<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0">

<channel>
	<title>Gyan Vaani</title>
	
	<link>http://www.gyanvaani.com</link>
	<description>True meaning of existence</description>
	<lastBuildDate>Mon, 23 Nov 2009 16:48:48 +0000</lastBuildDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=2.9.2</generator>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
			<atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/rss+xml" href="http://feeds.feedburner.com/GyanVaani" /><feedburner:info uri="gyanvaani" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><feedburner:emailServiceId>GyanVaani</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><item>
		<title>आत्मिक गुणों का महत्त्व और उनका अपने जीवन में उपयोग किस प्रकार हो</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/GyanVaani/~3/Of71z_r6GwQ/</link>
		<comments>http://www.gyanvaani.com/2009/11/23/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%a3%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%94/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 23 Nov 2009 16:48:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>meeru</dc:creator>
				<category><![CDATA[General]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.gyanvaani.com/?p=174</guid>
		<description><![CDATA[सुनो मुझ पिता से मंगल मिलन मना कर जीवन के अन्दर छाये अन्धकार के बारे एवं उसके निराकरण करवाने हेतु प्रार्थना कर रहे मेरे सच्चे बच्चे, जब कोई ज्ञानवान बच्चा सच्ची राह पर चलकर अपना और अन्य आत्माओं का कल्याण करना चाहता है तो वह बच्चा मेरे घर का वह अधिकार प्राप्त कर लेता है [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सुनो मुझ पिता से मंगल मिलन मना कर जीवन के अन्दर छाये अन्धकार के बारे एवं उसके निराकरण करवाने हेतु प्रार्थना कर रहे मेरे सच्चे बच्चे, जब कोई ज्ञानवान बच्चा सच्ची राह पर चलकर अपना और अन्य आत्माओं का कल्याण करना चाहता है तो वह बच्चा मेरे घर का वह अधिकार प्राप्त कर लेता है जिसे न जाने कितनी सीढियां मैंने पार करवा देनी होती हैं ! बच्चे सच्चा रास्ता हर किसी को प्राप्त नहीं होता,इसकी डगर कठिन होती है! जब तक बच्चे को राह दिलवानी होती है तब तक तो उसे अनेको सुगम रास्ते प्राप्त हो जाते हैं, जिन रास्तो पर उन्हें राह दिखाने वाले भी अनेको मिल जाते हैं, लेकिन जब जीव उस राह पर पहुचता है जो पहुचती है सीधे मुझ तक! तब सब कुछ छूट  जाता है, अकेले जीव को अपनी आत्मा के गुणों के आश्रय के सहारे चलना पड़ता है! यहाँ केवल आत्मिक गुण ही संगी होते हैं, ये ही साथी होते हैं! इस राह में फूल पर भंवरे की तरह मंडराते हुए अवगुण आत्मिक गुणों का हनन  करने के लिए आते हैं! अगर आत्मिक गुणों में शक्ति अधिक हुई तो अवगुणों को पास भी नहीं फटकने देगी! यहाँ जीवात्मा की जीत हुई कही जाएगी! लेकिन आत्मिक गुणों कि कमी होने पर अवगुणों का मुकाबला आत्मा नहीं कर पाएगी! अवगुण  गुणों पर हावी होंगे और जीवात्मा की हार कही जाएगी! तो बच्चे किस दौर से गुजर चुके हो और किस दौर में से गुजर रहे हो, देखो! मन का संताप तुम्हे तडपा चुका है और कौन सा तडपा रहा है! संताप पैदा हुआ तो कहाँ से! कमी किसकी थी,तुम्हारी या तुम्हारे संताप के कारण की! बच्चे कमी तो तुम्हारी ही रही थी! क्यूंकि वार करने वाले की जीत हुई वह बलशाली था! तुम्हारे आत्मिक गुण प्रबल न होने से वे वार को सहन नहीं कर पाए! अब सुनो असली बात, आत्मिक गुण बलहीन क्यों हुए! बच्चे, १ और १ ग्यारह कहे जाते है! २ और २ बाईस बन जाते हैं, मात्र १ को अपने सामान १ की ही आवश्यकता पड़ती है स्वयं को ११ कहलवाने के लिए ! उसे २ या ३ को ढूँढने की आवश्यकता नहीं पड़ती! मात्र अपने सामान को ढूँढा और अपनी शक्ति बढा ली! बच्चे ठीक इसी तरह आत्मिक गुणों की बढौतरी का हिसाब है! अपने समान गुणों की ही तलाश करनी है, बस बन गयी बात! आत्मा के गुणों का पिटारा मना तुम्हारे पास है! तुमने आज तक क्या किया, अपने गुण बढाने का प्रयास कम, दुसरो के अवगुण ढूंढ कर उनके अवगुणों का दुष्प्रभाव अपने गुणों पर करवाया! मान लिया, दुसरे के अवगुण अत्यंत भारी थे, थे तो उसके लिए थे , तुमने बेमतलब उस से अपने अवगुणों को क्यों पिटवाया! राक्षस बाहर निकलेंगे ,हुडदंग मचाएंगे ही,उन्हें बाहर निकलने के लिए प्रेरित किसने किया,तुमने,ललकारा किसने,तुमने! तो पिटाई किसकी होगी,तुम्हारी ही तो होगी! क्यूंकि पहले दहाड़े  भी तुम! तुम्हारी हार में कसूर तुम्हारा स्वयं का है, किसी और का है ही नहीं! तो बच्चे गाँठ बाँध लो आज से की किसी के मलबे में हाथ मरना नहीं! कोई कीचड से सना है तो उसे हो न हो,तुम्हे क्या! तुम क्यों अपने आप को उस कीचड से सनवा रहे हो! बच्चे आजमा कर देख लेना,अपने  किसी एक भी गुण से दुसरे जीव के गुण कुरेदोगे तो तुम्हारे खाते में उस गुण की बढौतरी होती चली जाएगी जो भी जीव तुम्हारे संपर्क में आये, उस के गुणों का खाता अपने गुणों में मिलाने का प्रयास प्रारभ कर दो! स्वागत करो उसका अपने सद्गुणों से! उड़ेल दो अपने सारे गुण उस पर! फिर देखना कैसे दो गुणों होकर तुम्हे वे सारे गुण वापिस मिल जायेंगे! अवगुण फेंकोगे तो  दो गुने होकर वापिस मिलेंगे! गुण फेंकोगे तो गुण दो गुना  होकर वापिस मिलेंगे! दूसरी जीवात्मा तुम्हारा तिरस्कार कर ही नहीं सकती! वह तो तुम्हारी  सौगात को दो गुना करके वापिस कर रही है! भेंट तो तुम्हारी ही  कूड़ा-कबाड़ है तो फिर दुसरे को दोष कैसा! वह तो मजबूर है भेंट का हिसाब भेंट के अनुरूप ही देना है! १ और १ ग्यारह करने है! सो बच्चे चिंता की आवश्यकता नहीं! अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा! समय और सामग्री दोनो तुम्हारे पास है! आज से अभी से अपने गुण रुपी फूलो से हार तुम्हे तैयार करने हैं,और उन हारो को स्वयं सजाना है! अर्थात आत्मा की सुन्दरता बढानी है! अब यह काम भी तुम्हारा है, करना भी तुम्हे समय रहते है! उसका लाभ भी तुम्हे ही होगा और में क्लास के न. १ बच्चो में तुम गिने जाओगे! अब आज से १०८ आत्माओं का संगम अपनी आत्मा के साथ करना है तुम्हे यह सोच कर एक-२ हार सज़ा कर अपनी आत्मा को देना है! यही मुझे उपहार होगा तुम्हारी तरह से इस जीवन का !बच्चे सोच लो दूसरी आत्मा के गुण कैसे कुरेदोगे!कुदाली किसे बनाओगे! बच्चे जो गुण तुम्हे चाहिए अपने गुण की ही कुदाली बना लो! और बटोर लो जितना बटोर सकते हो! एक से ही  पूर्ती में संतुष्टि न मान कर जहाँ से भी जिस भी जीवात्मा से जो भी गुण मिले उसे  बटोरने का प्रयास करो! तुम्हे अधिक प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्यूंकि जिसके पास विनम्रता और त्याग नाम के गुण हैं ये तो उस फाली का काम करते है कि आत्मिक भंडारों के खजाने स्वयं तुम्हारे सामने आ जायेंगे! जहाँ गुणों के भण्डार की खाने तुम्हारे साथ हो,लेकिन जिनके मुह उलटी तरफ हो जहाँ तक तुम्हारा पहुचना ही नहीं बन रहा हो,या वहाँ पहुचने के लिए रास्ता तुम्हे नज़र नहीं आ रहा हो, यह काम मेरे सपुर्द कर दो! इसमें मुझ पिता के बताये गये नियमों का पालन मात्र करने से पथरीली चट्टानें भी पिघल जाया करती है और गुण लावे के रूप में बहने लगते हैं! सो बच्चे काम तुम्हे  बता दिया गया है! है भी आसान! चाहे कही से भी, कैसे भी  मात्र  गुणों का संचय करना है! १०८ आत्माएं अपने संपर्क में मिलना संभव हो सके, तैयार करनी हैं! किसको कैसे अपने गुणों को सवारना है, यह देखो! जो भी आत्मा तुम्हारे संपर्क में है उसे खोना नहीं! हर किसी को कुछ न कुछ भेंट स्वरुप देना ही है! चाहे वह आत्मिक संपत्ति हो या भौतिक! बात तो काम शुरू करने से है! आखिर बात तो आत्मिक कार्य तक ही पहुचेगी! सो बच्चे आज से गिनती १०८ की १ से शुरू कर दो! दूसरा क्या भूल कर, तुम स्वयं क्या हो, यह देखो! </p>
