<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-61144145464550921</id><updated>2026-08-11T20:13:35.568+05:30</updated><category term="सम्पूर्ण महाभारत कथा"/><category term="शान्ति पर्व (महाभारत)"/><category term="शिव पुराण"/><category term="पुराणों की कथाएँ"/><category term="श्रीमद्भागवत महापुराण"/><category term="वन पर्व (महाभारत)"/><category term="अनुशासन पर्व (महाभारत)"/><category term="आदि पर्व (महाभारत)"/><category term="विष्णु पुराण"/><category term="द्रोण पर्व (महाभारत)"/><category term="उद्योग पर्व (महाभारत)"/><category term="श्रीरुद्र संहिता (शिव पुराण)"/><category term="भीष्म पर्व 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term="धर्म"/><category term="पाण्डवप्रवेश पर्व"/><category term="भक्त की कथा"/><category term="वेद व उपवेद"/><category term="शिक्षाप्रद कथा"/><category term="शिव चालीसा"/><category term="शिव पुराणमाहात्म्य"/><category term="श्रीमद्भागवत माहात्म्य"/><title type='text'>BHAKT or BHAGWAN (भक्त और भगवान)</title><subtitle type='html'>BHAKT or BHAGWAN (भक्त और भगवान) के माध्यम से हिन्दू धर्म के प्रमुख गर्न्थो जैसे  शिव पुराण , विष्णु पुराण , गरुड़ पुराण , देवी पुराण , मार्कण्डेय पुराण, लिंगपुराण, महापुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण, महाभारत आदि माह गर्न्थो की कथाएँ आप लोगो तक पहुचाना हमारा मकसद ,, धन्यवाद</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default?redirect=false'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/'/><link rel='hub' 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href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ पैतालीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय के श्लोक संख्या अज्ञात&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोका वर्णन”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पार्वतीने पूछा--भगवन्‌! मनुष्य किस प्रकारके शील, कैसे सदाचार और किन कर्मोसे युक्त होकर अथवा किस दानके द्वारा स्वर्गमें जाता है ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य ब्राह्मणोंका सम्मान और दान करता है दीन, दुःखी और दरिद्र आदि मनुष्योंको भक्ष्य-भोज्य, अन्न-पान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरनेके स्थान, धर्मशाला, कुआँ, प्याऊ, पोखरी या बावड़ी आदि बनवाता है, लेनेवाले लोगोंकी इच्छा पूछ-पूछकर नित्य देनेयोग्य वस्तुएँ दान करता है, समस्त नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन, धान्य, गौ, खेत और कन्याओंका प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, देवि! ऐसा मनुष्य देवलोकमें जन्म लेता है || २--५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ चिरकालतक निवास करके उत्तम भोगोंका भोग करते हुए नन्‍्दन आदि वनोंमें अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रमण करता है ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! फिर वह स्वर्गलोकसे नीचे आनेपर मनुष्य-जातिके भीतर महान्‌ भोगोंसे सम्पन्न कुलमें जन्म लेता है और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मानवयोनिमें वह समस्त कमनीय गुणोंसे सम्पन्न एवं प्रसन्न होता है। उसके पास महान्‌ भोगसामग्री संचित रहती है। उसका खजाना भी विशाल होता है। वह मनुष्य सभी दृष्टियोंसे धनवान्‌ होता है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! ये दानशील प्राणी ही ऐसे महान्‌ सौभाग्यसे सम्पन्न होते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इनका ऐसा ही परिचय दिया है। दाता मनुष्य सभीकी दृष्टि में प्रिय होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! दूसरे बहुत-से मनुष्य दान देनेमें कृपण होते हैं। वे मन्दबुद्धि मानव ब्राह्मणोंके माँगनेपर अपने पास धन होते हुए भी उन्हें कुछ नहीं देते || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे दीनों, अन्धों, दरिद्रों, भिखमंगों और अतिथियोंको देखते ही हट जाते हैं। उनके याचना करनेपर भी जिह्वाकी लोलुपताके कारण उन्हें अन्न नहीं देते || ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेन धन, न वस्त्र, न भोग, न सुवर्ण, न गौ और न अन्नकी बनी हुई नाना प्रकारकी खाद्य वस्तुओंका कभी दान करते हैं || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! ऐसे अकर्मण्य, लोभी, नास्तिक तथा दानधर्मसे दूर रहनेवाले बुद्धिहीन मनुष्य नरकमें पड़ते हैं ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि कालचक्रके फेरसे वे मन्दबुद्धि मानव पुनः मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं तो निर्धन कुलमें ही उत्पन्न होते हैं || १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ सदा भूख-प्यासका कष्ट सहते हैं। सब लोग उन्हें समाजसे बाहर कर देते हैं तथा वे सब प्रकारके भोगोंसे निराश होकर पापाचारसे जीविका चलाते हैं || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! इस पापकर्मसे ही मनुष्य अल्प भोगवाले कुलमें जन्म लेता है, थोड़े-से ही भोग भोगते और सदा निर्धन रहते हैं || १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनके सिवा दूसरे भी ऐसे मनुष्य हैं, जो सदा गर्व और अभिमानमें फूले तथा पापमें रत रहते हैं। वे मूर्ख आसन देनेयोग्य पूज्य पुरुषको बैठनेके लिये कोई पीढ़ा या चौकीतक नहीं देते हैं ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे बुद्धिहीन अथवा मन्दबुद्धि पुरुष मार्ग देनेयोग्य पुरुषोंको जानेके लिये मार्ग नहीं देते और पाद्य अर्पण करनेयोग्य पूजनीय पुरुषोंको पाद्य (पैर धोनेके लिये जल) नहीं देते हैं ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इतना ही नहीं, वे अर्घ्य देनेयोग्य माननीय व्यक्तियोंका नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा विधिपूर्वक पूजन नहीं करते अथवा वे मूर्ख उन्हें अर््ध या आचमनीय नहीं देते हैं || १९&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुरुके आनेपर प्रेमपूर्वक उनकी पूजा नहीं करते--उन्हें गुरुवत्‌ सम्मान नहीं देना चाहते, अभिमान और लोभके वशीभूत होकर वे सम्माननीय मनुष्योंका अपमान और बड़ेबूढ़ोंका तिरस्कार करते हैं। देवि! ऐसा करनेवाले सभी मनुष्य नरकगामी होते हैं ।। २०-२१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बहुत वर्षोके बाद जब वे उस नरकसे छुटकारा पाते हैं तो श्वपाक और पुल्कस आदि निन्दित और मूढ़ मनुष्योंके कुत्सित कुलमें जन्म लेते हैं। गुरुजनों और वृद्धोंका तिरस्कार करनेवाले वे अधम मानव चाण्डालोंके उन्हीं निन्दित कुलोंमें उत्पन्न होते हैं ।। २२-२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! जो न तो उद्दण्ड है, न अभिमानी है तथा जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करता है, संसारके लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ोंको प्रणाम करनेवाला, विनयी, मीठे वचन बोलनेवाला, सब वर्णोका प्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेवाला है, जिसका किसीके साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है, जो सदा स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा सबका यथायोग्य सत्कारपूर्वक पूजन करता रहता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुषोंको मार्ग देता और गुरुका उसके योग्य समादर करता है, अतिथियोंको आमन्त्रित करके उनकी सेवामें लगा रहता तथा स्वयं आये हुए अतिथियोंका भी पूजन करता है, ऐसा मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। तत्पश्चात्‌ मानव-योनिमें आकर विशिष्ट कुलमें जन्म लेता है । २४--२८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस जन्ममें वह महान्‌ भोगों और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न हो सुयोग्य ब्राह्मणोंको यथायोग्य दान देता और धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहता है ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ सब प्राणी उसका सम्मान करते हैं और सब लोग उसके सामने नतमस्तक होते हैं। इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मोका फल सदा स्वयं ही भोगता है ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मात्मा मनुष्य सर्वदा उत्तम कुल, उत्तम जाति और उत्तम स्थानमें जन्म धारण करता है। यह साक्षात्‌ ब्रह्माजीके बताये हुए धर्मका मैंने वर्णन किया है ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शोभने! जिस मनुष्यका आचरण क्रूरतासे भरा हुआ है, जिससे समस्त जीवोंको भय प्राप्त होता है, जो हाथ, पैर, रस्सी, डंडे और ढेलेसे मारकर, खम्भोंमें बाँधकर तथा घातक शस्त्रोंका प्रहार करके जीव-जन्तुओंको सताता है, छल-कपटमें प्रवीण होकर हिंसाके लिये उन जीवोंमें उद्बेग पैदा करता है तथा उद्वेगजनक होकर सदा उन जन्तुओंपर आक्रमण करता है, ऐसे स्वभाव और आचारवाले मनुष्यको नरकमें गिरना पड़ता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि वह कालचक्रके फेरसे फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो अनेक प्रकारकी विघ्नबाधाओंसे कष्ट उठानेवाले अधम कुलमें उत्पन्न होता है || ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! ऐसा मनुष्य अपने ही किये हुए कर्मोके फलके अनुसार मनुष्योंमें तथा जाति-बन्धुओंमें नीच समझा जाता है और सब लोग उससे द्वेष रखते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, जो हाथ-पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे, ढेले और घातक अस्त्र-शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है || ३७--४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर पुण्यकर्मोंके क्षीण होनेपर यदि वह मृत्यु-लोकमें जन्म लेता है, तो उसके ऊपर बाधाओंका आक्रमण कम होता है। वह निर्भय हो सुखसे अपनी उन्नति करता है। सुखका भागी होकर आयास और उद्वेगसे रहित जीवन व्यतीत करता है। देवि! यह सत्पुरुषोंका मार्ग है, जहाँ किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा नहीं आने पाती है || ४१-४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पार्वतीजीने पूछा--भगवन्‌! इन मनुष्योंमेंसे कुछ तो ऊहापोहमें कुशल, ज्ञानविज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान्‌ और अर्थनिषुण देखे जाते हैं || ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देव! कुछ दूसरे मानव ज्ञान-विज्ञानसे शून्य और दुर्बुद्धि दिखायी देते हैं। ऐसी दशामें मनुष्य कौन-सा विशेष कर्म करनेसे बुद्धिमान हो सकता है? ।। ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विरूपाक्ष! मनुष्य मन्दबुद्धि कैसे होता है? सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महादेव! आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये || ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देव! कुछ लोग जन्मान्ध, कुछ रोगसे पीड़ित और कितने ही नपुंसक देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।। ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहादेवजीने कहा--देवि! जो कुशल मनुष्य सिद्ध, वेदवेत्ता और धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे प्रतिदिन उनकी कुशल पूछते हैं और अशुभ कर्मका परित्याग करके शुभकर्मका सेवन करते हैं, वे परलोकमें स्वर्ग और इहलोकमें सदा सुख पाते हैं || ४७-४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसे आचरणवाला पुरुष यदि स्वर्गसे लौटकर फिर मनुष्ययोनिमें आता है तो वह मेधावी होता है। शास्त्र उसकी बुद्धिका अनुसरण करता है, अतः वह सदा कल्याणका भागी होता है ।। ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो परायी स्त्रियोंके प्रति सदा दोषभरी दृष्टि डालते हैं, उस दुष्ट स्वभावके कारण वे जन्मान्ध होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दूषित हृदयसे किसी नंगी स्त्रीकी ओर निहारते हैं, वे पापकर्मी मनुष्य इस लोकमें रोगसे पीड़ित होते हैं || ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दुराचारी, दुर्बुद्धि एवं मूढ़ मनुष्य पशु आदिकी योनिमें मैथुन करते हैं, वे पुरुषोंमें नपुंसक होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पशुओंकी हत्या कराते, गुरुकी शय्यापर सोते और वर्णसंकर जातिकी स्त्रियोंसे समागम करते हैं, वे मनुष्य नपुंसक होते हैं |। ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पार्वतीने पूछा--देवश्रेष्ठ] कौन सदोष कर्म हैं और कौन निर्दोष, कौन-सा कर्म करके मनुष्य कल्याणका भागी होता है? ।। ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--जो श्रेष्ठ मार्गको पानेकी इच्छा रखकर सदा ही ब्राह्मणोंसे उसके विषयमें पूछता है, धर्मका अन्वेषण करता और सदगुणोंकी अभिलाषा रखता है, वही स्वर्गलोकके सुखका अनुभव करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! ऐसा मनुष्य यदि कभी मानवयोनिको प्राप्त होता है तो वहाँ प्रायः मेधावी एवं धारण शक्तिसे सम्पन्न होता है ।। ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! यह सत्पुरुषोंका धर्म है, उसे कल्याणकारी मानना चाहिये। मैंने मनुष्योंके हितके लिये इस धर्मका तुम्हें भलीभाँति उपदेश किया है || ५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पार्वतीने पूछा--भगवन्‌! दूसरे बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं, जो अल्पबुद्धि होनेके कारण धर्मसे द्वेष करते हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके पास नहीं जाना चाहते हैं | ५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ मनुष्य व्रतधारी, श्रद्धालु और धर्मपरायण होते हैं तथा दूसरे व्रतहीन, नियमश्रष्ट तथा राक्षसोंके समान होते हैं || ५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कितने ही यज्ञशील होते हैं और दूसरे मनुष्य होम और यज्ञसे दूर ही रहते हैं। किस कर्मविपाकसे मनुष्य इस प्रकार परस्परविरोधी स्वभावके हो जाते हैं? यह मुझे बताइये ।। ६० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! शास्त्र लोकधर्मोकी उन मर्यादाओंको स्थापित करते हैं, जो सबके हितके लिये निर्मित हुई हैं। जो उन शास्त्रोंको प्रमाण मानते हैं, वे दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करते देखे जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मोहके वशीभूत होकर अधर्मको धर्म कहते हैं, वे व्रतहीन मर्यादाको नष्ट करनेवाले पुरुष ब्रह्मराक्षस कहे गये हैं || ६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे मनुष्य यदि कालयोगसे इस संसारमें मनुष्य होकर जन्म लेते हैं तो होम और वषट्कारसे रहित तथा नराधम होते हैं ।। ६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! यह धर्मका समुद्र, धर्मात्माओंके लिये प्रिय और पापात्माओंके लिये अप्रिय है। मैंने तुम्हारे संदेहका निवारण करनेके लिये यह सब विस्तारपूर्वक बताया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--देवदेव! त्रिलोचन! वृषभध्वज! भगवन्‌! महेश्वर! आपकी कृपासे मैंने पूर्वोक्त सब विषयोंको सुना है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुनकर आपके उस परम उत्तम उपदेशको मैंने बुद्धिके द्वारा ग्रहण किया है। इस समय मनुष्योंके विषयमें एक संदेह ऐसा रह गया है, जिसका समाधान आवश्यक है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्योंमें यह जो राजा दिखायी देता है, उसके भी प्राण, सिर और धड़ दूसरे मनुष्योंके समान ही हैं; फिर किस कर्मके फलसे यह सबमें प्रधान पद पानेका अधिकारी हुआ है?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह राजा नाना प्रकारके मनुष्योंको दण्ड देता और उन्हें डाँटता-फटकारता है। यह मृत्युके पश्चात्‌ कैसे पुण्यात्माओंके लोक पाता है? मानद! अतः मैं राजाके आचारव्यवहारका वर्णन सुनना चाहती हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--शुभानने! अब मैं तुम्हें राजधर्मकी बात बताऊँगा; क्योंकि जगत्‌का सारा शुभाशुभ आचार-व्यवहार राजाके ही अधीन है। देवि! राज्यको बहुत बड़ी तपस्याका फल माना गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राचीन कालकी बात है, सर्वत्र अराजकता फैली हुई थी। प्रजापर महान्‌ संकट आ गया। प्रजाकी यह संकटापन्न अवस्था देख ब्रह्माजीने मनुको राजसिंहासनपर बिठाया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तभीसे राजाओंका शुभाशुभ बर्ताव देखनेमें आया है। वरारोहे! राजाका जो आचरण जगत्‌के लिये हितकर और लाभदायक है, वह मुझसे सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस बर्तावके कारण वह मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गकका भागी हो सकता है, वही बता रहा हूँ। उसमें जैसा पराक्रम और जैसा यश होना चाहिये, वह भी सुनो। पिताकी ओरसे प्राप्त हुए अथवा और पहलेसे चले आते हुए अथवा स्वयं ही पराक्रमद्वारा प्राप्त करके वशमें किये हुए राज्यको राजा धर्मका आश्रय ले विधिपूर्वक उपभोगमें लाये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले अपने आपको ही विनयसे सम्पन्न करे। तत्पश्चात्‌ सेवकों और प्रजाओंको विनयकी शिक्षा दे। यही विनयका क्रम है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुभेक्षणे! राजाको ही आदर्श मानकर उसके आचरण सीखनेकी इच्छासे प्रजावर्गके लोग स्वयं भी विनयसे सम्पन्न होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो राजा स्वयं विनय सीखनेके पहले प्रजाको ही विनय सिखाता है, वह अपने दोषोंपर दृष्टि न डालनेके कारण उपहासका पात्र होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्याके अभ्यास और वृद्ध पुरुषोंके संगसे अपने आपको विनयशील बनाये। विद्या धर्म और अर्थरूप फल देनेवाली है। जो उस विद्याके ज्ञाता हैं, उन्हींको वृद्ध कहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! इसके बाद राजाको अपनी इन्द्रियोंपर विजय पाना चाहिये--यह बात बतायी गयी। इन्द्रियोंको काबूमें न रखनेसे जो महान्‌ दोष प्राप्त होता है, वह राजाको नीचे गिरा देता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पाँचों इन्द्रियोंको अपने अधीन करके उनके पाँचों विषयोंको सुखा डाले। ज्ञान और विनयके द्वारा आवश्यक प्रयत्न करके काम-क्रोध आदि छ: दोषोंको त्याग दे तथा शास्त्रीय दृष्टिका सहारा लेकर न्यायपरायण हो सेवकोंका संग्रह करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सदाचार, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुलसे सम्पन्न हों, जिनकी सचाई और ईमानदारीकी परीक्षा ले ली गयी हो, जो उस परीक्षामें उत्तीर्ण हुए हों, जिनके साथ बहुत-से जासूस हों और जो जितेन्द्रिय हों--ऐसे अमात्योंको यथायोग्य अपने कर्मोमें उनकी योग्यताके अनुसार नियुक्त करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बुद्धिमान्‌ मन्त्री, बहुजनप्रिय राष्ट्र, दुर्धर्ष श्रेष्ठ नगर या दुर्ग, कठिन अवसरोंपर काम देनेवाला कोष, सामनीतिके द्वारा राजामें अनुराग रखनेवाली सेना, दुविधेमें न पड़ा हुआ मित्र और विनयके तत्त्वको जाननेवाला राज्यका स्वामी--ये सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजाकी रक्षाके लिये ही यह सारा प्रबन्ध किया गया है। रक्षाकी हेतुभूत जो ये प्रकृतियाँ है, इनके सहयोगसे राजा लोकहितका सम्पादन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजाको प्रजाकी रक्षाके लिये ही अपनी रक्षा अभीष्ट होती है, अतः वह सदा सावधान होकर आत्मरक्षा करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनको वशमें रखनेवाला राजा भोजन-आच्छादन-स्नान, बाहर निकलना तथा सदा स्त्रियोंके समुदायसे संयोग रखना--इन सबसे अपनी रक्षा करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह मनको सदा अपने अधीन रखकर स्वजनोंसे, दूसरोंसे, शस्त्रसे, विषसे तथा स्त्रीपुत्रोंसे भी निरन्तर अपनी रक्षा करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आत्मवान्‌ राजा प्रजाकी रक्षाके लिये सभी स्थानोंसे अपनी रक्षा करे और सदा प्रजाके हितमें संलग्न रहे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजाका कार्य ही राजाका कार्य है, प्रजाका सुख ही उसका सुख है, प्रजाका प्रिय ही उसका प्रिय है तथा प्रजाके हितमें ही उसका अपना हित होता है। प्रजाके हितके लिये ही उसका सर्वस्व है, अपने लिये कुछ भी नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रकृतियोंकी रक्षाके लिये राग-द्वेष छोड़कर किसी विवादके निर्णयके लिये पहले दोनों पक्षोंकी यथार्थ बातें सुन ले। फिर अपनी बुद्धिके द्वारा स्वयं उस मामलेपर तबतक विचार करे, जबतक कि उसे यथार्थताका सुस्पष्ट ज्ञान न हो जाय ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्त्वको जाननेवाले अनेक श्रेष्ठ पुरुषोंक साथ बैठकर परामर्श करनेके बाद अपराधी, अपराध, देश, काल, न्याय और अन्यायका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त करके फिर शास्त्रके अनुसार राजा अपराधी मनुष्योंको दण्ड दे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पक्षपात छोड़कर ऐसा करनेवाला राजा धर्मका भागी होता है। प्रत्यक्ष देखकर, माननीय पुरुषोंके उपदेश सुनकर अथवा युक्तियुक्त अनुमान करके राजाको सदा ही अपने देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुप्तचरोंद्वारा और कार्यकी प्रवृत्तिसे देशके शुभाशुभ वृत्तान्तको जानकर उसपर विचार करे। तत्पश्चात्‌ अशुभका तत्काल निवारण करे और अपने लिये शुभका सेवन करे ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! राजा निन्दनीय मनुष्योंकी निन्‍दा ही करे, पूजनीय पुरुषोंका पूजन करे और दण्डनीय अपराधियोंको दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पाँच व्यक्तियोंकी अपेक्षा रखकर अर्थात्‌ पाँच मन्त्रियोंक साथ बैठकर सदा ही राजकार्यके विषयमें गुप्त मन्त्रणा करे। जो बुद्धिमान, कुलीन, सदाचारी और शास्त्रज्ञानसम्पन्न हों, उन्हींके साथ राजाको सदा मन्त्रणा करनी चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो इच्छानुसार राज्यकार्यसे विमुख हो जाते हों, ऐसे लोगोंके साथ मन्त्रणा करनेका विचार भी मनमें नहीं लाना चाहिये। राजाको राष्ट्रके हितका ध्यान रखकर सत्य-धर्मका पालन करना और कराना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुर्ग आदि तथा मनुष्योंकी देखभालके लिये राजा सम्पूर्ण उद्योग सदा स्वयं ही करे। वह देशकी उन्नति करनेवाले भृत्योंको सावधानीके साथ कार्यमें नियुक्त करे और देशको हानि पहुँचानेवाले समस्त अप्रियजनोंका परित्याग कर दे। जो राजाके आश्रित होकर जीविका चला रहे हों, ऐसे लोगोंकी देखभाल भी राजा प्रतिदिन स्वयं ही करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह प्रसन्नमुख और सबका परम प्रिय होकर लोगोंको जीविका दे, उनके साथ उत्तम बर्ताव करे। किसीसे पापपूर्ण, रूखा और तीखा वचन बोलना उसके लिये कदापि उचित नहीं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सत्पुरुषोंके बीचमें वह कभी ऐसी बात न कहे, जो विश्वासके योग्य न हो। प्रत्येक मनुष्यके गुणों और दोषोंको उसे अच्छी तरह समझना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सत्पुरुषोंके बीचमें वह कभी ऐसी बात न कहे, जो विश्वासके योग्य न हो। प्रत्येक मनुष्यके गुणों और दोषोंको उसे अच्छी तरह समझना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी चेष्टाको धैर्यपूर्वक छिपाये रखे। क्षुद्र बुद्धिका प्रदर्शन न करे अथवा मनमें क्षुद्र विचार न लाये। दूसरेकी चेष्टाको अच्छी तरह समझकर संसारमें उनके साथ सम्पर्क स्थापित करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजाको चाहिये कि वह अपने भयसे, दूसरोंके भयसे, पारस्परिक भयसे तथा अमानुष भयोंसे अपनी प्रजाको सुरक्षित रखे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लोभी, कठोर तथा डाका डालनेवाले मनुष्य हों, उन्हें जहाँ-तहाँसे पकड़वाकर राजा कैदमें डाल दे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजकुमारोंको जन्मसे ही विनयशील बनावे। उनमेंसे जो भी अपने अनुरूप गुणोंसे युक्त हो, उसे युवराजपदपर नियुक्त करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शोभने! एक क्षणके लिये भी बिना राजाका राज्य नहीं रहना चाहिये। अतः: अपने पीछे राजा होनेके लिये एक युवराजको नियत करना सदा ही आवश्यक है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुलीन पुरुषों, वैद्यों, श्रोत्रिय ब्राह्मणों, तपस्वी मुनियों तथा वृत्तियुक्त दूसरे पुरुषोंका भी राजा विशेष सत्कार करे। अपने लिये, राज्यके हितके लिये तथा कोष-संग्रहके लिये ऐसा करना आवश्यक है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नीतिज्ञ पुरुष अपने कोषको चार भागोंमें विभक्त करे--धर्मके लिये, पोष्य वर्गके पोषणके लिये, अपने लिये तथा देश-कालवश आनेवाली आपफत्तिके लिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजाको चाहिये कि अपने देशमें जो अनाथ, रोगी और वृद्ध हों, उनका स्वयं पोषण करे। संधि, विग्रह तथा अन्य नीतियोंका बुद्धिपूर्वक भलीभाँति विचार करके प्रयोग करे ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा सबका प्रिय होकर सदा अपने मण्डल [(देशके भिन्न-भिन्न भाग) में विचरे। शुभ कार्योमें भी वह अकेला कुछ न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने और दूसरोंसे संकटकी सम्भावनाका विचार करके द्वेष या लोभवश धार्मिक पुरुषोंके साथ सम्बन्धका त्याग न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजाका धर्म है रक्षणीयता और क्षत्रिय राजाका धर्म है रक्षा; अतः दुष्ट राजाओंसे पीड़ित हुई प्रजाकी सर्वत्र रक्षा करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सेनाको संकटोंसे बचावे, नीतिसे अथवा धन खर्च करके भी प्राय: युद्धको टाले। सैनिकों तथा प्रजाजनोंके प्राणोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही ऐसा करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनिवार्य कारण उपस्थित होनेपर ही युद्ध करना चाहिये, अपने या पराये दोषसे नहीं। उत्तम युद्धमें प्राण-विसर्जन करना वीर योद्धाके लिये धर्मकी प्राप्ति करानेवाला होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किसी बलवान शत्रुके आक्रमण करनेपर राजा उस आपत्तिसे बचनेका उपाय करे। प्रजाके हितके लिये समस्त विरोधियोंको अनुनय-विनयके द्वारा अनुकूल बना ले। देवि! यह संक्षेपसे राजधर्म बताया गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार बर्ताव करनेवाला राजा प्रजाको दण्ड देता और फटकारता हुआ भी जलसे लिप्त न होनेवाले कमलदलके समान पापसे अछूता ही रहता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस बर्तावसे रहनेवाले राजाकी जब मृत्यु होती है, तब वह स्वर्गलोकमें जाकर देवताओंके साथ आनन्द भोगता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(दाक्षिणात्यप्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;[योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा]&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ महेश्वर कहते हैं--राजा भाँति-भाँतिके भोग, वस्त्र और आभूषण देकर जिन लोगोंको अपनी सहायताके लिये बुलाता और रखता है, उनके साथ भोजन करके घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करता है और नाना प्रकारके सत्कारोंद्वारा उन्हें संतुष्ट करता है, ऐसे योद्धाओंको उचित है कि युद्ध छिड़ जानेपर सहायताके समय उस राजाके लिये शस्त्र उठावे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब घोर संग्राममें शूरवीर एक-दूसरेको मारते और मारे जाते हों, उस अवसरपर जो नराधम सैनिक पीठ देकर सेनानायककी इच्छा न होते हुए भी बिना घायल हुए ही युद्धसे मुँह मोड़ लेते हैं, वे सेनापतिके सम्पूर्ण पापोंको स्वयं ही ग्रहण कर लेते हैं और उन भगेड़ोंके पास जो कुछ भी पुण्य होता है, वह सेनानायकको प्राप्त हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अहिंसा परम धर्म है,&#39; ऐसी जिनकी मान्यता है, वे भी यदि राजाके सेवक हैं, उनसे भरण-पोषणकी सुविधा एवं भोजन पाते हैं, ऐसी दशामें भी वे अपनी शक्तिके अनुरूप संग्रामोंमें जूझते नहीं हैं तो घोर नरकमें पड़ते हैं; क्योंकि वे स्वामीके अन्नका अपहरण करनेवाले हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपने प्राणोंकी परवाह छोड़कर पतंगकी भाँति निर्भय हो हाथमें हथियार उठाये अग्निके समान विनाशकारी संग्राममें प्रवेश कर जाता है और योद्धाको मिलनेवाली निश्चित गतिको जानकर उत्साहपूर्वक जूझता है, वह स्वर्गलोकमें जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अत्यन्त घोर समरांगणमें मृगोंके झुडोंको संतप्त करनेवाले सिंहके समान शत्रुसैनिकोंको ताप देता हुआ अपने नायक (राजा या सेनापति) की रक्षा करता है, मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति रणक्षेत्रमें जिसकी ओर देखना शत्रुओंके लिये अत्यन्त कठिन हो जाता है तथा जो संग्राममें शस्त्र उठाये निर्दयतापूर्वक प्रहार करता है, वह शुद्धचित्त होकर उस युद्धके द्वारा ही मानो महान्‌ यज्ञका अनुष्ठान करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस समय कवच ही उसका काला मृगचर्म है, धनुष ही दाँतुन या दन्तकाष्ठ है, रथ ही वेदी है, ध्वज यूप है और रथकी रस्सियाँ ही बिछे हुए कुशोंका काम देती हैं। मान, दर्प और अहंकार--ये त्रिविध अग्नियाँ हैं, चाबुक, खुवा है, सारथि उपाध्याय है, खुकू-भाण्ड आदि जो कुछ भी यज्ञकी सामग्री है, उसके स्थानमें उस योद्धाके भिन्न-भिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं। सायकोंको ही समिधा माना गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस यशस्वी वीरके अंगोंसे जो पसीने ढलते हैं, वे ही मानो मधु हैं। मनुष्योंके मस्तक पुरोडाश हैं, रुधिर आहुति है, तृणीरोंको चरु समझना चाहिये। वसाको ही वसुधारा माना गया है, मांसभक्षी भूतोंके समुदाय ही उस यज्ञमें द्विज हैं। मारे गये मनुष्य, हाथी और घोड़े ही उनके भोजन और अन्नपान हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मारे गये योद्धाओंके जो वस्त्र, आभूषण और सुवर्ण हैं, वे ही मानो उस रणयज्ञकी दक्षिणा हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! जो संग्राममें हाथीकी पीठपर बैठा हुआ युद्धके मुहानेपर मारा जाता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रथके बीचमें बैठा हुआ या घोड़ेकी पीठपर चढ़ा हुआ जो वीर युद्धमें मारा जाता है, वह इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मारे गये योद्धा स्वर्गमें पूजित होते हैं; किन्तु मारनेवाला इसी लोकमें प्रशंसित होता है। अतः युद्धमें दोनों ही सुखी होते हैं--जो मारता है वह और जो मारा जाता है वह ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः संग्रामभूमिमें पहुँच जानेपर निर्भय होकर शत्रुपर प्रहार करना चाहिये। जो हथियार उठाकर संग्राममें निर्भय होकर प्रहार करता है, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ उस वीरको निस्संदेह सभी धर्म प्राप्त होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे महासागरमें सहस्रों नदियाँ आकर मिलती हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्म ही, यदि उसका हनन किया जाय तो मारता है और धर्म ही सुरक्षित होनेपर रक्षा करता है; अतः प्रत्येक मनुष्यको, विशेषत: राजाको धर्मका हनन नहीं करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहाँ राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है तथा जहाँ पितरों और देवताओंके साथ षट्कर्मपरायण ब्राह्मणोंकी पूजा होती है, उस देशमें न तो कभी अनावृष्टि होती है, न&amp;nbsp; रोगोंका आक्रमण होता है और न किसी तरहके उपद्रव ही होते हैं। राजाके स्वधर्म-परायण होनेपर वहाँकी सारी प्रजा धर्मशील होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! प्रजाको सदा ऐसे नरेशकी इच्छा रखनी चाहिये, जो सदाचारी तो हो ही, देशमें सब ओर गुप्तचर नियुक्त करके शत्रुओंके छिद्रोंकी जानकारी रखता हो। सदा ही प्रमादशून्य और प्रतापी हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुश्रोणि! पृथ्वीपर बहुत-से ऐसे क्षुद्र मनुष्य हैं, जो राजाओंका महान्‌ विनाश करनेपर तुले रहते हैं; अतः विद्वान्‌ राजाको कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये (आत्मरक्षाके लिये सदा सावधान रहना चाहिये।) ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहलेके छोड़े हुए मित्रोंपर, अन्यान्य मनुष्योंपर, हाथियोंपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। प्रतिदिनके स्नान और खानपानमें भी किसीका पूर्णतः विश्वास करना उचित नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो राष्ट्रके हितके लिये, गौ और ब्राह्मणोंके उपकारके लिये, किसीको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये और मित्रोंकी सहायताके निमित्त अपने दुस्त्यज प्राणोंका परित्याग कर देता है, वह राजाको प्रिय होता है और अपने कुलको उन्नतिके शिखरपर पहुँचा देता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वरारोहे! यदि कोई सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली कामधेनुको तथा पर्वत और वनोंसहित समुद्रपर्यन्त लोकधारिणी पृथ्वीको धनसे परिपूर्ण करके द्विजोंको दान कर देता है, उसका वह दान भी पूर्वोक्त प्राणत्यागी योद्धाके त्यागके समान नहीं है। वह प्राण-त्यागी ही उस दातासे बढ़कर है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके पास धन और सम्पत्ति है, वह सहस्रों यज्ञ कर सकता है। उसके उन यज्ञोंसे कौन-सी आश्वर्यकी बात हो गयी! प्राणोंका परित्याग करना तो सभीके लिये अत्यन्त दुष्कर है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः सम्पूर्ण यज्ञोंमें प्राणयज्ञ ही बढ़कर है। देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष रणयज्ञका यथार्थरूपसे वर्णन किया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;[संक्षेपसे राजधर्मका वर्णन]&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहादेवजी कहते हैं--देवि! राजाओंको अपने सेवकोंके साथ हास-परिहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे उन्हें लघुता प्राप्त होती है और उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहादेवजी कहते हैं--देवि! राजाओंको अपने सेवकोंके साथ हास-परिहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे उन्हें लघुता प्राप्त होती है और उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सेवकोंके साथ हँसी-परिहास करनेसे राजाका तिरस्कार होता है। वे धृष्ट सेवक न माँगने योग्य वस्तुओंको भी माँग बैठते हैं और न कहने योग्य बातें भी कह डालते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहलेसे ही उचित लाभ मिलनेपर भी वे संतुष्ट नहीं होते; इसलिये राजा सेवकोंके साथ हँसी-मजाक करना छोड़ दे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा अविश्वस्त पुरुषपर कभी विश्वास न करे। जो विश्वस्त हो, उसपर भी पूरा विश्वास न करे; विशेषतः अपने समान गोत्रवाले भाई-बन्धुओंपर किसी भी उपायसे कदापि विश्वास न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे वज्र वृक्षको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय राजाको नष्ट कर डालता है। प्रमादवश लोभके वशीभूत हुआ राजा मारा जाता है। अतः प्रमाद और लोभको अपने भीतर न आने दे तथा किसीपर भी विश्वास न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा भयातुर मनुष्योंकी भयसे रक्षा करे, दीन-दु:खियोंपर अनुग्रह करे, कर्तव्य और अकर्तव्यको विशेषरूपसे समझे और सदा राष्ट्रके हितमें संलग्न रहे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखावे। राज्यमें स्थित रहकर प्रजाके पालनमें तत्पर रहे। लोभशून्य होकर न्याययुक्त बात कहे और प्रजाकी आयका छठा भागमात्र लेकर जीवननिर्वाह करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कर्तव्य-अकर्तव्यको समझे। सबको धर्मकी दृष्टिसे देखे! अपने राष्ट्रके निवासियोंपर दया करे और कभी न करने योग्य कर्ममें प्रवृत न हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य राजाकी प्रशंसा करते हैं और जो उसकी निन्दा करते हैं, इनमेंसे शत्रु भी यदि निरपराध हो तो उसे मित्रके समान देखे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुष्टको अपराधके अनुसार दण्ड देकर उसका शासन करे। जहाँ राजा न्यायोचित दण्डमें रुचि रखता है, वहाँ धर्मका पालन होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहाँ राजा क्षमाशील न हो, वहाँ अधर्म नहीं होता। अशिष्ट पुरुषोंको दण्ड देना और शिष्ट पुरुषोंका पालन करना राजाका धर्म है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा वधके योग्य पुरुषोंका वध करे और जो वधके योग्य न हों, उनकी रक्षा करे। ब्राह्मण, गौ, दूत, पिता, जो विद्या पढ़ाता है वह अध्यापक तथा जिन्होंने पहले कभी उपकार किये हैं वे मनुष्य--ये सब-के-सब अवध्य माने गये हैं। स्त्रियोंका तथा जो सबका अतिथि-सत्कार करनेवाला हो, उस मनुष्यका भी वध नहीं करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वी, गौ, सुवर्ण, सिद्धात्न, तिल और घी--इन वस्तुओंका ब्राह्मणके लिये प्रतिदिन दान करनेवाला राजा पापसे मुक्त हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो राजा इस प्रकार राष्ट्रके हितमें तत्पर हो प्रतिदिन ऐसा बर्ताव करता है, उसके राष्ट्र, धन, धर्म, यश और कीर्तिका विस्तार होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा राजा पाप और अनर्थका भागी नहीं होता। जो नरेश प्रजाकी आयके छठे भागका उपयोग तो करता है; परंतु धर्म या पराक्रमद्वारा स्वचक्र (अपनी मण्डलीके लोगों) तथा परचक्र (शत्रुमण्डलीके लोगों)-से प्रजाकी रक्षा नहीं करता एवं जो राजा दूसरेके राष्ट्रपर आक्रमण करनेके विषयमें सदा उद्योगहीन बना रहता है, उस प्रतापहीन राजाका राज्य शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरे चक्रके राजाके लिये दूसरेके राष्ट्रका विनाश करनेपर जो पाप लागू होता है, वह समूचा पाप उस राजाको भी प्राप्त होता है, जिसका राज्य उसीकी दुर्बलताके कारण शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मामा, भानजा, माता, श्वशुर, गुरु तथा पिता--इनमेंसे प्रत्येकको छोड़कर यदि दूसरा कोई मनुष्य मारनेकी नीयतसे आ जाय तो उसे (आततायी समझकर) मार डालना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो राजा अपने राष्ट्रकी रक्षाके लिये युद्धमें जूझता हुआ शत्रुमण्डलके द्वारा मारा जाता है, उसे जो गति मिलती है, उसको श्रवण करो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वरारोहे! संग्राममें मारा गया नरेश अप्सराओंसे सेवित विमानपर आरूढ़ हो इस लोकसे इन्द्रलोकमें जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुन्दरि! उसके अंगोंमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोतक वह इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि कदाचित्‌ वह फिर मनुष्यलोकमें आता है तो पुनः राजा या राजाके तुल्य ही शक्तिशाली पुरुष होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये राजाको यत्नपूर्वक अपने राष्ट्रकी रक्षा करनी चाहिये। राजोचित व्यवहारोंका पालन, गुप्तचरोंकी नियुक्ति, सदा सत्यप्रतिज्ञ होना, प्रमाद न करना, प्रसन्न रहना, व्यवसायमें अत्यन्त कुपित न होना, भृत्यवर्गका भरण और वाहनोंका पोषण करना, योद्धाओंका सत्कार करना और किये हुए कार्यमें सफलता लाना--यह सब राजाओंका कर्तव्य है। ऐसा करनेसे उन्हें इहलोक और परलोकमें भी श्रेयकी प्राप्ति होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;[अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता]&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--सर्वदेववन्दित देवाधिदेव महादेव! अब मैं धर्मके रहस्योंको सुनना चाहती हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--अहिंसा परम धर्म है। अहिंसा परम सुख है। सम्पूर्ण धर्मशास्त्रोंमें अहिंसाको परमपद बताया गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वरारोहे! देवताओं और अतिथियोंकी सेवा, निरन्तर धर्मशीलता, वेदाध्ययन, यज्ञ, तप, दान, दम, गुरु और आचार्यकी सेवा तथा तीर्थोंकी यात्रा--ये सब अहिंसा-धर्मकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। यह मैंने तुम्हें धर्मका परम गुह्य रहस्य बताया है, जिसकी शास्त्रोंमें भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपनी इन्द्रियोंका निरोध करता है, वही सुखी है और वही विद्वान है। इन्द्रियोंके निरोधसे, दानसे और इन्द्रिय-संयमसे मनुष्य मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब पा लेता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाभागे! जिस-जिस ओरसे भारी हिंसाकी सम्भावना हो, उससे तथा मद्य और मांससे मनुष्यको निवृत्त हो जाना चाहिये। इससे हिंसाकी सम्भावना बहुत कम हो जाती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निवृत्ति परम धर्म है, निवृत्ति परम सुख है, जो मनसे विषयोंकी ओरसे निवृत्त हो गये हैं, उन्हें विशाल धर्मराशिकी प्राप्ति होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसमें संदेह नहीं कि धर्म और अधर्म पहले मनमें ही आते हैं। मनसे ही मनुष्य बँधता है और मनसे ही मुक्त होता है। यदि मनको वशमें कर लिया जाय, तब तो स्वर्ग मिलता है और यदि उसे खुला छोड़ दिया जाय तो नरककी प्राप्ति अवश्यम्भावी है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीव अपने पूर्वकृत कर्मके ही फलसे पशु-पक्षी एवं कीट आदि होते हैं। अपने-अपने कर्मोसे बँधे हुए प्राणी ही भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो जीव जन्म लेता है, उसकी मृत्यु पहले ही पैदा हो जाती है। मनुष्यने पूर्व जन्ममें जैसा कर्म किया है, तदनुसार ही उसे सुख या दु:ख प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राणी प्रमादमें पड़कर भले ही सो जाया, परंतु उनका प्रारब्ध या दैव प्रमादशून्य-सावधान होकर सदा जागता रहता है। उसका न कोई प्रिय है, न द्वेषपात्र है और न कोई मध्यस्थ ही है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;काल समस्त प्राणियोंके प्रति समान है। वह अवसरकी प्रतीक्षा करता रहता है। जिनकी आयु समाप्त हो गयी है, उन्हीं प्राणियोंका वह संहार करता है। वही समस्त देहधारियोंका जीवन है ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;[त्रिवर्गकका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार-व्यवहारका वर्णन]&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--प्रिये! विद्या, वार्ता, सेवा, शिल्यकला और अभिनय-कला--ये मनुष्योंके जीवन-निर्वाहके लिये पाँच वृत्तियाँ बनायी गयी हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! सभी मनुष्योंके लिये विद्याका योग पहले ही निश्चित कर दिया जाता है। विद्यासे लोग कर्तव्य और अकर्तव्यको जानते हैं, अन्यथा नहीं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्यासे ज्ञान बढ़ता है, ज्ञानसे तत्त्वका दर्शन होता है और तत्त्वका दर्शन कर लेनेके पश्चात्‌ मनुष्य विनीतचित्त होकर समस्त पुरुषार्थोका भाजन हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्यासे विनीत हुआ पुरुष संसारमें शुभ जीवन बिता सकता है; अतः अपने आपको पहले विद्याद्वारा पुरुषार्थका भाजन बनाकर क्रोधविजयी एवं जितेन्द्रिय पुरुष सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा-परमात्माका चिन्तन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परमात्माका चिन्तन करके मनुष्य सत्पुरुषोंके लिये भी पूजनीय बन जाता है। जीवात्मा पहले कुल-परम्परासे चले आते हुए सदाचारका ही आश्रय ले ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! यदि विद्यासे अपनी जीविका चलानेकी इच्छा हो तो शुश्रूषा आदि गुणोंसे सम्पन्न हो किसी गुरुसे राजविद्या अथवा लोकविद्याकी शिक्षा ग्रहण करे और उसे ग्रन्थ एवं अर्थके अभ्यारुद्वारा प्रयत्नपूर्वक दृढ़ करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! ऐसा करनेसे मनुष्य विद्याका फल पा सकता है, अन्यथा नहीं। न्यायसे ही विद्याजनित फलोंको पानेकी इच्छा करे। वहाँ अधर्मको सर्वथा त्याग दे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि वातवित्तिके द्वारा जीविका चलानेकी इच्छा हो तो जहाँ सींचनेके लिये जलकी व्यवस्था हो, ऐसे खेतमें तदनुरूप कार्य विधिपूर्वक करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अथवा यथासमय उस देशकी आवश्यकताके अनुसार वस्तु, उसके मूल्य, व्यय, लाभ और परिश्रम आदिका भलीभाँति विचार करके व्यापार करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देशवासी पुरुषको पशुओंका पालन-पोषण भी अवश्य करना चाहिये। अनेक प्रकारके बहुसंख्यक पशु भी उसके लिये अर्थप्राप्तिके साधक हो सकते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो कोई बुद्धिमान्‌ मनुष्य सेवाद्वारा जीवननिर्वाह करना चाहे तो वह मनको संयममें रखकर श्रवण करनेयोग्य मीठे वचनोंका प्रयोग करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे-जैसे सेव्य स्वामी संतुष्ट रहे, वैसे ही वैसे उसे संतोष दिलावे। सेवकके गुणोंसे सम्पन्न हो अपने आपको स्वामीके आश्रित रखे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्वामीका कभी अप्रिय न करे, यही संक्षेपसे सेवाका स्वरूप है। उसके साथ वियोग होनेसे पहले अपने लिये दूसरी कोई गति न देखे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शिल्पकर्म अथवा कारीगरी और नाट्यकर्म प्राय: निम्न जातिके लोगोंमें चलते हैं। शिल्प और नाटयमें भी यथायोग्य न्यायानुसार कार्यका वेतन लेना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सरल व्यवहारवाले सभी मनुष्योंसे सरलतासे ही वेतन लेना चाहिये। कुटिलतासे वेतन लेनेवालेके लिये वह पापका कारण बनता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीविका-साधनके जितने उपाय हैं, उन सबके आरम्भोंपर पहले न्यायपूर्वक विचार करे। अपनी शक्ति, उपाय, देश, काल, कारण, प्रवास, प्रक्षेप और फलोदय आदिके विषयमें युक्तिपूर्वक विचार एवं चिन्तन करके दैवकी अनुकूलता देखकर जिसमें अपना हित निहित दिखायी दे, उसी उपायका आलम्बन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार अपने लिये जीविकावृति चुनकर उसका सदा ही पालन करे और ऐसा प्रयत्न करे, जिससे वह दैव और मानुष विघ्नोंसे पुनः उसे छोड़ न बैठे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रक्षा, वृद्धि और उपभोग करते हुए उस वृत्तिको पाकर नष्ट न करे। यदि रक्षा आदिकी चिन्ता छोड़कर केवल उपभोग ही किया जाय तो पर्वत-जैसी धनराशि भी नष्ट हो जाती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आजीविकाके उपायोंसे धनका उपार्जन करके विद्वान्‌ पुरुष धर्म, अर्थ, काम तथा संकट-निवारण--इन चारोंके उद्देश्यसे उस धनके चार भाग करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भामिनि! इन चारों विभागोंमें भी जैसा विधान है, उसे सुनो। यज्ञ करने, दीनदुःखियोंपर अनुग्रह करके अन्न देने, देवताओं, ब्राह्मणों तथा पितरोंकी पूजा करने, मूलधनकी रक्षा करने, सत्पुरुषोंके रहने तथा क्रियापरायण धर्मात्मा पुरुषोंके सहयोगके लिये तथा इसी प्रकार अन्यान्य सत्कर्मोके उद्देश्यसे धर्मार्थ धनका दान करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फलकी प्राप्तिका विचार न करके धर्मके कार्यमें धन देना चाहिये। ऐश्वर्यपूर्ण स्थानकी प्राप्तिके लिये, राजाका प्रिय होनेके लिये, कृषि, गोरक्षा अथवा वाणिज्यके आरम्भके लिये, मन्त्रियों और मित्रोंके संग्रहके लिये, आमन्त्रण और विवाहके लिये, पूर्ण पुरुषोंकी वृत्तिके लिये, धनकी उत्पत्ति एवं प्राप्तिके लिये तथा अनर्थके निवारण और ऐसे ही अन्य कार्योंके लिये अर्थार्थ धनका त्याग करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हेतुयुक्त अनुबन्ध (सकारण सम्बन्ध) देखकर उसके लिये धनका त्याग करना चाहिये। अर्थ अनर्थका निवारण करता है तथा धन एवं अभीष्ट फलकी प्राप्ति कराता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निर्धन मनुष्य सैकड़ों यत्न करके भी धन नहीं पा सकते। अतः धनकी रक्षा करनी चाहिये तथा विधिपूर्वक उसका दान करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शरीरके पोषणके लिये विशेष प्रकारके आहारकी व्यवस्था तथा ऐसे ही अन्य कार्योंके निमित्त कामार्थ धनका व्यय करना उचित है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुण-दोषका विचार करके धर्म, अर्थ और काम-सम्बन्धी धनोंका तत्तत्‌ कार्योमें व्यय करना चाहिये। शुचिस्मिते! धनका जो चौथा भाग है, उसे आपत्तिकालके लिये सदा सुरक्षित रखे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शोभने! राज्य-विध्वंसका निवारण करने, दुर्भिक्षके समय काम आने, बड़े-बड़े रोगोंसे छुटकारा पाने, बुढ़ापेमें जीवन-निर्वाह करने, साहस और अमर्षपूर्वक शत्रुओंसे बदला लेने, विदेश-यात्रा करने तथा सब प्रकारकी आपत्तियोंसे छुटकारा पाने आदिके उद्देश्यसे अपने धनको अपने निकट बचाये रखना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धन संकटोंसे छुड़ानेवाला है, इसलिये इस जगत्‌में धनवानोंको सुख होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह धन यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। इतना ही नहीं, वह परम यशस्वरूप है। धर्म, अर्थ और काम यह त्रिवर्ग कहलाता है। वह जिनके वशमें होता है, उन सबके लिये कल्याणकारी होता है। ऐसा बर्ताव करनेवाले लोग उभय लोकमें अपना हित साधन करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रातःकाल उठना, शौच-स्नान करके शुद्ध होना, देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखते हुए गुरुजनोंकी सेवा तथा ब्राह्मण-वर्गको प्रणाम करना, बड़े-बूढ़ोंके आनेपर उठकर उनका स्वागत करना, देवस्थानमें मस्तक झुकाना, अतिथियोंके सम्मुख होकर उनका उचित आदर-सत्कार करना, बड़े-बूढ़ोंके उपदेशको मानना और आचरणमें लाना, उनके हितकर और लाभदायक वचनोंको सुनना, भृत्यवर्गको सान्त्वना और अभीष्ट वस्तुका दान देकर अपनाते हुए उसका पालन-पोषण करना, न्याययुक्त कर्म करना, अन्याय और अहितकर कार्यको त्याग देना, अपनी स्त्रीके साथ अच्छा बर्ताव करना, दोषोंका निवारण करना, पुत्रोंकोी विनय सिखाना, उन्हें भिन्न-भिन्न आवश्यक कार्योंमें लगाना, अशुभ पदार्थोंको त्याग देना, शुभ पदार्थोंका सेवन करना, कुलोचित धर्मोंका यथावत्‌ रूपसे पालन करना और अपने ही पुरुषार्थसे सर्वथा अपने कुलकी रक्षा करना इत्यादि सारे शुभ व्यवहार वृत्त कहे गये हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतिदिन अपने हितके लिये और ज्ञान-प्राप्तिकी इच्छासे वृद्ध पुरुषोंका सेवन करे। दूसरेके द्रव्यको उससे पूछे बिना कदापि न ले ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धीर पुरुष दूसरेसे याचना न करे। अपने बाहुबलका भरोसा रखे। आहार और आचारव्यवहारमें भी सदा अपने शरीरकी रक्षा करे। जो भोजन हितकर एवं लाभदायक हो तथा अच्छी तरह पक गया हो, उसीको नियत मात्रामें ग्रहण करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओं और अतिथियोंको पूर्णरूपसे विधिपूर्वक सत्कार करके शेष अन्नका पवित्र होकर भोजन करे और कभी किसीसे अप्रिय वचन न बोले ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गृहस्थ पुरुष धर्मपालनका व्रत लेकर अतिथिके लिये ठहरनेका स्थान, जल, उपहार और भिक्षा दे तथा गौओंका पालन-पोषण करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह किसी विशेष कारणसे बाहरकी यात्रा भी कर सकता है, परंतु दोपहर या आधी रातके समय उसे प्रस्थान करनेका विचार नहीं करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विषयोंमें डूबा न रहे। अपनी शक्तिके अनुसार धर्माचरण करे। गृहस्थ पुरुषकी जैसी आय हो, उसके अनुसार ही यदि उसका व्यय हो तो लोकमें उसकी प्रशंसा की जाती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भय अथवा लोभवश कभी ऐसा कर्म न करे जो यश और अर्थका नाशक तथा दूसरोंको पीड़ा देनेवाला हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किसी कर्मके गुण और दोषको दूरसे ही बुद्धिपूर्वक देखकर तदनन्तर उस शुभ कर्मको लाभदायक समझे तो आरम्भ करे या अशुभका त्याग करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने शुभ और अशुभ कर्ममें सदा अपने-आपको ही साक्षी माने और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा कभी पाप करनेकी इच्छा न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;[विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--सुरासुरपते! सबकी प्रीति बढ़ानेवाले वरदायक देव! मनुष्योंमें ही कितने ही लोग क्लेशशून्य, उपद्रवरहित एवं धन-धान्यसे सम्पन्न होकर भाँति-भाँतिके भोग भोगते देखे जाते हैं और दूसरे बहुत-से मनुष्य क्लेशयुक्त, दरिद्र एवं भोगोंसे वंचित पाये जाते हैं। महादेव! मनुष्यलोकमें सब लोग समान क्‍यों नहीं बनाये गये (वहाँ इतनी विषमता क्‍यों है)? यह सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वर कहते हैं--देवि! जीव जैसा कर्म करता है, वैसा फल पाता है। वह अपने किये हुएका फल स्वयं ही भोगता है, दूसरा कोई उसे भोगनेका अधिकारी नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुभेक्षणे! जो लोग धर्म और कामसे निवृत्त हो लोभी, निर्दयी और प्रायः अपने ही शरीरके पोषक हो जाते हैं, शोभने! ऐसे लोग मृत्युके पश्चात्‌ जब पुन: जन्म लेते हैं, तब दरिद्र और अधिक क्लेशके भागी होते हैं। इसमें संशय नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! मनुष्योंमें जो लोग धन-धान्यसे सम्पन्न हैं, उनमेंसे भी कितने ही ऐसे हैं, जो सम्पूर्ण भोगोंके होनेपर भी भोगहीन देखे जाते हैं। वे उन भोगोंको क्‍यों नहीं भोगते? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो दूसरोंसे प्रेरित होकर धर्म करते हैं, स्वेच्छासे नहीं तथा धर्मविषयक श्रद्धाको दूर करके अश्रद्धासे दान या धर्म करते हैं और उसके लिये रोते या पछताते हैं; शोभने! ऐसे लोग जब मृत्युको प्राप्त होकर फिर जन्म लेते हैं तो धर्मके उन फलोंको पाकर कभी भोगते नहीं हैं। केवल खजानेकी रक्षा करनेवाले सिपाहीकी भाँति उस धनकी रखवाली करते हुए उसे बढ़ाते रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--महेश्वर! कितने ही मनुष्य धनहीन होनेपर भी भोगयुक्त दिखायी देते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो धन न होनेपर भी सदा दान देनेकी इच्छा रखते हैं, वे मनुष्य मृत्युके पश्चात्‌ जब फिर जन्म लेते हैं, तब निर्धन होनेके साथ ही भोगयुक्त होते हैं (धर्मके प्रभावसे उनके योगक्षेमकी व्यवस्था होती रहती है) ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः धर्म और दानका उपदेश करना चाहिये--यह दिद्वानोंका निश्चय है। देवि! तुम्हारे इस प्रश्नका उत्तर तो दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--भगवन्‌! देवदेवेश्वर! त्रिलोचन! वृषभध्वज! देव! विभो! मनुष्य तीन प्रकारके दिखायी देते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ लोग बैठे-बैठे ही उत्तम स्थान, ऐश्वर्य और विविध भोगोंका संग्रह पाकर उनका उपभोग करते हैं। दूसरे लोग यत्नपूर्वक भोगोंका संग्रह कर पाते हैं, और तीसरे ऐसे हैं, जो यत्न करनेपर भी कुछ नहीं पाते। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--महाभागे! भामिनि! तुम न्‍्यायतः मेरा उपदेश सुनना चाहती हो, अतः सुनो। देवि! दानधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो मनुष्य संसारमें दानके सुयोग्य पात्रोंका विधिवत ज्ञान प्राप्त करके अथवा अनुमानसे भी उन्हें जानकर दूरसे भी स्वयं उनके पास चले जाते और उन्हें प्रसन्न करके अपनी दी हुई वस्तुएँ उन्हें स्वीकार करवाते हैं, उनके दान आदि कर्म संकेतसे ही होते हैं; अतः दान-पात्रोंको जनाये बिना ही जो उनके लिये दानकी वस्तुएँ दे देते हैं; देवि! वे ही पुनर्जन्ममें वैसे श्रेष्ठ पुरुष होते हैं तथा वे बिना यत्नके ही उन कर्मोके फलोंको प्राप्त कर लेते हैं और पुण्यके भागी होनेके कारण बैठे-बैठाये ही सब तरहके भोग भोगते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरे जो लोग याचकोंके माँगनेपर दान देते ही हैं और जब-जब याचकने माँगा, तबतब उसे दान देकर उसके पुन: याचना करनेपर फिर दान दे देते हैं; देवि! वे मनुष्य पुनर्जन्म पानेपर यत्न और परिश्रमसे बारंबार उन दान-कर्मोके फल पाते रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ लोग ऐसे हैं, जो याचना करनेपर भी याचकको कुछ नहीं देते। उनका चित्त लोभसे दूषित होता है और वे सदा दूसरोंके दोष ही देखा करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुभे! ऐसे लोग फिर जन्म लेनेपर बहुत यत्न करते रहते हैं तो भी कुछ नहीं पाते। बहुत दूँढ़नेपर भी उन्हें कोई भोग सुलभ नहीं होता ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे बीज बोये बिना खेती नहीं उपजती, यही बात दानके फलके विषयमें समझनी चाहिये--दिये बिना किसीको कुछ नहीं मिलता। मनुष्य जो-जो देता है, केवल उसीको पाता है। देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! भगदेवताका नेत्र नष्ट करनेवाले महादेव! कुछ लोग बूढ़े हो जानेपर, जब कि उनके लिये भोग भोगने योग्य समय नहीं रह जाता, बहुत-से भोग और धन पा जाते हैं। वे वृद्ध होनेपर भी जहाँ-तहाँसे भोग और एऐश्वर्य प्राप्त कर लेते हैं; ऐसा किस कर्म-विपाकसे सम्भव होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा-देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे इसका उत्तर देता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर इसका तात््विक विषय सुनो। जो लोग धनसे सम्पन्न होनेपर भी दीर्घकालतक धर्मकार्यको भूले रहते हैं और जब रोगोंसे पीड़ित होते हैं, तब प्राणान्त-काल निकट आनेपर धर्म करना या दान देना आरम्भ करते हैं, शुभे! वे पुनर्जन्म लेनेपर दु:खमें मग्न हो यौवनका समय बीत जानेपर जब बूढ़े होते हैं, तब पहलेके दिये हुए दानोंके फल पाते हैं। शुभलक्षणे! देवि! यह कर्म-फल काल-योगसे प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--महादेव! कुछ लोग युवावस्थामें ही भोगसे सम्पन्न होनेपर भी रोगोंसे पीड़ित होनेके कारण उन्हें भोगनेमें असमर्थ हो जाते हैं, इसका क्या कारण है? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--शुभलक्षणे! जो रोगोंसे कष्टमें पड़ जानेपर जब जीवनसे निराश हो जाते हैं, तब दान करना आस्मभ करते हैं। शुभे! वे ही पुनर्जन्म लेनेपर उन फलोंको पाकर रोगोंसे आक्रान्त हो उन्हें भोगनेमें असमर्थ हो जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें कुछ ही लोग रूपवान्‌, शुभ लक्षणसम्पन्न और प्रिय-दर्शन (परम मनोहर) देखे जाते हैं, किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक इसका रहस्य बताता हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जो मनुष्य पूर्वजन्ममें लज्जायुक्त, प्रिय वचन बोलनेवाले, शक्तिशाली और सदा स्वभावतः मधुर स्वभाववाले होकर सर्वदा समस्त प्राणियोंपर दया करते हैं, कभी मांस नहीं खाते हैं, धर्मके उद्देश्यसे वस्त्र और आभूषणोंका दान करते हैं, भूमिकी शुद्धि करते हैं, कारणवश अग्निकी पूजा करते हैं; ऐसे सदाचारसम्पन्न मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर रूपसौन्दर्यकी दृष्टिसे स्पृहणीय होते ही हैं, इसमें संशय नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े कुरूप दिखायी देते हैं, इसमें कौन-सा कर्मविपाक कारण है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! सुनो, मैं तुमको इसका कारण बताता हूँ। पूर्वजन्ममें सुन्दर रूप पाकर जो मनुष्य दर्प और अहंकारसे युक्त हो स्तुति और निन्दा आदिके द्वारा कुरूप मनुष्योंकी बहुत हँसी उड़ाया करते हैं, दूसरोंको सताते, मांस खाते, पराया दोष देखते और सदा अशुद्ध रहते हैं, ऐसे अनाचारी मनुष्य यमलोकमें भलीभाँति दण्ड पाकर जब फिर किसी प्रकार मनुष्य-योनिमें जन्म लेते हैं, तब रूपहीन और कुरूप होते ही हैं। इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! देवदेवेश्वर! कुछ मनुष्य सौभाग्यशाली होते हैं, जो रूप और भोगसे हीन होनेपर भी नारीको प्रिय लगते हैं। किस कर्म-विपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले सौम्य-स्वभावके तथा प्रिय वचन बोलनेवाले होते हैं, अपनी ही पत्नीमें संतुष्ट रहते हैं, यदि कई पत्नियाँ हों तो उन सबपर समान भाव रखते हैं, अपने स्वभावके कारण अप्रिय लगनेवाली स्त्रियोंके प्रति भी उदारतापूर्ण बर्ताव करते हैं, स्त्रियोंके दोषोंकी चर्चा नहीं करते, उनके गुणोंका ही बखान करते हैं, समयपर अन्न और जलका दान करते हैं, अतिथियोंको स्वादिष्ट अन्न भोजन कराते हैं, अपनी पत्नीके प्रति ही अनुरक्त रहनेका नियम लेते हैं, धैर्यवान्‌ और दुःखरहित होते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर सदा सौभाग्यशाली होते ही हैं। देवि! वे धनहीन होनेपर भी अपनी पत्नीके प्रीतिपात्र होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! बहुत-से श्रेष्ठ पुरुष भोगोंसे सम्पन्न होनेपर भी दुर्भाग्यके मारे दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा सम्भव होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! इस बातको मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम एकाग्रचित होकर सारी बातें सुनो। जो मनुष्य पहले अपनी पत्नीकी उपेक्षा करके स्वेच्छाचारी हो जाते हैं, लज्जा और भयको छोड़ देते हैं, मन, वाणी और शरीर तथा क्रियाद्वारा दूसरोंकी बुराई करते हैं और आश्रयहीन एवं निराहार रहकर पत्नीके हृदयमें क्रोध उत्पन्न करते हैं; ऐसे दूषित आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर दुर्भाग्ययुक्त और नारी जातिके लिये अप्रिय ही होते हैं। ऐसे भाग्यहीनोंको अपनी पत्नीसे भी अनुरागजनित सुख नहीं सुलभ होता ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमेंसे कुछ लोग ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, बुद्धिमान्‌ और दिद्वान्‌ होनेपर भी दुर्गतिमें पड़े दिखायी देते हैं। वे विधिपूर्वक यत्न करके भी उस दुर्गतिसे नहीं छूट पाते। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! सुनो, मैं इसका कारण तुम्हें बताता हूँ। देवि! जो मनुष्य पहले केवल विद्वान्‌ होनेपर भी आश्रयहीन और भोजन-सामग्रीसे वंचित होकर केवल अपने ही उदर-पोषणके प्रयत्नमें लगे रहते हैं, शुभे! वे पुनर्जन्म लेनेपर ज्ञान और बुद्धिसे युक्त होनेपर भी अकिंचन ही रह जाते हैं, क्योंकि बिना बोया हुआ बीज नहीं जमता है।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! इस जगत्‌में मूर्ख, अचेत तथा ज्ञान-विज्ञानसे रहित मनुष्य भी सब ओरसे समृद्धिशाली और दृढ़मूल दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले मूर्ख होनेपर भी सब ओर दीन-दु:खियोंपर अनुग्रह करके उन्हें दान देते रहे हैं, जो पहलेसे दानके महत्त्वको न समझकर भी जहाँ-तहाँ दान देते ही रहे हैं, शुभे! वे मनुष्य पुनर्जन्म प्राप्त होनेपर वैसी अवस्थाको प्राप्त होते ही हैं। कोई मूर्ख हो या पण्डित, प्रत्येक मनुष्य दानका फल भोगता है। बुद्धिसे अनपेक्षित दान भी सर्वथा फल देता ही है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े मेधावी, किसी बातको एक बार सुनकर ही उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले मूर्ख होनेपर भी सब ओर दीन-दु:खियोंपर अनुग्रह करके उन्हें दान देते रहे हैं, जो पहलेसे दानके महत्त्वको न समझकर भी जहाँ-तहाँ दान देते ही रहे हैं, शुभे! वे मनुष्य पुनर्जन्म प्राप्त होनेपर वैसी अवस्थाको प्राप्त होते ही हैं। कोई मूर्ख हो या पण्डित, प्रत्येक मनुष्य दानका फल भोगता है। बुद्धिसे अनपेक्षित दान भी सर्वथा फल देता ही है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े मेधावी, किसी बातको एक बार सुनकर ही उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले गुरुकी अत्यन्त सेवा करनेवाले रहे हैं और ज्ञानके लिये विधिपूर्वक गुरुका आश्रय लेकर स्वयं भी दूसरोंको विधिसे ही अपनी विद्या ग्रहण कराते रहे हैं, अविधिसे नहीं। अपने ज्ञानके द्वारा जो कभी अपनी झूठी बड़ाई नहीं करते रहे हैं, अपितु शान्त और मौन रहे हैं तथा जो जगतमें यत्नपूर्वक विद्यालयोंकी स्थापना करते रहे हैं, शोभने! ऐसे पुरुष जब मृत्युको प्राप्त होकर पुनर्जन्म लेते हैं, तब मेधावी, किसी बातको एक बार ही सुनकर उसे याद कर लेनेवाले और विशद अक्षर-ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--देव! दूसरे मनुष्य यत्न करनेपर भी जहाँ-तहाँ शास्त्रज्ञान और बुद्धिसे बहिष्कृत दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य ज्ञानके घमंडमें आकर अपनी झूठी प्रशंसा करते हैं और ज्ञान पाकर उसके अहंकारसे मोहित हो दूसरोंपर आक्षेप करते हैं, जिन्हें सदा अपने अधिक ज्ञानका गर्व रहता है, जो ज्ञानसे दूसरोंके दोष प्रकट किया करते हैं और दूसरे ज्ञानियोंको नहीं सहन कर पाते हैं, शोभने! ऐसे मनुष्य मृत्युके पश्चात्‌ पुनर्जन्म लेनेपर चिरकालके बाद मनुष्य-योनि पाते हैं। देवि! उस जन्ममें वे सदा यत्न करनेपर भी बोधहीन और बुद्धिरहित होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! कितने ही मनुष्य समस्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त होते हैं। वे गुणवान्‌ स्त्री-पुत्र, दास-दासी तथा अन्य उपकरणोंसे सम्पन्न होते हैं। स्थान, ऐश्वर्य तथा मनोहर भोगों और पारस्परिक समृद्धिसे संयुक्त होते हैं। रोगहीन, बाधाओंसे रहित, रूपआरोग्य और बलसे सम्पन्न, धन-धान्यसे परिपूर्ण, भाँति-भाँतिके विचित्र एवं मनोहर महल, यान और वाहनोंसे युक्त एवं सब प्रकारके भोगोंसे संयुक्त हो वे प्रतिदिन जाति-भाइयोंके साथ निर्विष्न आनन्द भोगते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! यह मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम एकाग्रचित होकर सब बातें सुनो। जो धनाढ्य या निर्धन मनुष्य पहले शास्त्रज्ञान और सदाचारसे युक्त, दान करनेके इच्छुक, शास्त्रप्रेमी, दूसरोंके इशारेको समझकर सदा दान देनेके लिये दृढ़ विचार रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ, क्षमाशील, लोभ-मोहसे रहित, सुपात्रको दान देनेवाले, व्रत और नियमोंसे युक्त तथा अपने दुःखके समान ही दूसरोंके भी दुःखको समझकर किसीको दु:ख न देनेवाले होते हैं, जिनका शील-स्वभाव सौम्य होता है, आचार-व्यवहार शुभ होते हैं, जो देवताओं तथा ब्राह्मणोंके पूजक होते हैं, शोभामयी देवि! ऐसे शील-सदाचारवाले मानव पुनर्जन्म पानेपर स्वर्गमें या पृथ्वीपर अपने सत्कर्मोंके फल भोगते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैसे पुरुष जब मनुष्योंमें जन्म ग्रहण करते हैं, तब वे सभी तुम्हारे बताये अनुसार कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न होते हैं। उन्हें रूप, द्रव्य, बल, आयु, भोग, ऐश्वर्य, उत्तम कुल और शास्त्रज्ञान प्राप्त होते हैं। इन सभी सदगुणोंकी प्राप्ति दानसे ही होती है, अन्यथा नहीं। शुभानने! तुम यह जान लो कि सब कुछ तपस्या और दानका ही फल है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--प्रभो! मनुष्योंमें ही कुछ लोग दुर्गतियुक्त अधिक क्लेशसे पीड़ित, दान और भोगसे वंचित, तीन प्रकारके भयोंसे युक्त, रोग और भोगके भयसे पीड़ित, दुष्ट पत्नीसे तिरस्कृत तथा सदा सभी कार्योंमें विघ्नका ही दर्शन करनेवाले होते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले आसुरभावके आश्रित, क्रोध और लोभसे युक्त, भोजन-सामग्रीसे वंचित, अकर्मण्य, नास्तिक, धूर्त, मूर्ख, अपना ही पेट पालनेवाले दूसरोंको सतानेवाले तथा प्राय: सभी प्राणियोंके प्रति निर्दय होते हैं। शोभने! ऐसे आचारव्यवहारसे युक्त मनुष्य पुनर्जन्मके समय किसी प्रकार मनुष्ययोनिको पाकर जहाँ-कहीं भी उत्पन्न होते हैं, सर्वत्र अपने ही प्रमादके कारण दुःखसे पीड़ित होते हैं और जैसा तुमने बताया है, वैसे ही अवांछनीय दोषसे युक्त होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! मनुष्यका किया हुआ शुभ या अशुभ कर्म ही उसे सुख या दुःखरूप फलकी प्राप्ति करानेवाला है। यह बात मैंने तुम्हें बता दी। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;[अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका वर्णन]&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--भगवन्‌! मेरी प्रीति बढ़ानेवाले देवदेवेश्वर! इस संसारमें कुछ लोग जन्मसे ही अन्धे दिखायी देते हैं और कुछ लोगोंके जन्म लेनेके पश्चात्‌ उनकी आँखें नष्ट हो जाती हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--प्रिये! जो पूर्वजन्ममें काम या स्वेच्छाचारवश पराये घरोंमें अपनी लोलुपताका परिचय देते हैं और परायी स्त्रियोंपर अपनी दूषित दृष्टि डालते हैं तथा जो मनुष्य क्रोध और लोभके वशीभूत होकर दूसरोंको अन्धा बना देते हैं, अथवा रूपविषयक लक्षणोंको जानकर उसका मभिथ्या प्रदर्शन करते हैं। ऐसे आचारवाले मनुष्य मृत्युको प्राप्त होनेपर यमदण्डसे दण्डित हो चिरकालतक नरकोॉमें पड़े रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके बाद यदि वे मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं, तब स्वभावतः अन्धे होते हैं अथवा जन्म लेनेके बाद अन्धे हो जाते हैं या सदा ही नेत्ररोगसे पीड़ित रहते हैं। इस विषयमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--प्रभो! कुछ मनुष्य सदा मुखके रोगसे व्यथित रहते हैं, दाँत, कण्ठ और कपोलोंके रोगसे अत्यन्त कष्ट भोगते हैं, कुछ तो जन्मसे ही रोगी होते हैं और कुछ जन्म लेनेके बाद कारणवश उन रोगोंके शिकार हो जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! एकाग्रचित होकर सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें सब कुछ बताता हूँ। जो कुवाक्य बोलनेवाले मनुष्य अपनी जिह्लासे गुरुजनों या दूसरोंके प्रति अत्यन्त कड़वे, झूठे, रूखे तथा घोर वचन बोलते हैं, जो क्रोधके कारण दूसरोंकी जीभ काट लेते हैं अथवा जो कार्यवश प्राय: अधिकाधिक झूठ ही बोलते हैं, उनके जिद्डाप्रदेशमें ही रोग होते हैं।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो परदोष और निन्दादियुक्त कुवचन सुनते हैं तथा जो दूसरोंके कानोंको हानि पहुँचाते हैं, वे दूसरे जन्ममें कर्ण-सम्बन्धी नाना प्रकारके रोगोंका कष्ट भोगते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसे ही लोगोंको दन्तरोग, शिरोरोग, कर्णरोग तथा अन्य सभी मुखसम्बन्धी दोष अपनी करनीके फलरूपसे प्राप्त होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--देव! मनुष्योंमें कुछ लोग सदा कुक्षि और पक्षसम्बन्धी दोषों तथा उदरसम्बन्धी रोगोंसे पीड़ित रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ लोगोंके उदरमें तीखे शूल-से उठते हैं, जिनसे वे बहुत पीड़ित होते और दु:खमें डूब जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! पहले जो मनुष्य काम और क्रोधके अत्यन्त वशीभूत हो दूसरोंकी परवा न करके केवल अपने ही लिये आहार जुटाते और खाते हैं, अभक्ष्य भोजनका दान करते हैं, विश्वस्त मनुष्योंको जहर दे देते हैं, न खानेयोग्य वस्तुएँ खिला देते हैं, शौच और मंगलाचारसे रहित होते हैं; शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्म लेनेपर किसी तरह मानव-शरीरको पाकर उन्हीं रोगोंसे पीड़ित होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! नाना प्रकारके रूपवाले उन रोगोंसे पीड़ित हो वे दुःखमें निमग्न हो जाते हैं। पूर्वजन्ममें जैसा किया था वैसा भोगते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--देव! बहुत-से मनुष्य प्रमेहसम्बन्धी रोगोंसे पीड़ित देखे जाते हैं, कितने ही पथरी और शर्करा (पेशाबसे चीनी आना) आदि रोगोंके शिकार हो जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्ममें परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करनेवाले होते हैं, जो धूर्त मानव पशुयोनिमें मैथुनके लिये चेष्टा करते हैं, रूपके घमंडमें भरे हुए जो धूर्त काम-दोषसे कुमारी कन्‍्याओं और विधवाओंके साथ बलात्कार करते हैं, शोभने! ऐसे मनुष्य मृत्युके पश्चात्‌ जब फिर जन्म लेते हैं, तब मनुष्ययोनिमें आनेके बाद वैसे ही रोगी होते हैं। प्रिये! वे प्रमेहसम्बन्धी भयंकर रोगोंसे पीड़ित रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! कुछ मनुष्य सूखारोग (जिसमें शरीर सूख जाता है) से पीड़ित एवं दुर्बल दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य मांसपर लुभाये रहते हैं, अत्यन्त लोलुप हैं, अपने लिये स्वादिष्ट भोजन चाहते हैं, दूसरोंकी भोगसामग्री देखकर जलते हैं तथा जो दूसरोंके भोगोंमें दोषदृष्टि रखते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर सूखारोगसे पीड़ित हो इतने दुर्बल हो जाते हैं कि उनके शरीरमें फैली हुई नस-नाड़ियाँतक दिखायी देती हैं। देवि! वे पापकर्मोका फल भोगनेवाले मनुष्य वैसे ही होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! कुछ मनुष्य कोढ़ी होकर कष्ट पाते हैं, यह किस कर्मविपाकका फल है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले मोहवश आघात, वध, बन्धन तथा व्यर्थ दण्डके द्वारा दूसरोंके रूपका नाश करते हैं, किसीकी प्रिय वस्तु नष्ट कर देते हैं। चिकित्सक होकर दूसरोंको अपथ्य भोजन देते हैं, द्वेष और लोभके वशीभूत होकर दुष्टता करते हैं, प्राणियोंकी हिंसाके लिये निर्दय बन जाते हैं, मल देते और दूसरोंकी चेतनाका नाश करते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले पुरुष पुनर्जन्मके समय यदि मनुष्य-जन्म पाते हैं तो मनुष्योंमें सदा दु:खी ही रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस जन्ममें वे सैकड़ों कुष्ठ रोगोंसे घिरकर क्लेशसे पीड़ित होते हैं। कोई चर्मदोषसे युक्त होते हैं, कोई व्रणकुष्ठ (कोढ़के घाव) से पीड़ित होते हैं अथवा कोई सफेद कोढ़से लांछित दिखायी देते हैं। देवि! जिसने जैसा किया है उसके अनुसार फल पाकर वे सब मनुष्य नाना प्रकारके कुष्ठ रोगोंके शिकार हो जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! किस कर्मके विपाकसे कुछ मनुष्य अंगहीन एवं पंगु हो जाते हैं, यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे आच्छादित होकर प्राणियोंके प्राणोंकी हिंसा करनेके लिये उनके अंग-भंग कर देते हैं, शस्त्रोंस काटकर उन प्राणियोंको निश्चेष्ट बना देते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले पुरुष मरनेके बाद पुनर्जन्म लेनेपर अंगहीन होते हैं; इसमें संशय नहीं है। वे स्वभावत: पंगुरूपमें उत्पन्न होते हैं अथवा जन्म लेनेके बाद पंगु हो जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! कुछ मनुष्य ग्रन्थि (गठिया), पिल्‍्लक (फीलपाँव) आदि रोगोंसे कष्ट पाते देखे जाते हैं, इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले लोगोंकी ग्रथियोंका भेदन करनेवाले रहे हैं; जो मुष्टि-प्रहार करनेमें निर्दय, नृशंस, पापाचारी, तोड़-फोड़ करनेवाले और शूल चुभाकर पीड़ा देनेवाले रहे हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग फिर जन्म लेनेपर गठिया और फीलपाँवसे कष्ट पाते तथा अत्यन्त दु:खी होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! देव! कुछ मनुष्य सदा पैरोंके रोगोंसे पीड़ित दिखायी देते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले क्रोध और लोभके वशी भूत होकर देवताके स्थानको अपने पैरोंसे भ्रष्ट करते, घुटनों और एड़ियोंसे मारकर प्राणियोंकी हिंसा करते हैं; शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्म लेनेपर श्वपद आदि नाना प्रकारके पाद-रोगोंसे पीड़ित होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! देव! इस भूतलपर कुछ ऐसे लोगोंकी बहुत बड़ी संख्या दिखायी देती है, जो वात, पित्त और कफजनित रोगोंसे तथा एक ही साथ इन तीनोंके संनिपातसे तथा दूसरे-दूसरे अनेक रोगोंसे कष्ट पाते हुए बहुत दुःखी रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे धनी हों या दरिद्र, पूर्वाक्त रोगोंमेंसे कुछके द्वारा अथवा समस्त रोगोंके द्वारा कष्ट पाते रहते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! इसका कारण मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो। देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्ममें असुरभावका आश्रय ले स्वच्छन्दचारी, क्रोधी और गुरुद्रोही हो जाते हैं, मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा दूसरोंको दुःख देते हैं, काटते, विदीर्ण करते और पीड़ा देते हुए सदा ही प्राणियोंके प्रति निर्दयता दिखाते हैं। शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्मके समय यदि मनुष्य-जन्म पाते हैं तो वे वैसे ही होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रिये! उस शरीरमें वे बहुतेरे भयंकर रोगोंसे संतप्त होते हैं। किसीको उलटी होती है तो कोई खाँसीसे कष्ट पाते हैं। दूसरे बहुत-से मनुष्य ज्वर, अतिसार और तृष्णासे पीड़ित रहते हैं। किन्हींको अनेक प्रकारके पादगुल्म सताते हैं। कुछ लोग कफदोषसे पीड़ित होते हैं। कितने ही नाना प्रकारके पादरोग, व्रणकुष्ठ और भगन्दर रोगोंसे रुग्ण रहते हैं। वे धनी हों या दरिद्र सब लोग रोगोंसे पीड़ित दिखायी देते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार उन-उन शरीरोंमें वे अपने किये हुए कर्मका ही फल भोगते हैं। कोई भी बिना किये हुए कर्मके फलको नहीं पा सकता। देवि! इस प्रकार यह विषय मैंने तुम्हें बताया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! देवदेवेश्वर! भूतनाथ! आपको नमस्कार है। देव! दूसरे मनुष्य छोटे शरीरवाले, टठेढ़े-मेढ़े अंगोंवाले, कुबड़े, बौने और लूले दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे युक्त हो खरीद-बिक्रीके लिये अनाज तौलनेके बाटोंको तोड़-फोड़कर छोटे कर देते हैं, तराजूमें भी कुछ दोष रख लेते हैं और प्रतिदिन क्रय-विक्रयके समय जब उन बाटोंको रखकर अनाज तौलते हैं, तब सभीके मालमेंसे आधेकी चोरी कर लेते हैं। जो क्रोध करते, दूसरोंके शरीरपर चोट करके उसके अंगोंमें दोष उत्पन्न कर देते हैं, जो मूर्ख मांस खाते और सदा झूठ बोलते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर छोटे शरीरवाले बौने और कुबड़े होते हैं ।।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! मनुष्योंमेंसे कुछ लोग उन्मत्त और पिशाचोंके समान इधरउधर घूमते दिखायी देते हैं। उनकी ऐसी अवस्थामें कौन-सा कर्म-फल कारण है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले दर्प और अहंकारसे युक्त हो नाना प्रकारकी अंटशंट बातें करते हैं, दूसरोंकी खूब हँसी उड़ाते हैं, लोभवश, उन्मत्त बना देनेवाले भोगोंद्वारा दूसरोंको मोहित करते हैं, जो मूर्ख वृद्धों और गुरुजनोंका व्यर्थ ही उपहास करते हैं तथा शास्त्रज्ञानमें चतुर एवं प्रवीण होनेपर भी सदा झूठ बोलते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर उन्मत्तों और पिशाचोंके समान भटकते फिरते हैं; इसमें संशय नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! कुछ मनुष्य संतानहीन होनेके कारण अत्यन्त दुःखी रहते हैं। वे जहाँ-तहाँसे प्रयत्न करनेपर भी संतानलाभसे वंचित ही रह जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले समस्त प्राणियोंके प्रति निर्दयताका बर्ताव करते हैं, मृगों और पक्षियोंके भी बच्चोंको मारकर खा जाते हैं, गुरुसे द्वेष रखते, दूसरोंके पुत्रोंके दोष देखते हैं, पार्वण आदि श्राद्धोंके द्वारा शास्त्रोक्त रीतिसे पितरोंकी पूजा नहीं करते; शोभने! ऐसे आचरणवाले जीव फिर जन्म लेनेपर दीर्घकालके पश्चात्‌ मानवयोनिको पाकर संतानहीन तथा पुत्रशोकसे संतप्त होते हैं; इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--भगवन! मनुष्योंमें कुछ लोग अत्यन्त दुःखी दिखायी देते हैं। उनके निवासस्थानमें उद्वेगका वातावरण छाया रहता है। वे उद्विग्न रहकर संयमपूर्वक व्रतका पालन करते हैं। नित्य शोकमग्न तथा दुर्गतिग्रस्त रहते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो मनुष्य पहले प्रतिदिन घूस लेते हैं, दूसरोंको डराते और उनके मनमें विकार उत्पन्न कर देते हैं, अपने इच्छानुसार दरिद्रोंका ऋण बढ़ाते हैं, जो कुत्तोंसे खेलते और वनमें मृगोंको त्रास पहुँचाते हैं, जहाँ-तहाँ प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, जिनके घरोंमें पले हुए कुत्ते व्यर्थ ही लोगोंको डराते रहते हैं, प्रिये! ऐसे आचरणवाले मनुष्य मृत्युको प्राप्त होकर यमदण्डसे पीड़ित हो चिरकालतक नरकमें पड़े रहते हैं। फिर किसी प्रकार मनुष्यका जन्म पाकर अधिक दु:खसे भरे हुए सैकड़ों बाधाओंसे व्याप्त कुत्सित देशमें उत्पन्न हो वहाँ दुः:खी, शोकमग्न और सब ओरसे उद्विग्न बने रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! भगदेवताके नेत्रको नष्ट करनेवाले महादेव! मनुष्योंमें कुछ लोग कायर, नपुंसक और हिजड़े देखे जाते हैं, जो इस भूतलपर स्वयं तो नीच हैं ही, नीच कर्मोमें तत्पर रहते और नीचोंका ही साथ करते हैं। उनके नपुंसक होनेमें कौन-सा कर्मविपाक कारण होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! मैं वह कारण तुम्हें बताता हूँ, सुनो! जो मनुष्य पहले भयंकर कर्ममें तत्पर होकर पशुके पुरुषत्वका नाश करने अर्थात्‌ पशुओंको बधिया करनेके कार्यद्वारा जीवननिर्वाह करते और उसीमें सुख मानते हैं, प्रिये! ऐसे आचरणवाले मनुष्य मृत्युकों पाकर यमदण्डसे दण्डित हो चिरकालतक नरकमें निवास करते हैं। यदि मनुष्यजन्म धारण करते हैं तो वैसे ही कायर, नपुंसक और हिजड़े होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! जैसे पुरुषोंको कर्मजनित फल प्राप्त होता है, उसी प्रकार स्त्रियोंको भी अपनेअपने कर्मोका फल भोगना पड़ता है। यह विषय मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;[उमा-महे श्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! देवदेवेश्वर! मनुष्यलोकमें बहुत-सी युवती स्त्रियाँ समस्त कल्याणोंसे रहित विधवा दिखायी देती हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो स्त्रियाँ पहले जन्ममें बुद्धिमें मोह छा जानेके कारण पतिके कुटु॒म्बका व्यर्थ नाश करती हैं, विष देती, आग लगाती और पतियोंके प्रति अत्यन्त निर्दय होती हैं, अपने पतियोंसे द्वेष रखनेके कारण दूसरी स्त्रियोंके पतियोंसे सम्बन्ध स्थापित कर लेती हैं, ऐसे आचरणवाली नारियाँ यमलोकमें भलीभाँति दण्डित हो चिरकालतक नरकमें पड़ी रहती हैं। फिर किसी तरह मनुष्य-योनि पाकर वे भोगरहित विधवा हो जाती हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कोई दासभावको प्राप्त दिखायी देते हैं, जो सब प्रकारके कर्मोंमें सर्वथा संलग्न रहते हैं। वे पीटे जाते हैं, डॉँट-फटकार सहते हैं और सब तरहसे सताये जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो। देवि! जो मनुष्य पहले दूसरोंके धनका अपहरण करते हैं, जो क्रूरतावश किसीके ऐसे धनको हड़प लेते हैं, जिसके कारण उसके ऊपर ऋण बढ़ जाता है, जो रखनेके लिये दिये हुए या धरोहरके तौरपर रखे हुए पराये धनको दबा लेते हैं अथवा प्रमादवश दूसरोंके भूले या खोये हुए धनको हर लेते हैं, दूसरोंको वध-बन्धन और क्लेशमें डालकर उनसे अपनी दासता कराते हैं; देवि! ऐसे लोग मृत्युको प्राप्त हो यमदण्डसे दण्डित होकर जब किसी तरह मनुष्य-योनिमें जन्म लेते हैं, तब जन्मसे ही दास होते हैं और उन्हींकी सेवा करते हैं, जिनका धन उन्होंने पूर्वजन्ममें हर लिया है। जबतक उनके पापका भोग समाप्त नहीं हो जाता, तबतक वे दासकर्म ही करते रहते हैं, यही शास्त्रका निश्चय है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पराये धनका अपहरण करनेवाले दूसरे लोग पशु होकर भी धनीकी सेवा करते हैं। ऐसा करनेसे उनका पूर्वापराधजनित कर्म क्षीण होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब प्रकारसे उस धनके स्वामीको प्रसन्न कर लेना ही उसके ऋणसे छुटकारा पानेका उपाय है, किंतु जो यथावत्‌ रूपसे उस ऋणसे छूटना नहीं चाहता, उसे पुनर्जन्म लेकर उसकी सेवा करनी पड़ती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो उस बन्धनसे छूटना चाहता हो, वह यथोचित रूपसे सारे काम करता और परिश्रमको सर्वथा सहता हुआ स्वामीको प्रसन्न करनेकी आकांक्षा रखे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसे स्वामी प्रसनन्‍्न्तापूर्वक दासताके बन्धनसे मुक्त कर देता है, वह मुक्त एवं शुद्ध हो जाता है। स्वामीको भी चाहिये कि वह ऐसे सेवकोंको सदा संतुष्ट रखे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनसे यथायोग्य कार्य कराये और विशेष कारणसे ही उन्हें दण्ड दे। जो वृद्धों, बालकों और दुर्बल मनुष्योंका पालन करता है, वह धर्मका भागी होता है। देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! इस भूतलपर राजा लोग जिन मनुष्योंको दण्ड दे देते हैं, अब उस दण्डसे ही उनके पापोंका नाश हो जाता है या नहीं? यह मेरा संदेह है। आप इसका निवारण करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! तुम्हारा संदेह ठीक है, तुम एकाग्रचित्त होकर इसका यथार्थ उत्तर सुनो। इस भूमिपर राजालोग जिस अपराधका नाम लेकर जिन मनुष्योंको दण्ड दे देते हैं, उसके लिये वे यमलोकमें यमराजके दण्डद्वारा दण्डित नहीं होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस पृथ्वीपर जो वास्तविक अपराधी बिना दण्ड पाये रह जाते हैं अथवा झूठे ही दूसरे लोग दण्डित हो जाते हैं, उस दशामें यमराज उन वास्तविक अपराधियोंको अवश्य दण्ड देते हैं; क्योंकि वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि किसने अपराध किया है और किसने नहीं किया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोई भी मनुष्य इस लोकमें कर्म करके यमराजको नहीं लाँध सकता, उसे अवश्य दण्ड भोगना पड़ता है। शोभने! राजा और यम सबको भरपूर दण्ड देते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है, जो कर्मोके फलका बिना भोगे नाश कर सके। प्रिये! इस विषयमें तुम्हें सारी बातें बता दीं। अब संदेहरहित हो जाओ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! यदि ऐसी बात है तो भूमण्डलके मनुष्य पाप-कर्म करके उसके निवारणके लिये प्रायश्ित्त क्‍यों करते हैं? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कहते हैं कि अश्वमेधयज्ञ सम्पूर्ण पापोंको हर लेनेवाला है। लोग दूसरे-दूसरे प्रायश्ित्त भी पापोंका नाश करनेके लिये ही करते हैं (इधर आप कहते हैं कि तीनों लोकोंमें कोई कर्मफलका नाश करनेवाला है ही नहीं) अतः इस विषयमें मुझे संदेह हो गया है। आप मेरे इस संदेहका निवारण करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! तुमने ठीक संशय उपस्थित किया है। अब एकाग्रचित्त होकर इसका वास्तविक उत्तर सुनो। पहलेके महर्षियोंके मनमें भी यह महान्‌ संदेह बना रहा है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सज्जन हों या असज्जन, सभीके द्वारा दो प्रकारका पाप बनता है, एक तो वह पाप है, जिसे सदा किसी उद्देश्यको मनमें लेकर जान-बूझकर किया जाता है और दूसरा वह है, जो अकस्मात्‌ दैवेच्छासे बिना जाने ही बन जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो उद्देश्य-सिद्धिकी कामना रखकर क्रोधपूर्वक कोई असत्‌ कर्म करता है, उसके उस कर्मका किसी तरह नाश नहीं होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फलाभिसन्धिपूर्वक किये गये कर्मोंका नाश सहसौ्रों अश्वमेधयज्ञों और सैकड़ों प्रायश्चित्तोंसे भी नहीं होता। इसके सिवा और प्रकारसे--असावधानी या दैवेच्छासे जो पाप बन जाता है, वह प्रायश्चित्त और अश्वमेधयज्ञसे तथा दूसरे किसी श्रेष्ठ कर्मसे नष्ट हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रिये! इस प्रकार पाप कर्मके विषयमें तुम्हारा यह संदेह अब दूर हो जाना चाहिये। देवि! यह विषय मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन! देवदेवेश्वर! जगतके मनुष्य तथा दूसरे प्राणी, जो किसी कारणसे या अकारण भी मृत्युको प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कौन-सा कर्मविपाक कारण है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! जो निर्दयी मनुष्य पहले किसी कारणसे या अकारण भी दूसरे प्राणियोंके प्राण लेते हैं, वे उसी प्रकार अपनी करनीका फल पाते हैं। विष देनेवाले विषसे ही मरते हैं और शस्त्रद्वारा दूसरोंकी हत्या करनेवाले लोग स्वयं भी जन्मान्तरमें शस्त्रोंक आघातसे ही मारे जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम इसीको सत्य समझो। कर्म करनेवाला मनुष्य उन कर्मोंका फल न भोगे, ऐसा कोई पुरुष न इस पृथ्वीपर है न स्वर्गमें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता, असुर और मनुष्य कोई भी अपने कर्मोका फल भोगे बिना नहीं रह सकता। आदिकालसे ही यह संसार कर्मसे गुँथा हुआ है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कर्मोके परिणामके विषयमें ये बातें संक्षेपसे बतायी गयी हैं। कर्मसंचयके विषयमें जो बात मैंने अबतक नहीं कही हो, उसे भी तुम्हें अपनी बुद्धिद्वारा तर्क--ऊहापोह करके जान लेना चाहिये। तुम्हें सुननेकी इच्छा थी, इसलिये मैंने ये सारी बातें बतायीं। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! भगनेत्रनाशन! आपका मत है कि मनुष्योंकी जो भली-बुरी अवस्था है, वह सब उनकी अपनी ही करनीका फल है। आपके इस मतको मैंने अच्छी तरह सुना; परंतु लोकमें यह देखा जाता है कि लोग समस्त शुभाशुभ कर्मफलको ग्रहजनित मानकर प्राय: उन ग्रहनक्षत्रोंकी ही आराधना करते रहते हैं। क्या उनकी यह मान्यता ठीक है? देव! यही मेरा संशय है। आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! तुमने उचित संदेह उपस्थित किया है। इस विषयमें जो सिद्धान्त मत है, उसे सुनो। महाभागे! ग्रह और नक्षत्र मनुष्योंक शुभ और अशुभकी सूचनामात्र देनेवाले हैं। वे स्वयं कोई काम नहीं करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजाके हितके लिये ज्यौतिषचक्र (ग्रह-नक्षत्र मण्डल)-के द्वारा भूत और भविष्यके शुभाशुभ फलका बोध कराया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किंतु वहाँ शुभ कर्मफलकी सूचना (उत्तम) शुभ ग्रहोंद्वारा प्राप्त होती है और दुष्कर्मके फलकी सूचना अशुभ ग्रहोंद्वारा ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;केवल ग्रह और नक्षत्र ही शुभाशुभ कर्मफलको उपस्थित नहीं करते हैं। सारा अपना ही किया हुआ कर्म शुभाशुभ फलका उत्पादक होता है। ग्रहोंने कुछ किया है--यह कथन लोगोंका प्रवादमात्र है |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! जीव नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म करके जब दूसरा जन्म धारण करता है, तब दोनोंमेंसे पहले किसका फल भोगता है, शुभका या अशुभका? देव! यह मेरा संशय है। आप इसे मिटा दीजिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! तुम्हारा संदेह उचित ही है, अब मैं तुम्हें इसका यथार्थ उत्तर देता हूँ। कुछ लोगोंका कहना है कि पहले अशुभ कर्मका फल मिलता है, दूसरे कहते हैं कि पहले शुभ कर्मका फल प्राप्त होता है। परंतु ये दोनों ही बातें मिथ्या कही गयी हैं। सच्ची बात क्या है? यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस पृथ्वीपर मनुष्य क्रमश: दोनों प्रकारके फल भोगते देखे जाते हैं। कभी धनकी वृद्धि होती है कभी हानि, कभी सुख मिलता है कभी दुःख, कभी निर्भयता रहती है और कभी भय प्राप्त होता है। इस प्रकार सभी फल क्रमश: भोगने पड़ते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कभी धनाढ्य लोग दुःखका अनुभव करते हैं और कभी दरिद्र भी सुख भोगते हैं। इस प्रकार एक ही साथ लोग शुभ और अशुभका भोग करते देखे जाते हैं। सारा जगत्‌ इस बातका साक्षी है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रिये! किंतु नरक और स्वर्गलोकमें ऐसी स्थिति नहीं है। नरकमें सदा दुःख ही दुःख है और स्वर्गमें सदा सुख ही सुख ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुभे! वहाँ भी शुभ या अशुभमेंसे जो बहुत अधिक होता है, उसका भोग पहले और जो बहुत कम होता है, उसका भोग पीछे होता है। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दीं, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! इस लोकमें प्राणी किस कारणसे मर जाते हैं? जन्म ले-लेकर वे यहीं बने क्यों नहीं रहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! इस विषयमें जो यथार्थ बात है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। कर्मोका भोग समाप्त होनेपर आत्मा इस शरीरको कैसे छोड़ता है? यह एकाग्रचित्त होकर सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शरीर और आत्माका (जड और चेतनका) जो संयोग है, उसीको जीव या प्राणी कहते हैं। इनमें आत्माको नित्य और शरीरको अनित्य बताया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब कालसे आक्रान्त होकर शरीर जरावस्थासे जर्जर हो जाता है, कोई कर्म करने योग्य नहीं रह जाता और सर्वथा गल जाता है, तब देहधारी जीव उसे त्यागकर चल देता है।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नित्य जीवात्मा जब अनित्य शरीरको त्यागकर चला जाता है, तब लोकमें उस प्राणीकी मृत्यु हुई मानी जाती है। देवता, असुर और मनुष्य कोई भी कालका उल्लंघन नहीं कर सकते ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे आकाशमें कोई भी जड द्रव्य स्थिर नहीं रह सकता, उसी प्रकार यह काल निरन्तर दौड़ लगाता रहता है। एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह जीव फिर किसी दूसरे शरीरमें प्रवेश करके अन्यत्र जन्म लेता है। इस प्रकार आदि कालसे ही लोककी सदा ऐसी ही गति चल रही है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! इस संसारमें बाल्यावस्थामें भी प्राणियोंकी मृत्यु होती देखी जाती है और अत्यन्त वृद्ध मनुष्य भी चिरजीवी होकर जीवित दिखायी देते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महेश्वर! केवल काल-मृत्यु अर्थात्‌ वृद्धावस्थामें ही मृत्यु होनेकी बात प्रमाणभूत नहीं रह गयी है; अतः प्राणियोंके जीवनके लिये उठे हुए मेरे इस संदेहका आप निवारण कीजिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! इसका कारण सुनो। इस विषयमें एक ही निर्णय है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जबतक पूर्वकृत कर्म (प्रारब्ध) शेष है, तबतक मनुष्य जीवित रहता है। उसी कर्मके अधीन होकर प्रारब्ध भोगका काल समाप्त होनेपर बालक भी मर जाते हैं और उसी कर्मकी मात्राके अनुसार वृद्ध पुरुष भी दीर्घकालतक जीवित रहते हैं। देवि! यह सब विषय तुम्हें बताया गया। प्रिये इस विषयमें अब तुम संशयरहित हो जाओ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! किस आचरणसे मनुष्य चिरजीवी होते हैं और किससे अल्पायु हो जाते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! यह सारा गूढ़ रहस्य मनुष्योंके लिये परम लाभदायक है। जिस आचरणसे सम्पन्न मनुष्य चिरजीवी होते हैं, वह सब सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोधका त्याग, क्षमा, सरलता, गुरुजनोंकी नित्य सेवा, बड़ेबूढ़ोंका पूजन, पवित्रताका ध्यान रखकर न करनेयोग्य कर्मोंका त्याग, सदा ही पथ्य भोजन इत्यादि गुणोंवाला आचार दीर्घजीवी मनुष्योंका है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा रसायनके सेवनसे मनुष्य अधिक धैर्यशाली, बलवान्‌ और चिरजीवी होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मात्मा पुरुष स्वर्गमें हो या मनुष्यलोकमें, वे दीर्घधकालतक अपने पदपर बने रहते हैं। इनके सिवा दूसरे जो पापकर्मी प्रायः झूठ बोलनेवाले, हिंसाप्रेमी, गुरुद्रोही, अकर्मण्य, शौचाचारसे रहित, नास्तिक, घोरकर्मी, सदा मांस खाने और मद्य पीनेवाले, पापाचारी, गुरुसे द्वेष रखनेवाले, क्रोधी और कलहप्रेमी हैं, ऐसे असदाचारी पुरुष चिरकालतक नरकमें पड़े रहते हैं तथा तिर्यग्योनिमें स्थित होते हैं, वे मनुष्य-शरीरमें अत्यन्त अल्प समयतक ही रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसीलिये ऐसे मनुष्य अल्पायु होते हैं। अगम्य स्थानोंमें जानेसे, अपथ्य वस्तुओंका भोजन करनेसे मनुष्योंकी आयु क्षीण होती है, क्योंकि वे आयुका नाश करनेवाले हैं ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऊपर बताये हुए कारणोंसे मनुष्य अल्पायु होते हैं, अन्यथा चिरजीवी होते हैं। यह सारा विषय मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--देवदेव! महादेव! भगवन्‌! यह विषय तो मैंने अच्छी तरह सुन लिया। अब यह बताइये कि आत्माका स्त्री या पुरुषमेंसे किस जातिके साथ सम्बन्ध है? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीवात्मा स्त्रीरूप है या पुरुषरूप? एक है या अलग-अलग? देव! यह मेरा संशय है। आप इसका निवारण करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहे श्वरने कहा--जीवात्मा सदा ही निर्विकार है! वह न स्त्री है न पुरुष। वह कर्मके अनुसार विभिन्न जातियोंमें जन्म लेता है। पुरुषोचित कर्म करके स्त्री भी पुरुष हो सकती है ।और स्त्री-भावनासे युक्त पुरुष तदनुरूप कर्म करके उस कर्मके अनुसार स्त्री हो सकता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन! सर्वलोकेश्वर! यदि आत्मा कर्म नहीं करता तो शरीरमें दूसरा कौन कर्म करनेवाला है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--भामिनि! कर्ता कौन है? यह सुनो। आत्मा कर्म नहीं करता है। प्रकृतिके गुणोंसे युक्त प्राणीद्वारा ही सदा कर्म किया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगतमें प्राणियोंका शरीर जैसे वात, पित्त और कफ--इन तीन दोषोंसे व्याप्त रहता है, इसी प्रकार प्राणी सत्त्व, रज और तम--इन गुणोंसे व्याप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सत्त्व, रज और तम--ये तीनों शरीरधारीके गुण हैं। इनमेंसे सत्त्व सदा प्रकाशस्वरूप माना गया है। रजोगुण दुःखरूप और तमोगुण मोहरूप बताया गया है। लोकमें इन तीनों गुणोंसे युक्त कर्मकी प्रवृत्ति होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सत्यभाषण, प्राणियोंपर दया, शौच, श्रेय, प्रीति, क्षमा और इन्द्रिय-संयम--ये तथा ऐसे ही अन्य कर्म भी सात्त्विक कहलाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दक्षता, कर्मपरायणता, लोभ, विधिके प्रति मोह, स्त्री-संग, माधुर्य तथा सदा ऐश्वर्यका लोभ--ये नाना प्रकारके भाव और कर्म रजोगुणसे प्रकट होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;असत्यभाषण, रूखापन, अत्यन्त अधीरता, हिंसा, असत्य, नास्तिकता, निद्रा, आलस्य और भय--ये तथा पापयुक्त कर्म तमोगुणसे प्रकट होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये समस्त शुभाशुभ कार्यारम्भ गुणमय है, अतः आत्माको व्यग्रतारहित, अकर्ता और अविनाशी समझो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सात््विक मनुष्य पुण्यलोकोंमें जाते हैं। राजस जीव मनुष्यलोकमें स्थित होते हैं तथा तमोगुणी मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिमें और नरकमें स्थित होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--इस शरीरके भेदनसे अथवा शस्त्रद्वारा मारे जानेसे आत्मा स्वयं ही क्‍यों चला जाता है? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--कल्याणि! इसका कारण मैं बताता हूँ, सुनो। इस विषयमें सूक्ष्म बुद्धिवाले विद्वान्‌ भी मोहित हो जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जन्मधारी प्राणियोंके कर्मोंका क्षय हो जानेपर इस देहमें जिस किसी भी कारणसे उपद्रव होने लगता है। उसके कारण शरीरका क्षय हो जानेपर देहाभिमानी जीव कर्मके अधीन हो उस शरीरको त्यागकर चला जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शरीर क्षीण होता है, आत्मा नहीं। वह वेदनाओंसे भी विचलित नहीं होता। जबतक कर्मफल शेष रहता है, तबतक जीवात्मा इस शरीरमें स्थित रहता है और कर्मोंका क्षय होनेपर पुनः चला जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आदिकालसे ही इस जगत्‌में आत्माकी ऐसी ही गति मानी गयी है। देवि! यह सब विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;i&gt;(नोट:- ये अध्याय समाप्त नहीं हुआ है,, आगे निरंतर है,)&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1269 पेज तक&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/2292091226765193322/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2026/07/145-chapter-entire-mahabharata.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-96½ &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कमोंका वर्णन”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! सर्वभूतेश्वर देवासुरवन्दित देव! विभो! अब मुझे धर्म और अधर्मका स्वरूप बताइये; जिससे उनके विषयमें मेरा संदेह दूर हो जाय ।। १&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य मन, वाणी और क्रिया--इन तीन प्रकारके बन्धनोंसे सदा बँधता है और फिर उन बन्धनोंसे मुक्त होता है || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! किस शील-स्वभावसे, किस बर्तावसे, कैसे कर्मसे तथा किन सदाचारों अथवा गुणोंद्वारा मनुष्य बँधते, मुक्त होते एवं स्वर्गमें जाते हैं |। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाली, सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली, इन्द्रियसंयम-परायणे देवि! तुम्हारा प्रश्न समस्त प्राणियोंके लिये हितकर तथा बुद्धिको बढ़ानेवाला है, इसका उत्तर सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य धर्मसे उपार्जित किये हुए धनको भोगते हैं, सम्पूर्ण आश्रमसम्बन्धी चिह्नोंसे बिलग रहकर भी सत्य, धर्ममें तत्पर रहते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं |। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिनके सब प्रकारके संदेह दूर हो गये हैं, जो प्रलय और उत्पत्तिके तत्त्वको जाननेवाले, सर्वज्ञ और सर्वद्रष्टा हैं, वे महात्मा न तो धर्मसे बँधते हैं और न अधर्मसे || ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसीकी हिंसा नहीं करते हैं और जिनकी आसक्ति सर्वथा दूर हो गयी है, वे पुरुष कर्मबन्धनोंसे मुक्ता हो जाते हैं || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो कहीं आसक्त नहीं होते, किसीके प्राणोंकी हत्यासे दूर रहते हैं तथा जो सुशील और दयालु हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनोंमें नहीं पड़ते, जिनके लिये शत्रु और प्रिय मित्र दोनों समान हैं, वे जितेन्द्रिय पुरुष कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं |। ८ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सब प्राणियोंपर दया करनेवाले, सब जीवोंके विश्वासपात्र तथा हिंसामय आचरणोंको त्याग देनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं || ९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दूसरोंके धनपर ममता नहीं रखते, परायी स्त्रीसे सदा दूर रहते और धर्मके द्वारा प्राप्त किये अन्नका ही भोजन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं || १० ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मानव परायी स्त्रीको माता, बहिन और पुत्रीके समान समझकर तदनुरूप बर्ताव करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं || ११ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सदा अपने ही धनसे संतुष्ट रहकर चोरी-चमारीसे अलग रहते हैं तथा जो अपने भाग्यपर ही भरोसा रखकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। १२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहकर ऋतुकालमें ही उसके साथ समागम करते हैं और ग्राम्य सुख-भोगोंमें आसक्त नहीं होते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं |। १३ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपने सदाचारके द्वारा सदा ही परायी स्त्रियोंकी ओरसे अपनी आँखें बंद किये रहते हैं, वे जितेन्द्रिय और शीलपरायण मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं || १४ | ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह देवताओंका बनाया हुआ मार्ग है। राग और द्वेषको दूर करनेके लिये इस मार्गकी प्रवृति हुई है। अतः साधारण मनुष्यों तथा विद्वान्‌ पुरुषोंको भी सदा ही इसका सेवन करना चाहिये || १५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह दान, धर्म और तपस्यासे युक्त तथा शील, शौच और दयामय मार्ग है। मनुष्यको जीविका एवं धर्मके लिये सदा ही इस मार्गका सेवन करना चाहिये। जो स्वर्गलोकमें निवास करना चाहता हो, उनके लिये सेवन करनेयोग्य इससे बढ़कर उत्कृष्ट मार्ग नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--निष्पाप भूतनाथ! महादेव! कैसी वाणी बोलने अथवा उस वाणीद्वधारा कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य बन्धनमें पड़ता या उस बन्धनसे छुटकारा पा जाता है? उन वाचिक कर्मोका मुझसे वर्णन कीजिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहे श्वरने कहा--जो हँसी और परिहासका सहारा लेकर भी अपने या दूसरेके लिये कभी झूठ नहीं बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो आजीविका अथवा धर्मके लिये तथा स्वेच्छाचारसे भी कभी असत्य भाषण नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो स्निग्ध, मधुर, बाधारहित और पापशून्य तथा स्वागत-सत्कारके भावसे युक्त वाणी बोलते हैं, वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो किसीकी चुगली नहीं खाते और कभी किसीसे रूखी, कड़वी और निष्ठुरतापूर्ण बात मुहसे नहीं निकालते, वे सज्जन पुरुष स्वर्गमें जाते हैं || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दो मित्रोंमें फूट डालनेवाली चुगलीकी बातें नहीं करते हैं, सत्य और मैत्रीभावसे युक्त वचन बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मानव दूसरोंसे तीखी बातें बोलना और द्रोह करना छोड़ देते हैं, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखने-वाले और जितेन्द्रिय होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिनके मुँहसे कभी शठतापूर्ण बात नहीं निकलती, जो विरोधयुक्त वाणीका त्याग करते हैं और सदा सौम्य (कोमल) वाणी बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो क्रोधमें आकर भी हृदयको विदीर्ण करनेवाली बात मुँहसे नहीं निकालते हैं तथा क्रुद्ध होनेपर भी सान्त्वनापूर्ण वचन ही बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! यह वाणीजनित धर्म बताया गया है। मनुष्योंको सदा इसका सेवन करना चाहिये। विद्वानोंको उचित है कि वे सदा शुभ और सत्य वचन बोलें तथा मिथ्याका परित्याग करें&quot; || २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--महाभाग! पिनाकधारी देवदेव! जिस मानसिक कर्मसे मनुष्य सदा बन्धनमें पड़ता है, उसको मुझे बताइये ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहे श्वरने कहा--कल्याणि! जो सदा मानसिक धर्मसे युक्त हैं अर्थात्‌ मनसे धर्मका ही चिन्तन और आचरण करते हैं, वे पुरुष स्वर्गमें जाते हैं। मैं इस विषयमें जो बताता हूँ, उसे सुनो ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुभानने! मनमें दुर्विचार आनेसे मनुष्यके कार्य भी दुर्नीतिपूर्ण एवं दूषित होते हैं, जिससे मन बन्धनमें पड़ जाता है। इस विषयमें मेरी बात सुनो || ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब दूसरेका धन निर्जन वनमें पड़ा हुआ दिखायी दे, उस समय भी जो उसकी ओर मन ललचाकर किसीकी हिंसा नहीं करते, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गाँव या घरके एकान्त स्थानमें पड़े हुए पराये धनका जो कभी अभिनन्दन नहीं करते हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं || ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार जो मनुष्य एकान्तमें प्राप्त हुई कामासक्त परायी स्त्रियोंको मनसे भी उनके साथ अन्याय करनेका विचार नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं || ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सबके प्रति मैत्रीभाव रखकर सबसे मिलते तथा शत्रु और मित्रको भी सदा समान हृदयसे अपनाते है, वे मानव स्वर्गलोकमें जाते हैं || ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो शास्त्रज्ञ, दयालु पवित्र, सत्यप्रतिज्ञ और अपने ही धनसे संतुष्ट होते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं | ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिनके मनमें किसीके प्रति वैर नहीं है, जो आयासरहित, मैत्रीभावसे पूर्ण हृदयवाले तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति सदा ही दयाभाव रखनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।। ३६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो श्रद्धालु, दयालु, शुद्ध, शुद्धजनोंके प्रेमी तथा धर्म और अधर्मके ज्ञाता हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! जो शुभ और अशुभ कर्मोके फल-संचयके विषयमें परिणामके ज्ञाता हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो न्यायशील, गुणवान्‌, देवताओं और द्विजोंके भक्त तथा उत्थानको प्राप्त हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं || ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! जो शुभ कर्मोके फलोंसे स्वर्गलोकके मार्ममें स्थित हैं, उनका वर्णन मैंने यहाँ किया है। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? ।। ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा-महेश्वर! मुझे मनुष्योंके विषयमें एक महान्‌ संशय है। आप अच्छी तरह उस संशयका समाधान करें || ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! मनुष्य किस कर्मसे दीर्घायु प्राप्त करता है? तथा देवेश्वर! किस तपस्यासे मनुष्यको बड़ी आयु प्राप्त होती है? || ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनिन्द्य महादेव! इस भूतलपर कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण हो जाती है? आप मुझसे कर्म-विपाकका वर्णन करें ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस जगत्‌में कुछ लोग महान्‌ भाग्यशाली हैं तो कुछ लोग मन्दभाग्य हैं, कुछ लोग निन्दित कुलमें उत्पन्न हैं तो दूसरे लोग उच्चकुलमें ।। ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ मनुष्य दुर्दशाके मारे काष्ठमय (जडवत्‌) प्रतीत हो रहे हैं, उनकी ओर देखना कठिन जान पड़ता है और दूसरे कितने ही मनुष्य दर्शनमात्रसे मन प्रसन्न कर देते हैं, उनकी ओर देखना प्रिय लगता है || ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ लोग दुर्बुद्धि जान पड़ते हैं और कुछ विद्वान्‌ तथा कितने ही ज्ञान-विज्ञानशाली महाप्राज्ञ प्रतीत होते हैं || ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देव! कुछ लोग साधारण एवं स्वल्प बाधाओंसे ग्रस्त होते हैं और कुछ लोगोंको बड़ीबड़ी बाधाएँ घेरे रहती हैं। इस तरह जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी विषम अवस्थामें पड़े हुए पुरुष दिखायी देते हैं, उनकी इस विषमताका क्‍या कारण है? यह मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ।। ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! अब मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें बता रहा हूँ कि कर्मके फलका उदय किस प्रकार होता है और मर्त्यलोकके सभी मनुष्य किस प्रकार अपनी-अपनी करनीका फल भोगते हैं || ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! जो मनुष्य दूसरोंका प्राण लेनेके लिये हाथमें डंडा लेकर सदा भयंकर रूप धारण किये रहता है, जो प्रतिदिन हथियार उठाये जगत्‌के प्राणियोंकी हत्या किया करता है, जिसके भीतर किसीके प्रति दया नहीं होती, जो समस्त प्राणियोंको सदा उद्वेगमें डाले रहता है और जो अत्यन्त क्रूर होनेके कारण चींटी और कीड़ोंको भी शरण नहीं देता, ऐसा मानव घोर नरकमें पड़ता है || ४९-५० $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसका स्वभाव इसके विपरीत है, वह धर्मात्मा और रूपवान्‌ होता है। देवि! हिंसाप्रेमी मनुष्य अपने पापकर्मके कारण दूसरोंका वध्य, सब प्राणियोंका अप्रिय तथा अल्पायु होता है ।। ५१-५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसका चित्त हिंसामें लगा होता है, वह नरकमें गिरता है और जो किसीकी हिंसा नहीं करता, वह स्वर्गमें जाता है। नरकमें पड़े हुए जीवको बड़ी कष्टटायक और भयंकर यातना भोगनी पड़ती है ।। ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि कभी कोई उस नरकसे छुटकारा पाता है तो मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है, किंतु वहाँ उसकी आयु बहुत थोड़ी होती है || ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! पापकर्मसे बाँधा हुआ हिंसापरायण मनुष्य समस्त प्राणियोंका अप्रिय होनेके कारण अल्पायु हो जाता है || ५५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके विपरीत जो शुद्ध कुलमें उत्पन्न और जीवहिंसासे अलग रहनेवाला है, जिसने शस्त्र और दण्डका परित्याग कर दिया है, जिसके द्वारा कभी किसीकी हिंसा नहीं होती, जो न मारता है, न मारनेकी आज्ञा देता है और न मारनेवालेका अनुमोदन ही करता है। जिसके मनमें सब प्राणियोंके प्रति स्नेह बना रहता है तथा जो अपने ही समान दूसरोंपर भी दयादृष्टि रखता है। देवि! ऐसा श्रेष्ठ पुरुष देवत्वको प्राप्त होता है और देवलोकमें प्रसन्नतापूर्वक स्वतः उपलब्ध हुए सुखद भोगोंका अनुभव करता है ॥। ५६--५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अथवा यदि कदाचित्‌ वह मनुष्यलोकमें जन्म लेता है तो वह मनुष्य दीर्घायु और सुखी होता है ।। ५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सत्कर्मका अनुष्ठान करनेवाले सदाचारी एवं दीर्घजीवी मनुष्योंका लक्षण है। स्वयं ब्रह्माजीने इस मार्गका उपदेश किया है। समस्त प्राणियोंकी हिंसाका परित्याग करनेसे ही इसकी उपलब्धि होती है || ६० ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादाविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय प्रा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;b&gt;टीका टिप्पणी -&lt;/b&gt;&lt;/i&gt; &lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;i&gt;उपर्युक्त कर्मोका निष्कामभावसे आचरण करनेवाले पुरुषको परमात्मपदकी प्राप्ति हो जाती है।&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/6999101997600180428/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2026/05/144-chapter-entire-mahabharata.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/6999101997600180428'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/6999101997600180428'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2026/05/144-chapter-entire-mahabharata.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) का एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय  (the 144 chapter the entire Mahabharata (anushashn Parva)'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ बयालीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ बयालीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-96½&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पार्वतीने कहा--भगवन्‌! नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले एकाग्रचित्त वानप्रस्थी महात्मा नदियोंके रमणीय तटप्रदेशोंमें, झरनोंमें, सरिताओंके तटवर्ती निकुंजोंमें, पर्वतोंपर, वनोंमें और फल-मूलसे सम्पन्न पवित्र स्थानोंमें निवास करते हैं ।। १-२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कल्याणकारी देवेश्वर! वानप्रस्थी महात्मा अपने शरीरको ही कष्ट पहुँचाकर जीवननिर्वाह करते हैं; अतः उनके पालन करनेयोग्य जो पवित्र कर्तव्य या नियम है, उसीको मैं सुनना चाहती हूँ ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ _महेश्वरने कहा--देवि! (गृहस्थ एवं) वानप्रस्थोंका जो धर्म है, उसको मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो और सुनकर एकचित्त हो अपनी बुद्धिको धर्ममें लगाओ ।। ४&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नियमोंका पालन करके सिद्ध हुए वनवासी साधु वानप्रस्थोंको यह कर्म करना चाहिये। कैसा कर्म? यह बताता हूँ, सुनो || ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य पहले गृहस्थ होकर पुत्रोंके उत्पादन-द्वारा पितरोंक ऋणसे उऋण हो पत्नीसे सम्पन्न होनेवाले कार्यकी पूर्ति करके धर्मसम्पादनके लिये गृहका परित्याग कर दे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनको धैर्यपूर्वक स्थिर करके मनुष्य दृढ़ निश्चयके साथ निर्द्धनद्ध (एकाकी) होकर अथवा स्त्रीको साथ रखकर वनवासके लिये प्रस्थान करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नदी और वनसे युक्त जो परम पुण्यमय प्रदेश हैं, वे प्रायः अज्ञानसे मुक्त और तीर्थों तथा देवस्थानोंसे सुशोभित हैं। उनमें जाकर विधिका ज्ञान प्राप्त करके क्रमश: ऋषिधर्मकी दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षित होनेके पश्चात्‌ एकचित्त हो परिचर्या आरम्भ करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सबेरे उठना, शौचाचारका पालन करना, सब देवताओंको मस्तक झुकाना, शरीरमें गायका गोबर लगाकर नहाना, दोष और प्रमादका त्याग करना, सायंकाल और प्रात:काल स्नान एवं विधिवत्‌ अग्निहोत्र करना, ठीक समयपर शौचाचारका पालन करना, सिरपर जटा और कटिप्रदेशमें वल्कल धारण करना, समिधा और पुष्पका संग्रह करनेके लिये सदा वनमें विचरना, समयपर नीवारसे आग्रयण कर्म (नवशस्येष्टि यज्ञका सम्पादन) करना, साग और मूलका संकलन करना तथा सदा अपने घरको शुद्ध रखना--आदि कार्य वानप्रस्थ मुनिके लिये अभीष्ट है। इनसे उसके धर्मकी सिद्धि होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले अतिथियोंके सम्मुख जाय, फिर सदा उनकी सेवामें तत्पर रहे। पाद्य और आसन आदिके द्वारा उनकी पूजा करके उन्हें भोजनके लिये बुलावे। समयपर ऐसी वस्तुओंसे रसोई बनावे, जो गाँवमें पैदा न हुई हों। उस रसोईके द्वारा पहले देवताओं और पितरोंका पूजन करे। तत्पश्चात्‌ अतिथिको सत्कारपूर्वक भोजन करावे। ऐसा करनेवाले वानप्रस्थको सनातन धर्मकी सिद्धि प्राप्त होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मासनपर बैठे हुए शिष्ट पुरुषोंद्वारा उसे धर्मार्थयुक्त कथाएँ सुननी चाहिये। उसे अपने लिये पृथक्‌ आश्रम बना लेना चाहिये। वह पृथ्वी अथवा प्रस्तरकी शय्यापर सोये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वानप्रस्थ मुनि व्रत और उपवासमें तत्पर रहे, दूसरोंपर क्षमाका भाव रखे, अपनी इन्द्रियोंको वशमें करे। दिन-रात यथासम्भव शौचाचारका पालन करके धर्मका चिन्तन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्हें दिनमें तीन बार स्नान, पितरों और देवताओंका पूजन, अग्निहोत्र तथा विधिवत्‌ यज्ञ करने चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वानप्रस्थको जीविकाके लिये नीवार (तिन्नीका चावल) और फल-मूलका सेवन करना चाहिये तथा शरीरमें स्निग्धता लाने या तेलसे होनेवाले कार्योंके निर्वाहके लिये इंगुद और रेड़ीके तेलका सेवन करना उचित है | ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्हें योगका अभ्यास करके उसमें सिद्धि प्राप्त करनी चाहिये। काम और क्रोधको त्याग देना चाहिये। वीरासनसे बैठकर वीरस्थान (विशाल और घने जंगल) में निवास करने चाहिये ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनको एकाग्र रखकर योगसाधनमें तत्पर रहना चाहिये। श्रेष्ठ वानप्रस्थको गर्मीमें पंचाग्नि सेवन करना चाहिये। हठयोगशास्त्रमें प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अभ्यासमें नियमपूर्वक लगे रहना चाहिये। किसी भी वस्तुका न्यायानुकूल सेवन करना चाहिये ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदा वीरासनसे बैठना और वेदी या चबूतरेपर सोना चाहिये। धर्ममें बुद्धि रखनेवाले वानस्थ मुनियोंकों शीततोयाग्नियोगका आचरण करना चाहिये अर्थात्‌ उन्हें सर्दीकी मौसममें रातको जलके भीतर बैठना या खड़े रहना, बरसातमें खुले मैदानमें सोना और ग्रीष्म-ऋतुमें पंचाग्निका सेवन करना चाहिये || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे वायु अथवा जल पीकर रहें। सेवारका भोजन करें। पत्थरसे अन्न या फलको कूँचकर खायाँ अथवा दाँतोंसे चबाकर ही भक्षण करें। सम्प्रक्षालके नियमसे रहें अर्थात्‌ दूसरे दिनके लिये आहार संग्रह करके न रखें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अधोवस्त्रकी जगह चीर और वल्कल पहनें, उत्तरीयके स्थानमें मृगछालेसे ही अपने अंगोंको आच्छादित करें। उन्हें समयके अनुसार धर्मके उद्देश्यसे विधिपूर्वक तीर्थ आदि स्थानोंकी ही यात्रा करनी चाहिये ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वानप्रस्थको सदा वनमें ही रहना, वनमें ही विचरना, वनमें ही ठहरना, वनके ही मार्गपर चलना और गुरुकी भाँति वनकी शरण लेकर वनमें ही जीवन-निर्वाह करना चाहिये ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतिदिन अग्निहोत्र और पंचमहायज्ञोंका सेवन वानप्रस्थोंका धर्म है। उन्हें विभागपूर्वक वेदोक्त पंच-यज्ञोंका निरन्तर पालन करना चाहिये ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अष्टमी तिथिको होनेवाले अष्टका श्राद्धरूप यज्ञमें तत्पर रहना, चातुर्मास्य व्रतका सेवन करना, पौर्णमास और दर्शादि यज्ञ तथा नित्ययज्ञका अनुष्ठान करना वानप्रस्थ मुनिका धर्म है ।। १५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वानप्रस्थ मुनि स्त्री-समागम, सब प्रकारके संकर तथा सम्पूर्ण पापोंसे दूर रहकर वनमें विचरते रहते हैं || १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खुक्‌-सुवा आदि यज्ञपात्र ही उनके लिये उत्तम उपकरण हैं। वे सदा आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियोंकी शरण लेकर सदा उन्हींकी परिचर्यामें लगे रहते हैं और नित्य सन्मार्गपर चलते हैं। इस प्रकार अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले वे श्रेष्ठ पुरुष परमगतिको प्राप्त होते हैं ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे मुनि सत्यधर्मका आश्रय लेनेवाले और सिद्ध होते हैं, अतः महान्‌ पुण्यमय ब्रह्मलोक तथा सनातन सोमलोकमें जाते हैं ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! यह मैंने तुम्हारे निकट विस्तारयुक्त एवं मंगलमय वानप्रस्थधर्मका स्थूलभावसे वर्णन किया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमादेवी बोलीं--भगवन्‌! सर्वभूतेश्वर! समस्त प्राणियोंद्वारा वन्दित महेश्वर! ज्ञानगोष्ठियोंमें मुनि-समुदायका जो धर्म निश्चित किया गया है, उसे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज्ञानगोष्ठियोंमें जो सम्यक्‌ सिद्ध बताये गये हैं, वे वनवासी मुनि कोई तो एकाकी ही स्वच्छन्द विचरते हैं, कोई पत्नीके साथ रहते हैं। उनका धर्म कैसा माना गया है? ।। 