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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" gd:etag="W/&quot;CUMGQ3cycSp7ImA9WhRbEEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3803048891423223924</id><updated>2012-02-01T00:03:42.999-08:00</updated><title>India Gate Se</title><subtitle type="html">Analysis of the News on Same Day. Its also published in Dainik Navajyoti (Rajasthan) Front page First Column.</subtitle><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://santoshindiagatese.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://santoshindiagatese.blogspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3803048891423223924/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false&amp;v=2" /><author><name>santosh.indiagatese</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16491414116218642153</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/_jY3-YUNELKk/TCy0y5IRJzI/AAAAAAAAACE/uIZatkWOww8/S220/Photo0987.jpg" /></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>316</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/atom+xml" href="http://feeds.feedburner.com/Indiagatese" /><feedburner:info uri="indiagatese" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><entry gd:etag="W/&quot;C0UEQ3oycCp7ImA9WhZRFk8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3803048891423223924.post-4156470225842727684</id><published>2011-04-12T08:13:00.000-07:00</published><updated>2011-04-12T08:13:22.498-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-04-12T08:13:22.498-07:00</app:edited><title>अन्ना लोकपाल के पीछे, तो नेता अन्ना के पीछे</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;एक कहावत है- ‘नेता, सांप, .., ऊंट और भैंसा अपनी चोट का बदला जरूर लेते हैं।’ सो अन्ना के वार से चोटिल नेताओं ने मुहिम छेड़ दी। येन-केन-प्रकारेण अन्ना हजारे को बदनाम करने की कोशिश होने लगी। मंगलवार को कांग्रेस नए शिगूफे के साथ मैदान में उतरी। इशारों में ही सवाल उठाया- धरना-प्रदर्शन-अनशन करने वाले एनजीओ को टेटं लगाने, माइक सिस्टम और अन्य बंदोबस्त के लिए फंड कहां से मिलते, इसकी भी जांच हो। अगर अन्ना राजनीति में ट्रांसपेरेंसी की पैरवी कर रहे, तो एनजीओ को इस काम के लिए फंड कौन देता है, यह भी खुलासा हो। यानी अन्ना के पांच दिन के अनशन में हुए खर्च का हिसाब मांग रही कांग्रेस। अब राजनीति की बेहयाई के बारे में क्या कहें। मनमोहन सरकार ने वल्र्ड कप क्रिकेट से हुई बेतहाशा आमदनी में भी आईसीसी को करीब 45 करोड़ रुपए की टेक्स छूट दी। तो कांग्रेस ने कोई सवाल नहीं उठाया। पर अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन किया, तो जंतर-मंतर पर तैयार हुए मंच और टेंट का खर्चा कांग्रेसियों की आंखों में खटक रहा। अब तो कांग्रेसी ही नहीं, करीब-करीब सभी राजनीतिक दल अन्ना की हर बात में नुक्ताचीनी कर रहे। अन्ना ने गुजरात के विकास के लिए नरेंद्र मोदी की तारीफ की। तो बटला, 26/11, मालेगांव, अजमेर ब्लास्ट जैसे मामलों को सांप्रदायिक जामा पहनाने वाले कांग्रेसी राजा दिग्विजय सिंह ने अब अन्ना के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया। बोले- ‘मोदी की तारीफ करने वाले अन्ना गुजरात में आठ साल से खाली पड़े लोकायुक्त के पद को भरने के लिए उन पर दबाव क्यों नहीं डालते?’ यानी खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे। अन्ना ने नेताओं को भ्रष्ट क्या कहा। अब तो दिग्विजय के साथ-साथ आडवाणी भी एतराज जता रहे। दोनों का लब्बोलुवाब यही- सभी नेताओं को भ्रष्ट कहने का मतलब समूची राजनीतिक व्यवस्था को नकारना होगा। यों यह बात सोलह आने सही, सभी नेताओं को भ्रष्ट कहना उचित नहीं। पर राजनीति में ईमानदार नेता की हालत कैसी, प्रख्यात कवि सुदामा पांडे धूमिल की इन पंक्तियों से लगाया जा सकता। उन ने लिखा- ‘.. संसद तेली की वह घानी है, जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है। और यदि यह सच नहीं है, तो यहां एक ईमानदार आदमी को अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है। जिसने सत्य कह दिया है, उसका बुरा हाल क्यों है?’ जो नेता अपने वक्त में ईमानदार रहा, उसका परिवार मुफलिसी में ही परलोक सिधार जाता। जो राज करने की नीति को समझ लेता, उसकी सात पुश्तें गरीबी की परिभाषा भी समझ नहीं पातीं। चुनाव में धन बल, बाहु बल इतना हावी हो चुका, कोई ईमानदार चुनाव लडऩे की सोच भी नहीं सकता। सो कांग्रेस ने मंगलवार को अन्ना और उनके समर्थकों को एक और चुनौती दी। कहा- ‘नेताओं को गाली मत दो। हिम्मत है, तो चुनाव लड़ो और जीतकर दिखाओ।’ यानी कांग्रेस चाह रही, अन्ना जैसे समाजसेवी को भी जैसे-तैसे अपनी जमात में शामिल कर लो। फिर न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। पर चुनाव की असलियत का ताजा किस्सा तमिलनाडु में दिख रहा। जहां अब तक करीब 50 करोड़ रुपए जब्त किए जा चुके। वोटरों को रिश्वत देने के 900 से अधिक मामले दर्ज हो गए। कहा तो यहां तक जा रहा- तमिलनाडु के बैंकों से पांच सौ और हजार रुपए के नोट गायब हो चुके। आम खाता धारक छुट्टों से ही काम चला रहे। पर नेता अपने गिरेबां में झांकना भूल चुके। किसी को भ्रष्टाचार नजर नहीं आता, तो किसी को महंगाई। जनता ने भ्रष्टाचार पर अपने गुस्से का इजहार क्या किया, नेताओं को तो दुकानदारी चौपट दिख रही। पर महंगाई की बात चली, तो कांग्रेस की एक और कलई खुल गई। अब तक महंगाई के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी को ढाल बनाती रही कांग्रेस। पर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग, जो एमएसपी तय करने में अहम भूमिका निभाता। उसके चेयरमैन अशोक गुलाटी ने महंगाई के पीछे एमएसपी में बढ़ोतरी की दलील सिरे से खारिज कर दी। बाकायदा आंकड़े भी पेश किए। पर आम आदमी को बरगलाना तो नेताओं की फितरत बन चुकी। अब वही खेल भ्रष्टाचार के मामले में। अन्ना जनता की आवाज बन गए। तो अन्ना की छवि धूमिल करने के तमाम हथकंडे अपनाए जा रहे। रामविलास पासवान चार दिन बाद जागे। तो याद आया, ड्राफ्टिंग कमेटी में कोई दलित नहीं। पर अभी तो महज शुरुआत। ड्राफ्टिंग कमेटी की मीटिंग शुरू होगी। तो अन्ना से जले-भुने नेता अपनी भड़ास निकालने में कसर नहीं छोड़ेंगे। वैसे भी नेतागिरी का अहम फार्मूला- एक झूठ को सौ बार बोलो, सच हो जाएगा। सो पहले अन्ना के अनशन पर राष्ट्रीय बहस छेड़ी। अब अनशन के खर्च पर सवाल उठा रहे। अन्ना विरोधियों की जमात खड़ी की जा रही। जिनमें एक ने तो मंगलवार को अखबार के दफ्तरों में घूम-घूम कर परचा बांटा। बुधवार को दिल्ली में राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी जनशक्ति के बैनर तले कोई हेमंत पाटिल प्रेस कांफ्रेंस करेंगे। तो अन्ना के हिंद स्वराज ट्रस्ट की 89 एकड़ जमीन घोटाला, जन्म दिन पर दो लाख 20 हजार रुपए का ट्रस्ट को चूना लगाना, ऑडिट को छुपाना जैसे कई गंभीर आरोप लगाए। अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। अन्नागिरी से चोटिल नेताओं ने ठान लिया- बिल ड्राफ्ट होते-होते अन्ना की ईमानदारी पर इतने सवाल उठा दो, वह खुद कमेटी से बाहर हो जाएं। &lt;br /&gt;
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जिन महात्मा गांधी को दुनिया ने अपना लिया, अब उन पर अपने देश के नेता ही उंगली उठा रहे। यों कुमारस्वामी ने यह साबित कर दिया, देवगौड़ा परिवार के पास जमा 700 करोड़ रुपए ईमानदारी के तो नहीं। सचमुच पेशे से किसान रहे एच.डी. देवगौड़ा की जिंदगी की शुरुआत बैलगाड़ी से हुई। अब हम-आप भला क्यों पूछें, खुद उनके बेटे ने अपनी अकूत संपत्ति का स्रोत बता दिया। पर कुमारस्वामी की छोडि़ए, हद तो कपिल सिब्बल ने पार कर दी। सिब्बल खुद लोकपाल बिल पर ड्राफ्टिंग कमेटी के मेंबर। पर दिल की खीझ जुबां पर आई। तो भ्रष्टाचार से लडऩे की मनमोहन सरकार की गंभीरता उजागर हो गई। अन्ना का अनशन तुड़वाने में सिब्बल को पांच दिन लग गए। सो इतवार को खूब भड़ास निकाली। बोले- अगर गरीब बच्चे के पास पढऩे का साधन नहीं, तो लोकपाल विधेयक उसकी क्या सहायता करेगा। गरीब को स्वास्थ्य सेवा की जरूरत। तो लोकपाल कैसे मदद करेगा? पर मनमोहन सरकार के काबिल मंत्री कपिल सिब्बल शायद भूल गए। देश में शिक्षा और स्वास्थ्य का स्तर आजादी के 64 साल बाद भी दयनीय, तो इसके लिए नेता ही जिम्मेदार। शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए दिया जाने वाला बजट कभी पूरी ईमानदारी से खर्च नहीं होता। गरीबों के लिए शुरू की गई सभी योजनाओं को उठाकर देखो। तो भ्रष्टाचार का कीड़ा हर जगह नजर आएगा। नरेगा में रोजगार चाहिए, तो ठेकेदार से लेकर मुखिया तक को रिश्वत। सर्वशिक्षा अभियान के तहत नौकरी चाहिए, तो पहले मुखिया, फिर ऊपर के अधिकारियों का पेट भरो। इंदिरा आवास का मकान चाहिए, तो 45 हजार में से बीडीओ पहले ही पांच हजार काट लेगा। फिर सिफारिश करने वाला मुखिया कोई धर्म-खाता खोले तो नहीं बैठा। सो कुछ दक्षिणा उसकी भी बनती। स्वास्थ्य मिशन का हाल तो पूछो मत। कागजों पर दवाइयां लिखी जातीं। पर गरीबों को मिलती नहीं। अगर कभी कोई छापा पड़ जाए, तो खुदरा दुकानदारों के पास नॉट फॉर सेल वाली दवाइयां यों ही मिल जाएंगी। सो अब कोई कपिल सिब्बल से पूछे- क्या शिक्षा-स्वास्थ्य में भ्रष्टाचार नहीं होता? क्या लोकपाल जैसी मजबूत संस्था के आने से शिक्षा-स्वास्थ्य का भ्रष्टाचार थम जाए, तो उसका फायदा गरीबों को नहीं होगा? पर माफ करिए, यह सवाल भला कपिल सिब्बल से क्यों पूछें। जिन्हें एक नील 76 खरब के टू-जी घोटाले में कोई घोटाला नजर नहीं आता। राजा घोटालेबाज नजर नहीं आते। हमेशा विपक्ष जिन्हें झूठा नजर आता। ऐसे कपिल सिब्बल से अन्ना के आंदोलन पर ऐसे बयान की उम्मीद थी। सो सोमवार को अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र लौटने से पहले सिब्बल पर पलटवार किया। बोले- अगर लोकपाल बिल से कुछ नहीं होगा, तो सिब्बल संयुक्त समिति से इस्तीफा दे दें। यों बयान पर बवाल मचने के बाद सोमवार को सिब्बल ने भी सफाई दी। उनके बयान का गलत मतलब निकाला गया। पर सिर्फ सिब्बल नहीं, ड्राफ्टिंग कमेटी के दूसरे मेंबर ने भी लोकपाल बिल को बेमतलब बताने की कोशिश की। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद की दलील सुनिए। भगवान के रहने पर भी अपराध होता है। तो भला लोकपाल बिल से क्या होगा। सचमुच भ्रष्टाचार के सागर में डुबकी लगा कांग्रेस अब काफी प्रेक्टीकल हो गई। यों अभी तो लोकपाल पर जुबानी जंग की शुरुआत। बीजेपी भी अंदरखाने कसमसा रही। सपा के मोहन सिंह, एनसीपी के तारिक अनवर और कई कांग्रेसी नेताओं की दलील- ऐसा होने लगा, तो फिर संसद का क्या महत्व रहेगा? पर संसद को महत्व की दुहाई देने वाले नेता संसद में क्या गुल खिलाते, यह जगजाहिर। अगर संसद की इतनी सुध, तो 42 साल से लोकपाल बिल पर कुंडली मारे क्यों बैठे रहे? सो अन्ना के आंदोलन पर खीझ की एकमात्र वजह- नेता अपने गले में घंटी नहीं बांधना चाहते। अगर लोकपाल बिल में अन्नागिरी चली, तो कुबेर का खजाना बनी राजनीति में मंदी का दौर आ जाएगा। फिर जेब भरने और भाई-भतीजावाद करने से पहले सोचना होगा। सो राजनेताओं का एक बड़ा तबका अब अन्ना के खिलाफ हाथ धोकर पड़ गया। &lt;br /&gt;
