<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591</id><updated>2026-09-24T18:10:25.300+02:00</updated><category term="भारत"/><category term="जीवन"/><category term="सभ्यता"/><category term="समाज"/><category term="पुस्तक"/><category term="इटली"/><category term="कथा"/><category term="कहानी"/><category term="इतिहास"/><category term="साहित्य"/><category term="व्यक्तिगत"/><category term="उपन्यास"/><category term="लेखन"/><category term="मानव अधिकार"/><category term="धारावाहिक"/><category term="भाषा"/><category term="कला"/><category term="यात्रा"/><category term="लेखक"/><category 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scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आत्मकथा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उपन्यास"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गाँधी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जीवन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="परिवार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुस्तक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="यादें"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="व्यक्तिगत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज"/><title type='text'>लेखन यात्रा - अलका सरावगी</title><content type='html'>&lt;p&gt;अलका जी मेरी जान-पहचान बीस-पच्चीस साल पहले अशोक जी (अशोक सेकसरिया) की वजह से हुई थी। अशोक जी, जैसा कि आप अलका जी के साक्षात्कार में पढ़ेंगे, ने उनके सृजनात्मक जीवन में महत्वपूर्ण भाग निभाया था। वैसे मैं अशोक जी को बचपन से जानता था जब वह दिल्ली में रहते थे और मेरे पिता ओम प्रकाश दीपक के साथ समाजवादी पत्रिका &#39;जन&#39; में काम करते थे और अक्सर हमारे घर आते थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhqeixuR2ny8S6E0zcU_WBctmcObrOk-7rsgN6rXjrTLSpCqDafQTKSdRamRmgxqXWT1QPcsZ29x3dWojR36AivjevflAmWdvcr1WHi2mTQvR_864j8HbLwgJR7uEv_J20GsA-xpLTq3qmFVJ60uY5oSG0zFhn1kFPgpfQX-rnb0qarjX3ORaTiIu6utPEf/s872/alka03.jpg&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;अलका सरावगी 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;872&quot; data-original-width=&quot;805&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhqeixuR2ny8S6E0zcU_WBctmcObrOk-7rsgN6rXjrTLSpCqDafQTKSdRamRmgxqXWT1QPcsZ29x3dWojR36AivjevflAmWdvcr1WHi2mTQvR_864j8HbLwgJR7uEv_J20GsA-xpLTq3qmFVJ60uY5oSG0zFhn1kFPgpfQX-rnb0qarjX3ORaTiIu6utPEf/w295-h320/alka03.jpg&quot; width=&quot;295&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;उसके बाद बीच-बीच में किसी न किसी वजह से अलका जी से पत्राचार होता रहता था। उनके तीन उपन्यास इतालवी भाषा में अनुवादित हो कर छपे हैं और उन्हें इतालवी सरकार का Order of the Star Cavelier सम्मान भी मिल चुका है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ साल पहले वह वेनिस युनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में अपने लेखन के बारे में बोलने आयीं थीं तो मैं उन्हें सुनने गया था, लेकिन घर लौटने वाली ट्रेन के छूटने की चिंता में, बाद में वहाँ रुक कर उनसे बात नहीं कर पाया था। पिछले साल कलकत्ता जा कर उनसे मिलने की बात थी, पर वह भी नहीं बन पाई थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बहुत समय से सोच रहा था कि अपने इस ब्लॉग के लिए उनसे बातचीत करूँ। यह आलेख एक प्रश्न-उत्तर के रूप में शुरु हुआ था। उसमें मैंने उनके कुछ वीडियो देख कर, कुछ अन्य बातें जोड़ीं। इस बातचीत को आप अलका जी की जुबानी ही पढ़ सकते हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अलका सरावगी की जुबानी&lt;/h1&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;व्यक्तिगत&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;हमारा एक मध्यवर्गीय मारवाड़ी परिवार था, जहां लड़कियों को रोका-टोका जाता है कि ऐसे मत करो, वैसे मत बोलो। इसे मैंने बहुत रज़िस्ट किया। घर के काम देखने-सीखने में मेरा मन नहीं लगता था, इसलिए खाना बनाना भी नहीं सीखा जबकि मां बहुत अच्छा खाना बनाती थी। घर के काम में मन इसलिए भी शायद नहीं लगा क्योंकि बहुत प्यार करने वाली दादी ने बचपन में कान में फूंक दिया था कि भगवान ने तुम्हें चौका-चूल्हा घर-वर संभालने नहीं भेजा है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब सब सहेलियाँ मिल कर कोई फिल्म देखने जाती थीं तो हमें अनुमति नहीं मिलती थी। इन सब बातों को ले कर मन में गुस्सा और विद्रोह का भाव था, और पिता जी की बहुत सी बातें गलत लगती थीं। बारह-तेरह साल की थी जब पीरियड शुुरु हुए तो सब कहते कि यहां मत बैठो, वहां मत बैठो, यह मत छूओ, वगैरा, तो उससे बहुत घुटन होती थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे पिता जी अपनी लड़कियों को आगे बढ़ाना चाहते थे, उन्हें गाड़ी चलाना सिखवाया था। स्कूल में स्विमिंग पूल था तो मैंने तैरना भी सीखा था। एन.सी.सी में भर्ती हुई थी और उसके कैम्प में रोने-धोने के बाद जाने दिया गया था। कांचरापाड़ा कैम्प में पिता गाड़ी की डिक्की भरकर पच्चीस लड़कियों का खाना लेकर पहुंचे थे। वे छह फुट लंबे शानदार व्यक्तित्व वाले थे। स्कूल के वार्षिक समारोह में किसी नाटक के बाद मुख्य पात्र निभाने वाली लड़की को&amp;nbsp;उन्होंने&amp;nbsp;हॉल में खड़े हो कर अपनी तरफ़ से मेडल घोषित कर दिया था। उन पर गर्व करने के हमारे पास तमाम कारण थे। मेरे हमेशा फर्स्ट आने पर उन्हें भी बहुत गर्व था, पर मेरे साथ ही पढ़ने वाली बड़ी बहन के कारण वे इसे छुपा लेते थे। या शायद इसलिए कि मेरे पाँव धरती पर रहें।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दो बड़ी बहनों की कम उम्र में शादी हुई तो उनके जीवन को देख कर लगता था कि आगे मुझे भी वैसा ही जीवन मिलेगा। स्कूल के दिनों में &quot;सारा आकाश&quot; पढ़ रही थी और मन ही मन में विद्रोही बन रही थी, सोचती थी कि उस उपन्यास की प्रभा जैसा ही मुझे भी कोई ससुराल मिलेगा जहां लोग तरह-तरह के ताने कसेंगे। मां से कहती थी कि बंगाली घर में पैदा होती तो अच्छा होता, वह लोग मेरे पढ़ने लिखने पर खुश होते। मेरी बहनों का तो बीे.ए. भी नहीं हुआ था जब उनकी शादी हुई थी। ग़नीमत थी कि मेरी शादी बीस साल की उम्र में जाकर हुई, जब मैंने बी.ए. पास कर लिया था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाहरी तौर पर मेरे ससुराल का परिवार उस तरह से मॉर्डन नहीं था जैसा पीहर में था। पिता पैंट-शर्ट पहनते और शौक से रहते। अंग्रेज़ी में फर्राटे से बोलते और शेरो-शायरी उन्हें कंठस्थ थी। ससुर धोती-कुरते वाले थे और सास सीधे पल्ले से साड़ी पहनतीं, जबकि माँ उल्टे पल्लेवाले आधुनिक अंदाज़ में।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन, ससुराल में अपेक्षकृत पिता की तरह मजबूती से मुझे&amp;nbsp; हां या नहीं कहने वाले लोग नहीं थे। पिता की इच्छा के सामने अपनी चलाई नहीं जा सकती थी। उनके गुस्से से भी सबको डर लगता था। मेरी सास की तरफ से सहयोग था, वह पढ़ने-लिखने की बहुत क़दर करती थीं। वे बहुत धार्मिक थीं और शायद इसीलिए हर आत्मा को उसके प्रवाह से रोकने के पक्ष में नहीं थीं। उनका हमेशा सहयोग रहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने शादी के बाद ही एम.ए. किया, फिर एम.फिल. किया। पति कहते थे कि बिना झगड़ा-झमेला किये जो कर सकती हो वह करो। वह समर्थन करते थे। लेकिन वैसी उन लोगों का सोच नहीं थी, यह बिना कहे ही ज़ाहिर था कि उस समय अगर कोई घर का काम होता तो वही ज्यादा ज़रूरी माना जाता था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब मेरे एम.ए. के इम्तहान चल रहे थे तो मेरे ससुर ने मुझे बुलाया, पूछा कि क्या कर रही हो, तो मैंने कहा कि पढ़ रही हूँ। बोले कि इतना पढ़ना क्या जरूरी है? मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहूं। अगर बचपन से स्कूल में टॉपर रहे हों तो मन में हमेशा टॉपर रहने की भावना रहती है। वहां हमारी स्पेस मेरा बैडरूम ही था, वहां पर हर ओर किताबें ही किताबें बिछा रखी थीं। एम.ए. में फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया तो सब खुश भी हुए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन दिनों में कुछ लिखने की याद तो बिल्कुल नहीं है। तब तक मैंने पी.एच.डी. और लेक्चरार बनने की परीक्षाएं दे डाली थीं। एक कॉलेज में पार्ट-टाइम नौकरी मिली, तो समझ में आया कि पढ़ाना मेरे बस की बात नहीं है। मैं अपनी ऊर्जा सिर्फ़ लिखने के लिए बचाना चाहती थी।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;मेरी दादी&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;मेरे ख्याल से मैं तीन या चार साल की थी, मेरी दादी सुंदरकांड का पाठ करती थीं। तब मुझे पढ़ना नहीं आता था, पर दादी से सुन कर मुझे सुंदरकांड पूरा याद हो गया था। मैं उसे पूरा रिसाइट कर सकती थी, जो कि काफी बड़ा है। तब हमारे घर में यह चलन था कि अगर कोई भी बाहर का आदमी आता तो कहते कि सुंदरकांड वाली लड़की को बुलाओ। सबके सामने कहा जाता कि सुंदरकांड सुनाओ तो मैं सुना देती थी, पर लोग सुनते-सुनते बोर हो जाते थे, तो कहते थे, अच्छा, ठीक है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुझे अपनी दादी से बहुत प्रेम था। वह मुझे अपने जीवन की बहुत सी बातें बताती थीं, कि कैसे वह लोग राजस्थान से कलकत्ता आये, कलकत्ता में शादी होने के बाद वह वापस राजस्थान चली गयीं, वहां से आते-जाते रहे, परिवार में क्या-क्या घटनाएं - दुर्घटनाएं घटीं, वह क्या खाती-पीती थी, कैसे उनका जीवन बदल गया। उन्हें मुझ में एक श्रोता मिला हुआ था, और मुझे उनकी बातों में बहुत रस आता था। उनके चेहरे की एक-एक रेखा, एक-एक झुर्री तक, मुझे आज भी याद है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह मुझे कहती थीं कि ऊपरवाले ने तुम्हें यह सब सामान्य काम करने के लिए नहीं, कुछ और करने के लिए बनाया है। वह और काम क्या था या क्या हो सकता है, उसकी उन्हें कोई स्पष्ट कल्पना नहीं थी। लेकिन उनकी यह बात मेरे भीतर कहीं पर रह गयी और पनपती रही।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;बचपन&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;हमारे बचपन के ज़माने में स्क्रीन तो था नहीं। किताबें और पत्रिकाएं घर में आती थीं और चाव से पढ़ी जाती थीं। माँ पापुलर उपन्यास पढ़ती थीं—शिवानी, रानू,ओम प्रकाश शर्मा, आचार्य चतुरसेन, ये कुछ नाम तो बिलकुल याद हैं। मुझे बचपन से पढ़ने का बेहद शौक़ था। जो कुछ मिल जाए उसे पढ़ डालती थी। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान आदि पत्रिकाएँ, चंदामामा और चंपक के साथ पढ़ी जाती थीं। अक्सर मैं अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ी किताब पढ़ लेती थी। बाद में चौदह साल की उम्र से अंग्रेजी में एनिड ब्लाइटन की किताब जन्मदिन पर किसी ने दी। उसके बाद उनका चस्का लगा और फिर आगे चलकर शेरलॉक होम्स, अगाथा क्रिस्टी, सिडनी शेल्डन पढ़ी गईं। जो कुछ मिल जाए वही पढ़ा जाता था। मेरी दादी दोस्तोवेस्की का हिंदी अनुवाद पढ़ती थीं। घर में साकेत, यशोधरा जैसी मैथिली शरण गुप्त की रचनाएँ थीं। पिता ग़ज़ल और गीतों के शौकीन थे और बाकायदा एक कॉपी रखते थे जिसमें उन्हें उतारते थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्कूल में पढ़ने में अच्छी थी इसलिए शिक्षिकाओं की प्रिय थी। स्कूल की लायब्रेरियन भी मुझे अच्छी विद्यार्थी समझती थी, आठवीं में आते-आते मैंने प्रेमचंद के मानसरोवर के सारे खंड, और अन्य जो लेखक हमारे स्लेबस में होते और लायब्रेरी में उनकी किताबें मिल जातीं तो उनको पढ़ने लग जाती थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस तरह से शब्दों से मेरा लगाव गहरा था और सब को मालूम था। बचपन में स्कूल की पत्रिका के लिए एकाध बार कुछ लिखा, पर विशेष कुछ नहीं लिखा। अलबत्ता परीक्षा में निबंध में हमेशा सबसे अधिक मार्क्स मिलते रहे। घर पर खाना खाते हुए पढ़ना मना था, पिता जी नाराज होते थे, इसलिए जब उनकी आवाज़ सुनती थी तो किताब को कुर्सी पर अपने नीचे रख कर उस पर बैठ जाती थी। पंडित रामचन्द्र शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास घर में पता नहीं कहां से आया था, वह भी पढ़ती रहती थी। हिंदी साहित्य से मेरा परिचय उसके माध्यम से हुआ, वह पुरानी प्रति अभी भी मेरे पास सुरक्षित है।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;पढ़ना&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;कॉलेज के दिनों में अंग्रेज़ी की बहुत किताबें पढ़ी गईं । एक सहेली के घर में बहुत सारी किताबें थीं - आर्थर हेली, लियोन यूरी खासकर पढ़े गए। ऐन रेंड की ‘फ़ाउंटेनहेड’ ने मुझे बहुत प्रभावित किया। अंग्रेज़ी के बेस्टसेलर टाइप के तमाम उपन्यास पढ़े जो मिल जाते थे। सॉमरसेट मॉम के उपन्यास और कहानियाँ पढ़ना याद है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने हिंदी साहित्य जो मैंने दसवीं-ग्याहरवीं क्लास तक पढ़ा था, उसके बाद कॉलेज में पढ़ते समय वह छूट गया था, तब अंग्रेजी साहित्य पर अधिक जोर था। अशोक जी से मिलने के बाद मैं हिंदी साहित्य की ओर लौटी। अशोक जी कहते थे कि हमेशा एक डायरी रखिए और उसमें लिखिये। इसलिए डायरी रखी, जिसमें उनकी बातें सुनकर लिख लेती कि कौन सी किताबें पढ़नी है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संयुक्त परिवार में रहते हुए और बच्चों के कारण, मेरे पास अपने लिए समय बहुत कम होता था। मैं अक्सर अपने उपन्यास की थीम से संबंधित नॉन-फिक्शन की किताबें पढ़ती रहती हूँ। समकालीन हिंदी साहित्य भी काफ़ी पढ़ती हूँ। प्रकाशक या लेखक मित्र कविता, कहानी, उपन्यास की किताबें भेज देते हैं, तो कोशिश करती हूँ कि उन्हें पढ़ कर फेसबुक पर ही सही, कुछ लिखूँ। मोबाइल पर ऑनलाइन वेब-साइट्स पर लेख और कहानियाँ पढ़ी जाती हैं। पत्रिकाओं में प्रकाशित किसी कहानी की चर्चा हो तो उसे खोज कर पढ़ती हूँ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरा बेटा अंग्रेज़ी के बुकर और नोबेल पुरस्कृत लेखकों को बहुत पढ़ता है। पर वे किताबें आसपास रहते हुए भी नहीं पढ़ पाती हूँ, इसका अफ़सोस रहता है।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अशोक सेकसरिया और लेखन की शुरुआत&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;पच्चीस साल की उम्र में, जब मेरी शादी और दो बच्चे हो चुके थे, मुझे मेरे गुरु लेखक-पत्रकार अशोक सेक्सरिया मिले। बच्चों के लिए शब्दकोश बनाने के प्रोजेक्ट में उनसे परिचय मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। जिस दिन मैं पहली बार बालकोश के दफ्तर में गयी, तभी समझ गयी थी कि मेरे जीवन का यही अर्थ है। वहां चारों ओर किताबें थीं, बातें थीं, लोग थे। अशोक सेकसरिया मुझे वहाँ मिले, वही मेरे गुरु और मैंटोर बने। वह एक जाने माने लेखक और पत्रकार थे। उसके बाद मैंने सोचा नहीं कि इस माहोल के बाहर भी मेरा कोई जीवन है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgcwTqDjr8fILb9glva92vfjSFRpNZ7ZlcafqT5gc0UrwguCqWsFo3og2MRjQuu7XBUjjfBkKsvgvUL4Mm1QEzPHKnIJYQ1_BmyJ9hhKbhf_vc3AndvxA4HXkXLn0tCDCBUuY8gfbZ0HnoqiiY9rUjjc8aUwUJQ3TtIFFnFhGq_lUAVBnK75QzODgku6xG8/s621/alka01.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;अशोक सेकसरिया व अलका सरावगी - तस्वीर अलका सरावगी के सौजन्य से&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;621&quot; data-original-width=&quot;595&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgcwTqDjr8fILb9glva92vfjSFRpNZ7ZlcafqT5gc0UrwguCqWsFo3og2MRjQuu7XBUjjfBkKsvgvUL4Mm1QEzPHKnIJYQ1_BmyJ9hhKbhf_vc3AndvxA4HXkXLn0tCDCBUuY8gfbZ0HnoqiiY9rUjjc8aUwUJQ3TtIFFnFhGq_lUAVBnK75QzODgku6xG8/w307-h320/alka01.jpg&quot; width=&quot;307&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अशोक जी को अपने बारे में कुछ भी बताने से वह कहते थे, इसे लिख डालिए। मुझे लगता कि इतनी मामूली बातों को कौन पढ़ेगा? बहरहाल मैंने &#39;अंग्रेज़ी स्कूल में पहला दिन&#39; शीर्षक से एक फीचर लिख डाला जो कलकत्ता की एक पत्रिका में छपा, जिसके राजकिशोर जी संपादक थे। जब मैंने उसे पढ़ा तो मैंने उसमें एक वाक्य था, &quot;कितना कातर था वह बचपन&quot;, तो उसमें अशोक जी ने &#39;कातर&#39; शब्द को काट करके कुछ और शब्द लिख दिया था, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने उस पर काफी बहस की। तब अशोक जी ने अपनी गलती मान ली कि उन्हे उस शब्द को बदलना नहीं चाहिए था और खासकर कि मुझसे बिना पूछे। बाद में आगे चलकर अशोक जी ने मुझे बताया कि इस बात से उनको लगा था कि मैं अपने शब्दों के प्रति बहुत सजग हूं और अपने शब्द के लिए मैं उनसे लड़ पड़ी थी तो इस बात के लिए उनके मन में मेरे प्रति बहुत सम्मान हुआ था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समाजवादी आंदोलन के लोगों की पत्रिका &quot;सामयिक वार्ता&quot; निकलती थी, अशोक जी उसके लिए बहुत काम करते थे, हर समय उसके लिए अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करते रहते थे। सच्चिदानंद सिन्हा, किशन पटनायक जैसे लोग वहाँ आते रहते थे। मेरी पॉलीटिकल अवेयरनेस की शिक्षा-दीक्षा उनके कमरे में हुई, जो कि रेलवे प्लेटफार्म की तरह का कमरा था जिसमें सिर्फ किताबें और सिगरेट का धुआं और धूल रहती थी। अशोक जी की खटिया थी, हमेशा उस पर बैठे रहते थे। पास में कुछ टूटी-फूटी कुर्सियाँ रहती थी जिन पर हम लोग बैठे रहते थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनके घर पर बहुत सारे लेखकों से मेरा परिचय और मिलना हुआ - कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, गिरधर राठी, अशोक वाजपेयी, विभूति नारायण राय। यह सारे लोग जब कलकत्ता आते तो अशोक जी से मिलने आते और मेरे लिए यह एक ट्रेनिंग स्कूल था, जहाँ सुनने के लिए बहुत सारी बातें मिलती थी और सुनने में बड़ा आनंद आता था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो अशोकजी इस बारे में बहुत चिंतित थे। उन्हें लगा मैं आगे लिख नहीं पाऊँगी।&amp;nbsp;&amp;nbsp;खैर पुरस्कार मिला और उसके बाद भी मैं लिखती रही। अशोक जी को शायद इससे आश्वासन भी मिला होगा कि एक पुरस्कार मुझे नष्ट नहीं कर पाया, जैसा कि मैं उनको बार-बार कहती थी कि ऐसा नहीं होगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे लेखन में और मेरे जीवन जीने के तरीके में, अशोक जी की एक बहुत बड़ी उपस्थिति हमेशा रही। वह ऐसे गुरु थे जो कुछ भी नहीं सिखाता है, कुछ भी नहीं पढ़ाता है,&amp;nbsp; फिर भी उसका होना ही एक तरह की एक मिसाल थी।&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;कहानियाँ&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;तीस साल की उम्र में पहली कहानी छपने के बाद, मैं उत्साह में भर कर लगातार लिखती गई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शायद 1989 में, हम सब परिवार सहित कलकत्ते के पास किसी के घर में दो दिन के लिए गए थे। वहां मुझे एक शक्स दिखाई दिया जो कुछ अजीब सा दिखता था, मुंह फाड़ कर मुस्कराता था, ऐसा ढीला पजामा पहने था कि वह लहंगे की तरह फट-फट करता चलता था। वह हंसता रहता था और हमारी सेवा-टहल ऐसे करता था जैसे घर का नौकर हो, लेकिन वह खाता हम सब के साथ में था और रहता भी उसी घर में सब के साथ था। घर में उसका स्थान क्या है, मुझे यह समझ में नहीं आता था। जब हम लौट रहे थे तब मैंने देखा कि वह रो रहा था। इसलिए जब गाड़ी चल पड़ी तो मैं बड़ी उदास हुई और मैंने उसके बारे में जानना चाहा। पहले तो उन लोगों को समझ में नहीं आया कि हम किसकी बात कर रहे हैं, क्योंकि अन्य लोगों के लिए जैसे वह था ही नहीं, अदृश्य सा था। बोले, कौन, वह पागल? तो मैंने कहा कि वह पागल नहीं है, तो सब हंस पड़े और खूब हंसे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस पर मैंने एक कहानी लिखी - &quot;आपकी हँसी&quot;। अशोक जी ने कहा कि रवींद्र कालिया है और यह उनका पता है यह भेज दीजिए। इस तरह से उस कहानी को &quot;वर्तमान साहित्य&quot; के महाविशेषांक में भेजा। निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती जैसे लेखकों के साथ, वह &#39;प्रथम रचना&#39; करके छपी और चर्चित हुई। मेरे पास बहुत सारी चिट्ठियां आईं कि ऐसा आदमी, हाशिए पर फेंका हुआ मार्जिनलाइज्ड आदमी, जिसकी तरफ हम कभी ध्यान भी नहीं देते हैं और वह दिखता ही नहीं है, उन सबकी ज़िंदगी में कहीं न कहीं मौजूद था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1996 में मेरा पहला कहानी संग्रह आया। वह कहानियाँ आसपास के जीवन और उससे जुड़े सोच पर आधारित थीं। कुछ स्त्री होने के अनुभव पर भी थीं, हालाँकि उनमें स्त्री-विमर्श या फेमिनिज्म नहीं था। शिल्प की दृष्टि से उनमें कुछ नयापन भी था।&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उपन्यास&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;कलिकथा&lt;/b&gt; की शुरुआत भी एक कहानी की तरह हुई थी। उसका शीर्षक था, &quot;बीच वाला कमरा कहाँ है&quot;। यह हमारे किसी परिचित के हार्ट के बाइपास करवा कर लौटने पर कही गई बात पर आधारित थी। पर वह कहानी दो पैराग्राफ के बाद रुक गई थी। आज़ादी के पहले जब बीच वाला कमरा नहीं था, उस समय को खोजते हुए इस कहानी ने उपन्यास का विराट रूप धारण कर लिया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhUx_J1Y6cRWbKPZY2lFKYPl3Om4d269JBg3iceo8NzOgIx2NuK9y9D9xgbvf4zl3swxP2QkHKvDVDgkbMFwGNdKAaU3ksLmMGxEd-ql4WCSyNOOBBoNXs518rvOh8VmH_UNYHu3McvqsAcSjrV1mk_AG2xgdKVvFYBoIVE4h1FXswxTAYfBswYHikqSRL_/s1072/alka02.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;अलका सरावगी व प्रो. थॉमस दाह्नहार्ट, 2016 में इटली में वेनिस युनिवर्सिटी में - तस्वीर डॉ. सुनील दीपक&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;647&quot; data-original-width=&quot;1072&quot; height=&quot;241&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhUx_J1Y6cRWbKPZY2lFKYPl3Om4d269JBg3iceo8NzOgIx2NuK9y9D9xgbvf4zl3swxP2QkHKvDVDgkbMFwGNdKAaU3ksLmMGxEd-ql4WCSyNOOBBoNXs518rvOh8VmH_UNYHu3McvqsAcSjrV1mk_AG2xgdKVvFYBoIVE4h1FXswxTAYfBswYHikqSRL_/w400-h241/alka02.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरी कहानियाँ ‘आधार प्रकाशन’ ने हज़ारों प्रूफ की गलतियों के साथ छापी थीं। कलकत्ता के पुस्तक मेले में आए प्रकाशक को मैंने चाय पर घर बुलाया और कह दिया कि मेरे पास बन्दूक होती तो मैं उन्हें गोली मार देती। फिर अपने गुस्से का प्रायश्चित करने के लिए उन्हें ही उपन्यास दिया। उन्होंने भी उसे ऐसा बढ़िया छापा कि निर्मल वर्मा तक हाथ में लेकर देर तक कवर देखते रहे। कलिकथा पर अनेक पत्र आए— समीक्षाएँ भी झोली भर कर आयीं। यह सब मेरी आशा से परे था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलिकथा के बाद कुछ एक ऐसी दुर्घटना घटी जिससे मैं डिप्रेशन में चली गई। पांच-छह महीने तक किसी की कोई बात सुनने-कहने का, कुछ भी करने का, दिल नहीं होता था। तब एक मीटिंग के लिए फोन आया। घर वाले भी सब कह रहे थे कि तुम उठो, घर के बाहर निकलो, तो मैंने सोचा कि चलो ठीक है, वहां जा कर बैठ जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं वहां गई तो मुझे एक महिला मिलीं, उन्होंने बिल्कुल दादी की जैसी सफ़ेद साड़ी पहनी थी, दादी जैसा उनका स्नेहिल&amp;nbsp; चेहरा था। उन्होंने कहा कि अरे हमने तुम्हारी कलिकथा पढ़ी है। वह मुझे अपने जीवन की कहानियां सुनाने लगींं, तो मैंने उन्हें कहा कि आप की कहानियां इतनी सशक्त हैं, आप इन पर क्यों नहीं लिखती हैं। इस पर उन्होंने कहा कि नहीं, मैं लिख नहीं सकती, तुम्हें लिखना हो तो तुम लिखो। इस तरह से &quot;&lt;b&gt;शेष कादंबरी&lt;/b&gt;&quot; की शुरुआत हुई और उसे लिखते हुए मेरा डिप्रेशन गायब हो गया और मैंने अपने आप को जैसे फिर से डिस्कवर किया, कि अल्टीमेटली मैं लेखक हूं और जीवन में चाहे कितना भी बड़ा कुछ भी हो जाए, मैं हार नहीं मान सकती। &quot;शेष कादंबरी&quot; ने इस तरह से मेरा उद्धार किया। मेरे शब्दों ने और लेखन ने मुझे फिर से जीवन जीने की हिम्मत दी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे उपन्यास &quot;&lt;b&gt;गांधी और सरलादेवी चौधरानी&lt;/b&gt;&quot; में गांधी जी एक मुख्य पात्र के रूप में है। गांधी जी को जानना भी मेरे लिए एक यात्रा थी, यह समझना कि किस तरह से उन्होंने अपने को बनाया, किस तरह से उन्होंने उस समाज को बनाया जिसने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। गांधी की क्या सोच थी, उनकी कितनी अंदरूनी ताकत थी जिसके भरोसे वह खड़े हो जाते थे, उन्हें भरोसा होता था कि वह ऐसा बदलाव ला सकेंगे। मैंने इस किताब में गांधी के जीवन का एक साल का पीरियड लिया है जो जलियांवाला बाग के 6 महीने बाद से शुरू होता है जब गांधी जी पहली बार लाहौर गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरलादेवी चौधरानी, लाहौर के देशभक्त वकील-पत्रकार रामभज दत्त चौधरी की पत्नी थी और रवींद्रनाथ टैगोर की बहन की लड़की थीं। गांधी जी उन्हें एक सहयोगी नेता की तरह देख रहे थे क्योंकि वह इस देश की औरतों में जागृति लाना चाहते थे। सरलादेवी चौधरानी के साथ उनका यह एक साल का जीवन, उसे आप प्रेम प्रसंग भी कह सकते हैं या एक तरह का सपना जो वह देख रहे थे। सरला देवी एक ऐसा चरित्र है जो अपने समय के बहुत आगे देख सकता है, सोच सकता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गांधी और सरलादेवी में बहुत ही फोकस है, देश ही उनके लिए सब कुछ है और देश की आज़ादी के अलावा कुछ नहीं था। व्यक्तिगत कुछ भी महत्व नहीं रखता है। प्रेम के लिए वे दोनों तैयार नहीं थे। पर प्रेम हुआ और गांधी ने अपने पत्र में इसे साफ़ स्वीकार किया। इस तरह से यह एक ह्यूमन साइकोलॉजी का, एक स्त्री पुरुष के बीच के संबंधों का, दोनों ही का एक बहुत ही अनयूजुअल चरित्र हैं।&amp;nbsp; वह सम्बंध क्यों टूटता है और किस तरह टूटता है,यह उपन्यास उसकी बात कहता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे पांचवें उपन्यास, &quot;&lt;b&gt;जानकीदास तेजपाल मेन्शन&lt;/b&gt;&quot; को अपेक्षित सराहना नहीं मिली, ऐसा मुझे लगा। अपने बच्चे सबको श्रेष्ठ लगते हैं, इसलिए अपनी राय को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। कई साल बाद उसे इंदु शर्मा कथा यू.के. में सम्मान मिला, तो तसल्ली ज़रूर हुई।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;लिखना&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;मैं यह कह सकती हूँ कि पात्र का चुनाव और विषय बहुत कुछ संयोग पर आधारित होता है। अचानक कोई कहानी आप को पकड़ लेती है और आप उसमें धँसते चले जाते हैं। वह सोते-जागते नए रूप लेती रहती है और जीवन के जिस छोटे ग्राफ से वह शुरू हुई थी, वह फैलता जाता है। पात्र बिल्कुल वही नहीं रहते जहाँ से उन्हें शुरू में देखा था। वे जैसे ख़ुद को लिखवाते हैं जिसमें आप का पढ़ा- लिखा- देखा- सुना हुआ अनायास जुड़ता जाता है। कोई योजना से वे नहीं चलते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिखते हुए यदि यह भय रहे कि कोई आपको ग़लत समझ लेगा या कोई शख़्स उसे असली ज़िंदगी में पहचान कर आप से नाराज़ हो जाएगा, तो लिखा जा नहीं सकता। मेरे साथ ऐसा हुआ भी है। पर यह ख़तरा उठाये बिना जीवन रचा नहीं जा सकता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमको पहले का सब कुछ अनलर्न करके लिखना होता है और अगर आप अनलर्न नहीं कर पाते हैं तो फिर आप कहीं न कहीं अपने आप को दोहराने लग जाते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पात्र लेखक को अपनी अंगुली पकड़ा कर मनमाने तरीके से चलाते हैं। उसमें बहुत कुछ प्रीमेडीटेटेड नहीं होता, वह भी एक यात्रा होती है, डिस्कवरी की। पात्रों के साथ चलते हुए, आप लिखते भी हैं और&amp;nbsp;साथ-साथ अपने आप को भी जानते चलते हैं, क्योंकि लिखा किरदार आपसे अलग भी होता है और वह आपका अपना ही होता है, खासकर जब तक किताब छप नहीं जाए।&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अन्य लेखक&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;हिंदी के अन्य लेखकों से अधिकतर मेरे औपचारिक संबंध ही रहे हैं क्योंकि कलकत्ता में रहते हुए मिलना-जुलना कम होता है। अनामिका, गीतांजलि श्री, प्रत्यक्षा, प्रियदर्शन, रजनी गुप्त, उदयन वाजपेयी, यतीश कुमार, अम्बर पांडे कुछ नाम हैं जिनसे अपनापन महसूस हुआ है। अन्य भाषाओं के लेखकों में असम के नीलिम कुमार हैं। अभी उनकी आत्मकथा पढ़ रही हूँ। गुजराती में ग़ुलाम मोहम्मद शेख हैं। बांग्ला और अंग्रेज़ी के कई लेखक हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/5791819234455911266/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/blog-post_22.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/5791819234455911266'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/5791819234455911266'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/blog-post_22.html' title='लेखन यात्रा - अलका सरावगी'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' 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style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEitJLxKupCENtKNOx1BJ6C2ZwG-2C9zS5dInieaR_AQ7_MD-vKvRB9LmtlBNjReDLg3EvL7XcIiz-tPKQctJaeNJE92ZI1seDqQy-GcVMNoRRGndtvM0FEp8SSsblKSiqFxPWKYpejMPF7AwJYmg8i1LTUG3GVwDa_gGbTK5I4tmQ4UV3BD7-ZMnaGOHjgU/s600/Cover01_mini.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;600&quot; data-original-width=&quot;375&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEitJLxKupCENtKNOx1BJ6C2ZwG-2C9zS5dInieaR_AQ7_MD-vKvRB9LmtlBNjReDLg3EvL7XcIiz-tPKQctJaeNJE92ZI1seDqQy-GcVMNoRRGndtvM0FEp8SSsblKSiqFxPWKYpejMPF7AwJYmg8i1LTUG3GVwDa_gGbTK5I4tmQ4UV3BD7-ZMnaGOHjgU/s320/Cover01_mini.jpg&quot; width=&quot;200&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उपन्यास के बारे में&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;उपन्यास के नायक हैं त्री यानि त्रिनेत्र जो सिक्किम में गंगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाते हैं, और इसके नायक-खलनायक हैं एक जापानी युवक ताकानोरी, जो हिन्दुस्तान में एक विशेष देवी प्रतिमा की तलाश में आये हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उपन्यास के अन्य मुख्य पात्र है - जामुन बाबा यानि कोरिया से आये बौद्ध भिक्षुक जून मिन, मणिपुर की आभा जिसमें जीव-जन्तुओं को आकर्षित करने की शक्ति है, और पाँच बच्चे - रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति। हर बच्चे के पास भी एक गुप्त शक्ति है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सब मिल कर तिरंगा योद्धा कहलाते हैं और वह अपनी शक्तियों की मदद से निर्बल और सताये हुए लोगों की सहायता करते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस उपन्यास के कुल 31 अध्याय हैं। (&lt;span style=&quot;background-color: #fff2cc;&quot;&gt;डाउनलोड के लिए नीचे जायें&lt;/span&gt;)&lt;/p&gt;&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&quot;देवी प्रतिमा के रक्षक&quot; पढ़िये&lt;/h1&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;(अध्याय पर क्लिक कीजिये)&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;अध्याय 01&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&amp;nbsp;- &lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;विष्णुपुर में जामुन बाबा त्रिनेत्र को उसके बचपन की बात बताते हैं और उसे घर छोड़ कर जाने के लिए कहते हैं&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/blog-post.html&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;अध्याय 02&lt;/a&gt;&amp;nbsp;- &amp;nbsp;&lt;/b&gt;रिकू यामागुचि अपने याकूज़ा-खूनी ताकानोरी को मूर्ति लाने हिन्दुस्तान जाने के लिए कहता है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/03.html&quot;&gt;अध्याय 03&lt;/a&gt;&amp;nbsp;-&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;जामुन बाबा भेस बदल कर नारायणपुर जाते हैं जहाँ उन्हें ताकानोरी की अन्वेषण किरण शक्ति का आभास मिलता है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/04.html&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;अध्याय 04&lt;/a&gt;&amp;nbsp;- &amp;nbsp;&lt;/b&gt;बाबा को खोजने ताकानोरी अपने आदमियों को ले कर जाता है लेकिन बाबा उसे नहीं मिलते&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/05.html&quot;&gt;अध्याय 05&lt;/a&gt;&amp;nbsp;- &amp;nbsp;&lt;/b&gt;नारायणपुर से लौट कर बाबा त्रिनेत्र को ताकानोरी के बारे में बताते हैं और समाधी लेने का निर्णय लेते हैं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/06.html&quot;&gt;अध्याय 06&lt;/a&gt;&amp;nbsp;- &lt;/b&gt;गँगटोक में अनाथाश्रम में पाँच बच्चों को गुप्त-शक्ति साधने की शिक्षा दे रहा है, वहाँ आभा मेहमान है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/07.html&quot;&gt;अध्याय 07&lt;/a&gt;&amp;nbsp;- &lt;/b&gt;त्रिनेत्र बाबा की सहायता करने असम जायेगा, बच्चे भी उसके साथ जाना चाहते हैं। पता चलता है कि आभा के पास एक विचित्र गुप्त शक्ति है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/08.html&quot;&gt;अध्याय 08&lt;/a&gt;&amp;nbsp;- &amp;nbsp;&lt;/b&gt;त्री और बच्चे आभा को समझाते हैं कि गुप्त-शक्तियाँ क्या होती हैं और उन्हें कैसे साधते हैं&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/09.html&quot;&gt;अध्याय 09&lt;/a&gt; - &amp;nbsp;&lt;/b&gt;मजूली के वृद्धाश्रम में जामुन बाबा जीवित समाधी ले रहे हैं, उन्हें देखने आसपास के लोग जमा होते हैं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/10.html&quot;&gt;अध्याय 10&lt;/a&gt; -&amp;nbsp;&lt;/b&gt;ताकानोरी को बाबा के वृद्धाश्रम का पता चल जाता है, वह अपने साथियों के साथ वहाँ मूर्ति खोजने आता है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/11.html&quot;&gt;अध्याय 11&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - त्रिनेत्र और नन्हे यौद्धा जामुन बाबा के आश्रम के लिए चलते हैं तो आभा भी उनके साथ जाना चाहती है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/12.html&quot;&gt;अध्याय 12 -&lt;/a&gt; &lt;/b&gt;ताकानोरी के गुँडे जामुन बाबा के बारे में वृद्धाश्रम में बूढ़ों से पूछताछ करते हैं और उन्हें धमकाते हैं&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/13.html&quot;&gt;अध्याय 13&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - गँगटोक से मजूली यात्रा में आभा मणिपुर के अपने जीवन के बारे में बताती है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/14.html&quot;&gt;अध्याय 14&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - ताकानोरी के आदमी रात को बाबा की समाधी को खोद रहे हैं, लेकिन यह काम थोड़ा कठिन है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/15.html&quot;&gt;अध्याय 15&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - त्री, बच्चे और आभा रात को मजूली पहुँच कर एक घर के तहखाने में छिप जाते हैं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/16.html&quot;&gt;अध्याय 16&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - मजूली वाले घर में नीचे एक गुप्त सुरंग है जो जँगल में एक वृक्ष में खुलती है, वहाँ से त्री, रंगनाथ और गार्गी ...&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/17.html&quot;&gt;अध्याय 17&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - त्री, रंगनाथ और गार्गी भेस बदल कर वृद्धाश्रम में जा कर बाबा की समाधी की जाँच करने जाते हैं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/18.html&quot;&gt;अध्याय 18&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - त्री जगदीश बाबु से बात कर रहा है, इधर ताकानोरी उसके साथियों को उठा कर ले जा रहा है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/19.html&quot;&gt;अध्याय 19&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - अपने बंदियों को नारायणपुर ले जाते हुए ताकानोरी को आभा की गुप्त-शक्ति का अहसास होता है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/20.html&quot;&gt;अध्याय 20&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - नारायणपुर में अपने घर जा कर ताकानोरी आभा को अपने कमरे में खाने पर बुला कर प्रश्न पूछता है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/21.html&quot;&gt;अध्याय 21&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - त्री और गार्गी नारायणपुर आते हैं, त्री अदृश्य हो कर ताकानोरी के घर में घुस कर आभा और बच्चों से मिलता है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/22.html&quot;&gt;अध्याय 22&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - ताकानोरी समझ जाता है कि त्री उसके घर में आया है, वह आभा, तृप्ति व वसंत से पूछताछ करता है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/23.html&quot;&gt;अध्याय 23&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - त्री ताकानोरी से मिलने आता है और उसे अपनी शक्ति दिखा कर उससे एक वचन लेता है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/24.html&quot;&gt;अध्याय 24&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - त्री, आभा और ताकानोरी बाबा की कविता-पहेली का अर्थ समझने की कोशिश करते हैं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/25.html&quot;&gt;अध्याय 25&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - शंखासुर की पहाड़ी की खोज में त्री और ओरी पहले लखमीपारा की ओर जाते हैं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/26.html&quot;&gt;अध्याय 26&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - त्री और ताकानोरी की जंगल में गैंडा-सींग चुराने वाले तस्करों से टक्कर होती है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/27.html&quot;&gt;अध्याय 27&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - तस्करों से मुठभेड़ के बाद त्री और ओरी मोटरबोट पर छुपते हैं जहाँ वसंत और गार्गी मूर्ति की खोज का ...&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/28.html&quot;&gt;अध्याय 28&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - त्री, ओरी और आभा डमरू द्वीप की ओर निकल पड़ते हैं लेकिन वहाँ के घड़ियालों का सामना कैसे करेंगे ..&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/29.html&quot;&gt;अध्याय 29&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - त्री और ओरी डमरू द्वीप की गुफाओं में शक्तिवाहिनी प्रतिमा की खोज में जाते हैं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/30.html&quot;&gt;अध्याय 30&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; - डमरू द्वीप से लौट कर ओरी जापान लौट जाता है और त्री अपने गुरु जी की खोज पर निकलता है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/blog-post.html&quot;&gt;अध्याय 31 (अंतिम अध्याय)&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;: गुरु जी और त्री देवी प्रतिमा के सारे रहस्य खोलते हैं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;उपन्यास डाउनलोड कीजिये&lt;/h2&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.kalpana.it/documents/Devi_Pratima_Ke_Rakshak_Sunil_Deepak.pdf&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;देवी प्रतिमा के रक्षक&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; - &lt;b&gt;&lt;span style=&quot;background-color: #fff2cc;&quot;&gt;पी.डी.एफ.&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; (4 MB)&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.kalpana.it/documents/Devi_Pratima_Ke_Rakshak_Sunil_Deepak.mobi&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;देवी प्रतिमा के रक्षक&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; - &lt;b&gt;&lt;span style=&quot;background-color: #fff2cc;&quot;&gt;मोबी (अमेज़न किन्डल के लिए)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; (1.6 MB)&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.kalpana.it/documents/Devi_Pratima_Ke_Rakshak_Sunil_Deepak.epub&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;देवी प्रतिमा के रक्षक&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; - &lt;b&gt;&lt;span style=&quot;background-color: #fff2cc;&quot;&gt;इपब (एंड्रोयड फोन, टेबलेट, विन्डो, लीनुक्स, आदि के लिए)&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; (5.9 MB)&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;उपन्यास के बारे में आलेख&lt;/h2&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;b&gt;इस उपन्यास के बारे में आप मेरे यह आलेख भी पढ़ सकते हैं&lt;/b&gt;:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/05/blog-post.html&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;धारावाहिक उपन्यास इस ब्लॉग पर&lt;/a&gt; (28 मई 2026)&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/03/blog-post.html&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;एक नया फैंतासी उपन्यास&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;(20 मार्च 2026)&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;उपन्यास के बारे में अपनी राय भेजिये&lt;/b&gt;&lt;/h2&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उपन्यास के बारे में आप मुझे अपनी राय भेजिये - जैसे कि उपन्यास की कौन सी बातें या पात्र आप को अच्छे लगे या अच्छे नहीं लगे, कौन से हिस्से अधिक दिलचस्प लगे, कौन सी गलतियाँ दिखीं, आदि।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आप &quot;देवी प्रतिमा के रक्षक&quot; की प्रशंसा या आलोचना कीजिये ताकि मुझे बेहतर लेखक बनने का मौका मिले।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आप अपनी राय नीचे टिप्पणी में लिख सकते हैं या मुझे ईमेल से भेज सकते हैं - मेरा ईमेल का पता है - sunil.deepak@gmail.com&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/8382121952563211289/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/blog-post_20.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/8382121952563211289'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/8382121952563211289'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/blog-post_20.html' title='पूरा उपन्यास पढ़िये - देवी प्रतिमा के रक्षक'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEitJLxKupCENtKNOx1BJ6C2ZwG-2C9zS5dInieaR_AQ7_MD-vKvRB9LmtlBNjReDLg3EvL7XcIiz-tPKQctJaeNJE92ZI1seDqQy-GcVMNoRRGndtvM0FEp8SSsblKSiqFxPWKYpejMPF7AwJYmg8i1LTUG3GVwDa_gGbTK5I4tmQ4UV3BD7-ZMnaGOHjgU/s72-c/Cover01_mini.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-7402198474873926937</id><published>2026-09-18T07:54:21.124+02:00</published><updated>2026-09-18T07:54:21.125+02:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आलेख"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कथा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कविता"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पत्रिकाएँ"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>क्या पढ़ा (2) - कहानी, कविता, आलेख</title><content type='html'>&lt;p&gt;कुछ माह पहले मैंने निश्चय किया था कि मैं अपनी डायरी लिखूँगा कि हिंदी में क्या पढ़ा जो अच्छा लगा और &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/1.html&quot;&gt;इस डायरी का पहला भाग&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; अगस्त के प्रारम्भ में लिखा था। आज इस डायरी का &lt;b&gt;दूसरा भाग &lt;/b&gt;प्रस्तुत है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं अधिकतर तीन भाषाओं में लिखता-पढ़ता हूँ - हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी, पर कभी-कभी फ्राँसिसी और पुर्तगाली में भी पढ़ना पड़ता है। जैसे कि सुबह हिंदी, अंग्रेज़ी और इतालवी में अखबार पढ़ी, फिर कोई हिंदी पत्रिका पढ़ी, दोपहर में अंग्रेज़ी उपन्यास पढ़ा और रात को सोने से पहले कोई इतालवी पत्रिका पढ़ी। सपने भी इन तीनों भाषाओं में देखता हूँ। मेरे विचार में हर भाषा में हमारे सोचने का तरीका बदल जाता है, तो मेरे इस तरह से तीनों भाषाओं में लगातार बदलने से मेरे सोचने पर क्या असर पड़ता है, यह प्रश्न भी अक्सर मन में उठता है लेकिन समझ नहीं आता कि उसका उत्तर कैसे खोजा जाये?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस बार मैंने जो हिंदी में पढ़ा उसे तीन भागों में बाँटा है - आलेख, कहानियाँ और कविताएँ। यह सब कुछ मैंने विभिन्न पत्रिकाओं में &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://notnul.com/Pages/Home.aspx&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;ॲानलाइन पोर्टल नॉटनुल&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; पर पढ़ा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgdsj2_8SFxmZhQLmvXBDt7F0s6vN9kxFD_B8-3hdDGLFF53QvSyjwn0G2wgvi9tmwuRruWarGdepKBRCTvRp2Q9X6iV2CkoQjb06d7itEVnahKYOGL_cuZL1DpY43KqQV71V11qvN-TFfjz5xvvkWC64355uCGvBTAX6uI1wtSs1NS-ABSkkrye1fOqzZh/s1215/01KyaPadha.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;701&quot; 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पत्रिका&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; के &lt;b&gt;अगस्त&lt;/b&gt; 2026 अंक में &lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/anuj.lugun.54/&quot;&gt;&lt;b&gt;अनुज लुगुन&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; का &lt;b&gt;अतिथि संपादकीय&lt;/b&gt;: हँस का यह अंक जनजातियों की संस्कृति, भाषाओं और जीवन पर केन्द्रित है, मुझे यह अंक पढ़ना बहुत अच्छा लगा।&amp;nbsp;लुगुन जी अपने सम्पादकीय में 1970 के दशक में शुरु हुआ कोइलकारो बांध के विरुद्ध जन आंदोलन जो तीस सालों तक चला, से शुरु करके विभिन्न विषयों को छूते हैं जैसे कि - मूलनिवासियों के सांस्कृतिक-अध्यात्मिक पुनर्निवास की माँग, आदिवासी नागरिकों को दो संवैधानिक अनुच्छेदों में बाँटना (पाँचवीं और छठी अनुसूची), कानजी पटेल के &quot;अनुत्तरित लोग&quot; में आदिवासी कवियों का संकलन जिसमें 141 आदिवासी भाषाओं में 382 कवियों की कविताएँ मूलभाषा और हिंदी में संकलित की गयीं, आदिवासी यानि असुर-राक्षस के रूप में स्वयं अपनेआप को देखते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हँस के इसी अंक में &lt;b&gt;सावित्री बड़ाईक&lt;/b&gt; का एक रोचक आलेख भी है, &quot;&lt;b&gt;असुरों की सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज&lt;/b&gt;&quot;, जिसमें वह बताती हैं कि हिंदू ग्रंथों में जिन्हें असुर कहा गया है वह छोटानागपुर के पठार में रहते हैं, आदि। इस आलेख को पढ़ कर सोच रहा था की प्राचीन सीरिया के असुर राजाओं, जैसे कि असुर बनिपाल, जिनकी कहानियाँ और इतिहास मेसोपोटेमिया की पक्की मिट्टी की तख्तियों पर मिली हैं और भारत की असुर जनजातियों में क्या सम्बंध था या कोई सीधा सम्बंध नहीं था?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;हँस&lt;/b&gt; में ही &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.instagram.com/anamika_chouksey21/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;अनामिका अनु&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; द्वारा लिखी &lt;b&gt;तीजन बाई की जीवनी&lt;/b&gt; का एक अंश, शीर्षक &quot;&lt;b&gt;अपनी नाक खुद सम्भाले यह समाज&lt;/b&gt;&quot; जिसमें तेरह साल की लड़की के घर से निकाले जाने की बात है क्योंकि पाण्डवानी को ऊँचे स्वर और जोश में ही गा कर उसका अभ्यास करना पड़ता है और कोई उसे गाते हुए सुन लेता था, अच्छा लगा। इस आलेख की पहली पंक्ति, &quot;धूँए से उठी, लोगों की आँखों में लगी&quot;, बहुत सुंदर लगी, उसमें तीजन बाई के जीवन का सार दिखता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://pakhi.in/&quot;&gt;पाखी&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; के अगस्त अंक में &quot;&lt;b&gt;पाखी संवाद - जहाँ शब्द डरते नहीं&lt;/b&gt;&quot; में &lt;b&gt;शिवकुमार बटालवी&lt;/b&gt; और &lt;b&gt;ताराशंकर वंद्योपाध्याय&lt;/b&gt; का स्मृति आलेख अच्छा लगा। वंद्योपाध्याय के लेखन की बात करते हुए कहते हैं, &quot;इस उपन्यास में उन्होंने समाज के उस हिस्से को केन्द्र में रखा जिसे मुख्यधारा का साहित्य अक्सर अनदेखा कर देता था। वहाँ के लोगों की भाषा, उनके रीति-रिवाज, उनके भय, उनकी आस्थाएँ और उनके सपने - सब कुछ इतनी प्रमाणिकता से चित्रित है कि पाठक स्वयं उस संसार का हिस्सा बन जाते हैं।