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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408</atom:id><lastBuildDate>Thu, 16 Jul 2009 06:49:16 +0000</lastBuildDate><title>कुछ हम कहें</title><description /><link>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/</link><managingEditor>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>87</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/anitakumar3" type="application/rss+xml" /><feedburner:emailServiceId>anitakumar3</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-8454510969581980160</guid><pubDate>Wed, 15 Jul 2009 19:46:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-07-16T01:18:47.719+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दोस्त</category><title>हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैने सोचा था</title><description>शाम यही कोई साढ़े पाँच बजे घर लौटे थे, पेट में चूहे वर्ल्ड कप जीत चुके थे, बहुत दिनों के इंतजार के बाद वर्षा रानी का मूड ठीक हुआ है और बम्बईवासियों ने राहत की सांस ली है। बरखा रानी ने घर की बाहरी दिवारें धो पौंछ दी हैं और कमरे के अंदर की छत पर भी सो चार हाथ चला दिए हैं। टी वी पर न्यूज चैनल चला कर हम खाने की प्लेट लिए सोफ़े पर अलसाये से पसरे पड़े थे कि मोबाइल की घंटी टनटना उठी। हैल्लो कहा तो दूसरी तरफ़ से घुघूती जी की आवाज खनखना उठी,&lt;br /&gt;"हम आप के इलाके में हैं"।&lt;br /&gt;एक क्षण में सारा आलस्य काफ़ूर हो गया, सोफ़े से लगभग उछल कर उठते हुए हमने पूछा&lt;br /&gt;"आप का ड्राइवर लोकल आदमी है"?&lt;br /&gt;हाँ!&lt;br /&gt;"ड्राइवर को फ़ोन दीजिए"&lt;br /&gt;ड्राइवर को हमने समझाया कि कैसे आना है, पता चला कि वो मेरे घर से पांच मिनिट की दूरी पर हैं। अभी हम नौकरानी को बता ही रहे थे कि क्या बनाओ कि घंटी बजी और घुघूती  जी और घुघूता जी दरवाजे पर थे। हम घुघूती जी को पहली बार देख रहे थे,नहीं नहीं देखा तो बाद में, दरवाजा खुलते ही घुघूती जी ने गले जो लगा लिया। एक दूसरे से मिल हम दोनों इतनी आनंदित हो रही थी कि बिन बात के हंस रही थी, सही कहना ये होगा कि छोटी बच्चियों की तरह गिगल कर रही थीं। उनके पतिदेव हम दोनों की मनोस्थिति समझ कर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। हमने घर आ कर अभी घर की खिड़कियां भी नहीं खोलीं थी, जल्दी जल्दी उन्हें बिठा कर हमने खिड़की खोली, बरखा में भीगी ताजी हवा का झोंका तन मन को सरोबार कर गया। घुघूती जी से न रहा गया और वो बाल्कनी की ओर खिचीं चली गयीं। कहने सुनने को इतना कुछ था हम दोनों के पास कि डेढ़ घंटा कैसे बीत गया पता ही न चला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले जब अचानक घुघूती जी ने वेरावल से फ़ोन दनदनाया था और कहा था कि मैं बोम्बे आने वाली हूँ, हम पहली बार उनकी आवाज सुन रहे थे, मन में एक उत्सुकता थी कि घुघूती जी कैसी दिखती होगीं, कैसे बात करती होगीं, क्या वो वैसी ही होगीं जैसी मेरी कल्पना में हैं या कुछ और्। ये उत्सुकता इस लिए भी ज्यादा थी क्युं कि मैने आज तक नेट पर घुघूती जी की या उनके परिवार के किसी सद्स्य की कोई फ़ोटो नहीं देखी थी। लेकिन चैट पर न जाने कितने घंटे हम उनसे बतियाये हैं। उनसे इतनी ढेर सारी बातें कर मुझे अक्सर ऐसा लगा कि उन में और मुझ में काफ़ी कुछ एक जैसा है( अब ये मत पूछिए कि क्या?) उनके सेंस ऑफ़ ह्युमर ने हमारी दोस्ती को जोड़ने में सीमेंट का काम किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घुघूती जी कुछ महीनों के लिए बोम्बे शिफ़्ट हो रही हैं, कुछ एक हफ़्ता पहले वो फ़ोन पर बम्बई के अलग अलग इलाकों के बारे में पूछताछ कर रही थीं, हम भी लोभ रोक नहीं पाये और उनको विश्वास दिलाया कि जिस इलाके में हम रहते हैं उनके लिए वही सबसे अच्छा इलाका है। कल जब उन्हों ने कहा कि हम बम्बई पहुंच गये हैं तो मन किया कि सब काम धाम छोड़ उनसे मिलने चले जाएं, लेकिन ऐसा करना मुमकिन न था। खैर हमने उनके नबी मुंबई में मकान देखने का जुगाड़ जमाया। दूसरे दिन कम से कम फ़ोन पर मिलने का वादा किया। दूसरे दिन उन्हें फ़ोन करने का इरादा बनाते बनाते दिन शाम में ढल गया। हम बहुत गिल्टी महसूस कर रहे थे और सोच ही रहे थे कि उन्हें फ़ोन लगाये। लेकिन जब कुछ मिनिट बाद उन्हें अपने दरवाजे पर खड़ा देखा तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उनसे मिलने का सपना सच हो गया। बाय द वे वो बिल्कुल वैसी हैं जैसा मैने सोचा था&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-8454510969581980160?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/efsXndCUWCo/blog-post_16.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/07/blog-post_16.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-3134635431458818628</guid><pubDate>Thu, 28 May 2009 12:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-05-28T17:50:56.527+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">बस यूँ ही</category><title>मुझे कुछ कहना है</title><description>&lt;p&gt;छब्बीस की चिठ्ठाचर्चा में अनूप जी ने हमारे बेटे की सगाई की खबर जोड़ हमारी पारिवारिक खुशी को ब्लोगजगत से जोड़ दिया है और सभी ब्लोगर मित्रों की शुभकामानाएं पा कर हम दुगुनी खुशी महसूस कर रहे हैं। आज से दो साल पहले( जी हां दो साल हो गये)  जब हम ब्लोगजगत में आये थे तब इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि ब्लोगजगत हमारे विस्तृत परिवार का हिस्सा बन जाएगा और हम अपने सब सुख दुख इस परिवार से यूं बाँट रहे होगें जैसे अपने आस पास मौजूद मित्रों से भी नहीं बाँट रहे होगें। किसे पता था कि सुबह आठ बजे पाबला जी के बच्चों को शुभकामनाएं भेजने के लिए जब कंप्युटर ऑन करुंगी तो अनूप जी दिख जायेगें और मैं अपनी जिन्दगी के एक बड़ी खबर सबसे पहले उनसे बाँट रही होऊंगी, अपनी सहेलियों को बाद में फ़ोन करके दस बजे बताऊँगी  जब सब अपने अपने ग्रहस्थी के कामों से निपट चुकी होगीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज घर पर हूँ और बहुत दिनों के बाद कुछ खास काम नहीं कर रही, कितने ही विचार, कितनी ही यादें उथल पुथल मचाये हुए हैं। आदित्य ने जब पच्चीस में पांव रखा था तभी हर मां की तरह हमें भी उसकी शादी की चिन्ता सताने लगी थी। मेरी इस चिन्ता पर मेरे पति,बेटा, और मेरी सहेलियां सब हंस पड़े थे। सबका ये कहना था कि अभी तो आदित्य बच्चा है। लेकिन हम नहीं माने बस कन्या ढ़ूढ़ाई अभियान शुरु कर दिया। कई पापड़ बेलने पड़े। जब इस काम में लगे तब पता चला कि किताबें आप को दुनिया भर की जानकारी दे दें लेकिन दुनियादारी नहीं सिखा सकतीं उसके लिए तो जिन्दगी की किताब पढ़नी पढ़ती है। रिश्ता पक्का होते ही अगली चिन्ता जो हमें सताने लगी वो ये कि हमें तो कोई रीति रिवाज पता ही नहीं, किसी कोर्स की किताब में नहीं सिखाए जाते न्।&lt;br /&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;अब पिछ्ले दो साल से ऐसी आदत पड़ गयी है कि जब भी मन विचलित होता है हम नेट पर आ जाते हैं और कोई न कोई दोस्त बात करने के लिए मिल जाता है और मन हल्का हो जाता है। बहुत दिनों से कुछ न पोस्ट करने के बावजूद लोगों से संपर्क बना हुआ है। हम में सब्र की बहुत कमी है, जब एक बात ठान लेते हैं तो उसे उसी समय पूरा करने की कौशिश करते हैं। लेकिन हर अभियान का संपन्न होना हमारे हाथ में तो नहीं। ऐसे ही एक दिन उदास हुए हम नेट पर आ बैठे, द्विवेदी जी मिल गये। हमने अपने मन की बैचेनी उनसे बाँटी, उन्हों ने हमसे आदित्य की जन्म तारीख पूछी और पता कर के बताया कि बात जून तक बनने की आशा है, और देखिए बात मई में बन गयी। ( सभी अविवाहित ब्लोगर मित्रों को कहां लाइन लगानी है पता चल गया न? )…॥:)&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;रिश्ता पक्का होने के बाद तय हुआ कि पहले 'रोके' की रस्म कर ली जाए। हम ने हां तो कर दी लेकिन अंदर ही अंदर बहुत परेशान थे। कारण ये था कि हमें पता नहीं था कि 'रोके' की रस्म में क्या करना होता है। नजदीकी रिश्तेदारों में ले दे के सिर्फ़ दो छोटी भाभियां हैं, उनमें से भी जो बम्बई में ही रहती है वो गुजराती है और जो इंदौर में रहती है वो पंजाबी। खैर हमने इंदौर फ़ोन लगाया, पूछने के लिए कि क्या करना है, कुछ सहेलियों से पूछा, लेकिन दिमाग में टोटल कन्फ़्युशन था। परेशान से हम नेट पर आ गये। दोस्त तो बहुत दिखाई पड़े ऑनलाइन, पर उस समय हमें किसी महिला सहेली की जरूरत महसूस हो रही थी, अभी हम सोच ही रहे थे कि किससे बात करें कि लो हमें मिल गयीं मिनाक्षी जी। बस हमने आधे घंटे उन्हें चैट पर अटकाये रखा और उन्हों ने भी बड़े सब्र से हमारे छोटे बड़े सभी सवालों का जवाब देते हुए एकदम सही सलाह दी। उनकी दी जानकारी के बल पर हम ये काम भी सही सलामत निपटा आये। आज ही एक पुरानी पोस्ट पढ़ रहे थे कि हिन्दी ब्लोगजगत में हिन्दी ब्लोगजगत के एक परिवार जैसा होने का डंका काफ़ी बज चुका और अब उससे ऊपर उठ कर सोचना चाहिए कि हम हिन्दी ब्लोग क्युं लिखते हैं( कुछ ऐसा ही लिखा था पोस्ट में)। मुझे लगता है कि लोग ब्लोग लिखना चाहे किसी भी कारण से शुरु करें और चाहे कितनी ही हिन्दी ब्लोगजगत की उपलब्धियां क्युं न हों , पर सबसे बड़ी उपलब्धी है यहां जो भी आता है खुद को इस तेजी से बड़ते परिवार का हिस्सा बनते पाता है और इतने मित्र पा जाता है जितने की उसने कल्पना भी नहीं की होती। आगे का आखों देखा हाल भी आप के साथ बांटूगी , इस लिए नहीं की आप जानना चाहेगें बल्कि इस लिए कि मैं आप के साथ अपने अनुभव बांटना चाहूंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;(ये पोस्ट दो दिन पहले लिखी गयी थी लेकिन नेट ने धोखा दे दिया और हम इसे आज पब्लिश कर पा रहे हैं।) &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-3134635431458818628?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/LvNYeGQx82Y/blog-post.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">38</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/05/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-8202556602733121793</guid><pubDate>Sun, 19 Apr 2009 10:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-04-19T15:44:42.631+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>गोली दिमाग के आरपार, महिला ने चाय बनायी"</title><description>&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;गोली दिमाग के आरपार, महिला ने चाय बनायी"&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;वैसे तो हमने अखबार पढ़ना बहुत कम कर दिया है। अखबार हमारी सेहत के लिए हानिकारक हैं। पूरा अखबार रेप, इनसेस्ट, या राजनीतिज्ञों की फ़ैलायी नफ़रत, धोखागड़ी के मामलों से पटा पड़ा रहता है, पढ़ते पढ़ते बेकार में रक्तचाप बड़ जाता है। लेकिन आज इतवार का दिन और बहुत दिनों बाद फ़ुर्सती सुबह के कुछ पल्। आराम से चाय की चुस्की के साथ सोचा चलो अखबार ही देख लें। पहले पन्ने पर तो था कि संजय दत्त ने मायावती को जादू की झप्पी और पप्पी देने की इच्छा जताई, हम क्ल्पना मात्र से ही मुस्कुरा उठे। संजय को अपनी ये तमन्ना पूरी करने के लिए मायावती के जन्मदिन पर एक जिम उपहार के रूप में भेजना होगा तभी उनका ये सपना पूरा होने की कुछ संभावना बन सकती है।&lt;br /&gt;पेज पलटते ही एक खबर पर नजर पड़ी, " गोली दिमाग के आरपार, महिला ने चाय बनायी"&lt;br /&gt;यकीनन खबर चौंकाने वाली थी। खबर कुछ यूँ थी कि ब्रिटेन में एक 47 वर्षीय महिला दोपहर के बारह बजे अपने घर आराम कर रही थी। अदालत ने उसके पति को घरेलू मारपीट की वारदात की वजह से छ: महीने के लिए पत्नी से दूर रहने को कहा था। लेकिन ये जनाब दोपहर बारह बजे घर में घुसे और आते ही पंलग पर आराम करती अपनी पत्नी के माथे पर गोली दाग दी। गोली खोपड़ी को चीरती पीछे से निकल गयी। इतने में पत्नी के एक पड़ौसी रिश्तेदार ने पुलिस को फ़ोन कर दिया था। अब ये अपनी पुलिस तो थी नहीं जो क्रियाकरम होने के बाद तेरहवीं पर आती, तो आनन फ़ानन में पुलिस हाजिर हो गयी। तब तक पति देव मकान के पिछवाड़े जा कर खुद को भी गोली मार कर टें बोल लिए। जब पुलिस अफ़सर उस महिला के पास पहुँचा तो महिला न सिर्फ़ होश में थी बल्कि अपने लिए किचन में जा कर चाय बना लाई थी, हां माथा एक कपड़े से दबा रखा था। लेकिन उसने अफ़सर को पूछा&lt;br /&gt;"यहां क्या हो रहा है? तुम यहां क्या कर रहे हो? अब आये हो तो चाय पियो।"&lt;br /&gt;महिला को हेलिकोप्टर से तुंरत अस्पताल ले जाया गया और उम्मीद की जा रही है कि वो पूर्णरुपेन स्वस्थ हो जायेगी। लोग परेशान हैं, अरे गोली लगे तो आदमी को मर जाना चाहिए,ये थोड़े के चाय पीने बैठ जाओ और फ़िर आराम से अस्पताल जाओ और ठीक हो कर आ जाओ। कल को टाटा टी वाले कहेगें "देखाआआआअ, हमारी चाय का कमाल।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे पढ़ कर हमें इंगलैंड में ही घटा एक और किस्सा याद आ गया, मनोविज्ञान की किताबों में अक्सर इसका जिक्र रहता है और छात्रों की यादों में रचा बसा रहता है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;बात सन 1848 की है। रेल की पटरी बिठाने का काम चल रहा था। अब जमीन कहीं समतल तो कहीं ऊबड़ खाबड़ थी। पटरी बिठाने वाली टीम में से एक पच्चीस साल के नौजवान के जिम्मे ये काम था कि जमीन को समतल बनाने के लिए चट्टानों में ड्रिल मशीन से सुराख कर उसमें थोड़ा बारुद भर कर ऊपर से रेता से ढक दो और फ़िर बिजली के फ़्युस और लोहे की छड़ों की मदद से चट्टान को उड़ा दिया जाए। उस दिन इस नौजवान का थोड़ा सा ध्यान बंटा और लोहे की तीन सेंटीमीटर मोटी और 109 से मी लम्बी छ्ड़ चट्टान के बदले उसके गाल को चीरती हुई खोपड़ी से आकाश की तरफ़ उड़ ली। ये नौजवान हक्का बक्का रह गया लेकिन तत्काल होश संभाला। वो बात करने और साथी की &lt;span class=""&gt;म&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/Ser46f-OGbI/AAAAAAAAAf4/WldyEbdNZNg/s1600-h/GageSkulls2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5326343193217604018" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 217px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/Ser46f-OGbI/AAAAAAAAAf4/WldyEbdNZNg/s320/GageSkulls2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;दद&lt;/span&gt; से चलने की स्थिती में था। वो नौजवान न सिर्फ़ बच गया बल्कि एक लंबे जीवन का सफ़र तय करके गया। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;हाँ, ये बात और है कि इस हादसे ने उसकी पूरी पर्सनलिटी ही बदल दी। हादसे से पहले वो एक जिम्मेदार, अक्लमंद, सर्वजन प्रिय व्यक्ति था जिसका उज्जवल भविष्य सबको दिखाई दे रहा था। हादसे के बाद जैसे जैसे समय गुजरा उसके माता पिता ने चैन की सांस ली, उसके शारिरीक स्वास्थय में, बातचीत में, उठने बैठने, चलने फ़िरने में कहीं कोई कमी नहीं आयी थी, सब पहले जैसा ही था। यहां तक की उसकी नयी चीजें सीखने की काबलियत, यादाश्त या बुद्धीमत्ता पर भी कोई असर न पड़ा था। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कुछ न कुछ तो असर पड़ना ही था। उसके स्वभाव में एक अजीब प्रकार का सनकीपन, उंदडता, मौजीपना, गैरजिम्मेदारानापन नजर आने लगा। माता पिता का श्रवण कुमार अब समाज के किसी भी नियम को तोड़ना अपना धर्म समझने लगा। गाली गलौच करना, दूसरों से झगड़ा करना उसकी खास आदत बन गयी और लोग उससे कतराने लगे। लोगों से किए वायदे तोड़ना उसका शौक बन गया। किसी जमाने में सबसे निष्ठावान, जिम्मेदार माना जाने वाला मजदूर अब नौकरी से हाथ धो बैठा इसके बावजूद की मालिक उसे निकालना नहीं चाहते थे पर उस पर भरौसा भी नहीं किया जा सकता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आप को भी ऐसा ही कोई किस्सा मालूम है, यदि हाँ तो बताइए न…॥