<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?>
<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" version="2.0">
<channel>
<title><![CDATA[hastakshep | हस्तक्षेप]]></title>
<description><![CDATA[हस्तक्षेप एक स्वतंत्र हिंदी न्यूज़ पोर्टल है जो समसामयिक, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक मुद्दों पर समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ दलित, वंचित, आदिवासी, महिला व छात्र अधिकारों को विशेष महत्व दिया जाता है।]]></description>
<link>https://hastakshep.com</link>
<image>
<url>https://hastakshep.com/images/logo.png</url>
<title>hastakshep | हस्तक्षेप</title>
<link>https://hastakshep.com</link>
</image>
<atom:link href="https://hastakshep.com/custom_feeds_partners.xml" rel="self" type="application/rss+xml"/>
<pubDate>Fri, 03 Jul 2026 08:35:15 GMT</pubDate>
<lastBuildDate>Fri, 03 Jul 2026 08:35:15 GMT</lastBuildDate>
<copyright><![CDATA[Hastakshep]]></copyright>
<language><![CDATA[hi]]></language>
<managingEditor><![CDATA[anushka@blinkcms.ai (Hastakshep)]]></managingEditor>
<ttl>1</ttl>
<item>
<title><![CDATA[पश्चिम बंगाल OBC आरक्षण विवाद: 17% से 7% तक की पूरी कहानी]]></title>
<description><![CDATA[पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण 17% से 7% होने के फैसले का कानूनी, संवैधानिक और राजनीतिक विश्लेषण। जानिए हाईकोर्ट के फैसले, मंडल आयोग और इसके सामाजिक प्रभाव]]></description>
<tags>ममता बनर्जी,पश्चिम बंगाल,सामाजिक न्याय,सुप्रीम कोर्ट,सुप्रीम कोर्ट के फैसले,संविधान</tags>
<link>https://hastakshep.com/aapki-najar/west-bengal-obc-reservation-17-to-7-percent-analysis-307887</link>
<guid isPermaLink="true">https://hastakshep.com/aapki-najar/west-bengal-obc-reservation-17-to-7-percent-analysis-307887</guid>
<category><![CDATA[आपकी नज़र,कानून,समाचार,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Fri, 03 Jul 2026 08:35:14 GMT</pubDate>
<imagecaption/>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2025/07/19/7110-drramjilal-kamboj.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2025/07/19/7110-drramjilal-kamboj.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण 17% से 7%: कानून, राजनीति और सामाजिक प्रभाव
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>बंगाल में OBC आरक्षण घटा: हाईकोर्ट, राजनीति और संविधान का विश्लेषण
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण पर नया विवाद: कानूनी और राजनीतिक समीक्षा
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>सारांश-
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>डॉ. रामजीलाल का यह लेख पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को 17% से घटाकर 7% किए जाने की पृष्ठभूमि, संवैधानिक आधार और राजनीतिक प्रभाव का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस लेख में वाम मोर्चा सरकार, ममता बनर्जी सरकार और वर्तमान राज्य सरकार की नीतियों की तुलना करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के 2024 के निर्णय, मंडल आयोग की सिफारिशों, इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के फैसले तथा जातीय जनगणना की आवश्यकता पर चर्चा की गई है। लेख यह भी बताता है कि इस निर्णय का सामाजिक न्याय, आरक्षण नीति, सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षा और भविष्य की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। 
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>इस लेख में जानिए -
</b></p><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण 17% से 7% क्यों हुआ
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बंगाल OBC आरक्षण पर कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>पश्चिम बंगाल OBC आरक्षण का नया नियम
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>क्या बंगाल में OBC आरक्षण घटा दिया गया
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>मंडल आयोग और पश्चिम बंगाल OBC आरक्षण
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>इंदिरा साहनी केस और 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बंगाल में OBC आरक्षण विवाद का कानूनी विश्लेषण
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>पश्चिम बंगाल में मुस्लिम OBC आरक्षण विवाद
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>जातीय जनगणना और OBC आरक्षण
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बंगाल भाजपा सरकार OBC आरक्षण नीति
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>ममता बनर्जी सरकार का OBC आरक्षण मॉडल
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>पश्चिम बंगाल OBC सूची में बदलाव
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बंगाल हाईकोर्ट के फैसले का सामाजिक प्रभाव
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>OBC Reservation News Hindi
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>West Bengal Reservation Policy Analysis
</b></li></ul><h3 style="text-align: justify; "><b>पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण 17% से घटकर 7% : जातीय और धार्मिक राजनीति -एक समीक्षा
</b></h3><p style="text-align: justify; ">प्रारम्भ में पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार (The Left Front government of West Bengal) ने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत के आधार पर चलते हुए सामाजिक संरचना की अनदेखी करते हुए कहा था कि बंगाल में जाति-आधारित समाज नहीं है. परिणामस्वरूप काफी लंबे समय तक ओबीसी वर्गों को कोई आरक्षण नहीं दिया। लेकिन कालांतर में जब चुनावी जानाधार खिसकने लगा, तब भी मंडल आयोग की सिफारिश के आधार पर ओबीसी वर्गों को 27 फीसदी की जगह 7 फीसदी आरक्षण दिया. जिसे बाद में 3 फीसदी से 10 फीसदी और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने नेतृत्व में बढ़ा कर 17फीसदी किया, जो कि फिर भी मडंल आयोग की संस्तुतियों से10 फीसदी कम था। परन्तु इसकी विशेषता यह थी कि इसमें हिन्दू और मुस्लिम के आधार कोई भेदभाव न करके दोनों को ही ओबीसी की सूची में सम्मिलित किया। अतः बंगाल में एससी को 22 फीसदी, एसटी को 6 फीसदी, ओबीसी को 17 फीसदी (10 फीसदी-ओबीसी-ए श्रेणी, 7 फीसदी ओबीसी-बी श्रेणी) कुल मिला कर यह 45 फीसदी हो गया जो कि अभी भी 5 फीसदी कम था. 
</p><p style="text-align: justify; ">आरक्षण के प्रावधान में बड़ा बदलाव सर्व प्रथम ज्योति बासु व बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य की वाम मोर्चा की 34 वर्ष से चली सरकार को सन् 2011 के विधान सभा चुनावों में धारा शाही करने के पश्चात 20 मई 2011 में ममता बनर्जी मुख्य मंत्री बनी।
</p><p style="text-align: justify; ">ममता ने सता में आने पश्चात विकलांगों के लिए 3 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया। अतः बंगाल में कुल आरक्षण 48 फीसदी हो गया.
</p><h4 style="text-align: justify; "><b>ओबीसी वर्गों के लिए अब यह 17 फीसदी की जगह सिर्फ 7 फीसदी आरक्षण
</b></h4><p style="text-align: justify; ">बंगाल की वर्तमान भाजपा सरकार ने इस संबंध में <b><i>कलकत्ता हाईकोर्ट के 2024 के फैसले </i></b>को आधार माना। परन्तु यह दलील इस लिए उचित नहीं लगती क्योंकि ममता बनर्जी की सरकार में ओबीसी वर्गों आरक्षण 17 फीसदी जारी रहा। भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं ने चुनावों में दलितों व पिछड़ों वर्गों के आश्वासन देकर     आरक्षण सुरक्षित रखने का वायदा करके वोट लेने के लिए अपील की थी। परन्तु शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद सौगात देते हुए 17 फीसदी ओबीसी आरक्षण को 7 फीसदी कर दिया। सन् 2010 से पहले सूची में शामिल 66 समुदायों को बहाल कर किया गया। वर्तमान सरकार के इस निर्णय ने <b><i>ममता बनर्जी सरकार की व्यवस्था</i></b> को समाप्त कर दिया, जिसमें ओबीसी को श्रेणी में 10% और श्रेणी बी में 7% में विभाजित कर के कुल 17 %  आरक्षण दिया जाता था। यह फैसला <b>मंडल आयोग की 27 फीसदी आरक्षण की संस्तुति,</b> जिसको इंदिरा साहनी विवाद में संवैधानिक व औचित्य पूर्ण माना था, का सरासर उल्लंघन ही नहीं अपितु 20 फीसदी कटौती करके पिछड़े वर्गों के हितों ठेस पहुंचाई है.
