﻿<?xml version='1.0'?>
<rss version="2.0">

<channel>
<title>अभिव्यक्ति: साहित्य का सुरुचिपूर्ण साप्ताहिक</title>
<description>अभिव्यक्ति ३ अक्तूबर २०११ </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org</link>

<item>
<title>रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहानी- विद्रोही</title>
<description>लोग कहते हैं अँग्रेजी पढ़ना और भाड़ झोंकना बराबर है। अँग्रेजी पढ़ने वालों की मिट्टी खराब है। अच्छे-अच्छे एम.ए. और बी.ए. मारे-मारे फिरते हैं, कोई उन्हें पूछता तक नहीं। मैं इन बातों के विरुद्ध हूँ। अँग्रेजी पढ़-लिखकर मैं डॉक्टर बना हूँ। अँग्रेजी शिक्षा के विरोधी तनिक आँख खोलकर मेरी दशा देखें। सोमवार का दिन था। सवा नौ बजे मेरे मित्र बाबू सन्तोषकुमार बी.एस-सी. एक नवयुवक रोगी को साथ लिये मेरे दवाखाने में आये। उस रोगी की आयु अठारह-उन्नीस से अधिक न थी। गेहुआँ रंग, बड़ी-बड़ी आँखें, गठीला शरीर, कपड़े स्वदेशी, किन्तु मैले थे। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sahityasangam/2011/vidrohi/vidrohi1.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ. अशोक गौतम का व्यंग्य- हाय रे मेरे भाग</title>
<description>सुबह के साढ़े की दस बजे का समय हुआ होगा। पत्नी को दफ्तर रवाना करने के बाद लगे हाथ बरतन धो जरा धूप देखने के लिए दरवाजा खोल सीढ़ियों पर आराम फरमाने निकलने की सोच ही रहा था कि दरवाजे पर घंटी बजी। कहीं श्रीमती दफ्तर से लौट तो नहीं आई! अरे अभी तो झाड़ू पोछा करना बाकी है। सोच रहा था जरा कमर सीधी कर लूँ। फिर लगूँगा। किसी अज्ञात डर से भीतर तक काँप गया। अपने बड़े बुरे दिन चल रहे हैं आजकल भाई साहब! हाय रे स्‍वार्थी सात जन्‍म के रिश्‍ते!</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/haire_mere_bhaag.htm</link>
</item>

<item>
<title>मनोहर पुरी का आलेख- दसों पापों को हरने वाला दशहरा</title>
<description>त्योहार लोक जीवन की प्रगाढ़ता के केन्द्र बिन्दु माने जाते हैं। यह न केवल हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन को प्रभावित करते हैं वरन इनके साथ हमारी आर्थिक गतिविधियाँ भी पूरी तरह से जुड़ी हुई हैं। त्योहार पग पग पर व्यक्ति को समाज के साथ जोड़ते हैं। प्रकृति के बदले परिधानों के साथ जुड़े त्योहार फूलों के बदलते रंगों की भाँति व्यक्ति को लुभाते रहते हैं। इनकी विविधता मानव को अपने मोहपाश में बाँधे रखती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2011/dason_paaponko.htm</link>
</item>


<item>
<title>शैलेन्द्र पांडेय के साथ पर्यटन- धनुषकोटि जहाँ राम ने सेतु बाँधा था</title>
<description>विगत दिनों रामेश्‍वरम् जाने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ। ऐसी मान्‍यता हे कि पवित्र सेतु में स्‍नान के बाद ही रामेश्‍वरम् में ज्‍योर्तिलिंग का दर्शन करना चाहिए। धनुषकोटि के विषय में स्‍थानीय लोगों से जानकारी मिली कि वहाँ तो अब कोई जाता ही नहीं है, मंदिर के पास ही समुद्र के पश्‍चात चौबीस कुंडों के जल से स्‍नान करके दर्शन करते हैं। अगले दिन कमर कस ली कि चाहे जैसे जाना पड़े, धनुषकोटि तो जाना ही है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2011/dhnushkoti/dhanushkoti.htm</link>
</item>


<item>
<title>मानोशी चैटर्जी की कलम से- चंदनपुर की जगद्धात्री पूजा </title>
<description>शरद का महीना आते ही शुरू हो जाती है बंगाल में दुर्गा पूजा की धूम। नये कपड़े, नये ज़ेवर, और चार दिन के इस उत्सव के ख़त्म होते ही जैसे सब उदास हो जाते हैं। मगर फिर कुछ ही दिनों बाद कोजागरी पूर्णिमा के दिन घर-घर में लक्ष्मी पूजन के लिए जोड़-तोड़ होने लगती है। और थोड़े ही दिनों में फिर आ जाती है दिवाली। दिवाली या काली पूजा के बाद त्यौहारों का मौसम जैसे ख़त्म हो जाता है सबके लिए। मगर कलकता शहर से कोई तीस किलोमीटर दूर उत्तर में? हुगली ज़िले में बसे चंदरनगर या चंदन नगर नामक छोटे से शहर में तैयारी हो रही होती है एक और उत्सव की? जगद्धात्री पूजा।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2006/jagaddhatri.htm</link>
</item>

<item>
<title>मथुरा कलौनी की कहानी- एक झूठ</title>
<description>कहानियों के लिये सामग्री हमें आसपास की जीवन से मिल जाती है। पात्रों के जीवन में झाँक कर और कुछ कल्पलना के रंग भर कर कहानी बन ही जाती है। सावधानी यह बरतनी पड़ती है कि पात्र या घटनाएँ बहुत करीब की न हों। बच्चे क्या सोचेंगे, भाई साहब कहीं बुरा न मान जाएँ आदि के चक्कर में रोचक उपन्यासों का मसाला धरा का धरा रह जाता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि पाठक कपोल कल्पित घटना को सच मान बैठते हैं। 'ऐसी कल्पना तो कोई कर ही नहीं सकता है, जरूर आपके साथ ऐसा घटा है!' बहरहाल, आप बताइये कि यह कहानी सच्ची है या नही। मुझे तो लगता है कि इस कहानी का नायक झूठ बोल रहा है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/ek_jhooth/ek_jhooth1.htm</link>
</item>

<item>
<title>संजीव सलिल का लघुकथा- गांधी और गांधीवाद</title>
<description>बापू आम आदमी के प्रतिनिधि थे। जब तक हर भारतीय को कपड़ा न मिले, तब तक कपड़े न पहनने का संकल्प उनकी महानता का जीवंत उदाहरण है। वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं’ -नेताजी भाषण फटकारकर मंच से उतरकर अपनी महँगी आयातित कार में बैठने लगे तो पत्रकारों ने उनसे कथनी-करनी में अन्तर का कारण पूछा। नेताजी बोले– ‘बापू पराधीन भारत के नेता थे। उनका अधनंगापन पराये शासन में देश का दुर्दशा दर्शाता था, हम स्वतंत्र भारत के नेता हैं।  अपने देश के जीवनस्तर की समृद्धि तथा सरकार की सफलता दिखाने के लिए हमें यह ऐश्वर्य भरा जीवन जीना होता है। हमारी कोशिश तो यह है की हर जनप्रतिनिधि को अधिक से अधिक सुविधाएँ दी जाएँ।’</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/gandhi.htm</link>
</item>

<item>
<title>अनुपम मिश्र का आलेख- तैरने वाला समाज डूब रहा है</title>
<description>जुलाई (२००४) के पहले पखवाड़े में उत्तर बिहार में आई भयानक बाढ़ अब पुरानी बात हो गई है। लोग उसे भूल गए हैं। लेकिन याद रखना चाहिए कि उत्तर बिहार उस बाढ़ की मंजिल नहीं था। वह एक पड़ाव भर था। बाढ़ की शुरुआत नेपाल से होती है, फिर वह उत्तर बिहार आती है। उसके बाद बंगाल जाती है। और सबसे अंत में- सितम्बर के अंत या अक्टूबर के प्रारंभ में- वह बाँग्लादेश में अपनी आखरी उपस्थिति जताते हुए सागर में मिलती है। इस बार उत्तर बिहार में बाढ़ ने बहुत अधिक तबाही मचाई। कुछ दिन सभी का ध्यान इसकी तरफ गया। जैसा कि अक्सर होता है, हेलीकॉप्टर आदि से दौरे हुए। फिर हम इसको भूल गए।
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2011/tairne.htm</link>
</item>


<item>
<title>रिंपी खिल्लन सिंह का आलेख- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की लोक चेतना</title>
<description>सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म सन १९२७ में बस्ती में हुआ था। सन १९४९ में प्रयाग विश्वविद्यालय से एम .ए .की परीक्षा पास की। आरंभ में आप कुछ समय तक आकाशवाणी से जुड़े रहे। बाद में जब अज्ञेय 'दिनमान' के संपादक बने तो सर्वेश्वर को उन्होंने अपने संपादक मंडल में शामिल कर लिया जहाँ वे मृत्युपर्यन्त (सन १९८३) कार्यरत रहे। इनकी प्रारंभिक रचनाओं का एक संकलन 'काठ की घंटियाँ' सन १९५९ में प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादन अज्ञेय ने किया था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2006/sarveshwardayal_saxena.htm</link>
</item>


<item>
<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>


<item>
<title>उषा राजे सक्सेना की कहानी- इंटरनेट डेटिंग</title>
<description>उस दिन स्काइप पर सौम्या, ममी-पापा से उनके विवाह की पचीसवी वर्षगाँठ लंदन में मनाने की योजना पर बातचीत कर रही थी कि ममी ने बात को बीच में ही काटते हुए कहा, ‘सौम्या, अब तू प्रोफेशनल हो गई है साथ ही रीयल स्टेट रैशब्रुक ऐंड सन्स में फिफ्टी परसेन्ट की पार्टनर है। मकान, कार, भारी बैंक-बैलेन्स सबकुछ है तेरे पास। अब अपनी शादी की सीरियसली सोच! तू इतने लोगो से मिलती-जुलती है। कोई तो तुझे पसंद होगा ही!’</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2011/internet_dating/internet_dating1.htm</link>
</item>

<item>
<title>दीपक दुबे का व्यंग्य- फाइलों में अटका भोलाराम का जीव</title>
<description>धर्मराज के कहने पर नारद भोलाराम के जीव को खोजने पृथ्वीलोक आ गए। उन्होंने भेालाराम का घर भी ढूँढ लिया और उसकी फैमिली से भी मिल लिए। बात बात में ही उन्हें उस दफतर का भी पता चला जहाँ भोलाराम जी शासकीय सेवक थे। वे खोजते खोजते उस दफतर मे पहुँच गए। फाइल मे छिपे बैठे भोलाराम के जीव से उन्होने साथ चलने की रिक्वेस्ट की मगर पेंशन फाईल मे छिपे भोलाराम के जीव ने साथ चलने से साफ इंकार कर दिया।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/filonme.htm</link>
</item>

<item>
<title>महेश परिमल का ललित निबंध- रिश्ते कभी बोझ नहीं होते</title>
<description>हम रोज ही मौतों के बारे में पढ़ते-सुनते हैं। पर हमें कितनों की मौत याद रहती है? सोचा कभी आपने? वैसे तो मौत सबके लिए एक भयावह त्रासदी के रूप में सामने आती है। पर किसी अपनों की मौत हमें भीतर तक हिला देती है, इसके अलावा कई मौतें हम पर कोई भी असर नहीं छोड़ती। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/lalit_nibandh/2011/rishte.htm</link>
</item>


<item>
<title>जयप्रकाश मानस के कविता संग्रह- 'अबोले के विरुद्ध' से परिचय</title>
<description>मानवता में अस्तित्वबोध की नयी ऊर्जा एवं संभावनाओं को लेकर कवि जयप्रकाश मानस का नया काव्य संग्रह ‘अबोले के विरूद्ध’ अनस्तित्व के खिलाफ साहित्य, समाज एवं व्यक्ति की नयी भूमिका को रेखांकित करता है। संग्रह वर्गीकृत नहीं अपितु बहुरंगी संवेदनाओं का संयोजन प्रतीत होता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2011/abole_ke_virudh.htm</link>
</item>


<item>
<title>प्रमिला कटरपंच से जानें- लोकपर्व साँझी का विषय में</title>
<description>क्वार मास की समाप्ति पर ब्रज क्षेत्र में घर–घर साँझी के लोकगीत गाकर कार्तिक महीने का स्वागत किया जाता है। यों अभी क्षेत्रीय परम्परा की रूपरेखा अपने अनवरत गति से प्रवाहित हो रही है, परन्तु "साँझी" तो साहित्यकारों तथा शोधकारों के लिये स्वयं में गंभीर और महत्वपूर्ण विषय है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2003/sanjhi.htm</link>
</item>
<item>
<title>रवीन्द्र कुमार का व्यंग्य- दाखिला अँग्रेजी स्कूल में</title>
<description>(हिंदुस्तान में अंग्रेजी पब्लिक स्कूलों में दाखिले के लिए मची मार-काट से मैकाले की आत्मा को कितनी शांति मिलती होगी)। अगर घर की बड़ी-बूढ़ियों को को बच्चों का दाखिला कराने की कवायद सौंप दी जाए तो बच्चू सबकी सिट्टी-पिटटी गुम हो जाएगी और सारी चौकड़ी भूल जाएँगी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/dakhila.htm</link>
</item>

<item>
<title>मधु संधु की लघुकथा- साक्षात्कार</title>
<description>भाषा विभाग के हिन्दी अधिकारी की एक नौकरी के लिए उसने आवेदन दिया था। आज साक्षात्कार था। ऐसा न था कि उसने साक्षात्कार के लिए तैयारी न की हो अथवा वह विषय का ज्ञाता न हो। फिर भी भय, घबराहट थरथराहट उसका साथ न छोड़ रहे थे। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/sakshatkar.htm</link>
</item>

<item>
<title>विजय कुमार का दृष्टिकोण- विश्व बाजार और हिंदी</title>
<description>भाषा की निर्मिति हमेशा ही बाज़ार में हुई है। बाज़ार में कुछ ख़ास ज़रूरतों के तहत मनुष्‍य एक दूसरे से जुड़ते हैं। उनके संबंध विकसित होते हैं। भाषा के रूप बनते हैं। बाज़ार में भाषा चीज़ों को परिभाषित करती है, चीज़ें भाषा को परिभाषित करती हैं। गाँव की हाट से जिले की मंडी तक, जिला मंडी से प्रांतीय बाज़ार तक और वहाँ से राष्‍ट्रीय बाज़ार और अन्‍तर्राष्‍ट्रीय नेटवर्क तक बाज़ार के विकास के साथ-साथ मनुष्‍य संबंधों की अनेक स्‍तरीय यात्राएँ भी हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2011/vishwabazar_aur_hindi.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ. राकेश शर्मा के शब्दों में- विश्व हिंदी सचिवालय का सफरनामा</title>
<description>हिन्दी का एक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में संवर्द्धन करने और विश्व हिन्दी सम्मेलनों के आयोजन को संस्थागत व्यवस्था प्रदान करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना का निर्णय लिया गया। इसकी संकल्पना १९७५ में नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान की गई जब मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर शिव सागर रामगुलाम ने मॉरीशस में विश्व हिन्दी सचिवालय स्थापित करने का प्रस्ताव किया। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/itihas/2011/vishva_hindi_sachivalay.htm</link>
</item>


