<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:blogger="http://schemas.google.com/blogger/2008" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224</atom:id><lastBuildDate>Thu, 19 Dec 2024 03:10:25 +0000</lastBuildDate><category>vedic sanskriti</category><category>महापुरुष</category><category>अंधविश्वास</category><category>राष्ट्र</category><category>वेद</category><category>Arya  Samaj</category><category>कहानी</category><category>संस्कृत साहित्य</category><category>वैदिक ग्रन्थ</category><category>ईश्वर भक्ति भजन</category><category>भजन व गीत</category><category>Sanskrit vyakaran</category><category>ईश्वर</category><category>आचार्य सुधांशु जी की वीडियो</category><category>नारी जाति</category><category>वैदिक गुरुकुल</category><category>Blogger</category><category>आत्मा</category><category>वीर सिपाही</category><category>दर्शन</category><category>महापुरुषों की वीडियो</category><category>यज्ञ</category><category>रामायण कथा</category><category>Wallpaper</category><category>health</category><category>निबन्ध</category><category>स्वास्थ्य</category><title>वैदिक समाज जानकारी</title><description>वैदिक काल को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है- ऋग्वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल। ऋग्वैदिक काल आर्यों ... आर्यो द्वारा निर्मित सभ्यता वैदिक काल कहलाई। आर्यो द्वारा ..... समाज का एक वर्ग &#39;पाणी&#39; व्यापार किया करते थे। उत्तर वैदिक काल की सामाजिक स्थिति,उत्तर वैदिक काल का धार्मिक जीवन,उत्तर वैदिक,काल का सामाजिक जीवन,वैदिक काल pdf,उत्तर वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति,ऋग्वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में अंतर,ऋग्वैदिक काल की,राजनीतिक दशा,वैदिक काल नोट्स</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (Sanjay)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>147</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-1907246653138553177</guid><pubDate>Sun, 15 Mar 2020 06:47:00 +0000</pubDate><atom:updated>2020-03-15T12:17:31.842+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">संस्कृत साहित्य</category><title>पंचतन्त्र की कहानियाँ - Panchtantra ki Kahaniyan</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
विश्व-साहित्य में पंचतन्त्र का स्थान&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=hindi.niban&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;पंचतन्त्र की कहानियाँ&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;512&quot; data-original-width=&quot;512&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiUHO8YOb3l_FzmwErvTLVGwgo4IvPf3tiqlVFhLLcbuyGubK46-hJe7NrNbtq9aAW4MdGK0dOPpK-NHNoedhRpoKuH-42vUsT29PshQytLqSo8Kz8jDkAyNARh86r1pDhvbTYQmWaL0uz_/s320/PicsArt_03-14-01.22.00_copy_512x512.jpg&quot; title=&quot;पंचतन्त्र की कहानियाँ&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=hindi.niban&quot;&gt;पंचतन्त्र की कहानियाँ&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;विश्व-साहित्य में भी पंचतन्त्र का महत्वपूर्ण स्थान है। इसका कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इन अनुवादों में पहलवी भाषा का ‘करटकदमनक’ नाम का अनुवाद ही सबसे प्राचीन अनुवाद माना जाता है। इसकी लोकप्रियता का यह परिणाम था कि बहुत जल्द ही पंचतंत्र का ‘लेरियाई’ भाषा में अनुवाद करके प्रकाशित किया गया, यह संस्करण 570 ई. में प्रकाशित हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फारसी से अरबी भाषा में इसका अनुवाद हुआ। अरबी से सन 1080 के लगभग इसका यूनानी भाषा में अनुवाद हुआ। फिर यूनानी से इसका अनुवाद लैटिन भाषा में पसिनस नामक व्यक्ति ने किया। अरब अनुवाद का एक उल्था स्पेन की भाषा में सन 1251 के लगभग प्रकाशित हुआ। जर्मन भाषा में पहला अनुवाद 15वीं शताब्दी में हुआ और उससे ग्रंथ का अनुवाद यूरोप की सब भाषाओं में हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विंटरनित्ज़ के अनुसार जर्मन साहित्य पर पंचतन्त्र का अधिक प्रभाव देखा जाता है। इसी प्रकार ग्रीक की ईसप् की कहानियों का तथा अरब की &#39;अरेबिअन नाइट्स&#39; आदि कथाओं का आधार पंचतन्त्र ही है। ऐसा माना जाता है कि पंचतन्त्र का लगभग 50 विविध भाषाओं में अब तक अनुवाद हो चुका है और इसके लगभग 200 संस्करण भी हो चुके है। यही इसकी लोकप्रियता का परिचायक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
पंचतन्त्र का स्वरूप&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
पंचतन्त्र में पांच तन्त्र या विभाग है। (पंचानाम् तन्त्राणाम् समाहारः - द्विगुसमास) विभाग को तन्त्र इसलिए कहा गया है क्योंकि इनमें नैतिकतापूर्ण शासन की विधियाँ बतायीं गयीं हैं। ये तन्त्र हैं- मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति (मित्रलाभ), काकोलूकीयम् (सन्धि-विग्रह), लब्धप्रणाश एवं अपरीक्षितकारक।&lt;br /&gt;
संक्षेप में इन तन्त्रों की विषयवस्तु इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
मित्रभेद&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
नीतिकथाओं में एक मुख्य कथा होती है और उसको पुष्ट करने के लिए अनेक गौण कथाएं होती हैं उसी प्रकार ‘मित्रभेद’ नामक इस प्रथम तन्त्र में अंगीकथा के पूर्व दक्षिण में महिलारोप्य के राजा अमरशक्ति की कथा दी गई है जिसमें यह बताया गया है कि वे अपने मूर्ख पुत्रों के लिए कारण चिन्तित थे और इसलिए वे विष्णुशर्मा नामक विद्वान् को अपने पुत्रों को शिक्षित करने के सौंप देते है और विष्णुशर्मा उन्हें छः मास में ही कथाओं के माध्यम से सुशिक्षित करने में सफल होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्पश्चात् मित्रभेद नामक भाग की अंगी-कथा में, एक दुष्ट सियार द्वारा पिंगलक नामक सिंह के साथ संजीवक नामक बैल की शत्रुता उत्पन्न कराने का वर्णन है जिसे सिंह ने आपत्ति से बचाया था और अपने दो मन्त्रियों- करकट और दमनक के विरोध करने पर भी उसे अपना मित्र बना लिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=hindi.niban&quot;&gt;पंचतन्त्र की कहानियाँ पढ़ने के लिए ऐप्प डाउनलोड करें - डाउनलोड/Download&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस तन्त्र में अनेक प्रकार की शिक्षाएं दी गई है जैसे कि धैर्य से व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थिति का भी सामना कर सकता है अतः प्रारब्ध के बिगड़ जाने पर भी धैर्य का त्याग नहीं करना चाहिए-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि काले धैर्यात्कदाचित् गतिमाप्नुयात्सः (मित्रभेद, श्लोक 345)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=hindi.niban&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1200&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;240&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi5DAsNRi6wRhiBHbDSt_x_fgshSHNyRI-CRhMBG214ejo8EFqm3LimnpdtfG1SG7yWS5qy9Pp8d3mxjcMuMKcLnvFA1hyphenhyphenWtj6eflIToeQifs_Geb1BzRG0y-XqDJ1NHcGfXX3qQYCvxm-J/s320/PicsArt_03-14-12.57.54.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
मित्रसम्प्राप्ति&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
इस तन्त्र में मित्र की प्राप्ति से कितना सुख एवं आनन्दप्राप्त होता है वह कपोतराज चित्रग्रीव की कथा के माध्यम से बताया गया है। विपत्ति में मित्र ही सहायता करता है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;सर्वेषामेव मर्त्यानां व्यसने समुपस्थिते।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;वाड्मात्रेणापि साहाय्यंमित्रादन्यो न संदधे॥&lt;/b&gt; (मित्रसम्प्राप्ति श्लोक 12)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा कहा गया है कि मित्र का घर में आना स्वर्ग से भी अधिक सुख को देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;सुहृदो भवने यस्य समागच्छन्ति नित्यशः।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;चित्ते च तस्य सौख्यस्य न किंचत्प्रतिमं सुखम्॥&lt;/b&gt; (मित्रसम्प्राप्ति श्लोक 18)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार इस तन्त्र का उपदेश यह है कि उपयोगी मित्र ही बनाने चाहिए जिस प्रकार कौआ, कछुआ, हिरण और चूहा मित्रता के बल पर ही सुखी रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
काकोलूकीय&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
इसमें युद्ध और सन्धि का वर्णन करते हुए उल्लुओं की गुहा को कौओं द्वारा जला देने की कथा कही गयी है। इसमें यह बताया गया है कि स्वार्थसिद्धि के लिए शत्रु को भी मित्र बना लेना चाहिए और बाद में धेखा देकर उसे नष्ट कर देना चाहिए। इस तन्त्र में भी कौआ उल्लू से मित्रता कर लेता है और बाद में उल्लू के किले में आग लगवा देता है। इसलिए शत्रुओं से सावधन रहना चाहिए क्योंकि जो मनुष्य आलस्य में पड़कर स्वच्छन्दता से बढ़ते हुए शत्रु और रोग की उपेक्षा करता है- उसके रोकने की चेष्टा नहीं करता वह क्रमशः उसी (शत्रु अथवा रोग) से मारा जाता है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;य उपेक्षेत शत्रु स्वं प्रसरस्तं यदृच्छया।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;रोग चाऽलस्यसंयुक्तः स शनैस्तेन हन्यते॥&lt;/b&gt; (काकोलूकीय श्लोक 2)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
लब्धप्रणाश&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
इस तन्त्र में वानर और मगरमच्छ की मुख्य कथा है और अन्य अवान्तर कथाएं हैं। इन कथाओं में यह बताया गया है कि लब्ध अर्थात् अभीष्ट की प्राप्ति होते होते कैसे रह गई अर्थात नष्ट हो गई। इसमें वानर और मगरमच्छ की कथा के माध्यम से शिक्षा दी गई है कि बुद्धिमान अपने बुद्धिबल से जीत जाता है और मूर्ख हाथ में आई हुई वस्तु से भी वंचित रह जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
अपरीक्षितकारक&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
पंचतन्त्र के इस अन्तिम तन्त्र अर्थात् भाग में विशेषरूप से विचार पूर्वक सुपरीक्षित कार्य करने की नीति पर बल दिया है क्योंकि अच्छी तरह विचार किए बिना एवं भलीभांति देखे सुने बिना किसी कार्य को करने वाले व्यक्ति को कार्य में सफलता प्राप्त नहीं होती अपितु जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;पंचतन्त्र की कहानियाँ - &lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=hindi.niban&quot;&gt;डाउनलोड/Download&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiZvUOmD5ZMgIURSl1mvPyz5pwo6YQixbRstjFJV8JHKpgGqGw_Lm1m7e2FRMmLNRYsRh8wlekeSMsnTZDgOYPmBFy0UQwx92rfLgSl6Bfrw3bwFHfUtId4o2j6xchJs2hA7ca8ciCft9kB/s1600/PicsArt_03-14-04.00.20_copy_256x256.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;256&quot; data-original-width=&quot;256&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiZvUOmD5ZMgIURSl1mvPyz5pwo6YQixbRstjFJV8JHKpgGqGw_Lm1m7e2FRMmLNRYsRh8wlekeSMsnTZDgOYPmBFy0UQwx92rfLgSl6Bfrw3bwFHfUtId4o2j6xchJs2hA7ca8ciCft9kB/s1600/PicsArt_03-14-04.00.20_copy_256x256.jpg&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;
अतः अन्धनुकरण नहीं करना चाहिए। इस तन्त्र की मुख्य कथा में बिना सोचे समझे अन्धनुकरण करने वाले एक नाई की कथा है जिसको मणिभद्र नाम के सेठ का अनुकरण करजैन-संन्यासियों के वध के दोष पर न्यायाधीशों द्वारा मृत्युदण्ड दिया गया। अतः बिना परीक्षा किए हुए नाई के समान अनुचित कार्य नहीं करना चाहिए-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
&lt;b&gt;कुदृष्टं कुपरिज्ञातं कुश्रुतं कुपरीक्षितम्।&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;b&gt;तन्नरेण न कर्त्तव्यं नापितेनात्र यत् कृतम्॥&lt;/b&gt; (अपरीक्षितकारक श्लोक-1)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसमें यह भी बताया है कि पूरी जानकारी के बिना भी कोई कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि बाद में पछताना पड़ता है जैसे कि ब्राह्मण पत्नीने बिना कुछ देखे खून से लथपथ नेवले को यह सोचकर मार दिया कि इस ने मेरे पुत्र को खा लिया है वस्तुतः नेवले ने तो सांप से बच्चे की रक्षा करने के लिए सांप को मारा था जिससे उसका मुख खून से सना हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए कहा गया-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;अपरीक्ष्य न कर्तव्यं कर्तव्यं सुपरीक्षितम्।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;पश्चाद्भवति सन्तापो ब्राह्मण्या नकुले यथा॥&lt;/b&gt; (अपरीक्षित कारक श्लोक-17)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार पंचतन्त्र एक उपदेशपरक रचना है। इसमें लेखकने अपनी व्यवहार कुशलता राजनैतिकपटुता एवं ज्ञान का परिचय दिया है। नीति-कथाओं के मानवेतर पात्र प्रायः दो प्रकार के होते हैं, सजीव प्राणी तथा अचेतन पदार्थ। पंचतन्त्र में भी ये दो प्रकार के पात्र देखे जाते हैं- पशुओं में सिंह, व्याघ्र, शृगाल, शशक, वृषभ, गधा, आदि, पक्षियों में काक, उलूक, कपोत, मयूर, चटक, शुक आदि तथा इतर प्राणियों में सर्प, नकुल, पिपीलिका आदि। इनके अतिरिक्त नदी, समुद्र, वृक्ष, पर्वत, गुहा आदि भी अचेतन पात्र हैं, जिन पर कि मानवीय व्यवहारों का आरोप किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
पंचतन्त्र में मानव को व्यवहार कुशल बनाने का प्रयास&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
अत्यधिक सरल एवं रोचक शैली में किया गया है। पंचतन्त्र के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए डॉ॰ वासुदेव शरण अग्रवाल ने लिखा है कि-&lt;br /&gt;
&quot;पंचतन्त्र एक नीति शास्त्र या नीति ग्रन्थ है- नीति का अर्थ जीवन में बुद्धि पूर्वक व्यवहार करना है। चतुरता और धूर्तता नहीं, नैतिक जीवन वह जीवन है जिसमें मनुष्य की समस्त शक्तियों और सम्भावनाओं का विकास हो अर्थात् एक ऐसे जीवन की प्राप्ति हो जिसमें आत्मरक्षा, धन-समृद्धि, सत्कर्म, मित्रता एवं विद्या की प्राप्ति हो सके&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;पंचतन्त्र की कहानियाँ&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;और इनका इस प्रकार समन्वय किया गया हो कि जिससे आनंद की प्राप्ति हो सके, इसी प्रकार के जीवन की प्राप्ति के लिए, पंचतन्त्र में चतुर एवं बुद्धिमान पशु-पक्षियों के कार्य व्यापारों से सम्बद्ध कहानियां ग्रथित की गई हैं। पंचतन्त्र की परम्परा के अनुसार भी इसकी रचना एक राजा के उन्मार्गगामी पुत्रों की शिक्षा के लिए की गई है और लेखक इसमें पूर्ण सफल रहा है।&quot;&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=hindi.niban&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;512&quot; data-original-width=&quot;512&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj6HaysItOUPZT2hqlUwkS5t3N51JkHFPdUcHJvREYs1Cbz9FI1IyMNm-klMRaDAJA9dK_xsX23NvF1FdJLQTrtQZfPCAq27AN33u8JFjBBQbp5fCp-G48ZSzNonhsbqaW3Q68p76VKEw8G/s320/PicsArt_03-14-01.22.00_copy_512x512.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;b&gt;पंचतन्त्र की सभी कहानियाँ पढ़ने के लिए ऐप्प डाउनलोड करें&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;h2 style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=hindi.niban&quot;&gt;डाउनलोड/DOWNLOAD&lt;/a&gt;&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2020/03/Panchtantra-Kahani.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiUHO8YOb3l_FzmwErvTLVGwgo4IvPf3tiqlVFhLLcbuyGubK46-hJe7NrNbtq9aAW4MdGK0dOPpK-NHNoedhRpoKuH-42vUsT29PshQytLqSo8Kz8jDkAyNARh86r1pDhvbTYQmWaL0uz_/s72-c/PicsArt_03-14-01.22.00_copy_512x512.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-6589086965066140166</guid><pubDate>Wed, 22 Jan 2020 01:48:00 +0000</pubDate><atom:updated>2020-01-22T07:18:59.275+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">आचार्य सुधांशु जी की वीडियो</category><title>अनहद नाद रहस्य | आचार्य सुधांशु जी |</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;अनहद नाद क्या है,क्या यह अन्धविश्वास है या इससे कोई लाभ है वा नहीं ? इसके बारे में जानने के लिये वीडियो दखिये |&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;
&lt;div&gt;
&lt;span style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;hr /&gt;
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&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
वीडियो&lt;/h2&gt;
&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&lt;iframe frameborder=&quot;0&quot; height=&quot;350&quot; marginheight=&quot;0&quot; marginwidth=&quot;0&quot; scrolling=&quot;no&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/fbPdjVWiRlo?autoplay=0&amp;amp;origin=https://webbeast.in&quot; type=&quot;text/html&quot; width=&quot;450&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2020/01/Anahad-Naad.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://img.youtube.com/vi/fbPdjVWiRlo/default.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-7793913242748379599</guid><pubDate>Sun, 29 Dec 2019 10:26:00 +0000</pubDate><atom:updated>2020-01-13T13:03:36.667+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">निबन्ध</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">राष्ट्र</category><title>सत्ता (कुर्सी) प्राप्त अधिकारियों के लक्षण</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjaCocf8AZYyoBAWMKiFHhcsBfBXREWpF3yGOnbTlaf3tQIY3O0Wz07ZmyqpkYweZ0DGT1WDu6QSr_iNOsn5QhyvMK3deA95P79e1SnaYBrao15diYotnKn9-N_y1KFja7tVfAMrXYE8iVp/s1600/download+%25281%2529.jpeg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;सत्ता (कुर्सी) प्राप्त अधिकारियों के लक्षण&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;169&quot; data-original-width=&quot;299&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjaCocf8AZYyoBAWMKiFHhcsBfBXREWpF3yGOnbTlaf3tQIY3O0Wz07ZmyqpkYweZ0DGT1WDu6QSr_iNOsn5QhyvMK3deA95P79e1SnaYBrao15diYotnKn9-N_y1KFja7tVfAMrXYE8iVp/s1600/download+%25281%2529.jpeg&quot; title=&quot;सत्ता (कुर्सी) प्राप्त अधिकारियों के लक्षण&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;सत्ता (कुर्सी) प्राप्त अधिकारियों के लक्षण&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/h2&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
सत्ता (कुर्सी) प्राप्त अधिकारियों के लक्षण&lt;/h2&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
क्रोध अधिक करना&lt;/h2&gt;
कुर्सी का मद अधिकारियों का बहुत पतन करता है । कुर्सी ( सत्ता ) सबसे पहले क्रोध को करती है । क्रोध के कुछ उचित कारण भी होते हैं , परन्तु सत्ता कारण भी क्रोध की मात्रा बहुत बढ़ जाती है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
वाणी में असंयम&lt;/h2&gt;
अधिकारियों के में कटुता प्रायः व्याप्त रहती है । अधिकारी वाणी के संयम को प्रायः खो देते हैं । अधिक बोलना , सोच - समझकर न बोलना , प्रेम न बोलकर कटतापूर्वक बोलना , अधीनस्थ कर्मचारियों की पीठ पर निन्दा ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आलोचना और उपहास करना , उनके समक्ष दिल दुखानेवाली&amp;nbsp; बातें कहना , अपनी कार्य - सिद्धि के लिए झूठे वचन देना , झूठ बोलना ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;एक व्यक्ति द्वारा की गई आलोचना को दूसरे को बताकर उन्हें लड़ाना , गर्वोक्तियाँ कहना , आत्म - प्रशंसा करते रहना - आदि वाचिक दुर्गुण प्रायः अधिकारियों में आ जाते हैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
मानसिक पतन&lt;/h2&gt;
मानसिक पतन का तो कोई ठिकाना ही नहीं । अधिकारियों में अपने से छोटों और अधीनस्थ कर्मचारियों के प्रति प्रायः प्रेम का अभाव होता है और अभिमान को मात्रा बढ़ जाती है । अधिकारी चाटुकारिताप्रिय हो जाते हैं&amp;nbsp;।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ये आत्म - सम्मानी और स्पष्टवादी व्यक्तियों के घोर शत्रु हो जाते हैं । यदि कोई आत्मसम्मानी व्यक्ति इनके आगे अड़ जाए तो उसे पशु बल और अधिकार - बल से कुचलने का प्रयत्न करेंगे । अधीन कर्मचारी से यदि कोई त्रुटि हो जाए तो क्षमा - याचना कराएंगे , किन्तु यदि अपने से त्रुटि हो जाए तो उससे क्षमा याचना तो कहीं रही , अधीनस्थ कर्म चारियों के सम्मुख खेद भी प्रकट नहीं करेंगे और कर्मचारी का हृदय सुलगता रहेगा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
छलकपटता&lt;/h2&gt;
अधिकारियों के आचरण में वक्रता आ जाती है , सरलता नहीं रहती । छल - कपट , धोखेबाजी और मक्कारी उनके आचरण में आ जाती है वे बहुत तीव्र रुचि और अरुचि के व्यक्ति बन जाते हैं । जिसपर रीझ गए उसे सिर का ताज बना लिया और जिससे रुष्ट हो गए , बस उसे चींटी की भांति मसलने पर उतारू हो गए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
बदले की भावना&lt;/h2&gt;
ये अधिकारी प्रतिकारी भी हो जाते हैं । बदला लेने की भावना उनमें प्रबल हो जाती है । जिसपर रुष्ट हो जाएंगे , उसके प्रति कमीनापन भी दिखाएंगे । ऐसी चेष्टाएँ दिखाएंगे कि जिनसे इनका कमीनापन प्रकट हो और कर्मचारी के मन में आग सुलगती रहे । कई अधिकारी अपने कर्मचारी के प्रति ( जिससे वे रुष्ट हों ) कमीनी चेष्टाएँ तो नहीं दिखाते , परन्तु रोष को मन में रखकर उस कर्मचारी की अवहेलना करने लगते हैं । उसे कोई काम नहीं बताते और उसे उपेक्षित कर&amp;nbsp;देते हैं । आध्यात्मिकता की दृष्टि से यह भी एक कमी है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्मचारी को बुलाकर उसके आगे अपना रोष प्रकट करने से अधिकारी मानसिक दुर्भावनाओं से बच सकते हैं । कई बार अधिकारी कर्म चारियों को आपस में लड़ा भी देते हैं । अधिकारी जिससे रुष्ट हो जाएँ उसके विरुद्ध झूठा प्रचार ( कर्मचारी की छवि बिगाड़ने और अपने पक्ष को सत्य सिद्ध करने के लिए ) आरम्भ कर देते हैं । वे अनचित साधनों से भी अपने लक्ष्य को सिद्ध करना चाहते हैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
स्वार्थ सिद्धि&lt;/h2&gt;
वे पक्के स्वार्थी होते हैं । जब कोई स्वार्थ पूरा करना हो तो सम्बन्धित व्यक्ति के प्रति मधुर व्यवहार प्रदशित करेंगे । जब काम निकल जाए तो फिर उसकी कोई परवाह नहीं । कई अधिकारी तो यहाँ तक स्वार्थी होते हैं कि वे जिस कर्मचारी से रुष्ट हों उसके साथ कोई नेको नहीं करेंगे , परन्तु यदि उससे कोई काम हो तो उसके साथ बहुत मीठे हो जाएंगे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि कोई व्यक्ति अधिकारी के आचरण से रुष्ट हो तो सीधे शब्दों में कभी भी उसको नहीं मनाएंगे , परन्तु उससे ही यदि कोई स्वार्थ - सिद्धि होती हो तो फिर बहुत मीठे हो जाएंगे । कई बार अपनी स्वार्थ - सिद्धि के लिए अपने कर्मचारी की स्थिति भी बिगाड़ देंगे । यदि किसी का उपकार करेंगे तो उससे आशाएँ रखेंगे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि आशाएँ पूरी न हुईं तो उसके विरुद्ध घोर निन्दापूर्ण एवं अपमानजनक प्रचार करेंगे । कई धन की हेरा - फेरी भी करते हैं । उपलब्ध साधनों का दुरुपयोग भी इनकी प्रवृत्ति बन जाती है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधिकारियों के प्रायः दो चेहरे होते हैं - एक दिखाने का और दूसरा छिपाने का । इनकी मूख - मृद्रा व्यक्ति के समक्ष कुछ और होती है और व्यक्ति के पीछे कुछ और । ये व्यक्ति के सामने कुछ बात करेंगे और पीछे कुछ । यदि राज्य की सत्ता इनके हाथ में आ जाए तो कई व्यक्तियों को ही मरवा डालेंगे । हाय ! कुर्सी ( सत्ता ) के लिए इतना नैतिक पतन !&lt;!--/data/user/0/com.samsung.android.app.notes/files/share/clipdata_191229_155436_220.sdoc--&gt;&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_49.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjaCocf8AZYyoBAWMKiFHhcsBfBXREWpF3yGOnbTlaf3tQIY3O0Wz07ZmyqpkYweZ0DGT1WDu6QSr_iNOsn5QhyvMK3deA95P79e1SnaYBrao15diYotnKn9-N_y1KFja7tVfAMrXYE8iVp/s72-c/download+%25281%2529.jpeg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-3617529626685108410</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:47:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-04-01T17:44:31.175+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">vedic sanskriti</category><title>गोरक्षा व गोपालन</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ओ३म्&lt;br /&gt;
&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgE2iPBDLWkAzKxj8FRe_kgLRD4OraHz5m7j-UABaNgv8HIwnFWpgapOak2sC9KlnRmGAS3Dp4GUN2wmBpO7hNhGvdY6Fy_dHkZnNhkl7AZEFtGB3ZWqjsgbbFS_vQ4e23NyLajxuXCkalh/s1600/%25E0%25A4%2597%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B7%25E0%25A4%25BE+%25E0%25A4%25B5+%25E0%25A4%2597%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25AA%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25A8.jpg&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;गोरक्षा व गोपालन&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1067&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;213&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgE2iPBDLWkAzKxj8FRe_kgLRD4OraHz5m7j-UABaNgv8HIwnFWpgapOak2sC9KlnRmGAS3Dp4GUN2wmBpO7hNhGvdY6Fy_dHkZnNhkl7AZEFtGB3ZWqjsgbbFS_vQ4e23NyLajxuXCkalh/s320/%25E0%25A4%2597%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B7%25E0%25A4%25BE+%25E0%25A4%25B5+%25E0%25A4%2597%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25AA%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25A8.jpg&quot; title=&quot;गोरक्षा व गोपालन&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;गोरक्षा व गोपालन&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
“गोरक्षा व गोपालन मानवीय कार्य होने से वैदिक धर्म का अंग है”&lt;/h2&gt;
===============&lt;br /&gt;
मनुष्य का कर्तव्य ‘&lt;b&gt;जियो और जीने दो&lt;/b&gt;’ सिद्धान्त का पालन करना है। कोई मनुष्य यह नहीं चाहता दूसरा कोई मनुष्य उसके प्रति हिंसा का व्यवहार करे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः उसका भी यह कर्तव्य बनता है कि वह भी किसी मनुष्य या इतर प्राणी के प्रति हिंसा का व्यवहार न करे। हिंसा से मनुष्य सहित अन्य सभी प्राणियों को दुःख व पीड़ा होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्य तो दुःख में रो सकता है, अपनों को अपनी व्यथा बता सकता है परन्तु मूक प्राणी तो अपनी बात किसी को कह भी नहीं सकते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम अनुमान लगा सकते हैं कि उनको मनुष्यों द्वारा की जाने वाली हिंसा से कितना दुःख व पीड़ा होती होगी। मनुष्य को यदि कांटा भी चुभ जाता है तो वह दुःखी व व्याकुल हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि हम किसी के गले पर शस्त्र प्रहार कर मांसाहार व ऐसे किसी प्रयोजन के लिए उसके प्राण हरण का कार्य करें या करायें, तो यह अमानवीय एवं घोर क्रूर कृत्य होता है।&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
&lt;/h3&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
पशु हत्या पाप कर्म है-&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