</p><p style="text-align: justify; ">मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। <b><i>16 नवंबर, 1992 </i></b>को <b><i>इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया विवाद</i></b> में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। इस ऐतिहासिक फ़ैसले की मुख्य बातें इस तरह हैं: पहला, OBCs के लिए 27% रिज़र्वेशन को संवैधानिक घोषित किया गया, दूसरा, सुप्रीम कोर्ट ने 50 पर सेंट रिजर्व कोटे की ऊपरी लिमिट घोषित की. तीसरा, जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट की सिफ़ारिशें लागू की गईं, तो उसमें क्रीमी लेयर का कोई ज़िक्र नहीं था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में 'क्रीमी लेयर' जोड़ दिया। इस वजह से, मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें 'कमज़ोर' हो गईं। 
</p><p style="text-align: justify; ">हम अपने पाठकों को बताना चाहेंगे कि 'क्रीमी लेयर' शब्द का इस्तेमाल पहली बार साल 1975 में केरल राज्य बनाम थॉमस केस में किया गया था।
</p><p style="text-align: justify; "><b>जाति के आधार पर जनगणना--बहुत ज़रूरी
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले </b>के बाद, आरक्षण की निर्धारित सीमा 50% से ज़्यादा नहीं हो सकती। अन्य पिछड़े वर्गों (OBCs) के लिए 27%, अनुसूचित जनजातियों (SCs) के लिए 15%, अनुसूचित जनजातियों (STs )के लिए 7.5% आरक्षण का प्रावधान है, अन्य शब्दों में कुल आरक्षण 49.5% है। जबकि इन जातियों – (वर्गों) अन्य पिछड़े वर्गों (OBCs )की जनसंख्या 52%, अनुसूचित जनजातियों (SCs) की 15% और अनुसूचित जनजातियों (STs ) की 7.5% है, यानी इन तीनों श्रेणियों की कुल जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का 74.5% है.
</p><p style="text-align: justify; ">विधानसभा में पिछड़ा वर्ग विकास मंत्री गौरी शंकर घोष ने कहा कि यह फेरबदल कलकत्ता हाई कोर्ट के 22 मई 2024 के फैसले के अनुपालन के कारण किया गया है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने मार्च 2010 से मई 2012 के बीच जोड़े गए 77 समुदायों का ओबीसी दर्जा रद्द कर दिया था। 
</p><p style="text-align: justify; ">जस्टिस तापव्रत चक्रवर्ती और राजशेखर मंथा की खंड पीठ ने पाया कि कई समूह को केवल धर्म के आधार पर शामिल किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 15(4)व 16(4)का उल्लंघन है। यद्यपि सन् 2010 के बाद जारी सभी ओबीसी प्रमाण पत्र रद्द कर दिए, लेकिन पहले से नौकरी पा चुके व्यक्तियों को राहत दी गई।
</p><p style="text-align: justify; "><b>कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश </b>का पालन करते हुए नई सरकार ने धर्म- आधारित वर्गीकरण खत्म कर सन् 2010 से पहले की सूची वाले 66 समुदायों को नियमित किया है। अब इन 66 समुदायों का सरकारी सेवाओं, पदों व कॉलेज प्रवेश में 7% आरक्षण मिलेगा। पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने कहा कि संशोधित नीति वास्तव में पिछड़े हिंदू समुदायों पर संविधान पर लागू होगी जो एससी व एसटी श्रेणी में नहीं हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">नई सूची में पारंपरिक कारीगर और कृषक जातियां शामिल हैं -कपाली, कुर्मी, नाई(नापित), तांती, धनुक, कसाई, कर्मकार, कुंभकार, स्वर्णकार, तेली, यादव, मोइरा, मोदक आदि. इनके अतिरिक्त हज्जाम ( मुस्लिम), पहाड़िया, मुस्लिम व जोलाहा (अंसारी ) जैसे कुछ समुदाय भी बरकरार हैं।ले किन पिछली 140 -समूह सूची के 74 के उप - जातियों को हटा दिया गया, उसमें अधिकांश मुस्लिम धर्म के अनुयायी हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">इस बदलाव से पहले, <b>बंगाल में 17% ओबीसी आरक्षण</b> था- ओबीसी-ए में 10% के तहत 81 समुदाय (मुस्लिम 56 मुस्लिम) और ओबीसी -बी में 7% के तहत 99 समुदाय (41 मुस्लिम). बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाई कोर्ट के निर्णय से करीब 5 लाख ओबीसी प्रमाण पत्र प्रभावित हुए।
</p><p style="text-align: justify; "><b>50% की सीमा का तर्क वर्ग
</b></p><p style="text-align: justify; ">राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने पहले कहा था कि बंगाल में एससी, एसटी, ओबीसी का कुल आरक्षण 45% है। यानी इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ विवाद (16 नवंबर, 1992) मामले में की सीमा 50% के तहत अभी 5% की गुंजाइश बाकी की है।राष्ट्रीय पिछड़ा वर्गआयोग (एनसीबीसी ) ने ओबीसी कोटा 5% बढ़ाने की सिफारिश की थी इसके बिल्कुल विपरीत बंगाल की नई भाजपा सरकार ने ओबीसी कोटा 5% बढ़ाने घटा दिया और पिछली सरकारों पर ‘वोट बैंक राजनीति व असंवैधानिक धार्मिक समावेश ‘का आरोप लगाया।
</p><p style="text-align: justify; ">बंगाल की भाजपा सरकार ने इसे संवैधानिक सुधार बताया है जब कि टीएमसी ने कहा कि कई समुदाय केंद्रीय सूची में अभी भी ओबीसी हैं। जिससे अजीब स्थिति बनी हुई है। अन्य शब्दों यह विरोधाभास की स्थिति है। ममता बनर्जी ने विधानसभा में कहा था कि नए सामाजिक -आर्थिक सर्वे के आधार पर 140 समुदायों-49 श्रेणी-ए और 91 श्रेणी सूचीबद्ध कर 17% का कोटा बहाल किया जाएगा।
</p><p style="text-align: justify; ">460 सरकारी व सहायता प्राप्त कॉलेजों में प्रवेश प्रभावित हुए हैं क्योंकि जादवपुर व प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय अब 7% का पालन कर रहे हैं। यद्यपि कलकता हाई कोर्ट के फैसले के विरूद्ध तत्कालीन ममता बनर्जी की बंगाल सरकार ने 77 समुदाय के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील विचाराधीन है। परन्तु वर्तमान शुभेंदु अधिकारी की भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील वापस लेने के लिए याचिका दायर की है।
</p><p style="text-align: justify; ">यह संशोधन जातीय गणना को नया आकार देगा व इसके दूरगामी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिणाम होंगे तथा इसके प्रभाव अन्य भाजपा शासित राज्यों पर पड़ने की संभावना दृष्टिगोचर होती है.
</p><p style="text-align: justify; "><b><span style="font-size: 26px;">डॉ. रामजीलाल</span>, 
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>लेखक सामाजिक वैज्ञानिक, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल (हरियाणा) के पूर्व प्रिंसिपल हैं।
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>FAQs
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>प्रश्न 1. पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण 17% से 7% क्यों हुआ?
</b></p><p style="text-align: justify; ">उत्तर: कलकत्ता हाईकोर्ट के 22 मई 2024 के फैसले के बाद 2010 से 2012 के बीच OBC सूची में जोड़े गए 77 समुदायों का OBC दर्जा रद्द कर दिया गया। नई सरकार ने 2010 से पहले की सूची बहाल करते हुए कुल OBC आरक्षण 7% लागू किया।
</p><p style="text-align: justify; "><b>प्रश्न 2. क्या हाईकोर्ट ने मुस्लिम समुदाय का OBC आरक्षण समाप्त किया?
</b></p><p style="text-align: justify; ">उत्तर: नहीं। हाईकोर्ट ने धर्म के आधार पर किए गए वर्गीकरण को असंवैधानिक माना। जिन समुदायों को केवल धार्मिक आधार पर शामिल किया गया था, उनका दर्जा रद्द किया गया। कुछ मुस्लिम OBC समुदाय नई सूची में भी बने हुए हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>प्रश्न 3. इंदिरा साहनी मामले का इस विवाद से क्या संबंध है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">उत्तर: 1992 के इंदिरा साहनी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने OBC के लिए 27% आरक्षण को वैध माना और कुल आरक्षण की सामान्य सीमा 50% निर्धारित की। इसी निर्णय का उल्लेख वर्तमान बहस में बार-बार किया जा रहा है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>प्रश्न 4. क्या पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">उत्तर: हाँ। कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्णय के विरुद्ध दायर अपील पर सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही का उल्लेख किया गया है। अंतिम कानूनी स्थिति सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करेगी।
</p><p style="text-align: justify; "><b>प्रश्न 5. इस बदलाव का सबसे अधिक प्रभाव किन क्षेत्रों पर पड़ेगा?
