<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:blogger="http://schemas.google.com/blogger/2008" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875</atom:id><lastBuildDate>Fri, 24 Oct 2025 08:10:28 +0000</lastBuildDate><category>Hindi Poems</category><category>Didi</category><category>Aansoo</category><category>Bhram</category><category>नारी मन</category><category>माँ</category><title>ज्योत्स्ना मैं...</title><description></description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>63</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><language>en-us</language><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle/><itunes:category text="Arts"><itunes:category text="Literature"/></itunes:category><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email></itunes:owner><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-7134348964173036600</guid><pubDate>Tue, 26 Feb 2013 07:57:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-02-26T13:27:05.638+05:30</atom:updated><title>आवरण</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
जानती हूँ&lt;br&gt;
तुम्हारा दर्प&lt;br&gt;
तुम्हारे भीतर छुपा है.&lt;br&gt;
&lt;br&gt;
उस पर मैं&lt;br&gt;
परत-दर-परत&lt;br&gt;
चढाती रही हूँ&lt;br&gt;
प्रेम के आवरण&lt;br&gt;
&lt;br&gt;
जिन्हें ओढकर&lt;br&gt;
तुम प्रेम से भरे&lt;br&gt;
सभ्य और सौम्य हो जाते हो&lt;br&gt;
&lt;br&gt;
जब कभी भी&lt;br&gt;
मेरे प्रश्न&lt;br&gt;
तुम्हें निरुत्तरित कर देते हैं,&lt;br&gt;
तुम्हारी खिसियाहट&lt;br&gt;
 

कोंचती है&lt;br&gt;
तुम्हारे दर्प को&lt;br&gt;
और उठ बैठता है&lt;br&gt;
वह फुंफकार कर&lt;br&gt;
&lt;br&gt;
केंचुली की भांति&lt;br&gt;
उतरते जाते हैं&lt;br&gt;
प्रेम के आवरण&lt;br&gt;
परत-दर-परत&lt;br&gt;
&lt;br&gt;
हर बार की तरह तुम&lt;br&gt;
क्षण भर में ही&lt;br&gt;

उगल देते हो&lt;br&gt;
ढेर सारा ज़हर&lt;br&gt;
मेरे पीने के लिए&lt;br&gt;
&lt;br&gt;
इस बार मैंने&lt;br&gt;
ज़हर के बदले ज़हर को&lt;br&gt;
न तो उगला है&lt;br&gt;
न ही अंदर समेटा है&lt;br&gt;
नीलकंठ की तरह&lt;br&gt;
&lt;br&gt;
ओढ़ लिया है&lt;br&gt;
एक आवरण
मैंने भी&lt;br&gt;
देखो न!&lt;br&gt;
मेरी आँखों में चमक है&lt;br&gt;
और चेहरे पे मुस्कराहट...&lt;br&gt;.
&lt;/div&gt;
</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2013/02/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>16</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-1435024849189076419</guid><pubDate>Sat, 08 Dec 2012 14:59:00 +0000</pubDate><atom:updated>2012-12-16T17:11:33.815+05:30</atom:updated><title>किताब </title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
जागते हुए शब्दों के बीच&lt;br&gt;
सोते हुए अर्थों में&lt;br&gt;
बंद एक किताब&lt;br&gt;
&lt;br&gt;


अपने में समेटे&lt;br&gt;
कई- कई इतिहासों की पुनरावृत्ति &lt;br&gt;
भूगोल की नयी परिभाषाएं &lt;br&gt;
जीत से हार और&lt;br&gt; 
हार से जीत का मनोविज्ञान&lt;br&gt;&lt;br&gt;


समस्याओं से संघर्ष &lt;br&gt;
परास्त होते हौसलों को &lt;br&gt;
जुटाने का सामर्थ्य &lt;br&gt;
विडंबनाओं का आर्तनाद &lt;br&gt;
&lt;br&gt;


खण्ड-खण्ड में विभाजित&lt;br&gt;
हर खण्ड का अपना तिलिस्म &lt;br&gt;
मृग मरिचिकाओं की  &lt;br&gt;
लंबी फेहरिस्त &lt;br&gt;
&lt;br&gt;

आशाओं की उड़ान का &lt;br&gt;
थक कर ,&lt;br&gt;
अंतिम पड़ाव पर ठहर जाना &lt;br&gt;
सब कुछ लिपटा है &lt;br&gt;
पाकीज़ा ज़िल्द में &lt;br&gt;
&lt;br&gt;


है तैयार &lt;br&gt;
होने को अनावृत्त&lt;br&gt; 
बीच से खोल कर&lt;br&gt;
या कुछ पन्ने पलट कर&lt;br&gt; 
मत देना प्रतिक्रिया &lt;br&gt;
सहज अभिव्यक्ति पर .&lt;br&gt;
&lt;br&gt;


पढना मुझे ,&lt;br&gt;
ऊपरी आवरण से &lt;br&gt;
अंतिम पृष्ठ  तक &lt;br&gt;
फिर करना &lt;br&gt;
मेरे मूल्य का निर्धारण&lt;br&gt; 
&lt;br&gt;

बदलते समय में &lt;br&gt;
कुछ एडिटिंग के बाद  &lt;br&gt;
फिर आऊँगी &lt;br&gt;
नए आवरणों में &lt;br&gt;
नए नामों के साथ .&lt;br&gt;&lt;br&gt;

&lt;br /&gt;
&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2012/12/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>7</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-5724163773568214882</guid><pubDate>Mon, 12 Mar 2012 11:01:00 +0000</pubDate><atom:updated>2012-03-12T16:39:14.639+05:30</atom:updated><title>“ आरक्षण मेरे लिए क्यों ? ”</title><description>नहीं चाहिए मुझे&lt;br /&gt;तैंतीस प्रतिशत आरक्षण&lt;br /&gt;देना चाहते हों&lt;br /&gt;यदि बराबरी का अधिकार&lt;br /&gt;तो, मत मारना मुझे गर्भ में&lt;br /&gt;जन्म लेने देना&lt;br /&gt;सहजता से संतान के रूप में--&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मत होने देना&lt;br /&gt;मेरे साथ कोई भी पक्ष-पात&lt;br /&gt;शिक्षा , खान पान  या खेल कूद में--&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मत समझना विवाह को,&lt;br /&gt;माध्यम वासनापूर्ति  का&lt;br /&gt;धैर्य से करना प्रतीक्षा&lt;br /&gt;प्रेम से आप्लावित&lt;br /&gt;एक सहमति की,&lt;br /&gt;जन्म देने देना&lt;br /&gt;मुझे मेरी स्वप्निल संतानों को--&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मुझे तुम्हारे धिक्कार की नहीं&lt;br /&gt;वरन, जरूरत है उन हौसलों की&lt;br /&gt;जो देते आये हो&lt;br /&gt;तुम अपनी पुल्लिंग संतानों को,&lt;br /&gt;नाम रौशन करने की थाती&lt;br /&gt;उनके ही पास नहीं ,&lt;br /&gt;मुझ पर भी भरोसा करना--&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;करने देना&lt;br /&gt;मुझे भी वे&lt;br /&gt;छोटी- छोटी गलतियाँ&lt;br /&gt;जो रही हैं, तुम्हारे लिए&lt;br /&gt;सदा ही क्षम्य&lt;br /&gt; माफ कर देना मुझे&lt;br /&gt;उन सभी बातों के लिए&lt;br /&gt;जिनके लिए&lt;br /&gt;तुम कह देते हों&lt;br /&gt;मुझे चरित्र-हीन्&lt;br /&gt;और स्वयं को विचलित-- .&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;करती रही हूँ&lt;br /&gt;तुम्हारी असहमतियों का भी&lt;br /&gt;अकाट्य समर्थन,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओढ़ लेती हूँ&lt;br /&gt;अपने सिर,&lt;br /&gt;तुम्हारी गलतियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; समेट लेती हूँ&lt;br /&gt;अपने आंचल में&lt;br /&gt;तुम्हारी   बेचैनियाँ&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; भर देती हूँ&lt;br /&gt;तुमहारे भीतर प्रेम-- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी ममता&lt;br /&gt; जब भी&lt;br /&gt;तुम्हारा माथा सहलाती है&lt;br /&gt;खींच लाती है&lt;br /&gt;तुम्हारी पेशानी की सारी लकीरें&lt;br /&gt;अपने हाथों में--.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हर बार , हर रूप में&lt;br /&gt;देती रही हूँ तुम्हे संबल&lt;br /&gt;करती रही हूँ तुमसे प्रेम&lt;br /&gt;करती रही हूँ तुम्हे आरक्षित&lt;br /&gt;तो आरक्षण मेरे लिए क्यों ?