<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7507238667008689912</id><updated>2025-02-19T11:17:34.954-08:00</updated><category term="घोटाला"/><category term="भारतीय घोटाला वर्ष: 2010"/><title type='text'>Ek Nai Soch</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://eknaisoch.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default?redirect=false'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Ek Nai Soch</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13312145934333738798</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>8</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7507238667008689912.post-6371999660573448453</id><published>2012-10-31T08:23:00.003-07:00</published><updated>2012-10-31T08:23:35.894-07:00</updated><title type='text'>अब पत्रकार क्या करें</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; color: #4c4c4c; font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;आपको दस्तावेज चाहिये, हम तुरंत दे देगें। लेकिन हमारा नाम न आये इसलिये आप आरटीआई के तहत दस्तावेज मांगे। इसके लिये लिये तो नोटरी के पास जाना होगा। दस रुपये का पेपर लेना होगा। ना ना &amp;nbsp;आप सिर्फ दस रुपये ही नत्थी कर दीजिये और दस्तावेज भी आपको हम हाथों हाथ दे देते हैं। आपको महीने भर इंतजार भी नहीं करायेंगें। आप खबर दिखायेंगे तो गरीबों का भला होगा। और सादे कागज पर आरटीआई की अर्जी के साथ दस रुपये नत्थी कर देने के बाद जैसे ही बाबू खबर से जुड़े दस्तावेज रिपोर्टर के हाथ में देता है वैसे ही कहता है, खबर दिखा जरुर दीजिएगा।। मंत्री महोदय से कोई समझौता ना कर लीजियेगा या डर ना जाइयेगा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #4c4c4c; font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 18.883333206176758px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; color: #4c4c4c; font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;यह संवाद दिल्ली-यूपी के सरकारी दफ्तर के बाबू और पत्रकार के हैं। तो सत्ता को लेकर टूटते भरोसे में तमाशे में तब्दील होती पत्रकारिता में भी सरकारी दफ्तरों के बाबूओं में भी आस हैं कि अगर पत्रकार खड़ा हो गया तो गरीब और हाशिये पर पड़े लोगों को न्याय मिल सकता है या फिर भ्रष्ट मंत्री की भ्रष्ट तानाशाही पर रोक लग सकती है। और यह स्थिति दिल्ली से लेकर देश के किसी भी राज्य में है। जैसे ही किसी राजनेता या सत्ताधारी के खिलाफ दस्तावेज बंटोरने के लिये कोई रिपोर्टर सरकारी दफ्तरों में बाबुओं से टकराता है तो कमोवेश यही स्थिति हर जगह आती है। कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के जाकिर हुसैन ट्रस्ट की कारगुजारियों को लेकर भी कुछ इसी तरह रिपोर्टर को दस्तावेज मिलते चले गये। तो क्या यह मान लिया जाये कि मीडिया की साख अब भी बरकरार है। या फिर ढहते सस्थानों के बीच सिर्फ मीडिया को लेकर ही आम लोगों में आस है कि वहां से न्याय मिल सकता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #4c4c4c; font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 18.883333206176758px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; color: #4c4c4c; font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;जाहिर है पत्रकारिता की साख भी इसी पर टिकी है कि किसी भी रिपोर्ट को लेकर जनता किसी भी ताकतवर मंत्री को कठघरे में खड़ा देखे। लेकिन कोई मंत्री अगर कानून की धमकी देकर अदालत के कठघरे में पत्रकार की रिपोर्ट के सही-गलत होने की बात कहने लगे तब पत्रकार क्या करे। यह सवाल कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की अदालत में देख लेने की धमकी के बाद कमोवेश हर पत्रकार के सामने है। अगर तथ्यों के आसरे किसी पत्रकार की कोई खोजी रिपोर्ट किसी भी सत्ताधारी की राजनीतिक जमीन खिसकाती है और तथ्यों का जवाब देने के बदले अगर सत्ताधारी अदालत के कठघरे में ही जवाब देने की बात कहने लगे तो संकेत साफ है कि अब कानून की जटिलता के आसरे पत्रकारिता पर नकेल कसने की तैयारी शुरु हो चुकी है। यानी लोकतंत्र का वह मिजाज अब सत्ताधारियो को नहीं भाता, जहां संविधान चैक एंड बैंलेस के तहत मीडिया को सत्ता पर निगरानी का हक भी देता है और जनता के बीच मीडिया की विश्वसनीयता के जरीये लोकतंत्र को जिलाये रखना भी होता है। सलमान खुर्शीद ने दोनों परिस्थितियों को उलट दिया है। मीडिया की विश्वसनीयता को कानून की विश्वसनीयता तले दबाया है तो चुनी हुई सत्ता को सर्वोपरि करार देकर पांच बरस तक हर अपराध से बरी मान लिया है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #4c4c4c; font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 18.883333206176758px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; color: #4c4c4c; font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;जाहिर है ऐसे में चार सवाल सीधे खड़े होते हैं। पहला कोई भी पत्रकार किसी भी सत्ताधारी के खिलाफ कैसे रिपोर्ट बनायेगा, जब धमकी अदालत की होगी। दूसरा कोई भी मीडिया हाउस अपने पत्रकारों को किसी भी मंत्री के खिलाफ तथ्यों को जुगाड़ने और दिखाने की जहमत क्यों उठायेगा, जब उसे यह अनकही धमकी मिलेगी कि अदालत के चक्कर उसे भी लगाने होंगे। तीसरा पत्रकारिता का स्तर खोजी रिपोर्ट के जरीये सिर्फ छोटे स्तर के भ्रष्टाचार को ही दिखा कर ताली पिटने वाला नहीं हो जायेगा। मसलन हवलदार या बीडीओ या जिला स्तर के बाबुओं या छोटी फर्जी चिट-फंड कंपनियों के गड़बड़झाले के खिलाफ रिपोर्टिंग हो नहीं पायेगी। और चौथा समूची पत्रकारिता सत्ता को बनाये या टिकाये रखने के लिये होगी और मीडिया हाउस की भूमिका भी सत्तानुकुल होकर सरकार से मान्यता पाने के अलावा कुछ होगी नहीं। यानी पत्रकारिता के नये नियम खोजी पत्रकारिता को सौदेबाजी में बदल देंगे। यह खतरे पत्रकारिता को कुंद करेंगे या फिर मौजूदा व्यवस्था में यही पत्रकारिता धारधार मानी जायेगी। यह दोनों सवाल इसलिये मौजूं है क्योंकि जिस तरह से लोकतंत्र के नाम पर आर्थिक सत्ता मजबूत हुई है और जिस तरह मुनाफा लोकतंत्र का नियामक बन रहा है, उसमें मीडिया हाउसो के लिये साख की पत्रकारिता से ज्यादा मुनाफे की पत्रकारिता ही मायने रख रही है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि मुनाफा साख के आधार पर नहीं बल्कि बाजार के नियमों के साथ साथ सरकार या सत्ता की मदद से ज्यादा तेजी से बनाया जा सकता है, यह बीते ढाई बरस में हर घोटाले के बाद सामने आया है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;संयोग से इसी कड़ी में मीडिया को लेकर भी सरकार ने जो भी निर्णय लिये हैं, वह भी कहीं न कहीं पत्रकारिता को सफल धंधे की नींव पर ही खड़ा कर रहे हैं। न्यूज प्रिंट को खुले बाजार के हवाले करने से लकेर विदेशी पूंजी को मीडिया के लिये खोलने के सिलसिले को समझें तो एक ही लकीर सीधी दिखायी देती है कि कोई भी समाचार पत्र या न्यूज चैनल जितनी पूंजी लगायेगा, उससे ज्यादा कमाने के रास्ते उसी तलाशने होंगे। नहीं तो उसकी मौत निश्चित है। यानी आर्थिक सुधार या खुले बाजार ने मीडिया को उस आम आदमी या बहुसख्यक तबके से अलग कर दिया जिसके लिये बाजार नहीं है। तो क्या पत्रकारिता के नये नियम भी उपभोक्ताओ पर टिके हैं। यकीनन यही वह सवाल है जो चुनाव में जीतने के बाद मंत्री बने राजनेता या सरकार चलाने वाली राजनीतिक पार्टी के कामकाज के तौर तरीके से सामने आ रहा है। और मीडिया को भी उस सरोकार से दूर कर उसके लिये पत्रकारिता की जो जमीन राज्य के आर्थिक नियम बना रहे हैं, उसे ही लोकतंत्र का राष्ट्रीय राग मान लिया गया है। जाहिर है ऐसे में प्रेस काउंसिल से लेकर एडिटर्स गिल्ड या फिर राष्ट्रीय ब्राडकास्टिग एसोशियशन [एनबीए ] से लेकर ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोशियशन [बीईए] &amp;nbsp;के तौर तरीकों को समझे तो यह भी उस वातावरण से दूर है जो आर्थिक सुधार के बाद सूचना तकनीक के बढते कैनवास के साथ साथ देश के सामाजिक, आर्थिक या सास्कृतिक पहलु हैं। यानी देश के अस्सी फीसद लोग जिस वातारण को जी रहे हैं, अगर उनके अनुकुल सरकार के पास सिवाय राजनीतिक पैकेज के अलावे कुछ नहीं है और उन्हीं के वोट से बनी सरकार की प्राथमिकता अगर पन्द्रह फीसद उपभोक्ताओं को लेकर है तो फिर असमानता की इस कहानी को बताना विकास में सेंध लगाना माना जाये या फिर देश को समान विकास की सोच की तरफ ले जाना।