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xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-04-09T08:07:03.348-07:00</app:edited><title>सरकार ही नहीं, समाज के लिए भी सबक ‘अन्नागिरी’</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;तो आखिर तय हो ही गया- देश में लोक बड़ा, तंत्र नहीं। अपने नेता तंत्र की दुहाई दे लोक यानी जनता की आवाज दबाने में जुटे थे। पर देर से ही सही, मनमोहन के सिपहसालारों को बात समझ आ गई। तंत्र कोई आसमान से नहीं आया। पहले लोक, फिर लोक से तंत्र बना। सो ना-नुकर के बाद सरकार ने शासनादेश के बजाए नोटीफिकेशन जारी करना ही मुफीद समझा। अनशन के पांचवें दिन छपा हुआ गजट अन्ना हजारे तक पहुंचा दिया। सो लोकतंत्र की जीत के साथ ही शनिवार सुबह दस बजे अन्ना ने अनशन तोड़ दिया। जंतर-मंतर ही नहीं, समूचा देश दूसरी आजादी के जश्न में सराबोर हो गया। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या युवा और क्या महिलाएं। न कोई मजहब, न कोई जात-पांत, न सामाजिक भेद-भाव। अन्ना का आंदोलन देश-दुनिया में छा गया। दिन में होली, तो शाम को देशभर में दिवाली मनी। अपने इंडिया गेट पर भी लोगों ने कैंडल मार्च कर खुशी का इजहार किया। आईपीएल का रंग इतना फीका पड़ेगा, शायद ही किसी ने सोचा हो। शुक्रवार आंदोलनकारियों और सरकार की वार्ता तक आयोजकों के तो हाथ-पांव फूले हुए थे। शुक्रवार का चेन्नई बनाम कोलकाता का मैच भले रोमांचक हुआ, पर पहली दफा अपनी मीडिया और युवाओं ने उदासीनता दिखाई। जंतर-मंतर पर कई युवाओं के हाथों में तख्तियां दिखीं, जिनमें लिखा था- वेट आईपीएल, इट्स टाइम फॉर इंडियन अगेंस्ट करप्शन। सचमुच अन्ना की आंधी ने सरकार की सांसें उखाड़ दीं। पहले नोटीफिकेशन को सिरे से खारिज कर दिया। पर जनता के जज्बे के आगे झुकना पड़ा। तो खीझ मिटाने को अब कांग्रेस कह रही- तमाम कानूनी बाध्यताओं के बाद भी हम एक स्वस्थ लोकतंत्र चाहते। संयुक्त समिति का गठन भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारी गंभीरता को दर्शाता। हमने भविष्य की चिंता की, भूत की नहीं। यानी कानूनी पेच को गिना सरकार पुरानी दलील देती रहती। तो शायद सरकार का भविष्य अंधेरे में होता। सो कांग्रेस की साख को ध्यान में रख खुद सोनिया गांधी ने कमान संभाली। कपिल सिब्बल की आंदोलनकारियों से पहली वार्ता फेल हुई। तो खुद सोनिया ने अन्ना हजारे से अपील की। फिर नौकरशाही की दलीलों में सरकार आए, उससे पहले सोनिया ने शीर्ष स्तर पर मीटिंग का दौर शुरू कर दिया। सो नोटीफिकेशन को ना कर चुके कपिल सिब्बल ने आखिरकार स्वामी अग्निवेश को औपचारिक नोटीफिकेशन की कापी थमा दी। अब असली इम्तिहान बिल के ड्राफ्ट पर होगा। अन्ना हजारे ने तो अल्टीमेटम दे दिया- 15 अगस्त तक जन लोकपाल बिल पारित नहीं हुआ, तो लालकिले से तिरंगा लहराते हुए फिर अनशन करेंगे। उन ने आशंका जताई- जन लोकपाल बिल के लिए शायद एक और अनशन करना होगा। पर अन्ना के उपवास तोडऩे के बाद पीएम मनमोहन ने जो कहा, वह बेहद अहम। बोले- संसद के मानसून सत्र में आने वाला यह बिल एतिहासिक होगा। सोनिया गांधी की एनएसी अन्ना के जन लोकपाल बिल पर सहमति जाहिर कर चुकी। सो संयुक्त समिति के अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी ने इशारा कर दिया- बिल आम सहमति का होगा। यानी अन्ना के अनशन ने देश को नई दिशा दी। भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगा युवाओं के प्रेरणास्रोत बने। पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में फिलहाल सिर्फ बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी बनी। यह जीत आखिरी नहीं, अलबत्ता अभी तो शुरुआत हुई। सो खुशी के बावजूद जोश और जज्बा कायम रखना होगा। देश के युवाओं को शपथ लेनी होगी- अब कोई पुलिस वाला हो या पटवारी, कोई अफसर हो या बाबू, कोई मंत्री हो या संतरी। किसी ने रिश्वत मांगी, तो अन्नागिरी अपनाएंगे। भले एक झटके में भ्रष्टाचार का खात्मा संभव नहीं। पर इस नकारात्मक सोच की वजह से नई शुरुआत को दफन नहीं कर सकते। भ्रष्टाचार से लडऩे को अभी भी कई कानून, पर अन्ना बोले- अभी जो संस्था काम कर रहीं, सब सरकार के अधीन। हम स्वायत्त संस्था की बात कर रहे। अब सरकार को शायद अक्ल आ गई होगी। जनता ने पांच दिनों में अपनी भावना का इजहार कर दिया। पर अन्ना का आंदोलन सरकार ही नहीं, समाज के उन कई तबकों के लिए भी एक सबक। जो अपने निजी स्वार्थ के लिए कई रेल की पटरियां उखाड़ते, कभी बसें फूंक डालते, सडक़ें जाम कर देते। हाल ही में जाट और गुर्जर आंदोलनों ने बाकी जनता के मन में गुस्सा पैदा किया। जबकि अन्ना के आंदोलन ने देशवासियों के दिल में जगह बनाई। जंतर-मंतर पर लोग अपने पूरे परिवार, छोटे-छोटे बच्चों के साथ पहुंचने में गर्व महसूस करने लगे। क्या कोई अन्य व्यक्ति किसी गुर्जर-जाट आंदोलन में ऐसे पहुंच सकता? जाट-गुर्जर आंदोलन तो हालिया उदाहरण, पर समाज के हर वर्ग के लोगों को अन्ना से सबक लेने की जरूरत। जिनके आंदोलन ने महज पांच दिन में सरकार के घुटने टिकवा दिए और ना कोई ट्रेफिक जाम हुआ, न जनता को परेशानी। न रेल की पटरियां उखड़ीं, न किसी सरकारी संपत्ति को नुकसान। सरकार को भी मानना पड़ा, यह लोकतंत्र की जीत। सो अन्ना का आंदोलन सरकार ही नहीं, पटरी उखाडऩे वाले, सडक़ जाम करने वाले, बस फूंकने वाले समाज के अन्य आंदोलनकारियों के लिए भी सबक। &lt;br /&gt;
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xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-04-08T09:18:22.218-07:00</app:edited><title>आंदोलन की शक्ल ने दी सरकार को अक्ल</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;दुष्यंत की ये पंक्तियां शुक्रवार को मौजूं हो गईं- ‘.. आज ये दीवार परदों की तरह हिलने लगी। शर्त लेकिन थी कि बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सडक़ पर, हर गली में। हर नगर, हर गांव में हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं। मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं, तो तेरे सीने में सही। हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।’ यों सही मायने में अन्ना हजारे ने तो सिर्फ लौ जलाई थी। भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी जम चुकीं, हर दिल में आग जलने लगी। सो जन लोकपाल बिल के लिए अन्ना के आंदोलन को अपार जन समर्थन मिला। देश का कोई कोना नहीं बचा, जहां आंदोलन की गूंज न पहुंची हो। सो सरकार की रात की नींद, दिन का चैन गायब हो गया। गुरुवार की आधी रात को पीएमओ जागता रहा। केबिनेट सचिव ने समाधान ढूंढने की कोशिश की। फिर शुक्रवार तडक़े सोनिया गांधी प्रधानमंत्री निवास पहुंचीं। मीटिंग में सोनिया-पीएम-सिब्बल-अहमद पटेल और पीएम के प्रिंसीपल सैक्रेट्री टी.के.ए. नायर शरीक हुए। दोपहर बाद पीएम ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से विचार-विमर्श किया। फिर पीएम के घर वीरप्पा मोइली-कपिल सिब्बल-सलमान खुर्शीद और प्रणव मुखर्जी का जमावड़ा हुआ। अन्ना को भेजे जाने वाले ड्राफ्ट पर चर्चा हुई। तो देर शाम सिब्बल के घर चौथे दौर की वार्ता हुई। सरकार की ओर से मोइली-सिब्बल-प्रणव, तो अन्ना की ओर से स्वामी अग्निवेश, किरन बेदी, अरविंद केजरीवाल पहुंचे। वार्ता के बाद अग्निवेश ने अनशन खत्म करने का इशारा किया। पर अन्ना के आगे सरकार की चालाकी नहीं चली। आखिर सरकार पर फौरी ऐतबार हो भी कैसे, जब सुबह ही हुस्नी मुबारक की तरह हेकड़ी दिखाई। आंदोलनकारियों की ओर से संयुक्त समिति के लिए नोटीफिकेशन और गैर सरकारी नेता को अध्यक्ष बनाने की मांग सिरे से खारिज कर दी। सो देर शाम सरकार नतमस्तक दिखी। तो अन्ना को शक हो गया, सुबह हेकड़ी दिखाने वाले शाम को झुक रहे। तो दाल में जरूर कुछ काला। वैसे भी ड्राफ्ट को तैयार करने वाले तीनों केबिनेट मंत्री पेशे से वकील। सिब्बल, सलमान खुर्शीद और वीरप्पा मोइली ने आसानी से सरेंडर किया होगा, ऐसी उम्मीद करना बेमानी। सो सरकार के ड्राफ्ट पर अन्ना ने पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण के साथ चर्चा की। देर रात एलान कर दिया- अभी अनशन जारी रहेगा। सरकार के ड्राफ्ट पर अभी अंतिम फैसला नहीं, शनिवार को बात होगी। सो अब उम्मीद, शनिवार को शायद अनशन खत्म हो। सरकार संयुक्त समिति के लिए नोटीफिकेशन तो नहीं, पर शासनादेश जारी करने को राजी दिख रही। कमेटी में चेयरमैन के बजाए को-चेयरमैन का पद आंदोलनकारियों को देने का प्रस्ताव रखा गया। सरकार की हालत अब बद से बदतर हो चुकी। पांच राज्यों के चुनाव में आंदोलन का असर पड़ता दिख रहा। कांग्रेस और सरकार के रणनीतिकार अब मानने लगे। देर से ही सही, अन्ना के आंदोलन ने जो राह पकड़ी, संयुक्त समिति की मांग माननी पड़ेगी। सो ऐसा न हो, जैसे टू-जी घोटाले में सब कुछ लुटाकर होश में आए, अब भी कुछ ऐसा ही हो। सो संयुक्त समिति की मांग मानने में देरी की अब कोई तुक नहीं। अनशन पर बैठे अन्ना की तबियत थोड़ी भी नासाज हुई। तो कहीं देश की जनता सरकार की अर्थी न सजा दे। पर सरकार के झुकने की सबसे बड़ी वजह खुफिया रपट बनी। जिसमें बताया गया- अगर जल्द आंदोलन को नहीं रोका गया, तो आंदोलन अराजक हो सकता। दिल्ली में जंतर-मंतर पर तो अन्ना बैठे। पर देश भर के चौक-चौराहों-मैदानों में कोई एक नेतृत्व नहीं। लोगों का गुस्सा भडक़ता जा रहा। आंदोलनकारियों की भीड़ बढ़ती जा रही। यानी इंटेलीजेंस रिपोर्ट ने सरकार के कान खड़े कर दिए। सो सरकार की ओर से वार्ताकार अब आंदोलनकारियों से वार्ता में जुबान कम, कलम अधिक चला रहे। ताकि आंदोलन खत्म हो सके। शुक्रवार की शाम सरकार को उम्मीद बंधी। स्वामी अग्निवेश के इशारे के बाद मीडिया ने आनन-फानन में अनशन खत्म होने के आसार जता दिए। तो जंतर-मंतर हो या इंडिया गेट, मुंबई का आजाद मैदान हो या देश के अन्य चौक-चौराहे, हर जगह आजादी का तराना गूंजने लगा। ये देश है वीर जवानों का, हम होंगे कामयाब, वंदे मातरम जैसे गीतों के उद्घोष से माहौल ऐसा बन गया, मानो दूसरी आजादी मिल गई। सचमुच भ्रष्टाचार की मार से शायद ही देश का कोई नागरिक बचा हो। सो गुस्सा अब सडक़ों पर साफ दिख रहा। सबके दिलों में अजीब सी आग, जुबां पर एक ही नारा- अब जान रहे या जाए, पर ये सूरत बदलनी चाहिए। &lt;br /&gt;
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क्यों नहीं जन लोकपाल बिल लाने और भ्रष्टाचारियों को सींखचों में बंद करने का साहस दिखाते? क्या सिर्फ सोनिया गांधी सरीखे नेताओं के लिए ही एनएसी बन सकती? क्या सिर्फ बड़े नेताओं को बचाने के लिए ही बैक डेट से लाभ के पद का कानून लागू किया जा सकता? जिस कानून पर तबके राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी आपत्ति जताई थी। सो नीयत में खोट देख अन्ना समर्थकों ने सरकारी प्रस्ताव ठुकरा दिया। दो दौर की बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला। अब शुक्रवार को फिर वार्ता होगी। पर मौके की नजाकत भांप सोनिया गांधी ने गुरुवार को ही अपील जारी कर दी। अन्ना के अनशन पर दुख जताया। बोलीं- अन्ना ने जो मुद्दा उठाया, वह बेहद चिंता की बात। भ्रष्टाचार पर कभी दो राय नहीं हो सकतीं। भ्रष्टाचार से लडऩे का कानून प्रभावी और नतीजा देने वाला होना चाहिए। मुझे भरोसा है, सरकार अन्ना की राय को पूरी तवज्जो देगी। सो मैं अन्ना हजारे से अनशन खत्म करने की अपील करती हूं। अब जब सोनिया गांधी जैसी नेता भ्रष्टाचार पर दो राय न होने की दलील दे रहीं। तो उनके मनोनीत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अगर-मगर क्यों कर रहे? क्यों नहीं जनता की आवाज को अक्षरश: कबूल किया जा रहा? क्रिकेट डिप्लोमैसी के लिए तो मनमोहन मोहाली के मैदान में घंटों बैठे। पर जंतर-मंतर जाने की जहमत क्यों नहीं उठा रहे, जहां लोकतंत्र की सच्ची आवाज गूंज रही? विधानसभा चुनाव की दलील देकर पल्ला क्यों झाड़ रहे? क्या सिर्फ चुनाव के समय ही जनता की बात होगी? और तो और, मनमोहन ने ऐसे कपिल सिब्बल को वार्ताकार बना क्यों भेजा, जिन्हें न तो टू-जी घोटाले में कोई घोटाला नजर आता, न घोटालाधिराज ए. राजा दोषी नजर आते? पर सिब्बल ने स्वामी अग्निवेश और अरविंद केजरीवाल से बात की। तो संयुक्त समिति का अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी को बनाने का प्रस्ताव रखा। पर अन्ना समर्थकों ने अन्ना का नाम आगे किया। तो देर शाम खुद अन्ना हजारे ने अध्यक्षता से इनकार कर दिया। बोले- मैं संयुक्त समिति का अध्यक्ष बना, तो कहा जाएगा- मैं इस पद के लिए अनशन कर रहा। मैं ताउम्र कहीं भी किसी भी संस्था का सामान्य पदाधिकारी तक नहीं रहा। अन्ना ने साफ कर दिया- अब पीछे नहीं हटेंगे। गांधीवादी तरीका नहीं, तो छत्रपति शिवाजी को सामने लाना होगा। अन्ना ने शरद पवार के इस्तीफे पर दो-टूक कहा- सिर्फ एक शरद पवार की बात नहीं। जो-जो भ्रष्ट मंत्री, उसे केबिनेट में नहीं रहना चाहिए। सूचना के हक कानून के लिए अपने आंदोलन की याद ताजा करते हुए अन्ना बोले- उस कानून की वजह से आज घोटाले दर घोटाले बाहर आ रहे। पर अफसोस, घोटालेबाज जेल नहीं जा रहे। सो अब पीएम साहस दिखाएं। यों अन्ना भले पीएम को ईमानदार कहें। पर दागी मंत्री के मसले में मनमोहन ने ही संसद में क्या कहा था, रिकार्ड उठाकर देख लीजिए। उन ने दलील दी थी- जब तक कोर्ट में आरोप तय न हो, किसी मंत्री को दागी नहीं कहा जा सकता। सो पीएम से साहस की उम्मीद भला कैसे करें। वैसे भी केबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत से मनमोहन को अलग नहीं किया जा सकता। पर बात अन्ना के आंदोलन की। अब देश का हर चौक-चौराहा तहरीर की झलक दे रहा। भले अन्ना का आंदोलन अभी सिर्फ जन लोकपाल के लिए। सरकार जल्द नहीं चेती, तो जनता चेतनाशून्य न कर दे। &lt;br /&gt;