</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2012/03/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>12</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-7829001094108273795</guid><pubDate>Wed, 21 Sep 2011 12:11:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-09-22T23:22:29.218+05:30</atom:updated><title>खुशबू</title><description>उससे बिछड़ते हुए &lt;br /&gt;मैंने उसे एक डायरी दी &lt;br /&gt;इस वादे के साथ कि &lt;br /&gt;वह लिखेगा,&lt;br /&gt;हर रोज़&lt;br /&gt;एक नई कविता-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और उसके दिये फूल &lt;br /&gt;सुरक्षित हैं,&lt;br /&gt;आज भी &lt;br /&gt;मेरी पाकीज़ा किताबों में-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बरसों बाद&lt;br /&gt;जब भी सुन लेती हूँ&lt;br /&gt;दर्द से भीगी &lt;br /&gt;उसकी गज़लें-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैबस्त हो जाती है &lt;br /&gt;मेरे भीतर &lt;br /&gt;एक खुशबू &lt;br /&gt;सूखे गुलाबों की--</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2011/09/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>25</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-6084493864039346514</guid><pubDate>Wed, 04 May 2011 10:21:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-05-04T15:55:46.952+05:30</atom:updated><title>पतंग</title><description>कौन देता है आकार &lt;br /&gt;नहीं जानती है &lt;br /&gt;बस ! रंगों से सजी,&lt;br /&gt;डोर पर तनी,&lt;br /&gt;उन्मत्त हो उडती है,&lt;br /&gt;उन्मुक्त आकाश में--&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पवन के संग पर इठलाती,&lt;br /&gt;ठुमकियां लेती,&lt;br /&gt;अपने अस्तित्व की तलाश में, &lt;br /&gt;इधर से उधर भटकती-- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्मरक्षा में,&lt;br /&gt;दूसरों के कन्ने काटती,&lt;br /&gt;विवश ईर्ष्या के पेंचों में उलझ &lt;br /&gt;कभी स्वयं कट जाती---&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;छत की मुंडेर से लहराता &lt;br /&gt;कभी कोई हाथ&lt;br /&gt;संभाल लेता तो,&lt;br /&gt;जिजीविषा बढ़ जाती,&lt;br /&gt;नहीं तो,&lt;br /&gt;अधिकारों की छीनाझपटी में,&lt;br /&gt;हो जाती है, चिंदी-चिंदी--&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उसे, अपने गर्भ में सहेजती है धरा &lt;br /&gt;परतों के भीतर,&lt;br /&gt;और भीतर,&lt;br /&gt;देती है जन्म &lt;br /&gt;नव पादपों के रूप में,&lt;br /&gt;एक अंतराल &lt;br /&gt;परिणित कर देता है &lt;br /&gt;उसे वृक्षों में--&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वृक्षों की त्वचा से निकल,&lt;br /&gt;जाने कितनी ही &lt;br /&gt;यातनाओं के द्वार खोलती,&lt;br /&gt;जन्म से जन्म तक &lt;br /&gt;मृत्यु को भोगती,&lt;br /&gt;क्रियाओं की वीथिका से,&lt;br /&gt;जब बाहर आती,&lt;br /&gt;तो, बन जाती है,&lt;br /&gt;वही कागज़---&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फिर से-&lt;br /&gt;भरे जाते हैं, जीवन के रंग,&lt;br /&gt;आदर्शों और संस्कारों की &lt;br /&gt;कांट-छांट&lt;br /&gt;देते हैं एक आकार,&lt;br /&gt;बाँस-हड्डियों पर &lt;br /&gt;लेई- मज्जा से चिपकी,&lt;br /&gt;लचकती दृढता के साथ,&lt;br /&gt;बन जाती है &lt;br /&gt;नियति की चकरी पर आश्रित &lt;br /&gt;एक पतंग---&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;कदाचित इस बार जीवन-डोर &lt;br /&gt;उसे पंहुचा सके, &lt;br /&gt;शून्य की अनन्तता तक ---</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2011/05/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>25</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-5676461631349970777</guid><pubDate>Thu, 03 Mar 2011 13:23:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-03-03T19:27:00.251+05:30</atom:updated><title>एक मुलाकात : डॉ० कुमार विश्वास के साथ</title><description>&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg82z72sHf209gL__82ZOmulfRbFvRq9rjOCqPcXhjZ9zMo51v75i1nzvF8lfosY7sBvAIDTPYgiRi0LWLZvGgtf-yhEYtIdI9EjZiHX_T6b_0aMYUgjE2IhSRyvtCpznRuT36j7B9LdJJk/s1600/Image043.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg82z72sHf209gL__82ZOmulfRbFvRq9rjOCqPcXhjZ9zMo51v75i1nzvF8lfosY7sBvAIDTPYgiRi0LWLZvGgtf-yhEYtIdI9EjZiHX_T6b_0aMYUgjE2IhSRyvtCpznRuT36j7B9LdJJk/s320/Image043.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5579844727755718994" /&gt;&lt;/a&gt;डॉ० कुमार विश्वास के गांधीनगर आगमन का यह प्रथम अवसर नहीं था, न ही मुझसे मिलने का. एक औपचारिक परिचय पहले भी हो चुका था, और वे गांधीनगर भी पहले कई बार आ चुके थे. उनसे गांधीनगर में मिलने का यह प्रथम अवसर अवश्य था.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मैं दिए गए नियत समय से पूर्व ही पहुँच कर पतिदेव के साथ होटल के प्रतीक्षा-कक्ष में, उनकी प्रतीक्षा करने लगी.  होटल के रिशेप्सनिस्ट ने बताया- विमान सेवा में समय व्यवधान के कारण वह विलम्ब से पहुँच रहे हैं.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;                लगभग आधे घंटे बाद उन्होंने इन्जीनियरिंग कर रहे छात्रों के साथ प्रवेश किया- "पाण्डेय जी नमस्कार!" और हाथ आगे की ओर बढ़ा दिया. मैंने देखा वे पतिदेव से मुखातिब थे. यह उनकी तीव्र स्मरण शक्ति ही थी,  जिसके कारण वे छः माह पूर्व हुए एक औपचारिक परिचय को याद रख पाए..&lt;br /&gt;मिलने के पश्चात होने वाली औपचारिकताओं को निभाते हुए हम उनके कक्ष तक आ पहुंचे. साथ आये छात्रों को उन्होंने प्रतीक्षा-कक्ष में प्रतीक्षा करने को कहा और हमारे लिए चाय का ऑर्डर देकर, वाशरूम में चले गए.  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;              कुछ देर बाद आये, तो मैंने कहा- "छात्रों के बीच तो आप बहुत लोकप्रिय हैं, बड़ी प्रशंसा होती है आपकी."&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"हाँ! यह सच है कि प्रशंसा होती है, परन्तु आलोचना भी कम नहीं होती"&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"तो क्या आप आलोचनाओं से डरते हैं?"&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"नहीं! मैं आलोचनाओं से नहीं डरता, वरन उन्हें सकारात्मक दृष्टि से लेता हूँ. जो लोग मेरी आलोचना करते हैं, वे सभी किसी न किसी रूप में  हिन्दीभाषा से जुड़े है, इसलिए मैं उन्हें अपना मानता हूँ. वे मुझसे प्रेम करते हैं. मेरी प्रसिद्धि चाहते हैं, इसीलिये मेरे विषय में सोचते हैं, कहते हैं, और लिखते हैं. और हाँ!  आलोचना के माध्यम से ही सही मुझे चर्चाओं में भी रखते हैं." एक सहज हास उनके होंठों पर आकर ठहर जाता है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"छात्रों के बीच आने का कोई खास प्रयोजन है क्या ?"&lt;br /&gt;" हाँ!  भारतीय जनगणना के आकडों के अनुसार भारत  में साठ करोड़ युवा है, जो हिन्दी से इतर भाषाओं की ओर मुड गया था. उनमे से यदि तीस करोड़ युवाओं को  भी   मातृभाषा की तरफ लौटाकर ला पाया, तो क्या यह खास प्रयोजन नहीं?&lt;br /&gt;कालेजों में रॉकबैंड  की जगह कविता-पाठ हो रहा है, क्या यह खास प्रयोजन नहीं ?&lt;br /&gt;यदि भारत का युवा हिन्दी से जुड़ रहा है तो निश्चित ही भारत हिन्दी से जुड़ रहा है. युवाओं में वह शक्ति है, जो देश की गति को बदलने का सामर्थ्य रखती है. देश का युवा ही हिन्दी को मातृभाषा का गौरव प्रदान करा सकता है, आवश्यकता है उसे जाग्रत करने की.  क्या यह खास प्रयोजन नहीं?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मेरे गीत यदि हिन्दी से जुड़े रहने का माध्यम बनते हैं तो ये मेरा सौभाग्य है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      &lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgdInvj6IHXTjWaI6PNysCxTGfKS1OSpsyZPHAS0Fejsv00mfczbxAv6tWvL5a9aeh1rUllzCfN8XoB9hJ9KgrWDw_A3xlk-EWl4rjfh8Y_lvRv0ujHhVNnt5LyfeY4cLHCJF1Lah9xQObD/s1600/Image042.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgdInvj6IHXTjWaI6PNysCxTGfKS1OSpsyZPHAS0Fejsv00mfczbxAv6tWvL5a9aeh1rUllzCfN8XoB9hJ9KgrWDw_A3xlk-EWl4rjfh8Y_lvRv0ujHhVNnt5LyfeY4cLHCJF1Lah9xQObD/s320/Image042.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5579844730495818946" /&gt;&lt;/a&gt;हमें बात-चीत को विराम देना पड़ा क्योंकि छात्र  पुनः उपस्थित थे, और समय का भान कराते हुए,डॉ० कुमार विश्वास से कार्यक्रम में शीघ्र पहुँचाने का आग्रह कर रहे थे.मुझे समय की कमी अखर रही थी.कई प्रश्न अभी भी मन में अंगडाइयां ले रहे थे, जिन्हें पूछना शेष रह गया.वो शेष फिर कभी....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(यह पोस्ट डॉ० कुमार विश्वास से हुई संक्षिप्त वार्ता पर आधारित है. बातचीत की उनकी चिर-परिचित शैली,जिसमें उनकी टिप्पणियाँ भी सम्मिलित हैं, जिन्हें आपके समक्ष नहीं रख पाई हूँ.)