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	<title>स्वप्न से स्मृति तक</title>
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		<title>जीवन फूलों की सेज नहीं</title>
		<link>http://lalitkumar.in/poems/1244</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Lalit Kumar]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Oct 2012 15:30:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ग़नुक (ग़ज़ल-नुमा-कविता)]]></category>
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					<description><![CDATA[ललित कुमार द्वारा लिखित, 12 अक्तूबर 2012 एक नई कविता। यह ग़नुक (ग़ज़ल नुमा कविता) नहीं है क्योंकि इसमें मतला [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ललित कुमार द्वारा लिखित, 12 अक्तूबर 2012</p>
<p>एक नई कविता। यह ग़नुक (ग़ज़ल नुमा कविता) नहीं है क्योंकि इसमें मतला अनुपस्थित है&#8230;</p>
<p>कैसे सपना उतरे आँखों में<br />
जब नींद ही किरचें बोती है</p>
<p>जीवन फूलों की सेज नहीं<br />
काँटो की कठिन चुनौती है</p>
<p>तम की ख़ातिर पास मेरे<br />
मुठ्ठी भर ये ज्योती है</p>
<p>तार-तार तर दामन यूँ ही<br />
बरखा भी क्यूँ भिगोती है</p>
<p>जहाँ कहीं से गुज़रुँगा मैं<br />
वो खड़ी वहीं पर होती है</p>
<p>जिसे देख के मैं लिखता हूँ<br />
पिए चांदनी वो सोती है</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>तेरा पारितोषिक</title>
		<link>http://lalitkumar.in/poems/1235</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Lalit Kumar]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 02 Sep 2012 15:00:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी कविताएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[ललित कुमार द्वारा लिखित, 1 अगस्त 2004 जीवन कर्म प्रधान है और जीवन जीने का शायद सबसे उत्तम तरीका कर्मयोगी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ललित कुमार द्वारा लिखित, 1 अगस्त 2004</p>
<p>जीवन कर्म प्रधान है और जीवन जीने का शायद सबसे उत्तम तरीका कर्मयोगी हो जाना है। कर्तव्य पूर्ण करने के बाद मिलने वाली आत्मिक संतुष्टि को ही अपना पारितोषिक मानना चाहिए&#8230;</p>
<p>कर्तव्य-निष्ठा से तूने, यह स्वप्न भी साकार किया<br />
जीवन-पथ का यह मोड़ भी, तूने अविचल पार किया</p>
<p>मुड़ कर न देख तूने, कितना महत्‌ है काम किया<br />
सोच नहीं कि कितना थोड़ा, तूने है आराम किया</p>
<p>मत विचार कर अब आगे, इसका कैसा फल होगा<br />
सोच तुझे अब क्या करना, आने वाले कल होगा</p>
<p>एक राह ख़त्म होती है, तो दूजी राह हम पाते हैं<br />
यूँ ही जुड़ कर असंख्य रास्ते, जीवन-पथ बनाते हैं</p>
<p>बस कर्तव्य किये जा, यही तो है गीता में घोषित<br />
यह कार्य किये की संतुष्टि ही, तेरा पारितोषिक</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>सागर कभी डूबता नहीं</title>
		<link>http://lalitkumar.in/poems/1225</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Lalit Kumar]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Aug 2012 14:26:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी कविताएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[ललित कुमार द्वारा लिखित, 26 अगस्त 2012 आज सागर का दिल बेचैन है उसके सीने पर तैरती बेढब कारोबारी नौकाओं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ललित कुमार द्वारा लिखित, 26 अगस्त 2012</p>