&quot; मुझे भी हिंदी कहानियाँ-उपन्यास पढ़ते समय, लेखकों का यही कौशल आकर्षित करता है, कि अनदेखे-अनजाने लोगों के जीवन की झलक मिले। पाखी संवाद के इन आलेखों से मुझे उनकी &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.youtube.com/@PakhiSamvad&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;पाखी संवाद यूट्यूब की चैनल&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; का भी पता चला, और अब उनके विडियो देखने-सुनने का मौका भी मिलेगा।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/akaar.patrika.7&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;अकार&lt;/b&gt; पत्रिका&lt;/a&gt; के अगस्त अंक के प्रारम्भ और अंत में मुख्यपृष्ठों के पीछे &lt;b&gt;मिर्ज़ा हादी रुसवा&lt;/b&gt; के उपन्यास &lt;b&gt;उमराव जान अदा&lt;/b&gt; के हिंदी अनुवाद का एक छोटा सा अंश दिया है जो बहुत सुंदर लगा। इस अंश में पता चलता है कि उमराव जान के समय में तवायफों की तालीम में और उपन्यास लिखने वाले लेखक को, शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों और उनके सुरों की गहरी पहचान होती थी। यह जान कर भी थोड़ा सा आश्चर्य हुआ कि उपन्यास का यह अनुवाद गुलशन नन्दा ने किया था। अपने समय में गुलशन नन्दा जी शायद हिंदी के सबसे प्रसिद्ध लेखक थे। बचपन की रेलयात्राओं में मुझे उनके विभिन्न उपन्यास पढ़ना याद है। उनके बहुत से उपन्यासों पर सफल फिल्में भी बनी थीं। लेकिन जैसा हिंदी लेखन जगत में अक्सर होता है, लोकप्रियता को अ-साहित्यिक माना जाता है, और जब हिंदी के बड़े लेखकों की बात होती है, शायद कोई गुलशन नन्दा को उनमें नहीं गिनता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;अकार&lt;/b&gt;&amp;nbsp;पत्रिका&amp;nbsp;के अगस्त अंक&amp;nbsp;में &lt;b&gt;प्रियंवद जी&lt;/b&gt; का संपादकीय, जहाँगीर के अंग्रेज सलाहकार हॉकिन्स द्वारा लिखे बादशाह जहाँगीर के एक दिन के ब्यौरे के बारे में है। उसे पढ़ते हुए सोच रहा कि उस जमाने में और आज में किंतना अंतर आया है, जो चीजे हमें इतनी आसानी से मिल जाती हैं कि हम उनके बारे में सोचते भी नहीं हैं, उस समय वह बादशाह को भी नहीं मिलती थीं। अगर जहाँगीर के पास ट्विटर, टिकटॉक, इंस्टाग्राम होते तो वह अपना सारा दिन कैसे बिताते? अगर उनके पास फ्रिज होता तो वह उसमें अपने लिए कौन सी आईसक्रीम रखवाते? अगर उनके पास टीवी होता तो क्या वह किस तरह के प्रोग्राम व फिल्में देखते या शायद वह भी अमिताभ बच्चन के फैन हो जाते? अगर उनके पास माईक्रोवेव होता तो क्या वह अपने लिए कॉफी बना कर पीते? या फिर, हवाई जहाज में घूमते हुए ट्रम्प या पुतिन से दोस्ती बनाते? या फिर, अनुराग कश्यप की फिल्म देख कर कहते, &quot;कितनी गालियाँ लगाता है यह आदमी अपनी फिल्मों में, लाहोल विला कुव्वत! इसे फाँसी पर चढ़ा दिया जाये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://katha-chakra.blogspot.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;कथाक्रम&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; के सितम्बर अंक में ही &lt;b&gt;लोकबाबू&lt;/b&gt; के उपन्यास &quot;&lt;b&gt;बस्तर-बस्तर&lt;/b&gt;&quot; पर &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jayprakashmanas.blogspot.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;जयप्रकाश मानस&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; का आलोचनात्मक आलेख, &quot;&lt;b&gt;जहाँ जंगल स्मृति है और आदमी धीरे-धीरे गायब होता हुआ वर्तमान&lt;/b&gt;&quot; अच्छा लगा और इसे पढ़ कर &quot;बस्तर-बस्तर&quot; को पढ़ने की इच्छा भी हुई। मानस जी लिखते हैं, &quot;बस्तर रूपक है उस देश का, जो अपने ही भीतर कुछ दूर छूट गया है - जहाँ विकास की सड़कें पहुँचते-पहुँचते थक जाती हैं, और पगडँडियाँ अब भी अपने होने पर अड़ी रहती हैं। बस्तर कविता है उस आदिम लय की जिसे किसी छंद में बांधना सम्भव नही; वह महुए की गंध की तरह फैलती है - धीरे, अनाम, लेकिन गहरे तक उतरती हुई।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;कथाक्रम&lt;/b&gt; के सितम्बर अंक में &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/p/Archana-Painuly-100063774194759/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;अर्चना पैन्यूली&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; के उपन्यास &quot;&lt;b&gt;अलकनंदा सुन&lt;/b&gt;&quot; पर &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/sanjeevjaiswal.sanjay/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;संजीव जयसवाल &#39;संजय&#39;&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; का आलोचनात्मक आलेख, &quot;&lt;b&gt;माटी की गंध और स्मृतियों की सरिता&lt;/b&gt;&quot; भी अच्छा लगा। इस उपन्यास के कथन-विन्यास के बारे में उन्होंने लिखा है, &quot;यह उपन्यास शिवानंद के जीवन को किसी सर्वज्ञ कथावचाक के माध्यम से नहीं, बल्कि उसके बच्चों की दृष्टि से प्रस्तुत करता है - पहले बड़ा बेटा, फिर दूसरा बेटा और अंत में पुत्री। इस क्रमिक परिवर्तन से कथा केवल आगे ही नहीं बढ़ती, बल्कि भावनात्मक रूप से अधिक गहरी होती जाती है।&quot; इस बात से भी इस उपन्यास पढ़ने का मन किया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/p/Banaas-Jan-100064795893764/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;बनास जन पत्रिका&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; के 88वें अंक में &lt;b&gt;विद्यासागर नौटियाल&lt;/b&gt; के बारे में पढ़ रहा था। उनके लेखन के बारे में लिखा है: &quot;उनके उपन्यासों और कहानियों का संसार उत्तराखंड के साधारण लोगों के जीवन संघर्षों का दस्तावेज बन गया है। वह सहज भाषा और सरल कथा-शिल्प में अपने लोगों की यातनाओं को दर्ज करते हैं। इतिहास और संस्कृति उनके लिए गौरव का स्मारक न हो कर साधारण लोगों की मुक्ति चेतना के वाहक बनते हैं।&quot; ऐसे ही बातें कुछ अन्य आलेखों में भी थीं और मैंने अक्सर अन्य लेखकों के बारे में भी पढ़ी हैं। इसे पढ़ कर सोच रहा था कि क्यों हिंदी&amp;nbsp; में लेखकों के साधारण आदमियों की पीड़ा, शोषण, यातनाओं की बात करना ही अच्छा साहित्य समझा जाता है? जबकि मेरे मन में वही किताबें रहती हैं जिनमें मानव जीवन का और रिश्तों का सजीव चित्रण हो, उनमें केवल दुख, पीड़ा और कठिनाईयाँ देखना उसका अधूरापन नहीं बन जायेगा? मैंने नौटियाल जी की कोई किताब नहीं पढ़ी इसलिए मेरी यह टिप्पणी उनके लेखन के बारे में नहीं है, बल्कि अच्छा साहित्यकार किसे माना जाये का मूल्यांकन करने वाली दृष्टि के बारे में है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/p/%E0%A4%A4%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A4%B5-100090705210781/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;तद्भव पत्रिका&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; के जनवरी-जून 2026 अंक में &lt;b&gt;विश्वनाथ त्रिपाठी&lt;/b&gt; के संस्मरण &quot;&lt;b&gt;अस निबहुर देसू&lt;/b&gt;&quot; का आठवाँ भाग बहुत रुचि से पढ़ा जिसमें उनके&amp;nbsp;दिल्ली आने और यहाँ रहने के 1950-60&amp;nbsp;के वर्णन हैं। उनकी बातें पढ़ कर मुझे भी अपनी बचपन की वह घटनाएँ याद आयीं, जब मैं बच्चा था। उनका जामामस्जिद जा कर कबाब खाना, जमुनापार दिलशाद गार्डन में रहने के बारे में कहना &quot;नानक दुखिया सब संसार, सबसे दुखिया जमुना पार&quot;, श्रीकाँत वर्मा और मन्मथनाथ गुप्त की चीन के बारे में बहस, सैम मानिकशा और जनरल करिअप्पा की बातें, ऐसी बहुत सी घटनाओं के बारे में पढ़ना अच्छा लगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;तद्भव&lt;/b&gt; में ही &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/rajarambhadubarmer/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;राजाराम भादू&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; का &lt;b&gt;धर्मवीर भारती&lt;/b&gt; की जन्म शताब्दी के अवसर पर &quot;&lt;b&gt;एक पुनरावलोकन&lt;/b&gt;&quot; आलेख भी अच्छा लगा। 1983-84 के आसपास मेरी एक कहानी धर्मयुग में छपी थी, तब भारती जी से कुछ पत्रचार हुआ था। वह मेरे पिता को जानते थे, दोनों इलाहाबाद के थे, करीब-करीब हमउम्र थे और दोनों के परिवार आर्यसमाजी थे। मैंने लड़कपन में भारती की &quot;गुनाहों का देवता&quot; पढ़ी थी और उनके लाखों प्रशंसकों में मैं भी आ गया था। मैं उनकी एक कविता को भी बहुत पसंद करता हूँ - &quot;दिन यूँ ही बीत गया, अंजुरी में भरा हुआ जल जैसे रीत गया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;तद्भव&lt;/b&gt; में &lt;b&gt;आकांक्षा बरनवाल&lt;/b&gt; के लम्बे आलेख &quot;&lt;b&gt;परंपरा का मूल्यांकन और औपनिवेशिक आधुनिकता&lt;/b&gt;&quot; में महाभारत के संदर्भ में, एक ओर है पश्चिमी तर्क, समझ और श्रेणीकरण, और दूसरी ओर हैं भारतीय समझ और परम्परा। वह इन दोनों के बीच के विरोधाभासों पर पश्चिमी सोच से प्रभावित महाभारत के &quot;क्रिटिकल एडिशन&quot; बना कर ग्रंथ के &quot;मूल तथा प्रमाणिक&quot; रूपों की खोज-दृष्टि, और दूसरी ओर, उसके विभिन्न संस्करणों-लेखकों की गतिशील, समय के साथ बदलने वाली भारतीय समझ की दृष्टि के अंतरों की बात करती हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस सिलसिले में वह लिखती हैं, &quot;जो विद्वान वैज्ञानिक पाठालोचन की पद्धिति और मूल पाठ की अवधारणा के समर्थक हैं उन्हें शिकायत है कि सुकथांकर और उनके सहयोगियों ने बहुत से परवर्ती प्रक्षेप अपने क्रिटिकल एडिशन में शामिल कर लिए। जो विद्वान महाभारत को एक स्थिर रचना की बजाय एक गतिशील और जीवंत प्रवाह की तरह देखते हैं उन्हें यह शिकायत है कि&amp;nbsp;क्रिटिकल एडिशन के&amp;nbsp;संपादकों ने ऐसे प्रसंगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जो भारतीय जनमानस में महाभारत की प्रसिद्धि और लोकप्रियता के आधारस्तंभ हैं।&quot; इस संदर्भ में वह &lt;b&gt;एस. एन. बालगंगाधर&lt;/b&gt; की बात रखती हैं, &quot;इतिहास हमें &#39;तथ्य&#39; देता है, अतीत हमें &#39;स्मृति&#39; और &#39;मूल्य&#39; देता है।&quot; अपने निष्कर्ष में वह कहती हैं कि &quot;आज हम जिस &#39;सांस्कृतिक राष्ट्रवाद&#39; का उदय देख रहे हैं, विडम्बना यह है कि वह भी उसी औपनिवेशिक जाल में फंसा हुआ है जिसका शिकार &lt;b&gt;बंकिमचंद्र&lt;/b&gt; और &lt;b&gt;सुकथांकर&lt;/b&gt; जैसे विद्वान हुए थे। एक तरफ आज का राजनीतिक विमर्श पश्चिम का विरोध करता है और भारतीयता की बात करता है, किन्तु दूसरी तरफ अपनी महानता सिद्ध करने के लिए वह पैमाना (standard) आज भी पश्चिम का ही उपयोग कर रहा है। जब आज का नैतृत्व या उसके बुद्धिजीवि यह दावा करते हैं कि &#39;महाभारत काल में इंटरनेट था&#39; या &#39;वैदिक काम में हवाई जहाज थे&#39; तो वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि महान होने का एकमात्र अर्थ तकनीक और विज्ञान में आगे होना है, जो पूरी तरह से एक आधुनिक, पश्चिमी पैमाना है।&quot; यह आलेख पढ़ कर बहुत सी बातें और प्रश्न मन में उठे और इसलिए यह बहुत अच्छा लगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;हिंदी कहानियाँ&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;विभिन्न पत्रिकाएँ पढ़ते हुए एक बात मेरे मन में आई कि अंग्रेजी, इतालवी, फ्रैंच आदि भाषाओं में विभिन्न श्रेणियों की कहानियाँ होती हैं - रोमांस, रहस्य, जासूसी, एडवैंचर, साईंस फिक्शन, फैतासी, डरावनी, आदि। भारत में भी अंग्रेजी के लेखन में अधिक विविधता है। लेकिन मुझे लगता है कि हिंदी कहानियों का संसार अधिकतर दुखों, संघर्ष, भेद-भाव, परिवार, जैसे दायरों आदि में ही घूमता रहता है, उसमें उतनी विविधता नहीं होती। यही बात &lt;b&gt;मृणाल पाण्डे&lt;/b&gt;&amp;nbsp;जी के एक साक्षात्कार में भी सुनी, जब उनसे पूछा गया कि उनकी कहानियाँ मध्यम वर्ग पर क्यों होती हैं, और गरीब, शोषित वर्ग के लोगों के बारे में क्यों नहीं होतीं? यानि लेखकों को गम्भीरता से तभी लिया जा सकता है अगर वह कुछ विशेष विषयों पर ही लिखें? पर ऐसा करना क्या हिंदी साहित्य को पिंजरों में बंद करना नहीं हो जायेगा?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;हँस &lt;/b&gt;में &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/gc.bagri/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;ज्ञानचन्द बागड़ी&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;धधकती ज़मीन&lt;/b&gt;&quot; में मणिपुर की स्थिति की कहानी है जिसमें एक बाहर से आया प्रोफैसर आदित्य समझना चाहता है कि लड़ाईयाँ किसके बीच और क्यों हो रही है, लेकिन उनकी बातें स्थिति समझने में विशेष मदद नहीं करती। कहानी का भूगौलिक परिपेक्ष्य समझ में नहीं आता कि जिन गाँवों-जँगलों की बात हो रही है वे कहाँ हैं, न ही उसके पात्र किन जनजातियों के हैं, लड़ाई किसके बीच है, यह सब कुछ समझ नहीं आता। शायद यही वहाँ की सच्चाई है कि कुछ भी समझना कठिन है। एक जगह पर एक पात्र कहता है, कि शहर के लोग पहाड़ी लोगों की ज़मीन लेने के लिए यह कर रहे हैं। दूसरी जगह एक पात्र समझाता है कि विभिन्न जनजातियाँ हैं, राजनीति करने वाले हैं, उग्रवादी हैं, सेना वाले हैं, बाहरी ताकते हैं, सबका इस लड़ाई में हाथ है, सब अपने को सही समझते हैं और दूसरे को गलत। यह कहानी लड़ने वालों के धर्मों की बात नहीं करती। कहानी में घरों का जलना, लोगों का मरना, परिवारों का विस्थापित होना, आदि घटनाओं का दर्द महसूस होता है, लेकिन उसका क्या होगा या क्या करना चाहिये, इसकी झलक नहीं मिलती।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;हँस&lt;/b&gt; में &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/alison.minz&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;अनिशा मिंज&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;फिर एक कोड़ा राजी&lt;/b&gt;&quot; में एक चाय बागान में रहने वाली बुघनी नाम की बच्ची की कहानी है, जो स्कूल नहीं जाती क्योंकि उसकी शिक्षका कहती है कि वह हिंदी ठीक से नहीं जानती। बुघनी माँ के पीछे-पीछे चाय-बागान में जाती है, वहाँ काम में माँ की मदद करती है और लोगों से उनके अपने गाँव छोड कर चाय-बागानों में आने के इतिहास की बातें पूछती है। दिन समाप्त होता तो माँ को पगार अधिक मिलती है क्योंकि बुघनी की सहायता से उसने पत्तियाँ अधिक तोड़ी हैं। लेकिन रात को झोपड़ी में आग लगने से उसके माता-पिता मर जाते हैं, और कहानी का अंतिम भाग कलकत्ता में है जहाँ सोलह साल की बघनी एक घर में काम करती है, शोषित होती है और चायबगान के दिनों को याद करती है। कहानी की बनावट कमज़ोर है, लेकिन उसकी चायबागान की बोली और उनके गीत, यह दोनों बातें अच्छी लगीं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;हँस&lt;/b&gt; में &lt;b&gt;विनोद कुमार&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;वह राम नहीं था&lt;/b&gt;&quot; में दो बेटियों की माँ आदिवासी परिवार की सुमारी है, जो एक &quot;बाहरी&quot; आदमी के साथ चली जाती है और कुछ महीनों बाद घर लौट आती है। मास्टर जी जो इस कहानी को सुना रहे हैं, इस बात को सुन कर उसकी तुलना रामायण के राम और गर्भवति सीता के वनवास से करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि एक स्त्री-पुरुष के रिश्ते को केवल एक अच्छा या बुरा में बाँटना इतना आसान नहीं लगता, क्योंकि इसमें हम उनकी भावनाओं को अनदेखा कर रहे हैं। अपनी मर्जी से घर छोड़ कर नये साथी के साथ जाने के कुछ महीनों बाद पहले साथी के पास लौट आना, यह आदिवासी परिवार में हो या गैर-आदिवासी परिवार में हो, उसे केवल यौन-शुचिता की दृष्टि से तोलना, मुझे अधूरा सा लगता है। अगर दूसरे मर्द के साथ गयी स्त्री के घर वापस लौटने पर उसे स्वीकारना विकासशीलता का मापदंड है, तब दूसरी औरतों के साथ जाने वाले पुरुष के घर लौटने पर स्वीकारना क्या होगा? खैर इस कहानी ने इस विषय के बारे में सोचने का मौका दिया, इसलिए यह कहानी अच्छी लगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;पाखी&lt;/b&gt; के अगस्त अंक में &lt;b&gt;विद्याभूषण&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;बनवारी बाबू का मकान&lt;/b&gt;&quot; में उत्तर भारत के छोटे शहर के पारिवारिक रिश्तों की बातें हैं, जहाँ दो कमरों के घर में महीनों रहने वाले भाँजे-भतीजे ही नहीं, भाँजे के मित्र पेयिन्ग गैस्ट भी हैं, पैसा अधिक कमाने वाले बेटे का परिवार के निर्णयों पर अधिकार है, बेटी की शादी करने के लिए दान-दहेज क्या और कैसे तैयार किया जाये की बातें भी हैं, और सबसे बड़ी बात की मन-मुटाव हो या पुरानी यादों के साथ हँसना-हँसाना, जीवन नहीं रुकता, वह चलता रहता है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;अकार&lt;/b&gt; में &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/jeeveshprabhakar/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;जीवेश प्रभाकर&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;फ्री बर्डस&lt;/b&gt;&quot; में धर्म और रिश्तों की नाजुकता की बात बहुत अच्छे तरीके से कही गयी है। रानी की माँ मुसलमान हैं और पिता हिंदू। समय के साथ उनके अपने परिवारों के साथ रिश्ते बदलते हैं लेकिन रानी के भाई की घर वालों द्वारा पक्की की हुई शादी में दिक्कत आती हैं क्योंकि लोग उनके परिवार के बारे में जान कर मना कर देते हैं। रानी के विवाह में भी मुश्किलें आयेंगी, इसलिए उसके मामा उसके लिए एक मुसलमान लड़के का रिश्ता लाते हैं लेकिन रानी का भी अपना एक रहस्य है जिसे उसने सबसे छुपाया है .. कहानी के अंत का सरप्राइज़ अच्छा है। कहानी में माँ और पिता के धर्मों की बात नहीं की है, कि क्या उनमें से किसी ने धर्म बदला था या नहीं, पर शायद उस बात को जोड़ने से कहानी की सरंचना थोड़ी जटिल बन जाती।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://sammukh.com/kathank/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;सम्मुख में दो सौ शब्दों की कुछ लघु-कथाएँ&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&amp;nbsp;पढ़ीं - कुछ कहानियाँ अच्छी लगीं जैसे कि &lt;b&gt;बेजी जैसन&lt;/b&gt; की कहानी &quot;भरम&quot;, &lt;b&gt;अंजू शर्मा&lt;/b&gt; की &quot;जीत&quot;, &lt;b&gt;हरि मृदुल&lt;/b&gt; का &quot;रोना&quot;, &lt;b&gt;लकी राजीव&lt;/b&gt; की &quot;अनायक&quot;,&amp;nbsp;&lt;b&gt;आदित्य शुक्ल&lt;/b&gt; की कहानी &quot;पंख&quot;, और, &lt;b&gt;आकांक्षा पारे काशिव&lt;/b&gt; की &quot;न्यौता&quot;। कुछ अन्य कहानियों में लगा कि उनका मूल विचार अच्छा था, लेकिन कथा-संरचना को थोड़ा और असरदार किया जा सकता था, जैसे कि , &lt;b&gt;अनिर्बाण साधु&lt;/b&gt; का &quot;रंग धनुष&quot;, &lt;b&gt;देवेश पथ&lt;/b&gt; की &quot;तुर्किश आइसक्रीम&quot;, &lt;b&gt;उषा कुमारी&lt;/b&gt; की &quot;वायरल विकास&quot;, और &lt;b&gt;पल्लवी विनोद&lt;/b&gt; की &quot;फोटोग्राफर&quot;। खैर, अभी सभी लघु-कथाएँ नहीं पढ़ पाया हूँ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;कथाक्रम&lt;/b&gt; के सितम्बर 2026 अंक में &lt;b&gt;गोविंद मिश्र&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;काम ... मुझे भी&lt;/b&gt;&quot; में वृद्ध सज्जन हैं जो अकेले रहते हैं पर बुढ़ापे के साथ तकलीफें बढ़ी हैं इसलिए किसी सहायक को खोज रहे हैं और एक एजैंसी से बात करते हैं। लेकिन शुरु में जितने युवक रखते हैं उनके साथ अनुभव अच्छा नहीं होता, जब एजैंसी वाला एक ऐसे युवक की बात करता है जिसका पारिवारिक इतिहास संदेहनीय है .. छोटी सी कहानी में कोई नाटकीय मोड़ नहीं हैं, बस विश्वास बनने की बात है। यह कहानी आज की दुनिया में अकेले वृद्धों की बढ़ती संख्या और नवयुवकों को नौकरी मिलने की दिक्कतें, इन दोनों समस्याओं को जोड़ती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://samwed.com/patrika/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;संवेद&lt;/b&gt; पत्रिका&lt;/a&gt; के जनवरी 2026 अंक में &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/divya.vijay.319/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;दिव्या विजय&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;कृष्ण पंखुरी&lt;/b&gt;&quot; की कहानी सुरमा की है जिसकी बस्ती में सब लड़कियाँ घरों में बाथरूम साफ करने जाती हैं और सुरमा को एक मॉल के बाथरूम की सफाई की नौकरी मिलती है। आसपास सब काम करने वाली लड़कियों को ईर्श्या है कि सुरमा इतनी अच्छी जगह पर इज़्जतदार नौकरी करती है, लेकिन दिक्कत यह है कि जब मॉल में आने वाली लड़कियों की तरह, सफाईवाली के कपड़े-बाल छोड़ कर मॉल वाली लड़कियों के फैशन करने की कोशिश करती है तो उसके पास उनके क्रूर शब्दों से लड़ने के लिए साहस नहीं है, वह हार मान लेती है। पर, कुछ महीने बाद, उसे भी उनमें से एक युवती से बदला लेने का मौका मिलता है तो ... कहानी में अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ने की कमज़ोरी का चित्रण अच्छा लगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;तद्भव&lt;/b&gt; में &lt;b&gt;मृत्युंजय कुमार सिंह&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;जल्लाद उर्फ हैंगमैंन&lt;/b&gt;&quot; में जेल के पुराने फांसी लगाने वाले बाबुल मसीह हैं, उनकी पत्नी बिल्किस है, उनका बेटा अब्दुल्ला है और जेल का कैदी तारक सकुल है। तारक ने लोगों की हत्या की है और जिस दिन तारक को फांसी लगने वाली है, उस दिन बाबुल मसीह उसे फांसी पर लटकाने वाली रस्सी को तैयार करते हुए उससे बातें करते हैं। छोटी सी कहानी में एक छोटी सी बात है, लेकिन मृत्युंजय जी की काबलियत है कि उस कहानी को ऐसे रचते हैं कि अंत तक बांधे रखती है।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;हिंदी कविता&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुझे कविताएँ कम ही अच्छी लगती हैं, मैं अंग्रेज़ी और इतालवी में कविताएँ बिल्कुल नहीं पढ़ पाता, पढ़ूँ तो उनमें सौंदर्यबोध या भावबोध नहीं होता। हिंदी कविताओं में भी मुझे पुराने कवि ही अच्छे लगते हैं, नयी कविता मुझे प्रभावित नहीं करती। लेकिन आज के इस आलेख में दो आधुनिक कवि भी हैं - &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/binay.saurabh/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;विनय सौरभ&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; और &lt;b&gt;दिनेश शुक्ल&lt;/b&gt;।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अकार पत्रिका में&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/binay.saurabh/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;विनय सौरभ&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; की कविताओं में छोटी-छोटी बातों में छिपी हुई लम्बी कहानियाँ हैं। &quot;&lt;b&gt;असंभावित के विरुद्ध&lt;/b&gt;&quot; की कहानी में घर से भागी हुई एक लड़की है, और उसके सालों बाद अपने गाँव में लौटने की बात है। &quot;&lt;b&gt;माँ के शाल&lt;/b&gt;&quot; में माँ और मौसी के सम्बंधों का रस है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सौरभ जी की &quot;&lt;b&gt;अपने ही स्टेशन से गुज़रना&lt;/b&gt;&quot; में छूटे हुए गाँव की यादों की बात है, उनकी कविताओं में मुझे यह कविता-कहानी सबसे अधिक अच्छी लगी - इसकी पहली पंक्तियाँ हैं, &quot;एक रोज यात्री बन कर गुजरते हो/ अपने ही गाँव के स्टेशन से/ एक उदासी भीतर फैल जाती है अचानक/&amp;nbsp; खिड़की से बाहर तलाशते हो, कोई चेहरा दिख जाये परिचित/&quot;।&amp;nbsp; उनकी एक अन्य कविता, &quot;&lt;b&gt;वे ही!&lt;/b&gt;&quot; में अपने आप से प्रश्न हैं कि हम लोगों के सुख-दुख में, उनकी मृत्यु आदि पर क्यों नहीं हिस्सा ले पाते। इसकी कुछ पंक्तियाँ हैं - &quot;यह ख्याल आता है अक्सर देर रात गये/ या आधी नीँद के बीच/ जैसे कोई पत्थर आज भी सीने में लुढ़कता रहता है/ आत्मग्लानी का भार लिए/&quot;।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/kaksaadmagazine/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;ककसाड़&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; के अगस्त अंक में मुझे &lt;b&gt;दिनेश शुक्ल&lt;/b&gt; की दो गज़लें पसंद आयीं। उनकी पहली गज़ल की यह पंक्तियाँ देखिये: &quot;यह चादर वक्त की जर्जर हवा से थरथराती है/ गरीबी पर लगी तुरपाइयाँ रह-रह उधड़ती हैं/&quot; और &quot;दुखी सपनों के किस्से, रात की टूटी हुई नींदें/ सुबह परछाईयाँ इक सीढ़ियाँ चढ़ती उतरती हैं/&quot;।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;और उनकी दूसरी गज़ल की पहली पंक्तियाँ भी मुझे बहुत अच्छी लगीं: &quot;किस्सा मत पूछिये, टूटी हुई थकानों का, इसके आगे है सफर, रेत के मकानों का।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अंत में&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;आज के इस आलेख के अंत में &lt;b&gt;तद्भव&lt;/b&gt; से &lt;b&gt;आकांक्षा बरनवाल&lt;/b&gt; के आलेख से कुछ अन्य पंक्तियां जो मुझे विचारनीय लगीं: &quot;जिस प्रकार 19वीं सदी के सुधारकों ने &#39;पौरुषहीन (effeminate) कहलाने के डर से अपने धर्म को &#39;कठोर&#39; और &#39;एकेश्वर वादी&#39; बनाने का प्रयास किया था, वैसा ही आज की राजनीति इतिहास-2 (लोक परंपरा और मिथक) को जबरन इतिहास-1 (तथ्यात्मक इतिहास) बनाने पर तुली है। दीपेश चर्कवर्ती कहते हैं कि गाँधी ने इतिहास-2 (लोक परंपरा, मिथक और भावनाओं) की भाषा बोली। जब गांधी ने रामराज्य कहा तो उसका मतलब किसी ऐतिहासिक समय या राजा की वापसी नहीं बल्कि राज्य की ऐसी परिकल्पना देना था जिसे किसान भी समझता था। जब गांधी ने नमक उठाया या चरखा चलाया, तो वह कोई आर्थिक सिद्धांत देने से अधिक भारत की आत्मा को छूना चाहते थे। ... आज के नेता इतिहास-1 की भाषा बोलते हैं। यहां तक कि जब वे धर्म की बात भी करते हैं तो उसे &#39;वैज्ञानिक&#39; सिद्ध करने में लगे रहते हैं ...लेकिन दोनों ही स्थितियों में वह पश्चिमी इतिहासबोध की ही नकल कर रहे हैं। यह सांस्कृतिक युद्ध तब तक शांत नहीं होगा जब तक हम गांधी की या जे. कृष्णमूर्ति की भांति उस हीन भावना से मुक्त नहीं हो जाते, जो हमें हर क्षण पश्चिम के समक्ष खुद को सही और ऐतिहासिक सिद्ध करने के लिए विवश करती है।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस बार जो पढ़ा उसमें मुझे &lt;b&gt;आकांक्षा बरनवाल&lt;/b&gt; के आलेख के अतिरिक्त &lt;b&gt;हँस पत्रिका&lt;/b&gt; का आदिवासी जीवन और साहित्य पर केन्द्रित अंक सबसे अधिक रोचक लगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/7402198474873926937/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/2.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/7402198474873926937'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/7402198474873926937'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/2.html' title='क्या पढ़ा (2) - कहानी, कविता, आलेख'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' 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href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;प्रारम्भ से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/30.html&quot;&gt;पिछला भाग पढ़िये&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi4qyBQK9wunInN7_CdAXPZkUSqOQ-HmdctwLkdOFsYDLx-11Ad7g-iROweb8Zb7e9jcX4Qg8ccngpMzkrYoI5VH4bZCe8XcKkwCixsVDDS4cJRZWWBHpjgYnE-FmSeUDGmmBdbDx1VMbzWy9cqoiwaoWAU1XFN-JrIyMqVL0pbaPussXJKb-rWUh7HOmSX/s600/Cover01_mini.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;600&quot; data-original-width=&quot;375&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi4qyBQK9wunInN7_CdAXPZkUSqOQ-HmdctwLkdOFsYDLx-11Ad7g-iROweb8Zb7e9jcX4Qg8ccngpMzkrYoI5VH4bZCe8XcKkwCixsVDDS4cJRZWWBHpjgYnE-FmSeUDGmmBdbDx1VMbzWy9cqoiwaoWAU1XFN-JrIyMqVL0pbaPussXJKb-rWUh7HOmSX/s320/Cover01_mini.jpg&quot; width=&quot;200&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 31&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अंतिम अध्याय&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;


	&lt;style type=&quot;text/css&quot;&gt;h1 { margin-bottom: 0.21cm; direction: ltr; orphans: 2; color: #000000; text-align: left; widows: 2; background: transparent; page-break-after: avoid }h1.western { font-weight: bold; so-language: it-IT; font-size: 18pt; font-family: &quot;Liberation Sans&quot;, sans-serif }h1.cjk { font-weight: bold; so-language: zh-CN; font-family: &quot;Noto Sans CJK SC&quot;; font-size: 18pt }h1.ctl { font-family: &quot;Noto Sans Devanagari&quot;; font-size: 18pt; so-language: hi-IN; font-weight: bold }p { margin-bottom: 0.25cm; direction: ltr; orphans: 2; color: #000000; widows: 2; line-height: 115%; text-align: left; background: transparent }p.western { font-family: &quot;Liberation Serif&quot;, serif; so-language: it-IT; font-size: 12pt }p.cjk { so-language: zh-CN; font-family: &quot;Noto Serif CJK SC&quot;; font-size: 12pt }p.ctl { font-size: 12pt; font-family: &quot;Noto Sans Devanagari&quot;; so-language: hi-IN }a:link { color: #000080; text-decoration: underline }&lt;/style&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Noto Sans Devanagari;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;hi-IN&quot;&gt;गँगटोक&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
	&lt;span style=&quot;font-family: Noto Sans Devanagari;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;hi-IN&quot;&gt;सिक्किम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;,
	24 &lt;span style=&quot;font-family: Noto Sans Devanagari;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;hi-IN&quot;&gt;अप्रैल
	&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;2026

&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“गँगटोक की पहाड़ी हवा बहुत अच्छी है, लेकिन यहाँ की ऊपर-नीचे जाती हुई सड़कों पर चलना थोड़ा कठिन है&quot;, गुरु जी बोले। वह त्री के साथ अखाड़े में बैठे थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री हँसा, बोला, “गुरु जी, मैं आप को जानता हूँ। आप अभी भी कमज़ोर हैं, लेकिन मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ कि और एक महीने के अंदर आप बिना थके, यहाँ से देवराली बौद्ध-विहार तक का पूरा चक्कर लगा कर आयेंगे। बस आप हर रोज, सुबह-शाम सैर करना नहीं छोड़िये।”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुरु जी भी मुस्कराये, बोले, “जब तुम छोटे थे तो मैं तुम्हें कहता था कि एक बार और कोशिश करो, मैं पक्का जानता हूँ कि तुम अगली बार इसे बेहतर करोगे। अब मैं बूढ़ा हूँ तो तुम मुझे वही सबक सिखाते हो।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;थोड़ी देर के बाद जब आभा वहाँ चाय ले कर आयी तो देखा कि वह दोनों शतरंज खेल रहे हैं। कुर्सी पास खींच कर वह उनके करीब बैठ कर उनका खेल देखनी लगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री ने चाय पीते हुए उससे पूछा, “ओरी से बात हुई?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आभा ने सिर हिला कर मना किया, बोली, “पिछले हफ्ते हुई थी। उसके बाद मैंने उसे मैसेज भी भेजे, लेकिन उसका उत्तर नहीं आया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुरु जी बोले, “चिंता नहीं करो बेटी, कुछ ही दिनों की बात है, उसने कहा है कि वह यहाँ आयेगा, और वह अपने वचन का पक्का है, जो कहता है, उसे अवश्य करता है।”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला, “गुरु जी, आप ने अच्छा प्लैन बनाया, एक तो हमें यामागुचि से छुट्टी मिल गयी, और साथ में आभा को ताकानोरी भी मिल गया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;क्या मतलब, कैसा प्लैन? मुझे भी बताओ”, वह बोली। मजूली से लौट कर वह मणिपुर में अपने गाँव चली गयी थी और कुछ दिन पहले ही उनके अनाथाश्रम में लौटी है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“कई दशकों से यामागुचि के आदमी गुरु जी का पीछा कर रहे थे। करीब दस साल पहले जब मैंने यहाँ यह अनाथाश्रम खोला, तब मैंने गुरु जी से यहाँ आने के लिए बहुत कहा, लेकिन वह नहीं माने। वह डरते थे कि यामागुचि के आदमी उन्हें खोजते हुए यहाँ भी आ जायेंगे और उनकी वजह से हमारे अनाथाश्रम के बच्चों की जान को खतरा हो जायेगा&quot;, त्री ने बताया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“माँ तारा की मेरी वह मूर्ति, जिसे मैं कोरिया से ले कर आया था और जिसे यामागुचि लेना चाहता था, दस साल पहले मैंने वह मूर्ति त्री को दे दी थी। तब से वह मूर्ति यहीं रखी है। हमने देखा था कि जब शक्ति वाले लोग साथ रहते हैं तो उनकी शक्ति बढ़ जाती है। यहाँ पर त्री ने उस मूर्ति के साथ कुछ नये प्रयोग किये जिससे हमें पता चला कि अगर हम बिना शक्ति वाले हरिताश्म पत्थरों को, माँ तारा की शक्तिवाहिनी मूर्ति के पास रखें तो उनमें शक्ति आ जाती है। वैसे ही हरिताश्म पत्थरों के आसपास अगर शक्ति वाले लोग रहें तब भी उन पत्थरों में भी शक्ति आ जाती है। लेकिन यह सभी हरिताश्म पत्थरों में नहीं होता। तब हमने उन पत्थरों की वैज्ञानिक जाँच करवायी, इससे पता चला कि हरिताश्म पत्थर कई तरह के होते हैं। कुछ पत्थरों के भीतर के क्रिस्टल ऐसे होते हैं कि उनमें शक्ति-लहरों के प्रभाव से शक्ति जमा होने लगती है। जैसे कि बैटरी में ऊर्जा भरते हैं, वैसे ही उनमें शक्ति भर जाती है&quot;, गुरु जी बोले।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री हँसा, बोला, “सबसे पहले इस बात को गार्गी ने पहचाना। एक दिन वह बोली कि हमारी नटराज की प्रतिमा में भी शक्ति महसूस होती है। हमने उस मूर्ति की जाँच की, तब समझे कि शक्ति पूरी मूर्ति में नहीं थी, केवल उसके हरिताश्म पत्थर के बने मोतियों में थी। दूसरी बात जो हम समझे, वह है कि अगर मूर्ति को शक्ति वाले लोगों का साथ नहीं मिले तो धीरे-धीरे उनकी शक्ति क्षीण हो जाती है। यानि यह शक्ति जल की तरह है, जब तक बहती रहती है, तभी तक जीवित रहती है। इसलिए हमने सोचा कि अगर यामागुचि उस मूर्ति के लिए इतना तरस रहा है, तो क्यों न हम उसे एक शक्ति वाली मूर्ति बना कर दें?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुरु जी बोले, &quot;पहले मैं डरता था कि अगर यामागुचि को वह प्रतिमा मिल गयी तो वह शक्ति का गलत कामों के लिए उपयोग कर सकता है। लेकिन त्री बोला कि केवल मूर्ति से उसका कुछ नहीं होगा, उसे शक्ति वाले बच्चे भी खोजने हैं और उन्हें खोजना इतना आसान नहीं है। इस तरह से त्री ने यह सारा प्लैन बनाया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला, “पहले मैंने सरस्वती की मूर्ति बनायी और उसमें हरिताश्म पत्थर के टुकड़े लगाये। उसे दिन में इस अखाड़े में रखते थे और रात को रंगनाथ, वसंत और माधव उसके पास सोते थे। करीब छह महीने पहले जब हमें लगा कि अब उस मूर्ति में शक्ति बहुत प्रबल हो गयी है तो हमने उसे डमरू द्वीप की गुफा में लगा दिया। फिर हमने गुरु जी के वीडियो बनाये और उन्हें फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, वगैरा पर चढ़ा दिया, और उनके साथ लिखा कि वह वीडियो एक कोरियन भिक्षुक के हैं। तब से हम प्रतीक्षा कर रहे थे कि यामागुचि के आदमी उसे देखें और वह किसी को गुरु जी को खोजने के लिए भेजे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;यानि, तुम दोनों ने यामागुचि को फसाने के लिए एक जाल फ़ैंका था, और उसने ताकानोरी को यहाँ भेज दिया। पर क्या गुरु जी की समाधी लेने में खतरा नहीं था?”, आभा ने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला, “मुझे मालूम है कि गुरु जी समाधी में एक महीने तक, कम अक्सीजन और खाने-पीने के बिना भी जीवित रह सकते हैं। लेकिन साथ ही हम लोग, विशेषकर गार्गी, दूर से ही गुरु जी के स्वास्थ्य पर नजर रखे हुए थे। मजूली के वृद्धाश्रम के पास वाले खण्डहर के नीचे जो गुरु जी का छुपा हुआ तहखाना है, वहाँ से गार्गी आसानी से गुरु जी की मानसिक लहरों को महसूस कर सकती थी। वह वहाँ से नियमित जाँच कर लेती थी कि गुरु जी की तबियत कैसी है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यानि, मुझे छोड़ कर तुम सबको मालूम था कि यह एक ड्रामा है?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री मुस्कराया, “यह पूरा ड्रामा नहीं था। हमने प्लैन बनाया था लेकिन उसकी हर चीज हमारे हाथ में नहीं थी। तुम्हारे अतिरिक्त, वसंत, माधव और तृप्ति को भी यह सब बातें पता नहीं थीं, तभी तो ताकानोरी जब तुम्हें पकड़ कर ले गया और उसने तुम्हारे दिमाग में देखा, फिर भी उसे कुछ पता नहीं चला। लेकिन काज़ीरंगा में हमारी गैंडों के तस्करों से टक्कर हो जायेगी, इस बात का हमें अंदाज़ा नहीं था, और न ही हमने सोचा था कि ताकानोरी एक गार्ड को बचाने के लिए एक तस्कर को मार देगा। हमें डमरू द्वीप पर इतने सारे घड़ियालों के इकट्ठा होने वाली बात का भी पता नहीं था। सौभाग्य से उस समय तुम हमारे साथ थीं, वरना हमारा सारा प्लैन बेकार हो जाता।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“और डमरू द्वीप की उस गुफा में छिपी हुई सीढ़ियाँ और नीचे जाने का रास्ता, क्या वह भी तुमने बनाया था? क्या तुम सचमुच वहाँ पर नयी मूर्ति लगाओगे?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला, “वह गुफा सचमुच बहुत पुरानी है और उसमें बने भित्तिचित्र आदिमानव के समय के हैं, हज़ारों साल पुराने हैं। सदियों से हर साल वहाँ पर दूर-दूर से तीर्थयात्री आते हैं। हमने वहाँ दीवार पर एक खाली जगह पर केवल घड़ियाल और गँगा का चित्र बनाया था। वह सीढ़ियाँ और तालाब वहाँ पर पहले से थे, और उस तालाब में एक पुरानी सरस्वती की मूर्ति लगी थी, हमने उसकी जगह पर वहाँ एक नयी मूर्ति रख दी और उसके ऊपर खुलने-बंद होने वाला गुप्त दरवाज़ा लगा दिया। अब वह सारी जगह जैसे पहले थी, बिल्कुल वैसी ही हो गयी है, क्योंकि ऐसी जगहें हमारी एतिहासिक और साँस्कृतिक सम्पदा हैं, हम उनकी रक्षा करना चाहते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुरु जी बोले, “मेरी आशा है कि यामागुचि उस मूर्ति को पा कर खुश होगा और अब वह मुझे भूल जायेगा। इसलिए अब मैं यहाँ आया हूँ और त्री और बच्चों के बीच में रह सकता हूँ। त्री ही मेरा परिवार है और बुढ़ापे में, उसके और छोटे बच्चों के साथ रह पाना, मेरे लिए बहुत सुखदायक है। मेरी यही कामना है कि हम लोग शक्तिवान बच्चों की एक सैना बनायें, जिसके तिरंगा यौद्धा अपनी शक्ति से निर्बल, शोषित और असहाय लोगों को आत्मनिर्भर बनने में सहायता करें, प्रकृति और वातावरण की रक्षा करें और इस पृथ्वी को ऐसा बेहतर स्थान बनायें जहाँ मानव के साथ-साथ, सभी प्राणी भी फलें-फूलें।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;थोड़ी देर के बाद जब गुरु जी सैर करने गये तो त्री आभा को अपनी शिल्पशाला में ले कर गया, बोला, &quot;देखो, यह मेरी नयी कलाकृति है, बताओ कैसी लगी?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आभा ने देखा कि उसकी नयी कलाकृति, ताँबे की दोमुही मूर्ति है, जिसमें एक ओर शिव जी हैं और दूसरी ओर महात्मा बुद्ध, और दोनों योगमुद्रा में हैं। उसने पूछा, “शिव और बुद्ध, एक साथ, क्या यह कोई नया एक्सपैरिमैंट कर रहे हो?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला , “मैं शिव का भक्त हूँ और गुरु जी बुद्ध के, इसलिए मैंने सोचा कि उन दोनों को एक साथ बनाऊँ। अंत में परमेश्वर तो एक ही है, हम मानव उसे भिन्न रूपों में देखते हैं और उसकी पूजा के भिन्न रीति-रिवाज़ अपनाते हैं। वैसे भी हमारे भारत में धर्मों के बीच में दीवारें नहीं हैं, बल्कि वह नदी की धाराओं जैसे हैं, जो कभी मिलती हैं, कभी अलग हो जाती हैं और अंत में सभी एक ही सागर की ओर जाती हैं। गुरु जी के साथ रह कर धर्म के बारे में मुझे यही समझ में आया है। यह मूर्ति इसी भाव को अभिव्यक्त करती है। लेकिन इस मूर्ति में एक और बात है, इसमें शिव जी और महात्मा बुद्ध, दोनों की आँखें हरिताश्म पत्थर की बनी हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह दोनों यही बातें कर रहे थे, जब तृप्ति भागती हुई आई, बाहर से ही चिल्ला कर बोली, “दीदी, तुम्हारे जापानी भैया आये हैं।&quot; त्री ज़ोर से हँसा, बोला, “ताकानोरी आ गया? लेकिन वह तुम्हारी दीदी का भैया नहीं है, तुम्हारा भैया है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दो मिनट बाद, बच्ची के पीछे-पीछे ताकानोरी भी वहाँ आया और सबसे पहले उसने आभा को बाहों में जकड़ा और उसके गाल पर चूमा। यह सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि आभा उसे रोक नहीं पायी, न कुछ कह पायी। त्री मुस्कराया तो आभा का चेहरा शर्म से लाल हो गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब ओरी ने देखा कि तृप्ति उन्हें बड़ी-बड़ी आँखों से देख रही थी, तो उसने उसकी ओर और फिर आभा की ओर हाथ जोड़ दिये, बोला, “सॉरी, तुम्हें देख कर … तुम इतने दिनों के बाद मिली हो, मुझसे रहा नहीं गया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह सभी लोग हँसते हुए अनाथाश्रम को पार करके वहाँ लगे वृक्षों की ओर बढ़े। वहाँ एक लकड़ी की कुटिया बनी थी। ओरी ने पूछा, “यह कौन सी जगह है?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला , “तुम्हें एक और व्यक्ति से मिलवाना है, जिससे तुम अभी तक नहीं मिले।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह लोग जब कुटिया के पास पहुँचे, तभी दूसरी ओर से त्री ने गुरु जी को सैर से लौटते देखा। उसने ओरी से कहा, “वह देखो कौन है? आओ, मैं तुम्हें अपने गुरु जी से मिलवाऊँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;कौन से गुरु जी?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जून-मिन गुरु जी, जिन्हें तुम खोजने आये थे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“लेकिन उन्होंने तो समाधी ले ली थी?” ओरी को विश्वास नहीं हुआ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“समाधी ली तो थी, लेकिन जब उनका लक्ष्य पूरा हो गया तो वह मेरे पास लौट आये, क्योंकि वह मेरे पिता समान हैं। उनका शरीर अभी भी बहुत कमज़ोर है, लेकिन उनके मन की शक्ति, वह बिल्कुल कमजोर नहीं हुई है&quot;, त्री ने उसके कँधे पर हाथ रख कर कहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी ने आगे बढ़ कर, तीन बार झुक कर गुरु जी का जापानी अभिवादन किया। बाद में आभा ने उसे मोबाइल पर गुरु जी के समाधी से बाहर निकलने का वीडियो दिखाया, तो वह बोला, “वीडियो में तो आप बहुत कमज़ोर दिखते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुरुजी&amp;nbsp; बोले, “यहाँ मैं तुम सब लोगों की शक्ति से घिरा हुआ हूँ, उसकी वजह से मुझे बहुत जल्दी स्वास्थ्य-लाभ हुआ है। तुम बताओ, तुम्हारे यामागुचि सान उस प्रतिमा से खुश हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी ने लम्बी साँस ली, बोला, “हाँ वह मूर्ति से खुश हैं लेकिन कहते हैं कि अब शक्तिवाले बच्चों को कैसे खोजें? उन्होंने मुझे कहा कि इस अनाथाश्रम के कुछ बच्चों को उठा कर जापान लाते हैं, तो मैंने तुरंत मना कर दिया, कहा कि उसके लिए उन्हें पहले मुझसे लड़ना पड़ेगा क्योंकि अब मैं उन बच्चों का रक्षक बन कर यहाँ रहूँगा। वह यह भी कह रहे थे कि त्री से पूछना कि क्या वह उनके लिए काम करेगा? त्री, अगर तुम उनके याकूज़ा बनना चाहते हो तो उनसे सीधा सम्पर्क करो, क्योंकि मैंने उनकी नौकरी को त्याग दिया है।”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शाम को जब अँधेरा हुआ तो आभा और ताकानोरी घूमते हुए अखाड़े में गये और वहाँ एक चबूतरे पर बैठ गये। वह बोला, “यहाँ पर, इस अखाड़े में कितनी शाँति है और यहाँ ऐसा लगता है जैसे कि हम एक शक्ति-धारा में स्नान कर रहे हैं, भीतर आत्मा तक मुझे यहाँ पर शक्ति की ऊर्जा महसूस हो रही है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आभा बोली, “हर रोज़ यहाँ पर त्री बच्चों को शक्ति-जागरण का अभ्यास करवाता है, और गुरु जी उन्हें ध्यान करना और मन को एकाग्र करना सिखाते हैं। यहाँ के कण-कण में शक्ति है। तुम चाहो तो तुम भी उनके विद्यार्थी बन सकते हो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी बोला, &quot;उसके बारे में बाद में सोचेंगे, पहले मुझे एक और महत्वपूर्ण काम करना है।&quot; वह उठा और उसके सामने एक घुटना मोड़ कर ज़मीन पर बैठ गया, उसके हाथ में एक अँगूठी थी, बोला, “तुमसे तीन महीने दूर रहा तो समझा हूँ कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आभा ने कनखियों से चबूतरे के पीछे दीवार में लगी माँ तारा की हरिताश्म प्रतिमा को देखा, मुस्करा कर बोली, “मैं भी यही सपना देख रही हूँ कि तुम मुझसे यह कहोगे। लेकिन अपनी अँगूठी देने में इतनी जल्दी नहीं करो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“क्यों?” ओरी के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “तुम मुझसे विवाह नहीं करना चाहती?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“क्या मैंने ऐसा कहा?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“तो तुमने मेरी अँगूठी क्यों नहीं स्वीकार की?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“क्योंकि मैं जल्दबाज़ी में कुछ नहीं करना चाहती। हम लोग कुछ दिन साथ रहे हैं, अभी हम एक दूसरे को ठीक से नहीं जानते। कुछ दिन साथ रहेंगे, एक दूसरे को जानेंगे, मैं तुम्हें अपने भैया से मिलवाऊँगी, और तुम्हें अपना गाँव दिखाने मणिपुर ले कर जाऊँगी, फिर आराम से यह निर्णय भी ले लेंगे।&quot;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;*****&lt;br /&gt;इति&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h1 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;पाठकों से एक निवेदन&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;आप ने मेरे उपन्यास को पढ़ा, इसके लिए धन्यवाद। यह आप को कैसा लगा, कृपया इस बारे में अपनी राय नीचे एक टिप्पणी लिख कर मुझे अवश्य दें।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्या आप त्री, ओरी, आभा और अनाथाश्रम के बच्चों के बारे में अन्य उपन्यास पढ़ना चाहेंगे? टिप्पणी में अपनी राय अवश्य लिखें।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगर आप चाहें तो मुझे ईमेल लिख कर भी बता सकते हैं कि यह उपन्यास आप को कैसा लगा। मेरा ईमेल का पता है - sunil.deepak@gmail.com&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धन्यवाद&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/2932340549197153477/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2932340549197153477'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2932340549197153477'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/blog-post.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अंतिम अध्याय'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi4qyBQK9wunInN7_CdAXPZkUSqOQ-HmdctwLkdOFsYDLx-11Ad7g-iROweb8Zb7e9jcX4Qg8ccngpMzkrYoI5VH4bZCe8XcKkwCixsVDDS4cJRZWWBHpjgYnE-FmSeUDGmmBdbDx1VMbzWy9cqoiwaoWAU1XFN-JrIyMqVL0pbaPussXJKb-rWUh7HOmSX/s72-c/Cover01_mini.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-4286416434018059304</id><published>2026-09-10T06:02:34.788+02:00</published><updated>2026-09-14T06:09:47.630+02:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उपन्यास"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कथा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धारावाहिक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुस्तक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 30</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;: प्रतिमा की खोज में त्री, आभा और ओरी डमरू द्वीप
 पहुँचे जहाँ पर शक्तिवान प्रतिमा एक गुफा में छिपी थी। द्वीप पर उतरना 