</b></p><p style="text-align: justify; ">उत्तर: सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश, OBC प्रमाणपत्रों की वैधता तथा राज्य की सामाजिक एवं राजनीतिक संरचना पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[राम मंदिर चंदा हेराफेरी मामले में वकीलों का फैसला : क्या बार एसोसिएशन किसी आरोपी का केस लड़ने से रोक सकती है?]]></title>
<description><![CDATA[राम मंदिर चंदा मामले में फैज़ाबाद बार एसोसिएशन के प्रस्ताव पर जस्टिस काटजू का कानूनी विश्लेषण। जानिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले, संविधान और वकालत की नैतिकता क्या कहती है।]]></description>
<tags>महात्मा गांधी,इंदिरा गांधी,काटजू,जस्टिस काटजू,जस्टिस काटजू का लेख,जस्टिस मार्कंडेय काटजू</tags>
<link>https://hastakshep.com/law-and-justice/faizabad-bar-association-illegal-resolution-justice-katju-supreme-court-analysis-307773</link>
<guid isPermaLink="true">https://hastakshep.com/law-and-justice/faizabad-bar-association-illegal-resolution-justice-katju-supreme-court-analysis-307773</guid>
<category><![CDATA[आपकी नज़र,कानून,समाचार,स्तंभ,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 02 Jul 2026 17:25:33 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Justice Markandey Katju's open letter to the Supreme Court judges: Serious questions on the working style of judges]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/wp-content/uploads/2025/02/Justice-Markandey-Katju-638659692419676442.jpg]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/wp-content/uploads/2025/02/Justice-Markandey-Katju-638659692419676442.jpg' /><h2 style="text-align: justify; "><b>फैज़ाबाद बार एसोसिएशन का गैर-कानूनी प्रस्ताव: जस्टिस काटजू का संवैधानिक विश्लेषण
</b></h2><p style="text-align: justify; "><b>फैज़ाबाद बार एसोसिएशन का गैर-कानूनी प्रस्ताव
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>यह लेख सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू द्वारा फैज़ाबाद बार एसोसिएशन के उस प्रस्ताव का कानूनी विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें राम मंदिर चंदा हेराफेरी मामले के आरोपियों की पैरवी न करने का निर्णय लिया गया। लेख में A.S. Mohammad Rafi vs State of Tamil Nadu (2010) के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, संविधान के अनुच्छेद 22(1), बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रोफेशनल एथिक्स नियमों तथा ऐतिहासिक उदाहरणों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार है और ऐसे सामूहिक प्रतिबंध असंवैधानिक एवं शून्य हैं...
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>राम मंदिर चंदा हेराफेरी मामले में वकीलों का फैसला
</b></h3><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>A.S. Mohammad Rafi vs State of Tamil Nadu 2010 हिंदी
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>क्या बार एसोसिएशन किसी आरोपी का केस लड़ने से रोक सकती है
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>सुप्रीम कोर्ट का वकीलों के अधिकार पर फैसला
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>अनुच्छेद 22(1) के तहत आरोपी के अधिकार
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बार काउंसिल ऑफ इंडिया प्रोफेशनल एथिक्स नियम
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>क्या हर आरोपी को वकील पाने का संवैधानिक अधिकार है
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>जस्टिस मार्कंडेय काटजू का कानूनी विश्लेषण
</b></li></ul><h4 style="text-align: justify; "><b>फैज़ाबाद बार एसोसिएशन का गैर-कानूनी प्रस्ताव
</b></h4><p style="text-align: justify; "><b><span style="font-size: 30px;">जस्टिस मार्कंडेय काटजू</span>
</b></p><p style="text-align: justify; ">अयोध्या में फैज़ाबाद बार एसोसिएशन ने फ़ैसला किया है कि उसका कोई भी सदस्य राम मंदिर चंदे में कथित हेराफेरी के मामले में गिरफ़्तार किए गए आठ आरोपियों का केस नहीं लड़ेगा। हाल ही में हुई गिरफ़्तारियों के बाद एसोसिएशन की आम बैठक में यह फ़ैसला लिया गया।
</p><p style="text-align: justify; ">इस प्रस्ताव के मुताबिक, अगर कोई वकील आरोपियों की तरफ़ से पेश होता है, तो उस पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। <b><a href="https://www.hindustantimes.com/india-news/ram-mandir-donation-theft-allegations-ayodhya-temple-faizabad-bar-association-lawyers-fine-101782716245104.html" target="_blank">खबरों के अनुसार,</a></b> वकीलों ने यह भी चेतावनी दी है कि प्रस्ताव का उल्लंघन करने वालों के ख़िलाफ़ और भी कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें उनकी सदस्यता रद्द करना भी शामिल है।
</p><p style="text-align: justify; ">A.S. मोहम्मद रफ़ी बनाम तमिलनाडु राज्य (2010) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को देखते हुए यह प्रस्ताव पूरी तरह से ग़ैर-क़ानूनी है, जिसमें कोर्ट ने कहा था:
</p><p style="text-align: justify; ">“इस मामले को खत्म करने से पहले, हम एक बहुत ही ज़रूरी कानूनी और संवैधानिक मुद्दे पर बात करना चाहते हैं, जिसने हमें इस मामले में बहुत परेशान किया है। ऐसा लगता है कि कोयंबटूर बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पास किया था कि कोयंबटूर बार का कोई भी सदस्य आरोपी पुलिसकर्मियों का बचाव नहीं करेगा, जिन पर इस मामले में आपराधिक केस चल रहा है।
</p><p style="text-align: justify; ">पूरे भारत में कई बार एसोसिएशनों ने - चाहे वे हाई कोर्ट बार एसोसिएशन हों या डिस्ट्रिक्ट कोर्ट बार एसोसिएशन - ऐसे प्रस्ताव पास किए हैं कि वे किसी खास क्रिमिनल केस में किसी खास व्यक्ति या व्यक्तियों का बचाव नहीं करेंगे। कभी-कभी पुलिस वालों और वकीलों के बीच टकराव हो जाता है, और बार एसोसिएशन प्रस्ताव पास करती है कि कोई भी वकील कोर्ट में क्रिमिनल केस में पुलिस वालों का बचाव नहीं करेगा। इसी तरह, कभी-कभी बार एसोसिएशन ऐसा प्रस्ताव पास करती है कि वे किसी ऐसे व्यक्ति का बचाव नहीं करेंगे जिस पर आतंकवादी होने का आरोप हो, या जिसने कोई बहुत क्रूर या जघन्य अपराध किया हो, या जो रेप केस में शामिल हो।
</p><p style="text-align: justify; ">हमारी राय में, ऐसे प्रस्ताव पूरी तरह से गैर-कानूनी हैं, बार की सभी परंपराओं और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ हैं। समाज चाहे किसी व्यक्ति को कितना भी बुरा, भ्रष्ट, नीच, पतित, विकृत, घिनौना, निंदनीय, दुष्ट या घृणित क्यों न माने, उसे अदालत में अपना बचाव करने का अधिकार है, और इसी के अनुसार वकील का यह कर्तव्य है कि वह उसका बचाव करे।
</p><p style="text-align: justify; "><b>इस संबंध में हम कुछ ऐतिहासिक उदाहरण दे सकते हैं।
</b></p><p style="text-align: justify; ">जब महान क्रांतिकारी लेखक थॉमस पेन को 1792 में इंग्लैंड में फ्रांसीसी क्रांति के समर्थन में अपना मशहूर पैम्फलेट 'द राइट्स ऑफ़ मैन' लिखने के लिए जेल में डाला गया और उन पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया गया, तो महान वकील थॉमस एर्स्किन (1750-1823) को उनका बचाव करने के लिए नियुक्त किया गया। उस समय एर्स्किन प्रिंस ऑफ़ वेल्स के अटॉर्नी जनरल थे और उन्हें चेतावनी दी गई थी कि अगर उन्होंने यह केस लिया, तो उन्हें उनके पद से हटा दिया जाएगा। बिना डरे, एर्स्किन ने केस स्वीकार कर लिया और उन्हें उनके पद से हटा दिया गया।
</p><p style="text-align: justify; "><b>हालाँकि, इस संदर्भ में उनके अमर शब्द आज भी एक चमकदार रोशनी की तरह हैं:
</b></p><p style="text-align: justify; ">"जिस पल किसी वकील को यह कहने की इजाज़त मिल जाती है कि वह क्राउन (सरकार) और अदालत में पेश किए गए आरोपी के बीच खड़ा होगा या नहीं—जबकि वह रोज़ वहीं अपनी वकालत करता है—उसी पल से इंग्लैंड की आज़ादी खत्म हो जाती है। अगर वकील आरोप या बचाव पक्ष के बारे में अपनी राय के आधार पर केस लड़ने से इनकार करता है, तो वह जज की भूमिका निभाने लगता है; बल्कि वह फ़ैसला आने से पहले ही ऐसा करने लगता है। और अपनी हैसियत व शोहरत के दम पर, वह शायद अपनी गलत राय का भारी असर आरोपी के खिलाफ़ डालता है—जबकि अंग्रेज़ी कानून के उदार सिद्धांत आरोपी के पक्ष में ही सारी बातें मानते हैं और खुद जज को ही उसका वकील बनने का निर्देश देते हैं।"