<p>आज सागर का दिल बेचैन है</p>
<p>उसके सीने पर तैरती<br />
बेढब कारोबारी नौकाओं और<br />
प्यार की हर सुंदर कश्ती की<br />
साँसे&#8230; अटक गई हैं<br />
आज सागर का दिल बेचैन है<br />
आज न जाने क्या होगा!</p>
<p>अपार का विस्तार जैसे<br />
ख़ुद में ही सिमट गया है<br />
सब कुछ, कितना ख़ामोश<br />
कितना चुप-सा हो गया है<br />
आज न जाने क्या होगा!</p>
<p>हवाओं की हरहराहट ने<br />
लहरों के घोर गर्जन ने<br />
अचानक पनाह ले ली है<br />
डरा देने वाले सन्नाटे में<br />
आज न जाने क्या होगा!</p>
<p>हर कश्ती, हर मछली, हर शहर<br />
जवाँ होने को तैयार हर लहर<br />
हर थमी हुई, भुला दी गई साँस<br />
दुगनी गति से धड़कता हर दिल<br />
बस यही सोच रहा है<br />
आज न जाने क्या होगा!</p>
<p>चुप्पी साधे, हाथों को बाँधे<br />
सिर झुकाए खड़ी कायनात को<br />
एक सहमी-सी आशंका है<br />
इस ख़ामोशी के गर्भ से<br />
ऐसे तूफ़ान के आने की<br />
जिसके बाद कुछ नहीं रहेगा</p>
<p>क्या सागर आख़िरकार<br />
अपना ज़ब्त खो देगा?<br />
अपनी सीमाएँ तोड़ देगा?<br />
हाँ, शायद तोड़ ही देगा<br />
आख़िर ज़ब्त की भी तो<br />
एक सीमा होती ही है<br />
पर शायद ऐसा न भी हो<br />
क्योंकि सागर ने ख़ुद ही तो<br />
अपने को सीमाबद्ध किया है<br />
वरना भला प्रकृति में कौन है<br />
जो अपार को बाँध ले?</p>
<p>आज सागर का दिल बेचैन है<br />
आज न जाने क्या होगा&#8230;<br />
कयास सभी लगा रहे हैं<br />
और सब यह भी जानते हैं<br />
कि कुछ नहीं होने वाला<br />
उसका ये नया दुख भी<br />
असीम गहराइयों में दफ़्न हो जाएगा<br />
इस बार भी सागर<br />
एक गहरी साँस लेकर रह जाएगा</p>
<p>देखो, सागर कभी रोता नहीं<br />
वो दर्द-बयानी नहीं करता<br />
दुख में घुटेगा पर सीमाबद्ध रहेगा<br />
यही तो उसका तुमसे वायदा है</p>
<p>उसका वायदा कभी टूटता नहीं<br />
उसका धीरज कभी छूटता नहीं<br />
वो सागर है<br />
सागर कभी डूबता नहीं</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>आज मन बहुत कष्ट में है</title>
		<link>http://lalitkumar.in/poems/1222</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Lalit Kumar]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 27 Jul 2012 14:35:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी कविताएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[ललित कुमार द्वारा लिखित, 27 जुलाई 2012 आज मन बहुत कष्ट में है इस मन में कुछ भी नहीं है [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ललित कुमार द्वारा लिखित, 27 जुलाई 2012</p>
<p>आज मन बहुत कष्ट में है<br />
इस मन में कुछ भी नहीं है<br />
यहाँ तक कि न वीराना है<br />
और न ही कोई सन्नाटा<br />
आवाज़ो के साथ यहाँ से<br />
सन्नाटा भी चला गया है<br />
जो कुछ यहाँ हुआ करता था<br />
अब वो कुछ भी यहाँ नहीं है</p>
<p>लेकिन&#8230;</p>
<p>इतने विराट ख़ालीपन में भी<br />
न जाने ये कमबख़्त&#8230; दर्द<br />
जाने ये दर्द कहाँ से उपजता है<br />
किस तरह ये दर्द उदयशील है<br />
जबकि सृष्टि सारी अस्त में है?<br />
आज मन बहुत कष्ट में है</p>
]]></content:encoded>
					
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		<item>