पशु को मारना, मरवाना, उनको अकारण कष्ट देना व उनकी हत्या में सहायक होने सहित उन पशुओं से अपने मांसाहार के प्रयोजन को सिद्ध करना घोर अमानवीय एवं निन्दनीय कार्य हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;यह अधर्म एवं पाप कर्म है जिसका फल मनुष्य को अपनी मृत्यु के बाद पशु व पक्षी आदि योनियों में से किसी एक में जन्म लेकर भोगना पड़ता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक सिद्धान्त है कि मनुष्य जो भी शुभ व अशुभ अथवा पुण्य व पाप कर्म करता है उसके फल उसको अवश्य ही भोगने पड़ते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पशु हत्या करना व हमारे किसी निमित्त से कोई अन्य मनुष्य करे, तो हम उसमें समान रूप से दोषी व अपराधी होते हैं। हम यह भूल रहे होते हैं कि यह संसार किसी सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान सत्ता से चल रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह सत्ता इस संसार की स्वामी, मालिक तथा न्यायाधीश है। उस सत्ता परमात्मा ने जीवों को उनके पूर्वजन्मों के कर्मानुसार ही यह मनुष्य आदि जन्म दिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इस जन्म में हम पूर्वजन्म के किये हुए शुभाशुभ कर्मों का फल भी भोगते हैं और कुछ इस जन्म और कुछ परजन्म को सुखी व उन्नत बनाने के लिये नये कर्म भी करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा सभी जीवों की आत्माओं के भीतर सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी रूप से साक्षी रूप में निवास कर रहा है। किसी जीव व प्राणी का कोई कर्म परमात्मा की दृष्टि से बचता नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;परमात्मा की व्यवस्था ऐसी है कि कोई भी मनुष्य बिना भोगे अपने कर्मों से मुक्त नहीं हो सकता। कोई ऐसा मत व सम्प्रदाय नहीं है जिसकी शरण में जाने से हमारे किये हुए पाप कर्म क्षमा हो सकते हों। यदि कोई ऐसा कहता है तो वह प्रमाणहीन होने से असत्य कहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्य का कर्तव्य है कि वह जीवन में ईश्वर, जीव व प्रकृति का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करे और कर्म-फल व्यवस्था को जानकर अपने जीवन, आचरण व दिनचर्या को उसके अनुरूप बनाये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ऐसा करके ही मनुष्य असत् कर्मों का त्याग कर तथा सत् कर्मों को धारण कर दुःखों से बच सकता है और परजन्म में भी उन्नति व सुखों को प्राप्त हो सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;यही कारण था व है कि धर्मात्मा व विवेकशील मनुष्य शुभ, पुण्य व धर्मानुकूल कर्मों को करते हैं और सुख व सन्तोष का अनुभव करते हुए दीर्घायु का भोग करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेदों में भी परमात्मा ने सदाचरण व धर्माचरण की ही आज्ञा दी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय का दूसरा मन्त्र ‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः’ कहकर बताया गया है कि मनुष्य वेद विहित कर्मों को करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें वेद विहित-कर्म ही करने हैं तथा वेद-निषिद्ध कर्मों का त्याग करना है। ऐसा करके ही हम इस जन्म व परजन्म में सुखी हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि हमने मांसाहार किया अथवा भ्रष्टाचार से धन कमा भी लिया तो हम कुछ दिन, युवावस्था में ही, सुख भोग कर सकते हैं। वृद्धावस्था में तो रोग आदि व परिवार में कुछ दुःखद घटनाओं, पत्नी व पुत्र आदि का वियोग होने पर शेष जीवन दुःख में ही बीतता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इसके अतिरिक्त भी यदि हमारे बुरे कर्मों की जानकारी सरकार के न्याय विभाग तक पहुंच गई तो फिर जांच व न्याय व्यवस्था में फंसकर सुख काफूर हो जायेंगे और मृत्यु पर्यन्त हमारा अपयश, तनाव एवं दुःखों में ही व्यतीत होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ऐसे व्यक्तियों को देख कर लोग कहते हैं कि देखो! वह चोर जा रहा है। अतः मनुष्य को सभी पहलुओं पर विचार कर सद्कर्मों को ही करना चाहिये। इसी से सुख व चैन का जीवन प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
स्वस्थ रहने के लिए गोपालन आवश्यक-&lt;/h2&gt;
मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिये अन्न, दुग्ध, फल व ऐसे ही अनेक पदार्थों की आवश्यकता होती है। दुग्धधारी पशुओं में मुख्यतः गाय, बकरी, भैंस आदि पशु आते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाय प्रायः संसार के सभी देशों में पायी जाती है। गाय का दुग्ध मनुष्य के लिये सर्वोत्तम है। देशी गाय का दुग्ध प्रायः मां के दुग्ध के समान ही होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस दुग्ध में बच्चे व बड़ों को पूर्ण भोजन व पौष्टिक तत्व प्रदान करने की पूर्ण सामथ्र्य होती है। ऐसा ज्ञात हुआ है कि यदि मनुष्य केवल दुग्धपान ही करे तो भी उसका शरीर जीर्ण व दुर्बल नहीं होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह स्वस्थ रहता है। उसकी बुद्धि की क्षमता अधिक होती है। अतः जिन पशुओं से हमें सीधा लाभ प्राप्त हो रहा है उनके प्रति हमारा भी कर्तव्य है कि हम उनको अच्छा वातावरण जिसमें अभय व प्रेम हो, देना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ऐसा करके हम पशुओं के प्रति कोई अहसान नहीं करते अपितु यह हमारा कर्तव्य बनता है। जो मनुष्य किसी से सेवा व सुख प्राप्त करता है तो वह उसका ऋणी होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार से हम उन सभी दुग्धधारी पशुओं व कृष्कों के ऋणी होते हैं जो परिश्रम करके अन्न, दुग्ध व फल आदि उत्पन्न करते व हमें पहुंचाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
गौ हत्या आदि कार्य पाप है और गोपालन पुण्य है&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इसके विपरीत पशुओं का पालन न करना अथवा उनका मांस खाना अमानवीय एवं ईश्वर की आज्ञा व अपेक्षाओं को भंग करने वाला कार्य होता है जिसका दण्ड परमात्मा की व्यवस्था से मनुष्य को मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे अस्पतालों में जो रोगी दिखाई देते हैं उनमें से अधिकांश अपने कर्मों के कारण ही दुःख उठाते हैं। यह कर्म इस जन्म व पूर्वजन्म दोनों जन्मों के होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे बचने के लिये हमें पूर्ण शाकाहार बनना होगा। इतना ही नहीं हमें पशुओं की रक्षा भी करनी है और उनका पालन भी करना है। ऐसा करके हम अपना यह जीवन सार्थक कर सकते हैं और अपने भावी व परजन्म के जीवन को भी सुधार कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्य के शरीर में एक जीवात्मा होता है जो चेतन पदार्थ है। चेतन पदार्थ के मुख्य गुण ज्ञान प्राप्ति व कर्म होते हैं। मनुष्य ज्ञान अर्जित कर सकता है और ज्ञान के अनुरूप अथवा अज्ञान के वशीभूत होकर अन्धविश्वासों आदि का आचरण कर सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शास्त्र मनुष्य को सद्ज्ञान प्राप्त करने, जो वेदों व वेदानुकूल ग्रन्थों यथा सत्यार्थप्रकाश, विशुद्ध मनुस्मृति आदि से प्राप्त होता है, की प्रेरणा करते हैं और वेद के अनुसार ही सदाचरण पर बल देते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ऐसा करने से मनुष्य अशुभ कर्मों से बचा रहता है और इनके दुःख रूपी परिणाम व फल भी उसे प्राप्त नहीं होते। कोई मनुष्य दुःख नहीं चाहता, अतः दुःख से बचने के लिये सदाचरण करना ही होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इस समस्त संसार और सभी प्राणियों को परमात्मा ने बनाया है। यह सब हमारे परिवार के अंग हैं। हमें गाय अथवा किसी भी प्राणी के प्रति हिंसा नहीं करनी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके विपरीत हमें लाभकारी प्राणियों का पालन व रक्षा करनी है। यही मनुष्य धर्म है। जो इस धर्म के विरुद्ध बातें हैं, उनका हमें त्याग कर देना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शास्त्रों में अहिंसा व प्राणियों की रक्षा को धर्म कहा गया है। अतः इस सिद्धान्त को हृदय में स्थिर कर हमें गो आदि लाभकारी पशुओं की रक्षा व पालन दोनों करना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
हमारे महापुरुष गोपालन करते थे&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
इतिहास को पढ़ने पर ज्ञात होता है कि योगेश्वर कृष्ण भी गोपालक व गोरक्षक थे। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पूर्व महाराज रघु आदि भी गोरक्षक थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इन महापुरुषों में जो अद्भुद ज्ञान व शक्तियां थी, उन्नत बुद्धि थी और उनके जो अलौकिकता से युक्त कार्य थे, उसमें अनेक कारणों के अतिरिक्त एक कारण उनका गोरक्षा, गोपालन सहित गोदुग्ध का पान करना भी था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोरक्षा व गोपालन के महत्व पर स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी ने ‘गो की पुकार’ नाम से एक अति महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह पुस्तक ऋषि दयानन्द की गोकरुणानिधि पुस्तक की व्याख्या है। पं0 प्रकाशवीर शास्त्री जी ने भी ‘गो हत्या राष्ट्र हत्या’ नाम से एक पुस्तक लिखी है जो अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं लाभकारी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्य विद्वान डा. ज्वलन्तकुमार शास्त्री ने भी ‘गोरक्षा-राष्ट्ररक्षा’ नाम से एक पुस्तक लिखी है जिसमें महत्वपूर्ण जानकारियां हैं। इन पुस्तकों को पढ़कर गोदुग्ध, गोरक्षा व गोपालन का महत्व विदित हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोपालन व गोदुग्ध के सेवन से मनुष्य स्वस्थ, बलिष्ठ एवं दीर्घायु होता है और उसके बहुत से रोग, साध्य एवं असाध्य, दूर होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः सभी को &lt;b&gt;गोरक्षा व गोपालन&lt;/b&gt; के कार्य में अपनी भूमिका निभानी चाहिये। इससे हमारा यह जीवन और परजन्म भी सुखी व कल्याण को प्राप्त होंगे। ओ३म् शम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-मनमोहन कुमार आर्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;https://play.google.com/store/apps/details?id=app956946.vmr&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;App Download&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/Go-palan.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgE2iPBDLWkAzKxj8FRe_kgLRD4OraHz5m7j-UABaNgv8HIwnFWpgapOak2sC9KlnRmGAS3Dp4GUN2wmBpO7hNhGvdY6Fy_dHkZnNhkl7AZEFtGB3ZWqjsgbbFS_vQ4e23NyLajxuXCkalh/s72-c/%25E0%25A4%2597%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B7%25E0%25A4%25BE+%25E0%25A4%25B5+%25E0%25A4%2597%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25AA%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25A8.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-6354846716522893418</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:43:00 +0000</pubDate><atom:updated>2020-02-05T20:43:57.776+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">vedic sanskriti</category><title>आर्य शब्द के प्रमाण</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*#आर्य_शब्द_के_प्रमाण*&lt;/h2&gt;
&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgtGXKiVSnt50WeBdQyR0xmKJqDaTMOLZ_lU8QMy7w2Y0C3-eF_xOzFGF3d2xuoTco-3YaHbr4A8nueVaFwwJmcwXBskmb6yxlMTYJNNfM0u5JkDie7qCX19NWHT_yIJ70f5zrXT1Ii72iQ/s1600/%25E0%25A4%2586%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF%252C+Arya.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;आर्य शब्द के प्रमाण&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;801&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;160&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgtGXKiVSnt50WeBdQyR0xmKJqDaTMOLZ_lU8QMy7w2Y0C3-eF_xOzFGF3d2xuoTco-3YaHbr4A8nueVaFwwJmcwXBskmb6yxlMTYJNNfM0u5JkDie7qCX19NWHT_yIJ70f5zrXT1Ii72iQ/s320/%25E0%25A4%2586%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF%252C+Arya.jpg&quot; title=&quot;आर्य शब्द के प्रमाण&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;आर्य शब्द के प्रमाण&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*_सृष्टि की समकालीन पुस्तक ऋग्वेद में_:-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*(१) *कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । ~ ऋ. ९/६३/५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*- सारे संसार को &#39;आर्य&#39; बनाओ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*_मनुस्मृति में_:-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*(२) मद्य मांसा पराधेषु गाम्या पौराः न लिप्तकाः।*&lt;br /&gt;
*आर्या ते च निमद्यन्ते सदार्यावर्त्त वासिनः।।*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*- वे ग्राम व नगरवासी जो मद्य, मांस और अपराधों में लिप्त न हों तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं वे &#39;आर्य&#39; कहे जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*_वाल्मीकि रामायण में_-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*(३) सर्वदा मिगतः सदिशः समुद्र इव सिन्धुभिः ।*&lt;br /&gt;
*आर्य सर्व समश्चैव व सदैवः प्रिय दर्शनः ।।-(बालकाण्ड)*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*- जिस तरह नदियाँ समुद्र के पास जाती हैं उसी तरह जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं वे &#39;आर्य&#39; हैं जो सब पर समदृष्टि रखते हैं हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(५) _महाभारत में_:-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त,न दर्पयासे हति नास्तिमेति।*&lt;br /&gt;
*न दुगेतोपीति करोव्य कार्य,तमार्य शीलं परमाहुरार्या।।(उद्योग पर्व)*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- जो अकारण किसी से वैर नहीं करते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते उन शील पुरुषों को &#39;आर्य&#39; कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(६) _वशिष्ठ स्मृति में_-*&lt;/h3&gt;
*कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन ।*&lt;br /&gt;
*तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः ।।*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- जो रंग, रुप, स्वभाव, शिष्ठता, धर्म, कर्म, ज्ञान और आचार-विचार तथा शील-स्वभाव में श्रेष्ठ हो उसे &#39;आर्य&#39; कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(७) _निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं_-*&lt;/h3&gt;
*आर्य ईश्वर पुत्रः।*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ―*&#39;आर्य&#39; ईश्वर के पुत्र हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(८) _विदुर नीति में_-*&lt;/h3&gt;
*आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते ।*&lt;br /&gt;
*हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।।-(अध्याय १ श्लोक ३०)*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- भरत कुल भूषण! पण्डित जन्य जो श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं वही &#39;आर्य&#39; हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(९) _गीता में_-*&lt;/h3&gt;
*अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्ति करमर्जुन।*&lt;br /&gt;
–(अध्याय २ श्लोक २)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- हे अर्जुन तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है (यहां पर अर्जुन के अनार्यता के लक्षण दर्शाये हैं)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(१०) _चाणक्य नीति में_-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*अभ्यासाद धार्यते विद्या कुले शीलेन धार्यते।*&lt;br /&gt;
*गुणेन जायते त्वार्य,कोपो नेत्रेण गम्यते।।-(अध्याय ५ श्लोक ८)*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- सतत् अभ्यास से विद्या प्राप्त की जाती है, कुल-उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से स्थिर होता है,आर्य-श्रेष्ठ मनुष्य गुणों के द्वारा जाना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(११) _नीतिकार के शब्दों में_-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*प्रायः कन्दुकपातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि।*&lt;br /&gt;
*तथा त्वनार्ष पतति मृत्पिण्ड पतनं यथा।।*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- आर्य पाप से च्युत होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है अर्थात् पतन से अपने आपको बचा लेता है,अनार्य पतित होता है तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(१२) _अमरकोष में_:-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः।-(अध्याय२ श्लोक६ भाग३)*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- जो आकृति,प्रकृति,स&lt;br /&gt;
भ्यता,शिष्टता,धर्म,कर्म,विज्ञा&lt;br /&gt;
न,आचार,विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो उसे &#39;आर्य&#39; कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(१३) _कौटिल्य अर्थशास्त्र में_-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*व्यवस्थितार्य मर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः।*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- आर्य मर्यादाओं को जो व्यवस्थित कर सके और वर्णाश्रम धर्म का स्थापन कर सके वही &#39;आर्य&#39; राज्याधिकारी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(१४) _पंचतन्त्र में_-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*अहार्यत्वादनर्धत्वाद क्षयत्वाच्च सर्वदा।*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ विद्या को ही कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(१५) _धम्म पद में_:-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो।*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(१६) _पाणिनि सूत्र में_:-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः।*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- ब्राह्मणों में &#39;आर्य&#39; ही श्रेष्ठ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(१७) _काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर_-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्धः।*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- आर्य धर्म से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(१८) _आर्यों के सम्वत् में_:-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
*जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते।*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा वाक्य बोलकर पौराणिक भाई भी संकल्प पढ़ते हैं अर्थात् यह आर्यों का देश &#39;आर्यावर्त्त&#39; है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(१९) _आचार्य चतुरसेन और आर्य शब्द_:-*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
उठो आर्य पुत्रो नहि सोओ।&lt;br /&gt;
समय नहीं पशुओं सम खोओ।&lt;br /&gt;
भंवर बीच में होकर नायक।&lt;br /&gt;
बनो कहाओ लायक-लायक।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अर्थ*:- तुम्हारा जीवन पशुओं के समान निद्रा के वशीभूत होने के लिए निर्माण नहीं हुआ है।यह समय तुम्हें पुरुषार्थ करने का है,यदि जीवन में तुम पुरुषार्थ करोगे तो किसी कहानी के नायक बनकर समाज के आगे उपस्थित होवोगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(२०) _पं. प्रकाशचन्द कविरत्न के शब्दों में:-_*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
आर्य-बाहर से आये नहीं,&lt;br /&gt;
देश है इनका भारतवर्ष।&lt;br /&gt;
विदेशों में भी बसे सगर्व,&lt;br /&gt;
किया था परम प्राप्त उत्कर्ष।।&lt;br /&gt;
आर्य और द्रविड जाति हैं,&lt;br /&gt;
भिन्नचलें यह विदेशियों की चाल।&lt;br /&gt;
खेद है कुछ भारतीय भी,&lt;br /&gt;
व्यर्थ बजाते विदेशियों सम गाल।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*(२१) _पं. राधेश्याम कथावाचक बरेली वाले और आर्य शब्द_:–*&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
जब पंचवटी में शूर्पणखा राम के पास मोहित होकर अपना विवाह करने की बात राम से कहती है,तब राम उत्तर देते हैं―&lt;br /&gt;
हम आर्य क्षत्रीय हैं,&lt;br /&gt;
रघुवंशी वैदिक धर्मी हैं।&lt;br /&gt;
जो करें एक से अधिक विवाह,&lt;br /&gt;
कहते वेद उन्हें दुष्कर्मी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब आप तय करो कि यह सब त्याग कर हिंदू कहलाना पसंद करोगे या मूल वैदिक सनातन धर्म के लिये हिंदू शब्द को त्यागकर आर्य कहलाना ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
जय आर्य जय आर्यावर्त्त&lt;/h2&gt;
&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/Arya-Praman.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgtGXKiVSnt50WeBdQyR0xmKJqDaTMOLZ_lU8QMy7w2Y0C3-eF_xOzFGF3d2xuoTco-3YaHbr4A8nueVaFwwJmcwXBskmb6yxlMTYJNNfM0u5JkDie7qCX19NWHT_yIJ70f5zrXT1Ii72iQ/s72-c/%25E0%25A4%2586%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF%252C+Arya.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-3375556727437853141</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:42:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-27T00:08:06.616+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">कहानी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">राष्ट्र</category><title>भारत में मुसलमानो के 800 वर्ष के शासन का झूठ </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
जरूर पढ़ें&lt;br /&gt;
&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhgg9JCO6VqiHiH3kSwY9IwBwR7MOECloW4pbcjLIOdp8cU5ThEWBcn9teKhcZcPOyeLmoIN7T5Rn6K9ahOZ7Oaa2OuwzipgnRmp5deBrK_ehViuBnzpK_QGH0ReGWOQtLxigZ-U9CTXpfY/s1600/%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%2597%25E0%25A4%25B2%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%2582+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BE+%25E0%25A4%25B6%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25A8.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;भारत में मुसलमानो के 800 वर्ष के शासन का झूठ &quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;800&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;160&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhgg9JCO6VqiHiH3kSwY9IwBwR7MOECloW4pbcjLIOdp8cU5ThEWBcn9teKhcZcPOyeLmoIN7T5Rn6K9ahOZ7Oaa2OuwzipgnRmp5deBrK_ehViuBnzpK_QGH0ReGWOQtLxigZ-U9CTXpfY/s320/%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%2597%25E0%25A4%25B2%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%2582+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BE+%25E0%25A4%25B6%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25A8.jpg&quot; title=&quot;भारत में मुसलमानो के 800 वर्ष के शासन का झूठ &quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;भारत में मुसलमानो के 800 वर्ष के शासन का झूठ&amp;nbsp;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
भारत में मुसलमानो के 800 वर्ष के शासन का झूठ : श्री राजिव दीक्षित द्वारा-&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
_*क्या भारत में मुसलमानों ने 800 वर्षों तक शासन किया है-*_&lt;br /&gt;
_सुनने में यही आता है पर न कभी कोई आत्ममंथन करता है और न इतिहास का सही अवलोकन। आईये देखते हैं, इतिहास के वास्तविक नायक कौन थे? और उन्होंने किस प्रकार मुगलिया ताकतों को रोके रखा और भारतीय संस्कृति की रक्षा में सफल रहे।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_*राजा दाहिर : प्रारम्भ करते है मुहम्मद बिन कासिम के समय से-*_&lt;br /&gt;
_भारत पर पहला आक्रमण मुहम्मद बिन ने 711 ई में सिंध पर किया। राजा दाहिर पूरी शक्ति से लड़े और मुसलमानों के धोखे के शिकार होकर वीरगति को प्राप्त हुए।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_*बप्पा रावल:*_ _दूसरा हमला 735 में राजपुताना पर हुआ जब हज्जात ने सेना भेजकर बप्पा रावल के राज्य पर आक्रमण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;वीर बप्पा रावल ने मुसलमानों को न केवल खदेड़ा बल्कि अफगानिस्तान तक मुस्लिम राज्यों को रौंदते हुए अरब की सीमा तक पहुँच गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईरान अफगानिस्तान के मुस्लिम सुल्तानों ने उन्हें अपनी पुत्रियां भेंट की और उन्होंने 35 मुस्लिम लड़कियों से विवाह करके सनातन धर्म का डंका पुन: बजाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बप्पा रावल का इतिहास कही नहीं पढ़ाया जाता। यहाँ तक की अधिकतर इतिहासकर उनका नाम भी छुपाते है। गिनती भर हिन्दू होंगे जो उनका नाम जानते हैं!_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*_दूसरे ही युद्ध में भारत से इस्लाम समाप्त हो चुका था। ये था भारत में पहली बार इस्लाम का नाश।_*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_*सोमनाथ के रक्षक राजा जयपाल और आनंदपाल:*_ _अब आगे बढ़ते है गजनवी पर। बप्पा रावल के आक्रमणों से मुसलमान इतने भयक्रांत हुए की अगले 300 सालों तक वे भारत से दूर रहे।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_इसके बाद महमूद गजनवी ने 1002 से 1017 तक भारत पर कई आक्रमण किये पर हर बार उसे भारत के हिन्दू राजाओ से कड़ा उत्तर मिला। पहले राजा जयपाल और फिर उनका पुत्र आनंदपाल, दोनों ने उसे मार भगाया था।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर भी कई आक्रमण किये पर 17 वे युद्ध में उसे सफलता मिली थी। सोमनाथ के शिवलिंग को उसने तोडा नहीं था बल्कि उसे लूट कर वह काबा ले गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;जिसका रहस्य आपके समक्ष जल्द ही रखता हु। यहाँ से उसे शिवलिंग तो मिल गया जो चुम्बक का बना हुआ था। पर खजाना नहीं मिला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय राजाओ के निरंतर आक्रमण से वह वापिस गजनी लौट गया और अगले 100 सालो तक कोई भी मुस्लिम आक्रमणकारी भारत पर आक्रमण न कर सका।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_*सम्राट पृथ्वीराज चौहान:*_ _1098 में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज राज चौहान को 16 युद्द के बाद परास्त किया और अजमेर व दिल्ली पर उसके गुलाम वंश के शासक जैसे कुतुबुद्दीन, इल्तुमिश व बलवन दिल्ली से आगे न बढ़ सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्हें हिन्दू राजाओ के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। पश्चिमी द्वार खुला रहा जहाँ से बाद में ख़िलजी लोधी तुगलक आदि आये। ख़िलजी भारत के उत्तरी भाग से होते हुए बिहार बंगाल पहुँच गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कूच बिहार व बंगाल में मुसलमानो का राज्य हो गया पर बिहार व अवध प्रदेश मुसलमानो से अब भी दूर थे। शेष भारत में केवल गुजरात ही मुसलमानो के अधिकार में था। अन्य भाग स्वतन्त्र थे।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_*राणा सांगा:-*_ _1526 में राणा सांगा ने इब्राहिम लोधी के विरुद्ध बाबर को बुलाया। बाबर ने लोधियों की सत्ता तो उखाड़ दी पर वो भारत की सम्पन्नता देख यही रुक गया और राणा सांगा को उसने युद्ध में हरा दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;चित्तोड़ तब भी स्वतंत्र रहा पर अब दिल्ली मुगलो के अधिकार में थी। हुमायूँ दिल्ली पर अधिकार नहीं कर पाया पर उसका बेटा अवश्य दिल्ली से आगरा के भाग पर शासन करने में सफल रहा। तब तक कश्मीर भी मुसलमानो के अधिकार में आ चूका था।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*_महाराणा प्रताप:-_*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; _अकबर पुरे जीवन महाराणा प्रताप से युद्ध में व्यस्त रहा। जो बाप्पा रावल के ही वंशज थे और उदय सिंह के पुत्र थे जिनके पूर्वजो ने 700 सालो तक मुस्लिम आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक सामना किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;जहाँगीर व शाहजहाँ भी राजपूतों से युद्धों में व्यस्त रहे व भारत के बाकी भाग पर राज्य न कर पाये।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_दक्षिण में बीजापुर में तब तक इस्लाम शासन स्थापित हो चुका था।