&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-8202556602733121793?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/RLoTMUhFWKc/blog-post.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/Ser46f-OGbI/AAAAAAAAAf4/WldyEbdNZNg/s72-c/GageSkulls2.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">29</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/04/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-3437160050874585304</guid><pubDate>Wed, 18 Mar 2009 15:49:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-03-18T21:58:47.895+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>ये दिल मांगे मोर</title><description>&lt;div style="font-weight: bold; color: rgb(204, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मांगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मोर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;18 &lt;span&gt;मार्च&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तारीख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मायने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बदल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt;&lt;span&gt;किशोरावस्था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उत्सुकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होली&lt;/span&gt; 18 &lt;span&gt;मार्च&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटी&lt;/span&gt;&lt;span&gt;होली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रंगपंचमी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़ीं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उससे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिनचर्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़र्क&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़िर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेबात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखा&lt;/span&gt;SSSS &lt;span&gt;होली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;  18 &lt;span&gt;मार्च&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जवाब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खोज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt;&lt;span&gt;क्युं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर्षित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;औरों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पतिदेव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिजीए।&lt;/span&gt;&lt;span&gt;केलेण्डर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नवंबर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महीने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पलटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिवाली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जन्मदिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैरानी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिवाली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जन्मदिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़र्क&lt;/span&gt;&lt;span&gt;पड़ता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;बस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐवेंही।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt;?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सालों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तारीख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमको&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर्षाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्युं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मार्च&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हफ़्ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सालाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परिक्षायें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खत्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt;&lt;span&gt;मार्च&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मतलब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अंत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पढ़ाई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुक्ति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नजदीक।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घर&lt;/span&gt;&lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बूढ़ियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रश्क&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कितने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आराम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिन्दगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;बस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनाया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खत्म&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;आराम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोपहर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घूम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किताबों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरफ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आंख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डांटने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाला&lt;/span&gt;&lt;span&gt;नहीं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तारीख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अधीर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कितना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span&gt;साल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़िसल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अधीरता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़ी।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कछुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चलते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धीरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धीरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt;&lt;span&gt;तारीख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मायने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बदल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गये।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भविष्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बदले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूतकाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;बचपन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt;&lt;span&gt;तर्ज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर्।लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़िर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तारीख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिछले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पांच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सालों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तारीख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अर्थ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़िर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बदल&lt;/span&gt;&lt;span&gt;गये&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूतकाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भविष्य&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वर्तमान्।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span&gt;घरवालों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आग्रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाहर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रस्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अदायगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यंत्रवत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यूं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अगर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नवीनतम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोस्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिन्दादिली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span&gt;इसमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्राण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ूंकते।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सबने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द्विवेदी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बदौलत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जनवरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हफ़्ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहचान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ोन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ई&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;मेल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जरिए&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हालत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गले&lt;/span&gt;&lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हड्डी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़स&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाए।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तर्ज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कॉलेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनवाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिम्मा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऊपर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ले&lt;/span&gt;&lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; 26 &lt;span&gt;जनवरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उदघाटन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐलान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अगर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आता&lt;/span&gt;&lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्रासदी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मित्रों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निर्भर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;&lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ायदे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;सौदा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शुक्रगुजार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अनजान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ब्लोगर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुहार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बल्कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुरंत&lt;/span&gt;&lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तकनीकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ज्ञान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रस्सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ैंकते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिम्मत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बंधायी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डरिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डूबेंगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं।&lt;/span&gt;&lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लड़के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परिचय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिनिट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विदा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;&lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लड़का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखेगा।मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भगवान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द्विवेदी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जानते&lt;/span&gt;&lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लड़के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हवाले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिये।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिछले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महीने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दयनीय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्थिती&lt;/span&gt;&lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कारण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिन्दी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ब्लोगजगत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काबिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;युवा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ब्लोगर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डेवेलपर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करवाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कौशिश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;औंधे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुंह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खैर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विकल्प&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt;&lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शुरु&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वभाविक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शुरु&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शुरु&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काफ़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रिसर्वड&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;आखिरकार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt;&lt;span&gt;पिता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ब्लोगर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोस्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इंट्रोड्युस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुश्किल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाइस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तैइस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नौजवान्&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span&gt;छोटा।