<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:blogger="http://schemas.google.com/blogger/2008" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055</atom:id><lastBuildDate>Fri, 08 Nov 2024 15:20:23 +0000</lastBuildDate><category>Krishna Bhajan</category><category>Shri Devkinandan Thakur Ji Bhajan</category><category>Sakhiyon Ke Shyam</category><category>Kartik Maas Katha</category><category>Radha Rani Bhajan</category><category>PriyaKant Ju Bhajan</category><category>Holi Bhajan</category><category>Chitra Vichitra Ji Bhajan</category><category>Shri Shri Ji Maharaj Bhajan</category><category>Raman Bhaiyya Bhajan</category><category>Virah Bhajan</category><category>RadhaKrishna Lilaye</category><category>JSR Madhukar Ji Bhajan</category><category>Maanya Arora</category><category>Poonam Didi Bhajan</category><category>Aarti Lyrics</category><category>Braj Ke Sant</category><category>Ram Gopal Shastri Ji Bhajan</category><category>Guru Bhajan</category><category>Gaurav Krishna Ji Bhajan</category><category>Hit Ambrish Ji Bhajan</category><category>Mridul Krishna Goshwami Bhajan Lyrics</category><category>Bhakti Katha</category><category>Jaya Kishori Ji</category><category>Vinod Aggarwal Ji Bhajan</category><title>Vrindavan Bhajan Ras</title><description></description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (Unknown)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>239</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-3277146869804350150</guid><pubDate>Fri, 14 Jan 2022 03:36:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-01-14T09:06:07.069+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Bhakti Katha</category><title>क्यों पड़ते है श्री जगन्नाथ भगवान प्रत्येक वर्ष बीमार......  ????</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;क्यों पड़ते है श्री जगन्नाथ भगवान प्रत्येक वर्ष बीमार ......&amp;nbsp; ????&lt;/h1&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEgw9J9pXXebakE1xPAbfP_ZSBhe-qXyc4PsTiGKizeCVGC8A9VPVbcz1z9pkRIk1FkfNwIPxwlHcw8wlYfBMhfUHUZPhYsJ0kPG5BDy4c2wa5VYFENZotTlK_wadVeMouCU8SYDcRu35GqX2ZP2804kcmFReR3vOPLZ7a41fLI3h7F85x3rydEyzkgY=s800&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;क्यों पड़ते है श्री जगन्नाथ भगवान प्रत्येक वर्ष बीमार......  ????&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;600&quot; data-original-width=&quot;800&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEgw9J9pXXebakE1xPAbfP_ZSBhe-qXyc4PsTiGKizeCVGC8A9VPVbcz1z9pkRIk1FkfNwIPxwlHcw8wlYfBMhfUHUZPhYsJ0kPG5BDy4c2wa5VYFENZotTlK_wadVeMouCU8SYDcRu35GqX2ZP2804kcmFReR3vOPLZ7a41fLI3h7F85x3rydEyzkgY=s16000&quot; title=&quot;क्यों पड़ते है श्री जगन्नाथ भगवान प्रत्येक वर्ष बीमार......  ????&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उड़ीसा प्रान्त में जगन्नाथ पूरी में एक भक्त रहते थे , &lt;b&gt;श्री माधव दास जी&lt;/b&gt;&amp;nbsp; अकेले रहते थे, कोई संसार से इनका लेना देना नही।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अकेले बैठे बैठे भजन किया करते थे, नित्य प्रति श्री जगन्नाथ प्रभु का दर्शन करते थे और उन्ही को अपना सखा मानते थे, प्रभु के साथ खेलते थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभु इनके साथ अनेक लीलाए किया करते थे | प्रभु इनको चोरी करना भी सिखाते थे भक्त माधव दास जी अपनी मस्ती में मग्न रहते थे |&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक बार माधव दास जी को अतिसार( उलटी – दस्त ) का रोग हो गया। वह इतने दुर्बल हो गए कि उठ-बैठ नहीं सकते थे, पर जब तक इनसे बना ये अपना कार्य स्वयं करते थे और सेवा किसी से लेते भी नही थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोई कहे महाराजजी हम कर दे आपकी सेवा तो कहते नही मेरे तो एक जगन्नाथ ही है वही मेरी रक्षा करेंगे । ऐसी दशा में जब उनका रोग बढ़ गया वो उठने बेठने में भी असमर्थ हो गये ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;तब श्री जगन्नाथजी स्वयं सेवक बनकर इनके घर पहुचे और माधवदासजी को कहा की हम आपकी सेवा कर दे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भक्तो के लिए अपने क्या क्या नही किया…&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्यूंकि उनका इतना रोग बढ़ गया था की उन्हें पता भी नही चलता था की कब मल मूत्र त्याग देते थे। वस्त्र गंदे हो जाते थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन वस्त्रो को जगन्नाथ भगवान अपने हाथो से साफ करते थे, उनके पुरे शरीर को साफ करते थे, उनको स्वच्छ करते थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोई अपना भी इतनी सेवा नही कर सके, जितनी जगन्नाथ भगवान ने भक्त माधव दास जी की करी है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भक्त माधव दास जी पर प्रभु का स्नेह.........&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब माधवदासजी को होश आया,तब उन्होंने तुरंत पहचान लीया की यह तो मेरे प्रभु ही हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन श्री माधवदासजी ने पूछ लिया प्रभु से –&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;“प्रभु आप तो त्रिभुवन के मालिक हो, स्वामी हो, आप मेरी सेवा कर रहे हो आप चाहते तो मेरा ये रोग भी तो दूर कर सकते थे, रोग दूर कर देते तो ये सब करना नही पड़ता”&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ठाकुरजी कहते हा देखो माधव! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता,इसी कारण तुम्हारी सेवा मैंने स्वयं की। जो प्रारब्द्ध होता है उसे तो भोगना ही पड़ता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगर उसको काटोगे तो इस जन्म में नही पर उसको भोगने के लिए फिर तुम्हे अगला जन्म लेना पड़ेगा और मै नही चाहता की मेरे भक्त को ज़रा से प्रारब्द्ध के कारण अगला जन्म फिर लेना पड़े,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;इसीलिए मैंने तुम्हारी सेवा की लेकिन अगर फिर भी तुम कह रहे हो तो भक्त की बात भी नही टाल सकता&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भक्तो के सहायक बन उनको प्रारब्द्ध के दुखो से, कष्टों से सहज ही पार कर देते है प्रभु&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब तुम्हारे प्रारब्द्ध में ये 15 दिन का रोग और बचा है, इसलिए 15 दिन का रोग तू मुझे दे दे&lt;/p&gt;&lt;p&gt;15 दिन का वो रोग जगन्नाथ प्रभु ने माधवदास जी से ले लिया&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज भी इसलिए जगन्नाथ भगवान होते है बीमार.......&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वो तो हो गयी तब की बात पर भक्त वत्सलता देखो आज भी वर्ष में एक बार जगन्नाथ भगवान को स्नान कराया जाता है ( जिसे स्नान यात्रा कहते है )&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्नान यात्रा करने के बाद हर साल 15 दिन के लिए जगन्नाथ भगवान आज भी बीमार पड़ते है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;15 दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है&amp;nbsp; कभी भी जगनाथ भगवान की रसोई बंद नही होती पर इन 15 दिन के लिए उनकी रसोई बंद कर दी जाती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;भगवान को 56 भोग नही खिलाया जाता , ( बीमार हो तो परहेज़ तो रखना पड़ेगा )&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रभु को लगाया जाता है काढ़ो का भोग.........&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;15 दिन जगन्नाथ भगवान को काढ़ो का भोग लगता है | इस दौरान भगवान को आयुर्वेदिक काढ़े का भोग लगाया जाता है। जगन्नाथ धाम मंदिर में तो भगवान की बीमारी की जांच करने के लिए हर दिन वैद्य भी आते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;काढ़े के अलावा फलों का रस भी दिया जाता है। वहीं रोज शीतल लेप भी लगया जाता है। बीमार के दौरान उन्हें फलों का रस, छेना का भोग लगाया जाता है और रात में सोने से पहले मीठा दूध अर्पित किया जाता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान जगन्नाथ बीमार हो गए है और अब 15दिनों तक आराम करेंगे। आराम के लिए 15 दिन तक मंदिरों पट भी बंद कर दिए जाते है और उनकी सेवा की जाती है। ताकि वे जल्दी ठीक हो जाएं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस दिन वे पूरी तरह से ठीक होते है उस दिन जगन्नाथ यात्रा निकलती है, जिसके दर्शन हेतु असंख्य भक्त उमड़ते है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खुद पे तकलीफ ले कर अपने भक्तो का जीवन सुखमयी बनाये। ऐसे तो सिर्फ मेरे भगवान ही हो सकते है।.....&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2022/01/Jagannath-Bhagwan-kyo-Bimar-padte-hai.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEgw9J9pXXebakE1xPAbfP_ZSBhe-qXyc4PsTiGKizeCVGC8A9VPVbcz1z9pkRIk1FkfNwIPxwlHcw8wlYfBMhfUHUZPhYsJ0kPG5BDy4c2wa5VYFENZotTlK_wadVeMouCU8SYDcRu35GqX2ZP2804kcmFReR3vOPLZ7a41fLI3h7F85x3rydEyzkgY=s72-c" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 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लो ।वह सुनकर यह दूत शिव जी के स्थान पर पहुंचा । परंतु नंदी ने उसे सभा के भीतर नहीं जाने दिया ।किंतु वह अपनी उग्रता से शिव की सभा में चला गया और शंकर के आगे बैठकर उनकी आज्ञा ले सब संदेश कह सुनाया ।फिर तो राहु नामक दूत के ऐसा कहते हैं भगवान शूलपानी के आगे पृथ्वी छोड़कर एक शब्द वाला पुरुष प्रकट हो गया जिसका सिंह के समान मुख था और जो कि मानो दूसरा नर्सिंह था ।वह दौड़कर राहु को खाने चला तो राहु बड़े जोर से भागा परंतु उस पुरुष ने राहु को पकड़ लिया फिर उसने शिव जी की शरण ले अपनी रक्षा मांगी। शिवजी ने पुरुष से राहु को छोड़ देने को कहाँ उसने कहां। मुझे बड़े जोर की भूख लगी है ।मैं क्या खाऊं ?महेश्वरी ने कहा यदि तुझे भूख लगी है तो शीघ्र ही अपने हाथ पैरों का मांस भक्षण कर ले। शिव जी की आज्ञा से अपने हाथ और पैर का मांस भक्षण कर गया ।अब केवल उसका सिर मात्र शेष रह गया ।तब उसका ऐसा करते देख शिवजी ने प्रसन्न होकर उसे अपना आज्ञाकारी मान कर अपना बना लिया ।और कहा कि मेरी पूजा की तरह तेरी सदैव पूजा होती रहेंगी। और जो तेरी पूजा नहीं करेंगे वह मेरे प्रिय नहीं&amp;nbsp; होंगे। शिवजी के वचन सुनकर कर उस पुरुष को बड़ी प्रसन्नता हुई ।उस दिन से वह शिव जी द्वारा स्वीकृति नामक गण होकर स्थित रहने लगा।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-15.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEgBihNBtJxdQRZNehUhHNIHGXw-PFNuMTcADoHCWyzMESXMQHopOoI5a-HSzdhXefIsIYzK6BqAq1pozSDUR017YW5nTb8En-lbtT5GLwYeROmw5tApOgan-XBdLp4yEUT5oELpZc--BF10QNvFae36l4TEQtUG5DWbQbaUH5R_qq-K0UkOuyvonxIx=s72-c" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-1092936934412195454</guid><pubDate>Sun, 02 Jan 2022 06:38:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-01-02T12:08:40.752+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  14</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 14&lt;/h1&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;14 वांअध्याय&lt;/h2&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEiuh6OrTY0sg3G0Gx0Z66Q-bc-qza_7GdPcvTGyUxUi3TMrbfi0_F5OeXMRZYlIA64ijWs_XV-8d54-W8PRG_1OiC_XwGp3m0bCCUazu7BOlwEyvJFFv3tTzlY3NbGBH1ji4hoxvIkHF8wnrkkIZd_OsRhgSrzm4VZklhfbQuBujeQg9zp3e75FEjMY=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  14&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; 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दैत्यराज&amp;nbsp; जालंधर के पास जा रहा हूं ।ऐसा कहकर देवताओं को आश्वासन देकर श्रीनाथजी जालंधर की सभा में आए जालंधर ने नारद जी के चरणों की पूजा कर हंसते हुए कहा -हे !ब्राह्मण&amp;nbsp; आप कहां से आ रहे हैं और कहां-कहां पर आपने क्या-क्या देखा ?यहां कैसे आए हैं! मेरे योग्य जो सेवा हो उसके लिए मुझे आज्ञा दीजिए। जालंधर के इस प्रकार के वचन सुनकर नारदजी प्रसन्न होकर बोले हे! दानव- राज महा बुद्धिमान जालंधर तुम धन्य हो क्योंकि इस समय सब रत्नों के भोक्ता एक तुम ही हो ।हे !दैत्य&amp;nbsp; श्रेष्ठ अब आप मेरे आगमन का कारण सुनिए जिसके लिए मैं आज यहां आया हूं हे&amp;nbsp; दैत्यराज मैं स्वेच्छा से कैलाश पर्वत पर गया था जहां 10000 योजनाओं में कल्पवृक्ष का वन है वहां पर मैंने सैकड़ों कामधेनु को घूमते हुए देखा। तथा यह भी देखा कि वह 1 चिंतामणि से प्रकाशित परम दिव्य अद्भुत और सब&amp;nbsp; में है। मैंने वहां पार्वती के साथ स्थित शंकर जी को भी देखा जो&amp;nbsp; सुंदर गौरव त्रिनेत्र और मस्तक पर चंद्रमा धारण किए हुए हैं ।यह देख कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इनके सामान समृद्धिशाली त्रिलोक में कोई है या नहीं ?हे देवेंद्र उसी समय मुझे तुम्हारी भी स्मृति का स्मरण हो आया ।और देखने की इच्छा से तुम्हारे पास आया हूं ।यह सुन जालंधर को बड़ा हर्ष हुआ उसने नारदजी जी को अपनी सब समृद्धि देखकर देवताओं का कार्य करने से कार्य करने में इच्छुक से प्रेरित नारद ने जालंधर की बड़ी प्रशंसा की और कहां। निश्चय ही तुम त्रिलोक पति होने के योग्य थे ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम्हारे लिए ऐसा होना कोई विचित्र बात नहीं है ।मैं देखता हूं और तुम्हारे पास सब कुछ है किसी बात की कमी नहीं है। एरावत ,&amp;nbsp; कल्पवृक्ष और कुबेर की निधि तुम्हारे पास है, मणियों और रत्नों के ढेर भी तुम्हारे पास लगे हुए हैं ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मा जी का हंस युक्त विमान भी तुम्हारे पास है ।और&amp;nbsp; &amp;nbsp;पाताल लोक और पृथ्वी पर जितने भी रत्न आती हैं ।वह सब तुम्हारे ही तो है। मैं तुम्हारे इस प्रकार के रत्नेश्वरी को देखकर बड़ा प्रसन्न हूं ।परंतु तुम्हारे पास कोई स्त्री रत्न नहीं है। इसलिए तुम्हारा यह सब कुछ अधुरा&amp;nbsp; है तुम कोई स्त्री रत्न ग्रहण करो ।नारद जी के इस प्रकार के वचन सुनकर दैत्य काम से व्याकुल हो गया। उसने नारद जी को प्रणाम करके पूछां कि ऐसी स्त्री कहां मिलेगी जो सब रत्नों में श्रेष्ठ हो। यदि ऐसा रत्न कहीं मिले तो मैं उसे अवश्य लाऊंगा ।देवर्षि नारद बोले ऐसा रत्न तो कैलाश पर्वत पर योगी शंकर के पास ही है। उनकी सर्वांग सुंदर पत्नी देवी पार्वती बहुत ही मनोहर है ।उसके समान सुंदरी मैंने आज तक नहीं देखी। शंकर से बढ़कर समृद्धि वाला दूसरा कोई नहीं है ।