<img src="http://feeds.feedburner.com/~r/GyanVaani/~4/Of71z_r6GwQ" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.gyanvaani.com/2009/11/23/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%a3%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%94/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<feedburner:origLink>http://www.gyanvaani.com/2009/11/23/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%a3%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%94/</feedburner:origLink></item>
		<item>
		<title>भाव समर्पण और कृष्ण  प्राप्ति की राह</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/GyanVaani/~3/-qmFZfpLrc8/</link>
		<comments>http://www.gyanvaani.com/2009/08/15/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%a3-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%aa/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2009 06:46:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>meeru</dc:creator>
				<category><![CDATA[ज्ञानवाणी (1996)]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.gyanvaani.com/?p=167</guid>
		<description><![CDATA[मुझ अगोचर पिता के बच्चे ,जिस प्रकार प्राण जो शरीर में रहते हैं,शरीर को चलाते हैं,हर पल रहते हुए महसूस होते हैं मगर उन्हें किसी ने देखा नहीं है,ठीक उसी प्रकार मैं अगोचर पिता तुम्हारे साथ हर पल रहकर तुम्हे चलायमान रखता हूँ लेकिन नेत्रों से दिखाई नहीं देता! इसका अर्थ यह नहीं की दिखाई [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मुझ अगोचर पिता के बच्चे ,जिस प्रकार प्राण जो शरीर में रहते हैं,शरीर को चलाते हैं,हर पल रहते हुए महसूस होते हैं मगर उन्हें किसी ने देखा नहीं है,ठीक उसी प्रकार मैं अगोचर पिता तुम्हारे साथ हर पल रहकर तुम्हे चलायमान रखता हूँ लेकिन नेत्रों से दिखाई नहीं देता! इसका अर्थ यह नहीं की दिखाई नहीं दे रहा तो हूँ नहीं! हूँ,सदा हों,सदा रहूँगा! लेकिन क्या तुम मुझे देखना चाहते हो,यह तड़प कितनी है,इस बात का अंदाजा लगता हूँ मैं! बच्चे मीरा भी संसार में जन्म लेकर आई थी! तो उसका तड़प का फल क्या निकला की,जिस रूप को उसने चाहा उसी में सामना उसका बना! नाम जुड़ गया उसका उसी रूप के साथ! क्यूंकि उसी रंग में रंग गयी थी वह! ठीक उसी तरह पार्वती ने पर्वतो में रहकर जिस स्वरुप का ध्यान किया उस स्वरुप में स्वयं को डुबो दिया एवं शंकर को अर्धनारीश्वर नाम मिलने लगा! तो बच्चे हर संसारी प्राणी अगर चाहे तो परमात्मा की प्राप्ति उसे हो सकती है,लेकिन उसके लिए तो मन से व्यापार कौडियों का नहीं कीमती श्वासों का चलाना पड़ता है! एक-२ श्वास अनमोल हीरे की कीमत अदा कर्ता है! सो बच्चे आज यही ज्ञान-प्रेरणा तुम आत्मा को है की लग्न भी जब बच्चे की सच्ची होती है तो वहां अग्नि जो तड़प रुपी जलती  है वही सच्ची जोत होती है! जहाँ जोत जलती है वहां परमात्मा का वास रहता ही है! जहाँ परमात्मा का वास होगा वहां आत्मा प्यासी रहे ऐसा होना असंभव होता है! तो बच्चे  कीमती श्वासें जग को अर्पित न करते हुए मात्र मन से &#8220;टेर&#8221; ही निकालो</p>
<p>मैं तेरा हूँ,तू मेरा है,फिर भला क्यों रहता यहाँ अँधेरा है! चारो योगो की भटकी हुई मैं,अब तेरा घर ही मेरा है! दो कान दिए थे सुन ने को,पर कुछ भी सुन न पायी थी मैं,मन की इस वीणा से,टूटा फंदों का घेरा है! तेरा घर ही मेरा है! मीरा बनाने की चाहत ने,मुझे दर पे  तेरे भेज दिया,जब रंग में लगी थी रंगने तेरे,राणा ने ज़हर उडेल दिया! इस विष से बच्चा लो मुझ को प्रभु,अब ज़हर पिया बहुतेरा है! बन पार्वती मैं वन में जाऊ,अब यही करो मुझ पर कृपा,अब तेरा घर ही मेरा है! बन शंकर तुम भी आ जाओ,मेरे मन की बुझा दो ये तृषा,तुम शंकर हो मैं भक्तन हूँ,दर्शन की कर दो अब कृपा! तेरा घर ही अब मेरा है! टूटा फंदों का घेरा है!</p>
<p>सुनो बच्चे कीमती श्वास  ही तुम्हे मीरा बना देंगे और ये ही तुम्हे उस रंग में दुबोयेंगे जहाँ स्वयं श्री कृष्ण तुम्हारा हाथ थाम कर शंकर स्वरुप से तुम्हे पार्वती बना कर अपना लेंगे! भाग्यो को भाग मत होने दो! उन्हें कर्मो के द्वारा गुना करके बढाते रहो! यही संख्या तुम्हारी सीढीया  बनेगी  मुझ  तक  पहुचाने  की !सबसे पहले शब्द की धुन को ग्रहण करो! रात्रि १२ बजे के बाद चलनी आरम्भ होती है सुबह होने से पहले तक चलती है! अर्थात कानो को खुला रखना होता है इस समय! अंतर्मन से उठने वाली इस धुन को देने वाल्व हैं ही श्री &#8220;कृष्ण&#8221; अर्थात जिसने इस धुन को सुन लिया कृष्ण की पकड़ उसे हो गयी! फिर उस छवि को अपने अन्दर निहारो जिसे प्राप्त करना चाहते हो! छवि का दर्धन होने से पहले वहां उजाला होगा फिर स्वरुप नज़र आएगा! स्वरुप का साक्ष्ताकार हो जाने के बाद स्वयं का स्थान प्रभु के हृदय में विचारते हुए हर कर्म जो भी तुम करोगे ऐसा हो नहीं सकेगा की प्रभु को प्री न हो! जब हर कर्म प्रभु के लिए प्रिय होगा तो जो होगा प्रभु के लिए! फिर तुम स्वयं को प्रभु में खोया हुआ अनुभव करोगे! एक-२ पल तुम्हे अनमोल खजाना जीवन का तभी महसूस होगा! सो बच्चे गुजर गए जमाने की तलाश छोड़ कर ,नया ज़माना नए सिरे से बनाना है जिसमें प्रभु,प्रभु के पारे ,प्रभु के प्रिय कर्म यही सब होगा! नाटक जो पहले तुम संसार के साथ करते रहे हो,अब मेरे साथ करने होंगे! फिर देखना तुम्हारा जीवन कैसा बनेगा! यही जीवन तुम्हारा अंतिम पल सुधारने वाला बनेगा! सो बच्चे निराहार रह कर पार्वती ने कठोर तप किया था तुम भी उसी की भागी बनो! यह वरदान है तुम्झे मुझ पिता का! आज से ही तुम्हारी सायमी जीवन की मनो-इच्छा पूरी हो सकेगी! कांटो भरा जीवन फूलो की सेज महसूस  होगा!</p>
<img src="http://feeds.feedburner.com/~r/GyanVaani/~4/-qmFZfpLrc8" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.gyanvaani.com/2009/08/15/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%a3-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%aa/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<feedburner:origLink>http://www.gyanvaani.com/2009/08/15/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%a3-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%aa/</feedburner:origLink></item>
		<item>
		<title>जीवन की सार्थकता हेतु अनमोल ज्ञान-रत्न ग्रहण करना</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/GyanVaani/~3/a78fykldH4s/</link>
		<comments>http://www.gyanvaani.com/2009/08/15/%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%ae/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2009 05:39:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>meeru</dc:creator>
				<category><![CDATA[ज्ञानवाणी (1996)]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.gyanvaani.com/?p=163</guid>
		<description><![CDATA[मुझ पिता की शरण ग्रहण कर चुकी बच्ची ,दिन जिस प्रकार  दिन ही कहलाता  है,रात्रि रात्रि ही कहलाती  है,फिर भी दिन और रात की अलग-2 अवस्थाएं  होने से दिन की अपेक्षा  रात्रि के कुछ पल अत्यंत  कीमती  कहे  जाते हैं! हर पल,नक्षत्र  एवं  अवस्था  का कुछ अंश  अत्यंत  फलदायक  होता है! अगर उस पल को ही संभाल  [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मुझ पिता की शरण ग्रहण कर चुकी बच्ची ,दिन जिस प्रकार  दिन ही कहलाता  है,रात्रि रात्रि ही कहलाती  है,फिर भी दिन और रात की अलग-2 अवस्थाएं  होने से दिन की अपेक्षा  रात्रि के कुछ पल अत्यंत  कीमती  कहे  जाते हैं! हर पल,नक्षत्र  एवं  अवस्था  का कुछ अंश  अत्यंत  फलदायक  होता है! अगर उस पल को ही संभाल  लिया जाता है तो पुरे  दिन या रात्रि का फल  मिल जाता है! जिस प्रकार  पूरा  जीवन कोई पुष्कर   तीर्थ  में स्नान  कर लेता  है और उसे  सारे तीर्थो  का पुन्य  मिल जाता है ठीक उसी  प्रकार  पूरा  दिन ध्यान  न करने वाला जीव  एक बार संध्या  का  समय ध्यान  में व्यतीत   कर देता है उसे पूरे  दिन की प्रभु  सेवा  का फल  मिल जाता है! बच्चे  कभी-2 मन की गति  इतनी तीव्र  होती है की अत्यंत  कठिनता  से प्राप्त  हो सकने  