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<title><![CDATA[hastakshep | हस्तक्षेप]]></title>
<description><![CDATA[हस्तक्षेप एक स्वतंत्र हिंदी न्यूज़ पोर्टल है जो समसामयिक, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक मुद्दों पर समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ दलित, वंचित, आदिवासी, महिला व छात्र अधिकारों को विशेष महत्व दिया जाता है।]]></description>
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<title>hastakshep | हस्तक्षेप</title>
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<pubDate>Tue, 11 Aug 2026 17:50:06 GMT</pubDate>
<lastBuildDate>Tue, 11 Aug 2026 17:50:06 GMT</lastBuildDate>
<copyright><![CDATA[Hastakshep]]></copyright>
<language><![CDATA[hi]]></language>
<managingEditor><![CDATA[anushka@blinkcms.ai (Hastakshep)]]></managingEditor>
<ttl>1</ttl>
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<title><![CDATA[‘शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो’: जंतर-मंतर पर समाजवादियों का प्रदर्शन, निजीकरण के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन का आह्वान]]></title>
<description><![CDATA[जंतर-मंतर पर ‘शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो’ के नारे के साथ समाजवादियों का प्रदर्शन। युवा सोशलिस्ट पहल ने शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और सांप्रदायीकरण के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया।]]></description>
<tags>शिक्षा,समाजवादी,समाजवादी नेता,निजीकरण,भारत छोड़ो आंदोलन</tags>
<link>https://hastakshep.com/national-india-news/shiksha-ke-saudagar-satta-chhodo-jantar-mantar-socialist-protest-315142</link>
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<category><![CDATA[देश,राजनीति,समाचार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 11 Aug 2026 17:48:22 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA["Merchants of Education, Quit Power": Socialists protest at Jantar Mantar, call for a nationwide movement against privatisation.]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/08/11/185043-merchants-of-education-quit-power-socialists-protest-at-jantar-mantar-call-for-a-nationwide-movement-against-privatisation.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/08/11/185043-merchants-of-education-quit-power-socialists-protest-at-jantar-mantar-call-for-a-nationwide-movement-against-privatisation.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>जंतर-मंतर पर ‘शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो’ का नारा, शिक्षा के निजीकरण और व्यवसायीकरण के खिलाफ समाजवादियों का आंदोलन
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन: युवा सोशलिस्ट पहल ने देशव्यापी आंदोलन का किया आह्वान
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>शिक्षा के अधिकार और सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के लिए समाजवादियों का देशव्यापी आंदोलन का आह्वान
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>'शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो' के नारे के साथ जंतर-मंतर पर समाजवादियों का प्रदर्शन
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>शिक्षा के अधिकार, सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की मजबूती और शिक्षा के निजीकरण-व्यवसायीकरण-सप्रदायीकरण के खिलाफ युवा सोशलिस्ट पहल का देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने का आह्वान
</b></p><p style="text-align: justify; ">नई दिल्ली, 11 अगस्त 2026. भारत छोड़ो आंदोलन दिवस 9 अगस्त के अवसर पर नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो’ के नारे के साथ युवा सोशलिस्ट पहल के तत्वावधान में प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शन में देश के अलग-अलग हिस्सों से समाजवादी कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन नेताओं, शिक्षकों, छात्रों,पत्रकारों और युवाओं ने भाग लिया।
