<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><rss xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" version="2.0"><channel><title>*साधना*</title><description>MAN KEE SHAANTI KAA RAASTAA/ 
      मन की शांती का रास्ता</description><managingEditor>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</managingEditor><pubDate>Thu, 18 Sep 2025 13:00:31 +0530</pubDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">194</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">25</openSearch:itemsPerPage><link>http://aphmkj.blogspot.com/</link><language>en-us</language><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:summary>MAN KEE SHAANTI KAA RAASTAA/ मन की शांती का रास्ता</itunes:summary><itunes:subtitle>MAN KEE SHAANTI KAA RAASTAA/ मन की शांती का रास्ता</itunes:subtitle><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email></itunes:owner><item><title>कबीर के श्लोक - १२१</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/12/blog-post_20.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>दोहे</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Thu, 20 Dec 2012 05:52:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-1296303897732914961</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;ढूंढ्त डोलहि अंध गति , अरु चीनत नाही संत॥&lt;br /&gt;
कहि नामा किऊ पाईऐ , खिनु भगतहु भगवंतु॥२४१॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि नामदेव जी कहते हैं -जीव खोज खोज कर परेशान हो जाता है,लेकिन संत पुरुष पहचान में नही आता।भगवान की भक्ति करने वाला जीव फिर कैसे पहचाने भगवान के भक्त को ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी नामदेव जी के विचारों को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि भक्ति करने वालों की संगति के बिना परमात्मा नही मिल सकता।जो जीव प्रभु की भक्ति तो करते हैं लेकिन भगत जनों को पहचान नही पाते,वे भटकते रह जाते हैं।अर्थात वे कहना चाहते हैं कि परमात्मा का भक्त परमात्मा के भक्त को पहचान लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;हरि से हीरा छाडि कै , करहि आन की आस॥&lt;br /&gt;
ते नर दोजक जाहिगे , सति भाखै रविदास॥२४२॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी रविदास जी के विचारों को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि परमात्मा को छोड़ कर किसी दूसरे से सुख पाने की आशा करनी ठीक ऐसा ही जैसे नरक में सुख पाने की आशा करना।ऐसी आशा करने वाले सदा दुखी ही रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि किसी भी दुनियावी पदार्थ से सुख प्राप्त नही हो सकता।यदि किसी को सुख पानें की इच्छा है तो उसे उस परमात्मा की शरण मे ही जाना पड़ेगा।यदि जीव अन्य जगह सुख पाने की चाह में जायेगा तो अंतत: उसे दुख ही प्राप्त होगा।कबीर जी अपने इसी अनुभव को रविदास जी के शब्दो की मदद से हमे समझाना चाहते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">11</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १२०</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/12/blog-post.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Mon, 10 Dec 2012 05:50:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-6646555528247770733</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर जऊ तुहि साध पिरंम की , सीसु काटि करि गोइ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;खेलत खेलत हाल करि, जोकिछु होइ त होइ॥२३९॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि यदि तुझे परमात्मा पाने की अभिलाषा है तो अपना सिर काट कर गेंद बना ले और खेलता खेलता इतना मस्त हो जा, कि कुछ होता हो होने दे।उसकी जरा भी परवाह मत कर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि परमात्मा को तभी पाया जा सकता है जब सिर काट कर गेंद बना ली जाये अर्थात अपना अंहकार छोड़ दिया जाये।फिर अंहकार रहित हो कर अपने सभी काम करे अर्थात दुनियादारी को निभाये और दुनियादारी निभाते समय इस बात की जरा भी परवाह ना करें की कोई उसके साथ कैसा सलूक कर रहा है।तभी उस परमात्मा को पाया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर जऊ तुहि साध पिरंम की, पाके सेती खेलु॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;काची सरसऊं पेलि कै, ना खलि भई न तेलु॥२४०॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी आगे कहते हैं कि यदि तुझे परमात्मा पाने की चाह है तो उसके साथ खेल जो पक चुका है।क्योकि कच्ची सरसों को कोल्हू में पेलने से ना तो तेल निकलता है और ना ही उसकी खल बनती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि यदि परमात्मा पानें की अभिलाषा है तो ऐसे सतगुरु की शरण मे जाओ जो उसे पा चुका हो। क्योकि जिसने स्वयं ही ना पाया हो वह तुम्हारा गुरु बन कर तुम्हें कोई लाभ नही दे सकता।कबीर जी ये बात इस लिये कह रहे हैं कि जीव का स्वभाव होता है कि वह मशहूर गुरु के प्रति और दिखावा करने वाले के प्रति बहुत जल्दी आकर्षित हो जाता है या कर्म कांडी ब्राह्मण को ही गुरु मान लेता है।ऐसा करने कि बजाय ऐसे गुरु को चुनना चाहिए जो उस परमात्मा को पा चुका हो।भले ही वो देखने मे वह आम आदमी ही क्यो ना लगता हो।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ११९</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/11/blog-post_30.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>दोहे</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Fri, 30 Nov 2012 05:42:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-771746704502542717</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर बामनु गुरु है भगत का,भगतन का गुरु नाहि॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;अरझि उरझि कै पचि मूआ, चारऊ बेदहु माहि॥२३७॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि ब्राह्मण उन लोगो का गुरू है जो उसके कहे अनुसार कर्म-कांडों को करने में लगे रहते हैं अर्थात वह दुनियादारों का ही गुरु कहलाया जा सकता है। ऐसा ब्राह्मण भक्ति करने वालों का वह गुरु नही बन सकता।क्योकि ऐसा ब्राह्मण तो स्वयं ही यज्ञ आदि कर्म कांडो में और बेदों को रटने में ही जीवन -भर उलझा रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि ऐसा ब्राह्मण जो स्वयं ही कर्म-कांडो मे उलझा रहता है और परमात्मा की भक्ति नही करता। यदि उसने अपने भीतर बसे परमात्मा को ही नही जाना तो वह दूसरों को उस से कैसे जोड़ सकता है।मात्र वेदों के उपदेशों को रटने से कोई गुरु नही बन सकता। यही बात कबीर जी हमे समझाना चाहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;हरि है खांडु, रेतु महि बिखरी,हाथी चुनी न जाइ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कहि कबीर गुरि भली बुझाई,कीटी होइ कै खाइ॥२३८॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि ऐसा मानो की परमात्मा का नाम खांड अर्थात चीनी है और वह रेत में बिखरी हुई है।इस चीनी को हाथी कभी नही चुन सकता।लेकिन यदि हमारा कोई सतगुरु है तो वह हमे रास्ता सुझा सकता है कि यदि तुझे ये चीनी चुन के खानी है तो तुझे हाथी की बजाय चीटी होना होगा, तभी तू इसे चुन सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि कर्म-कांडो और मात्र वेदों को रटने से किसी का विवेक नही जाग सकता। ऐसा ब्राह्मण मात्र वेदों का सहारा लेकर ही अपनी बात तुम्हें कहता है,इस लिये समानुसार आने वाली समस्याओ का समाधान वह नही कर सकता।