वाली  &#8220;बौद्धिक   शक्ति &#8221; स्वयं जागृत  हो जाती है! इसके पीछे  भी उदाहरण  कुछ पलों  के प्रयोग का ही आता है! सो बच्चे जीवन बहुत बड़ा होने के साथ -२ ,हर तरह के कर्म-बन्धनों से बंधे हुए तो हो ही तुम जीव,लेकिन फिर भी तुम कर्ता स्वयं को मत मानो! बुद्धि एवं मन का हिसाब मुझ परमात्मा के स्थायी स्थान अपनी आत्मा से बना कर रखो ! फिर जो होगा मुझ पिता के हिसाब से ठीक ही होगा,न्यारा  होगा,प्यारा होगा! मात्र तुम निमित्त बनते रहो,बने रहे हो,बने रहोगे१ न जाने किस  आत्मा का उधहार किस रीती से होना लिखा गया था! कर्म के फंदे तो मुझे सभी के कटवाने होते है,जब काम काटने का है फिर तेज़ धार वाले औजार की आवाश्यकता पड़ेगी! वह तेज़ धार तुम जीवो की बुद्धि ही होगी! जिसे पैनी करने का जरिए &#8220;ज्ञान-घाट &#8221; होते हैं! तुम तो स्वयं ही घाट  हो,कहीं जाने की आवाश्यकता तुम्हे नहीं! सो बच्चे कर्म के बलबूते तुम अपना हर तरह का कर्तव्य हर जीव के प्रति पूरा करते रहो! मन मुझ में लीन  होगा तो कर्म मुझ तक पहुचेगा! तुम अछूती रहोगी कर्म-फल से! इस फल का हिसाब तो मुझे इकठा करना होता है! तुम निश्चिंत अपना कर्म करते रहकर क्षत्रिय वंश की भाँती विकारों का सफाया  करने का मन बनाए रखो! बच्चे कर्म में कर जीव लीनहै! वह मुझ द्वारा ही चलाया जा रहा है! संस्कारों के हिसाब से उसका मन आत्मा के अधीन बनता है अन्यथा तो वह अपने ही विकारों के द्वारा दबोच लिया जाता है! जब घ्यान की वर्षा होती है तो विकार भाग जाते है और वहां से आत्मा का काम आरम्भ होता है! तो बच्चे इसी वर्षा की आवश्यकता कलियुग में पड़ती है तभी अनेको संगठन ,मठ,अलग-२ परंपराएं चालू की जाति है मन को आत्मा के अधीन करने के लिए! जिस जीव का मन जहाँ जिस वातावरण में शान्ति अनुभव करता  है वही उसकी निष्ठा बनती है! उस समय असली कार्य आरम्भ होता है! भगवान् श्री कृषण की सोलह हज़ार रानियों का भी यही अर्थ है की १६ हज़ार आत्माएं विकारों की जेल में बंद थी! कहा जाता है की १६ हज़ार रानियों ने श्री कृषण कृपा से ही जेल से मुक्ति पायी थी अर्थात भगवान् ने ज्ञान-मुरली बजाई जिसे रानियों ने अपना कर जेल से छुटकारा पाया और सदा-२ के लिए भगवान् के गुण अपनाने का व्रत उन्होंने लेकर श्री-कृष्ण  के हृदय में वास किया! ऐसे ही जीवो को चंगुल से छ्द्वाना होताहै विकारों के,यह व्रत लेकर चलना होगा,गुड  दिखाओगे तो गुड  खाने वाले तुम्हारे पास अवश्य आयेंगे!</p>
<div><span style="font-family: arial; font-size: medium;"><span style="line-height: 25px;"><br />
</span></span></div>
<img src="http://feeds.feedburner.com/~r/GyanVaani/~4/a78fykldH4s" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.gyanvaani.com/2009/08/15/%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%ae/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<feedburner:origLink>http://www.gyanvaani.com/2009/08/15/%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%ae/</feedburner:origLink></item>
		<item>
		<title>इश्वर द्वारा आत्माओ का परीक्षण और उनके गुणों का सदुपयोग करवाना</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/GyanVaani/~3/HDukpxWqR9I/</link>
		<comments>http://www.gyanvaani.com/2009/07/26/%e0%a4%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%93-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 26 Jul 2009 09:20:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>meeru</dc:creator>
				<category><![CDATA[General]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.gyanvaani.com/?p=160</guid>
		<description><![CDATA[मुझ अन्तर्यामी कहलाने वाले त्रिकालदर्शी अवधूत पिता शंकर के अनंत स्वरुप को प्राप्त कर चुके मेरे घर के सर्वश्रेष्ठ बच्चे सुनो ध्यान से किस बच्चे का जीवन किस तरीके से गुणवत्ता को प्राप्त करने में सक्षम हो सकता है यह मुझ पिता को देखना होता है! बच्चे के भावो की गुणवत्ता की परख करके उत्तम मार्ग [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मुझ अन्तर्यामी कहलाने वाले त्रिकालदर्शी अवधूत पिता शंकर के अनंत स्वरुप को प्राप्त कर चुके मेरे घर के सर्वश्रेष्ठ बच्चे सुनो ध्यान से किस बच्चे का जीवन किस तरीके से गुणवत्ता को प्राप्त करने में सक्षम हो सकता है यह मुझ पिता को देखना होता है! बच्चे के भावो की गुणवत्ता की परख करके उत्तम मार्ग बच्चे को दिखा दिया जाता है! बच्चा मन की शुद्धता के अनुसार कर्म श्रृंख्ला से जुड़ कर अपने कर्मो का भुगतान करते रह्कत अपना जीवन मेरे प्रति समर्पित करता है! यह तो हुआ जीव का स्वयं का कल्याण होने का हिसाब! लेकिन इस से ऊपर एक गुप्त मार्ग चलता हैजिसमें प्रवेश  मात्र   उन्ही आत्माओ को मिलता है जिनका जीवन संकल्प बद्ध तरीके से चलना होता है! ये संकल्प अन्य आत्माओ के कल्याणार्थ लिए जाने होते हैं जिनमें पूर्वजन्मो के पाप दोषों के तहत भुगतान में लगी आत्माओ को उनके मार्ग तय करने में सहायता प्रदान करवाई जानी होती है! बच्चे राह चलते -२ प्यास से व्याकुल जीव को मात्र दो बोंड पानी मिल जाए उसी से वह जीव निढाल होकर गिरने से बच जाता है! जैसे ठीक उसी प्रकार इस धरा पर अपना जीवन जी रही आत्माएं कहीं न कहीं से ऐसे किसी मोड़ टकरा कर गिरी पड़ी है या घायल हो चुकी हैं जिस मोड़ पर उन्हें सिवाए  रोने के कुछ सूझ नहीं रहा क्यूंकि  यहाँ उन्हें देखने वाला या उठाने वाला सहारा देकर मलहम पट्टी करने वाला कोई नज़र नहीं आ रहा! बच्चे यह बात आध्यात्मिकता के हिसाब से कही जा रही है अर्थात अच्चा भला जीवन जी रही आत्मा पूर्वजन्मो के किसी अपराध के निर्धारित दंड  स्वरुप किसी भी कारण से गिरा दी जाति है यह उसका भगतान हुआ! लेकिन उसके स्वयं के पुन्य्कर्मो की पोंजी इतनी नहीं के किसी को उसका सहायक बनाकर उसे उठाने में मदद दिलवाई जा सके! तो ऐसे में मैं पिता अपने उत्तम <span>बच्चो  की ऐसी श्रृंखला  तैयार  करवाता  हूँ  जो ऐसी आत्माओ के कल्याण के कार्य  में जुट  सकें ! </span> बच्चे ऐसी उत्तम आत्माएं  अपने कर्मो की कसौटी  पर खरी  उतरे    इसके लिए उनकी भी पहले कड़ी  परीक्षा  ली जानी होती है! ऐसे आत्माओ को तराजू  के दो पल्दो  के बीच  खडा  कर दिया जाता है! एक पलडे  में सारे संसार  का धन -ऐश्वर्य  रखा  जाता है और दुसरे  में मैं पिता कष्टों  से तड़प  रही आत्माओ के लिए उस आत्मा  से उसका संकल्प जप -तप -व्रत  का लेने  के लिए उसका बाकी का जीवन भीख  के रूप में मांगने  के लिए अपना भिक्षा  पात्र  रख  देता हूँ! तो मेरा बच्चा किस चीज़ को उठाता  है ये देखना होता है मुझे१ बच्चे में कितना त्याग भाव है यह पता चलता है अगर बच्चे ने मेरे भिक्खशा -पात्र  में स्वयं का संकल्प से भरा मन दाल दिया तो बच्चे तुम मेरे द्वारा तैयार कसौटी पर खरे उतरे हो! यह मुझ पिता की स्वयं की इच्छा का हिसाब है जिसे तुम आत्मा ने सच्चे  मन से स्वीकार  है! बच्चे तुम्हारी  झोली  आज से उन हीरे -मोतियों  से भर  दी गयी है जिन्हें  मुझे जीवो  को उनके काम के बाद प्रदान करवाना  होता है! तुम्हारे कार्य की गति इस हिसाब से हो की देवताओं का आह्वाहन स्वयं होना बने! हर देवता अपनी कृपा का स्वरुप पेश करते रह कर तुम्हारे कार्य को प्रगति प्रदान करेंगे! कार्य का स्वरुप तुम्हारी गुणवत्ता जाहिर करेगा! दूध-घृत-दही-माखन-गंगाजल , इन पांच अमृतों का पंचामृत जैसे मुझे अत्यंत प्रिय है ठीक उसी प्रकार तुम्हारे पुण्यकर्म  पंचामृत बन कर मुझे स्वीकार्य होंगे! यह तुम आत्मा को मुझ पिता का वरदान  है!</p>
<img src="http://feeds.feedburner.com/~r/GyanVaani/~4/HDukpxWqR9I" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.gyanvaani.com/2009/07/26/%e0%a4%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%93-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<feedburner:origLink>http://www.gyanvaani.com/2009/07/26/%e0%a4%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%93-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/</feedburner:origLink></item>