<item>
<title>
<title>डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय से जानें- हिंदी का वैश्विक परिदृष्य</title>
<description>इक्कीसवीं सदी बीसवीं शताब्दी से भी ज्यादा तीव्र परिवर्तनों वाली तथा चमत्कारिक उपलब्धियों वाली शताब्दी सिद्ध हो रही है। विज्ञान एवं तकनीक के सहारे पूरी दुनिया एक वैश्विक गाँव में तब्दील हो रही है और स्थलीय व भौगोलिक दूरियां अपनी अर्थवत्ता खो रहीं हैं। वर्तमान विश्व व्यवस्था आर्थिक और व्यापारिक आधार पर ध्रुवीकरण तथा पुनर्संघटन की प्रक्रिया से गुजर रही है। ऐसी स्थिति में विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों के महत्त्व का क्रम भी बदल रहा है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parikrama/delhi/2011/09_12_11.htm</link>
</item>

<item>
<title>मनमोहन सरल की कहानी- चाबी के खिलौने</title>
<description>वह लॉबी में खड़ा था। उसकी औरत चमकदार कपड़ों में सोफ़े पर बैठी थी। वह पहले खड़ा नहीं था। जब मैंने वहाँ प्रवेश किया था तो दोनों को दूर से बैठे देखा था लेकिन मैं नहीं पहचान पाया था कि वह होगा। उसकी किसी औरत के साथ सटकर बैठे और चिडि़यों की तरह गुपचुप बातें करने की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती थी। मुझे आते देखकर वह बहुत पहले से ही खड़ा हो गया था लेकिन उसकी औरत वैसे ही बैठी रही थी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/chabi_ke_khilone/chabi_ke_khilone1.htm</link>
</item>

<item>
<title>अशोक गौतम का व्यंग्य- इस दर्द की दवा क्या है</title>
<description>अपने घर में वैसे तो हर रोज किसी को कुछ न कुछ हुआ करता है, किसी को जुकाम है तो किसी को खाँसी। किसी को घुटने में दर्द रहता है तो किसी को सिर में दर्द। किसी को जुलाब लगे होते हैं तो किसी को कब्जी हुई होती है। कई बार तो ये सब देख कर मन करता है कि सरकार से अनुरोध करूँ कि... </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/isdard.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ. भक्तदर्शन श्रीवास्तव की विज्ञानवार्ता- कागज पर सौर ऊर्जा</title>
<description>अब नये शोध से उम्मीद की जा सकती है कि इस उर्जा के संग्रहण के लिए कागज या कपड़ों जैसी सस्ती सतहों पर सौर सेल को प्रिंट कर, सौर इंस्टालेशन की लागत भी काफी कम की जा सकेगी। खुले स्थानों पर प्रयोग के लिए इनको लेमिनेट कर वर्षा व तूफानी इलाकों में आसानी से प्रयोग किया जा सकेगा और सेल के फंक्शन पर कोई असर भी नहीं होगा। इन्हें आप मोड़कर अपनी जेब में रख सकते हैं। जेब से निकाल कर इस्तेमाल कर सकते हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/vigyan/2011/saur_urja_kagaz_per.htm</link>
</item>


<item>
<title>दिविक रमेश का संस्मरण- कवि-चिन्तक शमशेर बहादुर सिंह</title>
<description>मुझे एक लम्बे समय तक शमशेर के सम्पर्क में रहने का सुअवसर मिला है।। बहुतेरों की तरह उनसे निकटता का दावा भी कर सकता हूँ। मैं उनके घर पर गया हूँ और वे भी मेरे घर पर आए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के उनके कार्यालय में और बाहर हुई सभाओं आदि में भी उनसे मुलाकात करने के मुझे सुअवसर मिले हैं। शमशेर जी से मेरा पहला वास्ता सत्तर के दशक में ही पड़ा था। बहुत ही प्रभावशाली ढ़ंग से। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2011/shamsher.htm</link>
</item>


<item>
<title>पर्यटक के साथ घूमें- इतिहास प्रसिद्ध इस्तांबूल</title>
<description>नैसर्गिक एवं प्राकृतिक सौन्दर्य की अनुपम छटा बिखेरती सूर्यरश्मियाँ, बफार्नी पहाडियाँ, समुद्रीतट व झीलों के नयनाभिराम परिदृश्यों से पर्यटको को लुभाता, दो महाद्वीपों के आलिंगन में बंधा राष्ट्र टर्की। भारत से यूरोप जाते समय टर्की रास्ते में पडता है, बिना किसी अतिरिक्त किराये के आप इसकी राजधानी अंकारा एवं प्रसिद्ध नगर इस्तंबूल के भमण की सुखद अनुभूति कर सकते है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2002/turkey/istanbul.htm</link>
</item>

<item>
<title>शीला इंद्र की कहानी- गिलास</title>
<description>सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बँटा हुआ था। उच्च श्रेणी वह गिलास कोई साधारण गिलास नहीं था। फिर उसकी कहानी साधारण कैसे होती। किंतु ऐसी होगी यह किसी ने कहीं जाना था। कई पीढ़ियों की सेवा करते-करते उस गिलास पर क्या बीती कि हे भगवान! वह गिलास हमारे परबाबा जी का था। ख़ूब बड़ा सा, पीतल का गिलास बेहद सुंदर नक्काशीदार। अंदर उसमें कलई रहती थी। चाय का उन दिनों रिवाज़ नहीं था। हमारे परबाबा जी उस गिलास में भरकर जाड़ों में दूध और गर्मियों में गाढ़ी लस्सी पिया करते थे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/gilas/gilas1.htm</link>
</item>

<item>
<title>रतनचंद जैन का प्रेरक प्रसंग- प्रगति और अभिमान</title>
<description>एक प्रसिद्ध मूर्तिकार अपने पुत्र को मूर्ति बनाने की कला में दक्ष करना चाहता था। उसका पुत्र भी लगन और मेहनत से कुछ समय बाद बेहद खूबसूरत मूर्तियाँ बनाने लगा। उसकी आकर्षक मूर्तियों से लोग भी प्रभावित होने लगे। लेकिन उसका पिता उसकी बनाई मूर्तियों में कोई न कोई कमी बता देता था। उसने और कठिन अभ्यास से मूर्तियाँ बनानी जारी रखीं। ताकि अपने पिता की प्रशंसा पा सके।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prerakprasang/2011/pragati_aur_abhiman.htm</link>
</item>

<item>
<title>ऋषभ देव शर्मा की कलम से-सच्चिदानंद चतुर्वेदी का उपन्यास `अधबुनी रस्सी'
</title>
<description>सच्चिदानंद चतुर्वेदी का उपन्यास `अधबुनी रस्सी : एक परिकथा' आंचलिक उपन्यासों और ग्राम कथाओं की परंपरा का विकास करने वाला अद्यतन प्रयास है। वस्तु और शिल्प दोनों ही दृष्टियों से इसके नयेपन को निरखा परखा जा सकता है। सौ साल पहले `हिंद स्वराज' के रूप में महात्मा गांधी ने भारतीय लोकतंत्र की जिस रस्सी को बुनना शुरू किया था वह आज भी अधबुनी ही है! उपन्यास की कथाभूमि डमरुआ गाँव है लेकिन उसका ध्वन्यर्थ है भारतवर्ष।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2011/adhbuni_rassi.htm</link>
</item>


<item>
<title>डा .सुरेशचन्द्र शुक्ल "शरद आलोक" का संस्मरण- भारतीय संस्कृति के आख्याता हजारी प्रसाद द्विवेदी</title>
<description>हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म १९ अगस्त १९०७ को आरत दुबे का छपरा ओझवलिया बलिया उत्तर प्रदेश भारत में हुआ था। हजारी प्रसाद द्विवेदी को भारतीय संस्कृति का आख्याता कहा जाता है। उन्होंने भारतीय साहित्य संस्कृति परम्परा समाज धर्म मान्यताओं की पुर्नव्याख्या की है। जिन विचारों से वह सहमत नहीं होते थे वह असहमति व्यक्त करते थे। द्विवेदी जी व्यंग्य करना द्विवेदी जी की विशेषता थी। व्यंग्य और हास्य उनकी रचनाओं में जहाँ–तहाँ भरा पड़ा है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2001/hpd.htm</link>
</item>


<item>
<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>

<item>
<title>कादंबरी मेहरा की कहानी- जीटा जीत गया</title>
<description>सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बँटा हुआ था। उच्च श्रेणी में 'ओ' लेवल- ऑर्डिनरी लेवल, मध्य में सी. एस. ई. सर्टिफिकेट ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन और निम्न श्रेणी में रेमेडिअल यानि कमजोर जिन्हें सुधार की जरूरत हो। मुझे तीसरे दर्जे के छात्रों से निपटना था। क्लासरूम क्या था--- कबाडखाना! जितने शरारती, लफंगे, कम दिमाग छोकरे थे सब जमा थे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2011/jitha_jeet_gaya/jitha1.htm</link>
</item>

<item>
<title>मनोहर पुरी का व्यंग्य- हो के मजबूर मुझे उसने उठाया होगा</title>
<description>हमारे पास वास्तव में कोई विकल्प नहीं था? यह वास्तविकता ही थी कोई गल्प नहीं था। जब किसी देश का प्रधान मंत्री यह कहता है कि किसी विशेष परिस्थिति में उसके पास स्थिति को संभालने के लिए कोई विकल्प नहीं था तो मान लेना चाहिए कि वह सत्य ही कह रहा होगा, वह सत्य के कठोर धरातल पर रह रहा होगा। और यह सत्य कहने में क्या क्या नहीं सह रहा होगा। उसे बहुत ही मजबूर हो कर यह कदम उठाना पड़ा होगा। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/hokemajboor.htm</link>
</item>

<item>
<title>कुमार रवीन्द्र के साथ- यात्रा एक कलातीर्थ की
</title>
<description>एलीफैंटा के गुफा–शिल्पों से रू–ब–रू हुए चौबीस घंटे होने को हैं और हम मुंबई से उत्तर–पूर्व में स्थित मराठवाड़ा क्षेत्र के मुख्य नगर औरंगाबाद से एलोरा गुफाओं के मार्ग पर हैं। एलोरा के यात्रापथ में ही औरंगाबाद से लगभग पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर है दौलताबाद का प्रसिद्ध ऐतिहासिक किला। सह्याद्रि पर्वतमाला की पूर्वी शाखाओं में से एक छः सौ फुट ऊँचे शृंग पर स्थित है दौलताबाद का किला। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2011/ajanta_alora/ajanta_alora.htm</link>
</item>


<item>
<title>शेर सिंह का संस्मरण- धारा के विपरीत</title>
<description>वह वर्ष २००३ का संभवत: अगस्त या सितंबर महीने के किसी शनिवार का दिन था। लखनऊ का दिल कहे जाने वाले हजरतगंज चौक से मैं मिनी बस द्वारा गोमती नगर की ओर अपने घर की दिशा में जा रहा था। मिनी बस खचाखचा भरी हुई थी। बस में जो थोड़ी सी सीटें थी, वे सब क्षमता से भी अधिक भरी हुई थी। अधिकतर सवारियाँ खड़ी थीं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2011/dharaa.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ. प्रेम जनमेजय का आलेख- व्यंग्य का सही दृष्टिकोण- हरिशंकर परसाईं </title>
<description>हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल को एक रेखा साफ साफ विभाजित कर रही है और वह रेखा है देश की आजादी की। आजादी के कारण परिस्थितियाँ बदलीं तो रचनाकार के सोचने का तरीका भी बदला। आजादी से पहले की सोच तथा आजादी के दस साल बाद की सोच में पर्याप्त अंतर आया। जिस आजादी के प्रति मोह था। वह भंग होने की स्थिति में आ पहुँचा। वैचारिक दृष्टि से ही नहीं अन्य अनेक दृष्टियों से भारतीय परिवेश में परिवर्तन लक्षित हुए। 
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2001/parsai.htm</link>
</item>

<item>
<title>नीलम राकेश की कहानी- उनसे मिलना</title>
<description>महात्मा गाँधी के बजाये क्रान्ति के बिगुल से हर दिल में स्वतंत्रता की ज्योति जल उठी थी। एक अजब सा आलम था चारों ओर। कुछ कर गुजरने की तमन्ना हर दिल में थी। क्या स्त्री क्या पुरुष हर एक के हृदय में स्वतंत्रता की चिनगारी भड़क रही थी। हर इंसान बड़ी से बड़ी कुर्बानी के लिये तैयार था।
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/unse_milna/unse_milna1.htm</link>
</item>

<item>
<title>संजीव सलिल की लघुकथा- निपूती भली थी</title>
<description>बापू के निर्वाण दिवस पर देश के नेताओं, चमचों एवं अधिकारियों ने उनके आदर्शों का अनुकरण करने की शपथ ली। अख़बारों और दूरदर्शनी चैनलों ने इसे प्रमुखता से प्रचारित किया। अगले दिन एक तिहाई अर्थात नेताओं और चमचों ने अपनी आँखों पर हाथ रख कर कर्तव्य की इति श्री कर ली। उसके बाद दूसरे तिहाई अर्थात अधिकारियों ने कानों पर हाथ रख लिए, तीसरे दिन शेष तिहाई अर्थात पत्रकारों ने मुँह पर हाथ रखे तो भारत माता प्रसन्न हुई कि देर से ही सही इन्हे सदबुद्धि तो आयी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/niputi.htm</link>
</item>

<item>
<title>कैलाश बुधवार की चेतावनी- क्या हम नव-साम्राज्यवाद के सामने घुटने टेक देंगे? </title>
<description>लाखों वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए एक दिशा चुनी थी। उसी ने निर्धारित किया कि उनकी संतति का जीवन कैसा होगा, आने वाली दुनिया की, हमारी दुनिया की शक्ल कैसी होगी। अपने पूर्वजों से मिली इस विरासत में हम पर भी यह दायित्व है कि हम अपनी संतति के बारे में, अगली पीढ़ियों के बारे में यह चिन्ता करें कि जो धरोहर इतिहास से हमें मिली है, आने वाली सदियों में कहीं उनसे छिन न जाए। मैं उस युग में साँस ले रहा हूं जब मुझे बताया जा रहा है कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की, ‘विश्व-बन्धुत्व’ की, हमारे मनीषियों की कल्पना साकार हो रही है। सारी धरती सिमटकर एक कुनबा बन चली है। वैज्ञानिक क्रांति ने हर महाद्वीप को, हर देश-प्रदेश को ही नहीं, घर-घर को एक दूसरे से जोड़ दिया है। हमें एक-दूसरे के बारे में जानने की, समझने की असीम सुविधा सुलभ है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2011/kya_hum.htm</link>
</item>


<item>
<title>अजय ब्रह्मात्मज की कलम से- हिंदी फ़िल्मों में राष्ट्रीय भावना</title>
<description>जल्दी ही रिलीज़ हो रही राजकुमार हिरानी की फ़िल्म 'लगे रहो मुन्नाभाई' में एक गीत है – 'बंदे में था दम, वंदे मातरम।' 'आओ बच्चो तुम्हें दिखाऊं झांकी हिंदुस्तान की' की धुन से प्रेरित इस गीत में गाँधीजी का आह्वान किया जाता है। गाँधीजी के बारे में गीतकार के शब्द हैं, 'ऐनक पहने, लाठी पकड़े चलते थे वे शान से, ज़ालिम कांपे थर–थर–थर, सुन कर उनका नाम रे, कद था उनका छोटा और सरपट उनकी चाल रे दुबले से पतले से थे वो, चलते सीना तान के . . . बंदे में था दम, वंदे मातरम।'</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/samachar/film_ilm/2006/hindifilmomerashtriyabhawna.htm</link>
</item>

