<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2enclosuresfull.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0"><channel><title>काँव काँव publication ltd</title><link>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/</link><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/rss+xml" href="http://feeds.feedburner.com/PublicationLtd" /><description></description><language>en</language><managingEditor>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</managingEditor><lastBuildDate>Sun, 04 Mar 2012 07:33:19 PST</lastBuildDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">17</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">25</openSearch:itemsPerPage><feedburner:info uri="publicationltd" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email></itunes:owner><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle></itunes:subtitle><feedburner:emailServiceId>PublicationLtd</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><item><title>मोक्ष</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/_c27lbQzIzE/blog-post_31.html</link><category>kanv</category><category>कहानी</category><category>daughter</category><category>काँव</category><category>story</category><category>पुत्री</category><category>नीरज बसलियाल</category><category>father</category><category>पिता</category><category>मनोविज्ञान</category><category>kaanv</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sun, 04 Mar 2012 03:04:30 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-9175351629930782907</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-9SO-JvfcT2s/Tv5ILMBsFTI/AAAAAAAABWQ/EdIcbI8Ludg/s1600/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%2528143%2529.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://2.bp.blogspot.com/-9SO-JvfcT2s/Tv5ILMBsFTI/AAAAAAAABWQ/EdIcbI8Ludg/s400/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%2528143%2529.JPG" width="300" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;इन बीस सालों में वह अपनी बेटी से नहीं मिला था | वह नहीं चाहता था कि उसकी बेटी को पता चले कि उसका पिता कौन है | अपनी सारी हैवानियत को आज ताक पर रखकर वह अपनी बेटी को एक नजर देखना चाहता था | वह उसको क्या बताएगा कि वह कौन है, एकबारगी आंसुओं ने उसकी आँखों में घर बना लिया था | लेकिन वह कभी कमजोर नहीं पड़ा है, तो आज क्यूँ ? एक नादान लड़की जो महज पच्चीस बरस की होगी, भला उसकी बिसात क्या है ? क्या पूछ लेगी वह ? दुनिया की उसे समझ ही कितनी है ? और दिल ही दिल में वह इस बात की उम्मीद करता रहा कि वह वाकई में वैसा ही हो जैसा वो नहीं है | सलीन, कितना प्यारा नाम है, उसने सोचा | ऐसा नहीं है कि वह अपनी ही बेटी का नाम नहीं जानता था | बल्कि यह नाम उसे उसने ही दिया था, सलीन | लेकिन कभी इस बारे में उसने नहीं सोचा कि वह नाम इस कदर खूबसूरत हो सकता है | चीजें अपने आप में कितनी मिठास भरी हो सकती हैं, है न ? कोलोन डालते हुए उसने खुद को शीशे में देखा, वह पच्चीस का लग रहा था | उसे लग रहा था कि वह अपनी ही बेटी से छोटा हो गया है | दुनिया को अपने इशारों पर नचाने की कोशिश करने में उसने उम्र का एक बेहद जरुरी हिस्सा गँवा दिया था | लेकिन आज वो उसे वापस पा रहा था | 
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"सलीन, तुम बेहद खूबसूरत हो | तुम अपनी माँ पर गयी हो ? "&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"नहीं , पापा पर. माँ कहती थी कि वे बेहद खूबसूरत थे, लड़कियों की तरह | उनके रेशमी बाल थे, और उनकी आँखें बिलकुल आपकी आँखों की तरह थी, गहरी नीली | उनकी कोरों पर हलकी नमी रहती थी , जैसे गहरे समंदर में डोलती कोई छोटी सी नौका |"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"ये सब तुम्हारी माँ ने तुम्हें बताया ?"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"नहीं !" सलीन के चेहरे पर अनिश्चितता के भाव थे |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"फिर ...?" &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"पहले मुझे एक आइसक्रीम खानी है |" सलीन ने जिद की |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"नहीं ! पहले तुम मुझे बताओ |" उसने इनकार जरुर किया , लेकिन इनकार के लिए नहीं, वह बस उसकी जिद देखना चाहता था | यह प्यास, एक अधूरी कविता की तरह थी, जो मूर्त रूप लेने से पहले छाई उदासी को और घना करती जाती है | वह चुप रही, उसे दुःख हुआ कि बेवजह उसने उसे नाराज किया | जब सलीन की जिद करने की उम्र थी तब वह उसके आसपास नहीं था |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"आप गंदे हो | मुझे पहले आइसक्रीम चाहिए |"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;उसकी आँखों में अब पुरकशिश सुकून था | आइसक्रीम खाने के बाद वे दोनों हाथ थाम कर वैलिस के किनारे घडी भर बैठे |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"तुम इतने बूढ़े हो, तुम्हें मेरे साथ घूमने में शर्म नहीं आती ?" सलीन ने कहा | वह मुस्कुराया, समंदर पर डोलती नाव को आँखों में बसा लेने के लिए |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"मुझे खूबसूरत लड़कियों के साथ घूमना पसंद है | वैसे तुम्हें तो मेरे साथ घूमने में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए, बहुत सारी लड़कियां उम्र में काफी बड़े इंसान के साथ डेट करती हैं |"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"मुझे कोई परेशानी नहीं |" सलीन ने नौका पर खड़े होकर पाल को आगोश में भर लेने जितनी अंगडाई ली |
"आप मेरे पिता को जानते थे , है न ?"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"हाँ, लेकिन तुम उनके बारे में कुछ तो जानती ही होगी |"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"उनकी आँखें ... और वे विओलिन भी बहुत अच्छा बजाते थे |"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;यह उसका ट्रेडमार्क था | अपने शिकार को फंसाने के लिए वह अक्सर इसका इस्तेमाल करता था, विओलिन बजाने का | तोमसो विताली की एक एक धुन उसके कानों में चीखों के शीशे उडेलती रही |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"और..." वाइन का एक कड़वा घूँट लेते हुए उसने पूछा |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"और बाकी कुछ नहीं |" सलीन के चेहरे पर चन्द्रमा की घटती कलाएं थी |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;वक्त बदला, शरद के पूर्ण चन्द्र ने आखिर दस्तक दी |"मुझे लगता है मेरे पिता एक सिपाही थे |" 
वह भी मुस्कुरा पड़ा | उसने सलीन के गीले होंठों के किनारे को ऊँगली से छुआ, जिस पर वाइन की एक बहकी सी लकीर खिंच आई थी |

&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"आप मेरे पिता को जानते थे, है न ?" सलीन की चमकदार आँखों में दुनियादारी का लेश भी न था |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"तुम्हें क्यूँ लगता है कि तुम्हारे पिता एक सिपाही थे ?" वह सिर्फ़ पूछने के लिए पूछना चाहता था | सवाल ,सवाल बेहिसाब सवाल उसे पसंद थे | बस सवाल ही बचे रह जायेंगे आखिरी में , जहाँ से चले थे जब सवाल लेके चले थे |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"ऊं ..." सलीन ने कुछ देर सोचने की मुद्रा बनायीं | "ऐसे ही ... उन्हें वर्दी पहने ही देखा है | मैं रातों को सपने में कई बार भाग कर उनके पास गयी हूँ, और उन्होंने मुझे गोद में उठा लिया है | पूरा आसमान मेरी मुट्ठी में भिंचा चला जाता है | तभी अचानक गोलियों का शोर सुनाई देता है , और मेरी नींद टूट जाती है | बचपन में बहुत बार ये सपने देखे थे मैंने , इसलिए अब याद भी हो गए |"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"क्या तुम्हें अब भी ये सपना आता है ?" उसने आँखों को पहाड़ों के पीछे छिपा दिया |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"नहीं, अब ज्यादा नहीं आता | लेकिन कुछ दो तीन महीने पहले देखा था उन्हें |" सलीन की उदासियाँ बिना शीर्षक की कहानियां थी |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"आपको सपने आते हैं ?" सलीन ने उसके हाथों को छुआ |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"नहीं , अब नहीं !" उसने झूठ बोला | सच ये था कि हर रोज , हर वक्त उसे सपने आते थे | लाशें ही लाशें , और उनके बीच वह सोता हुआ , खुद भी एक लाश जैसा | &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"क्या तुमने कभी सोचा है कि तुम्हारे पिता कुछ और भी हो सकते हैं ?" उसने आँखों को वापस माथे पर चढा लिया | सलीन की बदली त्योरियों ने जिन्हें वापस जगह पर फिट सा कर दिया |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"नहीं !" सलीन चाँद के धब्बों में भी खूबसूरती ढूँढने लगी |
"मेरे पिता एक सैनिक थे | जो अपने देश से प्यार करते थे | उन्होंने इस देश के लिए अपनी जान दे दी थी | माँ के लिए इस बारे में बात करना काफी तकलीफदेह है, इसलिए माँ इस बारे में कुछ नहीं कहती |"
बोम्ब के धमाके विओलिन की स्वरलहरियों के साथ एक अजीब तरह का फ्यूज़न करने लगी , उसे सुनने की कोशिश में उसके कानों की दीवारें हिल गयी | फ्रांसेस्को मारियो वेरासिनी के हाथ में एक मिसाइल लौन्चेर था , जिसके हर एक बटन से संगीत निकल रहा था |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"अगर तुम्हें पता चले कि तुम्हारे पिता एक संगीतकार ... ?" बोम्ब के धमाकों के बीच वह अपनी ही आवाज सुनने के कोशिश कर रहा था | सहसा उसे महसूस हुआ कि वह काफी चिल्लाकर बोल रहा है तो वह बीच में ही रुक गया |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"ओह, क्या वाकई ?" सलीन ने काफी नाखुश होने का भाव जतलाया |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"हाँ , और बोम्ब से उसे उतना ही डर लगता है जितना कि तुम्हें छिपकली से लगता है |" 
सलीन को यह सुनकर खुशी नहीं मिली | वह उसके चेहरे के भाव पढ़ सकता था | 
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;सलीन ने अपने चेहरे को उसकी तरफ मोड़ा तो उसकी आँखों में आंसू थे | "क्या ये सब मेरे पिता ने झेला है ?" उसने पूछा |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"हाँ !" उसकी ठहरी आँखों में पुतलियाँ संतुलन बनने की कोशिश में लगी थीं | "लेकिन फिर भी उन्होंने उफ़ तक नहीं की |" वह खामोश वैलिस को देखता रहा | वैलिस की खामोशी उसकी हड्डियों के अंदर तक जम चुकी थी, "तुम्हारे पिता एक कलाकार थे | एक उम्दा कलाकार |"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"सलीन !" उसने सलीन के बालों को एक और हटाया | सलीन के कंधे उजली चांदनी में उतने ही स्वच्छ और निर्मल दिख रहे थे जितने वो बरसों पहले याद कर सकता था |&amp;nbsp; खून सने हुए साफ़ कंधे, जैसे सावन की बारिश ने पत्तों पर जमा गर्द को एक ही बौछार से साफ़ कर दिया हो | उसकी नन्ही गर्दन जिस पर एक छोटा बेचारा सा तिल था , उस पर उसने अपनी ऊँगली रखी | आहिस्ता से , जैसे उसे जगाने से डर रहा हो | सलीन की आँखों को चूमकर उसने जब उन्हें देखा तो नन्ही रोशनियाँ अभी भी छटपटा रही थी |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"क्या तुम थोड़ी देर और नहीं ठहर सकते ?" सलीन ने जब उसे सिगार निकालते हुए देखा तो पूछा , अक्सर वह जाते वक्त ही सिगार निकालता था |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"बेशक ठहर सकता हूँ |" वह फिर से बैठ गया | सलीन ने उसके कन्धों पर सर टिका दिया |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"उन्हें बचाया जा सकता था , है न ?"उसने पूछा |
उसने कोई जवाब नहीं दिया | जवाब उसे भी मालूम न था |
क्या वाकई उसे बचाया जा सकता था ? आज पहली बार इस सवाल का सामना उसने किया था |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"बोम्ब के धमाके में ... कैसे उन्हें , उनके जैसे कलाकार को कोई कैसे ?" सलीन जैसे सोते से बोली |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"तुम उसे दुनिया में सबसे ज्यादा अजीज़ थी सलीन |"
जब वह जाने के लिए उठा तो सलीन ने उसे बांहों में भर लिया | उसने दूर होने की कोशिश की लेकिन, उसकी जकड कसती ही जा रही थी | उसने एकदम जैसे फंदे से खुद को आजाद किया |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"क्या तुम कल आओगे ?"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"हां, जरुर ! मैं जरुर आऊंगा " उसने दो कदम आगे बढ़कर कहा , "मेरा इंतज़ार करना , यहीं ! वैलिस के किनारे !"
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;जब वह घर पहुंचा तो काफी रात हो चुकी थी | कमरे को चारों और से बंद कर के, खिड़कियों और दरवाजों को दोबारा पड़ताल करके उसने महसूस किया | अपने अंतस और बाहर की आवाजों से मुक्ति पाने के लिए उसने टेलिविज़न चला दिया | घर में कोई शोर चलता रहे तो अच्छा है | 'दी व्हाईट चैपल मर्डर मिस्ट्री, टुनाईट एट एलेवेन ... कीप वाचिंग हिस्टरी चैनल'| अपने सारे कपडे उतार कर वह आदमकद आईने के सामने खड़ा हो गया | काफी देर तक वह अपनी आँखों को गौर से देखता रहा | झूठ, एक झूठ उसे मोक्ष दिला सकता है , उसने नहीं सोचा था | यीशु ने जब कहा था कि पतितों के लिए भी मोक्ष है , तब वे झूठ नहीं कह रहे थे | फिर उसने सिगार अपने मुंह से लगा कर लाइटर जला दिया | कमरा एक धमाके से गूँज उठा | उसकी आँखों के समंदर में डोलती कश्ती गश खाती रही, उसे आज सही ठौर मिला, और वह मुस्कुराया |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;अगले रोज सलीन अकेली वैलिस के किनारे बैठी रही |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="background-color: #f3f3f3; color: #666666; font-size: small;"&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="background-color: #eeeeee; color: #666666; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="background-color: #f3f3f3; color: #666666; font-size: small;"&gt;नोट&amp;nbsp; : दी व्हाईट चैपल मर्डर मिस्ट्री, जैक दी रिपर नाम से मशहूर एक अनजान सीरियल किलर ने १८८८ में कुछ महिलाओं की अविश्वसनीय क्रूरता से हत्या कर दी थी |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;
&lt;span style="background-color: #f3f3f3; color: #666666; font-size: small;"&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-9175351629930782907?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/_c27lbQzIzE" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-03-04T16:34:30.808+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://2.bp.blogspot.com/-9SO-JvfcT2s/Tv5ILMBsFTI/AAAAAAAABWQ/EdIcbI8Ludg/s72-c/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%2528143%2529.JPG" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/12/blog-post_31.html</feedburner:origLink></item><item><title>मुर्दा</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/WL9OFkG8DY4/blog-post.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sat, 24 Dec 2011 17:21:25 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-7268956645754347807</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-I1vf_r2DH-0/TnV3aptQx8I/AAAAAAAAAx8/uycsXY2CZSA/s720/Circa%252520Art%252520-%252520Vincent%252520van%252520Gogh%252520%25252834%252529.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="277" src="http://4.bp.blogspot.com/-I1vf_r2DH-0/TnV3aptQx8I/AAAAAAAAAx8/uycsXY2CZSA/s400/Circa%252520Art%252520-%252520Vincent%252520van%252520Gogh%252520%25252834%252529.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिंदगी एक अवसाद है | एक मन पर गहरा रखा हुआ दुःख, जो सिर्फ घाव करता जाता है | और जीना , जीना एक नश्तर है , डॉक्टर |&lt;br /&gt;
ऐसा नहीं है, मेरी तरफ देखो , देखो मेरी तरफ | आँखें बंद मत करना | जीना , जीना है , जैसे मरना मरना | जब तक ये हो रहा है, इसे होने दो | इसे रोको मत |&lt;br /&gt;
तो आप ऐसा क्यों नहीं समझ लेते कि अभी मौत हो रही है है , इसे भी होने दो | मुझे मत रोको |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डॉक्टर , लोग कितने गरीब हैं, भूखे सो जाते हैं , भूखे मर जाते हैं | तुम्हें एक मेरी जान बचाने से क्या मिलेगा ?&lt;br /&gt;
तुम जानना चाहते हो , मेरे दिल में उन लोगों के लिए कितनी हमदर्दी है ? जरा भी नहीं | मरने वाले को मैं खुद अपने हाथों से मार देना चाहता हूँ | जब कभी सामने सामने किसी को मरता हुआ देखता हूँ , तो बहुत आराम से उसकी मौत देखता हूँ | जैसे परदे पर कोई रूमानी सिनेमा चल रहा हो | मुझे मौत पसंद है , मरने की हद तक |&lt;br /&gt;
फिर मैं क्यूँ डॉक्टर ! मुझे क्यों बचा रहे हो ?&lt;br /&gt;
क्यूंकि , मैं खुद को बचा रहा हूँ , अपनी आत्मा का वो हिस्सा बचा रहा हूँ , जिसे मैंने खुद से कई साल पहले अलग कर लिया था | अपने बेटे को बचा रहा हूँ, जिसे मैं बचा नहीं पाया | &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;अ&lt;/span&gt;पने अन्दर एक ऊर्जा सी महसूस कर रहा हूँ , बावजूद इसके कि मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया है | इसे एब्सर्ड एनर्जी का नाम दूंगा मैं | शाम घिरने का इंतज़ार कर रहा हूँ, ताकि मैं फिर वापस होस्टल जाकर खाना खा सकूँ | बस बैठा हूँ, यहाँ चट्टान पे देखते हुए सामने घाटियों में लगे चीड़ के पेड़ | डूबते सूरज की ओर बैठा हूँ पीठ करके या जिंदगी ने शायद सिखा दिया है ये सब | तुम एक पल को याद आते हो और मैं दूसरे पल चीड़ के जंगल में नामालूम सी कुछ आवाजें ढूंढता हूँ | जैसे तफ्तीश कर रहा हूँ कि हाँ, मैं एक दुनिया में रहता हूँ | ऐसे ग्रह में जहाँ आज भी जीवन है | पत्तों की सरसराहट, बियाबान में उड़ती चिड़िया, कोई तो दिखे, मेरे अहसासों को नम कर दे जो | हम वक़्त के दो टुकडो की तरह हैं, जो कभी नहीं मिलते | एक समानांतर चलती हुई जिंदगी, जैसा वे होलीवुड की साइंस फिक्शन फिल्मों में दिखाते है | तुम 2006&amp;nbsp; हो और मैं 2011&amp;nbsp;, लेकिन दोनों हैं, बीता कोई नहीं , गुज़रा कुछ नहीं | तुम्हारे 2006&amp;nbsp; वाले संस्करण में मैं नहीं, मेरे 2011&amp;nbsp; में तुम कहीं खो गए | क्या वक़्त ऐसे ही चलता है , हर वक़्त |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्यास ... कभी ख़त्म नहीं होती | और, और, और बढती जाती है | तुम्हें आखिरी बार देखना, जैसे आखिरी बार देखना हो जाता है | बार -बार चुभता है | क्या कहूँ ? कैसे इस बात को लिखूं, या सोचूं ? कि तुम्हें समझा सकूँ | एक खंजर की तरह, नहीं... नहीं... नहीं, खंजर नहीं, चाकू या कोई और धारदार चीज जैसा कुछ नहीं | स्टॉप बीइंग मेलोद्रमाटिक शैली, तुम कह उठोगे | नहीं, कोई खंजर या चाक़ू नहीं, लेकिन एक अजीब खिंचाव है | एक अजीब सा ख़याल है | तुम्हारा मेरी जिंदगी से जाना तुम कभी नहीं समझ पाओगे | ये कुछ ऐसा है जैसे दुनिया से सब लोग चले जायेंगे | उनकी निशानियाँ, फोटोग्राफ्स, रिकार्डेड आवाजें, टेलीविजन और रेडिओ आवाजें सब | और मैं बेसहारा, एक कमरे से दूसरे कमरे और एक घर से दूसरे घर भाग रहा हूँ | मुझे पता भी नहीं मैं क्या ढूंढ रहा हूँ | मुझे नहीं पता मैं कहाँ था और कहाँ आ गया हूँ | कौन रहता था इनमें ? क्या इन्हें घर कहते हैं ? क्या इनमे कोई जीता जागता कुछ था ?? क्या था ये ? क्या है ये? क्या सवाल है ? मैं क्या हूँ ? मैं चीख रहा हूँ, जाने क्या कोई भाषा है ? जाने क्या कोई आवाज ही है ? नहीं पता ? जो मेरी आवाज सुन सकता है, जवाब दो ... जवाब दो मुर्दों, कि मैं यहाँ सवालों को नहीं पहचानता |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बचपन में देखे हुए कुछ रंग याद हैं, जिनका तब नाम पता नहीं था | बस एक चमत्कार की तरह आँखों में कौंधा करते थे | अब रंगों के नाम ढूंढ सकता हूँ पर रामधेनु अब नहीं दिखता | कोई चमत्कार नहीं होता, मासूमियत पर कलम चुभो दी हमने, खून की नीली लकीर कागज़ की गन्दी संकरी नालियों से बह रहा है | भागा भागा स्कूल से मैं आया तो पता चला दिलीप भैया जा चुके थे | आज दिलीप भैया गाँव जाने वाले थे, इजा ने कहा कि भैया तुम्हारे स्कूल से आने के बाद जायेंगे, इसी वायदे पर मैं आज की परीक्षा में गया था | मैं भागकर उनके घर गया | घर का दरवाजा खुला था, अंकल बाहर थे | कमरा वैसा ही लग रहा था, जैसा किसी के जाने के बाद लगना चाहिए | अलमारी में रखी किताबें और गाने के कैसेटों की जगह खालीपन पसरा हुआ था | एक तरफ गोल करके रखा हुआ बिस्तरबंद भी गायब था | दो दिन से सारा सामान भी समेट लिया गया था | लेकिन तब महसूस नहीं था कि जाना क्या होता है, महसूस नहीं हुआ कि वे सचमुच चले जायेंगे | आज अचानक खाली जगह देखकर महसूस होता है वे वाकई चले गए हैं | और हाँ, जाना होता किसी का चले जाना | उसका तुम्हारी जिंदगी से एक हिस्सा अपने साथ लेके जाना | कई बार चीजें कैसे वजूद की जगह घेर लेती हैं | जैसे हमारा वजूद भी सिर्फ एक चीज हो... जो अगर है तो पास है, पास नहीं है तो जैसे है ही नहीं | चले तो भैया बहुत पहले ही गए थे, लेकिन चीजें वहीँ थीं, आज चीजें भी नहीं थीं | इजा ने कहा कि वे वापस आयेंगे | लेकिन जैसे मेरा दिल मुझे बहुत पहले ही बता चुका हो कि वे वापस नहीं आयेंगे |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वो मेरी जिंदगी का पहला खोना था | मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ मुझे खोने की आदत है | चीजों को, लोगों को ... खुद को तो बहुत बाद में सीखा | दिलीप भैया की पहली चिट्ठी अलका दीदी तक मैंने ही पहुंचाई थी, और अलका दीदी की शादी का कार्ड दिलीप भैया के घर देने के लिए मैं ही गया था | मुझे याद है जब दिलीप भैया शर्ट निकालने के लिए अलमारी खोलते थे तो उसमे से एक अजीब सी खुशबू आती थी, सूख चुके गुलाबों के जैसी | खिड़की पर अटकाए शीशे पर वो करीने से बाल संवारते थे, और आगे हल्का सा पफ देते थे | भौहों को ऊपर करके देखते थे | फिर आईने में मुझे देखकर हँसते थे, एक हलकी हंसी | मैं स्कूल से घर आते ही, उनके घर भागा चला आता था, उन्हें देखने के लिए | इजा की मुझे घर पर रोकने की तमाम कोशिशें नाकाम होती थीं | मैं हर काम जल्दी जल्दी निबटा देता था, ताकि इजा मुझे दिलीप भैया के घर जाने दे | भैया अक्सर शाम को घूमने जाने के लिए निकल रहे होते थे | उन्हें तैयार होते हुए देखना मेरे लिए किसी चमत्कार की तरह था, कई रंगों की तरह जो अचानक आँखों में कौंधा करते हैं | एक शाम दिलीप भैया आये तो काफी खुश थे | मुझे बांहों में लिया, घुमा कर हवा में उछाला | अंग्रेजी में कुछ कहा जिसमें मुझे सिर्फ डार्लिंग ही समझ आया, मुझे बहुत शर्म आई, जैसे किसी ने मुझे कोई गलत काम करते हुए पकड़ लिया हो | मुझे कुर्सी पर बिठाकर उन्होंने हलके से आवाज में कोई गीत चला दिया | जिसके बोल मुझे याद नहीं लेकिन संगीत जैसे आज भी कानों में गुनगुनाता हो | वे खुद आँखें बंद करके लेट गए | "ओह आई एम् इन लव !" उन्होंने जैसे गुनगुनाते हुए कहा | मैं उनकी किताबों से खेल रहा था | उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया | "आज मैंने एक लड़की को चूमा है |" उन्होंने कहा | मैं शर्म में डूब गया | "तुम जानते हो लड़की को चूमना क्या होता है ?" मैंने शर्मिंदगी को एक हद तक ढकते हुए नहीं में गर्दन हिलाई | "आज जाना है मैंने भी | एक नशा है, मरने से पहले एक घूँट दुनिया की सबसे नशीली शराब पीने जैसा है | एक भरोसा जिन्दा रहने के लिए | तुम अभी बहुत छोटे हो, तुम नहीं जानते, जब तुम बड़े होओगे तुम्हें किसी से प्यार होगा तो तुम समझोगे |" मैं कभी नहीं समझ पाया |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक छोटी सी चोरी मैंने की है | मैंने आपकी एक चिट्ठी पढ़ी है भैया | मुझे इस बात का कई दिन तक डर लगा रहा कि आपको पता चल जाएगा | बहुत दिन तक जब आप कुछ नहीं बोले तो मुझे लगा कि आपको पता चल गया | पर आप बहुत दिन से गुमसुम थे, कुछ बोल ही नहीं रहे थे, इसलिए मैंने अलका दीदी की एक चिट्ठी जो उन्होंने आपके लिए भेजी थी ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;प्रियतम,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;आप हमें समझेंगे और हम पर नाराज नहीं होंगे | हम खुद भी तो छुप छुप के रो रहे हैं, लेकिन आंसू किसी को नहीं दिखा सकते | क्या हमारा प्यार इतना खुदगर्ज़ हो जाएगा कि हम दूसरे किसी के सुख दुःख की परवाह ही नहीं करेंगे | आप हमारे अनमोल धरोहर की तरह रहेंगे | किसी को हम ऐसा तोहफा दिखा भी नहीं सकेंगे , जिंदगी भर लेकिन आपकी यादों को सीने से लगा के रहेंगे | रातों को जब सब सो जायेंगे तो हम चुपके चुपके रोया करेंगे | और इस उम्मीद में खुद को तसल्ली देंगे कि उस घडी हमें कोई जुदा नहीं कर सकता |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;तुम्हारी और हर जनम में तुम्हारी,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;अलका&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;
अलका दीदी को मैंने सिर्फ हँसते हुए ही देखा था, उसके पहले भी और उसके बाद भी |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँव से रमेश भैया आये थे | मैं जब घर पहुंचा तो उन्हें देखकर मुझे कोई ख़ास ख़ुशी नहीं हुई, मैं उन्हें ज्यादा पसंद नहीं करता था | उन्होंने आते ही मेरी तरफ देखते हुए हलके से मुस्कुराते से कहा | "शैली, दादी मर गई |" दादी मर गई, तीन शब्दों में ही किसी की जिंदगी कैसे ख़तम हो जाती है | शाम को हम चारों भाई बहन, सुमित के घर खाने पर गए | सुमित की माँजी हमें लेने के लिए आई | घर पर उस रात खाना नहीं बना था | इजा ने कहा कि जब घर में कभी मौत होती है तो उस रात खाना नहीं पकता है | इजा और पिताजी ने उस रात खाना नहीं खाया | अगले दिन पिताजी हमें बाल कटवाने के लिए ले गए | इस रास्ते गंगा की तरफ मैं कभी नहीं आया था | पिताजी ने अपने दाढ़ी बनाने वाले उस्तरे से हमारे बाल काटे | मैं रो रहा था, मुझे काफी दर्द महसूस हो रहा था | पिताजी बोलते जा रहे थे, तू रो बेटा | बहुत प्यारी थी तेरी दादी | तुझे बहुत मानती थी | जब भी तू गाँव जाता था तो तुझे शहद खिलाती थी | मुझे सब कुछ पता था लेकिन पिताजी क्यों सब दोहरा रहे थे, मुझे बेहद अजीब सा लग रहा था | गंगा का वो किनारा आज भी मेरे डरावने सपनों में आता है | इतना दर्द तो तुझे सहना ही होगा बेटा | किसी अपने के लिए दर्द सहना होता है | माँ अपने सब बच्चों को बराबर प्यार देती है | बस कुछ बच्चे उस प्यार से वंचित रह जाते हैं | माँ गाँव में मर जाती है और बच्चे को पता भी नहीं चलता | गर्मी की हलकी सी लकीर मेरे कान के पास से बहने लगी | पिता के हाथ रुक गए थे , मैंने पीछे मुड़कर देखा |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे दादी के प्यार के बारे में कुछ ख़ास पता नहीं था | हाँ, पर गाँव जाने पर दादी जरुर मुझसे भजन सुनती, गीता सार सुनाने को कहती, और सबसे ख़ास चीज जो मुझे याद थी वो था उनका संदूकची में रखा हुआ शहद का जार, जिसके अन्दर वो ऊँगली डुबाती थी, थोडा ऊँगली को घुमाकर गाढ़ा पीला रसीला द्रव्य निकालती थी, और मेरी हथेली पर धर देती थी | शहर में कुछ खिलाता नहीं है तेरा पिताजी तुझको , बार बार यही बोलती थी | अरसे बाद मैंने इजा से पूछा था कि क्या सचमुच दादी मुझसे बहुत प्यार करती थी | इजा ने मुझे ऐसी नजरों से देखा जैसे मैंने उनसे कोई ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रपति का नाम पूछ लिया हो, फिर धीरे से कहा, नहीं | तेरी दादी तुझे मार डालना चाहती थी जब तू पैदा हुआ था, उन्हें लगा था कि मैं तीसरी औलाद भी लड़की ही जनने वाली हूँ |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
"साले ! छक्के !" सुनील ने मेरे सर पर हाथ मारा | "जब मैंने तुझसे कहा था कि खिड़की वाली सीट मेरी है तो तेरी बैठने की हिम्मत कैसे हुई |" मुझे पता था ऐसा कुछ होने वाला है | काफी देर तक खुद को समझाता भी रहा कि जब वो ऐसा कहेगा तो मैं क्या करूँगा | लेकिन उसके ऐसा करते ही मैं खुद को नहीं रोक पाया और रोने लगा | मुझे वो सारे दिन याद आये जब बचपन से लोग मुझे चिढाते रहते थे | सुनील मेरे साथ मेरी ही क्लास में पढता था | पांचवी के बाद पिताजी ने मुझे जिस नए स्कूल में दाखिल किया था वो काफी दूर था और हमें लाने ले जाने के लिए एक गाड़ी का बंदोबस्त भी | उसी में कुछ नए दोस्त भी बने थे | सुनील अपने घर से पिता के पैसे चुरा के लाता जिसे हम लोग विडियो गेम पार्लर और चोकोबार खाने में उड़ा देते | एक दिन हम लोगों की गाड़ी छूट गयी | मैं पैदल चलते हुए घर पहुंचा | इजा देहरी पर ही बैठी थी | मैं गर्दन झुकाए घर के अन्दर घुसा | इजा ने मेरी तरफ देखे बिना कहा, आ गया तू, ले खाना खा ले, ठंडा हो गया है | मैं फिर गरम कर दूँ | मैं जब किचन में बैठा , तो मैं गर्दन नीचे किये हुए था | जितनी कोशिश कर सकता था इजा से नजरें बचाने की, उतनी कोशिश कर रहा था | "तुझे आज इतनी देर क्यूँ हो गयी" इजा का पूछना था कि मैं रोने लगा | जोर जोर से रोने लगा | रोते रोते मैंने उन्हें बताया कि सुनील घर से पैसे चुरा के लाता है और हम सब लोग उसके पैसों से चीज खाते हैं | इजा कुछ नहीं बोली, लेकिन मैं रोता रहा, गुस्सा होता रहा | अगले दिन से मैंने सुनील के इन सब कामों में साथ देना बंद कर दिया | अगले दो साल तक मैं शाम को स्कूल से आने के बाद हर रोज चार लोगों से लड़ता रहा | हर रोज, बिना रुके, हर रोज़ ... लेकिन मैंने हार नहीं मानी | स्कूल ख़तम होने के बाद, गाड़ी में जाने से पहले मैं खुद को तैयार कर लेता था कि मुझे लड़ना है | मैं रोता था, लड़ता था | मार खाता था, और फिर लड़ता था | बोबी और मैं बचपन के दोस्त थे, और बोबी भी उन चार लोगों में था | ये रिश्तों से मेरा पहला तल्ख़ परिचय था | और मेरी पहली हत्या,&amp;nbsp; मेरे भोलेपन की |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
"गोविन्द, घर से भाग गया है | आजकल किसी नागनाथ मंदिर के साधू के यहाँ डेरा जमाया है | दिन भर चिलम चढ़ाए पड़ा रहता है |" पिताजी, इजा को ये सब बता रहे थे | "इस बार उसने नया ड्रामा किया | जब उसको कमरे में बंद किया तो उसने सारे कपडे फाड़ के फेंक दिए और खिड़की के रास्ते कमरे से भाग आया | पूरे गाँव भर में नंगा घूमा |" मेरे सामने गोविन्द चाचा का चेहरा घूम गया | घर के सारे बच्चों में से चाचा सिर्फ मुझे पसंद करते थे | इजा इसका कारण बताती है, चाचा इजा को बहुत मानते थे, बहुत ज्यादा | और चाचा ने इजा से कहा था, "भाभी तुम्हारी ये संतान दुनिया में तुम्हारा नाम करेगी | आज इसके परताप से मेरी जान बची है |" चाचा जिस बस से घर आ रहे थे वो खड्डे में गिर गयी, बच गए खुशनसीब लोगों में चाचा भी थे | चाचा, ये अंदाजा नहीं लगा सके कि मर गए लोगों के घरवालों के लिए मैं अँधेरा लेके आया हूँ | जब मैं बहुत छोटा था तो चाचा इजा से कहते कि भाभी जैली के साथ मैं सोऊंगा | इजा हंसती और पूछती कि तू अपने बच्चों के पास क्यों नहीं जाता | उनके बिस्तर से बदबू आती है, चाचा जवाब देते | "अबे जैली |" चाचा मुझे इसी नाम से बुलाते थे | जब भी गाँव जाता था | चाचा हमेशा कुछ नयी किताब मुझे देते थे, ज्यादातर वे होती थी जो मुझे मुझसे दो कदम आगे के लगती थी | अभी इस बार वे कविताओं की कोई किताब लाये थे, जिसमें मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी | महादेवी वर्मा ?!?&amp;nbsp; &lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Mangal; font-size: x-small;"&gt;यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है, &lt;br /&gt;
सुधि से सुरभित स्नेह-धुले, &lt;br /&gt;
ज्वाला के चुम्बन से निखरे है; &lt;br /&gt;
दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना! &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
महादेवी वर्मा ?!? मुझे आज तक कवितायें समझ भी नहीं आई | एक पहेली जैसी हैं, बस पहेलियों की तरह ही मुझे आकर्षित करती रही | उन पहेलियों की तरह जिनका जवाब मैं कभी ढूंढ नहीं पाया | जैसे, गोविन्द चाचा का नाम आने पर इजा चुपचाप रह जाती हैं | कोई प्रतिक्रिया नहीं देती | जैसे, गोविन्द चाचा का मुझे देखकर एकदम गले से लगा लेना | रोते हुए कहना, मैं बहुत पहले ही दुनिया छोड़ देता, लेकिन तू, तू मुझे नहीं जाने देगा | मैं अविचलित खड़ा रहता | गोविन्द चाचा क्यों मेरी वजह से रुके हैं ? वे दुनिया छोड़ के जायेंगे कहाँ ? क्या वे मरने की बात कर रहे हैं | ये सब भी पहेलियाँ थी |&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Mangal; font-size: x-small;"&gt;लौ ने वर्ती को जाना है &lt;br /&gt;
वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने &lt;br /&gt;
रज का अंचल पहचाना है; &lt;br /&gt;
चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना!&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Mangal; font-size: x-small;"&gt;जब यह दीप थके तब आना।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