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;color: #4c4c4c; font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 18.883333206176758px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;span style=&quot;background-color: white; color: #4c4c4c; font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;अगर ध्यान दें तो असमानता का यही वातावरण मीडिया को भी बहुसंख्यक तबके से अलग कर ना सिर्फ खड़ा कर रहा है बल्कि उसे लोकतंत्र के पहुरुये के तौर पर सरकार ही मान्यता भी दे रही है। यानी आजादी के बाद पहले प्रेस आयोग से लेकर इमरजेन्सी के दौर में दूसरे प्रेस आयोग के जरीये मीडिया को लेकर जो बहस समूचे देश को ध्यान में रखकर हो रही थी वह आर्थिक सुधार के दौर में गायब है। बाजार व्यवस्था में तीसरे प्रेस आयोग की जरुरत समझी ही नहीं जा रही है। और मीडिया को भी उन्हीं सस्थानों से हांकने की तैयारी हो चली है जो सत्ता के साथ सहमति के बोल बोल कर मौजूदा दौर में मान्यता पा रहे हैं। जाहिर है नये खांचे में संविधान को देखने का नजरिया भी बदला है और लोकतंत्र के लिये चैक एंड बैलेस की सोच भी। अब ऐसा वातावरण तैयार किया गया है जिसमें कार्यपालिका के नजरिये से विधायिका भी चले और न्यायपालिका भी। और चौथा स्तम्भ भी इसी कार्यपालिका को टिकाये रखने को ही लोकतंत्र मान ले। चाहे इन सबके बीच समाज के भीतर सरकारी दफ्तर का बाबू यह कहकर कार्यपालिका के खिलाफ चौथे खम्भे को दस्तावेज दे दें कि अब तो न्याय होगा। और जनता की साख पर होने वाला न्याय का सवाल भी मंत्री की धमकी पर अदालत के कठघरे में चला जाये। और पत्रकार सोचता रहे कि अब वह क्या करे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;span style=&quot;line-height: 18.899999618530273px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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साभार : पुण्य प्रसून वाजपेयी के ब्लॉग से &lt;/div&gt;
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&lt;a href=&quot;http://prasunbajpai.itzmyblog.com/&quot;&gt;http://prasunbajpai.itzmyblog.com/&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://eknaisoch.blogspot.com/feeds/6371999660573448453/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2012/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/6371999660573448453'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/6371999660573448453'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2012/10/blog-post.html' title='अब पत्रकार क्या करें'/><author><name>Ek Nai Soch</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13312145934333738798</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7507238667008689912.post-5814379532140843837</id><published>2012-09-20T09:23:00.002-07:00</published><updated>2012-09-20T09:24:15.220-07:00</updated><title type='text'>सुनिए, एफडीआई के फायदे !</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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शाहनवाज आलम&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjAm6_ZtIWUDXldJxFCDl8U6N0Mk_3agsNxo0Wrox-7XzlCMtc2GGE4fjudrb-8-PFOS8-3186A3uxsBxvWtNQtQ4mNot6Kp_ONgxlVJMcIv6mZMR5CdqlmqJFK1WOIJlXvzVxSA7mUyFU/s1600/bjp_fdi_retail_cong.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;214&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjAm6_ZtIWUDXldJxFCDl8U6N0Mk_3agsNxo0Wrox-7XzlCMtc2GGE4fjudrb-8-PFOS8-3186A3uxsBxvWtNQtQ4mNot6Kp_ONgxlVJMcIv6mZMR5CdqlmqJFK1WOIJlXvzVxSA7mUyFU/s320/bjp_fdi_retail_cong.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
विपक्ष राजनीतिक पार्टियों की एकजुट भारत बंद, ममता बनर्जी का समर्थन वापस लेने की भभकी के बावजूद केंद्र सरकार ने खुदरा बाजार में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए अधिसूचना जारी कर दी है। यानी मनमोहन सरकार देश में चौतरफा हंगामें के बावजूद खुदरा बाजार में विदेशी पूंजी निवेश चाहती है।&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार पैरालाइसिस पॉलिसी को उबारने के लिए किसी भी कीमत पर निवेश चाहती है। यानी विदेशी मुद्रा से देशी विकास। सरकार का तर्क है कि इससे देश में रोजगार पैदा होगा। किसानों को लाभ मिलेगा। सरकार जितने भी सब्ज बाग दिखाए, लेकिन विचार, अर्थशास्त्री, प्रोफेसर, लेखक तक यही मानते हैं कि इससे देश के आम आदमी को नुकसान होगा। बेरोजगारी और महंगाई में इजाफा होगा। चीजों के दाम तेजी से बढ़ेंगे और घरेलू उद्योगों को नुकसान होगा। यहां तक कि युवा भी सोशल साइट्स के जरिए युवा एफडीआई के खिलाफ कमेंट व पोस्ट कर रहे हैं।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgC9nPr_dtT-cfLreVXiQnOHUA0SC_tFKcfenDMISOEUeOtZyQKWA0bg958BDaFMsIPt7dPZJsqNH-64H7awEG-xRFXnYs4P9M1PGkcEpQxVIHfk2p6NwNaUTF2CiHEKIhY8xLMsYf9Tmo/s1600/16VZVIJCITYREG2CPI_1210802f.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;211&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgC9nPr_dtT-cfLreVXiQnOHUA0SC_tFKcfenDMISOEUeOtZyQKWA0bg958BDaFMsIPt7dPZJsqNH-64H7awEG-xRFXnYs4P9M1PGkcEpQxVIHfk2p6NwNaUTF2CiHEKIhY8xLMsYf9Tmo/s320/16VZVIJCITYREG2CPI_1210802f.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सरकार भले ही सुनहरे सपने दिखा रही हो, लेकिन कई सवालों का जवाब अब भी सरकार नहीं दे पा रही है। माना कि आज खुदरा बाजार में 1 किलो मटर 50 रुपये किलो में मिल रही है और उस मटर का मूल्य उसके उत्पादक किसान को 10 रुपये मिल रहा है। क्या वालमार्ट जैसी विदेशी खुदरा रिटेलर किसानों से सीधे खरीद कर 40 रुपये में बेचेगा? इस बात की क्या गारंटी है कि किसान को वालमार्ट 20 रुपये भी देगा! क्या इस पर सरकार समर्थन मूल्य निर्धारित कर पायेगी?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
मौजूदा समय में कमोबेश करीब पांच करोड़ लोग खुदरा रिटेल से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। अगर देश में वालमार्ट जैसी पांच बड़ी कंपनियां भारत में एफडीआई के जरिए दुकानें खोलती हैं तो मंडियां समाप्त होने की प्रबल संभावना है। क्योंकि वालमार्ट जैसी कंपनियां सीधे किसान से माल खरीदेंगी और कुछ समय बाद एक मात्र थोक खरीदार बन कर इसकी मूल्य निर्धारक बन जाएंगी और किसान को अभी जो 10 रुपये मिल रहा है उसे मजबूरी में 8 रुपये में बेचना पड़ सकता है! क्योंकि मनमोहन सरकार जिसने पेट्रोलियम को नियंत्रण मुक्त कर दिया है वो दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर मूल्य नियंत्रण करेगी! रही बात किसानों के फायदे कि तो आज भी लेस कंपनी सैफ अली खान का डांस करवाकर 20 रुपये किलो वाले आलू का चिप्स 800 रुपये किलो बेच रही है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgugAHY0iH_sxYU8mzqZ8L9kRmvwHP2ItnSna-jvftBTcY43tMBLKR-rlJnjj6slqYh_gTaa3WSGR_jTI53XNtkIXslfPYeKqklUBZpEj0cJm18q5IbPqzhIDK5_QeEmfVRfDUktzl7gAE/s1600/FDI1409.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;199&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgugAHY0iH_sxYU8mzqZ8L9kRmvwHP2ItnSna-jvftBTcY43tMBLKR-rlJnjj6slqYh_gTaa3WSGR_jTI53XNtkIXslfPYeKqklUBZpEj0cJm18q5IbPqzhIDK5_QeEmfVRfDUktzl7gAE/s320/FDI1409.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
माना कि ग्राहकों को प्रत्यक्ष रूप से 10 रुपये का फायदा होगा। लेकिन मौजूदा समय में जिस तरह गली-गली में रिटेल दुकानें चल रही हैं। क्या वालमार्ट जैसी कंपनियां गली में अपना रिटेल सेंटर खोलेंगी। निश्चित ही नहीं। सीधे किसानों से खरीदने के कारण मंडियां भी धीरे-धीरे दम तोड़ देंगी। खुदरा बाजार बंद हो जाएगा। इसके बाद अभी जो खुले बाजार में मटर 50 रुपये किलो बिक रहा है उसे शुरुआत में वालमार्ट हो सकता है 30 रुपये में बेचे लेकिन इसकी पूरी सम्भावना है कि छोटे गलियों में दुकान बंद होने के बाद यही उसे 80 रुपये में भी बेच सकता है।&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