<item>
<title>सुनील मिश्र का आलेख- महेन्द्र कपूर : देशराग के अनूठे गायक </title>
<description>शास्त्रीय संगीत की परम्परा में राग देश एक महत्वपूर्ण राग है। देशभक्ति के गीतों की परंपरा में महेन्द्र कपूर का नाम भी उसी प्रकार महत्वपूर्ण है। देशप्रेम का हर गीत देश राग में नहीं होता, मगर जब भी हम महेन्द्र कपूर का जिक्र करते हैं तो हमारे जेहन में उनकी छवि बाकायदा देशराग के एक अहम् गायक के रूप में कौंधती है। यह वाकई सच है कि देशभक्ति और परम्परागत मूल्यों में जितने लोकप्रिय और अनूठे गाने महेन्द्र कपूर ने गाए हैं उतनी संख्या में उतने श्रेष्ठ गाने शायद किसी दूसरे गायक ने न गाए होंगे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2004/mahendra_kapoor.htm</link>
</item>

<item>
<title>मन्नू भंडारी की कहानी- स्त्री सुबोधिनी</title>
<description>प्यारी बहनों, न तो मैं कोई विचारक हूँ, न प्रचारक, न लेखक, न शिक्षक। मैं तो एक बड़ी मामूली-सी नौकरी पेशा घरेलू औरत हूँ, जो अपनी उम्र के बयालीस साल पार कर चुकी है। लेकिन उस उम्र तक आते - आते जिन स्थितियों से मैं गुज़री हूँ, जैसा अहम् अनुभव मैंने पाया... चाहती हूँ, बिना किसी लाग - लपेट के उसेआपके सामने रखूँ और आपको बहुत सारे खतरों से आगाह कर दूँ। अब सीधी बात सुनिये। सीधी और सच्ची ! मेरा अपने बॉस से प्रेम हो गया। वाह! आपके चेहरों पर तो चमक आ गयी ! आप भी क्या करें? प्रेम कम्बख्त है ही ऐसी चीज़।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gauravgatha/2011/stree1.htm</link>
</item>

<item>
<title>मनजीत शर्मा मीरा का व्यंग्य- महँगाई मार गई
</title>
<description>हाँ, इस बात पर सभी एकमत थे कि महँगाई चाहे पेट्रोलियम पदार्थों की वजह से बढ़े या खाद्य-पदार्थों की वजह से, इसका खामियाजा आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है। जेब कटती है तो आम आदमी की, पेट काट-काटकर की गई बचत को दीमक चाटती है तो आम आदमी की और पेट पिचकता है तो आम आदमी का। अब हम कोई रईसजादे तो थे नहीं कि महँगाई पर छपी ढेर सारी खबरों का हम पर कोई असर नहीं होता। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/mahangai.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ. अनिल कुमार का आलेख- नवगीत- परिप्रेक्ष्य और प्रासंगिकता </title>
<description>प्राथमिक अवस्था में गीत मुख्यतया गेय था। उसके भाव-प्रसार के लिए काव्यत्व का आग्रह नहीं था। मिलन-विरह, हर्ष-शोक, आनन्द-विषाद का चित्र भावुकता द्वारा नहीं, बल्कि संगीत की भावाकुलता, भावना की अनुरूपता तथा गेयता का आधार लेकर उपस्थित हुआ और अतीत में इसी तरह अनुभूति बोधक गीतों का विकास होता रहा। जिस प्रकार लोकगाथाओं का साहित्यिक रूप महाकाव्य, खण्डकाव्य आदि प्रबन्ध- काव्यों में प्रकट हुआ, उसी प्रकार व्यक्तिगत हर्ष-शोक से परिपूर्ण गीतों का साहित्यिक रूप गीतिकाव्य या प्रगीत मुक्तकों में स्थान पाया। वस्तुतः लोकगीत ही इन साहित्यिक गीतों का आधार है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2011/navgeet_pariprekshya_aur_prasangikta.htm</link>
</item>


<item>
<title>अभिलाष अवस्थी की दृष्टि से- सूर्यबाला का कहानी संग्रह- गौरा गुनवंती</title>
<description>सूर्यबाला की १२ कहानियों का संग्रह ‘गौरागुनवंती’ एक ऐसा साहित्यिक दस्तावेज है, जिसकी हर कहानी में मानवीय संबंधों को रेशा-रेशा उघाड़ कर देखने की कोशिश की गई है, अगर विज्ञान की भाषा से विषेषण लिए जाएँ तो ये कहा जा सकता है कि सूर्यबाला के पात्र तरल, पारदर्शी और ज्वलंशील हैं। ‘नीली थैली वाला पैराशूट’ की कौशल्याबाई हो, या ‘कपड़े’ कहानी का चन्दू – सभी पात्र इतने तरल और पारदर्शी कि पाठकों को उनके अन्दर झाँकने की युक्ति नहीं ढूँढनी पड़ती। 
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2011/gaura_gunvanti.htm</link>
</item>

<item>
<title>रति सक्सेना का नगरनामा- सागरी झीलों का शहर त्रिवेन्द्रम</title>
<description>पसीना और चिपचिपाहट, चार दिनों से लगातार चलती यात्रा से चकराता दिमाग, थकावट से मुँदी आँखें अ़चानक एक ठंडा सा झोंका, मन कुछ संभला नन्हीं सी फिज़ा तन मन को छूती निकल गई प़्रदीप ने कंधे झकझोरते हुए कहा, "उठो! देखो न, फिर कहोगी कि दिखाया भी नहीं!" आँखें अपने आप खुल गईं, आँखों के फोकस में था नन्हीं नन्हीं लौले लिए सपाट फैला पानी, किनारों से पानी की ओर झुकते नारियल दरख्त, बाँस की चप्पू के सहारे तिरतीं नन्हीं-नन्हीं डोंगियाँ 
"कौन सी नदी है?" मैंने आँखें झपझपाते हुए कहा। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/nagarnama/trivendram.htm</link>
</item>

<item>
<title>जयनंदन की कहानी- पनसोखा</title>
<description>जब भी गाँव गया बासो ठाकुर को अलग-अलग वेश में देखा। कभी मिलिट्री के लिबास में, कभी सिपाही के, कभी करखनिया मजदूर के, कभी रेलवे कुली के। अपना यह बहुरूप वे हास्य पैदा करने के लिए नहीं बल्कि वस्त्रहीनता की स्थिति में हास्यास्पद बनने से बचने के लिए अख्तियार करते थे।
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/pansokha/pansokha1.htm</link>
</item>

<item>
<title>वीरेन्द्र जैन का व्यंग्य- पागलपन के पक्ष में</title>
<description>हे भावी आत्महत्यारो!, आत्महत्या मत करो, क्यों कि उसका परिणाम देखना सम्भव नहीं होता। ऐसा अंधा काम ठीक नहीं। इस प्रयास में वैसे तो अधिकांश बहादुर असफल हो जाते हैं, जो बाद में देख पाते हैं कि असफलता सदैव ही उपहास का पात्र बनाती है। लोग पीठ पीछे कहते है कि साले को मरना- वरना तो था नही एक कुप्पी मिट्टी की तेल और खराब कर दिया। आत्महत्या में असफल हो जाने के बाद जो फजीहत होती है उसे देखकर तो लगता है कि आत्महत्या ही कर लेना चाहिए। यह फजीहत पिछले असफल प्रयास की पृष्ठभूमि से ज्यादा ठोस कारण देती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/pagalpan.htm</link>
</item>

<item>
<title>मनोज श्रीवास्तव की पड़ताल- प्रवासी हिंदी साहित्य में परंपरा, जड़ें और देशभक्ति</title>
<description>क्या प्रवासी हिन्दी साहित्य पछतावे का साहित्य होकर ही जड़ों का या देशप्रेम का साहित्य हो सकता है ? कि जिसके चरित्र पीछे मुड़कर देखने की प्रक्रिया में लीन हैं ? कि उस साहित्य में बार-बार ऐसे चरित्र आते हैं जो अलग अलग परिस्थितियों से एक ही जगह पहुँचते हैं जहाँ वे अपने अभी तक जिये हुए का पुनर्निरीक्षण कर रहे होते हैं ?</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2011/pravasi_hindi_sahitya.htm</link>
</item>


<item>
<title>गुरमीत बेदी के साथ पर्यटन- श्रद्धा और सौंदर्य का संगम मंडी</title>
<description>चारों ओर से खूबसूरत पर्वतमालाओं से घिरा, व्यास नदी के तट पर बसा मंडी नगर अपनी ऐतिहासिकता, भव्यता व गौरवमयी संस्कृति के कारण न केवल हिमाचल अपितु देशभर में प्रसिद्ध हैं। श्रद्धालुओं व पर्यटकों के लिए जहाँ मंडी आकर्षण का केंद्र हैं, वहीं कलाप्रेमियों के लिए कौतूहल का विषय भी। यह वही नगरी है जहाँ महर्षि वेद व्यास ने विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत की रचना की थी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2002/mundi/mundi1.htm</link>
</item>

<item>
<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>


<item>
<title>हिमांशु श्रीवास्तव की कहानी- फ़र्क</title>
<description>बच्चों के लिये कॉरपोरेशन का स्कूल नजदीक ही, बगल की सँकरी और गन्दी गली से आगे था। मदन के दोनो बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते और अपने साथियों से रोज नई नई गालियाँ सीख कर अपने घर लौटते थे। यह सब देख-सुन और अनुभव कर मनोरमा को बड़ा दुख होता था और वह अक्सर सोचा करती कि उसके बच्चों को ऐसा नहीं होना चाहिये था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/fark/farki1.htm</link>
</item>

<item>
<title>कृष्ण बजगाईं की लघुकथा- तर्जनी उँगली</title>
<description>उनके हाथ की पाँचों उँगलियाँ सक्रिय थीं। यह पाँच उँगलियों का ही कमाल था जिनसे वे अपना और ख़ुदपर आश्रित परिवार का पेट पालते। कुछ असरे बाद उनके दोनों हाथों की दसों उँगलियाँ सक्रिय हो गईं। दो हाथ जोड़कर दसों उँगलियों से वे वोट माँगते फिरे। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/tarjani.htm</link>
</item>

<item>
<title>गिरीश पंकज का आलेख- नागार्जुन का कथा साहित्य</title>
<description>हिंदी कविता के दूसरे कबीर के रूप में लोकप्रिय नागार्जुन का यह एकांगी परिचय है। कबीर ने तो केवल कविताएँ ही रचीं, लेकिन इस आधुनिक कबीर उर्फ नागार्जुन ने प्रचुर मात्रा में गद्य साहित्य भी रचा और अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से समयुगीन समस्याओं की गहरी पड़ताल भी की। उनके तमाम उपन्यास इस बात के प्रमाण हैं कि उन्होंने हिंदी कथा-साहित्य की प्रेमचंद-परम्परा का ही सुविस्तार किया। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2011/nagarjun.htm</link>
</item>


<item>
<title>कमलेश माथुर का निबंध- रूप रंग अमलतास</title>
<description>फिर आ गया मौसम धरा के अनुपम शृंगार का। नंगे, पर्णविहीन पीत पुष्प अमलतास के रूप रंग का। अब सजेंगे कसीदे, प्रकृति की पुष्पवल्लरी के। धूप और झुलसती आग उगलते सूरज को छकाएँगे अब लाल सुर्ख गुलमोहर और स्वर्ण पीत अमलतास के मन­भावन पुष्प। लाल-पीले रेशमी पुष्पों के धागों से सजी धरा की यह चिताकर्षक छटा हर जन-मन को अनायास ही आकर्षित करती है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2011/amaltas.htm</link>
</item>

<item>
<title>दयानंद पांडेय का लेख- शब्दाचार्य अरविंद कुमार</title>
<description>अरविंद कुमार ने हिंदी थिसारस की रचना का जो विशाल और सार्थक और श्रमसाध्य कार्य किया है, उसने हिंदी को विश्व की सर्वाधिक विकसित भाषाओं के समकक्ष लाकर खड़ा किया है। उनका यह प्रयास न सिर्फ़ अद्भुत है बल्कि स्तुत्य भी है। कमलेश्वर उन्हें शब्दाचार्य कहते थे। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parikrama/delhi/2011/06_27_11.htm</link>
</item>

<item>
<title>अमरकांत की कहानी- पलाश के फूल</title>
<description>नए मकान के सामने पक्की चहारदीवारी खड़ी करके जो आहाता बनाया गया है, उसमें दोनो ओर पलाश के पेड़ों पर लाला लाल फूल छा गए थे। राय साबह अहाते का फाटक खोलकर अंदर घुसे और बरामनदे में पहुँच गए। धोती कुर्ता गाँधी टोपी हाथ में छड़ी... हाथों में मोटी मोटी नसें उभर आई थीं। गाल भे हुए बासी आलू के समान सिकुड़ चले थे, मूँछ और भौंहों के बालों पर हल्की सफेदी...</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/palash_ke_phool/pkp1.htm</link>
</item>

<item>
<title>रवीन्द्रनाथ त्यागी का व्यंग्य- पूरब खिले पलाश पिया</title>
<description>मैं काव्य-प्रेमी व्यक्ति हूँ। स्थिति यह कि नित्य लीला से जो कुछ भी समय शेष बचता है वह काव्य-पाठ को ठीक उसी भाँति दिया जाता है जिस प्रकार विनोबा जी को उर्वर धरती दान में दी जाती रही। आज जो एक काव्य-ग्रन्थ खोला तो उसकी एक पंक्ति मेरे मन को काफी गहराई तक छू गयी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/purab.htm</link>
</item>

<item>
<title>अर्बुदा ओहरी का लेख- पेड़ पलाश का</title>
<description>पलाश, टेसू या ढाक का वृक्ष भारत के सुंदर फूलों वाले प्रमुख वृक्षों में से एक है, उत्तर प्रदेश सरकार का राज्य पुष्प है और इसको भारतीय डाकतार विभाग द्वारा डाकटिकट पर प्रकाशित कर सम्मानित किया जा चुका है। भारतीय साहित्य और संस्कृति से घना संबंध रखने वाले इस वृक्ष का चिकित्सा और स्वास्थ्य से भी गहरा संबंध है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2001/palash.htm</link>
</item>


<item>
<title>पूर्णिमा वर्मन का आलेख- डाकटिकटों और प्रथम दिवस आवरणों में पलाश</title>
<description>भारतीय साहित्य और संस्कृति में पलाश टेसू या ढाक के पेड़ का महत्वपूर्ण स्थान है। इसे ध्यान में रखते हुए भारतीय डाकतार विभाग ने फूलों और पेड़ों पर प्रकाशित अपनी शृंखला में अनेक बार इसको सम्मिलित किया है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/tikat_sangrah/palash/palash.htm</link>
</item>

<item>
<title>सुधा गोयल नवीन की पुराणकथा- अग्निदेव का शाप
</title>
<description>’’माँ... माँ... हमारे खेत की मुँडेर पर जो पेड़ लगे हैं उन पर कितने सुन्दर फूल आऐं हैं, देखा तुमने?‘‘
’’वह तो हर साल आते हैं... इन्हीं दिनों, होली के समय... टेसू कहते हैं उसे...‘‘ </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/palash.htm</link>
</item>