"मैं कभी किसी के काम नहीं आ सका |" पिताजी रो रहे थे, मैंने पिताजी को रोते हुए दूसरी बार देखा था | मैं समझ गया था कि क्या हुआ होगा | दादाजी के मरने की खबर गाँव से आई थी | लेकिन इस बार पिताजी अपने आंसू छुपाने की कोशिश नहीं कर रहे थे | मैं चुपचाप बाहर किसी सलून में जाकर बाल कटा आया | "मैं हमेशा अपने घर परिवार में इतना उलझा रहा कि अपने माँ-बाप की सेवा भी नहीं कर सका |" पिताजी का श्रवण - स्वप्न जारी था | चार साल से घिसटते दादा को देखकर हर किसी ने यही कहा था कि भगवान् करे उन्हें जल्दी मौत आ जाये | अच्छे भले बुढापे में खुद चलकर सत्संग करने जाते थे | एक दिन अचानक उनकी रीड की हड्डी खिसकी और उसके बाद वे हमेशा के लिए अपने शरीर में कैद हो गए | इतने अच्छे लोगों के साथ, जो दिन रात उसका नाम सुमिरन करते हैं, भगवान् भी कैसा अन्याय करता है | है न ? उन्हें उनके पैरों पे खड़ा करने की मैंने और सुधी ने बहुत कोशिश की | लेकिन ये नामुमकिन काम था | इजा ने जीते जी उन्हें कभी स्पर्श नहीं किया | चरणों को प्रणाम भी दो गज दूरी की जमीन छूकर किया | वही इजा अब उनका गू-मूत साफ़ करती थी | मैंने यह सब करने से साफ़ मना कर दिया | दादा को भूलने की बीमारी भी घिर आने लगी | अक्सर उन्हें अपने बीते दिनों के आम के बगीचे की याद आती जो शायद उनका दिवा स्वप्न रहा हो, जो कभी पूरा नहीं हुआ | इन्हीं दिनों मैंने अपने दिवा स्वप्न शुरू किये थे, और मुझे अपने बारे में जो बात पता चली उसने मुझे खुद अन्दर तक डरा दिया | &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इजा के सिरहाने बैठा था | इजा ने आँखें खोली, "अभी तू मुझे मार डालने की कोशिश कर रहा था, अभी मेरे सिरहाने बैठा है ? लाड़ जता रहा है ?" इजा की आँखें मुझे खुद से डरा गयी | सामने काले शीशे पर मेरी काली परछाई बन रही थी | "इजा! ये मैं हूँ | तेरा शैली" किसी तरह हिम्मत जुटाकर मैंने कहा | इजा फिर से सो गयी | मैं रोने लगा, बस अब एक जमाने से मेरे आंसू बाहर दिखने बंद हो गए थे | "शैली ! शैली !" इजा फिर से उठी | "जा बेटा थोडा धूप बाल दे इस कमरे में |" मैं बाहर रिसेप्शन पर गया | मैंने नर्स से पूछा, "सिस्टर कैन आई हेव सम धूपस्टिक्स एंड मचेस, प्लीज़ !" "क्यूँ ?" नर्स ने मेरी तरफ देखा | "अक्चुली, पेशेंट को थोडा पूजा करनी है |" मैं धूप लेकर रूम पर गया | "तू आ गया" इजा ने कहा | इजा को बोलने में तकलीफ हो रही थी, फिर भी वे बोलती जा रही थी | "अभी उधर एक विडाल था, वहां |" मैंने इजा की नजरों का पीछा किया, वे पंखें पर अटकीं थी | "वहां से उसने छलांग लगाईं और खिड़की से बाहर | मुझे लगा कि वो मेरे ऊपर कूद जायेगी |" इजा अब मैं आ गया हूँ, मैंने खिड़की खोलने के लिए हाथ बढाया | "नहीं, नहीं खिड़की मत खोलना, वो यमराज है मेरे प्राण लेने को आया है |" एक ठन्डे डर ने मेरे कानों को जकड लिया | नहीं इजा नहीं, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा | मैंने झुककर इजा के बाल सूंघे | मेरी आँखों का गीलापन इजा के माथे पर तैर आया था | इजा डरो मत, अभी तो मैं धूप भी ले आया हूँ | और मैंने धूप जला दी | जब मैंने मुड़कर देखा तो इजा सो गयी थी | और अब मैं चैन से बैठ कर रो सकता था |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिता ने इजा को देखने से मना कर दिया | मुझे नहीं जाना उसके पास, मुझे ऑफिस जाने के लिए देर हो रही है | शीला, मीना ने जल्दी जल्दी खाना पकाया | उतनी देर तक इजा के पास सुधी बैठा रहा | फिर सुधी को भी स्कूल जाना होगा | मुझे कहीं नहीं जाना था, क्योंकि मैं इंजीनियरिंग कम्पीटीशन की तैयारी कर रहा था | आपका बेटा बहुत होशियार है, डॉक्टर ने इजा से कहा | "मैंने देखा है उसे, आपके पास बैठा रहता है, और अपनी किताब पढता रहता हो | तुम जरूर आई आई टी निकालोगे बेटा | जरूर | ब्लेस यू |" अगले इतवार को मेरा रिजल्ट आना था | जब मैं रिजल्ट लेकर घर आया तो इजा....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;strike&gt;इजा&lt;/strike&gt; ,&lt;br /&gt;
&lt;strike&gt;इजा&amp;nbsp;&lt;/strike&gt;&lt;br /&gt;
सुंदरी देवी, इजा जब पैदा हुई तो उनका यही नाम था |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और तब तुम मेरी जिंदगी में आये | मुझे खुद नहीं पता कि मैंने तुम्हें और तुमने मुझे कैसे चुना | बस ऐसे ही , एक नाजुक वक़्त में, शायद जिंदगी को मुझ पर रहम आया हो, या शायद उसके मजाक की पंचलाइन अभी बाकी थी | मुझे अंदाजा तो था, लेकिन मुझे यकीन नहीं था कि मैं ? पिताजी मुझे इस बात के लिए ताना मारा करते थे | घृणा से मुझे देखते थे | बहनें मेरी तरफ अजीब दया भरी नजरों से देखती थी | और सुधीन्द्र, मेरा छोटू सुधी वो मुझसे कटने सा लगा था | पिताजी ने मुझे धमकी दी कि वे अपनी जान ले लेंगे अगर उन्होंने दुबारा ऐसा कुछ मेरे बारे में सुना | उस वक़्त मुझे महसूस हुआ कि दादी मेरी जान लेकर मुझपे शायद एक अहसान ही करती | वो वाकई मुझसे बहुत प्यार करती थी | दादा -दादी, गोविन्द चाचा, इजा, पिताजी, मैं जिन्दा लाशों और मुर्दा लाशों के बीच जी रहा था | तुम क्यूँ मेरी जिदगी में चले आये ? नहीं .. नहीं .. ये सवाल तुम्हारे लिए वाजिब नहीं है | मुझे खुद से पूछना चाहिए कि भगवान् ने मुझे क्यूँ ऐसा बनाया ? मुझे याद है, जब पहली बार तुम्हारे होंठों को छुआ था | अन्दर बहुत कुछ टूटा था, एक चिड़िया को जैसे पिंजरे से खोल दिया हो और वो नहीं समझ पा रही हो कि जाए तो कहाँ जाए | मैं यही था, यही था मैं, तुमने बस मुझमे सांस भर दी | मैं जी भर के रोया था, उस वक़्त भी और घर आकर भी | जब घर आकर मैंने गुलाम अली चलाया था | तो मुझे अचानक दिलीप भैया याद आये, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Mangal; font-size: x-small;"&gt;खेंच लेना वो मेरा परदे का कोना दफ्फतन,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Mangal; font-size: x-small;"&gt;और दुपट्टे से तेरा वो मुंह छुपाना याद है |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Mangal; font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
'आज मैंने एक लड़की को चूमा है | तुम जानते हो लड़की को चूमना क्या होता है ?' मैं नहीं जानता दिलीप भैया | मैं कभी नहीं जान पाऊंगा |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिर एक रोज मेरे नाम तुम्हारा ख़त आया था , वही ख़त जो मैंने चोरी से पढ़ा था |&lt;br /&gt;
&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;शैली ,&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;यू विल ट्राई टु अंडरस्टेंड मी , एंड प्लीज़ डोंट गेट अंग्री | आई आल्सो डोंट लाइक इट दिस वे, बट कांट शो एनीवन माय हार्ट | वी डोंट वांट टु बी सो सेल्फिश देट इट रुइंस अदर'स लाइफ | यू आलवेज़ अ ट्रेजर तो माय लाइफ , अ प्रेसेंट फ्रॉम देट आलमाइटी व्हू मेड अस दिस वे | अ ट्रेजर , व्हिच आई कांट शो नो वन , बट विल कीप फोरेवर क्लोस तो माई चेस्ट | वी विल क्राई व्हेन दी वर्ल्ड विल फाल अस्लीप, एंड वे विल कीप रीमाइन्डिंग अवरसेल्व्स ओनली डेथ कैन कीप अस अपार्ट&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;फोरेवर यौर्स,&lt;/div&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;विक्की&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;
एक चिड़िया जो उड़ती रहती है, इस उम्मीद में कि कहीं उसे उसका खोया हुआ झुण्ड वापस मिल जाए या भरी दुपहरी झाड़ियों के बीच जगह बनता अलमस्त हिरन, अचानक किसी शिकारी की आहट पर हलके से कानों को हिलाता है | दरवाजे की देहरी के पास बैठा कुत्ता जो हर आने जाने वाले पर भूंकता हो , ताकि उसकी तरफ भी इस व्यस्त दुनिया का ध्यान जाए | बीहड़ में बने मंदिर में चिलम चढ़ाता साधू | खाली पड़ा हुआ टिन शेड, एक दूर इकलौता सा अँधेरे में टिमटिमाता दिया | या डाक बंगले के भुतहे कमरे, जहाँ एक कमरे से दूसरे कमरे में एक पूरी जिंदगी का फासला रखा हो | एक अलमारी जिसके तहखाने में कैद हो कई ऐसे दस्तावेज जो खुले तो रिश्तों का भरोसा डिगा दें | एक बचपन में छुपकर की हुई बुरी हरकत हो जुबान पर आने से पहले ही चिपक जाती है तालू की किसी खोह में | एक रूखी शाम, जब जिंदगी ख़त्म करने की इच्छा सबसे प्रबल होती है | या एक बेतरतीब भागती हार्ड म्यूजिक की रात, जब नाचते गाते हुए जैसे अपने अंतर पर रखे बोझ से आँखें मूँद रहे हों , बेशक उसे हटा नहीं सकते | बेहोशी के आलम में होश खो बैठने का जिद्दीपना | देर रात अँधेरे में अपनी आत्मा को छुपाना खुद की ही नजरों से, या खूब चकाचौंध ताकि चेहरे की कालिख कोई फेस क्रीम जैसी निखर कर आये | जब लाइब्ररी को जाना जिंदगी से पलायन हो जाए, जब सिनेमा एक हारे हुए जुआरी का दांव हो | जब गम करना एस्केपिस्म हो जाए, जिंदगी ऐसे मोड़ पर क्यूँ आ जाती है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा,&lt;br /&gt;
शैलेन्द्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पी. एस. : आज मैंने दूसरी बार खुद को मारा है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विक्की आहिस्ता क़दमों से अंदर आया | "क्यों?... क्यों" उसने एक बार फिर खुद से पूछा, जैसे जांच लेना चाहता हो कि जो कुछ वह पूछ रहा है, उसका कुछ मतलब भी बनता है या नहीं | मुर्दे जवाब नहीं देते, सो सवाल पूछने का मतलब नहीं बनता था, इसलिए उसने फिर नहीं पूछा | वह चुपचाप एक कोने में बैठ गया | अपने अंगूठे और तर्जनी के बीच की जगह को दांतों के बीच कसकर काट लिया, लेकिन उसके आंसू नहीं निकले |&lt;br /&gt;
'अगर तुम्हें मरना ही था, तो मुझे क्यूं बताया ? चुपचाप मर जाते |' उसके होंठ फडफडा रहे थे | तुमसे पहले भी तो कई लोग मरे हैं | आगे भी मरते रहेंगे |' वह एक पल को चुप हुआ, उसने नजरें फेर लेनी चाही, लेकिन नहीं कर पाया | शैली जब चुपचाप सोता है तो बहुत प्यारा लगता है | बिलकुल जैसे कोई छोटा सा बच्चा | 'या चुपचाप जिन्दा रहे हैं, एक मुर्दे की सी जिंदगी जीते रहे | तुमने ऐसा क्या झेला है ? हाँ ठीक है, लोग मरते रहे तुम्हारे आसपास, मरते रहेंगे | फिर? क्या फर्क पड़ता है, जब तक हम जिन्दा है, हमारी साँसे चलती हैं | कल तुम जिन्दा थे, मुर्दों को देखते थे | आज मैं तुम्हें देख रहा हूँ | क्या फर्क पड़ेगा ? मैं जिन्दा रहूँगा | जीता रहूँगा | और तुम्हें और चिढाने के लिए जिन्दा रहूँगा | मैं जिन्दा रहूँगा, और देखूंगा कि एक दिन हम जैसे लोगों को पाप नहीं समझा जाएगा | और मैं बखुशी जिंदगी गुजारूँगा | घर बसाऊंगा, रहूँगा इसी अनैतिकता के नैतिक होने के इंतज़ार में | या खुद ही कोशिश करूँगा, ये सब बदलने की |'&amp;nbsp; &lt;br /&gt;
वह तेजी से चलते हुए उसके पास आया | उसके मन में आ रहा था कि उसे झकझोर दे | बेतहाशा उसे मारे, लेकिन वह ठिठक गया | उसके कान के पास जाकर सिर्फ इतना ही कहा - &lt;br /&gt;
'लेट मी टेल यू समथिंग, कीप दिस थिंग इन युअर फकिंग डेड ब्रेन | तुम हर बार हारे हो मिस्टर शैलेन्द्र मेहरा |'&lt;br /&gt;
'नोट दिस टाइम !' मुर्दा जिस्म के होंठों पर हलकी सी सिहरन हुई, और उसने आँखें खोल दी |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-family: Mangal; font-size: x-small;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-7268956645754347807?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/WL9OFkG8DY4" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-12-25T06:51:25.232+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://4.bp.blogspot.com/-I1vf_r2DH-0/TnV3aptQx8I/AAAAAAAAAx8/uycsXY2CZSA/s72-c/Circa%252520Art%252520-%252520Vincent%252520van%252520Gogh%252520%25252834%252529.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/12/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>धुंध, सिगमंड फ्रायड और शाम का सूर्योदय :चौथा भाग</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/l4YQFCSpAIk/blog-post_21.html</link><category>कहानी</category><category>सिगमंड फ्रायड</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Fri, 25 Mar 2011 01:58:36 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-3267339991908097756</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s1600/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s400/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" width="317" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/03/blog-post_14.html"&gt;[पिछला भाग]&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मणिभ! यहाँ से हमने स्पाइडर क्लब की शुरुआत की थी | याद है ? " अलग ने मुझे फ़्रोग-हिल के दूसरी तरफ की खाई दिखाई | ७०-८० फीट की खड़ी ढलान | असल में हम ऐसे ही नीलकंठ छात्रावास के पास&amp;nbsp;जंगल में घूम रहे थे, जो अलग और मेरा रविवार का कार्यक्रम रहता है | उसी वक़्त हम इस चोटी&amp;nbsp;के नीचे खड़े थे | नीचे से हमें पता भी नहीं चल रहा था कि हम फ़्रोग-हिल के नीचे खड़े हैं | चुनौती ? मैंने और अलग ने मन ही मन सोचा | अगले ही पल हम उस पर चढ़ने की कोशिश करने लगे | ये एक खतरनाक फैसला था क्योंकि खड़ी चढ़ाई होने के साथ साथ नीचे सीधी खड़ी छोटी छोटी नुकीली चट्टानें भी थी | जब हम शिखर पर पहुँचने वाले थे, वहां पर हम फंस गए | नीचे देखने की हिम्मत नहीं थी, उतरना तो दूर की बात थी | ऊपर चढ़ने के लिए कोई सहारा नहीं था | लेकिन ऊपर चढ़ना ही था, और कोई रास्ता नहीं था | नीचे से अलग लगातार पूछ रहा था, अबे रुक क्यों गया | आखिर कुछ सोचकर मैंने पूरे शरीर का संतुलन एक पाँव पर बनाया | शरीर को मोड़कर झुका लिया, और पंजों के बल उछल गया | अलग अक्सर मेरे &amp;nbsp;हाथों और आँखों&amp;nbsp;के तालमेल की तारीफ़ करता है, आज वो कसौटी पर खरे उतरने के लिए बेचैन थे | मेरी निगाहें दांयी तरफ उगे घास के एक गुच्छे पर टिकी थी | अगर थोड़ी देर के लिए मुझे सहारा मिल जाए ... मुझे यकीन था कि मैं इसे पकड़ लूँ तो ... अगले ही पल वो घास मेरे हाथ में थी और मैं और घास दोनों हवा में उखड़ चुके थे | घास के हाथ में आते ही मैंने दुबारा हवा में छलांग लगा दी | घास जड़ से उखड़ी, नीचे जा गिरी थी, लेकिन मेरी उँगलियाँ मिटटी की भुरभुरी&amp;nbsp;चट्टान के अन्दर धंस चुकी थी | और मैं सही सलामत ऊपर पहुँच गया | ऊपर पहुँचते ही मैं ठिठक गया, मैं फ़्रोग-हिल पर खड़ा था | ये एक तरह का सरप्राइज़ पैकेज था | खैर अलग के चिल्लाने से मुझे उसकी याद आई | जल्दी से उसे ऊपर निकाला |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"हमने नहीं, मैंने... तू सिर्फ एक सदस्य है |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ओ भाई ... मैं भी था यार फाउन्डर में |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ओके, ओके भाई .. मैं तो ऐसे ही ..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"अच्छा मणिभ, अगर उस दिन तू नीचे गिर जाता और मर जाता तो सबसे ज्यादा अफ़सोस किस बात का होता ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ऐसा हो ही नहीं सकता साले ..." मेरी पीठ में लेकिन सिहरन दौड़ गयी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"फिर भी ..." अलग मुझे जबरदस्ती धक्का सा देता रहा | अलग की इन्हीं हरक़तों और ऐसे सवालों की वजह से छात्रावास में ज्यादातर लोग उससे बचके निकलने की कोशिश करते थे |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"कुंवारा मरने का |" मैंने हँसते हुए जवाब दिया | मेरी हंसी में उसका कोई साथ नहीं था |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मणिभ, आज तुझे एक बात बताता हूँ ... वो बात जो मैं आज तक अपने आप से भी छुपाता हूँ |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"क्या ?" मैं आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगा | उसके इस तरह घुमाफिराकर बात करने की उम्मीद मैं नहीं करता हूँ | बात वो सीधी ही करता था, जब भी मुहावरेदार या आकर्षक बनाने की कोशिश करता, जगहंसाई करवाता | यहाँ पर मैं यह इकबाले जुर्म करता हूँ कि उसका मजाक उड़ाने में सबसे आगे मैं रहता हूँ | उसका चेहरा मेरे आश्चर्य से किंचित भी प्रभावित नहीं हुआ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मैं बचपन से साफ़ नहीं बोल पाता हूँ | इस बात को लेकर मेरा तब भी मजाक उड़ाया जाता था , और आज भी ..." अलग मेरी तरफ देखने लगा | उसकी नज़रों से बचने के लिए&amp;nbsp;मैं सामने चौखम्भा देखने की कोशिश में लगा हूँ, लेकिन धुंध आँखों पर छाई हुई है | मेरे न चाहने के बावजूद देखने का दायरा सीमित ही रहा | अलग मेरे उहापोह को तवज्जो न देकर जारी रहा, "मैं जब ग्यारहवीं में था तब एक लड़की हमारे विद्यालय में आई थी | दोस्त बनने बनाने का फैशन चल रहा था | मैं उससे दोस्ती करना चाहता था पर उसने मना कर दिया | उसके बाद मैंने बारहवीं बोर्ड में पांचवां स्थान हासिल किया और आई आई टी प्री निकाल लिया, तब वो मेरे पास आई ... दोस्ती करने ... उस वक़्त मैंने उसे ठुकरा दिया |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"साली... " मैंने अपनी घृणा प्रदर्शित की |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तुम इसे सही मान सकते हो जो कि मैं भी मानता हूँ, लेकिन मेरा दिल और मेरा भविष्य इसे सिरे से नकार देता है | उसके अगले साले मैं आई आई टी मेंस तो छोड़ो प्री भी नहीं निकाल पाया | कोई और स्टेट कॉलेज भी नहीं ... इन दोनों चीजों का कोई रिश्ता नहीं , लेकिन ऐसा उसी साल क्यों हुआ ? मैं आज भी उस वक़्त को कोसता हूँ जब मैंने इनकार करने का फैसला लिया था | तुम कह सकते हो कि ये मेरा वहम है ? लेकिन फिर ये वहम भी क्यों ? मैं आज भी सोचता हूँ कि क्या क्या हो सकता था | लेकिन फिर से भावनाओं को दबाकर जीने लगता हूँ | मैं चाहे कितना भी खुश हो लूँ, लेकिन एक अधूरापन सा लगता है |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वो चुप हो गया | हमारे बीच खामोशी फिर से पसर गयी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"जिंदगी हर वक़्त तुम्हारे हिसाब से नहीं चलती मणिभ | दूसरों को पढने की कोशिश में तुम खुद को पढ़ना भूल गए हो | अगर मनोविज्ञान में तुम्हारी इतनी ही रूचि है तो तुम्हें तुमसे बेहतर विषय नहीं मिलेगा |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक पल के लिए मुझे लगा अलग कोई पुरानी भड़ास निकाल रहा है | लेकिन उसकी बात काटने का मुझे साहस नहीं हुआ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तुझे याद है, वैभव के कमरे में जब वैभव तुझे अपने उपहार दिखा रहा था ... तो मैं भी वहां पे था | क्या कहा था तूने ? श्रद्धा को पता होना चाहिए कि तेरी  अभिरुचि के विषय क्या हैं ? क्या तुझे पता है कि श्रद्धा की अभिरुचि के विषय क्या हैं ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अलग जेब से सिगरेट निकाल चुका था |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"श्रद्धा ने तुझे डायरी दी है न ?" अलग ने सिगरेट होंठों के बीच दबा ली |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तुझे कैसे पता ?" मुझे आश्चर्य हुआ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेरे सवाल को नजरअंदाज करते हुए वो आगे बोला , "श्रद्धा को पता है कि तुझे लिखना पसंद है बिना ये सोचे कि उसे खुद लिखना पसंद है या नहीं |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुझसे कुछ कहते न बना , मुझे चुप देखकर अलग ने बातों के सिलसिले को खुद ही आगे बढाया , "तुम्हें उससे जवाब क्यों चाहिए ? क्यों तुमको ऐसा लगता है कि दुनिया में कोई किसी के लिए जवाबदेह है, जबकि तुम खुद किसी के लिए नहीं ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मन में सवालों के झंझावात से उलझा हुआ था मैं, एक ही चीज के कई पहलू थे | हर एक चेहरा , एक नई परत थी | मेरा असली चेहरा क्या है ? अलग ... क्या तुम मैं हो ?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तुझे पता है दर्द सहन किया जा सकता है , उसमें दुःख नहीं होता | दुःख तब होता है , जब लोग आपके दर्द को दर्द मानने से इनकार कर देते हैं | आज तू श्रद्धा से प्यार करता है | कल अगर तुम दोनों एक साथ नहीं होते हो ..." अलग ने पत्थर दूर हवा में फेंक दिया, "...तो तुम इस दर्द को झेल लोगे, मुझे पता है | पर तुम्हें तब बहुत दुःख होगा जब लोग तुम्हें समझाने लगेंगे कि ये सब होता रहता है | तब तुम्हारा दिल जानता है कि ये सब होता नहीं रहता, बल्कि एक छोटी सी बात, एक छोटा सा कदम, तुम्हारी एक छोटी सी कोशिश से सब बदल सकता था | जब जीवन तुम्हारा प्रारब्ध लिख रहा था, तब तुम जीवन लिख सकते थे | लेकिन मेरे भाई यही बात तुम पूरी दुनिया के सामने नहीं स्वीकार कर पाओगे | तुम सिर्फ जीते जाओगे , बिना ये सोचे कि कुछ बदल सकता था |" पत्थर नीचे घाटी की धुंध में नजर आना बंद हो गया था |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"कितना खतरनाक है ऐसा जीना, जिसमे एक तिलमिलाहट, एक बेचैनी हमेशा तुम्हारे हमकदम होगी , जिसकी कैफियत का अंदाजा तुम्हे नहीं होगा | है न ?"&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अलग की सिगरेट का काफी लम्बा इंतज़ार अपने मुकाम पर पहुँच गया था , लाइटर उसे जलाने के लिए निकाला जा चुका था |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तुम लोगों को प्यार कैसे हो जाता है यार ?&amp;nbsp;" अलग ने सिगरेट का धुंआ मेरे मुंह पर छोड़ते हुए कहा , "और हो जाता है , तो इतनी आसानी से छोड़ कैसे देते हो यार ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अलग मंदिर के आगे खड़ा था , मैं सही सही नहीं जानता कि उसने क्या कहा | लेकिन सिगरेट को उगलियों के बीच दबाकर उसने मूर्ती की तरफ कुछ इशारा सा किया | मैं मंदिर के पीछे खड़ा नीचे खाई की तरफ देख रहा था | &amp;nbsp; ०...१...३...# ...#...#...४३..#...#...# &amp;nbsp;रिंग रिंग...रिंग रिंग ... मुझे अपने धड़कते दिल की आवाज सुनाई दे रही थी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"हेलो ..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अपनी धडकनों को संयत करने में मुझे थोडा वक़्त लग गया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"हेलो रितु | श्रद्धा है क्या वहां पर ?" फोन रितु ने उठाया था, अक्सर किसी और के फोन उठाने पर मैं फोन काट देता हूँ | लेकिन इस बार ऐसा नहीं किया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दीदी तुम्हारा फोन आया है , गुहार लगाती रितु की आवाज मेरे कानों में गूँज रही थी | कुछ देर का इंतज़ार काफी बड़ा लग रहा था | क्या होगा ? अगर वो मुझसे बात नहीं करना चाहेगी तो ? करेगी भी तो ? क्या कहूँगा मैं ? क्या जवाब दूंगा मैं अगर ?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"हेलो " श्रद्धा की आवाज ने मुझे भिगो दिया था |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"श्रद्धा ..." मैं नहीं जानता कि मैं शुरुआत कैसे करना चाहता था ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"... ... ..." श्रद्धा सिर्फ खामोश थी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"कैसी हो ?" जितनी बातें सोच के रखी थी सब धरी की धरी रह गयी |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ठीक हूँ ..." जाने उसकी आवाज में अविश्वास सा क्यूँ भरा था | जैसे क्या वाकई मैं जो पूछ रहा हूँ, वो सुनना चाहता हूँ या नहीं |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"..." बातें मेरे पास ख़त्म हो चुकी थी या शायद लफ़्ज़ों की जरुरत नहीं थी , या साथ साथ कमाए ख़ामोशी के कुछ पल खर्च करने मुझे ज्यादा जरुरी लगे ?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तुम कैसे हो ?" श्रद्धा की आवाज मौसम में घुलने लगी थी , एक डरी हुई पौष की अकेली बूँद जैसी |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"श्रद्धा ! मेरे पास दो एस एम् एस आये हैं | तुम सुनना चाहोगी ?" मैं हिम्मत जुटाने लगा |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"हूँ..." वो अभी भी आशंकित थी , क्या मैं उससे इस तरह बात नहीं करता था कभी, खुद से भी सवाल चल रहे थे |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"अगर तुम किसी से प्यार करते हो तो उसे आज़ाद उड़ने दो ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अगर वो तुम्हारे पास आता है, तो वो तुम्हारा है ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अगर तुम्हारे पास नहीं आता, तो वो कभी तुम्हारा था ही नहीं ..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"लेकिन श्रद्धा उसी दोस्त ने मुझे दूसरा एस एम् एस भी किया है ..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"जब किसी क्षण तुम किसी को छोड़ देने की सोचते हो, बस एक बार , एक कारण तलाश लो कि तुमने इतनी देर तक उसे क्यों पकड़ा हुआ था |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मैं आज भी कारण ढूंढ रहा हूँ , श्रद्धा |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मणिभ..."उसकी आवाज हल्की सी कांपी, "मैं तुमसे&amp;nbsp;कोई&amp;nbsp;वादा नहीं कर सकती | तुम जानते हो हम दोनों का परिवार ... हम लोग किस&amp;nbsp;माहौल में ...?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"श्रद्धा ... मैं तुमसे कोई वादा नहीं चाहता , हाँ ... मैं तुमसे ये वादा करना चाहता हूँ कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मणिभ ... " अब आवाज के कांपने का डर शायद उसे नहीं रह गया था |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"हाँ ... "&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मैं ... मैं तुम्हें बहुत याद करती हूँ "&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मैं भी ..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"वैसे, तुम्हारे&amp;nbsp;लिए जन्मदिन का उपहार अभी भी मेरे पास रखा है | मुझे लगा था कि मैं तुम्हें कभी नहीं दे पाऊँगी ... जानते हो... क्या है ? मैं नहीं बताऊँगी... अंदाजा लगाओ |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं था , "कोई डायरी ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"नहीं, ये कोई ऐसी वैसी डायरी नहीं | वो पांच लाइन की डायरी है, वो जिसपे संगीत वाली भाषा लिखी जाती है | तुम्हारे विओलिन के लिए ..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं मुस्कुराया , मैं ये भी जानता था , बस जान बूझ कर पूरा अंदाजा सही नहीं लगाया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"...मैं ... तुम्हे खोना नहीं चाहती मणिभ " मैंने आसमान की ओर देखा | कोहरे की चादर हल्की पड़ गयी थी | सूरज धुंधला सा टिमटिमाने लगा था | पेंटिंग पूरी हो गयी थी |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;श्रद्धा से बात करके मैं काफी खुश हूँ | अलग और मैं चुपचाप वापस चल रहे हैं | मैं उम्मीद कर रहा हूँ कि अलग कुछ तो पूछे , लेकिन वो चुपचाप चलता जा रहा है |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"हे अलग ... शुक्रिया दोस्त " मैं तर्जनी और अंगूठे को समकोण पर रखकर अलग की ओर इशारा भी करता हूँ , लेकिन वो मेरी ओर ध्यान नहीं देता |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हॉस्टल में से गालियों की आवाजें आने लगी थी | चेहरे कमरों से बाहर दिखने लगे थे | रोहित अभी भी जिम कर रहा था |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"हे रोहित ... "&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;रोहित जिम करता रहा |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मर जाएगा साले , कपडे पहन ले&amp;nbsp;" मैं चिल्लाया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वो एक नजर मुड़कर मेरी ओर देखकर हँसता है , या मुस्कुराता है और फिर से हांफकर वजन उठाने लगता है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सामने के कमरे में लड़के अभी भी पढ़ रहे थे , "अबे पाइरेट्स ऑफ़ कैरेबियन का तीसरा भाग केदार छात्रावास में आ गया है , ला नहीं रहे ?" मैं सबके बीच में खड़ा होकर घोषणा जैसी करता हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सारे लोग वापस किताबों की तरफ झुक गए हैं , उनका स्वघोषित&amp;nbsp;प्रमुख मुझे जवाब देता है , "ओ भाई मणिभ ! पढ़ ले भाई ... २० से प्रायोगिक शुरू हैं |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस कमरे में भी कुछ नहीं बदला था | मैं अपने कमरे में घुसता हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"भाई.. याद कर तूने पेन्सिल मांगी थी शिवानी से, तब स्मृति ने तुझे दी थी |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ओये आकाश ! साले , पेन्सिल स्मृति से ही मांगी थी |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"भाई , तेरी हिम्मत नहीं पड़ी थी |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेरे कमरे में भी कुछ नहीं बदला था, लेकिन मेरी दुनिया पूरी तरह से बदल गयी थी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अचानक मेरे दिल में अपने हमदर्द के लिए दर्द उठा , और मैंने अलग से आखिरकार पूछ ही लिया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"अलग ! अगर आज वो लड़की तुझे मिल जाए तो क्या तू उससे कहेगा कि तू उससे प्यार करता है ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कमरे में यकायक सन्नाटा छा गया | अलग ?!? ... लड़की ?!? ... आकाश और रजत एक दूसरे की तरफ देख रहे थे |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तुझे क्या लगता है, मैं किसी से प्यार कर सकता हूँ ? ... वैसे ... कौन सी लड़की ?!?" अलग फिर मुस्कुराने लगा | उसके बदलते रंग में मैं उलझ गया था | क्या वो सच बोल रहा था थोड़ी देर पहले या कि अब ?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"कल रात तू नींद में श्रद्धा का नाम ले रहा था | इसलिए मैंने आज ये सब ड्रामा किया |" अपनी तरफ की खिड़की से वो घाटी में बसे श्रीनगर को देख रहा था | बारिश का देवता | &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"क्या ?!? " हैरान होने की बारी मेरी थी |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"क्या ?!?" आकाश और रजत की हैरानी की वजह दूसरी थी , "तू नींद में भी लड़की का नाम&amp;nbsp;बड़बड़ाने लगा ?" और रजत हंसने लगा |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"हा हा .. "अलग हंस रहा था , "हाँ , वैसे चिंता की कोई बात नहीं है | फ्रायड ने कहा है कि जो बात हमारे अवचेतन मस्तिष्क में होती है , हम वही रात को&amp;nbsp;बड़बड़ाते&amp;nbsp;हैं | अब तेरी उससे बात हो चुकी है , तो अब ये बोझ तेरे अवचेतन मस्तिष्क से हट गया है |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अलग मुस्कुरा रहा था |&amp;nbsp;मुझे पता है कि फ्रायड ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा , मतलब ... मैं निश्चित नहीं हूँ | कहा भी हो सकता है , इसलिए इस बात का मैंने विरोध नहीं किया | कई बार मैं खुद फ्रायड के नाम का गलत इस्तेमाल करता हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्षमा, मिस्टर सिगमंड फ्रायड |&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-3267339991908097756?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/l4YQFCSpAIk" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-03-25T14:28:36.080+05:30</app:edited><media:thumbnail url="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s72-c/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/03/blog-post_21.html</feedburner:origLink></item><item><title>धुंध, सिगमंड फ्रायड और शाम का सूर्योदय :तीसरा भाग</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/BbQACgT2gFE/blog-post_14.html</link><category>कहानी</category><category>सिगमंड फ्रायड</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Fri, 25 Mar 2011 01:57:56 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-6417816431727009211</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s1600/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s400/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" width="317" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/03/blog-post.html"&gt;[पिछला भाग ]&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;काफी खूबसूरत मौसम है | बारिश के बाद सब कुछ जैसे धुल सा जाता है | प्रकृति के कैनवास पर बने चित्र और भी ज्यादा अच्छे लगने लगते हैं | जमीन गीली और चिकने भरी हो गयी है , इसलिए हम दोनों संभल संभलकर कदम रख रहे हैं |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ये आकाश और रजत हमेशा लड़कियों की बात क्यों करते रहते हैं ?" अलग ने मुद्दा शुरू किया | अब इस मुद्दे पर काफी लम्बी चर्चा होने की सम्भावना है , क्यूंकि अलग और मैं बोलना बहुत पसंद करते हैं |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"पता नहीं .. मुझे लगता है कि उनके पास और कोई विषय नहीं है |" मगर इस वक़्त मुझे इस बहस में बिलकुल कोई दिलचस्पी नहीं है | उसके सवालों से ज्यादा मेरा ध्यान अलकनंदा नदी और उसके किनारे बसे श्रीनगर की खूबसूरती पर है | इस दृश्य को देखकर मुझे हमेशा बचपन की वो सीनरी याद आती है | तीन पहाड़ बनाकर उनमे से किन्ही दो के बीच में से सर्पिलाकार नदी निकाल देते हैं , और नदी के दोनों तरफ घर, ढालदार छत वाले | बस तैयार हो गयी हमारी पेंटिंग , एक मिनट रास्ता नहीं बनाया है | कुछ ऐसा ही दृश्य जीवन देखकर लगता है कि सृष्टि के निर्माता की भी ये पहली पेंटिंग रही होगी |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पगडण्डी पर चलते -चलते और अलग के फ़िज़ूल सवालों का जवाब देते हुए हम कैंटीन पहुंचे | कैंटीन में ख़ामोशी और अँधेरा पसरा है , कोई और मौसम होता तो ये जगह गुलज़ार होती | कुछ दिनों में वैसे भी जब सूरज देवता दर्शन देंगे तो ... आउच...हमेशा की तरह अन्दर घुसते हुए मेरा सर दरवाजे से टकरा गया | यार , हम पहाड़ी लोग दरवाजे इतने छोटे क्यूँ बनाते हैं | अन्दर काफी अँधेरा था , होस्टल में भी लाईट नहीं आ रही थी | कैंटीन वाला हमारे होस्टल से ही बिजली चोरी करता है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"अंकल, दो चाय...और सिगरेट है ?" फिर मेरी तरफ देखकर बोला, "कुछ खायेगा ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"बन-आमलेट मंगा ले |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ठीक है, अंकल ...दो बन-आमलेट "&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अखबार पढना मेरा दूसरा&amp;nbsp;सबसे प्रिय शगल है , बेशक लोगों को पढना पहला | कहीं पर भी, कोई भी अखबार हो, मैं उसे चाटने लगता हूँ | यहाँ पर भी मेरा नज़रों में हलके अँधेरे में चमकता दैनिक जागरण आ गया है |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"चल बाहर बैठते हैं , यहाँ बहुत अँधेरा है |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अलग के इस प्रस्ताव पर मैं सहमत हो गया | वैसे ये प्रस्ताव नहीं था, सो असहमति की न गुंजाइश थी , न वजह |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं अखबार अपने चेहरे के आगे रखकर पढ़ने लगा | अलग को पढ़कर मैं इतना तो समझ ही गया था कि वो मुझसे कोई न कोई सवाल जरूर पूछेगा | और बेशक वो ऐसा सवाल होगा, जिसका जवाब मेरे पास नहीं होगा | और मैं अभी दिमाग लगाने की मनोदशा&amp;nbsp;में नहीं था | ख़ास तौर पर उसके ऐसे सवालों का कि 'कुछ बता मेरे बारे में' |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"अच्छा मणिभ, तेरा उसका क्या चल रहा है ?" उसका सवाल मेरी अपेक्षा से ज्यादा मुश्किल था | मुझे कुछ समझ नहीं आया कि बात कहाँ से शुरू करूँ | मैंने आँखों के आगे से अखबार हटाया , और मिस्टर बीन जैसा चेहरा बनाकर कहा |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"किसका ?.. वैदेही चौहान का ? कल चलते हैं अलकनंदा छात्रावास... सुबह देखते हैं, पसंद आ गयी तो शाम को प्रपोज़..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अलग हँस पड़ा | पहले दिन देखकर उसी दिन प्रपोज़ करने का मेरा किस्सा आज भी हर&amp;nbsp;आने वाले नए बच्चों में सुनाया जाता है |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तुझे पता है मैं किसके बारे में बात कर रहा हूँ , श्रद्धा के साथ ..