21&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! सभी वानप्रस्थ तपस्यामें संलग्न रहते हैं, उनमेंसे कुछ तो स्वच्छन्द विचरनेवाले होते हैं (स्त्रीको साथ नहीं रखते) और कुछ अपनी-अपनी स्त्रीके साथ रहते हैं। स्वच्छन्द विचरनेवाले मुनि सिर मुड़ाकर गेरुए वस्त्र पहनते हैं; (उनका कोई एक स्थान नहीं होता) किंतु जो स्त्रीके साथ रहते हैं, वे रात्रिको अपने आश्रममें ही ठहरते हैं ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दोनों प्रकारके ही ऋषियोंका यह महान्‌ कर्तव्य है कि वे प्रतिदिन तीनों समय जलनमें स्नान करें और अग्निमें आहुति डालें। समाधि लगावें, सन्मार्गपर चलें और शास्त्रोक्त कर्मोका अनुष्ठान करें || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले जो तुम्हारे समक्ष वनवासियोंके धर्म बताये गये हैं, उन सबका यदि वे पालन करते हैं तो उन्हें अपनी तपस्याका पूर्ण फल मिलता है ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गृहस्थ दाम्पत्य धर्मका पालन करते हुए स्त्रीको अपने साथ रखते हैं, उसके साथ ही इन्द्रियसंयम-पूर्वक वेदविहित धर्मका आचरण करते हैं और केवल ऋतुकालनमें ही स्त्रीसमागम करते हैं, उन धर्मात्माओंको ऋषियोंके बताये हुए धर्मोके पालन करनेका फल मिलता है। धर्मदर्शी पुरुषोंको कामनावश किसी भोगका सेवन नहीं करना चाहिये || २५-२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो हिंसादोषसे मुक्त होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान कर देता है, उसीको धर्मका फल प्राप्त होता है ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करता है, सबके साथ सरलताका बर्ताव करता और समस्त भूतोंको आत्मभावसे देखता है, वही धर्मके फलसे युक्त होता है || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चारों वेदोंमें निष्णात होना और सब जीवोंके प्रति सरलताका बर्ताव करना--ये दोनों एक समान समझे जाते हैं अथवा सरलताका ही महत्त्व अधिक माना जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सरलताको धर्म कहते हैं और कुटिलताको अधर्म। सरलभावसे युक्त मनुष्य ही यहाँ धर्मके फलका भागी होता है ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सदा सरल बर्तावमें तत्पर रहता है, वह देवताओंके समीप निवास करता है। इसलिये जो अपने धर्मका फल पाना चाहता हो, उसे सरलतापूर्ण बर्तावसे युक्त होना चाहिये ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्षमाशील, जितेन्द्रिय, क्रोधविजयी, धर्मनिष्ठ, अहिंसक और सदा धर्मपरायण मनुष्य ही धर्मके फलका भागी होता है ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष आलस्यरहित, धर्मात्मा, शक्तिके अनुसार श्रेष्ठ मार्गपपर चलनेवाला, सच्चरित्र और ज्ञानी होता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमादेवी बोलीं--सबको मान देनेवाले महेश्वर! मैं यायावरोंके धर्मको सुनना चाहती हूँ, आप महान्‌ अनुग्रह करके मुझे यह बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--भामिनि! तुम तत्पर होकर यायावरोंके धर्म सुनो। व्रत और उपवाससे उनके अंग-प्रत्यंग शुद्ध हो जाते हैं तथा वे तीर्थ-स्नानमें तत्पर रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनमें धैर्य और क्षमाका भाव होता है। वे सत्यव्रत-परायण होकर एक-एक पक्ष और एक-एक मासका उपवास करके अत्यन्त दुर्बल हो जाते हैं। उनकी दृष्टि सदा धर्मपर ही रहती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पवित्र मुसकानवाली देवि! वे सर्दी, गर्मी और वर्षाका कष्ट सहन करते हुए बड़ी भारी तपस्या करते हैं और कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ भी नाना प्रकारके भोगोंसे संयुक्त और दिव्यगन्धसे सम्पन्न हो दिव्य आभूषण धारण करके सुन्दर विमानोंपर बैठते और दिव्यांगनाओंके साथ इच्छानुसार विहार करते हैं। देवि! यह सब यायावरोंका धर्म मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--प्रभो! वानप्रस्थ ऋषियोंमें जो चक्रचर (छकड़ेसे यात्रा करनेवाले) हैं उनके धर्मको मैं जानना चाहती हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--शुभे! यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। चक्रचारी या शाकटिक मुनियोंका धर्म सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे अपनी स्त्रियोंक साथ सदा छकड़ोंके बोझ ढोते हुए यथासमय छकड़ोंद्वारा ही जाकर भिक्षाकी याचना करते हैं। सदा तपस्याके उपार्जनमें लगे रहते हैं। वे धीर मुनि तपस्याद्वारा अपने सारे पापोंका नाश कर डालते हैं तथा काम और क्रोधसे रहित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें पर्यटन करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शोभने! उसी जीवनचर्यासे रहित हुए वे कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गमें जाते हैं और वहाँ दिव्य भोगोंसे आनन्दित हो अपने मौजसे घूमते-फिरते हैं। देवि! तुम्हारे इस प्रश्नचका भी उत्तर दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--प्रभो! अब मैं वैखानसोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--शुभेक्षणे! वे जो वैखानस नामवाले वानप्रस्थ हैं, बड़ी कठोर तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अपने तेजसे देदीप्यमान होते हैं। सत्यव्रत-परायण और धीर होते हैं। उनकी तपस्यामें पापका लेश भी नहीं होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनमेंसे कुछ लोग अभश्मकुट्ट (पत्थरसे ही अन्न या फलको कूँचकर खानेवाले) होते हैं। दूसरे दाँतोंस ही ओखलीका काम लेते हैं, तीसरे सूखे पत्ते चबाकर रहते हैं, चौथे उज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले होते हैं। कुछ कापोती वृत्तिका आश्रय लेकर कबूतरोंके समान अन्नके एक-एक दाने बीनते हैं। कुछ लोग पशुचर्याको अपनाकर पशुओंके साथ ही चलते और उन्हींकी भाँति तृण खाकर रहते हैं। दूसरे लोग फेन चाटकर रहते हैं तथा अन्य बहुतेरे वैखानस मृगचर्याका आश्रय लेकर मृगोंके समान उन्हींके साथ विचरते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ लोग जल पीकर रहते, कुछ लोग हवा खाकर निर्वाह करते और कितने ही निराहार रह जाते हैं। कुछ लोग भगवान्‌ विष्णुके चरणारविन्दोंका उत्तम रीतिसे पूजन करते हैं।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे रोग और मृत्युसे रहित हो घोर तपस्या करते हैं और अपनी ही शक्तिसे प्रतिदिन मृत्युको डराया करते हैं। उनके लिये इन्द्रलोकमें ढेर-के-ढेर भोग संचित रहते हैं। वे देवतुल्य भोगोंसे सम्पन्न हो देवताओंकी समानता प्राप्त कर लेते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सती साध्वी देवि! वे चिरकालतक श्रेष्ठ अप्सराजोंके साथ रहकर सुखका अनुभव करते हैं। यह तुमसे वैखानसोंका धर्म बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--भगवन्‌! अब मैं तपस्याके धनी वालखिल्योंका परिचय सुनना चाहती हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! वालखिल्योंकी धर्मचर्याका वर्णन सुनो। वे मृगछाला पहनते हैं, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्*ोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। तपस्या ही उनका धन है। सुश्रोणि! उनके शरीरकी लम्बाई एक अंगूठेके बराबर है, उन्हीं शरीरोंमें वे सब एक साथ रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे प्रतिदिन नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा निरन्तर उगते हुए सूर्यकी स्तुति करते हुए सहसा आगे बढ़ते जाते हैं और अपनी सूर्यतुल्य किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते रहते हैं। वे सब-के-सब धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्हींमें लोकरक्षाके लिये निर्मल सत्य प्रतिष्ठित है। देवि! उन वालखिल्योंके ही तपोबलसे यह सारा जगत्‌ टिका हुआ है। पवित्र मुसकानवाली महाभागे! उन्हीं महात्माओंकी तपस्या, सत्य और क्षमाके प्रभावसे सम्पूर्ण भूतोंकी स्थिति बनी हुई है, ऐसा मनीषी पुरुष मानते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महान्‌ पुरुष समस्त प्रजावर्ग तथा सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करते हैं। तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तपस्यासे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। लोकमें जो दुर्लभ वस्तु है, वह भी तपस्यासे सुलभ हो जाती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--देव! जो तपस्याके धनी तपस्वी अपने आश्रमधर्ममें ही रम रहे हैं, वे किस आचरणसे तपस्वी होते हैं? || ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवन्‌! जो राजा या राजकुमार हैं अथवा जो निर्धन या महाधनी हैं, वे किस कर्मके प्रभावसे महान्‌ फलके भागी होते हैं? ।। ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देव! वनवासी मुनि किस कर्मसे दिव्य स्थानको पाकर दिव्य चन्दनसे विभूषित होते हैं? । ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देव! त्रिपुरनाशन त्रिलोचन! तपस्याके आश्रित शुभ फलके विषयमें मेरा यही संदेह है। इस सारे संदेहका उत्तर आप पूर्णरूपसे प्रदान करें ।। ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--जो उपवास व्रतसे सम्पन्न, जितेन्द्रिय, हिंसारहित और सत्यवादी होकर सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं, वे मृत्युके पश्चात्‌ रोग-शोकसे रहित हो गन्धर्वोके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो धर्मात्मा पुरुष न्यायानुसार विधिपूर्वक हठयोग-प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अनुसार शयन करता और यज्ञकी दीक्षा लेता है, वह नागलोकमें नागोंके साथ सुख भोगता है ।। ३९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मृगचर्या-व्रतकी दीक्षा ले मृगोंके मुखसे उच्छिष्ट हुई घासको प्रसन्नतापूर्वक उन्हींके साथ रहकर भक्षण करता है, वह मृत्युके पश्चात्‌ अमरावतीपुरीमें जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो व्रतधारी वानप्रस्थ मुनि सेवार अथवा जीर्ण-शीर्ण पत्तेका आहार करता तथा जाड़ेमें प्रतेदिन शीतका कष्ट सहन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ।। ४१&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो वायु, जल, फल अथवा मूल खाकर रहता है, वह यक्षोंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करके अप्सराओंके साथ आनन्द भोगता है ।। ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गर्मीमें शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पंचाग्नि सेवन करता है, वह बारह वर्षोतक उक्त व्रतका पालन करके जन्मान्तरमें भूमण्डलका राजा होता है || ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मुनि बारह वर्षोतक आहारका संयम करता हुआ यत्नपूर्वक मरु-साधना करके अर्थात्‌ जलको भी त्यागकर तप करता है, वह भी इस पृथ्वीका राजा होता है || ४४।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो वानप्रस्थ अपने चारों ओर विशुद्ध आकाशको ग्रहण करता हुआ खुले मैदानमें वेदीपर सोता और बारह वर्षोके लिये प्रसन्नतापूर्वक व्रतकी दीक्षा ले उपवास करके अपना शरीर त्याग देता है, वह स्वर्गलोकमें सुख भोगता है || ४५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भामिनि! वेदीपर शयन करनेसे प्राप्त होनेवाले फल इस प्रकार बताये गये हैं--सवारी, शय्या और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल बहुमूल्य गृह ।। ४६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो केवल अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ नियमपूर्वक रहता है और नियमित भोजन करता है अथवा अनशन व्रतका आश्रय ले शरीरको त्याग देता है, वह स्वर्गका सुख भोगता है || ४७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ बारह वर्षोकी दीक्षा ले महासागरमें अपने शरीरका त्याग कर देता है, वह वरुणलोकमें सुख भोगता है ।। ४८ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ निर्द्धनद्ध और परिग्रहशून्य हो बारह वर्षोके लिये व्रतकी दीक्षा ले अन्तमें पत्थरसे अपने पैरोंको विदीर्ण करके स्वयं ही अपने शरीरको त्याग देता है, वह गुह्कलोकमें आनन्द भोगता है ।। ४९-५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह वर्षोतक इस मनोगत दीक्षाका पालन करता है, वह स्वर्गलोकमें जाता और देवताओंके साथ आनन्द भोगता है ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह वर्षोके लिये व्रत-पालनकी दीक्षा ले अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ अपने शरीरको अग्निमें होम देता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है || ५२&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! जो ब्राह्मण नियमपूर्वक रहकर यथोचित रीतिसे वनवास-व्रतकी दीक्षा ले अपने मनको परमात्मचिन्तनमें लगाकर ममताशून्य और धर्मका अभिलाषी होकर बारह वर्षोतक इस मनोगत दीक्षाका पालन करके अरणी-सहित अग्निको वृक्षकी डालीमें बाँधकर अर्थात्‌ अग्निका परित्याग करके अनावृत भावसे यात्रा करता है, सदा वीर मार्गसे चलता है, वीरासनपर बैठता है और वीरकी भाँति खड़ा होता है, वह वीरगतिको प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह इन्द्रलोकमें जाकर सदा सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न होता है। उसके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होती है तथा वह दिव्य चन्दनसे विभूषित होता है ।। ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह धर्मात्मा देवलोकमें देवताओंके साथ सुख-पूर्वक निवास करता है और निरन्तर वीरलोकमें रहकर वीरोंके साथ संयुक्त होता है || ५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सब कुछ त्यागकर वनवासकी दीक्षा ले सत्त्वगुणमें स्थित नियमपरायण एवं पवित्र हो वीरपथका आश्रय लेता है, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं || ५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह इन्द्रलोकमें जाकर नीरोग और दिव्य शोभासे सम्पन्न हो आनन्द भोगता है और इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा स्वच्छन्द विचरता रहता है || ५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादाविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;i&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३७½ श्लोक मिलाकर कुल ९६½ “लोक हैं)&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ&amp;nbsp; तैंतालीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-59&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“ब्राह्मणादि वर्णोकी प्राप्तिमें मनुष्य के शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पार्वतीजीने पूछा--भगदेवताकी आँख फोड़कर पूषाके दाँत तोड़ डालनेवाले दक्षयज्ञविध्वंसी भगवान्‌ त्रिलोचन! मेरे मनमें यह एक महान्‌ संशय है ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन चार वर्णोंकी सृष्टि की है, उनमेंसे वैश्य किस कर्मके परिणामसे शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है? |। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अथवा क्षत्रिय किस कर्मसे वैश्य होता है और ब्राह्मण किस कर्मसे क्षत्रिय हो जाता है? देव! प्रतिलोम धर्मको कैसे निवृत्त किया जा सकता है? ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! कौन-सा कर्म करनेसे ब्राह्मण शूद्र-योनिमें जन्म लेता है अथवा किस कर्मसे क्षत्रिय शूद्र हो जाता है? ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देव! पापरहित भूतनाथ! मेरे इस संशयका समाधान कीजिये। शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय --इन तीन वर्णोंके लोग किस प्रकार स्वभावतः ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो सकते हैं? || ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। शुभे! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शाद्र --ये चारों वर्ण मेरे विचारसे नैसर्गिक (प्राकृतिक या स्वभावसिद्ध) हैं, ऐसा मेरा विचार है ।। ६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इतना अवश्य है कि यहाँ पापकर्म करनेसे द्विज अपने स्थानसे-अपनी महत्तासे नीचे गिर जाता है। अत: द्विजको उत्तम वर्णमें जन्म पाकर अपनी मर्यादाकी रक्षा करनी चाहिये ।। ७ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि क्षत्रिय अथवा वैश्य ब्राह्मण-धर्मका पालन करते हुए ब्राह्मणत्वका सहारा लेता है तो वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण ब्राह्मणत्वका त्याग करके क्षत्रिय-धर्मका सेवन करता है, वह अपने धर्मसे भ्रष्ट होकर क्षत्रिय योनिमें जन्म लेता है ।। ९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो विप्र दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर लोभ और मोहके वशीभूत हो अपनी मन्दबुद्धिताके कारण वैश्यका कर्म करता है, वह वैश्ययोनिमें जन्म लेता है। अथवा यदि वैश्य शूद्रके कर्मको अपनाता है, तो वह भी शाूद्रत्वको प्राप्त होता है। शूद्रोचित कर्म करके अपने धर्मसे भ्रष्ट हुआ ब्राह्मण शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है ।। १०-११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मण-जातिका पुरुष शूद्र-कर्म करनेके कारण अपने वर्णसे भ्रष्ट होकर जातिसे बहिष्कृत हो जाता है और मृत्युके पश्चात्‌ वह ब्रह्मलोककी प्राप्तिसे वंचित होकर नरकमें पड़ता है। इसके बाद वह शूद्रकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाभागे! धर्मचारिणि! क्षत्रिय अथवा वैश्य भी अपने-अपने कर्मोंको छोड़कर यदि शूद्रका काम करने लगता है तो वह अपनी जातिसे भ्रष्ट होकर वर्णसंकर हो जाता है और दूसरे जन्ममें शूद्रकी योनिमें जन्म पाता है। ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य कोई भी क्यों न हो, वह शूद्रभावको प्राप्त होता है ।। १३-१४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष अपने वर्णधर्मका पालन करते हुए बोध प्राप्त करता है और ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, पवित्र तथा धर्मज्ञ होकर धर्ममें ही लगा रहता है, वही धर्मके वास्तविक फलका उपभोग करता है ।। १५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! ब्रह्माजीनी यह एक बात और बतायी है--धर्मकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंको आजीवन अध्यात्म-तत्त्वका ही सेवन करना चाहिये ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! उग्रस्वभावके मनुष्यका अन्न निन्दित माना गया है। किसी समुदायका, श्राद्धका, जननाशौचका, दुष्ट पुरुषका और शूद्रका अन्न भी निषिद्ध है--उसे कभी नहीं खाना चाहिये ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओं और महात्मा पुरुषोंने शूद्रके अन्नकी सदा ही निन्‍्दा की है। इस विषयमें पितामह ब्रह्माजीके श्रीमुखका वचन प्रमाण है, ऐसा मेरा विश्वास है ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण पेटमें शूद्रका अन्न लिये मर जाता है, वह अग्निहोत्री अथवा यज्ञ करनेवाला ही क्‍यों न रहा हो, उसे शूद्रकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उदरमें शूद्रात्नका शेषभाग स्थित होनेके कारण ब्राह्मण ब्रह्मलोकसे वंचित हो शूद्रभावको प्राप्त होता है; इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उदरमें जिसके अन्नका अवशेष लेकर जो ब्राह्मण मृत्युको प्राप्त होता है, वह उसीकी योनिमें जाता है। जिसके अन्नसे जीवन-निर्वाह करता है, उसीकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो शुभ एवं दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर उसकी अवहेलना करता है और नहीं खानेयोग्य अन्न खाता है, वह निश्चय ही ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शराबी, ब्रह्महत्यारा, नीच, चोर, व्रतभंग करनेवाला, अपवित्र, स्वाध्यायहीन, पापी, लोभी, कपटी, शठ, व्रतका पालन न करनेवाला, शूद्रजातिकी स्त्रीका स्वामी, कुण्डाशी (पतिके जीते-जी उत्पन्न किये हुए जारज पुत्रके घरमें खानेवाला अथवा पाकपात्रमें ही भोजन करनेवाला), सोमरस बेचनेवाला और नीचसेवी ब्राह्मण ब्राह्मणकी योनिसे भ्रष्ट हो जाता है || २३-२४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गुरुकी शैय्यापर सोनेवाला, गुरुद्रोही और गुरुनिन्दामें अनुरक्त है, वह ब्राह्मण वेदवेत्ता होनेपर भी ब्रह्मयोनिसे नीचे गिर जाता है || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! इन्हीं शुभ कर्मों और आचरणोंसे शूद्र ब्राह्मणत्वको प्राप्त होता है और वैश्य क्षत्रियत्वको ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्र अपने सभी कर्मोको न्यायानुसार विधिपूर्वक सम्पन्न करे। अपनेसे ज्येष्ठ वर्णकी सेवा और परिचर्यामें प्रयत्नपूर्वक लगा रहे। अपने कर्तव्यपालनसे कभी ऊबे नहीं। सदा सन्मार्गपर स्थित रहे। देवताओं और द्विजोंका सत्कार करे। सबके आतिथ्यका व्रत लिये रहे। ऋतुकालमें ही स्त्रीके साथ समागम करे। नियमपूर्वक रहकर नियमित भोजन करे। स्वयं शुद्ध रहकर शुद्ध पुरुषोंका ही अन्वेषण करे। अतिथि-सत्कार और कुट॒म्बीजनोंके भोजनसे बचे हुए अन्नका ही आहार करे और मांस न खाय। इस नियमसे रहनेवाला शूद्र (मृत्युके पश्चात्‌ पुण्यकर्मोंका फल भोगकर) वैश्ययोनिमें जन्म लेता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैश्य सत्यवादी, अहंकारशून्य, निर्द्धन्द्ध, शान्तिके साधनोंका ज्ञाता, स्वाध्यायपरायण और पवित्र होकर नित्य यज्ञोंद्वारा यजन करे। जितेन्द्रिय होकर ब्राह्म॒णोंका सत्कार करते हुए समस्त वर्णोकी उन्नति चाहे। गृहस्थके व्रतका पालन करते हुए प्रतिदिन दो ही समय भोजन करे। यज्ञशेष अन्नका ही आहार करे। आहारपर काबू रखे। सम्पूर्ण कामनाओंको त्याग दे। अहंकारशून्य होकर विधिपूर्वक आहुति देते हुए अग्निहोत्र कर्मका सम्पादन करे। सबका आतिथ्य-सत्कार करके अवशिष्ट अन्नका स्वयं भोजन करे। त्रिविध अग्नियोंकी मन्त्रोच्चारणपूर्वक परिचर्या करे। ऐसा करनेवाला वैश्य द्विज होता है। वह वैश्य पवित्र एवं महान क्षत्रियकुलमें जन्म लेता है ।। ३०--३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुआ वह वैश्य जन्मसे ही क्षत्रियोचित संस्कारसे सम्पन्न हो उपनयनके पश्चात्‌ ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर हो सर्वसम्मानित द्विज होता है। वह दान देता है, पर्याप्त दक्षिणावाले समृद्धिशाली यज्ञोंद्वारा भगवानका यजन करता है, वेदोंका अध्ययन करके स्वर्गकी इच्छा रखकर सदा त्रिविध अग्नियोंकी शरण ले उनकी आराधना करता है, दुःखी एवं पीड़ित मनुष्योंको हाथका सहारा देता है, प्रतिदिन प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करता है, स्वयं सत्यपरायण होकर सत्यपूर्ण व्यवहार करता है तथा दर्शनसे ही सबके लिये सुखद होता है, वही श्रेष्ठ क्षत्रिय अथवा राजा है || ३५--३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मानुसार अपराधीको दण्ड दे। दण्डका त्याग न करे। प्रजाको धर्मकार्यका उपदेश दे। राजकार्य करनेके लिये नियम और विधानसे बँधा रहे। प्रजासे उसकी आयका छठा भाग करके रूपमें ग्रहण करे ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कार्यकुशल धर्मात्मा क्षत्रिय स्वच्छन्दतापूर्वक ग्राम्य धर्म (मैथुन) का सेवन न करे। केवल ऋतुकालमें ही सदा पत्नीके निकट शयन करे ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदा उपवास करे अर्थात्‌ एकादशी आदिके दिन उपवास करे और दूसरे दिन भी सदा दो ही समय भोजन करे। बीचमें कुछ न खाय। नियमपूर्वक रहे, वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहे, पवित्र हो प्रतिदिन अग्निशालामें कुशकी चटाईपर शयन करे ।। ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्षत्रिय सदा प्रसन्नतापूर्वक सबका आतिथ्य-सत्कार करते हुए धर्म, अर्थ और कामका सेवन करें। शूद्र भी यदि अन्नकी इच्छा रखकर उसके लिये प्रार्थना करे तो क्षत्रिय उनके लिये सदा यही उत्तर दे कि तुम्हारे लिये भोजन तैयार है, चलो कर लो || ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह स्वार्थ या कामनावश किसी वस्तुका प्रदर्शन न करे। जो पितरों, देवताओं तथा अतिथियोंकी सेवाके लिये चेष्टा करता है, वही श्रेष्ठ क्षत्रिय है ।। ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्षत्रिय अपने ही घरमें न्‍्यायपूर्वक भिक्षा (भोजन) करे। तीनों समय विधिवत्‌ अग्निहोत्र करता रहे ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह धर्ममें स्थित हो त्रिविध अग्नियोंकी मन्त्रपूर्वक परिचर्यासे पवित्रचित्त हो यदि गौओं तथा ब्राह्मणोंके हितके लिये समरमें शत्रुका सामना करते हुए मारा जाय तो दूसरे जन्ममें ब्राह्मण होता है || ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार धर्मात्मा क्षत्रिय अपने कर्मसे जन्मान्तरमें ज्ञानविज्ञानसम्पन्न, संस्कारयुक्त तथा वेदोंका पारंगत विद्वान ब्राह्मण होता है || ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! इन कर्मफलोंके प्रभावसे नीच जाति एवं हीन कुलमें उत्पन्न हुआ शूद्र भी जन्मान्तरमें शास्त्रज्ञान-सम्पन्न और संस्कारयुक्त ब्राह्मण होता है ।। ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मण भी यदि दुराचारी होकर सम्पूर्ण संकर जातियोंके घर भोजन करने लगे तो वह ब्राह्मणत्वका परित्याग करके वैसा ही शूद्र बन जाता है || ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! शूद्र भी यदि जितेन्द्रिय होकर पवित्र कर्मोके अनुष्ठानसे अपने अन्तःकरणको शुद्ध बना लेता है, वह द्विजकी ही भाँति सेव्य होता है--यह साक्षात्‌ ब्रह्माजीका कथन है || ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरा तो ऐसा विचार है कि यदि शूद्रके स्वभाव और कर्म दोनों ही उत्तम हों तो वह द्विजातिसे भी बढ़कर माननेयोग्य है ।। ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिमें न तो केवल योनि, न संस्कार, न शास्त्रज्ञान और न संतति ही कारण है। ब्राह्मणत्वका प्रधान हेतु तो सदाचार ही है || ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोकमें यह सारा ब्राह्मणसमुदाय सदाचारसे ही अपने पदपर बना हुआ है। सदाचारमें स्थित रहनेवाला शाद्र भी ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो सकता है ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुश्रोणि! ब्रह्मका स्वभाव सर्वत्र समान है। जिसके भीतर उस निर्गुण और निर्मल ब्रह्मका ज्ञान है, वही वास्तवमें ब्राह्मण है, ऐसा मेरा विचार है || ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! ये जो चारों वर्णोंके स्थान और विभाग बतलाये गये हैं, ये उस-उस जातिमें जन्म ग्रहण करनेके फल हैं। प्रजाकी सृष्टि करते समय वरदाता ब्रह्माजीने स्वयं ही यह बात कही है ।। ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भामिनि! ब्राह्मण संसारमें एक महान क्षेत्र है। दूसरे क्षेत्रोंकी अपेक्षा इसमें विशेषता इतनी ही है कि यह पैरोंसे युक्त चलता-फिरता खेत है। इस क्षेत्रमें जो बीज डाला जाता है, वह परलोकके लिये जीविकाकी साधनरूप खेतीके रूपमें परिणत हो जाता है || ५४&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपना कल्याण चाहनेवाले ब्राह्मणको उचित है कि वह सज्जनोंके मार्गका अवलम्बन करके सदा अतिथि और पोष्यवर्गको भोजन करानेके बाद अन्न ग्रहण करे, वेदोक्त पथका आश्रय लेकर उत्तम बर्ताव करे || ५५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गृहस्थ ब्राह्मण घरमें रहकर प्रतिदिन संहिताका पाठ और शास्त्रोंका स्वाध्याय करे। अध्ययनको जीविकाका साधन न बनावे ।। ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार जो ब्राह्मण सन्मार्गपर स्थित हो सत्पथका ही अनुसरण करता है तथा अन्निहोत्र एवं स्वाध्यायपूर्वक जीवन बिताता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ।। ५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! शुचिस्मिते! मनुष्यको चाहिये कि वह ब्राह्मणत्वको पाकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए योनि, प्रतिग्रह और दानकी शुद्धि एवं सत्कर्मोंद्वारा उसकी रक्षा करे ।। ५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गिरिराजकुमारी! शूद्र धर्माचरण करनेसे जिस प्रकार ब्राह्मणत्वको प्राप्त करता है तथा ब्राह्मण स्वधर्मका त्याग करके जातिसे भ्रष्ट होकर जिस प्रकार शूद्र हो जाता है, यह गूढ़ रहस्यकी बात मैंने तुम्हें बतला दी ॥५९॥&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार&amp;nbsp; श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादाविषयक एक सौ तैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;टीका टिप्पणी - &lt;/b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;उपर्युक्त कर्मोका निष्कामभावसे आचरण करनेवाले पुरुषको परमात्मपदकी प्राप्ति हो जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/3021872569335020795/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2026/05/142-chapter-and-143-chapter-entire.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/3021872569335020795'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/3021872569335020795'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2026/05/142-chapter-and-143-chapter-entire.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) का एक सौ बयालीसवाँ अध्याय व एक सौ तैंतालीसवाँ (the 142 chapter the and 143 chapter entire Mahabharata (anushashn Parva)'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' 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कथा"/><title type='text'>सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) का एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय  (the 141 chapter the entire Mahabharata (anushashn Parva)</title><content type='html'>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; 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small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-115&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“शिव-पार्वतीका धर्मविषयक संवाद--वर्णाश्रम धर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ शिवने कहा-! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने एक सर्वोत्तम नारीकी सृष्टि की थी। उन्होंने सम्पूर्ण रत्नोंका तिल-तिलभर सार उद्धृत करके उस शुभलक्षणा सुन्दरीके अंगोंका निर्माण किया था; इसलिये वह तिलोत्तमा नामसे प्रसिद्ध हुई ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! शुभे! इस पृथ्वीपर तिलोत्तमाके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सुमुखी बाला मुझे लुभाती हुई मेरी परिक्रमा करनेके लिये आयी ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! वह सुन्दर दाँतोंवाली सुन्दरी निकटसे मेरी परिक्रमा करती हुई जिस-जिस दिशाकी ओर गयी, उस-उस दिशाकी ओर मेरा मनोरम मुख प्रकट होता गया ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तिलोत्तमाके रूपको देखनेकी इच्छासे मैं योगबलसे चतुर्मूर्ति एवं चतुर्मुख हो गया। इस प्रकार मैंने लोगोंको उत्तम योगशक्तिका दर्शन कराया ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं पूर्व दिशावाले मुखके द्वारा इन्द्रपदका अनुशासन करता हूँ। अनिन्दिते! मैं उत्तरवर्ती मुखके द्वारा तुम्हारे साथ वार्तालापके सुखका अनुभव करता हूँ ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरा पश्चिमवाला मुख सौम्य है और सम्पूर्ण प्राणियोंको सुख देनेवाला है तथा दक्षिण दिशावाला भयानक मुख रौद्र है, जो समस्त प्रजाका संहार करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोगोंके हितकी कामनासे ही मैं जटाधारी ब्रह्मचारीके वेषमें रहता हूँ। देवताओंका हित करनेके लिये पिनाक सदा मेरे हाथमें रहता है ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालमें इन्द्रने मेरी श्री प्राप्त करनेकी इच्छासे मुझपर वज्रका प्रहार किया था। वह वजच्र मेरा कण्ठ दग्ध करके चला गया। इससे मेरी श्रीकण्ठ नामसे ख्याति हुई ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राचीन कालके दूसरे युगकी बात है, बलवान्‌ देवताओं और असुरोंने मिलकर अमृतकी प्राप्तिके लिये महान्‌ प्रयास करते हुए चिरकालतक महासागरका मन्थन किया था ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नागराज वासुकिकी रस्सीसे बँधी हुई मन्दराचलरूपी मथानीद्वारा जब महासागर मथा जाने लगा, तब उससे सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाला विष प्रकट हुआ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसे देखकर सब देवताओंका मन उदास हो गया। देवि! तब मैंने तीनों लोकोंके हितके लिये उस विषको स्वयं पी लिया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुभे! उस विषके ही कारण मेरे कण्ठमें मोर-पंखके समान नीले रंगका चिह्न बन गया। तभीसे मैं नीलकण्ठ कहा जाने लगा। ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दी। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--सम्पूर्ण लोकोंको सुख देनेवाले नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! बहुत-से आयुधोंके होते हुए भी आप पिनाकको ही किसलिये धारण करना चाहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--पवित्र मुसकानवाली महादेवि! सुनो। मुझे जिस प्रकार धर्मानुकूल शस्त्रोंकी प्राप्ति हुई है, उसे बता रहा हूँ। युगान्तरमें कण्वनामसे प्रसिद्ध एक महामुनि हो गये हैं। उन्होंने दिव्य तपस्या करनी आरम्भ की ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रिये! उसके अनुसार घोर तपस्या करते हुए मुनिके मस्तकपर कालक्रमसे बाँबी जम गयी। वह सब अपने मस्तकपर लिये-दिये वे पूर्ववत्‌ तपश्चर्यामें लगे रहे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुनिकी तपस्यासे पूजित हुए ब्रह्माजी उन्हें वर देनेके लिये गये। वर देकर भगवान्‌ ब्रह्माने वहाँ एक बाँस देखा और उसके उपयोगके लिये कुछ विचार किया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भामिनि! उस बाँसके द्वारा जगत॒का उपकार करनेके उद्देश्यसे कुछ सोचकर ब्रह्माजीने उस वेणुको हाथमें ले लिया और उसे धनुषके उपयोगमें लगाया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोकपितामह ब्रह्माने भगवान्‌ विष्णुकी और मेरी शक्ति जानकर उनके और मेरे लिये तत्काल दो धनुष बनाकर दिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे धनुषका नाम पिनाक हुआ और श्रीहरिके धनुषका नाम शार्ज्। उस वेणुके अवशेष भागसे एक तीसरा धनुष बनाया गया, जिसका नाम गाण्डीव हुआ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गाण्डीव धनुष सोमको देकर ब्रह्माजी फिर अपने लोकको चले गये। अनिन्दिते! शस्त्रोंकी प्राप्तिका यह सारा वृत्तान्त मैंने तुम्हें कह सुनाया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महादेव! इस जगत्‌में अन्य सब सुन्दर वाहनोंके होते हुए क्‍यों वृषभ ही आपका वाहन बना है? ।। ९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--प्रिये! ब्रह्माजीने देवताओंके लिये दूध देनेवाली सुरभि नामक गायकी सृष्टि की, जो मेघके समान दूधरूपी जलकी वर्षा करनेवाली थी। उत्पन्न हुई सुरभि अमृतमय दूध बहाती हुई अनेक रूपोंमें प्रकट हो गयी || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन उसके बछड़ेके मुखसे निकला हुआ फेन मेरे शरीरपर पड़ गया। इससे मैंने कुपित होकर गौओंको ताप देना आरम्भ किया। मेरे रोषमें दग्ध हुई गौओंके रंग नाना प्रकारके हो गये ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब अर्थनीतिके ज्ञाता लोकमुरु ब्रह्माने मुझे शान्त किया तथा ध्वज-चिह्न और वाहनके रूपमें यह वृषभ मुझे प्रदान किया ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! स्वर्गलोकमें अनेक प्रकारके सर्वगुणसम्पन्न निवासस्थान हैं, उन सबको छोड़कर आप श्मशान-भूमिमें कैसे रमते हैं? ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्मशानभूमि तो केशों और हड्डियोंसे भरी होती है। उस भयानक भूमिमें मनुष्योंकी खोपड़ियाँ और घड़ें पड़े रहते हैं। गीधों और गीदड़ोंकी जमातें जुटी रहती हैं। वहाँ सब ओर चिताएँ जला करती हैं। मांस, वसा और रक्तकी कीच-सी मची रहती है। बिखरी हुई आँतोंवाली हड्डियोंके ढेर पड़े रहते हैं और सियारिनोंकी हुआँ-हुआँकी ध्वनि वहाँ गूँजती रहती है, ऐसे अपवित्र स्थानमें आप क्‍यों रहते हैं? ।। १४-१५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--प्रिये! मैं पवित्र स्थान ढूँढ़नेके लिये सदा सारी पृथ्वीपर दिन-रात विचरता रहता हूँ, परंतु श्मशानसे- बढ़कर दूसरा कोई पवित्रतर स्थान यहाँ मुझे नहीं दिखायी दे रहा है ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये सम्पूर्ण निवासस्थानोंमेंसे श्मशानमें ही मेरा मन अधिक रमता है। वह श्मशानभूमि बरगदकी डालियोंसे आच्छादित और मुर्दोके शरीरसे टूटकर गिरी हुई पुष्पमालाओंके द्वारा विभूषित होती है ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पवित्र मुसकानवाली देवि! ये मेरे भूतगण श्मशानमें ही रमते हैं। इन भूतगणोंके बिना मैं कहीं भी रह नहीं सकता || १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुभे! यह श्मशानका निवास ही मैंने अपने लिये पवित्र और स्वर्गीय माना है। यही परम पुण्यस्थली है। पवित्र वस्तुकी कामना रखनेवाले उपासक इसीकी उपासना करते हैं ।। १९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनिन्दिते! इस श्मशानभूमिसे अधिक पवित्र दूसरा कोई स्थान नहीं है, क्योंकि वहाँ मनुष्योंका अधिक आना-जाना नहीं होता। इसीलिये वह स्थान पवित्रतम माना गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रिये! वह वीरोंका स्थान है, इसलिये मैंने वहाँ अपना निवास बनाया है। वह मृतकोंकी सैकड़ों खोपड़ियोंसे भरा हुआ भयानक स्थान भी मुझे सुन्दर लगता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दोपहरके समय, दोनों संध्याओंके समय तथा आर्द्रा नक्षत्रमें दीर्घायुकी कामना रखनेवाले अथवा अशुद्ध पुरुषोंको वहाँ नहीं जाना चाहिये, ऐसी मर्यादा है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे सिवा दूसरा कोई भूतजनित भयका नाश नहीं कर सकता। इसलिये मैं श्मशानमें रहकर समस्त प्रजाओंका प्रतिदिन पालन करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरी आज्ञा मानकर ही भूतोंके समुदाय अब इस जगतूमें किसीकी हत्या नहीं कर सकते हैं। सम्पूर्ण जगत्‌के हितके लिये मैं उन भूतोंको श्मशानभूमिमें रमाये रखता हूँ। श्मशानभूमिमें रहनेका सारा रहस्य मैंने तुमको बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन! देवदेवेश्वर! त्रिनेत्र! वृषभध्वज! आपका रूप पिंगल, विकृत और भयानक प्रतीत होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपके सारे शरीरमें भभूति पुती हुई है, आपकी आँख विकराल दिखायी देती है, दाढ़ें तीखी हैं और सिरपर जटाओंका भार लदा हुआ है, आप बाघम्बर लपेटे हुए हैं और आपके मुखपर कपिल रंगकी दाढ़ी-मूँछ फैली हुई है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपका रूप ऐसा रौद्र, भयानक, घोर तथा शूल और पट्टिश आदिसे युक्त किसलिये है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--प्रिये! मैं इसका भी यथार्थ कारण बताता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जगतके सारे पदार्थ दो भागोंमें विभक्त हैं--शीत और उष्ण (अग्नि और सोम) ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्नि-सोम-रूप यह सम्पूर्ण जगत्‌ उन शीत और उष्ण तत्त्वोंमें गुँथा हुआ है। सौम्य गुणकी स्थिति सदा भगवान्‌ विष्णुमें है और मुझमें आग्नेय (तैजस) गुण प्रतिष्ठित है। इस प्रकार इस विष्णु और शिवरूप शरीरसे मैं सदा समस्त लोकोंकी रक्षा करता हूँ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! यह जो विकराल नेत्रोंसे युक्त और शूल-पट्टिशसे सुशोभित भयानक आकृतिवाला मेरा रूप है, यही आग्नेय है। यह सम्पूर्ण जगतके हितमें तत्पर रहता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुभानने! यदि मैं इस रूपको त्यागकर इसके विपरीत हो जाऊँ तो उसी समय सम्पूर्ण लोकोंकी दशा विपरीत हो जायगी ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! इसलिये लोकहितकी इच्छासे ही मैंने यह रूप धारण किया है। अपने रूपका यह सारा रहस्य बता दिया, अब और क्‍या सुनना चाहती हो? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारदजी कहते हैं--देवेश्वर भगवान्‌ शंकरके ऐसा कहनेपर सभी महर्षि बड़े विस्मित हुए और हाथ जोड़कर अपनी वाणीद्वारा उन महादेवजीकी स्तुति करने लगे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋषि बोले--सर्वेश्वर शंकर! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌के गुरुदेव! आपको नमस्कार है। देवताओंके भी आदि देवता! आपको नमस्कार है। चन्द्रकलाधारी शिव! आपको नमस्कार है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अत्यन्त घोरसे भी घोर रुद्रदेव! शंकर! आपको बार-बार नमस्कार है। अत्यन्त शान्तसे भी शान्त शिव! आपको नमस्कार है। चन्द्रमाके पालक! आपको नमस्कार है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमासहित महादेवजीको नमस्कार है। चतुर्मुख/ आपको नमस्कार है। गंगाजीके जलको सिरपर धारण करनेवाले भूतनाथ शम्भो! आपको नमस्कार है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हाथोंमें त्रिशूल धारण करनेवाले तथा सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित आप महादेवको नमस्कार है। दक्ष-यज्ञको दग्ध करनेवाले त्रिलोचन! आपको नमस्कार है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोकरक्षामें तत्पर रहनेवाले शंकर! आपके बहुत-से नेत्र हैं, आपको नमस्कार है। अहो! महादेवजीका कैसा माहात्म्य है। अहो! रुद्रदेवकी कैसी कृपा है। ऐसी धर्मपरायणता देवदेव महादेवके ही योग्य है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारदजी कहते हैं--जब मुनि इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, उसी समय अवसरको जाननेवाली देवी पार्वती मुनियोंकी प्रसन्नताके लिये भगवान्‌ शंकरसे परम हितकी बात बोलीं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ! सर्वभूतेश्वरर भगवन्‌! वरदायक! पिनाकपाणे! मेरे मनमें यह एक और महान्‌ संशय है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! यह जो मुनियोंका सारा समुदाय यहाँ उपस्थित है, सदा तपस्यामें संलग्न रहा है और तपस्वीका वेष धारण किये लोकमें भ्रमण कर रहा है; इन सबकी आकृति भिन्न-भिन्न प्रकारकी है। शत्रुदमन शिव! इस ऋषिसमुदायका तथा मेरा भी प्रिय करनेकी इच्छासे आप मेरे इस संदेहका समाधान करें || २१-२२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! धर्मज्ञ! धर्मका क्या लक्षण बताया गया है? तथा जो धर्मको नहीं जानते हैं ऐसे मनुष्य उस धर्मका आचरण कैसे कर सकते हैं? यह मुझे बताइये ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारदजी कहते हैं--तदनन्तर समस्त मुनि-समुदायने देवी पार्वतीकी ऋग्वेदके मन्त्रार्थोंसे सुशोभित वाणी तथा उत्तम अर्थयुक्त स्तोत्रोंद्वारा स्तुति एवं प्रशंसा की || २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! किसी भी जीवकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, सब प्राणियोंपर दया करना, मन और इन्द्रियोंपर काबू रखना तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान देना गृहस्थ-आश्रमका उत्तम धर्म है ।। २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(उक्त गृहस्थ-धर्मका पालन करना,) परायी स्त्रीके संसर्गसे दूर रहना, धरोहर और सत्रीकी रक्षा करना, बिना दिये किसीकी वस्तु न लेना तथा मांस और मदिराको त्याग देना --से धर्मके पाँच भेद हैं, जो सुखकी प्राप्ति करानेवाले हैं। इनमेंसे एक-एक धर्मकी अनेक शाखाएँ हैं। धर्मको श्रेष्ठ माननेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे पुण्यप्रद धर्मका पालन अवश्य करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--भगवन्‌! मैं एक और संशय उपस्थित करती हूँ; चारों वर्णोका जो-जो धर्म अपने-अपने वर्णके लिये विशेष लाभकारी हो, वह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणके लिये धर्मका स्वरूप कैसा है, क्षत्रियके लिये कैसा है, वैश्यके लिये उपयोगी धर्मका क्‍या लक्षण है तथा शूद्रके धर्मका भी कया लक्षण है? ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! तुम्हारे मनको प्रिय लगनेवाला जो यह धर्मका विषय है, उसे बताऊँगा। तुम वर्णों और आश्रमोंपर अवलम्बित समस्त धर्मका पूर्णरूपसे वर्णन सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र--ये वर्णोौंके चार भेद हैं। लोकतन्त्रकी इच्छा रखनेवाले विधाताने सबसे पहले ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है और शास्त्रोंमें उनके योग्य कर्मोका विधान किया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! यदि यह सारा जगत्‌ एक ही वर्णका होता तो सब साथ ही नष्ट हो जाता। इसलिये विधाताने चार वर्ण बनाये हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणोंकी सृष्टि विधाताके मुखसे हुई है, इसीलिये वे वाणीविशारद होते हैं। क्षत्रियोंकी सृष्टि दोनों भुजाओंसे हुई है, इसीलिये उन्हें अपने बाहुबलपर गर्व होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैश्योंकी उत्पत्ति उदरसे हुई है, इसीलिये वे उदर-पोषणके निमित्त कृषि, वाणिज्यादि वार्तवृत्तिका आश्रय ले जीवन-निर्वाह करते हैं। शूद्रोंकी सृष्टि पैरसे हुई है, इसलिये वे परिचारक होते हैं। देवि! अब तुम एकाग्रचित्त होकर चारों वर्णोौंके धर्म और कर्मोंका वर्णन सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्यणको इस भूमिका देवता बनाया गया है। वे सब लोकोंकी रक्षाके लिये उत्पन्न किये गये हैं। अतः अपने हितकी इच्छा रखनेवाले किसी भी मनुष्यको ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! यदि दान और योगका वहन करनेवाले वे ब्राह्मण न हों तो लोक और परलोक दोनोंकी स्थिति कदापि नहीं रह सकती ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मणोंका अपमान और निन्दा करता अथवा उन्हें क्रोध दिलाता या उनपर प्रहार करता अथवा उनका धन हर लेता है या काम, लोभ एवं मोहके वशीभूत होकर उनसे नीच कर्म कराता है, वह नराधम मेरा ही अपमान या निन्दा करता है। मुझे ही क्रोध दिलाता है, मुझपर ही प्रहार करता है, वह मूढ़ मेरे ही धनका अपहरण करता है तथा वह मूढ़चित्त मानव मुझे ही इधर-उधर भेजकर नीच कर्म कराता और निन्दा करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदोंका स्वाध्याय, यज्ञ और दान ब्राह्मणका धर्म है, यह शास्त्रका निर्णय है। वेदोंको पढ़ाना, यजमानका यज्ञ कराना और दान लेना--ये उसकी जीविकाके साधनभूत कर्म हैं। सत्य, मनोनिग्रह, तप और शौचाचारका पालन--यह उनका सनातन धर्म है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रस और धान्य (अनाज) का विक्रय करना ब्राह्मणके लिये निन्दित है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदा तप करना ही ब्राह्मणका धर्म है, इसमें संशय नहीं है। विधाताने पूर्वकालमें धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये ही अपने तपोबलसे ब्राह्मणको उत्पन्न किया था ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाभागे! मैंने तुम्हारे निकट सब प्रकारसे धर्मका निर्णय किया है। महाभाग ब्राह्मण इस लोकमें सदा भूमिदेव माने गये हैं || ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसमें संशय नहीं कि उपवास (इन्द्रियसंयम) व्रतका आचरण करना ब्राह्मणके लिये सदा धर्म बतलाया गया है। धर्मार्थसम्पन्न ब्राह्मण ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ।| ३१&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! उसे धर्मका अनुष्ठान और न्यायतः ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिये। व्रतके पालनपूर्वक उपनयन-संस्कारका होना उसके लिये परम आवश्यक है, क्योंकि उसीसे वह द्विज होता है ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुरु और देवताओंकी पूजा तथा स्वाध्याय और अभ्यासरूप धर्मका पालन ब्राह्मणको अवश्य करना चाहिये। धर्मपरायण देहधारियोंको उचित है कि वे पुण्यप्रद धर्मका आचरण अवश्य करें ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--भगवन्‌! मेरे मनमें अभी संशय रह गया है। अत: उसकी व्याख्या करके मुझे समझाइये। चारों वर्णोंका जो धर्म है, उसका पूर्णरूपसे प्रतिपादन कीजिये ।। ३४ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--धर्मका रहस्य सुनना, वेदोक्त व्रतका पालन करना, होम और गुरुसेवा करना--यह ब्रह्मचर्य-आश्रमका धर्म है || ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मचारीके लिये भैक्षचर्या (गाँवोंमेंसे भिक्षा माँगकर लाना और गुरुको समर्पित करना) परम धर्म है। नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहना, प्रतिदिन वेदका स्वाध्याय करना और ब्रह्मचर्याश्रमके नियमोंके पालनमें लगे रहना, ब्रह्मचारीका प्रधान कर्म है || ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मचर्यकी अवधि समाप्त होनेपर द्विज अपने गुरुकी आज्ञा लेकर समावर्तन करे और घर आकर अनुरूप स्त्रीसे विधिपूर्वक विवाह करे ।। ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणको शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये, यह उसका धर्म है। सन्मार्गका सेवन, नित्य उपवास-व्रत और ब्रह्मचर्यका पालन भी धर्म है ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गृहस्थको अग्निस्थापनपूर्वक अग्निहोत्र करनेवाला, स्वाध्यायशील, होमपरायण, जितेन्द्रिय, विधसाशी, मिताहारी, सत्यवादी और पवित्र होना चाहिये ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतिथि-सत्कार करना और गार्हपत्य आदि त्रिविध अग्नियोंकी रक्षा करना उसके लिये धर्म है। वह नाना प्रकारकी इष्टियों और पशुरक्षाकर्मका भी विधिपूर्वक आचरण करे ।। ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यज्ञ करना तथा किसी भी जीवकी हिंसा न करना उसके लिये परम धर्म है। घरमें पहले भोजन न करना तथा विघसाशी होना--कुट॒म्बके लोगोंके भोजन करानेके बाद ही अवशिष्ट अन्नका भोजन करना--यह भी उसका धर्म है || ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब कुट॒ुम्बीजन भोजन कर लें उसके पश्चात्‌ स्वयं भोजन करना-यह गृहस्थ ब्राह्मणका विशेषत: श्रोत्रियका मुख्य धर्म बताया गया है || ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पति और पत्नीका स्वभाव एक-सा होना चाहिये। यह गृहस्थका धर्म है। घरके देवताओंकी प्रतिदिन पुष्पोंद्वारा पूजा करना, उन्हें अन्नकी बलि समर्पित करना, रोज-रोज घर लीपना और प्रतिदिन व्रत रखना भी गृहस्थका धर्म है ।। ४३ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;झाड़-बुहार, लीप-पोतकर स्वच्छ किये हुए घरमें घृतयुक्त आहुति करके उसका धुआँ फैलाना चाहिये। यह ब्राह्मणोंका गार्हस्थ्य धर्म बतलाया, जो संसारकी रक्षा करनेवाला है। अच्छे ब्राह्मणोंके यहाँ सदा ही इस धर्मका पालन किया जाता है ।। ४४-४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! मेरे द्वारा जो क्षत्रिय-धर्म बताया गया है, उसीका अब तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ, तुम मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्षत्रियका सबसे पहला धर्म है प्रजाका पालन करना। प्रजाकी आयके छठे भागका उपभोग करनेवाला राजा धर्मका फल पाता है ।। ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! क्षत्रिय ब्राह्मणोंके पालनमें तत्पर रहते हैं। यदि संसारमें क्षत्रिय न होता तो इस जगत्‌में भारी उलट-फेर या विप्लव मच जाता क्षत्रियोंद्वारा रक्षा होनेसे ही यह जगत्‌ सदा टिका रहता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उत्तम गुणोंका सम्पादन और पुरवासियोंका हितसाधन उसके लिये धर्म है। गुणवान्‌ राजा सदा न्याययुक्त व्यवहारमें स्थित रहे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उसे उसके प्रजापालनरूपी धर्मके प्रभावसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं || ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजाका परम धर्म है--इन्द्रियसंयम, स्वाध्याय, अग्निहोत्रकर्म, दान, अध्ययन, यज्ञोपवीत-धारण, यज्ञानुष्ठान, धार्मिक कार्यका सम्पादन, पोष्यवर्गका भरण-पोषण, आरम्भ किये हुए कर्मको सफल बनाना, अपराधके अनुसार उचित दण्ड देना, वैदिक यज्ञादि कर्मोका अनुष्ठान करना, व्यवहारमें न्यायकी रक्षा करना और सत्यभाषणमें अनुरक्त होना। ये सभी कर्म राजाके लिये धर्म ही हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो राजा दुखी मनुष्योंको हाथका सहारा देता है, वह इस लोक और परलोकमें भी सम्मानित होता है। गौओं और ब्राह्मणोंको संकटसे बचानेके लिये जो पराक्रम दिखाकर संग्राममें मृत्युको प्राप्त होता है, वह स्वर्गमें अश्वमेध यज्ञोंद्वारा जीते हुए लोकोंपर अधिकार जमा लेता है || ५२-५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! इसी प्रकार वैश्य भी लोगोंकी जीवन-यात्राके निर्वाहमें सहायक माने गये हैं। दूसरे वर्णोके लोग उन्हींके सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं। यदि वैश्य न हों तो दूसरे वर्णके लोग भी न रहें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पशुओंका पालन, खेती, व्यापार, अग्निहोत्रकर्म, दान, अध्ययन, सन्मार्गका आश्रय लेकर सदाचारका पालन, अतिथि-सत्कार, शम, दम, ब्राह्मणोंका स्वागत और त्याग--ये सब वैश्योंके सनातन धर्म हैं || ५४-५५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यापार करनेवाले सदाचारी वैश्यको तिल, चन्दन और रसकी विक्री नहीं करनी चाहिये तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य--इस त्रिवर्गका सब प्रकारसे यथाशक्ति यथायोग्य आतिथ्यसत्कार करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्रका परम धर्म है तीनों वर्णोकी सेवा। जो शूद्र सत्यवादी, जितेन्द्रिय और घरपर आये हुए अतिथिकी सेवा करनेवाला है, वह महान्‌ तपका संचय कर लेता है। उसका सेवारूप धर्म उसके लिये कठोर तप है ।। ५७-५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नित्य सदाचारका पालन और देवता तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाले बुद्धिमान्‌ शूद्रको धर्मका मनोवांछित फल प्राप्त होता है ।। ५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार शूद्र भी सम्पूर्ण धर्मॉके साधक बताये गये हैं। यदि शूद्र न हों तो सेवाका कार्य करनेवाला कोई नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहलेके जो तीन वर्ण हैं, वे सब शूद्रमूलक ही हैं, क्योंकि शूद्र ही सेवाका कर्म करनेवाले माने गये हैं। ब्राह्मण आदिकी सेवा ही दास या शूद्रका धर्म माना गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वाणिज्य, कारीगरके कार्य, शिल्प तथा नाट्य भी शूद्रका धर्म है। उसे अहिंसक, सदाचारी और देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजक होना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा शूद्र अपने धर्मसे सम्पन्न और उसके अभीष्ट फलोंका भागी होता है। यह तथा और भी शाूद्र-धर्म कहा गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शोभने! इस प्रकार मैंने तुम्हें एक-एक करके चारों वर्णोका सारा धर्म बतलाया। सुभगे! अब और क्या सुनना चाहती हो? ।। ६० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमा बोलीं--भगवन्‌! देवदेवेश्वर! वृषभध्वज! देव! आपको नमस्कार है। प्रभो! अब मैं आश्रमियोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! एकाग्रचित्त होकर आश्रमधर्मका वर्णन सुनो। ब्रह्मवादी मुनियोंने आश्रमोंका जो धर्म निश्चित किया है, वही यहाँ बताया जा रहा है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह गार्हस्थ्य धर्मपर प्रतिष्ठित है। पंच महायज्ञोंका अनुष्ठान, बाहर-भीतरकी पवित्रता, अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहना, आलस्यको त्याग देना, ऋतुकालमें ही पत्नीके साथ समागम करना, दान, यज्ञ और तपस्यामें लगे रहना, परदेश न जाना और अभन्निहोत्रपूर्वक वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करना--ये गृहस्थके अभीष्ट धर्म हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार वानप्रस्थ आश्रमके सनातन धर्म बताये गये हैं। वानप्रस्थ आश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छावाला पुरुष एकचित्त होकर निश्चय करनेके पश्चात्‌ घरका रहना छोड़कर वनमें चला जाय और वनमें प्राप्त होनेवाले उत्तम आहारोंसे ही जीवन-निर्वाह करे। यही उसके लिये शास्त्रविहित मर्यादा है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीपर सोना, जटा और दाढ़ी-मूँछ रखना, मृगचर्म और वल्कल वस्त्र धारण करना, देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करना, महान्‌ कष्ट सहकर भी देवताओंकी पूजा आदिका निर्वाह करना--यह वानप्रस्थ-का नियम है। उसके लिये प्रतिदिन अग्निहोत्र और त्रिकाल-स्नानका विधान है। ब्रह्मचर्य, क्षमा और शौच आदि उसका सनातन धर्म है। ऐसा करनेवाला वानप्रस्थ प्राणत्यागके पश्चात्‌ देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! यतिधर्म इस प्रकार है। संन्यासी घर छोड़कर इधर-उधर विचरता रहे। वह अपने पास किसी वस्तुका संग्रह न करे। कर्मोके आरम्भ या आयोजनसे दूर रहे। सब ओरसे पवित्रता और सरलताको वह अपने भीतर स्थान दे। सर्वत्र भिक्षासे जीविका चलावे। सभी स्थानोंसे वह विलग रहे। सदा ध्यानमें तत्पर रहना, दोषोंसे शुद्ध होना, सबपर क्षमा और दयाका भाव रखना तथा बुद्धिको तत्त्वके चिन्तनमें लगाये रखना--ये सब संन्यासीके लिये धर्मकार्य हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वरारोहे! जो भूख-प्याससे पीड़ित और थके-मादे आये हुए अतिथिकी सेवा-पूजा करते हैं, उन्हें भी महान्‌ फलकी प्राप्ति होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि अपने घरपर आये हुए सभी अतिथियोंको दानका उत्तम पात्र समझकर दान दें। उन्हें यह विश्वास रखना चाहिये कि आज जो पात्र आयेगा, वह हमारा उद्धार कर देगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समयपर भोजनकी इच्छासे आये अथवा उपस्थित हुए अतिथिका जो समादर करता है, वहाँ ये साक्षात्‌ भगवान्‌ व्यास उपस्थित होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः कोमलचित्त होकर उस अतिथिकी यथा-शक्ति पूजा करनी चाहिये; क्योंकि धर्मका मूल है चित्तका विशुद्ध भाव और यशका मूल है धर्म ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः देवि! सर्वथा सौम्यचित्तसे दान देना चाहिये; क्योंकि जो सौम्यचित्त होकर दान देता है, उसका वह दान सर्वोत्तम होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शोभने! जैसे भूतलपर वर्षाके समय गिरती हुई जलकी छोटी-छोटी बूँदोंसे ही खेतोंकी क्यारियाँ, तालाब, सरोवर और सरिताएँ अतर्क्य भावसे जलपूर्ण दिखायी देती हैं, उसी प्रकार एक-एक करके थोड़ा-थोड़ा दिया हुआ दान भी बढ़ जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरण-पोषण के योग्य कुटुम्बीजनोंको थोड़ा-सा कष्ट देकर भी यदि दान किया जा सके तो दान ही श्रेष्ठ माना गया है। स्त्री-पुत्र, धन और धान्य--ये वस्तुएँ मरे हुए पुरुषोंके साथ नहीं जाती हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यशस्विनी! धन पाकर उसका दान और भोग करना भी श्रेष्ठ है; परंतु दान करनेसे मनुष्य महान्‌ सौभाग्यशाली नरेश होते हैं। इस पृथ्वीपर दानके समान कोई दूसरी वस्तु नहीं है। दानके समान कोई निधि नहीं है। सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और असत्यसे बढ़कर कोई पातक नही है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो वानप्रस्थ आश्रममें फल-मूल खाकर जटा बढ़ाये, वल्कल पहने, सूर्यकी ओर मुँह करके तपस्या करता है, हेमन्त-ऋतुमें मेठककी भाँति जलमें सोता है और ग्रीष्म-ऋतुमें पंचाग्निका ताप सहन करता है। इस प्रकार जो लोग वानप्रस्थ आश्रममें रहकर श्रद्धापूर्वक उत्तम तप करते हैं, वे भी गृहस्थाश्रमके पालनसे होनेवाले धर्मकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--प्रभो! गृहस्थाश्रमका जो आचार है, जो व्रत और नियम हैं, गृहस्थको सदा जिस प्रकारसे देवताओंकी पूजा करनी चाहिये तथा तिथि और पर्वोके दिन उसे जिसजिस वस्तुका त्याग करना चाहिये, वह सब मैं आपके मुखसे सुनना चाहती हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! गृहस्थ-आश्रमका जो मूल और फल है, यह उत्तम धर्म जहाँ अपने चारों चरणोंसे सदा विराजमान रहता है, वरारोहे! जैसे दहीसे घी निकाला जाता है, उसी प्रकार जो सब धर्मोंका सारभूत है, उसको मैं तुम्हें बता रहा हूँ। धर्मचारिणि! सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लोग गृहस्थ-आश्रममें रहकर माता-पिताकी सेवा करते हैं, जो नारी पतिकी सेवा करती है तथा जो ब्राह्मण नित्य अनग्निहोत्र कर्म करते हैं, उन सबपर इन्द्र आदि देवता, पितृलोकनिवासी पितर प्रसन्न होते हैं एवं वह पुरुष अपने धर्मसे आनन्दित होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने पूछा--जिन गृहस्थोंके माता-पिता न हों, उनकी अथवा विधवा स्त्रियोंकी जीवनचर्या क्या होनी चाहिये? यह मुझे बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवता और अतिथियोंकी सेवा, गुरुजनों तथा वृद्ध पुरुषोंका अभिवादन, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, लोभको त्याग देना, सत्यप्रतिज्ञ होना, ब्रह्मचर्य, शरणागतवत्सलता, शौचाचार, पहले बातचीत करना, उपकारीके प्रति कृतज्ञ होना, किसीकी चुगली न खाना, सदा धर्मशील रहना, दिनमें दो बार स्नान करना, देवता और पितरोंका पूजन करना, गौओंको प्रतिदिन अन्नका ग्रास और घास देना, अतिथियोंको विभागपूर्वक भोजन देना, दीप, ठहरनेके लिये स्थान तथा पाद्य और आसन देना, पंचमी, षष्ठी, द्वादशी, अष्टमी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमाको सदा ब्रह्मचर्यका पालन करना, इन तिथियोंपर मूँछ मुड़ाने, सिरमें तेल लगाने, आँखमें अंजन करने तथा दाँतुन करने एवं दाँत धोने आदिका कार्य न करे। जो इन विधि-निषेधोंका पालन करते हैं, उनके यहाँ लक्ष्मी प्रतिष्ठित होती हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्रत और उपवासका नियम पालना, तपस्या करना, यथाशक्ति दान देना, पोष्यवर्गका पोषण करना, दीनोंपर कृपा रखना, परायी स्त्रीसे दूर रहना तथा सदा ही अपनी स्त्रीसे प्रेम रखना गृहस्थका धर्म है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विधाताने पूर्वकालमें पति-पत्नीका एक ही शरीर बनाया था; अतः अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहनेवाला पुरुष ब्रह्मचारी माना जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो शील और सदाचारसे विनीत है, जिसने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखा है, जो सरलतापूर्वक बर्ताव करता है और समस्त प्राणियोंका हितैषी है, जिसको अतिथि प्रिय है, जो क्षमाशील है, जिसने धर्मपूर्वक धनका उपार्जन किया है--ऐसे गृहस्थके लिये अन्य आश्रमोंकी क्या आवश्यकता है? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे सभी जीव माताका सहारा लेकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार सभी आश्रम गृहस्थ-आश्रमका आश्रय लेकर ही जीवन-यापन करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा, पाखण्डी, नट, सपेरा, दम्भ, चोर, राजपुरुष, विद्वान, सम्पूर्ण शीलोंके जानकार, सभी संशयालु तथा दूरके रास्तेपर आये हुए पाथेयरहित राही--ये तथा और भी बहुत-से मनुष्य गृहस्थ-आश्रमपर ही ताक लगाये रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! चूहे, बिल्ली, कुत्ते, सुअर, तोते, कबूतर, कर्कटक (काक आदि), सरीसूपसेवी-ये तथा और भी बहुत-से मृग-पक्षियोंके वनवासी समुदाय हैं तथा इसी तरह इस जगतमें जो नाना प्रकारके सैकड़ों और हजारों चराचर प्राणी घर, क्षेत्र और बिलमें निवास करते हैं, वे सब-के-सब यहाँ गृहस्थके किये हुए कर्मको ही भोगते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो वस्तु उनके उपयोगमें आ गयी, उसके लिये जो बुद्धिमान्‌ पुरुष कभी शोक नहीं करता, इन सबका पालन करना धर्म ही है, ऐसा समझकर संतुष्ट रहता है, उसे मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! जो सम्पूर्ण यज्ञोंका सम्पादन कर चुका है, उसे अश्वमेधयज्ञसे जो फल मिलता है, वही फल इस गृहस्थको बारह वर्षोतक पूर्वाक्त नियमोंका पालन करनेसे प्राप्त हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--भगवन्‌! आपने चारों वर्णोके लिये हितकारी एवं शुभ धर्मका पृथक्‌पृथक्‌ वर्णन किया है। अब मुझे वह धर्म बतलाइये, जो सब वर्णोके लिये समानरूपसे उपयोगी हो ।। ६१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! गुणोंकी अभिलाषा रखनेवाले जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने समस्त लोकोंका उद्धार करनेके लिये जगत्‌की सार वस्तुद्वारा मृत्युलोकमें ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है। ब्राह्मण इस भूमण्डलके देवता हैं, अतः पहले उनके ही धर्म-कर्म और उनके फलोंका वर्णन करता हूँ, क्योंकि ब्राह्मणोंमें जो धर्म होता है, उसे ही परम धर्म माना जाता है | ६२-६३&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माजीने सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षाके लिये तीन प्रकारके धर्मका विधान किया है। पृथ्वीकी सृष्टिके साथ ही इन तीनों धर्मोकी सृष्टि हो गयी है, इनको भी तुम मुझसे सुनो || ६४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहला है वेदोक्त धर्म, जो सबसे उत्कृष्ट धर्म है। दूसरा है वेदानुकूल स्मृति-शास्त्रमें वर्णित--स्मार्तधर्म और तीसरा है शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरित धर्म (शिष्टाचार)। ये तीनों धर्म सनातन हैं ।। ६५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो तीनों वेदोंका ज्ञाता और दविद्वान्‌ हो; पढ़ने-पढ़ानेका काम करके जीविका न चलाता हो; दान, धर्म और यज्ञ--इन तीन कर्मोका सदा अनुष्ठान करता हो; काम, क्रोध और लोभ--इन तीनों दोषोंका त्याग कर चुका हो और सब प्राणियोंके प्रति मैत्रीभाव रखता हो--ऐसा पुरुष ही वास्तवमें ब्राह्मण माना गया है ।। ६६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सम्पूर्ण भुवनोंके स्वामी ब्रह्माजीने ब्राह्मणोंकी जीविकाके लिये ये छ: कर्म बताये हैं; जो उनके लिये सनातन धर्म हैं। इनके नाम सुनो ।। ६७ ।।यजन-याजन (यज्ञ करना-कराना), दान देना, दान लेना, वेद पढ़ना और वेद पढ़ाना। इन छ: कर्मोंका आश्रय लेनेवाला ब्राह्मण धर्मका भागी होता है || ६८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनमें भी सदा स्वाध्यायशील होना ब्राह्मणका मुख्य धर्म है, यज्ञ करना सनातन धर्म है और अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक दान देना उसके लिये प्रशस्त धर्म है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब प्रकारके विषयोंसे उपरत होना शम कहलाता है। यह सत्पुरुषोंमें सदा दृष्टिगोचर होता है। इसका पालन करनेसे शुद्ध चित्तवाले गृहस्थोंको महान्‌ धर्म-राशिकी प्राप्ति होती है || ७० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गृहस्थ पुरुषको पंचमहायज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने मनको शुद्ध बनाना चाहिये। जो गृहस्थ सदा सत्य बोलता, किसीके दोष नहीं देखता, दान देता, ब्राह्मणोंका सत्कार करता, अपने घरको झाड़-बुहारकर साफ रखता, अभिमानको त्याग देता, सदा सरल भावसे रहता, स्नेहयुक्त वचन बोलता, अतिथि और अभ्यागतोंकी सेवामें मन लगाता, यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता और अतिथिको शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार पाद्य, अर्घ्य, आसन, शय्या, दीपक तथा ठहरनेके लिये गृह प्रदान करता है, उसे धार्मिक समझना चाहिये ।। ७१ --७३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो प्रातःकाल उठकर आचमन करके ब्राह्मणोंको भोजनके लिये निमन्त्रण देता और उसे ठीक समयपर सत्कारपूर्वक भोजन करानेके बाद कुछ दूरतक उसके पीछे-पीछे जाता है, उसके द्वारा सनातन धर्मका पालन होता है ।। ७४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्र गृहस्थको अपनी शक्तिके अनुसार तीनों वर्णोका निरन्तर सब प्रकारसे आतिथ्यसत्कार करना चाहिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य--इन तीन वर्णोंकी परिचर्यामें रहना उसके लिये प्रधान धर्म बतलाया गया है || ७५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रवृत्तिरूप धर्मका विधान गृहस्थोंके लिये किया गया है। वह सब प्राणियोंका हितकारी और शुभ है। अब मैं उसीका वर्णन करता हूँ || ७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको सदा अपनी शक्तिके अनुसार दान करना चाहिये। सदा यज्ञ करना चाहिये और सदा ही पुष्टिजनक कर्म करते रहना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्यको धर्मके द्वारा धनका उपार्जन करना चाहिये। धर्मसे उपार्जित हुए धनके तीन भाग करने चाहिये और प्रयत्नपूर्वक धर्मप्रधान कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये ।। ७८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको धनके उपर्युक्त तीन भागोंमेंसे एक भागके द्वारा धर्म और अर्थकी सिद्धि करनी चाहिये। दूसरे भागको उपभोगमें लगाना चाहिये और तीसरे अंशको बढ़ाना चाहिये (प्रवृत्तिधर्मका वर्णन किया गया है) || ७९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इससे भित्न निवृत्तिरूप धर्म है। वह मोक्षका साधन है। देवि! मैं यथार्थरूपसे उसका स्वरूप बताता हूँ, उसे सुनो || ८० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनी चाहिये। यही उनका धर्म है। उन्हें सदा एक ही गाँवमें नहीं रहना चाहिये और अपने आशारूपी बन्धनोंको तोड़नेका प्रयत्न करना चाहिये। यही मुमुक्षुके लिये प्रशंसाकी बात है || ८१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मोक्षाभिलाषी पुरुषको न तो कुटीमें आसक्ति रखनी चाहिये न जलमें, न वस्त्रमें, न आसनमें; न त्रिदण्डमें, न शय्यामें, न अग्निमें और न किसी निवासस्थानमें ही आसक्त होना चाहिये ।। ८२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुमुक्षुको अध्यात्मज्ञानका ही चिन्तन, मनन और निदिध्यासन करना चाहिये। उसे उसीमें सदा स्थित रहना चाहिये। निरन्तर योगाभ्यासमें प्रवृत्त होकर तत्त्वका विचार करते रहना चाहिये ।। ८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संन्यासी द्विजको उचित है कि वह सब प्रकारकी आसक्तियों और स्नेहबन्धनोंसे मुक्त होकर सर्वदा वृक्षके नीचे, सूने घरमें अथवा नदीके किनारे रहता हुआ अपने अन्तःकरणमें ही परमात्माका ध्यान करे || ८४-८५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो युक्तचित्त होकर संन्यासी होता है और मोक्षोपयोगी कर्म श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदिके द्वारा समय व्यतीत करता हुआ निराहार (विषयसेवनसे रहित) और ठूठे काठकी भाँति स्थिर रहता है, उसको सनातन धर्मका मोक्षरूप धर्म प्राप्त होता है ।। ८६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संन्यासी किसी एक स्थानमें आसक्ति न रखे, एक ही ग्राममें न रहे तथा किसी एक ही किनारेपर सर्वदा शयन न करे। उसे सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त होकर स्वच्छन्द विचरना चाहिये ।। ८७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह मोक्षधर्मके ज्ञाता सत्पुरुषोंका वेदप्रतिपादित धर्म एवं सन्मार्ग है। जो इस मार्गपर चलता है, उसको ब्रह्मपदकी प्राप्ति होती है || ८८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संन्यासी चार प्रकारके होते हैं--कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस। इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है ।। ८९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस परमहंस धर्मके द्वारा प्राप्त होनेवाले आत्म-ज्ञानसे बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं है। यह परमहंस-ज्ञान किसीसे निष्कृष्ट नहीं है। परमहंस-ज्ञानके सम्मुख परमात्मा तिरोहित नहीं है। यह दुःख-सुखसे रहित सौम्य अजर-अमर और अविनाशी पद है ।। ९० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमा बोलीं--भगवन्‌! आपने सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए गार्हस्थ्यधर्म और मोक्षधर्मका वर्णन किया। ये दोनों ही मार्ग जीवजगत्‌का महान्‌ कल्याण करनेवाले हैं ।। ९१ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मज्ञ! अब मैं ऋषिधर्म सुनना चाहती हूँ। तपोवननिवासी मुनियोंके प्रति सदा ही मेरे मनमें स्नेह बना रहता है || ९२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महेश्वर! ये ऋषिलोग जब अग्निमें घीकी आहुति देते हैं, उस समय उसके धूमसे प्रकट हुई सुगन्ध मानो सारे तपोवनमें छा जाती है। उसे देखकर मेरा चित्त सदा प्रसन्न रहता है ।। ९३ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विभो! देव! यह मैंने मुनिधर्मके सम्बन्धमें जिज्ञासा प्रकट की है। देवदेव! आप सम्पूर्ण धर्मोका तत्त्व जाननेवाले हैं, अतः महादेव! मैंने जो कुछ पूछा है, उसका पूर्णरूपसे यथावत्‌ वर्णन कीजिये ।। ९४ ।।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीभगवान्‌ शिव बोले--शुभे! तुम्हारे इस प्रश्नसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। अब मैं मुनियोंके सर्वोत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ, जिसका पालन करके वे अपनी तपस्याके द्वारा परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाभागे! धर्मज्ञे! सबसे पहले धर्मवेत्ता साधुपुरुष फेनप ऋषियोंका जो धर्म है, उसीका मुझसे वर्णन सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालमें ब्रह्माजीने यज्ञ करते समय जिसका पान किया तथा जो स्वर्गमें फैला हुआ है, वह अमृत (ब्रह्माजीके द्वारा पीया गया इसलिये) ब्राह्म कहलाता है। उसके फेनको जो थोड़ा-थोड़ा संग्रह करके सदा पान करते हैं (और उसीके आधारपर जीवन-निर्वाह करके तपस्यामें लगे रहते हैं,) वे फेनप- कहलाते हैं || ९७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपोधने! यह धर्माचरणका मार्ग उन विशुद्ध फेनप महात्माओंका ही मार्ग है। अब बालखिल्य नामवाले ऋषिगणोंद्वारा जो धर्मका मार्ग बताया गया है, उसको सुनो ।। ९८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वालखिल्यगण तपस्यासे सिद्ध हुए मुनि हैं। वे सब धर्मोके ज्ञाता हैं और सूर्यमण्डलमें निवास करते हैं। वहाँ वे उज्छवृत्तिका आश्रय ले पक्षियोंकी भाँति एक-एक दाना बीनकर उसीसे जीवन-निर्वाह करते हैं ।। ९९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मृगछाला, चीर और वल्कल-- ये ही उनके वस्त्र हैं। वे बालखिल्य शीत-उष्ण आदि द्न्द्ोंसे रहित, सन्मार्गपर चलनेवाले और तपस्याके धनी हैं || १०० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनमेंसे प्रत्येकका शरीर अंगूठेके सिरेके बराबर है। इतने लघुकाय होनेपर भी वे अपने-अपने कर्तव्यमें स्थित हो सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं। उनके धर्मका फल महान्‌ है ।। १०१ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उनके समान रूप धारण करते हैं। वे तपस्यासे सम्पूर्ण पापोंको दग्ध करके अपने तेजसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हैं || १०२&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनके अतिरिक्त दूसरे भी बहुत-से शुद्धचित्त, दयाधर्मपरायण एवं पुण्यात्मा संत हैं, जिनमें कुछ चक्रचर (चक्रके समान विचरनेवाले), कुछ सोमलोकमें रहनेवाले तथा कुछ पितृलोकके निकट निवास करनेवाले हैं। ये सब शास्त्रीय विधिके अनुसार उज्छवृत्तिसे जीविका चलाते हैं || १०३ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोई ऋषि सम्प्रक्षाल*, कोई अभ्मकुट्ट* और कोई दन्तोलूखलिकर हैं। ये लोग सोमप (चन्द्रमाकी किरणोंका पान करनेवाले) और उष्णप (सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले) देवताओंके निकट रहकर अपनी स्ट्रियों-लहित उज्छवृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते और इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं || १०४-१०५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अन्निहोत्र, पितरोंका पूजन (श्राद्ध) और पंचमहा-यज्ञोंका अनुष्ठान यह उनका मुख्य धर्म कहा जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! चक्रकी तरह विचरनेवाले और देवलोकमें निवास करनेवाले पूर्वोक्त ब्राह्मणोंने इस ऋषिधर्मका सदा ही अनुष्ठान किया है। इसके अतिरिक्त दूसरा भी जो ऋषियोंका धर्म है, उसे मुझसे सुनो || १०७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सभी आर्षधर्मोमें इन्द्रियसंयमपूर्वक आत्मज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। फिर काम और क्रोधको भी जीतना चाहिये। ऐसा मेरा मत है || १०८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रत्येक ऋषिके लिये अग्निहोत्रका सम्पादन, धर्मसत्रमें स्थिति, सोमयज्ञका अनुष्ठान, यज्ञविधिका ज्ञान और यज्ञमें दक्षिणा देना--इन पाँच कर्मोंका विधान आवश्यक है || १०९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नित्य यज्ञका अनुष्ठान और धर्मका पालन करना चाहिये। देवपूजा और श्राद्धमें प्रीति रखना चाहिये। उछ्छवृत्तिसे उपार्जित किये हुए अन्नके द्वारा सबका आतिथ्य-सत्कार करना ऋषियोंका परम कर्तव्य है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विषयभोगोंसे निवृत्त रहना, गोरसका आहार करना, शमके साधनमें प्रेम रखना, खुले मैदान चबूतरेपर सोना, योगका अभ्यास करना, साग-पातका सेवन करना, फल-मूल खाकर रहना, वायु, जल और सेवारका आहार करना--ये ऋषियोंके नियम हैं। इनका पालन करनेसे वे अजित--सर्वश्रेष्ठ गतिको प्राप्त करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब गृहस्थोंके यहाँ रसोईघरका धुआँ निकलना बंद हो जाय, मूसलसे धान कूटनेकी आवाज न आये--सन्नाटा छाया रहे, चूल्हेकी आग बुझ जाय, घरके सब लोग भोजन कर चुकें, बर्तनोंका इधर-उधर ले जाया जाना रुक जाय और भिक्षुक भीख माँगकर लौट गये हों, ऐसे समयतक ऋषिको अतिथियोंकी बाट जोहनी चाहिये और उसके बचे-खुचे अन्नको स्वयं ग्रहण करना चाहिये। ऐसा करनेसे सत्यधर्ममें अनुराग रखनेवाला शान्त पुरुष मुनिधर्मसे युक्त होता है अर्थात्‌ उसे मुनिधर्मके पालनका फल मिलता है। जिसे गर्व और अभिमान नहीं है, जो अप्रसन्न और विस्मित नहीं होता, शत्रु और मित्रको समान समझता तथा सबके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, वही धर्मवेत्ताओंमें उत्तम ऋषि है ।। ११३-११५ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;i&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०६½ “लोक मिलाकर कुल २२१½ “लोक हैं)&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;टिका टिप्पणी -&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;ul style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;li&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;यहाँ आचार्य नीलकण्ठके मतमें श्मशान शब्दसे काशीका महाश्मशान ही गृहीत होता है। इसीलिये वहाँ शवके दर्शनसे शिवके दर्शनका फल माना जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;कुछ लोग दूध पीनेके समय बछड़ोंके मुँहमें लगे हुए फेनको ही वह अमृत मानते हैं, उसीका पान करनेवाले उनके मतमें फेनप हैं। आचार्य नीलकण्ठ अन्नके अग्रभाग (रसोईसे निकाले गये अग्राशन) को फेन और उसका उपयोग करनेवालेको फेनप कहते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;ol style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;li&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;जो भोजनके पश्चात्‌ पात्रको धो-पोंछकर रख देते हैं, दूसरे दिनके लिये कुछ भी नहीं बचाते हैं, उन्हें सम्प्रक्षाल कहते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;पत्थरसे फोड़कर खानेवालेको अभ्मकुट्ट कहते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;जो दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेते हैं अर्थात्‌ अन्नको ओखलीमें न कूटकर दाँतोंसे ही चबाकर खाते हैं वे दन्तोलूखलिक कहलाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/4081905727206720302/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/12/141-chapter-entire-mahabharata.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/4081905727206720302'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/4081905727206720302'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/12/141-chapter-entire-mahabharata.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) का एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय  (the 141 chapter the entire Mahabharata (anushashn Parva)'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सम्पूर्ण महाभारत कथा"/><title type='text'>सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ छत्तीसवें अध्याय से एक सौ चालीसवें अध्याय तक (From the 136 chapter to the 140 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva)</title><content type='html'>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; 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small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-25&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्षित्त”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिने कहा--पितामह! आपने भोज्यान्न और अभोज्यान्न सभी तरहके मनुष्योंका वर्णन किया; किंतु इस विषयमें मुझे पूछनेयोग्य एक संदेह उत्पन्न हो गया। उसका मेरे लिये समाधान कीजिये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राय: ब्राह्मणोंको ही हव्य और कव्यका प्रतिग्रह लेना पड़ता है और उन्हें ही नाना प्रकारके अन्न ग्रहण करनेका अवसर आता है। ऐसी दशामें उन्हें पाप लगते हैं, उनका क्या प्रायश्चित्त है? यह मुझे बतावें ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन! महात्मा ब्राह्मणोंको प्रतिग्रह लेने और भोजन करनेके पापसे जिस प्रकार छुटकारा मिलता है, वह प्रायश्ित्त मैं बता रहा हूँ, सुनो ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! ब्राह्मण यदि घीका दान ले तो गायत्री-मन्त्र पढ़कर अग्निमें समिधाकी आहुति दे। तिलका दान लेनेपर भी यही प्रायश्चित्त करना चाहिये। ये दोनों कार्य समान हैं ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फलका गुद्दा, मधु और नमकका दान लेनेपर उस समयसे लेकर सूर्योदयतक खड़े रहनेसे ब्राह्मण शुद्ध हो जाता है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुवर्णका दान लेकर गायत्री-मन्त्रका जप करने और खुले तौरपर काले लोहेका दंड धारण करनेसे ब्राह्मण उसके दोषसे छुटकारा पाता है ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठ इसी प्रकार धन, वस्त्र, कन्या, अन्न, खीर और ईखके रसका दान ग्रहण करनेपर भी सुवर्ण-दानके समान ही प्रायश्चित्त करे | ७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गन्ना, तेल और कुशोंका प्रतिग्रह स्वीकार करनेपर त्रिकाल स्नान करना चाहिये। धान, फूल, फल, जल, पूआ, जौकी लपसी और दही-दूधका दान लेनेपर सौ बार गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये ।। ८-९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्राद्धमें जूता और छाता ग्रहण करनेपर एकाग्रचित्त हो यदि सौ बार गायत्री-मन्त्रका जप करे तो उस प्रतिग्रहके दोषसे छुटकारा मिल जाता है || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;gt;ग्रहणके समय अथवा अशौचमें किसीके दिये हुए खेतका दान स्वीकार करनेपर तीन रात उपवास करनेसे उसके दोषसे छुटकारा मिलता है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो द्विज कृष्णपक्षमें किये हुए पितृश्राद्धका अन्न भोजन करता है, वह एक दिन और एक रात बीत जानेपर शुद्ध होता है ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मण जिस दिन श्राद्धका अन्न भोजन करे, उस दिन संध्या, गायत्री-जप और दुबारा भोजन त्याग दे। इससे उसकी शुद्धि होती है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसीलिये अपराह्लकालमें पितरोंके श्राद्धका विधान किया गया है। (जिससे सबेरेकी संध्योपासना हो जाय और शामको पुनर्भोजनकी आवश्यकता ही न पड़े) ब्राह्मणोंको एक दिन पहले श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहिये। जिससे वे पूर्वोक्त प्रकारसे विशुद्ध पुरुषोंके यहाँ यथावत्‌ रूपसे भोजन कर सकें ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके घर किसीकी मृत्यु हुई हो, उसके यहाँ मरणाशौचके तीसरे दिन अन्न ग्रहण करनेवाला ब्राह्मण बारह दिनोंतक त्रिकाल स्नान करनेसे शुद्ध होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बारह दिनोंतक स्नानका नियम पूर्ण हो जानेपर तेरहवें दिन वह विशेषरूपसे स्नान आदिके द्वारा पवित्र हो ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन करावे। तब उस पापसे मुक्त हो सकता है ।। १६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य किसीके यहाँ मरणाशौचमें दस दिनतक अन्न खाता है, उसे गायत्री-मन्त्र, रैवत शाम, पवित्रेष्टि कृष्माण्ड अनुवाक्‌ और अघमर्षणका जप करके उस दोषका प्रायश्चित करना चाहिये ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार जो मरणाशौचवाले घरमें लगातार तीन रात भोजन करता है, वह ब्राह्मण सात दिनोंतक त्रिकाल स्नान करनेसे शुद्ध होता है ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह प्रायश्रित्त करनेके बाद उसे सिद्धि प्राप्त होती है और वह भारी आपत्तिमें कभी नहीं पड़ता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण शूद्रोंके साथ एक पंक्तिमें भोजन कर लेता है, वह अशुद्ध हो जाता है। अतः उनकी शुद्धिके लिये शास्त्रीय विधिके अनुसार यहाँ शौचका विधान है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण वैश्योंके साथ एक पंक्तिमें भोजन करता है, वह तीन राततक व्रत करनेपर उस कर्मदोषसे मुक्त होता है || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण क्षत्रियोंके साथ एक पंक्तिमें भोजन करता है, वह वस्त्रोंसहित स्नान करनेसे पापमुक्त होता है | २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्णणफा तेज उसके साथ भोजन करनेवाले शूद्रके कुलका, वैश्यके पशु और बान्धवोंका तथा क्षत्रियकी सम्पत्तिका नाश कर डालता है ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके लिये प्रायश्रित्त और शान्तिहोम करना चाहिये। गायत्री-मन्त्र, रैवत साम, पवित्रेष्टि, कृष्माण्ड अनुवाक्‌ और अघमर्षण मन्त्रका जप भी आवश्यक है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किसीका जूठा अथवा उसके साथ एक पंक्तिमें भोजन नहीं करना चाहिये। उपर्युक्त प्रायश्चित्तके विषयमें संशय नहीं करना चाहिये। प्रायश्चित्त करनेके अनन्तर गोरोचन, दूर्वा और हल्दी आदि मांगलिक वस्तुओंका स्पर्श करना चाहिये || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें प्रायश्षित्तविधि नामक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;टिका टिप्पणी;-&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;कुछ लोग &#39;ग्रहसूतकयो:” का अर्थ करते हैं “कारागारस्थाशौचवतो” इसके अनुसार जो जेलमें रह आया हो तथा जो जनन-मरण-सम्बन्धी अशौचसे युक्त हो ऐसे लोगोंका दिया हुआ क्षेत्रदान स्वीकार करनेपर तीन रात उपवास करनेसे प्रतिग्रह-दोषसे छुटकारा मिलता है।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ सैतीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ सैतीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-32&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“दानसे स्वर्गलोकमें जानेवाले राजाओंका वर्णन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भरतनन्दन! पितामह! आप कहते हैं कि दान और तप दोनोंसे ही मनुष्य स्वर्गमें जाता है, परंतु मेरे मनमें संशयजनित दुःख हो रहा है। आप इसका निवारण कीजिये। इस पृथ्वीपर दान और तपमेंसे कौन-सा साधन श्रेष्ठ है, यह बतानेकी कृपा करें ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! तपस्यासे शुद्ध अन्तः:करणवाले जिन धर्मात्मा राजाओंने दान-पुण्यमें तत्पर रहकर नि:सन्देह बहुत-से उत्तम लोक प्राप्त किये हैं, उनके नाम बता रहा हूँ, सुनो । २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! लोकसम्मानित महर्षि आत्रेय अपने शिष्योंको निर्गुण ब्रह्मका उपदेश देकर उत्तम लोकोंमें गये हैं |। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उशीनरकुमार शिवि अपने प्यारे पुत्रके प्राणोंको ब्राह्मणके लिये निछावर करके यहाँसे स्वर्गलोकमें चले गये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;काशीके राजा प्रतर्दनने अपने प्यारे पुत्रको ब्राह्मणकी सेवामें अर्पित कर दिया, जिसके कारण उन्हें इस लोकमें अनुपम कीर्ति मिली और परलोकमें भी वे अक्षय आनन्दका उपभोग कर रहे हैं ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संकृतिके पुत्र राजा रन्तिदेवने महात्मा वसिष्ठ मुनिको विधिवत्‌ अर्घ्यदान किया, जिससे उन्हें श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हुई |। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवावृध नामक राजा यज्ञमें सोनेकी सौ तीलियोंवाले सुन्दर दिव्य छत्रका ब्राह्मणको दान करके स्वर्ग-लोकको प्राप्त हुए हैं ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐश्वर्यशशाली राजा अम्बरीष अमित तेजस्वी ब्राह्मणको अपना सारा राज्य सौंपकर देवलोकको प्राप्त हुए ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूर्यपुत्र कर्ण अपना दिव्य कुण्डल देकर तथा महाराजा जनमेजय ब्राह्मणको सवारी और गौ दान करके उत्तम लोकोंमें गये हैं ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजर्षि वृषादर्भिने ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न तथा रमणीय गृह प्रदान करके स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त किया है || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विदर्भके पुत्र राजा निमि अगस्त्य मुनिको अपनी कन्या और राज्यका दान करके पुत्र, पशु और बान्धवोंसहित स्वर्गलोकमें चले गये ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महायशस्वी जमदग्निनन्दन परशुरामजीने ब्राह्मणको भूमिदान करके उन अक्षय लोकोंको प्राप्त किया है, जिन्हें पानेकी मनमें कल्पना भी नहीं हो सकती ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक बार संसारमें वर्षा न होनेपर मुनिवर वसिष्ठजीने समस्त प्राणियोंको जीवन दान दिया था, जिससे उन्हें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हुई |। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दशरथनन्दन भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी यज्ञोंमें प्रचुर धनकी आहुति देकर संसारमें अपने महान्‌ यशकी स्थापना करके अक्षय लोकोंमें चले गये ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महायशस्वी राजर्षि कक्षसेन महात्मा वसिष्ठको अपना सर्वस्व समर्पण करके स्वर्गलोकमें गये हैं || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;करन्धमके पौत्र, अविक्षित॒के पुत्र महाराज मरुत्तने अंगिराके पुत्र संवर्तको कन्यादान करके शीघ्र ही स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पाज्चालदेशके राजा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मदत्तने ब्राह्यणगको शंखनामक निधि प्रदान करके परम गति प्राप्त कर ली थी ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा मित्रसह महात्मा वसिष्ठ मुनिको अपनी प्यारी पत्नी मदयन्ती सेवाके लिये देकर स्वर्गलोकमें चले गये ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुपुत्र राजा सुद्युम्न महात्मा लिखितको धर्मतः दण्ड देकर परम उत्तम लोकोंमें गये ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महान्‌ यशस्वी राजर्षि सहस्नचित्य ब्राह्मणके लिये अपने प्यारे प्राणोंकी बलि देकर श्रेष्ठ लोकोंमें गये हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराजा शत्द्युम्नने मौदगल्य नामक ब्राह्मणको समस्त कामनाओंसे परिपूर्ण सुवर्णमय गृह दान देकर स्वर्ग प्राप्त किया है ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा सुमन्युने भक्ष्य, भोज्य पदार्थोके पर्वत-जैसे कितने ही ढेर लगाकर उन्हें शाण्डिल्यको दान दिया था। जिससे उन्होंने स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महातेजस्वी शाल्वराज द्युतिमान्‌ महर्षि ऋचीकको राज्य देकर सर्वोत्तम लोकोंमें चले गये ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजर्षि मदिराश्व अपनी सुन्दरी कन्या विप्रवर हिरण्यहस्तको देकर देवताओंके लोकमें चले गये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभावशाली राजर्षि लोमपादने मुनिवर ऋष्यशृंगको अपनी शान्ता नामवाली कन्या दान की थी, इससे उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्णरूपसे सफल हुईं || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजर्षि भगीरथ अपनी यशस्विनी कन्या हंसीका कौत्स ऋषिको दान करके अक्षय लोकोंमें गये हैं || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा भगीरथने कोहल नामक ब्राह्णको एक लाख सवत्सा गौएँ दान कीं, जिससे उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई || २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! ये तथा और भी बहुत-से राजा दान और तपस्याके प्रभावसे बारंबार स्वर्गलोकको जाते और पुनः वहाँसे इस लोकमें लौट आते हैं ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिन गृहस्थोंने दान और तपस्याके बलसे उत्तम लोकोंपर विजय पायी है, उनकी कीर्ति इस लोकमें तबतक प्रतिष्ठित रहेगी, जबतक कि यह पृथ्वी स्थिर रहेगी || २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! यह शिष्ट पुरुषोंका चरित्र बताया गया है। ये सब नरेश दान, यज्ञ और संतानोत्पादन करके स्वर्गमें प्रतिष्ठित हुए हैं | ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कौरवधुरंधर! तुम भी सदा दान करते रहो। तुम्हारी बुद्धि दान और यज्ञकी क्रियामें संलग्न हो धर्मकी उन्नति करती रहे ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नृपश्रेष्ठ! अब तुम्हें जिस विषयमें संदेह होगा, उसे मैं कल सबेरे बताऊँगा; क्योंकि इस समय संध्याकाल उपस्थित है ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-11&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“पाँच प्रकारके दानोंका वर्णन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(दूसरे दिन प्रातःकाल) युधिष्ठिरने पूछा--सत्यव्रती और पराक्रमसम्पन्न तात! दानजनित महान्‌ धर्मके प्रभावसे जो-जो नरेश स्वर्गलोकमें गये हैं, उन सबका परिचय मैंने आपके मुखसे सुना है ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! अब मैं दानके सम्बन्धमें इन धर्मोंको सुनना चाहता हूँ कि दानके कितने भेद हैं? और जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल मिलता है? ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कैसे और किन लोगोंको धर्मके अनुसार दान देना अभीष्ट है? किन कारणोंसे देना चाहिये? और दानके कितने भेद हो जाते हैं? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--निष्पाप कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! दानके सम्बन्धमें मैं यथार्थरूपसे जो कुछ कहता हूँ, सुनो। सभी वर्णोके लोगोंको दान किस प्रकार करना चाहिये--यह बता रहा हूँ || ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! धर्म, अर्थ, भय, कामना और दया--इन पाँच हेतुओंसे दानको पाँच प्रकारका जानना चाहिये। अब जिन कारणोंसे दान देना उचित है, उनको सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दान करनेवाला मनुष्य इहलोकमें कीर्ति और परलोकमें सर्वोत्तम सुख पाता है। इसलिये ईर्ष्यारहित होकर मनुष्य ब्राह्मणोंको अवश्य दान दे (यह धर्ममूलक दान है) |। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;ये दान देते हैं, ये दान देंगे अथवा इन्होंने मुझे दान दिया है&#39; याचकोंके मुखसे ये बातें सुनकर अपनी कीर्तिकी इच्छासे प्रत्येक याचकको उसकी इच्छाके अनुसार सब कुछ देना चाहिये (यह अर्थमूलक दान है) || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“न मैं इसका हूँ न यह मेरा है तो भी यदि इसको कुछ न दूँ तो अपमानित होकर मेरा अनिष्ट कर डालेगा।” इस भयसे ही विद्वान्‌ पुरुष जब किसी मूर्खको दान दे तो यह भयमूलक दान है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यह मेरा प्रिय है और मैं इसका प्रिय हूँ” यह विचारकर बुद्धिमान्‌ मनुष्य आलस्य छोड़कर अपने मित्रको प्रसन्नतापूर्वक दान दे (यह कामनामूलक दान है) ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यह बेचारा बड़ा गरीब है और मुझसे याचना कर रहा है। थोड़ा देनेसे भी संतुष्ट हो जायगा।&#39; यह सोचकर दरिद्र मनुष्यके लिये सर्वथा दयावश दान देना चाहिये || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह पाँच प्रकारका दान पुण्य और कीर्तिको बढ़ानेवाला है। यथाशक्ति सबको दान देना चाहिये। ऐसा प्रजापतिका कथन है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-51&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“तपस्वी श्रीकृष्णके पास ऋषियोंका आना, उनका प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठटिरने पूछा--महाप्राज्ञ पितामह! आप हमारे श्रेष्ठ कुलमें सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान और अनेक आगमोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शत्रुदमन! मैं आपके मुखसे अब ऐसे विषयका वर्णन सुनना चाहता हूँ, जो धर्म और अर्थसे युक्त, भविष्यमें सुख देनेवाला और संसारके लिये अद्भुत हो ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुरुषप्रवर! हमारे बन्धु-बान्धवोंको यह दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ है। हमारे लिये आपके सिवा दूसरा कोई समस्त धर्मोका उपदेश करनेवाला नहीं है ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनघ! यदि भाइयोंसहित मुझपर आपका अनुग्रह हो तो पृथ्वीनाथ! मैं आपसे जो प्रश्न पूछता हूँ, उसका हम सब लोगोंके लिये उत्तर दीजिये ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सम्पूर्ण नरेशोंद्वारा सम्मानित ये श्रीमान्‌ भगवान्‌ नारायण श्रीकृष्ण बड़े आदर और विनयके साथ आपकी सेवा करते हैं ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनके तथा इन भूपतियोंके सामने मेरा और मेरे भाइयोंका सब प्रकारसे प्रिय करनेके लिये इस पूछे हुए विषयका सस्नेह वर्णन कीजिये ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर स्नेहके आवेशसे युक्त हो गंगापुत्र भीष्मने यह बात कही ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी बोले--बेटा! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त मनोहर कथा सुना रहा हूँ। राजन! पूर्वकालमें इन भगवान्‌ नारायण और महादेवजीका जो प्रभाव मैंने सुन रखा है, उसको तथा पार्वतीजीके संदेह करनेपर शिव और पार्वतीमें जो संवाद हुआ था, उसको भी बता रहा हूँ, सुनो || ८-९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहलेकी बात है, धर्मात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाले व्रतकी दीक्षा लेकर (एक पर्वतके ऊपर) कठोर तपस्या कर रहे थे। उस समय उनका दर्शन करनेके लिये नारद और पर्वत-ये दोनों ऋषि वहाँ पधारे ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनके सिवा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ धौम्य, देवल, काश्यप, हस्तिकाश्यप तथा अन्य साधु-महर्षि जो दीक्षा और इन्द्रियसंयमसे सम्पन्न थे, अपने देवोपम, तपस्वी एवं सिद्ध शिष्योंके साथ वहाँ आये ।। ११-१२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने बड़ी प्रसन्नताके साथ देवोचित उपचारोंसे उन महर्षियोंका अपने कुलके अनुरूप आतिथ्य-सत्कार किया ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवानके दिये हुए हरे और सुनहरे रंगवाले कुशोंके नवीन आसनोंपर वे महर्षि प्रसन्नतापूर्वक विराजमान हुए ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर वे राजर्षियों, देवताओं और जो तपस्वी मुनि वहाँ रहते थे, उनके सम्बन्धमें धर्मयुक्त मधुर कथाएँ कहने लगे ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात्‌ व्रतचर्यारूपी ईंधनसे प्रज्वलित हुआ भगवान्‌ नारायणका तेज अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णके मुखारविन्दसे निकलकर अग्निरूपमें प्रकट हो वृक्ष, लता, झाड़ी, पक्षी, मृगसमुदाय, हिंसक जन्तु तथा सर्पोंसहित उस पर्वतको जलाने लगा ।। १६-१७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस समय नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंका आर्तनाद चारों ओर फैल रहा था, मानो पर्ववका वह अचेतन शिखर स्वयं ही हाहाकार कर रहा हो। उस तेजसे दग्ध हो जानेके कारण वह पर्वतशिखर बड़ा दयनीय दिखायी देता था ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़ी-बड़ी लपटोंवाली उस आगने समस्त पर्वत-शिखरको दग्ध करके भगवान्‌ विष्णु (श्रीकृष्ण) के समीप आकर जैसे शिष्य गुरुके चरण छूता है, उसी प्रकार उनके दोनों चरणोंका स्पर्श किया और उन्हींमें वह विलीन हो गयी ।। १९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर शत्रुसूदन श्रीकृष्णने उस पर्वतको दग्ध हुआ देखकर अपनी सौम्य दृष्टि डाली और उसे पुन: प्रकृतावस्थामें पहुँचा दिया--पहलेकी भाँति हरा-भरा कर दिया || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह पर्वत फिर पहलेकी ही भाँति खिली हुई लताओं और वृक्षोंसे सुशोभित होने लगा। वहाँ पक्षी चहचहाने लगे। वहाँ हिंसक पशु और सर्प आदि जीव-जन्तु जी उठे || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सिद्धों और चारणोंके समुदाय प्रसन्न होकर उस पर्वतकी शोभा बढ़ाने लगे। वह स्थान पुनः मतवाले हाथियों और नाना प्रकारके पक्षियोंसे सम्पन्न हो गया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस अद्भुत और अचिन्त्य घटनाको देखकर ऋषियोंका समुदाय विस्मित और रोमांचित हो उठा। उन सबके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भर आये ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारायणस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन ऋषियोंको विस्मयविमुग्ध हुआ देख विनय और स्नेहसे युक्त मधुर वाणीमें पूछा-- ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“महर्षियो! ऋषिसमुदाय तो आसक्ति और ममतासे रहित है! सबको शास्त्रोंका ज्ञान है, फिर भी आपलोगोंको आश्चर्य क्यों हो रहा है? ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तपोधन ऋषियो! आप सब लोग सबके द्वारा प्रशंसित हैं, अतः मेरे इस संशयको निश्चित एवं यथार्थ-रूपसे बतानेकी कृपा करें” || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋषियोंने कहा--भगवन्‌! आप ही संसारको बनाते और आप ही पुनः उसका संहार करते हैं। आप ही सर्दी, आप ही गर्मी और आप ही वर्षा करते हैं | २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस पृथ्वीपर जो भी चराचर प्राणी हैं, उनके पिता-माता, प्रभु और उत्पत्तिस्थान भी आप ही हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मधुसूदन! आपके मुखसे अग्निका प्रादुर्भाव हमारे लिये इस प्रकार विस्मपजनक हुआ है। हम संशयमें पड़ गये हैं। कल्याणमय श्रीकृष्ण! आप ही इसका कारण बताकर हमारे संदेह और विस्मयका निवारण कर सकते हैं ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शत्रुसूदन हरे! उसे सुनकर हम भी निर्भय हो जायँगे और हमने जो आश्वर्यकी बात देखी या सुनी है, उसका हम आपके सामने वर्णन करेंगे | २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीकृष्ण बोले--मुनिवरो! मेरे मुखसे यह मेरा वैष्णव तेज प्रकट हुआ था; जिसने प्रलयकालकी अग्निके समान रूप धारण करके इस पर्वतको दग्ध कर डाला था ।। ३० ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसी तेजसे आप-जैसे तपस्याके धनी, देवोपम शक्तिशाली, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय ऋषि भी पीड़ित और व्यथित हो गये थे ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं व्रतचर्यामें लगा हुआ था, तपस्वी जनोंके उस व्रतका सेवन करनेसे मेरा तेज ही अग्निरूपमें प्रकट हुआ था। अत: आपलोग उससे व्यथित न हों ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं तपस्याद्वारा अपने ही समान वीर्यवान्‌ पुत्र पानेकी इच्छासे व्रत करनेके लिये इस मंगलकारी पर्वतपर आया हूँ ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे शरीरमें स्थित प्राण ही अग्निके रूपमें बाहर निकलकर सबको वर देनेवाले सर्वलोक-पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये उनके लोकमें गया था || ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुनिवरो! उन ब्रह्माजीने मेरे प्राणको यह संदेश देकर भेजा है कि साक्षात्‌ भगवान्‌ शंकर अपने तेजके आधे भागसे आपके पुत्र होंगे || ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वही यह अग्निरूपी प्राण मेरे पास लौटकर आया है और निकट पहुँचनेपर शिष्यकी भाँति परिचर्या करनेके लिये उसने मेरे चरणोंमें प्रणाम किया है । इसके बाद शान्त होकर वह अपनी पूर्वावस्थाको प्राप्त हो गया है || ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपोधनो! यह मैंने आपलोगोंके निकट बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ विष्णुका गुप्त रहस्य संक्षेपसे बताया है। आपलोगोंको भय नहीं मानना चाहिये ।। ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपलोगोंकी गति सर्वत्र है, उसका कहीं भी प्रतिरोध नहीं है; क्योंकि आपलोग दूरदर्शी हैं। तपस्वी जनोंके योग्य व्रतका आचरण करनेसे आपलोग देदीप्यमान हो रहे हैं तथा ज्ञान और विज्ञान आपकी शोभा बढ़ा रहे हैं || ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये मेरी प्रार्थना है कि यदि आपलोगोंने इस पृथ्वीपर या स्वर्गमें कोई महान्‌ आश्चर्यकी बात देखी या सुनी हो तो उसको मुझे बतलाइये ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपलोग तपोवनमें निवास करनेवाले हैं, इस जगत्‌में आपके द्वारा कथित अमृतके समान मधुर वचन सुननेकी इच्छा मुझे सदा बनी रहती है ।। ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महर्षियो! आपका दर्शन देवताओंके समान दिव्य है। यद्यपि द्युलोक अथवा पृथिवीमें जो दिव्य एवं अद्भुत दिखायी देनेवाली वस्तु है, जिसे आपलोगोंने भी नहीं देखा है, वह सब मैं प्रत्यक्ष देखता हूँ। सर्वज्ञता मेरा उत्तम स्वभाव है। वह कहीं भी प्रतिहत नहीं होता तथा मुझमें जो ऐश्वर्य है, वह मुझे आश्वर्यरूप नहीं जान पड़ता तथापि सत्पुरुषोंके कानोंमें पड़ा हुआ कथित विषय विश्वासके योग्य होता है और वह पत्थरपर खिंची हुई लकीरकी भाँति इस पृथ्वीपर बहुत दिनोंतक कायम रहता है || ४१--४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः मैं आप साधु-संतोंके मुखसे निकले हुए वचनको मनुष्योंकी बुद्धिका उद्दीपक (प्रकाशक) मानकर उसे सत्पुरुषोंके समाजमें कहूँगा || ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णके समीप बैठे हुए सभी ऋषियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे कमलदलके समान खिले हुए नेत्रोंसे उनकी ओर देखने लगे || ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोई उन्हें बधाई देने लगा, कोई उनकी पूजा-प्रशंसा करने लगा और कोई ऋग्वेदकी अर्थयुक्त ऋचाओंद्वारा उन मधुसूदनकी स्तुति करने लगा || ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर उन सभी मुनियोंने बातचीत करनेमें कुशल देवदर्शी नारदको भगवान्‌की बातचीतका उत्तर देनेके लिये नियुक्त किया || ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुनि बोले--प्रभो! मुने! तीर्थयात्रापरायण मुनियोंने हिमालय पर्वतपर जिस अचिन्त्य आश्चर्यका दर्शन एवं अनुभव किया है, वह सब आप आरम्भसे ही ऋषिसमूहके हितके लिये भगवान्‌ श्रीकृष्णको बताइये ।। ४८-४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुनियोंके ऐसा कहनेपर देवर्षि भगवान्‌ नारदमुनिने यह पूर्वघटित कथा कही || ५०&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५१ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ चालीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;i&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ चालीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-&lt;/i&gt;57&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;½&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;b style=&quot;font-size: small; font-style: italic;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्ववीका आगमन शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुनः प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि! तदनन्तर श्रीनारायणके सुहृद्‌ भगवान्‌ नारदमुनिने शंकरजीका पार्वतीके साथ जो संवाद हुआ था, उसे बताना आरम्भ किया ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारदजीने कहा--भगवन्‌! जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते है, जो नाना प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न तथा भाँति-भाँतिके फूलोंसे व्याप्त होनेके कारण रमणीय जान पड़ता है, जहाँ झुंड-की-झुंड अप्सराएँ भरी रहती हैं और भूतोंकी टोलियाँ निवास करती हैं; उस परम पवित्र हिमालयपर्वतपर धर्मात्मा देवाधिदेव भगवान्‌ शंकर तपस्या कर रहे थे ।। २-३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस स्थानपर महादेवजी सैकड़ों भूतसमुदायोंसे घिरे रहकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करते थे। उन भूतोंके रूप नाना प्रकारके एवं विकृत थे, किन्हीं-किन्हींके रूप दिव्य एवं अद्भुत दिखायी देते थे || ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ भूतोंकी आकृति सिंहों, व्याप्रों एवं गजराजोंके समान थी। उनमें सभी जातियोंके प्राणी सम्मिलित थे। कितने ही भूतोंके मुख सियारों, चीतों, रीछों और बैलोंके समान थे।। ५।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कितने ही उल्लू-जैसे मुखवाले थे। बहुत-से भयंकर भूत भेड़ियों और बाजोंके समान मुख धारण करते थे। और कितनोंके मुख हरिणोंके समान थे। उन सबके वर्ण अनेक प्रकारके थे तथा वे सभी जातियोंसे सम्पन्न थे || ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनके सिवा बहुत-से किन्नरों, यक्षों, गन्धर्वों, राक्षमों तथा भूतगणोंने भी महादेवजीको घेर रखा था। भगवान्‌ शंकरकी वह सभा दिव्य पुष्पोंसे आच्छादित, दिव्य तेजसे व्याप्त, दिव्य चन्दनसे चर्चित और दिव्य धूपकी सुगन्धसे सुवासित थी। वहाँ दिव्य वाद्योंकी ध्वनि गूँजती रहती थी। मृदंग और पणवका घोष छाया रहता था। शंख और भेरियोंके नाद सब ओर व्याप्त हो रहे थे। चारों ओर नाचते हुए भूतसमुदाय और मयूर उसकी शोभा बढ़ाते थे || ७--९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ अप्सराएँ नृत्य करती थीं, वह दिव्य सभा देवर्षियोंके समुदायोंसे शोभित, देखनेमें मनोहर, अनिर्वचनीय, अलौकिक और अदभुत थी ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ शंकरकी तपस्यासे उस पर्वतकी बड़ी शोभा हो रही थी। स्वाध्यायपरायण ब्राह्मणोंकी वेद-ध्वनि वहाँ सब ओर गूँज रही थी ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माधव! वह अनुपम पर्वत भ्रमरोंके गीतोंसे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था। जनार्दन! वह स्थान अत्यन्त भयंकर होनेपर भी महान्‌ उत्सवसे सम्पन्न-सा प्रतीत होता था। उसे देखकर मुनियोंके समुदायको बड़ी प्रसन्नता हुई ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महान्‌ सौभाग्यशाली मुनि, ऊर्ध्वरेता सिद्धणण, मरुदगण, वसुगण, साध्यगण, इन्द्रसहित विश्वेदेवगण, यक्ष और नाग, पिशाच, लोकपाल, अग्नि, समस्त वायु और प्रधान भूतगण वहाँ आये हुए थे ।। १३-१४ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋतुएँ वहाँ उपस्थित हो सब प्रकारके अत्यन्त अद्भुत पुष्प बिखेर रही थीं। ओषधियाँ प्रज्वलित हो उस वनको प्रकाशित कर रही थीं ।। १५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँके रमणीय पर्वतशिखरोंपर लोगोंको प्रिय लगनेवाली बोली बोलते हुए पक्षी प्रसन्नतासे युक्त हो नाचते और कलरव करते थे ।। १६६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिव्य धातुओंसे विभूषित पर्यकके समान उस पर्वतशिखरपर बैठे हुए महामना महादेवजी बड़ी शोभा पा रहे थे || १७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने व्याप्रचर्मको ही वस्त्रके रूपमें धारण कर रखा था। सिंहका चर्म उनके लिये उत्तरीय वस्त्र (चादर)का काम देता था। उनके गलेमें सर्पमय यज्ञोपवीत शोभा दे रहा था। वे लाल रंगके बाजूबंदसे विभूषित थे। उनकी मूँछ काली थी, मस्तकपर जटाजूट शोभा पाता था। वे भीमस्वरूप रुद्र देवद्रोहियोंके मनमें भय उत्पन्न करते थे। अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले वे भगवान्‌ शिव भक्तों तथा सम्पूर्ण भूतोंक भयका निवारण करते थे ।। १८-१९ ३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ शंकरका दर्शन करके उन सभी महर्षियोंने पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया और परम शुद्ध वाणीद्वारा उनकी मनोहर स्तुति की। वे सभी ऋषि सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त, क्षमाशील और कल्मषरहित थे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ भूतनाथका वह भयानक स्थान बड़ी शोभा पा रहा था। वह अत्यन्त दुर्धर्ष और बड़े-बड़े सर्पोंसे भरा हुआ था || २१६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मधुसूदन! वृषभध्वजका वह भयानक सभास्थल क्षणभरमें अद्भुत शोभा पाने लगा ।। २२३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस समय भूतोंकी स्त्रियोंसे घिरी हुई गिरिराज-नन्दिनी उमा सम्पूर्ण तीर्थोके जलसे भरा हुआ सोनेका कलश लिये उनके पास आयीं। उन्होंने भी भगवान्‌ शंकरके समान ही वस्त्र धारण किया था। वे भी उन्हींकी भाँति उत्तम व्रतका पालन करती थीं ।। २३-२४&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनके पीछे-पीछे उस पर्वतसे गिरनेवाली सभी नदियाँ चल रही थीं। शुभलक्षणा पार्वती फूलोंकी वर्षा करती और नाना प्रकारकी सुगन्ध बिखेरती हुई भगवान्‌ शिवके पास आयीं। वे भी हिमालयके पार्श्चभागका ही सेवन करती थीं ।। २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आते ही मनोहर हास्यवाली देवी उमाने मनोरंजन या हास-परिहासके लिये मुसकराकर अपने दोनों हाथोंसे सहसा भगवान्‌ शंकरके दोनों नेत्र बंद कर लिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनके दोनों नेत्रोंके आच्छादित होते ही सारा जगत्‌ सहसा अन्धकारमय, चेतनाशून्य तथा होम और वषट्कारसे रहित हो गया ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब लोग अनमने हो गये, सबके ऊपर त्रास छा गया। भूतनाथके नेत्र बंद कर लेनेपर इस संसारकी वैसी ही दशा हो गयी, मानो सूर्यदेव नष्ट हो गये हैं || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर क्षणभरमें सारे जगत्‌का अन्धकार दूर हो गया। भगवान्‌ शिवके ललाटसे अत्यन्त दीप्तिशालिनी महाज्वाला प्रकट हो गयी ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनके ललाटमें आदित्यके समान तेजस्वी तीसरे नेत्रका आविर्भाव हो गया। वह नेत्र प्रलयाग्निके समान देदीप्यमान हो रहा था। उस नेत्रसे प्रकट हुई ज्वालाने उस पर्वतको जलाकर मथ डाला ।। ३० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब महादेवजीको प्रज्वलित अग्निके सदृश तीसरे नेत्रसे युक्त हुआ देख गिरिराजनन्दिनी विशाललोचना उमाने सिरसे प्रणाम करके उनकी ओर चकित दृष्टिसे देखा ।। ३१ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;साल और सरल आदि वृक्षोंसे युक्त, श्रेष्ठ चन्दन-वृक्षसे सुशोभित तथा दिव्य ओषधियोंसे प्रकाशित उस रमणीय वनमें आग लग गयी थी और वह सब ओरसे जल रहा था ।। ३२ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भयभीत मृगोंके झुंडोंको जब कहीं भी शरण न मिली, तब वे भागते हुए महादेवजीके पास आ पहुँचे। उनसे वह सारा सभास्थल भर गया और उसकी अपूर्व शोभा होने लगी ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ लगी हुई आगकी लपटें आकाशको चूम रही थीं। विद्युतके समान चंचल हुई वह आग बड़ी भयानक प्रतीत हो रही थी, वह बारह सूर्योके समान प्रकाशित होकर दूसरी प्रलयाग्निके समान प्रतीत होती थी ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसने क्षणभरमें हिमालय पर्वतको धातु और विशाल शिखरोंसहित दग्ध कर डाला। उसकी लताएँ और ओषधियाँ प्रजवलित हो जलकर भस्म हो गयीं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस पर्वतको दग्ध हुआ देख गिरिराजकुमारी उमा दोनों हाथ जोड़कर भगवान्‌ शंकरकी शरणमें गयीं ।। ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस समय उमामें नारी-स्वभाववश मृदुता (कातरता) आ गयी थी। वे पिताकी दयनीय अवस्था नहीं देखना चाहती थीं। उनकी ऐसी दशा देख भगवान्‌ शंकरने हिमवान्‌ पर्वतकी ओर प्रसन्नतापूर्ण दृष्टिसे देखा | ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनकी दृष्टि पड़नेपर क्षणभरमें सारा हिमालय पर्वत पहली स्थितिमें आ गया। देखनेमें परम सुन्दर हो गया। वहाँ हर्षमें भरे हुए पक्षी कलरव करने लगे। उस वनके वृक्ष सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित हो गये ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर्वतको पूर्वावस्थामें स्थित हुआ देख पतित्रता पार्वती देवी बहुत प्रसन्न हुईं। फिर उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी कल्याणस्वरूप महेश्वरदेवसे पूछा ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमा बोलीं--भगवन! सर्वभूतेश्वर! शूलपाणे! महान्‌ व्रतधारी महेश्वर! मेरे मनमें एक महान्‌ संशय उत्पन्न हुआ है। आप मुझसे उसकी व्याख्या कीजिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्यों आपके ललाटमें तीसरा नेत्र प्रकट हुआ? किसलिये आपने पक्षियों और वनोंसहित पर्वतको दग्ध किया और देव! फिर किसलिये आपने उसे पूर्वावस्थामें ला दिया। मेरे इन पिताको आपने जो पूर्ववत्‌ वृक्षोंसे आच्छादित कर दिया, इसका क्या कारण है?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवदेव! मेरे हृदयमें यह संदेह विद्यमान है। आप इसका समाधान करनेकी कृपा करें। आपको मेरा सादर नमस्कार है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारदजी कहते हैं--देवी पार्वतीके ऐसा कहने-पर भगवान्‌ शंकर प्रसन्न होकर बोले ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीमहे श्वरने कहा--धर्मको जानने तथा प्रिय वचन बोलनेवाली देवि! तुमने जो संशय उपस्थित किया है, वह उचित ही है। प्रिये! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मुझसे ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भामिनि! प्रकट या गुप्त जो भी बात होगी, तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं सब कुछ बताऊँगा। तुम इस सभामें मुझसे सारी बातें सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रिये! सभी लोकोंमें मुझे कूटस्थ समझो। तीनों लोक मेरे अधीन हैं। ये जैसे भगवान्‌ विष्णुके अधीन हैं, उसी प्रकार मेरे भी अधीन हैं। भामिनि! तुम यही जान लो कि भगवान्‌ विष्णु जगतके स्रष्टा हैं और मैं इसकी रक्षा करनेवाला हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शोभने! इसीलिये जब मुझसे शुभ या अशुभका स्पर्श होता है, तब यह सारा जगत्‌ वैसा ही शुभ या अशुभ हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! अनिन्दिते! तुमने अपने भोलेपनके कारण मेरी दोनों आँखें बंद कर दीं। इससे क्षणभरमें समस्त संसारका प्रकाश तत्काल नष्ट हो गया ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गिरिराजकुमारी! संसारमें जब सूर्य अदृश्य हो गये और सब ओर अन्धकार-हीअन्धकार छा गया, तब मैंने प्रजाकी रक्षाके लिये अपने तीसरे तेजस्वी नेत्रकी सृष्टि की है || ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसी तीसरे नेत्रका यह महान्‌ तेज था, जिसने इस पर्वतको मथ डाला। देवि! फिर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैंने इस गिरिराज हिमवान्‌को पुनः प्रकृतिस्थ कर दिया है || ४५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उमाने कहा--भगवन्‌! (आपके चार मुख क्‍यों हैं) आपका पूर्व दिशावाला मुख चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ एवं देखनेमें अत्यन्त प्रिय है। उत्तर और पश्चिम दिशाके मुख भी पूर्वकी ही भाँति कमनीय कान्तिसे युक्त हैं। परंतु दक्षिण दिशावाला मुख बड़ा भयंकर है। यह अन्तर क्‍यों? तथा आपके सिरपर कपिल वर्णकी जटाएँ कैसे हुईं? क्या कारण है कि आपका कण्ठ मोरकी पाँखके समान नीला हो गया? || ४६-४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देव! आपके हाथमें पिनाक क्‍यों सदा विद्यमान रहता है? आप किसलिये नित्य जटाधारी ब्रह्मचारीके वेशमें रहते हैं? || ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! वृषध्वज! मेरे इस सारे संशयका समाधान कीजिये; क्योंकि मैं आपकी सहधर्मिणी और भक्त हूँ ।। ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! गिरिराजकुमारी उमाके इस प्रकार पूछनेपर पिनाकधारी भगवान्‌ शिव उनके धैर्य और बुद्धिसे बहुत प्रसन्न हुए ।। ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात्‌ उन्होंने पार्ववीजीसे कहा--“सुभगे! रुचिरानने! जिन हेतुओंसे मेरे ये रूप हुए हैं, उन्हें बता रहा हूँ, सुनो || ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादनामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&amp;nbsp;(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६½ श्लोक मिलाकर कुल ५७½ “लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/1317904920443980510/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/12/from-136-chapter-to-140-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/1317904920443980510'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/1317904920443980510'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/12/from-136-chapter-to-140-chapter-of.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ छत्तीसवें अध्याय से एक सौ चालीसवें अध्याय तक (From the 136 chapter to the 140 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva)'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ इकत्तीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ इकत्तीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-12&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“प्रमथगणोंके द्वारा धर्माधर्मसम्बन्धी रहस्यका कथन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर सभी महाभाग देवता, पितर तथा महान्‌ भाग्यशाली महर्षि प्रमथगणोंसे बोले-- ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“महाभागगण! आपलोग प्रत्यक्ष निशाचर हैं। बताइये, अपवित्र, उच्छिष्ट और शाद्र मनुष्योंकी किस तरह और क्‍यों हिंसा करते हैं? ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“वे कौन-से प्रतिघात (शत्रुके आघातोंको रोक देनेवाले उपाय) हैं, जिनका आश्रय लेनेसे आपलोग उन मनुष्योंकी हिंसा नहीं करते। वे रक्षोघ्न मन्त्र कौन-से हैं, जिनका उच्चारण करनेसे आपलोग घरमें ही नष्ट हो जायूँ या भाग जायँ? निशाचरो! ये सारी बातें हम आपके मुखसे सुनना चाहते हैं&quot; || ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रमथ बोले--जो मनुष्य सदा स्त्री-सहवासके कारण दूषित रहते, बड़ोंका अपमान करते, मूर्खतावश मांस खाते, वृक्षकी जड़में सोते, सिरपर मांसका बोझा ढोते, बिछौनोंपर पैर रखनेकी जगह सिर रखकर सोते, वे सब-के-सब मनुष्य उच्छिष्ट (अपवित्र) तथा बहुतसे छिद्रोंवाले माने गये हैं। जो पानीमें मल-मूत्र एवं थूक फेकते हैं, वे भी उच्छिष्टकी ही कोटिमें आते हैं। ये सभी मानव हमारी दृष्टिमें भक्षण और वधके योग्य हैं। इसमें संशय नहीं है || ४--६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिनके ऐसे शील और आचार हैं, उन मनुष्योंको हम धर दबाते हैं। अब उन प्रतिरोधक उपायोंको सुनिये, जिनके कारण हम मनुष्योंकी हिंसा नहीं कर पाते ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपने शरीरमें गोरोचन लगाता, हाथमें वच नामक औषध लिये रहता, ललाटमें घी और अक्षत धारण करता तथा मांस नहीं खाता-ऐसे मनुष्योंकी हिंसा हम नहीं कर सकते ।। ८$ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके घरमें अग्निहोत्रकी अग्नि नित्य--दिन-रात देदीप्यमान रहती है, छोटे जातिके बाघ (जरख) का चर्म, उसीकी दाढ़ें तथा पहाड़ी कछुआ मौजूद रहता है, घीकी आहुतिसे सुगन्धित धूम निकलता रहता है, बिलाव तथा काला या पीला बकरा रहता है, जिन गृहस्थोंके घरोंमें ये सभी वस्तुएँ स्थित होती हैं, उन घरोंपर भयंकर मांसभक्षी निशाचर आक्रमण नहीं करते हैं || ९--११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमारे-जैसे जो भी निशाचर अपनी मौजसे सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते हैं, वे उपर्युक्त घरोंको कोई हानि नहीं पहुँचा सकते; अतः प्रजानाथ! अपने घरोंमें इन रक्षोघ्न वस्तुओंको अवश्य रखना चाहिये। यह सब विषय, जिसमें आपलोगोंको महान्‌ संदेह था, मैंने कह सुनाया ।१२॥&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें प्रमथगणोंका धर्मसम्बन्धी रहस्यविषयक एक सौ इकत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-17&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;“दिग्गजोंका धर्मसम्बन्धी रहस्य एवं प्रभाव”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर कमलके समान कान्तिमान्‌ कमलोदभव ब्रह्माजीने देवताओं तथा शचीपति इन्द्रसे इस प्रकार कहा-- ।। १ |॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यह रसातलमें विचरनेवाला, महाबली, शक्ति-शाली, महान्‌ सत्त्व और पराक्रमसे युक्त तेजस्वी रेणुक नामवाला नाग यहाँ उपस्थित है। सब-के-सब महान्‌ गजराज (दिग्गज) अत्यन्त तेजस्वी और महापराक्रमी होते हैं। वे पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वीको धारण करते हैं ।। २-३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यदि आपलोग आज्ञा दें तो रेणुक उन महान्‌ गजोंके पास जाकर धर्मके समस्त गोपनीय रहस्योंको पूछे” ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह ब्रह्माजीकी बात सुनकर शान्त चित्तवाले देवताओंने उस समय रेणुकको उस स्थानपर भेजा, जहाँ पृथ्वीको धारण करनेवाले वे दिग्गज मौजूद थे ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रेणुकने कहा--महाबली दिग्गजो! मुझे देवताओं और पितरोंने आज्ञा दी है, इसलिये यहाँ आया हूँ और आपलोगोंके जो धर्मविषयक गूढ़ विचार हैं, उन्हें मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। महाभाग दिग्गजो! आपकी बुद्धिमें जो धर्मका तत्त्व निहित हो, उसे कहिये ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिग्गजोंने कहा--कार्तिक मासके कृष्णपक्षमें आश्लेषा नक्षत्र और मंगलमयी अष्टमी तिथिका योग होनेपर जो मनुष्य आहार-संयमपूर्वक क्रोधशून्य हो निम्नांकित मन्त्रका पाठ करते हुए श्राद्धके अवसरपर हमारे लिये गुड़मिश्रित भात देता है (वह महान्‌ फलका भागी होता है) ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“बलदेव (शेष या अनन्त) आदि जो अत्यन्त बलशाली नाग हैं, वे अनन्त, अक्षय, नित्य फनधारी और महाबली हैं। वे तथा उनके कुलमें उत्पन्न हुए जो अन्य विशाल भुजंगम हों, वे भी मेरे तेज और बलकी वृद्धिके लिये मेरी दी हुई इस बलिको ग्रहण करें। जब श्रीमान्‌ भगवान्‌ नारायणने इस पृथ्वीका एकार्णवके जलसे उद्धार किया था, उस समय इस वसुन्धराका उद्धार करते हुए उन भगवानके श्रीविग्रहमें जो बल था, वह मुझे प्राप्त हो || ८ -:१०३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार कहकर किसी बाँबीपर बलि निवेदन करे। उसपर नागकेसर बिखेर दे, चन्दन चढ़ा दे और उसे नीले कपड़ेसे ढक दे तथा सूर्यास्त होनेपर उस बलिको बाँबीके पास रख दे ।। ११-१२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार संतुष्ट होकर पृथ्वीके नीचे भारसे पीड़ित होनेपर भी हम सब लोगोंको वह परिश्रम प्रतीत नहीं होता है और हमलोग सुखपूर्वक वसुधाका भार वहन करते हैं। भारसे पीड़ित होनेपर भी किसीसे कुछ न चाहनेवाले हम सब लोग ऐसा ही मानते हैं || १३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र यदि उपवासपूर्वक एक वर्षतक इस प्रकार हमारे लिये बलिदान करे तो उसका महान्‌ फल होता है। बाँबीके निकट बलि अर्पित करनेपर वह हमारे लिये अधिक फल देनेवाला माना गया है ।।१४_१५&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तीनों लोकोंमें जो समस्त महापराक्रमी नाग हैं, वे इस बलिदानसे सौ वर्षोके लिये यथार्थरूपसे सत्कृत हो जाते हैं ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिग्गजोंके मुखसे यह बात सुनकर महाभाग देवता, पितर और ऋषि रेणुक नागकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दिग्गजोंका धर्मसम्बन रहस्यविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ तैतीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ तैतीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-9&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“महादेवजीका धर्मसम्बन्धी रहस्य”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(ऋषि, मुनि, देवता और पितरोंसे) महेश्वर बोले--तुमलोगोंने धर्मशास्त्रका सार निकालकर उत्तम धर्मका वर्णन किया है। अब सब लोग मुझसे धर्म-सम्बन्धी इस गूढ़ रहस्यका वर्णन सुनो ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिनकी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहती है और जो मनुष्य परम श्रद्धालु हैं, उन्हींको इस महान्‌ फलदायक रहस्ययुक्त धर्मका उपदेश देना चाहिये ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो उद्धवेगरहित होकर एक मासतक प्रतिदिन गौको भोजन देता है और स्वयं एक ही समय खाता है, उसे जो फल मिलता है, उसका वर्णन सुनो ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये गौएँ परम सौभाग्यशालिनी और अत्यन्त पवित्र मानी गयी हैं। ये देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोकोंको धारण करती हैं ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनकी सेवा करनेसे बहुत बड़ा पुण्य और महान्‌ फल प्राप्त होता है। प्रतिदिन गौओंको भोजन देनेवाला मनुष्य नित्य महान्‌ धर्मका उपार्जन करता है || ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने पहले सत्ययुगमें गौओंको अपने पास रहनेकी आज्ञा दी थी। पद्मयोनि ब्रह्माजीने इसके लिये मुझसे बहुत अनुनय-विनय की थी ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये मेरी गौओंके झुंडमें रहनेवाला वृषभ मुझसे ऊपर मेरे रथकी ध्वजामें विद्यमान है। मैं सदा गौओंके साथ रहनेमें ही आनन्दका अनुभव करता हूँ। अतः उन गौओंकी सदा ही पूजा करनी चाहिये || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौओंका प्रभाव बहुत बड़ा है। वे वरदायिनी हैं। इसलिये उपासना करनेपर अभीष्ट वर देती हैं। उसे सम्पूर्ण कर्मोंमें जो फल अभीष्ट होता है। उसके लिये वे गौएँ अनुमोदन करती --उसकी सिद्धिके लिये वरदान देती हैं। जो पूर्वोक्तरूपसे गौको नित्य भोजन देता है, उसे सदाकी जानेवाली गोसेवाके फलका एक चौथाई पुण्य प्राप्त होता है ।। ८-९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महादेवजीका धर्मसम्बन्धी रहस्यविषयक एक सौ तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ चौतीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ चौतीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-17&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“स्कन्ददेवका धर्मसम्बन्धी रहस्य तथा भगवान्‌ विष्णु और भीष्मजीके द्वारा माहात्म्यका वर्णन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्कन्दने कहा--देवताओ! अब एकाग्रचित्त होकर मेरी मान्यताके अनुसार भी धर्मका गोपनीय रहस्य सुनो। जो मनुष्य नीले रंगके साँड़की सींगोंमें लगी हुई मिट्टी लेकर इससे तीन दिनोंतक स्नान करता है, उसे प्राप्त होनेवाले पुण्यका वर्णन सुनो ।। १½ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह अपने सारे पापोंको धो डालता है और परलोकमें आधिपत्य प्राप्त करता है। फिर जब वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है, तब शूरवीर होता है || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब धर्मका यह दूसरा गुप्त रहस्य सुनो। पूर्णममासी तिथिको चन्द्रोदयके समय ताँबेके बर्तनमें मधु मिलाया हुआ पकवान लेकर जो चन्द्रमाके लिये बलि अर्पण करता है, उसे जिस नित्य धर्म-फलकी प्राप्ति होती है, उसका श्रद्धापूर्वक श्रवण करो। उस पुरुषकी दी हुई उस बलिको साध्य, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुदगण और वसुदेवता भी ग्रहण करते हैं तथा उससे चन्द्रमा और समुद्रकी वृद्धि होती है। इस प्रकार मैंने रहस्यसहित सुखदायक धर्मका वर्णन किया है || ३--७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ विष्णु बोले--जो देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंके बताये हुए धर्मसम्बन्धी इन सभी गूढ़ रहस्योंका प्रतिदिन पाठ करेगा अथवा दोषदृष्टिसे रहित हो सदा एकाग्रचित्त रहकर श्रद्धापूर्वक श्रवण करेगा, उसपर किसी विघ्नका प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा उसे कोई भय भी नहीं प्राप्त होगा || ८-९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यहाँ जिन-जिन पवित्र एवं कल्याणकारी धर्मोंका रहस्योंसहित वर्णन किया गया है, उन सबका जो इन्द्रियसंयमपूर्वक पाठ करेगा, उसे उन धर्मोका पूरा-पूरा फल प्राप्त होगा ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके ऊपर कभी पापका प्रभाव नहीं पड़ेगा, वह कभी पापसे लिप्त नहीं होगा। जो इस प्रसंगको पढ़ेगा, दूसरोंको सुनायेगा अथवा स्वयं सुनेगा, उसे भी उन धर्मोंके आचरणका फल मिलेगा। उसका दिया हुआ हव्य-कव्य अक्षय होगा तथा उसे देवता और पितर बड़ी प्रसन्नतासे ग्रहण करेंगे ।। ११ ई ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य पर्वके दिन शुद्धचित्त होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धर्मके इन रहस्योंका श्रवण करायेगा, वह सदा देवता, ऋषि और पितरोंके आदरका पात्र एवं श्रीसम्पन्न होगा। उसकी सदा धर्मामें प्रवृत्ति बनी रहेगी || १२-१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य महापातकको छोड़कर अन्य पापोंका आचरण करके भी यदि इस रहस्यधर्मको सुन लेगा तो उन सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जायगा ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--नरेश्वर! देवताओंके बताये हुए इस धर्मरहस्यको व्यासजीने मुझसे कहा था। उसीको मैंने तुम्हें बताया है। यह सब देवताओंद्वारा समादृत है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक ओर रत्नोंसे भरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वी प्राप्त होती हो और दूसरी ओर यह सर्वोत्तम ज्ञान मिल रहा हो तो उस पृथ्वीको छोड़कर इस सर्वोत्तम ज्ञानको ही श्रवण एवं ग्रहण करना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुष ऐसा ही माने ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;न श्रद्धाहीनको, न नास्तिकको, न धर्म नष्ट करनेवालेको, न निर्दयीको, न युक्तिवादका सहारा लेकर दुष्टता करनेवालेको, न मुरुद्रोहीकों और न देहाभिमानी व्यक्तिको ही इस धर्मका उपदेश देना चाहिये ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्कन्ददेवका रहस्यविषयक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ पैतीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ पैतीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-21&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य है और जिनका ग्रहण करने योग्य नहीं है, उन मनुष्योंका वर्णन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भरतनन्दन! इस जगत्‌में ब्राह्मणको किनके यहाँ भोजन करना चाहिये, क्षत्रियको किनके घरका अन्न ग्रहण करना चाहिये तथा वैश्य और शूद्रको किनकिन लोगोंके घर भोजन करना चाहिये? ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--बेटा! इस लोकमें ब्राह्मणको ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यके घर भोजन करना चाहिये। शूद्रके घर भोजन करना उसके लिये निषिद्ध है || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार क्षत्रियको ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यके घर ही भोजन ग्रहण करना चाहिये। भक्ष्य-अभक्ष्यका विचार न करके सब कुछ खानेवाले और शास्त्रके विरुद्ध आचरण करनेवाले शूद्रोंका अन्न उसके लिये भी त्याज्य है ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैश्योंमें भी जो नित्य अग्निहोत्र करनेवाले, पवित्रतासे रहनेवाले और चातुर्मास्य-व्रतका पालन करनेवाले हैं, उन्हींका अन्न ब्राह्मण और क्षत्रियोंके लिये ग्राह्म है ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो द्विज शूद्रोंके चरका अन्न खाता है, वह समस्त पृथ्वी और सम्पूर्ण मनुष्योंके मलका ही पान और भक्षण करता है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो शूट्रोंका अन्न खाता है, वह पृथ्वीका मल खाता है। शूद्रात्न भोजन करनेवाले सभी द्विज पृथ्वीका मल ही खाते हैं ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य शूद्रके कर्मोमें संलग्न रहनेवाला हो, वह यदि विशिष्ट कर्म --संध्या-वन्दन आदियमें संलग्न रहनेवाला हो, तो भी नरकमें पकाया जाता है। यदि शूद्रके कर्म न करके भी वह शास्त्रविरुद्ध कर्ममें संलग्न रहता हो तो भी उसे नरककी यातना भोगनी पड़ती है || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर और मनुष्योंके लिये मंगलकारी कार्यमें लगे रहनेवाले होते हैं। क्षत्रियको सबकी रक्षामें तत्पर बताया गया है और वैश्यको प्रजाकी पुष्टिके लिये कृषि, गोरक्षा आदि कार्य करने चाहिये ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैश्य जो कर्म करता है, उसका आश्रय लेकर सब लोग जीविका चलाते हैं। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य--ये वैश्यके अपने कर्म हैं। इससे उसको घृणा नहीं होनी चाहिये ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो वैश्य अपना कर्म छोड़कर शूद्रका कर्म करता है, उसे शूद्रके समान ही जानना चाहिये और उसके यहाँ कभी भोजन नहीं करना चाहिये || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो चिकित्सा करनेवाला, शास्त्र बेचकर जीविका चलानेवाला, ग्रामाध्यक्ष, पुरोहित, वर्षफल बतानेवाला ज्योतिषी और वेद-शास्त्रसे भिन्न व्यर्थकी पुस्तकें पढ़नेवाला है, वे सबके सब ब्राह्मण शूद्रके समान हैं || ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो निर्लज्ज मनुष्य शूद्रोचित कर्म करनेवाले इन द्विजोंके घर भोजन करता है, वह अभक्ष्य-भक्षणका पाप करके दारुण भयको प्राप्त होता है ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके कुल, वीर्य और तेज नष्ट हो जाते हैं तथा वह धर्म-कर्मसे हीन होकर कुत्तेकी भाँति तिर्यक्‌-योनिमें पड़ जाता है || १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो चिकित्सा करनेवाले वैद्यका अन्न खाता है, उसका वह अन्न विष्ठाके समान है। व्यभिचारिणी स्त्री या वेश्याका अन्न मूत्रके समान है। कारीगरका अन्न रक्तके तुल्य है ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित पुरुष विद्या बेचकर जीविका चलानेवाले ब्राह्मणका अन्न खाता है, उसका वह अन्न भी शाद्वान्नके ही समान है। अतः साधु पुरुषको उसका परित्याग कर देना चाहिये ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो कलंकित मनुष्यका अन्न ग्रहण करता है, उसे रक्तका कुण्ड कहते हैं। जो चुगुलखोरके यहाँ भोजन करता है, उसका वह भोजन करना ब्रह्महत्याके समान माना गया है। असत्कार और अवहेलनापूर्वक मिले हुए भोजनको कभी नहीं ग्रहण करना चाहिये ।। १६-१७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण ऐसे अन्नको भोजन करता है, वह रोगी होता है और शीघ्र ही उसके कुलका संहार हो जाता है। जो नगररक्षकका अन्न खाता है, वह चण्डालके समान होता है ।। १८&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गोवध, ब्राह्मणवध, सुरापान और गुरुपत्नीगमन करनेवाले मनुष्यके यहाँ भोजन कर लेनेपर ब्राह्मण राक्षसोंके कुलकी वृद्धि करनेवाला होता है ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धरोहर हड़पनेवाले, कृतघ्न तथा नपुंसकका अन्न खा लेनेसे मनुष्य मध्यदेशबहिष्कृत भीलोंके घरमें जन्म लेता है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! जिनके यहाँ खाना चाहिये और जिनके यहाँ नहीं खाना चाहिये, ऐसे लोगोंका मैंने विधिवत्‌ परिचय दे दिया। अब मुझसे और क्या सुनना चाहते हो ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भोज्याभोज्यान्नकथन नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय प्रा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/8754119631421193711/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/12/from-131-chapter-to-135-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/8754119631421193711'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/8754119631421193711'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/12/from-131-chapter-to-135-chapter-of.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ इकत्तीसवें अध्याय से एक सौ पैतीसवें अध्याय तक (From the 131 chapter to the 135 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva)'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s72-c/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png" height="72" 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वर्णन”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! प्राचीन कालकी बात है, एक बार देवराज इन्द्रने भगवान्‌ विष्णुसे पूछा--“भगवन्‌! आप किस कर्मसे प्रसन्न होते हैं? किस प्रकार आपको संतुष्ट किया जा सकता है?&#39; सुरेन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर जगदीश्वर श्रीहरिने कहा ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ विष्णु बोले--इन्द्र! ब्राह्मणोंकी निन्दा करना मेरे साथ महान्‌ द्वेष करनेके समान है तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे सदा मेरी भी पूजा हो जाती हैं--इसमें संशय नहीं है।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकोी प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिये। भोजनके पश्चात्‌ अपने दोनों पैरोंकी भी सेवा करे अर्थात्‌ पैरोंको भलीभाँति धो ले तथा तीर्थकी मृत्तिकासे सुदर्शन चक्र बनाकर उसपर मेरी पूजा करे और नाना प्रकारकी भेंट चढ़ावे। जो ऐसा करते हैं, उन मनुष्योंपर मैं सन्तुष्ट होता हूँ |। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य बौने ब्राह्मण और पानीसे निकले हुए वराहको देखकर नमस्कार करता और उनकी उठायी मृत्तिकाको मस्तकसे लगाता है, ऐसे लोगोंको कभी कोई अशुभ या पाप नहीं प्राप्त होता | ४ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य अश्व॒त्थ वृक्ष, गोरोचना और गौकी सदा पूजा करता है, उसके द्वारा देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत्‌की पूजा हो जाती है ।। ५६&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस रूपमें उनके द्वारा की हुई पूजाको मैं यथार्थरूपसे अपनी पूजा मानकर ग्रहण करता हूँ। जबतक ये सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं, तबतक यह पूजा ही मेरी पूजा है। इससे भिन्न दूसरे प्रकारकी पूजा मेरी पूजा नहीं है ।। ६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अल्पबुद्धि मानव अन्य प्रकारसे मेरी व्यर्थ पूजा करते हैं। मैं उसे ग्रहण नहीं करता हूँ। वह पूजा मुझे संतोष प्रदान करनेवाली नहीं हैं || ७-८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्रने पूछा--भगवन्‌! आप चक्र, दोनों पैर, बौने ब्राह्मण, वराह और उनके द्वारा उठायी हुई मिट्टीकी प्रशंसा किसलिये करते हैं? ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आप ही प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं, आप ही समस्त प्रजाका संहार करते हैं और आप ही मनुष्योंसहित सम्पूर्ण प्राणियोंकी सनातन प्रकृति (मूल कारण) हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तब भगवान्‌ विष्णुने हँसकर इस प्रकार कहा--*देवराज! मैंने चक्रसे दैत्योंको मारा है। दोनों पैरोंसे पृथ्वीको आक्रान्त किया है। वाराहरूप धारण करके हिरण्याक्ष दैत्यको धराशायी किया है और वामन ब्राह्मणका रूप ग्रहण करके मैंने राजा बलिको जीता है ।। ११-१२ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस तरह इन सबकी पूजा करनेसे मैं महामना मनुष्योंपर संतुष्ट होता हूँ। जो मेरी पूजा करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“ब्रह्मचारी ब्राह्मगको घरपर आया देख गृहस्थ पुरुष ब्राह्मणको प्रथम भोजन कराये, तत्पश्चात्‌ स्वयं अवशिष्ट अन्नको ग्रहण करे तो उसका वह भोजन अमृतके समान माना गया है ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;जो प्रातःकालकी संध्या करके सूर्यके सम्मुख खड़ा होता है, उसे समस्त तीथोमें स्नानका फल मिलता है और वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तपोधनो! तुमलोगोंने जो संशय पूछा है, उसके समाधानके लिये मैंने यह सारा गूढ़ रहस्य तुम्हें बताया है। बताओ और क्या कहूँ” ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बलदेवजीने कहा--जो मनुष्योंको सुख देनेवाला है तथा मूर्ख मानव जिसे न जाननेके कारण भूतोंसे पीड़ित हो नाना प्रकारके कष्ट उठाते रहते हैं, वह परम गोपनीय विषय मैं बता रहा हूँ; उसे सुनो || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातः:काल उठकर गाय, घी, दही, सरसों और राईका स्पर्श करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपस्वी पुरुष आगे या पीछेसे आनेवाले सभी हिंसक जन्‍्तुओंको त्याग देते--उन्हें छोड़कर दूर हट जाते हैं। इसी प्रकार संकटके समय भी वे उच्छिष्ट वस्तुका सदा परित्याग ही करते हैं ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता बोले--मनुष्य जलसे भरा हुआ ताँबेका पात्र लेकर उत्तराभिमुख हो उपवासका नियम ले अथवा और किसी व्रतका संकल्प करे || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ऐसा करता है, उसके ऊपर देवता संतुष्ट होते हैं और उसकी सारी मनोवांछा सिद्ध हो जाती है; परन्तु मंदबुद्धि मानव ऐसा न करके व्यर्थ दूसरे-दूसरे कार्य किया करते हैं ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उपवासका संकल्प लेने और पूजाका उपचार समर्पित करनेमें ताम्रपात्रको उत्तम माना गया है। पूजन-सामग्री, भिक्षा, अर्घ्य तथा पितरोंके लिये तिल-मिश्रित जल ताम्रपात्रके द्वारा देने चाहिये अन्यथा उनका फल बहुत थोड़ा होता है। यह अत्यन्त गोपनीय बात बतायी गयी है। इसके अनुसार कार्य करनेसे देवता संतुष्ट होते हैं | २२-२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मने कहा--ब्राह्मण यदि राजाका कर्मचारी हो, वेतन लेकर घण्टा बजानेका काम करता हो, दूसरोंका सेवक हो, गोरक्षा एवं वाणिज्यका व्यवसाय करता हो, शिल्पी या नट हो, मित्रद्रोही हो, वेद न पढ़ा हो अथवा शूद्र जातिकी स्त्रीका पति हो, ऐसे लोगोंको किसी तरह भी देवकार्य (यज्ञ) और पितृकार्य (श्राद्ध) का अन्न आदि नहीं देना चाहिये। जो इन्हें पिण्ड या अन्न देते हैं, उनकी अवनति होती है तथा उनके पितरोंको भी तृप्ति नहीं होती ।। २४-२५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके घरसे अतिथि निराश लौट जाता है, उसके यहाँसे अतिथिका सत्कार न होनेके कारण देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश लौट जाते हैं || २६-२७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके यहाँ अतिथिका सत्कार नहीं होता, उस पुरुषको स्त्रीहत्यारों, गोघातकों, कृतष्नों, ब्रह्मघातियों और गुरुपत्नीगामियोंके समान पाप लगता है ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्नि बोले--जो दुर्बद्धि मनुष्य लात उठाकर उससे गौका, महाभाग ब्राह्मणका अथवा प्रज्वलित अग्निका स्पर्श करता है, उसके दोष बता रहा हूँ, सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। २९३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसे मनुष्यकी अपकीर्ति स्वर्गतक फैल जाती है। उसके पितर भयभीत हो उठते हैं। देवताओंमें भी उसके प्रति भारी वैमनस्य हो जाता है तथा महातेजस्वी पावक उसके दिये हुए हविष्यको नहीं ग्रहण करते हैं || ३०-३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सौ जन्मोंतक नरकमें पकाया जाता है। ऋषिगण कभी उसके उद्धारका अनुमोदन नहीं करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु पुरुषको गौओंका, महातेजस्वी ब्राह्मणका तथा प्रज्वलित अग्निका भी कभी पैरसे स्पर्श नहीं करना चाहिये। जो इन तीनोंपर पैर उठाता है, उसे प्राप्त होनेवाले इन दोषोंका मैंने वर्णन किया है ।। ३३-३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विश्वामित्र बोले--देवताओ! यह धर्मसम्बन्धी परम गोपनीय रहस्य सुनो, जब भाद्रपदमासके कृष्णपक्षमें त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रका योग हो, उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख हो कुतप कालमें (मध्याह्नके बाद आठवें मुहूर्तमें) जब कि हाथीकी छाया पूर्व दिशाकी ओर पड़ रही हो, उस छायामें ही स्थित हो पितरोंके निमित्त उपहारके रूपमें उत्तम अन्नका दान करता है, उस दानका जैसा विस्तृत फल बताया गया है, वह सुनो। दान करनेवाले उस पुरुषने इस जगतमें तेरह वर्षोंके लिये पितरोंका महान्‌ श्राद्ध सम्पन्न कर दिया, ऐसा जानना चाहिये || ३५--३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौओंने कहा--पूर्वकालमें ब्रह्मलोकके भीतर वज्रधारी इन्द्रके यज्ञमें “बहुले! समंगे! अकुतोभये! क्षेमे! सखी, भूयसी” इन नामोंका उच्चारण करके बछड़ोंसहित गौओंकी स्तुति की गयी थी, फिर जो-जो गौएँ आकाशमें स्थित थीं और जो सूर्यके मार्गमें विद्यमान थीं, नारदसहित सम्पूर्ण देवताओंने उनका &#39;सर्वसहा” नाम रख दिया ।। ३८-३९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये दोनों श्लोक मिलकर एक मन्त्र है। उस मन्त्रसे जो गौओंकी वन्दना करता है, वह पापकर्मसे मुक्त हो जाता है। गोसेवाके फलस्वरूप उसे इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है तथा वह चन्द्रमाके समान कान्तिलाभ करता है ।। ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पर्वके दिन गोशालामें इस देवसेवित मन्त्रका पाठ करता है, उसे न पाप होता है, न भय होता है और न शोक ही प्राप्त होता है। वह सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके लोकमें जाता है ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर महान्‌ सौभाग्यशाली विश्वविख्यात वसिष्ठ आदि सभी सप्तर्षियोंने कमलयोनि ब्रह्माजीकी प्रदक्षिणा की और सब-के-सब हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये || ४२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनमेंसे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिने समस्त प्राणियोंके लिये हितकर तथा विशेषत: ब्राह्मण और क्षत्रियजातिके लिये लाभदायक प्रश्न उपस्थित किया-- || ४३ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“&#39;भगवन्‌! इस संसारमें सदाचारी मनुष्य प्राय: दरिद्र एवं द्रव्यहीन हैं। वे किस कर्मसे किस तरह यहाँ यज्ञका फल पा सकते हैं? उनकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा || ४४-४५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माजी बोले--महान्‌ भाग्यशाली सप्तर्षियो! तुम लोगोंने परम शुभकारक, गूढ़ अर्थसे युक्त, सूक्ष्म एवं मनुष्योंके लिये कल्याणकारी प्रश्न सामने रखा है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपोधनो! मनुष्य जिस प्रकार बिना किसी संशयके यज्ञका फल पाता है, वह सब पूर्णरूपसे बताऊँगा, सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पौषमासके शुक्ल पक्षमें जिस दिन रोहिणी नक्षत्रका योग हो, उस दिनकी रातमें मनुष्य स्नान आदिसे शुद्ध हो एक वस्त्र धारण करके श्रद्धा और एकाग्रताके साथ खुले मैदानमें आकाशके नीचे शयन करे और चन्द्रमाकी किरणोंका ही पान करता रहे। ऐसा करनेसे उसको महान्‌ यज्ञका फल मिलता है ।। ४८-४९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विप्रवरो! तुमलोग सूक्ष्मतत्त्व एवं अर्थके ज्ञाता हो। तुमने मुझसे जो कुछ पूछा है, उसके अनुसार मैंने तुम्हें यह परम गूढ़ रहस्य बताया है || ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय के श्लोक 1-19&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदगन्निके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निदेवने कहा--जो मनुष्य पूर्णिमा तिथिको चन्द्रोदयके समय चन्द्रमाकी ओर मुँह करके उन्हें जलकी भरी हुई एक अंजलि घी और अक्षतके साथ भेंट करता है, उसने अन्निहोत्रका कार्य सम्पन्न कर लिया। उसके द्वारा गार्हपत्य आदि तीनों अग्नियोंको भलीभाँति आहुति दे दी गयी ।। १-२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मूर्ख अमावास्याके दिन किसी वनस्पतिका एक पत्ता भी तोड़ता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बुद्धिहीन मानव अमावास्या तिथिको दन्तधावन काष्ठ चबाता है, उसके द्वारा चन्द्रमाकी हिंसा होती है और पितर भी उससे उद्िग्न हो उठते हैं || ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर्वके दिन उसके दिये हुए हविष्यको देवता नहीं ग्रहण करते हैं। उसके पितर भी कुपित हो जाते हैं और उसके कुलमें वंशकी हानि होती है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लक्ष्मी बोलीं--जिस घरमें सब पात्र इधर-उधर बिखरे पड़े हों, बर्तन फ़ूटे और आसन फटे हों तथा जहाँ स्त्रियाँ मारी-पीटी जाती हों, वह घर पापके कारण दूषित होता है। पापसे दूषित हुए उस गृहसे उत्सव और पर्वके अवसरोंपर देवता और पितर निराश लौट जाते हैं-उस घरकी पूजा नहीं स्वीकार करते ।। ६-७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंगिराने कहा--जो पूरे एक वर्षतक करंज (करज) वृक्षके नीचे दीपदान करे और ब्राह्मीबूटीकी जड़ हाथमें लिये रहे, उसकी संतति बढ़ती है || ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गार्ग्यने कहा--सदा अतिथियोंका सत्कार करे, घरमें दीपक जलाये, दिनमें सोना छोड़ दे। मांस कभी न खाय। गौ और ब्राह्मणकी हत्या न करे तथा तीनों पुष्कर तीर्थोंका प्रतिदिन नाम लिया करे। यह रहस्यसहित श्रेष्ठतम धर्म महान्‌ फल देनेवाला है || ९-१० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सैकड़ों बार किये हुए यज्ञका फल भी क्षीण हो जाता है; किंतु श्रद्धालु पुरुषोंद्वारा उपर्युक्त धर्मोंका पालन किया जाय तो वे कभी क्षीण नहीं होते || ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह परम गोपनीय रहस्यकी बात सुनो। श्राद्धमें, यज्ञमें, तीर्थमें और पर्वोके दिन देवताओंके लिये जो हविष्य तैयार किया जाता है, उसे यदि रजस्वला, कोढ़ी अथवा वन्ध्या स्त्री देख ले तो उनके नेत्रोंद्वारा देखे हुए हविष्यको देवता नहीं ग्रहण करते हैं तथा पितर भी तेरह वर्षोतक असंतुष्ट रहते हैं || १२-१३ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्राद्ध और यज्ञके दिन मनुष्य स्नान आदिसे पवित्र होकर श्वेत वस्त्र धारण करे। ब्राह्मणोंसे स्‍्वस्तिवाचन कराये तथा महाभारत (गीता आदि) का पाठ करे। ऐसा करनेसे उसका हव्य और कव्य अक्षय होता है ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धौम्य बोले--घरमें फूटे बर्तन, टूटी खाट, मुर्गा, कुत्ता और अभश्वत्थादि वृक्षका होना अच्छा नहीं माना गया है ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फूटे बर्तनमें कलियुगका वास कहा गया है। टूटी खाट रहनेसे धनकी हानि होती है। मुर्गे और कुत्तेके रहनेपर देवता उस घरमें हविष्य नहीं ग्रहण करते तथा मकानके अंदर कोई बड़ा वृक्ष होनेपर उसकी जड़के अंदर साँप, बिच्छू आदि जन्तुओंका रहना अनिवार्य हो जाता है; इसलिये घरके भीतर पेड़ न लगावे ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जमदग्नि बोले--कोई अश्वमेध या सैकड़ों बाजपेय यज्ञ करे, नीचे मस्तक करके वृक्षमें लटके अथवा समृद्धिशाली सत्र खोल दे; किंतु जिसका हृदय शुद्ध नहीं है, वह पापी निश्चय ही नरकमें जाता है; क्योंकि यज्ञ, सत्य और हृदयकी शुद्धि तीनों बराबर हैं (फिर भी हृदयकी शुद्धि सर्वश्रेष्ठ है) ।। १७-१८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(प्राचीन समयमें एक ब्राह्मण) शुद्ध हृदयसे ब्राह्मणको सेरभर सत्तू दान करके ही ब्रह्मलोकको प्राप्त हुआ था। हृदयकी शुद्धिका महत्त्व बतानेके लिये यह एक ही दृष्टान्त पर्याप्त होगा || १९ |।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ सत्ताईयवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय के श्लोक 1-11&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वायुदेवने कहा--मैं मनुष्योंके लिये सुखदायक धर्मका किंचित्‌ वर्णन करता हूँ और रहस्यसहित जो दोष हैं, उन्हें भी बतलाता हूँ। तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। १&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतिदिन अग्निहोत्र करना चाहिये। श्राद्धके दिन उत्तम अन्तके द्वारा ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। पितरोंके लिये दीप-दान तथा तिलमिश्रित जलसे तर्पण करना चाहिये ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य श्रद्धा और एकाग्रताके साथ इस विधिसे वर्षाके चार महीनोंतक पितरोंको तिलमिश्रित जलकी अंजलि देता है और वेद-शास्त्रके पारंगत विद्वान्‌ ब्राह्मणको यथाशक्ति भोजन कराता है, वह सौ यज्ञोंका पूरा फल प्राप्त कर लेता है ।। ३-४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब यह दूसरी उस गोपनीय बातको सुनो, जो उत्तम नहीं है अर्थात्‌ निन्दनीय है। यदि शूद्र किसी द्विजके अग्निहोत्रकी अग्निको एक स्थानसे दूसरे स्थानको ले जाता है तथा मूर्ख स्त्रियाँ यज्ञ-सम्बन्धी हविष्यको ले जाती हैं--इस कार्यको जो धर्म ही समझता है, वह अधर्मसे लिप्त होता है। उसके ऊपर अग्नियोंका कोप होता है और वह शूद्रयोनिमें जन्म लेता है || ५-६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके ऊपर देवताओंसहित पितर भी विशेष संतुष्ट नहीं होते हैं। ऐसे स्थलोंपर जो प्रायश्चित्तका विधान है, उसे बताता हूँ, सुनो || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसका भलीभाँति अनुष्ठान करके मनुष्य सुखी और निश्चिन्त हो जाता है। द्विजको चाहिये कि वह निराहार एवं एकाग्रचित्त होकर तीन दिनोंतक गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध और गोघृतसे अग्निमें आहुति दे। तत्पश्चात्‌ एक वर्ष पूर्ण होनेपर देवता उसकी पूजा ग्रहण करते हैं और पितर भी उसके यहाँ श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर प्रसन्न होते हैं || ८-९३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार मैंने रहस्यसहित धर्म और अधर्मका वर्णन किया। यह स्वर्गकी कामनावाले मनुष्योंको मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गीय सुखकी प्राप्ति करानेवाला है ।।१०-११।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ उनत्तीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ उनत्तीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-15&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;“लोमश द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोशमजीने कहा--जो स्वयं विवाह न करके परायी स्त्रियोंमें आसक्त हैं, उनके यहाँ श्राद्ध.काल आनेपर पितर निराश हो जाते हैं ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो परायी स्त्रीमें आसक्त है, जो वन्ध्या स्त्रीका सेवन करता है तथा जो ब्राह्मणका धन हर लेता है--ये तीनों समान दोषके भागी होते हैं || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये पितरोंकी दृष्टिमें बात करनेयोग्य नहीं रह जाते हैं, इसमें संशय नहीं है और देवता तथा पितर उसके हविष्यको आदर नहीं देते हैं ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः अपना हित चाहनेवाले पुरुषको परायी स्त्री और वन्ध्या स्त्रीका त्याग कर देना चाहिये तथा ब्राह्मणके धनका कभी अपहरण नहीं करना चाहिये ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब दूसरी धर्मयुक्त गोपनीय रहस्यकी बात सुनो। सदा श्रद्धापूर्वक गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रत्येक मासकी द्वादशी और पूर्णिमाके दिन ब्राह्मणोंको घृतसहित चावलोंका दान करे। इसका जो पुण्य है, उसे सुनो ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस दानसे चन्द्रमा तथा महोदथधि समुद्रकी वृद्धि होती है और उस दाताको इन्द्र अश्वमेध यज्ञका चतुर्थाश फल देते हैं || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस दानसे मनुष्य तेजस्वी और बलवान होता है और भगवान्‌ सोम प्रसन्न होकर उसे अभीष्ट कामनाएँ प्रदान करते हैं ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब दूसरे महान्‌ फलदायक रहस्ययुक्त धर्मका वर्णन सुनो। जो इस कलियुगको पाकर मनुष्योंके लिये सुखकी प्राप्ति करानेवाला है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य सबेरे उठकर स्नान करके पवित्र सफेद वस्त्रसे युक्त हो मनको एकाग्र करके ब्राह्मणोंको तिल-पात्रका दान करता है और पितरोंके लिये मधुयुक्त तिलोदक, दीपक एवं खिचड़ी देता है, उसको जो फल मिलता है, उसका वर्णन सुनो ।। १०-११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ इन्द्रने तिल-पात्रके दानका फल इस प्रकार बतलाया है--जो सदा गो-दान और भूमि-दान करता है तथा जो बहुत-सी दक्षिणावाले अग्निष्टोम यज्ञका अनुष्ठान करता है, उसके इन पुण्य-कर्मोके समान ही देवतालोग तिल-पात्रके दानको भी मानते हैं || १२-१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितरलोग सदा श्राद्धमें तिलसहित जलका दान करना अक्षय मानते हैं। दीपदान और खिचड़ीके दानसे उसके पितामह संतुष्ट होते हैं || १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह पुरातन धर्म-रहस्य ऋषियोंद्वारा देखा गया है। स्वर्गलोक और पितृलोकमें भी देवताओं तथा पितरोंने इसका समादर किया है। इस प्रकार इस धर्मका मैंने वर्णन किया है ।। १५ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लोगशवर्णित धर्मका रहस्यविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय प्रा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ तीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ तीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-40&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“अरुन्धती, धर्मराज और चित्रगुप्तद्वारा धर्मसम्बन्धी रहस्यका वर्णन”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर सभी ऋषियों, पितरों और देवताओंने तपस्यामें बढ़ी-चढ़ी हुई अरुन्धती देवीसे, जो शील और शक्तिमें महात्मा वसिष्ठजीके ही समान थीं, एकाग्रचित्त होकर पूछा--“भद्रे! हम आपके मुँहसे धर्मका रहस्य सुनना चाहते है। आपकी दृष्टिमें जो गुह्मतम धर्म हो, उसे बतानेकी कृपा करें” ।। १-२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अरुन्धती बोली--देवगण! आपलोगोंने मुझे स्मरण किया, इससे मेरे तपकी वृद्धि हुई है। अब मैं आप ही लोगोंकी कृपासे गोपनीय रहस्योंसहित सनातन धर्मोंका वर्णन करती हूँ, आपलोग वह सब सुनें। जिसका मन शुद्ध हो, उस श्रद्धालु पुरुषको ही इन धर्मोंका उपदेश करना चाहिये ।। ३-४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो श्रद्धासे रहित, अभिमानी, ब्रह्महत्यारे और गुरुस्त्रीगामी हैं, इन चार प्रकारके मनुष्योंस बात भी नहीं करनी चाहिये। इनके सामने धर्मके रहस्यको प्रकाशित न करे ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य बारह वर्षोतक प्रतिदिन एक-एक कपिला गौका दान करता है, हर महीनेमें निरन्तर सत्रयाग चलाता और ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें जाकर एक लाख गोदान करता है, उसके धर्मका फल उस मनुष्यके बराबर नहीं हो सकता, जिसके द्वारा की हुई सेवासे अतिथि संतुष्ट हो जाता है ।। ६-७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब मनुष्योंके लिये सुखदायक तथा महान्‌ फल देनेवाले दूसरे धर्मका रहस्यसहित वर्णन सुनो। श्रद्धापूर्वक इसका पालन करना चाहिये ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सबेरे उठकर कुश और जल हाथमें ले गौओंके बीचमें जाय। वहाँ गौओंके सींगपर जल छिड़के और सींगसे गिरे हुए जलको अपने मस्तकपर धारण करे। साथ ही उस दिन निराहार रहे। ऐसे पुरुषको जो धर्मका फल मिलता है, उसे सुनो || ९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तीनों लोकोंमें सिद्ध, चारण और महर्षियोंसे सेवित जो कोई भी तीर्थ सुने जाते हैं, उन सबमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है वही गायोंके सींगके जलसे अपने मस्तकको सींचनेसे प्राप्त होता है ।। १०-११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सुनकर देवता, पितर और समस्त प्राणी बहुत प्रसन्न हुए। उन सबने उन्हें साधुवाद दिया और अरुन्धती देवीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माजीने कहा--महाभागे! तुम धन्य हो, तुमने रहस्यसहित अद्भुत धर्मका वर्णन किया है। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ, तुम्हारी तपस्या सदा बढ़ती रहे ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यमराजने कहा--देवताओ और महर्षियो! मैंने आपलोगोंके मुखसे दिव्य एवं मनोरम कथा सुनी है, अब आपलोग चित्रगुप्तका तथा मेरा भी प्रिय भाषण सुनिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस धर्मयुक्त रहस्यको महर्षि भी सुन सकते हैं। अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु मनुष्यको भी इसे श्रवण करना चाहिये ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्यका किया हुआ कोई भी पुण्य तथा पाप भोगके बिना नष्ट नहीं होता। पर्वकालमें जो कुछ भी दान किया जाता है, वह सब सूर्यदेवके पास पहुँचता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब मनुष्य प्रेतलोकको जाता है, उस समय सूर्यदेव वे सारी वस्तुएँ उसे अर्पित कर देते हैं और पुण्यात्मा पुरुष परलोकमें उन वस्तुओंका उपभोग करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब मैं चित्रगुप्तकके मतके अनुसार कुछ कल्याण-कारी धर्मका वर्णन करता हूँ। मनुष्यको जलदान और दीपदान सदा ही करने चाहिये ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उपानह (जूता), छत्र तथा कपिला गौका भी यथोचित रीतिसे दान करना चाहिये। पुष्कर तीर्थमें वेदोंके पारंगत विद्वान्‌ ब्राह्मणको कपिला गाय देनी चाहिये और अग्निहोत्रके नियमका सब तरहसे प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये ।। १९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके सिवा यह एक दूसरा धर्म भी चित्रगुप्तने बताया है। उसके पृथक्‌ू-पृथक्‌ फलका वर्णन सभी साधु पुरुष सुनें। समस्त प्राणी कालक्रमसे प्रलयको प्राप्त होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पापोंके कारण दुर्गम नरकमें पड़े हुए प्राणी भूख-प्याससे पीड़ित हो अतामें जलते हुए पकाये जाते हैं। वहाँ उस यातनासे निकल भागनेका कोई उपाय नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मन्दबुद्धि मनुष्य ही नरकके घोर दुःखमय अन्धकारमें प्रवेश करते हैं। उस अवसरके लिये मैं धर्मका उपदेश करता हूँ, जिससे मनुष्य दुर्गम नरकसे पार हो सकता है ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस धर्ममें व्यय बहुत थोड़ा है, परंतु लाभ महान्‌ है। उससे मृत्युके पश्चात्‌ भी उत्तम सुखकी प्राप्ति होती है। जलके गुण दिव्य हैं। प्रेतलोकमें ये गुण विशेषरूपसे लक्षित होते हैं ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ पुण्योदका नामसे प्रसिद्ध नदी है, जो यमलोकनिवासियोंके लिये विहित है। उसमें अमृतके समान मधुर, शीतल एवं अक्षय जल भरा रहता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो यहाँ जलदान करता है, वही परलोकमें जानेपर उस नदीका जल पीता है। अब दीपदानसे जो अधिकाधिक लाभ होता है, उसको सुनो ।। २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दीपदान करनेवाला मनुष्य नरकके नियत अन्धकारका दर्शन नहीं करता। उसे चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि प्रकाश देते रहते हैं || २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता भी दीपदान करनेवालेका आदर करते हैं। उसके लिये सम्पूर्ण दिशाएँ निर्मल होती हैं तथा प्रेतलोकमें जानेपर वह मनुष्य सूर्यके समान प्रकाशित होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये विशेष यत्न करके दीप और जलका दान करना चाहिये। विशेषतः पुष्कर तीर्थमें जो वेदोंके पारंगत विद्वान्‌ ब्राह्यणको कपिला दान करते हैं, उन्हें उस दानका जो फल मिलता है, उसे सुनो। उसे साँड़ों-सहित सौ गौओंके दानका शाश्वत फल प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्म हत्याके समान जो कोई पाप होता है, उसे एकमात्र कपिलाका दान शुद्ध कर देता है। वह एक ही गोदान सौ गोदानोंके बराबर है। इसलिये ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें कार्तिककी पूर्णिमाको अवश्य कपिला गौका दान करना चाहिये || ३१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो श्रेष्ठ एवं सुपात्र ब्राह्मणको उपानह (जूता) दान करता है, उसके लिये कहीं कोई विषम स्थान नहीं है। न उसे दुःख उठाना पड़ता है और न काँटोंका ही सामना करना पड़ता है। छत्र-दान करनेसे परलोकमें जानेपर दाताको सुखदायिनी छाया सुलभ होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस लोकमें दिये हुए दानका कभी नाश नहीं होता। चित्रगुप्तका यह मत सुनकर भगवान्‌ सूर्यके शरीरमें रोमांच हो आया। उन महातेजस्वी सूर्यने सम्पूर्ण देवताओं और पितरोंसे कहा--“आपलोगोंने महामना चित्रगुप्तके धर्मविषयक गुप्त रहस्यको सुन लिया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो मनुष्य महामनस्वी ब्राह्मणोंपर श्रद्धा करके यह दान देते हैं, उन्हें भय नहीं होता&#39; || ३६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आगे बताये जानेवाले पाँच धर्मविषयक दोष जिनमें विद्यमान हैं, उनका यहाँ कभी उद्धार नहीं होता। ऐसे अनाचारी नराधमोंसे बात नहीं करनी चाहिये। उन्हें दूरसे ही त्याग देना चाहिये || ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्महत्यारा, गोहत्या करनेवाला, परस्त्रीलम्पट, अश्रद्धालु तथा जो स्त्रीपर निर्भर रहकर जीविका चलाता है--ये ही पूर्वोक्त पाँच प्रकारके दुराचारी हैं || ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये पापकर्मी मनुष्य प्रेतलोकमें जाकर नरककी आगमें मछलियोंकी तरह पकाये जाते हैं और पीब तथा रक्त भोजन करते हैं ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन पाँचों पापाचारियोंसे देवताओं, पितरों, स्नातक ब्राह्मणों तथा अन्यान्य तपोधनोंको बातचीत भी नहीं करनी चाहिये || ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अरन्धती और चित्रगुप्तका धर्मसम्बन्धी रहस्यविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/3920679085364450793/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/11/from-126-chapter-to-130-chapter-of.html#comment-form' 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कथा"/><title type='text'>सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ इक्कीसवें अध्याय से एक सौ पच्चीसवें अध्याय तक (From the 121 chapter to the 125 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))</title><content type='html'>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; 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बतायी हैं, वे दोषरहित और निर्मल हैं। इसमें संदेह नहीं कि आपने विद्या और तपस्यासे अपने अन्तःकरणको परम पवित्र बना लिया है || ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आप शुद्धचित्त हैं, इसलिये आपके समागमसे मुझे यह महान्‌ लाभ पहुँचा है। यह बात मैं समृद्धिशाली तपवाले महर्षिके समान बुद्धिसे बारंबार विचारकर प्रत्यक्ष देखता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपके दर्शनसे ही हमलोगोंका महान्‌ अभ्युदय हो सकता है। आपने जो दर्शन दिया, यह आपकी बहुत बड़ी कृपा है। मैं ऐसा ही मानता हूँ। यह कर्म भी आपकी कृपासे ही स्वभावत: बन गया है ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणत्वके तीन कारण माने गये हैं--तपस्या, शास्त्रज्ञान और विशुद्ध ब्राह्मणकुलमें जन्म। जो इन तीनों गुणोंसे सम्पन्न है, वही सच्चा ब्राह्मण है || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसे ब्राह्मणके तृप्त होनेपर देवता और पितर भी तृप्त हो जाते हैं। विद्वानोंके लिये ब्राह्मणसे बढ़कर दूसरा कोई मान्य नहीं है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि ब्राह्मण न हों तो यह सारा जगत्‌ अज्ञानान्धकारसे आच्छन्न हो जाय। किसीको कुछ सूझ न पड़े तथा चारों वर्णोकी स्थिति, धर्म-अधर्म और सत्यासत्य कुछ भी न रह जाय ।। ९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे मनुष्य अच्छी तरह जोतकर तैयार किये हुए खेतमें बीज डालनेपर उसका फल पाता है, उसी प्रकार विद्वान ब्राह्मणको दान देकर दाता निश्चय ही उसके फलका भागी होता है ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि विद्या और सदाचारसे सम्पन्न ब्राह्मण जो दान लेनेका प्रधान अधिकारी है, धन न पा सके तो धनियोंका धन व्यर्थ हो जाय ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मूर्ख मनुष्य यदि किसीका अन्न खाता है तो वह उस अन्नको नष्ट करता है (अर्थात्‌ कर्ताको उसका कुछ फल नहीं मिलता)। इसी प्रकार वह अन्न भी उस मूर्खको नष्ट कर डालता है। जो सुपात्र होनेके कारण अन्न और दाताकी रक्षा करता है, उसकी भी वह अन्न रक्षा करता है। जो मूर्ख दानके फलका हनन करता है, वह स्वयं भी मारा जाता है ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभाव और शक्तिसे सम्पन्न दिद्वान्‌ ब्राह्मण यदि अन्न भोजन करता है तो वह पुनः अन्नका उत्पादन करता है, किंतु वह स्वयं अन्नसे उत्पन्न होता है, इसलिये यह व्यतिक्रम सूक्ष्म (दुर्विज्ञेय) है अर्थात्‌ यद्यपि वृष्टिसे अन्नकी और अन्नसे प्रजाकी उत्पत्ति होती है; किंतु यह प्रजा (विद्वान ब्राह्मण) से अन्नकी उत्पत्तिका विषय दुर्विज्ञेय है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“दान देनेवालेको जो पुण्य होता है, वही दान लेनेवालेको भी (यदि वह योग्य अधिकारी है तो) होता है। (क्योंकि दोनों एक दूसरेके उपकारक होते हैं) एक पहियेसे गाड़ी नहीं चलती--प्रतिग्रहीताके बिना दाताका दान सफल नहीं हो सकता।” ऐसी ऋषियोंकी मान्यता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहाँ विद्वान्‌ और सदाचारी ब्राह्मण रहते हैं, वहीं दिये हुए दानका फल इहलोक और परलोकमें मनुष्य भोगता है || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण विशुद्ध कुलमें उत्पन्न, निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले, बहुत दानपरायण तथा अध्ययनसम्पन्न हैं, वे ही सदा पूज्य माने गये हैं | १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसे सत्पुरुषोंने जिस मार्गका निर्माण किया है, उससे चलनेवालेको कभी मोह नहीं होता; क्योंकि वे मनुष्योंको स्वर्गलोकमें ले जानेवाले तथा सनातन यज्ञनिर्वाहक हैं || १७।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ बाईसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ बाईसवाँ अध्याय के श्लोक 1-20&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“व्यास-मैत्रेय-संवाद--तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! मैत्रेयके इस प्रकार कहनेपर भगवान्‌ वेदव्यास उनसे इस प्रकार बोले--&#39;ब्रह्मन! तुम बड़े सौभाग्यशाली हो, जो ऐसी बातोंका ज्ञान रखते हो। भाग्यसे ही तुमको ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई है ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“संसारके लोग उत्तम गुणवाले पुरुषकी ही अधिक प्रशंसा करते हैं। सौभाग्यकी बात है कि रूप, अवस्था और सम्पत्तिके अभिमान तुम्हारे ऊपर प्रभाव नहीं डालते हैं। यह तुमपर देवताओंका महान्‌ अनुग्रह है। इसमें संशय नहीं है | २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;अस्तु, अब मैं दानसे भी उत्तम धर्मका तुमसे वर्णन करता हूँ, सुनो। इस जगतमें जितने शास्त्र और जो कोई भी प्रवृतियाँ हैं, वे सब वेदको ही सामने रखकर क्रमशः प्रचलित हुए हैं |। ३-४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं दानकी प्रशंसा करता हूँ, तुम भी तपस्या और शास्त्रज्ञानकी प्रशंसा करते हो, वास्तवमें तपस्या पवित्र और वेदाध्ययन एवं स्वर्गका उत्तम साधन है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैंने सुना है कि तपस्या और विद्या दोनोंसे ही मनुष्य महान्‌ पदको प्राप्त करता है। अन्यान्य जो पाप हैं, उन्हें भी तपस्यासे ही वह दूर कर सकता है ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो कोई भी उद्देश्य लेकर पुरुष तपस्यामें प्रवृत्त होता है, वह सब उसे तप और विद्यासे प्राप्त हो जाता है; यह हमारे सुननेमें आया है ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जिससे सम्बन्ध स्थापित करना अत्यन्त कठिन है, जो दुर्धर्ष, दुर्लभ और दुर्लड्घ्य है, वह सब तपस्यासे सुलभ हो जाता है; क्योंकि तपस्याका बल सबसे बड़ा है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“शराबी, चोर, गर्भहत्यारा, गुरुकी शय्यापर शयन करनेवाला पापी भी तपस्याद्वारा सम्पूर्ण संसारसे पार हो जाता है और अपने पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो सब प्रकारकी विद्याओंमें प्रवीण है, वही नेत्रवान्‌ है और तपस्वी, चाहे जैसा हो उसे भी नेत्रवान्‌ ही कहा जाता है। इन दोनोंको सदा नमस्कार करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो विद्याके धनी और तपस्वी हैं, वे सब पूजनीय हैं तथा दान देनेवाले भी इस लोकमें धन-सम्पत्ति और परलोकमें सुख पाते हैं ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संसारके पुण्यात्मा पुरुष अन्न-दान देकर इस लोकमें भी सुखी होते हैं और मृत्युके बाद ब्रह्मलोक तथा दूसरे शक्तिशाली लोकको प्राप्त कर लेते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“दानी स्वयं पूजित और सम्मानित होकर दूसरोंका पूजन और सम्मान करते हैं। दाता जहाँ-जहाँ जाते हैं, सब ओर उनकी स्तुति की जाती है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मनुष्य दान करता हो या न करता हो, वह ऊपरके लोकमें रहता हो या नीचेके लोकमें, जिसे कर्मानुसार जैसा लोक प्राप्त होगा, वह अपने उसी लोकमें जायगा ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैत्रेयजी! तुम जो कुछ चाहोगे, उसके अनुसार तुमको अन्न-पानकी सामग्री प्राप्त होगी। तुम बुद्धिमान, कुलीन, शास्त्रज्ञ और दयालु हो। तुम्हारी तरुण अवस्था है और तुम व्रतधारी हो। अतः सदा धर्म-पालनमें लगे रहो और गृहस्थोंके लिये जो सबसे उत्तम एवं मुख्य कर्तव्य है, उसे ग्रहण करो--ध्यान देकर सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जिस कुलमें पति अपनी पत्नीसे और पत्नी अपने पतिसे संतुष्ट रहती हो, वहाँ सदा कल्याण होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जिस प्रकार जलसे शरीरका मल धुल जाता है और अग्निकी प्रभासे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार दान और तपस्यासे मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“महाभाग! ब्राह्मण दान, तपस्या और भगवान्‌ विष्णुकी आराधनाके द्वारा संसारसागरसे पार हो जाता है। जिन्होंने अपने वर्णोचित कर्मोका अनुष्ठान करके अन्तःकरणको शुद्ध बना लिया है, तपस्याद्वारा जिनका चित्त निर्मल हो गया है तथा विद्याके प्रभावसे जिनका मोह दूर हो गया है, ऐसे मनुष्योंके उद्धारके लिये भगवान्‌ श्रीहरि माने गये हैं अर्थात्‌ उनका स्मरण करते ही वे अवश्य उद्धार करते हैं। अतः तुम भगवान्‌ विष्णुकी आराधनामें तत्पर हो सदा उनके भक्त बने रहो और निरन्तर उन्हें नमस्कार करो। अष्टाक्षर मन्त्रके जपमें तत्पर रहनेवाले भगवद्धक्त कभी नष्ट नहीं होते। जो इस जगतमें प्रणवोपासनामें संलग्न और परमार्थ-साधनमें तत्पर हैं, ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंके संगसे सारा पाप दूर करके अपने आपको पवित्र करो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैत्रेय! तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं सावधानीके साथ अपने आश्रमको जा रहा हूँ। मैंने जो कुछ बताया है, उसे याद रखना; इससे तुम्हारा कल्याण होगा” ।। १९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब मैत्रेयजीने व्यासजीको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर कहा --“भगवन्‌! आप मंगल प्राप्त करें! || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर २४ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-25½&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“शाण्डिली और सुमनाका संवाद--पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्यका वर्णन”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ पितामह! साध्वी स्त्रियोंके सदाचारका क्‍या स्वरूप है? यह मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। उसे मुझे बताइये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! देवलोककी बात है--सम्पूर्ण तत्त्वोंको जाननेवाली सर्वज्ञा एवं मनस्विनी शाण्डिलीदेवीसे केकयराजकी पुत्री सुमनाने इस प्रकार प्रश्न किया-- ।। २ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“कल्याणि! तुमने किस बर्ताव अथवा किस सदाचारके प्रभावसे समस्त पापोंका नाश करके देवलोकमें पदार्पण किया है? ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तुम अपने तेजसे अग्निकी ज्वालाके समान प्रज्वलित हो रही हो और चन्द्रमाकी पुत्रीके समान अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित होती हुई स्वर्गगलोकमें आयी हो ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निर्मल वस्त्र धारण किये थकावट और परिश्रमसे रहित होकर विमानपर बैठी हो। तुम्हारी मंगलमयी आकृति है, तुम अपने तेजसे सहख्रगुनी शोभा पा रही हो ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;थोड़ी-सी तपस्या थोड़े-से दान या छोटे-मोटे नियमोंका पालन करके तुम इस लोकमें नहीं आयी हो। अत: अपनी साधनाके सम्बन्धमें सच्ची-सच्ची बात बताओ&#39; ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुमनाके इस प्रकार मधुर वाणीमें पूछनेपर मनोहर मुसकानवाली शाण्डिलीने उससे नम्रतापूर्ण शब्दोंमें इस प्रकार कहा-- ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;*देवि! मैंने गेरआ वस्त्र नहीं धारण किया, वल्कलवस्त्र नहीं पहना, मूँड़ नहीं मुड़ाया और बड़ी-बड़ी जटाएँ नहीं रखायीं। वह सब करके मैं देवलोकमें नहीं आयी हूँ || ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैंने सदा सावधान रहकर अपने पतिदेवके प्रति मुँहले कभी अहितकर और कठोर वचन नहीं निकाले हैं ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैं सदा सास-ससुरकी आज्ञामें रहती और देवता, पितर तथा ब्राह्मणोंकी पूजामें सदा सावधान होकर संलग्न रहती थी ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“किसीकी चुगली नहीं खाती थी। चुगली करना मेरे मनको बिलकुल नहीं भाता था। मैं घरका दरवाजा छोड़कर अन्यत्र नहीं खड़ी होती और देरतक किसीसे बात नहीं करती थी ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैंने कभी एकान्तमें या सबके सामने किसीके साथ अश्लील परिहास नहीं किया तथा मेरी किसी क्रियाद्वारा किसीका अहित भी नहीं हुआ। मैं ऐसे कार्योमें कभी प्रवृत्त नहीं होती थी ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यदि मेरे स्वामी किसी कार्यसे बाहर जाकर फिर घरको लौटते तो मैं उठकर उन्हें बैठनेके लिये आसन देती और एकाग्रचित्त हो उनकी पूजा करती थी ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मेरे स्वामी जिस अन्नको ग्रहण करने योग्य नहीं समझते थे तथा जिस भक्ष्य, भोज्य या लेह्म आदिको वे नहीं पसंद करते थे, उन सबको मैं भी त्याग देती थी ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;सारे कुट॒म्बके लिये जो कुछ कार्य आ पड़ता, वह सब मैं सबेरे ही उठकर कर-करा लेती थी ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैं अग्निहोत्रकी रक्षा करती और घरको लीप-पोतकर शुद्ध रखती थी। बच्चोंका प्रतिदिन पालन करती और कन्याओंको नारीधर्मकी शिक्षा देती थी। अपनेको प्रिय लगनेवाली खाद्य वस्तुएँ त्यागकर भी गर्भकी रक्षामें ही सदा संलग्न रहती थी। बच्चोंको शाप (गाली) देना, उनपर क्रोध करना अथवा उन्हें सताना आदि मैं सदाके लिये त्याग चुकी थी। मेरे घरमें कभी अनाज छीटे नहीं जाते थे। किसी भी अन्नको बिखेरा नहीं जाता था। मैं अपने घरमें गौओंको घास-भूसा खिलाकर, पानी पिलाकर तृप्त करती थी और रत्नकी भाँति उन्हें सुरक्षित रखनेकी इच्छा करती थी तथा शुद्ध अवस्थामें मैं आगे बढ़कर ब्राह्मणोंको भिक्षा देती थी ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि मेरे पति किसी आवश्यक कार्यवश कभी परदेश जाते तो मैं नियमसे रहकर उनके कल्याणके लिये नाना प्रकारके मांगलिक कार्य किया करती थी ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;स्वामीके बाहर चले जानेपर मैं आँखोंमें आँजन लगाना, ललाटमें गोरोचनका तिलक करना, तैलाभ्यंगपूर्वक स्नान करना, फूलोंकी माला पहनना, अंगोंमें अंगराग लगाना तथा शृंगार करना पसंद नहीं करती थी ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जब स्वामी सुखपूर्वक सो जाते उस समय आवश्यक कार्य आ जानेपर भी मैं उन्हें कभी नहीं जगाती थी। इससे मेरे मनको विशेष संतोष प्राप्त होता था ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;परिवारके पालन-पोषणके कार्यके लिये भी मैं उन्हें कभी नहीं तंग करती थी। घरकी गुप्त बातोंको सदा छिपाये रखती और घर-आँगनको सदा झाड़-बुहारकर साफ रखती थी ।। १९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;जो स्त्री सदा सावधान रहकर इस धर्ममार्गकका पालन करती है, वह नारियोंमें अरुन्धतीके समान आदरणीय होती है और स्वर्गलोकमें भी उसकी विशेष प्रतिष्ठा होती है! || २० |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! सुमनाको इस प्रकार पातित्रत्य धर्मका उपदेश देकर तपस्विनी महाभागा शाण्डिली देवी तत्काल वहाँ अदृश्य हो गयीं || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पाण्डुनन्दन! जो प्रत्येक पर्वके दिन इस आख्यानका पाठ करता है, वह देवलोकमें पहुँचकर नन्दनवनमें सुखपूर्वक निवास करता है || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शाण्डिली और युमनाका संवादविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३½ श्लोक मिलाकर कुल २५½ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ चौबीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ चौबीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-67½&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“नारदका पुण्डरीकको भगवान्‌ नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--पितामह! जो सर्वोत्तम कर्तव्य-रूपसे जानने योग्य है, महात्मा पुरुष जिसका अनुष्ठान करना अपना धर्म समझते हैं तथा जो सम्पूर्ण शास्त्रोंका सार है, उस श्रेयका कृपापूर्वक वर्णन कीजिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--प्रजानाथ! जो अत्यन्त गूढ़, संसारबन्धनसे मुक्त करनेवाला और तुम्हारे द्वारा श्रवण करने एवं भलीभाँति जाननेके योग्य है, उस परम श्रेयका वर्णन सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राचीन कालकी बात है, पुण्डरीक नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण किसी पुण्यतीर्थमें सदा जप किया करते थे। उन्होंने योगपरायण मुनिवर नारदजीसे श्रेय (कल्याणकारी साधन) के विषयमें पूछा। तब नारदजीने महात्मा ब्रह्माजीके द्वारा बताये हुए श्रेयका उन्हें इस प्रकार उपदेश दिया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारदजीने कहा--तात! तुम सावधान होकर परम उत्तम ज्ञानयोगका वर्णन सुनो। यह किसी व्यक्ति-विशेषसे नहीं प्रकट हुआ है--अनादि है, प्रचुर अर्थका साधक है तथा वेदों और शास्त्रोंके अर्थका सारभूत है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो चौबीस तत्त्वमयी प्रकृतिसे उसका साक्षिभूत पचीसवाँ तत्त्व पुरुष कहा गया है तथा जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, उसीको नर कहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरसे सम्पूर्ण तत्त्व प्रकट हुए हैं, इसलिये उन्हें नार कहते हैं। नार ही भगवानूका अयन --निवासस्थान है, इसलिये वे नारायण कहलाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सृष्टिकालमें यह सारा जगत्‌ नारायणसे ही प्रकट होता है और प्रलयकालमें फिर उन्हींमें इसका लय होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारायण ही परब्रह्म हैं, परमपुरुष नारायण ही सम्पूर्ण तत्त्व हैं, वे ही परसे भी परे हैं। उनके सिवा दूसरा कोई परात्पर तत्त्व नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्हींको वासुदेव, विष्णु तथा आत्मा कहते हैं। संज्ञाभेदसे एकमात्र नारायण ही सम्पूर्ण शास्त्रोंद्वारा वर्णित होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समस्त शास्त्रोंका आलोडन करके बारंबार विचार करनेपर एकमात्र यही सिद्धान्त स्थिर हुआ है कि सदा भगवान्‌ नारायणका ध्यान करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः तुम शात्त्रार्थके सम्पूर्ण गहन विस्तारका त्याग करके अनन्यचित्त होकर सर्वव्यापी अजन्मा भगवान्‌ नारायणका ध्यान करो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो आलस्य छोड़कर दो घड़ी भी नारायणका ध्यान करता है, वह भी उत्तम गतिको प्राप्त होता है। फिर जो निरन्तर उन्हींके भजन-ध्यानमें तत्पर रहता है, उसकी तो बात ही क्या है।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो “ॐ नमो नारायणाय” इस अष्टाक्षर मन्त्रको सनातन ब्रह्मरूप जानता है और अन्तकालमें इसका जप करता है, वह भगवान्‌ विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य अपना हित चाहता हो, वह सदा श्रवण, मनन, गीत, स्तुति और पूजन आदिके द्वारा सर्वदा ब्रह्मस्वरूप नारायणकी आराधना करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारायणके भजनमें तत्पर रहनेवाला पुरुष पापसे लिप्त नहीं होता। वह उदित हुए सहस््र किरणोंवाले सूर्यकी भाँति समस्त लोकको पवित्र कर देता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मचारी हो या गृहस्थ, वानप्रस्थ हो या संन्यासी, भगवान्‌ विष्णुकी आराधना छोड़ देनेपर ये कोई भी परम गतिको नहीं प्राप्त होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुण्डरीक! सहस्रों जन्म धारण करनेपर भी भगवान्‌ विष्णुमें मन और बुद्धिका लगना अत्यन्त दुर्लभ है। अतः तुम उन भक्तवत्सल नारायणदेवकी भलीभाँति आराधना करो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! नारदजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर विप्रवर पुण्डरीक भगवान्‌ श्रीहरिकी आराधना करने लगे। वे स्वप्रमें भी शंख-चक्र गदाधारी, किरीट और कुण्डलसे सुशोभित, सुन्दर श्रीवत्स-चिह्न एवं कौस्तुभभणि धारण करनेवाले कमलनयन नारायण देवका दर्शन करते थे और उन देवदेवेश्वरको देखते ही बड़े वेगसे उठकर उनके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करते थे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर दीर्घकालके बाद भगवानने उसी रूपमें पुण्डरीकको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उस समय सम्पूर्ण वेद तथा देवता, गन्धर्व और किन्नर नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते थे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;योग ही जिनका निवासस्थान है, वे भगवान्‌ अधोक्षज श्रीहरि सबके द्वारा पूजित हो उस भक्त पुण्डरीकको साथ लेकर ही पुनः अपने धामको चले गये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजेन्द्र! इसलिये तुम भी भगवानके भक्त एवं शरणागत होकर उनकी यथायोग्य पूजा करके उन्हीं पुरुषोत्तमके भजनमें लगे रहो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अजर, अमर, एक (अद्वितीय), ध्येय, अनादि, अनन्त, सगुण, निर्गुण, सबके आदि कारण, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, उपमारहित, उपमाके योग्य तथा योगियोंके लिये ज्ञान-गम्य हैं, उन त्रिभुवनगुरु भगवान्‌ विष्णुकी शरण लो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! आपके मतमें साम और दानमें कौन-सा श्रेष्ठ है? इनमें जो उत्कृष्ट हो, उसे बताइये || १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--बेटा! कोई मनुष्य सामसे प्रसन्न होता है और कोई दानसे। अतः पुरुषके स्वभावको समझकर दोनोंमेंसे एकको अपनाना चाहिये ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! भरतश्रेष्ठ] अब तुम सामके गुणोंको सुनो। सामके द्वारा मनुष्य भयानक-सेभयानक प्राणीको वशमें कर सकता है ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसके अनुसार कोई ब्राह्मण किसी जंगलमें किसी राक्षसके चंगुलमें फँसकर भी सामनीतिके द्वारा उससे मुक्त हो गया था ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक बुद्धिमान्‌ एवं वाचाल ब्राह्मण किसी निर्जन वनमें घूम रहा था। उसी समय किसी राक्षएने आकर उसे खानेकी इच्छासे पकड़ लिया। बेचारा ब्राह्मण बड़े कष्टमें पड़ गया ।। ५ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणकी बुद्धि तो अच्छी थी ही, वह शास्त्रोंका विद्वान्‌ भी था। इसलिये उस अत्यन्त भयानक राक्षसको देखकर भी वह न तो घबराया और न व्यथित ही हुआ। बल्कि उसके प्रति उसने साम नीतिका ही प्रयोग किया ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राक्षसने ब्राह्मणके शान्तिमय वचनोंकी प्रशंसा करके उनके सामने अपना प्रश्न उपस्थित किया और कहा--&#39;यदि मेरे प्रश्नका उत्तर दे दोगे तो तुम्हें छोड़ दूँगा! बताओ, मैं किस कारणसे अत्यन्त दुर्बल और सफेद (पाण्डु) हो गया हूँ! ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सुनकर ब्राह्मणने दो घड़ीतक विचार करके शान्तभावसे निम्नांकित गाथाओं (वचनोंद्वारा) उस राक्षसके प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया ।। ८ ॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मण बोला--राक्षस! निश्चय ही तुम सुहृदजनोंसे अलग होकर परदेशमें दूसरे लोगोंके साथ रहते और अनुपम विषयोंका उपभोग करते हो; इसीलिये चिन्ताके कारण तुम दुबले एवं सफेद होते जा रहे हो || ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निशाचर! तुम्हारे मित्र तुम्हारे द्वारा भलीभाँति सम्मानित होनेपर भी अपने स्वभावदोषके कारण तुमसे विमुख रहते हैं; इसीलिये तुम चिन्तावश दुबले होकर सफेद पड़ते जा रहे हो || १० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गुणोंमें तुम्हारी अपेक्षा निम्नश्रेणीके हैं, वे जड मनुष्य भी धन और ऐश्वर्यमें अधिक होनेके कारण निश्चय ही सदा तुम्हारी अवहेलना किया करते हैं; इसीलिये तुम दुर्बल और सफेद (पीले) होते जा रहे हो ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम गुणवान्‌, विद्वान्‌ एवं विनीत होनेपर भी सम्मान नहीं पाते और गुणहीन तथा मूढ़ व्यक्तियोंको सम्मानित होते देखते हो; इसीलिये तुम्हारे शरीरका रंग फीका पड़ गया है और तुम दुर्बल हो गये हो ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीवन-निर्वाहका कोई उपाय न होनेसे तुम क्लेश उठाते होगे, किंतु अपने गौरवके कारण जीविकाके प्रतिग्रह आदि उपायोंकी निनन्‍्दा करते हुए उन्हें स्वीकार नहीं करते होगे। यही तुम्हारी उदासी और दुर्बलताका कारण है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;साधो! तुम सज्जनताके कारण अपने शरीरको कष्ट देकर भी जब किसीका उपकार करते हो; तब वह तुम्हें अपनी शक्तिसे पराजित समझता है; इसीलिये तुम कृशकाय और सफेद होते जा रहे हो ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिनका चित्त काम और क्रोधसे आक्रान्त है, अतएव जो कुमार्गपर चलकर कष्ट भोग रहे हैं। सम्भवत: ऐसे ही लोगोंके लिये तुम सदा चिन्तित रहते हो; इसीलिये दुर्बल होकर सफेद (पीले) पड़ते जा रहे हो ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यद्यपि तुम अपनी उत्तम बुद्धिके द्वारा सम्मानके योग्य हो तो भी अज्ञानी पुरुष तुम्हारी हँसी उड़ाते हैं और दुराचारी मनुष्य तुम्हारा तिरस्कार करते हैं। इसी चिन्तासे तुम्हारा शरीर सूखकर पीला पड़ता जा रहा है ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निश्चय ही कोई शत्रु मुँहसे मित्रताकी बातें करता हुआ आया, श्रेष्ठ पुरुषके समान बर्ताव करने लगा और तुम्हें ठगकर चला गया; इसीलिये तुम दुर्बल और सफेद होते जा रहे हो ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम्हारी अर्थगति--कार्यपद्धति सबको विदित है, तुम रहस्यकी बातें समझानेमें कुशल और दिद्दान्‌ हो तो भी गुणज्ञ पुरुष तुम्हारा आदर नहीं करते हैं; इसीसे तुम सफेद और दुर्बल हो रहे हो ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम दुराग्रही दुष्ट पुरुषोंके बीचमें ही संशयरहित होकर उत्तम बात कहते हो, तो भी तुम्हारे गुण वहाँ प्रकाशित नहीं होते; इसीलिये तुम दुर्बल होते और फीके पड़ते जा रहे हो ।। १९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अथवा यह भी हो सकता है कि तुम धन, बुद्धि और विद्यासे हीन होकर भी केवल शारीरिक शक्तिसे सम्पन्न होकर ऊँचा पद चाहते रहे हो और इसमें तुम्हें सफलता न मिली हो; इसीलिये तुम पाण्डुवर्णके हो गये हो और तुम्हारा शरीर भी सूखता जा रहा है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुझे यह भी जान पड़ता है कि तुम्हारा मन तपस्यामें लगा है और इसलिये तुम जंगलमें रहना चाहते हो, परंतु तुम्हारे भाई-बन्धु इस बातको पसंद नहीं करते हैं; इसीलिये तुम सफेद और दुर्बल हो गये हो || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अथवा यह भी सम्भव है कि तुम्हारा पुत्र दुर्विनीत--उद्दण्ड हो, या दामाद घरकी सारी सम्पत्ति झाड़-पोंछकर ले जानेवाला हो या तुम्हारी पत्नी प्रतिकूल स्वभावकी हो; इसीसे तुम कृशकाय और पीले होते जा रहे हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम्हारे भाई बड़े बेईमान हों अथवा तुम्हारे पिता, माता या ज्येष्ठ भाई एवं गुरुजन भूखसे दुर्बल होकर मर गये हों, इस बातकी भी सम्भावना है। शायद इसीसे तुम्हारे शरीरका रंग सफेद हो गया है और तुम सूखते चले जा रहे हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अथवा यह भी अनुमान होता है कि पहले तुमने किसी ब्राह्मण या गौकी हत्या की हो, किसी ब्राह्मण या देवताका किसी समय अधिक-से-अधिक धन चुरा लिया हो, इसीलिये तुम कृशकाय और पीले हो रहे हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह भी सम्भव है कि तुम्हारी स्त्रीका किसीने अपहरण कर लिया हो। अथवा तुम बूढ़े हो चले हो या जगतके मनुष्य तुमसे द्वेष करने लगे हों। अथवा अज्ञानके द्वारा ही तुम बढ़ेचढ़े हो और इसीलिये चिन्ताके कारण तुम्हारा शरीर सफेद तथा दुर्बल हो गया हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बुढ़ापेके लिये तुम्हारे पास धनका संग्रह देखकर दूसरोंने तुम्हारी उस निजी सम्पत्तिका अपहरण कर लिया हो अथवा जीविकाके लिये दुष्ट पुरुषोंकी अपेक्षा रखनी पड़ती हो, इसकी भी सम्भावना जान पड़ती है। शायद इसी चिन्तासे तुम्हारा शरीर दुबला होता और पीला पड़ता जा रहा हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह भी सम्भव है कि तुम्हारी स्त्री परम सुन्दरी होनेके कारण तुम्हें बहुत प्रिय हो और तुम्हारे पड़ोसमें ही कोई बहुत सुन्दर, महाधनी और कामी नवयुवक निवास करता हो! इसी चिन्तासे तुम दुबले और पीले पड़ते जा रहे हो || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निश्चय ही तुम धनवानोंके बीच परम उत्तम और समयोचित बात कहते होगे, किंतु वह उन्हें पसंद न आती होगी। इसीलिये तुम सफेद और दुर्बल हो रहे हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम्हारा कोई पहलेका दृढ़ निश्चयवाला प्रिय व्यक्ति मूर्खताके कारण तुमपर कुपित हो गया होगा और तुम उसे किसी तरह समझा-बुझाकर शान्त नहीं कर पाते होगे। इसीलिये तुम दुर्बल और फीके पड़ते जा रहे हो | २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निश्चय ही कोई मनुष्य अपनी इच्छाके अनुसार किसी अभीष्ट कार्यमें नियुक्त करके सदा अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है; इसीलिये तुम श्वेत (पीत) वर्णके और दुबले हो रहे हो || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अवश्य ही तुम सदगुणोंसे युक्त होनेके कारण दूसरे लोगोंद्वारा पूजित होते हो; परंतु तुम्हारा मित्र समझता है कि यह मेरे ही प्रभावसे आदर पा रहा है। इसीलिये तुम चिन्तासे दुर्बल एवं पीले होते जा रहे हो || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निश्चय ही तुम लज्जावश किसीपर अपना आन्तरिक अभिप्राय नहीं प्रकट करना चाहते, क्योंकि तुम्हें अपनी अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिके विषयमें संदेह है, इसीलिये चिन्तावश सूखते और पीले पड़ते जा रहे हो || २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निश्चय ही संसारमें नाना प्रकारकी बुद्धि और भिन्न-भिन्न रुचि रखनेवाले लोग रहते हैं। उन सबको तुम अपने गुणोंसे वशमें करना चाहते हो। इसीलिये क्षीणकाय और पाण्डुवर्णके हो रहे हो || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अथवा यह भी हो सकता है कि तुम विद्वान्‌ न होकर भी विद्यासे मिलनेवाले यशको पाना चाहते हो। डरपोक और कायर होनेपर भी पराक्रमजनित कीर्ति पानेकी अभिलाषा रखते हो और अपने पास बहुत थोड़ा धन होनेपर भी दानवीर होनेका यश पानेके लिये उत्सुक हो। इसीलिये कृुशकाय और पीले हो रहे हो ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुमने कोई कार्य किया, जिसका चिरकालसे अभिलषित कोई फल तुम्हें प्राप्त होनेवाला था, किंतु तुम्हें तो वह प्राप्त हुआ नहीं और दूसरे लोग उसे हर ले गये। इसीलिये तुम्हारे शरीरकी कान्ति फीकी पड़ गयी है और दिनोंदिन दुबले होते जा रहे हो || ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक बात यह भी ध्यानमें आती है कि तुम्हें तो अपना कोई दोष दिखायी नहीं देता तथापि दूसरे लोग अकारण ही तुम्हें कोसते रहते हैं। शायद इसीलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल होते जा रहे हो || ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम विरक्त साधुओंको गृहस्थ, दुर्जनोंको वनवासी तथा संन्यासियोंको मठ-मन्दिरमें आसक्त देखते हो; इसीलिये सफेद और दुर्बल होते जा रहे हो || ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम्हारे स्नेही बन्धु-बान्धव रोग आदिसे पीड़ित होकर महान्‌ दुःख भोगते हैं और तुम उन्हें उस पीड़ाजनित कष्टसे मुक्त नहीं कर पाते हो तथा अपने आपको भी तुम अर्थ-लाभसे हीन पाते हो; शायद इसीलिये तुम सफेद और दुबले-पतले हो गये हो ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम्हारी बातें धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल एवं सामयिक होती हैं, तो भी दूसरे लोग उनपर ठीक विश्वास नहीं करते हैं। इसलिये तुम कान्तिहीन एवं कृशकाय हो रहे हो ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनीषी होनेपर भी तुम जीवन-निर्वाहकी इच्छासे ही अज्ञानी पुरुषोंके दिये हुए धनको लेकर उसीपर गुजारा करते हो; इसीलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल हो ।। ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पापियोंको आगे बढ़ते और कल्याणकारी कर्मोंमें लगे हुए पुण्यात्मा पुरुषोंको दुःख उठाते देखकर अवश्य ही तुम सदा इस परिस्थितिकी निन्‍्दा करते हो; इसीलिये दुर्बल और पाण्डुवर्णके हो गये हो ।। ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दूसरेसे विरोध रखनेवाले अपने सुहृदोंको रोककर तुम निश्चय ही उनका प्रिय करना चाहते हो; इसीलिये चिन्ताके कारण श्रीहीन और दुर्बल हो गये हो || ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदज्ञ ब्राह्मणोंको वेदविरुद्ध कर्ममें तत्यर और विद्दानोंको इन्द्रियोंक अधीन देखकर मेरी समझमें तुम निरन्तर चिन्तित रहते हो। सम्भवतः इसीलिये तुम्हारा शरीर सफेद (पीला) पड़ गया है और तुम दुर्बल हो गये हो || ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा कहकर जब उस ब्राह्मणने राक्षसका समादर किया, तब राक्षसने भी ब्राह्मणका विशेष सत्कार किया। उसने ब्राह्मणगको अपना मित्र बना लिया और उसे धन देकर छोड़ दिया ।। ३९ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दुर्बल और पाण्डुवर्णके राक्षमका आख्यानविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २८½ श्लोक मिलाकर कुल ६७½ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-84&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! मनुष्यकुलमें जन्म और परम दुर्लभ कर्मक्षेत्र पाकर अपना कल्याण चाहनेवाले दरिद्र पुरुषको क्या करना चाहिये? ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गंगानन्दन! सब दानोंमें जो उत्तम दान है, जिस वस्तुका जिस-जिस प्रकारसे दान करना उचित है तथा जो माननीय और पूजनीय हैं--इन सब रहस्यमय (गोपनीय) विषयोंका वर्णन कीजिये ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! यशस्वी पाण्डुपुत्र महाराज युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भीष्मजीने उनसे धर्मका परम गुह्य रहस्य बताना आरम्भ किया ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! भरतनन्दन! पूर्वकालमें भगवान्‌ वेदव्यासने मुझे धर्मके जो गूढ़ रहस्य बताये थे, उनका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले यमने नियमपरायण और योगयुक्त होकर महान्‌ तपके फलस्वरूप इस देवगुह्य रहस्यको प्राप्त किया था ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिससे देवता, पितर, ऋषि, प्रमथगण, लक्ष्मी, चित्रगुप्त और दिग्गज प्रसन्न होते हैं ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसमें महान्‌ फल देनेवाले ऋषिधर्मका रहस्यसहित समावेश हुआ है तथा जिसके अनुष्ठानसे बड़े-बड़े दानों और सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिलता है || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निष्पाप नरेश! जो उस धर्मको इस प्रकार जानता और जानकर इसके अनुसार आचरण करता है, वह सदोष (पापी) रहा हो भी तो उस दोषसे मुक्त होकर उन सदगुणोंसे सम्पन्न हो जाता है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दस कसाइयोंके समान एक तेली, दस तेलियोंके समान एक कलवार, दस कलवारोंके समान एक वेश्या और दस वेश्याओंके समान एक राजा है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा इन सबकी अपेक्षा अधिक दोषयुक्त बताया जाता है, इसलिये ये सब पाप राजाके आधेसे भी कम हैं। (अतः राजाका दान लेना निषिद्ध है।) धर्म, अर्थ और कामका प्रतिपादन करनेवाला जो शास्त्र है, वह पवित्र एवं पुण्यका परिचय करानेवाला है ।। १०&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसमें धर्म और उसके रहस्योंकी व्याख्या है वह परम पवित्र, महान्‌ रहस्यमय तत्त्वका श्रवण करानेवाला, धर्मयुक्त और साक्षात्‌ देवताओंद्वारा निर्मित है। उसका श्रवण करना चाहिये ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसमें पितरोंके श्राद्धके विषयमें गूढ़ बातें बतायी गयी हैं, जहाँ सम्पूर्ण देवताओंके रहस्यका पूरा-पूरा वर्णन है तथा जिसमें रहस्यसहित महान्‌ फलदायी ऋषि-धर्मका एवं बड़े-बड़े यज्ञों और सम्पूर्ण दानोंके फलका प्रतिपादन किया गया है || १२-१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य उस शास्त्रको सदा पढ़ते हैं, जिन्हें उसका तत्त्व हृदयंगम हो जाता है तथा जो उसका फल सुनकर दूसरोंके सामने व्याख्या करते हैं, वे साक्षात्‌ भगवान्‌ नारायणस्वरूप हो जाते हैं || १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मानव अतिथियोंकी पूजा करता है, वह गोदान, तीर्थस्थान और यज्ञानुष्ठानका फल पा लेता है ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो श्रद्धापूर्वक धर्मशास्त्रका श्रवण करते हैं तथा जिनका हृदय शुद्ध हो गया है, वे श्रद्धालु एवं श्रेष्ठ मनके द्वारा अवश्य ही पुण्यलोकपर विजय प्राप्त कर लेते हैं || १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुद्धचित्त पुरुष श्रद्धापूर्वक शास्त्र-श्रवण करनेसे पूर्व पापसे मुक्त हो जाता है तथा वह भविष्यमें भी पापसे लिप्त नहीं होता है। नित्य-प्रति धर्मका अनुष्ठान करता है और मरनेके बाद उसे उत्तम लोककी प्राप्ति होती है ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक समयकी बात है, एक देवदूतने अकस्मात्‌ पहुँचकर आकाशमें स्थित हो इन्द्रसे कहा-- || १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“वे जो कमनीय गुणोंसे सम्पन्न वैद्यप्रवर अश्विनीकुमार हैं, उन दोनोंकी आज्ञासे मैं यहाँ देवताओं, पितरों और मनुष्योंके पास आया हूँ ।। १९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मेरे मनमें यह जिज्ञासा हुई है कि श्राद्धके दिन श्राद्ध-कर्ता और श्राद्धात्नर भोजन करनेवाले ब्राह्मणके लिये जो मैथुनका निषेध किया गया है, उसका क्या कारण है? तथा श्राद्धमें पूथक्‌ू-पृथक्‌ तीन पिण्ड किसलिये दिये जाते हैं? ।। २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“प्रथम पिण्ड किसे देना चाहिये? दूसरा पिण्ड किसे प्राप्त होता तथा तीसरे पिण्डपर किसका अधिकार माना गया है? यह सब कुछ मैं जानना चाहता हूँ” ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस श्रद्धालु देवदूतके इस प्रकार धर्मयुक्त भाषण करनेपर पूर्वदिशामें स्थित हुए सभी देवताओं और पितरोंने उस आकाशचारी पुरुषकी प्रशंसा करते हुए कहा ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितर बोले--आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! तुम्हारा स्वागत है। तुम कल्याणके भागी होओ। तुमने गूढ़ अभिप्रायसे युक्त बहुत उत्तम प्रश्न उपस्थित किया है। इसका उत्तर सुनो || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष श्राद्धका दान और भोजन करके स्त्रीके साथ समागम करता है, उसके पितर उस महीनेभर उसी वीर्यमें शयन करते हैं || २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब मैं पिण्डोंका क्रमश: विभाग बताऊँगा। श्राद्धमें जो तीन पिण्डोंका विधान है, उनमें पहला पिण्ड जलमें डाल देना चाहिये। मध्यम पिण्ड केवल श्राद्धकर्ताकी पत्नीको भोजन करना चाहिये और उनमें जो तीसरा पिण्ड है, उसे आगमें डाल देना चाहिये || २५-२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यही श्राद्धकी विधि बतायी गयी है, जिसके अनुसार चलनेपर धर्मका लोप नहीं होता। जो इस धर्मका पालन करता है, उसके पितर सदा प्रसन्नचित्त एवं संतुष्ट रहते हैं। उसकी संतति बढ़ती है और कभी क्षीण नहीं होती || २७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवदूतने पूछा--पितृगण! आपलोगोंने क्रमश: पिण्डोंका विभाग बतलाया और तीनों लोकोंमें जो समस्त पितर हैं, उनको पिण्डदान करनेका शास्त्रोक्त प्रकार भी बतला दिया ।। २८६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किंतु पहले पिण्डको उठाकर जो नीचे जलमें डाल देनेकी बात कही गयी है, उसके अनुसार यदि वह जलमें डाला जाय तो वह किसको प्राप्त होता है? किस देवताको तृप्त करता है? और किस प्रकार पितरोंको तारता है? ।। २९½।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार यदि गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार मध्यम पिण्ड पत्नी ही खाती है तो उसके पितर किस प्रकार उस पिण्डका उपभोग करते हैं? || ३०६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तथा अन्तिम पिण्ड जब अग्निमें डाल दिया जाता है, तब उसकी क्या गति होती है? वह किस देवताको प्राप्त होता है? |। ३१६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका जो फल, वृत्ति और मार्ग है तथा जो देवता उस पिण्डको पाता है, उन सबपर प्रकाश डालिये || ३२६&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितरोंने कहा--आकाशचारी देवदूत! तुमने यह महान प्रश्न उपस्थित किया है और हमलोगोंसे अद्भुत रहस्यकी बात पूछी है। देवता और मुनि भी इस पितृकर्मकी प्रशंसा करते हैं ।। ३३-३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परन्तु वे भी इस प्रकार पितृकार्यके रहस्यको निश्चित रूपसे नहीं जानते हैं। जो पिताके भक्त हैं और जिन महायशस्वी ब्राह्मणको वर प्राप्त हुआ है, उन सर्वश्रेष्ठ चिरजीवी महात्मा मार्कण्डेयको छोड़कर और किसीको उसका पता नहीं है || ३५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने भगवान्‌ विष्णुसे तीनों पिण्डोंकी गति सुनकर श्राद्धका रहस्य जान लिया है। देवदूत! तुमने जो श्राद्धविधिका निर्णय पूछा है, उसके अनुसार तीनों पिण्डोंकी गति बतायी जा रही है। सावधान होकर मुझसे सुनो || ३६-३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महामते! इस श्राद्धमें जो पहला पिण्ड पानीके भीतर चला जाता है, वह चन्द्रमाको तृप्त करता है और चन्द्रमा स्वयं देवता तथा पितरोंको तृप्त करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार श्राद्धकर्ताकी पत्नी गुरुजनोंकी आज्ञासे जो मध्यम पिण्डका भक्षण करती है, उससे प्रसन्न हुए पितामह पुत्रकी कामनावाले पुरुषको पुत्र प्रदान करते हैं ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निमें जो पिण्ड डाला जाता है, उसके विषयमें भी मुझसे समझ लो। उससे पितर तृप्त होते हैं और तृप्त होकर वे मनुष्यकी सब कामनाएँ पूर्ण करते हैं || ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार तुम्हें यह सब कुछ बताया गया। तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका भी प्रतिपादन किया गया। श्राद्धमें भोजनके लिये निमन्त्रित हुआ ब्राह्मण उस दिनके लिये यजमानके पितृभावको प्राप्त हो जाता है; अत: उस दिन उसके लिये मैथुनको त्याज्य मानते हैं। आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! ब्राह्मगको स्नान आदिसे पवित्र होकर सदा श्राद्धमें भोजन करना चाहिये ।। ४१-४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने जो दोष बताये हैं, वे वैसे ही प्राप्त होते हैं। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता; अतः ब्राह्मण स्नान करके पवित्र एवं क्षमाशील हो श्राद्धमें भोजन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो इस प्रकार श्राद्धका दान देता है, उसकी संतति बढ़ती है। पितरोंके इस प्रकार कहनेके बाद विद्युत्प्रभ नामवाले एक महातपस्वी महर्षिने अपना प्रश्न उपस्थित किया ।। ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनका रूप सूर्यके समान तेजसे प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने धर्मके रहस्योंको सुनकर इन्द्रसे पूछा-- ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देवराज! मनुष्य मोहवश जो तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियों, मृग, पक्षी और भेड़ आदिको तथा कीड़ों, चींटे-चींटियों एवं सर्पोंकी हिंसा करते हैं, इससे वे बहुत-सा पाप बटोर लेते हैं। उनके लिये इन पापोंसे छूटनेका क्या उपाय है?” ।। ४६६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनका यह प्रश्न सुनकर सम्पूर्ण देवता, तपोधन ऋषि तथा महाभाग पितर विद्युत्प्रभ मुनिकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ।। ४७ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्र बोले--मुने! मनुष्यको चाहिये कि कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, प्रभास और पुष्करक्षेत्रका मन-ही-मन चिन्तन करके जलमें स्नान करे। ऐसा करनेसे वह पापसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा राहुके ग्रहणसे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य गायकी पीठ छूता और उसकी पूँछको नमस्कार करता है, वह मानो उपर्युक्त तीर्थोमें तीन दिनतक उपवासपूर्वक रहकर स्नान कर लेता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर विद्युत्प्रभने इन्द्रसे कहा--“शतक्रतो! यह सूक्ष्मतर धर्म मैं बता रहा हूँ। इसे ध्यानपूर्वक सुनिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“बरगदकी जटासे अपने शरीरको रगड़े, राईका उबटन लगाये और दूधके साथ साठीके चावलोंकी खीर बनाकर भोजन करे तो मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“एक दूसरा गूढ़ रहस्य, जिसका ऋषियोंने चिन्तन किया है, सुनिये। इसे मैंने भगवान्‌ शंकरके स्थानमें भाषण करते हुए बृहस्पतिजीके मुखसे भगवान्‌ रुद्रके साथ ही सुना था। देवेश! शचीपते! उसे ध्यानपूर्वक सुनिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो पर्वतपर चढ़कर भोजनसे पूर्व एक पैरसे खड़ा हो दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये हाथ जोड़े वहाँ अग्निदिवकी ओर देखता है, वह महान्‌ तपस्यासे युक्त होकर उपवास करनेका फल पाता है ।। ५४-५५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;जो ग्रीष्म अथवा शीतकालमें सूर्यकी किरणोंसे तापित होता है, वह अपने सारे पापोंको नाश कर देता है। इस प्रकार मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। पापसे मुक्त हुए पुरुषको सनातन कान्ति प्राप्त होती है। वह अपने तेजसे सूर्यके समान देदीप्यमान और चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है” || ५६-५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात्‌ देवराज शतक्रतु इन्द्रने देवमण्डलीके बीचमें अपने सर्वश्रेष्ठ गुरु बृहस्पतिजीसे मधुर वाणीमें कहा-- ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;भगवन्‌! मनुष्योंको सुख देनेवाले धर्मके गूढ़-स्वरूपका तथा रहस्योंसहित जो दोष हैं, उनका भी यथावत्‌्रूपसे वर्णन कीजिये” ।। ५९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पतिजीने कहा--शचीपते! जो सूर्यकी ओर मुँह करके मूत्र त्याग करते हैं, वायुदेवसे द्वेष रखते हैं अर्थात्‌ वायुके सम्मुख मूत्र त्याग करते हैं, जो प्रज्वलित अम्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते तथा जो दूधके लोभसे बहुत छोटे बछड़ेवाली धेनुको भी दुह लेते हैं, उन सबके दोषोंका वर्णन करता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वासव! साक्षात्‌ ब्रह्माजीने सूर्य, वायु, अग्नि तथा लोकमाता गौओंकी सृष्टि की है ।। ६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये मर्त्यलोकके देवता हैं तथा सम्पूर्ण जगत्‌का उद्धार करनेकी शक्ति रखते हैं। आप सब लोग सुनें, मैं एक-एक धर्मका निश्चय बता रहा हूँ ।। ६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्र! जो दुराचारी और कुलांगार पुरुष तथा जो समस्त दुराचारिणी स्त्रियाँ सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करती हैं और जो लोग वायुसे द्वेष रखते अर्थात्‌ वायुके सम्मुख मूत्रत्याग करते हैं उन सबकी छियासी वर्षोतक गर्भमें आयी हुई संतान गिर जाती है ।। ६४ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो प्रज्वलित यज्ञाग्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते, उनके अन्निहोत्रमें अग्निदेव हविष्य ग्रहण नहीं करते हैं (अतः अग्नि प्रज्वलित किये बिना उसे आहुति नहीं देनी चाहिये) || ६५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मानव छोटे बछड़ेवाली गौओंके दूध दुहकर पी जाते हैं, उनके वंशमें दूध पीनेवाले और कुलकी वृद्धि करनेवाले कोई बालक नहीं उत्पन्न होते हैं। उनकी संतान नष्ट हो जाती है तथा उनके कुल एवं वंशका क्षय हो जाता है || ६६-६७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंने पूर्वकालमें यह प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया है; अत: अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको शास्त्रमें जिन्हें त्याज्य बतलाया है, उन कर्मोको त्याग देना चाहिये और जो कर्तव्य कर्म है, उसका सदा अनुष्ठान करते रहना चाहिये। यह मैं तुम्हें सच्ची बात बता रहा हूँ || ६८ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब मरुदगणोंसहित सम्पूर्ण महाभाग देवता और परम सौभाग्यशाली ऋषियोंने पितरोंसे पूछा-- ।। ६९३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मनुष्योंकी बुद्धि थोड़ी होती है; अतः वे कौन-सा कर्म करें, जिससे आप सम्पूर्ण पितर उनके ऊपर संतुष्ट होंगे? श्राद्धमें दिया हुआ दान किस प्रकार अक्षय हो सकता है? अथवा मनुष्य किस कर्मसे किस प्रकार पितरोंके ऋणसे छुटकारा पा सकते हैं? हम यह सुनना चाहते हैं। यह सब सुननेके लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है” || ७०-७१ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितरोंने कहा--महाभाग देवताओ! आपने न्यायतः अपना संदेह उपस्थित किया है। उत्तम कर्म करनेवाले मनुष्योंके जिस कार्यसे हम संतुष्ट होते हैं, उसको सुनिये || ७२३ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नीले रंगके साँड़ छोड़नेसे, अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्दारा तर्पण करनेसे और वर्षा-ऋतुमें पितरोंके लिये दीप देनेसे मनुष्य उनके ऋणसे मुक्त हो सकता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस तरह निष्कपट भावसे किया हुआ दान अक्षय एवं महान्‌ फलदायक होता है और उससे हमें भी अक्षय संतोष प्राप्त होता है--ऐसा शास्त्रका कथन है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य पितरोंमें श्रद्धा रखकर संतान उत्पन्न करेंगे, वे अपने प्रपितामहोंका दुर्गम नरकसे उद्धार कर देंगे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितरोंका यह भाषण सुनकर तपस्याके धनी महातेजस्वी वृद्धगार्ग्यके शरीरमें रोमांच हो आया और उनसे इस प्रकार पूछा-- || ७६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तपोधनो! नीले रंगके साँड़ छोड़ने, वर्षा-ऋतुमें दीप देने और अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्वारा तर्पण करनेसे क्या लाभ होते हैं?” ।। ७७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितरोंने कहा--मुने! छोड़े हुए नीले रंगके साँड़की पूँछ यदि नदी आदिके जलमें भीगकर उस जलको ऊपर उछालती है तो जिसने उस साँड़को छोड़ा है उसके पितर साठ हजार वर्षोतक उस जलसे तृप्त रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो नदी या तालाबके तटसे अपने सींगोंद्वारा कीचड़ उछालकर खड़ा होता है, उससे वृषोत्सर्ग करनेवालेके पितर निस्संदेह चन्द्रलोकमें जाते हैं || ७९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वर्षा-ऋतुमें दीपदान करनेसे मनुष्य चन्द्रमाके समान शोभा पाता है। जो दीपदान करता है, उसके लिये नरकका अन्धकार है ही नहीं | ८०६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपोधन! जो मनुष्य अमावास्याके दिन ताँबेके पात्रमें मधु एवं तिलसे मिश्रित जल लेकर उसके द्वारा पितरोंका तर्पण करते हैं, उनके द्वारा रहस्यसहित श्राद्धकर्म यथार्थरूपसे सम्पादित हो जाता है ।। ८१-८२&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनकी प्रजा सदा हृष्ट-पुष्ट मनवाली होती है। कुल और वंश-परम्पराकी वृद्धि श्राद्धका फल है। पिण्डदान करनेवालेको यह फल सुलभ होता है। जो श्रद्धापूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है, वह उनके ऋणसे छुटकारा पा जाता है ॥। ८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार यह श्राद्धके काल, क्रम, विधि, पात्र और फलका यथावतरूपसे वर्णन किया गया है ।।८४।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पितरोंका रहस्य नामक एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/2723616757878343932/comments/default' 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कथा"/><title type='text'>सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ सौलहवें अध्याय से एक सौ बीसवें अध्याय तक (From the 116 chapter to the 120 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))</title><content type='html'>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; 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सिवा यह भी कहिये कि भोजन करने योग्य क्‍या वस्तु है और भोजन न करने योग्य क्या वस्तु है ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! मांसका जो स्वरूप है, यह जैसा है, इसका त्याग कर देनेमें जो लाभ है और इसे खानेवाले पुरुषको जो दोष प्राप्त होते हैं--ये सब बातें मुझे बताइये ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--महाबाहो! भरतनन्दन! तुम जैसा कहते हो ठीक वैसी ही बात है। कौरवनन्दन! मांस न खानेमें बहुत-से लाभ हैं, जो वैसे मनुष्योंको सुलभ होते हैं; मैं बता रहा हूँ; सुनो || ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दूसरेके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, उससे बढ़कर नीच और निर्दयी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगतमें अपने प्राणोंसे अधिक प्रिय दूसरी कोई वस्तु नहीं है। इसलिये मनुष्य जैसे अपने ऊपर दया चाहता है, उसी तरह दूसरोंपर भी दया करे ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! मांस-भक्षण करनेमें महान्‌ दोष है; क्योंकि मांसकी उत्पत्ति वीर्यसे होती है, इसमें संशय नहीं है। अतः उससे निवृत्त होनेमें ही पुण्य बताया गया है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कौरवनन्दन! इस लोक और परलोकमें इसके समान दूसरा कोई पुण्यकार्य नहीं है कि इस जगतमें समस्त प्राणियोंपर दया की जाय ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस जगत्‌में दयालु मनुष्यको कभी भयका सामना नहीं करना पड़ता। दयालु और तपस्वी पुरुषोंके लिये हहलोक और परलोक दोनों ही सुखद होते हैं ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मज्ञ पुरुष यह जानते हैं कि अहिंसा ही धर्मका लक्षण है। मनस्वी पुरुष वही कर्म करे, जो अहिंसात्मक हो || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दयापरायण पुरुष सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान देता है, उसे भी सब प्राणी अभयदान देते हैं। ऐसा हमने सुन रखा है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह घायल हो, लड़खड़ाता हो, गिर पड़ा हो, पानीके बहावमें खिंचकर बहा जाता हो, आहत हो अथवा किसी भी सम-विषम अवस्थामें पड़ा हो, सब प्राणी उसकी रक्षा करते हैं ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दूसरोंको भयसे छुड़ाता है, उसे न हिंसक पशु मारते हैं और न पिशाच तथा राक्षस ही उसपर प्रहार करते हैं। वह भयका अवसर आनेपर उससे मुक्त हो जाता है || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राणदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है और न होगा। अपने आत्मासे बढ़कर प्रियतर वस्तु दूसरी कोई नहीं है। यह निश्चित बात है || १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! किसी भी प्राणीको मृत्यु अभीष्ट नहीं है; क्योंकि मृत्युकालमें सभी प्राणियोंका शरीर तुरंत काँप उठता है ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस संसार-समुद्रमें समस्त प्राणी सदा गर्भवास, जन्म और बुढ़ापा आदिके दु:खोंसे दुःखी होकर चारों ओर भटकते रहते हैं। साथ ही मृत्युके भयसे उद्विग्न रहा करते हैं ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गर्भमें आये हुए प्राणी मल-मूत्र और पसीनोंके बीचमें रहकर खारे, खट्टे और कड़वे आदि रसोंसे, जिनका स्पर्श अत्यन्त कठोर और दुःखदायी होता है, पकते रहते हैं, जिससे उन्हें बड़ा भारी कष्ट होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मांसलोलुप जीव जन्म लेनेपर भी परवश होते हैं। वे बार-बार शस्त्रोंसे काटे और पकाये जाते हैं। उनकी यह बेवशी प्रत्यक्ष देखी जाती है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे अपने पापोंके कारण कुम्भीपाक नरकमें राँधे जाते और भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेकर गला घोंट-घोंटकर मारे जाते हैं। इस प्रकार उन्हें बारंबार संसार-चक्रमें भटकना पड़ता है । २१&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस भूमण्डलपर अपने आत्मासे बढ़कर कोई प्रिय वस्तु नहीं है। इसलिये सब प्राणियोंपर दया करे और सबको अपना आत्मा ही समझे ।। २२&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! जो जीवनभर किसी भी प्राणीका मांस नहीं खाता, वह स्वर्गमें श्रेष्ठ एवं विशाल स्थान पाता है, इसमें संशय नहीं है || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो जीवित रहनेकी इच्छावाले प्राणियोंके मांसको खाते हैं, वे दूसरे जन्ममें उन्हीं प्राणियोंद्वारा भक्षण किये जाते हैं। इस विषयमें मुझे संशय नहीं है ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! (जिसका वध किया जाता है, वह प्राणी कहता है--) “मां स भक्षयते यस्माद्‌ भक्षयिष्ये तमप्यहम्‌ ।” अर्थात्‌ “आज मुझे वह खाता है तो कभी मैं भी उसे खाऊँगा।” यही मांसका मांसत्व है--इसे ही मांस शब्दका तात्पर्य समझो ।। २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! इस जन्ममें जिस जीवकी हिंसा होती है, वह दूसरे जन्ममें सदा ही अपने घातकका वध करता है। फिर भक्षण करनेवालेको भी मार डालता है। जो दूसरोंकी निन्दा करता है, वह स्वयं भी दूसरोंके क्रोध और द्वेषका पात्र होता है ।। २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो जिस-जिस शरीरसे जो-जो कर्म करता है, वह उस-उस शरीरसे भी उस-उस कर्मका फल भोगता है ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम संयम है, अहिंसा परम दान है और अहिंसा परम तपस्या है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अहिंसा परम यज्ञ है, अहिंसा परम फल है, अहिंसा परम मित्र है और अहिंसा परम सुख है || २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सम्पूर्ण यज्ञोंमें जो दान किया जाता है, समस्त तीर्थोमें जो गोता लगाया जाता है तथा सम्पूर्ण दानोंका जो फल है-यह सब मिलकर भी अहिंसाके बराबर नहीं हो सकता ।। ३० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो हिंसा नहीं करता, उसकी तपस्या अक्षय होती है। वह सदा यज्ञ करनेका फल पाता है। हिंसा न करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंके माता-पिताके समान है ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुश्रेष्ठ! यह अहिंसाका फल है। यही क्या, अहिंसाका तो इससे भी अधिक फल है। अहिंसासे होनेवाले लाभोंका सौ वर्षोमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता || ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्ग पर्वमें अहिंसाके फलका वर्णनविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ सत्तरहवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ सत्तरहवाँ अध्याय के श्लोक 1-29&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“शुभ कर्मसे एक कीड़ेको पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जो योद्धा महासमरमें इच्छा या अनिच्छासे मारे गये हैं, वे किस गतिको प्राप्त हुए है? यह मुझे बताइये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाप्राज्ञ! आप तो जानते ही हैं कि महा-संग्राममें मनुष्योंके लिये प्राणोंका परित्याग करना कितना दुःखदायक होता है। प्राणोंका त्याग करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राणी उन्नति या अवनति, शुभ या अशुभ किसी भी अवस्थामें मरना नहीं चाहते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये; क्योंकि मेरी दृष्टिमें आप सर्वज्ञ हैं ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--पृथ्वीनाथ! इस संसारमें आये हुए प्राणी उन्नतिमें या अवनतिमें तथा शुभ या अशुभ अवस्थामें ही सुख मानते हैं। मरना नहीं चाहते। इसका क्या कारण है, यह बताता हूँ, सुनो। युधिष्ठिर! यह तुमने बहुत अच्छा प्रश्न उपस्थित किया है ।। ४-५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! युधिष्ठिर! इस विषयमें द्वैपवायन व्यास और एक कीड़ेका संवादरूप जो यह प्राचीन वृत्तान्त प्रसिद्ध है, वही तुम्हें बता रहा हूँ ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहलेकी बात है, ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णद्वैपायन विप्रवर व्यासजी कहीं जा रहे थे। उन्होंने एक कीड़ेको गाड़ीकी लीकसे बड़ी तेजीके साथ भागते देखा ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सर्वज्ञ व्यासजी सम्पूर्ण प्राणियोंकी गतिके ज्ञाता तथा सभी देहधारियोंकी भाषाको समझनेवाले हैं। उन्होंने उस कीड़ेको देखकर उससे इस प्रकारकी बातचीत की ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यासजीने पूछा--कीट! आज तुम बहुत डरे हुए और उतावले दिखायी दे रहे हो, बताओ तो सही--कहाँ भागे जा रहे हो? कहाँसे तुम्हें भय प्राप्त हुआ है? ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कीड़ेने कहा--महामते! यह जो बहुत बड़ी बैलगाड़ी आ रही है, इसीकी घर्घराहट सुनकर मुझे भय हो गया है; क्योंकि उसकी यह आवाज बड़ी भयंकर है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह आवाज जब कानोंमें पड़ती है, तब यह संदेह होता है कि कहीं गाड़ी आकर मुझे कुचल न डाले। इसीलिये यहाँसे जल्दी-जल्दी भाग रहा हूँ। यह देखिये बैलोंपर चाबुककी मार पड़ रही है और वे बहुत भारी बोझ लिये हाँफते हुए इधर आ रहे हैं। प्रभो! मुझे उनकी आवाज बहुत निकट सुनायी पड़ती है। गाड़ीपर बैठे हुए मनुष्योंके भी नाना प्रकारके शब्द कानोंमें पड़ रहे हैं | ११-१२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे-जैसे कीड़ेके लिये इस भयंकर शब्दको बधैर्यपूर्वक सुन सकना असम्भव है। अतः इस अत्यन्त दारुण भयसे अपनी रक्षा करनेके लिये मैं यहाँसे भाग रहा हूँ ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राणियोंके लिये मृत्यु बड़ी दुःखदायिनी होती है। अपना जीवन सबको अत्यन्त दुर्लभ जान पड़ता है। अतः डरकर भागा जा रहा हूँ। कहीं ऐसा न हो कि मैं सुखसे दुःखमें पड़ जाऊँ || १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! कीड़ेके ऐसा कहनेपर व्यासजीने उससे पूछा--“कीट! तुम्हे सुख कहाँ है?” मेरी समझमें तो तुम्हारा मर जाना ही तुम्हारे लिये सुखकी बात है; क्योंकि तुम तिर्यक्‌ योनि--अधम कीट-योनिमें पड़े हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“कीट! तुम्हें शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध तथा बहुत-से छोटे-बड़े भोगोंका अनुभव नहीं होता है। अतः तुम्हारा तो मर जाना ही अच्छा है! || १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कीड़ेने कहा--महाप्राज्ञ! जीव सभी योनियोंमें सुखका अनुभव करते हैं। मुझे भी इस योनिमें सुख मिलता है और यही सोचकर जीवित रहना चाहता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यहाँ भी इस शरीरके अनुसार सारे विषय उपलब्ध होते हैं। मनुष्यों और स्थावर प्राणियोंके भोग अलग-अलग हैं ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! पहले जन्ममें मैं एक मनुष्य, उसमें भी बहुत धनी शूद्र हुआ था। ब्राह्मणोंके प्रति मेरे मनमें आदरका भाव न था। मैं कंजूस, क्रूर और व्याजखोर था ।। १९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सबसे तीखे वचन बोलना, बुद्धिमानीके साथ लोगोंको ठगना और संसारके सभी लोगोंसे द्वेष रखना, यह मेरा स्वभाव हो गया था। झूठ बोलकर लोगोंको धोखा देना और दूसरोंके मालको हड़प लेनेमें संलग्न रहना--यही मेरा काम था ।। २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं इतना निर्दयी था कि केवल स्वाद लेनेकी कामनासे अकेला ही भोजनकी इच्छा रखता और ईर्ष्यावश घरपर आये हुए अतिथियों और आश्रितजनोंको भोजन कराये बिना ही भोजन कर लेता था ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वजन्ममें मैं देवताओं और पितरोंके यजनके लिये श्रद्धापूर्वक अन्न एकत्र करता; परंतु धन-संग्रहकी कामनासे उस देनेयोग्य अन्नका भी दान नहीं करता था ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भयके समय अभय पानेकी इच्छासे कितने ही शरणार्थी मेरे पास आते, किन्तु मैं उन्हें शरण लेनेयोग्य सुरक्षित स्थानमें पहुँचाकर भी अकस्मात्‌ वहाँसे निकाल देता। उनकी रक्षा नहीं करता था || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरे मनुष्योंके पास धन-धान्य, सुन्दरी स्त्री, अच्छी-अच्छी सवारियाँ, अदभुत वस्त्र और उत्तम लक्ष्मी देखकर मैं अकारण ही उनसे कुढ़ता रहता था ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरोंका सुख देखकर मुझे ईर्ष्या होती थी, दूसरे किसीकी उन्नति हो यह मैं नहीं चाहता था, औरोंके धर्म, अर्थ और काममें बाधा डालता और अपनी ही इच्छाका अनुसरण करता था ।। २५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वजन्ममें प्राय: मैंने वे ही कर्म किये हैं, जिनमें निर्दयता अधिक थी। उनकी याद आनेसे मुझे उसी तरह पश्चात्ताप होता है, जैसे कोई अपने प्यारे पुत्रको त्यागकर पछताता है ।। २६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुझे पहलेके अपने किये हुए शुभकर्मोंके फलका अबतक अनुभव नहीं हुआ है। पूर्वजन्ममें मैंने केवल अपनी बूढ़ी माताकी सेवा की थी तथा एक दिन किसीके साथ हो जानेसे अपने घरपर आये हुए ब्राह्मण अतिथिका जो अपने जातीय गुणोंसे सम्पन्न थे, स्वागत-सत्कार किया था। ब्रह्मन्‌! उसी पुण्यके प्रभावसे मुझे आजतक पूर्वजन्मकी स्मृति छोड़ न सकी है | २७-२८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपोधन! अब मैं पुनः किसी शुभकर्मके द्वारा भविष्यमें सुख पानेकी आशा रखता हूँ। वह कल्याणकारी कर्म क्या है, इसे मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ।।२९।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीटका उपाख्यानविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ अट्ठारहवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ अट्ठारहवाँ अध्याय के श्लोक 1-24&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“कीडेका क्रमश: क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यासजीने कहा--कीट! तुम जिस शुभकर्मके प्रभावसे तिर्यग्‌ योनिमें जन्म लेकर भी मोहित नहीं हुए हो, वह मेरा ही कर्म है। मेरे दर्शनके प्रभावसे ही तुम्हें मोह नहीं हो रहा है।। १।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं अपने तपोबलसे केवल दर्शनमात्र देकर तुम्हारा उद्धार कर दूँगा; क्योंकि तपोबलसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ बल नहीं है || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कीट! मैं जानता हूँ, अपने पूर्वकृत पापोंके कारण तुम्हें कीटयोनिमें आना पड़ा है। यदि इस समय तुम्हारी धर्मके प्रति श्रद्धा है तो तुम्हें धर्म अवश्य प्राप्त होगा ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता, मनुष्य और तिर्यग्‌ योनिमें पड़े हुए प्राणी कर्मभूमिमें किये हुए कर्मोका ही फल भोगते हैं। अज्ञानी मनुष्यका धर्म भी कामनाको लेकर ही होता है तथा वे कामनाकी सिद्धिके लिये ही गुणोंको अपनाते हैं || ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य मूर्ख हो या विद्वान, यदि वह वाणी, बुद्धि और हाथ-पैरसे रहित होकर जीवित है तो उसे कौन-सी वस्तु त्यागेगी, वह तो सभी पुरुषार्थोंसे स्वयं ही परित्यक्त है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कीट! एक जगह एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते हैं। वे जीवनमें सदा सूर्य और चन्द्रमाकी पूजा किया करते हैं तथा लोगोंको पवित्र कथाएँ सुनाया करते हैं। उन्हींके यहाँ तुम (क्रमशः) पुत्ररूपसे जन्म लोगे || ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ विषयोंको पंचभूतोंका विकार मानकर अनासक्तभावसे उपभोग करोगे। उस समय मैं तुम्हारे पास आकर ब्रह्मविद्याका उपदेश करूँगा तथा तुम जिस लोकमें जाना चाहोगे, वहीं तुम्हें पहुँचा दूँगा ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यासजीके इस प्रकार कहनेपर उस कीड़ेने बहुत अच्छा कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली और बीच रास्तेमें जाकर वह ठहर गया। इतनेहीमें वह विशाल छकड़ा अकस्मात्‌ वहाँ आ पहुँचा और उसके पहियेसे दबकर चूर-चूर हो कीड़ेने प्राण त्याग दिये ।। ८३६&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात्‌ वह क्रमश: शाही, गोधा, सूअर, मृग, पक्षी, चाण्डाल, शूद्र और वैश्यकी योनिमें जन्म लेता हुआ क्षत्रिय-जातिमें उत्पन्न हुआ। अन्य सारी योनियोंमें भ्रमण करनेके बाद अमित तेजस्वी व्यासजीकी कृपासे क्षत्रियकुलमें उत्पन्न होकर वह उन महर्षिका दर्शन करनेके लिये उनके पास गया ।। ९-१० | ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह कीट-योनिमें उन सत्यवादी महर्षि वेदव्यासजीके साथ बातचीत करके जो इस प्रकार उन्नतिशील हुआ था, उसकी याद करके उस क्षत्रियने हाथ जोड़कर ऋषिके चरणोंमें अपना मस्तक रख दिया ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कीट (क्षत्रिय) ने कहा--भगवन्‌! आज मुझे वह स्थान मिला है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। इसे मैं दस जन्मोंसे पाना चाहता था। यह आपहीकी कृपा है कि मैं अपने दोषसे कीड़ा होकर भी आज राजकुमार हो गया हूँ ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब सोनेकी मालाओंसे सुशोभित अत्यन्त बलवान्‌ गजराज मेरी सवारीमें रहते हैं। उत्तम जातिके काबुली घोड़े मेरे रथोंमें जोते जाते हैं || १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऊँटों और खच्चरोंसे जुती हुई गाड़ियाँ मुझे ढोती हैं। मैं भाई-बन्धुओं और मन्त्रियोंके साथ मांस-भात खाता हूँ ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाभाग! श्रेष्ठ पुरुषोंमें रहने योग्य अपने निवासभूत सुन्दर महलोंके भीतर सुखद शय्याओंपर मैं बड़े सम्मानके साथ शयन करता हूँ ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतिदिन रातके पिछले पहरोंमें सूत, मागध और वन्दीजन मेरी स्तुति करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे देवता प्रिय वचन बोलकर महेन्द्रके गुण गाते हैं || १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आप सत्यप्रतिज्ञ हैं, अमित तेजस्वी हैं, आपके प्रसादसे ही आज मैं कीड़ेसे राजपूत हो गया हूँ ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाप्राज्ञ आपको नमस्कार है, मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्‍या सेवा करूँ; आपके तपोबलसे ही मुझे राजपद प्राप्त हुआ है || १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यासजीने कहा--राजन्‌! आज तुमने अपनी वाणीसे मेरा भलीभाँति स्तवन किया है। अभीतक तुम्हें अपनी कीट-योनिकी घृणित स्मृति अर्थात्‌ मांस खानेकी वृत्ति बनी हुई है || १९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुमने पूर्वजन्ममें अर्थथरायण, नृशंस और आततायी शूद्र होकर जो पाप संचय किया था, उसका सर्वदा नाश नहीं हुआ है ।। २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कीट-योनिमें जन्म लेकर भी जो तुमने मेरा दर्शन किया, उसी पुण्यका यह फल है कि तुम राजपूत हुए और आज जो तुमने मेरी पूजा की, इसके फलस्वरूप तुम इस क्षत्रिययोनिके पश्चात ब्राह्मणत्वको प्राप्त करोगे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजकुमार! तुम नाना प्रकारके सुख भोगकर अन्तमें गौ और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये संग्रामभूमिमें अपने प्राणोंकी आहुति दोगे। तदनन्तर ब्राह्मणरूपमें पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके स्वर्गसुखका उपभोग करोगे। तत्पश्चात्‌ अविनाशी ब्रह्मस्वरूप होकर अक्षय आनन्दका अनुभव करोगे ।। २२-२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तिर्यगू-योनिमें पड़ा हुआ जीव जब ऊपरकी ओर उठता है, तब वहाँसे पहले शूद्रभावको प्राप्त होता है। शूद्र वैश्ययोनिको, वैश्य क्षत्रिययोनिको और सदाचारसे सुशोभित क्षत्रिय ब्राह्मणयोनिको प्राप्त होता है। फिर सदाचारी ब्राह्मण पुण्यमय स्वर्गलोकको जाता है ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीड़ेका उपाख्यानविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-15&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“कीड़ेका ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेकर ब्रह्मलोकमें जाकर सनातनब्रह्म॒को प्राप्त करना”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजा युधिष्ठिर! इस प्रकार कीटयोनिका त्याग करके अपने पूर्वजन्मका स्मरण करनेवाला वह जीव अब क्षत्रिय-धर्मको प्राप्त हो विशेष शक्तिशाली हो गया और बड़ी भारी तपस्या करने लगा ।। १ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले उस राजकुमारकी उग्र तपस्या देखकर विप्रवर श्रीकृष्ण-द्वैघवायन व्यासजी उसके पास आये |। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यासजीने कहा--पूर्वजन्मके कीट! प्राणियोंकी रक्षा करना देवताओंका व्रत है और यही क्षात्रधर्म है। इसका चिंतन और पालन करके तुम अगले जन्ममें ब्राह्मण हो जाओगे ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम शुभ और अशुभका ज्ञान प्राप्त करो तथा अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें करके भलीभाँति प्रजाका पालन करो। उत्तम भोगोंका दान करते हुए अशुभ दोषोंका मार्जन करके प्रजाको पावन बनाकर आत्मज्ञानी एवं सुप्रसन्न हो जाओ तथा सदा स्वधर्मके आचरणमें तत्पर रहो। तदनन्तर क्षत्रिय-शरीरका त्याग करके ब्राह्मणत्वको प्राप्त करोगे ।। ४-५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! वह भूतपूर्व कीट महर्षि वेदव्यासका वचन सुनकर धर्मके अनुसार प्रजाका पालन करने लगा। तत्पश्चात्‌ वह पुनः वनमें जाकर थोड़े ही समयमें परलोकवासी हो प्रजापालनरूप धर्मके प्रभावसे ब्राह्मण-कुलमें जन्म पा गया ।। ६-७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसे ब्राह्मण हुआ जान महायशस्वी महाज्ञानी श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास पुनः उसके पास आये ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यासजीने कहा--ब्राह्मणशिरोमणे! अब तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये। उत्तम कर्म करनेवाला उत्तम योनियोंमें और पाप करनेवाला पाप-योनियोंमें जन्म लेता है || ९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मज्ञ! मनुष्य जैसा पाप करता है, उसके अनुसार ही उसे फल भोगना पड़ता है। अतः भूतपूर्व कीट! अब तुम मृत्युके भयसे किसी प्रकार व्यथित न होओ। हाँ, तुम्हें धर्मके लोपका भय अवश्य होना चाहिये, इसलिये उत्तम धर्मका आचरण करते रहो ।। १०६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भूतपूर्व कीटने कहा--भगवन्‌! आपके ही प्रयत्नसे मैं अधिकाधिक सुखकी अवस्थाको प्राप्त होता गया हूँ। अब इस जन्ममें धर्ममूलक सम्पत्ति पाकर मेरा सारा पाप नष्ट हो गया || ११३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! भगवान्‌ व्यासके कथनानुसार उस भूतपूर्व कीटने दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर पृथ्वीको सैकड़ों यज्ञयूपोंसे अंकित कर दिया। तदनन्तर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ होकर उसने ब्रह्मसालोक्य प्राप्त किया अर्थात्‌ ब्रह्मलोकमें जाकर सनातन ब्रह्मको प्राप्त किया || १२-१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पार्थ! व्यासजीके कथनानुसार उसने स्वधर्मका पालन किया था। उसीका यह फल हुआ कि उस कीटने सनातन ब्रह्मपद प्राप्त कर लिया ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बेटा! (क्षत्रिययोनिमें उस कीटने युद्ध करके प्राण त्याग किया था, इसलिये उसे उत्तम गतिकी प्राप्ति हुई।) इसी प्रकार जो प्रधान-प्रधान क्षत्रिय अपनी शक्तिका परिचय देते हुए इस रणभाूमिमें मारे गये हैं, वे भी पुण्यमयी गतिको प्राप्त हुए हैं। अत: उसके लिये तुम शोक न करो || १५ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीड़ेका उपाख्यानविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ बीसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ बीसवाँ अध्याय के श्लोक 1-11&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“व्यास और मैत्रेयका संवाद--दानकी प्रशंसा और कर्मका रहस्य”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठटिरने पूछा--सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! विद्या, तप और दान--इनमेंसे कौन-सा श्रेष्ठ है? यह मैं आपसे पूछता हूँ, मुझे बताइये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन! इस विषयमें श्रीकृष्णद्वैवायन व्यास और मैत्रेयके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! एक समयकी बात है--भगवान्‌ श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजी गुप्तरूपसे विचरते हुए वाराणसी-पुरीमें जा पहुँचे। वहाँ मुनियोंकी मण्डलीमें बैठे हुए मुनिवर मैत्रेयजीके यहाँ वे उपस्थित हुए ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पास आकर बैठे हुए मुनिवर व्यासजीको पहचानकर मैत्रेयजीने उनका पूजन किया और उन्हें उत्तम अन्न भोजन कराया ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह उत्तम लाभदायक और सबकी रुचिके अनुकूल अन्न भोजन करके महामना व्यासजी बहुत संतुष्ट हुए। फिर जब वे वहाँसे चलने लगे तो मुस्कराये ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्हें मुस्कराते देख मैत्रेयजीने व्यासजीसे पूछा--&#39;धर्मात्मन्‌! विद्वन्‌! मैं आपको अभिवादन- एवं प्रणाम करके यह पूछता हूँ कि आप अभी-अभी जो मुस्कराये हैं, उसका क्या कारण है? आपको हँसी कैसे आयी? आप तो तपस्वी और धैर्यवान्‌ हैं। आपको कैसे सहसा उल्लास हो आया? यह मुझे बताइये ।। ६-७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तात! मैं अपनेमें तपस्याजनित सौभाग्य देखता हूँ और आपमें यहाँ सहज महाभाग्य प्रतिष्ठित है (क्योंकि आप मेरे गुरुपुत्र हैं)। जीवात्मा और परमात्मामें मैं बहुत थोड़ा अनार मानता हूँ। परमात्माका सभी पदार्थोंके साथ सम्बन्ध है; क्योंकि वह सर्वव्यापी है। इसीलिये मैं उसे जीवात्माकी अपेक्षा श्रेष्ठ भी मानता हूँ, किंतु आप तो जीवात्माको परमात्मासे अभिन्न जाननेवाले हैं, फिर आपका आचरण इस मान्यतासे भिन्न हो रहा है; क्योंकि आपको कुछ विस्मय हुआ है और मुझे नहीं हुआ है” || ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यासजीने कहा--ब्रह्मन! अतिथिको अत्यन्त गौरव प्रदान करते हुए उसकी इच्छाके अनुसार सत्कार करना “अतिच्छन्द&#39; कहलाता है और वाणीद्वारा अतिथिके गौरवका जो प्रकाशन किया जाता है, उसे “अतिवाद&#39; कहते हैं। मुझे यहाँ अतिच्छन्‍्द और अतिवाद दोनों प्राप्त हुए हैं, इसीलिये मेरा यह विस्मय एवं हर्षोल्लास प्रकट हुआ है। (दान और आतिथ्य आदिका महत्त्व वेदोंके द्वारा प्रतिपादित हुआ है।) वेदोंका वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता। भला, वेद क्‍यों असत्य कहेगा? ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेद मनुष्यके लिये तीन बातोंको उत्तम व्रत बताते हैं--(१) किसीके प्रति द्रोह न करे, (२) दान दे तथा (३) दूसरोंसे सदा सत्य बोले || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदके इस कथनका सबसे पहले ऋषियोंने पालन किया। हमने भी बहुत पहलेसे इसे सुन रखा है और इस समय भी वेदकी इस आज्ञाका पालन करना हमारा कर्तव्य है ।। ११ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शास्त्रविधिके अनुसार दिया हुआ थोड़ा-सा भी दान महान्‌ फल देनेवाला होता है। तुमने ईर्ष्या-रहित हृदयसे भूखे-प्यासे अतिथिको अन्न-जलका दान किया है || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! मैं भूखा और प्यासा था। तुमने मुझ भूखे-प्यासेको अन्न-जल देकर तृप्त किया। इस पुण्यके प्रभावसे महान्‌ यज्ञोंद्वारा प्राप्त होनेवाले बड़े-बड़े लोकोंपर तुमने विजय पायी है--यह मुझे प्रत्यक्ष दिखायी देता है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस दानके द्वारा पवित्र हुई तुम्हारी तपस्यासे मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूँ। तुम्हारा बल पुण्यका ही बल है और तुम्हारा दर्शन भी पुण्यका ही दर्शन है ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम्हारे शरीरसे जो सदा पुण्यकी ही सुगन्ध फैलती रहती है, इसे मैं इस दानरूप पुण्यकर्मके अनुष्ठानका फल मानता हूँ। तात! दान करना तीर्थ-स्नान तथा वैदिक व्रतकी पूर्तिसे भी बढ़कर है ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्म! जितने पवित्र कर्म हैं, उन सबमें दान ही सबसे बढ़कर पवित्र एवं कल्याणकारी है। यदि दान ही समस्त पवित्र वस्तुओंसे श्रेष्ठ न होता तो वेद-शास्त्रोंमें उसकी इतनी प्रशंसा नहीं की जाती ।। १६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम जिन-जिन वेदोक्त उत्तम कर्मोंकी यहाँ प्रशंसा करते हो, उन सबमें दान ही श्रेष्ठतर है, इस विषयमें मुझे संशय नहीं है ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दाताओंने जो मार्ग बना दिया है, उसीसे मनीषी पुरुष चलते हैं। दान करनेवाले प्राणदाता समझे जाते हैं। उन्हींमें धर्म प्रतिष्ठित है । १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे वेदोंका स्वाध्याय, इन्द्रियोंका संयम और सर्वस्वका त्याग उत्तम है, उसी प्रकार इस संसारमें दान भी अत्यन्त उत्तम माना गया है ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! महाबुद्धे! तुमको इस दानके कारण उत्तम सुखकी प्राप्ति होगी। बुद्धिमान्‌ मनुष्य दान करके उत्तरोत्तर सुख प्राप्त करता है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह बात हमलोगोंके सामने प्रत्यक्ष है। हमें निःसंदेह ऐसा ही समझना चाहिये। तुमजैसे श्रीसम्पन्न पुरुष जब धन पाते हैं, तब उससे दान, यज्ञ और सुख भोग करते हैं ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाप्राज्ञ! किंतु जो लोग विषयसुखोंमें आसक्त हैं, वे सुखसे ही महान्‌ दु:खमें पड़ते हैं और जो तपस्या आदिके द्वारा दुःख उठाते हैं, उन्हें दु:खसे ही सुखकी प्राप्ति होती देखी जाती है। सुख और दुःख मनुष्यके स्वभावके अनुसार नियत हैं ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस जगत्‌में मनीषी पुरुषोंने मनुष्यके तीन प्रकारके आचरण बतलाये हैं--पुण्यमय, पापमय तथा पुण्य-पाप दोनोंसे रहित ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मननिष्ठ पुरुष कर्तापनके अभिमानसे रहित होता है। अतः उसके किये हुए कर्मको न पुण्य माना जाता है न पाप। उसे अपने कर्मजनित पुण्य और पापकी प्राप्ति होती ही नहीं है ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो यज्ञ, दान और तपस्यामें प्रवीण रहते हैं, वे ही मनुष्य पुण्य कर्म करनेवाले हैं तथा जो प्राणियोंसे द्रोह करते हैं, वे ही पापाचारी समझे जाते हैं || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य दूसरोंके धन चुराते हैं, वे दुःख पाते और नरकमें पड़ते हैं। इन उपर्युक्त शुभाशुभ कर्मोसे भिन्न जो साधारण चेष्टा है, वह न तो पुण्य है और न तो पाप ही है।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महर्षे! तुम आनन्दपूर्वक स्वधर्म-पालनमें रत रहो, तुम्हारी निरन्तर उन्नति हो, तुम प्रसन्न रहो, दान दो और यज्ञ करो। विद्वान्‌ और तपस्वी तुम्हारा पराभव नहीं कर सकेंगे ।। २७ ।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;टिका टिप्पणी -&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;ul style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;li&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;आदरणीय पुरुषके चरणोंको हाथसे पकड़कर जो नमस्कार किया जाता है, उसे अभिवादन कहते हैं और दोनों हाथोंकी अंजलि बाँधकर उसे अपने ललाटसे लगाकर जो वन्दनीय पुरुषको मस्तक झुकाया जाता है उसका नाम प्रणाम है।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/5966951008456510439/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-116-chapter-to-120-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/5966951008456510439'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/5966951008456510439'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-116-chapter-to-120-chapter-of.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ सौलहवें अध्याय से एक सौ बीसवें अध्याय तक (From the 116 chapter to the 120 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail 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class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ तेरहवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ तेरहवाँ अध्याय के श्लोक 1-11&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्‌! अहिंसा, वेदोक्त कर्म, ध्यान, इन्द्रिय-संयम, तपस्या और गुरु-शुश्रूषा--इनमेंसे कौन-सा कर्म मनुष्यका (विशेष) कल्याण कर सकता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पतिजीने कहा--भरतश्रेष्ठ! ये छः प्रकारके कर्म ही धर्मजनक हैं तथा सब-केसब भित्न-भिन्न कारणोंसे प्रकट हुए हैं। मैं इन छहोंका वर्णन करता हूँ; तुम सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब मैं मनुष्यके लिये कल्याणके सर्वश्रेष्ठ उपायका वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य अहिंसायुक्त धर्मका पालन करता है, वह मोह, मद और मत्सरतारूप तीनों दोषोंको अन्य समस्त प्राणियोंमें स्थापित करके एवं सदा काम-क्रोधका संयम करके सिद्धिको प्राप्त हो जाता है || ३-४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य अपने सुखकी इच्छा रखकर अहिंसक प्राणियोंको डंडेसे मारता है, वह परलोकमें सुखी नहीं होता है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य सब भूतोंको अपने समान समझता, किसीपर प्रहार नहीं करता (दण्डको हमेशाके लिये त्याग देता है) और क्रोधको अपने काबूमें रखता है, वह मृत्युके पश्चात्‌ सुख भोगता है ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, अर्थात्‌ सबकी आत्माको अपनी ही आत्मा समझता है तथा जो सब भूतोंको समान भावसे देखता है, उस गमनागमनसे रहित ज्ञानीकी गतिका पता लगाते समय देवता भी मोहमें पड़ जाते हैं || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बात अपनेको अच्छी न लगे, वह दूसरोंके प्रति भी नहीं करनी चाहिये। यही धर्मका संक्षिप्त लक्षण है। इससे भिन्न जो बर्ताव होता है, वह कामनामूलक है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माँगनेपर देने और इनकार करनेसे, सुख और दुःख पहुँचानेसे तथा प्रिय और अप्रिय करनेसे पुरुषको स्वयं जैसे हर्ष-शोकका अनुभव होता है, उसी प्रकार दूसरोंके लिये भी समझे ।। ९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे एक मनुष्य दूसरोंपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार अवसर आनेपर दूसरे भी उसके ऊपर आक्रमण करते हैं। इसीको तुम जगत्‌में अपने लिये भी दृष्टान्त समझो। अतः किसीपर आक्रमण नहीं करना चाहिये। इस प्रकार यहाँ कौशलपूर्वक धर्मका उपदेश किया है ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहकर परम बुद्धिमान्‌ देवगुरु बृहस्पतिजी उस समय हमलोगोंके देखते-देखते स्वर्गगलोकको चले गये।।११।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रकी समाप्तिविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ चौदहवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ चौदहवाँ अध्याय के श्लोक 1-21&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“हिंसा और मांसभक्षणकी घोर निन्दा”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर महातेजस्वी और वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने बाणशय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्मसे पुनः प्रश्न किया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--महामते! देवता, ऋषि और ब्राह्मण वैदिक प्रमाणके अनुसार सदा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा किया करते हैं। अतः नृपश्रेष्ठ! मैं पूछता हूँ कि मन, वाणी और क्रियासे भी हिंसाका ही आचरण करनेवाला मनुष्य किस प्रकार उसके दुःखसे छुटकारा पा सकता है? ।। २-३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--शत्रुसूदन! ब्रह्मवादी पुरुषोंने (मनसे, वाणीसे तथा कर्मसे हिंसा न करना एवं मांस न खाना--इन) चार उपायोंसे अहिंसाधर्मका पालन बतलाया है। इनमेंसे किसी एक अंशकी भी कमी रह गयी तो अहिंसा-धर्मका पूर्णतः पालन नहीं होता ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महीपाल! जैसे चार पैरोंवाला पशु तीन पैरोंसे नहीं खड़ा रह सकता, उसी प्रकार केवल तीन ही कारणोंसे पालित हुई अहिंसा पूर्णतः: अहिंसा नहीं कही जा सकती || ५ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे हाथीके पैरके चिह्ममें सभी पदगामी प्राणियोंके पदचिह्न समा जाते हैं, उसी प्रकार पूर्वकालमें इस जगत्‌के भीतर धर्मतः अहिंसाका निर्देश किया गया है अर्थात्‌ अहिंसाधर्ममें सभी धर्मोंका समावेश हो जाता है। ऐसा माना गया है || ६३६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीव मन, वाणी और क्रियाके द्वारा हिंसाके दोषसे लिप्त होता है, किंतु जो क्रमशः पहले मनसे, फिर वाणीसे और फिर क्रियाद्वारा हिंसाका त्याग करके कभी मांस नहीं खाता, वह पूर्वोक्त तीनों प्रकारकी हिंसाके दोषसे भी मुक्त हो जाता है || ७-८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मवादी महात्माओंने हिंसादोषके प्रधान तीन कारण बतलाये हैं--मन (मांस खानेकी इच्छा), वाणी (मांस खानेका उपदेश) और आस्वाद (प्रत्यक्षरूपमें मांसका स्वाद लेना)। ये तीनों ही हिंसा-दोषके आधार हैं ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये तपस्यामें लगे हुए मनीषी पुरुष कभी मांस नहीं खाते हैं। राजन! अब मैं मांसभक्षणमें जो दोष है, उनको यहाँ बता रहा हूँ, सुनो || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मूर्ख यह जानते हुए भी कि पुत्रके मांसमें और दूसरे साधारण मांसोंमें कोई अन्तर नहीं है, मोहवश मांस खाता है, वह नराधम है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे पिता और माताके संयोगसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार हिंसा करनेसे पापी पुरुषको विवश होकर बारंबार पापयोनिमें जन्म लेना पड़ता है ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे जीभसे जब रसका ज्ञान होता है, तब उसके प्रति वह आकृष्ट होने लगती है, उसी प्रकार मांसका आस्वादन करनेपर उसके प्रति आसक्ति बढ़ती है। शास्त्रोंमें भी कहा है कि विषयोंके आस्वादनसे उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संस्कृत (मसाले आदि डालकर संस्कृत किया हुआ) असंस्कृत (मसाला आदिके संस्कारसे रहित), पक्‍व, केवल नमक मिला हुआ और अलोना--ये मांसकी जो-जो अवस्थाएँ होती हैं, उन्हीं-उन्हींमें रुचिभेदसे मांसाहारी मनुष्यका चित्त आसक्त होता है ।। १४ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मांसभक्षी मूर्ख मनुष्य स्वर्गमें पूर्णतः सुलभ होनेवाले भेरी, मृदंग और वीणाके दिव्य मधुर शब्दोंका सेवन कैसे कर सकेंगे; क्योंकि वे स्वर्गमें नहीं जा सकते ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरोंके धन-धान्यको नष्ट करनेवाले तथा मांस-भक्षणकी स्तुति-प्रशंसा करनेवाले मनुष्य सदा ही स्वर्गसे बहिष्कृत होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मांसके रसमें होनेवाली आसक्तिसे अभिभूत होकर उसी अभीष्ट फल मांसकी अभिलाषा रखते हैं तथा उसके बारंबार गुण गाते हैं, उन्हें ऐसी दुर्गति प्राप्त होती है, जो कभी चिन्तनमें नहीं आयी है। जिसका वाणीद्दारा कहीं निर्देश नहीं किया गया है तथा जो कभी मनकी कल्पनामें भी नहीं आयी है ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मृत्युके पश्चात्‌ चितापर जला देनेसे भस्म हो जाता है अथवा किसी हिंसक प्राणीका खाद्य बनकर उसकी विष्ठाके रूपमें परिणत हो जाता है, या यों ही फेंक देनेसे जिसमें कीड़े पड़ जाते हैं--इन तीनोंमेंसे यह एक-न-एक परिणाम जिसके लिये सुनिश्चित है, उस शरीरको विद्वान्‌ पुरुष दूसरोंको पीड़ा देकर उसके मांससे कैसे पोषण कर सकता है? मांसकी प्रशंसा भी पापमय कर्मफलसे सम्बन्ध कर देती है ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उशीनर शिबि आदि बहुत-से श्रेष्ठ पुरुष दूसरोंकी रक्षाके लिये अपने प्राण देकर, अपने मांससे दूसरोंके मांसकी रक्षा करके स्वर्गलोकमें गये हैं || १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! इस प्रकार चार उपायोंसे जिसका पालन होता है, उस अहिंसा-धर्मका तुम्हारे लिये प्रतिपादन किया गया। यह सम्पूर्ण धर्मोमें ओतप्रोत है ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मांसके परित्यागका उपदेशविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&amp;nbsp;(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय के श्लोक 1-76&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“मद्य और मांसके भक्षणमें महान्‌ दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! आपने बहुत बार यह बात कही है कि अहिंसा परम धर्म है; अतः मांसके परित्यागरूप धर्मके विषयमें मुझे संदेह हो गया है। इसलिये मैं यह जानना चाहता हूँ कि मांस खानेवालेकी क्या हानि होती है और जो मांस नहीं खाता उसे कौन-सा लाभ मिलता है? ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो स्वयं पशुका वध करके उसका मांस खाता है या दूसरेके दिये हुए मांसका भक्षण करता है या जो दूसरेके खानेके लिये पशुका वध करता है अथवा जो खरीदकर मांस खाता है, उसको क्‍या दण्ड मिलता है? ॥। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निष्पाप पितामह! मैं चाहता हूँ कि आप इस विषयका यथार्थरूपसे विवेचन करें। मैं निश्चितरूपसे इस सनातन धर्मके पालनकी इच्छा रखता हूँ ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य किस प्रकार आयु प्राप्त करता है, कैसे बलवान्‌ होता है, किस तरह उसे पूर्णागता प्राप्त होती है और कैसे वह शुभलक्षणोंसे संयुक्त होता है? ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! कुरुनन्दन! मांस न खानेसे जो धर्म होता है, उसका मुझसे यथार्थ वर्णन सुनो तथा उस धर्मकी जो उत्तम विधि है, वह भी जान लो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सुन्दर रूप, पूर्णांगता, पूर्ण आयु, उत्तम बुद्धि, सत्त्व, बल और स्मरणशक्ति प्राप्त करना चाहते थे, उन महात्मा पुरुषोंने हिंसाका सर्वथा त्याग कर दिया था ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुनन्दन युधिष्ठिर! इस विषयको लेकर ऋषियोंमें अनेक बार प्रश्नोत्तर हो चुका है। अन्तमें उन सबकी रायसे जो सिद्धान्त निश्चित हुआ है, उसे बता रहा हूँ, सुनो || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! जो पुरुष नियमपूर्वक व्रतका पालन करता हुआ प्रतिमास अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा जो केवल मद्य और मांसका परित्याग करता है, उन दोनोंको एकसा ही फल मिलता है | ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! सप्तर्षि, वालखिल्य तथा सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले अन्यान्य मनीषी महर्षि मांस न खानेकी ही प्रशंसा करते हैं ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्वायम्भुव मनुका कथन है कि जो मनुष्य न मांस खाता और न पशुकी हिंसा करता और न दूसरेसे ही हिंसा कराता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंका मित्र है || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष मांसका परित्याग कर देता है, उसका कोई भी प्राणी तिरस्कार नहीं करता है, वह सब प्राणियोंका विश्वासपात्र हो जाता है तथा श्रेष्ठ पुरुष उसका सदा सम्मान करते हैं ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मात्मा नारदजी कहते हैं--जो दूसरेके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह निश्चय ही दुःख उठाता है || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पतिजीका कथन है--जो मद्य और मांस त्याग देता है, वह दान देता, यज्ञ करता और तप करता है अर्थात्‌ उसे दान, यज्ञ और तपस्याका फल प्राप्त होता है | १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सौ वर्षोतक प्रतिमास अश्वमेध यज्ञ करता है और जो कभी मांस नहीं खाता है-इन दोनोंका समान फल माना गया है ॥। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मद्य और मांसका परित्याग करनेसे मनुष्य सदा यज्ञ करनेवाला, सदा दान देनेवाला और सदा तप करनेवाला होता है ।। १५ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! जो पहले मांस खाता रहा हो और पीछे उसका सर्वथा परित्याग कर दे, उसको जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, उसे सम्पूर्ण वेद और यज्ञ भी नहीं प्राप्त करा सकते ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मांसके रसका आस्वादन एवं अनुभव कर लेनेपर उसे त्यागना और समस्त प्राणियोंको अभय देनेवाले इस सर्वश्रेष्ठ अहिंसाव्रका आचरण करना अत्यन्त कठिन हो जाता है ।। १७ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो विद्वान सब जीवोंको अभयदान कर देता है, वह इस संसारमें निःसंदेह प्राणदाता माना जाता है ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार मनीषी पुरुष अहिंसारूप परमधर्मकी प्रशंसा करते हैं। जैसे मनुष्यकोी अपने प्राण प्रिय होते हैं, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको अपने-अपने प्राण प्रिय जान पड़ते हैं ।। १९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अत: जो बुद्धिमान्‌ और पुण्यात्मा है, उन्हें चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने समान समझें। जब अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले विद्वानोंको भी मृत्युका भय बना रहता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब जीवित रहनेकी इच्छावाले नीरोग और निरपराध प्राणियोंको, जो मांसपर जीविका चलानेवाले पापी पुरुषोंद्वारा बलपूर्वक मारे जाते हैं, क्यों न भय प्राप्त होगा || २०-२१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये महाराज! तुम्हें यह विदित होना चाहिये कि मांसका परित्याग ही धर्म, स्वर्ग और सुखका सर्वोत्तम आधार है ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है और अहिंसा परम सत्य है; क्योंकि उसीसे धर्मकी प्रवृत्ति होती है ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तृणसे, काठसे अथवा पत्थरसे मांस नहीं पैदा होता है, वह जीवकी हत्या करनेपर ही उपलब्ध होता है; अतः उसके खानेमें महान्‌ दोष है ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लोग स्वाहा (देवयज्ञ) और स्वधा (पितृयज्ञ) का अनुष्ठान करके यज्ञशिष्ट अमृतका भोजन करनेवाले तथा सत्य और सरलताके प्रेमी है, वे देवता हैं, किंतु जो कुटिलता और असत्य भाषणमें प्रवृत्त होकर सदा मांसभक्षण किया करते हैं, उन्हें राक्षस समझो ।। २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! जो मनुष्य मांस नहीं खाता, उसे संकटपूर्ण स्थानों, भयंकर दुर्गों एवं गहन वनोंमें, रात-दिन और दोनों संध्याओंमें, चौराहोंपर तथा सभाओंमें भी दूसरोंसे भय नहीं प्राप्त होता तथा यदि अपने विरुद्ध हथियार उठाये गये हों अथवा हिंसक पशु एवं सर्पोके भय सामने हों तो भी वह दूसरोंसे नहीं डरता है ।। २६-२७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इतना ही नहीं, वह समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाला और उन सबका विश्वासपात्र होता है। संसारमें न तो वह दूसरेको उद्वेगमें डालता है और न स्वयं ही कभी किसीसे उद्विग्न होता है ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि कोई भी मांस खानेवाला न रह जाय तो पशुओंकी हिंसा करनेवाला भी कोई न रहे; क्योंकि हत्यारा मनुष्य मांस खानेवालोंके लिये ही पशुओंकी हिंसा करता है || २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि मांसको अभक्ष्य समझकर सब लोग उसे खाना छोड़ दें तो पशुओंकी हत्या स्वतः ही बंद हो जाय; क्योंकि मांस खानेवालोंके लिये ही मृग आदि पशुओंकी हत्या होती है ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महातेजस्वी नरेश! हिंसकोंकी आयुको उनका पाप ग्रस लेता है। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता हो, वह मनुष्य मांसका सर्वथा परित्याग कर दे || ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे यहाँ हिंसक पशुओंका लोग शिकार खेलते हैं और वे पशु अपने लिये कहीं कोई रक्षक नहीं पाते, उसी प्रकार प्राणियोंकी हिंसा करनेवाले भयंकर मनुष्य दूसरे जन्ममें सभी प्राणियोंके उद्वेगपात्र होते हैं और अपने लिये कोई संरक्षक नहीं पाते हैं || ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोभसे, बुद्धिके मोहसे, बल-वीर्यकी प्राप्तिके लिये अथवा पापियोंके संसर्गमें आनेसे मनुष्योंकी अधर्ममें रुचि हो जाती है ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दूसरोंके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ कहीं भी जन्म लेता है, चैनसे नहीं रहने पाता है ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नियमपरायण महर्षियोंने मांस-भक्षणके त्यागको ही धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्तिका प्रधान उपाय और परमकल्याणका साधन बतलाया है ।। ३५ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! मांसभक्षणमें जो दोष हैं, उन्हें बतलाते हुए मार्कण्डेयजीके मुखसे मैंने पूर्वकालमें ऐसा सुन रखा है-- |। ३६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो जीवित रहनेकी इच्छावाले प्राणियोंको मारकर अथवा उनके स्वयं मर जानेपर उनका मांस खाता है, वह न मारनेपर भी उन प्राणियोंका हत्यारा ही समझा जाता है || ३७ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खरीदनेवाला धनके द्वारा, खानेवाला उपभोगके द्वारा और घातक वध एवं बन्धनके द्वारा पशुओंकी हिंसा करता है। इस प्रकार यह तीन तरहसे प्राणियोंका वध होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो मांसको स्वयं नहीं खाता पर खानेवालेका अनुमोदन करता है, वह मनुष्य भी भावदोषके कारण मांसभक्षणके पापका भागी होता है। इसी प्रकार जो मारनेवालेका अनुमोदन करता है, वह भी हिंसाके दोषसे लिप्त होता है || ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो मनुष्य मांस नहीं खाता और इस जगत्‌में सब जीवोंपर दया करता है, उसका कोई भी प्राणी तिरस्कार नहीं करते और वह सदा दीर्घायु एवं नीरोग होता है || ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान करनेसे जो धर्म प्राप्त होता है, मांसका भक्षण न करनेसे उसकी अपेक्षा भी विशिष्ट धर्मकी प्राप्ति होती है। यह हमारे सुननेमें आया है || ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;जो मांस खानेवालोंके लिये पशुओंकी हत्या करता है, वह मनुष्योंमें अधम है। घातकको बहुत भारी दोष लगता है। मांस खानेवालेको उतना दोष नहीं लगता ।। ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो मांसलोभी मूर्ख एवं अधम मनुष्य यज्ञ-याग आदि वैदिक मार्गोंके नामपर प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह नरकगामी होता है ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो पहले मांस खानेके बाद फिर उससे निवृत्त हो जाता है, उसको भी अत्यन्त महान्‌ धर्मकी प्राप्ति होती है, क्योंकि वह पापसे निवृत्त हो गया है ।। ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो मनुष्य हत्याके लिये पशु लाता है, जो उसे मारनेकी अनुमति देता है, जो उसका वध करता है तथा जो खरीदता, बेचता, पकाता और खाता है, वे सब-के-सब खानेवाले ही माने जाते हैं। अर्थात्‌ वे सब खानेवालेके समान ही पापके भागी होते हैं! || ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब मैं इस विषयमें एक दूसरा प्रमाण बता रहा हूँ, जो साक्षात्‌ ब्रह्माजीके द्वारा प्रतिपादित, पुरातन, ऋषियोंद्वारा सेवित तथा वेदोंमें प्रतिष्ठित है ।। ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नृपश्रेष्ठ! प्रजार्थी पुरुषोंने प्रवृत्तिरूप धर्मका प्रतिपादन किया है, परन्तु वह मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले विरक्त पुरुषोंके लिये अभीष्ट नहीं है ।। ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य अपने आपको अत्यन्त उपद्रवरहित बनाये रखना चाहता हो, वह इस जगतमें प्राणियोंके मांसका सर्वथा परित्याग कर दे || ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुना है, पूर्वकल्पमें मनुष्योंके यज्ञमें पुरोडाश आदिके रूपमें अन्नमय पशुका ही उपयोग होता था। पुण्यलोककी प्राप्तिके साधनोंमें लगे रहनेवाले याज्ञिक पुरुष उस अन्नके द्वारा ही यज्ञ करते थे || ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! प्राचीन कालमें ऋषियोंने चेदिराज वसुसे अपना संदेह पूछा था। उस समय वसुने मांसको भी जो सर्वथा अभक्ष्य है, भक्ष्य बता दिया || ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस समय आकाशचारी राजा वसु अनुचित निर्णय देनेके कारण आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े। तदनन्तर पृथ्वीपर भी फिर यही निर्णय देनेके कारण वे पातालमें समा गये ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निष्पाप राजेन्द्र! मनुजेश्वर! मेरी कही हुई यह बात भी सुनो--मांस-भक्षण न करनेसे सब प्रकारका सुख मिलता है ।। ५२ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य सौ वर्षोतक कठोर तपस्या करता है तथा जो केवल मांसका परित्याग कर देता है--ये दोनों मेरी दृष्टिमें एक समान हैं || ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! विशेषतः शरदऋतु, शुक्लपक्षमें मद्य और मांसका सर्वथा त्याग कर दे; क्योंकि ऐसा करनेमें धर्म होता है ।। ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य वर्षाके चार महीनोंमें मांसका परित्याग कर देता है, वह चार कल्याणमयी वस्तुओं--कीर्ति, आयु, यश और बलको प्राप्त कर लेता है ।। ५५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अथवा एक महीनेतक सब प्रकारके मांसोंका त्याग करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो सुखी एवं नीरोग जीवन व्यतीत करता है ।। ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो एक-एक मास अथवा एक-एक पक्षतक मांस खाना छोड़ देते हैं, हिंसासे दूर हटे हुए उन मनुष्योंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है (फिर जो कभी भी मांस नहीं खाते, उनके लाभकी तो कोई सीमा ही नहीं है) ।। ५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! जिन राजाओंने आश्वचिन मासके दोनों पक्ष अथवा एक पक्षमें मांस भक्षणका निषेध किया था, वे सम्पूर्ण भूतोंके आत्मरूप हो गये थे और उन्हें परावर तत्त्वका ज्ञान हो गया था। उनके नाम इस प्रकार हैं--नाभाग, अम्बरीष, महात्मा गय, आयु, अनरण्य, दिलीप, रघु, पूरु, कार्तवीर्य, अनिरुद्ध, नहुष, ययाति, नृग, विश्वगश्व, शशविन्दु, युवनाश्व, उशीनरपुत्र शिबि, मुचुकुन्द, मान्धाता अथवा हरिश्वन्द्र || ५८--६१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सत्य बोलो, असत्य न बोलो, सत्य ही सनातन धर्म है। राजा हरिश्वन्द्र सत्यके प्रभावसे आकाशमें चन्द्रमाके समान विचरते हैं || ६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजेन्द्र! श्येनचित्र, सोमक, वृक, रैवत, रन्तिदेव, वसु, सूंजय, अन्यान्य नरेश, कृप, भरत, दुष्यन्त, करूष, राम, अलर्क, नर, विरूपाश्वच, निमि, बुद्धिमान्‌ जनक, पुरूरवा, पृथु, वीरसेन, इक्ष्वाकु, शम्भु, श्वेतसागर, अज, धुन्धु, सुबाहु, हर्यश्च, क्षुप, भरत--इन सबने तथा अन्यान्य राजाओंने भी कभी मांस नहीं खाया था ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे सब नरेश अपनी कान्तिसे प्रज्वलित होते हुए वहाँ ब्रह्मलोकमें विराज रहे हैं, गन्धर्व उनकी उपासना करते हैं और सहस्ौरों दिव्यांगनाएँ उन्हें घेरे रहती हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अत: यह अहिंसारूप धर्म सब धर्मोसे उत्तम है। जो महात्मा इसका आचरण करते हैं, वे स्वर्गलोकमें निवास करते हैं |। ६९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो धर्मात्मा पुरुष जन्मसे ही इस जगत्‌में शहद, मद्य और मांसका सदाके लिये परित्याग कर देते हैं, वे सब-के-सब मुनि माने गये हैं || ७० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मांस-भक्षणके परित्यागरूप इस धर्मका आचरण करता अथवा इसे दूसरोंको सुनाता है, वह कितना ही दुराचारी क्‍यों न रहा हो, नरकमें नहीं पड़ता || ७१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! जो ऋषियोंद्वारा सम्मानित एवं पवित्र इस मांस-भक्षणके त्यागके प्रकरणको पढ़ता अथवा बारंबार सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंद्वारा सम्मानित होता है और अपने सजातीय बन्धुओंमें विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है || ७२-७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इतना ही नहीं, इसके श्रवण अथवा पठनसे आपपत्तिमें पड़ा हुआ आपत्तिसे, बन्धनमें बँधा हुआ बन्धनसे, रोगी रोगसे और दुःखी दुःखसे छुटकारा पा जाता है || ७४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुश्रेष्ठी इसके प्रभावसे मनुष्य तिर्यगयोनिमें नहीं पड़ता तथा उसे सुन्दर रूप, सम्पत्ति और महान्‌ यशकी प्राप्ति होती है ।। ७५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! यह मैंने तुम्हें ऋषियोंद्वारा निर्मित मांस-त्यागका विधान तथा प्रवृत्तिविषयक धर्म भी बताया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मांसभक्षणका निषेधविषयक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/6199124950505111988/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-113-chapter-to-115-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/6199124950505111988'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/6199124950505111988'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-113-chapter-to-115-chapter-of.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ तेरहवें अध्याय से एक सौ पन्द्रहवें अध्याय तक (From the 113 chapter to the 115 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s72-c/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png" height="72" 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href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय के श्लोक 1-133&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! अब मैं मनुष्योंकी संसारयात्राके निर्वाहकी उत्तम विधि सुनना चाहता हूँ ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! अब मैं मनुष्योंकी संसारयात्राके निर्वाहकी उत्तम विधि सुनना चाहता हूँ ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजेन्द्र! पृथ्वीपर रहनेवाले मनुष्य किस बर्तावसे उत्तम स्वर्गलोक पाते हैं? और नरेश्वर! कैसा बर्ताव करनेसे वे नरकमें पड़ते हैं? || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोग अपने मृत शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान छोड़कर जब यहाँसे परलोककी राह लेते हैं, उस समय उनके पीछे कौन जाता है? ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--वत्स! ये उदारबुद्धि भगवान्‌ बृहस्पतिजी यहाँ पधार रहे हैं। इन्हीं महाभागसे इस सनातन गूढ़ विषयको पूछो ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज दूसरा कोई इस विषयका प्रतिपादन नहीं कर सकता। बृहस्पतिजीके समान वक्ता दूसरा कोई कहीं भी नहीं है || ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर और गंगानन्दन भीष्म, इन दोनोंमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि विशुद्ध अन्तःकरणवाले बृहस्पतिजी स्वर्गलोकसे वहाँ आ पहुँचे || ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्हें देखते ही राजा युधिष्छिर धृतराष्ट्रको आगे करके खड़े हो गये। फिर उन्होंने तथा उन सभी सभासदोंने बृहस्पतिजीकी अनुपम पूजा की ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने भगवान्‌ बृहस्पतिजीके समीप जाकर यथोचित रीतिसे यह तात्विक प्रश्न उपस्थित किया ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्‌! आप सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता और सब शास्त्रोंके विद्वान हैं; अतः बताइये, पिता, माता, पुत्र, गुरु, सजातीय सम्बन्धी और मित्र आदिमेंसे मनुष्यका सच्चा सहायक कौन है? जब सब लोग अपने मरे हुए शरीरको काठ और ढेलेके समान त्यागकर चले जाते हैं, तब इस जीवके साथ परलोकमें कौन जाता है? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पतिजीने कहा--राजन्‌! प्राणी अकेला ही जन्म लेता, अकेला ही मरता, अकेला ही दुःखसे पार होता तथा अकेला ही दुर्गति भोगता है ।। ११३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पिता, माता, भाई, पुत्र, गुरु, जाति, सम्बन्धी तथा मित्रवर्ग--ये कोई भी उसके सहायक नहीं होते ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोग उसके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी तरह फेंककर दो घड़ी रोते हैं और फिर उसकी ओरसे मुँह फेरकर चल देते हैं |। १३ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे कुटुम्बीजन तो उसके शरीरका परित्याग करके चले जाते हैं, किंतु एकमात्र धर्म ही उस जीवात्माका अनुसरण करता है; इसलिये धर्म ही सच्चा सहायक है। अतः मनुष्योंको सदा धर्मका ही सेवन करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मयुक्त प्राणी ही उत्तम स्वर्गमें जाता है और अधर्मपरायण जीव नरकमें पड़ता है ।। १५३६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि न्यायसे प्राप्त हुए धनके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करे। एकमात्र धर्म ही परलोकमें मनुष्योंका सहायक है ।। १६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बहुश्रुत नहीं है, वही मनुष्य लोभ और मोहके वशीभूत हो दूसरेके लिये लोभ, मोह, दया अथवा भयसे न करने योग्य पापकर्म कर बैठता है ।। १७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्म, अर्थ और काम--ये तीन जीवनके फल हैं, अतः मनुष्यको अधर्मके त्यागपूर्वक इन तीनोंको उपलब्ध करना चाहिये ।। १८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्‌! आपके मुँहसे मैंने धर्मयुक्त परम हितकर बात सुनी। अब शरीरकी स्थिति जाननेके लिये मेरा विचार हो रहा है || १९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्यका स्थूल शरीर तो मरकर यहीं पड़ा रह जाता है और उसका सूक्ष्म शरीर अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है--नेत्रोंकी पहुँचसे परे है। ऐसी दशामें धर्म किस प्रकार उसका अनुसरण करता है? ।। २० | ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पतिजीने कहा--धर्मराज! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, यम, बुद्धि और आत्मा--ये सब सदा एक साथ मनुष्यके धर्मपर दृष्टि रखते हैं || २१६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिन और रात भी इस जगतके सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं। इन सबके साथ धर्म भी जीवका अनुसरण करता है || २२६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महामते! त्वचा, अस्थि, मांस, शुक्र और शोणित--ये सब धातु निष्प्राण शरीरका परित्याग कर देते हैं अर्थात्‌ ये उस शरीरधारी जीवात्माका साथ छोड़ देते हैं, एक धर्म ही उसके साथ जाता है || २३ ३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये धर्मयुक्त जीव ही परमगति प्राप्त करता है। फिर परलोकमें अपने कर्मोंका भोग समाप्त करके प्राणी जब दूसरा शरीर धारण करता है, उस समय उसके शरीरके पाँचों भूतोंमें स्थित अधिष्ठाता देवता उस जीवके शुभ और अशुभ कर्मोंको देखते हैं। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ।। २४-२५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर धर्मयुक्त वह जीव इहलोक और परलोकमें सुखका अनुभव करता है। अब तुम्हें और क्या बताऊँ? ।। २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्‌! धर्म जिस प्रकार जीवका अनुसरण करता है, वह तो आपने समझा दिया। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि इस शरीरमें वीर्यकी उत्पत्ति कैसे होती है? ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पतिजीने कहा--शुद्धात्मन! नरेश्वर! राजेन्द्र! इस शरीरमें स्थित पृथ्वी, जल, अन्न, वायु, आकाश और मनके अधिष्ठाता देवता जो अन्न भक्षण करते हैं और उस अन्नसे मनसहित वे पाँचों भूत जब पूर्ण तृप्त होते हैं, तब महान्‌ रेतस्‌ (वीर्य) की उत्पत्ति होती है || २८-२९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! फिर स्त्री-पुरुषका संयोग होनेपर वही वीर्य गर्भका रूप धारण करता है। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दी। अब और क्या सुनना चाहते हो? ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--भगवन्‌! गर्भ जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह आपने बताया। अब यह बताइये कि उत्पन्न हुआ पुरुष पुन: किस प्रकार बन्धनमें पड़ता है || ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पतिजीने कहा--राजन्‌! जीव उस वीर्यमें प्रविष्ट होकर जब गर्भमें संनिहित होता है, तब वे पाँचों भूत शरीररूपमें परिणत हो उसे बाँध लेते हैं, फिर उन्हीं भूतोंसे विलग होनेपर वह दूसरी गतिको प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शरीरमें सम्पूर्ण भूतोंसे युक्त हुआ वह जीव ही सुख या दु:ख पाता है। उस समय पाँचों भूतोंमें स्थित उनके अधिष्ठाता देवता जीवके शुभ या अशुभ कर्मको देखते हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो? ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्‌! जीव त्वचा, अस्थि और मांसमय शरीरका त्याग करके जब पाँचों भूतोंके सम्बन्धसे पृथक हो जाता है, तब कहाँ रहकर वह सुख-दुःखका उपभोग करता है? || ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पतिजीने कहा--भारत! जीव अपने कर्मोंसे प्रेरित होकर शीघ्र ही वीर्यभावको प्राप्त होता है और स्त्रीके रजमें प्रविष्ट होकर समयानुसार जन्म धारण करता है ।। ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(गर्भमें आनेके पहले सूक्ष्मशरीरमें स्थित होकर अपने दुष्कर्मोंके कारण) वह यमदूतोंद्वारा नाना प्रकारके क्लेश पाता, उनके प्रहार सहता और दुःखमय संसारचक्रमें भाँति-भाँतिके कष्ट भोगता है ।। ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीनाथ! यदि प्राणी इस लोकमें जन्मसे ही पुण्यकर्ममें लगा रहता है तो वह धर्मके फलका आश्रय लेकर उसके अनुसार सुख भोगता है। यदि अपनी शक्तिके अनुसार बाल्यकालसे ही धर्मका सेवन करता है तो वह मनुष्य होकर सदा सुखका अनुभव करता है।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किंतु धर्मके बीचमें यदि कभी-कभी वह अधर्मका भी आचरण कर बैठता है तो उसे सुखके बाद दुःख भी भोगना पड़ता है || ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अधर्मपरायण मनुष्य यमलोकमें जाता है और वहाँ महान्‌ दुःख भोगकर यहाँ पशुपक्षियोंकी योनिमें जन्म लेता है || ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीव मोहके वशीभूत होकर जिस-जिस कर्मका अनुष्ठान करनेसे जैसी-जैसी योनिमें जन्म धारण करता है, उसे बता रहा हूँ, सुनो || ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शास्त्र, इतिहास और वेदमें जो यह बात बतायी गयी है कि मनुष्य इस लोकमें पाप करनेपर मृत्युके पश्चात्‌ यमराजके भयंकर लोकमें जाता है, यह सत्य ही है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भूपाल! इस यमलोकमें देवलोकके समान पुण्यमय स्थान भी हैं, जिनमें तिर्यक्‌ (तथा कीट-पतंग आदि) योनिके प्राणियोंको छोड़कर समस्त पुण्यात्मा जंगम जीव जाते हैं ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यमराजका भवन सौन्दर्य आदि गुणोंके कारण ब्रह्मलोकके समान दिव्य भी है। परंतु अपने नियत पापकर्मोसे बँधा हुआ जीव वहाँ भी नरकमें पड़कर दुःख भोगता है ।। ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य जिस-जिस भाव और जिस-जिस कर्मसे निष्ठुरतापूर्ण भयंकर गतिको प्राप्त होता है, अब उसीको बता रहा हूँ ।। ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो द्विज चारों वेदोंका अध्ययन करनेके बाद भी मोहवश पतित मनुष्योंसे दान लेता है, उसका गदहेकी योनिमें जन्म होता है || ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! गदहेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है। उसके बाद मरकर बैल होता है। उस योनिमें वह सात वर्षोतक जीवित रहता है ।। ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब बैलका शरीर छूट जाता है, तब वह ब्रह्मराक्षस होता है। तीन मासतक ब्रह्मराक्षस रहनेके बाद फिर वह ब्राह्मणका जन्म पाता है ।। ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! जो ब्राह्मण पतित पुरुषका यज्ञ कराता है, वह मरनेके बाद कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है और उस योनिमें पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है ।। ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कीड़ेकी योनिसे छूटनेपर वह गदहेका जन्म पाता है। पाँच वर्षतक गदहा रहकर पाँच वर्ष सूअर, पाँच वर्ष मुर्गा, पाँच वर्ष सियार और एक वर्ष कुत्ता होता है। उसके बाद वह मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मूर्ख शिष्य अपने अध्यापकका अपराध करता है, वह यहाँ निम्नांकित तीन योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है, इसमें संशय नहीं है। राजेन्द्र! पहले तो वह कुत्ता होता है, फिर राक्षस और गदहा होता है। उसके बाद मरकर प्रेतावस्थामें अनेक कष्ट भोगनेके पश्चात्‌ ब्राह्मणका जन्म पाता है || ५२-५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पापाचारी शिष्य गुरुपत्नीके साथ समागमका विचार भी मनमें लाता है, वह अपने मानसिक पापके कारण भयंकर योनियोंमें जन्म लेता है || ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले कुत्तेकी योनिमें जन्म लेकर वह तीन वर्षतक जीवन धारण करता है। उस योनिमें मृत्युको प्राप्त होकर वह कीड़ेकी योनिमें उत्पन्न होता है। कीटयोनिमें जन्म लेकर वह एक वर्षषक जीवित रहता है। फिर मरनेके बाद उसका ब्राह्मण-योनिमें जन्म होता है ।। ५५-५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि गुरु अपने पुत्रके समान शिष्यको बिना कारणके ही मारता-पीटता है तो वह अपनी स्वेच्छा-चारिताके कारण हिंसक पशुकी योनिमें जन्म लेता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! जो पुत्र अपने माता-पिताका अनादर करता है, वह भी मरनेके बाद पहले गदहा नामक प्राणी होता ।। ५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गदहेका शरीर पाकर वह दस वर्षोंतक जीवित रहता है। फिर एक सालतक घड़ियाल रहनेके बाद मानवयोनिमें उत्पन्न होता है ।। ५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस पुत्रके ऊपर माता और पिता दोनों ही रष्ट होते हैं, वह गुरुजनोंके अनिष्टचिन्तनके कारण मृत्युके बाद गदहा होता है ।। ६० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गदहेकी योनिमें वह दस मासतक जीवित रहता है। उसके बाद चौदह महीनोंतक कुत्ता और सात मासतक बिलाव होकर अनन्‍्तमें वह मनुष्यकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है ।। ६१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माता-पिताकी निन्‍्दा करके अथवा उन्हें गाली देकर मनुष्य दूसरे जन्ममें मैना होता है। नरेश्वर! जो माता-पिताको मारता है, वह कछुआ होता है ।। ६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दस वर्षतक कछुआ रहनेके पश्चात्‌ तीन वर्ष साही और छ: महीनेतक सर्प होता है। उसके अनन्तर वह मनुष्यकी योनिमें जन्म लेता है ।। ६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष राजाके टुकड़े खाकर पलता हुआ भी मोहवश उसके शत्रुओंकी सेवा करता है, वह मरनेके बाद वानर होता है ।। ६४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दस वर्षोतक वानर, पाँच वर्षोतक चूहा और छ: महीनोंतक कुत्ता होकर वह मनुष्यका जन्म पाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरोंकी धरोहर हड़प लेनेवाला मनुष्य यमलोकमें जाता और क्रमश: सौ योनियोंमें भ्रमण करके अन्तमें कीड़ा होता है ।। ६६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! कीड़ेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है और अपने पापोंका क्षय करके अन्तमें मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है || ६७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरोंके दोष दढूँढ़नेवाला मनुष्य हरिणकी योनिमें जन्म लेता है तथा जो अपनी खोटी बुद्धिके कारण किसीके साथ विश्वासघात करता है, वह मनुष्य मछली होता है ।। ६८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! आठ वर्षोतक मछली रहकर मरनेके बाद वह चार मासतक मृग होता है। उसके बाद बकरेकी योनिमें जन्म लेता है ।। ६९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बकरा पूरे एक वर्षपर मृत्युको प्राप्त होनेके पश्चात्‌ कीड़ा होता है। उसके बाद उस जीवको मनुष्यका जन्म मिलता है || ७० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! जो पुरुष लज्जाका परित्याग करके अज्ञान और मोहके वशीभूत होकर धान, जौ, तिल, उड़द, कुलथी, सरसों, चना, मटर, मूँग, गेहूँ और तीसी तथा दूसरे-दूसरे अनाजोंकी चोरी करता है, वह मरनेके बाद पहले चूहा होता है || ७१-७२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! फिर वह चूहा मृत्युके पश्चात्‌ सूअर होता है। नरेश्वर! वह सूअर जन्म लेते ही रोगसे मर जाता है || ७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीनाथ! फिर उसी कर्मसे वह मूढ़ जीव कुत्ता होता है और पाँच वर्षतक कुत्ता रहकर अन्तमें मनुष्यका जन्म पाता है ।। ७४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परस्त्रीगमनका पाप करके मनुष्य क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गीध, साँप, कंक और बगुला होता है || ७५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! जो पापात्मा मोहवश भाईकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, वह एक वर्षतक कोयलकी योनिमें पड़ा रहता है ।। ७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो कामनाकी पूर्तिके लिये मित्र, गुरु और राजाकी स्त्रीका सतीत्व भंग करता है, वह मरनेके बाद सूअर होता है || ७७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पाँच वर्षमक सूअर रहकर दस वर्ष भेड़िया, पाँच वर्ष बिलाव, दस वर्ष मुर्गा, तीन महीने चींटी और एक महीने कीडेकी योनिमें रहता है। इन सभी योनियोंमें चक्कर लगानेके बाद वह पुनः कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है || ७८-७९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस कीट-योनिमें वह चौदह महीनोंतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षय करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है || ८० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! जो विवाह, यज्ञ अथवा दानका अवसर आनेपर मोहवश उसमें विघ्न डालता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ा ही होता है ।। ८१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! वह कीट पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है। फिर पापोंका क्षय करके वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है || ८२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! जो पहले एक व्यक्तिको कन्यादान करके फिर दूसरेको उसी कन्याका दान करना चाहता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है || ८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! उस योनिमें वह तेरह वर्षोतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षयके पश्चात्‌ वह पुनः मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है ।। ८४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो देवकार्य अथवा पितृकार्य न करके बलि-वैश्वदेव किये बिना ही अन्न ग्रहण करता है, वह मरनेके बाद कौएकी योनिमें जन्म लेता है || ८५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सौ वर्षोतक कौएके शरीरमें रहकर वह मुर्गा होता है। उसके बाद एक मासतक सर्प रहता है। तत्पश्चात्‌ मनुष्यका जन्म पाता है || ८६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़ा भाई पिताके समान आदरणीय है, जो उसका अपमान करता है, उसे मृत्युके बाद क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है || ८७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्रौंच होकर वह एक वर्षतक जीवित रहता है। उसके बाद चीरक जातिका पक्षी होता है और फिर मरनेके बाद मनुष्य-योनिमें जन्म पाता है ।। ८८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्र-जातिका पुरुष ब्राह्मणजातिकी स्त्रीके साथ समागम करके देहत्यागके पश्चात्‌ पहले कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। फिर मरनेके बाद सूअर होता है ।। ८९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! सूअरकी योनिमें जन्म लेते ही वह रोगसे मर जाता है। पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात्‌ वह मूढ़ जीव उसी पाप-कर्मके कारण कुत्ता होता है ।। ९० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुत्ता होनेपर पापकर्मका भोग समाप्त करके वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है। मनुष्ययोनिमें भी वह एक ही संतान पैदा करके मर जाता है और शेष पापका फल भोगनेके लिये चूहा होता है ।। ९१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! कृतघ्न मनुष्य मरनेके बाद यमराजके लोकमें जाता है। वहाँ क्रोधमें भरे हुए यमदूत उसके ऊपर बड़ी निर्दयताके साथ प्रहार करते हैं || ९२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! वह दण्ड, मुद्गर और शूलकी चोट खाकर दारुण अग्निकुम्भ (कुम्भीपाक), असिपत्रवन, तपी हुई भयंकर बालू, काँटोंसे भरी हुई शाल्मली आदि नरकोंमें कष्ट भोगता है। यमलोकमें पहुँचकर इन ऊपर बताये हुए तथा और भी बहुत-से नरकोंकी भयंकर यातनाएँ भोगकर वह वहाँ यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार निर्दयी यमदूतोंसे पीड़ित हुआ कृतघ्न पुरुष पुनः संसारचक्रमें आता और कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है ।। ९५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! पंद्रह वर्षोतक वह कीड़ेकी योनिमें रहता है। फिर गर्भमें आकर वहीं गर्भस्थ शिशुकी दशामें ही मर जाता है ।। ९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस तरह कई सौ बार वह जीव गर्भकी यन्त्रणा भोगता है। तदनन्तर बहुत बार जन्म लेनेके पश्चात्‌ वह तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होता है ।। ९७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन योनियोंमें बहुत वर्षोतक दुःख भोगनेके पश्चात्‌ वह फिर मनुष्ययोनिमें न आकर दीर्घकालके लिये कछुआ हो जाता है ।। ९८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुर्बुद्धि मनुष्य दहीकी चोरी करके बगला होता है, कच्ची मछलियोंकी चोरी करके वह कारण्डव नामक जलपक्षी होता है और मधुका अपहरण करके वह डाँस (मच्छर) की योनिमें जन्म लेता है ।। ९९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फल, मूल अथवा पूएकी चोरी करनेपर मनुष्यको चींटीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। निष्पाव (मटर या उड़द) की चोरी करनेवाला हलगोलक नामवाला कीड़ा होता है || १०० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खीरकी चोरी करनेवाला तीतरकी योनिमें जन्म लेता है। आटेका पूआ चुराकर मनुष्य मरनेके बाद उल्लू होता है || १०१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोहेकी चोरी करनेवाला मूर्ख मानव कौवा होता है। काँसकी चोरी करके खोटी बुद्धिवाला मनुष्य हारीत नामक पक्षी होता है ।। १०२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाँदीका बर्तन चुरानेवाला कबूतर होता है और सुवर्णमय भाण्डकी चोरी करके मनुष्यको कीड़ेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ।। १०३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऊनी वस्त्र चुरानेवाला कृकल (गिरगिट) की योनिमें जन्म लेता है। कौशेय (रेशमी) वस्त्रकी चोरी करनेपर मनुष्य बत्तक होता है || १०४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंशुक (महीन कपड़े) की चोरी करके मनुष्य तोतेका जन्म पाता है तथा दुकूल (उत्तरीय वस्त्र) की चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ मानव हंसकी योनिमें जन्म लेता है ।। १०५ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूती वस्त्रकी चोरी करके मरा हुआ मनुष्य क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। भारत! पाटम्बर, भेड़के ऊनका बना हुआ तथा क्षौम (रेशमी) वस्त्र चुरानेवाला मनुष्य खरगोश नामक जन्तु होता है || १०६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनेक प्रकारके रंगोंकी चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ पुरुष मोर होता है। लाल कपड़े चुरानेवाला मनुष्य चकोरकी योनिमें जन्म लेता है ।। १०७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! जो मनुष्य लोभके वशीभूत होकर वर्णक (अनुलेपन) आदि तथा चन्दनकी चोरी करता है, वह छछूँदर होता है। उस योनिमें वह पंद्रह वर्षतक जीवित रहता है || १०८-१०९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर अधर्मका क्षय हो जानेपर वह मनुष्यका जन्म पाता है। दूध चुरानेवाली स्त्री बगुली होती है ।। ११० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! जो मनुष्य मोहयुक्त होकर तेल चुराता है, वह मरनेपर तेलपायी नामक कीड़ा होता है ।। १११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो नीच मनुष्य धनके लोभसे अथवा शत्रुताके कारण हथियार लेकर निहत्थे पुरुषको मार डालता है, वह अपनी मृत्युके बाद गदहेकी योनिमें जन्म पाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गदहा होकर वह दो वर्षोतक जीवित रहता है। फिर शस्त्रसे उसका वध होता है। इस प्रकार मरकर वह मृगकी योनिमें जन्म लेता और हिंसकोंके भयसे सदा उद्विग्न रहता है ।। ११३ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मृग होकर वह सालभरमें ही शस्त्रद्वारा मारा जाता है। मरनेपर मत्स्य होता है, फिर वह भी जालसे बँधता है ।। ११४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह किसी प्रकार जालसे छूटा हुआ भी चौथे महीनेमें मृत्युको प्राप्त हो हिंसक जन्तु भेड़िया आदि होता है। उस योनिमें दस वर्षोतक रहकर वह पाँच वर्षोतक व्याप्र या चीतेकी योनिमें पड़ा रहता है ।। ११५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर पापका क्षय होनेपर कालकी प्रेरणासे मृत्युको प्राप्त हो वह पुनः मनुष्य होता है ।। ११६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो खोटी बुद्धिवाला पुरुष स्त्रीकी हत्या कर डालता है, वह यमराजके लोकमें जाकर नाना प्रकारके क्लेश भोगनेके पश्चात्‌ बीस बार दुःखद योनियोंमें जन्म लेता है ।। ११७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! तदनन्तर वह कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है और बीस वर्षोतक कीट-योनिमें रहकर अन्तमें मनुष्य होता है ।। ११८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भोजनकी चोरी करके मनुष्य मक्खी होता है और कई महीनोंतक मक्खियोंके समुदायके अधीन रहता है। तत्पश्चात्‌ पापोंका भोग समाप्त करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है ।। ११९३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धान्यकी चोरी करनेवाले मनुष्यके शरीरमें दूसरे जन्ममें बहुत-से रोएँ पैदा होते हैं। प्रजानाथ! जो मानव तिलके चूर्णसे मिश्रित भोजनकी चोरी करता है, वह नेवलेके समान आकारवाला भयानक चूहा होता है तथा वह पापी सदा मनुष्योंको काटा करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दुर्बुद्धि मनुष्य घी चुराता है, वह काकमदगु (सींगवाला जल-पक्षी) होता है। जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य मत्स्य और मांसकी चोरी करता है, वह कौवा होता है। नमककी चोरी करनेसे मनुष्यको चिरिकाक-योनिमें जन्म लेना पड़ता है ।। १२२-१२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! जो मानव विश्वासपूर्वक रखी हुई दूसरेकी धरोहरको हड़प लेता है, वह गतायु होनेपर मत्स्यकी योनिमें जन्म लेता है ।। १२४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मत्स्ययोनिमें जन्म लेनेके बाद जब मरता है, तब पुनः मनुष्यका जन्म पाता है। मानवयोनिमें आकर उसकी आयु बहुत कम होती है ।। १२५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! पाप करके मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेते हैं। वहाँ उन्हें अपने उद्धार करनेवाले धर्मका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता ।। १२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पापाचारी पुरुष लोभ और मोहके वशीभूत हो पाप करके उसे व्रत आदिके द्वारा दूर करनेका प्रयत्न करते हैं, वे सदा सुख-दुःख भोगते हुए व्यथित रहते हैं। उन्हें कहीं रहनेको ठौर नहीं मिलता तथा वे म्लेच्छ होकर सदा मारे-मारे फिरते हैं। इसमें संशय नहीं है || १२७-१२८ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य जन्मसे ही पापका परित्याग कर देते हैं, वे नीरोग, रूपवान्‌ और धनी होते हैं ।। १२९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्त्रियाँ भी यदि पूर्वोक्त पापकर्म करती हैं तो पापकी भागिनी होती हैं और वे उन पापभोगी प्राणियोंकी ही पत्नी होती हैं || १३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निष्पाप नरेश! पराये धनका अपहरण करनेसे जो दोष होते हैं, वे सब बताये गये। यहाँ मेरे द्वारा संक्षेपसे ही इस विषयका दिग्दर्शन कराया गया है ।। १३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! अब दूसरी बार बातचीतके प्रसंगमें फिर कभी इस विषयको सुनना। महाराज! पूर्वकालमें ब्रह्माजी देवर्षियोंके बीच यह प्रसंग सुना रहे थे। वहाँ उन्हींके मुँहसे मैंने ये सारी बातें सुनी थीं और तुम्हारे पूछनेपर उन्हीं सब बातोंका मैंने भी यथार्थरूपसे वर्णन किया है। राजन्‌! यह सुनकर तुम सदा धर्ममें मन लगाओ ।। १३२-१३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्र नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ बारहवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ बारहवाँ अध्याय के श्लोक 1-35&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“पापसे छूटनेके उपाय तथा अन्नदानकी विशेष महिमा”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--ब्रह्मनन! आपने अधर्मकी गति बतायी। पापरहित वक्ताओंमें श्रेष्ठ! अब मैं धर्मकी गति सुनना चाहता हूँ ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य पाप कर्म करके कैसे शुभगतिको प्राप्त होते हैं तथा किस कर्मके अनुष्ठानसे उन्हें उत्तम गति प्राप्त होती है? ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पतिजीने कहा--राजन्‌! जो मनुष्य पापकर्म करके अधर्मके वशीभूत हो जाता है, उसका मन धर्मके विपरीत मार्ममें जाने लगता है; इसलिये वह नरकमें गिरता है ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परंतु जो अज्ञानवश अधर्म बन जानेपर पुनः उसके लिये पश्चात्ताप करता है, उसे चाहिये कि मनको वशमें रखकर वह फिर कभी पापका सेवन न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्यका मन ज्यों-ज्यों पापकर्मकी निन्दा करता है त्यों-त्यों उसका शरीर उस अधर्मके बन्धनसे मुक्त होता जाता है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! यदि पापी पुरुष धर्मज्ञ ब्राह्मणोंसे अपना पाप बता दे तो वह उस पापके कारण होनेवाली निन्दासे शीघ्र ही छुटकारा पा जाता है ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य अपने मनको स्थिर करके जैसे-जैसे अपना पाप प्रकट करता है, वैसे-ही-वैसे वह मुक्त होता जाता है। ठीक उसी तरह जैसे सर्प पूर्वमुक्त, जराजीर्ण केचुलसे छूट जाता है ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य एकाग्रचित्त होकर सावधान हो ब्राह्मणको यदि नाना प्रकारके दान करे तो वह उत्तम गतिको पाता है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! अब मैं उन उत्कृष्ट दानोंका वर्णन करूँगा, जिन्हें देकर मनुष्य यदि उससे न करने योग्य कर्म बन जायं तो भी धर्मके फलसे संयुक्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब प्रकारके दानोंमें अन्नका दान श्रेष्ठ बताया गया है। अतः धर्मकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको सरलभावसे पहले अन्नका ही दान करना चाहिये ।। १० ।॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अन्न मनुष्योंका प्राण है, अन्नसे ही प्राणीका जन्म होता है, अन्नके ही आधारपर सारा संसार टिका हुआ है। इसलिये अन्न सबसे उत्तम माना गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता, ऋषि, पितर और मनुष्य अन्नकी ही प्रशंसा करते हैं। अन्नके ही दानसे राजा रन्तिदेव स्वर्गको प्राप्त हुए हैं || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मणोंके लिये प्रसन्न चित्तसे न्यायोपार्जित उत्तम अन्नका दान करना चाहिये ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस पुरुषके प्रसन्न चित्तसे दिये हुए अन्नको एक हजार ब्राह्मण खा लेते हैं, वह पशुपक्षीकी योनिमें नहीं जन्म लेता || १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठ! जो मनुष्य सदा योग-साधनमें संलग्न रहकर दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन करा देता है, वह पापके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदज्ञ ब्राह्मण भिक्षासे अन्न लाकर यदि स्वाध्याय-परायण विप्रको दान देता है तो इस लोकमें सुखी होता है || १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो भिक्षासे भी अन्न लाकर ब्राह्मणोंको देता है और सुवर्णका दान करता है, उसके बहुत-से पाप भी नष्ट हो जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीविका चलानेवाली भूमिका दान करके भी मनुष्य पातकसे मुक्त हो जाता है। पुराणोंके पाठसे भी ब्राह्मण पातकोंसे छुटकारा पा जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक लाख गायत्री जपनेसे, एक हजार गौओंको तृप्त करनेसे, विशुद्ध ब्राह्मणोंको यथार्थरूपसे वेदार्थका ज्ञान करानेसे तथा सर्वस्वके त्याग आदिसे भी द्विज पापमुक्त हो जाता है। इन सबमें सबका अन्नके द्वारा आतिथ्य-सत्कार करना ही सबसे श्रेष्ठ कर्म है। इसलिये अन्नको सबसे उत्तम माना गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मात्मा पाण्डुनन्दन! जो क्षत्रिय ब्राह्मणके धनका अपहरण न करके न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए अपने बाहुबलसे प्राप्त किया हुआ अन्न वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको भलीभाँति शुद्ध एवं समाहित चित्तसे दान करता है, वह उस अन्न-दानके प्रभावसे अपने पूर्वकृत पापोंका नाश कर डालता है ।। १७-१८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो वैश्य खेतीसे अन्न पैदा करके उसका छठा भाग राजाको देकर बचे हुएमेंसे शुद्ध अन्नका ब्राह्मणको दान करता है, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्र भी यदि प्राणोंकी परवा न करके कठोर परिश्रमसे कमाया हुआ अन्न ब्राह्मणोंको दान करता है तो पापसे छुटकारा पा जाता है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो किसी प्राणीकी हिंसा न करके अपनी छातीके बलसे पैदा किया हुआ अन्न विप्रोंको दान करता है, वह कभी संकटका अनुभव नहीं करता || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;न्यायके अनुसार अन्न प्राप्त करके उसे वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको हर्षपूर्वक दान देनेवाला मनुष्य अपने पापोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संसारमें अन्न ही बलकी वृद्धि करनेवाला है, अत: अन्नका दान करके मनुष्य बलवान्‌ होता है और सत्पुरुषोंके मार्गका आश्रय लेकर समस्त पापोंसे छूट जाता है | २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दाता पुरुषोंने जिस मार्गको चालू किया है, उसीसे मनीषी पुरुष चलते हैं। अन्नदान करनेवाले मनुष्य वास्तवमें प्राणदान करनेवाले हैं। उन्ही लोगोंसे सनातन धर्मकी वृद्धि होती है ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्यको प्रत्येक अवस्थामें न्‍्यायतः उपार्जित किया हुआ अन्न सत्पात्रके लिये अर्पित करना चाहिये; क्योंकि अन्न ही सब प्राणियोंका परम आधार है || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अन्न-दान करनेसे मनुष्यको कभी नरककी भयंकर यातना नहीं भोगनी पड़ती; अतः न्यायोपार्जित अन्नका ही सदा दान करना चाहिये ।। २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रत्येक गृहस्थको उचित है कि वह पहले ब्राह्मणको भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन करनेका प्रयत्न करे तथा अन्न-दानके द्वारा प्रत्येक दिनको सफल बनावे ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! जो मनुष्य वेद, न्याय, धर्म और इतिहासके जाननेवाले एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह घोर नरक और संसारचक्रमें नहीं पड़ता। इहलोकमें उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और मरनेके बाद वह परलोकमें सुख भोगता है || २८-२९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार अन्न-दानमें संलग्न हुआ पुरुष निश्चिन्त हो सुखका अनुभव करता है और रूपवान, कीर्तिमान्‌ तथा धनवान होता है ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! अन्न-दान सब प्रकारके धर्मों और दानोंका मूल है। इस प्रकार मैंने तुम्हें यह अन्नदानका सारा महान्‌ फल बताया है ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&amp;nbsp;(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३५ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/5689986658612246041/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-111-chapter-and-112-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/5689986658612246041'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/5689986658612246041'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-111-chapter-and-112-chapter-of.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय व एक सौ बारहवाँ अध्याय (From the 111 chapter and the 112 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' 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कथा"/><title type='text'>सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ आठवें अध्याय से एक सौ दसवें अध्याय तक (From the 108 chapter to the 110 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))</title><content type='html'>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; 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small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ आठवाँ अध्याय के श्लोक 1-21½&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जो सब तीथेंमें श्रेष्ठ हो तथा जहाँ जानेसे परम शुद्धि हो जाती हो, उस तीर्थको मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब मनीषी पुरुषोंके लिए गुणकारी होते हैं; किंतु उन सबमें जो परम पवित्र और प्रधान तीर्थ हैं, उसका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसमें धैर्यरूप कुण्ड और सत्यरूप जल भरा हुआ है तथा जो अगाध, निर्मल एवं अत्यन्त शुद्ध है, उस मानस तीर्थमें सदा परमात्माका आश्रय लेकर स्नान करना चाहिये ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कामना और याचनाका अभाव, सरलता, सत्य, मृदुता, अहिंसा, समस्त प्राणियोंके प्रति क्रूरताका अभाव--दया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह--ये ही इस मानस तीर्थके सेवनसे प्राप्त होनेवाली पवित्रताके लक्षण हैं ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ममता, अहंकार, राग-द्वेषादि द्वद्ध और परिग्रहसे रहित एवं भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हैं, वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधु पुरुष तीर्थस्वरूप हैं ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किंतु जिसकी बुद्धिमें अहंकारका नाम भी नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ तीर्थ कहलाता है। भगवान्‌ नारायण अथवा भगवान्‌ शिवमें जो भक्ति होती है, वह भी उत्तम तीर्थ मानी गयी है। पवित्रताका यह लक्षण तुम्हें विचार करनेपर सर्वत्र ही दृष्टिगोचर होगा ॥| ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिनके अन्त:करणसे तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण धुल गये हैं अर्थात्‌ जो तीनों गुणोंसे रहित है, जो बाह्य पवित्रता और अपवित्रतासे युक्त रहकर भी अपने कर्तव्य (तत्त्वविचार, ध्यान, उपासना आदि) का ही अनुसंधान करते हैं। जो सर्वस्वके त्यागमें ही अभिरुचि रखते हैं, सर्वज्ञ और समदर्शी होकर शौचाचारके पालनद्वारा आत्मशुद्धिका सम्पादन करते हैं, वे सत्पुरुष ही परम पवित्र तीर्थस्वरूप हैं || ७-८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शरीरको केवल पानीसे भिगो लेना ही स्नान नहीं कहलाता है। सच्चा स्नान तो उसीने किया है, जिसने मन-इन्द्रियके संयमरूपी जलमें गोता लगाया है। वही बाहर और भीतरसे भी पवित्र माना गया है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बीते या नष्ट हुए विषयोंकी अपेक्षा नहीं रखते, प्राप्त हुए पदार्थोमें ममताशून्य होते हैं तथा जिनके मनमें कोई इच्छा पैदा ही नहीं होती, उन्हींमें परम पवित्रता होती है || १०&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस जगतमें प्रज्ञान ही शरीर-शुद्धिका विशेष साधन है। इसी प्रकार अकिंचनता और मनकी प्रसन्नता भी शरीरको शुद्ध करनेवाले हैं ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुद्धि चार प्रकारकी मानी गयी है--आचारशुद्धि, मनःशुद्धि, तीर्थशुद्धि और ज्ञानशुद्धि; इनमें ज्ञानसे प्राप्त होनेवाली शुद्धि ही सबसे श्रेष्ठ मानी गयी है ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो प्रसन्न एवं शुद्ध मनसे ब्रह्मज़्ानमरूपी जलके द्वारा मानसतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान ही तत्त्वदर्शी ज्ञानीका स्नान माना गया है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सदा शौचाचारसे सम्पन्न, विशुद्ध भावसे युक्त और केवल सदगुणोंसे विभूषित है, उस मनुष्यको सदा शुद्ध ही समझना चाहिये ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! यह मैंने शरीरमें स्थित तीर्थोका वर्णन किया; अब पृथ्वीपर जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका महत्त्व भी सुनो || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे शरीरके विभिन्न स्थान पवित्र बताये गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वीके भिन्न-भिन्न भाग भी पवित्र तीर्थ हैं और वहाँका जल पुण्यदायक है ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लोग तीर्थोंके नाम लेकर तीर्थोमें स्नान करके तथा उनमें पितरोंका तर्पण करके अपने पाप धो डालते हैं, वे बड़े सुखसे स्वर्गमें जाते हैं || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीके कुछ भाग साधु पुरुषोंके निवाससे तथा स्वयं पृथ्वी और जलके तेजसे अत्यन्त पवित्र माने गये हैं ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार पृथ्वीपर और मनमें भी अनेक पुण्यमय तीर्थ हैं। जो इन दोनों प्रकारके तीर्थो्में स्नान करता है, वह शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे क्रियाहीन बल अथवा बलरहित क्रिया इस जगत्‌में कार्यका साधन नहीं कर सकती। बल और क्रिया दोनोंके संयुक्त होनेपर ही कार्यकी सिद्धि होती है, इसी प्रकार शरीरशुद्धि और तीर्थशुद्धिसे युक्त पुरुष ही पवित्र होकर परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त करता है। अतः दोनों प्रकारकी शुद्धि ही उत्तम मानी गयी है ।।२०-२१।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुद्धिकी जिज्ञासानामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पावका ½ श्लोक मिलाकर कुल २१½ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ नवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ नवाँ अध्याय के श्लोक 1-17&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“प्रत्येक मासकी द्वादशशी तिथिको उपवास और भगवान्‌ विष्णुकी पूजा करनेका विशेष माहात्म्य”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--पितामह! समस्त उपवासोंमें जो सबसे श्रेष्ठ और महान्‌ फल देनेवाला है तथा जिसके विषयमें लोगोंको कोई संशय नहीं है, वह आप मुझे बताइये ।। १ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! स्वयम्भू भगवान्‌ विष्णुने इस विषयमें जैसा कहा है, उसे बताता हूँ, सुनो। उसका अनुष्ठान करके पुरुष परम सुखी हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मार्गशीर्षमासमें द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान्‌ केशवकी पूजा-अर्चा करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पा लेता है और उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार पौषमासमें द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक भगवान्‌ नारायणकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाले पुरुषको वाजपेय यज्ञका फल मिलता है और वह परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माघमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान्‌ माधवकी पूजा करनेसे उपासकको राजसूय यज्ञका फल प्राप्त होता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी तरह फाल्गुनमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक गोविन्द नामसे भगवानकी पूजा करनेवाला पुरुष अतिरात्र यज्ञका फल पाता है और मृत्युके पश्चात्‌ सोमलोकमें जाता है ।। ६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चैत्रमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके विष्णुनामसे भगवान्‌का चिन्तन करनेवाला मनुष्य पौण्डरीक यज्ञका फल पाता है और देवलोकमें जाता है || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशाखमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक भगवान्‌ मधुसूदनका पूजन करनेवाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता और सोमलोकमें जाता है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज्येष्ठमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके जो भगवान्‌ त्रिविक्रमकी पूजा करता है, वह गोमेधयज्ञका फल पाता और अप्सराओंके साथ आनन्द भोगता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आषाढ़मासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक वामन नामसे भगवान्‌का पूजन करनेवाला पुरुष नरमेध यज्ञका फल पाता और महान्‌ पुण्यका भागी होता है || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रावणमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके जो भगवान्‌ श्रीधरकी आराधना करता है, वह पंच महायज्ञोंका फल पाता और विमानपर बैठकर सुख भोगता है ।। ११ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भाद्रपदमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक हृषीकेश नामसे भगवान्‌की पूजा करनेवाला मनुष्य सौत्रामणि यज्ञका फल पाता और पतवित्रात्मा होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आश्विनमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके पद्मनाभ नामसे भगवानकी पूजा करनेवाला पुरुष सहस्र गोदानका पुण्यफल पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कार्तिकमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान्‌ दामोदरकी पूजा करनेसे स्त्री हो या पुरुष गो-यज्ञका फल पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार जो एक वर्षतक कमलनयन भगवान्‌ विष्णुका पूजन करता है, वह पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला होता है और उसे बहुत-सी सुवर्ण-राशि प्राप्त होती है ।। १५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो प्रतिदिन इसी प्रकार भगवान्‌ विष्णुकी पूजा करता है, वह विष्णुभावको प्राप्त होता है। यह व्रत समाप्त होनेपर ब्राह्मणोंको भोजन करावे अथवा उन्हें घृत दान करे ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस उपवाससे बढ़कर दूसरा कोई उपवास नहीं है, इसे निश्चय समझना चाहिये। साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णुने ही इस पुरातन व्रतके विषयमें बताया है ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भगवान्‌ विष्णुका द्वादशीव्रत नामक एक सौ नवाँ अध्याय प्रा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ दसवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ दसवाँ अध्याय के श्लोक 1-10&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“रूप-सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र-व्रत करनेका प्रतिपादन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महाज्ञानी युधिष्ठिरने बाणशय्यापर सोये हुए कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मजीके निकट जाकर इस प्रकार प्रश्न किया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर बोले--पितामह! मनुष्यके अंगोंको सुन्दर रूपका सौभाग्य कैसे प्राप्त होता है? मनुष्यमें लोकप्रियता कैसे आती है? धर्म, अर्थ और कामसे युक्त पुरुष किस प्रकार सुखका भागी हो सकता है? ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजेन्द्र! मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको मूल नक्षत्रसे चन्द्रमाका योग होनेपर चन्द्रसम्बन्धी व्रत आरम्भ करे। चन्द्रमाके स्वरूपका इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये। देवता-सहित मूलनक्षत्रके द्वारा उनके दोनों चरणोंकी भावना करे और पिण्डलियोंमें रोहिणीको स्थापित करे ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जाँघोंमें अश्विनी नक्षत्र, ऊरुओंमें पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, गुह्य भागमें पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र तथा कटिभागमें कृत्तिकाकी स्थिति समझे ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाभिमें पूर्वाभाद्रपदा और उत्तराभाद्रपदाको जाने, नेत्रमण्डलमें रेवती, पृष्ठभागमें धनिष्ठा, अनुराधा तथा उत्तराको स्थापित समझे ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! दोनों भुजाओंमें विशाखाका, हाथोंमें हस्तका, अंगुलियोंमें पुनर्वसुका तथा नखोंमें आश्लेषाकी स्थापना करे ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजेन्द्र! ज्येष्ठा नक्षत्रसे ग्रीवाकी, श्रवणसे दोनों कानोंकी, पुष्य नक्षत्रकी स्थापनासे मुखकी तथा स्वाती नक्षत्रसे दाँतों और ओठोंकी भावना बतायी जाती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शतभिषाको हास, मघाको नासिका, मृगशिराको नेत्र और मित्र (अनुराधा) को ललाट समझे ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वरर भरणीको सिर और आर्द्रोको चन्द्रमाके केश समझे। (इस प्रकार विभिन्न अंगोंमें नक्षत्रोंकी स्थापना करके तत्सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा उन-उन अंगोंकी पूजा एवं जप) होम आदि प्रतिदिन करे। पौर्णमासीको व्रत समाप्त होनेपर वेदोंके पारंगत विद्दधान्‌ ब्राह्मणको घृत दान करे ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा करनेसे मनुष्य पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति परिपूर्णांग सौभाग्यशाली, दर्शनीय तथा ज्ञानका भागी होता है ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/7945712751969859295/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-108-chapter-to-110-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/7945712751969859295'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/7945712751969859295'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-108-chapter-to-110-chapter-of.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ आठवें अध्याय से एक सौ दसवें अध्याय तक (From the 108 chapter to the 110 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s72-c/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png" height="72" 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href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ छठा अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ छठा अध्याय के श्लोक 1-72&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन ”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! सभी वर्णों और म्लेच्छ जातिके लोग भी उपवासमें मन लगाते हैं, किंतु इसका क्या कारण है? यह समझमें नहीं आता ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! सुननेमें आया है कि ब्राह्मण और क्षत्रियोंको नियमोंका पालन करना चाहिये; परंतु उपवास करनेसे किस प्रकार उनके प्रयोजनकी सिद्धि होती है, यह नहीं जान पड़ता है।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीनाथ! आप कृपा करके हमें सम्पूर्ण नियमों और उपवासोंकी विधि बताइये। तात! उपवास करनेवाला मनुष्य किस गतिको प्राप्त होता है? ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठ! कहते हैं, उपवास बहुत बड़ा पुण्य है और उपवास सबसे बड़ा आश्रय है; परंतु उपवास करके यहाँ मनुष्य कौन-सा फल पाता है? ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! मनुष्य किस कर्मके द्वारा पापसे छुटकारा पाता है और क्‍या करनेसे किस प्रकार उसे धर्मकी प्राप्ति होती है? वह पुण्य और स्वर्ग कैसे पाता है? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! उपवास करके मनुष्यको किस वस्तुका दान करना चाहिये? जिस धर्मसे सुख और धनकी प्राप्ति हो सके, वही मुझे बताइये ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मज्ञ धर्मपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर धर्मके तत्त्वको जाननेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने उनसे इस प्रकार कहा ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! भरतश्रेष्ठ! उपवास करनेमें जो श्रेष्ठ गुण हैं, उनके विषयमें मैंने प्राचीन कालमें इस तरह सुन रखा है || ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! जिस तरह आज तुमने मुझसे प्रश्न किया है इसी प्रकार मैंने भी पूर्वकालमें तपोधन अंगिरा मुनिसे प्रश्न किया था | ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतभूषण! जब मैंने यह प्रश्न पूछा, तब अग्निनन्दन भगवान्‌ अंगिराने मुझे उपवासकी पवित्र विधि इस प्रकार बतायी || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंगिरा बोले--कुरुनन्दन! ब्राह्मण और क्षत्रियके लिये तीन रात उपवास करनेका विधान है। कहीं-कहीं दो त्रिरात्र और एक दिन अर्थात्‌ कुल सात दिन उपवास करनेका संकेत मिलता है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैश्यों और शूद्रोंने जो मोहवश तीन रात अथवा दो रातका उपवास किया है, उसका उन्हें कोई फल नहीं मिला है || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैश्य और शूद्रके लिये चौथे समयतकके भोजनका त्याग करनेका विधान है अर्थात्‌ उन्हें केवल दो दिन एवं दो रात्रितक उपवास करना चाहिये; क्‍योंकि धर्मशास्त्रके ज्ञाता एवं धर्मदर्शी विद्वानोंने उनके लिये तीन राततक उपवास करनेका विधान नहीं किया है ।। १३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! यदि मनुष्य पंचमी, षष्ठी और पूर्णिमाके दिन अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर एक वक्त भोजन करके दूसरे वक्त उपवास करे तो वह क्षमावान्‌, रूपवान्‌ और विद्वान होता है। वह बुद्धिमान्‌ पुरुष कभी संतानहीन या दरिद्र नहीं होता | १४-१५&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुनन्दन! जो पुरुष भगवान्‌की आराधनाका इच्छुक होकर पंचमी, षष्ठी, अष्टमी तथा कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको अपने घरपर ब्राह्मणोंको भोजन कराता है और स्वयं उपवास करता है, वह रोगरहित और बलवान होता है || १६६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मार्गशीर्ष मासको एक समय भोजन करके बिताता है और अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह रोग और पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। १७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सब प्रकारके कल्याणमय साधनोंसे सम्पन्न तथा सब तरहकी ओषधियों (अन्नफल आदि) से भरा-पूरा होता है। मार्गशीर्ष मासमें उपवास करनेसे मनुष्य दूसरे जन्ममें रोगरहित और बलवान होता है। उसके पास खेती-बारीकी सुविधा रहती है तथा वह बहुत धन-धान्यसे सम्पन्न होता है ।। १८-१९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! जो पौष मासको एक वक्त भोजन करके बिताता है, वह सौभाग्यशाली, दर्शनीय और यशका भागी होता है ।। २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो माघमासको नियमपूर्वक एक समयके भोजनसे व्यतीत करता है, वह धनवान्‌ कुलमें जन्म लेकर अपने कुट॒म्बीजनोंमें महत्त्वको प्राप्त होता है ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो फाल्गुन मासको एक समय भोजन करके व्यतीत करता है, वह स्त्रियोंको प्रिय होता है और वे उसके अधीन रहती हैं || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो नियमपूर्वक रहकर चैत्रमासको एक समय भोजन करके बिताता है, वह सुवर्ण, मणि और मोतियोंसे सम्पन्न महान्‌ कुलमें जन्म लेता है || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो स्त्री अथवा पुरुष इन्द्रियसंयमपूर्वक एक समय भोजन करके वैशाख मासको पार करता है, वह सजातीय बन्धु-बान्धवोंमें श्रेष्ठताको प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो एक समय ही भोजन करके ज्येष्ठ मासको बिताता है; वह स्त्री हो या पुरुष, अनुपम श्रेष्ठ ऐश्वर्यको प्राप्त होता है । २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो आषाढ़ मासमें आलस्य छोड़कर एक समय भोजन करके रहता है, वह बहुत-से धन-धान्य और पुत्रोंसे सम्पन्न होता है || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर एक समय भोजन करते हुए श्रावण मासको बिताता है, वह विभिन्न तीर्थोमें स्नान करनेके पुण्य-फलसे युक्त होता और अपने कुट॒म्बीजनोंकी वृद्धि करता है ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य भाद्रपद मासमें एक समय भोजन करके रहता है, वह गोधनसे सम्पन्न, समृद्धिशील तथा अविचल ऐश्वर्यका भागी होता है || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो आश्विन मासको एक समय भोजन करके बिताता है, वह पवित्र, नाना प्रकारके वाहनोंसे सम्पन्न तथा अनेक पुत्रोंसे युक्त होता है । २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य कार्तिक मासमें एक समय भोजन करता है, वह शूरवीर, अनेक भार्याओंसे संयुक्त और कीर्तिमान होता है || ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुरुषसिंह! इस प्रकार मैंने मासपर्यन्त एकभुक्त व्रत करनेवाले मनुष्योंके लिये विभिन्न मासोंके फल बताये हैं। पृथ्वीनाथ! अब तिथियोंके जो नियम हैं, उन्हें भी सुन लो || ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! जो पंद्रह-पंद्रह दिनपयर भोजन करता है, वह गोधनसे सम्पन्न और बहुत-से पुत्र तथा स्त्रियोंसे युक्त होता है ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह वर्षोतक प्रतिमास अनेक न्रिरात्रव्रत करता है, वह भगवान्‌ शिवके गणोंका निष्कण्टक एवं निर्मल आधिपत्य प्राप्त करता है ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! प्रवृत्तिमा्गका अनुसरण करनेवाले पुरुषको ये सभी नियम बारह वर्षोंतक पालन करने चाहिये ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य प्रतिदिन सबेरे और शामको भोजन करता है, बीचमें जलतक नहीं पीता तथा सदा अहिंसा-परायण होकर नित्य अन्निहोत्र करता है, उसे छः: वर्षोमें सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसमें संशय नहीं है तथा नरेश्वर! वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह पुण्यात्मा एवं रजोगुणरहित पुरुष सहस्रों दिव्य रमणियोंसे भरे हुए अप्सराओंके महलमें, जहाँ नृत्य और गीतकी ध्वनि गूँजती रहती है, रमण करता है ।। ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इतना ही नहीं, वह तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान्‌ विमानपर आरूढ़ होता है और पूरे एक हजार वर्षोतक ब्रह्मलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है। पुण्यक्षीण होनेपर इस लोकमें आकर महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है ।। ३८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मानव पूरे एक वर्षतक प्रतिदिन एक बार भोजन करके रहता है, वह अतिरात्रयज्ञका फल भोगता है || ३९३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह पुरुष दस हजार वर्षोतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर पुण्यक्षीण होनेपर इस लोकमें आकर महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लेता है || ४०३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पूरे एक वर्षतक दो-दो दिनपर भोजन करके रहता है तथा साथ ही अहिंसा, सत्य और इन्द्रिय-संयमका पालन करता है, वह वाजपेय यज्ञका फल पाता है और दस हजार वर्षोतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है । ४१-४२ ई ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! जो एक सालतक छठे समय अर्थात्‌ तीन-तीन दिनोंपर भोजन करता है, वह मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ।। ४३ इ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह चक्रवाकोंद्वारा वहन किये हुए विमानसे स्वर्गलोकमें जाता है और वहाँ चालीस हजार वर्षोतक आनन्द भोगता है || ४४३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! जो मनुष्य चार दिनोंपर भोजन करता हुआ एक वर्षतक जीवन धारण करता है, उसे गवामय यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। ४५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानद्वारा जाता है और पचास हजार वर्षोतक स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ।। ४६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! जो एक-एक पक्ष बीतनेपर भोजन करता है और इसी तरह एक वर्ष पूरा कर देता है, उसको छः: मासतक अनशन करनेका फल मिलता है। ऐसा भगवान्‌ अंगिरा मुनिका कथन है || ४७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजानाथ! वह साठ हजार वर्षोतक स्वर्गमें निवास करता है और वहाँ वीणा, वल्लकी, वेणु आदि वाद्योंके मनोरम घोष तथा सुमधुर शब्दोंद्वारा उसे सोतेसे जगाया जाता है || ४८-४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! नरेश्वर! जो मनुष्य एक वर्षतक प्रतिमास एक बार जल पीकर रहता है, उसे विश्वजित्‌ यज्ञका फल मिलता है ।। ५० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सिंह और व्याप्र जुते हुए विमानसे यात्रा करता है और सत्तर हजार वर्षोतक स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुरुषसिंह! एक माससे अधिक समयतक उपवास करनेका विधान नहीं है। कुन्तीनन्दन! धर्मज्ञ पुरुषोंने अनशनकी यही विधि बतायी है ।। ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बिना रोग-व्याधिके अनशन व्रत करता है, उसे पद-पदपर यज्ञका फल मिलता है, इसमें संशय नहीं है || ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! ऐसा पुरुष हंस जुते हुए दिव्य विमानसे यात्रा करता है और एक लाख वर्षोतक देवलोकमें आनन्द भोगता है, सैकड़ों कुमारी अप्सराएँ उस मनुष्यका मनोरंजन करती हैं ।। ५४ ३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! रोगी अथवा पीड़ित मनुष्य भी यदि उपवास करता है तो वह एक लाख वर्षोतक स्वर्गमें सुखपूर्वक निवास करता है ।। ५५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सो जानेपर दिव्य रमणियोंकी कांची और नूपुरोंकी झनकारसे जागता है और ऐसे विमानसे यात्रा करता है, जिसमें एक हजार हंस जुते रहते हैं |। ५६३&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! वह स्वर्गमें जाकर सैकड़ों रमणियोंसे भरे हुए महलमें रमण करता है। इस जगतमें दुर्बल मनुष्यको हृष्ट-पुष्ट होते देखा गया है। जिसे घाव हो गया है, उसका घाव भी भर जाता है। रोगीको अपने रोगकी निवृत्तिके लिये औषधसमूह प्राप्त होता है। क्रोधमें भरे हुए पुरुषको प्रसन्न करनेका उपाय भी उपलब्ध होता है। अर्थ और मानके लिये दुःखी हुए पुरुषके दुःखोंका निवारण भी देखा गया है; परन्तु स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले और दिव्य सुख चाहनेवाले पुरुषको ये सब इस लोकके सुखोंकी बातें अच्छी नहीं लगतीं || ५७--५५९ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः वह पवित्रात्मा पुरुष वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो सैकड़ों स्त्रियोंसे भरे हुए और इच्छानुसार चलनेवाले सुवर्ण-सदृश विमानपर बैठकर रमण करता है। वह स्वस्थ, सफलमनोरथ, सुखी एवं निष्पाप होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य अनशन-व्रत करके अपने शरीरका त्याग कर देता है, वह निम्नांकित फलका भागी होता है। वह प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशमान, सुनहरी कान्तिवाले, वैदूर्य और मोतीसे जटित, वीणा और मृदंगकी ध्वनिसे निनादित, पताका और दीपकोंसे आलोकित तथा दिव्य घंटानादसे गूँजते हुए, सहस्रों अप्सराओंसे युक्त विमानपर बैठकर दिव्य सुख भोगता है || ६१--६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पाण्डुनन्दन! उसके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही सहस्र वर्षोतक वह स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है ।। ६४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदसे बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, धर्मसे बढ़कर कोई उत्कृष्ट लाभ नहीं है तथा उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है || ६५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे इस लोक और परलोकमें ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणोंसे बढ़कर कोई पावन नहीं है, उसी प्रकार उपवासके समान कोई तप नहीं है || ६६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओंने विधिवत्‌ उपवास करके ही स्वर्ग प्राप्त किया है तथा ऋषियोंको भी उपवाससे ही सिद्धि प्राप्त हुई है ।। ६७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परम बुद्धिमान्‌ विश्वामित्रजी एक हजार दिव्य वर्षोतक प्रतिदिन एक समय भोजन करके भूखका कष्ट सहते हुए तपमें लगे रहे। उससे उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति हुई ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;च्यवन, जमदग्नि, वसिष्ठ, गौतम, भृगु--ये सभी क्षमावान्‌ महर्षि उपवास करके ही दिव्य लोकोंको प्राप्त हुए हैं || ६९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालमें अंगिरा मुनिने महर्षियोंको इस अनशन-व्रतकी महिमाका दिग्दर्शन कराया था। जो सदा इसका लोगोंमें प्रचार करता है, वह कभी दुःखी नहीं होता ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! महर्षि अंगिराकी बतलायी हुई इस उपवासत्रतकी विधिको जो प्रतिदिन क्रमश: पढ़ता और सुनता है, उस मनुष्यका पाप नष्ट हो जाता है || ७१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सब प्रकारके संकीर्ण पापोंसे छुटकारा पा जाता है तथा उसका मन कभी दोषोंसे अभिभूत नहीं होता। इतना ही नहीं, वह श्रेष्ठ मानव दूसरी योनिमें उत्पन्न हुए प्राणियोंकी बोली समझने लगता है और अक्षय कीर्तिका भागी होता है || ७२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवायविधिविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ सातवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ सातवाँ अध्याय के श्लोक 1-144&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--महात्मा पितामहने विधिपूर्वक यज्ञोंका वर्णन किया और इहलोक तथा परलोकमें जो उनके सम्पूर्ण गुण हैं, उनका भी यथावत्‌रूपसे प्रतिपादन किया ।। १ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किन्तु पितामह! दरिद्र मनुष्य उन यज्ञोंका लाभ नहीं उठा सकता; क्योंकि उन यज्ञोंके उपकरण बहुत हैं और अनेक प्रकारके आयोजनोंके कारण उनका विस्तार बहुत बढ़ जाता है।।२।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दादाजी! राजा अथवा राजपुत्र ही उन यज्ञोंका लाभ ले सकते हैं। जिनके पास धनकी कमी है, जो गुणहीन, एकाकी और असहाय हैं, वे उस प्रकारके यज्ञ नहीं कर सकते ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये जिस कर्मका अनुष्ठान दरिद्रों, गुणहीनों, एकाकी और असहायोंके लिये भी सुगम तथा बड़े-बड़े यज्ञोंके समान फल देनेवाला हो, उसीका मुझसे वर्णन कीजिये ।। ४ $|&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! अंगिरा मुनिकी बतलायी हुई जो उपवासकी विधि है, वह यज्ञोंके समान ही फल देनेवाली है। उसका पुनः वर्णन करता हूँ, सुनो || ५३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सबेरे और शामको ही भोजन करता है, बीचमें जलतक नहीं पीता तथा अहिंसापरायण होकर नित्य अग्निहोत्र करता है, उसे छ: वर्षोमें ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है --इसमें संशय नहीं है ।। ६-७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह मनुष्य तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान्‌ विमान पाता है और अग्नितुल्य तेजस्वी प्रजापतिलोकमें नृत्य तथा गीतोंसे गूँजते हुए देवांगनाओंके महलमें एक पद्म वर्षोतक निवास करता है । ८६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपनी ही धर्मपत्नीमें अनुराग रखते हुए निरन्तर तीन वर्षोतक प्रतिदिन एक समय भोजन करके रहता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। ९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बहुत-सी सुवर्णकी दक्षिणासे युक्त इन्द्रप्रिय यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा सत्यवादी, दानशील, ब्राह्मणभक्त, अदोषदर्शी, क्षमाशील, जितेन्द्रिय और क्रोधविजयी होता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सफेद बादलोंके समान चमकीले हंसोपलक्षित विमानपर बैठकर दो पद्म वर्षोतक समय समाप्त होनेतक अप्सराओंके साथ वहाँ निवास करता है || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य नित्य अग्निमें होम करता हुआ एक वर्षतक प्रति दूसरे दिन एक बार भोजन करता है तथा प्रतिदिन अग्निकी उपासनामें तत्पर रहकर नित्य सबेरे जागता है, वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह मानव हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानको पाता है और इन्द्रलोकमें सुन्दरी स्त्रियोंसे घिरा हुआ निवास करता है || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक प्रति तीसरे दिन एक समय भोजन करता, नित्य सबेरे उठता और अग्निकी परिचर्यामें तत्पर हो नित्य अग्निमें आहुति देता है, वह अतिरात्र यागका परम उत्तम फल पाता है ।। १६-१७ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसे मोरोंसे जुता हुआ विमान प्राप्त होता है और वह सदा सप्तर्षियोंके लोकमें अप्सराओंके साथ निवास करता है। वहाँ तीन पद्म वर्षोतक वह निवास करता है ॥| १८३&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बारह महीनोंतक प्रति चौथे दिन एक बार भोजन करता है, वह वाजपेय यज्ञका परम उत्तम फल पाता है ।। १९-२० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस मनुष्यको देवकन्याओंसे आरूढ़ विमान उपलब्ध होता है और वह पूर्वसागरके तटपर इन्द्रलोकमें निवास करता है तथा वहाँ रहकर वह प्रतिदिन देवराजकी क्रीडाओंको देखा करता है || २१६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर पाँचवें दिन एक समय भोजन करता है और लोभहीन, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त, अहिंसक और अदोषदर्शी होकर सदा पापकर्मोंसे दूर रहता है, उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। २२-२३ ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सूर्यकी किरणमालाओंके समान प्रकाशमान तथा जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए श्वेतकान्तिवाले हंसलक्षित दिव्य विमानकर आरूढ़ होता तथा चार, बारह एवं पैंतीस (कुल मिलाकर इक्यावन) पद्म वर्षोतक स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है || २४-२५ ई |&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनेतक सदा अग्निहोत्र करता, तीनों संध्याओंके समय स्नान करता, ब्रह्मचर्यका पालन करता, दूसरोंके दोष नहीं देखता तथा मुनिवृत्तिसे रहकर प्रति छठे दिन एक बार भोजन करता है, वह गोमेध यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है || २६-२७ ६ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसे अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान, हंस और मयूरोंसे सेवित, सुवर्णजटित उत्तम विमान प्राप्त होता है और वह अप्सराओंके अंकमें सोकर उन्हींके कांचीकलाप तथा नूपुरोंकी मधुर ध्वनिसे जगाया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह मनुष्य दो पताका (महापद्मा), अठारह पद्मा, एक हजार तीन सौ करोड़ और पचास अयुत वर्षोतक तथा सौ रीछोंके चमड़ोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है || ३०-३१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक प्रति सातवें दिन एक समय भोजन करता, प्रतिदिन अम्निमें आहुति देता, वाणीको संयममें रखता और ब्रह्मचर्यका पालन करता एवं फूलोंकी माला, चन्दन, मधु और मांसका सदाके लिये त्याग कर देता है, वह पुरुष मरुद्गणों तथा इन्द्रके लोकमें जाता है ।। ३२--३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन सभी स्थानोंमें सफलमनोरथ होकर वह देवकन्याओंद्वारा पूजित होता है तथा जिस यज्ञमें बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा दी जाती है, उसके फलको वह प्राप्त कर लेता है और असंख्य वर्षोतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है || ३५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो एक वर्षतक प्रति आठवें दिन एक बार भोजन करता, सबके प्रति क्षमाभाव रखता, देवताओंके कार्यमें तत्पर रहता और नित्यप्रति अग्निहोत्र करता है, उसे पौण्डरीक यागका सर्वश्रेष्ठ फल मिलता है ।। ३६-३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह कमलके समान वर्णवाले विमानपर चढ़ता है और वहाँ उसे श्यामवर्णा, सुवर्णसदश गौर वर्णवाली, सोलह वर्षकी-सी अवस्थावाली और नूतन यौवन तथा मनोहर रूपविलाससे सुशोभित देवांगनाएँ प्राप्त होती हैं। इसमें संशय नहीं है ।। ३८ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो एक वर्षतक नौ-नौ दिनपर एक समय भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञका परम उत्तम फल प्राप्त होता है || ३९-४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तथा वह पुण्डरीकके समान श्वेत वर्णोका विमान पाता है। दीप्तिमान्‌ सूर्य और अग्निके समान तेजस्विनी और दिव्यमालाधारिणी रुद्रकन्याएँ उसे सनातन अन्तरिक्ष-लोकमें ले जाती हैं और वहाँ वह एक कल्प लाख करोड़ एवं अठारह हजार वर्षोतक सुख भोगता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो एक वर्षतक दस-दस दिन बीतनेपर एक बार भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह सम्पूर्ण भूतोंके लिये मनोहर ब्रह्मकन्याओंके निवासस्थानमें जाकर एक हजार अभश्व-मेध यज्ञोंका परम उत्तम फल पाता है और उस सनातन पुरुषका वहाँकी रूपवती कन्याएँ मनोरंजन करती हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह नीले और लाल कमलके समान अनेक रंगोंसे सुशोभित, मण्डलाकार घूमनेवाला, भँवरके समान गहन चक्कर लगानेवाला, सागरकी लहरोंके समान ऊपर-नीचे होनेवाला, विचित्र मणिमालाओंसे अलंकृत और शंखध्वनिसे परिपूर्ण सर्वोत्तम विमान प्राप्त करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसमें स्फटिक और वज्रजसारमणिके खम्भे लगे होते हैं। उसपर सुन्दर ढंगसे बनी हुई वेदी शोभा पाती है तथा वहाँ हंस और सारस पक्षी कलरव करते रहते हैं। ऐसे विशाल विमानपर चढ़ता और स्वच्छन्द घूमता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ प्रति ग्यारहवें दिन एक बार हविष्यान्न ग्रहण करता है, मन-वाणीसे भी कभी परस्त्रीकी अभिलाषा नहीं करता है और माता-पिताके लिये भी कभी झूठ नहीं बोलता है, वह विमानमें विराजमान परम शक्तिमान्‌ महादेवजीके समीप जाता और हजार अभश्वमेध यज्ञोंका सर्वोत्तम फल पाता है | ४९-५१ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह अपने पास ब्रह्माजीका भेजा हुआ विमान स्वतः उपस्थित देखता है। सुवर्णके समान रंगवाली रूपवती कुमारियाँ उसे उस विमानद्वारा झुलोकमें दिव्य मनोहर रुद्रलोकमें ले जाती हैं || ५२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ वह प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी शरीर धारण करके असंख्य वर्षोतक एक लाख एक हजार करोड़ वर्षोतक निवास करता हुआ प्रतिदिन देवदानव-सम्मानित भगवान्‌ रुद्रको प्रणाम करता है। वे भगवान्‌ उसे नित्य-प्रति दर्शन देते रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक प्रति बारहवें दिन केवल हविष्यान्न ग्रहण करता है, उसे सर्वमेध यज्ञका फल मिलता है || ५५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके लिये बारह सूर्योके समान तेजस्वी विमान प्रस्तुत किया जाता है। बहुमूल्यमणि, मुक्ता और मूँगे उस विमानकी शोभा बढ़ाते हैं। हंसश्रेणीसे परिवेष्टित और नागवीथीसे परिव्याप्त वह विमान कलरव करते हुए मोरों और चक्रवाकोंसे सुशोभित तथा ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित है। उसके भीतर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनी हुई हैं। राजन! वह नित्यनिवासस्थान अनेक नर-नारियोंसे भरा हुआ होता है। यह बात महाभाग धर्मज्ञ ऋषि अंगिराने कही थी ।। ५६--५५९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक सदा तेरहवें दिन हविष्यात्र भोजन करता है, उसे देवसत्रका फल प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस मनुष्यको रक्तपद्मोदय नामक विमान उपलब्ध होता है, जो सुवर्णसे जटित तथा रत्नसमूहसे विभूषित है। उसमें देवकन्याएँ भरी रहती हैं, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित उस विमानकी बड़ी शोभा होती है। उससे पवित्र सुगन्ध प्रकट होती रहती है तथा वह दिव्य विमान वायव्यास्त्रसे शोभायमान होता है || ६१-६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह व्रतधारी पुरुष दो शंख, दो पताका (महापद्म), एक कल्प एवं एक चतुर्युग तथा दस करोड़ एवं चार पद्म वर्षोतक ब्रह्मलोकमें निवास करता है || ६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ देवकन्याएँ गीत और वाद्योंके घोष तथा भेरी और पणवकी मधुर ध्वनिसे उस पुरुषको आनन्द प्रदान करती हुई सदा उसका पूजन करती हैं ।। ६४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनेतक प्रति चौदहवें दिन हविष्यान्न भोजन करता है, वह महामेध यज्ञका फल पाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिनके यौवन तथा रूपका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी देवकन्याएँ तपाये हुए शुद्ध स्वर्णके अंगद (बाजूबन्द) और अन्यान्य अलंकार धारण करके विमानोंद्वारा उस पुरुषकी सेवामें उपस्थित होती हैं || ६६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सो जानेपर कलहंसोंके कलरवों, नूपुरोंकी मधुर झनकारों तथा काड्चीकी मनोहर ध्वनियोंद्वारा जगाया जाता है ।। ६७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह मानव देवकन्याओंके उस निवासस्थानमें उतने वर्षोतक निवास करता है, जितने कि गंगाजीमें बालूके कण हैं || ६८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो जितेन्द्रिय पुरुष बारह महीनोंतक प्रति पंद्रहवें दिन एक बार खाता और प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वह एक हजार राजसूय यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है और हंस तथा मोरोंसे सेवित दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है ।। ६९-७० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह विमान सुवर्णपत्रसे जटित तथा मणिमय मण्डलाकार चिह्ढोंसे विचित्र शोभासम्पन्न है। दिव्य वस्त्राभूषणोंसे शोभायमान सुन्दरी रमणियाँ उसे सुशोभित किये रहती है ।। ७१&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस विमानमें एक ही खम्भा होता है, चार दरवाजे लगे होते हैं। वह सात तल्लोंसे युक्त एवं परममंगलमय विमान सहस्रों वैजयन्ती पताकाओंसे सुशोभित तथा गीतोंकी मधुरध्वनिसे व्याप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मणि, मोती और मूँगोंसे विभूषित वह दिव्य विमान विद्युत्‌की-सी प्रभासे प्रकाशित तथा दिव्य गुणोंसे सम्पन्न होता है। वह व्रतधारी पुरुष उसी विमानपर आरूढ़ होता है। उसमें गेंडे और हाथी जुते होते हैं तथा वहाँ एक सहस्र युगोंतक वह निवास करता है ।। ७३ न्‍्]&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक प्रति सोलहवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे सोमयागका फल मिलता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सोम-कन्याओंके महलोंमें नित्य निवास करता है, उसके अंगोंमें सौम्य गन्धयुक्त अनुलेप लगाया जाता है। वह अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहता है, घूमता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह विमानपर विराजमान होता है और देखनेमें परम सुन्दरी तथा मधुरभाषिणी दिव्य नारियाँ उसकी पूजा करती तथा उसे काम-भोगका सेवन कराती हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह पुरुष सौ पद्म वर्षोके समान दस महाकल्प तथा चार चतुर्युगीतक अपने पुण्यका फल भोगता है ।। ७७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ सोलह दिन उपवास करके सत्रहवें दिन केवल हविष्यात्र भोजन करता है, वह वरुण, इन्द्र, रुद्र, मरुत, शुक्राचार्यजी तथा ब्रह्माजीके लोकमें जाता है और उन लोकोंमें देवताओंकी कन्याएँ आसन देकर उसका पूजन करती हैं || ७८--८० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह पुरुष भूलोक, भुवर्लोक तथा विश्वरूपधारी देवर्षिका वहाँ दर्शन करता है और देवाधिदेवकी कुमारियाँ उसका मनोरंजन करती हैं। उनकी संख्या बत्तीस है। वे मनोहर रूपधारिणी, मधुरभाषिणी तथा दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत होती हैं || ८१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! जबतक आकाशकमें चन्द्रमा और सूर्य विचरते हैं, तबतक वह धीर पुरुष सुधा एवं अमृतरसका भोजन करता हुआ ब्रह्मलोकमें विहार करता है || ८२३&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लगातार बारह महीनोंतक प्रति अठारहवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है ।। ८३३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके पीछे आनन्दपूर्वक जयघोष करते हुए बहुत-से तेजस्वी एवं सजे-सजाये रथ चलते हैं। उन रथोंपर देवकन्याएँ बैठी होती हैं || ८४ $ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके सामने व्याप्र और सिंहोंसे जुता हुआ तथा मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाला दिव्य एवं उत्तम विमान प्रस्तुत होता है, जिसपर वह अत्यन्त सुखपूर्वक आरोहण करता है ।। ८५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस दिव्य लोकमें वह एक हजार कल्पोंतक देवकन्याओंके साथ आनन्द भोगता और अमृतके समान उत्तम सुधारसका पान करता है || ८६३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लगातार बारह महीनोंतक उन्नीसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भी भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है || ८७३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसे अप्सराओंद्वारा सेवित उत्तम स्थान--गन्धर्वोंके गीतोंसे गूँजता हुआ सूर्यके समान तेजस्वी विमान प्राप्त होता है ।। ८८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस विमानमें वह सुन्दरी देवांगगाओंके साथ आनन्द भोगता है। उसे कोई चिन्ता तथा रोग नहीं सताते। दिव्यवस्त्रधारी और श्रीसम्पन्न रूप धारण करके वह दस करोड़ वर्षोतक वहाँ निवास करता है ।। ८९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लगातार बारह महीनेतक पूरे बीस दिनपर एक बार भोजन करता, सत्य बोलता, व्रतका पालन करता, मांस नहीं खाता, ब्रह्मचर्यका पालन करता तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहता है, वह सूर्यदेवके विशाल एवं रमणीय लोकोंमें जाता है || ९०-९१&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके पीछे-पीछे दिव्यमाला और अनुलेपन धारण करनेवाले गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे सेवित सोनेके मनोरम विमान चलते हैं ।। ९२ ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लगातार बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ इक्कीसवें दिनपर एक बार भोजन करता है, वह शुक्राचार्य तथा इन्द्रके दिव्यलोकमें जाता है। इतना ही नहीं, उसे अश्विनीकुमारों और मरुद्गणोंके लोकोंकी भी प्राप्ति होती है। उन लोकोंमें वह सदा सुख भोगनेमें ही तत्पर रहता है। दुःखोंका तो वह नाम भी नहीं जानता है और श्रेष्ठ विमानपर विराजमान हो सुन्दरी स्त्रियोंसे सेवित होता हुआ शक्तिशाली देवताके समान क्रीड़ा करता है | ९३--९५ ३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बाईसवाँ दिन प्राप्त होनेपर एक बार भोजन करता है तथा अहिंसामें तत्पर, बुद्धिमान, सत्यवादी और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी रूप धारण करके श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो वसुओंके लोकमें जाता है। वहाँ इच्छानुसार विचरता, अमृत पीकर रहता और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है || ९६--९८ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लगातार बारह महीनोंतक मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर तेईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह वायु, शुक्राचार्य तथा रुद्रके लोकमें जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ अनेक गुणोंसे युक्त श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो इच्छानुसार विचरता, जहाँ इच्छा होती वहाँ जाता और अप्सराओंद्वारा पूजित होता है। उन लोकोंमें वह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है ।। १०१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लगातार बारह महीनोंतक अग्निहोत्र करता हुआ चौबीसवें दिन एक बार हविष्यान्न भोजन करता है, वह दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध तथा दिव्य अनुलेपन धारण करके सुदीर्घकालतक आदित्यलोकमें सानन्द निवास करता है || १०२-१०३ ई ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ हंसयुक्त मनोरम एवं दिव्य सुवर्णमय विमानपर वह सहस्रों तथा अयुतों देवकन्याओंके साथ रमण करता है || १०४ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लगातार बारह महीनोंतक पचीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसको सवारीके लिये बहुत-से विमान या वाहन प्राप्त होते हैं | १०५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके पीछे सिंहों और व्याप्रोंसे जुते हुए तथा मेघोंकी गम्भीर गर्जनासे निनादित बहुसंख्यक रथ सानन्द विजयघोष करते हुए चलते हैं। उन सुवर्णमय, निर्मल एवं मंगलकारी रथोंपर देवकन्याएँ आरूढ़ होती हैं ।। १०६-१०७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह दिव्य, उत्तम एवं मनोहर विमानपर विराजमान हो सैकड़ों सुन्दरियोंसे भरे हुए महलमें सहस्र कल्पोंतक निवास करता है। वहाँ देवताओंके भोज्य अमृतके समान उत्तम सुधारसको पीकर वह जीवन बिताता है || १०८६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लगातार बारह महीनोंतक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मिताहारी हो छब्बीसवें दिन एक बार भोजन करता है तथा वीतराग और जितेन्द्रिय हो प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह महाभाग मनुष्य अप्सराओंसे पूजित हो सात मरुदगणों और आठ वसुओंके लोकोंमें जाता है ।। १०९--१११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत स्फटिक मणिमय दिव्य विमानोंसे सम्पन्न हो गन्धर्वों और अप्सराओंद्वारा पूजित होता हुआ दिव्य तेजसे युक्त हो देवताओंके दो हजार दिव्य युगोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है ।। ११२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर सत्ताईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह प्रचुर फलका भागी होता और देवलोकमें सम्मान पाता है ।। ११३-११४ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ उसे अमृतका आहार प्राप्त होता है तथा वह तृष्णारहित हो वहाँ रहकर आनन्द भोगता है। राजन! वह दिव्यरूपधारी पुरुष राजर्षियोंद्वारा वर्णित देवर्षियोंके चरित्रका श्रवण-मनन करता है और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो मनोरम सुन्दरियोंके साथ मदोन्मत्तभावसे रमण करता हुआ तीन हजार युगों एवं कल्पोंतक वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है || ११५-११६३६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक सदा अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर अट्ठाईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह देवर्षियोंको प्राप्त होनेवाले महान्‌ फलका उपभोग करता है ।। ११७-११८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह भोगसे सम्पन्न हो अपने तेजसे निर्मल सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है और सुन्दर कान्तिवाली, पीन उरोज, जाँच और जघन प्रदेशवाली, दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुकुमारी रमणियाँ सूर्यके समान प्रकाशित और सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले मनोरम दिव्य विमानपर बैठकर उस पुण्यात्मा पुरुषका दस लाख कल्पोंके वर्षोतक मनोरंजन करती हैं || ११९-१२० ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर हो उन्‍्तीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे देवर्षियों तथा राजर्षियोंद्वारा पूजित दिव्य मंगलमय लोक प्राप्त होते हैं । १२१-१२२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित, सम्पूर्ण रत्नोंस विभूषित तथा आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त सुवर्णमय दिव्य विमान प्राप्त करता है || १२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस विमानमें अप्सराएँ भरी रहती हैं, गन्धर्वोके गीतोंकी मधुर ध्वनिसे वह विमान गूँजता रहता है। उस विमानमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित, शुभ लक्षणसम्पन्न, मनोभिराम, मदमत्त एवं मधुरभाषिणी रमणियाँ उस पुरुषका मनोरंजन करती हैं || १२४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह पुरुष भोगसम्पन्न, तेजस्वी, अग्निके समान दीप्तिमानू, अपने दिव्य शरीरसे देवताकी भाँति प्रकाशमान तथा दिव्यभावसे युक्त हो वसुओं, मरुद्गणों, साध्यगणों, अश्विनीकुमारों, रुद्रों तथा ब्रह्माजीके लोकमें भी जाता है || १२५-१२६ $&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बारह महीनोंतक प्रत्येक मास व्यतीत होनेपर तीसवें दिन एक बार भोजन करता और सदा शान्तभावसे रहता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ।। १२७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह वहाँ सुधारसका भोजन करता और सबके मनको हर लेनेवाला कान्तिमान्‌ रूप धारण करता है। वह अपने तेज, सुन्दर शरीर तथा अंगकान्तिसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है || १२८३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध और दिव्य अनुलेपन धारण करके वह भोगकी शक्ति और साधनसे सम्पन्न हो सुख-भोगमें ही रत रहता है। दुःखोंका उसे कभी अनुभव नहीं होता है || १२९३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह विमानपर आरूढ़ हो अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारियोंद्वारा सम्मानित होता है। रुद्रों तथा देवर्षियोंकी कन्याएँ सदा उसकी पूजा करती हैं। वे कन्याएँ नाना प्रकारके रमणीय रूप, विभिन्न प्रकारके राग, भाँति-भाँतिकी मधुर भाषणकला तथा अनेक तरहकी रति-क्रीड़ाओंसे सुशोभित होती हैं || १३०-१३१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस विमानपर वह विराजमान होता है, वह आकाशके समान विशाल दिखायी देता है। सूर्य और वैदूर्यमणिके समान तेजस्वी जान पड़ता है। उसका पिछला भाग चन्द्रमाके समान, वामभाग मेघके सदृश, दाहिना भाग लाल प्रभासे युक्त, निचला भाग नीलमण्डलके समान तथा ऊपरका भाग अनेक रंगोंके सम्मिश्रणसे विचित्र-सा प्रतीत होता है। उसमें वह अनेक नर-नारियोंके साथ सम्मानित होकर रहता है || १३२-१३३ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेघ जम्बूद्वीपमें जितने जलबिन्दुओंकी वर्षा करता है, उतने हजार वर्षोतक उस बुद्धिमान्‌ पुरुषका ब्रह्मलोकमें निवास बताया गया है ।। १३४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वर्षा-ऋतुमें आकाशसे धरतीपर जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने वर्षोतक वह देवोपम तेजस्वी पुरुष ब्रह्मलोकमें निवास करता है ।। १३५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दस वर्षोतक एक-एक मास उपवास करके एकतीसवें दिन भोजन करनेवाला पुरुष उत्तम स्वर्ग लोकको जाता है। वह महर्षि पदको प्राप्त होकर सशरीर दिव्यलोककी यात्रा करता है || १३६६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य सदा मुनि, जितेन्द्रिय, क्रोधको जीतनेवाला, शिश्व और उदरके वेगको सदा काबूमें रखनेवाला, नियमपूर्वक तीनों अग्नियोंमें आहुति देनेवाला और संध्योपासनामें तत्पर रहनेवाला है तथा जो पवित्र होकर इन पहले बताये हुए अनेक प्रकारके नियमोंके पालनपूर्वक भोजन करता है, वह आकाशके समान निर्मल होता है और उसकी कान्ति सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! ऐसे गुणोंसे युक्त पुरुष देवताके समान अपने शरीरके साथ ही देवलोकमें जाकर वहाँ इच्छाके अनुसार स्वर्गके पुण्यफलका उपभोग करता है ।। १३९३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतमश्रेष्ठ! यह तुम्हें यज्ञोंका उत्तम विधान क्रमश: विस्तारपूर्वक बताया गया है। इसमें उपवासके फलपर प्रकाश डाला गया है। कुन्तीनन्दन! दरिद्र मनुष्योंने इन उपवासात्मक व्रतोंका अनुष्ठान करके यज्ञोंका फल प्राप्त किया है ।। १४०-१४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ) देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजामें तत्पर रहकर जो इन उपवासोंका पालन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ।। १४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! नियमशील, सावधान, शौचाचारसे सम्पन्न, महामनस्वी, दम्भ और द्रोहसे रहित, विशुद्ध बुद्धि, अचल और स्थिर स्वभाववाले मनुष्योंके लिये मैंने यह उपवासकी विधि विस्तारपूर्वक बतायी है। इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये || १४३-१४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवासकी विधिनामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/870765955050249844/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-106-chapter-and-107-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/870765955050249844'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/870765955050249844'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-106-chapter-and-107-chapter-of.