		<item>
		<title>कैसी आत्मा के शरीर में भगवान् निवास करते हैं और उस आत्मा को क्या करने की प्रेरणा वो देते हैं</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/GyanVaani/~3/bnD6q-Rhhrc/</link>
		<comments>http://www.gyanvaani.com/2009/07/09/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 09 Jul 2009 17:09:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>meeru</dc:creator>
				<category><![CDATA[General]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.gyanvaani.com/?p=157</guid>
		<description><![CDATA[सुनो मुझ परमदेव महादेव के परमप्रिय शिष्य, तुम शिष्य हो ,मैं शिक्षक हूँ! तुम भक्त हो मैं भगवन हूँ! तुम बालक हो मैं पिता हूँ! तुम शक्ति प्राप्त कर रहे हो मैं शक्ति दे रहा हूँ, तुम्हारा हर श्वास मेरे श्वास से जुडा है क्योंकि तुम बाहर हो मैं अन्दर हूँ! तुम बोलते हो मैं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सुनो मुझ परमदेव महादेव के परमप्रिय शिष्य, तुम शिष्य हो ,मैं शिक्षक हूँ! तुम भक्त हो मैं भगवन हूँ! तुम बालक हो मैं पिता हूँ! तुम शक्ति प्राप्त कर रहे हो मैं शक्ति दे रहा हूँ, तुम्हारा हर श्वास मेरे श्वास से जुडा है क्योंकि तुम बाहर हो मैं अन्दर हूँ! तुम बोलते हो मैं सुनता हूँ,तुम खाते हो, मैं खिलाता हूँ! तुम देखते हो मैं दृष्टि बन कर दिखाता हूँ! तुम शरीर हो मैं शक्ति बन कर इसे चला रहा हूँ! तो तुम क्या हो? बच्चे तुम मैं हो हो,तुम तुम नहीं मैं ही तुम में हूँ अर्थात तुम मुझसे अलग हो ही नहीं! मुझसे तुम बने हो तो तुम्हारा अस्तित्व अलग कैसे हुआ! बच्चे अलग होता है जीव के मन का एहंकार, अलग होता है जीव का स्वयं को और दुनिया से अलग करके पेश करने का भाव,अलग करती है जीव को उसकी मन में समाई वो बुराईयाँ जो जीव को छुप-२ कर अलग गलत रास्ते पर चलाती हैं! लेकिन जहाँ ये सब है ही नहीं वहां तो जीव भक्त बन कर भगवान में ही समाया होता है! वहां अलग होने जैसे बात ही नहीं होती! जिस जीव के मन में कई के समान एहंकार- आग के समान लोभ- अंगारों के समान तृष्णा बसी होगी, वह अपना जीवन ऐसे जीता है जैसे गहरे पानी में काई लगी होने से पैर कब फिसल जाए उसे पता नहीं चलेगा,गहरे पानी में फिसल कर गिरने वाला जीव हड्डी भी तुड़वा लेता है और दोबारा स्वयं संभल कर उठ जाए यह भी संभव नहीं होता सो बच्चे नंबर एक तो अपना मन अधिक सुख सुविधाओं में पैर पसारने से जीव को हटाना चाहिए ये सुख-सुविधायें  जीव को नरक के गर्त में न धकेलती हो ऐसा हो ही नहीं सकता! दुसरे अधिक प्राप्ति का लालच जीव को दिन-प्रतिदिन उसी गर्त में इस प्रकार ले जाता रहता है जिस प्रकार अत्यधिक गहरे पानी में जाने से नौका कब पलट जाए उसे पता नहीं चलता! सो बच्चे ऐसे जीव गन्दगी के ढेर होते हैं जो स्वयं तो सड़ते ही हैं, अन्यों को दुर्गंधी प्रदान करते हैं! इन ढेरो का सफाया मैं पिता जितनी जल्दी करवाया हूँ,यहाँ उतिनी ही जल्दी सुगन्धित वातावरण तैयार होना बनता है! सो बच्चे जहाँ तुम रह रहे हो,वहां न कोई आंतरिक गन्दगी है और न ही कोई बाह्य, तो मैं पिता सफाई किस चीज़ की करवाऊ! जहाँ पहले ही मन के अन्दर दया- सहानुभूति,सहनशक्ति-सेवा ,आनंद के दिए जल रहे होंगे वहां विकारों के कीटाणु तो पहुच ही नहीं पाएंगे! मुझ दया के सागर परमपिता के गुणों के समान स्वयं को ढाल चुके मेरे बच्चे सुनो जहाँ आनंद की धरा बह रही होगी वहां अंतर्मन में शान्ति यह तो समझ आ ही जाएगा! जहाँ शान्ति है वहां मन एवं आत्मा में वह ज्योति जक रही जानो जिसे जलाने के लिए ही जीव को अनेको प्रपंच करने पड़ते हैं! तुम आत्मा स्वयं के हिसाब से स्वयं को कहीं से अधूरी न जान कर अनमोल रत्न स्वयं को जानो जिसे मेरे घर पहुच कर मुझ में ही समाना है! तुम्हारा स्वयं के तप के प्रति जागरूक रहना व उसके लिए तड़पना,साक्षात् मेरी उपस्थिति  तुम्हारी आत्मा में होने का प्रमाण है! तुम किसे पाना चाहते हो, कौन तुम्हारी साधना से प्रसन्न होगा, जो स्वयं तुम्हारे अन्दर विराजमान है,उसकी प्रसन्नता ही तुम्हे जागरूक रखे हुए है! जो बच्चे अन्य आत्माओं के कल्याणार्थ प्रार्थना मुझसे करते हैं, उन आत्माओं का कल्याण तो हो ही चूका जानो,मात्र अन्तराल शेष की ही बात है! जिन-२ आत्माओं के कल्याणार्थ जप-तप तुम्हे करना है वे स्वयं भी जागरूक हैं! तुम्हारा काम तो केवल धक्का मार कर गाडी को चालु करना करना ही है! बच्चे मैं तुम्हारा पिता हूँ! तुम्हारे हर भाव का अंदाजा मुझे तुम्हारे सोचने से पहले ही होता है! बच्चे तुम स्वयं संसारी हो,संसारियों में तुम्हे रहना है,तुम्हे अपने द्वारा किसी का भी रास्ता अगर कांटो-नुमा  नज़र आ रहा हो तो उसके लिए किया गया थोडा सा भी जाप उस आत्मा को अत्यंत फल प्रदान करवाने वाला होगा! सो बच्चे तुम्हारा कल्याण तो हुआ ही जानो,तुम्हारा कोई पाप-कर्म तुम्हारे मार्ग में बाधक नै बन रहा ! पाप ही नहीं है तो दंड कहाँ से होगा! तुम्हार स्वयं का मार्ग लुभावना है,अन्यों को मार्ग प्रदान तुम्हारे द्वारा न हो ऐसा हो ही नहीं सकेगा! सो मेरे बच्चे कोई काम कब शुरू हो रहा है ये सोचने की आवश्यकता नहीं है! तुम्हारा करता-धरता मैं स्वयं कार्य करूँगा! उसका फल भी उतनी ही जल्दी तुम्हे मिलना बनेगा! सो तुम्हे किन-किन फलो से सुसज्जित तुम्हे किये हुए हूँ,ये तुम्हे तभी पता चलेगा,जब उनमें से फूल उन-उन आत्माओं तक पहुचने बनेगे जिनके निम्मित तुम्हे तैयार किया गया है!</p>
<img src="http://feeds.feedburner.com/~r/GyanVaani/~4/bnD6q-Rhhrc" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.gyanvaani.com/2009/07/09/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<feedburner:origLink>http://www.gyanvaani.com/2009/07/09/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5/</feedburner:origLink></item>
		<item>
		<title>प्रार्थना के विभिन्न भाव और ईश्वरीय सहायता का मार्ग प्राप्त करना</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/GyanVaani/~3/PZC51Y4U_Fw/</link>
		<comments>http://www.gyanvaani.com/2009/07/02/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 02 Jul 2009 16:27:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>meeru</dc:creator>
				<category><![CDATA[ज्ञानवाणी (1996)]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.gyanvaani.com/?p=154</guid>
		<description><![CDATA[सुनो मुझ बिंदु के सामान दिखाई देकर तुम्हारी पालना कर रहे शक्ति स्वरुप पिता के बच्चों, इस नश्वर संसार में तुम अपने कर्मो का उपभोग करते हुए मुझ पिता से शक्ति ग्रहण करते हुए अपनी याचना मुझ तक पहुचाते रहे हो! एक याचना क्षमा के लिए तुम करते हो जब दंड तुम्हे मिल रहा होता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सुनो मुझ बिंदु के सामान दिखाई देकर तुम्हारी पालना कर रहे शक्ति स्वरुप पिता के बच्चों, इस नश्वर संसार में तुम अपने कर्मो का उपभोग करते हुए मुझ पिता से शक्ति ग्रहण करते हुए अपनी याचना मुझ तक पहुचाते रहे हो! एक याचना क्षमा के लिए तुम करते हो जब दंड तुम्हे मिल रहा होता है,मार मारने वाले से बचना होता है तुम्हे! दूसरी याचना तुम्हारी उस समय की होती है जब अन्य संसारी जीवो को मार खाते देखते  हो तो स्वयं उस मार का भागी न बनना पड़े , इसलिए तुम्हारे द्वारा प्रार्थना रुपी याचना होती है! तो बच्चों , मैं तो दाता  हूँ, जो जैसी प्रार्थना करेगा उसे वैसी ही बुद्धि प्रदान करवा दूंगा जिस से कर्म उसके उसी हिसाब से बनते रहे! तो बच्चे एक प्रार्थना उन जीवो की होती है जो संसार में रहते हुए भी संसारी नहीं बनना चाहते! इन जीवो की प्रार्थना आत्मा के उद्धार की ही रहती है! जिसमें आत्मा को उच्च दर्जा मिलने वाली बात बार-२ दोहराई जाती है! इन आत्माओ की श्रेणी बिलकुल अलग होती है,इनके कर्म बिलकुल अलग होते हैं! इनका जीवन सामान्य दीखाई देते हुए भी सामान्य नहीं होता! संसार के हिसाब से ये संसार में रहते अवश्य हैं लेकिन इनके कर्म उच्च दर्जे के होने से इन्हें शक्ति प्राप्त होती है अर्थात योग प्राप्त होता है! ये योगी की उपाधि ग्रहण किये होते हैं! संसारी जीव भुगतने वाले भोगी कहलाते हैं और ये जीव योग युक्त योगी कहलाते हैं! तो भी भोगी जीव को दंड का सामना करना पड़ता है! इसलिए दंड से बचने के लिए अनेलो उपाय प्रदान किये जाते हैं! लेकिन योगी जीवो को जो बुद्धि प्रदान की जाती है वह तो उस हिसाब से होगी जिसमें उन्हें परमयोगी की उपाधि प्राप्त हो सके,इसके लिए विशेष प्रकार के उच्च कर्म ही उनसे करवाए जाने होते हैं! इन विशेष कर्मो की श्रृंख्ला &#8220;मानस कर्मो&#8221; की होती है अर्थात मन की शुद्धि होती रहे एवेम शुद्ध कर्म बनते रहे जिनका उपयोग परोपकार के लिए होता रहे! सो बच्चे मात्र &#8220;मन की शुद्धि&#8221; ही बनी रहेगी तो स्वच्छ एवेम शुद्ध कर्म बनते रहेंगे ही!  