</p><p style="text-align: justify; ">भारतीय वकीलों ने इस महान परंपरा का पालन किया है। <b><i>ब्रिटिश शासन के दौरान बंगाल के क्रांतिकारियों का बचाव </i></b>हमारे वकीलों ने किया; मेरठ षड्यंत्र मामले में भारतीय कम्युनिस्टों का बचाव किया गया; हैदराबाद के रज़ाकारों का बचाव हमारे वकीलों ने किया; शेख अब्दुल्ला और उनके साथ आरोपी बनाए गए लोगों का बचाव भी उन्होंने ही किया; और <b>महात्मा गांधी</b> तथा <b>इंदिरा गांधी</b> के कुछ कथित हत्यारों का बचाव भी उन्होंने किया। हाल के समय में, <b>डॉ. विनायक सेन </b>का बचाव भी किया गया है। किसी भी नामी भारतीय वकील ने कभी भी इस आधार पर अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा कि इससे वे अलोकप्रिय हो जाएंगे या ऐसा करना उनके लिए व्यक्तिगत रूप से खतरनाक होगा। इसी महान परंपरा के तहत, बॉम्बे हाई कोर्ट के जाने-माने वकील भूलाभाई देसाई ने दिल्ली के लाल किले में I.N.A. मुकदमों (नवंबर 1945 - मई 1946) के दौरान आरोपियों का बचाव किया था।
</p><p style="text-align: justify; "><b>हालांकि, देश के कई हिस्सों से परेशान करने वाली खबरें आ रही हैं, जहां बार एसोसिएशन कुछ आरोपियों का बचाव करने से इनकार कर रहे हैं।
</b></p><p style="text-align: justify; ">अमेरिकी संविधान का छठा संशोधन कहता है कि "सभी आपराधिक मुकदमों में आरोपी को अपना बचाव करने के लिए वकील की मदद लेने का अधिकार होगा"।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>पावेल बनाम अलबामा (287 US 45, 1932) मामले</i></b> में तथ्य यह थे कि 13 से 21 साल की उम्र के नौ अनपढ़ अश्वेत युवकों पर टेनेसी और अलबामा से गुज़र रही एक मालगाड़ी में <b><i>दो श्वेत लड़कियों के साथ बलात्कार का आरोप</i></b> लगाया गया था। उनका मुक़दमा स्कॉट्सबोरो, अलबामा में चला, जहाँ अश्वेतों के प्रति समुदाय में बहुत ज़्यादा नफ़रत थी। मुक़दमे के जज ने बचाव पक्ष के वकील के तौर पर काम करने के लिए स्थानीय बार के सभी सदस्यों को नियुक्त किया। जब मुक़दमा शुरू हुआ, तो स्थानीय बार का कोई भी वकील आरोपियों का पक्ष रखने के लिए नहीं आया। मुक़दमे वाले दिन सुबह जज ने एक स्थानीय वकील को नियुक्त किया, जिसने अनिच्छा से यह काम संभाला। आरोपियों को दोषी ठहराया गया। उन्होंने अपनी सज़ा को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि उन्हें असल में वकील की मदद नहीं मिल पाई, क्योंकि उन्हें अपने वकील से सलाह लेने और बचाव की तैयारी करने का मौका नहीं मिला था। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट इस बात से सहमत हुआ। कोर्ट की ओर से लिखते हुए जस्टिस जॉर्ज सदरलैंड ने बताया:
</p><p style="text-align: justify; ">“यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि जब वकील रखने का अधिकार मिला हुआ है, तो आरोपी को अपनी पसंद का वकील चुनने का उचित मौका मिलना चाहिए। यहाँ न सिर्फ़ ऐसा नहीं किया गया, बल्कि वकील तय करने की जो कोशिश की गई, वह या तो इतनी अस्पष्ट थी या फिर ट्रायल के इतने करीब थी कि इसे असरदार और ठोस मदद से वंचित रखने जैसा ही माना जाएगा.....”
</p><p style="text-align: justify; "><b>इसी फ़ैसले में जस्टिस सदरलैंड ने कहा:
</b></p><p style="text-align: justify; ">"तो, सुनवाई में क्या-क्या शामिल होता है? ऐतिहासिक रूप से और व्यवहार में, कम से कम हमारे देश में, इसमें हमेशा वकील की मदद लेने का अधिकार शामिल रहा है, जब भी संबंधित पक्ष चाहे और उसका इंतज़ाम करे। कई मामलों में, अपनी बात रखने का अधिकार तब तक बहुत काम का नहीं होगा जब तक उसमें वकील के ज़रिए अपनी बात रखने का अधिकार शामिल न हो। यहाँ तक कि समझदार और पढ़े-लिखे आम आदमी को भी कानून की बारीकियों की बहुत कम या बिल्कुल जानकारी नहीं होती। अगर उस पर कोई अपराध का आरोप लगाया जाए, तो आम तौर पर वह खुद यह तय नहीं कर पाता कि आरोप सही है या गलत। वह सबूतों से जुड़े नियमों से अनजान होता है। वकील की मदद के बिना, हो सकता है कि उस पर बिना किसी सही आरोप के मुक़दमा चलाया जाए, और उसे ऐसे सबूतों के आधार पर दोषी ठहरा दिया जाए जो नाकाफ़ी हों, मामले से संबंधित न हों या जिन्हें अदालत में स्वीकार न किया जा सके। भले ही उसके पास अपना बचाव करने का मज़बूत आधार हो, फिर भी उसमें बचाव की तैयारी ठीक से करने के लिए ज़रूरी कौशल और ज्ञान की कमी होती है। अपने ख़िलाफ़ चल रही कार्यवाही के हर चरण में उसे वकील के मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है। इसके बिना, भले ही वह बेगुनाह हो, उसे दोषी ठहराए जाने का ख़तरा रहता है क्योंकि वह यह नहीं जानता कि अपनी बेगुनाही कैसे साबित करे। अगर समझदार लोगों के मामले में यह बात सच है, तो अनपढ़, कम जानकारी वाले या कमज़ोर बुद्धि वाले लोगों के लिए यह बात और भी ज़्यादा सच है। अगर किसी भी मामले में - चाहे वह दीवानी हो या फ़ौजदारी - कोई राज्य या संघीय अदालत मनमाने ढंग से किसी पक्ष को उसके द्वारा नियुक्त और उसकी ओर से पेश होने वाले वकील के ज़रिए अपनी बात रखने से मना कर देती है, तो इसमें कोई शक नहीं कि ऐसा इनकार सुनवाई के अधिकार से वंचित करना होगा, और इसलिए, संवैधानिक अर्थों में 'उचित प्रक्रिया' (due process) का उल्लंघन होगा।"
</p><p style="text-align: justify; ">इस सिलसिले में हम <b><i>मशहूर अमेरिकी वकील क्लेरेंस डैरो (1857-1930)</i></b> का ज़िक्र कर सकते हैं। उनका पक्का मानना था कि हर आरोपी को - चाहे समाज उसे कितना भी बुरा, घिनौना, नीच या नफ़रत के लायक क्यों न समझे - अदालत में अपना बचाव करने का हक है। अमेरिका में ज़्यादातर वकील ऐसे बुरे और घिनौने लोगों (जैसे बेरहम कातिल, आतंकवादी वगैरह) के केस लेने से मना कर देते थे, लेकिन क्लेरेंस डैरो उनके केस लेते थे और उनका बचाव करते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि उनका पक्का मानना था कि हर व्यक्ति को अदालत में अपना बचाव करने का हक है और वकील का फ़र्ज़ है कि वह उनका बचाव करे। ऐसे खतरनाक, घिनौने और बुरे लोगों के कई मुकदमों में उनकी पैरवी ऐतिहासिक बन गई। इसी वजह से अमेरिका में उन्हें 'एटॉर्नी फ़ॉर द डैम्ड' (यानी 'बदनाम लोगों के वकील') के नाम से जाना जाने लगा (क्योंकि वह ऐसे लोगों के केस लड़ते थे जिन्हें समाज बहुत बुरा, बिगड़ा हुआ और घटिया मानता था और जिनकी जनता पहले ही निंदा कर चुकी होती थी) और वह अमेरिका में एक लेजेंड बन गए (उनकी जीवनी '<b><i>एटॉर्नी फ़ॉर द डैम्ड</i></b>' देखें)।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>'इन री एनास्टैप्लो, 366 US 82 (1961)' मामले</i></b> में, <b><i>US सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ह्यूगो ब्लैक</i></b> ने अपने फ़ैसले में डैरो की तारीफ़ की और कहा:
</p><p style="text-align: justify; ">लॉर्ड अर्सकिन, जेम्स ओटिस, क्लेरेंस डैरो और ऐसे ही कई अन्य लोगों ने खुद पर आने वाले निजी खतरों की परवाह किए बिना, अलग-अलग मुद्दों और मुवक्किलों के बचाव में आवाज़ उठाने की हिम्मत दिखाई है। अगर वकालत के पेशे में ऐसे वकील लगातार शामिल नहीं होते रहे, तो यह पेशा अपनी महानता और गौरव का काफी हिस्सा खो देगा। बार (वकीलों के समूह) को ऐसे लोगों का समूह बनने के लिए मजबूर करना जो पूरी तरह से रूढ़िवादी हों, सिर्फ़ अपना मतलब साधते हों और सरकार से डरते हों, बार का अपमान करना और उसका स्तर गिराना है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>नूर्नबर्ग ट्रायल</i></b> में, लाखों लोगों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार नाज़ी युद्ध अपराधियों का भी वकीलों ने बचाव किया था। होलोकॉस्ट के मुख्य साज़िशकर्ताओं में से एक, एडॉल्फ आइकमैन के मुक़दमे में भी ऐसा ही हुआ था।
</p><p style="text-align: justify; ">हम <b><i>हार्पर ली के मशहूर नॉवेल 'टू किल अ मॉकिंग बर्ड'</i></b> के <b><i>काल्पनिक अमेरिकी वकील एटिकस फिंच</i></b> का भी ज़िक्र कर सकते हैं। इस नॉवेल में एटिकस फिंच ने बहादुरी से एक अश्वेत व्यक्ति का बचाव किया, जिस पर अलबामा राज्य में एक गोरी महिला के साथ रेप का झूठा आरोप लगाया गया था; उस राज्य में यह एक गंभीर अपराध था जिसके लिए मौत की सज़ा हो सकती थी। शहर की नस्लभेदी गोरी आबादी से उन्हें और उनके परिवार को हिंसा की धमकियाँ मिलने और बहुसंख्यक गोरे समुदाय द्वारा सामाजिक बहिष्कार का सामना करने के बावजूद, एटिकस फिंच ने उस अश्वेत व्यक्ति का बहादुरी से बचाव किया, क्योंकि उनका मानना था कि हर किसी को अपना बचाव करने का अधिकार है (हालाँकि अंततः उसे दोषी ठहराया गया और फाँसी दे दी गई क्योंकि जूरी नस्लभेदी और पक्षपाती थी)।