यह सिर्फ तर्कहीन बातें नहीं है, बल्कि कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ में पहले छोटी-छोटी काफी सीमेंट उत्पादक कारखाने थे। फिर एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी का पदार्पण हुआ जो अपने उत्पादन मूल्य से भी कम अथवा बराबर मूल्य में सीमेंट बेचना चालू की जो इन स्थानीय उत्पादकों के मूल्य से भी काफी कम थी। शुरुआत में कंपनी अपना पैर जमाने के लिए प्रमोशनल के तौर पर घाटा उठाया, लेकिन जब स्थानीय उत्पादक उस मूल्य से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके और साल भर के अंदर ही आर्थिक बदहाली का शिकार होकर कारखाने बंद हो गये। जैसे ही सीमेंट की स्थानीय फैक्ट्रियां बंद हुई वैसे ही उस मल्टीनेशनल कंपनी ने अपने दाम तीन महीनों के भीतर ही दुगुने कर दिया और साम्राज्य पर एकाधिकार कर पुराने घाटों की भरपाई कर आज तक मलाई चाट रही है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi9KCGwXfDDmAQ4rl2nMJV-FzUFB4lIlJtMfsZH_JwpAWf1hwL-5gYfiYeqSBHSS-ELUSgd9TVQveRdj6N6BTtQECjGjdomm7mRGBeBeplBXh56nNB9Kt51Ss9StTN-c650LdAZbOtXAUA/s1600/FDI-In-Retail.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;175&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi9KCGwXfDDmAQ4rl2nMJV-FzUFB4lIlJtMfsZH_JwpAWf1hwL-5gYfiYeqSBHSS-ELUSgd9TVQveRdj6N6BTtQECjGjdomm7mRGBeBeplBXh56nNB9Kt51Ss9StTN-c650LdAZbOtXAUA/s320/FDI-In-Retail.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;बहरहाल, खुदरा निवेश के जरिए अरबो रुपये जो मल्टीनेशनल कंपनी खुदरा रिटेल में निवेश कर कमायेगा। उसे डॉलर में बदलकर भारत से बाहर ले जायेगा जिससे मुद्रा का अवमूल्यन नहीं होगा? क्या इससे हमारी कमाई का एक बड़ा हिस्सा जो आज देश के अंदर ही घूम रहा है उसके देश के बाहर जाने पर एक असंतुलन की स्थिति उत्पनन नहीं होगी। लेकिन अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री होने के बावजूद यह बात समझ से परे है कि क्या एफडीआई कुछ क्षण कि लिए रोजगार देंगी, लेकिन लंबे समय पर इन्हीं युवाओं के हाथों में कुछ नहीं होगा। अब तो सोनिया जी और मनमोहन जी ही बता सकते हैं कि एफडीआई से किसका भला होगा, जनता का, नेता का या सोनिया जी का। वैसे भी राहुल तो अब कांग्रेस ने अंतर्राष्ट्रीय नेता बन गए हैं।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;
&lt;br class=&quot;Apple-interchange-newline&quot; /&gt;&lt;/div&gt;
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</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://eknaisoch.blogspot.com/feeds/5814379532140843837/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2012/09/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/5814379532140843837'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/5814379532140843837'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2012/09/blog-post.html' title='सुनिए, एफडीआई के फायदे !'/><author><name>Ek Nai Soch</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13312145934333738798</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjAm6_ZtIWUDXldJxFCDl8U6N0Mk_3agsNxo0Wrox-7XzlCMtc2GGE4fjudrb-8-PFOS8-3186A3uxsBxvWtNQtQ4mNot6Kp_ONgxlVJMcIv6mZMR5CdqlmqJFK1WOIJlXvzVxSA7mUyFU/s72-c/bjp_fdi_retail_cong.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7507238667008689912.post-7022883631043818045</id><published>2011-01-12T06:50:00.000-08:00</published><updated>2011-01-16T06:27:09.189-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="घोटाला"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारतीय घोटाला वर्ष: 2010"/><title type='text'>भारतीय घोटाला वर्ष: 2010</title><content type='html'>&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;!! &lt;strong&gt;शाहनवाज़ आलम &lt;/strong&gt;!! &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान में देश जिस दौर से गुजर रहा है वह समय किसी भी देश के लिए&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEieFecGZvmVyd5PZsn0clOiYpURQxeCWSQRl95qBOhMQqMgP1Yb0vjLlpJDnP57BDXzvuiameMk92phvoGGSaoRzdvHN-gB-eM0PVYKPm57L_SOlD9hNgHPz1cYAUycBumryA6ZTd0yHRv3/s1600/18514corruption.jpg&quot;&gt;&lt;img id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5561315988233969090&quot; style=&quot;FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 183px; CURSOR: hand; HEIGHT: 174px&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEieFecGZvmVyd5PZsn0clOiYpURQxeCWSQRl95qBOhMQqMgP1Yb0vjLlpJDnP57BDXzvuiameMk92phvoGGSaoRzdvHN-gB-eM0PVYKPm57L_SOlD9hNgHPz1cYAUycBumryA6ZTd0yHRv3/s200/18514corruption.jpg&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;ठीक नहीं कहा जा सकता है। एक ओर आम जनता महंगाई, भ्रष्टाचार, कुपोषण, नक्सलवाद साथ ही पानी, बिजली, चिकित्सा, सड़क जैसी आधारभूत समस्याओं से जूझ रहा है, वहीं कांग्रेस का हाथ आम जनता के साथ वाली केन्द्र सरकार का आमजनों से कोई सरोकार नहीं है। सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के मामलों से घिरी हुई हैं। आये दिन एक के बाद एक उजागर होते घोटालों ने देश की साख पर बट्टा लगा दिया है। देश में हर किसी के जुबान में घोटाला का ही जिक्र है। चाहे वह 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो, आदर्श सोसायटी घोटाला हो, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला हो, आईपीएल घोटाला हो या और कोई घोटाला। जनता घोटालों और समस्याओं से त्रस्त है। मगर इससे सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पर रहा है। कांग्रेस और सहयोगी दलों के नेता भ्रष्टाचार के नदी में डूबे हुये है। मगर दिल्ली में आयोजित कांग्रेस के 83वें महाधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार का उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा पारदर्शिता और शुचिता के पक्ष में रही है जबकि वास्तविकता यह है कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में जितने घोटाले हुये है वो आजादी के बाद आज तक किसी सरकार के कार्यकाल में नहीं हुए है। केवल वर्ष 2010 में इतने बड़े-बड़े घोटाले सामने आये है जिसे भूलना आसान नहीं होगा। इन बड़े घोटालों के भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखते हुए यदि वर्ष 2010 को घोटाला वर्ष कहा जाय तो कोई अतियुक्ति नहीं होगी। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;वर्ष 2010 के कुछ बडे़ घोटाले हैं - &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#ff0000;&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#ff0000;&quot;&gt;2जी स्पेक्ट्रम घोटाला&lt;/span&gt; - भारतीय संसद के इतिहास में पहली बार ऐसी शर्मनाक घटना घटी कि संसद का पूरा शीतकालीन सत्र शोर-शराबे व हंगामें की भेंट चढ़ गया। कारण 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर विपक्ष द्वारा जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) की मांग और सŸाारूढ़ पार्टी द्वारा पीएसी जांच कराने की बात।नियंत्रक &lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgSsfNfynjONlCN31qTD5JSiZgPgUM8aXrE6aRwk9g5oFXIcHGuE35wzSYSfsqkYlEfFbDmy6Of4yB1kK46uq2tWgdbSgm5aQF8-Oif9FR6zxoMU2VGGnWtnEjULFTfIailJ63AVVuQmlze/s1600/scam.jpg&quot;&gt;&lt;img id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5561317115720449570&quot; style=&quot;FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 258px; CURSOR: hand; HEIGHT: 157px&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgSsfNfynjONlCN31qTD5JSiZgPgUM8aXrE6aRwk9g5oFXIcHGuE35wzSYSfsqkYlEfFbDmy6Of4yB1kK46uq2tWgdbSgm5aQF8-Oif9FR6zxoMU2VGGnWtnEjULFTfIailJ63AVVuQmlze/s200/scam.jpg&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के अनुसार पूर्व केन्द्रीय दूरसंचार मंत्री ए। राजा ने अपने चहेतों को मनमाने ढंग से 2जी स्पेक्ट्रम बांटकर देश के सरकारी खजाने को 1।76 लाख करोड़ का चूना लगाया। कैग ने अपनी पड़ताल में मूल रूप से 3जी स्पेक्ट्रम के नीलामी के दौरान जिन दरों पर दूरसंचार कंपनियों को लाइसंेस दिये थे, उनको आधार मानते हुए सरकारी खजाने को 1।76 लाख करोड़ का घोटाले की बात कही थी। राजा के कारनामों के बारे में कैग की कुल 77 पृष्ठ की रिपोर्ट कहती है, संचार विभाग ने यूनिवर्सल ऐक्सेस सर्विसेस लाइसेंस सन् 2001 की कीमत 1,660 करोड़ रुपये में सन् 2008 में एक करोड़ और जोड़कर केवल 1661 करोड़ रुपये में 122 कंपनियों को जारी कर दिया। जबकि इनमें से 88 कंपनियों के पास जरूरी योग्याताएं भी नहीं थी। कैग की रिपोर्ट कहती है, ऐसा करते समय राजा ने अधीनस्थ अधिकारियों, भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकार, वित्त मंत्रालय, कानून मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी सलाहों को पूरी तरह नजरअंदाज किया, इससे देश को 1&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;/span&gt;.76 लाख करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ। गौरतलब है कि नवंबर 2007 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राजा को लिखे पत्र में लाइसेंस दिये जाने की मामले में नीलामी व्यवस्था को अमल में लाये जाने की सलाह दी थी। 