<item>
<title>तेजेन्द्र शर्मा की कहानी- धुँधली सुबह</title>
<description>आज फिर वही हुआ। ठीक आठ बजे रात को बिजली गुल। दिव्या सहम गई। उसने राहुल को अपनी छाती से चिपका लिया। किन्तु बहुत जल्दी ही उसे अपना निर्णय बदलन देना पड़ा। गर्मी के मारे राहुल ने रोना शुरू कर दिया था। राहुल की चिल्लाहट जैसे अन्धेरे से टकराकर एक गूँज-सी पैदा करने लगी थी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2011/dhundhali_subah/dhundhli_subah1.htm</link>
</item>

<item>
<title>शरद जोशी का व्यंग्य- नेतृत्व की ताकत</title>
<description>नेता शब्द दो अक्षरों से बना है- 'ने' और 'ता'। इनमें एक भी अक्षर कम हो तो कोई नेता नहीं बन सकता । मगर हमारे शहर के एक नेता के साथ एक अजीब ट्रेजेडी हुई। वे बड़ी भागदौड़ में रहते थे। दिन गेस्ट हाउस में गुजारते रातें डाक बंगलों में। लंच अफसरों के सात लेते डिनर सेठों के साथ।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/netritva_ki_takat.htm</link>
</item>

<item>
<title>कनीज भट्टी का आलेख- रंग बिरंगी जयपुरी रजाइयाँ</title>
<description>हर शहर या प्रांत की कुछ चीजें, वहाँ की कला की देन होती हैं। पर्यटक हो या सगा संबंधी, वह आते ही यह जरूर पूछता है कि यहाँ की क्‍या चीज़ मशहूर है। और वाक़ई यह बात सही है कि किसी भी शहर की कोई खासियत, आने वाला अपने घर लेकर जाना पसन्‍द करता है, चाहे वह खाने की हो, पहनने-ओढ़ने की हो या रखने की हो। यही चीज़ें देने-लेने में भी काम आती हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2011/rang_birangi.htm</link>
</item>


<item>
<title>श्रीराम परिहार का ललित निबंध- शब्द वृक्ष</title>
<description>एक था बेटा। एक थी बेटी। दोनों खेलते आँगन में। आँगन में था पेड़। पेड़ पर थे पत्ते। पत्तों में था घोंसला। घोंसले में थे बच्चे। बच्चे चिड़िया के। चिड़िया की थी चहक। बच्चों की थी चें-चें। पत्तों की थी नाक। नाक से पत्ते लेते थे साँस। साँसों में बसा था हरापन। हरेपन में था पानी। पानी से था जीवन। जीवन की थी कहानी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/lalit_nibandh/2011/shabdvriksh.htm</link>
</item>

<item>
<title>अंबरीष मिश्र के साथ बनें- हिमालय के हमसफ़र</title>
<description>हिमालय के दुर्गम स्थानों की अपनी पदयात्राओं की याद आते ही स्वर्गीय भास्कर जी की छवि तथा उनकी बातें स्मृति पटल पर उभर आती है। उनके बिना हिमालय की यात्राओं के कार्यक्रम कई बार बनाये पर योजना कागज तक ही सीमित रह गयी। वे हम लोगों के प्रेरक तथा हमारी यात्राओं के पथ प्रदर्शक थे। भास्कर जी यात्राओं के समय कहा करते थे कि हिमालय के मूड का किसी को पता नहीं कि साफ सुथरा दृश्य कब घने बादलों से ढक कर सघन अन्धकार में बदल जाये। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2002/dankar/dankar.htm</link>
</item>

<item>
<title>अशोक गुप्ता की कहानी- शोक वंचिता</title>
<description>उस समय रात के डेढ़ बज रहे थे...कमरे की लाईट अचनाक जली और रौशनी का एक टुकड़ा खिड़की से कूद कर नीचे आँगन में आ गिरा। लाईट दमयंती ने जलाई थी। वह बिस्तर से उठी और खिड़की के पास आ कर बैठ गई। उसके बाल खुले थे, चेहरा पथराया हुआ था लेकिन आँखें सूखी थीं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/shok_vanchita/shokvanchita1.htm</link>
</item>

<item>
<title>नंदलाल भारती की लघुकथा- लैपटॉप</title>
<description>तालियों की गड़गड़ाहट से सभाकक्ष गूँज रहा था। विक्रय प्रतिनिधियों के मुखिया वे कई शुभ समाचार सुनाने के बाद, सूचना क्रान्ति पर प्रतिनिाधियों का ध्यान आकर्षित करते हुए बोले,
"आज सूचना क्रान्ति का महत्त्व शहर गाँव खेत खलिहान तक दिखायी पड़ने लगा है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/laptop.htm</link>
</item>

<item>
<title>एम.एस. मूर्ति से रंगमंच पर- आंध्र प्रदेश की नाट्य शैलियाँ
</title>
<description>रंगमंच एक दृश्‍य काव्‍य है, इसमें दृश्‍यों के आधार पर कहानी/घटना दिखायी जाती है। प्राचीन काल से वर्तमान तक आंध्र प्रदेश में प्रचलित रंगमंच की मुख्‍य शैलियाँ है :- १.बुर्रकथा (तुक्‍कड़ प्रस्‍तुति और लोकगीत), २.हरि कथा, ३.विधि नाटकम्, ४.कोलाटम्, ५.साधारण नाटक, ६.गायक-दल, ७.तोलुबोम्‍मलाट 
</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/natak/rangmanch/2011/andhra_pradesh.htm</link>
</item>


<item>
<title>विवेक मांटेरो से जानें- परमाणु ऊर्जा- आवश्यकता या राजनीति</title>
<description> फुकुशिमा के परमाणु विध्वंस से ये साफ हो गया है कि चाहे परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा का कितना भी दावा किया जाए, वो पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहे जा सकते। फुकुशिमा में चारों रिएक्टरों में हुए विस्फोट से परमाणु विकिरण कितने बड़े इलाके में पहुँचा है और इसके कितने दूरगामी असर होंगे, इन सवालों का ठीक-ठीक जवाब देने की स्थिति में न तो राजनीतिज्ञ हैं और न ही वैज्ञानिक। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/parikrama/delhi/2011/06_06_11.htm</link>
</item>

<item>
<title>पुनर्पाठ में राजेन्द्र प्रसाद सिंह का आलेख- भोजपुरी में नीम आम और जामुन</title>
<description>डॉ भ़ोलाशंकर व्यास ने प्रो प्रजीलुस्की के हवाले से बताया है कि 'म्ब' 'बु' ध्वनिवाले संस्कृत शब्दों में से अधिकतर शब्द मुंडा भाषाओं से आए हैं। 'निंब, अंब और जंबु ऐसे ही शब्द हैं। नीम का एक नाम 'कीटक' है और 'कीटक' मगध की प्राचीन जनजाति थी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2005/bhojpuri.htm</link>
</item>


<item>
<title>पुष्पा तिवारी की कहानी- सावित्री का वट</title>
<description>सावित्री एक लड़की थी। 
वह अपने को अनोखी लड़की समझती थी। वह लड़की थी-प्रेम करने के लिये क्या यही काफी नहीं था? उसमें अनोखी लड़की हो जाने का अहसास संकोच सहित ठहर गया था। तबसे वह खुद में कुछ ढूँढ़ने लगी। अचानक उसे अपने में एक लड़के के लिए प्रेम मिला। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/savitri_ka_vat/skv1.htm</link>
</item>

<item>
<title>रवीन्द्र खरे की लघुकथा-बरगद का दर्द</title>
<description>घर के सामने लगे बूढ़े बरगद के पेड़ को देख वह बेहद खुश होता। घरवाली ताने देती- 'रोज डलवा-डलवा भरके इन पत्तन को फेंकना पड़ता है.मैं तो तंग आ गई बरगद के पेड़ से। मैं तो शुरू से ही कहती आ रही हूँ कि कटवा क्यूँ नहीं देते इस पेड़ को। वह कुछ न कहता चुपचाप रहता।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/bargad.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ. राजकुमार मलिक का आलेख- समय का समरूप बरगद</title>
<description>भारतीय बरगद का पेड़ फाइकस बैंगा‍लेंसिस, जिसकी शाखाएं और जड़ें एक बड़े हिस्‍से में एक नए पेड़ के समान लगने लगती हैं। जड़ों से और अधिक तने और शाखाएं बनती हैं। इस विशेषता और लंबे जीवन के कारण इस पेड़ को अनश्‍वर माना जाता है और यह भारत के इतिहास और लोक कथाओं का एक अविभाज्‍य अंग है। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/snibandh/2011/bargad.htm</link>
</item>


<item>
<title>कन्हैयालाल चतुर्वेदी से क्रांतिकथा- क्रांतिकारी घटना का साक्षी वह बरगद</title>
<description> पुणे का कृषि बैंकिंग महाविद्यालय देश का एक उत्कृष्ट प्रशिक्षण केंद्र है। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा संचालित इस प्रशिक्षण संस्थान ने देश विदेश में काफ़ी प्रसिद्धि प्राप्त की है। वहाँ पहुँच कर पाँच अगस्त की सुबह महाविद्यालय परिसर की परिक्रमा के लिए निकला। परिसर के दक्षिण में रिज़र्व बैंक का केंद्रीय अभिलेखागार है</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/snibandh/2006/vahbargat.htm</link>
</item>

<item>
<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>


<item>
<title>दीपक शर्मा की कहानी- नौ तेरह बाईस</title>
<description>'मैं निझावन बोल रहा हूँ, सर', मेरे मोबाइल के दूसरी तरफ़ मेरे बॉस हैं, मेरे जिले के एस.पी.। अपनी आई.पी.एस. के अन्‍तर्गत। जबकि मेरी प्रदेशीय पुलिस सेवा ने मेरी तैनाती यहाँ के चौक क्षेत्र में सर्कल आफिसर के रूप में कर रखी है। अभी कोई तीन माह पूर्व। 'एनी इमरजेंसी?' राजधानी से बॉस आज सुबह लौटे हैं और इस समय ज़रूर अपनी शृंगार-मेज़ पर अपने प्रसाधन के मध्‍य में हैं। 'येस सर।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/nauterahbais/nauterah_bais1.htm</link>
</item>

<item>
<title>अनूप कुमार शुक्ल का व्यंग्य- फटाफट क्रिकेट और चियर बालाएँ</title>
<description>कभी क्रिकेट सभ्य लोगों का खेल माना जाता था। खिलाड़ी सफ़ेद पोशाक में सभ्य लोगों की तरह खेलते थे। आज खिलाड़ी सफ़ेद पोशाक तो नहीं ही पहनते हैं। वे ऐसी कोई हरकत भी नहीं करते जिसके उन पर सभ्य होने का इल्जाम लगाया जा सके। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/fatafat.htm</link>
</item>

<item>
<title>प्रवीण गार्गव का दृष्टिकोण- लिखे हुए शब्दों के प्रति श्रद्धा</title>
<description>जीवन का पहला निबंध जो स्कूल के कोर्स में नहीं था, वह पिताजी के एक विद्वान घनिष्ठ मित्र के कहने पर लिखा था- "मैं इंजिनियर बनाना चाहता हूँ" इस विषय पर। संकोचवश वह निबंध किसी को बताया नहीं, परन्तु सम्हाल कर रखा। चार वर्ष बाद जब अभियाँत्रिकीय महाविद्यालय में प्रवेश मिला तो सहज ही इन लिखे शब्दों के प्रति श्रद्धा का भाव जाग्रत हो गया। किसी की प्रेरणा से लिखे हुए शब्द जीवन की प्रतिश्रुति बन गए, मंजिल बन गए।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2011/likhe_huye.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ. मनोज मिश्र का आलेख-दूर संवेदी रिसोर्ट उपग्रह - २</title>
<description> दूर सम्वेदी उपग्रह रिसोर्ट सेट-२ के पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रक्षेपण के साथ ही 'इसरो` के वैज्ञानिकों तथा अधिकारियों ने राहत की साँस ली। पिछले वर्ष जी०एस०एल०वी०डी-३ तथा जी०एस०एल०वी०एफ-०६ के असफल प्रक्षेपणों के बाद तथा 'इसरो` की व्यापारिक इकाई एन्ट्रिक्स का निजी व्यावसायिक कम्पनी 'देवास` के साथ करार के घोटाले की खबरों से भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन 'इसरो` की प्रतिष्ठा धूमिल हुई थी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/vigyan/2011/doorsamvedi_upgrah.htm</link>
</item>

<item>
<title>महेन्द्र राजा जैन के विचार- क्या उपन्यास लेखन सिखाया जा सकता है</title>
<description> पिछले नवम्बर (२०००) में मेलकाम ब्रेडवरी की असामयिक मृत्यु के बाद ब्रिटेन के साहित्य जगत के साथ ही पत्र -पत्रिकाओं में ब्रिटेन के कुछ विश्वविद्यालयों में चलाए जा रहे 'रचनात्मक लेखन' सम्बन्धी पाठ्यक्रमों के पक्ष -विपक्ष में बहस चल रही है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/upanyas_lekhan.htm</link>
</item>


<item>
<title>उमेश अग्निहोत्री की कहानी- बनियान</title>
<description>पिछले जन्म में जो आपके दुश्मन होते हैं, वे आपकी औलाद बन कर पैदा होते हैं।‘ न जाने पापा जी से यह बात किसने कही थी, लेकिन यह बात उन्हें इतनी पसंद आयी थी कि अगले-पिछले जन्मों में यकीन न होने के बावजूद उनके दिमाग में रह गई थी, और उस वक्त तो खासतौर पर याद हो आती थी जब वह अपने बेटे को बनियान उलटी पहने देखते।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2011/baniyan/baniyan1.htm</link>
</item>

<item>
<title>प्रवीण कुमार शर्मा की लघुकथा- राजनीतिक बाप</title>
<description>"पिताजी अब तो मैं एक सफल राजनीतिज्ञ बन गया हूँ पार्टी ने मुझे महासचिव बना दिया है।" पैर छूते हुए पुत्र ने बताया।  "हाँ तुम्हारा राजनैतिक कद तो ऊँचा हुआ है उसके लियें मैं तुम्हें बधाई देता हूँ। एक बात बताओ तुम्हें मुझ पर कितना भरोसा है?"  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/rajneetikbaap.htm</link>
</item>

<item>
<title>दिविक रमेश का आलेख- २१वीं सदी का बाल-साहित्य : विभिन्न भाषाओं से अनुवाद के संदर्भ में</title>
<description>अनुवाद की बात करना प्राय: तब जायज माना जाता है जब मूल महत्त्वपूर्ण और समृद्ध हो। भारतीय भाषाओं की बात करें तो नि:संदेह बंगला और मराठी जैसी भाषाओं के समृद्ध और महत्त्वपूर्ण बाल-साहित्य की भांति आज हिन्दी का बाल-साहित्य भी मह्त्त्वपूर्ण और समृद्ध है। इस नाते यदि हिन्दी-बाल-साहित्य के संदर्भ में भी अनुवाद की दृष्टि से विचार किया जाए तो तर्कयुक्त ही कहा जाएगा। लेकिन बहुभाषी भारत के संदर्भ में तो मेरे विचार से सभी भाषाओं के बाल-साहित्य के एक दूसरे की भाषा में अनुवाद की आवश्यकता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2011/21visadi_ka_balsahitya.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ राजेन्द्र गौतम की कलम से- नवगीत और जातीय अस्मिता</title>
<description> समकालीन हिंदी आलोचना के संदर्भ में नवगीत और जातीय अस्मिता जैसे पद काफी असुविधा पैदा करते हैं क्योंकि अब भी हिन्दी आलोचना और रचना से जुड़ा एक वर्ग इनके प्रति न तो सहज रूप से ग्रहणशील है और न ही इनकी प्रासंगकिता के प्रति आश्वस्त है। नवगीत का एक उभार नवें दशक में 'नवगीतदशक` योजना के साथ आया था। इक्कीसवीं सदी का आरंभ फिर इसके नए उभार के साथ हुआ है। वर्तमान दशक में कई अच्छे नवगीत संग्रह प्रकाशित हुए हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2011/navgeet_aur_jateeyata.htm</link>
</item>