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अम्मा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होऊंगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आशंका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुढ़िया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जानती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;कैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करुंगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;यू&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कम्युनिकेशन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गेप्।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हफ़्ता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैठा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भिलाई&lt;/span&gt;&lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोम्बे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काफ़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोझ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ग्यारह&lt;/span&gt;&lt;span&gt;बजे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैठेगें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टॉक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समझायेगें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहिए।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगातार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt;&lt;span&gt;रात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ग्यारह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बजे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुबह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बजे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैठे।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बजे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घंटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साढ़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छ&lt;/span&gt;: &lt;span&gt;बजे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कॉलेज&lt;/span&gt;&lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निकल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुशी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थकान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महसूस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;&lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जरूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महसूस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बिचारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उससे&lt;/span&gt;&lt;span&gt;कहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भाई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुबह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाओ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेगें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आंटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जोश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन&lt;/span&gt;&lt;span&gt;चार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तेजी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जितनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़िया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्वालटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काबिले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तारीफ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेहनती&lt;/span&gt;&lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काबिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लड़के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लड़के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शक्ती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कितनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरा&lt;/span&gt;&lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मजा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिमाग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आइडिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt;&lt;span&gt;ज्यादा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;,  &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़िर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़ता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संवारने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संतुष्ट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हों।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खीझा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ायदा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धीरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धीरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोस्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गये।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्नेह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बच्चा&lt;/span&gt;&lt;span&gt;बुलाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जुड़वां&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बिटिया।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एन्ट्री&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संतुष्ट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt;&lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इनाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आभासी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परांठे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खिलाते।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पनीर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परांठे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पंसद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बजे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कॉफ़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ब्रेक&lt;/span&gt;&lt;span&gt;ले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कॉफ़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऑफ़र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करता।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मानों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शहर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बल्कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैठ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जाहिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम्&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यक्ति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span&gt;जानने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कौशिश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिचकते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बताया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जनाब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt;&lt;span&gt;पहुंची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हस्ती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उम्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विविध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रकार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काफ़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तजुर्बा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हासिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मॉडलिंग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़ी&lt;/span&gt;&lt;span&gt;बड़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कंपनियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनाई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;रेंप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;डेटाप्रो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सीनीयर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कस्टमर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कंसल्टेंट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जॉब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;&lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आखिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ज्यादा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भाया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सफ़ल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डिजाइनिंग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कंपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt;&lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;         18                                             &lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;table style="width: auto;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;a href="http://picasaweb.google.com/lh/photo/SmZNo5cVjQSJ5S1hjaj4Bw?feat=embedwebsite"&gt;&lt;img src="http://lh5.ggpht.com/_NxhMpnpS6Ss/SaDtcsHWEmI/AAAAAAAABA0/ZIbYqt9iuKk/s400/DaisyGuru%206.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="font-family: arial,sans-serif; font-size: 11px; text-align: right;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;From &lt;a href="http://picasaweb.google.com/bspabla/Daisy?feat=embedwebsite"&gt;Daisy&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;table style="width: auto;"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="font-family: arial,sans-serif; font-size: 11px; text-align: right;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;उससे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चांद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खरीदी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सकती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt;&lt;span&gt;छोटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बच्चे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चांद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टुकड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खरीद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब्दुल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कलाम&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;&lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूछा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खरीदनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चांद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमीन।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूछा&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ललचाया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़िर&lt;/span&gt;&lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;जरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुपर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रोग्रामर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अगला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गंतव्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहां&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;पता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चले&lt;/span&gt;&lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चांद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सीट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुक्ड&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धरती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;फ़िर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करेगें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt;?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऑनलाइन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बलविन्दर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्नेही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गर्वित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ुला&lt;/span&gt;&lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; ‘ &lt;span&gt;अनिता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; , &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चैलेंज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेस्ट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डेवेलमेंट&lt;/span&gt;&lt;span&gt;टेकनीक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कंसर्ड&lt;/span&gt;’ &lt;span&gt;।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुस्कुरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कितना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बच्चों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span&gt;गर्वित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकदम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कॉलेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;लिहाजा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आइडिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसका।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आइडिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बम्बई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कॉलेजों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span&gt;वेबसाइटस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिंक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिसाब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थीं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; ‘&lt;span&gt;आंटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चिन्ता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कीजिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन&lt;/span&gt;&lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूंगा&lt;/span&gt;’ &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सौलह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निकली।