1।76 लाख करोड़ में से 1,02,490 करोड़ का नुकसान 2008 में हुआ था। जब दूरसंचार मंत्री ए। राजा ने नियमों की अनदेखी करते हुए 122 नई दूरसंचार कंपनियों को 2001 की दरों पर 2जी स्पेक्ट्रम के लिए लाइसेंस दिया था। जिस स्वान कंपनी को 1537 करोड़ रू में लाइसेंस मिला, उसने तुरंत ही अपने 45 प्रतिशत शेयर इटिसलर कंपनी को 4200 करोड़ रू में बेच दिये और यूनिटेक वायरलेस जिसने 1661 करोड़ में लाइसेंस खरीदा, उसने अपने 60 प्रतिशत अधिकार 6200 करोड़ रू में बेच दिये। एक तरफ केवल दो कंपनियों के आधे हिस्से को ही केवल 10 हजार करोड़ से अधिक कीमत प्राप्त हो रही है, वहीं दूसरी ओर सभी 09 लाइसेंस पाने वाली कंपनियों ने मिलकर दूरसंचार विभाग को केवल 10,722 करोड़ रू दिये।2008 में ही आरकाॅम और टाटा को 2001 की दर पर डुअल टेक लाइसेंस दिया गया, जिससे सरकार को 37,154 करोड़ का नुकसान हुआ। इसी वर्ष यानी 2008 में ही जीएसएम आॅपरेटरों को 6.2 मेगाहाट्र्ज से अधिक स्पेट्रम मुहैया करवाने के कारण सरकार को 36,993 करोड़ का घाटा हुआ।दरअसल, संचार मंत्रालय ने अपने ही बनाये नियमों और निर्देशिका का पालन नहीं किया, लाइसेंस आवेदन के लिए पहले आओ-पहले पाओ का नियम अपनाया और फिर बिना कोई सूचना दिए आवेदन की तारीख को सीमित कर दिया। और तो और आवेदन जमा करने के लिए सिर्फ 45 मिनट दिये। इन सब घटनाओं से यह बात तो स्पष्ब्ट है कि पर्दे के पीछे का घेल पैसो का था जिसके कारण यह सब हुआ। भले ही आरोपों से घिरने के बाद प्रधानमंत्री ने राजा से इस्तीफा ले लिया मगर राजा ने अपने इस्तीफा में साफ नहीं किया कि वह क्यों इस्तीफा दे रहे है ? 2जी स्पेक्ट्रम की स्टोरी में रतन टाटा और सुनील मिŸाल की भूमिका देश के काॅरपोरेट घरानों का सरकार पर हमेशा से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव रहने के तथ्य को उजागर करता है। इससे यह साबित होता है कि कहने के लिए हमारा देश लोकतांत्रिक है, लेकिन सच्चाई में देश में काॅरपोरेट घरानों का राज चल रहा हैं, वे जो चाहते हेै, जैसा चाहते है अपने हिसाब से देश के नियम कानून को तोड़ मरोड़ कर अपना काम करवा लेते है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;color:#ff0000;&quot;&gt;काॅमनवेल्थ घोटाला&lt;/span&gt; - काॅमनवेल्थ गेम्स के सफल आयोजन और समापन के साथ ही इसने अपने साथ घोटालों की कथा छोड़ गया। आजाद भारत का सबसे बड़ा खेल समारोह नेताओं और अधिकारियों की भ्रष्टाचार की वजह से बड़े घोटालों में तब्दील हो गया। &lt;span class=&quot;&quot;&gt;घोटा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgKSwxXtp6jRs0Fw-9qUrWHzKMIBQ7PBK-YSvWgqb05aBxc1tYHVwXWJ6ETwx5ElDZccMRKQ-0o85U3aGRFFYgOsTa7qqXaSo_vHLLlCAMMmk-uO82-XRMilekGEoGuH4YGo24feKSDtCXI/s1600/shera-worried-with-all-the-scams.jpg&quot;&gt;&lt;img id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5561320153404330242&quot; style=&quot;FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 180px; CURSOR: hand; HEIGHT: 209px&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgKSwxXtp6jRs0Fw-9qUrWHzKMIBQ7PBK-YSvWgqb05aBxc1tYHVwXWJ6ETwx5ElDZccMRKQ-0o85U3aGRFFYgOsTa7qqXaSo_vHLLlCAMMmk-uO82-XRMilekGEoGuH4YGo24feKSDtCXI/s200/shera-worried-with-all-the-scams.jpg&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;लों&lt;/span&gt; का आलम यह था कि 1600 करोड़ का खेल बजट समापन तक 7000 करोड़ पहुंच गया। एक अनुमान के मुताबिक 25 करोड़ के सामान को 230 करोड़ में खरीदा गया। उदाहरण के तौर पर टेªड मिल को ही ले लीजिए, 45 दिनों के किराये के रूप मंे लिए एक टेªड मिल के लिए नौ लाख पचहŸार हजार रूपये चुकाये गये, जबकि बाजार में एक लाख से कम किराये पर आसानी से मिल रहे है। मतलब यह है कि एक टेªड मिल के लिए नौ गुना ज्यादा खर्च किया गया। हैरानी की बात यह है कि एक ट्रेड मिल की कीमत ही सिर्फ चार लाख रूपये है। यानी एक ट्रेड मिल के 45 दिनों के किराए से दो ट्रेड मिल खरीदे जा सकतते थे। साथ ही 30 रूपये वाले टीशू पेपर को काॅमनवेल्थ अधिकारियों ने 3757 रुपये में एक रोल खरीदा। छाता और कुर्सी को बाजार के कई गुना ज्यादा कीमत पर किराये पर लिए गया। वास्तविक कीमत और काॅमनवेल्थ अधिकारियों द्वारा किये गये कीमत या किराये में जमीन-आसमान को देखकर कोई भी आदमी लूट की कीमत को समझ सकता है। इस समय सीवीसी, सीबीआई , सीएजी, ईडी और इनकम टैक्स विभाग खेल के दौरान हुए घपलों के आरोपों की जांच कर रहा है। पूर्व सीएजी के नेतृत्व में विशेष जांच समिति इस माह अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। प्रधानमंत्री की ओर से नियुक्त की गई शुंगलू कमेटी ने दिल्ली सरकार की परियोजनाओं की जांच शुरू कर दी है। शानदान ढंग से गेम्स खत्म होने के बाद आयोजन समिति के प्रमुख के साथ कई उच्च अधिकारियों को नाम इस घोटाले में सामने आ रहे है । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color:#ff0000;&quot;&gt;आदर्श सोसायटी घोटाला&lt;/span&gt;- अब कारगिल यु़द्ध में शहीद हुये लोगों के लिए बनाये गये आदर्श सोसायटी के साथ भी घोटाला जुड़ गया। जिसके कारण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। शहीदों के परिवार के लिए बनने वाली इमारत निर्माण खत्म होते-होते नेताओं, नौकरशाहों और सैन्य अफसरों की मिल्कियत बन गई । इसे बनाने में पर्यावरण और सुरक्षा नियमों को अनदेखा किया गया। 1999 में कारगिल युद्ध के बाद 40 सदस्यीय आदर्श सोसायटी का गठन किया गया था, अब इसके 103 सदस्य है, जिसमें सिर्फ 03 सदस्यों का संबंध करगिल युद्ध से है। जिस समय आदर्श सोसायटी का आवंटन हुआ उस समय उसकी कीमत 60 लाख रूपये थी। आज इसकी बाजार कीमत आठ करोड़ के आस-पास है। इमारत के लाइन में ही ताज प्रेसिडेंट होटल है और पास में अंबानी बंधुओं का घर सी-विंड। नौसेना का मुख्यालय भी पास मेें हैै। सोसायटी निर्माण के समय से ही नौसेना ने आपŸिा जताई थी। इमारत की उचाई शुरूआत में 30 मीटर तय की गई थी जबकि इसका निर्माण कार्य खत्म होते-होते यह सौ मीटर हो गयी। सैन्य अफसरों और नेताओं ने इस में फलैट माने वालों ने अपनी आय को वास्तविक आय से कई गुना कम बताया तो कुछ ने अपने रोब का प्रयोग करके अपने रिश्तेदारों का अवंटन करवाया।&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;color:#ff0000;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;color:#ff0000;&quot;&gt;कर्नाटक जमीन घोटाला&lt;/span&gt; - चाहेे कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की। सभी के दामन घोटालों से दागदार है यानी इस हमाम में सब नंगे है। कर्नाटक में भाजपा शासित सरकार ने राज्य में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़ दिये है। बतौर मुख्यमंत्री युदियुरप्पा ने पार्टी के लिए जमीन तैयार करने के बजाय जमीन के घोटाले को ज्यादा प्राथमिकता दी। यह खेल तीन कदमों में येदियुरप्पा ने खेला। पहले, औद्योगिक क्षेत्र के नाम पर सस्ते में उद्योगपतियों को जमीन आवंटन कर दिया और दूसरे कदम में उसी जमीन को अपने रिश्तेदारों को खरीदवा दिया। आखिर में जमीन को संबंधित संस्था से नोटिफाई कर दिया गया। जिससे देखते-देखते लाखों की जमीन करोड़ों में बदल गई। पोल खुलने के बाद येदियुरप्पा के परिवार वालों ने जमीन लौटाना शुरू कर दिया। मगर येदियुरप्पा दावा करते है कि मैंने कुछ गलत नहीं किया।&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;                     घोटालों&lt;/span&gt; की फेहरिस्त यही समाप्त नहीं होती है। और भी घोटाले है। बहरहाल, टैक्स चोरी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और अन्य तमाम गलत तरीको से कमाये गये नेताओं, अधिकारियोें और भ्रष्टाचरियों के कारण आजादी से लेकर अब तक, अमेरिका में वाशिंगटन स्थित संस्था ग्लोबल फाईनेंशियल इंटिग्रिटी के अनुसार, 450 अरब डाॅलर का नुकसान हुआ है यानी लगभग 23 लाख करोड़। यदि यह धन देश के सकल घरेलू उत्पाद का हिस्सा होता तो यकीनन देश की बहुत सारी समस्याओं का निवारण हो चुका होता। मगर बढ़ते भ्रष्टाचार के मामले को देखकर लगता है सरकार को जल्द से जल्द कोई ठोस कदम उठाना ही होगा। यदि जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ी हुई तो देश में एक क्रांति की शुरूआत हो जाएगी।