<item>
<title>कृपाशंकर तिवारी का आलेख- मुसीबत बनता प्लास्टिक कचरा</title>
<description> चमत्कारी पदार्थ के रूप में प्लास्टिक ने भारत में साठ के दशक में प्रवेश किया था। आज इसको लेकर अजीब -सा विवाद है। पर्यावरणविद भी इसको लेकर अपने-अपने तर्क रखते हैं। कुछ का कहना है कि पारिस्थितिक तंत्र के लिए खतरनाक है, पर पिछले कुछ वर्षों में इसका उपयोग कई गुना बढ़ चुका है, इसके पक्षधारों का दावा है कि यह 'इको फ्रेंडली' यानी पारिस्थितिक तंत्र का मित्र है, क्योंकि लकड़ी और कागज़ का उत्तम विकल्प है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2004/museebut.htm</link>
</item>


<item>
<title>पावन की कहानी- दो तस्वीरें दो कहानियाँ</title>
<description>अरे! हैलो!
कब तक ताकते रहोगे? अब बस भी करो। अधिक मत सोचो, मुझे कहने दो।
यह मेरा ही फोटो है। मैं, अवनिका, उम्र छब्बीस साल, रिहाइश दिल्ली। इस फोटो में मैं जहाँ हूँ वहीं से शुरू करती हूँ-  कुछ चीजों पर किसी का बस नहीं होता, शायद ईश्वर का भी नहीं। वे होने के लिए बनी होती हैं, होना ही उनकी नियति होती है। हम सिर्फ बाध्य होते हैं उसे होते देखते रहने के लिए। मेरे साथ क्या हुआ?  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/do_tasweeren_do_kahaniyan/dtdk1.htm</link>
</item>


<item>
<title>इंदिरा दाँगी की कहानी- करिश्मा ब्यूटी पार्लर</title>
<description>बड़ी चर्चा है, कॉलोनी में नया ब्यूटी पार्लर खुला है। 
पिछले एक दशक से आसपास की चार कॉलोनियों सहित इस कॉलोनी पर एकछत्र राज करने वाले भव्य ब्यूटी पार्लर की गर्वीली संचालिका राजेश्वरी इन दिनों अपनी पुरानी ग्राहकों के मुँह से भी बस उसी पार्लर की चर्चाएँ सुन रही हैं। भव्य ब्यूटी पार्लर को ग्राहकों की कमी नहीं थी, पर यों ग्राहकों का घटना राजेश्वरी को ईर्ष्या और चिड़चिड़ाहट से भर रहा था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/kbp/kbp1.htm</link>
</item>


<item>
<title>अभिज्ञात की कहानी- सोनेवाली कुर्सी</title>
<description>रोज़ की तरह सुरेश आठ घंटे की क्लर्की की ड्यूटी बजाने के बाद घर लौटा था। वह एक निजी जूट मिल में कार्यरत था, जहाँ मज़दूरों और बाबुओं के वेतन में कोई खास फर्क नहीं था। प्रबंधन के लिए सभी नौकर एक जैसे थे और वेतन भी एक जैसा। भले वे अलग-अलग काम जानते और करते हों। इसलिए मजदूर, झाड़ूदार, दरबान और क्लर्क सबके वेतन में लगभग समानता थी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/soneki_kursi/sonekikursi1.htm</link>
</item>



<item>
<title>मोहन गुप्ता मोनी की कहानी- जहाँ से चले थे</title>
<description>मुझे आज भी वो वैसी ही लगी थी। तीस वर्ष पूर्व की बिन्‍दु और आज की बिन्‍दु में कोई विशेष अंतर नहीं था। कनपटियों के पीछे के बालों और पहरावे पर गौर न करें तो कोई कह ही नहीं सकता था कि बिन्‍दु पचपन के आसपास होगी। जिसे बचपन में चाहा और जिंदगी के इस पड़ाव में आकर उससे भेंट हो जाए, तो समय लौट सा आता है। मन उसी प्रकार उछलने लगता है जैसा कभी बचपन में होता था। लेकिन ओढ़ी हुई मर्यादा किसी ओज़ोन की परत सी फैल जाती है। बिन्‍दु पहले तो मुझे देखती रही। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/jahansechalethhe/jahansechalethhe1.htm</link>
</item>


<item>
<title>हीरालाल ठक्कर की लघुकथा- बच्चे</title>
<description>पति-पत्‍नी झगड़ रहे थे। दोनों एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हुए बहस कर रहे थे। पत्‍नी - 'मैं इस घर में नौकरानी से बदतर हूँ। दिन भर घर का सारा काम करके भी रूखा खाना और सस्‍ते कपड़े ही तो मिलते हैं। तुमसे शादी करके बहुत घाटे में हूँ।' 
पति - 'मैं इस घर में दो वक्‍त का खाना और थोड़े से चाय-नाश्‍ते के लिए सारी तनख्‍वाह दे देता हूँ। मुझे तुमसे जरा भी आदर या इज्‍जत नहीं मिलती।' </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/bachche.htm</link>
</item>

<item>
<title>जूथिका राय की आत्मकथा का अंश- आज भी याद आता है</title>
<description>बीते दिनों को याद करने बैठते ही पहले याद आती है हावड़ा जिले के आमता ग्राम की बात यहाँ मेरा जन्म हुआ था। जन्मस्थान की तरह मधुर एवं अपनी जगह शायद दूसरी नहीं होती। वो चाहे ग्राम ही क्यों न हो। हरीतिमा के स्नेह में लिपटा उसी आमता से मैं अपनी जीवनगाथा शुरू करना चाहती हूँ।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2011/juthikaroy.htm</link>
</item>

<item>
<title>जयप्रकाश मानस का ललित निबंध- काग के भाग</title>
<description>सृष्टि का सबसे बड़ा चमत्कार है- हर कृति का अनन्य एवं अनुपम स्वभाव। सबकी अपनी-अपनी अर्थवत्ता, अपना-अपना माहात्म्य। निरुद्देश्य कदाचित् कुछ भी नहीं। एक सर्वमान्य तथ्य यह भी-सर्वगुण संपन्न संज्ञा संसार में कहाँ कोई-
जड़ चेतन गुन-दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहि पय परिहरि वारि विकार ॥</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/lalit_nibandh/2011/kaagkebhaag.htm</link>
</item>

<item>
<title>हनुमान सरावगी का आलेख- लोक उद्धारक महावीर</title>
<description>भगवान महावीर सही अर्थों में लोक उद्धारक थे। उन्होंने जो भी संदेश दिए तथा धर्म की जो भी व्याख्या की वह सर्वसाधारण लोगों के लिए उन्हीं की भाषा में कीं। वे लोक पुरुष थे और वे तत्कालीन सामाजिक, नैतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों की उपज थे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2006/mahavir.htm</link>
</item>


<item>
<title>शैल अग्रवाल की कहानी- एक बार फिर</title>
<description>श्रुति एक बार फिर स्कूल में खेले नाटक की वही एलिस थी जो आज तक वन्डरलैंड में ही घूम रही है। कंचन, मधुर और रिया तीनों ही तो थीं साथ, उसकी अभिन्न और प्यारी सहेलियाँ। तीस साल में पहली बार ऐसा हुआ था कि चारो एकसाथ थीं, एक ही शहर में थीं और एक ही छत के नीचे थी। गरिमा गर्ल्र्स कौलेज की चार होनहार छात्राएँ---- ऐसी छात्राएँ जिनसे हर शिक्षिका को कई कई अपेक्षाएँ थीं, परन्तु हर अपेक्षा और महत्त्वाकाँक्षा को झुठलाती, अपनी अपनी गृहस्थी में ही रमी रह गईं थीं, चारों।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2011/ekbarphir/ebp1.htm</link>
</item>

<item>
<title>यशवंत कोठारी का व्यंग्य- क्रिकेट ऋतुसंहार</title>
<description>आह, सखि! यह कैसी मनोरम बेला है, हर तरफ गेंदबाल, विकेट, लेग बिफोर, रनों और तालियों का शोर है। देख सखि ! पूरे शहर की आबादी दो भागों में बंट गयी है। एक भाग क्रिकेट कमेंट्री सुन रहा है, दूसरा भाग अपनी छत पर टी.वी. का एंटीना लगा कर बाजार में पान की दुकान पर खड़ा-खड़ा बहस कर रहा है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/cricket_ritusamhar.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ. रामकुमार सिंह का निबंध- सूर के राम</title>
<description>श्रीकृष्ण लीला के अमर गायक, भक्ति-भागीरथी तथा संगीत-सरस्वती के साधक प्रज्ञा-चक्षु सूरदास ने ‘श्रीमद्भागवत’ के आधार पर सूरसागर की रचना कर श्रीकृष्ण लीला के विविध पक्षों को प्रकाशित किया-
“उक्ति चीज अनुप्रास बरन अस्थित अति भारी।
बचन प्रीति निरबाह अर्थ, अद्भुत तुक धारी।
प्रतिबिंबित दिवि दृष्टि, हृदय हरि लीला भासी।
जनम करम गुन रूप, सबै रसना परकासी।”</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2011/sur_ke_raam.htm</link>
</item>

<item>
<title>देवेन्द्र चौबे का लेख- मुक्तछंद के प्रथम कवि- महेश नारायण</title>
<description>कवि महेश नारायण १८५८ से १९०७ एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनका नाम साहित्य और समाज दोनो में नई चेतना के लिये दस्तक देता है। उनके पिता मुंशी भगवतीचरण संस्कृत और फारसी के विद्वान थे तथा उन्होंने महेश नारायण को शुरू से ही विकास का ऐसा वातावरण प्रदान किया जिसके कारण बचपन से ही उनके अंदर कुछ कर गुजरने की चाह बनी रही। पटना से इंट्रैंस की परीक्षा पास करने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिये कलकत्ता चले गए। बीए की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वे वापस अपने बड़े भाई गोविंदचरण के पास पटना आ गए। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/itihas/2011/mahesh_narayan.htm</link>
</item>



<item>
<title>भारतेंदु मिश्र की भावभीनी श्रद्धांजलि- छंदप्रसंग के आदर्श: आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री</title>
<description>सहज गीत कविता धारा के कवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री हिन्दी कविता के उन महान कवियों में से एक हैं जिन्होंने छंदोबद्ध हिन्दी कविता के कई युग एक साथ जिये हैं। प्रारंभ में शास्त्री जी संस्कृत में कविता करते थे। संस्कृत कविताओं का संकलन काकली के नाम से १९३० के आसपास प्रकाशित हुआ। संस्कृत साहित्य के इतिहास में नागार्जुन और शास्त्री जी को देश के नवजागरण काल का प्रमुख संस्कृत कवि माना जाता है। निराला जी ने काकली के गीत पढ़कर ही पहली बार उन्हें प्रिय बाल पिक संबोधित कर पत्र लिखा था। कुछदिन बाद निराला जी स्वयं उनसे मिलने काशी पहुँचे थे। कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव भी दिए थे। बाद में वे हिन्दी में आ गए। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2010/jankivallabh_shastri.htm</link>
</item>


<item>
<title>विपिन चौधरी की कहानी- धुँधली सी आस</title>
<description>दिन धीरे धीरे बीतते चले जा रहे हैं, सपनों का पानी बिलकुल ही खतम हो चुका है, जीवन की पुरानी मदमस्त चाल अब बेढंगी हो चली है। वह आवाज कहीं दूर जा कर लुप्त हो गई है, जिसकी प्रतिध्वनि पर मुझे ताउम्र चलना था। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/dhundhlisiaas/dsa1.htm</link>
</item>

<item>
<title>आकुल की लघुकथा- चवन्नी नहीं चली</title>
<description>एक भिखारी ने दूसरे भिखारी से मोबाइल पर कहा-
‘यार, पिछले दो तीन दिन से दिखाई नहीं दिया।' 
उसने जवाब दिया-‘ऊपर वाला देता है तो छप्पर फाड़ के देता है। पिछले दो तीन दिन में दो बोरी भर के पैसे मिले हैं। उन्हें गिन रहा था, पूरे पाँच लाख और कुछ हैं। मैंनें तो यार, अपनी पहले की जमा पूँजी से घर को ठीक करा लिया है, एडवांस दे कर डबल बैड, कूलर, कलर टी0वी0, वाशिंग मशीन, एक पुराना स्कूबटर भी खरीद लिया है। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/chavanni.htm</link>
</item>

<item>
<title>प्रभात रंजन की कलम से- फैंटम हुआ पचहत्तर का </title>
<description>फैंटम का नाम आते ही इंद्रजाल कॉमिक्स के उस महानायक की तस्वीर मन में उभरने लगती है जो शरीर को रंगीन नकाब से ढंककर रहता था, और आँखों को काले चश्मे से, खोपड़ी जैसी गुफा में रहता था, घोड़ा और बाज़ जिसके वफादार साथी थे। जिसका असली चेहरा किसी ने नहीं देखा था। कहा जाता था कि जिसने नकाबपोश फैंटम का असली चेहरा देख लिया उसकी मृत्यु निश्चित है।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/itihas/2011/phantom.htm</link>
</item>

<item>
<title>गिरीश पंकज का विश्लेषण- अज्ञेय की कविता- नई दृष्टि, नए बिंब, नए इंद्रधनुष </title>
<description>अपनी महान काव्य-परम्परा का आंशिक-तत्व लेकर नए मौलिक बौद्धिक-विवेक के साथ अज्ञेय ने जो कविताएँ रचीं, जो गद्य हमें प्रदान किया, उसने साहित्य की समकालीन धारा ही बदल दी। यही कारण है कि मुझे ही क्यों बहुतों को भी कविता और समग्र साहित्य के नए रूप-रंग और आकार को गढऩे वाले अज्ञेय को पढऩा हमेशा अच्छा लगता रहा। इस बावरे अहेरी ने नई साहित्यिक चेतना की जो असाध्य वीणा बजाई, उसने अपने समय को झंकृत किया ही मगर उसकी अनुगूँज से लगता है, शताब्दियाँ भी अछूती नहीं रह सकेंगी। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/snibandh/2011/ajneya.htm</link>
</item>


<item>
<title>डा. सच्चिदानंद झा की चेतावनी- सावधान मौसम बदल रहे हैं</title>
<description>पृथ्वी पर जबसे जल एवं वायु की उत्पत्ति हुई है, तब से लेकर आज तक जलवायु परिवर्तन होता रहा है और भविष्य में भी होता रहेगा। वेद, पुराण, उपनिषद् सभी में इस परिवर्तन की चर्चा अंकित है।
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में फ्रांस के वैज्ञानिक एँटोनियो स्त्राइडर पेलेग्रीनि ने जलवायु परिवर्तन के विषय में जोरदार वैज्ञानिक तर्क प्रस्तुत किया था। इसके पूर्व अठारह सौ ई. में जरमनी के प्रकृति वैज्ञानिक एलेकजेंडर फान हंबोल्ड ने जलवायु परिवर्तन की व्याख्या करने के क्रम में यह अभिमत व्यक्त किया था कि मीसोजोइक युग के पूर्व अंध महासागर नहीं था।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/prakriti/2002/mausam.htm</link>
</item>