</p><p style="text-align: justify; "><b>एटिकस फिंच के ये शब्द इतिहास में हमेशा गूंजते रहेंगे:
</b></p><p style="text-align: justify; ">"हिम्मत का मतलब हाथ में बंदूक लिए हुए कोई व्यक्ति नहीं है। हिम्मत का मतलब है यह जानते हुए भी कि आप शुरू करने से पहले ही हार चुके हैं, फिर भी काम शुरू करना और चाहे कुछ भी हो जाए, उसे पूरा करना। आप शायद ही कभी जीतते हैं, लेकिन कभी-कभी जीत भी जाते हैं।"
</p><p style="text-align: justify; "><b>हमारे अपने देश में, संविधान का अनुच्छेद 22(1) कहता है:
</b></p><p style="text-align: justify; ">“गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी दिए बिना हिरासत में नहीं रखा जाएगा; साथ ही, उसे अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और अपना बचाव करवाने के अधिकार से भी वंचित नहीं किया जाएगा।“
</p><p style="text-align: justify; ">बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया द्वारा बनाए गए नियमों का अध्याय II 'पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानकों' के बारे में इस प्रकार बताता है:
</p><p style="text-align: justify; ">“एक वकील को उन अदालतों, ट्रिब्यूनलों या अन्य अधिकारियों के सामने कोई भी केस (brief) लेने के लिए बाध्य होना पड़ता है, जहाँ वह प्रैक्टिस करने का इरादा रखता है। इसके लिए वह बार में अपनी स्थिति और केस की प्रकृति के अनुसार फीस ले सकता है। कुछ खास हालात में किसी खास केस को लेने से इनकार करना सही ठहराया जा सकता है।“
</p><p style="text-align: justify; ">प्रोफ़ेशनल एथिक्स (पेशेवर नैतिकता) के अनुसार, कोई वकील किसी केस (brief) को लेने से मना नहीं कर सकता, बशर्ते क्लाइंट उसकी फ़ीस देने को तैयार हो और वकील किसी और काम में व्यस्त न हो। इसलिए, किसी भी बार एसोसिएशन का ऐसा प्रस्ताव पास करना कि उसका कोई भी सदस्य किसी खास आरोपी का केस नहीं लड़ेगा—चाहे वह आरोपी पुलिसकर्मी हो या संदिग्ध आतंकवादी, बलात्कारी, सामूहिक हत्यारा आदि—संविधान, क़ानून और प्रोफ़ेशनल एथिक्स के सभी नियमों के ख़िलाफ़ है। यह बार की उन महान परंपराओं के भी ख़िलाफ़ है जो हमेशा अपराध के आरोपी लोगों का बचाव करने के लिए खड़ी रही हैं। असल में, ऐसा प्रस्ताव कानूनी समुदाय के लिए शर्म की बात है। हम घोषित करते हैं कि भारत में बार एसोसिएशनों के ऐसे सभी प्रस्ताव अमान्य और शून्य हैं; और अगर वकील चाहते हैं कि देश में लोकतंत्र और क़ानून का शासन बना रहे, तो उन्हें ऐसे प्रस्तावों को नज़रअंदाज़ करना चाहिए और नहीं मानना चाहिए। नतीजे चाहे जो भी हों, बचाव करना वकील का फ़र्ज़ है; और जो वकील ऐसा करने से मना करता है, वह अपना फ़र्ज़ निभाने के गीता के संदेश का पालन नहीं कर रहा है।
</p><p style="text-align: justify; ">इस कोर्ट की रजिस्ट्री इस फ़ैसले/आदेश की प्रतियाँ भारत के सभी हाई कोर्ट बार एसोसिएशन और स्टेट बार काउंसिल को भेजेगी। हाई कोर्ट बार एसोसिएशन से अनुरोध है कि वे इस फ़ैसले/आदेश को अपने राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के सभी ज़िला कोर्ट बार एसोसिएशन तक पहुँचाएँ।
</p><p style="text-align: justify; ">कानून की इस स्पष्ट और विस्तृत व्याख्या को देखते हुए, फ़ैज़ाबाद बार एसोसिएशन को सलाह दी जाती है कि वह अपने ग़ैर-क़ानूनी और अदालत की अवमानना करने वाले प्रस्ताव को वापस ले ले, और फ़ैज़ाबाद बार के सदस्य इसे नज़रअंदाज़ करें, इसे शून्य और बेकार तथा अपने पेशे के लिए शर्मनाक मानें।
</p><p style="text-align: justify; "><b>(जस्टिस काटजू सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>FAQs
</b></p><p style="text-align: justify; "><b><i>Q1. क्या बार एसोसिएशन किसी आरोपी का केस लड़ने पर रोक लगा सकती है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">Answer: नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने A.S. Mohammad Rafi vs State of Tamil Nadu (2010) में स्पष्ट किया है कि ऐसा प्रस्ताव असंवैधानिक, गैर-कानूनी और पेशेवर नैतिकता के विरुद्ध है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>Q2. संविधान आरोपी को कौन-सा अधिकार देता है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">Answer: संविधान के अनुच्छेद 22(1) के अनुसार प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और अपना बचाव कराने का अधिकार प्राप्त है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>Q3. जस्टिस काटजू ने फैज़ाबाद बार एसोसिएशन के प्रस्ताव को क्यों गैर-कानूनी कहा?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">Answer: क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय, संविधान तथा बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रोफेशनल एथिक्स नियमों का उल्लंघन करता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>Q4. क्या गंभीर अपराधों के आरोपियों को भी कानूनी सहायता का अधिकार है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">Answer: हाँ। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र के अनुसार हर आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार प्राप्त है, चाहे आरोप कितना भी गंभीर क्यों न हो।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>Q5. इस लेख का मुख्य निष्कर्ष क्या है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">Answer: कानून के शासन में हर आरोपी को निष्पक्ष बचाव का अधिकार है और किसी भी बार एसोसिएशन द्वारा सामूहिक रूप से वकीलों को मुकदमा लड़ने से रोकना विधि और संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध माना गया है।
</p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बंगाल में कानून की जगह भीड़ का राज? भाजपा सरकार पर प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी का विश्लेषण]]></title>
<description><![CDATA[पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक हिंसा, भीड़ द्वारा हमले, नए गुंडा एक्ट और लोकतंत्र पर प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी का विस्तृत विश्लेषण]]></description>
<tags>पश्चिम बंगाल,लोकतंत्र,भाजपा,कानून,कानून के समाचार</tags>
<link>https://hastakshep.com/videos/west-bengal-political-violence-bjp-government-analysis-jagdishwar-chaturvedi-307704</link>
<guid isPermaLink="true">https://hastakshep.com/videos/west-bengal-political-violence-bjp-government-analysis-jagdishwar-chaturvedi-307704</guid>
<category><![CDATA[Videos,आपकी नज़र,स्तंभ,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 02 Jul 2026 05:30:31 GMT</pubDate>
<imagecaption/>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/videothumb/yt_full_qqXCIVqJdjI.jpg]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/videothumb/yt_full_qqXCIVqJdjI.jpg' /><h2 style="text-align: justify; "><b>बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद क्या बदल रहा है? प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify; "><b>पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा, गुंडा एक्ट और लोकतंत्र पर बड़ा सवाल
</b></li><li style="text-align: justify; "><b>बंगाल में भाजपा सरकार और लोकतंत्र पर प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी की टिप्पणी
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>Summary
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>इस विश्लेषण में प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर अपनी राय प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार लोकतंत्र में राजनीतिक अपराधों का समाधान न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से होना चाहिए, न कि भीड़ द्वारा सार्वजनिक दंड के जरिए। वे नए गुंडा एक्ट पर भी प्रश्न उठाते हैं तथा पूर्ववर्ती शासनकाल में हुई कथित राजनीतिक हिंसा की निष्पक्ष न्यायिक जांच की मांग करते हैं..