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुझे पता है कि वो श्रद्धा के बारे में ही पूछ रहा था | लेकिन उसका नाम सुनते ही जैसे किसी ने कोई तार सा छेड़ दिया हो | अभी बाकी तारों को भी गुंजायमान करता रहेगा | मेरे जेहन में एक नहीं कई श्रद्धाएँ उतर आयीं | मुस्कुराती, नाराज होती, खिलखिलाती सरसों पे धूप जैसी, या किसी पहाड़ी नदी जैसी भागती हुई , पहाड़ जैसी उदास एक कोने में बैठी , कभी मुझसे हाथ छुड़ाकर भागती श्रद्धा, कभी मेरा हाथ थामती , अल्हड दार्शनिक ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अचानक जैसे कहीं कुछ टूटा ... कैंटीन वाले अंकल का लड़का गोपी कांच के टुकड़े बटोर रहा था | और मुझे नजर आई एक और श्रद्धा, 'मैंने तुमसे कभी नहीं कहा कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ |'&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो , पर सिर्फ एक दोस्त '&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'मैं तुमसे कोई वादा नहीं कर सकती '&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'मणिभ...हाथ छोडो मेरा ...'&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;श्रद्धा का चेहरा घुलने लगा है और अलग का चेहरा धुंध से जैसे बाहर आने लगा, "कुछ नहीं यार , कुछ चार एक महीने से हमने आपस में बात नहीं की है |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ये तो तू बता चुका है, उसके बाद कुछ नहीं हुआ ?" उसने बिकुल खारिज करने वाले भाव से पूछा , मुझे अन्दर ही अन्दर काफी गुस्सा आ गया था , जब ये सब मैं बता चुका हूँ तो इसे क्या जरुरत है बार बार पूछने की | खैर वो अभी भी काफी संयत लग रहा था, जैसे संवाद अभी पूरा नहीं हुआ हो , "और तेरा जन्मदिन भी तो आया था बीच में , क्या उसने फ़ोन किया ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"नहीं " अखबार हाथ में रखने का भी कोई फायेदा नहीं था, मेरा डर बरक्स खड़ा था | मैं वार्तालाप के इस नए अध्याय से खिन्न हो चला था | पर साथ ही साथ एक अजीब सी शान्ति भी महसूस कर रहा था | फ्रायड के सिद्धांतों में मैंने कहीं पढ़ा था कि आदमी उसी चीज से अधिकतम शान्ति महसूस कर सकता है जिस पर उसका मन सबसे अधिक विचलित होता है | फ्रायड को मैं अपना गुरु मानता हूँ, उसी की किताबें पढ़कर मैंने सोच के कीड़े को अपने दिमाग में विकसित किया है | मुझे पता है कि फ्रायड की बातें काफी लोगों को समाज विधर्मी लगती हैं , और कई बार तो ऐसे तथ्य लिखने वाले लेखक के आचार-विचार, व्यव्हार, यहाँ तक कि चरित्र पर भी संदेह किया जाता है | फ्रायड की कुछ सोचों से मैं आज तक सहमति नहीं जता पाया हूँ , खासतौर पर interpretation of dreams&amp;nbsp;&amp;nbsp;को मैं अपने तर्क या विवाद में शामिल नहीं करता |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तूने किया था उसके जन्मदिन पर... "&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"अरे यार!!! उसका जन्मदिन अगस्त में आता है , उसके बाद ही तो ..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"यार , वैसे एक बात कहूँ , मैंने तुझे कभी उससे बात करते हुए देखा नहीं | इसलिए ज्यादा कुछ कह नहीं सकता, तेरा काल्पनिक किरदार तो नहीं है न वो ?" अलग हंसने लगा |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"वो छात्रावास में रहने वाली लड़की नहीं है | घरेलू लड़की है ... तीन- पांच मिनट से ज्यादा हमारी बात नहीं होती | होती वो अलकनंदा में , या मैं होता आकाश , रजत की तरह तो करता दिन भर फ़ोन और सारे छात्रावास में फ़ोन लेकर घूमता रहता " मैं और तीखा बनना चाहता था लेकिन, "हाँ, एक बार बात की थी उससे एक घंटे तक | यार, जब मैं उससे सिर्फ तीन मिनट तक बात करता था तो आराम से फोन काट देता था , उस दिन जब घर गया वहां से एक घंटे तक बात की तो मेरा फ़ोन रखने का मन ही नहीं किया | पता नहीं , ऐसा लगा जैसे कि बस फ़ोन रख दिया तो ... ऐसा क्यों हुआ ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मुझे क्या पता भाई ? होता होगा कुछ ... फ्रायड ने बताया नहीं तुझे ?" तीखा होने की बारी अलग की थी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अंकल चाय और बन-आमलेट रखकर चले गए | सिगरेट का एक पैकेट भी अलग को थमा गए | उसी वक़्त ही मेरे दिमाग में ये ख़याल आया कि अंकल हर रोज़ कैंटीन में आये लड़कों के किस्से सुना करते होंगे | शायद हर किस्से में लड़की का शुमार जरूर होता होगा | तो क्या सोचते होंगे अंकल हमारे बारे में ? ये कोई नैतिक शिक्षा का सवाल नहीं था , बहरहाल हमसे ज्यादा अंकल कैंटीन बनने से बचे घर के दूसरे हिस्से के बारे में सोचते होंगे , जहाँ उनकी तीन बेटियां उस उम्र में प्रवेश कर रही थी , जिस उम्र में उन्हें हम जैसे लड़कों से बचाना जरूरी था | अंकल हम लोगों के पापा की उम्र के हैं , तो अंत में पापा क्या सोचेंगे अगर उन्हें पता चला कि किसी तरह से इक्कीस पर पहुंचे उनके बेटे को किसी तरह उन्नीस पर पहुंची उनके दोस्त की बेटी&amp;nbsp;से प्यार हो गया | मुझे लगता है कि सबसे पहले उनकी सोच यही होगी कि सुपुत्र को सही राह कैसे लाया जाए | पता नहीं हम लोग प्यार को इतना प्रतिबंधित क्यों मानते हैं ? इसके बारे में बात नहीं कर सकते, बड़ों की राय नहीं ले सकते | जबकि फ्रायड का एक सिद्धांत यह भी है कि अगर तुम अपने बच्चे को फव्वारे के पास जाने से मना करते हो तो वह जरूर जाएगा कि आखिर इसमें ऐसा क्या है | ओह.. नहीं , फिर से फ्रायड ... मुझे श्रद्धा पर ध्यान लगाना है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"अलग तू जानता है कि श्रद्धा ही वो लड़की है , या मैं कहूँ कि वो इंसान है जिसके बारे में मैं लगातार चौबीस घंटे सोच सकता हूँ, बिना रुके सारी रात बोल सकता हूँ |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"और जिसके साथ तू सारी जिंदगी बिना रोये गुज़ार सकता है | यही न ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"पता नहीं... हाँ... शायद यही |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अलग अब सिगरेट का धुंआ मेरे मुंह पर फेंकने लगा था | मुझे यह पसंद नहीं है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तू बर्बाद हो गया यार... पता नहीं तुम लोगों को प्यार कैसे हो जाता है |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अलग की बात सुनकर भी मैंने अपना आप नहीं खोया पर बात को कूटनीतिक विनम्रता से सँभालने के लिए मैंने छात्रावास वापस&amp;nbsp;चलने का प्रस्ताव रख दिया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तूने चाय ख़तम कर ली ?" अलग आश्चर्य से मुझे देखने लगा, "अच्छा , चल फ़्रोग-हिल चलते हैं |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"अबे यार , कौन जाएगा उतनी दूर ?" हालांकि मुझे पता है कि कि इस बहाने से कोई फायेदा नहीं होने वाला , फ़्रोग-हिल कुछ ही दूरी पर है , और हम दोनों के लिए तो बिलकुल पास | फ़्रोग-हिल दरअसल एक बड़ी खाई के शीर्ष&amp;nbsp;का कुछ बाहर को निकला हुआ हिस्सा है , मेंढक की आकर की पहाड़ी जिस पर माता&amp;nbsp;का छोटा&amp;nbsp;सा मंदिर है | पहाड़ी के शिखर से श्रीनगर और साफ़ और खूबसूरत दीखता है |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम दोनों पगडण्डी के साथ कदमताल करते हुए चलने लगे | पगडण्डी इतनी छोटी है कि दोनों एकसाथ नहीं चल सकते | अलग आगे आगे और मैं पीछे पीछे |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"इतनी ठण्ड में तुझे घूमने की क्या सूझी ?" मैं चिल्लाया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"बस ऐसे ही , मजा नहीं आ रहा क्या ? "&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"साले... मर रहा हूँ ठण्ड से ... अगर कल भी यही हाल रहा तो बर्फ गिर जायेगी | है न ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"नहीं बे ! बर्फ ऐसे नहीं गिरती और आज वैसे भी बारिश हो गयी है |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उसकी बातों से असहमत होने के लिए मेरे पास कोई तर्क नहीं है . क्योंकि ऋषिकेश में बर्फ नहीं गिरती | और... फ्रायड ने भी इस बारे में कुछ नहीं कहा |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"अच्छा , इस बार वैलेंटाइन डे पर तुम दोनों ने क्या सोचा है ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"पागल है क्या? वैलेंटाइन डे , अगर घरवालों को पता चल गया तो मेरा शहीद दिवस और निर्वाण दिवस उसी दिन हो जायेगा |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"कभी मनाया भी नहीं ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"नहीं यार , उस दिन घरवालों की पूरी नजर रहती है | मजाक जरूर करते हैं, वैलेंटाइन डे को लेकर... पर वो कुछ ऐसा है जैसे अच्छा व्यव्हार करने वाला इंस्पेक्टर ..." मैं हँसा , "हाँ , वैसे उनकी नजरें बचा के कुछ दिन पहले ही हम एक दूसरे को उपहार दे देते हैं |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"क्या उपहार ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मुझे वैभव का ख्याल आ गया | उसके कमरे में काफी सारे उपहार रखे हुए थे , जो वो ख़ुशी मिश्रित गर्व से बताता था कि उसे मिनी ने दिए है | एक दिल के आकार का कांच का टुकड़ा , जिस पर लिखा&amp;nbsp;I love you &amp;nbsp;अलग अलग कोण पर रखने पर अलग रंगों से चमकता है , &amp;nbsp;प्रिज्म जैसा | एक शेर का छोटा सा रोंयेदार खिलौना | एक महंगा सा ब्रेसलेट , जिसे वो हमेशा अपने हाथ पर पहनता है | वो मुझे समझाता , "अबे तू श्रद्धा को ये, इस तरह के गिफ्ट दिया कर | यार, ये सस्ता भी है , और उसे अच्छा भी लगेगा | तू कैसे गिफ्ट देता है उसे ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं बताने लगा, "डायरी , पेन , सीडीज़ , एक बार अमृता प्रीतम की 'कोरे कागज़', तुषार रहेजा की anything for you, ma'am जिसे उसने एक हफ्ते बाद ही लौटा दिया था कि इंग्लिश बहुत मुश्किल है |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"यार, ये चीजें लड़कियों को समझ नहीं आती हैं , इन चीजों के साथ ..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"यार वैभव , मुझे लगता है कि जो लड़की मुझसे प्यार करती है , उसने मेरे रुझान , मेरी दिलचस्पियों को देखकर समझकर ही मुझसे प्यार किया होगा | अगर कोई मुझसे प्यार करता है तो उसे मेरी रूचि के बारे में पता होना ही चाहिए |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"क्या उपहार देता है तू ?" अलग ने सवाल दोहराया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"जो भी उसे पसंद हो |" मैंने अलग को टाल दिया, मेरे दिमाग में कोई बिम्ब ही नहीं बना , अब इतनी सारी चीजें होती है , छोटी छोटी ... सब याद थोड़े ही रह पाएंगी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम फ़्रोग-हिल तक पहुँच गए | अब अलग के दिमाग की खुराफातों की अगली किश्त मुझे पता थी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"चल सीढ़ियों से जाने के बजाये पत्थर पर चढ़कर चलते हैं , MI2 वाले स्टाइल में "&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"यार अलग , वो सब कब का छोड़ चुका हूँ, स्पाइडर क्लब वाले काम ... और वैसे भी ठण्ड इतनी हो रही है कि हाथ बाहर निकालने का मन नहीं कर रहा |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पर हर बार की तरह इस बार भी मैं उसके अनुरोध और अपनी रोमांचक प्रवृत्ति को नहीं रोक पाया | कच्ची पहाड़ियों पर या किसी घासरहित चट्टान पर बिना सहारे के&amp;nbsp;चढ़ने का एक सबसे जरुरी नियम यह होता है कि आप जितना तेज चलेंगे , उतने ही सुरक्षित रहेंगे | इसके लिए आँखें बेहद तेज होनी चाहिए , तुम्हें पता चल जाए कि अगले पांच कदम तुम कहाँ कहाँ पर रख सकते हो | मेरी आँखों और हाथों के बीच के तालमेल , हलके और चपल शरीर की वजह से मैं उससे पहले ही ऊपर पहुँच गया हूँ | चट्टानों को कसकर पकड़ने की वजह से हाथों में दर्द होने लगा है, मैं हाथों को फूंक मारकर गर्म करने लगा |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मंदिर के अन्दर पहुंचकर मैंने थोड़ी देर&amp;nbsp;हाथ जोड़े, सर झुकाया | लेकिन अलग मंदिर के बगल से होते हुए मंदिर के पीछे पहुँच गया | उसके मुताबिक वो अपने आप को कभी किसी से कमजोर नहीं मान सकता | मैं भी मंदिर के पीछे चला गया | यहाँ से श्रीनगर बिलकुल पास लगने लगता है , ऐसा लगता है मानों सीढ़ीदार खेतों से उतरते जाओ तो दस मिनट में पहुंचा जा सकता है | हम चोटी से पाँव लटकाए बैठ गए |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/03/blog-post_21.html"&gt;: क्रमश&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;(अगली कड़ी अंतिम कड़ी समझिये, बस जल्द ही पोस्ट करता हूँ |)&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-6417816431727009211?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/BbQACgT2gFE" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-03-25T14:27:56.002+05:30</app:edited><media:thumbnail url="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s72-c/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/03/blog-post_14.html</feedburner:origLink></item><item><title>धुंध, सिगमंड फ्रायड और शाम का सूर्योदय :दूसरा भाग</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/_s50NOJS9J8/blog-post.html</link><category>कहानी</category><category>सिगमंड फ्रायड</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Fri, 25 Mar 2011 01:55:45 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-2097508293686001385</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s1600/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s400/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" width="317" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/02/blog-post_28.html"&gt;[पिछला भाग&amp;nbsp;]&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"क्या सोच रहा है तू ?" अलग सिगरेट का धुंआ मेरे मुंह पर छोड़ता है | मैं जैसे सोते से जगा , उसके बारे में सोचते सोचते मैं काफी दूर किसी और पल में आ गया हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"अभी तुझे देख रहा था काफी देर से , कुछ सोच रहा था तू ?" मैं हार गया था सो आखिर पूछना पड़ा | अलग अभी भी मुस्कुरा रहा था | मैं समझ गया था कि वो मुझे पढने की कोशिश लगातार कर रहा है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"कैंटीन चलेगा ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं चौंका, फिर संयत हो गया | सोचा, इसीलिए तो वो अलग है | ये सब इतनी जल्दी हुआ कि खुद मुझे भी पता नहीं चला |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"इस वक़्त ? बाहर सर्दी हो रही है बहुत |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"चल न यार !"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उसे पता था कि उसके अनुरोध को मैं टाल नहीं पाऊंगा | असल में मैं खुद भी बाहर जाकर मौसम का मजा लेना चाहता था | मैं अपनी टोपी और जैकेट लेने के लिए रूम पर आया | अलग भी मेरे साथ साथ आ गया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आकाश और रजत रजाई के अन्दर घुसकर सोने की पिछले दो घंटे से कोशिश कर रहे थे , लेकिन कामयाब अभी तक नहीं हुए |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"साले ! तूने ही तो कहा था उससे जाके कहने के लिए |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"और तू बोल आया ? कमीने !!!"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"और क्या करता ? भाई ... "आकाश रजत को हिलाता है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"सोने दे साले अब | अब सिर्फ नींद बची है मेरे पास , इज्ज़त तो तूने लुटवा दी सरे बाज़ार |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"भाई... पहली बार तो अपने भाई को प्यार हुआ है |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"किससे? किससे ?" मैंने बातचीत में शामिल होने की कोशिश की |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ओये मणिभ ! इधर आ !!! तेरे को एक बात बताता हूँ |" आकाश चिल्लाया | "रजत को फर्स्ट इयर की लड़की पसंद आ गयी एक |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"कौन है ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"वैदेही चौहान"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ये कौन है ? कहाँ की है ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"कोटद्वार है भाई का ससुराल !" आकाश ने सोते हुए रजत पर एक धौल जमाते हुए कहा |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"कैसी है दिखने में ?" अलग बोला | लड़की कैसी दिखती है वैसे, अलग को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है , मैं जानता हूँ कि वो सिर्फ बातचीत में शामिल होने के लिए पूछ रहा है | कोई और वक़्त होता तो हम सब शायद अलग को अचरज भाव से देखते , लेकिन आज आकाश इतना उत्साहित था कि उसने इस पर ध्यान नहीं दिया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मस्त है यार !!!"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ओये तमीज से ! " रजत आँख बंद किये हुए बड़बड़ाया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मतलब बहुत अच्छी लड़की है |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तुझे तो अच्छी ही लगेगी ... कोई है ऐसी जो नहीं लगती ?" अलग ने होंठ टेढ़े कर लिए , "तू बता रजत कैसी है ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ठीक ठीक है यार " रजत ने अब आँखें खोल दी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अलग जोश में उछल सा पड़ा , "चल ...चल रजत !!! आज तुझे प्यार हुआ है इसी ख़ुशी में तू कैंटीन चल के कुछ खिलायेगा |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वो दोनों एक पल को हैरान हुए | फिर दोनों ने मशीनी अंदाज में रजाई एकसाथ मुंह के ऊपर डाल ली | "पागल है क्या ??? बाहर बहुत ठण्ड है&amp;nbsp;"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुझे पता था कि थोड़ी देर में ऐसा होने वाला है | अलग हमेशा अजीब प्रस्ताव रखता है , जो कि एक तरह के रोमांचक होते है | कभी -कभी बचकाने, तो कभी खतरनाक, और अक्सर उसके इस तरह के प्रस्ताव का मैं समर्थन करता हूँ | डरते डरते कि अगर लोगों को ये सब पता चल जाए तो मैं भी अलग मान लिया जाऊँगा | रजत तभी समर्थन करता है , जब उसे कुछ क्लिक करता है | लेकिन अगर वो इसका समर्थन करेगा तो वो इस प्रस्ताव में इतने फेरबदल करेगा कि वो अलग का ही नहीं रहेगा | और, आकाश अलग का कभी किसी बात पर समर्थन नहीं करता |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं और अलग , हम दोनों गर्म कपड़े पहनकर कैंटीन की ओर चलने लगे हैं | गैलरी में सिगरेट के ठूंठ पड़े हैं | अलग को रूम के अन्दर सिगरेट पीने की मनाही है | खिड़की पर लगे कांच टोपोग्राफी के लिए निकाले जा चुके है | इसलिए हवा अन्दर हड्डियों में घुस रही है | हमारे सामने वाले रूम का दरवाजा अचानक तेज हवा से खुल गया | सभी लोग पढ़ रहे थे | एकबारगी मेरा मन हुआ कि थोड़ा उनकी पढाई में बाधा डालनी चाहिए | लेकिन , ये तो हमेशा ही पढ़ते रहते हैं , और इस वक़्त उनसे ज्यादा बाधा मेरे काम में आ जाएगी | इस विचार को त्याग दिया | गैलरी के तीसरे और अंतिम कमरे से गुज़रा तो देखा रोहित जिम कर रहा है | इसका तो यही काम है, अगर ये सोने में वक़्त बर्बाद न करे तो उस वक़्त भी शायद ये यही करना पसंद करेगा | मैंने सोचा, मुस्कुराया, और आगे बढ़ गया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/03/blog-post_14.html"&gt;: &lt;b&gt;क्रमश:&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-2097508293686001385?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/_s50NOJS9J8" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-03-25T14:25:45.701+05:30</app:edited><media:thumbnail url="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s72-c/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/03/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>धुंध, सिगमंड फ्रायड और शाम का सूर्योदय :पहला भाग</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/ctPpP-t9KWM/blog-post_28.html</link><category>कहानी</category><category>सिगमंड फ्रायड</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Fri, 25 Mar 2011 01:55:13 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-5645057828823611962</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;&lt;a href="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s1600/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s400/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" width="317" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वो खिड़की के पास खड़ा है | हमेशा की तरह सिगरेट उसकी उँगलियों के बीच तिल तिल जल रही है | गैलरी के दूसरे सिरे पर खड़ा मैं उसे गौर से देख रहा हूँ, और अलग खिड़की से बाहर | अलग, हाँ ये उसका वास्तविक नाम नहीं लेकिन यही नाम है जिससे उसे हर कोई जानता है नीलकंठ में | उसने थोडा और आगे बढ़कर खिड़की पर लगे कांच के दरवाजे खोल दिए | ठंडी हवा का झोंका अन्दर घुस आया | ये सिर्फ ठंडी हवा नहीं, हड्डियों को कंपा देने वाली दिसम्बर की बर्फीली शीत है | मेरे बदन में न चाहते हुए भी हलकी झुरझुरी दौड़ गयी, लेकिन अलग निश्चिन्त खड़ा था | सिगरेट का धुंआ उसे घेरे हुए था, जाने कितनी वीं सिगरेट थी | सर्दी की लहर से बचने के लिए उसने अपने आसपास धुंए की गर्म परत चढ़ा ली थी | सिगरेट पीने के मामले में उसका कोई तोड़ नहीं है | लेकिन आज वो पी कम रहा था , आसपास धुंआ ज्यादा फैला रहा था | उसकी उँगलियाँ उठती हैं, और फिर धीरे धीरे कुछ देर बाद नीचे गिर जाती हैं , अलग और उसकी सिगरेट दोनों धुंआ उगलने लगते हैं |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं उसे काफी देर से देख रहा हूँ | मैं शाम की चाय के लिए तीसरे तल पर बने कहवाघर में आया , उसे अकेले खड़ा देखकर रुक गया | उसका अकेला होना कोई ऐतिहासिक बात नहीं है , बल्कि हम दोनों अपना अकेलापन काफी बांटते हैं | आज भी कोई ख़ास बात नहीं, लोगों को छुप छुप कर देखना मेरा वक़्त काटने का सबसे बढ़िया तरीका है | वैसे ये दिल बहलाव मुझे इतना पसंद है कि मुझे जगाना पड़ता है बाकी काम करने के लिए | तो मैं उसे देख रहा हूँ ... लेकिन आखिर वो सोच क्या रहा है | वैसे वो सोचता क्या रहता है | उसके बारे में महाविद्यालय&amp;nbsp;में सबसे ज्यादा मुझे ही पता होगा | उसके घर में उसका एक छोटा भाई और दो छोटी बहनें हैं | बस ये औरों से अतिरिक्त जानकारी मेरे पास है | तो क्या वो अपने घरवालों को याद करता होगा ? हममें से कुछ लड़के ही खुलेआम ये स्वीकार करने को तैयार होते हैं कि वे अपने घरवालों को याद करते है | बल्कि ये एक तरह का बिनबोला अनुबंध सा है कि जो अपने घरवालों को याद करते हैं हम उनका मजाक उड़ायेंगे | मेरा घमंड मुझे मेरे घरवालों को याद नहीं करने देता | लव स्टोरी में ओलिवर बेर्रेट चतुर्थ के अपने पिता से जो सम्बन्ध थे , मुझे लगता है कि वैसे ही मेरे भी अपने पिता से हैं | माँ की जरूर कभी कभी बहुत याद आती है ... अलग भी शायद अपनी माँ को याद कर रहा होगा | छात्रावास एक ऐसी जगह है , जहाँ रहने वाले दूसरे गृह के प्राणी लगते हैं , ऐसा लगता है जैसे मानवीय रिश्तों की उनकी जिंदगी में कुछ ख़ास जगह नहीं है | इसलिए अलग की कोई माँ भी होगी और वो उन्हें याद भी कर रहा होगा , ये सोचना जरूर एक साहस भरा कदम है | सबसे ज्यादा जिस विषय पर पूरा नीलकंठ एकमत है वो है , लड़की | दिन में पचास बार मैं खुद श्रद्धा को याद करता हूँ , लाईट जलाता हूँ तो अँधेरा कमरा याद आता है जिसमे पहली बार मैंने उसके हाथों को छुआ था, किसी सस्ते शैम्पू की महक उसके बालों से आ रही थी, और वो नजरें झुकाए खड़ी थी | अफ़सोस होता कि मैं कुछ और क्यों नहीं कर पाया , दीवार पे सर टेक देता हूँ | जगजीत सिंह गा रहे हैं 'उस दरीचे में भी अब कोई नहीं ...'  तो क्या अलग लड़की के बारे में सोच रहा है ?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"ओय मणिभ ! इधर आ देख !"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं चुपचाप चला गया | दिल के किसी कोने में मुझे इस बात का बेहद घमंड सा है कि मैं बहुत किताबें वगैरह पढता हूँ , और मैंने फ्रायड को पढ़ा है | मुझे कुछ ऐसा भी मुगालता है कि चेहरे को देखकर मैं आदमी के दिमाग में क्या चल रहा है , समझ जाता हूँ | मैं उसकी तरफ देखता हूँ , उसे अजीब न लगे इसलिए खिड़की से बाहर देखता हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"यार ! ये खिड़की तो बंद कर , तुझे ठण्ड नहीं लग रही है क्या ?" मेरे कहने पे उसने आगे बढ़कर खिड़की बंद कर दी | मेरे सवाल के जवाब में हमेशा की तरह मुस्कुरा दिया | "देख ! वो बादल ! श्रीनगर में बारिश हो रही है, मगर यहाँ नहीं |" उसने ऊँगली श्रीनगर की दिशा में उठा दी | "यहाँ हम उनके लिए भगवान् हैं , बादलों से ऊपर , बारिश के देवता |" मैं जानता था वो कुछ सोच रहा था और मेरे आते ही बात उसने बादलों की तरफ मोड़ दी हैं और अब वो &amp;nbsp;बात को भुलाने छुपाने की कोशिश करेगा | मुझे इन क्षणों में हस्तक्षेप करना बुरा लगता है | कभी- कभी मुझे वक़्त के इन टुकड़ों पर भी गुस्सा आता है | ये पल इंसान को अपने साथ लेकर जाते हैं , और इंसान भी सच को भूलकर इन्हीं पलों के साथ जीने लगता है | लेकिन सच तो सच होता हैं न , इंसान जब सच से रूबरू होता है तो वो असल जिंदगी में वापस आ जाता है | उस वक़्त ये पल अपना मुंह छिपाते फिरते हैं | अक्सर उसी वक़्त मैं वक़्त के साथ दखल करता हूँ | ये सच है मुझे ये अजीब इत्तेफाक कभी ज्यादा ही&amp;nbsp;अजीब लगता है | फिर सोचता हूँ शायद भगवान ने मुझे इसी काम के लिए तैयार किया है कि मैं दूसरों को देखूं , उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करूँ , उनके सवालों और जवाबों की दुनिया को समझूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"क्या सोच रहा है तू ?" अलग सिगरेट का धुंआ मेरे मुंह पर छोड़ता है | मैं जैसे सोते से जगा , उसके बारे में सोचते सोचते मैं काफी दूर किसी और पल में आ गया हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/03/blog-post.html"&gt;:&lt;b&gt; क्रमश:&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-5645057828823611962?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/ctPpP-t9KWM" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-03-25T14:25:13.280+05:30</app:edited><media:thumbnail url="https://lh5.googleusercontent.com/-KjTZG1hc6eE/TX2DR0uwb7I/AAAAAAAAALc/wCdiP7N6LhA/s72-c/Circa+Art+-+Vincent+van+Gogh+%252823%2529blog.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/02/blog-post_28.html</feedburner:origLink></item><item><title>कहानी</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/ilNZtfsTgq4/blog-post.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Fri, 25 Mar 2011 07:38:02 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-7526449444220828743</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0" class="tr-caption-container" style="margin-left: 0px; margin-right: 0px; text-align: left;"&gt;&lt;tbody style="text-align: left;"&gt;
&lt;tr style="text-align: left;"&gt;&lt;td style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-C94R7d--ZIs/TWZMtX282GI/AAAAAAAAAK0/dD_ePrUELB0/s1600/kurosawas-dreams-van-gogh-bridge.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: auto; margin-right: auto;"&gt;&lt;img border="0" height="210" src="http://4.bp.blogspot.com/-C94R7d--ZIs/TWZMtX282GI/AAAAAAAAAK0/dD_ePrUELB0/s400/kurosawas-dreams-van-gogh-bridge.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr style="text-align: left;"&gt;&lt;td class="tr-caption" style="text-align: center;"&gt;(अकिरा कुरोसावा की फिल्म ड्रीम्स के दृश्य में वैन गोग की पेंटिंग, साभार : गूगल)&amp;nbsp; &lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लिखना मन की परतों को खोलने जैसा है, एक के बाद एक सतह | लिखकर आप लगातार भीतरी सतह पर प्रवेश करते जाते हैं | यह सब मैं पढ़ चुका हूँ, कई बार , कई जगह | शब्द थोड़े बहुत इधर उधर होते होंगे, मजमून नहीं बदलता | शायद औरों के लिए लिखना अपनी दबी हुई इच्छाओं को निकालना, कुछ के लिए अपनी अन्दर छिपी आदमियत को रचनात्मक संतुष्टि देना है | कुछ स्वान्त सुखाय जैसा शब्द भी बताते हैं, जिसका अर्थ मुझे नहीं पता | मुझे याद है मेरा एक सहपाठी कहता था कि ये आर्ट, कुछ लिखना, पेंटिंग वगैरह ये उन लोगों के काम हैं जो समाज के सामने अपने आप को व्यक्त नहीं कर पाते | अपनी भावनाएं सबके सामने न व्यक्त कर पाने की मजबूरी ही इन्हें कलाकार, लेखक, पेंटर बनाती है | फ़िलहाल आप मेरे बारे में जानना चाहेंगे | मेरे लिए लिखना दर्द से गुजरने जैसा है | कुछ कुछ ऐसा जैसे बिलखना चाहते हैं , मगर नहीं रो पाते | ठहाका लगाना चाहते हैं, हँस भी नहीं पाते | मेरे समानांतर दो दुनिया चलती है | कहानी में बेग साहब के बेटे को मार दिया है; मेरी माँ, भाई , बहनें ये सब सहज ही रहते हैं , और मुझे भी सहज समझते हैं | लेकिन मियां लियाकत, सुधीर, ओलिवर, जोनाथन रिवेट मेरी मनोदशा जान जाते हैं | पडोसी का पच्चीससाला बेटा एक्सीडेंट में मर जाता है, आपको दुःख होता है | उसके घरवालों को आप सांत्वना देते हो; लेकिन श्रद्धा, जब्बार नाई , बेग साहब को इन ख़बरों का कुछ नहीं पता |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लिखना एक ऑपरेशन जैसा है | ऑपरेशन थियेटर, एक परिवेश जो एक पूरी दुनिया है , आप अपनी कहानियाँ इसी परिवेश से तो चुराते हो | कभी गए हो वहाँ अन्दर ? गौर किया है कि वहाँ अन्दर जाने पर डर ख़त्म हो जाता है, लेकिन राहत मिले ऐसा भी नहीं | आपका दिमाग सोचना बन्द कर देता है, वहाँ पर डर, गुस्सा, तकलीफ ख़त्म होती है , लेकिन साथ ही साथ ख़ुशी, संतोष, आराम जैसी चीजें भी नहीं मिलती | आप किस अवस्था में है ? क्या आपको डर लग रहा है ? नहीं | फिर आप क्या महसूस कर रहे हैं ? कुछ भी नहीं | कुछ भी नहीं, क्योंकि जिस वक़्त से आपको स्ट्रेचर पर रखकर अन्दर ऑपरेशन टेबल पर पटका है आप कुछ सोच ही नहीं पा रहे | आपके लिए आप अपनी कहानी के पात्र हैं, महज़ एक पात्र | आपके अन्दर जन्म ले रही है कहानी , लेकिन विचारों के सिरे का आपको कुछ नहीं पता | आगे किस पात्र के साथ क्या होगा , क्या पता, आप ये सब भी नहीं सोचते | आप बस लेटे हुए अपने आपको स्ट्रेचर पर देख रहे हैं | स्ट्रेचर को धकेलकर ले जाया जा रहा है , आप एक और करवट लेके दुनिया को देखने की कोशिश करते हैं , इनमे से कोई पात्र कहानी में आएगा क्या ?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आपका डर केवल रिसेप्शन तक रहता है | दर्द का ग़ज़ल से सदियों का नाता है , लेकिन खूबसूरत रिसेप्शनिस्ट को अपने दर्द का दोष न दें | आपका डर वहाँ पर सबसे ज्यादा मुखर होता है, जब प्राइवेट हॉस्पिटल की रिसेप्शनिस्ट हौले से धवल दंतपंक्ति दिखाते हुए कहती है "आपका नाम ?" ओह! तो इस चीज़ का डर है; आपका नाम | नाम ? नाम का डर ? नाम से डर ? क्या ? नहीं पता | क्या मेरा नाम सुन के कोई पूछेगा कि ये कौन था ? या कोई मेरा नाम ही न सुने, न पूछे | ज़ेरेसेस की सेना का एक सिपाही मैं भी रहा हूँगा जो बेनाम मर गया | रिसेप्शनिस्ट जिन्दगी खूबसूरत है कि तर्ज़ पर फिर से मुस्कुराती है, और आप आश्चर्य करते हो कि हमेशा दर्द देखने वाली आँखें कैसे हँस सकती हैं | ये अलग बात है कि रिसेप्शनिस्ट आपको नहीं बताती कि आज सुबह उसने एक नामचीन मैगज़ीन में इस हॉस्पिटल पर एक आलेख पढ़ा, जिसमे इसकी काफी तारीफ़ की गयी है | उसके मुस्कुराने पे आपकी खीझ बढ़ जाती है , लेकिन खीझने का अधिकार आपको खुद नहीं मिला है | आपके चेहरे से उसे अंदाजा हो भी जाता है , तो ग्लानि, क्षोभ दबाकर भी वो मुस्कुराती है | क्या करे बेचारी, डॉक्टर तो है नहीं जो जान जाए कि मरीज लाइलाज है | सवाल फौजी कदमताल से आगे बढ़ते हैं | आप हिन्दू हैं, आप भारतीय है, आप मर्द हैं, जवाब भी रस्म पूरी करते हैं | और भी बाकी डिटेल्स ले लो, इससे कहानी में बहुत फर्क पड़ने वाला है | मसलन मज़हब मुसलमान कर दो , पढ़ने वाले ज्यादा हो जायेंगे | हिन्दू करोगे, ऑपरेशन करने शल्य आयेंगे , भगवान विष्णु के गरुड़ पे लिफ्ट लेकर |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नर्स आपकी डिटेल्स देख रही है , और आप नर्स में अपनी कहानी की नायिका की डिटेल्स तलाश रहे हो | मौत के वक़्त भी पात्रों को बाजीगरी सूझती है, मेरी कहानियों में तो सालों को मौत के वक़्त ही बाजीगरी सूझती है | दो मरीज थे, एक दूसरे से बोलता है , "साले, बात करा यार उससे कभी |" दूसरा बोलता है , "हाँ , हाँ , करवा दूंगा | एक बार हमारे वार्ड में लग जाने दे उसकी नाईट ड्यूटी |" गरीब गुरबे कहानियाँ उसी रात सुनाते हैं , जब पेट खाली होने की वजह से नींद नहीं आती | जिस रोज़ रोटी नसीब हो , पेट भर जाए तो फुटपाथ पे लम्बी तान के सो जाते हैं साले | फिर किसकी कहानी , कौन सी कहानी | अरे हाँ , फुटपाथ से याद आया; ये वो जगह है जहाँ मेरी कहानियों का गरीब आदमी हगता है और अमीर आदमी अपने कुत्ते को हगाता है | एक तरह से ये ब्रिटिश मानसिकता 'डॉग्स एंड इंडियंस आर नॉट अलाउड' का जवाब है | तो मैं कह रहा था, कि लेखक भी उसी गरीब की तरह होता है | उन विषयों पर चीखता है , जो बुद्धिजीवी लोगों के लिए बस एक बौद्धिक बहस है | मन में हाहाकार था , ग्रन्थ तभी लिखे गए है | कलम की तलवार लेकर अपने मन से लड़ते रहता है | आसपास की दुनिया में कुछ लड़ने लायक नहीं देखता तो काल्पनिक दुनिया बनाकर तलवार भांजता है | आपके ऑपरेशन की पूरी तैयारी हो चुकी है | ड्यूक ऑफ़ वेलिंग्टन ने 1815 में नेपोलियन को हराया था | मेवाड़ राजवंश की नींव बप्पा रावल ने रखी थी | पाकिस्तान स्वतन्त्रता संग्राम 1905 -1947 तक चला था, ये आपने पाकिस्तान की ऑफिशियल वेबसाइट से पढ़ लिया है | आपने असाम और उसकी सात बहन प्रदेशों के इतिहास, भूगोल को पढ़ लिया है | आपको ये भी पता है कि कंप्यूटर में अब चिप्स के साइज़ के रजिस्टर होंगे जो उसे मोड़कर जेब में रखने लायक बना देंगे | क्या कहा ? मस्जिद बाबर ने नहीं मीर बाकी ने बनायीं थी ? ठीक है , ये जानकारी भी रख लो , काम आएगी | आपके पास अभी बहुत सारी जानकारी है , जो नर्स भी देख रही है | अब आपको डर लग रहा है , है न ? सारी जानकारी होने के बाद ऑपरेशन की सफलता संदिग्ध लगती है, एक दो सेकेण्ड के लिए | हाँ .. ठीक है .. जिंदगी थोड़े ही खत्म हो जाएगी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब आप शांत हैं , आपको अनास्थीसिया दे दिया गया है | लेकिन आप इस वजह से शांत नहीं है | आप शांत हैं क्योंकि आप कहानी बुन रहे हैं , बिना डर के , बिना तसल्ली के, बिना भावुकता के | आप शब्द बिखेरते जा रहे हैं | बिना कोई कशमकश के , आप अपने पात्रों को चला रहे हो शुरू के दो कदम | अभी पात्रों ने खुद चलना शुरू किया है | नन्हे -मुन्ने उनके पांवों की थाप आप महसूस कर सकते हो अपने सर पर, किरर्र... किरर्र | नाक बहती है अभी उनकी , गीलापन रुई के बड़े बड़े पैडों से सोखा जा रहा है , नोज़ी साफ़ कलो ...