क्योकि सतगुरु जानता है कि हाथी जैसे बड़ा होने से अर्थात अपने को बड़ा मान कर,वह हरि रूप चीनी नही चुन सकता। लेकिन यदि वह चींटी अर्थात नम्रता अपने भीतर पैदा कर ले तो उस परमात्मा को पा सकता है।कबीर जी कहना चाहते हैं कि&amp;nbsp; अंहकार रहित होने पर ही ,परमात्मा को पाया जा सकता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ११८</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/11/blog-post_20.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>दोहे</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Tue, 20 Nov 2012 05:46:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-6597625553404965042</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;आठ जाम चऊसठि घरी,तुअ निरखत रहै जीउ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;नीचे लोइन किउ करऊ,सभ घट देखऊ पीउ॥२३५॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि जो जीव आठ पहर चौंसठ घड़ी सिर्फ तुझे ही देखते रहते हैं,उनकी नजरे नीची हो जाती हैं अर्थात उनमे नम्रता आ जाती है।जिस कारण वे सभी में अपने प्रिय को ही देखते रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि जो जीव निरन्तर उस परमात्मा के ध्यान में ही लगा रहता है, उसे हर जगह परमात्मा ही नजर आता है और उसका अंहाकार भी तिरोहित हो जाता है।अंहकार के मिटने के कारण जीव सभी मे अपने प्रिय अर्थात उस परमात्मा को ही निहारते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;सुनु सखी पीअ महि जीउ बसै,जीअ महि बसै कि पीउ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;जीउ पीउ बूझऊ नही,घट महि जीउ कि पीउ॥२३६॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी आगे कहते हैं कि हे सहेली मैं प्रभु पति मे बस रही हूँ या प्रभु मुझ मे बस गया है। ये बात समझ मे ही नही आती कि कौन किस में बसा है, परमात्मा जीव मे बसा हुआ है या जीव परमात्मा मे बसा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि सृष्टी की रचना परमात्मा ने ऐसे कि हुई है कि वह भी उसी में समाया हुआ हैं ।इस लिये उसे जानने के बाद ये बात कभी समझ ही नही आती कि परमात्मा जीव में समाया हुआ है या जीव परमात्मा मे समाया हुआ है।यही बात कबीर जी कहना चाहते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ११७</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/11/blog-post.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>दोहे</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Sat, 10 Nov 2012 05:39:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-3022191587240078334</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;आठ जाम चऊसठि घरी,तुअ निरखत रहै जीउ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;नीचे लोइन किउ करऊ,सभ घट देखऊ पीउ॥२३५॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि जो जीव आठ पहर चौंसठ घड़ी सिर्फ तुझे ही देखते रहते हैं,उनकी नजरे नीची हो जाती हैं अर्थात उनमे नम्रता आ जाती है।जिस कारण वे सभी में अपने प्रिय को ही देखते रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि जो जीव निरन्तर उस परमात्मा के ध्यान में ही लगा रहता है, उसे हर जगह परमात्मा ही नजर आता है और उसका अंहाकार भी तिरोहित हो जाता है।अंहकार के मिटने के कारण जीव सभी मे अपने प्रिय अर्थात उस परमात्मा को ही निहारते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;सुनु सखी पीअ महि जीउ बसै,जीअ महि बसै कि पीउ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;जीउ पीउ बूझऊ नही,घट महि जीउ कि पीउ॥२३६॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी आगे कहते हैं कि हे सहेली मैं प्रभु पति मे बस रही हूँ या प्रभु मुझ मे बस गया है। ये बात समझ मे ही नही आती कि कौन किस में बसा है, परमात्मा जीव मे बसा हुआ है या जीव परमात्मा मे बसा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि सृष्टी की रचना परमात्मा ने ऐसे कि हुई है कि वह भी उसी में समाया हुआ हैं ।इस लिये उसे जानने के बाद ये बात कभी समझ ही नही आती कि परमात्मा जीव में समाया हुआ है या जीव परमात्मा मे समाया हुआ है।यही बात कबीर जी कहना चाहते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ११६</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/10/blog-post_30.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>दोहे</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Tue, 30 Oct 2012 05:36:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-6977659715291645863</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर साधू संग परापती,लिखिआ होइ लिलाट॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;मुकति पदारथु पाईऐ,ठाक न अवघट घाट॥२३१॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि साधू का संग उन्हें प्राप्त होता है जिनके भाग्य में लिखा होता है अर्थात बिना परमात्मा की इच्छा के कुछ नही मिलता।साधू की संगति के कारण ही जीव संसारिक झंझटों से छूटता है और उसके रास्ते में कोई रूकावट नही आती और वह मुश्किल पहाड़ी रास्तो को आसानी से पार कर लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि&amp;nbsp; साधू के&amp;nbsp; संग से ही प्राप्ती होती है।क्योकि जो साधक उस परमानंद को प्राप्त कर चुका है वही जीव को रास्ता दिखा सकता है।लेकिन साधू भी तभी मिलता है जब परमात्मा की कृपा होती है।कबीर जी कहना चाहते हैं कि जब तक हम अपनी मर्जी चलाते रहते हैं तब तक कुछ नही होता ।विषय -विकारों से मुक्ति भी तभी मिलती है जब साधू का साथ मिल जाता है,फिर कठिन&amp;nbsp; रास्ते भी आसान हो जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर एक घड़ी आधी घरी,आधी हूँ ते आध॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;भगतन सेती गोसटे,जो कीने सो लाभ॥२३२॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहते हैं कि एक घड़ी -भर के लिये या आधी से भी आधी घड़ी के लिये भी परमात्मा के भक्त के साथ परमात्मा के संबध में कोई बात-चीत की जाती है तो उससे भी बहुत लाभ होता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि जब जीव उन साधको से परमात्मा के संबध मे वार्तालाप करता है जो उस परमात्मा को जान चुके हैं,तो कम से कम समय मे भी अधिक लाभ पाया जा सकता है।क्योकि भक्त जो भी कहता है वह उस परमात्मा को जानने के अनुभव के आधार पर ही कहता है।जिस के द्वारा जीव का सही मार्गदर्शन होता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ११५</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/10/blog-post_20.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><category>श्लोक</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Sat, 20 Oct 2012 05:34:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-8407710924994945742</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर ऐसा बीजु बोइ,बारह मास फलंत॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;शीतल छाइआ गहिर फल,पंखी केल करंत॥