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद क्या बदला?
</b></h3><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify; "><b>राजनीतिक हिंसा और सार्वजनिक हमलों पर सवाल
</b></li><li style="text-align: justify; "><b>कानून का शासन बनाम भीड़ का न्याय
</b></li><li style="text-align: justify; "><b>नया गुंडा एक्ट क्या है?
</b></li><li style="text-align: justify; "><b>बंगाल में कानून की जगह भीड़ का राज?</b></li></ul><p style="text-align: justify; ">प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी का कहना है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक हिंसा, सार्वजनिक हमलों और नए गुंडा एक्ट को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। वे कानून के शासन, न्यायपालिका की भूमिका और लोकतांत्रिक अधिकारों पर विस्तार से चर्चा करते हैं
</p><p style="text-align: justify; ">बंगाल में कानून की जगह भीड़ का राज? सत्ता परिवर्तन के बाद क्या बदल रहा है?
</p><p style="text-align: justify; ">क्या पश्चिम बंगाल में कानून का शासन मजबूत हो रहा है या राजनीतिक हिंसा नए रूप में सामने आ रही है? प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी का विस्तृत विश्लेषण।</p><p style="text-align: justify; ">बंगाल में सत्ता बदलने के बाद क्या बदल रहा है? हिंसा, गुंडा एक्ट और लोकतंत्र पर बड़ी बहस
</p><p style="text-align: justify; ">क्या किसी लोकतंत्र में सड़क पर भीड़ किसी व्यक्ति को सजा दे सकती है? क्या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना कानून का राज है या भीड़ का न्याय?
</p><p style="text-align: justify; ">पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद सामने आ रहे वीडियो, हिंसा के आरोप और नए 'गुंडा एक्ट' को लेकर गंभीर बहस शुरू हो गई है।
</p><p style="text-align: justify; ">आज प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी इन्हीं सवालों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। उनका कहना है कि यदि कानून की जगह भीड़ फैसला करने लगे, तो लोकतंत्र की बुनियाद ही खतरे में पड़ जाती है।
</p><p style="text-align: justify; ">आइए सुनते हैं उनका पूरा विश्लेषण।
</p><p style="text-align: justify; ">इस वीडियो में व्यक्त विचार वक्ता प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी के व्यक्तिगत विश्लेषण और राय हैं। वीडियो में किए गए राजनीतिक दावों और आरोपों को उसी रूप में प्रस्तुत किया गया है। दर्शकों को विभिन्न स्रोतों से तथ्यों का अध्ययन कर अपनी स्वतंत्र राय बनाने की सलाह दी जाती है।</p><p style="text-align: justify; "><b>FAQ
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>बंगाल में नया गुंडा एक्ट क्या है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">यह पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा पारित एक कानून है जिसका उद्देश्य सरकार के अनुसार संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण है। इसके आलोचक नागरिक अधिकारों पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी इस कानून का विरोध क्यों करते हैं?
</b></p><p style="text-align: justify; ">वे इसे लोकतांत्रिक अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया पर संभावित प्रभाव के आधार पर आलोचनात्मक दृष्टि से देखते हैं तथा इसे संवैधानिक कसौटी पर परखे जाने की आवश्यकता बताते हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>वीडियो में मुख्य मुद्दा क्या है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">मुख्य विषय राजनीतिक हिंसा, कानून का शासन, भीड़ द्वारा दंड, न्यायपालिका की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>क्या वीडियो में दिए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं?
</b></p><p style="text-align: justify; ">हाँ। यह प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी का विश्लेषण और व्यक्तिगत मत है।</p><p><b><i>बंगाल में प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी किन मुद्दों पर सवाल उठाते हैं?
</i></b></p><p>वे मुख्यतः इन बिंदुओं पर चर्चा करते हैं—
</p><ul class="hocalwire-editor-list"><li>सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक हिंसा
</li><li>भीड़ द्वारा कथित सार्वजनिक हमले
</li><li>कानून के शासन (Rule of Law) की आवश्यकता
</li><li>न्यायपालिका और पुलिस की भूमिका
</li><li>नए गुंडा एक्ट की आलोचना
</li><li>पिछले शासनकाल की हिंसा की न्यायिक जांच की मांग
</li><li>लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा</li></ul>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बांडुंग से ब्रिक्स तक: क्या 'ग्लोबल साउथ' अमेरिकी दबदबे का कोई विकल्प खड़ा कर सकता है? प्रोफ़ेसर मनोरंजन मोहंती से जानिए]]></title>
<description><![CDATA[क्या BRICS अमेरिकी वर्चस्व का विकल्प बन सकता है? प्रो. मनोरंजन मोहंती ने बांडुंग सम्मेलन, गुटनिरपेक्ष आंदोलन, ग्लोबल साउथ और भारत की भूमिका पर विस्तार से विश्लेषण किया]]></description>
<tags>ब्रिक्स,अमेरिका,साम्राज्यवाद,गुटनिरपेक्ष आंदोलन,BRICS,रूस</tags>
<link>https://hastakshep.com/world-news/world-news/bandung-to-brics-global-south-us-hegemony-prof-manoranjan-mohanty-307565</link>
<guid isPermaLink="true">https://hastakshep.com/world-news/world-news/bandung-to-brics-global-south-us-hegemony-prof-manoranjan-mohanty-307565</guid>
<category><![CDATA[दुनिया,देश,व्यापार व अर्थशास्त्र,समाचार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 01 Jul 2026 09:51:44 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[From Bandung to BRICS: Is the Global South Moving Towards an Alternative to American Imperialism?]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/07/01/160075-from-bandung-to-brics-is-the-global-south-moving-towards-an-alternative-to-american-imperialism.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/07/01/160075-from-bandung-to-brics-is-the-global-south-moving-towards-an-alternative-to-american-imperialism.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>बांडुंग से ब्रिक्स तक: क्या बहुध्रुवीय दुनिया अमेरिकी दबदबे की जगह ले रही है?