</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2011/03/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg82z72sHf209gL__82ZOmulfRbFvRq9rjOCqPcXhjZ9zMo51v75i1nzvF8lfosY7sBvAIDTPYgiRi0LWLZvGgtf-yhEYtIdI9EjZiHX_T6b_0aMYUgjE2IhSRyvtCpznRuT36j7B9LdJJk/s72-c/Image043.jpg" width="72"/><thr:total>21</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-6703052777416236493</guid><pubDate>Thu, 24 Feb 2011 06:43:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-02-24T14:31:54.600+05:30</atom:updated><title>अनिरुद्ध जी की 'पनिहारिन'</title><description>प्रकृति अनुरागी श्री अनिरुद्ध जी के साक्षात्कार को आप सभी ने पढ़ा, व सराहा. उनके द्वारा  भोजपुरी भाषा में रचित काव्य संग्रह "पनिहारिन" अपनी माटी की सोंधी सुगंध का एहसास दिलाती है. विहान के गीत , साँझ के गीत, खेत-खलिहान के गीत, देश-गीत,  छंद, लय,अलंकार आदि सभी साहित्य की परंपरा का अनुनाद करते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  नवदिवस का स्वागत करती सूर्य की प्रथम रश्मि पनिहारिनों के आगमन का सन्देश देती है --&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पनिहारिन भरल डगरिया, भोर पहर की बेला |&lt;br /&gt;एक घइलिया माथे बइठल,दूजा चढ़ल कमरिया,&lt;br /&gt;घइला में गलबँहिंया देले, लपकत चलल संवरिया,&lt;br /&gt;लहर-लहर पुरवइया लहरे, लहंगा लहर भरेला ||"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूर्य की पहली किरण हो अथवा संध्या- समय के रक्ताभ आकाश का किसी सरोवर में समाना, अनिरुद्ध जी के गीत प्रकृति से मानव को जोडते हैं-- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ताल-ताल,नदिया दिन भर फेंके जाल सुरुज &lt;br /&gt;  खींचे गुटिआवे अब लाल-लाल डोरी &lt;br /&gt;झांझ साँझ झमकावे किरण सोन  मछरी ला &lt;br /&gt;मछुआ मग झांके गछिया सांवर गोरी"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संध्या सुंदरी अपनी झांझर झनकाकर बाट जोह रही है,उस सूर्यरूपी मछुहारे की जो किरण रुपी सोने की मछली लाने के लिए  दिन भर जाल फेंकता है सरोवरों में.अब लाल-लाल डोरियों को घसीट कर उन्हें इकठ्ठा कर रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऋतु-गीतों को प्रकृति के आँचल पर अलग-अलग संवेदना, और अद्भुत रंगों से सजाने में अनिरुद्ध जी का कोई सानी नहीं. सावन में गाईजाने वाली कजरी का विरह-नाद हो, या फूलों के रंग में रंगे वसंत का अलसाया यौवन, होली की ठिठोली हो, या चैता की एकांत उदासी, सभी का अपना स्थान कवि के गीतों में सुनिश्चित है--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"महुआ बन फूल झरे, मद मातल नैना रे &lt;br /&gt;महकत मग धूर ,हवा पी बोतल बैना रे"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"धरती ओढ़े रंगल दोलाई, धानी बिछल चदरिया &lt;br /&gt;पीयर रंगल छींट के पगड़ी, हरियल रंगल घंघरिया" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन १९६२ में भारत-चीन युद्ध काल में समय की मांग को देखते हुए अनिरुद्ध जी ने देश के जवानों में जोश भरने के लिए  अनेक देश गीतों की रचना की. अनिरुद्ध जी द्वारा भोजपुरी भाषा में लिखा गया प्रयाण-गीत हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के अत्यंत ओजपूर्ण गीतों में से एक है --&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आज महाधार में, देस के पुकार बा,&lt;br /&gt;करम के गोहार बा,सामने पहाड़ बा,&lt;br /&gt;तू जवान बढ़ चल, झूम-झूम बढ़ चल &lt;br /&gt;बान बन कमान पर,सनसनात चल चल "   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; व्याकरण की दृष्टि से समृद्ध उनके गीत साहित्य की अनुपम धरोहर हैं, अनिरुद्ध जी के गीतों की मूर्धन्य साहित्यकारों ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की है---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"श्री अनिरुद्ध जी की रचनाएँ सुनने का प्रायः ही अवसर मिला है.जिन लोगों ने भोजपुरी के ग्रामीण सौंदर्य की रक्षा करते हुए उसमें माधुरी और लालित्य भरने की कोशिश की है, उनमें अनिरुद्ध जी एक प्रमुख युवक हैं. इनका मधुर कंठ इनके गीतों में और भी रस भर देता है. मेरी कामना अनिरुद्ध जी चिरंजीवी हों और अपनी वाणी  की रस माधुरी से लोगों के हृदयों को तृप्ति देते रहें."&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;श्री रामवृक्ष बेनीपुरी&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;मांझी&lt;br /&gt;२५-१-५३&lt;br /&gt;"अनिरुद्ध जी की कविताएँ बहुत ही सरस और अनूठी कल्पना से अलंकृत हैं. मैं समझता हूँ कि उनमें ओजगुण की वृद्धि और होगी. नि:संदेह उनमें एक प्रतिभाशाली कवि की रचना शक्ति है. मैं उनके विकास को उत्सुकता से देखता रहूँगा."&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रामविलास शर्मा &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;छपरा&lt;br /&gt;१-६-५३ &lt;br /&gt;"श्री अनिरुद्ध जी के गीतों में भोजपुरी के प्राणों का आर्द्र माधुर्य है. एक ऐसी निश्छल सरलता, जो रसानुभूति से द्रवित हो गीत की कड़ी बन जाये, कवि अनिरुद्ध में पाई जाती है. परिमार्जन के पश्चात गीतों के आकाश में कवि के प्रिय स्वरों को उड़ान भरने योग्य पर प्राप्त होंगे. इतना ही नहीं, अधिक तन्मयता उन्हें जन-जन के मन प्राणों में नीड़ बनाकर बस जाने की क्षमता प्रदान करेगी, विश्वास है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जानकी वल्लभ शास्त्री &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हाजीपुर &lt;br /&gt;३१-१०-५५ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अनिरुद्ध जी की भोजपुरी कविताएँ बड़ी सुन्दर और सामयिक हैं. होनहार कवि के आगे बढ़ाने की कामना करता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राहुल सांकृत्यायन &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;छपरा&lt;br /&gt;१८-१-५६ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"श्री अनिरुद्ध जी भोजपुरी काव्य के रससिद्ध कवि हैं.कविताओं में रस का स्रोत उमड़ पडता है.इनके पढने में भी वह जादू है कि सुनने वाले विभोर हो उठाते हैं .जहाँ तक भोजपुरी कविताएँ सुनने को मिली हैं, मुझे अनिरुद्ध जी की कविता सबसे अधिक पसंद आई है. मैं इनके उत्तरोत्तर विकास की कामना करता हूँ."&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;श्री श्याम नारायण पाण्डेय &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आजमगढ़&lt;br /&gt;१२-२-५६ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"श्रीअनिरुद्ध जी की रचना "पनिहारिन"सुना. उसमें ग्राम को छूकर बहती नदी का प्रवाह है.स्वाभाविकता के साथ ही साथ माधुर्य की छटा जो कवि ने उसमें भर दी है उससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे, उसमें फूलों के साथ -साथ दीप भी जलते बह रहे हों. उसकी गूँज मेरे कानों में बहुत दिनों बनी रहेगी."   &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बच्चन &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;छपरा &lt;br /&gt;२६-११-५६    &lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2011/02/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>19</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-6932411557937103160</guid><pubDate>Sun, 09 Jan 2011 04:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-01-09T11:15:20.990+05:30</atom:updated><title>" साक्षात्कार : भोजपुरी कवि श्री अनिरुद्ध जी "</title><description>&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_FxluzCkQGnQ29ZgONYg88ndlr1qrYx5grq8lOYpwq1MnfzbW0PjfiDV8UdTHd-GNJG8FIRzR9DRgB1xkja1Tv9ZfCveGOxvJdcdrItVHv_OQBqyAWc2AR1nrcKOVVqtthaA7z7W3hwwy/s1600/Photo0137.jpg"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 240px; DISPLAY: block; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5560045070441662754" border="0" alt="" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_FxluzCkQGnQ29ZgONYg88ndlr1qrYx5grq8lOYpwq1MnfzbW0PjfiDV8UdTHd-GNJG8FIRzR9DRgB1xkja1Tv9ZfCveGOxvJdcdrItVHv_OQBqyAWc2AR1nrcKOVVqtthaA7z7W3hwwy/s320/Photo0137.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;/span&gt; ------------------------------------श्री अनिरुद्ध जी---------------------------------&lt;br /&gt;भोजपुरी साहित्य के गौरव , सुमधुर भोजपुरी गीतों के रचयिता, कवि श्री अनिरुद्ध जी इन दिनों गुजरात राज्य की यात्रा पर हैं , और गांधीनगर में निवास कर रहे हैं. प्रस्तुत है उनसे की गयी साहित्यिक वार्ता का संक्षेप-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;१- प्रश्न - अपने विषय में कुछ बताएं..