<item>
<title>सुभाष नीरव की कहानी- चुप्पियों के बीच तैरता संवाद</title>
<description>मुझे यहाँ आए एक रात और एक दिन हो चुका था। पिताजी की हालत गंभीर होने का तार पाते ही मैं दौड़ा चला आया था। रास्ते भर अजीब-अजीब से ख्याल मुझे आते और डराते रहे थे। मुझे उम्मीद थी कि मेरे पहुँचने तक बड़े भैया किशन और मँझले भैया राज दोनों पहुँच चुके होंगे। पर, वे अभी तक नहीं पहुँचे थे। जबकि तार अम्मा ने तीनों को एक ही दिन, एक ही समय दिया था। वे दोनों यहाँ से रहते भी नज़दीक हैं। उन्हें तो मुझसे पहले यहाँ पहुँच जाना चाहिए था, रह-रहकर यही सब बातें मेरे जेहन में उठ रही थीं और मुझे बेचैन कर रही थीं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/chuppiyon/chuppiyon1.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ. बालकरण पाल का व्यंग्य- बैठकबाजी</title>
<description>बैठकबाजी की महिमा अपरंपार है और जितने भी किस्म की बाजियाँ हमारे दश में प्रचलित है, उन सबमें बैठकबाजी सर्वाधिक लोकप्रिय एवं श्रेष्ठ है। इसका अपना अलग ही आनंद है। इस स्वर्गिक आनंद को वही समझ सकते हैं, जिनहोंने कभी इसका लुत्फ उठाया है। बाइबिल की भाषा में कहा जा सकता है- वे धन्य हैं जिन्होंने बैठकबाजी की है। और जिन्हें कभी बैठकबाजी का अवसर ही नसीब नहीं हुआ उनके लिये तू क्या जाने वाइज कि तूने पी ही नहीं।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/baithakbaji.htm</link>
</item>

<item>
<title>संकलित लेख- पुष्टि मार्ग के प्रवर्तक वल्लभाचार्य</title>
<description>महान दार्शनिक तथा पुष्टि मार्ग के संस्थापक महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को संवत् १५३५ अर्थात सन् १४७९ ई. को रायपुर जिले में स्थित महातीर्थ राजिम के पास चम्पारण्य (चम्पारण) में हुआ था। बाद में वे अपने पिता के साथ काशी आकर बसे।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2011/vallabhacharya.htm</link>
</item>

<item>
<title>रश्मि आशीष से जानें- उपयोगी ब्राउजर एक्सटेंशन</title>
<description>वेब ब्राऊज़रों के बारे में कुछ आरम्भिक जानकारी हम अपने पिछले लेख "कहानी ब्राऊज़रों की" में दे चुके हैं। वर्तमान में इन्टरनेट एक्सप्लोरर को छोड़कर बाकी सभी ब्राऊज़रों की क्षमतायें एक्सटेंशनों के द्वारा आश्चर्यजनक रूप से बढ़ाई जा सकती हैं। एक्सटेंशनों के मामले में फायरफौक्स सबसे आगे है और क्रोम तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। ओपेरा तथा सफारी भी ज़्यादा पीछे नहीं हैं। संख्या में बहुत ज़्यादा होने के कारण इनमें से कौन से एक्सटेंशन स्थापित करें - यह निर्णय लेना मुश्किल होता है।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/pradyogiki/2011/browser_extension.htm</link>
</item>

<item>
<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>
<item>
<title>सुधा ओम ढींगरा की कहानी- ...और बाड़ बन गई</title>
<description>''साथ वाले घर के सामने सामान ढोने वाला ट्रक खड़ा है। लगता है नए पड़ोसी आ गए हैं।" घर में प्रवेश करते ही मनु ने कहा।
यह सुनते ही मेरी उनींदी आँखें पूरी तरह से खुल गईं। मैं रसोई में सुबह की चाय बना रही थी और पूरी तरह से सचेत नहीं हुई थी। सुबह जब तक मैं एक प्याला चाय का ना पी लूँ, चुस्त-दुरुस्त नहीं हो पाती। 
''क्या आप ने उन्हें देखा है ?'' उँगलियों के अग्रिम पोरों से आँखों को मलते हुए मैंने पूछा।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2011/aur_baad_bangai/abbg1.htm</link>
</item>

<item>
<title>शैलचंद्रा का प्रेरक प्रसंग- पूजनीय कौन </title>
<description>एक मंदिर में स्थापित प्रस्तर प्रतिमा पर चढ़ाए गए पुष्प ने क्रोधित होकर पुजारी से कहा,
"तुम प्रतिदिन इस प्रस्तर प्रतिमा पर मुझे चढ़ाकर इसकी पूजा करते हो। यह मुझे कतई पसंद नहीं है। पूजा मेरी होनी चाहिये क्योंकि मैं कोमल, सुंदर, सुवासित हूँ। यह तो मात्र पत्थर की मूर्ति है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prerakprasang/2011/pujaniya.htm</link>
</item>

<item>
<title>कुमार रवींद्र का रचना प्रसंग- लोक संस्कृति और नवगीत</title>
<description>किसी भी देश की लोक संस्कृति उसकी जातीय स्मृति का रूपक होती है। किसी भी समुदाय की समूची जातीय इयत्ता उससे परिभाषित होती है। वह उस समुदाय की आध्यात्मिक-नैतिक चेतना को भी रूपायित करती है। लोक में पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रचलित-प्रचारित रीति रिवाजों एवं संस्कारों से उसकी निर्मिति होती है। यही वह भावभूमि है, जिससे समुदाय के सारे रिश्ते-नाते, उसके तीज-त्यौहार उपजते हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2011/loksanskriti_navgeet.htm</link>
</item>

<item>
<title>अनुपम मिश्र का प्रकृति-लेख- पानी की राजनीति</title>
<description>आज हर बात की तरह पानी का राजनीति भी चल निकली है। पानी तरल है, इसलिए उसकी राजनीति भी जरूरत से ज्यादा बहने लगी है। देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है, जिसे प्रकृति उसके लायक पानी न देती हो, लेकिन आज दो घरों, दो गाँवों, दो शहरों, दो राज्यों और दो देशों के बीच भी पानी को लेकर एक न एक लड़ाई हर जगह मिलेगी। मौसम विशेषज्ञ बताते हैं कि देश को हर साल मानसून का पानी निश्चित मात्रा में नहीं मिलता, उसमें उतार-चढ़ाव आता रहता है, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि प्रकृति ‘आईएसआई मार्का’ तराजू लेकर पानी बाँटने निकलने वाली पनिहारिन नहीं है।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/prakriti/2011/pani.htm</link>
</item>

<item>
<title>पुनर्पाठ में निर्मला जोशी का आलेख- मंच के हंस बलबीर सिंह रंग </title>
<description>हिंदी गीत को मुहावरों से बचाकर मौलिक चिंतन का धरातल देने वालों के नाम अगर लिए जाएँ तो स्व बलबीर सिंह रंग का नाम सबसे पहले आता है। क्योंकि जिस गीतकार पीढ़ी ने गीत को मंच पर प्रतिष्ठित करने के लिए स्पर्धा का वातावरण बनाया वे सारे गीतकार आयु, अनुभव और सृजन में स्व रंग जी से काफ़ी पीछे रहे हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/visheshank/holi_visheshank.htm</link>
</item>


<item>
<title>रामदरश मिश्र की कहानी- विदूषक</title>
<description>जब भी गाँव जाता हूँ, मन में अपने बचपन के सहपाठियों और मित्रों से मिलने की एक अजीब बेचैनी भरी होती है। इस जीवन-यात्रा में कुछ तो नवयौवन के पड़ाव पर ही अभावों से टूटकर गिर पड़े, जैसे आँधी में‍ टिकोरे। कुछ बाद में टूटे। कुछ बीमारी या अस्‍वस्‍थता की लपेट में आ गए। यानी एक-एक कर न जाने कितने चले गए और कितनों से तो (जो दूसरे गाँवों के थे) युगों से भेंट ही नहीं हुई। पता नहीं, कौन क्‍या कर रहा है, जीवित भी है कि नहीं। गाँव के भी कई सहपाठियों से जमाने से भेंट नहीं हुई क्‍योंकि वे नौकरी के सिलसिले में बाहर रहते हैं। जब मैं गाँव पहुँचता हूँ तो वे नहीं होते, वे पहुँचते हैं तो मैं नहीं होता। यही स्थिति मेरे बचपन के बहुत जीवंत दोस्‍त जोगीराय की थी। वे रेलवे में काम करते थे और अपने ढँग से गाँव आते-जाते रहे होंगे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/vidushak/vidushak1.htm</link>
</item>

<item>
<title>त्रिभुवन पांडेय का व्यंग्य- ललित निबंध होली पर </title>
<description>मैं विद्यानिवास मिश्र और विवेकी राय को हाजिर नाजिर जानकर सौगंध लेता हूँ कि आगे जो कुछ भी लिखूँगा वह ललित निबंध ही होगा। ललित निबंध के सिवाय यदि यह कुछ अन्यथा जान पड़े तो इसकी जिम्मेदारी लेखक पर नहीं होगी। जिस तरह श्रेष्ठ नेता अपने कार्य के लिए जिम्मेदार नहीं होता उसी तरह मुझे भी समझ लिया जाए। वैसे यह केवल विधागत उलटफेर का चक्कर है। समीक्षक इसके पीछे न पड़ें। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/lalit_nibandh.htm</link>
</item>

<item>
<title>सुरेशचंद्र शर्मा का निबंध- लोकगीतों में झाँकता वसंत</title>
<description>‘लोकगीत’ मन की सहज और सुन्दर अभिव्यक्ति है। सच तो यह है कि ‘लोकगीत’ लोकमन की धड़कन और अनुगूँज है। लोक कवि लोक सौन्दर्य का व्याख्याता होता है। लोकगीतों में लोकांचल की छाप दिखाई देती है।सोहर, नकटा,गारी, लचारी, फाग, चैता, उठान, कजरी आदि विविध नामों से हम लोकगीतों की सत्ता को स्वीकार करते हैं। फाग अथवा वासन्ती लोकगीतों का अपने में एक विशिष्ट स्थान है। भारतीय जनमानस में उत्सव का बड़ा प्रभाव है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2011/lokgeeton_me.htm</link>
</item>

<item>
<title>पवन चंदन की इतिहास कथा-क्यों लगाते हैं गुलाल होली में</title>
<description>बहुत पुरानी कहानी है, असुर राज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका और पडोसी राज्य के राजकुमार इलोजी एक दूसरे को दिलोजान से चाहते थे। इलोजी के रूप-रंग के सामने देवता भी शर्माते थे। सुंदर, स्वस्थ, सर्वगुण संपन्न साक्षात कामदेव का प्रतिरूप थे वे। इधर होलिका भी अत्यंत सुंदर रूपवती युवती थी। लोग इनकी जोडी की बलाएँ लिया करते थे। । उभय पक्ष की सहमति से दोनों का विवाह होना भी तय हो चुका था। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2011/gulal.htm</link>
</item>

<item>
<title>पुनर्पाठ में होली के अवसर पर- होली विशेषांक समग्र </title>
<description>कहानी, कविता, व्यंग्य, लेख निबंध और जानकारियाँ</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/visheshank/holi_visheshank.htm</link>
</item>


<item>
<title>सुनील कुमार श्रीवास्तव की कहानी- वापसी</title>
<description>सर्वेश्‍वर राय के गाँव के लिए वाराणसी से आखिरी सीधी बस अपराह्न दो बजे होती थी, जो शाम पाँच बजे मुगलसराय को पीछे छोड़ती हुई बिहार की सीमा में प्रवेश करती और करीब घंटे भर बाद उनके गाँव को छूती हुई पूर्व में डिहरी-ऑन-सोन तक चली जाती। पिछले पन्‍द्रह वर्षों में उन्‍हें जब-जब गाँव जाना हुआ, इस बस ने उनकी यात्रा काफी व्‍यवस्थित रखी। लेकिन इस बार उन्‍हें सपरिवार वाराणसी पहुँचने पर पता लगा कि अब वह सीधी बस सेवा बंद हो गई है। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/vapasi/vapasi1.htm</link>
</item>

<item>
<title>भारती पंडित की लघुकथा- गुरु दक्षिणा</title>
<description>"अरे मास्टरजी... आप? आइए.. आइए.." इतने वर्षों के बाद मास्टरजी को अचानक अपने सामने पा कर मैं चौंक ही गया था। मास्टरजी... कहने को तो गाँव के जरा से मिडिल स्कूल के हेडमास्टर.. मगर मेरे आदर्श शिक्षक, जिनकी सहायता और मार्गदर्शन की बदौलत ही उन्नति की अनगिनत सीढियां चढ़कर मैं इस पद पर पहुँचा था। बीस साल पहले की स्मृतियाँ अचानक लहराने लगी थी आँखों के सामने... </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/gurudakshina.htm</link>
</item>

<item>
<title>ईश्वर भट्ट का आलेख- तटीय कर्नाटक की लोककला- यक्षगान</title>
<description>अभी रात नहीं हुई है। बस सूरज डूब गया है। तारे नहीं निकले हैं। तभी कहीं से गूँजने लगता है, चण्डे का नाद। सुनकर लोग तैयार हो जाते हैं। उस रात को वहाँ चलनेवाले यक्षगान को देखने के लिये। रात के नौ बजते बजते आसपास के गाँव के लोग वहाँ इकट्ठे हो जाते हैं। हजारों की भीड़ लग जाती है। एक छोटे से रंगमंच पर विनूतन मायालोक का निर्माण हो जाता है। देवी देवता और पौराणिक पात्र लोगों के सामने आकर बोलने लगते हैं।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/natak/rangmanch/2011/yakshgaan.htm</link>
</item>

<item>
<title>सुधा अरोड़ा का दृष्टिकोण- महिलाएँ- शिक्षा और आत्मनिर्भरता के बाद</title>
<description>जब मैं एक महिला सलाहकार केंद्र 'हेल्प` से नही जुड़ी थी तब तक मेरा विचार था कि शिक्षा और आत्मनिर्भरता महिलाओं के बेहतर स्थिति का द्वार खोल देते हैं। लेकिन जब इस संस्था से जुड़ी तो देखा कि, यहाँ ज्यादातर ऐसी औरतें आतीं हैं जो शादी के पहले अच्छी खासी नौकरी करती थीं, पारिवारिक दबाव के चलते जिन्होंने नौकरी छोड़ दी और ऐसी नौकरीपेशा औरतें भी कम नहीं थीं जो महीने के आखीर में अपनी तनख्वाह का पूरा पैकेट अपने पति या सास के हाथ में थमा देतीं और फिर हमेशा अपने खर्च के लिए हाथ फैलाती रहतीं। इस सबसे कुछ तथ्य उभरकर आए।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2011/mahila_divas.htm</link>
</item>