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ छठा अध्याय व एक सौ सातवाँ अध्याय (From the 106 chapter and the 107 chapter of the entire Mahabharata (anushashn 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x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ चारवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ चारवें अध्याय के श्लोक 1-165½&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“आयु वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--पितामह! शास्त्रोंमें कहा गया है कि “मनुष्यकी आयु सौ वर्षोकी होती है। वह सैकड़ों प्रकारकी शक्ति लेकर जन्म धारण करता है।” किंतु देखता हूँ कि कितने ही मनुष्य बचपनमें ही मर जाते हैं। ऐसा क्‍यों होता है? ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य किस उपायसे दीर्घायु होता है अथवा किस कारणसे उसकी आयु कम हो जाती है? क्या करनेसे वह कीर्ति पाता है या क्या करनेसे उसे सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है? || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! मनुष्य मन, वाणी अथवा शरीरके द्वारा तप, ब्रह्मचर्य, जप, होम तथा औषध आदिमेंसे किसका आश्रय ले, जिससे वह श्रेयका भागी हो, वह मुझे बताइये ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, इसका उत्तर देता हूँ। मनुष्य जिस कारणसे अल्पायु होता है, जिस उपायसे दीर्घायु होता है, जिससे वह कीर्ति और सम्पत्तिका भागी होता है तथा जिस बर्तावसे पुरुषको श्रेयका संयोग प्राप्त होता है, वह सब बताता हूँ, सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदाचारसे ही मनुष्यको आयुकी प्राप्ति होती है, सदाचारसे ही वह सम्पत्ति पाता है तथा सदाचारसे ही उसे इहलोक और परलोकमें भी कीर्तिकी प्राप्ति होती है ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुराचारी पुरुष, जिससे समस्त प्राणी डरते और तिरस्कृत होते हैं, इस संसारमें बड़ी आयु नहीं पाता ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः यदि मनुष्य अपना कल्याण करना चाहता हो तो उसे इस जगत्‌में सदाचारका पालन करना चाहिये। जिसका सारा शरीर ही पापमय है, वह भी यदि सदाचारका पालन करे तो वह उसके शरीर और मनके बुरे लक्षणोंको दबा देता है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदाचार ही धर्मका लक्षण है। सच्चरित्रता ही श्रेष्ठ पुरुषोंकी पहचान है। श्रेष्ठ पुरुष जैसा बर्ताव करते हैं; वही सदाचारका स्वरूप अथवा लक्षण है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य धर्मका आचरण करता और लोक-कल्याणके कार्यमें लगा रहता है, उसका दर्शन न हुआ हो तो भी मनुष्य केवल नाम सुनकर उससे प्रेम करने लगते हैं || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो नास्तिक, क्रियाहीन, गुरु और शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाले, धर्मको न जाननेवाले और दुराचारी हैं, उन मनुष्योंकी आयु क्षीण हो जाती है || ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य शीलहीन, सदा धर्मकी मर्यादा भंग करनेवाले तथा दूसरे वर्णकी स्त्रियोंके साथ सम्पर्क रखनेवाले हैं; वे इस लोकमें अल्पायु होते और मरनेके बाद नरकमें पड़ते हैं ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे हीन होनेपर भी जो मनुष्य सदाचारी, श्रद्धालु और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सौ वर्षोतक जीवित रहता है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो क्रोधहीन, सत्यवादी, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेवाला, अदोषदर्शी और कपटशून्य है, वह सौ वर्षोतक जीवित रहता है ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ढेले फोड़ता, तिनके तोड़ता, नख चबाता तथा सदा ही उच्छिष्ट (अशुद्ध) एवं चंचल रहता है, ऐसे कुलक्षणयुक्त मनुष्यको दीर्घायु नहीं प्राप्त होती || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें (अर्थात्‌ सूर्योदयसे दो घड़ी पहले) जागे तथा धर्म और अर्थके विषयमें विचार करे। फिर शय्यासे उठकर शौच-स्नानके पश्चात्‌ आचमन करके हाथ जोड़े हुए प्रात:कालकी संध्या करे ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार सायंकालमें भी मौन रहकर संध्योपासना करे। उदय और अस्तके समय सूर्यकी ओर कदापि न देखे ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ग्रहण और मध्याह्नके समय भी सूर्यकी ओर दृष्टिपात न करे तथा जलनमें स्थित सूर्यके प्रतिबिम्बकी ओर भी न देखे। ऋषियोंने प्रतिदिन संध्योपासन करनेसे ही दीर्घ आयु प्राप्त की थी। इसलिये सदा मौन रहकर द्विजमात्रको प्रात:काल और सायंकालकी संध्या अवश्य करनी चाहिये || १८३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो द्विज न तो प्रातःकालकी संध्या करते हैं और न सायंकालकी ही, उन सबसे धार्मिक राजा शूद्रोचित कर्म करावे || १९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किसी भी वर्णके पुरुषको कभी भी परायी स्त्रियोंसे संसर्ग नहीं करना चाहिये। परस्त्रीसेवनसे मनुष्यकी आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है। संसारमें परस्त्री-समागमके समान पुरुषकी आयुको नष्ट करनेवाला दूसरा कोई कार्य नहीं है । २०-२१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्त्रियोंके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक व्यभिचारी पुरुषोंको नरकमें रहना पड़ता है ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;केशोंको सँवारना, आँखोंमें अंजन लगाना, दाँत-मुँह धोना और देवताओंकी पूजा करना--ये सब कार्य दिनके पहले प्रहरमें ही करने चाहिये || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मल-मूत्रकी ओर न देखे, उसपर कभी पैर न रखे। अत्यन्त सबेरे, अधिक साँझ हो जानेपर और ठीक दोपहरके समय कहीं बाहर न जाय। न तो अपरिचित पुरुषोंके साथ यात्रा करे, न शूद्रोंके साथ और न अकेला ही ।। २४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मण, गाय, राजा, वृद्ध पुरुष, गर्भिणी स्त्री, दुर्बल और भारपीड़ित मनुष्य यदि सामनेसे आते हों तो स्वयं किनारे हटकर उन्हें जानेका मार्ग देना चाहिये | २५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मार्गमें चलते समय अश्वत्थ आदि परिचित वृक्षों तथा समस्त चौराहोंको दाहिने करके जाना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दोपहरमें, रातमें, विशेषत: आधी रातके समय और दोनों संध्याओंके समय कभी चौराहोंपर न रहे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरोंके पहने हुए वस्त्र और जूते न पहने। सदा ब्रह्मचर्यका पालन करे। पैरसे पैरको न दबावे। सभी पक्षोंकी अमावास्या, पौर्णमासी, चतुर्दशी और अष्टमी तिथिको सदा ब्रह्मचारी रहे--स्त्री-समागम न करे। किसीकी निंदा, बदनामी और चुगली न करे || २८--३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरोंके मर्मपर आघात न करे। क्रूरतापूर्ण बात न बोले, औरोंको नीचा न दिखावे। जिसके कहनेसे दूसरोंको उद्वेग होता हो वह रुखाईसे भरी हुई बात पापियोंके लोकमें ले जानेवाली होती है। अतः वैसी बात कभी न बोले ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वचनरूपी बाण मुँहसे निकलते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोकमें पड़ा रहता है। अतः जो दूसरोंके मर्मस्थानोंपर चोट करते हैं, ऐसे वचन विद्वान्‌ पुरुष दूसरोंके प्रति कभी न कहे ।। ३२ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वचनरूपी बाण मुँहसे निकलते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोकमें पड़ा रहता है। अतः जो दूसरोंके मर्मस्थानोंपर चोट करते हैं, ऐसे वचन विद्वान्‌ पुरुष दूसरोंके प्रति कभी न कहे ।। ३२ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाणोंसे बिंधा और फरसेसे कटा हुआ वन पुन: अंकुरित हो जाता है, किंतु दुर्वचनरूपी शस्त्रसे किया हुआ भयंकर घाव कभी नहीं भरता है ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कर्णि, नालीक और नाराच--ये शरीरमें यदि गड़ जायेँ तो चिकित्सक मनुष्य इन्हें शरीरसे निकाल देते हैं, किंतु वचनरूपी बाणको निकालना असंभव होता है; क्योंकि वह हृदयके भीतर चुभा होता है ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हीनांग (अंधे-काने आदि), अधिकांग (छांगुर आदि), विद्याहीन, निन्दित, कुरूप, निर्धन और निर्बल मनुष्योंपर आक्षेप करना उचित नहीं है || ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नास्तिकता, वेदोंकी निंदा, देवताओंको कोसना, द्वेष, उद्ण्डता, अभिमान और कठोरता--इन दुर्गुणोंका त्याग कर देना चाहिये || ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्रोधमें आकर पुत्र या शिष्यके सिवा दूसरे किसीको न तो डंडा मारे, न उसे पृथ्वीपर ही गिरावे। हाँ, शिक्षाके लिये पुत्र या शिष्यको ताड़ना देना उचित माना गया है ।। ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणोंकी निंदा न करे, घर-घर घूम-घूमकर नक्षत्र और किसी पक्षकी तिथि न बताया करे। ऐसा करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है || ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणोंकी निंदा न करे, घर-घर घूम-घूमकर नक्षत्र और किसी पक्षकी तिथि न बताया करे। ऐसा करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है || ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अमावास्याके सिवा प्रतिदिन दन्‍तधावन करना चाहिये। इतिहास, पुराणोंका पाठ, वेदोंका स्वाध्याय, दान, एकाग्रचित्त होकर संध्योपासना और गायत्रीमंत्रका जप--ये सब कर्म नित्य करने चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मल-मूत्र त्यागने और रास्ता चलनेके बाद तथा स्वाध्याय और भोजन करनेके पहले पैर धो लेने चाहिये ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसपर किसीकी दूषित दृष्टि न पड़ी हो, जो जलसे धोया गया हो तथा जिसकी ब्राह्मणलोग वाणीद्वारा प्रशंसा करते हों--ये ही तीन वस्तुएँ देवताओंने ब्राह्मणोंके उपयोगमें लाने योग्य और पवित्र बतायी हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जौके आटेका हलवा, खिचड़ी, फलका गूदा, पूड़ी और खीर--ये सब वस्तुएँ अपने लिये नहीं बनानी चाहिये। देवताओंको अर्पण करनेके लिये ही इनको तैयार करना चाहिये ।। ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतिदिन अग्निकी सेवा करे, नित्यप्रति भिक्षुको भिक्षा दे और मौन होकर प्रतिदिन दन्तथधावन किया करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सायंकालमें न सोये, नित्य स्नान करे और सदा पवित्रतापूर्वक रहे। सूर्योदय होनेतक कभी न सोये। यदि किसी दिन ऐसा हो जाय तो प्रायश्षित्त करे। प्रतिदिन प्रातःकाल सोकर उठनेके बाद पहले माता-पिताको प्रणाम करे। फिर आचार्य तथा अन्य गुरुजनोंका अभिवादन करे। इससे दीर्घायु प्राप्त होती है || ४३ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शास्त्रोंमें जिन काष्ठोंका दाँतन निषिद्ध माना गया है, उन्हें सदा ही त्याग दे--कभी काममें न ले। शास्त्रविहित काष्ठका ही दन्‍्तधावन करे; परंतु पर्वके दिन उसका भी परित्याग कर दे || ४४६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदा एकाग्रचित्त हो दिनमें उत्तरकी ओर मुँह करके ही मल-मूत्रका त्याग करे। दन्तधावन किये बिना देवताओंकी पूजा न करे || ४५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवपूजा किये बिना गुरु, वृद्ध, धार्मिक तथा विद्वान्‌ पुरुषको छोड़कर दूसरे किसीके पास न जाय ।। ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अत्यन्त बुद्धिमान्‌ पुरुषोंको मलिन दर्पणमें कभी अपना मुँह नहीं देखना चाहिये। अपरिचित तथा गर्भिणी स्त्रीके पास भी न जाय ।। ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्वान्‌ पुरुष विवाहसे पहले मैथुन न करे, अन्यथा वह ब्रह्मचर्य-व्रतको भंग करनेका अपराधी माना जाता है। ऐसी दशामें उसे प्रायश्चित्त करना चाहिये। वह परायी स्त्रीकी ओर न तो देखे और न एकान्तमें उसके साथ एक आसनपर बैठे ही। इन्द्रियोंको सदा अपने वशमें रखे। स्वप्रमें भी शुद्ध मनवाला होकर रहे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उत्तर तथा पश्चिमकी ओर सिर करके न सोये। विद्वान्‌ पुरुषको पूर्व अथवा दक्षिणकी ओर सिर करके ही सोना चाहिये ।। ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;टूटी और ढीली खाटपर नहीं सोना चाहिये। अँधेरेमें पड़ी हुई शय्यापर भी सहसा शयन करना उचित नहीं है (उजाला करके उसे अच्छी तरह देख लेना चाहिये)। किसी दूसरेके साथ एक खाटपर न सोये। इसी तरह पलंगपर कभी तिरछा होकर नहीं, सदा सीधे ही सोना चाहिये ।। ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नास्तिकोंके साथ काम पड़नेपर भी न जाय। उनके शपथ खाने या प्रतिज्ञा करनेपर भी उनके साथ यात्रा न करे। आसनको पैरसे खींचकर मनुष्य उसपर न बैठे ।। ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्वान पुरुष कभी नग्न होकर स्नान न करे। रातमें भी कभी न नहाय। स्नानके पश्चात्‌ अपने अंगोंमें तैल आदिकी मालिश न करावे ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्नान किये बिना अपने अंगोंमें चन्दन या अंगराग न लगावे। स्नान कर लेनेपर गीले वस्त्र न झटकारे। मनुष्य भीगे वस्त्र कभी न पहने ।। ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गलेमें पड़ी हुई मालाको कभी न खींचे। उसे कपड़ेके ऊपर न धारण करे। रजस्वला सत्रीके साथ कभी बातचीत न करे ।। ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बोये हुए खेतमें, गाँवके आस-पास तथा पानीमें कभी मल-मूत्रका त्याग न करे ।। ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवमन्दिर, गौओंके समुदाय, देवसम्बन्धी वृक्ष और विश्रामस्थानके निकट तथा बढ़ी हुई खेतीमें भी मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। भोजन कर लेनेपर, छींक आनेपर, रास्ता चलनेपर तथा मल-मूत्रका त्याग करनेपर यथोचित शुद्धि करके दो बार आचमन करे। आचमनमें इतना जल पीये कि वह हृदयतक पहुँच जाय ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भोजन करनेकी इच्छावाला पुरुष पहले तीन बार मुखसे झलका स्पर्श (आचमन) करे। फिर भोजनके पश्चात्‌ भी तीन आचमन करे। फिर अंगुष्ठके मूलभागसे दो बार मुँहको पोंछे || ५५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भोजन करनेवाला पुरुष प्रतिदिन पूर्वकी ओर मुँह करके मौन भावसे भोजन करे। भोजन करते समय परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे। किंचिन्मात्र अन्न थालीमें छोड़ दे और भोजन करके मन-ही-मन अग्निका स्मरण करे ।। ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके भोजन करता है, उसे दीर्घायु, जो दक्षिणकी ओर मुँह करके भोजन करता है उसे यश, जो पश्चिमकी ओर मुख करके भोजन करता है उसे धन और जो उत्तराभिमुख होकर भोजन करता है उसे सत्यकी प्राप्ति होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(मनसे) अग्निका स्पर्श करके जलसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंका, सब अंगोंका, नाभिका और दोनों हथेलियोंका स्पर्श करे | ५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भूसी, भस्म, बाल और मुर्देकी खोपड़ी आदिपर कभी न बैठे। दूसरेके नहाये हुए जलका दूरसे ही त्याग कर दे ।। ५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शान्ति-होम करे, सावित्रसंज्ञक मन्त्रोंका जप और स्वाध्याय करे। बैठकर ही भोजन करे, चलते-फिरते कदापि भोजन नहीं करना चाहिये ।। ६० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खड़ा होकर पेशाब न करे। राखमें और गोशालामें भी मूत्र त्याग न करे, भीगे पैर भोजन तो करे, परंतु शयन न करे ।। ६१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीगे पैर भोजन करनेवाला मनुष्य सौ वर्षोतक जीवन धारण करता है। भोजन करके हाथ-मुँह धोये बिना मनुष्य उच्छिष्ट (अपवित्र) रहता है। ऐसी अवस्थामें उसे अग्नि, गौ तथा ब्राह्मग--इन तीन तेजस्वियोंका स्पर्श नहीं करना चाहिये। इस प्रकार आचरण करनेसे आयुका नाश नहीं होता ।। ६२ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उच्छिष्ट मनुष्यको सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र--इन त्रिविध तेजोंकी ओर कभी दृष्टि नहीं डालनी चाहिये ।। ६३ ह ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वृद्ध पुरुषके आनेपर तरुण पुरुषके प्राण ऊपरकी ओर उठने लगते हैं। ऐसी दशामें जब वह खड़ा होकर वृद्ध पुरुषोंका स्वागत और उन्हें प्रणाम करता है, तब वे प्राण पुनः पूर्वावस्थामें आ जाते हैं |। ६४ ई ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये जब कोई वृद्ध पुरुष अपने पास आवे, तब उसे प्रणाम करके बैठनेकी आसन दे और स्वयं हाथ जोड़कर उसकी सेवामें उपस्थित रहे। फिर जब वह जाने लगे, तब उसके पीछे-पीछे कुछ दूरतक जाय ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फटे हुए आसनपर न बैठे। फूटी हुई काँसीकी थालीको काममें न ले। एक ही वस्त्र (केवल धोती) पहनकर भोजन न करे (साथमें गमछा भी लिये रहे)। नग्न होकर स्नान न करे || ६६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नंगे होकर न सोये। उच्छिष्ट अवस्थामें भी शयन न करे। जूठे हाथसे मस्तकका स्पर्श न करे; क्योंकि समस्त प्राण मस्तकके ही आश्रित हैं ।। ६७ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सिरके बाल पकड़कर खींचना और मस्तकपर प्रहार करना वर्जित है। दोनों हाथ सटाकर उनसे अपना सिर न खुजलावे। बारंबार मस्तकपर पानी न डाले। इन सब बातोंके पालनसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है ।। ६८-६९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सिरके बाल पकड़कर खींचना और मस्तकपर प्रहार करना वर्जित है। दोनों हाथ सटाकर उनसे अपना सिर न खुजलावे। बारंबार मस्तकपर पानी न डाले। इन सब बातोंके पालनसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है ।। ६८-६९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सिरपर तेल लगानेके बाद उसी हाथसे दूसरे अंगोंका स्पर्श नहीं करना चाहिये और तिलके बने हुए पदार्थ नहीं खाने चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है || ७० |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जूठे मुँह न पढ़ाये तथा उच्छिष्ट अवस्थामें स्वयं भी कभी स्वाध्याय न करे। यदि दुर्गन्धयुक्त वायु चले, तब तो मनसे स्वाध्यायका चिन्तन भी नहीं करना चाहिये || ७१ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राचीन इतिहासके जानकार लोग इस विषयमें यमराजकी गायी हुई गाथा सुनाया करते हैं। (यमराज कहते हैं--) “जो मनुष्य जूठे मुँह उठकर दौड़ता और स्वाध्याय करता है, मैं उसकी आयु नष्ट कर देता हूँ और उसकी संतानोंको भी उससे छीन लेता हूँ। जो द्विज मोहवश अनध्यायके समय भी अध्ययन करता है, उसके वैदिक ज्ञान और आयुका भी नाश हो जाता है।&#39; अतः सावधान पुरुषको निषिद्ध समयमें कभी वेदोंका अध्ययन नहीं करना चाहिये || ७२--७४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सूर्य, अग्नि, गौ तथा ब्राह्मणोंकी ओर मुँह करके पेशाब करते हैं और जो बीच रास्तेमें मूतते हैं, वे सब गतायु हो जाते हैं || ७५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मल और मूत्र दोनोंका त्याग दिनमें उत्तराभिमुख होकर करे और रातमें दक्षिणाभिमुख। ऐसा करनेसे आयुका नाश नहीं होता ।। ७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसे दीर्घ कालतक जीवित रहनेकी इच्छा हो, वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और सर्प--इन तीनोंके दुर्बल होनेपर भी इनको न छेड़े; क्योंकि ये सभी बड़े जहरीले होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्रोधमें भरा हुआ साँप जहाँतक आँखोंसे देख पाता है, वहाँतक धावा करके काटता है। क्षत्रिय भी कुपित होनेपर अपनी शक्तिभर शत्रुको भस्म करनेकी चेष्टा करता है; परंतु ब्राह्मण जब कुपित होता है, तब वह अपनी दृष्टि और संकल्पसे अपमान करनेवाले पुरुषके सम्पूर्ण कुलको दग्ध कर डालता है; इसलिये समझदार मनुष्यको यत्नपूर्वक इन तीनोंकी सेवा करनी चाहिये || ७८-७९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुरुके साथ कभी हठ नहीं ठानना चाहिये। युधिष्ठिर! यदि गुरु अप्रसन्न हों तो उन्हें हर तरहसे मान देकर मनाकर प्रसन्न करनेकी चेष्टा करनी चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुरु प्रतिकूल बर्ताव करते हों तो भी उनके प्रति अच्छा ही बर्ताव करना उचित है; क्योंकि गुरुनिन्दा मनुष्योंकी आयुको दग्ध कर देती है, इसमें संशय नहीं है ।। ८१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपना हित चाहनेवाला मनुष्य घरसे दूर जाकर पेशाब करे, दूर ही पैर धोवे और दूरपर ही जूठे फेंके || ८२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! विद्वान्‌ पुरुषको लाल फूलोंकी नहीं, श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करनी चाहिये; परंतु कमल और कुवलयको छोड़कर ही यह नियम लागू होता है। अर्थात्‌ कमल और कुवलय लाल हों तो भी उन्हें धारण करनेमें कोई हर्ज नहीं है | ८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लाल रंगके फूल तथा वन्य पुष्पको मस्तकपर धारण करना चाहिये। सोनेकी माला पहननेसे कभी अशुद्ध नहीं होती ।। ८४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजानाथ! स्नानके पश्चात्‌ मनुष्यको अपने ललाटपर गीला चन्दन लगाना चाहिये। बुद्धिमान्‌ पुरुषको कपड़ोंमें कभी उलट-फेर नहीं करना चाहिये अर्थात्‌ उत्तरीय वस्त्रको अधोवस्त्रके स्थानमें और अधोवस्त्रको उत्तरीयके स्थानमें न पहने ।। ८५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठ! दूसरेके पहने हुए कपड़े नहीं पहनने चाहिये। जिसकी कोर फट गयी हो, उसको भी नहीं धारण करना चाहिये। सोनेके लिये दूसरा वस्त्र होना चाहिये। सड़कोंपर घूमनेके लिये दूसरा और देवताओंकी पूजाके लिये दूसरा ही वस्त्र रखना चाहिये ।। ८६।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बुद्धिमान्‌ पुरुष राई, चन्दन, बिल्व, तगर तथा केसरके द्वारा पृथक्‌ू-पृथक्‌ अपने शरीरमें उबटन लगावे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य सभी पर्वोके समय स्नान करके पवित्र हो वस्त्र एवं आभूषणोंसे विभूषित होकर उपवास करे तथा पर्वकालमें सदा ही ब्रह्मचर्यका पालन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जनेश्वर! किसीके साथ एक पात्रमें भोजन न करे। जिसे रजस्वला स्त्रीने अपने स्पर्शसे दूषित कर दिया हो, ऐसे अन्नका भोजन न करे एवं जिसमेंसे सार निकाल लिया गया हो ऐसे पदार्थको कदापि भक्षण न करे तथा जो तरसती हुई दृष्टिसे अन्नकी ओर देख रहा हो, उसे दिये बिना भोजन न करे ।। ८९-९० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बुद्धिमान्‌ पुरुषको चाहिये कि वह किसी अपवित्र मनुष्यके निकट अथवा सत्पुरुषोंके सामने बैठकर भोजन न करे। धर्मशास्त्रोंमें जिनका निषेध किया गया हो, ऐसे भोजनको पीठ पीछे छिपाकर भी न खाय ।। ९१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपना कल्याण चाहनेवाले श्रेष्ठ पुरुषको पीपल, बड़ और गूलरके फलका तथा सनके सागका सेवन नहीं करना चाहिये ।। ९२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्वान्‌ पुरुष हाथमें नमक लेकर न चाटे। रातमें दही और सत्तू न खाय। मांस अखाद्य वस्तु है, उसका सर्वथा त्याग कर दे || ९३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतिदिन सबेरे और शामको ही एकाग्रचित्त होकर भोजन करे। बीचमें कुछ भी खाना उचित नहीं है। जिस भोजनमें बाल पड़ गया हो, उसे न खाय तथा शत्रुके श्राद्धमें कभी अन्न न ग्रहण करे ।। ९४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भोजनके समय मौन रहना चाहिये। एक ही वस्त्र धारण करके अथवा सोये-सोये कदापि भोजन न करे। भोजनके पदार्थको भूमिपर रखकर कदापि न खाय। खड़ा होकर या बातचीत करते हुए कभी भोजन नहीं करना चाहिये ।। ९५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजानाथ! बुद्धिमान्‌ पुरुष पहले अतिथिको अन्न और जल देकर पीछे स्वयं एकाग्रचित्त हो भोजन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! एक पंक्तिमें बैठनेपर सबको एक समान भोजन करना चाहिये। जो अपने सुहृदजनोंको न देकर अकेला ही भोजन करता है, वह हालाहल विष ही खाता है ।। ९७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पानी, खीर, सत्तू, दही, घी और मधु--इन सबको छोड़कर अन्य भक्ष्य पदार्थोका अवशिष्ट भाग दूसरे किसीको नहीं देना चाहिये || ९८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुरुषसिंह! भोजन करते समय भोजनके विषयमें शंका नहीं करनी चाहिये तथा अपना भला चाहनेवाले पुरुषको भोजनके अन्तमें दही नहीं पीना चाहिये || ९९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भोजन करनेके पश्चात्‌ कुल्ला करके मुँह धो ले और एक हाथसे दाहिने पैरके अँगूठेपर पानी डाले ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर प्रयोगकुशल मनुष्य एकाग्रचित्त हो अपने हाथको सिरपर रखे। उसके बाद अग्निका मनसे स्पर्श करे। ऐसा करनेसे वह कुटुम्बीजनोंमें श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है || १०१ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके बाद जलसे आँख, नाक आदि इन्द्रियों और नाभिका स्पर्श करके दोनों हाथोंकी हथेलियोंको धो डाले। धोनेके पश्चात्‌ गीले हाथ लेकर ही न बैठ जाय (उन्हें कपड़ोंसे पोंछकर सुखा दे) ।। १०२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अँगूठेका अन्तराल (मूलस्थान) ब्राह्मतीर्थ कहलाता है, कनिष्ठा आदि अँगुलियोंका पश्चादभाग (अग्रभाग) देवतीर्थ कहा जाता है ।। १०३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! अंगुष्ठ और तर्जनीके मध्यभागको पितृतीर्थ कहते हैं। उसके द्वारा शास्त्रविधिसे जल लेकर सदा पितृकार्य करना चाहिये || १०४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी भलाई चाहनेवाले पुरुषको दूसरोंकी निनन्‍्दा तथा अप्रिय वचन मुँहसे नहीं निकालने चाहिये और किसीको क्रोध भी नहीं दिलाना चाहिये || १०५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पतित मनुष्योंके साथ वार्तालापकी इच्छा न करे। उनका दर्शन भी त्याग दे और उनके सम्पर्कमें कभी न जाय। ऐसा करनेसे मनुष्य बड़ी आयु पाता है || १०६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिनमें कभी मैथुन न करे। कुमारी कन्या और कुलटाके साथ कभी समागम न करे। अपनी पत्नी भी जबतक ऋतुस्नाता न हो तबतक उसके साथ समागम न करे। इससे मनुष्यको बड़ी आयु प्राप्त होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कार्य उपस्थित होनेपर अपने-अपने तीर्थमें आचमन करके तीन बार जल पीये और दो बार ओठोंको पोंछ ले--ऐसा करनेसे मनुष्य शुद्ध हो जाता है ।। १०८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले नेत्र आदि इन्द्रियोंका एक बार स्पर्श करके तीन बार अपने ऊपर जल छिड़के इसके बाद वेदोक्त विधिके अनुसार देवयज्ञ और पितृयज्ञ करे || १०९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुनन्दन! अब ब्राह्मणके लिये भोजनके आदि और अन्तमें जो पवित्र एवं हितकारक शुद्धिका विधान है, उसे बता रहा हूँ, सुनो || ११० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणको प्रत्येक शुद्धिके कार्यमें ब्राह्मतीर्थसी आचमन करना चाहिये। थूकने और छींकनेके बाद झलका स्पर्श (आचमन) करनेसे वह शुद्ध होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बूढ़े कुटुम्बी, दरिद्र मित्र और कुलीन पण्डित यदि निर्धन हों तो उनकी यथाशक्ति रक्षा करनी चाहिये। उन्हें अपने घरपर ठहराना चाहिये। इससे धन और आयुकी वृद्धि होती है || ११२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परेवा, तोता और मैना आदि पक्षियोंका घरमें रहना अभ्युदयकारी एवं मंगलमय है। ये तैलपायिक पक्षियोंकी भाँति अमंगल करनेवाले नहीं होते। देवताकी प्रतिमा, दर्पण, चन्दन, फ़ूलकी लता, शुद्ध जल, सोना और चाँदी--इन सब वस्तुओंका घरमें रहना मंगल-कारक है ।। ११३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फ़ूलकी लता, शुद्ध जल, सोना और चाँदी--इन सब वस्तुओंका घरमें रहना मंगल-कारक है ।। ११३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उद्दीपक, गीध, कपोत (जंगली कबूतर) और भ्रमर नामक पक्षी यदि कभी घरमें आ जायँ तो सदा उसकी शान्ति ही करानी चाहिये; क्‍योंकि ये अमंगलकारी होते हैं। महात्माओंकी निन्‍्दा भी मनुष्यका अकल्याण करनेवाली है ।। ११४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महात्मा पुरुषोंके गुप्त कर्म कहीं किसीपर प्रकट नहीं करने चाहिये। परायी स्त्रियाँ सदा अगम्य होती हैं, उनके साथ कभी समागम न करे। राजाकी पत्नी और सखियोंके पास भी कभी न जाय ।। ११५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजेन्द्र युधिष्ठिर! वैद्यों, बालकों, वृद्धों, भृत्यों, बन्धुओं, ब्राह्मणों, शरणार्थियों तथा सम्बन्धियोंकी स्त्रियोंक पास कभी न जाय। ऐसा करनेसे दीर्घायु प्राप्त होती है ।। ११६½।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुजेश्वर! अपनी उन्नति चाहनेवाले विद्वान्‌ पुरुषको उचित है कि ब्राह्मणके द्वारा वास्तुपूजनपूर्वक आरम्भ कराये और अच्छे कारीगरके द्वारा बनाये हुए घरमें सदा निवास करे || ११७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! बुद्धिमान्‌ पुरुष सायंकालमें गोधूलिकी वेलामें न तो सोये, न विद्या पढ़े और न भोजन ही करे। ऐसा करनेसे वह बड़ी आयुको प्राप्त होता है ।। ११८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको रातमें श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिये। भोजन करके केशोंका संस्कार (क्षौरकर्म) भी नहीं करना चाहिये तथा रातमें जलसे स्नान करना भी उचित नहीं है ।। ११९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! रातमें सत्तू खाना सर्वथा वर्जित है। अन्न-भोजनके पश्चात्‌ जो पीनेयोग्य पदार्थ और जल शेष रह जाते हैं, उनका भी त्याग कर देना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रातमें न स्वयं डटकर भोजन करे और न दूसरेको ही डटकर भोजन करावे। भोजन करके दौड़े नहीं। ब्राह्मणोंका वध कभी न करे | १२१½।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुई हो, उत्तम लक्षणोंसे प्रशंसित हो तथा विवाहके योग्य अवस्थाको प्राप्त हो गयी हो, ऐसी सुलक्षणा कन्याके साथ श्रेष्ठ बुद्धिमान्‌ पुरुष विवाह करे || १२२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! उसके गर्भसे संतान उत्पन्न करके वंश-परम्पराको प्रतिष्ठित करे और ज्ञान तथा कुलधर्मकी शिक्षा पानेके लिये पुत्रोंको गुरुके आश्रममें भेज दे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! यदि कन्या उत्पन्न करे तो बुद्धिमान्‌ एवं कुलीन वरके साथ उसका ब्याह कर दे। पुत्रका विवाह भी उत्तम कुलकी कन्याके साथ करे और भृत्य भी उत्तम कुलके मनुष्योंको ही बनावे || १२४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! मस्तकपरसे स्नान करके देवकार्य तथा पितृकार्य करे। जिस नक्षत्रमें अपना जन्म हुआ हो उसमें एवं पूर्वा और उत्तरा दोनों भाद्रपदाओंमें तथा कृत्तिका नक्षत्रमें भी श्राद्धका निषेध है || १२५-१२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(आश्लेषा, आर्द्रा, ज्येष्ठा और मूल आदि) सम्पूर्ण दारुण नक्षत्रों और प्रत्यरिताराकाभी परित्याग कर देना चाहिये। सारांश यह है कि ज्योतिष-शास्त्रके भीतर जिन-जिन नक्षत्रोंमें श्राद्धछक्ा निषेध किया गया है, उन सबमें देवकार्य और पितृकार्य नहीं करना चाहिये ।। १२७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजेन्द्र! मनुष्य एकाग्रचित्त होकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके हजामत बनवाये, ऐसा करनेसे बड़ी आयु प्राप्त होती है ।। १२८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! सत्पुरुषों, गुरुजनों, वृद्धों और विशेषतः कुलांगनाओंकी, दूसरे लोगोंकी और अपनी भी निन्दा न करे; क्योंकि निन्‍दा करना अधर्मका हेतु बताया गया है || १२९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठी जो कन्या किसी अंगसे हीन हो अथवा जो अधिक अंगवाली हो, जिसके गोत्र और प्रवर अपने ही समान हो तथा जो माताके कुलमें (नानाके वंशमें) उत्पन्न हुई हो, उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिये ।। १३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बूढ़ी, संन्यासिनी, पतिव्रता, नीच वर्णकी तथा ऊँचे वर्णकी स्त्री हो, उसके सम्पर्कसे दूर रहना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसकी योनि अर्थात्‌ कुलका पता न हो तथा जो नीच कुलमें पैदा हुई हो, उसके साथ विद्वान्‌ पुरुष समागम न करे। युधिष्ठिर! जिसके शरीरका रंग पीला हो तथा जो कुष्ठ रोगवाली हो, उसके साथ तुम्हें विवाह नहीं करना चाहिये ।। १३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! जो मृगीरोगसे दूषित कुलमें उत्पन्न हुई हो, नीच हो, सफेद कोढ़वाले और राजयक्ष्माके रोगी मनुष्यके कुलमें पैदा हुई हो, उसको भी त्याग देना चाहिये || १३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ आचरणोंद्वारा प्रशंसित, मनोहारिणी तथा दर्शनीय हो, उसीके साथ तुम्हें विवाह करना चाहिये ।। १३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठि! अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अपनी अपेक्षा महान्‌ या समान कुलमें विवाह करना चाहिये। नीच जातिवाली तथा पतिता कन्याका पाणिग्रहण कदापि नहीं करना चाहिये ।। १३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(अरणी-मन्थनद्वारा) अग्निका उत्पादन एवं स्थापन करके ब्राह्मणोंद्वारा बतायी हुई सम्पूर्ण वेदविहित क्रियाओंका यत्नपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये ।। १३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सभी उपायोंसे अपनी स्त्रीकी रक्षा करनी चाहिये। स्त्रियोंसे ईर्ष्या रखना उचित नहीं है। ईर्ष्या करनेसे आयु क्षीण होती है। इसलिये उसे त्याग देना ही उचित है || १३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिनमें एवं सूर्योदयके पश्चात्‌ शयन आयुको क्षीण करनेवाला है। प्रातःकाल एवं रात्रिके आरम्भमें नहीं सोना चाहिये। अच्छे लोग रातमें अपवित्र होकर नहीं सोते हैं || १३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परस्त्रीसे व्यभिचार करना और हजामत बनवाकर बिना नहाये रह जाना भी आयुका नाश करनेवाला है। भारत! अपवित्रावस्थामें वेदोंका अध्ययन यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिये ।। १३९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संध्याकालमें स्नान, भोजन और स्वाध्याय कुछ भी न करे। उस बेलामें शुद्ध चित्त होकर ध्यान एवं उपासना करनी चाहिये। दूसरा कोई कार्य नहीं करना चाहिये ।। १४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! ब्राह्मणोंकी पूजा, देवताओंको नमस्कार और गुरुजनोंको प्रणाम स्नानके बाद ही करने चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बिना बुलाये कहीं भी न जाय, परंतु यज्ञ देखनेके लिये मनुष्य बिना बुलाये भी जा सकता है। भारत! जहाँ अपना आदर न होता हो, वहाँ जानेसे आयुका नाश होता है || १४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अकेले परदेश जाना और रातमें यात्रा करना मना है। यदि किसी कामके लिये बाहर जाय तो संध्या होनेके पहले ही घर लौट आना चाहिये ।। १४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठ! माता-पिता और गुरुजनोंकी आज्ञाका अविलम्ब पालन करना चाहिये। इनकी आज्ञा हितकर है या अहितकर, इसका विचार नहीं करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! क्षत्रियको धनुर्वेद और वेदाध्ययनके लिये यत्न करना चाहिये। राजेन्द्र! तुम हाथी-घोड़ेकी सवारी और रथ हाँकनेकी कलामें निपुणता प्राप्त करनेके लिये प्रयत्नशील बनो, क्‍योंकि यत्न करनेवाला पुरुष सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है। वह शत्रुओं, स्वजनों और भृत्योंके लिये दुर्धर्ष हो जाता है ।। १४५-१४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो राजा सदा प्रजाके पालनमें तत्पर रहता है, उसे कभी हानि नहीं उठानी पड़ती। भरतनन्दन! तुम्हें तर्कशास्त्र और शब्दशास्त्र दोनोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।। १४७ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! गान्धर्वशास्त्र (संगीत) और समस्त कलाओंका ज्ञान प्राप्त करना भी तुम्हारे लिये आवश्यक है। तुम्हें प्रतेदिन पुराण, इतिहास, उपाख्यान तथा महात्माओंके चरित्रका श्रवण करना चाहिये ।। १४८ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा माननीय पुरुषोंका सम्मान और निन्दनीय मनुष्योंकी निनन्‍दा करे। वह गौओं तथा ब्राह्मणोंके लिये युद्ध करे। उनकी रक्षाके लिये आवश्यकता हो तो प्राणोंको भी निछावर कर दें।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी पत्नी भी रजस्वला हो तो उसके पास न जाय और न उसे ही अपने पास बुलाये। जब चौथे दिन वह स्नान कर ले, तब रातमें बुद्धिमान्‌ पुरुष उसके पास जाय। पाँचवें दिन गर्भाधान करनेसे कन्याकी उत्पत्ति होती है और छठे दिन पुत्रकी अर्थात्‌ समरात्रिमें गर्भाधानसे पुत्रका और विषमरात्रिमें गर्भाधान होनेसे कन्‍्याका जन्म होता है ।। १४९-१५० |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी विधिसे विद्वान्‌ पुरुष पत्नीके साथ समागम करे। भाई-बन्धु, सम्बन्धी और मित्र --इन सबका सब प्रकारसे आदर करना चाहिये ।। १५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी शक्तिके अनुसार भाँति-भाँतिकी दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये। नरेश्वर! तदनन्तर गार्हस्थ्यकी अवधि समाप्त हो जानेपर वानप्रस्थके नियमोंका पालन करते हुए वनमें निवास करना चाहिये ।। १५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुमसे आयुकी वृद्धि करनेवाले नियमोंका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो नियम बाकी रह गये हैं, उन्हें तुम तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े-चढ़े ब्राह्मणोंसे पूछकर जान लेना ।। १५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदाचार ही कल्याणका जनक और सदाचार ही कीर्तिको बढ़ानेवाला है। सदाचारसे आयुकी वृद्धि होती है और सदाचार ही बुरे लक्षणोंका नाश करता है ।। १५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सम्पूर्ण आगमोंमें सदाचार ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है। सदाचारसे धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मसे आयु बढ़ती है ।। १५५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालमें सब वर्णोके लोगोंपर दया करके ब्रह्माजीने यह सदाचार धर्मका उपदेश दिया था। यह यश, आयु और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा कल्याणका परम आधार है ।। १५६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! जो प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनता और कहता है, वह सदाचार-व्रतके प्रभावसे शुभ लोकोंमें जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें आयु बढ़ानेवाले साधनोंका वर्णनविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९½ श्लोक मिलाकर कुल १६५½ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;टिका टिप्पणी -&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;ul style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;li&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;अपने जन्मनक्षत्रसे वर्तमान नक्षत्रतक गिने, गिननेपर जितनी संख्या हो उसमें नौका भाग दे। यदि पाँच शेष रहे तो उस दिनके नक्षत्रको प्रत्यरि तारा समझे।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ पाँचवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ पाँचवें अध्याय के श्लोक 1-20&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“बड़े और छोटे भाईके पारस्परिक बर्ताव तथा माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंके गौरवका वर्णन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! बड़ा भाई अपने छोटे भाइयोंके साथ कैसा बर्ताव करे? और छोटे भाइयोंका बड़े भाईके साथ कैसा बर्ताव होना चाहिये? यह मुझे बताइये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--तात भरतनन्दन! तुम अपने भाइयोंमें सबसे बड़े हो; अतः सदा बड़ेके अनुरूप ही बर्ताव करो। गुरुको अपने शिष्यके प्रति जैसा गौरवयुक्त बर्ताव होता है, वैसा ही तुम्हें भी अपने भाइयोंके साथ करना चाहिये ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि गुरु अथवा बड़े भाईका विचार शुद्ध न हो तो शिष्य या छोटे भाई उसकी आज्ञाके अधीन नहीं रह सकते। भारत! बड़ेके दीर्घदर्शी होनेपर छोटे भाई भी दीर्घदर्शी होते हैं ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़े भाईको चाहिये कि वह अवसरके अनुसार अन्ध, जड़ और दिद्वान्‌ बने अर्थात्‌ यदि छोटे भाइयोंसे कोई अपराध हो जाय तो उसे देखते हुए भी न देखे। जानकर भी अनजान बना रहे और उनसे ऐसी बात करे, जिससे उनकी अपराध करनेकी प्रवृत्ति दूर हो जाय ।। ४ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि बड़ा भाई प्रत्यक्षरूपसे अपराधका दण्ड देता है तो उसके छोटे भाइयोंका हृदय छिन्न-भिन्न हो जाता है और वे उस दुर्व्यवहारका लोगोंमें प्रचार कर देते हैं, तब उनके ऐश्वर्यको देखकर जलनेवाले कितने ही शत्रु उनमें मतभेद पैदा करनेकी इच्छा करने लगते हैं ।। ५ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जेठा भाई अपनी अच्छी नीतिसे कुलको उन्नतिशील बनाता है; किंतु यदि वह कुनीतिका आश्रय लेता है तो उसे विनाशके गर्तमें डाल देता है! जहाँ बड़े भाईका विचार खोटा हुआ, वहाँ वह जिसमें उत्पन्न हुआ है, अपने उस समस्त कुलको ही चौपट कर देता है ।। ६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बड़ा भाई होकर छोटे भाइयोंके साथ कुटिलतापूर्ण बर्ताव करता है, वह न तो ज्येष्ठ कहलाने योग्य है और न ज्येष्ठांश पानेका ही अधिकारी है। उसे तो राजाओंके द्वारा दण्ड मिलना चाहिये ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कपट करनेवाला मनुष्य नि:संदेह पापमय लोकों (नरक)-में जाता है। उसका जन्म पिताके लिये बेतके फूलकी भाँति निरर्थक ही माना गया है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस कुलमें पापी पुरुष जन्म लेता है, उसके लिये वह सम्पूर्ण अनर्थोका कारण बन जाता है। पापात्मा मनुष्य कुलमें कलंक लगाता और उसके सुयशका नाश करता है।। ९।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि छोटे भाई भी पापकर्ममें लगे रहते हों तो वे पैतृक धनका भाग पानेके अधिकारी नहीं हैं। छोटे भाइयोंको उनका उचित भाग दिये बिना बड़े भाईको पैतृक-सम्पत्तिका भाग ग्रहण नहीं करना चाहिये ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि बड़ा भाई पैतृक धनको हानि पहुँचाये बिना ही केवल जाँघोंके परिश्रमसे परदेशमें जाकर धन पैदा करे तो वह उसके निजी परिश्रमकी कमाई है। अतः यदि उसकी इच्छा न हो तो वह उस धनमेंसे भाइयोंको नहीं दे सकता है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि भाइयोंके हिस्सेका बटवारा न हुआ हो और सबने साथ-ही-साथ व्यापार आदिके द्वारा धनकी उन्नति की हो, उस अवस्थामें यदि पिताके जीते-जी सब अलग होना चाहें तो पिताको उचित है कि वह कभी किसीको कम और किसीको अधिक धन न दे अर्थात्‌ वह सब पुत्रोंको बराबर-बराबर हिस्सा दे || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़ा भाई अच्छा काम करनेवाला हो या बुरा, छोटेको उसका अपमान नहीं करना चाहिये। इसी तरह यदि स्त्री अथवा छोटे भाई बुरे रास्तेपर चल रहे हों तो श्रेष्ठ पुरुषको जिस तरहसे भी उनकी भलाई हो, वही उपाय करना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषोंका कहना है कि धर्म ही कल्याणका सर्वश्रेष्ठ साधन है ।। १३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौरवमें दस आचार्योंसे बढ़कर उपाध्याय, दस उपाध्यायोंसे बढ़कर पिता और दस पिताओंसे बढ़कर माता है। माता अपने गौरवसे समूची पृथ्वीको भी तिरस्कृत कर देती है। अतः माताके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है ।। १४-१५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! माताका गौरव सबसे बढ़कर है, इसलिये लोग उसका विशेष आदर करते हैं। भारत! पिताकी मृत्यु हो जानेपर बड़े भाईको ही पिताके समान समझना चाहिये ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़े भाईको उचित है कि वह अपने छोटे भाइयोंको जीविका प्रदान करे तथा उनका पालन-पोषण करे। छोटे भाइयोंका भी कर्तव्य है कि वे सब-के-सब बड़े भाईके सामने नतमस्तक हों और उसकी इच्छाके अनुसार चलें। बड़े भाईको ही पिता मानकर उनके आश्रयमें जीवन व्यतीत करें ।। १७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! पिता और माता केवल शरीरकी सृष्टि करते हैं, किंतु आचार्यके उपदेशसे जो ज्ञानरूप नवीन जीवन प्राप्त होता है, वह सत्य, अजर और अमर है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! बड़ी बहिन भी माताके समान है। इसी तरह बड़े भाईकी पत्नी तथा बचपनमें जिसका दूध पिया गया हो, वह धाय भी माताके समान है ।।२०।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बड़े और छोटे भाईका पारस्परिक बरतावनामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/6354670284728626155/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-104-chapter-and-105-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/6354670284728626155'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/6354670284728626155'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-104-chapter-and-105-chapter-of.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ चारवाँ अध्याय व एक सौ पाँचवाँ अध्याय (From the 104 chapter and the 105 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s72-c/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-61144145464550921.post-8639384962453617178</id><published>2025-09-11T14:29:00.005+05:30</published><updated>2025-09-11T14:29:49.718+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अनुशासन पर्व (महाभारत)"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सम्पूर्ण महाभारत कथा"/><title type='text'>सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ एकवें अध्याय से एक सौ तीनवें अध्याय तक (From the 101 chapter to the 103 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))</title><content type='html'>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; 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small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ एकवें अध्याय के श्लोक 1-29&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मास्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! जो मूर्ख और मंदबुद्धि मानव क्रूरतापूर्ण कर्ममें संलग्न रहकर ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करते हैं, वे किस लोकमें जाते हैं? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन! ब्राह्मणोंके धनका बलपूर्वक अपहरण--यह सबसे बड़ा पातक है। ब्राह्मणोंका धन लूटनेवाले चाण्डाल-स्वभावयुक्त मनुष्य अपने कुलपरिवारसहित नष्ट हो जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! इस विषयमें जानकार मनुष्य एक चाण्डाल और क्षत्रियबंधुका संवादविषयक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्षत्रियने पूछा--चाण्डाल! तू बूढ़ा हो गया है तो भी बालकों-जैसी चेष्टा करता है। कुत्तों और गधोंकी धूलिका सेवन करनेवाला होकर भी तू इन गौओंकी धूलिसे क्‍यों इतना उद्विग्न हो रहा है ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाण्डालके लिये विहित कर्मकी श्रेष्ठ पुरुष निंदा करते हैं। तू गोधूलिसे ध्वस्त हुए अपने शरीरको क्यों जलके कुण्डमें डालकर धो रहा है? ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाण्डालने कहा--राजन्‌! पहलेकी बात है--एक ब्राह्मणकी कुछ गौओंका अपहरण किया गया था। जिस समय वे गौएँ हरकर ले जायी जा रही थीं, उस समय उनकी दुग्धकणमिश्रित चरणधूलिने सोमरसपर पड़कर उसे दूषित कर दिया। उस सोमरसको जिन ब्राह्मणोंने पीया, वे तथा उस यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले राजा भी शीघ्र ही नरकमें जा गिरे। उन यज्ञ करानेवाले समस्त ब्राह्मणोंसहित राजा ब्राह्मणके अपहृत धनका उपयोग करके नरकगामी हुए ।। ५-६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहाँ वे गौएँ हरकर लायी गयी थीं, वहाँ जिन मनुष्योंने उनके दूध, दही और घीका उपभोग किया, वे सभी ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि नरकमें पड़े ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे अपहृत हुई गौएँ जब दूसरे पशुओंको देखतीं और अपने स्वामी तथा बछड़ोंको नहीं देखती थीं, तब पीड़ासे अपने शरीरको कँपाने लगती थीं। उन दिनों सद्धावसे ही दूध देकर उन्होंने अपहरणकारी पति-पत्नीको तथा उनके पुत्रों और पौत्रोंको भी नष्ट कर दिया ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! मैं भी उसी गाँवमें ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक जितेन्द्रियभावसे निवास करता था। नरेश्वर! एक दिन उन्हीं गौओंके दूध एवं धूलके कणसे मेरा भिक्षात्र भी दूषित हो गया ।। ९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! उस भिक्षान्नको खाकर मैं चाण्डाल हो गया और ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले वे राजा भी नरकगामी हो गये ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये कभी किंचिन्मात्र भी ब्राह्मणके धनका अपहरण न करे। ब्राह्मणके धूलधूसरित दुग्धरूप धनको खाकर मेरी जो दशा हुई है, उसे आप प्रत्यक्ष देख लें || ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसीलिये विद्वान्‌ पुरुषको सोमरसका विक्रय भी नहीं करना चाहिये। मनीषी पुरुष इस जगत्‌में सोमरसके विक्रयकी बड़ी निंदा करते हैं || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! जो लोग सोमरसको खरीदते हैं और जो लोग उसे बेचते हैं, वे सभी यमलोकमें जाकर रौरव नरकमें पड़ते हैं ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदवेत्ता ब्राह्मण यदि गौओंके चरणोंकी धूलि और दूधसे दूषित सोमको विधिपूर्वक बेचता है अथवा व्याजपर रुपये चलाता है तो वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है || १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह तीस नरकोंमें पड़कर अंतमें अपनी ही विष्ठापर जीनेवाला कीड़ा होता है। कुत्तोंको पालना, अभिमान तथा मित्रकी स्त्रीसे व्यभिचार--इन तीनों पापोंको तराजूपर रखकर यदि धर्मतः तौला जाय तो अभिमानका ही पलड़ा भारी होगा || १५६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आप मेरे इस पापी कुत्तेको देखिये, यह कान्तिहीन, सफेद और दुर्बल हो गया है। यह पहले मनुष्य था। परंतु समस्त प्राणियोंके प्रति अभिमान रखनेके कारण इस दुर्गतिको प्राप्त हुआ है || १६३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! प्रभो! मैं भी दूसरे जन्ममें धनसम्पन्न महान्‌ कुलमें उत्पन्न हुआ था। ज्ञानविज्ञानमें पारंगत था। इन सब दोषोंको जानता था तो भी अभिमानवश सदा सब प्राणियोंपर क्रोध करता और पशुओंके पृष्ठका मांस खाता था; उसी दुराचार और अभक्ष्यभक्षणसे मैं इस दुरवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ। कालके इस उलट-फेरको देखिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरी दशा ऐसी हो रही है, मानो मेरे कपड़ोंके छोरमें आग लग गयी हो अथवा तीखे मुखवाले भ्रमरोंने मुझे डंक मार-मारकर पीड़ित कर दिया हो। मैं रजोगुणसे युक्त हो अत्यंत रोष और आवेशमें भरकर चारों ओर दौड़ रहा हूँ। मेरी दशा तो देखिये || २०३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गृहस्थ मनुष्य वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा तथा नाना प्रकारके दानोंसे अपने महान्‌ पापको दूर कर देते हैं। जैसा कि मनीषी पुरुषोंका कथन है || २१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीनाथ! आश्रममें रहकर सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्ता हो वेदपाठ करनेवाले ब्राह्मगको यदि वह पापाचारी हो तो भी उसके द्वारा पढ़े जानेवाले वेद उसका उद्धार कर देते हैं ।। २२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्षत्रियशिरोमणे! मैं पापयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ। मुझे यह निश्चय नहीं हो पाता कि मैं किस उपायसे मुक्त हो सकूँगा? ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! पहलेके किसी शुभ कर्मके प्रभावसे मुझे पूर्व-जन्मकी बातोंका स्मरण हो रहा है, जिससे मैं मोक्ष पानेकी इच्छा करता हूँ ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! मैं आपकी शरणमें आकर अपना यह संशय पूछ रहा हूँ। आप मुझे इसका समाधान बताइये। मैं चाण्डाल-योनिसे किस प्रकार मुक्त हो सकता हूँ? || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्षत्रियने कहा--चाण्डाल! तू उस उपायको समझ ले, जिससे तुझे मोक्ष प्राप्त होगा। यदि तू ब्राह्मणकी रक्षाके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करे तो तुझे अभीष्ट गति प्राप्त होगी ।। २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि ब्राह्मणकी रक्षाके लिये तू अपना यह शरीर समराग्निमें होमकर कच्चा मांस खानेवाले जीव-जन्तुओंको बाँट दे तो प्राणोंकी आहुति देनेपर तेरा छुटकारा हो सकता है, अन्यथा तू मोक्ष नहीं पा सकेगा ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--परंतप! क्षत्रियके ऐसा कहनेपर उस चाण्डालने ब्राह्मणके धनकी रक्षाके लिये युद्धके मुहानेपर अपने प्राणोंकी आहुति दे अभीष्ट गति प्राप्त कर ली || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बेटा! भरतश्रेष्ठ! महाबाहो! यदि तुम सनातन गति पाना चाहते हो तो तुम्हें ब्राह्मणके धनकी पूरी रक्षा करनी चाहिये || २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवादविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ दोवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ दोवें अध्याय के श्लोक 1-63&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“भिन्न-भिन्न कर्मोके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! (मृत्युके पश्चात्‌) सभी पुण्यात्मा एक ही तरहके लोकमें जाते हैं या वहाँ उन्हें प्राप्त होनेवाले लोकोंमें भिन्नता होती है? दादाजी! यह मुझे बताइये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--कुन्तीनंदन! मनुष्य अपने कर्मोके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोमें जाते हैं। पुण्यकर्म करनेवाले पुण्यलोकोंमें जाते हैं और पापाचारी मनुष्य पापमय लोकोंमें ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इन्द्र और गौतम मुनिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालमें गौतम नामवाले एक ब्राह्मण थे, जिनका स्वभाव बड़ा कोमल था। वे मनको वशमें रखनेवाले और जितेन्द्रिय थे। उन व्रतधारी मुनिने विशाल वनमें एक हाथीके बच्चेको अपने माताके बिना बड़ा कष्ट पाते देखकर उसे कृपापूर्वक जिलाया। दीर्घकालके पश्चात्‌ वह हाथी बढ़कर अत्यंत बलवान्‌ हो गया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस महानागके कुम्भस्थलसे फ़ूटकर मदकी धारा बहने लगी। मानो पर्वतसे झरना झर रहा हो। एक दिन इन्द्रने राजा धृतराष्ट्रके रूपमें आकर उस हाथीको अपने अधिकारमें कर लिया ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कठोर व्रतका पालन करनेवाले महातपस्वी गौतमने उस हाथीका अपहरण होता देख राजा धृतराष्ट्रसे कहा-- ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“कृतज्ञताशून्य राजा धृतराष्ट्र! तुम मेरे इस हाथीको न ले जाओ। यह मेरा पुत्र है। मैंने बड़े दुःखसे इसका पालन-पोषण किया है। सत्पुरुषोंमें सात पग साथ चलनेमात्रसे मित्रता हो जाती है। इस नाते हम और तुम दोनों मित्र हैं। मेरे इस हाथीको ले जानेसे तुम्हें मित्रद्रोहका पाप लगेगा। तुम्हें यह पाप न लगे, ऐसी चेष्टा करो ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“राजन! यह मुझे समिधा और जल लाकर देता है। मेरे आश्रममें जब कोई नहीं रहता है, तब यही रक्षा करता है। आचार्यकुलमें रहकर इसने विनयकी शिक्षा ग्रहण की है। गुरुसेवाके कार्यमें यह पूर्णरूपसे संलग्न रहता है। यह शिष्ट, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ तथा मुझे सदा ही प्रिय है। मैं चिल्‍ला-चिल्लाकर कहता हूँ, तुम मेरे इस हाथीको न ले जाओ&#39; ।। ९-१० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--महर्षे! मैं आपको एक हजार गौएँ दूँगा। सौ दासियाँ और पाँच सौ स्वर्णमुद्राएँ प्रदान करूँगा और भी नाना प्रकारका धन समर्पित करूँगा। ब्राह्मणके यहाँ हाथीका क्‍या काम है? ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--राजन! वे गौएँ, दासियाँ, स्वर्णमुद्राएँ, नाना प्रकारके रत्न तथा और भी तरह-तरहके धन तुम्हारे ही पास रहें। नरेन्द्र! ब्राह्मणके यहाँ धनका क्या काम है? ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--विप्रवर गौतम! ब्राह्मणोंको हाथियोंसे कोई प्रयोजन नहीं है। हाथियोंके समूह तो राजाओंके ही काम आते हैं। हाथी मेरा वाहन है, अतः इस श्रेष्ठ हाथीको ले जानेमें कोई अधर्म नहीं है। आप इसकी ओरसे अपनी तृष्णा हटा लीजिये ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतमने कहा--महात्मन्‌! जहाँ जाकर पुण्यकर्मा पुरुष आनंदित होता है और जहाँ जाकर पापकर्मा मनुष्य शोकमें डूब जाता है, उस यमराजके लोकमें मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--जो निष्क्रिय, नास्तिक, श्रद्धाहीन, पापात्मा और इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त हैं, वे ही यमयातनाको प्राप्त होते हैं; परंतु राजा धृतराष्ट्रको वहाँ नहीं जाना है।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--जहाँ कोई भी झूठ नहीं बोलता, जहाँ सदा सत्य ही बोला जाता है और जहाँ निर्बल मनुष्य भी बलवान्‌से अपने प्रति किये गये अन्यायका बदला लेते हैं, मनुष्योंको संयममें रखनेवाली यमराजकी वही पुरी संयमनी नामसे प्रसिद्ध है। वहीं मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--महर्षे! जो मदमत्त मनुष्य बड़ी बहिन, माता और पिताके साथ शत्रुके समान बर्ताव करते हैं, उन्हींके लिये यह यमराजका लोक है, परंतु धृतराष्ट्र वहाँ जानेवाला नहीं है ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतमने कहा--महान्‌ सौभाग्यशाली मंदाकिनी नदी राजा कुबेरके नगरमें विराज रही हैं, जहाँ नागोंका ही प्रवेश होना संभव है, गंधर्व, यक्ष और अप्सराएँ उस मंदाकिनीका सदा सेवन करती हैं; वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्र बोले--जो सदा अतिथियोंकी सेवामें तत्पर रहकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं, जो लोग ब्राह्मणको आश्रयदान करते हैं, तथा जो अपने आश्रितोंको बाँटकर शेष अन्नका भोजन करते हैं, वे ही लोग उस मंदाकिनीतटकी शोभा बढ़ाते हैं (राजा धृतराष्ट्रको तो वहाँ भी नहीं जाना है) ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--मेरुपर्वतके सामने जो रमणीय वन शोभा पाता है, जहाँ सुंदर फूलोंकी छटा छायी रहती है और किन्नरियोंके मधुर गीत गूँजते रहते है, जहाँ देखनेमें सुंदर विशाल जम्बूवृक्ष शोभा पाता है, वहाँ पहुँचकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्र बोले--महर्षे! जो ब्राह्मण कोमलस्वभाव, सत्यशील, अनेक शास्‍्त्रोंके विद्वान्‌ तथा सम्पूर्ण भूतोंको प्यार करनेवाले हैं, जो इतिहास और पुराणका अध्ययन करते तथा ब्राह्मणोंको मधुर भोजन अर्पित करते हैं; ऐसे लोगोंके लिये ही यह पूर्वोक्त लोक है; परंतु राजा धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है। आपको जो-जो स्थान विदित हैं, उन सबका यहाँ वर्णन कर जाइये। मैं जानेके लिये उतावला हूँ। यह देखिये, मैं चला ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतमने कहा--सुंदर-सुंदर फूलोंसे सुशोभित, किन्नर-राजोंसे सेवित तथा नारद, गंधर्व और अप्सराओंको सर्वदा प्रिय जो नंदननामक वन है, वहाँ जाकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्र बोले--महर्ष! जो लोग नृत्य और गीतमें निपुण हैं; कभी किसीसे कुछ याचना नहीं करते हैं तथा सदा सज्जनोंके साथ विचरण करते हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह नंदनवनका जगत्‌ है; परंतु राजा धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है | २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--नरेन्द्र! जहाँ रमणीय आकृतिवाले उत्तर कुरुके निवासी अपूर्व शोभा पाते हैं, देवताओंके साथ रहकर आनंद भोगते हैं, अग्नि, जल और पर्वतसे उत्पन्न हुए दिव्य मानव जिस देशमें निवास करते हैं, जहाँ इन्द्र सम्पूर्ण कामनाओंकी वर्षा करते हैं, जहाँकी स्त्रियाँ इच्छानुसार विचरनेवाली होती हैं तथा जहाँ स्त्रियों और पुरुषोंमें ईर्ष्याका सर्वथा अभाव है, वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा || २५-२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--महर्षे! जो समस्त प्राणियोंमें निष्काम हैं, जो मांसाहार नहीं करते, किसी भी प्राणीको दण्ड नहीं देते, स्थावर-जंगम प्राणियोंकी हिंसा नहीं करते, जिनके लिये समस्त प्राणी अपने आत्माके ही तुल्य हैं, जो कामना, ममता और आसक्तिसे रहित हैं, लाभ-हानि, निंदा तथा प्रशंसामें जो सदा समभाव रखते हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह उत्तर कुरुनामक लोक है; परंतु धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है ।। २७-२८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतमने कहा--राजन्‌! उससे भिन्न बहुत-से सनातन लोक हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है। वहाँ रजोगुण तथा शोकका सर्वथा अभाव है। महात्मा राजा सोमके लोकमें उनकी स्थिति है। वहाँ पहुँचकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--महर्षे! जो सदा दान करते हैं, किंतु दान लेते नहीं, जिनकी दृष्टिमें सुयोग्य पात्रके लिये कुछ भी अदेय नहीं है, जो सबका अतिथि-सत्कार करते तथा सबके प्रति कृपाभाव रखते हैं, जो क्षमाशील हैं, दूसरोंसे कभी कुछ नहीं बोलते हैं और जो पुण्यशील महात्मा सदा सबके लिये अन्नसत्ररूप हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह सोमलोक है; परंतु धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है ।। ३०-३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतमने कहा--राजन्‌! सोमलोकसे भी ऊपर कितने ही सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जो रजोगुण, तमोगुण और शोकसे रहित है। वे महात्मा सूर्यदेवके स्थान हैं। वहाँ जाकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--महर्षे! जो स्वाध्यायशील, गुरुसेवापरायण, तपस्वी, उत्तम व्रतधारी, सत्यप्रतिज्ञ, आचार्योंके प्रतिकूल भाषण न करनेवाले, सदा उद्योगशील तथा बिना कहे ही गुरुके कार्यमें संलग्न रहनेवाले हैं, जिनका भाव विशुद्ध है, जो मौनव्रतावलम्बी, सत्यनिष्ठ और वेदवेत्ता महात्मा हैं, उन्हीं लोगोंके लिये यह सूर्यदेवका लोक है, परंतु धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है ।। ३३-३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतमने कहा--उसके सिवा दूसरे भी बहुत-से सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है। वहाँ न तो रजोगुण है और न शोक ही। महामना राजा वरुणके लोकमें वे स्थान हैं। वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा || ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--जो लोग सदा चातुर्मास्य याग करते हैं, हजारों इष्टियोंका अनुष्ठान करते हैं तथा जो ब्राह्मण तीन वर्षोतक वैदिक विधिके अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अन्निहोत्र करते हैं, धर्मका भार अच्छी तरह वहन करते हैं, वेदोक्त मार्गपर भलीभाँति स्थित होते हैं, वे ही धर्मात्मा महात्मा ब्राह्मण वरुणलोकमें जाते हैं। धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है। यह उससे भी उत्तम लोक प्राप्त करेगा ।। ३६-३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतमने कहा--राजन्‌! इन्द्रके लोक रजोगुण और शोकसे रहित हैं। उनकी प्राप्ति बहुत कठिन है। सभी मनुष्य उन्हें पानेकी इच्छा करते हैं। उन्हीं महातेजस्वी इन्द्रके भवनमें चलकर मैं आपसे अपने इस हाथीको वापस लूँगा ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--जो सौ वर्षतक जीनेवाला शूरवीर मनुष्य वेदोंका स्वाध्याय करता, यज्ञमें तत्पर रहता और कभी प्रमाद नहीं करता है, ऐसे ही लोग इन्द्रलोकमें जाते हैं। धृतराष्ट्र उससे भी उत्तम लोकमें जायगा। उसे वहाँ भी नहीं जाना है || ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--राजन! स्वर्गके शिखरपर प्रजापतिके महान्‌ लोक हैं जो हृष्ट-पुष्ट और शोकरहित हैं। सम्पूर्ण जगतके प्राणी उन्हें पाना चाहते हैं। मैं वहीं जाकर तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ।। ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--मुने! जो धर्मात्मा राजा राजसूय यज्ञमें अभिषिक्त होते हैं प्रजाजनोंकी रक्षा करते हैं तथा अश्वमेधयज्ञके अवभृूथ-स्नानमें जिसके सारे अंग भीग जाते हैं, उन्हींके लिये प्रजापतिलोक हैं। धृतराष्ट्र वहाँ भी नहीं जायगा ।। ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--उससे परे जो पवित्र गन्धसे परिपूर्ण, रजोगुणरहित तथा शोकशून्य सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, उन्हें गोलोक कहते हैं। उस दुर्लभ एवं दुर्धर्ष गोलोकमें जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा || ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--जो सहस्र गौओंका स्वामी होकर प्रतिवर्ष सौ गौओंका दान करता है, सौ गौओंका स्वामी होकर यथाशक्ति दस गौओंका दान करता है, जिसके पास दस ही गौएँ हैं, वह यदि उनमेंसे एक गायका दान करता है अथवा जो दानशील पुरुष पाँच गौओंमेंसे एक गायका दान कर देता है, वह गोलोकमें जाता है। जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यका पालन करते-करते ही बूढ़े हो जाते हैं, जो वेदवाणीकी सदा रक्षा करते हैं तथा जो मनस्वी ब्राह्मण सदा तीर्थयात्रामें ही तत्पर रहते हैं, वे ही गौओंके निवास-स्थान गोलोकमें आनंद भोगते हैं || ४३-४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभास, मानसरोवर तीर्थ, त्रिपुष्कर नामक महान्‌ सरोवर, पवित्र नैमिषतीर्थ, बाहुदा नदी, करतोया नदी, गया, गयशिर, स्थूल बालुकायुक्त विपाशा (व्यास), कृष्णा, गंगा, पंचनद, महाहृद, गोमती, कौशिकी, पम्पासरोवर, सरस्वती, दृषद्वती और यमुना--इन तीर्थोमें जो व्रतधारी महात्मा जाते हैं, वे ही दिव्य रूप धारण करके दिव्य मालाओंसे अलंकृत हो गोलोकमें जाते हैं और कल्याणमय स्वरूप तथा पवित्र सुगंधसे व्याप्त होकर वहाँ निवास करते हैं। धृतराष्ट्र उस लोकमें भी नहीं मिलेगा ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--जहाँ सर्दीका भय नहीं है, गर्मीका अणुमात्र भी भय नहीं है, जहाँ न भूख लगती है न प्यास, न ग्लानि प्राप्त होती है न दुःख-सुख, जहाँ न कोई द्वेषका पात्र है न प्रेमका, न कोई बन्धु है न शत्रु, जहाँ जरा-मृत्यु, पुण्य और पाप कुछ भी नहीं है, उस रजोगुणसे रहित, समृद्धिशाली, बुद्धि और सत्त्वगुणसे सम्पन्न तथा पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाकर तुम्हें मुझे यह हाथी वापस देना पड़ेगा | ४९--५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धृतराष्ट्रने कहा--महामुने! जो सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त है, जिन्होंने अपने मनको वशगमें कर लिया है, जो नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं जो अध्यात्मज्ञान और योगसंबंधी आसनोंसे युक्त हैं, जो स्वर्गलोकके अधिकारी हो चुके हैं, ऐसे सात््विक पुरुष ही पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाते हैं। वहाँ तुम्हें धृतराष्ट्र नहीं दिखायी दे सकता || ५२-५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--जहाँ रथन्तर और बृहत्सामका गान किया जाता है, जहाँ याज्ञिक पुरुष वेदीको कमलपुष्पोंसे आच्छादित करते हैं तथा जहाँ सोमपान करनेवाला पुरुष दिव्य अश्रोंद्वारा यात्रा करता है, वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ।। ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं जानता हूँ, आप राजा धृतराष्ट्र नहीं, वृत्रासुरका वध करनेवाले शतक्रतु इन्द्र हैं और सम्पूर्ण जगत्‌का निरीक्षण करनेके लिये सब ओर घूम रहे हैं। मैंने मानसिक आवेशमें आकर कदाचित्‌ वाणीद्वारा आपके प्रति कोई अपराध तो नहीं कर डाला? ।। ५५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शतक्रतु बोले--ैं इन्द्र हूँ और आपके हाथीके अपहरणके कारण मानव प्रजाके दृष्टिपथमें निन्दित हो गया हूँ। अब मैं आपके चरणोंमें मस्तक झुकाता हूँ। आप मुझे कर्तव्यका उपदेश दें। आप जो-जो कहेंगे, वह सब करूँगा ।। ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--देवेन्द्र! यह श्वेत गजराजकुमार जो इस समय नवजवान हाथीके रूपमें परिणत हो चुका है, मेरा पुत्र है और अभी दस वर्षका बच्चा है। यही इस वनमें रहते हुए मेरा सहचर एवं सहयोगी है। इसे आपने हर लिया है। मेरी प्रार्थना है कि मेरे इसी हाथीको आप मुझे लौटा दें || ५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शतक्रतुने कहा--विप्रवर! आपका पुत्रस्वरूप यह हाथी आपहीकी ओर देखता हुआ आ रहा है और पास आकर आपके दोनों चरणोंको अपनी नासिकासे सूँघता है। अब आप मेरा कल्याण-चिंतन कीजिये, आपको नमस्कार है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--सुरेन्द्र! मैं सदा ही यहाँ आपके कल्याणका चिंतन करता हूँ और सदा आपके लिये अपनी पूजा अर्पित करता हूँ। शक्र! आप भी मुझे कल्याण प्रदान करें। मैं आपके दिये हुए इस हाथीको ग्रहण करता हूँ ।। ५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शतक्रतुने कहा--जिन सत्यवादी मनीषी महात्माओंकी हृदय-गुफामें सम्पूर्ण वेद निहित हैं, उनमें आप प्रमुख महात्मा हैं। केवल आपके कल्याण-चिंतनसे मैं समृद्धिशाली हो गया। इसलिये आज मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ। ब्राह्मण! मैं बड़े हर्षके साथ कहता हूँ कि आप अपने इस पुत्रभूत हाथीके साथ शीघ्र चलिये। आप अभी चिरकालके लिये कल्याणमय लोकोंकी प्राप्तिके अधिकारी हो गये हैं || ६०-६१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुत्रस्वरूप हाथीके साथ गौतमको आगे करके वज्धारी इन्द्र श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ दुर्गम देवलोकमें चले गये || ६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष जितेन्द्रिय होकर प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनेगा, अथवा इसका पाठ करेगा, वह गौतम ब्राह्मणकी भाँति ब्रह्मलोकमें जायगा ।। ६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें हस्तिकूट नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;एक सौ तीनवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) एक सौ तीनवें अध्याय के श्लोक 1-45&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! आपने अनेक प्रकारके दान, शांति, सत्य और अहिंसा आदिका वर्णन किया। अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहनेकी बात बतायी और दानके फलका भी निरूपण किया। आपकी जानकारीमें तपोबलसे बढ़कर दूसरा कौन बल है? यदि आपकी रायमें तपस्यासे भी कोई उत्कृष्ट साधन हो तो हमारे समक्ष उसकी व्याख्या करें ।। १-२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युथधिष्ठिर! मनुष्य जितना तप करता है, उसीके अनुसार उसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं; किन्तु कुंतीकुमार! मेरी रायमें अनशनसे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस विषयमें विज्ञ पुरुष राजा भगीरथ और महात्मा ब्रह्माजीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! सुननेमें आया है कि राजा भगीरथ देवलोक, गौओंके लोक और ऋषिलोकको भी लाँघकर ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! राजा भगीरथको वहाँ उपस्थित देख ब्रह्माजीने उनसे पूछा--“भगीरथ! इस लोकमें तो आना बहुत ही कठिन है, तुम कैसे यहाँ आ पहुँचे ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“भगीरथ! देवता, गंधर्व और मनुष्य बिना तपस्या किये यहाँ नहीं आ सकते। फिर तुम कैसे यहाँ आ गये?” ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगीरथने कहा--िद्वन! मैं ब्रह्मचर्यव्रतका आश्रय लेकर प्रतिदिन एक लाख स्वार्णमुद्राओंका ब्राह्मणोंके लिये दान किया करता था; परंतु उस दानके फलसे मैं यहाँ नहीं आया हूँ ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने एक रातमें पूर्ण होनेवाले दस यज्ञ, पाँच रातोंमें पूर्ण होनेवाले दस यज्ञ, ग्यारह रातोंमें समाप्त होनेवाले ग्यारह यज्ञ और ज्योतिष्टोम नामक एक सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया है, परंतु उन यज्ञोंके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने जो घोर तपस्या करते हुए लगातार सौ वर्षोतक प्रतिदिन गंगाजीके तटपर निवास किया है और वहाँ सहस्रों खच्चरियों तथा झुंड-की-झुंड कन्‍्याओंका दान किया, उस पुण्यके प्रभावसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुष्करतीर्थमें जो सैकड़ों-हजारों बार मैंने ब्राह्यगोंको एक लाख घोड़े और दो लाख गौएँ दान कीं तथा सोनेके उत्तम चन्द्रहार धारण करनेवाली जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित हुई साठ हजार सुन्दरी कनन्‍्याओंका जो सहस्रों बार दान किया, उस पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोकनाथ! गोसव नामक यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें मैंने दूध देनेवाली सौ करोड़ गौओंका दान किया। उस समय एक-एक ब्राह्मणको दस-दस गायें मिली थीं। प्रत्येक गायके साथ उसीके समान रंगवाले बछड़े और सुवर्णमय दुग्धपात्र भी दिये गये थे; परंतु उस यज्ञके पुण्यसे भी मैं यहाँतक नहीं पहुँचा हूँ || १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनेक बार सोमयागकी दीक्षा लेकर उन यज्ञोंमें मैंने प्रत्येक ब्राह्मणगको पहले बारकी ब्यायी हुई दूध देनेवाली दस-दस गौएँ और रोहिणी जातिकी सौ-सौ गौएँ दान की हैं ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्म! इनके अतिरिक्त भी मैंने दस बार दस-दस लाख दुधारू गौएँ दान की हैं; किंतु उस पुण्यसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वाह्लीक देशमें उत्पन्न हुए श्वेतरंगके एक लाख घोड़ोंको सोनेकी मालाओंसे सजाकर मैंने ब्राह्मणोंको दान किया; किंतु उस पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मन! मैंने एक-एक यज्ञमें प्रतिदिन अठारह-अठारह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ बाँटी थीं; परंतु उसके पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्म! पितामह! फिर स्वर्णहारसे विभूषित हरे रंगवाले सत्रह करोड़ श्यामकर्ण घोड़े, ईषादण्ड (हरिस) के समान दाँतोंवाले, स्वर्णमालामण्डित एवं विशाल शरीरवाले सत्रह हजार कमलचिह्नयुक्त हाथी तथा सोनेके बने हुए दिव्य आभूषणोंसे विभूषित स्वर्णमय उपकरणोंसे युक्त और सजे-सजाये घोड़े जुते हुए सत्रह हजार रथ दान किये || १८--२० $ई&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनके अतिरिक्त भी जो वस्तुएँ वेदोंमें दक्षिणाके अवयवरूपसे बतायी गयी हैं, उन सबको मैंने दस वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान करके दान किया था ।। २१६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! यज्ञ और पराक्रममें जो इन्द्रके समान प्रभावशाली थे, जिनके कण्ठमें सुवर्णके हार शोभा पा रहे थे, ऐसे हजारों राजाओंको युद्धमें जीतकर प्रचुर धनके द्वारा आठ राजसूययज्ञ करके मैंने उन्हें ब्राह्मणोंको दक्षिणामें दे दिया; परंतु उस पुण्यसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ || २२-२३ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगत्पते! मेरी दी हुई दक्षिणाओंसे गंगानदी आच्छादित हो गयी थी; परंतु उसके कारण भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ।। २४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस यज्ञमें मैंने प्रत्येक ब्राह्यणको तीन-तीन बार सोनेके सैकड़ों आभूषणोंसे विभूषित दो-दो हजार घोड़े और एक-एक सौ अच्छे गाँव दिये थे || २५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! मिताहारी, मौन और शांतभावसे रहकर मैंने हिमालय पर्वतपर सुदीर्घ कालतक तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर भगवान्‌ शंकरने गंगाजीकी दुःसह धाराको अपने मस्तकपर धारण किया; परंतु उस तपस्याके फलसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ।। २६-२७ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देव! मैंने अनेक बार “शम्याक्षेप-” याग किये। दस हजार &#39;साद्यस्क&#39; यागोंका अनुष्ठान किया। कई बार तेरह और बारह दिनोंमें समाप्त होनेवाले याग और “&#39;पुण्डरीक” नामक यज्ञ पूर्ण किये; परंतु उनके फलोंसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इतना ही नहीं, मैंने सफेद रंगके ककुद्वाले आठ हजार वृषभ भी ब्राह्मणोंको दान किये, जिनके एक-एक सींगमें सोना मढ़ा हुआ था तथा उन ब्राह्मणोंको सुवर्णमय हारसे विभूषित गौएँ भी मैंने दी थीं ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने आलस्यरहित होकर अनेक बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके उनमें सोने और रत्नोंके ढेर, रत्नमय पर्वत, धनधान्यसे सम्पन्न हजारों गाँव और एक बारकी ब्यायी हुई सहसों गौएँ ब्राह्मणोंको दान कीं; किंतु उनके पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ || ३०-३१&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देव! ब्रह्मन! मैंने ग्यारह दिनोंमें होनेवाले और चौबीस दिनोंमें होनेवाले दक्षिणासहित यज्ञ किये। बहुत-से अश्वमेधयज्ञ भी कर डाले तथा सोलह बार आर्कायणयज्ञोंका अनुष्ठान किया; परंतु उन यज्ञोंके फलसे मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चार कोस लंबा-चौड़ा एक चम्पाके वृक्षोंका वन, जिसके प्रत्येक वृक्षमें रत्न जड़े हुए थे, वस्त्र लपेटा गया था और कण्ठदेशमें स्वर्णमाला पहनायी गयी थी, मैंने दान किया है; किंतु उस दानके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं तीस वर्षोतक क्रोधरहित होकर तुरायण नामक दुष्कर व्रतका पालन करता रहा, जिसमें प्रतिदिन नौ सौ गायें ब्राह्मणोंको दान देता था ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोकनाथ! सुरेश्वर! इनके अतिरिक्त रोहिणी (कपिला) जातिकी बहुत-सी दुधारू गौएँ तथा बहुसंख्यक साँड़ भी मैं प्रतिदिन ब्राह्मणोंको दान करता था; परंतु उन सब दानोंके फलसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मन! मैंने प्रतिदिन एक-एक करके तीस बार अग्निचयन एवं यजन किया। आठ बार सर्वमेध, सात बार नरमेध और एक सौ अद्बाईस बार विश्वजित्‌ यज्ञ किया है; परंतु देवेश्वर! उन यज्ञोंके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ।। ३६-३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सरयू, बाहुदा, गंगा और नैमिषारण्य तीर्थमें जाकर मैंने दस लाख गोदान किये हैं; परंतु उनके फलसे भी यहाँ आना नहीं हुआ है (केवल अनशनव्रतके प्रभावसे मुझे इस दुर्लभ लोककी प्राप्ति हुई है) || ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले इन्द्रने स्वयं अनशनव्रतका अनुष्ठान करके इसे गुप्त रखा था। उसके बाद शुक्राचार्यने तपस्याके द्वारा उसका ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्हींके तेजसे उसका माहात्म्य सर्वत्र प्रकाशित हुआ। सर्वश्रेष्ठ पितामह! मैंने भी अंतमें उसी अनशनव्रतका साधन आरम्भ किया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब उस कर्मकी पूर्ति हुई, उस समय मेरे पास हजारों ब्राह्मण और ऋषि पधारे। वे सभी मुझपर बहुत संतुष्ट थे। प्रभो! उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मुझे आज्ञा दी कि “तुम ब्रह्मतोकको जाओ।” भगवन्‌! प्रसन्न हुए उन हजारों ब्राह्मणोंके आशीर्वादसे मैं इस लोकमें आया हूँ। इसमें आप कोई अन्यथा विचार न करें ।। ४०-४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवेश्वर! मैंने अपनी इच्छाके अनुसार विधिपूर्वक अनशनव्रतका पालन किया। आप सम्पूर्ण जगतके विधाता हैं। आपके पूछनेपर मुझे सब बातें यथावत्‌्रूपसे बतानी चाहिये, इसलिये सब कुछ कहा है। मेरी समझमें अनशनव्रतसे बढ़कर दूसरी कोई तपस्या नहीं है। आपको नमस्कार है, आप मुझपर प्रसन्न होइये || ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! राजा भगीरथने जब इस प्रकार कहा, तब ब्रह्माजीने शास्त्रोक्त विधिसे आदरणीय नरेशका विशेष आदर-सत्कार किया ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः तुम भी अनशनव्रतसे युक्त होकर सदा ब्राह्मणोंका पूजन करो; क्योंकि ब्राह्मणोंके आशीर्वादसे इह लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध होती हैं |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अन्न, वस्त्र, गौ तथा सुंदर गृह देकर और कल्याणकारी देवताओंकी आराधना करके भी ब्राह्मणोंको ही संतुष्ट करना चाहिये। तुम लोभ छोड़कर इसी परम गोपनीय धर्मका आचरण करो ।। ४५ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें ब्रह्मा और भगीरथका संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;टिका टिप्पणी -&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;ul style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;li&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;यज्ञकर्ता पुरुष &#39;शम्या&quot; नामक एक काठका डंडा खूब जोर लगाकर फेंकता है, वह जितनी दूरपर जाकर गिरता है। उतने दूरमें यज्ञकी वेदी बनायी जाती है; उस वेदीपर जो यज्ञ किया जाता है उसे “शम्याक्षेप&#39; अथवा “शम्याप्रास” यज्ञ कहते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/8639384962453617178/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-101-chapter-to-103-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/8639384962453617178'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/8639384962453617178'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-101-chapter-to-103-chapter-of.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के एक सौ एकवें अध्याय से एक सौ तीनवें अध्याय तक (From the 101 chapter to the 103 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail 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style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;सत्तानबेवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) सत्तानबेवें अध्याय के श्लोक 1-25&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“गृहस्थधर्म, पञठचयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान्‌ श्रीकृष्णका संवाद”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--भरतश्रेष्ठ) पृथ्वीनाथ! अब आप मुझे गृहस्थ-आश्रमके सम्पूर्ण धर्मोका उपदेश कीजिये। मनुष्य कौन-सा कर्म करके इहलोकमें समृद्धिका भागी होता है? ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--नरेश्वर! भरतनन्दन! इस विषयमें भगवान्‌ श्रीकृष्ण और पृथ्वीका संवादरूप एक प्राचीन वृत्तान्त बता रहा हूँ ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! प्रतापी भगवान्‌ श्रीकृष्णने पृथ्वी-देवीकी स्तुति करके उनसे यही बात पूछी थी, जो आज तुम मुझसे पूछते हो ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ श्रीकृष्णने पूछा--वसुन्धरे! मुझको या मेरे-जैसे किसी दूसरे मनुष्यको गा्स्थ्य-धर्मका आश्रय लेकर किस कर्मका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये? क्या करनेसे गृहस्थको सफलता मिलती है? ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीने कहा--माधव! गृहस्थ पुरुषको सदा ही देवताओं, पितरों, ऋषियों और अतिथियोंका पूजन एवं सत्कार करना चाहिये। यह सब कैसे करना चाहिये! सो बता रही हूँ, सुनिये।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतिदिन यज्ञ-होमके द्वारा देवताओंका, अतिथि-सत्कारके द्वारा मनुष्योंका (श्राद्ध तर्पण करके पितरोंका) तथा वेदोंका नित्य स्वाध्याय करके पूजनीय ऋषि-महर्षियोंका यथाविधि पूजन और सत्कार करना चाहिये। इसके बाद नित्य भोजन करना उचित है ।। ६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मधुसूदन! स्वाध्यायसे ऋषियोंको बड़ी प्रसन्नता होती है। प्रतिदिन भोजनके पहले ही अनिनिहोत्र एवं बलिवैश्वदेव कर्म करे। इससे देवता संतुष्ट होते हैं। पितरोंकी प्रसन्नताके लिये प्रतिदिन अन्न, जल, दूध अथवा फल-मूलके द्वारा श्राद्ध करना उचित है ।। ७-८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सिद्ध अन्न (तैयार हुई रसोई) मेंसे अन्न लेकर उसके द्वारा विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव कर्म करना चाहिये ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले अग्नि और सोमको, फिर विश्वेदेवोंको, तदनन्तर धन्वन्तरिको, तत्पश्चात्‌ प्रजापतिको पृथक्‌-पृथक्‌ आहुति देनेका विधान है || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार क्रमश: बलिकर्मका प्रयोग करे। माधव! दक्षिण दिशामें यमको, पश्चिममें वरुणको, उत्तर दिशामें सोमको, वास्तुके मध्यभागमें प्रजापतिको, ईशानकोणमें धन्वन्तरिको और पूर्वदिशामें इन्द्रको बलि समर्पित करे || ११-१२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;घरके दरवाजेपर सनकादि मनुष्योंके लिये बलि देनेका विधान है। मरुदगणों तथा देवताओंको घरके भीतर बलि समर्पित करनी चाहिये ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विश्वेदेवोंके लिये आकाशमें बलि अर्पित करे। निशाचरों और भूतोंके लिये रातमें बलि दे ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार बलि समर्पण करके ब्राह्मणको विधिपूर्वक भिक्षा दे। यदि ब्राह्मण न मिले तो अन्नमेंसे थोड़ा-सा अग्रग्रास निकालकर उसका अग्निमें होम कर दे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस दिन पितरोंका श्राद्ध करनेकी इच्छा हो, उस दिन पहले श्राद्धकी क्रिया पूरी करे। उसके बाद पितरोंका तर्पण करके विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव-कर्म करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सत्कारपूर्वक भोजन करावे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! इसके बाद विशेष अन्तके द्वारा अतिथियोंको भी सम्मानपूर्वक भोजन करावे। ऐसा करनेसे गृहस्थ पुरुष सम्पूर्ण मनुष्योंको संतुष्ट करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो नित्य अपने घरमें स्थित नहीं रहता, वह अतिथि कहलाता है। आचार्य, पिता, विश्वासपात्र मित्र और अतिथिसे सदा यह निवेदन करे कि “अमुक वस्तु मेरे घरमें मौजूद है, उसे आप स्वीकार करें।” फिर वे जैसी आज्ञा दें वैसा ही करे। ऐसा करनेसे धर्मका पालन होता है ।। १९-२० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीकृष्ण! गृहस्थ पुरुषको सदा यज्ञशिष्ट अन्नका ही भोजन करना चाहिये। राजा, ऋत्विज, स्नातक, गुरु और श्वशुर--ये यदि एक वर्षके बाद घर आवें तो मधुपर्कसे इनकी पूजा करनी चाहिये ।। २१६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुत्तों, चाण्डालों और पक्षियोंके लिये भूमिपर अन्न रख देना चाहिये। यह वैश्वदेव नामक कर्म है। इसका सायंकाल और प्रातःकाल अनुष्ठान किया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य दोषदृष्टिका परित्याग करके इन गृहस्थोचित धर्मोंका पालन करता है, उसे इस लोकमें ऋषि-महर्षियोंका वरदान प्राप्त होता है और मृत्युके पश्चात्‌ वह पुण्यलोकोंमें सम्मानित होता है || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! पृथ्वी देवीके ये वचन सुनकर प्रतापी भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन्हींके अनुसार गृहस्थधर्मोंका विधिवत्‌ पालन किया। तुम भी सदा इन धर्मोंका अनुष्ठान करते रहो ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जनेश्वर! इस गृहस्थ-धर्मका पालन करते रहनेपर तुम इहलोकमें सुयश और परलोकमें स्वर्ग प्राप्त कर लोगे ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बलिदानविधि नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;अट्ठानबेवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) अट्ठानबेवें अध्याय के श्लोक 1-67&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद--पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ) यह जो दीपदान नामक कर्म है, यह कैसे किया जाता है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? अथवा इसका फल कया है? यह मुझे बताइये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--भारत! इस विषयमें प्रजापति मनु और सुवर्णके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! सुवर्णनामसे प्रसिद्ध एक तपस्वी ब्राह्मण थे। उनके शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी। इसीलिये वे सुवर्णनामसे विख्यात हुए थे ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे उत्तम कुल, शील और गुणसे सम्पन्न थे। स्वाध्यायमें भी उनकी बड़ी ख्याति थी। वे अपने गुणोंद्वारा उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए बहुत-से श्रेष्ठ पुरुषोंकी अपेक्षा आगे बढ़े हुए थे।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन जन ब्राह्मणदेवताने प्रजापति मनुको देखा। देखकर वे उनके पास चले गये। फिर तो वे दोनों एक-दूसरेसे कुशल-समाचार पूछने लगे ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर वे दोनों सत्यसंकल्प महात्मा सुवर्णमय पर्वत मेरके एक रमणीय शिलापृष्ठपर एक साथ बैठ गये ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ वे दोनों ब्रह्मर्षियों, देवताओं, दैत्यों तथा प्राचीन महात्माओंके सम्बन्धमें नाना प्रकारकी कथा-वार्ता करने लगे || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस समय सुवर्णने स्वायम्भुव मनुसे कहा--&#39;प्रजापते! मैं एक प्रश्न करता हूँ, आप समस्त प्राणियोंके हितके लिये मुझे उसका उत्तर दीजिये। फूलोंसे जो देवताओंकी पूजा की जाती है, यह क्‍या है? इसका प्रचलन कैसे हुआ है? इसका फल क्या है और इसका उपयोग क्या है? यह सब मुझे बताइये” ।। ८-९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुजीने कहा--मुने! इस विषयमें विज्ञजन शुक्राचार्य और बलि--इन दोनों महात्माओंके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहलेकी बात है, विरोचनकुमार बलि तीनों लोकोंका शासन करते थे। उन दिनों भुगुकुलभूषण शुक्र शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले असुरराज बलिने भृगुपुत्र शुक्राचार्यको अर्घ्य आदि देकर उनकी विधिवत्‌ पूजा की और जब वे आसनपर बैठ गये, तब बलि भी अपने सिंहासनपर आसीन हुए ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ उन दोनोंमें यही बातचीत हुई, जिसे तुमने प्रस्तुत किया है। देवताओंको फूल, धूप और दीप देनेसे क्या फल मिलता है, यही उनकी वार्ताका विषय था। उस समय दैत्यराज बलिने कविवर शुक्रके सामने यह उत्तम प्रश्न उपस्थित किया ।। १३-१४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बलिने पूछा--ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ) द्विजशिरोमणे! फूल, धूप और दीपदान करनेका क्या फल है? यह बतानेकी कृपा करें ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुक्राचार्यने कहा--राजन्‌! पहले तपस्याकी उत्पत्ति हुई है, तदनन्तर धर्मकी। इसी बीचमें लता और ओषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ है ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस भूतलपर अनेक प्रकारकी सोमलता प्रकट हुई। अमृत, विष तथा दूसरी-दूसरी जातिके वृणोंका प्रादुर्भाव हुआ || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अमृत वह है, जिसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। जो तत्काल तृप्ति प्रदान करता है और विष वह है जो अपनी गन्धसे चित्तमें सर्वथा तीव्र ग्लानि पैदा करता है ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अमृतको मंगलकारी जानो और विष महान्‌ अमंगल करनेवाला है। जितनी ओषधियाँ हैं, वे सबन-की-सब अमृत मानी गयी हैं और विष अग्निजनित तेज है ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फूल मनको आह्लाद प्रदान करता है और शोभा एवं सम्पत्तिका आधान करता है, इसलिये पुण्यात्मा मनुष्योंने उसे सुमन कहा है ।। २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य पवित्र होकर देवताओंको फूल चढ़ाता है, उसके ऊपर सब देवता संतुष्ट होते और उसके लिये पुष्टि प्रदान करते हैं || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! दैत्ययाज! जिस-जिस देवताके उद्देश्यसे फ़ूल दिये जाते हैं, वह उस पुष्पदानसे दातापर बहुत प्रसन्न होता और उसके मंगलके लिये सचेष्ट रहता है ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उग्रा, सौम्या, तेजस्विनी, बहुवीर्या और बहुरूपा--अनेक प्रकारकी ओषधियाँ होती हैं। उन सबको जानना चाहिये ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब यज्ञसम्बन्धी तथा अयज्ञोपयोगी वृक्षोंका वर्णन सुनो। असुरोंके लिये हितकर तथा देवताओंके लिये प्रिय जो पुष्पमालाएँ होती हैं, उनका परिचय सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राक्षस, नाग, यक्ष, मनुष्य और पितरोंको प्रिय एवं मनोरम लगनेवाली ओषधियोंका भी वर्णन करता हूँ, सुनो || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फूलोंके बहुत-से वृक्ष गाँवोंमें होते हैं और बहुत-से जंगलोंमें। बहुतेरे वृक्ष जमीनको जोतकर क्‍्यारियोंमें लगाये जाते हैं और बहुत-से पर्वत आदिपर अपने-आप पैदा होते हैं। इन वृक्षोंमें कुछ तो काँटेदार होते हैं और कुछ बिना काँटोंके। इन सबमें रूप, रस और गन्ध विद्यमान रहते हैं || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फूलोंकी गन्ध दो प्रकारकी होती है--अच्छी और बुरी। अच्छी गन्धवाले फूल देवताओंको प्रिय होते हैं। इस बातको ध्यानमें रखो ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! जिन वृक्षोंमें काँटे नहीं होते हैं, उनमें जो अधिकांश श्वेतवर्णवाले हैं, उन्हींके फूल देवताओंको सदैव प्रिय हैं। कमल, तुलसी और चमेली--ये सब फूलोंमें अधिक प्रशंसित हैं ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जलसे उत्पन्न होनेवाले जो कमल-उत्पल आदि पुष्प हैं, उन्हें विद्वान्‌ पुरुष गन्धर्विों, नागों और यक्षोंको समर्पित करे || २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अथर्ववेदमें बतलाया गया है कि शत्रुओंका अनिष्ट करनेके लिये किये जानेवाले अभिचार कर्ममें लाल फूलोंवाली कड़वी और कण्टकाकीर्ण ओषधियोंका उपयोग करना चाहिये ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिन फूलोंमें काँटे अधिक हों, जिनका हाथसे स्पर्श करना कठिन जान पड़े, जिनका रंग अधिकतर लाल या काला हो तथा जिनकी गन्धका प्रभाव तीव्र हो, ऐसे फूल भूतप्रेतोंके काम आते हैं। अतः उनको वैसे ही फूल भेंट करने चाहिये ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! मनुष्योंको तो वे ही फूल प्रिय लगते हैं, जिनका रूप-रंग सुन्दर और रस विशेष मधुर हो, तथा जो देखनेपर हृदयको आनन्ददायी जान पड़ें || ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्मशान तथा जीर्ण-शीर्ण देवालयोंमें पैदा हुए फूलोंका पौष्टिक कर्म, विवाह तथा एकान्त विहारमें उपयोग नहीं करना चाहिये ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर्वतोंके शिखरपर उत्पन्न हुए सुन्दर और सुगन्धित पुष्पोंको धोकर अथवा उनपर जलके छींटे देकर धर्मशास्त्रोंमें बताये अनुसार उन्हें यथायोग्य देवताओंपर चढ़ाना चाहिये ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता फूलोंकी सुगन्धसे, यक्ष और राक्षस उनके दर्शनसे, नागगण उनका भलीभाँति उपभोग करनेसे और मनुष्य उनके दर्शन, गन्ध एवं उपभोग तीनोंसे ही संतुष्ट होते हैं ।। ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फूल चढ़ानेसे मनुष्य देवताओंको तत्काल संतुष्ट करता है और संतुष्ट होकर वे सिद्धसंकल्प देवता मनुष्योंको मनोवांछित एवं मनोरम भोग देकर उनकी भलाई करते हैं ।। ३६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओंको यदि सदा संतुष्ट और सम्मानित किया जाता है तो वे भी मनुष्योंको संतोष एवं सम्मान देते हैं तथा यदि उनकी अवज्ञा एवं अवहेलना की गयी तो वे अवज्ञा करनेवाले नीच मनुष्यको अपनी क्रोधाग्निसे भस्म कर डालते हैं || ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके बाद अब मैं धूपदानकी विधिका फल बताऊँगा। धूप भी अच्छे और बुरे कई तरहके होते हैं। उनका वर्णन मुझसे सुनो ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धूपके मुख्यतः तीन भेद हैं--निर्यास, सारी और कृत्रिम। इन धूपोंकी गंध भी अच्छी और बुरी दो प्रकारकी होती है। ये सब बातें मुझसे विस्तारपूर्वक सुनो ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वृक्षोंके रस (गोंद) को निर्यास कहते हैं, सल्‍लकीनामक वृक्षके सिवा अन्य वृक्षोंसे प्रकट हुए निर्यासमय धूप देवताओंको बहुत प्रिय होते हैं। उनमें भी गुग्गुल सबसे श्रेष्ठ है। ऐसा मनीषी पुरुषोंका निश्चय है || ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिन काष्ठोंको आगमें जलानेपर सुगंध प्रकट होती है, उन्हें सारी धूप कहते हैं। इनमें अगुरुकी प्रधानता है। सारी धूप विशेषतः यक्ष, राक्षस और नागोंको प्रिय होते हैं। दैत्य लोग सलल्‍लकी तथा उसी तरह अन्य वृक्षोंकी गोंदका बना हुआ धूप पसंद करते हैं || ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीनाथ! राल आदिके सुगन्धित चूर्ण तथा सुगन्धित काष्ठौषधियोंके चूर्णको घी और शकक्‍्करसे मिश्रित करके जो अष्टगंध आदि धूप तैयार किया जाता है, वही कृत्रिम है। विशेषत: वही मनुष्योंके उपयोगमें आता है || ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैसा धूप देवताओं, दानवों और भूतोंके लिये भी तत्काल संतोष प्रदान करनेवाला माना गया है। इनके सिवा विहार (भोग-विलास) के उपयोगमें आनेवाले और भी अनेक प्रकारके धूप हैं, जो केवल मनुष्योंके व्यवहारमें आते हैं |। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओंको पुष्पदान करनेसे जो गुण या लाभ बताये गये हैं, वे ही धूप निवेदन करनेसे भी प्राप्त होते हैं। ऐसा जानना चाहिये। धूप भी देवताओंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाले हैं ।। ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब मैं दीप-दानका परम उत्तम फल बताऊँगा। कब किस प्रकार किसके द्वारा किसके दीप दिये जाने चाहिये, यह सब बताता हूँ, सुनो || ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दीपक ऊर्ध्वगामी तेज है, वह कान्ति और कीर्तिका विस्तार करनेवाला बताया जाता है। अतः दीप या तेजका दान मनुष्योंके तेजकी वृद्धि करता है || ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंधकार अंधतामिस्र नामक नरक है। दक्षिणायन भी अंधकारसे ही आच्छन्न रहता है। इसके विपरीत उत्तरायण प्रकाशमय है। इसलिये वह श्रेष्ठ माना गया है। अतः अन्धकारमय नरककी निवृत्तिके लिये दीपदानकी प्रशंसा की गयी है || ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दीपककी शिखा ऊर्ध्वगामिनी होती है। वह अंधकाररूपी रोगको दूर करनेकी दवा है। इसलिये जो दीपदान करता है, उसे निश्चय ही ऊर्ध्वगतिकी प्राप्ति होती है ।। ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता तेजस्वी, कांतिमान्‌ और प्रकाश फैलानेवाले होते हैं और राक्षस अंधकारप्रिय होते हैं; इसलिये देवताओंकी प्रसन्नताके लिये दीपदान किया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दीपदान करनेसे मनुष्यके नेत्रोंका तेज बढ़ता है और वह स्वयं भी तेजस्वी होता है। दान करनेके पश्चात्‌ उन दीपकोंको न तो बुझावे, न उठाकर अन्यत्र ले जाय और न नष्ट ही करे।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दीपक चुरानेवाला मनुष्य अंधा और श्रीहीन होता है तथा मरनेके बाद नरकमें पड़ता है, किंतु जो दीपदान करता है, वह स्वर्गलोकमें दीपमालाकी भाँति प्रकाशित होता है ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;घीका दीपक जलाकर दान करना प्रथम श्रेणीका दीप-दान है। ओषधियोंके रस अर्थात्‌ तिल-सरसों आदिके तेलसे जलाकर किया हुआ दीपदान दूसरी श्रेणीका है। जो अपने शरीरकी पुष्टि चाहता हो--उसे चर्बी, मेदा और हड्डियोंसे निकाले हुए तेलके द्वारा कदापि दीपक नहीं जलाना चाहिये ।। ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपने कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे प्रतिदिन पर्वतीय झरनेके पास, वनमें, देवमंदिरमें, चौराहोंपर, गोशालामें, ब्राह्मणके घरमें तथा दुर्गम स्थानमें प्रतिदिन दीप-दान करना चाहिये। उक्त स्थानोंमें दिया हुआ पवित्र दीप ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दीप-दान करनेवाला पुरुष अपने कुलको उद्दीप्त करनेवाला, शुद्धचित्त तथा श्रीसम्पन्न होता है और अंतमें वह प्रकाशमय लोकोंमें जाता है || ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब मैं देवताओं, यक्षों, नागों, मनुष्यों, भूतों तथा राक्षस्रोंको बलि समर्पण करनेसे जो लाभ होता है, जिन फलोंका उदय होता है, उनका वर्णन करूँगा ।। ५५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लोग अपने भोजन करनेसे पहले देवताओं, ब्राह्मणों, अतिथियों और बालकोंको भोजन नहीं कराते, उन्हें भयरहित अमंगलकारी राक्षस ही समझो ।। ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः गृहस्थ मनुष्यका यह कर्तव्य है कि वह आलस्य छोड़कर देवताओंकी पूजा करके उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करे और शुद्धचित्त हो सर्वप्रथम उन्हींको आदरपूर्वक अन्नका भाग अर्पण करे ।। ५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्योंकि देवतालोग सदा गृहस्थ मनुष्योंकी दी हुई बलिको स्वीकार करते और उन्हें आशीर्वाद देते हैं। देवता, पितर, यक्ष, राक्षस, सर्प तथा बाहरसे आये हुए अन्य अतिथि आदि गृहस्थके दिये हुए अन्नसे ही जीविका चलाते हैं और प्रसन्न होकर उस गृहस्थको आयु, यश तथा धनके द्वारा संतुष्ट करते हैं | ५८-५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओंको जो बलि दी जाय, वह दही-दूधकी बनी हुई, परम पवित्र, सुगंधित, दर्शनीय और फूलोंसे सुशोभित होनी चाहिये ।। ६० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आसुर स्वभावके लोग यक्ष और राक्षसोंको रुधिर और मांससे युक्त बलि अर्पित करते हैं। जिसके साथ सुरा और आसव भी रहता है तथा ऊपरसे धानका लावा छींटकर उस बलिको विभूषित किया जाता है ।। ६१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नागोंको पद्म और उत्पलयुक्त बलि प्रिय होती है। गुड़मिश्रित तिल भूतोंको भेंट करे ।। ६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य देवता आदिको पहले बलि प्रदान करके भोजन करता है, वह उत्तम भोगसे सम्पन्न, बलवान्‌ और वीर्यवान्‌ होता है। इसलिये देवताओंको सम्मानपूर्वक अन्न पहले अर्पण करना चाहिये ।। ६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गृहस्थके घरकी अधिष्ठातृ देवियाँ उसके घरको सदा प्रकाशित किये रहती हैं, अतः कल्याणकामी मनुष्यको चाहिये कि भोजनका प्रथम भाग देकर सदा ही उनकी पूजा किया करें।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार शुक्राचार्यने असुरराज बलिको यह प्रसंग सुनाया और मनुने तपस्वी सुवर्णको इसका उपदेश किया। तत्पश्चात्‌ तपस्वी सुवर्णने नारदजीको और नारदजीने मुझे धूप, दीप आदिके दानके गुण बताये। महातेजस्वी पुत्र! तुम भी इस विधिको जानकर इसीके अनुसार सब काम करो ।। ६५-६६ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपरव्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्ण और मनुका संवादविषयक अद्दानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;निन्यानबेवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) निन्यानबेवें अध्याय के श्लोक 1-29&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भूगु और अगस्त्यकी बातचीत”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठटिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ) फ़ूल और धूप देनेवालोंको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मैंने सुन लिया। अब बलि समर्पित करनेका जो फल है, उसे पुनः बतानेकी कृपा करें ।। १ ॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धूपदान और दीपदानका फल तो ज्ञात हो गया! अब यह बताइये कि गृहस्थ पुरुष बलि किसलिये समर्पित करते हैं? || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! इस विषयमें भी जानकार मनुष्य राजा नहुष और अगस्त्य एवं भूगुके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! राजर्षि नहुष बड़े भारी तपस्वी थे। उन्होंने अपने पुण्यकर्मके प्रभावसे देवराज इन्द्रका पद प्राप्त कर लिया था ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! वहाँ स्वर्गमें रहते हुए भी शुद्धचित्त राजा नहुष नाना प्रकारके दिव्य और मानुष कर्मोंका अनुष्ठान किया करते थे || ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! स्वर्गमें भी महामना राजा नहुषकी सम्पूर्ण मानुषी क्रियाएँ तथा दिव्य सनातन क्रियाएँ भी सदा चलती रहती थीं ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनग्निहोत्र, समिधा, कुशा, फूल, अन्न और लावाकी बलि, धूपदान तथा दीपकर्म--ये सब-के-सब महामना राजा नहुषके घरमें प्रतिदिन होते रहते थे। वे स्वर्गमें रहकर भी जपयज्ञ एवं मनोयज्ञ (ध्यान) करते रहते थे ।। ७-८ ॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शत्रुदमन! वे देवेश्वर नहुष विधिपूर्वक सभी देवताओंका पूर्ववत्‌ यथोचितरूपसे पूजन किया करते थे ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किंतु तदनन्तर &quot;मैं इन्द्र हूँ” ऐसा समझकर वे अहंकारके वशीभूत हो गये। इससे उन भूपालकी सारी क्रियाएँ नष्टप्राय होने लगीं ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे वरदानके मदसे मोहित हो ऋषियोंसे अपनी सवारी खिंचवाने लगे। उनका धर्म-कर्म छूट गया। अतः वे दुर्बल हो गये--उनमें धर्मबलका अभाव हो गया ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे अहंकारसे अभिभूत होकर क्रमश: सभी श्रेष्ठ तपस्वी मुनियोंको अपने रथमें जोतने लगे। ऐसा करते हुए राजाका दीर्घकाल व्यतीत हो गया ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नहुषने बारी-बारीसे सभी ऋषियोंको अपना वाहन बनानेका उपक्रम किया था। भारत! एक दिन महर्षि अगस्त्यकी बारी आयी ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसी दिन ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी भूगुजी अपने आश्रमपर बैठे हुए अगस्त्यके निकट आये और इस प्रकार बोले-- ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“महामुने! देवराज बनकर बैठे हुए इस दुर्बुद्धि नहुषके अत्याचारको हमलोग किसलिये सह रहे हैं! ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगस्त्यजीने कहा--महामुने! मैं इस नहुषको कैसे शाप दे सकता हूँ, जब कि वरदानी ब्रह्माजीने इसे वर दे रखा है। उसे वर मिला है, यह बात आपको भी विदित ही है ।। १६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्वर्गलोकमें आते समय इस नहुषने ब्रह्माजीसे यह वर माँगा था कि “जो मेरे दृष्टिपथमें आ जाय, वह मेरे अधीन हो जाय” ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा वरदान प्राप्त होनेके कारण ही मैंने और आपने भी अबतक इसे दग्ध नहीं किया है। इसमें संशय नहीं है। दूसरे किसी श्रेष्ठ ऋषिने भी उसी वरदानके कारण न तो अबतक उसे जलाकर भस्म किया और न स्वर्गसे नीचे ही गिराया ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! पूर्वकालमें महात्मा ब्रह्माने इसे पीनेके लिये अमृत प्रदान किया था। इसीलिये हमलोग इस नहुषको स्वर्गसे नीचे नहीं गिरा रहे हैं ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ ब्रह्माजीने जो इसे वर दिया था, वह प्रजाजनोंके लिये दुःखका कारण बन गया। वह नराधम ब्राह्मणोंके साथ अधर्मयुक्त बर्ताव कर रहा है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वक्ताओंमें श्रेष्ठ भुगुजी! इस समय हमारे लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, वह बताइये। आप जैसा कहेंगे वैसा ही मैं करूँगा; इसमें संशय नहीं है || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगु बोले--मुने! ब्रह्माजीकी आज्ञासे मैं आपके पास आया हूँ। बलवान्‌ नहुष दैववश मोहित हो रहा है। आज उससे ऋषियोंपर किये गये अत्याचारका बदला लेना है || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज यह महामूर्ख देवराज आपको रथमें जोतेगा। अतः आज ही मैं इस उच्छुंखल नहुषको अपने तेजसे इन्द्रपदसे भ्रष्ट कर दूँगा || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज इस पापाचारी दुर्बुद्धिको इन्द्रपदसे गिराकर मैं आपके देखते-देखते पुनः शतक्रतुको इन्द्रपदपर बिठाऊँगा ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दैवने इसकी बुद्धिको नष्ट कर दिया है। अतः यह देवराज बना हुआ मन्दबुद्धि नीच नहुष अपने ही विनाशके लिये आज आपको लातसे मारेगा ।। २५ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपके प्रति किये गये इस अत्याचारसे अत्यंत अमर्षमें भरकर मैं धर्मका उल्लंघन करनेवाले उस द्विजद्रोही पापीको रोषपूर्वक यह शाप दे दूँगा कि &#39;तू सर्प हो जा” ।। २६ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महामुने! तदनन्तर चारों ओरसे धिक्कारके शब्द सुनकर यह दुर्बुद्धि देवेन्द्र श्रीहीन हो जायगा और मैं ऐश्वर्यबलसे मोहित हुए इस पापाचारी नहुषको आपके देखते-देखते पृथ्वीपर गिरा दूँगा। अथवा मुने! आपको जैसा जँचे वैसा ही करूँगा || २७-२८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगुके ऐसा कहनेपर अविनाशी मित्रावरुणकुमार अगस्त्यजी अत्यंत प्रसन्न और निश्चिन्त हो गये || २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और भ्रगुका संवादनामक निन्‍यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;सौवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) सौवें अध्याय के श्लोक 1-41&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नहुषका पतन, शतक्रतुका इन्द्रपदपर पुन: अभिषेक तथा दीपदानकी महिमा&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! राजा नहुषपर कैसे विपत्ति आयी? वे कैसे पृथ्वीपर गिराये गये और किस तरह वे इन्द्रपदसे वंचित हो गये? इसे आप बतानेकी कृपा करें ।। १ ॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! जब महर्षि भूगु और अगस्त्य उपर्युक्त वार्तालाप कर रहे थे। उस समय महामना नहुषके घरमें दैवी और मानुषी सभी क्रियाएँ चल रही थीं || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दीपदान, समस्त उपकरणोंसहित अन्नदान, बलिकर्म एवं नाना प्रकारके स्नानअभिषेक आदि पूर्ववत्‌ चालू थे। देवलोक तथा मनुष्यलोकमें विद्वानोंने जो सदाचार बताये हैं, वे सब महामना देवराज नहुषके यहाँ होते रहते थे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजेन्द्र! गृहस्थके घर यदि उन सदाचारोंका पालन हो तो वे गृहस्थ सर्वथा उन्नतिशील होते हैं, धूपदान, दीपदान तथा देवताओंको किये गये नमस्कार आदिसे भी गृहस्थोंकी ऋद्धि-सिद्धि बढ़ती है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे तैयार हुई रसोईमेंसे पहले अतिथिको भोजन दिया जाता है, उसी प्रकार घरमें देवताओंके लिये अन्नकी बलि दी जाती है। जिससे देवते प्रसन्न होते हैं |। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बलिकर्म करनेपर गृहस्थको जितना संतोष होता है, उससे सौगुनी प्रीति देवताओंको होती है || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष अपने लिये लाभदायक समझकर देवताओंको नमस्कारसहित धूपदान और दीपदान करते हैं ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्वान्‌ पुरुष जलसे स्नान करके देवता आदिके लिये नमस्कारपूर्वक जो तर्पण आदि कर्म करते हैं, उससे देवता, महाभाग पितर तथा तपोधन ऋषि संतुष्ट होते हैं तथा विधिपूर्वक पूजित होकर घरके सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं | ९-१० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी विचारधाराका आश्रय लेकर राजा नहुषने महान देवेन्द्रपद पाकर यह अदभुत पुण्यकर्म सदा चालू रखा था ।