</p><p style="text-align: justify; ">यह कार्यक्रम समाजवादी आंदोलन के 90 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अगले दस वर्षों तक आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों की श्रृंखला की एक और कड़ी था। कार्यक्रम में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और उसमें समाजवादियों की महत्वपूर्ण भूमिका को याद करते हुए शिक्षा के संवैधानिक अधिकार को कारपोरेट-कम्यूनल गठजोड़ से बचाने के लिए देश-व्यापी आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया गया।
</p><p style="text-align: justify; ">कार्यक्रम की शुरुआत सुबह महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर उन्हें नमन करके हुई। यहां युवा  सोशलिस्ट पहल और भारतीय सोशलिस्ट मंच के सदस्यों ने गांधीजी की समाधि पर सभी भारट के समस्त विद्यार्थियों के लिए समान, गुणवत्तापूर्ण और मुफ़्त शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष की शपथ ली।
</p><p style="text-align: justify; ">तत्पश्चात ‘आचार्य नरेंद्र देव अमर रहें’ और  ‘शिक्षा के सौदागर सत्ता छोड़ो’ के नारों के बीच समाजवादी आंदोलन के पुरोधा आचार्य नरेंद्रदेव की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया।
</p><h4 style="text-align: justify; "><b>जंतर-मंतर पर आयोजित जनसभा में शिक्षा के सौदागरों की निम्नलिखित सूची जारी की गई:
</b></h4><p style="text-align: justify; ">1.   कांग्रेस पार्टी, जिसने 1991 में बाजार-अर्थव्यवस्था लागू करके संविधान के बरखिलाफ शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और ग्लोबीकरण का रास्ता खोला;
</p><p style="text-align: justify; ">2.   भाजपा/आरएसएस, जिसने शिक्षा पर दो बड़े उद्योगपतियों – कुमार मंगलम बिड़ला और मुकेश अंबानी – की कमिटी बना कर शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और ग्लोबीकरण की प्रक्रिया को मजबूती और तेजी प्रदान की। नई शिक्षा नीति 2020 उस दिशा में एक लंबी छलांग है;
</p><p style="text-align: justify; ">3.   एनडीए और यूपीए में शामिल सभी राजनीतिक पार्टियां जो इस पूरी प्रक्रिया में शामिल रही हैं;
</p><p style="text-align: justify; ">4.  राजनीतिक सुभीता और संरक्षण पाकर शिक्षा के बाजार में मुनाफाखोरी के लिए प्रतिस्पर्धा में जुटे छोटे-बड़े व्यवसायी;
</p><p style="text-align: justify; ">5.   वे ‘धर्मात्मा’ (फिलेंथ्रोपिस्ट) जो निजी स्कूलों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में वैश्विक स्तर की शिक्षा देने के नाम पर शिक्षा का व्यवसाय करते हैं;     
</p><p style="text-align: justify; ">6.   संवैधानिक पदों पर आसीन विशिष्ट/अतिविशिष्ट महानुभाव जो निजी विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों में भागीदारी करते हैं;
</p><p style="text-align: justify; ">7.   देश के शिक्षाविद, शिक्षक और बुद्धिजीवी जो यूजीसी/सरकारी कमिटियों में रहते हुए इस संविधान-विरोधी काम को अंजाम देने में सरकारों के साथ रहे हैं;  
</p><p style="text-align: justify; ">8.   देश के विद्वान शिक्षक जिन्होंने अपना कैरियर सार्वजनिक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बनाया, लेकिन निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों की नौकरी बजाते और उनका विरुद गाते हैं;
</p><p style="text-align: justify; ">9.   एनजीओ जगत के वे लोग जो शिक्षा/ज्ञान के बाजार-चरित्र और बाजार-अर्थव्यवस्था को बनाए रख कर शिक्षा-सुधारों के टोटकों के नाम पर देशी-विदेशी अनुदान और पद-पुरस्कार लेते हैं और शिक्षा के संघर्ष को दबाने और भटकाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।    
</p><p style="text-align: justify; ">इसके बाद देश की जन-पंचायत के सामने युवा सोशलिस्ट पहल का निम्नलिखित संकल्प पेश किया गया:
</p><p style="text-align: justify; ">संविधान-निर्माता, खास कर डॉक्टर अंबेडकर शिक्षा के अधिकार को संविधान के खंड 3 में मौलिक अधिकारों के साथ रखना चाहते थे। उसे संविधान के खंड 4 में राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के साथ इस संकल्प के साथ रखा गया कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा के अधिकार का लक्ष्य जल्दी ही हासिल कर लिया जाना चाहिए – यानि दस वर्षों में। लेकिन यह संवैधानिक संकल्प कभी पूरा नहीं हुआ। उल्टे, भारत के नेताओं और बुद्धिजीवियों ने इस संकल्प के विरुद्ध कानून बना कर शिक्षा को बाजारवाद का ग्रास बना दिया। इस सारी प्रक्रिया को उलटना होगा।