| बड़े हो गए हैं आपके पात्र, सहज मानवीय गुण भरे हैं आपने उनमें | लड़ते हैं , झगड़ते हैं , प्यार भी करते हैं | किसी का खून भी हो गया , किसी ने डूबते को भी बचाया | आपके पात्र भी न ! कहानी अटक रही है क्या ? यहाँ पर पाठक बोर हो रहा है | आप सोचते ही जा रहे हैं | हाहाकार से ही ग्रन्थ उपजते है | बेचैनी ख़त्म नहीं हो रही | लिखना एक दर्द है, सिर्फ एक दर्द |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;डॉक्टर बाहर आता है, "आई ऍम सॉरी ...उनका बचना काफी मुश्किल है | लगभग नामुमकिन ..." कहानी की पूर्ण तृप्ति के साथ आप आँखें बन्द कर लेते हैं | आखिरी सांस एक अधूरा उपन्यास है | बाहर पाठक खड़े हैं; माँ, भाई, बहनें रो रहे हैं | कहानी की भावनात्मकता के साथ बह गए हैं | पिता अभी आलोचना कर रहे है | विचार एक ब्रेन ट्यूमर है |&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-7526449444220828743?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/ilNZtfsTgq4" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-03-25T20:08:02.708+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://4.bp.blogspot.com/-C94R7d--ZIs/TWZMtX282GI/AAAAAAAAAK0/dD_ePrUELB0/s72-c/kurosawas-dreams-van-gogh-bridge.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">9</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/02/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>प्रेमचंद के देश में</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/W6H6h_4nrYk/blog-post_18.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sat, 22 Jan 2011 19:25:00 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-8285426646999741898</guid><description>&lt;div style="color: black; font-family: Verdana,sans-serif; text-align: justify;"&gt;(&lt;b&gt;कहानी कब तक पूरी होगी कह नहीं सकता , लेकिन अधूरे ड्राफ्ट पढ़कर भी हौंसला बढ़ाएंगे तो अच्छा लगेगा | जब तक पूरी न हो, शीर्षक तब तक यही समझा जाए | उर्दू का ज्ञान बहुत कच्चा है बेशक बेहद पसंदीदा भाषा है, सो गलतियों को नज़रन्दाज किया जाए | कहानी सम्राट, प्रेमचंद को मेरा प्रणाम | &lt;/b&gt;)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTVBVebXU-I/AAAAAAAAAIc/vzCSgyssLe4/s1600/field-with-pollard-trees-and-mountainous-background.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="332" src="http://4.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTVBVebXU-I/AAAAAAAAAIc/vzCSgyssLe4/s400/field-with-pollard-trees-and-mountainous-background.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये आज की बात नहीं है | हर दौर, हर उम्र में, इंसान अपने-परायों की दुहाई देता रहा है | दुनिया भर अपने परायों के नाम पे भेदभाव चलता रहा है | अपना घर, अपना गाँव, देश, समाज, धर्म ... अपनी इंसानियत ? लेकिन, कौन करता है ये फैसला कि कौन अपना है कौन पराया ? भगवान् अपने-पराये में इंसान को बाँट देता है, दिल जरूर साबुत बचता है, उसे दुनिया के स्वयंभू भगवान् जाति, धर्म में तोड़ देते हैं | टूटा हुआ कांच बार बार जख्मी करता है | गरीब के घर के टूटे हुए आईने की तरह न वो फेंका ही जा सकता, न रखा ही जा सकता |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिंयाँ ताहिर को इस बात का अंदाजा था, यही हुआ भी | शराफत अली ने रात को खाना नहीं खाया | जाने क्यूँ अब्बू बच्चों के जैसा बर्ताव करने लगे हैं; हर एक चीज़ पर नाराज़गी, पहले तो ऐसा न था | फातिमा ने खाना रखा, लेकिन मुँह जूठा करना भी गंवारा ना किया | बस एक कोने में बैठ कर आहें भरते रहे- या खुदा! जाने नसीब में क्या बदा था जो ऐसी औलाद पैदा हुई | दीवार की ओर मुँह किये मरहूम नसीमा बानो को गाली देते रहे | ताहिर अली पुलिस महकमे में थे | आज उनका प्रमोशन हुआ था | नया ओहदा मिला था सब इंस्पेक्टर का, साथ ही तबादला भी | सहारनपुर से उन्हें और आगे पहाड़ों में भेज दिया गया | यहाँ चाल थोड़ी टेड़ी है, सो प्रमोशन इतनी हलचल पैदा नहीं करता जितना कि तबादले की खबर | तबादला कहाँ हुआ है, यही जाहिर करता है कि प्रमोशन हुआ है या डिमोशन | तो सीधे शब्दों में कहा जाए तो उनका डिमोशन हुआ है | बाप बेटे में एक ज़माने से सीधे मुँह बात ना हुई थी | ताहिर अली इस तबादले का सबब जानते थे, पंडित रामकिशोर के सुपुत्र को उन्होंने कच्ची शराब बेचते हुए पकड़ा | पंडित जी ने पूरी रात कचहरी में बिताई थी कि मियां जो चाहे दाम बताएं पर उनके लड़के को अदालत की चौखट ना देखनी पड़े | मगर ताहिर मियां उसूलों के पक्के आदमी थे, रिश्वत हराम की कमाई समझते थे | अदालत में गवाह एक एक कर मुकरते गए, ताहिर मियां बेबसी से सब देखते गए | शराफत अली बेहद नाराज हुए- और दिखाओ ईमानदारी, अरे इस मुल्क में हमें छुप छुप के सजदा करना है, क्यूँ किसी की नजरों में चढ़ते हो | ताहिर कुछ नहीं बोले, मन ही मन कहा- आप ही से सीखा है अब्बू | जवाब देते न बना | कुछ ही महीनों में तबादले का परवाना आ ही पहुंचा | ताहिर अली जानते थे कि उनसे कहाँ पर चूक हुई थी, और ऐसा भी नहीं कि वे फ़रिश्ते इंसान हों | बस उस वक़्त कुछ ऐसा जोश चढ़ा कि आगा-पीछा कुछ भी याद ना रहा |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हालात की मार इंसान को क्या बना देती है, शराफत अली इसका जीता जागता उदाहरण हैं| शराफत अली किसान थे, मगर खेती की ज़मीन गिरवी रखी पड़ी थी | ६ लोगों का परिवार और कमाने का एक ही जरिया, वो भी देनदारी में अटका हुआ था | दिन सूरज सा तेज़ ताप और रात सर्दियों सी ठिठुरती गुजरती | शराफत अली के छोटे भाई लियाक़त बी ए पास थे | नौकरियां कहीं नहीं थी, थी भी तो नाम देखकर ही आगे कोई सवाल नहीं पूछा जाता | रामधन साहूकार के पास खेत गिरवी रखे थे पर सूद चौगुने दर से बढ़ता जा रहा था | मुल्क आज़ाद हुए जमाना हो चुका था, लेकिन गुलामी के दौर अभी तक गए नहीं थे | नन्हा ताहिर १५ अगस्त की परेड देखने के लिए अब्बा से जिद करता था | अब्बा का मुंहलगा ताहिर, बहनों का दुलारा, और नसीमा बानो के जिगर का टुकड़ा | घर में खाने, पहनने को ज्यादा कुछ नहीं था, इसके बावजूद शराफत अली अंटी ढीली करके ताहिर को दिल्ली लेके जाते | लियाक़त भी साथ होते, हालांकि उन्हें अब गुस्सा जल्दी आ जाता है | छोटी छोटी बातों को भी दिल से लगा बैठते थे | इस हिन्दू मुल्क को लेकर उनके तमाम शुबहे सही साबित हुए थे | क्या करें वो इस मुल्क की आज़ादी और इसकी परेड का ? अरे उन्हें नहीं देखनी है | लेकिन बड़े भाई के सामने कुछ कहने का हौसला ना होता था | शराफत अली भी बदलती हवा से बेखबर न थे | पहले रामधन को कभी सूद न भी दो तो चल जाता था, लेकिन अब असल तक जबरिया वसूल करने तक की नौबत आने लगी थी | पंडित हरिराम के पिताजी, शराफत अली के चचा के अभिन्न मित्र थे | साथ साथ पुलिस के डंडे खाए, और भारत माता की जय का नारा बुलंद किया | लेकिन अब हरिराम के लिए उनका परिवार अछूत हो गया था | खाने के लिए बुलावे दोनों ओर से आने बन्द हो गए थे | बसों, ट्रेनों में अपने तरह के लोग ढूंढ कर उनके साथ बैठना पड़ता था | बसें कई बार तो गोल टोपी और खिचड़ी दाड़ी वालों को देखते अनदेखा कर जाती | बंटवारे के बाद जैसे किसी को किसी पर ऐतबार ही न रह गया था | जहीर मियां की दूकान पर पहले खुले में नमाज होती थी, दिन ढले काम काज के बाद जहीर मियां नेकी और ईमान पर अमल करने का मशविरा सबको देते | वो सब अब बन्द हो गया था, सिजदा अब सिर्फ चारदीवारों के अन्दर ही होता | ट्रेन में एक नन्ही परी खेल में भैया भैया करती हुई रुनझुन रुनझुन चाल से ताहिर की टोपी उससे छीन ले गयी | ताहिर भी खिलखिला रहा था | अचानक उसकी माँ क्षमा कीजियेगा कहते हुए ताहिर की टोपी हमारी गोद में फेंककर बच्ची को लगभग घसीटते हुए ले गयी | 'हे राम! किधर को नाव लगेगी हमारी' शराफत मियां बन्द लफ़्ज़ों में बुदबुदाये |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१० साल का ताहिर इतना बड़ा होकर भी आपा की उंगली पकड़ के चलता है | नज्जो आपा कभी भी कहीं पर जाती तो ताहिर को साथ ले जाती | पंडित हरिराम और रामधन की दोस्ती के चलते कालांतर में इनके सुपुत्र जगतराम और बनवारी की अभिन्न मित्रता हुई | ये दोनों दिन भर मटरगश्ती करते, सिनेमा के अश्लील गाने गाते, और कभी कभी घर से पैसे चुराकर शराब इत्यादि का सेवन करते | जगतराम नजमा पर लट्टू था, इसलिए ये दोनों मित्र अक्सर ही नजमा की ताक़ में पलक पांवड़े बिछाए रखते | कुँए की जगत पर बैठे ये दोनों अक्सर कुछ न कुछ छींटाकशी करते रहते | नज्जो,ताहिर को अपने साथ तेज़ तेज़ चाल से लेकर चलती थी | एक रोज़ ताहिर ने अब्बू को सब बता दिया | शराफत अली बेचारे क्या करते, बेटी के घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी | दबे लहजों में शराफत अली ने इसकी शिकायत रामधन से की तो वे शांत स्वर में बोले कि लड़के जवान हैं और जवानी में बच्चे शरारत तो करते ही हैं, और फिर हमारे बच्चे ऐसे कोई गुंडे मवाली तो हैं नहीं | शराफत अली ने चुपचाप सर हिला दिया | मियां लियाक़त मगर कहाँ मानने वाले थे | एक शाम चुपके से कुँए के पास वाले बरगद के पेड़ पर चढ़ गए, और जब दोनों नवाबजादे नया फिकरा कसते हुए दिखायी दिए, वही से हनुमान जी की तरह कूद कर उन्हें चारों खाने चित्त किया | अपना रणकौशल दिखा कर मियांजी ने दोनों को खूब हाथ जमाये | खबर चारों तरफ आग की तरह फ़ैल गयी | साले विधर्मी ने दो बेचारे हिन्दू लड़कों को ऐसा मारा कि बेचारे मर ही गए थे, वो तो भला हो थानेदार हुकुमसिंह का जो वहां से गुज़र रहे थे |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुकुमसिंह कद्दावर इंसान थे | दंगा-फसाद करने वालों से सिर्फ उनका डंडा बात करता था | दिल में नेकी और ईमान का ख्याल करते थे, मजहब जात-पात के कीचड़ से ईमान को गीला ना होने देते | वैसे तो थानेदार साहब की नजर में हर कोई बराबर था, वे पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष हैं, लेकिन अन्दर ही अन्दर उन्हें यकीन हो चला था कि ये कौम चैन से रह ही नहीं सकती | क्या जरूरत थी लियाक़त अली को ये सब करने की ? थानेदार साहब के इलाके में तकसीम के वक़्त कोई फसाद न हुआ था, जिनका उन्हें बडा गुरूर रहता था | ये बात दीगर थी कि फसाद से ऐन पहले ही उन्होंने सारे मुस्लिमों को डंडा दिखा के कह दिया था कि सालों घर के अन्दर रहियो, और कोई भी कुछ भी करने के वास्ते घर से बाहर नहीं आएगा | तो ऐसे आदर्श और धर्मनिरपेक्ष हुकुमसिंह के इलाके में गड़बड़ी करने वाले लियाक़त अली को कैसे छोड़ा जाता, जी भर के मार लगायी गयी | धर्मनिरपेक्षता बरक़रार रहे, इसके लिए दो मुसलमान हवलदारों के हाथो भी पीटा गया | शराफत अली जमानत देने के वास्ते चिरौरी के लिए फिर से रामधन के पास गए, "माफ़ करियेगा हुजुर, आपका दिल बडा हैगा|" रामधन का हाथ अपने आप मूंछों पर चला गया- शराफत मियां, आपकी बड़ी इज्ज़त करते हैं, लेकिन देखिये तो जरा कैसा मारा है पठ्ठे ने हमारे लड़के को | चार दिन से बिस्तर नहीं छोड़ा | शराफत अली की आँखों में आंसू आ गए, चार दिन से तो उनके लियाकत को खाना भी नसीब न हुआ होगा | "बाबू, अब क्या करें, हमारी ही गलती है, चाहे तो हमें सजा दिला दो, लेकिन लड़के को छुडवा दें |" रामधन बाबू कैसे भी इंसान हो लेकिन किसी को रोता हुआ नहीं देख सकते थे | पूरे दो हज़ार के मुचलके पे लियाक़त अली को छोड़ा गया | बड़े भाई की आज्ञा का सम्मान करते हुए लियाक़त ने रामधन और पंडित हरिराम से माफ़ी भी मांग ली | लेकिन मन से बैर न गया|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जगतराम और बनवारी अब और अकड़ में चलने लगे थे, अब तो थानेदार भी हमारी ही सुनता है, अब काहे का डर | लियाक़त कहीं पे भी दिख जाते तो 'ओये पाकिस्तानी, ओये पाकिस्तानी' कहते हुए ठठाकर हँसते थे | लियाक़त अपना दुखड़ा किसको रोते, नन्हे ताहिर से बतियाते रहते कि इस मुल्क से हमें इन्साफ की उम्मीद ही छोड़ देनी चाहिए, ये हमारा मुल्क नहीं है, वगैरह वगैरह | शराफत अली ने सुना तो बहुत नाराज हुए, "लियाक़त, बच्चे के दिल में जहर न भरो | क़यामत के दिन तो सब का फैसला होना ही है, तो तुम्हारा गुनाह भी खुदा की निगाह से न छुपेगा |" गाँव के मुसलमान हाल-चाल जानने के लिए आये, इनमे से मगर किसी ने आगे बढ़कर जमानत न दी थी, "क्या मियां, ये लोग तो अब हमें गलत दफाओं में जेल भेजते रहेंगे | अरे इस जुल्म के खिलाफ कोई आवाज उठाएगा या नहीं |" शराफत अली सब को चुप कराते रहे, "न भैया न, गलती हमारी ही थी | अरे हम ही ने अपनी बेटी को इतनी छूट दी रखी थी |" जुम्मे की नमाज में अक्सर लोग यही बातें करते, "शराफत मियां, क्या हाल चाल?", "चचा , क्या मिजाज़ ?" शराफत अली जानते थे कि अचानक उनके हाल-चाल क्यों इतने जरूरी हो गए | मौलाना हफ़ीज़, जो जहीर मियां के रोशन चिराग हैं, देवबंद से तालीम लेकर आये थे | अक्सर मौलाना जिक्र करते जाते "आजकल गैरमज़हबी लोग कैसे खुदापरस्त और इमानपसंद लोगों को जीने नहीं दी रहे | आज तक हमें वैसे भी काफिरों की गुलामी ही मिली है | अंग्रेजों ने इस मुल्क को इन लोगों के हाथ दे दिया | एक जिहाद की जरूरत है मुल्क में |" कोई इस बारे में कुछ नहीं कह रहा था, लेकिन हवाओं का रूख आप ही जाहिर था | बस एक चिंगारी और आग फैलनी तय थी | खुदा को भी शायद अपने बन्दों पर रहम नहीं आता है | घास के ढेर के पास आग जाने से खुदा रोक सकता है, लेकिन नहीं, वो नहीं रोकता | जाने क्यों, जब महाकाल अपनी विनाशलीला पर उतरता है, शिव को तांडव सूझता है, और विष्णु क्षीर में सोने चले जाते हैं | ताहिर अली ने नज्जो आपा को जाते देखा था, जैसे कोई बकरी जिबह के लिए ले जाई जा रही हो | उस शाम नजमा घर नहीं लौटी, और उसके बाद कभी नहीं | शराफत अली को पता था कि ये खबर अगर बाहर फ़ैल गयी तो फसादात को कोई नहीं रोक पायेगा | लियाक़त को दिल्ली भेज दिया | और गाँव भर में कहलवा दिया कि नजमा को लियाक़त के साथ भेज दिया है | दिल्ली में कोई बूढी खाला हैं, उनके पास रहेगी | लियाक़त बहुत गुस्से में थे, रोने को हुए थे | लेकिन शराफत अली बिलकुल पत्थर बन गए थे, "बेटी खो चुका हूँ, अब ताहिर को नहीं खोना चाहता मैं |" नज्जो आपा का वो चेहरा ताहिर मियां को आज भी डराता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-- &lt;b&gt;जारी है&amp;nbsp;&lt;/b&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-8285426646999741898?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/W6H6h_4nrYk" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-01-23T08:55:00.542+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://4.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTVBVebXU-I/AAAAAAAAAIc/vzCSgyssLe4/s72-c/field-with-pollard-trees-and-mountainous-background.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/01/blog-post_18.html</feedburner:origLink></item><item><title>परिंदे</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/DY2E7Itef30/blog-post.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sat, 15 Jan 2011 10:37:45 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-3653884615788872972</guid><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;(कहानी किश्तों में इससे पहले &lt;a href="http://kabaadkhaana.blogspot.com/2011/01/blog-post_03.html"&gt;कबाड़खाने&lt;/a&gt; में पोस्ट की जा चुकी है)&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTFG-z45iBI/AAAAAAAAAHs/3UXge8gfN7c/s1600/The+Old+Church+Tower+at+Nuenen+-+400pxlsw.bmp" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="351" src="http://2.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTFG-z45iBI/AAAAAAAAAHs/3UXge8gfN7c/s400/The+Old+Church+Tower+at+Nuenen+-+400pxlsw.bmp" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
शाम का धुंधलका छाने लगा था | पगडण्डी की मोड़ों पर अँधेरा पाँव पसारने लगा था | बेतरतीब उग आई झाड़ियाँ अँधेरे को पनाह देती सी महसूस होती हैं | पहाड़ों में हरे रंग की कालिमा के बीच बीच में भूरा रंग उजला लग रहा था | प्रोफ़ेसर उप्रेती चलते चलते ठिठक गए | जैकेट की जेब में हाथ डालकर अपना पसंदीदा सिगरेट ब्रांड निकाला, कैप्सटन | पीछे पीछे जमीन देखता सुधीर भी रुक गया | प्रोफ़ेसर हर एक जेब में हाथ डालकर माचिस ढूँढने की नाकाम कोशिश करने लगे | बीच बीच में हाथ झटककर नाउम्मीद भी होते | सुधीर ने माचिस की डिबिया उनकी तरफ बढ़ा दी | प्रोफ़ेसर खिसियानी हँसी हँस पड़े | "भगवान् की तलाश सबसे ज्यादा नास्तिक को ही होती है | तुम कब से माचिस रखने लगे ?" सुधीर ने सिर्फ हूँ किया, प्रोफ़ेसर के भूलने की आदत वो जानता था |&lt;br /&gt;
"तुमको अर्चना याद है ? अर्चना सेमवाल ? शायद तुम्हारी सीनियर रही होगी |" प्रोफ़ेसर ने धीरे से कहा | सुधीर का कोई जवाब नहीं आया, बात उस तक नहीं पहुंची |&lt;br /&gt;
"जिंदगी का गणित कुछ अजीब नहीं लगता तुम्हें ?" प्रोफ़ेसर ने सवाल किया | सुधीर का ध्यान इस ओर नहीं था | प्रोफ़ेसर ने अपना सवाल दोहराया |&lt;br /&gt;
"आपको ऐसा क्यों लगता है प्रोफ़ेसर ?&lt;br /&gt;
"अर्चना के बारे में सोचकर लगता है | मेरी सबसे होनहार स्टुडेंट |" प्रोफ़ेसर आगे आगे चल रहे थे | पगडंडी इतनी छोटी थी कि दो लोग एक साथ नहीं चल सकते थे | बात करने के लिए लगभग चिल्लाना पड़ रहा था |&lt;br /&gt;
"प्रोफ़ेसर! अब वापस चलें ? हम लोग काफी दूर आ गए हैं कॉलेज से | अँधेरा भी घिरने लगा है |" सुधीर ने चिल्लाकर कहा | दोनों वापस मुड़ गए | अब सुधीर आगे आगे चल रहा था, प्रोफ़ेसर पीछे | पटकथा वही थी, बस पात्र आपस में बदल लिए | कॉलेज के मैदान में पीली रौशनी जलने लगी थी | फ़ुटबाल खेलने वाले लड़के अब होहल्ला करते हुए, एक दूसरे को गाली देते हुए अपने होस्टल की ओर जा रहे होंगे | गंगोत्री गर्ल्स होस्टल के गेट पर खड़े लड़के लड़की अब एक दूसरे से विदा लेने लगे होंगे | कॉलेज में ऑफिशियल रात हो गयी थी | &lt;br /&gt;
"आप कुछ कह रहे थे प्रोफ़ेसर |" सुधीर ने प्रोफ़ेसर को याद दिलाया |&lt;br /&gt;
"हाँ, अर्चना वापस आई है यहाँ पढ़ाने के लिए | तुम तो जानते हो अर्चना तुम्हारी सीनियर थी |"&lt;br /&gt;
सुधीर तब फर्स्ट इयर में आया था, जब अर्चना सेमवाल फाइनल इयर में थी | कॉलेज की जीनियस लडकी, मैकेनिकल इंजीनियरिंग में अपने बैच की अकेली लडकी | मैकेनिकल लेने वाली, बाद की कई लड़कियों के लिए वो प्रेरणाश्रोत बनी थी, मिस अर्चना | "मुझे पता है प्रोफ़ेसर लेकिन मेरी उनसे कोई जान-पहचान नहीं थी |"&lt;br /&gt;
"अर्चना ने प्रेम विवाह किया था, कुछ सालों में तलाक़, जब विवाह में प्रेम ही नहीं रहा |" प्रोफ़ेसर अब सुधीर के बगल में आ गए थे | "पगडण्डी पे सावधानी से कदम रखना, आगे फिसलन है |"&lt;br /&gt;
प्रोफ़ेसर ने एक गहरी सांस भरी, "शोभा और डॉली को अपने साथ रखने के लिए मैंने क्या क्या कोशिशें नहीं की | लेकिन शोभा गयी तो गयी, डॉली ने भी पूरा बचपन बाप के बिना गुज़ार लिया |" सुधीर चुपचाप चलता रहा, कहने के लिए कुछ नहीं था | प्रोफ़ेसर अपनी रौ में बोलते रहे, "डॉली की शादी भी हो गयी, लेकिन मुझे नहीं बुलाया | कभी कभी मिल आता हूँ उससे दिल्ली जाकर, लेकिन दिल्ली बहुत दूर है शायद अभी | वक़्त भी कितनी तेज़ भागता है न ? कल तक तो मेरी बच्ची थी डॉली, मेरी दुनिया | आज उसकी अपनी दुनिया है, जहाँ मेरे लिए कोई जगह नहीं |"&lt;br /&gt;
"आप, वहाँ क्यों नहीं चले जाते ? क्या रखा है यहाँ ?" सुधीर ने बेपरवाही से कहा |&lt;br /&gt;
"सूरज बुझते ही यहाँ रात हो जाती है | है न ?" प्रोफ़ेसर ने सिगरेट फेंक दी |&lt;br /&gt;
हलकी बूंदाबांदी फिर से होने लगी थी | दोनों तेज़ क़दमों से ट्रांसिट की ओर चलने लगे |&lt;br /&gt;
"प्रोफ़ेसर ! अभी स्वामी जी के पास गयी थी, लगा कि आप वहाँ होंगे | आज रात का खाना मेरे रूम में, ठीक ?" सामने मिस अर्चना खड़ी थी |&lt;br /&gt;
"क्या कर रहा है वो साला ? हमारे साथ घूमने भी नहीं आया |" प्रोफ़ेसर ने गुस्से से कहा | मिस अर्चना हँस पड़ी, सुधीर ने देखा, मिस अर्चना अभी भी सुन्दर लगती हैं |&lt;br /&gt;
"सुधीर! तुम भी हमारे साथ ही खाओगे |" मिस अर्चना ने आदेश के स्वर में कहा |&lt;br /&gt;
"मिस, मैं ...खुद..." सुधीर सकपका गए |&lt;br /&gt;
"अरे! सुधीर खा लो, कब तक विश्वामित्र की तरह तपस्या करते रहोगे |" प्रोफ़ेसर ने धीमे से कहा |&lt;br /&gt;
"क्या कहा आपने ?" मिस अर्चना ने दोनों हाथ कमर पे रख लिए |&lt;br /&gt;
"मैं कह रहा था कि खा लो, अर्चना खाना बहुत अच्छा बनाती है |" प्रोफ़ेसर ने शरारती मुस्कान से कहा |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खाना खाने के बाद सभी सुर-स्तव(बकौल स्वामी) का पान करने के लिए बैठ गए | सुधीर उनसे थोड़ी दूर बैठ गया, फ्रान्ज़ काफ्का में मुँह डालकर | किताबों में सुधीर की कोई दिलचस्पी नहीं है , लेकिन... | मिस अर्चना ने सुधीर से भी लेने का आग्रह किया, पर सुधीर टाल गए | बातों की कोई धुन छेड़े बिना सभी पी रहे थे | अचानक स्वामी बोले, "यार डॉक्टर, तुम कहाँ यहाँ हम लोगों के बीच चले आये | अच्छा खासा बेंगलोर में थे | पैसा भी बना रहे थे | बढ़िया कुलीन परिवार, शादी वादी करे रहते और फिर ..." बोलते बोलते रुक गए | सुधीर के लिए ये सवाल कभी आया न हो ऐसी बात नहीं थी | बस सुधीर को खुद कभी ये कोई सवाल नहीं लगा, "माँ ने शादी कराने के लिए काफी जोर लगाया था | तीनों भाई अपनी गृहस्थी में खुश हैं | फिर माँ चल बसी तो उस दुनिया के साथ जो ताना बाना था वो भी नहीं रहा | ऐसे ही एक दिन यहाँ चला आया |" ख़ामोशी एक बार फिर सबके मन में पसर गयी थी | बाहर टिन शेड पर बारिश की धीमी धीमी टप टप सुनी जा सकती थी | आज सुधीर का जन्मदिन था, माँ थी तो जन्मदिन भी याद रहता था | अब तो पता ही नहीं चलता और गुज़र जाता है | प्राग से कभी कभी भैया भाभी का फोन आ जाता है, साथ में छोटा अंशुल भी होता है |&lt;br /&gt;
"जिंदगी का गणित भी अजीब है प्रोफ़ेसर !" मिस अर्चना पहली बार बोली, सुधीर ने चौंककर प्रोफ़ेसर की ओर देखा, प्रोफ़ेसर धीमे से मुस्कुराये | अर्चना ने सिप लेकर अपनी बात जारी रखी, "जहाँ से नफ़ा होने की उम्मीद होती है, वहाँ से नुक्सान, है न प्रोफ़ेसर ?" प्रोफ़ेसर बन्द खिड़की को घूर रहे थे, "लाइफ इस व्हट हैपंस टु यू व्हाइल यू आर बिजी मेकिंग अदर प्लान्स" | स्वामी हल्के से हँस दिए, "प्रोफ़ेसर साला, हमेशा कुछ न कुछ फिलोसोफी मारता है | किताबें पढ़ पढ़ के पागल हो गया है |" सुधीर जानना चाहता था कि मिस अर्चना क्यों इस जगह पर चली आई, पूछने में संकोच हुआ तो नहीं पूछा | प्रोफ़ेसर ने कुछ कहा तो था कि तलाक़ लिया था मिस अर्चना ने, लेकिन फिर यहाँ आने की क्या जरूरत थी | सुबह की बरसात होने से धूप की उम्मीद बेमानी तो नहीं होती | जिंदगी एक बार फिर से भी तो शुरू हो सकती है | सपनों से हार जाना भी जीवन का एक अहम् पड़ाव है, सफ़र फिर भी जारी रहता है |&lt;br /&gt;
"मीरा देहरादून जाना चाहती है, जाह्नवी को लेकर |" स्वामी ने अपना सर झुका लिया |&lt;br /&gt;
प्रोफ़ेसर ने धीमे से पूछा "तुम क्यों नहीं चले जाते उनके साथ ?"&lt;br /&gt;
स्वामी ने बदले में कुछ न कहा | प्रोफ़ेसर उप्रेती ने शोभा को ऐसे ही जाते देखा था | शोभा, फिर कभी वापस नहीं आई | डॉली भी बदलकर अनुपमा हो गयी | दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर, मिसेज़ अनुपमा कोहली | "चलो खैर, देहरादून जाकर जाह्नवी की एडुकेशन ठीक से हो जायेगी, फ्यूचर अच्छा रहेगा |" प्रोफ़ेसर ने सिगरेट जलाते हुए कहा | "आपके घर से कोई पत्र नहीं आया, मिस अर्चना ?" स्वामी ने पूछा |&lt;br /&gt;
"नहीं" अर्चना एक बेबस हँसी हँस दी, "बाबूजी और छोटे भाई ने जो कहा था, पूरा किया | पिछले दिनों माँ की चिट्ठी आई थी, बाबूजी की तबियत खराब होने का जिक्र भी था |"&lt;br /&gt;
"तुम्हें जाना चाहिए था |" प्रोफ़ेसर ने खांसते खांसते कहा |&lt;br /&gt;
"पी एस में भाई ने लिखा था कि आने की कोई जरूरत नहीं है, पोस्ट करते वक़्त लिखा होगा |" अर्चना हाथ में पकडे ग्लास को काफी देर तक देखती रही, "धमकी के स्वर में अपने साइन भी किये थे |"&lt;br /&gt;
बाहर बारिश तेज़ हो चली थी, टिन शेड की टप टप अब संगीत न रहकर एक कुंठा हो चली थी | लैम्प की बत्ती अचानक तेज़ हो गयी थी | प्रोफ़ेसर ने आगे बढ़कर उसे थोड़ा धीमा किया | अर्चना के अन्दर भावनाओं का आलोड़न जारी था, "बाबूजी शायद न बचें, फिर उसके बाद भाई घर अपने नाम करना चाहेगा | आखिर उसके बीवी-बच्चे हैं, घर-गृहस्थी है | सब कुछ जानते हुए भी बाबूजी उसके नाम कर देंगे | पुरुषप्रधान समाज की हकीकत यही है | स्त्री पुरुष बराबरी, भेदभाव नहीं, से सब बातें सिर्फ घर से बाहर ही अच्छे लगती है | जिंदगी के गणित का एक अजीब सा समीकरण |" कॉलेज के शिवमंदिर से टन...टन की आवाज आ रही थी | शाम की आरती के बाद पुजारी रात को २ किलोमीटर दूर जंगल में अपने घर जाएगा | सर्दी , गर्मी , बरसात हो लेकिन पुजारी का नियम नहीं टूटता | सन्यास उसने लिया नहीं है, लेकिन अकथ, अदृश्य, अनाम को लेकर ऐसा पागलपन एक गृहस्थ में बिरले ही देखने को मिलता है | स्वामी ने हाथ जोड़कर हरिओम का घोष किया |&lt;br /&gt;
"बाबूजी ने बचपन से दिल्ली की लड़की बनाके रखा | पिछ्ड़ेपंथी से कहीं दूर, मोडर्न दुनिया में | इस दुनिया में लड़के -लड़कियों के बीच कोई फर्क नहीं है | दोनों जींस पहनते हैं, बाल कटाते हैं, फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करते हैं | इंजीनियरिंग में एडमिशन के टाइम पर उन्हें अपना गाँव याद आया, गाँव से मेरा बर्थ सर्टिफिकेट बना लिया गया | फिर इंजीनियरिंग में विक्रांत से प्यार | एक साल के करीयर को समर्पित किया, फिर शादी | विक्रांत के रूप में सब कुछ मिला, और भी बड़ा परिवार, और भी बड़ा घर, और और भी बड़े बुद्धिजीवी | विक्रांत के साथ हर तरह से खुश थी मैं, मेरी मनमर्जी चलती थी | फिर वही, जिसपे खबरें बनती हैं; अविश्वास, शक, रोज़ रोज़ के झगड़े | मेरी जॉब छुड़वा दी गयी,फिर एक दिन चरित्रहीनता का आरोप लगाकर तलाक़ की अर्जी डाल दी गयी | अदालत में बैठकर सुनती रही कि मेरे अफ़ेयर किस किस से हैं | बदले में मेरे वकील ने भी विक्रांत के ऐसी ऐसी लड़कियों से रिश्ते निकाले, जिनके नाम मैंने भी नहीं सुने थे | तलाक़ तो खैर लेना ही था, लेकिन होड़ लगी थी कि कौन सामने वाले को ज्यादा पतित और स्खलित साबित कर सकता है | वो लोग जीत गए |" अर्चना के चेहरे पे सख्ती आने लगी थी | प्रोफ़ेसर फिर से बन्द खिड़की के बाहर देखने लगे, काले शीशे को, जैसे जानते हों कि सच और काला होने जा रहा है | अर्चना ने एक सिप और भरा, "अदालती कार्यवाही में मेरे वकील ने वो सब गलत साबित किया , लेकिन अब कोई फ़ायेदा नहीं था | कुछ दिन माँ के आँचल में चुपचाप सोई कुछ घूरती रही | एक दिन मेरा सारा सामान मेरे घर वापस पहुंचा दिया | उस दिन महसूस हुआ मानो दलदल में गिरी हुई हूँ | बस अब कोई रास्ता नहीं है, संघर्ष से और भी हार मिलेगी |"&lt;br /&gt;
"आपके घर वालों ने तो आपको सपोर्ट किया होगा |" सुधीर ने पहली बार मिस अर्चना से सीधा संवाद किया |&lt;br /&gt;
"भाई को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच आती दिखने लगी थी | हर एक बात में टोकाटोकी होने लगी थी | कभी कभी मुँह पर कह भी दिया जाता कि तुम तो हमें मत ही समझाओ | अपने आस पास बैठे बुद्धिजीवियों की नस्ल को गिद्धों से भी नीचे गिरते हुए देखा मैंने | कॉलेज में नियुक्तियां निकली तो माँ ने अपने अकाउंट में छुपाये हुए पैसे निकालके मुझे रोते हुए विदा किया |" अर्चना की आँखों में एक आँसू छटपटा रहा था |&lt;br /&gt;
"नफरत होती है ऐसे लोगों से |" प्रोफ़ेसर अपने आप में बड़बड़ाए |&lt;br /&gt;
"नफरत मुझे माँ से होती है | क्यों, इस सब के बीच में बेचारी सी बनी रही, लाचार बनी रही| अरे लोगों के खिलाफ मेरा पक्ष नहीं ले सकती थी, तो लोगों के साथ ही हो लेती | मेरे चरित्र को जब मेरे अपने ही बाजार में बेच रहे थे, तो वो भी कुछ नफ़ा कमा लेती | क्यों दोनों तरफ से हिस्सेदार बनना ?"&lt;br /&gt;
"अर्चना! उन्होंने तुम्हें यहाँ भेजा है, सबके विरोध के वावजूद |"&lt;br /&gt;
"यही तो ग़लतफ़हमी है स्वामीजी, उन्होंने मुझे वहाँ से भेज दिया | जो काम भाई, बाबूजी सारी लानत-मलानत भेजने के बाद भी नहीं कर सके, उन्होंने मुझे ममता के धोखे में रखकर कर दिया |"&lt;br /&gt;
"तुम अभी बहुत निर्दयता से आकलन कर रही हो अर्चना, वक़्त के साथ शायद तुम्हें ... |" प्रोफ़ेसर जानते थे वक़्त के साथ भी धारणाएं बदलनी बहुत मुश्किल होती हैं | आखिर यही था तो वक़्त उनके रिश्तों में जमी बर्फ क्यों नहीं पिघला पाया |&lt;br /&gt;
"वैसे आप सही कहते हैं प्रोफ़ेसर |" अर्चना के चेहरे पर सायास मुस्कान थी, "शान्ति और नीरवता के इस शमशान में, गिद्धों की आमद मंदिरों से कम है |"&lt;br /&gt;
"प्रोफ़ेसर! डॉली की तरफ से कोई ख़त आया ?" स्वामी ने एक हलकी झिझक के बाद पूछ लिया | समंदर में थोड़ा सा नमक और डालने से समंदर नहीं बदलेगा | खारापन जुबान पर अभी ताजा ही था |&lt;br /&gt;
"फोन आया था | एक बेटा हुआ है | कह रही थी, पापा, माथा बिलकुल आप का लगता है |" प्रोफ़ेसर बच्चों जैसे खुश हुए, लेकिन एक वक़्त के बाद हँसी को जबरन खींचा भी तो नहीं जाता, "फिर कहने लगी कि, पापा! पूछोगे नहीं माँ पर क्या गया है ?" सुधीर चौंका, लेकिन शांत बैठा रहा | मिस अर्चना अपने ग्लास को ध्यान से देखती रही | स्वामी खिड़की की ओर देखने लगे, जहाँ थोड़ी देर पहले तक प्रोफ़ेसर देख रहे थे |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगले दिन दरवाजे पर हुई थाप से सुधीर यकबयक चौंक कर उठा | दरवाजा खोला तो प्रोफ़ेसर और मिस अर्चना खड़े थे | "जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई हो भई डॉक्टर " प्रोफ़ेसर ने हाथ आगे बढ़ाया | सुधीर अभी उन्नींदा सा ही था, "लेकिन आप लोगों को कैसे पता चला ?" प्रोफ़ेसर एक ओर को हट गए | "हमें तो हमारी स्लैम बुक से पता चला है |" मिस अर्चना ने हाथ आगे बढ़ा लिया | सुधीर ने बढ़कर हाथ मिलाया,"मिस! इतनी पुरानी चीजें आपने रखी हुई हैं ? और आपको मेरा जन्मदिन भी याद है उसमे ?" सुधीर को याद आया कि बहुत सारे जूनियर मिस अर्चना के काफी प्रशंसक थे | और उन्होंने ही मिस अर्चना से अनुरोध करके उनकी स्लैम बुक भरी थी | "तुम भी क्या मिस मिस लगाये रहते हो यार |" प्रोफ़ेसर ने जैकेट की जेब में हाथ डाल लिए थे | सुधीर की तन्द्रा टूटी, ध्यान आया बरामदे में ठंडी हवाएं चल रही हैं | "अन्दर आ जाइए |" सुधीर ने एक ओर हटते हुए कहा, "आदत नहीं जाती सर, शुरू से ही मिस कहते रहे हैं |" मिस अर्चना और प्रोफ़ेसर उप्रेती अन्दर आकर बिस्तर पर बैठ गए (घर में कुर्सियां नहीं है) | "हाँ सुधीर ! और तुम्हारा वो हाँजी हाँजी करना भी | क्या पंजाबियों की तरह हिंदी बोलते हो |" सुधीर खिसिया गए, "ठीक है मिस , अब से नहीं बोलूँगा |" प्रोफ़ेसर ने दो दिन पुराना अखबार उठा लिया, "सुधीर तुम्हारा कमरा तो बाकी ट्रांसिट से भी ठंडा है | अरे यार, कुछ बंदोबस्त करो हीटर वगैरह का |" अर्चना ने गंभीर भाव से कहा - "अरे! दासगुप्ता सर को बोल दो , बोयज़ होस्टल से जब्त कर लेंगे तुम्हारे लिए भी |" प्रोफ़ेसर और सुधीर हँसने लगे, अर्चना ने दोनों की ओर देखा, "अरे सही में |" प्रोफ़ेसर उप्रेती दासगुप्ता को बेहद पसंद करते थे , "दासगुप्ता थोड़ा शरारती सा है, लेकिन अच्छा टीचर है |" सुधीर ने उनकी ओर अविश्वास से देखा | "अरे मानों भई !" प्रोफ़ेसर सुधीर का असमंजस समझ गए थे, "दासगुप्ता साला अपनी इमेज सही नहीं रखता , पता नहीं क्यूँ |" "दासगुप्ता सर ने प्रेम विवाह किया है न ?" अर्चना ने जिज्ञासा रखी | "हाँ , मिस आपके ही बैच की लड़की हैं, कंप्यूटर साइंस ब्रांच से हैं, मिस इंदिरा सेन |" "वो मिस नहीं, मिसेज हैं अब |" प्रोफ़ेसर ने टोका | "इंदिरा सही स्टुडेंट थी सी एस के टॉप लोगों में से थी | लेकिन टीचर से शादी ..." अर्चना ने अपने शब्दों को रोक दिया | "दासगुप्ता ने सारा मामला बहुत अच्छी तरह संभाला था | उसके घर से मंजूरी नहीं मिली थी , हम लोगों ने उसकी शादी करवाई थी | स्वामी ने लड़की का कन्यादान किया था |" प्रोफ़ेसर हौले से हँसे, "तो आज क्या करने का प्लान है भई?" सुधीर ने बारी बारी से दोनों की ओर देखा, कुछ समझ नहीं आने पर कह दिया, "कुछ नहीं सर |" "अरे ऐसे कैसे कुछ नहीं | आज कुछ मीठा तो बनाना होगा | मन्दिर में प्रसाद चढ़ाना चाहिए |" मिस अर्चना अपनी लय में बोलती जा रही थी | सुधीर को माँ का स्मरण हो आया | हर जन्मदिन पर फ़ोन करके ये दोनों चीजें प्राथमिकता में गिनवाती, मन्दिर में प्रसाद, घर पर मीठा | इन सब से जिंदगी की कड़वाहट शायद थोड़ी कम होती हो , सुधीर ने मन ही मन सोचा | "अरे कहाँ खो गए ?" अर्चना ने सुधीर के कंधे पर हाथ रखा, "मैं कह रही थी कि इन सबसे जिंदगी में थोड़ी मिठास घुलती है |" सुधीर हँस दिए, लड़कियों की आदत एक जैसी होती हैं, माँ जैसी | "तुम्हारा जन्मदिन भी बड़े अच्छे दिन आया है, आज मुझे मन्दिर जाना है | तुम भी चलो |" मिस अर्चना के स्वर में सुधीर को हमेशा एक आदेश का भान रहता है | "नहीं , मिस ... मन्दिर के लिए तो मुझे माफ़ ही करो " सुधीर ने कहा | "अच्छा ? क्यूँ भई ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा जिसका सुधीर ने कोई जवाब नहीं दिया | "तुम आखिरी बार मन्दिर कब गए थे ?" मिस अर्चना ने पूछा | "याद नहीं पड़ता | ऐसा नहीं कि भगवान से कोई दुश्मनी हो , बस वहाँ अन्दर रहा नहीं जाता |" सुधीर ने अपना बचाव किया | "ठीक है , फिर तुम अन्दर मत आना , बाहर से ही पूजा करना , वैसे भी यहाँ मन्दिर में एक साथ सिर्फ दो ही आदमी अन्दर रह सकते हैं | तुम अन्दर आ जाओगे तो पुजारी को बाहर खड़ा होना पड़ेगा |" मिस अर्चना मुस्कुरायी | सुधीर ने अब प्रतिरोध करना छोड़ दिया |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज माता के मन्दिर की ओर जाने वाले काफी लोग ट्रैकरों का इंतज़ार कर रहे थे | कुछ लोग पैदल ही चलने लगे | "सुधीर ! पैदल चलें ? तुम चल लोगे ?" अर्चना ने सुधीर की ओर देखा | आसमानी लिबास में बेहद हल्के रंग का दुप्पटा हवा में उड़ रहा था | "हाँ जी | हम तो कॉलेज टाइम में पौड़ी तक पैदल ही निकल जाते थे |" सुधीर मुस्कुराया | "अच्छा ?" अर्चना को आश्चर्य हुआ | माथे पे उड़ रही अलकों को कान से पीछे करती, और दूसरे हाथ से दुप्पटे को उड़ने से बचाती अर्चना को देखकर सुधीर ने मदद का प्रस्ताव किया | "मिस, आप चाहें तो मैं आपकी ये पूजा की डलिया पकड़ लूँ ?" सुधीर ने हाथ आगे बढ़ाया | "ओह , श्योर , थैंक यू |" मिस अर्चना ने डलिया सुधीर की ओर बढ़ा दी | जल्दी में सुधीर की उँगलियाँ उनकी उँगलियों से छू गयी | "ओह माय ... तुम्हारी उँगलियाँ इतनी ठंडी क्यूँ है ? अरे खून नहीं है क्या शरीर में ?" अर्चना ने सुधीर को झिड़का , "देखो, यहाँ सही से खाना खाया करो , नहीं खाओगे तो वजन गिरने लगेगा |" "जी मिस " सुधीर से कुछ कहते न बना | "अपने हाथ जैकेट के अन्दर रखो " अर्चना ने दुबारा आदेश दिया | सुधीर ने चुपचाप बाँया हाथ जेब में रख लिया , और दाहिने की उँगलियाँ भी जेब में डाल ली | सामने एक नवविवाहिता चल रही थी, उसकी बाजुओं तक भरी लाल चूड़ियाँ बार बार खनक रही थी | उसी के आगे एक प्रौढ़ा थी, जो संभवत उसकी सास थी | जरा सा हट कर चलता युवक उसके कान में कुछ कहता और वो हौले से हँस देती | युवक ने थोड़ा सा पीछे हटकर, युवती से डलिया अपने हाथ में ले ली, और दाहिने हाथ से युवती का हाथ कसकर पकड़ लिया | वो थोड़ा कसमसाई , लेकिन फिर दाहिना हाथ भी उसने अपने बाँयें हाथ से मिला लिया | "तुम्हारा शादी करने का कोई इरादा भी है या ... ?" मिस अर्चना ने सुधीर से पूछा | सुधीर झेंप गए , मिस ने उन्हें सामने चल रहे विवाहित युगल को देखते हुए पकड़ लिया है शायद | "पता नहीं मिस |"&lt;br /&gt;
