<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:blogger="http://schemas.google.com/blogger/2008" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772</atom:id><lastBuildDate>Tue, 20 Feb 2024 20:29:43 +0000</lastBuildDate><category>धर्म यात्रा</category><title>ॐ जिन्दगी मेरे साथ</title><description>साधारण महिलाओं की उपलब्धियों के जगमगाते तारे/
प्रेरणास्रोत के रूप में नारी की भूमिका को सदैव ही स्वीकार किया जाता है। नारी निराशा में आशा का संचार करती है। वह कभी श्रद्धा बनकर जीवन से निराश मनु के मन में नवचेतना भरती है, कभी विद्योत्तमा बनकर मूर्ख कालिदास की प्रेरणा बनती है.</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (Anonymous)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>11</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><language>en-us</language><itunes:explicit>no</itunes:explicit><copyright>dont copy all right reserve</copyright><itunes:keywords>आसमां,होगा,मुट्ठी,में</itunes:keywords><itunes:summary>साधारण महिलाओं की उपलब्धियों के जगमगाते तारे/ प्रेरणास्रोत के रूप में नारी की भूमिका को सदैव ही स्वीकार किया जाता है। नारी निराशा में आशा का संचार करती है। वह कभी श्रद्धा बनकर जीवन से निराश मनु के मन में नवचेतना भरती है, कभी विद्योत्तमा बनकर मूर्ख कालिदास की प्रेरणा बनती है.</itunes:summary><itunes:subtitle>आसमां होगा मुट्ठी में</itunes:subtitle><itunes:category text="Religion &amp; Spirituality"><itunes:category text="Buddhism"/></itunes:category><itunes:author>alka</itunes:author><itunes:owner><itunes:email>goelalka1408@gmail.com</itunes:email><itunes:name>alka</itunes:name></itunes:owner><xhtml:meta content="noindex" name="robots" xmlns:xhtml="http://www.w3.org/1999/xhtml"/><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-8854142741403275013</guid><pubDate>Wed, 12 Dec 2012 20:12:00 +0000</pubDate><atom:updated>2012-12-11T21:55:21.184-08:00</atom:updated><title/><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;
&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiWDCE21cE3sBlpPVguXGNLRUNtOAg2UrivnyEpl21t1wDJN-gTTMyaCfYfRfG-WhfOE2nqbQKzhT_N04NvYR8S8ayK-2kiosL2PeRt1xpymlrGVs49gRE3OJsGiy5-KkuIinjf0VADGDQ8/s1600/297683_10152305294780375_197658465_n.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiWDCE21cE3sBlpPVguXGNLRUNtOAg2UrivnyEpl21t1wDJN-gTTMyaCfYfRfG-WhfOE2nqbQKzhT_N04NvYR8S8ayK-2kiosL2PeRt1xpymlrGVs49gRE3OJsGiy5-KkuIinjf0VADGDQ8/s320/297683_10152305294780375_197658465_n.jpg" width="247" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;h2 style="color: #fff2cc; text-align: center;"&gt;
&lt;b&gt;&lt;span class="short_text" id="result_box" lang="hi"&gt;&lt;span class=""&gt;जय श्री कृष्ण&lt;/span&gt; &lt;span class="hps"&gt;...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/2012/12/blog-post.html</link><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiWDCE21cE3sBlpPVguXGNLRUNtOAg2UrivnyEpl21t1wDJN-gTTMyaCfYfRfG-WhfOE2nqbQKzhT_N04NvYR8S8ayK-2kiosL2PeRt1xpymlrGVs49gRE3OJsGiy5-KkuIinjf0VADGDQ8/s72-c/297683_10152305294780375_197658465_n.jpg" width="72"/><thr:total>0</thr:total><author>goelalka1408@gmail.com (alka)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-5046340818467091527</guid><pubDate>Wed, 02 Dec 2009 09:26:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-12-02T01:26:00.253-08:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धर्म यात्रा</category><title>प्राणि-सेवा ही परमात्मा की सेवा है</title><description>ईश्वर निराकार है; उसकी सेवा नहीं की जा सकती । किन्तु वह संसार के प्राणियों में अधिक व्यक्त है । अत: जो प्राणि-सेवारत है वह वास्तव में परमात्मा की सेवा ही करता है ।