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*_छत्रपति शिवाजी महाराज:_* _औरंगजेब के समय में मराठा शक्ति का उदय हुआ और शिवाजी महाराज से लेकर पेशवाओ ने मुगलो की जड़े खोद डाली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज्य का विस्तार उनके बाद आने वाले मराठा वीरों ने किया। बाजीराव पेशवा इन्होने मराठा सम्राज्य को भारत में हिमाचल बंगाल और पुरे दक्षिण में फैलाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्ली में उन्होंने आक्रमण से पहले गौरी शंकर भगवान से मन्नत मांगी थी कि यदि वे सफल रहे तो चांदनी चौक में वे भव्य मंदिर बनाएंगे। जहाँ कभी पीपल के पेड़ के नीचे 5 शिवलिंग रखे थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;बाजीराव ने दिल्ली पर अधिकार किया और गौरी शंकर मंदिर का निर्माण किया। जिसका प्रमाण मंदिर के बाहर उनके नाम का लगा हुआ शिलालेख है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाजीराव पेशवा ने एक शक्तिशाली हिन्दुराष्ट्र की स्थापना की जो 1830 तक अंग्रेजो के आने तक स्थापित रहा।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_*अंग्रेजों और मुगलों की मिलीभगत:*_&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; _मुगल सुल्तान मराठाओ को चौथ व कर देते रहे थे और केवल लालकिले तक सिमित रह गए थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;और वे तब तक शक्तिहीन रहे। जब तक अंग्रेज भारत में नहीं आ गए। 1760 के बाद भारत में मुस्लिम जनसँख्या में जबरदस्त गिरावट हुई जो 1800 तक मात्र 7 प्रतिशत तक पहुँच गयी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेजो के आने के बाद मुसल्मानो को संजीवनी मिली और पुन इस्लाम को खड़ा किया गया, ताकि भारत में सनातन धर्म को नष्ट किया जा सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इसलिए अंग्रेजो ने 50 साल से अधिक समय से पहले ही मुसलमानो के सहारे भारत विभाजन का षड्यंत्र रच लिया था। मुसलमानो के हिन्दु विरोधी रवैये व उनके धार्मिक जूनून को अंग्रेजो ने सही से प्रयोग किया तो यह झूठा इतिहास क्यों पढ़ाया गया?:-_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;_असल में हिन्दुओ पर 1200 सालो के निरंतर आक्रमण के बाद भी जब भारत पर इस्लामिक शासन स्थापित नहीं हुआ और न ही अंग्रेज इस देश को पूरा समाप्त कर सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;तो उन्होंने शिक्षा को अपना अस्त्र बनाया और इतिहास में फेरबदल किये। अब हिन्दुओ की मानसिकता को बदलना है तो उन्हें ये बताना होगा की तुम गुलाम हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लगातार जब यही भाव हिन्दुओ में होगा तो वे स्वयं को कमजोर और अत्याचारी को शक्तिशाली समझेंगे। इसी चाल के अंतर्गत ही हमारा जातीय नाम आर्य के स्थान पर हिन्दू रख दिया गया,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिसका अर्थ होता है काफ़िर, काला, चोर, नीच आदि ताकि हम आत्महीनता के शिकार हो अपने गौरव, धर्म, इतिहास और राष्ट्रीयता से विमुख हो दासत्व मनोवृति से पीड़ित हो सकें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*वास्तव में हमारे सनातन धर्म के किसी भी शास्त्र और ग्रन्थ में हिन्दू शब्द कहीं भी नहीं मिलता बल्कि शास्त्रो में हमे आर्य, आर्यपुत्र और आर्यवर्त राष्ट्र के वासी बताया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज भी पंडित लोग संकल्प पाठ कराते हुए&amp;nbsp; &quot;आर्यवर्त अन्तर्गते...&quot;* का उच्चारण कराते हैं । अत: भारत के हिन्दुओ को मानसिक गुलाम बनाया गया जिसके लिए झूठे इतिहास का सहारा लिया गया और परिणाम सामने है।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;_*लुटेरे और चोरो को आज हम बादशाह सुलतान नामो से पुकारते है उनके नाम पर सड़के बनाते है।* शहरो के नाम रखते है और उसका कोई हिन्दू विरोध भी नहीं करता जो बिना गुलाम मानसिकता के संभव नहीं सकता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए उन्होंने नई रण नीति अपनाई। इतिहास बदलो, मन बदलो और गुलाम बनाओ। यही आज तक होता आया है। जिसे हमने मित्र माना वही अंत में हमारी पीठ पर वार करता है। इसलिए झूठे इतिहास और झूठे मित्र दोनों से सावधान रहने की आवश्यकता है।_&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_*इस लेख को अधिक से अधिक जनता तक पहुंचाएं। हमें अपना वास्तविक इतिहास जानने का न केवल अधिकार है अपितु तीव्र आवश्यकता भी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताकि हम उस दास मानसिकता से मुक्त हो सकें जो हम सब के अंदर घर कर गयी है, ताकि हम जान सकें की हम कायर और विभाजित पूर्वजों की सन्तान नहीं, हम कर्मठ और संगठित वीरों की सन्तान हैं।*&lt;br /&gt;
जय भवानी 🚩&lt;br /&gt;
जय हिंदु राष्ट्र ✊🏻&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/Muslim-Shasan.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhgg9JCO6VqiHiH3kSwY9IwBwR7MOECloW4pbcjLIOdp8cU5ThEWBcn9teKhcZcPOyeLmoIN7T5Rn6K9ahOZ7Oaa2OuwzipgnRmp5deBrK_ehViuBnzpK_QGH0ReGWOQtLxigZ-U9CTXpfY/s72-c/%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%2597%25E0%25A4%25B2%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%2582+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BE+%25E0%25A4%25B6%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25A8.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-4510429000636990753</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:39:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-27T06:10:52.475+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">vedic sanskriti</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">अंधविश्वास</category><title>मूर्ति पूजा</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ओ३म्&lt;br /&gt;
&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjaRaJqKCiihESjAKfj21KnpbFSeHoD8ZBHiRYNR2cuZHWsb9zUfMnvypOWUmkFlejt_XNTZGvfJgbM2lXLliINdnZQD14PCgQ2AyDMvryCeh6wbH0l-PRfAxU0gFWmUKNxTLgc_6kfLejR/s1600/%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%2582%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25BF+%25E0%25A4%25AA%25E0%25A5%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25BE%252Cmurti+puja.png&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;मूर्ति पूजा&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;800&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;160&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjaRaJqKCiihESjAKfj21KnpbFSeHoD8ZBHiRYNR2cuZHWsb9zUfMnvypOWUmkFlejt_XNTZGvfJgbM2lXLliINdnZQD14PCgQ2AyDMvryCeh6wbH0l-PRfAxU0gFWmUKNxTLgc_6kfLejR/s320/%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%2582%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25BF+%25E0%25A4%25AA%25E0%25A5%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25BE%252Cmurti+puja.png&quot; title=&quot;मूर्ति पूजा&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;मूर्ति पूजा&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*🌷मूर्ति पूजा🌷*&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तव में मूर्तिपूजा का ईश्वर पूजा से कोई भी सम्बन्ध नहीं है।मूर्तियाँ कल्पित अवतारों की बनाई जाती है अथवा कल्पित देवी-देवताओं की होती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निराकार,सर्वव्यापक और अनन्त विश्व में एकरस व्याप्त सर्वाधार सर्वशक्तिमान परब्रह्म परमेश्वर की कोई मूर्ति बन ही नहीं सकती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मूर्ति साकार वस्तु की आकृति की ही बनाना सम्भव होता है और उसी का फोटो भी खींचा जा सकता है.उसके रुप,रंग,आकार,लम्बाई,चौड़ाई,मोटाई की आकृति मूर्ति में उतारी जा सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जबकि परम सूक्ष्म निराकार सत्ता परमात्मा के सम्बन्ध में यह सम्भव नहीं है।इस प्रकार उनकी मूर्ति बन ही नहीं सकती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राम,कृष्ण,हनुमान् आदि जिन महापुरुषों की मूर्तियाँ उन्हें ईश्वरावतार मानकर पूजते हैं,वे महान आत्मायें स्वयं परमात्मा की उपासना सन्धया,अग्निहोत्रादिनित्य कर्म करती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो जो स्वयं ईश्वर भक्त हो,उन्हीं को परमात्मा मान बैठना पागलपन नहीं तो क्या माना जाएगा।महापुरुष मनुष्य थे,वे ईश्वर नहीं थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न उन्होंने जीवन में कोई भी कार्य ऐसा कभी किया था,जो मानव के करने की शक्ति से बाहर हो।ईश्वर का कार्य क्षेत्र जगत की रचना,पालन,रक्षण व प्रलय है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानव का कार्य-क्षेत्र उससे सर्वथा भिन्न व सीमित है.किसी भी मनुष्य ने ,चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो,अपने सीमित कार्य-क्षेत्र से बाहर ईश्वरीय रचना क्षेत्र में कोई कार्य करके नहीं दिखाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे साधारण मानव की अपेक्षा महामानव अवश्य थे,जाति के पथ-प्रदर्शक थे और उसी रुप में उनका आदर किया जाना चाहिए।समय आने पर सभी की मृत्यु हुई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज कोई नहीं जानता कि वे पवित्रात्मआयें किस योनि में,कहां होंगी अथवा जन्म-जन्मान्तरों की तपश्चर्या स्वरुप मोक्षानन्द का उपभोग कर रही होंगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब उनकी मूर्तियाँ पूजने और उनके नामों का जाप करने से क्या लाभ होगा,जबकि उनका पता-ठिकाना ही कुछ नहीं है।जब वे स्वयं परमेश्वर के भक्त थे तो सभी को ईश्वर का भक्त बनना चाहिए,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न कि उन ईश्वर भक्तों का उपासक बनकर उनकी मूर्तियों को पूजना व उनके नामों को जपना ।जिस परमेश्वर की उपासना करके उन लोगों ने अपना कल्याण किया था,वही परमेश्वर अपने सभी भक्तों का कल्याण करेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मूर्तिपूजकों ने पूजने के लिए अपने कल्पित देवताओं की आकृतियाँ भी बड़ी विलक्षण कल्पित की हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्माजी की मूर्ति चतुर्मुखी बनाई जाती है।उसके सिर में चारों और मुँह बने होते हैं।इसका अर्थ ये हुआ कि ब्रह्माजी खाट या पृथ्वी पर सो नहीं पाते होंगे,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्योंकि जब भी वे लेटते होंगे तो उनका एक मुँह,नाक,आँख और मस्तक जमीन पर रगड़ खाकर जख्मी हो जाते होंगे।बेचारे ब्रह्माजी की बड़ी मुसीबत रहती होंगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए ब्रह्माजी की मूर्ति को सदैव जमीन में वेदी पर गाड़कर खड़ा रखा जाता है ताकि वे लेटने न पाए।जबकि विष्णु जी कई मूर्ति को बिना गाड़े हुए मन्दिरों में वेदी पर खड़ा रखा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तव में ब्रह्मा नाम परमात्मा का है।वह सर्वत्र व्यापक होने से चतुर्मुखी ही नहीं,सहस्रमुखी कहा जाता है क्योंकि वह अनन्त विश्व की प्रत्येक बात को जानता है।&lt;br /&gt;
इन पौराणिकों ने उसे चार मुंह,आठ आंखों वाला चतुर्मुखी बनाकर पाखण्ड फैलाया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार विष्णु की मूर्ति के चित्रों में उनके चार हाथ बनाकर उनके शंख,चक्र,गदा और पदम चार पदार्थ धारण करा दिये जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या परमात्मा को भी शंख,सीटी या बाजा बजाने का शोक रहता है,जो शंख धारण करता है?या परमेश्वर को दुश्मनों से डर भी लगा रहता है जो वह सुदर्शन चक्र तथा गदा नाम के दो हथियार हर समय हाथों में लिये रहता है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा के भी शत्रु होते हैं और क्या वह उनसे भयभीत रहता है?यदि नह़ी तो फिर गदा और चक्र धारण करने का क्या रहस्य है,यह पुराणों में क्यों नहीं बताया गया है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या परमात्मा को भी सुगन्धि सूंघने का अथवा फूलों का शौक है जो वह पद्य(कमल) को धारण करता है?यदि वह शौकीन है तो वह विकारी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि वह भयभीत रहकर आत्मरक्षा के लिए सशस्त्र रहता है तो वह परमेश्वर नहीं हो सकता।यदि वह सर्वव्यापक घट-घट वासी है तो उसे शंख के बाजे की कोई आवश्यकता नहीं हो सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि वह बाजा रखता है तो वह घट-घट वासी ईश्वर नहीं है।पुराणकारों ने विष्णु की मूर्ति बनाकर उसकी बड़ी निन्दा की है.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तव में विष्णु नाम परमेश्वर का है जिसकी निराकार होने से कोई भी मूर्ति नहीं बन सकती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिवमूर्ति की ध्यानावस्थित दशा का होना यह बताता है कि शिवजी स्वयं किसी अन्य परब्रह्म परमेश्वर की आराधना किया करते थे।जो व्यक्ति दूसरों का उपासक हो ,आत्म-कल्याण के लिए योगाभ्यास व ध्यान करता हो,वह दूसरों को क्या देगाl&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
------- *Arya&amp;nbsp; ram kishan _*&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/MurtiPuja.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjaRaJqKCiihESjAKfj21KnpbFSeHoD8ZBHiRYNR2cuZHWsb9zUfMnvypOWUmkFlejt_XNTZGvfJgbM2lXLliINdnZQD14PCgQ2AyDMvryCeh6wbH0l-PRfAxU0gFWmUKNxTLgc_6kfLejR/s72-c/%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%2582%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25BF+%25E0%25A4%25AA%25E0%25A5%2582%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25BE%252Cmurti+puja.png" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-2870607250123517262</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:37:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-29T12:01:21.114+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">vedic sanskriti</category><title>तलाक/Divorce</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
*विवाह उपरांत जीवन साथी को छोड़ने के लिए 2 शब्दों का प्रयोग किया जाता है&lt;/h2&gt;
&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhmwbaZMXZ_JfHIKnHklEVoZlmhcPyAWgX6uxylCTe-ZuIu3TQS6pweyLKqM4dlm1hJDYaQ76plR-bYvHEV7enBmM3sFjhnbPhuNPxmeOLVBSt24R0A6Zml6_fzFcpUxg6PkSFcaug3zxw8/s1600/%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%2595%252C+Divorce.png&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;तलाक/Divorce&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;705&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;141&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhmwbaZMXZ_JfHIKnHklEVoZlmhcPyAWgX6uxylCTe-ZuIu3TQS6pweyLKqM4dlm1hJDYaQ76plR-bYvHEV7enBmM3sFjhnbPhuNPxmeOLVBSt24R0A6Zml6_fzFcpUxg6PkSFcaug3zxw8/s320/%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%2595%252C+Divorce.png&quot; title=&quot;तलाक/Divorce&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;तलाक/Divorce&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
*1-Divorce (अंग्रेजी)&lt;br /&gt;
*2-तलाक (उर्दू)*&lt;br /&gt;
*कृपया हिन्दी का शब्द बताए...??*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहानी आजतक के Editor संजय सिन्हा की लिखी है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब मैं जनसत्ता में नौकरी करता था एक दिन खबर आई कि एक आदमी ने झगड़ा के बाद अपनी पत्नी की हत्या कर दी मैंने खब़र में हेडिंग लगाई कि पति ने अपनी बीवी को मार डाला खबर छप गई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसी को आपत्ति नहीं थी पर शाम को दफ्तर से घर के लिए निकलते हुए प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी सीढ़ी के पास मिल गए मैंने उन्हें नमस्कार किया तो कहने लगे कि संजय जी, पति की बीवी नहीं होती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पति की बीवी नहीं होती?” मैं चौंका था&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बीवी तो शौहर की होती है, मियां की होती है पति की तो पत्नी होती है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाषा के मामले में प्रभाष जी के सामने मेरा टिकना मुमकिन नहीं था हालांकि मैं कहना चाह रहा था कि भाव तो साफ है न ? बीवी कहें या पत्नी या फिर वाइफ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सब एक ही तो हैं लेकिन मेरे कहने से पहले ही उन्होंने मुझसे कहा कि भाव अपनी जगह है, शब्द अपनी जगह कुछ शब्द कुछ जगहों के लिए बने ही नहीं होते, ऐसे में शब्दों का घालमेल गड़बड़ी पैदा करता है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभाष जी आमतौर पर उपसंपादकों से लंबी बातें नहीं किया करते थे लेकिन उस दिन उन्होंने मुझे टोका था और तब से मेरे मन में ये बात बैठ गई थी कि शब्द बहुत सोच समझ कर गढ़े गए होते हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खैर, आज मैं भाषा की कक्षा लगाने नहीं आया आज मैं रिश्तों के एक अलग अध्याय को जीने के लिए आपके पास आया हूं लेकिन इसके लिए आपको मेरे साथ निधि के पास चलना होगा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निधि मेरी दोस्त है कल उसने मुझे फोन करके अपने घर बुलाया था फोन पर उसकी आवाज़ से मेरे मन में खटका हो चुका था कि कुछ न कुछ गड़बड़ है मैं शाम को उसके घर पहुंचा उसने चाय बनाई और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;मुझसे बात करने लगी पहले तो इधर-उधर की बातें हुईं, फिर उसने कहना शुरू कर दिया कि नितिन से उसकी नहीं बन रही और उसने उसे तलाक देने का फैसला कर लिया है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने पूछा कि नितिन कहां है, तो उसने कहा कि अभी कहीं गए हैं बता कर नहीं गए उसने कहा कि बात-बात पर झगड़ा होता है और अब ये झगड़ा बहुत बढ़ गया है ऐसे में अब एक ही रास्ता बचा है कि अलग हो जाएं, तलाक ले लें&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निधि जब काफी देर बोल चुकी तो मैंने उससे कहा कि तुम नितिन को फोन करो और घर बुलाओ, कहो कि संजय सिन्हा आए हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निधि ने कहा कि उनकी तो बातचीत नहीं होती, फिर वो फोन कैसे करे?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अज़ीब संकट था निधि को मैं बहुत पहले से जानता हूं मैं जानता हूं कि नितिन से शादी करने के लिए उसने घर में कितना संघर्ष किया था बहुत मुश्किल से दोनों के घर वाले राज़ी हुए थे,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिर धूमधाम से शादी हुई थी ढेर सारी रस्म पूरी की गईं थीं ऐसा लगता था कि ये जोड़ी ऊपर से बन कर आई है पर शादी के कुछ ही साल बाद दोनों के बीच झगड़े होने लगे दोनों एक-दूसरे को खरी-खोटी सुनाने लगे और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज उसी का नतीज़ा था कि संजय सिन्हा निधि के सामने बैठे थे उनके बीच के टूटते रिश्तों को बचाने के लिए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खैर, निधि ने फोन नहीं किया मैंने ही फोन किया और पूछा कि तुम कहां हो&amp;nbsp; मैं तुम्हारे घर पर हूं आ जाओ नितिन पहले तो आनाकानी करता रहा, पर वो जल्दी ही मान गया और घर चला आया&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब दोनों के चेहरों पर तनातनी साफ नज़र आ रही थी ऐसा लग रहा था कि कभी दो जिस्म-एक जान कहे जाने वाले ये पति-पत्नी आंखों ही आंखों में एक दूसरे की जान ले लेंगे दोनों के बीच कई दिनों से बातचीत नहीं हुई थी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नितिन मेरे सामने बैठा था मैंने उससे कहा कि सुना है कि तुम निधि से तलाक लेना चाहते हो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने कहा, “हां, बिल्कुल सही सुना है अब हम साथ नहीं रह सकते&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने कहा कि तुम चाहो तो अलग रह सकते हो पर तलाक नहीं ले सकते&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“क्यों&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“क्योंकि तुमने निकाह तो किया ही नहीं है”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरे यार, हमने शादी तो की है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हां, शादी की है शादी में पति-पत्नी के बीच इस तरह अलग होने का कोई प्रावधान नहीं है अगर तुमने मैरिज़ की होती तो तुम डाइवोर्स ले सकते थे अगर तुमने निकाह किया होता तो तुम तलाक ले सकते थे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;लेकिन क्योंकि तुमने शादी की है, इसका मतलब ये हुआ कि हिंदू धर्म और हिंदी में कहीं भी पति-पत्नी के एक हो जाने के बाद अलग होने का कोई प्रावधान है ही नहीं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने इतनी-सी बात पूरी गंभीरता से कही थी, पर दोनों हंस पड़े थे दोनों को साथ-साथ हंसते देख कर मुझे बहुत खुशी हुई थी मैंने समझ लिया था कि रिश्तों पर पड़ी बर्फ अब पिघलने लगी है वो हंसे, लेकिन मैं गंभीर बना रहा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने फिर निधि से पूछा कि ये तुम्हारे कौन हैं?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निधि ने नज़रे झुका कर कहा कि पति हैं मैंने यही सवाल नितिन से किया कि ये तुम्हारी कौन हैं? उसने भी नज़रें इधर-उधर घुमाते हुए कहा कि बीवी हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने तुरंत टोका ये तुम्हारी बीवी नहीं हैं ये तुम्हारी बीवी इसलिए नहीं हैं क्योंकि तुम इनके शौहर नहीं तुम इनके शौहर नहीं, क्योंकि तुमने इनसे साथ निकाह नहीं किया तुमने शादी की है शादी के बाद ये तुम्हारी पत्नी हुईं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे यहां जोड़ी ऊपर से बन कर आती है तुम भले सोचो कि शादी तुमने की है, पर ये सत्य नहीं है तुम शादी का एलबम निकाल कर लाओ, मैं सबकुछ अभी इसी वक्त साबित कर दूंगा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बात अलग दिशा में चल पड़ी थी मेरे एक-दो बार कहने के बाद निधि शादी का एलबम निकाल लाई अब तक माहौल थोड़ा ठंडा हो चुका था, एलबम लाते हुए उसने कहा कि कॉफी बना कर लाती हूं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने कहा कि अभी बैठो, इन तस्वीरों को देखो कई तस्वीरों को देखते हुए मेरी निगाह एक तस्वीर पर गई जहां निधि और नितिन शादी के जोड़े में बैठे थे और पांव पूजन की रस्म चल रही थी मैंने वो तस्वीर एलबम से निकाली और उनसे कहा कि इस तस्वीर को गौर से देखो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने तस्वीर देखी और साथ-साथ पूछ बैठे कि इसमें खास क्या है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने कहा कि ये पैर पूजन का रस्म है तुम दोनों इन सभी लोगों से छोटे हो, जो तुम्हारे पांव छू रहे हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हां तो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ये एक रस्म है ऐसी रस्म संसार के किसी धर्म में नहीं होती जहां छोटों के पांव बड़े छूते हों लेकिन हमारे यहां शादी को ईश्वरीय विधान माना गया है,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए ऐसा माना जाता है कि शादी के दिन पति-पत्नी दोनों विष्णु और लक्ष्मी के रूप हो जाते हैं दोनों के भीतर ईश्वर का निवास हो जाता है अब तुम दोनों खुद सोचो कि क्या हज़ारों-लाखों साल से विष्णु और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;लक्ष्मी कभी अलग हुए हैं दोनों के बीच कभी झिकझिक हुई भी हो तो क्या कभी तुम सोच सकते हो कि दोनों अलग हो जाएंगे? नहीं होंगे हमारे यहां इस रिश्ते में ये प्रावधान है ही नहीं तलाक शब्द हमारा नहीं है डाइवोर्स शब्द भी हमारा नहीं है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहीं दोनों से मैंने ये भी पूछा कि बताओ कि हिंदी में तलाक को क्या कहते हैं?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोनों मेरी ओर देखने लगे उनके पास कोई जवाब था ही नहीं फिर मैंने ही कहा कि दरअसल हिंदी में तलाक का कोई विकल्प नहीं हमारे यहां तो ऐसा माना जाता है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;कि एक बार एक हो गए तो कई जन्मों के लिए एक हो गए तो प्लीज़ जो हो ही नहीं सकता, उसे करने की कोशिश भी मत करो या फिर पहले एक दूसरे से निकाह कर लो, फिर तलाक ले लेना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब तक रिश्तों पर जमी बर्फ काफी पिघल चुकी थी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निधि चुपचाप मेरी बातें सुन रही थी फिर उसने कहा कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भैया, मैं कॉफी लेकर आती हूं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वो कॉफी लाने गई, मैंने नितिन से बातें शुरू कर दीं बहुत जल्दी पता चल गया कि बहुत ही छोटी-छोटी बातें हैं, बहुत ही छोटी-छोटी इच्छाएं हैं, जिनकी वज़ह से झगड़े हो रहे हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खैर, कॉफी आई मैंने एक चम्मच चीनी अपने कप में डाली नितिन के कप में चीनी डाल ही रहा था कि निधि ने रोक लिया, “भैया इन्हें शुगर है चीनी नहीं लेंगे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लो जी, घंटा भर पहले ये इनसे अलग होने की सोच रही थीं और अब इनके स्वास्थ्य की सोच रही हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं हंस पड़ा मुझे हंसते देख निधि थोड़ा झेंपी कॉफी पी कर मैंने कहा कि अब तुम लोग अगले हफ़्ते निकाह कर लो, फिर तलाक में मैं तुम दोनों की मदद करूंगा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शायद अब दोनों समझ चुके थे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*हिन्दी एक भाषा ही नहीं - संस्कृति है*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*इसी तरह हिन्दू भी धर्म नही - सभ्यता है*&lt;br /&gt;
👆उपरोक्त लेख मुझे बहुत ही अच्छा लगा, जो सनातन धर्म और संस्कृति से जुड़ा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आप सभी से निवेदन है कि समय निकाल कर इसे पढ़े घोर करे, अच्छा लगे तो आप अपने मित्रों व आपके पास जो भी ग्रुप हैं उनमें प्रेषित करे👏&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/divorce.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhmwbaZMXZ_JfHIKnHklEVoZlmhcPyAWgX6uxylCTe-ZuIu3TQS6pweyLKqM4dlm1hJDYaQ76plR-bYvHEV7enBmM3sFjhnbPhuNPxmeOLVBSt24R0A6Zml6_fzFcpUxg6PkSFcaug3zxw8/s72-c/%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%2595%252C+Divorce.png" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-8700551366795144420</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:35:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-26T20:56:05.224+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">vedic sanskriti</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">वैदिक ग्रन्थ</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">संस्कृत साहित्य</category><title>दर्शन किसे कहते हैं?</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
ओ३म्&lt;/h2&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjhMPH_sr_nib-EF8-sF4-zP563nCVheewXrGjInHfIOX5c1zuc9Ni-_5NZgSLphSxb12yylxvmQLwjVKBk6h3NGiOFtvENMhI7aGF64qMs08rosMQajMzyQxuP7bcBCsKf6IL80uIfGZXm/s1600/%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B6%25E0%25A4%25A8+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25B8%25E0%25A5%2587+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25A4%25E0%25A5%2587+%25E0%25A4%25B9%25E0%25A5%2588%25E0%25A4%2582.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;दर्शन किसे कहते हैं?&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;841&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;168&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjhMPH_sr_nib-EF8-sF4-zP563nCVheewXrGjInHfIOX5c1zuc9Ni-_5NZgSLphSxb12yylxvmQLwjVKBk6h3NGiOFtvENMhI7aGF64qMs08rosMQajMzyQxuP7bcBCsKf6IL80uIfGZXm/s320/%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B6%25E0%25A4%25A8+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25B8%25E0%25A5%2587+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25A4%25E0%25A5%2587+%25E0%25A4%25B9%25E0%25A5%2588%25E0%25A4%2582.jpg&quot; title=&quot;दर्शन किसे कहते हैं?&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;दर्शन किसे कहते हैं?&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
