<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048</id><updated>2026-10-26T02:31:26.063+05:30</updated><title type='text'>The Inner Soul©</title><subtitle type='html'>A JOURNEY WITHIN</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default?redirect=false'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>266</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-4335524719014100234</id><published>2026-10-04T15:14:48.095+05:30</published><updated>2026-10-04T15:14:48.095+05:30</updated><title type='text'>माधव</title><content type='html'>&lt;p&gt;आओ माधव! फिर से तुम, गांडीव थमा दो जीवन में,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भटक रहा इंसान आज फिर, आधुनिकता के रण में।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चारों ओर कुरुक्षेत्र बना है, मन में युद्ध निरंतर है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तृष्णा, चिंता, होड़, व्यथा का, छाया हुआ बवंडर है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यंत्र बने हैं हाथ हमारे, संवेदना पर ताला है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुख की अंधी दौड़ में हमने, घट में विष ही ढाला है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मोह-पाश के कठिन जाल में, फिर से अर्जुन हार रहा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने ही संशयों का विषधर, हृदय उसी का मार रहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पार्थ जगाओ फिर से माधव! निष्काम कर्म बतलाओ तुम,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;कर्म करो, मत फल की सोचो&quot;, यही महामंत्र फिर गाओ तुम।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जय-अपजय से पार ले चले, समता का वह भाव सिखा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीड़ भरे इस कोलाहल में, धीरज की अमृत छांव दिखा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देह अनित्य, अमर आत्मा, फिर से यह विश्वास जगा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भौतिकता के इस कलयुग में, अलौकिक वह आस जगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;छोड़ के सारे भय और संशय, स्वधर्म पर निज कदम बढ़ा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे मुरलीधर! हे जगदीश्वर! नव जीवन की राह दिखा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बनकर सारथी थामो डोरी, इस बिखरे कुरुक्षेत्र में,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर से गीता का ज्ञान जगा दो, पीड़ित मानव-नेत्र में।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गूंजे फिर से अनहद नाद, हटे तिमिर, उजियारा हो,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माधव! तेरा नाम जपे जग, सत्य का ही सहारा हो।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/4335524719014100234/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/10/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/4335524719014100234'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/4335524719014100234'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/10/blog-post.html' title='माधव'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-4533946425029661835</id><published>2026-09-22T08:02:16.337+05:30</published><updated>2026-09-22T08:02:16.337+05:30</updated><title type='text'>जब मैं ना रहूंगा</title><content type='html'>&lt;p&gt;एक मोड़ ऐसा भी आएगा, जब ये शोर थम जाएगा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हवा में घुला मेरा नाम, धीरे-धीरे धुंधलाएगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चिराग बुझेंगे महफिल के, पर चिराग़ों की लौ बोलेगी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब-जब मेरी कोई अधूरी तहरीर अलमारी खोलेगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ यादों की धूल धुलेगी, कुछ पन्ने फिर से पलटे जाएंगे,&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाय की उसी चुस्की पर, मेरे चंद पुराने क़िस्से तराशे जाएंगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोई हँसते-हँसते रुक जाएगा, कोई चुपचाप मुस्कुराएगा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोने की खाली कुर्सी देख, कोई पल भर को ठिठक जाएगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सड़कों पर गाड़ियाँ चलती रहेंगी, शहर वैसे ही जागेगा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूरज उसी ढलान से चढ़ेगा, चाँद अपने वक्त पर आएगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मौसम अपने रंग बदलेगा, हवाएँ अपना गीत गाएँगी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुनिया अपनी रफ़्तार पकड़ेगी, ज़िंदगियाँ फिर पटरी पर आएँगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लबों से नाम हटेगा मेरा, पर साँसों में एक नमी रहेगी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हर महफ़िल के मुकम्मल होने में, बस एक छोटी सी कमी रहेगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं ज़मीन का हिस्सा बनूँगा, पर हर लफ़्ज़ में बहता रहूँगा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम जब भी तन्हा बैठोगे, मैं हवा बन कुछ कहता रहूँगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बच्चे अपनी दुनिया की दौड़ में आगे निकल जाएँगे,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नए सपने, नई उलझनों में रोज़ उलझकर ढल जाएँगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरी बातें उनके लिए बस इक गुज़रा हुआ इतिहास बनेंगी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कभी-कभार के ज़िक्र में ही बस मेरी कोई याद जगेगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रिश्ते-नाते, साथी-संगती अपने कामों में रम जाएँगे,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वक्त की धूल चढ़ेगी मुझ पर, वो अपनी राह बढ़ जाएँगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर उस घर की एक अलमारी में, मेरी तस्वीर के साए में,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक शख़्स खड़ा होगा तन्हा, बीते लम्हों को समेटे खुद में।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरी चाय की खाली प्याली को, वो चुप्पियों से सहलाएगी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरी पुरानी कमीज़ों से, मेरी खुशबू ढूँढ के लाएगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज़माना आगे बढ़ेगा और सब भूलने का ढोंग करेंगे,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो आँखें चुरा के रोएगी, जब लोग मेरी बातें बंद करेंगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुनिया के लिए मैं एक बीता हुआ सा पन्ना हो जाऊँगा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर उसकी हर धड़कन में, मैं खुद को ज़िंदा पाऊँगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके सन्नाटों की सरगम में, मेरा ही एक तराना होगा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब भूल चुके होंगे मुझे, पर उसके लिए मैं ही ज़माना होऊँगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हवा जब भी उसके गेसुओं को हौले से सहलाएगी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो मुस्कुरा के समझ जाएगी... कि मेरी याद मिलने आई है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो हौले से मुझे महसूस करेगी, मन ही मन मुस्कुराएगी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन हवाओं को खुद में समेट, मुझे कस कर गले लगाएगी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/4533946425029661835/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/09/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/4533946425029661835'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/4533946425029661835'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/09/blog-post.html' title='जब मैं ना रहूंगा'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-5404523159368067801</id><published>2026-06-12T18:55:57.718+05:30</published><updated>2026-06-12T18:55:57.719+05:30</updated><title type='text'>रघुबर</title><content type='html'>&lt;p&gt;चेतना के इस तिमिर झंझावात में,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बुद्धि की नौका डगमगाती जब,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संदेह के घने मेघ अंबर में,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आस्था के दीप को बुझाते तब।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शिथिल पड़ जाते विकल प्राण,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिशाएं सब मौन हो डसती हैं,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नियति की निष्ठुर, कुटिल रेखाएं,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विवशता पर मेरी हंसती हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब अंतर के सूने नभ में,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक नीरव राग झंकृत होता,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मर्यादा का वह महासिंधु,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे अवसाद के आंसू धोता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;न कोई काया, न कोई वाणी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बस एक दिव्य स्पंदन जगता है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो कल तक था उलझन का मरुथल,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह कल्पवृक्ष की छांव सा लगता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समीर का धीमा सा वह झोंका,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कह जाता है - धीर हमेशा धरना तुम।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पल्लव से टपकी ओस की बूंद,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कहती - भीतर शांत ही रहना तुम।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किरण जो चीरती घने तम को,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह रघुवर का ही तो सांत्वन है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो बिखरी राह को सुगम कर दे,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह प्रभु का ही कर - लोचन है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब द्वंद्व नहीं, ना कोई व्याकुलता,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हर उलझन उनकी करुणा का उपक्रम है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहां खो जाती हैं जगत की राहें,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहीं से अनंत &#39;राम&#39; का उद्ग्म है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/5404523159368067801/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_448.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/5404523159368067801'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/5404523159368067801'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_448.html' title='रघुबर'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-3052924361706159038</id><published>2026-06-12T18:34:01.252+05:30</published><updated>2026-06-12T18:34:01.252+05:30</updated><title type='text'>विरक्ति</title><content type='html'>&lt;p&gt;गंगा की लहरों पर बहती, एक ठंडी, निश्छल रात है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सामने मणिकर्णिका पर सजती, इंसानी औकात है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लपटें अंबर को छूती हैं, लाल-नारंगी साया है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये जलता हुआ शरीर नहीं, जलती हुई एक माया है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक चिता पर यौवन जलता, एक पे बूढ़ा बचपन है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस तन पर कल तक नाज़ था, आज वो केवल ईंधन है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धुएँ के हर एक कतरे में, कोई सपना रूठ रहा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संसार का सबसे पक्का, हर एक धागा टूट रहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्यों दौड़ रहा था जीवन भर? क्या खोया और क्या पाया है?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुट्ठी खाली ही आई थी, मुट्ठी खाली ही जाना है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये नाम, ये रुतबा, ये कोठी, सब माटी का एक ढेरा है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसे तू अपना कहता था, वो केवल रैन-बसेरा है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देखते-देखते इस सच को, मन भीतर से टूट गया,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मोह था इस झूठी जग से, पल भर में वो छूट गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लगा कि मैं भी राख ही हूँ, बस थोड़ा सा ठहरना है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी आग की आग़ोश में, एक रोज़ मुझे भी मरना है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तभी, एक चिता की तपिश ने मुझको दूर से छुआ था,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विरक्ति के उस सन्नाटे में, एक गहरा जुड़ाव हुआ था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह राख जो उड़कर बहती है, इस मिट्टी का ही हिस्सा है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं अलग कहाँ हूँ इस जग से? यह मेरा भी तो किस्सा है!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये रोते हुए जो लोग खड़े, इनके भीतर भी मैं ही हूँ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो जलकर राख हुआ इस पल, उस मंज़र में भी मैं ही हूँ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुख-सुख का ये ताना-बाना, हम सबको एक बनाता है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मरने वाले से भी गहरा, जीने का एक नाता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जुड़ाव विरक्ति से जुदा नहीं, दोनों ही एक स्वरुप हैं,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो खोने के डर से मुक्त हुआ, वो ही तो प्रेम का रूप है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मणिकर्णिका की आग ने, मुझको मुझसे ही मिलवाया है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीने की असली कीमत को, मरते जीवन ने सिखाया है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/3052924361706159038/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_554.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/3052924361706159038'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/3052924361706159038'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_554.html' title='विरक्ति'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-2435411489804961659</id><published>2026-06-12T17:57:19.519+05:30</published><updated>2026-06-12T17:57:19.519+05:30</updated><title type='text'>झल्ली</title><content type='html'>&lt;p&gt;वह ज़रा सी उलझी, ज़रा सी साफ़ है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़ी अजीब लड़की है, खुदा का इंसाफ़ है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसकी आँखों में समंदर है, मगर प्यास भी है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हँसती है तो लगती है जैसे, कोई पुरानी आस है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़ी अजीब लड़की है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो कभी तेज़ हवाओं सी बहती है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तो कभी ठहरे पानी सी शांत रहती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बातों-बातों में दुनिया जीत लेती है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;और तनहाइयों में खुद से ही डरती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़ी अजीब लड़की है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसका होना, न होना, किसी पहेली सा है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसका चुप रहना भी, किसी राग-रागिनी सा है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो अपनी ही दुनिया की रचयिता है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसमें हकीकत कम और ख्वाबों का रेला है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़ी अजीब लड़की है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कभी वो चाँद की रौशनी को छूना चाहती है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तो कभी अपनी परछाईं से ही मुख मोड़ लेती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज़िद उसकी ऐसी कि पत्थर पिघला दे,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;और नाज़ुक इतनी कि एक लफ्ज़ पर टूट जाती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब कहते हैं उसे, कि बदल जाना चाहिए,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वक्त के साथ खुद को ढाल लेना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर वो जो है, उसे वही बनकर रहना है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी शर्तों पर जीने का उसे जुनून सहना है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़ी अजीब लड़की है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो किसी की समझ में नहीं आती,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे किताब हो कोई, जिसे बस पढ़ना है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मगर जिसका कोई भी पन्ना पूरा नहीं होता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो ज़रा सी नादान, ज़रा सी समझदार है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसकी खामोशियों में छिपा एक अजब सा प्यार है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोग पूछते हैं, &quot;कौन है वो? क्या है वो?