कठिन था क्योंकि बहुत से घड़ियाल थे। तब आभा ने अपनी शक्ति से उन्हें वहाँ से हटाया और फिर, त्री और ओरी उस द्वीप पर उतरे। वहाँ उन्हें एक गुफा में सरस्वती मां की एक शक्तिवान मूर्ति मिली, उसे ले कर वह मोटरबोट में लौटे। आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;प्रारम्भ से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/29.html&quot;&gt;पिछला भाग पढ़िये&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjhWuRIpRAQJWFS2XsPyzu9krbVJ1MImx6msQk2lS0JdSQLR59Pqn3u2q2NiCFIvZdMGMzPDJpi5UeWb6cn8uaIxQ1H2ghIcJx7vWf59qLMAuOh2k5VuuzDnQ7DRPdG5uZESc1xYqBO_5_H_mGzTd9PgNorQ3FcQj6K_a83o61xAg3JMA-tAGcq10_cySYa/s952/Tiranga_30.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 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याकूज़ा का शरीर और भाव ऐसे होने चाहिये कि उन्हें देख कर ही लोग डर जायें। अगर डराने से काम नहीं चलता तो याकूज़ा को मार-पिटाई भी करनी पड़ती है, विशेषकर प्रतिद्वंदियों के गुँडों की। जब बॉस कहें तो याकूज़ा किसी को जान से भी मार सकते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“लोगों का खून कर देते हैं? किसका?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“किसी को भी मार सकते हैं, हमारा काम प्रश्न पूछना नहीं है, आदेश का पालन करना है। याकूज़ा, वह सही-गलत की बहस में नहीं पड़ते, जिसे मारने का आदेश मिले और जिस तरह से मारने का आदेश मिले, उसे वैसे ही मार देते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“जिस तरह से मारने का आदेश मिले, इसका क्या मतलब है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“अगर किसी को चेतावनी देनी हो कि वह लोग हमसे डर कर रहें, तो हम खुले आम, लोगों के बीच में भी किसी का सिर काट सकते हैं। अगर किसी को केवल रास्ते से हटाना है तो उसे चुपचाप, दूर से गोली भी मार सकते हैं। कभी-कभी किसी को ऐसे मारते हैं कि वह एक्सीडैंट लगे। यह बॉस के आदेश पर निर्भर करता है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;औरतों और बच्चों को भी?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने सिर हिला कर मना किया, बोला, “मैं छोटे बच्चों को नहीं मारता और औरतों को मारने से पहले कारण पूछता हूँ, अगर ठीक नहीं लगे तो मना कर देता हूँ। वैसे मैंने अभी तक किसी औरत को नहीं मारा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“तुम इस रास्ते पर कैसे आये?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“यामागुचि दादा जी, अक्को में हमारे पड़ोसी थे। वहाँ उनका परिवार जूएखाने चलाता था और उन्होंने बहुत पैसा बनाया था। मेरे पिता उनके लिए काम करते थे। जब वह गुज़र गये तो यामागुचि सान ने मेरी माँ को घर चलाने का पैसा दिया और मुझे स्कूल भेजा। जब मैं थोड़ा सा बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे अपनी छत्रछाया में ले लिया। उन्होंने मेरी शक्ति को पहचाना और मुझे याकूज़ा बनने की शिक्षा और प्रशिक्षण दिलवाया, उसके बाद मैं उनका याकूज़ा बन गया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“और अब, इस काम के बाद?”, त्री ने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह मुस्कराया, बोला, &quot;यह मूर्ति उन्हें दे कर मैं उनका ऋृण चुका दूँगा। जैसे तुम्हारे गुरु जी कहते हैं, शायद शक्ति का उपयोग दुनिया के भले के लिए करना बेहतर है। अगर हो सकेगा तो मैं कुछ समय भारत में तुम लोगों के साथ बिताना चाहता हूँ। यह मूर्ति उन्हें दे कर, मैं तुम्हारे यहाँ लौट कर आऊँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उन्होंने मोटरबोट में ही खाना खाया, तब ओरी आभा के पास बैठा था, उससे बातें कर रहा था। गार्गी ने त्री से धीरे से कहा, “दादा, मेरे विचार में इन दोनों का मामला फिट हो गया है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“क्या आभा को भी वह अच्छा लगता है?” उसने पूछा तो गार्गी ने सिर हिला कर हामी भरी।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;बच्चों को मजूली उतार कर, त्री और आभा, ओरी को छोड़ने नारायणपुर गये। बच्चों से विदा लेते हुए ताकानोरी ने कहा, “एक दिन मैं तुम्हारे अनाथाश्रम में तुम लोगों के साथ रहने आऊँगा। तब मैं तुम्हें जूदो, आइकीदो, जिजुत्सु, वगैरा जापानी मार्शियल आर्टस् और लड़ाई करना सिखाऊँगा। अगर तुम सचमुच के योद्धा बनना चाहते हो तो केवल शक्ति से काम नहीं चलेगा, योद्धा को लड़ना भी आना चाहिये।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;नारायणपुर में घर पहुँच कर, ओरी ने जापान में अपने बॉस को वीडियो-कॉल किया और उसे सरस्वती माँ की मूर्ति दिखायी, बताया कि उसने मूर्ति को जाँचा है और स्वयं उस मूर्ति की प्रबल शक्ति को महसूस किया है। बोला, “इस प्रतिमा के पास रहो तो मन में शाँति की अनुभूति होती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जापान लौटने के लिए जब ओरी ने अपना सामान पैक कर लिया, तब तीनों ने साथ बैठ कर रात का खाना खाया। ओरी ने सबके लिए रामेन का सूप बनवाया, बोला, “अभी मेरे पास इन जापानी नूडल्स के बहुत सारे पैकेट बचे हुए हैं, मैं उन्हें तुम्हारे लिए छोड जाऊँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “हम इसमें सब्जियाँ, मिर्ची, मसाला डाल कर इस रामेन को अपने तरीके से बनायेंगे और जब तुम लौट कर आओगे तब तुम्हें हिन्दुस्तानी रामेन खिलायेंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अगले दिन सुबह ताकानोरी को कलकत्ता के लिए रवाना होना है, जहाँ से उसे जापान के लिए हवाई जहाज़ मिलेगा।&lt;br /&gt;*&lt;br /&gt;ओरी से विदा ले कर, त्री और आभा को वृद्धाश्रम में लौटे हुए करीब आधा घंटा हुआ था और वे दोनों कैंटीन में बैठ कर जगदीश बाबू के साथ चाय पी रहे थे जब अचानक मन्दिर की घंटियाँ बजने लगीं। घंटियों की आवाज़ कैंटीन में भी स्पष्ट आ रही थी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जगदीश बाबू घबरा कर उठ खड़े हुए, बोले, “ऐसी घंटियाँ की ध्वनि तो मैंने यहाँ पहले कभी नहीं सुनी थी, शायद कोई तूफान आ रहा है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “जगदीश बाबू, मेरे विचार में यह घंटियाँ गुरु जी बजा रहे हैं और कह रहे हैं कि उनकी समाधी समाप्त हो गयी है।&quot;&lt;br /&gt;जगदीश बाबू को विश्वास नहीं हुआ, बोले, “इतने दिनों तक धरती में दबे रहने के बाद भी क्या जामुन बाबा जीवित हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह तीनों उठ कर बाहर आये तो देखा कि वृद्धाश्रम के अन्य बहुत से लोग उनकी तरह वहाँ खड़े हो कर मंदिर की ओर देख रहे थे। वह तीनों मंदिर की ओर आगे बढ़े तो उनके पीछे-पीछे अन्य लोगों की भीड़ भी आ गयी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री मंदिर वाली पहाड़ी की सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गया। उसके पीछे-पीछे बाकी के सब लोग आ रहे थे। उसने हाथ उठा कर लोगों से रुकने का इशारा किया, फिर बोला, “गुरु जी जिस तपस्या के लिए समाधी में लीन हुए थे, उनकी वह तपस्या पूरी हुई है। यह घंटियाँ उनके प्रभाव से बज रही हैं, वह कह रहे हैं कि उनकी समाधी का समय समाप्त हो गया है, वह हमारे जगत में लौट रहे हैं। जगदीश बाबू, तुरंत उन मजदूरों को बुलाईये, जिन्होंने गुरु जी की समाधी बनायी थी।&quot; उसके यह कहने के बाद मंदिर की घंटियाँ बजनी अपने आप थम गयीं।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जगदीश बाबू ने मजदूर बुलाने के लिए लोग भेजे, फिर बोले, “जब ताकानोरी ने इस समाधी को खुलवाने की कोशिश की थी तो वह इसे नहीं खोद पाये थे, तो अब यह मजदूर क्या इसे खोल पायेंगे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री हँसा, “जब गुरु जी कह रहे हैं कि उनकी समाधी पूर्ण हो गयी तो अब इसे खोदनें में कोई कठिनाई नहीं आयेगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;इस बार मजदूरों को समाधी का पत्थर हटाने में ज़रा सी भी दिक्कत नहीं हुई। समाधी का बक्सा करीब दस फुट मिट्टी के नीचे दबा था, वहाँ से उस मिट्टी को हटाने में करीब दो घंटे लगे। जब वह बक्से तक पहुँचे तो मैदान लोगों से भर चुका था और यह सुन कर कि बाबा की समाधी का बक्सा दिखने लगा है, उन लोगों ने &quot;जामुन बाबा&quot; का नाम जपना शुरु कर दिया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आसपास की सारी मिट्टी हटाने और बक्से को बाहर निकालने में करीब आधा घंटा और लगा। उसके आगे-पीछे रस्सियाँ लपेट कर मजदूरों ने डिब्बे को ऊपर उठाया तो उत्तेजित हो कर सब लोग चिल्लाने लगे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने आगे बढ़ कर बक्से के पाट खोले, भीतर उसके गुरु जी पद्मासन में आँखें बंद किये बैठे थे, उनकी गोद में उनकी भिक्षा का कटोरा था और उसमें तारा की मूर्ति थी। सारे मैदान में सन्नाटा छा गया। लोग हाथ जोड़ कर उस दृश्य को देख रहे थे। त्री ने झुक कर अपने गुरु जी के चरण छूए लेकिन गुरु जी बहुत देर तक वैसे ही बिना हिले-डुले बैठे रहे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;फिर उनकी पलकें थरथराईं और उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं, सारे मैदान में &quot;जय जामुन बाबा&quot; की ध्वनि गूँज उठी, लोग तालियाँ बजाने लगे, कुछ लोग भावविभूत हो कर रोने लगे। गुरु जी कुछ देर तक चुपचाप सबको देखते रहे फिर उन्होंने बक्से के बाहर टाँगें निकाली और बाहर निकल आये, त्री ने उन्हें खड़े होने के लिए सहारा दिया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा और जगदीश बाबू, दोनों ने झुक कर उनके पैर छूए। वह पहले भी दुबले-पतले थे, लेकिन अब वह इतने कमज़ोर हो गये थे कि उनके शरीर की सभी हड्डियाँ दिख रही थीं, लगता था कि हड्डियों और चमड़ी के बीच में माँसपेशियाँ बिल्कल ही नहीं हों।&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गुरु जी चुपचाप बिना किसी सहारे के मंदिर की ओर बढ़े, हाथ उठा कर उन्होंने बाहर वाला घंटा बजाया, फिर मंदिर की ओर नमन किया और हाथ ऊपर उठा कर मैदान में खड़े लोगों का अभिवादन किया। फिर वह त्री की ओर मुड़े, बोले, “बेटा, मैं थक गया हूँ, मुझे घर ले चलो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;एक हाथ त्री के कँधे पर और दूसरा आभा के कंधे पर रख कर, वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरे और लोगों की भीड़ के बीच में अपने घर की ओर चले। जिस जगह वह पैर रख रहे थे, बहुत से लोग उस जगह से मिट्टी ले कर उसे अपने माथे पर लगा रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;घर के प्रांगण में बच्चे उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। रंगनाथ, गार्गी, वसंत, माधव और तृप्ति ने उन्हें प्रणाम किया और उन्होंने सबके सिर पर प्यार से हाथ रख कर सहलाया। जब तृप्ति की बारी आयी तो वह धीरे से बोले, “तुमने कितनी ज़ोर से घंटियाँ बजायीं, ज़मीन के नीचे से भी मुझे उनकी गूँज सुनाई दे रही थी।&quot; तृप्ति खुश हो कर मुस्करायी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गुरु जी ने कुछ फलाहार किया और थोड़ा सा दूध पिया, फिर उन्होंने जगदीश बाबू को पास बुलाया, बोले, “अब यहाँ पर मेरा काम समाप्त हो गया है। प्रभु ने मुझे अपना बाकी का जीवन, प्रार्थना में बिताने की आज्ञा दी है। कुछ दिनों में मैं यहाँ से चला जाऊँगा। अब यह वृद्धाश्रम आप को और यहाँ के रहने वाले लोगों को ही चलाना होगा।”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जगदीश बाबू रोने लगे, बोले, “बाबा, आप ने इस आश्रम को जन्म दिया है, आप की कृपा से मेरे जैसे लोगों को, जिनके परिवार नहीं हैं या जिन्हें उनके बच्चे अकेला छोड कर चले गये हैं, हमें गरिमा से जीने का मौका दिया है। आप के बिना हम इसकी ज़िम्मेदारी कैसे उठायेंगे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गुरुजी मुस्कराये, बोले, “जब मैंने समाधी ली थी, तब नहीं जानता था कि इस समाधी से लौटूँगा या नहीं। तब आप ने मेरा निर्णय स्वीकार किया था और वृद्धाश्रम को चलाने की ज़िम्मेदारी ली थी, तो अब क्या हो गया? हम वृद्ध अवश्य हैं, लेकिन निस्सहाय नहीं हैं, और दुनिया का कोई काम ऐसा नहीं है जिसे हम लोग नहीं कर सकते। क्या आप इस बात को भूल गये हैं? आप के साथ आप का सहकारी संघ है, आप के साथी हैं, मुझे पूरा विश्वास है कि आप के नेतृत्व में यह वृद्धाश्रम और भी समृद्ध तथा विकसित होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/blog-post.html&quot;&gt;अगला (अंतिम) अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/4286416434018059304/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/30.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4286416434018059304'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4286416434018059304'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/30.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 30'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjhWuRIpRAQJWFS2XsPyzu9krbVJ1MImx6msQk2lS0JdSQLR59Pqn3u2q2NiCFIvZdMGMzPDJpi5UeWb6cn8uaIxQ1H2ghIcJx7vWf59qLMAuOh2k5VuuzDnQ7DRPdG5uZESc1xYqBO_5_H_mGzTd9PgNorQ3FcQj6K_a83o61xAg3JMA-tAGcq10_cySYa/s72-c/Tiranga_30.jpg" height="72" 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था क्योंकि बहुत से घड़ियाल थे। तब त्री ने आभा को&amp;nbsp; दिखाया, कि कैसे वह घड़ियालों से सम्पर्क करके उन्हें वहाँ से जाने के लिए कह सकती थी। जब आभा वह करना सीख गयी तो त्री और ओरी डमरू द्वीप पर उतरने के लिए तैयार हो गये। आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;प्रारम्भ से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/28.html&quot;&gt;पिछला भाग पढ़िये&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiCHLDsqa4bwEex6ksI25oIsITl4H5f7MwM3t37v8z7hMhuG4UvhxjExU9qz8r11h6Je5Tmr6Kv3z1dsoxRRHLqUQ4rzjAlJR_6fAaKQ5n4xZNdAhaC-e20F3rZAfUuiDUxNPPtCTxV28m4QwmvnPmFqktBggYUkmFxvgrBrwtjDLc-NJCHs92XwlWxRZL3/s345/Tiranga_29.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; 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उसे साथ खींचता हुआ तेज़ी से पहाड़ी की ओर बढ़ा। पहाड़ी के बीच-बीच में कुछ काली नुकीली चट्टानें निकल रही थीं, उन पर पैर टिका कर वह दोनों तेज़ी से ऊपर चढ़ गये। वहाँ पहुँच कर देखा कि ऊपर कोई घड़ियाल नहीं थे, तो त्री ने मुड़ कर मोटरबोट की ओर हाथ हिला कर इशारा किया, और उन्हेंं वहाँ से जाने के लिए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;घड़ियालों से बच कर निकल आने से ओरी भी खुश हो गया, बोला, “आभा की शक्ति तो बहुत काम की है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने अपनी जेब से वसंत का बनाया नक्शा निकाला जिस पर गुफाएँ बनी हुई थीं और उसे ओरी को दिखाया, बोला, “इस समय, यहाँ पर हम लोग डमरू के बीच के संकरे हिस्से में हैं, जबकि यह गुफाएँ द्वीप के उत्तरी और दक्षिणी किनारों की ओर हैं। हमें चुनना है कि हम उत्तर से शुरु करें या दक्षिण से, तुम क्या कहते हो, हम किस ओर जायें?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “अगर मुझे गुफाओं को नम्बर देना हो तो मैं बायें से, यानि दक्षिण से शुरु करूँगा। इसलिए हमें बायें जा कर, वहाँ से गिन कर, चौदही गुफा को खोजना चाहिये। अगर उसमें मूर्ति नहीं मिलेगी, तो हम उत्तर से शुरु करके चौदहवीं गुफा को खोज सकते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री कुछ नहीं बोला, तुरंत बायीं दिशा में चल पड़ा। ओरी उसके पीछे-पीछे आया, बोला, “क्या यह सब ब्रह्मपुत्र नदी के द्वीप हैं? यह नदी तो बहुत बड़ी लगती है, इसका पाट कई किलोमीटर चौड़ा लगता है।”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“हाँ, यहाँ पर नदी का पाट छह-सात किलोमीटर चौड़ा है और यह नदी धाराओं में बँट कर बह रही है, इसलिए धाराओं के बीच में इसमें बहुत से द्वीप हैं&quot;, त्री ने बताया, “लेकिन जब बारिश का मौसम आता है, तब नदी के पानी का स्तर बढ़ जाता है और छोटे वाले सारे द्वीप पानी में पूरे डूब जाते हैं। केवल यह बड़े द्वीप, जहाँ पहाड़ियाँ है, चट्टाने हैं, यह पूरे नहीं डूबते और तब इस डमरू द्वीप पर उतरना कठिन हो जाता होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;पंद्रह-बीस मिनट तक चल कर जब वह गुफाओं वाले हिस्से में पहुँचे तो देखा कि वहाँ की चट्टानें सफेद, सलेटी और मटमैले से हरे रंग के पत्थर की थीं, और वह पहले वाली काली चट्टानों की तरह नुकीली भी नहीं थीं। सदियों की सीली हवा और पानी की वजह से घिसते-घिसते उन चट्टानों का नुकीलापन खत्म हो गया था। वहाँ ऊँची-नीची पहाड़ियाँ थीं, जिनके बीच में गुफाएँ दिख रही थीं। गुफाओं के बीच में पगडँडियाँ दिख रही थीं।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने इशारा किया और बोला, “इन पगडँडियों को देखो, इनका मतलब है कि यहाँ पर श्रद्धालु आते हैं। शायद वह घड़ियाल यहाँ सारा साल नहीं रहते, केवल अँडे देने के समय आते हैं और फिर चले जाते हैं। क्योंकि अगर वह घड़ियाल यहाँ सारा साल रहते हों तो तीर्थयात्री यहाँ नहीं आ सकते।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “मैंने गिना है, उधर तीन गुफाए हैं, यह सामने वाली चौथी गुफा है। ऐसे गिन कर हमें चौदह नम्बर की गुफा को पहले देखना चाहिये। मैंने अन्वेषण-किरण से देखा है, उस ओर से मुझे शक्ति का एक प्रबल स्रोत दिख रहा है। इसका मतलब है कि हम सही जगह पर आये हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री को पीछे छोड़ कर, अब ओरी तेज़ी से आगे बढ़ा, वह उस मूर्ति को देखने के लिए बेचैन था। जब उसे चौदहवीं गुफा दिखी तो सीधा उसमें घुस गया। उस गुफा का रास्ता कुछ नीचे जा कर था और उसका द्वार थोड़ा छोटा था, उसमें घुसने के लिए उसे नीचे झुकना पड़ा। भीतर पहुँचा तो देखा कि गुफा का कक्ष बहुत बड़ा है और उसकी छत में एक छेद है जहाँ से भीतर सूरज की रोशनी आ रही है। गुफा की खुरदरी दीवारों पर कत्थई खड़िया मिट्टी और सफेद चूने से आदिमानवों के बनाये चित्र दिख रहे थे, जिनमें विभिन्न पशु-पक्षी और उनका शिकार करते हुए मानव दिख रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब त्री वहाँ पहुँचा तो देखा कि ओरी एक खाली गुफा में खड़ा है, वहाँ कोई मूर्ति नहीं दिख रही थी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “इस गुफा की धरती के भीतर एक शक्ति-स्रोत छुपा हुआ है, मैं उसे महसूस कर सकता हूँ, लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि उसका रास्ता कहाँ से है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री हँसा, बोला, “तुम वह कविता भूल गये? उसमें गुरु जी पूछते हैं कि त्रिनेत्र कहाँ है? इसका मतलब है कि मेरे बिना तुम्हें वह मूर्ति नहीं मिलेगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह घूम कर गुफा की दीवारों को देखने लगा, बोला, “देखो, क्या कहीं पर शिव जी का कोई चिन्ह दिख रहा है? गुरु जी जब त्रिनेत्र के बारे में पूछ रहे हैं, इसका मतलब है कि हमें इस गुफा में शिव जी के किसी चिन्ह को खोजना है।”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी को पता नहीं था कि शिव जी कौन से चिन्ह होते हैं, उसे त्री की बात समझ में नहीं आई, तो त्री बोला, “त्रिशूल, डमरू या नाग देवता या चंद्रमा, यह सभी शिव जी के चिन्ह हैं, क्या गुफा की दीवारों पर इनमें से कुछ दिख रहा है?”&lt;br /&gt;दोनों गुफा में घूम-घूम कर चित्रों को देखने लगे, तब ओरी बोला, “देखो, इधर एक घड़ियाल बना है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री वहाँ गया तो देखा कि वहाँ घड़ियाल के ऊपर लम्बे बालों वाली एक युवती की आकृति बनी है, बोला, “हाँ, यही है शिव जी का चिन्ह, गंगा माँ और उनका वाहन घड़ियाल। गंगा माँ भी शिव जी की जटाओं में ही रहती हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसने पास जा कर गंगा की आकृति पर हाथ के सामने हाथ फिराया तो पीछे से सर्र-सर्र की आवाज़ आयी और गुफा के बीचों-बीच, ज़मीन में एक रास्ता खुल गया।&amp;nbsp; वहाँ से नीचे जाती हुई बारह सीढ़ियाँ दिख रही थीं और अंत में एक छोटा सा गोल तालाब बना था, जिसके बीच में सफेद पत्थर की, हँस पर बैठी हुई, वीणावादिनी सरस्वती की मूर्ति लगी थी। ओरी ने महसूस किया कि उस मूर्ति से शक्ति का प्रचंड स्पंदन निकल रहा था, वह तुरंत सीढ़ियाँ उतर कर नीचे गया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री थोड़ी देर तक ऊपर ही खड़ा रहा, फिर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर कर नीचे पहुँचा तो देखा कि ओरी सरस्वती प्रतिमा के सामने हाथ जोड़े हुए, आँखें बंद करके खड़ा है। वह भी उसके पास जा कर हाथ जोड कर खड़ा हो गया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;कुछ देर के बाद जब त्री ने आँखें खोलीं तो देखा कि ओरी की आँखों से आँसू बह रहे हैं। वह कुछ नहीं बोला।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी&amp;nbsp; उसी जगह पर घुटनों के बल बैठ गया, धीरे से बोला, “इस शक्ति में स्नान करना मेरे लिए अभूतपूर्व अनुभव है। मुझे लगता है कि शक्ति की लहरें मेरे भीतर, मेरे तन और मन के सभी घावों को भर कर मुझे शांति दे रही हैं। इस पवित्र मूर्ति को क्या यहाँ से ले जाना उचित होगा?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “मैंने तुम्हें बताया था न कि यह मूर्ति गुरु जी ने पाँच साल पहले बनवायी थी। माँ तारा की हरिताश्म मूर्ति इससे बहुत छोटी थी, उसके अधिकतर टुकड़े इस प्रतिमा में लगे हैं, जैसे कि उनके माथे की बिन्दी में, उनके गले के हार में और उनकी करधनी के मोतियों में। तुम इसे लेने आये हो, ले जाओ, मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि कुछ महीनों में इस जगह पर मैं अपने हाथों से माँ सरस्वती की ऐसी ही एक नयी मूर्ति बना कर लगाऊँगा ताकि श्रद्धालुओं की पूजा में बाधा नहीं आये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी चुपचाप मूर्ति को देखता रहा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “अब मुझे गुरु जी की कविता की वह पंक्ति समझ में आयी जिसमें वह सती के पर्वतराज के यहाँ लौटने की बात करते हैं। सती यानि पार्वती, वह हिमालय पर्वत की बेटी और शिव की पत्नि थीं और अपने पिता के घर यज्ञ के लिए लौटी थीं। शायद गुरु जी कहना चाहते हैं कि उसी तरह से माँ सरस्वती भी प्रकृति का हिस्सा बन कर यहाँ पर लौटी हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “मैं इस मूर्ति को यहाँ से नहीं ले जा सकता, मैं इसे नहीं तोड सकता। मुझे लगता है कि इस पवित्र जगह से इस मूर्ति को हटाना पाप होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री मुस्कराया, बोला, “तुम्हें कुछ तोड़ना नहीं पड़ेगा। मैं अपने गुरु जी को जानता हूँ। अगर वह नहीं चाहते कि तुम इस प्रतिमा को यहाँ से ले कर जाओ, तो वह उस कविता को लिख कर नहीं जाते। उन्होंने ही हमें यहाँ पर आने का रास्ता दिखाया है, तुम संकोच मत करो। इस प्रतिमा को उठा कर देखो, यह आसानी से उठ जायेगी, तुम्हें कुछ तोड़-फोड़ करने की आवश्यकता ही नहीं होगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब उसने देखा कि ओरी वहाँ पर निश्चल खड़ा है, आगे नहीं बढ़ रहा, तो त्री उस तालाब में घुसा। उसका पानी गहरा नहीं था। पानी के बीच में जा कर उसने माँ के चरणों में सिर झुका कर प्रणाम किया, फिर उसे दोनों हाथों में उठा कर अपने सिर पर रख लिया। वह प्रतिमा पत्थर के चबूतरे पर रखी हुई थी, उससे जुड़ी हुई नहीं थी, इसलिए आसानी से उठायी गयी। वह भीतर से खोखली थी, इसलिए भारी नहीं थी और उसे उठाना आसान था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तालाब से निकल कर त्री सीढ़ियाँ चढ़ने लगा, लेकिन ओरी अपनी जगह से नहीं हिला, वह मूर्ति की खाली जगह को देख रहा था और उसके आँसू नहीं रुक रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने उसे कहा, “तुम अपनी आँखें बंद करके, उस मूर्ति के स्थान को अपने मन की दृष्टि से देखो, तुम्हें उस खाली जगह पर एक ज्योति की लौ दिखेगी।&quot; वह ऊपर आया और मूर्ति के साथ ज़मीन पर बैठ गया, बोला, “मैं सोचता था कि इन पाँच साल में, इसकी शक्ति हम सबसे दूर रह कर कमज़ोर हो गयी होगी, लेकिन यह तो अब भी बहुत प्रबल है। इसे छूने में एक अजीब से अनुभूति होती है, लगता है कि जैसे शक्ति की धारा मेरे भीतर बह रही हो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी कुछ देर तक तालाब के पास आँखें बंद करके बैठा रहा। जैसा कि त्री ने कहा था, आँखें बंद करके उसे मूर्ति की जगह पर एक ज्योति-पुंज दिख रहा था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब वह ऊपर आया तो उसने देखा कि छत के छेद से आने वाली सूर्य की किरणें सीधा मूर्ति पर पड़ रही थी और उसके साथ ज़मीन पर बैठा, मुस्कराता हुआ त्री भी उसी रोशनी में प्रज्जवलित हो रहा था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी उसे देखता रह गया, फिर धीरे से बोला, “यह एक दिव्य प्रतिमा है और यामागुचि बड़ा गुँडा है। उसके जूआघर हैं, वह युवतियों को वैश्या बनवा कर उनसे धँधा करवाता है, और नवजवानों को नशा बेचता है, इस दिव्य प्रतिमा को उसके पास ले कर जाना क्या सही होगा?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “मेरे गुरु जी कहते हैं कि हर बात में हमें मैं, मेरा, मुझे, वगैरा नहीं सोचना चाहिये। हमें याद रखना चाहिये कि हम केवल निमित्त हैं, हमारे पीछे इच्छा माँ तारा, बौद्धिसत्व और माँ सरस्वती की है। शायद वह तुम्हारे यामागुचि सान के जीवन की दिशा बदलना चाहते हैं, इसीलिए गुरु जी चाहते हैं कि तुम यह प्रतिमा उनके पास ले कर जाओ।”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने आगे बढ़ कर प्रतिमा को छुआ, बोला, “मैं मां के सिर की कसम खाता हूँ कि इसके बाद मैं यामागुचि के याकूज़ा के जीवन को त्याग दूँगा। इस मूर्ति को उनके पास ले जा कर, मेरा और उनका रिश्ता समाप्त हो जायेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री उठ कर खड़ा हुआ, उसने प्रतिमा को उठाया और उसे ताकानोरी को दिया, बोला, “डरो नहीं, इसे हाथ में ले कर देखो। सौभाग्य से नियति ने तुम्हें यह मौका दिया है कि तुम इसकी शक्ति को अपने तन-मन और अंतरात्मा में महसूस करो, इस मौके को व्यर्थ मत जाने दो। चलो, अब हम वापस चलें।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;फिर वह गुफा की दीवार पर बने गँगा माँ और घड़ियाल के चित्र की ओर गया और उसके सामने हाथ फेरा, तो सर्र-सर्र की आवाज़ से ज़मीन में खुला रास्ता फिर से बंद हो गया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह दोनों गुफा से बाहर निकले और मोटरबोट की ओर चल पड़े। उन्हें वहाँ पर आये हुए करीब एक घंटा हुआ था लेकिन उन्हें लग रहा था मानो वह वहाँ पर बहुत समय से हों। ओरी ने मूर्ति को अपनी छाती से लगाया हुआ था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब वह द्वीप के घड़ियालों वाले तट के पास पहुँचे तो त्री ने पहाड़ी से हाथ हिला कर आभा को इशारा किया, क्योंकि वह रास्ता फिर से घड़ियालों से भर गया था। आभा ने ध्यान लगाया तो थोड़ी देर में ही घड़ियाल उनका रास्ता छोड कर एक ओर चले गये।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;मोटरबोट की ओर जाते हुए त्री बोला, “थोड़े से अभ्यास से ही, आभा उन घड़ियालों से सम्पर्क बनाने में कुशल हो गयी है। अब उसकी शक्ति का विकास और भी आसान हो जायेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/30.html&quot;&gt;अगला भाग पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/4727204097190402934/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/29.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4727204097190402934'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4727204097190402934'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/29.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 29'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail 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scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 28</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;: प्रतिमा की खोज में त्री और ओरी लखमीपारा गाँव के पास 
शंखासुर की पहाड़ी देखने जा रहे थे, तब रास्ते में उनका सामना कुछ गैंडों के
 सींग चुराने वाले तस्करों से हो गया, जो एक फॉरैस्ट गार्ड को मार रहे थे। 
ओरी उस गार्ड को बचाने के लिए गया और तस्करों से लड़ने लगा। लड़ाई में एक 
तस्कर की मृत्यु हो गयी, त्री और ओरी वहाँ से भागे। वसंत ने पेड़ों से बात करके बताया कि शंखासुर पहाड़ी के क्षेत्र में कोई गुफाएँ नहीं हैं। गार्गी ने कहा कि उसके अनुसार वह गलत दिशा में खोज रहे थे और उन्हें डमरू द्वीप दिखाया, जहाँ बहुत सी गुफाएँ थीं। आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;प्रारम्भ से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/27.html&quot;&gt;पिछला भाग पढ़िये&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh6awiWpl8yeqCgyt7AkCoGb685tpg4Bhsol-OJUoCqADCT3MsdH0v2JNy3mPmeKfTjcjTpjjpHBjHD0i6xt5EFe8g08VeNJCYV6REQXYCIuXCdb6Sou9uJ2QSx2INDubHqLorzDM_ka2ZhLghweQ_dFV9W74cTYpGcpseJkZDCiji6zrB4uPTjcWWpFRcT/s864/Tiranga28.jpg&quot; 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अंबर के सप्त ऋषि&amp;nbsp;&lt;br /&gt;कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की&lt;br /&gt;लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?&lt;br /&gt;वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर बोली, &quot;मेरे विचार में हमने कविता की पहली और अंतिम पंक्तियाँ सही समझी हैं, यानि कि हम काज़ीरंगा की बात कर रहे हैं। लेकिन &#39;पद्मा की कमल अँजुरी&#39; का अर्थ लखमीपारा नहीं है, बल्कि लखमी चापोड़ी द्वीप है। इस नक्शे में देखो, उसके नीचे इस छोटे द्वीप की आकृति क्या शंख से नहीं मिलती? और जहाँ पर शंख की नोक है, ठीक उसके नीचे वाले द्वीप की आकृति आधे डमरू जैसी नहीं है?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री ने टैबलेट ली, देखा और हँसा, बोला, “शाबाश गार्गी, शायद तुमने गुरु जी की पहेली को सही पहचाना है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी बोला, “मुझे भी दिखाओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गार्गी काज़ीरंगा आरक्षित क्षेत्र के पास ब्रह्मपुत्र नदी के द्वीपों की बात कर रही थी। उसने वसंत से कहा, “यह डमरू वाला द्वीप यहाँ से दक्षिण दिशा में है, तुम उस द्वीप के पेड़ों से पूछो कि वहाँ कोई गुफाएँ हैं या नहीं?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसंत ने आँखें बंद करके ध्यान लगाया, और कुछ क्षणों के बाद आँखें खोल कर बोला, “वहाँ पर बहुत सारी गुफाएँ हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी उत्साहित हो कर बोला, “वह जगह यहाँ से बहुत दूर नहीं है, चलो हम अभी, इसी समय वहाँ चलते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री ने एक मिनट के लिए सोचा, फिर बोला, “सबको वहाँ ले जाने की आवश्यकता नहीं है, मैं एक दूसरी मोटर बोट का प्रबंध करता हूँ, केवल मैं और ओरी ही वहाँ जायेंगे। अगर चाहे तो आभा हमारे साथ आ सकती है। &quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गार्गी ने पूछा , “क्यों दादा? हम तुम्हारे साथ क्यों नहीं आ सकते?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला, “तुम सभी बच्चे मेरी ज़िम्मेदारी हो। कल जो हादसा हुआ, उसके बारे में तो तुमने सुना है। कब, कहाँ पर, कुछ अप्रत्याशित हो जाये, कुछ पता नहीं चलता। बेकार खतरा लेने से क्या फायदा? वैसे भी तुम मेरी चेतना से जुड़ कर मेरे साथ सब कुछ देख सकती हो, क्या वह काफी नहीं है?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह बात सुन कर बच्चे चुप हो गये, पर आभा बोली कि वह उनके साथ जायेगी। त्री ने घाट से एक अन्य मोटर बोट का प्रबंध किया और तीनों उस पर डमरू द्वीप की ओर निकल पड़े।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मोटर बोट वाले ने उसे कहा, “बाबू जी, वहाँ पर बहुत से घड़ियाल होंगे क्योंकि आजकल उनका मौसम चल रहा है। मैं वहाँ पर आप को उतार दूँगा लेकिन नाव को वहाँ रोक कर आप की प्रतीक्षा नहीं करूँगा, कहीं दूसरी जगह जहाँ घड़ियाल न हों, वहाँ रुकूँगा। जब आप लोगों का लौटने का समय हो तो मुझे फोन कर देना, मैं पंद्रह-बीस मिनट में आप को लेने पहुँच जाऊँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी उनकी बात सुन रहा था, उसने त्री से पूछा, “यह किस जानवर की बात कर रहा है?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री को मालूम नहीं था कि घड़ियाल को अंग्रेज़ी में क्या कहते हैं, बोला, “यह मगरमच्छ की एक प्रजाती है जो भारत की नदियों में मिलती है। मगरमच्छ के सिर का आगे वाला हिस्सा चपटा सा होता है, जबकि घड़ियाल के सिर का आगे वाला हिस्सा बहुत लम्बा और संकरा होता है, और उनकी नाक पर गेंद जैसा फूला हुआ एक गोल हिस्सा होता है जिसे हम लोग घड़ा कहते हैं और उसकी वजह से उन्हें घड़ियाल बुलाते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मगरमच्छों की बात सुन कर ताकानोरी थोड़ा सा घबराया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;डमरू द्वीप तक पहुँचने में उन्हें करीब आधा घंटा लगा और वहाँ पहुँचने से पहले, दूर से ही उन्हें घड़ियालों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं। उनके फूले हुए नाक के घड़ों से &#39;घूँ-घूँ&#39; की आवाज़ आ रही थी मानो वह खुर्राटे ले रहे हों। पास जा कर देखा तो द्वीप के रेतीले किनारे पर कम से कम पचास घड़ियाल धूप में घूँ-घूँ करते हुए आगे-पीछे घूम रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मोटर-बोट वाला बोला, “मादा को आकर्षित करने के लिए यह आवाज़ नर-घड़ियाल करते हैं। बोलिये आप को कहाँ पर उतारूँ?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री ने ओरी और आभा की ओर देखा। ओरी का चेहरा फीका पड़ गया था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आभा बोली, “मैं इन जानवरों के बीच में नहीं जाना चाहती, तुम लोग उतर कर जहाँ घूमना है वहाँ घूम आओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री ने मोटरबोट वाले से पूछा, “क्या इसके अतिरिक्त यहाँ उतरने की कोई अन्य जगह नहीं है? आप थोड़ा द्वीप का चक्कर लगाईये, शायद इससे आसान कोई दूसरी जगह मिल जाये?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिक्कत यह थी कि द्वीप के आसपास नुकीली चट्टाने थीं जिनकी वजह से वहाँ उतरना असम्भव था। द्वीप के आगे-पीछे चक्कर लगा कर उनकी मोटर-बोट वापस घड़ियालों की जगह पर ही लौट आई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री ने आभा से कहा, “तुम अपनी शक्ति से इन घड़ियालों से सम्पर्क बना कर देखो, शायद तुम्हारी बात मान कर, यह यहाँ से कुछ देर के लिए हट जायें?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह बोली, “तुम तो जानते हो कि मुझे अपनी शक्ति को नियंत्रित करना नहीं आता, अभी तक जितनी बार भी उस शक्ति ने काम किया है, वह मेरे भय की वजह से किया है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला, “हम नाव की साइड में एक रस्सी की सीढ़ी लटका देते हैं, तुम उस पर थोड़ा सा नीचे, उनके करीब जाओ, शायद तुम्हारे पास होने से वह शाँत हो जायें।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस बात को सुन कर आभा घबरा गयी, बोली, “नहीं, वह मुझसे नहीं होगा। इनके दाँत देखो, किसी घड़ियाल ने उछल कर मेरी टाँग को पकड़ लिया तो?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला, “बस थोड़ी सी कोशिश करो, पाँच मिनट के लिए। प्लीज़!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तो आभा और घबराई। शायद इस बात से उसकी शक्ति जागृत हो गयी और सभी घड़ियाल उनकी नाव की ओर आने लगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनके झुँड को नाव की ओर आता देख कर ओरी भी परेशान हो गया, बोला, “उस पर जबरदस्ती नहीं करो, वरना यह मगरमच्छ हमारी मोटर-बोट में चढ़ आयेंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मोटर-बोट वाला भी डर गया, बोला, “साहब यह तो खतरनाक हो रहे हैं&quot;, और बोट को द्वीप से कुछ दूर ले आया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री ने आभा का हाथ पकड़ लिया, बोला, “तुम घबराओ नहीं, जैसे मैं कहता हूँ तुम वैसे करो। वहाँ जाने की और नीचे उतरने की तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं है। तुम्हारे डरने से वह घड़ियाल तुम्हें बचाने के लिए नाव की ओर आने लगे, इससे हमें यह पता चलता है कि उन पर तुम्हारी शक्ति का असर हो रहा है। मैंने यही देखने के लिए तुमसे रस्सी की सीढ़ी वाली बात कही थी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आभा ने भयभीत आँखों से उसकी ओर देखा। उसने उसे अपने पास एक कुर्सी पर बिठाया और धीरे-धीरे बोलने लगा, &quot;तुम आँखें बंद कर लो और अपनी साँस पर ध्यान दो, धीरे-धीरे लम्बी साँस लो। जैसा मैं कहता हूँ, तुम वैसा करो, मैं तुम्हें नाव से उतरने के लिए नहीं कह रहा। मैंने सभी बच्चों को अपनी शक्ति पर नियंत्रण करना सिखाया है, मैं तुम्हारे साथ भी एक बार कोशिश करना चाहता हूँ। तुम बस आँखें बंद करो, धीरे-धीरे साँस लो और अपनी साँस पर ध्यान दो, कुछ और नहीं सोचो, उन घड़ियालों को भूल जाओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ समय बाद जब आभा की साँस की गति धीमी हुई तो द्वीप पर जमा घड़ियाल भी वापस तट की ओर लौट गये और पहले की तरह इधर-उधर घूमने लगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब त्री ने पूछा, “अब तुम अपने मन को स्थिर करके देखो कि क्या तुम उन घड़ियालों को अपने आसपास महसूस कर सकती हो? अगर नहीं, तो कोई बात नहीं, तुम वापस अपनी साँस पर ध्यान दो।” हर पाँच मिनट के बाद, वह उससे यही बात पूछता था कि वह उन घड़ियालों को महसूस कर सकती है या नहीं?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;करीब आधे घंटे के बाद जब उसने पूछा तो आभा ने धीरे से सिर हिलाया कि हाँ, वह घड़ियालों को महसूस कर रही है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब त्री बोला, “अब सोचो कि वह सभी घड़ियाल दायीं ओर जा रहे हैं। अपनी कल्पना में देखो कि सभी घड़ियाल तट के दायीं ओर जा रहे हैं। थोड़ी देर तक यही कल्पना करने की कोशिश करो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सचमुच द्वीप पर इकट्ठे घड़ियाल तट के दायीं ओर जाने लगे और बायीं ओर वाला हिस्सा खाली होने लगा। तब उसने आभा से आँखें खोलने के लिए कहा और उसे दिखाया, “वह देखो, जैसा तुमने सोचा, वह सभी सचमुच दायीं ओर चले गये। इसका मतलब है कि वह तुम्हारी बात सुन और समझ रहे हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आभा ने&amp;nbsp; घड़ियालों को देखा तो आश्चर्यचकित रह गयी, बोली, “यह मेरे सोचने से हुआ?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला, “इस समय तुमने आँखें खोल ली हैं फिर भी देखो वह वहीं पर रुके हुए हैं, इस ओर नहीं आ रहे। तुम दोबारा बैठ कर पहले की तरह ध्यान लगाओ और फिर से उन्हें दायीं ओर जाने के लिए कहो। हमें पाँच-दस मिनट का समय मिल जायेगा तो हम भाग कर पीछे पहाड़ी वाले हिस्से तक तट से कुछ ऊपर पहुँच जायेंगे, उसके बाद तुम ध्यान तोड़ सकती हो। जब हम लौटेंगे तो तुम्हें वहीं पहाड़ी से इशारा करेंगे और अगर आवश्यकता होगी तो तुम दोबारा ध्यान लगा कर उन्हें दायें करवा देना।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर उसने मोटर-बोट वाले से कहा, “आप तैयार रहिये, जब सब घड़ियाल तट के दायीं ओर जायेंगे तो आप इस बोट को तट के बायीं ओर, जितना करीब ले जा सकते हैं, ले जाईये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/29.html&quot;&gt;अगला भाग पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/1172055681785087580/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/28.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/1172055681785087580'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/1172055681785087580'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/28.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 28'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धारावाहिक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुस्तक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 27</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;: प्रतिमा की खोज में त्री और ओरी लखमीपारा गाँव के पास शंखासुर की पहाड़ी देखने जा रहे थे, तब रास्ते में उनका सामना कुछ गैंडों के सींग चुराने वाले तस्करों से हो गया, जो एक फॉरैस्ट गार्ड को मार रहे थे। ओर उस गार्ड को बचाने के लिए गया और तस्करों से लड़ने लगा। लड़ाई में एक तस्कर की मृत्यु हो गयी, त्री और ओरी वहाँ से भागे। गार्गी ब्रह्मपुत्र नदी पर एक मोटर-बोट से त्री से सम्पर्क बनाये हुए थी, उसने उन्हें नदी किनारे बुलाया। आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;प्रारम्भ से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/26.html&quot;&gt;पिछला भाग पढ़िये&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiQRAVtIMKB0nwHxt5Fnfa1xLp3yPKwK-lCoz4z03Q7YvSJ5ms-V25lO50w-PhVeU9e7nqDbQ7DSP8ikc-re-QlA4qs5HujMSZKGI64SPUw9I0efpQH-PzH0XP2imfuBjeV3fHg5blv-LZ1N1h4Kyo3u5D9-D3hvN6wIReKeGkUAZ1uYjJsJgpG2yvycVWc/s864/Tiranga27.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;708&quot; data-original-width=&quot;864&quot; height=&quot;328&quot; 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वहाँ लौटें तो पुलिस हमें पकड़ सकती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;रंगनाथ बोला, “पहले आप लोग लखमीपारा के पश्चिम में ठहरे थे, इस बार हम वहाँ से कुछ देर, पूर्व की ओर कोई होटल खोज सकते हैं, हालाँकि वहाँ से रास्ता कुछ लम्बा पड़ेगा। दूसरी मुश्किल है कि पूरे क्षेत्र में यह खबर फैल चुकी होगी, इसलिए लोग आप को पहचान कर तुरंत पुलिस को खबर कर सकते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “जब वह गार्ड होश में आयेगा तो वह बतायेगा कि उस पर तस्करों ने हमला किया था, पर मेरे विचार में वह तस्कर पुलिस को रिपोर्ट लिखवाने नहीं जायेंगे कि उन पर किसने हमला किया था। इसलिए हो सकता है कि पुलिस तुम्हारी नहीं, केवल तस्करों की खोज कर रही हो। किसी ने तुम दोनों को वहाँ नहीं देखा, अधिक से अधिक, पंडित जी पुलिस को बता सकते हैं कि तुम दोनों उस दिन शंखासुर पहाड़ी की ओर गये थे। इसलिए पुलिस तुमसे पूछ सकती है कि तुमने वहाँ क्या देखा? मेरे विचार में एक-दो दिन में यह बात ठंडी हो जायेगी, फिर तुम लोग अपनी खोज पर जा सकते हो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी कुछ नहीं बोला लेकिन उसके चेहरे से स्पष्ट था कि वह गुस्से में है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला , “लेकिन वह तस्कर इसी क्षेत्र से हैं, उन्होंने हमें देखा है, वह हमें खोज रहे होंगे। अगर उनके हाथ लग गये तो हमसे कुछ पूछेंगे नहीं, सीधा गोली मार देंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “तुम ठीक कहते हो, इस समय कुछ निर्णय नहीं लेना चाहिये। कल सुबह अखबार में देखेंगे कि क्या लिखा है और अगर ज़रूरत पड़ी, तो मैं, रंगनाथ और गार्गी, हम कोहोरा में पता करने जा सकते हैं। वहाँ के टैक्सी ड्राइवर, पर्यटकों को काज़ीरंगा की सफारी के लिए ले कर जाते हैं, उनसे भीतर की खबर मिल जायेगी। उसके बाद ही निर्णय लेंगे कि क्या करें।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने मोटरबोट वाले को बिश्वानाथ चरियाली में बियर खरीदने भेज दिया और रात को देर तक डैक पर बैठ कर बियर पीता रहा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;बाकी सब लोग सोने गये। नाव में केवल एक कमरा था, उसमें मोटी चद्दरों से बने हैम्मोक साथ-साथ लटक रहे थे, सभी उन पर सोये।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अगले दिन सुबह, त्री और रंगनाथ शहर से अखबारें और नाश्ता खरीदने गये। अखबार से पता चला कि गार्ड बच गया है और उसकी अंतिम स्मृति थी कि एक तस्कर उसे पेड़ से बाँधने के लिए घसीट रहा था। काज़ीरंगा के एक अधिकारी ने उस अज्ञात व्यक्ति को धन्यवाद दिया जिसने रुमाल बाँध कर गार्ड का खून बहना रोका था और उसकी जान बचायी थी। पुलिस के अनुसार गार्ड को बचाने वाला व्यक्ति, शायद तस्करों का कोई प्रतिद्वंदी तस्कर ही था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “अगर उन्हें हमारे बारे में कुछ नहीं मालूम, तो हम आज वहाँ पर लौट सकते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत उनकी बात सुन रहा था, वह बोला, “दादा, अगर आप को काज़ीरंगा के आसपास कुछ खोजना है तो हम पेड़ों की सहायता से, यहीं से उस जगह को खोज सकते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “मैंने भी इस बारे में सोचा था लेकिन ताकानोरी सान उस जगह को स्वयं देखना चाहते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत बोला, “इधर-उधर भटकने से अच्छा है कि पहले मैं उस जगह को खोज लूँ, फिर आप दोनों सीधा वहाँ जा सकते हो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;यह बात सुन कर ओरी का गुस्सा कुछ कम हुआ।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत बोला, “आप मुझे बताओ कि हम किस दिशा में, क्या खोज रहे हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने टैबलेट बाहर निकाली और उस पर लखमीपारा गाँव को खोजा, उसे दिखाते हुए बोला, “यहाँ से पूर्व दिशा में जा कर एक दलदल-झील है, वहाँ के लोग उसे डाफलोंग बील कहते हैं। उसके पश्चिमी किनारे पर जो पहाड़ी है, वह शंखासुर है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत ने आँखें बंद कर लीं और उस दिशा में ध्यान लगाया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने फुसफुसा कर आभा से पूछा, “क्या पेड़ भी बोलते हैं?&amp;nbsp; उन्हें डाफलोंग दलदल-झील का नाम बताओ तो वह बता देंगे कि वह किधर है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा मुस्करायी, “वसंत बता रहा था कि उसे कुछ कहना नहीं पड़ता, वह केवल अपनी संचेतना को पेड़ों की संचेतना से जोड़ देता है, पेड़ अपने आप जान लेते हैं कि वह क्या पूछ रहा है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी ने त्री से पूछा, “दादा, यह दलदल-झील क्या होता है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“जब वहाँ बारिश नहीं होती और पानी कम हो जाता है तो वहाँ दलदल रह जाती है, पर बारिश के मौसम में वह झील बन जाती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत ने आँखें खोलीं, बोला, “वह पहाड़ी मिल गयी, उस पर पेड़ कम हैं, अधिकतर झाड़ियाँ हैं। इस&amp;nbsp; समय पहाड़ी के साथ वाली दलदल-झील में पानी कम है, और वहाँ दलदल में एक हिरण फँसा हुआ है, वह अधिक समय तक जीवित नहीं रह पायेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने आभा से पूछा, &quot;कविता की आगे की पंक्तियाँ क्या हैं?” तो उसने वह पंक्तियाँ सुनायीं -&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;margin-left: 40px; text-align: left;&quot;&gt;“कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की,&lt;br /&gt;लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह बोला, “यानि गुफा में डमरू की चौदह ध्वनियाँ गूँज रही हैं, इसका मतलब है कि वहाँ कोई लम्बी गुफा है जिसमें चौदह कक्ष हैं, या फिर चौदह गुफाएँ हैं जो शायद डमरू की आकृति में बनी हैं। शंखासुर पहाड़ी किस दिशा में है? उससे हमें उन गुफाओं की दिशा दिखनी चाहिये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत बोला, “उस पहाड़ी के पूर्व में तो दलदल है और पश्चिम में लखमीपारा, मैं उसके उत्तर और दक्षिण में खोज कर सकता हूँ कि वहाँ कोई गुफाएँ हैं या नहीं।&quot; यह कह कर वह फिर से ध्यान में लीन हो गया। कुछ देर के बाद उसने आँखें खोलीं, बोला, “वहाँ आसपास कोई गुफा नहीं मिली। उस पहाड़ी के आसपास बहुत देखा लेकिन वहाँ पर दूर-दूर तक कोई गुफा नहीं है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी को विश्वास नहीं हुआ, बोला, “शायद यह बच्चा उस क्षेत्र को ठीक से देख नहीं पाया? हमें खुद वहाँ जा कर उसकी जाँच करनी चाहिये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत कुछ नहीं बोला, लेकिन त्री ने कहा, “यह खोज वसंत ने नहीं की है, यह इस क्षेत्र के हज़ारों पेड़ों और पौधों का काम है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि यहाँ कोई गुफा हो और उसके आसपास के पेड़-पौधों को उसके बारे में पता नहीं हो। अगर वसंत कह रहा है कि वहाँ कोई गुफा नहीं है तो हमारा वहाँ जाना बेकार है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “लेकिन अगर गुफा वहाँ नहीं है, तो हम क्या करेंगे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“हमें फिर से कविता के अर्थ को समझने की कोशिश करनी चाहिये, शायद उनकी कोई बात हमने ठीक से नहीं समझी। आभा, गुरु जी का कागज़ निकालो, हम उस पर दोबारा विचार करेंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “मुझे लगता है कि तुम लोग कोई ड्रामा कर रहे हो। तुम्हारे गुरु ने तुम्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया है लेकिन मूर्ति के बारे में स्पष्ट लिखने के बजाय एक पहेली बना दी है, जो तुम्हारी समझ में नहीं आ रही, यह क्या बात हुई?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“गुरु जी ज्ञानी हैं, वह जैसा उचित समझते हैं, वैसा करते हैं&quot;, रंगनाथ बोला तो त्री ने इशारा करके उसे चुप रहने के लिए कहा और ओरी से बोला, “तुम डरते हो कि अगर हमें वह मूर्ति नहीं मिलेगी तो तुम क्या करोगे। तुम्हारी यह चिंता व्यर्थ है, हम उसे अवश्य खोज लेंगे, हमें केवल थोड़ा सा समय चाहिये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;लेकिन ताकानोरी का गुस्सा शाँत नहीं हुआ, बोला, “मेरे पास अधिक समय नहीं है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा उठी और पास जा कर उसके कँधे पर हाथ रखा तो वह चुप हो गया, वह बोली, “कल शाम को तुमने शायद कुछ अधिक बियर पी ली, इसलिए आज तुम चिड़चिड़े हो रहे हो। मैं तुम्हारे लिए दालचीनी और सौंफ वाली चाय बनाती हूँ, उससे तुम्हारा मन शाँत होगा और तुम्हें फायदा होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तभी गार्गी बोली, “मेरे विचार में हम लोग गलत जगह पर मूर्ति खोज रहे हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;सब ने मुड़ कर उसकी ओर देखा। उसके हाथ में ओरी की टैबलेट थी और वह उस पर उस क्षेत्र के नक्शे को देख रही थी। बोली, “यहाँ देखो, इस द्वीप का क्या नाम है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/09/28.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/866249737207843674/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/27.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/866249737207843674'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/866249737207843674'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/27.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 27'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiQRAVtIMKB0nwHxt5Fnfa1xLp3yPKwK-lCoz4z03Q7YvSJ5ms-V25lO50w-PhVeU9e7nqDbQ7DSP8ikc-re-QlA4qs5HujMSZKGI64SPUw9I0efpQH-PzH0XP2imfuBjeV3fHg5blv-LZ1N1h4Kyo3u5D9-D3hvN6wIReKeGkUAZ1uYjJsJgpG2yvycVWc/s72-w400-h328-c/Tiranga27.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-2439663168499842242</id><published>2026-08-27T05:52:54.473+02:00</published><updated>2026-08-31T06:34:42.517+02:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उपन्यास"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कथा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धारावाहिक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुस्तक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 26</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;:&amp;nbsp; त्रिनेत्र ने ताकानोरी से कहा है वह उसे 