&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर - मेरा जन्म बिहार राज्य के सारण जिले के डीहीं ग्राम में ९ मार्च १९२८ को हुआ . पिता स्व० श्री जगदेव सहाय स्वयं उर्दू व फारसी के प्रकांड विद्वान थे. हाईस्कूल तक की शिक्षा राजपूत हाईस्कूल से, तदोपरांत इंटरमीडिएट (कला) राजेन्द्र कालेज, छपरा से प्राप्त की.&lt;br /&gt;१९४८ में विवाह के उपरांत कुछ पारिवारिक उलझनों के कारण अध्ययन स्थगित करना पड़ा. १९५० से बेसिक स्कूल में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया, १९६४ मे प्रधानाचार्य नियुक्त हुआ, और इसी पद से १९८६ में अवकाश ग्रहण किया....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;२- प्रश्न- क्या सृजन कार्य अब भी जारी है ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर - हाँ ! जारी है. एक काव्य संग्रह "पनिहारिन" प्रकाशित हो चुका है. इसके अतिरिक्त "भोजपुरी काव्य संग्रह" , "भोजपुरी गज़ल संग्रह", मेघदूतम का भोजपुरी भाषा में अनुवाद व "कृष्ण-लीला" नामक एक गीत नाटिका (इसमे मथुरा गमन तक का चित्रण किया गया है) प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;३- प्रश्न- हिंदी खडी बोली में भी लिख सकते थे , फिर भोजपुरी को लेखन का माध्यम चुनने का कारण क्या है ...?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- राजेन्द्र कालेज के प्राचार्य पूज्य मनोरंजन बाबूजी ने भोजपुरी में लिखने को प्रेरित किया, उन्होंने कहा- हिन्दी में बहुत से लोग लिख रहे हैं, तुम अपनी प्रतिभा मातृभाषा को समर्पित करो, मैं हरसंभव सहयोग करूँगा....बस ! तभी से मैंने भोजपुरी भाषा को अपनी रचनाओं का प्रधान माध्यम माना ... हिंदी खड़ी बोली में भी कुछ स्वतंत्र रचनाएँ लिखी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;४- प्रश्न- भोजपुरी भाषा में लेखन की चुनौतियां क्या है, तथा भाषा के प्रति उदासीनता का क्या कारण मानते हैं ..?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- किसी भी भाषा का सम्मान तभी संभव है, जब उसका सम्बन्ध साहित्य से हो, व्याकरण की शुद्धता से हो, भाषा में एक चुम्बकीय आकर्षण हो , मैं तो इसी विचार व दृष्टिकोण के साथ भोजपुरी कविताओं व गीतों की रचना करता हूँ.......&lt;br /&gt;आजकल भोजपुरी भाषा में प्रयुक्त द्विअर्थी सम्वाद उसे "अश्लील भाषा" कहलाने के लिए उत्तरदायी है. जिस कारण भोजपुरी भाषा को निजभाषा कहने में कुछ लोगों को हीनता का बोध होता है, आजकल वही साहित्य परोसा जाता है, जिसे जनसामान्य आसानी से पचा सके व उसका रसास्वादन कर सके..... मेरा सोचना यही है कि यह भी एक कारण हो सकता है भाषा के प्रति बुद्धिजीवियों की उदासीनता का.... प्रसारण माध्यमो से भोजपुरी भाषा का जो स्वरुप सामने आ रहा है ,वह व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध नहीं है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;५- प्रश्न- हिंदी नव जागरण में देशभाषा का जागरण आवश्यक था , हिंदीभाषी प्रदेशों में अवधी व भोजपुरी क्षेत्र भाषाएँ प्रमुख होने पर भी , आधुनिक भारत में इसका अभाव क्यों है ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- हिन्दी नव जागरण में देश भाषा का जागरण आवश्यक था, परन्तु देश में हो रहे देशव्यापी स्वतंत्रता आन्दोलनों में जन जागरण भी आवश्यक था... शायद यही कारण है, कि एक देश एक भाषा की नीति को प्रमुखता से रखा गया और इस जागरण काल में हिन्दी खडी बोली साहित्यिक क्षेत्र में प्रमुखता से निखर कर आई, और क्षेत्रीय भाषाएँ पिछड़ गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;६- प्रश्न- हिन्दी साहित्य के इतिहास में अवधी, भोजपुरी, ब्रज आदि भाषाओं को सम्मान मिला है, आधुनिक हिन्दी साहित्य में इसका अभाव क्यों ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में भोजपुरी, अवधी, मैथिली व ब्रज आदि क्षेत्रीय भाषाएँ सम्मिलित नहीं यह क्षोभ का विषय है....क्षेत्रीय भाषाएँ क्षेत्र के भीतर ही सीमित रह गयी हैं...कारण, लोगों में लोक भाषाओं के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता का अभाव है.. किसी भी भाषा को उचित सम्मान मिले इसके लिए आवश्यक है, कि भाषा को भाषा का पूर्ण रूप देने की बात हो, भाषा को इतना सामर्थ्यवान बना दें कि वह जनसामान्य की भाषा हो जाए, और साहित्य जनसामान्य के लिए हो.... रामचरित मानस इसका उदाहरण है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;७- प्रश्न- भोजपुरी में कटनी, ओसवनी, रोपनी, दउनी आदि गीतों को लिखने का क्या औचित्य है ? क्या इनसे प्रेरणा मिलती है ? या ये उत्थान में सहायक हैं ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- हाँ ! इस प्रकार के गीत हमें हमारे कर्म के प्रति जागरूक रखते हैं, इनसे कर्म के प्रति उत्साहवर्धन की प्रेरणा मिलती है... जिन गीतों के द्वारा अपने कर्म के लिए कर्तव्यबोध की मंगल भावना जाग्रत हो, वे निश्चय ही उत्थान के कारक हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;८- प्रश्न- भोजपुरी में लेखन की प्रेरणा किससे मिली, व समकालीन भोजपुरी कवियों से कैसे सम्बन्ध रहे...?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- मुख्य प्रेरणा स्रोत तो पूज्य मनोरंजन बाबू जी ही रहे किन्तु आचार्य महेंद्र शास्त्री, डॉ० राम विचार पाण्डेय, पं० श्याम नारायण पाण्डेय जी का वृहदहस्त सदैव शीश पर रहा...&lt;br /&gt;प्रो० रिपुसूदन प्रसाद श्रीवास्तव, सतीश्वर सहाय वर्मा "सतीश", डॉ० उमाकान्त वर्मा, कविवर कन्हैया जी, पाण्डेय कपिल, डॉ० प्रभुनाथ सिंह, मूसा कलीम, मैनेजर पाण्डेय "मनमौजी" आदि से मित्रवत सम्बन्ध रहे...अर्जुन कुमार "अशांत" मेरे सहपाठी भी रहे, और अभिन्न मित्र भी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;९- प्रश्न- आजकल भोजपुरी भाषा में रचनात्मकता कितनी बढ़ी है , इसमें भाषा के योगदान को आप किस रूप में देखते हैं ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- भाषा जिस रूप में सामने आनी चाहिए, उस प्रकार नहीं आई.. रचनात्मकता तो निश्चितरूप से बढ़ी है... भोजपुरी में दूरदर्शन पर नाटकों की श्रृंखलाएं प्रसारित हो रही हैं , भोजपुरी में फ़िल्में बन रही हैं , इस सबका सम्बन्ध कहीं न कहीं साहित्य से है.. परन्तु भाषा का स्तर घटा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;१०- प्रश्न- संविधान की आठवीं सूची में क्षेत्रीय भाषा मैथिली ने स्थान पा लिया है, भोजपुरी ने नहीं, क्या ऐसा सरकारी योगदान की कमी के कारण है ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- सरकारी योगदान का अभाव तो है, पर मेरा ऐसा मानना है कि मुख्य कारण भाषा का पूर्णरूपेण परिष्कृत न होना ही है..मैथिली पूर्णरूपेण शुद्ध व सिद्धांतों पर आधारित भाषा है, इसलिए यह सम्मानित भाषा है, और संविधान की आठवीं सूची में स्थान पाने की अधिकारिणी भी है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;११- प्रश्न- भूमंडलीकरण के इस दौर में लोक भाषाओं के भविष्य को कैसे देखते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- भाषा को सर्वव्यापक बनाया जाए, भाषा सर्वग्राह्य हो ये ध्यान में रखते हुए, ऐसी रचनाओं का सृजन किया जाए जो सभी के लिए हों, तो लोकभाषाओं का भविष्य भी निश्चित ही सुन्दर होगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhHK56bDfnyJalJQ0lJA2Mf9_OV-hpx349t-zooi9AOwarsa7sBO-JyeyLIJXq7_xqhkOprm5B00OBI4DOMdCVBeQIkLJJ8tAvoff_ysl6eY3k6ZoMtsx4HsCdKbPmu_6IAcN_nz7qoSXTn/s1600/Photo0139.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 240px; FLOAT: right; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5560043516682750898" border="0" alt="" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhHK56bDfnyJalJQ0lJA2Mf9_OV-hpx349t-zooi9AOwarsa7sBO-JyeyLIJXq7_xqhkOprm5B00OBI4DOMdCVBeQIkLJJ8tAvoff_ysl6eY3k6ZoMtsx4HsCdKbPmu_6IAcN_nz7qoSXTn/s320/Photo0139.