&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://eknaisoch.blogspot.com/feeds/7022883631043818045/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2011/01/2010.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/7022883631043818045'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/7022883631043818045'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2011/01/2010.html' title='भारतीय घोटाला वर्ष: 2010'/><author><name>Ek Nai Soch</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13312145934333738798</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEieFecGZvmVyd5PZsn0clOiYpURQxeCWSQRl95qBOhMQqMgP1Yb0vjLlpJDnP57BDXzvuiameMk92phvoGGSaoRzdvHN-gB-eM0PVYKPm57L_SOlD9hNgHPz1cYAUycBumryA6ZTd0yHRv3/s72-c/18514corruption.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7507238667008689912.post-424604585745941885</id><published>2010-07-06T23:45:00.000-07:00</published><updated>2010-07-07T00:14:06.667-07:00</updated><title type='text'>बंद से क्या महंगाई कम हुई..?</title><content type='html'>&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;शाहनवाज आलम &lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;br /&gt;05 जुलाई को बढ़ती महंगाई के खिलाफ विपक्ष ने भारत बंद का आहवान किया। बंद सफल रहा या असफल ? यदि बंद के समर्थक पार्टियों की मानें तो बंद सौ फीसदी सफल रही। देश के कुछ हिस्से में बंद प्रभावी और कुछ में &lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjSm2bDt5MlYIcHwidikqW-TBAnm3SmYPvrGl_-_amb2bTYP56Kt8xBouuLrZIBk2HYI7d7ecVoWEN39_Slzsoht6f6NlEgpGvS3Rn_26WwRNXcRHJqi8COo8bqunThXBsrTaKvuCCLGmXV/s1600/Inflation.jpg&quot;&gt;&lt;img id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5491054376325523314&quot; style=&quot;FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 188px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjSm2bDt5MlYIcHwidikqW-TBAnm3SmYPvrGl_-_amb2bTYP56Kt8xBouuLrZIBk2HYI7d7ecVoWEN39_Slzsoht6f6NlEgpGvS3Rn_26WwRNXcRHJqi8COo8bqunThXBsrTaKvuCCLGmXV/s200/Inflation.jpg&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;निष्प्रभावी साबित हुआ। ज्यादातर बंद का असर उन प्रदेशों में देखा गया जहां विपक्ष सत्ता में है। बंद समर्थक दरअसल सफल इसलिए मान रहे है क्योंकि उस दिन हवाई जहाज नहीं उड़ी, रेलगाड़ियों का परिचालन ठप रहा, दुकानें बंद रही और सड़कों की रफ्तार रूक गई। अनुमान के मुताबिक एक दिन के भारत बंद से देश को लगभग 20 करोड़ का नुकसान हुआ। यदि तार्किक तौर पर मानें तो यह बंद असफल रहा, क्योंकि बंद का उद्देश्य था-महंगाई कम हो। क्या महंगाई कम हो गई ? भारत बंद के द्वारा विपक्ष मंहगाई के खिलाफ सरकार को जगाने की कोशिश कर रही है। उस सरकार को जो खुद ही महंगाई की जानकारी आम जनता तक पहुंचाती है। देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री बार-बार महंगाई कम होने के बजाय बढ़ने का ढाढस बंधाते है। तो फिर क्या आम आदमी को यह बताने की कोशिश की जा रही है ? आम आदमी से भला कौन जानता है कि कितनी महंगाई है ? आखिर किस लिये था यह बंद। &lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;दरअसल यह बंद थी राजनीति चमकाने के लिए। आम जनता को बताने के लिए कि विपक्ष अपना काम को पूरी जिम्मेदारी के साथ कर रही है। मगर लेफ्ट-राइट के इस सामूहिक बंद में नेता कहीं भी साथ नजर नहीं आये। जिस तरह से आम जनता के सहयोग की आशा विपक्ष पार्टियां कर रही थी उस तरह से आम जनता बंद के समर्थन में रोड पर नजर नहीं आयी। क्या &lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj1Iqu6a0J_D7m4Ppc6Xj8zvRewSXjyfj1aHn33aSVra00-69d8NXUWm-oy18AKCQbf8-beF1wWK9bknCIJlzF5zOZuKtuwCYMdM-rcy3BCTyM3KngUk3scljJ3m5fYBSSYMI8rZurVU4ay/s1600/inflation-for-blog1.JPG&quot;&gt;&lt;img id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5491055302519017714&quot; style=&quot;FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 152px&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj1Iqu6a0J_D7m4Ppc6Xj8zvRewSXjyfj1aHn33aSVra00-69d8NXUWm-oy18AKCQbf8-beF1wWK9bknCIJlzF5zOZuKtuwCYMdM-rcy3BCTyM3KngUk3scljJ3m5fYBSSYMI8rZurVU4ay/s200/inflation-for-blog1.JPG&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;विपक्ष&lt;/span&gt; इस पर विचार करेगा कि ऐसे समय आम जनता उसके आयोजन में सहभागी क्यों नहीं बनी जब बढ़ती महंगाई उसे वास्तव में त्रस्त कर रही है ? कमर तोड़ महंगाई को लेकर केंद्रीय शासन संवेदनहीनता का परिचय दे रहा है उसे देखते हुए होना तो यह चाहिए था कि विपक्षी दल ऐसे माहौल बनाते कि जनता खुद-ब-खुद सड़कों पर उतर आती। बंद को सफल बनाने के लिए जो जतन किए गए उससे यही संदेश गूंजा कि महंगाई से त्रस्त जनता को विपक्ष ने और त्रस्त किया। भले ही आम जनता त्रस्त हो लेकिन बंद के बहाने नेताओं की नेतागिरी सफल रही। जिस आम आदमी का नाम लेकर यह सब किया गया। सबसे ज्यादा नुकसान उसी आम आदमी को हुआ। एक दिन की रोजी मारी गयी और नुकसान हुआ वो अलग। आम आदमी से किसी को कोई सरोकार नहीं है। आम जनता तो सीधा सा लक्ष्य है भेदने के लिए। सब के सब उसी के नाम पर रोटियां सेंकते है और उसी के रोटी भी छीनते है।&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;निःसंदेह&lt;/span&gt; विपक्ष को मंहगाई के खिलाफ रोष जताने का  अधिकार है लेकिन क्या सड़क और रेल मार्ग बाधित करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं किया जा सकता है ? क्या बंद समर्थक विपक्ष पार्टी के शासित प्रदेश में महंगाई के दुष्प्रभाव अलग है और अन्य दलों द्वारा शासित प्रदेशों में अलग है ? बेहतर होता कि विपक्ष इसे लेकर एकजुट होने के साथ आम जनता को विश्वास में लेकर केन्द्र सरकार को घेरने का काम करती और खाने-पीने की सामग्री के साथ अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने की वजह तलाश करती।&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://eknaisoch.blogspot.com/feeds/424604585745941885/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2010/07/blog-post_06.html#comment-form' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/424604585745941885'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/424604585745941885'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2010/07/blog-post_06.html' title='बंद से क्या महंगाई कम हुई..?'/><author><name>Ek Nai Soch</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13312145934333738798</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjSm2bDt5MlYIcHwidikqW-TBAnm3SmYPvrGl_-_amb2bTYP56Kt8xBouuLrZIBk2HYI7d7ecVoWEN39_Slzsoht6f6NlEgpGvS3Rn_26WwRNXcRHJqi8COo8bqunThXBsrTaKvuCCLGmXV/s72-c/Inflation.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7507238667008689912.post-4078086221615229925</id><published>2010-07-05T02:02:00.000-07:00</published><updated>2010-07-05T02:12:44.147-07:00</updated><title type='text'>जसवंत सिंह के वापसी के मायने?</title><content type='html'>&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgNlT1rkE-4cfdZ5u7jCgSVAv9TYP98SpVv6LojrwtRHHARb6ax-kBjhmlmVopSy_9mTRlZWPykz2JRxddSt8g3K07LTa96ZZQ44dxaayZH1fmwGclvCWi_bi5PHAL2m4sV5FEKBc6FWzyc/s1600/jm.bmp&quot;&gt;&lt;img id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5490347378195910834&quot; style=&quot;FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 136px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgNlT1rkE-4cfdZ5u7jCgSVAv9TYP98SpVv6LojrwtRHHARb6ax-kBjhmlmVopSy_9mTRlZWPykz2JRxddSt8g3K07LTa96ZZQ44dxaayZH1fmwGclvCWi_bi5PHAL2m4sV5FEKBc6FWzyc/s200/jm.bmp&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शाहनवाज आलम&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;पूर्व विदेश मंत्री और वरिष्ठ राजनेता जसवंत सिंह की जिस शर्मनाक तरीके से भाजपा से निष्कासित किया गया था, दस माह बाद उसी शानदार तरीके से बिन शर्त पार्टी में उनकी वापसी हुई। पार्टी में अपनी वापसी के अवसर पर जसवंत सिंह आभार के साथ यह भी जता रहे थे कि किस तरह लालकृष्ण आडवाणी से लेकर नितिन गडकरी तक उनकी वापसी के लिए आतुर है । भाजपा की ओर से किसी भी नेता ने यह स्पष्टीकरण