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अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। पर सवाल कांग्रेस से- माना बाहरी लोग बिल तय नहीं करते। तो सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल क्या आसमान से उतर कर आई? कांग्रेस जिन अन्ना हजारे को बाहरी बताना चाह रही, वह आज देश की जनता की आवाज हैं। पर सोनिया ने गिने-चुने लोगों को एनएसी का मेंबर बनाया। पीएम मनमोहन ने मजबूरी में मान्यता दी। अब जब सोनिया गांधी के लिए सरकार एनएसी का गठन कर संवैधानिक जामा पहना सकती। तो अन्ना और उनके समर्थकों को क्यों नहीं? जब एनएसी के मेंबर बड़े-बड़े कानून का ड्राफ्ट बना सरकार को भेज सकते। सरकार ना-नुकर के बाद भी उस ड्राफ्ट को कानूनी शक्ल देने के लिए बाध्य हो सकती। तो भला अन्ना की आवाज को कांग्रेस बाहरी कैसे बता सकती? वैसे भी अपनी संसद भले बिल पारित करने की औपचारिकता निभाती हो। पर क्या यह सच नहीं, संसद में पास होने वाला हर बिल मंत्रालयों में ही अंतिम रूप ले लेता? अपने कानूनविद लक्ष्मीमल सिंघवी ने तो यही कहा था। उनके मुताबिक- यह सत्य है कि कानून बनाने और टेक्स लगाने की सर्वोपरि सत्ता संसद में निहित है। पर वास्तविकता यह है कि विधि अधिनियमों का गर्भाधान और जन्म मंत्रालयों में होता है, संसद में तो सिर्फ मंत्रोच्चारण के साथ उनका उपनयन संस्कार होता और औपचारिक यज्ञोपवीत दे दिया जाता। अब सवाल- यह कैसा तंत्र, जिसमें सिर्फ चुनाव तक जनता जनार्दन की जय होती। सत्ता में बैठने के बाद जनता से दूर हो जाते। अब संसदीय मर्यादा की दुहाई देकर जनता की आवाज दबाने की कोशिश हो रही। यों कांग्रेस लाख दलीलें दे, पर अन्ना ने पीएम को खुला पत्र लिख बता दिया- यह आजादी की दूसरी लड़ाई। किसी के उकसावे पर नहीं। सचमुच महात्मा गांधी ने भी ऐसे ही अंग्रेजी संसदीय मर्यादा का ख्याल रखा होता। तो भारत की आजादी की तारीख और साल शायद कुछ और होते। कांग्रेस भूल रही, जब जनता सडक़ों पर उतरती, तो फिर मर्यादा नहीं, मकसद सामने होता। सो अन्ना ने अब अनशन स्थल पर नेताओं के लिए नो एंट्री का बोर्ड टंगवा दिया। मंगलवार को शरद यादव जैसे-तैसे बोल आए। पर बुधवार को उमा भारती और ओम प्रकाश चौटाला को उलटे पांव लौटना पड़ा। सो अब अपने नेता और नौकरशाह अपनी खैर मनाएं। नवरात्र के इन दिनों में देवी से दुआ करें, जंतर-मंतर सचमुच में तहरीर-ए-स्क्वायर न बन जाए। &lt;br /&gt;
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xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-04-05T08:41:47.037-07:00</app:edited><title>तो अबके तय हो ही जाए, ‘लोक’ बड़ा या ‘तंत्र’</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;क्रिकेट के बाद करप्शन कांग्रेस को फिर कुरेदने लगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ अबके मुहिम राजनीतिक नहीं, छोटे गांधी के नाम से मशहूर अन्ना हजारे ने छेड़ी। अब तक विपक्ष या स्वामी रामदेव जैसे इक्के-दुक्के लोग आवाज उठाते। तो राजनीतिक बता दबा दी जाती। पर पहली दफा भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे जैसी गैर-विवादित छवि मैदान में। जिनकी अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं। सो अन्ना की चोट सह पाना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। दूसरी आजादी की लड़ाई का शंखनाद करते हुए अन्ना मंगलवार से आमरण अनशन पर बैठ गए। स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल जैसी कई सामाजिक हस्तियां भी अन्ना के साथ जुड़ गईं। मंगलवार को देश भर में अन्ना के अनशन का असर दिखा। देश भर में लोगों ने उपवास रखा, रैलियां निकालीं। सो सोमवार तक अकड़ रही कांग्रेस मंगलवार को सकपका गई। अन्ना से अनशन खत्म करने की अपील की। पर कांग्रेस से पहले मनमोहन और उनका महकमा एड़ी-चोटी का जोर लगा चुका। फिर भी अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम से पीछे नहीं हटे। सो अन्ना की मुहिम की राजनीतिक बढ़त लेने बीजेपी मैदान में कूद पड़ी। अन्ना से उपवास तोडऩे का अनुरोध तो किया। पर सरकार को कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकी। सो अब दबी जुबान में कांग्रेसी अन्ना के आंदोलन को भी संघ की साजिश समझाने में जुटे। खीझ में कांग्रेसी अंटशंट गालियां भी निकाल रहे। पर देश के लिए सर्वस्व लुटाने सडक़ों पर उतरे अन्ना हजारे को जन-भावना का अनुमान। सो बोले- सरकार मेरे अनशन से नहीं डरती। उसे डर है, तो बस यह कि पब्लिक भडक़ेगी। तो उसकी सरकार गिर जाएगी। इसलिए मुझे लगता है कि सरकार तीन-चार दिन में झुकेगी। और उसे जन-लोकपाल बिल की मांग माननी पड़ेगी। सचमुच गांधीवादी अन्ना से सरकार सहमी हुई। अन्ना अब तक सौ से अधिक बार आमरण अनशन कर चुके। छह मंत्री और चार सौ नौकरशाहों के खिलाफ मुहिम को अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लिया। मनमोहन ने सरकार जब नौकरशाही के दबाव में सूचना के हक कानून में संशोधन करने की सोची। तो मुखालफत की पहली आवाज अन्ना ने ही उठाई। अब अन्ना जन-लोकपाल बिल की मांग कर रहे। ताकि भ्रष्टाचार का जड़ से खात्मा हो। पर नेताओं-नौकरशाहों का दिल है कि भरेगा नहीं। सो सरकार अपनी मर्जी का लोकपाल बिल थोपना चाहती। पर अन्ना ने ठान लिया- अब जनता का बिल ही कानून बनेगा। जन-लोकपाल में स्वत: संज्ञान, सारी शक्तियों से लैस, तय समय में जांच और कार्रवाई दोषी को कड़ी सजा का प्रावधान। और 11 सदस्यीय संस्था की बात, जिनमें आधे सरकार के, तो आधे सीधे जनता के लोग हों। पर सरकारी लोकपाल में भ्रष्टाचार को झुनझुना बनाने की कोशिश। मसलन, शिकायतों पर पहले अनुमति लेनी होगी। कार्रवाई नहीं, परामर्श देने का अधिकार होगा। नौकरशाहों और जजों के खिलाफ जांच का प्रावधान नहीं। सजा भी महज छह से सात महीने की। घोटालों की रिकवरी की कोई व्यवस्था नहीं। सो सात मार्च की मुलाकात में ही पीएम ने अन्ना हजारे के सामने अपनी असमर्थता जता दी। पीएम ने बजट सत्र और पांच राज्यों के चुनाव के बाद दुबारा बात करने का भरोसा दिया। सो अन्ना को यह बात चुभ गई। बोले- जिस जनता ने उन्हें कुर्सी पर बिठाया, उसके लिए टाइम नहीं। हमारे बिल को इसलिए नहीं मान रहे, क्योंकि सबका खाना-पीना (रिश्वत) बंद हो जाएगा। पर सरकार की दलील- लोकपाल बिल पर विचार के लिए जीओएम बना हुआ। फिर भी आंदोलनकारियों ने संयुक्त समिति की मांग की। ताकि जन-लोकपाल बिल पर विचार हो। अन्ना की दलील- भ्रष्टाचार से लडऩे को देश में बहुतेरे कानून। पर सब हाथी के दिखाने वाले दांत। अब कुछ ऐसा हो, जो काट सके। पर सरकार के लिए मुश्किल- नौकरशाही को कैसे मनाए। भ्रष्टाचार का कोई भी किस्सा उठाकर देखो, नेता-नौकरशाह का गठजोड़ दिख जाएगा। टू-जी के राजा हों, या कॉमनवेल्थ के खिलाड़ी कलमाड़ी या कारगिल शहीद की विधवाओं के लिए बनी आदर्श इमारत की बलि चढ़े अशोक चव्हाण। हर खेल में नेता-नौकरशाह का गठजोड़ जन-जाहिर। अपने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने 1993 में भारतीय अफसरशाही को पॉलिश्ड कॉल गल्र्स की संज्ञा दी थी। नौकरशाह सचमुच किसी न किसी नेता को गॉड फादर बना इशारों पर काम करते। जिसका प्रतिफल वरिष्ठता लांघ मलाईदार पद के रूप में मिलता। सो 42 साल से लोकपाल बिल धूल फांक रहा। कभी किसी राजनीतिक दल ने लोकपाल बिल को अमल में लाने का साहस नहीं दिखाया। सो तबसे अब तक 13 सरकारें आईं-गईं, लोकपाल बिल भी लोकसभा में पेश होता और खत्म हो जाता। यानी नौकरशाही अपनी मनमर्जी पर अंकुश लगाना नहीं चाहती। अंग्रेजों ने भारत में जैसी नौकरशाही शुरू की, आज तक वही चलता आ रहा। सो अपने लोक-सेवक अभी भी कानून के संरक्षक या प्रतीक नहीं, अलबत्ता मालिक ही समझते। पर अन्ना हजारे ने उम्मीद की किरण जगा दी। बुजुर्ग नेतृत्व में युवा एक बार फिर सडक़ों पर उतर रहा। सो कहीं भ्रष्टाचार के महासागर में डुबकी लगा रही कांग्रेस की सरकार के लिए अन्ना का आंदोलन ताबूत में आखिरी कील साबित न हो। &lt;br /&gt;
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पर आईसीसी हो या बीसीसीआई या शरद पवार। तीनों के लिए सिर्फ पैसे की अहमियत, बाकी जाएं भाड़ में। जिन चैनलों को प्रसारण का अधिकार मिला हुआ, सिर्फ उनका फायदा बढ़ाने के लिए आईसीसी ने यह कदम उठाया। पर जब भारत में हो रहे मैच की कवरेज से भारतीय मीडिया को वंचित रखा जा रहा। यानी भारत सरकार से छूट भी ले रही और भारतीय इलैक्ट्रॉनिक मीडिया को आंखें भी दिखा रही। वह भी तब, जब अपने शरद पवार आईसीसी के प्रेसीडेंट। पर जब दिन भर आईसीसी और शरद पवार की खिंचाई हुई। बीजेपी-कांग्रेस ने मोर्चेबंदी कर मैच से पहले मामला सुलझाने की मांग की। तो आखिरकार देर से ही सही, आईसीसी दुरुस्त आई। शुक्रवार की देर शाम मीडिया कवरेज से बैन हट गया। यों शरद पवार से भला और उम्मीद भी क्या। जिन ने बतौर कृषि मंत्री आम जनता का बेड़ गर्क कर दिया। जब भी मुंह खोला, महंगाई बढ़ा दी। पर जब सरकारी खजाने को लूटना हो, तो पवार चुप रहना मुनासिब समझते। गुरुवार की केबिनेट मीटिंग में यही हुआ। जब आईसीसी वल्र्ड कप को टेक्स छूट का मामला आया। तो पवार चुपचाप बैठे रहे। पर पवार के खास-उल-खास और एनसीपी कोटे से मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने केबिनेट में टेक्स छूट की पैरवी की। अपने मनमोहन भी शायद मन बना चुके थे। पर खानापूर्ति के लिए खेल मंत्री अजय माकन से राय मांगी। तो माकन ने टेक्स छूट की मुखालफत की। माकन ने दलील दी, ऐसे में अन्य खेल संगठन भी सरकार से छूट की मांग करेंगे। क्रिकेट टूर्नामेंट को छूट देने का कोई तुक नहीं बनता। वैसे भी आईसीसी कोई सामाजिक संस्था नहीं, अलबत्ता पेशेवर और मुनाफा कमाने के लिए बनाई गई संस्था। माकन ने अपनी सरकार को आईना भी दिखाया। जब दलील दी- खेल मंत्रालय का बजट कम किया गया। तो ऐसे में क्रिकेट को टेक्स छूट क्यों? अब जरा वल्र्ड कप 2011 के आयोजन से आमदनी, खर्च और भारत सरकार की ओर से मिलने वाली टेक्स छूट को देखो। इस वल्र्ड कप से आईसीसी को कुल 1,476 करोड़ रुपए की आमदनी होगी। पर इस पूरे टूर्नामेंट का खर्चा महज 571 करोड़ रुपए होने की संभावना। यानी कुल 905 करोड़ की अतिरिक्त आमदनी आईसीसी को होने जा रही। फिर भी अपनी सरकार जो छूट दे रही, उसका आंकड़ा करीबन 45 करोड़ रुपया बन रहा। सो केबिनेट मीटिंग में अजय माकन के साथ-साथ अंबिका सोनी, कुमारी शैलजा और अन्य मंत्रियों ने भी टेक्स छूट का विरोध किया। केबिनेट मीटिंग में पवार टेक्स छूट के विरोधियों को हैरानगी से देखते रहे। पर आखिर में फैसला आईसीसी के फेवर में गया। सो अब सवाल- पवार ने इस केबिनेट मीटिंग में शिरकत क्यों की। जबकि वह खुद आईसीसी के मुखिया भी। ऐसे में नीयत पर सवाल उठना लाजिमी। सो अब सवाल पवार से- क्या यह मुफ्तखोरी नहीं? जब सुप्रीम कोर्ट ने सड़ रहे अनाज को बरबादी से बचाने के लिए गरीबों में बांटने का आदेश दिया। तो पवार ने मुफ्तखोरी की आदत को बढ़ावा देने वाला बताया था। अपने मनमोहन ने कार्यपालिका के अधिकार में दखल बताया था। पर अब कोई पूछे- 905 करोड़ का सीधा मुनाफा कमाने वाली संस्था को 45 करोड़ की टेक्स छूट क्यों? किसी आम नागरिक की सालाना आमदनी आयकर छूट की सीमा से महज हजार रुपए भी आगे बढ़ जाए, तो दस फीसदी टेक्स चुकाना पड़ता। शुक्रवार को जब टेक्स छूट के मामले पर देश में बवाल मचा। तो संयोग देखिए, आज के दिन यानी पहली अप्रैल 2010 को राइट टू एजूकेशन का कानून देश में लागू हुआ था। पर यूपी, बिहार समेत कई राज्यों, यहां तक कि राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने भी केंद्र-राज्य के खर्च अनुपात को 85:15 करने की मांग की थी। पर मनमोहन सरकार ने किसी की नहीं सुनी। पर क्रिकेट के लिए सबकी सुन रहे। किसी ने सच ही कहा है- गरीबों को देने में दर्द होता है, अमीरों को देने में खुशी। अपनी सरकार को अब क्या कहें। पर आईसीसी भी मानो शर्म का परदा उतार चुकी। महज 45 करोड़ की छूट के लिए भारत सरकार के सामने गिड़गिड़ाई। केबिनेट मीटिंग में पवार ने प्रफुल्ल पटेल को एक बार भी नहीं रोका। हद तो तब पार हो गई, जब विश्व कप ट्राफी को कस्टम ड्यूटी से बचाने के लिए आईसीसी ने कमर्शियल वैल्यू जीरो बता दी। पर कस्टम विभाग ने ट्राफी को रोक आकलन करवाया। तो साठ लाख कीमत आंकी गई। सुनते हैं, कस्टम विभाग ने 22 लाख की ड्यूटी लगा दी। &lt;br /&gt;