</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/2009/12/blog-post.html</link><thr:total>0</thr:total><author>goelalka1408@gmail.com (alka)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-2873698614399578824</guid><pubDate>Mon, 02 Nov 2009 09:23:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-02T01:23:00.080-08:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धर्म यात्रा</category><title>परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम्</title><description>दूसरों का उपकार करना ही पुण्य है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; दूसरों   को   सताना   ही   पाप  है ।</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/2009/11/blog-post.html</link><thr:total>0</thr:total><author>goelalka1408@gmail.com (alka)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-2920016263430000079</guid><pubDate>Fri, 02 Oct 2009 08:14:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-02T01:14:00.116-07:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धर्म यात्रा</category><title>क्रिया की प्रतिक्रिया होती है</title><description>हिन्दू धर्म कहता है कि यदि आप दूसरों को सुख देने का यत्न करेंगें तो प्रतिक्रिया स्वरूप आपको भी सुख प्राप्त होगा । यदि आप दूसरों को दु:ख देंगे तो आपको भी दु:ख मिलकर रहेगा । किये गये पापों से मुक्त होने का एक ही उपाय है, अधिक से अधिक पुण्य का अर्जन कीजिए । दुष्कर्मों के परिणाम भोगने से बचने का एक ही उपाय है कि अधिक से अधिक सुकर्म कीजिए । हम जो भी शुभाशुभ कर्म करते है उसका अनजान में मन पर प्रभाव पड़ता है और वह हमारा संस्कार बन जाता है । कुसंस्कार हमें अकल्याणकर और पाप-कर्म की ओर प्रेरित करता है और सुसंस्कार हमें कल्याणकर और पुण्य कर्मों की ओर ले जाता है । दुष्कर्म का जितना अधिक संचय होगा, एक दिन उसकी प्रतिक्रिया उतनी ही भयंकर होगी । एक गुण्डे, आतंकवादी या तस्कर का दूसरे गुण्डे या आतंकवादी द्वारा मारा जाना क्रिया की प्रतिक्रिया को ही दर्शाता है ।</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/2009/10/blog-post.html</link><thr:total>0</thr:total><author>goelalka1408@gmail.com (alka)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-6186372080145566596</guid><pubDate>Wed, 02 Sep 2009 08:11:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-02T01:11:00.439-07:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धर्म यात्रा</category><title>हिन्दुओं में कोई पैगम्बर नहीं है</title><description>ईसामसीह ईसाई धर्म के प्रवर्तक हैं । हजरत मुहम्मद इस्लाम के पैगम्बर माने जाते हैं । किन्तु हिन्दुत्व का न तो कोई प्रवर्तक है और न ही पैगम्बर । हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें विभिन्न मतों के सह-अस्तित्व पर बल दिया गया है । किसी को किसी एक पुस्तक में लिखी बातों पर ही विश्वास कर लेने के लिए विवश नहीं किया गया है । हिन्दू धर्म में फतवा जारी करने की कोई व्यवस्था नहीं है । यह उदारता और सहनशीलता पर आधारित धर्म है ।</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/2009/09/blog-post_02.html</link><thr:total>0</thr:total><author>goelalka1408@gmail.com (alka)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-6542242100425209886</guid><pubDate>Sun, 02 Aug 2009 08:09:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-08-02T01:09:00.625-07:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धर्म यात्रा</category><title>हिन्दुत्व का लक्ष्य स्वर्ग-नरक से ऊपर है</title><description>कुछ पंथ या मजहब कहते हैं कि ईश्वर से डरोगे, संयम रखोगे तो मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा और सरकशी का जीवन बिताओगे तो नरक मिलेगा । स्वर्ग में सुन्दर स्त्री मिलती है; मनचाहे भोजन का, सुगन्धित वायु का और कर्णप्रिय संगीत का आनंद मिलता है; नेत्रों को प्रिय लगने वाले दर्शनीय स्थल होते हैं अर्थात् पांचों ज्ञानेन्द्रियों को परम तृप्ति जहाँ मिले वहीं स्वर्ग है । नरक में यातनाएँ मिलती हैं पुलिसिया अंदाज में; जैसे अपराधी से उसका अपराध कबूल करवाने या सच उगलवाने के लिए व्यक्ति को उल्टा लटका देना, बर्फ की सिल्लियों पर लिटा देना आदि या आतंकवादियों, डकैतों और तस्करों के कुकृत्य की तरह जो शारीरिक और मानसिक यातना देने की सारी सीमाएँ तोड़ देते हैं । नरक में इससे अधिक कुछ नहीं है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वर्ग के जो सुख बताये गये हैं, उन सुखों को विलासी राजाओं और बादशाहों ने इस धरती पर ही प्राप्त कर लिया । और नरक की जो स्थिति बतायी गयी है, मजहब और पंथ के नाम पर आतंकवादी इस धरती को ही नरक बना रहें हैं । नरक का भय दिखाकर तो हम ईश्वर को सबसे बड़ा आतंकवादी ही साबित करेंगे । वस्तुत: ईश्वर को स्वर्ग के सुख या नारकीय यातना से जोड़ने का कोई सर्वस्वीकार्य कारण उपलब्ध नहीं है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दू धर्म में जो संकेत मिलते हैं उसके अनुसार स्वर्ग और नरक यहीं हैं । हमारे शरीर एवं इन्द्रियों की क्षमताएँ सीमित हैं । हम अत्यधिक विषयासक्ति के दुष्परिणामों से बच नहीं सकते । किन्तु हिन्दू समाज में भी स्वर्ग और नरक के लोकों के अन्यत्र स्थित होने को मान्यता दी गयी है । यदि हम इसे सही मान लें तो जिन लोगों ने नेक काम किये हैं उन्हें स्वर्ग में और जिन लोगों ने बुरे काम किये हैं उन्हें नरक में होना चाहिए । चाहे सुख हो या यातना दोनों को शरीर के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है । इस स्थिति में स्वर्ग की आबादी तो बहुत बढ़ जानी चाहिए । अप्सराओं की संख्या तो सीमित है; वे कितने लोगों का मन बहलाती होंगी? वस्तुत: यह धरती ही स्वर्ग है, यह धरती ही नरक है । इस धरती को नरक बनने से रोकने और स्वर्ग में बदलने का उत्तरदायित्व हमारा है । यह कार्य सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना और सामूहिक प्रयास से ही सम्भव है । इसीलिए धर्म की आवश्यकता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दुत्व कहता है कि यदि हमने सत्कर्म किये हैं और हमें लगता है कि पूर्ण कर्म-फल नहीं मिला तो हमारा पुनर्जन्म हो सकता है - अतृप्त कामना की पूर्ति के लिए । और यदि हमने दुष्कर्म कियें हैं तो कर्म-फल भोगने के लिए हमारा पुनर्जन्म होगा । किन्तु यदि संसार से हमारा मोह-भंग हो जाता है, कर्मों में आसक्ति समाप्त हो जाती है, कोई कामना शेष नहीं रहती या ईश्वर में असीम श्रद्धा और भक्ति के कारण ईश्वर को पाने की इच्छा ही शेष रहती है तो हम पुनर्जन्म सहित सभी बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं, मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं । इस प्रकार हिन्दुत्व का परम लक्ष्य स्वर्ग-प्राप्ति न होकर मोक्ष की प्राप्ति है ।</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/2009/08/blog-post.html</link><thr:total>0</thr:total><author>goelalka1408@gmail.com (alka)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-4069596496607469355</guid><pubDate>Thu, 02 Jul 2009 08:07:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-07-02T01:07:00.530-07:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धर्म यात्रा</category><title>ईश्वर से डरें नहीं, प्रेम करें और प्रेरणा लें</title><description>हिन्दुत्व कहता है कि ईश्वर हमारा परमपिता है, हम उसकी संतान हैं । वही बच्चा अपने माता-पिता से डरता है जो गलत काम करता है या उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करता है । ईश्वर की इच्छा क्या हो सकती है? अपनी सृष्टि को बनाये रखना ही उसकी इच्छा है । वह पालनकर्ता है, हम भी किसी न किसी के पालन-पोषण में सहायक बनें । अपनी स्त्री और संतान का उचित लालन-पालन भी उत्तम कार्य है । वह दयालु है, हम भी दया दिखायें । वह समदर्शी है, हम भी यथासम्भव समानता एवं न्याय को जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान दें । यह प्रकृति ही ईश्वर का शरीर है । प्रकृति से प्रेम ईश्वर से प्रेम करने के समान ही है । हम ईश्वर और उसकी प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करें ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईश्वर न तो चाटुकारिता से प्रसन्न होता है, न ही बलि से और न ही धन और रुपया-दान से । हम अकर्मण्य रहकर राम-राम जपते रहें और चाहें कि हमारी चाटुकारिता से प्रसन्न होकर ईश्वर हमें सारे सुख-साधन उपलब्ध करा दे तो यह हमारी भूल है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पशु-पक्षियों की बलि से ईश्वरीय न्याय में बाधा पहुँचती है । हिंस्र पशु भी अकारण शिकार नहीं करते । ईश्वर या किसी देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए यदि किसी को बलि देना है तो उसे अपने अहं की बलि देना चाहिए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्त धन-सम्‍पत्ति का अनन्त काल का स्वामित्व ईश्वर का ही है, अत: धन-सम्‍पत्ति से उसे नहीं रिझाया जा सकता । धन-सम्‍पत्ति का दान पुजारियों के भरण-पोषण एवं मन्दिरों के अनुरक्षण के लिए किया जाता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ-जहाँ राजतंत्र है, प्रत्येक राजकुमार स्वयं को शासन एवं राज-काज संचालन के योग्य मानता है । ऐसा ही भाव प्रत्येक व्यक्ति को रखकर यह समझना चाहिए कि वह भी परमपिता परमेश्वर की संतान है । इस प्रकार लोकतंत्र में वह हीनभावना से मुक्त होकर अपनी क्षमता के अनुसार अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईश्वर में विश्वास भय से मुक्त करता है । ईश्वर में अति विश्वास और अपार श्रद्धा से मृत्यु के भय से भी मुक्ति मिलती है । जल की एक बूँद को महासागर से क्या भय; महासागर में गिरकर बूँद का अस्तित्व महासागर में विलीन हो जायेगा । बूँद भी महासागर बन जायेगी । हिन्दुत्व का सर्वोच्च विचार प्रलय से भी भयभीत नहीं है क्योंकि उस समय कर्मफल से सबको मुक्ति मिल जाती है । कयामत के समय किसी से पुण्य-पाप का हिसाब नहीं लिया जाता । स्वर्ग नरक का अस्तित्व नहीं है । अत: किसी को इन स्थानों पर भेजे जाने का प्रश्न ही नहीं उठता । प्रलय के समय सभी मुक्त होकर ब्रह्ममय हो जाते हैं ।</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/2009/07/blog-post.html</link><thr:total>0</thr:total><author>goelalka1408@gmail.com (alka)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-4965827726176865897</guid><pubDate>Tue, 02 Jun 2009 08:05:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-06-02T01:05:00.748-07:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धर्म यात्रा</category><title>ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है</title><description>ब्रह्माण्ड का जो भी स्वरूप है वही ब्रह्म का रूप या शरीर है । वह अनादि है, अनन्त है । जैसे प्राण का शरीर में निवास है वैसे ही ब्रह्म का अपने शरीर या ब्रह्माण्ड में निवास है । वह कण-कण में व्याप्त है, अक्षर है, अविनाशी है, अगम है, अगोचर है, शाश्वत है । ब्रह्म के प्रकट होने के चार स्तर हैं - ब्रह्म, ईश्वर, हिरण्यगर्भ एवं विराट (विराज) । भौतिक संसार विराट है, बुद्धि का संसार हिरण्यगर्भ है, मन का संसार ईश्वर है तथा सर्वव्यापी चेतना का संसार ब्रह्म है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ अर्थात् ब्रह्म सत्य और अनन्त ज्ञान-स्वरूप है । इस विश्वातीत रूप में वह उपाधियों से रहित होकर निर्गुण ब्रह्म या परब्रह्म कहलाता है । जब हम जगत् को सत्य मानकर ब्रह्म को सृष्टिकर्ता, पालक, संहारक, सर्वज्ञ आदि औपाधिक गुणों से संबोधित करते हैं तो वह सगुण ब्रह्म या ईश्वर कहलाता है । इसी विश्वगत रूप में वह उपास्य है । ब्रह्म के व्यक्त स्वरूप (माया या सृष्टि) में बीजावस्था को हिरण्यगर्भ (सूत्रात्मा) कहते हैं । आधार ब्रह्म के इस रूप का अर्थ है सकल सूक्ष्म विषयों की समष्टि । जब माया स्थूल रूप में अर्थात् दृश्यमान विषयों में अभिव्यक्त होती है तब आधार ब्रह्म वैश्वानर या विराट कहलाता है ।</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/2009/06/blog-post.html</link><thr:total>1</thr:total><author>goelalka1408@gmail.com (alka)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-6117174621191544384</guid><pubDate>Sat, 23 May 2009 08:30:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-05-23T01:30:23.408-07:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धर्म यात्रा</category><title>हिन्‍दुत्‍व अथवा हिन्‍दू धर्म</title><description>हिन्दुत्व को प्राचीन काल में सनातन धर्म कहा जाता था। हिन्दुओं के धर्म के मूल तत्त्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि हैं जिनका शाश्वत महत्त्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था। इस प्रकार हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। मान्य ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है प्रत्येक वस्तु या विचार का गहन मूल्यांकन कर रहा है और इस प्रक्रिया में अनेक विश्वास, मत, आस्था और सिद्धान्त धराशायी हो रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आघातों से हिन्दुत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके मौलिक सिद्धान्तों का तार्किक आधार तथा शाश्वत प्रभाव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्य समाज जैसे कुछ संगठनों ने हिन्दुत्व को आर्य धर्म कहा है और वे चाहते हैं कि हिन्दुओं को आर्य कहा जाय। वस्तुत: 'आर्य' शब्द किसी प्रजाति का द्योतक नहीं है। इसका अर्थ केवल श्रेष्ठ है और बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य की व्याख्या करते समय भी यही अर्थ ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ उदात्त अथवा श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। वस्तुत: प्राचीन संस्कृत और पालि ग्रन्थों में हिन्दू नाम कहीं भी नहीं मिलता। यह माना जाता है कि परस्य (ईरान) देश के निवासी 'सिन्धु' नदी को 'हिन्दु' कहते थे क्योंकि वे 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। धीरे-धीरे वे सिन्धु पार के निवासियों को हिन्दू कहने लगे। भारत से बाहर 'हिन्दू' शब्द का उल्लेख 'अवेस्ता' में मिलता है। विनोबा जी के अनुसार हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा-प्रियता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अन्य श्लोक में कहा गया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ॐकार जिसका मूलमंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है, तथा हिंसा की जो निन्दा करता है, वह हिन्दू है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीनी यात्री हुएनसाग् के समय में हिन्दू शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि हिन्दू' शब्द इन्दु' जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है से बना है। चीन में भी इन्दु' को इन्तु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व देते हैं। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिन्दु' कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही 'हिन्दू' शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम मुसलमानों की देन नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत भूमि में अनेक ऋषि, सन्त और द्रष्टा उत्पन्न हुए हैं। उनके द्वारा प्रकट किये गये विचार जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। कभी उनके विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं और कभी परस्पर विरोधी। हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों में विविधता है किन्तु नदियों की गति की तरह इनमें निरन्तरता है तथा समुद्र में मिलने की उत्कण्ठा की तरह आनन्द और मोक्ष का परम लक्ष्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता है।