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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2enclosuresfull.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" version="2.0"><channel><title>COAL CITY DHANBAD</title><link>http://coalcitydhanbad.blogspot.com/</link><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/rss+xml" href="http://feeds.feedburner.com/CoalCityDhanbad" /><description>Voice of Coal Capital of India</description><language>en</language><managingEditor>noreply@blogger.com (किशोर कुमार)</managingEditor><lastBuildDate>Sat, 31 Dec 2011 11:18:43 PST</lastBuildDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">8</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex 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isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3546609333563952579.post-7246489251253049254</guid><description>कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण का सबसे ज्यादा लाभ क्या हुआ? यदि इस सवाल का एक ही जबाव देना हो तो मैं तो यहीं कहूंगा कि बेइंतहा शोषण के शिकार कोयला मजदूरों को इससे मुक्ति मिल गई। अब वे बंधुआ मजदूर नहीं रह गए। इसके अलावा कोयला उद्योग में जो भी बदलाव आए, उन्हें राष्ट्रीयकरण से पहले विद्यमान परिस्थितियों का परिमार्जित रूप ही कहा जा सकता है। जैसे, भ्रष्ट्राचार पहले भी था, अब भी है। खान सुरक्षा से पहले भी खिलवाड़ किया जाता था, अब भी किया जाता है। आदि। फर्क इतना हुआ कि इनके रूप बदल गए हैं। &lt;br /&gt;बात पहले राष्ट्रीयकरण से पूर्व कोयला मजदूरों की स्थिति की। नई पीढ़ी के कम ही लोगों को यह मालूम होगा कि साठ के दशक तक ज्यादातर कोलियरियों के कोयला मजदूरों को सोमवार से शनिवार तक यानी छह दिनों तक लगातार खान के भीतर रह कर ही काम करना पड़ता था। तब खान के भीतक महिलाओं के काम करने पर पाबंदी नहीं थी। इसलिए महिलाओं को भी अपने बाल-बच्चों के साथ खान में ही रहकर काम करना पड़ता था। वे केवल रविवार को सूर्य के दर्शन कर पाते थे। &lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि सपरिवार जान हथेली पर रखकर काम करने के एवज में इन मजदूरों को अतिरिक्त लाभ होता था। यह तुगलकी फरमान इसलिए थी कि शोषण के चक्की में पिस रहे मजदूर कहीं अपने "देस" भाग न जाएं। इसलिए प्रत्येक रविवार को खान से बाहर निकले मजदूरों पर कड़ी निगरानी रखी जाती थी। मजदूर आज की तरह संगठित होते हुए भी शोषण के शिकार इसलिए थे कि उनके तथाकथित नेता खान मालिकों के हाथों बिके हुए थे। इसलिए चंद ईमानदार मजदूर नेताओं की आवाज सभी मजदूरों की आवाज नहीं बन पाती थी। इसका लाभ खान मालिकों को यह था कि प्रबंधन के खिलाफ आवाज उठाने वाले मजदूरों को खान के भीतर ही जुबान खोलने का खामियाजा भुगत लेना पड़ता था। यह खबर खान के बाहर तक इस रूप में आती थी कि फलां मजदूर दुर्धटना में मारा गया। लेकिन केस-मुकदमा इसलिए नहीं हो पाता था कि खानों के भीतर काम करने वाले मजदूरों के नाम और रजिस्टर में उल्लिखित मजदूरों के नाम अलग-अलग होते थे। यानी कि जिस मजदूर को दुर्घटना का शिकार बताया जाता था, कोलियरी के रजिस्टर में उसका नाम ही नहीं होता था।      &lt;br /&gt;जिन कोलियरियों के मजदूरों को खान के बाहर रहने की आजादी थी, उन्हें अलग-नामों से बनाए गए कैंपों में रखा जाता था। जैसे गोरखपुरिया कैंप। इस कैंप में गोरखपुर के मजदूरों को रखा जाता था। इन कैंपों में रहना और जीते जी नरक भोगना दोनों बराबर था। कैंपों के प्रभारी आमतौर पर रक्तपिपासु पहलवान होते थे। नतीजतन मजदूरों की थोड़ी सी गलती उनकी मौत का कारण बन जाती थी। उन दिनों सूदखोरी और शराबखोरी भी चरम पर थी। कोयला उद्योग में पांव जमाए बैठे माफिया गिरोह भोले-भाले  कोयला मजदूरों को गुमराह करके उनमें शराब की लत लगाते थे। फिर इस नए शौक को पूरा करने के लिए सूद पर धन उपलब्ध कराते थे। और यहीं से कोयला मजदूरों के अंतहीन शोषण का सिलसिला शुरू हो जाता था।  (जारी)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3546609333563952579-7246489251253049254?l=coalcitydhanbad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-12T23:14:33.323+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>सतीशचंद्र को परेशान करने की वजह कहीं यही तो नहीं!</title><link>http://coalcitydhanbad.blogspot.com/2008/10/blog-post_16.html</link><author>noreply@blogger.com (किशोर कुमार)</author><pubDate>Thu, 16 Oct 2008 02:50:10 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3546609333563952579.post-4639622032441767212</guid><description>&lt;strong&gt;झारखंड सरकार के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय द्वारा धनबाद के वयोवृद्ध पत्रकार श्री सतीशचंद्र को परेशान किए जाने संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद बड़ी संख्या में पाठकों ने मेल भेजकर जहां इस प्रयास की सराहना की है, वहीं आग्रह भी किया कि इस बात को भी सामने लाया जाना चाहिए कि धनबाद के वयोवृद्ध पत्रकार श्री सतीशचंद्र द्वारा सन् 2002 में लिखे गए उपन्यास की पृष्ठभूमि क्या है औऱ उस उपन्यास कौन-कौन से प्रसंग हैं, जिनसे झारखंड सरकार को संचालित करने वाले नेता और नौकरशाह नाराज हो सकते हैं।  