२२९॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं&amp;nbsp; कि यदि बीज बौना है तो ऐसा बीज बोवो जिस से उगने वाला वृक्ष जो पूरे बारह महीने फल देता रहे और जिससे ठंडी छाँव व वैराग्य पैदा करना वाला फल प्राप्त हो। जिसपर पंछी आनंद पूर्वक रह सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि परमात्मा का नाम ही एक ऐसा बीज है जो सदा सुख व आनंद प्रदान करने वाला है।जिस को अपने ह्र्दय मे बसा पर शीतलता व अडोलता को पाया जा सकता है। जिसके ह्र्दय में यह नाम रूपी बीज बस जाता है फिर वह जो भी काम करता है उसे आनंद ही प्राप्त होता है,क्योकि परमात्मा के साथ एकाकार होने के बाद जीव जो भी कर्म करता है उसमे परमात्मा की मर्जी भी शामिल होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर दाता तरवरु दया फलु,उपकारी जीवंत॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;पंखी चले दिसावरी,बिरखा सुफल फलंत॥२३०॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहते हैं कि परमात्मा का भक्त एक ऐसा वृक्ष है जिस में सदा दया रूपी फल ही लगता है।ऐसे भक्त सदा दूसरों की भलाई में ही जीवन-भर लगे रहते है।परमात्मा के भक्तों का लक्ष्य ही उपकार करना है।लेकिन संसारी जीव सदा संसारिक धँधों मे ही लगा रहता है और परमात्मा का भक्त सदा यही सीख देता रहता है कि उस घट घट वासी परमात्मा से प्रेम करो जिस से ह्र्दय में दया का निवास हो सके।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि जो साधक परमात्मा के साथ एकाकार हो चुके हैं वे दूसरों के प्रति सदा दया ही दिखाते है और सदा ऐसी कोशिश करते रहते हैं कि सभी उस घट घट वासी परमात्मा की शरण मे जायें। जिस से उनके भीतर दया और प्रेम पैदा हो सके।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ११४</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/10/blog-post.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Wed, 10 Oct 2012 05:31:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-6105407622447010506</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर आखी केरे माटुके, पलु पलु गई बिहाइ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;मनु जंजाल न छोडई, जम दीआ दमामा आइ॥२२७॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि जीव पलक झपकने जितनी देर भी उस परमात्मा को याद नही करता और इसी तरह उसका जीवन बीत जाता है और वह संसारिक मोह माया में ही रमा रहता है। उसे होश तब आता है जब यमराज आ कर उसे मौत की खबर देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि हम संसारिक कामों मे इतना रम जाते है कि हमें उस परमात्मा का कभी ध्यान ही नही आता।हम इन्ही जंजालो मे उलझे रहते हैं और हमारि मृत्यू का समय आ जाता है।कबीर जी यहाँ हमे होश में जीने का संकेत देना चाहते&amp;nbsp; हैं ताकि जीव जीवन का सदुपयोग कर सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर तरवर रूपी रामु है , फल रूपी वैराग॥&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;छाइआ रूपी साधु है, जिन तजिआ बा्दु बिबादु ॥२२८॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी आगे कहते हैं कि हम संसारिक मोह माया में ही ना रमे रहे और यह जान ले कि राम का नाम एक वृक्ष के समान गुणकारी है जिस पर वैराग रूपी फल लगता है और इस वृक्ष की छाया साधु रूपी है जिस के कारण हम संसारिक वाद-विवादों की उलझनों से निजात पा जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि संसारिक मोह माया को तोड़ने के लिये परमात्मा का आसरा लेना चाहिए। जिसका नाम का ध्यान करने से हमारे भीतर वैराग का जन्म होता है और जीव का मन साधु के स्वाभाव की तरह हो जाता है जो कभी भी व्यर्थ की बातों मे नही उलझता।अर्थात कबीर जी यहाँ हमारी मोह निद्रा को तोड़ने का रास्ता सुझा रहे हैं।ताकि हम सही रास्ते पर चल सके।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ११३</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/09/blog-post_30.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Sun, 30 Sep 2012 05:27:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-6829961954719802324</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर राम रतन मुखु कोथरी,पारख आगै खेलि॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;  &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कोई आइ मिलेगो गाहकी,लेगो महगो मोल॥२२५॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि राम का नाम एक बहुत कीमती रत्न है जिसे मुँह रूपी गठरी  में बहुत संभाल कर रखना चाहिए और इसे सिर्फ उसी के सामने खोलना चाहिए जो  इस राम नाम रत्न की पहचान रखता है। कबीर जी आगे कहते हैं कि जब इस राम रत्न  को पहचानने वाला कोई ग्राहक मिल जाता है तो वह इस रत्न के लिये कोई भी  कीमत देने को तैयार हो जाएगा।&lt;/span&gt; &lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि परमात्मा का नाम दुनिया में सब से कीमती है इसे  कभी भूलना नही चाहिए।जब भी इस नाम की महिमा का बखान करना हो तो ऐसे लोगों  के सामने करो जो राम नाम के प्रति श्रदा का भाव रखते हो ।ऐसे श्रदावान  साधकों मे से ही कोई ऐसा साधक जरूर मिल सकता है जो परमात्मा की भक्ति की  खातिर सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाए।अर्थात अपना मन गुरु को  समर्पित करके नाम रत्न को ग्रहण कर ले।&lt;/span&gt; &lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;&lt;br /&gt;
कबीर राम नामु जानिउ नही, पालिउ कटकु कुटंबु॥&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;धंधे ही महि मरि गईउ,बाहरि भई न बंब॥२२६॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी आगे कहते हैं कि जो लोग उस राम के नाम की महिमा को नही जानते और  अपने कुटुंब के लिये संसारिक सुख साधनों को इकट्ठा करने मे ही लगे रहते  हैं।ऐसे लोग परमात्मा को भूल कर इन्हीं कामों मे लगे लगे मर जाते हैं  अर्थात उनकी आध्यात्मिक मौत हो जाती है और वह कभी परमात्मा का नाम अपने  मुँह से उच्चारित ही नही करते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि अधिकतर लोग परमात्मा की भक्ति कि जगह सदा अपने  परिवार के लिये सुखसाधन जुटाने में ही लगे रहते हैं और संसारिक मोह माया  में इस कदर डूब जाते हैं कि उन्हे यह होश ही नही रहता कि जिसकी कृपा द्वारा  यह सब संसारिक सुखो का आनंद ले रहा है उसे कभी याद करे। जबकि ये संसारिक  सुख तो अस्थाई हैं। वह उसका नाम कभी लेता ही नही जो स्थाई सुख देने वाला  है।इसी संसारिक मोह माया में उलझे रहने के कारण जीव की आध्यात्मिक मौत हो  जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ११२</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/09/blog-post_20.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Thu, 20 Sep 2012 17:04:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-5844403033421225442</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर केसो केसो कूकीऐ, न सोईऐ असार॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;राति दिवस के कूकने,कबहू को सुनै पुकार॥२२३॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि उस परमात्मा केशव को सदा पुकारते रहना चाहिए और कभी लापरवाही नही करनी चाहिए।यदि जीव इस तरह रात -दिन&amp;nbsp; उस परमात्मा को पुकारता रहेगा तो एक न एक दिन परमात्मा हमारी पुकार जरूर सुन ही लेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि यदि संसारिक मोह माया से बचना है तो उस परमात्मा का ध्यान निरन्तर करते रहना चाहिए।निरन्तर परमात्मा का ध्यान करने से जीव उस परमात्मा के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ने लगता है और एक दिन ऐसा भी आता है जब जीव परमात्मा के साथ एकाकार हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;&lt;br /&gt;