<item>
<title>विश्वनाथ सचदेव का आलेख- बिन चिड़िया का जंगल </title>
<description>'एक थी चिड़िया नन्हीं मुन्नी, चीं चीं करती आती थी वो
मुझको रोज जगाती थी वो, मीठा गाना गाती थी वो
हाथ बढ़ाता था जब भी मैं, फुर्र से उड़ जाती थी वो।' 
वह नन्हीं मुन्नी चिड़िया जो मेरे बचपन में फुर्र से उड़ जाया करती थी, अब सचमुच ही उड़ गई है। कुछ ही दिन पहले मुम्बई के एक बड़े अखबार में इस छोटी सी चिड़िया के बारे में एक खबर छपी थी। खबर पक्षीविदों की यह चिंता उजागर करती थी कि मुम्बई में गौरेयों की संख्या लगातार घट रही है और कौओं की संख्या बढ़ती जा रही है। खबर को पढ़कर मुझे एक पुरानी घटना याद आ गई। एक दिन अचानक ही मुम्बई के एक व्यस्त इलाके में पौधों के एक झुरमुट में एक तितली को देखकर अचानक मुझे अहसास हुआ था -अरे, कितने दिनों बाद मैं देख रहा हूँ तितली को। मैं याद नहीं कर पाया था, पिछली बार मैंने तितली को कब देखा था।`</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2004/bin_chidiya.htm</link>
</item>


<item>
<title>पुष्पा तिवारी का उपन्यास अंश- नरसू</title>
<description>नाचते-नाचते थक गया हूँ। पैर हैं कि मन में थिरकते ही रहते हैं। स्टेशन दर स्टेशन गाड़ियाँ बदलते पैर कितने थक गए हैं और मन भी। मेरे पैर नाचते हुए कभी नहीं थके। नाचने से मैं कभी थकता भी नहीं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/upanyas/narsu/narsu1.htm</link>
</item>

<item>
<title>सुरेन्द्र गुप्त की लघुकथा- रजाई</title>
<description>बेटा मैं तुझे कितनी बार कह चुकी हूँ कि छत पर जो चारपाई पड़ी है उस पर यह रजी सूखने के लिये डाल आ, पर तू तो एक कान से सुनता है दूसरे से निकाल देता है। माँ इस रजाई को ऊपर डालने की बात तो दूर मैं इसे छुऊँगा भी नहीं। माँ इसे तू बाहर क्यों नहीं फेंक देती।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/razai.htm</link>
</item>

<item>
<title>प्रकृति और पर्यावरण में अनुपम मिश्र का लेख- सिमट-सिमट जल भरहिं तलाबा</title>
<description>आज हर बात की तरह पानी का राजनीति भी चल निकली है। पानी तरल है, इसलिए उसकी राजनीति भी जरूरत से ज्यादा बहने लगी है। देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है, जिसे प्रकृति उसके लायक पानी न देती हो, लेकिन आज दो घरों, दो गाँवों, दो शहरों, दो राज्यों और दो देशों के बीच भी पानी को लेकर एक न एक लड़ाई हर जगह मिलेगी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2011/simat.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ. राजेन्द्र गौतम का संस्मरण- सादगी और साफ़गोई की तस्वीर- डॉ. शंभुनाथ सिंह</title>
<description>डेढ़ दशक से भी अधिक हो गया है शंभुनाथ जी को गए हुए! दरअसल मौत उनके पास एक चालाक शेरनी की तरह दबे पाँव आकर नहीं झपटी थी बल्कि उनके जीवन की अंतिम पाँच वर्षो की घटनाएँ क्रमश: दु:खद आशंकाओं की छाया से घेरती रही थीं। सन् '८५ में मुझे उनका एक पोस्टकार्ड मिला था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि मैं उनसे 'अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान` में आकर मिलूँ। तब हृदय सम्बन्धी विकारों के कारण उन्हें वहाँ कुछ दिन रहना पड़ा था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2011/shambhunath.htm</link>
</item>

<item>
<title>पुनर्पाठ में चित्र लेख- दिन की अगवानी</title>
<description>अंधेरे में डूबी थी धरती
दूर तक 
कुछ भी नज़र नहीं आता था
तिमिर में खो गए थे घर
पहाड़ियां सोई थीं काली चादर ताने
परिन्दे अभी तक जागे नहीं थे
छाया था 
हर ओर सन्नाटा
दिन की अगवानी को 
निकली ही थी 
बादलों की चुस्त टोली, 
कि तभी 
दूर से झलकी 
सुबह की पहली किरन</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/dopal/chitralekh/din_ki_agvani/akash_01.htm</link>
</item>


<item>
<title>अनिल प्रभा कुमार की कहानी- घर</title>
<description>कॉलेज में साल का आख़िरी दिन था। विश्व - विद्यालय के अहाते में खूब सरगर्मी मची हुई थी। सलिल भी अपनी इमारत से नीचे उतर कर, मुख्य द्वार के साथ लगी पटरी पर अपना थोड़ा-सा सामान रख कर खड़ा हो गया। प्रतीक्षा कर रहा था अपनी माँ की। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2011/ghar1.htm</link>
</item>

<item>
<title>मनोहर पुरी का व्यंग्य- प्याज और ब्याज</title>
<description>जब चाहे राजनीति का मुद्दा बन जाता है प्याज, लगता है मूल के साथ खतरे में पड़ जाता है ब्याज। नेता कहते रह जाते हैं इस देश में गरीबी दोबारा राजनीति का मुद्दा नहीं बन पाई, प्याज क्या लहसुन खाकर बनेगा भाई। बहुत ऊंचा उड़ेगा तो क्षेत्रीय छत्रपों सरीखा औंधे मुँह नीचे गिरेगा। वह तो हमारे देश की अधम प्याज को ऊंचा उठाने की तैयारी है, नहीं तो दुनिया भर में प्याज यूं ही फिरती मारी-मारी है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/pyajaurbyaj.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ. किशोर काबरा का लेख- गीत और नवगीत के बीच एक ऋतुमती प्यास</title>
<description>प्रत्येक गीत बीते युग के सन्दर्भ में अपने समय का नवगीत होता है और प्रत्येक नवगीत आने वाले कल की पृष्ठभूमि मे अपने जमाने का गीत होता है।ये नव, नूतन या अभिनव उपसर्ग तो पीढ़ियों के अन्तर को उनमें छिपे अस्तित्व के संघर्ष को बताते हैं। इनका देशकाल से सम्बन्ध है, शाश्वती का इनसे क्या लेना देना? फूलों की माला में छिपे धागे की तरह एक ही प्यास पूरे गीति तत्व को सँभाले हुए है और वह है ऋतुमती प्यास! प्यास जो ऋतुमती है, ऋतुमती जो प्यासी है अर्थात गीतकार और संगीतकार के बीच किसी नवगीत के सृजन की अतृप्त उत्सुकता, उर्वर जिज्ञासा, नए मुहावरे की तलाश, पुराने को छोड़ कर नए शिल्प को ग्रहण करने की आनन्ददायक उत्तेजना, एक चुनौती, किसी टूटन को... शब्द से सी देने की एक लयात्मक ललक, सूई धागे की तरह एक -दूसरे में होने न होने के बीच की अनुभूति, मिट्टी की गंध के आकाशी सपनों को थामने और आकाशी सपनों के मिट्टी सने पाँवों को टटोलने की अनथक कोशिश का नाम नवगीत है, जिससे हर गीत को नवगीत बनने के लिए गुजरना पड़ता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2011/geetaurnavgeet.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ. वेद प्रताप वैदिक के विचार- दाल में कुछ काला जरूर है</title>
<description>स्विस बैंकों में भारत का कितना धन जमा है ? विभिन्न रपटों के मुताबिक यह लगभग ७० लाख करोड़ रू. है। यह इतनी बड़ी राशि है कि साधारण आदमी इसका हिसाब ही नहीं लगा सकता लेकिन इसे समझने का एक दूसरा तरीका भी है। अगर हम यह कहें तो बात बहुत जल्दी समझ में आ जाएगी कि यदि इस राशि को भारत के गरीबों में बांट दें तो एक ही रात में ७० करोड़ गरीब लोग लखपति बन जाएँगे। जो आदमी २० रू. रोज़ पर गुजारा कर रहा है, उसके हाथ में एक लाख रू. आ जाए तो वह क्या नहीं कर सकता ?</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parikrama/delhi/2011/02_14_11.htm</link>
</item>


<item>
<title>भारतीय लोक कलाओं की जानकारी- कलमकारी</title>
<description>कलमकारी आंध्र प्रदेश की अत्यंत प्राचीन लोक कला है और जैसा कि नाम से स्पष्ट है यह कलम की कारीगरी है। इसकी जड़े आंध्र के श्रीकलाहस्ति और मछलीपुरम नामक नगरों में हैं। श्रीकलाहस्ति में आज भी कलमकारी के लिये कलम का उपयोग होता है जबकि मछलीपुरम में ठप्पों का चलन है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kaladirgha/folkart/kalamkari.htm</link>
</item>


<item>
<title>प्रवीण पंडित की कहानी- अपने अपने दायरे</title>
<description>चौपाल अलसाई सी उठ बैठी। 
पीपल ने भी अंगड़ाई ली। 
गली कूंचे कुलबुला उठे।
हल्की सी ठंड भरे दिन ने बदन सेंकने के लिये सुबह के नवेले गुलाबी गोले को बरसाती की मुंडेर पर लटका दिया, तो गुरजी घोसी ने भी दरवाज़े पर गुहार लगा दी__
"दो SSS ध "
माँ खामोशी से चादर लपेटने लगी। अब खाट से पांव ज़मीन पर टिका कर धीरे- धीरे चट्टी (लकड़ी की खड़ाऊँ ) ढ़ूढ़ेंगी। दूध लाने के लिये भगौना उठा कर कोठा, सहन और चौक पार करते हुए दरवाज़े तक जाएगी-- धीरे धीरे। तब तक गुरजी की दूसरी, फ़ीट भर ज़्यादा लम्बी गुहार लग चुकी होगी--
"दो SSSSS ध "।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/apne_apne_dayare/aad1.htm</link>
</item>

<item>
<title>उमेश अग्निहोत्री का व्यंग्य- मैं और फेसबुक</title>
<description>पिछले दिनों जब मैं अपने नाटक की तैयारी कर रहा था, मेरे कुछ दोस्तों ने कहा आप फेसबुक के सदस्य बन जाएँ, फेसबुक ने बड़े-बड़े व्यापार बढाए हैं, आप भी फायदा उठाइये, नाटक का विज्ञापन करने में मदद मिलेगी, तो मैं भी फेसबुक पर चढ़ गया। फेसबुक पर नाटक की चर्चा हुई, मैं खुश हूँ, नाटक यहाँ हुआ, चर्चा दुनियाभर में। यह हमारी आज की दुनिया का कमाल और हक़ीकत है। आयोजन हो न हो, धूम दुनिया के कोने-कोने में मचाई जा सकती है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/facebook.htm</link>
</item>

<item>
<title>कुमार रवीन्द्र की स्मृति-यात्रा महोबा होकर खजुराहो तक</title>
<description>ग्रीष्मावकाश, ईस्वी सन् १९८०
`बारह बरस लौं कूकुर जीवे, सोलह बरस लौं जिये सियार
अठारह बरस लौं छत्री जीवे, आगे जीवन को धिक्कार ।` डिंगल काव्य का यह बहुश्रुत दोहा मेरी साँसों में ऊभ-चूभ कर रहा है कानपुर से महोबा जाती बस के शोर के साथ-साथ।धुर बचपन में सुनी लोककाव्य आल्हा की अनूठी स्वर-लहरियाँ भी गूँज-अनुगूँज बन कर साँसों में व्याप रहीं हैं। महोबा जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, `आल्ह-खंड' के नायक-द्वय आल्हा और ऊदल के शौर्य के प्रसंग भी जैसे साकार होते जा रहे हैं। बुंदेलखंड की भूमि अप्रतिम शौर्य की भूमि रही है। उसमें भी झाँसी और महोबा का अपना अलग ही स्थान है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2011/khajuraho/khajuraho.htm</link>
</item>

<item>
<title>प्रदीप शर्मा खुसरो का आलेख- सूफी दरगाहों में वसंत पंचमी</title>
<description>वसंत पंचमी का त्योहार बहुत से सूफी दरगाहों पर बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। यह जश्न आज भी सात दिनों तक भक्ति और उत्सव के साथ जारी रहता है। यह रिवाज तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में अमीर खुसरो (१२५३-१३२५ ई. तक) ने दिल्ली में शुरू किया था, जो चिश्तिया सूफी सिलसिले के संत हजरत निजामुद्दीन के शिष्य थे। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2011/dargah_vasant.htm</link>
</item>

<item>
<title>सूरज जोशी के साथ देखें- आस्ट्रेलिया के कंगारू</title>
<description>कंगारू मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप व पापुआ न्यू गिनी के कुछ भागों के मूल पशु हैं। कंगारूओं की कुछ प्रजातियाँ तो ऐसी हैं जो कि केवल ऑस्ट्रेलिया में ही पाई जाती हैं, और कहीं भी नहीं। कंगारुओं की ६० से भी अधिक प्रजातियों की गणना लातीनी में मैक्रोपोडिडे (Macropodidae) कहे जाने वाले परिवार में की जाती है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2006/kangaroo.htm</link>
</item>

<item>
<title>दीपक शर्मा की कहानी- मुर्दादिल</title>
<description>सोने से पहले मैं रम्भा का मोबाइल जरूर मिलाता हूँ। दस और ग्यारह के बीच। “सब्सक्राइबर नाट अवेलेबल” सुनने के वास्ते। 
लेकिन उस दिन वह उपलब्ध थी- “इस वक्त कैसे फोन किया, सर ?”
“रेणु ने अभी फोन पर बताया कविता की शादी तय हो गई है।“ अपनी खुशी को तत्काल काबू कर लेने में मुझे पल दो पल लग गए।
रेनू मेरी बहन है और कविता उसकी बेटी। रम्भा को मेरे पास रेणु ही लाई थी। भाई यह तुम्हारा सारा काम देखेगी। फोन, ईमेल और डाक। 
“हरीश पाठक से, रम्भा हँसने लगी। 
“तुम्हें कैसे मालूम?”
“उनके दफ्तर में सभी जानते थे।“ </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/murdadil/murdadil1.htm</link>
</item>

<item>
<title>रतनचंद जैन का प्रेरक प्रसंग- रूप या गुण</title>
<description>सम्राट चंद्रगुप्त ने एक दिन अपने प्रतिभाशाली मंत्री चाणक्य से कहा- 
“कितना अच्छा होता कि तुम अगर रूपवान भी होते।“ 
चाणक्य ने उत्तर दिया, 
"महाराज रूप तो मृगतृष्णा है। आदमी की पहचान तो गुण और बुद्धि से ही होती है, रूप से नहीं।“ </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prerakprasang/2011/roop_ya_gun.htm</link>
</item>

<item>
<title>भीमसेन जोशी को प्रभु जोशी की श्रद्धांजलि- उनका स्वर ही उनका स्मारक रहेगा </title>
<description>स्वर संसार के एक अभूतपूर्व नागरिक पंडित भीमसेन जोशी का अवसान दरअस्ल कंठ संगीत के महा-अध्याय की समाप्ति की दारुण सूचना है। हमारी स्वाधीनता की वय जितनी आज है, लगभग वही उनके गायन की रही है। लगभग भरे पूरे छह दशकों से वे कंठ स्वर के ऐसे अपने आप में एक अकेले साधक रहे हैं जिन्होंने भारतीय संगीत को अपनी गायन मेधा से ऐसा आलोकित के रखा कि संगीत की दुनिया की सारी असहमतियाँ और आलोचनाएँ ध्वस्त हो गईं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parikrama/delhi/2011/01_31_11.htm</link>
</item>