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कॉलेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गार्डन&lt;/span&gt;&lt;span&gt;गार्डन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आकाओं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अगर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कमी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वजह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt;&lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डेटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उपलब्ध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करवाया।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कॉलेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://amcollegemumbai.org/"&gt;http://amcollegemumbai.org/&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बच्चा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यूं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परदे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पीछे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छुप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्टेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कलाकार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रोल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खत्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नेपथ्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span&gt;चला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जरुरत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बच्चा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाजिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; , &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिफ़ारिश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span&gt;जरुरत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़ती।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेबसाइट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खत्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इच्छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रबल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt;&lt;span&gt;परिवार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जितना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सदस्य&lt;/span&gt; ( &lt;span&gt;डेजी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt;) &lt;span&gt;स्नेह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span&gt;ओतप्रोत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महीने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;मिले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहां&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ़&lt;/span&gt;&lt;span&gt;बतियाये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डिजाइनर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कार्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नमूना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेजा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt;&lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काफ़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बताइए।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हंस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिये।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;&lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आंटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ोटो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेजिए।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परिवार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ोटो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेजीं&lt;/span&gt; , &lt;span&gt;आनन&lt;/span&gt;&lt;span&gt;फ़ानन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ोटोस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कल्प&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परिवार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आखें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़टी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़टी&lt;/span&gt;&lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गयीं।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लड़का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt; ‘&lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मांगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मोर&lt;/span&gt;’, &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ज्यादा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लालच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहिए&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span&gt;दो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ोटो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हीरो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शुक्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मनाओ।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कारिस्तानी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नमूना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;पाबला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्नेह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थाह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आज&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;बाप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रे&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;मुझ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साधारण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ब्लोगर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दे&lt;/span&gt;&lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;इतनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेहनत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पोस्ट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुब्बारों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;हा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हा&lt;/span&gt; , &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उम्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुब्बारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठीक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बारह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बजे&lt;/span&gt;&lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ोन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बधाई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पांच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिनिट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बलविन्दर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;द्विवेदी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt;&lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मलाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बारह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बजे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ोन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिला।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हा।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जन्मदिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मनाया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूतकाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वर्तमान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तारीख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मायने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आम&lt;/span&gt;&lt;span&gt;तारीख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चलो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगो&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुशियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दामन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;चलो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कलम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लो&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तुम्हारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमेशा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span&gt;साथी।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़ोन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दनदनाया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैरान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरफ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द्विवेदी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुपुत्री&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूर्वा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वल्लभगढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt;&lt;span&gt;जन्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बधाई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt; ‘&lt;span&gt;हैप्पी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बर्थडे&lt;/span&gt;……’ &lt;span&gt;अरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़िर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span&gt;सवाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दागा।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जवाब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुनिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खबर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उससे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बतिया&lt;/span&gt;&lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फ़िर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घंटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बजी&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दरवाजे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घंटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;दरवाजा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खोला&lt;/span&gt; , &lt;span&gt;सामने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदमी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुर्ख&lt;/span&gt;&lt;span&gt;गुलाबों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुलदस्ता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;हाथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चिट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साइन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिजीए।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सरप्राइस&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;सरप्राइस&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;गुलदस्ता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रंजीत&lt;/span&gt; (&lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जुड़वा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहन&lt;/span&gt;) &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरफ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आखों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुशी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आसूं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span&gt;शब्द&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;जरूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिन्दगी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर्म&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अचानक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यूं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिन्दी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ब्लोगजगत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छे&lt;/span&gt;&lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुलाकात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भगवान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूर्वा&lt;/span&gt; , &lt;span&gt;गुरप्रीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रंजीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झोली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सदा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुशियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यूं&lt;/span&gt;&lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सदा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे।&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आमीन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;                                          &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-3437160050874585304?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/qIDpsPWx-Gs/blog-post_18.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://lh5.ggpht.com/_NxhMpnpS6Ss/SaDtcsHWEmI/AAAAAAAABA0/ZIbYqt9iuKk/s72-c/DaisyGuru%206.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">19</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/03/blog-post_18.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-5878526924509766536</guid><pubDate>Fri, 13 Mar 2009 15:25:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-03-13T20:57:17.191+05:30</atom:updated><title>तेरा नाम क्या है बसंती?</title><description>&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;तेरा नाम क्या है बसंती?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शेक्सपियर ने कहा “अरे नाम में क्या रखा है?”