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xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-03-31T08:45:55.831-07:00</app:edited><title>रिकार्ड पंद्रहवीं जनगणना और 15वीं लोकसभा का</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;तो अपनी जनसंख्या के शुरुआती आंकड़े जारी हो गए। पर जनसंख्या से पहले बात क्रिकेट और कूटनीति की। भारत-पाक की क्रिकेट कूटनीति का सूत्रधार अमेरिका गदगद हो गया। भारत में अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर बोले- मीडिया जिसे क्रिकेट कूटनीति कह रहा, हम उसके साथ आगे बढऩे के लिए दोनों देशों की सराहना करते हैं। यानी मनमोहन-गिलानी वार्ता पर अमेरिकी मोहर लग गई। सो अब जब क्रिकेट वल्र्ड कप समापन की ओर, तो मनमोहन केबिनेट ने तोहफा थमा दिया। आईसीसी को वल्र्ड कप से होने वाली आमदनी में टेक्स छूट दे दी। शनिवार को वल्र्ड कप का शोर थम जाएगा। फिर आईपीएल की गूंज होगी। सो क्रिकेट की बातें होती रहेंगी। फिलहाल बात जनसंख्या के ताजा आंकड़ों की। तो अब भारत की आबादी एक अरब 21 करोड़ हो गई। यानी पिछले दस साल में देश की आबादी कुल 18 करोड़ बढ़ी। अब भारत और चीन की आबादी का अंतर 23 करोड़ 80 लाख से घटकर महज 13 करोड़ 10 लाख रह गया। पर राहत की बात यह, पिछली जनगणना के मुकाबले अबके जनसंख्या वृद्धि की दर में करीब चार फीसदी की कमी आई। पहले यह दर 21.5 फीसदी थी, अब 17.6 रह गई। देश का कुल लिंगानुपात 1971 से अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 940 पर पहुंच गया। यानी पिछली जनगणना के मुकाबले सात का इजाफा। अब एक हजार पुरुषों के मुकाबले 940 महिलाएं। पर विकास की अंधाधुंध दौड़ में भागते भारत को जनसंख्या का यह ताजा आंकड़ा आईना भी दिखा रहा। छह साल की उम्र तक के बच्चों के लिंगानुपात में गिरावट बेडिय़ों में जकड़े समाज की कड़वी सच्चाई। बच्चों का लिंगानुपात आजाद भारत के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। कुल 3.08 फीसदी की कमी दर्ज की गई। जिनमें बालकों की संख्या में 2.42 फीसदी की कमी, तो बालिकाओं की संख्या में 3.80 फीसदी की कमी। यानी राज्य और केंद्र स्तर पर चल रही लाडली योजनाएं जमीन पर कम, कागजों में अधिक चल रहीं। भ्रूण हत्या की कड़वी सच्चाई भी आंकड़ों में जगजाहिर। पंजाब, हरियाणा में लिंगानुपात बढ़ा, पर अभी भी देश में सबसे कम। हरियाणा के झज्जर जिले में तो 774 का ही अनुपात। महिलाओं की साक्षरता दर में दस फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। पर तमाम आंकड़ों के बावजूद अपने देश में जनसंख्या नियंत्रण की कोई स्पष्ट नीति नहीं। फिर भी सुकून, 1911-21 का अपवाद छोड़ दें, तो यह पहला मौका, जब पिछले दशक की तुलना में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आई। पर संयोग कहिए या कुछ और, भारत की पंद्रहवीं जनगणना जनता की जागरूकता को दर्शा रही। तो देश की पंद्रहवीं लोकसभा भ्रष्टाचार के मामले में परचम लहरा रही। जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार घटी, पर राजनेताओं के भाव बढ़ गए। जब 1993 में नरसिंह राव की सरकार खतरे में थी। तो महज 45 लाख में सांसद बिके। लालू ने सात साल में 900 करोड़ का चारा घोटाला किया। बोफोर्स दलाली कांड भी याद करिए। तो महज 64 करोड़ का मामला था। फिर सांसदों की महामंदी का भी एक दौर आया, जब 2005 में अपने 11 सांसद चवन्नी-अठन्नी में बिकते धरे गए। पर जैसे ही जुलाई 2008 में मनमोहन ने विश्वास मत हासिल करने की ठानी। सांसदों के रेट 25 करोड़ तक पहुंच गए। कई सांसदों को तो निजी विमान का भी ऑफर हो गया। रही-सही कसर अपने ए. राजा ने पूरी कर दी। जनसंख्या के आंकड़े तो हमने गिन लिए। पर टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की रकम को गिनना फिलहाल अपनी जांच एजेंसी के बूते से भी बाहर। यों सीएजी ने जो 1.76 लाख करोड़ का आंकड़ा दिया, उसे आमजन की भाषा में तोड़ें। तो अमूमन एक नील 76 खरब रुपए का बनता। यानी आम आदमी की तो छोडि़ए, शायद मशीन भी इन रुपयों को गिनते-गिनते हांफ जाए। कॉमनवेल्थ घोटाले का भी आंकड़ा 70,000 करोड़ बताया जा रहा। आदर्श जैसी तो कई मीनारें घोटाले की नींव पर खड़ीं। सोचो, अगर इसरो की एस- बैंड डील रद्द न होती, तो राजा का घोटाला पीछे छूट जाता। अब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की कड़ी खत्म होने का नाम नहीं ले रही। कॉमनवेल्थ पर शुंगलू रिपोर्ट ने शीला दीक्षित, उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना और सुरेश कलमाड़ी के चेहरे से नकाब हटा दिया। शीला ने तो फौरन केबिनेट मीटिंग बुला कमेटी की रपट खारिज कर दी। सो यह चोरी और सीना जोरी नहीं, तो और क्या? पीएम की बनाई कमेटी को सीएम शीला ने ठुकरा दिया। पर सवाल- जब शुंगलू रपट को आधार बना प्रसार भारती के सीईओ बी.एस. लाली हटाए गए। तो शीला पर पीएम चुप क्यों? अगर शीला-खन्ना-कलमाड़ी बेदाग, तो भला लाली को सजा क्यों? अब जब भ्रष्टाचार पर दोहरे मापदंड होंगे, तो भला देश की आबादी की चिंता क्यों होगी? सो अब जनता खुद ही जागरूक हो रही। जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट होने लगी। पर मनमोहन सरकार की विकास दर ने नेताओं की जेब को ऐसा झोला बना दिया, जो कभी भरता नहीं। सो पंद्रहवीं जनगणना और पंद्रहवीं लोकसभा का रिकार्ड आपके सामने। &lt;br /&gt;
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पर सरकार ही नहीं, विपक्ष भी बापू के अपमान पर बेफिक्र दिख रहा। सरकार को घेरने का एक भी मौका न चूकने वाली बीजेपी अभी भी खामोश बैठी। यों कांग्रेस-बीजेपी की लाज दोनों की राज्य सरकार ने बचा ली। पर बतौर प्रमुख विपक्ष बीजेपी की न तो कोई टिप्पणी, न ही किसी नेता का ट्वीट आया। अलबत्ता बीजेपी के नेता अब स्वीट-स्वीट सपने देखने लगे। मंगलवार को सुषमा स्वराज ने तो असम में अपने बूते बीजेपी की सरकार का दावा कर दिया। यों सपने देखना कोई बुरी बात नहीं। पर जो पार्टी कुल 126 की विधानसभा में फिलहाल दस सीटों पर हो और कुल 25 सीट जीतने का लक्ष्य लेकर चली हो। वह गठबंधन की सरकार का दावा करे, तो समझ में आने वाली बात। पर अपने बूते का दावा खयाली पुलाव से कम नहीं। असम में विपक्ष बिखरा हुआ। सो कांग्रेस की राह आसान दिख रही। फिर भी बीजेपी नेताओं के दावे कम नहीं। बुधवार को तो वेंकैया नायडू ने असम ही नहीं, केंद्र सरकार का भविष्य बतला दिया। वेंकैया का दावा- कांग्रेस की रहनुमाई वाली यूपीए सरकार छह महीने में गिर जाएगी और मध्यावधि चुनाव होगा। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मनमोहन सरकार को जाना होगा। क्योंकि मौजूदा शासन में हुए कई घोटालों से लोग ऊब चुके। पर सवाल- यूपीए सरकार अगर भरोसा खो चुकी, तो बीजेपी ने जनता का भरोसा पाने वाला कौन सा काम कर लिया? कर्नाटक में येदुरप्पाई छत्रप राज बीजेपी की परेशानी बना हुआ। अंदरूनी गुटबाजी खत्म होने का नाम नहीं ले रही। पर बात गांधी जी के अपमान से जुड़े मामले की। बुधवार को भले वीरप्पा मोइली बोले। गुजरात की बीजेपी और महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने किताब पर बैन लगा दिया। पर क्रिकेट मैच के चक्कर में बीजेपी-कांग्रेस की दुकानें बंद रहीं। राजनीतिक दल ही नहीं, सरकार का शीर्ष नेतृत्व मोहाली की महफिल में बैठा। बाकी जो बच गए, टीवी स्क्रीन से चिपके रहे। सो क्रिकेट के शोर में बापू के अपमान का मसला दब गया। &lt;br /&gt;
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पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए जाने वाले सबसे बड़े पुलित्जर पुरस्कार से नवाजे जा चुके अमेरिकी लेखक जोसेफ लेलीवेल्ड ने अबके यह गुस्ताखी की। अपनी किताब- ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया, में महात्मा गांधी को समलैंगिक बताया। जर्मन व्यक्ति हर्मन कोलेनबाश से रिश्ते बताए। पर तथ्यों के बिना संबंधों की कहानी गढ़ दी। अमेरिकी लेखक भूल गया, महात्मा गांधी ही एकमात्र ऐसे शख्स, जिन ने अपनी जिंदगी की नकारात्मक चीजें भी सहज ढंग से परोसीं। बापू ने अपनी आत्मकथा: सत्य के प्रयोग, में कड़वे-मीठे सारे सच उड़ेल दिए। ऐसी आत्मकथा शायद ही देखने को मिलती। फिर भी दुनिया के कुछ लोग गांधी जी के सहारे सुर्खियां बटोरने का मौका ढूंढते रहते। पर गांधी जी के जीवन पर शोध करने वाले कभी सही तस्वीर नहीं पेश कर पाए। किसी ने तारीफ की, तो सिर्फ सकारात्मक पहलू ही ढूंढे। किसी ने आलोचना की, तो सिर्फ नकारात्मक पहलू ही दिखाए। समग्र पहलू कभी किसी और ने नहीं परोसा। यों असली तस्वीर तो खुद गांधी जी अपनी आत्मकथा में दिखा गए। दुनिया को बतला दिया- वह भी हाड़-मांस के बने एक आम इनसान। पर सवाल- अमेरिकी लेखक लेलीवेल्ड ने ऐसा दुस्साहस कैसे किया? क्या दुनिया भर में गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत को मिली मान्यता अब खटक रही? कहीं दुनिया पर अपनी हिंसक ताकत का रौब दिखाने वाला अमेरिका की यह टटपुंजिया हरकत तो नहीं? देश-दुनिया को बापू ने लाठी की ताकत दिखाई। पर लाठी से ही सारे आंदोलन सफल होने लगें, तो अमेरिकी हथियारों के जखीरे का क्या होगा? सो हो-न-हो, अपना मानना तो यही, बापू की छवि को धूमिल करने का यह कुत्सित प्रयास। इससे पहले अमेरिका में ही स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस के संबंधों पर कीचड़ उछाला जा चुका। यों अमेरिका की छोडि़ए, बापू के ऊपर कीचड़ उछाले जाने के बाद भी भारत सरकार चुप बैठी। वैसे मौजूदा सरकार से उम्मीद भी क्या रखें। जब बापू के खड़ाऊं, चश्मे, कटोरी, चम्मच विदेशों में नीलाम हो रहे थे। तो अपनी सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी थी। वह तो भला हो विजय माल्या का, जिन ने नीलामी में बाजी मारी। भले माल्या की कमाई शराब के धंधे की हो। पर नीयत तो अपनी सरकार से कहीं अच्छी। मनमोहन सरकार को तो अंकल सैम का हुक्म मानने की आदत पड़ चुकी। तभी तो मंगलवार को बापू पर लगे लांछन का कोई खंडन या निंदा नहीं की। अलबत्ता अंकल सैम के इशारे पर मोहाली के सेमीफाइनल को क्रिकेट के बजाए कूटनीति का मंच बना दिया। सो मंगलवार को भी ऐसा लगा, मानो देश में सिर्फ क्रिकेट ही बचा। बुधवार को तो समूचे देश में कफ्र्यू जैसे हालात ही नजर आएंगे। चंडीगढ़ में तो सुरक्षा के ऐसे पुख्ता बंदोबस्त कि चिडिय़ा भी चूं नहीं कर सकती। मनमोहन ने गिलानी की खातिरदारी के लिए डिनर की तैयारी कर ली। दोनों पीएम की मीटिंग का बैक ग्राउंड मंगलवार को होम सैक्रेटरियों ने तय कर लिया। गृह सचिव स्तर की वार्ता के&amp;nbsp; बाद साझा बयान जारी हुआ। तो अमेरिकी एजंडे के मुताबिक कई मुद्दों पर सहमति बन गई। अब मुंबई हमले की जांच के लिए अपना न्यायिक जांच दल पाक जा सकेगा। पर बदले में भारत को भी समझौता ब्लास्ट केस की जानकारी साझा करनी होगी। यानी दोनों तरफ से न्यायिक जांच दल आएंगे-जाएंगे। पर सवा दो साल में पाकिस्तान सवा दो कदम भी नहीं चला। तो अब भला क्या उम्मीद? पाकिस्तान कभी भी सकारात्मक सोच के साथ वार्ता की मेज पर नहीं बैठा। अगर 1947 से अब तक का इतिहास पलटकर देखें। तो यही देखने को मिलेगा कि पाक की ग्रंथि में ईमानदारी नाम की चीज नहीं। अब अगर अपना जांच दल पाक जाएगा, मुंबई हमले के साजिशकर्ताओं से पूछताछ करेगा। तो क्या पाक हुक्मरान भारतीय जांच दल के निष्कर्ष को कबूल कर लेगा? अब तक पाक ने साजिशकर्ताओं की आवाज के नमूने तक नहीं लेने दिए। पाक की निचली अदालत ने इस मामले को खारिज कर दिया। पर अब पाकिस्तानी दलील- हाईकोर्ट में अपील दायर की गई, जहां से सकारात्मक नतीजे की उम्मीद। अब पाक चाहे जो दलील दे, पाक की न्यायपालिका की ईमानदारी भी जगजाहिर। भले पाक में फिलहाल लोकतांत्रिक हुकूमत। पर आईएसआई और सेना की नकेल कसने की हिम्मत नहीं। गृह सचिव स्तरीय वार्ता में जाली नोट, साइबर अपराध, मानव तस्करी जैसे मुद्दे भी शामिल थे। भारत ने जाली नोट के मामले में कई आईएसआई मुलाजिमों के नाम बताए। पर क्या पाक हुक्मरान कार्रवाई करेगा? आतंकवाद के मसले पर जब पाकिस्तानी जांच दल भारत आएगा, तो फिर कोई नई थ्योरी न गढ़ दे। समझौता ब्लास्ट में कई भारतीयों के हाथ सामने आए। सो आखिर में कहीं पाक यह न कह दे- दोनों देश अपने-अपने आतंकवाद के शिकार। वैसे पाक की यही फितरत रही। सो गृह सचिव स्तर पर हॉट लाइन शुरू हो जाए या जांच की रिपोर्ट साझा होने लगे। पर जब तक नीयत में खोट रहेगा, कोई भी वार्ता कैसे सफल होगी? सो क्रिकेट की आड़ में कूटनीति पुरानी ही राह पर। सन 1948 से अब तक दोनों देशों के दिल मिले, न मिले, हाथ मिलाने की कोशिशें जारी। &lt;br /&gt;