</p><p style="text-align: justify; ">इसके लिए बिना देरी किए निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:
</p><p style="text-align: justify; ">1.   नवउदारवादकालीन सभी संविधान-विरोधी कानूनों को निरस्त किया जाए ताकि संविधान-सम्मत शिक्षा-व्यवस्था की अविलंब बहाली और मजबूती हो सके;
</p><p style="text-align: justify; ">2.   पहली से स्नातकोत्तर कक्षा तक सभी को समान और उम्दा गुणवत्ता वाली शिक्षा देने की जिम्मेदारी राज्य की हो;
</p><p style="text-align: justify; ">3.   देश के प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी पसंद के विषय/कोर्स में दाखिला सुलभ कराने की जिम्मेदारी राज्य की हो;
</p><p style="text-align: justify; ">4.   जो विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय सरकारी अनुदान (सस्ती जमीन और कर्ज आदि के रूप में) से कायम किए गए हैं उन सभी का सार्वजनीकरण किया जाए;
</p><p style="text-align: justify; ">5.   वर्तमान शिक्षा मौजूदा पूंजीवादी बाज़ार व्यवस्था के लिए कुशल मजदूर पैदा करने तक सीमित कर दी गई है। शिक्षा का साम्प्रदायीकरण समाज में संकीर्णता, अंधविश्वास और तर्कहीनता को बढ़ावा दे रहा है। इस शिक्षा-विरोधी स्थिति को समाप्त कर विज्ञान, वाणिज्य, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मानविकी, कला, टेक्नॉलाजी, मेडिकल, प्रबंधन आदि विषयों की शिक्षा का कंटेंट और भाषा ऐसी हो कि प्रत्येक विषय में मौलिक अवदान करने वाले तर्कशील नागरिकों का निर्माण हो सके;
</p><p style="text-align: justify; ">6.   कुल मिला कर, शिक्षा/ज्ञान के बाजारोन्मुख चरित्र और अर्थव्यवस्था को जनोन्मुख बनाया जाए;
</p><p style="text-align: justify; ">7.   शिक्षा के सवाल पर समग्रता में चर्चा के लिए संसद और विधानसभाओं का विशेष सत्र बुलाया जाए।  
</p><p style="text-align: justify; ">युवा सोशलिस्ट पहल का मानना है कि देश में जड़ जमा चुकी कारपोरेट राजनीति के तहत कारपोरेट हितों और सांप्रदायिकता की पोषक सरकार इन मांगों को नहीं मानेगी। लिहाजा, जन-जागृति एकमात्र रास्ता है। जैसा कि प्रोफेसर अनिल सदगोपाल ने कहा है, देश की संघर्षशील जनता को जल, जंगल, जमीन और जीविका की लड़ाई में शिक्षा के हक की लड़ाई को भी शामिल करना होगा।
</p><p style="text-align: justify; ">भारत छोड़ो आंदोलन दिवस के ऐतिहासिक मौके पर युवा सोशलिस्ट पहल की अपील है कि भारतीय जनता के संवैधानिक अधिकारों का विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष करने वाले प्रगतीशील संगठन, समूह एवं व्यक्ति शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और ग्लोबीकरण को समाप्त करने का बीड़ा उठाएं। युवा सोशलिस्ट पहल का मानना है कि भारत के राष्ट्रीय जीवन पर कसे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे को नष्ट करने के लिए सबसे पहले शिक्षा को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने की जरूरत है।
</p><p>कार्यक्रम में मुख्य अतिथि गुजरात के वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता जयंती भाई पांचाल थे। अध्यक्षता भारतीय समाजवादी मंच के अध्यक्ष एडवोकेट आदित्य कुमार ने की। भारत संवाद अभियान के संयोजक एडवोकेट बिजेंद्र यादव, जम्मू-कश्मीर से आए यूनाइटेड पीस इनीशीएटिव के ऐक्टिविस्ट शाहिद सलीम, वरिष्ठ समाजवादी देवेंद्र सिंह अवाना, देवेंद्र गुर्जर, चरणसिंह राजपूत कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि थे। 
</p><p>
</p><p>प्रदर्शन स्थल पर आयोजित सभा को कॉमरेड नरेंद्र, डॉ शशिशेखर सिंह, डॉ भगवान सिंह, अमर सिंह अमर, डॉ प्रेम सिंह, बंदना पांडे, डॉ सुरेश गवई समेत कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। समाजवादी ऐक्टिविस्ट तहसीन अहमद, पुरुषोत्तम, संजय कनौजिया, डॉ अतुल कुमार, लेखक रामेश्वर दूबे समेत दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के कई छात्र-छात्राओं और शिक्षकों ने प्रदर्शन में भाग लिया। संचालन डॉ हिरण्य हिमकर ने किया।&nbsp; &nbsp;</p><p style="text-align: justify; "><b>युवा सोशलिस्ट पहल के लिए