<item>
<title>भावना कुंअर की पुस्तक से परिचय- साठोत्तरी हिंदी गजल में विद्रोह के स्वर</title>
<description>गज़ल लम्बे अर्से तक सौन्दर्य अनुभूति एवं उसकी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम रही है। जीवन-अनुभव की तीव्रता को स्वतन्त्र शेर में अभिव्यक्त करना वाणी की शक्ति का परीक्षण है। कालान्तर में ग़ज़ल ने व्यष्टिगत हित की अपेक्षा समष्टिगत हित को अपना क्षेत्र बनाया, तब से इसकी भूमिका भी परिवर्तित होती गई। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2011/sathottari.htm</link>
</item>

<item>
<title>भवानी प्रसाद मिश्र का निबंध- वर्षा विगत शरद ऋतु आई</title>
<description>शारदीय सुषमा, भारतीय साहित्यकारों के गुणग्राही चक्षुओं के समक्ष, सदा सतरंगी बनकर ही उभरती आयी है। वसंत के अपने झूमते-महकते, सुमन हो सकते हैं, खिलती-इठलाती कलियाँ, गंधवाही मंद बयार और भौरों की गुंजरित-उल्लासित पंक्तियाँ हो सकती हैं, पर शरद का नील-धवल, स्फटिक-सा आकाश, उसकी अमृतवर्षिणी चाँदनी और कमल-कुम़ुदिनियों-भरे उसके असंख्य ताल-तड़ाग, उसके पास कहाँ?</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2002/sharad.htm</link>
</item>

-----
<item>
<title>हर्ष कुमार की कहानी- फौजी</title>
<description>इंदौर स्टेशन पर खड़ी इंदौर-निज़ामुद्दीन एक्सप्रेस में अपनी सीट पर बैठ कर आराम से किताब पढ़ रहा था कि अचानक फर्श पर पड़ रहे किसी के कड़क जूतों की आवाज़ से उसका ध्यान बँट गया। अगर आप किसी ट्रेन यात्रा कर रहे हों तो ट्रेन चलने से पहले स्टेशन लोगों के इधर-उधर भागने से जूतों की आवाज़ होती ही रहती है और उससे आपका ध्यान नहीं बँटता। पर यह आवाज एक अलग तरह की थी – सालों की कवायद के बाद पड़ी आदत से सख्ती से तन कर चलते हुये किसी फौजी की चाल की आवाज़। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/fauji/fauji1.htm</link>
</item>

<item>
<title>रमाशंकर श्रीवास्तव का व्यंग्य- देशभक्ति और सरसों का साग</title>
<description>भारत एक बड़ा देश है। इसको आजाद कराने में बहुत मेहनत लगी है। सैकड़ों नेताओं ने कुर्बानियाँ दी हैं। आज के लाखों स्वतंत्रता सेनानी उस त्याग के गवाह हैं। इसलिये यहाँ देशभक्ति की परम्परा अटूट है। सुबह का अखबार पढ़ा तो अपने देश के प्रति भक्तिपूर्ण चिंतन और बढ़ गया। समाचार था कि सरकार के एक बड़े सचिव अपने पोते का जन्मदिन मनाने सरकारी खर्च पर न्यूयार्क गए हैं। वे अपने साथ सरसों का एक किलो साग भी लेते गए हैं।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/deshbhakti.htm</link>
</item>

<item>
<title>ओमप्रकाश कश्यप का आलेख-भारत में गणतंत्र की परंपरा</title>
<description>सामान्यत: यह कहा जाता है कि गणराज्यों की परंपरा यूनान के नगर राज्यों से प्रारंभ हुई थी। लेकिन इन नगर राज्यों से भी हजारों वर्ष पहले भारतवर्ष में अनेक गणराज्य स्थापित हो चुके थे। उनकी शासन व्यवस्था अत्यंत दृढ़ थी और जनता सुखी थी।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2011/bharatmeganatantra.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ.चंद्रप्रकाश त्रिवेदी का आलेख- सांस्कृतिक विरासत का अंग अशोक स्तंभ</title>
<description>हहमारी सांस्कृतिक विरासत का ही एक अंग है, हमारा राष्ट्रीय चिह्न, जिसे हमने सम्राट अशोक की विरासत के रूप में प्राप्त किया है। सारनाथ में जहाँ गौतम बुद्ध ने सर्वप्रथम अपने ज्ञान के प्रकाश से संसार को आलोकित किया था, वहाँ सम्राट अशोक ने शिलालेख और यह चिह्न स्थापित किया था। यहीं से इस चिह्न को राष्ट्रीय के रूप में अपनाया गया। यह चिह्न सम्राट अशोक और महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं की स्मृति को तो ताजा करता ही है, वरन् इस चिह्न में हमारी असीम सांस्कृतिक विरासत भी झलकती है।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/snibandh/2004/ashok_stambh.htm</link>
</item>


<item>
<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>

---

<item>
<title>जीवन सिंह ठाकुर की कहानी सरासर</title>
<description>जिन हालात में मुझे लगभग अचानक दिल्ली के लिए रवाना होना पड़ रहा था। वह बेहद त्रासद था और लग रहा था, अब मेरे जीवन में लम्बे समय तक शिकारी कुत्तों की तरह पीछा करने वाली परेशानियों का एक लम्बा सिलसिला शुरू हो जाएगा। दरअस्ल हुआ यह था कि दिल्ली के मुख्यालय से अप्रत्याशित संदेश मेरे उच्चाधिकारी के पास आया था कि मुझे किसी खास वजह से मुख्यालय में अविलम्ब उपस्थित होना है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/saraasar/saraasar1.htm</link>
</item>

<item>
<title>देवेन्द्र इन्द्रेश का व्यंग्य- वी आई पी कबूतर</title>
<description>वे जमाने लद गए जब खलील मियाँ फाख्ता उड़ाया करते थे। उस जमाने में फाख्ता उड़ने के लिए होती थी। अब फाख्ता ही नहीं है तो उड़ाएँ क्या। खलील मियाँ तो अब भी हैं पर फाख्ता नहीं है। जब जमाना था तो खलील मियाँ ने बड़े फाख्त़े उड़ाए। और अब वे जिंदा हैं तो उन्हें कुछ न कुछ तो उड़ाना ही है। जिसने जिंदगी भर अपनाऔर परायों का उड़ाया हो वह बिना उड़ाए कैसे रह सकता है। सो खलील मियाँ ने कबूतर उड़ाना शुरू कर दिया।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/vipkabootar.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ. ए. के. अरुण से जानें- होमियोपैथी की विकास यात्रा</title>
<description>भारत में होमियोपैथी का इतिहास २०० साल से अधिक पुराना है। सहज एवं सस्ती चिकित्सा प्रणाली होते हुए भी होम्योपैथी को कभी महत्त्वपूर्ण या प्रमुख चिकित्सा पद्धति नहीं माना गया। कभी जादू की पुड़िया, मीठी गोलियाँ तो कभी प्लेसिबो कहकर इसे महत्त्वहीन बताने की कोशिश हुई, लेकिन अपनी क्षमता और वैज्ञानिकता के बलबूते होम्योपैथी विकसित होती रही। होम्योपैथी एलोपैथी के बाद दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी चिकित्सा पद्धति है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parikrama/delhi/2011/01_17_11.htm</link>
</item>


<item>
<title>रवीन्द्र प्रभात की पड़ताल- हिंदी भाषा और साहित्य में चिट्ठाकारिता की भूमिका</title>
<description>हर समाज की अपनी भाषा और संस्कृति होती है और हर भाषा का अपना साहित्य होता है। हिन्दी भाषा का भी अपना साहित्य और समाज है। कहना न होगा यह समाज और इसका साहित्य अत्यंत समृद्ध रहा है। आधुनिक समय में मीडिया, विज्ञापन, पत्रकारिता और सिनेमा ने हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति की भूमि को उर्वर बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2011/chitthakarita.htm</link>
</item>


<item>
<title>पुनर्पाठ में पद्मप्रिया का आलेख- अनूदित साहित्य एवं पठनीयता</title>
<description>साहित्यिक कृतियों के समक्ष बाज़ार की चुनौती हमेशा बनी रहती हैं और अगर यह चुनौती अनुवाद जैसे विशिष्ट क्षेत्रों से जुड़ी हो तो पाठकों तक कृति की यात्रा और भी कठिन हो जाती है। अनूदित साहित्य आधुनिक युग की विशिष्ट देन है पर फिर भी यह प्रश्न उठता है कि इन अनूदित कृतियों के पाठक कितने हैं।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2005/anoodit_sahitya.htm</link>
</item>

-----
<item>
<title>सुधा अरोड़ा की कहानी पीले पत्ते</title>
<description>टक्......टक्.......और एक पीला पत्ता टूटा। फिर एक और। फिर एक और। जनवरी महीने की उस सुबह में उगते सूरज की लाली थी। हरे भरे दरख्तों और अपने कद के हरे पौधों के बीच उनकी उँगलियाँ बड़े एहतियात से सूखे हुए पीले पत्ते ढूँढ लेतीं और उन पत्तों को बड़े प्यार से समेट कर अपने बाएँ हाथ में फँसी थैली में डाल देतीं। पिछले एक साल से मैं उन्हें लगभग रोज देख रही थी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/peele_patte/peele_patte1.htm</link>
</item>

<item>
<title>आकुल की लघुकथा- एक करोड़ का सवाल</title>
<description>टीवी कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में एक करोड़ के अंतिम सवाल पर मुस्कुराते हुए बिग बी ने प्रतियोगी से कहा- ‘आप बहुत भाग्यशाली हैं, इस सीट पर बैठ कर एक करोड़ के सवाल का जवाब देने वाले आप पहले व्यक्ति हैं। जवाब आपको सोच समझ कर देना है। इसका जवाब सही देने पर आपको मिलेंगे एक करोड़ रुपये, प्रसिद्धि, सम्मान और गलत जवाब देने पर आप निराश हो कर लौटेंगे, क्योंकि आपने पचास लाख कमाने का भी अवसर खो दिया है। उन्होंने प्रतियोगी की तरफ व्यंग्यपपूर्ण मुस्कान बिखेरी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/ek_karod.htm</link>
</item>

<item>
<title>भारतीय पर्वों की जानकारी के लिये- पर्व पंचांग</title>
<description> वर्ष २०११ में पड़ने वाले प्रमुख भारतीय वर्वों की जानकारी </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/panchang/panchang11.htm</link>
</item>


<item>
<title>रश्मि आशीष से जानें- खोज युक्तियों का प्रयोग</title>
<description>इन्टरनेट पर जब भी हमें कोई जानकारी चाहिए होती है तो हम सबसे पहले किसी सर्च इंजन जैसे गूगल या याहू पर ही जाते हैं। हालाँकि अक्सर केवल शब्द डालने से ही हमें वह जानकारी मिल जाती है परन्तु कभी-कभी हम चाहते कुछ हैं और सर्च इंजन हमें कुछ और दिखा रहा होता है। ऐसी स्थिति में हम कुछ युक्तियों का उपयोग करके अपनी मनचाहे खोज परिणाम पा सकते हैं। आइए गूगल की इन युक्तियों के बारे में जानें </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/pradyogiki/2011/khoj_yuktiyan.htm</link>
</item>


<item>
<title>एन.डी तिवारी का आलेख- चिर सखा है बाँस</title>
<description>बाँस का ग्रामीण तथा औद्योगिक अर्थ-व्यवस्था में समान महत्व है। इसका उपयोग झोंपड़ी बनाने, बाड़ी एवं पनवाड़ी में लगाने, छड़ी, चटाई, टोकरी, चिक, सीढ़ी, फर्नीचर एवं दैनिक वस्तुओं के निर्माण में किया जाता है तो बाँस से प्लाईवुड, अख़बारी एवं लिखने का कागज, रेयान आदि भी बनाया जाता है। नगरों में बननेवाली अट्टालिकाएँ बाँस का सहारा पाकर ही ऊँचाई तथा भव्यता को प्राप्त करती हैं। शहरों में मलिन बस्ती वालों के लिए भी बाँस घर बनाने का एक अति महत्त्वपूर्ण संसाधन है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2006/baans.htm</link>
</item>

---

<item>
<title>शुभदा मिश्रा की कहानी- नव वर्ष शुभ हो</title>
<description>फोन करने जाना था बेटा... परेशानी में डूबे बाबू जी तीसरी बार कह चुके थे। नीलू स्वयं बहुत परेशानी में पड़ गई थी। फोन तो रखा था बगल के कमरे में। दरवाजा खोलो तो रखा है फोन। लेकिन दरवाजा थोड़े ही खोला जा सकता है। दरवाजा तो उस तरफ से बंद है। और उस तरफ है आफिस। एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का जोनल आफिस। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/nav_varsh.htm</link>
</item>

<item>
<title>शरद तैलंग का व्यंग्य- शुभ कामनाएँ नए साल की</title>
<description>उस रात मैं बहुत व्याकुल था। वैसे यहाँ व्याकुल शब्द मुझे कुछ जम नहीं रहा है क्योंकि इसका प्रयोग अक्सर कृष्ण के वियोग में गोप गोपियों के लिए किया जाता है कि वे कृष्ण के विरह में बहुत व्याकुल थे। अब मैं न तो गोप समान मोटा हूँ और न ही गोपियों जैसा कमसिन। तो उस रात मैं बहुत बैचैन था। उस रात यानी किस रात। ३१ दिसम्बर की रात। वर्ष के आखिरी दिन की रात। सब लोगों की तरह मैं भी इन्तज़ार कर रहा था कि कब रात्री के बारह बजें और `कृपाला जी नए साल के रूप में प्रकट हों। कब `हेप्पी न्यू इयर' का खाता खुले।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/shubhkamanayen.htm</link>
</item>

<item>
<title>सुभाष राय का साहित्यिक निबंध- अनंत काल में एक वर्ष का अर्थ</title>
<description>समय की सत्ता अखंड और अनंत है। वही सम्पूर्ण सृष्टि का, सम्पूर्ण ब्रह्मांड का सर्जक है, नियामक भी है। वह न कभी शुरू हुआ, न कभी खत्म होगा। वह न चलता है, न रुकता है, न जाता है, न आता है। वही सर्जक है, पालक है और उसी के भीतर सब कुछ पैदा हो रहा है, लय हो रहा है। इन्ही अर्थों में समय ही ईश्वर है, खुदा है, गाड है। वह रेत में नदी बहा सकता है, नदी के गर्भ से पहाड़ को खड़ा कर सकता है और हर असम्भव को सम्भव कर सकता है। मनुष्य की दृष्टि इस परम विस्तार को पकड़ नहीं सकती।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2011/anant.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ. हरिकृष्ण देवसरे और डॉ. मनोहर भंडारी के शब्दों में- कैलेंडर शब्द की उत्पत्ति</title>
<description>चीन यूनानी सभ्यता में 'कैलेंड्स' का अर्थ था-'चिल्लाना'। उन दिनों एक आदमी मुनादी पीटकर बताया करता था कि कल कौन-सी तिथि, त्योहार, व्रत आदि होगा। नील नदी में बाढ़ आएगी या वर्षा होगी। इस 'चिल्लाने' वाले के नाम पर ही- दैट हू कैलेंड्स इज 'कैलेंडर' शब्द बना। वैसे लैटिन भाषा में 'कैलेंड्स' का अर्थ हिसाब-किताब करने का दिन माना गया। उसी आधार पर दिनों, महीनों और वर्षों का हिसाब करने को 'कैलेंडर' कहा गया है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2011/calender.htm</link>
</item>


<item>
<title>नववर्ष विशेषांक समग्र </title>
<description>पिछले वर्षों के नववर्ष विशेषांकों का संग्रह </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/visheshank/navvarsh_visheshank.htm</link>
</item>


</channel>
</rss>