		<title>मेरी कलम</title>
		<link>http://lalitkumar.in/poems/1215</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Lalit Kumar]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Jul 2012 15:34:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी कविताएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[ललित कुमार द्वारा लिखित, 25 जुलाई 2012 बहुत दिन से मैंने कुछ नहीं लिखा&#8230; ज़िद थी कि इस बार लिखूँगा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ललित कुमार द्वारा लिखित, 25 जुलाई 2012</p>
<p>बहुत दिन से मैंने कुछ नहीं लिखा&#8230; ज़िद थी कि इस बार लिखूँगा तो केवल ख़ुशी में लिपटे शब्द&#8230; पर ऐसा हो न सका&#8230; मैं ये भी नहीं कह सकता कि मुझे नहीं मालूम क्यों मेरी कलम ख़ुशनुमाई छोड़कर अंधेरी ऊबड़-खाबड़ राहों पर चलने लगती है&#8230; मैं ये नहीं कह सकता; क्योंकि जवाब मैं जानता हूँ&#8230; </p>
<p>आज अपनी क़लम को मैंने<br />
बहुत सख़्त ताकीद की थी<br />
बड़े दिनों बाद तुम्हें उठाया है<br />
तो हुस्नो-माह की बातें लिखना<br />
ख़ुशनुमा दिन, उगते सूरज<br />
चांदनी रात की बातें लिखना<br />
जब चलो तो चलना केवल<br />
मुहब्बत-ओ-वफ़ा की गलियों में<br />
कल्पना के रस में डूब-डूब<br />
हर्फ़ों के निशां बनाना कुछ ऐसे<br />
जैसे कोई कविता लिखी हुई हो</p>
<p>मेरी हिदायत-ओ-ताक़ीद पर<br />
कलम बस दो ही कदम चली<br />
और फिर वही हुआ जो होता है<br />
मेरी कोशिशों से मुँह मोड़कर<br />
ख़ुशनुमा रास्तों को छोड़कर<br />
कलम एक पगडंडी पर उतरी<br />
दर्द के आवारा ग़ुबारों के बीच<br />
दु:ख से सहमी-सी शाम में<br />
अकेलेपन की कंटीली झाड़ियों से<br />
घायल हो, अपने ही लहू में डूब-डूब<br />
कलम आज फिर इक ग़मज़दा<br />
ख़ामोश अफ़साना लिखने लगी है<br />
जो कविता तो शायद नहीं है</p>
]]></content:encoded>
					
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		<item>
		<title>मेरी रची रचनाएँ</title>
		<link>http://lalitkumar.in/poems/1169</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Lalit Kumar]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Apr 2012 13:17:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी कविताएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[ललित कुमार द्वारा लिखित, 17 जून 2006 मेरी रची रचनाएँ अक्सर मुझसे पूछती हैं कि ओ रचनाकार तुम ये अन्याय [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ललित कुमार द्वारा लिखित, 17 जून 2006</p>
<p>मेरी रची रचनाएँ<br />
अक्सर मुझसे पूछती हैं<br />
कि ओ रचनाकार<br />
तुम ये अन्याय क्यों करते हो?<br />
व्यक्त करने में स्वंय को<br />
जब तुम समर्थ नहीं<br />
तो काव्य के नाम पर<br />
हमें क्यों रचते हो?</p>
<p>कविता पर्याय है<br />
भावना का<br />
बलात्‌ जोड़े गये<br />
शब्दों और तुकों से<br />
कविता नहीं बनती<br />
जल जैसा बहाव चाहिये<br />
बर्फ़ के टुकडों से<br />
सरिता नहीं बनती</p>
<p>भावनाओं को<br />
उलझे हुए शब्दों में<br />
पिरोने का तुम<br />
अपराध क्यों करते हो?</p>
<p>काव्य के नाम पर<br />
हमें क्यों रचते हो?</p>
<p>मेरी रची रचनाएँ<br />
अक्सर मुझसे पूछती हैं&#8230;</p>
]]></content:encoded>
					
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		<item>