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>डॉ हिरण्य हिमकर&nbsp;&nbsp;</b></p><p style="text-align: justify; "></p><section draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/5li1LbtIZU4" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></section><b><br></b><p></p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भाजपा से पसमांदा मुसलमानों की 4 बड़ी मांगें: SC आरक्षण, OBC में 4% उप-कोटा और मुस्लिम महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान]]></title>
<description><![CDATA[पसमांदा मुस्लिम समाज की भाजपा से 4 प्रमुख मांगें—SC सूची में शामिल करने, OBC में 4% उप-कोटा, मुस्लिम महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान और गरीब अशराफ जातियों के लिए EWS में अलग कोटा।]]></description>
<tags>मुसलमान,मुस्लिम,भाजपा,सामाजिक न्याय</tags>
<link>https://hastakshep.com/aapki-najar/pasmanda-muslim-bjp-4-demands-sc-obc-reservation-women-ews-315139</link>
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<category><![CDATA[आपकी नज़र,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 11 Aug 2026 17:37:20 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Dr. Mohammad Akram Nawaz]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/08/11/185042-dr-mohammad-akram-nawaz.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/08/11/185042-dr-mohammad-akram-nawaz.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>पसमांदा मुसलमानों के लिए भाजपा से 4 ठोस मांगें, SC-OBC आरक्षण से महिला प्रतिनिधित्व तक
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>पसमांदा समाज के सशक्तिकरण के लिए भाजपा से क्या हैं चार प्रमुख मांगें?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>पसमांदा मुस्लिम समाज के लिए SC सूची में शामिल करने की मांग
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>OBC मुस्लिम बिरादरियों के लिए 4% उप-कोटे की मांग
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>गरीब अशराफ जातियों के लिए EWS में अलग प्रावधान
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ और पसमांदा समाज
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>पसमांदा समाज को साथ लिए बिना समावेशी विकास संभव है?</b></p><p style="text-align: justify; ">पिछले कई वर्षों से भारतीय जनता पार्टी पसमांदा मुस्लिम समाज को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयासरत है। आज ऐसा प्रतीत होता है कि पसमांदा मुसलमानों की सबसे बड़ी हितैषी पार्टी भाजपा ही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और सम्मान - ये किसी भी नागरिक के विकास की बुनियाद हैं, और एक समावेशी समाज के निर्माण में हर समुदाय की भागीदारी अनिवार्य है। इसीलिए पसमांदा समाज का सशक्तिकरण, समग्र विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
</p><p style="text-align: justify; ">ज़मीनी स्तर पर आज यह महसूस किया जा रहा है कि पसमांदा मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के मुद्दों को सबसे अधिक गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ भाजपा ने ही उठाया है। आज भाजपा देश की सबसे बड़ी और प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति है। ऐसे में यदि पार्टी इसी इच्छाशक्ति और संकल्प के साथ आगे बढ़े, तो मुस्लिम समाज विशेषकर पसमांदा समाज के लिए ठोस और दीर्घकालिक बदलाव लाना पूरी तरह संभव है।
</p><p style="text-align: justify; ">"<b>सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास</b>" - इस मूल मंत्र को धरातल पर साकार करने के लिए यह आवश्यक है कि भाजपा मुस्लिम अल्पसंख्यकों सहित सभी अल्पसंख्यक समुदायों के कल्याण के लिए समावेशी, न्यायसंगत और संवेदनशील नीतियों पर दिल से कार्य करे। भाजपा देश की सबसे बड़ी और प्रभावशाली पार्टी है। यदि वह चाहे तो मुस्लिम समाज, विशेषकर पसमांदा समाज का वास्तविक भला कर सकती है। <b>इस संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी से से हमारी 4 ठोस मांगें हैं:
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>1. पसमांदा SC बिरादरियों को SC सूची में शामिल किया जाए