| ११ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किंतु कुछ कालके पश्चात्‌ जब उनके सौभाग्य-नाशका अवसर उपस्थित हुआ, तब उन्होंने इन सब बातोंकी अवहेलना करके ऐसा पापकर्म आरम्भ कर दिया ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बलके घमण्डमें आकर देवराज नहुष उन सत्कर्मोंसे भ्रष्ट हो गये। उन्होंने धूपदान, दीपदान और जलदानकी विधिका यथावत्‌्रूपसे पालन करना छोड़ दिया ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसका फल यह हुआ कि उनके यज्ञस्थलमें राक्षसोंने डेरा डाल दिया। उन्हींसे प्रभावित होकर महाबली नहुषने मुसकराते हुए-से मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको सरस्वतीतटसे तुरंत अपना रथ ढोनेके लिये बुलाया। तब महातेजस्वी भृगुने मित्रावरुणकुमार अगस्त्यजीसे कहा -- || १४-१५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मुने! आप अपनी आँखें मूँद लें, मैं आपकी जटामें प्रवेश करता हूँ।” महर्षि अगस्त्य आँखें मूँदकर काष्ठकी तरह स्थिर हो गये। अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले महातेजस्वी भृगुने राजाको स्वर्गसे नीचे गिरानेके लिये अगस्त्यजीकी जटामें प्रवेश किया। इतनेहीमें देवराज नहुष ऋषिको अपना वाहन बनानेके लिये उनके पास पहुँचे || १६-१७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजानाथ! तब अगस्त्यने देवराजसे कहा--“राजन्‌! मुझे शीघ्र रथमें जोतिये और बताइये मैं आपको किस स्थानपर ले चलूँ। देवेश्वरर आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपको ले चलूँगा।” उनके ऐसा कहनेपर नहुषने मुनिको रथमें जोत दिया ।। १८-१९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह देख उनकी जटाके भीतर बैठे हुए भृगु बहुत प्रसन्न हुए। उस समय भृगुने नहुषका साक्षात्कार नहीं किया || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगस्त्यमुनि महामना नहुषको मिले हुए वरदानका प्रभाव जानते थे, इसलिये उसके द्वारा रथमें जोते जानेपर भी वे कुपित नहीं हुए || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! राजा नहुषने चाबुक मारकर हाँकना आरम्भ किया तो भी उन धर्मात्मा मुनिको क्रोध नहीं आया। तब कुपित हुए देवराजने महात्मा अगस्त्यके सिरपर बायें पैरसे प्रहार किया ।। २२६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनके मस्तकपर चोट होते ही जटाके भीतर बैठे हुए महर्षि भूगु अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने पापात्मा नहुषको इस प्रकार शाप दिया--&#39;ओ दुर्मते! तुमने इन महामुनिके मस्तकमें क्रोधपूर्वक लात मारी है, इसलिये तू शीघ्र ही सर्प होकर पृथ्वीपर चला जा” ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! भूगु नहुषको दिखायी नहीं दे रहे थे। उनके इस प्रकार शाप देनेपर नहुष सर्प होकर पृथ्वीपर गिरने लगे || २५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीनाथ! यदि नहुष भृगुको देख लेते तो उनके तेजसे प्रतिहत होकर वे उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरानेमें समर्थ न होते || २६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! नहुषने जो भिन्न-भिन्न प्रकारके दान किये थे, तप और नियमोंका अनुष्ठान किया था, उनके प्रभावसे वे पृथ्वीपर गिरकर भी पूर्वजन्मकी स्मृतिसे वंचित नहीं हुए। उन्होंने भूगुको प्रसन्न करते हुए कहा--&#39;प्रभो! मुझको मिले हुए शापका अंत होना चाहिये” ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! तब अगस्त्यने दयासे द्रवित होकर उनके शापका अंत करनेके लिये भृगुको प्रसन्न किया। तब कृपायुक्त हुए भूगुने उस शापका अंत इस प्रकार निश्चित किया ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगुने कहा--राजन! तुम्हारे कुलमें सर्वश्रेष्ठ युधिष्ठिर नामसे प्रसिद्ध एक राजा होंगे, जो तुम्हें इस शापसे मुक्त करेंगे--ऐसा कहकर भृगुजी अंतर्धान हो गये ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महातेजस्वी अगस्त्य भी शतक्रतु इन्द्रका कार्य सिद्ध करके द्विजातियोंसे पूजित होकर अपने आश्रमको चले गये ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! तुमने भी नहुषका उस शापसे उद्धार कर दिया। नरेश्वर! वे तुम्हारे देखते-देखते ब्रह्मतोकको चले गये ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भूगु उस समय नहुषको पृथ्वीपर गिराकर ब्रह्माजीके धाममें गये और उनसे उन्होंने यह सब समाचार निवेदन किया ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब पितामह ब्रह्माने इन्द्र तथा अन्य देवताओंको बुलवाकर उनसे कहा--&#39;देवगण! मेरे वरदानसे नहुषने राज्य प्राप्त किया था। परंतु कुपित हुए अगस्त्यने उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरा दिया। अब वे पृथ्वीपर चले गये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देवताओ! बिना राजाके कहीं भी रहना असंभव है। अतः अपने पूर्व इन्द्रको पुनः देवराजके पदपर अभिषिक्त करो” || ३५३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनंदन! नरेश्वर! पितामह ब्रह्माका यह कथन सुनकर सब देवता हर्षसे खिल उठे और बोले--&#39;भगवन्‌! ऐसा ही हो” ।। ३६½ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजसिंह! भगवान्‌ ब्रह्माके द्वारा देवरराजके पदपर अभिषिक्त हो शतक्रतु इन्द्र फिर पूर्ववत्‌ शोभा पाने लगे || ३७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार पूर्वकालमें नहुषके अपराधसे ऐसी घटना घटी कि वे नहुष बार-बार दीपदान आदि पुण्यकर्मोंसे सिद्धिको प्राप्त हुए थे || ३८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये गृहस्थोंको सायंकालमें अवश्य दीपदान करने चाहिये। दीपदान करनेवाला पुरुष परलोकमें दिव्य नेत्र प्राप्त करता है ।। ३९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दीपदान करनेवाले मनुष्य निश्चय ही पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ होते हैं। जितने पलकोंके गिरनेतक दीपक जलते हैं, उतने वर्षोतक दीपदान करनेवाला मनुष्य रूपवान्‌ और बलवान होता है || ४०-४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और भ्रगुका संवादनामक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/1151536842820939222/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-97-chapter-to-100-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;छानबेवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) छानबेवें अध्याय के श्लोक 1-197½&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानकी प्रशंसा”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जब सूर्यदेव इस प्रकार याचना कर रहे थे, उस समय महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ जमदग्निने कौन-सा कार्य किया? ।। १ ॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--कुरुनन्दन! सूर्यदेवके इस तरह प्रार्थना करनेपर भी अग्निके समान तेजस्वी जमदग्नि मुनिका क्रोध शान्त नहीं हुआ ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजानाथ! तब विप्ररूपधारी सूर्यने हाथ जोड़ प्रणाम करके मधुर वाणीद्वारा यों कहा -- ३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“विप्रर्ष! आपका लक्ष्य तो चल है, सूर्य भी सदा चलते रहते हैं। अतः निरन्तर यात्रा करते हुए सूर्यरूपी चंचल लक्ष्यका आप किस प्रकार भेदन करेंगे?” ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जमदग्नि बोले--हमारा लक्ष्य चंचल हो या स्थिर, हम ज्ञानदृष्टिसे पहचान गये हैं कि तुम्हीं सूर्य हो। अत: आज दण्ड देकर तुम्हें अवश्य ही विनययुक्त बनायेंगे || ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिवाकर! तुम दोपहरके समय आधे निमेषके लिये ठहर जाते हो! सूर्य! उसी समय तुम्हें स्थिर पाकर हम अपने बाणोंद्वारा तुम्हारे शरीरका भेदन कर डालेंगे। इस विषयमें मुझे कोई (अन्यथा) विचार नहीं करना है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूर्य बोले-धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ विप्र्षे! निस्संदेह आप मेरे शरीरका भेदन कर सकते हैं। भगवन्‌! यद्यपि मैं आपका अपराधी हूँ तो भी आप मुझे अपना शरणागत समझिये ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! सूर्यदेवकी यह बात सुनकर भगवान्‌ जमदग्नि हँस पड़े और उनसे बोले--&#39;सूर्यदेव! अब तुम्हें भय नहीं मानना चाहिये; क्योंकि तुम मेरे शरणागत हो गये हो ॥। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“ब्राह्मणोंमें जो सरलता है, पृथ्वीमें जो स्थिरता है, सोमका जो सौम्यभाव, सागरकी जो गम्भीरता, अग्निकी जो दीप्ति, मेरुकी जो चमक और सूर्यका जो प्रताप है--इन सबका वह पुरुष उल्लंघन कर जाता है, इन सबकी मर्यादाका नाश करनेवाला समझा जाता है जो शरणागतका वध करता है ।। ९-१० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो शरणागतकी हत्या करता है, उसे गुरुपत्नीगमन, ब्रह्महत्या और मदिरापानका पाप लगता है! ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! इस समय तुम्हारे द्वारा जो यह अपराध हुआ है, उसका कोई समाधान--उपाय सोचो। जिससे तुम्हारी किरणोंद्वारा तपा हुआ मार्ग सुगमतापूर्वक चलने योग्य हो सके” ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! इतना कहकर भृगुश्रेष्ठ जमदग्नि मुनि चुप हो गये। तब भगवान्‌ सूर्यने उन्हें शीघ्र ही छत्र और उपानह दोनों वस्तुएँ प्रदान कीं ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूर्यदेवने कहा--महर्षे! यह छत्र मेरी किरणोंका निवारण करके मस्तककी रक्षा करेगा तथा चमड़ेके बने ये एक जोड़े जूते हैं, जो पैरोंको जलनेसे बचानेके लिये प्रस्तुत किये गये हैं। आप इन्हें ग्रहण कीजिये ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आजसे इस जगत्‌में इन दोनों वस्तुओंका प्रचार होगा और पुण्यके सभी अवसरोंपर इनका दान उत्तम एवं अक्षय फल देनेवाला होगा ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--भारत! छाता और जूता--इन दोनों वस्तुओंका प्राकट्य--छाता लगाने और जूता पहननेकी प्रथा सूर्यने ही जारी की है। इन वस्तुओंका दान तीनों लोकोंमें पवित्र बताया गया है ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये तुम ब्राह्मणोंको उत्तम छाते और जूते दिया करो। उनके दानसे महान धर्म होगा। इस विषयमें मुझे भी संदेह नहीं है | १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! जो ब्राह्मगको सौ शलाकाओंसे युक्त सुन्दर छाता दान करता है, वह परलोकमें सुखी होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतभूषण! वह देवताओं, ब्राह्मणों और अप्सराओंद्वारा सतत सम्मानित होता हुआ इन्द्रलोकमें निवास करता है ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाबाहो! भरतनन्दन! जिसके पैर जल रहे हों ऐसे कठोर व्रतधारी स्नातक द्विजको जो जूते दान करता है, वह शरीर-त्यागके पश्चात्‌ देववन्दित लोकोंमें जाता है और बड़ी प्रसन्नताके साथ गोलोकमें निवास करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ] भरतसत्तम! यह मैंने तुमसे छातों और जूतोंके दानका सम्पूर्ण फल बताया है ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;[सिवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति]&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! इस जगत्‌में शूद्रोंके लिये सदा द्विजातियोंकी सेवाको ही परम धर्म बताया गया है। वह सेवा किन कारणोंसे कितने प्रकारकी कही गयी है?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतभूषण! भरतरत्न! शूद्रोंको द्विजोंकी सेवासे किन लोकोंकी प्राप्ति बतायी गयी है? मुझे धर्मका लक्षण बताइये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! इस विषयमें ब्रह्मवादी पराशरने शूद्रोंपर कृपा करनेके लिये जो कुछ कहा है, उसी इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़े-बूढ़े पराशर मुनिने सब वर्णोॉपर कृपा करनेके लिये शौचाचारसे सम्पन्न निर्मल एवं अनामय धर्मका प्रतिपादन किया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्त्वज्ञ पराशर मुनिने अपने सारे धर्मोपदेशको ठीक-ठीक आनुपूर्वीसहित अपने शिष्योंको पढ़ाया। वह एक सार्थक धर्मशास्त्र था ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पराशरने कहा-मनुष्यको चाहिये कि वह जितेन्द्रिय, मनोनिग्रही, पवित्र, चंचलतारहित, सबल, थधैर्यशील, उत्तरोत्तर वाद-विवाद न करनेवाला, लोभहीन, दयालु, सरल, ब्रह्मवादी, सदाचारपरायण और सर्वभूतहितैषी होकर सदा अपने ही देहमें रहनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मान, मोह और मद--इन छ: शत्रुओंको अवश्य जीते ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बुद्धिमान मनुष्य विधिपूर्वक धैर्यका आश्रय ले गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर, अहंकारशून्य तथा तीनों वर्णोकी सहानुभूतिका पात्र होकर अपनी शक्ति और बलके अनुसार कर्म, मन, वाणी और नेत्र--इन चारोंके द्वारा चार प्रकारके संयमका अवलम्बन ले शान्तचित्त, दमनशील एवं जितेन्द्रिय हो जाय ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दक्ष--ज्ञानीजनोंका नित्य अन्वेषण करनेवाला यज्ञशेष अमृतरूप अन्नका भोजन करे। जैसे भौंरा फूलोंसे मधुका संचय करता है, उसी प्रकार तीनों वर्णोंसे मधुकरी भिक्षाका संचय करते हुए ब्राह्मण भिक्षुको धर्मका आचरण करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणोंका धन है वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय, क्षत्रियोंका धन है बल, वैश्योंका धन है व्यापार और खेती, तथा शूद्रोंका धन है तीनों वर्णोकी सेवा। इस धर्मरूपी धनका उच्छेद करनेसे मनुष्य नरकमें पड़ता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरकसे निकलनेपर ये धर्मरहित निर्दय मनुष्य म्लेच्छ होते हैं और म्लेच्छ होनेके बाद फिर पापकर्म करनेसे उन्हें सदाके लिये नरक और पशु-पक्षी आदि तिर्यक्‌ योनिकी प्राप्ति होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लोग प्राचीन वर्णाश्रमोचित सन्मार्गका आश्रय ले सारे विपरीत मार्गोंका परित्याग करके स्वधर्मके मार्गपर चलते हैं, समस्त प्राणियोंके प्रति दया रखते हैं और क्रोधको जीतकर शास्त्रोक्त विधिसे श्रद्धापूर्वक देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, उनके लिये यथावत्‌ रूपसे क्रमशः सम्पूर्ण धर्मोंके ग्रहणकी विधि तथा सेवाभावकी प्राप्ति आदिका वर्णन करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो विशेषरूपसे शौचका सम्पादन करना चाहते हैं, उनके लिये सभी शौचविषयक प्रयोजनोंका वर्णन करता हूँ। तत्त्वदर्शी विद्वानोंने शास्त्रमें महाशौच आदि विधानोंको प्रत्यक्ष देखा है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ शूद्र भी भिक्षुओंके शौचाचारके लिये मिटटी तथा अन्य आवश्यक पदार्थोंका प्रबन्ध करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो धर्मके ज्ञाता, केवल धर्मके ही आश्रित तथा सम्यक्‌ ज्ञानसे सम्पन्न हैं, उन सर्वहितैषी संन्यासियोंको चाहिये कि वे सज्जनाचरित मार्गपर स्थित हो इस पवित्र कामलतास्वरूप स्थान (मलत्यागके योग्य क्षेत्र आदि) का निश्चय करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह निर्जन एवं घिरे हुए स्थानको देखकर वहाँ सजल पात्र और देख-भाल कर ली हुई मृत्तिका रखे। फिर उस भूमिका भलीभाँति निरीक्षण करके मौन होकर मूत्र-त्यागके लिये बैठे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि दिन हो तो उत्तरकी ओर मुँह करके और रात हो तो दक्षिणाभिमुख होकर मल या मूत्रका त्याग करे। मल त्याग करनेके पूर्व उस समय भूमिको तिनके आदिसे ढके रखना चाहिये तथा अपने मस्तकको भी वस्त्रसे आच्छादित किये रहना उचित है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जबतक शौच-कर्म समाप्त न हो जाय तबतक मुँहसे कुछ न बोले, अर्थात्‌ मौन रहे। शौच-कर्म पूरा करके भी आचमनके अनन्तर जाते समय मौन ही रहे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शौचके लिये बैठा हुआ पुरुष अपने सामने मृत्तिका और जलपात्र रखे। धीर पुरुष कमण्डलुको हाथमें लिये हुए दाहिने पार्श्व और ऊरुके मध्यदेशमें रखे और सावधानीके साथ धीरे-धीरे मूत्र-त्याग करे, जिससे अपने किसी अंगपर उसका छींटा न पड़े ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात्‌ हाथसे विधिपूर्वक शुद्ध जल लेकर मूत्रस्थान (उपस्थ) को ऐसी सावधानीके साथ धोये, जिससे उसमें मूत्रकी बूँदें नलगी रह जायँ तथा अशुद्ध हाथसे दोनों जाँघोंका भी स्पर्श न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि मल त्याग किया गया हो तो गुदाभागको धोते समय उसमें क्रमश: तीन बार मिट्टी लगाये। गुदाको शुद्ध करनेके लिये बारंबार इस प्रकार धोना चाहिये कि जलका आघात कपड़ेमें न लगे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात्‌ बायें हाथमें बारह बार और दाहिनेमें कई बार तीन-तीन बार मिट्टी लगावे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसका कपड़ा मलसे दूषित हो गया है ऐसे पुरुषके लिये द्विगुण शौचका विधान है। उसे दोनों पैरों, दोनों जाँघों और दोनों हाथोंकी विशेष शुद्धि अवश्य करनी चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शौचका पालन न करनेसे शरीर-शुद्धिके विषयमें संदेह बना रहता है। अत: जिस-जिस प्रकारसे शरीर-शुद्धि हो वैसे-ही-वैसे कार्य करनेकी चेष्टा करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मिट्टीके साथ क्षार और रेह मिलाकर उसके द्वारा वस्त्रकी शुद्धि करनी चाहिये। जिसमें कोई अपवित्र वस्तु लग गयी हो उस वस्त्रसे उस वस्तुका लेप मिट जाय और उसकी दुर्गन्‍्ध दूर हो जाय, ऐसी शुद्धिका सम्पादन आवश्यक होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपत्तिकालमें चार, तीन, दो अथवा एक बार मृत्तिका लगानी चाहिये। देश और कालके अनुसार शौचाचारमें गौरव अथवा लाघव किया जा सकता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस विधिसे प्रतिदिन आलस्यका परित्याग करके शौच (शुद्धि) का सम्पादन करे तथा शुद्धिका सम्पादन करनेवाला पुरुष दोनों पैरोंको धोकर इधर-उधर दृष्टि न डालता हुआ बिना किसी घबराहटके चला जाय ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले पैरोंको भलीभाँति धोकर फिर कलाईसे लेकर समूचे हाथको ऊपरसे नीचेतक धो डाले। इसके बाद हाथमें जल लेकर आचमन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आचमनके समय मौन होकर तीन बार जल पीये। उस जलमें किसी प्रकारकी आवाज न हो तथा आचमनके पश्चात्‌ वह जल हृदयतक पहुँचे। विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि वह अंगूठेके मूलभागसे दो बार मुँह पोंछे। इसके बाद इन्द्रियोंके छिद्रोंका स्पर्श करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह प्रथम बार जो जल पीता है, उससे ऋग्वेदको तृप्त करता है, द्वितीय बारका जल यजुर्वेदको और तृतीय बारका जल सामवेदको तृप्त करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहली बार जो मुखका मार्जन किया जाता है, उससे अथर्ववेद तृप्त होता है और द्वितीय बारके मार्जनसे इतिहास-पुराण एवं स्मृतियोंके अधिष्ठाता देवता सन्तुष्ट होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुखमार्जनके पश्चात्‌ द्विज जो अंगुलियोंसे नेत्रोंका स्पर्श करता है, उसके द्वारा वह सूर्यदेवको तृप्त करता है। नासिकाके स्पर्शसे वायुको और दोनों कानोंके स्पर्शसे वह दिशाओंको संतुष्ट करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आचमन करनेवाला पुरुष अपने मस्तकपर जो हाथ रखता है, उसके द्वारा वह ब्रह्माजीको तृप्त करता है और ऊपरकी ओर जो जल फेंकता है, उसके द्वारा वह आकाशके अधिष्ठाता देवताको संतुष्ट करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह अपने दोनों पैरोंपर जो जल डालता है, इससे भगवान्‌ विष्णु प्रसन्न होते हैं। आचमन करनेवाला पुरुष पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके अपने हाथको घुटनेके भीतर रखकर जलका स्पर्श करे। भोजन आदि सभी अवसरोंपर सदा आचमन करनेकी यही विधि है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि दाँतोंमें अन्न लगा हो तो अपनेको जूठा मानकर पुनः आचमन करे, यह शौचाचारकी विधि बतायी गयी। किसी वस्तुकी शुद्धिके लिये उसपर जल छिड़कना भी कर्तव्य माना गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(साधु-सेवाके उद्देश्यसे) घरसे निकलते समय शूद्रके लिये भी यह शौचाचारकी विधि देखी गयी है। जिसने मनको वशमें किया है तथा जो अपने हितकी इच्छा रखता है, ऐसे सुयशकामी शूद्रको चाहिये कि वह सदा शौचाचारसे सम्पन्न होकर ही संन्यासियोंके निकट जाय और उनकी सेवा आदिका कार्य करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्षत्रिय आस्मभ (उत्साह) रूप यज्ञ करनेवाले होते हैं। वैश्योंके यज्ञमें हविष्य (हवनीय पदार्थ) की प्रधानता होती है, शूद्रोंका यज्ञ सेवा ही है, तथा ब्राह्मण जपरूपी यज्ञ करनेवाले होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्र सेवासे जीवननिर्वाह करनेवाले होते हैं, वैश्य व्यापारजीवी हैं, दुष्टोंका दमन करना क्षत्रियोंकी जीवनवृत्ति है और ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे जीवन-निर्वाह करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्योंकि ब्राह्मण तपस्यासे, क्षत्रिय पालन आदिसे, वैश्य अतिथि-सत्कारसे और शाद्र सेवावृतिसे शोभा पाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने मनको वशमें रखनेवाले शूद्रकों सदा ही तीनों वर्णोंकी विशेषतः आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्रिवर्णकी सेवामें अशक्त हुए शूद्रकों अपनी शक्ति, बुद्धि, धर्म तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये। विशेषतः संन्यास-आश्रममें रहनेवाले भिक्षुकी सेवा उसके लिये परम कर्तव्य है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शास्त्रोंके सिद्धान्त-ज्ञानमें निपुण शिष्ट पुरुष चारों आश्रमोंमें संन्यासको ही प्रधान मानते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शिष्ट पुरुष वेदों और स्मृतियोंके विधानके अनुसार जिस कर्तव्यका उपदेश करें असमर्थ पुरुषको उसीका अनुष्ठान करना चाहिये। उसके लिये वही धर्म निश्चित किया गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके विपरीत करनेवाला मानव कल्याणका भागी नहीं होता है, अतः शूद्रको संन्यासियोंकी सेवा करके सदा अपना कल्याण करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके विपरीत करनेवाला मानव कल्याणका भागी नहीं होता है, अतः शूद्रको संन्यासियोंकी सेवा करके सदा अपना कल्याण करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य इस लोकमें जो कल्याणकारी कार्य करता है, उसका फल मुत्युके पश्चात्‌ उसे प्राप्त होता है। जिसे वह अपना कर्तव्य समझता है, उस कार्यको वह दोषदृष्टि न रखते हुए करे। दोषदृष्टि रखते हुए जो कार्य किया जाता है, उसका फल इस जगतमें बड़े दुःखसे प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्रको चाहिये कि वह प्रिय वचन बोले, क्रोधको जीते, आलस्य दूर भगा दे, ईर्ष्याद्वेष से रहित हो जाय, क्षमाशील, शीलवान्‌ तथा सत्यधर्ममें तत्पर रहे। आपत्तिकालमें वह संन्यासियोंके आश्रममें (जाकर) उनकी सेवा करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यही मेरा परम धर्म है, इसीके द्वारा मैं इस अत्यन्त दुस्तर घोर संसार-सागरसे पार हो जाऊँगा। इसमें संशय नहीं है। मैं निर्भय होकर इस देहका त्याग करके परमगतिको प्राप्त हो जाऊँगा। इससे बढ़कर मेरे लिये दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है। यही सनातन धर्म है।” मनही-मन ऐसा विचार करके प्रसन्नचित्त हुआ शूद्र बुद्धिको एकाग्र करके सदा उत्तम शुश्रूषाधर्मका पालन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्रको चाहिये कि वह नियमपूर्वक सेवामें तत्पर रहे, सदा यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करे। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे और सदा कर्तव्याकर्तव्यको जाने ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सभी कार्योमें जो आवश्यक कृत्य हों, उन्हें करके ही दिखावे। जैसे-जैसे संन्यासीको प्रसन्नता हो, उसी प्रकार उसका कार्य साधन करे। जो कार्य संन्यासीके लिये हितकर न हो, उसे कदापि न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो कार्य संन्यास-आश्रमके विरुद्ध न हो तथा जो धर्मके अनुकूल हो, शुभकी इच्छा रखनेवाले शूद्रको वह कार्य सदा बिना विचारे ही करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा ही उन्हें संतुष्ट रखे। जब वे संन्यासी खड़े हों, तब सेवा करनेवाले शूद्रको स्वयं भी खड़ा रहना चाहिये तथा जब वे कहीं जा रहे हों, तब उसे स्वयं भी उनके पीछे-पीछे जाना चाहिये। यदि वे आसनपर बैठे हों तब वह स्वयं भी भूमिपर बैठे। तात्पर्य यह कि सदा ही उनका अनुसरण करता रहे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रात्रिके कार्य पूरे करके प्रतिदिन उनसे आज्ञा लेकर विधिपूर्वक स्नान करके उनके लिये जलसे भरा हुआ कलश ले आकर रखे। फिर संन्यासियोंके स्थानपर जाकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्राह्मण आदि गुरुजनोंको प्रणाम करे। इसी प्रकार स्वधर्मका अनुष्ठान करनेवाले आचार्य आदिको नमस्कार एवं अभिवादन करे। उनका कुशल-समाचार पूछे। पहलेके जो शूद्र आश्रमके कार्यमें सिद्धहस्त हों, उनका स्वयं भी सदा अनुकरण करे, उनके समान कार्यपरायण हो। अपने समानधर्मा शूद्रको प्रणाम करे, दूसरे शूद्रोंकी कदापि नहीं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संन्यासियों अथवा आश्रमके दूसरे व्यक्तियोंको कहे बिना ही प्रतिदिन नियमपूर्वक उठे और झाड़ू देकर आश्रमकी भूमिको लीप-पोत दे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात्‌ धर्मके अनुसार फूलोंका संग्रह करके पूजनीय देवताओंकी उन फूलोंद्वारा पूजा करे। इसके बाद आश्रमसे निकलकर तुरंत ही दूसरे कार्यमें लग जाय ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आश्रमवासियोंके स्वाध्यायमें विघ्न न पड़े, इसके लिये सदा सचेष्ट रहे। जो स्वाध्यायमें विघ्न डालता है, वह पापका भागी होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने-आपको इस प्रकार सावधानीके साथ सेवामें लगाये रखना चाहिये, जिससे वे साधु पुरुष प्रसन्न हों। शूद्रकों सदा इस प्रकार विचार करना चाहिये कि “मैं तो शास्त्रोंमें धर्मतः तीनों वर्णोका सेवक बताया गया हूँ। फिर जो संन्यास-आश्रममें रहकर जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करनेवाले बड़े-बूढ़े संन्यासी हैं, उनकी सेवाके विषयमें तो कहना ही क्या है? (उनकी सेवा करना तो मेरा परम धर्म है ही) ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो केवल ज्ञानदर्शी, वीतराग संन्यासी हैं, उनकी सेवा मुझे विशेषरूपसे मनको वशमें रखते हुए करनी चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उनकी कृपा और तपस्यासे मैं मनोवांछित शुभगति प्राप्त कर लूँगा।&#39; ऐसा निश्चय करके यदि शाूद्र पूर्वोक्त विधिसे संन्यासियोंका सेवन करे तो परम गतिको प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्र सेवाकर्मसे जिस मनोवांछित गतिको प्राप्त कर लेता है, वैसी गति दान तथा उपवास आदिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर सकता ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य जैसे जलसे कपड़ा धोता है, उस जलकी स्वच्छताके अनुसार ही वह वस्त्र स्वच्छ होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्र भी इसी मार्गसे चलकर जैसे पुरुषका सेवन करता है, संसर्गवश वह शीघ्र वैसा हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः शूद्रको चाहिये कि अपने मनको वशमें करके प्रयत्नपूर्वक संन्यासियोंकी सेवा करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो राह चलनेसे थके-माँदे कष्ट पा रहे हों तथा रोगसे पीड़ित हों, उन संन्यासियोंकी उस आपत्तिके समय यत्न और नियमके साथ विशेष सेवा करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनके कुशासन, मृगचर्म और भिक्षापात्रकी भी देखभाल करे तथा उनकी रुचिके अनुसार सारा कार्य करता रहे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब कार्य इस प्रकार सावधानीसे करे, जिससे कोई अपराध न बनने पावे। संन्यासी यदि रोगग्रस्त हो जायेँ तो सदा उद्यत रहकर उनके कपड़े धोवे। उनके लिये ओषधि ले आवे तथा उनकी चिकित्साके लिये प्रयत्न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भिक्षुक बीमार होनेपर भी भिक्षाटनके लिये जाय। विद्वान्‌ चिकित्सकोंके यहाँ उपस्थित हो तथा रोग-निवारणके लिये उपयुक्त विशुद्ध ओषधियोंका संग्रह करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो चिकित्सक प्रसन्नतापूर्वक ओषधि दे, उसीसे संन्यासीको औषध लेना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक दी हुई ओषधियोंको संन्यासी अपने उपयोगमें न ले ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो श्रद्धापूर्वक दी गयी और श्रद्धासे ही ग्रहण की गयी हो, उसी ओषधिके सेवनसे धर्म होता है और रोगोंसे छुटकारा भी मिलता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूद्रको चाहिये कि जबतक यह शरीर छूट न जाय तबतक इसी प्रकार विधिपूर्वक सेवा करता रहे। धर्मका उल्लंघन करके उन साधु-संन्यासियोंके प्रति विपरीत आचरण न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शीत-उष्ण आदि सारे द्वन्ध स्वभावसे ही आते-जाते रहते हैं, समस्त पदार्थ स्वभावसे ही उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं। सारे त्रिगुणमय पदार्थ समुद्रकी लहरोंके समान उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बुद्धिमान्‌ एवं तत्त्वज्ञ पुरुष ऐसा जानता है, वह जलसे निर्लिप्त रहनेवाले पद्मपत्रके समान पापसे लिप्त नहीं होता ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार शूद्रोंकी आलस्यशून्य होकर संन्यासियोंकी सेवाके लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये। वह सब प्रकारकी छोटी-बड़ी सेवाओंद्वारा ऐसी चेष्टा करे, जिससे वे संन्यासी सदा संतुष्ट रहें ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भिक्षुका अपराध कभी न करे, उसकी अवहेलना भी न करे, उसकी कड़ी बातका कभी उत्तर न दे और यदि वह कुपित हो तो उसे प्रसन्न करनेकी चेष्टा करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदा कल्याणकारी बात ही बोले और प्रसन्नतापूर्वक कल्याणकारी कर्म ही करे। संन्यासी कुपित हो तो उसके सामने चुप ही रहे, बातचीत न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संन्यासीको चाहिये कि भाग्यसे कोई वस्तु मिले या न मिले, जो कुछ प्राप्त हो उसीसे जीवन-निर्वाह एवं शरीरका पोषण करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो क्रोधी हो, उससे किसी वस्तुकी याचना न करे। जो ज्ञानसे द्वेष रखता हो, उससे भी कोई वस्तु न माँगे। स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंपर दया करे। जैसे अपने ऊपर उसी प्रकार दूसरोंपर समतापूर्ण दृष्टि डाले ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संन्यासी पुण्यतीर्थोंका निरन्तर सेवन करे, नदियोंके तटपर कुटी बनाकर रहे। अथवा सूने घरमें डेरा डाले। वनमें वृक्षोंके नीचे अथवा पर्वतोंकी गुफाओंमें निवास करे। सदा वनमें विचरण करे। वेदरूपी वनका आश्रय ले, किसी भी स्थानमें एक रात या दो रातससे अधिक न रहे। कहीं भी आसक्त न हो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संन्यासी जंगली फल-मूल अथवा सूखे पत्तेका आहार करे। वह भोगके लिये नहीं, शरीरयात्राके निर्वाहके लिये भोजन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह धर्मतः प्राप्त अन्नका ही भोजन करे। कामना-पूर्वक कुछ भी न खाय। रास्ता चलते समय वह दो हाथ आगेतककी भूमिपर ही दृष्टि रखे और एक दिनमें एक कोससे अधिक न चले ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मान हो या अपमान--वह दोनों अवस्थाओंमें समान भावसे रहे। मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको एक समान समझे। समस्त प्राणियोंको निर्भय करे और सबको अभयकी दक्षिणा दे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शीत-उष्ण आदि द्वद्धोंसे निर्विकार रहे, किसीको नमस्कार न करे। सांसारिक सुख और परिग्रहसे दूर रहे। ममता और अहंकारको त्याग दे। समस्त प्राणियोंमेंसे किसीके भी आश्रित न रहे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वस्तुओंके स्वरूपके विषयमें विचार करके उनके तत्त्वको जाने। सदा सत्यमें अनुरक्त रहे। ऊपर, नीचे या अगल-बगलमें कहीं किसी वस्तुकी कामना न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार विधिपूर्वक यतिधर्मका पालन करनेवाला संन्यासी कालके परिणामवश अपने शरीरको पके हुए फलकी भाँति त्यागकर सनातन ब्रह्ममें प्रविष्ट हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह ब्रह्म निरामय, अनादि, अनन्त, सौम्यगुणसे युक्त, चेतनासे ऊपर उठा हुआ, अनिर्वचनीय, बीजहीन, इन्द्रियातीत, अजन्मा, अजेय, अविनाशी, अभेद्य, सूक्ष्म, निर्मुण, सर्वशक्तिमान्‌, निर्विकार, भूत, वर्तमान और भविष्य कालका स्वामी तथा परमेश्वर है। वही अव्यक्त, अन्तर्यामी पुरुष और क्षेत्र भी है। जो उसे जान लेता है, वह मोक्षको प्राप्त कर लेता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार वह भिक्षु घोंसला छोड़कर उड़ जानेवाले पक्षीकी भाँति यहीं इस शरीरको त्यागकर समस्त पापोंको ज्ञानाग्निसे दग्ध कर देनेके कारण निर्वाण--मीक्ष प्राप्त कर लेता है।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका वैसा ही फल भोगता है। बिना किये हुए कर्मका फल किसीको नहीं भोगना पड़ता है तथा किये हुए कर्मका फल भोगके बिना नष्ट नहीं होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो शुभ कर्मका आचरण करता है, उसे शुभ फलकी ही प्राप्ति होती है और जो अशुभ कर्म करता है, वह अशुभ फलका ही भागी होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः जो अपना कल्याण चाहता हो, वह शुभ-कर्मोंका ही आचरण करे। अशुभ कर्मोको त्याग दे। ऐसा करनेसे वह शुभ फलोंको ही प्राप्त करेगा ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्यको चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न हो। शास्त्रके ज्ञानसे ही मनुष्यको अनामय गतिकी प्राप्ति हो सकती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;साधु पुरुष जिसका अन्वेषण करते हैं, वह परमगति शास्त्रोंमें देखी गयी है। जहाँ पहुँचकर मनुष्य अनन्त दुःखका परित्याग करके अमृतत्वको प्राप्त कर लेता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस धर्मका आश्रय लेकर पापयोनिमें उत्पन्न हुए पुरुष तथा स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र भी परमगतिको प्राप्त कर लेते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर जो दिद्वान्‌ ब्राह्मण अथवा बहुश्रुत क्षत्रिय है, उसकी सदगतिके विषयमें क्या कहना है। जिस देहधारीके पाप क्षीण नहीं हुए हैं, उसे ज्ञान नहीं होता। जब मनुष्यको ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है, तब वह कृतकृत्य हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज्ञान या विज्ञानको प्राप्त कर लेनेपर भी दोषदृष्टिसे रहित हो गुरुजनोंके प्रति पहले हीजैसा सद्भाव रखे। अथवा एकाग्रचित्त होकर पहलेसे भी अधिक श्रद्धाभाव रखे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शिष्य जिस तरह गुरुका अपमान करता है, उसी प्रकार गुरु भी शिष्योंके प्रति बर्ताव करता है। अर्थात्‌ शिष्यको अपने कर्मके अनुसार फल मिलता है। गुरुका अपमान करनेवाले शिष्यका किया हुआ वेद-शास्त्रोंका अध्ययन व्यर्थ हो जाता है। उसका सारा ज्ञान अज्ञानरूपमें परिणत हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह नरकमें जानेके लिये अशुभ मार्गको ही प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। उसका पुण्य नष्ट हो जाता है और ज्ञान अज्ञान हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसने पहले कभी कल्याणका दर्शन नहीं किया है ऐसा मनुष्य शास्त्रोक्त विधिको न देखनेके कारण अभिमानवश मोहको प्राप्त हो जाता है। अतः उसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अत: किसीको भी ज्ञानका अभिमान नहीं करना चाहिये। ज्ञानका फल है शान्ति, इसलिये सदा शान्तिके लिये ही प्रयत्न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनका निग्रह और इन्द्रियोंका संयम करके सदा क्षमाशील तथा अदोषदर्शी होकर गुरुजनोंकी सेवा करनी चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धैर्यके द्वारा उपस्थ और उदरकी रक्षा करे। नेत्रोंके द्वारा हाथ और पैरोंकी रक्षा करे। मनसे इन्द्रियोंक विषयोंको बचावे और मनको बुद्धिमें स्थापित करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले शुद्ध एवं घिरे हुए स्थानमें जाकर आसन ले, उसके ऊपर धैर्यपूर्वक बैठे और शास्त्रोक्त विधिके अनुसार ध्यानके लिये प्रयत्न करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विवेकयुक्त साधक अपने हृदयमें विराजमान परमात्मदेवका साक्षात्कार करे। जैसे आकाशकमें विद्युतका प्रकाश देखा जाता है तथा जिस प्रकार किरणोंवाले सूर्य प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार उस परमात्मदेवको धूमरहित अग्निकी भाँति तेजस्वी स्वरूपसे प्रकाशित देखे। हृदयदेशमें विराजमान उन अविनाशी सनातन परमेश्वरका बुद्धिरूपी नेत्रोंके द्वारा दर्शन करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो योगयुक्त नहीं है ऐसा पुरुष अपने हृदयमें विराजमान उस महेश्वरका साक्षात्कार नहीं कर सकता। योगयुक्त पुरुष ही मनको हृदयमें स्थापित करके बुद्धिके द्वारा उस अन्तर्यामी परमात्माका दर्शन करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि इस प्रकार हृदयदेशमें ध्यान-धारणा न कर सके तो यथावत्‌्रूपसे योगका आश्रय ले सांख्यशास्त्रके अनुसार उपासना करे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस शरीरमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत और सोलहवाँ मन--ये सोलह विकार हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पाँच तन्मात्राएँ, मन, अहंकार और अव्यक्त--ये आठ प्रकृतियाँ हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये आठ प्रकृतियाँ और पूर्वोक्त सोलह विकार--इन चौबीस तत्त्वोंको यहाँ रहनेवाले तत्त्वज्ञ पुरुषको जानना चाहिये। इस प्रकार प्रकृति-पुरुषका विवेक हो जानेसे मनुष्य शरीरके बन्धनसे ऊपर उठकर भवसागरसे पार हो जाता है, अन्यथा नहीं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज्ञानयुक्त बुद्धिवाले पुरुषको यही सांख्ययोग मानना चाहिये। प्रतिदिन शान्तचित्त हो अपने अन्तःकरणको पवित्र बनाने और अपना हित-साधन करनेके लिये इसी प्रकार उपर्युक्त तत्त्वोंका विचार करनेसे मनुष्यको यथार्थ तत्त्वका बोध हो जाता है और वह बन्धनसे छूट जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुद्ध तत्त्वार्थको तत्त्वसे जाननेवाला पुरुष अवयवरहित द्वितीय ब्रह्म हो जाता है ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्यको सेदा सत्पुरुषोंके समीप रहना चाहिये। विद्यामें बड़े-चढ़े पुरुषोंका सेवन करना चाहिये। जो जिसके निकट रहता है, उसके समान वर्णका हो जाता है। जैसे नील पक्षी मेरु पर्वतका आश्रय लेनेसे सुवर्णके समान रंगका हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्छिर! शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेवाले महामुनि पराशर इस प्रकार चारों वर्णोके लिये कर्तव्यका विधान बताकर तथा शुश्रूषा और समाधिसे प्राप्त होनेवाली गतिका निरूपण करके एकाग्रचित्त हो अपने आश्रमको चले गये ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;[सबके पूजनीय और वन्दनीय कौन हैं--इस विषयमें इन्द्र और मातलिका संवाद]&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! इस लोकमें महाभाग देवता किन महात्माओंको मस्तक झुकाते हैं? मैं उन समस्त ऋषियोंका यथार्थ परिचय सुनना चाहता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें प्राचीन बातोंको जाननेवाले महाज्ञानी ब्राह्मण इस इतिहासका वर्णन करते हैं। तुम उस इतिहासको सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब इन्द्र वृत्रासुरको मारकर लौटे, उस समय देवता उन्हें आगे करके खड़े थे। महर्षिगण महेन्द्रकी स्तुति करते थे। हरित वाहनोंवाले देवराज इन्द्र रथपर बैठकर उत्तम शोभासे सम्पन्न हो रहे थे। उसी समय मातलिने हाथ जोड़कर देवराज इन्द्रसे कहा ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मातलि बोले--भगवन्‌! जो सबके द्वारा वन्दित होते हैं, उन समस्त देवताओंके आप अगुआ हैं; परन्तु आप भी इस जगतमें जिनको मस्तक झुकाते हैं, उन महात्माओंका मुझे परिचय दीजिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! मातलिकी वह बात सुनकर शचीपति देवराज इन्द्रने उपर्युक्त प्रश्न पूछनेवाले अपने सारथिसे इस प्रकार कहा ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्र बोले--मातले! धर्म, अर्थ और कामका चिन्तन करते हुए भी जिनकी बुद्धि कभी अधर्ममें नहीं लगती, मैं प्रतिदिन उन्‍्हींको नमस्कार करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मातले! जो रूप और गुणसे सम्पन्न हैं तथा युवतियोंके हृदय-मन्दिरमें हठात्‌ प्रवेश कर जाते हैं--अर्थात्‌ जिन्हें देखते ही युवतियाँ मोहित हो जाती हैं, ऐसे पुरुष यदि काम-भोगसे दूर रहते हैं तो मैं उनके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मातले! जो अपनेको प्राप्त हुए भोगोंमें ही संतुष्ट हैं--दूसरोंसे अधिककी इच्छा नहीं रखते। जो सुन्दर वाणी बोलते हैं और प्रवचन करनेमें कुशल हैं, जिनमें अहंकार और कामनाका सर्वथा अभाव है तथा जो सबसे अर्घ्य पानेके योग्य हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धन, विद्या और ऐश्वर्य जिनकी बुद्धिको विचलित नहीं कर सकते तथा जो चंचल हुई बुद्धिको भी विवेकसे काबूमें कर लेते हैं, उनकी मैं नित्य पूजा करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मातले! जिनका अर्थ और काम धर्ममूलक होकर वृद्धिको प्राप्त हुआ है तथा जिसके धर्म और अर्थ नियत हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्ममूलक धनकी कामना रखनेवाले ब्राह्मणोंको तथा गौओं और पतिव्रता नारियोंको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मातले! जो जीवनकी पूर्व अवस्थामें मानवभोगोंका उपभोग करके तपस्याद्वारा स्वर्गमें आते हैं, उनका मैं सदा ही पूजन करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो भोगोंसे दूर रहते हैं, जिनकी कहीं भी आसक्ति नहीं है, जो सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं, जो सच्चे संन्यासी हैं और पर्वतोंके समान कभी विचलित नहीं होते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोंकी मैं मनसे पूजा करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मातले! जिनकी विद्या ज्ञानके कारण स्वच्छ है, जो सुप्रसिद्ध धर्मके पालनकी इच्छा रखते हैं तथा जिनके शौचाचारकी प्रशंसा दूसरे लोग करते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;[सरोवर खोदाने और वृक्ष लगानेका माहात्म्य]&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--कुरुपुंगव! भरतश्रेष्ठ! सरोवरोंके बनानेका जो फल है, उसे आज मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! जो तालाब बनवाता है वह पुरुष विचित्र धातुओंसे विभूषित धनाध्यक्ष कुबेरके समान दर्शनीय है। वह तीनों लोकोंमें सर्वत्र पूजित होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तालाबका संस्थापन श्रेष्ठ एवं कीर्तिजनक है। वह इस लोक और परलोकमें भी उत्तम निवासस्थान है। वह पुत्रका घर तथा धनकी वृद्धि करनेवाला है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनीषी पुरुषोंने सरोवरोंको धर्म, अर्थ और काम तीनोंका फल देनेवाला बताया है। तालाब देशमें मूर्तिमान्‌ पुण्यस्वरूप है और क्षेत्रमें देशका भारी आश्रय है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं तालाबको चारों (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) प्रकारके प्राणियोंके लिये उपयोगी देखता हूँ। जगतमें जितने भी सरोवर हैं, वे सभी उत्तम सम्पत्ति प्रदान करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा स्थावर भूत--ये सभी जलाशयका आश्रय लेते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः सरोवर खोदवानेमें जो गुण हैं, उन सबका मैं तुमसे वर्णन करूँगा तथा ऋषियों ने तालाब खोदानेसे जिन फलोंकी प्राप्ति बतायी है, उनका भी परिचय दे रहा हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस सरोवरमें एक वर्षतक पानी ठहरता है, उसका फल मनीषी पुरुषोंने अग्निहोत्र बताया है अर्थात्‌ उसे खोदानेवालेको प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेका पुण्य प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके तालाबमें गर्मीभर जल रहता है, उसके लिये ऋषियोंने वाजपेय यज्ञके फलकी प्राप्ति बतायी है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके खोदवाये हुए सरोवरमें सदा साधुपुरुष तथा गौएँ पानी पीती हैं, वह अपने कुलको तार देता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके जलाशयमें प्यासी गौएँ पानी पीती हैं तथा तृषित मृग, पक्षी एवं मनुष्य अपनी प्यास बुझाते हैं, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य उस तालाबमें जो जल पीते, स्नान करते और तटपर विश्राम लेते हैं, वह सारा पुण्य सरोवर बनवानेवालेको परलोकमें अक्षय होकर मिलता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शत्रुओंको संताप देनेवाले तात! जल विशेषरूपसे दुर्लभ वस्तु है; अतः जलदान करनेसे शाश्वत सिद्धि प्राप्त होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तिल, जल, दीप, अन्न और रहनेके लिये घर दान करो, तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ सदा आनन्दित रहो, क्योंकि ये सब वस्तुएँ मरे हुओंके लिये दुर्लभ हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठ जलका दान सभी दानोंसे गुरुतर है। वह समस्त दानोंसे बढ़कर है; अतः उसका दान अवश्य ही करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार यह सरोवर खोदानेका उत्तम फल बताया गया है। इसके बाद वृक्ष लगानेका फल भली प्रकार बताऊँगा ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्थावर भूतोंकी छः जातियाँ बतायी गयी हैं--वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार तथा तृण, वीरुध--ये वृक्षोंकी जातियाँ हैं। इनके लगानेसे ये-ये गुण बताये गये हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कटहल और आम आदि वृक्ष जातिके अन्तर्गत हैं। मन्दार आदि गुल्म कोटियमें माने गये हैं। नागिका, मलिया आदि वल्लीके अन्तर्गत हैं। मालती आदि लताएँ हैं। बाँस और सुपारी आदिके पेड़ त्वक्सार जातिके अन्तर्गत हैं। खेतमें जो घास और अनाज उगते हैं, वे सब तृण जातिमें अन्तर्भूत हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! वृक्ष लगानेसे मनुष्यलोकमें कीर्ति बनी रहती है और मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गलोकमें शुभ फलकी प्राप्ति होती है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष पितरोंद्वारा भी सम्मानित होता है। देवलोकमें जानेपर भी उसका नाम नहीं नष्ट होता। वह अपने बीते हुए पूर्वजों और आनेवाली संतानोंको भी तार देता है। अत: वृक्ष अवश्य लगाने चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके कोई पुत्र नहीं हैं, उसके भी वृक्ष ही पुत्र होते हैं; इसमें संशय नहीं है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष परलोकमें जानेपर स्वर्गमें अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! वृक्ष अपने फूलोंसे देवताओंका, फलोंसे पितरोंका तथा छायासे अतिथियोंका सदा पूजन करते रहते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किन्नर, नाग, राक्षस, देव, गन्धर्व, मनुष्य तथा ऋषिगण भी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फल और फूलोंसे भरे हुए वृक्ष इस जगतमें मनुष्योंको तृप्त करते हैं। जो वृक्ष दान करते हैं, उनके वे वृक्ष परलोकमें पुत्रकी भाँति पार उतारते हैं। अतः कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा ही सरोवरके किनारे वृक्ष लगाना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वृक्ष लगाकर उनकी पुत्रोंकी भाँति रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि वे धर्मतः पुत्र माने गये हैं। जो तालाब बनवाता है और जो उसके किनारे वृक्ष लगाता है, जो द्विज यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा दूसरे जो लोग सत्यभाषण करनेवाले हैं--वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये सरोवर खोदावे और उसके तटपर बगीचे भी लगावे। सदा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करे और विधिपूर्वक सत्य बोले ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छत्रदान और उपानहदानकी प्रशंसानामक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १७५½ श्लोक मिलाकर कुल १९७½ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/3209172131690541168/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-96-chapter-of-entire-mahabharata.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/3209172131690541168'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/3209172131690541168'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-96-chapter-of-entire-mahabharata.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के छानबेवाँ अध्याय (From the 96 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;चौरनबेवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) चौरनबेवें अध्याय के श्लोक 1-54&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इसी विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है। तीर्थयात्राके प्रसंगमें इसी तरहकी शपथको लेकर जो एक घटना घटित हुई थी, उसे बताता हूँ, सुनो || १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतवंशशिरोमणे! महाराज! पूर्वकालमें कुछ राजर्षियों और ब्रह्मर्षियोंने भी इसी प्रकार कमलोंके लिये चोरी की थी || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पश्चिम समुद्रके तटपर प्रभास तीर्थमें बहुत-से ऋषि एकत्र हुए थे। उन समागत महर्षियोंने आपसमें यह सलाह की कि हमलोग अनेक पुण्यतीर्थोंसे भरी हुई समूची पृथ्वीकी यात्रा करें। यह हम सभी लोगोंकी अभिलाषा है। अतः सब लोग साथ-ही-साथ यात्रा प्रारम्भ कर दें ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! ऐसा निश्चय करके शुक्र, अंगिरा, विद्वान्‌ कवि, अगस्त्य, नारद, पर्वत, भृगु, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, गालव मुनि, अष्टक, भरद्वाज, अरुन्धती, वालखिल्यगण, शिबि, दिलीप, नहुष, अम्बरीष, राजा ययाति, धुन्धुमार और पूरु--ये सभी राजर्षि तथा ब्रह्मर्षि वज्रधारी महानुभाव वृत्रहन्ता शतक्रतु इन्द्रको आगे करके यात्राके लिये निकले और सभी तीर्थोमें घूमते हुए माघ मासकी पूर्णिमा तिथिको पुण्यसलिला कौशिकी नदीके तटपर जा पहुँचे || ४--६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार वहाँके तीर्थोंमें स्नानके द्वारा अपने पाप धो करके ऋषिगण उस स्थानसे परम पवित्र ब्रह्मसर तीर्थमें गये। उन अग्निके समान तेजस्वी ऋषियोंने वहाँके जलमें स्नान करके कमलके फूलोंका आहार किया ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! कुछ ऋषि वहाँ कमल खोदने लगे। कुछ ब्राह्मण मृणाल उखाड़ने लगे। इसी बीचमें अगस्त्यजीने उस पोखरेसे जितना कमल उखाड़कर रखा था, वह सब सहसा गायब हो गया। इस बातको सबने देखा ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब अगस्त्यजीने उन समस्त ऋषियोंसे पूछा--&#39;किसने मेरे सुन्दर कमल ले लिये। मैं आप सब लोगोंपर संदेह करता हूँ। मेरे कमल लौटा दीजिये। आप-जैसे साधु पुरुषोंको कमलोंकी चोरी करना कदापि उचित नहीं है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;सुनता हूँ कि काल धर्मकी शक्तिको नष्ट कर देता है। वही काल इस समय प्राप्त हुआ है। तभी तो धर्मको हानि पहुँचायी जा रही है--अस्तेय-धर्मका हनन हो रहा है। अतः इस जगतमें अधर्मका विस्तार न हो इसके पहले ही हम चिरकालके लिये स्वर्गलोकमें चले जायेँ ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“ब्राह्मणलोग गाँवके बीचमें उच्चस्वरसे वेदपाठ करके शूट्रोंको सुनाने लगें तथा राजा व्यावसायिक दृष्टिसे धर्मको देखने लगें, इसके पहले ही मैं परलोकमें चला जाऊँ ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जबतक सभी श्रेष्ठ मनुष्य महान्‌ पुरुषोंकी नीचोंके समान अवहेलना नहीं करते हैं तथा जबतक इस संसारमें अज्ञानजनित तमोगुणका बाहुल्‍य नहीं हो जाता, इसके पहले ही मैं चिरकालके लिये परलोक चला जाऊँ ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“भविष्यकालमें बलवान मनुष्य दुर्बलोंको अपने उपभोगमें लायेंगे, इस बातको मैं अभीसे देख रहा हूँ। इसलिये मैं दीर्घकालके लिये परलोकमें चला जाऊँ। यहाँ रहकर इस जीवजगत्‌की ऐसी दुरवस्था मैं नहीं देख सकता” ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सुनकर सभी महर्षि घबरा उठे और अगस्त्यजीसे बोले--“महर्षे! हमने आपके कमल नहीं चुराये हैं। आपको झूठा कलंक नहीं लगाना चाहिये। हम अपनी सफाई देनेके लिये कठोर-से-कठोर शपथ खा सकते हैं! ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीनाथ! तदनन्तर वे महर्षि तथा नरेशगण वहाँ कुछ निश्चय करके इस धर्मपर दृष्टि रखते हुए पुत्रों और पौत्रोंसहित बारी-बारीसे शपथ खाने लगे ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगु बोले--मुने! जिसने आपके कमलकी चोरी की है, वह गाली सुनकर बदलेमें गाली दे और मार खाकर बदलेमें स्वयं भी मारे तथा दूसरेकी पीठके मांस खाय अर्थात्‌ उपर्युक्त पापोंका भागी हो ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसिष्ठने कहा--जिसने आपके कमल चुराये हो, वह स्वाध्यायसे विमुख हो जाय। कुत्ता साथ लेकर शिकार खेले और गाँव-गाँव भीख माँगता फिरे || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कश्यपने कहा--जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह सब जगह सब तरहकी वस्तुओंकी खरीद-विक्री करे। किसीकी धरोहरको हड़प लेनेका लोभ करे और झूठी गवाही दे, अर्थात्‌ उपर्युक्त पापोंका भागी हो || १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--जिसने आपके कमलकी चोरी की हो, वह अहंकारी, बेईमान और अयोग्यका साथ करनेवाला, खेती करनेवाला और ईरष्यायुक्त होकर जीवन व्यतीत करे ।। १९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंगिराने कहा--जो आपका कमल ले गया हो, वह अपवित्र, वेदको मिथ्या बतानेवाला, ब्रह्महत्यारा और अपने पापोंका प्रायश्चित्त न करनेवाला हो। इतना ही नहीं, वह कुत्तोंकोी साथ लेकर शिकार खेलता फिरे, अर्थात्‌ उपर्युक्त पापोंका भागी हो || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धुन्धुमारने कहा--जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, वह अपने मित्रोंका उपकार न माने। शूद्र जातिकी स्त्रीसे संतान उत्पन्न करे और अकेला ही स्वादिष्ट अन्न भोजन करे। अर्थात्‌ इन पापोंके फलका भागी बने ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूरु बोले--जों आपका कमल चुरा ले गया हो, वह चिकित्साका व्यवसाय (वैद्य या डॉक्टरका पेशा) करे। स्त्रीकी कमाई खाय और ससुरालके धनपर गुजारा करे || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिलीप बोले--जो आपका कमल चुराकर ले गया हो, वह एक कूएँपर सबके साथ पानी भरनेवाले गाँवमें रहकर शूद्र जातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणको मृत्युके पश्चात्‌ जिन दुःखदायी लोकोंमें जाना पड़ता है, उन्हींमें जाय ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुक्रने कहा--जो आपका कमल चुराकर ले गया हो, उसे मांस खानेका, दिनमें मैथुन करनेका और राजाकी नौकरी करनेका पाप लगे ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जमदग्नि बोले--जिसने आपके कमल लिये हों, वह निषिद्ध कालमें अध्ययन करे। मित्रको ही श्राद्धमें जिमावे तथा स्वयं भी शूद्रके श्राद्धमें भोजन करे || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शिबिने कहा--जो आपका कमल चुरा ले गया हो; वह अग्निहोत्र किये बिना ही मर जाय, यज्ञमें विघ्म डाले और तपस्वी जनोंके साथ विरोध करे, अर्थात्‌ इन सब पापोंके फलका भागी हो ।। २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ययातिने कहा--जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, वह व्रतधारी होकर भी ऋतुकालसे अतिरिक्त समयमें स्त्री-समागम करे और वेदोंका खण्डन करे, अर्थात्‌ इन सब पापोंके फलका भागी हो ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नहुष बोले--जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह संन्यासी होकर भी घरमें रहे। यज्ञकी दीक्षा लेकर भी इच्छाचारी हो और वेतन लेकर विद्या पढ़ाये, अर्थात्‌ इन सब पापोंके फलका भागी हो | २८ ॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अम्बरीषने कहा--जो आपका कमल ले गया हो, वह क्रूरस्वभावका हो जाय। स्त्रियों, बन्धु-बान्धवों और गौओंके प्रति अपने धर्मका पालन न करे तथा ब्रह्महत्याके पापका भागी हो ।। २९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारदजीने कहा--जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह देहरूपी घरको ही आत्मा समझे। मर्यादाका उल्लंघन करके शास्त्र पढ़े। स्वरहीन पदका उच्चारण करे और गुरुजनोंका अपमान करता रहे, अर्थात्‌ उपर्युक्त पापोंका भागी बने || ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाभाग बोले--जिसने आपके कमल चुराये हों, उसे सदा झूठ बोलनेका, संतोंके साथ विरोध करनेका और कीमत लेकर कन्या बेचनेका पाप लगे || ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कविने कहा--जिसने आपका कमल लिया हो, उसे गौको लात मारनेका, सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करनेका और शरणागतको त्याग देनेका पाप लगे ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विश्वामित्र बोले--जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह वैश्यका भृत्य होकर उसीके खेतमें वर्षा होनेमें बाधा उपस्थित करे। राजाका पुरोहित हो और यज्ञके अनधिकारीका यज्ञ करानेके लिये ऋत्विक्‌ बने, अर्थात्‌ इन पापोंके फलका भागी हो ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर्वतने कहा--जो आपका कमल ले गया हो, वह गाँवका मुखिया हो जाय, गधेकी सवारीपर चले तथा पेट भरनेके लिये कुत्तोंकी साथ लेकर शिकार खेले ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरद्वाजने कहा--जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, उस पापीको निर्दयी और असत्यवादी मनुष्योंमें रहनेवाला सारा-का-सारा पाप सदा ही प्राप्त होता रहे || ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अष्टक बोले--जो आपका कमल ले गया हो, वह राजा मन्दबुद्धि, स्वेच्छाचारी और पापात्मा होकर अधर्मपूर्वक इस पृथ्वीका शासन करे ।। ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गालव बोले--जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह महापापियोंसे भी बढ़कर अनादरणीय हो, स्वजनोंका भी अपकार करे तथा दान देकर अपने ही मुखसे उसका बखान करे ।। ३७ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अरुन्धती बोलीं--जिस स्त्रीने आपका कमल लिया हो, वह अपने सासकी निन्दा करे, पतिके लिये अपने मनमें दुर्भावना रखे और अकेली ही स्वादिष्ट भोजन किया करे, अर्थात्‌ इन सब पापोंकी फलभागिनी बने ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बालखिल्य बोले--जो आपका कमल ले गया हो, वह अपनी जीविकाके लिये गाँवके दरवाजेपर एक पैरसे खड़ा रहे और धर्मको जानते हुए भी उसका परित्याग करे ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुन:सख बोले--जो आपका कमल ले गया हो, वह द्विज होकर भी सबेरे और शामको अग्निहोत्रकी अवहेलना करके सुखसे सोये तथा संन्यासी होकर भी मनमाना बर्ताव करे, अर्थात्‌ उपर्युक्त पापोंके फलका भागी हो ।। ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुरभि बोली--जो गाय आपका कमल ले गयी हो, उसके पैर बालोंकी रस्सीसे बाँधे जाय, उसके दूधके लिये ताँबे मिले हुए धातुका दोहनपात्र हो और वह दूसरे गायके बछड़ेसे दुही जाय ।। ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--कौरवेन्द्र! इस प्रकार जब सब लोग नाना प्रकारकी अनेकानेक शपथ कर चुके, तब सहस् नेत्रधारी देवराज इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और उन विप्रवर अगस्त्यको कुपित हुआ देख उनके सामने प्रकट हो गये || ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों तथा राजर्षियोंके बीचमें कुपित हुए महर्षि अगस्त्यको सम्बोधित करके देवराज इन्द्रने जो अपना अभिप्राय व्यक्त किया, उसे आज तुम मेरे मुखसे यहाँ सुनो ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्र बोले--ब्रह्म)! जो आपका कमल ले गया हो, वह ब्रह्मचर्य व्रतको पूर्ण करके आये हुए यजुर्वेदी अथवा सामवेदी विद्वानको कन्यादान दे। अथवा वह ब्राह्मण अथर्ववेदका अध्ययन पूरा करके शीघ्र ही स्नातक बन जाय ।। ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करे। पुण्यात्मा और धार्मिक हो, तथा मृत्युके पश्चात्‌ वह ब्रह्माजीके लोकमें जाय ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगस्त्यने कहा--बलसूदन! आपने जो शपथ की है, वह तो आशीर्वादस्वरूप है। अतः आपने ही मेरे कमल लिये हैं, कृपया उन्हें मुझे दे दीजिये। यही सनातन धर्म है || ४६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्र बोले--भगवन्‌! मैंने लोभवश कमलोंको नहीं लिया था। आपलोगोंके मुखसे धर्मकी बातें सुनना चाहता था, इसीलिये इन कमलोंका अपहरण कर लिया था। अतः मुझपर क्रोध न कीजियेगा।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज मैंने आपलोगोंके मुखसे उस आर्ष सनातन धर्मका श्रवण किया है जो नित्य अविकारी, अनामय और संसार-सागरसे पार उतारनेके लिये पुलके समान है। इससे धार्मिक श्रुतियोंका उत्कर्ष सिद्ध होता है ।। ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;द्विजश्रेष्ठ! विद्वन्‌! अब आप अपने ये कमल लीजिये। भगवन्‌! अनिन्दनीय महर्षे! मेरा अपराध क्षमा कीजिये ।। ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महेन्द्रके ऐसा कहनेपर वे क्रोधी तपस्वी बुद्धिमान्‌ अगस्त्य मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने इन्द्रके हाथसे अपने कमल ले लिये || ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर उन सब लोगोंने वनके मार्गोंसे होते हुए पुनः तीर्थयात्रा आरम्भ की और पुण्यतीर्थोमें जा-जाकर गोते लगाकर स्नान किया ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो प्रत्येक पर्वके अवसरपर एकाग्रचित्त हो इस पवित्र आख्यानका पाठ करता है, वह कभी मूर्ख पुत्रको नहीं जन्म देता है, तथा स्वयं भी किसी अंगसे हीन या असफलमनोरथ नहीं होता है || ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके ऊपर कोई आपत्ति नहीं आती। वह चिन्तारहित होता है। उसके ऊपर जरावस्थाका आक्रमण नहीं होता। वह रागशून्य होकर कल्याणका भागी होता है तथा मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गलोकमें जाता है || ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठ जो ऋषियोंद्वारा सुरक्षित इस शास्त्रका अध्ययन करता है, वह अविनाशी ब्रह्मधामको प्राप्त होता है ।। ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शपथविधिनामक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;पंचानबेवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) पंचानबेवें अध्याय के श्लोक 1-28&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! श्राद्धकर्मोमें जिनका दान दिया जाता है, उन छत्र और उपानहोंके दानकी प्रथा किसने चलायी है? ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनकी उत्पत्ति कैसे हुई और किसलिये इनका दान किया जाता है? केवल श्राद्धकर्ममें ही नहीं, अनेक पुण्यके अवसरोंपर भी इनका दान होता है ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बहुत-से निमित्त उपस्थित होनेपर पुण्यके उद्देश्यसे इन वस्तुओंके दानकी प्रथा देखी जाती है। अतः राजन! मैं इस विषयको विस्तारके साथ यथावत्‌ रूपसे सुनना चाहता हूँ ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! छाते और जूतेकी उत्पत्तिकी वार्ता मैं विस्तारके साथ बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो। संसारमें किस प्रकार इनके दानका आरम्भ हुआ और कैसे उस दानका प्रचार हुआ, यह सब श्रवण करो ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! इन दोनों वस्तुओंका दान किस तरह अक्षय होता है, तथा ये किस प्रकार पुण्यकी प्राप्ति करानेवाली मानी गयी हैं। इन सब बातोंका मैं पूर्णरूपसे वर्णन करूंगा।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! इस विषयमें महर्षि जमदग्नि और महात्मा भगवान्‌ सूर्यके संवादका वर्णन किया जाता है। पूर्वकालकी बात है, एक दिन भृगुनन्दन भगवान्‌ जमदग्निजी धनुष चलानेकी क्रीड़ा कर रहे थे। धर्मसे च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! वे बारंबार धनुषपर बाण रखकर उन्हें चलाते और उन चलाये हुए सम्पूर्ण तेजस्वी बाणोंको उनकी पत्नी रेणुका ला-लाकर दिया करती थीं ।। ६-७ ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि और बाणके छूटनेकी सनसनाहटसे जमदग्नि मुनि बहुत प्रसन्न होते थे। अतः वे बार-बार बाण चलाते और रेणुका उन्हें दूरसे उठा-उठाकर लाया करती थीं ।। ८६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जनेश्वर! इस प्रकार बाण चलानेकी क्रीड़ा करते-करते ज्येष्ठ मासके सूर्य दिनके मध्यभागमें आ पहुँचे। विप्रवर जमदग्निने पुन: बाण छोड़कर रेणुकासे कहा--&#39;सुभ्रु! विशाललोचने! जाओ, मेरे धनुषसे छूटे हुए इन बाणोंको ले आओ, जिससे मैं पुनः इन सबको धनुषपर रखकर छोड़ूँ&#39; ।। ९-१० ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मानिनी रेणुका वृक्षोंक बीचसे होकर उनकी छायाका आश्रय ले जाती हुई बीच-बीचमें ठहर जाती थी; क्योंकि उसके सिर और पैर तप गये थे | ११ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कजरारे नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी देवी एक जगह दो ही घड़ी ठहरकर पतिके शापके भयसे पुनः उन बाणोंको लानेके लिये चल दी || १२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन बाणोंको लेकर सुन्दर अंगोंवाली यशस्विनी रेणुका जब लौटी; उस समय वह बहुत खिन्न हो गयी थी। पैरोंके जलनेसे जो दुःख होता था, उसको किसी तरह सहती और पतिके भयसे थर-थर काँपती हुई उनके पास आयी ।। १३-१४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस समय महर्षि कुपित होकर सुन्दर मुखवाली अपनी पत्नीसे बारंबार पूछने लगे -- रेणुके! तुम्हारे आनेमें इतनी देर क्‍यों हुई?” ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रेणुका बोली--तपोधन! मेरा सिर तप गया, दोनों पैर जलने लगे और सूर्यके प्रचण्ड तेजने मुझे आगे बढ़नेसे रोक दिया। इसलिये थोड़ी देरतक वृक्षकी छायामें खड़ी होकर विश्राम लेने लगी थी ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्म! इसी कारणसे मैंने आपका यह कार्य कुछ विलम्बसे पूरा किया है। तपोधन! प्रभो! मेरे इस बातपर ध्यान देकर आप क्रोध न करें ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जमदग्निने कहा-रेणुके! जिसने तुझे कष्ट पहुँचाया है, उस उद्दधीप्त किरणोंवाले सूर्यको आज मैं अपने बाणोंसे, अपनी अस्त्राग्निके तेजसे गिरा दूँगा || १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! ऐसा कहकर महर्षि जमदग्निने अपने दिव्य धनुषकी प्रत्यंचा खींची और बहुत-से बाण हाथमें लेकर सूर्यकी ओर मुँह करके वे खड़े हो गये। जिस दिशाकी ओर सूर्य जा रहे थे, उसी ओर उन्होंने भी अपना मुँह कर लिया था ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! उन्हें युद्धके लिये तैयार देख सूर्यदेव ब्राह्मणका रूप धारण करके उनके पास आये और बोले--&#39;ब्रह्मन! सूर्यने आपका क्या अपराध किया है? ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूर्यदेव तो आकाशगमें स्थित होकर अपनी किरणों-द्वारा वसुधाका रस खींचते हैं और बरसातमें पुनः उसे बरसा देते हैं | २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“विप्रवर! उसी वर्षासे अन्न उत्पन्न होता है, जो मनुष्योंके लिये सुखदायक है। अन्न ही प्राण है, यह बात वेदमें भी बतायी गयी है || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“ब्रह्मम!)! अपने किरणसमूहसे घिरे हुए भगवान्‌ सूर्य बादलोंमें छिपकर सातों द्वीपोंकी पृथ्वीको वर्षकि जलसे आप्लावित करते हैं ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उसीसे नाना प्रकारकी ओषधियाँ, लताएँ, पत्र-पुष्प, घास-पात आदि उत्पन्न होते हैं। प्रभो! प्राय: सभी प्रकारके अन्न वर्षकि जलसे उत्पन्न होते हैं | २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जातकर्म, व्रत, उपनयन, विवाह, गोदान, यज्ञ सम्पत्ति, शास्त्रीय दान, संयोग और धनसंग्रह आदि सारे कार्य अन्नसे ही सम्पादित होते हैं। भूगुनन्दन! इस बातको आप भी अच्छी तरह जानते हैं || २५-२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जितने सुन्दर पदार्थ हैं, अथवा जो भी उत्पादक पदार्थ हैं, वे सब अन्नसे ही प्रकट होते हैं। यह सब मैं ऐसी बात बता रहा हूँ जो आपको पहलेसे ही विदित हैं || २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“विप्रवर! ब्रह्मर्षे! मैंने जो कुछ भी कहा है, वह सब आप भी जानते हैं। भला, सूर्यको गिरानेसे आपको क्या लाभ होगा? अतः मैं प्रार्थनापूर्वक आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ (कृपया सूर्यको नष्ट करनेका संकल्प छोड़ दीजिये)” || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छ॒त्र और उपानहकी उत्पत्तिनामक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/8853331704982098541/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-94-chapter-and-95-chapter-of.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/8853331704982098541'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/8853331704982098541'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-94-chapter-and-95-chapter-of.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के चौरानबेवाँ अध्याय व पंचानबेवाँ अध्याय (From the 94 chapter and the 95 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;इक्यानबेवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) इक्यानबेवें अध्याय के श्लोक 1-45&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमे निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्लवेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! श्राद्ध कब प्रचलित हुआ? सबसे पहले किस महर्षिने इसका संकल्प किया अर्थात्‌ प्रचार किया? श्राद्धका स्वरूप क्‍या है? यदि भूगु और अंगिराके समयमें इसका प्रारम्भ हुआ तो किस मुनिने इसको प्रकट किया? श्राद्धमें कौनकौनसे कर्म, कौन-कौनसे फल-मूल और कौन-कौनसे अन्न त्याग देने योग्य हैं? वह मुझसे कहिये ।। १-२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन! श्राद्धका जिस समय और जिस प्रकार प्रचलन हुआ, जो इसका स्वरूप है तथा सबसे पहले जिसने इसका संकल्प किया अर्थात्‌ प्रचार किया, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुनन्दन! महाराज! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीसे महर्षि अत्रिकी उत्पत्ति हुई। वे बड़े प्रतापी ऋषि थे। उनके वंभमें दत्तात्रेयजीका प्रादुर्भाव हुआ ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दत्तात्रेयके पुत्र निमि हुए, जो बड़े तपस्वी थे। निमिके भी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम था श्रीमान। वह बड़ा कान्तिमान्‌ था ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसने पूरे एक हजार वर्षोतक बड़ी कठोर तपस्या करके अन्तमें काल-धर्मके अधीन होकर प्राण त्याग दिया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर निमि शास्त्रोक्त कर्मद्वारा अशौच निवारण करके पुत्र-शोकमें मग्न हो अत्यन्त संतप्त हो उठे || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर परम बुद्धिमान्‌ निमि चतुर्दशीके दिन श्राद्धमें देने योग्य सब वस्तुएँ एकत्रित करके पुत्रशोकसे ही चिन्तित हो रात बीतनेपर (अमावास्याको श्राद्ध करनेके लिये) प्रात:काल उठे ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रातःकाल जागनेपर उनका मन पुत्रशोकसे व्यथित होता रहा; किन्तु उनकी बुद्धि बड़ी विस्तृत थी। उसके द्वारा उन्होंने ममको शोककी ओरसे हटाया और एकाग्रचित्त होकर श्राद्धवेधिका विचार किया ।। ९३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर श्राद्धके लिये शास्त्रोंमें जो फल-मूल आदि भोज्य पदार्थ बताये गये हैं तथा उनमेंसे जो-जो पदार्थ उनके पुत्रको प्रिय थे, उन सबका मन-ही-मन निश्चय करके उन तपोधनने संग्रह किया ।। १०-११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर, उन महान्‌ बुद्धिमान्‌ मुनिने अमावास्याके दिन सात ब्राह्मणोंको बुलाकर उनकी पूजा की और उनके लिये स्वयं ही प्रदक्षिण भावसे मोड़े हुए कुशके आसन बनाकर उन्हें उनपर बिठाया ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभावशाली निमिने उन सातोंको एक ही साथ भोजनके लिये अलोना सावाँ परोसा ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके बाद भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंके पैरोंके नीचे आसनोंपर उन्होंने दक्षिणाग्र कुश बिछा दिये और (अपने सामने भी) दक्षिणाग्र कुश रखकर पवित्र एवं सावधान हो अपने पुत्र श्रीमानके नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए कुशोंपर पिण्डदान किया ।। १४-१५&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार श्राद्ध करनेके पश्चात्‌ मुनिश्रेष्ठ निमि अपनेमें धर्मसंकरताका दोष मानकर (अर्थात्‌ वेदमें पिता-पितामह आदिके उद्देश्यसे जिस श्राद्धका विधान है, उसको मैंने स्वेच्छासे पुत्रके निमित्त किया है--यह सोचकर) महान पश्चात्तापसे संतप्त हो उठे और इस प्रकार चिन्ता करने लगे-- || १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अहो! मुनियोंने जो कार्य पहले कभी नहीं किया, उसे मैंने ही क्यों कर डाला? मेरे इस मनमाने बर्तावको देखकर ब्राह्मणलोग मुझे अपने शापसे क्‍यों नहीं भस्म कर डालेंगे?” || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह बात ध्यानमें आते ही उन्होंने अपने वंशप्रवर्तक महर्षि अत्रिका स्मरण किया। उनके चिन्तन करते ही तपोधन अत्रि वहाँ आ पहुँचे ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आनेपर जब अविनाशी अत्रिने निमिको पुत्रशोकसे व्याकुल देखा तब मधुर वाणीद्वारा उन्हें बहुत आश्वासन दिया-- ।। १९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तपोधन निमे! तुमने जो यह पितृयज्ञ किया है, इससे डरो मत। सबसे पहले स्वयं ब्रह्माजीने इस धर्मका साक्षात्कार किया है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अतः तुमने यह ब्रह्माजीके चलाये हुए धर्मका ही अनुष्ठान किया है। ब्रह्माजीके सिवा दूसरा कौन इस श्राद्धविधिका उपदेश कर सकता है ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“बेटा! अब मैं तुमसे स्वयम्भू ब्रह्माजीकी बतायी हुई श्राद्धकी उत्तम विधिका वर्णन करता हूँ, इसे सुनो और सुनकर इसी विधिके अनुसार श्राद्धका अनुष्ठान करो ।। २२ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तब तपोधन! पहले वेदमन्त्रके उच्चारणपूर्वक अग्नौकरण--अग्निकरणकी क्रिया पूरी करके अग्नि, सोम, वरुण और पितरोंके साथ नित्य रहनेवाले विश्वेदेवोंको उनका भाग सदा अर्पण करे। साक्षात्‌ ब्रह्माजीने इनके भागोंकी कल्पना की है || २३-२४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तदनन्तर श्राद्धकी आधारभूता पृथ्वीकी वैष्णवी, काश्यपी और अक्षया आदि नामोंसे स्तुति करनी चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अनघ! श्राद्धके लिये जल लानेके लिये भगवान्‌ वरुणका स्तवन करना उचित है। इसके बाद तुम्हें अग्नि और सोमको भी तृप्त करना चाहिये || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“ब्रह्माजीके ही उत्पन्न किये हुए कुछ देवता पितरोंके नामसे प्रसिद्ध हैं। उन महाभाग पितरोंको उष्णप भी कहते हैं। स्वयम्भूने श्राद्धमें उनका भाग निश्चित किया है ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;श्राद्धके द्वारा उनकी पूजा करनेसे श्राद्धकर्ताके पितरोंका पापसे उद्धार हो जाता है। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन अग्निष्वात्त आदि पितरोंको श्राद्धका अधिकारी बताया है, उनकी संख्या सात है ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“विश्वेदेवोंकी चर्चा तो मैंने पहले ही की है, उन सबका मुख अग्नि है। यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी उन महात्माओंके नामोंको कहता हूँ ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“बल, धृति, विपाप्मा, पुण्यकृत्‌, पावन, पर्ष्पिक्षेमा, समूह, दिव्यसानु, विवस्वान्‌, वीर्यवान्‌, हीमान्‌, कीर्तिमान, कृत, जितात्मा, मुनिवीर्य, दीप्तरोमा, भयंकर, अनुकर्मा, प्रतीत, प्रदाता, अंशुमान, शैलाभ, परमक्रोधी, धीरोष्णी, भूपति, स्रज, वज्री, वरी, विश्वेदेव, विद्युद्वर्चा, सोमवर्चा, सूर्यश्री, सोमप, सूर्यसावित्र, दत्तात्मा, पुण्डरीयक, उष्पीनाभ, नभोद, विश्वायु, दीप्ति, चमूहर, सुरेश, व्योमारि, शंकर, भव, ईश, कर्ता, कृति, दक्ष, भुवन, दिव्यकर्मकृत्‌, गणित, पंचवीर्य, आदित्य, रश्मिवान्‌ू, सप्तकृत, सोमवर्चा, विश्वकृत, कवि, अनुगोप्ता, सुगोप्ता, नप्ता और ईश्वर। इस प्रकार सनातन विश्वेदेवोंके नाम बतलाये गये। ये महाभाग कालकी गतिके जाननेवाले कहे गये हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अब श्राद्धमें निषिद्ध अन्न आदि वस्तुओंका वर्णन करता हूँ। अनाजमें कोदो और पुलक-सरसो, हिंगुद्रव्य--छौंकनेके काम आनेवाले पदार्थोंमें हींग आदि पदार्थ, शाकोंमें प्याज, लहसुन, सहिजन, कचनार, गाजर, कुम्हडा और लौकी आदि; कालानमक, गाँवमें पैदा होनेवाले वाराहीकन्दका गूदा, अप्रोक्षित--जिसका प्रोक्षण नहीं किया गया (संस्कारहीन), काला जीरा, बीरिया सौंचर नमक, शीतपाकी (शाक-विशेष), जिसमें अंकुर उत्पन्न हो गये हों ऐसे मूँग और सिंघाड़ा आदि। ये सब वस्तुएँ श्राद्धमें वर्जित हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“सब प्रकारका नमक, जामुनका फल तथा छींक या आँसूसे दूषित हुए पदार्थ भी श्राद्धमें त्याग देने चाहिये ।।४०।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“सब प्रकारका नमक, जामुनका फल तथा छींक या आँसूसे दूषित हुए पदार्थ भी श्राद्धमें त्याग देने चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;श्राद्धविषयक हव्य-कव्यमें सुदर्शनसोमलता निन्दित है। उस हविको विश्वेदेव एवं पितृगण पसंद नहीं करते हैं || ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“पिण्डदानका समय उपस्थित होनेपर उस स्थानसे चाण्डालों और श्वपचोंको हटा देना चाहिये। गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाला संन्यासी, कोढ़ी, पतित, ब्रह्महत्यारा, वर्णसंकर ब्राह्मण तथा धर्मभ्रष्ट सम्बन्धी भी श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर विद्दानोंद्वारा वहाँसे हटा देने योग्य हैं! || ४३-४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालमें अपने वंशज निमि ऋषिको श्राद्धके विषयमें यह उपदेश देकर तपस्याके धनी भगवान्‌ अगत्रि ब्रह्माजीकी दिव्य सभामें चले गये || ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें श्राद्धकल्पविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;बानबेवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) बानबेवें अध्याय के श्लोक 1-23&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“पितर और देवताओंका श्राद्धान्नसे अजीर्ण होकर ब्रह्माजीके पास जाना और अग्निके द्वारा अजीर्णका निवारण, श्राद्धसे तृप्त हुए पितरोंका आशीर्वाद”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इस प्रकार जब महर्षि निमि पहले-पहल श्राद्धमें प्रवृत्त हुए, उसके बाद सभी महर्षि शास्त्रविधिके अनुसार पितृयज्ञका अनुष्ठान करने लगे ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले और नियमपूर्वक व्रत धारण करनेवाले महर्षि पिण्डदान करनेके पश्चात्‌ तीर्थके जलसे पितरोंका तर्पण भी करते थे | २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! धीरे-धीरे चारों वर्णोके लोग श्राद्धमें देवताओं और पितरोंको अन्न देने लगे। लगातार श्राद्धमें भोजन करते-करते वे देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गये। अब वे अन्न पचानेके प्रयत्नमें लगे। अजीर्णसे उन्हें विशेष कष्ट होने लगा। तब वे सोम देवताके पास गये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सोमके पास जाकर वे अजीर्णसे पीड़ित पितर इस प्रकार बोले--&#39;देव! हम श्राद्धान्नसे बहुत कष्ट पा रहे हैं। अब आप हमारा कल्याण कीजिये! ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब सोमने उनसे कहा--&#39;देवताओ! यदि आप कल्याण चाहते हैं तो ब्रह्माजीकी शरणमें जाइये, वही आपलोगोंका कल्याण करेंगे&#39; || ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! सोमके कहनेसे वे पितरोंसहित देवता मेरुपर्वतके शिखरपर विराजमान ब्रह्माजीके पास गये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितरोंने कहा--भगवन्‌! निरन्तर श्राद्धका अन्न खानेसे हम अजीर्णतावश अत्यन्त वष्ट पा रहे हैं। देव! हमलोगोंपर कृपा कीजिये और हमें कल्याणके भागी बनाइये ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितरोंकी यह बात सुनकर स्वयम्भू ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा--“देवगण! मेरे निकट ये अग्निदेव विराजमान हैं। ये ही तुम्हारे कल्याणकी बात बतायेंगे” || ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्नि बोले--देवताओे और पितरो! अबसे श्राद्धका अवसर उपस्थित होनेपर हमलोग साथ ही भोजन किया करेंगे। मेरे साथ रहनेसे आपलोग उस अन्नको पचा सकेंगे, इसमें संशय नहीं है ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! अग्निकी यह बात सुनकर वे पितर निश्चिंत हो गये; इसीलिये श्राद्धमें पहले अग्निको ही भाग अर्पित किया जाता है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुरुषप्रवर! अग्निमें हवन करनेके बाद जो पितरोंके निमित्त पिण्डदान दिया जाता है, उसे ब्रह्मराक्षस दूषित नहीं करते ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निदेवके विराजमान रहनेपर राक्षस वहाँसे भाग जाते हैं। सबसे पहले पिताको पिण्ड देना चाहिये, फिर पितामहको ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर प्रपितामहको पिण्ड देना चाहिये। यह श्राद्धकी विधि बतायी गयी है। श्राद्धमें एकाग्रचित्त हो प्रत्येक पिण्ड देते समय गायत्री-मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पिण्ड-दानके आरम्भमें पहले अग्नि और सोमके लिये जो दो भाग दिये जाते हैं, उनके मन्त्र क्रमश: इस प्रकार हैं--&lt;b&gt;“अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा”, “सोमाय पितृमते स्वाहा ।&#39;&lt;/b&gt; जो स्त्री रजस्वला हो अथवा जिसके दोनों कान बहरे हों, उसको श्राद्धमें नहीं ठहरना चाहिये। दूसरे वंशकी स्त्रीको भी श्राद्धकर्ममें नहीं लेना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जलको तैरते समय पितामहों (के नामों) का कीर्तन करे। किसी नदीके तटपर जानेके बाद वहाँ पितरोंके लिये पिण्डदान और तर्पण करना चाहिये ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले अपने वंशमें उत्पन्न पितरोंका जलके द्वारा तर्पण करके तत्पश्चात्‌ सुहृद्‌ और सम्बन्धियोंके समुदायको जलांजलि देनी चाहिये || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो चितकबरे रंगके बैलोंसे जुती गाड़ीपर बैठकर नदीके जलको पार कर रहा हो, उसके पितर इस समय मानो नावपर बैठकर उससे जलांजलि पानेकी इच्छा रखते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अत: जो इस बातको जानते हैं, वे एकाग्रचित्त हो नावपर बैठनेपर सदा ही पितरोंके लिये जल दिया करते हैं। महीनेका आधा समय बीत जानेपर कृष्णपक्षकी अमावास्या तिथिको अवश्य श्राद्ध करना चाहिये। पितरोंकी भक्तिसे मनुष्यको पुष्टि, आयु, वीर्य और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है ।। १९३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुकुलश्रेष्ठ! ब्रह्मा, पुलस्त्य, वसिष्ठ, पुलह, अंगिरा, क्रतु और महर्षि कश्यप--ये सात ऋषि महान्‌ योगेश्वर और पितर माने गये हैं। राजन! इस प्रकार यह श्राद्धकी उत्तम विधि बतायी गयी || २०-२१ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रेत (मरे हुए पिता आदि) पिण्डके सम्बन्धसे प्रेतत्वके कष्टसे छुटकारा पा जाते हैं। पुरुषश्रेष्ठट यह मैंने शास्त्रके अनुसार तुम्हें पूर्वमें बताये श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रसंग विस्तारपूर्वक बताया है। अब दानके विषयमें बताऊँगा ।। २२-२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें श्राद्धल्पविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;तिरानबेवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) तिरानबेवें अध्याय के श्लोक 1-146½&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“गृहस्थके धर्मोका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! यदि व्रतधारी विप्र किसी ब्राह्मणकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उसके घर श्राद्धका अन्न भोजन कर ले तो इसे आप कैसा मानते हैं? (अपने व्रतका लोप करना उचित है या ब्राह्मणकी प्रार्थना अस्वीकार करना) ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! जो वेदोक्त व्रतका पालन नहीं करते, वे ब्राह्मणकी इच्छापूर्तिके लिये श्राद्धमें भोजन कर सकते हैं; किंतु जो वैदिक व्रतका पालन कर रहे हों, वे यदि किसीके अनुरोधसे श्राद्धका अन्न ग्रहण करते हैं तो उनका व्रत भंग हो जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! साधारण लोग जो उपवासको ही तप कहा करते हैं, उसके सम्बन्धमें आपकी क्या धारणा है? मैं यह जानना चाहता हूँ कि वास्तवमें उपवास ही तप है या उसका और कोई स्वरूप है ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! जो लोग पंद्रह दिन या एक महीनेतक उपवास करके उसे तपस्या मानते हैं, वे व्यर्थ ही अपने शरीरको कष्ट देते हैं। वास्तवमें केवल उपवास करनेवाले न तपस्वी हैं, न धर्मज्ञ || ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्यागका सम्पादन ही सबसे उत्तम तपस्या है। ब्राह्मणको सदा उपवासी (व्रतपरायण), ब्रह्मचारी, मुनि और वेदोंका स्वाध्यायी होना चाहिये || ५½ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मपालनकी इच्छासे ही उसको स्त्री आदि कुटुम्बका संग्रह करना चाहिये (विषयभोगके लिये नहीं)। ब्राह्मणको उचित है कि वह सदा जाग्रत्‌ रहे, मांस कभी न खाय, पवित्रभावसे सदा वेदका पाठ करे, सदा सत्य भाषण करे और इन्द्रियोंको संयममें रखे। उसको सदा अमृताशी, विधघसाशी और अतिथिप्रिय तथा सदा पवित्र रहना चाहिये || ६-८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पृथ्वीनाथ! ब्राह्मण कैसे सदा उपवासी और ब्रह्मचारी होवे? तथा किस प्रकार वह विघसाशी एवं अतिथिप्रिय हो सकता है? ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! जो मनुष्य केवल प्रात:काल और सायंकाल ही भोजन करता है, बीचमें कुछ नहीं खाता, उसे सदा उपवासी समझना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो केवल ऋतुकालमें धर्मपत्नीके साथ सहवास करता है वह ब्रह्मचारी ही माना जाता है। सदा दान देनेवाला पुरुष सत्यवादी ही समझने योग्य है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मांस नहीं खाता, वह अमांसाशी होता है और जो सदा दान देनेवाला है, वह पवित्र माना जाता है। जो दिनमें नहीं सोता वह सदा जागनेवाला माना जाता है ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! जो सदा भृत्यों- और अतिथियोंके भोजन कर लेनेके बाद ही स्वयं भोजन करता है, उसे केवल अमृत भोजन करनेवाला (अमृताशी) समझना चाहिये ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जबतक ब्राह्मण भोजन नहीं कर लें तबतक जो अन्न ग्रहण नहीं करता, वह मनुष्य अपने उस व्रतके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय पाता है ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों और आश्रितोंको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नको ही स्वयं भोजन करता है उसे विघसाशी कहते हैं। उन मनुष्योंको ब्रह्मधाममें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है तथा गन्धर्वोंसहित अप्सराएँ उनकी सेवामें उपस्थित होती हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो देवताओं और अतिथियोंसहित पितरोंके लिये अन्नका भाग देकर स्वयं भोजन करते हैं, वे इस जगतमें पुत्र-पौत्रोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं और मृत्युके पश्चात्‌ उन्हें परम उत्तम गति प्राप्त होती है ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! लोग ब्राह्मणोंको नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान करते हैं। दान देने और दान लेनेवाले पुरुषोंमें क्या विशेषता होती है? ।। १८ ।॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन! जो ब्राह्मण साधु अर्थात्‌ उत्तम गुण-आचरणवाले पुरुषसे तथा असाधु अर्थात्‌ दुर्गुण और दुराचारवाले पुरुषसे दान ग्रहण करता है, उनमें सदगुणीसदाचारवाले पुरुषसे दान लेना अल्प दोष है। किंतु दुर्गुण और दुराचारवालेसे दान लेनेवाला पापमें डूब जाता है || १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! इस विषयमें राजा वृषादर्भि और सप्तर्षियोंके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक समयकी बात है, कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि और पतिव्रता देवी अरुन्धती--ये सब लोग समाधिके द्वारा सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या करते हुए इस पृथ्वीपर विचर रहे थे। इन सबकी सेवा करनेवाली एक दासी थी, जिसका नाम था “गण्डा&#39;। वह पशुसख नामक एक शूद्रके साथ व्याही गयी थी (पशुसख भी इन्हीं महर्षियोंके साथ रहकर सबकी सेवा किया करता था) || २१-२३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुनन्दन! एक बार पृथ्वीपर दीर्घकालतक वर्षा नहीं हुई। जिससे अकाल पड़ जानेके कारण यह सारा जगत्‌ भूखसे पीड़ित रहने लगा। लोग बड़ी कठिनाईसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे || २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालमें शिबिके पुत्र शैब्यने किसी यज्ञमें दक्षिणाके रूपमें अपना एक पुत्र ही ऋत्विजोंको दे दिया था || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस दुर्भिक्षेके समय वह अल्पायु राजकुमार मृत्युको प्राप्त हो गया। वे सप्तर्षि भूखसे पीड़ित थे, इसलिये उस मरे हुए बालकको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ।। २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब वृषादर्भि बोले--प्रतिग्रह ब्राह्मणोंके लिये उत्तम वृत्ति नियत किया गया है। तपोधन! प्रतिग्रह दुर्भिक्ष और भूखके कष्टसे ब्राह्मणकी रक्षा करता है तथा पुष्टिका उत्तम साधन है। अतः मेरे पास जो धन है उसे आप स्वीकार करें और ले लें ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्योंकि जो ब्राह्मण मुझसे याचना करता है, वह मुझे बहुत प्रिय लगता है। मैं आपलोगोंमेंसे प्रत्येकको एक हजार खच्चरियाँ देता हूँ तथा सभीको सफेद रोएँवाली शीघ्रगामिनी एवं ब्यायी हुई गौएँ साँडोंसहित देनेको उद्यत हूँ ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;साथ ही एक कुलका भार वहन करनेवाले दस हजार भारवाहक सफेद बैल भी आप सब लोगोंको दे रहा हूँ। इतना ही नहीं, मैं आप सब लोगोंको जवान, मोटी-ताजी, पहली बारकी ब्यायी हुई, अच्छे स्वभाववाली श्रेष्ठ एवं दुधारू गौएँ भी देता हूँ || २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनके सिवा अच्छे-अच्छे गाँव, धान, रस, जौ, रत्न तथा और भी अनेक दुर्लभ वस्तुएँ प्रदान कर सकता हूँ। बतलाइये, मैं आपको क्या दूँ? आप इस अभक्ष्य वस्तुके भक्षणमें मन न लगावें। कहिये, आपके शरीरकी पुष्टिके लिये मैं क्या दूँ ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋषि बोले--राजन्‌! राजाका दिया हुआ दान ऊपरसे मधुके समान मीठा जान पड़ता है, परंतु परिणाममें विषके समान भयंकर हो जाता है। इस बातको जानते हुए भी आप क्यों हमें प्रलोभनमें डाल रहे हैं | ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणोंका शरीर देवताओंका निवासस्थान है, उसमें सभी देवता विद्यमान रहते हैं। यदि ब्राह्मण तपस्यासे शुद्ध एवं संतुष्ट हो तो वह सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करता है ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मण दिनभरमें जितना तप संग्रह करता है, उसको राजाका दिया हुआ दान वनको दग्ध करनेवाले दावानलकी भाँति नष्ट कर डालता है ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! इस दानके साथ ही आप सदा सकुशल रहें और यह सारा दान आप उन्हींको दें जो आपसे इन वस्तुओंको लेना चाहते हों। ऐसा कहकर वे दूसरे मार्गसे चल दिये || ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब राजाकी प्रेरणासे उनके मन्त्री वनमें गये और गूलरके फल तोड़कर उन्हें देनेकी चेष्टा करने लगे || ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मन्त्रियोंने गूलर तथा दूसरे-दूसरे वृक्षोंक फल तोड़कर उनमें सुवर्ण-मुद्राएँ भर दीं। फिर उन फलोंको लेकर राजाके सेवक उन्हें ऋषियोंके हवाले करनेके लिये उनके पीछे दौड़े गये ।। ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे सभी फल भारी हो गये थे, इस बातको महर्षि अत्रि ताड़ गये और बोले--ये “गूलर हमारे लेने योग्य नहीं हैं। हमारी बुद्धि मन्द नहीं हुई है। हमारी ज्ञानशक्ति लुप्त नहीं हुई है। हम सो नहीं रहे हैं, जागते हैं। हमें अच्छी तरह ज्ञात है कि इनके भीतर सुवर्ण भरा पड़ा है। यदि आज हम इन्हें स्वीकार कर लेते हैं तो परलोकमें हमें इनका कटु परिणाम भोगना पड़ेगा। जो इहलोक और परलोकमें भी सुख चाहता हो उसके लिये यह फल अग्राह्म है! ।। ३७-३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसिष्ठ बोले--एक निष्क (स्वर्णमुद्रा) का दान लेनेसे सौ हजार निष्कोंके दान लेनेका दोष लगता है। ऐसी दशामें जो बहुत-से निष्क ग्रहण करता है, उसको तो घोर पापमयी गतिमें गिरना पड़ता है ।। ३९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कश्यपने कहा--इस पृथ्वीपर जितने धान, जौ, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब किसी एक पुरुषको मिल जाया तो भी उसे संतोष न होगा; यह सोचकर दविद्वान्‌ पुरुष अपने मनकी तृष्णाको शान्त करे || ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरद्वाज बोले--जैसे उत्पन्न हुए मृगका सींग उसके बढ़नेके साथ-साथ बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मनुष्यकी तृष्णा सदा बढ़ती ही रहती है, उसकी कोई सीमा नहीं है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतमने कहा--संसारमें ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जो मनुष्यकी आशाका पेट भर सके। पुरुषकी आशा समुद्रके समान है, वह कभी भरती ही नहीं ।। ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विश्वामित्र बोले--किसी वस्तुकी कामना करनेवाले मनुष्यकी एक इच्छा जब पूरी होती है, तब दूसरी नयी उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार तृष्णा तीरकी तरह मनुष्यके मनपर चोट करती ही रहती है ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अत्रि बोले--भोगोंकी कामना उनके उपभोगसे कभी नहीं शान्त होती है। अपितु घीकी आहुति पड़नेपर प्रज्वयलित होनेवाली आगकी भाँति वह और भी बढ़ती ही जाती है।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जमदग्निने कहा--प्रतिग्रह न लेनेसे ही ब्राह्मण अपनी तपस्याको सुरक्षित रख सकता है। तपस्या ही ब्राह्मणका धन है। जो लौकिक धनके लिये लोभ करता है, उसका तपरूपी धन नष्ट हो जाता है || ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अरुन्धती बोलीं--संसारमें एक पक्षके लोगोंकी राय है कि धर्मके लिये धनका संग्रह करना चाहिये; किंतु मेरी रायमें धन-संग्रहकी अपेक्षा तपस्याका संचय ही श्रेष्ठ है ।। ४५।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गण्डाने कहा--मेरे ये मालिक लोग अत्यन्त शक्तिशाली होते हुए भी जब इस भयंकर प्रतिग्रहके भयसे इतना डरते हैं, तब मेरी क्या सामर्थ्य है? मुझे तो दुर्बल प्राणियोंकी भाँति इससे बहुत बड़ा भय लग रहा है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पशुसखने कहा--धर्मका पालन करनेपर जिस धनकी प्राप्ति होती है, उससे बढ़कर कोई धन नहीं है। उस धनको ब्राह्मण ही जानते हैं; अतः मैं भी उसी धर्ममय धनकी प्राप्तिका उपाय सीखनेके लिये विद्वान्‌ ब्राह्मणोंकी सेवामें लगा हूँ || ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋषियोंने कहा--जिसकी प्रजा ये कपटयुक्त फल देनेके लिये ले आयी है तथा जो इस प्रकार फलके व्याजसे हमें सुवर्णदान कर रहा है, वह राजा अपने दानके साथ ही कुशलसे रहे ।। ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! यह कहकर उन सुवर्णयुक्त फलोंका परित्याग करके वे समस्त व्रतधारी महर्षि वहाँसे अन्यत्र चले गये || ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब मन्त्रियोंने शैव्यके पास जाकर कहा--महाराज! आपको विदित हो कि उन फलोंको देखते ही ऋषियोंको यह संदेह हुआ कि हमारे साथ छल किया जा रहा है। इसलिये वे फलोंका परित्याग करके दूसरे मार्गसे चले गये हैं |। ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सेवकोंके ऐसा कहनेपर राजा वृषादर्भिको बड़ा कोप हुआ और वे उन सप्तर्षियोंसे अपने अपमानका बदला लेनेका विचार करके राजधानीको लौट गये ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ जाकर अत्यन्त कठोर नियमोंका पालन करते हुए वे आहवनीय अमि्निमें आभिचारिक मन्त्र पढ़कर एक-एक आहुति डालने लगे ।। ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आहुति समाप्त होनेपर उस अग्निसे एक लोकभयंकर कृत्या प्रकट हुई। राजा वृषादर्भिने उसका नाम यातुधानी रखा ।। ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कालरात्रिके समान विकराल रूप धारण करनेवाली वह कृत्या हाथ जोड़कर राजाके पास उपस्थित हुई और बोली--&#39;महाराज! मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ?” || ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वृषादर्भिने कहा--यातुधानी! तुम यहाँसे वनमें जाओ और वहाँ अरुन्धतीसहित सातों ऋषियोंका, उनकी दासीका और उस दासीके पतिका भी नाम पूछकर उसका तात्पर्य अपने मनमें धारण करो। इस प्रकार उन सबके नामोंका अर्थ समझकर उन्हें मार डालो; उसके बाद जहाँ इच्छा हो चली जाना || ५५-५६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजाकी यह आज्ञा पाकर यातुधानीने “तथास्तु&#39; कहकर इसे स्वीकार किया और जहाँ वे महर्षि विचरा करते थे, उस वनमें चली गयी ।। ५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! उन दिनों वे अत्रि आदि महर्षि उस वनमें फल-मूलका आहार करते हुए घूमा करते थे || ५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन उन महर्षियोंने देखा, एक संन्यासी कुत्तेके साथ वहाँ इधर-उधर विचर रहा है। उसका शरीर बहुत मोटा था। उसके मोटे कंधे, हाथ, पैर, मुख और पेट आदि सभी अंग सुन्दर और सुडौल थे ।। ५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अरुन्धतीने सारे अंगोंसे हृष्ट-पुष्ट हुए उस सुन्दर संन्यासीको देखकर ऋषियोंसे कहा --&#39;क्या आपलोग कभी ऐसे नहीं हो सकेंगे?” ।॥ ६० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसिष्ठजीने कहा--हमलोगोंकी तरह इसको इस बातकी चिन्ता नहीं है कि आज हमारा अग्निहोत्र नहीं हुआ और सबेरे तथा शामको अग्निहोत्र करना है; इसीलिये यह कुत्तेके साथ खूब मोटा-ताजा हो गया है ।। ६१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अत्रि बोले--हमलोगोंकी तरह भूखके मारे उसकी सारी शक्ति नष्ट नहीं हो गयी है तथा बड़े कष्टसे जो वेदोंका अध्ययन किया गया था, वह भी हमारी तरह इसका नष्ट नहीं हुआ है; इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ।। ६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विश्वामित्रने कहा--हमलोगोंका भूखके मारे सनातन शास्त्र विस्मृत हो गया है और शास्त्रोक्त धर्म भी क्षीण हो चला है। ऐसी दशा इसकी नहीं है तथा यह आलसी, केवल पेटकी भूख बुझानेमें ही लगा हुआ और मूर्ख है। इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ।। ६३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जमदग्नि बोले--हमारी तरह इसके मनमें वर्षभरके लिये भोजन और ईंधन जुटानेकी चिन्ता नहीं है, इसीलिये कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ।। ६४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कश्यपने कहा--हमलोगोंके चार भाई हमसे प्रतिदिन &#39;भोजन दो, भोजन दो” कहकर अन्न माँगते हैं, अर्थात्‌ हमलोगोंको एक भारी कुट॒म्बके भोजन-वस्त्रकी चिन्ता करनी पड़ती है। इस संन्यासीको यह सब चिन्ता नहीं है। अतः यह कुत्तेके साथ मोटा है ।। ६५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरद्वाज बोले--इस विवेकशून्य ब्राह्मणबन्धुको हमलोगोंकी तरह अपनी स्त्रीके कलंकित होनेका शोक नहीं है। इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--हमलोगोंकी तरह इसे तीन-तीन वर्षोतक कुशकी रस्सीकी बनी हुई तीन लरवाली मेखला और मृगचर्म धारण करके नहीं रहना पड़ता है। इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ।। ६७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! कुत्तेसहित आये हुए संन्यासीने जब उन महर्षियोंको देखा, तब उनके पास आकर संन्यासकी मर्यादाकें अनुसार उनका हाथसे स्पर्श किया || ६८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर वे एक दूसरेको अपना कुशल-समाचार बताते हुए बोले--“हमलोग अपनी भूख मिटानेके लिये इस वनमें भ्रमण कर रहे हैं&quot; ऐसा कहकर वे साथ-ही-साथ वहाँसे चल पड़े || ६९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन सबके निश्चय और कार्य एक-से थे। वे फल-मूलका संग्रह करके उन्हें साथ लिये उस वनमें विचर रहे थे || ७० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन घूमते-फिरते हुए उन महर्षियोंको एक सुन्दर सरोवर दिखायी पड़ा; जिसका जल बड़ा ही स्वच्छ और पवित्र था। उसके चारों किनारोंपर सघन वृक्षोंकी पंक्ति शोभा पा रही थी | ७१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रातःकालीन सूर्यके समान अरुण रंगके कमलपुष्प उस सरोवरकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा वैदूर्यमणिकी-सी कान्तिवाले कमलिनीके पत्ते उसमें चारों ओर छा रहे थे || ७२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाना प्रकारके विहंगम कलरव करते हुए उसकी जलराशिका सेवन करते थे। उसमें प्रवेश करनेके लिये एक ही द्वार था। उसकी कोई वस्तु ली नहीं जा सकती थी। उसमें उतरनेके लिये बहुत सुन्दर सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। वहाँ काई और कीचड़का तो नाम भी नहीं था ।। ७३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा वृषादर्भिकी भेजी हुई भयानक आकारवाली यातुधानी कृत्या उस तालाबकी रक्षा कर रही थी ।। ७४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पशुसखके साथ वे सभी महर्षि मृणाल लेनेके लिये उस सरोवरके तटपर गये, जो उस कृत्याके द्वारा सुरक्षित था | ७५ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सरोवरके तटपर खड़ी हुई उस यातुधानी कृत्याको जो बड़ी विकराल दिखायी देती थी, देखकर वे सब महर्षि बोले-- || ७६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अरी! तू कौन है और किसलिये यहाँ अकेली खड़ी है? यहाँ तेरे आनेका क्या प्रयोजन है? इस सरोवरके तटपर रहकर तू कौन-सा कार्य सिद्ध करना चाहती है?” || ७७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--तपस्वियो! मैं जो कोई भी होऊँ, तुम्हें मेरे विषयमें पूछ-ताछ करनेका किसी प्रकार कोई अधिकार नहीं है। तुम इतना ही जान लो कि मैं इस सरोवरका संरक्षण करनेवाली हूँ ।। ७८ ।।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋषि बोले--भटद्रे! इस समय हमलोग भूखसे व्याकुल हैं और हमारे पास खानेके लिये दूसरी कोई वस्तु नहीं है। अतः: यदि तुम अनुमति दो तो हम सब लोग इस सरोवरसे कुछ मृणाल ले लें || ७९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानीने कहा--ऋषियो! एक शर्तपर तुम इस सरोवरसे इच्छानुसार मृणाल ले सकते हो। एक-एक करके आओ और मुझे अपना नाम और तात्पर्य बताकर मृणाल ले लो। इसमें विलम्ब करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। ८० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! उसकी यह बात सुनकर महर्षि अत्रि यह समझ गये कि &#39;यह राक्षसी कृत्या है और हम सब ऋषियोंका वध करनेकी इच्छासे यहाँ आयी हुई है।&#39; तथापि भूखसे व्याकुल होनेके कारण उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया || ८१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अत्रि बोले--कल्याणी! काम आदि शत्रुओंसे त्राण करनेवालेको अरात्रि कहते हैं और अत्‌ (मृत्यु) से बचानेवाला अत्रि कहलाता है। इस प्रकार मैं ही अरात्रि होनेके कारण अत्रि हूँ। जबतक जीवको एकमात्र परमात्माका ज्ञान नहीं होता, तबतककी अवस्था रात्रि कहलाती है। उस अज्ञानावस्थासे रहित होनेके कारण भी मैं अरात्रि एवं अत्रि कहलाता हूँ। सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अज्ञात होनेके कारण जो रात्रिके समान है, उस परमात्मतत्त्वमें मैं सदा जाग्रत्‌ रहता हूँ; अतः वह मेरे लिये अरात्रिके समान है, इस व्युत्पत्तिके अनुसार भी मैं अरात्रि और अत्रि (ज्ञानी) नाम धारण करता हूँ। यही मेरे नामका तात्पर्य समझो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानीने कहा--तेजस्वी महर्षे! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बताया है, उसका मेरी समझमें आना कठिन है। अच्छा, अब आप जाइये और तालाबमें उतरिये ।। ८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसिष्ठ बोले--मेरा नाम वसिष्ठ है, सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण लोग मुझे वरिष्ठ भी कहते हैं। मैं गृहस्थ-आश्रममें वास करता हूँ; अतः वसिष्ठता (ऐश्वर्य-सम्पत्ति) और वासके कारण तुम मुझे वसिष्ठ समझो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--मुने! आपने जो अपने नामकी व्याख्या की है उसके तो अक्षरोंका भी उच्चारण करना कठिन है। मैं इस नामको नहीं याद रख सकती। आप जाइये तालाबमें प्रवेश कीजिये || ८५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कश्यपने कहा--यातुधानी! कश्य नाम है शरीरका, जो उसका पालन करता है उसे कश्यप कहते हैं। मैं प्रत्येक कुल (शरीर) में अन्तर्यामी रूप से प्रवेश करके उसकी रक्षा करता हूँ, इसीलिये कश्यप हूँ। कु अर्थात्‌ पृथ्वीपर वम यानी वर्षा करनेवाला सूर्य भी मेरा ही स्वरूप है, इसलिये मुझे “कुवम” भी कहते हैं। मेरे देहका रंग काशके फूलकी भाँति उज्ज्वल है, अतः मैं काश्य नामसे भी प्रसिद्ध हूँ। यही मेरा नाम है। इसे तुम धारण करो ।। ८६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--महर्षे! आपके नामका तात्पर्य समझना मेरे लिये बहुत कठिन है। आप भी कमलोंसे भरी हुई बावड़ीमें जाइये || ८७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरद्वाजने कहा--कल्याणी! जो मेरे पुत्र और शिष्य नहीं हैं, उनका भी मैं पालन करता हूँ, तथा देवता, ब्राह्मण, अपनी धर्मपत्नी तथा द्वाज (वर्णसंकर) मनुष्योंका भी भरण-पोषण करता हूँ, इसलिये भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध हूँ || ८८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--मुनिवर! आपके नामाक्षरका उच्चारण करनेमें भी मुझे क्लेश जान पड़ता है, इसलिये मैं इसे धारण नहीं कर सकती। जाइये, आप भी इस सरोवरमें उतरिये ।। ८९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतमने कहा--कृत्ये! मैंने गो नामक इन्द्रियोंका संयम किया है, इसलिये “गोदम&#39; नाम धारण करता हूँ। मैं धूमरहित अग्निके समान तेजस्वी हूँ, सबमें समान दृष्टि रखनेके कारण तुम्हारे या और किसीके द्वारा मेरा दमन नहीं हो सकता। मेरे शरीरकी कान्ति (गो) अन्धकारको दूर भगानेवाली (अतम) है, अतः तुम मुझे गौतम समझो ।। ९० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--महामुने! आपके नामकी व्याख्या भी मैं नहीं समझ सकती। जाइये, पोखरेमें प्रवेश कीजिये || ९१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विश्वामित्रने कहा--यातुधानी! तू कान खोलकर सुन ले, विश्वेदेव मेरे मित्र हैं, तथा गौओं और सम्पूर्ण विश्वका मैं मित्र हूँ। इसलिये संसारमें विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हूँ ।। ९२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--महर्ष! आपके नामकी व्याख्याके एक अक्षरका भी उच्चारण करना मेरे लिये कठिन है। इसे याद रखना मेरे लिये असम्भव है। अतः जाइये, सरोवरमें प्रवेश कीजिये ।। ९३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जमदग्निने कहा--कल्याणी! मैं जगत्‌ अर्थात्‌ देवताओंके आहवनीय अग्निसे उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिये तुम मुझे जमदग्नि नामसे विख्यात समझो ।। ९४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--महामुने! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बतलाया है, उसको समझना मेरे लिये बहुत कठिन है। अब आप सरोवरमें प्रवेश कीजिये || ९५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अरुन्धतीने कहा--यातुधानी! मैं अरु अर्थात्‌ पर्वत, पृथ्वी और द्युलोकको अपनी शक्तिसे धारण करती हूँ। अपने स्वामीसे कभी दूर नहीं रहती और उनके मनके अनुसार चलती हूँ, इसलिये मेरा नाम अरुन्धती है ।। ९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--देवि! आपने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके एक अक्षरका भी उच्चारण मेरे लिये कठिन है, अतः इसे भी मैं नहीं याद रख सकती। आप तालाबमें प्रवेश कीजिये || ९७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गण्डाने कहा--अग्निसे उत्पन्न होनेवाली कृत्ये! गडि धातुसे गण्ड शब्दकी सिद्धि होती है, यह मुखके एक देश--कपोलका वाचक है। मेरा कपोल (गण्ड) ऊँचा है, इसलिये लोग मुझे गण्डा कहते हैं ।। ९८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--तुम्हारे नामकी व्याख्याका भी उच्चारण करना मेरे लिये कठिन है। अतः इसको याद रखना असम्भव है। जाओ, तुम भी बावड़ीमें उतरो || ९९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पशुसखने कहा--आगसे पैदा हुई कृत्ये! मैं पशुओंको प्रसन्न रखता हूँ और उनका प्रिय सखा हूँ; इस गुणके अनुसार मेरा नाम पशुसख है || १०० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--तुमने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके अक्षरोंका उच्चारण करना भी मेरे लिये कष्टप्रद है। अत: इसको याद नहीं रख सकती; अब तुम भी पोखरेमें जाओ || १०१ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुन:ःसख (संन्यासी) ने कहा--यातुधानी! इन ऋषियोंने जिस प्रकार अपना नाम बताया है; उस तरह मैं नहीं बता सकता। तू मेरा नाम शुन:सख समझ ।।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यातुधानी बोली--विप्रवर! आपने संदिग्धवाणीमें अपना नाम बताया है। अत: अब फिर स्पष्टरूपसे अपने नामकी व्याख्या कीजिये || १०३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुन:ःसखने कहा--मैंने एक बार अपना नाम बता दिया फिर भी यदि तूने उसे ग्रहण नहीं किया तो इस प्रमादके कारण मेरे इस त्रिदण्डकी मार खाकर अभी भस्म हो जा-इसमें विलम्ब न हो || १०४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह कहकर उस संन्यासीने ब्रह्मदण्डके समान अपने त्रिदण्डसे उसके मस्तकपर ऐसा हाथ जमाया कि वह यातुधानी पृथ्वीपर गिर पड़ी और तुरंत भस्म हो गयी ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार शुन:ः:सखने उस महाबलवती राक्षसीका वध करके त्रिदण्डको पृथ्वीपर रख दिया और स्वयं भी वे वहीं घाससे ढँकी हुई भूमिपर बैठ गये || १०६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर वे सभी महर्षि इच्छानुसार कमलके फूल और मृणाल लेकर प्रसन्नतापूर्वक सरोवरसे बाहर निकले ।। १०७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर बहुत परिश्रम करके उन्होंने अलग-अलग बोझे बाँधे। इसके बाद उन्हें किनारेपर ही रखकर वे सरोवरके जलसे तर्पण करने लगे ।। १०८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;थोड़ी देर बाद जब वे पुरुषप्रवर पानीसे बाहर निकले तो उन्हें रखे हुए अपने वे मृणाल नहीं दिखायी पड़े || १०९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब वे ऋषि एक दूसरेसे कहने लगे--अरे! हम सब लोग भूखसे व्याकुल थे और अब भोजन करना चाहते थे। ऐसे समयमें किस निर्दयीने हम पापियोंके मृणाल चुरा लिये ।। ११० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शत्रुसूदन! वे श्रेष्ठ ब्राह्मण आपसमें ही एक-दूसरेपर संदेह करते हुए पूछ-ताछ करने लगे और अन्तमें बोले--“हम सब लोग मिलकर शपथ करें&quot; ।। १११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शपथकी बात सुनकर सब-के-सब बोल उठे--“बहुत अच्छा&#39;। फिर वे भूखसे पीड़ित और परिश्रमसे थके-माँदे ब्राह्मण एक साथ ही शपथ खानेको तैयार हो गये || ११२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अत्रि बोले--जो मृणालकी चोरी करता हो उसे गायको लात मारने, सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करने और अनध्यायके समय अध्ययन करनेका पाप लगे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसिष्ठ बोले--जिसने मृणाल चुराये हों उसे निषिद्ध समयमें वेद पढ़ने, कुत्ते लेकर शिकार खेलने, संन्यासी होकर मनमाना बर्ताव करने, शरणागतको मारने, अपनी कन्या बेचकर जीविका चलाने तथा किसानके धन छीन लेनेका पाप लगे ।। ११४-११५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कश्यपने कहा--जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसको सब जगह सब तरहकी बातें कहने, दूसरोंकी धरोहर हड़प लेने और झूठी गवाही देनेका पाप लगे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मृणालोंकी चोरी करता हो उसे मांसाहारका पाप लगे। उसका दान व्यर्थ चला जाय तथा उसे दिनमें स्त्रीके साथ समागम करनेका पाप लगे || ११७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरद्वाज बोले--जिसने मृणाल चुराया हो उस निर्दयीको धर्मके परित्यागका दोष लगे। वह स्त्रियों, कुटुम्बीजनों तथा गौओंके साथ पापपूर्ण बर्ताव करनेका दोषी हो और ब्राह्मणको वाद-विवादमें पराजित करनेका पाप लगे ।। ११८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मृणालकी चोरी करता हो, उसे उपाध्याय (अध्यापक या गुरु) को नीचे बैठाकर उनसे ऋग्वेद और यजुर्वेदका अध्ययन करने और घास-फ़ूसकी आगमें आहुति डालनेका पाप लगे ।। ११९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जमदग्नि बोले--जिसने मृणालोंका अपहरण किया हो, उसे पानीमें मलत्याग करनेका पाप लगे, गाय मारनेका अथवा उसके साथ द्रोह करनेका तथा ऋतुकाल आये बिना ही स्त्रीके साथ समागम करनेका पाप लगे || १२० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसने मृणाल चुराये हों उसे सबके साथ द्वेष करनेका, स्त्रीकी कमाईपर जीविका चलानेका, भाई-बन्धुओंसे दूर रहनेका, सबसे वैर करनेका और एक-दूसरेके घर अतिथि होनेका पाप लगे ।। १२१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौतम बोले--जिसने मृणाल चुराये हों उसे वेदोंको पढ़कर त्यागनेका, तीनों अग्नियोंका परित्याग करनेका और सोमरसका विक्रय करनेका पाप लगे ।। १२२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसे वही लोक मिले, जो एक ही कूपमें पानी भरनेवाले, गाँवमें निवास करनेवाले और शूद्रकी पत्नीसे संसर्ग रखनेवाले ब्राह्मणको मिलता है || १२३ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विश्वामित्र बोले--जो इन मृणालोंको चुरा ले गया हो, जिस पुरुषके जीवित रहनेपर उसके गुरु और माता तथा पिताका दूसरे पुरुष पोषण करें उसको और जिसकी कुगति हुई हो तथा जिसके बहुत-से पुत्र हों उसको जो पाप लगता है वह पाप उसे लगे ।। १२४&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसने मृणालोंका अपहरण किया हो, उसे अपवित्र रहनेका, वेदको मिथ्या माननेका, धनका घमंड करनेका, ब्राह्मण होकर खेत जोतनेका और दूसरोंसे डाह रखनेका पाप लगे ।। १२५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसने मृणाल चुराये हों, उसे वर्षाकालमें परदेशकी यात्रा करनेका, ब्राह्मण होकर वेतन लेकर काम करनेका, राजाके पुरोहित तथा यज्ञके अनधिकारीसे भी यज्ञ करानेका पाप लगे ।। १२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अरुन्धती बोलीं--जो स्त्री मृणालोंकी चोरी करती हो उसे प्रतिदिन सासका तिरस्कार करनेका, अपने पतिका दिल दुखानेका और अकेली ही स्वादिष्ट वस्तुएँ खानेका पाप लगे ।। १२७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसने मृणालोंकी चोरी की हो, उस स्त्रीको कुटुम्बीजनोंका अपमान करके घरमें रहनेका, दिन बीत जानेपर सत्तू खानेका, कलंकिनी होनेके कारण पतिके उपभोगमें न आनेका और ब्राह्मणी होकर भी क्षत्राणियोंके समान उग्र स्वभाववाले वीर पुत्रकी जननी होनेका पाप लगे ।। १२८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गण्डा बोली--जिस स्त्रीने मृणलकी चोरी की हो उसे सदा झूठ बोलनेका, भाईबन्धुओंसे लड़ने और विरोध करने और शुल्क लेकर कन्यादान करनेका पाप लगे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस स्त्रीने मृणाल चुराया हो उसे रसोई बनाकर अकेली भोजन करनेका, दूसरोंकी गुलामी करती-करती ही बूढ़ी होनेका और पापकर्म करके मौतके मुखमें पड़नेका पाप लगे ।। १३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पशुसख बोला--जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसे दूसरे जन्ममें भी दासीके ही घरमें पैदा होने, संतानहीन और निर्धन होने तथा देवताओंको नमस्कार न करनेका पाप लगे ।। १३१ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुन:ःसखने कहा--जिसने मृणालोंको चुराया हो वह ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके आये हुए यजुर्वेदी अथवा सामवेदी विद्वानको कन्यादान दे अथवा वह ब्राह्मण अथर्ववेदका अध्ययन पूरा करके शीघ्र ही स्नातक बन जाय ।। १३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋषियोंने कहा--शुनःसख ! तुमने जो शपथ की है, वह तो ब्राह्मणोंको अभीष्ट ही है। अतः जान पड़ता है, हमारे मृणालोंकी चोरी तुमने ही की है || १३३&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुन:सखने कहा--मुनिवरो! आपका कहना ठीक है। वास्तवमें आपका भोजन मैंने ही रख लिया है। आपलोग जब तर्पण कर रहे थे, उस समय आपकी दृष्टि इधर नहीं थी; तभी मैंने वह सब लेकर रख लिया था। अत: आपका यह कथन कि तुमने ही मृणाल चुराये हैं, ठीक है। मिथ्या नहीं है। वास्तवमें मैंने ही उन मृणालोंकी चोरी की है ।। १३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने उन मृणालोंको यहाँ छिपा दिया था। देखिये, ये रहे आपके मृणाल। निष्पाप मुनियो! मैंने आपलोगोंकी परीक्षाके लिये ही ऐसा किया था || १३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं आप सब लोगोंकी रक्षाके लिये यहाँ आया था यह यातुधानी अत्यन्त क्रूर स्वभाववाली कृत्या थी और आपलोगोंका वध करना चाहती थी ।। १३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपोधनो! राजा वृषादर्भिने इसे भेजा था, किंन्तु यह मेरे द्वारा मारी गयी। ब्राह्मणो! मैंने सोचा कि अग्निसे उत्पन्न यह दुष्ट पापिनी कृत्या कहीं आप-लोगोंकी हिंसा न कर डाले; इसलिये मैं यहाँ आ गया। आपलोग मुझे इन्द्र समझें। आपलोगोंने जो लोभका परित्याग किया है, इससे आपको वे अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले हैं। अतः ब्राह्मणो! अब आपलोग यहाँसे उठें और शीघ्र उन लोकोंमें पदार्पण करें || १३७-१३९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इन्द्रकी बात सुनकर महर्षियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने देवराजसे “तथास्तु”/ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर वे सब-के-सब देवेन्द्रके साथ ही स्वर्गलोक चले गये ।। १४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार उन महात्माओंने अत्यन्त भूखे होनेपर और बड़े-बड़े लोगोंके अनेक प्रकारके भोगोंद्वारा लालच देनेपर भी उस समय लोभ नहीं किया। इसीसे उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई || १४१-१४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सभी दशाओंमें लोभका त्याग करे, क्योंकि यह सबसे बड़ा धर्म है। अत: लोभको अवश्य त्याग देना चाहिये ।। १४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य जनसमुदायमें इस पवित्र चरित्रका कीर्तन करता है, वह धन एवं मनोवांछित वस्तुका भागी होता है और कभी संकटमें नहीं पड़ता है || १४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके ऊपर देवता, ऋषि और पितर सभी प्रसन्न होते हैं। वह मनुष्य इहलोकमें यश, धर्म एवं धनका भागी होता है। और मृत्युके पश्चात्‌ उसे स्वर्गलोक सुलभ होता है ।। १४५ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गृणालकी चोरीका उपाख्यानविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&amp;nbsp;(दक्षिणात्य अधिक पाठके १½ “लोक मिलाकर कुल १४६½ “लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/9045284861300518396/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-91-chapter-to-93-chapter-of-entire.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/9045284861300518396'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/9045284861300518396'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-91-chapter-to-93-chapter-of-entire.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के इक्यानबेवें अध्याय से तिरानबेवें अध्याय तक (From the 91 chapter to the 93 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सम्पूर्ण महाभारत कथा"/><title type='text'>सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के छियासीवें अध्याय से नब्बेवें अध्याय तक (From the 86 chapter to the 90 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))</title><content type='html'>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; 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small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) छियासीवें अध्याय के श्लोक 1-35&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“कार्तिकेयकी उत्पत्ति, पालन-पोषण और उनका देवसेनापति-पदपर अभिषेक, उनके द्वारा तारकासुरका वध”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! सुवर्णका विधिपूर्वक दान करनेसे जो वेदोक्त फल प्राप्त होते हैं, यहाँ उनका आपने विस्तारपूर्वक वर्णन किया ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुवर्णकी उत्पत्तिका जो कारण है, वह भी आपने बताया। अब मुझे यह बताइये कि वह तारकासुर कैसे मारा गया? ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीनाथ! आपने पहले कहा है कि वह देवताओंके लिये अवध्य था, फिर उसकी मृत्यु कैसे हुई? यह विस्सारपूर्वक बताइये ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुकुलका भार वहन करनेवाले पितामह! मैं आपके मुखसे यह तारक-वधका सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजेन्द्र! जब गंगाजीने अग्नि-द्वारा स्थापित किये हुए उस गर्भको त्याग दिया, तब देवताओं और ऋषियोंका बना-बनाया काम बिगड़तेकी स्थितिमें आ गया। उस दशामें उन्होंने उस गर्भके भरण-पोषणके लिये छहों कृत्तिकाओंको प्रेरित किया ॥। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कारण यह था कि देवांगनाओंमें दूसरी कोई स्त्री अग्नि एवं रुद्रकं उस तेजका भरणपोषण करनेमें समर्थ नहीं थी और ये कृत्तिकाएँ अपनी शक्तिसे उस गर्भको भलीभाँति धारण-पोषण कर सकती थीं ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने तेजके स्थापन और उत्तम वीर्यके ग्रहणद्वारा गर्भ धारण करनेके कारण अग्निदेव उन छहों कृत्तिकाओंपर बहुत प्रसन्न हुए | ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! उन छहों कृत्तिकाओंने अग्निके उस गर्भका पोषण किया। अग्निका वह सारा तेज छः मार्गोसे उनके भीतर स्थापित हो चुका था ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गर्भमें जब वह महामना कुमार बढ़ने लगा, तब उसके तेजसे उनका सारा अंग व्याप्त होनेके कारण वे कृत्तिकाएँ कहीं चैन नहीं पाती थीं || ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठू तदनन्तर तेजसे व्याप्त अंगवाली उन समस्त कृत्तिकाओंने प्रसवकाल उपस्थित होनेपर एक साथ ही उस गर्भको उत्पन्न किया ।। १० |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;छः: अधिष्ठानोंमें पला हुआ वह गर्भ जब उत्पन्न होकर एकत्वको प्राप्त हो गया, तब सुवर्णके समीप स्थित हुए उस बालकको पृथ्वीने ग्रहण किया ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह कान्तिमान्‌ शिशु अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। उसके शरीरकी आकृति दिव्य थी। वह देखनेमें बहुत ही प्रिय जान पड़ता था। वह दिव्य सरकंडेके वनमें जन्म ग्रहण करके दिनोंदिन बढ़ने लगा ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कृत्तिकाओंने देखा वह बालक अपनी कान्तिसे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है। इससे उनके हृदयमें स्नेह उमड़ आया और वे सौहार्दवश अपने स्तनोंका दूध पिलाकर उसका पोषण करने लगीं ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसीसे चराचर प्राणियोंसहित त्रिलोकीमें वह कार्तिकेयके नामसे प्रसिद्ध हुआ। स्कन्दन (स्खलन) के कारण वह &#39;स्कन्द&#39; कहलाया और गुहामें वास करनेसे “गुह” नामसे विख्यात हुआ ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर तैंतीस देवता, दसों दिशाएँ, दिक्पाल, रुद्र, धाता, विष्णु, यम, पूषा, अर्यमा, भग, अंश, मित्र, साध्य, वसु, वासव (इन्द्र), अश्विनीकुमार, जल (वरुण), वायु, आकाश, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रहगण, रवि तथा दूसरे-दूसरे विभिन्न प्राणी जो देवताओंके आश्रित थे, सबके-सब उस अदभुत अग्निपुत्र “कुमार” को देखनेके लिये वहाँ आये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋषियोंने स्तुति की और गन्धर्वोने उनका यश गाया। ब्राह्मणोंके प्रेमी उस कुमारके छ: मुख, बारह नेत्र, बारह भुजाएँ, मोटे कंधे और अग्नि तथा सूर्यके समान कान्ति थी। वे सरकण्डोंके झुरमुटमें सो रहे थे। उन्हें देखकर ऋषियोंसहित देवताओंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ और यह विश्वास हो गया कि अब तारकासुर मारा जायगा। तदनन्तर सब देवता उन्हें उनकी प्रिय वस्तुएँ भेंट करने लगे || १८--२० ॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पक्षियोंने खेल-कूदमें लगे हुए कुमारको खिलौने दिये, गरुडने विचित्र पंखोंसे सुशोभित अपना पुत्र मयूर भेंट किया |। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राक्षसोंने सूअर और भैंसा--ये दो पशु उन्हें उपहाररूपमें दिये। गरुड़के भाई अरुणने अग्निके समान लाल वर्णवाला एक मुर्गा भेंट किया || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चन्द्रमाने भेंड़ा दिया, सूर्यने मनोहर कान्ति प्रदान की, गोमाता सुरभि देवीने एक लाख गौएँ प्रदान कीं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निने गुणवान्‌ बकरा, इलाने बहुतसे फल-फूल, सुधन्वाने छकड़ा और विशाल कूबरसे युक्त रथ दिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वरुणने वरुणलोकके अनेक सुन्दर एवं दिव्य हाथी दिये। देवराज इन्द्रने सिंह, व्याप्र, हाथी, अन्यान्य पक्षी, बहुत-से भयानक हिंसक जीव तथा नाना प्रकारके छत्र भेंट किये || २५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राक्षमों और असुरोंका समुदाय उन शक्तिशाली कुमारके अनुगामी हो गये। उन्हें बढ़ते देख तारकासुरने युद्धके लिये ललकारा; परंतु अनेक उपाय करके भी वह उन प्रभावशाली कुमारको मारनेमें सफल न हो सका ।। २६-२७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओंने गुहावासी कुमारकी पूजा करके उनका सेनापतिके पदपर अभिषेक किया और तारकासुरने देवताओंपर जो अत्याचार किया था, सो कह सुनाया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महापराक्रमी देवसेनापति प्रभु गुहने वृद्धिको प्राप्त होकर अपनी अमोघ शक्तिसे तारकासुरका वध कर डाला ।। २९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खेल-खेलमें ही उन अग्निकुमारके द्वारा जब तारकासुर मार डाला गया, तब ऐश्वर्यशाली देवेन्द्र पुन: देवताओंके राज्यपर प्रतिष्ठित किये गये || ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतापी स्कन्द सेनापतिके ही पदपर रहकर बड़ी शोभा पाने लगे। वे देवताओं के ईश्वर तथा संरक्षक थे और भगवान्‌ शंकरका सदा ही हित किया करते थे ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये अग्निपुत्र भगवान्‌ स्कन्द सुवर्णमय विग्रह धारण करते हैं। वे नित्य कुमारावस्थामें ही रहकर देवताओंके सेनापतिपदपर प्रतिष्ठित हुए हैं ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुवर्ण कार्तिकेयजीके साथ ही उत्पन्न हुआ है और अग्निका उत्कृष्ट तेज माना गया है। इसलिये वह मंगलमय, अक्षय एवं उत्तम रत्न है ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुनन्दन! नरेश्वर! इस प्रकार पूर्वकालमें वसिष्ठजीने परशुरामको यह सारा प्रसंग एवं सुवर्णकी उत्पत्ति और माहात्म्य सुनाया था। अतः तुम स्वर्णदानके लिये प्रयत्न करो ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परशुरामजी सुवर्णका दान करके सब पापोंसे मुक्त हो गये और स्वर्गमें उस महान्‌ स्थानको प्राप्त हुए जो दूसरे मनुष्योंके लिये सर्वथा दुर्लभ है || ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें तारकवधका उपाख्यान नामक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;सतासीवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) सतासीवें अध्याय के श्लोक 1-19&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“विविध तिथियोंमें श्राद्ध करनेका फल”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--धर्मात्मन्‌! पृथ्वीनाथ! आपने जैसे चारों वर्णोके धर्म बताये हैं, उसी प्रकार अब मेरे लिये श्राद्ध-विधिका वर्णन कीजिये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--(जनमेजय!) राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार अनुरोध करनेपर उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने इस सम्पूर्ण श्राद्धवेधिका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी बोले--शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तुम श्राद्ध-कर्मके शुभ विधिको सावधान, होकर सुनो। यह धन, यश और पुत्रकी प्राप्ति करानेवाला है। इसे पितृयज्ञ कहते हैं ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, पिशाच और किन्नर--इन सबके लिये पितर सदा ही पूज्य हैं ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनीषी पुरुष पहले पितरोंकी पूजा करके पीछे देवताओंकी पूजा करते हैं। इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह सदा सम्पूर्ण यज्ञोंके द्वारा पितरोंकी पूजा करे || ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! पितरोंके श्राद्धको अन्वाहार्य कहते हैं। अतः विशेष विधिके द्वारा उसका अनुष्ठान पहले करना चाहिये ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सभी दिनोंमें श्राद्ध करनेसे पितर प्रसन्न रहते हैं। अब मैं तिथि और अतिथिके सब गुणागुणका वर्णन करूँगा ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निष्पाप नरेश! जिन दिनोंमें श्राद्ध करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब मैं यथार्थरूपसे बताऊँगा, ध्यान देकर सुनो ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतिपदा तिथिको पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य अपने उत्तम गृहमें मनके अनुरूप सुन्दर एवं बहुसंख्यक संतानोंको जन्म देनेवाली दर्शनीय भार्या प्राप्त करता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;द्वितीयाको श्राद्ध करनेसे कन्याओंका जन्म होता है। तृतीयाके श्राद्धसे घोड़ोंकी प्राप्ति होती है, चतुर्थीको पितरोंका श्राद्ध किया जाय तो घरमें बहुत-से छोटे-छोटे पशुओंकी संख्या बढ़ती है ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! पंचमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंके बहुत-से पुत्र होते हैं। षष्ठीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्य कान्तिके भागी होते हैं || ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! सप्तमीको श्राद्ध करनेवाला मनुष्य कृषिकर्ममें लाभ उठाता है और अष्टमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषको व्यापारमें लाभ होता है || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नवमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषके यहाँ एक खुरवाले घोड़े आदि पशुओंकी बहुतायत होती है और दशमीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्यके घरमें गौओंको वृद्धि होती है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! एकादशीको श्राद्ध करनेवाला मानव सोने-चाँदीको छोड़कर शेष सभी प्रकारके धनका भागी होता है। उसके घरमें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र जन्म लेते हैं ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;द्वादशीको श्राद्धके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषको सदा ही मनोरम सुवर्ण, चाँदी तथा बहुत-से धनकी प्राप्ति होती देखी जाती है ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्रयोदशीको श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने कुट॒म्बी-जनोंमें श्रेष्ठ होता है; परंतु जो चतुर्दशीको श्राद्ध करता है, उसके घरमें नवयुवकोंकी मृत्यु अवश्य होती है तथा श्राद्ध करनेवाला मनुष्य स्वयं भी युद्धका भागी होता है (इसलिये चतुर्दशीको श्राद्ध नहीं करना चाहिये)। अमावास्याको श्राद्ध करनेसे वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। १६-१७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कृष्ण-पक्षमें केवल चतुर्दशीको छोड़कर दशमीसे लेकर अमावास्यातककी सभी तिथियाँ श्राद्धकर्ममें जैसे प्रशस्त मानी गयी हैं, वैसे दूसरी प्रतिपदासे नवमीतक नहीं ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे पूर्व (शुक्ल) पक्षकी अपेक्षा अपर (कृष्ण) पक्ष श्राद्धके लिये श्रेष्ठ माना है, उसी प्रकार पूर्वाह्नकी अपेक्षा अपराह्न उत्तम माना जाता है ।। १९ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें श्राद्धकल्पविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;अट्ठासीवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) अट्ठासीवें अध्याय के श्लोक 1-10&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“श्राद्धमें पितरोंके तृप्तिविषयका वर्णन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! पितरोंके लिये दी हुई कौन-सी वस्तु अक्षय होती है? किस वस्तुके दानसे पितर अधिक दिनतक और किसके दानसे अनन्त कालतक तृप्त रहते हैं? ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! श्राद्धवेत्ताओंने श्राद्ध-कल्पमें जो हविष्य नियत किये हैं, वे सब-के-सब काम्य हैं। मैं उनका तथा उनके फलका वर्णन करता हूँ, सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! तिल, ब्रीहि, जौ, उड़द, जल और फल-मूलके द्वारा श्राद्ध करनेसे पितरोंको एक मासतक तृप्ति बनी रहती है ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुजीका कथन है कि जिस श्राद्धमें तिलकी मात्रा अधिक रहती है, वह श्राद्ध अक्षय होता है। श्राद्ध-सम्बन्धी सम्पूर्ण भोज्य-पदार्थोंमें तिलोंका प्रधानरूपसे उपयोग बताया गया है ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि श्राद्धमें गायका दही दान किया जाय तो उससे पितरोंको एक वर्षतक तृप्ति होती बतायी गयी है। गायके दहीका जैसा फल बताया गया है, वैसा ही घृतमिश्रित खीरका भी समझना चाहिये ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! इस विषयमें पितरोंद्वारा गायी हुई गाथाका भी विज्ञ पुरुष गान करते हैं। पूर्वकालमें भगवान्‌ सनत्कुमारने मुझे यह गाथा बतायी थी ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितर कहते हैं--“क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा पुरुष उत्पन्न होगा, जो दक्षिणायनमें आश्विन मासके कृष्णपक्षमें मघा और त्रयोदशी तिथिका योग होनेपर हमारे लिये घृतमिश्रित खीरका दान करेगा? ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अथवा वह नियमपूर्वक व्रतका पालन करके मघा नक्षत्रमें ही हाथीके शरीरकी छायामें बैठकर उसके कानरूपी व्यजनसे हवा लेता हुआ अन्न-विशेष-चावलका बना हुआ पायस या लौहशाकसे विधिपूर्वक हमारा श्राद्ध करेगा? ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“बहुत-से पुत्र पानेकी अभिलाषा रखनी चाहिये, उनमेंसे यदि एक भी उस गया-तीर्थकी यात्रा करे, जहाँ लोकविख्यात अक्षयवट विद्यमान है, जो श्राद्धके फलको अक्षय बनानेवाला है।। ९।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;पितरोंकी क्षय-तिथिको जल, मूल, फल, उसका गूदा और अन्न आदि जो कुछ भी मधुमिश्रित करके दिया जाता है, वह उन्हें अनन्तकालतक तृप्ति देनेवाला है&quot; || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;नवासीवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) नवासीवें अध्याय के श्लोक 1-15&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“विभिन्न नक्षत्रोंमें श्राद्ध करनेका फल”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! यमने राजा शशबिन्दुको भिन्न-भिन्न नक्षत्रोंमें किये जानेवाले जो काम्य श्राद्ध बताये हैं; उनका वर्णन मुझसे सुनो ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य सदा कृत्तिका नक्षत्रके योगमें अग्निकी स्थापना करके पुत्रसहित श्राद्ध या पितरोंका यजन करता है, वह रोग और चिन्तासे रहित हो जाता है ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संतानकी इच्छावाला पुरुष रोहिणीमें और तेजकी कामनावाला पुरुष मृगशिरा नक्षत्रमें श्राद्ध करे। आर्दरा नक्षत्रमें श्राद्धका दान देनेवाला मनुष्य क्रूरकर्मा होता है (इसलिये आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये) ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धनकी इच्छावाले पुरुषको पुनर्वसु नक्षत्रमें श्राद्ध करना चाहिये। पुष्टिकी कामनावाला पुरुष पुष्यनक्षत्रमें श्राद्ध करे | ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आश्लेषामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष धीर पुत्रोंको जन्म देता है। मघामें श्राद्ध एवं पिण्डदान करनेवाला मनुष्य अपने कुट॒म्बी जनोंमें श्रेष्ठ होता है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वाफाल्गुनीमें श्राद्धका दान देनेवाला मानव सौभाग्यशाली होता है। उत्तराफाल्गुनीमें श्राद्ध करनेवाला संतानवान्‌ और हस्तनक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाला अभीष्ट फलका भागी होता है ।। ६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चित्रामें श्राद्धका दान करनेवाले पुरुषको रूपवानू पुत्र प्राप्त होते हैं। स्वातीके योगमें पितरोंकी पूजा करनेवाला वाणिज्यसे जीवन-निर्वाह करता है ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विशाखामें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य यदि पुत्र चाहता हो तो बहुसंख्यक पुत्रोंसे सम्पन्न होता है। अनुराधामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष दूसरे जन्ममें राजमण्डलका शासक होता है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुकुलश्रेष्ठ)! ज्येष्ठा नक्षत्रमें इन्द्रियसंयमपूर्वक पिण्डदान करनेवाला मनुष्य समृद्धिशाली होता है और प्रभुत्व प्राप्त करता है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मूलमें श्राद्ध करनेसे आरोग्यकी प्राप्ति होती है और पूर्वाषाढ़ामें उत्तम यशकी। उत्तराषाढ़ामें पितृयज्ञ करनेवाला पुरुष शोकशून्य होकर पृथ्वीपर विचरण करता है ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अभिजित्‌ नक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाला वैद्यविषयक सिद्धि पाता है। श्रवण नक्षत्रमें श्राद्धका दान देनेवाला मानव मृत्युके पश्चात्‌ सदगतिको प्राप्त होता है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धनिष्ठामें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य नियमपूर्वक राज्यका भागी होता है। वारुण नक्षत्रशतभिषामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष वैद्यविषयक सिद्धिको पाता है | १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वभाद्रपदा्में श्राद्ध करनेवाला बहुत-से भेड़-बकरोंका लाभ लेता है और उत्तराभाद्रपदामें श्राद्ध करनेवाला सहस्रों गौएँ पाता है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्राद्धमें रेवतीका आश्रय लेनेवाला (अर्थात्‌ रेवतीमें श्राद्ध करनेवाला) पुरुष सोनेचाँदीके सिवा अन्य नाना प्रकारके धन पाता है। अभश्रिनीमें श्राद्ध करनेसे घोड़ोंकी और भरणीमें श्राद्धका अनुष्ठान करनेसे उत्तम आयुकी प्राप्ति होती है ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस श्राद्धविधिका श्रवण करके राजा शशबिन्दुने वही किया। उन्होंने बिना किसी क्लेशके ही पृथ्वीको जीता और उसका शासनसूत्र अपने हाथमें ले लिया ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;नब्बेवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) नब्बेवें अध्याय के श्लोक 1-55&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“भ्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्म॒णोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ततका कथन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! कैसे ब्राह्मणको श्राद्धका दान (अर्थात्‌ निमन्त्रण) देना चाहिये? कुरुश्रेष्ठी आप इसका मेरे लिये स्पष्ट वर्णन करें ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन! दान-पधर्मके ज्ञाता क्षत्रियको देवसम्बन्धी कर्म (यज्ञयागादि) में ब्राह्मणकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये, किंतु पितृकर्म (श्राद्ध) में उनकी परीक्षा न्यायसंगत मानी गयी है ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता अपने दैव तेजसे ही इस जगतमें ब्राह्मणोंका पूजन (समादर) करते हैं; अतः देवताओंके उददेश्यसे सभी ब्राह्मणोंके पास जाकर उन्हें दान देना चाहिये ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किंतु महाराज! श्राद्धके समय विद्वान्‌ पुरुष कुल, शील (उत्तम आचरण), अवस्था, रूप, विद्या और पूर्वजोंके निवासस्थान आदिके द्वारा ब्राह्मणकी अवश्य परीक्षा करे ।। ४&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणोंमें कुछ तो पंक्तिदूषक होते हैं और कुछ पंक्तिपावन। राजन! पहले पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंका वर्णन करूँगा, सुनो ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जुआरी, गर्भहत्यारा, राजयक्ष्माका रोगी, पशुपालन करनेवाला, अपढ़, गाँवभरका हरकारा, सूदखोर, गवैया, सब तरहकी चीज बेचनेवाला, दूसरोंका घर फूँकनेवाला, विष देनेवाला, माताद्वारा पतिके जीते-जी दूसरे पतिसे उत्पन्न किये हुए पुत्रके घर भोजन करनेवाला, सोमरस बेचनेवाला, सामुद्रिक विद्या (हस्तरेखा) से जीविका चलानेवाला, राजाका नौकर, तेल बेचनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, पितासे झगड़ा करनेवाला, जिसके घरमें जार पुरुषका प्रवेश हो वह, कलंकित, चोर, शिल्पजीवी, बहुरूपिया, चुगलखोर, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, व्रतरहित, मनुष्योंका अध्यापक, हथियार बनाकर जीविका चलानेवाला, कुत्ते साथ लेकर घूमनेवाला, जिसे कुत्तेने काटा हो वह, जिसके छोटे भाईका विवाह हो गया हो ऐसा अविवाहित बड़ा भाई, चर्मरोगी, गुरुपत्नीगामी, नटका काम करनेवाला, देवमन्दिरमें पूजासे जीविका चलानेवाला और नक्षत्रोंका फल बताकर जीनेवाला--ये सभी ब्राह्मण पंक्तिसे बाहर रखने योग्य हैं! युधिष्ठि!! ऐसे पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंका खाया हुआ हविष्य राक्षसोंको मिलता है, ऐसा ब्रह्मवादी पुरुषोंका कथन है ।। ६ -११½ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण श्राद्धका भोजन करके फिर उस दिन वेद पढ़ता है तथा जो वृषली स्त्रीसे समागम करता है, उसके पितर उस दिनसे लेकर एक मासतक उसीकी विष्ठामें शयन करते हैं ।। १२३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सोमरस बेचनेवालेको जो श्राद्धका अन्न दिया जाता है, वह पितरोंके लिये विष्ठाके तुल्य है। श्राद्धमें वैद्यकों जिमाया हुआ अन्न पीब और रक्तके समान पितरोंको अग्राह्म हो जाता है। देवमन्दिरमें पूजा करके जीविका चलानेवालेको दिया हुआ श्राद्धका दान नष्ट हो जाता है--उसका कोई फल नहीं मिलता। सूदखोरको दिया हुआ अन्न अस्थिर होता है। वाणिज्यवृत्ति करनेवालेको श्राद्धमें दिये हुए अन्नका दान न इहलोकमें लाभदायक होता है और न परलोकमें ।। १३-१४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक पतिको छोड़कर दूसरा पति करनेवाली स्त्रीके पुत्रको दिया हुआ श्राद्धमें अन्नका दान राखमें डाले हुए हविष्यके समान व्यर्थ हो जाता है। जो लोग धर्मरहित और चरित्रहीन द्विजको हव्य-कव्यका दान करते हैं, उनका वह दान परलोकमें नष्ट हो जाता है ।। १५&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मूर्ख मनुष्य जान-बूझकर वैसे पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंको श्राद्धमें अन्नका दान करते हैं, उनके पितर परलोकमें निश्चय ही उनकी विष्ठा खाते हैं ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन अधम ब्राह्मणोंको पंक्तिसे बाहर रखने-योग्य जानना चाहिये। जो मूढ़ ब्राह्मण शूद्रोंको वेदका उपदेश करते हैं, वे भी अपांक्तेय (अर्थात्‌ पंक्ति-बाहर) ही हैं | १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! काना मनुष्य पंक्तिमें बैठे हुए साठ मनुष्योंको दूषित कर देता है। जो नपुंसक है, वह सौ मनुष्योंको अपवित्र बना देता है तथा जो सफेद कोढ़का रोगी है, वह बैठे हुए पंक्तिमें जितने लोगोंको देखता है, उन सबको दूषित कर देता है ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सिरपर पगड़ी और टोपी रखकर भोजन करता है, जो दक्षिणकी ओर मुख करके खाता है तथा जूते पहने भोजन करता है, उनका वह सारा भोजन आसुर समझना चाहिये ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दोषदृष्टि रखते हुए दान करता है और जो बिना श्राद्धके देता है, उस सारे दानको ब्रह्माजीने असुरराज बलिका भाग निश्चित किया है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुत्तों और पंकिादूषक ब्राह्मणोंकी किसी तरह दृष्टि न पड़े, इसके लिये सब ओरसे घिरे हुए स्थानमें श्राद्धका दान करे और वहाँ सब ओर तिल छींटे ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो श्राद्ध तिलोंसे रहित होता है, अथवा जो क्रोधपूर्वक किया जाता है, उसके हविष्यको यातुधान (राक्षस) और पिशाच लुप्त कर देते हैं || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पंक्तिदूषक पुरुष पंक्तिमें भोजन करनेवाले जितने ब्राह्मणोंको देख लेता है, वह मूर्ख दाताको उलने ब्राह्मणोंक दानजनित फलसे वंचित कर देता है || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठस अब जिनका वर्णन किया जा रहा है, इन सबको पंक्तिपावन जानना चाहिये। इनका वर्णन इसलिये करूँगा कि तुम ब्राह्मणोंकी श्राद्धमें परीक्षा कर सको ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्या और वेदव्रतमें स्नातक हुए समस्त ब्राह्मण यदि सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हों तो उन्हें सर्वपावन जानना चाहिये ।। २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब मैं पांक्तेय ब्राह्मणोंका वर्णन करूँगा। उन्हींको पंक्तिपावन जानना चाहिये। जो त्रिणाचिकेत नामक मन्त्रोंका जप करनेवाला, गार्हपत्य आदि पाँच अग्नियोंका सेवन करनेवाला, त्रिसुपर्ण नामक (त्रिसुपर्णमित्यादि) मन्त्रोंका पाठ करनेवाला है तथा “ब्रह्ममेतु माम्‌” इत्यादि तैत्तिरीय-प्रसिद्ध शिक्षा आदि छहों अंगोंका ज्ञान रखनेवाला है ये सब पंक्तिपावन हैं || २६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो परम्परासे वेद या पराविद्याका ज्ञाता अथवा उपदेशक है, जो वेदके छन्दोग शाखाका दविद्वान्‌ है, जो ज्येष्ठ साममन्त्रका गायक, माता-पिताके वशमें रहनेवाला और दस पीढ़ियोंसे श्रोत्रिय (वेदपाठी) है, वह भी पंक्तिपावन है || २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपनी धर्मपत्नियोंके साथ सदा ऋतुकालमें ही समागम करता है, वेद और विद्याके व्रतमें स्नातक हो चुका है, वह ब्राह्मण-पंक्तिको पवित्र कर देता है || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अथर्ववेदके ज्ञाता, ब्रह्मचारी, नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, सत्यवादी, धर्मशील और अपने कर्तव्य-कर्ममें तत्पर हैं, वे पुरुष पंक्तिपावन हैं || २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिन्होंने पुण्य तीर्थोमें गोता लगानेके लिये श्रम--प्रयत्न किया है, वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान करके अवभृथ-स्नान किया है; जो क्रोधरहित, चपलतारहित, क्षमाशील, मनको वशमें रखनेवाले, जितेन्द्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितैषी हैं, उन्हीं ब्राह्मणोंको श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्योंकि ये पंक्तिपावन हैं; अतः इन्हें दिया हुआ दान अक्षय होता है। इनके सिवा दूसरे भी महान्‌ भाग्यशाली पंक्तिपावन ब्राह्मण हैं, उन्हें इस प्रकार जानना चाहिये ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मोक्ष-धर्मका ज्ञान रखनेवाले संयमी और उत्तम प्रकारसे व्रतका आचरण करनेवाले योगी हैं, पांचरात्र आगमके जाननेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं, परम भागवत हैं, वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाले, कुलमें श्रेष्ठ और वैदिक आचारका अनुष्ठान करनेवाले हैं। जो मनको संयममें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इतिहास सुनाते हैं, जो महाभाष्य और व्याकरणके विद्वान्‌ हैं तथा जो पुराण और धर्मशास्त्रोंका न्यायपूर्वक अध्ययन करके उनकी आज्ञाके अनुसार विधिवत्‌ आचरण करनेवाले हैं, जिन्होंने नियमित समयतक गुरुकुलमें निवास करके वेदाध्ययन किया है, जो परीक्षाके सहस्रों अवसरोंपर सत्यवादी सिद्ध हुए हैं तथा जो चारों वेदोंके पढ़ने-पढ़ानेमें अग्रगण्य हैं, ऐसे ब्राह्मण पंक्तिको जितनी दूर देखते हैं उतनी दूरमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको पवित्र कर देते हैं || ३३--३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पंक्तिको पवित्र करनेके कारण ही उन्हें पंक्ति-पावन कहा जाता है। ब्रह्मवादी पुरुषोंकी यह मान्यता है कि वेदकी शिक्षा देनेवाले एवं ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंके वंशमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण अकेला ही साढ़े तीन कोसतकका स्थान पवित्र कर सकता है ।। ३७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ऋत्विक्‌ या अध्यापक न हो, वह भी यदि ऋत्विजोंकी आज्ञा लेकर श्राद्धमें अग्रासन ग्रहण करता है तो पंक्तिके दोषको हर लेता है अर्थात्‌ दूर कर देता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! यदि कोई वेदज्ञ ब्राह्मण सब प्रकारके पंक्तिदोषोंसे रहित है और पतित नहीं हुआ है तो वह पंक्तिपावन ही है ।। ३९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये सब प्रकारकी चेष्टाओंसे ब्राह्मणोंकी परीक्षा करके ही उन्हें श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये। वे स्वकर्ममें तत्पर रहनेवाले, कुलीन और बहुश्रुत होने चाहिये || ४० $ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके श्राद्धोंक भोजनमें मित्रोंकी प्रधानता रहती है, उसके वे श्राद्ध एवं हविष्य पितरों और देवताओंको तृप्त नहीं करते हैं तथा वह श्राद्धकर्ता पुरुष स्वर्गमें नहीं जाता है || ४१३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य श्राद्धमें भोजन देकर उससे मित्रता जोड़ता है, वह मृत्युके बाद देवमार्गसे नहीं जाने पाता। जैसे पीपलका फल डंठलसे टूटकर नीचे गिर जाता है, वैसे ही श्राद्धको मित्रताका साधन बनानेवाला पुरुष स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हो जाता है || ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये श्राद्धकर्ताको चाहिये कि वह श्राद्धमें मित्रको निमन्त्रण न दे। मित्रोंको संतुष्ट करनेके लिये धन देना उचित है। श्राद्धमें भोजन तो उसे ही कराना चाहिये जो शत्रु या मित्र न होकर मध्यस्थ हो ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे ऊसरमें बोया हुआ बीज न तो जमता है और न बोनेवालेको उसका कोई फल मिलता है, उसी प्रकार अयोग्य ब्राह्मणोंको भोजन कराया हुआ श्राद्धका अन्न न इस लोकमें लाभ पहुँचाता है, न परलोकमें ही कोई फल देता है || ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे घास-फ़्सकी आग शीघ्र ही शान्त हो जाती है, उसी प्रकार स्वाध्यायहीन ब्राह्मण तेजहीन हो जाता है, अतः उसे श्राद्धका दान नहीं देना चाहिये, क्योंकि राखमें कोई भी हवन नहीं करता ।। ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लोग एक-दूसरेके यहाँ श्राद्धमें भोजन करके परस्पर दक्षिणा देते और लेते हैं, उनकी वह दान-दक्षिणा पिशाच-दक्षिणा कहलाती है। वह न देवताओंको मिलती है, न पितरोंको। जिसका बछड़ा मर गया है ऐसी पुण्यहीना गौ जैसे दुखी होकर गोशालामें ही चक्कर लगाती रहती है, उसी प्रकार आपसमें दी और ली हुई दक्षिणा इसी लोकमें रह जाती है, वह पितरोंतक नहीं पहुँचने पाती || ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे आग बुझ जानेपर जो घृतका हवन किया जाता है, उसे न देवता पाते हैं, न पितर; उसी प्रकार नाचनेवाले, गवैये और झूठ बोलनेवाले अपात्र ब्राह्मणको दिया हुआ दान निष्फल होता है। अपात्र पुरुषको दी हुई दक्षिणा न दाताको तृप्त करती है न दान लेनेवालेको; प्रत्युत दोनोंका ही नाश करती है। यही नहीं, वह विनाशकारिणी निन्दित दक्षिणा दाताके पितरोंको देवयान-मार्गसे नीचे गिरा देती है || ४७-४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! जो सदा ऋषियोंके बताये हुए धर्ममार्गपर चलते हैं, जिनकी बुद्धि एक निश्चयपर पहुँची हुई है तथा जो सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता हैं, उन्‍्हींको देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ।। ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! ऋषि-मुनियोंमें किन्हींको स्वाध्यायनिष्ठ, किन्हींको ज्ञाननिष्ठ, किन्हींको तपोनिष्ठ और किन्हींको कर्मनिष्ठ जानना चाहिये ।। ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! उनमें ज्ञाननिष्ठ महर्षियोंको ही श्राद्धका अन्न जिमाना चाहिये। जो लोग ब्राह्मणोंकी निन्दा नहीं करते, वे ही श्रेष्ठ मनुष्य हैं ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! जो बातचीतमें ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हैं, उन्हें श्राद्धमें भोजन नहीं कराना चाहिये। नरेश्वर! वानप्रस्थ ऋषियोंका यह वचन सुना जाता है कि “ब्राह्मणोंकी निन्दा होनेपर वे निन्‍दा करनेवालेकी तीन पीढ़ियोंका नाश कर डालते हैं।” वेदवेत्ता ब्राह्मणोंकी दूरसे ही परीक्षा करनी चाहिये || ५२-५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! वेदज्ञ पुरुष अपना प्रिय हो या अप्रिय--इसका विचार न करके उसे श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये। जो दस लाख अपात्र ब्राह्मगको भोजन कराता है, उसके यहाँ उन सबके बदले एक ही सदा संतुष्ट रहनेवाला वेदज्ञ ब्राह्मण भोजन करनेका अधिकारी है, अर्थात्‌ लाखों मूर्खोकी अपेक्षा एक सत्पात्र ब्राह्मणको भोजन कराना उत्तम है ।।५४।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;i&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं)&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/5677553625251060770/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-86-chapter-to-90-chapter-of-entire.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/5677553625251060770'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/5677553625251060770'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/09/from-86-chapter-to-90-chapter-of-entire.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के छियासीवें अध्याय से नब्बेवें अध्याय तक (From the 86 chapter to the 90 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' 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कथा"/><title type='text'>सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के पचासीवाँ अध्याय (From the 85 chapter the entire Mahabharata (anushashn Parva))</title><content type='html'>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; 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small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) पचासीवें अध्याय के श्लोक 1-168&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अन्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता बोले--प्रभो! आपने जिसे वर दे रखा है, वह तारक नामक असुर देवताओं और ऋषियोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! देव! उस असुरसे हमलोगोंको भारी भय उत्पन्न हो गया है। आप हमारी उससे रक्षा करें; क्योंकि हमारे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रद्माजीने कहा--मेरा तो समस्त प्राणियोंके प्रति समान भाव है तथापि मैं अधर्म नहीं पसन्द करता; अतः देवताओं तथा ऋषियोंको कष्ट देनेवाले तारकासुरको तुम लोग शीघ्र ही मार डालो || ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुरश्रेष्ाणण! वेदों और धर्मोंका उच्छेद न हो, इसका उपाय मैंने पहलेसे ही कर लिया है। अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता बोले--भगवन्‌! आपके ही वरदानसे वह दैत्य बलके घमंडसे भर गया है। देवता उसे नहीं मार सकते। ऐसी दशामें वह कैसे शान्त हो सकता है? ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! उसने आपसे यह वरदान प्राप्त कर लिया है कि देवताओं, असुरों तथा राक्षसोंमेंसे किसीके हाथसे भी मारा न जाऊँ ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगत्पते! पूर्वकालमें जब हमने रुद्राणीकी संततिका उच्छेद कर दिया, तब उन्होंने सब देवताओंको शाप दे दिया कि तुम्हारे कोई संतान नहीं होगी || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माजी बोले--सुरश्रेष्टण! उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे। अतः देवद्रोहियोंके वधके लिये वे ही संतान उत्पन्न करेंगे || ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वही समस्त देवताओं, दानवों, राक्षसों, मनुष्यों, गन्धर्वों, नागों तथा पक्षियोंको लाँधकर अपने अचूक अस्त्र-शक्तिके द्वारा उस असुरका वध कर डालेगा, जिससे तुम्हें भय उत्पन्न हुआ है। दूसरे जो देवशत्रु हैं, उनका भी वह संहार कर डालेगा ।। ९-१० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सनातन संकल्पको ही काम कहते हैं। उसी कामसे रुद्रका जो तेज स्खलित होकर अग्निमें गिरा था, उसे अग्निने ले रखा है। द्वितीय अग्निके समान उस महान्‌ तेजको वे गंगाजीमें स्थापित करके बालकरूपसे उत्पन्न करेंगे। वही बालक देवशत्रुओंके वधका कारण होगा ।। ११-१२ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निदेव उस समय छिपे हुए थे, इसलिये वह शाप उन्हें नहीं प्राप्त हुआ; अतः देवताओ! अग्निके जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह तुमलोगोंका सारा भय हर लेगा ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुमलोग अग्निदेवकी खोज करो और उन्हें आज ही इस कार्यमें नियुक्त करो। निष्पाप देवताओ! तारकासुरके वधका यह उपाय मैंने बता दिया ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तेजस्वी पुरुषोंके शाप तेजस्वियोंपर अपना प्रभाव नहीं दिखाते। साधारण बली कितने ही क्‍यों न हों, अत्यन्त बलशालीको पाकर दुर्बल हो जाते हैं || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपस्वी पुरुषका जो काम है, वही संकल्प एवं अभिरुचिके नामसे प्रसिद्ध है। वह सनातन या चिरस्थायी होता है। वह वर देनेवाले अवध्य पुरुषोंका भी वध कर सकता है ।। १६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निदेव इस जगत्‌के पालक, अनिर्वचनीय, सर्वव्यापी, सबके उत्पादक, समस्त प्राणियोंके हृदयमें शयन करनेवाले, सर्वसमर्थ तथा रुद्रसे भी ज्येष्ठ हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तेजकी राशिभूत अग्निदेवका तुम सब लोग शीघ्र अन्वेषण करो। वे तुम्हारी मनोवांछित कामनाको पूर्ण करेंगे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महात्मा ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सफलमनोरथ हुए देवता अग्निदेवका अन्वेषण करनेके लिये वहाँसे चले गये ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब देवताओंसहित ऋषियोंने तीनों लोकोंमें अग्निकी खोज प्रारम्भ की। उन सबका मन उन्हींमें लगा था और वे--सभी अग्निदेवका दर्शन करना चाहते थे || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भुगुश्रेष्ठट उत्तम तपस्यासे युक्त, तेजस्वी और लोकविख्यात सभी सिद्ध देवता सभी लोकोंमें अग्निदेवकी खोज करते रहे || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे छिपकर अपने-आपमें ही लीन थे; अतः देवता उनके पास नहीं पहुँच सके। तब अग्निका दर्शन करनेके लिये उत्सुक और भयभीत हुए देवताओंसे एक जलचारी मेढक, जो अग्निके तेजसे दग्ध एवं क्लान्तचित्त होकर रसातलसे ऊपरको आया था, बोला -- || २२-२३ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देवताओ! अग्नि रसातलमें निवास करते हैं। प्रभो! मैं अग्निजनित संतापसे ही घबराकर यहाँ आया हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देवगण! भगवान्‌ अग्निदेव अपने तेजके साथ जलको संयुक्त करके जलमें ही सोये हैं। हमलोग उन्हींके तेजसे संतप्त हो रहे हैं ।। २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देवताओ! यदि आपको अग्निदेवका दर्शन अभीष्ट हो और यदि उनसे आपका कोई कार्य हो तो वहीं जाकर उनसे मिलिये ।। २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देवगण! आप जाइये। हम भी अग्निके भयसे अन्यत्र जायँगे।! इतना ही कहकर वह मेढक तुरंत ही जलमें घुस गया ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निदेव समझ गये कि मेढकने मेरी चुगली खायी है; अतः उन्होंने उसके पास पहुँचकर यह शाप दे दिया कि “तुम्हें रसका अनुभव नहीं होगा” || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेढकको शाप देकर वे तुरंत दूसरी जगह निवास करनेके लिये चले गये। सर्वव्यापी अग्निने अपने-आपको प्रकट नहीं किया ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भुगुश्रेष्॒ महाबाहो! उस समय देवताओंने मेढकोंपर जो कृपा की, वह सब बता रहा हूँ, सुनो || ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता बोले--मेढको! अग्निदेवके शापसे तुम्हारे जिह्ला नहीं होगी; अतः तुम रसोंके ज्ञानसे शून्य रहोगे तथापि हमारी कृपासे तुम नाना प्रकारकी वाणीका उच्चारण कर सकोगे ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बिलमें रहते समय तुम आहार न मिलनेके कारण अचेत और निष्प्राण होकर सूख जाओगे तो भी भूमि तुम्हें धारण किये रहेगी--वर्षाका जल मिलनेपर तुम पुन: जीवित हो उठोगे। घने अन्धकारसे भरी हुई रात्रिमें भी तुम विचरते रहोगे || ३२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेढकोंसे ऐसा कहकर देवता पुनः अग्निकी खोजके लिये इस पृथ्वीपर विचरने लगे; किंतु वे अग्निदेवको कहीं उपलब्ध न कर सके ।। ३३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भुगुश्रेष्ठ॒ तदनन्तर देवराज इन्द्रके ऐरावतकी भाँति कोई विशालकाय गजराज देवताओंसे बोला--&#39;अश्वत्थ अग्निरूप है&#39; || ३४३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगुकुलभूषण! यह सुनकर अग्निदेव क्रोधसे विह्लल हो उठे और उन्होंने समस्त हाथियोंको शाप देते हुए कहा--तुमलोगोंकी जिह्ला उलटी हो जायगी” || ३५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा कहकर हाथीद्वारा सूचित किये गये अग्निदेव अश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर प्रविष्ट हो गये। वे वहाँ अच्छी तरह सोना चाहते थे ।। ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! भृगुकुलश्रेष्ठ तब सत्यपराक्रमी देवताओंने प्रसन्न हो नागोंपर जिस प्रकार अपना अनुग्रह प्रकट किया, उसे सुनो || ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता बोले--हाथियो! तुम अपनी उलटी जिह्वासे भी सब प्रकारके आहार ग्रहण कर सकोगे तथा उच्चस्वरसे वाणीका उच्चारण कर सकोगे; किंतु उससे किसी अक्षरकी अभिव्यक्ति नहीं होगी ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा कहकर देवताओंने पुनः अग्निका अनुसरण किया। उधर अग्निदेव अभश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर जा बैठे ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विप्रवर! तदनन्तर तोतेने अग्निका पता बता दिया। फिर तो देवता शमीवृक्षकी ओर दौड़े। यह देख अग्निने तोतेको शाप दे दिया--&#39;तू वाणीसे रहित हो जायगा” ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निदेवने उसकी भी जिह्ला उलट दी। अब अग्निदेवको प्रत्यक्ष देखकर देवताओंने दयायुक्त होकर शुकसे कहा--&#39;तू शुकयोनिमें रहकर अत्यन्त वाणीरहित नहीं होगा--कुछकुछ बोल सकेगा। जीभ उलट जानेपर भी तेरी बोली बड़ी मधुर एवं कमनीय होगी ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;जैसे बड़े-बूढ़े पुरुषको बालककी समझमें न आनेवाली अदभुत तोतली बोली बड़ी मीठी लगती है, उसी प्रकार तेरी बोली भी सबको प्रिय लगेगी” ।। ४२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा कहकर शमीके गर्भमें अग्निदेवका दर्शन करके देवताओंने सभी कर्मोंके लिये शमीको ही अग्निका पवित्र स्थान नियत किया। तबसे अग्निदेव शमीके भीतर दृष्टिगोचर होने लगे || ४३-४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भार्गव! मनुष्योंने अग्निको प्रकट करनेके लिये शमीका मन्‍्थन ही उपाय जाना। अग्निने रसातलमें जिस जलका स्पर्श किया था और वहाँ शयन करनेवाले अग्नि-देवके तेजसे जो संतप्त हो गया था, वह जल पर्वतीय झरनोंके रूपमें अपनी गरमी निकालता है || ४५-४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस समय देवताओंको देखकर अग्निदेव व्यथित हो गये और उनसे पूछने लगे --“किस उद्देश्यसे यहाँ आपलोगोंका शुभागमन हुआ है?” ।। ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब सम्पूर्ण देवता और महर्षि उनसे बोले--“हम तुम्हें एक कार्यमें नियुक्त करेंगे। उसे तुम्हें करना चाहिये। उस कार्यको सम्पन्न कर देनेपर तुम्हें भी बहुत बड़ा लाभ होगा” || ४८-४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निने कहा--देवताओ! आपलोगोंका जो कार्य है उसे मैं अवश्य पूर्ण करूँगा, अतः उसे कहिये। मैं आपलोगोंका आज्ञापालक हूँ। इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये || ५०&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता बोले--अग्निदेव! एक तारकनामक असुर है जो ब्रह्माजीके वरदानसे मदमत्त होकर अपने पराक्रमसे हम सब लोगोंको कष्ट दे रहा है। अतः तुम उसके वधका कोई उपाय करो ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! महाभाग पावक! इन देवताओं, प्रजापतियों तथा ऋषियोंकी भी रक्षा करो ।। ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! हव्यवाहन! तुम एक ऐसा तेजस्वी और महावीर पुत्र उत्पन्न करो जो उस असुरसे प्राप्त होनेवाले हमारे भयका नाश करे ।। ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! महादेवी पार्वतीने हमलोगोंको संतानहीन होनेका शाप दे दिया है; अतः तुम्हारे बलवीर्यके सिवा हमारे लिये दूसरा कोई आश्रय नहीं रह गया है इसलिये हमलोगोंकी रक्षा करो ।। ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओंके ऐसा कहनेपर “तथास्तु” कहकर दुर्धर्ष भगवान्‌ हव्यवाहन भागीरथी गंगाके तटपर गये ।। ५५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे वहाँ गंगाजीसे मिले। गंगाजीने उस समय भगवान्‌ शंकरके उस तेजको गर्भरूपसे धारण किया। जैसे सूखे तिनकों अथवा लकड़ियोंके ढेरमें रखी हुई आग प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वह तेजस्वी गर्भ गंगाजीके भीतर बढ़ने लगा ।। ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निदेवके दिये हुए उस तेजसे गंगाजीका चित्त व्याकुल हो गया। वे अत्यन्त संतप्त हो उठीं और उसे सहन करनेमें असमर्थ हो गयीं || ५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अन्निके द्वारा गंगाजीमें स्थापित किया हुआ वह तेजस्वी गर्भ जब बढ़ रहा था, उसी समय किसी असुरने वहाँ आकर सहसा बड़े जोरसे भयानक गर्जना की ।। ५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस आकस्मिक महान्‌ सिंहनादसे भयभीत हुई गंगाजीकी आँखें घूमने लगीं और उनके नेत्रोंसे आँसू बहने लगा ।। ५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे अचेत हो गयीं। अतः: उस गर्भको और अपने-आपको भी न सम्हाल सकीं। उनके सारे अंग तेजसे व्याप्त हो रहे थे। विप्रवर/! उस समय जाह्नवी देवी उस गर्भकी शक्तिसे अभिभूत हो काँपती हुई-सी अग्निसे बोलीं--“भगवन्‌! मैं आपके इस तेजको धारण करनेमें असमर्थ हूँ || ६०-६१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“निष्पाप अग्निदेव! इसने मुझे मूर्च्छित-सी कर दिया है। मेरा स्वास्थ्य अब पहले-जैसा नहीं रह गया है। भगवन्‌! मैं बहुत घबरा गयी हूँ। मेरी चेतना लुप्त-सी हो रही है || ६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तपनेवालोंमें श्रेष्ठ पावक! अब मुझमें इस गर्भको धारण किये रहनेकी शक्ति नहीं रह गयी है। मैं असह्य दुःखसे ही इसे त्यागने जा रही हूँ। स्वेच्छासे किसी प्रकार नहीं ।। ६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देव! विभावसो! महाद्युते! इस तेजके साथ मेरा कोई सम्पर्क नहीं है। इस समय जो अत्यन्त सूक्ष्म सम्बन्ध स्थापित हुआ है वह भी देवताओंपर आयी हुई विपत्तिको टालनेके उद्देश्यसे ही है ।। ६४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“हुताशन! इस कार्यमें यदि कोई गुण या दोषमुक्त परिणाम हो अथवा केवल धर्म या अधर्म हो, उन सबका उत्तरदायित्व आपपर ही है, ऐसा मैं मानती हूँ” || ६५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब अग्निने गंगाजीसे कहा--देवि! यह गर्भ मेरे तेजसे युक्त है, इससे महान्‌ गुणयुक्त फलका उदय होनेवाला है। इसे धारण करो, धारण करो ।। ६६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;देवि! तुम सारी पृथ्वीको धारण करनेमें समर्थ हो, फिर इस गर्भकों धारण करना तुम्हारे लिये कुछ असाध्य नहीं है” ।। ६७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओं तथा अग्निके मना करनेपर भी सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाने उस गर्भको गिरिराज मेरुके शिखरपर छोड़ दिया ।। ६८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यद्यपि गंगाजी उस गर्भको धारण करनेमें समर्थ थीं; तो भी रुद्रके तेजसे पराभूत होकर बलपूर्वक उसे धारण न कर सकीं ।। ६९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगुश्रेष्ठ! गंगाजीने बड़े दुःखसे अग्निके समान तेजस्वी उस गर्भको त्याग दिया। तत्पश्चात्‌ अग्निने उनका दर्शन किया और सरिताओंमें श्रेष्ठ उन गंगाजीसे पूछा--&#39;“देवि! तुम्हारा गर्भ सुखपूर्वक उत्पन्न हो गया है न? उसकी कान्ति कैसी है अथवा उसका रूप कैसा दिखायी देता है, वह कैसे तेजसे युक्त है? यह सारी बातें मुझसे कहो” || ७०-७१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गंगा बोलीं--देव! वह गर्भ क्‍या है, सोना है। अनघ! वह तेजमें हूबहू आपके ही समान है। सुवर्ण-जैसी निर्मल कान्तिसे प्रकाशित होता है और सारे पर्वतको उद्धासित करता है | ७२ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपनेवालोंमें श्रेष्ठ अग्निदिव! कमल और उत्पलसे संयुक्त सरोवरोंके समान उसका अंग शीतल है और कदम्ब-पुष्पोंके समान उससे मीठी-मीठी सुगन्ध फैलती रहती है || ७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूर्यकी किरणोंके समान उस गर्भसे वहाँकी भूमि या पर्वतोंपर रहनेवाले जिस किसी द्रव्यका स्पर्श हुआ, वह सब चारों ओरसे सुवर्णमय दिखायी देने लगा || ७४ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह बालक अपने तेजसे चराचर प्राणियोंको प्रकाशित करता हुआ पर्वतों, नदियों और झरनोंकी ओर दौड़ने लगा था || ७५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हव्यवाहन! आपका एऐश्वर्यशाली पुत्र ऐसे ही रूपवाला है। वह सूर्य तथा आपके समान तेजस्वी और दूसरे चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ है || ७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भार्गवनन्दन! ऐसा कहकर देवी गंगा वहीं अन्तर्धान हो गयीं और तेजस्वी अग्निदेव देवताओंका कार्य सिद्ध करके उस समय वहाँसे अभीष्ट देशको चले गये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्हीं समस्त कर्मों और गुणोंके कारण देवता तथा ऋषि संसारमें अग्निको हिरण्यरेताके नामसे पुकारते हैं। उस समय अग्निजनित हिरण्य (वसु) धारण करनेके कारण पृथ्वीदेवी वसुमती नामसे विख्यात हुईं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निके अंशसे उत्पन्न हुआ गंगाका वह महातेजस्वी गर्भ सरकण्डोंके दिव्य वनमें पहुँचकर बढ़ने और अद्भुत दिखायी देने लगा ।। ८० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभातकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिवाले उस तेजस्वी बालकको कृत्तिकाओंने देखा और उसे अपना पुत्र मानकर स्तनोंका दूध पिलाकर उसका पालन-पोषण किया ।। ८१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसीलिये वह परम तेजस्वी कुमार “कार्तिकेय&#39; नामसे प्रसिद्ध हुआ। शिवके स्कन्दित (स्खलित) वीर्यसे उत्पन्न होनेके कारण उनका नाम &#39;स्कन्द&#39; हुआ और पर्वतकी गुहामें निवास करनेसे वह “गुह” कहलाया ।। ८२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार अग्निसे संतानरूपमें सुवर्णकी उत्पत्ति हुई है। उसमें भी जाम्बूनद नामक सुवर्ण श्रेष्ठ है और वह देवताओंका भी भूषण है ।। ८३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तभीसे सुवर्णका नाम जातरूप हुआ। वह रत्नोंमें उत्तम रत्न और आशभृषणोंमें श्रेष्ठ आभूषण है ।। ८४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह पवित्रोंमें भी अधिक पवित्र तथा मंगलोंमें भी अधिक मंगलमय है। जो सुवर्ण है, वही भगवान्‌ अनि्नि हैं, वही ईश्वर और प्रजापति हैं || ८५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;द्विजवरो! सुवर्ण सम्पूर्ण पवित्र वस्तुओंमें अतिशय पवित्र है; उसे अग्नि और सोमरूप बताया गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसिष्ठजी कहते हैं--परशुराम! परमात्मा पितामह ब्रह्माका जो ब्रह्मदर्शन नामक वृत्तान्त मैंने पूर्वकालमें सुना था, वह तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो || ८७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभावशाली तात परशुराम! एक समयकी बात है, सबके ईश्वर और महान्‌ देवता भगवान्‌ रुद्र वरुणका स्वरूप धारण करके वरुणके साम्राज्यपर प्रतिष्ठित थे। उस समय उनके यज्ञमें अग्नि आदि सम्पूर्ण देववा और ऋषि पधारे। सम्पूर्ण मूर्तिमान्‌ यज्ञांग, वषट्कार, साकार साम, सहसोरों यजुर्मन्त्र तथा पद और क्रमसे विभूषित ऋग्वेद भी वहाँ उपस्थित हुए ।। ८८--९० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदोंके लक्षण, उदात्त आदि स्वर, स्तोत्र, निरुक्त, सुरपंक्ति, ओंकार तथा यज्ञके नेत्रस्वरूप प्रग्रह और निग्रह भी उस स्थानपर स्थित थे ।। ९१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेद, उपनिषद्‌, विद्या और सावित्री देवी भी वहाँ आयी थीं। भगवान्‌ शिवने भूत, वर्तमान और भविष्य--तीनों कालोंको धारण किया था ।। ९२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! पिनाकधारी महादेवजीने अनेक रूपवाले उस यज्ञकी शोभा बढ़ायी और उन्होंने स्वयं ही अपने द्वारा अपने आपको आहुति प्रदान की ।। ९३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये भगवान्‌ शिव ही स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी समस्त शून्य प्रदेश, राजा, सम्पूर्ण विद्याओंके अधीश्वर तथा तेजस्वी अग्निरूप हैं || ९४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये ही भगवान्‌ सर्वभूतपति महादेव ब्रह्मा, शिव, रुद्र, वरुण, अग्नि, प्रजापति तथा कल्याणमय शम्भु आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं || ९५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगुकुलभूषण! इस प्रकार भगवान्‌ पशुपतिका वह यज्ञ चलने लगा। उसमें सम्मिलित होनेके लिये तप, क्रतु, उद्दीप्त व्रतवाली दीक्षा देवी, दिकृपालोंसहित दिशाएँ, देवपत्नियाँ, देवकन्याएँ तथा देव-माताएँ भी एक साथ आयी थीं ।। ९६-९७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महात्मा वरुण पशुपतिके यज्ञमें आकर वे देवांगनाएँ बहुत प्रसन्न थीं। उस समय उन्हें देखकर स्वयम्भू ब्रह्माजीका वीर्य स्खलित हो पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। ९८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब ब्रह्माजीके वीर्यसे संसिक्त धूलिकणोंको दोनों हाथोंद्वारा भूमिसे उठाकर पूषाने उसी आगमें फेंक दिया ।। ९९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर प्रज्वलित अग्निवाले उस यज्ञके चालू होनेपर वहाँ ब्रह्माजीका वीर्य पुनः स्खलित हुआ || १०० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भृगुनन्दन! स्खलित होते ही उस वीर्यको खुवेमें लेकर उन्होंने स्वयं ही मन्त्र पढ़ते हुए घीकी भाँति उसका होम कर दिया || १०१ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शक्तिशाली ब्रह्माजीने उस त्रिगुणात्मक वीर्यसे चतुर्विध प्राणिसमुदायको जन्म दिया। उनके वीर्यका जो रजोमय अंश था, उससे जगतमें तैजस प्रवृत्तिप्रधान जंगम प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई || १०२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तमोमय अंशसे तामस पदार्थ--स्थावर वृक्ष आदि प्रकट हुए और जो साच्चिक अंश था, वह राजस और तामस दोनोंमें अन्तर्भूत हो गया। वह सत्त्वगुण अर्थात्‌ प्रकाशस्वरूपा बुद्धिका नित्यस्वरूप है और आकाश आदि सम्पूर्ण विश्व भी उस बुद्धिका कार्य होनेसे उसका ही स्वरूप है |&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः सम्पूर्ण भूतोंमें जो सत्त्वमुण तथा उत्तम तेज है, वह प्रजापतिके उस शुक्रसे ही प्रकट हुआ है। प्रभो! ब्रह्माजीके वीर्यकी जब अग्निमें आहुति दी गयी तब उससे तीन शरीरधारी पुरुष उत्पन्न हुए, जो अपने-अपने कारणजनित गुणोंसे सम्पन्न थे || १०४; ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भृग्‌ अर्थात्‌ अग्निकी ज्वालासे उत्पन्न होनेके कारण एक पुरुषका नाम “भृगु” हुआ। अंगारोंसे प्रकट हुए दूसरे पुरुषका नाम “अंगिरा&#39; हुआ और अंगारोंके आश्रित जो स्वल्पमात्र ज्वाला या भृूगु होती है उससे “कवि&#39; नामक तीसरे पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। भृगुजी ज्वालाओंके साथ ही उत्पन्न हुए थे, उससे भूगु कहलाये || १०५-१०६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसी अग्निकी मरीचियोंसे मरीचि उत्पन्न हुए; जिनके पुत्र मारीच--कश्यप नामसे विख्यात हैं। तात! अंगारोंसे अंगिरा और कुशोंके ढेरसे वालखिल्य नामक ऋषि प्रकट हुए थे ।। १०७ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विभो! अत्रैव--उन्हीं कुशसमूहोंसे एक और ब्रह्मर्षि उत्पन्न हुए, जिन्हें लोग “अत्रि” कहते हैं। भस्म--राशियोंसे ब्रह्मर्षियोंद्वारा सम्मानित वैखानसोंकी उत्पत्ति हुई, जो तपस्या, शास्त्र-ज्ञान और सदगुणोंके अभिलाषी होते हैं। अग्निके अश्रुसे दोनों अश्विनीकुमार प्रकट हुए, जो अपनी रूप-सम्पत्तिके द्वारा सर्वत्र सम्मानित हैं || १०८-१०९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शेष प्रजापतिगण उनके श्रवण आदि इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए। रोमकूपोंसे ऋषि, पसीनेसे छन्‍्द और वीर्यसे मनकी उत्पत्ति हुई || ११० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस कारणसे शास्त्रज्ञानसम्पन्न महर्षियोंने वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए अग्निको सर्वदेवमय बताया है || १११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस यज्ञमें जो समिधाएँ काममें ली गयीं तथा उनसे जो रस निकला, वे ही सब मास, पक्ष, दिन, रात एवं मुहूर्तरूप हो गये और अग्निका जो पित्त था, वह उग्र तेज होकर प्रकट हुआ || ११२ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निके तेजको लोहित कहते हैं, उस लोहितसे कनक उत्पन्न हुआ। उस कनकको मैत्र जानना चाहिये तथा अग्निके धूमसे वसुओंकी उत्पत्ति बतायी गयी है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्निकी जो लपटें होती हैं, वे ही एकादश रुद्र तथा अत्यन्त तेजस्वी द्वादश आदित्य हैं, तथा उस यज्ञमें जो दूसरे-दूसरे अंगारे थे वे ही आकाशस्थित नक्षत्रमण्डलोंमें ज्योति:पुंजके रूपमें स्थित हैं || ११४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस लोकके जो आदि स्रष्टा हैं, उन ब्रह्माजीका कथन है कि अग्नि परब्रह्मस्वरूप है। वही अविनाशी परब्रह्म परमात्मा है और वही सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। यह गोपनीय रहस्य ज्ञानी पुरुष बताते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब वरुण एवं वायुरूप महादेवजीने कहा--“देवताओ! यह मेरा दिव्य यज्ञ है। मैं ही इस यज्ञका गृहस्थ यजमान हूँ ।। ११६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“आकाशचारी देवगण! पहले जो तीन पुरुष प्रकट हुए हैं, वे भूगु, अंगिरा और कवि मेरे पुत्र हैं, इसमें संशय नहीं है। इस बातको तुम जान लो; क्योंकि इस यज्ञका जो कुछ फल है, उसपर मेरा ही अधिकार है” || ११७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अग्नि बोले--ये तीनों संतानें मेरे अंगोंसे उत्पन्न हुई हैं और मेरे ही आश्रयमें विधाताने इनकी सृष्टि की है। अतः ये तीनों मेरे ही पुत्र हैं। वरुणरूपधारी महादेवजीका इनपर कोई अधिकार नहीं है ।। ११८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर लोकपितामह लोकगुरु ब्रह्माजीने कहा--“ये सब मेरी ही संतानें हैं; क्योंकि मेरे ही वीर्यकी आहुति दी गयी है; जिससे इनकी उत्पत्ति हुई है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैं ही यज्ञका कर्ता और अपने वीर्यका हवन करनेवाला हूँ। जिसका बीज होता है उसको ही उसका फल मिलता है। यदि इनकी उत्पत्तिमें वीर्यकी ही कारण माना जाय तो निश्चय ही ये मेरे पुत्र हैं&#39; | १२० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार विवाद उपस्थित होनेपर समस्त देवताओंने ब्रह्माजीके पास जा दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनको प्रणाम किया और कहा-- || १२१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“भगवन्‌! हम सब लोग और चराचरसहित सारा जगत्‌ ये सब-के-सब आपकी ही संतान हैं। अत: अब ये प्रकाशमान अग्नि और ये वरुणरूपधारी ईश्वर महादेव भी अपना मनोवांछित फल प्राप्त करें! || १२२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे जलजन्तुओंके स्वामी वरुणरूपी भगवान्‌ शिवने सबसे पहले सूर्यके समान तेजस्वी भृगुको पुत्ररूपमें ग्रहण किया। फिर उन्होंने ही अंगिराको अग्निकी संतान निश्चित किया || १२३-१२४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर तत्त्वज्ञानी ब्रह्माने कविको अपनी संतानके रूपमें ग्रहण किया। उस समय संतानके कर्तव्यको जाननेवाले महर्षि भूगु वारुण नामसे विख्यात हुए। तेजस्वी अंगिरा आग्नेय तथा महायशस्वी कवि ब्राह्म नामसे विख्यात हुए। भूगु और अंगिरा--ये दोनों लोकमें जगत्‌की सृष्टिका विस्तार करनेवाले बतलाये गये हैं | १२५-१२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार ये तीन प्रजापति हैं और शेष सब लोग इनकी संतानें हैं। यह सारा जगत्‌ इन्हींकी संतति हैं, इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ।। १२७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भृगुके सात पुत्र व्यापक हुए, जो उन्हींके समान गुणवान्‌ थे। च्यवन, वज्रशीर्ष, शुचि, और्व, शुक्र, वरेण्य, तथा सवन--ये ही उन सातोंके नाम हैं। सभी भृगुवंशी सामान्यतः वारुण कहलाते हैं। जिनके वंशमें तुम भी उत्पन्न हुए हो ।। १२८-१२९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंगिराके आठ पुत्र हैं, वे भी वारुण कहलाते हैं (वरुणके यज्ञमें उत्पन्न होनेसे ही उनकी वारुण संज्ञा हुई है)। उनके नाम इस प्रकार हैं--बृहस्पति, उतथ्य,पयस्य, शान्ति, घोर, विरूप, संवर्त और आठवाँ सुधन्वा। ये आठ अग्निके वंशमें उत्पन्न हुए हैं। अतः आग्नेय कहलाते हैं। वे सब-के-सब ज्ञाननिष्ठ एवं निरामय (रोग-शोकसे रहित) हैं || १३०-१३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माके पुत्र जो कवि हैं, उनके पुत्रोंकी भी वारुण संज्ञा है। वे आठ हैं और सभी पुत्रोचित गुणोंसे सम्पन्न हैं। उन्हें शुभलक्षण एवं ब्रह्मज्ञानी माना गया है ।। १३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनके नाम ये हैं--कवि, काव्य, धुृष्णु, बुद्धिमान शुक्राचार्य, भूगु, विरजा, काशी तथा धर्मज्ञ उग्र || १३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये आठ कवितके पुत्र हैं। इन सबके द्वारा यह सारा जगत्‌ व्याप्त है। ये आठों प्रजापति हैं और प्रजाके गुणोंसे युक्त होनेके कारण प्रजा भी कहे गये हैं || १३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भुगुश्रेष्ठी इस प्रकार अंगिरा, कवि और भृगुके वंशजों तथा संतान-परम्पराओंसे सारा जगत्‌ व्याप्त है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विप्रवर! तात! प्रभावशाली जलेश्वर वरुणरूप शिवने पहले कवि और भृगुको पुत्ररूपसे ग्रहण किया था, इसलिये वे वारुण कहलाये ।। १३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज्वालाओंसे सुशोभित होनेवाले अग्निदेवने वरुणरूप शिवसे अंगिराको पुत्ररूपमें प्राप्त किया; इसलिये अंगिराके वंशमें उत्पन्न हुए सभी पुत्र अग्निवंशी एवं वारुण नामसे भी जानने योग्य हैं |। १३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालमें देवताओंने पितामह ब्रह्माको प्रसन्न किया और कहा--&#39;प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे ये भूगु आदिके वंशज इस पृथ्वीका पालन करते हुए अपनी संतानोंद्वारा हमारा संकटसे उद्धार करें। ये सभी प्रजापति हों और सभी अत्यन्त तपस्वी हों। ये आपके कृपाप्रसादसे इस समय इस सम्पूर्ण लोकका संकटसे उद्धार करेंगे ।। १३८-१३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“आपकी दयासे ये सब लोग वंशप्रवर्तक, आपके तेजकी वृद्धि करनेवाले तथा वेदज्ञ पुण्यात्मा हों || १४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“इन सबका स्वभाव सौम्य हो। प्रजापतियोंके वंशमें उत्पन्न हुए ये महर्षिगण सदा देवताओंके पक्षमें रहें तथा तप और उत्तम ब्रह्मचर्यका बल प्राप्त करें || १४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;प्रभो! पितामह! ये सब और हमलोग आपहीकी संतान हैं; क्योंकि देवताओं और ब्राह्मणोंकी सृष्टि करनेवाले आप ही हैं ।। १४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! कश्यपसे लेकर समस्त भृगुवंशियोंतक हम सब लोग आपहीकी संतान हैं --ऐसा सोचकर आपसे अपनी भूलोंके लिये क्षमा चाहते हैं ।। १४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;*वे प्रजापतिगण इसी रूपसे प्रजाओंको उत्पन्न करेंगे और सृष्टिके प्रारम्भसे लेकर प्रलयपर्यन्त अपने-आपको मर्यादामें स्थापित किये रहेंगे” || १४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओंके ऐसा कहनेपर लोकपितामह ब्रह्मा प्रसन्न होकर बोले--“तथास्तु (ऐसा ही हो)।&#39; तत्पश्चात्‌ देवता जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये || १४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार पूर्वकालमें जब कि सृष्टिके प्रारम्भका समय था, वरुण-शरीर धारण करनेवाले सुरश्रेष्ठ महात्मा रुद्रके यञ्ञमें पूर्वोक्त वृत्तान्त घटित हुआ था ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनिन ही ब्रह्मा, पशुपति, शर्व, रुद्र और प्रजापतिरूप हैं। यह सुवर्ण अग्निकी ही संतान है--ऐसी सबकी मान्यता है ।। १४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जमदग्निनन्दन परशुराम! वेद-प्रमाणका ज्ञाता पुरुष वैदिक श्रुतिके दृष्टान्तके अनुसार अग्निके अभावमें उसके स्थानपर सुवर्णका उपयोग करता है ।। १४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुशोंके समूहपर, उसपर रखे हुए सुवर्णपर, बाँबीके छिद्रमें, बकरेके दाहिने कानपर, जिस मार्गसे छकड़ा आता-जाता हो उस भूमिपर, दूसरेके जलाशयमें तथा ब्राह्मणके हाथपर वैदिक प्रमाण माननेवाले पुरुष अग्निस्वरूप मानकर होम आदि कर्म करते हैं और वह होमकार्य सम्पन्न होनेपर भगवान्‌ अग्निदेव आनन्ददायिनी समृद्धिका अनुभव करते हैं ।। १४९-१५० |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः सब देवताओंमें अग्नि ही श्रेष्ठ हैं। यह हमने सुना है। ब्रह्मासे अग्निकी उत्पत्ति भी है और अग्निसे सुवर्णकी ।। १५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये जो धर्मदर्शी पुरुष सुवर्णका दान करते हैं; वे समस्त देवताओंका ही दान करते हैं, यह हमारे सुननेमें आया है || १५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुवर्णदाता परमगतिको प्राप्त होता है, उसे अन्धकाररहित ज्योतिर्मय लोक मिलते हैं। भुगुनन्दन! स्वर्गलोकमें उसका राजाधिराज (कुबेर) के पदपर अभिषेक किया जाता है ।। १५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सूर्योदय-कालमें विधिपूर्वक मन्त्र पढ़कर सुवर्णका दान करता है, वह अपने पाप और दुःस्वप्रको नष्ट कर डालता है || १५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूर्योदयके समय जो सुवर्णदान करता है, उसका सारा पाप धुल जाता है, तथा जो मध्याह्नकालमें सोना दान करता है, वह अपने भविष्य पापोंका नाश कर देता है || १५५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सायं संध्याके समय व्रतका पालन करते हुए सुवर्ण दान देता है, वह ब्रह्मा, वायु, अग्नि और चन्द्रमाके लोकोंमें जाता है ।। १५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्रसाहित सभी लोकपालोंके लोकोंमें उसे शुभ सम्मान प्राप्त होता है। साथ ही वह इस लोकमें यशस्वी एवं पापरहित होकर आनन्द भोगता है ।। १५७ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मृत्युके पश्चात्‌ जब वह परलोकमें जाता है, तब वहाँ अनुपम पुण्यात्मा समझा जाता है। कहीं भी उसकी गतिका प्रतिरोध नहीं होता और वह इच्छानुसार जहाँ चाहता है, विचरता रहता है। ।। १५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुवर्ण अक्षय द्रव्य है, उसका दान करनेवाले मनुष्यको पुण्यलोकोंसे नीचे नहीं आना पड़ता। संसारमें उसे महान्‌ यशकी प्राप्ति होती है तथा परलोकमें उसे अनेक समृद्धिशाली पुण्यलोक प्राप्त होते हैं || १५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य सूर्योदयके समय अग्नि प्रकट करके किसी व्रतके उद्देश्यसे सुवर्णदान करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ।। १६० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुवर्णको अग्निस्वरूप ही कहते हैं। उसका दान सुख देनेवाला होता है। वह यशथेष्ट पुण्यको उत्पन्न करने-वाला और दानेच्छाका प्रवर्तक माना गया है ।। १६१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! निष्पाप भृगुनन्दन! यह मैंने तुम्हें सुवर्ण और कार्तिकेयकी उत्पत्ति बतायी है। इसे अच्छी तरह समझ लो ।। १६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भुगुश्रेष्! कार्तिकेय जब दीर्घकालमें बड़े हुए तब इन्द्र आदि देवताओंने उनका अपने सेनापतिके पदपर वरण किया ।। १६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मन! उन्होंने लोकोंके हितकी कामना एवं देवराज इन्द्रकी आज्ञासे प्रेरित हो तारकासुर तथा अन्य दैत्योंका संहार कर डाला || १६४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! दाताओंमें श्रेष्ठ) इस प्रकार मैंने तुम्हें सुवर्णदानका माहात्म्य बताया है। इसलिये अब तुम ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान करो || १६५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी परशुरामजीने ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान किया। इससे वे सब पापोंसे छुटकारा पा गये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुम्हें सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानका फल यह सब कुछ बता दिया ।। १६७ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः नरेश्वर! अब तुम भी ब्राह्मणोंको बहुत-सा सुवर्ण दान करो। सुवर्ण दान करके तुम पापसे मुक्त हो जाओगे ।। १६८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्तिविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/1701998977600209355/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/08/from-85-chapter-entire-mahabharata.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/1701998977600209355'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/1701998977600209355'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/08/from-85-chapter-entire-mahabharata.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के पचासीवाँ अध्याय (From the 85 chapter the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' 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कथा"/><title type='text'>सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के इक्यासीवें अध्याय से चौरासीवें अध्याय तक (From the 81 chapter to the 84 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))</title><content type='html'>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; 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small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) इक्यासीवें अध्याय के श्लोक 1-47&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--पितामह! संसारमें जो वस्तु पवित्रोंमें भी पवित्र तथा लोकमें पवित्र कहकर अनुमोदित एवं परम पावन हो, उसका मुझसे वर्णन कीजिये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन! गौएँ महान प्रयोजन सिद्ध करनेवाली तथा परम पवित्र हैं। ये मनुष्योंको तारनेवाली हैं और अपने दूध-घीसे प्रजावर्गके जीवनकी रक्षा करती हैं ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ) गौओंसे बढ़कर परम पवित्र दूसरी कोई वस्तु नहीं है। ये पुण्यजनक, पवित्र तथा तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौएँ देवताओंसे भी ऊपरके लोकोंमें निवास करती हैं। जो मनीषी पुरुष इनका दान करते हैं, वे अपने आपको तारते हैं और स्वर्गमें जाते हैं ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता, (सोमवंशी) नहुष और ययाति--ये सदा लाखों गौओंका दान किया करते थे; इससे वे उन उत्तम स्थानोंको प्राप्त हुए हैं, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ हैं ।। ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निष्पाप नरेश! इस विषयमें मैं तुम्हें एक पुराना वृत्तान्त सुना रहा हूँ। एक समयकी बात है, परम बुद्धिमान्‌ शुकदेवजीने नित्यकर्मका अनुष्ठान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर अपने पिता--ऋषियोंमें उत्तम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको, जो लोकके भूत और भविष्यको प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं, प्रणाम करके पूछा--&#39;पिताजी! सम्पूर्ण यज्ञोंमें कौन-सा यज्ञ सबसे श्रेष्ठ देखा जाता है? || ६--८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;प्रभो! मनीषी पुरुष कौन-सा कर्म करके उत्तम स्थानको प्राप्त होते हैं तथा किस पवित्र कार्यके द्वारा देवता स्वर्गलोकका उपभोग करते हैं? ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यज्ञका यज्ञत्व कया है? यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? देवताओंके लिये कौन-सी वस्तु उत्तम है? इससे श्रेष्ठ यज्ञ क्या है? ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“पिताजी! पवित्रोंमें पवित्र वस्तु क्या है? इन सारी बातोंका मुझसे वर्णन कीजिये।” भरतश्रेष्ठ! पुत्र शुकदेवका यह वचन सुनकर परम धर्मज्ञ व्यासने उससे सब बातें ठीक-ठीक बतायीं || ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यासजी बोले--बेटा! गौएँ सम्पूर्ण भूतोंकी प्रतिष्ठा हैं। गौएँ परम आश्रय हैं। गौएँ पुण्यमयी एवं पवित्र होती हैं तथा गोधन सबको पवित्र करनेवाला है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमने सुना है कि गौएँ पहले बिना सींगकी ही थीं। उन्होंने सींगके लिये अविनाशी भगवान्‌ ब्रह्माकी उपासना की ।। १३ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ ब्रह्माजीने गौओंको प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करते देख उन गौओंमेंसे प्रत्येकको उनकी अभीष्ट वस्तु दी || १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बेटा! वरदान मिलनेके पश्चात्‌ गौओंके सींग प्रकट हो गये। जिसके मनमें जैसे सींगकी इच्छा थी, उसके वैसे ही हो गये। नाना प्रकारके रूप-रंग और सींगसे युक्त हुई उन गौओंकी बड़ी शोभा होने लगी ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माजीका वरदान पाकर गौएँ मंगलमयी, हव्य-कव्य प्रदान करनेवाली, पुण्यजनक, पवित्र, सौभाग्यवती तथा दिव्य अंगों एवं लक्षणोंसे सम्पन्न हुईं || १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौएँ दिव्य एवं महान्‌ तेज हैं। उनके दानकी प्रशंसा की जाती है। जो सत्पुरुष मात्सर्यका त्याग करके गौओंका दान करते हैं, वे पुण्यात्मा कहे गये हैं। वे सम्पूर्ण दानोंके दाता माने गये हैं। निष्पाप शुकदेव! उन्हें पुण्यमय गोलोककी प्राप्ति होती है । १७-१८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;द्विजश्रेष्ठ! गोलोकके सभी वृक्ष मधुर एवं सुस्वादु फल देनेवाले हैं। वे दिव्य फलफूलोंसे सम्पन्न होते हैं। उन वृक्षोंके पुष्प दिव्य एवं मनोहर गन्धसे युक्त होते हैं |। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँकी भूमि मणिमयी है। वहाँकी बालुका कांचनचूर्णरूप है। उस भूमिका स्पर्श सभी ऋतुओंमें सुखद होता है। वहाँ धूल और कीचड़का नाम भी नहीं है। वह भूमि सर्वथा मंगलमयी है ।। २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँके जलाशय लाल कमलवनोंसे तथा प्रातः-कालीन सूर्यके समान प्रकाशमान मणिजटित सुवर्णमय सोपानोंसे सुशोभित होते हैं || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँकी भूमि कितने ही सरोवरोंसे शोभा पाती है। उन सरोवरोंमें नीलोत्पलमिश्रित बहुत-से कमल खिले रहते हैं। उन कमलोंके दल बहुमूल्य मणिमय होते हैं और उनके केसर अपनी स्वर्णमयी प्रभासे प्रकाशित होते हैं || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस लोकमें बहुत-सी नदियाँ हैं, जिनके तटोंपर खिले हुए कनेरोंके वन तथा विकसितसंतानक (कल्पवृक्ष-विशेष) के वन एवं अन्यान्य वृक्ष उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे वृक्ष और वन अपने मूल भागमें सहस्रों आवर्तोंसे घिरे हुए हैं || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन नदियोंके तटोंपर निर्मल मोती, अत्यन्त प्रकाशमान मणिरत्न तथा सुवर्ण प्रकट होते हैं | २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कितने ही उत्तम वृक्ष अपने मूलभागके द्वारा उन नदियोंके जलमें प्रविष्ट दिखायी देते हैं। वे सर्वरत्नमय विचित्र देखे जाते हैं। कितने ही सुवर्णमय होते हैं और दूसरे बहुत-से वृक्ष प्रज्ज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होते हैं || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ सोनेके पर्वत तथा मणि और रत्नोंके शैलसमूह हैं, जो अपने मनोहर, ऊँचे तथा सर्वरत्नमय शिखरोंसे सुशोभित होते हैं || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फ़ूल और फल लगे रहते हैं। वे वृक्ष पक्षियोंसे भरे होते हैं तथा उनके फूलों और फलोंमें दिव्य सुगन्ध और दिव्य रस होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! वहाँ पुण्यात्मा पुरुष ही सदा निवास करते हैं। गोलोकवासी शोक और क्रोधसे रहित, पूर्णकाम एवं सफलमनोरथ होते हैं || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! वहाँके यशस्वी एवं पुण्यकर्मा मनुष्य विचित्र एवं रमणीय विमानोंमें बैठकर यथेष्ट विहार करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! उनके साथ सुन्दरी अप्सराएँ क्रीड़ा करती हैं। युधिष्ठिर! गोदान करके मनुष्य इन्हीं लोकोंमें जाते हैं || ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेन्द्र! शक्तिशाली सूर्य और बलवान्‌ वायु जिन लोकोंके अधिपति हैं, एवं राजा वरुण जिन लोकोंके ऐश्वर्यपर प्रतिष्ठित हैं, मनुष्य गोदान करके उन्हीं लोकोंमें जाता है। गौएँ युगन्धरा, सुरूपा, बहुरूपा, विश्वरूपा तथा सबकी माताएँ हैं। शुकदेव! मनुष्य संयमनियमके साथ रहकर गौओंके इन प्रजापतिकथित नामोंका प्रतिदिन जप करे ।। ३१-३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष गौओंकी सेवा और सब प्रकारसे उनका अनुगमन करता है, उसपर संतुष्ट होकर गौएँ उसे अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं || ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौओंके साथ मनसे भी कभी द्रोह न करे, उन्हें सदा सुख पहुँचाये, उनका यथोचित सत्कार करे और नमस्कार आदिके द्वारा उनका पूजन करता रहे ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य जितेन्द्रिय और प्रसन्नचित्त होकर नित्य गौओंकी सेवा करता है, वह समृद्धिका भागी होता है। मनुष्य तीन दिनोंतक गरम गोमूत्र पीकर रहे, फिर तीन दिनतक गरम गोदुग्ध पीकर रहे ।। ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गरम गोदुग्ध पीनेके पश्चात्‌ तीन दिनोंतक गरम-गरम गोघृत पीये। तीन दिनतक गरम घी पीकर फिर तीन दिनोंतक वह वायु पीकर रहे ।। ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवगण भी जिस पवित्र घृतके प्रभावसे उत्तम-उत्तम लोकका पालन करते हैं तथा जो पवित्र वस्तुओंमें सबसे बढ़कर पवित्र है, उससे घृतको शिरोधार्य करे ।। ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गायके घीके द्वारा अग्निमें आहुति दे। घृतकी दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराये। घृत भोजन करे तथा गोघृतका ही दान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य गौओंकी समृद्धि एवं अपनी पुष्टिका अनुभव करता है ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौओंके गोबरसे निकाले हुए जौकी लप्सीका एक मासतक भक्षण करे। इससे मनुष्य ब्रह्महत्या-जैसे पापसे भी छुटकारा पा जाता है ।। ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब दैत्योंने देवताओंको पराजित कर दिया, तब देवताओंने इसी प्रायश्चित्तका अनुष्ठान किया। इससे उन्हें पुनः (नष्ट हुए) देवत्वकी प्राप्ति हुई तथा वे महाबलवान्‌ और परम सिद्ध हो गये ।। ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौएँ परम पावन, पवित्र और पुण्यस्वरूपा हैं। वे महान्‌ देवता हैं। उन्हें ब्राह्मणोंको देकर मनुष्य स्वर्गका सुख भोगता है || ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पवित्र जलसे आचमन करके पवित्र होकर गौओंके बीचमें गोमतीमन्त्र (गोमाँ अग्नेविमाँ अश्वि इत्यादि) का मन-ही-मन जप करे। ऐसा करनेसे वह अत्यन्त शुद्ध एवं निर्मल (पापमुक्त) हो जाता है || ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्या और वेददव्रतमें निष्णात पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे अग्नियों और गौओंके बीचमें तथा ब्राह्मणोंकी सभामें शिष्योंको यज्ञतुल्य गोमतीविद्याकी शिक्षा दें। जो तीन राततक उपवास करके गोमती-मन्त्रका जप करता है, उसे गौओंका वरदान प्राप्त होता है || ४३-४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुत्रकी इच्छावाला पुत्र और धन चाहनेवाला धन पाता है। पतिकी इच्छा रखनेवाली सत्रीको मनके अनुकूल पति मिलता है। सारांश यह है कि गौओंकी आराधना करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। गौएँ मनुष्योंद्वारा सेवित और संतुष्ट होकर उन्हें सब कुछ देती हैं, इसमें संशय नहीं है | ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार ये महाभाग्यशालिनी गौएँ यज्ञका प्रधान अंग हैं और सबको सम्पूर्ण कामनाएँ देनेवाली हैं। तुम इन्हें रोहिणी समझो। इनसे बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है ।। ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! अपने महात्मा पिता व्यासजीके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी शुकदेवजी प्रतिदिन गौकी सेवा-पूजा करने लगे; इसलिये तुम भी गौओंकी सेवा-पूजा करो || ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;बयासीवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) बयासीवें अध्याय के श्लोक 1-27&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“लक्ष्मी और गौओंका संवाद तथा लक्ष्मीकी प्रार्थनापर गौओंके द्वारा गोबर और गोमूत्रमें लक्ष्मीको निवासके लिये स्थान दिया जाना”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--पितामह! मैंने सुना है कि गौओंके गोबरमें लक्ष्मीका निवास है; किंतु इस विषयमें मुझे संदेह है; अतः इसके सम्बन्धमें मैं यथार्थ बात सुनना चाहता हूँ ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष गौ और लक्ष्मीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक समयकी बात है, लक्ष्मीने मनोहर रूप धारण करके गौओंके झुंडमें प्रवेश किया। उनके रूप-वैभवको देखकर गौएँ आश्षर्यचकित हो उठीं ।। ३ ॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौओंने पूछा--देवि! तुम कौन हो और कहाँसे आयी हो? इस पृथ्वीपर तुम्हारे रूपकी कहीं तुलना नहीं है। महाभागे! तुम्हारी इस रूप-सम्पत्तिसे हमलोग बड़े आश्वर्यमें पड़ गये हैं ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये हम तुम्हारा परिचय जानना चाहती हैं। तुम कौन हो और कहाँ जाओगी? वरवर्णिनि! ये सारी बातें हमें ठीक-ठीक बताओ ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लक्ष्मी बोलीं--गौओ! तुम्हारा कल्याण हो। मैं इस जगतमें लक्ष्मी नामसे प्रसिद्ध हूँ। सारा जगत्‌ मेरी कामना करता है। मैंने दैत्योंको छोड़ दिया, इसलिये वे सदाके लिये नष्ट हो गये हैं ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे ही आश्रयमें रहनेके कारण इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु, जलके अधिष्ठाता देवता वरुण और अग्नि आदि देवता सदा आनन्द भोग रहे हैं ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओं तथा ऋषियोंको मुझसे अनुगृहीत होनेपर ही सिद्धि मिलती है। गौओ! जिनके शरीरमें मैं प्रवेश नहीं करती, वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्म, अर्थ और काम मेरा सहयोग पाकर ही सुखद होते हैं; अतः सुखदायिनी गौओ! मुझे ऐसे ही प्रभावसे सम्पन्न समझो ।। ९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं तुम सब लोगोंके भीतर भी सदा निवास करना चाहती हूँ और इसके लिये स्वयं ही तुम्हारे पास आकर प्रार्थना करती हूँ। तुमलोग मेरा आश्रय पाकर श्रीसम्पन्न हो जाओ ।। १० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौओंने कहा--देवि! तुम चंचला हो। कहीं भी स्थिर होकर नहीं रहती। इसके सिवा तुम्हारा बहुतोंके साथ एक-सा सम्बन्ध है; इसलिये हम तुम्हें नहीं चाहती हैं। तुम्हारा कल्याण हो। तुम जहाँ आनन्दपूर्वक रह सको, जाओ || ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमारा शरीर तो यों ही हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर है। हमें तुमसे क्या काम? तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ। तुमने दर्शन दिया, इतनेहीसे हम कृतार्थ हो गयीं ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लक्ष्मीजीने कहा--गौओ! यह क्या बात है? क्या यही तुम्हारे लिये उचित है कि तुम मेरा अभिनन्दन नहीं करती? मैं सती-साध्वी हूँ, दुर्लभ हूँ। फिर भी इस समय तुम मुझे स्वीकार क्यों नहीं करती? ।। १३&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उत्तम व्रतका पालन करनेवाली गौओ! लोकमें जो यह प्रवाद चल रहा है कि “बिना बुलाये स्वयं किसीके यहाँ जानेपर निश्चय ही अनादर होता है।” यह ठीक ही जान पड़ता है || १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और मनुष्य बड़ी उग्र तपस्या करके मेरी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करते हैं ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सौम्य स्वभाववाली गौओ! यह तुम्हारा प्रभाव है कि मैं स्वयं तुम्हारे पास आयी हूँ। अतः तुम मुझे यहाँ ग्रहण करो। चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें कहीं भी मैं अपमान पानेके योग्य नहीं हूँ ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौओंने कहा--देवि! हम तुम्हारा अपमान या अनादर नहीं करतीं। केवल तुम्हारा त्याग कर रही हैं। वह भी इसलिये कि तुम्हारा चित्त चंचल है। तुम कहीं भी स्थिर होकर नहीं रहती || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस विषयमें बहुत बात करनेसे क्या लाभ? तुम जहाँ जाना चाहो--चली जाओ। अनघे! हम सब लोगोंका शरीर तो यों ही हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर है; अतः तुमसे हमें क्या काम है? ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लक्ष्मीने कहा--दूसरोंको सम्मान देनेवाली गौओ! तुम्हारे त्याग देनेसे मैं सम्पूर्ण जगत्‌के लिये अवहेलित और उपेक्षित हो जाऊँगी, इसलिये मुझपर कृपा करो ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम महान्‌ सौभाग्यशालिनी और सबको शरण देनेवाली हो। मैं भी तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। तुम्हारी भक्त हूँ। मुझमें कोई दोष भी नहीं है; अतः तुम मेरी रक्षा करो--मुझे अपना लो ॥। २० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौओ! मैं तुमसे सम्मान चाहती हूँ। तुम सदा सबका कल्याण करनेवाली हो। तुम्हारे किसी एक अंगमें, नीचेके कुत्सित अंगमें भी यदि स्थान मिल जाय तो मैं उसमें रहना चाहती हूँ || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निष्पाप गौओ! वास्तवमें तुम्हारे अंगोंमें कहीं कोई कुत्सित स्थान नहीं दिखायी देता। तुम परम पुण्यमयी, पवित्र और सौभाग्यशालिनी हो। अतः मुझे आज्ञा दो। तुम्हारे शरीरमें जहाँ मैं रह सकूँ, उसके लिये मुझे स्पष्ट बताओ || २२३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! लक्ष्मीके ऐसा कहनेपर करुणा और वात्सल्यकी मूर्ति शुभस्वरूपा गौओंने एक साथ मिलकर सलाह की; फिर सबने लक्ष्मीसे कहा-- ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;शुभे! यशस्विनि! अवश्य ही हमें तुम्हारा सम्मान करना चाहिये। तुम हमारे गोबर और मूत्रमें निवास करो; क्योंकि हमारी ये दोनों वस्तुएँ परम पवित्र हैं! || २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लक्ष्मीने कहा--सुखदायिनी गौओ! धन्यभाग्य जो तुमलोगोंने मुझपर अपना कृपापूर्ण प्रसाद प्रकट किया। ऐसा ही होगा--मैं तुम्हारे गोबर और मूत्रमें ही निवास करूँगी। तुमने मेरा मान रख लिया, अत: तुम्हारा कल्याण हो ।। २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! इस प्रकार गौओंके साथ प्रतिज्ञा करके लक्ष्मीजी उनके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बेटा! इस तरह मैंने तुमसे गोबरका माहात्म्य बतलाया है। अब पुनः गौओंका माहात्म्य बतला रहा हूँ, सुनो || २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और गौओंका संवादनामक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;तिरासीवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) तिरासीवें अध्याय के श्लोक 1-52&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! जो मनुष्य सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन और गोदान करते हैं उन्हें प्रतेदिन अन्नदान और यज्ञ करनेका फल मिलता है ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दही और गोघृतके बिना यज्ञ नहीं होता। उन्हींसे यज्ञका यज्ञत्व सफल होता है। अतः गौओंको यज्ञका मूल कहते हैं || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब प्रकारके दानोंमें गोदान ही उत्तम माना जाता है; इसलिये गौएँ श्रेष्ठ, पवित्र तथा परम पावन हैं ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्यको अपने शरीरकी पुष्टि तथा सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये भी गौओंका सेवन करना चाहिये। इनके दूध, दही और घी सब पापोंसे छुड़ानेवाले हैं || ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! गौएँ इहलोक और परलोकमें भी महान्‌ तेजोरूप मानी गयी हैं। गौओंसे बढ़कर पवित्र कोई वस्तु नहीं है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान्‌ पुरुष इन्द्र और ब्रह्माजीके इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालमें देवताओंद्वारा दैत्योंके परास्त हो जानेपर जब इन्द्र तीनों लोकोंके अधीश्वर हुए तब समस्त प्रजा मिलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ सत्य और धर्ममें तत्पर रहने लगी ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! तदनन्तर एक दिन जब ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, असुर, गरुड़ और प्रजापतिगण ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा और हूृहू नामक गन्धर्व जब दिव्य तान छेड़कर गाते हुए वहाँ उन भगवान्‌ ब्रह्माजीकी उपासना करते थे, वायुदेव दिव्य पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर बह रहे थे, पृथक्‌ू-पृथक्‌ ऋतुएँ भी उत्तम सौरभसे युक्त दिव्य पुष्प भेंट कर रही थीं, देवताओंका समाज जुटा था, समस्त प्राणियोंका समागम हो रहा था, दिव्य वाद्योंकी मनोरम ध्वनि गूँज रही थी तथा दिव्यांगनाओं और चारणोंसे वह समुदाय घिरा हुआ था, उसी समय देवराज इन्द्रने देवेश्वर ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा--- | ८--१२ ॥।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“भगवन्‌! पितामह! गोलोक समस्त देवताओं और लोकपालोंके ऊपर क्‍यों है? मैं इसे जानना चाहता हूँ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;प्रभो! गौओंने यहाँ किस तपस्याका अनुष्ठान अथवा ब्रह्मचर्यका पालन किया है, जिससे वे रजोगुणसे रहित होकर देवताओंसे भी ऊपर स्थानमें सुखपूर्वक निवास करती हैं? ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब ब्रह्माजीने बलसूदन इन्द्रसे कहा--“बलासुरका विनाश करनेवाले देवेन्द्र! तुमने सदा गौओंकी अवहेलना की है। प्रभो! इसीलिये तुम इनका माहात्म्य नहीं जानते। सुरश्रेष्ठ! गौओंका महान्‌ प्रभाव और माहात्म्य मैं बताता हूँ, सुनो || १५-१६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“वासव! गौओंको यज्ञका अंग और साक्षात्‌ यज्ञरूप बतलाया गया है; क्योंकि इनके दूध, दही और घीके बिना यज्ञ किसी तरह सम्पन्न नहीं हो सकता ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“ये अपने दूध-घीसे प्रजाका भी पालन-पोषण करती हैं। इनके पुत्र (बैल) खेतीके काम आते तथा नाना प्रकारके धान्य एवं बीज उत्पन्न करते हैं ।। १८ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उन्हींसे यज्ञ सम्पन्न होते और हव्य-कव्यका भी सर्वथा निर्वाह होता है। सुरेश्वर! इन्हीं गौओंसे दूध, दही और घी प्राप्त होते हैं। ये गौएँ बड़ी पवित्र होती हैं। बैल भूख-प्याससे पीड़ित होकर भी नाना प्रकारके बोझ ढोते रहते हैं | १९-२० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“इस प्रकार गौएँ अपने कर्मसे ऋषियों तथा प्रजाओंका पालन करती रहती हैं। वासव! इनके व्यवहारमें माया नहीं होती। ये सदा सत्कर्ममें ही लगी रहती हैं || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसीसे ये गौएँ हम सब लोगोंके ऊपर स्थानमें निवास करती हैं। शक्र! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह बात बतायी कि गौएँ देवताओंके भी ऊपर स्थानमें क्यों निवास करती हैं। शतक्रतु इन्द्र! इसके सिवा ये गौएँ वरदान भी प्राप्त कर चुकी हैं और प्रसन्न होनेपर दूसरोंको वर देनेकी भी शक्ति रखती हैं || २२-२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;सुरभी गौएँ पुण्यकर्म करनेवाली और शुभ-लक्षणा होती हैं। सुरश्रेष्ठ! बलसूदन! वे जिस उद्देश्यसे पृथ्वीपर गयी हैं, उसको भी मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ, सुनो || २४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तात! पहले सत्ययुगमें जब महामना देवेश्वरगण तीनों लोकोंपर शासन करते थे और अमरश्रेष्ठ जब देवी अदिति पुत्रके लिये नित्य एक पैरसे खड़ी रहकर अत्यन्त घोर एवं दुष्कर तपस्या करती थी और उस तपस्यासे संतुष्ट होकर साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णु ही उनके गर्भमें पदार्पण करनेवाले थे उन्हीं दिनोंकी बात है, महादेवी अदितिको महान्‌ तप करती देख दक्षकी धर्मपरायणा पुत्री सुरभी देवीने बड़े हर्षक साथ घोर तपस्या आस्मभ की ।। २५ --२८ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“कैलासके रमणीय शिखरपर जहाँ देवता और गन्धर्व सदा विराजते रहते हैं, वहाँ वह उत्तम योगका आश्रय ले ग्यारह हजार वर्षोतक एक पैरसे खड़ी रही। उसकी तपस्यासे देवता, ऋषि और बड़े-बड़े नाग भी संतप्त हो उठे || २९-३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“वे सब लोग मेरे साथ ही उस शुभलक्षणा तपस्विनी सुरभी देवीके पास जाकर खड़े हुए। तब मैंने वहाँ उससे कहा-- || ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“सती-साधथ्वी देवी! तुम किसलिये यह घोर तपस्या करती हो? शोभने! महाभागे! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ। देवि! तुम इच्छानुसार वर माँगो।” पुरंदर! इस तरह मैंने सुरभीको वर माँगनेके लिये प्रेरित किया || ३२-३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुरभीने कहा--भगवन्‌! निष्पाप लोकपितामह! मुझे वर लेनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। मेरे लिये तो सबसे बड़ा वर यही है कि आज आप मुझपर प्रसन्न हो गये हैं ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माजीने कहा--देवेश्वर! देवेन्द्र! शचीपते! जब सुरभी ऐसी बात कहने लगी तब मैंने उसे जो उत्तर दिया, वह सुनो || ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(मैंने कहा--) देवि! शुभानने! तुमने लोभ और कामनाको त्याग दिया है। तुम्हारी इस निष्काम तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम्हें अमरत्वका वरदान देता हूँ ।। ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम मेरी कृपासे तीनों लोकोंके ऊपर निवास करोगी और तुम्हारा वह धाम “गोलोक&#39; नामसे विख्यात होगा || ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाभागे! तुम्हारी सभी शुभ संतानें--समस्त पुत्र और कन्याएँ मानवलोकमें उपयुक्त कर्म करती हुई निवास करेंगी ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवि! शुभे! तुम अपने मनसे जिन दिव्य अथवा मानवी भोगोंका चिन्तन करोगी तथा जो स्वर्गीय सुख होगा, वे सभी तुम्हें स्वतः प्राप्त होते रहेंगे || ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सहस्राक्ष! सुरभीके निवासभूत गोलोकमें सबकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं। वहाँ मृत्यु और बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता है। अग्निका भी जोर नहीं चलता ।। ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वासव! वहाँ न कोई दुर्भाग्य है और न अशुभ। वहाँ दिव्य वन, दिव्य भवन तथा परम सुन्दर एवं इच्छानुसार विचरनेवाले विमान मौजूद हैं || ४१६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कमलनयन इन्द्र! ब्रह्मचर्य, तपस्या, यत्न, इन्द्रियसंयम, नाना प्रकारके दान, पुण्य, तीर्थसेवन, महान्‌ तप और अन्यान्य शुभ कर्मोंके अनुष्ठानसे ही गोलोककी प्राप्ति हो सकती है || ४२-४३ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;असुरसूदन शक्र! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने सारी बातें बतलायी हैं। अब तुम्हें गौओंका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये || ४४-४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रतिदिन गौओंकी पूजा करने लगे। उन्होंने उनके प्रति बहुत सम्मान प्रकट किया ।। ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाद्युते! यह सब मैंने तुमसे गौओंका परम पावन, परम पवित्र और अत्यन्त उत्तम माहात्म्य कहा है || ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुरुषसिंह! यदि इसका कीर्तन किया जाय तो यह समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। जो एकाग्रचित्त हो सदा यज्ञ और श्राद्धमें हव्य और कव्य अर्पण करते समय ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उसका दिया हुआ (हव्य और कव्य) समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होकर पितरोंको प्राप्त होगा || ४८-४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गोभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त होती है। स्त्रियोंमें भी जो गौओंकी भक्ता हैं, वे मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेती हैं || ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्‍्या। धन चाहनेवालेको धन और धर्म चाहनेवालेको धर्म प्राप्त होता है ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख। भारत! गोभक्तके लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है ।। ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपववके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोलोकका वर्णनविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;चौरासीवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) चौरासीवें अध्याय के श्लोक 1-31&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“भीष्मजीका अपने पिता शान्तनूके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिने कहा--पितामह! आपने सब मनुष्योंके लिये, विशेषतः धर्मपर दृष्टि रखनेवाले नरेशोंके लिये परम उत्तम गोदानका वर्णन किया है ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राज्य सदा ही दुःखरूप है। जिन्होंने अपना मन वशमें नहीं किया है, उनके लिये राज्यको सुरक्षित रखना बहुत ही कठिन है। इसलिये प्रायः राजाओंको शुभ गति नहीं प्राप्त होती है ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनमें वे ही पवित्र होते हैं जो नियमपूर्वक पृथ्वीका दान करते हैं। कुरुनन्दन! आपने मुझसे समस्त धर्मोंका वर्णन किया है || ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी तरह राजा नृगने जो गोदान किया था तथा नाचिकेत ऋषिने जो गौओंका दान और पूजन किया था, वह सब आपने पहले ही कहा और निर्देश किया है ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेद और उपनिषदोंने भी प्रत्येक कर्ममें दक्षिणाका विधान किया है। सभी यज्ञोंमें भूमि, गौ और सुवर्णकी दक्षिणा बतायी गयी है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इनमें सुवर्ण सबसे उत्तम दक्षिणा है--ऐसा श्रुतिका वचन है, अतः पितामह! मैं इस विषयको यथार्थ रूपसे सुनना चाहता हूँ ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुवर्ण क्या है? कब और किस तरहसे इसकी उत्पत्ति हुई? सुवर्णका उपादान क्या है? इसका देवता कौन है? इसके दानका फल कया है? सुवर्ण क्‍यों उत्तम कहलाता है? ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनीषी विद्वान्‌ सुवर्णानका अधिक आदर क्‍यों करते हैं? तथा यज्ञ-कर्मोमें दक्षिणाके लिये सुवर्णकी प्रशंसा क्यों की जाती है? ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! क्‍यों सुवर्ण पृथ्वी और गौओंसे भी पावन और श्रेष्ठ है? दक्षिणाके लिये सबसे उत्तम वह क्‍यों माना गया है? यह मुझे बताइये ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! ध्यान देकर सुनो! सुवर्णकी उत्पत्तिका कारण बहुत विस्तृत है। इस विषयमें मैंने जो अनुभव किया है, उसके अनुसार तुम्हें सब बातें बता रहा हूँ ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे महातेजस्वी पिता महाराज शान्तनुका जब देहावसान हो गया तब मैं उनका श्राद्ध करनेके लिये गंगाद्वार तीर्थ (हरद्वार)-में गया ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बेटा! वहाँ पहुँचकर मैंने पिताका श्राद्धकर्म आरम्भ किया। इस कार्यमें वहाँ उस समय मेरी माता गंगाने भी बड़ी सहायता की ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर अपने सामने बहुत-से सिद्ध-महर्षियोंको बिठाकर मैंने जलदान आदि सारे कार्य आरम्भ किये ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एकाग्रचित्त होकर शास्त्रोक्तविधिसे पिण्डदानके पहलेके सब कार्य समाप्त करके मैंने विधिवत्‌ पिण्डदान देना आरम्भ किया ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजानाथ! इसी समय पिण्डदानके लिये जो कुश बिछाये गये थे, उन्हें भेदकर एक बड़ी सुन्दर बाँह बाहर निकली। उस विशाल भुजामें बाजूबंद आदि अनेक आभूषण शोभा पा रहे थे ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसे ऊपर उठी देख मुझे बड़ा आश्वर्य हुआ। भरतश्रेष्ठ! साक्षात्‌ मेरे पिता ही पिण्डका दान लेनेके लिये उपस्थित थे। प्रभो! किंतु जब मैंने शास्त्रीय विधिपर विचार किया, तब मेरे मनमें सहसा यह बात स्मरण हो आयी कि मनुष्यके लिये हाथपर पिण्ड देनेका वेदमें विधान नहीं है। पितर साक्षात्‌ प्रकट होकर कभी मनुष्यके हाथसे पिण्ड लेते भी नहीं हैं। शास्त्रकी आज्ञा तो यही है कि कुशोंपर पिण्डदान करें || १६--१८ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ) यह सोचकर मैंने पिताके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले हाथका आदर नहीं किया। शास्त्रको ही प्रमाण मानकर उसकी पिण्डदानसम्बन्धी सूक्ष्म विधिका ध्यान रखते हुए कुशोंपर ही सब पिण्डोंका दान किया ।। १९-२० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैंने शास्त्रीय मार्गका अनुसरण करके ही सब कुछ किया। नरेश्वर! तदनन्तर मेरे पिताकी वह बाँह अदृश्य हो गयी ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर स्वप्नमें पितरोंने मुझे दर्शन दिया और प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहा --“भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस शास्त्रीय ज्ञानसे हम बहुत प्रसन्न हैं; क्योंकि उसके कारण तुम्हें धर्मके विषयमें मोह नहीं हुआ || २२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;पृथ्वीनाथ! तुमने यहाँ शास्त्रको प्रमाण मानकर आत्मा, धर्म, शास्त्र, वेद, पितृगण, ऋषिगण, गुरु, प्रजापति और ब्रह्माजी--इन सबका मान बढ़ाया है तथा जो लोग धर्ममें स्थित हैं उन्हें भी तुमने अपना आदर्श दिखाकर विचलित नहीं होने दिया है || २३-२४ ६&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“भरतश्रेष्ठ) यह सब कार्य तो तुमने बहुत उत्तम किया है; किंतु अब हमारे कहनेसे भूमिदान और गोदानके निष्क्रयरूपसे कुछ सुवर्णदान भी करो || २५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“धर्मज्ञ! ऐसा करनेसे हम और हमारे सभी पितामह पवित्र हो जायूँगे; क्योंकि सुवर्ण सबसे अधिक पावन वस्तु है || २६६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;जो सुवर्ण दान करते हैं, वे अपने पहले और पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं।। राजन! जब मेरे पितरोंने ऐसा कहा तो मेरी नींद खुल गयी। उस समय स्वप्नका स्मरण करके मुझे बड़ा विस्मय हुआ। प्रजानाथ! भरतश्रेष्ठ! तब मैंने सुवर्णदान करनेका निश्चित विचार कर लिया || २७-२८ ३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! अब (सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके माहात्म्यके विषयमें) एक प्राचीन इतिहास सुनो जो जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे सम्बन्ध रखनेवाला है। विभो! यह आख्यान धन तथा आयुकी वृद्धि करनेवाला है || २९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालकी बात है, जमदग्निकुमार परशुरामजीने तीव्र रोषमें भरकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया था ।। ३०३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! इसके बाद सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतकर वीर कमलनयन परशुरामजीने ब्राह्मणों और क्षत्रियोंद्वारा सम्मानित तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया ।। ३१-३२ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यद्यपि अश्वमेध यज्ञ समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाला तथा तेज और कान्तिको बढ़ानेवाला है तथापि उसके फलसे तेजस्वी परशुरामजी सर्वथा पापमुक्त न हो सके। इससे उन्होंने अपनी लघुताका अनुभव किया || ३३३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न उस श्रेष्ठ यज्ञका अनुष्ठान पूर्ण करके महामना भृगुवंशी परशुरामजीने मनमें दयाभाव लेकर शास्त्रज्ञ ऋषियों और देवताओंसे इस प्रकार पूछा --“महाभाग महात्माओ! उग्र कर्ममें लगे हुए मनुष्योंके लिये जो परम पावन वस्तु हो, वह मुझे बताइये।” उनके इस प्रकार पूछनेपर उन वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता महर्षियोंने इस प्रकार कहा-- || ३४--३६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“परशुराम! तुम वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए ब्राह्मणोंका सत्कार करो और ब्रह्मर्षियोंके समुदायसे पुनः इस पावन वस्तुके लिये प्रश्न करो || ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“और वे महाज्ञानी महर्षिगण जो कुछ बतावें, उसीका प्रसन्नतापूर्वक पालन करो।” तब महातेजस्वी भृगुनन्दन परशुरामजीने वसिष्ठ, नारद, अगस्त्य और कश्यपजीके पास जाकर पूछा--“विप्रवरो! मैं पवित्र होना चाहता हूँ। बताइये, कैसे किस कर्मके अनुष्ठानसे अथवा किस दानसे पवित्र हो सकता हूँ? ।। ३८-३९ ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;साधुशिरोमणे! तपोधनो! यदि आपलोग मुझपर अनुग्रह करना चाहते हों तो बतायें, मुझे पवित्र करनेवाला साधन क्या है?” || ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋषियोंने कहा--भृगुनन्दन! हमने सुना है कि पाप करनेवाला मनुष्य यहाँ गाय, भूमि और धनका दान करके पवित्र हो जाता है || ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मर्ष! एक दूसरी वस्तुका दान भी सुनो। वह वस्तु सबसे बढ़कर पावन है। उसका आकार अत्यन्त अद्भुत और दिव्य है तथा वह अग्निसे उत्पन्न हुई है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस वस्तुका नाम है सुवर्ण। हमने सुना है कि पूर्वकालमें अग्निने सम्पूर्ण लोकोंको भस्म करके अपने वीर्यसे सुवर्णको प्रकट किया था। उसीका दान करनेसे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर कठोर व्रतका पालन करनेवाले भगवान्‌ वसिष्ठने कहा--*परशुराम! अग्निके समान प्रकाशित होनेवाला सुवर्ण जिस प्रकार प्रकट हुआ है, वह सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;सुवर्णका दान तुम्हें उत्तम फल देगा; क्योंकि वह दानके लिये सर्वोत्तम बताया जाता है। महाबाहो! सुवर्णका जो स्वरूप है, जिससे उत्पन्न हुआ है और जिस प्रकार वह विशेष गुणकारी है, वह सब बता रहा हूँ, मुझसे सुनो || ४५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यह सुवर्ण अग्नि और सोमरूप है। इस बातको तुम निश्चितरूपसे जान लो। बकरा, अग्नि, भेड़, वरुण तथा घोड़ा सूर्यका अंश है। ऐसी दृष्टि रखनी चाहिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भुगुनन्दन! हाथी और मृग नागोंके अंश हैं। भैंसे असुरोंके अंश हैं। मुर्गा और सूअर राक्षसोंके अंश हैं इडा--गौ, दुग्ध और सोम--ये सब भूमिरूप ही हैं। ऐसी स्मृति है || ४७-४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“सारे जगत्‌का मन्‍्थन करके जो तेजकी राशि प्रकट हुई है, वही सुवर्ण है। अतः ब्रह्मरष! यह अज आदि सभी वस्तुओंसे परम उत्तम रत्न है || ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“इसीलिये देवता, गन्धर्व, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच--ये सब प्रयत्नपूर्वक सुवर्ण धारण करते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;भुगुश्रेष्ठ! वे सोनेके बने हुए मुकुट, बाजूबंद तथा अन्य नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अतः नरश्रेष्ठ! जगतमें भूमि, गौ तथा रत्न आदि जितनी पवित्र वस्तुएँ हैं, सुवर्णको उन सबसे पवित्र माना गया है; इस बातको भलीभाँति जान लो ।। ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“विभो! पृथ्वी, गौ तथा और जो कुछ भी दान किया जाता है, उन सबसे बढ़कर सुवर्णका दान है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देवोपम तेजस्वी परशुराम! सुवर्ण अक्षय और पावन है, अतः तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको यह उत्तम और पावन वस्तु ही दान करो || ५४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब दक्षिणाओंमें सुवर्णका ही विधान है; अतः जो सुवर्ण दान करते हैं, वे सब कुछ दान करनेवाले होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;जो सुवर्ण देते हैं, वे देवताओंका दान करते हैं; क्योंकि अग्नि सर्वदेवतामय है और सुवर्ण अग्निका स्वरूप है || ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;पुरुषसिंह! अतः सुवर्णका दान करनेवाले पुरुषोंने सम्पूर्ण देवताओंका ही दान कर दिया--ऐसा माना जाता है। अतः विद्वान्‌ पुरुष सुवर्णसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं मानते हैं ।। ५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विप्ररषे! मैं पुनः सुवर्णका माहात्म्य बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो || ५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;भगुनन्दन! मैंने पहले पुराणमें प्रजापतिकी कही हुई यह न्यायोचित बात सुन रखी है ।। ५९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगुकुलरत्न! भृगुनन्दन परशुराम! यह बात उस समयकी है, जब श्रेष्ठ पर्वत हिमालयपर शूलपाणि महात्मा भगवान्‌ रुद्रका देवी रुद्राणीके साथ विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ था और महामना भगवान्‌ शिवको उमादेवीके साथ समागम-सुख प्राप्त था ।। ६०-६१ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उस समय सब देवता उद्विग्न होकर कैलास-शिखरपर बैठे हुए महान्‌ देवता रुद्र और वरदायिनी देवी उमाके पास गये ।। ६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भुगुश्रेष्ठ॒ वहाँ उन सबने उन दोनोंके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उन्हें प्रसन्न करके भगवान्‌ रुद्रसे कहा--“पापरहित महादेव! यह जो देवी पार्ववीके साथ आपका समागम हुआ है, यह एक तपस्वीका तपस्विनीके साथ और एक महातेजस्वीका एक तेजस्विनीके साथ संयोग हुआ है || ६३ ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;देव! प्रभो! आपका तेज अमोघ है। ये देवी उमा भी ऐसी ही अमोघ तेजस्विनी हैं। आप दोनोंकी जो संतान होगी वह अत्यन्त प्रबल होगी। निश्चय ही वह तीनों लोकोंमें किसीको शेष नहीं रहने देगी ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विशाललोचन! लोकेश्वर! हम सब देवता आपके चरणोंमें पड़े हैं। आप तीनों लोकोंके हितकी इच्छासे हमें वर दीजिये ।। ६६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;प्रभो! संतानके लिये प्रकट होनेवाला जो आपका उत्तम तेज है, उसे आप अपने भीतर ही रोक लीजिये। आप दोनों त्रिलोकीके सारभूत हैं। अतः अपनी संतानके द्वारा सम्पूर्ण जगत्‌को संतप्त कर डालेंगे || ६७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“आप दोनोंसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह निश्चय ही देवताओंको पराजित कर देगा। प्रभो! हमारा तो ऐसा विश्वास है कि न तो पृथ्वीदेवी, न आकाश और न स्वर्ग ही आपके तेजको धारण कर सकेगा। ये सब मिलकर भी आपके इस तेजको धारण करनेमें समर्थ नहीं हैं। यह सारा जगत्‌ आपके तेजके प्रभावसे भस्म हो जायगा ।। ६८-६९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अतः भगवन्‌! हमपर कृपा कीजिये। प्रभो! सुरश्रेष्ठ! हम यही चाहते हैं कि देवी पार्वतीके गर्भसे आपके कोई पुत्र न हो। आप धैर्यसे ही अपने प्रज्वलित उत्तम तेजको भीतर ही रोक लीजिये” || ७० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विप्रर्ष! देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ वृषभध्वजने उनसे “एवमस्तु” कह दिया || ७१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देवताओंसे ऐसा कहकर वृषभवाहन भगवान्‌ शंकरने अपने “रेतस&#39; अर्थात्‌ वीर्यको ऊपर चढ़ा लिया। तभीसे वे “ऊर्ध्वरेता&#39; नामसे विख्यात हुए || ७२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देवताओंने मेरी भावी संतानका उच्छेद कर डाला&quot; यह सोचकर उस समय देवी रुद्राणी बहुत कुपित हुईं और स्त्री-स्वभाव होनेके कारण उन्होंने देवताओंसे यह कठोर वचन कहा-- ।। ७३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“देवताओ! मेरे पतिदेव मुझसे संतान उत्पन्न करना चाहते थे, किंतु तुमलोगोंने इन्हें इस कार्यसे निवृत्त कर दिया; इसलिये तुम सभी देवता निर्वेश हो जाओगे ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“आकाशचारी देवताओ! आज तुम सब लोगोंने मिलकर मेरी संततिका उच्छेद किया है; अत: तुम सब लोगोंके भी संतान नहीं होगी” ।। ७५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भुगुश्रेष्ठ उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे; अतः उनपर यह शाप लागू नहीं हुआ। अन्य सब देवता देवीके शापसे संतानहीन हो गये ।। ७६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रुद्रदेवने उस समय अपने अनुपम तेज (वीर्य) को यद्यपि रोक लिया था; तो भी किंचित्‌ स्खलित होकर वहीं पृथ्वीपर गिर पड़ा || ७७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह अद्भुत तेज अग्निमें पड़कर बढ़ने और ऊपरको उठने लगा। तेजसे संयुक्त हुआ वह तेज एक स्वयम्भू पुरुषके रूपमें अभिव्यक्त होने लगा || ७८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी समय तारक नामक एक असुर उत्पन्न हुआ था, जिसने इन्द्र आदि देवताओंको अत्यन्त संतप्त कर दिया था ।। ७९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आदित्य, वसु, रुद्र, मरुदगण, अश्विनीकुमार तथा साध्य--सभी देवता उस दैत्यके पराक्रमसे संत्रस्त हो उठे थे || ८० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;असुरोंने देवताओंके स्थान, विमान, नगर तथा ऋषियोंके आश्रम भी छीन लिये थे।। ८१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे सब देवता और ऋषि दीनचित्त हो अजर-अमर एवं सर्वव्यापी देवता भगवान्‌ ब्रह्माकी शरणमें गये || ८२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्ति नामक चौरासीवाँ अध्याय प्रा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/2592705527797325524/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/08/from-81-chapter-to-84-chapter-of-entire.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/2592705527797325524'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/2592705527797325524'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/08/from-81-chapter-to-84-chapter-of-entire.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के इक्यासीवें अध्याय से चौरासीवें अध्याय तक (From the 81 chapter to the 84 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' 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कथा"/><title type='text'>सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के छिहत्तरवें अध्याय से अस्सीवें अध्याय तक (From the 76 chapter to the 80 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))</title><content type='html'>&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; 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small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) छिहत्तरवें अध्याय के श्लोक 1-31&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“गोदानकी विधि, गौओंसे प्रार्थना, गौओंके निष्क्रय और गोदान करनेवाले नरेशोंके नाम”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--नरेश्वर! अब मैं गोदानकी उत्तम विधिका यथार्थरूपसे श्रवण करना चाहता हूँ; जिससे प्रार्थी पुरुषोंके लिये अभीष्ट सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--पृथ्वीनाथ! गोदानसे बढ़कर कुछ भी नहीं है। यदि न्यायपूर्वक प्राप्त हुई गौका दान किया जाय तो वह समस्त कुलका तत्काल उद्धार कर देती है || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! ऋषियोंने सत्पुरुषोंके लिये समीचीन भावसे जिस विधिको प्रकट किया है, वही इन प्रजाजनोंके लिये भलीभाँति निश्चित किया गया है। इसलिये तुम आदिकालसे प्रचलित हुई गोदानकी उस उत्तम विधिका मुझसे श्रवण करो ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालकी बात है, जब महाराज मान्धाताके पास बहुत-सी गौएँ दानके लिये लायी गयीं, तब उन्होंने &#39;कैसी गौ दान करे?” इस संदेहमें पड़कर बृहस्पतिजीसे तुम्हारी ही तरह प्रश्न किया। उस प्रश्नके उत्तरमें बृहस्पतिजीने इस प्रकार कहा-- ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गोदान करनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह नियमपूर्वक व्रतका पालन करे और ब्राह्मणको बुलाकर उसका अच्छी तरह सत्कार करके कहे कि “मैं कल प्रातः:काल आपको एक गौ दान करूँगा।” तत्पश्चात्‌ गोदानके लिये वह लाल रंगकी (रोहिणी) गौ मँगाये और “समंगे बहुले” इस प्रकार कहकर गायको सम्बोधित करे, फिर गौओंके बीचमें प्रवेश करके इस निम्नांकित श्रुतिका उच्चारण करे-- |। ५-६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“गौ मेरी माता है। वृषभ (बैल) मेरा पिता है। वे दोनों मुझे स्वर्ग तथा ऐहिक सुख प्रदान करें। गौ ही मेरा आधार है।” ऐसा कहकर गौओंकी शरण ले और उन्हींके साथ मौनावलम्बनपूर्वक रात बिताकर सबेरे गोदानकालमें ही मौन भंग करे--बोले ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार गौओंके साथ एक रात रहकर उनके समान व्रतका पालन करते हुए उन्हींके साथ एकात्मभावको प्राप्त होनेसे मनुष्य तत्काल सब पापोंसे छूट जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! सूर्योदयके समय बछड़ेसहित गौका तुम्हें दान करना चाहिये। इससे स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी और अर्थवाद मन्त्रोंमें जो आशी: (प्रार्थना) की गयी है, वह तुम्हारे लिये सफल होगी ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(वे मन्त्र इस प्रकार हैं, गोदानके पश्चात्‌ इनके द्वारा प्रार्थना करनी चाहिये--) “गौएँ उत्साहसम्पन्न, बल और बुद्धिसे युक्त, यज्ञमें काम आनेवाले अमृतस्वरूप हविष्यके उत्पत्तिस्थान, इस जगतकी प्रतिष्ठा (आश्रय), पृथ्वीपर बैलोंके द्वारा खेती उपजानेवाली, संसारके अनादि प्रवाहको प्रवृत्त करनेवाली और प्रजापतिकी पुत्री हैं। यह सब गौओंकी प्रशंसा है ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;सूर्य और चन्द्रमाके अंशसे प्रकट हुई वे गौएँ हमारे पापोंका नाश करें। हमें स्वर्ग आदि उत्तम लोकोंकी प्राप्तिमें सहायता दें। माताकी भाँति शरण प्रदान करें। जिन इच्छाओंका इन मन्त्रोंद्वारा उल्लेख नहीं हुआ है और जिनका हुआ है, वे सभी गोमाताकी कृपासे मेरे लिये पूर्ण हों ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“गौओ! जो लोग तुम्हारी सेवा करते हुए तुम्हारी आराधनामें लगे रहते हैं, उनके उन कर्मोसे प्रसन्न होकर तुम उन्हें क्षय आदि रोगोंसे छुटकारा दिलाती हो और ज्ञानकी प्राप्ति कराकर उन्हें देहबन्धनसे भी मुक्त कर देती हो। जो मनुष्य तुम्हारी सेवा करते हैं, उनके कल्याणके लिये तुम सरस्वती नदीकी भाँति सदा प्रयत्नशील रहती हो। गोमाताओ! तुम हमारे ऊपर सदा प्रसन्न रहो और हमें समस्त पुण्योंके द्वारा प्राप्त होनेवाली अभीष्ट गति प्रदान करो ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“इसके बाद प्रथम दृष्टिपथमें आया हुआ दाता पहले विधिपूर्वक निम्नांकित आधे श्लोकका उच्चारण करे &lt;b&gt;“या वै यूयं सोऽहमद्यैव भावो युष्मान्‌ दत्त्वा चाहमात्मप्रदाता &lt;/b&gt;।“--गौओ! तुम्हारा जो स्वरूप है, वही मेरा भी है--तुममें और हममें कोई अन्तर नहीं है; अत: आज तुम्हें दानमें देकर हमने अपने आपको ही दान कर दिया है।&#39; दाताके ऐसा कहनेपर दान लेनेवाला गोदानविधिका ज्ञाता ब्राह्मण शेष आधे शलोकका उच्चारण करे--&lt;b&gt;“मनश्ष्युता मन एवोपपन्ना: संधुक्षध्वं सौम्य-रूपोग्ररूपा:”&lt;/b&gt; ।-- -गौओ! तुम शान्त और प्रचण्डरूप धारण करनेवाली हो। अब तुम्हारे ऊपर दाताका ममत्व (अधिकार) नहीं रहा, अब तुम मेरे अधिकारमें आ गयी हो; अतः अभीष्ट भोग प्रदान करके तुम मुझे और दाताको भी प्रसन्न करो” ।। १३-१४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो गौके निष्क्रयरूपसे उसका मूल्य, वस्त्र अथवा सुवर्ण दान करता है, उसको भी गोदाता ही कहना चाहिये। मूल्य, वस्त्र एवं सुवर्णरूपमें दी जानेवाली गौओंका नाम क्रमशः ऊर्ध्वास्या, भवितव्या और वैष्णवी है। संकल्पके समय इनके इन्हीं नामोंका उच्चारण करना चाहिये अर्थात्‌ &lt;b&gt;“इमां ऊर्ध्वास्यां&#39; “इमां भवितव्यां” “इमां वैष्णवीं” तुभ्यमहं संप्रददे त्वं गृहाण&lt;/b&gt;--मैं यह ऊर्ध्वास्या, भवितव्या या वैष्णवी गौ आपको दे रहा हूँ, आप इसे ग्रहण करें।