"कभी कोई लड़की पसंद नहीं आई ?"&lt;br /&gt;
"आई थी मिस" सुधीर को अपने बेबाकी पर खुद भी आश्चर्य हुआ |&lt;br /&gt;
"फिर?"&lt;br /&gt;
"बस , जब तक मैं इंजीनियरिंग पूरी करता उसकी शादी तय हो गयी थी |"&lt;br /&gt;
"ओके !"&lt;br /&gt;
"हमारे यहाँ तो आप जानती ही हैं मिस कि एक बार लड़की की शादी तय हो गयी , इसका मतलब कि शादी हो ही गयी | फिर कुछ कहना सुनना बाकी नहीं रह जाता |"&lt;br /&gt;
"हूँ ..." मिस अर्चना अपने पैरों की ओर देखने लगी | पहाड़ी का ये मोड़ अन्दर की ओर था इसलिए हवा लगनी बन्द हो गयी थी , लेकिन काफी ठंडा और प्रकाश भी थोड़ा कम था |&lt;br /&gt;
अचानक से एक जीप उनके बगल में रुकी उन्होंने मुड़कर देखा तो दासगुप्ता जीप से मुँह बाहर किये दिखाई दिए , "अरे मैडम , अरे सुधीर , आओ आओ, जगह है थोड़ी इसमें |" फिर मुड़कर अपने साथ वाले लोगों से विनय की , "भाईसाहब ! आप कृपया पीछे बैठ जाएँ |" एक साधारण सा ग्रामीण इस विनम्र निवेदन से पानी पानी हो गया | जल्दी से उतर कर पिछली सीट पर चला गया | दासगुप्ता और उनकी पत्नी एक ओर , एक आदमी दांयी ओर बैठा था | सुधीर और मिस अर्चना बीच में एक आदमी की सीट पर बैठ गए | इंदिरा, दासगुप्ता सर की पत्नी , अर्चना से बातचीत का सिलसिला बढ़ने लगी | पुरानी बातों, और यादों को ताजा करते, और हँसते रहते | दासगुप्ता बोले , "हाँ अर्चना, कैसा लग रहा है तुमको यहाँ ?"&lt;br /&gt;
"सर, पूरे चार साल यहीं गुज़ारे थे, कोई पहली बार थोड़े ही आई हूँ |"&lt;br /&gt;
"हाँ सो तो है... लेकिन फिर भी, काफी चेंजेज भी तो हुआ है इधर |"&lt;br /&gt;
"नहीं सर, कुछ भी तो नहीं बदला है | वही सर्दियाँ हैं, वहीं हम हैं |"&lt;br /&gt;
"पिछले साल हम यहीं रुके थे, बर्फ पड़ी थी, इस साल भी पड़ेगी न ?" इंदिरा ने दोनों हाथो को रगड़ना शुरू कर दिया जैसे पिछली बर्फ़बारी की याद आने से ही ठण्ड ज्यादा तेज़ लगने लगी हो |&lt;br /&gt;
"अभी फिफ्थ सेमेस्टर के एक्साम बाकी हैं , तब तक तो हम यहीं है |" दासगुप्ता ने मुस्कुराके इंदिरा की ओर देखा |&lt;br /&gt;
"इस बार भी यहीं ... रहते हैं न ..."इंदिरा साफ़ तौर पर नाराज दिख रही थी |&lt;br /&gt;
"देखेंगे" कहकर दासगुप्ता सर पहाड़ियों पर उग रहे सूर्य को देखने लगे |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुधीर बाहर खड़े हो गए | मिस अर्चना ने अन्दर बुलाया तो नहीं आये | "भगवान को नहीं मानते हो क्या ?" मिस अर्चना ने दबी जुबान में गुस्से से कहा | "मानता हूँ |" सुधीर ने जवाब तो दिया लेकिन मन की कशमकश नहीं ख़त्म कर पाए | हाथ जोड़ दिए , लेकिन मन या आँखों में कोई भाव प्रकट न हुआ | अर्चना ने दुपट्टे का एक छोर सर पे रख लिया, पूजा का नारियल गर्भ-गृह में बैठे पंडित जी को दिया | धूप के तीन चार बत्तियां बनाकर जला लीं | अगरबत्तियां और धूप पहले से ही काफी जली हुई थी, फिर और धुंआ करके क्या... | सुधीर हाथ जोड़े हुए सोचते जा रहे हैं | माँ होती तो हाथ पकड के मन्दिर के अन्दर लेके जाती | उस दिन भी जब मैं गुस्सा होता था, किसी चीज को पाने की जिद करने के लिए | मेरा सबसे आसान तरीका होता था रोते रोते सड़क पर लेट जाना | माँ हँसती, कहती ठीक है लेकिन मन्दिर के अन्दर तो चल ले पहले | मन्दिर के अन्दर ही एक घर में बहुत बूढ़े बाबाजी रहते , जिनकी उम्र मुझे सौ साल की लगती | वे मुझे खूब सारे फल खाने को देते और मैं उनके मन्दिर में कहीं भी घूम सकता था | बस बदले में मुझे मन्दिर में आये लोगों को गीता सार सुनाना होता | मन्दिर से बाहर आते आते मैं भूल जाता कि मैं किस चीज़ के लिए जिद कर रहा था, और माँ का हाथ थामकर उछल उछल कर एक के बाद एक बातें बनाने लगता | माँ, भैया कहता है कि ... "प्रसाद ले लो ! कब तक हाथ जोड़े खड़े रहोगे ?" अर्चना की आवाज सुधीर के कानों में पड़ी | सुधीर की तन्द्रा टूटी, लोग जाने की तैयारी में हैं | सुधीर ने प्रसाद लेने के लिए हाथ बढ़ाया | "अरे मुझसे नहीं , पंडित जी से ले लो | फिर तुम्हें सबको बाँटना है, आज तुम्हारा जन्मदिन है न !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुधीर अपने कमरे में लेटे हुए छत को घूर रहे थे | दोपहर का वक़्त होने के बावजूद कमरे में अँधेरा था , सर्दियों की वजह से दीवारों में सीलन थी | छत पर पानी से बने हुए पैटर्न देखते रहे | बाल सफ़ेद होने लगे हैं क्या ? उसने उठकर आइना ढूँढने की कोशिश की | बैग के अन्दर वाले हिस्से मे से आइना निकालकर देखा | कमरे की लाईट जलाई, ओह लाईट तो कल रात से ही गायब है | खिड़की के पास ले जाकर आईने में कुछ खोजने जैसे लगा | नहीं , बाल सफ़ेद नहीं हुए हैं , सुधीर ने आईने को चेहरे के दायें बाएं घुमाया | शेव भी नहीं की है, लेकिन अभी गरम पानी कहाँ से मिलेगा | दुबारा जाकर बिस्तर पर लेट गए | कुछ सोचने के बाद एकदम से उठे और गैस पर गरम करने के लिए पानी चढ़ा दिया | पुरानी डायरी खोल के पढ़ने लगे जो आदमी, समझिये उसे पढ़ के कुछ और बूढ़ा होता जा रहा है | शायद वाकई मैं बूढ़ा हो रहा हूँ , सुधीर ने मन ही मन सोचा | ये डायरी एक ज़माने से पढ़ी नहीं , लेकिन हर जगह इसे अपने साथ रखकर घूमता हूँ | इसे फेंक देना चाहता हूँ , लेकिन पुरानी चीज़ों से पता नहीं लगाव क्यूँ होता जाता है | छः दिसंबर बयानवे, पौड़ी , आज मैंने श्रद्धा को फ़ोन किया | सोलह दिसंबर बयानवे, श्रद्धा को फ़ोन किया | टेड़े मेड़े अक्षरों में कुछ कुछ गूढ़ जानकारी सी लिखी हुई थी | तीस जनवरी तेरानवे, श्रद्धा के घर फ़ोन किया , बात नहीं हो पायी | सुधीर ने डायरी को टेबल की ओर उछाल दिया | ओंधे मुँह गिरने से पहले डायरी के बीच से एक छोटा सा कार्ड गिर गया | तीन दिसंबर बयानवे , हैप्पी बर्थडे टु माय डियरेस्ट फ्रेंड , फ्रॉम श्रद्धा |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
"जब मैं छोटा था तो सोचा करता था कि पहाड़ों में कहीं मेरा एक छोटा सा घर होगा , जिसमे मैं दिन भर बैठा हुआ विओलिन बजाता रहूँगा |" प्रोफ़ेसर हल्के से हँसे, हाथ सर के पीछे ले जाकर बोले - "अब देखो, घर तो नहीं लेकिन सरकारी कमरा है मेरे पास , जिसमे दिन भर मैं अपने अकेलेपन की विओलिन बजाता रहता हूँ |" सुधीर चुपचाप इस एकालाप को सुनता रहा | धूप खिली हुई थी | तीन दिन हलकी बारिश के बाद आज धूप निकली थी | "यार डॉक्टर ! जीने का मजा तो अकेलेपन में है | है नहीं ?" प्रोफ़ेसर ने धूप में आँखे मिचमिचाते हुए कहा | "जी सर !" सुधीर ने कहा | "रेगिस्तान में चलते रहो , धूप में , न किसी मंजिल की तलाश न कहीं कोई पड़ाव , बस एक सफ़र हो | सफ़र भी ऐसा जिसका कोई नतीजा नहीं निकलना हो , बस एक सफ़र हो , ना आगे कुछ , ना पीछे |" प्रोफ़ेसर ने हथेलियों को आँखों के ऊपर रख लिया , "धूप में आँखें बन्द करो तो नारंगी रंग दिखायी देता है | जोर से पलकों को दबाओगे तो वही रंग काला पड़ जाता है |" आँखें खोलकर उन्होंने गहरी साँस ली | "वो सामने चौखम्भा है न ?" उन्होंने ऊँगली से इशारे किया | सुधीर अनमने भाव से उनकी बात सुन रहा था | अचानक मुड़ कर देखा, बोला "हाँ" | "कभी चलें क्या वहाँ पे ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा | सुधीर हल्के से मुस्कुरा दिया | "अरे वाकई ! चलते हैं कभी | कितनी खूबसूरत जगह है वो |" "कब चलना है ?" सुधीर ने पूछा | "यार ! चलते हैं कभी, मई जून में | अगले सेमेस्टर एंड पे" प्रोफ़ेसर पूरे विश्वास से बोले | जेब से सिगरेट निकाली ही थी, कि सुधीर उनकी ओर देखने लगा, " प्रोफ़ेसर! एक दिन में दो , केवल | उससे ज्यादा नहीं |" प्रोफ़ेसर मुस्कुराये - "अरे यार ! आज मौसम अच्छा है |" थोड़ी देर सोचकर बोले , "स्वामी को मत बताना , नहीं तो साला बखेड़ा खड़ा करेगा |" अचानक प्रोफ़ेसर जैसे सोते से जगे, "आज तारीख क्या है ?" "पंद्रह दिसंबर" सुधीर ने हाथ में पकडे हुए अख़बार के उपरी हिस्से में तारीख देखकर उसमे दो जोड़कर बता दिया | "अरे यार ! कल तो मेकैनिकल का जरूरी पेपर है |" ट्रांसिट की ओर जाती सड़क पर दो लड़कों को टहलते हुए देखा , "अरे सुनो ! मेकैनिकल के किसी लड़के को भेज देना यहाँ , जल्दी |" वे दोनों उलटे कदम वापस होस्टल की ओर चल दिए |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मीरा (स्वामीजी की पत्नी) और मिस अर्चना बैठे हुए बात कर रहे थे | प्रोफ़ेसर उप्रेती के आते ही दोनों चुप हो गए | "स्वामी कहाँ है ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा | "आज सुबह से ही मुझसे नाराज हैं | मुझे लगा कि शायद आपके पास गए होंगे |" मिसेज स्वामी ने जवाब दिया | " अरे मेरे पास तो नहीं आया |" प्रोफ़ेसर कुछ सोचते हुए वापस जाने लगे | "अंकल , पापा बहुत गुस्से मे थे |" जाह्नवी ने पास आकर कहा | "अरे तेरा पापा तो ऐसे ही नाराज होता रहता है | अभी तेरे से भी छोटा है वो |" प्रोफ़ेसर ने उसकी नाक को छूकर कहा | जाह्नवी हँसने लगी, घर के अन्दर भाग गयी | "सर , जाह्नवी की पढाई भी रुक रही है यहाँ | देहरादून में कुछ दिन मम्मी के पास जाना चाहती हूँ , उसके बाद जाह्नवी को बोर्डिंग स्कूल में डाल देती |" मीरा अपनी भड़ास निकाल रही थी , स्वामी ने जरूर ये सब सुनने से मना कर दिया होगा, प्रोफ़ेसर ने मन में सोचा | "ठीक है ! मैं देखता हूँ | शायद मेरे ही रूम पे गया होगा वो |" प्रोफ़ेसर ने मीरा को तसल्ली देने की कोशिश की | "मुझे जाह्नवी के करियर की बेहद चिंता होती रहती है | अगर यहाँ रहेगी तो ..." प्रोफ़ेसर जाना चाहते थे लेकिन मीरा की बातें मानों आज ही ख़त्म होना चाहती हों, "आपने सही किया था सर, जो डॉली को पढ़ने के लिए दिल्ली भेज दिया था | सुना है डॉली अब बाहर जाने वाली है |" प्रोफ़ेसर को अचानक अपनी साँस फूलती सी लगी, वहीं सीढ़ी पर बैठ गए - "हाँ ! जर्मनी जा रही है, दो महीने के लिए | कुछ रिसर्च फेलोशिप का मामला है | " मीरा  "बहुत अच्छा है | बहुत तरक्की मिली है बेटी को | हमारी जाह्नवी जितनी थी , जब गयी थी न ? उसका चेहरा अभी भी याद आता है |" प्रोफ़ेसर जल्दी से बोले - "मीरा , मैं अभी स्वामी को ढूंढ के लाता हूँ | तुम बैठो |" तेज क़दमों से बाहर निकल गए |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कॉलेज होस्टल से पीछे के रास्ते से सीधा सीधा उतर जाओ तो सामने कई छोटे मंझोले खेत दिखाई देते हैं , जो जानवरों को चराने के ज्यादा काम आते हैं | उसी पर बनी हुई पगडण्डी चलते हुए एक छोटी पहाड़ी के पास से गुजरती है | दूर, हॉस्टल से ये पहाड़ी एक मेंढक के मुँह जैसी लगती है | लोग इसे मेंढक पहाड़ी कहते हैं | इसी पहाड़ी के दूसरे छोर पर, जहाँ गहरी खाई है, स्वामी बैठे हुए दिखायी दिए | प्रोफ़ेसर चुपचाप जाकर उनके साथ बैठ गए | " प्रोफ़ेसर यार ! हम शापित हैं , हीदन देवताओं का सोना चुराने वाले समुद्री लुटेरों की तरह | न हम जी सकते हैं , न मर सकते हैं | है न ?" स्वामी प्रोफ़ेसर की ओर देखकर मुस्कुराये | प्रोफ़ेसर ने आश्वस्त भाव से स्वामी की बात को सुना, जवाब देना ही चाहते थे कि यकायक चुप हो रहे | धीरे से इतना ही कहा, "स्वामी |&lt;br /&gt;
"पहले डॉली, अभी जाह्नवी | हम लोग, ऐसा लगता है जैसे विस्थापित लोग हैं | अतीत से विस्थापित, भविष्य में हमारे लिए कोई जगह नहीं |"&lt;br /&gt;
"क्या तुम सेल्फिश होना चाहते हो ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा |&lt;br /&gt;
स्वामी ने मुँह फेर लिया, सामने पहाड़ियों पर बादल उतर आये थे | आँखों में धुंध गहराने लगी थी, "प्रोफ़ेसर , तुम रिटायर कब होने वाले हो ?"&lt;br /&gt;
"दो या तीन साल में, क्यूँ?" प्रोफेसर खुश हुए कि स्वामी ने विषय बदल दिया है |&lt;br /&gt;
"नहीं , मैं सोच रहा हूँ कि तुम उसके बाद क्या करोगे ?"&lt;br /&gt;
प्रोफ़ेसर उप्रेती से कुछ कहते न बना, ज़मीन पर उगी घास को उखाड़ने लगे | पहाड़ी से नीचे अलकनंदा बहती हुई दिखायी दे रही थी | पानी से उठती हुई भाप ने उसके किनारे बसे छोटे कसबे को अपने में समेट लिया था | पहाड़ी कस्बों की अपनी कोई इच्छा नहीं होती | एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ पानी , उनकी रोजमर्रा के जीवन की दिशा तय करते हैं | पहाड़ और पानी , बारहों महीने ठण्ड सहते सहते, ठिठुरते हुए पहाड़ | पानी बर्फ बनकर जम सकता है , पहाड़ वो भी नहीं कर सकते | पहाड़ सिर्फ टूट सकता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
"सुधीर ! दरवाजा खोलो |" दासगुप्ता सर दरवाजे को लगातार पीट रहे थे | सुधीर अचानक चौंककर उठे | बाहर जाकर देखा, दासगुप्ता सर दरवाजे के बाहर खड़े हैं | "प्रोफ़ेसर की तबियत खराब हो गयी है | उनको लेकर पौड़ी जाना है | चलो |" सुधीर और दासगुप्ता तेज क़दमों से चलते हुए ट्रांसिट के बाहर के मैदान में गए | हल्के हल्के रुई के फाहे जैसे आसमान से बूँदे गिर रही थी | इंदिरा और मीरा बाहर मैदान में एक ओर बैठे हुए थे | कुछ और टीचर भी एक एक झुण्ड सा नियत करके उसमे शामिल थे | "स्वामी सर कहाँ हैं ?" सुधीर ने इधर उधर घूमकर पूछा | "कॉलेज की एम्बुलेंस लेने गए हैं | प्रोफ़ेसर ने तुम्हें बुलाया था |" दासगुप्ता धीरे से सुधीर के कान में बोले , "कुछ कहना मत, बस सुनते जाना उनसे |" सुधीर एकाएक डर गए, माँ ने एक बार ऐसे ही बुलाकर दादा के पास भेजा था, फिर कान में कहा कि कुछ कहना मत , बस सुनते जाना | सुधीर एकटक दासगुप्ता सर को देखते रहे , दादा को सुधीर ने फिर कभी अपने सामने नहीं देखा | &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रोफ़ेसर सो रहे थे , या शायद थक गए थे | थकान से आँखें मूँद लीं थी | सुधीर बिना कोई आवाज किये रूम के अन्दर आये, अर्चना ने चुप रहने का इशारा करके कुर्सी पर बिठा दिया | "सुधीर !" प्रोफ़ेसर ने हलकी सी आहट भांप ली | "जी सर !" सुधीर चौकन्ने से हो गए | " थोड़ा देखके चलना आगे फिसलन है |" प्रोफ़ेसर बड़बड़ाये | सुधीर ने बहुत ध्यान लगाकर सुनने की कोशिश की | "ये कौन है ?" प्रोफ़ेसर ने अचानक आँखें खोल दी | "मैं हूँ ! सुधीर " सुधीर ने फिर से जवाब दिया | "सुधीर , तुम्हारे पास माचिस है ?" प्रोफ़ेसर ने पूछा | "यस सर !" सुधीर ने जवाब दिया | "दिया जला दो , एक अगरबती |" प्रोफ़ेसर ने अपना कमरा समझकर भगवान के आले की ओर इशारा किया | अर्चना अल्मिरा से एक अगरबत्ती लेकर आई और सुधीर को दे दी | सुधीर ने अगरबत्ती जलाकर प्रोफ़ेसर के सिरहाने रख दिया | प्रोफ़ेसर ने राहत की साँस ली , "हाँ, अब आराम है | शोभा , ये तकिया हटा दो |" प्रोफ़ेसर ने अर्चना को शोभा कहकर संबोधित किया | अर्चना चौंकी, पास नहीं गयी | सुधीर ने पास आकर तकिया हटा दिया | "शोभा ! तुम डॉली को लेकर...बस कुछ दिन की तो बात थी ... उसके बाद मैं ..." प्रोफ़ेसर अचानक चुप हो गए, "सुधीर ? ये तुम हो क्या ?" &lt;br /&gt;
"जी सर ! क्या बात है ?" सुधीर ने पूछा | प्रोफ़ेसर चुप रहे | "सर ?" सुधीर पास आये | "नहीं, कुछ नहीं" प्रोफ़ेसर झल्लाकर बोले, "मैं ठीक हूँ | चलो, मैं चलता हूँ |" ये कहकर प्रोफ़ेसर चुपचाप लेट गए | थोड़ी देर बाद उठकर बोले - "सुधीर ! चौखम्भा चलेंगे हम , ठीक है ?" सुधीर ने हाँ में सर हिला दिया &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगले दिन मिस अर्चना, मीरा कुछ खाना लेकर आये | सुधीर रात भर अस्पताल में ही रहे | प्रोफ़ेसर उप्रेती के साथ वाले बिस्तर पर लेटे रहे | "अब कैसी तबियत है प्रोफ़ेसर उप्रेती की ?" मीरा ने पूछा | "अभी सो रहे हैं | रात भर कुछ -कुछ बोलते ही रहे | अभी जाकर सोये हैं |" सुधीर ने जवाब दिया | "डॉक्टर ने क्या कहा है ?" मिस अर्चना ने बैठते हुए कहा | "ठीक हैं | बस थोड़ा तनाव की वजह से | काफी कमज़ोर भी हो चले हैं, वजन सामान्य से काफी गिर गया है |" सुधीर ग्लूकोज़ की बोतल को खाली होते हुए देखता रहा | "तुम खाना खा लो" मीरा ने सुधीर की ओर खाने का डब्बा बढ़ा दिया | "कुछ रिपोर्ट्स आनी बाकी हैं , उसके बाद ही सही सही कुछ कहा जा सकता है |" सुधीर ने डब्बा मेज़ के ऊपर रखते हुए कहा | "ठीक है, अभी थोड़ी देर में स्वामी सर आयेंगे | वे रहेंगे प्रोफ़ेसर के पास | तुम खाना खा लो" अर्चना ने कहा | "यहाँ पौड़ी में धूप अच्छी आती है | थोड़ी चहल पहल रहती है तो महसूस होता है कि दुनिया में और लोग भी रहते हैं | मैं थोड़ा बाहर हो आती हूँ |" कहते हुए मीरा बाहर चली गयी | "तुमने खाना खाया " सुधीर ने अर्चना की ओर देखकर पूछा | एक पल के लिए तुम कहना थोड़ा अजीब लगा, लेकिन अधूरी बात अधूरी नहीं रख पाया | अर्चना को अच्छा लगा, "नहीं, अभी नहीं |&lt;br /&gt;
"तो आप भी अभी खा लो , काफी खाना रखा है मीरा जी ने |"&lt;br /&gt;
"तुम ही सही रहेगा |" मिस अर्चना मुस्कुराई |सुधीर ने खाने के डब्बे को खोला | एक ख़ाली डिब्बे में आधी सब्जी डालकर अर्चना ने अपने पास ले लिया |&lt;br /&gt;
"क्या हम डॉली को खबर करें ?" अर्चना ने पूछा |&lt;br /&gt;
"मैंने पूछा था प्रोफ़ेसर से, उन्होंने मना किया |" खाने का कौर मुँह में डालते हुए सुधीर ने कहा |&lt;br /&gt;
"लेकिन , प्रोफ़ेसर की हालत...डॉली को पता तो होना ही चाहिए | " मिस अर्चना ने सुधीर को समझते हुए कहा, "क्या प्रोफ़ेसर ने साफ़ साफ़ मना किया ? तुमने पूछा या उन्होंने खुद कहा ?"&lt;br /&gt;
सुधीर खाना हाथ में लेकर रुक गए, "प्रोफ़ेसर रात भर डॉली के बारे में बात करते रहे , डॉक्टर बीच बीच में आके उन्हें चुप होने के लिए कह रहे थे | जब मैंने उनसे पूछा कि प्रोफ़ेसर क्या डॉली को यहीं बुला लें, तो उन्होंने मना कर दिया | इससे ज्यादा मैं पूछ नहीं सका |" धूप दरवाजे तक आ गयी थी | सुधीर ने दरवाजे की ओर देखा | अर्चना ने पीछे मुड़कर दरवाजे की तरफ देखा, कोई नहीं था | "क्या बात है ?" अर्चना ने सुधीर की ओर देखकर पूछा &lt;br /&gt;
"नहीं, कुछ नहीं | क्या तुम पूरी सर्दियाँ यहीं रहोगी ? अभी तुम्हें कोई क्लास नहीं मिली है | छुट्टियों के बाद ही वो सब होगा... एक -डेढ़ महीने बाद |&lt;br /&gt;
"हाँ ... तुम लोग भी तो यहीं हो |"&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शाम को वापस ट्रांसिट आकर सुधीर अपने कमरे में लेट गए | चाय पीने का मूड हुआ, उठकर बोयज़ हॉस्टल की ओर जाने लगे | होस्टल की ओर जाने वाली पगडण्डी से एक पल रूककर मेंढक पहाड़ी की ओर देखा, हम शापित लोग हैं , मन ही मन सोचा और फिर आगे बढ़ गए | बोयज़ हॉस्टल में फिफ्थ सेमेस्टर के ही कुछ स्टुडेंट रह गए थे | कुछ स्टुडेंट सुधीर के पास आये, वे प्रोफ़ेसर उप्रेती की तबियत के बारे में जानना चाहते थे | सुधीर का ध्यान बार बार भटक कर प्रोफ़ेसर के कहे वाक्य पर अटक रहा था कि हम शापित लोग हैं | डॉक्टर तुम यहाँ से कहीं और चले जाओ, और अर्चना को भी ..."वे ठीक हैं , कुछ ही दिनों में वापस आ जायेंगे |" सुधीर ने जल्दी से कहा | सुधीर को ऐसा लगा कि जाने से पहले उन्होंने उसे अविश्वास से देखा हो | रमेश को चाय बनाने को कहकर सुधीर एक खाली टेबल पर बैठ गए | हॉस्टल मेस पूरी तरह खाली थी | आज आखिरी पेपर ख़त्म होने के साथ आधे से ज्यादा हॉस्टल खाली हो चुका था | कल सारे लड़के चले जायेंगे | फिर हॉस्टल मेस बन्द हो जायेगी , सुधीर को अपने खाने का इंतजाम बाहर कहीं किसी होटल में करना होगा | सारे टीचर्स भी कल चले जायेंगे | दासगुप्ता सर ने भी सामान पैक कर लिया था, इंदिरा के विरोध के बावजूद | हम शापित लोग हैं ... स्माल सेल लंग कार्सिनोमा ... उफ़ |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीन साल तक लंग कैंसर से लड़ने के बाद आखिर प्रोफ़ेसर ने अपनी लड़ाई रोक दी | डॉली से लड़ाई भी प्रोफ़ेसर जारी नहीं रख सके, उन्हें बुला लिया गया| प्रोफ़ेसर ने शोभा से दूसरी शादी की थी | डॉली, प्रोफ़ेसर की पहली पत्नी से हुई बेटी थी | अनुपमा, जिसे प्रोफ़ेसर ने तलाक़ दिया था | कुछ दिनों बाद , अनुपमा का शव पंखे से लटकता हुआ पाया गया | डॉली को प्रोफ़ेसर अपने पास लेकर आ गए | जिंदगी भर इस अपराधबोध से प्रोफ़ेसर मुक्त नहीं हो सके | शोभा ने बाद में डॉली को सब कुछ बता दिया था , जिसके बाद डॉली ने कभी प्रोफ़ेसर को माफ़ नहीं किया | अपनी माँ के नाम पर ही अनुपमा नाम डॉली ने अपना लिया |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देहरादून में ही प्रोफ़ेसर का अंतिम संस्कार करना निश्चित हुआ | मुखाग्नि देने के लिए सुधीर से कहा गया | सुधीर की यादों में अभी प्रोफ़ेसर की बातें चल रही थी | स्वामी को ये सब मत बताना, अर्चना और तुम भी कहीं और चले जाना | अर्चना का हाथ थामकर प्रोफ़ेसर बच्चों की तरह रोये थे, "मुझे माफ़ कर देना अनुपमा |" शव आधा जल गया था | दहक वातावरण में अभी थी | सुधीर बोझिल क़दमों से पीछे पीछे हटे | तीन दिन बाद राख ली जाती है | सुधीर ने अस्थियों को एक घड़े में भरा , और अनुपमा को दे दिया | राख के एक एक टुकड़े में प्रोफ़ेसर के होने का अहसास था | यार डॉक्टर , यहाँ पहाड़ों में अपनी जिंदगी खराब मत करो | हम लोग तो दुनिया से भागे हुए लोग हैं , तुम क्यूँ भाग रहे हो | राख जैसे पूरे शरीर में चढ़ती जा रही हो |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
"पौड़ी!!! पौड़ी!!! " ऋषिकेश बस अड्डे पर पौड़ी की बस तैयार खड़ी थी , कंडक्टर हर आने जाने वाले से पूछ रहा था | सुबह के चार बजे थे | "भेजी, कहाँ जाना है ?" कंडक्टर ने सुधीर को हिलाकर पूछा | "पौड़ी " सुधीर की आँखें कहीं और देख रही थी | "वो वाली में बैठ जाओ |" कंडक्टर ने कहा | सुधीर जाने लगे तो कंडक्टर फिर से चिल्लाया - "अरे भैजी! इधर इधर |" जब ध्यान देने के बाद भी उसने देखा कि सुधीर के कदम कहीं के कहीं जा रहे हैं | उसने मन ही मन कुछ अंदाजा लगाया, भागकर आया | "भेजी ?" सुधीर की अधमुंदी आँखों में देखने लगा | हाथ पकड़ने की कोशिश की तो सुधीर ने हाथ में रखी प्लास्टिक की थैली अपने से सिमटा ली, जैसे कंडक्टर उससे वो थैली छीनना चाहता हो | उसने हाथ पकड़कर सुधीर को बस के अन्दर बिठा दिया | मन्दिर वाले बाबाजी आखिरी दिनों में चल नहीं पाते थे , जमीन पर घिसट घिसट कर चलते थे | "अर बेटा! सुना दे जरा गीता सार |"&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
य एनं  वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतं | &lt;br /&gt;
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
"भाईसाहब !" कंडक्टर ने सुधीर को हिलाया, "आपकी तबियत तो ठीक है ?" &lt;br /&gt;
सुधीर को याद आया , कि बाबाजी के साथ एक औरत रहती थी | माँ से उसने पूछा कि वो कौन है | वो उनकी चेरी है, माँ ने कहा | सुधीर को लगा कि पत्नी को कहते होंगे | ये तो उसे काफी दिनों बाद पता चला कि चेरी उस लड़की को कहते है, जो किसी बाबा के साथ भाग आई होती है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे | &lt;br /&gt;
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कंडक्टर ने सुधीर का माथा छुआ "शायद थोड़ा ज्वर है आपको,  बस थोड़ी दूर और है आपका कॉलेज | कॉलेज के टीचर हैं न आप ?" सुधीर ने ठंडा हाथ अपने माथे पर महसूस करके आँखें खोली | "हाँ , हाँ कॉलेज ही जाना है | आया क्या ?" कंडक्टर ने तसल्ली जैसे देते हुए कहा , "बस थोड़ी दूर है |"&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
"आ गया भाई साहब ! आपका कॉलेज |" कंडक्टर ने सुधीर को जगाया, "तबियत ठीक है अब आपकी ?" "हाँ मैं ठीक हूँ |" सुधीर ने उनींदी आखों से बाहर देखा | फिर तेजी से बस से उतर गया | कॉलेज दिखायी दे रहा था, सर्द बैगनी छाँव में | कॉलेज के आसपास का पूरा गाँव धूप में नहाया हुआ था | तेज तेज क़दमों से सुधीर चलना लगा | "चलो " पीछे से कंडक्टर की आवाज आई , और बस आगे बढ़ गयी | सुधीर ने अपने को स्वस्थ महसूस किया | कदम आगे बढ़ाया ही था कि माथे में भयंकर पीड़ा शुरू हो गयी | "गुड मोर्निंग सर |" रमेश मफलर पहने हुए सामने खड़ा था | "सर , आप बड़ी जल्दी आ गए | सामान नहीं लाये |" उसने पूछा | सुधीर को याद आया कि उसके साथ कोई सामान नहीं है | "सर!" रमेश पीछे से चिल्लाता रह गया | कॉलेज के गेट के बगल से एक छोटी सी पगडण्डी थी | सुधीर उसी पगडण्डी पर चलने लगे | बस थोड़ी दूर और, सुधीर अपने आप से कहते जा रहे थे | थकान बढती जा रही थी , सुधीर को महसूस होने लगा था कि उन्हें ज्वर है | पगडण्डी मेंढक पहाड़ी के पास जाकर सर्पिलाकार तरीके से मुड़ गयी | जिससे वो रास्ता खत्म होने का आभास से रही थी | पहाड़ी के सिरे पर पहुंचकर सुधीर ने इधर उधर घूमकर देखा | फिर जल्दी से थैले को उलटकर राख हवा में उछाल दी | सुधीर को काफी हल्का महसूस हो रहा था मानों इस राख के साथ उसने अपने अस्तित्व का कुछ टुकड़ा भी हवा में बिखेर दिया हो | राख उड़ती हुई घाटी से नीचे गिर रही थी, इस उम्मीद में कि कभी हवा में उड़ते हुए वो शायद चौखम्भा पहुँच जाए | वो राख  को देखता रहा, हम शापित लोग हैं |&lt;/div&gt;&lt;b&gt;can we do nothing for the dead ? And for a long time the answer had been - nothing!   - Katherin Mansfield&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;निर्मल वर्मा के लिए&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-3653884615788872972?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/DY2E7Itef30" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-01-16T00:07:45.379+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://2.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTFG-z45iBI/AAAAAAAAAHs/3UXge8gfN7c/s72-c/The+Old+Church+Tower+at+Nuenen+-+400pxlsw.bmp" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2011/01/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>हीरो की कहानी, परिंदे की जुबानी</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/KyLoJ8ASIvQ/blog-post.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sat, 15 Jan 2011 10:37:45 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-3001218306166093624</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TRGqwNlcmTI/AAAAAAAAAGI/192FewBhjZw/s1600/images2.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="326" src="http://2.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TRGqwNlcmTI/AAAAAAAAAGI/192FewBhjZw/s400/images2.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अभी न, मैं तुम्हारे लिए कहानी का टाइटल सोच रही थी " &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अच्छा ? क्या सोचा ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अभी मैं आ रही थी न, स्टैंड पे... तो वही कुत्ता था वहाँ पे परसों वाला, रो रहा था... उसे देख के मुझे टाइटल सूझी" &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"कुत्ते को देख के टाइटल ?" मैं हँसने लगा, वो भी हँसने लगी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अरे सुनो न स्टुपिड! तुम मुझे भुला दोगे नहीं तो |" &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"ओके बाबा, बोलो |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हाँ तो टाइटल है, हीरो की कहानी, परिंदे की जुबानी |" &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"वाह क्या टाइटल है !" मैंने उपहास किया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अच्छा है न ?" &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हाँ , लेकिन कुत्ते से तुम्हें ये टाइटल क्यों सूझा ? कुत्ता तो पूरे टाइटल में कहीं नहीं है |" मैंने अपनी हँसी को किसी तरह रोका हुआ था |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"पता नहीं" वो थोड़ा उदास हो गयी, "मैंने बहुत कोशिश किया, लेकिन उसके लिए जगह ही नहीं बनी टाइटल में, मे बी दैट लिल डॉग इंस्पायर्ड मी |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हाँ, शायद | तुम इसका नाम हीरो की कहानी, कुत्ते की जुबानी भी तो रख सकते थे |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"तुमको मेरा टाइटल पसंद आया न ?" उसने उम्मीद से पूछा |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"मैं परिंदों का पसीना रख लेता हूँ टाइटल |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"क्या ? परिंदों का क्या ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"पसीना .. पसीना" मैंने कहा |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"मजाक मत करो, मैंने बहुत सीरियसली&amp;nbsp;टाइटल&amp;nbsp;सोचा&amp;nbsp;था, और&amp;nbsp;तुम&amp;nbsp;मजाक&amp;nbsp;समझते&amp;nbsp;रहते&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;| मैं&amp;nbsp;जो&amp;nbsp;कुछ&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;बोली&amp;nbsp;हूँ&amp;nbsp;तुम&amp;nbsp;कभी&amp;nbsp;सीरियसली&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;लेते&amp;nbsp;|"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;उफ़ ... ये&amp;nbsp;तो&amp;nbsp;गलती&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;गयी&amp;nbsp;"अरे&amp;nbsp;बाबा! मैं&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;सीरियसली&amp;nbsp;बोल&amp;nbsp;रहा&amp;nbsp;हूँ&amp;nbsp;| कहानी&amp;nbsp;में&amp;nbsp;काफी&amp;nbsp;स्ट्रगल&amp;nbsp;होगा,&amp;nbsp;तो&amp;nbsp;परिंदों&amp;nbsp;का&amp;nbsp;पसीना&amp;nbsp;तो आएगा&amp;nbsp; न ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हाँ, वो&amp;nbsp;तो है |" उससे सहमति मिल गयी&amp;nbsp;|&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"तुम लिखो&amp;nbsp;मगर&amp;nbsp;कुछ, ठीक&amp;nbsp;है ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"ओके !" मैं अभी भी 'देश पराया' के 'लियाक़त मियां' की प्रतिक्रिया के बारे में सोच रहा था |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"स्टुपिड! मैं&amp;nbsp;सीरियसली बोल&amp;nbsp;रही&amp;nbsp;हूँ&amp;nbsp;| तुम लिखो कुछ, लिखते रहो, मैं चाहती हूँ कि&amp;nbsp;तुम बहुत बड़ा राइटर बनो |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"नाश्ता&amp;nbsp;किया&amp;nbsp;तुमने ?" उसने मुझे लिखते हुए पकड़ लिया था, वक़्त की नजाक़त देखते हुए&amp;nbsp;मैं स्वर में काफी लय घोल&amp;nbsp;लेता&amp;nbsp;हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हाँ&amp;nbsp;! मैं&amp;nbsp;न&amp;nbsp;बिस्किट&amp;nbsp;खाई&amp;nbsp;| तुमने&amp;nbsp;किया&amp;nbsp;नाश्ता&amp;nbsp;?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हाँ ! मैं&amp;nbsp;न&amp;nbsp;रोटी&amp;nbsp;सब्जी&amp;nbsp;खाई |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हे&amp;nbsp;! तुम&amp;nbsp;मेरा&amp;nbsp;नकली&amp;nbsp;कर&amp;nbsp;रहे&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;|"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"नहीं&amp;nbsp;तो |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"तुम&amp;nbsp;कर&amp;nbsp;रहे हो , नहीं&amp;nbsp;तो&amp;nbsp;तुम&amp;nbsp;फेमिनिन&amp;nbsp;क्यों बोल&amp;nbsp;रहे&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"ओके बाबा&amp;nbsp;! मैं&amp;nbsp;रोटी&amp;nbsp;सब्जी&amp;nbsp;खाया&amp;nbsp;| अब&amp;nbsp;खुश&amp;nbsp;?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"आँ&amp;nbsp;..हाँ ...आँ ......" &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अरे अब&amp;nbsp;क्या&amp;nbsp;हुआ&amp;nbsp;?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"तुम मेरा&amp;nbsp;मजाक&amp;nbsp;बना&amp;nbsp;रहे&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;| मैंने&amp;nbsp;क्या&amp;nbsp;गलत&amp;nbsp;बोला&amp;nbsp;?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;"कुछ&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;!"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"मैं&amp;nbsp;बहुत&amp;nbsp;अच्छी&amp;nbsp;हिंदी&amp;nbsp;बोलती&amp;nbsp;हूँ&amp;nbsp;स्टुपिड&amp;nbsp;! तुमसे&amp;nbsp;तो अच्छा&amp;nbsp;ही&amp;nbsp;बोलती&amp;nbsp;हूँ&amp;nbsp;| बस&amp;nbsp;तुम्हारे&amp;nbsp;सामने&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;बोल&amp;nbsp;पाती&amp;nbsp;|"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"क्यूँ&amp;nbsp;?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अरे&amp;nbsp;छोडो&amp;nbsp;न&amp;nbsp;ये&amp;nbsp;सब&amp;nbsp;! तुमने क्या&amp;nbsp;खाया&amp;nbsp;नाश्ते&amp;nbsp;में&amp;nbsp;?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अरे बाबा&amp;nbsp;! रोटी सब्जी"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"कौन&amp;nbsp;सा&amp;nbsp;सब्जी&amp;nbsp;?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"कैप्सिकम"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"पता&amp;nbsp;था&amp;nbsp;मुझे ! अब&amp;nbsp;तुम&amp;nbsp;हफ्ते&amp;nbsp;भर&amp;nbsp;तक&amp;nbsp;कैप्सिकम बनाते&amp;nbsp;रहोगे ? है&amp;nbsp;न ? है न&amp;nbsp;!! " &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हाँ" मैं&amp;nbsp;भी मुस्कुरा&amp;nbsp;पड़ा&amp;nbsp;| वैसे ये अतिश्योक्ति अलंकार है | मैं सब्जी सिर्फ तीन दिन तक की लेता हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अच्छा ! तो&amp;nbsp;फिर&amp;nbsp;कब&amp;nbsp;छोड़&amp;nbsp;रहे&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;तुम&amp;nbsp;कॉलेज ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"मम्मी&amp;nbsp;कह रही&amp;nbsp;है कि दस&amp;nbsp;दिन&amp;nbsp;में&amp;nbsp;ही&amp;nbsp;हम&amp;nbsp;लोग&amp;nbsp;वापस&amp;nbsp;चले जायेंगे ?" &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"गुवाहाटी ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"गुवाहाटी&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;स्टुपिड&amp;nbsp;गोहाटी&amp;nbsp;..." हँसती है , "गुवाहाटी&amp;nbsp;.. इट सीम्स .." फिर से हँसने लगती है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"ओके&amp;nbsp;! तुम मुझे&amp;nbsp;भूल&amp;nbsp;जाओगी&amp;nbsp;न |" मैं&amp;nbsp;थोडा संजीदापन&amp;nbsp;लाने की कोशिश करता हूँ | जब मेरा ध्यान उससे बात करने पर नहीं होता है तो मैं ऐसी ही कोई बात निकाल लेता हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हाँ&amp;nbsp;! तुम&amp;nbsp;अपनी&amp;nbsp;डायरी में&amp;nbsp;लिखना , आज&amp;nbsp;तारीख&amp;nbsp;13 दि.&amp;nbsp;2010 , वो&amp;nbsp;मुझे&amp;nbsp;भूल&amp;nbsp;जायेगी&amp;nbsp;| मैं&amp;nbsp;उससे&amp;nbsp;पूछा कि&amp;nbsp;तुम मुझे&amp;nbsp;भूल जाओगी न ? उसने&amp;nbsp;कुछ&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;कहा&amp;nbsp;और&amp;nbsp;हँसने&amp;nbsp;लगी&amp;nbsp;|"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;आज&amp;nbsp;तारीख&amp;nbsp;13 दि. 20, मैं&amp;nbsp;उससे&amp;nbsp;मिला&amp;nbsp;, दस&amp;nbsp;साल बाद, आज&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;उसकी&amp;nbsp;काजल&amp;nbsp;लगी&amp;nbsp;आँखें &amp;nbsp;बहुत खूबसूरत&amp;nbsp;हैं&amp;nbsp;| &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"शादी&amp;nbsp;की ?" वो&amp;nbsp;मुझसे पूछती&amp;nbsp;है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"नहीं&amp;nbsp;!" मेरा मुख़्तसर सा जवाब होता है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"क्यों ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"ऐसे ही !" तुम चली गयी, फिर कभी ये सवाल जेहन में आया ही नहीं |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"क्यों नहीं आया ?" वो आज भी उतनी ही बेबाक है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"बस ऐसे ही, अरे कभी सोचा नहीं बाबा |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"तुमने ?"&lt;/div&gt;"तुम तो बड़े राइटर बन गए हो | तुमने लिखी वो कहानी ?"&lt;br /&gt;