मन की शुद्धि का असली उपाय मुझ पिता से शक्ति ग्रहण करना ही बनता है ! मार्ग तय करते हुए अपने आस-पास के वातावरण से स्वयं प्रभावित न होते हुए अपने कर्मो के बल से अन्यों को प्रभावित करना होता है तुम बच्चों को! तुम्हारा मन का सम्बन्ध आत्मिक होना जरूरी है! संसारी जीव तो इच्छाओं के बोझ के टेल दब कर अपना मार्ग तय करते हैं लेकिन तुम्हारा बोझ तो स्वयं मैंने उठा लिया है,तुम्हे तो मात्र मन का योग ही मेरे साथ बनाए रखना होगा ! बेघर बच्चे जहाँ से जो प्राप्त होगा उसे उठाने के लिए लालायित होते रहेंगे लेकिन जिन बच्चों को मेरे पास घर पहुचना ही है वे तो घर पहुचने की जल्दी में ,जो भी उनके पास है उसे भी उतार फेंकते रहेंगेओर बोझ से मुक्त होकर जल्दी मुझ से मिलन मनाने के लिए बेचैन रहेंगे! सो बच्चे यही हालत तुम आत्मा की है! तुम स्वयं को मुझ तक पहुच सकने में सक्षम समझो. तुम्हारा हर पल का हिसाब मुझे प्राप्त हो रहा है! जो हो रहा है ठीक है,जो होगा ठीक होगा,निश्चिंत रहो!</p>
<img src="http://feeds.feedburner.com/~r/GyanVaani/~4/PZC51Y4U_Fw" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.gyanvaani.com/2009/07/02/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<feedburner:origLink>http://www.gyanvaani.com/2009/07/02/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5/</feedburner:origLink></item>
		<item>
		<title>दृद -संकल्प, तप और इश्वर  प्राप्ति</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/GyanVaani/~3/Pk0ydfl60DQ/</link>
		<comments>http://www.gyanvaani.com/2009/03/06/%e0%a4%a6%e0%a5%83%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa-%e0%a4%a4%e0%a4%aa-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 05 Mar 2009 19:52:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>meeru</dc:creator>
				<category><![CDATA[General]]></category>
		<category><![CDATA[ज्ञानवाणी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.gyanvaani.com/?p=149</guid>
		<description><![CDATA[




मुझ परमज्योति एवं बिन्दु स्वरुप शिव का अपने बच्चों को आशीर्वाद!अग्नि जिस प्रकार अपना सेक अधिक फैलाकर अन्य वस्तुओं को भी गर्म करके अपने वहां होने का एहसास दिलाती है ठीक उसी प्रकार तुम आत्मा की मुझ पिता से लग्न अपना एहसास अन्य आत्माओं को इस ज्ञानवाणी के ज्ञान से करवाते रह कर मेरी उपस्थिति [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table id="posts" class="posts" border="0">
<tbody>
<tr class=" selected">
<td class="title" onclick="setSelected(this, &quot;5067724014107838011&quot;);">
<div class="postContents">
<div class="entirePost">मुझ परमज्योति एवं बिन्दु स्वरुप शिव का अपने बच्चों को आशीर्वाद!अग्नि जिस प्रकार अपना सेक अधिक फैलाकर अन्य वस्तुओं को भी गर्म करके अपने वहां होने का एहसास दिलाती है ठीक उसी प्रकार तुम आत्मा की मुझ पिता से लग्न अपना एहसास अन्य आत्माओं को इस ज्ञानवाणी के ज्ञान से करवाते रह कर मेरी उपस्थिति का एहसास करवाती है ! बच्चे सेक में जैसे हर कोई एक सा आनंद अनुभव नहीं करता ,उसी प्रकार ज्ञान प्राप्ति की इच्छा या उस से आनंद सभी को एक सा प्राप्त हो यह नहीं हो सकता ! सो बच्चे मुझ पिता की कृपा वैसे तो सब जीवो को प्राप्त हो रही है लेकिन उस कृपा को कई गुना बढ़ा कर कौन उसे प्रयोग करता है यह जीव की मेहनत एवं आस्था के ऊपर निर्भर करता है! बच्चे! आस्था भी बहुत से जीवो की बहुत होती है लेकिन मेहनत अपनाना हर जीव के द्वारा बन सके ऐसा होना असंभव होता है! सो मेहनती बच्चो को अलग चुन लिया जाता है! उनसे मेहनत करवाते रहकर उनकी आस्था और मेहनत बढती रहे,इसके लिए प्रयास जारी रहता है !इस प्रयास में बच्चों को उसके मार्ग पर चलते-२ कुछ देर के बाद धक्का देकर देखा जाता है की उसके पाव कितने मजबूत हैं! माना अचानक धक्के से उसके पाव डगमगा गये भी तब भी वह दोबारा वापिस ख़ुद को उसी स्थान पर लाने में प्रयास किस हिसाब से करता है! स्वयं की मेहनत उसके द्वारा कितनी बढती है! इस प्रयास में वह कितना तड़पता है मुझ पिता से मिलने के लिए ! सो बच्चे स्वयं को उसी हिसाब से गिरी पड़ी जानो! मुझ पिता को दोबारा पाने के लिए तुम स्वयं को कितना प्रयास करवाती हो यही अब मुझ पिता द्वारा देखा जाना है ! बच्चे यहाँ मानसिक चोट भी लगी ,गिराया भी गया और दुःख भी सहना पड़ा ! फिर ऊपर उठने के लिए उस चोट का दर्द सहन करके भी ,स्वयं को चलाना पड़ता है बिना किसी के सहारे के ! सो बच्चे, अपनी मानसिक स्थिति को वही चोट के दर्द का एहसास समझो !तुम्हारा दृद्द-संकल्प ही तुम्हारा साथी है ! उसका सहारा तुम्हे शक्ति प्रदान करेगा ऊपर चढ़ने के लिए ! इसके बिना तो स्वयं को गिरी हुई ही जानो! सो बच्चे, आज का तुम्हारा भाव मुझ पिता के प्रति अपनी तड़प का , तुम्हे यही प्रेरणा दिलवाता है कि आज,अभी इसी वक़्त तुम्हारा दृद संकल्प तुम्हारा भाव बनना चाहिए! मुझ पिता की शरण तो तुम्हारे भावो को आधार बनाने से ही प्राप्त होगी ! सो बच्चे, कठोर तप का श्रेय तुम्हारी आत्मा को मिले ,इसके लिए तप का व्रत धारण करो!तुम्हारा प्रत्येक दिन ,प्रत्येक घडी ,प्रत्येक पल व्रत संलिप्त होना आवश्यक है ! मुझ पिता की प्रत्येक वस्तु की अधिकारिणी तुम स्वयं बन जोगी ! मुझ पिता के लिए छोडा गया अन्न का एक दाना कई करोड़ गुना फलदायक होता है ! अपनी निष्ठां इसी में समझो कि पिता की शरण में जाने से पहले अपना सब भार पिता के प्रति समर्पित करना है ! भार से हलके होकर ऐसे तप होगा के बस वायु में उड़ने लायक बन सकोगे ! सो बच्चे जलचर से थलचर और नभचर तुम्हे बनाना है ! जलचर को कोई भी निचे ही डुबो सकता है और थलचर को बाँध कर रख सकता है पर नभचर बनना तुम्हे मुक्त बना देगा ! बस यही प्रयास करना है !</div>
</div>
</td>
<td class="type"> </td>
<td class="type">
<div class="softAlert">draft</div>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<img src="http://feeds.feedburner.com/~r/GyanVaani/~4/Pk0ydfl60DQ" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.gyanvaani.com/2009/03/06/%e0%a4%a6%e0%a5%83%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa-%e0%a4%a4%e0%a4%aa-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<feedburner:origLink>http://www.gyanvaani.com/2009/03/06/%e0%a4%a6%e0%a5%83%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa-%e0%a4%a4%e0%a4%aa-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</feedburner:origLink></item>
		<item>
		<title>ज्ञानवाणी-3(1996)</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/GyanVaani/~3/ORtbE9wx_E8/</link>
		<comments>http://www.gyanvaani.com/2008/10/14/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-31996/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 14 Oct 2008 07:25:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>meeru</dc:creator>
				<category><![CDATA[ज्ञानवाणी (1996)]]></category>
