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<title><![CDATA[hastakshep | हस्तक्षेप]]></title>
<description><![CDATA[हस्तक्षेप एक स्वतंत्र हिंदी न्यूज़ पोर्टल है जो समसामयिक, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक मुद्दों पर समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ दलित, वंचित, आदिवासी, महिला व छात्र अधिकारों को विशेष महत्व दिया जाता है।]]></description>
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<title>hastakshep | हस्तक्षेप</title>
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<pubDate>Fri, 24 Jul 2026 02:47:50 GMT</pubDate>
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<copyright><![CDATA[Hastakshep]]></copyright>
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<managingEditor><![CDATA[anushka@blinkcms.ai (Hastakshep)]]></managingEditor>
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<title><![CDATA[कारपोरेट घरानों के ताबेदारों के खिलाफ सोशलिस्टों की ललकार]]></title>
<tags>पूंजीवादी</tags>
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<category><![CDATA[आपकी नज़र,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Fri, 24 Jul 2026 02:47:48 GMT</pubDate>
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<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2025/06/17/4553-breaking-news.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>कारपोरेट घरानों के ताबेदारों के खिलाफ सोशलिस्टों की ललकार
</b></h2><p style="text-align: justify; "><b>84वें भारत छोड़ो आंदोलन दिवस पर दिल्ली में युवा सोशलिस्ट पहल का 
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो&nbsp;</b><b>प्रदर्शन</b></p><p style="text-align: justify; ">“शिक्षा का स्तर गिर रहा है इसलिए छंटी भर्ती हो [केवल चुनिंदा विद्यार्थियों को कॉलेज/यूनिवर्सिटी में दाखिल दिया जाए], ऐसी आवाज हिंद सरकार और शिक्षाशास्त्रियों ने उठाई है। ... इसलिए जबरदस्त मांग होनी चाहिए कि नए-नए विश्वविद्यालय और कॉलेज खुलें, उपयुक्त परीक्षा पास कर लेने के बाद हर विद्यार्थी को मनचाही शिक्षा लेने का अधिकार हो, तीसरी अथवा दूसरी श्रेणी में उत्तीर्णता का फर्क बिल्कुल न किया जाए, और शिक्षा सस्ती हो। स्कूल और कॉलेजों में फीसें कम हो जाएं। हो सके, बिल्कुल न हो।”  डॉ राममनोहर लोहिया
</p><p style="text-align: justify; "><b>कौन हैं शिक्षा के सौदागार:
</b></p><p style="text-align: justify; ">कांग्रेस पार्टी, जिसने 1991 में बाजार-अर्थव्यवस्था लागू करके संविधान के बरखिलाफ शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और ग्लोबीकरण का रास्ता खोला; 
</p><p style="text-align: justify; ">भाजपा/आरएसएस, जिसने शिक्षा पर दो बड़े उद्योगपतियों – कुमार मंगलम बिड़ला और मुकेश अंबानी – की कमिटी बना कर शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और ग्लोबीकरण की प्रक्रिया को मजबूती और तेजी प्रदान की। नई शिक्षा नीति 2020 उस दिशा में एक लंबी छलांग है; 
</p><p style="text-align: justify; ">एनडीए और यूपीए में शामिल सभी राजनीतिक पार्टियां जो इस पूरी प्रक्रिया में शामिल रही हैं;
</p><p style="text-align: justify; ">राजनीतिक सुभीता और संरक्षण पाकर शिक्षा के बाजार में मुनाफाखोरी के लिए प्रतिस्पर्धा में जुटे छोटे-बड़े व्यवसायी; 
</p><p style="text-align: justify; ">वे ‘धर्मात्मा’ (फिलेंथ्रोपिस्ट) जो निजी स्कूलों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में वैश्विक स्तर की शिक्षा देने के नाम पर शिक्षा का व्यवसाय करते हैं;     
</p><p style="text-align: justify; ">संवैधानिक पदों पर आसीन विशिष्ट/अतिविशिष्ट महानुभाव जो निजी विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों में भागीदारी करते हैं;
</p><p style="text-align: justify; ">देश के शिक्षाविद, शिक्षक और बुद्धिजीवी जो यूजीसी/सरकारी कमिटियों में रहते हुए इस संविधान-विरोधी काम को अंजाम देने में सरकारों के साथ रहे हैं;  
</p><p style="text-align: justify; ">देश के विद्वान शिक्षक जिन्होंने अपना कैरियर सार्वजनिक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बनाया, लेकिन निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों की नौकरी बजाते और उनका विरुद गाते हैं;
