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<title>अभिव्यक्ति: साहित्य का सुरुचिपूर्ण साप्ताहिक</title>
<description>अभिव्यक्ति १९ जनवरी २०१५ </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org</link>
<language>hi</language>

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<title>देवकांतन की कहानी- मनसा वाचा </title>
<description>पतझड़ के मौसम में चिनार के पत्ते अब भी लाल-सुर्ख हो उठते थे, लेकिन उनकी रोमानियत गायब हो गई थी। उनकी वह सिंदूरी रंगत अब जाड़ों के मौसम की पूर्व सूचना बन गई थी। कश्मीर का ठंडा मौसम! आत्मा को तोड़ने वाले अवसाद, वीरानी और अकेलेपन का दूसरा नाम!</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2014/shdarsh.htm</link>
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<title>संजना कौल की कहानी- शहर दर शहर </title>
<description>पतझड़ के मौसम में चिनार के पत्ते अब भी लाल-सुर्ख हो उठते थे, लेकिन उनकी रोमानियत गायब हो गई थी। उनकी वह सिंदूरी रंगत अब जाड़ों के मौसम की पूर्व सूचना बन गई थी। कश्मीर का ठंडा मौसम! आत्मा को तोड़ने वाले अवसाद, वीरानी और अकेलेपन का दूसरा नाम!</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2014/shdarsh.htm</link>
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<title>भावना सक्सेना का व्यंग्य- नया नौ दिन </title>
<description>नया साल ज़िंदगी की डायरी का वह नया कोरा कागज है जिसपर अगले वाले ३६५ दिनों में बहुत कुछ लिखा जाता है। कुछ हम लिखते हैं तो कुछ आप लिखा जाता है। बहुतों का मानना है कि यदि पहला दिन अच्छा गुजरे तो आने वाले सभी दिन अच्छे होंगे या फिर जो पहले दिन करो वही साल भर होता रहेगा। अब तक तो हमने ऐसा होते हेखा नहीं, अधिकतर बहुराष्ट्रीय कंपनियों में साल का पहला दिन अवकाश होता है लेकिन वह पूरे वर्ष अवकाश रखती हों ऐसा तो नहीं, मान्यताएँ जो भी हों बहरहाल हम सब की कोशिश यही होती है कि कुछ विशेष करें कुछ अच्छा करें। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2014/naya_naudin.htm</link>
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<title>मुक्ता का आलेख- बौद्ध धर्मावलंबियों का नव वर्ष - लोसर </title>
<description>लोसर तिब्बत के बौद्ध अवलंबियों का प्रमुख पर्व है लेकिन इसको मनाने वाले अरुणाचल प्रदेश से नेपाल होते हुए उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर की उत्तरी सीमाओं तक फैले हुए हैं। संक्षेप में कहें तो यह भारत की उत्तरी सीमा पर उत्साह के साथ मनाया जाने वाला पर्व हैं। हालाँकि यह १ जनवरी को नहीं मनाया जाता बौद्ध संवत के अनुसार वर्ष के पहले माह की पहली तिथि को मनाया जाता है, जो ईस्वी कैलेंडर के अनुसार लगभग फरवरी के महीने के मध्य में पड़ती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2014/losar.htm</link>
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<title>डॉ. जगदीश व्योम का निबंध- हाइकु कविता में नया साल </title>
<description>लो फिर आ गया नया साल, निरन्तरता का सूचक है नया साल। कुछ भी स्थिर नहीं है समूची सृष्ट में। सब चल रहे हैं, और निरन्तर चलते जा रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं... किसी को कुछ पता नहीं। हम धरती पर चल रहे हैं, धरती अपने रास्ते पर चल रही है, जाने कब से लगाये जा रही है सूर्य के आस-पास चक्कर पर चक्कर, सूर्य महाराज किसी और किसी और की परिक्रमा किये जा रहे हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2014/haiku_nayasaal.htm</link>
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<title>पुनर्पाठ में राहुल देव का आलेख- समकालीन कहानियों में नया साल </title>
<description>कहानियों में देश, काल और परिस्थिति का बहुत बड़ा महत्त्व है। नया साल दस्तक दे रहा है, तो समकालीन कहानियों के व्यापक परिदृश्य में से कुछ कहानियाँ चुनकर, यह पड़ताल करना रुचिकर हो सकता है कि कहानियों में देश, काल और परिस्थिति के अनुसार नया साल हर व्यक्ति के लिए अलग कैसे हो जाता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2013/kahaniyon_me_naya_saal.htm</link>
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<title>शुभ्रा उपाध्याय की-कहानी-- अषाढ़ के दिन</title>
<description>आसमान काले-काले बादलों से भर गया। ठंडी हवाओं ने तन मन को तरावट दी। उसका बेहद उकताया हुआ मन जैसे नई ऊर्जा से उमग गया। अभी-अभी आग की बारिश करता मौसम बिल्कुल बदल गया। जैसे किसी ने जादू की छड़ी घुमा दी हो।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2014/akd.htm</link>
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<title>बसंत आर्य की लघुकथा- बारिश</title>