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ का भविष्य: अमेरिकी वर्चस्व के अंत पर प्रो. मनोरंजन मोहंती के विचार
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>क्या ब्रिक्स अमेरिकी साम्राज्यवाद को चुनौती दे सकता है? बांडुंग और गुटनिरपेक्ष आंदोलन से सीख
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बांडुंग सम्मेलन से ब्रिक्स तक: ग्लोबल साउथ की नई विश्व व्यवस्था की तलाश
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>ब्रिक्स बनाम अमेरिकी वर्चस्व: ऐतिहासिक जड़ें, चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं - एक विश्लेषण
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>Summary
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>मुख्य बिंदु
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>प्रो. मनोरंजन मोहंती का कहना है कि BRICS को अभी अमेरिकी साम्राज्यवाद का पूर्ण विकल्प नहीं कहा जा सकता।
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>BRICS में अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने की दीर्घकालिक क्षमता मौजूद है। बांडुंग सम्मेलन (1955) और गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने ग्लोबल साउथ की वैकल्पिक राजनीति की नींव रखी। BRICS डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है। भारत वर्तमान में अमेरिका और ग्लोबल साउथ के बीच संतुलन बनाने की रणनीति पर चल रहा है। न्यू डेवलपमेंट बैंक, वैकल्पिक व्यापार व्यवस्था और दक्षिण-दक्षिण सहयोग BRICS की प्रमुख पहल हैं। BRICS का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र का विकल्प बनना नहीं, बल्कि उसे अधिक लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक बनाने में योगदान देना है…
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>बांडुंग से ब्रिक्स: अमेरिकी साम्राज्यवाद के विकल्प की संभावनाएँ और चुनौतियाँ: प्रो. मनोरंजन मोहंती का व्याख्यान
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b>- <span style="font-size: 26px;">विनीत तिवारी और मोहित</span>
</b></p><p style="text-align: justify; ">नई दिल्ली, 1 जुलाई 2026. यह मानना जल्दबाजी होगी कि ब्रिक्स का उदय और विस्तार अमेरिकी साम्राज्यवाद के विकल्प का कोई संकेत है। न तो ब्रिक्स देशों ने कभी स्वयं को ऐसा कहा है, और न ही इसे ऐसी अपेक्षाओं के साथ देखा जाना चाहिए। फिर भी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ब्रिक्स देशों के समूह में यह संभावित क्षमता अवश्य है कि वह अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने वाली शक्ति के रूप में विकसित हो सके। विश्व के भू-राजनीतिक परिदृश्य में पिछले कुछ वर्षों में घटी घटनाएँ उन देशों को एक-दूसरे के अधिक निकट ला रही हैं, जो लंबे समय से अमेरिका के निशाने पर रहे हैं। यूक्रेन और रूस के बीच छद्म युद्ध, जो वस्तुतः नाटो और रूस के बीच युद्ध है, फ़िलिस्तीन में जारी नरसंहार, तथा हाल ही में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपा गया युद्ध — ये प्रमुख घटनाएँ हैं जिन्होंने विश्व भर के देशों के पुनर्गठन की प्रक्रिया को तीव्र किया है। भारतीय सरकार अब भी इस दुविधा में है कि वह अमेरिकी खेमे के साथ बनी रहे या तेजी से उभर रहे ग्लोबल साउथ के साथ जुड़े।
</p><p style="text-align: justify; ">प्रो. मनोरंजन मोहंती के व्याख्यान और उसके बाद हुई चर्चा ने हमारे आसपास रोज़ घटित हो रहे इन महत्त्वपूर्ण घटनाक्रमों पर ऐसी अनेक महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टियाँ सामने आयीं। 
</p><p style="text-align: justify; ">प्रो. मोहंती बीते माह 16 जून 2026 को दिल्ली के अजय भवन में जोशी-अधिकारी इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में “बांडुंग से ब्रिक्स तक: नयी चुनौतियाँ” विषय पर बोल रहे थे।
</p><p style="text-align: justify; ">प्रो. मोहंती ने बताया कि सदियों के शोषण के बाद अनेक नवस्वतंत्र पूर्व उपनिवेशों ने 18–24 अप्रैल 1955 को इंडोनेशिया के बांडुंग में एक ऐतिहासिक बैठक आयोजित की थी। अफ्रीका और एशिया के उनतीस देशों के प्रतिनिधि शांति, बहुपक्षीय विकास और विश्व राजनीति में ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व पर चर्चा करने के लिए एकत्र हुए थे। उन्होंने साम्राज्यवाद-विरोधी वैकल्पिक विश्व-व्यवस्था को आकार देने वाली पाँच प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया। ये घटनाएँ थीं: लीग अगेंस्ट इम्पीरियलिज़्म, ब्रुसेल्स (1927), एशियन रिलेशंस कॉन्फ्रेंस, दिल्ली (1947), बांडुंग, इंडोनेशिया (1955), <b>गुटनिरपेक्ष आंदोलन</b>, बेलग्रेड (1961), और न्यू इंटरनेशनल इकनॉमिक ऑर्डर (1974)। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ का इतिहास औपनिवेशिक शोषण का रहा है, और इन देशों ने साम्राज्यवादी शक्तियों के उत्थान को देखा, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने बांडुंग सम्मेलन और गुटनिरपेक्ष आंदोलन के रूप में अपनी दृढ़ता प्रदर्शित की। आज भी, इसमें कोई संदेह नहीं कि साम्राज्यवाद अत्यंत शक्तिशाली है, लेकिन साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिरोध भी उतना ही प्रबल है। साम्राज्यवाद इसलिए भी इतना आक्रामक दिखाई देता है क्योंकि वह अपने विरुद्ध उठने वाले प्रतिरोध से भयभीत है। और यही संघर्ष की गतिशीलता है। साम्राज्यवाद आज निर्विरोध नहीं है। इस साम्राज्यवादी प्रभुत्व को दी जा रही चुनौती स्पष्ट है और अत्यंत सशक्त भी। उन्होंने तीन पुस्तकों — “बांडुंग लीगेसी एण्ड ग्लोबल फ्यूचर”, “बांडुंग एट 70” और “दि राइज़ ऑफ़ एशिया” — का परिचय दिया, जो इस विषय के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में, अमेरिका के वित्तीय और औद्योगिक अभिजात्य वर्ग की यह <b>कॉर्पोरेट रणनीति</b> थी कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को जी-7 की अपनी जमात में सम्मिलित कर लिया जाए; किंतु बांडुंग की विरासत और रंगभेद-विरोधी संघर्ष की विरासत ने ब्रिक्स देशों को साम्राज्यवाद-विरोधी मंच के रूप में एक-दूसरे के नज़दीक ला दिया। अब तक लगभग हर ब्रिक्स बैठक में दो सामान्य बिंदु रहे हैं: <b><i>व्यापार की डॉलर-आधारित प्रणाली </i></b>पर निर्भरता कम करनी चाहिए। और एक अधिक न्यायसंगत तथा समावेशी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। पश्चिमी शक्तियाँ पूरी तरह से एकाधिकारवादी लाभों पर आधारित हैं, जिनमें सैन्य प्रौद्योगिकी का एकाधिकार, सूचना का एकाधिकार, वित्तीय एकाधिकार और संचार का एकाधिकार शामिल है। ब्रिक्स ने इन सभी क्षेत्रों में निरंतर परस्पर सहयोग से कार्य करते हुए एकध्रुवीय, एकाधिकारवादी साम्राज्यवादी शक्तियों के विकल्प को विकसित करने की दिशा में प्रयास किया है। इसने <b><i>न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी ) </i></b>विकसित किया, बहुपक्षीय व्यापार के लिए मंच उपलब्ध कराए, और खाद्य सुरक्षा पर कार्य किया।
</p><p style="text-align: justify; "><b>रूस</b> और चीन भी ब्रिक्स के महत्त्वपूर्ण संस्थापक सदस्य हैं, जिन्हें अमेरिका सीधे तौर पर अपने निशाने पर रखता है। रूस और चीन पर तो व्यापारिक प्रतिबंध लगे ही हैं, साथ ही इन देशों के साथ व्यापार करने वाले अन्य देशों पर भी प्रतिबंध लगाये जाते हैं। इसलिए इन सभी देशों ने आपस में मिलकर ब्रिक्स में व्यापार की ऐसी व्यवस्था करने की कोशिश की है जिसमें इन्हें डॉलर के ज़रिये व्यापार न करन पड़े। फिर भी डॉलर को पूरी तरह से दरकिनार करने में अनेक व्यावहारिक कठिनाइयाँ हैं। रूस और चीन सहित ऐसे कई देश हैं जिनके रिजर्व भंडार डॉलर में हैं। इसलिए यदि डॉलर में गिरावट आती है, तो इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा। स्थिति जटिल तो है, लेकिन ब्रिक्स देश अपने बीच व्यापार के लिए अधिक समतामूलक, न्यायपूर्ण और आर्थिक व्यवस्था विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">1 जनवरी 2026 को ब्रिक्स की हर साल बदलने वाली अध्यक्षता भारत को प्राप्त हुई, किंतु ब्रिक्स के संस्थागत विकास में योगदानकर्ता बनने के बजाय भारत एक समझौतावादी सदस्य के रूप में कार्य कर रहा है। भारत डॉलर-केंद्रित वित्तीय और मौद्रिक व्यवस्था से पूर्णतः अलग होने के लिए तैयार नहीं है। साथ ही, भारत के दक्षिण के देशों तथा रूस के साथ ऐतिहासिक रूप से मैत्रीपूर्ण व्यापारिक संबंध रहे हैं। इसलिए वह दो परस्पर-विरोधी व्यापारिक और निवेश संबंधी ढाँचों के बीच संतुलन साधने का प्रयास कर रहा है। दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील ब्रिक्स के सबसे सक्रिय सदस्य बन गए हैं। यह एक भ्रांति है कि ब्रिक्स संयुक्त राष्ट्र का विकल्प है; वस्तुतः ब्रिक्स का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र को सशक्त बनाना है। अतः होना यह चाहिए कि बहुध्रुवीय विकल्प के माध्यम से ग्लोबल साउथ की राजनीतिक दृष्टि को पुनर्स्थापित किया जाए।