</p><p style="text-align: justify; ">एनजीओ जगत के वे लोग जो शिक्षा/ज्ञान के बाजार-चरित्र और बाजार-अर्थव्यवस्था को बनाए रख कर शिक्षा-सुधारों के टोटकों के नाम पर देशी-विदेशी अनुदान और पद-पुरस्कार लेते हैं और शिक्षा के संघर्ष को दबाने और भटकाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।    
</p><p style="text-align: justify; "><b>हमारी मान्यता:
</b></p><p style="text-align: justify; ">संविधान-निर्माता, खास कर डॉक्टर&nbsp;अंबेडकर&nbsp;शिक्षा के अधिकार को संविधान के खंड 3 में मौलिक अधिकारों के साथ रखना चाहते थे।&nbsp;उसे संविधान के खंड 4 में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के साथ इस संकल्प के साथ रखा&nbsp;गया&nbsp;कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा के अधिकार का लक्ष्य&nbsp;जल्दी ही&nbsp;हासिल कर लिया जाना चाहिए – यानि दस वर्षों में। लेकिन यह संवैधानिक&nbsp;संकल्प कभी पूरा नहीं हुआ। उल्टे, भारत के नेताओं और बुद्धिजीवियों ने इस संकल्प के विरुद्ध कानून बना कर शिक्षा को बाजारवाद का ग्रास बना दिया। इस सारी प्रक्रिया को उलटना होगा। 
</p><p style="text-align: justify; "><b>इसके लिए:&nbsp;
</b></p><p style="text-align: justify; ">नवउदारवादकालीन सभी संविधान-विरोधी कानूनों को निरस्त किया जाए ताकि संविधान-सम्मत शिक्षा-व्यवस्था की अविलंब बहाली और मजबूती हो सके;
</p><p style="text-align: justify; ">पहली से स्नातकोत्तर कक्षा तक सभी को समान और उम्दा गुणवत्ता वाली शिक्षा देने की जिम्मेदारी राज्य की हो; 
</p><p style="text-align: justify; ">देश के प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी पसंद के विषय/कोर्स में दाखिला सुलभ कराने की जिम्मेदारी राज्य की हो; 
</p><p style="text-align: justify; ">जो विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय सरकारी अनुदान (सस्ती जमीन और कर्ज आदि के रूप में) से कायम किए गए हैं उन सभी का सार्वजनीकरण किया जाए;
</p><p style="text-align: justify; ">वर्तमान शिक्षा मौजूदा पूंजीवादी बाज़ार व्यवस्था के लिए कुशल मजदूर पैदा करने तक सीमित कर दी गई है। शिक्षा का साम्प्रदायीकरण समाज में संकीर्णता, अंधविश्वास और तर्कहीनता को बढ़ावा दे रहा है। इस शिक्षा-विरोधी स्थिति को समाप्त कर विज्ञान, वाणिज्य, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मानविकी, कला, टेक्नॉलाजी, मेडिकल, प्रबंधन आदि विषयों की शिक्षा का कंटेंट और भाषा ऐसी हो कि प्रत्येक विषय में मौलिक अवदान करने वाले तर्कशील नागरिकों का निर्माण हो सके;
</p><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>कुल मिला कर, शिक्षा/ज्ञान के बाजारोन्मुख चरित्र और अर्थव्यवस्था को जनोन्मुख बनाया जाए;
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>शिक्षा के सवाल पर समग्रता में चर्चा के लिए संसद और विधानसभाओं का विशेष सत्र बुलाया जाए।  
</b></li></ul><p style="text-align: justify; ">देश में जड़ जमा चुकी कारपोरेट राजनीति के तहत कारपोरेट हितों और सांप्रदायिकता की पोषक सरकार को उपर्युक्त मांगों का ज्ञापन देना एक निरर्थक कवायद ही होगी। जन-जागृति एकमात्र रास्ता है। जैसा कि प्रोफेसर अनिल सदगोपाल ने कहा है, देश की संघर्षशील जनता को जल, जंगल, जमीन और जीविका की लड़ाई में शिक्षा के हक की लड़ाई को भी शामिल करना होगा। यह पर्चा देश की जन पंचायत में पेश किया गया ज्ञापन है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>भारत छोड़ो आंदोलन दिवस (9 अगस्त) </b>के ऐतिहासिक मौके पर हमारी अपील है कि भारतीय जनता के संवैधानिक अधिकारों का विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष करने वाले प्रगतीशील संगठन, समूह एवं व्यक्ति शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और ग्लोबीकरण को समाप्त करने का बीड़ा उठाएं। युवा सोशलिस्ट पहल का मानना है कि भारत के राष्ट्रीय जीवन पर कसे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे को नष्ट करने के लिए सबसे पहले शिक्षा को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने की जरूरत है। 
</p><p style="text-align: justify; ">आप साथियों सहित सादर आमंत्रित हैं 
</p><p style="text-align: justify; ">स्थान: जंतर मंतर तारीख: 9 अगस्त 2026 समय: पूर्वाह्न 10 बजे से अपराह्न 2 बजे तक
</p><p style="text-align: justify; ">अगस्त के शहीदों को भूलो मत भूलो मत
</p><p style="text-align: justify; "><b>युवा सोशलिस्ट पहल
</b></p><p style="text-align: justify; ">11 - राजपुर रोड नई दिल्ली -110054
</p><p style="text-align: justify; ">संपर्क: <b>डॉ हिरण्य हिमकर, बंदना पांडे, नीरज</b></p>]]></content:encoded>
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