शक्तिवाहिनी मूर्ति तक ले कर जायेगा, और ओरी ने उसे वचन दिया है कि मूर्ति 
मिलने के बाद वह उनका और पीछा नहीं करेंगे। गुरु जी त्री के नाम एक 
कविता-पहेली छोड़ी थी, उसे पढ़ कर त्री, ओरी और आभा काजीरंगा के पास देवपानी 
के एक होटल में ठहरे थे। आज सुबह, त्री और ओरी लखमीपारा गाँव से हो कर 
शंखासुर की पहाड़ी को खोजने निकले थे। लखमीपारा के मन्दिर के पुजारी ने उन्हें शंखासुर जाने का रास्ता बताया है। आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;शुरु से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/25.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh9crGIDqB8Si78qs_JmljZVn_7hUkaIR3Nyv8T1uyz3XzT8aG-uZlWMILaNGdAS7KaG71uyWKpUsJoRQQs5w6uaZgqKptcZse1nFPP8is2NY6J4JV_VSIceO6wAm1ADXWHdoyAQisztlTencxXvToa6RBzxb81n9Ahx1oW_TSlR2yWZtTf9S8gz_c_z-nN/s864/Tiranga26.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;708&quot; data-original-width=&quot;864&quot; 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मुस्कराया, “आभा का चेहरा क्या तुमसे बहुत भिन्न है? वह भी थोड़ी सी जापानी नहीं लगती?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “नहीं, वह जापानी नहीं लगती, उसका चेहरा म्यंमार और थाईलैंड के लोगों से अधिक मिलता है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री हँसा, बोला, “चीनी, जापानी, म्यंमार, थाईलैंड, मुझे उनके चेहरों को अलग-अलग पहचानना नहीं आता, मुझे सभी एक जैसे लगते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी भी हँसा, “वैसे ही, मुझे भी तुम हिन्दुस्तानी आपस में एक जैसे लगते हो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;लेकिन तुम नक्शे में देखो तो यहाँ पर एक ओर भूटान और चीन हैं, दूसरी ओर म्यंमार और थाईलैंड हैं। यहाँ की बहुत सी जनजातियाँ आज की राष्ट्रीय सीमाओं से बँट गयी हैं लेकिन उनके लोग नहीं बँटे हैं। शायद इसलिए तुम्हें देख कर यहाँ के लोग सोचते हैं कि तुम भी हमारी किसी जन-जाति के होगे&quot;, त्री ने कहा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह दोनों ऐसे ही बातें कर रहे थे कि अचानक आगे से एक गोली चलने की आवाज़ आई।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री रुक गया, बोला, “पंडित जी कह रहे थे कि यहाँ पर गैंडों के सींग चुराने वाले तस्कर खतरनाक हो सकते हैं, हमें आगे नहीं जाना चाहिये?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “अगर वह लोग कोई गलत काम कर रहे हैं, तो हमें उन्हें रोकना चाहिये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;लेकिन त्री आगे नहीं बढ़ा, बोला, “जब बचने का कोई और रास्ता नहीं हो तब मैं लड़ सकता हूँ, लेकिन मैं जबरदस्ती किसी से लड़ने नहीं जाऊँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “यह तो कायरता होगी, क्या तुम कायर हो? देखोगे भी नहीं कि वहाँ कौन हैं और वह क्या कर रहे हैं?”&lt;br /&gt;त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “ठीक है, तुम रुको, मैं अदृश्य हो कर देख कर आता हूँ, फिर यह निर्णय लेंगे कि कुछ करना चाहिये या नहीं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जैसे ही उसकी शक्ति जागृत हुई वह अदृश्य हो कर आगे देखने चला गया। ओरी पाँच मिनट रुका, फिर वह भी जिस ओर से गोली चलने की आवाज आई थी उसी ओर बढ़ा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वहाँ से करीब दो किलोमीटर आगे जा कर उन्हें कुछ आदमी दिखे। एक फोरैस्ट गार्ड जीप में उनका पीछा कर रहा था। उसके एक हाथ में वॉकी-टॉकी थी जिससे वह अपने साथियों को बुला रहा था। उसकी जीप के सामने, पेड़ों के बीच में, तीन आदमी भाग रहे थे, जिनके चेहरे रुमालों से छिपे थे और जिनके हाथों में बन्दूकें थीं। अचानक एक पेड़ पर छुपा हुआ एक आदमी, नीचे जाती हुई फोरैस्ट गार्ड की जीप पर कूदा। उसके हाथ में एक चाकू था, जिससे उसने गार्ड पर हमला कर दिया। गार्ड के बायें कँधे पर चाकू का घाव लगा तो उसके हाथ से उसका वॉकी-टॉकी छूट कर गिर गया, उसकी कमीज़ तुरंत खून से लाल हो गयी और उसने जीप को रोक कर उतरने की कोशिश की।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जो तीन आदमी आगे भाग रहे थे, वे मुड़ कर जीप की ओर आये, उनमें से एक बोला, “सिपाहिया जी, क्यों मरने का शौक लगा है जो बीच में अटका डालने के लिए कूद पड़े?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;दूसरा आदमी बोला, “इस साले को पेड़ से बाँध दो, बाद में इसके साथी आ कर इसे खोल लेंगे। वह गैंडा उस तरफ भागा है, हमें उसका पीछा करना है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;एक आदमी के पास रस्सी थी, उसने उससे गार्ड के हाथ बाँधे, और उसे एक पेड़ की तरफ खींचने लगा तो दर्द से गार्ड चिल्लाया, तब उस आदमी ने अपनी बन्दूक के कुन्दे से उस गार्ड के सिर पर ज़ोर से मारा तो वह बेहोश हो गया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;पास में छिपा हुआ त्री सब कुछ देख रहा था, उसने सोचा कि जब वह लोग गार्ड को छोड़ कर जायेंगे तो वह उसकी रस्सी खोल देगा, लेकिन ओरी तुरंत पेड़ों के बीस से बाहर निकल आया, चिल्ला कर बोला, “उस आदमी को छोड़ दो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;चूँकि ताकानोरी अंग्रेज़ी में बोल रहा था और उन आदमियों को शायद उसकी बात समझ नहीं आयी, उनमें से एक ने अपनी बन्दूक उठायी और उसकी ओर निशाना साधा। तब त्री ने चिल्ला कर ओरी को पुकारा। उन आदमियों ने उसकी आवाज़ सुनी लेकिन वह दिखाई नहीं दिया, वह आसपास देखने लगे। इतनी देर में ताकानोरी ने अपनी आस्तीन से एक चाकू को निकाल कर, उसे निशाना साधने वाले तस्कर की ओर फैंका। उसका निशाना इतना सधा हुआ था कि काफी दूर होने पर भी वह चाकू सीधा उस आदमी की गर्दन में घुस गया। जब वहाँ से खून का फुव्वारा निकला तो उस आदमी के हाथ से उसकी बन्दूक छूट कर गिर गयी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अपने साथी को नीचे तड़पता देख कर बाकी दोनों आदमियों ने भी अपनी बन्दूकें उठायी तो ओरी ने आस्तीन से दो चाकू और निकाल लिए, बोला, “समझदार हो तो बन्दूकें नीचे कर लो, वरना तुम दोनों की जान भी जायेगी।&quot; यह कह कर वह निडर हो कर उनके सामने सीना तान कर खड़ा हो गया। उसकी निडरता देख कर वह दोनों आदमी थोड़ा हिचकिचाये, तब अचानक त्री भी वहाँ प्रकट हो गया, और बंगाली में बोला, “यह आदमी बड़ा निशानेबाज है, मेरी मानो तो यहाँ से तुरंत भाग जाओ, वरना तुम दोनों की मृत्यु भी आज ही होगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री को वहाँ अचानक प्रकट होता देख कर वह दोनों घबरा गये और अपने घायल साथी को वहीं छोड़ कर, पीछे पेड़ों में घुस कर भाग गये। उनका तीसरा साथी जो जिसने गार्ड को चाकू मारा था, वह जीप पर खड़ा सब कुछ देख रहा था, वह भी वहाँ से उतर कर भागा।&amp;nbsp;&lt;br /&gt;ओरी ने घायल तस्कर की गर्दन से अपने चाकू को निकाल कर उस पर लगे खून को उसकी कमीज़ से पोंछा और वापस अपनी आस्तीन में छुपा लिया, बोला, &quot;इस आदमी का बहुत सा खून बह गया है, इसका बचना मुश्किल होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने आगे बढ़ कर बेहोश गार्ड के हाथ से रस्सी खोली फिर उसकी कमीज़ को खोल कर उसके कँधे के घाव को देखा। वह चाकू जहाँ घुसा था, शायद वहाँ कोई खून की नस थी जिससे खून बहता जा रहा था। उसके बहते खून को देख कर त्री वहाँ मूर्ति की तरह खड़ा रह गया, उसका चेहरा फीका पड़ गया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने पीछे से आ कर, अपनी जेब से एक साफ रुमाल निकाल कर उसे पहले गार्ड के घाव पर दबाया, फिर उसे कँधे पर बाँध कर टाईट खींच दिया। फिर उसने त्री से कहा, “उस वॉकी-टॉकी से इसके गार्ड साथियों को खबर करके यहाँ बुलाओ, इसे जल्दी अस्पताल ले जाना ज़रूरी है, नहीं तो यह भी नहीं बचेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने वॉकी-टॉकी का बटन दबा कर &quot;हैलो, हैलो&quot; बोला तो उसे उत्तर मिला। ओरी ने उसे याद दिलाया, “उन्हें हमारे बारे में कुछ मत कहना।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने वॉकी-टॉकी से गार्ड के साथियों को उसकी और तस्करों की लड़ाई की बात बतायी, कहा कि घायल गार्ड को जल्दी से अस्पताल ले जाना ज़रूरी है। जब उन्होंने उससे पूछा कि वह कौन है तो उसने वॉकी-टॉकी को बंद कर दिया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “हम जितना कर सकते थे, उतना कर दिया, अब हमें यहाँ से जाना चाहिये।&quot; उन दोनों के वस्त्रों पर भी खून के दाग लगे था, उनकी ओर इशारा करके उसने कहा, “हो सकता है कि वह गार्ड कुत्तों के साथ आयें और हमें खोजने की कोशिश करें। कुत्ते सूंघ कर देख लेंगे कि हम किधर गये हैं। उनसे बचने के लिए हमें पानी में चलना चाहिये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;दोयाँग नदी वहाँ से अधिक दूर नहीं थी और उसके किनारे पर पानी गहरा नहीं था, उनके घुटनों से नीचे आ रहा था। वह उसमें चलते हुए लखमीपारा की ओर बढ़े।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री को उस लड़ाई से बहुत धक्का लगा था। अभी तक उसने गुरु जी द्वारा सिखायी लड़ने की कला को व्यायाम और अभ्यास की तरह से लिया था, उसने आजतक कभी किसी से इस तरह की मार-पिटाई नहीं की थी, न ही कभी इस तरह से खून बहाते घायल लोगों को मरते हुए देखा था। वहाँ से जाते हुए, बार-बार उसके सामने तस्कर की गर्दन में घुसे चाकू और फुव्वारे की तरह निकलते लाल खून की छवि उभर आती थी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी उसकी मनोस्थिति को समझ गया, बोला, “त्रिनेत्र, शायद आज तुमने पहली बार लड़ाई में किसी को इस तरह से मरते देखा है? तुम्हें इसके बारे में सोचने के लिए बाद में समय मिलेगा, लेकिन इस समय हमें अपने बचाव के बारे में सोचना है। हमारे कपड़ों पर खून लगा है और हो सकता है कि उन तस्करों के जासूस गाँव में हों, या हमारे होटल में भी हों। बेहतर होगा कि हम इस समय गाँव से हो कर नहीं लौटें और किसी तरह से होटल से अपना सामान ले कर यहाँ से चले जायें।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसकी बात सुन कर त्री थोड़ा होश में आया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तब उसने अपने भीतर गार्गी की आवाज़ सुनी, वह कह रही थी, “दादा, आप लोग गाँव की ओर मत जाईये। बल्कि छोटी नदी को छोड़ कर, उत्तर दिशा में ब्रह्मपुत्र नदी की ओर आईये। हमारे पास नाव है, हम आप को नदी के किनारे किसी घाट से ले लेंगे। आप को होटल लौटने की भी आवश्यकता नहीं है, आभा दीदी वहाँ से सारा सामान ले आयेंगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/27.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/2439663168499842242/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/26.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh9crGIDqB8Si78qs_JmljZVn_7hUkaIR3Nyv8T1uyz3XzT8aG-uZlWMILaNGdAS7KaG71uyWKpUsJoRQQs5w6uaZgqKptcZse1nFPP8is2NY6J4JV_VSIceO6wAm1ADXWHdoyAQisztlTencxXvToa6RBzxb81n9Ahx1oW_TSlR2yWZtTf9S8gz_c_z-nN/s72-w400-h328-c/Tiranga26.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-6221307665190941614</id><published>2026-08-24T05:38:45.054+02:00</published><updated>2026-08-27T05:54:05.159+02:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उपन्यास"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कथा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धारावाहिक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुस्तक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 25</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;:&amp;nbsp; त्रिनेत्र ने ताकानोरी से कहा है वह उसे शक्तिवाहिनी मूर्ति तक ले कर जायेगा, और ओरी ने उसे वचन दिया है कि मूर्ति मिलने के बाद वह उनका और पीछा नहीं करेंगे। गुरु जी त्री के नाम एक कविता-पहेली छोड़ी थी, उसे पढ़ कर त्री, ओरी और आभा काजीरंगा के पास देवपानी के एक होटल में ठहरे थे। आज सुबह, त्री और ओरी लखमीपारा गाँव से हो कर शंखासुर की पहाड़ी को खोजने जा रहे हैं। आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;शुरु से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/24.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj4WT0hPdvesbQeUP6hChnTtQjHNY3srtExThrJ8dKSYL50o5mqeGkieciT9xabzZ1vge89MJy8CbkghV65bJLAO_B_J5wWL4ivCfXHKM16nUXKjkha2AsTMb0CzosmZFAXg1z0oRZnhkMgotbLEA_hbtQVVAfQwvfltPuEHVbFl74gD9olkh9E7N5LKe-E/s864/Tiranga25.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;708&quot; data-original-width=&quot;864&quot; height=&quot;328&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj4WT0hPdvesbQeUP6hChnTtQjHNY3srtExThrJ8dKSYL50o5mqeGkieciT9xabzZ1vge89MJy8CbkghV65bJLAO_B_J5wWL4ivCfXHKM16nUXKjkha2AsTMb0CzosmZFAXg1z0oRZnhkMgotbLEA_hbtQVVAfQwvfltPuEHVbFl74gD9olkh9E7N5LKe-E/w400-h328/Tiranga25.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 25&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;लखमीपारा, काज़ीरंगा, असम, 7 मार्च 2026&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अगले दिन सुबह आभा ने त्री से पूछा, “तुम आज लखमीपारा और शंखासुर पहाड़ी की ओर जाने की कह रहे थे। तुम्हारे ख्याल में वहाँ तुम्हें वह मूर्ति मिल जायेगी? आज मेरी तबियत ठीक नहीं है, मेरा कहीं बाहर जाने का मन नहीं है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “मैं गुरु जी को जानता हूँ, वह कोई चीज़ किसी आसान जगह पर नहीं छुपाते, इसलिए मैं जानता हूँ कि आज उस जगह पर पहुँचना बहुत कठिन होगा। अगर तुम अभी नहीं आना चाहती तो कमरे में आराम करो। लेकिन जाने से पहले मुझे कविता की बाकी पंक्तियाँ बता दो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा ने अपने पर्स से कविता वाला कागज़ निकाल कर पढ़ा:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;margin-left: 40px; text-align: left;&quot;&gt;“कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की&lt;br /&gt;लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?&lt;br /&gt;वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “कंदरा माने गुफा और पिनाक माने शिव जी का डमरू, शायद चौदह ध्वनियों का अर्थ है कि वहाँ चौदह स्थान या गुफाएँ हैं। शंखासुर पहाड़ी पर पहुँच कर, वहाँ गुफाओं के बारे में पता करेंगे। अब हम जाते हैं, दोपहर से पहले लौट आयेंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तबियत खराब होने का केवल बहाना था। जब वह दोनों होटल से निकले तो आभा भी फटाफट तैयार हो गयी और देवपानी घाट की ओर गयी। वहाँ उसने एक नाव किराये पर ली और उसे पूर्व दिशा में ले जाने के लिए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब वह नाव घाट से कुछ दूर आयी तो सामने से एक मोटरबोट उसकी नाव के पास आ गयी, उसमें रंगनाथ, गार्गी और वसंत थे। करीब के एक द्वीप पर अपनी पहली नाव को छोड़ कर, वह बच्चों के साथ उनकी मोटरबोट पर चली गयी। उसने उन्हें त्री और ओरी के शंखासुर पहाड़ी की खोज में जाने के बारे में बताया, और गार्गी से बोली, “मैं उन दोनों पर नज़र रखना चाहती हूँ, तुम त्री से सम्पर्क बना कर रखो और देखो कि वे दोनों कहाँ जाते हैं और क्या करते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उधर त्री और ओरी लखमीपारा गाँव की ओर पैदल जा रहे थे। होटल से निकलने के दस मिनट बाद वह दोयांग नदी के किनारे पहुँच गये, जिसके दोनों ओर पेड़ उगे थे। वहाँ नदी पर कोई पुल नहीं दिखा और आसपास, कोई नाव वाला भी नहीं था, लेकिन लखमीपारा जाने के लिए उन्हें वह नदी पार करनी थी। ओरी ने नदी के साथ-साथ चल कर उत्तर दिशा में जाने के लिए कहा, तो त्री मान गया, सोचा कि शायद आगे जा कर नदी पार करने का कोई रास्ता मिल जायेगा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वहाँ पर केवल पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी। त्री ने जमीन पर गिरी हुई पेड़ों दो लम्बी-सीधी डालियों को खोजा, और उनकी छोटी डालियों और पत्तों को तोड़ कर उनकी छड़ियाँ बनायीं। एक छड़ी ताकानोरी को दी, और बोला, “काज़ीरंगा का सफारी पार्क नदी के उस ओर है, इसलिए मेरे विचार में खतरनाक जानवर इस ओर कम आयेंगे, लेकिन यहाँ की ऊँची घास में साँप हो सकते हैं, इस छड़ी से आगे ठक-ठक करके चलो, तो साँप और छोटे-मोटे जानवर भाग जायेंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने पूछा, “उसके टूटने से पहले, तुमने जून-मिन की विशेष शक्ति वाली मर्ति को अवश्य देखा होगा? मैंने उसकी तस्वीरें देखी हैं और यामागुचि सान ने कहा कि वह केवल बारह इंच की है, क्या यह सच है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने हाथों से इशारा करके दिखाया, “जहाँ तक मुझे याद है, वह करीब इतनी बड़ी थी, हो सकता है कि बारह इंच की ही हो। लेकिन वह बहुत हलकी थी, जैसे पत्थर की मूर्तियाँ होती हैं, वैसी नहीं थी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;वह टूटी कैसे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने मुँह बनाया, बोला, “मेरी गलती से ही टूटी थी। गुरु जी मेरे लिए पिता जैसे हैं, उन्होंने मुझे बचपन से पाला है, शायद इसलिए मुझे उनके साथ खेलना और मज़ाक करना अच्छा लगता है। मेरे एक मज़ाक की वजह से वह मूर्ति टूटी थी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने उसकी ओर प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा तो उसने पूरी बात बतायी, बोला, “मैं शिल्पकार हूँ, शिल्प बनाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। गुरु जी ने मुझे अपनी मूर्ति जैसी, सफेद और हरे पत्थरों की बारह अन्य मूर्तियाँ बनाने के लिए कहा था। जहाँ उनका समाधी-स्थल है, वह उस मन्दिर की दीवार में उन मूर्तियों को स्थापित करना चाहते थे, शायद तुमने वहाँ मेरी उन मूर्तियों को देखा होगा? उस मन्दिर के भीतर वाले कक्ष में एक अवलोकितेश्वर बौद्धिसत्व की बड़ी मूर्ति भी है, जिनकी दायीं हथेली में हरी तारा और बायीं हथेली में श्वेत तारा खड़ी हैं, वह दोनों छोटी मूर्तियाँ भी मैंने ही बनायी हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;फिर?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“एक दिन मैं मन्दिर के प्रांगण में बैठ कर उन मूर्तियों को तराश रहा था, जब गुरु जी वहाँ आये। उस समय मैंने यह ध्यान नहीं दिया कि उनके हाथों में वह शक्तिवाहिनी प्रतिमा थी। तुम तो जानते हो कि मेरी अदृश्य होने की शक्ति है, उनके साथ खेलने के लिए कई बार मैं अदृश्य हो कर छिप जाता था और उनके पीछे से आ कर, उन्हें डराने के लिए अचानक &#39;हाउ-हाउ&#39; चिल्लाते हुए प्रकट हो जाता था। मेरे उस खेल से वह डरते नहीं थे, क्योंकि शायद वह मुझे देखे बिना भी मेरी उपस्थिति को भाँप लेते थे। पता नहीं उस दिन क्या हुआ, मैं &#39;हाउ-हाउ&#39; कहता हुआ उनके सामने प्रकट हुआ तो उनके हाथ से वह प्रतिमा गिर गयी&quot;, उस दिन को याद करके त्री की आँखों में आँसू आ गये, “मूर्ति के टुकड़ों को देख कर वह इतने दुखी थे कि अपनी हरकत पर मुझे बहुत पछतावा हुआ, लेकिन तब पछताने से क्या होता, वह मूर्ति तो ठीक नहीं हो सकती थी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;नदी के साथ चलते-चलते वे दोनों, उत्तर दिशा में काफ़ी आगे आ गये थे, वहाँ उन्हें नदी पर बाँस का बना एक कच्चा पुल दिखा। देखने में वह कमज़ोर लगता था इसलिए उन्होंने उसे एक-एक कर के पार किया। नदी पार करके वह वापस दक्षिण दिशा में लखमीपारा गाँव की ओर लौटे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “यामागुचि दादा जी कहते थे कि अगर उस मूर्ति के पास रहो तो तुम्हारी भीतर की शक्ति अपने आप सशक्त हो जाती है। मैं सोचता था कि अगर उनके पास वह मूर्ति होती तो मेरी शक्तियाँ भी पूरी तरह से विकसित हो सकती थीं। लेकिन मूर्ति टूटने के बाद, जून-मिन ने उसके टुकड़ों को नयी मूर्ति में लगवा कर, यहाँ अपने आश्रम से इतनी दूर क्यों रखवा दिया? यहाँ रखने से उसका लाभ किसे मिलेगा? क्या तुम लोगों को उसकी शक्ति की आवश्यकता नहीं है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“क्योंकि कई वर्ष पहले ही हमने समझ लिया था कि हमारी शक्ति को प्रबल करने के लिए, प्रतिमा के अतिरिक्त कुछ अन्य रास्ते भी हैं। जब कुछ शक्तिवान लोग साथ में रहते हैं, साथ में शक्ति-साधन का अभ्यास करते हैं तो उससे भी आपस में उनकी शक्तियाँ सशक्त और विकसित होती है। प्रतिमा से बच्चों की शक्ति बढ़ती है और शक्तिवान लोगों के पास रहने से प्रतिमा की शक्ति भी बढ़ती है। गुरु जी कहते हैं कि शक्ति एक चुम्बक है, जिसके साथ रखो, वह भी चुम्बक बन जाता है, लेकिन हर पत्थर पर उसका असर नहीं होता, उसके लिए तो विशेष हरिताष्म पत्थर ही चाहिये। जब गुरु जी की वह प्रतिमा टूटी तो उसकी कुछ धूल मैं अपने साथ ले गया और उसे मिला कर मैंने नटराज की एक मूर्ति बनायी। पहले उसकी शक्ति हलकी थी लेकिन आज, क्योंकि मेरे साथ अन्य नौ शक्तिवान बच्चे रहते हैं, हमारे सामिप्य से हमारे नटराज की शक्ति भी बढ़ गयी है&quot;, त्री ने उसे समझाया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;यानि, यामागुचि दादा जी, अगर उस मूर्ति के बदले में कुछ शक्तिवान लोगों को खोज कर अपने साथ रखते तो भी हमारी शक्ति बढ़ कर विकसित हो जाती?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने सिर हिला कर हामी भरी। तब तक वह लोग लखमीपारा गाँव पहुँच गये थे। वहाँ त्री ने लोगों से शंखासुर पहाड़ी के बारे में पूछा लेकिन किसी को उस पहाड़ी के बारे में नहीं पता था। किसी ने सुझाव दिया कि वह मन्दिर के पुजारी जी से पूछे तो वह उस मन्दिर की ओर गये।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह मन्दिर एक विशालकाय पीपल के वृक्ष के नीचे बना था, जिसके आसपास लाल मौली के धागे बँधे थे और पास में एक चबूतरे पर राधा-कृष्ण की मूर्ति रखी थी। बूढ़े पंडित जी बोले, “बहुत दिनों के बाद आज शंखासुर पहाड़ी का नाम सुना। पिछले दस-पंद्रह सालों में यहाँ बहुत से नये लोग, बाहर से आ कर बस गये हैं, उन्हें यह पुराने नाम नहीं मालूम, उन्होंने जगहों को अपने नये नाम दिये हैं।&quot; फिर, उस पहाड़ी का रास्ता बताते हुए वह बोले, “उस तरफ ध्यान से जाना। वहाँ गैंडों के सींग काटने वाले तस्कर, हाथों में हथियार लिये घूमते हैं। अगर वैसा कोई व्यक्ति दिखे तो खतरा मत लेना, क्योंकि वह लोग तुम्हें जान से मार कर तुम्हारी लाशों को जंगल में फ़ैंक देंगे तो महीनों उसे खोजते रहेंगे। उधर एक दूसरा खतरा दलदल का भी है, जहाँ कोई बड़ा कीचड़ जैसा कुछ दिखे तो उसके किनारे से चलना, जल्दबाजी करके उसके बीच में मत जाना। दलदल में फँस गये तो मृत्यु निश्चित है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने पूछा, “पंडित जी, शंखासुर पहाड़ी के आसपास कोई गुफाएँ भी हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह बोले, “मैंने गुफाओं की बात तो कभी नहीं सुनी, लेकिन पिछले पचास सालों से यह संरक्षित क्षेत्र है, भीतर अगर तुम्हें काज़ीरंगा के गार्ड पकड़ लें और उन्हें पता चले कि तुम यहाँ के गाँव के नहीं हो, तो जुर्माना लगता है, इसलिए बाहर वाले लोग इधर घूमने नहीं जाते। लेकिन यहाँ अगर गुफाएँ होंगी तो शायद उन तस्करों को या पार्क में काम करने वाले गार्डों को उसका पता होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वहाँ से चले तो त्री ने ओरी से कहा, “डर तो नहीं गये? तुम चाहो तो होटल लौट सकते हो, आज मैं आगे जा कर पता लगा कर आता हूँ और अगर पता चल गया तो कल हम दोनों साथ में वहाँ जा सकते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ठहाका मार कर हँसा, बोला, “क्या मेरे चेहरे से लगता है कि मैं डर गया हूँ? मैं हर रोज़ केन-दो, क्यू-दो और नागीनाताजुत्सु की लड़ाई का अभ्यास करता हूँ। मेरे पूर्वज एक समुराई यौद्धा थे, शायद तुमने भी उन सैंतालिस समुराइयों की कहानी सुनी होगी? उस पर हॉलीवुड वालों ने एक फ़िल्म भी बनायी थी। क्या तुम उस कहानी को जानते हो?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने सिर हिला कर मना किया तो वह बोला, “हमारे शहर का नाम है अक्को, करीब तीन सौ साल पहले हमारे एक राजा थे, लॉर्ड असानो, जिनका धोखे से खून हुआ था। मेरे पूर्वज ओकानो उनके समुराई थे। नियम के अनुसार, जब स्वामी मरता है तो उसके समुराई आत्महत्या कर लेते हैं, इसलिए उन्हें भी आत्महत्या करनी चाहिये थी। लेकिन उन्होंने आत्महत्या करने के बजाय, पहले अपने स्वामी की हत्या का बदला लिया और फिर आत्महत्या की थी। उनकी यह कहानी पूरे जापान में प्रसिद्ध हो गयी और आज भी अक्को में राजा के किले के पास, उन सैंतालिस समुराईयों का मन्दिर बना है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “इसका मतलब है कि अगर समुराई काम में असफल हो जाये, तो उसे आत्महत्या करनी पड़ती है? मान लो कि अगर तुम्हें वह मूर्ति न मिले तो क्या तुम्हें भी आत्महत्या करनी पड़ेगी?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी ने लम्बी साँस ली, बोला, “आजकल समुराई नहीं हैं, और अब पहले जैसी पेट में तलवार घुसा कर आत्महत्या करने की परम्परा भी नहीं है। वैसे तो मैं याकूज़ा हूँ, एक अपराधी गैंग के लिए काम करने वाला खूनी। लेकिन यामागुचि दादा जी ने मुझे पाला-पोसा है, मैं उनके साथ गद्दारी नहीं कर सकता। मैं उस मूर्ति को खोजने में अपनी जान भी लगा दूँगा और जब तक वह नहीं मिलेगी, मैं उसे खोजना नहीं छोड़ूँगा। यही मेरा धर्म है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/26.html&quot;&gt;अगला भाग पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/6221307665190941614/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/25.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6221307665190941614'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6221307665190941614'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/25.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 25'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धारावाहिक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुस्तक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 24</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;:&amp;nbsp;&amp;nbsp;ताकानोरी से बचने के लिए जामुन बाबा ने समाधी ले 
ली। ओरी उनकी एक मूर्ति चाहता है। बाबा की मदद करने, त्रिनेत्र पाँच 
गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली आया है। 
ताकानोरी आभा, वसंत 
और तृप्ति कर अपहरण कर लेता है। त्री उनके पीछे गार्गी के साथ नारायणपुर 
आता है और अदृश्य हो 
कर ताकानोरी के घर में घुस कर आभा और बच्चों से बात करता है। ओरी को जब यह 
समझ आती है तो वह आभा और बच्चों से पूछताछ करता है लेकिन उसके पैर में 
बिच्छु काट लेता है।&amp;nbsp;त्री ओरी से बात करने आता है, वह कहता है कि बच्चों को छोड़ दो और उससे एक वचन लेता है ... इसके आगे 
पढ़िये ...&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; -&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/23.html&quot;&gt;&lt;b&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjL7MAd95XvV2FX2tjqjmxhiQkbX2AhCYN2gSxbyGWaC26CVEELifA34u2QMvgTMtge_Cvsg1Tud8oIYM8Obs9M4pY1i_LCFe61T9uTqGg2Uk_5IXMqiYuUE_Xz19hBHDdZaMcInXeEN5tRnv7iR2b9FIK8Ia1Tc55GVNfgOJU2K4IOZ5L5_G16F7Kiqr9H/s864/24.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;518&quot; data-original-width=&quot;864&quot; height=&quot;240&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjL7MAd95XvV2FX2tjqjmxhiQkbX2AhCYN2gSxbyGWaC26CVEELifA34u2QMvgTMtge_Cvsg1Tud8oIYM8Obs9M4pY1i_LCFe61T9uTqGg2Uk_5IXMqiYuUE_Xz19hBHDdZaMcInXeEN5tRnv7iR2b9FIK8Ia1Tc55GVNfgOJU2K4IOZ5L5_G16F7Kiqr9H/w400-h240/24.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 24&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;मोरनाइगुड़ी से काज़ीरंगा, असम, 6 मार्च 2026&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी ने जून-मिन की चिट्ठी वाला लिफाफा, जो उसे जगदीश बाबू ने दिया था, बाहर निकाला और उसे त्री को दिया। त्री ने उसमें से गुरु जी की कविता वाला कागज़ बाहर निकाला और उसे पढ़ा -&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;margin-left: 40px; text-align: left;&quot;&gt;&quot;चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे&amp;nbsp;&lt;br /&gt;पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल&lt;br /&gt;विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि&lt;br /&gt;कंदरा में गूँजती चौदह ध्वनियाँ पिनाक की&lt;br /&gt;लौटी सति पर्वतराज पिता के घर, त्रिनेत्र कहाँ है?&lt;br /&gt;वहाँ जहाँ पर लाल बकरियाँ घास चरें।”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसने कविता को धीरे-धीरे पढ़ा और मुस्कराया, बोला, “जब मैं छोटा सा था, तबसे गुरु जी मुझसे यह खेल खेलते थे। वह मेरी गेंद या खिलौना छिपा देते थे, फिर मुझे एक कविता सुनाते थे और कहते थे कि इसके शब्दों में संकेत हैं कि वह कहाँ छुपा है। कई बार मुझे अपने खिलौने खोजने में दो-तीन दिन भी लग जाते थे। उस खेल की वजह से मुझे उनकी कविताओं के संकेत समझना आता है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री, आभा और ओरी मोरनाइगुड़ी में होटल में बैठे हैं। वह लोग सुबह नारायणपुर से वहाँ आये हैं। त्री ने सभी बच्चों को मजूली भेज दिया है। वह चाहता था कि आभा भी बच्चों के साथ मजूली चली जाये, लेकिन ताकानोरी नहीं माना, बोला, “तुम मेरे सामने हो कर भी अदृष्य हो सकते हो, मैंने तुम्हारी शक्ति का वह रूप देखा है। अगर तुम मुझे रास्ते में कहीं पर अकेला छोड कर गुम हो गये तो मैं क्या करूँगा? गारँटी के लिए आभा भी हमारे साथ चलेगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब त्री ने गुरु जी की कविता पढ़ी तो ओरी बोला, “तो बताओ कि हमें वह देवी मूर्ति लेने कहाँ जाना है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “मैंने उस मूर्ति के बारे में एक बात तुमसे छिपायी है, पहले तुम्हें वह बात बतानी है। तुम तो जानते हो कि वह मूर्ति हरे जेड पत्थर की बनी थी? पाँच साल पहले जब गुरु जी यहाँ मजूली आये तो एक दिन वह मूर्ति गिर कर टूट गयी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी गुस्सा हो गया, बोला, “इसका मतलब है कि तुमने मुझसे झूठ बोल कर वचन लिया है? तुमने तो कहा था कि तुम मुझे उस देवी मूर्ति तक ले कर जाओगे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“पहले मेरी पूरी बात सुनो, फिर गुस्सा होना। जब वह मूर्ति टूटी तो उसका एक बड़ा हिस्सा था, और कुछ छोटे टुकड़े थे। उसके हर टुकड़े में वही शक्ति थी। मैंने उसके छोटे से कण में भी उसकी शक्ति को महसूस किया है और वह उतनी ही प्रबल है जितनी कि मूल मूर्ति में थी। तब गुरु जी ने फैसला किया कि हर टुकड़े को एक नयी प्रतिमा में जोड़ देंगे। उन्होंने जो कविता लिखी है, वह उस नयी प्रतिमा तक पहुँचने का संकेत है जिसमें देवी मूर्ति का सबसे बड़ा टुकड़ा जुड़ा हुआ है, इसलिए वह भी शक्तिवाहिनी मूर्ति है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसकी बात सुन कर ओरी ने कुछ देर सोचा, फिर बोला, “मुझे यह बात यामागुचि सान को बतानी पड़ेगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसने जापान में फोन किया और किसी से बात की, फिर थोड़ी तक फोन हाथ में लिए किसी और से बात करने की प्रतीक्षा की, लम्बे समय तक बात करने के बाद, आखिर में फोन बंद करके बोला, “यामागुचि सान कहते हैं कि अगर उस मूर्ति में शक्ति नहीं होगी तो वह तुम सबसे बदला लेंगे, तुम्हें छोड़ेंगे नहीं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “तुम्हारे पास अन्वेषण-किरण की शक्ति है, तुम्हें मेरी बात पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं होगी, तुम खुद ही जाँच कर लेना कि उस नयी प्रतिमा में कितनी शक्ति है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“ठीक है, अब देर लगाने की आवश्यकता नहीं, बताओ हमें कहाँ जाना है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“पहले हमें गुरु जी की कविता के संकेत समझने होंगे और उसके लिए हमें इस क्षेत्र के नक्शे की आवश्यकता है। शायद मोबाइल पर जो नक्शा होता है, उससे काम हो जाये&quot;, त्री बोला।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“मेरे पास हिन्दुस्तान का बड़ा नक्शा है, जिसमें हर राज्य के सारे जिले और गाँवों को देख सकते हैं&quot;, ताकानोरी ने अपने बैग से एक टैबलेट निकाली, चालू की और उसमें आसाम का नक्शा निकाला, और उसे त्री की ओर बढ़ाते हुए बोला, “यहाँ पर मजूली के दक्षिण भाग का, जहाँ पर जून-मिन का वृद्धाश्रम है, उसका नक्शा है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा अभी तक चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी। त्री ने उसे कहा, “गुरु जी की कविता की पहली पंक्ति दोबारा पढ़ो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“चन्द्र-वधु के चरण-कमल, तीन दशानन कोसे&quot;, आभा ने पढ़ा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री सोचने लगा, फिर बोला, “शायद गुरु जी इसमें उस जगह की दूरी और दिशा की बात बता रहे हैं। दशानन यानि दस सिर वाला, यानि रावण, और तीन दशानन यानि तीस सिर वाला, और कोसे का मतलब कोस, तो शायद यह जगह गुरु जी के आश्रम से तीस कोस दूर है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “यह कोस क्या होता है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “पुराने ज़माने में दूरियाँ कोसों में मापी जाती थीं, तीस कोस का मतलब हुआ करीब साठ किलोमीटर। यानि यह जगह आश्रम से साठ किलोमीटर दूर है। पहला वाक्य है, चन्द्र-वधु के चरण-कमल, चन्द्र-वधु यानि चन्द्रमा की बहू, शायद वह चंद्रकाँति यानि माँ सरस्वती की बात कर रहे हैं? तारा माँ की मूर्ति के सबसे बड़े टुकड़े को माँ सरस्वती की मूर्ति में ही लगाया गया है। इसलिए मेरा ख्याल है कि गुरु जी, माँ सरस्वति के चरण-कमलों की बात कर रहे हैं। चरण-कमल किस दिशा में होते हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “सरस्वती? जापानी भाषा में उन्हें बेन्ज़ाइतेन कहते हैं, हम भी उन्हें ज्ञान और संगीत की देवी मानते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“अगर देवी का मस्तक उत्तर में मानते है, तो चरण-कमल दक्षिण में हुए&quot;, आभा बोली।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“मजूली के दक्षिण में साठ किलोमीटर दूर क्या है?”, त्री ने नक्शे में देखा और बोला, “वहाँ पर काज़ीरंगा का आरक्षित सफारी-पार्क है। शायद हमने उस जगह को ठीक खोजा है, क्योंकि कविता की अंतिम पंक्ति में लाल बकरियों की बात है और काज़ीरंगा का मतलब भी लाल बकरी ही होता है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “तो क्या हमें पता चल गया कि वह कौन सी जगह है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने सिर हिला कर मना किया,&amp;nbsp; बोला, &quot;अभी तो हमें केवल दिशा और क्षेत्र पता चले हैं, लेकिन काज़ीरंगा बहुत बड़ा है, और वह मूर्ति वहाँ पर किस जगह पर छिपी रखी है, अभी हम यह नहीं समझे। कविता की दूसरी पंक्ति पढ़ो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “पद्मा की कमल-अँजुरी से बहता जल।”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, &quot;पद्मा और कमल-अँजुरी तो लक्ष्मी की ओर संकेत लगते हैं। शायद वहाँ पर लखिमपुर या लखमीपुर जैसा कोई गाँव होगा?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “वह तो जँगली पशु-पक्षियों का संरक्षित क्षेत्र है, क्या वहाँ पर गाँव भी हैं?”&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने बताया, “पिछले कुछ दशकों में वहाँ पर बहुत सारे नये गाँव बस गये हैं, जिनकी वजह से जँगली जानवरों के लिए जगह कम हो गयी है। वहाँ कुछ जानवरों के चोर भी घूमते हैं जो उनकी तस्करी करते हैं। जैसे कि गैंडे के सींगों से चीन में पारम्परिक दवाईयाँ बनाते हैं, इसलिए उनकी बहुत माँग है और वहाँ के कुछ लोग गैंडों को मार कर उनके सींग काट कर उसकी तस्करी करते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह कुछ देर तक टैबलेट पर काज़ीरंगा के आसपास के क्षेत्र को ध्यान से देखता रहा, फिर बोला, “काज़ीरंगा के पश्चिम में लखमीपारा नाम का गाँव है, शायद गुरु जी की कविता उसकी बात कर रही है? हमें वहाँ जा कर पता करना चाहिये क्योंकि कविता की अगली पंक्तियों में विष्णु के शंख की और गुफाओं में शिव जी के डमरू की बातें हैं। शायद वहाँ के गाँव वाले इस बारे में कुछ बता सकते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “फिर देर करने से क्या फायदा, हमें तुरंत उस जगह के लिए रवाना होना चाहिये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने कहा, “ज़रूरी नहीं कि हमें वह जगह आसानी से मिल जायेगी, छुपी जगहें खोजने में गुरु जी बहुत होशियार हैं, हो सकता है कि हमें वहाँ तीन-चार दिन लग जायें और किसी होटल में रहना पड़े।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी के माथे पर बल पड़ गये, बोला, “तुम जून-मिन के बारे में ऐसे बात करते हो मानो वह अभी जीवित हो, क्या उसने समाधी नहीं ली?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री मुस्कराया, “मैं सालों तक गुरु जी से बहुत दूर रहा हूँ, लेकिन मैंने उन्हें हमेशा अपने साथ महसूस किया है। उनके समाधी लेने से भी इस बात में कुछ अंतर नहीं पड़ा, जब तक मैं हूँ, तब तक वह मेरे साथ हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उन्होंने दोपहर में बनपुराई घाट से काज़ीरंगा के पास देवपानी के लिए मोटरबोट ली और करीब चार बजे वहाँ पहुँचे। वहाँ एक लॉज में उनके लिए तीन कमरे बुक थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;लॉज वाले सज्जन ने उन्हें बताया कि वहाँ से लखमीपारा जाने के लिए पगडँडी के रास्ते से पैदल जाना आसान है, बीस-पच्चीस मिनट में वहाँ पहुँच सकते हैं। उन्होंने कहा, &quot;यह क्षेत्र काज़ीरंगा की परिधि के साथ लगा हुआ है, इसलिए यहाँ अक्सर जँगली जानवर भी आ जाते हैं, आप उस रास्ते पर ज़रा ध्यान से रहियेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने उनसे पूछा, “लखमीपारा के आसपास क्या विष्णु या कृष्ण या शंख से जुड़ा किसी जगह का नाम है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह सज्जन कुछ देर तक सोचते रहे, फिर बोले, “लखमीपारा से काज़ीरंगा की ओर जायें तो वहाँ पर शंखासुर की पहाड़ी है। पुराणों में एक कहानी है कि एक दानव के पास एक महाशंख था, जिसकी वजह से सब उसे शंखासुर बुलाते थे। विष्णु ने उसे हरा कर वह महाशंख ले लिया और उस शंख को पंचजन्य का नाम दिया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी पास में खड़ा उन्हें बातचीत करते हुए देख रहा था, उसने त्री से पूछा, “क्या पता चला?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“लगता है कि हमारी किस्मत अच्छी है और हम सही जगह पर आये हैं। अभी कुछ देर में अँधेरा हो जायेगा इसलिए अभी शंखासुर पहाड़ी की ओर जाने का समय नहीं है, कल सुबह चलेंगे&quot;, त्री बोला, फिर उसने आभा से कहा, “कविता की वह शंख वाली पंक्ति फिर से पढ़ो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“विष्णु के शंख नाद से प्रज्जवलित अंबर के सप्त ऋषि।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री सोचते हुए बोला, “इसमें आसमान पर सप्तऋषि मँडल की बात है, क्यों? उसका क्या अर्थ हुआ?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी को नहीं मालूम था कि सप्तऋषि क्या है, तो त्री ने उसे बताया, “यह एक कोन्स्टेलेशन यानि तारा-समूह है, पश्चिमी देशों में उसे कानिस मेजर या बिग बैरो कहते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, &quot;सप्तऋषि ध्रुव तारे की राह भी तो दिखाते हैं?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने पूछा, &quot;कौन से तारे की?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“ध्रव तारा, नोर्थ स्टार।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“इस कविता में इस जगह पर ध्रुव तारे का क्या अर्थ बना?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने सोचते हुए कहा, “शायद इसका अर्थ है कि जैसे सप्तऋषि आकाश में ध्रुव तारे की दिशा दिखाते हैं, वैसे ही शंखासुर की पहाड़ी हमें प्रतिमा की दिशा दिखायेगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“नक्शे में देखते हैं&quot;, ओरी को अब इस खोज में आनन्द आने लगा था, उसने टेबलेट पर उस क्षेत्र के नक्शे को बड़ा किया और कुछ देर तक देखता रहा, फिर बोला, “यहाँ कहीं पर शंखासुर की पहाड़ी का नाम नहीं है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “तुम चिंता नहीं करो, यह पारम्परिक नाम हैं, यह नाम अक्सर नक्शों पर नहीं दिखते क्योंकि हमारे आधुनिक नक्शे अंग्रेज़ों के समय बने थे और कई बार वह लोग हमारे पाराम्परिक नामों को महत्व नहीं देते थे। लेकिन यह जानकारी हमें गाँव वालों से मिल जायेगी।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/25.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/5976892928611755336/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/24.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/5976892928611755336'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/5976892928611755336'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/24.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 24'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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2004-05 के आसपास बनने शुरु हुए थे। मैंने यह अपना ब्लॉग 2005 में गूगल के ब्लॉगर पर बनाया था। पिछले इक्कीस सालों में अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने वाले माध्यमों में बहुत से परिवर्तन आये हैं। गूगल के अतिरिक्त, ब्लॉग बनाने के अन्य बहुत से प्लेटफॉर्म आये और गये, उनमें से कुछ जैसे कि वर्डप्रैस आज भी जीवित हैं। लेकिन स्थिति बदलती रहती है, जब भी फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे नये प्लेटफॉर्म निकलते हैं तो कुछ ब्लॉग लिखने वाले उन पर लिखने लगते हैं और अपने पुराने ब्लॉगों को बंद कर देते हैं, कुछ साथ-साथ ब्लाग को भी चालू रखते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiOXc5DCAsP3WgdCKHEuVfipQ24SOIBmIVwUaEuZGGxyL1o_bzHACFcFZSYeL3LSkPnAN5wCIhhkBTM30IGlG4jWzz-6HQEXRjS0fz4AStsc8rT-l2rYeE58-usF3VG31SXTGice4z5H9Pi-3eeK6EulWaxTFf_4tUYNDcP6JoRP9hcprYFB0Z5vP94uTVd/s800/--.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;800&quot; data-original-width=&quot;470&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiOXc5DCAsP3WgdCKHEuVfipQ24SOIBmIVwUaEuZGGxyL1o_bzHACFcFZSYeL3LSkPnAN5wCIhhkBTM30IGlG4jWzz-6HQEXRjS0fz4AStsc8rT-l2rYeE58-usF3VG31SXTGice4z5H9Pi-3eeK6EulWaxTFf_4tUYNDcP6JoRP9hcprYFB0Z5vP94uTVd/s320/--.jpg&quot; width=&quot;188&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कुछ वर्ष पहले सबस्टैक नाम का एक नया प्लेटफॉर्म निकला तो बहुत से ब्लॉग वहाँ चले गये हैं। कुछ दिन पहले किसी ने मेरी राय पूछी कि सामान्य ब्लॉग बनाना चाहिये या सबस्टैक वाला ब्लॉग, तो मैंने इस विषय पर सोचा। साथ में इस बात पर भी विचार किया कि इक्कीस साल के बाद भी मैं इस ब्लॉग पर क्यों लिखता रहता हूँ?&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस आलेख में ब्लॉग बनाम सबस्टैक, और आज की दुनिया में जब अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए इतने सारे माध्यम है, ब्लॉग लिखने का महत्व, जैसी बातों के बारे में अपनी सोच और अनुभव साझा करना चाहता हूँ।&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;यह सबस्टैक क्या है?&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;सबस्टैक के पाठकों के लिए दो चेहरे हैं - उसका प्रमुख चेहरा है इलैक्ट्रोनिक न्यूजलैटर का, यानि अगर आप किसी सबस्टैक के सदस्य बनेंगे तो उसके आलेख आप के ईमेल से आप तक पहुँचेंगे। उसका दूसरा चेहरा है कि आप उन्हीं आलेखों को ब्लॉग की तरह भी इंटरनैट पर या सबस्टैक एप्प पर पढ़ सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सबस्टैक के लेखक अपने पाठकों से अपने आलेखों को पढ़ने के लिए फीस माँग सकते हैं, आप से कह सकते हैं कि आप उनके सदस्य बनिये और अगर फीस दे कर आप सदस्य नहीं बनते तो उनके आलेखों को नहीं पढ़ सकते।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सबस्टैक 2017-18 के आसपास बनने शुरु हुए थे।&amp;nbsp;गूगल से पूछा तो पता चला कि दुनिया में इस समय करीब एक लाख सबस्टैक लेखक हैं जो नियमित लिखते हैं और उन्हें पढ़ने के लिए पैसे दे कर सदस्य बनना आवश्यक है। उनके अतिरिक्त अन्य कई लाख फ्री सबस्टैक हैं, जिन्हें पढ़ने की कोई फीस नहीं लगती।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत से निकलने वाले लोकप्रिय सबस्टैक हैं &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://rohanvenkat.substack.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;रोहण वैंकट का इंडिया इनसाईड-आऊट&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;, &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://publicpolicy.substack.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;प्रणय कोटास्थाने का एन्टीसिपेटिन्ग द अनइनटैंडिड&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;, &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://womaning.substack.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;महिमा वशिष्ठ का वूमैंनिन्ग इन इंडिया&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;, &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.theindiacable.