कबीर काईआ कजली बनु भईआ,मनु कुचरु मयमंतु॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;अंकसु ग्यानु रतनु है,खेवटु बिरला संतु॥२२४॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी आगे कहते हैं कि जब जीव परमात्मा के नाम से दूर होता है तो वह घने जगंल की तरह हो जाता है,जिस में मन रूपी हाथी मस्त होकर विचरण करने लगता है।लेकिन यदि किसी के पास ज्ञान रूपी अकुंश गुरु कृपा से लग जाये, खेवट के समान तो कोई विरला संत इसे अपने नियंत्रण कर सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि हमारा मन एक मस्त हाथी के समान है जो विषय-विकारों के कारण मस्त हाथी की तरह हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाता है।लेकिन यदि ज्ञान रूपी&amp;nbsp; अकुंश अर्थात उस परमात्मा का ध्यान हमे गुरु कृपा से प्राप्त हो जाये तो अपने हाथी रूपी इस मन को अपनी मर्जी से चलाया जा सकता है।क्योकि जीव तो सदा मन के पीछे भागता रहता है और विषय वासनाओं के जाल मे फँसाता रहता है।इसी से बचने के लिये कबीर जी हमें उपाय बता रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ११३</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/09/blog-post.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Mon, 10 Sep 2012 05:23:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-3141870901177459394</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर केसो केसो कूकीऐ, न सोईऐ असार॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;राति दिवस के कूकने,कबहू को सुनै पुकार॥२२३॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि उस परमात्मा केशव को सदा पुकारते रहना चाहिए और कभी लापरवाही नही करनी चाहिए।यदि जीव इस तरह रात -दिन&amp;nbsp; उस परमात्मा को पुकारता रहेगा तो एक न एक दिन परमात्मा हमारी पुकार जरूर सुन ही लेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि यदि संसारिक मोह माया से बचना है तो उस परमात्मा का ध्यान निरन्तर करते रहना चाहिए।निरन्तर परमात्मा का ध्यान करने से जीव उस परमात्मा के साथ एकाकार होने की ओर बढ़ने लगता है और एक दिन ऐसा भी आता है जब जीव परमात्मा के साथ एकाकार हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर काईआ कजली बनु भईआ,मनु कुचरु मयमंतु॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;अंकसु ग्यानु रतनु है,खेवटु बिरला संतु॥२२४॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी आगे कहते हैं कि जब जीव परमात्मा के नाम से दूर होता है तो वह घने जगंल की तरह हो जाता है,जिस में मन रूपी हाथी मस्त होकर विचरण करने लगता है।लेकिन यदि किसी के पास ज्ञान रूपी अकुंश गुरु कृपा से लग जाये, खेवट के समान तो कोई विरला संत इसे अपने नियंत्रण कर सकता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि हमारा मन एक मस्त हाथी के समान है जो विषय-विकारों के कारण मस्त हाथी की तरह हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाता है।लेकिन यदि ज्ञान रूपी&amp;nbsp; अकुंश अर्थात उस परमात्मा का ध्यान हमे गुरु कृपा से प्राप्त हो जाये तो अपने हाथी रूपी इस मन को अपनी मर्जी से चलाया जा सकता है।क्योकि जीव तो सदा मन के पीछे भागता रहता है और विषय वासनाओं के जाल मे फँसाता रहता है।इसी से बचने के लिये कबीर जी हमें उपाय बता रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १११</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/06/blog-post.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Thu, 30 Aug 2012 05:57:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-187793593085959713</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर रामु न चेतिउ, फिरिआ लालच माहि॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;पाप करंता मरि गईआ,अऊध पुनी खिन माहि॥२२१॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि जब हम उस परमात्मा से दूर होते हैं उस समय हमारे मन में लालच पैदा हो जाता हैं और हम पापों को करने लगते हैं,इसी में हमारी सारी ऊमर व्यतीत हो जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि जब जीव उस परमात्मा का ध्यान नही करता,उस समय लालच और पाप मन मे जन्म लेते हैं।इसका कारण मात्र इतना है कि परमात्मा को भूलने के कारण जीव जब भी कोई कर्म करता है तो वह मोह-माया मे फँस जाता है और यही मोह -माया लालच और पाप की ओर प्रेरित करता हैं।क्योकि जीव को, जगत नाशवान है इसका स्मरण नही रहता।वह भूल जाता है कि एक दिन सभी कुछ छोड़ कर जाना पड़ेगा।इसी कारण उस के मन में यह लालच और मोह-माया के कारण भ्रम पैदा हो जाता है और जीव द्वारा समस्त पाप इसी लालच के कारण होते हैं। ऐसे मे सारी ऊमर वह इसी में फँसा रहता है और उसकी आध्यात्मिक मौत पहले ही हो जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर काइआ काची कारवी,केवल काची धातु॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;साबतु रखहि त राम भजु, नाहि त बिनठी बात॥२२२॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि हमारा शरीर कच्चे लोटे के समान है और इसे बनाने मे जिस धातू का इस्तमाल किया गया है वह भी कच्ची मिट्टी के समान है।यदि जीव चाहता है कि इस कच्ची मिट्टी के बने शरीर पर कोई असर ना हो तो परमात्मा का ध्यान करो। नही तो इस धातू पर उसमे डाली गयी वस्तु का असर जरूर होगा। जिस से बात बिगड़ सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि जिस प्रकार कच्ची मिट्टी के बरतन में कुछ डाला जाता है तो उसका असर उस बरतन पर होता हैं।ठीक उसी तरह यह हमारा शरीर जो कि कच्ची मिट्टी के समान ही बना हुआ है।इसमे रहते हुए जब हम किसी विषय विकार से ग्रस्त होते हैं तो उसका असर हमारे भीतर बना रहता है।इसलिये जीव को सदैव इनसे बचना चाहिए और इससे बचने का एक ही उपाय है कि जीव उस परमात्मा का ध्यान करे ,उसका भजन करे।यदि ऐसा नही किया गया तो इस कच्ची मिट्टी के बने शरीर में विषय-विकारों का प्रभाव बढ़ता ही जायेगा।जिस से हमारा यह जीवन व्यर्थ हो जायेगा और हम इन्ही विकारों में ही उलझे रहेगें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ११०</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/08/blog-post_20.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><category>श्लोक महला९वा</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Mon, 20 Aug 2012 05:54:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-5737577047004058332</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर जो मै चितवऊ ना करै,किआ मेरे चितवे होइ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;अपना चितविआ हरि करै, जो मेरे चिति न होइ॥२१९॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कह्ते हैं कि जिस बारे मे मैं सोचता रहता हूँ वह बात तो परमात्मा कभी पूरी करता ही नही।फिर मेरे सोचने से क्या होगा।क्योकि परमात्मा तो वही करता है जो वह करना चाहता है और जो वह परमात्मा करता है वह मेरे सोचनें मे कभी आता ही नही।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि जीव हमेशा ऐसी बाते सोचता जो उसे माया मोह मे और अधिक फँसाती जाती है।इस लिये हमारा चिंतन हमें हमेशा पतन के रास्ते पर ही ले जाता है।इस लिये मेरे सोचने से कोई लाभ होने वाला नही है। जबकि परमात्मा जो भी हमारे बारे मे करता है या सोचता है वह हमेशा हमारे हित मे ही होता है।