पाठकों की मांग को ध्यान में रखकर मैं उपन्यास लिखने की पृष्ठभूमि और उस उपन्यास के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूं। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;धनबाद के वयोवृद्ध पत्रकार श्री सतीशचंद्र ने सन् 2002 में अपना देश नामक  उपन्यास लिखा था।  उसकी पृष्ठभूमि देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हालात है। श्री सतीशचंद्र ने आजादी की लड़ाइयों को नजदीक से देखा है तो देश के कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण से पूर्व कोयला मजदूरों को जीते जी नरक भोगते भी देखा। यही वजह है कि संवेदनशील पत्रकार सतीश बाबू ने  पत्रकारीय धर्म का निर्वहन करते हुए सामाजिक सरोकारों के लिए सड़क पर उतरने का भी काम किया।   &lt;br /&gt;इस बुजर्ग पत्रकार को यह बात काफी कचोटती थी कि स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम महासंग्राम में भाग लेने वाली उनकी पीढ़ी के लोगों ने जो सपने देखे थे, वे धूमिल होते जा रहे हैं। सतीश बाबू कहते हैं - "हमारा देश 1947 मे आजाद हुआ था और उसके एक साल बाद चीन सामंतवाद के चंगुल से मुक्त हुआ था। चीन के मामले में भारत वर्षों बड़े भाई की भूमिका निभाता रहा। जवाहरलाल नेहरू ने 1957 में चीन को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिलाने के लिए भारत के दावे को दरकिनार कर दिया था। इस तरह चीन अंतर्राष्ट्रीय मंच पर आसीन हो पाया था। भारत मे जब कारें बन रही थी और लोग उस पर चलने लगे थे तो उस दौरान चीन के नेता साइकिल पर चलते थे। &lt;br /&gt;बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक तक भारत हर क्षेत्र में चीन से आगे था। लेकिन आठवें दशक से तस्वीरें इस तरह बदलती गईं कि चीन ने भारत को काफी पीछे छोड़ दिया है। यदि समाचार पत्रों की मानें तो आज चीन में कोई भूखे पेट सोने को मजबूर नहीं है, जबकि भारत में अभी भी कम से कम पच्चीस फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे जीने को विवश हैं। ऐसा क्यों हुआ?" इन्हीं सवालों पर चिंतन-मनन करते हुए श्री सतीशचंद्र ने अपने आसपास जो देखा-सुना, उन्हें काल्पनिक पात्रों के जरिए रेखांकित करने की कोशिश की है। &lt;br /&gt;इस उपन्यास के मुख्यरूप से दो पात्र हैं-माधव और भारती। माधव काफी संघर्ष करके पढ़-लिखकर आईएएस बने व्यक्ति है, जो यहां की राजनीति से त्रस्त होकर लंदन चला जाता है औऱ वहीं नौकरी करता है। भारती भारतीय मूल की महिला है, जिसके माता-पिता भारत में आपातकाल के दौरान सरकारी दमन से त्रस्त होकर लंदन चले गए थे और भारती का जन्म विदेश जाने के रास्ते में ही हुआ था। लंदन में ही माधव औऱ भारती की शादी हुई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने पिता की बीमारी की खबर सुनकर माधव भारती के साथ भारत आते हैं और उसके बाद उन्हें किन-किन परिस्थियों का सामना करना पड़ता है औऱ विदेश जाने के पूर्व आईएएस अधिकारी के रूप में किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है, उन्हीं बातों के जरिए बताने की कोशिश की गई है कि भारत चीन से पीछे कैसे हो गया। &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;रिपोर्ताज शैली में लिखे गए इस उपन्यास मे कुल पंद्रह अध्याय हैं - बंगाल बंद-बिहार जाम, बिहार बनेगा गोबरिस्तान, आईएएस मान-मर्दन, चना-चबेना गंगाजल, नेताजी ही नेताजी, अंधा बांटे रेवड़ी, शासन बदला - समाज नहीं बदला, लंका के राक्षस हैं माफिया, दक्षिण का बदलता स्वरूप, पेंशन का सच, बदलता राजनीतिक परिवेश, दिल्ली के दलाल, गरीबी नहीं भ्रष्टाचार है, महाकुंभ और अपना देश।    &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;यहां प्रस्तुत उपन्यास के कुछ रोचक अंशों से उपन्यास के बारे में समझने में मदद मिलेगी और साथ ही लगेगा भी कि झारखंड की राजग से लेकर यूपीए तक की सरकारें इस बुजुर्ग पत्रकार से इसलिए नाराज हो सकती है।  &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;"माधव आईएएस अधिकारी था और राज्य में चुनाव के बाद नई सरकार के एक दबंग मंत्री का सचिव  नियुक्त हो गया था। उसने अपने मंत्री के लिए किसी मामले में एक नोट तैयार किया और उससे संबंधित फाइल मंत्री जी को देते हुए कहा - "सर, नोट है, दस्तखत कर दीजिएगा।" नोट की बात सुनते ही मंत्री जी की बांछे खिल गई। ठीक ही लोग कहते हैं कि मंत्री के यहां नोटों की वर्षा होती है। मंत्री जी ने झट से दरवाजा बंद किया और पूरी फाइल उलट-पुलट गए। फिर माधव के मुंह पर फाइल फेंकते हुए कहा - हमीं को ठगते हो। हम बड़े-बड़ों का ......फाड़ चुके हैं औऱ तुम तो कलमघिस्सु किरानी हो। कहां है नोट? नोट अपनी गाड़ी में रखकर कागज हमारे सामने रख दिया। हमको इतना बुड़बक समझते हो?"  ( राजग के शासनकाल में झारखंड के एक मंत्री के बारे में लोग इसी तरह की बात करके चुटकियां लेते थें।)  हालांकि लेखक ने अपने उपन्यास में इस प्रसंग के साथ एक बात जोड़ी कि इस घटना से माधव इतना मर्माहत हुआ कि नौकरी से इस्तीफा दे दिया। {वास्तविक जीवन में इस तरह मर्माहत होकर इस्तीफा देने वाले गिने-चुने ही होते हैं। मुझे याद नहीं है कि झारखंड में ऐसी कोई घटना घटी।) &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;"आईएएस से नाता तोड़ने के बाद लंदन बस गए माधव अपने पिता की बीमारी की खबर सुनकर भारती के साथ लंदन से कलकत्ता एयरपोर्ट तो पहुंच गया। लेकिन बंगाल बंद के कारण सड़क या रेल मार्ग से बिहार के अपने गांव तक जाना लगभग नामुमकिन था। सीपीएम ने बंद करवाया था। इसलिए बंद पूर्ण रूप से सफल था। बावजूद इसके एक एंबुलेंस वाले ने माधव और भारती को बिहार तक पहुंचा दिया। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि वह खुद भी सीपीएम का कार्यकर्त्ता था और बंद कराने उतरे युवाओं से उसकी सेटिंग थी। ड्राइवर मुट्ठी गर्म करता गया और आसानी से रास्ता पार करता गया। बिहार में सड़क जाम के दौरान यही नुस्खा काम आया। रास्ते में यह सब देखकर माधव के चेहरे पर उभरे आश्चर्य के भाव को पढ़ते हुए ड्राईवर ने अपनी चतुराई का बखान करते हुए कहा - "सब सेट किया हुआ है। देखिएगा, ये लोग कहीं रोक-टोक नहीं करेंगे।" ( राजग के बाद गठित राज्य की यूपीए सरकार को भला यह कैसे गंवारा होता, वह भी तब जबकि उस समय सीपीआई यूपीए का घटक दल थी ?) &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;"माधव अपने पिता के निधन के बाद पूरी संपत्ति ट्रस्ट  के नाम करके एक मंदिर बनवाना चहता था। ऐसा वह अपने पिता की सहयोगी चंपा के कहने पर करना चाहता था। लेकिन भारती मंदिर का नाम सुनते ही भड़क गई। कहने लगी -  " लंदन के अखबारों  में पढ़ती रही हूं  कि भारत में सबसे ज्यादा दंगा-फसाद मंदिर-मस्जिद के नाम पर ही होता है। देश को मंदिर से ज्यादा शिक्षा की जरूरत है औऱ ट्रस्ट के द्वारा स्कूल ही खोला जाना चाहिए।" ( जरा सोचिए, राजग सरकार इन बातों को भला कैसे पचा पाती) &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;झारखँड में विकास के नाम पर लूट, रिश्वतखोरी, राजनीतिज्ञों की स्वार्थपरता औऱ बेलगाम नौकरशाही की बात अब आम है। उपन्यास में झाऱखंड का नाम नहीं है, लेकिन जगह-जगह जो वर्णन हैं, वे झारखंड घटित घटनाओं से मेल खाते हैं। मसलन,   &lt;br /&gt;"माधव ट्रस्ट की रजिस्ट्री के लिए रजिस्टार के कार्यालय में गया तो उसे इस बात का अहसास हुआ कि उदारीकरण का असर दिल्ली के सरकारी कार्यालयों मे भले ही हो, जिला और प्रखंड स्तर के कार्यालयों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, बल्कि घूस का रेट ज्यादा हो गया है। जरूरतमंदों को अधिक परेशान करने की मानसिकता बढ़ गई है। ताकि लोग मुंहमांगी रिश्वत दे दें।  माधव का आईएएस वाला रौब सिर चढ़कर बोलने लगा।  वह उस दफ्तर के बड़े अधिकारी से शिकायत करना चाहता था। लेकिन बड़े अधिकारी तो बड़े अधिकारी ठहरे। वह बिना छुट्टी लिए और बिना किसी दफ्तरी कार्य के आफिस से बाहर थे। पूछने पर उनके कलर्क ने कहा - "साहब हैं, जब मर्जी होगी, दफ्तर आ जाएंगे।" &lt;br /&gt;एक अन्य प्रसंग में एक व्यक्ति अधिकारी से वार्तालाप के दौरान कह रहा है- " सरकार के दो स्तंभों में तो घुन लग गया। विधायिका पर दलालों और अपराधियों का कब्जा है, कार्यपालिका भी इससे अछूता नहीं। अपनी छाती पर हाथ रखकर बोलिए, आप में अब कितने रीढ़ वाले रह गए हैं? वैसे हमारी जानकारी के अनुसार ज्यादा अफसरों ने अपनी रीढ़ नीलाम कर बंगले बनवा लिए हैं, फार्म हाऊस बनवा लिए हैं, देश और विदेश के बैंकों में बेनामी खातों में करोड़ों-करोड़ रूपए जमा कर रखे हैं। जाहिल, चपाट नेताओं और राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय दलालों ने उनकी रीढ़ें ढ़ीली कर दी है।" &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;"माधव भारती के साथ पटना चले गए। पिता जी के मित्र नेताजी राज्य की कमान संभाले हुए थे। माधव ने सोचा था कि एक बार उनसे भी मिल लिया जाए। पटना में मुलाकात हो भी गई। नेताजी ने भारती से पूछ दिया, पटना कैसा लगा? भारती ने छूटते ही कहा- "मच्छरों ने परेशान कर दिया है। होटल वाले से शिकायत की तो कहा कि चारो ओर खटाल ही खटाल है। कितना मच्छर भगाएं? "    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेताजी झट बोल पड़े - देखिए, सबकी खोपड़ी उलट गई है। आप ही नहीं, दूसरे सफेदपोश लोग भी शिकायत करते हैं कि पटने मे खटाल बहुत हैं। अदालत ने भी कहा, खटाल शहर से बाहर करो। यह सरकार की उपलब्धियों को कम करके आंकने के समान है, जबकि खटालों की बढ़ती संख्या बिहार की समृद्धि का परिचायक है। दूध-दही कौन खाता है, अमीर ही ना? अब बिहार में अमीरी बढ़ रही है तो खटाल कैसे कम होंगे, बताइए?   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रही बात मच्छरों की तो इन मच्छरों के कारण ही तो बिहारी जवान घर छोड़कर पंजाब भागते हैं, दिल्ली भागते हैं और वहां से हर महीने हजार-हजार रूपए मनिआर्डर भेजते हैं, जिसके बल पर गंवई बाजार में लोग अंगूर खाते हैं। पहले बिहारी लोगों को घरघूसन कहा जाता था। जब से राज्य में मच्छर बढ़ा है, उसके डर से बिहारी लड़के बाहर भागने लगे हैं।" नेता जी ने आगे जोड़ा - "आपको मालूम है कि अपने गांधी जी भी अपनी कुटिया में बकरी रखते थे। अरे, जानवर के बिना भला आदमी कहीं आदमी बना रह सकता है?" भारती ने हार मान ली। कहा - गजब का आदमी है, बात में इससे पार नहीं पाया जा सकता।" ( इस वार्तालाप से सब कुछ स्पष्ट है। झारखंड में अठारह महीने एक ऐसी सरकार रही, जिसके बारे में कहा जाता है कि बिहार रूट से दिल्ली गए नेता संचालित करते रहे। यदि इस बात में सच्चाई हो तो झारखंड की उस सरकार की नाराजगी समझी जा सकती है।)     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपन्यास में इस तरह के पच्चास से ज्यादा प्रसंग हैं।   &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;यहां उल्लेखनीय है कि झारखंड सरकार के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने पत्र लिखकर पत्रकार श्री सतीशचंद्र के उपन्यास अपना देश की पांच सौ प्रतियां राज्य के राज्य पुस्तकालयों के माध्यम से खरीदी थी। लेकिन कुल 63 हजार रूपए के बिल का भुगतान चार साल बाद भी नहीं किया गया है। लगातार बीमार चल रहे इस बुजुर्ग पत्रकार ने बिल के भुगतान के लिए कितनी कोशिशें की, पर सब बेकार गया। अशर्फी की लूट, कोयले पे छापा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है झारखंड में।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3546609333563952579-4639622032441767212?l=coalcitydhanbad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-10-16T15:20:10.686+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>वयोवृद्ध पत्रकार सतीशचंद्र ने मुख्यमंत्री गुहार लगाई</title><link>http://coalcitydhanbad.blogspot.com/2008/10/63-794-13-2004-16-63-85.html</link><author>noreply@blogger.com (किशोर कुमार)</author><pubDate>Tue, 14 Oct 2008 01:32:09 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3546609333563952579.post-8818990380431365609</guid><description>वयोवृद्ध पत्रकार श्री सतीशचंद्र ने झारखंड के मुख्यमंत्री श्री शिबू सोरेन पत्र लिखा है। उन्हें जीवन में पहली बार निहायत ही व्यक्तिगत काम से किसी राजनेता को पत्र लिखना पड़ा है। विगत चार वर्षों से अपने उपन्यास के बिल का भुगतान नहीं मिलने से परेशान सतीश बाबू ने थक-हारकर यह कदम उठाया है। वे कहते हैं- शारीरिक रूप से कमजोर हो जाने के कारण ऐसी स्थिति नहीं रही कि भाग-दौड़ की जा सके। वैसे भी पिछले चार सालों में अनवरत भाग-दौड़ का कोई लाभ नहीं मिला। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस झारखंड राज्य के गठन की लड़ाई में मेरी भी भूमिका रही और झारखंड के नेताओं को मैंने इतना प्रमोट किया, उसी राज्य में मुझे इस तरह सरकार की बेरूखी झेलनी होगी। &lt;br /&gt;यहां उल्लेखनीय है कि झारखंड सरकार के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने पत्र लिखकर पत्रकार श्री सतीशचंद्र के उपन्यास &lt;strong&gt;अपना देश &lt;/strong&gt;की पांच सौ प्रतियां राज्य के राज्य पुस्तकालयों के माध्यम से खरीदी थी। लेकिन कुल 63 हजार रूपए के बिल का भुगतान चार साल बाद भी नहीं किया गया है। लगातार बीमार चल रहे इस बुजुर्ग पत्रकार ने बिल के भुगतान के लिए कितनी कोशिशें की, पर सब बेकार गया। अशर्फी की लूट, कोयले पे छापा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है झारखंड में। &lt;br /&gt;श्री सतीशचंद्र ने मुख्यमंत्री को जो पत्र भेजा है, उसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सेवा में,&lt;br /&gt;श्री शिबू सोरेन&lt;br /&gt;माननीय मुख्यमंत्री&lt;br /&gt;झारखंड सरकार&lt;br /&gt;रांची। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विषय: शिक्षा विभाग मेरे उपन्यास से संबंधित बिल का भुगतान नहीं कर रहा है। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;महोदय,&lt;br /&gt;झारखंड के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने अपने पत्रांक 794,  दिनांक 13 दिसंबर 2004 के तहत मेरे द्वारा लिखित औऱ प्रकाशित उपन्यास "अपना देश" की पांच सौ प्रतियों को राज्य के 16 पुस्तकालयों में आपूर्ति करने का आदेश दिया था। उस पत्र में कहा गया था कि उपन्यास की आपूर्त्ति करने के बाद प्राप्ति रसीदों के साथ बिल माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में जमा करवा दें। ताकि बिल का त्वरित भुगतान किया जा सके। &lt;br /&gt;मैंने ऐसा ही किया। कुल 63 हजार रूपए का बिल प्राप्ति रसीदों के साथ जमा करवा दिया। लंबे समय बाद जब बिल का भुगतान नहीं हुआ तो मामले की तहकीकात करवाई। पता चला कि फाइल में प्राप्ति रसीदें नहीं हैं। कायदे से इस बात के लिए संबंधित अधिकारी को जिम्मवार ठहराते हुए उनसे इस मामले में तलब किया जाना चाहिए था। परन्तु ऐसा नहीं करके मुझे आदेश दिया गया कि पुस्तकालयों से फिर से प्राप्ति रसीदें हासिल करके उन्हें नए बिल के साथ जमा करा दें। चेक या ड़्राफ्ट तो पहले से बना हुआ है, उसका भुगतान कर दिया जाएगा। &lt;br /&gt;जब यह आदेश दिया गया था उस वक्त संभवत: श्री अविनाश कुमार निदेशक थे। दोबारा प्राप्ति रसीदें हासिल करने का अनुभव बड़ा ही कड़वा रहा। फिर भी जितना बन पड़ा प्राप्ति रसीदों के साथ नया बिल माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में जमा करवा दिया। बावजूद इसके बिल का भुगतान नहीं किया जा रहा है। &lt;br /&gt;श्री अविनाथ कुमार के बाद जब मणिकांत आजाद माध्यमिक शिक्षा निदेशक थे तो वह व्यक्तिगत रूप से रूचि लेकर बिल का भुगतान करवाना चाहते थे। उन्होंने मेरे मामले को लेकर मातहत अधिकारियों को काफी फटकार भी लगाई थी। लेकिन उनका वहां से तबादला हो गया और मेरा मामला जहां का तहां लंबित रह गया।&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले उस बिल के बारे में जानकारी चाही तो किसी कर्मचारी ने बताया कि फाइल में प्राप्ति रसीदें हैं ही नहीं, फिर बिल का भुगतान कैसे होगा? मुझे पता नहीं कि इस बात में कितनी सच्चाई है।  &lt;br /&gt;मैं 85 वर्ष का रोगग्रस्त पत्रकार हूं। शरीर साथ नहीं दे रहा है औऱ बिल के लिए अब भाग-दौड़ करने की स्थिति नहीं है। &lt;br /&gt;आपसे आग्रह है कि इस मामले में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करके  मेरे बिल का भुगतान करवा दीजिए। मुझ बहुत सहारा मिल जाएगा। इस कृपा के लिए मैं आपका आभारी रहूंगा। &lt;br /&gt;                                        सधन्यवाद। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;विश्वासभाजन,&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सतीशचंद्र&lt;br /&gt;पत्रकार तथा साहित्यकार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3546609333563952579-8818990380431365609?l=coalcitydhanbad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-10-14T14:02:09.105+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भ्रष्टाचार में डूबी झारखंड सरकार और बुजुर्ग पत्रकार सतीशचंद्र की पीड़ा</title><link>http://coalcitydhanbad.blogspot.com/2008/10/blog-post_10.html</link><category>Social Worker</category><category>Corruption</category><category>Dhanbad</category><category>Jharkhand</category><category>Book</category><category>Journalist</category><author>noreply@blogger.com (किशोर कुमार)</author><pubDate>Fri, 10 Oct 2008 07:47:56 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3546609333563952579.post-2842085113387732815</guid><description>&lt;strong&gt;किशोर कुमार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घोर अव्यवस्था की शिकार और भ्रष्टाचार में आकंड डूबी रही झाऱखंड सरकार ने राज्य के वयोवृद्ध पत्रकार श्री सतीशचंद्र को भी नहीं बख्शा। सत्ता में चाहे राजग की सरकार रही हो या यूपीए की, किसी ने बीते  चार वर्षों में इस बुजुर्ग पत्रकार को राहत नहीं दिलाई। इसके उलट उन्हें तरह-तरह से परेशान करने का ही काम किया गया।&lt;br /&gt;पत्रकारीय धर्म का निर्वहन करते हुए व्यवस्था के खिलाफ कोई पचास दशकों तक अपनी आवाज मुखर करने वाले सतीशचंद्र इस सड़ी-गली व्यवस्था के शिकार तब बने, जब सन् 2004 में झारखंड सरकार के माध्यमिक शिक्षा निदेशालय के आग्रह पर राज्य सरकार के पुस्तकालयों में अपनी चर्चित पुस्तक अपना देश की पांच सौ प्रतियों की  आपूर्त्ति कर दी। माध्यमिक शिक्षा निदेशालय के संबंधित अधिकारी ने श्री सतीशचंद्र को लिखे अपने पत्र में कहा था कि वे पत्र में उल्लिखित राज्य पुस्तकालयों को बताई गई संख्या के मुताबिक अपनी पुस्तकों की आपूर्त्ति सीधे तौर पर कर दें और बिल निदेशालय को भेज दें। &lt;br /&gt;श्री सतीशचंद्र ने ऐसा ही किया। उन्होंने कूरियर के माध्यम से अपनी पुस्तकें पुस्तकालयों को भेज दी और पावती रशीद के साथ बिल निदेशालय में जमा करवा दिया। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी जब बिल का भुगतान नहीं हुआ तो उन्होंने इसकी चर्चा इस लेखक से की। इसके बाद से अनेक पत्रकार इस मामले में रांची स्थित माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में गए। घंटों खड़े रहने पर भी सिर ऊपर की ओर नहीं उठाने वाले कलर्कों और अधिकारियों को झेला। कम से कम चार बार कहा गया कि बाद में आइएगा। अभी फुर्सत नहीं है। चौदह महीने बीत जाने पर बड़ी आरजू मिन्नतों के बाद एक अधिकारी का दिल पसीजा तो उन्होंने इतना भर बताया कि चेक तो बन गया था, लेकिन फाइल में पुस्तकालयों की पावती रसीदें नहीं होने के कारण चेक को डिस्पैच करना संभव नहीं हो सका है। &lt;br /&gt;अनेक राज्य सरकारों से लेकर भारत सरकार तक के विभागों में प्रावधान यह है कि लेखकों से पुस्तकों में केंद्रीयकृत खरीददारी करके विभागीय स्तर पर उन्हें संबंधित पुस्तकालयों मे भेजा जाता है। लेकिन झारखंड सरकार ने एक अतिरिक्त काम से बचने के लिए नयाब तरीका निकाल रखा है। खैर, श्री सतीशचंद्र के शिष्य पत्रकारों ने चिलचिलाती धूप में पलामू से चतरा तक धूल फांकते हुए पुस्तकालयों से फिर से पावती रसीदें हासिल की। हालांकि यह काम काफी टेढ़ा था। जिस किसी पुस्तकालय से दोबारा पावती रसीद की मांग की गई, पुस्तकालयाध्यक्षों ने यह कहते हुए डुप्लीकेट पावती रसीद जारी करने में आनाकानी की कि यह उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है। डीसी साहब आदेश देंगे तभी वे डुप्लीकेट रसीद दे पाएंगे। काफी मान-मनौव्वल करने पर ही  डुप्लीकेट रसीदें हासिल करना संभव हो सका था। &lt;br /&gt;उन सभी पावती रसीदों को श्री सतीशचंद्र के पत्र के साथ माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में जमा करवा दिया गया। संबंधित अधिकारियों ने कहा कि अब जल्दी ही बिल का भुगतान कर दिया जाएगा। लेकिन वह घड़ी आज तक नहीं आई है।  तीन महीने पहले जब उक्त बिल की खोजबीन फिर से की गई तो एक अधिकारी ने वही पुराना रोना रो दिया कि फाइल में पावती रसीदें तो हैं ही नहीं। बिल का भुगतान कैसे होगा? अब समस्या यह है कि तीसरी बार पावती रसीदें कैसे हासिल की जाए। दो बार में ही तो सारा तेल निकल चुका है।  &lt;br /&gt;यह एक बात बताना लाजिमी होगा कि पिछले चार सालों में मात्र एक ही अधिकारी माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में संवेदनशील दिखा, जिसने अपने मातहत अधिकारियों को लिखित निर्देश दिया कि वे बिल का भुगतान अविलंब करें। उस अधिकारी का नाम है मणिकांत आजाद। इस भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ने मिलने गए पत्रकारों से कहा कि वह खुद भी साहित्यकार हैं और एक ईमानदार पत्रकार और साहित्यकार के दर्द को समझ सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि वह इस पूरे घटनाक्रम से काफी दुखी हैं। मुझे लगता है कि श्री आजाद अपने पद पर कुछ दिन और बने रह गए होते तो शायद बिल का भुगतान हो जाता। लेकिन दुर्भाग्य से उनका जल्दी ही तबादला हो गया और उनके मातहत अधिकारियों ने फिर से फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया। &lt;br /&gt;झारखंड मे करोड़ों का वारा-न्यारा आम बात है। लेकिन एक मेहनतकश पत्रकार को महज 63 हजार रूपए के भुगतान बड़े कानूनी पेंच हैं।  