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;द वायर का इंडिया केबल&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; और &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://indialog.substack.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;श्रेयास शैंदे का इंडियालॉग&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहाँ तक मुझे मालूम है अभी तक दुनिया मे हिंदी में कोई सबस्टैक नहीं चल रहा है।&amp;nbsp;सदस्यता वाले सबस्टैक भारत में रह कर चलाना कठिन है क्योंकि उसके पैसे केवल &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://stripe.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;स्ट्राईप पैयमैंट सिस्टम&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; से मिलते हैं जिससे जुड़ने के लिए भारत में आप को रजिस्टर्ड बिज़नैस होना आवश्यक है, इसलिए आम व्यक्ति जो अपना व्यक्तिगत सबस्टैक बनाना चाहते हैं वह उसके माध्यम से कमा नहीं सकते। मैंने कुछ भारतीय सबस्टैक में देखा है कि वह आप से सदस्यता नहीं माँगते, लेकिन आलेखों के अंत में लिंक डाल देते हैं &quot;हमारी सहायता कीजिये और हमे चाय या कॉफी पिलाईये&quot; और वहाँ आप से पैसे देने के लिए कहते हैं। ऐसी ही एक लिंक पर क्लिक किया तो उन्होंने मुझसे कॉफी के लिए 5 यूरो यानि पाँच सौ रुपये देने के लिए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यूरोप के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के कुछ उदाहरण हैं - तकनीकी के बारे में हॉलैंड से &quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://substack.com/@pragmaticengineer&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;द प्रेगमैटिक इंजीनियर&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&quot; जिसके लाखों सदस्य हैं, साँस्कृतिक विषय पर इटली से &quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://selvaggialucarelli.substack.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;वाले तूत्तो&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&quot; जिसके ढाई लाख सदस्य हैं, मैनेजमैंट के बारे में इटली से &quot;&lt;a href=&quot;https://substack.com/@refactoring&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;रिफैक्टरिन्ग&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&quot; जिसके डेढ़ लाख सदस्य हैं, और फाईनैन्स के विषय पर इंग्लैंड से &quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://substack.com/@netinterest&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;नेट इंडरस्ट&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&quot;।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अमरीका के कुछ लोकप्रिय सबस्टैकों के उदाहरण हैं - अमरीकी राजनीति पर &quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://heathercoxrichardson.substack.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;लैटर्स फ्रोम एन अमेरिकन&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&quot; और &quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://substack.com/@thebulwark&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;द बुलवार्क&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&quot;, समाचारों पर &quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://substack.com/@thefreepress&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;द फ्री प्रैस&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&quot;, नीतियों और आर्थिक विषयों पर &quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://substack.com/@matthewyglesias&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;स्लो बोरिन्ग&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&quot;, और समाचारों पर व्यंग करने वाला, &quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://substack.com/@borowitzreport&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;द बोरोविट्ज़ रिपोर्ट&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&quot;।&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ब्लॉग या सबस्टैक पर लिखने के फायदे&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;मेरे विचार में इनका सबसे बड़ा फायदा है कि दुनिया के किसी भी कोने में लोग आप को पढ़ सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरा फायदा है कि यह बने-बनाये प्लेटफॉर्म हैं, इसमें फॉन्ट, लेआऊट, तस्वीर लगाना आदि बहुत आसान है, इसे आप एक दिन में बिना किसी की सहायता के सीख सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसका तीसरा फायदा है कि जब तक वह प्लेटफॉर्म रहेगा, आप का लिखा सुरक्षित है, जैसे कि मैं अपने बीस साल पहले लिखे आलेखों को आसानी से देख-खोज सकता हूँ, अगर उनमें कुछ नया जोड़ना चाहूँ या बदलना चाहूँ तो वह सब कर सकता हूँ। चूँकि कम्पनियाँ फेल हो जाती हैं, उनके प्लेटफॉर्म कभी भी बंद हो सकते हैं, इसलिए आप अपने ब्लॉग के आरकाइव को डाउनलोड करके उसकी एक कॉपी अपने पास सम्भाल कर भी रख सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसका चौथा फायदा है कि आप अपने पाठकों की टिप्पणियाँ तुरंत देख सकते हैं और उनसे विचारों का आदान-प्रदान भी कर सकते हैं। एक ज़माने में लोग कम्प्यूटर से अधिक पढ़ते थे, तब टिप्पणियाँ अधिक मिलती थीं, आजकल लोग ट्रेन या बस में बैठे-बैठे मोबाइल पर ब्लॉग पढ़ते हैं इसलिए टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्लॉगर पर बहुत सी एप्प हैं जिनकी सहायता से आप आसानी से जान सकते हैं कि कितने लोगों ने आप का आलेख पढ़ा है, वह कौन से देशों से हैं, महीने में कितने लोग आप के ब्लॉग को पढ़ते हैं। जैसे कि मेरे इस ब्लॉग को आजकल हर महीने बारह-पंद्रह हज़ार लोग पढ़ते हैं, इसके कुछ आलेख बहुत लोकप्रिय हैं, उन्हें बीस-पच्चीस हज़ार लोग पढ़ चुके हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगर आप चाहें तो ब्लॉग से कमा भी सकते हैं। ब्लॉगर आप को गूगल-एड डालने का मौका देता है, अन्य प्लेटफॉर्म वाले यह मौका नहीं देते लेकिन आप खुद अपने स्पॉन्सर या विज्ञापन खोज सकते हैं। जिन्होंने गूगल विज्ञापनों से कमाने की कोशिश की है, वह कहते हैं कि यह आसान नहीं है और कई बार गूगल अपने विज्ञापकों की वजह से आप से अपने लिखे को बदलने या हटाने के लिए कह सकता है। लेकिन गूगल-एड में कोई जबरदस्ती नहीं है, मैं ब्लॉग से कमाना नहीं चाहता, इसलिए मैं इसमें कोई व्यवसायिक आलेख या विज्ञापन नहीं स्वीकारता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हो सकता है कि अपने ब्लॉग पर भी आप &quot;मुझे चाय पिलाईये&quot; जैसी लिंक डाल सकते हैं जिसके लिए आप यू.पी.आई. के किसी सिस्टम से पाठकों से कुछ पैसे देने के लिए कह सकते हैं। मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है, न ही मैं जानता हूँ कि यह भारतीय कानून के हिसाब से कानूनी है या नहीं। इसे करने से पहले वकील आदि से सलाह लीजिये।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरा अनुभव है कि ब्लॉग या सबस्टैक से पैसा कमाना कठिन है। कुछ प्रसिद्ध सबस्टैक जिनके नाम ऊपर दिये हैं वह लाखों डालर कमाते हैं लेकिन वहाँ हम लाखों में से एक की बात कर रहे हैं, वह भी उसकी जो किसी क्षेत्र में बहुत ज्ञान रखता है और बहुत मेहनत करता है, हर हफ्ते नयी जानकारी ले कर आ रहा है।&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ब्लॉग और सबस्टैक में अंतर&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;कुछ अंतरों के बारे में ऊपर बात हुई है, जैसे कि ब्लॉग को उसकी वेबसाइट पर पढ़ते हैं जबकि सबस्टैक आप की ईमेल में न्यूजलैटर की तरह से आ सकता है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक अन्य बड़ा अंतर है कि सबस्टैक का ले-आऊट (शब्द संयोजन) बदला नहीं जा सकता, जबकि ब्लॉग में आप रंग, तस्वीरें, ले-आऊट आदि सरलता से बदल सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्लॉगर बिल्कुल फ्री होता है, आप जितने चाहें, अलग-अलग भाषाओं में ब्लॉग बना सकते हैं। जबकि सबस्टैक में अगर आप सदस्यता की फीस नहीं लेते तो वह भी फ्री है, लेकिन अगर आप सदस्यता फीस लेते हैं तो आप को उसकी कमीशन देनी होती है। बाकी ब्लॉग प्लेटफॉर्म, जैसे कि स्कावयरस्पेस, को वार्षिक फीस देनी पड़ती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्लॉगर और सबस्टैक दोनों पर आप के आलेखों को, पाठक अपनी भाषा में अनुवादित देख और पढ़ सकते हैं। यानि आप के हिंदी ब्लॉग को फ्राँसिसी या स्पैनिश बोलने वाले भी पढ़ सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगर आप ऐसे विषयों के बारे में लिखेंगे जिसके बारे में दुनिया जानना चाहती है तो लोग आप को किसी भी भाषा में पढ़ेंगे। पर अधिक पाठक खोजना जरूरी नहीं है, अगर ब्लॉग आप की आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है, तो कौन-कितने वाली बातें भूल जाईये, जिसमें आप के मन को संतोष मिलता है, वह लिखिये। मेरी अपनी सोच यही रही है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्लॉगर गूगल का है, अगर एक बार गूगल को विश्वास हो जाये कि आप बिना कहीं से नकल किये, अपनी जानकारी से और अच्छी भाषा में अच्छी तरह से लिखते हैं, तो वह पाठकों को आप के ब्लॉग में भेजता है, जबकि सबस्टैक को यह मदद नहीं मिलती। ब्लॉग और सबस्टैक, दोनों फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि की सहायता से भी अपने पाठक खोज सकते हैं।&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अंत में&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;हिंदी ब्लॉग जगत को जानने और पढ़ने के लिए आप &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.indiantopblogs.com/p/hindi-blog-directory.html&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;पाँच लिंको का आनन्द&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;, &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://hindiblogjagat.blogspot.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;हिंदी ब्लाग जगत&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;, &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://blog4varta.blogspot.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;ब्लाग4वार्ता&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;, &lt;a href=&quot;https://blogabhanpur.blogspot.com/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;ब्लोगोदय&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;, जैसे ब्लॉग प्लेटफार्म से तरह-तरह के हिंदी ब्लॉगों को देख सकते हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दस-पंद्रह साल पहले तक हिंदी के हज़ारों ब्लॉग होते थे, आज उनकी संख्या बहुत कम हो गयी है, बहुत से लोग अन्य सोशल मीडिया, विशेषकर फेसबुक के माध्यम से अपने लेखन को दूसरो तक पहुँचाते हैं। फेसबुक पर &quot;हिंदी ब्लाग&quot; खोजेंगे तो वहाँ ऐसे पन्ने मिलेंगे जहाँ पर आप अपने हिंदी लेखन के बारे में समाचार या विज्ञापन दे सकते हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे लिए मेरा ब्लॉग मेरी डायरी है, मैं इसे सबसे पहले अपने संतोष के लिए लिखता हूँ। पहले के मुकाबले में आजकल पाठकों की टिप्पणियाँ मिलना बहुत कम हो गया है, लेकिन मैं देख सकता हूँ कि हर रोज़ पाँच सौ से ले कर एक हज़ार लोग इस ब्लॉग पर कुछ न कुछ पढ़ने आते हैं, मेरे लिए यही संतोष की बात है। कुछ महीने पहले मैंने अपने नये फैंतासी उपन्यास को भी अपने ब्लॉग से प्रकाशित किया है, इस तरह मुझे नये प्रयोग करना अच्छा लगता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगर आप के मन में लिखने की और आत्म-अभिव्यक्ति की इच्छा है तो मेरी राय है कि अपना ब्लॉग बनाईये, इसके लिए आप को किसी अन्य पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। आप के पास कम्प्यूटर या लेपटाप हो तो यह आसान होगा, मोबाइल से ब्लॉग लिखने में शायद कुछ मुश्किलें हों। एक बार लेखन का अभ्यास बढ़ेगा तो कल आप पत्रिकाओं और प्रकाशकों के लिए भी लिख सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/4146395023893491393/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/blog-post.html#comment-form' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4146395023893491393'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/4146395023893491393'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/blog-post.html' title='ब्लॉग या सबस्टैक'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiOXc5DCAsP3WgdCKHEuVfipQ24SOIBmIVwUaEuZGGxyL1o_bzHACFcFZSYeL3LSkPnAN5wCIhhkBTM30IGlG4jWzz-6HQEXRjS0fz4AStsc8rT-l2rYeE58-usF3VG31SXTGice4z5H9Pi-3eeK6EulWaxTFf_4tUYNDcP6JoRP9hcprYFB0Z5vP94uTVd/s72-c/--.jpg" height="72" 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त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली आया है। 
ताकानोरी आभा, वसंत 
और तृप्ति कर अपहरण कर लेता है। त्री उनके पीछे गार्गी के साथ नारायणपुर आता है और अदृश्य हो 
कर ताकानोरी के घर में घुस कर आभा और बच्चों से बात करता है। ओरी को जब यह समझ आती है तो वह आभा और बच्चों से पूछताछ करता है लेकिन उसके पैर में बिच्छु काट लेता है ... इसके आगे 
पढ़िये ...&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiEG8aI-Z04d7us2Zc0UFHT48bh4mZwvgmdbZhXWpa7O_vGG8ZckrImpnu4Kc5afF5Fbt565nxjKLnGCR8A_UXawgwCD_AoJUPrzwzVHLpQXuwwsr8RBIksP1tEvzkaYMNP-onTzMHFmVN0HHgA-utSwAI89o8r_VU1miilHyldbyRZlO_ttO42ENADupTu/s864/23.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;612&quot; data-original-width=&quot;864&quot; height=&quot;284&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiEG8aI-Z04d7us2Zc0UFHT48bh4mZwvgmdbZhXWpa7O_vGG8ZckrImpnu4Kc5afF5Fbt565nxjKLnGCR8A_UXawgwCD_AoJUPrzwzVHLpQXuwwsr8RBIksP1tEvzkaYMNP-onTzMHFmVN0HHgA-utSwAI89o8r_VU1miilHyldbyRZlO_ttO42ENADupTu/w400-h284/23.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; -&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/22.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 23&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;नारायणपुर, असम, 5 मार्च 2026, शाम&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी के घर से जाने से पहले, त्री ने बाहर से उसका पूरा चक्कर लगाया। देखा कि रसोई का एक दरवाज़ा पीछे भी है जो खुला हुआ है, यानि ज़रूरत पड़ने पर वह वहाँ से भी घर में घुस सकता है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;घर की पिछली चारदीवारी के बाहर उसे एक कटहल का पेड़ देखा जिसकी कुछ शाखाएँ घर के भीतर तक आ रही थीं। वह उसकी एक शाखा पर चढ़ कर बाहर आ गया और वहाँ से नामघर के तालाब के पास लौट आया जहाँ गार्गी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। उसे कुछ भी कहने-बताने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि सारा समय गार्गी उसके दिमाग से जुड़ी हुई थी और उसने उसकी हर बात सुनी थी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसने त्री को बताया, “दादा, जब तुम वहाँ से निकल आये तो ताकानोरी उनके कमरे में गया और वह आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को ऊपर ले गया है, और इस समय उनसे बातें कर रहा है।&quot; उसने उनकी बातचीत के बारे में बताया और जब कहा कि कैसे बिच्छु ने ताकानोरी के पैर को काटा तो वह दोनों भी बहुत हँसे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह बोली, “वह कहता है कि जापान में यामागुचि सान ने उसे केवल वह मूर्ति लाने के लिए कहा है। यानि अगर उन्हें वह मिल जायेगी तो वह गुरु जी का और हमारा पीछा छोड़ देंगे। वह कौन सी मूर्ति है और वह कैसे पहचानेगा कि वो वही असली मूर्ति है? अगर हम उसे गुरु जी की मूर्ति की जगह कोई और मूर्ति दे दें तो?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “आज हमें पता चला है कि ताकानोरी देखने में पहलवान है, वह आमने-सामने की लड़ाई में और तलवारबाज़ी में अवश्य निपुण होगा, लेकिन उसकी कुछ कमज़ोरियाँ भी हैं। उसके पहरेदार यहाँ के स्थानीय लोग हैं, जिन्हें हम आसानी से उल्लू बना सकते हैं। और अगर हम सब मिल कर उस पर हमला करें तो वह हमारा सामना नहीं कर सकता, हम उसे आसानी से हरा सकते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी बोली, “दादा, अगर ऐसा है तो हम उससे क्यों डर रहे हैं, उसे यहाँ से भगा क्यों नहीं देते?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“इसके दो कारण हैं। पहला कि वह लोग गुरु जी का कई दशकों से पीछा कर रहे हैं, वह उस मूर्ति को किसी भी कीमत पर पाना चाहते हैं। अगर ताकानोरी यहाँ से खाली हाथ लौटेगा, तो वह उसकी जगह किसी और को भेज देंगे, यह बात यहीं पर समाप्त नहीं होगी।&amp;nbsp;दूसरी बात है कि ताकानोरी मुझे अच्छा व्यक्ति लगता है और वह हमारा शक्तिवान भाई भी है। नियति ने उसे याकूज़ा-गुँडा बना दिया है, क्योंकि दुर्भाग्य से वह यामागुचि के चँगुल में आ गया था, लेकिन वह दिल का बुरा नहीं है। जापानी यौद्धाओं के लिए आत्मसम्मान सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है, उसे हरा कर खाली हाथ वापस भेजना सही नहीं होगा&quot;, त्री ने समझाया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“तो हम क्या करेंगे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“हमें कोई ऐसा उपाय खोजना है कि साँप भी मर जाये और लाठी भी नहीं टूटे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“यानि कि गुरु जी की मूर्ति भी बच जाये और ताकानोरी हमारा पीछा छोड कर जापान लौट जाये?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;यही नहीं, हमें यह भी करना है कि यामागुचि सान सोचे कि उसे सफलता मिली है और वह गुरु जी का पीछा छोड़ दे। चलो, अब हम मोरनाइगुड़ी वापस चलते हैं। तुम रंगनाथ को सूचित कर दो कि यहाँ सब ठीक है और हम वापस आ रहे हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वापस लौटते समय, रास्ते भर त्री सोचता रहा कि आगे क्या और कैसे करे। मोरनाइगुड़ी पहुँच कर उसने सबको पास बिठा कर अपना प्लैन बताया और उनकी राय पूछी। कुछ देर तक उनमें बहस हुई फिर सब मान गये।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने तुरंत ओरी को फोन किया, बोला, “मैं त्रिनेत्र बोल रहा हूँ, आज शाम को आप से मिलना चाहता हूँ, क्या पाँच बजे का समय आप के लिए ठीक रहेगा?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी को उससे यह अपेक्षा नहीं थी, वह कुछ क्षण तक बोल नहीं पाया, फिर कहा, “हाँ, पाँच बजे मैं आप की प्रतीक्षा करूँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;शाम को फिर से उसके साथ गार्गी भी नारायणपुर गयी, और सुबह की तरह, वह नामघर के तालाब के पास बैठ गयी। उसने तुरंत वसंत से सम्पर्क किया और बताया कि वह लोग वहाँ आ गये हैं और बाहर हैं।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ताकानोरी के घर गया और चौकीदार से बोला कि उसे उनके जापानी साहब से मिलना है। चौकीदार को मालूम था कि वह आयेगा, वह उसे तुरंत ओरी के कमरे में ले गया। ओरी ने उसे बैठाया और चौकीदार से चाय भिजवाने के लिए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;थोड़ी देर तक ओरी उसे चुपचाप देखता रहा। दोनों करीब तीस साल के थे, और उनकी कुछ बातें मिलती थीं जैसे कि गम्भीर चेहरे, छोटे कटे सिर के बाल और लम्बे कद। ओरी उससे करीब दो इँच अधिक लम्बा है, उसका शरीर अधिक भारी है और वह गुदवाये टैटू से भरा हुआ है। त्री श्याम वर्ण का है, और ओरी गोरा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;चौकीदार हरी चाय ले कर आया तो ओरी ने उससे केतली ले ली और उसे भेज दिया, फिर उसे प्यालों में उड़ेला और एक प्याला उसकी ओर बढ़ाया। त्री ने गुरु जी के साथ कई बार हरी चाय पी थी, इसलिए वह उसके लिए नयी नहीं थी, हालाँकि उसे सामान्य दूध वाली भारतीय चाय ज्यादा अच्छी लगती है। दोनों ने चुपचाप चाय पी, फिर मुँह को नेपकिन से पोंछ कर ओरी बोला, “मैं ओकानो गैन्ज़ो ताकानोरी, मेरे घर में आप का स्वागत है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“मैं त्रिनेत्र, स्वागत के लिए धन्यवाद। अब हम काम की बात कर सकते हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान कौंधी, बोला, “मैं जून-मिन की विशेष मूर्ति की खोज में आया हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने सिर हिला कर हामी भरी, बोला, “मुझे मालूम है, और हम उसकी बात भी करेंगे, लेकिन उससे पहले मैं कुछ अन्य बातें साफ करना चाहता हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने धीरे से सिर हिलाया, कुछ नहीं बोला।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “सबसे पहली बात है कि हमें आप से किसी तरह का डर नहीं है, अगर मैं चाहता तो आप से मिले बिना यहाँ से आभा, वसंत और तृप्ति को ले गया होता, इसलिए मैं आप के पास किसी डर की वजह से नहीं आया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी मुस्कराया बोला, “मैं भिन्न तरह के अस्त्र-शस्त्रों की लड़ाई में माहिर हूँ, अगर हम सीधा लड़ें तो मैं दो मिनट में आप को मार सकता हूँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि आप के पास विभिन्न शक्तियों वाले यौद्धा हैं, जिनके सामने मेरी लड़ाई की क्षमता का कुछ महत्व नहीं है। उन्हीं के कारण आज सुबह से मेरे पैर में सूजन और दर्द थे, जो अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हुए हैं। लेकिन मेरे पास एक और छुपा हुआ अस्त्र है, कि मुझे अपने जीने-मरने की परवाह नहीं है, मैं चाहूँ तो इस पूरे घर को आग लगवा सकता हूँ जिसमें मेरे साथ आप और इस घर में बँधक आप के साथी, सब मर सकते हैं और आप की शक्तियाँ आप को बचा नहीं पायेंगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री भी मुस्कराया, बोला, “आप को पक्का यकीन है कि आप इस घर में आग लगवा पायेंगे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“कौन रोकेगा मुझे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “अच्छा तो आप अपने चौकीदार को बुला कर दिखाईये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी जो उनकी बातें सुन रही थी, उसने तुरंत ताकानोरी के दिमाग को अजगर-पाश में बाँध दिया। ओरी को लगा मानो उसके शरीर को लकवा मार गया हो, न&amp;nbsp; उसके मुँह से आवाज़ निकल रही थी, न ही वह हाथ या पाँव हिला पा रहा था। एक-दो लम्बे मिनट ऐसे ही गुज़रे, उसके बाद गार्गी ने अजगर-पाश को खोल दिया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री मुस्करा कर बोला, “आप के घर में आ कर, आप के साथ इस तरह की हरकत करने के लिए मुझे क्षमा कीजिये, लेकिन अब आप समझ गये होंगे कि मैं किसी डर की वजह से आप से बात करने नहीं आया। मैं आप को शक्तिवाहिनी माँ तारा की देवी मूर्ति तक ले जाने के लिए तैयार हूँ, लेकिन उससे पहले मुझे आप का एक वचन चाहिये। अगर आप मेरी इस शर्त को मानने के लिए तैयार हैं तब हम आगे बात करेंगे, वरना मैं अभी यहाँ से चला जाऊँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी का चेहरा फीका पड़ गया, बोला, “कैसा वचन?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“कि उस मूर्ति को पाने के बाद, आप और आप के बॉस यामागुचि सान, मेरे गुरु जी जून-मिन और हमें भूल जायेंगे और दोबारा उनका या हमारा पीछा नहीं करेंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने एक क्षण सोचा, बोला, “मैं स्वयं क्या करूँगा उसका मैं आप को वचन दे सकता हूँ, लेकिन यामागुचि सान भविष्य में क्या करेंगे, यह वचन मैं कैसे दे सकता हूँ?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“अगर आप मुझे यह वचन नहीं दे सकते तो मैं आप को वह प्रतिमा भी नहीं दे सकता।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी थोड़ी देर तक सोचता रहा, फिर बोला, “मैं वचन दे सकता हूँ कि शक्तिवाहिनी देवी प्रतिमा को यामागुचि सान को दे कर मैं उनसे कहूँगा कि जून-मिन अब नहीं है, वह ज़मीन के गर्भ में दफन हो चुका है। यह जान कर वह उसका पीछा नहीं करेगा। मैं यह वचन भी दे सकता हूँ कि अगर यामागुचि सान के गैंग ने दोबारा तुम लोगों पर हमला करने की कोई कोशिश की, तो मैं तुम्हारे साथ उनसे लड़ूँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने सोचा, बोला, “ठीक है, मुझे तुम्हारा यह वचन स्वीकार है। अब तुम आभा, वसंत और तृप्ति को जाने दो। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि तुम्हें शक्तिवाहिनी देवी प्रतिमा तक ले कर जाऊँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/24.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/5615956468775399612/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/23.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/5615956468775399612'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/5615956468775399612'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/23.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 23'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 22</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;:&amp;nbsp;&amp;nbsp;ताकानोरी जामुन बाबा की 
मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। बाबा का शिष्य 
त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली पहुँचा है। 
ताकानोरी आभा, वसंत 
और तृप्ति को उठा कर नारायणपुर ले जाता है और उन तीनों को एक कमरे में बंद 
कर देता है। त्री उनके पीछे गार्गी के साथ नारायणपुर आता है और अदृश्य हो कर ताकानोरी के घर में घुस कर आभा और बच्चों से बात करता है ... इसके आगे पढ़िये ...&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; -&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/21.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEitplbq2phqtM7IswbEFuSSEuhfdjQPkJ-eCwU_JCNXvVSF1N5hWwcA4o01l8xr35TI-NaHBHib25Lyr5zD1I1ANEGkz-3oF_wuXZY3FNkKOWfgAQX4MTCu9lKWxOZebuq7cHENEpHY0uuusb7PTSW_UJ4XfSIjZnwQeR5JMY_zZ8UuQL68HckWhl9PAKQx/s864/22.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;612&quot; data-original-width=&quot;864&quot; height=&quot;284&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEitplbq2phqtM7IswbEFuSSEuhfdjQPkJ-eCwU_JCNXvVSF1N5hWwcA4o01l8xr35TI-NaHBHib25Lyr5zD1I1ANEGkz-3oF_wuXZY3FNkKOWfgAQX4MTCu9lKWxOZebuq7cHENEpHY0uuusb7PTSW_UJ4XfSIjZnwQeR5JMY_zZ8UuQL68HckWhl9PAKQx/w400-h284/22.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&amp;nbsp;अध्याय 22&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;नारायणपुर, असम, 5 मार्च 2026&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;त्री कमरे से निकल रहा था जब उसे सीढ़ियों से किसी के आने की आहट हुई। गार्गी ने तुरंत उसकी शक्ति-लहर को ढक दिया। उसने केवल दरवाजे को बंद किया, उसकी कुँडी बंद नहीं की और सीढ़ियों के नीचे खड़ा हो गया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी सीढ़ियों से नीचे आ रहा था। हालाँकि त्री ने बिल्कुल भी आवाज़ नहीं की थी, लेकिन ताकानोरी की श्रवण शक्ति अच्छी थी, उसे लगा कि नीचे कोई है, लेकिन वहाँ कोई नहीं दिखा। वह त्री के साथ से गुज़रा लेकिन उसे नहीं देख पाया। जब उसने आभा के कमरे का कुँडा बाहर से खुला देखा तो वह चौंक गया, उसने सोचा कि कोई उसके बंदियों को निकाल कर ले गया है। उसने तुरंत अपनी अन्वेषण-किरण से जाँचा और देखा कि कमरे के तीन लोगों की शक्ति-लहर थी तो वह कुछ शाँत हुआ।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह द्वार की ओर आया तो दोनों पहरेदारों ने तुरंत ताश के पत्तों को समेट कर जेब में डाल लिया और खड़े हो गये।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;यहाँ पर कोई बाहर से आया था?”, उसने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“नहीं सर&quot;, दोनों पहरेदारों ने एक साथ उत्तर दिया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसने अपनी पीठ से बँधी तलवार को म्यान से निकाला और इशारे से दोनों पहरेदारों को पास बुलाया, और आभा के कमरे की ओर ले गया, बोला, “यह दरवाज़ा बंद क्यों नहीं है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;एक पहरेदार हकलाते हुए बोला, “सर, मैं .. मैं.. हमने यह.. बंद क..क..किया …”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“तुमने तो कहा कि कोई भीतर नहीं आया, तो क्या यह कुँडा अपने आप खुल गया?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;दोनों आदमी चुप हो गये।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;इसे तुरंत बंद करो&quot;, कह कर वह द्वार के पास आया और वहाँ रखी कुर्सी पर बैठ गया। कुछ क्षण बाद, कुँडा बंद करके जब दोनों पहरेदार लौटे तो वह बोला, “तुम अपने बायें हाथों को यहाँ मेज़ पर रखो। यह तुम्हारी पहली गलती है, इसलिए आज तुम्हें छोटी सजा दूँगा। लेकिन अगर ऐसी गलती दोबारा की, तो पूरी उँगली काट दूँगा, समझे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसने हाथ में तलवार ऊपर उठायी तो वह दोनों समझ गये कि उन्हें कुछ गम्भीर सजा मिलने वाली है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;दोनों आदमी काँप रहे थे, लेकिन उन्होंने अपने हाथ मेज़ पर नहीं रखे। ताकानोरी उन्हें एक मिनट तक चुपचाप देखता रहा और फिर उन्हें आँखों से मुख्य द्वार से बाहर जाने का इशारा किया। दोनों आदमी चुपचाप बाहर चले गये, तब ताकानोरी ने लम्बी साँस ली और धीरे से सिर हिलाया, बोला, “यहाँ के गुँडे तो बहुत डरपोक हैं, यह जाने बिना कि सज़ा क्या होगी, पत्ते की तरह काँप रहे थे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उन आदमियों ने बाहर जाते समय दरवाज़ा खुला छोड़ दिया था, उनके पीछे से त्री भी बाहर निकल गया। जब वह उसके सामने से गुज़रा तो शायद एक क्षण के लिए ताकानोरी को हवा में कुछ कम्पन सा महसूस हुआ, बोला, “कौन है? कौन जा रहा है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने उसे कुछ उत्तर नहीं दिया लेकिन वह वहाँ से गया नहीं, दरवाज़े के बाहर, झाड़ियों के पास उनमें घुलमिल कर खड़ा हो गया। वह देखना चाहता है कि ताकानोरी अब क्या करेगा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी उठ कर दरवाज़े तक आया। उसके दोनों पहरेदार, गेट के चौकीदारों को अपनी बात बता रहे थे, उसे दरवाज़े पर खड़ा देखा तो चुप हो गये और गेट खोल कर बाहर चले गये। ओरी ने आसपास ध्यान से देखा लेकिन त्री को नहीं देख पाया। गेट से प्रौढ़ वाला चौकीदार उठ कर उसके पास आया, बोला, “साहब जी, क्या हुआ? किसे खोज रहे हैं? क्या कोई भाग गया है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने सिर हिला कर मना किया, कुछ बोला नहीं, फिर भीतर आ कर दरवाज़े को बंद कर दिया। उसने सोचा कि अब उसे दो-तीन नये पहरेदार खोजने पड़ेंगे, लेकिन वह इन लोगों पर पूरा भरोसा नहीं कर सकता। यह लोग सामान्य गुँडे हैं, इन्हें ठीक से काम करना नहीं आता और यह डरपोक हैं। जब तक उसे सही व्यक्ति नहीं मिलेंगे, तब तक उसे खुद ही अपने घर की सारी पहरेदारी देखनी पड़ेगी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;फिर उसने आभा के कमरे का दरवाज़ा खोला और उन तीनों को बुला कर, उन्हें ऊपर अपने कमरे में ले कर गया।&lt;br /&gt;सीढ़ियाँ चढ़ते हुए आभा ने पूछा, “क्या हुआ? तुम कुछ परेशान से लग रहे हो?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी को आश्चर्य हुआ कि वह उसकी परेशानी को भाँप गयी है, हालाँकि वह अपने चेहरे और आवाज़ को निर्विकार रखने में बहुत कुशल है। उसके मन की परेशानी उसके चेहरे से कोई समझ नहीं पाता। उस समय वह कुछ नहीं बोला।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अपने कमरे में जा कर उसने उन्हें बैठने के लिए कहा, फिर बोला, “आज त्रिनेत्र तुमसे मिलने आया था और अभी कुछ देर पहले ही यहाँ से गया है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा हँसी, बोली, “अरे, हमें तो पता ही नहीं चला कि वह कब आया और कब गया, क्या तुमने उसे देखा?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत और तृप्ति कुछ नहीं बोले।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“तुम झूठ बोल रही हो&quot;, उसने कठोर स्वर में कहा, फिर वसंत से पूछा, “वह यहाँ कैसे घुसा? क्या उसके पास अदृष्य होने की शक्ति है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत ने भोला चेहरा बना कर कहा, “त्री दादा? कहाँ हैं वह?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“ठीक है, मैं अभी तुम्हें दिखाता हूँ&quot;, उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी शक्ति को जगा कर, उसे तृप्ति के मस्तिष्क में घुसा दिया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;छोटी सी तृप्ति चीख उठी। उसने उसे भीतर घुसने से रोका और अपने मस्तिष्क के पटों को बंद करने की कोशिश की। हालाँकि ओरी की शक्ति अधिक तीव्र नहीं है, लेकिन उस बच्ची के लिए वह काफ़ी थी। तृप्ति दर्द से छटपटाई तो मेज़ के पास रखी ओरी की तलवार, म्यान से निकल कर, हवा में ऊपर उठी और फिर छपाक से उसके पलंग के बीच में जा कर ऐसे गड़ी कि अगर उस समय वहाँ कोई&amp;nbsp; लेटा होता तो अवश्य मर जाता।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा ने बच्ची की यातना देखी तो वह भी चिल्लाई, “तृप्ति को छोड़ो, बच्ची के साथ ऐसा मत करो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;लेकिन तब तक ओरी ने तृप्ति के मानस-पटल में त्रिनेत्र के कमरे में घुसने और बच्ची को गले लगाने की छवि को देख लिया था। वह&amp;nbsp; जानना चाहता है कि त्रिनेत्र वहाँ कैसे आया और उसने उन्हें क्या कहा है?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तृप्ति, वसंत और आभा तीनों चिल्ला रहे थे, लेकिन ओरी अपनी जगह पर स्थिर बैठा ध्यान में लीन था और तृप्ति के मानस-पटल की स्मृतियों को जाँच रहा था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अचानक कमरे के कोनों से, दरवाज़े के नीचे से, बाहर बालकनी से, कीड़े, मकोड़े, बिच्छु, आदि निकल कर बाहर आने लगे। हालाँकि वह कमरा पहली मज़िल पर है, फिर भी आभा की शक्ति की पुकार इतनी प्रबल थी कि बहुत सारे जीव-जन्तु बाहर बाग से और घर के निचले भाग से निकल कर दीवारों और सीढ़ियों से ऊपर आ रहे थे। बालकनी से एक हरे रंग का साँप भी कमरे में घुसा। उन सब जीव-जन्तुओं को देख कर वह तीनों चुप हो गये लेकिन ओरी का ध्यान नहीं टूटा। उसकी तंद्रा तब टूटी जब एक बिच्छु ने उसके पैर पर काटा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तब उसने आँखें खोलीं और अपने आसपास फर्श पर घूमते उन&amp;nbsp; जीव-जन्तुओं को देखा तो वह कूद कर अपने बिस्तर पर चढ़ गया। तब उसे बिस्तर के बीच में गड़ी हुई अपनी तलवार दिखाई दी, तो वह और घबराया। उसके चेहरे के डरे हुए भाव को देख कर तृप्ति हँसने लगी। उसकी हँसी से आभा की पीड़ा-तंद्रा टूटी और वह जीव-जन्तु जहाँ थे वहीं रुक गये, फिर धीरे-धीरे जिधर से आये थे, उसी ओर लौटने लगे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तब तक ओरी का पैर जहाँ बिच्छु ने काटा था, वह लाल हो कर फूलने लगा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“किसने काटा मेरे पैर पर? क्या मुझे जहरीले साँप ने काटा है?”, उसने घबरा कर पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत बोला, “नहीं, तुम्हें साँप ने नहीं, छोटे से बिच्छु ने काटा है। वैसे भी वह हरा साँप जहरीला नहीं था, वह तो केवल चूहे खाता है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“पर यह सूज रहा है, देखो कितना फूल गया है&quot;, ओरी ने अपने पैर की ओर इशारा किया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “इस पैर को अच्छी तरह से साबुन और ठंडे पानी से धो लो। कुछ घंटों में यह ठीक हो जायेगा, और दर्द अधिक हो तो ब्रूफैन की गोली ले लो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;लंगड़ाता हुआ ओरी गुसलखाने में गया, तृप्ति और वसंत भी उसके साथ गये और उसका पाँव धोने में उसकी मदद की। वसंत उसकी बाहों, हाथों और पैरों पर गुदे हुए रंग-बिरंगे टैटू देख कर मुग्ध हो गया, बोला, “आप के यह टैटू बहुत सुंदर हैं, बड़ा हो कर मैं भी अपने शरीर पर ऐसे ही बनवाऊँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने सूजन और दर्द घटाने के लिए एक गोली खाई और फिर लंगड़ाता हुआ बाहर निकल आया और कुर्सी पर बैठ गया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तब तृप्ति ने उसे कहा, “त्री दादा कह रहे थे कि अगर आप हमें छोड दोगे तो कल या परसों वह आप से मिलने आयेंगे। वह पूछ रहे थे कि मूर्ति के अतिरिक्त आप को और क्या चाहिये? अगर आप को वह मूर्ति मिल जायेगी तो क्या आप हमारा पीछा छोड़ देंगे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने आभा की ओर देखा, बोला, “तुम्हारी शक्ति तो बहुत खतरनाक है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह बोली, “यह मेरे बस में नहीं है, लगता है कि जब मैं उत्तेजित होती हूँ तो यह अपने आप जागृत हो जाती है। तुम अगर मुझे परेशान नहीं करोगे तो तुम्हें डरने की कोई बात नहीं है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“और वह मेरी तलवार, अपनी म्यान से निकल कर वह बिस्तर पर कैसे आयी, यह किसका काम था?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तृप्ति बोली, “दीदी की तरह, मेरी शक्ति भी मेरे बस में नहीं है। तुम मेरे दिमाग में घुसे, इसलिए वह तलवार अपने आप हवा में चल पड़ी। अगर तुम रुकते नहीं तो शायद वह बिस्तर से निकल कर तुम्हारी छाती में भी घुस सकती थी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“लेकिन जब मैं तुम्हारे दिमाग में झाँक कर तुम्हारी स्मृतियों को देखने की कोशिश कर रहा था, तो क्या तुम्हें दर्द हो रहा था?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“नहीं, दर्द नहीं हो रहा था&quot;, तृप्ति बोली, “लेकिन तुम्हें ठीक तरह से मन में देखना नहीं आता। तुम झटके से और ज़ोर लगा कर घुसे तो मुझे बहुत बुरा लगा। मेरी गार्गी दीदी बहुत प्यार से और धीरे-धीरे मन में झाँकती है, तुम्हें भी उससे वैसा ही सीखना चाहिये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी उसकी बात सुन कर चुप हो गया। कुछ देर बाद बोला, “क्या तुम सच कह रही हो कि त्रिनेत्र आपने आप मुझसे मिलने आयेगा? क्यों? क्या वह उस मूर्ति को नहीं रखना चाहता?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;इस बार आभा बोली, “उसने हमें मूर्ति के बारे में कुछ विशेष नहीं बताया, हमें केवल इतना पता है कि पिछले चालिस-पचास सालों से तुम्हारे बॉस उस मूर्ति के लिए त्री के गुरु जी का पीछा कर रहे हैं। त्री यह जानना चाहता है कि तुम्हें उस मूर्ति के अतिरिक्त और क्या चाहिये?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी कुछ देर तक उसे देखता रहा, फिर बोला, “मुझे यामागुचि सान ने मूर्ति लाने का काम सौंपा है, कहता था कि इसके लिए अगर मुझे तुम्हारे गुरु को जान से भी मारना पड़े तो मैं उसे मार दूँ। बस, और कोई आदेश नहीं दिया है। लेकिन तुम्हारे गुरु ने तो मुझसे मिले बिना ही समाधी ले ली है, इसलिए अब मुझे उसकी चिंता नहीं है, अब मुझे केवल वह मूर्ति चाहिये, और कुछ भी नहीं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत बोला, “तुम हमे वचन दो कि अगर तुम्हें वह मूर्ति मिल जायेगी तो तुम हमारा पीछा छोड़ दोगे और भविष्य में हमे नुक्सान पहुँचाने की दोबारा कोशिश नहीं करोगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी बोला, “मैं वचन देता हूँ कि मुझे वह मूर्ति मिल जायेगी तो मैं तुम लोगों को और कोई कष्ट नहीं दूँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तब आभा ने कहा, “मैं तुम्हारा संदेश त्री तक पहुँचा दूँगी। वह तुम्हें बतायेगा कि तुमसे कब और कहाँ मिलेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/23.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/2927913525099609872/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/22.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2927913525099609872'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2927913525099609872'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/22.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 22'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEitplbq2phqtM7IswbEFuSSEuhfdjQPkJ-eCwU_JCNXvVSF1N5hWwcA4o01l8xr35TI-NaHBHib25Lyr5zD1I1ANEGkz-3oF_wuXZY3FNkKOWfgAQX4MTCu9lKWxOZebuq7cHENEpHY0uuusb7PTSW_UJ4XfSIjZnwQeR5JMY_zZ8UuQL68HckWhl9PAKQx/s72-w400-h284-c/22.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-9181094524655645086</id><published>2026-08-10T05:45:42.440+02:00</published><updated>2026-08-13T06:40:13.637+02:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उपन्यास"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कथा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धारावाहिक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 21</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;:&amp;nbsp; ताकानोरी जामुन बाबा की 
मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। बाबा का शिष्य 
त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली पहुँचा है। ताकानोरी आभा, वसंत 