नहीं दिया कि वे कौन से कारण थे जिनके चलते जसवंत सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था और किन कारणों से उन्हें पार्टी में फिर शामिल किया गया। जसंवत सिंह पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नजदीकी है। ऐसा माना जा रहा है कि जसवंत सिंह की वापसी लालकृष्ण आडवाणी के पहल पर हुई है। नितिन गडकरी ने अपने वक्तव्य में कहा कि जसंवत सिंह की पार्टी में वापसी से भाजपा को विदेश, सुरक्षा और आर्थिक मामलों में लाभ मिलेगा। निःसंदेह जसंवत सिंह विद्वान और इन मामलों के जानकार है। मगर केवल इस आधार पर पार्टी में वापसी हुई है। यह बात कुछ हजम होने वाली नहीं है। साथ ही यह भी सवाल उठता है कि इतने बड़े पार्टी में कोई और जानकार नहीं है या उसके पास जसवंत सिंह के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। भाजपा एक तरह से प्रायश्चित कर रही है। इसीलिए बिना शर्त पार्टी में वापसी हुई। दरअसल उन्हंे पार्टी से सिर्फ इसलिए निष्कासित किया गया था क्योंकि उन्होने अपनी किताब में देश विभाजन के लिए जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल की भूमिका पर सवाल उठाए थे। बिना किसी विश्लेषण और जसवंत सिंह के सफाई के बगैर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। भाजपा को एतराज इस बात पर थी उन्होंने कैसे सरदार पटेल को विभाजन का दोषी ठहराया ? जबकि भाजपा के अनुसार विभाजन का मुखिया जिन्ना है। गौरतलब है कि अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान करांची में जिन्ना को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए जिन्ना को सेक्यूलर बताने के बाद लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटना पड़ा था। जब भी पड़ोसी देश पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना का नाम सामने आता है भाजपा उसी विरोध भाव को दर्शाती है। जिस समय जसवंत सिंह को निष्कासित किया गया था उस समय भाजपा लोकसभा चुनाव में हार की वजह तलाश रही थी। इसके लिए शिमला में चिंतन बैठक का आयोजन किया गया, मगर हार के कारणों से ज्यादा जसवंत सिंह पर केन्द्रित रही थी । जसवंत सिंह के शिमला पहुंचने से पहलेे ही मीडिया के सामने भाजपा नेतृत्व ने उन्हें निष्कासन का फैसला सुना दिया। मगर जसवंत सिंह पार्टी के सामने झुकने के बजाय पार्टी से लोहा लेना समझा और अपने पुस्तक में व्यक्त विचारों पर अडिग रहे। साथ ही साथ उन्होंने अपने पुस्तक के प्रचार और विमोचन के लिए पाकिस्तान भी गये। वहां भी उन्होंने कायदे-आजम जिन्ना की तारीफ में कोई कसर नहीं छोड़ी। निष्कासन के बाद केवल उन्होंने लोक-लेखा समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। अब अचानक दस माह बाद भाजपा सब कुछ भूल कर उन्हें पार्टी में फिर से वापस ले लिया। मगर इस वापसी के साथ ही कई सवाल पैदा हो रहे है जिसका जवाब पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ भाजपा समर्थक भी जानना चाहेंगे। पार्टी में जसवंत सिंह की वापसी किस आधार पर हुई ? जसवंत सिंह के वापसी का मतलब यह समझा जाएं कि पार्टी भारत विभाजन के लिए जिन्ना से अधिक जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल को दोषी मानती है ? यदि जसवंत सिंह का निष्कासन भाजपा की भूल थी, तो इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार क्यों नहीं कर रही है ? इस मामले में जसवंत सिंह भी चुप क्यों हैै ? क्या पार्टी फिर से बुजुर्ग राग अलाप रही है ? क्या जसवंत सिंह की वापसी भाजपा में वैचारिक बदलाव के संकेत है ? क्या जसवंत सिंह को अलग पार्टी बनाने का खतरा महसूस हो रहा था ? &lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://eknaisoch.blogspot.com/feeds/4078086221615229925/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2010/07/blog-post.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/4078086221615229925'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/4078086221615229925'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='जसवंत सिंह के वापसी के मायने?'/><author><name>Ek Nai Soch</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13312145934333738798</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgNlT1rkE-4cfdZ5u7jCgSVAv9TYP98SpVv6LojrwtRHHARb6ax-kBjhmlmVopSy_9mTRlZWPykz2JRxddSt8g3K07LTa96ZZQ44dxaayZH1fmwGclvCWi_bi5PHAL2m4sV5FEKBc6FWzyc/s72-c/jm.bmp" height="72" width="72"/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7507238667008689912.post-6829134706816896282</id><published>2010-05-12T21:38:00.000-07:00</published><updated>2010-05-14T02:45:54.161-07:00</updated><title type='text'>राजनीति का शिकार झारखंड</title><content type='html'>&lt;div&gt;शाहनवाज आलम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;br /&gt;झारखंड की उम्र महज दस साल है। मगर सात मुख्यमंत्री देख चुका है और आठवें मुख्यमंत्री की अगवानी की तैयारी दिख रही है। झामुमो और आजसू ने शेष साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल के लिए भाजपा के नेतृत्व में सरकार को समर्थन देने &lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjpMRYmKNADAllgaIot20pJYV6-8uxHrLzhchcce435aS0xHyWOYALMfibjsG9ihXzZCS7kQ8RDkcbLL5Uti9JOyST1jNwZWQ82oOJSKy9JFjUIzvgrm6rVAuERaOuGtBAXL9P1RZGx9K2d/s1600/ARV_SOREN_20167f.jpg&quot;&gt;&lt;img id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5470686093803503026&quot; style=&quot;FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 215px; CURSOR: hand; HEIGHT: 184px&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjpMRYmKNADAllgaIot20pJYV6-8uxHrLzhchcce435aS0xHyWOYALMfibjsG9ihXzZCS7kQ8RDkcbLL5Uti9JOyST1jNwZWQ82oOJSKy9JFjUIzvgrm6rVAuERaOuGtBAXL9P1RZGx9K2d/s200/ARV_SOREN_20167f.jpg&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;की घोषणा की है। इसी के साथ झारखंड में छाया राजनीतिक संकट हल होता नजर आ रहा है। मगर बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार स्थिर होगी?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;दरअसल झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का दौर इसके अस्तित्व के साथ ही शुरू हुआ। मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की कलाबाजी की देन है। झारखंड में झामुमो, भाजपा के साथ है। लेकिन सोरेन केन्द्र में भाजपा द्वारा लाये गये कटौती प्रस्ताव के विरूद्ध और यूपीए के पक्ष में मतदान करते है। यूपीए सरकार के समर्थन में आने से नाराज भाजपा ने शिबू सोरेन सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी। लेकिन सत्ता मोह में फंसी भाजपा वास्तव में ऐसा नहीं कर सकी। झामुमो के भाजपा मुख्यमंत्री बनाने के बयान ने भगवा गलियारे में ऐसी अफरा-तफरा मचाई कि सिद्धांतों की जगह सत्ता भाने लगी। सोरेन के साथ मिलकर सरकार बनाते समय भाजपा को यह पता नहीं था कि वे कभी भी पलटी मार सकते है? हो सकता है आने वाले दिनों में गुरूजी भाजपा को और धोखा दें। शिबू सोरेन अभी विधानसभा के सदस्य &lt;span class=&quot;&quot;&gt;न&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgbD19DBMkL7A58ow35x6dDMGGX9wNXnnMOxTl853Z8eail_lxBzSOEFO4T_2gsHwLGe39GF5-OeaIPCrorFzkiS6OrpgmqppWNgNO7_Pq9nbY9Kdf0EJBiViWf1AYOr5374_4ad3yl7p01/s1600/J_C_1_113006e.jpg&quot;&gt;&lt;img id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5471058826409708162&quot; style=&quot;FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 159px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgbD19DBMkL7A58ow35x6dDMGGX9wNXnnMOxTl853Z8eail_lxBzSOEFO4T_2gsHwLGe39GF5-OeaIPCrorFzkiS6OrpgmqppWNgNO7_Pq9nbY9Kdf0EJBiViWf1AYOr5374_4ad3yl7p01/s200/J_C_1_113006e.jpg&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;हीं&lt;/span&gt; है। पिता को मुख्यमंत्री बनाये रखने के लिए विधायक हेमंत सोरेन ने अपना इस्तीफा दे दिया है। दुमका विधानसभा क्षेत्र खाली है, जिसपर उपचुनाव होना तय है। उपचुनाव में शिबू सोरेन वहां से चुनाव भी लड़ेगे। अगर उपचुनाव में जोड़-तोड़-मरोड़ कर चुनाव जीत जाते है तो फिर से राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू होना तय है, क्योंकि शिबू सोरेन अवसरवादी हैं और हमेशा मुख्यमंत्री बने रहना चाहते हैं। भाजपा में मुख्यमंत्री पद को लेकर अस्थिरता का दौर कायम है। इसे लेकर भाजपा संसदीय बोर्ड को माथा-पच्ची करनी पड़ रही है। झामुमो ने आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग रखी है। जबकि प्रदेश भाजपा से अर्जुन मुंडा और रघुवर दास का नाम सामने आ रहा है। मगर दिल्ली की पसंद तो हजारीबाग के सांसद यशवंत सिन्हा है। अर्जुन मुंडा पूर्व मुख्यमंत्री है और रघुवर दास वर्तमान में उपमुख्यमंत्री है। दोनों राजनेता झारखंड के जमशेदपुर क्षेत्र के है तथा पिछले कुछ समय से उनके बीच छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है, जिसके कारण भाजपा को सरकार बनाने की राह दुश्वार बनी हुई है। किसी तरह भाजपा अपना मुख्यमंत्री चुन भी लेती है तो आठवें मुख्यमंत्री का कार्यकाल कितने दिनों का होगा यह तो वक्त ही बतायेगा।