पच्चासी वर्षीय इस पत्रकार को ऐसे समय में झारखंड सरकार की लालफीताशाही का शिकार होना पड़ रहा है, जब वह शारीरिक रूप से अस्वस्थ हैं। पत्रकारीय धर्म का निर्वहन करते हुए साहित्य सर्जना और उत्तरी छोटानागपुर के विकास के लिए अनवरत लंबी लड़ाइयां लड़ने वाले सतीश बाबू उम्र के इस पड़ाव पर थक गए हैं। इस बीच उनके साथ दो-दो घटनाएं हुईं हैं। वह एक बार गंभीर रूप से बीमार हुए और काफी टूट गए। दूसरी बार घर में गिर पड़े थे, जिससे उन्हें काफी चोटें आई थीं। परिणाम यह हुआ कि 85 साल की उम्र में भी सक्रिय रहने वाले सतीश बाबू के लिए पिछले कुछ दिनों से घर से बाहर नहीं निकलने की मजबूरी हो गई है। &lt;br /&gt;लंबे समय तक संवेदनहीन राजनीतिज्ञों के हाथों में सत्ता की बागडोर होने के कारण अफसरशाही भी कितनी असंवेदनशील हो गई है, इसका जीता-जागता उदाहरण माध्यमिक शिक्षा निदेशालय में देखने को मिला। एक अधिकारी ने मुस्कुराते हुए यह कहने की हिम्मत की कि व्यवस्था के विरूद्ध लिखकर सहयोग की अपेक्षा करना बड़ी भूल है। प्रतिरोध करने पर वहां उपस्थित बाकी अधिकारी करने लगे कि ये बाहरी आदमी हैं। इनकी बातों से उन्हें लेना-देना नहीं। सवाल है कि वह बाहरी आदमी था तो निदेशालय में किस लिए था और उसे पुस्तक के कंटेंट के बारे में कैसे जानकारी थी? &lt;br /&gt;इस बात की तह मे जाए बिना इतना तो कहा ही जा सकता है कि सरकार में बैठे लोग अपना देश पुस्तक के कंटेंट को नहीं पचा पाए और नीचे के मुलाजिम आदतन रिश्वत के चक्कर में फाइलों से रिकार्ड गायब कर-करके बुजुर्ग पत्रकार को परेशान करते रहे हैं। वैसे तो इस  पुस्तक में देश की व्यवस्था पर सवाल उठाया गया है। लेकिन पुस्तक का कंटेंट ऐसा है कि झारखंड के भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को भी उसमें अपना चेहरा नजर आता है। &lt;br /&gt;श्री सतीश चंद्र ने 1947 मे झारखंड की धरती पर कदम रखा था। तब से वह लगातार देश औऱ प्रदेश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे। उन्होंने इंडियन नेशन और आर्यावर्त अखबारों में नौकरी की और धनबाद में आवाज नामक साप्ताहिक अखबार निकाल रहे श्री ब्रह्मदेव सिंह शर्मा के साथ मिलकर उसे दैनिक अखबार का स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने सन् 1982 में आवाज से अलग होकर जनमत नामक दैनिक अखबार निकाला। इस बीच पच्चास वर्षों के अपने पत्रकारीय जीवन में उन्होंने देश के शायद ही किसी पत्र-पत्रिका में नहीं लिखा हो। उनका मजदूर आंदोलन से भी नजदीकी रिश्ता था। कांतिभाई मेहता के साथ काफी काम किया। उनकी साहित्यिक कृतियों में कोयला मजदूरों की जिंदगी पर अनुसंधानपरक और मार्मिक उपन्यास वन पाथर और काली माटी  को सर्वाधिक सराहा गया। झारखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री श्री शिबू सोरेन के आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है। सतीश बाबू ने ही पहली बार दिनमान साप्ताहिक पत्रिका में शिबू सोरेन पर स्टोरी की थी। अब जबकि श्री शिबू सोरेन सत्ता में हैं, सतीश बाबू को भरोसा है कि वह उनके साथ न्याय करेंगे। पर देखना है कि नौकरशाही जीतती है या दिशम गुरू यानी मुख्यमंत्री शिबू सोरेन।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3546609333563952579-2842085113387732815?l=coalcitydhanbad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-10-10T20:17:56.319+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>धधक रहा है झरिया !</title><link>http://coalcitydhanbad.blogspot.com/2008/06/blog-post_3298.html</link><author>noreply@blogger.com (किशोर कुमार)</author><pubDate>Thu, 03 Jul 2008 11:29:11 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3546609333563952579.post-5037824797058536531</guid><description>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://www.chitthajagat.in/" title="चिट्ठाजगत"&gt;&lt;img src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagat.png" border="0" alt="चिट्ठाजगत" title="चिट्ठाजगत" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;प्राइम &lt;/span&gt;कोकिंग कोल के लिए &lt;span class=""&gt;विश्व&lt;/span&gt; प्रसिद्द झरिया के भूगर्भ में वर्षों पुरानी आग की विभीषिका ख़बर अब पुरानी हो चली है। नयी ख़बर है कि झरिया की धरती इंसानी गुस्सों से धधक रही है। कारण है कि झारखण्ड सरकार ने जमीनी आग के संभावित खतरों से बचाव के लिए झरिया के खतरनाक इलाकों में रह रहे लोगों के पुनर्वास के लिए योजना को हरी झंडी दिखा दी है। पर झरिया की जनता मानने को तैयार नहीं है कि भूगर्भ की आग इतनी विकत है की पूरी झरिया को ही लील जाए। जनता मान कर चल रही है की भूगर्भ से कीमती कोयला निकलने के लिए जमीनी आग का खौफ दिखाया जा रहा है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;झरिया पुनर्वास योजना :&lt;/strong&gt;  धनबाद नगर निगम के वर्तमान क्षेत्र से 1,83,223 ग्रामीण अलग होंगे। माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना अनुमति एवं प्रस्वीकृति हेतु नियमावली तैयार है।