<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:blogger="http://schemas.google.com/blogger/2008" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-4838333994700236814</atom:id><lastBuildDate>Thu, 05 Sep 2024 06:51:55 +0000</lastBuildDate><title>VICHAR BINDU</title><description></description><link>http://prakash-timezone-prakash.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (prakash)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>1</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-4838333994700236814.post-545621653425840125</guid><pubDate>Thu, 24 Jan 2008 18:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-01-24T10:11:18.658-08:00</atom:updated><title>रहस्य इच्छाशक्ति का</title><description>शंका और संदेह आपके मन की एकाग्रता में बाधक हैं जबकि मन की एकाग्रता ही आपके कार्य सम्पादन की  शक्ति है । आप अपने आपको जैसा मानेंगे वैसा ही आपका आदर्श होगा । आप स्वयं को जैसा समझते हैं आप उससे अधिक नहीं बन सकते ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस प्रकार व्यर्थ विवाद और वार्ता से वाक् शक्ति नष्ट होती है उसी प्रकार व्यर्थ चिंतन और विचारों से गूँथे रहने पर विचार शक्ति या इच्छा शक्ति  नष्ट होती   है । इच्छा संभव पदार्थों की करनी चाहिए क्योंकि अपूर्ण इच्छाएँ विचारों पर आघात करती रहती हैं जिससे मानसिक क्षति पहुँचती है । &lt;br /&gt;मन दो होते हैं अन्तर्मन और बाह्य मन । चेतन अवस्था में बाह्यमन सक्रीय होता है जो नीति-अनीति का विचार करता है  । सुप्तावस्था में बाह्यमन शिथिल होता है व अन्तर्मन जागृत होता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन पर नियन्त्रण पाने के लिए पहले बाह्य मन तत्पश्चात् अन्तर्मन को विचारशून्य करना पड़ता है । विचार या इच्छा श्वास से उत्पन्न होता है । श्वास ही प्राण कहलाता है । प्राण पर नियंत्रण प्रणायाम द्वारा संभव है । जो प्राणायाम विधिपूर्वक नहीं करना चाहते हों तो वे श्वास के आने जाने पर ध्यान  रर्खें । हम जिस चीज़ पर ध्यान देते हैं या दृष्टि रखते हैं उसकी गति आरंभ में बढ़ जाती है और कालान्तर में गति पर नियंत्रण हो जाता है । प्राणशक्ति की सघनता ही इच्छा शक्ति की सुदृढ़ता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर खाली समय में की जाने वाली क्रिया श्वास पर ध्यान लगाना है । श्वास पर ध्यान लगाने से विचारों पर नियंत्रण पाना है । विचारों पर नियंत्रण पाना इच्छा पर नियंत्रण पाना है ।&lt;br /&gt;श्वास जितना कम होगा विचार उतना ही कम होगा । लम्बा श्वास लेना विचारों को लम्बा करना है । फेफड़ों में श्वास भरना इच्छा को धारण करना है ।&lt;br /&gt;जितने लम्बे समय तक श्वास धारण कर सकें वही इच्छाशक्ति की सुदृढ़ता है । सुदृढ़ इच्छाशक्ति ही दृढ़ आत्मविश्वास है और दृढ़ आत्मविश्वास ही सफलता की कुँजी है ।&lt;br /&gt;प्राचीन के साथ साथ आधुनिक मनोवैज्ञानिक तथ्य यह है कि शारीरिक भाव भंगिमा में परिवर्तन कर भावनात्मक परिवर्तन किया जा सकता है अर्थात् जानबूझकर प्रयत्नपूर्वक उत्साही होने या  मुस्कराने का अभिनय किया जाए तो थोड़ी देर में आप वास्तव में उत्साह से भर जाएँगे ।</description><link>http://prakash-timezone-prakash.blogspot.com/2008/01/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (prakash)</author><thr:total>0</thr:total></item></channel></rss>