-पं0 राजवीर शास्त्री के विचार-&lt;/h2&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
‘दर्शन किसे कहते हैं?’&lt;/h3&gt;
======&lt;br /&gt;
पं0 राजवीर शास्त्री आर्यजगत के उच्च कोटि के सुप्रसिद्ध ऋषि भक्त विद्वान थे। वह आजीवन आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट से जुड़े रहे। आपने आर्यजगत की प्रमुख व प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘दयानन्द सन्देश’ का सम्पादन किया वहीं आपने ट्रस्ट के माध्यम से अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का लेखन एवं सम्पादन भी किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आप संस्कृत के वृहद् ग्रन्थ ‘‘वैदिक कोष” के भी सम्पादक हैं। विशुद्ध-मनुस्मृति का भी आपने सम्पादन किया था। यह ग्रन्थ वैदिक साहित्य का अनूठा एवं अति उपयोगी ग्रन्थ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;शास्त्री जी का एक ग्रन्थ पातंजल योग-दर्शन-भाष्यम् भी है। पांतजल योग दर्शन भाष्य का ट्रस्ट की ओर से प्रकाशित यह तीसरा संस्करण हैं। इसका प्रकाशकीय ट्रस्ट के यशस्वी मंत्री श्री धर्मपाल आर्य जी ने लिखा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रन्थ के प्रथम संस्करण में प्रकाशित का प्राक्कथन को पुस्तक के पृष्ठ 9 से 37 तक प्रकाशित किया गया है। इसमें शास्त्री जी ने दर्शन किसे कहते है? इस विषय पर भी विचार किया है और इसका उत्तर भी दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दर्शन विषयक शास्त्री जी के इन विचारों को लेकर ही हम इस लेख के माध्यम से आपके सम्मुख उपस्थित हुए हैं। शास्त्री जी ने इस ग्रन्थ में योग दर्शन के सभी सूत्रों पर महर्षि व्यास का भाष्य देने सहित जिन सूत्रों पर ऋषि दयानन्द की व्याख्या उपलब्ध थी, उसे भी इस ग्रन्थ में सम्मिलित किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाष्य का क्रम इस प्रकार रखा है कि पहले सूत्र को प्रस्तुत कर उस पर महर्षि व्यास जी का भाष्य दिया है। इसके बाद सूत्र का अर्थ प्रस्तुत किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सूत्रार्थ के बाद महर्षि दयानन्द जी की व्याख्या यदि उपलब्ध है, तो उसे प्रस्तुत किया है। सूत्रार्थ के बाद शास्त्री जी ने महर्षि व्यास के भाष्य का हिन्दी अनुवाद दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाष्यानुवाद के बाद शास्त्री जी ने अपनी ज्ञानप्रसूता लेखनी से सूत्र एवं व्यास-भाष्य के आधार पर भावार्थ प्रस्तुत किया है। यह अति महत्वपूर्ण ग्रन्थ 568 पृष्ठों का है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शास्त्री जी ने इस कार्य को करके एक अभाव की पूर्ति की है क्योंकि इस प्रकार का भाष्य इससे पूर्व व पश्चात किसी विद्वान द्वारा उपलब्ध नहीं किया जा सका। यह ग्रन्थ योगदर्शन के अध्येताओं के लिये अति महत्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस संक्षिप्त लेख में हम शास्त्री जी द्वारा प्राक्कथन में ‘दर्शन किसे कहते हैं?’ विषय पर प्रस्तुत विचारों को दे रहे हैं। शास्त्री जी के कहे गये शब्द निम्न हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘सृष्टि के आरम्भ से ही मानव में जिज्ञासा और अन्वेषण की प्रवृत्ति रही है। मानव ने जब से इस धरातल पर अवतरण किया और अपने चक्षुओं का उन्मीलन किया,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तभी से वह अपने चारों तरफ के विद्यमान प्राकृतिक वस्तुओं, सूर्य, चन्द्रादि के व्यवस्थित भ्रमण, द्युलोकवर्ती असंख्य नक्षत्रमण्डल, सभी जीवों को कर्मानुसार सुख-दुःख की विचित्र व्यवस्था करनेवाले नियन्ता परमेश्वर आदि के विषय में जानने की इच्छा करता रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस जिज्ञासा-वृत्ति प्राप्त करने के लिये किये गये अनवरत प्रयत्नों का ही यह फल है कि मानव ने लोक-लोकान्तरों में भी पहुंचने में सफलता प्राप्त कर ली है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु प्राचीन ऋषि-मुनियों ने केवल भौतिक उन्नति से ही सन्तोष नहीं किया, प्रत्युत सूक्ष्मातिसूक्ष्म गूढ़तम जिन तत्वों को सतत-साधना तथा ईश्वर-आराधना से जानने में सफलता प्राप्त की थी, उसी यथार्थ-ज्ञान का नाम ‘दर्शन’ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘दृश्यतेऽनेनेति दर्शनम्।’ इस दर्शन शब्द की व्युत्पत्ति से भी यही स्पष्ट होता है कि सत्-असत् पदार्थों के ज्ञान को ही दर्शन कहते हैं। योगदर्शन तथा व्यास-भाष्य में ‘दर्शन’ शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में करते हुए लिखा है--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(क)&amp;nbsp; परमार्थस्तु ज्ञानाददर्शनं निवर्त्तते।। (व्यासभा0 3/55)&lt;br /&gt;
(ख)&amp;nbsp; एकमेव दर्शनं ख्यातिरेव दर्शनम्।। (व्यासभा0 2/24)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थात् सत्यज्ञान से अदर्शन=अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है। अथवा समस्तज्ञानों में सर्वोत्तम ज्ञान ख्याति=विवेकख्याति है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सूत्रकार ने बुद्धि के लिये भी दर्शन शब्द का प्रयोग किया है--‘तच्चादर्शनं बन्धकारणं दर्शनान्निवर्त्तते।’ (योग0 2/24) यथार्थ में मानव जैसे जैसे तर्क और बुद्धि के द्वारा विविध समस्याओं का समाधान और दुःखों से निवृत्ति का उपाय सोचने का प्रयास करता है, वैसे-वैसे ही वह दर्शन के क्षेत्र में पहुंच जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसार क्या है? इसको बनाने का क्या प्रयोजन है? इसको बनानेवाला कौन है? इत्यादि प्रश्नों का समाधान दर्शन ही करता है।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम आशा करते हैं कि दर्शन किसे कहते हैं?, इस शंका का सभी पाठकों का समाधान होगा। इस प्रस्तुति के माध्यम से हमें श्रद्धेय शास्त्री जी को स्मरण करने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ है। हम पं0 राजवीर शास्त्री जी की दिवंगत पवित्र आत्मा व स्मृति को नमन करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-मनमोहन कुमार आर्य&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/darshan.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjhMPH_sr_nib-EF8-sF4-zP563nCVheewXrGjInHfIOX5c1zuc9Ni-_5NZgSLphSxb12yylxvmQLwjVKBk6h3NGiOFtvENMhI7aGF64qMs08rosMQajMzyQxuP7bcBCsKf6IL80uIfGZXm/s72-c/%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B6%25E0%25A4%25A8+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25B8%25E0%25A5%2587+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25A4%25E0%25A5%2587+%25E0%25A4%25B9%25E0%25A5%2588%25E0%25A4%2582.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-6436643352836393703</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:32:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-27T06:17:07.763+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">vedic sanskriti</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ईश्वर</category><title>वैदिक धर्म की प्रातः सायं सन्ध्या की परम्परा सबके लिये शिक्षाप्रद</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ओ३म्&lt;br /&gt;
&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh8pdxnN9xdKKklWfz3Ifjq9SqzUnpZQQSzjx2X1tivR537lPe8ckIdqAkb5wNfOjlpQMkHbXLghNbyBACBl5AA7ARIfYy5lBE9U-EQMb_ihV8ufLdnZnqfQ9MCUzjM6Yo6HmVsBU5rvpJ0/s1600/Vedic+sandhya%252C+%25E0%25A4%25B5%25E0%25A5%2588%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%2595+%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A7%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF%25E0%25A4%25BE.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;वैदिक सन्ध्या&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;800&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;160&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh8pdxnN9xdKKklWfz3Ifjq9SqzUnpZQQSzjx2X1tivR537lPe8ckIdqAkb5wNfOjlpQMkHbXLghNbyBACBl5AA7ARIfYy5lBE9U-EQMb_ihV8ufLdnZnqfQ9MCUzjM6Yo6HmVsBU5rvpJ0/s320/Vedic+sandhya%252C+%25E0%25A4%25B5%25E0%25A5%2588%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%2595+%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A7%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF%25E0%25A4%25BE.jpg&quot; title=&quot;वैदिक धर्म की प्रातः सायं सन्ध्या की परम्परा सबके लिये शिक्षाप्रद&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;वैदिक सन्ध्या&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
“वैदिक धर्म की प्रातः सायं सन्ध्या की परम्परा सबके लिये शिक्षाप्रद”&lt;/h2&gt;
=========&lt;br /&gt;
वैदिक धर्म एवं अन्य मतों में अनेक अन्तर है। वैदिक धर्म ईश्वर प्रदत्त धर्म है जबकि अन्य धार्मिक संगठन व संस्थायें, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय, धर्म न होकर मत व मजहब आदि हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मत कहते हैं जिसे कोई मनुष्य आरम्भ करता व चलाता है। मत मनुष्य से ही चलता भले ही कोई कुछ भी कहे। मत धार्मिक व सामाजिक दोनों प्रकार के हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजनीतिक भी हो सकते हैं। कांग्रेस भी एक राजनीतिक दल होने के साथ कुछ लोगों की अपनी विचारधारा है जो ईश्वर से पुष्ट नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कांग्रेस की स्थापना परतन्त्र भारत में अंग्रेजों से सहानुभूति रखने वाले कुछ विदेशी अंग्रेजों ने भारतीयों के सहयोग से की थी। उन्होंने स्वप्न में भी देश को अंग्रेजों की दासता से आजादी दिलाने का विचार नहीं किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वराज्य प्राप्ति की भावना व विचार तो एक परिस्थितियजन्य आवश्यकता एवं लोगों के हृदय की भावना से स्वतः स्फूर्त विचार थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसमें प्रमुख कारण आर्यसमाज की वेदों पर आधारित विचारधारा सहित ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश एवं उनके अन्य ग्रन्थों में देश की आजादी के स्वराज्य विषयक विचारों का प्रभाव माना जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज ने सन् 1884 में ही स्पष्ट शब्दों में सत्यार्थप्रकाश के माध्यम से घोषणा कर दी थी कि कोई कितना ही करे किन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा मत-मतान्तर के आग्रह रहित, अपने और पराये का भेद शून्य, प्रजा पर माता-पिता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ भी विदेशियों (अंग्रेज व यवनों आदि) का राज्य पूर्ण सुखदायक नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द की ईश्वरोपासना विषयक आर्याभिविनय पुस्तक में इसी स्वदेशी व स्वराज्य की भावना के दर्शन होते हैं। इसी प्रकार से भारत सहित संसार में जितने धार्मिक प्रकृति के संगठन व संस्थायें हैं वह किसी व किन्हीं अल्पज्ञ व्यक्तियों व आचार्यों द्वारा चलाये गये मत हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द योगी, ऋषि तथा वैदिक साहित्य के ज्ञात विद्वानों में अपूर्व मर्मज्ञ विद्वान होने पर भी स्वयं को अल्पज्ञ ही मानते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसार में जन्में सभी मनुष्य अल्पज्ञ ही होते हैं व हुए है।, अतः उनका प्रत्येक विचार व सिद्धान्त शत प्रतिशत वा पूर्ण सत्य नहीं हो सकता। पूर्ण सत्य का ज्ञाता तो केवल एक सर्वव्यापक ईश्वर ही है और उसके द्वारा प्रदत्त ज्ञान ही पूर्ण सत्य विद्याओं से निहित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा ज्ञान संसार में केवल वेद है जो सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा से चार ऋषियों को मिला था और उसके बाद वेदों का वही ज्ञान ऋषि-परम्परा से ऋषि दयानन्द व अनेक कालों के इतर सभी ऋषियों व उनके द्वारा प्रजाजनों तक पहुंचा है। वर्तमान लोगों को वेदों व उसके महत्व आदि का ज्ञान ऋषि दयानन्द की कृपा से प्राप्त हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक धर्म संसार का पहला व सबसे पुराना धर्म है जिसका प्रादुर्भाव व प्रचार ईश्वर प्रदत्त चार वेदों के ज्ञान से चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा और ब्रह्मा जी आदि ने मिलकर किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेदज्ञान ईश्वर प्रदत्त ज्ञान था तथा प्रचार करने वाले ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए हमारे ऋषि थे। ऋषियों ने ही संसार को बताया है कि मनुष्य का कर्तव्य है कि वह परमात्मा द्वारा बनाई गई सृष्टि और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवात्माओं को उनके पूर्वजन्मों के कर्मानुसार मनुष्यादि का जन्म देने तथा उन्हें माता-पिता, कुटुम्बीजन व मानव शरीर प्रदान करने के लिये प्रातः व सायं ईश्वर का धन्यवाद करें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा ईश्वर के उपकारों के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित करने के लिये किया जाता है। ईश्वर का ध्यान वा उपासना करने से अन्य अनेक लाभ भी होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सबसे बड़ा लाभ तो ज्ञानवृद्धि सहित ईश्वर का साक्षात्कार होना होता है। ईश्वर के साक्षात्कार के तुल्य कोई धन व भौतिक सुख नहीं होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः सभी मनुष्यों को वेदों के आधार पर ऋषियों द्वारा प्रचलित ईश्वर के ध्यान की विधि ‘‘संन्ध्या” को जानना चाहिये और उसे नियमित विधि व विधान के साथ करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्ध्या में हम मुख्यतः ईश्वर स्तुति, प्रार्थना व उपासना के कुछ मंत्रों का पाठ व विचार करके ईश्वर से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति की कामना करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस कार्य सन्ध्या को व्यवस्थित रूप देने के लिये प्रथम शरीर की शुद्धि करके गायत्री मन्त्र के जप व पाठ से अपने मन को बाह्य जगत से हटाकर ईश्वर में स्थिर करना होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इसके बाद सन्ध्या का प्रयोजन सूचित करने वाले आचमन मंत्र का ईश्वर के स्वरूप का ध्यान करते हुए पाठ कर उससे पवित्र एवं अभीष्ट कामनाओं की प्राप्ति तथा सुखों की वर्षा की कामना की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचमन मंत्र सन्ध्या में की जाने वाली ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना आदि का पूरक मन्त्र है। हम ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना सहित जप व तप आदि अनुष्ठान तभी कर सकते हैं जब कि हमारा शरीर स्वस्थ हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिये अपने शरीर पर दृष्टि डाल कर हम उसके प्रत्येक अंग के स्वस्थ एवं बलवान रहने व होने की कामना करते हैं। इस काम को इन्द्रिय स्पर्श के मन्त्रों का उच्चारण कर किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इसमें हम अपनी वाणी, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, नाभि आदि का उल्लेख कर उनके स्वस्थ एवं बलवान होने की प्रार्थना करते हैं। हमारा शरीर व इन्द्रियां स्वस्थ और बलवान होने सहित पवित्रता से युक्त भी होनी चाहियें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके लिये मार्जन मंत्रों का विधान किया गया है। शरीर को स्वस्थ एवं निरोग रखने सहित मन को एकाग्र करने के लिये प्राणायाम का महत्व निर्विवाद है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिये ऋषि दयानन्द जी ने मार्जन मन्त्रों के बाद मन्त्रोच्चार पूर्वक प्राणायाम का विधान किया है। प्राणायाम के मन्त्र का अर्थपूर्वक चिन्तन करने सहित न्यूनतम तीन व अधिक प्राणायाम कर मन को एकाग्र किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इस विधि को करने के पश्चात पाप व अधर्म से दूर रहने के लिये तीन अघमर्षण मन्त्रों से ईश्वर द्वारा सृष्टि की रचना व उसकी महिमा का ध्यान करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब हम ईश्वर के सर्वशक्तिमान रूप सहित इसके सृष्टि रूपी कार्य पर विचार करते हैं तो हमें यह भी विदित होता है कि ईश्वर हमारे प्रत्येक कर्म का साक्षी और उनका फल प्रदाता एवं न्यायकर्ता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः ईश्वर द्वारा पापों के फल दुःखों से बचने के लिये हम अघमर्षण मन्त्रों का पाठ करके एक प्रकार से जीवन में कभी कोई पाप न करने का संकल्प लेते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शरीर को स्वस्थ एवं पवित्र करने की प्रार्थना सहित पाप न करने के संकल्प के बाद ईश्वर की हम पर कृपा दृष्टि बनी रहे और हमें ईश्वर का प्रत्यक्ष वा साक्षात्कार हो जाये, इसके लिये हमें न तो किसी मनुष्य व प्राणी से द्वेष करना है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;और न ही दूसरों के द्वेष से स्वयं को हानि होने देनी है। इसके लिये हम सर्वव्यापक, सर्वदेशी, सर्वशक्तिमान ईश्वर की उपस्थिति का अपने चारों ओर एवं नीचे व ऊपर की दिशाओं में ध्यान कर उसे अपना रक्षक स्वीकार मानते हुए उससे दूसरों के हमारे प्रति द्वेष और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे दूसरों के प्रति द्वेष को त्याग कर ईश्वर की न्याय व्यवस्था में अर्पित कर स्वयं को द्वेष मुक्त करते हैं। सभी प्रकार के द्वेषों से मुक्त व्यक्ति ही ईश्वर की उपासना को एकाग्र चित्त होकर भली प्रकार से कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस स्थिति के सम्पादित होने पर उपस्थान के चार मन्त्रों से ईश्वर की सत्ता का अपने बाहर व भीतर अनुभव कर उससे प्रार्थनायें करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्वर-उपस्थान के चार मन्त्रों से प्रार्थना करते हुए हम कहते हैं कि हे परमेश्वर! आप अन्धकार से पृथक् प्रकाशस्वरूप हैं। आप प्रलय के पश्चात् भी सदा विद्यमान रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आप प्रकाशकों के प्रकाशक, चराचर जगत के आत्मा ओर ज्ञानस्वरूप हैं। आपको सर्वश्रेष्ठ जानकर श्रद्धपूर्वक हम आपकी शरण में आये हैं। हे नाथ! आप हमारी रक्षा कीजिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपस्थान के दूसरे मन्त्र में प्रार्थना है कि वेद की श्रुति और जगत् के नाना पदार्थ आपका पता देने वाले झण्डों के समान हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह वेदज्ञान एवं ईश्वर के बनाये पदार्थ हमें उस दिव्य गुणयुक्त, सर्वप्रकाशक, चराचर के आत्मा, वेद प्रकाशक भगवान् को सब सत्य विद्याओं की प्राप्ति के लिये उत्तम रीति से उसका ज्ञान कराते और उन्हें प्राप्त कराते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरे उपस्थान मन्त्र में हम विचार करते हैं कि ईश्वर सब देवों में श्रेष्ठ और बलवान् है। वह सूर्यलोक, प्राण, अपान और अग्नि का भी प्रकाशक है। वही परमात्मा द्युलोक, अन्तरिक्ष और पृथिवीलोक में व्यापक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वही जड़ और चेतन जगत का आत्मा अर्थात् जीवन है। वह परमात्मा हमारे हृदयों में सदा सर्वदा प्रकाशित रहें। चौथा मन्त्र बोलकर हम कहते हैं कि हमारा परमात्मा सबका द्रष्टा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह धार्मिक विद्वानों का परमहितकारक, सृष्टि से पूर्व, पश्चात् और मध्य में सत्यस्वरूप से विद्यमान रहनेवाला है। हम उस सर्व जगदुत्पादक ब्रह्म को सौ वर्ष तक देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;उसके सहारे से सौ वर्ष तक जीयें। सौ वर्ष तक उसका ही गुण-गान सुनें। उसी ब्रह्म का हम सौ वर्ष तक उपदेश करें। उसी की कृपा से हम सौ वर्ष तक किसी के अधीन न रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस ईश्वर की आज्ञापालन और कृपा से सौ वर्ष के उपरान्त भी हम लोग देखें, जीवें, सुनें, सुनावें और स्वतन्त्र व स्वाधीन रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपस्थान के इन महत्वपूर्ण मन्त्रों के पाठ व तदनुरूप चिन्तन व भावों के बाद गायत्री मन्त्र का पाठ व उसके अर्थ के अनुसार अपने हृदय व मन में भाव उत्पन्न करने का विधान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गायत्री मन्त्र में ईश्वर से प्रार्थना है कि वह सच्चिदानन्दस्वरूप, सकल जगदुत्पादक, प्रकाशकों के प्रकाशक परमात्मा के हम सर्वश्रेष्ठ, पापनाशक तेज का ध्यान करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारा परमेश्वर हमारी बुद्धि और कर्मों को उत्तम प्रेरणा प्रदान करें अर्थात् वह हमें बुरे कर्मों से छुड़ाकर अच्छे कामों में प्रवृत्त करे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;गायत्री मन्त्र के बाद समर्पण मन्त्र है जिसमें हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हे दया के भण्डार परमेश्वर! आपकी कृपा से हमने जो जप, उपासना वा सन्ध्या आदि कर्म किये हैं उससे हमें धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की सिद्धि शीघ्र वा आज ही प्राप्त हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सन्ध्या का प्रयोजन ईश्वर का साक्षात्कार करना भी है। हमें लगता है कि समर्पण मन्त्र में जो काम शब्द आता है, उसमें सभी अभीष्ट पदार्थों की प्राप्ति सहित ईश्वर साक्षात्कार की कामना व भावना भी निहित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्वर साक्षात्कार के बाद ही मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः यह स्पष्ट है कि ईश्वर से धर्म, अर्थ व काम की प्रार्थना में ईश्वर का साक्षात्कार भी निहित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समर्पण मन्त्र के बाद नमस्कार का मन्त्र है। यह एक प्रकार से ईश्वर को नमस्कार करते हुए सन्ध्या की पूर्णता व समाप्ति का द्योतक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सन्ध्या प्रतिदिन प्रातः व सायं करने का विधान है। इसकी न्यूनतम अवधि एक घंटा होती है। इससे अधिक कर सकें तो ऐसा करना लाभदायक होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्ध्या की अवधि एक घंटा न्यूनतम अवधि है। इससे हम अभीष्ट उद्देश्यों व लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकते हैं। ऋषि दयानन्द का जीवन इसका साक्षात् उदाहरण था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम यह भी अनुभव करते हैं कि संसार में जितने मत हैं उन्हें वैदिक सन्ध्या से लाभ उठाना चाहिये। सन्ध्या का समय प्रातः सूर्योदय से पूर्व एवं सायं सूर्यास्त के पश्चात होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;यही समय ईश्वर का ध्यान करने का उत्तम होता है। सभी मतों के लोगों को वैदिक सन्ध्या से प्रेरणा ग्रहण कर अपने मतों की उपासना विधि में सुधार करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम अनुभव करते हैं कि संसार में प्रचलित सभी उपासना पद्धतियों में वैदिक सन्ध्या सर्वोत्तम ही है और इससे धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के लक्ष्य प्राप्त होते व हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लक्ष्य की प्राप्ति हमारे अपने प्रयत्नों सहित सही विधि से सन्ध्या करने पर निर्भर है। वैदिक सन्ध्या की विधि सर्वथा दोषरहित एवं उचित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें सन्ध्या में निरन्तरता को बनाये रखने के साथ दीर्घ काल तक इस सन्ध्या रूपी साधन को करना है। मृत्यु पर्यन्त हमें इसे पूर्ण श्रद्धा से करना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द ने अपनी मृत्यु व प्राणों का त्याग करते समय भी ईश्वर की उपासना के मन्त्रों का पाठ सहित प्रार्थना के कुछ मार्मिक शब्द कहे थे। हमें भी इसका अनुसरण करना है। इसका सुखद परिणाम हमें अवश्य मिलेगा। ओ३म् शम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-मनमोहन कुमार आर्य&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_91.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh8pdxnN9xdKKklWfz3Ifjq9SqzUnpZQQSzjx2X1tivR537lPe8ckIdqAkb5wNfOjlpQMkHbXLghNbyBACBl5AA7ARIfYy5lBE9U-EQMb_ihV8ufLdnZnqfQ9MCUzjM6Yo6HmVsBU5rvpJ0/s72-c/Vedic+sandhya%252C+%25E0%25A4%25B5%25E0%25A5%2588%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%2595+%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A7%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF%25E0%25A4%25BE.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-28360436980001757</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:25:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-21T09:55:42.985+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">vedic sanskriti</category><title>पीपल</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
बरगद एक लगाइये,पीपल रोपें पाँच।&lt;br /&gt;
घरघर नीम लगाइये,यही पुरातन साँच।।&lt;br /&gt;
यही पुरातन साँच,- आज सब मान रहे हैं।&lt;br /&gt;
भाग जाय प्रदूषण सभी अब जान रहे हैं।।&lt;br /&gt;
विश्वताप मिट जाये होय हर जन मन गदगद।&lt;br /&gt;
धरती पर त्रिदेव हैं- नीम पीपल औ बरगद।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*आप को लगेगा अजीब बकवास है किन्तु यह सत्य है.. .*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*पिछले 68 सालों में पीपल, बरगद और नीम के पेडों को सरकारी स्तर पर लगाना बन्द किया गया है*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100% एबजार्बर है, बरगद 80% और नीम 75 %*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अब सरकार ने इन पेड़ों से दूरी बना ली तथा इसके बदले विदेशी यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया जो जमीन को जल विहीन कर देता है*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*आज हर जगह यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य सजावटी पेड़ो ने ले ली है*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही नही रहेगा तो गर्मी तो बढ़ेगी ही और जब गर्मी बढ़ेगी तो जल भाप बनकर उड़ेगा ही*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*हर 500 मीटर की दूरी पर एक पीपल का पेड़ लगाये तो आने वाले कुछ साल भर बाद प्रदूषण मुक्त हिन्दुस्तान होगा*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*वैसे आपको एक और जानकारी दे दी जाए*&lt;br /&gt;
पीपल के पत्ते का फलक अधिक और डंठल पतला होता है जिसकी वजह शांत मौसम में भी पत्ते हिलते रहते हैं और स्वच्छ ऑक्सीजन देते रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैसे भी पीपल को वृक्षों का राजा कहते है। इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए-&lt;br /&gt;
*मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु,*&lt;br /&gt;
*सखा शंकरमेवच।*&lt;br /&gt;
*पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम,*&lt;br /&gt;
*वृक्षराज नमस्तुते।*&lt;br /&gt;
*अब करने योग्य कार्य*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*इन जीवनदायी पेड़ों को ज्यादा से ज्यादा लगायें तथा यूकेलिप्टस पर बैन लगायें*🙏&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/Peepal.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-8307784817527583383</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:23:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-21T09:53:40.533+05:30</atom:updated><title>मूर्ति पूजा</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