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं बस मुस्कुरा देता हूँ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो कोई ख्वाब, या बस एक एहसास है...&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बड़ी अजीब लड़की है, पर बहुत ही खास है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/2435411489804961659/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_126.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/2435411489804961659'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/2435411489804961659'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_126.html' title='झल्ली'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-7575847511769146359</id><published>2026-06-12T17:45:58.435+05:30</published><updated>2026-06-12T17:45:58.435+05:30</updated><title type='text'>देखो पापा, मैं बड़ा हो गया</title><content type='html'>&lt;p&gt;उंगली पकड़कर चलना सीखा, अब खुद दौड़ लगाता हूँ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हज़ार उलझने जीवन की अब खुद ही सुलझा लेता हूँ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो जो छोटी सी चोट पे रोता था, अब दर्द छुपाना सीख लिया,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीतर चाहे तूफान उठे, पर बाहर मुस्कुराना सीख लिया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कंधों पर अब घर का बोझ, उठाना भी मुझे आ गया,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ आ गया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपकी कमीज़ें अब मेरे बदन पर फिट आने लगी हैं,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुनिया की कड़वी बातें भी अब मुझको भाने लगी हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कल तक जो बातें आपकी, मुझको लगती थी पाबंदी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज समझ में आता, क्यों की थी आपने वो नाकाबंदी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हवाओं के रुख को मोड़ सकूँ, इतना हुनर मुझमें आ गया,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ आ गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धूप में जलकर काम करूँ तो आपकी मेहनत दिखती है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह मतलबी दुनिया है, यहाँ हर चीज़ की कीमत दिखती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पैसे कमाने की दौड़ में जब पांव मेरे थक जाते हैं,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब आपके फटे हुए पुराने जूते याद आ जाते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कि कैसे आपने सब सहा, ये अहसास रगों में समा गया,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ अब आ गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिद तो अब भी करता हूँ, पर खुद से ही लड़ जाता हूँ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शाम को जब घर लौटता हूँ, और ज़िम्मेदार बन जाता हूँ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कद मेरा बढ़ गया आपसे, पर साया आपका ही चाहिए,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस मतलबी सी दुनिया में पापा, सहारा आपका ही चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बचपन पीछे छूट गया, मैं वक्त की धूल में नहा गया,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ आ गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर सच कहूँ तो आज भी, वो बच्चा दिल में बाकी है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपकी एक शाबाशी मिल जाए, बस इतना ही काफी है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भले ही दुनिया की नज़रों में, मैं ऊँचे मकाम पर खड़ा हूँ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर आपके सामने छोटा रहूँ, तो ही सच में बड़ा हूँ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज़िंदगी के इस सफ़र में, मैं अब खुद एक रास्ता पा गया,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देखो पापा, मैं बड़ा हो गया, पापा होना समझ अब आ गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/7575847511769146359/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_12.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/7575847511769146359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/7575847511769146359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_12.html' title='देखो पापा, मैं बड़ा हो गया'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-5482509023998845011</id><published>2026-06-11T11:10:36.994+05:30</published><updated>2026-06-11T11:10:36.995+05:30</updated><title type='text'>फकीरी</title><content type='html'>&lt;p&gt;बटुआ मेरा नहीं है भारी, ना ही कोई बड़ी दुकान है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर दोस्तों की महफ़िल में, मेरी अपनी ही एक शान है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;महल नहीं है रहने को मेरे, ना कोई मखमली लिबास है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर जो मिला सुकून से खाया, यही सबसे खास है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हाँ, है मुझ में खूब अमीरी, सीखा है मैंने इस फकीरी में।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गाड़ी मेरी कोई बड़ी नहीं, जो सड़कों पर धुआँ उड़ाए,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर कंधे मेरे यारों के, हर मुश्किल में साथ निभाए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कपड़ों पर कोई ब्रैंड नहीं, सादगी का ही चोला है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिल में कोई बैर नहीं, यह सबसे सीधा-भोला है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हाँ, है मुझ में खूब अमीरी, सीखा है मैंने इस फकीरी में।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विरासत में नहीं मिली तिजोरी, नाहीं कोई बैंक बैलेंस है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माँ-बाप के संस्कार हैं, मेरे व्यक्तित्व का एक्सीलेंस है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनों का हाथ है मेरे सर पर, तो हर मुश्किल आसान है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन चंद वफ़ादार चेहरों में ही, बसता मेरा सारा जहान है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हाँ, है मुझ में खूब अमीरी, सीखा है मैंने इस फकीरी में।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुनिया नापती होगी अमीरी, पैसों और मकानों से,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं दौलत अपनी गिनता हूँ, अपनों की मुस्कानों से।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगर दिल का अमीर होना ही, सबसे बड़ी जागीर है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तो सुन लो मेरे यारों, मेरी टक्कर का ना कोई फ़कीर है!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हाँ, है मुझ में खूब अमीरी, सीखा है मैंने इस फकीरी में।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/5482509023998845011/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_11.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/5482509023998845011'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/5482509023998845011'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_11.html' title='फकीरी'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-8274473982818565815</id><published>2026-06-10T11:30:32.796+05:30</published><updated>2026-06-10T11:30:32.796+05:30</updated><title type='text'>एक कप ठहराव</title><content type='html'>&lt;p&gt;दिल्ली की वो कड़कड़ाती ठण्ड थी, थोड़ी ओस में डूबी, थोड़ी रुमानियत से भरी। सुबह के आठ बज रहे थे। मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन के बाहर कोहरे की एक मोटी चादर पसरी हुई थी। भगवान दास रोड की नुक्कड़ पर हरी भाई की चाय की दूकान से निकलता सफ़ेद धुआं कोहरे के साथ घुल मिल कर अपना वज़ूद खो रहा था। चाय की सोंधी खुशबु कोहरे को सुगन्धित कर रही थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपन अपनी ओवरकोट की जेब में हाथ डाले उस ठंड से दो - दो हाथ कर रहा था। सिकुड़ता - सिमटता वो हरी भाई की दूकान तक पहुंचा की चाय की गर्माहट उसके बर्फ से जमे हाथों और ठन्डे होते जिस्म में कुछ गर्मी दे जाये। तपन नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (NDS) का थिएटर आर्टिस्ट था। उसके दोनों हाथ ओवरकोट की जेब में थे और बगलों में प्ले की स्क्रिप्ट के कुछ पन्ने दबे थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;हरी भाई, एक कड़क चाय देना, अदरक मारकर&quot; तपन ने ठण्ड से कंपकंपाती आवाज में कहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;और हरी भाई, एक मेरी भी... बिना चीनी और थोड़ी ज्यादा इलायची&quot; पीछे से एक खनकती हुई आवाज आई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हरी भाई ने मुड़कर देखा। वह रुपल थी। तपन उसे जानता था, वह उसी के नाटक में लीड एक्ट्रेस थी, लेकिन दोनों के बीच अब तक सिर्फ &#39;हाय-हेलो&#39; वाली ही औपचारिक बातचीत हुई थी। रुपल ने मैरून कलर की सूट पहनी थी जिसपे डीप ग्रीन ओवरकोट पहना था। सिर पर हलकी हरे रंग की मफलर लपेटा हुआ था। ठण्ड के मारे उसका रंग गुलाबी हो गया था उसकी नाक हल्की सी लाल हो रही थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हरी भाई ने मिट्टी के दो कुल्हड़ आगे बढ़ा दिए। चाय इतनी गर्म थी कि कुल्हड़ पकड़ते ही दोनों की हथेलियों को एक मखमली गर्माहट का अहसास हुआ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;उफ़! यह ठंड तो जान ले लेगी&quot; रुपल ने कुल्हड़ से उठती भाप को अपने चेहरे की तरफ लेते हुए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपन ने चाय की एक चुस्की ली और मुस्कुराया, &quot;इस ठंड की बस यही एक अच्छी बात है। हल्की सी गर्माहट स्वर्ग का आभास देने लगती है और चाय अमृत जैसी लगती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रुपल ने तपन के हाथ में दबे स्क्रिप्ट के पन्नों को देखा। &quot;सुबह-सुबह डायलाग रटे जा रहे हैं? वैसे, वो तीसरे सीन की जो तुम्हारी लाइनें हैं ना... &#39;तुम जानती हो तुम मेरे लिए बनी हो। तुम ठहर क्यों नहीं जाती&#39;... वो तुम बहुत जल्दी में बोल जाते हो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपन चौंक गया। &quot;अच्छा? तुम्हें ऐसा लगता है?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;हां,&quot; रुपल ने अपने कुल्हड़ को दोनों हाथों से भींचते हुए कहा, &quot;उस लाइन में एक ठहराव होना चाहिए। जैसे इस चाय को पीने में है। तुम भागते से जाते हो उस लाइन से।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस सुबह की चाय के बाद जैसे एक अनकहा सिलसिला शुरू हो गया। थियेटर की रिहर्सल नौ बजे शुरू होती थी, लेकिन कबीर और अहाना दोनों ही सवा आठ बजे मंडी हाउस के उस नुक्कड़ पर मिलने लगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहां कोई रेस्टोरेंट वाली औपचारिकता नहीं थी, कोई महंगी कॉफी नहीं थी। बस मिट्टी के दो कुल्हड़ थे, सर्दियों की गुनगुनी धूप थी और दो दिल थे जो धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आ रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बातें नाटक की स्क्रिप्ट से शुरू होतीं और धीरे-धीरे उनकी निजी जिंदगी के पन्नों तक पहुंच जातीं। रूपल को पता चला कि तपन को पुरानी गजलें पसंद हैं, और तपन ने जाना कि रूपल जब बहुत खुश या उदास होती है, तो बहुत तेज - तेज बोलती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;तुम्हें पता है तपन?&quot; एक दिन रूपल ने अपनी चाय में डूबा हुआ बिस्कुट बचाते हुए कहा, &quot;मुझे जिंदगी में चकाचौंध से ज्यादा यह सादगी पसंद है। एक गरम कुल्हड़ हाथ में हो, तो लगता है दुनिया की सारी खुशियां बस यहीं सिमट गई हैं। और हाँ, अगर कोई उस चाय में साथ देने वाला मिल जाये तो जैसे जिंदगी पूरी लगने लगती है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपन उसे देखता रह गया। उसने मन ही मन सोचा, &#39;और मुझे उस कुल्हड़ को पकड़े हुए तुम पसंद हो। मैं हूँ वो साथ देने वाला जो तुम्हारे साथ जीवन भर चाय पीना चाहता है कि तुम खुद को मुकम्मल कर सको।&#39;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन वह कह नहीं पाया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लगभग डेढ़ महीने की रिहर्सल के बाद आखिरकार नाटक के मंचन का दिन आ गया। ऑडिटोरियम खचाखच भरा था। नाटक अपने आखिरी मोड़ पर था। मंच पर तपन और रूपल आमने-सामने थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाटक की स्क्रिप्ट के मुताबिक, रूपल को तपन को छोड़कर दूर जाना था, और तपन को उसे रोकना था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपन आगे बढ़ा। उसने रूपल की आंखों में देखा। वहां स्टेज की लाइट्स की चमक थी, लेकिन तपन को उस चमक में भगवान् दास रोड के नुक्कड़ वाली रूपल दिखी - मफलर लपेटे, चाय की भाप के पीछे मुस्कुराती हुई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तपन ने रूपल का हाथ थामा। इस बार उसके शब्दों में कोई जल्दबाजी नहीं थी। उसने पूरी शिद्दत और गहरे ठहराव के साथ अपनी वह अधूरी लाइन बोली:&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;तुम जानती हो तुम मेरे लिए बनी हो। तुम ठहर क्यों नहीं जाती... मेरी क्यों नहीं हो जाती, जीवनभर के लिए तुम ठहर क्यों नहीं जाती...&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। नाटक खत्म हुआ, पर्दा गिरा। सबने दोनों की अदाकारी की जमकर तारीफ की।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाटक के बाद, जब सब लोग बैकस्टेज पार्टी की तैयारी कर रहे थे, तपन चुपके से बाहर निकल आया। वह सीधा हरी भाई की दुकान पर गया। कुछ देर बाद रूपल भी अपना कॉस्ट्यूम बदले, वही पुराना मफलर डाले वहां पहुंच गई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;तो... आखिरकार तुमने वह लाइन सही से बोल ही दी,&quot; रूपल ने आते ही कहा। &quot;और वो improvisation क्या था! इन डेढ़ महीनों के रिहर्सल में तो ये लाइन कभी नहीं बोली गयी। स्क्रिप्ट में भी नहीं थी वो लाइन!&quot; रूपल कुछ और भी जानना चाह रही थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;पता नहीं कहाँ से आई वो बाद की लाइन। बस बोल दिया।&quot; तपन ने हरी भाई से चाय के दो कुल्हड़ लेते हुए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रूपल ने कुल्हड़ थामा। तपन ने गहरी सांस ली, अपने दिल की धड़कनों को संभाला और रूपल की आंखों में देखते हुए बोला, &quot;रूपल... वह सिर्फ नाटक की लाइन नहीं थी। मैं सच में चाहता हूं कि तुम... मेरी जिंदगी में हमेशा के लिए ठहर जाओ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रूपल ने तपन को देखा। हवा में अदरक और इलायची की सोंधी महक घुली हुई थी। रूपल के चेहरे पर एक हया की खूबसूरत सी लाली दौड़ गई। उसने अपनी चाय की चुस्की ली, तपन के कुल्हड़ से अपना कुल्हड़ हल्का सा टकराया, Cheers बुदबुदाया और धीरे से कहा:&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;चाय ठंडी हो रही है तपन... और मैं अब कहीं नहीं जा रही।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शाम की उस कड़कती ठंड में, चाय के दो गर्म कुल्हड़ों के बीच, एक बेहद मासूम और सुलगते हुए प्रेम का सफर मुकम्मल हो चुका था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/8274473982818565815/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_10.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/8274473982818565815'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/8274473982818565815'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_10.html' title='एक कप ठहराव'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-7700870789167332834</id><published>2026-06-09T13:37:01.004+05:30</published><updated>2026-06-09T13:46:22.842+05:30</updated><title type='text'>वियोग</title><content type='html'>&lt;p&gt;उठ चला चरण, छू अवध-धूल,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रो पड़ी चेतना, मुरझाईं कुल;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दृग-कोर खुले, फूटी सावन,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बह चली तमस की एक पवन।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोचन-मद से घुल मिला सघन,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंजन का वह श्यामल सावन;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गंगा-यमुना का श्वेत हास,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बन गया आज कज्जल-विलास!