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लोग अभी 26/11 के जख्म नहीं भूले। वैसे भी शिवसेनिकों को वानखेड़े स्टेडियम की पिच खोदने का अच्छा-खासा अनुभव। साख खो रही शिवसेना को राजनीति के लिए भला इससे बेहतर मौका क्या मिलेगा। पर पाक भी कम फिक्रमंद नहीं। पाकिस्तानी गृहमंत्री रहमान मलिक ने तो पहले ही मैच फिक्सिंग की आशंका जता दी। अपने खिलाडिय़ों को फिक्सिंग से दूर रहने की कड़ी नसीहत दी। तो पाक खिलाड़ी बौखला गए। सो अब देश की निगाहें इस सवाल पर टिकीं। क्या पाक पीएम गिलानी मोहाली से सिर्फ कूटनीति कर विदा होंगे, या अपने खिलाडिय़ों को भी साथ लिवा ले जाएंगे? या क्या फिर शिवसेनिकों को अपनी राजनीति चमकाने का मौका मिलेगा? बाल ठाकरे ने तो ट्रेलर दिखा दिया। गिलानी-जरदारी को न्योते पर एतराज जता मनमोहन सरकार को सलाह दी- कसाब और अफजल को भी मोहाली का मैच दिखाओ। यों क्रिकेट और राजनीति का गठजोड़ कोई नई बात नहीं। पिछले वल्र्ड कप से जब अपनी टीम फिसड्डी बनकर लौटी थी। तो देश का नजारा छोडि़ए, अपने सांसद आग-बबूला हो गए थे। इसी वल्र्ड कप से पहले दक्षिण अफ्रीका में अपनी टीम पिटी थी। तो अपने सांसद ऐसे उखड़े, तबके कोच ग्रेग चैपल ने सांसदों को अपने काम पर ध्यान देने की नसीहत तक दे डाली थी। इतना ही नहीं, इस बार की तरह पिछले वल्र्ड कप में भी सरकार क्रिकेट के रंग में सराबोर थी। आम आदमी के लिए भले सरकार फुर्ती न दिखाए। पर दूरदर्शन पर क्रिकेट का प्रसारण करवाने के लिए अध्यादेश तक ले आई थी। आम आदमी को चाहे रोटी-पानी मिले, न मिले, क्रिकेट जरूर देखें। अपने लोगों की सोच भी अजीब हो गई। कभी सिर पर ऐसे बिठाएंगे, मानो भगवान हों। पर टीम एकाध मैच हारी नहीं कि दुआ मांगने वाले हाथ पुतले फूंकने लगते। पिछले वल्र्ड कप के वक्त तो प्रशंसकों ने टीम इंडिया की अर्थी तक निकाल दी थी। क्रिकेट टीम के प्रदर्शन की फिक्र सबको होती। देश में आतंकवादी हमले हो जाएं। अपने जवान आतंकियों का मुकाबला करते शहीद हो जाएं। किसानों पर लाठियां भांजी जाएं। महिलाओं-बच्चों का शोषण हो। तो आंखों में आंसू ढूंढे नहीं मिलते। अब तो बापू की जयंती हो या पुण्यतिथि, रस्म अदायगी भर रह गई। पर सचिन, धौनी, सहवाग, युवराज सस्ते में आउट हो जाएं, तो लोगों को खाना हजम नहीं होता। क्रिकेट अब धर्म बन गया। ओलंपिक के जन्मदाता पियरे द कुबर्तिन ने कहा था- खेल में एक की हार, दूसरे की जीत तय। सो खेल को खेल भावना से खेलना चाहिए। पर क्रिकेट के मामले में यह कितना सच? भारत-पाक का सेमीफाइनल ही लो, ऐसा लग रहा, मानो मोहाली में जंग होने जा रही। आखिर ऐसा क्यों न हो, जब खुद पीएम क्रिकेट को कूटनीति से जोड़ रहे। सचमुच क्रिकेट को देश ने जितना प्यार दिया, राष्ट्रीय खेल हाकी को उतनी ही दुत्कार मिली। हाकी खिलाड़ी जब राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार लेने दिल्ली पहुंचते, तो उन्हें पहाडग़ंज के सस्ते होटलों में ठहराया जाता। पर अगर क्रिकेटर आ जाएं, तो मौर्या-ताज से नीचे बात नहीं होती। हाकी खिलाड़ी साधारण टेक्सी में राष्ट्रपति भवन पहुंचते। तो अपने क्रिकेटर्स या तो महंगी कार में जाएंगे, या कुछ तो ऐसे जो पद्म पुरस्कार लेने राष्ट्रपति भवन पहुंचना अपनी शान के खिलाफ समझते। उन दोनों खिलाडिय़ों का नाम वल्र्ड कप के बाद याद दिलाएंगे। पर वजह बता दें, वे दोनों खिलाड़ी राष्ट्रपति भवन इसलिए नहीं गए, क्योंकि विज्ञापन की शूटिंग में व्यस्त थे। सो अल्पसंख्यक कल्याण के लिए जस्टिस सच्चर कमेटी की पैरोकार कांग्रेस और सरकार को अपनी एक सलाह- क्यों न हाकी के लिए भी कोई जस्टिस सच्चर कमेटी गठित करे। पर हाकी नहीं, बात क्रिकेट की। सिर पर ऐसा जुनून चढ़ा हुआ, टीवी खोलो या अखबार। या फिर किसी दफ्तर में घुस जाओ, आपको यही लगेगा- देश में कोई और गम नहीं सिवा क्रिकेट के। क्रिकेट, बालीवुड और अंडरवल्र्ड का रिश्ता किसी से छुपा नहीं। तभी तो काला धन जमा करने वालों पर कभी नकेल नहीं कसी। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने पूछ ही लिया- सरकार की जांच सिर्फ हसन अली तक ही सीमित। यह तो सिर्फ एक ही व्यक्ति, बाकी कहां हैं? कोर्ट ने सीधा सवाल उठाया- जांच एजेंसियां 2008 से क्यों सोई हुई थीं। तब कार्रवाई क्यों की, जब हमने पहल की। अगर रिट याचिका दायर न होती, तो कुछ नहीं होता। अब कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद कांग्रेसी क्या कहेंगे? जो अब तक दावा कर रहे थे- काले धन पर जो भी जानकारी जुटाई, हमने जुटाई, एनडीए ने नहीं। पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की बदनीयती से परदा हटा दिया। साफ हो गया- काला धन हो या राजा का बाजा बजना, सब सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता से हुआ। वरना अपनी सरकार तो क्रिकेट का लीग मैच ही खेल रही थी। कोर्ट ने जब, जिसका नाम लिया, उस पर कार्रवाई कर दी। मोहाली जैसा कोई कड़ा मुकाबला नहीं करती। &lt;br /&gt;
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28/03/2011 &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3803048891423223924-1645519976643318400?l=santoshindiagatese.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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सही मायने में कॉमनवेल्थ घोटाले की जांच में जुटीं कंपनियां अब आयोजकों को मैडल थमा रहीं। सो सच से परदा उठ गया, पर क्या कांग्रेस सच का सामना करेगी? यों जब लोकायुक्त की सिफारिश के बाद दिल्ली का एक मंत्री राजकुमार चौहान तक नहीं हटाया गया। तो सीएम शीला को हटाने की उम्मीद कांग्रेस से कैसे की जा सकती? पर आखिरी दिन सिर्फ शुंगलू रपट नहीं, विकीलिक्स ने भी एक नया धमाका किया। देश की एकता और अक्षुण्णता शपथ लेने वाले केंद्रीय मंत्री कैसी सोच रखते, साफ हो गया। गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने अमेरिकी अधिकारियों से बातचीत में कहा था- अगर उत्तर भारत न होता, तो हमारा देश तेजी से विकास करता। यानी चिदंबरम बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के सगे निकले। पर चिदंबरम भूल गए, जिस राज्य से वह खुद आते, वहीं से घोटालों के महाराजा ए. राजा भी आते। पर नेताओं में यही कमी, कभी अपने गिरेबां में नहीं झांकते। चिदंबरम की ऐसी सोच कोई नई नहीं। कॉमनवेल्थ से पहले भी दिल्ली वालों को डंडे के जोर पर सुधारने का दंभ भर चुके। सो संसद में चिदंबरम खास तौर से लालू-मुलायम का निशाना बने। चिदंबरम के इस्तीफे की मांग हुई। पर बीजेपी ने सिर्फ एतराज जता चिदंबरम को बख्श दिया। सो सत्र के समापन पर दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने संतोष जताया। कहा- शीत सत्र के मुकाबले बजट सत्र में कुछ तो काम हुआ। पर सरकार और विपक्ष जमकर अपनी पीठ ठोक रहीं। सत्र समापन के बाद सुषमा, जेतली ने चार अहम सफलताएं गिनाईं। जिनमें जेपीसी का गठन, सीवीसी थॉमस का मामला, जनहित के मुद्दे और आक्रामकता के साथ-साथ विपक्ष की सकारात्मक सोच भी शामिल। सुषमा बोलीं- बजट सत्र में सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, जनहित के मुद्दे भी खूब उठे। जैसे सोमालिया लुटेरे, अमेरिका ट्राइवेली यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्रों के पैरों में रेडियो कॉलर, तमिल मछुआरों की सुरक्षा आदि। पर क्या चुनाव की खातिर सिकुड़े संसद सत्र से सचमुच जनता का भला हुआ? संसद में हंगामा हुआ, बहस भी हुई। पर निचोड़ क्या निकला? विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की। फिर वोट के बदले नोट कांड की बहस में पीएम की खरी-खरी सुननी पड़ी। पर अगले दिन ही पेंशन बिल पेश करने में घिरी सरकार को बचा लिया। अब सत्र निपट गया। तो अरुण जेतली ने भड़ास निकाली। पीएम ने कहा था- आडवाणी पीएम पद पर जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे। इसलिए वह मुझे माफ नहीं कर पा रहे। पर अब जेतली ने चुटकी ली- मनमोहन का बयान कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना। जेतली के मुताबिक पीएम ने भले आडवाणी का नाम लिया। पर उनका इशारा गांधी-नेहरू खानदान की ओर था। सो जेतली की चतुर चाल से संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल सोच में पड़ गए। खीझते हुए बोले- जेतली ही जानें, वह क्या कहना चाहते हैं। यानी समझ कर भी बंसल ने नासमझी का ढोंग रचा। पर पक्ष-विपक्ष की तू-तू, मैं-मैं तो चलती रहेगी। सो बात संसद सत्र से मिले संदेश की। भ्रष्टाचार के मुद्दे के साथ सत्र की शुरुआत हुई। आखिर जेपीसी का गठन हो गया। पर समूचे सत्र से भ्रष्टाचार पर देश को कोई कठोर संदेश नहीं मिला। अलबत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सब एक-दूसरे का अतीत खंगालने और कपड़े उतारने में ही लगे रहे। अपने-अपने वोट बैंक को ध्यान में रख सबने मुद्दे उठाने की कोशिश की। आखिर में जेपीसी बनाम पीएसी जंग छिडऩे की नौबत। यानी फिर वही पुराने सवाल- संसद की प्रासंगिकता क्या रह गई। संसदीय मूल्यों में लगातार गिरावट, पर किसी को फिक्र नहीं। &lt;br /&gt;
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ऐसे नेताओं को तो चुनाव प्रचार में सेंटर फ्रैश च्वइंगम खिलाकर भेजना चाहिए। ताकि जुबान बंद रख सकें। चुनावी चोंचलेबाजी ने ही अपने राजस्थान में चार बार गुर्जर आंदोलन करा दिए। पर नेताओं की जुबां है कि मानती नहीं। अब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे। तो गुरुवार को तमिलनाडु के दोनों बड़े दलों ने चुनावी वायदे किए। करुणानिधि ने कालेज के पहले वर्ष के छात्रों को लेपटॉप देने का बात की। तो जयललिता ने 11वीं क्लास में ही लेपटॉप का वादा कर दिया। मुफ्त पंखे, मिक्सर, ग्राइंडर और गरीबों को मिनरल वाटर देने का भी वादा। जयललिता ने भले खुद शादी नहीं की। पर सत्ता में आईं, तो गरीब महिला मतदाताओं को चार ग्राम सोने का मंगल सूत्र देंगी। करुणा-जया ने और भी कई वादे किए। पर क्या ऐसे वादे वोट को खरीदने की कोशिश नहीं? अपनी नजर में यह न सिर्फ वोट खरीदना, अलबत्ता गरीबी और लोकतंत्र से भद्दा मजाक। पिछले चुनाव में करुणा ने कलर टीवी का वादा किया। सत्ता में आकर टीवी तो बंटवाया। पर गरीबों ने टीवी लेकर वापस दुकान में सस्ते दाम पर बेच दिए। क्योंकि उनके पास केबल के पैसे नहीं, बिजली उपलब्ध नहीं। सो टीवी रख अपनी गरीबी का उपहास क्यों बनाएं। अब जब लोकतंत्र के मंदिर में सांसद-विधायक बिकने लगे। तो वोटर को खरीदने की कोशिश क्यों नहीं होगी। चुनाव सुधार की बातें तो खूब होतीं। पर जो बात सभी राजनीतिक दलों को नुकसान पहुंचाए, उसे लागू ही नहीं करते। सनद रहे, सो बताते जाएं। राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार के वक्त विधि मंत्री दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में चुनाव सुधार कमेटी बनी थी। मई 1990 में गोस्वामी कमेटी ने करीब तीन दर्जन से अधिक सुझाव दिए। पर उनमें से दो दर्जन सिफारिशें कभी लागू नहीं हुईं। इन्हीं सिफारिशों में एक थी- सभी चुनावी मुद्दों की जांच के लिए संसद की स्थायी समिति गठित हो। पर राजनीतिक दलों ने इस सुझाव को ठंडे बस्ते में डाल दिया। सो अब मंगल सूत्र भी चुनावी हो गया। गरीब को मिनरल वाटर का सपना दिखाया जा रहा। पर किसको कोसें और किसकी सराहना करें। राज्य से केंद्र तक सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे। भ्रष्टाचार, महंगाई राजनीति का मुद्दा बनकर रह गईं। गुरुवार को टू-जी घोटाले पर बनी जेपीसी की पहली मीटिंग हुई। तो अध्यक्ष पी.सी. चाको ने वही कहा, जो जेपीसी गठन के वक्त कांग्रेस दबी जुबान से कह रही थी। यानी जेपीसी में बीजेपी कोटे से पूर्व मंत्री यशवंत-जसवंत-हरेन पाठक को लेकर एतराज। अब चाको लोकसभा स्पीकर से मिल इन तीनों को हटाने की मांग करेंगे। कांग्रेस तो तभी मांग करने वाली थी। पर सीवीसी थॉमस के मुद्दे ने मजबूर कर दिया था। कांग्रेस को डर, जेपीसी में बीजेपी के दबंगों के सामने अपने मेंबर दब्बू न रह जाएं। पर कांग्रेस तो नहीं, अब जेपीसी के मुखिया चाको ने वही बात की। लगे हाथ मुरली मनोहर की रहनुमाई वाली पीएसी को दायरे में रखने की भी मांग होगी। सो मुश्किल में कांग्रेस। जिस पीएसी और जोशी की सराहना करते नहीं थकती थी, अब क्या कहेगी? चाको की दलील- संसद की दो कमेटी एक ही जांच नहीं कर सकतीं। यानी अब संसदीय कमेटी में सिविल वार की नौबत। संसद में कमेटियां भिड़ रहीं, तो चुनावी मैदान में नेताओं की चोंचलेबाजी चालू आहे। &lt;br /&gt;
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24/03/2011&lt;br /&gt;
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जिन विपक्षी सांसदों ने पलटूराम की उपाधि धारण की, क्या यों ही? गुरुदास दासगुप्त ने तो साफ कहा- संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व घटना, जब विश्वास मत के दौरान विपक्ष के कई सांसद गैर-हाजिर रहे। शरद यादव ने भी कहा- अखबार ने क्या लिखा, उस पर नहीं जाऊंगा। पर जिस तरह से 19 सांसदों ने पाला बदला था, मैंने अपनी आंखों से देखा। मेरी पार्टी के भी दो सांसद थे। जिनमें एक धन के लालच में, तो दूसरा टिकट के लालच में पलटी मार गया। सो बहुमत के लिए नोट का खेल हुआ, इसे कोई दिल से इनकार नहीं कर सकता। सो बहस के दौरान सुषमा स्वराज ने मनमोहन पर खूब तीर चलाए। बोलीं- पीएम अपनी भलमनसाहत का सहारा लेकर दूसरों पर ठीकरा फोड़ते हैं। देश में महंगाई, तो शरद पवार, कॉमनवेल्थ घोटाला, तो कलमाड़ी, टू-जी घोटाला, तो राजा जिम्मेदार। और जहां कुछ नहीं पता, वहां गठबंधन की मजबूरी। सो अब पीएम के बहानों से जनता तंग आ चुकी। अब लोग पूछ रहे- पीएम पद पर बने रहने की क्या मजबूरी है? सुषमा ने शायराना अंदाज में पीएम के जमीर को ललकारा। बोलीं- न इधर-उधर की तू बात कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा? हमें रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है। पर पीएम ने बुधवार को भी नया पेंतरा ढूंढ लिया। विपक्ष ने संसदीय जांच रपट के आधार पर झूठा बताया, तो पीएम ने बुधवार को इसका ठीकरा पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के सिर फोड़ दिया। बोले- जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद 16 दिसंबर 2008 को सदन में सोमनाथ ने जो बात कही, मैंने वही कहा। पर पीएम ने चतुराई दिखाई। सुषमा ने पीएम पर तीर चलाए थे। तो पीएम ने सीधे आडवाणी की दुखती रग पर हाथ रख दिया। बोले- आडवाणी को विश्वास था कि पीएम बनना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। सो उन ने मुझे इस बात के लिए कभी माफ नहीं किया कि मैं पीएम हूं। आखिर में सुषमा की शायरी पर पीएम ने भी शे‘र मारा- माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतजार तो देख। पर शे‘र-ओ-शायरी के बीच समूची बहस का निचोड़ क्या निकला। मुद्दे वहीं रह गए। यानी शे‘रबाजी में लोकतंत्र को गीदड़ बना दिया। &lt;br /&gt;