और तृप्ति को उठा कर नारायणपुर ले जाता है और उन तीनों को एक कमरे में बंद कर देता है। त्री को यह सब खबर मिल चुकी है, अपने साथियों से बात करने वह आ रहा है ... इसके आगे पढ़िये ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; -&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/20.html&quot;&gt;&lt;b&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjy-QmJR-Y_yvO3fGpdqGFAzlFMdvQteJA_LcLSHPcNikHtYXK7TYQkZpWNu5qKbucBKXQ_qweDtQmGiyYEA8g1RwTK3QDxTsLyECSgCqMI0etZMPMg5qDv28EnOmrc_RhL2toBJUVAgbp0bupbggBEwe9cv78tA1tWQGC0S4SCeblsz1_YFX1YlFx-v8aS/s864/21.jpg&quot; 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से उसने गार्गी को बताया कि वह लोग नारायणपुर में बंदी हैं। गार्गी ने यह बात त्री को बतायी तो वह बोला, “उनसे कहो कि कल हम वहाँ तुमसे मिलने आयेंगे।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अन्वेषण-किरण का प्रयोग करने के लिए ताकानोरी को ध्यान लगाना पड़ता है और थोड़ी देर के बाद वह थक जाता है तो उसे अपनी खोज बंद करनी पड़ती है। वह दिन में केवल तीन-चार बार अन्वेषण-किरण का प्रयोग कर सकता है, बाकी समय में वह उन पर निगरानी नहीं रख पाता।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी के गुँडे उनके कमरे में घुसने से डरते हैं क्योंकि जब वह वसंत और तृप्ति के लिए ट्रे में खाना ले कर कमरे में गये थे तो तृप्ति की शक्ति से स्टील की प्लेटें और चम्मच हवा में उड़ने लगे थे, इसलिए उन्हें लगा कि उस कमरे में भूत हैं।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अगले दिन सुबह, त्री, रंगनाथ, गार्गी और माधव नाव में नारायणपुर के पास के छोटे से शहर मोरनाइगुड़ी में आये और वहाँ एक छोटे से होटल में एक दिन के लिए एक कमरा लिया। रंगनाथ और माधव को होटल में छोड़ कर, त्री और गार्गी ने नारायणपुर के लिए टैक्सी ली।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;रास्ते में गार्गी ने वसंत से सीधा सम्पर्क बना कर उससे सारी जानकारी ली और उसे कहा, “हम लोग आज सुबह नारायणपुर आयेंगे और त्री दादा अदृश्य हो कर ताकानोरी के घर में घुसेंगे। अगर तुम्हें महसूस हो कि दादा वहाँ हैं तो होशियार रहना, कुछ नहीं बोलना या करना जिससे उन्हें शक हो कि वह वहाँ हैं। यह बात आभा दीदी और तृप्ति को भी समझा देना।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब उनकी टैक्सी ताकानोरी के घर के पास पहुँची तो गार्गी ने अपनी और त्री की शक्तियों को ढक लिया। ताकानोरी के घर से कुछ पहले दोनों टैक्सी से उतर गये और आगे पैदल गये। बाकी घरों के मुकाबले में वह घर बड़ा था, उसे पहचानने में मुश्किल नहीं हुई। उसके घर के दूसरी ओर, बादल सत्र का नामघर था जिसके पास एक तालाब था। नामघर से हो कर, त्री और गार्गी तालाब के पास जा कर बैठ गये।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी बोली, &quot;दादा, यहाँ से ताकानोरी का घर दूर नहीं है, मैं यहाँ बैठ कर आप की शक्ति को ढक लूँगी, आप अदृश्य हो कर उसके घर में घुस सकते हो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जिस समय त्री और गार्गी नामघर के तालाब के पास बैठे, उस समय ताकानोरी ने आभा को फिर से अपने कमरे में बुलाया और उससे पूछा, “क्या तुम लोगों ने त्रिनेत्र को खबर दे दी है कि तुम तीनों अब मेरे बंदी हो?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;तुम लोगों ने उससे कैसे सम्पर्क किया?”, रात को ताकानोरी ने देर से वेबकैम और अपनी अन्वेषण-किरण से उनके कमरे पर निगरानी रखी थी लेकिन उसने वहाँ से किसी को बात करते हुए या वहाँ से गुप्त-शक्ति की लहर को निकलते या आते हुए महसूस नहीं किया था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा मुस्करायी, बोली, “मुझे अपनी शक्ति नियंत्रित करनी नहीं आती और शक्ति के माध्यम से बातचीत करने का मेरा अनुभव कम है, इसलिए मैं आप को इस बात को ठीक से नहीं समझा सकती। जहाँ तक मुझे मालूम है, यह सम्पर्क हमने नहीं किया बल्कि त्री ने हमारे साथ किया था, लेकिन उसने मुझसे बात नहीं की, केवल बच्चों से की। उसे वसंत और तृप्ति की आधिक चिंता है, मैं तो उसके लिए अजनबी जैसी हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“इसका मतलब है कि वह बीस-तीस किलोमीटर की दूरी से भी बच्चों से सम्पर्क कर सकता है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा ने कँधे उचका दिये, बोली, &quot;मैंने कहा न कि मुझे यह सब नहीं मालूम&quot;, फिर उससे पूछा, “जब तुम्हें वह गुप्त शक्ति वाली मूर्ति मिल जायेगी तो क्या तुम त्रिनेत्र को और हमें मार दोगे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“तुम्हें मारने की बात मैंने कब की?”, ओरी ने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;कल शाम को तुम मुझे धमकी दे रहे थे कि त्रिनेत्र से कहना कि अगर वह तुम्हें वह मूर्ति नहीं देगा तो तुम हम तीनों को मार दोगे?&quot;, आभा बोली।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी उसे थोड़ी देर तक देखता रहा, फिर बोला, “मूर्ति को पाने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हैं, तुम्हें और बच्चों को मार भी सकता हूँ। लेकिन मैं समुराई योद्धा हूँ, बिना कारण मैं औरतों और बच्चों को नहीं मारता।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा उसके सामने जा कर बैठ गयी, “तुमसे एक प्रश्न पूछ सकती हूँ? अपनी शक्ति के बारे में कुछ बताओ कि वह कब और कैसे विकसित हुई?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी जानता है कि इस काम में यह युवती उसके दुश्मन की साथी है और उसे अपने बारे में बताना ठीक नहीं होगा। दूसरी ओर, बचपन से उसके मन में अपनी शक्ति के बारे में प्रश्न उठते रहे हैं, लेकिन आज तक उसे ऐसा कोई नहीं मिला है जिससे वह यह बातें कर सके। उसने सोचा कि वह उसे अपनी गुप्त शक्ति के बारे में कुछ नहीं बतायेगा लेकिन वह इस विषय पर वह दोनों सामान्य बातें कर सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;यह सोच कर वह धीरे से बोला, “जिस तरह से तुम सब शक्ति वाले लोग, एक साथ रहते हो और एक साथ शक्ति साधने का अभ्यास करते हो, मुझे वैसा मौका नहीं मिला। मेरे पिता यामागुचि सान के लिए काम करते थे। जब मैं बच्चा था तब मेरे पिता की मृत्यु हो गयी थी। यामागुचि सान में भी शायद कुछ शक्ति थी और उन्होंने मेरी शक्ति को पहचाना। उन्होंने मुझे लड़ना और शस्त्र चलाना आदि सिखाने के लिए गुरु रखे, और बड़ा हो कर मैं उनके साथ काम करने लगा। बचपन से ही मैं उनका रक्षक था, उन्हें दुश्मनों से बचाता था। अब वह बहुत बूढ़े हो गये हैं, आजकल उनका पोता रिकू यामागुचि उनके धँधे का मालिक है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“गुँडागर्दी, मार-पिटाई और मासूम लोगों का खून करना, वह सब तुम्हें किसने सिखाया?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा का प्रश्न ताकानोरी पर वज्र जैसे गिरा, वह चुप हो गया। फिर उसने अपने आदमी को बुलाया और आभा को नीचे ले जाने के लिए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तालाब के पास बैठी गार्गी ने आभा और ताकानोरी की सभी बातों को सुना और उनके बारे में त्री को बताया। वह बोली, “ताकानोरी के मन में आभा दीदी के लिए प्रेम जाग रहा है, शायद इसीलिए वह उनके प्रश्न से गुस्सा हो गया। वह नहीं चाहता कि दीदी उसे एक गुँडे या खूनी की तरह देखे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री को विश्वास नहीं हुआ, बोला, “अभी कल ही तो वह पहली बार आभा से मिला है, इतनी जल्दी उसे उससे प्रेम कैसे हो गया?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“दादा, यह प्रेम पूछ कर या सोच-समझ कर नहीं होता&quot;, गार्गी हँसी, “क्योंकि तुम्हें अभी तक किसी से प्रेम नहीं हुआ इसलिए तुम इस बात को नहीं समझ सकते।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“अच्छा यह बातें अब रहने दो। इस समय हमारे तीनों साथी, एक साथ नीचे वाले कमरे में बंद हैं, मैं उनसे मिलने जा सकता हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“हाँ दादा, अभी अच्छा मौका है&quot;, गार्गी ने हामी भरी, “इस समय ताकानोरी का मन भी विचलित है, अभी कुछ देर तक वह ठीक से ध्यान नहीं लगा पायेगा, तुम तुरंत वहाँ जाओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री सड़क पार करके ताकानोरी के घर की ओर आया। आज उसने सफेद और हलके रंग वाले कपड़े पहने हैं, जिसमें उसके लिए अदृश्य होना अधिक आसान है। उसकी गिरगिट शक्ति, उसके शरीर और वस्त्रों के रंगों को फीका कर देती है, वह पारदर्शी सा हो जाता है और आसानी से दिखायी नहीं देता।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी के घर के चारों ओर, बाँस की चटाई लगी थी, वह उससे सट कर चलने लगा, एक क्षण में ही वह उस चटाई में बिल्कुल घुल-मिल गया। वह घर के गेट के पास जा कर रुक गया। गेट के भीतर दो आदमी बैठ कर धीमे स्वर में बातें कर रहे थे, एक प्रौढ़ था, पैंतालिस-पचास साल का और दूसरा जवान, पच्चीस-तीस का।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;कुछ देर के बाद, घर के भीतर से एक औरत निकली और उनसे बोली कि बाज़ार से कुछ तरकारी लानी है। जवान युवक ने उससे पैसे और थैला लिए और गेट खोल कर बाहर निकला। जब तक वह अपने पीछे गेट बंद करता, त्री फुर्ती से भीतर घुस गया और वहाँ की झाड़ियों के साथ खड़ा हो गया, एक पल में उसका रंग बदल कर झाड़ियों जैसा हो गया। दूसरे चौकीदार को लगा कि कोई भीतर घुसा है, तो उसने सिर घुमा कर आसपास देखा लेकिन तब तक त्री गुम हो चुका था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;चौकीदार वापस बैठा तो त्री धीरे से भीतर की ओर सरक गया। एक बार फिर से चौकीदार को लगा कि वहाँ कोई है, उसने घूम कर देखा लेकिन उसे कुछ नहीं दिखा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब वह औरत वापस घर के भीतर गयी थी तो उसने पीछे से दरवाज़ा बंद कर दिया था। इस बार त्री ने प्रतीक्षा नहीं की, एक झटके में दरवाज़ा खोला और भीतर घुस गया। भीतर बायीं ओर कुछ कुर्सियाँ रखी थीं, वहाँ दो आदमी बैठ कर ताश खेल रहे थे, उनकी बन्दूकें दीवार से टिकी रखी थीं। जब तक उन्होंने दरवाज़े की ओर सिर घुमाया, त्री घर के भीतर आ कर और दीवार के रंग में घुलमिल सा गया था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;यह दरवाज़ा कैसे खुल गया?”, एक आदमी उठ कर देखने आया, बाहर झाँका, देखा कि कोई नहीं है, तो पीछे से दूसरा बोला, “रसोई वाली ने ठीक से बंद नहीं किया, हवा से खुल गया होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;पहले वाला आदमी बोला, “बाहर ऐसी कोई हवा तो नहीं चल रही।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह दरवाज़े की बातें कर रहे थे, और त्री वहाँ से जा चुका था। गार्गी उससे सम्पर्क बनाये थी, उसने उसे दिशा बतायी कि आभा और बच्चे किस ओर हैं। वह सीधा उनके कमरे तक पहुँच गया। कमरे पर बाहर से कुँडी लगी हुई थी लेकिन वहाँ पर कोई पहरेदार नहीं था। उसने जल्दी से कुँडे को खोला, भीतर घुस कर पीछे से दरवाज़ा बंद कर दिया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा, वसंत और तृप्ति ने दरवाज़ा खुलते हुए देखा लेकिन कोई भीतर नहीं आया, पर तृप्ति तुरंत समझ गयी कि वह है, खुश हो कर बोली, “त्री दादा, तुम आ गये।&quot;&lt;/p&gt;तब त्री प्रकट हुआ और उन्हें दिखने लगा। उसने होठों पर उंगली रख कर उन्हें चुप रहने का इशारा किया, फिर कुछ क्षणों तक बाहर की ओर कान लगा कर पहरेदारों की बातें सुनीं। तृप्ति तुरंत उससे लिपट गयी।&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने तृप्ति को गोदी में उठा लिया, धीरे से बोला, “आज मैं तुम्हें यहाँ से छुड़ाने नहीं आया, तुम्हें अभी एक-दो दिन यहीं रहना है। मैं तुम्हें केवल यह दिखाना चाहता हूँ कि मेरे लिए तुम्हें छुड़ाना बहुत आसान है, जब चाहूँ तुम्हें यहाँ से निकाल कर ले जा सकता हूँ, समझे? इसलिए तुम लोग डरो नहीं और इन दिनों को छुट्टियों की तरह समझो।”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;फिर आभा से बोला, &quot;तुम ताकानोरी से जो बातें कर रही हो, वह बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मैं उसके और उसके मालिकों के मन में क्या है, यह जानना चाहता हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “वह हमेशा एक मूर्ति की बात करता है और कुछ नहीं कहता।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“हाँ, मूर्ति की बात तो है। लेकिन हमें उसकी पूरी बात समझनी है, मैं नहीं चाहता कि भविष्य में हमारे अनाथाश्रम पर या हमारे बच्चों पर, कोई खतरा आये। तुम उससे सावधान रहो, वह खतरनाक खूनी है, पता नहीं अब तक कितने लोगों को मार चुका होगा।”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा मुस्करायी, बोली, “मुझे उससे कोई खतरा नहीं होगा। मैं यह नहीं कहती कि वह खूनी नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि वह अपने आप को बहुत अकेला महसूस करता है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“फिर भी तुम चौकन्नी रहो, उसका भरोसा मत करो। अब मैं जाता हूँ, एक-दो दिन में दोबारा तुमसे मुलाकात होगी। हमें तुम्हारी और मेरी अदला-बदली करनी है, मैं उसका बँधक बन जाऊँगा और तुम तीनों मुक्त हो जाओगे। यह कैसे और कब करेंगे, इसके बारे में प्लैन बना कर मैं तुम्हें खबर करूँगा, तुम लोग बिल्कुल चिंता मत करना।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“दादा, तुम जा रहे हो?”, तृप्ति रोने लगी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“अरे, तुम तो मेरी सबसे बहादुर यौद्धा हो, जब तुम तलवार और चाकू चलाती हो तो बड़े-बड़े डाकू-लुटेरे भी डर कर भाग जाते हैं, तुम रोओगी तो मैं क्या करूँगा?&quot;, त्री ने उसे कहा ।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तब तृप्ति ने अपने आँसू पोंछ लिये और मुस्कराने की कोशिश की, बोली, &quot;ठीक है दादा, मुझे लेने जल्दी लौटना।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/22.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/9181094524655645086/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/21.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/9181094524655645086'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/9181094524655645086'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/21.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 21'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पत्रिकाएँ"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>क्या पढ़ा (1) - हिंदी कहानियाँ-आलेख</title><content type='html'>&lt;p&gt;लगभग पिछले चालिस सालों से, जबसे दिल्ली छोड़ कर इटली में रहने लगा था, मेरा हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ना बहुत कम हो गया था, जब भारत जाता था तो इक्का-दुक्का पढ़ लेता था। पिछले साल अगस्त में मैंने &quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://notnul.com/Pages/Home.aspx&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;नॉटनुल&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&quot; की वार्षिक सदस्यता ली तो इतने सालों के बाद हिंदी की पत्रिकाएँ पढ़ने का मौका मिलने लगा। अब इस बात को करीब एक साल हो गया है, एक दिन मैं याद करने लगा कि पिछले बारह महीनों में हिंदी पत्रिकाओं में क्या अच्छा पढ़ा, तो कुछ भी याद नहीं कर पाया। तब सोचा कि आगे से मुझे जो पढ़ा हुआ अच्छा लगेगा, उसके बारे में इस ब्लॉग पर लिखने की कोशिश करनी चाहिये, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसे याद किया जा सके।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi3rrDR5W7h-PTIAVNcEEdPmjJz9wUY0HwUJRBA9xjsssQEmaQ7nuNtgDMNS7MgjWY0KRGvAaeEmysWcg3TdnKdZsouD_Bgo4Slix7yEDhpTiEN4T4IUXQMJ7hcfyj8F1OeJDRRXp9frsPjanNBs_p8rHh_56INMYGNEFvHeq9kAsHPRScDpyqN-ZtXjyg-/s1000/Hindi_magazine_covers.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;760&quot; data-original-width=&quot;1000&quot; height=&quot;243&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi3rrDR5W7h-PTIAVNcEEdPmjJz9wUY0HwUJRBA9xjsssQEmaQ7nuNtgDMNS7MgjWY0KRGvAaeEmysWcg3TdnKdZsouD_Bgo4Slix7yEDhpTiEN4T4IUXQMJ7hcfyj8F1OeJDRRXp9frsPjanNBs_p8rHh_56INMYGNEFvHeq9kAsHPRScDpyqN-ZtXjyg-/s320/Hindi_magazine_covers.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुझे आशावादी साहित्य पढ़ना अच्छा लगता है, मैं चाहता हूँ कि चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किलें या दुख हों, लेकिन कहानी के क्षितिज पर एक आशा की छोटी सी किरण भी होनी चाहिये, सब कुछ बिल्कुल नकारात्मक नहीं होना चाहिये। दूसरी बात है कहानी का कथानक, उसके कहने का अन्दाज़, उसकी बातें। पिछले वर्ष में जब हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ीं तो मुझे समझ में आया कि मुझे हिंदी कहानियाँ पढ़ना इतना अच्छा नहीं लगता, बल्कि आलेख पढ़ना अधिक अच्छा लगता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसीलिए आज के मेरे इस आलेख में कहानियाँ कम पायेंगे और आलेख अधिक।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;कथा-कहानियाँ&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;चंद्रकिशोर जायसवाल&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;फर्ज&lt;/b&gt;&quot;, &lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/p/Naya-Gyanoday-61581586524558/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;नया ज्ञानोदय&lt;/b&gt;&amp;nbsp;पत्रिका &lt;/a&gt;के जुलाई अंक में पढ़ी। इसमें दामोदर भगत का बेटा बैजनाथ अपनी पसंद की युवती से ब्याह करना चाहता है, पर भगत जी ने पाँच साल पहले किसी को ज़ुबान दी थी कि उनकी सुंदर, सुस्कृंत कन्या से पुत्र का ब्याह करेंगे। गुस्से में भगत जी निर्णय लेते हैं कि अगर बैजनाथ उनकी बात नहीं मानेगा तो वह उसे अपनी जयदाद से बेदखल कर देंगे। कह तो देते हैं लेकिन उनके मन में इस बारे में कुछ संशय है, इसलिए वह अपने फुलकाहा गाँव के वरिष्ठ ज्ञानी वेदानन्द गिरि से सलाह लेने जाते हैं ... जब यह कहानी शुरु हुई, तो मेरे मन में अपेक्षा थी कि वह किस दिशा में जायेगी, लेकिन कहानी ने वह घिसा-पिटा रास्ता नहीं लेती, बल्कि एक दूसरी ही दिशा में चल पड़ती है। कहानी में वेदानन्द बाबू की यादों के किस्से और उनकी भगत जी को समझाने की कोशिशें, मुझे अच्छी लगीं। कहानी का अंत थोड़ा सा कन्वीनियंट लगा, पर कहानी पढ़ने में मज़ा आया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;मुकेश नौटियाल&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;सियारसिंगी&lt;/b&gt;&quot;, जुलाई 2026 की &lt;a href=&quot;https://pakhi.in/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;पाखी&lt;/b&gt;
 पत्रिका&lt;/a&gt; में पढ़ी। इस कहानी में दो कहानियाँ हैं, एक कहानी है एक पहाड़ी गाँव की 
औरत, उसके बेटे और उसके खोये हुए भाई की। और दूसरी कहानी है एक 
तिब्बती शरणार्थी युवती और उसके साथ रहने वाले गूँगे-बहरे लड़के की। इन दो 
कहानियों को स्कूल में पढ़ाने वाले एक मास्टर जी जोड़ते हैं जो गाँव वाली औरत की
 चिट्ठियाँ लिखते हैं और उसके भाई को खोजने देहरादून की तिब्बती बस्ती में 
जाते हैं। कहानी में दो लोकविश्वास की कहानियाँ भी जुड़ी हैं, एक सियारों के माथे
 में उगने वाली जादुई शक्ति वाली सियारसिंगी की और दूसरी, इन्सानों को आग 
पर पका कर उनके कपाल से निकाले जाने वाले रामतेल की। यह सारी कहानी संयोगों पर
 टिकी है, कहानी के हर मोड़ पर मास्टर जी हर जगह पर जो भी खोजते हैं, वह उन्हें आसानी से मिल जाता है। पर जादुई-यदार्थवाद की कहानी में तर्क की अपेक्षा करना शायद उचित भी नहीं 
है। इस कहानी में मुझे उसकी भाषा और पहाड़ी लोकजीवन की खुशबु अच्छी लगीं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;नर्मदेश्वर&lt;/b&gt; की कहानी &quot;&lt;b&gt;सूई धागा&lt;/b&gt;&quot;, &lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/parikatha.h.patrika/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;परिकथा&lt;/b&gt; पत्रिका&lt;/a&gt; के जुलाई अंक में पढ़ी, अच्छी लगी। छोटी सी, सीधी-साधी कहानी है, जद्दी चाचा नाम के दर्जी और संदीप नाम के लड़के की, कि कैसे समय के साथ संदीप की उनसे जान-पहचान बनती है और लड़के को समझ आती है कि ऊपर से सख्त दिखने वाले जद्दी चाचा मन के नर्मदिल हैं। कहानी में जद्दी चाचा का अपने बेटों के नाम पेट्रोल और डीज़ल देख कर कुछ अजीब सा लगा, सोचा कि लेखक को उन नामों की कहानी भी बतानी चाहिये थी। इस कहानी से मुझे बचपन के दिनों की याद आई जब दर्जी, सफाई वाले, कपड़े इस्तरी करने वाले, दुकानदार, आदि बेनाम नहीं सचमुच के लोग होते थे, हम उनके नामों और परिवारों के इतिहासों को जानते थे, और वे हमारे।&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आलेख, संस्मरण, आदि&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;बिपिन तिवारी&lt;/b&gt;, &lt;b&gt;अभिषेख गुप्ता&lt;/b&gt; और &lt;b&gt;रोहतास कुमार&lt;/b&gt; का &lt;b&gt;सुधीर विद्यार्थी &lt;/b&gt;से लम्बा साक्षात्कार &quot;&lt;b&gt;विप्लव राग&lt;/b&gt;&quot; शीर्षक से, &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/p/Banaas-Jan-100064795893764/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;बनास जन&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&amp;nbsp;पत्रिका में पढ़ा जो मुझे अच्छा लगा। सुधीर विद्यार्थी जी 1953 में पैदा हुए थे, उन्होंने इतिहास में एमए की और बीसवीं सदी के क्राँतिकारियों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। इस साक्षत्कार-आलेख में बहुत सी रोचक बातें जानने को मिली, जैसे कि बनारसीदास चतुर्वेदी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, सुंदरलाल, बाबा नागार्जुन, आदि के संस्मरण, क्राँतिकारियों के बारे में गाँधी जी और नेहरू जी के बीच मतभेद, लोगों द्वारा भगतसिंह के सिर पर पगड़ी रखने का अर्थ, पंडित परमानन्द की कहानी, सुनीति चौधरी और शांति घोष की बातें, आदि। आलेख में अपने लेखन के बारे में सुधीर जी कहते हैं, &quot;मैं किसी लायब्रेरी में नहीं बैठा, न किसी आर्काइव में गया। उस इतिहास को मैंने देखा-सुना-जाना, क्राँतिकारियों की आँखों से, उनके शब्दों से। इतिहास को बताते हुए कई-कई बार उन्हें रोते हुए देखा ...&quot;। 64 पन्नों का यह साक्षात्कार है, किसी छोटी किताब के बराबर लम्बा है, पर बहुत दिलचस्प है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रसिद्ध शायर&amp;nbsp;&lt;b&gt;बशीर बद्र &lt;/b&gt;का मई 2026 में 91 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनके बारे में दो आलेख पढ़े। एक आलेख &quot;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://hanshindimagazine.in/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;हँस पत्रिका&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&quot; में पढ़ा जिसमें युवा शायर&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;https://www.instagram.com/mahendrakumarsani/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;महेंद्र कुमार सानी&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;ने अपने स्मृति-आलेख, &quot;&lt;b&gt;उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो&lt;/b&gt;&quot;,&amp;nbsp;में&amp;nbsp;उनके प्रिय और प्रसिद्ध शेरों को याद किया है। जबकि &lt;b&gt;डॉ. जियाउर रहमान ज़ाफ़री&lt;/b&gt; ने &quot;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/kaksaadmagazine/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;ककसाड़ पत्रिका&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&quot; के जुलाई अंक में अपने आलेख, &quot;&lt;b&gt;शायर बशीर बद्र को याद करने वाले ...&lt;/b&gt;&quot;, में उनके जीवन की कुछ बातों बतायीं हैं जैसे कि कैसे 1987 में मेरठ के दंगे में अपना घर खो कर वह भोपाल चले आये थे, कैसे अंतिम वर्षों में उनकी यादाश्त नहीं रही थी और कैसे बड़े बाग कब्रिस्तान में उनके जनाज़े साथ केवल मोबाइल की रोशनी और थोड़े से लोग थे। यहाँ मैं बद्र साहब का वह शेर याद करना चाहूँगा जिसे मैंने अपना जीवन जीने का मंत्र बनाया है: &quot;&lt;i&gt;हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल देंगे, रास्ता हो जायेगा।&lt;/i&gt;&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;शिव कुमार पाण्डेय&lt;/b&gt; का आलेख, &quot;&lt;b&gt;बस्तर की बोली-भाषा&lt;/b&gt;&quot;, भी&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/kaksaadmagazine/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;ककसाड़&lt;/b&gt; पत्रिका&lt;/a&gt; में ही पढ़ा। मुझे जनजातियों के जीवन से जुड़े लेख पढ़ना अच्छा लगता है इसलिए &quot;ककसाड़&quot; मासिक पत्रिका हमेशा चाव से पढ़ता हूँ। इस आलेख में पाण्डेय जी ने बस्तर की भाषाओं और बोलियों का बहुत दिलचस्प विवरण दिया है। जैसे कि गोंडी भाषा बस्तर में कांकेर और भानुप्रतापपुर के साथ-साथ अन्य बहुत से क्षेत्रों में भी बोली जाती है जिनमें कोन्टा, भोपाल पटनम, दाँतेवाड़ा, गढ़चिरोली, बालाधार, आदि भी शामिल हैं। हर जगह की गोंडी थोड़ी सी भिन्न है, लोग एक-दूसरे की गोंडी को समझते हैं, लेकिन उत्तर अपनी गोंडी में देते हैं। गोंडी के अतिरिक्त इस आलेख में &quot;हल्बी&quot; भाषा का भी जिक्र है जिसे बस्तर की सम्पर्क की भाषा भी कह सकते हैं और जिसमें छत्तीगढ़िया, मराठी और उड़िया भाषाएँ मिली हुई हैं। लेकिन गोंडी, हल्बी और बस्तर की अन्य 36 बोलियों में आपस में क्या सम्बंध है, यह बात मुझे ठीक से समझ नहीं आई, इसलिए इस विषय पर और पढ़ना अच्छा लगेगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/akaar.patrika.7&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;अकार&lt;/b&gt; पत्रिका&lt;/a&gt; में &lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.hindwi.org/authors/priyamvad-1/profile&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;प्रियंवद&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; का सम्पादकीय पढ़ा जिसमें उन्होंने हिंदी के वरिष्ठ लेखक तथा पहल पत्रिका के सम्पादक &lt;b&gt;ज्ञानरंजन&lt;/b&gt; जी के बारे में लिखा है वह अच्छा लगा। उसमें उन्होंने, अन्य लेखकों के ज्ञानरंजन जी को लिखे पत्रों के माध्यम से, उनकी मार्क्सवादी-कथाकार बनने की यात्रा और फ़िर उनका कथाकार से अधिक सम्पादक बन जाने की बात, अन्य लेखकों के साथ उनके सम्बंधों, आदि की बातें बतायी हैं। ज्ञानरंजन जी की यह बात कि &quot;मैं अपनों के प्रति बहुत निर्मम हूँ&quot;, मुझे बहुत परिचित सी लगी, क्योंकि एक समय था जब मेरी सोच भी कुछ वैसी ही थी, मुझे भी यह लगता था कि अगर मैं आप की कड़वी आलोचना करता हूँ तो इसका मतलब है कि आप मेरे प्रिय हैं (अब मैं इस सोच से बचने की कोशिश करता हूँ)। ज्ञानरंजन जी का इस साल के प्रारम्भ में देहांत हो गया था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/akaar.patrika.7&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;अकार पत्रिका&lt;/a&gt; के 73 अंक&lt;/b&gt; में ही &quot;&lt;b&gt;मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद&lt;/b&gt;&quot; शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य छपे हैं, इन्हें भी मैंने बहुत रुचि से पढ़ा और यह मुझे बहुत अच्छे लगे। इनमें से कुछ की बात करना चाहता हूँ, जिन्होंने मुझे गहरा छुआ:&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;मनोज रूपड़ा &lt;/b&gt;के वक्तव्य में, उनकी स्मृतियों में हिंसा की घटनाओं, कुत्तों का घायल बिल्ली को नोच कर खाने से ले कर जलती रेल की बोगी में झुलसती लाशों के विवरणों, ने दिल को हिला दिया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://www.instagram.com/jaya.jadwani/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;जया जादवानी&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; की जीवन गाथा पढ़ी तो लगा कि उनके जैसा जीवन जीते हुए पढ़ना और लिखना का मतलब कितनी कठिनाईयों से लड़ना है। वह लिखती हैं, &quot;द्वंद कुछ नया सोचने का, कुछ नया रचने का अब ज़्यादा है। कुछ ऐसा जो वर्जित हो, जिसे अब तक कहा न जा सका हो। कहा भी गया हो तो उसके भीतर घुस कर नहीं। मैं चाहती हूँ मेरा सत्य मेरे होने से निकले ...&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://samalochan.com/authors/%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;जितेन्द्र भाटिया&lt;/a&gt;&lt;/b&gt; के वक्तव्य में उनका कहानी लिखने को वैताल के वृक्ष से &quot;स्मृति के शव को नीचे उतारने जैसा&quot; पढ़ कर बहुत देर तक सोचता रहा। मुझे लगा कि शायद स्मृतियाँ शव नहीं होतीं, जीवित होती हैं पर उनमें एक अलग किस्म का जीवन होता है। जैसे विक्रम के गलत उत्तर देने पर वह शव उड़ कर वापस पेड़ पर लौट जाता है, वैसे ही स्मृतियाँ भी हमारे मानसिक पटल पर उड़ती-घूमती रहती हैं। उनकी एक अन्य बात कि &quot;कविता के मुकाबले में गद्य लेखन, प्रेरणा से अधिक एक धैर्यपूर्ण रियाज़ और अपने आगे-पीछे देखने-समझने की विवेकपूर्ण मशक्कत माँगता है&quot;, ने भी सोचने पर मजबूर किया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/divya.vijay.319/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;दिव्या विजय&lt;/b&gt; &lt;/a&gt;की बात कि व्यक्ति अपने आप को लेखक कब महसूस करता है, मुझे दिलचस्प लगी। मैं अक्सर कला प्रदर्शनियों में कलाकारों से साक्षत्कार करता हूँ, वहाँ भी अक्सर उनके मन में यही संशय मिलता है, कि शायद मैं कलाकार नहीं हूँ, मैंने कला के लिए बलिदान वाला जीवन नहीं जिया। दिव्या जी लिखती हैं, &quot;लिख देना, छप जाना, क्या इतने भर से लेखक बना जा सकता है? वह क्या है जो किसी व्यक्ति को लेखक में बदल देता है?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;राही डूमरचीर&lt;/b&gt; के वक्तव्य में संताल गाँव और मित्रों के बीच में एक प्रवासी परिवार का हिस्सा होने का द्वंद है, जो संतालों को नीचा और पिछड़ा हुआ मानता है, उनसे सम्बंध नहीं रखना चाहता, वहाँ की प्रकृति-पहाड़ की सुंदरता को नहीं देख पाता। वह लिखते हैं, &quot;... दंभ भी आनुवांशिक होता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वत: हस्तांतरित होता रहता है ... आदिवासियों के प्रति हमदर्दी ही हिलोर मारती थी, प्यार नहीं कर पाता था ... जँगल में अराजकता का राज होता है, कोई कायदा, कानून नहीं होता, यह वही कह सकता है जिसे सिर्फ बगीचे वाली व्यवस्था नज़र आती है ...हमारा समय पुरखे, पेड़ों, जंगलों में निवास करता है। उनके बीच पलता-बढ़ता है। उन्हीं के साथ-साथ चलता है। उनके बीतने से हमारा समय भी बीत जाता है ... मनुष्य विरोधी हो कर तो फ़िर भी रहा जा सकता है, पर धरती विरोधी हो कर कितने दिनों तक बचे रह पायेंगे हम?&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://www.facebook.com/p/%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE-100064147960847/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;कथा क्रम &lt;/b&gt;पत्रिका&lt;/a&gt; के अप्रैल-जून अंक में &lt;a href=&quot;https://lahakdigital.com/2023/08/18/lovelesh-dutt-on-famous-critic-madhuresh/&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;&lt;b&gt;मधुरेश &lt;/b&gt;जी&lt;/a&gt; का लम्बा आलेख &quot;&lt;b&gt;शरत चन्द्र और उनका &#39;शेष प्रश्न&#39;: प्रेम दृष्टि और स्त्री चिंता के सवाल&lt;/b&gt;&quot; में शरत चन्द्र के उपन्यास &quot;शेष प्रश्न&quot; के विभिन्न पात्रों विशेषकर कमल के बारे में, विवेचना तो है ही, साथ ही इस उपन्यास के विभिन्न संस्करणों के अनुवादों की गुणवत्ता और साहित्यिक भिन्नताओं की बात भी है। इस सब के साथ, आलेख में हिंदी साहित्य के पुराने अनुवादकों और प्रकाशकों की बाते भी हैं जो मुझे बहुत दिलचस्प लगीं। उदाहरण के लिए इस उपन्यास के 1927 में निकले संस्करण जिसका अनुवाद धन्य कुमार जैन ने किया था और नाथूराम &#39;प्रेमी&#39; ने प्रकाशित किया था, की बात करते हुए वह नाथूराम प्रेमी के बारे में वह पुरानी जानकारी देते हैं जिससे आज का साहित्य जगत अवश्य ही अपरिचित होगा। उन्होंने लिखा है: &quot;नाथूराम प्रेमी किस कद-बुत के प्रकाशक थे, इसके लिए चंद उदाहरण ही काफी होंगे। वे प्रेमचन्द्र और जैनेन्द्र के ही प्रकाशक नहीं थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी की &#39;बाणभट्ट की आत्मकथा&#39;, &#39;कबीर&#39; और &#39;हिन्दी साहित्य की भूमिका&#39; के प्रकाशक भी वही थे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अंत में&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;रिटायर होने के बाद से, हर रोज़ इतना कुछ पढ़ता हूँ, कि सब के बारे में लिखना सम्भव नहीं है, लेकिन जो पढ़ा उसमें क्या याद रखने लायक लगा, यह लिखना शायद थोड़ा सा आसान है। मेरे लिए ब्लॉग मेरी डायरी है, इस आलेख को लिखने की चेष्ठा का मेरा यही अर्थ है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस आलेख में जिन कहानियों और आलेखों के बारे में मैंने लिखा है, अगर आप कहें कि उसमें से चुन कर यह बताईये कि सबसे अधिक अच्छा क्या लगा, तो मेरा चुनाव होगा, अकार पत्रिका के 73 अंक में ही &quot;मेरी रचनात्मकता: मेरे द्वंद&quot; शीर्षक से विभिन्न लेखकों के वक्तव्य - इस बार सबसे अधिक दिलचस्प मुझे वही लगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/2631528519406759447/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/1.html#comment-form' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2631528519406759447'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2631528519406759447'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/1.html' title='क्या पढ़ा (1) - हिंदी कहानियाँ-आलेख'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi3rrDR5W7h-PTIAVNcEEdPmjJz9wUY0HwUJRBA9xjsssQEmaQ7nuNtgDMNS7MgjWY0KRGvAaeEmysWcg3TdnKdZsouD_Bgo4Slix7yEDhpTiEN4T4IUXQMJ7hcfyj8F1OeJDRRXp9frsPjanNBs_p8rHh_56INMYGNEFvHeq9kAsHPRScDpyqN-ZtXjyg-/s72-c/Hindi_magazine_covers.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-551474929328434185</id><published>2026-08-06T05:37:13.296+02:00</published><updated>2026-08-10T05:55:16.177+02:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उपन्यास"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कथा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धारावाहिक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुस्तक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 20</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;:&amp;nbsp; ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी 
मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनकी 
समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य 
त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली पहुँचा है। 
त्री, रंगा और गार्गी बाबा के आश्रम आते हैं। पीछे से ताकानोरी आभा, वसंत 
और तृप्ति को उठा कर नारायणपुर ले जाता है और रास्ते में उसे आभा की शक्ति का खतरा समझ में आता है। इसके आगे पढ़िये ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; -&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/19.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj-tin4bR73CBz0cRO13j7GMYLSyiakls30cQltkSIz9rcpff0TMnpZCwNmAKdLqoaHOTMsF2aeGLbbAto0bWPPAWN4HmY01hcMWa8sgclXQCoR1hU383UqjqxVoDJLJWQfb7bHxp24fvUzGNcnTJkaj9fkHTrbmf_FrceimfHBG91Hj2sn7jTkNeQFrdtt/s700/Tiranga_20.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;340&quot; data-original-width=&quot;700&quot; height=&quot;194&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj-tin4bR73CBz0cRO13j7GMYLSyiakls30cQltkSIz9rcpff0TMnpZCwNmAKdLqoaHOTMsF2aeGLbbAto0bWPPAWN4HmY01hcMWa8sgclXQCoR1hU383UqjqxVoDJLJWQfb7bHxp24fvUzGNcnTJkaj9fkHTrbmf_FrceimfHBG91Hj2sn7jTkNeQFrdtt/w400-h194/Tiranga_20.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 20&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;नारायणपुर, असम, 4 मार्च 2026, रात&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;नारायणपुर में ताकानोरी का घर, घंटाघर के सामने से बेलागुड़ी सत्र जाने वाली सड़क पर है। दो मंजिला घर में सात कमरे हैं, चार नीचे और तीन ऊपर। ओरी अकेला ऊपर रहता है और सारे गार्ड नीचे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;घर पहुँच कर उसने उन तीनों को नीचे के एक कमरे में बंद करवा दिया। फ़िर गार्ड से कहा कि वह आभा के लिए बाथरूम में साबुन, शैम्पू, वगैरा रख दे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब गार्ड कमरे से गये और वह तीनों वहाँ अकेले हुए, तो खिड़की के पास लगे पेड़ों के माध्यम से, वसंत ने त्री को संदेश भेजा, और उसे बताया कि वह लोग नारायणपुर में ताकानोरी के घर पर ठहरे हैं और सभी ठीक-ठाक हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;घर लौट कर ओरी नहाने गया और बहुत देर तक अपने सुडोल और गठी हुई माँसपेशियों वाले शरीर को शीशे में देख कर निहारता रहा। वह अपने आप से बहुत खुश महसूस कर रहा था कि उसने त्रिनेत्र के साथियों को पकड़ लिया है। उसकी पीठ वाले टैटू सचमुच डराने वाले थे, वहाँ पर एक लाल आँखों वाले हँसते हुए कंकाल का चेहरा बना है जिसके मुख से लाल आग निकल रही है और जिसके चारों ओर नारंगी रंग की मछलियाँ बनी हैं। अंत में वह सिल्क का ड्रैसिन्ग गाउन पहन कर बाहर निकल कर आया, सोच रहा था कि अब वह मूर्ति उसे अवश्य मिल जायेगी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;नीचे जा कर उसने रसोई में काम करने वाली को हटाया और खुद रात के खाने के लिए रामेन सूप बनाया और फ़िर, गार्ड से अपने कमरे में दो लोगों के लिए मेज़ पर खाना लगाने के लिए कहा। मेज़ के बीच में लाल रंग की मोमबत्ती जल रही थी। उसे लगा कि कमरे का वातावरण बहुत अच्छा बना है। तब उसने एक गार्ड से आभा को ऊपर लाने के लिए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब ताकानोरी के गार्ड ने उसे साहब के साथ खाना खाने जाने के लिए तैयार होने के लिए कहा था, तो आभा समझ गयी थी कि वह क्या सोच रहा है। उसने निश्चय किया कि वह उसके साथ ऐसा व्यवहार करेगी जिससे उसे लगे कि वह उसे अच्छा लगता है, ताकि वह उससे खुल कर बातें करे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब गार्ड उसे बुलाने आया तो वह बोली, “बच्चे भी भूखे हैं, पहले इनके लिए खाना लाओ, फ़िर तुम्हारे साहब से मिलने जाऊँगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्ड ने कार में बैल का हमला देखा था, वह मन ही मन में आभा से डर रहा था, सोच रहा था कि वह कोई चुड़ैल या जादुगरनी है। वह भाग कर रसोई से बच्चों के लिए खाना ले आया, तब वह कमरे से निकली। गार्ड ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की तो उसने उसे झटका कर दूर कर दिया और गर्व से सिर उठा कर सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गयी। उसने कोई श्रंगार नहीं किया था लेकिन उसके तीखे नाक-नक्श बहुत सुंदर लग रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब उसने ओरी के कमरे में सजी हुई मेज़ देखी तो मुस्करा कर बोली, “मेरी इतनी खातिरदारी क्यों हो रही है, क्या मुझसे जबरदस्ती करने का प्लैन बनाया है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसकी बात सुन कर ओरी गुस्सा हो गया, बोला, “मुझे ऐरा-गेरा समझा है क्या? मैं समुराई खानदान से हूँ, मैंने आज कभी किसी औरत से जबरदस्ती नहीं की, औरतें खुद मेरे पास आती हैं और मेरे आगे-पीछे घूमती हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा मुस्करायी, कुछ कहा नहीं, कमरे में इधर-उधर देखा। एक ओर ताकानोरी का बिस्तर लगा था, उसके पास छोटी सी मेज़ पर एक बूढे जापानी की फ्रैम में लगी तस्वीर रखी थी। एक ओर खिड़की के पास एक दूसरी मेज़ पर हाथ में धनुष-बाण लिए हुए, घोड़े पर सवार जापानी पोशाक पहने हुए एक योद्धा की तस्वीर थी, जिसके सामने कुछ फ़ूल रखे थे और एक अगरबत्ती जल रही थी। वह किसी आराध्य-देवता का मन्दिर जैसा लग रहा था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“वह बूढ़े व्यक्ति कौन हैं? तुम्हारे पिता हैं?”, उसने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी तस्वीर की ओर मुड़ कर झुका और उसे नमन किया, बोला, “वह यामागुचि सान हैं, उन्होंने मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया है, मैं उनका सेवक हूँ, वह पिता समान मेरे वंदनीय हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“और वह घुड़सवार यौद्धा?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी ने उस तस्वीर की ओर भी झुक कर नमन किया, बोला, “वह हाचिमनतारो योशिए हैं, प्राचीन जापान के बहुत बड़े यौद्धा थे। हम उन्हें हाचिमन-शिन का अवतार मानते हैं। हमारे शिंतो धर्म में हाचिमन-शिन साहस और युद्ध के देवता हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“उस तस्वीर के दाहिनी ओर जापानी भाषा में कुछ लिखा हुआ भी है, उसका क्या अर्थ है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी उसके प्रश्नों से बहुत खुश हुआ, उसे लगा कि वह पढ़ी-लिखी सुसंस्कृत युवती है, जो जापानी सभ्यता के बारे में जानना चाहती है। जब से वह भारत आया है, उसके कमरे में आने वाली किसी युवती ने अभी तक उसकी तस्वीरों में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। वह बोला, “एक बार हाचिमनतारो एक पहाड़ से उतर कर नीचे आ रहे थे, उनके रास्ते के दोनों ओर चैर्री के पेड़ लगे थे, तब उन्होंने एक कविता कही, ‘अगर मत-आओ द्वार पर हवाएँ नहीं चलीं, तो राह पर चैर्री के फ़ूल क्यों बिखरे हैं&#39;। उस तस्वीर पर यही शब्द लिखे हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“मत-आओ द्वार का क्या मतलब?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“वह द्वार जहाँ से यौद्धा को नहीं जाना चाहिये। इसका मतलब है कि कवि पूछ रहा है कि अगर मुझे यहाँ नहीं आना चाहिये था तो फ़िर मेरी राह में यह फ़ूल क्यों बिखेरे?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उस कविता के शब्द आभा को सचमुच अच्छे लगे। उसे लगा कि ओरी जैसा भी है, उसके दिल में अपने अग्रजों और गुरुओं के प्रति आदर और कविता की जगह भी है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी उसके चेहरे के भाव से समझ गया कि उसे यह कविता अच्छी लगी है, खुश हो कर बोला, “आओ, रामेन सूप ठंडा हो रहा है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह खाना खाने के लिए कुर्सी पर बैठी तो पूछा, “यह रामेन सूप क्या कोई जापानी भोजन है? यहाँ पर कैसे मिला?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“मैं इन्हें जापान से लाया हूँ। यह गेहूँ की मोटी नूडल्स हैं जिसमें कन्साइ मिला कर बनाते हैं&quot;, उसने कहा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह उससे पूछना चाहती थी कि कन्साइ क्या होता है, लेकिन उससे पहले, ओरी बात बदलते हुए बोला, “तुम्हारी गुप्त-शक्ति जीव-जन्तुओं को तुम्हारी ओर आकर्षित करती है और वह तुम्हारी रक्षा करते हैं। इस शक्ति के बारे में कुछ बताओ?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“बचपन से मुझे घायल पशु-पक्षियों को बचाना अच्छा लगता था, और घायल जीव-जन्तु मेरे पास बहुत आसानी से आ जाते थे&quot;, वह सोचते हुए बोली, “लेकिन तब मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि इसमें मेरी कोई विशेष शक्ति है। मैं मैइतै जनजाति की हूँ, हम लोग मणिपुर में रहते हैं। जब छोटी थी तो मैं पशु-पक्षियों की डॉक्टर बनना चाहती थी लेकिन उसके लिए कॉलेज हमारे गाँव से दूर था, उस पढ़ाई के लिए मुझे इम्फाल जा कर रहना पड़ता। उसके लिए मेरे पिता नहीं माने और स्कूल के बाद मेरा विवाह हो गया। मेरे पति विवेक का दो साल पहले एक बम विस्फोट में देहांत हो गया। उसके बाद से यह शक्ति, जिसे तुम मेरी गुप्त-शक्ति कहते हो, धीरे-धीरे वह कुछ सामने आई है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसकी बात सुन कर ओरी सोच में पड़ गया, बोला, “यानि, तुम्हारे पति की मृत्यु के सदमें ने तुम्हारे भीतर सोयी गुप्त-शक्ति को जगा दिया?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा की आँखें भीग गयीं, आँसू पोंछते हुए बोली, “जिस विस्फोट ने विवेक की जान ली थी, उसी में मेरी बेटी मयूरी भी मुझसे छिन गयी। बेटी और पति को एक साथ खोना, इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने उसके मस्तिष्क में झाँका, इस बार आभा ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। वहाँ उसे केवल दुख और उदासी दिख रहे थे, यानि वह सच बोल रही है। वह बोला, “जापान में हमारे यामागुचि सान को उस कोरियाई भिक्षुक की तलाश थी, जिसे तुम लोग जामुन बाबा कहते हो। उन्हें उनकी हरिताश्म पत्थर की बनी देवी तारा की प्रतिमा चाहिये, जिसे बाबा कोरिया से ले कर आये थे। तुम इस बारे में क्या जानती हो?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“मैं केवल इतना जाती हूँ कि बाबा त्रिनेत्र के गुरु थे, मैं उनसे कभी नहीं मिली। मैं त्रिनेत्र से भी कुछ दिन पहले ही मिली हूँ, वह मेरे भाई का दोस्त है। मुझे उस मृ्र्ति के बारे में कुछ नहीं मालूम।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी थोड़ी देर तक सोचता रहा, फ़िर बोला, “तुम मुझे अच्छी लगती हो। क्या तुम आज रात को यहाँ मेरे साथ रुकना चाहती हो? मैं तुम पर कोई जबरदस्ती नहीं करूँगा, लेकिन अगर तुम स्वेच्छा से रुको, तो मुझे अच्छा लगेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा ने उसे तुरंत उत्तर नहीं दिया, कुछ देर तक सोचती रही, फ़िर लम्बी साँस ले कर बोली, “मैं सोचती थी कि तुम गुँडे और खूनी हो, पर अब समझी हूँ कि तुम जैसे बाहर से लगते हो, वैसे नहीं हो। तुम दिलचस्प व्यक्ति हो, लेकिन मैं अभी किसी अन्य पुरुष से प्रेम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने अपने गार्ड को बुलाया और उसे आभा को नीचे बच्चों के पास ले जाने के लिए कहा, बोला, “मुझे तुम तीनों के बदले वह तारा माँ की प्रतिमा चाहिये। अगर त्रिनेत्र तुमसे सम्पर्क करे तो उसे कहना कि अगर वह प्रतिमा मुझे नहीं मिलेगी तो मैं तुम तीनों को मार दूँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा ने उसकी ओर देखा, कुछ नहीं बोली।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह मुस्कराया, बोला, “मैंने तुमसे कहा कि तुम मुझे अच्छी लगती हो, वह झूठ नहीं था। लेकिन मेरा धर्म अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना है। अगर तुम्हारी हत्या से मुझे वह मूर्ति मिलेगी तो मैं तुम्हारी गर्दन काटने से एक क्षण के लिए भी नहीं हिचकिचाऊँगा, तुम यह बात समझती हो न?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसकी आँखों में कुछ था, जिसे वह समझ नहीं पायी कि वह सच कह रहा है या झूठी धमकी दे रहा है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह मुस्करा कर बोली, “जापानी रामेन का खाना खिलाने के लिए धन्यवाद। रामेन अच्छी हैं, पर मुझे खाने में बिना मिर्च-मसाले के अच्छा नहीं लगता। मेरे ख्याल में तुम्हारी रामेन में थोड़ी सी लाल मिर्च मिल जायेगी तो और भी बढ़िया लगेगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/21.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/551474929328434185/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/20.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/551474929328434185'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/551474929328434185'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/20.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 20'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 19 </title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;:&amp;nbsp; ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी ले लेते हैं। ताकानोरी उनकी समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य त्रिनेत्र पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चों और आभा के साथ मजूली पहुँचा है। त्री, रंगा और गार्गी बाबा के आश्रम आते हैं। पीछे से ताकानोरी आभा, वसंत और तृप्ति को उठा कर नारायणपुर ले जा रहा है। इसके आगे पढ़िये ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; -&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/18.html&quot;&gt;&lt;b&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: 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style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 19&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;मजूली से नारायणपुर, असम, 4 मार्च 2026&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी ने जून-मिन की समाधी लेने की खबर तुरंत रिकू को दी थी और उसने उसे ऐसे डाँटा था मानो इसमें उसकी कोई गलती हो। एक पल के लिए ओरी को बहुत गुस्सा आया था, फ़िर उसने अपने आप को समझाया कि वह यह काम रिकू के लिए नहीं, बल्कि उसके दादा जी के लिए कर रहा है और जब तक वह कोई काम करेगा, उसका धर्म है उसे पूरे मन और निष्ठा से करना। अगर वह रिकू से बदला लेने के लिए दादा जी से विश्वासघात करेगा तो वह अपने आप को समुराई नहीं मान सकता, सचमुच अधर्मी याकूज़ा बन जायेगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसने अपने गुस्से को दबा कर, त्रिनेत्र के बारे में सोचा था कि वह उसे कैसे खोजे। जून-मिन और उसके शिष्य का मामला उतना साफ नहीं था जितना वह दोनों दिखाने की कोशिश कर रहे थे। जिस तरह से वीडियो में दिखता था कि जून-मिन एक बक्से में बंद हो कर, धरती के गर्भ में दबाया गया था, उसका मतलब था कि वह मर गया होगा। लेकिन वह इतनी आसानी से क्यों मरेगा? इसमें अवश्य कोई धोखा है। तीस वर्षों से लापता व्यक्ति, एक अन्वेषण-किरण को महसूस करके, उसी दिन समाधी ले कर आत्महत्या कर ले, क्यों? यह कोई संयोग नहीं लगता, इसके पीछे अवश्य उनकी कुछ चाल है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जून-मिन के शिष्य की प्रतीक्षा करने, वह सुबह ही जीप ले कर कमलाबाड़ी आ गया था। उसने अपनी जीप फैरी घाट से कुछ दूर, घरों के पीछे छुपा कर खड़ी की और वहाँ से अन्वेषण-किरण से हर आने वाली फैरी की जाँच करने लगा। आखिर में, दोपहर में उसने शक्ति-लहरें आने वाली फैरी से नहीं बल्कि कमलाबाड़ी के पूर्व में एक मैदान से आती हुई महसूस कीं। उसने तुरंत अपने नये ड्राईवर से उधर जाने के लिए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;दस मिनट में उनकी जीप उस मैदान में पहुँच गई जहाँ से शक्ति-लहरें महसूस हो रहीं थीं। वहाँ जून-मिन के शिष्य की जगह पर एक युवती और दो बच्चे को पक्षियों के बीच में खेलते हुए देख कर उसे अचरज हुआ। उसने अपने गुँडों से उन तीनों को उठा कर कार में लाने के लिए कहा और वे सब तुरंत वहाँ से भाग निकले। उन्होंने फैरी ली और पहले वह लोग मरियानी की ओर गये और वहाँ से वह जीप में नारायणपुर की ओर निकले।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने सोचा कि वह तीनों अवश्य ही त्रिनेत्र के साथी हैं, नहीं तो इतने सारे शक्तिवान लोग वहाँ पर क्यों एकत्रित हो गये थे? वह यह सोच कर खुश हो रहा है कि अब त्रिनेत्र उससे नहीं बच पायेगा, उस युवती और उन बच्चों को बचाने वह अपने आप उसके पास आयेगा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह सबसे पीछे वाली सीट पर आभा के साथ बैठा था। उनके आगे वाली सीट पर दोनों बच्चे और एक गुँडा बैठे थे। साथ में उनका नया ड्राईवर और एक अन्य गुँडा था। रिकू ने उसके लिए इन नये गुँडों का प्रबंध किया था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;रास्ते में उसने फ़िर से आभा के दिमाग में खोजा। वह भी तुरंत समझ गयी कि वह उसके दिमाग में घुस रहा है, क्योंकि उसे इस शक्ति का ठीक से प्रयोग करना नहीं आता था। गार्गी जब उसके दिमाग में झाँकती थी तो ऐसा महसूस होता था मानो किसी ने प्यार से सहलाया हो। जबकि ओरी का दिमाग में घुसना हथौड़े मारने जैसा था। आभा ने ओरी को रोकने की कोशिश की, लेकिन नहीं रोक पायी और वह समझ गया कि त्रिनेत्र कहीं बाहर गया है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसने वसंत और तृप्ति के दिमाग खंगालने की भी कोशिश की लेकिन वहाँ से उसे कुछ नयी जानकारी नहीं मिली। उस लड़के के दिमाग में उसे हर ओर घने जंगल और पेड़ दिखे, जैसे वहाँ पर हरे रंग का समुद्र हो जिसमें कुछ भी देखना या खोजना असम्भव था। बच्ची की शक्ति ठीक से विकसित नहीं हुई थी लेकिन वहाँ से उसे त्रिनेत्र की कुछ छवियाँ मिलीं। इस जाँच के बाद उसने सोचा कि शायद आभा त्रिनेत्र की पत्नी है और वह दोनों उनके बच्चे हैं।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उनके दिमागों की इस जाँच से वह जल्दी ही थक गया और उसने उनसे अन्य प्रश्न नहीं किये, सोचा कि नारायणपुर में घर पहुँच कर ठीक से पूछताछ करेगा और फ़िर त्रिनेत्र को पकड़ने का प्लैन बनायेगा। वह तीनों भी कार में चुपचाप बैठे थे, पर आभा उसके गुदे हुए शरीर के रंग-बिरंगे टैटू को कौतूहल से देख रही थी। वह उनके बारे में जानना चाहती थी, अंत में वह अपने आप को नहीं रोक पायी, पूछा, “तुम्हारे सारे शरीर पर यह चित्र क्यों बने हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी को अपने टैटू वाले त्वचा-चित्रों पर बहुत गर्व है, बोला, “इन्हें जापानी में इरेज़ूमी कहते हैं। यह सामान्य टैटू नहीं हैं जो मशीन से बनाते हैं, मैंने इन्हें पाराम्परिक विधि से गुदवाया है, जिसमें दर्द सहना पड़ता है”, उसने अपनी कमीज़ के बटन खोल खोल कर अपनी छाती और कँधे दिखाये, वह सारा हिस्सा उन रंगीन टैटू-चित्रों से ढका था। वह मुस्करा कर बोला, &quot;मेरी पीठ, छाती, पेट, जाँघें, मेरे शरीर की हर जगह चित्रित है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह मोर की तरह ऐसे इतरा रहा था कि आभा को हँसी आने लगी, उसे छुपाने के लिए वह खिड़की से बाहर देखने लगी। कुछ देर बाद ओरी ने पूछा, “क्या तुम त्रिनेत्र की पत्नि हो?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब उसने उत्तर नहीं दिया तो ओरी ने उसकी कलाई&amp;nbsp; को पकड़ लिया और दबाते हुए बोला, &quot;जब तुमसे कुछ पूछूँ तो मुझे उसका जवाब तुरंत चाहिये, समझी?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उस समय उनकी जीप एक रैड लाईट पर रुकी हुई थी। उसके दबाने से आभा की कलाई में पीड़ा हुई तो वह बोली, “मेरा हाथ छोड़िये, मुझे दर्द हो रहा है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;सड़क के किनारे एक साँड घास चर रहा था, शायद उसने आभा के दिमाग की पीड़ा-लहर को महसूस किया तो वह अचानक जैसे नींद से जागा और सिर उठा कर उनकी जीप की ओर भागा आया। ड्राईवर ने अपने साथ वाली खिड़की खुली रखी हुई थी, साँड ने वहीं से उस पर हमला किया और खिड़की से सीर जीप के भीतर घुसा कर मारा। यह सब कुछ इतना अचानक हुआ कि किसी को समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने तुरंत आभा की ओर देखा, उसने महसूस किया कि आभा की शक्ति-लहरें उत्तेजित हो कर उसके सिर के आसपास मँडरा रही हैं, तो उसने तुरंत उसकी कलाई छोड दी। वह समझ गया कि उस साँड का हमला आभा की वजह से हुआ है, वह चिल्लाया, “रोको उसे, ऐसे मत करो।&quot; लेकिन आभा को कुछ समझ नहीं आया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;सीट के पीछे ओरी की तलवार रखी थी, उसके बिना वह कहीं नहीं जाता था। उसने उसे उठाया, उसमें से तलवार बाहर निकाली, पीछे वाला दरवाज़ा खोल कर जीप से उतरा और सीधा साँड की गर्दन पर वार किया। साँड की गर्दन से खून निकला तो शायद आभा को उस जन्तु का दर्द महसूस हुआ और उसकी शक्ति-लहर शाँत हो गयी। जब उसके और साँड के बीच का तार टूट गया तो वह वहाँ से भाग गया।&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी ने अपने ड्राईवर को देखा कि साँड के सींग से उसके माथे पर बड़े घाव बन गये थे और खून से उसके चेहरा, गर्दन और कमीज लाल हो रहे थे। उसने ड्राईवर को अपना रुमाल निकाल कर दिया, कहा कि उसे अपने माथे पर खून रोकने के लिए दबा कर रखे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसके गुँडों ने पास के डॉक्टर का पता पूछा और घायल ड्राईवर को वहाँ ले गये। उसके उपचार में समय लगना था, उन्होंने उसे वहीं छोड दिया और ओरी ने दूसरे आदमी से गाड़ी चलाने के लिए कहा। तब तक अँधेरा होने लगा था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसने आभा से पूछा, “तुमने उस जानवर से हमारी जीप पर हमला क्यों करवाया?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“मैंने जानबूझ कर कुछ नहीं किया, तुमने मेरी कलाई को ज़ोर से दबाया था, तो मुझे दर्द हो रहा था, इसलिए वह मुझे बचाने आया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अचानक ओरी ने हाथ बढ़ा कर अगली सीट पर बैठे वसंत के सिर के बाल पकड़ कर खींचे, तो वह दर्द से चिल्लाया, लेकिन उसने उसके बालों को नहीं छोड़ा, बोला, “तुम झूठ बोल रही हो। मुझे ठीक से उत्तर नहीं दोगी तो तुम्हारे बेटे का गला काट दूँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा घबरा कर चिल्लाई, “छोड़ो उसे, उसने कुछ नहीं किया। मैंने तुम्हें कहा है कि मैंने जानबूझ कर कुछ नहीं किया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उस समय उनके साथ में सड़क पर एक बैलगाड़ी जा रही थी। जब वह चिल्लायी तो अचानक उसका बैल उनकी जीप की ओर घूम कर आगे आने लगा। ताकानोरी ने उसे देखते ही घबरा कर वसंत के बालों को छोड़ दिया और ड्राईवर से बोला, &quot;जीप को तेजी से आगे निकाल लो, नहीं तो वह बैल हम पर हमला करेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ड्राईवर तुरंत तेज़ चला कर जीप को आगे ले गया। बैल के साथ बैलगाड़ी भी थी, वह उनका पीछा नहीं कर पाया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी कुछ शाँत हुआ तो उसने आभा के दिमाग के भीतर दोबारा झाँका, तो महसूस किया कि वहाँ पर उथल-पुथल मची है, शक्ति को केन्द्रित करके चलाने के लिए जो एकाग्रता और ध्यान चाहिये, वहाँ वैसा नहीं है। वह बोला, “तुम्हें अपनी शक्ति पर ठीक से काबू करना नहीं आता, क्यों? त्रिनेत्र ने तुम्हें यह शिक्षा नहीं दी?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “मैं उसे ठीक से नहीं जानती। वह मेरा गुरु नहीं है, वह एक अनाथाश्रम चलाता है और मैं उसके मित्र की बहन हूँ, विधवा हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“उसका अनाथाश्रम कहाँ है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा को समझ नहीं आया कि क्या कहे। अगर वह उसे गँगटोक कहेगी तो वह वहाँ उनके अनाथाश्रम पर हमला कर सकता है, बोली, “वह मणिपुर में है, यहाँ से करीब आठ सौ किलोमीटर दूर है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ओरी ने तुरंत उसके दिमाग में झाँका तो उसे वहाँ अनाथाश्रम की बिल्डिंग दिखी, जिसके आसपास खेत और पहाड़ थे। उसे लगा कि आभा ने उसे जगह का नाम सही नहीं बताया है, लेकिन उसे समझ नहीं आया कि वह उससे वहाँ का सही नाम कैसे जान सकता है? उसने पूछा, “और यह दोनों बच्चे? यह किसके हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“यह दोनों भी अनाथ हैं&quot;, वह बोली।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;ताकानोरी सोच में डूब गया। आभा के पास शक्ति है, और उन दोनों बच्चों में भी शक्ति है। शक्ति वाले इतने लोग एक जगह पर, एक साथ इकट्ठे कैसे हो गये? जापान में जब वह बड़ा हो रहा था तब यामागुचि सान के पास वह अकेला शक्ति वाला बच्चा था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह जानता है कि जून-मिन की मूर्ति से बच्चों की गुप्त-शक्ति विकसित होती है। शायद वह मूर्ति त्रिनेत्र के पास है, और उसकी मदद से ही उसने इन सब की शक्तियों को विकसित किया है?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/20.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़ें&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/3919027407307925820/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/19.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/3919027407307925820'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/3919027407307925820'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/19.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 19 '/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi-O6WdHLB1kCIjwRYpooGY8Wxx2r8qBCvp3usFc-GLBkHAe0HSXufjP99do9FUYPSemQnBKR7NghITyeo4lxpNEHUnMf2TUZVYTVKcVUtjYCsKQ8CPvw20RCyZ7PO8z7er2Ml9OfzO-t66jnROQxgnbA_rPoyNSV91rCSxE_nNpsPiCcMVc2weMqNZJfR2/s72-w400-h194-c/Tiranga_19.jpg" height="72" 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ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों 