भले ही वह कुछ भी कर या करवा रहा हो हमसे। इसी लिये हम मोह माया में फँसे होने के कारण कभी वह नही सोच सकते जो परमत्मा हमारे बारे मे सोचता या करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;महला ३॥ चिंता भी आपि कराइसी,अचिंतु भि आपे देइ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;नानक सो सालाहीऐ,जि सभना सार करेइ॥२२०॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस श्लोक में गुरु जी कबीर जी की बात को आगे बढाते हुए कहते हैं कि वास्तव मे तो परमात्मा ही जीवों के मन में दुनिया की फिकर-चिंता को पैदा करता है और वह अवस्था भी परमात्मा ही प्रदान करता है जब जीव संभल जाता है।इसलिये हमे हमेशा उस परमात्मा का ही&amp;nbsp; गुणगान करना चाहिए,हमेशा उसी का ध्यान करना चाहिए। जो हमेशा सब की चिंता करता रहता है और सदा वही करता है जो हमारे हित मे होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरु जी कहना चाहते हैं कि सब कुछ परमात्मा ही कर रहा है वही हमे भटकाता है और वही हमे रास्ता दिखाता है।इस लिये सदा उसी का ध्यान करना चाहिए।जब हम उसका ध्यान करेगे तो हमारी निकटता उस परमात्मा के साथ हो जायेगी।जिस से हम भी वही चिंतन करने लगेगें जो परमात्मा हमारे लिये करता है। फिर हम भी हर प्रकार की चिंता से मुक्त होकर चिंतारहित जीवन जी सकेगें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १०९</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/08/blog-post.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><category>श्लोक महला९वा</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Fri, 10 Aug 2012 05:51:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-6221614462067487742</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर लागी प्रीति सुजान सिउ,बरजै लोगु अजानु॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;ता सिउ टूटी किऊ बनै,जा को जीअ परान॥२१७॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कह्ते हैं कि जब साधक की प्रीत उस परमात्मा के साथ लग जाती है जो घट-घट की जानता है ,तब संगे सबधी जो उस परमात्मा की महिमा से अंजान है तुझे अपने साथ मिलाने के लिये तरह तरह से उस परमात्मा की प्रीत से हटाने की कोशिश करेगें।लेकिन&amp;nbsp; उस परमात्मा से जिसने हमें यह जीवन दिया है ,उस से बिछड़ कर, चाहे किसी भी कारण से यह प्रीत टूटी हो ।हम सुखी नही रह सकते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि जब साधक उस परमात्मा से जुड़ता है तो हमारे आस-पास के लोग जो उस परमात्मा से जुड़े हुए नही होते, वे साधक को कभी उलाहना देते हैं और कभी उस के तारीफ के पुल बाधँते हैं जिस से साधक भ्रमित हो, दी गई उलाहना या तारीफ के कारण समाजिक मर्यादाओं के कारण विचलित हो जाता है।परन्तु यदि साधक यह मान चुका है कि उस परमात्मा ने ही हमे जीवन दिया है तो वह उस परमात्मा से अपनी प्रीत कभी नही तोड़गा। इसी बात की ओर कबीर जी संकेत कर रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर कोठे मंडप हेतु करि, काहे मरहु सवारि॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कारजु साढे तीनि हथ,घनी त पऊने चारि॥२१८॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी आगे कहते हैं कि घर-बार को सजाने-सँवारनें के शॊक के कारण जीव तू क्यों अध्यात्मिक मौत मर जाता है।जबकि जीवन मे हम मात्र रोज साढे तीन या पौनें चार गज जमीन का ही इस्तमाल कर पाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि संसारिक मोह माया मे उलझ कर हम दूसरों को बाहरी तड़क-भड़क दिखाने के चक्कर में अपने जीवन लगा देते हैं। जिस कारण उस परमात्मा को याद करने का हमें ध्यान ही नही रहता और समय हाथ से निकल जाता है।जबकि हम अपने जीवन में बहुत कम ही इनका उपयोग कर पाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १०८</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/07/blog-post_30.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><category>श्लोक महला९वा</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Mon, 30 Jul 2012 05:48:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-7811439609903545913</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर कीचड़ि आटा गिरि परिआ किछू न आइउ हाथ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;पीसत पीसत चाबिआ सोई निबहिआ साथ॥२१५॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि जब आटा कीचड़ मे गिर जाता है तो वह किसी काम का नही रहता। जिस का आटा होता है उस के हाथ कुछ भी नही लगता।लेकिन चक्की पीसते समय जितने दानें उसने चख लिये बस वही उसके काम आते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि परमात्मा का ध्यान करने के लिये किसी विशेष समय या उमर की जरूरत नही होती। बल्कि हमे अपना स्वाभाव ऐसा बना लेना चाहिए की हर समय,चाहे हम किसी भी काम मे लगे हो ,उस परमात्मा का सिमरन करते रहे। अर्थात कुछ दानें खा सके। कहीं ऐसा ना हो कि हम बेकार के कामों मे ही व्यस्त रहें और समय निकल जाये। अर्थात हमारा आटा कीचड़ मे गिर जाये और हमारे हाथ कुछ भी ना लगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर मनु जानै सभ बात, जानत ही अऊगनु करै॥&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;काहै की कुसलात, हाथि दीपु कूऐ परै॥२१६॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी आगे कहते हैं कि हमारा मन सभी कुछ&amp;nbsp; जानता है कि हम क्या अच्छा कर रहे हैं और क्या बुरा।लेकिन सब जानते हुए भी हम बुराईओ की ओर ही जाते हैं। लेकिन कबीर जी कहते हैं कि इस मे भला कौन-सी समझदारी है, जबकि तुम्हारे हाथ मे जलता हुआ दीपक हो और फिर भी तुम कूए में गिर जाओ।.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि हमारा मन जानता है कि हम दिखावे के लिये तो मंदिर गुरूद्वारे जाते हैं लेकिन बाकि समय चोरी ठगी मे लगे रहते हैं।इस तरह की चालाकी करने से हमे क्या लाभ मिलने वाला है? जबकि परमात्मा का नाम रूपी दीपक हमारे हाथ में है जो हमारे मन का सारा अंधेरा दूर कर सकता है। यदि फिर भी हम परमात्मा की भक्ति की जगह विषय-विकारों मे ही फँसें रहते हैं तो यह ठीक ऐसा ही है कि जैसे तुम्हारे हाथ मे जलता हुआ दीया हो और तुम फिर भी कूए में जा गिरो।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १०७</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/07/blog-post_20.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><category>श्लोक महला९वा</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Fri, 20 Jul 2012 05:45:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-663740102657206184</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;नामा कहै तिलोचना मुख ते राम संम्हालि॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि॥२१३॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि नामा जी त्रिलोचन को जवाब देते हैं कि मुँह से राम नाम को बोलते हुए उस का ध्यान कर के और हाथ-पाँव से अपनी रोटी-रोजी के लिए कार्य करके उस परमात्मा को मैं सदा अपने चित मे रखता हूँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि भक्त भले ही संसारिक कार्यो मे उलझे हुए लगते हो लेकिन वास्तव में उन का ध्यान सभी कार-विहार करते हुए भी उस परमात्मा में ही लगा रहता है। यहाँ कबीर जी हमे भी संकेत द्वारा कहना चाहते हैं कि हमे परमात्मा की प्राप्ती के लिये संसार छोड़ कर कहीं भागने की जरूरत नही हैं बल्कि संसार के कार-विहार करते हुए उस परमात्मा के ध्यान मे डूबा रहना है। सभी भक्तों ने ऐसा ही किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;महला ५॥ कबीरा हमरा को नही, हम किस&amp;nbsp; हू के नाहि॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;जिनि इहु रचन रचाइआ, तिस ही माहि समाहि॥२१४॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(यह श्लोक गुरु अरजन देव जी का है)वे कहते हैं कि हे कबीर! जिस परमात्मा ने यह सब रचना रची है हम तो उसी की याद में लगे रहते हैं,क्यूँकि ना तो हमारा कोई सदा के लिये साथी हो सकता है और ना ही हम सदा किसी के लिये साथी हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरु जी इस श्लोक में उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में कहना चाहते हैं कि यदि जीव को इस सत्य का आभास हो जाये कि इस संसार मे कोई भी किसी का नही हो सकता।अर्थात वे कहना चाहते हैं कि भले ही ऊपरी तौर पर हम एक दूसरे के मित्र नजर आते हैं लेकिन एक व्यक्ति किसी दूसरे की शारिरिक व मानसिक पीड़ा को सांत्वना तो दे सकता है लेकिन कम नही कर सकता। इसी लिये गुरु जी कहते हैं कि ना तो कोई हमारा है और ना ही हम किसी के हो सकते हैं।हमे तो अंतत: उसी मे समाना है जिस ने यह सारी रचना इस प्रकार बनाई है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १०६</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/07/blog-post.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><category>श्लोक महला९वा</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Tue, 10 Jul 2012 05:43:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-7905478268771855894</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर चावल कारने तुख कऊ मुहली लाइ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;संगि कुसंगी बैसतै तब पूछै धरम राइ॥२११॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि चावलों के लिये हमे कैसी कैसी मेहनत करनी पड़ती है,गारे मे हाथ डाल कर चावल की पौधे रोपनें पड़ते है और अच्छे बुरे की परवाह ना करते हुए क्या कुछ करना पड़ता है। कबीर जी कहते हैं कि हम जो कुछ भी करते हैं, अच्छा या बुरा उसका हिसाब धर्मराज जरूर माँगेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि परमात्मा हमारे सभी कामों पर नजर रखे हुए हैं हम जो भी करते हैं उसका हिसाब जरूर देना पड़ेगा।कबीर जी इस लिये कह रहे हैं, क्योकि ज्यादातर जीव इस बात को सदा भूले रहते हैं कि परमात्मा की नजर सदा उनके कर्मों पर लगी रहती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;नामा माइआ मोहिआ कहै तिलोचनु मीत॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;काहे छीपहु छाइलै राम न लावहु चीतु॥२१२॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी यहाँ त्रिलोचन और नामा जी के वार्तालाप का जिक्र करते हुए कहते हैं कि त्रिलोचन जी नामा से कहते हैं कि तुम माया में क्यो उलझे हुए लगते हो। जब देखो अपने काम मे लगे रहते हो, रजाईयो को टाँकने मे लगे रहते हो। उस परमात्मा का नाम क्यो नही लेते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि भक्त भी देखने मे तो ऐसे ही लगते हैं की वे संसारिक कार-विहार में उलझे हुए हैं। ऐसे लगता है जैसे वे अपने कामों मे डूबे हुए हैं और परमात्मा का ध्यान करने के लिये उनके पास समय ही नही है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १०५</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/06/blog-post_30.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><category>श्लोक</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Sat, 30 Jun 2012 05:34:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-8275771059226085361</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;महला ५॥ कबीर कूकर बऊकना,करंग पिछै उठि धाइ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;करमी सतिगुरु पाइआ,जिनि हऊ लीआ छडाइ॥२०९॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि कुत्ता मुरदार के पीछे भौंकता हुआ भागता रहता है लेकिन जिस को सुकर्मों के कारण परमात्मा की कृपा से सतगुरु मिल गया है वह अंहकार रूपी विकारों से छूट गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि लालच व विषय -विकारों के पीछे जिस प्रकार कुत्ता भौंकता हुआ भागता रहता है ठीक उसी तरह विकारग्रस्त जीव विकारों के पीछे परमात्मा को भूल कर भागता रहता है। लेकिन परमात्मा की कृपा से यदि सतगुरु मिल जाये तो वह अंहकार रुपी विकारों से छूट सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;महला५॥कबीर धरती साध की,तसकर बैसहि गाहि॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;धरती भारि न बिआपई,उन कऊ लाहू लाहि॥२१०॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कह्ते हैं कि यह धरती तो उन के लिये है जो परमात्मा की कृपा को पहचानते हैं लेकिन इस धरती पर अक्सर चोर विकारी ही ज्यादातर देखे जाते हैं।लेकिन फिर भी धरती पर इनके भार का कोई असर नही होता ।क्योकि उनको अपना भार स्वयं ढोना पड़ता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि परमात्मा ने हमे उस परमानंद को भोगने के लिये भेजा है लेकिन हम यहाँ विषय -विकारों में ही फँसे रहते हैं और अपना जीवन व्यर्थ गवा जाते हैं।जिस से हमारा अपना ही नुकसान होता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १०४</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/06/blog-post_20.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><category>श्लोक महला९वा</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Wed, 20 Jun 2012 05:40:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-8405587019587796076</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर घाणी पीड़ते, सतिगुर लिए छडाइ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;परा पूरबली भावनी, परगटु होइ आइ॥२०७॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि लोग विषय -विकारों में इस तरह पीसे जा&amp;nbsp; रहे हैं जैसे कोल्हू में तिल पीसे जाते हैं।लेकिन जो परमात्मा की शरण मे चले गये हैं उन्हें परमात्मा अपनी कृपा से बचा लेता है।क्योकि जन्म से पहले जब हम ईश्वर के साथ एकाकार थे उस समय का आभास हमारे भीतर परमात्मा का चिन्तन करने से स्वयं ही प्रगट हो जाता हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि भले ही संसार मे आ कर हम विषय-विकारों में फँस जाते हैं लेकिन हमारे भीतर परमात्मा सदा मौजूद रहता है।हमें तो सिर्फ उस का ध्यान करने की जरूरत है वह हमारे भीतर फिर से प्रगट हो जाता है।अर्थात परमात्मा का ध्यान सभी विषय -विकारों से बचा लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर टालै टोलै दिनु गईआ, बिआजु बढतऊ जाइ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;न हरि भजिउ न खतु फटिउ, कालु पहूँचो आइ॥२०८॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी आगे कहते हैं कि बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो परमात्मा की शरण में जाने से टाल-मटोल करते रहते हैं। लेकिन वे नही जानते कि उनके ऐसा करने से ब्याज बढता ही जाता है। ऐसे लोगो का बही खाता बढता ही जाता है और उनकी मृत्यू का समय भी आ जाता है लेकिन वे सचेत नही होते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि विषय -विकारों के पीछे लग कर लोग परमात्मा के ध्यान करने को टालते रहते हैं । वे सोचते हैं कि अभी तो मौज-मस्ती कर ली जाये । जब समय आयेगा तब उस परमात्मा का भजन कर लेगें, लेकिन वे नही जानते कि उन के इस तरह करने से विषय-विकार उन पर और भी अधिक हावी होते जाते हैं। जिस कारण उन से बचना और भी अधिक कठिन हो जाता है।