उसके इस रत्न की महिमा तीन लोको और में कहीं पर भी नहीं है। तभी तो परम विरक्त आत्माराम शंकर भी उसके वश में हो गए। देवर्षि नारद उस दैत्य से ऐसा कहकर अन्य कार्य करने की इच्छा से आकाश मार्ग से चले गए।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-14.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEiuh6OrTY0sg3G0Gx0Z66Q-bc-qza_7GdPcvTGyUxUi3TMrbfi0_F5OeXMRZYlIA64ijWs_XV-8d54-W8PRG_1OiC_XwGp3m0bCCUazu7BOlwEyvJFFv3tTzlY3NbGBH1ji4hoxvIkHF8wnrkkIZd_OsRhgSrzm4VZklhfbQuBujeQg9zp3e75FEjMY=s72-c" height="72" 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href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEjvQGp5gEPBfuthhwwTheBA2zHzbfSmTCzOFUK-pOjfvbdrhIBTGsHxDQLcj-jHXrln5fvy4RLTEX8SO_GSok6Iol05xfagSp_AvYgs32mZa-P0VHPrw6Si2gp4AruPOdTXp3nFBDwSrIqnOOiPWMo2ytgWSHVe6Nbp1Nbhq3hYfnrknDSo2TwvB0od=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  13&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEjvQGp5gEPBfuthhwwTheBA2zHzbfSmTCzOFUK-pOjfvbdrhIBTGsHxDQLcj-jHXrln5fvy4RLTEX8SO_GSok6Iol05xfagSp_AvYgs32mZa-P0VHPrw6Si2gp4AruPOdTXp3nFBDwSrIqnOOiPWMo2ytgWSHVe6Nbp1Nbhq3hYfnrknDSo2TwvB0od=s16000&quot; title=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  13&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;दैत्यों की तीक्ष्ण प्रहारों से व्याकुल देवता इधर-उधर भागने लगे। तब इन्द्र आदि को इस प्रकार भयभीत देखकर, गरुड़ पर चढ़े भगवान युद्धमें आगे बढ़े उन्होंने अपना सारंग नामक धनुष उठाकर बड़े जोर से टंकार किया। त्रिलोक गूंज उठा। पल मात्र में ही भगवान विष्णु ने हजारों दैत्यों के सिर काट गिराये। यह देखकर जलन्धर के क्रोध की सीमा न रही। फिर तो भगवान विष्णुऔर जलन्धर का महान संग्राम हुआ। बाणों से आकाश भर गया, लोग आश्चर्य करने लगे भगवान विष्णु ने अपने बाणों के वेग से, उस दैत्य की ध्वजा, क्षेत्र और धनुष बाण काट डाले तथा एक बाण से उसकी छाती में प्रहार किया इससे व्यथित हो उसने अपनी प्रचण्ड गदा उठा गरुड़ के मस्तक पर दे मारी। गरुड़ पृथ्वी पर गिर पड़ा, साथ ही क्रोध से उस दैत्य ने अपने होंठ काटे और भगवानविष्णु की छाती में तीक्ष्ण बाण मारा गया। इसके उत्तर में भगवान विष्णु ने उसकी गदा काट दी और अपने सारंग धनुष पर बाण चढ़ाकर उसको बांधना आरंभ किया जालंधर भी उन पर अपने प्रहरी बान बरसाने लगा उस समय जालंधर ने भगवान को कहीं पे ने बाण मारकर विष्णु धनुष को काट दिया धनुष कट जाने पर भगवान ने गदा ग्रहण कर ली और शीघ्र ही जालंधर को खींचकर मारी परंतु उसने वो गधा की मार से भी वह चलाई मानना हुआ और मन दोनों मत हाथी के समान उसे यानी गधा की मार को फूल की माला ही जाना साथ ही उस युद्ध मे ने अत्यंत क्रोधित होकर अपने मुख त्रिशूल उठाकर भगवान विष्णु पर छोड़ दिया भगवान ने शिव जी के चरणों का स्मरण करना मत उसके त्रिशूल को छाती में एक मुष्टिका मारा इसके उत्तर में भगवान विष्णु ने उसके उत्तर में भगवान विष्णु ने भी उसकी छाती पर अपनी मुष्टिका्&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=&quot;font-size: medium;&quot;&gt;&amp;nbsp;का प्रहार किया फिर दोनों घुटनों टेककर बाहो और मुष्टिका&amp;nbsp; से बाहु युद्ध करने लगे कितनी ही देर तक भगवान उसके साथ युद्ध करते रहे ।जब वह कुछ श्रमिक से हो गए तब सर्वश्रेष्ठ मायावी से भगवान उस दैत्य से मेघवानी में बोले हैं-दैत्य श्रेष्ठ! धन्य हैं जो इस महायुद्ध में इतने बड़े-बड़े प्रहार से भी भयभीत न हुआ तेरे इस युद्ध से मैं बड़ा खुश हूं। तू जो चाहे वह मांग में वह वस्तु में आज तुझे दे दूंगा मायावी भगवान विष्णु की ऐसी वाणी सुनकर जालंधर ने कहा है !भावुक यदि आप मुझ पर खुश है। तो यह वर दीजिए कि आप मेरी बहन के साथ तथा अपने सारे कुटुंब सहित मेरे घर पर निवास करें ।नारद जी कहते हैं उसके ऐसे वचन सुनकर भगवान को खेद तो हुआ। किंतु उसी क्षण देवेश ने तथास्तु कह दिया अब भगवान विष्णु सब देवताओं के साथ चल जालंधरपुर में जाकर निवास करने लगे। जालंधर अपनी बहन लक्ष्मी और देवताओं सहित भगवान को वहां आकर देख बड़ा प्रसन्न हुआ। फिर तो देवताओं के पास जो रत्ना दी थी उनके स्थानों पर दैत्य को को स्थापित करके जालंधर पृथ्वी पर आ गया हूं निशा को पाताल में स्थापित कर दिया और देव दानव यक्ष गंधर्व राक्षस मनुष्य आदि सबको अपना व स्वर्ती बनाकर त्रिभुवन पर शासन करने लगा उसने धर्मानुसार सुपुत्र को समाज प्रजा का पालन किया उनके धर्म राज्य में सभी सुखी थे।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-13_0930031602.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;ग्यारहवाँ अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEg8SQtXRBlXuoyNQ4tMuasxldKz3ctUqGp4LKH1960MPasaDjNSW7eMW9K4ZgndB-657NP_o20FKF0JfaDfcn7oaYOBwgPdHTQ30TSlFPVsjYijKavn0C6oiwJtjWnZcGkjw7FWFCWgIIPcYoKZ01_E1lb-LE94deu5HWeluHRBm6hi0MGnfTRy4lEo=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  11&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEg8SQtXRBlXuoyNQ4tMuasxldKz3ctUqGp4LKH1960MPasaDjNSW7eMW9K4ZgndB-657NP_o20FKF0JfaDfcn7oaYOBwgPdHTQ30TSlFPVsjYijKavn0C6oiwJtjWnZcGkjw7FWFCWgIIPcYoKZ01_E1lb-LE94deu5HWeluHRBm6hi0MGnfTRy4lEo=s16000&quot; title=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  11&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक बार सागर पुत्र जलन्धर अपनी पत्नी वृन्दा सहित असुरों से सम्मानित हुआ सभा में बैठा था तभी गुरु शुक्राचार्य का वहाँ आगमन हुआ. उनके तेज से सभी दिशाएँ प्रकाशित हो गई. गुरु शुक्राचार्य को आता देखकर सागर पुत्र जलन्धर ने असुरों सहित उठकर बड़े आदर से उन्हें प्रणाम किया. गुरु शुक्राचार्य ने उन सबको आशीर्वाद दिया. फिर जलन्धर ने उन्हें एक दिव्य आसन पर बैठाकर स्वयं भी आसन ग्रहण किया फिर सागर पुत्र जलन्धर ने उनसे विनम्रतापूर्वक पूछा – हे गुरुजी! आप हमें यह बताने की कृपा करें कि राहु का सिर किसने काटा था?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस पर दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने विरोचन पुत्र हिरण्यकश्यपु और उसके धर्मात्मा पौत्र का परिचय देकर देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन की कथा संक्षेप में सुनाते हुए बताया कि जब समुद्र से अमृत निकला तो उस समय देवरूप बनाकर राहु भी पीने बैठ गया. इस पर इन्द्र के पक्षपाती भगवान विष्णु ने राहु का सिर काट डाला.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपने गुरु के मुख से इस प्रकार के वचन सुनकर जलन्धर के क्रोध की सीमा न रही, उसके नेत्र लाल हो गये फिर उसने अपने धस्मर नामक दूत को बुलाया और उसे शुक्राचार्य द्वारा सुनाया गया वृत्तान्त सुनाया. तत्पशचत उसने धस्मर को आज्ञा दी कि तुम शीघ्र ही इन्द्रपुरी में जाकर इन्द्र को मेरी शरण में लाओ.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धस्मर जलन्धर का बहुत आज्ञाकारी एवं निपुण दूत था. वह जल्द ही इन्द्र की सुधर्मा नामक सभा में जा पहुंचा और जलन्धर के शब्दों में इन्द्र से बोला – हे देवताधाम! तुमने समुद्र का मन्थन क्यों किया और मेरे पिता के समस्त रत्नों को क्यों ले लिया? ऎसा कर के तुमने अच्छा नहीं किया. यदि तू अपना भला चाहता है तो उन सब रत्नों एवं देवताओं सहित मेरी शरण में आ जा अन्यथा मैं तेरे राज्य का ध्वंस कर दूंगा, इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्र बहुत विस्मित हुआ और कहने लगा – पहले मेरे भय से सागर ने सब पर्वतों को अपनी कुक्षि में क्यों स्थान दिया और उसने मेरे शत्रु दैत्यों की क्यों रक्षा की? इसी कारण मैंने उनके सब रत्न हरण किये हैं. मेरा द्रोही सुखी नहीं रह सकता, इसमें सन्देह नहीं.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन्द्र की ऎसी बात सुनकर वह दूत शीघ्र ही जलन्धर के पास आया और सब बातें कह सुनाई. उसे सुनते ही वह दैत्य मारे क्रोध के अपने ओष्ठ फड़फड़ाने लगा और देवताओं पर विजय प्राप्त करने के लिए उसने उद्योग आरम्भ किया फिर तो सब दिशाओं, पाताल से करोड़ो-2 दैत्य उसके पास आने लगे. शुम्भ-निशुम्भ आदि करोड़ो सेनापतियों के साथ जलन्धर इन्द्र से युद्ध करने लगा. शीघ्र ही इन्द्र के नन्दन वन में उसने अपनी सेना उतार दी. वीरों की शंखध्वनि और गर्जना से इन्द्रपुरी गूंज उठी. अमरावती छोड़ देवता उससे युद्ध करने चले. भयानक मारकाट हुई. असुरों के गुरु आचार्य शुक्र अपनी मृत संजीवनी विद्या से और देवगुरु बृहस्पति द्रोणागिरि से औषधि लाकर जिलाते रहे.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस पर जलन्धर ने क्रुद्ध होकर कहा कि मेरे हाथ से मरे हुए देवता जी कैसे जाते हैं? जिलाने वाली विद्या तो आपके पास है.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस पर शुक्राचार्य ने देवगुरु द्वारा द्रोणाचार्य से औषधि लाकर देवताओं को जिलाने की बात कह दी. यह सुनकर जलन्धर और भी कुपित हो गया फिर शुक्राचार्य जी ने कहा – यदि शक्ति हो तो द्रोणागिरि को उखाड़कर समुद्र में फेंक दो तब मेरे कथन की सत्यता प्रमाणित हो जाएगी. इस पर जलन्धर कुपित होकर जल्द ही द्रोनागिरि पर्वत के पास पहुंचा और अपनी भुजाओं से पकड़कर द्रोणागिरि पर्वत को उखाड़कर समुद्र में फेंक दिया. यह तो भगवान शंकर का तेज था इसमें जलन्धर की कोई विचित्रता नहीं थी.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात यह सागर पुत्र युद्धभूमि में आकर बड़े तीव्र गति से देवताओं का संहार करने लगा. जब द्रोनाचार्य जी औषधि लेने गये तो द्रोणाचल को उखड़ा हुआ शून्य पाया. वह भयभीत हो देवताओं के पास आये और कहा कि युद्ध बन्द कर दो. जलन्धर को अब नहीं जीत सकोगे.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले इन्द्र ने शिवजी का अपमान किया था, यह सुन सेवता युद्ध में जय की आशा त्याग कर इधर-उधर भाग गये. सिन्धु-सुत निर्भय हो अमरावती में घुस गया, इन्द्र आदि सब देवताओं ने गुफाओं में शरण ली.&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-11.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEg6v27DdepGHswfjAhpRQ1D2h0qQ4ryTY7brRGGFixmkymb8GnhZGJUKH1aT_mSkDS8PWpcabEDjnnsgvBxr9U2drqyPq-XBb-8IzL_Koq9Er4aRzY00VFH1FgQeKpiWSxk6fF0XuQX1it58xaEIoSAl5HptshvF_SR6se0hkdSKS5ZDaa-q4qUz2Pf=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  12&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEg6v27DdepGHswfjAhpRQ1D2h0qQ4ryTY7brRGGFixmkymb8GnhZGJUKH1aT_mSkDS8PWpcabEDjnnsgvBxr9U2drqyPq-XBb-8IzL_Koq9Er4aRzY00VFH1FgQeKpiWSxk6fF0XuQX1it58xaEIoSAl5HptshvF_SR6se0hkdSKS5ZDaa-q4qUz2Pf=s16000&quot; title=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  12&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्री नारद जी ने कहा तब जालंधर को अपनी खोज में आते देखकर इंद्र आदि देवता भयभीत होकर वहां से भी भाग निकले भागकर वह बैकुंठ में भगवान विष्णु के पास पहुंचे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;फिर देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए उनकी स्तुति की देवताओं की उस दिव्य वाणी को सुनकर करुणासागर भगवान विष्णु ने उनसे कहां देवताओं तुम्हें को त्याग दो युद्ध में शीघ्र ही उस जालंधर को देखूंगा ऐसा कहने के साथ ही भगवान गरुड़ पर जा बैठे तब देवताओं सहित उन्हें युद्ध क्षेत्र की ओर प्रयाण करते देख समुद्र तन्हैया लक्ष्मी के नेत्रों में जल भर आया और उन्होंने कहां -हे_ नाथ यदि में सर्वदा आपकी प्रिय हूं और भक्त हूं तो मेरा भाई आप द्वारा युद्ध में कैसे मारा जाना चाहिए ।इस पर विष्णु भगवान ने कहा यदि तुम्हारी ऐसी ही प्रीति है तो मैं उसे अपने हाथों से नहीं मारूंगा। परंतु युद्ध में तो जाऊंगा ही। क्योंकि देवताओं ने मेरी बड़ी स्तुति की है ऐसा कह कर शंख चक्र गदा पद्म धारी भगवान विष्णु गरुड़ पर चढ़े हुए शीघ्र ही युद्ध के स्थान पर जा पहुंचे ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहां पर जिस जगह जालंधर विद्यमान था। विष्णु के तेज से भयभीत देवता सिंगर नाथ करने लगे फिर तो अरुण के अनुज गरुड़ के पंखों की प्रबल वायु से पीड़ित हो इस प्रकार घूमने लगे जैसे आंधी से बादल आकाश में घूमते हैं ।तब अपने वीर दैत्य को पीड़ित होते देखकर जालंधर न होकर भगवान विष्णु का अद्भुत वचन कहकर उन पर कठोर आक्रमण कर दिया।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-12.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEg6v27DdepGHswfjAhpRQ1D2h0qQ4ryTY7brRGGFixmkymb8GnhZGJUKH1aT_mSkDS8PWpcabEDjnnsgvBxr9U2drqyPq-XBb-8IzL_Koq9Er4aRzY00VFH1FgQeKpiWSxk6fF0XuQX1it58xaEIoSAl5HptshvF_SR6se0hkdSKS5ZDaa-q4qUz2Pf=s72-c" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 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margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  10&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEiLIklR6wZIpoCLosvyTnASvDm3BAV7E16hpzyLat_glYvAAGWEjQHfMaFBpFOol0mDWuIt9IfpFDcecOJ1d-2Tvu0TW53sIawgtB5VCWCMeI8uS56wCmkt5A7n8Girv1ZN5HEgTUbVB3vbTgsjLwyKg0m4ORW13ePE2OaSaNpu69CJErWfl7z7cSOQ=s16000&quot; title=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  10&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;राजा पृथु बोले – हे ऋषिश्रेष्ठ नारद जी! आपको प्रणाम है। कृपया अब यह बताने की कृपा कीजिए कि जब भगवान शंकर ने अपने मस्तक के तेज को क्षीर सागर में डाला तो उस समय क्या हुआ?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारद जी बोले – हे राजन्! जब भगवान शंकर ने अपना वह तेज क्षीर सागर में डाल दिया तो उस समय वह शीघ्र ही बालक होकर सागर के संगम पर बैठकर संसार को भय देने वाला रूदन करने लगा। उसके रूदन से सम्पूर्ण जगत व्याकुल हो उठा। लोकपाल भी व्याकुल हो गये। चराचर चलायमान हो गया। शंकर सुवन के रुदन से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्याकुल हो गया। यह देखकर सभी देवता और ऋषि-मुनि व्याकुल होकर ब्रह्माजी की शरण में गये और उन्हें प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे। उन सभी ने ब्रह्मा जी से कहा – हे पितामह! यह तोन बहुत ही विकट परिस्थिति उत्पन्न हो गई है। हे महायोगिन! इसको नष्ट कीजिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओं के मुख से इस प्रकार सुनकर ब्रह्माजी सत्यलोक से उतरकर उस बालक को देखने के लिए सागर तट पर आये। सागर ने ब्रह्मा जी को आता देखकर उन्हें प्रणाम किया और बालक को उठाकर उनकी गोद में दे दिया। आश्चर्य चकित होते हुए ब्रह्मा जी ने पूछा – हे सागर! यह बालक किसका है, शीघ्रतापूर्वक कहो।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सागर विनम्रतापूर्वक बोला – प्रभो! यह तो मुझे ज्ञात नहीं है परन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि यह गंगा सागर के संगम पर प्रगट हुआ है इसलिए हे जगतगुरु! आप इस बालक का जात कर्म आदि संस्कार कर के इसका जातक फल बताइए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारद जी राजा पृथु से बोले – सागर ब्रह्माजी के गले में हाथ डालकर बार-बार उनका आकर्षण कर रहा था। फिर तो उसने ब्रह्माजी का गला इतनी जोर से पकड़ा कि उससे पीड़ित होकर ब्रह्मा जी की आँखों से अश्रु टपकने लगे। ब्रह्माजी ने अपने दोनों हाथों का जोर लगाकर किसी प्रकार सागर से अपना गला छुड़वाया और सागर से कहा – हे सागर! सुनो, मैं तुम्हारे इस पुत्र का जातक फल कहता हूँ। मेरे नेत्रों से जो यह जल निकला है इस कारण इसका नाम जलन्धर होगा। उत्पन्न होते ही यह तरुणावस्था को प्राप्त हो गया है इसलिए यह सब शास्त्रों का पारगामी, महापराक्रमी, महावीर, बलशाली, महायोद्धा और रण में विजय प्राप्त करने वाला होगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह बालक सभी दैत्यों का अधिपति होगा। यह किसी से भी पराजित न होने वाला तथा भगवान विष्णु को भी जीतने वाला होगा। भगवान शंकर को छोड़कर यह सबसे अवध्य होगा। जहां से इसकी उत्पत्ति हुई है यह वहीं जायेगा। इसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता, सौभाग्यशालिनी, सर्वांगसुन्दरी, परम मनोहर, मधुर वाणी बोलने वाली तथा शीलवान होगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सागर से इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी ने शुक्राचार्य को बुलवाया और उनके हाथों से बलक का राज्याभिषेक कराकर स्वयं अन्तर्ध्यान हो गये। बालक को देखकर सागर की प्रसन्नता की सीमा न रही, वह हर्षित मन से घर आ गया। फिर सागर में उस बालक का लालन-पालन कर उसे पुष्ट किया, फिर कालनेमि नामक असुर को बुलाकर वृन्दा नामक कन्या से विधिपूर्वक उसका विवाह करा दिया। उस विवाह में बहुत बड़अ उत्सव हुआ। श्री शुक्राचार्य के प्रभाव से पत्नी सहित जलन्धर दैत्यों का राजा हो गया।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-10.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEiLIklR6wZIpoCLosvyTnASvDm3BAV7E16hpzyLat_glYvAAGWEjQHfMaFBpFOol0mDWuIt9IfpFDcecOJ1d-2Tvu0TW53sIawgtB5VCWCMeI8uS56wCmkt5A7n8Girv1ZN5HEgTUbVB3vbTgsjLwyKg0m4ORW13ePE2OaSaNpu69CJErWfl7z7cSOQ=s72-c" height="72" 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href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEgj7YrwBE6RMDnwYLRFsl7WTH1cSZ4RAoc4dqdIE-TUKBelHuAqZxeJb3Ocj2lqLCkHhkFCe0q8PXTz8bXA12Z3lsoysB3rHWJ0HC9dO1wgoZxywAtinkojSgxJyMBkDIAp3WxPCO2ultxr-U8qGZry7TmoYd-i6ncCP90yTqt9QM58Hlc3vHzVfE8j=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग - 09&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEgj7YrwBE6RMDnwYLRFsl7WTH1cSZ4RAoc4dqdIE-TUKBelHuAqZxeJb3Ocj2lqLCkHhkFCe0q8PXTz8bXA12Z3lsoysB3rHWJ0HC9dO1wgoZxywAtinkojSgxJyMBkDIAp3WxPCO2ultxr-U8qGZry7TmoYd-i6ncCP90yTqt9QM58Hlc3vHzVfE8j=s16000&quot; title=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग - 09&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा पृथु ने कहा: हे मुनिश्रेष्ठ नारद जी! आपने कार्तिक माह के व्रत में जो तुलसी की जड़ में भगवान विष्णु का निवास बताकर उस स्थान की मिट्टी की पूजा करना बतलाया है, अत: मैं श्री तुलसी जी के माहात्म्य को सुनना चाहता हूँ। तुलसी जी कहां और किस प्रकार उत्पन्न हुई, यह बताने की कृपा करें।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारद जी बोले – राजन! अब आप तुलसी जी की महत्ता तथा उनके जन्म का प्राचीन इतिहास ध्यानपूर्वक सुनिए –&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक बार देवगुरु बृहस्पति और देवराज इन्द्र भगवान शंकर का दर्शन करने कैलाश पर्वत की ओर चले तब भगवान शंकर ने अपने भक्तों की परीक्षा लेने के लिए जटाधारी दिगम्बर का रुप धारण कर उन दोनों के मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया यद्यपि वह तेजस्वी, शान्त, लम्बी भुजा और चौड़ी छाती वाले, गौर वर्ण, अपने विशाल नेत्रों से युक्त तथा सिर पर जटा धारण किये वैसे ही बैठे थे तथापि उन भगवान शंकर को न पहचान कर इन्द्र ने उनसे उनका नाम व धाम आदि पूछते हुए कहा कि क्या भगवान शंकर अपने स्थान पर हैं या कहीं गये हुए हैं?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस पर तपस्वी रूप भगवान शिव कुछ नहीं बोले। इन्द्र को अपने त्रिलोकीनाथ होने का गर्व था, उसी अहंकार के प्रभाव से वह चुप किस प्रकार रह सकता था, उसने क्रोधित होते हुए उस तपस्वी को धुड़ककर कहा – अरे! मैंने तुझसे कुछ पूछा है और तू उसका उत्तर भी नहीं देता, मैं अभी तुझ पर वज्र का प्रहार करता हूँ फिर देखता हूँ कि कौन तुझ दुर्मति की रक्षा करता है। इस प्रकार कहकर जैसे ही इन्द्र ने उस जटाधारी दिगम्बर को मारने के लिए हाथ में वज्र लिया वैसे ही भगवान शिव ने वज्र सहित इन्द्र का हाथ स्तम्भित कर दिया और विकराल नेत्र कर उसे देखा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस समय ऎसा प्रतीत हो रहा था कि वह दिगम्बर प्रज्वलित हो उठा है और वह अपने तेज से जला देगा। भुजाएँ स्तम्भित होने के कारण इन्द्र दुखित होने के साथ-साथ अत्यन्त कुपित भी हो गया परन्तु उस जटाधारी दिगम्बर को प्रज्वलित देखकर बृहस्पति जी ने उन्हें भगवान शंकर जानकर प्रणाम किया और दण्डवत होकर उनकी स्तुति करने लगे। बृहस्पति भगवान शंकर से कहने लगे – हे दीनानाथ! हे महादेव! आप अपने क्रोध को शान्त कर लीजिए और इन्द्र के इस अपराध को क्षमा कीजिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पति के यह वचन सुनकर भगवान शंकर ने गम्भीर वाणी में कहा – मैं अपने नेत्रों से निकाले हुए क्रोध को किस प्रकार रोकूँ?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब बृहस्पति ने कहा – भगवन्! आप अपना भक्तवत्सल नाम सार्थक करते हुए अपने भक्तों पर दया कीजिए। आप अपने इस तेज को अन्यत्र स्थापित कीजिए और इन्द्र का उद्धार कीजिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब भगवान शंकर गुरु बृहस्पति से बोले – मैं तुम्हारी स्तुति से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुमने इन्द्र को जीवनदान दिलवाया है। मुझे विश्वास है कि मेरे नेत्रों की अग्नि अब इन्द्र को पीड़ित नहीं करेगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बृहस्पति से इस प्रकार कहकर भगवान शिव ने अपने मस्तक से निकाले हुए अग्निमय तेज को अपने हाथों में ले लिया और फिर उसे क्षीर सागर में डाल दिया तत्पश्चात भगवान शंकर अन्तर्ध्यान हो गये। इस प्रकार जिसको जो जानने की कामना थी उसे जानकर इन्द्र तथा बृहस्पति अपने-अपने स्थान को चले गये।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-09.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEgj7YrwBE6RMDnwYLRFsl7WTH1cSZ4RAoc4dqdIE-TUKBelHuAqZxeJb3Ocj2lqLCkHhkFCe0q8PXTz8bXA12Z3lsoysB3rHWJ0HC9dO1wgoZxywAtinkojSgxJyMBkDIAp3WxPCO2ultxr-U8qGZry7TmoYd-i6ncCP90yTqt9QM58Hlc3vHzVfE8j=s72-c" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-8399403706666564520</guid><pubDate>Sun, 26 Dec 2021 03:24:00 +0000</pubDate><atom:updated>2021-12-26T08:54:16.357+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग - 08</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग - 08&lt;/h1&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;आठवाँ अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEjaVF9g0MxXUiKPo3T_TfXOfVcq4Yi9vZtLtLshCOOszTrOi8vfC1_YWnr-ws-jRSTLDn2h9BZOfYbzCVk1yQ5vSe0Cvm_ZBWLLO6Wybp-H4FVKItxjbc75wWGDNNkgtyNGDr_MkMSB7i1zjzAmu7mHHXpQFVXmmap1Tp26Wl_98gXxPPSDjzVTKRuE=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  08&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; 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सुनन्द, कुमुद और कुमुदाक्ष. उन्हें चारों दरवाजों पर दो-दो के क्रम से स्थापित कर भक्तिपूर्वक पूजन करे.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुलसी की जड़ के समीप चार रंगों से सुशोभित सर्वतोभद्रमण्डल बनावे और उसके ऊपर पूर्णपत्र तथा पंचरत्न से संयुक्त कलश की स्थापना करें. कलश के ऊपर शंख, चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु का पूजन करें. भक्तिपूर्वक उस तिथि में उपवास करें तथा रात्रि में गीत, वाद्य, कीर्तन आदि मंगलमय आयोजनों के साथ जागरण करें. जो भगवान विष्णु के लिए जागरण करते समय भक्तिपूर्वक भगवत्सम्बन्धी पदों का गान करते हैं वे सैकड़ो जन्मों की पापराशि से मुक्त हो जाते हैं.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य भगवान के निमित्त जागरण कर के रात्रि भर भगवान का कीर्तन करते हैं, उनको असंख्य गोदान का फल मिलता है. जो मनुष्य भगवान की मूर्ति के सामने नृत्य-गान करते हैं उनके अनेक जन्मों के एकत्रित पाप नष्ट हो जाते हैं. जो भगवान के सम्मुख बैठकर कीर्तन करते हैं और बंसी आदि बजाकर भगवद भक्तों को प्रसन्न करते हैं तथा भक्ति से रात्रि भर जागरण करते हैं, उन्हें करोड़ो तीर्थ करने का फल मिलता है.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके बाद पूर्णमासी में एक सपत्नीक ब्राह्मण को निमंत्रित करें. प्रात:काल स्नान और देव पूजन कर के वेदी पर अग्नि की स्थापना करे और भगवान की प्रीति के लिए तिल और खीर की आहुति दे. होम की शेष विधि पूरी कर के भक्ति पूर्वक ब्राह्मणों का पूजन करें और उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दें फिर उनसे इस प्रकार क्षमा प्रार्थना करें –&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;‘आप सब लोगों की अनुकम्पा से मुझ पर भगवान सदैव प्रसन्न रहें. इस व्रत को करने से मेरे सात जन्मों के किये हुए पाप नष्ट हो जायें और मेरी सन्तान चिरंजीवी हो. इस पूजा के द्वारा मेरी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हों, मेरी मृत्यु के पश्चात मुझे अतिशय दुर्लभ विष्णुलोक की प्राप्ति हो.’&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूजा की समस्त वस्तुओं के साथ गाय भी गुरु को दान में दे, उसके पश्चात घरवालों और मित्रों के साथ स्वयं भोजन करें.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान द्वाद्शी तिथि को शयन से उठे, त्रयोदशी को देवताओं से मिले और चतुर्दशी को सबने उनका दर्शन एवं पूजन किया इसलिए उस तिथि में भगवान की पूजा करनी चाहिए. गुरु की आज्ञा से भगवान विष्णु की सुवर्णमयी प्रतिमा का पूजन करें. इस पूर्णिमा को पुष्कर तीर्थ की यात्रा श्रेष्ठ मानी गयी है. कार्तिक माह में इस विधि का पालन करना चाहिए. जो इस प्रकार कार्तिक के व्रत का पालन करते हैं वे धन्य और पूजनीय हैं उन्हें उत्तम फल की प्राप्ति होती है. जो भगवान विष्णु की भक्ति में तत्पर हो कार्तिक में व्रत का पालन करते हैं उनके शरीर में स्थित सभी पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं. जो श्रद्धापूर्वक कार्तिक के उद्यापन का माहात्म्य सुनता या सुनाता है वह भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त करता है.&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-0_0992859645.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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center;&quot;&gt;सप्तम अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEi0OKI_ytnB8ustliGB-pYgphNZMycv2LKhTusDVwN-55AEuhJRopGamSXGYz9QgiP34aAJvsOu6NnZQtnpP65bSSu6pKahmaYktmM7xmTwtIPosryVOMu6NQ71Rj72DAjHtdJZxbwu9aJNO_HdDvSZ0UQVuCzuK5SHK8mHFGbTrNZJ7HhPPBP-3AdE=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  07&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEi0OKI_ytnB8ustliGB-pYgphNZMycv2LKhTusDVwN-55AEuhJRopGamSXGYz9QgiP34aAJvsOu6NnZQtnpP65bSSu6pKahmaYktmM7xmTwtIPosryVOMu6NQ71Rj72DAjHtdJZxbwu9aJNO_HdDvSZ0UQVuCzuK5SHK8mHFGbTrNZJ7HhPPBP-3AdE=s16000&quot; title=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  07&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारद जी ने कहा: हे राजन! कार्तिक मास में व्रत करने वालों के नियमों को मैं संक्षेप में बतलाता हूँ, उसे आप सुनिए। व्रती को सब प्रकार के आमिष मांस, उरद, राई, खटाई तथा नशीली वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए। व्रती को दूसरे का अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए, किसी से द्वेष नहीं करना चाहिए और तीर्थ के अतिरिक्त अन्य कोई यात्रा नहीं करनी चाहिए। देवता, वेद, ब्राह्मण, गाय, व्रती, नारी, राजा तथा गुरुजनों की निन्दा भी नहीं करनी चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्रती को दाल, तिल, पकवान व दान किया हुआ भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। किसी की चुगली या निन्दा भी नहीं करनी चाहिए। किसी भी जीव का मांस नहीं छूना चाहिए। पान, कत्था, चूना, नींबू, मसूर, बासी तथा झूठे अन्न का भी प्रयोग नहीं करना चाहिए। गाय, बकरी तथा भैंस के अतिरिक्त अन्य किसी पशु का दूध नहीं पीना चाहिए। कांस्य के पात्र में रखा हुआ पंचगव्य, बहुत छोटे घड़े का पानी तथा केवल अपने लिए ही पका हुआ अन्न प्रयोग करना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कार्तिक माह का व्रत करने वाले मनुष्य को सदैव ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। उसे धरती पर सोना चाहिए और दिन के चौथे पहर में केवल एक बार पत्तल में भोजन करना चाहिए। व्रती कार्तिक माह में केवल नरक चतुर्दशी जिसे छोटी दीवाली भी कहा जाता है के दिन ही शरीर में तेल लगा सकता है। कार्तिक माह में व्रत करने वाले मनुष्य को सिंघाड़ा, प्याज, मठ्ठा, गाजर, मूली, काशीफल, लौकी, तरबूज इन वस्तुओं का प्रयोग बिलकुल नहीं करना चाहिए। रजस्वला, चाण्डाल, पापी, म्लेच्छ, पतित, व्रतहीन, ब्राह्मणद्रोही और नास्तिकों से बातचीत नहीं करनी चाहिए। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए अपनी शक्ति के अनुसार चान्द्रायण आदि का व्रत करना चाहिए और उपर्युक्त नियमों का पालन करना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्रती को प्रतिपदा को कुम्हड़ा, द्वितीया को कटहल, तृतीया को तरूणी स्त्री, चतुर्थी को मूली, पंचमी को बेल, षष्ठी को तरबूज, सप्तमी को आंवला, अष्टमी को नारियल, नवमी को मूली, दशमी को लौकी, एकादशी को परवल, द्वादशी को बेर, त्रयोदशी को मठ्ठा, चतुर्दशी को गाजर तथा पूर्णिमा को शाक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। रविवार को आंवला का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कार्तिक माह में व्रत करने वाला मनुष्य यदि इन शाकों में से किसी शाक का सेवन करना चाहे तो पहले ब्राह्मण को देखकर ग्रहण करे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यही विधान माघ माह के व्रत के लिए भी है। देवोत्थानी एकादशी में पहले कही गयी विधि के अनुसार नृत्य, जागरण, गायन-वादन आदि करना चाहिए। इसको विधिपूर्वक करने वाले मनुष्य को देखकर यमदूत ऎसे भाग जाते हैं जैसे सिंह की गर्जना से हाथी भाग जाते हैं। कार्तिक माह का व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त जितने भी व्रत-यज्ञ हैं वह हजार की संख्या में किये जाने पर भी इसकी तुलना नहीं कर सकते क्योंकि यज्ञ करने वाले मनुष्य को सीधा वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार राजा की रक्षा उसके अंगरक्षक करते हैं उसी प्रकार कार्तिक माह का व्रत करने वाले की रक्षा भगवान विष्णु की आज्ञा से इन्द्रादि देवता करते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्रती मनुष्य जहाँ कहीं भी रहता है वहीं पर उसकी पूजा होती है, उसका यश फैलता है। उसके निवास स्थान पर भूत, पिशाच आदि कोई भी नहीं रह पाते। विधि पूर्वक कार्तिक माह का व्रत करने वाले मनुष्यों के पुण्यों का वर्णन करने में ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं। यह व्रत सभी पापों को नष्ट करने वाला, पुत्र-पौत्र प्रदान करने वाला और धन-धान्य की वृद्धि करने वाला है।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-07.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEi0OKI_ytnB8ustliGB-pYgphNZMycv2LKhTusDVwN-55AEuhJRopGamSXGYz9QgiP34aAJvsOu6NnZQtnpP65bSSu6pKahmaYktmM7xmTwtIPosryVOMu6NQ71Rj72DAjHtdJZxbwu9aJNO_HdDvSZ0UQVuCzuK5SHK8mHFGbTrNZJ7HhPPBP-3AdE=s72-c" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-1560028749246419568</guid><pubDate>Sun, 26 Dec 2021 03:19:00 +0000</pubDate><atom:updated>2021-12-26T08:49:08.410+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title> कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  06</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 06&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;छठा अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEh3DHjHN60ySlohmHZat4sNMyuHCgqXeXQLeCA0zEDsend_KRdvWSH7t_s7W7h7-r3NY12IF5j-GRq2Z_PYLyFGE_DZJ1q0_MUmqfPnc9oD-3XlQnpL8upEvPs1aKKTjNgv25FKrwvXZdpHUipuS2e3fGNv5-ryw5TDSHcGhdNWX35l887rKtw3bDCU=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  06&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEh3DHjHN60ySlohmHZat4sNMyuHCgqXeXQLeCA0zEDsend_KRdvWSH7t_s7W7h7-r3NY12IF5j-GRq2Z_PYLyFGE_DZJ1q0_MUmqfPnc9oD-3XlQnpL8upEvPs1aKKTjNgv25FKrwvXZdpHUipuS2e3fGNv5-ryw5TDSHcGhdNWX35l887rKtw3bDCU=s16000&quot; title=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  06&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारद जी बोले: जब दो घड़ी रात बाकी रहे तब तुलसी की मृत्तिका, वस्त्र और कलश लेकर जलाशय पर जाये। कार्तिक में जहां कहीं भी प्रत्येक जलाशय के जल में स्नान करना चाहिए। गरम जल की अपेक्षा ठण्डे जल में स्नान करने से दस गुना पुण्य होता है। उससे सौ गुना पुण्य बाहरी कुएं के जल में स्नान करने से होता है। उससे अधिक पुण्य बावड़ी में और उससे भी अधिक पुण्य पोखर में स्नान करने से होता है। उससे दस गुना झरनों में और उससे भी अधिक पुण्य कार्तिक में नदी स्नान करने से होता है। उससे भी दस गुना पुण्य वहाँ होता हैं जहां दो नदियों का संगम हो और यदि कहीं तीन नदियों का संगम हो तब तो पुण्य की कोई सीमा ही नहीं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;स्नान से पहले भगवान का ध्यान कर के स्नानार्थ संकल्प करना चाहिए फिर तीर्थ में उपस्थित देवताओं को क्रमश: अर्ध्य, आचमनीय आदि देना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अर्ध्य मन्त्र इस प्रकार है: हे कमलनाथ्! आपको नमस्कार है, हे जलशायी भगवान! आपको प्रणाम है, हे ऋषिकेश! आपको नमस्कार है। मेरे दिए अर्ध्य को आप ग्रहण करें। वैकुण्ठ, प्रयाग तथा बद्रिकाश्रम में जहां कहीं भगवान विष्णु गये, वहाँ उन्होंने तीन प्रकार से अपना पांव रखा था। वहाँ पर ऋषि वेद यज्ञों सहित सभी देवता मेरी रक्षा करते रहें। हे जनार्दन, हे दामोदर, हे देवेश! आपको प्रसन्न करने हेतु मैं कार्तिक मास में विधि-विधान से ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर रहा हूँ। आपकी कृपा से मेरे सभी पापों का नाश हो। हे प्रभो! कार्तिक मास में व्रत तथा विधिपूर्वक स्नान करने वाला मैं अर्ध्य देता हूँ, आप राधिका सहित ग्रहण करें। हे कृष्ण! हे बलशाली राक्षसों का संहार करने वाले भगवन्! हे पापों का नाश करने वाले! कार्तिक मास में प्रतिदिन दिये हुए मेरे इस अर्ध्य द्वारा कार्तिक स्नान का व्रत करने वाला फल मुझे प्राप्त हो।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात विष्णु, शिव तथा सूर्य का ध्यान कर के जल में प्रवेश कर नाभि के बराबर जल में खड़े होकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए। गृहस्थी को तिल और आँवले का चूर्ण लगाकर तथा विधवा स्त्री व यती को तुलसी की जड़ की मिट्टी लगाकर स्नान करना चाहिए। सप्तमी, अमावस्या, नवमी, त्रयोदशी, द्वितीया, दशमी आदि तिथियों को आंवला तथा तिल से स्नान करना वर्जित है। स्नान करते हुए निम्न शब्दों का उच्चारण करना चाहिए..&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिस भक्तिभाव से भगवान ने देवताओं के कार्य के लिए तीन प्रकार का रूप धारण किया था, वही पापों का नाश करने वाले भगवान विष्णु अपनी कृपा से मुझे पवित्र बनाएं। जो अम्नुष्य भगवान विष्णु की आज्ञा से कार्तिक व्रत करता है, उसकी इन्द्रादि सभी देवता रक्षा करते हैं इसलिए वह मुझको पवित्र करें। बीजों, रहस्यों तथा यज्ञों सहित वेदों के मन्त्र कश्यप आदि ऋषि, इन्द्रादि देवता मुझे पवित्र करें। अदिति आदि सभी नारियां, यज्ञ, सिद्ध, सर्प और समस्त औषधियाँ व तीनो लोकों के पहाड़ मुझे पवित्र करें।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार कहकर स्नान करने के बाद मनुष्य को हाथ में पवित्री धारण कर के देवता, ऋषि, मनुष्यों तथा पितरों का विधिपूर्वक तर्पण करना चाहिए। तर्पण करते समय तर्पण में जितने तिल रहते हैं, उतने वर्ष पर्यन्त व्रती के पितृगण स्वर्ग में वास करते हैं। उसके बाद व्रती को जल से निकलकर शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। सभी तीर्थों के सारे कार्यों से निवृत्त होकर पुन: भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। सभी तीर्थो के सारे देवताओं का स्मरण करके भक्तिपूर्वक सावधान होकर चन्दन, फूल और फलों के साथ भगवान विष्णु को फिर से अर्ध्य देना चाहिए। अर्ध्य के मंत्र का अर्थ इस प्रकार है..&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने पवित्र कार्तिक मास में स्नान किया है। हे विष्णु! राधा के साथ आप मेरे दिये अर्ध्य को ग्रहण करें!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तत्पश्चात चन्दन, फूल और ताम्बूल आदि से वेदपाठी ब्राह्मणों का श्रद्धापूर्वक पूजन करें और बारम्बार नमस्कार करें। ब्राह्मणों के दाएं पांव में तीर्थों का वास होता है, मुँह में वेद और समस्त अंगों में देवताओं का वास होता है। अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले मनुष्य को इनका न तो अपमान करना चाहिए और न ही इनका विरोध करना चाहिए। फिर एकाग्रचित्त होकर भगवान विष्णु की प्रिय तुलसी जी की पूजा करनी चाहिए, उनकी परिक्रमा कर के उनको प्रणाम करना चाहिए..&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे देवि! हे तुलसी! देवताओं ने ही प्राचीनकाल से तुम्हारा निर्माण किया है और ऋषियों ने तुम्हारी पूजा की है। हे विष्णुप्रिया तुलसी! आपको नमस्कार है। आप मेरे समस्त पापों को नष्ट करो।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार जो मनुष्य भक्तिपूर्वक कार्तिक व्रत का अनुष्ठान करते हैं, वे संसार के सुखों का भोग करते हुए अन्त में मोक्ष को प्राप्त करते हैं।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-0.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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/&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;पांचवा अध्याय&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEg-BwPLe1_PkXbaZ7SV4mRXoWqsUlNyLf4zMDjlI5UmZ1wGBS3_cfhHfwTwOMOap5O1tv0caGfKcdeBP3Xb82UKsBjDF7V8oNxP8GPum4Fd9qJDv532XU3M-kmttj0ImkeeM9WNi55zCFUQc5dbGYcl00pDZ_WXrtlmFvtlMhaGE6opr_7sEgpGS7Jg=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  05&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEg-BwPLe1_PkXbaZ7SV4mRXoWqsUlNyLf4zMDjlI5UmZ1wGBS3_cfhHfwTwOMOap5O1tv0caGfKcdeBP3Xb82UKsBjDF7V8oNxP8GPum4Fd9qJDv532XU3M-kmttj0ImkeeM9WNi55zCFUQc5dbGYcl00pDZ_WXrtlmFvtlMhaGE6opr_7sEgpGS7Jg=s16000&quot; title=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  05&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;राजा पृथु बोले: हे नारद जी! आपने कार्तिक मास में स्नान का फल कहा, अब अन्य मासों में विधिपूर्वक स्नान करने की विधि, नियम और उद्यापन की विधि भी बतलाइये।&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;देवर्षि नारद ने कहा: हे राजन्! आप भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न हुए हैं, अत: यह बात आपको ज्ञात ही है फिर भी आपको यथाचित विधान बतलाता हूँ।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आश्विन माह में शुक्लपक्ष की एकादशी से कार्तिक के व्रत करने चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त में उठकर जल का पात्र लेकर गाँव से बाहर पूर्व अथवा उत्तर दिशा में जाना चाहिए। उसके बाद जो मनुष्य मुख शुद्धि नहीं करता, उसे किसी भी मन्त्र का फल प्राप्त नहीं होता है। अत: दाँत और जीभ को पूर्ण रूप से शुद्ध करना चाहिए और निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए दातुन तोड़नी चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हे वनस्पतये! आप मुझे आयु, कीर्ति, तेज, प्रज्ञा, पशु, सम्पत्ति, महाज्ञान, बुद्धि और विद्या प्रदान करो। इस प्रकार उच्चारण करके वृक्ष से बारह अंगुल की दांतुन ले, दूध वाले वृक्षों से दांतुन नहीं लेनी चाहिए। इसी प्रकार कपास, कांटेदार वृक्ष तथा जले हुए वृक्ष से भी दांतुन लेना मना है। जिससे उत्तम गन्ध आती हो और जिसकी टहनी कोमल हो, ऎसे ही वृक्ष से दन्तधावन ग्रहण करना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रतिपदा, अमावस्या, नवमी, छठी, रविवार को, चन्द्र तथा सूर्यग्रहण में दांतुन नहीं करनी चाहिए। तत्पश्चात भली-भाँति स्नान कर के फूलमाला, चन्दन और पान आदि पूजा की सामग्री लेकर प्रसन्नचित्त व भक्तिपूर्वक शिवालय में जाकर सभी देवी-देवताओं की अर्ध्य, आचमनीय आदि वस्तुओं से पृथक-पृथक पूजा करके प्रार्थना एवं प्रणाम करना चाहिए फिर भक्तों के स्वर में स्वर मिलाकर श्रीहरि का कीर्तन करना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मन्दिर में जो गायक भगवान श्रीहरि का कीर्तन करने आये हों उनका माला, चन्दन, ताम्बूल आदि से पूजन करना चाहिए क्योंकि देवालयों में भगवान विष्णु को अपनी तपस्या, योग और दान द्वारा प्रसन्न करते थे परन्तु कलयुग में भगवद गुणगान को ही भगवान श्रीहरि को प्रसन्न करने का एकमात्र साधन माना गया है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नारद जी राजा पृथु से बोले: हे राजन! एक बार मैंने भगवान से पूछा कि हे प्रभु! आप सबसे अधिक कहां निवास करते हैं?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसका उत्तर देते हुए भगवान ने कहा: हे नारद! मैं वैकुण्ठ या योगियों के हृदय में ही निवास नहीं करता अपितु जहां मेरे भक्त मेरा कीर्तन करते हैं, मैं वहां अवश्य निवास करता हूँ। जो मनुष्य चन्दन, माला आदि से मेरे भक्तों का पूजन करते हैं उनसे मेरी ऎसी प्रीति होती है जैसी कि मेरे पूजन से भी नहीं हो सकती।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नारद जी ने फिर कहा: शिरीष, धतूरा, गिरजा, चमेली, केसर, कन्दार और कटहल के फूलों व चावलों से भगवान विष्णु की पूजा नहीं करनी चाहिए। अढ़हल, कन्द, गिरीष, जूही, मालती और केवड़ा के पुष्पों से भगवान शंकर की पूजा नहीं करनी चाहिए। जिन देवताओं की पूजा में जो फूल निर्दिष्ट हैं उन्हीं से उनका पूजन करना चाहिए। पूजन समाप्ति के बाद भगवान से क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यथा: हे सुरेश्वर, हे देव! न मैं मन्त्र जानता हूँ, न क्रिया, मैं भक्ति से भी हीन हूँ, मैंने जो कुछ भी आपकी पूजा की है उसे पूरा करें।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ऎसी प्रार्थना करने के पश्चात साष्टांग प्रणाम कर के भगवद कीर्तन करना चाहिए। श्रीहरि की कथा सुननी चाहिए और प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जो मनुष्य उपरोक्त विधि के अनुसार कार्तिक व्रत का अनुष्ठान करते हैं वह जगत के सभी सुखों को भोगते हुए अन्त में मुक्ति को प्राप्त करते हैं।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-05.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEg-BwPLe1_PkXbaZ7SV4mRXoWqsUlNyLf4zMDjlI5UmZ1wGBS3_cfhHfwTwOMOap5O1tv0caGfKcdeBP3Xb82UKsBjDF7V8oNxP8GPum4Fd9qJDv532XU3M-kmttj0ImkeeM9WNi55zCFUQc5dbGYcl00pDZ_WXrtlmFvtlMhaGE6opr_7sEgpGS7Jg=s72-c" height="72" 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href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEglNFVrFYE1b1RgOnnGJxtbTdkNTZKzh9eyjBbdZOsXIZoWEciKxNKUMcbAVJfazvh65grYsMi2nkoyJNSpRkyz2Sd4kTHnPVJT0ZXfiOVzwSlKcUxF36X1NvMkRyiRbngDf9-sd23NAB2aPc2t-TnzM6-3izV49B8-2-yhCFCprEweTjTTrvhPXpoY=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  04&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEglNFVrFYE1b1RgOnnGJxtbTdkNTZKzh9eyjBbdZOsXIZoWEciKxNKUMcbAVJfazvh65grYsMi2nkoyJNSpRkyz2Sd4kTHnPVJT0ZXfiOVzwSlKcUxF36X1NvMkRyiRbngDf9-sd23NAB2aPc2t-TnzM6-3izV49B8-2-yhCFCprEweTjTTrvhPXpoY=s16000&quot; title=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  04&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;शंखासुर वध तथा प्रयाग तथा बचौथादरीवन की महिमा का वर्णन।&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारद जी बोले :– ऐसा कह विष्णु भगवान मत्स्यरूप धारण कर विंध्यवासिनी कश्यप ऋषि की अंजली में पहुँच गये ।।१।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब उन ऋषि ने दया करके उस मछली को अपने कमण्डलु रख लिया, वह जब कमण्डलु में न अँट सका तो कुएँ में डाल दिया और जब उसमें भी ना समाया,&amp;nbsp; तब तालाब में और जब तालाब में भी नहीं आँटा, तब फिर समुद्र में डाल दिया ।।२–३।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनंतर उस नारायण रूपी मत्स्य ने शंखासुर को मार डाला और उस शंख को हाथ में लेकर विष्णु भगवान बदरिकारण्य चले गये ।।४।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने वहाँ सब मुनियों को बुलाकर यह आज्ञा दी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्री विष्णु भगवान बोले :– जल के भीतर वेद बिखर गए हैं, उनको तुम ढूंढो ।।५।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बहुत शीघ्र रहस्य समेत वेदों को जल के मध्य से बाहर लाओ। तब तक मैं देवताओं समेत प्रयाग में ठहरा हूँ ।।६।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारद बोले :–तदनंतर तपोबलयुक्त सब मुनीश्वरों द्वारा बीज और यज्ञमंत्रों सहित सब वेद जल से बाहर निकाले गए ।।७।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसमें जितना भाग जिसने पाया, उतना उसके नाम से प्रसिद्ध हुआ। हे राजन ! तब से उन भाग का वही ऋषि हुआ ।।८।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसके बाद सभी मुनीश्वर प्रयाग गये और पाये गये वेदों को विधाता सहित भगवान को दे दिया ।।९।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संपूर्ण वेदों को पाकर ब्रह्मा ने आनंदयुक्त हो ऋषिगणों के साथ अश्वमेघ यज्ञ किया ।।१०।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यज्ञ के अंत में देवता, गंधर्व, यक्ष, सर्प और गुह्यक, ये सब भूमि में दंडवत प्रणाम कर प्रार्थना करने लगे ।।११।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवता बोले :–हे देवों के देव स्वामीन्, हमारी प्रार्थना सुनिये, यह हमारे आनंद का समय है, आप वर देने वाले हो ।।१३।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इससे हे महाराज, आपके प्रसाद से यह स्थान अर्थात प्रयाग पृथ्वी में अति श्रेष्ठ पुण्य को बढ़ाने वाला और भक्ति–मुक्ति देनेवाला माना जाये ।।१४।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह काल का भी&amp;nbsp; महापवित्र ब्रह्महत्या आदि को निवृत्त करने वाला और दान को अक्षय करने वाला हो, यह वर हमको आप दीजिए ।।१५।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विष्णु जी बोले :– हे देवताओं, जो तुमने कहा, वही मेरा भी सम्मत है, तथास्तु अर्थात मैंने तुमको मन वांछित वर दे दिया।&amp;nbsp; ब्रह्मक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान सबको सुलभ होगा ।।१६।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूर्य वंश में उत्पन्न राजा भागीरथ यहां गंगा लायेंगे, वह गंगा यहाँ सूर्य की कन्या कालिंदी अर्थात यमुना जी के संयोग को प्राप्त होगी ।।१७।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यहां ब्रह्मादी तुम सब देवता मेरे पास वास करो। यह तीर्थराज के नाम से प्रसिद्ध होगा ।।१८।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस क्षेत्र में किया हुआ दान, तप, व्रत, होम, जप और पूजा आदि क्रियाएँ अनंत फल देने वाली होंगी और मेरी समीपता प्रदान करने वाली होंगी ।।१९।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनेक जन्मों के किए हुए ब्रह्महत्या आदि पाप इस तीर्थ के दर्शन से तत्काल नष्ट हो जायेंगे ।।२०।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो धीर पुरुष मेरी सान्निध्य अर्थात मेरे समीप देह छोड़ेंगे तो फिर जन्म नहीं लेनेवाले वे मनुष्य मेरे शरीर में प्रवेश करेंगे अर्थात मुक्ति पायेंगे ।।२१।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो यहाँ अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध करेंगे, उनके सब पितृगण मेरी सारूपता को प्राप्त होंगे ।।२२।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह समय भी मनुष्यों को महापुण्य फल देने वाला होगा और मकर के सूर्य आने पर स्नान करने वाले पुरुषों के पापों का नाश करेगा ।।२३।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माघ मास में मकर के सूर्य आने पर प्रातःकाल स्नान करने वाले मनुष्य के दर्शन से ही पाप ऐसे दूर हो जायेंगे जैसे सूर्य से अंधकार दूर हो जाता है ।।२४।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माघ में मकर के आने पर स्नान करनेवाले को मैं सालोक्य, सामीप्य और सारूप्य ये तीनों प्रकार की मुक्ति क्रम से देता हूँ ।।२५।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे मुनीश्वर ! तुम सब मेरे वचन सुनो, सर्वव्यापी में बद्रीवन में सदा&amp;nbsp; रहता हूँ ।।२६।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अन्य स्थानों में सौ वर्ष जप करने से जो फल प्राप्त होता है, वह तुम्हें वहाँ एक दिन में सदा प्राप्त होगा ।।२७।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो श्रेष्ठ उस स्थान का दर्शन करते हैं वे जीवन्मुक्त हैं और कभी उनमें पाप नहीं रहता ।।२८।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सूत जी बोले :– हे देवों के देव !&amp;nbsp; श्री भगवान देवताओं में ऐसा कहकर ब्रह्मा समेत वहीं अंतर्ध्यान हो गये और इन्द्रादि सब देवता भी आपने अंशों से वहाँ स्थित होकर अंतर्ध्यान हो गये ।।२९।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो उत्तम प्राणी शुद्ध चित्त हो इस कथा को सुनेंगे या सुनायेंगे वह तीर्थराज प्रयाग और बदरीवन में जाने से जो फल मिलता है, उसे पायेंगे ।।३०।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;।। इस प्रकार श्रीपद्मपुरण के अंतर्गत कार्तिक मास माहात्म्य में शंखासुर वध तथा प्रयाग तथा बदरीवन की महिमा का वर्णन नामक चौथा अध्याय समाप्त ।।४।।&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-Mas-katha-04.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEglNFVrFYE1b1RgOnnGJxtbTdkNTZKzh9eyjBbdZOsXIZoWEciKxNKUMcbAVJfazvh65grYsMi2nkoyJNSpRkyz2Sd4kTHnPVJT0ZXfiOVzwSlKcUxF36X1NvMkRyiRbngDf9-sd23NAB2aPc2t-TnzM6-3izV49B8-2-yhCFCprEweTjTTrvhPXpoY=s72-c" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-816407322891894247</guid><pubDate>Sat, 25 Dec 2021 03:14:00 +0000</pubDate><atom:updated>2021-12-25T08:44:06.685+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग  03</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 03&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;तृतीय अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEgsoISEA2ZFpvislvl2Kx0xzLBmmBl26cZeke3-Qf6E0GUwV5Ym-2oMOlFSGVIczdy90Q1TKywFXXzB3wcHtZOWD8VyYPntYnT3FVhyaMqQdOLGN5iPJmMCwTGbTmoYr2AWPsvjG1KaldM1oc7c8QgxqcvMwXlst8-BYAb9kfBcMmSWU3eYcJ3mfrDp=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  03&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEgsoISEA2ZFpvislvl2Kx0xzLBmmBl26cZeke3-Qf6E0GUwV5Ym-2oMOlFSGVIczdy90Q1TKywFXXzB3wcHtZOWD8VyYPntYnT3FVhyaMqQdOLGN5iPJmMCwTGbTmoYr2AWPsvjG1KaldM1oc7c8QgxqcvMwXlst8-BYAb9kfBcMmSWU3eYcJ3mfrDp=s16000&quot; title=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  03&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कृष्ण सत्यभामा संवाद में शंखासुर की कथा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सत्यभामा बोली :– हे प्रभु! आप कालस्वरूप हैं, आपके लिए तो सभी कालखंड बराबर हैं, तब कार्तिक ही मासों में कैसे श्रेष्ठ माना गया ।।१।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आखिर सब तिथियों में एकादशी तथा सब मासों में कार्तिक मास आपको प्रिय क्यों है ? हे देवाधिदेव, इसका क्या कारण है सो कहिए ।।२।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्री कृष्णचंद्र बोले :– हे प्रिय! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। इस विषय में मैं महाराज वेणु के पुत्र पृथु का वृतांत कहता हूँ, एकाग्र मन से सुनो ।।३।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्व समय में एक बार नारद जी से यह राजा पृथु ने पूछा था और सर्वज्ञ नारद ने कार्तिक मास की महिमा बतलायी थी ।।४।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारद जी के ने कहा :– पूर्वकाल में त्रैलोक्य को मथ डालने में समर्थ महाबली शंखासुर नामक समुद्र का पुत्र हुआ ।।५।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शंखासुर ने अपने पौरुष से स्वर्गलोक में देवताओं को परास्त कर दिया और इंद्रादिक लोकपालों के अधिकार अपने अधिकार कर लिये ।।६।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शंखासुर से भयभीत होकर सभी देवता अपनी स्त्री और कुटुम्ब के साथ सुमेरु पर्वत की कंदराओं में बहुत काल तक रहे ।।७।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब देवता आनंद से सुमेरु पर्वत की गुफा में रहने लगे तब उस राक्षसों ने सोचा कि यद्यपि मैंने समस्त देवताओं को जीत लिया, फिर भी यह लोग बलवान दिखाई पड़ते हैं, तो अब कौन उपाय करूँ ।।८-९।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हाँ अब मुझे ज्ञात हो गया है कि देवता वेद मंत्रों से बली हो रहे हैं, यदि उन वेदों को ही हर लिया जाए तो वे अपने आप ही निर्बल हो जाएंगे ।।१०।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा सोच शंखासुर भगवान को सोया हुआ देखकर सत्यलोक से वेदों को चुराने गया ।।११।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब वह वेदों का हरण कर रहा था, उसी हमें बीजों के साथ-साथ यज्ञमंत्र उसके डर से जल में छिप गए&amp;nbsp; ।।१२।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब यज्ञमंत्रों को खोजता हुआ शंखासुर समुद्र के भीतर विचरने&amp;nbsp; लगा। किंतु चिरकाल तक खोजने पर भी यज्ञमन्त्रों को एकत्र कहीं नहीं पाया ।।१३।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उधर ब्रह्मा जी पूजा की सब सामग्री तथा उपहार लेकर समस्त देवताओं के साथ बैकुंठ में भगवान विष्णु की शरण में गए ।।१४।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विष्णु जी को जगाने के लिए ब्रह्मा जी गाने-बजाने और धूप गंधादिकों से पूजन करने लगे ।।१५।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मा की आराधना से प्रसन्न होकर भगवान जाग गये, तब उन&amp;nbsp; देवताओं ने हजारों सूर्यों की तरह तेजस्वी भगवान विष्णु के दर्शन किए ।।१६।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनंतर उन्होंने विविध सामग्रि से विष्णु भगवान की पूजा और साष्टांग प्रणाम किया इससे प्रसन्न होकर भगवान बोले ।।१७।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विष्णु भगवान बोले :– मैं आप सज्जनों के कीर्तन और मंगलगान से अति प्रसन्न हूँ। आप लोग अभीष्ट वर मांगिये, मैं दूँगा ।।१८।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस प्रकार शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से हरि प्रबोधिनी एकादशी तक जो प्राणी ब्रह्म मुहूर्त में आप लोगों की भांति कीर्तन तथा मंगलगान करेंगे, वे सभी मेरे परम प्रिय होंगे और सदा ही मेरे समीप निवास करेंगे ।।१९-२०।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो पाद्य, अर्घ्य, और आचमनीय आदि सब सामग्रीयाँ आप लोगों ने मेरे लिए एकत्र कि है, वह सब अगणित गुणवाली होंगी, मुझे आपके क्लेश की बात ज्ञात हो गई है ।।२१।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शंखासुर वेदों को हर कर ले गया है। सभी वेद इस समय समुद्र में हैं। सो मैं दुष्ट शंखासुर को मारकर उन वेदों को शीघ्र ही ले आऊँगा ।।२२।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब से वेद हर वर्ष मंत्र तथा बीजों के साथ कार्तिक में जल में निमग्न रहा करेंगे ।।२३।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं आज से जल में रहूँगा और आप लोग भी सप्तर्षियों सहित मेरे साथ आइये ।।२४।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन दिनों जो प्राणी प्रातः स्नान करेंगे, वे यज्ञानंत में किए स्नान के फल के भागी होंगे ।।२५।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे देवेंद्र ! जो कार्तिक व्रत किया करें, उनको आप मेरे लोक में पहुँचा दिया करें ।।२६।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे देवराज ! आप सदा उन प्राणियों को सब आपत्तियों से बचायें। हे वरुण ! आप उन्हें पुत्र–पौत्रादि संतति देते रहिये ।।२७।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्योंकि कार्तिकव्रती मेरा रूप धारण करके जीते जी मुक्त हो जाता है ।।२८।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जन्म से मरणपर्यंत विधि पूर्वक जिन्होंने यह व्रत को किया है, वह आप लोगों को भी मान्य हैं और मुझे भी परम प्रिय है ।।२९–३०।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विधिपूर्वक करने से ये दोनों व्रत जिस प्रकार प्राणी को मेरे समीप पहुँचते है, वैसे कोई तीर्थ, व्रत और कोई यज्ञ भी नहीं पहुँचा सकता ।।३१।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;।। इस प्रकार श्री पद्मपुराण के अंतर्गत कार्तिक मास माहात्म्य में श्रीकृष्ण–सत्यभामा संवाद में शंखासुर की कथा नामक तीसरा अध्याय सम्पूर्ण ।।३।।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-Mas-Katha-03.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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left;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&amp;nbsp;द्वितीय अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEjV1gufptkV0Pb6qDoHErZ9qElDbbeyklr7Aa5MhWFskmZE_yyt_z7iGsOgg3hScqsz8TphYRHgZBe1lX6rB5aiuyF25ZQhKl10SoGqCnWTJ0nmfyA_O8BkM6-ANlZ2DUR78kICh0zaLeXoYOMvnZZ2yw_8HO6e4lyIfXsO-mron9wsFKjOza1FsQzk=s1280&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  01&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; 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normal;&quot;&gt;गुणवती बोली - हा प्राणनाथ ! हा पिता जी ! आप&amp;nbsp; मुझ को त्यागकर कहाँ चले गये ? अब मैं आप लोगों के बिना असहायिनी हो गयी। हा मैं क्या करूं ? ।।२।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;अब भोजन वस्त्रादिकों से कौन मेरा पालन-पोषण करेगा ?&amp;nbsp; कोई कार्य भी करने की योगयिता भी मुझ में नहीं है।&amp;nbsp; अब कौन स्नेह से मुझ विधवा का पालन करेगा ।।३।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;मैं कहाँ जाऊं ! कहाँ रहूँ ! क्या करूँ !!! हा मैं ऐसी घृणित हो गयी। मुझ पर देव का कोप हुआ है। अब मैं किस तरह जीऊँ ? मैं बड़ी पापनी हूँ ।।४।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;श्री कृष्ण बोले – चील पक्षी की भांति रोती हुई व्याकुल होकर वायु से झकझोरे हुए केले के वृक्ष की भांति पृथ्वी पर गिर गई ।।५–६।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;बहुत देर बाद होश में आयी तो फिर बहुत विलाप कर दुःख से विकल होती हुई शोकसागर में डूब गई ।।७।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;तदनन्तर अपनी घर की अनेक वस्तुओं वस्तुएँ बेचकर उसने बड़ी सावधानी के साथ यथाविधि पिता- पति का श्राद्ध आदि कर्म किया ।।८।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;और भगवान विष्णु की भक्ति में रात होकर वह शुद्ध और शांत भाव से इंद्रियों को वश में करके उसी पुरी में रहने लगी ।।९।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;जन्म से मरण पर्यंत वह एकादशी तथा कार्तिक के व्रत को विधिवत करती रही करती रही ।।१०।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;हे प्रिय ! यह दोनों व्रत भुक्ति– मुक्ति अथवा पुत्र–संपत्ति देने वाले और मुझे अत्यंत किए हैं ।।११।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;जो मनुष्य सूर्य के तुला की संक्रांति में आने पर कार्तिक मास में सवेरे के समय स्नान करता है – यदि बड़े से बड़ा पापी हो तो भी मुक्त होकर पूज्य माने जाते है ।।१२।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;जो लोग कार्तिक में स्नान, जागरण, दीपदान तथा तुलसी के वृक्ष की रक्षा करते हैं, वे विष्णु के सामान पूज्य माने जाते हैं ।।१२।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;जो प्राणी कार्तिक में भगवान विष्णु के मंदिर की सफाई और भगवान का पूजन करते हैं, वे प्राणी जीते ही मुक्त हो जाते हैं ।।१४।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;जो प्राणी कार्तिक ने तीन दिन भी नियम पालन करते हैं, वे देवताओं के भी पूज्य माने जाते हैं। तब भला जिन्होंने जीवन भर व्रत किया है, उनका क्या कहना ।।१५।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;इस तरह गुणवती मन लगाकर प्रतिवर्ष कार्तिक का व्रत और भक्ति पूर्वक विष्णु भगवान की आराधना करती रही ।।१६।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;एक समय की बात है, वह गुणवती रोग के कारण दुबली और ज्वर से पीड़ित थी। इस दशा में धीरे-धीरे गंगा स्नान को गई ।।१७।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;वह जल में स्नान करने को इतनी ठंड से काँपने लगी। और विह्वल अवस्था में ही उसने गगन–मंडल से आते हुए विमान को देखा ।।१८।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;उस पर शंख, चक्र, गदा और पद्म आदि से युक्त तथा विष्णु रूप धारण करने वाले पार्षद विद्यमान, गरुड़ की ध्वजा से युक्त और अप्सरागणों से सुसेवित उस&amp;nbsp; विमान पर गुणवती को चढ़ाकर चँवर डुलाते हुए विष्णु गण उसे बैकुंठ लोक ले आये ।।१९–२०।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;उस विमान में बैठी हुई वह प्रदीप अग्नि के समान लगती थी। इस प्रकार वह कार्तिक व्रत के प्रभाव से मेरे निकट आ गयी ।।२१।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;बहुत समय बाद जब ब्रह्मादि&amp;nbsp; देवताओं की प्रार्थना से मैं इस लोक में आया, तब मेरे साथ मेरे गैन भी आये ।।२२।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;हे भामिनि ! यह सभी यादव मेरे गाण हैं।&amp;nbsp; देवशर्मा विप्र जो उस जन्म में तुम्हारा पिता था सत्यजीत यादव हुआ है ।।२३।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;और उस जन्म के तुम्हारे पति चन्द्रशर्मा अक्रूर हुए हैं । तुम वही दुखिया गुणवती हो। उस जन्म के कार्तिक व्रत के पुण्य से ही मुझ तुम अत्यंत प्यारी हुई हो।।२४।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;उस समय मेरे मंदिर के द्वार पर जो तुमने तुलसी का बगीचा लगाया था, उसी के पूण्य से आज तुम्हारे घर में तुम्हारे घर में कल्पवृक्ष सुशोभित है ।।२५।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;तुमने जो पूर्व जन्म में, कार्तिक मास में दीपदान किया था उसी तुमने जो पूर्व जन्म में कार्तिक मास में दीपदान किया था उसी पुण्य से इस समय तुम्हारी देह में शोभा है और घर में लक्ष्मी का वास है ।।२६।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;उस समय तुमने जो वृतादिक पतिस्वरूप भगवान को अर्पण किए थे, उसके फल से इस जन्म में तुम मेरी भार्या हो ।।२७।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;जन्म से लेकर मरणपर्यंत जो तुमने कार्तिक का व्रत किया था,&amp;nbsp; इसी से कभी भी मेरा तुम्हारा वियोग नहीं होगा ।।२८।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;इस तरह जो मनुष्य नियम से कार्तिक मास–भर व्रत करेंगें, वे सब मेरे ही पास रहेंगे और तुम्हारे समान प्रिय होंगें ।।२९।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;नाना प्रकार के यज्ञ, दान, व्रत, कथा तथा तप करने वाले प्राणी को जो फल प्राप्त होता है, वह कार्तिक व्रत का षोडशांश भी नहीं होता ।।३०।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;अपने पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से का वृतांत सुनकर सत्यभामा बहुत प्रसन्न हुईं और&amp;nbsp; संसार के आदि कारणस्वरूप भगवान श्री कृष्ण को प्रणाम करके बोली ।।३१।।&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: normal;&quot;&gt;।। इस प्रकार श्रीपद्मपुरण के अंतर्गत&amp;nbsp; कार्तिक मास माहात्म्य में श्रीकृष्ण जी द्वारा सत्यभामा को उनके पूर्वजन्म का चरित्र सुनाना नमक द्वितिय अध्याय सामाप्त ।।२।।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/h2&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-Mas-Katha-02.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEjV1gufptkV0Pb6qDoHErZ9qElDbbeyklr7Aa5MhWFskmZE_yyt_z7iGsOgg3hScqsz8TphYRHgZBe1lX6rB5aiuyF25ZQhKl10SoGqCnWTJ0nmfyA_O8BkM6-ANlZ2DUR78kICh0zaLeXoYOMvnZZ2yw_8HO6e4lyIfXsO-mron9wsFKjOza1FsQzk=s72-c" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-4729324052767296174</guid><pubDate>Wed, 22 Dec 2021 15:41:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-11-23T11:58:10.353+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग  28</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 28&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;अट्ठाइसवां अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मदत्त ने पूछा -हे देवराज! जय और विजय ने अपने पूर्व जन्म में ऐसा कौनसा पुण्य किया ,जिससे&amp;nbsp; भगवान विष्णु का रूप धारण करके वह उनके द्वारपाल हुए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राचीन काल में वृणबिन्दु की पुत्री देवहुती से कर्दम ऋषि द्वारा केवल देखने मात्र से ही दो सुन्दर बालक उत्पन्न हुये। उनमे से बडे़ का नाम जय और छोटे का नाम अजय हुआ। बाद में देवहुती के गर्भ से कपिल देव जी भी हुए। जय और विजय दोनों विष्णु के बड़े भक्त और धर्मात्मा थे। दोनों ही नित्यप्रति अष्टाक्षर मंत्र का जाप करते थे और विष्णु जी का व्रत करते थे। भगवान उन दोनों भाइयों पर अत्यंत प्रसन्न थे और नित्य पूजा के समय इनको दर्शन दिया करते थे। एक समय राजा के निमंत्रण पर देवर्षि नारद जी गणों सहित राजा के यज्ञ में पधारे। उस यज्ञ में जय ने ब्रम्हा और अजय ने पुरोहित बन कर यज्ञ को सम्पूर्ण करवाया ।यज्ञ की विधिपूर्वक सम्पाप्ति हुई। मारूत राजा ने जय और अजय को बहुत सा धन दिया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह दोनों भाई दक्षिणा लेकर अपने आश्रम में आये। धन का बँटवारा करते समय दोनों भाइयों का आपस में झगड़ा हो गया। जय ने अजय से कहा कि धन के बराबर बराबर भाग होने चाहिए। अजय ने कहा कि जितना धन जिसको मिला है, उतना धन उसका ही है। तब जय ने क्रोध में आकर अजय को शाप दिया कि &quot;तुम धन लेकर नहीं देना चाहते हो इसलिए तुम ग्राह हो जाओ&quot;।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अजय ने जय का दिया शाप स्वीकार कर लिया ओर जय को शाप दिया कि -&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&#39;तू अभिमानी है इसलिए हाथी हो जा &#39;।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब नियमपूर्वक दोनों की पूजा के समय जब भगवान से श्राम मोचन का उपाय पूछा, दोनों ने प्रभु से कहा -हे देव! हम दोनों आपके भक्त हैं। मगर हम तो हाथी की योनि मे कैसे होंगे? हे कृपासागर! श्राप से हमारा उद्धार कीजिये। भगवान विष्णु ने कहा -मेरे भक्त की वाणी कभी असत्य नहीं हो सकती ।यमराज भी इसको अन्यथा नहीं कर सकते। पूर्वकाल में मुझे भक्तराज प्रहलाद के कहने पर स्तम्भ से प्रकट होना पड़ा था और राजा अम्बरीष के कहने पर दस अवतार लेने पड़े थे ।अतः तुम दोनों अपने श्रापों को भोग मेरे लोक को जाओगे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इतना कहकर विष्णु जी अन्तध्रयान हो गए फिर वह गंडकी नदी के किनारे मगर और हाथी हुए, जाति का स्मरण रहने के कारण इस योनि मे भी भगवान विष्णु का व्रत नियम से किया करते थे। एक दिन कार्तिक की पूर्णमासी को वह हाथी स्नान करने को गण्डकी नदी में गया तब पिछले जन्म का श्राप स्मरण करके मगर ने हाथी को पकड़ लिया। तो हाथी ने भी गाया विष्णु जी का स्मरण किया ।फिर क्या था तुरंत ही शंक, चक्र, गदा, पद्मधारी भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा उन दोनों को अपने जैसा रूप देकर उन्हें बैकुण्ठ में ले गए। उसी दिन से उस स्थान का नाम हरिक्षेत्र प्रसिद्ध है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चक्र के आघात से वहाँ के पत्थरों में भी चिन्ह बने हुए हैं। वह दोनों जय और अजय के नाम से संसार में आज तक प्रसिद्ध है। हे-प्रिय आपने विष्णु जी के द्वारपालों के सम्बन्ध में जो प्रश्न किया था उनका विस्तृत उत्तर मैने दे दिया है इसलिए हे द्विज! तुम भी ईष्या और द्वेष को त्याग कर नित्य भगवान विष्णु का व्रत करो। जगत् के प्रत्येक जीवन को समदृष्टि से देखो, तुला, मकर और मेष का संक्रांति में शामिल नित्य प्रात: स्नान किया करो, तुलसी वन की रक्षा करो, गौ ब्राह्मण, वैष्णवों की सेवा के लिए हमेशा तैयार रहो ।व्रत करने वालों को मसूर दाल और बैंगन के साग को कदापि प्रयोग न करना चाहिए। हे धर्मदत्त! ऐसा करने पर तुम शरीर त्याग कर हम लोगों के समान गति पाओगे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाले इस व्रत के समान फल देने वाला देने वाला तीर्थ, दान और यज्ञ दूसरा और कोई नहीं है। हे विप्र! तुम धन्य हो। क्योंकि तुमने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला व्रत किया है, जिसका आधा फल तुमने कलहा को दिया है उसके बाद हम कलहा को बैकुंठ में ले जा रहे हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब नारदजी ने कहा -हे राजन! इस प्रकार धर्मदत्त को विष्णु भक्ति का उपदेश देकर कलहा को साथ लेकर विष्णु के पार्षद बैकुंठ को चले गए और धर्मदत्त&amp;nbsp; भी उनके आदेशानुसार विष्णु के व्रत में तल्लीन हो गया ।जब उसका देहान्त हुआ तो अपनी स्त्रियों के साथ विष्णु लोक को गया। हे राजन! जो कोई भी प्राचीनकाल के इस इतिहास को सुनता हैं सुनाता हैं वह अन्त में विष्णु लोक को प्राप्त होता हैं।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-27_0998642394.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-1569366595951478334</guid><pubDate>Wed, 22 Dec 2021 15:40:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-11-23T11:58:06.189+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग  25</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 25&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;पच्चीसवां अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तीर्थ व्रत और दान आदि के करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं मगर प्रेत योनि में रहने वाले को इसका अधिकार नहीं है। तुम्हारे दुःख को देखकर मैं अत्यन्त दुःखी हूँ और तुम्हारा दुःख दूर किये बिना मुझे सन्तोष नहीं होता, तुम्हारे पाप बड़े भारी है क्योंकि यह तीनों योनियाँ बहुत बड़े पाप करने वाले को ही प्राप्त होती है और प्रेत योनि तो थोड़े पुण्य से नष्ट भी नहीं हो सकती है। लेकिन मैं तुम्हें इस योनि से अवश्य छूडाउंगा इसलिए मैने जो&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कार्तिक का व्रत किया है उसका आधा पुण्य तुम्हें देता हूँ क्योंकि यज्ञ, दान, त़ीर्थ से सब निश्चय ही कार्तिक के व्रत के पुण्य के समान नहीं है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवर्षि नारद बोले -हे राजन! धर्मदत्त ने उसको &quot;&quot;ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय:&quot;&quot;यह&amp;nbsp; द्वादषाक्षर मंत्र सुनाया और तुलसी का जल उसके उपर छोडा़। बस फिर क्या था क्षण भर में वह प्रेत योनि से छूटकर प्रज्वलित शिखा के समान दिव्य रूप धारण कर लक्ष्मी के समान सुन्दर हो गई तब वह धर्मदत्त को दंडवत करके प्रसन्नता से गदगद होकर बोली -&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;हे -ब्राम्हण आपके आशीर्वाद से मैं इसघोर नरक से छूट गई हूं। मुझे पाप सागर में डूबती हुई के लिए आप नौका के समान हैं। नारदजी ने कहा -हे राजन! अभी कलहा इसी प्रकार कह ही रही थी की वहाँ पर विष्णु गण एक देदीप्यमान विमान लेकर वहाँ आये, विमान के द्वार पर अप्सराये और गण बैठे हुए थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मदत्त ने उनको देखकर प्रणाम किया।पुण्यशील और सुशील नामक भगवान विष्णु के गणों ने धर्मदत्त को अपने हाथों से उपर उठा कर उसका अभिनंदन करके कहा -हे द्विजश्रैष्ठ! आप धन्य है जो सदा भगवान विष्णु के व्रत, कथा और सेवा में लगे रहते हो। आपने जो अपने बाल्यकाल में पवित्र और शुभ कार्तिक व्रत किया था उसके आधे फल से कलहा के पूर्व जन्म के एकत्रित पाप नष्ट कर दिये हैं ,यही नहीं आपकी कृपा से उसके सैकड़ों जन्म के पाप नष्ट हो गये हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपके जागरण आदि करने से पुण्य प्रभाव से आकाश मण्डल से यह विमान आया है। हे-ब्राम्हण! अब हम इसे भांति भांति के भोगों से युक्त बैकुंठ में ले जा रहे हैं आपके दान -पुण्य के प्रभाव से यह भगवान विष्णु के पास रहेगी। आप भी इस जन्म के बाद अपनी दोनों स्त्रियों सहित बैकुंठ में विष्णु जी के पास रहोगे और मुक्ति प्राप्त करोगे। हे-दयासागर! वह मनुष्य धन्य है और जन्म उन्हीं का फलीभूत है जिन्होंने तुम्हारी तरह विष्णु जी की भक्ति की है,क्योंकि भगवान विष्णु भला अपने भक्तो को क्या नहीं देते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिन्होंने प्राचीन काल में उत्तानपाद के पुत्र को ध्रुव पर पहुँचाया जिसके सुमिरन से प्राणियों की मुक्ति हो जाती हैं। प्राचीनकाल में विष्णु जी केवल अपने नाम के स्मरण से ही आप द्वारा पकड़े हुए हाथी को हस्ति योनि से मुक्त करके जय नाम देकर अपना पार्षद बना लिया, तमने उसी विष्णु की सेवा की है। इसलिए तुम अपनी दोनों स्त्रियों सहित एकहजार वर्ष तक भगवान विष्णु के पास निवास करोगे। जब तुम्हारा पुण्य क्षीण हो जायेगा तब तुम सुर्यवंश में अपनी दोनों रानियों के साथ राजा दशरथ के नाम से प्रसिद्ध होगे। तथा यह कलहा तुम्हारे आधे पुण्य की भागीदारी होने के कारण तुम्हारी तीसरी भार्या होगी व भगवान विष्णु पुत्र के रूप में तुम्हारे पास रहेंगे और देवताओं का कार्य करेंगे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विष्णु जी को प्रसन्न करने वाले तुम्हारे कार्तिक व्रत से अधिक यहाँ दान तीर्थ आदि और कोई भी नहीं है। हे-दयासागर! तुम धन्य हो क्योंकि तुमने जगत गुरू भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिये कार्तिक मास का व्रत किया है जिसके आधे पुण्य से फल की भागीदार कलहा हैं इस समय हम इसे अपने साथ विष्णु लोक में ले जा रहे हैं&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-25.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.5674001179127934 43.80663 48.754768117912789 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-2966158452305450926</guid><pubDate>Wed, 22 Dec 2021 15:40:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-11-23T11:58:01.563+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग  27</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 27&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;सत्ताईसवां अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गणों ने कहा -विष्णुदास एक दिन भोजन तैयार करके भक्ति में तल्लीन था कि कोई उसका भोजन चुरा ले गया। लेकिन सायंकाल की आराधना हो सके और व्रत भंग न हो, इसलिए उसने उस दिन दोबारा भोजन तैयार नहीं किया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;श्रीनारदजी ने कहा -हे राजन! इस तरह लगातार सात दिन तक कोई दूसरा भोजन चुराता रहा तब वह हैरान होकर सोचने लगा कि यह तो बड़ी विचित्र घटना है कि न जाने कौन हर रोज मेरै भोजन को चुरा कर ले जाता है? फिर भी इस देवस्थान को छोड़ना नहीं चाहिए। अगर मैं भोजन बना कर खां लेता हूँ तो देर हो जाएगी। अतः मुझे भोजन बना कर तुरंत खाना नही चाहिये। बिना भगवान को भोग लगाने के वैष्णवों को भोजन नहीं करना चाहिए। अगर सात दिन ओर बिन भोजन बीत गए तो आज का दिन और सही। आज मैं भलिभांति भोजन की रक्षा करूंगा और देखूंगा कि हर रोज इसे कौन चुरा कर ले जाता है? ऐसा सोच विष्णुदास भोजन तैयार करके भोजन के पास ही छिपकर बैठ गया। उसने थोड़ी देर के बाद देखा कि वहाँ पर एक चाण्डाल आया जिसका शरीर बहुत दुर्बल था। उसके शरीर पर केवल चमडी़ ही चमडी़ दिखाई देती थी। जब वह चाण्डाल भोजन चुरा कर चल दिया तो विष्णूदास ने उसे पुकारा -हे भाई! यह रूखा भोजन ले जाकर क्या करोगे, घी तो लेते जाओ।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा कहकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण आगे को बढा़। विष्णुदास को अपनी ओर&amp;nbsp; आता देखकर वह चाण्डाल तेजी से दौड़ने लगा। वह ब्राम्हण से डर गया, लेकिन दुर्बलता के कारण तो दौड़ तो न सकता था। अतः वह भूमि पर गिर पड़ा और मूर्छित हो गया। चाण्डाल को&amp;nbsp; मूर्छित देखकर विष्णुदास लपक कर उसके पास पहुँचा और अपने वस्त्र से उस पर हवा करने लगा और इसके बाद उसने जो कुछ देखा, उसे देखकर वह आश्चर्य चकित रह गया। उसने देखा कि उसके सम्मुख शंख, चक्र, गदा, पद्म, पीताम्बरधारी चतुर्भुजी रूप, अलसी के फूल के समान कांति वाले छाति में कौस्तुभ माला से सुशोभित साक्षात् श्री भगवान विष्णु खडे़ हैं। भगवान का दर्शन करके सात्विक भाव से मुक्त वह श्रेष्ठ ब्राह्मण उनकी स्तुति तथा प्रणाम कुछ न कर सका। वहीं पर सब इन्द्र आदि देवता भी उपस्थित हो गए और गंधर्व तथा अप्सरायें आकर गीत गान करने लगी तथा नृत्य करने लगी। ब्राम्हण उन्हें प्रणाम करने के लिए उतावला हुआ। त्यों ही वहाँ सम्पूर्ण देव, गंधर्व और अप्सराये आ गयी। विष्णु भगवान ने अपना स्वरूप ब्राह्मण को प्रकट कर उसका आलिंगन किया और दिव्य विमान में ब्रा्ह्माण को विष्णु के साथ जाते हुए चोल राजा ने भी देखा। उसने अपने गुरू आचार्य मुदगल को कहा कि मैनैं जो यज्ञादि किये हैं, वे सब व्यर्थ हुए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जितनी दान -दक्षिणा मैंने ब्राह्मण को दी, वह असफल हुए ।विष्णु भगवान के दर्शन नहीं हुए। ब्राह्मण ने केवल श्रद्धा से भक्ति की। उसके प्रभाव से विष्णु भगवान ने आकर उसको दर्शन दिये। इसलिए भक्ति ही सर्वोपरि है। मुझे भगवान के दर्शन के लिए राजकाज त्याग कर भक्ति करनी चाहिए। राजा के कोई पुत्र न होने के कारण अपने भानजे को राजगद्दी का अधिकारी बना दिया और आप विष्णु भगवान की भक्ति करने लगा। बहुत काल तक भक्ति करने के बाद भी विष्णु ने दर्शन नहीं दिये तो वह अग्नि कुंड में कूद पडा़। अग्नि में प्रकट होकर विष्णु भगवान ने राजा को गोदी मेंउठा&amp;nbsp; लिया और कहा कि मैं तेरे&amp;nbsp; त्याग और भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं। उसका आलिंगन कर उसको दिव्य विमान में अपने साथ बिठाकर बैकुंठ ले गए। विष्णु जी ने अपने समान रूप वाले ब्राह्मण को पूण्यशील और राजा चोल को सुशील नाम देकर दोनों को अपना द्वारपाल बनाया।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-27.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-4596662484887650021</guid><pubDate>Wed, 22 Dec 2021 15:38:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-11-23T11:57:57.033+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग  26</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 26&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;छब्बीसवां अध्याय&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवगणों के वचन सुनकर धर्मदत्त ने कहा सब मनुष्य भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए विधिवत् आराधना ,यज्ञ, दान, व्रत तीर्थ तथा तप आदि करते हैं, किन्तु ऐसा कोई सरल उपाय बताओ जिसके करने से इन सबका फल प्राप्त हो। तब गणों ने कहा हे-द्विजश्रेष्ठ! आपका प्रश्न बड़ा श्रेष्ठ है। हम आपको भगवान विष्णु को शीघ्र प्रसन्न करने का उपाय बताते है। हम इतिहास सहित प्राचीन वृतांत सुनाते है सावधानी से सुनो।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राचीन काल में कागचीपचर में चोल नामक चक्रवती राजा राज्य करता था। उसी के नाम से उसके देश का नाम भी चोल नामक चक्रवती राजा राज्य करता था। उसी के नाम से उसके देश का नाम भी चोल देश ही प्रसिद्ध था। राजा चोल के राज्य में कोई भी प्राणी दरिद्र, दुखी, पापी व रोगी न था। यह सब राजा के यज्ञ करने का प्रभाव था। ताम्रपर्णी नदी के दोनों किनारों पर सोने के यज्ञ स्तम्भ सुशोभित थे। हे-द्विजवर !एक दिन वह राजा भगवान विष्णु के पास गया ,भगवान उस समय शेष शय्या पर योगनिद्रा वश सो रहे थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा ने उनकी मणियों, मोतियों और स्वर्ण के दिव्य फलों -फुलों द्वारा पूजा की। वह साष्टांग प्रणाम करके भगवान के चरणों में बैठ गया ।थोड़ी देर के बाद राजा ने अपनी नगरी कांचीपुरी के ब्रहाम्ण विष्णुदास को वहाँ आते हुए देखा। विष्णुदास भगवान की पूजा के लिए तुलसी दल और जल लिए था। विष्णुदास ने वहां आकर भगवान को विष्णु सुक्त मंत्रों द्वारा स्नान करवाकर मञ्ञजरी तथा दलों से उनका विधिपूर्वक पूजन किया। विष्णुदास के चढा़ये हुए दलों से राजा के चढा़ये हुए मणि मोति व स्वर्ण के फूल ढ़क गए राजा यह देखकर क्रोध में भरकर बोला -&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ढोंगी मूर्ख! तूने मेरी चढ़ाई मणियों मोतियों व सोने के फूलो को तुलसी दल व अपने सारे फूलों से ढ़क दिया है तू भला भक्ति करना क्या जाने? क्योंकि तूने मेरे लिए विचित्र श्रृंगार को बिगाड़ दिया है। राजा की बात सुनकर विष्णुदास को भी क्रोध चढ़ आया और वह राजा के गौरव को तुच्छ समझकर कहने लगा -हे राजन! तुम भक्ति करना नहीं जानते, तुमको अपने धन का घमण्ड है। बताओ आज से पहले तुमने भगवान के कितने व्रत किये हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवगण ने कहा -ब्राह्मण के ऐसे वचन सुनकर राजा ने घमण्ड से हँसकर कहा -हे विप्र! भगवान की भक्ति के अभिमान से यदि तू ऐसी बात कह रहा हूँ तेरे जैसे भीखमंगे ब्राम्हण में भगवान की भक्ति ही कितनी है? क्योंकि तुमने आज तक भगवान की प्रसन्नता के लिए कुछ भी नहीं किया न तो कोई मन्दिर ही बनवाया हैं ,तुम भला इस प्रकार की भक्ति का जैसी कि तुम कर रहे हो, क्या गर्व कर सकते हो? यहाँ जितने भी ब्राम्हण बैठे हैं, मेरी बात को ध्यान पूर्वक सुने और देखे कि भगवान विष्णु के दर्शन मुझे होते हैं या कि उसे इसके बाद दोनों की भक्ति के सम्बन्ध में आप लोग जान लेंगे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवगणों ने कहा कि ऐसा कहकर राजा अपने महल में चला गया और वहाँ जाकर उसने पुरोहित मुद्गल को आचार्य बनाकर विष्णु यज्ञ आरम्भ किया। उसने उस यज्ञ में अनेक ऋषि महर्षियों को बुलाया। उनको बहुत सा अनाज और नकदी आदि दक्षिणा दी। उधर विष्णुदास भी अपने मन्दिर में ही रहकर भगवान की प्रसन्नता के लिए व्रत करने लगा। उसने माघ तथा कार्तिक मास के व्रत किये। तुलसी के वन का और एकादशी को भगवान विष्णु के द्वादश अक्षर मंत्र का जाप किया। वह भगवान को प्रसन्न करने के लिए गीत गाता रहा व नृत्य करता रहा। नित्य प्रति व्रत करता था। भूमि पर सोता हर समय भगवान को प्रसन्न करने के लिए माघ तथा कार्तिक के व्रत किये और उन व्रतों के नियमों का पालन भी किया। और इस प्रकार राजा चोल और विष्णुदास द्वारा आराधना करते हुए बहुत दिन बीत गए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-26.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-8354506733811354439</guid><pubDate>Wed, 22 Dec 2021 03:40:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-11-23T11:57:51.107+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग  24</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 24&lt;/h1&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;चौबीसवाँ अध्याय&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;राजा पृथु ने कहा -हे नारदजी! आपने तुलसी के इतिहास व्रत महात्म्य के बारे में कहा, अब यह बताने की कृपा करे कि कार्तिक मास में और भी देवताओं का पूजन होता है? यह भी मुझे समझा कर कहिये।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारदजी ने कहा-पहले समय में पर्वत के निकट करतीपुर में एक धर्मात्मा धर्मदत्त नामक ब्राह्मण रहता था। वह भगवान विष्णु के सब व्रत करता था एक दिन कार्तिक मास में वह एक पहर रात शेष रहने पर जागरण के लिए भगवान विष्णु के मंदिर में हर प्रकार की सामग्री लेकर जा रहा था कि मार्ग में उसने एक बड़ी भयंकर राक्षसी को देखा जिसके बडे़ बडे़ दांत,लपकती हुई जीभ और लाल-लाल नेत्र थे। उनका शरीर नंगा और मांसरहित था ।उस भयंकर राक्षसी को देख कर धर्मदत्त बुरी तरह से काँपने लगा। कुछ उपाय देखकर उसने पूजा वाली थाली और जल का लौटा उसके उपर फेंक दिया। क्योंकि उसने भगवद् नाम का जप करते हुए वह सामग्री और जल का लौटा जिसमें तुलसी दल पडा़ था उसके मारा था जिससे उसके जन्मजन्मांतर के पाप नष्ट हो गये और पूर्व जन्म याद आ गया।वह हाथ जोड़कर धर्मदत्त के चरणों में गिर पड़ी और बोली -हे विप्र! मैं पूर्व जन्म के कर्मो के फल से इस अवस्था को प्राप्त हुई हूँ।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;नारदजी ने कहा -हे राजन! उसे इस प्रकार देखकर अति विस्मित होकर धर्मदत्त ने पूछा -तेरी यह अवस्था किस कर्म के फल से हुई हैं? तू पूर्व में जन्म में कहाँ रहती थी और तेरा कैसा चरित्र था, यह सब मुझे बतां।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उस राक्षसी ने जिसका नाम कलहा था कहा कि हे ब्रह्माण! सौराष्ट्र में भिक्षुक नाम का का एक ब्राम्हण रहता था। मैं उसकी पत्नी थी, मेरा स्वभाव बड़ा ही निष्ठुर था। मैंनै अपने पति का कभी भला नहीं चाहा, न उसे कभी अच्छा भोजन और न मिठाई ही खाने को दी। मैं प्रति दिन उससे लड़ती -झगड़ती रहती थी। मुझे इस प्रकार की झगड़ालू देख तथा नित्य प्रति की कलह से तंग आकर मेरे पति ने दूसरा विवाह करने का निश्चय किया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सुनकर कि मेंरा पति दूसरा व्याह कर रहा है मैने उसके ब्याह से पहले ही जहर खां आत्महत्या कर ली। मेरी मृत्यु के बाद यमदूत आये और मुझे गदा से मारते हुए यम के पास ले गए। यमराज ने मुझे देखकर चित्रगुप्त से पूछा-हे-चित्रगुप्त! इसने क्या कर्म किया है? जो भी कर्म इसने किया है उसका फल इसे भोगना होगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कलहा ने कहा -हे ब्राह्मण! चित्रगुप्त ने यमराज से कहा-इसने अपने जीवन में कोई भी अच्छा काम नहीं किया है। यह अपने पति को सदा खराब भोजन देकर आप अच्छा भोजन खाती रही हैं, इसलिए अब यह विष्ठा खाने वाली होगी, इसे अब सुअरी का जन्म दिया जाये। चूँकि यह अकेली ही पाक के बर्तन में भोजन करती थी, इसलिए यह अपने बच्चो को खाने वाली बिल्ली होगी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसने अपने पति पर क्रोध करके आत्माघात किया है, इसलिए यह प्रेत योनि में जायेगी। अब आप इसको अपने दूतों द्वारा मरू -स्थान में भेज दीजिए, वहाँ पर यह बहुत दिनों तक प्रेत योनि में रहकर फिर यह पापिन अपने तीनों योनियों को भोगे। सो हे -ब्राम्हण! मैं 5 वर्ष से प्रेत योनि मे हूं और भूख -प्यास के कारण नित्य दुःखी रहती थी। एक दिन भूख से तंग आकर मैं एक एक वैश्य के शरीर में प्रविष्ट हो गई। उसके शरीर द्वारा मैं कृष्णा और बेणि के संगम पर इस देश में आ पहुँची।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक दिन भगवान शंकर व विष्णु जी ने मुझे बलात् उसके शरीर से बाहर निकाल दिया। फिर मुझे आप दिखाई दिये। आपके लोटे में से तुलसी जल का छींटा मेरे उपर पडा़, जिससे मेरे सब पाप नष्ट हो गये। हे-द्विजोत्म! अब आप मुझे यह बताइए की आगे होने वाली तीनों योनियों और इस प्रेत शरीर&amp;nbsp; से किस तरह मेरी मुक्ति होगी। धर्मदत्त ने कलहा की बात सुनकर उसके पीछले कर्मो और वर्तमान अवस्था को देखकर बडा़ दुखी हुआ। उसका दुःख देखकर उसका चित्त पिघल गया फिर उसने दुखित भाव से कहा।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-_0671111749.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-2523438768472257836</guid><pubDate>Wed, 22 Dec 2021 03:38:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-11-23T11:57:46.478+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग  23</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 23&lt;/h1&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;तैईसवां अध्याय&lt;/div&gt;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नारदजी ने कहा -हे राजन! इसी कारण से उद्धापन में तुलसी की जड़ में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। तुलसी का मूल प्रदेश भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला है। हे-राजन!तुलसी का पौधा जिस घर में वर्तमान है वह घर तीर्थ स्वरूप है और उस घर में यमदूत कभी नहीं आते हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह पौधा सब पापों का नाश करने वाला अभिष्ट फल को देनेवाला है वह यमराज को नहीं देखता, भगवान नंदी का दर्शन गङ्गा स्नान व तुलसी के पौधे का संसर्ग, यह तीनों एक पुण्यप्रद है। तूलसी के छूने से कामिक,वाचिक ,मानसिक आदि सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं ।जो प्राणी तुलसी के दल से भगवान का पूजन करते हैं वह पूनः गर्भ में नहीं जाते और निसन्देह जीवन मुक्त हो जाते हैं, तुलसी के दल में पुष्कर आदि समस्त तीर्थ गंङ्गा आदि नदियाँ और विष्णु प्रभृति सब देवता निवास करते है तुलसी के पौधे के पास जो अपना प्राण विसर्जन करते है वह चाहे कितना बडा़ पापी क्यों न हो उसे यमराज नहीं देख सकते ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे-राजन! जो लोग तुलसी के काष्ठ का चंदन लगाते हैं वह सहज में मोक्ष को प्राप्त होते हैं उनके द्वारा किये गये पाप उनके शरीर को स्पर्श नहीं कर पाते हैं। हे-राजन! जहाँ तुलसी के वन की छाया हो वहाँ पर पितरों का श्राद्द करना चाहिए, वहाँ पर पितरो के निमित्त दिया हुआ दान हमेशा के लिए अक्षय होता है ।आँवले को धारण करते है, उनको विष्णु रूप जानना चाहिए&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आँवले के फल और तुलसी के दलों को पानी में मिलाकर, जो प्राणी स्नान करते हैं उनको गङ्गा स्नान का फल मिलता हैं जो मनुष्य आँवले के पत्तो और फलों से देवताओं का पूजन करते हैं उन्हें स्वर्ण मणि और मोतियों द्वारा पूजन का फल प्राप्त होता&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;है। कार्तिक मास में सब तीर्थ, ऋषि, देवता और सब यज्ञ जब सूर्य तुला राशि में होता है, आंवले के वृक्ष में वास करते है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो मनुष्य द्वादशी तिथि को तुलसी दल और कार्तिक में आँवले की छाया मैं बैठकर भोजन करता है उसके अन्त संसर्ग में सब दोष नष्ट हो जाते हैं। कार्तिक में जो आँवले की जड़ में विष्णु जी का पूजन करता है उसे श्री विष्णु क्षेत्रों व पूजन का फल प्राप्त होता है। आँवले तथा तुलसी जी की जन्म कथा सुनने से मनुष्य अपने वंश सहित मुक्ति को पाता है।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-_01615529361.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-3576398988463017374</guid><pubDate>Wed, 22 Dec 2021 03:37:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-11-23T11:57:35.112+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग  22</title><description>&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 22&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;बाईसवां अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा पृथु ने कहा हे नारदजी! आप कृपा करके मुझको यह बतलाइए कि वृन्दा को मोहित करके विषय जीने क्या किया औ फिर वह कहा गये?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; जब देवता स्तुति करके मौन हो गए तो भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर देवताओं से कहा -हे भगवान ब्रम्हा आदि देवताओं जलन्धर तो मेरा ही अंश था मैनें उसे तुम्हारे लिए नहीं मारा यह मेरी सांसारिक लीला थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;फिर भी आप लोग सत्य कहिये कि इस से आप सुखी हुये या नहीं? तब ब्रह्मादि देवताओं के नेत्र हर्ष से खुल गए उन्होंने शिवजी को प्रणाम करके विष्णु जी से सब वृतांत कह सुनाया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो उन्होंने बडे़ प्रयत्न से वृन्दा को मोहित किया तथा वह अग्नि में प्रवेश करके परमगति को प्राप्त हुई। देवताओं ने यह कहा कि तभी से वृन्दा की सुंदरता पर मोहित हुए विष्णु जी उनकी चिता की राख लपेटे हुए इधर उधर घूमते हैं अतः आप उन्हें समझाइये क्योंकि यह प्राकृतिक चराचर आपके आधीन है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;देवताओं से यह सब सुनकर शंकर जी ने उन्हें अपनी दुस्तर माया समझाई और कहा यह सारा जगत् उसी के आधीन है उसी से मोहित विष्णु भी काम के वश हो गए हैं। परंतु महादेवी उमा त्रिदेवी की जननी सबसे परे वह मूल प्रकृति परम मनोहर और वही गिरिजा भी कहलाती है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विष्णु जी का मोह दूर करने के लिए आप सब उनकी शरण में जाइये यदि वह प्रसन्न करने चले, उनके पास पहुँच कर उनकी बडी़ स्तुति की तब आकाश वाणी हुई। हे देवताओं! मैं तीन प्रकार से तीनों गुणों से पृथक होकर स्थित होती हूं। सतगुण से गौरी, रजोगुण से ज्योति रूप हूं तथा आप लोग मेरी रक्षा से यदि सादर उन देवियों के पास जाओं तो वह तुम्हारे मनोरथों को पुरा कर देगी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सुनकर देवताओं के नेत्र खुल गए वह भगवती का आदर करते हुए गौरी, सरस्वती और लक्ष्मी को प्रणाम करने लगे। सब देवताओं की भक्तिपूर्वक प्रार्थना से वह सब देवियां प्रकट हो गई।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सभी देवताओं ने खुश होकर निवेदन किया तब देवियों ने कुछ बीज देकर कहा -इन्हें ले जाकर दे दो तुम्हारे सब काम सिद्ध हो जाएंगे। ब्रह्मादि देवता उन बीजों को लेकर विष्णु जी के पास गये, वृन्दा की चिता भुमि में डाल दिया जिससे धात्री, मालती एवं तुलसी प्रकट हुई। विष्णु जी ने ज्योंही उन स्री रुप वाली वन्सपतियों को देखा तो वे उठ बेठे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कामासक्त चित से मोहित हो उनसे याचना करने लगे। धात्री व तुलसी ने उनसे प्रीती की, तो विष्णु सारा दुःख भुलकर देवताओं से नमस्कृत हो अपने लोक को चले गए। वह पूर्ववत सुखी हो शंकर जी का स्मरण करने लगे। यह &lt;b&gt;आख्यान शिवजी की भक्ति देने वाला है।&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-22.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-54.4279046549826 -61.66212 90 -140.41212000000002</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-8692797422050248116</guid><pubDate>Wed, 22 Dec 2021 03:35:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-11-23T11:57:30.518+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग  21</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 21&lt;/h1&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;इक्कीसवाँ अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब ब्रह्मा आदि देवताओं ने नतमस्तक होकर शंकर जी की बड़ी स्तुति की और कहा-हे प्रभु! आप प्रकृति से परे पारब्रह्मा ओर परमेश्वर है, आप निर्गुण, निर्विकार व सबके ईश्वर होकर भी नित्य अनेक प्रकार के कर्मो को करते हैं। हे-शंकरजी हम सब ब्रह्मा आदि सब देवता आपके दास है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे-देवेश, हे-शिवजी! आप प्रसन्न होकर हमारी रक्षा कीजिये। हे नाथ! हम आपकी प्रजा हैं तथा सदा आपकी शरण में रहते हैं। राजा पृथु ने नारदजी से कहा -जब इस प्रकार ब्रह्मा आदि सब देवताओं को वर देकर शिवजी वही पर अंतर्ध्यान हो गये।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पश्चात शिवजी का यश गाते हुए सब देवता प्रसन्न होकर अपने अपने स्थान को चले गए। महेशाख्यान से जलन्धर का यह चरित्र बडा़ पुण्यप्रद और सब पापों का नाश करने वाला है। यह सब सुखदायक ओर महेश को भी आनन्ददायक है जो &lt;b&gt;इन दोनों व्याखानों पढे़गा और सुनेगा वह सुखों को भोगकर अंत में अमर पद को पायेगा।&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-6290341634902830182</guid><pubDate>Wed, 22 Dec 2021 03:34:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-11-23T11:57:14.656+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग  20</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास महात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 20&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;बीसवाँ अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब राजा पृथु ने पूछा हे -देवर्षि! इसके पश्चात युद्ध में क्या हुआ। तथा वह दैत्य कैसे मारा गया कृपा करके उस कथा को मुझसे कहो?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;नारदजी ने कहा कि जब गिरिजा वहाँ से अदृश्य हो गई और गन्धर्वी माया भी विलीन हो गई तब भगवान वृषध्वज चैतन्य हो गये, उन्होंने लौकिकता व्यक्त करते हुये बडा़ क्रोध किया फिर भगवान शंकर जलन्धर से युद्ध करने लगे। जलन्धर शंकर के बाणों को काटने लगा परन्तु जब काट न सका तो उसने माया की पार्वती बना कर अपने रथ से बांध ली जो विलाप कर रही थी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब अपनी प्रिय पार्वती को इस तरह कष्ट में पडा़ देख के लौकिक लीला दिखाते हुये शंकर जी संसारिक जनों की तरह व्याकुल हो गए और उन्होंने अग्नि पुंज की तरह भयंकर रौद्ररूप धारण किया। उनके रौद्ररूप को देखकर कोई भी दैत्य उनके सामने खड़ा होने में समर्थ न हो सके। जलन्धर की सारी माया क्षण भर में नष्ट हो गई, युद्ध में चारों ओर हा-हाकार होने लगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शिवजी ने उन भागते हुए शुम्भ -निशुम्भ को शाप देकर बड़ी धिक्कार दी और कहा -तुम दोनों बडे़ दुष्ट हो, तुमने मेरा बडा़ अपराध किया है तुम पार्वती को मारते थे और अब युद्ध से भागते हो, भागते को मारना पाप है इसलिए अब में तुम्हें नहीं मारूंगा परन्तु गौरी तुम्हें अवश्य मारेगी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शिवजी के कहने पर जलन्धर क्रोध में अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा उसने शिवजी पर घोर बाण वर्षा करके धरती पर अन्धकार कर दिया तब उस दैत्य की ऐसी चेष्टा देखकर शंकर जी बड़े ही क्रोधित हुए तथा उन्होंने अपने बनाए हुए सुदर्शन चक्र को चलाकर उसका सिर काट लिया। एक प्रचण्ड शब्द के साथ उसका सिर धरती पर गिर पड़ा और भयंकर हाहाकार होने लगा। अंजल पर्वत के समान उसके शरीर के दो खण्ड हो गये। उसके रूधिर से संग्राम भुमि व्याप्त हो गई, सारी धरती विह्वल हो गई शिवजी की आज्ञा से उसका रक्त और मांस महागौरव मैं जाकर रक्त का कुण्ड हो गया तथा उसके शरीर का तेज निकलकर शंकर जी के शरीर में वैसे ही प्रवेश कर गया जैसे वृन्दा का तेज गौरी जी के शरीर में प्रवेश हुआ था। जलन्धर को मरा हुआ देखकर देवता और गन्धर्व सब प्रसन्न हो गए।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/20.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-6686572276503155055.post-1124846546586527902</guid><pubDate>Wed, 22 Dec 2021 03:32:00 +0000</pubDate><atom:updated>2022-11-23T11:57:05.724+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kartik Maas Katha</category><title>कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग  19</title><description>&lt;h1 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;कार्तिक मास माहात्म्य कथा - भाग&amp;nbsp; 19&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;उन्नीसवाँ अध्याय&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजा पृथु ने पूछा हे देवर्षि! अब आप यह कहिये कि भगवान विष्णु ने वहाँ जाकर क्या किया तथा जलन्धर की स्त्री का पतिव्रत कैसे भ्रष्ट हुआ? श्री नारद जी ने कहा -जलन्धर के नगर में जाकर भगवान विष्णु ने उसकी पतिव्रता स्त्री बृन्दा का पतिव्रत भंग करने का विचार किया। वह उसके नगर में एक उधान में जाकर ठहर गये ओर रात में उसे स्वप्न दिया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह उनकी माया ओर अद्भुत कार्यपद्धति थी और उनकी माया द्वारा जलन्धर की स्त्री पतिव्रता बृन्दा ने रात में यह स्वप्न देखा की उसका पति नग्न होकर, सिर पर तेल लगाये महिष पर चढा़ हैं।वह काले रंग के फूलों की माला पहने हुए हैं तथा उसके चारों ओर हिसंक जीव है। वह सिर मुण्डाये हुए अधंकार में दक्षिणी दिशा की और जा रहा है। उसने अपने नगर को समुद्र में डूबा हुआ देखा ओर इस प्रकार के बहुत से सपने देखे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर तुरन्त ही वह जाग पडी़ ओर स्वप्न के संबंध में विचार करने लगी। वह छज्जे पर&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;गई,अटारी पर चढ़, भुमि पर उतरी मगर उसे कहीं पर भी शांति प्राप्त नहीं हुई। फिर वह अपने दो सखियों को साथ लेकर उपवन में गयी परन्तु वहाँ भी उसे शांति नहीं हुई फिर वह जंगल में निकल गई पर वहाँ भी उसे चैन न आया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वन में उसने सिंह के समान दो भयंकर राक्षसो को देखा जिससे वह अत्यंत भयभीत होकर वहाँ से भागने लगी। उसी समय वहाँ अपने शिष्यों सहित एक तपस्वी आ गया तो वृन्दा उसके पैरो मेंहाथ लगाकर उससे अपनी सुरक्षा के लिए याचना करने लगी। मुनि ने अपनी एक ही हुकाँर से दोनों राक्षसो को वहाँ से भगा दिया। वृन्दा को आश्चर्य हुआ वह भय से मुक्त हो मुनि को हाथ जोड़कर मुनि को प्रणाम करने लगी और कृतज्ञता का ज्ञापन किया। फिर उसने मुनि से अपने युद्धरत पति के संबंध में उसकी कुशल क्षेम का प्रश्न किया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुनि ने मौन हो आगे पीछे देखकर कहना चाहा कि उसी समय दो बानर के उनके पास आ हाथ जोड़ कर खडे़ हो गए। ज्योंही मुनि ने भृकुटी का संकेत किया तो वह उड़ कर आकाश मे चला गया। फिर जलन्धर का सिर व धड़ लेकर मुनि के पास आ गये। तब वृन्दा ने अपने पति को मरा जान मूर्छित होकर धरती पर गिर पडी़ और अनेक प्रकार के वचन कह कर दारूण विलाप करने लगी। पश्चात उसने मुनि जी से कहा -हे कृपानिधे! आप मेरे पति को जीवित कर दीजिए। पतिव्रता परायण दैत्य पत्नी ऐसा कहकर दुःखी श्वासों को छोड़ती हुई मुनि के चरणों में गिर पडी़।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब मुनिश्वर ने कहा -वह शिवजी द्वारा युद्ध में मारा गया है अतः वह जीवित नहीं हो सकता क्योंकि जिसे भगवान शंकर मार देते हैं वह कभी जीवित नहीं हो सकता परन्तु शरणागत की रक्षा सनातन धर्म है। अतः कृपा करके मैं इसे जिलाए देता हूँ। श्रीनारदजी कहते है कि वह मुनि साक्षात विष्णु थे जिन्होंने कि यह सब माया फैलाई थी वह वृन्दा के पति को जीवित करके अन्तध्यार्न हो गए। जलन्धर ने उठकर वृन्दा का आलिंगन किया और उसका मुंह चूमा और वृंदा भी बहुत खुश हुई और अब तक हुई सब बातों को स्वप्न समझा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पश्चात वृन्दा सकाम हो बहुत दिनतक अपने पति के साथ विहार करती रही। एक दिन उसने संभोग काल के अन्त में भगवान विष्णु को पहचान लिया तब वह उन्हें ताड़ित करते हुए बोली हे परस्री से गमन करने वाले विष्णु! तुम्हारे शील को धिक्कार है मैंने जान लिया है कि वह मायावती तपस्वी तुम्ही थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे राजन! ऐसा कह परम क्रुद्ध हो पतिव्रता ने अपने तेज को प्रकट करते हुए शाप दिया। जो तुने अपनी अपनी माया से दो राक्षस किसी समय तुम्हारी भी स्त्री का हरण करेंगे और ओर उसके विरह में दुःखी होकर तुम बानरों की सहायता से वन में भ्रमण करोगे और वह सर्वेश्वर जो इस समय तुम्हारा साथी रहेगा। ऐसा कहकर पतिव्रता वृन्दा भगवान विष्णु के लाख मना करने पर भी अग्नि में प्रवेश कर गयी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ब्रह्मा आदि देवता आकाश से उसका प्रवेश देखते रहे वृन्दा के शरीर का तेज श्री पार्वतीजी के शरीर में चला गया और आकाश मे जय जयकार होने लगी। पतिव्रत धर्म के प्रभाव से वृन्दा ने मुक्ति प्राप्त की।&lt;/p&gt;</description><link>https://vrindavanbhajanras.blogspot.com/2021/12/Kartik-maas-katha-19.html</link><author>noreply@blogger.com (Unknown)</author><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>India</georss:featurename><georss:point>20.593684 78.96288</georss:point><georss:box>-7.7165498361788458 43.80663 48.903917836178849 114.11913</georss:box></item></channel></rss>