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;                                            &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;                                                                                                                                                                                                           -------------------------मै,श्री अनिरुद्ध जी के साथ</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2011/01/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_FxluzCkQGnQ29ZgONYg88ndlr1qrYx5grq8lOYpwq1MnfzbW0PjfiDV8UdTHd-GNJG8FIRzR9DRgB1xkja1Tv9ZfCveGOxvJdcdrItVHv_OQBqyAWc2AR1nrcKOVVqtthaA7z7W3hwwy/s72-c/Photo0137.jpg" width="72"/><thr:total>30</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-5494257790003682600</guid><pubDate>Tue, 07 Dec 2010 13:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-12-07T18:59:48.869+05:30</atom:updated><title>मुस्कराते भ्रम</title><description>दिन के उजालों में&lt;br /&gt;भ्रम मुस्कराते है--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गणितीय उतार-चढावों का&lt;br /&gt;आकलन करती एक दृष्टि&lt;br /&gt;तन को स्पर्श करती है-&lt;br /&gt;दूसरी बंद हो जाती है,&lt;br /&gt;आत्मसात करने के लिए&lt;br /&gt;प्रीति की सुगंध--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक विकल है,&lt;br /&gt;प्रतीक्षा में&lt;br /&gt;निस्तब्ध अंधेरों की-&lt;br /&gt;दूसरी,पलकों के भीतर सहेजती है,&lt;br /&gt;चंचल स्वप्न--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बंद दरवाजों के पीछे-&lt;br /&gt;लज्जा, सिकुड कर&lt;br /&gt;भय में बदल जाती है,&lt;br /&gt;अपने भुज-बल पर&lt;br /&gt;इतराता दर्प&lt;br /&gt;और भी वीभत्स हो जाता है,&lt;br /&gt;कामुक अंधेरों में--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुसुप्त है,&lt;br /&gt;एक दृष्टि&lt;br /&gt;श्रम और मद से शेथिल,&lt;br /&gt;निश्चिन्तता के साथ-&lt;br /&gt;दूसरी, खंरोचे गए अंतस की&lt;br /&gt;पीड़ा से व्यथित&lt;br /&gt;स्वतः बंद हो जाती है,&lt;br /&gt;ढलक जाते हैं,&lt;br /&gt;चंचल स्वप्न--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन के उजालों में&lt;br /&gt; भ्रम फिर मुस्कराते हैं---</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/12/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>26</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-1414843007396580249</guid><pubDate>Wed, 03 Nov 2010 11:17:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-11-03T16:48:47.463+05:30</atom:updated><title>विद्रोही आँच</title><description>विषमताओं की विवशता,&lt;br /&gt;विभेद से उपजी वैमनस्यता,&lt;br /&gt;कारक हैं&lt;br /&gt;विसंगतियों से विद्रोह का..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विद्रोही आँच से बढता&lt;br /&gt;सामाजिक तापमान,&lt;br /&gt;अंतस को भर देता है,&lt;br /&gt;उमस और घुटन से...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कब, क्या, क्यों और कैसे&lt;br /&gt;जैसे कई प्रश्नों का समाधान,&lt;br /&gt;कागज़-दर-कागज़ होते हुए,&lt;br /&gt;बन्द हो जाता है,&lt;br /&gt;निरुत्तरित फाइलों में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि कभी-कभार&lt;br /&gt;सरकारी योजनाओं के छींटे,&lt;br /&gt;तपते अंतस पर पड़ भी जाएँ&lt;br /&gt;तो, भाप बन कर उड़ जाते हैं,&lt;br /&gt;ऊँची-ऊँची कुर्सियों के हत्थे तक..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में,&lt;br /&gt;बढ़ी हुई उमस,&lt;br /&gt;और अधकचरी, अपाच्य योजनाओं&lt;br /&gt;के कारण,&lt;br /&gt;उबकाइयां आती हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय रहते उपचार न हुआ ,&lt;br /&gt;तो, उल्टियां भी आ सकती हैं,&lt;br /&gt;फदकते हुए आक्रोश की...</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/11/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>13</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-409186281653351497</guid><pubDate>Thu, 30 Sep 2010 11:10:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-09-30T16:53:20.988+05:30</atom:updated><title>अंगार की तरह.....</title><description>दिल में रहा करते थे पहले प्यार की तरह.&lt;br /&gt;जेहन में पड़ गए हो अब दरार की तरह..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिश्तों के फ़र्ज़ तुमसे निभाए नहीं गए&lt;br /&gt;फैलाए रहे हाथ इक हक़दार की तरह.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मांगी नहीं थीं नेमतें तुमसे ज़माने की&lt;br /&gt;तुमने निभाया साथ भी व्यापार की तरह....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख्वाहिश थी कि चख लूँ दो घूँट प्यार के&lt;br /&gt;तेरे लफ्ज़ दहके सदा अंगार की तरह.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब रूठा-रूठी का न हमसे खेल खेलिए&lt;br /&gt;जज़्बात ढह चुके मेरे दीवार की तरह.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लम्बी हो उम्र तेरी, दुआ तेरे लिए की&lt;br /&gt;अब जी रही है "चाँदनी" मज़ार की तरह....</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/09/blog-post_30.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>45</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-5555069496338851679</guid><pubDate>Wed, 22 Sep 2010 10:07:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-09-22T22:42:29.060+05:30</atom:updated><title>मकड़जाल</title><description>तुम्हारे शब्द,&lt;br /&gt;मेरी चौखट पर&lt;br /&gt;बिखरे पड़े हैं--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना कि&lt;br /&gt;तुम्हारे शब्द&lt;br /&gt;सुन्दर हैं,&lt;br /&gt;लुभावने हैं,&lt;br /&gt;परन्तु हैं तो मकड़जाल ही--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनमें तुम प्रतिदिन&lt;br /&gt;किसी मक्खी के फंसने की&lt;br /&gt;प्रतीक्षा करते हो--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं, मक्खी नहीं हूँ,&lt;br /&gt;मैं छिपकली की भांति,&lt;br /&gt;तुम्हें निगलने का सामर्थ्य भी रखती हूँ--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तुम भी जानते होगे,&lt;br /&gt;तभी तो,&lt;br /&gt;तुम्हारे शब्द&lt;br /&gt;बिखरे पड़े हैं,&lt;br /&gt;मेरी चौखट पर---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट:- उपर्युक्त कविता में वर्णित "तुम" और "मैं" किसी व्यक्ति विशेष को इंगित कर नहीं लिखा गया है, अपितु अंतरजाल पर शब्दरूपी मकड़जाल द्वारा हो रहे भावनात्मक शोषण के विरुद्ध एक आवाज़ है.</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/09/blog-post_22.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>23</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-3990526244845945807</guid><pubDate>Fri, 03 Sep 2010 06:06:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-09-03T15:13:52.943+05:30</atom:updated><title>आओ फिर लौट चलें...</title><description>आओ फिर लौट ,&lt;br /&gt;चलें उन हसीन यादों में.......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं-&lt;br /&gt;गणित जैसा नीरस विषय&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; सिर्फ इसलिए पढती हूँ,&lt;br /&gt; क्योंकि वह तुम पढ़ाते हो ...&lt;br /&gt;तुम एक ही सवाल बार-बार समझाते  हो,&lt;br /&gt;और मैं,&lt;br /&gt;न समझ पाने के बहाने के साथ,&lt;br /&gt;तुम्हारे साथ कुछ वक्त और गुजारती हूँ,&lt;br /&gt;वैसे ही कुछ  और वक्त गुजारो न!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ फिर लौट चलें,&lt;br /&gt;उन हसीन यादों में.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तुम-&lt;br /&gt;मुझसे मिलने के लिए,&lt;br /&gt;रात को ही चल देते हो..&lt;br /&gt;बिना ये सोचे कि इस वक्त कैसे पंहुचोगे..&lt;br /&gt;फिर भी साधन जुटाते हो,&lt;br /&gt;आठ किलोमीटर पैदल भी चलकर आते हो.&lt;br /&gt;रात के  तीन बजे तुम्हारा  यूँ पंहुचना,&lt;br /&gt;मुझे हतप्रभ कर देता है....&lt;br /&gt;वैसे ही आज भी  चौंकाओ न!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ फिर लौट चलें,&lt;br /&gt;उन हसीन यादों में......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हम--&lt;br /&gt;साथ-साथ होते&lt;br /&gt;तुम्हारी उंगलियां मेरे बालों में कंघी करतीं,&lt;br /&gt;और तुम्हारी आँखे मेरा चेहरा पढ़तीं,&lt;br /&gt;तब मेरी उलाहनों भरी बक-बक&lt;br /&gt;तुम चुपचाप सुनते,&lt;br /&gt;मेरी पेशानी पर खिंची लकीरों को चूम लेते,&lt;br /&gt;मैं अपना सारा दर्द भूल जाती....