फिर हम इन विकारों में फँस इसके इतने आदि हो जाते हैं कि हम उन्ही मे उलझे रहते हैं और मृत्यू का समय हमारे सामने आ जाता है।इसी लिये कबीर जी हमे सचेत कर रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १०३</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/04/blog-post_27.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Fri, 27 Apr 2012 12:47:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-2941724194720047174</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर बिकारह चितवते झूठे करते आस॥ &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;मनोरथु कोइ न पूरिउ चाले ऊठि निरास॥२०५॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहते हैं कि जो लोग भौतिक पदार्थो को पाने की लालसा से उस परमात्मा का चिन्तन करते हैं वे झूठी आशा मे ही जीते रहते हैं। क्योकि कोई भी संसारिक मनोरथ या कामना पूरी हो जाने के बाद भी तृप्त नही करती।इस लिये अंत मे निराशा ही हाथ लगती है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि एक परमात्मा के सिवा जब जीव अन्य पदार्थो की कामना लेकर परमात्मा की शरण मे जाता है तो भले ही उस को वह पदार्थ मिल जाते हैं लेकिन उसे संतोष प्राप्त नही होता। किसी भी कार्य के पूरा हो जाने से भी मन में यदि तृपति नही होती वह अधूरा ही रहता है ।अर्थात कबीर जी कहना चाहते हैं कि संसार मे एक परमात्मा के सिवा किसी भी मनोरथ से कभी भी पूर्ण तृपति नही मिल सकती।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर हरि का सिमरनु जो करै, सो सुखीआ संसारि॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;इत कतहि न डोलई जिस राखै सिरजनहार॥२०६॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी आगे कहते हैं कि इस लिये पदार्थो का चिन्तन न करके उस परमात्मा का ही चिन्तन करना चाहिए। तभी स्थाई सुख की प्राप्ती हो सकती है और जीव संसार मे सुखी रह सकता है। क्योकि जब जीव परमात्मा की शरण मे चले जाता है तो उस का भटकाव समाप्त हो जाता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि यदि किसी को&amp;nbsp; सुख चाहिए चाहिए तो वह भौतिक पदार्थो से नही बल्कि परमात्मा की भक्ति करने से ही मिलेगा। क्योकि भौतिक पदार्थो भले ही हमे कितने भी मिल जाये। लेकिन उन्हे और पाने की लालसा हमेशा बनी ही रहती हैं ।जबकि एक बार परमात्मा की शरण मे जाने से मन मे ठहराव आ जाता है और मन का ठहराव ही सुख प्रदान करता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १०२</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/04/blog-post_18.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Wed, 18 Apr 2012 12:43:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-1617615664583539813</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर मेरा मुझ महि किछु नही जो किछु है सो तेरा॥&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;तेरा तुझ को सऊपते किआ लागै मेरा॥२०३॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि परमात्मा मेरा तो मुझ मे कुछ भी नही है जो भी मेरे पास हैं वह सब तो तेरा ही दिया हुआ है।यदि तू चाहे तो यह सब मैं तुझी को सौंप देने मे समर्थ हो सकता हूँ। क्योकि मैं जान चुका हूँ कि भी तभी संभव है जब तू चाहेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी हमे समझाना चाहते हैं कि द्वैत की भावना से कैसे छुटकारा मिल सकता है वह बताते हैं कि इस द्वैत की भावना&amp;nbsp; से मुक्ति पानें का एक ही उपाय है कि जीव परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण करदे। तभी हमारे और परमात्मा के प्रति हमारा कुछ करने की भावना का द्वंद समाप्त हो सकेगा।इस के सिवा परमात्मा से मिलने का और कोई रास्ता नही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर तूं तूं करता तूं हुआ मुझ महि रहा न हूं॥&lt;br /&gt;
जब आपा पर का मिटि गईआ जत देखऊ तत तू॥२०४॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी आगे कहते हैं कि जब एक तू ही है ऐसा भाव आ जाता है तो "मै" का भाव समाप्त हो जाता है और जब यह "मै" का भाव नही रहता तो हर जगह परमात्मा ही परमात्मा नजर आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी समझना चाह रहे हैं कि जब हम पूर्ण समर्पण परमात्मा के समक्ष कर देते हैं तो हमारे भीतर से "मै" का भाव समाप्त हो जाता है और इस "मैं"के भाव के समाप्त होने पर ही उस परमात्मा को महसूस किया जा सकता है। तभी हम उस तक पहुँच सकते हैं। अर्थात परमात्मा तक पहुँचने का एक यही रास्ता है कि स्वयं को भी उस परमात्मा को सौंप दे। ताकि हमारे भीतर से "मैं" का भाव पूर्णत: मिट जाए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १०१</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/04/blog-post.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Mon, 9 Apr 2012 05:40:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-3040318196189085177</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर लेखा देना सुहेला जऊ दिल सूची होइ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;उसु साचे दीबान महि पला न पकरै कोइ॥२०१॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहते हैं कि परमात्मा जीव की नही तेरे दिल के पाकीजगी की कुरबानी माँगता है।यदि जीव का दिल पवित्र व सच्चा है तो परमात्मा के दरबार में हिसाब-किताब देना आसान हो जायेगा। तब उस सच्चे दरबार में किसी प्रकार की रोक-टोक नही रहेगी।।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि जीवों के कुरबानी देने से परमात्मा खुश नही होता । यदि तुम्हारा ह्र्दय पवित्र है, सच्चा है तो उस परमात्मा के दरबार मे बिना रोक-टोक स्थान मिलता है।हम तभी निश्चिंत हो कर उस परमात्मा के सामने टिक सकते है जब हमारे कर्म अच्छे व नेक हो तभी हम आसानी से अपना हिसाब -किताब उस के सामने रख सकेगें।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर धरती अरू आकास महि दुइ तूं बरी अबध॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;खट दरसन संसे परे अरु चऊरासीह सिध॥२०२॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहते हैं कि धरती और आकास सभी जगह जीव के लिये द्वैत की भावना ही सबसे बड़ी रूकावट है। इस द्वैत के कारण ही उस परमात्मा की प्राप्ती मे लगे साधक और चौरासी सिध परमात्मा तक ना पहुँच पाने के कारण शंका मे पड़े हुए हैं। क्योकि वे अपनी तरफ से सभी उपाय व यत्न ईश्वर को पाने के लिये करते हैं लेकिन लक्ष्य तक नही पहुँच पाते।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि जब साधक किसी जीव की बलि देता है या फिर परमात्मा की प्राप्ती के लिये अपनी ओर से कोई उपाय करता है तो साधाक व सिध के मन में यह भाव आ जाता है कि मै कुछ कर रहा हूँ। इस ’मैं कुछ करता हूँ’ के भाव&amp;nbsp; के कारण साधक द्वैत अर्थात दो की भावना से ग्रस्त हो जाता है। इस लिये ईश्वर प्राप्ती मे बाधा उत्पन्न हो जाती है। यहाँ कबीर जी हमे बताना चाहते हैं कि हम किस कारण से परमात्मा तक पहुँचने मे समर्थ नही हो पाते।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - १००</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/03/blog-post_27.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यात्मिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Tue, 27 Mar 2012 04:36:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-8750414540310310231</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर जीअ जु मारहि जोरु करि कहते हहि जु हलालु॥&lt;br /&gt;