</b></h3><p style="text-align: justify; ">पसमांदा समाज की धोबी, दुनियां, मंसूरी, नट, हलालखोर, भंगी इत्यादि जैसी कई बिरादरियां सामाजिक और शैक्षणिक रूप से आज भी दलितों से बदतर स्थिति में हैं। हिंदू और सिख दलितों को जो संवैधानिक अधिकार और आरक्षण प्राप्त हैं, वही अधिकार इन मुस्लिम दलित बिरादरियों को भी मिलना चाहिए। "धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं" का तर्क अब पर्याप्त नहीं है। संविधान में संशोधन कर इन बिरादरियों को SC सूची में शामिल किया जाए।
</p><h4 style="text-align: justify; "><b>2. ओबीसी मुस्लिम बिरादरियों के लिए OBC के भीतर 4% उप-कोटा
</b></h4><p style="text-align: justify; ">ओबीसी सूची में शामिल मुस्लिम बिरादरियां, पिछड़ेपन और अवसरों की कमी के कारण हिंदू OBC समाज से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पातीं। इसलिए OBC आरक्षण के भीतर इनके लिए 4% का अलग उप-कोटा आरक्षित किया जाए।
</p><p style="text-align: justify; "><b>3. मुस्लिम महिलाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और राजनीति में विशेष प्रावधान
</b></p><p style="text-align: justify; ">भाजपा सरकार मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण की बात सबसे मुखरता से करती है। यदि यह प्रतिबद्धता वास्तविक है तो मुस्लिम महिलाओं के लिए शिक्षा, सरकारी नौकरी और पंचायत से लेकर संसद तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अलग से प्रावधान किया जाए।
</p><p style="text-align: justify; "><b>4. मुसलमानों की ग़रीब अशराफ/सवर्ण जातियों को EWS में अलग से कोटे का प्रावधान किया जाए
</b></p><p style="text-align: justify; ">भाजपा जैसी महान पार्टी से हमारी विनम्र गुजारिश है कि वह इन मांगों पर गंभीरता से विचार करे। और उन लोगों की धारणाओं को खारिज करे जो यह भ्रम फैलाते हैं कि "पसमांदा नैरेटिव" केवल मुसलमानों को बांटने के लिए है।
</p><p style="text-align: justify; ">याद रखिए, पसमांदा मुस्लिम, मुस्लिम समाज का 85% हिस्सा हैं। इन्हें साथ लिए बिना "सबका साथ, सबका विकास, और सबका विश्वास" का सपना अधूरा है। अगर भाजपा वास्तव में "सबका विश्वास" चाहती है, तो शुरुआत पसमांदा से होनी चाहिए।
</p><p style="text-align: justify; "><b><span style="font-size: 26px;">डॉ. मोहम्मद अकरम नवाज़</span>,
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>सहायक आचार्य,
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>नई दिल्ली</b></p><p style="text-align: justify; "><section draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/44Ku0pcRtVs" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></section><b>
</b></p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कनाडा के जंगलों में आग अब प्राकृतिक नहीं: जलवायु परिवर्तन ने भीषण जंगल की आग को बनाया दोगुना संभावित]]></title>
<description><![CDATA[कनाडा के जंगलों में भीषण आग की परिस्थितियों को जलवायु परिवर्तन ने करीब दोगुना अधिक संभावित बना दिया है। WWA की स्टडी आग, गर्मी, सूखे और वायु प्रदूषण के बढ़ते खतरे को समझाती है।]]></description>
<tags>जलवायु परिवर्तन,कनाडा</tags>
<link>https://hastakshep.com/environment-news/canada-wildfires-climate-change-double-likely-2026-315080</link>
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<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन,दुनिया,पर्यावरण,समाचार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 11 Aug 2026 09:36:11 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Raging forest fires]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/08/11/184893-raging-forest-fires.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/08/11/184893-raging-forest-fires.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>कनाडा के जंगलों में आग अब नहीं रही प्राकृतिक, जलवायु परिवर्तन ने बनाया दोगुना ज़्यादा संभावित
</b></h2><p style="text-align: justify; "><b>कनाडा में जंगल की आग क्यों बढ़ रही है? जलवायु परिवर्तन ने आग की भीषण परिस्थितियों को दोगुना संभावित बनाया
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>क्या कनाडा के जंगल की आग जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है?