</p><p style="text-align: justify; ">बैठक की अध्यक्षता कॉमरेड रामकृष्ण पांडा, राष्ट्रीय सचिव, सीपीआई ने की। उन्होंने प्रो. मनोरंजन मोहंती का परिचय देते हुए कॉमरेड लोकनाथ चौधुरी के ज़माने से सीपीआई के साथ प्रोफ़ेसर मोहंती के संबंधों का उल्लेख भी दिया। प्रो. मोहंती दिल्ली विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त होकर भी लगातार काम कर रहे हैं और देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों को अपनी सेवा दे रहे हैं। वे चीनी अध्ययन विभाग के भी प्रमुख रहे और उनकी अनेक पुस्तकें इन विषयों पर प्रकाशित हुई हैं। 
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट के निदेशक प्रो. अजय पटनायक </i></b>ने कार्यक्रम की शुरुआत विषय का संक्षिप्त परिचय देते हुए की और बांडुंग सम्मेलन, गुटनिरपेक्ष आंदोलन तथा ब्रिक्स के बीच संबंधों की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नाम) रणनीतिक स्वायत्तता का एक उत्कृष्ट आंदोलन था। यह केवल साम्राज्यवादी खेमे के साथ एकजुटता से इंकार भर नहीं था, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के बीच पारस्परिक विकास का भी एक मैत्रीपूर्ण मंच था। भारत बांडुंग और ‘नाम’ — दोनों में अग्रणी सदस्य देशों में शामिल था। प्रो. अजय पटनायक ने ‘नाम’ देशों को “तटस्थ” मानने की सामान्य भ्रांति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने तर्क दिया कि ‘नाम’ देश न तो समाजवादी खेमे से जुड़े थे और न ही साम्राज्यवादी खेमे से, लेकिन वे कभी तटस्थ नहीं थे; उनमें से अधिकांश साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध थे। ‘नाम’ ने  120 से अधिक देशों की विशाल शक्ति होने के कारण संयुक्त राष्ट्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस रणनीतिक स्वायत्तता ने देशों की संप्रभुता को सुरक्षित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। आज विकासशील देशों की संप्रभुता संकटग्रस्त हो रही है। प्रो. पटनायक ने आगे कहा कि ब्रिक्स ग्लोबल साउथ के लिए एक सहायक व्यवस्था के रूप में उभरा है।
</p><p style="text-align: justify; ">व्याख्यान के बाद प्रश्नोत्तर का एक संक्षिप्त सत्र हुआ। अंत में, जोशी-अधिकारी इंस्टीट्यूट की अनुसंधान एवं शैक्षणिक प्रमुख <b>डॉ. जया मेहता</b> ने ब्रिक्स और बांडुंग सम्मेलन के महत्व तथा प्रासंगिकता पर संक्षेप में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के माध्यम से नयी आर्थिक व्यवस्था स्थापित की गई, जहाँ आईएमएफ और विश्व बैंक की स्थापना हुई तथा डॉलर को विश्व की रिजर्व मुद्रा घोषित किया गया। सन 1945 में संयुक्त राष्ट्र का गठन इस वादे के साथ किया गया था कि वह सदस्य देशों की संप्रभुता की रक्षा करते हुए शांति बनाये रखेगा। विडंबना यह है कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद भी कोरियाई युद्ध में अमेरिकी बर्बरता देखने को मिली, और चीन को संयुक्त राज्य अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की धमकी दी। इसलिए दक्षिण-दक्षिण सहयोग और ग्लोबल साउथ की एकजुटता ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक सक्रिय उत्प्रेरक की भूमिका निभाई। भले ही यह एकता पूँजीवाद-विरोधी न हो, भले ही यह अपने-अपने देशों के पूँजीपतियों द्वारा समर्थित हो, फिर भी वैश्विक संदर्भ में साम्राज्यवादी शक्तियों का समर्थन करने से यह बेहतर है। ब्रिक्स के सहयोग के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं: राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय, तथा सांस्कृतिक और जन-जन के बीच आदान-प्रदान। आज अमेरिका को डॉलर-आधारित वर्चस्व का लाभ प्राप्त है। लगभग 67 देशों पर अमेरिकी शक्तियों द्वारा प्रतिबंध लगाए गए हैं। इस वर्चस्व को ध्वस्त करने के लिए ब्रिक्स ने द्विपक्षीय व्यापार, वैकल्पिक वित्तीय संदेश प्रणालियों, तथा चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) जैसे व्यापारिक विकल्पों पर ध्यान केंद्रित किया है। ये छोटे, किंतु प्रभावशाली कदम एक बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">सभा में कॉमरेड एनी राजा, कॉमरेड डॉ. भालचंद्र कांगो, कॉमरेड डॉ. गिरीश, कॉमरेड डॉ. दिनेश वार्षणेय, कॉमरेड राजन क्षीरसागर, कॉमरेड वेंकैया, कॉमरेड निशा सिद्धू, वरिष्ठ पत्रकार शीबा असलम फ़हमी, लेखक प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी, डॉ. अभय, राजीव कुमार शुक्ल, डॉ. तारा, नित्यानंद गायेन, एआईएसएफ़, एआईवायएफ के युवाओं और विद्यार्थियों सहित अनेक प्रतिष्ठित व्यक्ति उपस्थित थे। जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट के संयोजक विनीत तिवारी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया और घोषणा की कि इन घटनाक्रमों पर लोगों को जागरूक करने के लिए बैठकों की एक शृंखला आयोजित की जाएगी, क्योंकि इन मंचों पर लिए गए निर्णयों के इन देशों के आम लोगों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ते हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>FAQ
</b></p><p style="text-align: justify; "><b><i>BRICS क्या है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">BRICS ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका सहित अब विस्तारित सदस्य देशों का समूह है, जिसका उद्देश्य वैश्विक आर्थिक एवं राजनीतिक सहयोग को बढ़ाना और अधिक संतुलित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की दिशा में काम करना है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>क्या BRICS अमेरिका का विकल्प बन सकता है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">प्रो. मनोरंजन मोहंती के अनुसार अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी, लेकिन BRICS में अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने की संभावित क्षमता अवश्य मौजूद है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>बांडुंग सम्मेलन का BRICS से क्या संबंध है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">1955 का बांडुंग सम्मेलन एशिया-अफ्रीका की एकजुटता, उपनिवेशवाद-विरोध और ग्लोबल साउथ की राजनीति की आधारशिला था। BRICS उसी ऐतिहासिक विरासत को नए वैश्विक संदर्भ में आगे बढ़ाने की एक संभावित प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>भारत BRICS में क्या भूमिका निभा रहा है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">भारत BRICS का संस्थापक सदस्य है, लेकिन वर्तमान में वह अमेरिका और ग्लोबल साउथ के बीच रणनीतिक संतुलन बनाने की नीति अपनाता दिखाई देता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>BRICS डॉलर का विकल्प क्यों खोज रहा है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">डॉलर पर निर्भरता कम करने, अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंधों के प्रभाव को सीमित करने और सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने के उद्देश्य से BRICS वैकल्पिक भुगतान और वित्तीय तंत्र विकसित करने का प्रयास कर रहा है।
</p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
</channel>
</rss>