🤦🏻‍♂&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *चूहा अगर पत्थर का हो तो*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*सब उसे पूजते हैं*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *मगर जिन्दा हो तो मारे बिना*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *चैन नहीं लेते हैं*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*साँप अगर पत्थर का हो*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *तो सब उसे पूजते हैं*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*मगर जिन्दा हो तो उसी वक़्त*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*मार देते हैं*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*माँ बाप अगर &quot;तस्वीरों&quot; में हो*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*तो सब पूजते हैं*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*मगर जिन्दा है तो कीमत नहीं*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *समझते&quot;*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*बस यही समझ नहीं आता के*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*ज़िन्दगी से इतनी नफरत क्यों*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*और*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *पत्थरों से इतनी मोहब्बत क्यों*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *जिस तरह लोग मुर्दे इंसान को*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*कंधा देना पुण्य समझते हैं​*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*काश&quot; इस तरह&#39; ज़िन्दा&quot; इंसान*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*को सहारा देंना पुण्य&amp;nbsp; समझने*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *लगे तो ज़िन्दगी आसान हो*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *जायेगी​*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *एक बार जरूर सोचिए*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;*Believe in*&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; *Y O U R S E L F*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; Good morning&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_39.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-3951364184644496842</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:23:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-29T16:07:34.906+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">महापुरुष</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">राष्ट्र</category><title>भगत सिंह</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/h2&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjdPRU5-WrcMW2Ky29Wdhqqk90fhA9jnraq8et8GhuB5c65xI66_7ZL7vP08zuqyhhqKBkWZ4xrlIl6lb9wVDceK9PLIy-M3Z74ptxjlJ8H3VAWOP65qYQfHywKXGt6kdibONps7BKQrv9r/s1600/467px-Bhagat_Singh_1929.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;600&quot; data-original-width=&quot;467&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjdPRU5-WrcMW2Ky29Wdhqqk90fhA9jnraq8et8GhuB5c65xI66_7ZL7vP08zuqyhhqKBkWZ4xrlIl6lb9wVDceK9PLIy-M3Z74ptxjlJ8H3VAWOP65qYQfHywKXGt6kdibONps7BKQrv9r/s320/467px-Bhagat_Singh_1929.jpg&quot; width=&quot;249&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/h2&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
1. भगत सिंह की बैरक की साफ-सफाई करने वाले भंगी का नाम बोघा था। भगत सिंह उसको बेबे (मां) कहकर बुलाते थे।_*&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
*_2. जब कोई पूछता कि भगत सिंह ये भंगी बोघा तेरी बेबे कैसे हुआ? तब भगत सिंह कहता, मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे ने उठाया, या इस भले पुरूष बोघे ने। बोघे में मैं अपनी बेबे (मां) देखता हूं। ये मेरी बेबे ही है।_*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*_3. यह कहकर भगत सिंह बोघे को अपनी बाहों में भर लेता।_*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*_4. भगत सिंह जी अक्सर बोघा से कहते, बेबे मैं तेरे हाथों की रोटी खाना चाहता हूँ।_*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*_5. पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता, भगत सिंह तू ऊँची जात का सरदार, और मैं एक अदना सा भंगी, भगतां तू रहने दे, ज़िद न कर।_*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*_6. सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे, फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोघे को कहा बेबे अब तो हम चंद दिन के मेहमान हैं, अब तो इच्छा पूरी कर दे!_*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*_7. बोघे की आँखों में आंसू बह चले। रोते-रोते उसने खुद अपने हाथों से उस वीर शहीद ए आजम के लिए रोटिया बनाई, और अपने हाथों से ही खिलाई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगत सिह के मुंह में रोटी का गास डालते ही बोघे की रुलाई फूट पड़ी। ओए भगतां, ओए मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझे जन्म दिया।&lt;br /&gt;
भगत सिंह ने बोघे को अपनी बाहों में भर लिया। ऐसी सोच के मालिक थे अपने वीर सरदार भगत सिंह जी._*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*8. परन्तु आजादी के 70 साल बाद भी हम समाज में व्याप्त ऊँच-नीच व जात-पात के भेद-भाव की भावना को&amp;nbsp; दूर करने के लिये वो न कर पाए जो 88 साल पहले भगत सिंह ने किया। _*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
🙏👏&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_25.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjdPRU5-WrcMW2Ky29Wdhqqk90fhA9jnraq8et8GhuB5c65xI66_7ZL7vP08zuqyhhqKBkWZ4xrlIl6lb9wVDceK9PLIy-M3Z74ptxjlJ8H3VAWOP65qYQfHywKXGt6kdibONps7BKQrv9r/s72-c/467px-Bhagat_Singh_1929.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-3796406465099407306</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:21:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-27T00:11:16.178+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Arya  Samaj</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">वेद</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">वैदिक ग्रन्थ</category><title>वेद का सच्चा प्रचारक आर्य समाज</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
ओ३म्&lt;/h3&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjClhZ4pGG2GRFuPgnSQzzaMJkPDqFsnQDXKJ-LaQJx1CPwakCd5hWVI1D6ZKd8Y0cwQBfn9MeISy8e_8tibxFlklrmnFVasRYuJ6g_gMon9ZHdmxEUUaElGZ0b3jvqoCuFWo0L-mZ-d5OX/s1600/Ved%252C%25E0%25A4%25B5%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25A6%252C%25E0%25A4%2586%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF+%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25AE%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%259C%252CArya+samaj.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;801&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;160&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjClhZ4pGG2GRFuPgnSQzzaMJkPDqFsnQDXKJ-LaQJx1CPwakCd5hWVI1D6ZKd8Y0cwQBfn9MeISy8e_8tibxFlklrmnFVasRYuJ6g_gMon9ZHdmxEUUaElGZ0b3jvqoCuFWo0L-mZ-d5OX/s320/Ved%252C%25E0%25A4%25B5%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25A6%252C%25E0%25A4%2586%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF+%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25AE%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%259C%252CArya+samaj.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
विश्व में ईश्वरीय ज्ञान वेद का सच्चा धारक, प्रचारक एवं रक्षक एकमात्र आर्यसमाज है&lt;/h2&gt;
===============&lt;br /&gt;
क्या परमात्मा है? क्या वह ज्ञान से युक्त सत्ता है। क्या उसने सृष्टि की आदि में मनुष्यों को ज्ञान दिया है? यदि वह ज्ञान देता है तो वह ज्ञान उसने कब किस प्रकार से मुनष्यों को दिया था?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन प्रश्नों पर विचार करने पर उत्तर मिलता है कि परमात्मा का अस्तित्व सत्य एवं निर्विवाद है। परमात्मा की सत्ता का प्रमाण यह सृष्टि है और इसमें मनुष्यरूप व अन्य प्राणियों के रूप में हमारे अस्तित्व का होना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसी वैज्ञानिक व बुद्धिमान के पास इस बात का उत्तर नहीं है कि यह संसार कब, कैसे, क्यों व किस सत्ता से अस्तित्व में आया? उनके पास विचार करने के लिये कोई मार्गदर्शक ग्रन्थ व आचार्य आदि भी नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतियों व उनमें भी केवल आर्यसमाज के अनुयायियों के पास ही ऋषियों के उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों सहित सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर प्रदत्त ज्ञान के रूप में चार वेद भी विद्यमान हैं जिनकी अन्तःसाक्षी से वेद ईश्वरीय ज्ञान सिद्ध होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा है तो उसकी बनाई कृति यह सृष्टि भी है। यदि वह न होता तो इसकी यह कृति सृष्टि न होती। यदि कोई यह प्रश्न करे कि यदि यह संसार परमात्मा की कृति है, तो इसे सिद्ध कैसे किया जा सकता है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका उत्तर है कि संसार में ऐसी कोई सत्ता नहीं है, जो सृष्टि का निर्माण कर सकती है। सृष्टि की रचना अपौरुषेय रचना है। इसे मनुष्य अकेला व सभी मिलकर भी बना नहीं सकते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि बना भी सकते तो प्रश्न होता है कि मनुष्य को बनाने वाली भी एक सत्ता होनी चाहिये थी। सृष्टि व मनुष्य आदि सभी प्राणियों को बनाने वाली एक ही सत्ता है और वह ईश्वर वा परमात्मा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि किसी को ईश्वर का साक्षात् करना है तो उसे योगाभ्यास, ध्यान व समाधि को प्राप्त कर किया जा सकता है। हमारे सभी ऋषि व योगी ईश्वर का साक्षात् करते थे। ईश्वर का साक्षात् कर ही वह कहते थे&lt;br /&gt;
‘शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नो भवत्वर्य्यमा। शन्नऽइन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः।। नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि, त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि, ऋतं वदिष्यामि, सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु। अवतु माम् अवतु वक्तारम्।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोई भी मनुष्य यदि योगाभ्यास करता है और योग के लिये आवश्यक नियमों का पालन करता है, तो वह ईश्वर का प्रत्यक्ष कर सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम यह भी अनुभव करते हैं कि संसार में कोई भी मनुष्य यदि निष्पक्ष रूप से वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन करता है तो उसकी आत्मा ईश्वर के अस्तित्व को स्वतः स्वीकार कर लेती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इसका एक कारण यह है कि ईश्वर हमारी आत्मा में व्यापक है। हमारा ईश्वर से व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है। ईश्वर हमारी आत्माओं में निरन्तर सत्यासत्य की प्रेरणा करता रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्वर की प्रेरणा के लिये आवश्यक यह है कि हम शुद्ध व पवित्र अन्तःकरण वाले हों। इसका मुख्य कारण यह है कि ईश्वर स्वमेव परम शुद्ध एवं परम पवित्र चेतन एवं ज्ञानवान सत्ता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये हमें अपने जीवन को सत्य विचारों एवं सत्य आचरण से विभूषित करने के साथ शुद्ध अन्न, जल एवं वायु का सेवन कर शुद्ध एवं पवित्र बनना होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी विधि से हमारे वेद एवं योग के अभ्यासी मनीषी ईश्वर का ध्यान, चिन्तन व मनन करते हुए ईश्वर का प्रत्यक्ष किया करते थे। परमात्मा ज्ञानयुक्त सत्ता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका ज्ञान उसकी अपौरुषेय विशिष्टि रचनाओं को देखकर होता है। परमात्मा ने सृष्टि सहित सभी प्राणियों की रचना की है। हम किसी व्यक्ति के ज्ञान का आंकलन उससे बात-चीत करके व उसके पत्रों व पुस्तक आदि को पढ़कर लगाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द के ज्ञान का अनुमान भी हमें उनकी रचनाओं व ग्रन्थों को पढ़कर ही होता है। इसी प्रकार से ईश्वर की पुस्तक यह सृष्टिरूपी रचना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सृष्टि में परमात्मा ने जिस ज्ञान व शक्ति का प्रयोग किया है उसका तो हम व हमारे वैज्ञानिक सहस्रांश भी नहीं जानते। आज सृष्टि के 1.96 अरब वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी हम व हमारे वैज्ञानिक सृष्टि को पूरी तरह से नहीं जान सके हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज भी ऐसे अनेक रोग है जिनके विषय में वैज्ञानिक व चिकित्सक जानते ही नहीं हैं। बिहार में पिछले दिन दिनों लगभग 150 लोग बुखार से मर गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में इसका कहीं उल्लेख भी नहीं है। अतः चिकित्सकों को इस बीमारी का ज्ञान ही नहीं था। उपचार तो वह रोग व उसकी ओषधि के ज्ञान के बाद ही कर सकते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः हमारी सृष्टि ईश्वर के ज्ञानवान होने का संकेत करती व पता देती है। ईश्वर ज्ञानवान अर्थात् सर्वज्ञ सत्ता है। वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म, रंगरूप रहित, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं पवित्र सत्ता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वव्यापक का अर्थ है कि वह संसार में सब जगह तथा सब पदार्थों यथा जीवात्मा आदि के भी भीतर व बाहर सर्वत्र है। जीवात्मा एक चेतन सत्ता होने से ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता रखता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि के मनुष्यों को ज्ञान देने वाला ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं होता। बिना ज्ञान के मनुष्य अपना कोई भी कार्य नहीं कर सकता। ज्ञान व भाषा साथ-साथ रहती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि के मनुष्यों को ज्ञान केवल ईश्वर से ही मिल सकता है। वह ज्ञान ईश्वर प्रदत्त होने से अलौकिक व दैवीय भाषा से युक्त शब्दों व व्याकरण आदि से युक्त होता है जो मनुष्यों की रचना की सामर्थ्य से होना सम्भव नहीं होता। ऐसा ज्ञान चार वेदों का ज्ञान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;वेदों में ईश्वर, जीवात्मा सहित सभी सत्य विद्याओं का सत्य ज्ञान है। हमारा विचार है कि यदि ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में वेदों का ज्ञान न दिया होता तो मनुष्य भाषा सहित ज्ञान की उत्पत्ति नहीं कर सकते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेदों की भाषा एवं ज्ञान को देख कर इसका ईश्वर प्रदत्त होना सिद्ध होता है। सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा द्वारा ऋषियों को दिया गया वेदज्ञान ही परम्परा व गुरु-शिष्य परम्परा से लोगों को मिलता रहा है और वही वर्तमान में भी हमें सुलभ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;हमने वेदों का ज्ञान सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों को पढ़कर प्राप्त किया है, इस कारण से सत्यार्थप्रकाश व इसके रचयिता ऋषि दयानन्द हमारे गुरु व आचार्य हैं तथा वह हमारे लिए परमादरणीय हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा का अस्तित्व है, वह ज्ञानवान सर्वज्ञ सत्ता है और उसके द्वारा सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को दिया गया ज्ञान वेद है। वेदों का यह ज्ञान कहां व किसके पास है? इसका उत्तर है यह ज्ञान ऋषि दयानन्द के समय में विलुप्त हो गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;उसे उन्होंने अपने अथक पुरुषार्थ से प्राप्त किया था और उसके बाद अपने वेदांगों के ज्ञान से वेदों के मर्म को जानकर न केवल सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थ ही लिखे थे अपितु वेदों के सत्यार्थयुक्त वेदभाष्य करने का कार्य भी किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि ऋषि दयानन्द के अनुसार वेदों के अध्ययन, अध्यापन व वैदिक सिद्धान्तों के अनुसार जीवनयापन करने का मनुष्यमात्र को अधिकार है परन्तु हमारे देश की अज्ञान व स्वार्थों में फंसी जनता ने वेदों से लाभ नहीं उठाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह वर्तमान समय तक अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों के अन्धकार में फंसे हुए हैं। हमारे सनातन पौराणिक बन्धु वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते तो हैं परन्तु उसका वह आदर व लाभ नहीं लेते जो उनके लिये उचित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह अविद्यायुक्त पुराणों व ऐसे ही अन्य ग्रन्थों को अपना धर्म व कर्तव्य मान बैठे हैं। ऋषि दयानन्द ने इनकी यह अविद्या दूर करने के अनेकानेक प्रयत्न किये परन्तु इन्होंने उससे लाभ नहीं उठाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईसाई एवं मुसलमान तथा बौद्ध, जैन व सिख समुदाय के लोग भी वेदों को वह महत्व नहीं देते जो ईश्वरीय ज्ञान होने के कारण उन्हें दिया जाना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान समय में केवल आर्यसमाज जी वेदों का सच्चा वाहक एवं धारक है। सभी आर्यों द्वारा जीवनयापन एवं अन्य कार्य वेदों की आज्ञा अनुसार ही किये जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;वह वेद एवं वेदानुकूल ग्रन्थों सत्यार्थप्रकाश, उपनिषद एवं दर्शन आदि का अध्ययन करते हैं। चारों वेदों पर ऋषि एवं अन्य विद्वानों के वेदभाष्य का अध्ययन भी आर्यसमाज के अनुयायी नियमित रूप से करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी आर्यसमाजी शाकाहारी एवं वेदधर्म पारायण होते हैं। देशभक्ति एवं समाजहित इनके लिये सबसे अधिक महत्व रखता है। वेदों की भाषा संस्कृत है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;वेदों एवं संस्कृत का सबसे अधिक सम्मान यदि संसार में कोई करता है तो वह आर्यसमाज व उसके अनुयायी ही हैं। आर्यसमाज का मुख्य उद्देश्य ही इसके संस्थापक ऋषि दयानन्द ने वेद प्रचार निर्धारित किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज संगठन की यदि एक वाक्य में परिभाषा की जाये तो यह विश्व में वेदों का प्रचार व प्रसार करने वाला संगठन वा आन्दोलन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज संसार में वेदों का जो सम्मान व प्रचार है, उसका समस्त श्रेय ऋषि दयानन्द एवं उनके अनुयायी वैदिक विद्वानों सहित आर्यसमाज के संगठन को है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज के सभी लोग वेदों पर आधारित प्रातः व सायं ईश्वर का ध्यान करने के लिये संन्ध्या करते हैं। प्रतिदिन प्रातः सायं अग्निहोत्र यज्ञ भी करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज जाकर प्रति रविवार को यज्ञ करने के साथ भजन एवं वेद प्रवचनों द्वारा सत्संग करते हैं। आर्यसमाज द्वारा अनेक प्रकार के सामाजिक कार्य किये जा रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज अनाथालय, विद्यालय, चिकित्सालय व क्लिनिक सहित वेद और संस्कृत प्रचार आदि के अनेक कार्य करता है। अतः इस संसार के रचयिता एवं पालक ईश्वर द्वारा प्रदत्त ज्ञान का एकमात्र वाहक, धारक, पोषक एवं प्रचारक संसार में केवल आर्यसमाज ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज संसार में वेद विद्यमान हैं तो इसका श्रेय ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज को ही है। अतः आर्यसमाज संगठन विश्व का सबसे पवित्र, प्राणी मात्र का हितकारी, अज्ञान, अन्धविश्वासों एवं सामजिक असमानताओं को दूर करने वाला श्रेष्ठ एवं महान संगठन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;हम आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द एवं इस आन्दोलन को अपने प्राणों व तन-मन-धन से सींचने वाले सभी विद्वानों व महापुरुषों सहित दिव्य भावनाओं से युक्त इसके कार्यकर्ताओं को सादर नमन सहित अभिनन्दन करते हैं। ओ३म् शम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-मनमोहन कुमार आर्य&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_2.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjClhZ4pGG2GRFuPgnSQzzaMJkPDqFsnQDXKJ-LaQJx1CPwakCd5hWVI1D6ZKd8Y0cwQBfn9MeISy8e_8tibxFlklrmnFVasRYuJ6g_gMon9ZHdmxEUUaElGZ0b3jvqoCuFWo0L-mZ-d5OX/s72-c/Ved%252C%25E0%25A4%25B5%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25A6%252C%25E0%25A4%2586%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF+%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25AE%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%259C%252CArya+samaj.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-7105476437602374699</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:14:00 +0000</pubDate><atom:updated>2020-01-28T22:06:31.211+05:30</atom:updated><title>वेद और क़ुरान में से ईश्वरीय ज्ञान कौन सा हैं?</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
ज़ाकिर नाईक की आर्यसमाज द्वारा पोल-खोल&lt;/h2&gt;
&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiOHQyVqNDULChJHIFwvo6OeQXgGToTGj2AER1FG1Ybjn0Bt1rS9j5A5Tzly2C3nXoY3ZPOvMVvOdSOm3w4bUcuyef0POQpouqquJwAKCDCP4wWxVnUXdZl57seKfABOVKklxKZyB9tF7JX/s1600/%25E0%25A4%25B5%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25A6+%25E0%25A4%2594%25E0%25A4%25B0+%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A8.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;वेद और क़ुरान में से ईश्वरीय ज्ञान कौन सा हैं?&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;800&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;159&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiOHQyVqNDULChJHIFwvo6OeQXgGToTGj2AER1FG1Ybjn0Bt1rS9j5A5Tzly2C3nXoY3ZPOvMVvOdSOm3w4bUcuyef0POQpouqquJwAKCDCP4wWxVnUXdZl57seKfABOVKklxKZyB9tF7JX/s320/%25E0%25A4%25B5%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25A6+%25E0%25A4%2594%25E0%25A4%25B0+%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A8.jpg&quot; title=&quot;वेद और क़ुरान में से ईश्वरीय ज्ञान कौन सा हैं?&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;वेद और क़ुरान में से ईश्वरीय ज्ञान कौन सा हैं?&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;br /&gt;
डॉ विवेक आर्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
विषय-वेद और क़ुरान में से ईश्वरीय ज्ञान कौन सा हैं?&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
डॉ ज़ाकिर नाईक ने अपने वीडियो में केवल क़ुरान को सभी के मानने के लायक धार्मिक पुस्तक बताता है। उसके अनुसार प्रत्येक काल में अल्लाह की ओर से धार्मिक पुस्तकें तौरेत, जबूर, इंजील एवं अंत में क़ुरान अवतरित करी गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;क़ुरान अंतिम एवं निर्णायक पुस्तक है। क्यूंकि वेदों का कोई भी वर्णन क़ुरान में नहीं मिलता। इसलिए वेदों को ईश्वरीय पुस्तक मानने या न मानने पर शंका है। हालाँकि जो बात क़ुरान कि वेदों में मिलती है, वह मान्य है। जो जो बात क़ुरान की वेदों में नहीं मिलती वह अमान्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
समीक्षा-&lt;/h3&gt;
&lt;br /&gt;
क़ुरान करीब 1400 वर्षों पहले इस धरती पर अवतरित हुई। इस्लामिक मान्यता अनुसार हज़रत मुहम्मद के पास खुदा के भेजे हुए खुदा का पैगाम लेकर फरिश्ते आते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रसूल उन्हें लिखवा देते। इस तरीके से समय समय पर क़ुरान की आयतें नाज़िल हुई। इस प्रकार से क़ुरान की उत्पत्ति हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. ईश्वरीय ज्ञान सृष्टी के आरंभ में आना चाहिये न की मानव की उत्पत्ति के करोड़ो वर्षों के बाद।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज़ाकिर नाईक के अनुसार सबसे पहली आसमानी पुस्तक तौरेत थी। तौरेत मूसा नामक पैगम्बर पर नाजिल हुई थी। सैमेटिक मत अनुसार सबसे पहले आदम की उत्पत्ति हुई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदम से लेकर मूसा तक करोड़ो लोगों का इस धरती पर जन्म हुआ। क्या क़ुरान का अल्लाह इतना अपरिपक्व है जो उन करोड़ो लोगों को अपने ज्ञान से वंचित रखता?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस काल में जन्में करोड़ों लोगों को कोई ज्ञान नहीं था और मनुष्य बिना कुछ सिखाये कुछ भी सीख नहीं सकता था। इसलिए मनुष्य की उत्पत्ति के तुरंत बाद उसे ईश्वरीय ज्ञान की आवश्यकता थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सत्य के परिज्ञान न होने के कारण यदि सृष्टी के आदि काल में मनुष्य कोई अधर्म आचरण करता तो उसका फल उसे क्यूँ मिलता क्यूंकि इस अधर्माचरण में उसका कोई दोष नहीं होता, क्यूंकि अगर किसी का दोष होता भी हैं तो वह परमेश्वर का होता क्यूंकि उन्होंने मानव को आरंभ में ही सत्य का ज्ञान नहीं करवाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह क़ुरान के अल्लाह की कमी दर्शाता है। ईश्वरीय ज्ञान या ईश्वर में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर सकल मानव जाति के परम पिता है और सभी मनुष्यों का कल्याण चाहते हैं। वह मनुष्यों में कोई भेदभाव नहीं करता। केवल एक वेद ही हैं जो सृष्टी के आरंभ में ईश्वर द्वारा मानव जाति को प्रदान किया गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. क़ुरान का अल्लाह बार बार अपना ज्ञान क्यों परिवर्तन करता रहा? यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहले तौरेत, फिर जबूर, फिर इंजील और अंत में क़ुरान नाजिल हुई। प्रश्न उठता है कि ऐसी क्या कमी क़ुरान के अल्लाह से रह जाती थी जो वह उसे बार बार दुरुस्त करता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुसलमान लोग क़ुरान को अंतिम एवं निर्णायक ज्ञान मानते है? अल्लाह ने क़ुरान के ज्ञान को पहले ही क्यों नहीं दे दिया। उसे न बार बार परिवर्तन की आवश्यकता होती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज़ाकिर नाईक कहता है जो ज्ञान जिस काल में उपयोगी था उस उस ज्ञान को अल्लाह ने उपलब्ध करवाया। शंका उठती है कि फिर आप क़ुरान को अंतिम एवं निर्णायक किस आधार पर मानते है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क़ुरान के पश्चात क्या देश, काल और परिस्थिति नहीं बदलेगी। क़ुरान काल में तलवार, खंजर आदि चलते थे। आज बन्दुक, मिसाइल आदि युद्ध में प्रयोग होते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे तो यही सिद्ध हुआ कि क़ुरान का ज्ञान तो आज भी अप्रासंगिक हो गया है। आगे यही पर समाप्त नहीं हो जाती। अंतिम पुस्तक क़ुरान की आयतों को भीअनेक बार गलत समझ कर मंसूख़ अर्थात रद्द भी किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह रद्द करना ठीक वैसे था जैसे पहले की आसमानी किताबों को रद्द किया गया था। क्या क़ुरान का अल्लाह एक नर्सरी के बालक के समान नासमझ है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;एक नर्सरी का बालक क्या करता है? पहले स्लेट पर अक्षर बनाता है फिर उसे वह नहीं जचता तो उसे फिर मिटाता है। फिर दोबारा से बनाता है। वह कर्म तब तक चलता रहता है जब तक ठीक अक्षर नहीं बनता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;क़ुरान का अल्लाह भी अपनी ही बताई आयतों को एक बालक के समान गलत-ठीक करता रहता है। ज़ाकिर नाईक अगर इस तर्क के उत्तर में यह शंका करें कि जैसे आप चिकित्सा विज्ञान कि पुस्तक का पुराना संस्करण क्यों नहीं पढ़ते आप नया क्यों पढ़ते हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैसे ही आप आज तौरेत, जबूर और इंजील के स्थान पर अंतिम क़ुरान को पढ़ते है। ज़ाकिर नाईक की बात सुनकर आप मुस्कुरा देंगे। ज़ाकिर भाई मेडिकल की पुस्तक का अगला संस्करण भी आएगा। आप तब क़ुरान को किस आधार पर अंतिम एवं निर्णायक कहेंगे?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके विपरीत वेदों का ज्ञान सृष्टि के आदि में आया और सृष्टि के अंत तक उसमें न कोई परिवर्तन होता है। वह श्रुति परम्परा से पूर्ण रूप से सुरक्षित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोई चाहे भी तो उसमें बदलाव नहीं कर सकता। वैदिक ईश्वर सर्वज्ञ अर्थात सब ज्ञान को जानने वाला है। इसलिए उन्हें किसी भी वेद मंत्र को कभी भी बदलने की कोई आवश्यकता नहीं होती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. क़ुरान के ज्ञान को देने के लिए पैगम्बर और फरिश्तों की आवश्यकता क्यों हुई?