&lt;br /&gt;लेकिन सोचने वाली बात तो ये है भई कि नाम के बिना हमारा क्या अस्तित्व? किसी भी व्यक्ति से पहली मुलाकात, पहला वार्तालाप, स्टेज से भाषण में उवाचे पहले शब्द, टेलिफ़ोन पर उवाचे दूसरे शब्द ( पहला शब्द तो हैल्लो होता है), घरों के बाहर लगायी नाम की पट्टियाँ, आदि आदि, कहां कहां हम अपने नाम का प्रयोग नहीं करते। मुझे तो लगता है कि हम जिन्दगी में जो शब्द सबसे ज्यादा बोलते हैं वो है ‘माय नेम इस ………”। “ मैं … … बोल रहा हूँ”।&lt;br /&gt;फ़िर शेक्सपियर साहब ने कैसे कह दिया जी कि नाम में क्या रखा है?&lt;br /&gt;हमारी एक सखी से इस बारे में बतिया रहे थे। अब वो ठहरी अंग्रेजी विभाग की, शेक्सपियर को झूठा पड़ता तो देख ही नहीं सकती थी न्। सो तड़ से बोली लेकिन कितने ही लोग हैं जो अपने नाम बदल लेते हैं, छुपा लेते हैं। किसी भी विषय पर बात हो रही हो और हम भारतीयों को हिन्दी फ़िल्में न याद आयें ये तो बड़ा मुश्किल है न जी। सो उदाहरण भी फ़िल्म इंडस्ट्री के आने लगे, बोलीं कि देखो कितने ही लोकप्रिय कलाकार हुए जिन्हों ने अपने नाम छुपा कर छ्द्म नाम से अपनी पहचान बनायी, दिलीप कुमार, अजीत, मीना कुमारी से ले कर अपने खिलाड़ी नंबर वन अक्षय कुमार तक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाजशास्त्र विभाग वाली मैडम भी चर्चा में उतरीं और बोलीं कि विदेश गये भारतीयों को देखो, साल बीतते न बीतते उनकी काया पलट हो जाती है। जैसा देस वैसा भेस  का अनुसरण करते हुए वो लोग न सिर्फ़ अपने कपड़े पहनने का ढंग बदल लेते हैं बल्कि अपने नाम का भी विदेशीकरण कर डालते हैं। सुमित सैम हो जाता है तो प्रमिला प्रोम हो लेती है।&lt;br /&gt;अजी विदेशों की बातें छोड़ दें तो यहां भी अच्छे खासे नाम छोटे करने के चक्कर में अपना रंग रुप खो बैठते हैं जैसे आदित्य बन जाता है आदि, और आनंद बन जाता है अंडू, …॥    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जी शेक्सपियर गलत ही था। नाम में तो बहुत कुछ रखा है। नाम है तो जहान है। आप की कमाई के आकड़े आप के नाम पर भी निर्भर करते हैं, स्वीडन में हुई एक शोध के अनुसार जिन अप्रवासी नागरिकों ने अपने नाम बदल डाले उनकी सालाना आय में 114% की वृद्धी हुई। नाम बदलने के तीन साल पहले की आय और नाम बदलने के बाद तीन साल की आय में तुलना करने से ये वृद्धि देखी गयी।&lt;br /&gt;ऐसा क्युं? वैरी सिम्पल।&lt;br /&gt;ये तो जग जाहिर बात है कि जब कोई साक्षात्कार के लिए जाता है तो उसे नौकरी मिलेगी कि नहीं ये उसके कुर्सी पर बैठने से पहले ही निश्चित हो चुका होता है, बाकी का साक्षात्कार तो औपचारिकता निभानी होती है। केनडिडेट की शक्ल, हाव भाव, पोशाक ही निर्णय लेने में मदद करती है, और वो कहते हैं न जी ‘फ़र्स्ट इंप्रेशन इस ड लास्ट इंप्रेशन’, आदमी स्वभाविक रूप से इतना कंजूस है कि बाद में साक्षात्कार के दौरान अगर लगे तो भी अपना दिमाग खपाना नहीं चाहता और अपने पहले इंप्रेशन के साथ ही जाना चाहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे लेक्चर नुमा जवाब से बोर हो कर मेरी सहेली बोली ‘हां वो सब तो ठीक लेकिन नाम का क्या?,&lt;br /&gt;लो जी साक्षात्कार के दरवाजे तक तो आप तब पहुंचेंगे न जब आप को कोई बुलायेगा। आप के बायोडेटा पर सबसे पहले आप का नाम पढ़ कर ही वो आप की शक्शियत की जो तस्वीर बनायेगा वही तो निर्णायक होगा कि आप को इंटरवियु के लिए बुलायेगा कि नहीं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सोच रही हूँ कि अगर मेरा नाम अनिता न हो कर अनिता देवी /अनिता रानी /अनितामति हो तो मेरी शक्शियत के बारे में लोग क्या सोचेगें, वैसे अनिता के साथ कुमार लगा देख कर भी लोग जरा अटपटा ही महसूस करते हैं जैसे अरविंद जी ने लिखा। ये सिर्फ़ नेट पर ही नहीं हुआ ऐसा मेरे साथ कई बार जाति जिन्दगी में भी हुआ, कहीं नया फ़ॉर्म भरना है तो कलर्क ये सोच कर कि हम ई की मात्रा लगानी भूल गये हैं हमारी भूल सुधारने के इरादे से कुमार को कुमारी बनाने की चेष्टा करते हैं और हमें उन्हें रोकना पड़ता है। तो जी ये कुमार उपनाम का किस्सा कुछ यूं है कि शादी के बाद जब उपनाम बदलने की बात आयी तो समस्या ये थी कि हमारे पति देव दक्षिण भारतीय हैं , उनका उपनाम ऐसा है कि अक्सर लोग उसका कचूमर बना देते हैं , मेरे रिश्तेदारों के लिए तो वो उपनाम बिल्कुल ही टंगटिवस्टर होता। तो पूरी जिन्दगी या तो अपने उपनाम के भ्रष्ट रुप सुनते या लोगों को सुधारते रह जाते, इस  लिए हम दोनों ने सोचा कि क्युं न एक उपनाम कानून अपना लिया जाए और कुमार एक ऐसा उपनाम है जो भारत के हर प्रदेश में पाया जाता है तो बस हम कुमार हो लिए।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-5878526924509766536?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/Ub_pocJtI_E/blog-post_13.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">19</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/03/blog-post_13.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-838202743627189192</guid><pubDate>Sun, 08 Mar 2009 12:43:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-03-08T18:49:22.954+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title /><description>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SbPFmh0te2I/AAAAAAAAAeg/wElTwqO2-FE/s1600-h/%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B5.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SbPFmh0te2I/AAAAAAAAAeg/wElTwqO2-FE/s320/%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310805651305102178" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गांव वाले घर में अम्मा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप सबकी तरह ब्लोग जगत ने मुझे भी बहुत से दोस्त दिए हैं भिन्न भिन्न प्रदेश, व्यवसाय,और उम्र के। आप सब से मिल कर मेरी सोच मेरी जिन्दगी बहुत समृद्ध हुई है। अपनी जिन्दगी में इतनी संतुष्ट मैं पहले कभी न थी,खैर उसके बारे में फ़िर कभी। अभी तो आइए मिलिए बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी, मेरे एक मित्र योगेश समदर्शी से। इस समय मेल टुडे में सीनियर इंफ़ोग्राफ़र, गाजियाबाद निवासी हैं। लेकिन मूलत: लेखक, कवि, पत्रकार,और समाजसेवी है। बहुत जल्द इनका एक कविता संकलन प्रकाशित होने वाला है '&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; आई मुझको याद गांव की'&lt;/span&gt; । &lt;br /&gt;अब हमारा गांव से नाता उतना ही है जितना किसी बच्चे का चांद से। गांव या तो फ़िल्मों में देखे या प्रेमचंद की कहानियों में। समदर्शी जी की यूं तो सभी कवितायें मुझे अच्छी लगीं लेकिन एक कविता यहां आज '&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नारी दिवस'&lt;/span&gt; के उपलक्ष्य पर आप सब के साथ बांट रही हूँ (उनकी अनुमति ले कर  )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गांव वाले घर में अम्मा &lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह सवेरे जग जाती थी, गाय धू कर दूध बिलोकर.&lt;br /&gt;गांव वाले घर में अम्मा, सब कुछ थी कुछ भी न होकर.&lt;br /&gt;दूध मलाई और पिटाई, तक उसके हाथों से खाई.&lt;br /&gt;रोज सवेरे वह कहती थी, उठो धूप सर पे है आई.&lt;br /&gt;उपले पाथ रही अम्मा को, याद करूं हूं अब मैं रोकर.&lt;br /&gt;गांव वाले घर में अम्मा, सब कुछ थी कुछ भी न होकर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बापू, चाचा, ताऊ दादा, सबकी एक अकेली सुनती.&lt;br /&gt;गलती तो बच्चे करते थे, पर अम्मा ही गाली सुनती.&lt;br /&gt;रोती रोती आंगन लीपे, घूंघट भीतर लाज संजोकर.&lt;br /&gt;गांव वाले घर में अम्मा, सब कुछ थी कुछ भी न होकर.&lt;br /&gt;काला अक्षर भैंस बताती, लेकिन राम चौपाई गाती.&lt;br /&gt;पूरे घर के हम बच्चों को, आदर्शों की कथा बताती.&lt;br /&gt;सत्यवादी होने को कहती, हरिश्चंद्र की कथा बताकर.&lt;br /&gt;गांव वाले घर में अम्मा, सब कुछ थी कुछ भी न होकर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढीं लिखीं बहुंओं को अम्मा, बस अब तो इतना कहती है.&lt;br /&gt;औरत बडे दिल की होवे है, इस खातिर वह सब सहती है.&lt;br /&gt;पेड भला क्या पा जाता है, अपने सारे फल को खोकर.&lt;br /&gt;गांव वाले घर में अम्मा, सब कुछ थी कुछ भी न होकर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं तो आज नारी सशक्तिकरण की कई बातें हुई होगीं, वो अपनी जगह सही भी हैं लेकिन इस कविता को पढ़ कर मुझे लगा कि ये गांव की अम्मा भी उतनी सशक्त है जितनी मैं शहरी अम्मा। आप क्या कहते हैं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-838202743627189192?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/GFx4gOD1pp0/blog-post_08.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SbPFmh0te2I/AAAAAAAAAeg/wElTwqO2-FE/s72-c/%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B5.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">18</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/03/blog-post_08.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-8761543646815931722</guid><pubDate>Sat, 07 Mar 2009 17:19:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-03-07T23:58:46.392+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>और ट्रेन से कूद गये</title><description>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SbK8q98ymyI/AAAAAAAAAeY/h7QgukEVyHI/s1600-h/%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%B2+%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A8.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 117px; height: 91px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SbK8q98ymyI/AAAAAAAAAeY/h7QgukEVyHI/s320/%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%B2+%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A8.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310514356993301282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;और ट्रेन से कूद गये&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉलेज के आखरी दिनों में लोकल ट्रेन के सफ़र के मजे लूटने का अवसर मिला। लोकल ट्रेन बम्बई का आइना है, जिन्दगी है। लोकल ट्रेन की अपनी एक दुनिया है। पूरी ट्रेन में सिर्फ़ दो  डिब्बे महिलाओं के लिए आरक्षित होते थे। अब आम तौर पर तीन होते हैं और पिछ्ले कुछ सालों से तो महिलाओं के लिए अलग ट्रेन ही चल पड़ी हैं –पूरी ट्रेन आरक्षित्, कभी सुना किसी और देश में महिलाओं का इतना ख्याल रखा जाता हो कि पूरी की पूरी ट्रेन उनके लिए आरक्षित। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कई सालों में लोकल ट्रेन की तादात बड़ायी गयी, रेल के डिब्बे बड़ाये गये लेकिन फ़िर भी इन ट्रेनों में भीड़ शैतान की आंत सी बड़ती ही जाती है। पहले ये भीड़ सुबह और शाम ज्यादा होती थी और दोपहर और रात को काफ़ी कम हो जाती थी। अब तो क्या दिन क्या रात, चौबिसों घंटे भीड़ का वही हाल है। लेकिन इस भीड़ के सकारत्मक परिणाम भी हैं। असहनीय भीड़ और गाड़ी का हर स्टेशन पर सिर्फ़ एक मिनिट के लिए रुकना, हर बम्बईवासी को रेल से यात्रा करते हैं चुस्त और फ़ुर्तीला बना देता है। आप कभी शाम को वी टी स्टेशन पर चले जाएं और नजारा देखें। दूर से आती ट्रेन को देख औरतें अपनी अपनी साड़ियों की प्लीटस उठा कर कमर में खोंस लेती है, बैग जेबकतरों से बचाने के लिए पेट के आगे कर कस कर पकड़ लिए जाते हैं , सारे थैले और हाथ का सामान एक ही हाथ में कर लिया जाता है और दूसरा हाथ खाली रक्खा जाता है। सहेलियों से चल रही बातचीत बीच में ही बंद, आखें निशाने पर टिकी हुई, धीमी पड़ती रेल जैसे ही कुछ हाथ की दूरी पर रह जाती है, दौड़ कर डिब्बे के अंदर कूदा जाता है और सीट पकड़ी जाती है, मिशन कम्पलीट्। खिड़की के पास वाली खिड़की मिल जाए तो सोने पर सुहागा। इस दम घोंटू भीड़ में यही खिड़की सांस लेने का एक मात्र सहारा बनेगी अगर कोई उसके सामने आ कर न खड़ी हो गई तो। जो इतनी फ़ुर्ती नहीं दिखा पातीं वो फ़िर दो सीटों के बीच में खड़े होने की जगह तलाशती हैं या फ़िर तीन लोगों के लिए बने तख्ते पर जरा सा खिसक कर तिल भर बैठने की जगह की याचना करती नजर आती हैं। याचना कहना ठीक न होगा, वो तो बात पुरानी हो गयी, अब तो साधिकार आदेश दिया जाता है “खिसको”। ज्यादातर कामकाजी महिलाओं का पूरा जीवन इन ट्रेनों में सफ़र करते ही बीतता है, ट्रेन और वक्त कुछ नहीं बदलता, अरे जब दफ़तर के टाइम वहीं है तो ट्रेन का टाइम कैसे बदलेगा। लिहाजा वही चेहरे वही लोग सुबह शाम मिलते रहते हैं। धीरे धीरे दोस्तियां होती चली जाती हैं, कुछ महिलाएं तो एक ही दफ़तर में काम करती है तो पहले से ही दोस्त  होती हैं। जब दोस्तियां होती हैं तो गप्पें भी होती है और परिवार के दुख सुख भी बांटे जाते हैं, दूर रहने वाली महिलाएं ट्रेन में ही बैठ कर सब्जी छील काट रही होती हैं, (पूरी तैयारी के साथ आती है), फ़ल, फ़ूल, सब्जी, कंघा, बिन्दी,रुमाल, साड़ी, समोसे, चकली, चिक्की सब बिकने के लिए आता है ट्रेन में ही। इस भीड़ में भी ये सामान बेचने वाले कैसे अपने घूमने के लिए जगह बना लेते हैं अपने आप में एक अचंभा है। उस पर भी जो बात मुझे हैरान करती है वो ये कि अगर एक लड़का बिंदियाँ बेच रहा है और एक ग्राहक ने बिंदियों का डिब्बा पकड़ रखा है और चुन रही है तो वो लड़का उस डिब्बे को उसी के पास छोड़ कर डिब्बे के दूसरे हिस्से में बैठी ग्राहक के पास दूसरा डिब्बा ले कर चला जाएगा, बिना डरे कि अगर इस महिला ने उसमें से कोई पैकेट मार लिया तो या स्टेशन आया और नीचे उतर गयी तो? इतने सालों से देख रहे हैं रेल के डिब्बों के इन दुकानदारों और ग्राहकों का एक दूसरे पर विश्वास्। कभी कोई गड़बड़ नहीं होती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और बात जो रेल यात्रा के बारे में विशिष्ट हुआ करती थी वो था स्त्रियों का सम्मान्। अगर कभी ट्रेन छूट रही हो या किसी और कारण से अगर महिला पुरुषों के डिब्बे में चढ़ जाती थी तो पुरुष पूरे सम्मान के साथ उसे बैठने की जगह दे देते थे। अगर डिब्बा ठसाठस भरा हो और स्त्री पुरुष डिब्बे में प्रवास कर रही हो तो भी कोई किसी प्रकार की कोई बत्तमीजी या छेड़खानी नहीं करेगा, स्त्री तो खैर सिमटेगी ही, आस पास खड़े मर्द भी सिमटते रहते थे। सत्तर के दशक तक अगर कभी देर रात में महिलाओं का डिब्बा खाली हो तो महिला पुरुषों के डिब्बे में प्रवास करने में ज्यादा सुरक्षित महसूस करती थी। रात के कितने भी बजे हों , महिलाओं के लिए बम्बई एकदम सुरक्षित था। हमें बड़ा फ़क्र था इस बात का कि हमारी बम्बई के मर्द कितने शालीन हैं और औरत को एक मांस का टुकड़ा भर नहीं समझते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्सी का दशक आते आते छुटपुट घटनाओं का जिक्र आने लगा, जैसे रात के एक बजे एक महिला रेलेवे प्लेट फ़ॉर्म पर सिगरेट खरीदने के लिए रुकी तो वहां खड़े हवलदार ने उसके साथ बत्तमीजी की। पुलिस ने कहा कि जो महिला रात के एक बजे स्टेशन पर हो और सिगरेट खरीद रही हो उसका चरित्र कैसा होगा? वो महिला एडवर्टाइजिंग जगत से जुड़ी हुई थी देर से आना उसके काम का हिस्सा था। ये पहला मौका था जब हम सकते में आ गये कि ये किस्सा हमारी बम्बई में? फ़िर तो जैसे महिला अत्याचार की खबरों की बाढ़ सी आ गयी। रिंकू का केस (जिसमें उसके पूर्व प्रेमी ने परिक्षा कक्ष में से परिक्षा देते सब छात्रों को चाकू की नोक पर बाहर खदेड़ दिया था और फ़िर रिंकू को आग लगा दी थी) , जूहू का केस जहां एक लड़की पर तेजाब फ़ैंका गया था, चलती लोकल ट्रेन में दोपहर के समय एक मानसिक विकलांग लड़की के साथ एक शराबी का सबके सामने बलात्कार, हमें अंदर तक झंझोड़ कर रख गया। आज भी जब अखबारों में खबरे पढ़ते हैं दुध मुंही बच्चियों का बलात्कार, दोस्तों