को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने
 की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य 
त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, 
जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के 
लिए, मजूली पहुँच कर, उनके आश्रम आते हैं। समाधी के दर्शन करके वह बाहर आ रहे हैं जब त्री को जगदीश बाबू दिख जाते हैं। इसके आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/17.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 18&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, शाम&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी जगदीश बाबू को बुलाने गयी, बोली, “बाबू जी, हमारे बापू की तबियत ठीक नहीं है …”, और त्री की ओर इशारा किया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जगदीश बाबू ने रास्ते के किनारे पर सिर झुका कर बैठे हुए त्री को देखा, लेकिन पहचान नहीं पाये। वह उसके पास आये, पूछा, “क्या हुआ भाई?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने सिर ऊपर नहीं उठाया पर उनके साथ खड़ी गार्गी ने उन्हें धीरे से कहा, “जगदीश बाबू हमें आप से अकेले में ज़रूरी बात करनी है, हमें अपने दफ्तर में ले चलिये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhchjAvywponwOniEGFrNDC17UdC8X0G81NLJ3uaTATmTHSV1Mg1u-_f1ibTqLum8G9J7oqqCd8TzIV9GiKhRdQq7OIZxUhJFNSdB8UaqJQ0wd2gzfYselq8X1Qec93RB-tm7d2WZ974FoGb2JUR8t4m5_cjWsIX1LquVfYz-1SmOezjUBjw93lKoRJ5U0C/s1024/imageedit_4_8570763255.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1024&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhchjAvywponwOniEGFrNDC17UdC8X0G81NLJ3uaTATmTHSV1Mg1u-_f1ibTqLum8G9J7oqqCd8TzIV9GiKhRdQq7OIZxUhJFNSdB8UaqJQ0wd2gzfYselq8X1Qec93RB-tm7d2WZ974FoGb2JUR8t4m5_cjWsIX1LquVfYz-1SmOezjUBjw93lKoRJ5U0C/s320/imageedit_4_8570763255.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;उन्हें उसकी बात समझने में थोड़ी देर लगी पर शायद वह त्री को पहचान गये, आवाज़ ऊँची करके बोले, “हाँ, मैं तुम्हें दवाई देता हूँ, तुम लोग मेरे साथ चलो, तुम्हारे बापू की तबियत ठीक नहीं है।&quot;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री और गार्गी जगदीश बाबू के साथ चले, त्री सिर झुका कर और लँगड़ा कर चल रहा था। रंगनाथ उनके पीछे कुछ दूर पर था और देख रहा था कि कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा। जब उसे विश्वास हो गया कि किसी ने उनकी बातचीत पर ध्यान नहीं दिया है, तो वह भी उनके पीछे जगदीश बाबू के दफ्तर की ओर आया। वहाँ उसने बाहर बैठे हुए सोमचाई को देखा, तो उसके पास जा कर बैठ गया और जेब से रंग-बिरंगे कँचे निकाल कर उन्हें हाथों में उछालने लगा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह कँचों को उछालने के खेल में माहिर है, जब वह उनसे खेलता है तो ऐसा लगता है मानो वह कँचे धीरे-धीरे हवा में तैर रहे हैं और नीचे नहीं गिरते। जब उसने एक साथ हवा में चार कँचे घुमाये तो सोमचाई का ध्यान उसके खेल पर लग गया। तब उसने कँचे सोमचाई की ओर बढ़ाये और उसे उन्हें उछालने के लिए कहा। सोमचाई को समझ नहीं आया कि वह क्या कह रहा है, तो उसने मुस्करा कर, हाथ से उन्हें उछालने का इशारा किया। सोमचाई ने उसे सिर हिला कर मना किया, लेकिन इतनी देर में जगदीश बाबू, त्री और गार्गी को आश्रम के भीतर के किसी कमरे में ले जा चुके थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;भीतर जा कर जगदीश बाबू रोने लगे, त्री से बोले, “त्रिनेत्र बेटा, तुम्हें क्या बताऊँ। बाबा ने समाधी ले ली, हमें अनाथ कर दिया। लेकिन हमारे लिए यही दुख कम नहीं था, एक और आफत सिर पर आ पड़ी है। कल ताकानोरी और उसके गुँडे यहाँ आ धमके, उन्होंने हमारे एक बच्चे की गर्दन काटने की धमकी दी और बाबा ने तुम्हारे लिए जो चिट्ठी छोड़ी थी, उसे ले लिया। कल रात को उन्होंने बाबा की समाधी को तोड़ने की कोशिश की। इसमें उनके एक आदमी की आँख फूट गयी और दूसरे के पैर में गोली लगी है। वह कहता है कि वह किसी मूर्ति को खोज रहा है और जब तक उसे वह नहीं मिलेगी, वह हमें छोड़ेगा नहीं। अब हम क्या करें, हमें इन पापियों से कैसे मुक्ति मिलेगी?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने उन्हें ढाढ़स बँधाया, “काका आप चिंता नहीं कीजिये, हमारे गुरु जी इतने कमज़ोर नहीं हैं कि एक गुँडे से हार जायेंगे। आप धीरज रखिये, सब ठीक हो जायेगा। गुरु जी ने जो चिट्ठी मेरे लिए छोड़ी थी, आप को मालूम है कि उसमें क्या लिखा है?”&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“उसमें एक कविता जैसी लिखी है, जिसका अर्थ उन्हें समझ नहीं आ रहा है। तब उन्होंने मुझे उसका अंग्रेज़ी अनुवाद करने के लिए कहा। मैंने अनुवाद तो कर दिया है, लेकिन मुझे भी समझ नहीं आया कि बाबा क्या कहना चाहते थे&quot;, उन्होंने उसकी ओर एक कागज़ बढ़ाया, “जब अनुवाद कर रहा था तो मैंने उनकी चिट्ठी की बातों को यहाँ लिख लिया है। शायद यह कोई पहेली है? ताकानोरी कह रहा था कि जब तुम आओगे तो तुमसे इसका अर्थ पूछेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने उस कागज़ पर जल्दी से नज़र घुमायी और उसे तह करके जेब में रख लिया, बोला, “मैं समझ गया कि गुरु जी मुझे क्या कहना चाहते हैं। आप इस कविता की बिल्कुल चिंता नहीं कीजिये। जाने से पहले मैं आप से एक बात कहना चाहता हूँ। अगले दिनों में अगर आप मुझे ताकानोरी के साथ देखें तो उस समय मैं चाहे कुछ भी कहूँ या करूँ, आप ऐसा दिखाईये कि मुझे नहीं पहचानते और उनके सामने मुझसे बात करने की कोशिश भी नहीं कीजिये, समझे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जगदीश बाबू ने हामी भरी तो वह दोनों उठ कर पीछे के रास्ते से वृद्धाश्रम के गेट की ओर निकल गये। रंगनाथ ने उन्हें जाते देखा तो उसने मुस्करा कर सोमचाई से विदा ली और गेट की ओर आया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वहाँ से वे सीधा फुलानीबाड़ी घाट की ओर गये, और घाट से श्री भोला मन्दिर के लिए मोटर-बोट ली, और फ़िर वहाँ से पैदल चल कर सुबह वाले रास्ते से लौटे। तब तक अँधेरा होने लगा था। जब वह सुरंग द्वार वाले पीपल के पेड़ के पास पहुँचे तो अचानक गार्गी रुक गयी, बोली, “माधव की शक्ति-लहर महसूस हो रही है, वह यहाँ आसपास कहीं छिपा हुआ है।&quot; उसने आवाज़ लगाई, “माधव, हम हैं, बाहर आ जाओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तब माधव झाड़ियों के नीचे से बाहर निकला। उसके कपड़ों और चेहरे पर धूल लगी थी और उस धूल में आँसू बहने के निशान दिख रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने आगे बढ़ कर उसे बाहों में जकड़ लिया, पूछा, “क्या हुआ?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;माधव की आँखें फ़िर से भर आयीं, बोला, “एक आदमी आया था, मोटा, लम्बा-चौड़ा, पहलवान जैसा, वह आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को जबरदस्ती अपनी जीप में बिठा कर ले गया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;पता चला कि दोपहर को ज़रीना ने उनके लिए खाना बनाया था। खाने के बाद उन्होंने कुछ देर आराम किया था, फ़िर वे सुरंग से होते हुए जँगल में घूमने आये थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने पूछा, “जब तुम लोग सुरंग से बाहर निकले तो किसी खुली जगह पर तो नहीं गये?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“पहले तो हम जँगल में ही घूम रहे थे। लेकिन फ़िर पता नहीं कैसे, तीन सफेद बगुले जैसे पक्षी थे, वह आभा दीदी के एकदम पास आ गये। वह बहुत सुंदर पक्षी थे, उनकी पीली चोंच और सिर पर पीली कलगी थी और उन्हें हमसे बिल्कुल डर नहीं लग रहा था। हम उनके साथ खेलने लगे और उनके पीछे-पीछे चलते गये। उनके साथ हम एक मैदान में पहुँचे, वहाँ और भी बहुत सारे पक्षी जमा हो गये, वह सभी आभा दीदी के आसपास घूम रहे थे। हमें बहुत मज़ा आ रहा था। तब मुझे सू-सू आया था, तो मैं एक झाड़ी के पीछे सू-सू करने चला गया। तभी मैदान में एक जीप आयी, तो मैं छुप गया। जीप से तीन आदमी उतरे और उन्होंने आभा दीदी, वसंत और तृप्ति को पकड़ लिया। फ़िर वह पहलवान आदमी जीप से उतरा, उसने आभा दीदी से कुछ पूछा और जब दीदी ने उत्तर नहीं दिया तो उसने उन्हें चाँटा मारा। फ़िर वह लोग उन्हें जीप में बिठा कर कहीं ले गये&quot;, माधव ने बताया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने लम्बी साँस ली, बोला, “इसीलिए आज हमें वृद्धाश्रम के आसपास ताकानोरी की शक्ति महसूस नहीं हो रही थी, क्योंकि वह मुझे खोजने कमलाबाड़ी घाट की ओर आया था और उसने आभा और बच्चों की शक्ति-लहरों को देख लिया। यह कितनी देर पहले की बात है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“करीब आधा घंटा पहले की।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने कहा, “शायद वह लोग अभी यहाँ से बहुत दूर नहीं गये, गार्गी, तुम उनकी शक्ति-लहर को खोजने की कोशिश करो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी ने आँखें बंद कीं और कुछ क्षणों के बाद बोली, “वह लोग किसी नाव या फैरी बोट में बैठे हैं, वह नाव नदी पार करके मरियानी की ओर जा रही है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने रंगनाथ को इशारा किया तो उसने भी नदी की दिशा में ध्यान लगाया, बोला, “ताकानोरी सोमचाई से टेलीफोन पर बात कर रहा है, कहता है कि उसे तीन लोग मिले हैं जो त्रिनेत्र के साथी लगते हैं और वह उन्हें घर ले कर जा रहा है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“कौन से घर?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“यह तो उसने नहीं कहा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने कुछ देर तक सोचा, फ़िर गार्गी से कहा, “ताकानोरी के पास अन्वेषण-शक्ति है, तुम हमारी शक्ति-लहरों को ढक दो ताकि वह हमें नहीं देख पाये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी बोली, “दादा, मुझे बच्ची नहीं समझो, मैंने यहाँ आते ही हम सब की शक्ति-लहरों को ढक दिया था।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “अब हमें सोचना है कि हम उन तीनों तक संदेश कैसे पहुँचायें कि वह चिंता नहीं करें, हम उन्हें छुड़वाने का कोई रास्ता खोज निकलेंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी बोली, “दादा, मैं वसंत से बात कर सकती हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;नहीं गार्गी, मैं नहीं चाहता कि हम ऐसा कुछ करें जिससे ताकानोरी को हमारा पता चल जाये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;सोच कर रंगनाथ बोला, “दादा, वह सब लोग हमेशा तो एक साथ नहीं रहेंगे और वह उन्हें जहाँ भी ले कर जायेगा, चौबिस घंटे उनके पास नहीं रहेगा। जब वह उन्हें अकेला छोड़ेगा, तब हम उनसे बात कर सकते हैं, तब तक गार्गी उन पर नज़र रखेगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अचानक माधव बोला, “उस केले के पेड़ को देखो, कैसे हिल रहा है, इसका मतलब है कि वसंत हमें कुछ कह रहा है।&quot; सब ने उधर देखा, उस पेड़ के लम्बे हरे पत्ते, हाथी के कानों की तरह आगे-पीछे हिल रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “शायद वह पेड़ों के माध्यम से हमारी बातें सुन रहा है। वसंत अगर तुम मेरी आवाज़ सुन सकते हो, तो केले के साथ वाले पेड़ की पत्तियाँ हिलाओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तुरंत केले के साथ वाले पेड़ की शाखाएँ भी ऊपर-नीचे हिलने लगीं।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री मुस्कराया, बोला, “बहुत बढ़िया वसंत। तुम लोग कोई चिंता नहीं करो, समय आने पर हम तुम्हें वहाँ से छुड़ा लेंगे। तुम हमें संदेश भिजवा देना कि तुम कहाँ हो और सब ठीक हो या नहीं। जब तुम लोग अकेले होगे, तब गार्गी भी तुमसे बात करेगी। अगर ताकानोरी तुमसे कुछ पूछे तो उसे मेरे मोबाइल का नम्बर दे देना, कहना कि मैं उससे बात करना चाहता हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अगला अध्याय सोमवार 3 अगस्त को पढ़ सकते हैं&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/8772757990916288420/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/18.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/8772757990916288420'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/8772757990916288420'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/18.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 18'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhchjAvywponwOniEGFrNDC17UdC8X0G81NLJ3uaTATmTHSV1Mg1u-_f1ibTqLum8G9J7oqqCd8TzIV9GiKhRdQq7OIZxUhJFNSdB8UaqJQ0wd2gzfYselq8X1Qec93RB-tm7d2WZ974FoGb2JUR8t4m5_cjWsIX1LquVfYz-1SmOezjUBjw93lKoRJ5U0C/s72-c/imageedit_4_8570763255.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-7468222940331644998</id><published>2026-07-27T05:56:36.761+02:00</published><updated>2026-08-03T06:29:21.185+02:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उपन्यास"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कथा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धारावाहिक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुस्तक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 17</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी 
ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों 
को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने
 की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य 
त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, 
जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के 
लिए, मजूली पहुँच कर, उनके आश्रम आते हैं। इसके आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/16.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 17&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, दोपहर&lt;/b&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;गुरु जी का तहखाने वाला घर काफ़ी बड़ा था। उसमें चार कमरे थे। त्री ने इशारा करके कहा, &quot;वह गुरु जी का कमरा है, उसमें नहीं जाओ, बाकी घर में तुम जहाँ चाहो वहाँ जा सकते हो।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब वह वहाँ पहुँचे तो दोपहर हो चुकी थी और तीनों को भूख लगी थी। गार्गी बोली, “यहाँ रसोई में गैस का चूल्हा रखा है, क्या हम कुछ खाना पका सकते हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg1gAEYmu-bBRxCL6WKaWr99n9z3tyTdAgnX0nV34ci5LLdTqcP50H0maNyY-GmAEfbXTLFezAFnzCsSiDVkPPvixFdSxcvwXFw3uri6tAwSvTUvrrRFvd4bXdwTZkYGPSSWsMmKGiKsgx8EQfEgmJrlGRXy7CaLWVUeev4cBdOJP4W8Kpln7P0CoUxTax4/s1024/imageedit_2_7222579441.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1024&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg1gAEYmu-bBRxCL6WKaWr99n9z3tyTdAgnX0nV34ci5LLdTqcP50H0maNyY-GmAEfbXTLFezAFnzCsSiDVkPPvixFdSxcvwXFw3uri6tAwSvTUvrrRFvd4bXdwTZkYGPSSWsMmKGiKsgx8EQfEgmJrlGRXy7CaLWVUeev4cBdOJP4W8Kpln7P0CoUxTax4/s320/imageedit_2_7222579441.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;त्री ने मना किया, बोला, “खाना बनायेंगे तो चिमनी की पाईप से धूँआ और गँध ऊपर जा सकते हैं, उससे लोगों को शक हो जायेगा, इस समय यह खतरा लेना ठीक नहीं। उधर अलमारी में देखो, वहाँ कुछ फ़ल, गाजर, मूली आदि रखे होंगे, उन्हें खाना बेहतर होगा।&quot;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;फ़ल-सब्जियाँ खा कर त्री ने गार्गी और रंगनाथ से कहा, “तुम दोनों ऊपर जा कर पता लगाओ कि वृद्धाश्रम में क्या हो रहा है?&quot; वह उसे सीढ़ियों की ओर ले कर गया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;रंगनाथ ने ऊपर देखा तो बोला, “यह सीढ़ियाँ तो कुछ अजीब सी लगती हैं।&quot; वह सीढ़ियाँ कमरे की छत तक जा कर रुक जाती थीं।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “क्योंकि वहाँ एक छिपा हुआ दरवाज़ा है।&quot; उसने सीढ़ियाँ चढ़ कर दीवार पर लगा एक बटन दबाया तो ऊपर से छत का एक हिस्सा खुल गया। उसने सिर को बाहर निकाल कर आसपास देखा। जब कोई नहीं दिखा तो उन्हें ऊपर आने का इशारा किया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह सीढ़ियाँ झाड़-झँखाड़ के बीच में एक खण्डहर के पीछे निकलीं, वहाँ आसपास घना जँगल था। त्री ने उन्हें इशारे से बताया, “उधर जाओ, वहाँ एक बाग है, उससे हो कर गुरु जी के घर के पिछले दरवाज़े तक पहुँच जाओगे, जो खुला होगा। उनके घर की खिड़कियों से वृद्धाश्रम का गेट दिखता है, तुम बस वहाँ से देख कर आओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह दोनों उस दिशा में बढ़े, धीरे-धीरे देखभाल कर कदम रख रहे थे ताकि बिल्कुल शोर नहीं हो, हालाँकि रंगनाथ ने अपनी श्रवण शक्ति से जाँच लिया था कि वहाँ कोई नहीं है। पेड़ों के बीच से हो कर वह गुरु जी के घर के पिछवाड़े वाले बाग में घुसे, देखा कि उसका पीछे वाला दरवाज़ा खुला हुआ है। गार्गी ने वहीं से कुछ क्षणों तक आँखें बंद करके, मन की दृष्टि से घर के भीतर खोजा और जब किसी व्यक्ति का भास नहीं हुआ तो वह दोनों दबे पाँव भीतर गये।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;घर में देखा कि वहाँ किसी ने कुछ खोजने की कोशिश की है। सारे संदूक, दराज़ और अलमारियाँ खुले थे और चद्दर-कपड़े बाहर बिखरे हुए थे। वह खिड़की की ओर गये और छिप कर बाहर देखा। रंगनाथ ने आश्रम के भीतर से आते-जाते लोगों की बातों को सुना।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गेट के सामने एक कच्ची सड़क थी जो वृद्धाश्रम की ओर जा रही थी और जिस पर लोगों की कतार लगी थी, वह लोग एक-एक करके, धीरे-धीरे वृद्धाश्रम के भीतर जा रहे थे, और साथ से लोग बाहर निकल रहे थे। बाहर कोई पहरेदार या गार्ड नहीं था।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;दोनों दबे पाँव, जैसे गये थे, वैसे ही वापस खण्डहर तक लौट कर आये। फ़िर नीचे तहखाने में आ कर त्री को सारी बात बतायी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी बोली, “मैंने पूरे क्षेत्र को जाँचा लेकिन आश्रम में किसी की शक्ति-लहर महसूस नहीं हुई। इसका मतलब है कि ताकानोरी इस समय यहाँ नहीं है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“नदी की दूसरी ओर, नारायणपुर की तरफ भी शक्ति-लहर को खोजा? शायद वह वहाँ हो?” त्री ने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“हाँ मैंने उस ओर भी देखा, वहाँ भी ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;रंगनाथ बोला, “मैंने आश्रम से निकलने वाले लोगों के बातें सुनीं, लेकिन कोई विशेष बात नहीं पता चली, केवल गुरु जी की बातें कर रहे थे, और कह रहे थे कि आश्रम वालों को समाधी देखने वालों के लिए पानी पिलाने की व्यवस्था करनी चाहिये।&quot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “ठीक है, हम भी ऊपर जा कर समाधी देखने वालों की कतार में खड़े हो जायेंगे। यहाँ सब लोग गुरु जी को जामुन बाबा कहते हैं, अगर कोई पूछेगा तो हम भी यही कहेंगे कि उनकी समाधी को देखने आये हैं। लेकिन जहाँ तक हो सके, तुम दोनों कुछ नहीं बोलना, मुझे बात करने देना। आश्रम के गेट से घुसते ही, दायीं ओर की बिल्डिंग में उनके संचालक जगदीश बाबू का दफ्तर है, मुझे उनसे मिल कर बात करनी है। लेकिन वहाँ ताकानोरी का कम्प्यूटर वाला आदमी सोमचाई भी हो सकता है, हमें उससे बचना है। रंगनाथ, तुम उस ओर ध्यान लगा कर सुनने की कोशिश करना, अगर तुम्हें जगदीश बाबू या सोमचाई का नाम सुनाई दे तो मुझे बताना।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह तीनों तहखाने से निकल आये, फ़िर जँगल से निकल कर वृद्धाश्रम की ओर गये और वहाँ खड़ी कतार में लग गये।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;कतार में खड़े लोग आपस में बातें कर रहे थे। जब किसी ने त्री से पूछा तो उसने कहा कि वे अलीपुर द्वार के एक चाय-बागान से आये हैं और केवल बँगाली बोलते-समझते हैं, असमियाँ नहीं जानते। बाबा का नाम बँगाल तक फ़ैल गया है, और लोग उनकी समाधी देखने इतनी दूर से आ रहे हैं, यह सुन कर लोगों को अचरज हुआ। कतार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और उनके पीछे नये लोग आ कर जुड़ते जाते थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब तक उनकी गेट से भीतर घुसने की बारी आयी, तब तक शाम होने वाली थी और कतार छोटी सी रह गयी थी। जब वह लोग वृद्धाश्रम की बिल्डिंग के पास से गुज़रे तो रंगनाथ ने अपनी श्रवण शक्ति लगा कर आसपास हो रही बातों को सुनने की कोशिश की। थोड़ी देर में ही उसने सोमचाई की आवाज़ को पकड़ लिया, और उसकी बातों को ध्यान से सुना। कुछ देर तक सुनने के बाद उसने त्री को कहा, “दादा, सोमचाई टेलीफोन पर ताकानोरी से बात कर रहा था, बोला कि बटेर को जोरहाट ले कर गये हैं, वहाँ उसकी आँख का ओपरेशन हुआ है और मटरू भी अस्पताल में भर्ती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने पूछा, “ताकानोरी ने जवाब में कुछ कहा कि वह कहाँ पर है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“नहीं&quot;, रंगनाथ ने सिर हिला कर मना किया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“ठीक है, तुम जगदीश बाबू का पता लगाने की कोशिश करो कि वह कहाँ हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तब तक वे समाधी-स्थल पर पहुँच गये। चूँकि अब भीड कम हो गयी थी इसलिए लोगों को वहाँ रुकने का अधिक समय मिल रहा था। लोग समाधी स्थल की परिक्रमा कर रहे थे और कुछ लोग वहाँ हाथ जोड कर प्रार्थना भी कर रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;समाधी के पास पहुँचे तो त्री ने धीरे से गार्गी से कहा, “ज़रा कोशिश करके देखो कि क्या समाधी में गुरु जी की शक्ति-लहर महसूस होती है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह तीनों वहाँ आँखें बंद करके, हाथ जोड़ कर खड़े थे। रंगनाथ ने सुना कि एक बूढ़ा दूसरे से कह रहा है, “यह भीड़ सम्भालने का काम बहुत थकाने वाला है, पता नहीं यह सब कितने दिन चलेगा। मैं कल जगदीश बाबू से कहूँगा कि मेरी तबियत ठीक नहीं है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वहाँ से चलने लगे तो गार्गी बोली, “समाधी से बहुत हलका सा शक्ति का भास होता है, शायद उनकी शक्ति कमज़ोर हो रही है, या वह बहुत गहराई में हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री का चेहरा गम्भीर हो गया, बोला, “उनकी शक्ति इतनी आसानी से क्षीण नहीं होगी, वह अवश्य ही गहराई में हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;रंगनाथ ने पूछा, “दादा, ज़मीन के नीचे दबने के बाद गुरु जी साँस कैसे लेंगे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, पूछा, “जगदीश बाबू का पता नहीं चला?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;रंगनाथ ने फ़िर से अपनी श्रवण-शक्ति का ध्यान लगा कर&amp;nbsp; उसे आसपास घुमाया और बोला, “आश्रम में कई लोग उनकी बात कर रहे हैं लेकिन अभी तक किसी को उन्हें उनके नाम से बुलाते हुए नहीं सुना। मैं उनकी आवाज़ नहीं पहचानता, उनका पता कैसे लगाऊँगा?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वे वापस वृद्धालय के गेट की ओर जा रहे थे जब अचानक त्री रुक गया, बोला, “वह सामने हैं जगदीश बाबू, वह इधर ही आ रहे हैं। उनके साथ दो अन्य लोग हैं, हमें उनसे अकेले में बात करने का कोई बहाना चाहिये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/08/19.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/7468222940331644998/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/17.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/7468222940331644998'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/7468222940331644998'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/17.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 17'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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पर फ़िल्म निर्देशक &lt;b&gt;हरिसाधन दासगुप्ता&lt;/b&gt; ने एक फ़िल्म बनायी थी और वह हरिसाधन जी के पुत्र फ़िल्म निर्देशक &lt;b&gt;राजा दासगुप्ता&lt;/b&gt; का सम्पर्क खोज रहे थे। मैंने बचपन में बाघा जतिन का नाम सुना था लेकिन उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी, बस इतना जानता था कि वह अंग्रेज़ी सरकार से लड़ने वाले एक क्राँतिकारी थे। मैंने सोचा कि बाघा जतिन के पौत्र से सम्पर्क हुआ है तो इसका फायदा उठाना चाहिये और उनसे उनके दादा के बारे में जानने की कोशिश करनी चाहिये।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgpv8GnWK9EbsJ8fgFcfEGIhAgQXLjmzvwvY33mLeK3FE-yZFiCGOUFmv6-fLgnbLCPk6JpNt3tK7aZb_NQ-ScgPU0wygn-dQYVvuv_VttMWaEocytuHW0q39En9jE2InyZsltRB_DXsJqRVnvA3YB6iaR8H062LMtnpKz6fv8jbaGe7bR-SkHBnVY3Idk4/s391/India-Kolkata-Bagha-Jatin_04.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;391&quot; data-original-width=&quot;391&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgpv8GnWK9EbsJ8fgFcfEGIhAgQXLjmzvwvY33mLeK3FE-yZFiCGOUFmv6-fLgnbLCPk6JpNt3tK7aZb_NQ-ScgPU0wygn-dQYVvuv_VttMWaEocytuHW0q39En9jE2InyZsltRB_DXsJqRVnvA3YB6iaR8H062LMtnpKz6fv8jbaGe7bR-SkHBnVY3Idk4/s320/India-Kolkata-Bagha-Jatin_04.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस तरह से पृथ्वीन्द्र जी से कुछ संदेशों का आदान-प्रदान हुआ। तब मैं एक शोध रिपोर्ट पर काम कर रहा था, सोचा कि उसे पूरा करके पृथ्वीन्द्र जी से बातचीत करूँगा लेकिन जैसा अक्सर होता है, कुछ दिनों में मैं इस बात को भूल गया। दो साल पहले जब उनके देहांत की खबर पढ़ी तो अपनी वह पुरानी बातचीत याद आयी, बहुत दुख हुआ कि मैंने उस समय उनसे बात क्यों नहीं की।&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ ऐसा ही मेरे साथ पहले भी एक बार हुआ था जब मैंने दिल्ली में मित्र &lt;b&gt;कर्बान अली&lt;/b&gt; से कहा था कि जब दिल्ली आऊँगा तो उनके पिता जी &lt;b&gt;कप्तान अब्बास अली&lt;/b&gt; से बातचीत करने आऊँगा। कप्तान अब्बास अली जी ने 1940 के दशक में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथ आज़ाद हिंद फौज में भाग लिया था, वहीं पर वह कप्तान बने थे। जब 2014 में उनकी मृत्यु की खबर मिली थी तब भी यही दुख हुआ था कि समय रहते उनसे क्यों नहीं मिला था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खैर इस बार मैंने सोचा कि बाघा जतिन के बारे में इंटरनैट पर खोज करके लिखूँ। यही सोचते-सोचते दो साल बीत गये हैं, पर आखिर में वह आलेख लिखने का समय मुझे मिल ही गया।&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;बाघा जतिन - जतिन्द्रनाथ मुखर्जी&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;जतिन्द्रनाथ का जन्म सन् 1879 में उनकी ननिहाल&amp;nbsp;कुष्टिया जिले के केया गाँव में&amp;nbsp;हुआ था। उनका पैतृिक घर वहाँ से करीब 40 किलोमीटर दक्षिण में साधुहाटी में था, जहाँ वह बड़े हुए। यह दोनों जगहें अब बँगलादेश के खुलना डिविज़न का हिस्सा हैं। हाई स्कूल के बाद 1895 में वह कलकत्ता सैंट्रल कॉलेज में पढ़ने गये।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjdmTxey3qPgjg-uC7Ddw-GnFuMRwai_TW1Nv6M_h2FMimAdXxLnu91bqwB8QqQHBF0XhedTy_cq25x1RXg8HX63HX_fdk8BC5yJS_tb7cfl2lLh8kZLplB_RLNOxCHq0ZKMnKXzMKKxRO4COIuF2UCZI_MYc4RbLIXz28_SupSi8F_OO_fe7BAwrU5Hyqq/s837/Jatindranath01.jpg&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;837&quot; data-original-width=&quot;757&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjdmTxey3qPgjg-uC7Ddw-GnFuMRwai_TW1Nv6M_h2FMimAdXxLnu91bqwB8QqQHBF0XhedTy_cq25x1RXg8HX63HX_fdk8BC5yJS_tb7cfl2lLh8kZLplB_RLNOxCHq0ZKMnKXzMKKxRO4COIuF2UCZI_MYc4RbLIXz28_SupSi8F_OO_fe7BAwrU5Hyqq/s320/Jatindranath01.jpg&quot; width=&quot;289&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में वह स्वामी विवेकानन्द और बहन निवेदिता से मिले। स्वामी विवेकानन्द के अतिरिक्त उनकी मुलाकात अरविंदो घोष, रासबिहारी बोस आदि व्यक्तियों के सम्पर्क में आये। इस तरह से वह भारत की स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले युगांतर अभियान तथा अनुशीलन समिति से जुड़े और&amp;nbsp;भारत के स्वाधीनता संग्राम का हिस्सा बन गये। अनुशीलन समिति में बंकिमचन्द्र चैटर्जी और स्वामी विवेकानन्द के हिन्दू-शक्ता आध्यात्मिक विचारधारा की सोच वाले लोग थे जो स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्राँति का रास्ता खोज रहे थे।&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1906 में अपने गाँव से लौटते समय जतिन्द्रनाथ का जँगल में एक बाघ से सामना हुआ और वह अपनी छुरी से उसे मारने में सफल हुए जिसके लिए उन्हें अंग्रेज़ सरकार की ओर से बाघ का खिताब मिला और लोग उन्हें बाघा जतिन बुलाने लगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1908-09 में मुज़्ज़फरपुर के मजिस्ट्रेट की हत्या की साजिश का मुकदमा चला जिसमें अरविंद घोष के साथ अन्य आरोपियों में जतिन्द्रनाथ भी थे। इस मुकदमें में अनुशीलन समिति को बैन कर दिया गया, बहुत लोगों को सजा मिली लेकिन जतिन्द्रनाथ को सबूत न मिलने पर बरी किया गया, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें &quot;हावड़ा-शिवपुर साजिश&quot; के मुकदमें में दोबारा गिरफ्तार किया गया और वह ग्यारह महीनों तक हावड़ा जेल में रहे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने जर्मनी में हथियारों के लिए सम्पर्क किया लेकिन अंग्रेज़ों को उनके हथियारों के आने की खबर मिल गयी, और उनकी फौज से संघर्ष करते हुए 10 सितम्बर 1915 को जतिन्द्रनाथ का देहांत हो गया, उस समय वह छत्तीस साल के थे।&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;बाघा जतिन के पौत्र पृथ्वीन्द्र मुखर्जी&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;सन् 1900 में जतिन्द्रनाथ का विवाह इन्दुबाला बैनर्जी से हुआ, उनके चार बच्चे हुए, एक बेटी आशालता और तीन बेटे, अतीन्द्र, तेजेन्द्र और बिरेन्द्र। जिस समय जतिन्द्रनाथ की मृत्यु हुई, तेजेन्द्रनाथ उस समय केवल छह साल के थे।&amp;nbsp;उनके पहले पुत्र अतीन्द्र की मृत्यु बचपन में ही हो गयी थी, इसलिए 
तेजेन्द्र को उनका बड़ा बेटा मानते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तेजेन्द्रनाथ के तीन बेटे थे, रथीन्द्रनाथ, पृथ्वीन्द्रनाथ और ध्रितीन्द्रनाथ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgn_BCYSTlpIgBwyFwFEzPV5wNNPnRa-n86d-KiPHpiUXeKHKv5rQpzFXGzV0vbsrawOCyVoMuL1TlPBR8GA_1S_WEjliwPiotW8q8lA2zKksn6dXJmS11xKmAIxUommqAQQy6IJMh2orkpl-ZjTrTPWAqZMryR-gTqINalmwVOz2iXJ1f31BsVyncXOE4t/s670/Tejendranath01.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;670&quot; data-original-width=&quot;444&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgn_BCYSTlpIgBwyFwFEzPV5wNNPnRa-n86d-KiPHpiUXeKHKv5rQpzFXGzV0vbsrawOCyVoMuL1TlPBR8GA_1S_WEjliwPiotW8q8lA2zKksn6dXJmS11xKmAIxUommqAQQy6IJMh2orkpl-ZjTrTPWAqZMryR-gTqINalmwVOz2iXJ1f31BsVyncXOE4t/s320/Tejendranath01.jpg&quot; width=&quot;212&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;पृथ्वीन्द्र का जन्म 20 अक्टूबर 1936 में हुआ। जब वह पाँच साल के थे उन्हें पोलियो हो गया जिससे उनकी टाँग कमज़ोर हो गयी और वह चल या खड़े नहीं हो पाते थे। उनके मामा प्रबोधकुमार चैटर्जी ने उन्हें विज्ञान पढ़ाया और उनके फूफा ललितकुमार रायचौधरी ने उन्हें संस्कृत पढ़ायी। जब वह बारह वर्ष के थे जब वह परिवार के साथ पाँडेचैरी में अरविंद आश्रम में रहने आये और वहाँ पढ़ाई पूरी करके 1956 से श्री ओरोबिन्दो आश्रम के अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र में तीन भाषाएँ (अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी) पढ़ाने लगे।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीन्द्र को बचपन से कविता लिखने का शौक था, वह बंगाली और अंग्रेज़ी में कविता लिखते थे। 1955 में उन्होंने भारत में गाँधी जी से पहले, विषेशकर स्वामी अरविंद और अपने दादा जतिन्द्रनाथ के समय में भारत की स्वतंत्रता की कोशिशों के बारे में शोध करना शुरु किया। यह शोध पहले एक बंगाली पत्रिका बासुमति और फ़िर पुस्तक रूप में छपा। साथ ही उनका कविता लेखन चलता रहा और बंगाली व अंग्रेज़ी कविताओं के संकलन भी छपे। साथ ही वह फ्राँसिसी के कुछ प्रसिद्ध लेखकों की किताबों का बंगाली में अनुवाद कर रहे थे। इस तरह से पच्चीस वर्ष के होते-होते वह कवि, लेखक और अनुवादक के रूप में जाने जाने लगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीन्द्र को बचपन से संगीत में भी रुचि थी। उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन और पश्चिमी संगीत दोनों सीखे। वह भारतीय रागों और पश्चिमी संगीत के सिद्धातों को मिला कर संगीत रचना चाहते थे। इस तरह से वह भारतीय-पश्चिमी मिला-जुला आरकेस्ट्रा बना कर उनकी कन्सर्ट आयोजित करने लगे और उन्होंने श्री ओरोबिन्दु आश्रम का बैंड-दल बनाया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तीस वर्ष की आयु में 1966 में फ्राँसिसी सरकार की छात्रवित्ति ले कर वह पैरिस पहुँचे। फ्राँस में उनकी टाँग के आपरेशन भी हुए जिससे उनके लिए बैसाखी से चलना कुछ आसान हो गया। वहाँ उन्होंने 1970 में श्री ओरोबिन्दो के दर्शन पर पीएचडी की, और उसके बाद पैरिस के विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे, साथ ही रेडियो के कार्यक्रम तथा पत्रकारिता में लग गये। 1981 में उन्हें फुलब्राईट छात्रवित्ति मिली जिससे वह अमरीका गये। फ्राँस लौटने के बाद वह पैरिस में बँगाली पढ़ाने लगे। उन्होंने अंग्रेज़ी, बंगाली और फ्राँसिसी भाषाओं में करीब सत्तर पुस्तकें लिखीं। उन्हें श्री ओरोबिन्दो पुरस्कार, फ्राँस सरकार से शिवालिएर और भारतीय सरकार से पद्मश्री सम्मान मिले।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पृथ्वीन्द्र ने दो विवाह किये और उनके तीन बच्चे हुए, दो बेटियाँ अद्या और अमृता, और एक पुत्र, अर्जव।&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अंत में - बाहरी क्राँति से आंतरिक क्राँति&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;जतिन बाघा की कहानी स्वामी अरविंद या ओरोबिन्दो से जुड़ी हुई है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में दोनों सशस्त्र क्राँति की बात कर रहे थे। स्वामी ओरोबिन्दो को 1908 में अलीपुर बम्ब विस्फोट केस में जेल हुई। जतिन को 1910 में हावड़ा-शिबपुर केस में। स्वामी ओरोबिन्दो को जेल में आध्यात्मिक ज्योति मिली, जब वह बाहर आये तो वह बदल चुके थे। वह भारत की स्वतंत्रता की बात करते थे, पर वह आत्मा के विकास और स्वाधीनता के प्रति अधिक सजग थे। जतिन बाघा ने शस्त्र क्राँति का सपना नहीं छोड़ा और 1915 में पुलिस की गोलियों से घायल हो कर उनका देहांत हुआ। उनके पोत्र पृथ्वीन्द्र, अपनी माँ तथा भाईयों के साथ पाँडेचैरी के स्वामी ओरोबिन्दो के आश्रम में बड़े हुए और उनका परिवार आजीवन &quot;माँ&quot; (मिर्रा अलफस्सा, स्वामी ओरोबिन्दो की संगनी) के आध्यात्मिक सानिध्य में रहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यानि सोचिये कि शस्त्र क्राँति या देश की स्वाधीनता की कामना, कहीं पर आत्मा की क्राँती के साथ कब, क्यों और कैसे जुड़ जाती है?&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;*****&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नोट: इस आलेख में उपयोग की गयी तीनों तस्वीरें इंटरनेट से साभार ली गयी हैं&lt;/p&gt;&lt;p&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/2261630802030786507/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/blog-post.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2261630802030786507'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/2261630802030786507'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/blog-post.html' title='बाघा जतिन और उनके पौत्र'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgpv8GnWK9EbsJ8fgFcfEGIhAgQXLjmzvwvY33mLeK3FE-yZFiCGOUFmv6-fLgnbLCPk6JpNt3tK7aZb_NQ-ScgPU0wygn-dQYVvuv_VttMWaEocytuHW0q39En9jE2InyZsltRB_DXsJqRVnvA3YB6iaR8H062LMtnpKz6fv8jbaGe7bR-SkHBnVY3Idk4/s72-c/India-Kolkata-Bagha-Jatin_04.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-7704028602703050500</id><published>2026-07-23T05:38:06.120+02:00</published><updated>2026-07-27T05:57:22.448+02:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उपन्यास"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कथा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धारावाहिक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुस्तक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भाषा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 16</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;: ताकानोरी जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी मूर्ति चाहता है। उससे बचने के लिए बाबा समाधी 
ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में लोगों 
को जान से मारने की धमकी देता है। वह उनकी समाधी को खोदने
 की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, बाबा का शिष्य 
त्रिनेत्र एक अनाथाश्रम चलाता है, 
जहाँ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा भी हैं। वे बाबा को बचाने के 