		<category><![CDATA[ज्ञानवाणी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.gyanvaani.com/?p=146</guid>
		<description><![CDATA[९ मई १९९६ दिन गुरूवार दोपहर के अन्तिम प्रहर में अपने परम पिता शिव परमात्मा संग मिलन मनाकर अत्यन्त आनंद की अनुभूति करते हुए जीवन के शेष लम्हों का प्रयोग जीवन को सार्थक बनाने में लाभकारी सिद्ध हो ,इसके लिए अत्यन्त उपयोगी,लाभकारी,अत्यन्त सहायक शुद्ध वातावरण,एवं सहयोगी परिस्थितियाँ प्राप्त हो यही प्रार्थना मुझ आत्मा की परमात्मा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>९ मई १९९६ दिन गुरूवार दोपहर के अन्तिम प्रहर में अपने परम पिता शिव परमात्मा संग मिलन मनाकर अत्यन्त आनंद की अनुभूति करते हुए जीवन के शेष लम्हों का प्रयोग जीवन को सार्थक बनाने में लाभकारी सिद्ध हो ,इसके लिए अत्यन्त उपयोगी,लाभकारी,अत्यन्त सहायक शुद्ध वातावरण,एवं सहयोगी परिस्थितियाँ प्राप्त हो यही प्रार्थना मुझ आत्मा की परमात्मा से है!</p>
<p>सुनो मेरी बच्ची, कलियाँ फूलो की पहले खिलती हैं,वे ही फूल बनती हैं,उन्हें अलग से किसी विशेष हवा या पानी की आवश्यकता पड़े ऐसा नहीं होता! कली बन गयी है डाली पर तो फूल तो आएगा ही, ऐसा विश्वास माली को हो जाता है! माली का काम तो डाली की रक्षा करने का होता है! अधिक तेज़ वर्षा, आंधी ,रोग -कारक कीटाणु कली को नष्ट कर सकते हैं, इन्ही को ध्यान में रखते हुए कब,कैसे कली को बचाया जा सकता है,यह चिंता माली हर समय करता है! सो बच्चे संसार में रहते हुए किस-किस बात का भय तुम्हे हो सकता है,उसे दूर करने की चिंता भी मुझ पिता को है! उसका सामान अलग से तैयार कर दिया गया है! तुम्हारी हर तड़प ,परिस्थियों को संभालने के लिए मुझ पिता से प्रार्थना करने का ये भाव ही तुम्हे उस वातावरण को दिलवा देंगे जिसमें मुझ पिता की अनुकम्पा , पवित्रता की योग एवं द्यानावास्था तुम्हे प्राप्त होगी! सो बच्चे मिटटी और पानी तो पौधे के लिए वही रहता है, मात्र निगरानी माली की बढ़ जाती है!सो उस हिसाब से तुम्हे अधिक संभालना मेरा काम है!अब  आती है बारी जीवन की परिस्थितियों को  बदलने की!बच्चे अधिक आंधी आएगी जीवन में तो  तुम  ग्रस्त  होगी ! उस  आंधी  से  जो  असर  तुम  पर  होगा ,उसका  बुरा  प्रभाव  आत्मा  पर  मन  के  जरिये  होगा ! लेकिन  उसी  आंधी  के  ना  आने  का  इंतजाम  हो  तो  मुझे  करना  है , वह   ही  कर  दिया  है  समझो ! दिन -दुगनी  रात  चौगुनी  उन्नति  तुम्हारी  होगी   अपने  क्षेत्र  में ! नित्य  नए  परिधान  पहन  कर  वातावरण  तुम्हारे  सम्मुख  पेश  होगा ! मेरे  बाग़  की सुन्दर  कली  तुम  आत्मा  बहुत  जल्दी  सुन्दर  फूल  बन  कर  तैयार  हो  जोगी ! तुम्हे  तो  बस  खिलना  है  यही  तुम्हारा  काम  है , बाकी  के  काम  तो  मुझ  बाग़  के  मालिक  के  हैं  जो  माली  बन  कर  तुम्हे  संभाले  हुए  है ! मेरे  बाग़  के  फूल  अत्यंत  सुन्दर  हो  यही  मेरी  इच्छा  है ! बाकी  रही  तुम  जीवात्मा  के  भावो  की  बात  कि  समय  पर  जप -तप -भजन -पूजा -ध्यान  कुछ  नहीं  होता ! बच्चे  यहाँ  किसी  बिगडैल  बच्चे  को  सुधारने  का  काम  तो  हो  नहीं  रहा , यहाँ  तो  स्वयं  का  सुधार  करने  कि  चिंता  कर  रहे  बच्चे  का  हिसाब  है ! तो  बच्चे  तुम  निश्चिंत  भाव  से  जो  हो  रहा  है , जैसा  हो  रहा  है  उसी  में  मगन  रहो ! स्थिति  स्वयं  बनती  रहेगी ! लक्ष्य  को  ध्यान  में  रखते  हुए  अपने  हर  लम्हे  को  एक  कीमती  तोहफा  मुझ  पिता  की  और  से  मिलता  समझो ! तोहफे  की  कदर  तो  एक  साधारण  सामान  से  ज्यादा  होती  है ! उसी  हिसाब  से  अपने  प्रिय  तोहफे  को  सदुपयोग  करना  है  उसकी  कदर  करते  रहो !तुम्हारा  आने  वाला  समय  इन्ही  तोहफों  के  कारण  स्वर्णिम  बन  जाएगा ! किसी  धनवान  की  गरिमा  उसे  अन्दर  से  गन्दा  कर  देती  है   लेकिन  जिसके  पास   मुझ  पिता  के  तोहफे  रुपी  धन  का  अम्बार  लग  जाता   है ,वह  तो  राजा  बन  जाता  है ! सो  बच्चे  राजा  की  भाँती  स्वयं  को  तक्दीरवान  समझो  की  हर  पल  धन  की  वर्षा  तुम्हारे  ऊपर  हो  रही  है ! धन  भी  वह  जिसका  हर  कोई  हकदार  भी  नहीं  हो  सकता ! सो  बच्चे  पूर्वजनम  के  राजा  को  इस  जनम  में  भी   राजा  बनाना  था  ,इसीलिए  राह  बना  दी  गयी ! अब  खजाने  को  बढ़ाना  और  उस  से  अन्यों  का  पालन  करना  तुम्हारा  कर्तव्य  होना  चाहिए ! बच्चे  करम  की  परिभाषा  को  ध्यान  में  रखते  हुए  उसका  स्वरुप  अति  दर्शनीय  बनाओ ,ये   करम  तुम्हारी  भावनाओ  के  प्रतीक  होंगे ,इन्ही  का फल  तुम्हे  इनाम  के  तौर  पर  दिया  जायेगा ! सौ  शुभ  कर्मों  का  फल  एक  गौ  दान  के  बराबर  होता  है ! तो  तुमने  कितनी  गौ  दान  करनी  हैं  यह  सोच  कर  समय  को  संभालो !सौ  गौ  दान  करने  से  एक  अश्वमेघ  यज्य  का  फल  मिलता  है ! एक  अश्वमेघ  यज्य  में  पूर्व  जन्मों  तथा  इस  जनम  के  लिए  बुरे  करम &#8211; दोषों  का  फल  स्वयं  स्वाहा  हो  जाता  है ! जब  कोई  पाप  फल  शेष   नहीं  रहेगा ,फिर  कोई  परिस्थिति  गलत  कैसे  हो  सकती  है ! सो  बच्चे  स्वयं  को  दंड  से  बचाने   वाले  तुम  ही  होते  हो ! मुझे  अपना  हर  बच्चा  उतना  ही  प्रिय  होता  है  जितना  प्रिय  बच्चे  को  अपने  शरीर  का  हर  अंग  होता  है ! तो  तुम्हारी  सुरक्षा  तुम्हारे  से  करवा  कर  मैं  खुश  होता  हूँ ! तो  सुनो  मेरी  प्रिय  बच्ची , जिस  प्रकार  एक  पिता  पूरे  परिवार  की  पालना  करता  है ,फिर  पल  करके  बच्चे  बड़े  होकर  अपने -अपने  बच्चों  की  पालना  करें , ठीक  उसी  प्रकार  मुझ  pita की  चिंता  का  विषय  बनता  है  कि  कब  बच्चा  तैयार  हो  और  अन्य  बच्चों   की  पालना  करे , जिस  से  और  बच्चों  की  पालना  का  काम  आगे  चलता  रहे ! सो  इसके  लिए  अनेकों  आत्माएं  अलग -अलग  तरीके   से  काम  में  लगा  दी  गयी  हैं ! तुम  आत्मा  भी  अपने  करम  को  बढावा  देने  के  लिए  दिन -रात  मुझ  पिता  से  प्रार्थना  करती  हो ! लेकिन  बच्चे  जो  रोग  कई -2 जन्मों  के  दोषों  के  फल  स्वरुप  जीव  भुगत  कर  दुखी  हो  रहे  होंगे ,उनके  निवारणार्थ  तुम्हे  नियुक्त  किया  जा  चूका  है ! यह  काम  बाह्य  एवं  आंतरिक , दो  विधियों  से  चल  रहा  है ! अत्यंत  गुप्त  रूप  से  चलने  वाले  इस  काम  को  निष्काम  भाव  से  करने  का  संकल्प  तुम  आत्मा  करके  अपना  जीवन  सुखद  बनाओ ! दो -चार  घडियां  जीवन  की  शेष  रह  गयी  हैं  ,इन्हें  मजबूत  करके  अपने  पल -पल  का  हिसाब  बढाते  रहो ! वातावरण  अत्यंत  सुखद   तुम्हे  प्राप्त  होगा मुझ  पिता  का  वादा  है ! राजवैद  की  भाँती  पालकी  की  सवारी  करते  रह  कर  हर  आत्मा  को  दुःख -निवारण  औषधि  वितरित  करते  रहो ! </p>
<img src="http://feeds.feedburner.com/~r/GyanVaani/~4/ORtbE9wx_E8" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.gyanvaani.com/2008/10/14/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-31996/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<feedburner:origLink>http://www.gyanvaani.com/2008/10/14/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-31996/</feedburner:origLink></item>
		<item>
		<title>ज्ञानवाणी-2</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/GyanVaani/~3/dXNXDFTbVGU/</link>
		<comments>http://www.gyanvaani.com/2008/10/07/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-2/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 07 Oct 2008 13:18:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>meeru</dc:creator>
				<category><![CDATA[ज्ञानवाणी (1996)]]></category>
		<category><![CDATA[ज्ञानवाणी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.gyanvaani.com/?p=143</guid>
		<description><![CDATA[२५ जनवरी दिन सोमवार दोपहर की वेला में पिता शिव से जीवन में चल रहे दंड भुगतने के समान वातावरण को सामान्य बनाने के लिए प्रार्थना करके आत्मिक गुणों की वृद्धि के लिए प्रार्थना की!
  मुझ दीनदयालु दया के सागर कृपालु पिता की निःसंदेह उत्तमता को प्राप्त हो चुकी संतान जब कोई नई अवस्था [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>२५ जनवरी दिन सोमवार दोपहर की वेला में पिता शिव से जीवन में चल रहे दंड भुगतने के समान वातावरण को सामान्य बनाने के लिए प्रार्थना करके आत्मिक गुणों की वृद्धि के लिए प्रार्थना की!<br />
  मुझ दीनदयालु दया के सागर कृपालु पिता की निःसंदेह उत्तमता को प्राप्त हो चुकी संतान जब कोई नई अवस्था किसी जीव को दिलवानी होती है तो परिस्थितियाँ एक दम अपना स्वरुप बदल लेती हैं,पहले जो जैसा था वह वैसा न रहकर बदला बदला सा लगने लगता है या जो पहले था वैसा रहता ही नहीं! जिस प्रकार एक पेड़ जो तानकर खडा होता है,जरा सी चिंगारी उसे राख के ढेर में बदल देती है,उस राख के ढेर को देख कर कोई नहीं कहेगा की यह एक पेड़ खड़ा है! वह तो राख बन गया,राख तो राख  होती है,वह किसी भी चीज़ की हो सकती है! फिर वह बड़ा सा पेड़ जला हो या कोई शरीर!  तो बच्चे इसी प्रकार जब कहीं अहंकार जलता है तो उस से जो भाव बचेंगे उस से जीव का हाल उसी विभूति के समान बनता है जो भगवान् शंकर का दिखायी देता है! अर्थात अहंकार जीव के अन्दर जलता है लेकिन जब अहंकार स्वयं जल कर राख हो जाता है तो जीव की अवस्था बदल जाती है ! जैसे राख ठंडी होकर पड़ी रहती है उसी प्रकार जीव अहंकार से शून्य हो जाता है! सो बच्चे तुम्हारा हिसाब दंड भुगतने का उसी हिसाब से है जिस प्रकार आग जला कर पेड़ को जलाया जाता है तो धरती का आश्रय लेना पड़ता है, तो तपना धरती को पड़ता है! जहाँ धरती तो मात्र आश्रय देने के लारण कष्ट भोगती है , काम तो पेड़ का हो रहा होता है, ठीक उसी प्रकार किसी जीवात्मा के अन्दर के अहंकार की समाप्ति के अवसर पर किसी न किसी आत्मा को समर्पण करना पड़ता है! सो बच्चे जब उचित  वेला आती है तब कलि खिलकर अपनी महक वातावरण में बिखेर देती है! ठीक इसी प्रकार जब मुझे तुम्हारा स्वरुप जगजननी वाला बनाना था , उसका समय आ गया ,तुम्हे कुछ विशेष करने की आवश्यकता पड़ेगी ही नहीं ! जिस प्रकार गति से चल रही गाड़ी को धक्का मारने की आवश्यकता नहीं होती! सो बच्चे निरंतर चल रही जीवन की गाड़ी का मालिक मैं शक्ति रूप पिता तुम्हे सीधा उसी और खींच कर लेकर जा रहा हु जिस ओर शक्ति ओर शान्ति निवास करती हैं! तेजपुंज शक्ति स्वरूप माँ आदिशक्ति से तुम्हे नया स्वरुप शक्ति का प्रदान करवाया जाना है ! बाकी रही बात तुम्हारे मन की कष्टकारी अवस्था की, बच्चे कभी चींटी पहाड़ को गिरा पायी है! या फूँक से पहाड़ को उडाते देखा है! नहीं न! तो फिर क्यों अपना मन डावाडोल किया तुमने ! बच्चे निर-अहंकारी और निस्वार्थ भाव से जी रही उस आत्मा को अपने हिसाब से जीने दो,तुम्हे कहीं कोई अपनी राय का दाखिला करवाने की आवश्यकता नहीं! तुम्हारा स्वयं का स्वाभिमान तुम्हे उन उचाइयों पर ले जाएगा जहाँ पर अमृत विजयी बनने का गौरव प्राप्त हुआ करता है! बच्चे जिसके कुंड में जो भरा होगा अमृत या विष ,वह उसी की और लुढ़कता चला जाता है! उसे बार बार धकेलने की आवश्यकता नहीं रहती ,बिल्कुल उसी प्रकार जिस प्रकार चुम्बकीय शक्ति से लोहा स्वयं चुम्बक की तरफ़ खिचने लगता है,उसे धकेलना नहीं पड़ता ! तो बच्चे मैं पिता शक्ति स्वरुप उसी चुम्बकीय शक्ति से अपने समान गुणों वाली आत्माओ को अपनी तरफ़ खींच लिया करता हु! उन्हें अलग से कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं रहती!  यह सारा ब्रह्मांड इन्ही शक्तियों का भण्डार है! इसमें समाई शक्तियों को मानव शरीर के द्वारा ही खींचा जा सकता है! जिन्हें चलाने की शक्ति मानव शरीर में ही विद्यमान है! मात्र उन विधियों को अपनाना पड़ता है जिनसे शक्तियां खिंचनी प्रारंभ होती हैं! जिस प्रकार लकडियों का ढेर पडा हुआ है ,जलाने के लिए तिल्ली भी है लेकिन तिल्ली को घिसाने का जरिया माचिस न होने से आग जलाई जानी असंभव होगी, ठीक उसी प्रकार ब्रह्मांड में शक्तियां भी हैं ,उन्हें एकत्रित करने का जरिया मानवशरीर भी है ,लेकिन जब तक विशी को नहीं अपनाया जाएगा तब तक कुछ भी कर पाना असंभव होगा, सो बच्चे तुम्हे इस काम के लिए बार बार चेतावनी भी दी गयी लेकिन तुम्हे तो मूर्छा (सांसारिक प्र्वितियों का समावेश) आने लगी थी , तो मूर्छा तुम्हारी उडवानी थी इसीलिए तुम्हे इतनी जोर से झटकना और पटकना पडा की तुम्हारा मन क्षुब्ध होकर की यह तुम्हारे ही भले और कल्याण के लिए करना पडा तो काम में लगवाई गई जीवात्मा कसूर वार कैसे हुई! तुम्हे तुम्हारा काम और अवस्था याद करवाने के लिए इतना सारा बखेडा करना पडा! कसूर किसका था ,तुम्हारा या उस आत्मा का जिसे बेवजह तुम्हारा काम करना पड़ा! तो बच्चे समझो स्वयं की अवस्था को एवं तैयार हो जाओ अपने मूल रूप को पाने के किए ! तुम्हे कतई परेशान होने की आवश्यकता न पहले थी और न अब है ! तुम्हारा सारा काम पूर्णता को प्राप्त हो इसके लिए तुम्हे मन की विशमताओ के घेरे से स्वयं को निकालना  होगा! अपार शक्ति की मालिक तुम आत्मा क्यो बेवजह उस अंगारे से स्वयं को झुलसाने पर अडी हो जिस अंगारे का तुम्हारे जीवन से कोई सरोकार है ही नहीं! मैं पिता तुम्हे जीवन की खुशहाली  के लिए उस बगिया का एक फूल दे रहा हूँ जिस बगिया की महक स्वर्ग से भी अधिक आनंददायक हुआ करती है! बच्चे संभालो उस कृपा रुपी फूल को जिसका तुम्हारे पास आना ही तुम्हारे सौभाग्य का सूचक है! बच्चे मेरा अंश तो तुम हो ही , फिर कौन तुम्हे घिनौनी हरकतों से गिरा सकता है या तुम्हारा तिरस्कार कर रहा है! कौन तुम्हारी अवहेलना करके तुम्हे प्रताड़ना दे सकता है! बच्चे मेरी झोली में हीर मोती ही हुआ करते हैं और यही हीरे मोती मैं भेंट स्वरुप अपने बच्चों को दिया करता हूँ!तो तुम भी उन्ही हीर मोतिओं से स्वयं को सजी-सवरी समझो! एक हीरा ही जीवन  को चमकाने में सक्षम होता है!तो तुम्हे तो मालिक बना दिया गया है उस हीरे की खान की , सो बच्चे स्वयं को नीच कहना तुम्हे शोभा नहीं देता ! तुम तो सर्वथा सुंदर सर्वगुण संपन्न सौभाग्य शाली वह आत्मा हो जिसे प्रदान सब कुछ किया गया होने पर भी मात्र वंचित इसलिए रखा गया की समय आने पर किवाड़ खोल दिए जायेंगे  भाग्य का सूर्य उदय होगा ,चमकार निकलते ही भाग्य बदल जाएगा! चंदन के पेड़ होने पर भी जब राख के ढेर तुम्हे सौपे गए हो तो स्वयं का हिसाब राख जैसा ही तो तुम्हे लगना था ! जिस राख का कोई मोल नहीं होता उसे कौन चाहेगा! कोई नहीं! लेकिन समय बदलना तो सुनिश्चित है! फेरबदल इस प्रकार होगा की जिसे अब तक चंदन के पेडो के साए में बिठाया गया था उसे वहां से हटा दिया जाएगा और तुम्हारा अधिकार तुम्हे सौप दिया जाएगा! विदाम्ब्नाया रही अबतक की परिस्थिति की कि जो अब तक सुखो का उपभोग कर रहे थे उनके तांत्रिक विधान के हिसाब से समय का पैमाना ही ऐसा था ! लेकिन अब पैमाना पलट कर रख दिया जाएगा! अधिक गडबडी मचाने वाको कोई पहले दबोच लिया जाना है ,उसके बाद कार्यशैली के हिसाब से दंड उन्हें मिलते रहेंगे जिन्होंने काम में हिस्सा बढाया था! तो बच्चे लगन से तुम अपने आप में निश्चिंत रहो ! कीसे अपराधी को कौन सा दंड दिया जाना है यह तो भुगतने वालो की अवस्था ही बता देगी! तुम निडर बन कर जियो! डरने की तुम्हे जरूरत नहीं! तुम्हारा हिसाब संपरिवर्तन का चलने ही वाला है! उसे कोई रोक नहीं सकेगा! अपनी मर्ज़ी से भाग्य बदलने वालो की नाक में नकेल डालो देखना तुम! बच्चे समय की ही जरूरत थी जो इतना बड़ा झटका तुम्हे दिया गया!</p>
<img src="http://feeds.feedburner.com/~r/GyanVaani/~4/dXNXDFTbVGU" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.gyanvaani.com/2008/10/07/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-2/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<feedburner:origLink>http://www.gyanvaani.com/2008/10/07/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-2/</feedburner:origLink></item>
		<item>
		<title>ज्ञानवाणी -1(1996)</title>
		<link>http://feedproxy.google.com/~r/GyanVaani/~3/-mgcUECneV4/</link>
		<comments>http://www.gyanvaani.com/2008/10/07/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-61996/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 07 Oct 2008 11:51:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>meeru</dc:creator>
				<category><![CDATA[ज्ञानवाणी (1996)]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.gyanvaani.com/?p=132</guid>
		<description><![CDATA[२४ जनवरी दिन रविवार रात्री की वेला में शिव पिता संग मिलन मनाकर ज्ञान मणियाँ प्राप्त करते हुए पिता से जीवन की उन्नति हेतु प्रार्थना करके उसमें बाधक एवं आत्मा के हास में कारण बन रही आत्माओ के मन के दोषों के निवारण हेतु प्रार्थना करके आत्मा को बल दिलवाने के लिए उच्चतम मार्ग जप-तप-व्रत-संध्यावंदन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>२४ जनवरी दिन रविवार रात्री की वेला में शिव पिता संग मिलन मनाकर ज्ञान मणियाँ प्राप्त करते हुए पिता से जीवन की उन्नति हेतु प्रार्थना करके उसमें बाधक एवं आत्मा के हास में कारण बन रही आत्माओ के मन के दोषों के निवारण हेतु प्रार्थना करके आत्मा को बल दिलवाने के लिए उच्चतम मार्ग जप-तप-व्रत-संध्यावंदन -योग-ध्यान इनका सहारा मुझे मिले इसके लिए प्रार्थना की !</p>
<p>मुझ दया के सागर पिता शिव के अनमोल बच्चे ! कभी कभी कुकर्मियों को दंड दिलवाने के लिए उन आत्माओ का सहारा लेना होता है, जो उत्तम मार्ग पर चल रही होती हैं, उन्हें सहसा रोक देना पड़ता है और भिड्वा दिया जाता है उन आत्माओ के साथ जिनसे उनका कोई लेना देना नहीं होता, मात्र उन्हें दंड की परिधि पर ला कर खड़ा करना होता है,इसलिए दंड योग्य कुकर्मो में उन्हें लगवा कर उताम आत्मा का हास उनके द्वारा करवाना होता है,जिस आत्मा का हास हो रहा है उसका कही कोई मन का सम्बन्ध उस आत्मा के साथ न होते हुए भी उसे पिटना पड़ता है, यहाँ यह काम उस उत्तम आत्मा को मेरे लिए करना होता है! इसलिए उसे काम में लगा हुआ देख कर मैं तो बहुत खुश हुआ करता हु, लेकिन वह उतम आत्मा स्वयं को मार्ग से हटा हुआ देख कर एवं बेवजह पिटने से दुखी हर पल हुआ करती है! इस समय आत्मिक हास वह पल पल महसूस करके तडपती है और मुझ पिता के आगे गिड़गिडाती है और उसका यह गिड़ गिडाना ही उसकी प्रार्थना बन जाती है मुझ पिता के आगे ! सो बच्चे ,काम मुझ पिता का जब पूरा होना होता है तो उत्तम बच्चे को पुरुषार्थ कार्य मरीं फ़िर से लगा दिया जाता है, सो बच्चे यही हाल तुम स्वयं का हुआ जानो! चाह कर भी जो तुम्हे अभी उन्नत मार्ग प्राप्त नहीं हो रहा उसके पीछे मुझ पिता के काम का अधूरापन जानो , काम पूरा होते ही तुम्झे अत्यन्त उत्तम एवं उज्जवल परिधि प्रदान करवा दी जाएगी! तब तक निश्चिंत भाव से जहाँ बिठाए जा रहे हो, बैठे रहो! तुम्हे कुछ हानि नहीं होनी बन रही,उत्तमता के घेरे से निकले अवश्य हो लेकिन न्यूनता की और तो नहीं जा रहे ,तो बेचैन क्यो हुए! चैन तो तुम्हारी इस बात में छिपी हुई है के काम तुम मेरे आ रहे हो, जिस जीव को मैं अपने काम में प्रयुक्त करता हु क्या वह सामान्य होगा, नहीं! वह तोह अत्यन्त उच्चतम श्रेणी का होगा, सो बच्चे तुम स्वयं को उच्चतम जानो ! तुम्हारा हर भाव, हर कर्म मेरा है! तुम्हे उच्चतम अवस्था प्रदान करवानी थी, इसीलिए पहले काम में प्रयुक्त कर लिया गया! बाकी रही बात आत्मिक हास करने में संलग्न आत्मा की, बच्चे इस समय परीक्षा तुम्हारी नहीं बल्कि उस आत्मा की चल रही है, जिसे वक्त रहते ही सुधरना उसके खाते में लिख दिया गया है, उसके सारे खातो को खोल कर कुकर्मो को अलग करना जारी है इस समय! सो पोटली कुकर्मो को खुलेगी तो दुर्गन्ध से मन को परेशानी तो होगी ही! सो उसी का हिसाब तुम स्वयं पर पडा असर जानो! तुम्हे किसी बात की चिंता की आवश्यकता नहीं है! यह तो वही खेत है जिसमें जैसी बुआई जिसने की होगी,उसके सामने रख दी जाएगी,कांटे बोए होंगे तो स्वयं चुन ने पड़ेंगे! फूल बोए होंगे तो फूलो का गुलदस्ता तुम्हारे सामने रख दिया जाएगा! तो बच्चे कांटे चुनने वाला कांटो की चुभन से बचा रह सकेगा, नहीं न! उसकी स्वयं की कमाई का हिसाब उसे सहना पड़ रहा है!तोह बच्चे कुकर्मो की गाँठ को कब तक छुपाये रखती वह आत्मा अन्यो की नजर से !<br />
तो  उसे  कुकर्मो  के  बोझ  से  मुक्त  करवाने  का  भाव  मुझ  पिता  का  आज  उसे  इस  कदर  बाहर  खींच  लाया  है  मन  के  उस दुर्गंधी  भरे  वातावरण  से  जहाँ  उसके  भाव  सदा  नीचता  से  ग्रस्त  हो  जाया  करते  हैं  की  अब  साया  भी  किसी  विषैली  भावना  का  उसे  छूने  न  पायेगा ! रंगबिरंगी  रोशनियों  के  चमकारे  में  थिरकने  वाला  उसका  मन  स्वयं  के  ही  अंतःकरण  में  गोते  लगायेगा ! अंतःकरण  शुद्ध  है  तो  उसका  प्रभाव  अवश्य  ही  शुद्ध   होगा ! सो  बच्चे  &#8220;रामरक्षा  स्तोत्र &#8216; का  जाप  नित्य  प्रति  करने  से  उस  आत्मा  को  स्वयं  का  मार्ग  शुद्ध  होता  नज़र  आयेगा ! बाकी  तुम्हारी  प्रार्थना  स्वयं  के  उन्नत  मार्ग  पर  चलने  की  , तो  बच्चे  तुम्हे  अत्यन्त  सुंदर संवाद  &#8220;शिव -पार्वती &#8221; को  पढ़ते  रहकर  अपना मार्ग  खुला  जानना  होगा ! तुम्हे  उच्चतम  स्तोत्र  &#8220;रामरक्षा  का  पाठ   करते  रह  कर  अपना  तथा  कल्याण  के  लिए  प्रयुक्त  आत्मा  का  कल्याण  करना  होगा ! टाप -जप -पूजा -पाठ  सब  इसी  में  सम्माहित  हुए  जानो ! मुझ  पिता  के  सच्चे  बच्चे  तुम्हारा  कल्याण  हुआ  जानो ,तुम्हे  वैभव  के  अम्बार   अपने  घर  में लगते नज़र आयेंगे !उच्चतम  आत्मा  का  सानिध्य तुम्हे  प्राप्त होगा !अनिष्टकारी ,कुकर्मी ,अधर्मी ,अश्लील  आत्माओ  का  प्रभाव  तुम  पर  नहीं  पड़ेगा !उत्तम  मार्ग  मिलने   से  जीवन  उन्नति  की  और  बढ़ते  रहकर  पवित्रता  जीवन  की  तुम्हे  मिलने  से  एक  नया  छोर  जीवन  का  प्रारंभ  होगा !बच्चे  हर  काम   की  पूर्णता  का   एक  समय  निश्चित  होता  है ! इस  काम  को  भी  समयानुसार  पूरा  हुआ  जानना ! सो  बच्चे  जीवन  को  निश्चिन्तता  से  खुल  कर  जीयो ! तुम्हारा  कोई  हास   नहीं  हुआ ! मात्र  मन  की  दुविधा  है !उसकी  कुण्डी  खुलवा  दी  जानी  है !तुम्हे  पर्मोप्चार  करना  है  इसलिए  रामायण  पाठ  करते  रहकर  जहाँ  तक  हो  सके  हर  एक   आत्मा  के निमित  एक  पाठ  करो !भगवन  शंकर  की  आराधना  से  हर  क्लेश ,कष्ट  स्वयं  दूर  हो  जाया  करते  हैं  तो  इसके  लिए  सुबह -सुबह  नित्य  प्रति  महामृत्युंजय  का  जाप  अवश्य  करना  होगा ! बच्चे  नित्य  प्रति  जाप  चलने  से  घर  का  कलह भी  अवश्य  ही  समाप्त  होगा ! तुम  मेरे  बच्चे  हो ,तुम्हे  हर  पग  पर  सलाह  देना  मेरा  काम  है ! तुम  निश्चिंत  भाव  से  जाप करते  रह  कर  अपना  मन  टिकाये  रखो ! तुम्हे  दिन  दुगनी -रात  चौगुनि   उन्नति  प्राप्त  होगी !तुम्हे  हर  पल  शान्ति  दिलवानी  है  इसके  लिए  वातावरण  तैयार  होना  बन  रहा  है !        </p>
<img src="http://feeds.feedburner.com/~r/GyanVaani/~4/-mgcUECneV4" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.gyanvaani.com/2008/10/07/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-61996/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		<feedburner:origLink>http://www.gyanvaani.com/2008/10/07/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%80-61996/</feedburner:origLink></item>
	</channel>
</rss>