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b>हाँ। World Weather Attribution (WWA) की नई स्टडी के अनुसार, मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने कनाडा के ओंटारियो और नॉर्थवेस्ट टेरिटरीज़ में 2026 की भीषण जंगल की आग से जुड़ी गर्म, शुष्क और आग के लिए अनुकूल मौसमीय परिस्थितियों की संभावना करीब दोगुना या उससे अधिक बढ़ा दी है।
</b></p><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>कनाडा के जंगलों में आग जलवायु परिवर्तन से क्यों बढ़ रही है
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>क्या कनाडा की जंगल की आग जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही है
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>कनाडा में जंगल की आग को जलवायु परिवर्तन ने कितना बढ़ाया
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>2026 में कनाडा के जंगलों में इतनी भीषण आग क्यों लगी
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>कनाडा की जंगल की आग कितनी बार जलवायु परिवर्तन के कारण होती है
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>जलवायु परिवर्तन कनाडा की जंगल की आग को कैसे प्रभावित करता है
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>कनाडा में जंगल की आग की परिस्थितियां दोगुना अधिक संभावित क्यों हुईं
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>World Weather Attribution कनाडा जंगल की आग स्टडी 2026
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>WWA Canada wildfire climate change study 2026
</b></li></ul><p style="text-align: justify; ">नई दिल्ली, 11 अगस्त 2026. कनाडा में जंगलों की आग कोई नई बात नहीं है। हर साल गर्मियों में जंगल जलते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आग का आकार, उसकी रफ्तार और उसका असर इतना बढ़ गया है कि वैज्ञानिक अब इसे सामान्य प्राकृतिक घटना नहीं मान रहे।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>World Weather Attribution (WWA) की नई स्टडी</i></b> बताती है कि इस साल कनाडा के ओंटारियो और नॉर्थवेस्ट टेरिटरीज़ में फैली भीषण जंगल की आग के पीछे मौजूद मौसमीय परिस्थितियों को इंसानों की वजह से हुए <b><i>जलवायु परिवर्तन </i></b>ने करीब दोगुना अधिक संभावित बना दिया। यानी अगर पृथ्वी आज जितनी गर्म नहीं हुई होती, तो ऐसी परिस्थितियां बनने की संभावना काफी कम होती।
</p><p style="text-align: justify; ">इस साल जुलाई की शुरुआत से कनाडा के कई हिस्सों में आग तेजी से फैलनी शुरू हुई। अब तक 38 लाख हेक्टेयर से अधिक जंगल जल चुके हैं। हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े, जबकि लाखों लोग जहरीले धुएं की चपेट में आए। कई इलाकों में आग इतनी तेजी से फैली कि उसे नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो गया।
</p><p style="text-align: justify; ">WWA के वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि इन आगों के पीछे जलवायु परिवर्तन की कितनी भूमिका थी। इसके लिए उन्होंने Daily Severity Rating (DSR) नामक वैज्ञानिक पैमाने का इस्तेमाल किया, जो यह बताता है कि गर्मी, सूखे और मौसम की अन्य परिस्थितियों के कारण आग बुझाना कितना कठिन हो सकता है। वैज्ञानिकों ने मौजूदा मौसम की तुलना उस दुनिया से की, जहां जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से पैदा हुआ अतिरिक्त वैश्विक तापमान मौजूद नहीं होता।
</p><p style="text-align: justify; ">स्टडी के मुताबिक आज के गर्म होते <b><i>मौसम में नॉर्थवेस्ट टेरिटरीज़</i></b> में इस तरह की भीषण आग की परिस्थितियां हर 2 से 6 साल में देखने को मिल सकती हैं, जबकि ओंटारियो में ऐसी स्थिति 6 से 15 साल में एक बार बनने की संभावना है। लेकिन जलवायु परिवर्तन से पहले ऐसी परिस्थितियां 40 साल से भी कम बार देखने को मिलती थीं। वैज्ञानिकों ने जब मौसम के वास्तविक आंकड़ों और जलवायु मॉडलों को एक साथ देखा, तो पाया कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने इन परिस्थितियों की संभावना लगभग दो गुना या उससे अधिक बढ़ा दी है।