के दोस्तों को पैसे के लिए अगवा करने, मारने  के किस्से तो लगता है क्या ये वही बम्बई है जहां हम रात के दो दो बजे तक अपने पति के साथ बेधड़क घूमा करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; बहुत पहले चूहों को ले कर एक प्रयोग किया गया था जिसमें चूहों के बरताव को परखने के लिए एक बड़े से डिब्बे में एक एक कर चूहे छोड़े गये। उस डिब्बे में धीरे धीरे इतने चूहे छोड़े गये कि कोई भी चूहा दूसरे चूहे से अछुता न रह सका। उस डिब्बे में सब चूहों के लिए पर्याप्त खाना पानी होते हुए भी जैसे जैसे चूहे बड़ते गये वो आक्रमक होते चले गये और एक दूसरे को काटना शुरु कर दिया। कई चूहे मारे गये। ये सिलसिला तब तक चला जब तक उस डिब्बे में सिर्फ़ इतने ही चूहे बचे जितनों के लिए आरामदायक जगह थी। सोचती हूँ कहीं यही हाल मुंबई का तो नहीं हो रहा। दूसरी तरफ़ ऐसा भी लगता है कि सिर्फ़ बड़ती आबादी बड़ते अपराध का एक अकेला कारण नहीं हो सकती। और भी बहुत से कारण है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पैसा कमाने की मशीनें&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मुझे दूसरे शहरों का तो पता नहीं लेकिन बम्बई में हर कोई जल्द से जल्द पैसा कमाने की मशीन बन जाना चाहता है। कोई मजबूरी से, कोई सिर्फ़ अपने आप को सिद्ध करने के लिए, कोई दोस्तों में अपनी साख बनाने के लिए, कोई भविष्य के लिए अनुभव संचित करने के लिए तो कोई सिर्फ़ इस लिए कि पैसा कमाने के अवसर आसानी से मिल जाते हैं। किसी ने सच कहा है कि बम्बई नगरी किसी को भूखों नहीं मरने देती, कोई न कोई जुगाड़ हो ही जाता है। बम्बई सपनों का शहर है। सपना देखने की हिम्मत करो पूरी शिद्दत के साथ पूरा करने की कौशिश करो और बम्बई तुम्हारे सपने साकार करने में जी जान से जुट जाएगी। ये बात आज भी उतनी ही सच है जितनी कल थी, बल्कि आज कुछ ज्यादा ही सच है। पैसा कमाने के रुप बदल गये हैं लेकिन मूल आदर्श आज भी वही हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे जमाने में कॉलेज सुबह नौ बजे शुरु होता था और चार बजे तक रहता था। आज कल के जैसे कॉलेज फ़ैक्टरी नहीं थे जिसमें सुबह साढ़े सात बजे एक शिफ़्ट, फ़िर दोपहर एक बजे से दूसरी शिफ़्ट और शाम को पांच बजे से तीसरी शिफ़्ट् चलती है। हम अक्सर आज कल के बच्चों पर तरस खाते हैं बेचारे जैसे पैदा ही फ़ैक्टरी से फ़िनिशड प्रोडकट बनने के लिए हुए है। कॉलेज जाओ, फ़िर क्लासेस और फ़िर और होमवर्क। अब बताइए किसी और को पैसा कमाने का कोई और तरीका नहीं सूझा तो बच्चों को ही परेशान कर रहे हैं। पहले कोई क्लासेस जाता था तो शर्म महसूस करता था , आज कल तो शान से कहा जाता है मैं फ़लां फ़ंला  क्लास में जाता हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अजी मजे तो हमारे जमाने में थे। सुबह  छ: बजे उठ कर एक घंटा समुद्र की हवा खाने के बाद भी आराम से कॉलेज पहुंच जाते थे एक दो क्लास बैठे तो बैठे,  न बैठे तो न बैठे। हमारे दिन अक्सर कॉलेज की केन्टीन में गुजरते थे, वहीं बैठ कर नोटस लिखे जाते, खाया पिया जाता, अब बताइए बिना खाए कोई पढ़ सकता है क्या। केन्टीन भी ऐसी कि उठने का मन ही न करे। केन्टीन में न बैठे तो फ़िर लायब्रेरी हमारा दूसरा घर थी। सबके बैठने के लिए पर्याप्त जगह, एकदम शांत्। उस जमाने में जिरोक्स का चलन नहीं था। हम लोग कार्बन पेपर का इस्तेमाल कर नोटस बनाते थे। किताबें महंगी होने के कारण लायब्रेरी से ले कर पूरी पूरी किताब नकल की जाती थी। हमारे भावी पतिदेव ने कितने ही नोटस हमारे लिए इस तरह से बनाये। लगे कि नोटस प्यार की गहराई का मापक बन गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सत्तर के दशक में आया टी वी मुंबई&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; टी वी देहली में तो कई बरसों से था लेकिन बम्बई आया 1970 में या 1971 में। टी वी आने से पहले रोजमर्रा के जीवन में मनोरंजन के साधनों में तीन ही प्रमुख थे –फ़िल्में, रेडियो और उपन्यास्। हर नुक्कड़ पर सरकुलेटिंग लायब्रेरी दिखाई देती थी, (आज कल सायबर कैफ़े दिखते हैं , सरकुलेटिंग लायब्रेरी तो कब की लुप्त हो चुकीं) छुट्टियों में इन लायब्रेरियों पर छात्र छात्राओं की भीड़ लगी रहती थी। हिन्दी माध्यम से स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के कारण जब कॉलेज में आये तो अपनी भी अंग्रेजी लालू प्रसाद यादव से तोला भर बेहतर थी। छुट्टियों में इन्हीं लायब्रेरियों से ले ले कर पी जी वुडहाउस और जेम्स हार्डली चेस की पूरी श्रखंला पढ़ी और आज भी हमें पी जी वुडहाउस बहुत पंसद है। रेडियो पर भी सीमित स्टेशन ही बजते थे, शाम को पांच बजे से रात के साढ़े ग्यारह बजे तक विविध भारती या आल इन्डिया रेडियो या बुधवार के बुधवार बिनाका गीत माला सुना जाता था।  कालेज से भाग कर मैटिनी शो को जाना हमारे ऐबों में से एक था। एक किस्सा याद आ रहा है, इजाजत हो तो आप के साथ बांटते चलें। बॉबी फ़िल्म लगी थी और कॉलेज में उसकी बड़ी धूम थी। सहेलियों, दोस्तों के साथ कॉलेज बंक कर के वो पिक्चर देखने का प्रोग्राम बना। हम लोग कुल आठ जन गये बारह से तीन का शो देखने। पकड़े न जाएं इस डर से जूहू के थिएटर छोड़ दूर गोरेगांव में जा कर पिक्चर देखी जाती थी। शो छूटने के बाद घर आते आते साढे चार बज गये, घर पहुंचे तो देखा मम्मी बहुत गुस्से में थी। हमने सोचा मारे गये आज तो किसी ने आ कर बता दिया होगा कि हम पिक्चर गये थे, बच्चू अब खैर नहीं। मम्मी ने कहा , इतनी देर से कैसे आईं? हमारी तो घिग्गी बंध गयी पर इससे पहले कि हम मुंह खोलते , वो बोलीं । तुमने बहुत परेशान  कर रखा है, इतना देर से आती हो हम लोग पिक्चर जाने के लिए तैयार बैठे हैं सिर्फ़ तुम्हारे इंतजार में, अब अगर लेट हो गये तो सबका मजा खराब हो जाएगा, जल्दी से तैयार हो कर आओ। हमारी सांस में सांस आयी , धीरे से पूछा , कौन सी पिक्चर? जवाब आया ‘बॉबी’। हमें अत्यधिक खुशी जाहिर करने का नाटक करना पड़ा और जल्दी जल्दी तैयार हो कर चल दिये बॉबी देखने छ: से नौ। आज कल के बच्चों के नसीब में ऐसे एडवेन्चर कहां?    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्तर के दशक में टी वी अभी नया नया आया था,इरले बिरले लोगों के घर पर ही होता था। अरे टी वी तो दूर टेलीफ़ोन भी एक बिल्डिंग में एक दो ही हुआ करते थे। शाम होते ही जिसके घर टी वी होता था वहां जमा होने लगते थे, खास कर इतवार को। टी वी वाले उस दिन जल्दी खाना बना लेते थे। मुश्किल से एक दो चैनल हुआ करते थे। मुझे याद है तबुस्सम जी का फ़ूल खिले हैं गुलशन गुलशन, छायागीत, कमलेश्वर जी का परिक्रमा जैसे साहित्यिक प्रोग्राम एकदम हिट प्रोग्राम हुआ करते थे। टी वी पर कवि सम्मेलन सुनने के लिए मैं तो क्या पूरा परिवार पूरे हफ़्ते इंतजार करता था। बहुत लंबा होता जा रहा है, आप लोग अब उकता रहे होगें , तो लिजिए एक और याद के साथ इसे यहीं खत्म करती हूँ। एक बार कमलेश्वर जी को हमारे कॉलेज में आमंत्रित किया गया था। तब तक हम जूहू से फ़िर चेम्बूर वासी बन चुके थे पर आखरी साल था इस लिए कॉलेज वही था। लोकल ट्रेन से नया नया सफ़र करना शुरु किया था, कौन सी ट्रेन कहां जा रही है समझ में न आता था। जिस दिन कमलेश्वर जी का आना सुनिश्चित था,हम बांद्रा पहुचें वहां से ट्रेन बदल कर विले पार्ले जाना होता था। हमारे रोज के प्लेट फ़ार्म पर एक खाली गाड़ी देख कर हम चढ़ गये। गाड़ी थोड़ा देर से चली। जब गाड़ी चलने लगी तो हमें एहसास हुआ कि हम तो गलत गाड़ी में बैठे हैं। अब सीधा सा उपाय ये था कि हम अगले स्टेशन पर उतर कर वापसी की गाड़ी ले लेते। लेकिन हमने अपने मन में सोचा लेकिन इस सब में तो कम से कम आधा घंटा देर हो  जाएगी और कमलेश्वर जी का शुरुवाती भाषण हम मिस कर देगें, वो हमें गवारा न था। बस आव देखा न ताव, चलती गाड़ी से कूद गये। शुक्र है कि प्लेट फ़ार्म पर ही गिरे, नहीं तो ……।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-8761543646815931722?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/BWfjLUZcAOE/blog-post_07.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SbK8q98ymyI/AAAAAAAAAeY/h7QgukEVyHI/s72-c/%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%B2+%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A8.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/03/blog-post_07.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-8923956820076900106</guid><pubDate>Fri, 06 Mar 2009 06:35:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-03-06T12:34:07.809+05:30</atom:updated><title>होली के दिन भी क्या  दिन थे ,</title><description>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SbDKsYLzdeI/AAAAAAAAAeQ/B1-bQvoQGGo/s1600-h/holi.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SbDKsYLzdeI/AAAAAAAAAeQ/B1-bQvoQGGo/s320/holi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5309966824424830434" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;होली के दिन हम बहुत उदास रहते थे। बम्बई की होली में वो बात नहीं जो अलीगढ़ की होली में थी। वहां तो सुबह तीन बजे उठ कर होलिका जलायी जाती थी और उसी आग में गेहूं की नयी बालियां भूनी जाती थी , होली की मुबारकबाद देने का सिलसिला वहीं से शुरु हो जाता था, लोग एक दूसरे को भुनी बालियों के कुछ दाने देते और गले मिलते। लोगों के बड़े बड़े मकान जहां आगंन में हौद बना होता था। रात को ही उसमें पानी भर कर टेसू के फ़ूल छोड़ दिये जाते थे। सुबह तक पानी पीला रंग लिए बर्फ़ के जैसे ठंडा होता था। घर पर जो भी आता उसे उस हौद में एक बार तो जरूर ढकेला जाता था। देवर भाभी की होली तो देखते ही बनती थी। लोग झूठमूठ का ना नुकुर करते, होली न खेलने के कई कारण गिनाते लेकिन दरवाजे पर खड़ी टोली घ्रर में घुस कर सबको रंग डालती। सबसे बड़ा अभागा वो होता जिसके घर कोई जबरदस्ती करने न पहुंचता। रंगों में सराबोर होने के बाद खाने पीने का दौर चलता, कांजी की गाजर और वड़े, खोये की गुजिया, भांग के पकौड़े, ठंडाई, और भी न जाने क्या क्या। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां बम्बई में आये तो पता लगा यहां तो कोई किसी के घर में नहीं घुसता, सबके कमरे खराब हो जायेगें न, दरवाजे पर भी नहीं जाते, घर के बाहर भी खराब होने का डर रहता है, सिर्फ़ नीचे बिल्डिंग के अहाते में खड़े हो कर आवाजे लगायी जाती हैं। जो आ जाए वो ठीक जो नहीं आये उन के साथ कोई जोर जबरदस्ती नहीं जी सब के अपने मानवाधिकार हैं। अगर आप किसी के दरवाजे पर चले भी गये तो वो फ़ट से दरवाजा बंद कर लेगें और फ़िर कितना भी घंटी बजाओ, नहीं खोलेगे। तब अगर मन नहीं तो दक्षिण भारतीय कह देगें , हमारी तरफ़ होली नहीं खेली जाती और हमें ये बिल्कुल पसंद नहीं। आप अपना सा मुंह ले कर वापस आ जाएं। किसी के घर कोई पकवान नहीं बनते। लोग रंग खेलने के बाद भूख लगती है तो जाके बाजार में कोई दुकान ढूंढते हैं और वहां से बड़ा पाव या फ़ाफ़ले और जलेबियां लायी जाती है। फ़ाफ़ले एक गुजराती व्यजंन है  जो बेसन से बनाया जाता है। गुजिया को यहां करंजी कहा जाता है और वो भी महाराष्ट्रियन  के घर बनती हैं, मावे की जगह घिसे हुए खोपरे  और चीनी के साथ्। मावे की गुजिया का स्वाद अभी तक जीभ पर है फ़िर करंजी का स्वाद कैसे चढ़ेगा जी। जूहू पर लोग अपनी अपनी सोसायटी में होली खेलने के बाद समुद्र में नहाने चले जाते थे, खूब शौर मचाते हुए। इसमें आदमी औरत सभी शामिल होते थे। सारा रंग समुद्र के हवाले कर के ही लोग शाम तक घरों को लौटते थे। अब तो खैर वो बात नहीं रही। सत्तर के दशक से ही होली के दिन जूहू बीच पर गुंडों का राज होने लगा और महिलाओं  के लिए समुद्र स्नान एक सपना बन कर रह गया। सत्तर के दशक में हम जब जूहू छोड़ वापस चेम्बूर और फ़िर नवी मुंबई की तरफ़ बढ़े तब तक जूहू तट काफ़ी गंदा हो चुका था। जगह जगह लोग खुद को हल्का करने को बैठे दिख जाते थे और रेता पर चलने का आनंद हवा हो रहा था। अब तो सुना है कि रेता के व्यापारी वहां से रेता चोरी कर बाजार में बेच रहे हैं और वहां बहुत कम रेता बची है। दुकाने भी बेतहाशा बड़ गयी हैं । वेश्यावृति , शराबखोरी, गुंडा गर्दी अब जूहू पर आम बात है। अगर कोई रिश्तेदार आ कर कहता है कि समुद्र देखना है तो हम जूहू का रुख नहीं करते।  धीरे धीरे होली का त्यौहार अब फ़िल्मों में ही सिमट कर रह गया है। चालिस की दहलीज पार करते करते लोग होली को भूल जाते हैं। रंगों में मिलावट के चलते बच्चों को भी अब रंगों से खेलने के लिए मना किया जाता है। हमारी संस्कृति का एक और तनाव मिटाने वाला, लोगों को एक सूत्र में बांधने वाला सबब खतरे में है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-8923956820076900106?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/M9h99Ma0BJ8/blog-post_06.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SbDKsYLzdeI/AAAAAAAAAeQ/B1-bQvoQGGo/s72-c/holi.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/03/blog-post_06.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-3265668839475049086</guid><pubDate>Thu, 05 Mar 2009 09:53:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-03-05T15:51:38.046+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>भारत में बसे अप्रवासी भारतीय</title><description>भाग 2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल अनूप जी ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मुझे अपने मायके वालों के बारे में अच्छा सोचना चाहिए। हम कहां इंकार कर रहे हैं जी। बंबई आये थे किशोरावस्था में, तब तक आस पास के पुरुषों को देखा जाना नहीं था, आप कह सकते हैं कि अभी तो आखें भी न खुली थीं। बोम्बे आने के बाद फ़िर वापस उत्तर की तरफ़ कभी जाना नहीं हुआ। हम तो देश में रहते अप्रवासी भारतीय हैं जी। फ़िर बंबई में तो अपने मायके के प्रांत वाले बहुत कम नजर आये, उनके बारे में जो भी जाना और जो भी मन में इमेज बनायी सब मीडिया से मिले मसाले की बेस पर था। असली में तो अपने प्रांत वालों को जान रही हूँ अब ब्लोग जगत में आने के बाद्। पुरानी सब तस्वीरें धुल पुछ कर साफ़ हो चुकी हैं और नये रंग भरे जा चुके हैं। ऐसा न होता तो थोड़े हम वो लिख रहे होते जो अब लिख रहे हैं। अब तो हम कहते हैं मेरे प्रांत वाले &lt;strong&gt;" जय हो" &lt;/strong&gt;…:)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर देखिए बोम्बे की एक और झलक &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;घर से बाजार और बाजार से मॉल :&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ चार पांच साल पहले तक चेम्बूर की वो मेन मार्केट जिससे गुजर कर हम रोज स्कूल जाते थे खाऊ गली के नाम से जानी जाती थी, लेकिन अब वहां कपड़ों की, मोबाइल इत्यादी की दुकानें बहुतायत में आ गयी हैं। हां सब्जी मार्केट अभी भी वहीं हैं , मेन रोड से एक गली अंदर, और सब्जी के साथ चाट पकौड़ी की दुकानें भी उसी गली में आ गयी हैं। बम्बई का ये रंग भी हमारे लिए निराला था। अलीगढ़ में सुबह सुबह (और बाद में इंदौर में भी हमने यही चलन देखा) सब्जी वाले सब्जी का टोकरा उठाये गली गली घूमते थे, रोज के ग्राहक हों तो आ कर घर के किवाड़ भी खटखटाते थे कि मां जी सब्जी ले लो। बम्बई में शाम के पांच छ: बजते ही औरतें लिप्सटिक पाउडर लगा तैयार होती हैं, कभी अकेली या कभी किसी पड़ौसन के साथ सब्जी लेने भाजी मार्केट जाती हैं। भाजी ले कर एक दो घंटे के बाद लौटना और फ़िर कभी वहीं मार्केट से चाट पकौड़ी खा कर आना या फ़िर भाजी ला कर वहीं बिल्डिंग के अहाते में बैठ कर भेल खाना । यहां बम्बई आकर  जब पहली बार हमसे किसी ने कहा भेल खा लो तो हम समझे शिव जी को जो फ़ल चढ़ाया जाता है उसकी बात हो रही है, पर जब भेल बन कर हमारे सामने आयी तो एक निवाला न खाया गया। भेल बनती है मुरमुरे, सेव, उबले आलू, बारीक कटे प्याज, हरी मिर्च और तीखी , मीठी चटनी से। गिलगले सेव और मुरमुरे हमारे गले से नीचे न उतरे। अब की बात और है, अब तो हम भी आप को भेल या सेवपुरी खिलायेगें।  