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मंगलवार को वित्त विधेयक पर चर्चा शुरू हो गई। विकीलिक्स के खुलासे पर बहस इसके बाद ही होगी। यानी संसद में पक्ष-विपक्ष की लड़ाई अब सिर्फ प्रतिष्ठा से जुडक़र रह गई। हर मुद्दे पर दोनों के बीच प्रतिष्ठा आड़े आ जाती। पर बात विकीलिक्स की। तो मुश्किल में बीजेपी। एटमी डील पर बीजेपी के दोहरेपन का खुलासा हुआ। तो अब विकीलिक्स ने गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी को लेकर अमेरिका के दोहरेपन को जगजाहिर कर दिया। जब यूपीए की ताजा-ताजा सरकार बनी थी। अपने नटवर सिंह टीम मनमोहन के विदेश मंत्री हुआ करते थे। तब प्रवासी गुजरातियों के कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी को बतौर चीफ गेस्ट जाना था। पर अमेरिका ने नरेंद्र मोदी को न तो कूटनीतिक वीजा दिया, ना ही निजी। गुजरात दंगे की छाप को अमेरिका ने वीजा न देने का आधार बनाया। तब कांग्रेस दो घंटे तक ऊहापोह में रही। संसद का सत्र चल रहा था। पर सरकार सोच नहीं पा रही थी, मोदी का बचाव करे या अमेरिका का विरोध। सरकार की ऊहापोह ने विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया। तब जाकर होश में लौटी मनमोहन सरकार ने अमेरिका के सामने विरोध जताया। क्योंकि सवाल नरेंद्र मोदी का नहीं, भारत के एक प्रांत के निर्वाचित सीएम के अपमान से जुड़ा था। पर अपनी राजनीति की यही विडंबना, हर मामले में वोट बैंक जुड़ जाता। अब जिस अमेरिका ने मोदी को वीजा नहीं दिया था। वही अमेरिका कितना डरा-डरा सा था, इसका खुलासा विकीलिक्स के जरिए हो गया। बाकायदा अमेरिका ने मोदी की जासूसी कराई। मोदी के ताकतवर होने का अहसास हुआ। सो दूतावास के जरिए संबंध सुधारने की कोशिशें होने लगीं। यानी आज लीबिया पर हमला हो या अमेरिका के अन्य कथित मानवीय कदम, सब महज दिखावा। सही मायने में अमेरिका किसी का सगा नहीं हो सकता। सो मंगलवार को मोदी ने अमेरिका पर पलटवार किया। विकीलिक्स की रपट को प्रामाणिक बताया। अब चाहे जो भी हो, मोदी का कद एक बार फिर बीजेपी के अन्य नेताओं से ऊपर हो गया। पर बीजेपी की मुश्किल- विकीलिक्स की एक रपट को सही माने, तो दूसरी को झुठलाए कैसे? सो एटमी डील पर बीजेपी के डबल स्टैंडर्ड की भी पुष्टि मानकर चलिए। वैसे बीजेपी की अंदरूनी खींचतान अभी भी कम नहीं। संसद के दोनों सदनों के नेताओं में सरकार को घेरने की होड़ मची रहती। पर आजकल सुषमा स्वराज को सत्तापक्ष से मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा। जब भी कुछ बोलने को खड़ी होतीं, बिना मुंह खोले की कांग्रेसी प्वाइंट ऑफ आर्डर उठा देते। हंगामा शुरू हो जाता। सो पिछले हफ्ते और अब मंगलवार को भी सुषमा के लिए आडवाणी को बैटिंग करनी पड़ी। बोले- जब भी नेता विपक्ष खड़ी होती हैं, ट्रेजरी बैंच से रोकने की कोशिश की जाती है। सरकार यह भूल रही, विपक्ष के नेता को बोलने से रोकने का खामियाजा समूचे शीत सत्र के ठप होने के तौर पर भुगत चुकी। अब आडवाणी की इस दलील का मतलब आप खुद निकालें। पर लोकतंत्र में विपक्ष का मतलब सिर्फ विरोध करना ही नहीं। विपक्ष हर मुद्दे पर सदन को बंधक नहीं बना सकता। अब विपक्ष की वित्त विधेयक से गैरहाजिरी को क्या कहेंगे आप? प्रणव दा ने एयर कंडीशंड अस्पताल में इलाज से सर्विस टेक्स वापस ले राहत तो दी। पर लीबिया संकट के मद्देनजर महंगाई रूपी आफत के बादल मंडरा दिए। जल्द पेट्रोल-डीजल के दाम बढऩे का इशारा कर दिया। पर लीबिया के खिलाफ हो रहे अमेरिकी हमले की निंदा का प्रस्ताव लाने को राजी नहीं। सो कुल मिलाकर पक्ष-विपक्ष की प्रतिष्ठा की लड़ाई में पिस रहा बेचारा आम आदमी। &lt;br /&gt;
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यों सत्ता में बीजेपी हो या कांग्रेस, अमेरिका के आगे दुम हिलाती रहीं। सो जब डील पर बीजेपी के भीतर चिक-चिक हो रही थी, तभी साफ हो गया था। बीजेपी सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रही। सो अब वोट के बदले नोट कांड के पूर्व की परिस्थितियां देखें, तो कहीं न कहीं बीजेपी भी जिम्मेदार। बीजेपी डील की पैरोकार थी। अगर दिखावे का विरोध न करती। तो न नौ मन तेल होता, न राधा नाचती। शायद न सरकार संकट में आती, न बहुमत का भोंडा प्रदर्शन होता। पर कहते हैं ना- राजनीति, प्यार और जंग में सबकुछ जायज। अब बीजेपी की राजनीति की तो पोल खुल गई। सो बात कांग्रेस और तृणमूल के बीच ‘प्यार’ भरे रिश्ते की। कांग्रेस ने बंगाल में तमिलनाडु दोहराने की कोशिश की। पर आखिर में बिलबिलाती नजर आई। यों कांग्रेस के लिए सुखद संदेश यही रहा- न तमिलनाडु में गठबंधन टूटा, न बंगाल में दरका। पर तमिलनाडु में कांग्रेस ने करुणा को करुण कर दिया। तो बंगाल में ममता की ‘ममता’ पर ही निर्भर रहना पड़ा। तमिलनाडु में कांग्रेस ने अपनी मांग 48 से बढ़ाते-बढ़ाते 63 सीट तक कर दीं। ना-नुकर करते-करते करुणानिधि को भी मानना पड़ा। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच की आंच में डीएमके को झुलसा कांग्रेस ने मंशा पूरी की। पर बंगाल में ममता के राजनीतिक पेच ने कांग्रेस को पंक्चर कर दिया। कांग्रेस ने ममता से पहले 98 सीट मांगी। तो ममता ने 45 से गिनती शुरू की। फिर कांग्रेस 75 पर आई, तो ममता भी 50 पर आईं। फिर 60 और आखिर में 64 की लकीर खींच ममता ने बिना कांग्रेस की बाट जोहे अपने 228 उम्मीदवारों का एलान कर दिया। कांग्रेस के लिए 64 और दो सीट एसयूसीआई के लिए छोड़ दीं। सो कांग्रेस के लिए अब काटो तो खून नहीं। कांग्रेस की प्रतिष्ठा धूल धूसरित हो गई। सो कई राउंड की बातचीत के बाद ममता महज कांग्रेसी चेहरे से धूल झाडऩे को तैयार हुईं। आखिर में एक और सीट थमा कांग्रेस को हैसियत बता दी। पर गठबंधन बच गया, तो बंगाल कांग्रेस के प्रभारी शकील अहमद बोले- यह न आत्म समर्पण, न समझौता, यह गठबंधन है। पर जो भी हो, गठबंधन के खेल में कांग्रेस का तेल निकल गया। सो अब बात असली तेल की, जिसकी खातिर अमेरिका ने मित्र देशों के साथ मिल लीबिया पर हमला बोल दिया। लीबिया में तानाशाह कर्नल गद्दाफी के खिलाफ जन आंदोलन छिड़ा हुआ। दोतरफा संघर्ष चल रहा। सो अब दुनिया के कथित दादागण अपनी दादागिरी पर उतर आए। गद्दाफी के ठिकानों समेत कई जगहों पर हवाई हमले शुरू हो गए। पर सवाल- दुनिया के दादाओं को यह लाइसेंस किसने दिया? इराक में रासायनिक हथियार के नाम पर हमला बोला। इराक को नेस्तनाबूद कर दिया। पर रासायनिक हथियार का रा भी नहीं मिला। अब इराक के तेल के कुएं से अमेरिका और मित्र देशों की कंपनियां मालामाल हो रहीं। अगर सचमुच अमेरिका एंड कंपनी लोकतंत्र की पैरोकार, तो क्या हवाई हमले के सिवा कोई और विकल्प नहीं? हवाई हमले में शिकार हो रहे निर्दोष नागरिकों की जिम्मेदारी कौन लेगा? अपने भारत और पड़ोसी चीन ने हमले पर खेद जताया। हिंसा छोडऩे की अपील की। पर सिर्फ घरेलू राजनीति में ही दिखावा नहीं। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी दिखावे हो रहे। भारत कभी ईरान का पैरोकार रहा। अमेरिका ने घुडक़ी दी, तो विरोध किया। अब तो अमेरिका के हर कदम में भारत साथ दे रहा। पर मौका देख कभी परदे के पीछे, तो कभी सामने आ जाता। सो बात अमेरिका और सहयोगी देशों की, तो आप इतिहास पलट कर देख लो। कभी इन देशों के इरादे नेक नहीं रहे। लीबिया पर हमला भी लोकतंत्र लाना नहीं, अलबत्ता तेल के कुएं पर कब्जा जमाना। &lt;br /&gt;
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अपनी पार्टी के पलटूराम क्यों बने? नेताओं से नि:स्वार्थ काम करने की उम्मीद तो कतई नहीं की जा सकती। अठन्नी-चवन्नी में बिकने वाले सांसद मुफ्त में मनमोहन सरकार तो नहीं बचाएंगे। अब जरा पीएम की सफाई का मतलब भी देख लो। इंडिया टुडे कान्क्लेव में पीएम ने किसी को अधिकृत न करने वाली दलील दी। तो सवाल- क्या ऐसे काम के लिए पीएम अपने लैटर हैड पर किसी को अधिकृत करेंगे? पीएम ने संसद में सफाई दी, तो कांग्रेस और सरकार की ओर से ऐसे गैर-कानूनी काम को नकारा। पर पीएम ने यह नहीं कहा- विश्वास मत के लिए सांसदों की कोई खरीद-फरोख्त नहीं हुई। सो नोट के बदले वोट कांड का भूत तीन साल बाद आया या तीस साल बाद आए, कांग्रेस कभी कबूल नहीं करेगी। सो पीएम के बयान पर लोकसभा में सुषमा स्वराज ने स्पष्टीकरण की अनुमति मांगी। तो स्पीकर ने ठुकरा दिया। पर राज्यसभा में सभापति हामिद अंसारी ने सचमुच इतिहास बना दिया। राज्यसभा में मंत्री या पीएम के बयान पर स्पष्टीकरण मांगने की परंपरा। पर शुक्रवार को पीएम के बयान के बाद अंसारी ने अनुमति नहीं दी। तो विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया। सो अंसारी ने चौंकाने वाली दलील दी। बोले- चूंकि पीएम ने स्वत: बयान नहीं दिया, अलबत्ता विपक्ष की मांग पर दिया। सो रूल 251 के तहत स्पष्टीकरण नहीं मांगा जा सकता। उन ने अपनी व्यवस्था को पुष्ट करने के लिए 24 अप्रैल 1987 की एक रूलिंग भी परोस दी। यह रूलिंग किस मुद्दे पर आई थी, आप सुनते जाओ। बोफोर्स घोटाले पर तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने बयान दिया। विपक्ष ने स्पष्टीकरण मांगा, तो तत्कालीन&amp;nbsp; सभापति शंकरदयाल शर्मा ने यह कहते हुए स्पष्टीकरण की अनुमति नहीं दी कि अगले दिन इस मुद्दे पर विस्तृत बहस होनी है। सो विपक्ष ने दोनों सदनों में पीएम के बयान पर बहस का नोटिस थमा दिया। पर सीताराम येचुरी ने तो तभी चुटकी ली- 24 साल पीछे की रूलिंग लागू करने के बजाए पिछले हफ्ते अपनाई गई परंपरा का अनुसरण क्यों नहीं करते? पर सभापति नहीं माने। सरकार ने भी ठान ली थी, सो पवन बंसल बोले- विपक्ष की हर बात नहीं मानेंगे। यानी जो बात मुफीद, वही बात मानेगी सरकार। पर सवाल- जब मनमोहन को भरोसा, जुलाई 2008 में कुछ गलत नहीं किया। तो विपक्ष के सवालों का जवाब देने में संकोच कैसा? संसद में आकर बयान पढ़ दिया और चलते बने, यह कैसी परंपरा? अपनी संसद में यही देखने को मिलता। सभी दलों के सांसद बोलते, आखिर में मंत्री जवाब देता और कथा समाप्त हो जाती। मनमोहन ने भी शुक्रवार को वही किया। बोले- नोट के बदले वोट कांड में संसदीय जांच कमेटी को भी निष्कर्ष तक पहुंचने वाले सबूत नहीं मिले। विपक्ष भूल गया, चुनाव में जनता ने क्या जवाब दिया। जिस 14वीं लोकसभा में बीजेपी के 138 सांसद थे, 15वीं में घटकर 116 रह गए। लेफ्ट भी 59 से घटकर 24 पर अटक गया। सिर्फ कांग्रेस की सीटें 145 से बढक़र 206 हो गईं। अब इस दलील में सचमुच कोई तर्क या सिर्फ घमंड, आप ही तय करिए। अगर चुनाव जीतने से घूसखोरी, भ्रष्टाचार और अपराध को छूट मिलने लगे, तो फिर मनमोहन चुनाव सुधार की बात क्यों कर रहे? लालू, मुलायम, शिबू, माया, मुख्तार अंसारी, शहाबुद्दीन, ए. राजा जैसे लोग भी चुनाव जीत चुके। मनमोहन फार्मूले के मुताबिक तो इन्हें भी मुकदमेबाजी से मुक्त कर देना चाहिए। क्या सत्ता में आने का मतलब, सरकार कुछ भी कर सकती? अब होली के इस मौके पर संसद में हुड़दंग तो जारी। पर होलिका दहन से ठीक पहले मनमोहन सरकार ने नैतिकता का दहन कर दिया। &lt;br /&gt;