&lt;br /&gt;वैसे ही मेरे दर्द भुलाओ न!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ फिर लौट चलें,&lt;br /&gt;उन हसीन यादों में....</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/09/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>16</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-8757057784292470097</guid><pubDate>Wed, 30 Jun 2010 07:26:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-06-30T13:09:26.538+05:30</atom:updated><title>चिर-प्रतीक्षा</title><description>कब तक अवगुंठित रहूँ&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; जीवन या जीवन-क्षरण में?&lt;br /&gt; मैंने तो न देर की प्रिय!&lt;br /&gt; आपके शुभ संवरण में......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; प्रेम वर्षा से प्रिय तुम&lt;br /&gt; आज अंतस सिक्त कर दो,&lt;br /&gt; संग रहना तुम सदा ही&lt;br /&gt; प्रेम के इस आचरण में.......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तो न देर की प्रिय!&lt;br /&gt; आपके शुभ संवरण में.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; रात्रि की निस्तब्धता में&lt;br /&gt; तार मन के जुड गए&lt;br /&gt; लौ लगी तुमसे रही प्रिय!&lt;br /&gt; आत्म के निज जागरण में.......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तो न देर की प्रिय!&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; आपके शुभ संवरण में......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; शून्य की अनुभूति पाऊँ&lt;br /&gt; इतना तुम स्वछन्द कर दो,&lt;br /&gt; हूँ चिर प्रतीक्षारत युगों से&lt;br /&gt; देह के इस आवरण में........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तो न देर की प्रिय!&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; आपके शुभ संवरण में........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; तेरा अलौकिक रूप देखूं&lt;br /&gt; बंद आँखों से मनोहर&lt;br /&gt; करबद्ध हूँ अब ले चलो&lt;br /&gt; सानिध्य के वातावरण में........&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैंने तो न देर की प्रिय!&lt;br /&gt; आपके शुभ संवरण में........&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/06/blog-post_30.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>44</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-2171680899183398900</guid><pubDate>Thu, 17 Jun 2010 11:54:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-06-17T17:43:24.739+05:30</atom:updated><title>***जुनून***</title><description>पा  लूँ तुझे ये थी आरजू&lt;br /&gt;हर सिम्त में ढूँढा किये&lt;br /&gt;&lt;span&gt;रहे  भटकते हम दर-बदर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जलाए आँखों के  दिए .....&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;तेरी जुस्तजू से "जु" लिया,&lt;br /&gt;तेरे नूर से मुझे "नू" मिला .&lt;br /&gt;तू नहीं मिला है यही गिला,&lt;br /&gt;इस बात का ये मिला सिला--&lt;br /&gt;&lt;span&gt;मेरी आँखों में कुछ नमी-सी है,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उस नमी से "न" को चुरा लिया&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;एक "जु नू न"  यूं पैदा किया ....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अब तू मिलेगा या नहीं,&lt;br /&gt;&lt;span&gt;ये सोचना मुझको नहीं ,    &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;रहा मुझमें दम या दम, बेदम हुआ&lt;br /&gt;&lt;span&gt;तुझे ढूँढ लायेगा ऐ खुदा!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;मेरे जुनून में गर दम हुआ .......           &lt;/span&gt;</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/06/blog-post_17.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>43</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-3286709749133750269</guid><pubDate>Mon, 07 Jun 2010 15:11:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-06-17T17:17:48.760+05:30</atom:updated><title>इरोम शर्मीला</title><description>&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:Arial, sans-serif, Verdana;"&gt; &lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:Arial, sans-serif, Verdana;"&gt;&lt;div style="POSITION: relative; PADDING-BOTTOM: 0px; MARGIN: 0px; PADDING-LEFT: 0px; PADDING-RIGHT: 0px; DISPLAY: block" class="G1hh09x9MZ"&gt;&lt;div style="PADDING-BOTTOM: 0px; OVERFLOW-X: hidden; OVERFLOW-Y: hidden; MARGIN: 0px; PADDING-LEFT: 0px; WIDTH: 550px; PADDING-RIGHT: 0px; WHITE-SPACE: pre-wrap" class="G1hh09x9CEC"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;बेक़सूर लहू धरती का&lt;br /&gt;आँचल रंग जाता है,&lt;br /&gt;और औरतों की अस्मत&lt;br /&gt;का खिलौना बन जाता है......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किससे करे फरियाद..?&lt;br /&gt;ये प्रश्न सिर उठाता है,&lt;br /&gt;जब रक्षक ही भक्षक की&lt;br /&gt;तरह सामने आता है ......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब-जब दर्द हद से,&lt;br /&gt;गुज़र जाता है .....&lt;br /&gt;आँखों से बहता नहीं&lt;br /&gt;सूख जाता है .....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल में एक आक्रोश -सा&lt;br /&gt;दहकता है,&lt;br /&gt;फिर--&lt;br /&gt;जिस्म पर कपडों के बिना,&lt;br /&gt;औरत आवाज़ उठाती है ......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कानून की आँखों पर&lt;br /&gt;तो पट्टी है,&lt;br /&gt;प्रशासन को,&lt;br /&gt;हकीक़त नज़र कब आती है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में,&lt;br /&gt;आक्रोश की बेबसी,&lt;br /&gt;जब मायूसी से,&lt;br /&gt;गले मिलती है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो "इरोम शर्मीला",&lt;br /&gt;एक मशाल-सी जलती है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो जलती जा रही है॰,&lt;br /&gt;निरंतर............&lt;br /&gt;विगत आठ वर्षों से ,&lt;br /&gt;अब तक........&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;इरोम शर्मिला चानू एक मणिपुरी कवियात्री हैं जिन्हें मणिपुर की लौह महिला (Iron Lady of Manipur) भी कहा जाता है जो कि एक क़ानून Armed Forces Special Powers Act (AFSPA), जो पूरे&lt;br /&gt;उत्तर-पश्चिमी राज्यों (North Eastern States) में लागू है के विरोध में पिछले लगभग नौ वर्षों से भूख हड़ताल पर हैं वे नवंबर २००० में भारतीय सेना द्वारा १० मणिपुरी नागरिकों को मारे जाने को मानव अधिकार हनन का मामला मानते हुए भूख हड़ताल पर चली गयीं जिसके बाद उन्हें आत्महत्या के प्रयास में गिरफ्तार किया गया उन्हें हॉस्पिटल में एकांत में रखा गया है एवं कुछ तरल नाक के द्वारा उन्हें दिए जाते हैं जिससे की वे जीवित हैं&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/06/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>35</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-86047418923600889</guid><pubDate>Sun, 16 May 2010 08:22:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-05-16T13:53:07.561+05:30</atom:updated><title>***हर शय में था***</title><description>प्रस्तुत पंक्तियों की प्रेरणा किसी को हुक्का पीते देख कर मिली...&lt;br /&gt;.हुक्के को पीते समय जो आवाज़ आती है ऐसा लगता है-----णाम..फिर जब ठहर जाते हैं तो आवाज़ कुछ ऐसी होती है ---णानक...और जब छोड़ते हैं तो........हू.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिर, मस्जिद,गुरुद्वारा&lt;br /&gt;रही ढूँढती मैं हर सूँ&lt;br /&gt;छिपा राम में, या नानक में,&lt;br /&gt;याकि है तू अल्ला हू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब देखा तो हर शय में था&lt;br /&gt;हुक्के की गुड़ गुड में तू था&lt;br /&gt;खींचा राम था,ठहरा नानक&lt;br /&gt;और छोडा तो अल्ला हू था .</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/05/blog-post_16.