</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/2009/05/blog-post_6825.html</link><thr:total>0</thr:total><author>goelalka1408@gmail.com (alka)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-2733470396545504341</guid><pubDate>Sat, 23 May 2009 07:59:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-05-23T01:00:21.806-07:00</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धर्म यात्रा</category><title>ईश्वर एक नाम अनेक</title><description>ऋग्वेद कहता है कि ईश्वर एक है किन्तु दृष्टिभेद से मनीषियों ने उसे भिन्न-भिन्न नाम दे रखा है   । जैसे एक ही व्यक्ति दृष्टिभेद के कारण परिवार के लोगों द्वारा पिता,   भाई,   चाचा,   मामा,   फूफा,   दादा,   बहनोई,   भतीजा,   पुत्र,   भांजा,   पोता,   नाती आदि नामों से संबोधित होता है,   वैसे ही ईश्वर भी भिन्न-भिन्न कर्ताभाव के कारण अनेक नाम वाला हो जाता है   । यथा-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह सृष्टिकर्ता है वह ब्रह्मा कहलाता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह विद्या का सागर है उसका नाम सरस्वती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह सर्वत्र व्याप्त है या जगत को धारण करने वाला है उसका नाम विष्णु है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह समस्त धन-सम्पत्ति और वैभव का स्वामी है उसका नाम लक्ष्मी है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह संहारकर्ता है उसका नाम रुद्र है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह कल्याण करने वाला है उसका नाम शिव है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह समस्त शक्ति का स्वामी है उसका नाम पार्वती है, दुर्गा है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप मे वह सबका काल है उसका नाम काली है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप मे वह सामूहिक बुद्धि का परिचायक है उसका नाम गणेश है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह पराक्रम का भण्डार है उसका नाम स्कंद है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह आनन्ददाता है, मनोहारी है उसका नाम राम है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह धरती को शस्य से भरपूर करने वाला है उसका नाम सीता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह सबको आकृष्ट करने वाला है, अभिभूत करने वाला है उसका नाम कृष्ण है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रूप में वह सबको प्रसन्न करने, सम्पन्न करने और सफलता दिलाने वाला है उसका नाम राधा है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग अपनी रुचि के अनुसार ईश्वर के किसी नाम की पूजा करते हैं । एक विद्यार्थी सरस्वती का पुजारी बन जाता है, सेठ-साहूकार को लक्ष्मी प्यारी लगती है । शक्ति के उपासक की दुर्गा में आस्था बनती है । शैव को शिव और वैष्णव को विष्णु नाम प्यारा लगता है । वैसे सभी नामों को हिन्दू श्रद्धा की दृष्टि से स्मरण करता है ।</description><link>http://alkagoel14.blogspot.com/2009/05/blog-post_23.html</link><author>goelalka1408@gmail.com (alka)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6083218535736686772.post-8349161862176850512</guid><pubDate>Tue, 05 Aug 2008 11:12:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-05T04:32:40.948-07:00</atom:updated><title/><description>&lt;td height="89" width="496" colspan="3"&gt;    &lt;a href="http://flickr.com/photos/8806829@N07/"&gt;    &lt;img src="http://bighugelabs.com/flickr/profilewidget/randomint.explore/000000/ffa2ce/8806829@N07.jpg" border="0" alt="alkagoel1408. 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