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भले सबूत न हों, पर इसमें कोई शक नहीं कि विश्वास मत के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त हुई। सदस्यता और निष्ठा को दांव पर लगाकर 19 सांसदों ने यों ही पाला नहीं बदला होगा। क्रॉस वोटिंग करने वाले गैर कांग्रेसी दलों के सांसद 15वीं लोकसभा में कांग्रेसी टिकट पर चुनकर आए। भ्रष्टाचार पर कांग्रेस के डीएनए का एक और नमूना देखिए। सिर्फ वोट के बदले नोट कांड ही नहीं, सवाल के बदले घूस कांड में लोकसभा से बर्खास्त तबके बसपाई सांसद राजा रामपाल 15वीं लोकसभा में कांग्रेस के सांसद हैं। सो राजनीति बेहयाईपन की कोई सीमा रेखा नहीं। जिस चौदहवीं लोकसभा के विश्वासमत पर पंद्रहवीं लोकसभा में हंगामा बरपा। उस 14वीं लोकसभा में सबसे अधिक बीजेपी के सांसद भ्रष्ट थे। ऑपरेशन दुर्योधन, चक्रव्यूह, वोट के बदले नोट तक बीजेपी के कुल सांसद धरे गए। यानी उस लोकसभा में बीजेपी के कुल 138 सांसद से गुणा-भाग करें, तो औसतन बीजेपी का हर नौवां सांसद भ्रष्ट था। सो वोट के बदले नोट कांड के बाद आडवाणी ने ठोक-बजाकर उम्मीदवार उतारने का एलान किया। बीजेपी ने अपनी चुनाव समिति की मीटिंग टाल नए मापदंड तय किए- अब जिताऊ से अधिक टिकाऊ को अहमियत देंगे। ताकि चुनकर आने के बाद सांसद बिकाऊ न बनें। सचमुच कोई मजबूत विपक्ष होता, तो सर्कस बन चुकी मनमोहन सरकार का तख्ता पलट चुका होता। पर लोकसभा चुनाव के वक्त बीजेपी अंदरूनी कलह की शिकार रही। अध्यक्ष और पोल मैनेजर खुलेआम लड़ते रहे। सो भ्रष्टाचार, आतंकवाद और महंगाई जैसे तमाम मुद्दों के बावजूद मनमोहन सरकार सत्ता में वापस लौटी। विपक्ष न तो विकल्प के तौर पर मैदान में खड़ा हो सका और ना ही मनमोहन सरकार को घेर सका। सो कांग्रेस न सिर्फ सत्ता में लौटी, अलबत्ता मजबूत होकर लौटी। पर विपक्ष की कमजोरी ने कांग्रेस की जीत में नशा घोल दिया। सो सत्ता के नशे में गलतियों का पहाड़ खड़ा हो गया। कांग्रेस को इल्म तब हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने हथौड़ा मारा। अब विकीलिक्स के ताजा खुलासे पर कांग्रेस और प्रणव दा की दलील देखिए। चूंकि यह मामला 14वीं लोकसभा का, सो 15वीं लोकसभा में डिस्कस नहीं हो सकता। मौजूदा सरकार सिर्फ 15वीं लोकसभा के लिए जिम्मेदार, 14वीं के लिए नहीं। प्रणव दा ने खुलासे की न पुष्टि की, न खंडन किया। पर इसके लिए भी दलील देखिए- दूतावास को राजनयिक संरक्षण हासिल, सो सरकार के लिए पुष्टि या खंडन करना संभव नहीं। पर विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने पलटवार किया। बोले- चूंकि यह अपराध भारत में हुआ, इसमें भारतीय शामिल थे। सो राजनयिक छूट का मुद्दा नहीं उठता। जेतली और प्रणव दा के बीच जमकर तकरार हुई। पर क्या 14वीं के चांद पर लगा यह दाग नहीं धुलेगा? भले अजित सिंह की पार्टी के सांसदों ने सरकार के खिलाफ वोट दिया हो। पर पैसे के लेन-देन से अभी इनकार नहीं। लोकसभा में 22 जुलाई 2008 को चार बजकर चार मिनट पर बीजेपी के तीन सांसद अशोक अर्गल, महावीर भगोरा और फग्गन सिंह कुलस्ते ने अमर सिंह एंड कंपनी की ओर से दिए गए एक करोड़ के नोटों की गड्डियां सदन में लहराईं। बाद में संसद की जांच कमेटी बनी, तो नोट लहराने वाले ही अपराधी हो गए। अमर सिंह को क्लीन चिट मिल गई। पर सवाल- पाला बदलने वाले सांसदों ने क्या नि:स्वार्थ वोट दिया? एटमी डील की खातिर मनमोहन ने साम, दाम, दंड, भेद सब लगा दिए। विश्वास मत से पहले ही गुरुदास दासगुप्त ने खुलासा किया था- 25 करोड़ में बिक रहे सांसद। &lt;br /&gt;
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लोकायुक्त के अधिकार कर्नाटक में सही, तो दिल्ली में गलत कैसे? सीएजी की रिपोर्ट जब मुफीद नहीं लगी, तो कांग्रेस ने खूब सवाल उठाए। खुद शीला लो-फ्लोर बस की खरीब के मामले में सीएजी की रिपोर्ट को कूड़ेदान में फेंकने वाली टिप्पणी कर चुकीं। कपिल सिब्बल ने तो टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को ही झुठला दिया। अब उसी घोटाले के महाराजा ए. राजा के खिलाफ 31 मार्च तक सीबीआई चार्जशीट दाखिल करने जा रही। सरकार की जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट को बता चुका- इस घोटाले में छह देशों में हवाला के जरिए पैसे का लेन-देन हुआ। सो सिब्बल-शीला के दावों की हवा तो उनकी ही जांच एजेंसियां निकाल रहीं। अब तो जेपीसी के कांग्रेसी अध्यक्ष पी.सी. चाको भी रंग दिखाने लगे। यों जेपीसी की अभी पहली मीटिंग भी नहीं हुई। पर चाको ने मुरली मनोहर जोशी की रहनुमाई वाली पीएसी की जांच के दायरे पर सवाल उठा दिया। पर जेपीसी बनने से पहले इन्हीं चाको की कांग्रेस पीएसी की मुरीद थी। खुद मनमोहन पीएसी के सामने पेशी की पेशकश कर चुके। अब जेपीसी बन गई, तो कांग्रेस को पीएसी का दायरा बढ़ता दिख रहा। सो चाको बतौर जेपीसी अध्यक्ष कांग्रेसी रंग दिखाएंगे या सचमुच संसद का मान रखेंगे, यह आने वाला वक्त बताएगा। पर स्पेक्ट्रम घोटाले में बुधवार को एक नया मोड़ आ गया। जब ए. राजा के बेहद करीबी रहे सादिक बाशा की रहस्यमयी मौत हो गई। परिवार वालों और चेन्नई पुलिस ने सुसाइड बताया। पर परिस्थितियां ऐसीं, हत्या की साजिश से सीधे-सीधे इनकार भी नहीं किया जा सकता। सादिक बाशा की कंपनी में राजा की बीवी डायरेक्टर थीं। बाशा को राजा का फंड मैनेज करने वाला कहा जाता था। सीबीआई अब तक चार बार पूछताछ कर चुकी थी। कहा जा रहा था- राजा का कोई बेहद करीबी सीबीआई का एप्रूवर बनने वाला। यानी बाशा सरकारी गवाह बन जाता, तो राजदारों की पोल खुल जाती। सीबीआई ने बाशा को फिर पूछताछ के लिए समन किया था। पर उससे पहले ही कथित आत्महत्या ने सबको चोंका दिया। खुद सीबीआई इसे आश्चर्यजनक मौत करार दे रही। तो टू-जी घोटाले का पर्दाफाश करने वाले सुब्रहमण्यम स्वामी की दलील- बाशा की मौत से जांच प्रभावित होगी। बीजेपी ने तो सीधे-सीधे हत्या की आशंका जता दी। पर कांग्रेस की जयंती नटराजन ने सीधी टिप्पणी के बजाए बीजेपी पर चुटकी ली। बोलीं- बीजेपी कुछ अधिक जागरूक है। सो हत्या का निष्कर्ष निकाल लिया। बीजेपी को हर बात में षडयंत्र ही नजर आता। पर हम रिपोर्ट का इंतजार करेंगे। अब जयंती के जवाब का मतलब समझना मुश्किल नहीं। पर सत्तापक्ष हो या विपक्ष, किसी की हेकड़ी कम नहीं। बुधवार को गुजरात के मुद्दे पर राज्यसभा में रार ठन गई। वायब्रेंट गुजरात में हजारों करोड़ों के निवेश पर एमओयू दस्तखत हुए। गुजरात कांग्रेस की ओर से शिकायती चिट्ठी आई। तो संघीय ढांचे को अनदेखा कर आयकर विभाग के अधिकारी अनुराग शर्मा ने नोटिस भेज दिया। सो अरुण जेतली ने सरकार से जवाब मांगा। केंद्र-राज्य की इस लड़ाई में आसंदी पर बैठे सभापति हामिद अंसारी भी घेरे में आ गए। पर गुजरात के मुद्दे ने बीजेपी के अंदरूनी मतभेद को एक बार फिर सतह पर ला दिया। लोकसभा में यह मुद्दा एक सैकिंड के लिए भी नहीं उठा। &lt;br /&gt;
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अब कोई और सवाल उठाता, तो हम भी नहीं पूछते। पर सवाल रामदास अग्रवाल ने उठाया। सो गुर्जर आंदोलन के वक्त भाई रामदास की रामधुन भी याद दिलाते जाएं। जब राजस्थान में पहली बार गुर्जर अपने हक की लड़ाई के लिए रेलवे ट्रेक पर बैठे। तो बीजेपी की सरकार थी। गुर्जरों पर गोलियां चलाई गईं। तो सबसे पहले बीजेपी के साहिब सिंह वर्मा ने आलोचना की। अपनी बेबाकी के लिए पहचाने जाने वाले उन्हीं दिवंगत वर्मा की मंगलवार को ही जयंती भी। पर बात रामदास की। उस वक्त राजस्थान की सीएम ने गुर्जरों को धमकी देते हुए कहा था- एनफ इज एनफ। सो अपना मानना यही, शीशे के घरों में रहने वालों को दूसरे घर पर पत्थर नहीं फैंकना चाहिए। आंदोलन कांग्रेस राज में हो या बीजेपी के राज में या फिर माया-मुलायम के राज में। ऐसे आंदोलनों को जायज नहीं ठहराया जा सकता। आठ करोड़ लोग अपने निजी हक के लिए 125 करोड़ लोगों को परेशान नहीं कर सकते। आम मुसाफिर आंदोलन की मार झेल रहा। परदेस में काम करने वाले लोग आंदोलन की वजह से होली के त्योहार पर भी अपने घर नहीं जा पा रहे। हर बार आंदोलन के लिए सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता। पर सवाल- फिर उसी सरकार से अपने हित की मांग क्यों करते? दूसरों की आजादी में खलल डालने वाले आंदोलन को आंदोलन नहीं कहा जा सकता। जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अहिंसक रास्तों से देश को आजादी दिला सकते। जापान जैसा देश एटमी विनाश के बाद उठ कर विकसित देश बन सकता। तो अपने देश में आंदोलन की रूपरेखा जापानियों जैसी क्यों नहीं? पर अपने नेताओं को वोट बैंक की राजनीति अधिक मुफीद लगती। सो आंदोलन के वक्त विपक्ष में बैठने वाला अपने दिन भूल जाता। राजनीतिक सौहाद्र्र कफन ओढक़र बैठ जाता। सो सामाजिक सौहाद्र्र का माहौल कैसे बने? चुनावी घमासान में नेताओं की जुबान बिना ब्रेक के चलती। सो वोट बटोरने के लिए आरक्षण का सुर्रा छोड़ देते। पर सत्ता में आने पर वही सुर्रा अपने लिए मुसीबत बन जाता। अब जाट आंदोलन तेज हो गया। तो मंगलवार को सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक और गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने जाट नेताओं को बातचीत का न्योता दिया। अपनी सरकार के कान में पता नहीं कौन सी बीमारी। जो बिना आंदोलन के आवाज गूंजती ही नहीं। पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा फोन करें, तो एक की जगह दो-दो आवाज सुनाई देने लगतीं। अब अमेरिका से जुड़े नए खुलासे को ही देखो। विकीलिक्स ने खुलासा किया- अमेरिकी हित को देखते हुए यूपीए-वन में मणिशंकर अय्यर को पेट्रोलियम मंत्रालय से हटा मुरली देवड़ा को कमान दी गई। वजह बताई गई- मणिशंकर ईरान-भारत गैस पाइपलाइन के हिमायती थे। जो अमेरिका को पसंद नहीं। सो मणिशंकर को मंत्रालय से हटाया गया। पर अब मणिशंकर कह रहे- पेट्रोलियम मंत्रालय तो मुझे अस्थायी तौर पर दिया गया था। पर तबके अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड ने अपने आका को दस्तावेज भेजे। जिसमें खास तौर से उल्लेख किया गया कि पेट्रोलियम मंत्रालय में बदलाव अमेरिका-भारत के संबंधों के मद्देनजर हुआ। अब ऐसी सरकार को क्या कहेंगे? कभी कॉरपोरेट लॉबिस्ट केबिनेट मंत्री और विभाग तय करते, तो कभी अंकल सैम की खातिर विभाग बांटे जाते। सो मंगलवार को संसद के दोनों सदनों में विकीलिक्स के खुलासे पर विपक्ष ने मोर्चा खोला। अपने जसवंत सिंह ने मनमोहन सरकार की विदेश नीति को चिंताजनक बताया। तो पूर्व विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने सरकार की विदेश नीति का समर्थन करते हुए दलील दी- इसी नीति के चलते विकास दर बढ़ रही। तो क्या भारत की सरकार अब वाशिंगटन से चलेगी? परमाणुवीय जनदायित्व बिल को लेकर मानसून सत्र में कितना हंगामा बरपा था। अमेरिकी जिद के आगे मनमोहन ने विपक्ष को अनसुना सा कर दिया था। बाद में कुछ बातें मानीं, पर आज भी किसी एटमी अनहोनी की स्थिति में मुआवजे की कीमत देखिए। तो अमेरिका और भारत में 23 गुने का फर्क। तब बीजेपी के यशवंत सिन्हा ने बढिय़ा जुमला दिया था- क्या अमेरिकियों का खून खून और भारतीयों का खून पानी? सचमुच अपनी विदेश नीति लचर दिख रही। अमेरिकी शह पर पड़ोसी पाक पैंतरेबाजी करता रहता। तो दूसरा पड़ोसी चीन अपनी चालबाजियों से बाज नहीं आता। नेपाल में माओवाद पसर चुका। तो श्रीलंका से भी संबंध बेहतर नहीं। &lt;br /&gt;
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सचमुच बीजेपी को अपने गिरेबां में झांकने की जरूरत। सोमवार को संसद में सीबीआई जांच और इस्तीफे की मांग की। पर बैंगलुरु में बीजेपी के ही सीएम बी. एस. येदुरप्पा ने अपने खिलाफ लगे आरोपों पर इस्तीफा तो दूर, सीबीआई जांच से भी इनकार कर दिया। बोले- मुझे सीबीआई पर भरोसा नहीं। अब इसे बीजेपी का अंतद्र्वंद्व ना कहें, तो क्या कहें? थॉमस मसले पर बीजेपी का अंतर्विरोध जगजाहिर हो चुका। सो सोमवार को दोनों सदनों में एक जैसी रणनीति का दिखावा किया। पर क्या अंदरूनी कलह ढांपने के लिए संसद को ढाल बनाना सही? यों संसद की फिक्र किसे। सोमवार को हंगामा बंसल के मुद्दे पर हुआ। कांग्रेस-बीजेपी की भिड़ंत बीजेपी-सपा में बदल गई। कांग्रेसी तो मजे लेने लगे। पर सोमवार को सदन में जो हुआ, सचमुच लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला। बंसल अपनी सफाई के साथ-साथ सुषमा-सिद्धू को चुनौती देकर बैठ गए। पर सुषमा जवाब देने खड़ी हुईं, तो स्पीकर मीरा कुमार ने अनुमति न देकर सपा के अखिलेष यादव का नाम पुकार लिया। यों सुषमा की दलील सही। जब मंत्री ने नाम लेकर चुनौती दी। तो जवाब देने का उनका हक। वैसे भी विपक्ष का नेता बोलने को खड़ा हो। तो परंपरा यही, स्पीकर अनुमति दे देता। पर मीरा कुमार ने ऐसा नहीं किया। सो सुषमा के इशारे पर उत्तेजित बीजेपी सांसद वैल में आ गए। पर बीजेपी के हंगामे से अबके सपा वाले नाराज हो गए। यूपी की माया सरकार ने पिछले दिनों सपाइयों पर डंडे बरसाए। जेल में ठूंस दिया। सो सपाई पहले से ही बौखलाए। सदन में सपा के नीरज और धर्मेंद्र ने खुलेआम कह दिया- अब जब भी सुषमा-आडवानी बोलेंगे। हम बोलने नहीं देंगे। पर बीजेपी की जिद के बाद स्पीकर ने सुषमा को मौका दिया। तो मुलायम सिंह जैसे वरिष्ठ नेता दनदनाते हुए वैल में सुषमा के सामने खड़े हो गए। हंगामा खूब बरपा। नौबत गाली-गलौज, हाथापाई तक आ गई। सदन स्थगित होने के बाद मां-बहन की गाली-गलौज तो हुई ही। सपा के नीरज शेखर और बीजेपी के अनंत कुमार के बीच बाहर निकल कर देख लेने की चुनौतीबाजी भी हो गई। सो अब सवाल- संसद में बैठे अपने माननीय नेता कितना गिरेंगे? जापान इस कुदरती कहर के बाद भी न सिर्फ उठेगा, बल्कि और मजबूत होकर खड़ा होगा। जापान हिरोशिमा-नागासाकी विस्फोट के बाद ऐसा करके दिखा चुका। पर अपनी गिरी हुई राजनीति कब उठेगी? &lt;br /&gt;