<description>पाठशाला से बाहर निकलकर सनी ने भयभीत निगाहों से आसमान की तरफ देखा। उसके दिल की धड़कन अचानक बहुत तेज हो गई थी। पूरा का पूरा आसमान काले बादलों से ढँका हुआ था और दूर पूरब की ओर बारिश शुरू हो चुकी थी। उसके पास छतरी नहीं थीं। यद्यपि सबेरे ही उसे लगा था कि वर्षा होने वाली है परंतु माँगने पर पिता ने गुम होने के डर से उसे छतरी नहीं दी थी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2003/barish.htm</link>
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<title>कुमार अंबुज का एकालाप- अपनी बारिश के बीच </title>
<description>कभी-कभी वह अपनी बारिश के बीच कहती है : तुम्हें भीगना आता है, बारिश में भीगना आता है। तुम बारिश में भीगते हुये इस कदर दुःसाहस करते हो कि हँसी आती है। तुम्हारी हँसी अच्छी है लेकिन बारिश भी तो एक हँसी है। तुम बारिश में खुद को बीमार कर लोगे। तुम इतने सालों से किस बारिश में भीग रहे थे? लगता है वह मज़ाक़ बना रही है, खिल्ली उड़ा रही है, अफ़सोस ज़ाहिर कर रही है, अपनी किसी स्वीकृति पर, किसी मौन पर और किसी हँसी पर पछता रही है। लेकिन वह बारिश में मेरे भीगने की लालसा समझती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/lalit_nibandh/2014/barish.htm</link>
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<title>उमाशंकर चतुर्वेदी का निबंध- पावस के शृंगारिक छंद</title>
<description>पावस ऋतु बड़ी सुहावन और मनभावन होती है। यह मिलन और रससिक्त होने की ऋतु है। उमड़ते-घुमड़ते पावस पयोदों की गर्जन, रस बरसन, चंचला की चमकन और तड़पन, लोकगीतों पर गवैयों की तान, मन मोह लेती है। वसुंधरा वधू नवेली बनकर अपने रसीले गर्वीले गीत पर इठलाने लगती है। पयोद मनमानी करते हैं तो ऐसा लगता है कि ‘सावन के बादलों की नीयत खराब है।’</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2014/pawas.htm</link>
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<title>कुंती मुकर्जी की कहानी- गुलाबी कनेर का गुच्छा</title>
<description>‘’मही, इन कनेर के पेड़ों को लॉन से निकलवा देना। इसे रखने से बड़ा अपशकुन होता है।’’ डॉक्टर सोमदत्त त्रिपाठी आयुर्वेदाचार्य ने मही के घर में प्रवेश करते हुए कहा। 
‘’जी गुरु जी।’’ 
मही अपने गुरु से बहस करना उचित नहीं समझती थी अन्यथा वह उन्हें बतलाती कि जिन फूलों को वे अक्सर भूत प्रेतों के आकर्षण का केंद्र मानते हैं वह उसके जीवन में कितना शुभ शकुन लाया है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2014/gkkg.htm</link>
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<title>डॉ. सरस्वती माथुर की लघुकथा</title>
<description>मीठी मात्र आठ साल की थी जब घर के अहाते के एकदम बाहर बरवाड़ा हाउस सोसाइटी ने पीले कनेर के १० पेड़ रोपे थे। बरवाड़ा सोसायटी का यह अहाता तब बच्चों के क्रिकेट का मैदान था, गर्मी की लू से बेपरवाह रहते हुए दिन भर धमाचौकड़ी होती थी। वहाँ खेल कूद करते बच्चे कनेर के इस पेड़ के नीचे बैठ कर थकान मिटाते थे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2014/kaneri.htm</link>
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<title>डॉ. राकेश प्रजापति की कलम से- सदाबहार कनेर की कहानी</title>
<description>कनेर का पेड़ भारत में लगभग हर जगह देखा जा सकता है। यह विशाल सदाहरित झाड़ी है जो हिमालय में नेपाल से लेकर पश्चिम के कश्मीर तक, गंगा के ऊपरी मैदान और मध्यप्रदेश में बहुतायत से पाई जाती है। अन्य प्रदेशों में यह कम पाई जाती है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2014/kaner.htm</link>
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<title>पूर्णिमा वर्मन का ललित निबंध- चारदीवारी पर बाँह टिकाए खड़ा है कनेर</title>
<description>चार दीवारी पर बाँह टिकाए खड़ा है कनेर, देख रहा है बगिया को, जैसे सबकी कुशल मंगल उसी की दृष्टि पर निर्भर है। जैसे वह अपनी लंबी बाँहों के चँवर डुला देगा तो दूर हो जाएँगी सारी बलाएँ, जैसे वह पीले सीकर टपका देगा तो तर जाएँगी सारी कामनाएँ, बँध जाएँगे जीवन में मंगलमय तोरण! </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/lalit_nibandh/2014/chardiwari.htm</link>
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<title>पुनर्पाठ में - अशोक श्री श्रीमाल का आलेख- शब्दकोश का जन्म</title>
<description>आज जब हमें किसी कठिन शब्द के अर्थ, भावार्थ या मायने जानने की ज़रूरत पड़ती है, तो हम तत्काल शब्दकोष का सहारा लेते हैं। 'शब्द कोष' अथवा 'डिक्शनरी' आज ज़िंदगी का एक आम हिस्सा बन चुकी है। विभिन्न भाषाओं के विभिन्न आकार-प्रकार में आज शब्दकोष जिज्ञासु लोगों की ज्ञान-पिपासा शांत करने हेतु मौजूद हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/shabdkosh.htm</link>
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