&lt;div style="text-align: left;"&gt;"तुम पहले बताओ, तुमने शादी नहीं की ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"मुझे एम बी ए करना था&amp;nbsp;? पी एच डी करना था |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"तो पहले&amp;nbsp;एम बी ए&amp;nbsp;किया या&amp;nbsp;पी एच डी&amp;nbsp;"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अरे मेरी कहानी ? तुमने लिखी या नहीं ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अरे कौन सी कहानी बाबा ? तुमने क्या किया&amp;nbsp;?&amp;nbsp;एम बी ए&amp;nbsp; या&amp;nbsp;पी एच डी ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"कुछ&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;नहीं "&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"क्यों&amp;nbsp;?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"अरे नहीं पता |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"मेरा इंतज़ार कर रही थी |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हाँ ! और तो कोई काम नहीं था न ... इट सीम्स ..."&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"तो दस साल तक तुम क्या करती रही ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"याद है, एक बार तुमने क्या कहा था ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"तुम पर मैंने हो न हो तो 10-12 हज़ार रूपये केवल बात करने में ही खर्च किये होंगे | अब मुझे क्या पता कि एक बार क्या कहा था |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"स्टुपिड ! तुमने कहा था कि पहले अपनी औकात बनाओ, फिर मुझसे शादी की बात करना |" उसने छोटे बच्चों की तरह होंठ फैला लिए | "और तुमने ये भी कहा कि तुम्हें खुद नहीं पता कि तुम शादी करना भी चाहते हो या नहीं |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"हाँ&amp;nbsp;तो&amp;nbsp;?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"तो&amp;nbsp;मैंने&amp;nbsp;औकात&amp;nbsp;बना&amp;nbsp;ली |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"ऐसा क्या कर दिया तुमने ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"पता नहीं, पर तुम्हें अब मेरी जरूरत महसूस होती है न ... तुमने शादी नहीं की, लेकिन तुम 'गुवाहाटी' जा रहे हो ... अभी भी खुद खाना बना रहे हो ?" ख़ामोशी ट्रेन की धीमी चाल के साथ संगत कर रही है, "...तुमने लिखी न वो कहानी ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;ट्रेन ने गति पकड़ ली थी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"कब आ रहे हो मेरे घर&amp;nbsp;? मेरा हाथ मांगने के लिए ?" मैं पूछता हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;वो मुस्कुरा देती है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="color: #666666; font-size: x-small;"&gt;(हीरो की कहानी, परिंदे की जुबानी मीन्स जरूरी नहीं कि हर कहानी में लड़का और लड़की बिछुड़ जाएँ ...)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-3001218306166093624?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/KyLoJ8ASIvQ" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-01-16T00:07:45.380+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://2.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TRGqwNlcmTI/AAAAAAAAAGI/192FewBhjZw/s72-c/images2.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">17</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2010/12/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>'wow! wonderful story'</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/o39CImMBB5s/wow-wonderful-story.html</link><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Fri, 14 Jan 2011 23:28:05 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-10875524212819455</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTFMHQTr4JI/AAAAAAAAAH0/9mXPVXxJcE8/s1600/751px-VanGogh-starry_night.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="255" src="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTFMHQTr4JI/AAAAAAAAAH0/9mXPVXxJcE8/s320/751px-VanGogh-starry_night.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;तु&lt;/span&gt;म वो बेनामी हो, जो मेरी कहानियाँ समझ में नहीं आने पे भी कहती हो, 'wow! wonderful story' | तुम&amp;nbsp;सही&amp;nbsp;में नहीं जानती हो कि तुमने मेरी कहानियों का अंत किस हद तक 'wonderful' कर दिया है | मेरे जन्मदिन पर तुमने पहली बार लिखने की कोशिश की, मुझे बर्थडे सरप्राइज़ देने के लिए | वैसे तुमने एक दिन पहले कहा कि हम अब बात नहीं करेंगे | मुझे इतना पता है कि तुम मुझसे कुछ न कुछ कहे बिना नहीं रह सकती, इसलिए मन ही मन हँसते हुए मैंने हाँ कह दी | रोज़, सुबह 8 बजकर 30 मिनट पे तुम्हारा कॉल आता है, और तुम पूरे पंद्रह मिनट परेशान करती हो | आज तुम्हारा कॉल नहीं आया, और तुम मुझे 11 बजे तक परेशान करती रही | सबसे पहले विश करने की ये होड़ तुम्हारी, आखिर किससे थी | मुझे तो वैसे भी कोई उम्मीद नहीं थी कि तुम्हें कोई प्रतिद्वंदी मिलेगा | अपने पूरे परिवार को जगाके मुझे बर्थडे विश करवाना, तुम्हारे पापा जरूर तुम्हारे लक्षण देखके 'हाथ से निकल गयी लड़की' कह रहे होंगे | दूर दूर रहते हैं, कैम में देखते ही, एक दूसरे को देखकर जी भर के हँसते हैं | मेरी पिछली तीन गर्ल फ्रेंड्स के एवज तीन बॉय फ्रेंड्स बता के 'हिसाब किताब बराबर' कहना, क्या मेरा खुद का पागलपन कम था जो तुम भी ? &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: center;"&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;
The birds were singing but not melodious as now...&lt;br /&gt;
The poets were reciting poem but not meaningful as now...&lt;br /&gt;
Rainbow was always colourful but not bright as now...&lt;br /&gt;
Breeze were blowing but couldn't touch the heart as like now...&lt;br /&gt;
Flowers were fruitful, but blossom was not as now...&lt;br /&gt;
The world was beautiful but not as beautiful as&amp;nbsp; now....&lt;br /&gt;
It’s you who changed every view of my life...&lt;br /&gt;
It’s your Birthday,The day when God sent you to my life...&lt;br /&gt;
to give a beautiful meaning of my life...&lt;br /&gt;
HAPPY BIRTHDAY TO YOU...&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-10875524212819455?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/o39CImMBB5s" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-01-15T12:58:05.966+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTFMHQTr4JI/AAAAAAAAAH0/9mXPVXxJcE8/s72-c/751px-VanGogh-starry_night.jpg" height="72" width="72" /><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2010/12/wow-wonderful-story.html</feedburner:origLink></item><item><title>नयी, पुरानी टिहरी</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/i0D_fmUZwZI/blog-post_24.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sat, 15 Jan 2011 10:37:45 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-1149769808293940758</guid><description>&lt;div style="background-color: white; font-family: 'Trebuchet MS',sans-serif; text-align: justify;"&gt;&lt;div style="line-height: 1.8;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGBdr2ex5I/AAAAAAAAAH4/cB9RFhCEEd4/s1600/Vincent_van_Gogh_%25281853-1890%2529_-_The_Old_Mill_%25281888%2529.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGBdr2ex5I/AAAAAAAAAH4/cB9RFhCEEd4/s400/Vincent_van_Gogh_%25281853-1890%2529_-_The_Old_Mill_%25281888%2529.jpg" width="322" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 28px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;ज&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; line-height: 28px;"&gt;मनोत्री आज सुबह से कुछ अनमनी सी थी | सर्दियों की धूप वैसे भी मन को अन्यत्र कहीं ले जाती है | इतवार का दिन सारे लोग घर पर ही थे, छत पर धूप सेंकने के लिए | जेठ जेठानी, उनके बेटे-बहुएँ, पोता &amp;nbsp;प्रतीक भी अपनी छत पर घाम ताप रहे थे | ऐसा नहीं कि अलग छत पे हों, दोनों छत मिली हुई थी | लेकिन मनोमालिन्य ने दूरियों को एक छत से ज्यादा बढ़ा दिया था | सुधीर छुटियाँ लेकर आया था, बहू भी साथ आई थी, अमेरिका से | अमेरिका बोलने में जमनोत्री को मे पर काफी जोर डालना पड़ता था | सुधीर के पापा तो सुबह ही उठकर भजन गाने लगते हैं, अभी भी इस आदत को नहीं छोड़ा |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;"बस भी करो, थोड़ा धीमे बोलो या चुपचाप सो जाओ, बच्चे सो रहे हैं |" जमनोत्री ने उलाहना दिया| सुधीर के पापा गाते रहे "इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकलें..." हारकर जमनोत्री को उठना पड़ा |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;बहू अमेरिका से साड़ी लेकर आई थी |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; line-height: 28px;"&gt;"नहीं मम्मी जी, इसे पहनो... देखो, आप पर कितनी अच्छी लग रही है |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; line-height: 28px;"&gt;जमनोत्री हतप्रभ थी- "उस देश में साड़ी मिलती है क्या ? साड़ी पहनती है तू वहां ?"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; line-height: 28px;"&gt;सुधीर नाश्ता करते हुए बोला - "अरे माँ, इसके पास तो इतनी साड़ी हैं कि&amp;nbsp;उनके लिए एक कमरा खाली करना पड़ा हमें वहां |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; line-height: 28px;"&gt;"अच्छा !!!" जमनोत्री ने बनावटी आश्चर्य प्रकट किया |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; line-height: 28px;"&gt;"और आप मेरी दी हुई साड़ी पहनती भी नहीं" बहू की नाराजगी जायज़ थी |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; line-height: 28px;"&gt;"अरे बेटा, यहाँ कहाँ पहनूं मैं अब ? कभी कभी शादियों पार्टियों में पहन लेती हूँ |" &amp;nbsp;जमनोत्री बचाव कर रही थी, बहू को दुःख नहीं पहुँचना चाहिए |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; line-height: 28px;"&gt;"क्या बात कर रही हो मम्मी जी! अरे वो तो मैं घर में पहनने के लिए लायी थी, आप उन्हें घर पे पहना कीजिये , शादियों में नहीं |" बहू कहीं से भी उनका उपहास नहीं कर रही थी | यहाँ भी हारकर जमनोत्री को बहू की लायी गयी साड़ी पहनकर बैठना पड़ा |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;जेठानी समझदार थी, बाहर से ही घर में चल रहा वातावरण समझ गयीं |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; line-height: 28px;"&gt;"अरे बहू! क्या बात है, क्यूँ&amp;nbsp; डांट रही हो इसे ?" जमनोत्री की जेठानी ने हल्के माहौल को और हल्का करने की कोशिश की |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small; line-height: 28px;"&gt;"नहीं नहीं मम्मी जी, डांट नहीं रही हूँ, मैं मम्मी जी को कह रही थी कि....और आप भी मेरी दी हुई साड़ी नहीं पहनती |" बहू अब जेठानी से सवाल जवाब करने लगीं |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;"नहीं बेटा, पहनती हूँ..." जेठानी जी भी सकपका गयीं "मैंने अभी स्नान-ध्यान कुछ नहीं किया, उसके बाद पहनूंगी |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;"आज बहू सबकी तलाशी लेगी |" जमनोत्री को अपनी बहू पर लाड़ आ गया | कभी कभी बच्चों जैसी जिद पे उतर आती है, सुधीर की दादी तो अभी तक हमपे इतने ताने मार चुकी होती कि...खैर जमाना बदल गया है, तो हमें भी बदलना चाहिए "अरे बहू! अब बुढापे में&amp;nbsp;हम लोगों का भी क्या पहनना ओढ़ना | पूरा बचपन और जवानी जंगल में काट दी | घर से निकले मुँह-अँधेरे और जंगल गए घास-पात, कभी लकड़ी लेने, खेतों में काम, बैलों को सानी, दिन भर में इतने काम होते कि किसे याद कि फैशन&amp;nbsp; भी करना है | हाँ , कभी किसी की शादी-ब्याह के वक़्त देख लिया ऐना तो ठीक, नहीं तो ऐसे ही चल दिए |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;बहू के मुँह से बेसाख्ता निकल गया -"हाँ तो अब थोड़े ही जंगल में हो |"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: 'Trebuchet MS',sans-serif; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;प्रतीक भी अब इस ओर नहीं आता, जाने उसकी दादी ने क्या कहा उससे कि अब सिर्फ अपनी छत पे ही खेलता रहता है | जमनोत्री ने नन्हे प्रतीक को अपनी गाडी को उलट पलटकर ठीक करते हुए देखा | पिछली छुट्टी में सुधीर लेके आया था प्रतीक के लिए, अमेरिका से | "ए प्रतीक! इधर आ!" जमनोत्री ने पुकारा | प्रतीक ने सर उठाकर देखा, और फिर सर झुका लिया "देख नहीं रहे, मैं अभी बिजी हूँ|" प्रतीक भी बिजी था, प्रतीक की दादी ने स्नान-ध्यान करके बहू की दी हुई साड़ी पहनी थी | इधर सुधीर के पापा धूप में चटाई बिछा के लेट गए और अखबार पढ़ने लगे | अभी थोड़ी देर में अखबार पढ़ते पढ़ते ही सो जायेंगे | सुधीर इस बीच छत पे आ गया, अपने मोबाइल पे गाने बजाने लगा | जरूर सुधीर ने बहू के साथ कुछ चुहल की होगी, तभी भागते भागते छत पे आया है | जमनोत्री का अनुमान बिलकुल सही था, बहू भी पीछे पीछे छत पे आई, और आँखों ही आँखों में सुधीर से गुस्सा भी थी |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: 'Trebuchet MS',sans-serif; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;रास्ते में लगे हुए पेड़ों की शाखाएं बिजली के तारों को छूने लगे थे | एक निश्चित समय अंतराल पर उनकी शाखाएं काटने के लिए बिजली विभाग किसी को भेजता था | खट-खट की आवाज आने लगी, और एक शाख काट दी गयी | शाख के गिरते ही छत की आखिरी छोरों पे खड़ी जमनोत्री और उसकी जेठानी की आँखों आखों में ही कुछ बातें हुई | फ़ौरन से दोनों उठ गयी | मंहंगी अमेरिकन साड़ी के आँचल को कमर में बाँधा, और दोनों चल पड़ी टूटी हुई शाखें उठाने के लिए | "मम्मी जी कहाँ जा रही हैं ?" बहू ने सुधीर से पूछा | सुधीर का ध्यान रास्ते पे गया, जहाँ जमनोत्री टूटी हुई डाल को कंधे पे उठा के विजयी मुद्रा में चली आ रही थी | उनके पीछे ही जेठानी भी दूसरी डाल लेकर आ रही थी | "माँ! क्या कर रही हो उनका ?" सुधीर ने जिज्ञासा प्रकट की | जमनोत्री का ध्यान सुधीर की बातों पे नहीं था, जेठानी एक डाल अपनी छत पे रखके दूसरी लेने के लिए जल्दी कर रही थी | जमनोत्री ने जल्दी से डाल रखी और चली गयी | सुधीर के पापा ने धूप में लेटे लेटे एक आँख खोली | "पिता जी! माँ ये डालें क्यों ला रही है ? क्या करेगी इन लकड़ियों का ?" सुधीर ने माँ की ओर दिखाकर पूछा | जमनोत्री ने कटी शाखों का गट्ठर बना लिया | उसे पीठ पर लादकर लाने लगी | "पता नहीं बेटे! तभी तो मैं इसे गंवार कहता हूँ |" सुधीर के पापा हँसते हुए बोले | "अरे सूखी लकड़ियाँ बहुत काम आती हैं |" जमनोत्री ने झुके झुके ही जवाब दिया | सुधीर के पापा ने गट्ठर को पीठ से उतार दिया | "लेकिन अब तो गैस है, और नहाने के लिए गीज़र है बाथरूम में | फिर भी ?" सुधीर ने अपना तर्क प्रस्तुत किया | जिस पर जवाब देने की जमनोत्री की कोई इच्छा नहीं थी | सुधीर के पापा, जमनोत्री का ये भाव समझ गए | "और रखोगे कहाँ ? छत पे ? छत खराब हो जायेगी |" सुधीर ने आखिरी तर्क प्रस्तुत किया | "ए जमनोत्री! और भी हैं अभी वहां, रास्ते के दूसरी तरफ, जल्दी चल" छत के दूसरे छोर से जेठानी की आवाज आई |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;सुधीर चुपचाप माँ को शाखें ला लाके इकट्ठी करता हुआ देखता रहा | बीच बीच में सुधीर के पापा, सुधीर की ओर देखकर सांत्वना भरे स्वर में कहते रहे "गंवार है, कभी शहर देखा ही नहीं, तो ये हरकत तो करेगी ही |" सुधीर जानता था कि पापा की इसमें मौन सहमति है | बहू अपनी अमेरिकन साड़ी की दुर्दशा देख रही थी | सड़क के दूसरे छोर से जमनोत्री और जेठानी खिलखिलाते हुए आ रहे थे | प्रतीक भी एक छोटी सी डाल कंधे पे लादके चला आ रहा था, उन छोटे छोटे बच्चों की तरह जो बड़ी दीदी के साथ पहली बार स्वेटा पीठ पे बाँध के घास-पात लेने जाते हैं | इधर सुधीर के मोबाइल पे गाना अभी भी बज रहा था &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div style="background-color: #f3f3f3; font-family: 'Trebuchet MS',sans-serif; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;span style="background-color: #eeeeee;"&gt;&lt;i&gt;'अब मैं राशन की कतारों में&amp;nbsp;नजर आता हूँ,&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: #f3f3f3; font-family: 'Trebuchet MS',sans-serif; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&amp;nbsp; अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ|' &lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-1149769808293940758?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/i0D_fmUZwZI" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-01-16T00:07:45.380+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGBdr2ex5I/AAAAAAAAAH4/cB9RFhCEEd4/s72-c/Vincent_van_Gogh_%25281853-1890%2529_-_The_Old_Mill_%25281888%2529.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">28</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2010/11/blog-post_24.html</feedburner:origLink></item><item><title>रामकथा - डेमोक्रेसी काण्ड</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/butv-_DnH3M/blog-post_15.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sat, 15 Jan 2011 10:37:45 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-3721957324576613302</guid><description>&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;(अगर इस कहानी के पात्र काल्पनिक है, तो ये वास्तविकता नहीं, बहुत बड़ा षड्यंत्र है)&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGL7-OhjLI/AAAAAAAAAH8/51xbgFGrtDE/s1600/bharat_milap__lord_rama_meets_with_brother_bharat_pc03.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="137" src="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGL7-OhjLI/AAAAAAAAAH8/51xbgFGrtDE/s400/bharat_milap__lord_rama_meets_with_brother_bharat_pc03.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;कै&lt;/span&gt;केयी कोपभवन में थी, दशरथ आये, लाइट ऑन की, चेयर खींच के बैठ गए | लॉर्ड माउंटबेटन अभी भी नाराज बैठी थी, दशरथ&amp;nbsp;की आँखों से हिन्दुस्तान की बेबसी झलक रही थी | "आपने दो वचन देने का वादा किया था, याद है न ?" अँगरेज़ सरकार अभी इतनी आसानी से माल-मत्ते वाला&amp;nbsp;देश छोड़ने को तैयार न थी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"हाँ प्रिये!" नेहरूजी का डर सतह पर आ गया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"मेरा पहला वचन है कि&amp;nbsp;अयोध्या में इस बार बड़ा बेटा गद्दी पर नहीं बैठेगा | देश में अब डेमोक्रसी होगी | हर कोई , हर किसी का शोषण नहीं करेगा | आम चुनाव से चुने गए ख़ास आदमियों को ही शोषण का हक होगा |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दशरथ नाराज&amp;nbsp;तो बहुत हुए किन्तु माउंटबेटन के बेलन को स्मरण कर चुप रह गए| "अपना दूसरा वचन कहो महारानी&amp;nbsp;कैपिटलिस्ट!"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उद्धरण सुनकर कैकेयी मुस्कुराई | "सुमित्रा के पुत्रों को चुनाव लड़ने का हक नहीं होगा |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दशरथ ने दिल पर हाथ रखा किन्तु हृदयगति नहीं रुकी, "तुमने राम के लिए वनवास तो माँगा ही नहीं ?" माउंटबेटन&amp;nbsp; ने बड़े बेपरवाह भाव से जवाब दिया - "अयोध्या में ही कौन सा राजमहल है अब |"&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;महामंत्री&amp;nbsp;सुमंत हमेशा की तरह खादी की धोती, और एक चश्मा&amp;nbsp;पहने&amp;nbsp;खड़े थे | चश्मा उनके व्यक्तित्व से कुछ यों जुड़ गया था कि वे अब पर्दा गिराकर ही चश्मा उतारते थे | "राम और भरत के बीच में खाई और चौड़ी हो जाएगी |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दशरथ चिंतित स्वर में बोले "धीरुभाई ने कैसे दोनों लौंडों को मेनेज&amp;nbsp;किया था ?"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सुमंत चुप ही रहे, "सबको सन्मति दे भगवान |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दशरथ को बीच बीच में सुमंत पे गुस्सा बहुत आता था, बेबात गाने लगता | अहिंसा परमोधर्म उन्हें भी उसी दिन से लगने लगा था जिस दिन अनजाने में वो किसी बेचारे श्रवण कुमार पर तीर चलाकर आये थे | इसके पश्चात उन्हें सुमंत ने समझाया कि बिना हिंसा के भी अभीष्ट पाया जा सकता है | कथा के अनुसार जब अटल जी से पूछा गया कि विप्रवर! बताइए बाबरी मस्जिद किसने तोड़ी | तो अटल जी ने धीर गंभीर शब्दों में आँखें बन्द कर पूरे दस मिनट तक स्वरचित&amp;nbsp;'काल के कपाल' सुनाई थी | फैसले का तो पता नहीं क्या हुआ, लेकिन जज साहब को शाम को अपने&amp;nbsp;कपाल पर अमृतांजन बाम&amp;nbsp;लगाना पड़ा | अगले&amp;nbsp;दिन से उन्होंने&amp;nbsp;प्रक्टिस&amp;nbsp;छोड़&amp;nbsp;दी |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;राम ने सुना तो दुखी हुए, लेकिन&amp;nbsp;उन्हें पता था कि प्रजा में उन्होंने अपनी छवि बहुत अच्छी बना रखी थी | आज&amp;nbsp;ही तो कुलवंती काकी के घर पे उन्होंने चाय पी | कुलवंती थी या धनवंती ... पता नहीं, कल न्यूजपेपर में पढ़ लेंगे यार | भरत प्रजा में जिन्ना की तरह थे, जिसे पब्लिक सिर्फ दूर से देखना पसंद करती थी | लक्ष्मण और शत्रुघ्न ने राम और भरत की पार्टी ज्वाइन कर ली | घर के गैलरी&amp;nbsp;में क्रिकेट खेलते वक़्त होने वाली झड़पें अब अक्सर हिंसक रूप ले लेती | भरत आजकल लाहौर गए हुए थे, और समझौता&amp;nbsp;एक्सप्रेस&amp;nbsp;भी बन्द&amp;nbsp;पड़ी&amp;nbsp;थी, सो&amp;nbsp;उन्हें वक़्त पर खबर&amp;nbsp;नहीं मिल&amp;nbsp;पायी | शत्रुघ्न आकस्मिक वेग से भरत के चुनाव प्रचार की ध्वज संभाले हुए थे, लेकिन राम मंझे हुए खिलाडी थे | आरोप प्रत्यारोप के दौर चलने लगे, "एक युवराज की तरह पाले गए राम क्या समझेंगे जनता का दर्द..." आजतक वालों के विशेष हवाले से खबर अयोध्या के कोने कोने में हलचल मचाने लगी |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अयोध्या वालों की सहानुभूति पाने के लिए राम ने नया दांव खेला |&amp;nbsp;राम चित्रकूट में कुटिया बनाकर रहने लगे | यह मेड इन चाइना फोल्डेड कुटिया थी | जिसने भी सुना तुरंत ह्रदय उमड़कर आ गया, "अरे उन जैसा सुकुमार कैसे रहेगा वहां ?" सीता अपने सधे हुए हाथो से चित्रकारी करती, "कृपया राम को ही वोट दें, हमारा चुनाव चिन्ह है धनुष" लक्ष्मण रात को पम्पलेट कृषि भवन या बेसिक स्कूल की दीवारों पे चिपका आते | जब भरत वापस आये तो उन्होंने पहले राम को भगाने पे शत्रुघ्न की पीठ ठोंकी, फिर उसके बाद अचानक एक करारा&amp;nbsp;थप्पड़ रसीद कर दिया | शत्रुघ्न को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन दरवाजे पे पत्रकारों की भीड़ को उमड़ते देखकर कुछ कुछ समझ आने लगा था | भरत ने प्रेस कांफ्रेंस में राम की बहुत तारीफ की, बड़े बड़े आंसू बहाए | "अबे यो&amp;nbsp;तो दिखावा है |" एक ताऊ ने खैनी भरे मुँह से कहा, पीक कैमरे&amp;nbsp;पर गिरी, वीडिओ ढक गया | लगा कि आकाशवाणी का नजीबाबाद केंद्र होगा | रात को भरत ने जब पुनर्प्रसारण देखा तो उन्होंने आजतक के ऑफिस में फ़ोन करके इसके कुपरिणाम भुगतने की धमकी भी दी |&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भरत अपने साथ पूरे अयोध्या को लेकर आये | बाबा रामदेव भी साथ आये थे, क्योंकि आस्था चैनल के साथ कांट्रेक्ट का उल्लंघन वो नहीं कर सकते थे | इस जनसमूह में&amp;nbsp;वो लोंडे लपाड़े ज्यादा थे जिन्हें मुफ्त का घूमना, खाना मिल रहा था | कॉलेज बंक करने का उनके पास आज पूरा बहाना था | लडकियाँ जरूर कुछ कम आई थी, जिसकी शिकायत ये लौंडे समुदाय शत्रुघ्न से बार बार कर रहे थे | शत्रुघ्न पहले से ही काफी परेशान थे, काफी&amp;nbsp;चीजें&amp;nbsp;लानी थी | श्रुतकीर्ति हमेशा उनके पास कोई न कोई लिस्ट पकड़ाती रहती है, जैसे एस एम कृष्णा&amp;nbsp;पाकिस्तान को पकडाते&amp;nbsp;हैं, "ये ये आतंकवादी ले आना यार, और हमारे हवाले कर देना जब अगली बार मिलोगे तो |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुरैशी हर बार भूल जाते, "अरे यार! तुम एक मिस्काल मार देते तो याद रहता | चलो कोई नि, अगली बार ले आऊंगा | कहीं भाग थोड़े ही रहे हैं आतंकवादी |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कृष्णा कहते, "हुंह, जाओ मैं तुमसे बात नहीं करती |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुरैशी का दिल मोंम हो जाता, "ओबामा ममा, इसे समझाओ न ... देखो ये मुझसे बात नहीं कर रही |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कृष्णा सास का सम्मान करने की पुरानी भारतीय परंपरा से हैं | चुपचाप चाइनीज़ हक्का नूडल्स में&amp;nbsp;टोमाटो सौस लेते हुए खिलखिलाती हैं "उन्ह!!! तुम भी न... मैं तो मजाक कर रही थी |"&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इन लौंडों के बिना ये कथा पूरी नहीं हो सकती | ये वे थे जो खुद को गरीबों का मसीहा कहते थे | हर मुद्दे पर इनकी कड़ी नज़र थी | चाहे वो सुषमा आंटी की लड़कियों का अफ़ेयर हो या नक्सलवाद ... चाहे मंदिर-मस्जिद विवाद हो या कश्मीर, या फिर दारु का ब्रांड, कभी कभी चिलम के दौर पर भी | ये ग़ज़ल पढ़ते, कहानी लिखते | रुचिका केस पे टेसू बहाके सामने सेठीजी की लड़की को इशारा करते "ऐ चलती क्या ?" आश्चर्यजनक रूप से इनका हर कार्य देश को गाली मारने पे ख़त्म होता | अगर कोई इन्हें रोकता तो ये कहते कि इस देश में देशभक्ति बड़ी सस्ती चीज़ है, पाकिस्तान को चार गाली दो और देशभक्त बन जाओ | देशविरोधी बयान देकर ये बड़े सस्ते में राममनोहर लोहिया, जेपी नारायण या बाबा नागार्जुन बन जाते हैं |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस बीच राम चुनाव प्रचार में गहरे उतर गए थे | अखबार वाला जंगल के शुरू में ही अखबार डाल देता, जिसे लक्ष्मण&amp;nbsp;को लाना पड़ता | इसमें राम को अपने बारे&amp;nbsp;में कई दुष्प्रचार भी मिलते कि वे सिर्फ सवर्णों के ही हक की बात करते हैं | राम को सवर्ण शब्द&amp;nbsp; से सुमंत काका का स्मरण हो आया | सुमंत काका, जिन्होंने अछूतों को सबसे पहले हरिजन कहा था | वैसे ऐसे लोगों की भी देश में कमी नहीं थी जो कहते कि सुमंत काका सवर्णों को परिजन कहते थे | खैर राम ने दलित वोट बैंक के बारे में सोचा, और प्रखर दलित नेता निषाद राज गुह से मिलने का कार्यक्रम बना लिया | लक्ष्मण से मिली जानकारी के अनुसार निषादराज गुह पहले चीन में&amp;nbsp;भारत के&amp;nbsp;राजदूत थे, आजकल बदहाली में राजदूत&amp;nbsp;मोटरसाइकिल पे दूध बेचते हैं | लक्ष्मण की जानकारी से यह भी पता लगा कि वे काफी सौम्य, मृदु और इमोशनल टाइप बन्दे है | निषादराज प्रकाश&amp;nbsp;राज के फैन हैं |&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 25px; margin: 0px;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;निषादराज वाकई काफी सुलझे हुए इंसान थे | वे इतने सुलझे हुए थे कि आकर राम के पास ज़मीन पर बैठ गए | लक्ष्मण ने तुरंत मेड इन चाइना फोल्डेड कुर्सी लगा दी | निषादराज ने संकोच किया तो राम ने उन्हें खुद अपने हाथों से 'स्पर्श' करके कुर्सी पर बिठा दिया, इस पोज़ की कई तसवीरें अलग अलग एंगल से ली गयी | निषादराज ने पूछा - "प्रभु! आप&amp;nbsp;महाराष्ट्र न जाकर इस बियाबान में क्यूँ बनियान सुखा रहे है ?" जवाब में राम ने लक्ष्मण की ओर इशारा कर दिया, लक्ष्मण तुरंत पलटे ओर पीठ पर नील निशान दिखने लगे | लक्ष्मण की आँखों में वही खौफनाक मंजर&amp;nbsp;उठा, "हम यू पी के हैं न | और वैसे भी, वहां लैंड स्कैम भी बहुत हो रहे हैं |" जाते वक़्त राम ने निषादराज को गले से लगाया | निषादराज के पास बयान करने को शब्द नहीं थे, उनकी आँखों से इस सम्मान पर झर झर से आंसू झरने लगे | उन्होंने केवट को वहीं&amp;nbsp; पे खड़ा कर दिया कि जैसे ही राम बोलें चलो, नाव लेके सीधे पार करा देना | राम मन ही मन बड़े पछताए कि ये तो पूरी तरह से पार भेजने के ही मूड में है | ताजा&amp;nbsp;जानकारी मिलने तक केवट नाव से अभी तक बाहर नहीं आया |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सुबह कपालभाती, अनुलोम विलोम करने के उपरांत भरत जनसमुदाय के साथ चित्रकूट की ओर चले | लक्ष्मण ने धनुष तान लिया, "भैया! भरत इधर की ही तरफ आ रहा है |" राम ने लक्ष्मण को तीर चलाने की नेट प्रक्टिस करने कहीं ओर भेज दिया | भरत आते ही राम के चरणों में गिर गए | आजतक, एन डी टी वी, इंडिया टी वी वाले लाइव फुटेज के लिए&amp;nbsp;आपस में लड़ मरे | ये पानीपत का चतुर्थ युद्ध था | जिसे आप रोहिंटन मिस्त्री जी की बुक में पढ़ सकते हैं | भरत रो रोकर जी हलकान कर रहे थे | सीता बोर होने ही लगी थी कि भरत ने उनके  भी चरण पकड़ लिए | ये सीता के लिए असल अग्निपरीक्षा की घडी थी कि चाहे जो हो जाए  उन्हें इरिटेट&amp;nbsp;नहीं होना है, नहीं तो पति का रहा सहा वोट बैंक भी चला  जाएगा | राम भरत का ये ड्रामा जानते थे, लेकिन उन्हें भरत की इस पोलिटिकल सूझबूझ पर यकीन नहीं हो पा रहा था | राम ने जनसमुदाय को देखा, तीनों माताएं आई हुई थी .. नहीं नहीं वे भरत को इतना राजनैतिक ज्ञान नहीं दे सकते.. गुरु वशिष्ठ ... नहीं वे शिष्ट इंसान हैं...अरे वहां कौन खड़ा है, लाठी लिए.. और खद्दर पहने .. महामंत्री सुमंत ...