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>25</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-2173128379600626490</guid><pubDate>Sun, 09 May 2010 03:10:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-05-09T09:15:59.999+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">माँ</category><title>माँ!</title><description>&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj9sS58JU_RVGB0SFT9DWrtMNikLeNZ4GT-LEetTs4u0ThanldrKMfOLpzeJPX9Ffh2Yd9o7hG5gqHWayi4ke6AJmvAArU0hyQU5TZQrqRALKvF_y0B86EIShV8R5MCZhnDzQBLme8Y6BJl/s1600/OgAAAPrPBbrb4SAnbfM-NBYhrd2R3cg3R_LBEaMNW-Slq-FcbfEIjEeprUxEwqBVTl3rvkuhmJvOllOraelSpYrZ3p4Am1T1UK4TxxAkrkMcXH1xXk9LMvpvb3ic%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5469107062981268066" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj9sS58JU_RVGB0SFT9DWrtMNikLeNZ4GT-LEetTs4u0ThanldrKMfOLpzeJPX9Ffh2Yd9o7hG5gqHWayi4ke6AJmvAArU0hyQU5TZQrqRALKvF_y0B86EIShV8R5MCZhnDzQBLme8Y6BJl/s320/OgAAAPrPBbrb4SAnbfM-NBYhrd2R3cg3R_LBEaMNW-Slq-FcbfEIjEeprUxEwqBVTl3rvkuhmJvOllOraelSpYrZ3p4Am1T1UK4TxxAkrkMcXH1xXk9LMvpvb3ic%5B1%5D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; सूरज के जागने से पहले जागती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;चिड़ियों के चहकने से पहले,&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;आँगन बुहारती&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मुझे नींद से जगाने के लिए&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;दुलराती&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;अपने पद चिह्नों पर&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;चलने को प्रेरित करती&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मर्यादा और संस्कार कि धरोहर समेटे&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;आदर और स्नेह कि सीख देती&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मैंने,&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;उसे कर्तव्यों का निर्वहन करते भी देखा &lt;span class=""&gt;है--&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;अपने अधिकारों को भी पाना&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;उसका अधिकार नहीं था&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;तथाकथित बड़ों के तानों &lt;span class=""&gt;और &lt;/span&gt;उलाहनों का दर्द &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;आँखों तक आने से पहले ही&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;कहीं अन्दर समेट लेती&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;पूछने पर होठों पर&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;मौन की सांकल लगा लेती&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;जब वही बड़े लोग&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;मुझे लड़की होने के कारण &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;दुत्कारते&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;वह भूल जाती&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;माँ-&lt;span class=""&gt;मर्यादा, &lt;/span&gt;संस्कार&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;कर्त्तव्य और स्नेह!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;मैंने उसे &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;मेरे अधिकारों के लिए &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;लड़ते भी देखा है&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;वह कोई और नहीं&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;मेरी माँ है!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/05/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj9sS58JU_RVGB0SFT9DWrtMNikLeNZ4GT-LEetTs4u0ThanldrKMfOLpzeJPX9Ffh2Yd9o7hG5gqHWayi4ke6AJmvAArU0hyQU5TZQrqRALKvF_y0B86EIShV8R5MCZhnDzQBLme8Y6BJl/s72-c/OgAAAPrPBbrb4SAnbfM-NBYhrd2R3cg3R_LBEaMNW-Slq-FcbfEIjEeprUxEwqBVTl3rvkuhmJvOllOraelSpYrZ3p4Am1T1UK4TxxAkrkMcXH1xXk9LMvpvb3ic%5B1%5D.jpg" width="72"/><thr:total>21</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-8399070601425533539</guid><pubDate>Sun, 14 Mar 2010 05:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-03-14T10:47:13.887+05:30</atom:updated><title>माँ का आँचल (II)</title><description>मैंने अपने नन्हे-नन्हे&lt;br /&gt;हाथ पैरों को फैलाया&lt;br /&gt;और अंगड़ाई लेकर मेरा&lt;br /&gt;किशोर वय बाहर आया-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक प्रश्न तब भी&lt;br /&gt;कुलबुलाता था..........&lt;br /&gt;और आज भी&lt;br /&gt;सर उठता है----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर.........&lt;br /&gt;मैंने माँ से पूंछ ही लिया ---&lt;br /&gt;"माँ! ये दुनिया कितनी बड़ी है ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ ने मेरा माथा चूमा,&lt;br /&gt;सिर को गोद में रख लिया,&lt;br /&gt;और बोली- बस! मेरे आँचल से,&lt;br /&gt;थोड़ी-सी छोटी है........</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/03/blog-post_5503.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>22</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-2756735191158678182</guid><pubDate>Mon, 08 Mar 2010 15:06:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-03-08T21:20:18.287+05:30</atom:updated><title>महिला दिवस: एक विचार</title><description>&lt;p align="justify"&gt;मानव समाज रुपी गाड़ी स्त्री-पुरुष रुपी पहियों पर चलती है और अच्छी गति तभी होगी जब दोनों पहिये समान गति से चलें। स्त्री में वह गति है परन्तु पुरुष उसकी गति अवरुद्ध करने का प्रयास करता है, फिर भी स्त्री उन्नति के लिए प्रयासरत है&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;स्त्री तो निश्चित ही अपने स्थान व अधिकार को प्राप्त करेगी परन्तु एक विद्रोही मानसिकता के साथ । इस कारण समाज पर एक बुरा प्रभाव पड़ेगा और यही नारी का विद्रोह आगे की पीढ़ी की नारी को हस्तांतरित होगा और पुरुष की दमन करने वाली मानसिकता आगे आने वाली पुरुष पीढ़ी को , तो क्या आपको एक स्वस्थ समाज मिलेगा ? नहीं ,ऐसे समाज में कुत्सित भावनाओं का ही बोलबाला रहेगा । अतः मेरा पुरुष वर्ग से अनुरोध है कि वह हमें अपने पंख फ़ैलाने का मार्ग स्वतः दे तो हमें मार्ग छीनना नहीं पड़ेगा और न ही विद्रोह रहेगा बल्कि सहयोग के लिए धन्यवाद की भावना रहेगी और यही एक स्वस्थ समाज को जन्म देगी । &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;नारी का सामान गति से चलने के प्रयास से पुरुष आतंकित हो रहा है कि नारी उसके बराबर न आ जाये अतः उसका दमन और अधिक बढ़ने लगा है ,परिणाम दोनों ही पथ-भ्रष्ट हो गए हैं और मानव समाज धीरे-धीरे पशु समाज में परिणित होने लगा है । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="right"&gt;शैली त्रिपाठी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिक्षिका&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राथमिक विद्यालय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिला-लखनऊ&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोट - उपरोक्त विचार अंतर्राष्ट्रीय महिला-दिवस पर सुश्री शैली त्रिपाठी द्वारा व्यक्त किये गए ,जो कि मूल रूप से आपके सामने हैं। सुश्री त्रिपाठी हिंदी पठन-पाठन में विशेष रूचि रखने के साथ-साथ महिला समाज के उत्थान के लिए " स्वयं-सिद्धा" नामक संस्था भी चला रही हैं. &lt;/strong&gt;</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/03/blog-post_08.