दफतर बही जब काडि है होइगा कऊनु हवालु॥१९९॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहते हैं कि जो लोग जीवों&amp;nbsp;&amp;nbsp; के साथ जोर&amp;nbsp; जबरदस्ती करते हैं&amp;nbsp; और उन्हें मार कर कहते ही कि हमनें इस जीव को हलाल किया है अर्थात इस जीव को मार कर इसी का भला किया है।क्योकि इसे ईश्वर के नाम पर मारा गया है।लेकिन कबीर जी कहते हैं कि तेरे इस कृत्य का फल तुझे जरूर भुगतना पड़ेगा।जब वह ऊपर वाला अपने बही खाते मे तेरे इस कृत्य को देखेगा।उस समय तेरे इस कर्मफल से कौन बचाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि हमारे प्रत्येक कर्म का हिसाब-किताब हमे ही देना पड़ेगा। भले ही हम परमात्मा के नाम का सहारा लेकर यह कहे की हमारे द्वारा दी गयी कुर्बानी जायज़ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर जोरु कीआ सो जुलमु है लेइ जवाबु खुदाइ॥&lt;br /&gt;
दफतरि लेखा नीकसै मार मुहै मुहि खाइ॥२००॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी इसी बारे मे आगे कहते हैं कि इस तरह के कृत्य भले ही कोई हलाल माने लेकिन यह एक तरह का जुल्म ही है। इस काम का हिसाब खुदा तुझ से जरूर माँगेगा। कबीर जी कहते हैं कि जब तेरे खाते में तेरे इन कर्मों को खुदा देखेगा तो तुझे इस की सजा जरूर मिलेगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि हमारे द्वारा किये गये पाप भले ही वह परमात्मा के नाम का सहारा लेकर किये हो।लेकिन इन पाप कर्मों की सजा जरूर भुगतनी पड़ती हैं। वा्स्तव मे कबीर जी विभिन्न धर्मों व संप्रदायों में इस प्रकार की भ्रांतियों का विरोध कर रहे हैं जो धर्म के नाम पर तो की जाती हैं लेकिन जिस से दूसरे जीवों को कष्ट पहुँचता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ९९</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/03/blog-post_18.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यामिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Sun, 18 Mar 2012 07:16:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-7363063754039187734</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर हज काबै हऊ जाइ बा आगै मिलिआ खुदाइ॥&lt;br /&gt;
सांई मुझ सिऊ लरि परिआ&amp;nbsp; तुझे किनि फुरमाई गाइ॥१९७॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कह्ते हैं कि जब मैं हज के लिये काबा की यात्रा पर निकला तो मुझे रास्ते में खुदा मिल गया। जब वह मुझ से मिला तो वह सांई मुझ से लड़ने लगा। कहने लगा कि इस गाय की कुर्बानी मेरे नाम पर करने के लिये तुझे किसने कहा ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी समझाना चाहते है कि परमात्मा के लिये तो सभी जीव समान हैं ऐसे में यह मान कर कि गाय आदि किसी पशु की कुरबानी खुदा के नाम पर देने से वह खुदा खुश हो जायेगा और तेरे सभी गुनाह बख्श देगा यह सब नासमझी की बातें हैं। इसी ओर संकेत करने के लिये कबीर जी ने उपरोक्त विचार व्यक्त किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;कबीर हज काबै होइ होइ गईआ केती बार कबीर॥&lt;br /&gt;
सांईं मुझ महि किआ खता मुखहु न बोलै पीर॥१९८॥&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी आगे कहते हैं कि मैं कितनी ही बार सांई के घर उसका दीदार करने के लिये गया हूँ लेकिन सांई मेरे साथ बात ही नही करता। ऐसा लगता है वह मुझ से नाराज हो गया हैं। पता नही तू मुझ मे कैसी कैसी खता देख रहा हैं जो मुझ से हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर जी कहना चाहते हैं कि परमात्मा के नाम पर जब हम किसी जीव की बलि देते हैं या किसी से कोई जोर जबर्दस्ती करते हैं तो हमारे इस कृत्य से परमात्मा हम से नाराज हो जाता है।जब कि हम यह सब कृत्य उस परमात्मा के नाम पर उसे खुश करने के लिये करते हैं।अर्थात जब हम परमात्मा कि शरण मे जाते हैं तो परमात्मा की हम पर कृपा ना होने का कारण मात्र हमारी ही कुछ भूलें होती है। यदि हम अपनी इन भूलों को सुधार ले तो परमात्मा की कृपा प्राप्त हो सकती है।कबीर जी इसी ओर इशारा कर रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>कबीर के श्लोक - ९८</title><link>http://aphmkj.blogspot.com/2012/03/blog-post.html</link><category>Gurubani</category><category>अध्यामिक</category><category>कबीर</category><category>गुरुग्रंथ साहिब</category><category>गुरुबाणी</category><category>परमजीत बाली</category><category>श्लोक महला९वा</category><author>noreply@blogger.com (परमजीत सिहँ बाली)</author><pubDate>Fri, 9 Mar 2012 06:09:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7194932857421796632.post-3751488837171476172</guid><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर निरमल बूंद अकास की परि गई भुमि बिकार॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;बिनु संगति इऊ मांनई होइ गई भठ छार॥१९५॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहते हैं कि जब बरसात होती है आकाश से जो बूँदें धरती पर गिरती हैं यदि वह कुछ सँवार ना सके तो बेकार ही जाती है। धरती की तपिश में नष्ट हो जाती हैं।यही हाल जीव का होता है। जबकि वह परमात्मा की ही अंश है लेकिन बुरी संगत होने के कारण अपना जीवन व्यर्थ ही गवा देता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि यदि आकाश की बूँद बंजर धरती पर पड़े तो उस से किसी को कोई फायदा नही होता लेकिन यदि यही बूँद किसी खेत खलिहान पर पड़े तो धरती को लाभ पहुँचाती हैं।इसी तरह मनुष्य के जीवन पर संगत का प्रभाव पड़ता हैं यदि वह अच्छी व साध लोगों की संगत मे रहता है तो अपने जीवन को सँवार लेता है अन्यथा उसका यह जीवन विषय -विकारों से ग्रस्त लोगो की संगत करने के कारण व्यर्थ जी जाता है। कबीर जी यहाँ हमें सगति के प्रभाव के बारे मे बताना चाह रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कबीर निरमल बूंद अकास की लीनी भूमि मिलाऐ॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;अनिक सिआने पचि गए ना निरवारी जाऐ॥१९६॥&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी आगे कहते हैं कि धरती उस बूँद को अपने भीतर समाहित कर लेती है फिर वह उससे अलग होना उस बूँद के लिये कठिन होता है। भले ही कितने सयाने हो वह बूँद को धरती में मिलने के बाद पूर्णत: अलग नही कर सकते।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: large;"&gt;कबीर जी कहना चाहते हैं कि बूँद का धरती&amp;nbsp; मे समाहित होने के बाद जैसे उन्हें अलग करना कठिन हो जाता है ।ठीक वैसे ही जब कोई सतगुरू की कृपा का पात्र बन जाता है तो ऐसे साधक परमात्मा के रंग मे रंग कर विषय विकारों से दूर हो जाते हैं। फिर कोई भी विकार या बुरी संगति उन्हें नुकसान नही पहुँचा सकती।अर्थात कबीर जी कहना चाह रहे हैं कि जिस प्रकार उपजाऊ व बंजर धरती और बूँद के मिलने से परिणाम निकलते हैं ठीक वैसे ही अच्छी और बुरी संगत करने से प्रभाव पडता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">11</thr:total></item></channel></rss>