तो ये सुमंत काका थे जिन्होंने पार्टी बदल ली थी | महामंत्री सुमंत राम से नजरें नहीं मिला पा रहे थे, जैसे कह रहे हों कि राम मुझे माफ़ कर दो | राम जानते थे कि बिना सुमंत के वो कुछ नहीं कर सकते | राम को अर्धनिद्रा में लगा कि वे आडवाणी हैं और सुमंत अटल बिहारी, तो लक्ष्मण गडकारी |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भरत अपने साथ निषादराज को भी लेके आये थे | भरत ने जब सुना कि निषादराज को राम ने गले लगाया तो उन्होंने दो कदम आगे जाकर निषादराज के चरण ही पकड़ लिए | "यो देख, फिर डिरामेबाज़" खैनी वाले&amp;nbsp;ताऊ &amp;nbsp;ने फिर उच्चारा | लौंडा समुदाय भी भरत की इस हरक़त के पोलिटिकल मोटिफ देखने लगा, और नारेबाजी करने लगा | जाने कहाँ से शत्रुघ्न दारु -मुर्गा लेकर आये, तब नारेबाजियां थमी | निषादराज अभी तक राम से हुई मुलाक़ात के सदमे में ही थे, अकस्मात आये इस झटके से उनकी ह्रदय गति रुकते रुकते बची | "आप मेरे लिए बड़े भाई के समान है |" भरत की आँखों से प्रेमाश्रु बह रहे थे | राम जानते थे कि भरत ने ये कहकर एक तीर से दो शिकार किये हैं | एक तो उन्होंने दलित और पिछड़ी जातियों का समर्थन हासिल किया, दूसरे उन्होंने राम को उनकी औकात याद दिला दी&amp;nbsp;कि वो राम को निषादराज से ज्यादा ऊपर नहीं समझते | अभी तक 'डिरामा' देखने आये ताऊ की आँखें भी नम होने लगी थी | राम को लग गया कि अब भरत के कहने पर अगर अयोध्या चला गया तो भरत का चुनाव&amp;nbsp;जीतना निश्चित है | राम ने अपने को कई बार कोसा भी कि जाने किस कुघड़ी में उन्होंने यहाँ का टूर का प्रोग्राम बनाया | भरत अपने आप ही प्रेस कांफेरेंस को संबोधित करने लगे कि राम वापस नहीं आना चाहते | ये कहते ही भरत दहाड़ें मारकर रोने लगे, लौंडा समुदाय राम को निष्ठुर होने पर ताने मार रहा था | भरत बोले, "प्रभु नहीं आना चाहते तो ना आओ, लेकिन हमें सहेजने के लिए अपनी चरण पादुकाएं दे दो |" राम जानते थे कि लन्दन से आये इन चप्पलों पर भरत की नजर काफी पहले से है, लक्ष्मण ने उन्हें आगाह भी किया था | सारे दांव उलटे पड़ रहे थे, और राम भाग्य के हाथों विवश हो रहे थे | भरत की दूरदर्शिता&amp;nbsp;के किन्तु राम कायल भी हो रहे थे | भरत ने चप्पल भी ले ली, जनता की सहानुभूति भी, और राम को कहीं का भी नहीं छोड़ा | राम को लगा कि वे थोड़ी देर और रहे तो भरत कह उठेंगे कि भरत का काटा हुआ तो चप्पल भी नहीं पहन पाता | &amp;nbsp;राम चुपचाप चप्पल देने ही वाले थे कि लक्ष्मण ने उनका हाथ रोक लिया, "प्रभु ये क्या कर रहे हैं आप ? ये चप्पल इसके सर पर मारिये और अयोध्या वापस चलिए |" राम ने एक नज़र लक्ष्मण को देखा, "लक्ष्मण खुद को पहचानो, तुम सुमित्रानंदन लक्ष्मण हो, वी वी एस लक्ष्मण नहीं कि पारी ख़त्म होने पे भी बल्ला भांजते रहो |"&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुछ दिनों बाद महामत्री सुमंत की किसी ने हत्या कर दी |&amp;nbsp;जिस पर राम और भरत के समर्थक गाहे-बगाहे एक दूसरे का सर खोल देते हैं | किसने की, इसकी जांच आज तक जारी है | भरत ने १४ सालों तक राम की चप्पलों को राजगद्दी पर रखा, और राज्य किया | इस दौरान देश में इमरजेंसी लगा के रखी, और चुनाव नहीं हुए | इन १४ सालों में राम की चप्पलें वहीँ राजगद्दी पर रहीं | वैसे ही जैसे, मनमोहन जी सोनिया जी के हाई हील के सैंडलों को पी एम की कुर्सी पर रखकर देश चलाते हैं | बीच बीच में मनमोहन जी को जब कोई पसंद नहीं आता तो वहीँ से वो सैंडल फेंक के मारते हैं | निशाना इतना सधा हुआ होता है कि सुदूर देशों तक लगता है | राग रंग के नए नए मेले इस देश में लगते हैं, जिनमे पब्लिक को भी बड़ा&amp;nbsp;मजा आता है | किसको चाहिए रामराज्य, राम आयेंगे तो पचास सवाल जवाब करेंगे, इससे तो बिना रामराज्य के भले | इस बीच दस्तावेज गायब हो गए कि राम कहाँ पैदा हुए थे | कोई कहता यहाँ, कोई कहता वहां | जिसकी जहाँ मर्ज़ी आई उसने वहां राम की मूर्ति लगायी, ये अलग बात थी कि कोई नहीं चाहता था कि मूर्ति के बजाये राम वहां पे साक्षात हों | लोग एक दूसरे को राम का नाम लेकर डराते धमकाते थे | समाचार लिखे जाने तक&amp;nbsp;राम वापस नहीं आये हैं, लेखक ने उम्मीद भी छोड़ दी है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-3721957324576613302?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/butv-_DnH3M" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-01-16T00:07:45.380+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGL7-OhjLI/AAAAAAAAAH8/51xbgFGrtDE/s72-c/bharat_milap__lord_rama_meets_with_brother_bharat_pc03.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">27</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2010/11/blog-post_15.html</feedburner:origLink></item><item><title>आछरियाँ</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/luGw70M50Kk/blog-post.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sat, 15 Jan 2011 10:37:45 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-6842432860529039385</guid><description>&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGM_OexQyI/AAAAAAAAAIA/R7N8c8n09-M/s1600/Birdsnest500pix.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://1.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGM_OexQyI/AAAAAAAAAIA/R7N8c8n09-M/s400/Birdsnest500pix.jpg" width="341" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;b style="background-color: white;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b style="background-color: white;"&gt;स्थान : पौड़ी&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b style="background-color: white;"&gt;दिनांक : १-१-२००७&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b style="background-color: white;"&gt;समय : १०:४५ पूर्वान्ह &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;नए साल की नयी सुबह | पौड़ी की सर्दियाँ बहुत खूबसूरत होती हैं, और उससे भी ज्यादा खूबसूरत उस पहाड़ी कसबे की ओंस से भीगी सड़कें | सुबह उठते ही एकदम सामने चौखम्भा&amp;nbsp;पर्वत दिखायी देता है | कौन रहता होगा वहां ? इंसान तो क्या ही पहुंचा होगा | क्या कोई देवता ? माँ कहती है कि आछरियाँ(परियाँ) ऐसी जगहों पर&amp;nbsp;रहती हैं&amp;nbsp;जहाँ तुम्हारा ध्यान&amp;nbsp;&amp;nbsp;बार बार जाए, वो जगह इंसानों के लिए दुर्लभ हों | माँ कहती कि ऐसी जगहों पर नहीं जाना चाहिए, और अगर कुछ तुम्हें दिखायी भी दे तो अपनी आखों पे भरोसा मत करना | यह सब छल है, डरना मत बिलकुल भी | आछरियाँ किसी पर मुग्ध होती हैं, किसी की बातों पर, किसी की सच्चाई, अच्छाई पर तो उसे छल दिखाती हैं | फिर उसी छल से उसको अपने साथ अपने लोक में लेकर चली जाती हैं | गडरिये की कहानी, जिसे आछरियां लेके चली जाती हैं, किसी पहाड़ी पत्रिका में पढ़कर मैं थोडा सा सिहरा जरूर था, लेकिन दिल ही दिल में अच्छा&amp;nbsp;भी लगा&amp;nbsp;कि काश मुझे भी कोई लेके चला जाता | माँ एक कहानी और भी सुनाती है, क्या थी वो कहानी मुझे याद नहीं, बस एक वाक्य याद है कहानी में | कहानी में एक चिड़िया का जिक्र होता है जो 'बाट क अबाट! अबाट क बाट' की चिहुंक लगाये रहती है | शायद इसका मतलब है कि सही रास्ते छल&amp;nbsp;रास्ते है, और छल रास्ते सही | कोई नहीं जानता कि क्या सही है और क्या छल | वो चिड़िया किसी पथिक को उसके रास्तों से भटका ले जाती है | पहाड़ी कहानियों में किरदार पेड़-पौधे, जंगल-जानवर, आछरियाँ, नाग, देवता, पितर इत्यादि होते हैं | माँ को पता भी है कि मैं बहुत डरता हूँ, हर चीज़ से | काला धागा मेरे गले में मंत्रसिद्ध करवाया था, जिसे मैंने सातवीं क्लास में एक दोस्त के ललकारने पे तोड़ दिया था | मुझे हर वक़्त किसी के होने का अहसास बना रहता था | डर तो नहीं, लेकिन अजीब सिहरन जरूर पैदा होती थी |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;चौखम्भा इतना खूबसूरत न लगता अगर बीच में एक छोटी सी पहाड़ी पे माँ दुर्गा के मंदिर की पीले रंग की पताका न दिखती तो | हॉस्टल के आसपास के वीराने में एकाएक मंदिर मानो चौखम्भा से स्पर्धा करता | अलसुबह भी कुछ लड़के कॉमन रूम में पहुँच कर टी वी चलाकर न्यूज़ या गाने देखने लगते, या अपने ही रूम पे कंप्यूटर पे कोई ताज़ा हिट&amp;nbsp;हुआ गाना चला देते | लेकिन मेरे जैसे कुछ लोगों के लिए दिन शांत था | इंडिया टी वी वहां पर नहीं था, और अखबार दो-तीन दिन बाद पहुँचता था | किसी तरह की कोई जल्दी नहीं | कभी कभी रात को लाइट भी चली जाती थी | फिर तो यादों का समां बंध जाता था | कुछ दिन मैंने मंदिर के पीछे पहाड़ी के ढलान वाले हिस्से से नीचे बसे हुए छोटे छोटे गाँवों को देखते हुए भी गुज़ारे थे | इतनी सुबह, ऐसी ही जगह पर मेरे बचपन का डर फिर शक्ल लेता था कि कोई मेरे साथ है | देखो, उसकी आँखें भी मुझे दिखायी दे रही हैं | अब चेहरे ने शक्ल लेनी शुरू कर दी है | हाथ बढ़ा लूँ तो शायद छू सकता हूँ उसे | ये छल है, अपनी आँखों पे भरोसा मत करो, माँ की बातें याद आती है | मैं दूसरी तरफ देखने लगता हूँ, फिर वापस देखता हूँ | वो चेहरा अब नहीं है | काश उन पलों में मैं दूसरी तरफ नहीं&amp;nbsp;&amp;nbsp;देखता तो&amp;nbsp;ये छल मुझे लेके चला जाता | सूरज निकलने वाला था | गणेश भाई की कैंटीन तक जाने वाली पगडण्डी पर से उगता था सूरज , मानों वही से दिन भर का लम्बा सफ़र तय करेगा | एक बूढा भी उसी रास्ते से आता था रोज़ सुबह, रात का चौकीदार था कहीं | सदियाँ कितनी ही लम्बी क्यों न हो, लगातार चलता हुआ वक़्त सबको मामूली बना देता है | जिंदगी के आखिरी पड़ाव में भी जीवन ठहरता नहीं है | "क्या वो बूढा भी छल है ?" मैं माँ से पूछता हूँ | गणेश भाई की केन्टीन में चाय-समोसे का लुत्फ़ उठाते मैं और रोहित | रोहित की दो महीने पहले किसी लड़की से मुलाक़ात हुई थी | मोबाइल नम्बर्स का आदान-प्रदान हुआ, और बातें होने लगी | अक्सर हॉस्टल की लॉबी में उसे बादलों को छूते हुए देखता हूँ | खिड़की खोलते ही हल्के हल्के&amp;nbsp;जहाँ नमी कपड़ों को भिगो देती है, वहां वो बेचारा ठण्ड से ठिठुरता हुआ खड़ा रहता है | आज उसके साथ पौड़ी जा रहा हूँ, उसकी फ़ोन-फ्रेंड से मिलने | "पता नहीं, किस&amp;nbsp;गढ़वाली घसियारिन से प्यार हुआ होगा तुझे ?" मैं कहता हूँ, रास्ते में आई झाड़ियाँ हटाते हुए | हम दोनों हॉस्टल से नजरें बचाते हुए जा रहे थे, उसी पगडण्डी पर जहाँ से सूरज निकलता है |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;आज पहली सुबह है नए साल की तो यकीनन सारे दोस्त लोग, लड़के-लड़कियां, सीनियर-जूनियर आज पौड़ी घूमने के लिए आयेंगे | इसके अलावा हमारे कॉलेज के पास कोई विकल्प भी नहीं है |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;"वे सब लोग कंडोलिया मंदिर की तरफ जायेंगे, हम दूसरी तरफ निकल जायेंगे, श्रीनगर वाली रोड की तरफ " रोहित हँसते हुए कहता है "बाद में जब मैं उससे मिल लूँगा तो तू कंडोलिया वालों के साथ हिल मिस्ट में चले जाना, वहीँ जायेंगे वो लोग खाना खाने |"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;कंडोलिया गया था मैं एक बार | दूसरी क्लास में कंडोलिया घूमने के लिए स्कूल का टूर गया था | घर आकर मैंने माँ के पैरों को पकड़कर अपना मुँह छुपा लिया था उसके आँचल में | "माँ! आचार जी कहते हैं कि वहां पे स्वर्ग है | माँ चलो न, हम लोग वही पे रहेंगे | ठीक है न ?" माँ हँस रही थी जो मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था | मैं पूरी तरह से सीरिअस हूँ, और माँ मजाक बना रही है | "ठीक है, ठीक है, पहले बड़ा हो जा, फिर सोचना |" शीतल ने मुझे धक्का देकर जब पानी पहले पिया तो अपनी गढ़वाली हिंदी में सकपकाते हुए&amp;nbsp;मैंने पूछा, "ये तुमारा है ? यख म तुमारा नाम लिखा है ?"और उसने उंगली से वहां को इशारा किया जहाँ शीतल जल लिखा हुआ था | "वो मुझे छछूंदर कहती है माँ, मुझे तो पता भी नहीं वो कैसा दिखता है... माँ, क्या शीतल भी आछरी है ?"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;कॉलेज गेट पर एंट्री कभी करनी पड़ती है, कभी नहीं | आज नहीं करने का दिन था | वैसे भी हम लोगों की गार्ड से जान पहचान बन गयी थी | पौड़ी जाने के लिए ट्रैकर लगा हुआ था | हम लोग पीछे की सीटों पर बैठ गए |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;"चल नौना(बच्चे), कबरी चलेगा ?" बूढी ताईजी फटकार लगाती हैं |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;"चलता हूँ बौडीजी(ताईजी), चलता हूँ |" ड्राईवर हाथ रगड़ते हुए, मफलर से फिल्टर हुई आवाज में बोलता है | "अर तुमि को हो रही है भारी अब्यार(देर) ऑफिस जाने की |"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;रोहित और मैं एक दूसरे की तरफ देखते हैं, मुस्कुराते हुए | "तुझको उलटी तो नहीं होगी ?" मैं पूछता हूँ |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;"मत दिला साले याद |" रोहित हँसता है | रोहित अक्सर रात के ग्यारह बजे लॉबी में सिगरेट पीते हुए चीखता था - "क्या दिया इन पहाड़ों ने मुझे ?"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;मैं भी उसके सुर से सुर मिलाता - "सिर्फ तड़प, बेबसी, न ख़त्म होने वाली उलटी करने की&amp;nbsp;खलिश |"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;'दिल्ली का लड़का' रोहित जब पहली बार यहाँ आया था तो वो लिटरली जी एम् ओ यू की बस के खम्बे में लटककर आया था | हर मोड़ पर उसे लगता कि बस खाई में जाने वाली है, और&amp;nbsp;ड्राईवर बस मोड़ ही नहीं रहा | माँ मेरी उम्र हमेशा नौ से कम बताती थी ताकि मेरा हाफ&amp;nbsp;टिकेट लिया जाए | उस वक़्त मुझे चुप रहकर यात्रा करनी होती | एक दिन ऐसे ही&amp;nbsp;बस में ऐसे ही गुनगुना रहा था&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;i style="background-color: white;"&gt;सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।&amp;nbsp;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;i style="background-color: white;"&gt;ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;तो एक सज्जन बोले, "बेटे ये तो गीता के पंक्तियाँ है |" तो मैंने स्कूल में रटा हुआ पूरा गीता सार, एकात्मता स्त्रोत्रम, भोजन मन्त्र सब सुना दिया | कंडक्टर ने फुल टिकेट लगाया,&amp;nbsp;और माँ से खूब डांट पड़ी अपनी विद्वता&amp;nbsp;दिखाने पे |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;वो खूबसूरत तो थी | गढ़वाली थी, मगर घसियारिन न थी | आसमान से रंग की उसकी ड्रेस थी, जो यहाँ के लोगों के लिए कौतुहल का विषय हो सकती थी | लेकिन कोई उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा था | माया बाँद, कहता है रोहित उसको | मुस्कुराती है वो | गिटार&amp;nbsp;लेकर चल रही है |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;"आप जानती हैं गिटार बजाना ?" मैंने निहायत भोलेपन से पूछा |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;"थोडा सा" वो फिर लजाते हुए मुस्कुराती हैं, मुझे 'फ्योंली' याद आ जाती हैं | माँ ने ये कहानी नहीं सुनाई थी, ये तो ऐसे ही घर पे 'अमर उजाला' आता था, उसमे पढ़ी थी |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;"गिटार की वजह से ही तो मैं और माया मिले थे |" रोहित हँसता है | माया को मैंने कहीं देखा है, कहाँ देखा है नहीं जानता | "चलो यहाँ पर बैठते हैं |" फ्योंली मुस्कुराते हुए कहती है | दूर तक फैला हुआ हरा मैदान, अनवरत | क्षितिज तक जाकर ढल जाता था, छुपा हुआ सा, अनछुआ सा |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;"जाने कहाँ छुपा हुआ था ये मैदान ? मैं कई बार पौड़ी आया था , अपनी ही धुन में घूमता घामता लेकिन मुझे कभी नहीं दिखायी दिया |"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;"मैं यहाँ की लोकल&amp;nbsp;हूँ |" फ्योंली फिर से मुस्कुराती है | "कुछ गाओ न..." फ्योंली जिद करती है | रोहित फ्योंली की&amp;nbsp;ओर देख रहा है | मैं सामने देख रहा हूँ, चौखम्भा यहाँ से भी देखता है, जरा सा बाएं देखना पड़ रहा है | बर्फ से ढके पहाड़ों की भीड़ में चौखम्भा आराम से पहचाना जाता है | चार चोटियाँ एक साथ जैसे किसी शहंशाह का ताज हो | जहाँगीर कभी चौखम्भा नहीं गया, शायद इसलिए कश्मीर को स्वर्ग कहा उसने | मेरे दिमाग में कई सारे ख्याल एक के बाद एक बुलबुलों की तरह आ रहे थे | जहाँगीर&amp;nbsp;चौखम्भा जाता तो ? आछरियां पकड़ लेती उसे भी ?&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.8;"&gt;&lt;div style="font-size: 14px; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;मैं उठकर&amp;nbsp;चलता गया | जाते हुए एक बार पीछे मुड़कर देखने की इच्छा हुई लेकिन नहीं देखा | फ्योंली का चेहरा मुझे कुछ अनदेखा याद दिला रहा था | रास्ते में चीड, देवदार के पेड़ों के बीच से धूप छन छन कर आ रही थी | मेरी आँखों के आगे अँधेरे आ रहे थे, और कभी कभी अँधेरे भी नहीं दिखते | दोस्तों के साथ हिल मिस्ट&amp;nbsp;न जाकर मैं हॉस्टल वापस आया | पूरा हॉस्टल खाली पड़ा था | कुछ कुछ वैसा ही जैसे वो अस्पताल, तीन साल पहले | जब मैं भागा भागा आया था तुम्हें अपना एंट्रंस एक्साम का&amp;nbsp;रिजल्ट&amp;nbsp;बताने के लिए | पिछली&amp;nbsp;रात को ही तो तुम्हारे सिरहाने&amp;nbsp;मैंने तुम्हें एकात्मता स्तोत्रं, गीता सार सुनाया था माँ | हाँ, थोडा भूल गया था.. तो क्या? मैं खिड़की से बाहर देखता हूँ | अगर मैं पीछे मुड़कर देखता तो क्या फ्योंली गायब हो जाती | चेहरा शक्ल बनाने लगा था | फ्योंली की शक्ल तुमसे बहुत मिलती थी माँ | मेरी आँखों में ओंस बिखर गयी, "माँ! रोहित वापस नहीं आएगा न ?"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; text-align: right;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;-&lt;b&gt;सुधीर&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; text-align: right;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt;इतने सालों तक साथ रहने के बावजूद मैंने कभी सुधीर की डायरी नहीं पढ़ी | सुधीर की डायरी का ये पहला पेज है, और अब शायद आखिरी लिखा हुआ पेज | आज सुबह से ही कुछ अनमना सा था वो | गणेश भाई की कैंटीन में हम दोनों ने चाय-समोसे खाए | हॉस्टल से छुपते हुए हम लोग घुड़दौड़ी तक पहुंचे, क्योंकि कॉलेज गेट पर इतनी सुबह ट्रैकर&amp;nbsp;नहीं मिलते | वहां पर देवप्रयाग से आ रही जी एम ओ यू&amp;nbsp;की बस में बैठ गए हम | सुधीर अपने&amp;nbsp;पास बैठी बुढिया को कुछ श्लोक-विश्लोक सुनाने लगा | बुढिया बेचारी&amp;nbsp;एकटक सुधीर को देखे जा रही थी, बाकी लोग भी धीरे धीरे ध्यान देने लगे | सुधीर अपनी निष्कंप आवाज में एक के बाद एक श्लोक सुना रहा था | "ग्रीडी साला" मैं अपने आप से बडबडा रहा था "अटेंशन सीकर" | बस से उतरते वक़्त&amp;nbsp;बुढिया की आँखों में आंसू थे, दुआ दी "जुग जुग रै नौना" |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt;मैं अपना गिटार साथ ही लेकर आया था | जाने क्यों सुधीर ने माया को फ्योंली जैसा कुछ कहा | माया हँस पड़ी, उसने मुझे बताया फ्योंली किसी कहानी की नायिका है | माया और मैं मैंदान के एक कोने में बैठ गए | सुधीर हमसे थोड़ी दूर बैठ गया, जाने क्यों माया से नजरें &amp;nbsp;चुरा रहा था वो&amp;nbsp;| माया की जिद पर मैंने 'एनरिके' का&amp;nbsp;'हीरो' गाया | इस दौरान सुधीर अपनी डायरी में क्या क्या लिख रहा था | सुधीर डायरी लेकर आया था, ये मुझे नहीं पता था | फिर 'सिल्क रूट' का 'डूबा डूबा' गाते हुए मेरा ध्यान एक पल को सुधीर की ओर गया | वो सामने हिमालय में खो सा गया था |उसकी आँखें मानों&amp;nbsp;चौखम्भा के भी पार देख लेना चाहती हों | फिर वो एकदम से उठा और चलने लगा | मैंने गाना रोक दिया | वो बाट अबाट,&amp;nbsp;बाट अबाट सा कुछ&amp;nbsp;गुनगुनाता चला जा रहा था |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt;माया हँस रही थी "तुम्हारा ये दोस्त भी न |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt;मुझे लग गया था कि सुबह से उसकी तबियत शायद कुछ ठीक नहीं थी | मैं चिल्लाया, "सुधीर! अबे रुक जा, मैं भी आता हूँ | हॉस्टल चलते हैं फिर |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt;वो एक पल को ठिठक गया, लेकिन उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा | वो फिर से चलता हुआ मैदान की ढलान से उतर गया | मैं जब तक भागता हुआ पहुंचता, वो कहीं नज़र नहीं आ रहा था | माया ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे रोक दिया, "जाने दो उसे, बहुत खुश है वो आज |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt;मैं लौटकर वापस आ गया | माया जो कुछ कह रही थी, मेरा ध्यान सिर्फ सुधीर पर लगा हुआ था | दूर से मुझे एक बहुत खूबसूरत सा गाँव दिखायी दे रहा था | सफ़ेद छोटे छोटे पहाड़ी घर | बर्फ में ढंके हुए उनके आँगन को बुहारती आसमानी रंग के परिधान में छोटी छोटी लडकियाँ | और वहां कोने में शायद सुधीर भी है, वो मुड़ा, मुझे देख के मुस्कुराया |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;"अच्छा रोहित! मैं चलती हूँ" कहते हुए माया ने मेरी तन्द्रा भंग की | माया चलने लगी, &amp;nbsp;मैदान के उसी ढलान से वो&amp;nbsp;नीचे उतर गयी | उसके जाने के बाद मैं हॉस्टल जाने के लिए मुड़ा | सुधीर को इन सब पहाड़ी रास्तों का पता है, वो शाम को खुद ही हॉस्टल आ जायेगा |&amp;nbsp;मैं अगर उसे ढूँढने जाऊँगा तो मैं खुद ही खो जाऊँगा | वापस जाते हुए मैंने मैदान के कोने में लगे बैनर&amp;nbsp;पर उड़ती उड़ती नज़र डाली 'माया नेगी मेमोरिअल क्रिकेट टूर्नामेंट १८ जनवरी से' | ट्रैकर को पैसे देते वक़्त मैंने जेब में हाथ डाला तो सुधीर का&amp;nbsp;टूटा हुआ काला मोटा सा धागा मेरी जेब में था, जाने कब मुझे दे गया था वो |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;काश, वो धागा पहन के रखता...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-size: small;"&gt;हॉस्टल वापस आकर मैंने सुधीर की डायरी पढ़ी | माया नेगी की मौत तीन साल पहले एक प्लेन क्रेश में हो गयी थी, उसी दिन जिस दिन सुधीर की माँ की मौत हुई थी | सुधीर की डायरी में उस हादसे की कई तस्वीरें थी | सुधीर हॉस्टल वापस नहीं आया था, इन फैक्ट सुधीर उस दिन के बाद फिर कभी नहीं लौटा | वैसे जाने क्यों मुझे लगा ही&amp;nbsp;था कि वो नहीं आएगा | कभी कभी कुछ लोगों को दिख जाता है&amp;nbsp;उसी मैदान पे, सुबह ११ बजे, वैसे ही बैठे हुए, चौखम्भा को देखते हुए |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-size: 14px; text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;हाई मॉम! &amp;nbsp;हाई डैड!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;मातृभाषा और संस्कृति , जिन दो चीज़ों पर आपने थेसिस लिखने को मुझे यहाँ गाँव में जबरदस्ती&amp;nbsp;भेजा है, उसके रिजल्ट मैं किसी दिन दादी से ऑनलाइन चैटिंग करवा कर दे दूंगी | मैं ठीक हूँ, हाँ...हाँ रो रही हूँ | लेकिन मैं खुश हूँ | रोहित से मिली आज, आखिरी बार | अब शायद वो सुधीर को भूल जाये और खुद को भी माफ़ कर दे | डैड, डोन' कीप टेलिंग&amp;nbsp;&amp;nbsp;मी&amp;nbsp;यू आर ए&amp;nbsp;साइकैट्रिस्ट, इट इर्क्स | मुझे पता है कि ये आपका आईडिया था, लेकिन इसे परफोर्म करने वाली तो मैं हूँ न | कभी कभी सोचती हूँ कि काश रोहित एक नोर्मल पर्सन&amp;nbsp;होता | तीन साल पहले उसकी माँ का&amp;nbsp;प्लेन&amp;nbsp;क्रेश में मरना, फिर बचपन से उसका इतना अंतर्मुखी और भावुक होना, ये सब उसे विश्वास दिलाते रहे सुधीर के अस्तित्व का | उसके पापा ने सारा वक़्त और पैसा&amp;nbsp;माया नेगी मेमोरिअल क्रिकेट&amp;nbsp;क्लब में लगा दिया | दिल्ली&amp;nbsp;से वापस अपने गाँव&amp;nbsp;पौड़ी आना, उन्ही जगहों को देखना, जहाँ उसने बचपन गुज़ारा था | तन्हाइयों में भटकते रहना खुद को सुधीर समझकर | उफ़ कैसी उलझी हुई मनोदशा में रहता था होगा वो| लेकिन अगर वो ऐसा न होता तो शायद हम लोग मिलते भी नहीं | एक साल के लिए दादी के पास आई हुई मैं, उसे किसी और अजनबी की तरह नज़रअंदाज कर जाती | कितना मासूम सा है वो, कभी वो मेरी गोद में सर रखकर सो जाता, बिलकुल एक छोटे बच्चे की तरह ... मॉम&amp;nbsp;, शादी से पहले ही माँ बन&amp;nbsp;गयी थी मैं, उस छोटे &amp;nbsp;बच्चे की&amp;nbsp; :) | &amp;nbsp;डैड! बीच बीच में खुद को दोषी भी महसूस किया | उसकी निश्छल भावनाओं को धोखा तो नहीं दिया न मैंने कहीं&amp;nbsp;, उसे ये यकीन दिलाकर कि हाँ सुधीर की माँ कोई परी है, कोई एंजेल&amp;nbsp;जो सुधीर को लेने आई है | उसे जानबूझकर मैं उसी जगह ले गयी जिस जगह को वो अवोइड करता था, पौड़ी क्रिकेट ग्राउंड | आज सुबह से&amp;nbsp;बहुत खुश था वो, &amp;nbsp;बीच बीच में अंतर्मुखी भी हो जाता | फिर गिटार पर उसने हीरो सुनाया&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;'वुड यू सेव माइ&amp;nbsp;सोल टुनाईट!' कई बार दिल गले तक आ जा रहा था, पूरी कोशिश की कि उसके सामने ना रोने लगूं | फिर उसका करेंट फेवरिट 'डूबा डूबा', बीच में रुक गया | "वो सुधीर जा रहा है, सुधीर... रुक मैं भी चलता&amp;nbsp;हूँ |" रोकने की कोशिश की उसने सुधीर को | "जाने दो उसे, आज बहुत खुश है वो |" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर सुधीर की लाइफ को फुल स्टॉप कर दिया | शायद अपनी भी | डैड! वो अपना ख़याल रख लेगा न अब |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;मैं जानती हूँ कि अब मुझे वो कभी नहीं मिल सकता | मैं उसके सामने भी नहीं आ सकती | मॉम, &amp;nbsp;प्लीज़ फिर से ये मत कहने लगना कि बेलफास्ट आ जाओ | डैड! समझाओ न मॉम को, मुझे अभी मेरे हाल पे छोड़ दो :( | क्या हुआ जो वो मुझे नहीं मिल सकता , छुप छुप के देख तो सकती हूँ न उसे यहाँ इंडिया में | शायद ये दौर गुज़र जाए, लेकिन तब तक मुझे हर एक पल का मज़ा लेने दो | अभी तो मुझे भटकते रहना है उसके आसपास प्रेत बनकर | शायद ये पूरी जिंदगी यूँ ही गुज़ार दूँ , एक आछरी बनकर |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;युअर लवली 'आछरी'&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;b style="background-color: white;"&gt;माया&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-6842432860529039385?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/luGw70M50Kk" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-01-16T00:07:45.381+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://1.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGM_OexQyI/AAAAAAAAAIA/R7N8c8n09-M/s72-c/Birdsnest500pix.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2010/11/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>फेरी वाला</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/BATQ5x9qyaE/blog-post_25.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sat, 15 Jan 2011 10:37:45 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-1161823015564043319</guid><description>&lt;div style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGSHI4Y0AI/AAAAAAAAAIE/vvzp-TLjhnA/s1600/vincent-van-gogh-paintings-from-arles-1.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://1.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGSHI4Y0AI/AAAAAAAAAIE/vvzp-TLjhnA/s400/vincent-van-gogh-paintings-from-arles-1.jpg" width="321" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;ह&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;म  ख्वाब बेचते हैं | पता नहीं कितने सालों से, शायद जब से पैदा हुआ यही काम  किया,&amp;nbsp;ख्वाब बेचा | &amp;nbsp;दो आने का ख्वाब खरीदा, उसे किसी नुक्कड़ पे खालिश  ख्वाब&amp;nbsp;कह&amp;nbsp;के किसी को&amp;nbsp;बेच&amp;nbsp;आये&amp;nbsp;|&amp;nbsp;जब&amp;nbsp;कभी वो&amp;nbsp;शख्स&amp;nbsp;दुबारा मिला तो&amp;nbsp;शिकायत करता  -&amp;nbsp;"जनाब&amp;nbsp;पिछली बार&amp;nbsp;का ख्वाब आपका&amp;nbsp;अच्छा नहीं&amp;nbsp;रहा |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;अब अपने ख़्वाबों की  बुराई किसे बुरी नहीं लगती |&amp;nbsp;तुरंत तमककर बोले, "आज अगर नींद के मोहल्ले  में कोई कह दे कि मेरे ख़्वाबों में वो मजा नहीं है, जायेका नहीं है, या फिर  तंदुरुस्ती नहीं है, तो सब छोड़ के काशी चला जाऊं |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;ख्वाब खरीदने वाला सहम  जाता है | इधर नाचीज़ देखता है कि साहब शायद नाराज हो गए, कहीं अगली बार से  हमसे ख्वाब खरीदना बंद न कर दें |&amp;nbsp;तुरंत चेहरे का अंदाज बदल कर कहते हैं, "अरे साहब, बाप दादों की&amp;nbsp;कमाई&amp;nbsp;है ये ख्वाब, उनका खून लगा है इस ख्वाब  में | अपना होता तो एक बार को सुन लेता, चूं-चां भी न करता | लेकिन खानदान  की याद आते ही दिल मसोस कर रह जाता हूँ |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;साहब का बिगड़ा अंदाज फिर ठीक हो  जाता है | दिल ही दिल में खुद को तस्दीक मिलती होगी कि हाँ अभी भी मैं ही  साहब हूँ, क्या हुआ जो कल का लौंडा एक बार बिगड़ गया तो | बाप के नाम पे ही  तो जीना होता है कई लोगों का | तुरंत ही गलती से सीख ली और मुआफी मांगने  लगा है | &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: 14px; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: 14px; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;ऐसे  ही एक मोहल्ले में आज ख्वाब बेचने आया हूँ | पिछली बार ख्वाब बेचते बेचते  यहाँ से एक ख्वाब चुपके से जेब में रख लिया था, आयशा | नहीं, मुहब्बत कह के  इस ख्वाब को बदनाम न कीजिये, इसे सिर्फ&amp;nbsp;आयशा ही कहें |&amp;nbsp;दो साल से ऊपर गुजर  गए हैं, लोग अब पहचान में नहीं आते | गली के नुक्कड़ पे सियाराम का मंदिर  था | पिछली बार रात को वहीँ रहा था, रामेसर पंडा के दालान में | इन दो सालों  में मंदिर का निशां मिट गया था | उधर वो मियांजी का छापेखाना आज भी छप रहा  है | हर दम&amp;nbsp;सोचता हूँ कि कुछ तालीम&amp;nbsp;ली होती तो शायद&amp;nbsp;कुछ नए ख्वाब खरीद&amp;nbsp;के  उन्हें सजा&amp;nbsp;संवार के बाजार&amp;nbsp;में बेच आता,&amp;nbsp;शायद ख्वाब खरीदने का&amp;nbsp;शऊर  होता |&amp;nbsp;सुलेमान&amp;nbsp;दर्जी&amp;nbsp;का लड़का&amp;nbsp;पिछली दफे&amp;nbsp;लाहौर&amp;nbsp;भाग&amp;nbsp;गया था | सुना है, उधर  कुछ सनीमा में काम भी करने लगा है | बाप को पैसे भी भेजता&amp;nbsp;है |&amp;nbsp;सुलेमान ने  पानी पिला के बताया&amp;nbsp;था |&amp;nbsp;ताहिर अली और माहिर अली की तकरार&amp;nbsp;अब इस कदर&amp;nbsp;बढ़ गयी  थी कि जमीन&amp;nbsp;के उस टुकड़े पर कोई न रहता था, जिस पर दोनों&amp;nbsp;अदालत के  चक्कर&amp;nbsp;काटते&amp;nbsp;हैं | बेग साहब, आज भी लोगो&amp;nbsp;को ईमान, नेकी और मुहब्बत से रहने  का, हजरत&amp;nbsp;के बताये&amp;nbsp;रास्ते&amp;nbsp;पर चलने&amp;nbsp;की ताकीद&amp;nbsp;करते&amp;nbsp;हैं | बस अब कुछ&amp;nbsp;ज्यादा ही  कमजोर हो गए हैं |&amp;nbsp;सकीना&amp;nbsp;ने फ़य्याज़&amp;nbsp;से सबके सामने अपना इश्क क़ुबूल&amp;nbsp;किया,  तो&amp;nbsp;सारा&amp;nbsp;मोहल्ला दोनों की जान&amp;nbsp;का दुश्मन&amp;nbsp;हो गया था | बेग साहब ने ही दोनों  का निकाह&amp;nbsp;मंजूर&amp;nbsp;करवाया |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;इन सब के बीच मैंने पूछा, "रामेसर पंडा  किधर&amp;nbsp;चले गए ? क्या हिंदुस्तान&amp;nbsp;वापस चले गए ?"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"नहीं,  हिंदुस्तान&amp;nbsp;तो नहीं गए, अब किस आसरे हिंदुस्तान जायेंगे | वहां है ही कौन  उनका ?"&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: 14px; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: 14px; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;रामेसर  पंडा ने भी मेरे ख्वाब खरीदे थे कि&amp;nbsp;तकसीम&amp;nbsp;के बाद शायद ये गुबार ख़तम हो  जायेगा | वो भी अपने बाप दादों के ख्वाबो को जी रहे थे | सियाराम का मंदिर  वीराना कैसे छोड़ के जाएँ | इस लोक में जितनी सेवा हो सकती थी उन्होंने&amp;nbsp;की,  पर बाप दादों और खुद का परलोक भी उन्हें सुधारना था |&amp;nbsp;किसी तरह से  जलजला&amp;nbsp;थमने&amp;nbsp;तक&amp;nbsp;किसी मुसलमान&amp;nbsp;दोस्त के&amp;nbsp;यहाँ रुके |&amp;nbsp;लोगो का, और मेरा भी यही  सोचना है कि वो दोस्त बेग साहब ही थे | पंडा जी&amp;nbsp;की एक बेटी  थी, आशा | आशा सचमुच&amp;nbsp;पंडा जी&amp;nbsp;की इकलौती आशा थी | माँ के मरने के बाद  आजादखयाल&amp;nbsp;लड़की&amp;nbsp;को&amp;nbsp;ख्वाब चुराने में&amp;nbsp;डर ही किसका था | सुहैल&amp;nbsp;से मुहब्बत कर  बैठी | बेग साहब का लड़का, सुहैल | बेग साहब इस&amp;nbsp;हरक़त से&amp;nbsp;कतई&amp;nbsp;खुश&amp;nbsp;न थे, लेकिन  हारकर&amp;nbsp;मंजूरी देनी पड़ी | मगर कुर्बानी तो पंडा जी ने दी थी, आशा को आयशा  मानकर | अब पंडा जी की अगली पीढ़ी का हिंदुस्तान से नाता ही टूट गया था | &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: 14px; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: 14px; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;पिछली  बार यही ख्वाब मैंने आयशा के नाजुक हाथों में दिए थे | ख्वाब देते वक़्त  चुपके से उसकी उँगलियों को छू कर मैंने एक छोटा सा  ख्वाब&amp;nbsp;अपनी&amp;nbsp;रूह&amp;nbsp;में&amp;nbsp;हमेशा के लिए जज़्ब कर दिया |&amp;nbsp;आँखों में बच्चों सी मस्ती,  लाहौल-बिला-कुवत कहती बूढी अम्मायें, और उस पर सुहैल का बार बार उसे देखकर  बलिहारी हो जाना, दिल में पहली बार रश्क उठा था किसी के नसीब से | सुहैल एक  होनहार नौजवान था | मियांजी के&amp;nbsp;छापेखाने&amp;nbsp;पर काम करता, बाप से अच्छी  तालीम&amp;nbsp;तो मिली ही&amp;nbsp;थी,&amp;nbsp;दो-चार&amp;nbsp;अखबारों के&amp;nbsp;लिए लिखता&amp;nbsp;भी था | रामेसर पंडा अभी  भी छुआछूत को मानते थे | बेटी जमाई&amp;nbsp;जब घर आते तो बेटी के गले लग के खूब  रोते, लेकिन उसके बाद स्नान-ध्यान कर के सियाराम से क्षमा-याचना  करते |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"लेकिन पंडा जी गए कहाँ ?" मैंने बेताबी से पूछा | दिल ही दिल में डर  रहा था कि कहीं मेरी बेताबी को सुलेमान ताड़ न जाये | लेकिन सुलेमान बीडी  फूंकता रहा, फिर धीरे से बोला, "जलजला फिर आया था | पिछली बार बेग साहब ने  हिम्मत दिखाई, इस बार सुहैल ने मुहब्बत का फ़र्ज़ अदा किया | जान गँवा दी,  लेकिन आयशा और रामेसर पंडा को दूर भेज दिया | जाने कहाँ ?"&amp;nbsp;सुलेमान भी उन्ही  लोगो में से था जिन्होंने इस&amp;nbsp;निकाह&amp;nbsp;की खिलाफत&amp;nbsp;की थी |&amp;nbsp;ताहिर&amp;nbsp;अली और माहिर  अली&amp;nbsp;ने&amp;nbsp;एक दिन&amp;nbsp;के वास्ते रंजिश भुला दी थी&amp;nbsp;होगी |&amp;nbsp;फ़य्याज़&amp;nbsp;सबसे आगे-आगे रहा  होगा |&amp;nbsp;सुलेमान&amp;nbsp;की आँखों में कहीं कोई ख्वाब नहीं था, बस वो नहीं देख पाया  था&amp;nbsp;तो मेरी आँखों&amp;nbsp;से&amp;nbsp;दो नन्हे&amp;nbsp;ख्वाब चूं पड़े | मेरा तो कोई मजहब नहीं  था,&amp;nbsp;मेरे बाप ने गाय खा कर हिन्दू धरम&amp;nbsp;से हमेशा के लिए नाता तोड़&amp;nbsp;लिया था,  लेकिन मुसलमान नहीं बना |&amp;nbsp;धरम नहीं रखूँगा, मैंने भी हमेशा बाप के ख्वाब ही  बेचे थे | &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: 14px; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: 14px; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;अल्लाह  भी गली गली जाके ख्वाब बेचता है |&amp;nbsp;"खालिश ख्वाब है साहब,&amp;nbsp;जन्नत से सीधे आप  ही के वास्ते उतार&amp;nbsp;के लाये हैं | देखो तो सही कैसा&amp;nbsp;है|&amp;nbsp;अरे&amp;nbsp;एक बार लेके तो  देखो |&amp;nbsp;अजी चार पैसे न मिलें पर&amp;nbsp;ख्वाब हमारे&amp;nbsp;पाक हाथों में जाएँ, इससे  ज्यादा और हमें क्या चाहिए |"&amp;nbsp;कुछ इंसान ख्वाब खरीद लेते है, मजहब उन ख्वाबो  को&amp;nbsp;खरीदने वाले को खा जाता है | क्या ये मजहब का&amp;nbsp;तकाज़ा&amp;nbsp;है |&amp;nbsp;वो लोग तो कह  भी नहीं पाते, "तुमने पिछली बार नकली ख्वाब, असली कह के हमें थमा&amp;nbsp;दिया था,  भाई जान!"&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-1161823015564043319?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/BATQ5x9qyaE" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-01-16T00:07:45.381+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://1.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGSHI4Y0AI/AAAAAAAAAIE/vvzp-TLjhnA/s72-c/vincent-van-gogh-paintings-from-arles-1.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2010/10/blog-post_25.html</feedburner:origLink></item><item><title>स्वाल (संदेसा)</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/pOj8Jst4MBY/blog-post.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sat, 15 Jan 2011 20:56:07 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-7148558398360749326</guid><description>&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGVeygPHeI/AAAAAAAAAII/GM8TeHBFZ8Y/s1600/Vincent-van-Gogh-View-of-Vessenots-Near-Auvers-Oil-Painting.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="330" src="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGVeygPHeI/AAAAAAAAAII/GM8TeHBFZ8Y/s400/Vincent-van-Gogh-View-of-Vessenots-Near-Auvers-Oil-Painting.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;अ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;बकी  बम्बई से कमल की चिट्ठीपत्री कुछ न आयी, तो रामचरण को थोड़ी चिंता हुई | कमल हर तीन मास में एक चिट्ठी तो लिखता, कम से कम | कहीं कुछ हो तो...न न, राम राम ये पापी प्राण भी हमेशा कुछ अपशकुनी ही सोचता है | वैसे भी पिछली चिट्ठी में उसने लिखा था कि यू पी, बिहार के पुरब्यों से है बम्बई वालों को परेशानी, हम पहाड़ियों से थोड़े ही | हमें तो जैसे ही सुनते हैं कि उत्तराखंड से है, तो खुश हो के पूछते हैं, वो रिशिकेस, हरिद्वार वाला ? कभी किसी ने पूछ लिया कि जाति क्या है, और हम बताते हैं सकलानी, ब्रह्मण हैं, गढ़वाली ब्रह्मण | पंडा जी कह कर पैर छूते हैं, आज भी | रामचरण भी बहुत खुश हुआ था चिट्ठी पढ़कर | बरसों पहले पिताजी गए थे परदेस, क्या जगह थी यार वो, काफी जजमानी थी वहां पे पिताजी की | आज  तक चिट्ठी भेजते हैं वो लोग | यादों पर काफी जोर डालने पर भी रामचरण को  जगह का नाम याद नहीं आया, अलबत्ता ये जरूर याद आ गया कि कमल ने चिट्ठी नहीं  भेजी | यहाँ बैठे रहने से तो कुछ होगा नहीं, भागवत के लड़के को पूछ  आते हैं | वो भी वहीँ था बम्बई में, आजकल छुट्टी आया हुआ है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