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह बह निकली अविरल धारा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसमें डूबा साकेत सारा;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;थी सरयू निर्मल, शांत, शुचि,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर पा न सकी अपनी मरुचि।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मूर्छित तरंग, कंपित विहान,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;काली लहरों का हुआ गान;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सरयू में मिलकर कृष्ण-धार,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बन गई शोक का हाहाकार!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह तिमिर-सिंधु का पैरहन,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लो, लील रहा भू का स्पंदन;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पल्लव-पल्लव पर विषाद-राग,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धरती पर सोई आज आग।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;थी विकल धरा, व्याकुल गगन,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;घुट घुट रोता था कण-कण मन;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस महा-शोक की कालिमा से,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संसार हुआ ज्यों तमस-मगन!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रजनी का क्रंदन फैला अनंत,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे राम! तुम्हारा यह कैसा वसंत?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भू काली, अंबर काल-रूप,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;छाया विराग का महा-कूप!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह चली धार साकेत छोड़,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंबर का कज्जल-मुँह मरोड़;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;थी चली जहाँ राघव-चरण-धूल,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर विकल हुए गिरिवर के शूल!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;थी विकल धरा, व्याकुल गगन,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;घुट घुट रोता था कण-कण मन;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस महा-शोक की कालिमा से,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संसार हुआ ज्यों तमस-मगन!&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लो, चित्रकूट का हरित-हास,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्षण भर को भूल गया विकास;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निर्झर के स्वर में थमा गान,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तरु-तरु ने तज दिया दिव्य तान!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मंदाकिनी की वह स्वच्छ धार,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्यामल विषाद का बनी हार;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पायस्वनी का कंचन शरीर,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शोक की कालिमा से हुआ अधीर!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गिरि-शृंगों पर जो धूप-केश,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहने थे स्वर्णभ अमित वेश;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन पर भी बिखरा अंजन-शोक,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धुंधला सा दीखा सिद्ध-लोक!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;काले तरु की कातर पुकार,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे विलाप की हो कतार;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पशु-पक्षी का थमता विहंग,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;छू गया तमस का क्रूर ढंग!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कण-कण में व्यापे राम-नेह,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर विरह-बाण से विद्ध देह;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चित्रकूट भी अवध-शोक से,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;घिर गया तनिक परलोक से!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;थी विकल धरा, व्याकुल गगन,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;घुट घुट रोता था कण-कण मन;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस महा-शोक की कालिमा से,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संसार हुआ ज्यों तमस-मगन!&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह व्याकुल जन का महा-नाद,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ले चला साथ सृस्टि - विषाद;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;हा राम! लौट आओ&#39; पुकार,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नभ को देती शायक की मार!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हर कंठ बना था करुण राग,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उर में सुलगती विरह-आग;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्या वृद्ध, युवा, क्या विवश बाल,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सब झेल रहे थे वज्र-काल!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चिल्ला उठी अवध की धरा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्नत मस्तक, भय से भरा;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फैली बाहें नीले अनंत,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लौटा दो हमारा वह वसंत!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आँखों में नीर, है मन अधीर,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंबर से टकराता शरीर;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शून्यत्व चीरती जैसे वह पुकार,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे विलाप का वहां हो ज्वार!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे देव! सुनो यह आर्त-दान,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्यों रूठ गया हमसे विहान?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तज कर साकेत का राज-वेश,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्यों चला गया वह प्राण-ईश?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;थी विकल धरा, व्याकुल गगन,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;घुट घुट रोता था कण-कण मन;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस महा-शोक की कालिमा से,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संसार हुआ ज्यों तमस-मगन!&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;# मरुचि - कान्तिहीनता&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;# पैरहन - पोशाक (फ़ारसी)&lt;/p&gt;&lt;p&gt;# पायस्वनी - मन्दाकिनी नदी का प्रर्यायवाची&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;# शायक - बाण / तीर&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;# मही - पृथ्वी / धरा&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/7700870789167332834/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_09.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/7700870789167332834'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/7700870789167332834'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_09.html' title='वियोग'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-2592086095807414756</id><published>2026-06-04T14:42:55.052+05:30</published><updated>2026-06-04T14:42:55.052+05:30</updated><title type='text'>एक कप Imperfection</title><content type='html'>&lt;p&gt;विक्रम और अवंतिका आज के affluent couple थे। हाड़ तोड़ मेहनत कर के अपना एक मुकाम बनाया था। 15 साल लंदन में रह कर आये थे। खूब पैसा कमाया था। जानते थे की हिंदुस्तान में लंदन नहीं मिलेगा फिर भी यहाँ शिफ्ट कर गए थे। पैसे तो यहाँ भी दोनों बहुत ही अच्छा कमा रहे थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विक्रम एक मल्टीनेशनल Hedge - Fund कंपनी में Senior Analyst था। उसकी बीबी अवंतिका दुनिया की जानी मानी Art Curator थी। दोनों ही new age business में थे तो दौलत भी बढ़ती जा रही थी उनकी। गुडगाँव की एक नफीस सी जगह पर 10 करोड़ का पेंटहाउस ख़रीदा था। यही उनका आशियाना था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनकी सुबह उनके स्मार्ट होम के Ambient Wake Up अलार्म से होती थी। 7 बजते ही उनकी पेंटहाउस के automatic पर्दे धीरे से खुल जाते और बैकग्राउंड में बहुत ही धीमा, क्लासिकल जैज़ म्यूज़िक बजने लगता। अवंतिका अपने Carine Gilson के नाईट गाउन को संभालते हुए Ethiopian Roast Coffee Beans को खुद grind करती और एक बेहतरीन कॉफ़ी बनाती महंगी कॉफ़ी मशीन में। वहीं विक्रम Morning Breakfast के लिए आर्गेनिक अवोकार्डो टोस्ट और soaked चिआ सीड्स की प्लेट सजा रहा होता।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दोनों अपने आलिशान बंगले के गार्डन में महंगे पौधों के बीच अपनी महंगी जिंदगी जी रहे थे। उनकी बातचीत में हिंदी के शब्द उतने ही होते जितने उनकी डाइट में कार्बोहाइड्रेट्स। जिंदगी खुशहाल थी और दोनों एक दूसरे से बेहद खुश थे। यही उन्होंने चाहा भी अपनी जिंदगी से।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;विक्रम, आज शाम को मिस्टर एंड मिसेस रायचूरकर के साथ हमारा डिनर &quot;The Vintage Hall - Taj&quot; में है। प्लीज समय पर आ जाना। And yes, don&#39;t forget to wear that TAG Heuer Signature Carrera Model watch, ये मुझे बहुत पसंद है।&quot; अवंतिका ने अपने iPad पर अपना शेड्यूल चेक करते हुए कहा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;Don&#39;t Worry Babes, I will ensure looking best for you this evening, बस देख लेना मिसेस रायचूरकर को मुझपे Crush ना हो जाये?&quot; विक्रम ने आँखों में शरारत भरते हुए कहा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक हलकी हंसी तैर गयी उस सुहाने बाग़ में।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ ऐसे ही उनकी जिंदगी नपी तुली ख़ुशी, सोफिस्टिकेटेड हंसी और नफीस प्यार के साथ गुजर रही थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शाम को दोनों अपनी मर्सिडीज-बेन्ज से डिनर के लिए निकले। दिल्ली की बारिश के बाद मौसम सुहाना था, लेकिन सड़कों पर ट्रैफिक का बुरा हाल था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अचानक, एक चौराहे पर उनकी गाड़ी के आगे एक ऑटो रिक्शा बंद हो गया। विक्रम ने थोड़ा झल्लाकर हॉर्न बजाया। अवंतिका ने धीरे से कहा, &quot;काम डाउन विक्रम, इट्स सो अनप्रोफेशनल टू हॉंक लाइक दैट।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तभी सड़क के किनारे, एक पुरानी नीम के पेड़ के नीचे बनी एक छोटी सी टपरी पर विक्रम की नज़र गई। वहां तिरपाल के नीचे एक कोयले की भट्टी सुलग रही थी। मिट्टी के कुल्हड़ों से भाप निकल रही थी। बारिश की बूंदें गरम तवे पर गिरकर छन-छन की आवाज कर रही थीं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहां कुछ &#39;साधारण लोग&#39; एक साथ खड़े होकर कुल्हड़ की चाय हाथ में लिए किसी बात पर हंस रहे थे। एक लड़का जोर-जोर से हंसते हुए अपने दोस्त के कंधे पर हाथ मार रहा था। वहां कोई मैनर्स नहीं थे, कोई क्लासिकल जैज़ नहीं था, लेकिन वहां एक ऐसी चीज़ थी जो विक्रम और अवंतिका के लिविंग रूम में अक्सर गायब रहती थी - बेपरवाह, बेसाख्ता जिंदगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पता नहीं क्यों विक्रम ने गाड़ी को साइड में रोका। ये उस नीम के पेड़ के नीचे की टपरी से कुछ पहले था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;व्हाट आर यू डूइंग विक्रम? वी आर गेटिंग लेट,&quot; अवंतिका ने अपनी रोलेक्स में अपनी कीमती समय को देखते हुए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;अवंतिका, हमने आखिरी बार बिना किसी एजेंडे के, बिना किसी बिजनेस टॉक के, सिर्फ एक-दूसरे के साथ हंसते हुए वक्त कब बिताया था?&quot; विक्रम ने अवंतिका की आंखों में देखते हुए पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अवंतिका चुप हो गई। उसके पास इस बात का कोई सोफिस्टिकेटेड जवाब नहीं था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;चलो, आज कुछ ऐसा करते हैं जो हमारे &#39;स्टेटस&#39; को सूट नहीं करता,&quot; विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दोनों गाड़ी से नीचे उतरे। अवंतिका ने अपनी सैंडल्स को कीचड़ से बचाते हुए टपरी की तरफ कदम बढ़ाए। टपरी वाले ने दो आलीशान कपड़े पहने लोगों को देखकर फौरन स्टूल साफ किया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;भैया, दो कड़क कुल्हड़ चाय देना। अदरक वाली, &quot;विक्रम ने पहली बार अंग्रेजी लहजा छोड़कर बिल्कुल देसी अंदाज में कहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब गरम मिट्टी का कुल्हड़ अवंतिका के मैनीक्योर किए हुए हाथों में आया, तो पहले तो उसे थोड़ा अजीब लगा। लेकिन जैसे ही उसने पहला घूंट लिया, उसकी आंखें बंद हो गईं। अदरक, इलायची और मिट्टी की वो सोंधी खुशबू... जो किसी फाइव-स्टार होटल की कस्टमाइज्ड Chamomile Tea में कभी नहीं मिल सकती थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पास खड़े लोग किसी चुटकुले पर जोर से हंसे, तो इस बार अवंतिका ने नाक नहीं सिकोड़ी। बल्कि उसकी होंठों पर भी एक असली, बिना किसी बनावट वाली मुस्कान आ गई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विक्रम ने अवंतिका का हाथ पकड़ा। दोनों ने बिना कुछ कहे, सिर्फ चाय की चुस्कियों और बारिश की आवाज़ के बीच बीस मिनट बिता दिए। कोई फोन नहीं देखा गया, कोई शेड्यूल री-चेक नहीं हुआ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गाड़ी में वापस बैठते हुए अवंतिका ने कहा, &quot;यू नो विक्रम, कभी-कभी बहुत ज्यादा परफेक्ट होने की कोशिश में, हम जीना ही भूल जाते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विक्रम ने गाड़ी स्टार्ट की और मुस्कुराया, &quot;तो फिर तय रहा। हर संडे, हमारी सोफिस्टिकेटेड क्रॉकरी को थोड़ा आराम मिलेगा, और हम अपनी औकात से बाहर जाकर... थोड़ी जिंदगी पिएंगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस रात, मिस्टर एंड मिसेस रायचूरकर के साथ महंगी वाइन पीते हुए भी, विक्रम और अवंतिका के जेहन में उस मिट्टी के कुल्हड़ का स्वाद और उसकी सादगी बनी रही। उन्हें कहीं ये समझ में आ रहा था कि जिंदगी में थोड़ा Imperfection उसे और रोमांचक बना देते हैं। वे समझ रहे थे की जहाँ से उठ कर यहाँ पहुंचे थे, कभी - कभी वहां वापस जाना आपको खुद से, अपने अतीत से जुड़ने में मदद ही करता है।&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/2592086095807414756/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/affluent-couple-15-hedge-fund-senior.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/2592086095807414756'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/2592086095807414756'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/affluent-couple-15-hedge-fund-senior.html' title='एक कप Imperfection'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-4645584011297205844</id><published>2026-06-02T14:14:52.404+05:30</published><updated>2026-06-02T14:14:52.404+05:30</updated><title type='text'>एक कप जिंदगी</title><content type='html'>&lt;p&gt;सिद्धार्थ 35 साल का था। एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में मिडिल लेवल मैनेजर था। काफी नाम और पैसा कमा रहा था। जीवन में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। लेटेस्ट iPhone, महंगी कार, शहर के पॉश इलाके में 3 - BHK फ्लैट, महँगी क्लब मेम्बरशिप, वीकेंड पर गोल्फ खेलना, साल में दो बार solo trip पर देश विदेश में घूमना और इंस्टाग्राम पर &quot;Living My Best Life&quot; हैशटैग वाली तस्वीरें। सब कुछ तो था उसके पास। दुनिया की नजरों में सिद्धार्थ &#39;successful professional&#39; था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अक्सर रात 2 - 3 बजे, जब नींद नहीं आती, वो अपनी 30वें माले की फ्लैट से नीचे देखता। पूरा शहर जगमग जगमग करता लेकिन फिर भी सिद्धार्थ खुद में एक अंधेरापन ही महसूस करता। लगता सीने में एक अजीब सी घुटन हो रही हो। उन शांत रातों में भी सिद्धार्थ के अंदर में एक कोलाहल होता रहता। लगता वो आगे बढ़ने की होड़ में कुछ तो पीछे छोड़ता जा रहा है। सबकुछ हो है उसके पास, फिर भी अंदर से वो बिलकुल खाली है। उसे समझ नहीं आता कि वह भाग किस चीज के पीछे रहा है। फिर अगले दिन के काम याद आ जाते। लगता अभी लैपटॉप खोले और कल के काम में लग जाए। रातें ऐसे ही उहापोह में बीतती। कभी नींद आ जाती कभी हल्की नींद में ही रात कटती।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सिद्धार्थ रोबोट बन गया था सफलता के पीछे भागते भागते। जिंदगी नीरस हो गयी थी और दिन मैकेनिकल।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नए प्रोडक्ट लॉन्च&amp;nbsp;की वजह से उसपर बहुत प्रेशर था। वो अपना सबकुछ इस प्रोजेक्ट पर लगा चूका था। कंपनी की उम्मीदें भी सिद्धार्थ से थोड़ी ज्यादा थी। ठीक प्रोडक्ट लॉन्च से पहले कुछ तो गलत हुआ और पूरा प्रोजेक्ट ही फेल हो गया। सिद्धार्थ अकेला उसको हेड कर रहा था। इस असफलता की सारी जिम्मेदारी उसपे आ गयी। बॉस सिद्धार्थ पर बुरी तरह चिल्लाया। बातें इस हद तक पहुँच गयी की बॉस ने सिद्धार्थ के professionalism पर ही सवाल उठा दिया। सिद्धार्थ अपनी गलतियों से भाग नहीं सकता था। उसे उस एक पल में लगा की उसकी सारी सफलता, सारा अनुभव बस मिथ्या ही है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो ऑफिस से थोड़ा जल्दी निकाल गया, अपनी गाड़ी निकाली और पता नहीं किस ओर चलने लगा। शहर की संकरी गलियों से बस अपनी गाड़ी निकाल रहा था। पूरी ख़ामोशी तिरी थी गाड़ी में। सिद्धार्थ अपने ख्यालों में था। आज पहली बार वो काम नहीं, खुद के बारे में सोच रहा था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जाना कहाँ था पता नहीं, मंजिल क्या थी नहीं मालुम। जैसे जिंदगी गुजर रही थी वैसे ही अभी उसकी गाड़ी चल रही थी। कुछ घंटे ऐसे ही वो शहर की सड़कों पर गाड़ी चलती रही बिना किसी मंजिल की तलाश में। रास्ते में उसे &quot;शर्मा टी स्टॉल&quot; का बोर्ड दिखा। अनमने मन से सिद्धार्थ ने अपनी कार वही लगा दी। ये काफी मशहूर चाय की दूकान थी शहर की। अमूमन यहाँ&amp;nbsp; रहती है। लेकिन इस वक़्त थोड़ा खाली रहता है यह दूकान। सिद्धार्थ बड़े ही अनमने मन से अपनी कार से निकला और वही एक खाली पड़ी बेंच पर बैठ गया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;चाय पियोगे बाबू।&quot; शर्मा जी ने चूल्हे के पास बैठे बैठे आवाज़ लगाई। सिद्धार्थ ने बस हामी में सिर हिलाया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शर्मा जी खुद ही चाय ले कर आये। अभी उनकी दूकान में काम करने वाले सारे लड़के खाना खा रहे थे। चाय की कुल्हड़ सिद्धार्थ को देते हुए बोले, &quot;सब ठीक है ना बाबू?&quot; सिद्धार्थ की मनःस्थिति उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। उस एक अपनापन भरी बात ने उसकी आंखों में आँसू भर दिया। वो फूट - फूट कर रो पड़ा। शर्मा जी ने उसके कंधे पर हल्के हाथ रखा। इस एक स्पर्श ने जैसे उसके अंदर के बच्चे को जगा दिया था। &quot;काका मैं थक गया हूँ। दिन रात भाग रहा हूँ, पर लगता है मैं पीछे छूटता जा रहा हूँ। एक पल को लगता की पतंग सी ऊँची उड़ान भर रहा हूँ, आसमान से बात कर रहा हूँ, और दूसरे पल आभास होता की मेरी डोर तो कब की कटी हुई है और मैं ऐसे ही बेवजह उड़ रहा हूँ, शायद कुछ समय में मैं जमीन पर आ गिरूं। क्या फायदा ऐसी जिंदगी का?&quot; अपने सारे विषाद सिद्धार्थ ना जाने क्यों शर्मा जी के सामने निकाल रहा था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शर्मा जी ने अपनी हाथ के दबाव को उसके कंधे पर थोड़ा बढ़ाते हुए दूसरे हाथ से पकड़ी चाय की कुल्हड़ उसे दे कर बोले, &quot;बेटा, मुझे नहीं मालुम तुम इस समय किस दौर से गुजर रहे हो? पहले तो ये चाय पियो, ये तुम्हारी मन की थकान को थोड़ा सम्हालेगा। और रही बात जिंदगी की तो ये तो तुम्हे ईश्वर ने उपहार में दिया है। कुछ फायदा ऊपर वाले ने देखा होगा तभी तो तुम्हे यह जीवन मिला है। बस यही सवाल खुद से पूछो की क्या जीवन के उस फायदे को तुम समझ भी पा रहे हो या नहीं। तुम ज़िन्दगी काट रहे हो या जी रहे हो ये तो तुम्हे ही सोचना होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शर्मा जी की चाय और शर्मा जी की बातें जैसे सिद्धार्थ के लिए pain killer का काम कर गयी। थोड़ी देर के लिए वो अपने आप में आ गया था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शर्मा जी ने थोड़ी सुक़ूनियत उसके चेहरे पर देखी। वो बोले, &quot;बेटा अपने काम से थोड़ा छुट्टी लो। खुद के लिए समय निकालो। खुद से बातें करो। ढूंढो क्या गलत हो रहा है, क्या गलत हो गया है। कैसे वो ठीक होगा। बात बन जाएगी। दौड़ना महत्वपूर्ण नहीं है, कहीं पहुंचना जरुरी है। ढूंढो कहाँ पहुंचना चाहते हो। सब ठीक हो जायेगा। तुम सब ठीक कर लोगे। खुद पर और उसपर भरोसा रखो।&quot; बोलते हुए शर्मा जी ने ऊपर की ओर देखा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सिद्धार्थ शर्मा जी की बात सुन रहा था या नहीं, वो खुद से जरूर बात कर रहा था उन चाय की घूंटों के साथ।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;काका, एक और चाय मिलेगी क्या?&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;बिलकुल मिलेगी बेटा।&quot; बोलते बोलते शर्मा जी चले गए एक और चाय लाने।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माहौल खुशनुमा हो गया था उस टी स्टॉल का। शर्मा जी के चेहरे पर वो सुकून साफ़ झलक रहा था। सिद्धार्थ इन पंद्रह मिनट की बातों और चाय के दो प्यालों में कुछ और खुद में आ गया था।&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सिद्धार्थ समझ गया था की इस Rat Race में भागने का कोई मतलब नहीं है। वो अपने खुद के pressure में आ गया था। उसे अब एक ठहराव की जरुरत थी कि खुद को समेट सके। उसे घर जाना है, घर जहाँ उसके मम्मी पापा हैं, अरसा हो गया है उनसे मिले हुए। बाकी ये जो हुआ है कंपनी में उसे तो वो जल्द ही सही कर लेगा। इतना तो वो जानता ही है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सिद्धार्थ बेंच से उठा, अपनी कार में बैठा और निकल पड़ा। वो इस दफा अपनी मंजिल जानता था। बस गाड़ी उसी मंजिल की ओर मोड़ दी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/4645584011297205844/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_02.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/4645584011297205844'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/4645584011297205844'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post_02.html' title='एक कप जिंदगी'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-6918376542827948176</id><published>2026-06-01T17:23:41.559+05:30</published><updated>2026-06-01T17:23:41.560+05:30</updated><title type='text'>एक कप अधूरी चाय</title><content type='html'>&lt;p&gt;गुडलक कैफ़े, शहर के एक मशहूर सड़क की सबसे मशहूर कैफ़े। ये ख़ास तौर पर नौजवानों में ज्यादा चर्चित कैफ़े था। इनके बन मस्का और ईरानी चाय का लगभग पूरा शहर दीवाना था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कहते हैं की इसका मालिक कुछ 70 साल पहले भारत आया था और पुणे शहर उसे काफी पसंद आ गया था। फिर तो वो पुणेकर ही बन गया। उसने यहाँ पर एक छोटी सी चाय की दूकान खोली थी इसी नाम से। वो बन मस्का और ईरानी चाय बना कर यहाँ बेचता था। ईरानी चाय इस शहर के लिए एक नया जायका था। यह जल्दी ही सबके जुबान पर चढ़ सा गया। पहले तो आर्मी के लोग यहाँ आया करते थे। धीरे धीरे पूरा शहर यहाँ उमड़ने लगा। जल्द ही ये एक छोटी दूकान से ये बड़ा cafeteria बन गया था। हालाँकि पिछले 60 - 65 वर्षों से यहाँ कोई और नया निर्माण नहीं हुआ था। उनका मानना था की वो कैफ़े की बिल्डिंग पर ध्यान देने के बजाय अपनी चाय पर ज्यादा ध्यान देंगे। आज भी वहां लगे बेंच और कुर्सियां 60 - 65 वर्ष पुराने थे।&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिवाकर जी यहाँ वर्षों से आ रहे थे। ठीक पाँच बजे वो यहाँ आते, सड़क की तरफ की खिड़की के पास लगे टेबल पर बैठते और दो कप ईरानी चाय मंगवाते, थोड़ी कम चीनी वाली। अपनी चाय पीते और कभी अपने सामने की कुर्सी को देख कर मुस्कुरा देते फिर खिड़की से बाहर आती जाती गाड़ियों और लोगों को जैसे पहचानने की कोशिश करते रहते। लगता वो किसी के साथ बैठ कर चाय पी रहे हों और बीच बीच में उसकी बातों पर मुस्कुरा देते हों। घंटे भर तक यही चलता और फिर वो अपनी चाय ख़तम कर के एक भरी ठंडी कप चाय वहीं छोड़ के चले जाते। आसपास के लोगों को लगता की शायद बुढ़ापे और अकेलेपन में वो सठिया गए हों। लेकिन कैफ़े का वेटर जानता था कि यह पागलपन नहीं, प्रेम है, इबादत है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसे ही एक शाम दिवाकर जी बैठे अपनी चाय पी रहते थे और खुद में ही खोये थे। पास ही एक जोड़ा बैठा अपनी बातों के बीच में उन्हें देख लेता था। थोड़ी देर तक तो वो बस दिवाकर जी को देखते रहे लेकिन फिर उनसे रहा नहीं गया। वो उनकी टेबल पर आ गए और बड़े ही स्नेह से पूछा, &quot;बाबा मैं आपको कुछ दिनों से देख रहा हूँ, आप आते हैं, दो कप चाय मंगवाते हैं, एक कप पीते हैं और दूसरा छोड़ के निकल जाते हैं। आप किसी का इंतज़ार कर रहे हैं क्या?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिवाकर जी ने नज़रे उठाई, जैसे अपनी तन्द्रा से बाहर आये हों। अपना चश्मा उतारा और एक फीकी मुस्कान बिखेरी। बोले, &quot;बेटा मैं और सरिता इसी रोड की कॉलेज में पढ़ते थे। यहाँ हम अक्सर आते, उसकी पसंद की चाय पीते और अपने अपने घर चले जाते। मैं उन दिनों चाय नहीं पीता था। सरिता ने मुझे चाय की आदत लगा दी थी। उन दिनों Love Marriage इतना आसान नहीं था। हमने जमाने से लड़ कर शादी की थी। 40 साल तक हमदोनो साथ थे। 3 साल पहले वो मुझे छोड़ कर कभी वापस नहीं आने के लिए चली गयी।&quot; दिवाकर जी की आँखें थोड़ी नम हो गयी थी। अपनी आँखों के समुन्दर से पार पाते हुए बोले, &quot;लेकिन मेरा दिल आज भी यह मानने को तैयार नहीं की वो अब मेरे साथ नहीं है। मैं रोज उसकी उपस्थिति अपने आसपास ही देखता हूँ। हम आज भी रोज साथ में यहाँ चाय पीते हैं। इस एक घंटे में वो मुझसे बाते करती है, मुझे हंसाती है, चिढ़ाती है, ढ़ेर सारी बाते करती है फिर जाने की ज़िद करने लगती है। बस उसके साथ ये एक घंटा रोज बिताने के लिए यहाँ आ जाता हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिवाकर जी बोलते बोलते अपनी कुर्सी से उठे, सामने की ठंडी हो चुकी प्याली को छूकर महसूस किया और बोले, &quot;यह प्याली ठंडी जरूर हो गयी है लेकिन उसकी यादों की गर्माहट आज भी मैं इनमे महसूस करता हूँ।&quot; बोलते बोलते वो वेटर को दो कप चाय के पैसे दिए और जाने लगे। जाते जाते सामने की कुर्सी को थोड़ा थपथपाया और हल्की आवाज में बोले, &quot;कल फिर मिलेंगे, तुम नाराज़ मत होना।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खन्ना जी ने चश्मा उतारा और भीगी नज़रों से उसे देखा। उन्होंने कहा, &quot;बेटा, मेरी पत्नी को इलायची वाली कम चीनी की चाय बहुत पसंद थी। चालीस साल तक हमने साथ बैठकर चाय पी। पाँच साल पहले वो चली गई, पर मेरा दिल यह मानने को तैयार नहीं होता।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो नौजवान जोड़ा उन्हें जाते हुए बस देख रहा था। अपनी प्रेमिका को उस नौजवान ने कस के पकड़ लिया और बोला, &quot;तुम मुझे छोड़ कर कभी मत जाना। मैं हमेशा तुम्हारे साथ बैठ कर चाय पीना चाहता हूँ।&quot; लड़की की आँखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/6918376542827948176/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/6918376542827948176'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/6918376542827948176'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/06/blog-post.html' title='एक कप अधूरी चाय'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-3520472143920971399</id><published>2026-05-29T18:00:21.052+05:30</published><updated>2026-05-29T18:00:21.052+05:30</updated><title type='text'>एक कप इंतजार</title><content type='html'>&lt;p&gt;यह इंजीनियरिंग कॉलेज का आखिरी साल था। इन चार सालों के दौरान सबने अपने जीवन के संभवतः सबसे बेहतरीन पल बिताये थे। सब के पास किस्सों की पूरी लाइब्रेरी थी। यह देश का सबसे बेहतरीन इंजीनियरिंग कॉलेज था सो पढ़ाई तो सब ने अच्छी की थी। तक़रीबन सभी के अच्छे प्लेसमेंट भी हो गए थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन इससे भी इतर, सब ने ज़िन्दगी जिया था। वो लाइब्रेरी की आँखों में बातें, वो बड़ी कैंपस में सब की नज़रों से खो जाने के पल, कंबाइंड स्टडी के नाम की दारु पार्टी, कुछ क्लासेज जान कर बंक करना और ना जाने कितने ऐसे पल सब के पास थे की इनकी यादों में ही सारी ज़िन्दगी बीत जाये।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मायरा और प्रबाल भी इन्ही में से एक थे। कॉलेज के पहले साल में ही इनकी अच्छी जमने लगी थी। ये दोनों एक दूसरे के &quot;बेस्ट फ्रेंड&quot; थे। फोर्थ ईयर में आते आते इन्हे अहसास होने लगा था की इन दोनों में थोड़ा थोड़ा प्यार भी है शायद। बस एक ही समस्या थी की दोनों में से किसी ने इज़हार नहीं किया था, या शायद कर नहीं पाए थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ आखिरी के कुछ महीने बचे थे कॉलेज के। आज मायरा और प्रबाल फिर से अपने पसंदीदा कैफ़े में अपनी पसंदीदा चाय का आनंद ले रहे थे। अजीब ये की चाय में दोनों की पसंद भी एक दम एक सी थी - थोड़ा दूध, ज्यादा अदरक और चीनी बिलकुल नहीं। और हाँ चाय उतारते उतारते उसमे एक तेजपत्ते का तड़का लगना चाहिए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनकी चाय टेबल पर आ चुकी थी। दोनों चुप से थे कैफ़े के उस टेबल पर। वहां सबसे तेज आवाज़ उनके चाय के कप के मेज़ पर रखने की आ रही थी। कुछ देर में प्रबाल को ये चुप्पी काटने को दौड़ने लगी थी। बोला, &quot;अगर ऐसे ही बैठना था तो हम आये क्यों हैं यहाँ पर। अपने अपने कमरे में ही ठीक थे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;प्रबाल, कुछ महीने बाद शायद हम मिल ना पाएं। तुम बंगलोर चले जाओगे और मैं दिल्ली में आ जाऊंगी। कुछ समय तक तो हम दोस्ती के बहाने फोन पर बात कर लेंगे, फिर शायद धीरे धीरे वो भी खतम हो जायेगा।&quot; प्रबाल की बातों को नज़रअंदाज़ कर वो अपने ही ख्यालों को शब्द देने की कोशिश कर रही थी। उसकी आवाज में एक ऐसी गहराई थी की प्रबाल को लगा की वो डूब जायेगा इसमें, दम घुट जायेगा उसका।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो बैचेन हो गया। ये ख्याल तो कहीं ना कहीं उसके मन में भी आ रहा था, की कैसे एक दूसरे के साथ आजन्म रह पाए। कुछ साल वो दोनों अपनी करियर को देना चाहते थे। किसी प्यार व्यार में नहीं पड़ना चाहते थे। लेकिन आज ऐसा लग रहा था की शायद ये निर्णय गलत था।&amp;nbsp; शायद कुछ साल में दोनों अपनी अच्छी करियर बना लें, लेकिन उसकी कीमत कुछ ज्यादा ना चुकानी पड़ जाए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रबाल कुछ बोल नहीं पा रहा था। मायरा ने अपने पर्स से एक लॉकेट निकाला और प्रबाल के सामने रख दिया था। प्रबाल ने उसे देखा और एक हलकी मुस्कान उसके चेहरे पर तैर गयी थी। वह बेअरिंग और बोल्ट्स को जोड़ कर बनाये गए थे। देख कर ही लगा रहा था की किसी मैकेनिकल इंजीनियरिंग स्टूडेंट ने ये बनाया है। हालाँकि ये देखने में काफी अच्छा और कूल लग रहा था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मायरा की ओर देख कर प्रबाल बोला, &quot;अच्छा तभी मैं कहूं कुछ बेअरिंग हमारे कॉलेज वर्कशॉप में क्यों नहीं मिल रहे थे। ये तुमने बनाया है?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;चलो एक दूसरे से एक प्रॉमिस करते हैं। हम हर साल 2 बार मिलेंगे इसी कैफ़े में। हम इतना तो मैनेज कर ही सकते हैं ना की साल में दो बार लखनऊ के इस कैफ़े की चाय एन्जॉय करें और अपनी Nostalgia को एक बार और जी लें।&quot; ऐसा लग रहा था की मायरा आज बस बोलने के लिए आयी थी। प्रबाल क्या बोल रहा है इसमें कोई इंटरेस्ट नहीं था उसका। &quot;एक बार तुम्हारे जन्मदिन वाले दिन, 7 जून को और एक बार मेरी जन्मदिन के दिन, 15 दिसंबर को। बोलो प्रॉमिस करते हो?&quot; प्रबाल कुछ ना बोला, बस सहमति में सिर हिला पाया।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दोनों ने आँखों ही आँखों में फिर बातें की। चुप्पी भले थी उस टेबल पर, लेकिन बातें काफी हो रही थी। थोड़ी देर बाद दोनों उठे और अपने अपने हॉस्टल चले गए। ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा कुछ और दिनों तक।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;***&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;भैया एक चाय बनाना, दूध काम, अदरक थोड़ी ज्यादा, चीनी बिलकुल नहीं और हां आखिर में थोड़ा तेजपत्ता डाल कर उबाल देना।&quot; एक परिचित सी आवाज़ सुनाई दी थी। प्रबाल ने आवाज की दिशा में देखा, उसके पीछे की तरफ की एक टेबल पर एक चिर परिचित सा चेहरा दिखा। अरे ये तो मायरा है। ओह मायरा ही है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह तेजी से अपने टेबल से उठ कर मायरा के टेबल तक गया। उसकी साँसे तेज चल रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी जान हलक तक आ गयी है, इस अति उत्साह में। दिसंबर के महीने में भी उसके माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थी। बोला - &quot;मायरा, मेरी मायरा तुम। मैं तुम्हारा प्रबाल।&quot; इतने वर्षों के बाद मिल रहे थे दोनों। प्रबाल को समझ नहीं आ रहा था कि बोलना क्या है। जो मुँह में आया बोल दिया।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मायरा ने खूबसूरत गहरे गुलाबी रंग की साड़ी पहनी हुई थी। बाल खुले थे और लगता था शायद बालों की स्ट्रेटनिंग करवाई थी। हलके मेक अप में थी। कॉलेज के दिनों से भी ज्यादा खुबसूरत लग रही थी वो। हालाँकि चेहरे पर एक परिपक्वता आ गयी थी और आँखों पर चश्मा चढ़ गया था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसने नजरे उठाई, देखा प्रबाल था। उसकी धड़कने तेज हो गयी थी। उसने मुस्कुरा कर कहा, &quot;प्रबाल, आज तुम आ ही गए?&quot; और बढ़ कर एक साइड हग दिया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रबाल थोड़ा असमंजन में आ गया ये सुन कर। फिर भी उसे दरकिनार कर के बोला, &quot;12 बरस हो गए। तुमने आज तक फ़ोन भी नहीं किया मुझे। अपने बेस्ट फ्रेंड को तुम बिलकुल भूल गयी।&quot; वो थोड़ा शिकायती लहजे में था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;आज तारीख क्या है प्रबाल?&quot; मायरा आज भी वही &quot;No Nonsense Girl&quot; थी। गैर जरुरी बातों को इग्नोर करना जानती थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रबाल इस अचानक के सवाल के लिए तैयार नहीं था। एक क्षण की चुप्पी तिर गई वहां। प्रबाल ने चुप्पी तोड़ते हुए बोला, &quot;आज 15 दिसंबर है, क्यों?&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;प्रबाल आज मेरा जन्मदिन है, कॉलेज से निकलते समय हमने एक दूसरे से वादा किया था की हम साल में 2 बार जरूर इस कैफ़े में आएंगे और अपनी पसंदीदा चाय पिएंगे एक दूसरे के साथ। पिछले 12 वर्षों से मैं हर साल 7 जून और 15 दिसंबर को आ रही हूँ। मुझे हर बार लगता था की तुम जरूर आओगे। हर बार अकेले ही यहाँ की चाय पी कर मैं लौट जाती थी। मुझे उम्मीद थी, तुम एक बार तो जरूर आओगे यहाँ। देखो आज तुम आ ही गए। मैं तुम्हारे बारे में अक्सर LinkedIn पर पढ़ती थी। तुम काफी successful professional हो गए हो। शायद तुमने मुझे भूल जाना ही बेहतर समझा था। एक बार भी मुझसे बात नहीं की, मिलना तो बहुत दूर की बात है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रबाल ने मायरा का हाथ पाने दोनों हाथों से पकड़ लिया था। &quot;मायरा, हाँ मैं तुम्हारे जितना expressive आज भी नहीं हूँ। लेकिन मैं हमेशा तुम्हारी खबर रखता हूँ। हाँ मैं मानता हूँ मैं तुमसे बात नहीं कर पाया। करियर ने इतना व्यस्त कर दिया था कि मैं खुद को भी भूल चूका हूँ। आज अचानक यहाँ की factory में जाने का plan बन गया था। हाँ, मैं सच में भूल गया था की हमने कभी मिलते रहने का वादा किया था। हाँ, मैं भूल गया था की आज तुम्हारा जन्मदिन है। ये बस एक संयोग ही है कि आज के दिन मैं यहाँ आ गया। लेकिन अब मैं यहाँ से अकेले तो नहीं जाऊंगा। तुम हमेशा से मेरे जीवन की आखिरी ख्वाहिश थी। मुझे पता है तुम भी अभी तक single हो। लेकिन अब बहुत हो गयी दोस्ती - वोस्ती। अब हम एक दूसरे से एक और वादा करते हैं, आजन्म साथ रहने का वादा। कभी ना बिछड़ने का वादा। तुम्हारा मुझे संभालने के वादा। मेरा तुम्हे संवारने के वाद। बोलो करोगी आज ये वादा?&quot; प्रबाल ने कभी इतना नहीं बोला था मायरा से। थोड़ा मृदुभाषी ही था। लेकिन आज उसने ये सारे दायरे तोड़ दिए थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मायरा की आँखों में आँसू थे। जैसे उसकी बारह साल की तपस्या आज पूरी हो गयी हो। प्रबाल की आँखों में वो कॉलेज की धूप फिर से चमक उठी थी। वेटर चाय ले कर आ गया था। सिर्फ एक कप चाय। आज बारह बरस बाद ये चाय तेजपत्ते की सोंधी खुशबु से इन दोनों के जीवन में एक अमिट खुशबू फैला रहा था। दोनों एक ही कप में चाय पी रहे थे। और चाय उनके जीवन की उलझी गांठों को हर घूँट के साथ सुलझा रहा था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/3520472143920971399/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_29.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/3520472143920971399'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/3520472143920971399'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_29.html' title='एक कप इंतजार'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-7908898441800046270</id><published>2026-05-27T17:00:24.487+05:30</published><updated>2026-05-27T17:00:24.487+05:30</updated><title type='text'>एक कप साझा सुकून</title><content type='html'>&lt;p&gt;कपूर साहब ने शहर का नाम रोशन कर दिया था। रायपुर जैसे छोटे शहर को दुनिया जानती तक नहीं थी। एक छोटी चक्की से 50 साल पहले इन्होने मसाले का व्यापार&amp;nbsp;शुरू किया था यहाँ से। आज यही मसाले दुनिया भर में एक्सपोर्ट किये जाते हैं। कपूर साहब की कंपनी आज हिंदुस्तान की बड़ी कंपनियों में शुमार है। हजारो करोड़ का व्यापर है इनका। लेकिन अपने शहर से प्यार इतना की आज भी कंपनी का हेड ऑफिस रायपुर में ही रखा है। मालवीय रोड पर इनकी कंपनी का आलिशान ऑफिस है। कपूर साहब उम्रदराज़ होने के बावजूद आज भी कभी कभी शहर की मंडी में निकल जाते हैं अपने प्रोडक्ट का फीडबैक लेने के लिए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज उनका पोता अपनी पढाई पूरी कर के लंदन से रायपुर आ रहा था। कपूर साहब चाहते थे की उनका पोता उनकी बिज़नेस की पूरी जिम्मेदारी अब अपने सर पर ले ले। उनके बेटे का तो हाथ है ही बिज़नेस पर फिर भी चाहते थे की जैसे व्यापर करने का तरीका बदल रहा है, जरुरी है की नई पीढ़ी अब नए ग्राहक के लिए नए तरीके से व्यापार करे। पोता भी तैयार हो गया था अपने पारिवारिक व्यापार को सँभालने के लिए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कपूर साहब का बंगला रायपुर का सबसे आलिशान बंगला था। राज्यपाल का बंगला भी इतना आलीशान नहीं था। एक सुबह वो अपने बंगले के गार्डन में बैठे चाय पी रहे थे अकेले। उनके सामने मेज पर दो कप चाय रखी थी। एक कप से भाप उठ रही थी जिससे कपूर साहब चाय पी रहे थे, और दूसरा कप धीरे-धीरे ठंडा हो रहा था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पास ही खड़ा उनका पोता बड़े गौर से यह सब देख रहा था। मेज पर रखे दो कप को देख कर उसे लगा कि शायद दादाजी आज भी दादी को नहीं भूल पाए हैं और दूसरा कप उनके लिए ही मंगवाते हैं। पोता पास गया और सहानुभूति से बोला, &quot;दादाजी, दादी को गुजरे अब दस साल हो गए। आप रोज़ उनके हिस्से की चाय मंगाकर खुद को दुखी क्यों करते हैं? वह तो अब इसे पीने नहीं आएंगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कपूर साहब ने अपनी चाय का एक घूँट भरा और शांति से मुस्कुराए। उन्होंने कहा, &quot;बेटा, मैं यह चाय तुम्हारी दादी के लिए नहीं मंगाता।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पोता हैरान रह गया, &quot;फिर किसके लिए? यहाँ तो आपके अलावा कोई और नहीं है। मैंने कल भी देखा था की एक कप चाय रखे रखे ही ठंडी हो गयी और हाउस हेल्प उसे ऐसे ही उठा कर ले गया था आपके खाली कप के साथ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कपूर साहब ने ठंडी हो चुकी दूसरी प्याली की ओर इशारा किया और बोले, &quot;यह चाय मेरे अहंकार के लिए है। जब मैं अकेला बैठकर अपनी चाय पीता हूँ, तो यह दूसरा खाली कप मुझे याद दिलाता है कि इंसान चाहे कितना भी बड़ा बंगला बना ले, अपने व्यापार को कितना भी बड़ा कर ले, या कितना भी पैसा कमा ले, अगर उसके पास साथ बैठकर चाय पीने वाला कोई नहीं है, तो वह दुनिया का सबसे गरीब इंसान है, सबसे अकेला इंसान है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने आगे कहा, &quot;यह ठंडा कप मुझे हर दिन यह सिखाता है कि रिश्तों को वक्त रहते गरम रखना कितना ज़रूरी है, वरना एक दिन सिर्फ खाली कुर्सियाँ और ठंडी चाय और अपना अकेलापन ही बाकी रह जाती हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पोता खामोश हो गया। उसने तुरंत अपना फोन जेब में रखा, पास पड़ी खाली कुर्सी खींची और बोला, &quot;दादाजी, कल से चाय के तीन कप आएंगे। तीसरा मेरे लिए... और मैं वादा करता हूँ, मेरी वाली प्याली कभी ठंडी नहीं होगी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कपूर साहब पोते की इस बात से अपनी खुशियों को समेट ही रहे थे की पोते ने कहा, &quot;और हाँ दादा जी, ये एक एक्स्ट्रा कप मेरे लिए भी रहेगा कि मुझे हमेशा याद दिलाता रहे की आगे बढ़ने की होड़ में मैं कुछ रिश्ते पीछे ना छोड़ता चला जाऊँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कपूर साहब को आज पोते के साथ चाय पीते हुए एक साझा सुकून का अनुभव हो रहा था, जो वो कई वर्षों पहले तक़रीबन भूल से गए थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शायद पैसे और सफलता आपको एक मानसिक संतुष्टि भले ही कुछ समय के लिए दे दे। आत्मिक संतुष्टि साथ में चाय पर बिताये हुए कुछ साझा पल ही दे सकते हैं जो किसी अपने के साथ बिताये गए हों।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/7908898441800046270/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_142.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/7908898441800046270'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/7908898441800046270'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_142.html' title='एक कप साझा सुकून'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-4123595822276995457</id><published>2026-05-27T12:26:15.669+05:30</published><updated>2026-05-27T12:26:15.669+05:30</updated><title type='text'>एक कप आत्मियता </title><content type='html'>&lt;p&gt;दिसंबर का महीना था। सर्दियाँ अपनी पराकाष्ठा को छु रही थी। एक पल को जो हाथ शॉल से बाहर निकाला तो जैसे जमने को होती थी। रांची स्टेशन के बाहर, सात साल का छोटू और पाँच साल की गुड़िया कड़कड़ाती ठंड में फटे पुराने कम्बल लपेटे बैठे थे। गुड़िया बार बार भाई से भूख लगी है का रट लगा रही थी। उनके माँ बाप थोड़ी देर बाद आने का बोल कर गए थे। उन्हें वहाँ पर बैठा कर छोटू को समझा दिया था की कोई ट्रेन आये और उससे लोग उतरे तो उनसे पैसे मांगने हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माँ बाप को आने में देर हो रही थी। उधर गुड़िया बार बार कुछ खाने की जिद कर रही थी। उसके पास खाने को कुछ नहीं था, उसपर से ठंड इतनी की कोई भी स्टेशन से बाहर नहीं निकल रहा था। सुबह के 5 बजे थे और ऐसा लग रहा था अभी भी आधी रात हो। इतने में एक राहगीर बाहर आया। उसे देखते ही छोटू ने उससे बोला, &quot;बाबू कुछ खाने को दे दो। मेरी बहन बहुत देर से भूखी है।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस राहगीर को थोड़ी दया आ गयी और उसे पास की चाय की दूकान से एक चाय और पारले जी बिस्कुट का एक पैकेट पकड़ा दिया। ये कम से कम थोड़ी देर गुड़िया को शांत रखने के लिए काफी था। यही सोचते सोचते छोटू बड़े संभाल के चाय का कागज का कप और बिस्कुट पकड़े गुड़िया के पास आ गया। छोटी सी बच्ची बिस्कुट का पैकेट देख कर खुश हो गयी। छोटू ने बिस्कुट का पैकेट खोला तो उसमे बस 5 बिस्कुट थे। भूख तो उसे भी लगी थी। सोचा की आधे आधे बाँट कर वो खा लेगा गुड़िया के साथ।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;छोटू ने पहला बिस्कुट निकाला, चाय में डुबोया और गुड़िया के मुँह में डाल दिया। गुड़िया मुस्कुराई। दूसरा बिस्कुट भी उसने गुड़िया को ही खिलाया। गुड़िया के चेहरे पर अभी भी और खाने की भूख दिख रही थी। उसने दो और बिस्कुट उसे खिला दिया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब पैकेट में सिर्फ एक आखिरी बिस्कुट बचा था। गुड़िया ने उस आखिरी बिस्कुट को देखा और अपनी तोतली जुबान में बोला, &quot;भइया, ये आप खा लो। मेरा पेट भर गया।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हम कोई और बात समझे या ना समझे, भूख की भाषा बहुत जल्दी समझ जाते हैं। फिर छोटू गुड़िया के लिए कभी कभी बाप की तरह बर्ताव करता। था। छोटू को लगा की गुड़िया को अभी और भूख लगी है। वो उस बिस्कुट को गुड़िया को देते हुए बोला, &quot;अरे मुझे उतनी भूख नहीं लगी है। मुझे तो बस ये चाय पीना है। ये तुम खा लो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन गुड़िया ने ज़िद की कि यह भैया खाएगा। छोटू ने बिस्कुट उठाया, चाय में डुबोया और जैसे ही अपने मुँह के पास ले गया, उसने देखा कि गुड़िया की आँखें अभी भी उस बिस्कुट पर टिकी थीं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;छोटू ने हाथ घुमाया और वह आखिरी बिस्कुट भी गुड़िया के मुँह में डाल दिया। गुड़िया खुश होकर बोली, &quot;भैया, आपने क्यों नहीं खाया?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;छोटू ने चाय की कप में देखा की बस एक घूँट ही चाय बची थी। वो उस कप की आखिरी घूँट चाय की भरी और बोला, &quot;मुझे भूख नहीं लगी थी। तुमको खाते देख मेरा मन भर गया गुड़िया।&quot; और प्यार से गुड़िया के गाल पे एक चिकोटी काटी। ऐसा लग रहा था की छोटू बहुत बड़ा हो गया है। वैसे भी गरीबी इंसान को वक़्त से पहले बड़ा बना देता है। छोटू इसका अपवाद नहीं था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो राहगीर वहीं खड़ा अपनी टैक्सी का इंतज़ार कर रहा था। उसने ये सारी घटना होती देखी। वो छोटू के पास आया, उसके सर पर हाथ रखा और कहा, &quot;बेटा, दुनिया में सबसे अमीर वो नहीं जिसके सारी सुख सुविधाएँ हैं। वो भी नहीं जिसके पास दुनिया की सारी खुशियां खरीदने का धन है। दुनिया का सबसे अमीर तुम हो, जो अपनी आखिरी निवाला भी अपनी बहन की मुस्कान के लिए छोड़ सकता&amp;nbsp; है,भले ही खुद भूखा रह जाये। आज तुमने मुझे मेरे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया है। दूसरों की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी तलाशने का पाठ। खूब खुश रहो।&quot; कहते हुए उसे एक कप चाय और एक बिस्कुट का पैकेट और ख़रीदाते हुए बोला, &quot;ये ले तेरा गुरु दक्षिणा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;छोटू को उस राहगीर की कही सारी बात तो समझ में नहीं आयी, वो बस एक और बिस्कुट का पैकेट ले कर खुश हो गया था। चलो अब उसकी भूख कुछ कम हो जाएगी। एक बिस्कुट इसमें से वो गुड़िया को भी देगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो बिस्कुट को चाय में डूबा कर खुद भी खा रहा था और गुड़िया को भी खिला रहा था। उस राहगीर को ऐसा लग रहा था की वो सुदामा अपनी झोली का चना जैसे उस बाल कृष्ण को दे कर संतुष्टि पा रहा था और सामने कृष्ण उसके भाव से परे उसे खाने में ख़ुशी महसूस कर रहे हों।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/4123595822276995457/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_27.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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में शंकर का वास है। मोक्ष का द्वार है ये शहर। जीवन में कई उतार चढ़ाव के बाद उसे एक आत्मिक शांति चाहिए थी। इसी अभिलाषा में वह काशी में आ गया। अपना बचा हुआ सबकुछ छोड़ कर।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह यहाँ ईश्वर को ढूंढने निकला था। उसने घाटों पर संन्यासियों के प्रवचन सुने, घंटों आंखें बंद करके ध्यान लगाया, विश्वनाथ मंदिर की मंगला आरती में कतारों में खड़ा रहा, लेकिन उसके अंदर की बेचैनी शांत नहीं हुई। उसे हर जगह सिर्फ मंत्रों का शोर और अनुष्ठानों की औपचारिकताएं दिखाई दे रही थीं। ईश्वर का दर्शन जिसके लिए वह सब कुछ छोड़कर आया था, अब भी एक अधूरा ख्वाब था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मणिकर्णिका पर जलती चिता से उठते धुँए में वो ईश्वर की आकृति ढूंढता। योग करते हुए ध्यान में वो ईश्वर को देख पाने के कोशिश करता। गंगा में नाव पर सवार हो गंगा आरती में ईश्वर को तलाशता। हर इंसान, हर साधू, हर अघोरी, हर नागा साधु में वो शंकर को देखने की कोशिश करता।&amp;nbsp; लेकिन इस एक हफ्ते में उसे कहीं कुछ नहीं&amp;nbsp; मिला, सिवाय निराशा के।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक ढलती शाम, जब गंगा की लहरों पर दीयों की रोशनी तैर रही थी, अमित&amp;nbsp;थका - हारा अस्सी घाट की एक सीढ़ी पर बैठ गया। वहां बैठे बैठ वो अपने पिछले कुछ वर्षो को याद कर रहा था और सोंच रहा था कहाँ उसने गलती कर दी। कब उसे ईश्वर के दर्शन होंगे जो उसे उसकी इस परिस्थिति से निकालेंगे। कब वो वापस पहले जैसी ज़िन्दगी जी पायेगा। वो अपनी गहन सोंच में था। तभी उसकी नाक से एक सोंधी, कड़क खुशबू टकराई। पास ही एक बूढ़े बाबा अपनी छोटी सी दूकान पर पीतल के बड़े से डोंगे में चाय खौला रहे थे। ये सोंधी खुशबु ऐसी थी जैसे उसे अपनी ओर खींच रही हो।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अमित उठकर वहाँ गया और बोला, &quot;बाबा, एक चाय देना।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाबा ने उसकी तरफ देखा। उनकी आँखों में गजब की चमक थी और चेहरे पर बनारसी बेफिक्री। उन्होंने बिना कुछ बोले मिट्टी का एक साफ कुल्हड़ उठाया, उसमें खौलती हुई अदरक-इलायची वाली गाढ़ी चाय छानी और अमित की तरफ बढ़ा दी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अमित ने कुल्हड़ को दोनों हाथों में पकड़ा। मिट्टी की सोंधी महक और चाय की गर्माहट ने उसकी उंगलियों के जरिए उसके पूरे शरीर को छुआ। उसने पहली चुस्की ली। चाय का स्वाद सीधे उसकी रूह तक गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;चाय कैसी है बाबू?&quot; बाबा ने अपनी धोती का कोना संभालते हुए पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;बहुत अच्छी है बाबा। काशी में हर जगह चाय अच्छी ही मिलती है, पर इस चाय में कुछ अलग सुकून है,&quot; राघव ने थके हुए स्वर में कहा। फिर एक ठंडी सांस लेकर आगे बोला, &quot;पर मन का सुकून गायब है बाबा। सात दिन से काशी में हूँ, हर घाट छान मारा, हर मंदिर हो आया, पर ईश्वर का कोई दर्शन, कोई अहसास नहीं हुआ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाबा मुस्कुराए। उन्होंने अंगीठी में एक कोयला और डाला और बोले, &quot;बाबू, तुम ईश्वर को देखने आए हो या ढूंढने? जो ढूंढने निकलता है, वह अपनी धारणाओं का चश्मा पहन कर निकलता है। वो ईश्वर की एक तस्वीर दिमाग में रख कर आता है। वैसी ही तस्वीर जैसी घर के कैलेंडर या नाटकों में दिखाया जाता है। वह सोचता है कि ईश्वर किसी खास भेष में मिलेंगे जो बाकियों से अलहदा होगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाबा ने अमित&amp;nbsp;के कुल्हड़ की तरफ इशारा किया, &quot;इस चाय को देखो। इसमें दूध, पानी, चायपत्ती, अदरक, चीनी... सबने अपना अस्तित्व मिटा दिया, तब जाकर यह अमृत बनी। जब तक तुम खुद को, अपने अंदर बसे अहंकार को, इस काशी की गंगा में पूरी तरह विसर्जित नहीं कर दोगे, तब तक उसका दर्शन कैसे होगा? विसर्जन ही तो दर्शन की पहली सीढ़ी है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अमित बाबा की बात सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने चाय का दूसरा घूंट लिया। इस बार स्वाद और गहरा लगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;घाट पर शंख की आवाजें गूंजने लगी थीं। गंगा आरती शुरू हो चुकी थी। अमित&amp;nbsp;ने सामने देखा, जहाँ हज़ारों लोग हाथ जोड़े खड़े थे। कोई अमीर था, कोई गरीब, कोई विदेशी सैलानी था, तो कोई सन्यासी। लेकिन बिना किसी विद्वेष के सब एक ही कतार में खड़े थे। वैसे ही अभिभूत हो हाथ जोड़े जैसे उन्होंने ईश्वर को खुद के भीतर पा लिया हो।