&#39;--ऐसा कहकर ब्राह्मणको वह दान ग्रहण करनेके लिये प्रेरित करना चाहिये || १५ $||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“इनके दानका फल क्रमश: इस प्रकार है--गौका मूल्य देनेवाला छत्तीस हजार वर्षोतक, गौकी जगह वस्त्र दान करनेवाला आठ हजार वर्षोतक तथा गौके स्थानमें सुवर्ण देनेवाला पुरुष बीस हजार वर्षोतक परलोकमें सुख भोगता है। इस प्रकार गौओंके निष्क्रय दानका क्रमश: फल बताया गया है। इसे अच्छी तरह जान लेना चाहिये। साक्षात्‌ गौका दान लेकर जब ब्राह्मण अपने घरकी ओर जाने लगता है, उस समय उसके आठ पग जाते-जाते ही दाताको अपने दानका फल मिल जाता है ।। १६-१७ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;साक्षात्‌ गौका दान करनेवाला शीलवान्‌ और उसका मूल्य देनेवाला निर्भय होता है तथा गौकी जगह इच्छानुसार सुवर्ण दान करनेवाला मनुष्य कभी दु:खमें नहीं पड़ता है। जो प्रातः:काल उठकर नैत्यिक नियमोंका अनुष्ठान करनेवाला और महाभारतका विद्वान है तथा जो विख्यात वैष्णव हैं, वे सब चन्द्रलोकमें जाते हैं || १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;गौका दान करनेके पश्चात्‌ मनुष्यकोी तीन राततक गोव्रतका पालन करना चाहिये और यहाँ एक रात गौओंके साथ रहना चाहिये। कामाष्टमीसे लेकर तीन राततक गोबर, गोदुग्ध अथवा गोरसमात्रका आहार करना चाहिये ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो पुरुष एक बैलका दान करता है, वह देवव्रती (सूर्यमण्डलका भेदन करके जानेवाला ब्रह्मचारी) होता है। जो एक गाय और एक बैल दान करता है उसे वेदोंकी प्राप्ति होती है, तथा जो विधिपूर्वक गोदान यज्ञ करता है उसे उत्तम लोक मिलते हैं, परन्तु जो विधिको नहीं जानता, उसे उत्तम फलकी प्राप्ति नहीं होती || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो इच्छानुसार दूध देनेवाली धेनुका दान करता है, वह मानो समस्त पार्थिव भोगोंका एक साथ ही दान कर देता है। जब एक गौके दानका ऐसा माहात्म्य है तब हव्य-कव्यकी राशिसे सुशोभित होनेवाली बहुत-सी गौओंका यदि विधिपूर्वक दान किया जाय तो कितना अधिक फल हो सकता है? नौजवान बैलोंका दान उन गौओंसे भी अधिक पुण्यदायक होता है | २१ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;जो मनुष्य अपना शिष्य नहीं है, जो व्रतका पालन नहीं करता, जिसमें श्रद्धाका अभाव है तथा जिसकी बुद्धि कुटिल है, उसे इस गोदान-विधिका उपदेश न दे; क्योंकि यह सबसे गोपनीय धर्म है; अतः इसका यत्र-तत्र सर्वत्र प्रचार नहीं करना चाहिये || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;संसारमें बहुत-से अश्रद्धालु हैं (जो इन सब बातोंपर विश्वास नहीं करते) तथा राक्षसी प्रकृतिके मनुष्योंमें बहुत-से ऐसे क्षुद्र पुरुष हैं (जिन्हें ये बातें अच्छी नहीं लगतीं), कितने ही पुण्यहीन मानव नास्तिकताका सहारा लिये रहते हैं। उन सबको इसका उपदेश देना अभीष्ट नहीं है, उलटे अनिष्टकारक होता है” ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! बृहस्पतिजीके इस उपदेशको सुनकर जिन राजाओंने गोदान करके उसके प्रभावसे उत्तम लोक प्राप्त किये तथा जो सदाके लिये पुण्यात्मा बनकर सत्करमोामें प्रवृत्त हुए, उनके नामोंका उल्लेख करता हूँ, सुनो || २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उशीनर, विष्वगश्च, नृग, भगीरथ, सुविख्यात युवनाश्वकुमार महाराज मान्धाता, राजा मुचुकुन्द, भूरिद्युम्न, निषधनरेश नल, सोमक, पुरूरवा, चक्रवर्ती भरत--जिनके वंशमें होनेवाले सभी राजा भारत कहलाये, दशरथनन्दन वीर श्रीराम, अन्यान्य विख्यात कीर्तिवाले नरेश तथा महान्‌ कर्म करनेवाले राजा दिलीप--इन समस्त विधिज्ञ नरेशोंने गोदान करके स्वर्गलोक प्राप्त किया है। राजा मान्धाता तो यज्ञ, दान, तपस्या, राजधर्म तथा गोदान आदि सभी श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न थे || २५--२७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः कुन्तीनन्दन! तुम भी मेरे कहे हुए बृहस्पतिजीके इस उपदेशको धारण करो और कौरव-राज्यपर अधिकार पाकर उत्तम ब्राह्मणको प्रसन्नतापूर्वक पवित्र गौओंका दान करो ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मजीने जब इस प्रकार विधिवत्‌ गोदान करनेकी आज्ञा दी, तब धर्मराज युधिष्ठिरने सब वैसा ही किया तथा देवताओंके भी देवता बृहस्पतिजीने मान्धाताके लिये जिस उत्तम धर्मका उपदेश किया था, उसको भी भलीभाँति स्मरण रखा ।। २९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! राजाओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर उन दिनों सदा गोदानके लिये उद्यत होकर गोबरके साथ जौके कणोंका आहार करते हुए मन और इन्द्रियोंके संयमपूर्वक पृथ्वीपर शयन करने लगे। उनके सिरपर जटाएँ बढ़ गयीं और वे साक्षात्‌ धर्मके समान देदीप्यमान होने लगे ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेन्द्र! राजा युधिष्ठिर सदा ही गौओंके प्रति विनीत-चित्त होकर उनकी स्तुति करते रहते थे। उन्होंने फिर कभी बैलका अपनी सवारीमें उपयोग नहीं किया। वे अच्छे-अच्छे घोड़ोंद्वारा ही इधर-उधरकी यात्रा करते थे ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानकथनविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;सतहत्तरवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) सतहत्तरवें अध्याय के श्लोक 1-35&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“कपिला गौओंकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने पुनः शान्तनुनन्दन भीष्मसे गोदानकी विस्तृत विधि तथा तत्सम्बन्धी धर्मोके विषयमें विनयपूर्वक जिज्ञासा की ।। १ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर बोले--भारत! आप गोदानके उत्तम गुणोंका भलीभाँति पुनः मुझसे वर्णन कीजिये। वीर! ऐसा अमृतमय उपदेश सुनकर मैं तृप्त नहीं हो रहा हूँ || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उस समय शान्तनुनन्दन भीष्म केवल गोदान-सम्बन्धी गुणोंका भलीभाँति (विधिवत्‌) वर्णन करने लगे ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--बेटा! वात्सल्यभावसे युक्त, गुणवती और जवान गायको वस्त्र ओढ़ाकर उसका दान करे। ब्राह्मणको ऐसी गायका दान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है | ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;असुर्य नामके जो अन्धकारमय लोक (नरक) हैं, उनमें गोदान करनेवाले पुरुषको नहीं जाना पड़ता। जिसका घास खाना और पानी पीना प्राय: समाप्त हो चुका हो, जिसका दूध नष्ट हो गया है, जिसकी इन्द्रियाँ काम न दे सकती हों, जो बुढ़ापा और रोगसे आक्रान्त होनेके कारण शरीरसे जीर्ण-शीर्ण हो बिना पानीकी बावड़ीके समान व्यर्थ हो गयी हो, ऐसी गौका दान करके मनुष्य ब्राह्मणको व्यर्थ कष्टमें डालता है और स्वयं भी घोर नरकमें पड़ता है || ५-६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो क्रोध करनेवाली, दुष्ट, रोगिणी और दुबली-पतली हो तथा जिसका दाम न चुकाया गया हो, ऐसी गौका दान करना कदापि उचित नहीं है। जो इस तरहकी गाय देकर ब्राह्मणको व्यर्थ कष्टमें डालता है, उसे निर्बल और निष्फल लोक ही प्राप्त होते हैं || ७&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हृष्ट-पुष्ट, सुलक्षणा, जवान तथा उत्तम गन्धवाली गायकी सभी लोग प्रशंसा करते हैं। जैसे नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं, वैसे ही गौओंमें कपिला गौ उत्तम मानी गयी है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! किसी भी रंगकी गायका दान किया जाय, गोदान तो एक-सा ही होगा? फिर सत्पुरुषोंने कपिला गौकी ही अधिक प्रशंसा क्‍यों की है? मैं कपिलाके महान्‌ प्रभावको विशेषरूपसे सुनना चाहता हूँ। मैं सुननेमें समर्थ हूँ और आप कहनेमें ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--बेटा! मैंने बड़े-बूढ़ोंके मुँहसे रोहिणी (कपिला) की उत्पत्तिका जो प्राचीन वृत्तान्त सुना है, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सृष्टिके प्रारम्भमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रजापति दक्षको यह आज्ञा दी कि “तुम प्रजाकी सृष्टि करो,&#39; किंतु प्रजापति दक्षने प्रजाके हितकी इच्छासे सर्वप्रथम उनकी आजीविकाका ही निर्माण किया ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! जैसे देवता अमृतका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रजा आजीविकाके सहारे जीवन धारण करती है || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्थावर प्राणियोंसे जंगम प्राणी सदा श्रेष्ठ हैं। उनमें भी मनुष्य और मनुष्योंमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं; क्योंकि उन्हींमें यज्ञ प्रतिष्ठित हैं || १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यज्ञसे सोमकी प्राप्ति होती है और वह यज्ञ गौओंमें प्रतिष्ठित है, जिससे देवता आनन्दित होते हैं; अत: पहले आजीविका है फिर प्रजा ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समस्त प्राणी उत्पन्न होते ही जीविकाके लिये कोलाहल करने लगे। जैसे भूखे-प्यासे बालक अपने माँ-बापके पास जाते हैं, उसी प्रकार समस्त जीव जीविकादाता दक्षके पास गये ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजाजनोंकी इस स्थितिपर मन-ही-मन विचार करके भगवान्‌ प्रजापतिने प्रजावर्गकी आजीविकाके लिये उस समय अमृतका पान किया ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अमृत पीकर जब वे पूर्ण तृप्त हो गये, तब उनके मुखसे सुरभि (मनोहर) गन्ध निकलने लगी। सुरभि गन्धके निकलनेके साथ ही “सुरभि” नामक गौ प्रकट हो गयी, जिसे प्रजापतिने अपने मुखसे प्रकट हुई पुत्रीके रूपमें देखा || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस सुरभिने बहुत-सी &#39;सौरभेयी” नामवाली गौओंको उत्पन्न किया, जो सम्पूर्ण जगतके लिये माताके समान थीं। उन सबका रंग सुवर्णके समान उद्दीप्त हो रहा था। वे कपिला गौएँ प्रजाजनोंके लिये आजीविकारूप दूध देनेवाली थीं ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे नदियोंकी लहरोंसे फेन उत्पन्न होता है, उसी प्रकार चारों ओर दूधकी धारा बहाती हुई अमृत (सुवर्ण) के समान वर्णवाली उन गौओंके दूधसे फेन उठने लगा ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन भगवान्‌ शंकर पृथ्वीपर खड़े थे। उसी समय सुरभिके एक बछड़ेके मुँहसे फेन निकलकर उनके मस्तकपर गिर पड़ा। इससे वे कुपित हो उठे और अपने ललाटजनित नेत्रसे, मानो रोहिणीको भस्म कर डालेंगे, इस तरह उसकी ओर देखने लगे || २०६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजानाथ! रुद्रका वह भयंकर तेज जिन-जिन कपिलाओंपर पड़ा, उनके रंग नाना प्रकारके हो गये। जैसे सूर्य बादलोंको अपनी किरणोंसे बहुरंगा बना देते हैं, उसी प्रकार उस तेजने उन सबको नाना वर्णवाली कर दिया || २१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परंतु जो गौएँ वहाँसे भागकर चन्द्रमाकी ही शरणमें चली गयीं, वे जैसे उत्पन्न हुई थीं वैसे ही रह गयीं। उनका रंग नहीं बदला। उस समय क्रोधमें भरे हुए महादेवजीसे दक्षप्रजापतिने कहा-- || २२-२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! आपके ऊपर अमृतका छींटा पड़ा है। गौओंका दूध बछड़ोंके पीनेसे जूठा नहीं होता। जैसे चन्द्रमा अमृतका संग्रह करके फिर उसे बरसा देता है, उसी प्रकार ये रोहिणी गौएँ अमृतसे उत्पन्न दूध देती हैं || २४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;जैसे वायु, अग्नि, सुवर्ण, समुद्र और देवताओंका पीया हुआ अमृत--े वस्तुएँ उच्छिष्ट नहीं होतीं, उसी प्रकार बछड़ोंके पीनेपर उन बछड़ोंके प्रति स्नेह रखनेवाली गौ भी दूषित या उच्छिष्ट नहीं होती। (तात्पर्य यह कि दूध पीते समय बछड़ेके मुँहसे गिरा हुआ झाग अशुद्ध नहीं माना जाता।) ये गौएँ अपने दूध और घीसे इस सम्पूर्ण जगत्‌का पालन करेंगी। सब लोग चाहते हैं कि इन गौओंके पास मंगलकारी अमृतमय दुग्धकी सम्पत्ति बनी रहे” || २५-२६३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! ऐसा कहकर प्रजापतिने महादेवजीको बहुत-सी गौएँ और एक बैल भेंट किये तथा इसी उपायके द्वारा उनके मनको प्रसन्न किया || २७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महादेवजी प्रसन्न हुए। उन्होंने वृषभको अपना वाहन बनाया और उसीकी आकृतिसे अपनी ध्वजाको चिह्नित किया, इसीलिये वे “वृषभध्वज” कहलाये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर देवताओंने महादेवजीको पशुओंका अधिपति बना दिया और गौओंके बीचमें उन महेश्वरका नाम “वृषभांक” रख दिया ।। २९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार कपिला गौएँ अत्यन्त तेजस्विनी और शान्त वर्णवाली हैं। इसीसे दानमें उन्हें सब गौओंसे प्रथम स्थान दिया गया है ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौएँ संसारकी सर्वश्रेष्ठ वस्तु हैं। ये जगत्‌को जीवन देनेके कार्यमें प्रवृत्त हुई हैं। भगवान्‌ शंकर सदा उनके साथ रहते हैं। वे चन्द्रमासे निकले हुए अमृतसे उत्पन्न हुई हैं तथा शान्त, पवित्र, समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली और जगत्‌को प्राणदान देनेवाली हैं; अतः गोदान करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका दाता माना गया है ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौओंकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली इस उत्तम कथाका सदा पाठ करनेवाला मनुष्य अपवित्र हो तो भी मंगलप्रिय हो जाता है और कलियुगके सारे दोषोंसे छूट जाता है। इतना ही नहीं, उसे पुत्र, लक्ष्मी, धन तथा पशु आदिकी सदा प्राप्ति होती है ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! गोदान करनेवालेको हव्य, कव्य, तर्पण और शान्तिकर्मका फल तथा वाहन, वस्त्र एवं बालकों और वृद्धोंको संतोष प्राप्त होता है। इस प्रकार ये सब गोदानके गुण हैं। दाता इन सबको सदा पाता ही है ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! पितामह भीष्मकी ये बातें सुनकर अजमीढवंशी राजा युधिष्ठिर और उनके भाइयोंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सोनेके समान रंगवाले बैलों और उत्तम गौओंका दान किया ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार यज्ञोंकी दक्षिणाके लिये, पुण्यलोकोंपर विजय पानेके लिये तथा संसारमें अपनी उत्तम कीर्तिका विस्तार करनेके लिये राजाने उन्हीं ब्राह्मणोंको सैकड़ों और हजारों गौएँ दान कीं ।। ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गौओंकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;अठहत्तरवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) अठहत्तरवें अध्याय के श्लोक 1-25&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“वसिष्ठका सौदासको गोदानकी विधि एवं महिमा बताना”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! एक समयकी बात है, वक्ताओंमें श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी राजा सौदासने सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले, वैदिक ज्ञानके भण्डार, सिद्ध सनातन ऋषिषभ्रेष्ठ वसिष्ठजीसे, जो उन्हींके पुरोहित थे, प्रणाम करके इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ।। १-२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सौदास बोले--भगवन्‌! निष्पाप महर्षे! तीनों लोकोंमें ऐसी पवित्र वस्तु कौन कही जाती है जिसका नाम लेनेमात्रसे मनुष्यको सदा उत्तम पुण्यकी प्राप्ति हो सके? ।। ३&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! अपने चरणोंमें पड़े हुए राजा सौदाससे गवोपनिषद्‌ (गौओंकी महिमाके गूढ़ रहस्यको प्रकट करनेवाली विद्या) के विद्वान्‌ पवित्र महर्षि वसिष्ठने गौओंको नमस्कार करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया-- || ४ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“राजन! गौओंके शरीरसे अनेक प्रकारकी मनोरम सुगन्ध निकलती रहती है तथा बहुतेरी गौएँ गुग्गुलके समान गन्धवाली होती हैं। गौएँ समस्त प्राणियोंकी प्रतिष्ठा (आधार) हैं और गौएँ ही उनके लिये महान्‌ मंगलकी निधि हैं || ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौएँ ही भूत और भविष्य हैं। गौएँ ही सदा रहनेवाली पुष्टिका कारण तथा लक्ष्मीकी जड़ हैं। गौओंको जो कुछ दिया जाता है, उसका पुण्य कभी नष्ट नहीं होता ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;गौएँ ही सर्वोत्तम अन्नकी प्राप्तिमें कारण हैं। वे ही देवताओंको उत्तम हविष्य प्रदान करती हैं। स्वाहाकार (देवयज्ञ) और वषट्कार (इन्द्रयाग)--ये दोनों कर्म सदा गौओंपर ही अवलम्बित हैं || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;गौएँ ही यज्ञका फल देनेवाली हैं। उन्हींमें यज्ञोंकी प्रतिष्ठा है। गौएँ ही भूत और भविष्य हैं। उन्हींमें यज्ञ प्रतिष्ठित हैं, अर्थात्‌ यज्ञ गौओंपर ही निर्भर है || ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“महातेजस्वी पुरुषप्रवर! प्रातः:काल और सायंकाल सदा होमके समय ऋषियोंको गौएँ ही हवनीय पदार्थ (घृत आदि) देती हैं || ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;प्रभो! जो लोग (नवप्रसूतिका दूध देनेवाली) गौका दान करते हैं, वे जो कोई भी दुर्गम संकट आनेवाले होते हैं, उन सबसे अपने किये हुए दुष्कर्मोंस तथा समस्त पापसमूहसे भी तर जाते हैं ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जिसके पास दस गौएँ हों, वह एक गौका दान करे। जो सौ गायें रखता हो, वह दस गौओंका दान करे और जिसके पास एक हजार गौएँ मौजूद हों, वह सौ गौएँ दानमें दे दे तो इन सबको बराबर ही फल मिलता है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो सौ गौओंका स्वामी होकर भी अग्निहोत्र नहीं करता, जो हजार गौएँ रखकर भी यज्ञ नहीं करता तथा जो धनी होकर भी कृपणता नहीं छोड़ता--ये तीनों मनुष्य अर्घ्य (सम्मान) पानेके अधिकारी नहीं हैं || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;जो उत्तम लक्षणोंसे युक्त कपिला गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़ेसहित उसका दान करते हैं और उसके साथ दूध दुहनेके लिये एक कॉँस्यका पात्र भी देते हैं, वे इहलोक और परलोक दोनोंपर विजय पाते हैं ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! जो लोग जवान, सभी इन्द्रियोंसे सम्पन्न, सौ गायोंके यूथपति, बड़ी-बड़ी सींगोंवाले गवेन्द्र वृषभ (साँड़) को सुसज्जित करके सौ गायोंसहित उसे श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान करते हैं, वे जब-जब इस संसारमें जन्म लेते हैं, तब-तब महान्‌ ऐश्वर्यके भागी होते हैं ।। १४-१५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“गौओंका नाम-कीर्तन किये बिना न सोये। उनका स्मरण करके ही उठे और सबेरेशाम उन्हें नमस्कार करे। इससे मनुष्यको बल एवं पुष्टि प्राप्त होती है ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“गौओंके मूत्र और गोबरसे किसी प्रकार उद्विग्न न हो--घृणा न करे और उनका मांस न खाय। इससे मनुष्यको पुष्टि प्राप्त होती है ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“प्रतिदिन गौओंका नाम ले। उनका कभी अपमान न करे। यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गोमाताका नाम ले || १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“प्रतिदिन शरीरमें गोबर लगाकर स्नान करे। सूखे हुए गोबरपर बैठे। उसपर थूक न फेंके, मल-मूत्र न छोड़े तथा गौओंके तिरस्कारसे बचता रहे ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;भीगे हुए गोचर्मपर बैठकर भोजन करे। पश्चिम दिशाकी ओर देखे और मौन हो भूमिपर बैठकर घीका भक्षण करे। इससे सदा गौओंकी वृद्धि एवं पुष्टि होती है ।। २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अग्निमें घृतसे हवन करे। घृतसे ही स्वस्तिवाचन कराये। घृतका दान करे और स्वयं भी गौका घृत ही खाय। इससे मनुष्य सदा गौओंकी पुष्टि वृद्धिका अनुभव करता है ।। २१ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो मनुष्य सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त तिलकी धेनुको “गोमाँ अग्नेविमाँ अश्रि&#39; इत्यादि गोमती-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसका ब्राह्मणको दान करता है, वह किये हुए शुभाशुभ कर्मके लिये शोक नहीं करता ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जैसे नदियाँ समुद्रके पास जाती हैं, उसी तरह सोनेसे मढ़ी हुई सींगोंवाली, दूध देनेवाली सुरभी और सौरभेयी गौएँ मेरे निकट आयें ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैं सदा गौओंका दर्शन करूँ और गौएँ मुझपर कृपा-दृष्टि करें। गौएँ हमारी हैं और हम गौओंके हैं। जहाँ गौएँ रहें, वहीं हम रहें || २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो मनुष्य इस प्रकार रातमें या दिनमें, सम अवस्थामें या विषम अवस्थामें तथा बड़ेसे-बड़े भय आनेपर भी गोमाताका नामकीर्तन करता है, वह भयसे मुक्त हो जाता है! २५ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;उन्यासीवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) उन्यासीवें अध्याय के श्लोक 1-27&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“गौओंको तपस्याद्वारा अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उनके दानकी महिमा, विभिन्न प्रकारके गौओंके दानसे विभिन्न उत्तम लोकोंमें गमनका कथन”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसिष्ठजी कहते हैं--मानद परंतप! प्राचीन कालमें जब गौओंकी सृष्टि हुई थी, तब उन गौओंने एक लाख वर्षोतक बड़ी कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्याका उद्देश्य यह था कि हम श्रेष्ठता प्राप्त करें। इस जगतमें जितनी दक्षिणा देने योग्य वस्तुएँ हैं, उन सबमें हम उत्तम समझी जायाँ। किसी दोषसे लिप्त न हों। हमारे गोबरसे स्नान करनेपर सदा सब लोग पवित्र हों। देवता और मनुष्य पवित्रताके लिये हमेशा हमारे गोबरका उपयोग करें। समस्त चराचर प्राणी भी हमारे गोबरसे पवित्र हो जायेँ और हमारा दान करनेवाले मनुष्य हमारे ही लोक (गोलोकधाम) में जाया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब उनकी तपस्या समाप्त हुई, तब साक्षात्‌ भगवान ब्रह्माने उन्हें वर दिया--“गौओ! ऐसा ही हो--तुम्हारे मनमें जो संकल्प है, वह परिपूर्ण हो। तुम सम्पूर्ण जगत्‌के जीवोंका उद्धार करती रहो” ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार अपनी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जानेपर गौएँ तपस्यासे उठीं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान--तीनों कालोंकी जननी हैं; अतः प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गौओंको प्रणाम करना चाहिये। इससे मनुष्योंको पुष्टि प्राप्त होती है || ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! तपस्या समाप्त होनेपर गौएँ सम्पूर्ण जगत्‌का आश्रय बन गयीं; इसलिये वे महान्‌ सौभाग्यशालिनी गौएँ परम पवित्र बतायी जाती हैं ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये समस्त प्राणियोंके मस्तकपर स्थित हैं (अर्थात्‌ सबसे श्रेष्ठ एवं वन्दनीय हैं)। जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा कपिला गौको वस्त्र ओढ़ाकर कपिल रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा लाल रंगकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर लाल रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह सूर्यलोकमें सम्मानित होता है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष दूध देनेवाली सुलक्षणा चितकबरी गौको वस्त्र ओढ़ाकर चितकबरे बछड़ेसहित दान करता है, वह चन्द्रलोकमें पूजित होता है || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मानव दूध देनेवाली सुलक्षणा श्वेत वर्णकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर श्वेत वर्णके बछड़ेसहित दान करता है, उसे इन्द्रलोकमें सम्मान प्राप्त होता है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा कृष्ण वर्णकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर कृष्ण वर्णके बछड़ेसहित दान करता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष दूध देनेवाली सुलक्षणा धूएँ-जैसे रंगकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर धूएँके समान रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह यमलोकमें सम्मानित होता है || १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो जलके फेनके समान रंगवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो हवासे उड़ी हुई धूलके समान रंगवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, उसकी वायुलोकमें पूजा होती है || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सुवर्णके समान रंग तथा पिंगल वर्णके नेत्रवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह कुबेर-लोकको प्राप्त होता है ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुआलके धूएँके समान रंगवाली बछड़ेसहित गौको वस्त्रसे आच्छादित करके कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह पितृलोकमें प्रतिष्ठित होता है || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लटकते हुए गलकम्बलसे युक्त मोटी-ताजी सवत्सा गौको अलंकृत करके ब्राह्मणको दान देता है, वह बिना किसी बाधाके विश्वेदेवोंके श्रेष्ठ लोकमें पहुँच जाता है ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गौर वर्णवाली और दूध देनेवाली शुभलक्षणा गौको वस्त्र ओढ़ाकर समान रंगवाले बछड़ेसहित दान करता है, वह वसुओंके लोकमें जाता है ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो श्वेत कम्बलके समान रंगवाली सवत्सा गौको वस्त्रसे आच्छादित करके कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह साध्योंके लोकमें जाता है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! जो विशालपृष्ठभागवाले बैलको सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत करके उसका दान करता है, वह मरुद्गणोंके लोकोंमें जाता है || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य यौवनसे सम्पन्न और सुन्दर अंगवाले बैलको सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित करके उसका दान करता है, वह गन्धर्वों और अप्सराओंके लोकोंको प्राप्त करता है || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो लटकते हुए गलकम्बलवाले तथा गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ बैलको सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत करके ब्राह्मणको देता है, वह शोकरहित हो प्रजापतिके लोकोंमें जाता है || २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! गोदानमें अनुरागपूर्वक तत्पर रहनेवाला पुरुष सूर्यके समान देदीप्यमान विमानमें बैठकर मेघमण्डलको भेदता हुआ स्वर्गमें जाकर सुशोभित होता है || २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस गोदानपरायण श्रेष्ठ मनुष्यको मनोहर वेष और सुन्दर नितम्बवाली सहस्रों देवांगनाएँ (अपनी सेवासे) रमण कराती हैं || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह वीणा और वल्लकीके मधुर गुंजन, मृगनयनी युवतियोंके नूपुरोंकी मनोहर झनकारों तथा हास-परिहासके शब्दोंको श्रवण करके नींदसे जागता है || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक वह स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है। फिर पुण्यक्षीण होनेपर जब स्वर्गसे नीचे उतरता है, तब इस मनुष्यलोकमें आकर सम्पन्न घरमें जन्म लेता है ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;अस्सीवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) अस्सीवें अध्याय के श्लोक 1-17&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“गौओं तथा गोदानकी महिमा”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसिष्ठजी कहते हैं--राजन्‌! मनुष्यको चाहिये कि सदा सबेरे और सायंकाल आचमन करके इस प्रकार जप करे--“&#39;घी और दूध देनेवाली, घीकी उत्पत्तिका स्थान, घीको प्रकट करनेवाली, घीकी नदी तथा घीकी भवँररूप गौएँ मेरे घरमें सदा निवास करें। गौका घी मेरे हृदयमें सदा स्थित रहे। घी मेरी नाभिमें प्रतिष्ठित हो। घी मेरे सम्पूर्ण अंगोंमें व्याप्त रहे और घी मेरे मनमें स्थित हो। गौएँ मेरे आगे रहें। गौंएँ मेरे पीछे भी रहें। गौएँ मेरे चारों ओर रहें और मैं गौओंके बीचमें निवास करूँ।” इस प्रकार प्रतिदिन जप करनेवाला मनुष्य दिनभरमें जो पाप करता है, उससे छुटकारा पा जाता है || १--४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सहस्र गौओंका दान करनेवाले मनुष्य जहाँ सोनेके महल हैं, जहाँ स्वर्गगंगा बहती हैं तथा जहाँ गन्धर्व और अप्सराएँ निवास करती हैं, उस स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सहस्र गौओंका दान करनेवाले पुरुष जहाँ दूधके जलसे भरी हुई, दहीके सेवारसे व्याप्त हुई तथा मक्खनरूपी कीचड़से युक्त हुई नदियाँ बहती हैं, वहीं जाते हैं ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो विधिपूर्वक एक लाख गौओंका दान करता है, वह अत्यन्त अभ्युदयको पाकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है | ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह मनुष्य अपने माता और पिताकी दस-दस पीढ़ियोंको पवित्र करके उन्हें पुण्यमय लोकोंमें भेजता है और अपने कुलको भी पवित्र कर देता है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गायके बराबर तिलकी गाय बनाकर उसका दान करता है, अथवा जो जलधेनुका दान करता है, उसे यमलोकमें जाकर वहाँकी कोई यातना नहीं भोगनी पड़ती है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौ सबसे अधिक पवित्र, जगत्‌का आधार और देवताओंकी माता है। उसकी महिमा अप्रमेय है। उसका सादर स्पर्श करे और उसे दाहिने रखकर चले तथा उत्तम समय देखकर उसका सुपात्र ब्राह्मणको दान करे ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बड़े-बड़े सींगोंवाली कपिला धेनुको वस्त्र ओढ़ाकर उसे बछड़े और काँसीकी दोहनीसहित ब्राह्मणको दान करता है, वह मनुष्य यमराजकी दुर्गम सभामें निर्भय होकर प्रवेश करता है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतिदिन यह प्रार्थना करनी चाहिये कि सुन्दर एवं अनेक प्रकारके रूप-रंगवाली विश्वरूपिणी गोमाताएँ सदा मेरे निकट आयें ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गोदानसे बढ़कर कोई पवित्र दान नहीं है। गोदानके फलसे श्रेष्ठ दूसरा कोई फल नहीं है तथा संसारमें गौसे बढ़कर दूसरा कोई उत्कृष्ट प्राणी नहीं है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्वचा, रोम, सींग, पूँछके बाल, दूध और मेदा आदिके साथ मिलकर गौ (दूध, दही, घी आदिके द्वारा) यज्ञका निर्वाह करती है; अतः उससे श्रेष्ठ दूसरी कौन-सी वस्तु है || १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसने समस्त चराचर जगत्‌को व्याप्त कर रखा है, उस भूत और भविष्यकी जननी गौको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरश्रेष्ठ यह मैंने तुमसे गौओंके गुणवर्णनसम्बन्धी साहित्यका एक लघु अंशमात्र बताया है-दिग्दर्शनमात्र कराया है। गौओंके दानसे बढ़कर इस संसारमें दूसरा कोई दान नहीं है, तथा उनके समान दूसरा कोई आश्रय भी नहीं है ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--महर्षि वसिष्ठके ये वचन सुनकर भूमिदान करनेवाले संयतात्मा महामना राजा सौदासने “यह बहुत उत्तम पुण्यकार्य है” ऐसा सोचकर ब्राह्मणोंको बहुत-सी गौएँ दान दी। इससे उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/5113062014190254490/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/08/from-76-chapter-to-80-chapter-of-entire.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/5113062014190254490'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/5113062014190254490'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/08/from-76-chapter-to-80-chapter-of-entire.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के छिहत्तरवें अध्याय से अस्सीवें अध्याय तक (From the 76 chapter to the 80 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;इकहत्तरवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) इकहत्तरवें अध्याय के श्लोक 1-57&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--निष्पाप महाबाहो! गौओंके दानसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मुझे विस्तारके साथ बताइये। मुझे आपके वचनामृतोंको सुनते-सुनते तृप्ति नहीं होती है, इसलिये अभी और कहिये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन्‌! इस विषयमें विज्ञ पुरुष उद्दालक ऋषि और नाचिकेत दोनोंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक समय उद्दालक ऋषिने यज्ञकी दीक्षा लेकर अपने पुत्र नाचिकेतसे कहा--“तुम मेरी सेवामें रहो।” ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस यज्ञका नियम पूरा हो जानेपर महर्षिने अपने पुत्रसे कहा--“बेटा! मैंने समिधा, कुशा, फूल, जलका घड़ा और प्रचुर भोजन-सामग्री (फल-फूल आदि)--इन सबका संग्रह करके नदीके किनारे रख दिया और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओंको भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदीतटसे वह सब सामान यहाँ ले आओ&#39; ।। ४-५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाचिकेत जब वहाँ गया, तब उसे कुछ न मिला। सारा सामान नदीके वेगमें बह गया था। नाचिकेत मुनि लौट आया और पितासे बोला--&#39;मुझे तो वहाँ वह सब सामान नहीं दिखायी दिया” ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महातपस्वी उद्दालक मुनि उस समय भूख-प्याससे कष्ट पा रहे थे, अतः रुष्ट होकर बोले--&#39;अरे वह सब तुम्हें क्यों दिखायी देगा? जाओ यमराजको देखो।” इस प्रकार उन्होंने उसे शाप दे दिया ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पिताके वाग्वज़्से पीड़ित हुआ नाचिकेत हाथ जोड़कर बोला--&#39;प्रभो! प्रसन्न होइये।&#39; इतना ही कहते-कहते वह निष्प्राण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाचिकेतको गिरा देख उसके पिता भी दु:खसे मूर्च्छित हो गये और “अरे, यह मैंने क्या कर डाला!” ऐसा कहकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुःखमें डूबे और बारंबार अपने पुत्रके लिये शोक करते हुए ही महर्षिका वह शेष दिन व्यतीत हो गया और भयानक रात्रि भी आकर समाप्त हो गयी ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुश्रेष्ठ! कुशकी चटाईपर पड़ा हुआ नाचिकेत पिताके आँसुओंकी धारासे भीगकर कुछ हिलने-डुलने लगा, मानो वर्षसे सिंचकर अनाजकी सूखी खेती हरी हो गयी हो | ११ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महर्षिका वह पुत्र मरकर पुन: लौट आया, मानो नींद टूट जानेसे जाग उठा हो। उसका शरीर दिव्य सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था। उस समय उद्दालकने उससे पूछा-- ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बेटा! क्‍या तुमने अपने कर्मसे शुभ लोकोंपर विजय पायी है? मेरे सौभाग्यसे ही तुम पुनः यहाँ चले आये हो। तुम्हारा यह शरीर मनुष्योंका-सा नहीं है--दिव्य भावको प्राप्त हो गया है” ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने महात्मा पिताके इस प्रकार पूछनेपर परलोककी सब बातोंको प्रत्यक्ष देखनेवाला नाचिकेत महर्षियोंके बीचमें पितासे वहाँका सब वृत्तान्त निवेदन करने लगा-- ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“पिताजी! मैं आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये यहाँसे तुरन्त प्रस्थित हुआ और मनोहर कान्ति एवं प्रभावसे युक्त विशाल यमपुरीमें पहुँचकर मैंने वहाँकी सभा देखी, जो सुवर्णके समान सुन्दर प्रभासे प्रकाशित हो रही थी। उसका तेज सहस्रों योजन दूरतक फैला हुआ था || १५ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मुझे सामनेसे आते देख विवस्वानके पुत्र यमने अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि “इनके लिये आसन दो।” उन्होंने आपके नाते अर्घ्य आदि पूजनसम्बन्धी उपचारोंसे स्वयं ही मेरा पूजन किया ।। १६ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तब सब सदस्योंसे घिरकर उनके द्वारा पूजित होते हुए मैंने वैवस्वत यमसे धीरेसे कहा --&#39;धर्मराज! मैं आपके राज्यमें आया हूँ; मैं जिन लोकोंमें जानेके योग्य होऊँ, उनमें जानेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये&quot; || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तब यमराजने मुझसे कहा--“सौम्य! तुम मरे नहीं हो। तुम्हारे तपस्वी पिताने इतना ही कहा था कि तुम यमराजको देखो। विप्रवर! वे तुम्हारे पिता प्रजजलित अग्निके समान तेजस्वी हैं। उनकी बात झूठी नहीं की जा सकती ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तात! तुमने मुझे देख लिया। अब तुम लौट जाओ। तुम्हारे शरीरका निर्माण करनेवाले वे तुम्हारे पिताजी शोकमग्न हो रहे हैं। वत्स! तुम मेरे प्रिय अतिथि हो। तुम्हारा कौन-सा मनोरथ मैं पूर्ण करूँ। तुम्हारी जिस-जिस वस्तुके लिये इच्छा हो, उसे माँग लो” ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उनके ऐसा कहनेपर मैंने इस प्रकार उत्तर दिया--“भगवन्‌! मैं आपके उस राज्यमें आ गया हूँ, जहाँसे लौटकर जाना अत्यन्त कठिन है। यदि मैं आपकी दृष्टिमें वर पानेके योग्य होऊँ तो पुण्यात्मा पुरुषोंको मिलनेवाले समृद्धिशाली लोकोंका मैं दर्शन करना चाहता हूँ! ।। २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;द्विजेन्द्र! तब यम देवताने वाहनोंसे जुते हुए उत्तम प्रकाशसे युक्त तेजस्वी रथपर मुझे बिठाकर पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाले अपने यहाँके सभी लोकोंका मुझे दर्शन कराया ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तब मैंने महामनस्वी पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले वहाँके तेजोमय भवनोंका दर्शन किया। उनके रूप-रंग और आकार-प्रकार अनेक तरहके थे। उन भवनोंका सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्माण किया गया था ।। २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“कोई चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल थे। किन्हींपर क्षुद्रघंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं। उनमें सैकड़ों कक्षाएँ और मंजिलें थीं। उनके भीतर जलाशय और वन-उपवन सुशोभित थे। कितनोंका प्रकाश नीलमणिमय सूर्यके समान था। कितने ही चाँदी और सोनेके बने हुए थे। दिन्हीं-किन्हीं भवनोंके रंग प्रातःकालीन सूर्यके समान लाल थे। उनमेंसे कुछ विमान या भवन तो स्थावर थे और कुछ इच्छानुसार विचरनेवाले थे || २३-२४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उन भवनोंमें भक्ष्य और भोज्य पदार्थोंके पर्वत खड़े थे। वस्त्रों और शय्याओंके ढेर लगे थे तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाले बहुत-से वृक्ष उन गृहोंकी सीमाके भीतर लहलहा रहे थे || २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उन दिव्य लोकोंमें बहुत-सी नदियाँ, गलियाँ, सभाभवन, बावड़ियाँ, तालाब और जोतकर तैयार खड़े हुए घोषयुक्त सहस्रों रथ मैंने सब ओर देखे थे | २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैंने दूध बहानेवाली नदियाँ, पर्वत, घी और निर्मल जल भी देखे तथा यमराजकी अनुमतिसे और भी बहुत-से पहलेके न देखे हुए प्रदेशोंका दर्शन किया ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उन सबको देखकर मैंने प्रभावशाली पुरातन देवता धर्मराजसे कहा--&#39;प्रभो! ये जो घी और दूधकी नदियाँ बहती रहती हैं, जिनका स्रोत कभी सूखता नहीं है, किनके उपभोगमें आती हैं--इन्हें किनका भोजन नियत किया गया है?” ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यमराजने कहा--“ब्रह्मन! तुम इन नदियोंको उन श्रेष्ठ पुरुषोंका भोजन समझो, जो गोरस दान करनेवाले हैं। जो गोदानमें तत्पर हैं, उन पुण्यात्माओंके लिये दूसरे भी सनातन लोक विद्यमान हैं, जिनमें दुःख-शोकसे रहित पुण्यात्मा भरे पड़े हैं । २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“विप्रवर! केवल इनका दानमात्र ही प्रशस्त नहीं है; सुपात्र ब्राह्मण, उत्तम समय, विशिष्ट गौ तथा दानकी सर्वोत्तम विधि--इन सब बातोंको जानकर ही गोदान करना चाहिये। गौओंका आपसमें जो तारतम्य है, उसे जानना बहुत कठिन काम है और अग्नि एवं सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको पहचानना भी सरल नहीं है ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, अत्यन्त तपस्वी तथा यज्ञके अनुष्ठानमें लगा हुआ हो, वही इन गौओंके दानका सर्वोत्तम पात्र है। इनके सिवा जो ब्राह्मण कृच्छुव्रतसे मुक्त हुए हों और परिवारकी पुष्टिके लिये गोदानके प्रार्थी होकर आये हों, वे भी दानके उत्तम पात्र हैं। इन सुयोग्य पात्रोंको निमित्त बनाकर दानमें दी गयी श्रेष्ठ गौएँ उत्तम मानी गयी हैं । ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तीन राततक उपवासपूर्वक केवल जल पीकर धरतीपर शयन करे। तत्पश्चात्‌ खिलापिलाकर तृप्त की हुई गौओंका भोजन आदिसे संतुष्ट किये हुए ब्राह्मणोंको दान करे। वे गौएँ बछड़ोंके साथ रहकर प्रसन्न हों, सुन्दर बच्चे देनेवाली हों तथा अन्यान्य आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त हों। ऐसी गौओंका दान करके तीन दिनोंतक केवल गोरसका आहार करके रहना चाहिये ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उत्तम शील-स्वभाववाली, भले बछड़ेवाली और भागकर न जानेवाली दुधारू गायका कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करके उस गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक दाता स्वर्गलोकका सुख भोगता है ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“इसी प्रकार जो शिक्षा देकर काबूमें किये हुए, बोझ ढोनेमें समर्थ, बलवान, जवान, कृषक-समुदायकी जीविका चलानेयोग्य, पराक्रमी और विशाल डील-डौलवाले बैलका ब्राह्मणोंको दान देता है, वह दुधारू गायका दान करनेवालेके तुल्य ही उत्तम लोकोंका उपभोग करता है ।॥। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गौओंके प्रति क्षमाशील, उनकी रक्षा करनेमें समर्थ, कृतज्ञ और आजीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम पात्र बताया गया है। जो बूढ़ा हो, रोगी होनेके कारण पथ्य-भोजन चाहता हो, दुर्भिक्ष आदिके कारण घबराया हो, किसी महान्‌ यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला हो या जिसके लिये खेतीकी आवश्यकता आ पड़ी हो, होमके लिये हविष्य प्राप्त करनेकी इच्छा हो अथवा घरमें स्त्रीके बच्चा पैदा होनेवाला हो अथवा गुरुके लिये दक्षिणा देनी हो अथवा बालककी पुष्टिके लिये गोदुग्धकी आवश्यकता आ पड़ी हो, ऐसे व्यक्तियोंको ऐसे अवसरोंपर गोदानके लिये सामान्य देश-काल माना गया है (ऐसे समयमें देश-कालका विचार नहीं करना चाहिये)। जिन गौओंका विशेष भेद जाना हुआ हो, जो खरीदकर लायी गयी हों अथवा ज्ञानके पुरस्काररूपसे प्राप्त हुई हों अथवा प्राणियोंके अदला-बदलीसे खरीदी गयी हों या जीतकर लायी गयी हों अथवा दहेजमें मिली हों, ऐसी गौएँ दानके लिये उत्तम मानी गयी हैं” ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाचिकेत कहता है--वैवस्वत यमकी बात सुनकर मैंने पुनः उनसे पूछा--“भगवन्‌! यदि अभाववश गोदान न किया जा सके तो गोदान करनेवालोंको ही मिलनेवाले लोकोंमें मनुष्य कैसे जा सकता है?” ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर बुद्धिमान्‌ यमराजने गोदानसम्बन्धी गति तथा गोदानके समान फल देनेवाले दानका वर्णन किया, जिसके अनुसार बिना गायके भी लोग गोदान करनेवाले हो सकते हैं? ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो गौओंके अभावमें संयम-नियमसे युक्त हो घृतधेनुका दान करता है, उसके लिये ये घृतवाहिनी नदियाँ वत्सला गौओंकी भाँति घृत बहाती हैं || ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;घीके अभावमें जो व्रत-नियमसे युक्त हो तिलमयी धेनुका दान करता है, वह उस धेनुके द्वारा संकटसे उद्धार पाकर दूधकी नदीमें आनन्दित होता है || ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तिलके अभावमें जो व्रतशील एवं नियमनिष्ठ होकर जलमयी धेनुका दान करता है, वह अभीष्ट वस्तुओंको बहानेवाली इस शीतल नदीके निकट रहकर सुख भोगता है! || ४१ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले पूज्य पिताजी! इस प्रकार धर्मराजने मुझे वहाँ ये सब स्थान दिखाये। वह सब देखकर मुझे बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ ।। ४२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! मैं आपके लिये यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करता हूँ कि मैंने वहाँ थोड़े-से ही धनसे सिद्ध होनेवाला यह गोदानरूप महान्‌ यज्ञ प्राप्त किया है। वह यहाँ वेदविधिके अनुसार मुझसे प्रकट होकर सर्वत्र प्रचलित होगा ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपके द्वारा मुझे जो शाप मिला, वह वास्तवमें मुझपर अनुग्रहके लिये ही प्राप्त हुआ था, जिससे मैंने यमलोकमें जाकर वहाँ यमराजको देखा। महात्मन्‌! वहाँ दानके फलको प्रत्यक्ष देखकर मैं संदेहरहित दानधर्मोका अनुष्ठान करूँगा ।। ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महर्षे! धर्मराजने बारंबार प्रसन्न होकर मुझसे यह भी कहा था कि “जो लोग दानसे सदा पवित्र होना चाहें&quot; वे विशेषरूपसे गोदान करें ।। ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मुनिकुमार! धर्म निर्दोष विषय है। तुम धर्मकी अवहेलना न करना। उत्तम देश, काल प्राप्त होनेपर सुपात्रको दान देते रहना चाहिये। अतः तुम्हें सदा ही गोदान करना उचित है। इस विषयमें तुम्हारे भीतर कोई संदेह नहीं होना चाहिये || ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;पूर्वकालमें शान्तचित्तवाले पुरुषोंने दानके मार्ममें स्थित हो नित्य ही गौओंका दान किया था। वे अपनी उग्र तपस्याके विषयमें संदेह न रखते हुए भी यथाशक्ति दान देते ही रहते थे || ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;कितने ही शुद्धचित्त, श्रद्धालु एवं पुण्यात्मा पुरुष ईर्ष्याका त्याग करके समयपर यथाशक्ति गोदान करके परलोकमें पहुँचकर अपने पुण्यमय शील-स्वभावके कारण स्वर्गलोकमें प्रकाशित होते हैं || ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए इस गोधनका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये तथा पात्रकी परीक्षा करके सुपात्रको दी हुई गाय उसके घर पहुँचा देना चाहिये और किसी भी शुभ अष्टमीसे आरम्भ करके दस दिनोंतक मनुष्यको गोरस, गोबर अथवा गोमूत्रका आहार करके रहना चाहिये ।। ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“एक बैलका दान करनेसे मनुष्य देवताओंका सेवक होता है। दो बैलोंका दान करनेपर उसे वेद-विद्याकी प्राप्ति होती है। उन बैलोंसे जुते हुए छकड़ेका दान करनेसे तीर्थसेवनका फल प्राप्त होता है और कपिला गायके दानसे समस्त पापोंका परित्याग हो जाता है ।। ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मनुष्य न्यायतः प्राप्त हुई एक भी कपिला गायका दान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। गोरससे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; इसीलिये विद्वान्‌ पुरुष गोदानको महादान बतलाते हैं ।। ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौएँ दूध देकर सम्पूर्ण लोकोंका भूखके कष्टसे उद्धार करती हैं। ये लोकमें सबके लिये अन्न पैदा करती हैं। इस बातको जानकर भी जो गौओंके प्रति सौहार्दका भाव नहीं रखता, वह पापात्मा मनुष्य नरकमें पड़ता है || ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जो मनुष्य किसी श्रेष्ठ ब्राह्यणको सहस्र, शत, दस अथवा पाँच गौओंका उनके अच्छे बछड़ोंसहित दान करता है अथवा एक ही गाय देता है, उसके लिये वह गौ परलोकमें पवित्र तीर्थोवाली नदी बन जाती है ।। ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;प्राप्ति, पुष्टि तथा लोकरक्षा करनेके द्वारा गौएँ इस पृथ्वीपर सूर्यकी किरणोंके समान मानी गयी हैं। एक ही “गो” शब्द धेनु और सूर्य-किरणोंका बोधक है। गौओंसे ही संतति और उपभोग प्राप्त होते हैं; अतः गोदान करनेवाला मनुष्य किरणोंका दान करनेवाले सूर्यके ही समान माना जाता है ।। ५४ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;शिष्य जब गोदान करने लगे, तब उसे ग्रहण करनेके लिये गुरुको चुने। यदि गुरुने वह गोदान स्वीकार कर लिया तो शिष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है। विधिके जाननेवाले पुरुषोंके लिये यह गोदान महान्‌ धर्म है। अन्य सब विधियाँ इस आदि विधिमें ही अन्तर्भूत हो जाती हैं ।। ५५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तुम न्‍्यायके अनुसार गोधन प्राप्त करके पात्रकी परीक्षा करनेके पश्चात्‌ श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उनका दान कर देना और दी हुई वस्तुको ब्राह्मणके घर पहुँचा देना। तुम पुण्यात्मा और पुण्यकार्यमें प्रवृत्त रहनेवाले हो; अतः देवता, मनुष्य तथा हमलोग तुमसे धर्मकी ही आशा रखते हैं&quot; ।। ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मर्ष! धर्मराजके ऐसा कहनेपर मैंने उन धर्मात्मा देवताको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और फिर उनकी आज्ञा लेकर मैं आपके चरणोंके समीप लौट आया || ५७ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें यमराजका वाक्य नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;बहत्तरवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) बहत्तरवें अध्याय के श्लोक 1-12&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“गौओंके लोक और गोदानविषयक युधिष्ठिर और इन्द्रके प्रश्न”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--प्रभो! आपने नाचिकेत ऋषिके प्रति किये गये गोदानसम्बन्धी उपदेशकी चर्चा की और गौओंके माहात्म्यका भी संक्षेपसे वर्णन किया ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महामते पितामह! महात्मा राजा नृगने अनजानमें किये हुए एकमात्र अपराधके कारण महान्‌ दुःख भोगा था ॥। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब द्वारकापुरी बसने लगी थी, उस समय उनका उद्धार हुआ और उनके उस उद्धारमें हेतु हुए भगवान्‌ श्रीकृष्ण। ये सारी बातें मैंने ध्यानसे सुनी और समझी हैं ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परन्तु प्रभो! मुझे गोलोकके सम्बन्धमें कुछ संदेह है; अतः गोदान करनेवाले मनुष्य जिस लोकमें निवास करते हैं, उसका मैं यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। जैसा कि इन्द्रने किसी समय ब्रह्माजीसे यही प्रश्न किया था।। ५।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्रने पूछा--भगवन्‌! मैं देखता हूँ कि गोलोक-निवासी पुरुष अपने तेजसे स्वर्गवासियोंकी कान्ति फीकी करते हुए उन्हें लाँधघकर चले जाते हैं; अतः मेरे मनमें यहाँ यह संदेह होता है ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवन्‌! गौओंके लोक कैसे हैं? अनघ! यह मुझे बताइये। गोदान करनेवाले लोग जिन लोकोंमें निवास करते हैं, उनके विषयमें निम्नांकित बातें जानना चाहता हूँ || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे लोक कैसे हैं? वहाँ क्या फल मिलता है? वहाँका सबसे महान्‌ गुण क्या है? गोदान करनेवाले मनुष्य सब चिन्ताओंसे मुक्त होकर वहाँ किस प्रकार पहुँचते हैं? || ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दाताको गोदानका फल वहाँ कितने समयतक भोगनेको मिलता है? अनेक प्रकारका दान कैसे किया जाता है? अथवा थोड़ा-सा भी दान किस प्रकार सम्भव होता है? ।। ९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बहुत-सी गौओंका दान कैसा होता है? अथवा थोड़ी-सी गौओंका दान कैसा माना जाता है? गोदान न करके भी लोग किस उपायसे गोदान करनेवालोंके समान हो जाते हैं? यह मुझे बताइये ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! बहुत दान करनेवाला पुरुष अल्प दान करनेवालेके समान कैसे हो जाता है? तथा सुरेश्वर! अल्प दान करनेवाला पुरुष बहुत दान करनेवालेके तुल्य किस प्रकार हो जाता है? ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवन्‌! गोदानमें कैसी दक्षिणा श्रेष्ठ मानी जाती है? यह सब यथार्थरूपसे मुझे बतानेकी कृपा करें ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानसम्बन्धी बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;तिहत्तरवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) तिहत्तरवें अध्याय के श्लोक 1-51&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“ब्रम्हाजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माजीने कहा--देवेन्द्र! गोदानके सम्बन्धमें तुमने जो यह प्रश्न उपस्थित किया है, तुम्हारे सिवा इस जगतमें दूसरा कोई ऐसा प्रश्न करनेवाला नहीं है ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शक्र! ऐसे अनेक प्रकारके लोक हैं, जिन्हें तुम नहीं देख पाते हो। मैं उन लोकोंको देखता हूँ और पतित्रता स्त्रियाँ भी उन्हें देख सकती हैं ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि तथा शुभ बुद्धिवाले ब्राह्मण अपने शुभकर्मोंके प्रभावसे वहाँ सशरीर चले जाते हैं || ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि तथा शुभ बुद्धिवाले ब्राह्मण अपने शुभकर्मोंके प्रभावसे वहाँ सशरीर चले जाते हैं || ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रेष्ठ च्रतके आचरणमें लगे हुए योगी पुरुष समाधि-अवस्थामें अथवा मृत्युके समय जब शरीरसे सम्बन्ध त्याग देते हैं, तब अपने शुद्ध चित्तके द्वारा स्वप्नकी भाँति दीखनेवाले उन लोकोंका यहाँसे भी दर्शन करते हैं || ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सहस्राक्ष! वे लोक जैसे गुणोंसे सम्पन्न हैं, उनका वर्णन सुनो। वहाँ काल और बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता। अग्निका भी जोर नहीं चलता ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ किसीका किंचिन्मात्र भी अमंगल नहीं होता। उस लोकमें न रोग है न शोक। इन्द्र! वहाँकी गौएँ अपने मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करती हैं, वे सब उन्हें प्राप्त हो जाती हैं। यह मेरी प्रत्यक्ष देखी हुई बात है। वे जहाँ जाना चाहती हैं जाती हैं; जैसे चलना चाहती हैं चलती हैं और संकल्पमात्रसे सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्तकर उनका उपभोग करती हैं ।। ६-७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बावड़ी, तालाब, नदियाँ, नाना प्रकारके वन, गृह और पर्वत आदि सभी वस्तुएँ वहाँ उपलब्ध हैं ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गोलोक समस्त प्राणियोंके लिये मनोहर है। वहाँकी प्रत्येक वस्तुपर सबका समान अधिकार देखा जाता है। इतना विशाल दूसरा कोई लोक नहीं है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्र! जो सब कुछ सहनेवाले, क्षमाशील, दयालु, गुरुजनोंकी आज्ञामें रहनेवाले और अहंकाररहित हैं, वे श्रेष्ठ मनुष्य ही उस लोकमें जाते हैं ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सब प्रकारके मांसोंका भोजन त्याग देता है, सदा भगवच्चिन्तनमें लगा रहता है, धर्मपरायण होता है, माता-पिताकी पूजा करता, सत्य बोलता, ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता, जिसकी कभी निन्दा नहीं होती, जो गौओं और ब्राह्मणोंपर कभी क्रोध नहीं करता, धर्ममें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवा करता है, जीवनभरके लिये सत्यका व्रत ले लेता है, दानमें प्रवृत्त रहकर किसीके अपराध करनेपर भी उसे क्षमा कर देता है, जिसका स्वभाव मृदुल है, जो जितेन्द्रिय, देवाराधक, सबका आतिथ्य-सत्कार करनेवाला और दयालु है, ऐसे ही गुणोंवाला मनुष्य उस सनातन एवं अविनाशी गोलोकमें जाता है || ११--१३&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परस्त्रीगामी, गुरुहत्यारा, असत्यवादी, सदा बकवाद करनेवाला, ब्राह्मणोंसे वैर बाँध रखनेवाला, मित्रद्रोही, ठग, कृतघ्न, शठ, कुटिल, धर्मद्रेषी और ब्रह्महत्यारा--इन सब दोषोंसे युक्त दुरात्मा मनुष्य कभी मनसे भी गोलोकका दर्शन नहीं पा सकता; क्योंकि वहाँ पुण्यात्माओंका निवास है ।। १४-१५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुरेश्वर! शतक्रतो! यह सब मैंने तुम्हें विशेषरूपसे गोलोकका माहात्म्य बताया है। अब गोदान करनेवालोंको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो |। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष अपनी पैतृक सम्पत्तिसे प्राप्त हुए धनके द्वारा गौएँ खरीदकर उनका दान करता है, वह उस धनसे धर्मपूर्वक उपार्जित हुए अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शक्र! जो जूएमें धन जीतकर उसके द्वारा गायोंको खरीदता है और उनका दान करता है, वह दस हजार दिव्य वर्षोतक उसके पुण्यफलका उपभोग करता है ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पैतृक-सम्पत्तिसे न्यायपूर्वक प्राप्त की हुई गौओंका दान करता है, ऐसे दाताओंके लिये वे गौएँ अक्षय फल देनेवाली हो जाती हैं ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शचीपते! जो पुरुष दानमें गौएँ लेकर फिर शुद्ध हृदयसे उनका दान कर देता है, उसे भी यहाँ अक्षय एवं अटल लोकोंकी प्राप्ति होती है--यह निश्चितरूपसे समझ लो || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो जन्मसे ही सदा सत्य बोलता, इन्द्रियोंको काबूमें रखता, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंकी कठोर बातोंको भी सह लेता और क्षमाशील होता है, उसकी गौओंके समान गति होती है। अर्थात्‌ वह गोलोकमें जाता है || २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शचीपते शक्र! ब्राह्मणके प्रति कभी कुवाच्य नहीं बोलना चाहिये और गौओंके प्रति कभी मनसे भी द्रोहका भाव नहीं रखना चाहिये। जो ब्राह्मण गौओंके समान वृत्तिसे रहता है और गौओंके लिये घास आदिकी व्यवस्था करता है, साथ ही सत्य और धर्ममें तत्पर रहता है, उसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनो। वह यदि एक गौका भी दान करे तो उसे एक हजार गोदानके समान फल मिलता है ।। २२-२३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि क्षत्रिय भी इन गुणोंसे युक्त होता है तो उसे भी ब्राह्मणके समान ही (गोदानका) फल मिलता है। इस बातको अच्छी तरह सुन लो। उसकी (दान दी हुई) गौ भी ब्राह्मणकी गौके तुल्य ही फल देनेवाली होती है। यह धर्मात्माओंका निश्चय है || २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि वैश्यमें भी उपर्युक्त गुण हों तो उसे भी एक गोदान करनेपर ब्राह्मणकी अपेक्षा (आधे भाग) पाँच सौ गौओंके दानका फल मिलता है और विनयशील शूद्रको ब्राह्मणके चौथाई भाग अर्थात्‌ ढाई सौ गौओंके दानका फल प्राप्त होता है ।। २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष सदा सावधान रहकर इस उपर्युक्त धर्मका पालन करता है तथा जो सत्यवादी, गुरुसेवापरायण, दक्ष, क्षमाशील, देवभक्त, शान्तचित्त, पवित्र, ज्ञानवान्‌, धर्मात्मा और अहंकारशून्य होता है, वह यदि पूर्वोक्त विधिसे ब्राह्मणको दूध देनेवाली गायका दान करे तो उसे महान्‌ फलकी प्राप्ति होती है । २६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्र! जो सदा एक समय भोजन करके नित्य गोदान करता है, सत्यमें स्थित होता है, गुरुकी सेवा और वेदोंका स्वाध्याय करता है, जिसके मनमें गौओंके प्रति भक्ति है, जो गौओंका दान देकर प्रसन्न होता है तथा जन्मसे ही गौओंको प्रणाम करता है, उसको मिलनेवाले इस फलका वर्णन सुनो || २७-२८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है तथा बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा देकर यज्ञ करनेसे जो फल मिलता है, उपर्युक्त मनुष्य भी उसके समान ही उत्तम फलका भागी होता है। यह सभी सिद्ध-संत-महात्मा एवं ऋषियोंका कथन है ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गोसेवाका व्रत लेकर प्रतिदिन भोजनसे पहले गौओंको गोग्रास अर्पण करता है तथा शान्त एवं निर्लोेभ होकर सदा सत्यका पालन करता रहता है, वह सत्य-शील पुरुष प्रतिवर्ष एक सहस्र गोदान करनेके पुण्यका भागी होता है ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गोसेवाका व्रत लेनेवाला पुरुष गौओंपर दया करता और प्रतिदिन एक समय भोजन करके एक समयका अपना भोजन गौओंको दे देता है, इस प्रकार दस वर्षोतक गोसेवामें तत्पर रहनेवाले पुरुषको अनन्त सुख प्राप्त होते हैं || ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शतक्रतो! जो एक समय भोजन करके दूसरे समयके बचाये हुए भोजनसे गाय खरीदकर उसका दान करता है, वह उस गौके जितने रोएँ होते हैं, उतने गौओंके दानका अक्षय फल पाता है ।। ३२३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह ब्राह्मणके लिये फल बताया गया। अब क्षत्रियको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो। यदि क्षत्रिय इसी प्रकार पाँच वर्षोतक गौकी आराधना करे तो उसे वही फल प्राप्त होता है। उससे आधे समयमें वैश्यको और उससे भी आधे समयमें शूद्रकों उसी फलकी प्राप्ति बतायी गयी है ।। ३३-३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो अपने आपको बेचकर भी गायको खरीदकर उसका दान करता है, वह ब्रह्माण्डमें जबतक गोजातिकी सत्ता देखता है, तबतक उस दानका अक्षय फल भोगता रहता है ।। ३५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाभाग इन्द्र! गौओंके रोम-रोममें अक्षय लोकोंकी स्थिति मानी गयी है। जो संग्राममें गौओंको जीतकर उनका दान कर देता है, उनके लिये वे गौएँ स्वयं अपनेको बेचकर लेकर दी हुई गौओंके समान अक्षय फल देनेवाली होती हैं--इस बातको तुम जान लो ।। ३६।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो संयम और नियमका पालन करनेवाला पुरुष गौओंके अभावमें तिलधेनुका दान करता है, वह उस धेनुकी सहायता पाकर दुर्गम संकटसे पार हो जाता है तथा दूधकी धारा बहानेवाली नदीके तटपर रहकर आनन्द भोगता है ।। ३७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;केवल गौओंका दानमात्र कर देना प्रशंसाकी बात नहीं है; उसके लिये उत्तम पात्र, उत्तम समय, विशिष्ट गौ, विधि और कालका ज्ञान आवश्यक है। विप्रवर! गौओंमें जो परस्पर तारतम्य है, उसको तथा अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको जानना बहुत ही कठिन है ।। ३८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, शुद्ध कुलमें उत्पन्न, शान्तस्वभाव, यज्ञपरायण, पापभीरु और बहुज्ञ है, जो गौओंके प्रति क्षमाभाव रखता है, जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा नहीं है, जो गौओंकी रक्षा करनेमें समर्थ और जीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम पात्र बताया गया है || ३९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसकी जीविका क्षीण हो गयी हो तथा जो अत्यन्त कष्ट पा रहा हो, ऐसे ब्राह्मणको सामान्य देश-कालमें भी दूध देनेवाली गायका दान करना चाहिये। इसके सिवा खेतीके लिये, होम-सामग्रीके लिये, प्रसूता स्त्रीके पोषणके लिये, गुरुदक्षिणाके लिये अथवा शिशुपालनके लिये सामान्य देश-कालमें भी दुधारू गायका दान करना उचित है || ४० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गर्भिणी, खरीदकर लायी हुई, ज्ञान या विद्याके बलसे प्राप्त की हुई, दूसरे प्राणियोंके बदलेमें लायी हुई अथवा युद्धमें पराक्रम प्रकट करके प्राप्त की हुई, दहेजमें मिली हुई, पालनमें कष्ट समझकर स्वामीके द्वारा परित्यक्त हुई तथा पालन-पोषणके लिये अपने पास आयी हुई विशिष्ट गौएँ इन उपर्युक्त कारणोंसे ही दानके लिये प्रशंसनीय मानी गयी हैं ।। ४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हृष्ट-पुष्ट, सीधी-सादी, जवान और उत्तम गन्धवाली सभी गौएँ प्रशंसनीय मानी गयी हैं। जैसे गंगा सब नदियोंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कपिला गौ सब गौआओंमें उत्तम है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;(गोदानकी विधि इस प्रकार है--) दाता तीन राततक उपवास करके केवल पानीके आधारपर रहे, पृथ्वीपर शयन करे और गौओंको घास-भूसा खिलाकर पूर्ण तृप्त करे। तत्पश्चात्‌ ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे संतुष्ट करके उन्हें वे गौएँ दे। उन गौओंके साथ दूध पीनेवाले हृष्ट-पुष्ट बछड़े भी होने चाहिये तथा वैसी ही स्फूर्तियुक्त गौएँ भी हों। गोदान करनेके पश्चात्‌ तीन दिनोंतक केवल गोरस पीकर रहना चाहिये ।। ४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गौ सीधी-सूधी हो, सुगमतासे अच्छी तरह दूध दुहा लेती हो, जिसका बछड़ा भी सुन्दर हो तथा जो बन्धन तुड़ाकर भागनेवाली न हो, ऐसी गौका दान करनेसे उसके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक दाता परलोकमें सुख भोगता है ।। ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य ब्राह्मणको बोझ उठानेमें समर्थ, जवान, बलिष्ठ, विनीत--सीधा-सादा, हल खींचनेवाला और अधिक शक्तिशाली बैल दान करता है, वह दस धेनु दान करनेवालेके लोकोंमें जाता है || ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्र! जो दुर्गम वनमें फँसे हुए ब्राह्मण और गौओंका उद्धार करता है, वह एक ही क्षणमें समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा उसे जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होती है, वह भी सुन लो ।। ४६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सहस्राक्ष! उसे अश्वमेध यज्ञके समान अक्षय फल सुलभ होता है। वह मृत्युकालमें जिस स्थितिकी आकांक्षा करता है, उसे भी पा लेता है ।। ४७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाना प्रकारके दिव्य लोक तथा उसके हृदयमें जो-जो कामना होती है, वह सब कुछ मनुष्य उपर्युक्त सत्कर्मके प्रभावसे प्राप्त कर लेता है || ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इतना ही नहीं, वह गौओंसे अनुगृहीत होकर सर्वत्र पूजित होता है। शतक्रतो! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे वनमें रहकर गौओंका अनुसरण करता है तथा निःस्पृह, संयमी और पवित्र होकर घास-पत्ते एवं गोबर खाता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह मनमें कोई कामना न होनेपर मेरे लोकमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता है। अथवा उसकी जहाँ इच्छा होती है, उन्हीं लोकोंमें चला जाता है || ४९--५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्रह्माजी और इन्द्रका संवादविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;चौहत्तरवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) चौहत्तरवें अध्याय के श्लोक 1-57&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्रने पूछा--पितामह! यदि कोई जान-बूझकर दूसरेकी गौका अपहरण करे और धनके लोभसे उसे बेच डाले, उसकी परलोकमें क्या गति होती है? यह मैं जानना चाहता हूँ ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माजीने कहा--इन्द्र! जो खाने, बेचने या ब्राह्मणोंको दान करनेके लिये दूसरेकी गाय चुराते हैं, उन्हें क्या फल मिलता है, यह सुनो || २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो उच्छुंखल मनुष्य मांस बेचनेके लिये गौकी हिंसा करता या गोमांस खाता है तथा जो स्वार्थवश घातक पुरुषको गाय मारनेकी सलाह देते हैं, वे सभी महान्‌ पापके भागी होते हैं ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौकी हत्या करनेवाले, उसका मांस खानेवाले तथा गोहत्याका अनुमोदन करनेवाले लोग गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक नरकमें डूबे रहते हैं || ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! ब्राह्मणके यज्ञका नाश करनेवाले पुरुषको जैसे और जितने पाप लगते हैं, दूसरोंकी गाय चुराने और बेचनेमें भी वे ही दोष बताये गये हैं ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दूसरेकी गाय चुराकर ब्राह्मणको दान करता है, वह गोदानका पुण्य भोगनेके लिये जितना समय शास्त्रोंमें बताया गया है, उतने ही समयतक नरक भोगता है ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महातेजस्वी इन्द्र! गोदानमें कुछ सुवर्णकी दक्षिणा देनेका विधान है। दक्षिणाके लिये सुवर्ण सबसे उत्तम बताया गया है। इसमें संशय नहीं है ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनुष्य गोदान करनेसे अपनी सात पीढ़ी पहलेके पितरोंका और सात पीढ़ी आगे आनेवाली संतानोंका उद्धार करता है; किंतु यदि उसके साथ सोनेकी दक्षिणा भी दी जाय तो उस दानका फल दूना बताया गया है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्योंकि इन्द्र! सुवर्णका दान सबसे उत्तम दान है। सुवर्णकी दक्षिणा सबसे श्रेष्ठ है, तथा पवित्र करनेवाली वस्तुओंमें सुवर्ण ही सबसे अधिक पावन माना गया है || ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महातेजस्वी शतक्रतो! सुवर्ण सम्पूर्ण कुलोंको पवित्र करनेवाला बताया गया है। इस प्रकार मैंने तुमसे संक्षेपमें यह दक्षिणाकी बात बतायी ।। १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! यह उपर्युक्त उपदेश ब्रह्माजीने इन्द्रको दिया। इन्द्रने राजा दशरथको तथा पिता दशरथने अपने पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको दिया ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! श्रीरामचन्द्रजीने भी अपने प्रिय एवं यशस्वी भ्राता लक्ष्मणको इसका उपदेश दिया। फिर लक्ष्मणने भी वनवासके समय ऋषियोंको यह बात बतायी ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार परम्परासे प्राप्त हुए इस दुर्धर उपदेशको उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि और धर्मात्मा राजालोग धारण करते आ रहे हैं || १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिर! मुझसे मेरे उपाध्याय (परशुरामजी) ने इस विषयका वर्णन किया था। जो ब्राह्मण अपनी मण्डलीमें बैठकर प्रतिदिन इस उपदेशको दुहराता है और यज्ञमें, गोदानके समय तथा दो व्यक्तियोंके भी समागममें इसकी चर्चा करता है, उसको सदा देवताओंके साथ अक्षयलोक प्राप्त होते हैं। यह बात भी परमेश्वर भगवान्‌ ब्रह्माने स्वयं ही इन्द्रको बतायी है ।। १४-१५ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: small; text-align: left;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ½ श्लोक मिलाकर कुल १५½ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;पचहत्तरवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) पचहत्तरवें अध्याय के श्लोक 1-41&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;“व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्म॒चर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता”&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--प्रभो! आपने धर्मका उपदेश करके उसमें मेरा दृढ़ विश्वास उत्पन्न कर दिया है। पितामह! अब मैं आपसे एक और संदेह पूछ रहा हूँ, उसके विषयमें मुझे बताइये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाद्युते! व्रतोंका क्या और कैसा फल बताया गया है? नियमोंके पालन और स्वाध्यायका भी क्या फल है? ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दान देने, वेदोंको धारण करने और उन्हें पढ़ानेका क्या फल होता है? यह सब मैं जानना चाहता हूँ ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! संसारमें जो प्रतिग्रह नहीं लेता, उसे क्या फल मिलता है? तथा जो वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, उसके लिये कौन-सा फल देखा गया है ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहनेवाले शूरवीरोंको भी किस फलकी प्राप्ति होती है? शौचाचारका तथा ब्रह्मचर्यके पालनका क्या फल बताया गया है? ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पिता और माताकी सेवासे कौन-सा फल प्राप्त होता है? आचार्य एवं गुरुकी सेवासे तथा प्राणियोंपर अनुग्रह एवं दयाभाव बनाये रखनेसे किस फलकी प्राप्ति होती है? || ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मज्ञ पितामह! यह सब मैं यथावत्‌ रूपसे जानना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युथधिष्ठिर! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे किसी व्रतको आरम्भ करके उसे अखण्डरूपसे निभा देते हैं, उन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! संसारमें नियमोंके पालनका फल तो प्रत्यक्ष देखा जाता है। तुमने भी यह नियमों और यज्ञोंका ही फल प्राप्त किया है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदोंके स्वाध्यायका फल भी इहलोक और परलोकमें भी देखा जाता है। स्वाध्यायशील द्विज इहलोक और ब्रह्मलोकमें भी सदा आनन्द भोगता है || १० |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन्‌! अब तुम मुझसे विस्तारपूर्वक दम (इन्द्रियसंयम)के फलका वर्णन सुनो। जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सुखी और सर्वत्र संतुष्ट रहते हैं || ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे जहाँ चाहते हैं वहीं चले जाते हैं और जिस वस्तुकी इच्छा करते हैं वही उन्हें प्राप्त हो जाती है। वे सम्पूर्ण शत्रुओंका अन्त कर देते हैं। इसमें संशय नहीं है ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पाण्डुनन्दन! जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सम्पूर्ण मनचाही वस्तुएँ प्राप्त कर लेते हैं। वे अपनी तपस्या, पराक्रम, दान तथा नाना प्रकारके यज्ञोंसे स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। इन्द्रियोंका दमन करनेवाले पुरुष क्षमाशील होते हैं ।। १३ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दानसे दमका स्थान ऊँचा होता है। दानी पुरुष ब्राह्मणको कुछ दान करते समय कभी क्रोध भी कर सकता है; परंतु दमनशील या जितेन्द्रिय पुरुष कभी क्रोध नहीं करता; इसलिये दम (इन्द्रिय-संयम) दानसे श्रेष्ठ है। जो दाता बिना क्रोध किये दान करता है उसे सनातन (नित्य) लोक प्राप्त होते हैं || १४-१५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दान करते समय यदि क्रोध आ जाय तो वह दानके फलको नष्ट कर देता है; इसलिये उस क्रोधको दबानेवाला जो दमनामक गुण है, वह दानसे श्रेष्ठ माना गया है। महाराज! नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें निवास करनेवाले ऋषियोंके स्वर्गमें सहस्रों अदृश्य स्थान हैं, जिनमें दमके पालनद्वारा महान्‌ लोककी इच्छा रखनेवाले महर्षि और देवता इस लोकसे जाते हैं; अतः “दम&#39; दानसे श्रेष्ठ है ।। १६-१७ ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेन्द्र! शिष्योंको वेद पढ़ानेवाला अध्यापक क्लेश सहन करनेके कारण अक्षय फलका भागी होता है। अग्निमें विधिपूर्वक हवन करके ब्राह्मण ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। १८ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो वेदोंका अध्ययन करके न्यायपरायण शिष्योंको विद्यादान करता है तथा गुरुके कर्मोकी प्रशंसा करनेवाला है, वह भी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदाध्ययन, यज्ञ और दानकर्ममें तत्पर रहनेवाला तथा युद्धमें टूसरोंकी रक्षा करनेवाला क्षत्रिय भी स्वर्गलोकमें पूजित होता है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने कर्ममें लगा हुआ वैश्य दान देनेसे महत्‌-पदको प्राप्त होता है। अपने कर्ममें तत्पर रहनेवाला शूद्र सेवा करनेसे स्वर्गलोकमें जाता है ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शूरवीरोंके अनेक भेद बताये गये हैं। उन सबके तात्पर्य मुझसे सुनो। उन शूरोंके वंशजों तथा शूरोंके लिये जो फल बताया गया है, उसे बता रहा हूँ || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ लोग यज्ञशूर हैं। कुछ इन्द्रियसंयममें शूर होनेके कारण दमशूर कहलाते हैं। इसी प्रकार कितने ही मानव सत्यशूर, युद्धशूर, दानशूर, बुद्धिशूर तथा क्षमाशूर कहे गये हैं ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बहुत-से मनुष्य सांख्यशूर, योगशूर, वनवासशूर, गृहवासशूर तथा त्यागशूर हैं || २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कितने मानव सरलता दिखानेमें शूरवीर हैं। बहुत-से शम (मनोनिग्रह) में ही शूरता प्रकट करते हैं। विभिन्न नियमोंद्वारा अपना शौर्य सूचित करनेवाले और भी बहुत-से शूरवीर हैं। कितने ही वेदाध्ययनशूर, अध्यापनशूर, गुरुशुश्रूषाशूर, पितृसेवाशूर, मातृसेवाशूर तथा भिक्षाशूर हैं || २५-२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ लोग वनवासमें, कुछ गृहवासमें और कुछ लोग अतिथियोंकी सेवा-पूजामें शूरवीर होते हैं। ये सब-के-सब अपने कर्मफलोंद्वारा उपार्जित उत्तम लोकोंमें जाते हैं || २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सम्पूर्ण वेदोंको धारण करना और समस्त तीर्थोमें स्नान करना--इन सत्कर्मोंका पुण्य सदा सत्य बोलनेवाले पुरुषके पुण्यके बराबर हो सकता है या नहीं; इसमें सन्देह है। अर्थात्‌ इनसे सत्य श्रेष्ठ है ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यदि तराजूके एक पलड़ेपर एक हजार अभश्वमेध यज्ञोंका पुण्य और दूसरे पलड़ेपर केवल सत्य रखा जाय तो एक सहसख्र अश्वमेध यज्ञोंकी अपेक्षा सत्यका ही पलड़ा भारी होगा ।। २९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सत्यके प्रभावसे सूर्य तपते हैं, सत्यसे अग्नि प्रजजलित होती है और सत्यसे ही वायुका सर्वत्र संचार होता है; क्योंकि सब कुछ सत्यपर ही टिका हुआ है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता, पितर और ब्राह्मण सत्यसे ही प्रसन्न होते हैं। सत्यको ही परम धर्म बताया गया है; अतः सत्यका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिये || ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋषि-मुनि सत्यपरायण, सत्यपराक्रमी और सत्यप्रतिज्ञ होते हैं। इसलिये सत्य सबसे श्रेष्ठ है ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! सत्य बोलनेवाले मनुष्य स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। किंतु इन्द्रियसंयम-दम उस सत्यके फलकी प्राप्तिमें कारण है। यह बात मैंने सम्पूर्ण हृदयसे कही है || ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसने अपने मनको वशमें करके विनयशील बना दिया है, वह निश्चय ही स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। पृथ्वीनाथ! अब तुम ब्रह्मचर्यके गुणोंका वर्णन सुनो || ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! जो जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त यहाँ ब्रह्मचारी ही रह जाता है, उसके लिये कुछ भी अलभ्य नहीं है, इस बातको जान लो ।। ३५ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मलोकमें ऐसे करोड़ों ऋषि निवास करते हैं, जो इस लोकमें सदा सत्यवादी, जितेन्द्रिय और ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) रहे हैं | ३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! यदि ब्राह्मण विशेषरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करे तो वह सम्पूर्ण पापोंको भस्म कर डालता है; क्योंकि ब्रह्मचारी ब्राह्मण अग्निस्वरूप कहा जाता है || ३७ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपस्वी ब्राह्मणोंमें यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है; क्‍योंकि ब्रह्मचारीके आक्रमण करनेपर साक्षात्‌ इन्द्र भी डरते हैं। ब्रह्मचर्यका वह फल यहाँ ऋषियों में दृष्टिगोचर होता है। अब तुम माता-पिता आदिके पूजनसे जो धर्म होता है, उसके विषयमें भी मुझसे सुनो || ३८-३९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! जो पिता-माता, बड़े भाई, गुरुऔर आचार्यकी सेवा करता है और कभी उनके गुणोंमें दोषदृष्टि नहीं करता है, उसको मिलनेवाले फलको जान लो। उसे स्वर्गलोकमें सर्वसम्मानित स्थान प्राप्त होता है। मनको वशमें रखनेवाला वह पुरुष गुरुशुश्रूषाके प्रभावसे कभी नरकका दर्शन नहीं करता ।। ४०-४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पचद्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/6027413784765970268/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/08/from-71-chapter-to-75-chapter-of-entire.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/6027413784765970268'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/6027413784765970268'/><link rel='alternate' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/08/from-71-chapter-to-75-chapter-of-entire.html' title='सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासन पर्व) के इकहत्तरवें अध्याय से पचहत्तरवें अध्याय तक (From the 71 chapter to the 75 chapter of the entire Mahabharata (anushashn Parva))'/><author><name> Dangi blogger</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06589778538969349675</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='18' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhpulTdMM_I2y9okJeiNjCwIhdmMhu99Vj3XlzPe_hnXGFbBYV-qVTipZp5DY-vCHVbIjUAA_C1ksWn4dJImX3Mhc0v47juT9PGhn3AzHFAnbhUWTJrP6Jl1ocFq2MlcwU/s113/images+%285%29.jpeg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s1536/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1536&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBWwisuLOhWGeDrXUyNyXu5Wl9Pe24htRBKRcwYEs7Q1z9NcxcysS38JCK9TvVBEnR9xZT67yPlhbruBteVaRxU_iROwqaNSC9Vy4ixZQ0GzF-i0hOxBLpSn-tE-Si1nNy691UIlU-ojGDbTHlrrUi7i-vpOeiY76SNhMPaBsJ6BUGIYYx0Fk7j2xnwg/s320/file_00000000efc061fb835c2605aecd4c54%20(1).png&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;छाछठवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) छाछठवें अध्याय के श्लोक 1-65½&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! गर्मीके दिनोंमें जिसके पैर जल रहे हों, ऐसे ब्राह्मणको जो जूते पहनाता है, उसको जो फल मिलता है, वह मुझे बताइये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! जो एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मणोंके लिये जूते दान करता है, वह सब कण्टकोंको मसल डालता है और कठिन विपत्तिसे भी पार हो जाता है। इतना ही नहीं, वह शत्रुओंके ऊपर विराजमान होता है। प्रजानाथ! उसे जन्मान्तरमें खच्चरियोंसे जुता हुआ उज्ज्वल रथ प्राप्त होता है ।। २-३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीकुमार! जो नये बैलोंसे युक्त शकट दान करता है, उसे चाँदी और सोनेसे जटित रथ प्राप्त होता है ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--कुरुनन्दन! तिल, भूमि, गौ और अन्नका दान करनेसे क्या फल मिलता है? इसका फिरसे वर्णन कीजिये ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--कुन्तीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ तिलदानका जो फल है, वह मुझसे सुनो और सुनकर यथोचित रूपसे उसका दान करो ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माजीने जो तिल उत्पन्न किये हैं, वे पितरोंके सर्वश्रेष्ठ खाद्य पदार्थ हैं। इसलिये तिल दान करनेसे पितरोंको बड़ी प्रसन्नता होती है || ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो माघ मासमें ब्राह्मणोंको तिल दान करता है, वह समस्त जन्तुओंसे भरे हुए नरकका दर्शन नहीं करता ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो तिलोंके द्वारा पितरोंका पूजन करता है, वह मानो सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान कर लेता है। तिल-श्राद्ध कभी निष्काम पुरुषको नहीं करना चाहिये ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभो! ये तिल महर्षि कश्यपके अंगोंसे प्रकट होकर विस्तारको प्राप्त हुए हैं; इसलिये दानके निमित्त इनमें दिव्यता आ गयी है || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तिल पौष्टिक पदार्थ है। वे सुन्दर रूप देनेवाले और पापनाशक हैं। इसलिये तिल-दान सब दानोंसे बढ़कर है ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परम बुद्धिमान महर्षि आपस्तम्ब, शंख, लिखित तथा गौतम--ये तिलोंका दान करके दिव्यलोकको प्राप्त हुए हैं ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वे सभी ब्राह्मण स्त्री-समागमसे दूर रहकर तिलोंका हवन किया करते थे, तिल गोघृतके समान हविके योग्य माने गये हैं, इसलिये यज्ञोंमें गृहीत होते हैं एवं हरेक कर्मोंमें उनकी आवश्यकता है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः तिलदान सब दानोंसे बढ़कर है। तिलदान यहाँ सब दानोंमें अक्षय फल देनेवाला बताया जाता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्वकालमें परंतप राजर्षि कुशिकने हविष्य समाप्त हो जानेपर तिलोंसे ही हवन करके तीनों अग्नियोंको तृप्त किया था; इससे उन्हें उत्तम गति प्राप्त हुई || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार जिस विधिके अनुसार तिलदान करना उत्तम माना गया है, वह सर्वोत्तम तिलदानका विधान यहाँ बताया गया ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! इसके बाद यज्ञकी इच्छावाले देवताओं और स्वयम्भू ब्रह्माजीका समागम होनेपर उनमें परस्पर जो बातचीत हुई थी, उसे बता रहा हूँ, इसपर ध्यान दो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीनाथ! भूतलके किसी भागमें यज्ञ करनेकी इच्छावाले देवता ब्रह्माजीके पास जाकर किसी शुभ देशकी याचना करने लगे, जहाँ यज्ञ कर सकें ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता बोले--भगवन्‌! महाभाग! आप पृथ्वी और सम्पूर्ण स्वर्गके भी स्वामी हैं; अतः हम आपकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर यज्ञ करेंगे ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्योंकि भूस्वामी जिस भूमिपर यज्ञ करनेकी अनुमति नहीं देता, उस भूमिपर यदि यज्ञ किया जाय तो उसका फल नहीं होता। आप सम्पूर्ण चराचर जगतके स्वामी हैं; अतः पृथ्वीपर यज्ञ करनेके लिये हमें आज्ञा दीजिये ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्माजीने कहा--काश्यपनन्दन सुरश्रेष्ठणण! तुमलोग पृथ्वीके जिस प्रदेशमें यज्ञ करोगे, वही भूभाग मैं तुम्हें दे रहा हूँ || २१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओंने कहा--भगवन्‌! हमारा कार्य हो गया। अब हम पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञपुरुषका यजन करेंगे। यह जो हिमालयके पासका प्रदेश है, इसका ऋषि-मुनि सदासे ही आश्रय लेते हैं (अत: हमारा यज्ञ भी यहीं होगा) ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनन्तर अगस्त्य, कण्व, भृगु, अत्रि, वृषाकपि, असित और देवल देवताओंके उस यज्ञमें उपस्थित हुए। तब महामनस्वी देवताओंने यज्ञपुरुष अच्युतका यजन आरम्भ किया और जन श्रेष्ठ देवगणोंने यथासमय उस यज्ञको समाप्त भी कर दिया || २३-२४ $ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर्वतराज हिमालयके पास यज्ञ पूरा करके देवताओंने भूमिदान भी किया, जो उस यज्ञके छठे भागके बराबर पुण्यका जनक था ।। २५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसको खोदखादकर खराब न कर दिया गया हो, ऐसे प्रादेशमात्र भूभागका भी जो दान करता है, वह न तो कभी दुर्गम संकटोंमें पड़ता है और न पड़नेपर कभी दुःखी ही होता है ।। २६६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सर्दी, गर्मी और हवाके वेगको सहन करनेयोग्य सजी-सजायी गृह-भूमि दान करता है, वह देवलोकमें निवास करता है। पुण्यका भोग समाप्त होनेपर भी वहाँसे हटाया नहीं जाता ।। २७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीनाथ! जो विद्वान्‌ गृहदान करता है, वह भी उसके पुण्यसे इन्द्रके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता और स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ।। २८६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अध्यापक-वंशमें उत्पन्न श्रोत्रिय एवं जितेन्द्रिय ब्राह्मण जिसके दिये हुए घरमें प्रसन्नतासे रहता है, उसे श्रेष्ठ लोक प्राप्त होते हैं | २९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ) जो गौओंके लिये सर्दी और वर्षासे बचानेवाला सुदृढ़ निवासस्थान बनवाता है, वह अपनी सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ।। ३०३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खेतके योग्य भूमि दान करनेवाला मनुष्य जगत्‌में शुभ सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो रत्नयुक्त भूमिका दान करता है, वह अपने कुलकी वंश-परम्पराको बढ़ाता है || ३१३ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो भूमि ऊसर, जली हुई और श्मशानके निकट हो तथा जहाँ पापी पुरुष निवास करते हों, उसे ब्राह्मणको नहीं देना चाहिये || ३२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो परायी भूमिमें पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, अथवा जो उस भूमिको पितरोंके लिये दानमें देता है, उसके वे श्राद्धकर्म और दान दोनों ही नष्ट होते (निष्फल हो जाते) हैं ।। ३३।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि वह थोड़ी-सी भी भूमि खरीदकर उसका दान करे। खरीदकर अपनी की हुई भूमिमें ही पितरोंको दिया हुआ पिण्ड सदा स्थिर रहनेवाला होता है | ३४६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वन, पर्वत, नदी और तीर्थ--ये सब स्थान किसी स्वामीके अधीन नहीं होते हैं (इन्हें सार्वजनिक माना जाता है)। इसलिये वहाँ श्राद्ध करनेके लिये भूमि खरीदनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रजानाथ! इस प्रकार यह भूमिदानका फल बताया गया है ।। ३५-३६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनघ! इसके बाद मैं तुम्हें गोदानका माहात्म्य बताऊँगा। गौएँ समस्त तपस्वियोंसे बढ़कर हैं; इसलिये भगवान्‌ शंकरने गौओंके साथ रहकर तप किया था || ३७३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! ये गौएँ चन्द्रमाके साथ उस ब्रह्मलोकमें निवास करती हैं, जो परमगतिरूप है और जिसे सिद्ध ब्रह्मर्षि भी प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं || ३८६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! ये गौएँ अपने दूध, दही, घी, गोबर, चमड़ा, हड्डी, सींग और बालोंसे भी जगत्‌का उपकार करती रहती हैं || ३९६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्हें सर्दी, गर्मी और वर्षाका भी कष्ट नहीं होता है। ये सदा ही अपना काम किया करती हैं। इसलिये ये ब्राह्मणोंक साथ परमपदस्वरूप ब्रह्मलोकमें चली जाती हैं || ४०-४१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसीसे गौ और ब्राह्मणको मनस्वी पुरुष एक बताते हैं। राजन! राजा रन्तिदेवके यज्ञमें वे पशुरूपसे दान देनेके लिये निश्चित की गयी थीं; अतः गौओंके चमड़ोंसे वह चर्मण्वती नामक नदी प्रवाहित हुई थी। वे सभी गौएँ पशुत्वसे विमुक्त थीं और दान देनेके लिये नियत की गयी थीं ।। ४२-४३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भूपाल! पृथ्वीनाथ! जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इन गौओंका दान करता है, वह संकटमें पड़ा हो तो भी उस भारी विपत्तिसे उद्धार पा लेता है ।। ४४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो एक सहस््र गोदान कर देता है, वह मरनेके बाद नरकमें नहीं पड़ता। नरेश्वर! उसे सर्वत्र विजय प्राप्त होती है ।। ४५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवराज इन्द्रने कहा है कि &#39;गौओंका दूध अमृत है”; जो दूध देनेवाली गौका दान करता है, वह अमृत दान करता है ।। ४६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदवेत्ता पुरुषोंका अनुभव है कि “गोदुग्धरूप हविष्यका यदि अग्निमें हवन किया जाय तो वह अविनाशी फल देता है।” अतः जो धेनु दान करता है, वह हविष्यका ही दान करता है || ४७ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बैल स्वर्गका मूर्तिमान्‌ स्वरूप है। जो गौओंके पति--साँड़का गुणवान्‌ ब्राह्मणको दान करता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है || ४८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! ये गौएँ प्राणियों (को दूध पिलाकर पालनेके कारण उन) के प्राण कहलाती हैं; इसलिये जो दूध देनेवाली गौका दान करता है, वह मानो प्राण दान देता है ।। ४९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वेदवेत्ता विद्वान्‌ ऐसा मानते हैं कि “गौएँ समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाली हैं।&#39; इसलिये जो धेनु दान करता है, वह सबको शरण देनेवाला है || ५० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! जो मनुष्य वध करनेके लिये गौ माँग रहा हो, उसे कदापि गाय नहीं देनी चाहिये। इसी प्रकार कसाईको, नास्तिकको, गायसे ही जीविका चलानेवालेको, गोरस बेचनेवाले और पंचयज्ञ न करनेवालेको भी गाय नहीं देनी चाहिये || ५१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसे पापकर्मी मनुष्योंको जो गाय देता है, वह मनुष्य अक्षय नरकमें गिरता है, ऐसा महर्षियोंका कथन है ।। ५२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो दुबली हो, जिसका बछड़ा मर गया हो तथा जो ठाँठ, रोगिणी, किसी अंगसे हीन और थकी हुई (बूढ़ी) हो, ऐसी गौ ब्राह्मणको नहीं देनी चाहिये || ५३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दस हजार गोदान करनेवाला मनुष्य इन्द्रके साथ रहकर आनन्द भोगता है और जो लाख गौओंका दान कर देता है, उस मनुष्यको अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत! इस प्रकार गोदान, तिलदान और भूमिदानका महत्त्व बतलाया गया। अब पुनः अन्नदानकी महिमा सुनो ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! विद्वान्‌ पुरुष अन्नदानको सब दानोंमें प्रधान बताते हैं। अन्नदान करनेसे ही राजा रन्तिदेव स्वर्गलोकमें गये थे || ५६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! जो भूमिपाल थके-माँदे और भूखे मनुष्यको अन्न देता है, वह ब्रह्माजीके परमधाममें जाता है || ५७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतनन्दन! प्रभो! अन्नदान करनेवाले मनुष्य जिस तरह कल्याणके भागी होते हैं, वैसा कल्याण उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा अन्य वस्तुओंके दानसे नहीं प्राप्त होता है ।। ५८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अन्न प्रथम द्रव्य है। वह उत्तम लक्ष्मीका स्वरूप माना गया है। अन्नसे ही प्राण, तेज, वीर्य और बलकी पुष्टि होती है ।। ५९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पराशर मुनिका कथन है कि “जो मनुष्य सदा एकाग्रचित्त होकर याचकको तत्काल अन्नका दान करता है, उसपर कभी दुर्गम संकट नहीं पड़ता” ।। ६० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजन! मनुष्यको प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिसे देवताओंकी पूजा करके उन्हें अन्न निवेदन करना चाहिये। जो पुरुष जिस अन्नका भोजन करता है, उसके देवता भी वही अन्न ग्रहण करते हैं ।। ६१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें अन्नका दान करता है, वह दुर्गम संकटसे पार हो जाता है और मरकर अक्षय सुखका भागी होता है || ६२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ! जो पुरुष एकाग्रचित्त हो स्वयं भूखा रहकर अतिथिको अन्नदान करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओंके लोकोंमें जाता है ।। ६३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अन्नदाता मनुष्य कठिन-से-कठिन आपत्तिमें पड़नेपर भी उस आपत्तिसे पार हो जाता है। वह पापसे उद्धार पा जाता है और भविष्यमें होनेवाले दुष्कर्मोका भी नाश कर देता है ।। ६४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार मैंने यह अन्नदान, तिलदान, भूमिदान और गोदानका फल बताया है ।। ६५ ||&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ½ श्लोक मिलाकर कुल ६५½ “लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;सरसठवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) सरसठवें अध्याय के श्लोक 1-19&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“अन्न और जलके दानकी महिमा”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--तात! भरतनन्दन! आपने जो दानोंका फल बताया है, उसे मैंने सुन लिया। यहाँ अन्नदानकी विशेषरूपसे प्रशंसा की गयी है || १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितामह! अब जलदान करनेसे कैसे महान्‌ फलकी प्राप्ति होती है, इस विषयको मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--सत्यपराक्रमी भरतश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सब कुछ यथार्थ रूपसे बताऊँगा। तुम आज यहाँ मेरे मुँहसे इन सब बातोंको सुनो ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनघ! जलदानसे लेकर सब प्रकारके दानोंका फल मैं तुम्हें बताऊँगा। मनुष्य अन्न और जलका दान करके जिस फलको पाता है, वह सुनो ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तात! मेरे मनमें यह धारणा है कि अन्न और जलके दानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है; क्योंकि अन्नसे ही सब प्राणी उत्पन्न होते और जीवन धारण करते हैं ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये लोकमें तथा सम्पूर्ण मनुष्योंमें अन्नको ही सबसे उत्तम बताया गया है। अन्नसे ही सदा प्राणियोंके तेज और बलकी वृद्धि होती है; अतः प्रजापतिने अन्नके दानको ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है || ६१३ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! तुमने सावित्रीके शुभ वचनको भी सुना है। महामते देवताओंके यज्ञमें जिस हेतुसे और जिस प्रकार जो वचन सावित्रीने कहा था, वह इस प्रकार है-- || ७- ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जिस मनुष्यने यहाँ किसीको अन्न दिया है, उसने मानो प्राण दे दिये और प्राणदानसे बढ़कर इस संसारमें दूसरा कोई दान नहीं है।&#39; महाबाहो! इस विषयमें तुमने लोमशका भी वह वचन सुना ही है || ८-९ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रजानाथ! पूर्वकालमें राजा शिबिने कबूतरके लिये प्राणदान देकर जो उत्तम गति प्राप्त की थी, ब्राह्मणको अन्न देकर दाता उसी गतिको प्राप्त कर लेता है || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुश्रेष्ठ! अतः प्राणदान करनेवाले पुरुष श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होते हैं--ऐसा हमने सुना है। किंतु अन्न भी जलसे ही पैदा होता है। जलराशिसे उत्पन्न हुए धान्यके बिना कुछ भी नहीं हो सकता ।। ११ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महाराज! ग्रहोंके अधिपति भगवान्‌ सोम जलसे ही प्रकट हुए हैं। प्रजानाथ! अमृत, सुधा, स्वाहा, स्वधा, अन्न, ओषधि, तृण और लताएँ भी जलसे उत्पन्न हुई हैं, जिनसे समस्त प्राणियोंके प्राण प्रकट एवं पुष्ट होते हैं ।। १२-१३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओंका अन्न अमृत, नागोंका अन्न सुधा, पितरोंका अन्न स्वधा और पशुओंका अन्न तृण-लता आदि है ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मनीषी पुरुषोंने अन्नको ही मनुष्योंका प्राण बताया है। पुरुषसिंह! सब प्रकारका अन्न (खाद्य पदार्थ) जलसे ही उत्पन्न होता है; अत: जलदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान कहीं नहीं है । १५६ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसे प्रतेदिन जलदान करना चाहिये। जलदान इस जगत्‌में धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला बताया जाता है। कुन्तीनन्दन! जलदान करनेवाला पुरुष सदा अपने शत्रुओंसे भी ऊपर रहता है ।। १६-१७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह इस जगत्‌में सम्पूर्ण कामनाओं तथा अक्षय कीर्तिको प्राप्त करता है और सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। मृत्युके पश्चात्‌ वह अक्षय सुखका भागी होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महातेजस्वी पुरुषसिंह! जलदान करनेवाला पुरुष स्वर्गमें जाकर वहाँके अक्षय लोकोंपर अधिकार प्राप्त करता है--ऐसा मनुने कहा है ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें जलदानका माहात्म्यविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;अड़सठवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) अड़सठवें अध्याय के श्लोक 1-34&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य-धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! तिलोंके दानका कैसा फल होता है? दीप, अन्न और वस्त्रके दानकी महिमाका भी पुनः मुझसे वर्णन कीजिये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें ब्राह्मण और यमके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! मध्यदेशमें गंगा-यमुनाके मध्यभागमें यामुन पर्वतके निम्न स्थलमें ब्राह्मणोंका एक विशाल एवं रमणीय ग्राम था जो लोगोंमें पर्णशालानामसे विख्यात था। वहाँ बहुत-से विद्वान ब्राह्मण निवास करते थे ।। ३-४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन यमराजने काला वस्त्र धारण करनेवाले अपने एक दूतसे, जिसकी आँखें लाल, रोएँ ऊपरको उठे हुए और पैरोंकी पिण्डली, आँख एवं नाक कौएके समान थीं, कहा -- |। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तुम ब्राह्मणोंके उस ग्राममें चले जाओ और जाकर अगस्त्यगोत्री शर्मी नामक शमपरायण विद्वान्‌ अध्यापक ब्राह्मणको, जो आवरणरहित है, यहाँ ले आओ ।। ६३६&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उसी गाँवमें उसीके समान एक दूसरा ब्राह्मण भी रहता है। वह शर्मीके ही गोत्रका है। उसके अगल-बगलमें ही निवास करता है। गुण, वेदाध्ययन और कुलमें भी वह शर्मीके ही समान है। सन्तानोंकी संख्या तथा सदाचारके पालनमें भी वह बुद्धिमान्‌ शर्मीके ही तुल्य है। तुम उसे यहाँ न ले आना ।। ७-८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैंने जिसे बताया है, उसी ब्राह्मणको तुम यहाँ ले आओ; क्योंकि मुझे उसकी पूजा करनी है।” उस यमदूतने वहाँ जाकर यमराजकी आज्ञाके विपरीत कार्य किया || ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह आक्रमण करके उसी ब्राह्णको उठा लाया, जिसके लिये यमराजने मना कर दिया था। शक्तिशाली यमराजने उठकर उसके लाये हुए ब्राह्मणकी पूजा की और दूतसे कहा -- इसको तुम ले जाओ और दूसरेको यहाँ ले आओ&#39; ।। १०३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मराजके इस प्रकार आदेश देनेपर अध्ययनसे ऊबे हुए उस समागत ब्राह्मणने उनसे कहा--:&#39;धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले देव! मेरे जीवनका जो समय शेष रह गया है, उसमें मैं यहीं रहूँगा&#39; ।। ११-१२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यमराजने कहा--ब्रह्मन! मैं कालके विधानको किसी तरह नहीं जानता। जगत्‌में जो पुरुष धर्माचरण करता है, केवल उसीको मैं जानता हूँ ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले महातेजस्वी ब्राह्मण! तुम अभी अपने घरको चले जाओ और अपनी इच्छाके अनुसार सब कुछ बताओ मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ? ।। १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्राह्मणने कहा--साधुशिरोमणे! संसारमें जो कर्म करनेसे महान्‌ पुण्य होता हो वह मुझे बताइये; क्योंकि समस्त त्रिलोकीके लिये धर्मके विषयमें आप ही प्रमाण हैं ।। १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यमने कहा--ब्रह्मर्ष! तुम यथार्थरूपसे दानकी उत्तम विधि सुनो। तिलका दान सब दानोंमें उत्तम है। वह यहाँ अक्षय पुण्यजनक माना गया है ।। १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;द्विजश्रेष्ठ अपनी शक्तिके अनुसार तिलोंका दान अवश्य करना चाहिये। नित्यदान करनेसे तिल दाताकी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं || १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्राद्धमें विद्वान पुरुष तिलोंकी प्रशंसा करते हैं। यह तिलदान सबसे उत्तम दान है। अतः तुम शास्त्रीय विधिके अनुसार ब्राह्मणोंको तिलदान देते रहो ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैशाखकी पूर्णिमाको ब्राह्मणोंके लिये तिलदान दे, तिल खाये और सदा तिलोंका ही उबटन लगाये ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो सदा कल्याणकी इच्छा रखते हैं, उन्हें सब प्रकारसे अपने घरमें तिलॉका दान और उपयोग करना चाहिये। इसी प्रकार सर्वदा जलका दान और पान करना चाहिये--इसमें संशय नहीं है || २० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;द्विजश्रेष्ठ! मनुष्यको यहाँ पोखरी, तालाब और कुएँ खुदवाने चाहिये। यह इस संसारमें अत्यन्त दुर्लभ--पुण्य कार्य है ।। २१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विप्रवर! तुम्हें प्रतिदिन जलका दान करना चाहिये। जल देनेके लिये प्याऊ लगाने चाहिये। यह सर्वोत्तम पुण्य कार्य है। (भूखेको अन्न देना तो आवश्यक है ही,) जो भोजन कर चुका हो उसे भी अन्न देना चाहिये। विशेषतः जलका दान तो सभीके लिये आवश्यक है || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! यमराजके ऐसा कहनेपर उस समय ब्राह्मण जानेको उद्यत हुआ। यमदूतने उसे उसके घर पहुँचा दिया और उसने यमराजकी आज्ञाके अनुसार वह सब पुण्य कार्य किया और कराया ।। २३ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात्‌ यमदूत शर्मीको पकड़कर वहाँ ले गया और धर्मराजको इसकी सूचना दी ।। २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रतापी धर्मराजने उस धर्मज्ञ ब्राह्यणकी पूजा करके उससे बातचीत की और फिर वह जैसे आया था, उसी प्रकार उसे विदा कर दिया ।। २५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके लिये भी यमराजने सारा उपदेश किया। परलोकमें जाकर जब वह लौटा, तब उसने भी यमराजके बताये अनुसार सब कार्य किया || २६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितरोंके हितकी इच्छासे यमराज दीपदानकी प्रशंसा करते हैं; अतः प्रतिदिन दीपदान करनेवाला मनुष्य पितरोंका उद्धार कर देता है ।। २७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसलिये भरतश्रेष्ठ) देवता और पितरोंके उद्देश्य्से सदा दीपदान करते रहना चाहिये। प्रभो! इससे अपने नेत्रोंका तेज बढ़ता है || २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जनेश्वर! रत्नदानका भी बहुत बड़ा पुण्य बताया गया है। जो ब्राह्मण दानमें मिले हुए रत्नको बेचकर उसके द्वारा यज्ञ करता है, उसके लिये वह प्रतिग्रह भयदायक नहीं होता ।। २९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण किसी दातासे रत्नोंका दान लेकर स्वयं भी उसे ब्राह्मणोंको बाँट देता है तो उस दानके देने और लेनेवाले दोनोंको अक्षय पुण्य प्राप्त होता है ।। ३० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पुरुष स्वयं धर्ममर्यादामें स्थित होकर अपने ही समान स्थितिवाले ब्राह्मणको दानमें मिली हुई वस्तुका दान करता है, उन दोनोंको अक्षय धर्मकी प्राप्ति होती है। यह धर्मज्ञ मनुका वचन है ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखता हुआ वस्त्र दान करता है, वह सुन्दर वस्त्र और मनोहर वेष-भूषासे सम्पन्न होता है--ऐसा हमने सुन रखा है ।। ३२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पुरुषसिंह! मैंने गौ, सुवर्ण और तिलके दानका माहात्म्य अनेकों बार वेद-शास्त्रके प्रमाण दिखाकर वर्णन किया है ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुरुनन्दन! मनुष्य विवाह करे और पुत्र उत्पन्न करे। पुत्रका लाभ सब लाभोंसे बढ़कर है ।। ३४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें यम और ब्राह्मणका संवादविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;उनहत्तरवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) उनहत्तरवें अध्याय के श्लोक 1-25&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“गोदानकी महिमा तथा गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षासे पुण्यकी प्राप्ति”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने कहा--महाप्राज्ञ कुरुश्रेष्ठी आप दानकी उत्तम विधिका फिरसे वर्णन कीजिये। विशेषत: भूमिदानका महत्त्व बताइये ।। १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;केवल क्षत्रिय राजा ही यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणको पृथ्वीका दान कर सकता है और उसीसे ब्राह्मण विधि-पूर्वक भूमिका प्रतिग्रह ले सकता है। दूसरा कोई यह दान नहीं कर सकता ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दानके फलकी इच्छा रखनेवाले सभी वर्णोंके लोग जो दान कर सकें अथवा वेदमें जिस दानका वर्णन हो, उसकी मेरे समक्ष व्याख्या कीजिये ।। ३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! गाय, भूमि और सरस्वती--ये तीनों समान नामवाली हैं --इन तीनों वस्तुओंका दान करना चाहिये। इन तीनोंके दानका फल भी समान ही है। ये तीनों वस्तुएँ मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करनेवाली हैं ।। ४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो ब्राह्मण अपने शिष्यको धर्मानुकूल ब्राह्मी सरस्वती (वेदवाणी) का उपदेश करता है, वह भूमिदान और गोदानके समान फलका भागी होता है ।। ५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार गोदानकी भी प्रशंसा की गयी है। उससे बढ़कर कोई दान नहीं है। युधिष्ठिर! गोदानका फल निकट भविष्यमें मिलता है तथा वे गौएँ शीघ्र अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करती हैं ।। ६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौएँ सम्पूर्ण प्राणियोंकी माता कहलाती हैं। वे सबको सुख देनेवाली हैं। जो अपने अभ्युदयकी इच्छा रखता हो, उसे गौओंको सदा दाहिने करके चलना चाहिये ।। ७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गौओंको लात न मारे। उनके बीचसे होकर न निकले। वे मंगलकी आधारभूत देवियाँ हैं, अतः उनकी सदा ही पूजा करनी चाहिये ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओंने भी यज्ञके लिये भूमि जोतते समय बैलोंको डंडे आदिसे हाँका था। अतः पहले यज्ञके लिये ही बैलोंको जोतना या हाँकना श्रेयस्कर माना गया है। उससे भिन्न कर्मके लिये बैलोंको जोतना या डंडे आदिसे हाँकना निन्दनीय है ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि जब गौएँ स्वच्छन्दता-पूर्वक विचर रही हों अथवा किसी उपद्रवशून्य स्थानमें बैठी हों तो उन्हें उद्वेगमें न डाले। जब गौएँ प्याससे पीड़ित हो जलकी इच्छासे अपने स्वामीकी ओर देखती हैं (और वह उन्हें पानी नहीं पिलाता है), तब वे रोषपूर्ण दृष्टिसे बन्धु-बान्धवोंसहित उसका नाश कर देती हैं || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिनके गोबरसे लीपनेपर देवताओंके मन्दिर और पितरोंके श्राद्धस्थान पवित्र होते हैं, उनसे बढ़कर पावन और क्या हो सकता है? ।। ११ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो एक वर्षतक प्रतिदिन स्वयं भोजनके पहले दूसरेकी गायको एक मुट्ठी घास खिलाता है, उसका वह व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है ।। १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह अपने लिये पुत्र, यश, धन और सम्पत्ति प्राप्त करता है तथा अशुभ कर्म और दुःस्वप्रका नाश कर देता है ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! किन लक्षणोंवाली गौओंका दान करना चाहिये और किनका दान नहीं करना चाहिये? कैसे ब्राह्मणको गाय देनी चाहिये और कैसे ब्राह्मणको नहीं देनी चाहिये? || १४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजीने कहा--राजन! दुराचारी, पापी, लोभी, असत्यवादी तथा देवयज्ञ और श्राद्धकर्म न करनेवाले ब्राह्मणको किसी तरह गौ नहीं देनी चाहिये || १५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके बहुत-से पुत्र हों, जो श्रोत्रिय (वेदवेत्ता) और अन्निहोत्री ब्राह्मण हो और गौके लिये याचना कर रहा हो, ऐसे पुरुषको दस गौओंका दान करनेवाला दाता उत्तम लोकोंको पाता है || १६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो गोदान ग्रहण करके धर्माचरण करता है, उसके धर्मका जो कुछ भी फल होता है, उस सम्पूर्ण धर्मके एक अंशका भागी दाता भी होता है, क्योंकि उसीके लिये उसकी गोदानमें प्रवृत्ति हुई थी ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो जन्म देता है, जो भयसे बचाता है तथा जो जीविका देता है--ये तीनों ही पिताके तुल्य हैं ।। १८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुरुजनोंकी सेवा सारे पापोंका नाश कर देती है। अभिमान महान्‌ यशको नष्ट कर देता है। तीन पुत्र पुत्रहीनताके दोषका निवारण कर देते हैं और दूध देनेवाली दस गौएँ हों तो ये जीविकाके अभावको दूर कर देती हैं ।। १९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो वेदान्तनिष्ठ, बहुज्ञ, ज्ञानानन्दसे तृप्त, जितेन्द्रिय, शिष्ट, मनको वशमें रखनेवाला, यत्नशील, समस्त प्राणियोंके प्रति सदा प्रिय वचन बोलनेवाला, भूखके भयसे भी अनुचित कर्म न करनेवाला, मृदुल, शान्त, अतिथिप्रेमी, सबपर समानभाव रखनेवाला और स्त्री-पुत्र आदि कुटु॒म्बसे युक्त हो, उस ब्राह्मणकी जीविकाका अवश्य प्रबन्ध करना चाहिये || २०-२१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शुभ पात्रको गोदान करनेसे जो लाभ होते हैं, उसका धन ले लेनेपर उतना ही पाप लगता है; अतः किसी भी अवस्थामें ब्राह्मणोंक धनका अपहरण न करे तथा उनकी स्त्रियोंका संसर्ग दूरसे ही त्याग दे || २२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहाँ ब्राह्मणोंकी स्त्रियों अथवा उनके धनका अपहरण होता हो, वहाँ शक्ति रहते हुए जो उन सबकी रक्षा करते हैं, उन्हें नमस्कार है। जो उनकी रक्षा नहीं करते हैं, वे मुर्दोंके समान हैं। सूर्यपुत्र यमराज ऐसे लोगोंका वध कर डालते हैं, प्रतिदिन उन्हें यातना देते और डाँटते-फटकारते हैं और नरकसे उन्हें कभी छुटकारा नहीं देते हैं। इसी प्रकार गौओंके संरक्षण और पीड़नसे भी शुभ और अशुभकी प्राप्ति होती है। विशेषतः ब्राह्मणों और गौओंके अपने द्वारा सुरक्षित होनेपर पुण्य और मारे जानेपर पाप होता है ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानका माहात्म्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;i&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-large;&quot;&gt;सम्पूर्ण महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;अनुशासनपर्व (दान&lt;/b&gt;&lt;i style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;&lt;b&gt;धर्मपर्व&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;सत्तरवाँ अध्याय&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(सम्पूर्ण महाभारत (अनुशासनपर्व) सत्तरवें अध्याय के श्लोक 1-33&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;i style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;b&gt;का हिन्दी अनुवाद)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;“ब्राह्मगके धनका अपहरण करनेसे होनेवाली हानिके विषयमें दृष्टान्तके रूपमें राजा नृगका उपाख्यान”&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीष्मजी कहते हैं--कुरुश्रेष्ठ इस विषयमें श्रेष्ठ पुरुष वह प्रसंग सुनाया करते हैं, जिसके अनुसार एक ब्राह्मणके धनको ले लेनेके कारण राजा नृगको महान्‌ कष्ट उठाना पड़ा था || १ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पार्थ! हमारे सुननेमें आया है कि पूर्वकालमें जब द्वारकापुरी बस रही थी, उसी समय वहाँ घास और लताओंसे ढँका हुआ एक विशाल कूप दिखायी दिया ।। २ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ रहनेवाले यदुवंशी बालक उस कुएँका जल पीनेकी इच्छासे बड़े परिश्रमके साथ उस घास-फ़ूसको हटानेके लिये महान्‌ प्रयत्न करने लगे। इतनेहीमें उस कुएँके ढँके हुए जलनमें स्थित हुए एक विशालकाय गिरगिटपर उनकी दृष्टि पड़ी । ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर तो वे सहस्नों बालक उस गिरगिटको निकालनेका यत्न करने लगे। गिरगिटका शरीर एक पर्वतके समान था। बालकोंने उसे रस्सियों और चमड़ेकी पट्टियोंसे बाँधकर खींचनेके लिये बहुत जोर लगाया परंतु वह टस-से-मस न हुआ। जब बालक उसे निकालनेमें सफल न हो सके, तब वे भगवान्‌ श्रीकृष्णके पास गये ।। ४-५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने भगवान्‌ श्रीकृष्णसे निवेदन किया--“भगवन्‌! एक बहुत बड़ा गिरगिट कुएँमें पड़ा है, जो उस कुएँके सारे आकाशको घेरकर बैठा है; पर उसे निकालनेवाला कोई नहीं है।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण उस कुएँके पास गये। उन्होंने उस गिरगिटको कुएँसे बाहर निकाला और अपने पावन हाथके स्पर्शसे राजा नृगका उद्धार कर दिया। इसके बाद उनसे परिचय पूछा। तब राजाने उन्हें अपना परिचय देते हुए कहा--&#39;प्रभो! पूर्वजन्ममें मैं राजा नृग था, जिसने एक सहस्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया था” ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनकी ऐसी बात सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने पूछा--“राजन्‌! आपने तो सदा पुण्यकर्म ही किया था, पापकर्म कभी नहीं किया, फिर आप ऐसी दुर्गतिमें कैसे पड़ गये? बताइये, क्यों आपको यह ऐसा वष्ट प्राप्त हुआ? ।। ८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नरेश्वर! हमने सुना है कि पूर्वकालमें आपने ब्राह्मणोंको पहले एक लाख गौएँ दान कीं। दूसरी बार सौ गौओंका दान किया। तीसरी बार पुनः सौ गौएँ दानमें दीं। फिर चौथी बार आपने गोदानका ऐसा सिलसिला चलाया कि लगातार अस्सी लाख गौओंका दान कर दिया। (इस प्रकार आपके द्वारा इक्यासी लाख दो सौ गौएँ दानमें दी गयीं) आपके उन सब दानोंका पुण्यफल कहाँ चला गया?” ।। ९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब राजा नृगने भगवान्‌ श्रीकृष्णसे कहा--&#39;प्रभो! एक अग्निहोत्री ब्राह्मण परदेश चला गया था। उसके पास एक गाय थी, जो एक दिन अपने स्थानसे भागकर मेरी गौओंके झुंडमें आ मिली || १० ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“उस समय मेरे ग्वालोंने दानके लिये मँगायी गयी एक हजार गौओंमें उसकी भी गिनती करा दी और मैंने परलोकमें मनोवांछित फलकी इच्छासे वह गौ भी एक ब्राह्मणको दे दी | ११ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“कुछ दिनों बाद जब वह ब्राह्मण परदेशसे लौटा, तब अपनी गाय हढूँढ़ने लगा। ढूँढ़तेढूँढ़ते जब वह गाय उसे दूसरेके घर मिली, तब उस ब्राह्मणने, जिसकी वह गौ पहले थी, उस दूसरे ब्राह्मणसे कहा--“यह गाय तो मेरी है” || १२ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;फिर तो वे दोनों आपसमें लड़ पड़े और अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए मेरे पास आये। उनमेंसे एकने कहा--“महाराज! यह गौ आपने मुझे दानमें दी है (और यह ब्राह्मण इसे अपनी बता रहा है।)” दूसरेने कहा--“महाराज! वास्तवमें यह मेरी गाय है। आपने उसे चुरा लिया है” ।। १३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तब मैंने दान लेनेवाले ब्राह्मणसे प्रार्थनापूर्वक कहा--“मैं इस गायके बदले आपको दस हजार गौएँ देता हूँ (आप इन्हें इनकी गाय वापस दे दीजिये)। यह सुनकर वह यों बोला --“महाराज! यह गौ देश-कालके अनुरूप, पूरा दूध देनेवाली, सीधी-सादी और अत्यन्त दयालुस्वभावकी है। यह बहुत मीठा दूध देनेवाली है। धन्य भाग्य जो यह मेरे घर आयी। यह सदा मेरे ही यहाँ रहे || १४-१५ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“अपने दूधसे यह गौ मेरे मातृहीन शिशुका प्रतिदिन पालन करती है; अतः मैं इसे कदापि नहीं दे सकता।” यह कहकर वह उस गायको लेकर चला गया ।। १६&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तब मैंने उन दूसरे ब्राह्मगसे याचना की--&#39;भगवन्‌! उसके बदलेमें आप मुझसे एक लाख गौएँ ले लीजिये” ।। १७ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मधुसूदन! तब उस ब्राह्मणने कहा--“मैं राजाओंका दान नहीं लेता। मैं अपने लिये धनका उपार्जन करनेमें समर्थ हूँ। मुझे तो शीघ्र मेरी वही गौ ला दीजिये” ।। १८ ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“मैंने उसे सोना, चाँदी, रथ और घोड़े--सब कुछ देना चाहा; परंतु वह उत्तम ब्राह्मण कुछ न लेकर तत्काल चुपचाप चला गया ।। १९ ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“इसी बीचमें कालकी प्रेरणासे मैं मृत्युको प्राप्त हुआ और पितृलोकमें पहुँचकर धर्मराजसे मिला || २० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यमराजने मेरा आदर-सत्कार करके मुझसे यह बात कही--“राजन्‌! तुम्हारे पुण्यकर्मोकी तो गिनती ही नहीं है। परन्तु अनजानमें तुमसे एक पाप भी बन गया है। उस पापको तुम पीछे भोगो या पहले ही भोग लो, जैसी तुम्हारी इच्छा हो, करो || २१-२२&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“आपने प्रजाके धन-जनकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा की थी; किंतु उस ब्राह्मणकी गाय खो जानेके कारण आपकी वह प्रतिज्ञा झूठी हो गयी। दूसरी बात यह है कि आपने ब्राह्मणके धनका भूलसे अपहरण कर लिया था। इस तरह आपके द्वारा दो तरहका अपराध हो गया है” ।। २३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब मैंने धर्मराजसे कहा--प्रभो! मैं पहले पाप ही भोग लूँगा। उसके बाद पुण्यका उपभोग करूँगा। इतना कहना था कि मैं पृथ्वीपर गिरा | २४ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“गिरते समय उच्चस्वरसे बोलते हुए यमराजकी यह बात मेरे कानोंमें पड़ी--“महाराज! एक हजार दिव्य वर्ष पूर्ण होनेपर तुम्हारे पापकर्मका भोग समाप्त होगा। उस समय जनार्दन भगवान्‌ श्रीकृष्ण आकर तुम्हारा उद्धार करेंगे और तुम अपने पुण्यकर्मोके प्रभावसे प्राप्त हुए सनातन लोकोंमें जाओगे” || २५-२६ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुएँमें गिरनेपर मैंने देखा, मुझे तिर्यग्योनि (गिरगिटकी देह) मिली है और मेरा सिर नीचेकी ओर है। इस योनिमें भी मेरी पूर्वजन्मोंकी स्मरणशक्तिने मेरा साथ नहीं छोड़ा है | २७ |।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीकृष्णण आज आपने मेरा उद्धार कर दिया। इसमें आपके तपोबलके सिवा और क्या कारण हो सकता है। अब मुझे आज्ञा दीजिये, मैं स्वर्गलोकको जाऊँगा” ।। २८ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन्हें आज्ञा दे दी और वे शत्रुदमन नरेश उन्हें प्रणाम करके दिव्य मार्गका आश्रय ले स्वर्गलोकको चले गये ।। २९ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भरतश्रेष्ठ) कुरुनन्दन! राजा नृगके स्वर्गलोकको चले जानेपर वसुदेवनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने इस श्लोकका गान किया-- ।। ३० ||&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“समझदार मनुष्यको ब्राह्मणके धनका अपहरण नहीं करना चाहिये। चुराया हुआ ब्राह्मणका धन चोरका उसी प्रकार नाश कर देता है, जैसे ब्राह्मणकी गौने राजा नृगका सर्वनाश किया था” ।। ३१ ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुन्तीनन्दन! यदि सज्जन पुरुष सत्पुरुषोंका संग करें तो उनका वह संग व्यर्थ नहीं जाता। देखो, श्रेष्ठ पुछुषके समागमके कारण राजा नृगका नरकसे उद्धार हो गया ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;युधिष्ठि!! गौओंका दान करनेसे जैसा उत्तम फल मिलता है, वैसे ही गौओंसे द्रोह करनेपर बहुत बड़ा कुफल भोगना पड़ता है; इसलिये गौओंको कभी कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिये ।। ३३ ।।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें नृगका उपाख्यानविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='https://www.bhaktbhagwan.com/feeds/765938684283356991/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.bhaktbhagwan.com/2025/08/from-66-chapter-to-70-chapter-of-entire.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='https://www.blogger.com/feeds/61144145464550921/posts/default/765938684283356991'/><link rel='self' 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