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-5923513865875216689</guid><pubDate>Fri, 05 Feb 2010 14:01:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-02-05T19:39:56.994+05:30</atom:updated><title>ज़रूरत</title><description>जाने कैसे,&lt;br /&gt;रातें उड़ जाती हैं,&lt;br /&gt;या परछाइयों की तरह,&lt;br /&gt;घटती बढती रहती हैं,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन बंजर लगते हैं&lt;br /&gt;या सूखे की धरती जैसे,&lt;br /&gt;चटके-चटके&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर वक्त  गुज़र ही जाता है&lt;br /&gt;चांदनी बिखरी-बिखरी&lt;br /&gt;कुछ नमी छोड़ जाती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुश्क होते लबों पर&lt;br /&gt;फिर एक एहसास भीग जाता है&lt;br /&gt;ये ख़याल और भी पुख्ता हो जाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कि तुम्हारी याद,&lt;br /&gt;एक ज़रूरत है,&lt;br /&gt;मेरे जीने के लिए!</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2010/02/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>22</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-7761262834872274552</guid><pubDate>Tue, 29 Dec 2009 06:52:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-12-29T13:48:03.938+05:30</atom:updated><title>प्यार के मौसम</title><description>उसके आने की खबर-&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;'बसंत' को ले आती है&lt;br /&gt;हजारों ख्वाब रंगीन हो जाते हैं&lt;br /&gt;चेहरा खिल जाता है&lt;br /&gt;भावनाएं महक उठती हैं&lt;br /&gt;भँवरे तो नहीं,&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; पर दिल गुनगुनाता है......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका आना -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सर्दियों' की सरसराहट सा होता है&lt;br /&gt;जो मेरे पैरों को&lt;br /&gt;ठंडा कर देता है&lt;br /&gt;और दिल की धडकनों को&lt;br /&gt;बढ़ा देता है&lt;br /&gt;मैं उसकी बाहों में&lt;br /&gt;सिमट जाती हूँ&lt;br /&gt;गर्म साँसे जब भी आपस में टकराती हैं&lt;br /&gt;जाड़े की नरम धूप -सा एहसास दे जाती हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उसे जाना है-&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ये बात 'पतझड़'-सा&lt;br /&gt;सन्नाटा ले आती है&lt;br /&gt;उसका कुछ सामान&lt;br /&gt;जो मेरे पास है,&lt;br /&gt;जिसे मैं उसे सौंपती हूँ&lt;br /&gt;और इस क्रम में होती&lt;br /&gt;थोड़ी सी खटपट&lt;br /&gt;सूखे पत्तों के खड़कने जैसा&lt;br /&gt;और फिर एक सन्नाटा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके जाते ही-&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जाने कैसे मौसम बदल जाता है&lt;br /&gt;दिल के अंदर कुछ उमड़ता है&lt;br /&gt;आँखें बरस जाती हैं&lt;br /&gt;इस बेमौसम 'बारिश' को&lt;br /&gt;रोकने की कोशिश&lt;br /&gt;ऐसी हंसी में बदल जाती है&lt;br /&gt;जैसे बारिश के बीच&lt;br /&gt;होती बिजली की गड़गड़ाहट ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर उसके आने के इंतज़ार में--&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वक़्त सरकता है&lt;br /&gt;'गर्मियों' के लंबे दिनों की तरह&lt;br /&gt;धीरे-धीरे&lt;br /&gt;इंतज़ार की घड़ियाँ&lt;br /&gt;चिपचिपी, उमस भरी,&lt;br /&gt;गर्मियों की बेसब्र दोपहर-सी&lt;br /&gt;कटती ही नहीं.....&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उसके आने, जाने और&lt;br /&gt;फिर आने के बीच&lt;br /&gt;सारे मौसम अपने रंग&lt;br /&gt;दिखाते हैं,&lt;br /&gt;ना जाने वो कौन सा मौसम होगा?&lt;br /&gt;जब वो आएगा&lt;br /&gt;फिर कभी न जाने के लिए!</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2009/12/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>26</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-15302749962433025</guid><pubDate>Sun, 08 Nov 2009 16:21:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-08T21:55:50.921+05:30</atom:updated><title>सिलसिले चाहतों के गाने लगे</title><description>आज फिर याद तुम मुझको आने लगे&lt;br /&gt; सिलसिले चाहतों के गाने लगे ........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मोहब्बतों के चिराग जलाये बहुत &lt;br /&gt; आँधियाँ बन अपने बुझाने लगे... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; तेरी राहों में दिल को बिछाए रहे &lt;br /&gt; राह-ए-दिल पर तुम लड़खडाने लगे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मैं तो रूठी रही थी यही सोचकर &lt;br /&gt; कोई आये, आकर मनाने लगे....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; चाँद पर था मिलने का वादा सनम &lt;br /&gt; क्यों अमावस में मुंह अब छिपाने लगे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सहर तक सभी राज़ जल जायेंगे &lt;br /&gt; हम चिरागों को सबकुछ बताने लगे..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; तुम कहते हो शबनम गिरी रात भर &lt;br /&gt; अश्क-ए-चाँदनी यूँ झिलमिलाने लगे.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2009/11/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>16</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-2859452119057271004</guid><pubDate>Mon, 12 Oct 2009 15:38:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-12T21:18:12.899+05:30</atom:updated><title>"दिवास्वप्न"</title><description>बहुत ज़रूरी है,&lt;br /&gt;जीवन में वह&lt;br /&gt;सांसों की तरह---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उसे अंतर तक समा लेती हूँ,&lt;br /&gt;सांसों की ही तरह,&lt;br /&gt;पर उसे,&lt;br /&gt;मेरे अंतर में सिमटने से,&lt;br /&gt;घुटन होती है----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह आकाश की ऊंचाइयों को&lt;br /&gt;छूना चाहता है,&lt;br /&gt;पक्षियों-सा&lt;br /&gt;उड़ना चाहता है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्वतों पर&lt;br /&gt;उछलना चाहता है,&lt;br /&gt;तितलियों के रंग ,&lt;br /&gt;मुट्ठी में भरना चाहता है-----&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आवारा जंगलों में ,&lt;br /&gt;घूमना चाहता है,&lt;br /&gt;हर पत्ते पर&lt;br /&gt;अपना नाम लिखना चाहता है,&lt;br /&gt;समुद्र की गहराइयों को&lt;br /&gt;नापना चाहता है----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झीलों में जलतरंग का&lt;br /&gt;संगीत भरना चाहता है,&lt;br /&gt;चांद पर टहलना चाहता है,&lt;br /&gt;चाँदनी से बतियाना चाहता है----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब वह उन्मुक्त है,&lt;br /&gt;मेरा अपनत्व उसे बांधता नहीं,&lt;br /&gt;मैं खुश हूँ यह सोचकर---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि वह मेरा है तो,&lt;br /&gt;लौटकर आएगा, मेरे पास ,&lt;br /&gt;यदि नहीं आया वह तो,&lt;br /&gt;"वो"खुली आँखों से,&lt;br /&gt;दिन में देखा गया,&lt;br /&gt;एक सुन्दर दिवास्वप्न था</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2009/10/blog-post_12.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>15</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8639466837226535875.post-2465608246097028628</guid><pubDate>Sat, 03 Oct 2009 11:11:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-10-03T16:42:11.829+05:30</atom:updated><title>कविता</title><description>भाव को संजोए वह&lt;br /&gt;शब्द से लिपट गयी&lt;br /&gt;कहीं छन्द सी खनकती&lt;br /&gt;प्रकृति के निकट गयी&lt;br /&gt;कभी शरमाई&lt;br /&gt;मन घूँघट से ताकती&lt;br /&gt;कभी सबकी&lt;br /&gt;पीड़ा के अंतर में झाँकती&lt;br /&gt;कभी सकुचाई&lt;br /&gt;सम-सामयिक को बांचती&lt;br /&gt;चिंतन के चितवन से&lt;br /&gt;देखती समाज को&lt;br /&gt;तोड़ छन्द - बँध&lt;br /&gt;काव्य रीति के अनुबंध&lt;br /&gt;धर्म-जाति , राज - काज&lt;br /&gt;राग द्वेष , कल और आज&lt;br /&gt;सब पर हो कर निशंक&lt;br /&gt;आधुनिका सी विचारों को बांचती&lt;br /&gt;मुझमें सामर्थ्य कहाँ&lt;br /&gt;मैं जो करूँ उसकी सृष्टि&lt;br /&gt;शारदे की दया दृष्टि&lt;br /&gt;शब्दों प्रचुर वृष्टि&lt;br /&gt;और भावना की संतुष्टि&lt;br /&gt;जब-जब हो जाती है&lt;br /&gt;कविता बन जाती है !&lt;br /&gt;कविता बन जाती है !</description><link>http://jyotsnapandey.blogspot.com/2009/10/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (ज्योत्स्ना पाण्डेय)</author><thr:total>12</thr:total></item></channel></rss>