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस्लाम मान्यता के अनुसार हजरत पैगम्बर को पैगाम लेकर अल्लाह के फरिशते आते थे। कोई भी पैगाम किसी फासले अर्थात दूरी से आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज़ाकिर नाईक से यह पहला प्रश्न है कि अल्लाह और पैगम्बर (मनुष्य) के मध्य का फासला बताये? दूसरा प्रश्न यह है कि क्या क़ुरान का अल्लाह असक्षम और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असमर्थ है जो उसे अपना पैगाम देने के लिए फरिश्तों या संदेशवाहकों की आवश्यकता हुई? अधिकतर मुस्लिम विद्वान् इस प्रश्न पर मौन धारण कर लेते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस विषय में वैदिक सिद्धांत है कि ईश्वर और मनुष्य में कोई दूरी नहीं है क्यूंकि परमात्मा आत्मा में विराजमान है एवं हमें सदा देख, सुन रहा हैं और प्रेरणा दे रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर द्वारा ऋषियों के ह्रदय में ही वेदों का ज्ञान बिना किसी संदेशवाहक के सहज भाव से स्वयं प्रकाशित किया गया। इससे न केवल वैदिक ईश्वर सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है अपितु पूर्ण भी सिद्ध होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. क्या क़ुरान का अल्लाह कमजोर है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस्लाम मानने वाले शैतान की कहानी को मानते है। इस कहानी के अनुसार अल्लाह ने इबलीस को आदम को सजदा करने को कहा। इबलीस ने अल्लाह के हुकुम की अवमानना करते हुए आदम को सजदा करने से मना कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इससे क्रोधित होकर अल्लाह ने इबलीस को सजा दे दी। तब से इबलीस शैतान बनकर बहकाता फिरता है। क़ुरान के अल्लाह के हुकुम की अवमानना से यह सिद्ध हुआ कि क़ुरान का अल्लाह न केवल कमजोर है अपितु मनुष्यों एक समान क्रोधित होने वाला भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वप्रथम तो कोई ईश्वर की आज्ञा को कैसे नकार सकता है? इससे क़ुरान का अल्लाह अशक्त सिद्ध हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा क्या क़ुरान का अल्लाह अल्पज्ञ अर्थात कम ज्ञान वाला है, जो उसे यह भी नहीं मालूम कि जिस इबलीस को उसने बनाया है वह उसकी आज्ञा नहीं मानेगा?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरा शाप देकर अल्लाह ने इबलीस को शैतान बना दिया जो मनुष्यों को बहकाकर काफ़िर बनाता है। काफ़िर बनने पर अल्लाह को काफ़िरों को मारने के लिए आयत उतारनी पड़ी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका परिणाम यह निकला कि यह धरती मुसलमानों और गैर मुसलमानों में विभाजित हो गई। मुसलमानों को अपने आपको सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के काफिरों को मारना नैतिक कर्त्तव्य बन गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका अंतिम परिणाम यह निकला की 1400 वर्षों में इतनी मारकाट हुई कि यह स्वर्ग सी धरती दोज़ख अर्थात नरक बन गई। न क़ुरान का अल्लाह इबलीस को ऊटपटांग हुकुम देता, न वह अवमानना करता, न शैतान बनने का शाप दिया जाता, न काफ़िर बनते, न खून खराबा होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसे अल्लाह को मुसलमान लोग खुदा मानते है। यह उनकी अज्ञानता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेदों में वैदिक ईश्वर के गुण-कर्म- स्वभाव के विपरीत कोई भी बात नहीं है। ईश्वर सत्यस्वरूप, न्यायकारी, दयालु, पवित्र, शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव, नियंता, सर्वज्ञ आदि गुणों वाला है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्वरीय ज्ञान में ईश्वर के इन गुणों के विपरीत बातें नहीं लिखी है। कुरान में कई ऐसी बातें हैं जो की ईश्वर के गुणों के विपरीत है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक अन्य उदहारण लीजिए। इस्लाम मानने वालों की मान्यता है कि ईद के दिन निरीह पशु की क़ुरबानी देने से पुण्य की प्राप्ति होती है। यह कर्म ईश्वर के दयालु गुण के विपरीत कर्म है। इसलिए केवल वेद ही ईश्वरीय गुण-कर्म-स्वभाव के अनुकूल होने के कारण एक मात्र मान्य धर्म ग्रन्थ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार इस लेख में दिया गए तर्कों से यह सिद्ध होता हैं वेद ही ईश्वरीय ज्ञान मानने लायक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेदों को लेकर ज़ाकिर नाईक केवल अपने जैसों को बरगला रहा है। ज़ाकिर नाईक के कुतर्क कि परीक्षा एक अन्य उदहारण से होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज़ाकिर नाईक कहता है कि जो बात क़ुरान कि वेदों में मिलती है, वह मान्य है। जो जो बात क़ुरान की वेदों में नहीं मिलती वह अमान्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मतलब बाप का होना तभी माना जायेगा जब बेटे के दर्शन होंगे। अगर बेटा नहीं है तो बाप पैदा ही नहीं हुआ। ज़ाकिर भाई आप इस धरती पर हो इससे यह केवल यह सिद्ध नहीं होता की आपके पूर्वज भी इस धरती पर थे। परन्तु अगर आपके पूर्वज ही नहीं होते तो आप आज होते ही नहीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेदों का ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में आया तभी उसमें से कुछ बातें क़ुरान वालों ने उधारी ली। अब उन उधार ली गई बातों से वेद के सही या गलत होने की कसौटी स्थापित नहीं होती अपितु यह कसौटी क़ुरान के लिए सिद्ध होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो जो बातें वेदों की क़ुरान में मिलती है वह ईश्वरकृत होने के कारण मान्य है और जो जो बातें क़ुरान में वेदों से भिन्न मिलती है वह मनुष्यकृत होने के कारण अमान्य एवं कपोलकल्पित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेदों के ईश्वरीय ज्ञान होने की वेद स्वयं ही अंत साक्षी देते हैं। अनेक मन्त्रों से हम इस बात को सिद्ध करते हैं जैसे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. सबके पूज्य,सृष्टीकाल में सब कुछ देने वाले और प्रलयकाल में सब कुछ नष्ट कर देने वाले उस परमात्मा से ऋग्वेद उत्पन्न हुआ, सामवेद उत्पन्न हुआ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसी से अथर्ववेद उत्पन्न हुआ और उसी से यजुर्वेद उत्पन्न हुआ हैं- ऋग्वेद 10/90/9, यजुर्वेद 31/7, अथर्ववेद 19/6/13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. सृष्टी के आरंभ में वेदवाणी के पति परमात्मा ने पवित्र ऋषियों की आत्मा में अपनी प्रेरणा से विभिन्न पदार्थों का नाम बताने वाली वेदवाणी को प्रकाशित किया- ऋग्वेद 10/71/1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. वेदवाणी का पद और अर्थ के सम्बन्ध से प्राप्त होने वाला ज्ञान यज्ञ अर्थात सबके पूजनीय परमात्मा द्वारा प्राप्त होता हैं- ऋग्वेद 10/71/3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. मैंने (ईश्वर) ने इस कल्याणकारी वेदवाणी को सब लोगों के कल्याण के लिए दिया हैं- यजुर्वेद 26/2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद स्कंभ अर्थात सर्वाधार परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं- अथर्ववेद 10/7/20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
6. यथार्थ ज्ञान बताने वाली वेदवाणियों को अपूर्व गुणों वाले स्कंभ नामक परमात्मा ने ही अपनी प्रेरणा से दिया हैं- अथर्ववेद 10/8/33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
7. हे मनुष्यों! तुम्हे सब प्रकार के वर देने वाली यह वेदरूपी माता मैंने प्रस्तुत कर दी हैं- अथर्ववेद 19/71/1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
8. परमात्मा का नाम ही जातवेदा इसलिए हैं की उससे उसका वेदरूपी काव्य उत्पन्न हुआ हैं- अथर्ववेद- 5/11/2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये ईश्वरीय के सत्य सन्देश वेद को जाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेद के पवित्र संदेशों को अपने जीवन में ग्रहण कर अपने जीवन का उद्धार करे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#ZakirEndgameBegins&lt;br /&gt;
#ZakirNaikBhagoda&lt;br /&gt;
#ZakirNaikExposed&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_85.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiOHQyVqNDULChJHIFwvo6OeQXgGToTGj2AER1FG1Ybjn0Bt1rS9j5A5Tzly2C3nXoY3ZPOvMVvOdSOm3w4bUcuyef0POQpouqquJwAKCDCP4wWxVnUXdZl57seKfABOVKklxKZyB9tF7JX/s72-c/%25E0%25A4%25B5%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25A6+%25E0%25A4%2594%25E0%25A4%25B0+%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A8.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-8364568364584080672</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:10:00 +0000</pubDate><atom:updated>2020-01-28T22:07:58.398+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">वैदिक ग्रन्थ</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">संस्कृत साहित्य</category><title>ऋषि दयानन्द के लघु ग्रन्थों का महत्वपूर्ण संग्रह</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ओ३म्&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
“रामलाल कपूर ट्रस्ट, सोनीपत से प्रकाशित ऋषि दयानन्द के लघु ग्रन्थों का महत्वपूर्ण संग्रह”&lt;/h2&gt;
===============&lt;br /&gt;
आर्यजगत के प्रमुख एवं शीर्ष विद्वान पं0 युधिष्ठिर मीमांसक जी ने आर्यसमाज की स्थापना शताब्दी वर्ष 1975 के अवसर पर ऋषि दयानन्द के सभी प्रमुख ग्रन्थों को विशेष साजसज्जा एवं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनेक टिप्पणियों एवं महत्वपूर्ण परिशिष्टों के साथ रामलाल कपूर ट्रस्ट, बहालगढ़-सोनीपत की ओर से प्रकाशित किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन ग्रन्थों में लघु ग्रन्थों के संग्रह सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका तथा संस्कारविधि ग्रन्थ भी सम्मिलित थे। ‘ऋषि दयानन्द के शास्त्रार्थ और प्रवचन’ आदि कुछ अन्य ग्रन्थों का प्रकाशन भी हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;लघुग्रन्थ संग्रह एक विशालकाय ग्रन्थ बन है। इसमें 100+768 पृष्ठ हैं। इस संग्रह में ऋषि के निम्न ग्रंथों को समाविष्ट किया गया हैः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1-&amp;nbsp; स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म-चरित्र&lt;br /&gt;
2-&amp;nbsp; आर्याभिविनय&lt;br /&gt;
3-&amp;nbsp; ऋग्वेदभाष्य (प्रथम नमूने का अंक)&amp;nbsp; &lt;br /&gt;
4-&amp;nbsp; भ्रान्ति-निवारण&lt;br /&gt;
5-&amp;nbsp; भ्रमोच्छेदन&lt;br /&gt;
6-&amp;nbsp; पंचमहायज्ञविधि&lt;br /&gt;
7-&amp;nbsp; वेदान्ति-ध्वान्त-निवारण&lt;br /&gt;
8-&amp;nbsp; वेदविरुद्धमत-खण्डनम्&lt;br /&gt;
9-&amp;nbsp; शिक्षापत्री-ध्वान्त-निवारणम्&lt;br /&gt;
10- भागवत-खण्डनम्&lt;br /&gt;
11- व्यवहारभानु&lt;br /&gt;
12- गोकरुणानिधि&lt;br /&gt;
13- आर्योद्देश्यरत्नमाला&lt;br /&gt;
14- चतुर्वेद-विषय-सूची&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रन्थ के आरम्भ में इस संस्करण की निम्न विशेषतायें भी सूचित गई हैं:-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1-&amp;nbsp; इस संग्रह में ऋषि दयानन्द के 14 लघुग्रन्थों का संकलन है।&lt;br /&gt;
2-&amp;nbsp; यथासम्भव प्रथम-द्वितीय संस्करणों से मिलान करके मूलपाठ दिया गया है।&lt;br /&gt;
3-&amp;nbsp; उद्धृत वचनों का ग्रन्थकार-अभिमत शुद्ध पाठ वा उनके मूल स्थान का निर्देश।&lt;br /&gt;
4-&amp;nbsp; मूल ग्रन्थों के पाठों पर सहस्राधिक टिप्पणियां।&lt;br /&gt;
5-&amp;nbsp; अनेक ग्रन्थों से सम्बद्ध ग्रन्थकारीय लेखों का उस-उस ग्रन्थ के अन्त में परिशिष्टरूप से संकलन।&lt;br /&gt;
6-&amp;nbsp; उद्धरण की सुविधा के लिये प्रति पृष्ठ पंक्ति-संख्या का निर्देश।&lt;br /&gt;
7-&amp;nbsp; लम्बे-लम्बे सन्दर्भों का छोटे-छोटे सन्दर्भों में विभाजन।&lt;br /&gt;
8-&amp;nbsp; विस्तृत सम्पादकीय।&lt;br /&gt;
9-&amp;nbsp; ग्रन्थों का ऐतिहासिक विवरण।&lt;br /&gt;
10- अन्त में 10 अत्युपयोगी परिशिष्ट (=सूचियां)&lt;br /&gt;
11- सुन्दर शुद्ध मुद्रण, बढ़िया कागज, पक्की सुन्दर जिल्द।&lt;br /&gt;
12- लागत सजिल्द मात्र मूल्य 60-00 (महंगाई के कारण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह ग्रन्थ का पहला संस्करण था और इसकी 1000 प्रतियां प्रकाशित की गईं थीं। इस ग्रन्थ के सम्पादक पं0 युधिष्ठिर मीमांसक जी थे और मुद्रक श्री सुरेन्द्र कुमार कपूर, रामलाल कपूर ट्रस्ट प्रेस, बहालगढ-सोनीपत-हरयाणा थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुस्तक का प्रकाशन रामलाल कपूर ट्रस्ट, बहालगढ़-सोनीपत द्वारा किया गया था। पुस्तक के मुख पृष्ठ पर पुस्तक का नाम ‘‘दयानन्दीय-लघुग्रन्थ-संग्रहः” दिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके नीचे जो शब्द प्रकाशित किये हैं वह हैं ‘‘विविधटिप्पणीभिरलंकृतानाम्, अनेकविधैः परिशिष्टैः सुशोभितानाम्, चतुर्दश-लघुग्रन्थानाम्”। इन पंक्तियों के नीचे लिखा है ‘‘आर्यसमाज-शताब्दी-संस्करणम्”।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस ग्रन्थ की मुख्य विशेषताओं में पृष्ठ 6 से 24 तक का पं0 युधिष्ठिर मीमांसक जी का लिखा हुआ सम्पादकीय है। इसके बाद पृष्ठ 25 से 90 तक मीमांसक जी ने इन ग्रन्थों का विस्तृत ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रन्थ में दिये गये सम्पादकीय एवं ऐतिहासिक विवरण दोनों ही अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं एवं पठनीय है। इसके बाद सभी चौदह ग्रन्थों की विस्तृत विषय सूची एवं परिशिष्टों का विवरण दिया गया है जिससे पाठकों को सुविधा एवं बहुत लाभ होता है। ग्रन्थ के अन्त में 9 परिशिष्ट दिये गये हैं जो कि अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस संस्करण को प्रकाशित हुए 44 वर्ष हो चुके हैं। हमारा अनुमान है कि अब यह संस्करण बिक्री के लिये उपलब्ध नहीं है। इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ का पुनः प्रकाशन अवश्य होना चाहिये। ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिये दानी बन्धुओं को भी आगे आना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;हम अनुभव करते हैं कि आने वाले समय में पं0 मीमांसक जी के लिखित व सम्पादित ग्रन्थ पाठकों के लिए अलभ्य हो सकते हैं। नई पीढ़ी को इस पर ध्यान देना चाहिये और पंडित जी के सभी ग्रन्थ सुलभ होते रहें, इस समस्या का समाधान करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;हमें इस बात की प्रसन्नता एवं सन्तोष है कि हमारे पास यह अमूल्य ग्रन्थ व निधि विद्यमान है। हम यह भी बता दें कि इससे पूर्व व बाद में किसी प्रकाशक से यह सभी ग्रन्थ एक साथ नहीं छपे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इस ग्रन्थ के प्रकाशन से पूर्व आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली ने भी ऋषि के चौदह ग्रन्थों का एक संग्रह प्रकाशित किया था। इसके समाप्त होने पर एक नया संस्करण भी प्रकाशित हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारा अनुमान है कि आर्ष साहित्य प्रख्चार ट्रस्ट के संस्करण में ऋषि का आत्म चरित, भागवत-खण्डनम्, चतुर्वेद विषय सूची एवं आर्याभिविनय ग्रन्थ नहीं थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;श्री घूडमल प्रह्लादकुमार आर्य धर्मार्थ न्यास, हिण्डोन सिटी से भी दयानन्द लघु-ग्रन्थ संग्रह का एक भव्य संस्करण सन् 2008 में प्रकाशित हुआ है परन्तु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस ग्रन्थ में ऋषि के केवल पांच ग्रन्थों पंचमहायज्ञविधि, आर्योद्देश्यरत्नमाला, गोकरुणानिधिः, व्यवहारभानु तथा आर्याभिविनय को ही सम्मिलित किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें लगा कि इस ग्रन्थ की जानकारी पाठक महानुभावों को दी जानी उचित है जिसका परिणाम इस लेख की उपर्युक्त पंक्तियां हैं। ओ३म् शम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-मनमोहन कुमार आर्य&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_6.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-4540367743022421664</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-21T09:38:49.919+05:30</atom:updated><title>कॉन्वेंट शब्द क्या है? What is Convent word means?</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
कान्वेंट शब्द पर गर्व न करे सच समझे।&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;‘काँन्वेंट’ सबसे पहले तो यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द आखिर आया कहाँ से है, तो आइये प्रकाश डालते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रिटेन में एक कानून था लिव इन रिलेशनशिप बिना किसी वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब साथ में रहते थे तो शारीरिक संबंध भी बन जाते थे, तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाए तब वहाँ की सरकार ने काँन्वेंट खोले अर्थात जो बच्चे अनाथ होने के साथ-साथ नाजायज हैं उनके लिए काँन्वेंट बने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन अनाथ और नाजायज बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए उन्होंने अनाथालयो में एक फादर एक मदर एक सिस्टर की नियुक्ति कर दी क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायज बाप है ना ही माँ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;तो काँन्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए जायज। इंग्लैंड में पहला काँन्वेंट स्कूल सन्&amp;nbsp; 1609 के आसपास एक चर्च में खोला गया था जिसके ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद हैं और भारत में पहला काँन्वेंट स्कूल कलकत्ता में सन् 1842 में खोला गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परंतु तब हम गुलाम थे और आज तो लाखों की संख्या में काँन्वेंट स्कूल चल रहे हैं।&lt;br /&gt;
जब कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये तीनों गुलामी के ज़माने की यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।&lt;br /&gt;
मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है। उसमें वो लिखता है कि:&lt;br /&gt;
“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे। इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा।&lt;br /&gt;
इनको अपने मुहावरे नहीं मालुम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रुवाब पड़ेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;अरे ! हम तो खुद में हीन हो गए हैं। जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा?&lt;br /&gt;
लोगों का तर्क है कि “अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है”।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में ही बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है? शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईसा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी। समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत देश में अब भारतीयों की मूर्खता देखिए जिनके जायज माँ बाप भाई बहन सब हैं, वो काँन्वेन्ट में जाते है तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा काँन्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज जिसे देखो काँन्वेंट खोल रहा है जैसे बजरंग बली काँन्वेन्ट स्कूल, माँ भगवती काँन्वेन्ट स्कूल। अब इन मूर्खो को कौन समझाए कि भईया माँ भगवती या बजरंग बली का काँन्वेन्ट से क्या लेना देना?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन चीजो का हमने त्याग किया अंग्रेजो ने वो सभी चीजो को पोषित और संचित किया। और हम सबने उनकी त्यागी हुई गुलाम सोच को आत्मसात कर गर्वित होने का दुस्साहस किया।&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/what-is-convent-word-means.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-5163821499653128400</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:04:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-21T09:34:46.593+05:30</atom:updated><title>वेदों का प्रचार कैसे करना चाहिये</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ओ३म्&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
“आर्यसमाज के विद्वानों, नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को निःस्वार्थ भाव सहित निर्भीकतापूर्वक वेदों का प्रचार करना चाहिये”&lt;/h2&gt;
=============&lt;br /&gt;
महर्षि दयानन्द के आगमन से लोगों को यह ज्ञात हुआ कि विद्या व ज्ञान भी सत्य एवं असत्य दो प्रकार का हो सकता है। हम बचपन में माता-पिता द्वारा की जाने वाली मूर्तिपूजा एवं अल्पज्ञ मनुष्यों द्वारा रचित प्रार्थनाओं व आरती आदि करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों के स्वाध्याय एवं आर्य विद्वानों के प्रवचनों को सुनकर हमें यह ज्ञात हुआ कि मूर्तिपूजा व मनुष्यरचित आरतियों का गायन ईश्वर भक्ति व उपासना के अन्तर्गत नहीं आता अपितु यह अविद्या व अज्ञान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इससे लाभ न होकर मनुष्य को हानि होती है। इसका कारण यह है कि मूर्ति जड़ होती है। उससे अपने कल्याण व सुखों की अपेक्षा करना अज्ञान व अन्धविश्वास है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;यदि हमें अपना कल्याण करना है तो हमें अपने से अधिक ज्ञानी किसी चेतन विद्वान व अद्वितीय सत्ता ईश्वर को प्राप्त होना होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्वर का सत्यस्वरूप सृष्टि के आद्य ग्रन्थ ईश्वर प्रदत्त ज्ञान चार वेदों में उपलब्ध होता है। वेदों के ऋषियों द्वारा उपनिषद एवं दर्शन आदि ग्रन्थों में किये गये वेदानुकूल व्याख्यान भी मनुष्यों का ज्ञानवर्धन करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;वेदों का यह ज्ञान ही मनुष्यों के लिये हितकर एवं कल्याणदायक होता है। अतः चेतन, आनन्दस्वरूप तथा वेद प्रतिपादित ईश्वर का अध्ययन व उसके अनुसार ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना को करना ही सत्य व ज्ञानोचित कर्म होता है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा जड़ पदार्थों व उनसे बनी किसी आकृति व मूर्ति आदि में ईश्वर की भावना रखकर उसको पूजना व उपासना करना अर्थात् मूर्ति पर जल, पत्र, फल आदि पदार्थों को चढ़ाना इष्ट फल व परिणामदायक नहीं होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अविद्वान वह होता है जिसको अल्प ज्ञान व विपरीत ज्ञान होता है। विद्वान उसे कहते हैं जो सत्य ज्ञान से युक्त होता है। सत्य ज्ञान का पुस्तक ईश्वरीय ज्ञान वेद है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारी यह सृष्टि 1.96 अरब से कुछ अधिक वर्ष पुरानी है। इतने वर्ष पूर्व सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने अमैथुनी सृष्टि कर स्त्री व पुरुषों को उत्पन्न किया था और उन्हें ज्ञान प्रदान करने के लिये चार पवित्र आत्माओं अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को चार वेदों का ज्ञान दिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्हीं चार ऋषियों से वेदों का यह ज्ञान ब्रह्मा जी के माध्यम से समस्त मनुष्यों को प्राप्त हुआ और वही परम्परा वर्तमान समय तक चली आ रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;वेदां का ज्ञान ईश्वर प्रदत्त होने से उसमें ईश्वर व संसार के सभी पदार्थों का सत्य-सत्य ज्ञान है। मनुष्य अल्पज्ञ होता है। वेदज्ञानरहित मनुष्य कितना अध्ययन, चिन्तन व मनन क्यों न कर ले, वह वेदज्ञानी ऋषि व विद्वान् के तुल्य ज्ञानी नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सभी मनुष्यों के अल्पज्ञ होने के कारण उनके ज्ञान में सत्य व असत्य दोनों प्रकार के कथनों का मिश्रण होता है। यही कारण है कि महाभारत युद्ध के बाद वेदों का अध्ययन-अध्यापन बन्द हो जाने के कारण संसार में वेदों का ज्ञान लुप्त हो गया और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस अवधि में देश विदेश में जो मत-मतान्तर उत्पन्न हुए, उनकी तुलना रात्रि के अन्धकार से की जा सकती है। रात्रि के अन्धकार में मनुष्य को अपने आसपास विद्यमान पदार्थों का निर्भ्रान्त ज्ञान नहीं होता जैसा दिन में सूर्य के प्रकाश में होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही स्थिति हमारे मत-मतान्तरों की पुस्तकों की वेदों के ज्ञान के न होने के कारण हुई है। मत-मतान्तरों के आचार्यों के वेदज्ञान से अपरिचित होने के कारण उनकी पुस्तकों में अनेकानेक अविद्या व अज्ञान की बातें विद्यमान हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इस तथ्य को अनुभव करते हुए मत-मतान्तरों के आचार्य व उनके अनुयायी अपने अज्ञान व हितों के कारण सत्यज्ञान के ग्रन्थ वेद एवं वैदिक मान्यताओं का विरोध करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका उदाहरण है कि महाभारत के बाद वेद व वेदों पर आधारित जो ग्रन्थ हमारे तक्षशिला व नालन्दा आदि विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों सहित देश के अन्य पुस्तकालयों में थे, उन्हें विधर्मियों ने आग लगाकर नष्ट कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;देश विदेश के कुछ स्वार्थ से प्रेरित विद्वानों ने वेदों के मिथ्यार्थ कर यह कहने का प्रयत्न किया कि वेद गड़रियों के गीत हैं और इन ग्रन्थों में बुद्धि व ज्ञान की कोई बात नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द यदि संसार में न आते तो इन अविद्याग्रस्त मतवादियों का षडयन्त्र सफल हो सकता था। दैवीय संयोग से ऋषि दयानन्द का आगमन हुआ और उन्होंने सभी मतवादियों के मतों में विद्यमान अविद्या एवं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असत्य मान्यताओं का प्रकाश किया जिससे सज्जन व सात्विक प्रवृत्ति के मनुष्यों ने उसे समझकर उनका अनुसरण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द ने ही ज्ञान के सत्यासत्य की परीक्षा की कसौटी को न्याय दर्शन के आधार पर बताया और सत्यार्थप्रकाश आदि अपने ग्रन्थों में सत्यासत्य की परीक्षा कर सत्य ज्ञान को प्रस्तुत किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि ऋषि दयानन्द न आये होते तो लोगों को सत्यार्थप्रकाश जैसा क्रान्तिकारी व सत्य का पोषक ग्रन्थ न मिलता और न ही लोगों को धर्म के नाम पर परोसे जाने वाले अज्ञान व अन्धविश्वासों का ज्ञान होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ईश्वर की महती कृपा थी उसने ऋषि दयानन्द जैसी प्रतिभाशाली आत्मा को अविद्यान्धकार से ग्रस्त भारत एवं सम्पूर्ण विश्व में सब सत्य विद्याओं के ग्रन्थ वेदों के प्रचार व प्रसार के लिये भेजा था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;उनके द्वारा सत्यज्ञान वेदों का प्रचार करने से उनके समकालीन व बाद के लोगों का कल्याण हुआ जिनमें आर्यसमाज के सभी अनुयायी सम्मिलित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज ऋषि दयानन्द द्वारा सत्यार्थप्रकाश व अपने अन्य ग्रन्थों में प्रस्तुत ज्ञान से भारत व विश्व के कोटि-कोटि लोग लाभान्वित हो रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेदों की सभी मान्यतायें ज्ञान व विज्ञान के सिद्धान्तों पर सत्य हैं। ऋषि दयानन्द के तर्कों के परिप्रेक्ष्य में मत-मतान्तरों के आचार्यों में सत्य को अपनाने के स्थान पर अपने मत की पूर्व मान्यताओं की व्याख्याओं में परिवर्तन कर उन्हें तर्क के आधार पर प्रतिष्ठित करना आरम्भ किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह महर्षि दयानन्द जी की विश्व को बहुत बड़ी देन है। महर्षि दयानन्द का समूची मानवजाति को ईश्वर व आत्मा विषयक आध्यात्मिक सत्य ज्ञान प्रदान करने का जो ऋण हैं, उससे हम कभी उऋण नहीं हो सकते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महर्षि दयानन्द चार वेद एवं ऋषियों के वेदानुकूल साहित्य के अद्वितीय विद्वान थे। उन्होंने अपने जीवन को सुख भोग के लिये प्रस्तुत न कर सत्य ज्ञान के प्रचार के लिये समर्पित किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनके अनुयायी सभी विद्वानों का कर्तव्य है कि वह ऋषि दयानन्द सहित उनके प्रमुख अनुयायियों स्वामी श्रद्धानन्द, पं0 लेखराम, पं0 गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती, आचार्य चमूपति, पं0 गणपति शर्मा आदि की तरह स्वाध्याय व अध्ययन से अपने ज्ञान को बढ़ाकर उसका जन-जन में बिना किसी लोभ व यश आदि की कामना के प्रचार व प्रसार करें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजकल आर्यसमाज का संगठन दुर्बलता से ग्रस्त है। विद्वान भी आजकल केवल आर्यसमाज के सत्संगों व उत्सवों में जाकर प्रवचन करना ही अपना मुख्य कर्तव्य समझते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारी दृष्टि में इससे वेद प्रचार के लक्ष्य कभी प्राप्त नहीं हो सकते। आर्यसमाज मन्दिर के साप्ताहिक सत्संग या उत्सव में किसी आर्य विद्वान का उपदेश हमारी दृष्टि में प्रचार कोटि में नहीं आता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रचार तो वहां होता है जहां सत्य ज्ञान से वंचित व अपरिचित लोग विद्यमान हों। ऐसे लोगों में अपठित व पठित दोनों प्रकार के लोग होते हैं। आज ज्ञान व विज्ञान पढ़े लोग भी आध्यात्मिक ज्ञान से शून्य देखे जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसे लोग जो कभी विद्यालय या पाठशाला नहीं गये, उनसे तो धर्म व संस्कृति विषयक वेद व वेदानुकूल ज्ञान की अपेक्षा नहीं की जा सकती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आर्य विद्वानों एवं ऋषिभक्तों का कर्तव्य है कि वह विचार कर उन स्थानों का पता लगायें जहां उपदेश करने से उनके ज्ञान का यथार्थ अर्थों में उपयोग हो सकता हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निरक्षर अज्ञानियों की तुलना में किसी पठित व उच्च शिक्षित व्यक्ति से वैदिक सिद्धान्तों को मनवाना अधिक लाभकारी होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि हम मतवादी व स्वार्थों में फंसे लोगों के अतिरिक्त अन्य शिक्षित लोगों से वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों को स्वीकार कराने का प्रयत्न नहीं करते और उसमें सफलता प्राप्त नहीं करते तो ऐसा अनुमान होता है कि इसमें कहीं न कहीं हमारे विद्वानों की कुछ न्यूनता भी हो सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;हमें आर्यसमाज मन्दिरों में शिक्षितों एवं अन्य मतों के लोगों को बुलाकर समय-समय पर अनेकानेक विषयों पर गोष्ठियां व उपदेश-मालायें आयोजित करनी चाहियें और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसमें अन्य मतों के विद्वानों के प्रवचनों के बाद वैदिक मत को तर्क एवं युक्तिसंगत रूप से प्रस्तुत करना चाहिये। मीडिया आदि के माध्यम से भी हमें ऐसे आयोजनों का प्रचार करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;ऐसा होने पर धीरे-धीरे समाज पर इसका प्रभाव पड़ना आरम्भ होगा परन्तु मुद्दा यह है कि क्या हम ऐसे आयोजन कर पायेंगे और क्या उसमें हमें आर्यसमाजेतर लोगों का सहयोग प्राप्त होगा?