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाबा ने अमित&amp;nbsp;के कंधे पर हाथ रखा और कहा, &quot;बाबू, इस घाट पर देखो। एक तरफ महाश्मशान पर चिताएं जल रही हैं, जो सत्य का अंत हैं। दूसरी तरफ गंगा की लहरें हैं, जो जीवन का प्रवाह हैं। और इन दोनों के बीच यह चाय की दुकान है, जहाँ हर कोई एक समान है। यहाँ राजा आए या रंक, कुल्हड़ सबको मिट्टी का ही मिलता है। चाय सबके लिए एक ही डोंगे में बनाई जाती है। चाय भी अपना रंग उनके आर्थिक या सामाजिक स्थिति को देख कर नहीं बदलती।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बाबा ने अपनी दार्शनिक आवाज़ में कहा, &quot;ईश्वर कोई मूर्ति नहीं है बाबू जो कहीं छिपी है। वह इस चाय के स्वाद की तरह है - जो अदृश्य है, पर जिसका अहसास हर घूंट में है। वह इस चाय बेचने वाले में भी है, उस चिता की राख में भी है, और इस बहती गंगा में भी है। सब एक ही तो हैं। इसी को तो बनारस में &#39;अद्वैत&#39; कहते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अमित ने कुल्हड़ की आखिरी चुस्की ली। चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन उसका स्वाद और बाबा के शब्द उसके भीतर एक अद्भुत शांति भर चुके थे। उसकी सातों दिन की थकान और छटपटाहट गायब हो चुकी थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसने जेब से पैसे निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, तो बाबा ने हंसकर मना कर दिया, &quot;अरे छोड़ो बाबू! आज की चाय का पैसा नहीं, बस प्रसाद समझो। जब ज्ञान मिल जाए, तो गुरु दक्षिणा में अपनी चिंताएं यहीं छोड़ दी जाती हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अमित ने झुककर बाबा के पैर छुए। जब वह सीधा हुआ, तो उसे लगा कि सामने खड़े बूढ़े चाय वाले के भीतर से साक्षात शिव मुस्कुरा रहे थे। उसे मंदिर के गर्भगृह में जो गर्माहट महसूस नहीं हुई थी, वह उस मिट्टी के कुल्हड़ को छूकर मिल गई थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसने खाली कुल्हड़ को जमीन पर पटका। कुल्हड़ टूटकर वापस मिट्टी में मिल गया - ठीक वैसे ही, जैसे अमित&amp;nbsp;का भ्रम टूटकर बनारस की मिट्टी में विलीन हो चुका था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आरती के दीयों की रोशनी में गंगा माँ मुस्कुरा रही थीं, और अमित&amp;nbsp;को उसका दर्शन एक कप चाय के बहाने मिल चुका था। आज उसका काशी भ्रमण पूरा हो गया था, या शायद वो काशी का ही हो गया था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/9050568205463368173/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_832.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/9050568205463368173'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/9050568205463368173'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_832.html' title='एक कप ईश्वर'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-8044094251917137938</id><published>2026-05-26T15:54:31.348+05:30</published><updated>2026-05-26T15:54:31.348+05:30</updated><title type='text'>एक कप दुआएँ</title><content type='html'>&lt;p&gt;शहर के कोने पर &#39;मुरली काका&#39; की एक पुरानी चाय की टपरी थी। ये टपरी शहर में मशहूर थी अपनी चाय के लिए। शहर का शायद ही कोई हो जिसने कभी मुरली काका की चाय ना पी हो। वहाँ बड़े-बड़े साहब भी आते और मज़दूर भी। चाय की कीमत ऐसी की कोई भी उसे खरीद ले। स्वाद ऐसा की लोगों की जुबान पे चढ़ जाये।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुरली काका का एक नियम था - वे अपनी दुकान के एक बोर्ड पर &#39;किसी की चाय&#39; का हिसाब रखते थे। इसका मतलब था कि कोई अमीर ग्राहक अपनी चाय के पैसे देते वक्त एक अतिरिक्त चाय के पैसे दे जाता, जिसे काका बोर्ड पर एक चॉक से निशान बना देते। जब कोई बेसहारा या भूखा आता, तो वह बोर्ड देखकर एक चाय मांग लेता। उसे वो चाय मुफ्त में दे दी जाती। लोग अक्सर वहां 1 या ज्यादा चाय का पैसा दे कर जाते। मुरली काका नियम से उस एक्स्ट्रा चाय का निशान उस बोर्ड पे लगा देते।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन एक बहुत ही रईस व्यापारी वहाँ रुका। उसने यह सब देखा और हँसकर बोला, &quot;काका, ये क्या नाटक है? जिसे दान देना है, वो सीधे क्यों नहीं देता? एक कप चाय से किसी का क्या भला होगा?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;काका चुप रहे। तभी एक बूढ़ा, फटेहाल आदमी वहाँ आया। उसने बोर्ड पर नज़र डाली, एक निशान देखा और काका से कहा, &quot;काका, एक चाय पिला दो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;काका ने बड़े सम्मान के साथ उसे गरम चाय और दो बिस्किट दिए। उस बूढ़े के चेहरे पर जो सुकून और मुस्कान आई, वह देखने लायक थी। वह अपनी फटी जेब से पैसे निकालने की शर्मिंदगी से बच गया था, क्योंकि उसकी चाय का पैसा पहले ही कोई दे चुका था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब वह चला गया, तो मुरली काका ने उस व्यापारी से कहा, &quot;साहब, आपने पूछा था कि एक कप चाय से क्या होगा? उस बूढ़े आदमी ने भीख नहीं मांगी, उसने अपना हक माँगा। इस चाय ने उसका पेट ही नहीं भरा, उसकी &#39;इज़्ज़त&#39; भी बचा ली। दान वो नहीं जो हाथ फैलाकर लिया जाए, दान वो है जो लेने वाले को ये अहसास भी न होने दे कि वो किसी का कर्जदार है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यापारी की आँखों से अहंकार का पर्दा हट गया। उसने अपनी जेब से पाँच सौ का नोट निकाला और कहा, &quot;काका, आज इस बोर्ड पर पचास चाय के निशान और लगा दो। मैं आज तक सिर्फ दौलत कमा रहा था, आज समझ आया कि दुआएँ कैसे कमाई जाती हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मदद की कीमत बड़ी नहीं होती, मदद का तरीका उसे महान बनाता है। फिर चाय भी किसी की मदद हो सकती है, मुरली काका पुरे शहर को ये सीखा रहे है, सालों से।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/8044094251917137938/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_41.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/8044094251917137938'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/8044094251917137938'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_41.html' title='एक कप दुआएँ'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-2804271413875042801</id><published>2026-05-26T14:22:53.612+05:30</published><updated>2026-05-26T14:22:53.612+05:30</updated><title type='text'>एक कप मोहब्बत</title><content type='html'>&lt;p&gt;राघव अपने कमरे की बालकनी में बैठा हुआ था। हाथ में लैपटॉप था, लेकिन ध्यान स्क्रीन पर नहीं, बल्कि सामने की दीवार पर था। पिछले कुछ महीनों से उसके और उसकी पत्नी, अंजलि के बीच बातचीत जैसे खत्म ही हो गई थी। ऐसा लगने लगा था जैसे वो दोनों अपने रिश्ते की आखिरी पड़ाव पर हों। शायद ये ज्यादा ना चले अब। छोटी छोटी बातें भी बतंगड़ बन जा रही थी। दोनों ही किसी भी बात को नज़रअंदाज़ करने के मूड में नहीं होते थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दोनों एक ही घर में रहते थे, लेकिन दो अलग-अलग द्वीपों की तरह। ऑफिस का तनाव, आगे बढ़ने की होड़ और रोज़मर्रा की भागदौड़ ने उनके बीच एक खामोश दीवार खड़ी कर दी थी। अब बस निभ रही थी। कब तक निभेगी पता नहीं। दोनों ही जैसे पति पत्नी होने का किरदार अदा कर रहे हो जैसे। जो कोई एक दूसरे की मदद भी करता तो एक्टिंग लगती। भाव मरते जा रहे थे दोनों के बीच। एक ही बेड पर सोते पर एक दूसरे की ओर पीठ कर के।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंजलि रसोई में थी। शाम के छह बज रहे थे। वह जानती थी कि राघव के सिर में दर्द है, और इस वक्त उसे किसी दवा से ज़्यादा एक कप कड़क चाय की ज़रूरत है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंजलि ने गैस पर सस्पेन चढ़ाया। पानी उबलने लगा। उसने उसमें चायपत्ती, थोड़ी सी चीनी और कूटकर अदरक डाली। अदरक की वो चिरपरिचित खुशबू पूरे घर में फैलने लगी। यह वही खुशबू थी, जिसने कभी उनके नए-नवेले रिश्ते में मिठास घोली थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाय उबल रही थी और अंजलि की आँखों में पुरानी यादें तैर रही थीं। उसे याद आया जब वे दोनों कॉलेज में थे। टपरी की वो ₹5 वाली चाय, जिसे वो दोनों एक ही कुल्हड़ में शेयर करते थे। बारिश के दिनों में राघव का भीगते हुए सिर्फ इसलिए आना कि वे साथ में चाय पी सकें।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;चाय सिर्फ एक ड्रिंक नहीं है अंजलि, यह दिल की बात कहने का एक बहाना है,&quot; राघव अक्सर कहा करता था। कितना पसंद था उसे चाय पीना। वो चाय पीता नहीं था लगता एन्जॉय करता था। कहता, &quot;अंजलि, चाय महज एक चाय नहीं, एक पूरी feeling है। इसे पियोगे तो मजा नहीं देगी, इसे किसी के साथ पियोगे तो ज्यादा स्वाद लगेगा, चाय का ही नहीं, ज़िन्दगी का भी।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंजलि इस बेमतलब की philosophy पर एक ठंडी मुस्कान देती और बोलती, &quot;चाय पीने वालों को बस बहाना चाहिए। क्या ही बेमतलब की philosophy है। मेरे लिए चाय बस तुम्हारा साथ है। जब तुम्हारे साथ चाय पीती हूँ तो तुम्हारे ज्याद पास महसूस करती हूँ अपने आप को।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;पर आज? आज दोनों के पास महँगी से महँगी जगह पर चाय पीने के पैसे थे, लेकिन साथ बैठकर बात करने का वक्त नहीं था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंजलि ने चाय छानी। दो कप। उसने ट्रे उठाई और भारी कदमों से बालकनी की तरफ बढ़ी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राघव ने सिर उठाकर देखा। अंजलि ने बिना कुछ बोले एक कप उसकी तरफ बढ़ा दिया। राघव ने कप थामा। चाय गर्म थी, बिल्कुल वैसी ही जैसी उसे पसंद थी—कम चीनी, तेज़ पत्ती और अदरक का तीखापन।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राघव ने पहला घूंट लिया। चाय के उस गर्माहट भरे घूंट ने जैसे उसके भीतर जमी बर्फ को पिघला दिया। उसने अंजलि की तरफ देखा, उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, जो शायद उसकी अनदेखी और थकान की गवाही दे रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;चाय बहुत अच्छी बनी है,&quot; राघव की आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंजलि ने अपनी चाय का कप होठों से लगाया, &quot;तुम्हारे सिर में दर्द था ना, इसलिए थोड़ी कड़क बनाई।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दोनों चुप थे, लेकिन यह वो दम घोटने वाली खामोशी नहीं थी। इस खामोशी में चाय की भाप के साथ दोनों के दिल के जज्बात बह रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राघव ने लैपटॉप बंद करके साइड में रखा। उसने अंजलि का हाथ थामा, जो कप को पकड़े रहने के बावजूद थोड़ा ठंडा था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;आई एम सॉरी अंजलि,&quot; राघव ने धीरे से कहा। &quot;मैं काम में इतना उलझ गया कि यह भूल ही गया कि इस चाय का स्वाद तुम्हारे साथ के बिना अधूरा है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंजलि ने राघव की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक आँसू तैर गया, जो मुस्कुराते ही गालों पर ढलक गया। उसने राघव के कंधे पर अपना सिर रख दिया। अपनी आवाज पर थोड़ा काबू पा कर बोली, &quot;आई एम सॉरी राघव। गलती मेरी भी है। मैंने भी कभी तुम्हे समझने की कोशिश नहीं की। हमेशा वही कॉलेज वाला राघव ढूंढ़ती रहती तुममे। जो नहीं मिलता तो तुम्हारे प्रति कुंठा से भर जाती। मैं समझ चुकी हूँ अब की मैं तुम्हारे बिना शायद नहीं रह सकती।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शाम ढल रही थी, आसमान में परिंदे अपने घरों को लौट रहे थे, और बालकनी में रखे उन दो कपों से उठती हुई चाय की भाप, दो अजनबियों को फिर से एक कर रही थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कभी-कभी जिंदगी की बड़ी से बड़ी उलझनें, चाय के एक छोटे से प्याले और थोड़े से वक्त और थोड़ी बातों से सुलझ जाती हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/2804271413875042801/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_140.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/2804271413875042801'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/2804271413875042801'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_140.html' title='एक कप मोहब्बत'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-1780207992919996323</id><published>2026-05-26T12:53:15.903+05:30</published><updated>2026-05-26T12:53:15.904+05:30</updated><title type='text'>एक कप चाय और समोसा</title><content type='html'>&lt;p&gt;सर्दियों के दिन थे। पटना इस बार कुहासे से भरा था। अच्छी कंपकपाती ठंढ थी। सुबह के 7 बजे, स्कूल बस के स्टॉप पर कोहरे की चादर लिपटी हुई थी। समर हमेशा की तरह अपनी भारी-भरकम स्कूल बैग टांगे, ठंड से काँपते हुए खड़ा था। तभी शर्मा जी की चाय की दुकान से उठते धुएं के बीच, मायरा वहाँ आई। नीले रंग का स्कूल स्वेटर, दो चोटियाँ और ठंड से लाल नाक—वह बिल्कुल किसी परी जैसी लग रही थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मायरा ने अपनी सहेली से कहा, &quot;यार, इतनी ठंड है कि हाथ जम गए हैं, काश गरम-गरम चाय मिल जाती।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समर ने यह सुना। उसमें इतनी हिम्मत तो नहीं थी कि मायरा से सीधे बात कर सके, लेकिन उसने जेब में हाथ डाला—कुल 10 रुपये का सिक्का था। वह चुपके से शर्मा जी की दुकान पर गया और बोला, &quot;अंकल, एक चाय को दो कप में आधा-आधा कर दो।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समर ने एक कप मायरा की तरफ बढ़ाते हुए बिना उसकी आँखों में देखे कहा, &quot;ठंड बहुत है... पी लो।&quot; मायरा ने मुस्कुराते हुए चाय ले ली। उस दिन पहली बार चाय की चुस्की के साथ दोनों के दिलों में एक अनजानी सी गर्माहट घुल गई थी। शायद ये स्कूल के दिनों के मासूम प्यार के पहली दस्तक थी। मायरा के चाय ले लेने से समर में थोड़ी सी हिम्मत आ गयी थी कुछ और बात करने की।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसे ही उनकी दोस्ती बढ़ रही थी। ये दोस्ती हालांकि बस स्कूल में मिलने तक ही था। वैसे भी नौवीं कक्षा की दोस्ती ऐसे ही धीमे धीमे आंच पर पक कर निखरती है। धीरे-धीरे वक्त बीता। अब दोनों दसवीं क्लास में आ चुके थे। समर मैथ्स में थोड़ा कमज़ोर था और मायरा क्लास की टॉपर।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन जब लंच ब्रेक के बाद &#39;फ्री पीरियड&#39; था, तो समर ने हिम्मत जुटाकर मायरा से पूछा, &quot;क्या तुम मुझे ट्रिग्नोमेट्री के कुछ फॉर्मूले समझा दोगी?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मायरा ने पलकें झुकाकर हंसते हुए कहा, &quot;समझा तो दूंगी, लेकिन मेरी फीस लगेगी!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;क्या?&quot; समर ने घबराते हुए पूछा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;स्कूल की छुट्टी के बाद, शर्मा जी की दुकान की अदरक वाली चाय और एक समोसा।&quot; मायरा ने आंख मारते हुए कहा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस दिन के बाद से, स्कूल की छुट्टी के बाद का वह आधा घंटा दोनों की ज़िंदगी का सबसे पसंदीदा वक्त बन गया। स्कूल के भारी सिलेबस और बोर्ड एग्जाम के तनाव के बीच, वह नुक्कड़ वाली चाय उनके लिए सुकून का जरिया बन गई थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वक्त पंख लगाकर उड़ गया। 12वीं का फेयरवेल आ गया। सब एक-दूसरे की शर्ट पर ऑटोग्राफ लिख रहे थे, यादें समेट रहे थे। समर सफेद शर्ट और ब्लेज़र में था, और मायरा खूबसूरत नीली साड़ी में। दोनों ही जानते थे कि इसके बाद दोनों के रास्ते अलग होने वाले थे—मायरा को आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर जाना था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भीड़ से दूर, दोनों आखिरी बार उसी शर्मा जी की चाय की दुकान पर आकर बैठे थे। माहौल में एक अजीब सी खामोशी थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शर्मा जी ने दो कप चाय टेबल पर रखी और मुस्कुराते हुए बोले, &quot;आज तो विदाई है बच्चों, आज चाय के पैसे मैं नहीं लूंगा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समर ने चाय का कुल्हड़ हाथ में पकड़ा और मायरा को देखते हुए कहा, &quot;यार मायरा, शहर बदल जाएगा, कॉलेज बदल जाएगा... पर क्या यह चाय का स्वाद कभी बदलेगा?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मायरा ने चाय की चुस्की ली, उसकी आँखों में हल्के से आंसू थे। उसने अपनी डायरी से एक पन्ना फाड़कर समर की हथेली पर रख दिया और कहा, &quot;स्वाद तो नहीं बदलेगा समर, और न ही यह चाय वाला प्यार। जब भी तुम्हारी याद आएगी, मैं एक कप अदरक वाली चाय बना लूंगी।&quot; डायरी के उस पन्ने पर मायरा ने समर के साथ की पहली चाय के अनुभव को लिखा था। लिखा था की कैसे समर ने उसके दिल की बात समझ ली थी। और लिखा था की क्या हम दोनों आजन्म एक दूसरे के साथ रोज सुबह ऐसी ही अदरक वाली चाय पी पाएंगे। समर में ये पढ़ कर और भी बेचैनी आ गयी थी। जिन आंसुओं को वो अब तक संभाले बैठा था, उसने कब उसका दामन छोड़ दिया पता भी नहीं चला। शर्मा जी की चाय की दूकान की उस बेंच पर दोनों एक दूसरे का हाथ थामे रोते जा रहे थे। शर्मा जी ने ये देख कर भी अनदेखा कर दिया था। वो सालों से ये देख रहे थे। हर साल कोई ना कोई जोड़ा ऐसे ही बैठे आँसू बहता है की आजन्म हम एक दूसरे के दोस्त बने रहेंगे और फिर जिंदगी उन्हें इतने थपेड़े मारती है की ये सब कुछ समय में ही लोग भूल जाते हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बरसों बीत गए। समर ने MBA के बाद एक बड़ी Pharma कंपनी में नौकरी शुरू कर दी थी। कुछ बरस में वो कंपनी की GM बन गया था और कंपनी के HO में दिल्ली में बैठने लगा था। बचपन के स्कूल का वो प्यार और दोस्ती अब बस यादों में रह गयी थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन उसने दिल्ली में मार्किट वर्किंग की सोची और वहां के रीजनल मैनेजर को बोला की कुछ अच्छे डॉक्टर्स की visit का प्लान करो।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगले दिन वो अपनी कंपनी के लड़को के साथ डॉक्टर विजिट कर रहा था। सभी लोग एक Poly Clinic में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। उनकी कंपनी का नाम पुकारा गया। वो उस डॉक्टर के चैम्बर में जैसे ही गए, समर चौंक गया। वहां मायरा, डॉक्टर मायरा बैठी थी। अभी भी उतनी ही खूबसूरत थी। या शायद ज्यादा ही खूबसूरत हो गयी थी। वो शहर की मानी हुई neurologist थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मायरा ने समर को देखा, मुस्कुराई और बोली, &quot;चाय की फीस बाकी थी न तुम्हारी? आज समोसा मेरी तरफ से!&quot; और उस चैम्बर में उन दोनों के ठहाकों की आवाज गूंज उठी थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सालों बाद, स्कूल का वह मासूम प्यार एक बार फिर चाय की खुशबू के साथ ज़िंदा हो गया था। अब रास्ते अलग नहीं होने वाले थे, क्योंकि इस बार चाय की चुस्की के साथ एक नई कहानी की शुरुआत हो रही थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जरुरी नहीं की एक साथ एक ही मंजिल को चले तो ही प्यार मुकम्मल होता है। अहलदा मंजिल आँखों में लिए भी अगर कुछ पल को हमारे रस्ते एक दूसरे से मिले तो एक नए रिश्ते की नयी शुरुआत हो सकती है। आज इसी नए रिश्ते की शुरुआत समर और मायरा की ज़िन्दगी में हुई थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/1780207992919996323/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_488.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/1780207992919996323'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/1780207992919996323'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_488.html' title='एक कप चाय और समोसा'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-2195958067563207682</id><published>2026-05-26T12:09:55.276+05:30</published><updated>2026-05-27T14:12:00.410+05:30</updated><title type='text'>एक कप अकेलापन </title><content type='html'>&lt;div&gt;आनंद बाबू के लिए ये रोज का नियम था। आज कोई अलग दिन नहीं था। वो अपनी छड़ी टेकते हुए सोसाइटी के बाहर वाले पार्क पर खाली पड़े लकड़ी की बेंच पर बैठ जाते। वो नियम से रोज शाम 5 बजे आते और 7 बजे तक वहां बैठे रहते। इस बेंच के ठीक सामने सड़क के उस पार शास्त्री जी की चाय की दूकान थे। कभी कभी शास्त्री जी से बात हो जाती जब वो चाय बनाते बनाते वहीं से आवाज लगते, &quot;आनंद बाबू, चाय पिएंगे?&quot;, &quot;बच्चे कैसे हैं?&quot;, &quot;आपका स्वस्थ्य ठीक है ना?&quot; ऐसे ही कुछ शब्दों या एक दो वाक्यों में दोनों के बीच बातें हो जाती।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;शास्त्री जी भी करीब करीब उनकी ही उम्र के थे, उम्र के उस पड़ाव पर जब सारे बच्चे अपने अपने काम में लग गए है और अब एक एकांकीपन आ गया है जीवन में। आनंद बाबू 70 वर्ष के थे और उनका एक ही लड़का है जो अब न्यूयोर्क में सेटल हो गया है। हफ्ते में एक दो बार उसका फ़ोन आता और दो एक मिनट की बातें होती। बाते भी &quot;हाऊ आर यू, आप ठीक हैं ना, कोई प्रॉब्लम तो नहीं है&quot; तक ही सीमित रहती। अब वो कैसे बताएं की फ़ोन पर बात करना ठीक है लेकिन साल में एक बार आ जाये तो और भी बेहतर हो जाये। वैसे भी पत्नी के देहांत के बाद जैसे घर काटने को दौड़ता था। उनके बेटे ने कई बार बोला था की वो भी न्यूयोर्क आ जाएं और उनके साथ ही रहें। सारे कागज़ात की जरूरतें वो देख लेगा, लेकिन ये आनंद बाबू की जिद थी की जब पूरी ज़िन्दगी हिंदुस्तान में बितायी है तो अब जीवन के आखरी पड़ाव में यहाँ की मिट्टी नहीं छोड़ना। यहीं की मिट्टी में मिल जाना है। सेना से सेवानिवृत थे तो अपना ध्यान रखना उन्हें आता था। बाकी कभी कभी आर्मी रेजिमेंट में चले जाते तो थोड़ी बहुत इज्जत मिल जाती। पेंशन का इतना पैसा आ जाता था की आज भी अपने बेटे पर आश्रित नहीं थे। कुल मिला कर ज़िन्दगी ऐसे ही कट रही थे।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आज भी आनंद बाबू अपने रोज के नियम के अनुसार ठीक 5 बजे उसी बेंच पर बैठे हुए थे। शास्त्री जी की चाय की दूकान से इलायची, अदरक, दालचीनी और ना जाने कौन कौन से मसाले से बने चाय की तेज खुशूब सड़क के इस पार आनंद बाबू तक आ रही थी। कभी कभी लगता की चलो एक कप चाय मंगा ही ले फिर लगता चाय अकेले पीना अपने अकेलेपन को सरेआम स्वीकार करने जैसा है। वो यही नहीं करना चाहते थे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वो अपने ख्यालों में ही थे। आसपास के लोगों को देख रहे थे, पर ध्यान नहीं दे रहे थे। उनका पूरा ध्यान अपने ही ख्यालों में था। तभी एक 65 - 70 बरस की एक महिला दिखी। हलकी लाल बॉर्डर वाली सफ़ेद सूती साड़ी पहने हुए थी और आँखों पर चश्मा था। सीधी चल रही थी और उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था। वो थी सुदेशना जी जो अभी हाल ही में अपनी बेटी के यहाँ रहने आई थी। आसपास कोई बेंच नहीं था और आनंद बाबू बेंच के एक किनारे पर बैठे थी, सो काफी जगह बची थी उस बेंच पर। सुदेशना जी उसी बेंच पर एक किनारे बैठ गयी। एक हल्की सी मुस्कान दोनों ने एक दूसरे को दी जब क्षणिक नजर एक दूसरे पर पड़ी।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;शास्त्री जी ने दो एक मिनट में अपने दुकान में काम करने वाले लड़के को उस बेंच की तरफ भेजा, 2 कप और चाय की केतली के साथ। लड़का आनंद बाबू के पास आया और बोला , &quot;बाऊजी चाय निकालूँ?&quot;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आनंद बाबू ने चश्मा ठीक करते हुए बोला, &quot;हाँ, दे दो। बहन जी से भी पूछ लो अगर वो चाय पियें तो।&quot; कहते हुए उन्होंने सुदेशना जी की ओर इशारा किया।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुदेशना जी ने मुस्कराते हुए कहा, &quot;हाँ हाँ दे दो। और भाईसाहब चाय के पैसे मैं दूंगी।&quot; कहते हुए वो अपने छोटे पर्स से पैसे निकलने लगी। दूसरे तरफ से शास्त्रीजी ये सब देख रहे थे। वहीं से बोले, &quot;अरे आपलोग आज चाय मेरी तरफ से पियें। कल आप पैसे दे देना।&quot;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस बातचीत में वहां के माहौल में थोड़ा और अपनापन आ गया था।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दो कुल्हड़ चाय बेंच पर आ गई। मिट्टी के कुल्हड़ से सोंधी-सोंधी खुशबू आ रही थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आनंद बाबू ने पहला घूंट लिया और बोले, &quot;इस शहर में सब बहुत भाग रहे हैं, बस यह चाय की टपरी ही है जो अपनी रफ्तार से चल रही है।&quot;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुलोचना जी ने कप थामते हुए कहा, &quot;सही कहा आपने। जब अपने दूर हो जाते हैं, तो यह छोटे-छोटे पल ही जीने का सहारा बनते हैं। मेरी बेटी और दामाद रात के नौ बजे से पहले घर नहीं आते। अकेले घर काटने को दौड़ता है।&quot;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आनंद बाबू की आँखों में चमक आ गई। उन्हें लगा जैसे कोई उनके दिल की बात बोल रहा हो। उन्होंने कहा, &quot;मेरा बेटा भी न्यूयॉर्क में है। हफ़्ते में एक दो बार फोन आ जाता है—&#39;हॉउ आर यू डैड?&#39; और बस बात खत्म। उन्हें क्या पता कि डैड को &#39;हॉउ आर यू&#39; से ज़्यादा सुकून उसके साथ बैठ कर एक कप चाय पीने में आएगा। हाँ, मानता हूँ किए उसके लिए इतना आसान नहीं है अमेरिका से बात बात पर भारत आ जाना। लेकिन साल दो साल में एक बार तो आ ही सकता है ना।&quot;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस दिन, चाय की गर्माहट ने दोनों के दिलों के दरवाज़े खोल दिए। आधे घंटे में दोनों ने अपने बचपन, अपनी जवानी, अपने खोए हुए जीवनसाथी और अपनी छोटी-छोटी बीमारियों तक का ज़िक्र कर दिया। जो बातें वे अपने बच्चों से नहीं कह पाते थे, क्योंकि बच्चे &#39;बिज़ी&#39; थे, वे बातें उन्होंने एक अजनबी से कह दीं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चाय खत्म हो चुकी थी, लेकिन दोनों के चेहरों पर एक अजीब सा सुकून था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुलोचना जी बेंच की हैंडल का सहारा लेते हुए उठीं और मुस्कुराकर बोलीं, &quot;कल फिर इसी वक्त?&quot;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आनंद बाबू ने अपने जीवन में महीनों बाद इतनी खुशी महसूस की थी। उन्होंने सिर हिलाया, &quot;बिल्कुल। और कल चाय मेरी तरफ से होगी।&quot; और दोनों ने एक आत्मीय मुस्कान के साथ एक दूसरे से विदा लिया, का फिर मिलने के वादे के साथ।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अब पार्क की उस आखिरी बेंच पर सिर्फ दो बुज़ुर्ग नहीं बैठते, बल्कि वहाँ दो कुल्हड़ चाय के बहाने हर शाम ज़िंदगी मुस्कुराती है। बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त रहे, लेकिन चाय के उस एक प्याले ने दो अकेले इंसानों को जीने की एक नई वजह दे दी थी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/2195958067563207682/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_26.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/2195958067563207682'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/2195958067563207682'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_26.html' title='एक कप अकेलापन '/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-3086330901100996156</id><published>2026-05-25T18:41:38.905+05:30</published><updated>2026-05-25T18:41:38.906+05:30</updated><title type='text'>एक कप मासुमियत</title><content type='html'>&lt;p&gt;आज फिर पापा ऑफिस से आते ही सोफे पर बैठ गए थे। आँखें बंद किये निढ़ाल हो कर बैठे थे और अपने हाथों से अपना सर दबा रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रोहन ने पापा को देखा और माँ के पास जा कर लगभग फुसफुसा कर पूछा, &quot;माँ, पापा रोज ऑफिस से लौट कर आँखें बंद कर सोफे पर क्यों बैठ जाते हैं। हमेशा अपने हाथों से अपना सिर दबाते हैं। पापा ऐसा क्यों करते हैं माँ?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माँ ने प्यार से रोहन के सिर पर हाथ फेरा और बोला, &quot;बेटा पापा को ऑफिस में बहुत काम रहता है। दिन भर काम कर के थक जाते हैं इसलिए सोफे पर थोड़ी देर बैठ कर अपनी थकान मिटाते हैं। उन्हें अभी मैं एक कप कड़क चाय बना कर देती हूँ। उनकी थकान अभी छूमंतर हो जाएगी।&quot; कह कर माँ रोहन को वहीं छोड़ कर किचन में चली गयी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;7 साल के रोहन को यही समझ में आया की चाय एक जादुई दवा है और इसे पीते ही पापा की सारी थकान दूर हो जाती है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बात आई गयी हो गयी। रोहन चुपके से रोज माँ को चाय बनाते देखता। कभी कभी पापा के पास सोफे पर बैठ कर उनके बालों पर हाथ फेरता और पापा को मुस्कुराते देखता। उसे लगता की कड़क चाय तो पापा की थकान मिटाने की एक जादुई दवा है लेकिन वो तब ज्यादा असर करती जब रोहन पापा के सिर पर हाथ फेर कर उन सिर को दबाता।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस दिन शनिवार था। पापा का हाफ डे था और पापा दोपहर में ही ऑफिस से आ गए थे। माँ पास के ही आंटी के घर पर गयी हुई थी। पापा घर में घुसते ही अपना बैग टेबल पर रखा और रोज की तरह सोफे पर पसर गए। आँखें बंद कर के अपने हाथ से अपना सिर दबाने लगे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रोहन को लगा की उन्हें अभी उस जादुई दवा की जरुरत है। माँ घर पर नहीं है। क्यों ना मैं ही एक अच्छी कड़क चाय बना दूँ। यही सोचते सोचते वो किचन में गया। उनसे एक सस्पेन&amp;nbsp;निकला और उसे गैस स्टोव पर चढ़ा दिया। पापा के लिए चाय की कप निकली और एक कप भर कर पानी सस्पेन&amp;nbsp;में डाल दिया और स्टोव जला दिया। पानी उबलने लगी थी। उसने ऊँचे टेबल पर चढ़ कर ऊपर के अलमारी से चाय पत्ती का डब्बा उठाया और चाय में 2 चम्मच चाय पत्ती डाल दी। माँ इतना ही डालती थी। फिर लगा की थोड़ी और चाय पत्ती डाली तो चाय और भी कड़क हो जाएगी और पापा की थकान पर ज्यादा असर करेगी। उसने 2 और चम्मच चाय पत्ती उबलते पानी में डाल दिया। इतनी पत्ती की वजह से उबलता पानी बिलकुल काला हो गया था। उसने काला रंग देखा और मन ही मन सोंचा कि इसे कहते हैं कड़क चाय। माँ से भी बेहतर नुस्खे उसके पास हैं। अपने ख्याल पर वो मन ही मन मुस्काया और चीनी का डब्बा ढूंढने लगा। वहीं पास में वो भी मिल गया। उसने 4 - 5 चम्मच चीनी के भी दाल दिए थे उबलते पानी में। रोहन की जादुई चाय अब तैयार थी। उसे कप में छाना और पापा के पास जाने लगा। तभी उसे याद आया की माँ जब भी चाय बनती है तो कुछ तो कूट कर उसमे डालती है। शायद अदरक डालती है। बहुत ढूंढने पर भी उसे किचन में अदरक नहीं मिला। उसकी नजर इलिचाई पर पड़ी। उसने 2 इलिचाई निकाली और जैसे तैसे कूट कर चाय के कप में डाल दिया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो मंद मंद मुस्कुराते हुए पूरी एहतियात के साथ सधे क़दमों से धीरे धीरे ड्राइंग रूम की तरफ जाने लगा। पापा अभी भी आँखें बंद किये सोफे पर बैठे थे। शायद अभी किचन में जादुई चाय के नुस्खे के ढूंढ़े जाने की पूरी प्रक्रिया से पूरी तरह अनजान थे। पापा के नजदीक जा कर रोहन ने आवाज लगाई, &quot;पापा चाय पी लीजिये। आपकी थकान की दवा।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पापा ने चौंक कर आँखें खोली। &quot;मम्मी तो घर पर नहीं है, फिर ये चाय किसने बनाई?&quot; पापा की आवाज में आश्चर्य था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रोहन ने एक बड़ी सी मुस्कान बिखेरी और बोला, &quot;ये मैंने बनाई है। ये मम्मी की चाय से भी बेहतर है।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पारदर्शी कप में काले रंग की चाय देख कर पापा थोड़ा मुस्कुराये, और जल्दी से चाय रोहन के हाथों से ले लिया की उसका हाथ ना जले। चाय में कूट कर ऊपर से डाली हुई इलिचाई के छिलके तैर रहे थे। पापा ने&amp;nbsp; बोला,&quot;बेटा मेरी थकान तो बस तुम्हे देखते ही ख़तम हो जाती है।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रोहन को उन्होंने खींच कर अपने पास बिठाया और चाय की पहली चुस्की ली। चाय इतनी पत्ती डालने की वजह से करवाहट से भर गयी थी। ऊपर से जरुरत से ज्यादा चीनी ने उसमे एक अलग ही मिठास भर दी थी। रोहन गौर से पापा को देख रहा था की अब पापा कुछ कहेंगे। ये क्या, पापा की आँखों में आंसू छलक आये थे। उन्होंने रोहन को कास कर जकड़ लिया और बोला, &quot;ये दुनिया की बेस्ट चाय है। तुम तो Master Chef हो गए हो। देखो मेरी थकान एक चुस्की में ही उतर गयी।&quot; और धीरे धीरे चाय पीने लगे। शायद कोई और दिन होता और किसी और ने ये चाय बनायी होती तो वो&lt;span&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/span&gt; चाय की एक घूँट भी नहीं पीते। लेकिन ये चाय तो उनके छोटे जादूगर ने बनाया था। इसे कैसे छोड़ सकते थे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रोहन खुशी से उछल पड़ा, &quot;सच में पापा? अब से मैं रोज़ आपके लिए ये जादुई दवा बनाऊँगा!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पापा ने हँसते हुए कहा, &quot;रोज़ नहीं बेटा, सिर्फ छुट्टी वाले दिन। और अगली बार चीनी थोड़ी कम रखेंगे, नहीं तो पापा बहुत ज़्यादा मीठे हो जाएँगे।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस शाम, माँ जब घर लौटीं, तो उन्होंने देखा कि सोफे पर पापा और रोहन दोनों बैठे थे। पापा मुस्कुराते हुए वो कड़क-मीठी चाय पी रहे थे और रोहन उनके चश्मे को अपने कुर्ते से साफ कर रहा था। चाय के उस एक कप ने उस छोटे से घर को दुनिया की सबसे खुशनुमा जगह बना दिया था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/3086330901100996156/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_8137.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/3086330901100996156'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/3086330901100996156'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_8137.html' title='एक कप मासुमियत'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-8837492525797271486</id><published>2026-05-25T12:42:13.322+05:30</published><updated>2026-05-25T12:42:13.322+05:30</updated><title type='text'>कुत्ता</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;वो बात नहीं करता, पर सब समझता है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक टुकड़े की खातिर, वो उम्र भर तड़पता है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इंसान बदल जाते हैं अक्सर मौसम की तरह&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर ये बेजुबां हर हाल में, अपने मालिक पे मरता है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाहे धूप हो कड़ी, या ठिठुरती हुई सी रात,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो सोता नहीं जब तक मालिक हो उनके साथ&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसकी वफ़ा के आगे ताज़ - ओ - तख़्त फीका है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसने मुहब्बत में बस निभाना ही सीखा है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम झिड़क तो उसे, या मारो कोई पत्थर भी,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो लौट आता है, झुकाये अपना सर फिर भी&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुस्सा नहीं होता वो, बस आँखे भर आती है,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसकी खामोश वफ़ाएं, पत्थरों को भी पिघलाती हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोग ढूंढते है वफ़ा, ज़माने भर के इंसानों में,&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;और खुदा ने उसे रख दिया, इस बेजुबान के सायों में।