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;दरअसल राज्य बनने के साथ ही सियासत का खेल चलता आ रहा है। खेल में शामिल खिलाड़ियों को शायद यह ख्याल ही नहीं है कि पब्लिक सब जानती है। झारखंड के चैक-चैराहों से अलग-अलग सवाल उठ रहे हैं कि अलग राज्य बनने से क्या हुआ ? उस भावना का क्या हुआ जिसमें विपन्नता दूर कर पिछड़े क्षेत्र को संपन्न बनाने की बात कही गयी थी। हरेक के जेहन में एक ही सवाल है झारखंड के साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है ?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;नवंबर 2000 में बने तीन राज्यों में से झारखंड की हालत सबसे बदतर है, अखिर सवाल है क्यों? प्राकृतिक संसाधनों के अलावा ऐसे अनेक स्रोत है जिनपर काम करके झारखंड को देश का अव्वल राज्य बनाया जा सकता है। मगर अफसोस कि झारखंड विकास से कोसों दूर है। आखिर विकास का काम क्यों नहीं होता ? गौर करें तो कारण साफ नजर आता है। ऊपर से नीचे तक व्यवस्था, समाज और राजनीति हमेषा अस्थिर रही। ऐसे में प्रदेश का विकास कैसे होगा, यह चिंता का विषय है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;अगर एक नजर झारखंड की राजनीति पर डाले तो साफ पता चलता है कि आज तक जितनी भी सरकार बनी और उन सरकारों में जो भी मुख्यमंत्री बने, वे स्वयं भी असुरक्षित रहे। जब झारखंड अस्तित्व में आया तो बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत नहीं होने के कारण हमेशा चिंतित रहे। उन्होंने किसी तरह 28 महीने तक मुख्यमंत्री कार्यकाल गुजारा। इसके बाद आदिवासी नेता अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने। लेकिन वे अपनों से ही त्रस्त रहे। जैसे-तैसे 2003-05 तक सरकार चलाई। चुनाव घोषित हुआ। चुनाव के बाद गुरूजी को सरकार बनाने का प्रस्ताव मिला। विश्वाश मत प्राप्त न कर सके और पुनः भाजपा के नेतृत्व में अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने। पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के कारण अर्जुन मुंडा भी स्थिर सरकार नहीं दे सके और सरकार गिर गई। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा। कांग्रेस ने चाल चली और देश के इतिहास में पहली बार निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को राजद और झामुमो के समर्थन से मुख्यमंत्री पद दिया गया। मधु कोड़ा बिना आधार के मुख्यमंत्री बन गये। इशारे पर नाचने वाली कठपुतली की तरह। खुद भी लूटा और दूसरे को भी लूटने का खूब मौका दिया। जब मधु कोड़ा भ्रष्टाचार के मामले से दब गये तब कांग्रेस ने एक और चाल चली। कांग्रेस ने अपने सहयोग से शिबू सोरेन को एक बार मुख्यमंत्री बना दिया। लेकिन वे विधान सभा के सदस्य नहीं थे। संविधान के अनुसार उन्हें चुनाव लड़ना था। चुनाव लड़े, लेकिन तमाड़ की जनता ने मुख्यमंत्री को विधायक के रूप स्वीकार नहीं किया। जिसके कारण प्रदेश फिर से राष्ट्रपति के हाथों में चला गया। फिर शिबू सोरेन मुख्यमंत्री का पदभार संभाले और अभी तक है। लेकिन सवाल फिर मौजू है कि गरीबी, बेरोजगारी और नक्सलवाद जैसे समस्याओं से जूझ रहे राज्य में भविष्य की तस्वीर क्या होगी? हालांकि अस्थिरता के बीच अब कौन और कितने दिन राज्य की बागडोर संभालेगा यह भी देखनेवाली बात होगी।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://eknaisoch.blogspot.com/feeds/6829134706816896282/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/6829134706816896282'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/6829134706816896282'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='राजनीति का शिकार झारखंड'/><author><name>Ek Nai Soch</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13312145934333738798</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjpMRYmKNADAllgaIot20pJYV6-8uxHrLzhchcce435aS0xHyWOYALMfibjsG9ihXzZCS7kQ8RDkcbLL5Uti9JOyST1jNwZWQ82oOJSKy9JFjUIzvgrm6rVAuERaOuGtBAXL9P1RZGx9K2d/s72-c/ARV_SOREN_20167f.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7507238667008689912.post-6690262915580296138</id><published>2010-04-05T03:38:00.000-07:00</published><updated>2010-05-14T01:01:14.518-07:00</updated><title type='text'>माखनलाल चतुर्वेदी : &quot;एक भारतीय आत्मा&quot;</title><content type='html'>&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;शाहनवाज़ आलम &lt;/div&gt;&lt;p align=&quot;justify&quot;&gt;जैसे स्वामी विवेकानंद को एक कोरा सन्यासी, महात्मा गाँधी को कोरा &lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj-a2ACk23oxvAmAXM22T6BKvxVMBsYd3TAwsSyG6iSsSc5dv1eyytcySQPFwDq946mySMfLYjQQnEgcz8_Z0KnNX89sgxC_tqa5aQuf6qKi5bHjQ1vI21LDb_TpkgOEmb_k2OBjDDf03lc/s1600/Makhan_lal_Chaturvedi.jpg&quot;&gt;&lt;img id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5456607891752669730&quot; style=&quot;FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 130px; CURSOR: hand; HEIGHT: 165px&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj-a2ACk23oxvAmAXM22T6BKvxVMBsYd3TAwsSyG6iSsSc5dv1eyytcySQPFwDq946mySMfLYjQQnEgcz8_Z0KnNX89sgxC_tqa5aQuf6qKi5bHjQ1vI21LDb_TpkgOEmb_k2OBjDDf03lc/s200/Makhan_lal_Chaturvedi.jpg&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;राजनेता कहकर टालानही जा &lt;span class=&quot;&quot;&gt;सकता, &lt;/span&gt;ठीक उसी प्रकार पंडित माखनलाल चतुर्वेदी को कोरा साहित्यकार या पत्रकार कह कर नहीं  &lt;span class=&quot;&quot;&gt;टाला &lt;/span&gt;जा सकता है। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का अदभूत व्यक्तित्व स्वतंत्र &lt;span class=&quot;&quot;&gt;सेनानी, &lt;/span&gt;विशुद्ध &lt;span class=&quot;&quot;&gt;साहित्यकार, &lt;/span&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;क्रन्तिकारी &lt;/span&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;कवि &lt;/span&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;एवं &lt;/span&gt;निर्भीक पत्रकार की &lt;span class=&quot;&quot;&gt;मिली-&lt;/span&gt;जुली रेखाओं से बनता है। वे कर्म से &lt;span class=&quot;&quot;&gt;योद्धा, &lt;/span&gt;बुद्धि से &lt;span class=&quot;&quot;&gt;चिन्तक, &lt;/span&gt;दिल से &lt;span class=&quot;&quot;&gt;कवि &lt;/span&gt;स्वाभाव से संत और अद्भूत बेजोड़ प्रवक्ता थे। उनका सम्पूर्ण जीवन और चिंतन भारतीय समाज कि रक्षा करने और संवारने के सन्दर्भ में अभिव्यक्त हुआ है। उन्होंने जो लिखा उसमें अतीत कि &lt;span class=&quot;&quot;&gt;झलक, &lt;/span&gt;वर्तमान कि &lt;span class=&quot;&quot;&gt;स्वाभिमान &lt;/span&gt;और भविष्य के प्रति आशा का संकेत था। उनके व्यक्तित्व के विकास के कारण सामान्य परिवार में जन्म और संघर्षपूर्ण जीवन था।&lt;/p&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;अपने संघर्षरत जीवन के बारे में कहते हैं कि-&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;strong&gt;&quot;सूली का पथ ही सिखा हूँ, सुविधा सदा बचाता आया।&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;strong&gt;मैं बलि पथ का अंगारा हूँ, जीवन ज्वाला जलाता आया॥