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्वान वह होता है जो वेद ज्ञान सहित अनेक आध्यात्मिक विद्याओं से युक्त होता है और साथ ही विनम्र स्वभाव का भी होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योग दर्शन में अपरिग्रह एवं लोभ से दूर रहने का विधान है। अगर हम इन विघ्नों का त्याग नहीं करेंगे तो हम&amp;nbsp; ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः विद्वानों को भी लोभ, यश व परिग्रह की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर ऋषि दयानन्द एवं आर्यसमाज के आद्य प्रचारकों के समान वेदों का जन-जन में प्रचार करना होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम ईसाई पादरियों एवं उनके संगठनात्मक कार्यों से भी प्रेरणा ले सकते हैं। वह तो ग्रामीणों व अविद्याशून्य मनुष्यों को छल, प्रलोभन व बल आदि से धर्मान्तरित करते हैं परन्तु हमें इसकी आवश्यकता नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां ईसाई प्रचारक पहुंच कर वैदिक धर्मियों को धर्मान्तरण के लिये प्रेरित करते हैं, हमारे प्रचारकों को उन स्थानों पर जाकर वहां सत्य वैदिक मूल्यों व विचारों का प्रचार करना है और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वहां के लोगों को वैदिक धर्म विरोधियों की कुटिल व कुत्सित भावनाओं से अवगत कराना है। उनको अन्धविश्वास छोड़ने सहित सभी व्यस्नों के त्याग की प्रेरणा भी करनी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;यदि हमारे अशिक्षित निर्धन बन्धु मद्य, मांस एवं अन्य अभक्ष्य पदार्थों के सेवन को छोड़कर सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन करेंगे तो उनकी अविद्या दूर होकर विद्या के बढ़ने से उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और वह और उनके बच्चे भविष्य के योग्य विद्वान एवं सफल व्यवसायी बनकर आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बन सकते हैं। इस ओर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज विद्वानों, नेताओं व कार्यकर्ताओं को न केवल लोभरहित भावना से अपने सहयोगियों के साथ दूर दराज के स्थानों पर जाकर वैदिक विचारधारा का प्रचार करना है अपितु निर्धन एवं दुर्बल लोगों का मार्गदर्शन भी करना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;यदि ऐसा नहीं हुआ तो वैदिक धर्म व संस्कृति सुरक्षित नहीं रह सकतीं। दूसरे मतों की जनसंख्या वृद्धि तथा वैदिक व सनातनी बन्धुओं की जनसंख्या के अनुपात में निरन्तर हो रही कमी पर भी हमें विचार करना और सावधान रहना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सरकार से भी जनसंख्या नीति लागू करने की हमें मांग करनी है जैसी चीन आदि देशों में सभी मतों के लिये एक समान नीतियां हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक धर्म एवं संस्कृति को सुरक्षित व सबल बनाना सभी ऋषि भक्तों व आर्यसमाज सगठन से जुड़े व्यक्तियों का परम कर्तव्य है। यदि हम इसमें चूकेंगे तो इसके परिणाम हमारे अपने लिये, अमारी भावी पीढ़ियों सहित देश के लिये हितकर नहीं होंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें ऋषि दयानन्द के जीवन व उनके कार्यों पर समय समय पर गम्भीरता से विचार करते रहना चाहिये और अपने आचार व विचारों में परिवर्तन व संशोधन करते रहना चाहिये। हम जितना अधिक वेदों वा सद्धर्म का प्रचार करेंगे उतना ही देश व समाज सहित मानवता का लाभ होगा। ओ३म् शम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-मनमोहन कुमार आर्य&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_92.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-6832580824205489500</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:01:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-21T09:31:07.786+05:30</atom:updated><title>कहानी</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
एक अती सुन्दर महिला ने विमान में प्रवेश किया और अपनी सीट की तलाश में नजरें घुमाईं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने देखा कि उसकी सीट एक ऐसे व्यक्ति के बगल में है। जिसके दोनों ही हाथ नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;महिला को उस अपाहिज व्यक्ति के पास बैठने में झिझक हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस &#39;सुंदर&#39; महिला ने एयरहोस्टेस से बोला &quot;मै इस सीट पर सुविधापूर्वक यात्रा नहीं कर पाऊँगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;क्योंकि साथ की सीट पर जो व्यक्ति बैठा हुआ है उसके दोनों हाथ नहीं हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot; उस सुन्दर महिला ने एयरहोस्टेस से सीट बदलने हेतु आग्रह किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असहज हुई एयरहोस्टेस ने पूछा, &quot;मैम क्या मुझे कारण बता सकती है..?&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#39;सुंदर&#39; महिला ने जवाब दिया &quot;मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती। मैं ऐसे व्यक्ति के पास बैठकर यात्रा नहीं कर पाउंगी।&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिखने में पढी लिखी और विनम्र प्रतीत होने वाली महिला की यह बात सुनकर एयरहोस्टेस अचंभित हो गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महिला ने एक बार फिर एयरहोस्टेस से जोर देकर कहा कि &quot;मैं उस सीट पर नहीं बैठ सकती। अतः मुझे कोई दूसरी सीट दे दी जाए।&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एयरहोस्टेस ने खाली सीट की तलाश में चारों ओर नजर घुमाई, पर कोई भी सीट खाली नहीं दिखी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एयरहोस्टेस ने महिला से कहा कि &quot;मैडम इस इकोनोमी क्लास में कोई सीट खाली नहीं है, किन्तु यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखना हमारा दायित्व है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;अतः मैं विमान के कप्तान से बात करती हूँ। कृपया तब तक थोडा धैर्य रखें।&quot; ऐसा कहकर होस्टेस कप्तान से बात करने चली गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ समय बाद लोटने के बाद उसने महिला को बताया, &quot;मैडम! आपको जो असुविधा हुई, उसके लिए बहुत खेद है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इस पूरे विमान में, केवल एक सीट खाली है और वह प्रथम श्रेणी में है। मैंने हमारी टीम से बात की और हमने एक असाधारण निर्णय लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;एक यात्री को इकोनॉमी क्लास से प्रथम श्रेणी में भेजने का कार्य हमारी कंपनी के इतिहास में पहली बार हो रहा है।&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#39;सुंदर&#39; महिला अत्यंत प्रसन्न हो गई, किन्तु इसके पहले कि वह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती और एक शब्द भी बोल पाती...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एयरहोस्टेस उस अपाहिज और दोनों हाथ विहीन व्यक्ति की ओर बढ़ गई और विनम्रता पूर्वक उनसे पूछा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;सर, क्या आप प्रथम श्रेणी में जा सकेंगे..? क्योंकि हम नहीं चाहते कि आप एक अशिष्ट यात्री के साथ यात्रा कर के परेशान हों।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह बात सुनकर सभी यात्रियों ने ताली बजाकर इस निर्णय का स्वागत किया। वह अति सुन्दर दिखने वाली महिला तो अब शर्म से नजरें ही नहीं उठा पा रही थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब उस अपाहिज व्यक्ति ने खड़े होकर कहा,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;मैं एक भूतपूर्व सैनिक हूँ। और मैंने एक ऑपरेशन के दौरान कश्मीर सीमा पर हुए बम विस्फोट में अपने दोनों हाथ खोये थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबसे पहले, जब मैंने इन देवी जी की चर्चा सुनी, तब मैं सोच रहा था। की मैंने भी किन लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली और अपने हाथ खोये..?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन जब आप सभी की प्रतिक्रिया देखी तो अब अपने आप पर गर्व हो रहा है कि मैंने अपने देश और देशवासियों के लिए अपने दोनों हाथ खोये।&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और इतना कह कर, वह प्रथम श्रेणी में चले गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#39;सुंदर&#39; महिला पूरी तरह से अपमानित होकर सर झुकाए सीट पर बैठ गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगर विचारों में उदारता नहीं है तो ऐसी सुंदरता का कोई मूल्य नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैरे पास ये कहानी आई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने इसे पढ़ा तो हृदय को छू गई इसलिये पोस्ट कर रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि आप लोगों भी बहुत पसंद आएगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
🇮🇳🇮🇳🙏🏻जय हिन्द🙏🇮🇳🇮🇳&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_48.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-7699215323929959880</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 04:00:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-21T09:30:38.849+05:30</atom:updated><title>होटल की सच्चाई</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
हम झूठा व बासी नही खाते !&lt;/h2&gt;
&lt;br /&gt;
अगली बार ये कहने से पहले सोचियेगा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ दिन पहले एक परिचित दावत के लिये उदयपुर के एक मशहूर रेस्टोरेंट में ले गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं अक़्सर बाहर खाना खाने से कतराता हूँ, किन्तु सामाजिक दबाव तले जाना पड़ा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजकल पनीर खाना रईसी की निशानी है, इसलिए उन्होंने कुछ डिश पनीर की ऑर्डर की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;प्लेट में रखे पनीर के अनियमित टुकड़े मुझे कुछ अजीब से लगे। ऐसा लगा की उन्हें कांट छांट कर पकाया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने वेटर से कुक को बुलाने के लिए कहा, कुक के आने पर मैंने उससे पूछा पनीर के टुकड़े अलग अलग आकार के व अलग रंगों के क्यों हैं तो उसने कहा ये स्पेशल डिश है।&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने कहा की मैँ एक और प्लेट पैक करवा कर ले जाना चाहता हूं लेकिन वो मुझे ये डिश बनाकर दिखाये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारा रेस्टोरेंट अकबका गया...&lt;br /&gt;
बहुत से लोग थे जो खाना रोककर मुझे&amp;nbsp; देखने लगे...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्टाफ तरह तरह के बहाने करने लगा। आखिर वेटर ने पुलिस के डर से बताया की अक्सर लोग प्लेटों में खाना,सब्जी सलाद व रोटी इत्यादी छोड़ देते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;रसोई में वो फेंका नही जाता। पनीर व सब्जी के बड़े टुकड़ों को इकट्ठा कर दुबारा से सब्जी की शक्ल में परोस दिया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्लेटों में बची सलाद के टुकड़े दुबारा से परोस दिए जाते है । प्लेटों में बचे सूखे&amp;nbsp; चिकन व मांस के टुकड़ों को काटकर करी के रूप में दुबारा पका दिया जाता है। बासी व सड़ी सब्जियाँ भी करी की शक्ल में छुप जाती हैं...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये बड़े बड़े होटलों का सच है। अगली बार जब प्लेट में खाना बचे तो उसे इकट्ठा कर एक प्लास्टिक की थैली में साथ ले जाएं व बाहर जाकर उसे या तो किसी जानवर को दे दें या स्वयं से कचरेदान में फेंके&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरना क्या पता आपका झूठा खाना कोई और खाये या आप किसी और कि प्लेट का बचा खाना खाएं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा क़िस्सा भगवान कृष्ण की भूमि वृंदावन का है. वृंदावन पहुंच कर,मैँ मुग्ध होकर पावन धरा को निहार रहा था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;जयपुर से लंबी यात्रा के बाद हम सभी को कड़ाके की भूख लगी थी सो एक साफ से दिखने वाले&amp;nbsp; रेस्टोरेंट पर रुक गये । समय नष्ठ ना करने के लिए थाली मंगाई गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक साफ से ट्रे में दाल, सब्जी,चावल, रायता व साथ एक टोकरी में रोटियां आई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहले कुछ कौर में ध्यान नही गया फिर मुझे कुछ ठीक नही लगा। मुझे रोटी में खट्टेपन का अहसास हुआ, फिर सब्जी की ओर ध्यान दिया तो देखा सब्जी में हर टुकड़े का रंग अलग अलग सा था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;चावल चखा तो वहां भी माजरा गड़बड़ था। सारा खाना छोड़ दिया। फिर काउंटर पर बिल पूछा यो 650 का बिल थमाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने कहा &#39;भैया! पैसे तो दूँगा लेकिन एक बार आपकी रसोई देखना चाहता हूं&quot; वो अटपटा गया और पूछने लगा &quot;क्यों?&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने कहा &quot;जो पैसे देता है उसे देखने का हक़ है कि खाना साफ बनता है या नहीँ?&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे पहले की वो कुछ समख पाता मैंने होटल की रसोई की ओर रुख किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आश्चर्य की सीमा ना रही जब देखा रसोई में कोई खाना नहीं पक रहा था। एक टोकरी में कुछ रोटियां पड़ी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;फ्रिज खोल तो खुले डिब्बों में अलग अलग प्रकार की पकी हुई सब्जियां पड़ी हुई थी।कुछ खाने में तो फफूंद भी लगी हुई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ्रिज से बदबू का भभका आ रहा था।डांटने पर रसोइये ने बताया की सब्जियां करीब एक हफ्ता पुरानी हैं। परोसने के समय वो उन्हें कुछ तेल डालकर कड़ाई में तेज गर्म कर देता है और धनिया टमाटर से सजा देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोटी का आटा 2 दिन में एक बार ही गूंधता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कई कई घण्टे जब बिजली चली जाती है तो खाना खराब होने लगता है तो वो उसे तेज़ मसालों के पीछे छुपाकर परोस देते हैं। रोटी का आटा खराब हो तो उसे वो नॉन बनाकर परोस देते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने रेस्टोरेंट मालिक से कहा कि &quot;आप भी कभी यात्रा करते होंगे, इश्वेर करे जब अगली बार आप भूख से बिलबिला रहे हों तो आपको बिल्कुल वैसा ही खाना मिले जैसा आप परोसते हैं&quot;&amp;nbsp; उसका चेहरा स्याह हो गया....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज आपको खतरो, धोखों व ठगी से सिर्फ़ जागरूकता ही बचा सकती है। क्यों कि भगवान को भी दुष्टों ने घेर रखा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत से सही व गलत का भेद खत्म होता जा रहा है....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हर दुकान व प्रतिष्ठान में एक कोने में भगवान का बड़ा या छोटा मंदिर होता है।&amp;nbsp; व्यापारी सवेरे आते ही उसमें धूप दीप लगाता है, गल्ले को हाथ जोड़ता है और फिर सामान के साथ आत्मा बेचने का कारोबार शुरू हो जाता है!!!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान से मांगते वक़्त ये नही सोचते की वो स्वयं दुनिया को क्या दे रहे हैं!!***&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जागरूक बनिये!!&lt;br /&gt;
और कोई चारा नही है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे पास भी यह मैसेज कहीं और&amp;nbsp; से आया था,मुझे लगा कि आगे सेंड करना चाहिये। इसलिये कर दिया। हो सकता है आपको सब बातें सही न लगे, लेकिन जागरूक बनने में कोई बुराई नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;हो सकता है कि आपको इन इस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा हो, पर परिस्थितियां कभी भी एक समान नहीं होती ।&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_82.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-6814610581561577845</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 03:59:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-21T09:29:14.467+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ईश्वर भक्ति भजन</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">भजन व गीत</category><title>तेरी अपार महिमा कैसे बयान होवे - भजन</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;
&amp;nbsp;वैदिक भजन&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;
तेरी अपार महिमा कैसे बयान होवे&lt;br /&gt;
कुछ बोलने से पहले गूंगी जुबान होवे&lt;br /&gt;
तेरी अपार महिमा कैसे बयान होवे&lt;br /&gt;
तेरी अपार महिमा ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान तुमसे बढ़कर दुनिया में कौन होगा २&lt;br /&gt;
अब तक नहीं मिला जो तेरे समान होवे&lt;br /&gt;
तेरी अपार महिमा कैसे बयान होवे&lt;br /&gt;
तेरी अपार महिमा ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेरी महानता की सीढ़ी को छूं न पाए २&lt;br /&gt;
दुनिया में कोई चाहे कितना महान होवे&lt;br /&gt;
तेरी अपार महिमा कैसे बयान होवे&lt;br /&gt;
तेरी अपार महिमा ...&lt;br /&gt;
&lt;span style=&quot;white-space: pre;&quot;&gt;	&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
जिस आदमी के सर पर करुणा का हाथ रख दे २&lt;br /&gt;
उसकी हरेक मुश्किल पल में आसान होवे&lt;br /&gt;
तेरी अपार महिमा कैसे बयान होवे&lt;br /&gt;
तेरी अपार महिमा ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन में लोग तुझको पहले नहीं बुलाते २&lt;br /&gt;
तब पथिक याद करते जब लब पे जान होवे&lt;br /&gt;
तेरी अपार महिमा कैसे बयान होवे&lt;br /&gt;
तेरी अपार महिमा ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर एवं रचना - *सत्यपाल पथिक* (वैदिक भजनोपदेशक)&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_98.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-912379428389107250</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 03:58:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-21T09:28:44.545+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Arya  Samaj</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">महापुरुष</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">राष्ट्र</category><title>ऋषि दयानन्द के सभी उपदेशों का संग्रह</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ओ३म्&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
&quot;ऋषि दयानन्द द्वारा दिए सभी उपदेशों का संग्रह न होना मन में खटकता है&quot;&lt;/h2&gt;
============&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द को अपनी आयु के चौदहवें वर्ष में मूर्तिपूजा की विश्वसनीयता अथवा उसकी महत्ता पर शंका हुई थी जिसका समाधान उनके पिता व अन्य पण्डितगण नहीं कर सके थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसके कुछ समय बाद उनकी बहिन व चाचा की मृत्यु ने उनमें वैराग्य भाव को जन्म दिया और वह ईश्वर विषयक प्रश्नों के समाधान तथा मृत्यु पर विजय पाने के लिये अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में अपने घर से सत्यान्वेषण करने चले गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामी दयानन्द सन् 1860 में गुरु विरजानन्द सरस्वती जी के पास मथुरा में अध्ययन के लिये पहुंचे थे और सन् 1863 तक उनसे अध्ययन कर विद्यार्जन पूरा किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;वह स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से अध्ययन कर पूर्ण सन्तुष्ट एवं तृप्त भी हुए थे। स्वामी दयानन्द जी योगी तो पहले ही बन चुके थे। लगभग 18 घण्टों तक की समाधि लगाने का अभ्यास तो उन्हें पहले ही हो चुका था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे हम यह सहज अनुमान लगा सकते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में शताधिक बार ईश्वर का साक्षात्कार किया था। स्वामी दयानन्द जी की मथुरा में गुरु विरजानन्द जी के सान्निध्य में विद्या पूरी होने पर गुरु जी की प्रेरणा से उन्होंने देश व समाज से अविद्या,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;अन्धंविश्वास तथा पाखण्डों को दूर कर उनके स्थान पर सत्य विद्यायों से युक्त ईश्वर प्रणीत चार वेद एवं उनके अनुकूल ऋषियों के सत्यज्ञान से युक्त ग्रन्थों को प्रतिष्ठित करने का निश्चय किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने प्राणपण से यह कार्य किया भी और जितना सम्भव था, उन्होंने इस कार्य में सफलता भी प्राप्त की। महाभारत युद्ध से पूर्व व पश्चात हम देश व संसार में ऋषि दयानन्द जैसा वेद प्रचारक कहीं नहीं देखते&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;जिसने ईश्वर, उसके ज्ञान वेद तथा ऋषि परम्पराओं का अहर्निश प्रचार करने के साथ अविद्या व अन्धविश्वासों का निर्भीकता एवं साहस से खण्डन किया हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द ने आगरा में रहकर वेद प्रचार की योजना बनाई थी। उन्होंने दुर्लभ वा अलभ्य वेदों वा वेद संहिताओं को प्राप्त कर उनका अध्ययन किया और उन्हें ईश्वरीय ज्ञान की कसौटी पर खरा पाने पर ही उनके प्रचार का निश्चय किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इसके बाद उन्होंने देश में सर्वत्र प्रचलित अज्ञान, अन्धविश्वास, मिथ्या परम्पराओं तथा वेद विरुद्ध पाखण्डों का पुरजोर खण्डन किया और वैदिक मान्यताओं का मण्डन अपनी अनेक अपूर्व युक्तियों एवं तर्कों से किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह प्रचार के लिये देश के एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते थे और वहां के लोगों से सम्पर्क कर उन्हें उपदेशों से अनुग्रहीत करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;उनके जीवन काल में लोगों ने उनके उपदेशों की महत्ता को तो समझा था परन्तु किसी ने उन्हें संग्रहित व लेखबद्ध कर प्रकाशित करने का प्रयत्न नहीं किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सौभाग्य से जब वह सन् 1875 में पूना पहुंचे थे तो वहां उनके उपदेशों की व्यवस्था की गई थी। स्वामी दयानन्द जी पूना में धर्म जिज्ञासु न्यायमूर्ति गोविन्द रानाडे जी से मिले थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने ही उनके व्याख्यानों की व्यवस्था की थी। उन्होंने न केवल व्याख्यान ही कराये अपितु उनको मराठी भाषा में नोट भी कराया था जिसका कुछ समय बाद मराठी में प्रकाशन भी हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इन व्याख्यानों का बाद में हिन्दी अनुवाद हुआ और यह सामग्री ‘‘उपेदश-मंजरी” अथवा ‘‘पूना-प्रवचन” के नामों से प्रकाशित हुए और आज भी यह स्वाध्याय की एक बहुत महत्वपूर्ण निधि हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इसे पढ़कर जो ज्ञान प्राप्त होता है वह स्वाध्याय के अन्य ग्रन्थों व पुस्तकों से भी प्रायः नहीं मिलता। उन उपदेशों के अध्ययन से पाठक के मन में यह स्वाभाविक प्रश्न होता है कि इतने महत्वपूर्ण प्रवचन स्वामी दयानन्द जी के होते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;उनका तो एक-एक शब्द संग्रहणीय था। यह तो उस समय के लोगों से बहुत बड़ी भूल हुई कि वह स्वामी जी के सभी प्रवचनों को संग्रहीत नहीं कर पाये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;काश, कि स्वामी जी के सभी प्रवचनों को संग्रहीत किया जाता तो आज हमारे पास ज्ञान की बहुत बड़ी राशि उपलब्ध होती। हम यह अनुभव करते हैं कि हम अनेक बार सही निर्णय नहीं ले पाते जिसकी हानि का अनुमान बाद में पता चलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा ही कुछ स्वामी जी के प्रवचनों का संग्रह न हो पाने के विषय में हम अनुभव करते हैं। आर्यसमाज के पूर्व विद्वानों ने भी ऐसा ही अनुभव किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश व समाज का यह सौभाग्य रहा कि ऐसी परिस्थितियां बनी कि 10 अप्रैल सन् 1875 को मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज की स्थापना होने से संगठित रूप से वेद व धर्म प्रचार का कार्य होने लगा जिसके सुपरिणाम से ऋषि दयानन्द ने अनेक योजनायें बनाई और उनको पूर्ण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज की स्थापना से पूर्व ही सन् 1874 में मुरादाबाद के राजा जयकृष्ण दास जी की प्रेरणा से स्वामी दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश नामक ग्रन्थ का प्रथम संस्करण लिखा जिसे राजा जयकृष्ण दास जी ने प्रकाशित किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इस ग्रन्थ के अन्त के ईसाई व इस्लाम मत की समीक्षा विषयक दो समुल्लास प्रकाशित नहीं किये गये थे। ग्रन्थ में मुद्रण एवं अन्य अनेक त्रुटियां थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सन् 1874 में स्वामी जी को आर्यभाषा हिन्दी बोलने व लिखने का अभ्यास भलीप्रकार से नहीं हुआ था। इस कारण इस ग्रन्थ की भाषा में सुधार की आवश्यकता भी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;स्वामी दयानन्द जी ने भी इन कारणों को अनुभव किया था और अपनी मृत्यु से पूर्व ही सत्यार्थप्रकाश का संशोधित संस्करण तैयार कर दिया था जो उनकी मृत्यु के बाद सन् 1884 ईसवी में प्रकाशित हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही ग्रन्थ वर्तमान में ऋषि दयानन्द के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ बना है और इसने सत्यासत्य की परीक्षा, निर्णय, उसे स्वीकार करने व आचरण में लाने की दृष्टि से विश्व में धार्मिक एवं सामाजिक जगत में हलचल सी उत्पन्न की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामी दयानन्द जी द्वारा इस ग्रन्थ में व्यक्त किये विचारों का न केवल धार्मिक एवं सामाजिक जीवन में प्रभाव पड़ा है अपितु गुलामी दूर कर देश की आजादी में भी इस ग्रन्थ का महत्वपूर्ण योगदान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि स्वामी दयानन्द जी के सभी उपदेशों का संग्रह न हो पाने से जो अभाव की स्थिति बनी थी, वह इस ग्रन्थ के लेखन व प्रकाशन से आंशिक रूप में पूरी हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;आर्यसमाज की स्थापना के बाद भी स्वामी दयानन्द जी ने देश के अनेक भागों में सहस्राधिक उपदेश किये परन्तु उनमें से भी किसी उपदेश का विस्तृत व सार रूप उपलब्ध नहीं होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सुखद आश्चर्य है कि स्वामी जी के अनेक शास्त्रार्थ व शंका समाधान आदि विषयक सामग्री प्राप्त व सुरक्षित हो सकी है जिसे हमारे अनेक विद्वानों ने सम्पादित कर प्रकाशित किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस कार्य में पं0 भगवद्दत्त जी तथा पं0 युधिष्ठिर मीमांसक जी का महनीय योगदान है। पं0 युधिष्ठिर मीमांसक जी ने एक गृहस्थी होते जिस प्रकार से ऋषि दयानन्द के जीवन एवं साहित्य के सम्पादन सहित अनेक ग्रन्थों के सृजन का कार्य किया वह अत्यन्त महत्वपूर्ण, असम्भव प्रतीत होने वाला एवं सराहनीय कार्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारा सौभाग्य है कि हमें पं0 युधिष्ठिर मीमांसक जी, पं0 राजवीर शास्त्री, पं0 विश्वनाथ विद्यालंकार, स्वामी अमर स्वामी जी, स्वामी डॉ0 सत्यप्रकाश जी, स्वामी विद्यानन्द सरस्वती, आचार्य डॉ0 रामनाथ वेदालंकार, स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;डॉ0 भवानीलाल भारतीय आदि ऋषि दयानन्द के अनुगामी कुछ प्रमुख विद्वानों के दर्शनों एवं उनके विचारों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। हम अपने इस सौभाग्य के लिए अपने जीवन धन्य मानते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामी दयानन्द जी के सभी उपदेशों के संग्रह के न होने से जो अभाव हुआ, उसकी पूर्ति उनके लिखे गये अन्य ग्रन्थों जिनमें ऋग्वेद-यजुर्वेद वेद-भाष्य भी सम्मिलित है, हुई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन ग्रन्थों में प्रमुख ग्रन्थ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, पंचमहायज्ञविधि, व्यवहारभानु, गोकरूणानिधि, संक्षिप्त स्वात्मचरित आदि ग्रन्थों से हो जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी ऋषि भक्तों का कर्तव्य है कि वह ऋषि के सभी उपलब्ध ग्रन्थों का सग्रह करें और उनका स्वाध्याय निरन्तर करते रहें। इसके साथ ही जितना सम्भव हो, वह वैदिक विचारधारा का प्रचार प्रसार भी करें जो कि प्रत्येक वेदानुयायी मनुष्य का कर्तव्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज के तीसरे नियम में ऋषि दयानन्द जी ने इसका उल्लेख करते हुए कहा है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द जी के जीवन काल में तो हम उनके समस्त ग्रन्थों का संचय व संग्रह नहीं कर पाये परन्तु अब हमें इस बात का प्रयत्न अवश्य करना चाहिये कि आर्यसमाज का प्रत्येक सदस्य ऋषि दयानन्द के साहित्य का विद्वान हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द का कोई वचन व लेख अप्राप्य न रहे। वह लिखित रूप में भी सुरक्षित रहे और आर्यों के जीवन का अंग बन कर उनके व्यवहार में भी वह परिलक्षित हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज में हम एक अभाव यह भी देखते हैं कि परोपकारिणी सभा एवं रामलाल कपूर ट्रस्ट, सोनीपत के अतिरिक्त हमारे पास कोई वृहद प्रकाशन संस्थान नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यसमाज का अधिकांश प्रकाशन हमारे ऋषिभक्तों द्वारा स्थापित निजी प्रकाशन संस्थानो ंसे किया जाता है। भविष्य की सुरक्षा की दृष्टि से इस पर विचार होना चाहिये&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;और गीता प्रेस गोरखपुर के समान आर्यसमाज का भी एक प्रकाशन स्थान भविष्य में बन सके जो ऋषि दयानन्द विषयक लिखित व प्रकाशित साहित्य को प्रामाणिकता के साथ भव्य व आधुनिक रूप में उचित मूल्य पर प्रकाशित कर आर्यबन्धुओं को सुलभ कराता रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;हमारे निजी प्रकाशक जो कार्य कर रहे हैं वह अत्यन्त सराहनीय है। समूचा आर्यजगत उनका ऋणी है। आर्यजगत के लोगों को इन प्रतिष्ठानों को दान देकर व उनका साहित्य क्रय कर उनका उत्साह वर्धन करना चाहिये। सभी प्रकाशक अभिनन्दन के योग्य है। आर्यसमाज इनका ऋणी है। ओ३म् शम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-मनमोहन कुमार आर्य&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_79.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-7546141676421714608</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 03:54:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-21T09:24:52.245+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">vedic sanskriti</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ईश्वर</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">महापुरुष</category><title>दर्शन, धर्म तथा ईश्वर-जीव-प्रकृति नामी अनादि तत्वों पर स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी का गहन निश्चयात्मक चिन्तन</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ओ३म्&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
दर्शन, धर्म तथा ईश्वर-जीव-प्रकृति नामी अनादि तत्वों पर स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी का गहन निश्चयात्मक चिन्तन&lt;/h2&gt;
=========&lt;br /&gt;
स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी आर्यजगत् के उच्चकोटि के विद्वान थे। वह अच्छे प्रभावशाली वक्ता एवं आर्य नेता भी थे। स्वामी जी आर्य कालेज, पानीपत के प्राचार्य रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘खट्टी मिट्ठी यादें’ नाम से लिखी है। स्वामी जी ने वेदों पर भी अनेक प्रामाणिक ग्रन्थ यथा ‘वेद मीमांसा’आदि लिखे हैं वहीं ऋषि दयानन्द के सभी प्रमुख ग्रन्थों पर भाष्य, व्याख्या व टीकाओं सहित अनेक मौलिक ग्रन्थ भी लिखे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सत्यार्थप्रकाश पर उन्होंने सत्यार्थ-भास्कर, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पर भूमिका-भास्कर तथा संस्कार-विधि पर संस्कार भास्कर टीकायें लिखकर उन्होंने एक अभूतपूर्व कार्य किया है। हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामी जी ने गोकरूणानिधि सहित ऋषि दयानन्द के अन्य लघु ग्रन्थों पर भी विस्तृत व्याख्यायें व टीकायें लिखी हैं। आज हम स्वामी विद्यानन्द सरस्वती द्वारा महर्षि दयानन्द की पुस्तक ‘अद्वैतमत-खण्डन’ पर लिखे गये व्याख्या ग्रन्थ की भूमिका में लिखे गये कुछ भाग को आपके लिये प्रस्तुत कर रहे हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिनमें दर्शन, धर्म, अद्वैतमत, नास्तिक मत एवं वैदिक त्रैतवाद पर प्रकाश पड़ता है। हमें स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी के यह विचार अच्छे लगे हैं। इसी कारण हम इन्हें यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामी विद्यानन्द सरस्वती लिखते हैं कि भारत की वैचारिक परम्परा में दर्शन व धर्म एक दूसरे के पूरक हैं। दर्शन की नींव पर ही धर्म का भवन खड़ा किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;‘दृशिर् प्रेक्षणे’ धातु से दर्शन शब्द निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है-‘दृश्यते ज्ञायते सत्यमनेनेति दर्शनम्’ अर्थात् जिससे सत्य को जाना जा सके, इस ऊहापोहरूपी सन्नियत विचार श्रृंखला को ‘दर्शन’ कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस दार्शनिक सत्य का धारण करना व उसका जीवन में कार्यान्वित होना ‘धर्म’ है। दर्शन का सम्बन्ध विचार से है, धर्म का आचार से। इस प्रकार दर्शन का प्रायोगिक अथवा व्यावहारिक रूप धर्म है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दर्शन व धर्म के इस घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण ही हमारे यहां वेद, उपनिषद्, गीता आदि दार्शनिक ग्रन्थ भी हैं और धार्मिक भी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चमत्कारों में विश्वास रखनेवाला व्यक्ति ही संसार को किसी मायावी की लीला मान सकता है। सृष्टि के रंगमंच पर किसी के हाथ की कठपुतली बन कर नाचनेवाले हम नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे जीवन का कोई लक्ष्य है। अदृश्य शक्ति से प्रेरणा पाकर हमें कुछ बनना है। संसार को पहले से ही स्वप्नवत् मिथ्या समझनेवाले के लिए तत्वज्ञान का कोई अर्थ नहीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;किन्तु मनुष्य सृष्टि के आरम्भ से ही तत्वदर्शी रहा है। यदि वह संसार को मिथ्या मानता होता तो वह अपने सर्वतोन्मुखी ज्ञान की अभिवृद्धि करते रहने में सिर क्यों खपाता? सृष्टि में अभिव्यक्त ऋत और सत्य को जानकर ही मनुष्य अभ्युदय तथा निःश्रेयस् को प्राप्त करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;साधारणतः धर्म विषयक जिज्ञासा ही चित्त को ब्रह्म के प्रति जिज्ञासा के लिए तैयार करती है। ऐसे व्यक्ति जो सीधे ब्रह्म-जिज्ञासा में तत्पर हो जाते हैं, उन्होंने पूर्वजन्म में अपेक्षित कर्तव्यों का पालन किया होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्मोत्पत्ति के लिए कारण-सामग्री का पूर्ववर्ती होना आवश्यक है। दृश्य जगत् कार्यरूप है। अतः जगत् के मूल कारण अथवा तत्व की खोज में दार्शनिकों की रुचि सदा से रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह मूलतत्व क्या है जिसका यह जगत् रूपान्तर मात्र है। दृश्यमान जगत् में हम चेतन तथा अचेतन दोनों प्रकार की सत्ताओं का अनुभव करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;एक विचारधारा के अनुसार जगत् का एकमात्र मूलतत्व अचेतन है। अवस्था विशेष में आकर वही विकसित होकर चैतन्य में परिवर्तित हो जाता है। चेतन नाम की पृथक् तथा स्वतन्त्र सत्ता रखने वाली कोई वस्तु नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय दर्शन में यह विचारधारा उसके संस्थापक बृहस्पति तथा उसके महान् प्रचारक चार्वाक के नाम से प्रसिद्ध है। भारतीय विचारधारा से प्रभावित प्राचीन यूनानी दर्शन को&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोड़कर, पश्चिम का सम्पूर्ण दर्शन, जो हेगेल और कार्ल माक्स जैसे भौतिक तत्वज्ञों के सहारे आधुनिक पाश्चात्य दर्शन के रूप में विकसित हुआ है, इसी विचारधारा का पोषक है। सर्वथा समान न होते हुए भी चार्वाक तथा वर्तमान पाश्चात्य दर्शन मूलतः एक हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरी विचारधारा के अनुसार एकमात्र यथार्थ सत्ता चेतन ब्रह्म है। उससे भिन्न अन्य कोई तत्व अपना अस्तित्व नहीं रखता। यह जो जड़ एवं चेतन जगत् दृष्टिगोचर हो रहा है, उसकी अपनी वास्तविक व स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकमात्र ब्रह्मतत्व ही विभिन्न रूपों में भासता है। इस विचारधारा को पल्लवित व पुष्पित करने का श्रेय आचार्य शंकर को है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;उन्होंने कुछ प्राचीन ग्रन्थों को इसका आधार बनाया और इसी के अनुकूल उनकी व्याख्या की। उनमें वेदान्तदर्शन (ब्रह्मसूत्र), 11 उपनिषद् और गीता विशेषरूप से उल्लेखनीय है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरी विचारधारा के अनुसार चेतन व अचेतन दोनों प्रकार के तत्वों की वास्तविक सत्ता है और दोनो ंके सहयोग से ही सृष्टि-रचना का कार्य संभव है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चेतन तत्व दो हैं-जीवात्मा और परमात्मा। अचेतन तत्व प्रकृति अथवा प्रधान के नाम से जाना जाता है। यह वैदिक विचारधारा है। जिसका निर्देश एवं संकेत वेद के अनेक सूक्तों व मन्त्रों में उपलब्ध होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन विचारों को दर्शन के रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय प्राचीन काल में महर्षि कपिल को और चिरकाल से तिरोहित इस विचारधारा को वर्तमान में प्रवहमान करने का श्रेय महर्षि दयानन्द को है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वामी जी द्वारा लिखी भूमिका अति विस्तृत है। भूमिका में लिखा गया प्रत्येक शब्द एवं वाक्य महत्वपूर्ण है। भूमिका सहित इस पुस्तक को सभी धर्म एवं सत्य के जिज्ञासुओं को अवश्य पढ़ना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;यह बता दें कि इस पुस्तक का प्रकाशन सन् 1995 में वैदिक साहित्य के प्रमुख प्रकाशक श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने ‘मुनिवर गुरुदत्त संस्थान, हिण्डोन सिटी (राजस्थान)’ से किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुस्तक में कुल 64 पृष्ठ हैं एवं मूल्य 20 रुपये अंकित है। हमें लगता है कि ऋषि दयानन्द जी पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने स्वामी शंकराचार्य के अद्वैत-मत का प्रमाण पुरस्सर खण्डन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने यह भी बताया है कि ईश्वर, जीव तथा प्रकृति संसार में तीन अनादि व नित्य पदार्थ हैं। यह सृष्टि परमात्मा की रचना है जिसका उपादान कारण प्रकृति है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सृष्टि की रचना परमात्मा के द्वारा जीवों के पूर्वकल्प के कर्मों के फलों का भोग कराने के लिये की गई है। जीवात्मा का लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द के सभी धार्मिक विचार दार्शनिक सत्यासत्य के विवेचन पर आधारित होने से सत्यान्वेषी विद्वत जगत् में सर्वग्राह्य एवं सर्वमान्य हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहीं कारण है कि धर्म का सच्चा जिज्ञासु व पिपासु वैदिक मत व आर्यसमाज की विचारधारा को आत्मसात कर ही तृप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम आशा करते हैं कि पाठक स्वामी विद्यानन्द जी के इस लेख में प्रस्तुत विचारों को पसन्द करेंगे। ओ३म् शम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-मनमोहन कुमार आर्य&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_14.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-8212945201789453260</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 03:50:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-21T09:20:40.948+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ईश्वर भक्ति भजन</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">भजन व गीत</category><title>विश्वपति जगदीश तुम  तेरा ही ओम् नाम है</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
वैदिक भजन&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;
विश्वपति जगदीश तुम&lt;br /&gt;
तेरा ही ओम् नाम है -२&lt;br /&gt;
मस्तक झुका के प्रेम से&lt;br /&gt;
ईश्वर तुम्हें प्रणाम है&lt;br /&gt;
विश्वपति जगदीश...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सृष्टि बना के पालना&lt;br /&gt;
दाता है तेरे हाथ में -२&lt;br /&gt;
करना प्रलय भी अन्त में&lt;br /&gt;
तेरा ही नाथ काम है&lt;br /&gt;
विश्वपति जगदीश...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आता नजर नहीं मगर&lt;br /&gt;
कण कण में तू समा रहा -२&lt;br /&gt;
जग में जहां पे तू न हो&lt;br /&gt;
ऐसा न कोई धाम है&lt;br /&gt;
विश्वपति जगदीश...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋतुएँ बदल के आ रहीँ&lt;br /&gt;
नदीयाँ सिन्धु में जा रहीँ -२&lt;br /&gt;
शाम के बाद है सुबह&lt;br /&gt;
सुबह के बाद शाम है&lt;br /&gt;
विश्वपति जगदीश...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूरज समय पे ढल रहा&lt;br /&gt;
वायु नियम से चल रहा -२&lt;br /&gt;
झुकता है सर ये देखकर&lt;br /&gt;
तेरा जो इन्तज़ाम है&lt;br /&gt;
विश्वपति जगदीश...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होता है न्याय ही सदा&lt;br /&gt;
ईश्वर तेरे दरबार में -२&lt;br /&gt;
चलती नहीँ सिफ़ारिशेँ&lt;br /&gt;
चढ़ता न कोई दाम है&lt;br /&gt;
विश्वपति जगदीश...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेरे पदार्थ हैं प्रभु&lt;br /&gt;
पथिक सभी के वासते&lt;br /&gt;
सब के लिए हैं वेद भी&lt;br /&gt;
जिनमें तेरा पैगाम है&lt;br /&gt;
विश्वपति जगदीश तुम&lt;br /&gt;
तेरा ही ओम् नाम है&lt;br /&gt;
मस्तक झुका के प्रेम से&lt;br /&gt;
ईश्वर तुम्हें प्रणाम है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर एवं रचना - सत्यपाल पथिक (वैदिक भजन उपदेशक)&lt;/div&gt;
</description><link>https://vaidiksamaj.blogspot.com/2019/12/blog-post_53.html</link><author>noreply@blogger.com (Sanjay)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6455056352887770224.post-442490868007508423</guid><pubDate>Sat, 21 Dec 2019 03:49:00 +0000</pubDate><atom:updated>2019-12-27T06:08:38.006+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Arya  Samaj</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">महापुरुष</category><title>ऋषि दयानन्द का महत्वपूर्ण कार्य </title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ओ३म्&lt;br /&gt;
&lt;span id=&quot;goog_353865116&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto; text-align: center;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiOWsMcsIAblgZN9Q3cN-1kSgPT01uka3l28DYodKJYR1SOZWnrl3a462MI7Eofg9Up-kJXmlBgWzeL8-HoRYRTAZXl-HbuSSzYD5dbibqUB7lvaNGqRtA82ULOl5wPZiUhM-IyHlsbCyHm/s1600/%25E0%25A4%25AE%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B7%25E0%25A4%25BF+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BE+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;ऋषि दयानन्द का महत्वपूर्ण कार्य &quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;800&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;160&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiOWsMcsIAblgZN9Q3cN-1kSgPT01uka3l28DYodKJYR1SOZWnrl3a462MI7Eofg9Up-kJXmlBgWzeL8-HoRYRTAZXl-HbuSSzYD5dbibqUB7lvaNGqRtA82ULOl5wPZiUhM-IyHlsbCyHm/s320/%25E0%25A4%25AE%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B7%25E0%25A4%25BF+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BE+%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF.jpg&quot; title=&quot;ऋषि दयानन्द का महत्वपूर्ण कार्य &quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;ऋषि दयानन्द का महत्वपूर्ण कार्य&amp;nbsp;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;
&lt;span id=&quot;goog_353865117&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;
“ऋषि दयानन्द का महत्वपूर्ण कार्य धर्म, अधर्म आदि लगभग 51 विषयों को परिभाषित करना”&lt;/h2&gt;
==========&lt;br /&gt;
धर्म क्या है, धर्म क्या नहीं है सहित ईश्वर, जीव, प्रकृति आदि से सम्बन्धित अनेक ऐसे विषय हैं जिनके बारे में देश व विश्व के लोगों को ज्ञान नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन सब विषयों को किसी एक छोटी सी पुस्तक में परिभाषित करने का काम हमारी जानकारी में ऋषि दयानन्द से पूर्व किसी महापुरुष या विद्वान ने नहीं किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि जानते थे कि मनुष्य को इन विषयों व शब्दों के ज्ञान की आवश्यकता पड़ेगी और मत-मतान्तरों के स्वार्थी लोग उन्हें इन विषयों में तरह-तरह की अज्ञानयुक्त बातें बताकर भ्रमित करेंगे,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः उन्होंने ईश्वरीय ज्ञान वेदों के आधार पर अपने दो संक्षिप्त एवं लघु ग्रन्थों स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश एवं आर्योद्देश्यरत्नमाला में उन्हें परिभाषित करने का अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय कार्य किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महर्षि दयानन्द जी से पूर्व यदि हम कुछ ग्रन्थों पर दृष्टि डालें तो हमें ऐसे अनेक सूत्र मिलते हैं जहां कुछ विषयों को परिभाषित किया गया है परन्तु लोगों का उधर ध्यान ही नहीं जाता और&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;न ही हमारे विद्वान आचार्य व मंदिरों के पुजारी ही अपने भक्तों को इनसे परिचित कराने का प्रयास करते हैं। विपक्षी विद्वान व मन्दिरों के पुजारी अपने अनुयायियों को परिचित तो तब करायें जब उनमें अपने भक्तों का पूर्ण हित करने की भावना हो और उन्हें स्वयं भी इन विषयों का ज्ञान हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योगदर्शन पर दृष्टि डाले तो उसमें आरम्भ में ही कहा गया कि ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:’ अर्थात् चित्त की वृत्तियों के निरोध वा उन्हें रोकने को योग कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये योग के अष्टांगों को साधा व सिद्ध किया जाता है। योगदर्शन में ईश्वर के विषय में कहा गया है ‘क्लेशकर्मविकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः’ अर्थात् क्लेश, कर्म, कर्मों के फलों से जो रहित व मुक्त है उस पुरुष विशेष सत्ता को ईश्वर कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे हम यह सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि शरीरधारी सभी मनुष्यों को जन्म लेने तथा जीवन जीनें में अनेक प्रकार के क्लेश होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्म लेने वाले मनुष्यों वा जीवात्मा ही होते हैं और उनमें से कोई भी ईश्वर नहीं हो सकता। योग दर्शन के इस सूत्र में हमें ईश्वर के अवतार लेने का खण्डन होता हुआ भी प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः राम, कृष्ण व ऐसे सभी महापुरुष जिनका इस सृष्टि में जन्म हुआ है, वह ईश्वर नहीं हो सकते क्योंकि वह क्लेश, कर्म एवं कर्मफलों से सर्वथा मुक्त नहीं थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमद्-भगवद्-गीता ग्रन्थ में भी ईश्वर के लिये कहा गया है कि ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृदयेषु अर्जुन तिष्ठिति’ अर्थात् हे अर्जुन, ईश्वर वह है जो सब प्राणियों के हृदय वा हृदस्थ आत्मा में विद्यमान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशेषिक दर्शन में भी धर्म की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि ‘यतोभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः’ अर्थात् धर्म वह कर्म व आचरण हैं जिनको करके मनुष्य को अभ्युदय एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्वर के विषय में यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के प्रथम मन्त्र को भी ईश्वर का सत्यस्वरूप प्रकाशित करने वाली परिभाषा कह सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;मन्त्रः में कहा गया है ‘ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किंच्जगत्याम् जगत’ अर्थात् ईश्वर इस जड़ चेतन जगत में भीतर व बाहर सर्वव्यापक है। इस वेद वाक्य से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होने सहित वह सर्वव्यापक है, यह भी विदित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द ने स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश एवं आयोद्देश्यरत्नमाला ग्रन्थों की रचना करके भी देश एवं विश्व के लोगों का मार्गदर्शन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इन ग्रन्थों में ईश्वर, वेद, धर्म व अधर्म, जीव, ईश्वर-जीव का परस्पर सम्बन्ध, अनादि पदार्थ, सृष्टि प्रवाह से अनादि का सिद्धान्त, सृष्टि, सृष्टि का प्रयोजन, सृष्टि सकर्तृक, बन्धन, मुक्ति, मुक्ति के साधन, अर्थ, काम, वर्णाश्रम, राजा, प्रजा,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्वर न्यायकारी, देव, असुर, राक्षस, पिशाच, देवपूजा, शिक्षा, पुराण, तीर्थ, पुरुषार्थ प्रारब्ध से बड़ा, मनुष्य, संस्कार, यज्ञ, आर्य, दस्यु, आर्यावर्त, आचार्य, शिष्य, गुरु, पुरोहित,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपाध्याय, शिष्टाचार, आठ प्रमाण, आप्त महापुरुष, परीक्षा, परोपकार, स्वतन्त्र, परतन्त्र, स्वर्ग, नरक, जन्म, मृत्यु, विवाह, नियोग, स्तुति, प्रार्थना, उपासना, सगुण-निर्गुण-स्तुति-प्रार्थनोपासना आदि विषयों को परिभाषित व उन्हें स्पष्ट करने का सफल प्रयास किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इन विषयों को परिभाषित व स्पष्ट करते हुए ऋषि ने कुछ महत्वपूर्ण बातें भी लिखी हैं। हम यहां उनका उल्लेख करना भी आवश्यक समझते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि सर्वतन्त्र सिद्धान्त अर्थात् साम्राज्य सार्वजनिक धर्म जिस को सदा से सब मानते आये, मानते हैं और मानेंगे भी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसीलिये उस को सनातन नित्य धर्म कहते हैं कि जिस का विरोधी कोई भी न हो सके। यदि अविद्यायुक्त जन अथवा किसी मत वाले के भ्रमाये हुए जन जिस को अन्यथा जानें वा मानें उस का स्वीकार कोई भी बुद्धिमान् नहीं करते&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु जिस को आप्त अर्थात् सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी, परोपकारी, पक्षपातरहित विद्वान मानते हैं वही सब को मन्तव्य और जिस को नहीं मानते वह अमन्तव्य होने से प्रमाण के योग्य नहीं होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;अपने लघु ग्रन्थ स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश में उन्होंने अपने उन प्रायः सभी मन्तव्यों को परिभाषित कर प्रस्तुत किया है जो वेदादि सत्यशास्त्र और ब्रह्मा से ले कर जैमिनिमुनि पर्यन्तों के माने हुए ईश्वरादि पदार्थ हैं। इन मन्तव्यों को ऋषि दयानन्द जी भी अपने निजी जीवन में मानते व पालन करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषि दयानन्द जी ने अपने ग्रन्थ में यह भी लिखा है कि वह अपना मन्तव्य उसी को जानते हैं कि जो तीन कालों में सब मनुष्यों को एक सा मानने योग्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनका कोई नवीन कल्पना वा मतमतान्तर चलाने का लेशमात्र भी अभिप्राय नहीं था किन्तु जो सत्य है उस को मानना, मनवाना और जो असत्य है उस को छोड़ना व छुड़वाना उन्हें अभीष्ट था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि वह पक्षपात करते तो आर्यावर्त में प्रचारित व प्रचलित मतों में से किसी एक मत के आग्रही होते किन्तु जो-जो आर्यावर्त वा अन्य देशों में अधर्मयुक्त चाल चलन है उसका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वीकार और धर्मयुक्त बातें हैं उनका त्याग वह नहीं करते थे और न करना चाहते थे, क्योंकि उनके अनुसार ऐसा करना मनुष्यधर्म से बाहर था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महर्षि दयानन्द ने स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश तथा आयोद्देश्यरत्नमाला पुस्तकों में जिन व्याख्याओं को प्रस्तुत किया है उससे धर्म जिज्ञासु लोगों का बहुत उपकार हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ऋषि दयानन्द ने अपने सभी मन्तव्यों को सत्यासत्य की परीक्षा करके प्रस्तुत किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम भी ऋषि के मन्तव्यों के सत्यासत्य की परीक्षा कर सकते हैं। परीक्षा करने पर ऋषि के सभी मन्तव्य सत्य सिद्ध होते हैं। सत्य को स्वीकार करना और असत्य का त्याग करना ही मनुष्यधर्म है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आर्यसमाज के अनुयायियों सहित ऋषि दयानन्द के मन्तव्य सभी मनुष्यों चाहें वह किसी भी मत-मतान्तर के अनुयायी क्यों न हों, समान रूप से माननीय हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;सबको उनको मानना चाहिये और दूसरे लोगों में प्रचार भी करना चाहिये। सत्य का प्रचार करना भी मनुष्य का कर्तव्य व धर्म है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;हम ऋषि दयानन्द के मन्तव्यों से लाभान्वित हुए हैं व हो रहे हैं। हम उनके ऋणी हैं। हम समझते हैं कि उनके वेद विषयक योगदान के लिये समूचा विश्व उनका ऋणी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;इस रहस्य को जाने या न जानें तथा कोई माने या न मानें। सत्य तो सत्य ही होता है। उसकी उपेक्षा करके उसे बदला नहीं जा सकता। ओ३म् शम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-मनमोहन कुमार आर्य&lt;/div&gt;
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