&lt;br /&gt;आम आदमी बीमा योजना मंजूर कर ली  &lt;span class=""&gt;गई  है&lt;/span&gt;। योजना की हद में भूमिहीन आएंगे। उनके परिवार को मौत पर 30 हजार रुपये तथा दुर्घटना में मृत्यु पर 75 हजार रुपये की राशि देय होगी। बीमित व्यक्ति की उम्र 18 से 59 वर्ष के बीच होनी चाहिए। आवश्यक राशि में केंद्र व राज्य के बीच आधे-आधे की भागीदारी होगी। योजना से तीन लाख 12 हजार भूमिहीन लाभान्वित होंगे। कैबिनेट ने झरिया पुनर्वास योजना स्वीकृत कर दी। यह पुनर्वास नीति बीसीसीएल के 44,155, गैर बीसीसीएल के 29,444 अधिकृत विस्थापित परिवारों व 33,847 अनधिकृत विस्थापित परिवारों पर प्रभावी होगी। गैर बीसीसीएल के अधिकृत विस्थापित परिवारों को ही मुआवजे की राशि देय होगी। अनधिकृत विस्थापितों के लिए बहुमंजिली इमारत में 27 वर्गमीटर के कारपेट एरिया का आवास प्राप्त होगा। अधिकृत विस्थापितों के समक्ष तीन विकल्प होंगे। पहला, 100 वर्गफीट का नि:शुल्क भूखंड या पुनर्वास स्थल पर बहुमंजिली इमारत में 40 वर्गफीट के कारपेट एरिया में आवास या फिर बड़े परिवार की स्थिति में 100 वर्गफीट के अतिरिक्त जमीन देय होगी किन्तु बाजार दर पर। साथ ही सामान की ढुलाई को 10 हजार व प्रत्येक परिवार के मुखिया को दो वर्ष के लिए 250 दिनों का काम प्रदान किया जाएगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;क्यों है जमीनी आग?&lt;/strong&gt; :(निरंतर): खदानों में आग लगने के कई कारण हो सकते हैं। कई बार १०० डिग्री तापमान के उपर जाने पर कोयला स्वयं ही प्रज्वलित हो उठता है, तो कई दफ़ा खदानों के प्रवेश के निकट बिजली गिरने से। आस्ट्रेलिया स्थित बर्निंग माउंटेन विश्व की सबसे पुरानी आग है जो 6000 सालों से लगातर जल रही थी। बूटलेग खनन को रोकने के लिये विस्फोट से खान उड़ाने के कारण भी कई बार आग लगी हैं। सेंट्रालिया जैसे क्षेत्रों में खदानों के पास कचरा जलाने से आग लगी।ज़ाहिर है कि ऐसी आग के आसपास रहना खतरनाक होता है। तापमान अधिक रहता है और हवा में ज़हरीली गैस रहती है। इनसे उपजती ग्रीनहाउस गैसों के कारण पर्यावरण के लिये भी भारी खतरा होता है। भारत के साथ ही अमरीका, चीन, इंडोनेशिया, रूस, यूरोप और अफ्रीका ऐसी आग से जूझते रहे हैं। वैज्ञानिक आजकल रीमोट सेंसिंग सेटेलाईट से ऐसी ज्वाला का पता लगाने की कोशिश करते हैं।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3546609333563952579-5037824797058536531?l=coalcitydhanbad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-07-03T23:59:11.934+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total></item><item><title>कोयला उद्योग के लिए धन का टोंटा</title><link>http://coalcitydhanbad.blogspot.com/2008/07/blog-post_03.html</link><author>noreply@blogger.com (किशोर कुमार)</author><pubDate>Thu, 03 Jul 2008 09:25:10 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3546609333563952579.post-4884332201396698825</guid><description>&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.blogvani.com/logo.aspx"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=h794tvyrksbf" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"&gt;&lt;img src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;ऊर्जा के मामले में आत्म - निर्भरता के सवाल पर केन्द्र के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की कथनी और करनी में भारी विरोधाभाष है। वह एक तरफ़ तो ऊर्जा के मामले में आत्म- निर्भरता का हवाला देते हुए हर हाल में परमाणु करार पर आमादा है और इसके लिए उसे अपनी कुछ महीनों की आयु वाली सरकार को बलि देने से भी गुरेज नहीं है। दूसरी तरफ़ वह सरकारी क्षेत्र के कोयला उद्योग के लिए पर्याप्त धन नही उपलब्ध करा पा रही है। सरकारी क्षेत्र के कोयला उद्योग के लिए भारत सरकार के खजाने में ज्यादा धन नहीं है। इसका बुरा असर कोयला उद्योग पर देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;सरकारी क्षेत्र के कोयला उद्योग के लिए ११ वीं पंचवर्षीय योजना हेतु कोयला मंत्रालय द्वारा ७६८५.८७ करोड़ रुपये की मांग की गयी थी, इसके विरूद्ध मात्र १३१५.९५ करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। कोयला मंत्रालय ने भी हद कर दी। कहाँ तो उसे चालू योजना अवधि के लिए आवंटन से पॉँच गुणा ज्यादा धन चाहिए था और दूसरी तरफ़ वह एक साल के लिए आवंटित २५० करोड़ रुपये भी खर्च नहीं कर पाया।&lt;br /&gt;इन दोनों ही उदाहरणों से अस्पष्ट है कि ऊर्जा के मामले में आत्म-निर्भरता के सवाल पर केन्द्र सरकार कि चिंता महज दिखावा है और परमाणु करार के लिए बेकरारी की वजह कुछ और है। वरना जिस कोयला उद्योग से देश की कुल ऊर्जा की ६७ फीसदी जरूरतें पूरी होती हों, उस कोयला उद्योग के मामले में सरकार इतनी लापरवाह नही बनी रहती। सरकार के इस रवैये से सरकारी क्षेत्र का कोयला उद्योग भारी संकट में है।&lt;br /&gt;परमाणु करार के सन्दर्भ में एक आंकडा कबीले गौर है। पूर्व वित्त मंत्री श्री यशवंत सिन्हा के मुताबिक कोयला आधारित बिजली घर स्थापित करने में प्रति मेगावाट ४.५ करोड़ रुपये की लागत आती है, जबकि आयातित परमाणु रिएक्टर वाले बिजली घर की स्थापना में लगभग प्रति मेगावाट लगभग १० करोड़ रुपये की लागत आती है। &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3546609333563952579-4884332201396698825?l=coalcitydhanbad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-07-03T21:55:10.271+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>झारखण्ड में सूचना आयुक्तों की बहाली में राजनीति.