"रमेश!ऐ रमेश!!!" रामचरण ने आँगन से आवाज लगायी | भागवत आँगन में ही  था, 'भैजी प्रणाम' के एक छोटे से संबोधन के बाद मुंह फेरकर घाम तापने लगा | &lt;br /&gt;
"बडा प्रणाम!" रमेश ने भी द्वार तक आते आते उत्तर दिया "बडा! आओ, भीतर आ जाओ |"&lt;br /&gt;
रामचरण ने आगे कदम नहीं बढ़ाया, मन ही मन झुंझलाए भी |  ये रमेश हर बार क्यूँ भूल जाता है कि भागवत के साथ मेरी अनबन है | कभी समझता ही नहीं कि भागवत ने जुदा माँगा था | वहीं से बोले, "न बाबा, मैं तो ये पूछने को आया था कि कमल की चिट्ठी नहीं आयी | क्या बात हुई होगी ? ऐसा तो  कभी न करता था वो | मंगसीर में आई थी उसकी चिट्ठी | इधर होली आने वाली |" रामचरण ने बोल तो दिया लेकिन मन को अभी और खंगाल रहे थे कि कहीं शायद कुछ  था जो मैं घर से सोच के चला था कि पूछूँगा, यहाँ पे आते ही भूल गया |&lt;br /&gt;
"बडा! मैं तो दूसरे होटल में काम करता हूँ | फ़ोन फान भी नहीं किया क्या प्रधान चाचा के मोबाइल पे | करना तो चाहिए था, ऐसे ही किसी काम में उलझ गए होंगे भाईजी |" रमेश भी थोड़ा चिंतित हो गया, बोला, "बडा! तुम फिकर न करो, मैं दिन में जाता  हूँ लाटा मार्किट | वहां से मैं फ़ोन करता हूँ आसीस को, देवी चाचा का लड़का है मुंबई में, उसको पूछता हूँ |"  &lt;br /&gt;
रामचरण गदगद हो उठे, "हाँ बेटा, पूछ तो जरा |"&lt;br /&gt;
तभी रमेश की घरवाली ने रामचरण के पैरों की धूल माथे ली | "जीती रहो बहु, खूब खुश राख्य चौरंगी" रामचरण ने दुआ दी | रमेश की  घरवाली को देखकर उन्हें अपने कमल की बहू का स्मरण हो आया | सुनीता मायके गयी हुयी है, क्या पता वहां फ़ोन या चिट्ठी कुछ किया हो |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामचरण  घर आ गए, पर किसी काम में जी नहीं लगा | "ऐ कमल की माँ| जरा च्हा बना देना थोड़ी |" &lt;br /&gt;
जमुना च्हा बना के लाई, "क्या बोला रमेश ने ?  क्यूँ नी आरी बल कमल की चिट्ठी |"&lt;br /&gt;
रामचरण ने जमुना की तरफ देखा, "दिन में फ़ोन करेगा बल रमेश बम्बई |" &lt;br /&gt;
जमुना के सबर का बाँध टूट गया, "ब्वारी को भी एक महिना होने वाला है मैके में | वो भी भली, एक बार गयी तो दुबारा मुड के भी न देखी |" आवाज लगायी, "ऐ परकास! चल नास्ता करके इस्कूल के लिए तयार हो जा |" रामचरण शान्ति से घाम तापने के लिए बैठ  गए, पता था कि अब जमुना किसी के रोके रुकने वाली नहीं | &lt;br /&gt;
जमुना ने बैट ले जाते प्रकाश को रोका, "चल जल्दी इस्कूल के लिए तयार हो जा, नहीं तो इसी से कूट दूँगी |" &lt;br /&gt;
प्रकाश एक पल को सहम गया | लेकिन माँ के इस रूप को पहले भी देख चुका था, इसलिए एक चांस लेते हुए बोला, "माँ, आज ग्यार बजे है इस्कूल, उससे पहले हमारी किलास नहीं है |"&lt;br /&gt;
"ज्यादा जबान तो तू चला न, तेरा काल आया है शायद |" जमुना रौद्र हो गयी |  &lt;br /&gt;
"आँ... जब मैंने भी होटल में ही काम करना है तो बथेरा तो पढ़ लिया मैंने हायस्कूल तक | अब क्या मैंने प्रधान मंत्री..." चट्टाक ...आगे कुछ बोलने से पहले ही जमुना के तमाचे ने उसे खामोश कर दिया, "आज हेरोगिरी सूझ रही है बेटा, जब गाँव में इस्कूल खुल गया| कमल चार गदरा पार करके जाता था इस्कूल पढ़ने |"&lt;br /&gt;
बच्चों को वाक्य पूरा करने की भी जिद होती है, अपना लाल हुआ कान थामे प्रकाश बोल ही पड़ा, "हाँ तो कमल कौन सा प्रधान  मंत्री बन गया |" &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामचरण के चले जाने के बाद भागवत को घाम काफी अखरने लगा था | अन्दर आकर सुमनी से बोले, "घाम आज काफी चढ़चढ़ाया हुआ है |"&lt;br /&gt;
सुमनी समझदार थी, तुरंत ताड़ गयी, "जेठजी आज क्यूँ आये थे ?" &lt;br /&gt;
भागवत कुछ खिसियाकर बोले, "अरे वो कमल की चिट्ठी नहीं आई बल तीन मास से |"&lt;br /&gt;
सुमनी ने चौरंगी को सुमिरन कर हाथ जोड़ा, सर माथे लगाया, "हे भगवान्! हमारे बच्चों की रक्षा करे |" फिर भागवत से पूछा, "तुमने जेठजी को भीतर क्यूँ नी बुलाया ?" &lt;br /&gt;
भागवत सफाई देने लगे, "अरे रमेश ने बोला था, वो आये ही नहीं | &lt;br /&gt;
सुमनी ने अविश्वास से भागवत की तरफ देखा, कहना चाहती थी कि तुम बुलाते कि भैजी भीतर आ जाओ तो क्यूँ नी आते, मगर कहा नहीं | "क्यूँ नी भेजी मगर लड़के  ने चिट्ठी, अर फ़ोन ही करता कमस कम |" सुमनी ने जैसे खुद से कहा | किसी अनिष्ट की आशंका से उसकी आँख फडकने लगी, जल्दी से देवता के कमरे में जाकर रोने लगी, "हमारा लड़का सही सलामत हो, हे चौरंगी!" कुछ  सोचते हुए उसने अपने आंसू पोंछ दिए | रमेश को आवाज दी -"रमेश,ऐ रमेश!" &lt;br /&gt;
रमेश महाशय थोड़े आलसी प्रवृत्ति के हैं, जरा देर में जवाब दिया | "बेटा! जा जरा लाटा मार्किट से मिठाई ले आना, ब्वारी  के साथ तेरे को अपने ससुराल भी जाना होगा | अर वही से जरा फोन कर देना वो देवी के लड़के को, क्या नाम उसका ...आसीस" सुमनी ने अपनी साड़ी ठीक करते हुए  कहा | "माँ, मैं दिन में जाऊँगा | पर तुम कहाँ जा रही हो अभी ?" रमेश ने आँख मीचते हुए पूछा | "मेरे को जाने दे और तू अभी वो कर जो मैंने कहा, जा" सुमनी लगभग चीख उठी|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भागवत की घरवाली, सुमनी आई | रामचरण के पैरों की धूल माथे लेकर बोली, "जी, फ़ोन  नि आया कमल का, हमारा रमेश बता रहा था |" जमुना के पैर छूकर दीदी प्रणाम कहा, "क्या बात हुई होगी दीदी ?"&lt;br /&gt;
रामचरण कुछ नहीं बोले | औरतों की बातचीत में आखिर क्या बोले | रामचरण को सुमनी हमेशा दोनों भाइयों में जुदा का कारज लगती है | ये सुमनी की ही बनिक बुद्धि थी जिसने भागवत को उलटी सीधी पट्टी पढाई थी | रामचरण को आज भी याद आता है सुमनी का बोलना, "बड़े है, तो हम हमेशा आदर करेंगे, लेकिन हमारा हक क्यूँ छोड़ दें ?"  &lt;br /&gt;
रामचरण को अपना बचपन याद आ गया | 10 साल का था रामचरण, 5 साल की राजी और 2 साल का नन्हा भागवत, जब पिताजी भोपाल चले गए थे | अरे हाँ, याद आया, भोपाल थी वो जगह | दो साल बाद, सात साल की राजी को हैजा ने लील लिया | पिताजी भोपाल से नहीं आये | राजी को गदरा में बहाने के बाद कुछ रातें दोनों माँ बेटे ने आँखों में ही काटी थी | भागवत तो इतना छोटा था कि उसे पता ही नहीं कि उसकी दीदी कहाँ गयी | रामचरण को आज भी याद आती है राजी की | धीरे धीरे भागवत राजी की कमी पूरी करने लगा | रामचरण की हर ख़ुशी भागवत की ख़ुशी में ही होती थी | 17 साल का हो गया था रामचरण, तो पिताजी उसे लेकर भोपाल चले आये | यहाँ पर सभी लोग लोग उसे प्यार करते थे | उसे देखते ही पंडित जी का लड़का कहने लगते थे | पिताजी के काम में कुछ मदद भी करने लगा था | विष्णु सहस्रनाम और शिव स्त्रोतम का जाप सीख गया  था | कुछ कुछ जन्मपत्री भी लगाने लगा था, मगर फलादेश अभी भी पिताजी ही लिखते थे | कुछ ही दिनों में रामचरण उकता गया | गाँव के बिना उसका जी नहीं लगता था | छोटे भागवत की हमेशा याद आती, तो वापस चला आया | पिताजी अबकी बार भागवत को अपने साथ ले गए | भागवत का मन भी रमा और ऐसा रमा कि भागवत ने खूब सारी जजमानी भी ले ली | इस बीच 71 की लड़ाई छिड़ी तो रामचरण फौज में भर्ती हो गए | बाद में जब पिताजी भोपाल से आये तो स्वास्थ्य काफी बिगड़ गया था | भागवत ने गाँव में ही नया घर बना लिया | यहीं से सुमनी ने कलह के बीज बोने शुरू कर दिए | भागवत ने पिताजी की जमीन में भी हिस्सा माँगा, और जुदा हो गया | माँ ने मरते वक़्त भी वादा ले लिया कि कुछ भी हो जाये तू कभी भागवत को किसी भी चीज़ के लिए न नहीं कहेगा | "नहीं माँ, कभी न नहीं कहूँगा |" रामचरण के नयन सजल थे |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भागवत अँधेरे कमरे में बैठे थे | बत्ती जलाने की हिम्मत न पड़ती थी | पता नहीं भैजी के आते ही वो इतने असहाय क्यूँ हो जाते है | न उनसे सही से कुछ बात कर पाते हैं, न ही उसके बाद अपने मन में आये अपराधबोध को हटा पाते  है | आज भी उन्हें लगता है जैसे इस बंटवारे का दोष ज़बरदस्ती उन्ही के सर पे मढ़ दिया जाता है | गाँव उनकी तरफ ऐसे ही देखता है, जैसे उन्ही में ऐब रहे हों | अब तो सुमनी भी उन्हें ही कह रही थी कि जी को अन्दर क्यूँ  नहीं बुलाया | अरे, यही था तो क्यूँ माँगा था वो मंदिर के पास वाले खेत का हिस्सा | जब एक एक गहने अलग कर रही थी भाभी, तब भैजी ने उनको रोका क्यूँ नहीं | ये हंसुली मेरी, ये बुलाक तेरी, कर्णफूल में लूंगी | अब लो  कर्णफूल, ये सब तो रोज़ होगा ही | भैजी प्रणाम कहते हुए एक झलक देखा था उन्होंने रामचरण भैजी को | सुगर की दवाइयां चलती है भैजी की | अपने खलियान से नीचे आते आते तो थक जाते होंगे भैजी, भागवत ने पल भर को सोचा | कभी वो भी दिन था जब भैजी उसे पीठ पे बिठा के महासरताल मेला दिखाने ले गए थे | सुबह से शाम तक चलते रहे भैजी बिना रुके, बीच में उसे पूछते भी रहे कि भूख तो नहीं लगी | उसे याद आया जब उसने चूल्हे अलग करने की बात की थी, भैजी ने कहा था- "तेरे पैर पकड़ने है तो बोल, पर तू ऐसा मत कर भागवत | गाँव में कोई घर भी सुखी नी रह पाया जुदा होके |"&lt;br /&gt;
"जी, सुखी तो गाँव में अब कोई भी नी है | अपनी खेती बाड़ी भी कहाँ रही अब किसी की |"  भागवत के कुछ बोलने से पहले ही सुमनी बोल उठी|&lt;br /&gt;
भागवत ने किसी तरह बात संभाली थी- "न भैजी! खेती बाड़ी तो अपने बस की नी है, तभी तो अपने हिस्से के खेत ले के उसे बुवाई पे किसी को दूंगा |"&lt;br /&gt;
रामचरण बस एक गहरा उच्छ्वास लेके रह गए | गहने छांटते हुए भाभी ने ठिठोली की- "सासू जी, तुम भी कुछ ले लो |" माँ कुछ न बोली, गहनों की पोटली इस घर में सालों बाद खुली थी | इतने गहने होने के बावजूद माँ ने सारी जिंदगी गले में एक कांच के दानों की पतली सी माला पहनी थी | गहनों की पोटली को ध्यान से देखा, जाने क्या सोचकर दो कंगन उठाये, सीने से चिमटा के बोली- "ये मेरी राजी के हैं |" और वही पर होश खो बैठी |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगला दिन चढ़ आया था | रामचरण स्यूरा जाने को तैयार हुए ही थे कि भागवत नज़र आया , "भैजी! सिद्ध तुम्हारी |"&lt;br /&gt;
रामचरण बोले- "कुछ नहीं, कमल के ससुराल जा रहा हूँ कि कहीं वहां तो कोई चिट्ठी न आई | भागवत के अपनी चौखट पे आने पे रामचरण को थोड़ा आश्चर्य भी हुआ- "रमेश ने किया वहां फ़ोन ?"&lt;br /&gt;
भागवत ने कहा, "हाँ भैजी, बोल दिया उसने देवी के लड़के को, अर होटल में काम करता है न वो भी | तो आजकल में उसको बोल दिया कि पता कर आये कि कमल सकलानी किधर रहता है,कमस कम एड्रेस तो ले  ही आये |"&lt;br /&gt;
थोड़ी देर की झिझक के बाद अवरुद्ध गले को साफ़ करते हुए भागवत बोले, "भैजी मैं भी चलता हूँ तुम्हारे साथ |"&lt;br /&gt;
भिमा बैंड तक पैदल आते-आते रामचरण रस्ते में तीन बार बैठ गए | यहाँ से बस मिलनी थी स्यूरा के लिए |&lt;br /&gt;
"भैजी आजकल दवाई कहाँ से चल रही है तुम्हारी" भागवत ने पूछा |&lt;br /&gt;
"दवाई तो निर्मल हॉस्पिटल का डाकटर है एक, विक्रम अहलुवालिया कि विक्रम सलूजा |" रामचरण को नामों को गड्मड करने की आदत थी| &lt;br /&gt;
"अहलुवालिया होगा| अर वो इटारसी से रामचन्द्र तिवारी की चिट्ठी आई थी| आपकी खोज खबर पूछ रहे थे| उनके बेटे महेशचंद्र ने लिखी थी|" भागवत ने बात आगे बढ़ाई, तो रामचरण के आगे रामचंद्र तिवारी का चेहरा घूम गया|&lt;br /&gt;
"रामचंद्र वही जो लाल साफा पहनते थे हमेशा, सिन्दूर का ही टीका करते थे| हनुमान जी के परम भक्त थे |"&lt;br /&gt;
"हाँ वही वही, आजकल तबियत खराब है उनकी, आखिरी वक़्त है शायद, उम्र  भी हो ही गयी है | तो याद कर रहे थे कि कैसे तुमने उन्हें एक दिन शिव  पंचाक्षरी सिखाया था | उनके बाद के जीवन में ये बहुत काम आया | लिखा था कि  मन ही मन उन्होंने तुमको गुरु मान लिया था |"&lt;br /&gt;
रामचरण के होंठों पर हलकी सी मुस्कराहट आ गयी, जिसे वो भागवत से छिपा नहीं पाए| मन ही मन बुदबुदाये-  "गुरु!"&lt;br /&gt;
भागवत भी मुस्कुरा पड़ा- "हाँ, सही में, कई चीज़ों में तो मैं भी तुमको गुरु मानता हूँ | जैसे तुम भागते तो क्या भागते थे, जैसे गोली छूटती  हो | किसी के पकड़ में ही नहीं आते थे |"&lt;br /&gt;
रामचरण प्यार से बोले- "नहीं छोटे, तब तू मुझे इसलिए नहीं पकड़ पाता था, क्यूंकि तू छोटा था |"&lt;br /&gt;
भागवत ने नजरें झुका लीं- "आज भी कहाँ बड़ा हुआ हूँ भैजी |"&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्यूरा पहुँचने पर रामचरण ने एकदम से कुछ पूछ लेना उचित न समझा, इसलिए चुपचाप बैठ गए | स्यूरा वालों के समधी आये हुए थे, तो भागदौड़ शुरू होने लगी | जल्दी जल्दी बच्चों को दूकान पर भेजकर बिस्कुट नमकीन मंगाए गए | इधर दूसरी तरफ, घर के कुछ बुजुर्गो को ताश खेलने से लिवा लाने के लिए बच्चों की दौड़ आयोजित हुई | विजयी बच्चे को पुरस्कार स्वरुप कोफ़ी की टॉफी और दूसरे बच्चों की ईर्ष्या मिलनी थी | रामचरण बैठे बैठे बोर हो रहे थे तो समय बिताने के लिए उन्होंने पास ही में रखा अखबार उठा लिया | अखबार देखते ही उनके पैरों तले जमीन खिसक गयी, टाँगे भारी मालूम होने लगी, और सांस लेना तो जैसे भूल ही गए | मुख्य शीर्षक &lt;b&gt;'होटल ताज पर आतंकी हमला'&lt;/b&gt; बस इससे आगे  वो कुछ नहीं पढ़ पाए | आँखों के आगे अँधेरा छा गया, कल सुबह का अपशकुन फिर से कानों में सांय सांय करने लगा | कुछ नहीं कहा, किसी से कुछ नहीं पूछा | चुपचाप बुत की तरह वहां पर बैठे रहे | बहू ने चरणों की धूल माथे लगायी  लेकिन उसकी तरफ देखा तक नहीं | साल के सुधीर को बस देख कर घूरते रहे | मासूम सुधीर दादा की जेब चेक कर रहा था कि दादा उसके लिए कुछ लाये  होंगे | वो हर एक जेब चेक कर रहा था और गुस्सा होता जा रहा था, आखिर में  रो ही पड़ा |&lt;br /&gt;
किसी  तरह से बेसुध से घर आये | भागवत को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, आखिर भैजी ने वहां जाकर कुछ पूछा क्यूँ नहीं | घर आये तो रमेश, सुमनी भी चौके में ही  बैठे थे | जमुना एक कोने में रुआंसी हो रही थी | रामचरण ने एक नज़र जमुना की  तरफ देखा, जमुना ने कुछ डरते हुए एक कागज़ उनकी तरफ बढ़ा दिया | &lt;br /&gt;
&lt;i&gt; आदरणीय पिताजी अवं माताजी, &lt;br /&gt;
सर  झुका कर दंडवत प्रणाम, सर्वप्रथम शरीर स्वस्थ तदनंतर अन्य कारज होंगे  जी | मैं यहाँ पर आपकी कृपा से और चौरंगी देवता के आशीर्वाद से कुशल हूँ, और सदा आपकी कुशलता की कामना करता हूँ |&lt;br /&gt;
पिताजी, मैंने एक नए होटल में जॉब चेंज कर ली है | अब मैं होटल वसंत में आ गया  हूँ | मुझे पूरे पन्दरह हजार रूपये मिलते हैं | पिताजी मैं चाहता हूँ कि आपकी जमीन में जो मेरा हिस्सा हो वो आप बेच दें और उतने हिस्से के रूपये मुझे दे दे, फिर मैं सुनीता और सुधीर को भी यही मुंबई ले आऊंगा | मैं आपको पहले की तरह ही मनी औडर भेजता रहूँगा | &lt;br /&gt;
आपका आज्ञाकारी पुत्र,  &lt;br /&gt;
कमल सकलानी &lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
रामचरण  ने राहत की सांस ली | "कहाँ से आया ये पत्र" रामचरण ने पूछा|&lt;br /&gt;
"जी, मैं डाकघर गयी थी| वहां पता चला कि आजकल पिन कोड बदल रहे हैं, इसलिए चिट्ठियां भेजने में थोड़ा दिक्कत आ रही है" सुमनी बोली|&lt;br /&gt;
रामचरण ने सुमनी की  बुद्धिमता को मन ही मन सराहा| जमुना हैरान सी आई- "अब क्या करें, लड़के ने  तो बंटवारे की बात लिखी है| अर तब पता नहीं भेजता है मनी औडर कि नहीं|  क्या करना है अब ?"&lt;br /&gt;
"करना क्या है, शाम को परकास को स्यूरा भेज के बहू को  बोलना कि सामन वामन रेडी रखे और यहाँ आ जाये, कमल आके उसको ले जाएगा |"  रामचरण के आंसू छलकने को होने ही आये थे, "अर भागवत!"&lt;br /&gt;
बंटवारे की बात आते ही भागवत एक कोने में सर झुकाए गुनाहगार से खड़े हो गए, "जी!"&lt;br /&gt;
"उस जमीन की लिखत  पडत करा देना अच्छे से | जरा सही दाम मिल जाएँ तो कमल को घर खरीदने  में मुश्कल न होगी |" और रामचरण देवता के कमरे में जाकर चौरंगी की तस्वीर के आगे गिर गए|&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5236340117526932261-7148558398360749326?l=kaanv-kaanv.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/PublicationLtd/~4/pOj8Jst4MBY" height="1" width="1"/&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-01-16T10:26:07.080+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://3.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGVeygPHeI/AAAAAAAAAII/GM8TeHBFZ8Y/s72-c/Vincent-van-Gogh-View-of-Vessenots-Near-Auvers-Oil-Painting.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://kaanv-kaanv.blogspot.com/2010/10/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>No Greater Love</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/PublicationLtd/~3/7JRJPdm_IlQ/no-greater-love.html</link><category>कहानी</category><category>नीरज बसलियाल</category><author>noreply@blogger.com (Neeraj Basliyal)</author><pubDate>Sat, 15 Jan 2011 10:37:45 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-5236340117526932261.post-8310590749371762681</guid><description>&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGX22ziQ_I/AAAAAAAAAIM/IG8hXAKLZyg/s1600/vincent-van-gogh-9.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="322" src="http://4.bp.blogspot.com/_6kCAL8SmUug/TTGX22ziQ_I/AAAAAAAAAIM/IG8hXAKLZyg/s400/vincent-van-gogh-9.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: x-large;"&gt;वो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; मेरे सामने खड़ा था, सर झुकाए हुए, पेरिस का मशहूर गैंगस्टर, जोनाथन रिवेट उर्फ़ ली टिरेयर (दी शूटर) | "जोनाथन रिवेट, आप पर मुकदमा चलाया गया था, 12-06-1956, जगह ल्योन,&amp;nbsp; तीन पुलिसवालों की हत्या का&amp;nbsp;| आप दोषी साबित होते है | 3-12-1960, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका में वाशिंगटन नरसंहार जिसमे कि बेंजामिन डेमी, एंजेलो बेनिटो, गुस्ताव लोस्सेलिअनी और इतालियन माफिया फॅमिली हेड विनसेंजो अंतोनियो मारे गए थे, आप के इशारे पे हुआ था | आप दोषी पाए जाते हैं |" उसने एक नजर मेरी ओर देखा | मैं लगातार उसकी तरफ देखता रहा | "माइकल कार्लसन ने आपकी शिनाख्त जोनाथन रिवेट उर्फ़ ली टिरेयर उर्फ़ दी&amp;nbsp; शूटर के रूप में की है | इस अदालत को इस बात में कोई शक नहीं कि आप ही जोनाथन रिवेट हैं | आप पर लगे इलज़ाम सही पाए गए हैं | आप को फांसी की सजा सुनाई जाती है |" उसकी आँखों में कोई भाव प्रकट नहीं हुए | ये मेरे लिए कोई हैरानी की बात नहीं थी | अक्सर सुनवाई के दौरान मुजरिम पूरी तरह खामोश रहता है | उसके चेहरे पर दुःख, पश्चाताप, अवसाद के कोई चिन्ह नजर नहीं आते | "08-02-1963, पीपुल'स बैंक में लूट | दोषी पाए गए, बीस साल कैद की सजा | 11-05-1965, मार्सिली कैदखाने से चार पुलिसवालों की हत्या करके फरार | दोषी, 20 साल कैद |" हर सज़ा के साथ मेरी बेचैनी बढती जा रही थी, "आप एक जुर्मों की फेहरिश्त काफी लम्बी है | आप पर कोई भी रहमदिली करना गवर्नमेंट ऑफ़ फ्रेंच रिपब्लिक की कमजोरी होगी | साथ ही हमारी सुरक्षा से समझौता भी | आपको कहने का मौका दिया गया था, जिसमे आपने अपने ऊपर लगे सारे आरोपों को खारिज किया था, किन्तु आप दोषी पाए गए है | कई बार आपको सुधरने का मौका दिया गया था, किन्तु आप हर बार सुरक्षा घेरा तोड़कर भाग गए थे | इसलिए ये अदालत आपको सजा-ऐ-मौत का ऐलान करती है |" मेरी नम आँखों में उसके प्रति कोई हमदर्दी नहीं थी | "ये अदालत इस बात का भी ध्यान रखेगी कि अब जब आपके जुर्म साबित हो चुके है तो सजा भी आपको जल्द ही मिले, क्योंकि सजा में देर करना इन्साफ के खिलाफ होगा |" कोर्ट में तालियाँ गूँज उठी | इन लोगों को सिर्फ सज़ा से मतलब है, किसे क्यों मिल रही है ये जानने की कोई जहमत नहीं | 'आर्डर इन द कोर्ट' कहते हुए मैंने पेन एक तरफ रख दिया और न्यायलेखा को बन्द कर दिया, "जोनाथन रिवेट! आपको कुछ कहना है ?"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;1939, विले ग़ाइअ | वो&amp;nbsp;दूसरे&amp;nbsp;महायुद्ध के दिन थे | अफवाहें थी, कि जर्मन फौजों ने पेरिस पर कब्ज़ा कर लिया है और कुछ ही दिनों में फ्रांस पूरी तरह से जर्मन उपनिवेश बन जायेगा | जॉनी कहता था कि जर्मन को हम गाइअ में नहीं जीतने देंगे | वो कई तरह की रणनीति बनाने की भी बात करता था | हमारे घर के पास में दो बड़ी बड़ी चट्टानें थी, जिन्हें जॉनी हॉट गेट्स कहता था | जॉनी की योजना के मुताबिक वो जर्मन फौज को यहाँ पर रोकेगा | ग्रीक आर्मी ने&amp;nbsp; हॉट गेट्स के युद्ध में पर्शिया के लाखों की फौज का मुकाबला केवल कुछ हज़ार सैनिकों से किया था | मैं हमेशा कमजोर खिलाडी था इसलिए उसके बैटल ऑफ़ हॉट गेट्स मुझे ही नाज़ी बनना पड़ता था&amp;nbsp;| मैं हमेशा हार भी जाता था क्योंकि यही होना भी चाहिए था | रेडियो में एक दिन खबर आई कि युद्ध टल गया है क्योंकि चेकोस्लोवाकिया जर्मनी से हार गया है और उसने जर्मनी को सुदेतेंलैंड सौंप दिया है | हमारे स्कूल फिर से खुल गए थे | मुझे पढ़ने का बहुत शौक था इसलिए मुझे स्कूल जाना अच्छा लगता था, लेकिन जॉनी ने स्कूल जाना छोड़ दिया था | जॉनी के पिता के अचानक गायब होने के बाद उसकी माँ स्टेला को शराब में ही सुकून मिला | लोगो का यही मानना था कि स्टेला ने ही अपने पति की हत्या की है | जॉनी अक्सर मेरे घर पर ही रहने लगा था | उसकी ख़ामोशी धीरे धीरे उसके अन्दर एक अजीब सा गुस्सा भर गयी | जॉनी मेरा सबसे अच्छा दोस्त था, जिसे मैं उसके अपने ही गुस्से से हार रहा था | अगर उस वक़्त किसी ने मुझे संभाला था तो वो थी एलेनोर मेलविले, लेकिन जॉनी को कोई नहीं संभाल सका | विले &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;गाइअ में ये खबर गर्म थी कि जर्मनी ने फिर से फ्रांस पर हमला कर दिया है | &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;1945, जॉनी का कहीं कोई पता नहीं था | कुछ साल पहले उसका घर जल गया था, जिसमे स्टेला की मौत हो गयी थी | &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;उसके बाद से ही जॉनी ग़ाइअ छोड़ चुका था | &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;नयी कहानियों के अनुसार जॉनी ने ही स्टेला को जलाकर मार डाला है | मुझे पता था कि वो ऐसा नहीं कर सकता, लेकिन मैं किसी को कुछ नहीं समझा सकता था |&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt; उस शाम वो मेरे पास आया था, "हिटलर सारी दुनिया पे राज करेगा" उसने कहा था | लेकिन ऐसा नहीं हुआ | हिटलर का कहीं कोई पता नहीं चला था | अमेरिकंस ने उसे उसी के कैम्प्स में तडपा तडपा के मारा | कुछ कहते कि उसने ख़ुदकुशी कर ली | कुछ कहते कि वो अभी छुपा हुआ है और सही वक़्त आने पर दुनिया के सामने आएगा | इस बीच मैं वकालत पदने के लिए बोरेदोक्स चला गया | एल मुझे हर महीने ख़त लिखती रही | उसके खतों से पता चला कि जॉनी ग़ाइअ वापस आ गया है और वो माफिया बेनिटो शेरिफ्फ़ के गैंग में काम करने लगा था | जॉनी के बारे में सुनकर मुझे दुःख होता था, मैं कहीं से भी ये स्वीकार नहीं कर सकता था कि वो किसी की हत्या कर सकता है | इस बात की ख़ुशी थी कि वो अभी भी मेरे आसपास ही है | नाज़ी जर्मनी के अफसरों पर मुकदमा चला, जो हमारे लिए एक कोर्टरूम रिहर्सल थी | एक समर प्रोजेक्ट से ज्यादा उसकी अहमियत थी भी नहीं | 45 अफसरों को उम्र कैद की सजा सुनाई गयी, ऐसे जैसे बच्चों के झुण्ड को टॉफी बांटी जाती है | उनका सिर्फ एक ही वजूद था कि वो नाज़ी जर्मनी के अफसर थे| सजा सुनाने के बाद जज ने कहा "&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;न्याय में देर करना, न्याय नहीं करना है |"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;1950, एल और मैं एक दूसरे के लिए समर्पित थे | एक शाम हम हाथ थाम कर डौन गिओवानी के विओलिन कंसर्ट से आ रहे थे | तभी मैंने देखा कि लेन के आखिरी छोर पर एक साया खड़ा है, उसके हाथ में रिवोल्वर देख कर हम ठिठक गए | वो हमारे करीब आया, लैम्पपोस्ट की हलकी सी रौशनी उसके चेहरे पर पड़ी | इस चेहरे को मैं पहले से पहचानता था, अचानक एल मेरे सामने आ गयी, "प्लीज़, नो! नो!" एल की चिंता मैं समझ सकता था, वो मेरे लिए चिंतित थी ...लेकिन ...लेकिन एल नहीं पहचान सकी थी उसे शायद | उफ़, कितना खतरनाक हो गया था वो | दांयी आँख के नीचे गहरा जख्म का निशान अब सिर्फ क्रूरता ही प्रदर्शित कर रहा था | उसने एक नजर मुझे देखा, फिर एल को, फिर किसी उहापोह में वो थोडा आगे आया | अचानक मुड़कर एक दिशा में अँधेरे में घुल गया | एल की आँखों में अब भी डर समाया था | उसे सहारा देकर मैं धीरे धीरे चलने लगा | आज, अचानक इतने सालों बाद, मगर क्यों ... मेरा दिमाग सवालों का जवाब नहीं ढूंढ पा रहा था | क्या वो मुझसे मिलने आया था ... क्या वो मुझे मारने आया था ... वो क्यों आया था | कुछ देर बाद मैंने दो पुलिसवालों को भी उसी दिशा में भागते हुए देखा | &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;1952, एल मेरी दुनिया में ख़ुशी बनकर आई | मैं, एल और हमारी बेटी एन, हर तरह से हँसता खेलता परिवार | एल ने मुझे सहारा दिया, जिसकी मुझे हमेशा से बहुत जरूरत थी | एल का हौसला, उसकी साफगोई, जिंदगी को लेकर सीधा द्रष्टिकोण, समस्याओं का सीधा समाधान खोजने की क्षमता ने मुझे कभी भी टूटने नहीं दिया | वक़्त गुजरता गया, और एल मेरे अपने अस्तित्व के लिए जरूरी होती गयी | इस बीच जॉनी के बारे में खबरे आती रहती थी | वो ल्योन छोड़ चुका था, शायद हर शहर जहाँ उसके होने का जरा भी शक होता वो छोड़ चुका था | कुछ कुछ महीनो में वारदातों की खबर आने पर पता चलता कि जॉनी उस शहर में था |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"पापा, हिटलर क्या सचमुच बहुत बुरा आदमी था ?" दस साल की एन ने मुझसे पूछा |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"तुम्हें ये सब किसने बताया ?" मैं हैरान था |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"आपकी पुस्तक '&lt;b&gt;अ डेविल'स मोकिंग&lt;/b&gt;' में मैंने पढ़ा |"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"हाँ माय लव! बहुत बुरा था | लेकिन तुम मेरी ये सब पुस्तक क्यों पढ़ती हो |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"ऐसे ही ... आपके समय में तो दुनिया बहुत खतरनाक रही होगी न ?"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"एन! दुनिया हर दौर में ऐसी ही रहती है | बुराई और अच्छाई का संघर्ष हमेशा ही रहता है |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;1965, मेरी कांच की दुनिया का एक कोना दरक चुका था | मैं अभी भी उसी जगह पर था, पार्क में उसी बेंच पर, जहाँ एल मेरी कमीज़ पर फूल पतियाँ बनाने का शौक पूरा करती थी |&amp;nbsp; पत्तों की सरसराहट के साथ मैं जागा | मेरे गालों को एल ने छुआ शायद, मैंने झटके से उसका हाथ हटा दिया | वो पत्ता जमीन पर गिर गया | एल कहीं नहीं थी | आखिरी वक़्त में उसने मुझसे कहा - "जॉनी और मैं एक दूसरे को चाहते थे | लेकिन अपनी ही माँ का क़त्ल किया था उसने | उसके बाद उसने गाइअ छोड़ दिया और मैंने उसका इंतज़ार..." सांस टूटने लगी थी, "&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;मुझे लगा था कि मुझे शायद अपने निर्णय का पछतावा होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ ... तुम एक अच्छे पति ही नहीं, मेरे एक अच्छे दोस्त भी साबित हुए | मुझपर इतना विश्वास करने के लिए तुम्हारा शुक्रिया | मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;मेरी आँखें नम हो चली थी | हवा काफी तेज़ चलने लगी | खिड़की खुली, और एल डायरी के पन्नो की तरह मेरे वजूद में बिखर कर रह गयी | अब वहां पर सिर्फ एक ठंडा अहसास था | जिंदगी में पहली बार मुझे खुद से शिकायत हुई थी , एल मेरा हिस्सा थी |&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;1975, कोर्टरूम में जॉनी सर झुकाए हुए सारे फैसले सुन रहा था | "जोनाथन रिवेट! क्या आपको कुछ कहना है ?" मैंने पानी का एक घूँट भरा | "मुझे&amp;nbsp;एलेनोर&amp;nbsp;मेलविले से मिलना है | क्या मुझे इजाज़त है ?" जॉनी ने धीमे स्वर में कहा | "इजाज़त है |" मैंने कोर्ट की कार्यवाही स्थगित कर दी | आज जॉनी मेरे घर पर आया है | मेरे घर के आसपास की सुरक्षा बढ़ा दी गयी है | जॉनी पहले भी कई बार भागने के प्रयास कर चुका है |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"ये हमारी बेटी एन है |" मैंने एन को जॉनी से मिलाया |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"हाई एन! क्या आप मुझे जानती है ?" जॉनी ने पूछा |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;एन के चेहरे पर असमंजस के भाव थे, अजनबी लोगों से मिलना एल को बिलकुल&amp;nbsp;पसंद नहीं है&amp;nbsp;|&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"एन एक क्राइम रिपोर्टर बनना चाहती है |" मैंने कहा |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;जॉनी मुस्कुराया, "तब तो मुझे जरूर जानती होंगी |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"एन! ये मेरे और तुम्हारी माँ के बचपन के दोस्त जोनाथन रिवेट हैं |" मैंने एन का परिचय जॉनी से करवाया |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"ली टिरेयर !" एन ने मुस्कुराकर कहा | "माँ ने एक-दो बार कहा था आपके बारे में |"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"तुम्हारा चेहरा बिलकुल एल पर गया है, लेकिन थोड़ी देर पहले का&amp;nbsp;गुस्से भरा चेहरा अपने पापा पर |" जॉनी ने कहा और एन हँस पड़ी | एल मेरी आँखों के सामने आ गयी और नजरें कब पिघलकर पलकों से लड़ने लगी , पता ही नहीं चला | आँख बन्द कर मैंने एल को बह जाने दिया |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"शाम को यहाँ हवा काफी तेज़ हो जाती है |" मैंने &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;जॉनी को अपना कोट दिया | &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;हम दोनों साथ साथ चलने लगे | ठंडी हवाएं चलने लगी थी, हम पार्क में ही उस बेंच पर बैठ गए जहाँ ... "तुम और एले यहाँ बैठते हो ?" जॉनी ने पूछा |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;"अब नहीं" मैंने छोटा सा जवाब दिया |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: black; font-family: 'Courier New',Courier,monospace; font-size: 14px; line-height: 1.8; text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;"मुझे पता है कि तुम अपनी माँ की मौत के लिए जिम्मेदार नहीं हो |" वक़्त ये सवाल काफी पीछे छोड़ चुका था, लेकिन फिर भी ये पूछना मुझे जरूरी लगा | "मेरी माँ बहुत हिम्मती और बहादुर औरत थी |" जॉनी की आँखें क्षितिज के पार देख रही थी | "तुम जानते हो कि मेरे पिता अचानक गायब हो गए थे | बेंजामिन रिवेट, एक किसान ... किसी की क्या दुश्मनी हो सकती थी उनसे ?&amp;nbsp; डौन अल्ताबेलो का विरोध करते&amp;nbsp; हुए उन्हें अपनी जान गवानी पड़ी थी | यहाँ बन्दूक की नली रखी थी उनके |" जॉनी ने अपनी आँखों की तरफ इशारा किया | "और एक झटके में आँखे सर को फाड़कर बाहर आ गयी थी | ये सब हुआ था, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;ग़ाइअ शहर के क़ानून-रक्षक के सामने ... तुम्हारे पिता के सामने &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;|" उसने मेरी तरफ देखा | मेरे जबड़े भिंच गए थे | "गाइअ ने मेरी माँ के बारे में वो सब कुछ कहा जो वो कह सकते थे | वो बेचारी सब कुछ सहती रही | हर रोज़ डौन हमारे घर आता था , और मैं माँ को बेबस देखता था | सिर्फ मेरी खातिर , डौन की इच्छाओं को पूरा करना उसकी मजबूरी बन गयी थी | डौन ने धमकी दी थी कि वो मुझे भी वैसे ही मार डालेगा जैसे मेरे पिता को |"&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;सूरज डूब रहा था | नीला आसमान सांझ के हलके पीली रौशनी में और भी अकेला लगने लगा था | "तो क्या डोंन ने स्टेला को मारा ?" मेरा सवाल मेरे हलक में कांटे सा चुभता रहा | "एक रात जब डौन नशे में धुत्त माँ के साथ था, तो माँ ने घर को आग लगा दी | &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;उस शाम मैंने गाइअ छोड़ दिया | हॉट गेट्स से मैंने एक बार मुड़कर देखा था, माँ का बदला पूरा हो गया था |"&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&amp;nbsp;जॉनी ये सब कुछ इस सहजता से कह गया जैसे कुछ हुआ ही न हो |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size:
