<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230</id><updated>2022-05-09T04:08:54.932+05:30</updated><category term="hindi-articles"/><category term="साहित्य"/><category term="सरोकार"/><category term="आवारापन"/><category term="शख्सियत"/><category term="movie-review"/><category term="बॉलीवुड"/><category term="समाज"/><category term="कविता"/><category term="फिल्म समीक्षा"/><category term="hindi-poetry"/><category term="दीप जगदीप सिंह"/><category term="धर्म"/><category term="बहस"/><category term="कवि मित्र"/><category term="मेरी कविता"/><category term="यादें"/><category term="वीडियो"/><category term="emran hashmi"/><category term="film review"/><category term="hamari adhuri kahan full movie review"/><category term="maggi"/><category term="parsoon joshi"/><category term="rajkumar rao"/><category term="vidya balan"/><category term="गुरदास मान"/><category term="जसवंत सिंह ज़फर"/><category term="दिल्ली"/><category term="पंछी"/><category term="प्रसून जोशी"/><category term="बापू गांधी"/><category term="भगत सिंह"/><category term="रेल बजट"/><category term="लाइब्रेरी"/><title type='text'>दीप जगदीप सिंह</title><subtitle type='html'>कवि | स्तंभकार | गीतकार | फिल्म-समीक्षक | पटकथा लेखक</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25'/><author><name>Deep Jagdeep Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09390553388468161998</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='//1.bp.blogspot.com/-4nTNnBjIg1o/Xo90FkaluhI/AAAAAAAAFY8/7YW3-rzqoZUUoS6EPaHUcEHLf4krlio8gCK4BGAYYCw/s220/deep-jagdeep-singh-news-anchor2.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>27</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-3470062458131825919</id><published>2015-06-16T01:13:00.001+05:30</published><updated>2015-06-16T01:26:54.849+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="emran hashmi"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="film review"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hamari adhuri kahan full movie review"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="movie-review"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="rajkumar rao"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="vidya balan"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दीप जगदीप सिंह"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बॉलीवुड"/><title type='text'>फिल्म समीक्षा | कैसी है ये &#39;हमारी अधूरी कहानी&#39;</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;table cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;float: right; margin-left: 1em; text-align: right;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://3.bp.blogspot.com/-nLbpduma5Cc/VX8oSBqeHAI/AAAAAAAACF4/4fQcUAIfsjk/s512/hamari-adhuri-kahani.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;Film Review | Hamari Adhuri Kahani&quot; border=&quot;0&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;http://3.bp.blogspot.com/-nLbpduma5Cc/VX8oSBqeHAI/AAAAAAAACF4/4fQcUAIfsjk/s320/hamari-adhuri-kahani.jpg&quot; title=&quot;Film Review | Hamari Adhuri Kahani&quot; width=&quot;213&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;Film Review | Hamari Adhuri Kahani&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;क्यों हिंदी फिल्मों में &#39;हमारी अधूरी कहानी&#39; मर कर ही पूरी होती है? क्यों हमारे यहां प्यार जीते जी हासिल नहीं होता? क्यों प्रेमियों के चेहरे पर मुस्कुराहट मरने के बाद ही आती है? सबसे बड़ा सवाल के क्यों प्रेमी मरने के लिए हर पल तैयार रहते हैं? मोहित सूरी की &#39;हमारी अधूरी कहानी&#39; एक बार फिर उसी स्टीरियोटाइप को स्थापित करने की कोशिश करती है कि हमारे देश में प्रेम और प्रेमी परंपराओं के बंधनों में बंधे हुए हैं और उन्हें प्रेम को हासिल करने के लिए मौत को गले लगाना ही होगा। &amp;nbsp;यही नहीं उनकी आत्माएं तभी मिलती हैं जब दोनों प्रेमियों के अवशेष एक ही जगह पर मिलते हैं। इक्कसवीं सदी में प्रेम चाहे टवीटर और वट्स एप में सिमट गया है। प्रेमियों और प्रेम के मिलन के लिए साधन और संभावनाएं बढ़ गई हैं। प्रेमी को प्रेमिका की एक झलक पाने के लिए अब कई&amp;nbsp;दिन इंतज़ार नहीं करना पड़ता, जब दिल किया तभी तुरंत ताज़ा तस्वीर और लाइव&amp;nbsp;वीडियो शेयर हो जाती है। मोहित सूरी के प्रेमी भी इसी तरह प्रेम करते हैं, लेकिन उनका मिलन कई दशकों पुराने अंदाज़ में अस्थि विसर्जन के बाद ही होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script async src=&quot;//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js&quot;&gt;&lt;/script&gt;&lt;!-- hindi-post-ad --&gt;&lt;ins class=&quot;adsbygoogle&quot;      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बारिश की तरह होटेलियर आरव (इमरान हाशमी) आता है। अपने बुरे दिनों के दर्द को पैसों के झाड़ू से समेटने की कशमकश में ज़िंदगी जीना भूल चुके आरव को वक्त के कांटों से घिरी विद्या की फूलों सी खुशबू फिर से जीने की उम्मीद दे जाती है। थोड़ी ऊहापोह के बाद जब दोनों&amp;nbsp;ज़िंदगी की ऊंगली थामने को तैयार होते हैं तो वसूधा का अतीत फिर काला साया बन कर सामने खड़ा हो&amp;nbsp;जाता है। पर्त दर पर्त ऐसे राज़ खुलते हैं, जिनके ज़रिए मोहित सूरी नक्सलवाद, राजनीति और पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर्दे पर उतारते हैं। हालात से जूझती वसूधा के ज़रिए मोहित बीच-बीच में नारी के अस्तित्व से जुड़े सवालों को भी छूते हैं और नारी मुक्ती के ख़्याल भर से ही बौखलाए मर्दाना समाज को राजकुमार राओ के रूप में दिखाते हैं। &amp;nbsp;परंपरागत मां का बेटी को मर्यादाएं तोड़ कर आज़ाद हो जाने की नसीहत देना और अंत तक आते-आते विद्या का खुद प्रतीकों के बंधन छोड़ कर आगे बढ़ जाने का संकल्प नई दौर की नारी को परिभाषित करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script async src=&quot;//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js&quot;&gt;&lt;/script&gt;&lt;!-- hindi-post-ad --&gt;&lt;ins class=&quot;adsbygoogle&quot;      style=&quot;display:block&quot;      data-ad-client=&quot;ca-pub-5889405521939035&quot;      data-ad-slot=&quot;3398996424&quot;      data-ad-format=&quot;auto&quot;&gt;&lt;/ins&gt;&lt;script&gt;(adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); &lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहित सूरी की इस प्रेम कहानी में जो नारीवाद की झलक है, वह प्रेम कहानी में एक नया टविस्ट कही जा सकती है। &amp;nbsp;पुरानी कहानियों में प्रेमिका अपने पिता, भाई या पति को नारी पर लदी भारी भरकम परंपराओं का बखान नहीं करती थी, सूरी की प्रेम कहानी में प्रेमिका ही नहीं बल्कि उसकी मां भी नायिका को अपने खो चुके पति के मंगलसुत्र की कैद से निकल कर नई प्रेम कहानी बुनने की सलाह देती है। खोया हुआ परंपरागत पति जब लौट कर उसे वापिस हासिल करने की जब्रदस्ती कोशिश करता है तो वह उसे आज़ाद हो चुकी नारी के आक्रोश से रूबरू करवाती है। पति की बौखालहट में मोहित सूरी मर्द प्रधान समाज की बौखलाट को दिखाता है। इस बौखलाहट की अति को राओ बखूबी पर्दे पर उतारता है। इस कशमकश में पिसती, बंटती और फिर आज़ाद होती विद्या बालन नए दौर की नारी का प्रतीक बन कर उभरती है। मोहित सूरी की फिल्म में बस यही एक खूबसूरती है कि उन्होंने घिसी पिटी कहानी को तेज़ी और खूबसूरती से पेश करने की भरपूर कोशिश की है और काफी हद तक सफल हुए हैं। बहुत हद तक हर हिंदी फिल्म की तरह हमारी अधूरी कहानी भी पूरी तरह से प्रिडिक्टेबल है। अगर दर्शक को कुछ बांधे रखता है तो वह विद्या, इमरान हाशमी और राजू राओ के एक्सप्रैशन्स और भावनाओं का आदान-प्रदान हैं। फिल्म को रफ्तार देने के लिए डायरेक्टर ने इमरान को पूरी कहानी में लगातार सफर करते हुए दिखाया है। इससे सिनेमेटोग्राफर विष्णू राओ को खूबसूरत लोकेशन्स एक्सपलोर करने का काफी मौका मिला है, जिसे उन्होंने बखूबी भुनाया है। लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि इमरान हाशमी कलकत्ता, दुबई, मुंबई, शिमला जहां भी जाते है, हर जगह एयरपोर्ट, एयरपोर्ट स्टाफ और एयरपोर्ट पर लगे हुए फूल एक जैसे ही क्यों होते है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह कहीं भी जाने के लिए पहले अपने पसंदीदा एयरपोर्ट वाले शहर आते है? सैंकड़ों होटलों का मालिक कुछ भी कर सकता है, भाई। यह भी समझना मुश्किल था कि लेंड माईन लगाने के बावजूद फूलों का पूरा खेत कैसे खिला रहा या इतने घने फूलों के खेत को बिना खोदे लैंडमाइन बिछाए कैसे गए? लैंडमाईन बिछे हुए इलाके के पास चेतावनी भी लिख कर लगाई जाती है, यह भी मैंने पहली बार जाना। फिर भला इन लैंड माईन में जाएगा कौन? कोई पागल प्रेमी ही जाएगा, हैं जी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script async src=&quot;//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js&quot;&gt;&lt;/script&gt;&lt;!-- hindi-post-ad --&gt;&lt;ins class=&quot;adsbygoogle&quot;      style=&quot;display:block&quot;      data-ad-client=&quot;ca-pub-5889405521939035&quot;      data-ad-slot=&quot;3398996424&quot;      data-ad-format=&quot;auto&quot;&gt;&lt;/ins&gt;&lt;script&gt;(adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); &lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म का संगीत ठीक-ठाक है और कहानी को कंपलीमेंट करता है। कोई गीत ठूंसा हुआ नहीं लगता। संगीत के अलावा प्रेम कहानी में सबसे अहम भूमिका निभाते वाले डॉयलॉग, शगुफता रफीक ने बखूबी लिखे है। प्रेम के फलसफे को फिल्मी अंदाज़ में पेश करते हुए भी उनके संवादों में मुहब्बत की नफासत झलकती है और कई जगह वह कविता हो जाते हैं। इस फिल्म को जो भी रेटिंग मिलेगी, वह उनके डॉयलॉग और तीनों मुख्य कलाकारों की अदाकारी के लिए ही हैं। एक रिकार्ड भी बनाती है यह फिल्म, पहली बार इमरान हाशमी ने इस फिल्म में सीरियल किस्सर वाली इमेज तोड़ी है। अगर आप प्रेम कहानियों के डाई हार्ड फैन हैं और आपका &#39;दिल अगर बच्चा है जी&#39; तो इन सब बातों के लिए एक बार यह फिल्म देखी जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;-दीप जगदीप सिंह&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/3470062458131825919/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2015/06/film-review-hamari-adhuri-kahani.html#comment-form' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/3470062458131825919'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/3470062458131825919'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2015/06/film-review-hamari-adhuri-kahani.html' title='फिल्म समीक्षा | कैसी है ये &#39;हमारी अधूरी कहानी&#39;'/><author><name>Deep Jagdeep Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09390553388468161998</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='//1.bp.blogspot.com/-4nTNnBjIg1o/Xo90FkaluhI/AAAAAAAAFY8/7YW3-rzqoZUUoS6EPaHUcEHLf4krlio8gCK4BGAYYCw/s220/deep-jagdeep-singh-news-anchor2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/-nLbpduma5Cc/VX8oSBqeHAI/AAAAAAAACF4/4fQcUAIfsjk/s72-c/hamari-adhuri-kahani.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-4525026977895077576</id><published>2015-06-03T21:29:00.001+05:30</published><updated>2015-06-04T21:33:40.733+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="maggi"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दीप जगदीप सिंह"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सरोकार"/><title type='text'>हमें तो स्टार चाहीए, सेहत जाए भाड़ में</title><content type='html'>&lt;script type=&quot;text/javascript&quot;&gt;&lt;!-- google_ad_client = &quot;ca-pub-5889405521939035&quot;; google_ad_host = &quot;pub-1556223355139109&quot;; /* JP-LeaderBoard-Upper */ google_ad_slot = &quot;7647457223&quot;; google_ad_width = 728; google_ad_height = 90; //--&gt;&lt;/script&gt;&lt;script type=&quot;text/javascript&quot; src=&quot;//pagead2.googlesyndication.com/pagead/show_ads.js&quot;&gt;&lt;/script&gt;&lt;br&gt;&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;मैगी की मिलावट के मुद्दे ने यह चर्चा छेड़ दी है कि ब्रांडेड उत्पाद सभी नियम कानूनों को धत्ता बता कर मनमानी करते फिरते हैं और लोगों की सेहत की एेवज में मोटा माल कमा रहे हैं। इसके साथ ही मैगी के स्टार प्रचारकों को भी कटघरे में खड़ा किए जाने को लेकर चर्चा छिड़ गई है, जाे इस मोटे माल में &#39;हिस्सेदार&#39; हैं। कुछ प्रचारकों के हक में हैं तो कुछ उनको सज़ा दिलाने के हक में। कुछ यह भी मान रहें हैं कि हाे-हल्ला सितारों तक सिमट के रह जाएगा और असली मुद्दा खो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;table cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;float: right; margin-left: 1em; text-align: right;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://2.bp.blogspot.com/-5UwFw0YOwlw/VXBxYOmKcfI/AAAAAAAAEG8/RQKTRI6FKEQ/s1600/maggi-stars.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;http://2.bp.blogspot.com/-5UwFw0YOwlw/VXBxYOmKcfI/AAAAAAAAEG8/RQKTRI6FKEQ/s320/maggi-stars.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;maggi padegi mehangi/मैगी पड़ेगी महंगी&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;इस बात पर भी माथा खुरचा जा रहा है कि अाखिर अचानक मैगी पर ताबड़ताेड़ छापेमारी हाेने की वजह क्या है, इसके पीछे की राजनीति क्या है? बाकी नूड्लस उत्पाद और अन्य पैकेजड खाद्य उत्पाद कब इस जांच के घेरे में अाएंगे? अाएंगे भी या नहीं? सवाल बहुत से हैं। लेकिन एक अहम सवाल जो सितारों की नैतिकता से&amp;nbsp;जुड़ा&amp;nbsp;है और&amp;nbsp;हम सब भुक्तभोगियों की भी नैतिकता से जुड़ा है, बड़े बड़े सवालों की भीड़ में यह मामलूी सा सवाल कहीं खो कर ना रह जाए सो उसे छूने की कोशिश कर रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे दूसरों का पता नहीं, पर मैं यह जानता हूं अनैतिकता को अनैतिकता कहना मेरी ज़िम्मेदारी है। हम सब की है। मैगी की नैतिक जिम्मेदारी सबसे बड़ी है, जिसने मुनाफे के लालच में लोगों की सेहत और ज़िंदगी से खिलवाड़ किया है। उन लोगों की भी है, जिन्होंने पैसे के लालच और अपनी इमेज को कैश करके मुंह मांगे दाम कमाए हैं। लोगों की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि कोई चीज़ खाने और ख़रीदने से पहले वह पता करें कि उसमें क्या है। भारत जैसे अनपढ़ देश में यह श्रद्धा की चर्म सीमा ही है कि हमारे यहां लोगों को &#39;स्वाद भी सेहत भी&#39; कहना काफी है किसी उत्पाद को बेचने के लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात केवल सेलीब्रेटीज़ से ना शुरू हुई थी ना उन पर ही खत्म होगी। सेलीब्रेटीज़ की बात कर ही कौन रहा है, सिर्फ उनके फैन्स वर्ना कानून तों उनको क्राइम में पार्टी की ही तरह डील कर रहा है, साेशल मीडिया पर लोग क्याें हाे हल्ला मचा रहे हैं। हर सेलीब्रिटी ने एेड् से करोड़ों रूपए कमाएं हैं, अपने बचाव के लिए उनके पास वकील हैं, उनका खरीदा हुअा मीडिया है। सबसे बड़ी समस्या उनके भ्रमित और मोहित फैन्स हैं, जो बिना चीज़ों को गहराई से जाने बस अन्ध भक्ति में उनका पक्ष लेने लग जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type=&quot;text/javascript&quot;&gt;&lt;!-- google_ad_client = &quot;ca-pub-5889405521939035&quot;; google_ad_host = &quot;pub-1556223355139109&quot;; /* JP-LeaderBoard-Upper */ google_ad_slot = &quot;7647457223&quot;; google_ad_width = 728; google_ad_height = 90; //--&gt;&lt;/script&gt;&lt;script type=&quot;text/javascript&quot; src=&quot;//pagead2.googlesyndication.com/pagead/show_ads.js&quot;&gt;&lt;/script&gt;&lt;br&gt;सलमान ख़ान के मामले में क्या हुअा, पहले तो फैन्स उसकी सज़ा पर राेने लगे, प्रथार्नाएं करने लगे। लेकिन अगले ही दिन उसने पैसे और पहुंच के दम पर कानून काे &#39;कोठे&#39; की चीज़ बना डाला। तब क्यों नहीं राेया कोई। कानून की माैत पर रोना क्यों नहीं अाया किसी को। जब कोई मुहल्ले का गुंडा किसी की बहन बेटी को परेशान करेगा और थाने में आपकी बात नहीं सुनी जाएगी, तब सलमान खान अाएगा दराेगा को अापके हक में करने के लिए। आप खुद ही एक स्टार की भक्ति में पैसे के सामने कानून को छोटा होते देख कर खुश हो रहे हैं। कल को जब आपके पास कानून खरीदने के लिए पैसा नहीं होगा तब आप ही कहेंगे कि कानून सिर्फ पैसे वालों का है। फिर आप भी कानून को खरीदने के लिए अंधाधुंध पैसा कमाने लग जाएंगे बजाए यह सोचे कि अगर कानून सब के लिए बराबर हो जाए तो पैसे की ज़रूरत ही खत्म हो जाएगी। जितना हल्ला उसको सज़ा मिलने पर मचा, अगर उतना उसकी ज़मानत होने पर मचा होता तो अाज उसकी नियति भी कुछ और होती और लोंगों का भी कानून में विश्र्वास बढ़ता, लेकिन हमें क्या हमें क्या हमें तो स्टार चाहीए, कानून जाए भाड़ में। हमें तो मैगी चाहिए, सेहत जाए भाड़ में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सेलीब्रिटी भी इंसान ही होते हैं और हम सभी की तरह गल्तियां करते हैं, बल्कि पैसे के लालच और शाेहरत के दंभ में हमसे ज़्यादा करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type=&quot;text/javascript&quot;&gt;&lt;!-- google_ad_client = &quot;ca-pub-5889405521939035&quot;; google_ad_host = &quot;pub-1556223355139109&quot;; /* JP-LeaderBoard-Upper */ google_ad_slot = &quot;7647457223&quot;; google_ad_width = 728; google_ad_height = 90; //--&gt;&lt;/script&gt;&lt;script type=&quot;text/javascript&quot; src=&quot;//pagead2.googlesyndication.com/pagead/show_ads.js&quot;&gt;&lt;/script&gt;&lt;br&gt;अगर आप को लग रहा है कि इस हो हल्ले में बाकी उत्पाद बच जाएंगे तो अभी से आप उनको खरीदना बंद करीए। कोई इसका कारण पूछे तों उन्हें असलियत बताईए। जब कंपनियों का माल गोदामों में सड़ेगा तो अपने आप हो-हल्ला मचेगा उनके बारे में भी। नैतिक जिम्मेदारी सभी की है, सितारों की सबसे ज़्यादा है। जिनको वह अपनी फिल्मों के टिकट बेच कर सितारा बनते हैं कम से कम उनकी सेहत से खिलवाड़ करने में मुनाफाख़ाेर कंपिनयों का साथ देना और यह जानते हुए भी की उनके देश की जनता भोली है, उन्हें बेवकूफ बनाना उनको कभी तो इसके लिए दंड भुगतना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आप दंड क्यों भुगतते हैं, देख कर खाईए क्या खा रहे हैं। खाकर देखते रहेंगे तो देखने लायक नहीं रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;-दीप जगदीप सिंह&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/4525026977895077576/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2015/06/maggi-stars-fir.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/4525026977895077576'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/4525026977895077576'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2015/06/maggi-stars-fir.html' title='हमें तो स्टार चाहीए, सेहत जाए भाड़ में'/><author><name>Deep Jagdeep Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09390553388468161998</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='//1.bp.blogspot.com/-4nTNnBjIg1o/Xo90FkaluhI/AAAAAAAAFY8/7YW3-rzqoZUUoS6EPaHUcEHLf4krlio8gCK4BGAYYCw/s220/deep-jagdeep-singh-news-anchor2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-5UwFw0YOwlw/VXBxYOmKcfI/AAAAAAAAEG8/RQKTRI6FKEQ/s72-c/maggi-stars.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-8988731678724127853</id><published>2011-12-01T13:05:00.001+05:30</published><updated>2013-06-03T21:09:42.684+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-poetry"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दीप जगदीप सिंह"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मेरी कविता"/><title type='text'>अम्मू के नाम ख़त</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;अम्मू!&lt;br /&gt;कभी लगता तुम बहुत बड़ी हो&lt;br /&gt;मेरी अम्मी हो&lt;br /&gt;कभी लगता&lt;br /&gt;कि तुम नन्हीं सी अम्मू हो&lt;br /&gt;तुम संग मैं भी हो जाता हूं&lt;br /&gt;नन्हा सा बाल&lt;br /&gt;तुम्हारे मुस्कुराते होठों में से ढूंढता हूं&lt;br /&gt;अपनी आंखों की चमक&lt;br /&gt;तुम्हें सोच में डूबे देख&lt;br /&gt;मेरा दिल भी खाने लगता है गोते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलो अम्मू&lt;br /&gt;सोच के सागर से बाहर निकलें&lt;br /&gt;नीले आकाश पर उड़ान भरें&lt;br /&gt;सपनों के बादलों का पीछा करें&lt;br /&gt;चांद पर अपना घर बनाएं&lt;br /&gt;क्षितिज से&lt;br /&gt;उगता सूर्य देखें&lt;br /&gt;दिन निकलते ही&lt;br /&gt;चांद की तरह&lt;br /&gt;हम भी अदृश्य हो जाएं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस्म उतार कर&lt;br /&gt;किरनों की किल्ली पर टांग दें&lt;br /&gt;बादलों से मुट्ठी भर पानी&lt;br /&gt;उधार लें&lt;br /&gt;एक दूसरे पर छिड़कें&lt;br /&gt;गुलाबों की खुशबू&lt;br /&gt;सांसों में भर लें&lt;br /&gt;तितलियों से लेकर रंग&lt;br /&gt;एक दूसरे की आत्मा रंग दें&lt;br /&gt;अदृश्य दुनिया में&lt;br /&gt;आलिंग्न कर लें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम ढले&lt;br /&gt;अपना अपना&lt;br /&gt;जिस्म पहनें&lt;br /&gt;चांद जब लौट आए&lt;br /&gt;हर आंख जब सो जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलो वापिस धरती पे चलें&lt;br /&gt;सोते शहर के मध्य&lt;br /&gt;जागते तालाब के किनारे&lt;br /&gt;चांदनी में नहाएं&lt;br /&gt;आओ, समय का चक्र&lt;br /&gt;अपने हाथों से घुमाएं&lt;br /&gt;मोहब्बत का एक नया पल बनाएं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;2&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;ख़ाब से हकीकत तक&lt;br /&gt;आने के लिए&lt;br /&gt;तुम से तुम तक&lt;br /&gt;पल्कों को चलना होता है&lt;br /&gt;बस एक कदम&lt;br /&gt;कितना आसान है&lt;br /&gt;हर पल तुम संग रहना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;3&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारे बारे में सोचतां हूं&lt;br /&gt;तो सोच कवितामयी होती&lt;br /&gt;तुम्हें देखता हूं&lt;br /&gt;तुम जीती जागती कविता लगती&lt;br /&gt;तुम्हें जीता हूं तो&lt;br /&gt;मैं खुद बन जाता हूं इक गीत&lt;br /&gt;बस इतनी सी है मेरे इश्क की कहानी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;-दीप जगदीप सिंह&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-size: small;&quot;&gt;(अम्मू प्यार से रखा गया, प्रेमिका का नाम है&lt;/span&gt;&lt;b&gt;)&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/8988731678724127853/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2011/12/kavita-ammu-ke-naam-khat.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8988731678724127853'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8988731678724127853'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2011/12/kavita-ammu-ke-naam-khat.html' title='अम्मू के नाम ख़त'/><author><name>Deep Jagdeep Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09390553388468161998</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='//1.bp.blogspot.com/-4nTNnBjIg1o/Xo90FkaluhI/AAAAAAAAFY8/7YW3-rzqoZUUoS6EPaHUcEHLf4krlio8gCK4BGAYYCw/s220/deep-jagdeep-singh-news-anchor2.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-5607804057635845415</id><published>2009-03-02T17:20:00.010+05:30</published><updated>2013-06-03T20:58:57.315+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="parsoon joshi"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आवारापन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="प्रसून जोशी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शख्सियत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सरोकार"/><title type='text'>जनाब प्रसून पर नहीं मुझे तों सवालों से भागने वालों पर एतराज़ है</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;बात सिर्फ प्रसून जोशी की नहीं गीतकारों की उस पीढ़ी की है या कहूं फिल्मी लेखकों की है जिन्होंने साहिर द्वारा दिलवाए सम्मानजनक स्तर को गिरा दिया। मैंने सवाल प्रसून की प्रतिभा पर और उनके गीतों पर नहीं उठाए न ही मुझे उनके किरदार पर कोई शक है, यहां तक की &lt;a href=&quot;http://aawaarapan.blogspot.com/2009/03/blog-post.html&quot;&gt;पिछली पोस्ट&lt;/a&gt; में मैंने उनका &#39;पाठशाला&#39; जैसे ठेठ शब्दों के प्रयोग की सराहना की है। मेरा सवाल तो ये है कि आखिर इस दौर का स्थापित गीतकार (प्रसून जोशी), जो खुद कहता है कि अब वो काफी हद तक अपनी शर्तों पर काम करता है, तो वो जिस विधा का प्रतिनिधित्वत करता है उससे जुड़े सवालों से क्यों बचता है? क्या वो सिर्फ कैमरे के सामने आपनी मौजूदगी भर दर्ज करवाने तक सीमित रहेगा?&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;i&gt;कई यादगार गीत देने वाले साहिर लुधियानवी की किसी फिल्म के लिए गीत लिखने की एक ही&lt;br /&gt;शर्त होती थी, संगीतकार से एक रुपया ज्यादा लूंगा। सालों तक ये परंपरा चलती रही। बात सिर्फ एक रुपए या ज्यादा पैसे के नहीं थी, बात सम्मान और गीतकार के रुतबे की थी।&lt;br /&gt;गुलज़ार का अपना अंदाज है और वो इस स्तर पर हैं कि बिना कहे ये शर्त खुद ब खुद पूरी हो&lt;br /&gt;जाती है। आपने उन्हें कभी कैमरे के पीछे दौड़ते देखा है? नए दौर के बहुतेरे गीतकार पार्ट टाइम हैं, प्रोड्यूसर संगीतकार के इशारों&lt;br /&gt;पर नाचते हैं, तभी तो खिट पिट जैसे घटिया दर्जे के गीत लिखे और गाए जाते हैं।&lt;/i&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;क्या आप उससे &#39;गेंदा फूल&#39; की खुराफत के लिए जवाब नहीं चाहते? &lt;br /&gt;-अगर नहीं तो आप भी उस गीत के असल रचैयता और उससे जुड़े समूह जिंदा और मरहूम लोंगों से नाइंसाफी में बराबर के भागीदार हैं।&lt;br /&gt;-अगर हां तो आप मुझसे सहमत हैं। वो पत्रकार भी तो यही सवाल पूछ रहा था। फिर प्रसून को जवाब देने से एतज़ार क्यों था? क्या सिर्फ कैमरे के सामने ही सवालों के जवाब दिए जाने चाहिए?&lt;br /&gt;सतीश चंद्र सत्यार्थी जी की बात से भी मैं पूरी तरह सहमत हूं, कैमरे के सामने आने का लोभ सब को होता है। सच तो ये है फिल्म/टीवी क्षेत्र में जाने का मकसद ही कैमरे के सामने आना होता है। प्रसून, मैं, सतीश, जसदीप हर कोई इस पोस्ट को पढ़ने वाला कहीं ना कहीं कभी ना कभी कैमरे के कीड़े से कटना चाहता है। कोई हर्ज़ भी नहीं मैंने कब कहा ये बुरा है। मैंने तो इतना कहा, कैमरा बंद होते ही कैसे एक &#39;जिम्मेदार पब्लिक फिगर&#39; गैर जिम्मेदार हो जाता है। उसे इस बात पर पछतावा है कि एक गैर-कैमराधारी ने उनसे सवाल पूछे और वो जवाब देते रहे।&lt;br /&gt;जसदीप भाई!!!फिल्म नगरी में तो चोरी होती रहती है, तो क्या इसे परंपरा मान कर बदस्तूर जारी रहने दे। आवाज़ ना उठाएं। आपकी जानकारी के लिए बता दूं हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म दोस्ताना के एक गीत के लिए करन जौहर ने करोड़ों देकर रिलीज़ से तीन दिन पहले जान छुड़ाई थी। वो बात अलग है कि दावा करने वाला एक बड़ा प्रॉडक्शन हाउस था और अदालत जा पहुंचा था। उसने अपनी रायलटी वसूल कर ली। वो छतीसगढ़ वाले भोले लोग बस प्यार से क्रडिट देने की इल्तजा कर रहे हैं तो किसके कान पर जूं रेंगती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज छतीसगढ़ से एक गीत चुराया है तो इतना चर्चा है, पंजाब से हर रोज़ कितने गीत चुराते हैं बॉलीवुड वाले, रोज़ आवाज़ उठने लगे तो बॉलीवुड के आधे संगीतकार बेरोज़गार हों जाएं। सिंह इज़ किंग हो या हिमेश के कर्ज़ का &#39;सोहणिए जे तेरे नाल दगा मैं कमावां&#39; सालों पहले हिट हो चुके पंजाबी गीत हैं। पूरा देश इन्हें चोरी होने के बाद गुनगुना रहा है। अब बताईए चुप रहूं, भागने देता रहूं इन नामी लोगों को सवालों से। ठीक है पत्रकारी भी अब धंधा है, लेकिन ज़मीर कैसे मार दूं। आप कहें तो...???&lt;br /&gt;मेरी नज़र में तो सवालों से भागना चोरी से भी बड़ा गुनाह है। नेताओं का ये गुण संवेदनशील लेखकों में आना चिंतन का विषय है।आपको इस पर हैरानी नहीं होती मुझे इस बात का भी अफसोस है|&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/5607804057635845415/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2009/03/not-parsoon-i-am-agains-escapism.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/5607804057635845415'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/5607804057635845415'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2009/03/not-parsoon-i-am-agains-escapism.html' title='जनाब प्रसून पर नहीं मुझे तों सवालों से भागने वालों पर एतराज़ है'/><author><name>Deep Jagdeep Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09390553388468161998</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='//1.bp.blogspot.com/-4nTNnBjIg1o/Xo90FkaluhI/AAAAAAAAFY8/7YW3-rzqoZUUoS6EPaHUcEHLf4krlio8gCK4BGAYYCw/s220/deep-jagdeep-singh-news-anchor2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-6064177368948032820</id><published>2009-03-01T21:13:00.003+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.313+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आवारापन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वीडियो"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शख्सियत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सरोकार"/><title type='text'>प्रसून जोशी को &#39;कैमरा&#39; कीड़े ने काटा</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;सबसे पहले तो आपकी याददाशत दरुस्त कर दूं, जी हां ये प्रसून जोशी गेंदा फूल वाले गीतकार ही हैं और सुनिए जनाब ये कीड़ा है ही इतना खतरनाक कि जितना इससे बचो ये उतना ही काट खाने को दौड़ता है, अब आप हस्ती हैं, बॉलीवुड के अरमानों की बस्ती हैं, तो ये कीड़ा आपको भी चट कर जाएगा। पर जनाब यहां तो हालात उससे भी बद्दतर हो चले हैं। अब आप ही बताएं कि गर कीड़ से कटने वाला ख़ुद ही कीड़े को चाटने लगे तो क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनाब अब पता चला जहरबुझे &#39;कैमरा&#39; कीड़े का नशा इतना ख़तरनाक है कि एक बार चिपक गया तो लत छुटती नहीं। जानता हूं अभी तक बात पहेली ही बनी है, क्षमायाचना के साथ एक बात और कह कर असल मुद्दे पर आता हूं। कुछ दिन पहले मेरे एक क्रांतिकारी मित्र ने &#39;गेंदा फूल&#39; सुनते हुए एक क्रांतिकारी विचार ही दे डाला। क्या प्रसून अगला गुलज़ार बनने जा रहा है। तभी ख़बर छप गई कि गेंदा फूल तो छतीसगढ़ी गाना है जिसे बड़ी सफाई से प्रसून ने अपने नाम गोंद लिया। अभी मैं सोच रहा था कि मुझे प्रसून जोशी से मुलाकात का दिन याद आया, जयपुर का लिट्ररेचर फैस्टिवल था पिछले महीने वहीं पर जनाब विचार चर्चा में क्षेत्रीए भाषाओं के काल का गाल होने पर खूब चिंता जता रहे थे और अपने गीतों में ठेठ शबदों के प्रयोग की भी काफी चर्चा कर रहे थे, सुनने में अच्छा भी लग रहा था। फिर वो मौका आया जब मुझे उनकी बीमारी का पता चला। परिचर्चा के पंडाल से बाहर निकले तो सामने से एक टीवी कैमरे ने घेर लिया, हम भी लपक लिए कि सुनें पर्दे के पीछे गीत रचने वाले प्रसून कैमरे के सामने कैसे बोलते हैं। लो जी सवालों का सिलसिला शुरू हुआ और अपने प्रसून भाई एक्सर्ट अंदाज़ में बाइट देने लगे। पास ही खड़े एक प्रिंट मीडिया के पत्रकार को भी अपने ज्ञान कौशल पर &#39;ज्यादा&#39; ही &#39;ओवर कॉन्फिडेंस&#39; था। अब भई उन्होंने पूछ लिया जनाब साहिर लुधियानवी ने गीतकारों को संगीतकारों से ज्यादा अहृम दर्जा दिलाया, ज्यादा मेहनताना दिलाया। आज वो संगीतकारों/प्रड्यूसरों के दिहाड़ीदार हो गए हैं। पहले गीतकार, गीतकार ही होते थे अब वो पार्ट टाईम हो गए हैं। जवाब था, क्यों कि अब गीतकारी में उतना पैसा नहीं। अगला सवाल था, तो इतना स्तर गिराया किसने की संगीतकार से 1 रुपया ज्यादा लेने के हक रख़ने वाले गीतकारों की कीमत कम हो गई। जवाब था, नए लोग सुधार ला रहे हैं। मैं भी अब काफी हद तक अपनी शर्तों पर काम करता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी बंटाधार हो गया। कैमरे वाले की टेप खत्म हो गई। कॉपी पैन वाले पत्रकार ने अभी अपना अगला सवाल पूछा ही था कि प्रसून साहब ने हाथ खड़े कर दिए। बोले अब काहे का सवाल कैमरा तो बंद हो गया। अरे जनाब सवाल तो सवाल है कैमरे को पूछ के थोड़ी आता है। वो कैमरे वाले की तरफ मुड़े, पूछाः क्या ये आपके साथ नहीं हैं कैमरे वाले ने जनाब दिया जी वो अलग हैं। प्रसून जी इतराए अरे मैं तो इन्हें आपके साथ समझकर जवाब देता रहा। इतना बोलते ही वो ऑटोग्राफ लेने वाली भीड़ के समंदर के साथ आगे बह लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब समझे जनाब ये &#39;कैमरा&#39; कीड़ा कितना ख़तरनाक है। आप पीछे भागते रहो फोटो खिंचवाने के लिए उनके साथ, कभी नोट तो कभी हथेली पर ऑटोग्राफ लेने के लिए शायद आपके हाथ आ जाएं वो। कैमरे के सामने वो जरुर जुगाली करने रुक जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानने वाले तो उस प्रिट वाले पत्रकार को भी पहचान गए होंगे। उसी वक्त मुझे जयपुर मेले में ही कही तहलका वाले तरुण तेजपाल की बात याद आ गई। कह रहे थे, मीडिया को बड़े नामों के ग्लैमर से निकलना होगा, उद्यौगपति हों या फिल्मी सितारे, इनके मोह जाल से निकलेंगे तभी सत्यत जैसे घोटाले उजागर होंगे। पत्रकार बंधुओ! सुन रहे हो ना!!!&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/6064177368948032820/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2009/03/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/6064177368948032820'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/6064177368948032820'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2009/03/blog-post.html' title='प्रसून जोशी को &#39;कैमरा&#39; कीड़े ने काटा'/><author><name>Deep Jagdeep Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09390553388468161998</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='//1.bp.blogspot.com/-4nTNnBjIg1o/Xo90FkaluhI/AAAAAAAAFY8/7YW3-rzqoZUUoS6EPaHUcEHLf4krlio8gCK4BGAYYCw/s220/deep-jagdeep-singh-news-anchor2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-7475845425088457841</id><published>2008-10-25T13:53:00.004+05:30</published><updated>2013-06-03T21:09:42.682+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-poetry"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कविता"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मेरी कविता"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>सफर...</title><content type='html'>&lt;a href=&quot;http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SQLZDhL09DI/AAAAAAAAB04/j7GD6NbBlkM/s1600-h/safar.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:right; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 266px; height: 400px;&quot; src=&quot;http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SQLZDhL09DI/AAAAAAAAB04/j7GD6NbBlkM/s400/safar.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5261005969192973362&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मैं सुलझी हुई&lt;br /&gt;अनसुलझी&lt;br /&gt;पहेली हूं&lt;br /&gt;ना सोना, ना जगना&lt;br /&gt;ना रोना, ना हसना&lt;br /&gt;ना दर्द है, ना ठीक हूं&lt;br /&gt;ना जख़्म है, ना मरहम है&lt;br /&gt;नज़र, ज़ुबान, सुनने की ताकत&lt;br /&gt;जिस्म मे से घटा दी है&lt;br /&gt;मैं उसमें हूं&lt;br /&gt;लेकिन उसका हिस्सा नहीं&lt;br /&gt;मैं बुरा नहीं&lt;br /&gt;पर नापसंद हूं&lt;br /&gt;रुका हूं, पर सफर में हूं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तलाश है&lt;br /&gt;पर खोया कुछ भी नहीं&lt;br /&gt;मंजिल रस्ते में बदल गई&lt;br /&gt;और नदी का पानी कांच&lt;br /&gt;आग ठंडी बर्फ हुई&lt;br /&gt;ठंड में ठिठुरता प्यासा हूं&lt;br /&gt;रुका हूं, पर सफर में हूं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर्फ हैं,&lt;br /&gt;पर लफ्ज़ और वाक्य ग़ुम हैं&lt;br /&gt;कलम है, स्याही है&lt;br /&gt;कोरे सफे नहीं मिल रहे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिखूंगा&lt;br /&gt;पेड़ों पर&lt;br /&gt;फूलों पर&lt;br /&gt;पत्तों पर&lt;br /&gt;सूरज पर&lt;br /&gt;चांद पर&lt;br /&gt;धरती पर&lt;br /&gt;अंबर पर&lt;br /&gt;जिस्मों पर&lt;br /&gt;रुहों पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन लिखूंगा&lt;br /&gt;जिस दिन ये सब कोरे मिलेंगे&lt;br /&gt;फिलहाल रुका हूं, पर सफर में हूं</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/7475845425088457841/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/10/blog-post_25.html#comment-form' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/7475845425088457841'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/7475845425088457841'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/10/blog-post_25.html' title='सफर...'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SQLZDhL09DI/AAAAAAAAB04/j7GD6NbBlkM/s72-c/safar.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-3093588312781968550</id><published>2008-10-04T00:12:00.007+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.304+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कवि मित्र"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जसवंत सिंह ज़फर"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बापू गांधी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शख्सियत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सरोकार"/><title type='text'>क्या आपने मनाई कभी ऐसी गांधी जयंती</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;आप और मैं हम सब कलमघिस्सू, दिमाग रगड़ और बातों के पीर दूसरों पर भड़ास निकालने के लिए न जाने क्या क्या लिखकर कागज़ और बिल गेट्स के सर्वर को काला करते रहते हैं। गांधी जयंती पर भी हम सब ने मिल कर उनके बारे में लिखने के नाम पर ब्लागवाणी पर भी ख़ूब बोझ डाला और अपने ब्लाग में भी एक और चिट्ठा जोड़ लिया। मैंने तो सोचा था कि मैं ऐसा कुछ न करुं 2 अक्तूबर को पूरा दिन मैं यही सोचता रहा और मैंने अपना कम्यूटर तक ऑन नहीं किया, लेकिन जैसी ही शाम ढलने के बाद करीब सवा 8 बजे जब मैंने अपना ईमेल चैक किया तो सुबह 8 बजे का एक ईमेल देखकर चौंक गया। यह एक आमंत्रण था, कवि,चिंतक और छाया चित्रकार मित्र &lt;a href=&quot;http://aawaarapan.blogspot.com/2008/01/blog-post_24.html&quot;&gt;जसवंत सिंह ज़फर&lt;/a&gt; का। &lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;a href=&quot;http://1.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOZpP0w9_4I/AAAAAAAABx8/R_bDEiwKfqY/s1600-h/DSC02365.JPG&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5253001735957249922&quot; src=&quot;http://1.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOZpP0w9_4I/AAAAAAAABx8/R_bDEiwKfqY/s400/DSC02365.JPG&quot; style=&quot;cursor: hand; cursor: pointer; float: left; margin: 0 10px 10px 0;&quot; /&gt;&lt;/a&gt;जसवंत सिह ज़फर मुस्कुराहट सच कर रही है बयान&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;जी हां वहीं जसवंत सिंह ज़फर जिनकी किताब पर चर्चा के साथ मैंने अपने ब्लॉग का शुभारंभ किया था। बस उस निमंत्रण को पढ़ते ही मेरे लिखने का कीड़ा जाग उठा। दरअसल उन्होंने लुधियाना में अपने चित्रों की प्रदर्शनी इन दिनों लगा रखी है, गांधी जयंती पर उन्होंने इस आयोजन को खास बनाने के लिए शहर के सीनियर सिटीजन होम में रह रहे बुजुर्गों को वहां आमंत्रित किया। यह तो हुआ आमंत्रण, अब जो हुआ वो सुनीए, ज़फर और उनके साथियों का काफिला अपनी अपनी कारों में सुबह 11 बजे सीनियर सिटीजन होम पहुंच गया और सभी को बड़े सम्मान के साथ आर्ट गैलरी तक लाया गया। &lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;a href=&quot;http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOZpP46DSUI/AAAAAAAABxk/u5n2_RcPBx0/s1600-h/DSC02355.JPG&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5253001737069087042&quot; src=&quot;http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOZpP46DSUI/AAAAAAAABxk/u5n2_RcPBx0/s400/DSC02355.JPG&quot; style=&quot;cursor: hand; cursor: pointer; float: left; margin: 0 10px 10px 0;&quot; /&gt;&lt;/a&gt; हम साथ साथ हैं, ज़फर की अर्धांगिनी बुजुर्गों का हाल चाल जानते हुए, पीछे उनकी बेटी भी नज़र आ रही है&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले चाय पानी के साथ ही करीब एक घंटे तक जान पहचान और बातचीत का सिलसिला चला। उसके बाद जसवंत ने सभी को नाश्ते और दोपहर के खाने का मिलन यानि ब्रंच परोसा। फिर बुजुर्गों को अपनी मर्जी मुताबिक कुछ भी कहने या करने के लिए पूरी तरह आज़ादी देदी गई। &lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;a href=&quot;http://4.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOZpP4nEZ4I/AAAAAAAABxs/b2Rc_DBvM5E/s1600-h/DSC02356.JPG&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5253001736989468546&quot; src=&quot;http://4.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOZpP4nEZ4I/AAAAAAAABxs/b2Rc_DBvM5E/s400/DSC02356.JPG&quot; style=&quot;cursor: hand; cursor: pointer; float: left; margin: 0 10px 10px 0;&quot; /&gt;&lt;/a&gt;क्या कहना है क्या सुनना है...&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;फिर क्या था, बापू की शिक्षा पर अमल करते हुए बच्चों का एक &#39;तमाचा&#39; पड़ने पर दूसरा गाल आगे करते ही घर से बाहर किए गए इन बुजुर्गों ने जो अपनी आप बीती सुनाई, उसे सुन कर शायद हरे लाल नोटों पर छपे बापू की फोटो की आंखें भी भर आती। &lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;a href=&quot;http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOZpPy9XBUI/AAAAAAAABx0/XqLcU28JbPk/s1600-h/DSC02363.JPG&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5253001735472350530&quot; src=&quot;http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOZpPy9XBUI/AAAAAAAABx0/XqLcU28JbPk/s400/DSC02363.JPG&quot; style=&quot;cursor: hand; cursor: pointer; float: left; margin: 0 10px 10px 0;&quot; /&gt;&lt;/a&gt;वो बीते लम्हें हमें जब भी याद आते हैं...&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;ये तो शुरूआत भर थी बीते लम्हों को हाशिए पर रख जब उन बुजुर्गों ने चित्रों में छिपे रंगों से अपने अतीत के खुशग्वार रंग तलाशे तो सबके चेहरे पर मुस्कान के फूल खिल गए। फिर हर पल दोस्ती, अपनेपन, खिलखिलाहट और रंगों के नाम गुज़रा। मौके पर मौजूद सभी कलाकार और कलमकार साथियों को इस बात की राहत थी कि उन्होंने बापू गांधी के वचनों को जिन्हे वो अपने रंगों और लफ्जों में के साथ जिंदगी में भी ढालने की हर पल कोशिश करते रहते हैं, पर खरे उतरते हुए उनकी जयंती पर इन महात्माओं के दिल में यह अहसास जगा सके, कि वो आज भी उसी भारत में रहते हैं, जिसे बापू का देश कहा जाता है। &lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;a href=&quot;http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOZpQLrpEKI/AAAAAAAAByE/w0KpjDEp3oA/s1600-h/DSC02370.JPG&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5253001742108922018&quot; src=&quot;http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOZpQLrpEKI/AAAAAAAAByE/w0KpjDEp3oA/s400/DSC02370.JPG&quot; style=&quot;cursor: hand; cursor: pointer; float: left; margin: 0 10px 10px 0;&quot; /&gt;&lt;/a&gt;दुनिया से बेख़बर रंगो की दुनिया में&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;जो पराई पीढ़ा के अहसास को समझने वाले थे। सवाल वही है क्या आपने कभी अपना जन्मदिन या कोई और त्योहार ऐसे मनाने के बारे में कभी सोचा है। ज़रा ग़ौर से सोचिए&lt;br /&gt;ज़फर तुम्हें सलाम!!!&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/3093588312781968550/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/10/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/3093588312781968550'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/3093588312781968550'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/10/blog-post.html' title='क्या आपने मनाई कभी ऐसी गांधी जयंती'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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href=&quot;http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOJ35e2tDPI/AAAAAAAABXo/7RZ7nl703hE/s1600-h/redfort.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOJ35e2tDPI/AAAAAAAABXo/7RZ7nl703hE/s400/redfort.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5251891944886177010&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अभी कुछ ही दिन हुए हैं इस ख़ाब को पूरा हुए, पीछे मुड़कर देखता हूं तो वो सारे मंज़र याद आते हैं, जब मैंने इस खाब की पहली सीढ़ी पर एक एक ईंट रख कर हकीकत की दहलीज तक पहुंचाने वाले कई सारे पाएदान बनाए। खैर गिरते पड़ते चढ़ते चढ़ते मैं चढ़ ही आया हूं, जिस दिन चला था तो धमाकों ने स्वागत किया, जब से यहां हूं तो कभी गोलियों तो कभी धमाकों की गूंज आसपास ही सुनाई देती है। फिर अगर कहूं कि दिल्ली में दिल लग गया है, तो इसमें कोई बेदिली वाली बात नहीं होगी। इसमें उन सब लोगों का हाथ तो है ही जिन्होंने यहां तक पहुंचने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन उन सब का बड़ा किरदार है जो अहसास कराते रहे कि ये सब ख़ाब की बातें हैं, लेकिन यहां पहुंचते ही जिन्होंने सब से पहले हाथ थामा शैलेस भारतवासी और सजीव सारथी वो इन सबसे अलग ख़ास जगह रखते हैं। बाकी पूरी दिल्ली दिल में सहेज के रखने लायक हो जाउं, कुछ ऐसा करने की सोच रहा हूं।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/8235843710052881127/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/09/blog-post_30.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8235843710052881127'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8235843710052881127'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/09/blog-post_30.html' title='आखिर दिल्ली में लग गया दिल'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SOJ35e2tDPI/AAAAAAAABXo/7RZ7nl703hE/s72-c/redfort.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-4848574773449109618</id><published>2008-07-04T22:45:00.007+05:30</published><updated>2013-06-03T21:11:09.179+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="movie-review"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फिल्म समीक्षा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बॉलीवुड"/><title type='text'>जाने तू या जाने न</title><content type='html'>&lt;strong&gt;रेटिंग ****&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;आमीर खान युवाओं की नब्ज बखूबी पहचानते हैं और लेखक से निर्देशक बने अब्बास टायरवाला अभी खुद युवा हैं, इस लिए जाने तू या जाने न के जरिए उन्होंने टार्गेट ऑडियेंस को पूरी तरह से खुश कर लिया है।&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SG5cgbUzb4I/AAAAAAAABOI/PvFApuauBpk/s1600-h/12917.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SG5cgbUzb4I/AAAAAAAABOI/PvFApuauBpk/s320/12917.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5219210730329567106&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;स्टार कास्ट&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इमरान खान&lt;br /&gt;जेनीलिया&lt;br /&gt;नसरुद्दीन शाह&lt;br /&gt;रत्ना पाठक शाह&lt;br /&gt;परेश रावल&lt;br /&gt;सोहेल खान&lt;br /&gt;अरबाज खान&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;डायरेक्टर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अब्बास टायरवाला&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;कहानी जय (इमरान खान) और अदिती (जेनीलिया) की है, जिनका पूरा फ्रेंड्स ग्रुप और पेरेंट्स मानते हैं कि वह एक दूसरे को प्यार करते हैं, लेकिन खुद उन्हें ही अहसास नहीं होता। फिर जय की जिंदगी में मेघना (मंजरी) और अदिती की जिंदगी में सुशांत (अयाज खान) आते हैं, तभी दोनों दोस्तों को दिल में छिपे प्यार का अहसास होता है। कहानी रुटीन है और क्लाइमेक्स भी कई फिल्मों में देखा हुआ। डिफरेंट है तो ट्रीटमेंट, सबसे बड़ी बात आमिर और अब्बास ने फिल्म को मेट्रो शहरों के आम युवा से सहजता से जोड़ा है। लव स्टोरी में पेरेंट्स-बेटी, मां-बेटा, भाई-बहन के रिश्ते पिसे नहीं हैं। यही वजह है कि हर युवा खुद को कहानी से रिलेट कर सकता है। इमरान पहली ही फिल्म में अदाकारी की पुख्तगी का अहसास करवाते हैं। जेनेलिया भी गहरी छाप छोड़ती हैं। दोस्तों के ग्रुप में अनुराधा पटेल, जयंत, अलिशका, निरव, कर्न, सुगंधा, प्रतीक, रेणुका सबने अपने किरदार को बखूबी जिया है। रत्ना पाठक शाह और नसरूद्दीन की केमिस्ट्री हम पांच की याद दिलवाती है। दोनों ही शानदार हैं। परेश रावल छोटे से किरदार में जोरदार हैं। सोहेल और अब्बास जरुर इरीटेट करते हैं। एआर रहमान के दो गाने पप्पू को डांस नहीं आता और कहो न कहो पहले ही हिट हो चुके हैं। &lt;br /&gt;----------------------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रेटिंग चिन्ह---*पैसा बर्बाद/ **बस ठीक ठाक है/ *** पैसा वसूल/ ****जरूर देखें/ ****बेहतरीन &lt;/strong&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/4848574773449109618/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/07/blog-post_04.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/4848574773449109618'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/4848574773449109618'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/07/blog-post_04.html' title='जाने तू या जाने न'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SG5cgbUzb4I/AAAAAAAABOI/PvFApuauBpk/s72-c/12917.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-8865581782054155136</id><published>2008-07-04T02:49:00.007+05:30</published><updated>2013-06-03T21:11:09.182+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="movie-review"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फिल्म समीक्षा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बॉलीवुड"/><title type='text'>लव स्टोरीः आधी  2008 बाकी 2050</title><content type='html'>&lt;strong&gt;रेटिंग ***&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;हवा में उड़ती कारें, उंगली के इशारे पर काम करती घरों की दीवारे, आगे पीछे घूमते और हुक्म बजाते रोबोट और मीशीनी जिंदगी में कहीं पनपती एक लव-स्टोरी। यही है लव स्टोरी 2050 की कहानी। भई फिल्म का नाम 2050 है, लेकिन आधी फिल्म तो 2008 में ही गुजर जाती है।&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SG1DwLqd59I/AAAAAAAABOA/YFfS0NXI2gU/s1600-h/12430.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SG1DwLqd59I/AAAAAAAABOA/YFfS0NXI2gU/s320/12430.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5218902038235965394&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;स्टार कास्ट&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हरमन बवेजा&lt;br /&gt;प्रियंका चोपड़ा&lt;br /&gt;बोमन इरानी&lt;br /&gt;अर्चना पूर्ण सिंह&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;डायरेक्टर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हैरी बवेजा&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शूटिंग लोकेशन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आस्ट्रेलिया, न्यू यार्क, मुंबई&lt;/blockquote&gt; वो भी मौजूदा मुंबईया स्टाइल लव स्टोरी में जिसमें प्रेमी हर रोज &#39;होने वाली प्रेमिका&#39; के घर के चक्कर लगाता है, वो रोज डेट पर जाने के लिए मना करती है और फिर मान जाती है। लेकिन हैरी बवेजा ने इस बात को दो-तीन बार रिपीट करके तेजी से शुरू हुए पहले हाफ को कुछ ही देर बाद धीमा और बोर बना देता है। फिर भी अच्छी ओपनिंग, खास कर तेज़ रफ्तार पसंद करने वाले युवाओं को बांधने में कामयाब रहे हैं। हरमन बवेजा की एंट्री भी ठीक ठाक रही है। फिल्म की कहानी रुटीन लव स्टोरीज जैसी है, जिसमें पहले जन्म में प्रेमिका की मौत के बाद प्रेमी उसे ढूंढता फिरता है। बस इसमें नया ये है कि इस बार पुर्नजन्म की बजाए प्रेमी टाइम मशीन में बैठ कर 42 साल आगे चला जाता है। लेकिन घबराइए मत पहले हाफ से निराश होकर सिनेमा हाल छोड़ कर मत जाइए, दूसरे हाफ में फिल्म सब को चकित करती है। खास कर 2050 में कल्पित रोबो वल्र्ड हवा में उड़ती कारें, आसमान से उलटी लटक कर चलती ट्रेंन, वर्चुयल नियोन साइन बोर्ड और बोलते यूनीपोल, हवा में तैरती स्टेज के साथ ही मुंबई में हजारों मंजिली इमारतों के साथ ही समंदर में बनाए गए शीशे के घर आपको जरुर अकर्षित करेंगे। एडवांस दौर में हर काम में मदद करते रोबोट आपको काफी क्यूट लगेंगे।  खास कर प्रिंयका चोपड़़ा का नन्हां पिंंक रोबो, जो उसके दिल में पनपते प्यार को न सिर्फ बखूबी समझता है, बल्कि हीरो के रोबो से सारी बातें शेयर भी करता है। हैरी बवेजा ने अपने बेटे को स्थापित करने के लिए स्क्रिप्ट और सक्रीन प्ले पर खास ध्यान दिया है। यहां तक कि खतरनाक ताकतों वाला विलेन उस पर हावी न हो उसके चेहरे को नकाब में ही रखा गया है। एक्टिंग की बात करें तो विभिन्न इमोशंस को एक्सप्रेस करने में हरमन काफी हद तक सफल रहें हैं, फिर भी उन्हें काफी मेहनत करनी होगी। जो लोग उनके चेहरे को ऋतिक रोशन से मिला रहे हैं, उन्हें हरमन में कुछ डिफरेंट देखने को मिलेगा। डांस, एक्शन, रोमांस, इमोशनल, ट्रेजेडी और कॉमेडी हर तरह के सीन फिल्म में उनके लिए खास तौर पर रखे गए हैं, शायद पापा हैरी साबित करना चाहते थे कि जूनियर बवेजा में पूरा फिल्मी मैटिरियल है। प्रियंका एतराज के बाद एक बार फिर काफी हॉट और सेक्सी लगी हैं। चाहे ड्रेसेस हों या सेकेंड हॉफ में 2050 की स्टाइल उनकी हर चीज में गलैमर देखने को मिला है। बोमन इरानी भी अपने किरदार को जी गए हैं। अर्चना पूर्ण सिंह भी ठीक ठाक लगी हैं। म्यूजिक के मामले में अनु मलिक इस बार भी निराश ही करते हैं। मीलों का फासला खास कर सैड वर्शन जरुर प्रभाव छोड़ता है। खैर सभी चीजों का गुलदस्ता सजा हैरी बवेजा का निर्देशन लोगों को बांधने में सफल रहा है, अगर वह पहले हाफ में थोड़ी कैंची चलाने का साहस दिखाते तो सक्रीनप्ले में और कसाव आता। विजय अरोड़ा और किरण दियोहंस की सिनेमेटोग्राफी भी फिल्म का साकारात्मक पक्ष है। खास कर आस्ट्रेलिया के समंदर के आस पास की लोकेशंस को उन्होंने खूबसूरती से फिल्माया है। ग्राफिक्स के पीछे नजर आता मुंबई भी उनके कैमरा वर्क को बखूबी दिखाता है। ग्राफिक्स के मामले में लव स्टोरी 2050 को बॉलीवुड में क्रांति कहा जा सकता है। अगर ऐसी फिल्में बनने लगे तो बॉलीवुड का हॉलीवुड करन होने में देर नहीं लगेगी। फिल्म युवाओं को तो जरुर आकर्षित करेगी, लेकिन उससे पहली पीढ़ी को दूसरे हाफ में वीडियो गेम्स पर आधारित फाइटिंग सीन्स शायद ही समझ आएं। फिल्म में एक और चीज काबिले जिक्र है वनिता उमंग कुमार का आर्ट, 2050 की तकनीकी दुनिया को उभारने में उनका आर्ट वर्क खास भूमिका निभाता ही है, उसमें भारतीय संस्कृति की छाप भी नजर आती है। खास कर प्रियंका चोपड़ा द्वारा कमरे का रंग गुलाबी करने वाले सीन में दीवारों पर लिखे श्लोकों में इसकी झलक मिलती है। &lt;strong&gt;पिक्चर अभी बाकी है दोस्त एक और सरप्राइज फिल्म में हरमन बवेजा का क्लोन भी देखने को मिलेगा, सो कम ऑन दोस्तो हरमन को हरमन से लड़ते देखते हैं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रेटिंग चिन्ह---*पैसा बर्बाद/ **बस ठीक ठाक है/ *** पैसा वसूल/ ****जरूर देखें/ ****बेहतरीन&lt;/strong&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/8865581782054155136/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/07/2008-2050.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8865581782054155136'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8865581782054155136'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/07/2008-2050.html' title='लव स्टोरीः आधी  2008 बाकी 2050'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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href=&quot;http://bp2.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SGvwmdCgLpI/AAAAAAAABNg/R4XbEk9c-tE/s1600-h/Bullehshah.jpg&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5218529136659672722&quot; src=&quot;https://bp2.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SGvwmdCgLpI/AAAAAAAABNg/R4XbEk9c-tE/s320/Bullehshah.jpg&quot; style=&quot;cursor: hand; cursor: pointer; float: right; margin: 0 0 10px 10px;&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बाबा बुल्ले शाह के बिना और कौन समझा सकता है। जिसका आशिक होने से समाज लोग काफिर काफिर कहने लगे, बुल्ला उसी के नाम के घूंघरू पहन आहो आहो (हांजी-हांजी) कहता हुआ गलियों में नंगे पांव नाचता फिरता है। सैय्यद (उंची जात) बुल्ला ही अराई (नीची जात) शाह अनायत अली का मुरीद हो सकता है और जब उसकी बहनें और भाभियां कहती हैं-&lt;br /&gt;&lt;center&gt;&lt;br /&gt;बुल्ले नू समझावण आइयां भैणां ते भरजाइयां&lt;br /&gt;बुल्ले तूं की लीकां लाइयां छड्ड दे पल्ला अराइयां&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;तो बुल्ला ही गा सकता है-&lt;br /&gt;&lt;center&gt;&lt;br /&gt;अलफ अल्हा नाल रत्ता दिल मेरा,&lt;br /&gt;मैंनू &#39;बे&#39; दी खबर न काई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&#39;बे&#39; पड़देयां मैंनू समझ न आवे,&lt;br /&gt;लज्जत अलफ दी आई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐन ते गैन नू समझ न जाणां&lt;br /&gt;गल्ल अलफ समझाई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुल्लेया कौल अलफ दे पूरे&lt;br /&gt;जेहड़े दिल दी करन सफाई&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;(जिसकी अल्फ यानि उस एक की समझ लग गई उसे आगे पढऩे की जरुरत ही नहीं। अल्फ उर्दू का पहला अक्षर है बुल्ले ने कहा है, जिसने अल्फ से दिल लगा लिया, फिर उसे ऐन-गेन नहीं भाता)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा बुल्ले शाह का जन्म 1680 इसवी में बहावलपुर सिंध के गांव उच गैलानीयां में शाह मुहमंद दरवेश के घर हुआ, जो मुसलमानों में मानी जाती उंची जाति सैय्यद थे। इनका काम मसजिदों में इमामीयत और धर्म प्रचार हुआ करता था। जब बुल्ले को उस्ताद गुलाम मुर्तजा के पास तालीम दिलाने के लिए भेजा गया, तो उसने सारंगी उठा ली। मौलवी शाह मुहंमद दरवेश का ये बेटा तब बुल्ले शाह हो गया। सैय्यदों का बुल्ले शाह फिर निकला इशक हकीकी की तलाश में और छोटी समझी जाती अराईं जाति के सूफी फकीर हजऱत शाह अनायत कादरी का मुरीद हो गया। कसूर के मौलाना का बेटा काफिर हो गया। घर वालों की नाराजगी और हकूमत का गुस्सा जब फूटा, तो बुल्ला अपना घर-बार छोड़ बनजारा हो गया। बुल्ले शाह ने पंजाबी सूफी साहित्य को शाहकार रचनाएं दी। 162 काफीयां,  एक अठवारा, एक बारहमाहा, तीन शीहहर्फीयां, 49 दोहे और 40 गांठे लिखी। नाम-जाति-पाति, क्षेत्र, भाषा, पाक-नापाक, नींद-जगने, आग-हवा, चल-अचल के दायरे से खुद को बाहर करते हुए खुद के अंदर की खुदी को पहचानने की बात बुल्ले शाह यूं कहता है-&lt;br /&gt;&lt;center&gt;&lt;br /&gt;बुल्ला की जाना मैं कौन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ना मैं मोमन विच मसीतां न मैं विच कुफर दीयां रीतां&lt;br /&gt;न मैं पाक विच पलीतां, न मैं मूसा न फरओन&lt;br /&gt;बुल्ला की जाना मैं कौन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न मैं अंदर वेद किताबां, न विच भंगा न शराबां&lt;br /&gt;न रिंदा विच मस्त खराबां, न जागन न विच सौण&lt;br /&gt;बुल्ला की जाना मैं कौन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न मैं शादी न गमनाकी, न मैं विच पलीती पाकी&lt;br /&gt;न मैं आबी न मैं खाकी, न मैं आतिश न मैं पौण&lt;br /&gt;बुल्ला की जाना मैं कौन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न मैं अरबी न लाहौरी, न मैं हिंदी शहर नगौरी&lt;br /&gt;न हिंदू न तुर्क पिशौरी, न मैं रेहदंा विच नदौन&lt;br /&gt;बुल्ला की जाना मैं कौन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न मैं भेत मजहब दा पाया, न मैं आदम हव्वा जाया&lt;br /&gt;न मैं अपना नाम धराएया, न विच बैठण न विच भौण&lt;br /&gt;बुल्ला की जाना मैं कौन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अव्वल आखर आप नू जाणां, न कोई दूजा होर पछाणां&lt;br /&gt;मैंथों होर न कोई स्याना, बुल्ला शौह खड़ा है कौन&lt;br /&gt;बुल्ला की जाना मैं कौन&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;और जब पैरों में घूंघरूं बांध गली गली प्यारे के गीत गाता बुल्ले शाह अनायत की नजरे इनायत से अपने पीर को पाता है, तो अपनी सखीयों (हम सब जीव आत्मा हैं) को पुकारता है-&lt;br /&gt;&lt;center&gt;&lt;br /&gt;आवो सईयों रल देवो नी वधाई&lt;br /&gt;मैं वर पाया रांझा माही&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अज तां रोज़ मुबारक चढ़ेया, रांझा साड्डे वेहड़े वड़ेया&lt;br /&gt;हथ्थ खूंडी मोडे कंबल धरेया, चाकां वाली शकल बनाई&lt;br /&gt;मैं वर पाया रांझा माही, आवो सईयों रल देवो नी वधाई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुकट गऊआं दे विच रुलदा, जंगल जूहां दे विच रुलदा&lt;br /&gt;है कोई अल्हा दे वल भुलदा, लसल हकीकत खबर न काई&lt;br /&gt;मैं वर पाया रांझा माही, आवो सईयों रल देवो नी वधाई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुल्ले शाह इक सौदा कीता, पीता ज़हर प्याला पीता&lt;br /&gt;न कुझ लाहा टोटा लीता, दर्द दुखां दी गठड़ी चाई&lt;br /&gt;मैं वर पाया रांझा माही,  आवो सईयों रल देवो नी वधाई&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;1757 में अपने रांझे संग बुल्ला शाह तो इश्क हकीकी के गीत गाता हुआ, आसमान में तारा बन चमकने को इस धरती को अलविदा कह चला गया, लेकिन आज भी उसी कसूर पाकिस्तान में बाबा बुल्ले शाह की दरगाह पर उसके मुरीद सूफी गीत दिन भर गाते हुए, झूमते नजर आते हैं। हीर-रांझे के वसल के पलों को बयान करती इस काफ़ी को आपके लिए चर्चित पंजाबी गायक जसबीर जस्सी की आवाज में यहां पर संकलित कर रहा हूं। सुनिए और आनंद लीजिए बुल्ले शाह के असली सूफी संगीत का..&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; frameborder=&quot;0&quot; height=&quot;270&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/https://youtu.be/Sm_8BVl_9ik&quot; width=&quot;480&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt; &lt;br /&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/1860295770951529532/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/07/baba-bulleh-shah-biography-poetry-hindi.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/1860295770951529532'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/1860295770951529532'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/07/baba-bulleh-shah-biography-poetry-hindi.html' title='लोकी काफर काफर आखदे, तू आहो आहो आख'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://bp2.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SGvwmdCgLpI/AAAAAAAABNg/R4XbEk9c-tE/s72-c/Bullehshah.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-3204044162596503712</id><published>2008-06-15T16:39:00.003+05:30</published><updated>2008-06-15T16:46:28.060+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कवि मित्र"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कविता"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सरोकार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>पाप का घड़ा</title><content type='html'>अमेरीकी राजनीति और अर्थव्यवस्था जिस तरह से पूरी दुनिया के आर्थिक और राजनैतिक हालातों को प्रभावित करती है, ठीक उसी तरह मानवीय संवेदनाओं पर भी उसका गहरा असर होता है। इसका प्रमाण एक कवि की संवेदना से बेहतर और क्या हो सकता है। इराक में अमेरीकी दमन की भयावह तस्वीर दिखाती &lt;a href=&quot;http://geetchaturvedi.blogspot.com/2008/05/blog-post_17.html&quot;&gt;गीत चर्तुवेदी की वैतागवाड़ी &lt;/a&gt;पर कुछ दिन पहले प्रकाशित हुई कविता ने मुझे कई रातों तक चैन से सोने नहीं दिया। उसी कड़ी में पंजाबी के युवा आलोचक व कवि तसकीन की एक कविता पंजाबी के प्रौढ़ कवि परमिंदरजीत द्वारा संपादित साहित्य मैगज़ीन अक्खर में छपी है। तसकीन से मेरी मित्रता पिछले करीब डेढ़ साल में हुई कुछ ही मुलाकातों जितनी पुरानी है। मार्क्सवादी विचाराधारा के इस प्रतिबद्ध मित्र का आलोचक वाला रुप तो मैंने कुछ आयोजनों में देखा था और चुनिंदा निजी मुलाकातों में कई बार चाहे मै उनकी विचारों से मैं सहमत न भी रहा होउं, लेकिन पहली बार पढ़ी उनकी कविताओं ने मुझे जरुर प्रभावित किया है। तसकीन अक्सर कहता है, अगर आप इस ओर नहीं हैं, तो इसका मतलब है आप उस ओर हैं। खैर विचारों के जाल में उलझाने की बजाए मैं उनकी पंजाबी कविता के हिंदी अनुवाद से रुबरु करवाता हूं, जिसमें वह बुश के नए अर्थों और उसके पाप का घड़ा भर जाने की बात कर रहे हैं। ये कविता भी अमेरिका में बदले राजनीतिक हालातों से प्रभावित लगती है। आप भी पढि़ए और सोचिए&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;--------------------&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पाप का घड़ा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम कैसे जान सकते हैं&lt;br /&gt;कि घरों से थोड़ी सी दूरी पर&lt;br /&gt;ग्लोबल गांव में&lt;br /&gt;गोलियों की फुहार&lt;br /&gt;बम्बों की बारिश&lt;br /&gt;कैसे बरस रही है&lt;br /&gt;सड़कों पर दौड़ रही&lt;br /&gt;&#39;अपाहिजों&#39; को कुचल रही&lt;br /&gt;घरों से निकलती&lt;br /&gt;तेज़ रफ्तार&lt;br /&gt;लम्बी गाडि़यों में&lt;br /&gt;उफनता ईंधन&lt;br /&gt;किसके लहू में से गुज़रता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम तो बुश का अर्थ &lt;br /&gt;झाडि़यां ही निकालते रहे&lt;br /&gt;लेकिन &#39;पाताल की धरती&#39; ने&lt;br /&gt;हमारे समय में&lt;br /&gt;उलट दिए हैं&lt;br /&gt;बुश के अर्थ&lt;br /&gt;किसी मिथ के बदल जाने की तरह&lt;br /&gt;झाड़ियां तो अब&lt;br /&gt;तन्हा जिंदगियों के लिए&lt;br /&gt;भूत&lt;br /&gt;प्रेतों&lt;br /&gt;दैत्यों जैसे&lt;br /&gt;रुप बदल चुकी हैं&lt;br /&gt;बुश के नए अर्थों में&lt;br /&gt;धरती लाल रंग की है&lt;br /&gt;जिस पर फैले हैं&lt;br /&gt;बच्चों के बिलखते बोल&lt;br /&gt;बच्चों के चित्थड़ों के पास बैठी माएं&lt;br /&gt;भरी छातियों संग&lt;br /&gt;दूध पिलाने का करती हुई इंतज़ार&lt;br /&gt;पिघल रही हैं बूंद बूंद&lt;br /&gt;घरों से थोड़ी सी दूरी पर&lt;br /&gt;मास के लोथड़े&lt;br /&gt;लहू मास&lt;br /&gt;कुचले जा रहे इंसान&lt;br /&gt;सब शैतान हैं&lt;br /&gt;सूखे थनों से चिपकी बच्ची&lt;br /&gt;धरती के दुश्मनों&lt;br /&gt;स्पोलियों को जन्म नहीं देगी&lt;br /&gt;पाप इस धरती से धुल रहा है&lt;br /&gt;जल्दी जल्दी, धीमे धीमे&lt;br /&gt;बुश के इन नए अर्थों में&lt;br /&gt;हमें &#39;काम से घर जाते हुए&#39;&lt;br /&gt;नथुनों में खरखरी नहीं होती&lt;br /&gt;सड़ रहे मांस की&lt;br /&gt;बाज़ार तो इत्र से&lt;br /&gt;सराबोर हैं&lt;br /&gt;बुश के इन नए अर्थों में&lt;br /&gt;&#39;पाप का घड़ा है&lt;br /&gt;जो भर कर टूट रहा है।&#39;&lt;/strong&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/3204044162596503712/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/3204044162596503712'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/3204044162596503712'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/06/blog-post.html' title='पाप का घड़ा'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-183968676445386033</id><published>2008-05-15T04:33:00.003+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.294+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आवारापन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कविता"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="यादें"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शख्सियत"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>आंसूओं का भाड़ा</title><content type='html'>शिव की दीवानगी का सिलसिला मेरी जवानी के साथ ही शुरू हुआ और कब ये इश्क पागलपन तक पहुंच गया,खुद मुझे मालूम नहीं। तीन साल पहले की बात है, पता चला कुछ साहित्यकार दोस्त बटाला जा रहे हैं। मैंने एक दम कह दिया मैं भी चलूंगा, वहां पर साहित्य समारोह था, सभी उसमें शिरकत करने जा रहे थे। मुझे कवि गुरभजन गिल ने कहा सुबह 6 बजे जाना होगा, तुम पंजाबी भवन पहुंच जाना। अगली सुबह मैं छह से पहले वहां पहुंच गया। इसे मेरी खुशनसिबी समिझए कि जिस होटल में ये कार्यक्रम था, उसके ठीक सामने शिव की याद में एक ऑडिटोरियम बन रहा था। दो बार नींव पत्थर रखे जाने के बावजूद उसकी हालत पखाने से बद्दतर थी। जंग लगा बड़ा से गेट पर ताला लटक रहा था। डा.जगतार धीमान ने मुझे दीवार फांद अंदर जाने की सलाह दी, वो भी मेरे साथ हो लिए। बीस पच्चीस कदम दीवार पर चलने के बाद हम अंदर के दरवाजे के सामने पहुंच कर नीचे कूद गए। ऑडिटोरियम में अंधेरा था और  बैठने वाली सीढि़यों के दायरे के रुप में सीमेंट ईंट का ढांचा खड़ा था। उसके बीच मिट्टी के ढेर पड़े थे। बीचों बीच दो ढेर बिल्कुल गोल पहाड़ी की तरह करीब 5 फुट उंचाई तक होंगे, मैं यूं ही मस्ती में उन पर कोहनी रख कर खड़ा हो गया। धीमान साहब फोटो खींचने में बिजी थे, अचानक उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो चेताने वाले लहजे में बोले वहां से हट जा उसमें सांप हो सकता हैं। मैं हैरान था, मुझे पता चला ये सांप की बाम्बियां है। वहां से हटने से पहले ही मेरे दिमाग में बात गूंज गई कि शिव जिंदगी भर अपने गीतों में सांप और उनकी वर्मियों की बातें करता रहा और आज वह उसकी अधूरी खंडहर यादगार पर भी कुंडली मारे बैठे हैं, मैंने उन्हीं के साथ फोटो खिचवाई। अफसोस के वो फोटो आज तक नहीं मिल सके।&lt;br /&gt; उसी दोपहर को बटाले वाले सुभाष कलाकार और रंधावा के साथ हम शिव का घर देखने गए। घर बंद पड़ा था,जो कोई वहां पर रहता था, मौजूद नहीं था। पड़ोसियों ने मेरी आंखों की अकांक्षा समझ ली शायद और उनके घर की सीढि़यां चढ़ कर दीवार फांद कर हम शिव के उस छोटे से चौबारे में पहुंचे, जहां पर कहते हैं शिव ने कई खूबसूरत शामें गुजारी हैं। बिल्कुल खाली पड़ा कमरा, गली को खुलती लोहे की सलाखों वाली खिड़की और ठंडा सीमेंट का फर्श। कुछ पल खिड़की के पार झांकते हुए मैंने सोचा शायद शिव भी यूं अपना शहर यहां से देखता होगा। फिर न जाने क्या सूझी के ठंडे फर्श पर मैं लेट गया। एक पल लगा मानों मैं हल्का पंख हो गया फर्श की ठंडक भरी गोद में यूं लगा शिव की गोद में सो रहा हूं। आवाज गूंजी चलो चलें तो मेरा खाब टूटा भीगी पलकों के साथ खड़ा हुआ, तो दो बूंदें फर्श पर गिर पड़ी, मुझे याद आ गया शिव ने कहा था, भट्ठी वालिए चम्बे दिए डालिए पीड़ां दा परागा भुन दे, तैनूं देआं हंझूआं दा भाड़ा अंदर से आवाज गूंजी शिव तेरे फर्श पर दो पल सकून के गुजारने का भाड़ा मेरे दो आसूं रख लेना शायद यही मेरे लिए तसल्ली की बात थी कि पीड़ां दा परागा भुनाने के बदले आंसूओं का भाड़ा देने वाले शिव को मैंने उसी का सरमाया लौटाया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गीत चतुर्वेदी जी ने शिव पर एक ज्ञानपर्क पोस्ट लिखी है, उसे हूबहू पेश कर रहा हूं। इसके लिए उनका आभार। उनके ब्लॉग पर ये पोस्ट पढ़ने से आपको शिव की आवाज सुनने और इंटरव्यू देखने का भी मौका बोनस में मिल सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यौवन की ऋतु में जो भी मरता है, &lt;br /&gt;वह या तो फूल बन जाता है या तारा। &lt;br /&gt;यौवन की ऋतु में आशिक़ मरता है &lt;br /&gt;या फिर करमों वाला। &lt;br /&gt;- शिव बटालवी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहां बहुत उम्‍दा कवि हुए हैं, लेकिन ऐसे कम ही हैं, जिन्‍हें लोगों का इतना प्यार मिला हो। हिंदी में बच्चन को मिला, उर्दू में ग़ालिब और फ़ैज़ को. अंग्रेज़ी में कीट्स को. स्पैनिश में नेरूदा को. पंजाबी में इतना ही प्यार शिव को मिला. शिव कुमार बटालवी. शिव हिंदी में कितना आया, यह अंदाज़ नहीं है. पंजाब आने से पहले मैंने सिर्फ़ शिव का नाम पढ़ा था. इतना जानता था कि कोई मंचलूटू गीतकार था. पर शिव सिर्फ़ मंच नहीं लूटता. उसकी साहित्यिक महत्ता भी है. उसे पढ़ने, सुनने के बाद यह महसूस होता है. वह अकेला कवि है, जिसकी कविता मैंने अतिबौद्धिक अभिजात अफ़सरों के मुंह से भी सुनी है और साइकिल रिक्शा खींचने वाले मज़दूर के मुंह से भी. ऐसी करिश्माई बातें हम नेरूदा के बारे में पढ़ते हैं. पंजाब में वैसा शिव है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1973 में जब शिव की मौत हुई, तो उसकी उम्र महज़ 36 साल थी। उसने सक्रियता से सिर्फ़ दस साल कविताएं लिखीं. इन्हीं बरसों में उसकी कविता हर ज़बान तक पहुंच गई. 28 की उम्र में तो उसे साहित्य अकादमी मिल गया था. प्रेम और विरह उसकी कविता के मूल स्वर हैं. वह कविता में क्रांति नहीं करता. मनुष्य की आदत, स्वभाव, प्रेम, विरह और उसकी बुनियादी मनुष्यता की बात करता है. वह लोककथाओं से अपनी बात उठाता है और लोक को भी कठघरे में खड़ा करता है. जिस दौर में लगभग सारी भारतीय भाषाओं में कविता नक्‍सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित थी, शिव बिना किसी वाद में प्रवेश किए एक मेहनतकश आदमी की संवेदनाओं और भावनात्मक विश्वासों की बात कर रहा था. इसीलिए पंजाबी कविता के प्रगतिशील तबक़े ने शिव को सिरे से ख़ारिज कर दिया. हालांकि उसकी कविता इतनी ताक़तवर है कि अब तक लोकगीतों की तरह सुनी-गाई जाती है. कहते हैं, एक बार पाश ने शिव का गला पकड़ लिया था, किसी मंच पर. पाश को शिव की कविता पसंद नहीं थी. ख़ैर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिव की बरसी पिछले सप्ताह ही बीती है। यहां शिव की एक कविता प्रस्तुत है, जो पंजाबी में ही है. शिव बहुत सुंदर था. नाम था. कविताओं की गूंज थी. कहते हैं, एक वरिष्ठ साहित्यकार की बेटी उस पर फिदा हो गई. नाराज़ होकर बाप ने लड़की को लंदन भेज दिया. तो उस &#39;खो गई लड़की&#39; के लिए शिव ने यह कविता लिखी थी, जिसका असली शीर्षक है इश्तेहार. सरल-सी यह कविता सरल-सी पंजाबी में है. इसका अनुवाद मेरे बस का नहीं है, पर ऐसे भी यह समझ में आ जाती है. न आए, तो मुझे क्षमा करेंगे और बता देंगे, ताकि आगे ऐसी भूल न करूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत &lt;br /&gt;गुम है गुम है गुम है&lt;br /&gt;साद मुरादी सोहणी फब्बत&lt;br /&gt;गुम है गुम है गुम है &lt;br /&gt;सूरत उसदी परियां वरगी&lt;br /&gt;सीरत दी ओह मरियम लगदी&lt;br /&gt;हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने &lt;br /&gt;तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी&lt;br /&gt;लम्म सलम्मी सरूं क़द दी&lt;br /&gt;उम्र अजे है मर के अग्ग दी&lt;br /&gt;पर नैणां दी गल्ल समझदी&lt;br /&gt;गुमियां जन्म जन्म हन ओए&lt;br /&gt;पर लगदै ज्यों कल दी गल्ल है &lt;br /&gt;इयों लगदै ज्यों अज्ज दी गल्ल है &lt;br /&gt;इयों लगदै ज्यों हुण दी गल्ल है &lt;br /&gt;हुणे ता मेरे कोल खड़ी सी &lt;br /&gt;हुणे ता मेरे कोल नहीं है &lt;br /&gt;इह की छल है इह केही भटकण &lt;br /&gt;सोच मेरी हैरान बड़ी है &lt;br /&gt;नज़र मेरी हर ओंदे जांदे &lt;br /&gt;चेहरे दा रंग फोल रही है &lt;br /&gt;ओस कुड़ी नूं टोल रही है &lt;br /&gt;सांझ ढले बाज़ारां दे जद &lt;br /&gt;मोड़ां ते ख़ुशबू उगदी है &lt;br /&gt;वेहल थकावट बेचैनी जद &lt;br /&gt;चौराहियां ते आ जुड़दी है &lt;br /&gt;रौले लिप्पी तनहाई विच &lt;br /&gt;ओस कुड़ी दी थुड़ खांदी है &lt;br /&gt;ओस कुड़ी दी थुड़ दिसदी है &lt;br /&gt;हर छिन मैंनू इयें लगदा है &lt;br /&gt;हर दिन मैंनू इयों लगदा है &lt;br /&gt;ओस कुड़ी नूं मेरी सौंह है&lt;br /&gt;ओस कुड़ी नूं आपणी सौंह है&lt;br /&gt;ओस कुड़ी नूं सब दी सौंह है &lt;br /&gt;ओस कुड़ी नूं रब्ब दी सौंह है &lt;br /&gt;जे किते पढ़दी सुणदी होवे &lt;br /&gt;जिउंदी जां उह मर रही होवे &lt;br /&gt;इक वारी आ के मिल जावे &lt;br /&gt;वफ़ा मेरी नूं दाग़ न लावे &lt;br /&gt;नई तां मैथों जिया न जांदा &lt;br /&gt;गीत कोई लिखिया न जांदा &lt;br /&gt;इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत &lt;br /&gt;गुम है गुम है गुम है &lt;br /&gt;साद मुरादी सोहणी फब्बत &lt;br /&gt;गुम है गुम है गुम है। &lt;/strong&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/183968676445386033/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/05/blog-post.html#comment-form' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/183968676445386033'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/183968676445386033'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/05/blog-post.html' title='आंसूओं का भाड़ा'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-5750875352775364933</id><published>2008-04-26T18:03:00.001+05:30</published><updated>2013-06-03T21:11:09.181+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="movie-review"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फिल्म समीक्षा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बॉलीवुड"/><title type='text'>ये कैसी &#39;टशन&#39;</title><content type='html'>&lt;a href=&quot;http://1.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SBMhvzv0ncI/AAAAAAAAAVs/sfIkJUtGDG0/s1600-h/13446.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://1.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SBMhvzv0ncI/AAAAAAAAAVs/sfIkJUtGDG0/s320/13446.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5193531900516670914&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;साल की चिर प्रतिक्षित फिल्म के लिए अगर ये कहें कि &#39;खोदा पहाड़ और निकली चुहिया&#39; तो गल्त न होगा। भोजपुरिया डॉन से बदला लेने निकली उसके पूर्व बॉस की बेटी की कहानी 70 के दशक की फिल्मों की याद करवाती है। बेमतलब का एक्शन और ढांय ढांय कहानी में जान नहीं डाल पाती। बचपन की मोहब्बत की कहानी (करीना-अक्षय कुमार) और डॉन की गैंग में घुस कर उसके 25 करोड़ रुपए उड़ाकर बदला लेना अब लोगों को नहीं पचता। पहले हाफ में तो लोग कहानी की तलाश में सिर पकड़ लेते हैं। कॉल सेंटर में काम करने वाला और इंगलिश टीचर सैफ अली खान अपनी शुरूआती फिल्मों की तरह आशिक मिज़ाज है, जो हर रोज़ नई गर्ल फ्रेंड की तलाश में रहता है। (काश डायरेक्टर साहब ने उनकी ऐसी पुरानी फिल्मों का हश्र ध्यान में रखा होता) एक दिन उनकी मुलाकात भोली भाली सीधी सादी करीना से होती है। करीना के चक्कर में फंस सैफ, डॉन &#39;भैया जी&#39; यानि अनिल कपूर को अंग्रेजी सिखाने पहुंचता है। अदाओं को प्यार समझ धोखे के जाल में फंस कर सैफ करीना संग मिलके डॉन के 25 करोड़ उड़ा लेता है। लेकिन भई आज के ज़माने की हिरोईन और डॉन की पीए क्या सचमुच भोली भाली होगी? सो वो पैसे लेकर रफू चक्कर और अपने सैफ मियां बलि के बकरे बन जाते हैं। तभी एंट्री होती है जनाब बच्चन पांडे (अक्षय कुमार) की जो भैया जी के भक्त हैं और उनके नक्शे कदम पर चलते हुए डॉनगिरी में नाम कमाना चाहते हैं। न जाने हमारे फिल्मकारों को क्या हो गया है। यही जताने पर तुले हैं, आज कल के युवाओं के रोल मॉडल बस गुंडे ही हैं। कुछ हफ्ते पहले रिलीज हुई वन टू थ्री में तुषार का किरदार भी कुछ ऐसा ही था। खैर अब सैफ बच्चन की कस्टडी में है और करीना को ढूंढ कर लाने पर ही उसकी जान बख्शी जा सकती है। अक्षय कुमार पहले हाफ के मध्य में एंट्री के बाद फिल्म को पूरी तरह अपने कंधों पर उठा लेते, लेकिन बिना कहानी के हीरो फिल्म में जान नहीं डाल सकता। एक्शन के अलावा करीना को शादी के लिए प्रपोज करने की सलाह सैफ से लेने वाले सीन में अक्षय की एक्टिंग बेहद शानदार है। अनिल कपूर के भोजपुरी स्टाइल में हिंगलिश बोलना अखरता है। डायलाग समझने के लिए लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। दीवार के अमिताभ का इंगलिश स्टाइल कॉपी करने के चक्कर में वह अपने कैरेक्टर को बर्बाद कर गए, लेकिन एक्टिंग के मामले में उनका कोई सानी नहीं। करीना भी अपने रोल में सटीक बैठी हैं। &lt;br /&gt;खास कर उनका सीधी साधी लडक़ी से ग्लैमर डॉल बनते ही समंदर से निकलते हुए 5 सैकेंड का बिकिनी शो, लेकिन बॉक्स आफिस पर ये शो कितनी भीड़ जुटा पाता है कहना मुश्किल है। सैकेंड हाफ में गोलियों की बारिश में अकेले अक्षय का मजे से लडऩा और हाथ पर गोली लगने के बाद अगले ही सीन में वह करीना के बदन पर उसी हाथ को फिरा कर इश्क फरमाते नजर आते हैं और खरोंच एक भी नहीं। &lt;a href=&quot;http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SBMhwDv0ndI/AAAAAAAAAV0/y8RVH7hqTzw/s1600-h/still2.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:right; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SBMhwDv0ndI/AAAAAAAAAV0/y8RVH7hqTzw/s320/still2.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5193531904811638226&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;डायरेक्टर साहब ने 70 के दशक का प्लाट तो उठा लिया, लेकिन ये भूल गए शायद कि उन दिनों अगर हीरो के गोली गले, तो हीरोईन चाकू गर्म कर उसे निकाल कर पट्टी करती है, ही ही ही।। कानपुर का बच्चन सिंह जो मुश्किल से भोजपुरी अंदाज में हिंदी बोल पाता है, अचानक उर्दू लफ्जों वाले गीत फलक तक ले चल भी... गाने लगता है। वाह! डायरेक्टर साहब। फिल्म से बतौर डायरेक्टर विजय कृष्णा आचार्य बढ़ीया स्टार कास्ट के बावजूद कहानी के मामले में चूक गए। विशाल-शेखर का म्यूजिक भी निराश करता है। पंजाब के उदास गीतों का बादशाह सलीम का गाया टाइटल ट्रैक भी पूरे झमेले में कहीं खोकर रह गया।&lt;br /&gt;यश राज से पीवीआर की मुनाफा बंटवारे को लेकर चल रही &#39;टशन&#39; के चलते पीवीआर सहित कई मल्टीपलैक्स में फिल्म नहीं लग सकी। यश राज बैनर, कहानी को गुप्त रखने के चलते बढ़ी उत्सुकता और आज कल बाक्स आफिस पर छाई हुई स्टार कास्ट भीड़ को पुराने स्टाइल के सिनेमा घरों तक खींच लाने में सफल रहे। जिन मल्टीपलैक्स में टशन लगी है, उन्होंने सारे शोस का हाउस फुल का &#39;टशन&#39; (बोर्ड) भी टांग दिया पर वीक एंड तक फिल्म की हवा निकल सकती है। गैर भोजपुरी क्षेत्रों में भी फिल्म को नुकसान होगा।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/5750875352775364933/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/04/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/5750875352775364933'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/5750875352775364933'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/04/blog-post.html' title='ये कैसी &#39;टशन&#39;'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/SBMhvzv0ncI/AAAAAAAAAVs/sfIkJUtGDG0/s72-c/13446.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-8993559713361665901</id><published>2008-03-29T12:26:00.002+05:30</published><updated>2013-06-03T21:11:09.184+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="movie-review"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फिल्म समीक्षा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बॉलीवुड"/><title type='text'>प्यार,धोखे और पैसे की &#39;रेस&#39;</title><content type='html'>&lt;a href=&quot;http://4.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-1SyboLDII/AAAAAAAAARI/Lf0RPukMnns/s1600-h/13399.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://4.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-1SyboLDII/AAAAAAAAARI/Lf0RPukMnns/s320/13399.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5182889772536499330&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रेस कोई भी हो, हर दौडऩे वाला बस जीतना चाहता है। कुछ ऐसी ही रेस है अब्बास-मस्तान की, जिसमें दौड़ रहे हैं सैफ, अक्षय, कैटरीना, बिपाशा, अनिल और समीरा। बाक्स आफिस पर ये रेस कितनी लम्बी चलती है फाइनल तो आने वाले दिनों में होगा, फिलहाल होली की छुट्टी के बावजूद फिल्म की ओपनिंग एवरेज रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूवी में जिंदगी की रेस के तीन पहलू हैं, पैसा, धोखा और प्यार, जी हां कहानी में प्यार भी किया जाता है तो धोखा देने के लिए। रेस के असली हीरो सैफ अली खान हैं। चेहरे पर दाड़ी की लुक उन्हें खूब भाई है और उनके किरदार को सूट भी करती है, यही वजह है कि दर्शकों के दिलों पर वह छा जाते हैं। अब्बास मस्तान की जोड़ी खिलाड़ी और बाजीगर के बाद एक , अच्छी ससपेंस थ्रिलर बनाने में सफल हुई हैं। कहानी का केंद्र बिंदु सस्पैंस हैं, जो लोगों को पसंद आया है। म्यूजिक ठीक ठाक है, लेकिन बाकी गानों से ज्यादा लोग अल्हा दुआई है का इंतजार करते हैं और उन्हें इस गाने का डबल डोज मिलता है। एक बार गाना फिल्म में आता है, तो दूसरी बार क्लइमैक्स के बाद। कहानी दो सौतेले भाईयों की है जो डर्बन में स्टड फार्म चलाते हैं और रेस सैफ का पैशन है, लेकिन उसे हैरानी तब होती है जब उसका जान से प्यारा छोटा भाई उसकी जिंदगी की रेस पर फुल स्टॉप लगाना चाहता है। फिर शुरू होती है धोखे की रेस और इस धोखे का हथियार बनता है प्यार। सैफ अपने प्यार बिपाशा को अपने भाई को सौंप देता है, लेकिन ये त्याग नहीं धोखे के राज खोलने के लिए होता है। आखिर कलई खुलती है और धोखे के सूत्रधार कैटरीना और अक्षय, सैफ की जिंदगी की रेस पर फुल स्टाप लगाने की कोशिश करते हैं। खैर फिल्म एक बार देखने लायक तो है। कहीं कहीं फिल्म खिंचती सी लगती है, लेकिन एक नया सस्पेंस कहानी आगे बढ़ाता है। सो अगर सस्पेंस के साथ थ्रिल करने का शौक है, तो हो जाए रेस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोट: दोस्तो वादे के मुताबिक हर हफ्ते रिलीज होने वाली कुछ खास फिल्मों की समीक्षा देने का प्रयास कर रहा हूं। रेस पिछले हफ्ते रिलीज हुई थी, लेकिन किसी कारण वश लिखने के बावजूद इसका रिव्यू पोस्ट नहीं कर सका। देरी के लिए क्षमा चाहता हूं। &lt;a href=&quot;http://dekhasuna.blogspot.com/2008/03/blog-post_29.html&quot;&gt;फिल्म वन टू थ्री की समीक्षा&lt;/a&gt; &lt;/strong&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/8993559713361665901/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/03/blog-post_29.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8993559713361665901'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8993559713361665901'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/03/blog-post_29.html' title='प्यार,धोखे और पैसे की &#39;रेस&#39;'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-1SyboLDII/AAAAAAAAARI/Lf0RPukMnns/s72-c/13399.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-6166256413070158042</id><published>2008-03-28T12:22:00.003+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.314+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गुरदास मान"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="यादें"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वीडियो"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शख्सियत"/><title type='text'>और गुरदास मान फफक कर रोने लगे (खास वीडियो)</title><content type='html'>&lt;a href=&quot;http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-wBHboLDEI/AAAAAAAAAQM/8v8Pj397IXI/s1600-h/gurdas_bobbysandhu.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:right; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-wBHboLDEI/AAAAAAAAAQM/8v8Pj397IXI/s320/gurdas_bobbysandhu.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5182518498383563842&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गूरदास मान न सिर्फ पंजाबी गायकी की जीती जागती विरासत हैं, बल्कि पंजाबी गीतकारी के स्तर को कायम रखने में भी उनकी अहम भूमिका है। गुरदास के लिखे गीत कई सामाजिक बुराईयों के खिलाफ मुहिम बन कर खड़े हुए हैं और जो काम बड़े बड़े प्रचारक या नेता नहीं कर सके गुरदास के गीतों ने उन्हें भी कर दिखाया है।&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-wBHLoLDDI/AAAAAAAAAQE/ymhGpMDQwR0/s1600-h/bs_gurdas_maan.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-wBHLoLDDI/AAAAAAAAAQE/ymhGpMDQwR0/s320/bs_gurdas_maan.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5182518494088596530&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बीते साल में उनका एक गीत कुड़िए इतना चर्चित हुआ के लोग इसे सुनकर आज भी भावुक हो जाते हैं। लोग तो छोड़िए खुद इस गीत के लिए गुरदास कितने भावुक हैं, मैंने 2007 की आखिरी शाम को अलविदा कहने के लिए रखे एक लाइव कंसर्ट में अपनी आखों से देखा। लोगों की फरमाइश पर गुरदास अपना सबसे ज्यादा चर्चित गीत &#39;छल्ला&#39; गाने लगे। हाई स्केल के इस गीत का अभी अलाप ही शुरू किया था कि एक नन्हीं सी बच्ची हाथ में उनकी फोटो लेकर मंच के बिल्कुल सामने आकर खड़ी हो गई। गुरदास ने उसे मंच पर बुलाया और गले से लगा लिया। फिर एकदम से ऊंचे सुर को छोड़ कर निचले सुर पर आते हुए कुड़िए गीत को गाना शुरू किया। जैसे जैसे वो गीत की एक एक पंक्ति गाते गए, उनकी आखें में समंदर का तूफान उछाल पर आता गया। कब आंसूओं की सुनामी उनमें से बहने लगी पता न चला। गीत की आखिरी पंक्तियों पर आते आते वह एक दम नीचे नन्हीं बच्ची के कदमों में लेट गए। मेरे ख्याल से इससे बढ़िया ऑटोग्राफ आज तक किसी फैन को नहीं मिला होगा। फिर गुरदास ने उस बच्ची को उठकर गले लगा लिया। काफी पलों तक हजारों के पंडाल में सन्नाटा छाया रहा। उन्होंने बच्ची के हाथ में पकड़ी अपनी तस्वीर को उसके हाथ सहित अपने हाथ में लेकर ऑटोग्राफ दिया। उसके बाद वह प्रोग्राम को आगे नहीं बढ़ा सके और पैकअप कर दिया। अपनी गायकी के साथ अपनी भावुकता से वह लोगों को भ्रूण हत्या के खिलाफ गहरा संदेश दे गए। आप सब दोस्तों के लिए उस गीत का वीडियो खास तौर पर पेश कर रहा हूं। साथ ही गीत के बोल हिंदी लिपियांतर भी कर रहा हूं। अगर किसी शब्द के बारे में आप पूछना चाहते हैं, तो कमेंट्स में जरूर पूछें। मुझे वर्णन करने में खुशी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width=&quot;425&quot; height=&quot;355&quot;&gt;&lt;param value=&quot;http://www.youtube.com/v/jZ639wzJU2w&quot; name=&quot;movie&quot;/&gt;&lt;param value=&quot;transparent&quot; name=&quot;wmode&quot;/&gt;&lt;embed width=&quot;425&quot; src=&quot;http://www.youtube.com/v/jZ639wzJU2w&quot; wmode=&quot;transparent&quot; height=&quot;355&quot; type=&quot;application/x-shockwave-flash&quot;&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुड़िए किस्मत थुड़िए तैनू ऐना प्यार देआं&lt;br /&gt;अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://1.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-yhN7oLDFI/AAAAAAAAAQU/F_1QUOS5CTY/s1600-h/gurdas.JPG&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://1.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-yhN7oLDFI/AAAAAAAAAQU/F_1QUOS5CTY/s320/gurdas.JPG&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5182694531913157714&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तू जम्मी तां मापे कहन पराई एं धीए&lt;br /&gt;सोहरे घर विच कहन बेगानी जाई एं धीए&lt;br /&gt;केहड़े घर दी आखां तैंनू की सत्कार देआं&lt;br /&gt;अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इक धोबी लई सीता मां नू राम विसार गए&lt;br /&gt;जुए विच द्रौपदिए तैनू पांडो हार गए&lt;br /&gt;जी करदा मैं अपनी किस्मत तैनूं हार देआं&lt;br /&gt;अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्त भरा एक मिर्जा बाकी किस्साकारा ने&lt;br /&gt;कल्ली साहिबा बुरी बनाती मर्द हजारां ने&lt;br /&gt;कवियां दी इस गल्ती नू मैं किवें सुधार देआं&lt;br /&gt;अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मरजाने दे अंदर वसदी कुड़िए जिउंदी रह&lt;br /&gt;तू कमली मैं कमला तेरा गीत लिखाउंदी रह&lt;br /&gt;सदा सुहागन थीवें तेरी नजर उतार देआं&lt;br /&gt;अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/6166256413070158042/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/03/blog-post_28.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/6166256413070158042'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/6166256413070158042'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/03/blog-post_28.html' title='और गुरदास मान फफक कर रोने लगे (खास वीडियो)'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-wBHboLDEI/AAAAAAAAAQM/8v8Pj397IXI/s72-c/gurdas_bobbysandhu.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-4923730973766916875</id><published>2008-03-23T00:18:00.005+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.311+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आवारापन"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लाइब्रेरी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>मेरी होली</title><content type='html'>कामना करता हूं आप सब ने अपने अपने ढंग से अपनी होली को खूब मस्ती और खुशगवारी से मनाया होगा। रंग मुझे भी अच्छे लगते हैं, लेकिन मैं इस तरह होली नहीं मनाता। वैसे मेरी होली भी खास रही। मैंने अपनी होली अपने ही घर में बनाई अपनी लाइब्रेरी में बिताई। दोपहर 12 बजे के करीब मैंने लम्बे समय से अस्त व्यस्यत हालात में पड़ी अखबारों को सहेजा। दरअसल सात साल के पत्रकारिता के सफर के दौरान मैंने बहुत सामान जुटाया है। करीब सात साल के दैनिक जागरण की कम्पलीट फाइल के साथ ही अंग्रेजी और पंजाबी के अखबारों की जरूरी कटिंग रखी हैं। इसके अलावा पंजाबी, हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू साहित्य की कुछ किताबें भी लाइब्रेरी का हिस्सा हैं। अगर किसी को कभी जरूरत पड़े तो रेफ्रेंस के लिए कोई भी इसे प्रयोग कर सकता है। आपकी सेवा कर मुझे खुशी होगी। सो ये होली इन सब के रंगों में रंग कर इन्हें व्यविस्थत करते हुए मनाई। जाहिर है, पुरानी चीजों के साथ वक्त बिताते हुए कुछ पुरानी यादों और घटनाओं ओर भी ध्यान गया, लेकिन खुशी के मौके पर बुरी बातों का जिक्र करना भी मुनासिब नहीं। देश की गंगा जमुनी तहजीब के रंग अखबारों की सुर्खीयों में मिलते हैं। बस इस दौरान जिंदगी के सफर में तय किए मील के पत्थरों का अहसास हुआ। दुआ है कि इस त्योहार के रंगों में रंगे, हम मजहबों, जातों, क्षेत्रवाद को भूल ताउम्र यूं ही कदम कदम दर कदम मिल कर साथ चलते रहेंगे। आमीन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे छोटे भाई ने इस दिन की यादों को कैमरे में कैद कर लिया। आप सब से बांट रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://4.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-VXUboLBwI/AAAAAAAAADg/5VA5vhE8ODw/s1600-h/100_4171.JPG&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://4.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-VXUboLBwI/AAAAAAAAADg/5VA5vhE8ODw/s320/100_4171.JPG&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5180642954884876034&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-VXU7oLBxI/AAAAAAAAADo/gH_Xsq-3DqI/s1600-h/100_4176.JPG&quot;&gt;&lt;img style=&quot;display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-VXU7oLBxI/AAAAAAAAADo/gH_Xsq-3DqI/s320/100_4176.JPG&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5180642963474810642&quot; /&gt;&lt;/a&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/4923730973766916875/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/03/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/4923730973766916875'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/4923730973766916875'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/03/blog-post.html' title='मेरी होली'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R-VXUboLBwI/AAAAAAAAADg/5VA5vhE8ODw/s72-c/100_4171.JPG" height="72" width="72"/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-6549791228827891780</id><published>2008-02-29T20:58:00.000+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.316+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आवारापन"/><title type='text'>आवारापन बंजारापन...(मेरा पसंदीदा गीत)</title><content type='html'>आवारापन बंजारापन एक ख़ला है सीने में,&lt;br /&gt;हर दम हर पल बेचैनी है, कौन बला है सीने में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस धरती पर जिस पल सूरज रोज़ सवेरे उगता है,&lt;br /&gt;अपने लिए तो ठीक उसी पल रोज़ ढला है सीने में&lt;br /&gt;आवारापन बंजारापन एक ख़ला है सीने में,&lt;br /&gt;हर दम हर पल बेचैनी है, कौन बला है सीने में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने ये कैसी आग लगी है, इस में धुंआ न चिंगारी,&lt;br /&gt;हो ना हो इस बार कहीं कोई ख्वाब जला है सीने में,&lt;br /&gt;आवारापन बंजारापन एक ख़ला है सीने में,&lt;br /&gt;हर दम हर पल बेचैनी है, कौन बला है सीने में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रस्ते पर तपता सूरज सारी रात नहीं ढलता,&lt;br /&gt;इश्क की ऐसी राह गुजर को हमने चुना है सीने में,&lt;br /&gt;आवारापन बंजारापन एक ख़ला है सीने में,&lt;br /&gt;हर दम हर पल बेचैनी है, कौन बला है सीने में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहां किसी के लिए है मुमकिन सब के लिए एक सा होना,&lt;br /&gt;थोड़ा सा दिल मेरा बुरा है, थोड़ा भला है सीने में,&lt;br /&gt;आवारापन बंजारापन एक ख़ला है सीने में,&lt;br /&gt;हर दम हर पल बेचैनी है, कौन बला है सीने में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल जिस चीज को हां कहता है, ज़ेहन उसी को कहता है न&lt;br /&gt;इश्क में उफ ये खुदी से लड़ना एक सजा है सीने में&lt;br /&gt;आवारापन बंजारापन एक ख़ला है सीने में,&lt;br /&gt;हर दम हर पल बेचैनी है, कौन बला है सीने में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खंजर से हाथों पे लकीरें कोई भला क्या लिख पाया,&lt;br /&gt;हमने मगर एक पागलपन में खुद को छला है सीने में,&lt;br /&gt;आवारापन बंजारापन एक ख़ला है सीने में,&lt;br /&gt;हर दम हर पल बेचैनी है, कौन बला है सीने में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये दुनिया ही जन्नत थी, ये दुनिया ही जन्नत है,&lt;br /&gt;सब कुछ खो कर आज ये हम पर भेद खुला है सीने में&lt;br /&gt;आवारापन बंजारापन एक ख़ला है सीने में,&lt;br /&gt;हर दम हर पल बेचैनी है, कौन बला है सीने में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;----सईद कादरी----</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/6549791228827891780/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_29.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/6549791228827891780'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/6549791228827891780'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_29.html' title='आवारापन बंजारापन...(मेरा पसंदीदा गीत)'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-8794941113418976182</id><published>2008-02-26T16:40:00.003+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.325+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सरोकार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>झाड़ू पोछे से पेरिस तक का सफर:बेबी हालदार</title><content type='html'>&lt;a href=&quot;http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R8P1j1kFalI/AAAAAAAAAA0/d6xWvB8HRNc/s1600-h/babyhald.jpg&quot;&gt;&lt;img style=&quot;float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;&quot; src=&quot;http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R8P1j1kFalI/AAAAAAAAAA0/d6xWvB8HRNc/s320/babyhald.jpg&quot; border=&quot;0&quot; alt=&quot;&quot;id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5171246793174116946&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अक्सर हम सब लिक्खड़ सोचते हैं कि हम सब ही सबसे ज्यादा समझदार हैं और साधारण से दिखने वाले लोग गंवार। बेबी हालदार ने सभी कलम के ठेकेदारों की ऐसी सोच के गाल पर वो तमाचा जड़ा है कि हम जमीन पर लौट आएं। मैं अपनी तरफ से उनके बारे में ज्यारा बातें नहीं करना चाहता, क्यों मैं खुद भी बहुत ज्यादा नहीं जानता, लेकिन सबसे चर्चित अमेरीकी वेबसाइट के हिंदी समाचार संस्करण पर प्रकाशित उसके सफर को पढ़ कर मैं ये चिट्ठा लिखने के लिए मजबूर हो गया। पूरी खबर आप के लिए यहां हूबहू दे रहां हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सीमोन द बुआ के देश में बेबी हालदार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; पहली बार में यह सुनकर यकीन करना बहुत मुश्किल होता है कि दूसरों को घर में झाड़ू-पोंछा करने वाली लड़की एक लेखिका भी बन सकती है, मगर बेबी हालदार ने इसे हकीकत में बदल दिया. उनकी पहली किताब आलो आंधारि को जबरदस्त सफलता मिली. बीते साल यह किताब हिंदी में प्रकाशित हुई और अब तक उसके दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं. इसका हिन्दी से गहरा रिश्ता है क्योंकि प्रेमचंद के नाती प्रबोध कुमार ने न सिर्फ उन्हें अपने घऱ में रहने की जगह दी बल्कि उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया और उनकी पहली किताब को दुनिया के सामने लाए. उनकी किताब के बांग्ला संस्करण का विमोचन सुपरिचित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने किया था. खास बात यह है कि बेबी हालदार ने अपनी दूसरी किताब भी पूरी कर ली है. कवि, पत्रकार और टिप्पणीकार पंकज पाराशर ने पिछले दिनों बेबी हालदार की खोज-खबर ली. प्रस्तुत हैं उनकी टिप्पणियों के कुछ अंश...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;फ्लैशबैक&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हालदार से मिला. बेबी हालदार पांच-छह साल पहले तक गुमनाम जरूर थी मगर आज वह इतनी चर्चित है कि बर्षों से कलम घिस रहे रचनाकारों तक को उससे रश्क हो सकता है. हालांकि आज भी बेबी का ठिकाना वहीं है, प्रो. प्रबोध कुमार के घर-डी.एल.एफ.सिटी गुड़गांव में. प्यार से जिन्हें वह तातुश कहती है. बेबी साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेने हांगकांग, पेरिस से होकर आ चुकी है और आज वह देश के भी कई शहरों में वायुयान से आती -जाती हैं, जो उनकी संघर्ष का नतीजा है. न्यूयार्क टाइम्स, बी.बी.सी. , सीएनएन-आइ.बी.एन. आदि पर उनका इंटरव्यू आ चुका है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेखिका जैसा दिखना भी जरूरी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बेबी हालदार कुछ महीने पहले पहली बार हांगकांग जा रही थी तो दिल्ली एयरपोर्ट पर उसे रोक दिया गया. अधिकारियों ने कहा कि यह महिला लेखिका कैसे हो सकती है? क्योंकि अधिकारियों की समझ के अनुसार लेखिका होने के साथ-साथ दिखना भी जरूरी है. सो बेबी उनकी नजरों में वैसा दीख नहीं रही थी. द अदर साइड आफ साइलेंस की मशहूर लेखिका उर्वशी बुटालिया भी बेबी के साथ थी. उनके समझाने का भी अधिकारियों पर कोई असर नहीं हुआ. नतीजतन उस दिन बेबी की फ्लाइट मिस हो गई. अगले दिन एक सांस्कृतिक रुप से संपन्न अधिकारी की बदौलत बेबी की रवानगी संभव हो पाई. वहां जाकर दुनिया भर के लेखकों ने बेबी हालदार के संघर्ष से परिचय प्राप्त किया. उसके बाद बेबी पेरिस गईं. वहां तकरीबन एक सप्ताह तक वह रहीं और फ्रेंच भाषी समाज को अपनी प्रतिभा को लोहा मनवाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सिमोन के देश में बेबी हालदार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बेबी हालदार जब पेरिस पहुंची तो काफी लोगों को उनसे मिलने की उत्सुकता थी. लोग जानना चाहते थे कि एक कामवाली औरत कैसे आत्महत्या और हत्या से बचे जीवन में इतनी ताकतवर हो सकी? फ्रांस के लोग सांस्कृतिक रुप से कितने संपन्न है इसका अनुमान सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूरोपीय लेखकों के बीच यह धारणा प्रचलित है कि जिसको पेरिस में मान्यता नहीं मिली उसको समझो कहीं मान्यता नहीं मिली. शायद यही कारण है कि रायनेर मारिया रिल्के, स्टीफन ज्विग, सार्त्र, सिमोन सबने पेरिस को अपना ठिकाना बनाया. ऐसे पाठकों के बीच बेबी हालदार एक सप्ताह तक रही। रोज कहीं भाषण देना होता, कहीं पाठकों के सवालों का जवाब देना होता, कहीं आटोग्राफ देना होता और अक्सर फ्रेंच महिलाओं के साथ देर तक बैठकर उनके सवालों का जवाब देना पड़ता. यह सब होता एक दुभाषिया के माध्यम से. वहां के लोग बेबी के सवालों से चमत्कृत होते. हैरत की बात यह है कि फैशन के नये-नये रुप प्रचलित करनेवाले शहर पेरिस की फैशन पत्रिकाओं ने अपने आवरण पर बेबी को छापा, इंटरव्यू लिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पंकज पाराशर के ख्बाब का दर से&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;http://www.aol.in/hindi/art-culture/2008/02/18/writer-baby-haldar.html&lt;/em&gt;</content><link rel="related" href="http://www.aol.in/hindi/art-culture/2008/02/18/writer-baby-haldar.html" title="झाड़ू पोछे से पेरिस तक का सफर:बेबी हालदार"/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/8794941113418976182/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_862.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8794941113418976182'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8794941113418976182'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_862.html' title='झाड़ू पोछे से पेरिस तक का सफर:बेबी हालदार'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R8P1j1kFalI/AAAAAAAAAA0/d6xWvB8HRNc/s72-c/babyhald.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-1925679018361410501</id><published>2008-02-26T13:45:00.001+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.300+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="रेल बजट"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सरोकार"/><title type='text'>लालू जी हम से का भूल हुई</title><content type='html'>लालू जी ने रेल बजट में ग्रेजुएशन तक की छात्राओं को मुफ्त रेल सुविधा देने की घोषणा कर दी। अच्छी बात है। दूर दराज के इलाकें से शहर पढ़ने आने वाली छात्राओं से इसे जरूर फायदा होगा। लेकिन लालू जी जितनी लड़कियां पड़ने जाती हैं, उतने ही लड़के भी कॉलेज जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से हर रोज हजारों स्टुडेंट्स पढ़ने के लिए आते जाते हैं। अगर लालू जी को फ्री पास देने ही थे, तो अभावग्रस्त सभी छात्रों को बिना लिंग भेद के देने चाहिए थे। जिन छात्राओं की रेल टिकट खरीदने की हैसियत है, वह भी अब बिना टिकट के रेल में घूमेंगी, लेकिन जिन ग्रामीण और शहरी युवकों को दू जून की रोटी के लिए दिहाड़ी करनी पड़ती है उनका ख्याल लालू जी को क्यों नहीं आया। खुशी है कि 25 करोड़ के फायदे का बजट पेश कर चक दे रेलवे का नारा लगाया। गर वह एकआध करोड़ छात्रों के लिए रख देते तो खुशी का रंग कुछ और होता।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/1925679018361410501/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_6482.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/1925679018361410501'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/1925679018361410501'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_6482.html' title='लालू जी हम से का भूल हुई'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-387010938702887032</id><published>2008-02-26T12:54:00.000+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.307+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><title type='text'>धोनी ले लो, सचिन लेलो, भाजी (भज्जी) ले लो</title><content type='html'>हर रोज मेरी आंख सुबह एक आवाज से खुलती है, आलू ले लो, गोबी ले लो, बैंगन ले लो ओ ओ ओ। हर रोज इस बात के लिए हम अपनी अम्मा को भला बुरा कहते हैं कि वह गली में सब्जी बेचने आने वाले को घर के सामने बुला लेती हैं और वह अपने मधुर कर्कश कंठ से ये गीत एक ही कंपोजीशन में रोज गाता है। गर हिमेश रेशमिया साहब भी उसे सुन लें तो खुद चक्कर खा जाएं। खैर छोड़िए हम अपनी असली बात पर आते हैं,घटना पिछले वीरवार की है। रोज सुनाई देने वाली आवाज में आज अलग खनक थी, धोनी ले लो, सचिन ले लो, गांगुली ले लो, भज्जी ले लो भाई भाजी ले लो भाई इस आवाज के आदी हो चुके हम को अचानक झटका सा लगा। अपने पयजामे के किनारे हाथ में पकड़े हम धड़ाम से सीढ़ियां उतर कर सीधे घर के दरवाजे पर जा पहुंचे। अभी सब्जी वाले ग्वैये ने अपना मुंह खोला ही था कि हमने अपने हाथ का फाटक लगा कर उसे बंद कर दिया। उसे घूरते हुए पूछा ये क्या चिल्ला रहे हो, धोनी ले लो, सचिन ले लो अरे देश के सम्मानित धुरंधरों को सब्जी की तरह क्यों बेच रहे हो। वो झल्लाया क्या बाबू जी लगता है आप खबरिया चैनल नहीं देखते। पूरी दुनिया ने इन्हें सरेआम बिकते देखा। शाहरुख, प्रिटी सहित शेयर बाजार की तिकड़म से रातों रात अमीर होने वाले साहब को भी शर्म नहीं आई, हम काहे शर्म का घूंघट राग गाते रहें। अपनी कम अकली पर बिना सोचे और जानकारी से अभावग्रस्त दिमाग पर जोर देते हुए हमने कहा कि लेकिन ये आलू प्याज के ठेले पर ये लोग कहां सवार हैं। हाथ में लम्बा सा आलू,जिसके अंडाकार सिरे पर भूरे रंग के बाल से उगे थे को उठाते हुए हमारे थोबड़े पर चिपकी दो जोड़ी आखों के सामने लाते हुए बबुआ बोला,ये देख रहे हैं इसका नाम है धोनी। इस बार कोहरे ने अपनी आलू की फसल बर्बाद कर दी। बीसीसीआई से थोडी सीख ले खास दोस्तों की सिफारिश पर ये बचे खुचे आलुओं में से चुन के 11 लाया हूं। सब का नामकरण करोंड़ों रूपए में बिकने वाले किक्रेट धुरंधरों का रखा है। भई हम तो बर्बाद हो गए। बस एक आस बची है कहीं एक आध धोनी आलू लाख डेढ़ लाख में बिक गया तो वारे न्यारे हो जाएंगे। हम उससे कुछ पूछते उससे पहले ही उसने इस आईडिया का विस्तार बताना शुरू कर दिया, जनाब जब इनके नाम पर चड्डी बनियान, टायर, फिनाइल, चिप्स, छतरी बिक सकते हैं तो क्या आलू नहीं बिकेंगे। हम उसकी अक्ल की मन ही मन दाद देते नहीं थक रहे थे। हम जैसे फटीचरों के मोहल्ले में तुम्हारे ये सेलीब्रेटी आलू खरीदेगा कौन, जाओ शाहरुख, प्रीटी के मुहल्ले में बेचो। वो हमारी अक्ल पर खिसियानी हंसी हंसते हुए चिल्लाया, जनाब ये वो लोग हैं जो उन्हीं पर करोड़ों की बरसात करते हैं, जिनके घर में पहले से गांधी बापू की हरी मोहरों रखने की जगह नहीं होती। उनके नाम के आलू तो आप जैसे फटीचर ही खरीदोगे जो उनके हर लांग शॉट पर हिजड़ों की तरह तालियां पीटते हो, चाहे बाउंडरी पार होने से पहले गेंद आराम से लपक ली जाए। इससे पहले कि हम उसे बताते कि हम तो गरीबी रेखा से भी नीचे वाले फ्टीचर हैं, पिछली गली से आवाज गूंजी, अरे धोनी वाले भाई जल्दी आओ कहां घसियारे से बहस में पड़ हो हम कब से तुम्हारे आलू खरीदने के लिए इंतजार कर रहे हैं। वो ठेले को सरपट दौड़ाता गली मुड़ गया और हम अपना सा मुंह लिए खड़े रह गए।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/387010938702887032/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_26.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/387010938702887032'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/387010938702887032'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_26.html' title='धोनी ले लो, सचिन लेलो, भाजी (भज्जी) ले लो'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-6896289990538206095</id><published>2008-02-23T13:51:00.003+05:30</published><updated>2013-06-03T21:09:42.680+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-poetry"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कविता"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>वही दीप (मेरी पहली कविता)</title><content type='html'>क्या है दीप?&lt;br /&gt;पानी से गुंथी मिट्टी&lt;br /&gt;आग में तपाया&lt;br /&gt;धूप में सुखाया&lt;br /&gt;सृजनकर्ता के कलात्तमक हाथों से&lt;br /&gt;सृजन किया गया&lt;br /&gt;एक मिट्टी का घेरा&lt;br /&gt;तेल रूपी सांस&lt;br /&gt;और जलने के लिए&lt;br /&gt;थोङी सी हवा&lt;br /&gt;बस थोङी सी&lt;br /&gt;आंधी या ख़लाअ नहीं&lt;br /&gt;रात भर जिस के घर को रोशन किया&lt;br /&gt;उसी की ठोकर से टुकङे टुकङे हो गया&lt;br /&gt;कूङे की तरह घर से बाहर फेंका गया&lt;br /&gt;जब तक जलता हूं तो&lt;br /&gt;वाह!! वाह!!&lt;br /&gt;नहीं तो तुम्ही बताओ?&lt;br /&gt;तुम्ही बताओ...&lt;br /&gt;क्या वही दीप हूं मैं?&lt;br /&gt;चलो,&lt;br /&gt;फिर क्या हुआ &lt;br /&gt;फिर बनूंगा, जलूंगा&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;बांटूंगा उजाला</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/6896289990538206095/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_23.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/6896289990538206095'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/6896289990538206095'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_23.html' title='वही दीप (मेरी पहली कविता)'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-8089275303134718425</id><published>2008-02-19T23:50:00.001+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.322+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धर्म"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य"/><title type='text'>तसलीमा तुम्हें लोगों की भावनाओं का सम्मान करना होगा</title><content type='html'>भारत सरकार ने तसलीमा नसरीन का वीजा असिमित समय के लिए सशर्त बढ़ा दिया। धार्मिक भावनाओं को आहत करने आरोप में पहले बंगला देश और फिर कलकत्ता से उन्हें निवार्सन झेलना पढ़ा और आज कल वो भारत सरकार की कैदी मेहमान हैं। अपने शीषर्क वाली बात कहने से पहले में कुछ बाते साफ करना चाहता हूं। मैं बतौर लेखिका तसलीमा का पूरा सम्मान करता हूं और अभिव्क्यति की आजादी पर का भी पक्षधर हूं। साथ ही आम जन के हित में बेबाकी से कलम चलाने के लिए मैं उनकी निडरता की दाद भी देता हूं। अब मैं अपनी बात पर आता हूं, तसलीमा ने अपने धर्म की कुछ पुरानी मान्यताओं पर बेबाक टिप्पणियां की (द्विखंडित में, शायद दूसरी किताबों में भी)। ये टिप्पणियां हजरत साहिब के बारे में हैं। मैं मानता हूं कि धर्म की कुछ गैरजरूरी और अंधविश्वासी धारणाओं के खिलाफ लिखना गल्त नहीं है, लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि हमारा संदेश जिन लोगों तक पहुंच रहा हैं, क्या उनकी मानसिकता उतनी विकसित है कि वह हमारे संदेश को उसी भावना से समझ सकें। बस तसलीमा यहीं मार खा गईं। मैं भी नास्तिक हूं, लेकिन मेरा मानना है कि कोई भी जिस भी धर्म को मानता है मैं उसकी भावनाओं का सम्मान करुं। इससे भी महत्वर्णा बात ये है कि लेखक जिन्हें हम बुद्धिजीवी मानते हैं, वह धर्म सहित विभिन्न मामलों के बारे में गहरी समझ रखते हैं और उसी समझ के मुताबिक हर बात को तर्क के तराजू में तौलते हैं। इस लिए वह किसी भी गंभीर मसले पर बेबाकी से बात कर सकते हैं, लेकिन वही बात एक आम जन को समझ नहीं आती। खास कर धर्म के मामले में वह तर्क की बजाए श्रद्धा की आखों से स्थितियों को देखते हैं। डेनमार्क के एक अखबार में हजरत साहिब का काटूर्न छपने के बाद दुनिया भर में जो प्रतिक्रिया हुई उसमें केवल कट्टड़पंथियों की नहीं आम जन की भी भावनाएं शामिल थी। तब मीडिया की सवंत्रता की सीमिओं पर खासी बहस हुई थी। उसी तरह जब तसलीमा की किताब में सीधे मोहम्मद साहिब पर उनकी निजी जिंदगी के बारे में टिप्पणियां की गई, तो कट्टरपंथियों ने विरोध की अगुवाई की, जो बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में उग्र रूप में नजर आईं। मेरा मानना है कि जब तक हम लोंगों की समझ इतनी विकसित नहीं कर लेते कि वह वाक्यों के पीछे की भावनाओं को समझ सकें। तब तक हमें उन्हें समझ आने वाली भाषा में ही लिखना होगा और उसी लिहाज से लफ्जों की सीमाएं तय करनी होंगी। मुझे मालूम हैं कि ज्यादातर लोग मुझ से सहमत नहीं होंगे,लेकिन अगर ऐसे कहूं की बुद्धिजीवियों को अपनी समझ का प्रयोग करते हुए आम लोगों की समझ के स्तर पर उतर कर लिखना होगा। तभी हम बुद्धिजीवियों और आम लोंगों की समझ के बीच की चौड़ी खाई को पाटने में सफल हो पाएंगे। मेरी सलाह है कि एक बार द्विखंडित पड़ने के बाद आप मेरी बात पर गौर फरमाएं। आभार</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hi.deepjagdeep.com/feeds/8089275303134718425/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_19.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8089275303134718425'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/8089275303134718425'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_19.html' title='तसलीमा तुम्हें लोगों की भावनाओं का सम्मान करना होगा'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-3000359246648293661</id><published>2008-02-18T23:56:00.001+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.302+05:30</updated><title type='text'>कहां गया दिल्ली वालों का दिल</title><content type='html'>मैं भी ब्लू लाइन का शिकारपत्रकारिता के क्षेत्र में दाखिल होते ही मैंने दिल्ली को अपनी पक्की कर्म भूमि बनाने की ठानी। बस उसी सपने को पूरा करने के लिए फरवरी के पहले हफते दस दिन की छुट्टी ले, विश्व पुस्तक मेले में किताबें छानने के साथ ही इसका जुगाड़ करने का मन बना, मैं 2 फरवरी को दिल्ली पहुंच गया। लेकिन वहां हुई घटना ने मुझे काफी सोचने पर मजबूर कर दिया है।अक्सर टीवी पर देखकर मैं हैरान होता था कि हर रोज लोग दिल्ली में ब्लू लाइन बसों के शिकार क्यों और कैसे हो रहे हैं, लेकिन अब मैं भी समझ गया हूं कि शायद स्टूडेंट्स के साथ तो ब्लू लाइन का व्यवहार कातिलाना ही है। मैं ये बात इस लिए कह रहा हूं, क्यों कि 6 फरवरी को जामिया युनिवर्सिटी बस स्टॉप से प्रगति मैदान जाने के लिए काफी देर इंतजार करते हुए मैंने देखा कि वहां पर कोई भी बस रोकने का नाम नहीं ले रहा है। कई बार स्टूडेंट्स ने सङक के किनारे जाकर बस चालकों को रोकने का इशारा भी किया, लेकिन किसी ने सहानूभूति नहीं दिखाई। काफी देर बाद एक बस चालक ने बस थोङी धीमी की तो ३०-40 युवाओं ने आगे पीछे के दरवाजों से चढ़ने की कोशिश की। पिछले दरवाजे पर भारी भीड़ को देख कर मैंने भी आगे के दरवाजे से बस में दाखिल होने की कोशिश की,लेकिन शायद चालक को इस बात से कोई सरोकार नहीं था कि क्या लोग चढ़ गए हैं या भी दरवाजे के बीचों बीच हैं। बदकिस्मति कहीए या मेरी गल्ती लेकिन मेरे हालात कुछ ऐसे ही थे। बिना परवाह किए चालक महोदय ने बस को दौड़ा दिया। मेरा बायां पैर टायर के नीचे और शरीर धड़ाम जमीन पर, न जाने चालक को थोड़ी दया आ गई कि उसने तुरंत ब्रेक लगा दी। मेरे सहित कुछ और लोगों को बस में चढ़ने का मौका मिल गया। मेरे चढ़ते ही चालक महोदय ने झाड़ पिलाई, पिछले दरवाजे से चढ़े होते कम से कम गिर जाने पर बस तो न रोकनी पड़ती और शायद तुम चोट लगने से बच जाते। पांव से बह रहे खून को देख कर कडंक्टर साहब ने भी खूब दरिया दिली दिखाई और अगले चौक पर होली फैमिली अस्पताल के सामने बस रुकवाकर इलाज करवाने की सलाह दे डाली। पहले तो ये लगा कि शायद कडंक्टर की अस्पताल वालों से कहीं कोई सेंटिंग तो नहीं। लेकिन और कोई चारा नजर न आता देख मेरा दोस्त आलोक सिंह साहिल मुझे इस अस्पताल की एमरजेंसी में ले गया। ये भी सुनने में आया कि जामिया बस स्टॉप पर कुछ दिन पहले किसी बस वाले की स्टूडेंट्स के साथ तकरार हुई थी, इसलिए कोई भी बस वहां पर नहीं रोकी जा रही थी। इन सब बातों के बावजूद मुझे समझ में नहीं आ रहा कि ऐसे हादसों की वजह क्या है और इनमें पर कब और कैसे लगाम लगेगी। अगर आपके पास कोई हल हो तो मुझे और उन सभी रोजाना बस यात्रियों को बताने का कष्ट करें। आभार होगा।ये भी बता दें कि क्या दिल्ली मेरे सपने को सच होने देगी?</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/3000359246648293661'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/3000359246648293661'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/02/blog-post_18.html' title='कहां गया दिल्ली वालों का दिल'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4134984070062758230.post-3639452634587667569</id><published>2008-01-31T19:56:00.000+05:30</published><updated>2013-06-03T21:05:10.305+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="hindi-articles"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पंछी"/><title type='text'>ये हैं कू हू कू हू के सच्चे हकदार</title><content type='html'>&lt;a href=&quot;http://1.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R6HeMo5nr2I/AAAAAAAAAAo/jIxZv2vIMZE/s1600-h/102_2902.JPG&quot;&gt;&lt;img id=&quot;BLOGGER_PHOTO_ID_5161650956662189922&quot; style=&quot;FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand&quot; alt=&quot;&quot; src=&quot;http://1.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R6HeMo5nr2I/AAAAAAAAAAo/jIxZv2vIMZE/s320/102_2902.JPG&quot; border=&quot;0&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कोयल की कू हू कू हू चिङिया की चीं चीं और कोए की कांव कांव का सुखद अहसास कौन नहीं लेना चाहता, लेकिन सोचा आप ने कभी कि आप हकदार हैं इसके। बात शायद आपको आम सी लगे, लेकिन सवाल ये है कि आप ने खुद ऐसा कितनी बार किया है। मैं बात कर रहां हूं, लुधियाना शहर के ऋषि नगर में रहने वाली ऐसी दंपति की, जो सचमुच इसके हकदार हैं। बुधवार की सुबह सैर करते हुए उन्हें सङक पर पडा हुआ एक नन्हा पक्षी मिला। पुनीत और ऐनिका को न तो उनका नाम मालूम था और न उसके जख्मी होने का कारण, लेकिन ये उनके दिल में बसी कुहू कुहू थी, जिसने उन्हें उस नन्ही जान को गले लगाने के लिए मजबूर कर दिया। सुबह वह उसे घर ले गए, दूध पिलाया, फल खिलाए और मरहम पट्टी की, लेकिन उसे कदमों पर खङे न होता देख उन का दिल बैठ गया। सुबह से ही दोनों का किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था। दोपहर बाद एक साफ सुथरे डिब्बे में उसे डाला और अस्पताल की ओर चल पङे, जिसे ढूंढते हुए रास्ते में उनकी मेरे से मुलाकात हुई। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें देख न जाने क्या हुआ कि पता बताने की बजाए मैं उनके साथ हो लिया। अगले आधे घंटे तक पूरी दुनिया भूल कर वह दोनों बस उस नन्हें पंछी की जिंदगी के बारे में सोच रहे थे। तभी मेरे दिल में ख्याल आया कि आज तक हमने ऐसा कितनी बार किया। क्या हमें सचमुच हक है, हर सुबह उन खूबसूरत आवाज़ों को सुनने का जो किसी आयत, श्लोक या गुरबाणी के शबद से कहीं बढ़कर होतीं हैं। लेकिन सङक पर जख्मी हालत में पङे हम उन पर एक नजर तक डालना मुनासिब नहीं समझते। अब आप कहोगे कि वक्त किसके पास है, तो जिंदगी खत्म हो जाएगी लेकिन कभी वक्त नहीं मिलेगा। अगर अपने कानों में कुदरत की मिठास घोलना चाहते हैं, तो सिर्फ कू हू कू हू नहीं वक्त आने पर पंछियों की कराहटों को भी &lt;span class=&quot;&quot;&gt;सुनीए&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/3639452634587667569'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4134984070062758230/posts/default/3639452634587667569'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hi.deepjagdeep.com/2008/01/blog-post_31.html' title='ये हैं कू हू कू हू के सच्चे हकदार'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_90nC-GzpqT0/R6HeMo5nr2I/AAAAAAAAAAo/jIxZv2vIMZE/s72-c/102_2902.JPG" height="72" width="72"/></entry></feed>