		<title>इल्तिज़ा-ए-ज़र्रा</title>
		<link>http://lalitkumar.in/poems/1160</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Lalit Kumar]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 17 Apr 2012 14:07:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नज़्म]]></category>
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					<description><![CDATA[ललित कुमार द्वारा लिखित, 17 अप्रैल 2012 यह एक धूल के कण की दरख़्वास्त है। अपने प्रिय के कदम चूमने [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ललित कुमार द्वारा लिखित, 17 अप्रैल 2012</p>
<p>यह एक धूल के कण की दरख़्वास्त है। अपने प्रिय के कदम चूमने कि जिस इच्छा को उसने उम्र भर अपने दिल में संजोया; आज उस इच्छा के पूरे होने के आसार दिखने लगे हैं&#8230; लेकिन&#8230; कुछ इच्छाएँ मन में दम तोड़ देने के लिए बनी होती हैं&#8230;</p>
<p>तुम बेवजह ख़ुद को परेशान ना करो</p>
<p>मैं गर्द का एक ज़र्रा जो बेठिकाना ठहरा<br />
गिरफ़्तारे-सबा हूँ मुझे तो उड़ जाना ठहरा<br />
तुम्हारी राहें पोशीदा हुई हैं सुर्ख़ फ़ूलों से<br />
खुश्बुओं का गलीचा हर सू बिछा हुआ है<br />
परिंदे भी गाते हैं मौसिक़ी के उसूलों से<br />
तेरे नाज़ुक पैरों में चुभने को नहीं आया मैं<br />
बस इक हसरत थी तेरे मुकद्दस पाँव तले<br />
शायद पाबन्दी-ए-हवा से छूट जाता मैं<br />
जिस तरह सँवरी है याँ तकदीर फूलों की<br />
वैसे ही आवारगी से रिश्ता तोड़ पाता मैं</p>
<p>काश कुछ मेरे बस में भी होता या रब<br />
हवा ने ला पटका है याँ अंगार के ऊपर<br />
मौका-ए-कदमबोसी अब हासिल नहीं होगा<br />
पल ये मैंने पाया था, हाय उम्रें कई खोकर<br />
क्योंकि मैं तेरी दुनिया-सा नहीं खूबसूरत हूँ<br />
मुझे दुनिया से तुम्हारी मिटा देते हैं लोग<br />
तेरे हसीनो-मुकद्द्स कदमों की चाहत है<br />
मुझे मासूम-सी चाहत की सज़ा देते हैं लोग</p>
<p>लो फिर से आ रहा है झोंका हवा का गहरा<br />
मैं गर्द का एक ज़र्रा जो बेठिकाना ठहरा<br />
गिरफ़्तारे-सबा हूँ कि मुझे उड़ जाना ठहरा<br />
दूर तुमसे ले जाएगी दुश्मन है ये हवा मेरी<br />
इल्तिज़ा है कर दो उम्मीद फिर जवाँ मेरी</p>
<p>बस इक नज़र देख लो चाहे पहचान ना करो<br />
फिर तुम्हारी दुनिया से गुज़र जाऊँगा मैं<br />
तुम बेवजह ही ख़ुद को परेशान ना करो</p>
]]></content:encoded>
					
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			</item>
		<item>
		<title>कोमल मेरे हृदय द्वार</title>
		<link>http://lalitkumar.in/poems/1153</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Lalit Kumar]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Apr 2012 13:49:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी कविताएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[ललित कुमार द्वारा लिखित, 06 अप्रैल 2012 भीतर क्या है कोई न जाने आहत करना बस ये जग जाने इनको [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ललित कुमार द्वारा लिखित, 06 अप्रैल 2012</p>
<p>भीतर क्या है कोई न जाने<br />
आहत करना बस ये जग जाने</p>
<p>इनको रखता मैं सदा ही बंद<br />
बाहर का जग मुझे नहीं पसंद</p>
<p>विकृत शरीर में सुंदरता बन<br />
यहाँ अंदर रहता है मेरा मन</p>
<p>तुम आओ तो धीरे-से दस्तक देना<br />
फिर हौले से लेना मुझे पुकार </p>
<p>कठोर काठ के बने नहीं हैं<br />
हैं कोमल मेरे हृदय द्वार!</p>
]]></content:encoded>
					
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		<item>
		<title>मेरा वजूद इक सराब है</title>
		<link>http://lalitkumar.in/poems/1150</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Lalit Kumar]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Apr 2012 13:05:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी कविताएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[ललित कुमार द्वारा लिखित, 06 अप्रैल 2012 मृगतष्णा (सराब) अपने आप में एक अनोखी चीज़ होती है। मजबूर&#8230; अपने अस्तित्व [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ललित कुमार द्वारा लिखित, 06 अप्रैल 2012</p>
<p>मृगतष्णा (सराब) अपने आप में एक अनोखी चीज़ होती है। मजबूर&#8230; अपने अस्तित्व से अनजान&#8230; उसमें आकर्षण है –लेकिन उससे किसी की प्यास नहीं बुझती&#8230; मृगतृष्णा मजबूर है&#8230; मृगतृष्णा एकाकी है&#8230;</p>
<p>मेरा वजूद<br />
इक सराब है</p>
<p>मुझे देख राहें न बदल अपनी<br />
देख, तू भी प्यासा रह जाएगा</p>
<p>वक्त की इब्तिदा से<br />
आज तलक<br />
मैं प्यासा रहा हूँ<br />
और इंतिहा तक<br />
यूँ ही प्यासा रहूँगा<br />
फिर भी दामन में<br />
इक उम्मीद बसाए रहता हूँ<br />
कि आए कोई प्यासा<br />
और मुझसे वो हासिल करे<br />
जो मुझमें दिखता है<br />
जिससे मेरी भी प्यास बुझ सके<br />
और उसकी भी रूह को<br />
सुकून आए</p>
<p>प्यासे तो बहुत आए, बहुत गए<br />
पर मुझको न कोई पा सका<br />
कोई कहता है कि मैं होता हूँ<br />
लेकिन नहीं हूँ<br />
कोई कहता है कि मैं नहीं हूँ<br />
लेकिन होता ज़रूर हूँ<br />
हैरत तो ये है कि<br />
मैं ख़ुद भी नहीं जानता<br />
मैं हूँ या नहीं हूँ!</p>
<p>मेरी जानिब<br />
न क़दम बढ़ा मुसाफ़िर<br />
वरना तू भी मेरी तरह<br />
बन के इक तमाशा रह जाएगा</p>
<p>मुझे देख राहें न बदल अपनी<br />
देख, तू भी प्यासा रह जाएगा</p>
<p>मेरा वजूद<br />
इक सराब है</p>
]]></content:encoded>
					
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			</item>
		<item>
		<title>हृदय का प्याला</title>
		<link>http://lalitkumar.in/poems/1140</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Lalit Kumar]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 05 Apr 2012 13:25:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हिन्दी कविताएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[ललित कुमार द्वारा लिखित, 05 अप्रैल 2012 अहसास पुराना है&#8230; शब्द अब दे पाया हूँ&#8230; हृदय का प्याला जब टूटा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>ललित कुमार द्वारा लिखित, 05 अप्रैल 2012</p>
<p>अहसास पुराना है&#8230; शब्द अब दे पाया हूँ&#8230;</p>
<p>हृदय का प्याला जब टूटा<br />
तो आँखों से छलका</p>
<p>उर का दर्द निकल पलकों से<br />
बूंद बूंद बन के ढलका</p>
<p>जब तुमने नहीं समझा तो फिर<br />
मोल समझे कौन इस खारे जल का</p>
<p>आँसुओं से कठोर नियती गलती नहीं<br />
पर रो कर जिया हुआ कुछ तो हल्का</p>
<p>कल जब तुमने संग छोड़ दिया<br />
अब कहाँ ठिकाना मेरे कल का</p>
]]></content:encoded>
					
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