चेम्बूर छूटे तो कई साल हो गये लेकिन आज भी जब उस मार्केट से गुजरते हैं तो पारस की दुकान की सेवपुरी  खाये बिना नहीं आते। &lt;br /&gt;वैसे अब बिल्डिंग में शाम को वैसी रौनक नहीं होती, बिल्डिंग के बीच का मैदान जहां बच्चे खेलते थे और मांए किनारे बैठी बच्चों को खेलता देखती थी अब कार पार्क में बदल गया है। बच्चे अपने अपने घरों में टी वी या कंप्युटर के आगे जम गये हैं। चीखने चिल्लाने की आवाजें बच्चों के गलों से नहीं निकलतीं टी वी के एंकरों के गलों से निकलती हैं । आज की पीढ़ी बेहद मेहनती कामकाजी महिलाओं की पीढ़ी है। उनके पास कहां टाइम है कि सब्जी बाजार जा कर सब्जी वाले से तोल मोल कर चुन चुन कर सब्जी लायें और फ़िर आराम से टी वी का प्रोग्राम देखते हुए काटें। आज तो जगह जगह मॉल खुल गये हैं, साफ़ सुथरे, एअरकंडीशनड, टोकरी तक उठाने की जहमत नहीं करनी पड़ती। कार से उतरो, ट्रॉली लो, चुनी चुनाई, कटी कटाई, पेक्ड सब्जी खरीदो, कोई मोल तोल नहीं, वहीं साफ़ सुथरे रेस्टॉरेंट में बैठ कर खाओ पिओ और देर रात घर पर आओ। पहले महिलाएं सब्जी खरीदने रोज जाती थीं, एक टहलना भी हो जाता था। आज कल महिलाएं पूरे हफ़्ते की सब्जी एक साथ ला कर फ़्रिज के हवाले कर देती हैं ।  दो तीन दिन का खाना बना कर  फ़्रिज के  हवाले कर दिया जाता है और फ़िर जय माइक्रोवेव की जो उस खाने को तरोताजा दिखा देता है। अभी परसों ही एक मॉल में हम गये और सब्जी खरीद वहीं खाना खाने बैठ गये। हमारे मेज के पास ही लकड़ी का जंगला लगा कर एक चौकोर बनाया गया था और उसमें कुछ प्लास्टिक के झूले रखे थे जैसे अक्सर पहले बच्चों को पार्क में खेलते हुए देखते थे। हम सोच रहे थे क्या जमाना आ गया है , अब पार्क का काम भी मॉल करेगें? हमारा लड़का आर सी एफ़ के बड़े बड़े बागों में खेल कर बड़ा हुआ और ये बच्चे बिचारे ये भी नहीं जान सकते कि पींग लगाना किसे कहते हैं, पींग लगा कर हवा से बाते करना तो दूर की बात है। जानते है उन पिद्दी से झूलों पर ए सी की बासी हवा और ट्युब लाइटों की चकाचौंध में आधा घंटा खेलने की कीमत थी मात्र 40 रुपये। दो साल का बच्चा झूलों की तरफ़ बरबस खिचा चला जाए तो उसे खीच कर अलग कर दिया जाता कि पहले जा कर पैसे ले कर आओ। वो झूलों के सामने लहराते हरे हरे नोट उस बच्चे के मानस पटल पर छप गये होगें और वो अब ताउम्र उन के पीछे भागता रहेगा। मां बाप पास ही बैठे पिज़ा खा रहे थे।  &lt;br /&gt;पहले महिलाएं छोटे छोटे  स्तर पर किए बजत से भी खुश होती थीं, कईयों को बाइयों के काम पसंद ही नहीं आते थे, आज हाल ये है कि हर घर में दो दो नौकरानियां आम बात है। घर की सफ़ाई अभियान एक बड़ा काम होता था , घर की महिला को उपलब्धी की अनुभूती होती थी, आज घर सिर्फ़ एक नीड़ है रात्री विश्राम के लिए। जिन्दगी जीने के लिए हैं सफ़ाई कटाई कर के बर्बाद करने के लिए नहीं ।     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेम्बूर से जूहू तक &lt;br /&gt;एक साल चेम्बूर वास के बाद स्थानंतरण हुआ सीधे जूहू में। यहां की तो दुनिया ही निराली थी। साफ़ सुथरी सड़कें, चार फ़्लेटों वाली पूरी बिल्डिंग में हमारे परिवार का साम्राज्य्, ढेर सारे नौकर, थोड़ी ही दूरी पर धर्मेंद्र, मनोज कुमार जैसे नामी फ़िल्मी कलाकारों के घर, इत्यादि। लेकिन तब तक मॉल संस्कृती नहीं आयी थी। सांताक्रूज में स्कूल में, और बाद में कॉलेज में गुजराती जनसंख्या  बहुतायत में मिली। गुजराती भाषा बहुत ही मीठी भाषा है, गुजराती बहुत ही मिलनसार, जहीन और विनोदप्रिय वृति की जिन्दादिल कौम है, व्यापार और उधोग में तो इनकी कोई सानी नहीं। हमने न सिर्फ़ गुजराती पढ़ना लिखना बोलना सीखा बल्कि दसवीं में गुजराती को एक विषय के रूप में भी पढ़ा। गुजराती साहित्य भी बहुत समृद्ध है। गुजराती व्यजंनों के तो हम अब भी दिवाने हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर ये सिर्फ़ यादें हैं। गुजरात के दंगों और मोदी की सरकार आने के बाद गुजरातियों का जैसे चरित्र ही बदल गया हो। एक जमाना था जब मैं और मेरे पति गुजरातियों की जिन्दादिली और आत्मियता के इतने कायल थे कि हमें लगता था कि अगर बम्बई के बाहर कहीं जा कर बसा जा सकता है तो सिर्फ़ गुजरात में। लेकिन आज ये कहना मुश्किल है। कट्टर हिन्दूवाद ने मुझ जैसे न जाने कितने हिन्दुओं के सपनों का खून बहाया है जो किसी हाशिए पर नहीं दिखता। &lt;br /&gt;खैर, जूहू किनारे रहने का एक लाभ ये था कि रोज शाम को अपनी सहेलियों के साथ या परिवार के साथ जूहू  बीच पर घूमने जाते थे। यूं तो सुबह शाम जब भी खिड़की से बाहर झांकते समुद्र बाहें फ़ैलाये बुलाता नजर आता था, लहरों का संगीत दिन रात हमें तरंगित किए रखता था, लेकिन सुबह या देर शाम को ठंडी ठंडी रेत पर नंगे पांव घूमने का अपना  एक अलौकिक आनंद है। अगर आप सुबह सवेरे चार पांच बजे समुद्र किनारे पर निकल जाएं तो विनोद खन्ना, रेखा वगैरह भी घुड़सवारी करते दिख जाते थे। बम्बई की ये खास बात है कि यहां लोग इन फ़िल्म कलाकारों को परेशान नहीं करते, एक हल्के से अभिवादन के साथ अपने अपने काम पर लगे रहते हैं। सिर्फ़ बम्बई के बाहर से आये लोगों को उन्हें देखने का , मिलने का पागलपन सवार होता है। मुझे याद आ रहा है एक बार घर पर मम्मी पापा नहीं थे, रात का समय था, अचानक नौकर ने आकर कहा कि कोई साहब आप से मिलना चाहते हैं। वो किसी फ़िल्म का प्रोडक्शन वाला था और हमारी बिल्डिंग में लगे ढेर सारे नारियल के पेड़ो के साथ शूटिंग करना चाहता था। उनके लिए इमेरजेन्सी थी क्युं कि राजेश खन्ना को बुलवा लिया गया था और ऐन मौके पर जहां पहले शूटिंग करनी थी वहां नहीं कर सकते थे। अब क्युं कि बहन भाइयों में हम ही सब से बड़े थे और मम्मी पापा घर पर नहीं थे हमसे इजाजत मांगी गयी। कोई मारधाड़ का सीन करना था। हमने इजाजत दे दी लेकिन सिर्फ़ हमारे बाग के इस्तेमाल की, घर में नहीं घुसने दिया। राजेश खन्ना उस समय का चढ़ा हुआ सितारा था, प्रोडक्शन वाले हैरान थे कि राजेश खन्ना का नाम सुन कर हमने वैसे रिएक्ट नहीं किया जैसा एक कॉलेज की लड़की से उम्मीद की जा सकती थी। खैर शूटिंग तो हमने भी देखी ऊपर से और जब इनाम के तौर पर कहा गया कि आप राजेश खन्ना से बात कर सकती हैं तो हमने साफ़ इंकार कर दिया ये कहते हुए कि जब तक बात करने के लिए कोई मुद्दा न हो तब तक किसी से ऐसे ही मिलना बेकार है। जिस कॉलेज में हम पढ़ते थे वहां हमारे साथ कई फ़िल्मी कलाकारों और गायकों के बच्चे पढ़ते थे तो हमें इन लोगों से मिलने की ललक क्युं होती भला।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-3265668839475049086?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/Un3USR6Lt8E/blog-post_05.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">9</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/03/blog-post_05.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-7247907198875071398</guid><pubDate>Wed, 04 Mar 2009 15:43:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-03-04T21:49:03.095+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>जरा बच के, ये है मुंबई मेरी जान</title><description>पिछले हफ़्ते संजीत ने कहा कि आप बम्बई में इतने सालों से रह रही हैं , जरा अपने अनुभवों में झांक कर बताइए तो क्या क्या बदलाव दिखते हैं आप को बंबई( नहीं , नहीं मुंबई) में , मुंबई की जीवन शैली, संस्कृति, इत्यादी में। संजीत हमें जनादेश नामक ई-पेपर के लिए लिखने के लिए आमंत्रित कर रहे थे। अब संजीत हमारे खास मित्रों में से हैं  उनकी बात को कैसे टाला जा सकता था। वैसे भी किसी पेपर में जगह पाने का ये हमारा दूसरा मौका था। पहले शैलेश भारतवासी ने सितंबर 2008 में हमारा परिचय मुंबई संध्या नामक पेपर में करवाया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सो कल दोपहर को किसी तरह से मन बना कर बैठ गये लिखने। अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि संजीत जी नजर आ गये (हमारे चैट बॉक्स में…।:)) हमने कहा कि भाई ई – मेल में रफ़ ड्राफ़्ट भेज रहे हैं, देखिए ये आप की अपेक्षाओं  के अनुरूप बन रहा है कि नहीं, साथ में ये भी कह दिया कि अभी तो जो मन में आया हम लिखते गये, कल पढ़ कर थोड़ा छोटा कर देगें और लेख पूरा भी कर देगें। हमें पक्का यकीन हैं कि संजीत हमेशा की तरह चैट बॉक्स और मोबाइल दोनों पर बतिया रहे होगें। आज आकर अपना ई-मेल देखा तो पता लगा कि लेख तो छप भी गया। हम खुश भी हैं और एम्बेरेस्ड भी। खुश इस लिए कि संजीत जी को और अम्बरीश जी ने लेख पसंद कर लिया, एम्बेरेस्ड इस लिए कि बिना सुधार किए लेख प्रकाशित होना ऐसे ही है मानों बिना तैयार हुए कलाकार का मंच पर उतरना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम खुद मानते हैं कि लेख बहुत लंबा है( शुक्रगुजार हैं अम्बरीश जी के कि फ़िर भी उसे अपने पेपर में स्थान दे दिया) और हम जानते हैं कि ब्लोगर भाइयों के पास समय की बहुत कमी होती है इस लिए उस लेख का लिंक देने के साथ साथ उसे टुकड़ों में यहां पेश कर रहे हैं, जैसा आप को सुविधाजनक लगे वैसे ही पढ़ें । सिर्फ़ एक सवाल उठ रहा है मन में, संजीत मेरे लेख के साथ देवानंद की तस्वीर क्युं लगाई गयी है भई, क्या मैं वैसे ही हिलती नजर आ रही हूँ इस लेख में या उतनी ही पुरातत्व विभाग की सेंपल नजर आ रही हूँ? इसे यहां देख कर तो देवानंद भी कन्फ़्युज हो रहा होगा …।:)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;http://janadesh.in/&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला भाग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जरा बच के , ये है मुंबई मेरी जान &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ागुन आयो रे, संग रंगों की बहार लायो रे। बचपन से हमें हर साल मार्च का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। जनवरी में नया केलेण्डर आते ही हम सबसे पहले मार्च का महीना खोल कर दो तारीखों पर गोल निशान लगा देते हैं। एक तारीख तो लाल रंग में ही लिखी रहती है- होली का दिन और दूसरी कभी लाल तो कभी काली लिखी रहती है, वो तारीख हमें याद दिलाती है उस दिन की जब भगवान ने इस रंगबिरंगी खूबसूरत दुनिया से हमारा परिचय कराया था और हम इस दुनिया में ऐसे रमे कि अभी तक जाने का नाम नहीं ले रहे । होली मेरा सबसे प्रिय पर्व है। होली की मस्ती किसी और त्यौहार में कहां, बस एक ही खराबी है इस त्यौहार में, ये हमें बरबस यादों के सफ़र पर ले चलता है और हम सम्मोहित से इसके साथ चलते चलते यादों में खो जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जोर का झटका धीरे से &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ तेरह चौदह साल की रहे होगें साठ के दशक में जब बड़े बेमन से अलीगढ़ के मोहल्ले से निकल बम्बई आये थे और आते ही एक सांस्कृतिक झटका खाया था। मुंबई सैंट्रल से पापा सीधे चेम्बूर ले गये जहां हम सबको अस्थायी तौर पर एक किराए के मकान में रहना था। टैक्सी जब उस इमारत के सामने जा कर खड़ी हुई तो हम हैरान, परेशान सकुचाते से उस बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ रहे थे। बिल्डिंग अंग्रेजी के यू अक्षर सी बनी हुई तिमंजली इमारत थी। बिल्डिंग को एकदम बीच से दो भाग में विभक्त करते हुए सीढ़ियां और सीढ़ियों के दोनो तरफ़ बने हुए ढेर सारे कमरे। हर कमरे में एक एक या किसी किसी में दो तीन परिवार्। तीन तीन कमरों के लिए साझा गुसलखाने और पखाने। जी हां, हम बात कर रहे हैं मुंबई की प्रसिद्ध चाल की। अलीगढ़ के स्वत:पूर्ण घर से निकल कर ये चाल का एक कमरा और किचन एक साल के लिए हमारा घर बन गया। पहली बार जब मां ने कहा जाओ बाहर लगी तार पर कपड़े सुखा आओ। हमने बड़े जतन से फ़टक फ़टक कर कपड़े सुखाना शुरू ही किया था कि हमारे पास वाले कमरे से एक मोटी सी औरत बाहर निकली और बोली तुम यहां कपड़े नहीं सुखा सकती ये मेरी तार है। मैंने कहा कि लेकिन ये तो हमारे कमरे के बाहर है। उसने एक अर्थपूर्ण मुस्कुराहट के साथ हमारा ज्ञान बड़ाते हुए कहा तुम्हारी तार वो सीढ़ियों के सामने लगी है। मतलब ये कि अगर हमें कपड़े सुखाने हैं तो हमें गीले कपड़ो की टोकरी ले कर छ: कमरे पार कर सीढ़ियों के सामने सुखाने जाना होगा। शर्म के मारे हम कपड़े वहीं छोड़ सीधे अपने कमरे में लौट गये । कमरे में एक ही खिड़की होने के कारण हवा की आवाजाही के लिए दिन में लोग दरवाजे खुले रखते थे। हवा को तो पता नहीं आती थी कि नहीं लेकिन गलियारे में हर आने जाने वाला कमरे में झांक सकता था। सबको पता होता था कि किसके घर क्या पका, क्या बात हुई,इत्यादि इत्यादि। मुंबई की बात हो और फ़िल्म कलाकारों की बात न हो ये तो हो ही नहीं सकता न। फ़िल्मी कलाकारों से मेरा पहला पाला बड़ी जल्दी पड़ गया यहीं इसी बिल्डिंग नंबर 29 में( जी हां इन चालों के कोई नाम नहीं होते , वो सिर्फ़ नंबर से जानी जाती हैं।) आधी रात के बाद अक्सर  सामने वाले कमरे से खूब जोर जोर से चीखने चिल्लाने की, रोने की, गालियों की आवाजें आती थीं, हम डर जाते थे। आसपास पूछने पर पता चला कि केदार ( जो फ़िल्मों में एक्स्ट्रा का काम करता है) शराब के नशे में अपनी बीबी को मारता है। ऊपर तीसरे तल से उतरते हुए अक्सर एक आदमी सीढ़ियों में दिखाई दे जाता था। वो इतना मोटा था कि अगर वो सीढ़ियाँ उतरता हो तो कोई और पास से नहीं गुजर सकता था, जगह ही नहीं बचती थी। लेकिन वो और उसका पूरा परिवार दिल के बड़े अच्छे थे। नाम था उसका मूलचंद , अमिताभ बच्चन वाली डॉन पिक्चर में खैइके पान बड़ा रस वाला वाले गाने में वो भांग घोटता नजर आता है अपनी बड़ी सी तोंद के साथ्। खैर धीरे धीरे हमें उस चॉल में रहने की आदत पड़ने लगी। कपड़े सीढ़ियों के सामने सुखाने लगे। घर के नाम पर एक कमरा, लकड़ी की बनी परछती जिसे मेजेनेन फ़्लोर कहा जाता है, और छोटी सी किचन । आदमी एक ऐसा जानवर है जो हर परिस्थिती के अनुसार खुद को ढाल सकता है। हमने भी किया। किसी जमाने में पूरा कमरा अपना हुआ करता था,  अब हमने उस परछती को , जिसमें खड़े भी नहीं हुआ जा सकता था सिर्फ़ बैठा जा सकता था को ही अपनी दुनिया बना लिया। स्कूल तो हम अलीगढ़ में भी पैदल जाया करते थे, गलियों में से, जहां गली के दोनों तरफ़ दुकाने कम और घर ज्यादा दिखाई देते थे। तिमंजले मकान तो किसी किसी के ही होते थे। बम्बई में भी स्कूल पैदल ही जाना होता था लेकिन लगता था रास्ता खत्म ही नहीं होता। मेन मार्केट में से गुजरना, गाड़ियों की चिल्ल पों, रोड के दोनों तरफ़ दुकाने ही दुकाने और फ़िर दुकानों के आगे दुकानें। फ़ुटपाथ? फ़ुटपाथ तो जी वो नेमत है जो सिर्फ़ पैसे वालों को ही नसीब होती है, सिर्फ़ पोश इलाके में ही फ़ुटपाथ दिखते हैं । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां एक तरफ़ सांस्कृतिक झटका खाया था कि जगह की कमी के कारण लोग अपनी और एक दूसरे की प्राइवेसी का हनन ऐसे ही करते हैं जैसे रोजमर्रा का दातुन कर रहे हों( क्या आप यकीन करेगें कि कई लोग तो दातुन भी बाहर गलियारे में खड़े हो कर करते थे) वहीं कुछ विशिष्ट अनुभव भी आते ही हुए। अलीगढ़ में हमने हिन्दी और अंग्रेजी के सिवा और कोई भाषा न सुनी थी। बम्बई आते ही बम्बई के सर्वप्रांतीय चरित्र से परिचय हुआ। हांलाकि चेम्बूर का इलाका विभाजन के समय आये सिंधियों और पंजाबियों का गढ़ है( उस समय सरकार ने इन सिंधी और पंजाबी शरणार्थियों को बसाने के लिए ही शहर से दूर ये बिल्डिंगे बनायी थी जिनमें हमें बिल्डिंग नंबर 35 तक की तो खबर है , इससे ज्यादा और भी होगीं तो पता नहीं)पर यहां आर सी एफ़, भारत पेट्रोलियम, केलिको, जैसी कई बड़ी बड़ी कंपनियों की फ़ैक्ट्रियां होने की वजह से हर प्रांत के लोग नजर आते हैं । हमने पहली बार मुलतानी, सिंधी, तमिल, मराठी, बंगाली जैसी भाषाएं सुनी और लोग देखे। सिंधी और मुलतानी तो पंजाबियों जैसे ही थे लेकिन बाकी के लोगों के रहन सहन में बहुत अंतर था। उस जमाने में उत्तर भारतीय तो कोई इक्का दुक्का ही दिखता था। मुझे याद है कॉलेज में सिर्फ़ हिन्दी के प्रोफ़ेसर ही हिन्दी भाषी हुआ करते थे बाकी सब दूसरे प्रांतों से।