</title><link>http://coalcitydhanbad.blogspot.com/2008/06/blog-post_29.html</link><author>noreply@blogger.com (किशोर कुमार)</author><pubDate>Thu, 03 Jul 2008 01:48:49 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3546609333563952579.post-6535170376406441185</guid><description>&lt;div align="justify"&gt;झारखण्ड में सूचना आयुक्तों की बहाली राजनीतिक दांव-पेंच में उलझ कर रह गया है। "प्रभात खबर" के २८ जून २००८ वाले अंक के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित श्री हरिवंश के आलेख ने इस नंगी सच्चाई को दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है।&lt;br /&gt;"प्रभात ख़बर" झारखण्ड &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;सशक्त अख़बार है। इसके प्रधान संपादक श्री हरिवंश के जुनूनी अभियान ने इस अख़बार को " अख़बार नहीं , आन्दोलन " नारा बुलंद करने का अधिकार प्रदान किया है। हरिवंश जी उन चंद लोगों में से हैं, जिन्होंनें झारखण्ड में सूचना का अधिकार के आन्दोलन को व्यापकता प्रदान करने का काम किया था। आज उन्हीं हरिवंश को अपने अख़बार के माध्यम से सूचना आयुक्तों की बहाली के मामलें में महामहिम राज्यपाल से हतक्षेप करने के लिए याचना करनी पड़ रही है, तो यह बड़े शर्म की बात है और लोकतंत्र केलिए शुभ संकेत नहीं है।&lt;br /&gt;सूचना आयुक्त के पद ऐसे लोगों की बहाली की जा रही है , जो डिजर्व नहीं करते हैं। झारखण्ड में सूचना अधिकार आन्दोलन का यह हश्र होगा , इसकी कल्पना नहीं थी। श्री हरिवंश के मुताबिक झारखण्ड में ९ सूचना आयुक्तों के पद हैं और वर्तमान समय में कुछ ऐसे लोगों को सूचना आयुक्त बनाने की कोशिश है, जो उस पद के लायक नहीं हैं। हद हो गयी। हे भगवन, इस झारखण्ड सरकार को माफ़ कर।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3546609333563952579-6535170376406441185?l=coalcitydhanbad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-07-03T14:18:49.260+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>नयी कोयला खानों से १० लाख लोग विस्थापित होंगे</title><link>http://coalcitydhanbad.blogspot.com/2008/06/blog-post_26.html</link><author>noreply@blogger.com (किशोर कुमार)</author><pubDate>Wed, 02 Jul 2008 13:34:04 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3546609333563952579.post-3284435070924502392</guid><description>केन्द्रीय खनन योजना और डिजाइन संस्थान लिमिटेड (सीएमपीडीआई) ने अपने एक अध्ययन में कहा है कि देश में नई खनन योजनाओं के कारण 2025 तक करीब 10 लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा। सीएमपीडीआई कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) की सहायक इकाई है और देश के शीर्ष सलाहकार संस्थानों में शामिल है।&lt;br /&gt;सीएमपीडीआई के महाप्रबंधक (तकनीकी सेवा) बी दयाल ने बताया कि 'एक अनुमान के मुताबिक 2025 तक 8.5 लाख लोग कोयला खनन परियोजनाओं के कारण अपनी जगह से विस्थापित होंगे जबकि झरिया और रानीगंज कोयला खदानों में सीआईएल के मास्टर प्लान को लागू किया गया तो करीब 1.12 लाख अतिरिक्त लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा।'&lt;br /&gt;उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में लोगों को खनन के लिए बेदखल होना पड़ेगा। देश में 2025 तक खनन क्षेत्रफल बढ़कर 2,925 वर्ग किलोमीटर हो जाएगा। इस समय यह आंकड़ा 1,470 वर्ग किलोमीटर है। कोयल खनन गतिविधियों में जंगली क्षेत्रों की हिस्सेदारी भी मौजूदा 20 से 25 प्रतिशत के मुकाबले बढ़कर 2025 तक 30 प्रतिशत हो जाएगी।&lt;br /&gt;सीएमपीडीआई के अध्ययन में खानों के बंद होने और जंगलों में खनन की अनुमति देने पर भी सवाल उठाया गया है। रिपोर्ट में जंगली क्षेत्रों को खनन की अनुमति वाले और खनन प्रतिबंधित क्षेत्र में विभाजित करने का सुझाव भी दिया गया है। रिपोर्ट में कोयला खनन कंपनियों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन नियम बनाने की वकालत भी की गई है।&lt;br /&gt;अध्ययन में कहा है कि देश में इस समय पुर्नवास काफी संवेदनशील मुद्दा बन गया है। इसलिए पुर्नवास पर खास ध्यान देने और लोगों को खनन गतिविधियों में शामिल करने की जरुरत है। दयाल ने कहा कि 'खनन कंपनियों को विस्थापित लोगों के लिए आकर्षक पुर्नवास पैकेज की पेशकश करनी होगी। इतना ही नहीं उनके लिए मकान, सड़क, अस्पताल और स्कूल बनाने के लिए भी निवेश करना होगा। खनन परियोजनाओं से विस्थापित होने वाले लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए कंपनियों को काम करना होगा।'&lt;br /&gt;उन्होंने आगे कहा कि  जिन लोगों को परियोजना से रोजगार नहीं मिल पा रहा है, कंपनियों को उनके लिए रोजगार के वैकल्पिक जरिए तैयार करने चाहिए। उन्होंने कहा कि खनन गतिविधियों से बड़ी मात्रा में राख और अन्य कचरा निकलता है। इस समय देश में कोयला खनन से प्रतिवर्ष 30 करोड़ टन राख निकलती है। इसके अलावा 20 करोड़ टन अन्य कचरा निकलता है। ( बिज़नस स्टैण्डर्ड )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3546609333563952579-3284435070924502392?l=coalcitydhanbad.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-07-03T02:04:04.428+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><media:rating>nonadult</media:rating></channel></rss>