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बजट पर हुई बहस में विपक्ष ने जोर-शोर से महंगाई, किसान, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया था। पर प्रणव दा ने यहां भी चतुराई दिखा दी। आम आदमी को तो महंगाई की मार अभी और झेलनी पड़ेगी। सो दादा ने सीधे आम आदमी की आवाज उठाने वाले नुमाइंदों के मुंह पर ‘निधि’ मार दी। प्रणव दा का ऐसा मंत्र देख सोमनाथ दादा की याद आ गई। दोनों बंगाल की राजनीति के पुरोधा। दोनों ने केंद्र की राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल किया। पर फर्क देखिए- सोमनाथ दा ने सांसद निधि में घपले का मर्ज समझ हकीम की तरह ईलाज करने की कोशिश की। भले सांसद निधि को खत्म कराने में सफल नहीं हो पाए। पर प्रणव दा ने तो मर्ज को समझकर उसे और हवा दे दी। वह भी तब, जब बिहार जैसे बेहद पिछड़े राज्य ने हाल ही में ऐतिहासिक कदम उठा विधायक निधि खत्म कर दी। नीतिश सरकार की इस पहल के बाद सांसद निधि भी खत्म होने की आस थी। पर प्रणव मुखर्जी ने उसमें ढ़ाई गुना इजाफा कर दिया। सचमुच ईमानदार आदमी हमेशा कोने में खड़ा रोता ही रहेगा, क्योंकि भ्रष्टाचार के इस मौसम में ईमानदारी किसी काम की नहीं। सांसद निधि के मामले में भ्रष्टाचार की शिकायतें कोई नई बात नहीं। ऑपरेशन दुर्योधन में पकड़े गए 11 सांसद सवाल के बदले घूसकांड में बर्खास्त हो चुके। फिर ऑपरेशन चक्रव्यूह में करीब सात सांसद फंसे थे, जो सांसद निधि में घपलेबाजी पर ही आधारित था। पर सांसद निधि के घपलेबाज सांसद चौदहवीं लोकसभा में सस्ते में छूट गए थे। सो सांसद निधि को लेकर हर बार बहस हुई। पर बहुमत सांसद इसे खत्म करने के बजाए बढ़ाने की पैरवी करते रहे। सांसद निधि को दो से पांच करोड़ करने की मांग वाजपेयी सरकार के वक्त से चली आ रही। पर तब अरुण शौरी ने भ्रष्टाचार की कथा सुना वाजपेयी को रोक लिया। अपने ही सांसद शौरी के खिलाफ खड़े हो गए। फिर भी शौरी नहीं माने। पर महंगाई, भ्रष्टाचार के भंवर में गोते लगा रही मनमोहन सरकार ने अबके एक झटके में अमलीजामा पहना दिया। यों इस निधि की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई। राम नाईक अस्सी के दशक में विधायक थे। चुनाव क्षेत्र से लोग छोटे-मोटे काम के लिए आते थे। कहीं खरंजा, कहीं सीवर, तो कही पुलिया आदि। सो राम नाईक ने मुहिम चलाई और महाराष्ट्र में निधि तय हो गई। फिर राम नाईक जब सांसद बने, तो वही मुहिम दोहरा दी। आखिर पांच साल की मेहनत ने रंग दिखाया। नरसिंह राव की सरकार ने एक करोड़ की सांसद निधि तय कर दी। शुरुआती साल में ही इसके नतीजे दिखने लगे। ठेकेदार ठेका हासिल करने के लिए सांसदों तक 15 से 20 फीसदी कमीशन पहुंचाने लगे। सो फिर निधि दो करोड़ करने की मांग हुई। और अब पूरे पांच करोड़ तय हो गए। पर क्या कमीशनखोरी बंद हो जाएगी? बीस नहीं, अगर 15 फीसदी भी कमीशन जोड़ें। तो पांच करोड़ का सालाना कमीशन हुआ पिचहत्तर लाख। यानी मासिक कमीशन छह लाख पच्चीस हजार। अब किसी सांसद को बैठे-ठाले 6.25 लाख मिले और क्षेत्र में काम भी दिखे। तो भला कौन सांसद ऐसी निधि का विरोध करेगा। यह तो सांसदों के हाल में बढ़े वेतन-भत्ते से कहीं अधिक। सो सवाल- मनमोहन सरकार ने आम आदमी को राहत देने के बजाए सांसदों को तोहफा क्यों थमाया? प्रणव दा ने खुद माना, इस बढ़ोतरी से खजाने पर 2, 370 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। अब कोई पूछे, सांसद निधि अभी नहीं बढ़ाते। तो कौन सी आफत टूट पड़ती। आज तो सबसे बड़ी जरुरत आम आदमी को महंगाई से निजात दिलाने की है। पर शुक्रवार को सरकार ने आम आदमी को महंगाई का डर दिखाया। तेल की कीमतें बढ़ाने का इशारा किया। पर सांसदों को रेवड़ी थमा दी। ताकि आम आदमी काटे घास, मलाई काटे सांसद। जैसे ब्लैक मनी के मामले में हसन अली को जमानत मिल गई। सेशन कोर्ट ने माना, जांच एजेंसी के पास पुख्ता सबूत नहीं। यानी सरकार ने जान-बूझकर कमजोर केस बनवाया। सो टू-जी मामले में भले निगरानी सुप्रीम कोर्ट की। पर तथ्य तो सीबीआई को ही जुटाना। सो होगा वही, जो मंजूर-ए-मनमोहन सरकार होगा। &lt;br /&gt;
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पीएम ने संसद में ‘हाथ’ की ऐसी सफाई दिखाई, पृथ्वी का दामन दागदार हो गया। सो हताशा में चव्हाण ने भी झूठी कथा सुना दी। कह दिया- थॉमस मुद्दे पर केरल सरकार से रिपोर्ट मांगी गई थी, पर उसमें चार्जशीट की कोई जानकारी नहीं थी। पर अब केरल के सीएम वी.एस. अच्युतानंदन ने चव्हाण को झूठा बता दिया। बोले- थॉमस पर सारी जानकारी केंद्र को भेजी थी। यानी थॉमस पर साफ-सफाई के खेल में कांग्रेस ‘सर्फ एक्सेल’ का इश्तिहार बना रही। एक दाग छुड़ाने के चक्कर में दाग पर दाग लगाए जा रही। तभी तो पीएम ने संसद में सफाई दी, तो चव्हाण पर ठीकरा फोड़ दिया। चव्हाण ने केरल सरकार पर। और अब आलाकमान से मुलाकात के बाद चव्हाण ने चुप्पी की चादर ओढ़ ली। गुरुवार को बोले- पीएम की सफाई के बाद थॉमस मामले पर अब मुझे कुछ नहीं कहना। सीवीसी के पैनल के तीन नाम की सूची तैयार करने की जिम्मेदारी मेरी थी। यानी साफ-सफाई के लपेटे में पीएम के बाद सीधे दस जनपथ पर आंच न आए। सो आज की राजनीति के ‘पृथ्वीराज चव्हाण’ ने लड़े बिना ही हथियार डाल दिए। पर पीएम की सफाई हो चव्हाण की चुप्पी, सवाल अभी बहुतेरे। माना, पीएम को कार्मिक मंत्रालय ने थॉमस के केस के बारे में जानकारी नहीं दी। पर जब मीटिंग में सुषमा स्वराज ने मुद्दा उठाया। तो पीएम ने भरोसा क्यों नहीं किया? क्या लोकतंत्र में विपक्ष की अहमियत खत्म हो गई? अगर पीएम 24 घंटे के लिए थॉमस की नियुक्ति रोक तथ्यों की जांच करवा लेते। तो कौन सी आफत टूट पड़ती? अभी भी तो सीवीसी बिना चीफ के काम कर रहा। पर सत्ता का नशा सिर चढ़ कर बोला। सो अब सुप्रीम कोर्ट के डंडे से समूची सरकार सीधी हो गई। राज्यसभा में सीताराम येचुरी ने भी एक मौजूं सवाल उठाया। पूछा- जब टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले में भी थॉमस पर सूई घूम रही थी, तो पीएम ने खुद पड़ताल क्यों नहीं कराई? इसके अलावा एक और सबसे अहम सवाल। जब तीन नामों के पैनल में सिर्फ थॉमस के नाम पर आपत्ति थी। तो पीएम ने बाकी अन्य दो नामों पर विचार क्यों नहीं किया? आखिर थॉमसाई जिद का क्या मतलब? क्या पैनल में बाकी दो नाम सिर्फ खानापूर्ति के लिए रखे गए थे? पर जैसी सरकार, वैसा ही विपक्ष। कोई मजबूत विपक्ष होता, तो ऐसे हालातों में सरकार की डोली उठ चुकी होती। पर यहां तो दोनों सदनों के नेता विपक्ष ही आपस में लड़ रहे। आडवाणी जैसे वटवृक्षी नेता अफसोस जता रहे कि आज कोई वीपी सिंह जैसा नेता नहीं। यानी विपक्ष ने खुद को कमजोर मान लिया। जबकि टू-जी हो या थॉमस जी, अब बोफोर्स से बड़ा मुद्दा बन चुकी। पर विपक्ष में इतनी ताकत ही नहीं, इसलिए किसी वीपी सिंह की बाट जोह रही। कांग्रेस भी अब हर काम डंके की चोट पर कर रही। तभी तो टूटने की कगार पर पहुंच चुके डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को बचा लिया। सीट-सीबीआई का समझौता कर कांग्रेस बाजी मार गई। सो राजनीतिक नैतिकता तो सिर्फ सुनने-सुनाने की कहानी भर। जैसे आज आडवाणी कह रहे- कोई वीपी होता, तो....। वैसा ही एक दिन आएगा, जब नई पीढ़ी को उनके बाप-दादा कहानी सुनाएंगे- राजनीति में कभी नैतिकवान नेता हुआ करते थे..। पर अफसोस, आज के नेता आईना देखने के बजाए मौजूदा समाज को कोस रहे। दिल्ली की महिला सीएम शीला तीसरा टर्म सरकार चला रही। महिला दिवस के दिन सूरज के उजाले में दिल्ली की एक लडक़ी और बुजुर्ग महिला की हत्या हो गई। पर आत्ममंथन के बजाए मैडम शीला समाजशास्त्र पढ़ा रहीं। गुरुवार को बोलीं- राधिका तंवर हत्याकांड में पुलिस के साथ-साथ समाज भी जिम्मेदार। कहने-सुनने में दलील बिल्कुल सही। पर बंदूक थामे व्यक्ति से क्या कोई मुकाबला करेगा? अगर किसी ने हिम्मत दिखा भी दी। तो पुलिस स्टेशन के इतने चक्कर लगाने पड़ते, लोग पुलिस के नाम से सिहर उठते। अपनी पुलिस आज भी ब्रिटिश मानसिकता वाली। किसी भी राजनेता ने पुलिस रिफॉर्म पर ध्यान नहीं दिया। यही वजह है कि आज भी पुलिस को लोग सम्मान नहीं, खौफ की नजरों से देखते हैं। पुलिस को आम लोगों का दोस्त बनाने की राजनीतिक पहल कभी नहीं हुई। ताकि समाज के लोग हिम्मत से आगे बढ़े। पर शीला को तो ऐसी भाषणबाजी की आदत हो चुकी। महिला पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की हत्या हुई, तो शीला ने महिलाओं को रात में बाहर न निकलने की नसीहत दे दी। दिल्ली में क्राइम बढ़ा, तो बाहरियों को जिम्मेदार ठहराया। जबकि शीला खुद बाहरी। &lt;br /&gt;
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धूमल की ये पंक्तियां कवि की कल्पना नहीं, सच्चाई। संसद में कोई भी सरकार सच का सामना नहीं करना चाहती। विपक्ष भी विरोध की रस्म-अदायगी कर चुप बैठ जाता। सो थॉमस मसले पर शुक्रवार को बीजेपी ने चुप्पी की चादर ओढ़ ली। पर पहली बार पीएम ने जम्मू जाकर जुबान खोली। तो बतौर पीएम जिम्मेदारी कबूल ली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के सम्मान की बात दोहराई, भविष्य में ऐसा न होने का भरोसा दिलाया। पर सूखी-सूखी जिम्मेदारी कबूलने का क्या मतलब? अब तो एक और झूठ सामने आया। गुरुवार को कानून मंत्री मोइली ने थॉमस के इस्तीफे की पुष्टि की थी। पर शुक्रवार को थॉमस के वकील ने न सिर्फ इस्तीफे से इनकार किया। अलबत्ता फैसले के खिलाफ अपील करने का खम ठोक दिया। सो अब कांग्रेसी खेमा दलील दे रहा- इस्तीफे की कोई जरूरत ही नहीं। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति रद्द की। सो अधिसूचना जारी होगी। पर थॉमस का मामला निपटा नहीं, बोफोर्स केस ने विपक्ष को एक और मुद्दा थमा दिया। दिल्ली की तीसहजारी कोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट मान ली। बोफोर्स सौदे में दलाली खाने वाले ओतावियो क्वात्रोची के खिलाफ अब केस बंद हो गया। सीबीआई ने भ्रष्टाचार के इस मौसम में सबसे बड़ा केस बंद करवा बाकियों को इशारा कर दिया। अब जरा बोफोर्स केस बंद करने की सीबीआई की दलील देखिए- पच्चीस साल बीत चुके। ढाई सौ करोड़ खर्च हो चुके। क्वात्रोची को भारत नहीं लाया जा सका। सो अब केस को आगे चलाने का कोई मतलब नहीं। दलील तो सही, पर सवाल बहुतेरे। आखिर क्वात्रोची को भारत लाने में सीबीआई और सरकार सफल क्यों नहीं हुईं, यह कौन बताएगा? बोफोर्स केस में सरकार बदलने के साथ आए उतार-चढ़ाव का जवाब कौन देगा? अगर क्वात्रोची को कांग्रेस की सरकार आरोपियों की लिस्ट से बाहर कर रही। तो सवाल- क्या आजादी के बाद भी विदेशी हमारे देश के खजाने को यों ही लूट ले जाएंगे? अंग्रेजों ने सोने की चिडिय़ा भारत का खूब दोहन किया। पर आजाद देश को विदेशियों के हाथ लुटाने वालों की यह कैसी राष्ट्रभक्ति? अब निचली अदालत से ही सही। फिलहाल क्वात्रोची बोफोर्स केस से तो बरी ही हो गए। सो मनमोहन सरकार अब चाहे, तो क्वात्रोची की थोड़ी और मदद कर सकती। जैसे दिसंबर 2005 में एडीशनल सोलीसीटर जनरल बी. दत्ता को भेजकर क्वात्रोची के लंदन स्थित बैंक खाते डिफ्रीज करवाए। क्वात्रोची को दलाली की रकम निकालने की इजाजत दे दी। अब किसी कानून के जानकार को भेज दें। ताकि क्वात्रोची भारत सरकार पर मानहानि का मुकदमा कर सके। आखिर 25 साल तक किसी को आरोपी बनाना और फिर आखिर में केस बंद करना किसी यातना से कम नहीं। रेड कार्नर नोटिस की वजह से इंटरपोल ने मलेशिया और अर्जेंटिना में दो बार गिरफ्तार किया। कई दिन जेल में बिताने पड़े। पर आखिरकार भारत ने सोची-समझी देरी कर मलेशिया और अर्जेंटिना की अदालत से भी क्वात्रोची को रिहा होने दिया। सो सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को मिली अदालती मंजूरी के बाद तो क्वात्रोची मानहानि का दावा करने के हकदार। शायद ऐसा कर दिया। तो जितनी रकम दलाली में नहीं मिली होगी, उससे अधिक मिल जाएगी। वैसे भी भारत की जनता भले गरीब हो। पर नेताओं के लिए देश वैसे ही सोने की चिडिय़ा, जैसे अंग्रेजों के समय थी। तभी तो घोटाले नहीं, यहां एक नील 76 खरब के महाघोटाले होते। सत्तर हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ होते। ‘आदर्शों’ की तो कमी नहीं देश में। पर ऐसे माहौल में जब बोफोर्स केस की फाइल बंद करने का फैसला सुनाने चीफ मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट विनोद यादव पहुंचे। तो कुर्सी पर बैठते ही मजरूह सुल्तानपुरी की दो लाइन सुना दीं- ‘वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोडऩा अच्छा।’ यानी मजिस्ट्रेट ने सीबीआई की दलील मान ली। पर सवाल- क्या भ्रष्टाचार के सागर में डूबे देश के ताजा माहौल को ‘खूबसूरत मोड़’ कहेंगे? आखिर राजाओं-कलमाडिय़ों को क्या संदेश मिलेगा? यही ना, केस को लंबा उलझाओ। आखिर में सत्ता के बलबूते फाइल तो बंद हो ही जाएगी। यों फाइलें तो खुलती और बंद होती रहेंगी। पर शुक्रवार को राजनीति की एक बुलंद आवाज हमेशा के लिए बंद हो गई। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह का निधन हो गया। वह भी उसी दिन, जिस दिन सोनिया गांधी ने अपनी कांग्रेस वर्किंग कमेटी का एलान किया। अर्जुन वर्किंग कमेटी में स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाए गए। पर सोनिया की वर्किंग कमेटी मनमोहन के केबिनेट फेरबदल जैसी ही रही। &lt;br /&gt;
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04/03/2011&lt;br /&gt;
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