लिए, वहाँ पहुँचते हैं। इसके आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/15.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 16&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;मजूली द्वीप, असम, 4 मार्च 2026, सुबह&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री, रंगनाथ और गार्गी वृद्धाश्रम की ओर जाने के लिए तैयार हो गये।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री ने आभा से कहा, “हम सीढ़ियों से ऊपर नहीं जायेंगे बल्कि एक गुप्त सुरंग से बाहर निकलेंगे। तुम भी हमारे साथ चल कर सुरंग का रास्ता देख लो और जब यहाँ तहखाने में बैठे-बैठे बोर हो जाओ तो बच्चों को कुछ देर तक बाहर घुमा सकती हो। वसंत तुम्हारी शक्ति-लहरों को ढक कर तुम्हें उस जापानी की अन्वेषण-किरण से छुपा लेगा, लेकिन यह काम वह पेड़ों की सहायता से करता है, अगर तुम लोग खुले में जाओगे तो वहाँ वह तुम्हें नहीं छुपा सकता, इसलिए तुम बच्चों को खुली जगह में नहीं जाने देना।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाश्ते के बाद माधव और तृप्ति सोने के लिए वापस बिस्तर पर लौट गये, लेकिन वसंत वहीं बैठा उनकी बातें सुन रहा था, बोला, “मैं भी आप के साथ चलता हूँ, आभा दीदी के साथ लौट आऊँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आभा बोली, “क्या माधव और तृप्ति को यहाँ अकेले छोड़ना ठीक होगा?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhJ36aAtFEbiKYBJPXI9gX4fQChRMpqf8k6Mq2-159raqUUwb0TrondKmbjp6FN-b3qElhnJEAtW5SHNAn3dtHJANUurq0nLWMjKGD4ebO_ueRRyUuajkCruQhEW1HwycXyPfznwH5kth5CWFlKeG44b-FLjMSRZuYbpTVZt_Tu9dWAxRHtnSd0tjObfGVo/s767/Tiranga_16.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;639&quot; data-original-width=&quot;767&quot; height=&quot;267&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhJ36aAtFEbiKYBJPXI9gX4fQChRMpqf8k6Mq2-159raqUUwb0TrondKmbjp6FN-b3qElhnJEAtW5SHNAn3dtHJANUurq0nLWMjKGD4ebO_ueRRyUuajkCruQhEW1HwycXyPfznwH5kth5CWFlKeG44b-FLjMSRZuYbpTVZt_Tu9dWAxRHtnSd0tjObfGVo/s320/Tiranga_16.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;“इस घर में उन्हें कोई खतरा नहीं है। ज़रीना, वह लड़की जो ऊपर रहती है और हमें रात को मिली थी, वह हमारी साथी है। फरीद, वह नाव वाला जो हमें रात को मजूली ले कर आया था, ज़रीना उसकी बेटी है। वह सुन-बोल नहीं सकती, लेकिन इशारों की वर्णमाला जानती है और लिख-पढ़ सकती है। गुरु जी ने उसे गूँगे-बहरों के स्कूल में पढ़ने भिजवाया था, इसलिए वह लोग गुरु जी को बहुत मानते हैं। जब हमें अपने छुपने के लिए कमलाबाड़ी घाट के पास जगह चाहिये थी, तब गुरु जी ने यह घर बनवाया था और बाहर जाने के लिए सुरंग भी बनवायी। तुम्हें कुछ भी ज़रूरत हो तो ज़रीना को कहो&quot;, त्री ने सारी बात बतायी।&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रंगनाथ ने पूछा, “दादा, यह इशारों की वर्णमाला क्या होती है?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“जैसे अक्षरों की वर्णमाला होती है, वैसे ही हम हर अक्षर के लिए उंगलियों से भिन्न मुद्रा बना सकते हैं, वह मुद्राओं की वर्णमाला होती है। जैसे कि तुम्हारे नाम को अगर मुद्राओं की भाषा में कहना हो तो &#39;र&#39; कहने के लिए तर्जनी और मध्यमा उंगलियों से क्रोस बनाओ और बाकी दोनों उंगलियों पर अंगूठा रख दो। &#39;न&#39; कहने के लिए सभी उंगलियों के सिरों को अंगूठे के सिरे से मिलाओ। फ़िर &#39;ग&#39; कहने के लिए &#39;न&#39; वाली मुद्रा में मध्यमा को ऊपर उठाओ&quot;, यह कहते हुए उसने अपने हाथों से मुद्राएँ बदल कर अक्षर बना कर दिखाये, बोला, “इस तरह से यह &#39;रंग&#39; शब्द बन गया।&quot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रंगनाथ बोला, “यह भाषा तो बहुत कठिन लगती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री मुस्कराया, “जब कोई चीज़ नहीं करनी आती तो वह कठिन लगती है। अगर तुम हर रोज़ मुद्रा की भाषा की एक-दो नयी मुद्राएँ सीख लो और हर रोज़ उनका अभ्यास करो तो एक महीने में इशारों में फटाफट बोलने लगोगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गार्गी बोली, “जब हम घर लौटेंगे तो मैं यह इशारों की भाषा भी सीखूँगी ताकि ज़रूरत पड़े तो मैं आप को इशारों से गुप्त संदेश दे सकती हूँ।&quot; रंगनाथ बोला, “केवल तुम्हारे सीखने से कुछ नहीं होगा, उसे समझने वाला भी चाहिये, नहीं तो क्या अपने आप से बातें करोगी?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गार्गी ने पूछा, “दादा, कल रात जब हम यहाँ आये तो आप ने घंटी बजायी थी? ज़रीना दीदी ने उसे कैसे सुना?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री मुस्कराया, “ऊपर जब घंटी बजाओ तो घंटी बजती है और साथ में एक बल्ब जलता-बुझता है, ज़रीना उसे देख सकती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रंगनाथ ने पूछा, “ज़रीना दीदी टेलीफोन पर कही बातें भी समझ सकती हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“हाँ, उसके मोबाइल में एक एप्प है, तुम उसे कुछ कहोगे तो वह एप्प उसे मुद्रा की भाषा में वही बात वीडियो में दिखायेगी&quot;, कह कर त्री खड़ा हो गया, &quot;चलो, अब हमें चलना चाहिये&quot;।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह तहखाने की रसोई में गया और एक अलमारी के पास जा कर, उसने एक जगह दबाया तो वह अलमारी दरवाज़े की तरह खुल गयी। उसके पीछे एक गुप्त रास्ता छिपा था। जैसे ही वह भीतर घुसा, वहाँ एक बत्ती जल गयी। उसके पीछे रंगनाथ और गार्गी गये और उनके पीछे आभा और वसंत।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री ने आभा को दिखाया कि सुरंग खोलने के लिए अलमारी को कैसे खोलते-बंद करते हैं। वह बोला, “इस सुरंग में सैन्सर लगे हैं, तुम जिधर जाओ, वहाँ की बत्ती अपने आप जल जाती है और पीछे वाली कुछ देर बाद अपने आप बुझ जाती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुरंग का रास्ता पार करने में उन्हें करीब आधा घंटा लगा और जब वह दरवाज़ा खोल कर बाहर निकले तो देखा कि उस सुरंग का दरवाज़ा एक मोटे तने वाले पीपल के पेड़ का हिस्सा था। जब वह बंद होता था और उसे ध्यान से नहीं देखो, तो दिखाई नहीं देता था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसंत बोला, “देखो, यह तो बहुत बड़ा पीपल का पेड़ है, इसके भीतर पूरा कमरा है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री बोला, “यहाँ के लोग इस पेड़ को पवित्र मानते हैं, इसे संत माधवदेव का पेड़ भी कहते हैं क्योंकि इसके नीचे एक बार संत माधव देव रहे थे। उनका गाँव हरिसिंगबरा, यहाँ से अधिक दूर नहीं है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वसंत ने पूछा, “यह पेड़ कितना पुराना होगा, दो सौ साल?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“संत माधव देव करीब पाँच सौ साल पहले पैदा हुए थे, और कहते हैं कि उनके समय में भी इस पेड़ को बहुत प्राचीन मानते थे। इसलिए हो सकता है कि यह पेड़ एक हज़ार साल या उससे भी पुराना हो। यहाँ सब लोग इसे जानते हैं। अगर तुम आसपास कहीं खो जाओ तो लोगों से पूछो कि संत माधव देव का पीपल का पेड़ कहाँ है, वह तुम्हें यहाँ का रास्ता दिखा देंगे”, त्री ने समझाया, फ़िर बोला, “आभा और वसंत, तुम लोग अब वापस जाओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आभा बोली, “बाद में जब माधव और तृप्ति जागेंगे, उन्हें साथ ले कर हम लोग यहाँ लौटेंगे।&quot; वह&amp;nbsp; दोनों पीपल के पेड़ की ओर लौट गये।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री, रंगनाथ और गार्गी आगे चले। उन्होंने गाँव के गरीब लोगों जैसे कपड़े पहने थे, जैसे कि एक पिता अपने बच्चों के साथ कहीं जा रहा हो। करीब एक घंटा चल कर वे श्री भोला मन्दिर पहुँचे और वहाँ से मोटरबोट ली जो उन्हें फुलानीबाड़ी के घाट तक ले गयी। त्री उस क्षेत्र में पहले कई बार आ चुका था, इसलिए उसने अपना चेहरा गमछे से ढक लिया था। घाट पर पहुँचने से पहले ही गार्गी ने तीनों की शक्ति-लहरों को ढक लिया।&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फुलानीबाड़ी के घाट से जो रास्ता गाँव की ओर जाता है, वहाँ आगे जा कर पेड़ों के पीछे एक छोटा सा मैदान है, जिसके एक किनारे पर झाड़ियाँ के पीछे एक चबूतरा बना था। वह जगह सड़क से छिपी हुई थी। उस चबूतरे के पीछे जा कर त्री ने उसकी एक ईंट हटा कर दबाया तो उसमें एक छोटा सा गुप्त द्वार खुल गया, जिसमें वह तीनों झुक कर घुस गये।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहाँ पर एक अन्य सुरंग थी जो नीचे जा रही थी, उसमें घुसने के बाद त्री ने गार्गी से कहा कि वहाँ शक्ति ढकने की आवश्यकता नहीं है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रंगनाथ बोला, “दादा, हर जगह सुरंगें बनी हैं, इसका मतलब है कि गुरु जी बहुत सालों से इस खतरे का सामना करने के लिए तैयारी कर रहे थे?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री ने धीरे से सिर हिला कर हामी भरी। वह जानता है कि बच्चे समझदार हैं, वह उनसे पूरी बात नहीं छुपा सकता। लेकिन अगर उनमें से कोई उस जापानी याकूज़ा के चँगुल में आ गया तो वह इनके दिमाग में घुस कर सब बातों को जान जायेगा, इसलिए वह उन्हें सब बातें नहीं बताना चाहता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गार्गी बोली, “वह जापानी आदमी गुरु जी का पीछा क्यों कर रहा है? वह उनसे क्या चाहता है?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“गुरु जी कोरिया से हैं। वह भी अनाथ थे और उन्हें भी एक बौद्ध भिक्षुक ने पाला था, जो बाद में उनके गुरु बने। उनके गुरु जी का नाम कूवी महाराज था और उनके पास हरिताश्म पत्थर की बनी माँ तारा की एक मूर्ति थी, जिसके प्रभाव से बच्चों की गुप्त-शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं। कुछ जापानी लोग उस मूर्ति को पाना चाहते हैं&quot;, त्री ने बताया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यह हरिताश्म पत्थर क्या होता है?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“हरिताश्म को अंग्रेज़ी में जेड कहते हैं, यह हरे रंग के संगमरमर जैसा होता है, लेकिन मुलायम होता है। उसकी मालाएँ और गहने भी बनाते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“क्या यह पत्थर भारत में मिलता है? हमारे अखाड़े में भी तो हरे रंग की माँ तारा की कई मूर्तियाँ हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“यह पत्थर भारत में नहीं मिलता&quot;, त्री ने बताया, “हमारे उत्तर-पूर्व में एक देश है म्यंमार, उसे पहले बर्मा कहते थे, वहाँ पर हरिताश्म की खानें हैं। लेकिन सुना है कि हमारे मिज़ोराम में, म्यंमार की सीमा के पास भी, शायद यह पत्थर मिलते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“इसका मतलब है कि जापानी लोग गुरु जी का चालीस-पैंतालिस सालों से पीछा कर रहे हैं?” रंगनाथ ने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गार्गी बोली, “इतने सालों में तकनीकी ने इतनी तरक्की कर ली है, आज तो बहुत से अपराध इंटरनेट के माध्यम से होते हैं। इतने सालों के बाद भी वह लोग इस पुरानी बात के पीछे क्यों पड़े हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री मुस्कराया, बोला, “गुरु जी कहते हैं कि इस बात को यामागुचि नहीं भूल सकता, यह उसके आत्म-सम्मान की बात बन गयी है। तीन बार गुरु जी उसके चँगुल में आये और तीनों बार वह उसे चकमा दे कर भाग गये। आखिरी बार उसने गुरु जी को थाईलैंड में 1996 में खोजा था। उस बात को भी अब तीस साल हो गये। वह पहले वाले यामागुचि तो अब बहुत बूढ़े हो गये हैं, लेकिन उनका पोता है, रिकू यामागुचि, वह अब उनका गैंग चलाता है। शायद वह अपने दादा का अधूरा काम पूरा करना चाहता है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“पहले वह लोग गुरु जी को खोज लेते थे, तो वह उन्हें चकमा दे कर वहाँ से भाग कर नयी जगह में छिप जाते थे। लेकिन इस बार वह नहीं भागे, बल्कि उन्होंने समाधी ले ली, क्यों?”, गार्गी का दिमाग बहुत तेज़ है, वह हर अनकही बात को पकड़ लेती है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“क्यों कि अब गुरु जी बूढ़े हो रहे हैं, वह डरते हैं कि कहीं उनकी मृत्यु के बाद, यामागुचि के जासूस हमारे पीछे न लग जायें, और हमारे अनाथाश्रम पर हमला कर दें, क्योंकि मैं उनके उत्तराधिकारी हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;“क्या इसका मतलब है कि अब वह मूर्ति हमारे पास है? वह हमारे अनाथाश्रम में है?” गार्गी ने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्री फ़िर से मुस्कराया, सोचा कि गार्गी से कुछ छुपाना बहुत कठिन है, बोला, “जो मूर्ति गुरु जी कोरिया से लाये थे, कुछ साल पहले वह टूट गयी थी। उन्होंने उस मूर्ति के टुकड़ों को कुछ नयी मूर्तियों में जड़वा दिया है। उसमें से एक नयी मूर्ति हमारे पास, हमारे अनाथाश्रम में भी है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह बातें करते-करते वह तीनों सुरंग को पार करके, वृद्धाश्रम से कुछ दूर, गुरु जी के ज़मीन के नीचे छिपे हुए तहखाने वाले कमरों में पहुँच गये।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/17.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/7704028602703050500/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/16.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/7704028602703050500'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/7704028602703050500'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/16.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 16'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhJ36aAtFEbiKYBJPXI9gX4fQChRMpqf8k6Mq2-159raqUUwb0TrondKmbjp6FN-b3qElhnJEAtW5SHNAn3dtHJANUurq0nLWMjKGD4ebO_ueRRyUuajkCruQhEW1HwycXyPfznwH5kth5CWFlKeG44b-FLjMSRZuYbpTVZt_Tu9dWAxRHtnSd0tjObfGVo/s72-c/Tiranga_16.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9115561631155571591.post-1940813891414821258</id><published>2026-07-20T05:54:24.517+02:00</published><updated>2026-07-23T05:39:03.415+02:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उपन्यास"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कथा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धारावाहिक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पुस्तक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भारत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 15</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;अब तक की कहानी&lt;/b&gt;: जापानी याकूज़ा ताकानोरी हिन्दुस्तान आया है और 
जामुन बाबा को खोज रहा है, वह उनकी शक्तिदायिनी हरित तारा की 
मूर्ति चुराना चाहता है। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में 
जीवित समाधी 
ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आ कर, लोगों 
को जान से मारने की धमकी देता है और&amp;nbsp;वृद्धाश्रम में बाबा की समाधी को खोदने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं होता। उधर, जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास
 एक अनाथाश्रम चलाता है, 
जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। 
जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के 
लिए, वे गँगटोक से मजूली द्वीप के लिए निकल पड़े हैं। इसके आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/14.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 15&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;मजूली द्वीप की यात्रा, असम, 3-4 मार्च 2026&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;रात के दस बजे अचानक त्री के मोबाइल की घंटी बजी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“काका, क्या हुआ?” उसने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जगदीश बाबू ने पूछा, “तुम लोग कहाँ हो और यहाँ कब पहुँच रहे हो?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“क्यों? हम लोग कोहोरा के पास हैं, आज रात को मरियानी पहुँच कर वहीं आसपास कहीं रुक जायेंगे, बहुत थक गये हैं। हम कल मजूली की फैरी पकड़ेंगे, दोपहर तक आप के यहाँ पहुँच जायेंगे।”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj4JBC-6MEez3Q6X9nNZ1vk9EXkQ9X5L_uabNBxKStyYsl5ExlyBppXwK3j6Sfs06uwP2-hfXkeA_x1dRdNZtZzuMM1Vzg-3UD4W9HDNzBXMc4D7ZpAEzQeGwfhaXqFVFOR_wcmvGAudyi7iOoImVH2lAuTVS1JkmJUc76ZzHOViXNFza5F_9m5cjyYVHTq/s899/Tiranga_15.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;899&quot; data-original-width=&quot;766&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj4JBC-6MEez3Q6X9nNZ1vk9EXkQ9X5L_uabNBxKStyYsl5ExlyBppXwK3j6Sfs06uwP2-hfXkeA_x1dRdNZtZzuMM1Vzg-3UD4W9HDNzBXMc4D7ZpAEzQeGwfhaXqFVFOR_wcmvGAudyi7iOoImVH2lAuTVS1JkmJUc76ZzHOViXNFza5F_9m5cjyYVHTq/s320/Tiranga_15.jpg&quot; width=&quot;273&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जगदीश बाबू ने उसे ताकानोरी की समाधी को खुदवाने की कोशिशों के बारे में बताया, बोले, “वह अपने कम्प्यूटर वाले लड़के सोमचाई को यहाँ छोड़ कर गया है। यह सोमचाई बुरा आदमी नहीं लगता। ताकानोरी कह रहा था कि वह नारायणपुर वापस जा रहा है लेकिन मेरे विचार में वह झूठ बोल रहा था, मुझे डर है कि वह यहीं कहीं, हमारे आसपास ही छुपा हुआ है और जैसे ही तुम यहाँ पहुँचोगे, वह तुम्हें पकड़ लेगा।&quot;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “आप चिंता नहीं कीजिये काका, वहाँ आने से पहले मैं आप को खबर कर दूँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसके साथ बैठी आभा और पीछे बैठे बच्चे, सभी सो रहे थे लेकिन फोन की आवाज़ से आभा जाग गयी। जब उसने फोन बंद किया तो&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह धीरे से बोली, “वह जापानी नारायणपुर क्यों चला गया?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “मेरा ख्याल है कि उन्होंने जगदीश काका के मोबाइल में स्पाईवेयर लगाया है, जिससे वह लोग देख सकते हैं कि वह किसे फोन कर रहे हैं और उनकी बातें भी सुन सकते हैं। इसलिए सबसे पहले हमें इस मोबाइल के सिम-कार्ड को बदलना है।&quot; उसने अपनी जेब से एक छोटा लिफाफा निकाल कर आभा की ओर बढ़ाया, बोला, “इसमें मोबाइल खोलने वाला पिन है और एक नया सिम-कार्ड है। उसे बदल दो और पुराने सिम को खिड़की से बाहर फ़ैंक दो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा ने मोबाइल को लिया और उसका सिम कार्ड बदलने लगी, तो त्री बोला, “मैंने काका से झूठ बोला है। हम लोग मरियानी नहीं रुकेंगे, आज रात को ही मजूली पहुँच जायेंगे। मेरे ख्याल में वह जापानी वहीं आसपास छुपा हुआ होगा और अपनी अन्वेषण-किरण से हमें खोजेगा, लेकिन हम उसके लिए तैयार होंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह बोली, “तुम आज सुबह से लगातार गाड़ी चला रहे हो, हम लोग रास्ते में खाने के लिए भी बहुत थोड़ी देर के लिए रुके। हमने तो कुछ आराम किया है लेकिन तुम, क्या तुम्हें आराम भी बिल्कुल आवश्यकता नहीं है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री मुस्कराया लेकिन कुछ नहीं बोला।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह लोग रात को साढ़े ग्यारह बजे के करीब गोसाईंगाँव के घाट पर पहुँचे। बच्चों को जगाने में कुछ समय लगा, त्री ने उन्हें पानी की बोतल दी और सबसे आँखो पर पानी के छींटें मारने के लिए कहा। कार को पार्किन्ग में छोड़ कर वह आगे पैदल ही बढ़े।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गुरु जी का पुराना नाववाला मछुआरा फरीद, अपनी नाव के साथ अँधेरे में उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। जैसा उन्होंने पहले से निश्चित किया था, यह बताने के लिए कि वहाँ कोई खतरा नहीं है, वह मिसिन्ग भाषा में एक गीत गा रहा था, “ओकोल कापे दूदोने नो, केराद कमाइ मेमोदाग ...”।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसके गीत की आवाज़ सुनते हुए, त्री उन्हें वहाँ तक ले आया। फरीद की नाव घाट पर तैयार खड़ी थी, और घाट खाली था। उसने उन्हें नाव में बिठाया और बिना आवाज़ किये, धीरे-धीरे चप्पु चलाते हुए, उसे ब्रह्मपुत्र नदी की धारा के बीच में ले आया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा ने फुसफुसा कर त्री से पूछा, “यह आदमी ऐसे ही अँधेरे में नाव कैसे चलायेगा? कहीं फँस गये तो?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने धीरे से उसका हाथ दबाया, कुछ बोला नहीं। गोसाईंगाँव से कमलाबाड़ी का फैरी टर्मिनल करीब दस किलोमीटर दूर था। त्री थका हुआ था, जल्दी ही आँखें बंद करके बैठे-बैठे सो गया। अँधेरे में बच्चे भी दोबारा सो गये। केवल आभा डरी हुई थी, वह जाग रही थी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह एक बार पहले भी मजूली आयी थी, जानती थी कि वहाँ नदी के बीच में बहुत सारे द्वीप हैं, जिनके आसपास पानी की गहराई कम हो जाती है और वहाँ पर नाव फँस सकती है। लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि नाव वाला फरीद वहीं पैदा हुआ है और बचपन से उसने वहाँ नाव चलाई है, वह रास्ते को अच्छी तरह से जानता है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उन्हें मजूली पहुँचने में करीब तीन घंटे लगे। उन्हें कमलाबाड़ी उतार कर फरीद वहाँ रुका नहीं, त्री को नमस्कार करके तुरंत चला गया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने गार्गी से कहा, “हमारी सबकी शक्ति-लहरों को ढक दो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी ने तुरंत सबकी शक्ति लहर को ढका, फ़िर बोली, “दादा, हम बहुत लोग हैं, मैं थक जाऊँगी, अधिक देर नहीं कर पाऊँगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “हमें थोड़ी देर के लिए ही चाहिये, केवल दस मिनट की बात है।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह उन्हें घाट से कुछ दूर बामुनगाँव नामघर की ओर ले गया। नामघर के पीछे दो-तीन घर थे, उनमें से एक घर के दरवाज़े पर उसने तीन बार घंटी बजायी तो दरवाज़ा खुला। भीतर साड़ी पहने हुए एक लड़की खड़ी थी, उसने त्री को हाथ जोड़ कर नमस्ते की लेकिन कुछ नहीं बोली और उन्हें सीधा एक कोठरी में ले गयी, जहाँ पर नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ थीं। उसने उन्हें नीचे जाने का इशारा किया।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;करीब चालिस सीढ़ियाँ थीं, नीचे जाते हुए त्री ने गार्गी से कहा, “अब हमारी शक्ति-लहरों को ढकने की आवश्यकता नहीं है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा ने पूछा, “ज़मीन की सतह के नीचे से शक्ति-लहर का पता नहीं चलता?” तो गार्गी ने सिर हिला कर हामी भरी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;नीचे तहखाने में बिजली लगी थी। एक ओर गुसलखाना और टॉयलेट बने थे, दूसरी ओर रसोई थी और बीच में दीवार के साथ तीन-टायर वाले रेलगाड़ी के डिब्बे जैसे बिस्तर लगे थे। बाकी सबको आराम करने के लिए कह कर, त्री, वसंत और माधव, वह तीनों कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर आधे रास्ते तक ऊपर आये। उन्हें ऊपर जाते देख कर आभा भी उनके पीछे ऊपर आयी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वहाँ त्री ने वसंत से कहा, “कोशिश करके देखो कि क्या तुम बाहर के पेड़-पत्तों से बात कर सकते हो?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत ने एक मिनट आँखें बंद की, फ़िर सिर हिला कर मना किया, तो वह लोग कुछ अन्य सीढ़ियाँ चढ़ कर थोड़ा और ऊपर आये। वहाँ पहुँच कर वसंत ने फ़िर से आँखें बंद कीं और त्री से बोला, “दादा, यहाँ से मैं उनसे बात कर सकता हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;पूछो कि मजूली में और हमारे आसपास कहीं पर कोई शक्ति-लहर दिख रही है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत ने आँखें बंद कर लीं, कुछ देर के बाद आँखें खोल कर बोला, “वह कहते हैं कि दक्षिण में जहाँ पर मजूली द्वीप समाप्त होता है,&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वहाँ पर नदी के दूसरी ओर छह-सात किलोमीटर दूर जा कर एक शक्ति-लहर दिखती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने थोड़ी देर तक सोचा, फ़िर माधव को घुमाया और कहा, “सामने उस दिशा में देखो, यहाँ से करीब तीस किलोमीटर दूर, तुम्हें वहाँ कोई शक्ति-लहर महसूस होती है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;माधव ने भी कुछ क्षणों के लिए आँखें बंद की फ़िर बोला, “नहीं दादा, मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “इसका मतलब है कि ताकानोरी ने ठीक कहा था, वह सचमुच नारायणपुर में ही है। दूसरी बात है कि उसकी शक्ति-लहर कमज़ोर है, क्योंकि वह माधव को यहाँ से नहीं दिखी। इसका मतलब है कि वह हमें इतनी दूर से नहीं खोज सकता, अवश्य कल हमें यहाँ पर खोजने आयेगा।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह चारों नीचे लौट आये और त्री ने उन्हें भी सोने के लिए कहा। आभा चुपचाप, जिस बिस्तर पर तृप्ति सोई थी, उसके साथ जा कर लेट गयी। अपनी बेटी को खोने के बाद यह पहली बार थी कि वह किसी बच्चे के साथ इस तरह से बिस्तर पर लेटी थी। अचानक उसे अपनी बेटी की बहुत याद आयी और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। बहुत देर तक वह चुपचाप रोती रही, फ़िर उसे भी नींद आ गयी।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;सुबह आठ बजे त्री ने सबको जगाया और मुँह-हाथ धो कर नाश्ता करने के लिए कहा। नाश्ते के लिए तहखाने की रसोई में केले, अनानास और पका हुआ कटहल रखे थे। जब सबने अपनी प्लेटों में नाश्ता ले लिया तो त्री बोला, “नाश्ते के बाद तीन लोग - मैं, रंगनाथ और गार्गी, हम गुरु जी के वृद्धाश्रम की जाँच करने जायेंगे। उनका आश्रम यहाँ से करीब तीस किलोमीटर दूर है। मेरे विचार में उस जापानी की अन्वेषण-किरण केवल तीन-चार किलोमीटर की परिधि में काम करती है, लेकिन फ़िर भी वहाँ पहुँचते ही गार्गी करीब बीस-पच्चीस मिनट के लिए हमारी शक्ति-लहरों को ढक लेगी। वहाँ जाँच करके हम लोग शाम तक लौट आयेंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;और हम लोग? क्या हम सारा दिन इस तहखाने में बंद रहेंगे?”, आभा ने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“तुम लोग यहीं रहोगे, पर मैं तुम्हें एक गुप्त रास्ता दिखाऊँगा, तुम लोग वहाँ से आसपास थोड़ा-बहुत घूम सकते हो, पर दूर नहीं जा सकते।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “अच्छा बताओ, रात को वसंत ने उस जापानी व्यक्ति की शक्ति-लहर को कैसे खोजा था?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री ने उसे बताया कि पेड़-पौधे भी गुप्त-शक्ति की लहरों को महसूस कर सकते हैं और आपस में संदेश भेज सकते हैं। इस तरह से वसंत चाहे तो उसे पेड़ों से, बहुत दूर की खबरें भी आसानी से मिल जाती हैं। उसने अपना मोबाइल निकाल कर उस पर गूगल मैप खोला और मजूली द्वीप के दक्षिणी भाग को आभा को दिखाया, बोला, “हमें यहाँ जाना है, गुरु जी का वृद्धाश्रम वहीं है। वह जापानी नदी के दूसरे ओर, उनके आश्रम से करीब छह-सात किलोमीटर दूर है, वहाँ हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा ने थोड़ी देर सोचा, फ़िर पूछा, “रात को तुमने माधव से भी आँखें बंद करके शक्ति-लहर को देखने के लिए कहा था?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“क्योंकि माधव की दो दृष्टि-शक्तियाँ है, वह अपनी आँखों से और मन की आँखों से, दोनों से दस-बारह किलोमीटर की दूरी तक देख सकता है। शक्ति-लहरों से एक विशेष तरह का प्रकाश निकलता है, वह उसे पहचान लेता है। वैसे तो वह जापानी बहुत दूर है, इसलिए मुझे पता था कि माधव को उसकी शक्ति-लहर नहीं दिखेगी, लेकिन मैंने उससे यह इस लिए पूछा था ताकि हमें डबल पक्का हो जाये कि आसपास हमें खोजने वाला कोई नहीं है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “यह शक्ति वाली बातें मेरे लिए नयी हैं, इन्हें समझने में मुझे कुछ समय लगेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;कुछ देर बाद त्री ने उससे पूछा, “जब तुम सोने गयीं थीं, उस समय कुछ हुआ था?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“क्यों?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“क्योंकि मैंने देखा कि अचानक ही फर्श पर चिलचट्टे, कानखजूरे, बिच्छू, छिपकलियाँ, आदि जीव-जन्तु निकल आये, और वह सब तुम्हारे बिस्तर के आसपास घूम रहे थे। मुझे लगा कि वह तुम्हारी पहरेदारी कर रहे हैं। थोड़ी देर के बाद शायद तुम सो गयीं और वह सभी अपने बिलों में वापस लौट गये। जब वह दिखते हैं तो मुझे पता चल जाता है कि तुम्हारी शक्ति जागृत है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;उसकी बात सुन कर आभा कुछ देर तक सोचती रही, फ़िर रुँधे स्वर में बोली, “बेटी खोने के बाद आज पहली बार एक छोटी बच्ची के साथ इस तरह से लेटी थी, इसलिए उसकी याद आ गयी तो मुझे रोना आ गया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री सोचता हुआ बोला, “इसका मतलब है कि जब तुम्हारे मन में भावनायें तीव्र होती हैं, तब तुम्हारी शक्ति आपने आप जागृत हो जाती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/16.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/1940813891414821258/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/15.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/1940813891414821258'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/1940813891414821258'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/15.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 15'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj4JBC-6MEez3Q6X9nNZ1vk9EXkQ9X5L_uabNBxKStyYsl5ExlyBppXwK3j6Sfs06uwP2-hfXkeA_x1dRdNZtZzuMM1Vzg-3UD4W9HDNzBXMc4D7ZpAEzQeGwfhaXqFVFOR_wcmvGAudyi7iOoImVH2lAuTVS1JkmJUc76ZzHOViXNFza5F_9m5cjyYVHTq/s72-c/Tiranga_15.jpg" height="72" 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मूर्ति चुराना चाहता है। उससे बचने के लिए जामुन बाबा मजूली द्वीप में जीवित समाधी 
ले लेते हैं। ताकानोरी उनके वृद्धाश्रम में अपने गुँडो के साथ आ कर, लोगों को जान से मारने की धमकी देता है और&amp;nbsp;वृद्धाश्रम में बाबा की समाधी को खोद कर भीतर देखना चाहता है। उधर, जामुन बाबा का शिष्य त्रिनेत्र गँगटोक के पास एक अनाथाश्रम चलाता है, 
जहाँ उसके साथ पाँच गुप्त-शक्ति वाले बच्चे और उसके मित्र की बहन आभा हैं। 
जब उन्हें ताकानोरी के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के 
लिए, वे गँगटोक से मजूली द्वीप के लिए निकल पड़ते हैं। इसके आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/13.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 14&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;मजूली द्वीप, असम, 3 मार्च 2026 रात्रि&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;शाम को जामुन बाबा की समाधी को देखने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ कम हो गयी। जब सूरज डूबा और श्रद्धालु चले गये तो वृद्धाश्रम के द्वार बंद हो गये।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ताकानोरी ने पहले से ही बाबा की समाधी को खुदवाने के लिए मजदूर बुलवा लिये थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगदीश बाबू ने एक बार फ़िर उसे रोकने की कोशिश की, बोले, “आपने देखा कि आज कितने लोग उनकी समाधी पर प्रार्थना करने आये? बाबा को यहाँ के लोग बहुत मानते हैं। कल उन्हें पता चलेगा कि किसी ने उनकी समाधी को तोड़ा है तो वह बहुत गुस्सा होंगे और यहाँ दंगा भी हो सकता है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEizhie-9dorinhJAHFNfZn0dHhpTrB_pr4lzF6RMci1KPoR9lejrZDNgFxJU0v0mc84ZT0loH5l-SaDq_lCwQibP1T3rrKQslQcayrrjsqb5scb2gqDasu7u0RFx-vJHVm9u15KZKlWsv8E0zdwv41_qTpUTtZfkNn2uWqCI4FSBVNvp_JwcXpfDMA15RS6/s1231/Tiranga13.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1231&quot; data-original-width=&quot;1215&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEizhie-9dorinhJAHFNfZn0dHhpTrB_pr4lzF6RMci1KPoR9lejrZDNgFxJU0v0mc84ZT0loH5l-SaDq_lCwQibP1T3rrKQslQcayrrjsqb5scb2gqDasu7u0RFx-vJHVm9u15KZKlWsv8E0zdwv41_qTpUTtZfkNn2uWqCI4FSBVNvp_JwcXpfDMA15RS6/s320/Tiranga13.jpg&quot; width=&quot;316&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;ताकानोरी बोला, “मुझे वार्निन्ग देने के लिए धन्यवाद। उसे खोद कर, भीतर देख कर, हम उसे बंद कर देंगे, और यह सारा काम रातों-रात पूरा हो जायेगा। कल किसी को पता नहीं लगना चाहिये कि हमने समाधी को खोदा है। ध्यान रहे कि अगर यह खबर बाहर फ़ैली तो सबसे पहले मैं तुम्हारी गर्दन काट कर, तुम्हारे सिर को गेट पर टाँग दूँगा।&quot;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने आठ मजदूर बुलाये थे। जब बटेर ने उन्हें बताया कि क्या काम करना है तो उन्होंने तुरंत मना कर दिया, बोले कि उन्हें पैसे नहीं चाहिये, वह यह काम नहीं कर सकते।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी वहीं खड़ा था, उसने अपनी कताना तलवार निकाल ली, बोला, “जो यह काम नहीं करेगा, मैं&amp;nbsp; उसे काट कर यहीं गड़वा दूँगा, तब तुम अपने बाबा जी के साथ रह कर, हमेशा के लिए उनकी सेवा करते रहना।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बटेर, लक्की और मटरू ने पिस्तौलें निकाल लीं और मजदूरों को घेर लिया। डरे हुए मजदूरों ने आखिर में फावड़े उठा लिये। सबसे पहला काम था समाधी वाली जगह से काला पत्थर हटाना। उस पत्थर को मजदूरों ने एक दिन पहले ही वहाँ रखा था, उसे हटाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये थी, लेकिन बहुत मेहनत के बाद भी, मजदूर उसे अपनी जगह से नहीं हिला पाये।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बटेर ने मटरू को इशारा किया, कहा, “यह सब लोग बेकार की ड्रामेबाजी कर रहे हैं। तुम वह लोहे का सरिया ले कर उसे इस पत्थर की साईड में घुसा दो, जब उस पर जोर लगायेंगे तो यह पत्थर आराम से ऊपर उठ जायेगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मटरू ने लोहे का नुकीली नोक वाला सरिया लिया और जहाँ पत्थरों में जोड़ था, उस पर हथौड़े मार कर उसे वहाँ घुसाने की कोशिश की। पता नहीं कैसे, पत्थर का एक टुकड़ा टूट कर सीधा बटेर की बायीं आँख में लगा और उसे चीरता हुआ आँख के भीतर घुस गया। बटेर के हाथ से पिस्तौल छूट कर नीचे गिरी और चीख मार कर उसने हाथों से अपनी आँख को ढकने की कोशिश की, कुछ क्षणों में उसका हाथ और चेहरा उसके खून से सन गये।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब उसकी पिस्तौल नीचे गिरी तो फर्श के पत्थर से टकरा कर उसका ट्रिगर चल गया और गोली निकल कर मटरू के दायें पैर में जा लगी। गालियाँ देते हुए मटरू वहीं पैर पकड़ कर ज़मीन पर बैठ गया, उसके हाथ से लोहे का सरिया छूट कर गिर गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी बहुत गुस्सा हुआ, बोला, “तुम लोग आदमी हो या जोकर? एक छोटा सा काम करने में तुम लोगों ने यह क्या तमाशा लगाया है?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगदीश बाबू बोले, “समाधी-स्थल पर खुदाई की कोशिश करके तुमने घोर पाप किया है, इसीलिए आज यहाँ पर इतना खून बहा है। अभी भी समय है, मैं कहता हूँ कि तुम लोग रुक जाओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मटरू चिल्लाया, “हमें डॉक्टर की ज़रूरत है, अस्पताल जाना है, एम्बुलैंस को बुलाओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उधर बटेर &quot;हाय, हाय&quot; करके चिल्ला रहा था। जगदीश बाबू ने उसका हाथ हटा कर उसकी आँख को देखा, वह पत्थर उसकी आँख के भीतर घुसा हुआ था। वह बोले, “इसकी यह आँख तो पूरी नष्ट हो गयी है, इसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा। हमारा प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, कमलाबाड़ी सत्र के पास है, यहाँ से बीस-बाईस किलोमीटर का रास्ता होगा, वहाँ पहुँचने में कम से कम घंटा-डेढ़ घंटा लगेगा। बीच में कुछ रास्ता कच्ची सड़क का है और अँधेरे में वहाँ जाना आसान नहीं होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बटेर को चक्कर आ रहे थे, वह बेहोश सा हो कर ज़मीन पर लेट गया। उसकी आँख से खून बहना नहीं रुका था और वह खून उसके सिर के आसपास जमा हो रहा था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मटरू के पैर के आसपास भी फर्श खून से लाल हो गया था, वह ज़मीन पर बैठ कर चिल्ला रहा था। लक्की उनके पास खड़ा था, उसे गुस्सा आ गया, वह ताकानोरी से बोला, “अरे, इनके लिए कुछ करो, तुम इंसान हो या हैवान?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी को समझ नहीं आया कि उसने क्या कहा, लेकिन उसके बोलने के अन्दाज़ से समझ गया कि वह अपने साथियों के लिए मदद माँग रहा है, बोला, “यह सब तुम लोगों की लापरवाही से हुआ है, अब तुम उसका फ़ल भुगतो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगदीश बाबू बोले, “आप की कार में इन्हें अस्पताल भेज देते हैं, बेचारे बहुत पीड़ा में हैं।”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी बोला, “मेरी कार में नहीं, इन्हें अस्पताल ले जाने के लिए किसी दूसरी गाड़ी का प्रबंध करो।&quot; फ़िर मजदूरों से बोला, “इन दोनों आदमियों को उठा कर उधर किनारे पर बिठा दो, और तुम उस पत्थर को हटाओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगदीश बाबू को मालूम था कि फुलानीबाड़ी के स्कूल के करीब एक आदमी आटोरिक्शा चलाता है, उन्होंने उसे बुलाने के लिए अपने एक व्यक्ति को भेजा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बटेर और मटरू के घायल होने से मजदूर और भी डर गये थे, ओरी के कहने के बाद भी वह अपनी जगह से नहीं हिले, बल्कि अपने फावड़े वहीं रख कर वे वहाँ से जाने लगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी गुस्से में आग-बबूला हो गया, उसने पिस्तौल निकाल ली और मजदूरों की ओर निशाना लगाते हुए बोला, “एक कदम भी आगे बढ़ाया तो तुम्हें भून कर रख दूँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगदीश बाबू ने पास जा कर उसे धीरे से कहा, “गोलियाँ चलीं तो शोर होगा और आसपास के घरों से लोग यहाँ आ जायेंगे। कितनों को मारेंगे? कल सुबह तक यह बात सारे मजूली द्वीप में फ़ैल जायेगी और लोग डँडे-हँसली-छुरी-चाकू जो मिलेगा, उसे ले कर तुमसे लड़ने आ जायेंगे, तो क्या तुम पाँच सौ लोगों का सामना कर पाओगे? और उसके बाद तुम यहाँ से जीवित निकल पाओगे?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मजदूर चले गये और ओरी वहाँ पर हाथ मसलता हुआ खड़ा रह गया। थोड़ी देर में फुलानीबाड़ी से आटो वाला आ गया तो लक्की अपने दोनों साथियों को उसमें बिठा कर उन्हें कमलाबाड़ी के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में ले गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सोमचाई ने यह सारा तमाशा दूर से देखा। जब उसे लगा कि ओरी कुछ शाँत हुआ है तो वह उसके पास आया, बोला, “आप तलवार और बंदूक, सब कुछ चला सकते हैं, लड़ भी सकते हैं, लेकिन मुझे तो सिर्फ कम्प्यूटर का काम आता है। मैंने जीवन में कभी किसी से लड़ाई नहीं की। अब हम यहाँ अकेले रह गये हैं, हमें आगे का भी सोचना होगा। यहाँ के लोगों से बात करने के लिए हमारे पास स्थानीय आदमी होने चाहियें।”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी सोच में पड़ गया, बोला, “ठीक है, मैं फोन करके कुछ और आदमी बुलाता हूँ।&quot; उसे चिंता होने लगी कि जब वह यह बातें रिकू यामागुचि को बतायेगा तो वह बहुत गुस्सा होगा कि क्या वह एक पत्थर भी नहीं हटवा पाया? अंत में उसने सोचा कि वह रिकू को कुछ नहीं बतायेगा। वह बोला, “लेकिन यहाँ से जाने से पहले, मैं इस पत्थर को हटाना चाहता हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब ओरी ने आगे बढ़ कर ज़मीन से लोहे का सरिया उठाया तो उस पर मटरू का खून लगा हुआ था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगदीश बाबू बोले, “आप ने देखा कि जिसने भी बाबा की समाधी की मर्यादा भंग करने की कोशिश की, उनका क्या हुआ? फ़िर भी आप नहीं समझे? आप क्यों अपनी जान को खतरे में डालना चाहते हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी ने यह दिखाने के लिए कि उसे इन अँधविश्वासों की बिल्कुल परवाह नहीं है, हथोड़ा उठा कर उससे सरिये को पत्थरों के बीच में घुसाने के लिए मारने लगा। शायद उस पर लगे खून की वजह से सरिया चिकना हो गया था और फिसल रहा था, या शायद उसने हथोड़ा ठीक से नहीं मारा। जो भी कारण था, वह सरिया पत्थरों के बीच में जाने के बजाय, फर्श की सतह पर फ़िसल गया और ताकानोरी भी उसके पीछे फिसल कर गिरा। वैसे उसे कहीं विशेष चोट नहीं लगी लेकिन उसे गिरा हुआ देख कर जगदीश बाबू और सोमचाई हँसने लगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगदीश बाबू बोले, “साहिब, अभी भी मान जाईये। जब तक बाबा खुद नहीं चाहेंगे, आप उनकी समाधी में बाधा नहीं डाल सकते।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी को बहुत गुस्सा आ रहा था, उसका मन किया कि वह जगदीश बाबू और सोमचाई, दोनों के सिर अपनी तलवार से काट दे, लेकिन उसने आत्मसंयम दिखाते हुए अपने गुस्से को दबाया और उठ कर खड़ा हुआ। सोमचाई से बोला, “वह स्कूल के लड़कों वाले वीडियो जो तुमने मुझे दिखाये थे, मैं उन्हें दोबारा देखना चाहता हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सोमचाई ने तुरंत मोबाइल निकाल कर एक वीडियो को खोला और उसे दिखाया। ओरी ने उसे तीन-चार बार देखा, फ़िर एक जगह पर उसे रोक कर सोमचाई को दिखाया, बोला, “वह बाबा जब समाधी के लिए जा रहा था तो उसके कटोरे में एक मूर्ति थी, वह इस वीडियो में दिखती है, तुम बताओ कि वह कितनी बड़ी है?”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सोमचाई ने वीडियो को ध्यान से देखा, उसमें कटोरे में रखी मूर्ति साफ दिख रही थी। वह बोला, “उनके हाथों के आकार से तुलना करें तो वह तीन-साढ़े तीन इँच की लगती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओरी बोला, “यह वह प्रतिमा नहीं है, जो यामागुचि को चाहिये। जो हमें चाहिये, वह प्रतिमा आठ-साढ़े आठ इँच से बड़ी होनी चाहिये। यानि वह उसे अपने साथ समाधी में ले कर नहीं गया।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जगदीश बाबू ने उनकी बातें सुनी तो मन ही मन मुस्कराये, लेकिन उन्होंने अपनी खुशी को चेहरे पर ज़ाहिर नहीं होने दिया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ताकानोरी बोला, “इस समय यहाँ रुकने से मेरा कुछ फायदा नहीं है। बाबा का उत्तराधिकारी कल यहाँ पहुँचेगा। सोमचाई, तुम यहाँ रुको और जब वह आये तो मुझे खबर करो॑। मैं आज रात को ही नारायणपुर लौट जाता हूँ, वहाँ से अन्य आदमियों का प्रबंध भी करूँगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/15.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/6113997144026383439/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/14.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6113997144026383439'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/6113997144026383439'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/14.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 14'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' 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के बारे में पता चलता है तो जामुन बाबा को बचाने के लिए, त्रिनेत्र, आभा और पाँचों बच्चे गँगटोक से मजूली द्वीप की यात्रा पर निकलते हैं। इससे आगे पढ़िये ...&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/06/01.html&quot;&gt;पहले अध्याय से पढ़िये&lt;/a&gt; - &lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/12.html&quot;&gt;पिछला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/12.html&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अध्याय 13&lt;/h3&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;असम यात्रा, 3 मार्च 2026&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी ने आभा से पूछा, “दीदी, मणिपुर कैसी जगह है? आप इम्फाल में रहती हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“बहुत सुंदर है हमारा मणिपुर&quot;, आभा बोली, “लेकिन मैं इम्फाल में नहीं रहती। इम्फाल हमारी राजधानी है, बड़ा शहर है। उसके दक्षिण में एक झील है, लोकटक झील, वह बहुत सुंदर जगह है। मैं उस झील के पास एक गाँव में रहती हूँ, थमनापोकपी गाँव, वहाँ मेरे पति का पुराना घर है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तृप्ति बोली, “और आप के घर में कौन-कौन हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा की आँखें अचानक नम हो गयीं, धीरे से बोली, “बस मैं हूँ, मेरे ससुर हैं और हमारा कुत्ता है, डब्लयू। वैसे उसका नाम विलसन है लेकिन मेरे पति उसे डब्लयू बुलाते थे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhxLySHfbxHDhp6mjQsj17VKcFadg6GfY3dzs_3tY1WL-SDhkJPk9sxvtc9M0yVUPyipNp3ZcjURex6eLNtk_L3SJ7uUXmcsktp975liFk4ATEEFzGlyaKvIo3VNq5qt5jMcu5HBuYeXgcDMGTJdk3CWxOGbwI6SGbnf57phGHxL1oIFIoZV3A4jyxvYMSZ/s622/Tiranga12.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;572&quot; data-original-width=&quot;622&quot; height=&quot;294&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhxLySHfbxHDhp6mjQsj17VKcFadg6GfY3dzs_3tY1WL-SDhkJPk9sxvtc9M0yVUPyipNp3ZcjURex6eLNtk_L3SJ7uUXmcsktp975liFk4ATEEFzGlyaKvIo3VNq5qt5jMcu5HBuYeXgcDMGTJdk3CWxOGbwI6SGbnf57phGHxL1oIFIoZV3A4jyxvYMSZ/s320/Tiranga12.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;त्री ने बात बदलने के लिए पूछा, “मणिपुर के अपने जीवन के बारे में कुछ और बताओ, हम वहाँ के बारे में कुछ नहीं जानते।&quot;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वह बोली, “हमारा परिवार मैतेई है। हमारे मैतेई लोगों में सात वंश हैं, हमारी भाषा में उन्हें सालाई कहते हैं, जैसे कि खुमान, मैरंग, अंगोम, वगैरा। मैं मैरंग सालाई में पैदा हुई थी और मेरे पति का परिवार खुमान सालाई की ओइनम जाति का है। खुमान को ऊँची सालाई मानते हैं। हम लोगों के प्राचीन पाराम्परिक विश्वास को सनमही कहते हैं क्योंकि हम सनमही देवता को बहुत मानते हैं, जोकि हमारे सृष्टि देवता सिदाबा मापू के बेटे हैं। चार-पाँच सौ साल पहले मणिपुर में वैष्णव धर्म आया और फ़ैल गया। इस तरह से हमारे परिवार में हम वैष्णव और सनमही दोनों को मानते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “मेरे गुरु जी कहते हैं कि हमारे देशों में धर्म ऐसे ही बनते-बदलते हैं, कि नयी सोचें आती हैं और पुरानी सोच में घुल-मिल जाती है, फ़िर समय के साथ दोनों के देवी-देवता भी घुल-मिल जाते हैं। उनके कोरिया देश में पहले सिन्दो धर्म था, जिसमें मानते हैं कि प्रकृति, पहाड़, नदी, आकाश, सब में आत्मा होती है। फ़िर जब वहाँ पर बौद्ध धर्म आया तो सिन्दो और बौद्ध, वह दोनों विचार घुल-मिल गये। वैसे तो मेरे गुरु जी बौद्ध भिक्षुक हैं पर भारत आने के बाद, वह शिव-भक्त भी बन गये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “जब मैं चित्र बनाती हूँ, तो उसमें वैष्णव और सनमही देवी-देवता मिला कर बनाती हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी ने पूछा, “सनमही देवता कैसे होते हैं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा मुस्करायी, बोली, “यह तो देवी-देवता पर निर्भर करता है। जैसे कि पखांगबा को भूरे रंग के सींग वाले हिरण के रूप में दिखाते हैं। एक बार सिदाबा मापू ने अपने बेटों, सनमही और पखांगबा को ब्रह्माँड का चक्कर लगाने के लिए कहा तो सनमही सचमुच पूरी दुनिया का चक्कर लगाने चला गया, जबकि पखांगबा ने पिता के सिंहासन का चक्कर लगाया और बोला कि यही मेरा ब्रह्माँड है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “बिल्कुल यही कहानी शिव जी और उनके दोनों पुत्रों, कार्तिकेय और गणेश की भी है। उसमें कार्तिकेय सारी दुनिया का चक्कर लगाने निकल जाते हैं, जबकि गणेश जी केवल अपने माता-पिता की परिक्रमा करते हैं। गुरु जी भी यही कहते हैं कि जब हमारे धर्म मिलते हैं, तो उनकी कहानियाँ भी आपस में मिल जाती हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;इसी तरह बातें करते हुए उनका रास्ता कट रहा था और वे लोग अलीपुर द्वार से हो कर भाटीबाड़ी पहुँच गये। वहाँ त्री ने एक ढाबे पर कार रोकी, बोला, “असम सीमा यहाँ से करीब तीस किलोमीटर आगे है, हम यहाँ पर थोड़ी देर ही रुकेंगे। अगर हो सके तो मैं आज रात तक जोरहाट पहुँचना चाहता हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वहाँ से खाना खा कर वह लोग चलने ही वाले थे कि जगदीश बाबू का फोन आया, बोले, “त्री बेटा, तुम कहाँ पहुँचे हो? आज सुबह जामुन बाबा को खोजते हुए यहाँ कुछ बुरे आदमी आये हैं। उनका सरदार ताकानोरी नाम का एक जापानी है। उन्होंने हमारे साथ मार-पिटाई की और आज रात को वह बाबा की समाधी खोदने का प्लैन बना रहे हैं। जो चिट्ठी बाबा ने तुम्हारे लिए छोड़ी थी, वह उन्होंने ले ली है। वह जानते हैं कि तुम आ रहे हो और वे तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “काका, आप हमारी चिंता नहीं करें और वह जो चाहते हैं उन्हें करने दीजिये, आप बीच में नहीं पड़िये, समझे? आप सावधान रहिये, और जब तक कोई एमरजैंसी न हो मुझे दोबारा टेलीफोन न करें।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;जब उनकी बात खत्म हुई तो रंगनाथ ने पूछा, “दादा, उन लोगों से लड़ने के लिए हमारा क्या प्लैन है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“ताकानोरी के पास गुप्त-शक्तियाँ हैं। एक तो अन्वेषण-किरण है जिससे वह आसपास लोगों की शक्ति-लहरों को खोज सकता है। उसकी और कौन सी शक्तियाँ हैं, हमें नहीं मालूम। सबसे पहले हमें यह समझने की कोशिश करनी है कि उसकी शक्तियाँ कौन सी हैं, लेकिन हमें होशियार रहना पड़ेगा क्योंकि वह अन्वेषण-किरण से हमें पहचान सकता है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“अन्वेषण-किरण कैसे काम करती है?” वसंत ने पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“हमारी कुछ शक्तियाँ हर समय जागृत रहती हैं, जैसे माधव की दृष्टि-शक्ति और रंगनाथ की श्रवण-शक्ति। लेकिन कुछ शक्तियों को ध्यान लगा कर जगाना पड़ता है, वह हमेशा काम नहीं करतीं, जैसे मेरी गिरगिट-शक्ति और गार्गी का अजगर-पाश। अन्वेषण-किरण भी हमेशा काम नहीं करती, उसे जगाना पड़ता है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी बोली, “जैसे मैं लोगों के दिमाग में घुस कर देख सकती हूँ कि वह क्या सोच रहे हैं, क्या अन्वेषण-किरण भी वैसी ही होती है?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&quot;मेरे विचार में तुम्हारी और उसकी शक्ति भिन्न हैं। तुम लोगों के विचार पढ़ सकती हो, जबकि अन्वेषण-किरण से शक्ति वाले लोगों को खोज सकते हैं, लेकिन वह उनके विचार नहीं पढ़ सकते&quot;, त्री बोला, “लेकिन मुझे इसका पक्का पता नहीं है, हमें इसकी जाँच करनी होगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी बोली, “इसका मतलब है कि हमें अपनी शक्ति-लहरों को ढक कर रखना होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;आभा बोली, “मेरी जीवों को आकर्षित करने वाली शक्ति ठीक से विकसित नहीं हुई है, लेकिन मैं सोते-सोते भी दूर से लोगों की बातें सुन सकती हूँ। अगर मैं किसी बहाने से उसके पास जाऊँ तो शायद वह मुझे न पहचाने और मैं उसकी बातें सुन सकती हूँ?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री, रंगनाथ और गार्गी, तीनों एक साथ बोले, “हम आप को खतरे में नहीं डाल सकते। अगर उसने आप को पकड़ लिया तो?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तृप्ति बोली, “मैं और माधव, आभा दीदी के बच्चे बन कर इनके साथ जा सकते हैं। मेरी शक्तियाँ भी ठीक से विकसित नहीं हुईं लेकिन जरूरत पड़ने पर मैं कुछ देर के लिए अपनी और इनकी शक्ति-लहरों को ढक सकती हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी बोली, “लेकिन माधव की शक्तियाँ विकसित हैं, तुम्हारे लिए उसे छिपाना कठिन होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;तृप्ति बोली, “तो मैं और आभा दीदी, हम दोनों माँ-बेटी बन कर थोड़ी देर के लिए उनके पास जायेंगी और उनकी बातें सुन कर वापस लौट आयेंगीं?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “नहीं, ताकानोरी मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। उसे पता नहीं है कि हम सब के पास शक्तियाँ हैं। यह हमारा रहस्य ही हमारा गुप्त-शस्त्र है, उसे इसका पता नहीं चलना चाहिये।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गार्गी बोली, “वहाँ जा कर हम कहाँ रहेंगे? अगर उसके आसपास रहेंगे तो वह हमें खोज नहीं लेगा?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;त्री बोला, “तुम उसकी चिंता नहीं करो, हमारे लिए वहाँ एक छिपने की जगह है। अब तुम सभी थोड़ी देर सोने की कोशिश करो। हम लोग वहाँ पर कल सुबह के तीन-चार बजे से पहले नहीं पहुँचेगे, और वहाँ हमें लड़ने के लिए सतर्क और तैयार रहना है, इसलिए तुम इस समय जितना आराम करोगे उतना बेहतर होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;वसंत बोला, “दादा, उन्होंने टेलीफोन पर कहा था कि गुँडे आज रात को गुरु जी की समाधी को खोदेंगे, हम उसे कैसे रोकेंगे?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;“तुम उसकी चिंता नहीं करो&quot;, त्री मुस्कराया, “गुरु जी में बहुत शक्ति है, वह अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;*****&lt;/p&gt;&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/14.html&quot;&gt;अगला अध्याय पढ़िये&lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;*****&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jonakehsake.blogspot.com/feeds/3032166396895314370/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/13.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/3032166396895314370'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9115561631155571591/posts/default/3032166396895314370'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jonakehsake.blogspot.com/2026/07/13.html' title='देवी प्रतिमा के रक्षक - अध्याय 13'/><author><name>Sunil Deepak</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05781674474022699458</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhOj1wfqSlIV4rjOFwCfY0CrNW2WsiP-z3xCrYLvxMrGaQpkoy-GivkWbbx1BqeBPhuUSxjlB4LWdPF1Y8gG39NF34cXsObihDo4xzbs8BsXP0J4JcB_JDQvDs4hfAoiJM/s149/sunil_deepak_01+%285%29.jpg'/></author><media:thumbnail 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