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब दुनिया छोड़ देती है, और साये भी मुँह मोड़ते हैं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब भी इसके कदम मालिक को नहीं छोड़ते हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इश्क़ देखना है तो देखो उस कुत्ते की आँखों में,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो आखिरी सांस भी लेता, अपनी हमनफ़स की बाहों में।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/8837492525797271486/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_984.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/8837492525797271486'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/8837492525797271486'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_984.html' title='कुत्ता'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-318720365550636767</id><published>2026-05-25T12:14:48.121+05:30</published><updated>2026-05-25T12:14:48.121+05:30</updated><title type='text'>एक कप भावुकता</title><content type='html'>&lt;p&gt;&quot;चाचा चाय पियो हमारे साथ आज, क्या पता कल दुबारा तुमसे मुलाकात हो भी या नहीं!&quot; तिवारी जी ने रहीम डाकिया को अपनी चाय की दूकान पर आने को कहा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रहीम चाचा का आज आखिरी दिन था इस नौकरी में। आज वो सेवा निवृत्त हो रहे थे। 30 साल तक भारत सरकार को सेवा दी थी अपनी। तक़रीबन पुरे समय वो इसी तहसील में रहे थे। उस तहसील की तक़रीबन हर गांव में उन्होंने चिट्ठी पहुँचायी थी। इस तहसील का लगभग हर आदमी उन्हें जानता था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रहीम चाचा इस क्षेत्र में चिट्ठी का एक पर्याय बन गए थे। चिट्ठिओं के बहाने वो हर घर के सुख दुःख के साथी थे। लोग चिट्ठी सिर्फ लेते ही नहीं थे उनसे, बल्कि वो चिट्ठी पर विमर्श भी करते थे। इस पुरे क्षेत्र में लगभग 3000 घर थे। नहीं भी तो वो आधे लोगों को तो जानते ही थे और लगभग हर घर में इन 30 वर्षों में चिट्ठी पहुंचाई थी। ये पूरा क्षेत्र हिन्दुओं का था। मुसलमानों के गिने चुने ही घर थे। लेकिन रहीम चाचा सब के अपने घर के व्यक्ति थे। उनकी पहचान धर्म नहीं डाकिया होना था। उन्हें सब से एक सा ही स्नेह मिलता था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह चाय का निमंत्रण भी इनके लिए एक सामान्य सी बात थी। चाय के बहाने वो लोगों के सुख - दुःख का हिस्सा बन जाते थे। कई लोगों को यहाँ से निकल कर बड़े ओहदे पर जाते देखा था। कई लोगों के परिवार को बढ़ते फिर बिखरते देखा था। कई फसलों को पकते और कई किसानों को निखरते देखा था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये तिवारी जी का भी एक भरा पूरा परिवार था। आज उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से इनका बेटा निकल कर एक बड़ी कंपनी में प्रतिष्ठित पद पर मुंबई में काम कर रहा है। तिवारी जी का अपना खेत है और खेत आज भी उतना ही उपजाता है की इनका गुजर बसर हो जाता है। बेटे पर आज भी वो और उनकी पत्नी बोझ नहीं है। मुंबई जाते हैं तो अपनी जमीन का प्रसाद भी ले कर जाते हैं बेटे के पास।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तिवारी जी ने चाय का गिलास रहीम चाचा को बढ़ाते हुए एक मुस्कान दी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;चाचा समय लगेगा नयी परिस्थितिओं में जमने में। 30 बरस से निरंतर काम कर रहे हो। तुम चिट्ठी नहीं लाते थे हमारे यहाँ, तुम खुद एक खबर थे। चिट्ठी में जो कभी खराब खबर भी आती थी, तुम अपना कंधा हमें दे देते थे। हमारी खुशियों में हम से ज्यादा तुम खुश होते थे। कभी लगा नहीं के ये सिलसिला कभी ख़त्म होगा। देखो आज ख़त्म हो ही रहा है। शायद कल से कोई और हमारी सुख - दुःख का हिस्सा बने, बन भी पाए या ना। हम फिर भी हर चिट्ठी में तुम्हे ही ढूँढेगें।&quot; कहते कहते तिवारी जी थोड़े भावुक हो गए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाय लगभग खत्म होने को आयी थी। शायद रहीम चाचा के साथ का ये सफर भी। भावुकता ना सिर्फ तिवारी जी में थी, उस चाय की दूकान पर बैठा हर शख्स थोड़ी भावुकता महसूस कर रहा था। रहीम चाचा भी। शायद कल से उनकी ज़िन्दगी थोड़ी अलग होगी ... या एकदम ही अलग होगी। कल मुहरों की ठक - ठक नहीं सुनाई देगी, कल चिट्ठिओं के बोर से गिरने की आवाज़ नहीं होगी, ना उन खतों को छंटाई कर उन्हें श्रेणीबद्ध करने का कोई बड़ा काम होगा। न कोई अधूरे पते की ख़त को उनके सही जगह पर पहुँचाने की कोई कवायद। दिन पूरा सुकून भरा होगा। लेकिन ये सुकून रहीम चाचा को चाहिए भी या नहीं, ये तो कल से पता चलेगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रहीम चाचा अपनी तंद्रा मे ही थे। साइकिल की घंटी की आवाज से उसका ध्यान भटका। देखा वहां का नया डाकिया, सुभाष उस चाय की दुकान के सामने अपनी साइकिल खड़ा कर के घंटी बजा रहा था। रहीम चाचा ने एक मुस्कान बिखेरी और बोला, &quot;आओ सुभाष, अब ये पूरा इलाका तुम्हारे हवाले। ये सब मेरे परिवार ही हैं। सो तुमसे उम्मीदें थोड़ी ज्यादा हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;चाचा, कोशिश करूँगा आपकी जगह भरने की। फिलहाल मेरी पहली चिट्ठी की डिलीवरी करनी है। आपके नाम की ही चिट्ठी है, सो आपको देने आ गया हूँ।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रहीम चाचा थोड़ा चौंक गए। &quot;मेरे नाम की चिट्ठी! मुझे कौन खत भेजेगा? अगर भेजा भी तो मेरे घर के पते पर भेजेगा ना!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;चाचा ये लो तुम्हारी चिट्ठी।&quot; उसकी बातों को लगभग अनसुना करते हुए सुभाष ने रहीम चाचा के सामने अपनी चिट्ठिओं का बोरा पलट दिया। तक़रीबन 400 - 500 पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और लिफाफे थें। सब पर रहीम चाचा का नाम लिखा था पते की जगह पर। और कोई और विवरण नहीं।&amp;nbsp; हाँ, भेजने वाले का नाम और ग्राम लिखा था। उन सब को रहीम चाचा पहचानते थे। रहीम चाचा के कार्य क्षेत्र में 3 ग्राम पंचायत आते थे। ये सब प्रेषक इन्ही 3 ग्राम पंचायत के विभिन्न गावों के लोग थे। कभी ना कभी या अक्सर रहीम चाचा ने इनके घर पर डाक या पार्सल पहुंचाया था। इन सब चिट्ठियों पर उन लोगों के रहीम चाचा के साथ के अनुभव लिखे थे। सब पर उन खास मौकों का विवरण था जब उनके सुख - दुःख का हिस्सा बने थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रहीम चाचा ने दोनों हाथों से उन चिट्ठियों को पकड़ रखा था। जो भावुकता अब तक एक अहसास की तरह वो महसूस कर रहे थे, उसने अब आँखों का रास्ता अख़्तियार कर लिया था। अपनी भावनाओं को काबू करने की नाकाम कोशिश भी की चाचा ने लेकिन सफल ना हो पाए। इन चिट्ठियों को पढ़ते पढ़ते अब उनकी बाकी की ज़िन्दगी गुजर जाएगी। उन्होंने सिर्फ ख़त नहीं बाटें थे, हर परिवार के सुख - दुःख के साझेदार बने थे। आज इस चाय की दूकान पर चाय की चुस्कियों के बीच वो अपने भरे पुरे परिवार के फिर से अपने हो गए थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तिवारी जी मुस्कुरा रहे थे। सुभाष खुश था की इन ख़तों के बहाने वो शायद अपने नए कार्य क्षेत्र पर रहीम चाचा सी प्रसिद्धि और स्नेह पा ले।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/318720365550636767/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_25.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/318720365550636767'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/318720365550636767'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_25.html' title='एक कप भावुकता'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-8857610110075422744</id><published>2026-05-24T19:31:46.349+05:30</published><updated>2026-05-24T19:31:46.349+05:30</updated><title type='text'>एक कप सुकून और टूटे बिस्कुट</title><content type='html'>&lt;p&gt;फिर गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली थी। अलका ने दादा दादी के साथ छुट्टियां मानाने को ले कर पूरा घर सर पे उठा लिया था। उसे पता था, पापा कभी भी उसकी बात को टालेंगे नहीं। उसे पापा को मनाने के सौ नुस्खे पता थे। वो पापा के फेवरेट तेजपत्ते वाली चाय ले कर उनके साथ बैठ गयी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;पापा, दादी से बात कर रही थी आज। वो बोल रही थी की अल्कु से मिले अरसा हो गया लगता है। मुझे लगा वो कुछ ज्यादा उम्मीद लगा कर बैठी है। मैंने उन्हें समझाया की पापा इतनी आसानी से छुट्टी नहीं ले सकते। हजारो जिम्मेवारियाँ है उनके सर पे। हमसे तो बात भी कर नहीं पाते जो उनके साथ रहते हैं। आपसे कहाँ मिलने आएंगे।&quot; अलका ने अपने पिटारे के सौ नुस्खे में से एक निकाला।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पापा ने चाय की चुस्कियों के बीच बस &quot;हुँह&quot; कहा था। अलका जानती थी की हुँह सिर्फ एक Non-word नहीं था पापा का, अपने आप में एक पूरा वाक्य था, पूरी सोंच थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाय ख़त्म होने तक ना पापा कुछ बोले ना ही अलका। दोनों साथ बैठे होकर भी अपने आप से बातें कर रहे थे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;***&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देहरादून की गर्मी प्रकृति की अस्तव्यस्तता भर है। कभी तो गर्मी जान लेने पर उतारू हो जाती है, कभी सौम्य माँ का आँचल बन शीतलता फैलाती है। अलका को देहरादून की ये भ्रम वाली गर्मी बहुत पसंद आती थी। उसे अपना ददिहाल पसंद आता था। उसे अपनी दादी के नजदीक रहना भाता था। इस गर्मी की छुट्टियों में भी वो यहाँ आ गयी थी। हाँ थोड़े हथकंडे अपनाने पड़े थे उसे पापा के साथ। पापा ने कहा था की ग्यारहवीं के बच्चों को कहाँ गर्मियों की छुट्टी मिलती है। ये साल अलका के लिए भविष्य बनाने का साल है। अभी अच्छे से नहीं पढ़ेगी तो Medical Entrance में अच्छी ranking नहीं मिलेगी और बेहतर college भी नहीं मिल पायेगा। लेकिन अलका ने पापा को promise किया की वो अच्छे rank ले कर आएगी। लेकिन गर्मी की छुट्टियों में वो दादी से मिलने इस बार ही नहीं, हर बार जाएगी। थोड़ा मन तो पापा का भी था दादी से मिलने का।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अलका अपना बेहतर समय दादी के साथ गुजार रही थी। अहले सुबह वो दादी के साथ जागती और देहरादून की उबार खाबड़ रास्तों पे morning walk को जाती। घंटो दोनों बातें करते। लगता नहीं दादी - पोती हैं दोनों, लगता दो बूढ़ी महिलाएं जवान हो गयीं हैं। माँ पापा को ये देख कर ठीक ही लगता था। शायद इसी वजह से पापा गर्मियों की छुट्टी में यहाँ आना मान गए थे।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक तपती दोपहर में जब पूरा मोहल्ला सो गया था, तब अलका को चाय पीने की इच्छा हुई। दादी अपने कमरे में ऊंघती हुई सो गयी थी। अलका चुपके से दबे पाँव रसोई में गयी। चाय के बर्तन को स्टोव पर चढ़ाया। आज सोंचा दादी की लाल चाय बनायी जाये। ऊपर की अलमारी में चाय पत्ती रखी थी। वो उसे निकलने लगी तो बगल में रखा बिस्कुट का डिब्बा उसके हाथ&amp;nbsp; टकरा कर नीचे गिर गया। एक तेज आवाज़ हुई और जमीन पर गिरते ही डब्बे का ढक्कन खुल गया। कुछ बिस्कुट डब्बे बाहर निकल कर टूट गए। आवाज से दादी की नींद भी खुल गयी। इस डर से की रसोई में बंदर तो नहीं आ गए, वो तेजी से वहां आई।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पता नहीं क्यों, अलका को डर सा लग गया कि कहीं दादी बिस्कुट के डब्बे को गिरा देख कर उसे डाँट ना दे। वो कातर हो कभी नीचे गिरे डब्बे को देख रही थी, कभी दादी को।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दादी ने बिखरे हुए बिस्कुट को देखा और मुस्कुरा कर बोली, &quot;अरे! ये बिस्कुट तो टूट गए, अब इन्हें मेहमानों को तो दे नहीं सकते। चल, इन्हें हम दोनों ठिकाने लगाते हैं।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दादी ने इतनी सहजता से बोला जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। अलका को थोड़ी हिम्मत आई, बोली,&quot;अरे मैंने ये जान बुझ कर गिराया था। आप बड़ी इत्मिनान से सोइ थी। मुझे चाय पीने का दिल कर रहा था, लेकिन आपको उठाने का दिल नहीं किया, सो आपको उठाने का पाप इस डब्बे के सर रख दिया। देखो मैंने आपकी वाली लाल चाय बनायी है। चलो अब साथ बैठ कर पीते हैं।&quot;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दादी उसकी इस चतुरता पर हँस दी, अलका भी ठहाके लगा कर हँस दी, की चलो अब जान बची तो लाखों पाए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अलका ने चाय के प्याले को ट्रे पर रखा, प्लेट में उन टूटे बिस्कुट को सजाया और दोनों बरामदे में आ कर बैठ गए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाय की चुस्कियां लेते लेते अलका ने कहा की &quot;दादी मैं थोड़ा डर सी गयी थी। लगा की इन टूटे बिस्कुट को उठा कर कहीं फेंक दूँ। पता नहीं क्यों मैं इतना डर गयी थी।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दादी ने चाय में बिस्कुट डुबोया और धीरे से बोलीं, &quot;बेटा, गलतियाँ तो सबसे होती हैं। पर उन गलतियों को छुपाने के बजाय, अगर हम उन्हें सुधार लें या साझा कर लें, तो वो गलती नहीं रहतीं। जैसे ये टूटे बिस्कुट... अकेले शायद अच्छे न लगते, पर चाय के साथ इनका स्वाद दोगुना हो गया है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस दिन अलका ने सीखा कि रिश्ते साबुत बिस्कुटों की तरह चमकने के लिए नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का सहारा बनने के लिए होते हैं। ये एक ऐसी सीख उस भरी दोपहरी उसे मिली थी जो हमेशा उसके साथ रहेगी, ज़िन्दगी भर।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज कई बरस हो गए हैं। अलका MS कर के अभी अमेरिका से लौटी है। अब गर्मी की छुट्टियों में देहरादून जाना नहीं हो पाता, अब गर्मी की छुट्टियाँ भी कहाँ होती उसकी। दादी अब तस्वीरों में जिंदा हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अलका जब भी चाय पीती, बस पी लेती। आज भी दादी की वो सीख उसे याद है। बस उन टूटे बिस्कुट और दादी के संग चाय का सुकून कहीं खो गया है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/8857610110075422744/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_24.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/8857610110075422744'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/8857610110075422744'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_24.html' title='एक कप सुकून और टूटे बिस्कुट'/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2503458437868530048.post-6102314713333390017</id><published>2026-05-23T23:52:03.162+05:30</published><updated>2026-05-23T23:52:03.163+05:30</updated><title type='text'> साकी </title><content type='html'>&lt;p&gt;मयखाने की चौखट को ही इबादतगाह कर बैठे&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हम साकी की आँखों में खुदा का दीदार कर बैठे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो मंदिर - ओ - मस्जिद में ढूंढ़ते रहे उम्र भर जिसे,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हम एक जाम पीकर उसे दिल के पार कर बैठे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज़ाहिद ने कहा &#39;कबीरा गुनाह है शराब पीना&#39;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हम साकी की इनायत को खुदा का करम शुमार कर बैठे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तूने बनाई ये कायनात तो कोई खता न की ऐ खुदा,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;साकी ने महफ़िल सजाई हम और गुलज़ार कर बैठे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अश्क आँखों में थे जब तक, कोई सुनता न था दुआ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हम जाम उठा, ज़माने के गम दरकिनार कर बैठे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूछा खुदा ने चाहिए क्या तुझे महशर के रोज़?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हम&amp;nbsp; हाथों से एक और जाम की तकरार कर बैठे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अमितेश&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/feeds/6102314713333390017/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_132.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/6102314713333390017'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2503458437868530048/posts/default/6102314713333390017'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amiteshranjan.blogspot.com/2026/05/blog-post_132.html' title=' साकी '/><author><name>Amitesh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08740860175470068039</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>