</p><p style="text-align: justify; ">स्टडी यह भी बताती है कि कनाडा में आग का असर सिर्फ़ जंगलों तक सीमित नहीं रहता। आग से उठने वाला धुआं सैकड़ों किलोमीटर दूर तक फैल जाता है। इस साल कनाडा के अलावा अमेरिका के मिडवेस्ट और उत्तर-पूर्वी हिस्सों में 12 करोड़ से अधिक लोग खराब वायु गुणवत्ता से प्रभावित हुए। जंगल की आग का धुआं सांस और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ाता है, अस्पतालों पर दबाव बढ़ाता है और सामान्य जनजीवन को प्रभावित करता है।
</p><p style="text-align: justify; ">रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे ज्यादा असर दूर-दराज़ और स्वदेशी (Indigenous) समुदायों पर पड़ा है। कई समुदायों को बार-बार अपने घर छोड़ने पड़े हैं। लगातार होने वाली आग के कारण लोगों के लिए सामान्य जीवन में लौटना मुश्किल होता जा रहा है। सिर्फ़ घर ही नहीं, बल्कि पारंपरिक आजीविका, सांस्कृतिक गतिविधियां और मानसिक स्वास्थ्य भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>इम्पीरियल कॉलेज लंदन के डॉ. थियोडोर कीपिंग</i></b> का कहना है कि 2023 के बाद से कनाडा में जंगल की आग का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। उनके अनुसार इस साल नॉर्थवेस्ट टेरिटरीज़ में आग की तीव्रता रिकॉर्ड स्तर के बराबर पहुंच गई, जबकि ओंटारियो में जला हुआ क्षेत्र पिछले रिकॉर्ड से लगभग दोगुना हो चुका है। उनका कहना है कि यह बदलाव जलवायु परिवर्तन का एक और स्पष्ट प्रमाण है और सिर्फ़ आग बुझाने की तैयारी अब पर्याप्त नहीं होगी।
</p><p style="text-align: justify; ">स्टडी की सह-लेखक और <b><i>जलवायु वैज्ञानिक डॉ. फ्रेडेरिके ओटो </i></b>कहती हैं कि पिछले कुछ वर्षों में फ्रांस, स्पेन, चिली, अर्जेंटीना और अब कनाडा, लगभग हर जगह एक जैसी तस्वीर दिखाई दे रही है। जलवायु परिवर्तन गर्म, शुष्क और ज्वलनशील परिस्थितियों को बढ़ा रहा है, जिससे जंगल की आग पहले की तुलना में अधिक बार, अधिक तीव्र और अधिक विनाशकारी हो रही है। उनके मुताबिक दशकों से विज्ञान यही चेतावनी देता आया है कि फॉसिल फ्यूल जलाने से ऐसी घटनाएं बढ़ेंगी, और अब वही वास्तविकता दुनिया के सामने दिखाई दे रही है।
</p><p style="text-align: justify; ">रेड क्रॉस रेड क्रिसेंट क्लाइमेट सेंटर के रूप सिंह का कहना है कि एक साथ कई जगह आग लगने से अग्निशमन संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। समुदायों को एक आग से उबरने का मौका भी नहीं मिलता कि दूसरी आपदा सामने आ जाती है।
</p><p style="text-align: justify; ">WWA की विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि कनाडा के पिछले तीन जंगल-अग्नि सीजन असाधारण रूप से गंभीर रहे हैं। 2023 में भी संगठन ने पाया था कि क्यूबेक में भीषण आग की परिस्थितियों को जलवायु परिवर्तन ने सात गुना अधिक संभावित बना दिया था। तब से प्रकाशित कई वैज्ञानिक शोध भी यही संकेत देते हैं कि कनाडा में जंगल की आग का बढ़ता खतरा अब जलवायु परिवर्तन से गहराई से जुड़ चुका है।
</p><p style="text-align: justify; ">यह अध्ययन भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत देता है। हिमालयी राज्यों से लेकर मध्य भारत और पश्चिमी घाट तक, जंगल की आग की घटनाएं पिछले वर्षों में लगातार चिंता का विषय बनी हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती गर्मी, लंबे सूखे और बदलते मौसम के पैटर्न दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आग के जोखिम को बढ़ा रहे हैं। ऐसे में सिर्फ़ आग बुझाने की क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को धीमा करने, जंगलों को अधिक लचीला बनाने और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
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