&quot;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के एक छोटे से गांव बाबई में उनका जन्म 04 अप्रैल 1889 को हुआ था। चतुर्वेदी जी की प्राथमिक शिक्षा बाबई में हुई। नृसिंह मंदिर के सामने मैदान में रामलीला होती थी जिसमें आप कभी राम तो कभी लक्ष्मण का किरदार निभाते रहते। इन पात्रों का आप पर गहरा प्रभाव पड़ा और आप कवि जैसे सोच रखने लगे। यही प्रभाव आगे चलकर वैष्णवाद का रूप ले लिया। बचपन में चतुर्वेदी जी मंदिर की गायें चराने भी नर्मदा के तट पर जाया करते थे। कन्धे पर लाठी रखकर वे अक्सर &lt;strong&gt;‘‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो’’&lt;/strong&gt; गाया करते थे। आल्हा-उदल के छंदों के साथ हरदौल का चरित्र गाकर सुनाया जाता था तो बड़े चाव से सुनते थे। इस प्रकार चरित्र श्रवण से उनके हृदय में वीर-भाव जागृत हुए। निर्भीकता, दृढ़ निश्चय व व्यवहार कुशलता पिताजी से विरासत में मिली। माखनलाल जी को कई भाषाओं में महारत हासिल थी। कुछ को बोल लेते थे तो कुछ को लिख भी लेते थे। बांग्ला उन्होंने विष्णु पंतजी से सीखी। इसी तरह मराठी, गुजराती, ऊर्दू, फारसी और अंग्रेजी भाषा पर आपकी पकड़ थी। चतुर्वेदी जी का विवाह सन् 1930 में बाबई में ही ग्यारसी बाई से हो गई थी। तब वे 14 साल के थे और पत्नी की उम्र 09 वर्ष की थी। आपकी संतान कन्या के रूप में हुई पर जल्द ही उसकी मृत्यु हो गई। बीमारी के कारण पत्नी के देहांत 1914 में हो गया। वे बहुत दुखी हुए और ऐसे क्षण में दुख से भरी कविता &lt;strong&gt;‘भाई छेड़ों नहीं मुझे’&lt;/strong&gt; शोक गीत लिखी। माखनलाल जी को माता-पिता व परिवारजन समेत प्रिय मित्र गणेश शंकर विद्यार्थी ने दूसरे विवाह के लिए समझाया और दबाव डाला पर उन्होंने मना कर दिया और अकेले ही जीवन पथ पर निकल पड़े। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सुनहरे अतीत को पलटने पर पता चलता है कि माखनलाल जी का साहित्यिक व पत्रकारीय दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के जिन आंदोलन में भाग लिया। उसका प्रारंभ रतौना कसाई खाना आंदोलन से माना जाता हैै। इस आंदोलन के कारण अंग्रेजों को मुंह की तरह खानी पड़ी। रतौना कसाई खाना आंदोलन अपने युग का सबसे सफल जन आंदोलनों में से एक था। जिसकी शुरूआत चतुर्वेदी जी द्वारा प्रकाशित अखबार कर्मवीर से हुआ। 1920 में एक&lt;span class=&quot;&quot;&gt;  ब्रिटिश &lt;/span&gt;कंपनी सेंट्रल और ट्रेडिग ने सागर के निकट में रतौना नामक स्थान पर कसाई खाना खोलने की अपनी विस्तृत योजना को समाचारपत्र में विज्ञाप्ति किया। चतुर्वेदी जी अपनी बंबई यात्रा के दौरान पायोनियर नामक समाचार पत्र में यह विज्ञापन पढ़ा। उन्होंने अपना 17 जुलाई 1920 को दिया जाने वाला संपादकीय रोककर रतौना कसाई खाना की विभित्सता पर नया संपादकीय लिखा जो &lt;strong&gt;‘गौवध की ख्रूंखार तैयारी’&lt;/strong&gt; शीर्षक के अंतगर्त प्रकाशित हुआ। इस कारखाने को ब्रिटिष कंपनी 40 लाख रूपये की&lt;span class=&quot;&quot;&gt;  rashii  &lt;/span&gt;से स्थापित करने वाली थी। इसमें प्रतिदिन 2500 गायों के काटने की योजना थी। कर्मवीर में माखनलाल जी संपादकीय लिखने के बाद समस्त प्रदेश में उसके विरोध में एक ज्वाला सी दहल उठी। थोड़े ही समय में अखिल भारतीय आंदोलन का वातावरण बन गया। माखनलाल जी ने इस आंदोलन का नेतृत्व वैज्ञानिक भूमि पर किया और उसे धार्मिक सीमाओं से मुक्त रखा। परिणाम यह हुआ कि उन्हें हिन्दुओं के साथ मुसलमान, सिक्खों और ईसाइयों का प्रबल समर्थन प्राप्त हुआ। 12 मार्च 1921 के आंदोलन को विस्तार देने के लिए एक राजनैतिक परिषद् को संबोधित करने वे बिलासपुर आये थे। सभा में चतुर्वेदी जी ने कहा- ब्रिटिश राज के प्रेस एक्ट ने हमें नामर्द बना दिया है। 150 साल के अंदर ब्रिटिश सरकार सिर्फ दस प्रतिशत लोगों को पढ़ा सकी है। हिन्दुस्तान में अंग्रेज मुठ्ठी भर है। हम चाहे तो उनका कचूमर निकाल दे परंतु कम संख्या वाले अंग्रेजों को मारना कायरता और नीचता है। इस भाषण से उन पर राजद्रोह का मुकदमा बिलासपुर के अदालत में दायर किया गया। उनके खिलाफ मुकदमा चला और 05 जुलाई को कारावास की सजा सुनायी गयी। अदालत में एक कविता पढ़ते हुए अपनी सर्वोच्च आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की थी। उन्होंने कहा थाःहूं राष्ट्रीय सभा का सैनिक, छोटा सा अनुगामी हूँ।  इसकी ध्वनि पर मर मिटने में, मैं खुद अपना स्वामी हूं।। आठ माह की जेल काटने के बाद 04 मार्च 1922 को वे जेल से रिहा हुए। 18 फरवरी 1922 को बिलासपुर जेल के चहारदीवारी के अंदर पुष्प के माध्यम से अपने जीवन की घोषणा की जो आज प्रत्येक भारतवासी के कंठों में रच-बस गया है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt; &lt;strong&gt;चाह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt; नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूथा जाऊ&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt; चाह नहीं प्रेमी की माला छिंद प्यारी को ललचाउ.....&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;strong&gt;मुझे तोड़ देना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंका &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;strong&gt;मात्री भूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ पर जाए अनेक।।&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;1930 में उन्हें राजद्रोह के अभियोग में फिर एक वर्ष की सजा हुई। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 63 बार तलाषी ली गई और 12 बार कारावास की सजा भोगनी पड़ी। वस्तुतः हिन्दी लेखन में जहां तक अनुभूति की निष्ठा का प्रष्न है उसमें माखनलाल जी स्थान अप्रतिम है। साहस भरे पुरूष की दृढ़ता और कवि सुलभ कोमलता के भी प्रतीक थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रकृति का ऐसा मानवीकरण किया कि वे छायावाद की पहली रचनाओं के रूप में स्वीकार की गई। उनकी प्रथम काव्य संग्रह ‘हिमकिरीटनी’ एक भारतीय आत्मा के नाम 1942 में प्रकाषित हुई। इसमें उनके द्वारा लिखी गयी कविता जबलपुर संेटल जेल में लिखी है। दूसरा काव्य संग्रह ‘हिमतरंगिनी’ लगभग सात वर्ष बाद 1949 में प्रकाषित हुआ। उसमें 1908 से लेकर 1945 तक 55 कविताएं संकलित है। तीसरा काव्य संग्रह 1951 में ‘माता’ नाम से प्रकाशित हुआ। 56 कविताएं संग्रहित है जो 1904 से लेकर 45 के बीच लिखी गई । चौथा काव्य संग्रह 1964 में आया। माखनलाल एक कुशल वक्ता भी थे। जब वे बोलते थे तो लोग शांत हो जाते थे। उनके वक्तृत्व कला पर महात्मा गांधी भी मुग्ध थे। उन्होंने एक बार टिप्पणी की थी-&lt;strong&gt;‘हम सब लोग तो बात करते है, बोलना तो माखनलाल जी ही जानते है।&lt;/strong&gt; सन् 1933 में मध्यप्रदेश में  महात्मा गांधी के हरिजन दौरे के समय बाबई पहुंचे थे। तब उन्होंने कहा था- &lt;strong&gt;मैं बाबई जैसे छोटे स्थान पर इसलिए जा रहा हूं  क्योंकि  वह माखनलाल जी का जन्म स्थान है। जिस भूमि माखनलाल जी को जन्म दिया है, उसी भूमि को मैं सम्मान देना चाहता हूं।’&lt;/strong&gt; अज्ञेय धर्मवीर भारतीय, रामधारी सिंह दिनकर, गोपाल प्रसाद व्यास, ज्वाला प्रसाद, आषारानी, सुधाकर पांडेय, विष्वभर नाथ पांडे, सुमित्रानंदन पंत, शिवकुमार मिश्र, श्रीकांत जोशी आदि पत्रकारों और साहित्यकारों ने चतुर्वेदी जी कलम को शक्ति की खूब प्रशंसा की। वे हिन्दी के गौरव रहे है। उनके जबान में सरस्वती निवास करती थी। कलम में  अद्भूत शक्ति थी। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान युगों-युगों तक स्मरणीय रहेगा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://eknaisoch.blogspot.com/feeds/6690262915580296138/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/6690262915580296138'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/6690262915580296138'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='माखनलाल चतुर्वेदी : &quot;एक भारतीय आत्मा&quot;'/><author><name>Ek Nai Soch</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13312145934333738798</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj-a2ACk23oxvAmAXM22T6BKvxVMBsYd3TAwsSyG6iSsSc5dv1eyytcySQPFwDq946mySMfLYjQQnEgcz8_Z0KnNX89sgxC_tqa5aQuf6qKi5bHjQ1vI21LDb_TpkgOEmb_k2OBjDDf03lc/s72-c/Makhan_lal_Chaturvedi.jpg" height="72" 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सकूं...</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://eknaisoch.blogspot.com/feeds/2424574287767291736/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2009/10/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/2424574287767291736'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7507238667008689912/posts/default/2424574287767291736'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://eknaisoch.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='आप से रु-ब-रु'/><author><name>Ek Nai Soch</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13312145934333738798</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' 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