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-7247907198875071398?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/8yf9Y1Z4Olw/blog-post.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">15</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/03/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-4897439609989392822</guid><pubDate>Wed, 18 Feb 2009 21:04:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-02-19T02:53:45.258+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">्लेख</category><title>पसंद अपनी अपनी</title><description>पिछली पोस्ट हमने करीब दो महिने पहले लिखी थी( पता है बहुत बेकार स्कोर है), इस बीच बहुत कुछ घट गया, बहुत कुछ पढ़ा, कहीं टिपिया पाये कहीं नहीं। अक्सर ऐसा हुआ कि हमने पोस्ट पढ़ी, मन ही मन में टिपियाया और निकल गये। कारण ये था कि हम पिछले दो महीने से एक कोर्स कर रहे थे, कोई मजबूरी नहीं थी, बस अपनी मर्जी थी। कोर्स तो जोश में जॉइन कर लिया लेकिन इतने सालों बाद जब परीक्षा में बैठना पड़ा तो नानी याद आ गयी। पिछली बार मैने परीक्षा दी थी 1978 में। पता है, पता है, आप में से कई लोग तो पैदा भी नहीं हुए होगें और बाकी उस साल में नाक पौछतें, निक्कर संभालते गोटियाँ खेलते होगें। परिक्षा का जिस दिन परिणाम निकलना था, हमारे हाथ पांव ठंडे हो रहे थे। फ़ैल हो जाते तो कैरिअर पर कोई असर नहीं पड़ना था लेकिन कॉलेज की सहेलियां कितना हंसेगी सोच कर ही जान निकली जा रही थी। भगवान ने लाज रख ली और 80% ले कर पास हो लिए, जान बची तो लाखों पाये, लौट कर बुद्धु घर को(ब्लोगजगत में ) आये। &lt;br /&gt;यूँ तो सभी ब्लोग्स पर जब पोस्ट पढ़ते हैं तो कहने को कुछ न कुछ मन में  आता ही है लेकिन आज की पोस्ट को स्टीम्युलेट (हिन्दी में क्या कहेगें?) करने का सेहरा जाता है ज्ञान जी की पोस्ट को '&lt;a href="http://halchal.gyandutt.com/2009/02/blog-post_18.html"&gt;ब्लॉग पोस्ट प्रमुख है, शेष गौण&lt;/a&gt;'। ई-मेल में ही इस पोस्ट को पढ़ते ही मुझे याद आ गया एक खत जो मैनें अभी कुछ दिन पहले बलविन्दर पाबला जी को लिखा था। अपनी उस याद को आप सब से बांटने के लिए मैं वो खत ज्यों का त्यों यहां दे रही हूँ। &lt;br /&gt;लेकिन वो खत आप लोगों से बांटने के पहले ये तो बता दूँ कि पाबला जी से मेरी मुलाकात अभी कुछ दिन पहले ही हुई है और मुझे पता चला कि वो वेब डिजाइनिंग में बहुत दक्ष हैं। मैं उनसे कुछ तकनीकी सहायता ले रही थी( उसके बारे में अगली पोस्ट में लिखूंगी)। उसी संदर्भ में ये खत लिखा गया था……।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पाबला जी&lt;br /&gt;सादर प्रणाम,&lt;br /&gt;हम तो इस बात से ही खुश हैं कि कोई हमारे स्टुपिड से सवालों का जवाब देने को भी तैयार है, इस हिसाब से आप मेरे गुरु हो लिए…प्रणाम गुरु जी……।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं कि लोग बुढ़ापे में सठिया जाते हैं, अजीब अजीब हरकतें करने लगते हैं, अजीब अजीब (बम्बइया भाषा में अजीब बोले तो कहेगें अतरंगी) इच्छाएं मन में जन्म लेने लगती हैं। मैं साठ की तो नहीं हुई हूँ( अभी काफ़ी दूर हूँ उस मंजिल से) लेकिन सठिया जरूर गयी हूँ( जब साठ की होऊंगी तब पता नहीं क्या करूंगी) अपनी पूरी मसरुफ़ियत के बावजूद ब्लोगिंग की लती हो गयी हूँ। यहां तक तो गनीमत थी लेकिन उसके साथ साथ मुझे ये इन्टरनेट के फ़ंडे सीखने का शौक भी चर्राया है……&lt;a href="http://amar2you.blogspot.com/"&gt;डा अमर कुमार &lt;/a&gt;के ब्लोग पर विषय से संबधित कार्टून लगा देखा तो आश्चर्य से आखें फ़टी की फ़टी रह गयीं। ज्ञान जी के ब्लोग पर चलता इंजिन मुझे उतना ही अच्छा लगता है जैसे किसी बच्चे को प्लास्टिक की पटरी पर गोल गोल दौड़ती रेलगाड़ी…॥ &lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=588"&gt;फ़ुर्सतिया जी&lt;/a&gt; के ब्लोग पर खिले फ़ूल और हाशिये में लगा राजकपूर के गानों का विडियो……&lt;a href="http://radiovani.blogspot.com/"&gt;यूनुस जी&lt;/a&gt; के ब्लोग पर इस्तेमाल किए फ़ोन्ट्स का स्टाइल, मनीष और मीत जी के ब्लोग पर पहले ईस्निप (जिसे मैं थर्मामीटर कहती हूँ, वैसा ही दिखता था) से लोड किये गाने, &lt;a href="http://ojha-uwaach.blogspot.com/"&gt;अभिषेक &lt;/a&gt;के ब्लोग पर लगी ढेर सारी फ़ोटोस थम्बनेल के रूप में(उसे थम्बनेल कहते हैं ये भी अभी अभी पता चला है),अजित जी के ब्लोग के अक्सर बदलते रंगरूप,  होली के अवसर पर बैंगणी भाइयों की फ़ोटोशॉप से खेली होली कौन भुला सकता है, किसी के ब्लोग पर ढोलक बजाता ढीगंना का आइकोन और भी न जाने क्या क्या ....&lt;br /&gt;ब्लोगजगत ऐसा लगता है जैसे कोई मेला लगा है और मैं दुकानों के बाहर खड़ी हर दुकान पे सजी चीजें ललचाई नजरों से निहार रही हूँ…।काश मैं भी ये सब चीजें ले पाती। ये सब वो खिलौने हैं जो मेरी पहुंच के बाहर हैं ....बहुत सिर फ़ोड़ा, कई घंटे बरबाद किए लेकिन आज तक इन सब बातों को समझ नहीं पायी। सोचा कोई क्लास जॉइन कर लूँ, लेकिन सब ने कहा कि ये सब क्लास में नहीं सिखाते, खुद ही सीखना पड़ता है। झट से जाके वेबडिजाइनिंग पर एक मोटी सी किताब खरीद लाई…।घर पर आ कर खोली तो पाया कि मेरे लिए तो ये काला अक्षर भैंस बराबर है जी, उसे अपने किताबों की अलमारी में सबसे पीछे डाल दिया…:)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं कि अगर किसी चीज के लिए बहुत प्रबल इच्छा हो तो भगवान भी आप की सुन लेते हैं…।कुछ ऐसा ही हुआ होगा…द्विवेदी जी ने जब कहा कि आप को फ़ोन कर लूँ तो मेरा पहला सवाल ये था कि मैं तो ये नाम पहली बार सुन रही हूँ, क्या वो मेरे बारे में जानते हैं। द्विवेदी जी ने हंसते हुए कहा था कि अरे पाबला जी को आप को बहुत अच्छे से जानते है, बस आप फ़ोन कर लिजीए।मुझे याद भी दिलाया कि आप अक्सर 'अदालत' ब्लोग की बात करती हैं वो मैं नहीं लिखता पाबला जी लिखते हैं…हमें बड़ा आश्चर्य हुआ, हम तो यही समझे थे कि द्विवेदी जी लिखते हैं। कुछ कौतुहल और कुछ असमंजस की स्थिती में मैंने आप का नंबर घुमाया था…लेकिन आप इतनी आत्मियता के साथ बतियाये कि लगा ही नहीं कि पहली बार बात कर रही हूँ, और एक सिलसिला चल निकला…। आप से और गुरुप्रीत से मुझे इतना अपनापन मिला कि मुझे लगता है मानो आप लोग मेरे ही  परिवार का हिस्सा हों। ………"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ज्ञान जी  के ब्लोग पर कइयों को वो सब खिलौने डिस्ट्रेक्शन लगते होगें लेकिन कुछ मेरे जैसे भी होगें जो चलते इंजिन और ऊपर चलती पट्टी और ध्यानमगन कृष्ण जी को भी देखने आते होगें, रोज देखते है लेकिन फ़िर भी मन नहीं ऊबा। ये ऐसे ही है कि कुछ छात्र गणित प्रेक्टिस करने के समय रेडियो जरूर चला लेते हैं और कुछ बंद कर देते हैं । सब की  पसंद अपनी अपनी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-4897439609989392822?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/wrifkazUdTw/blog-post.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">17</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2009/02/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-8778256636658242055</guid><pubDate>Sun, 30 Nov 2008 19:15:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-01T01:30:00.087+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>क्या कहूँ</title><description>बम्बई की घटनाओं से अभी उबर नहीं पाये हैं। इतनी जल्दी उबर जाते तो हम ही न ग्रह मंत्री हो जाते…।:)&lt;br /&gt;अब इन अंधियारे 59 घंटों का जिक्र सब तरफ़ है तो मन में कुछ  न कुछ तो चलेगा ही। (ज्ञान जी से इस शीर्षकचोरी की माफ़ी मांगते हुए)मेरी मानसिक हलचल के कुछ और उदगार । ख्यालों का सिलसिला जारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आतंकी हमलों से बम्बई तो क्या पूरा देश अन्जान नहीं है पहली बार थोड़े न हुए हैं। कश्मीर में आये दिन होते ऐसे हमलों के हम आदी हो चुके हैं, अखबार में पढ़ कर इतने विचलित नहीं होते। बिल्कुल ऐसे ही जैसे पहले पंजाब में होते ऐसे हमले आम बात लगते थे। मीडिया में भी ऐसी घटनाएं एक दो दिन सुर्खियों में रहतीं और फ़िर तुरंत दूसरे ही दिन से कोई और खबर सुर्खी बन जाती। इस बार भी हमें पक्का विश्वास था कि शुक्रवार को ताज आजाद करा लिया गया, आतंकी मारे गये, खेल खत्म्। अब मीडिया कोई और सुर्खियां ढूंढ चुका होगा, ज्यादा से ज्यादा शाम तक खबरें बदल जाएगीं । लेकिन ऐसा नहीं हुआ,शुक्रवार का पूरा दिन बीता, फ़िर शनिवार बीता और आज इतवार भी बीत गया, यानि कि घटना खत्म होने के तीन दिन बाद भी मीडिया में वही ताज पर हमले की खबर सरगर्मी पर है। क्या पाकिस्तानी आका यही नहीं चाहते थे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम को एक सहेली के आव्हान पर शहीदों को श्रद्धांजली देने के लिए आयोजित एक रैली में हिस्सा लेने गये। वापस घर आ कर टी वी खोला तो हर चैनल पर वही एक बात थी, जनता अपना आक्रोश जाहिर करने के लिए सड़कों पर उतरी। रैली में भी वही देख कर आ रहे थे। टी वी में जो फ़ोटोस दिख रही थीं उसमें रैली में हिस्सा लेते लोग संभ्रात धनी परिवारों से दिख रहे थे और महिलाएं ज्यादा दिख रही थीं। ऐसा ही आक्रोश हमने कारगिल युद्ध के समय महसूस किया था ,खुद अपने अंदर और दूसरों में भी। इन दोनों घटनाओं के समय जनता का गुस्सा पाकिस्तान की तरफ़ तो है ही लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा गुस्सा सरकार की नपुंसकता पर है, मंत्रियों के घटनाओं को हल्के तौर पर लेने से है। आर आर पाटिल का कहना कि 'बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी मोटी घटनाएं होती रहती हैं' न सिर्फ़ ओछा लगा बल्कि फ़िल्मी भी लगा, मानो शाहरुख खान से ये डायलाग चुराया हो, सिर्फ़ आगे सिनोरिटा नहीं कहा। विलासराव देशमुख का आज ताज का दौरा करना अपने फ़िल्मी बेटे के साथ और फ़िल्म डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा के साथ एक और ओछेपन का सबूत था। राम गोपाल वर्मा ने जरूर अपनी नयी फ़िल्म का प्लोट लिख लिया होगा, विलासराव के बेटे को हीरो का रोल दे दिया होगा और शूटिंग की लोकेशन देखने आया होगा। अरे, शहीदों का खून तो सूख जाने दिया होता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कारगिल के समय भी हमारे कई जांबाज सिपाहियों को अकारण मौत को गले लगाना पड़ा था क्युं की किसी मंत्री ने, किसी नौकरशाह ने कारगिल में जरुरत पड़ने वाले समान को सिपाहियों को मुहैया कराना फ़जूल समझा था अपना विदेश घूमना ज्यादा जायज लगा था उन्हें। इस बार भी कई पुलिस अफ़सर और पुलिस कर्मी इस लिए बलि चढ़े क्युं कि हेल्मेट और बुलैटप्रूफ़ जैकेट हल्की क्वालिटी की थी या जंग खायी हुई थीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केरला के चीफ़ मिनिस्टर का उन्नीकृष्णन के घर जा कर तमाशा करना देख सर शर्म से झुक गया। हम सोच रहे थे राजनेता और राजनीति कितनी धरातल में धंस गयी है कि अब ये लोग मुर्दों के बल पर सत्ता का खेल खेलने लगें। इस प्रजातंत्र में किसी को अपने स्वजन के जाने पर शांती से प्र्लाप करने का भी अधिकार नहीं रह गया। रोना है तो मीडिया के कैमरे के सामने और किसी न किसी मिनिस्टर के कुर्ते के छोर को पकड़ कर ही रोओ ताकि सब तुम्हारे ये आंसू भुना सकें। हमारे झुके हुए सर को देख धरा ने हमें टोका और कहा " एक्यूज मी, ये तुम्हारे जगत के राजनेता और राजनीति की गंदगी ढोने की ताब मुझ में नहीं है, कहीं और जा कर फ़ेकों"&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शिव जी की पोस्ट &lt;/strong&gt;लगा हमारे ही मन की भावनाओं को उजागर करती है, इसे देखिए&lt;br /&gt;&lt;a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/11/blog-post_30.html"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर उसकी बात तो हम अनसुनी कर गये, लेकिन एक बात रह रह कर मन में उठ रही है, कारगिल के समय हमने बम्बई में कम से कम जनता को इस तरह अपने आक्रोश का प्रदर्शन करते नहीं देखा था, क्या इस बार आक्रोश ज्यादा है या इस बार पहली बार अमीरों को आतंकवाद ने छुआ है इस लिए प्रदर्शन कहीं ज्यादा सगंठित है और इसी लिए दिख भी रहा है। गरीब जनता ट्रेनों में , टेक्सियों में , बाजारों में हर बार मार खा कर चिल्ला चुल्लु कर चुप हो जाती थी ,कोई सुनने वाला न होता था। पर इस बार अमीरों के घरों में आग लगी है, सरकार पर इस लिए दवाब ज्यादा है या इस बार मीडिया ज्यादा  सक्रिय हो गया है और जनता के आक्रोश को जगाये रखना चाहता है, अगर हां तो क्युं? क्या मीडिया को अभी तक इस से बड़ी कोई खबर नहीं मिली या इस लिए कि चुनाव नजदीक हैं और सरकार अमीरों के दवाब से बौखला रही है और मीडिया मजे ले रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब बातों में एक बात अच्छी हुई( हमारे हिसाब से)और वो ये कि वी पी सिंह के मरने पर ज्यादा ताम झाम नहीं हुआ। एक तरह से गुमनामी की मौत मरा। कहते हैं न कर्मों का फ़ल यहीं मिलता है।…॥:) अब हमें ये बात क्युं अच्छी लगी ये फ़िर कभी। &lt;br /&gt;अपने मन के इन उदगारों को क्या नाम दूं समझ नहीं पा रही, आप ही बता दीजिए क्या कहूँ ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-8778256636658242055?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/avIV4nfcQ94/blog-post.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/12/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-9028763646173301394</guid><pubDate>Sun, 30 Nov 2008 03:53:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-11-30T09:40:52.328+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>कुछ  ख्याल</title><description>&lt;strong&gt;परसों से बहुत से चिठ्ठों पर मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बारे में ढेरों पोस्ट लिखी गयीं, कविताएं लिखी गयीं। किसी में नेताओं के प्रति आक्रोश(और वो सही भी है)था तो किसी में हम हिन्दूस्तानियों की बेबसी पर मौन आसूँ थे, कहीं युद्ध का ऐलान था तो कहीं 'हम सब एक हैं' के (खोखले) नारे थे। हम भी तीन दिन से टी वी से चिपके बैठे थे। उन तीन दिनों में जिन्दगी मानों थम सी गयी थी, ताज के बाहर तैनात मीडियाकर्मियों के साथ साथ हमारे भी दिन और रात में कोई फ़र्क नहीं रह गया था। &lt;br /&gt;बहुत से ख्याल , बहुत सी भावनाएं गुजरीं मन से इन तीन दिनों में। पता नहीं क्युं इस युद्ध के लाइव कवरेज को देखते हुए मन में एक बार भी ब्लोग पर कुछ लिखने का ख्याल नहीं आया। न ही इस बात का ख्याल आया कि दूसरों ने क्या कहा वो पढ़ा जाए। सच कहूँ तो कंप्युटर का ही ख्याल नहीं आया और आप सब के जैसे ही मैं भी ब्लोगजगत की लती उस समय एक बार फ़िर टी वी लती हो गयी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला ख्याल जो मन में आया वो ये कि ये अठ्ठारह बीस साल के छोकरों से लड़ने के लिए हमारे सबसे बेहतरीन सैन्य बल (जिसको मारकोस कहा जा रहा था) बुलाने की जरुरत पड़ गयी, क्या दुनिया हम पर, हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर हंस नहीं रही होगी, ओसामा बिन लादेन की विद्रुप हंसी हमारे कानों में सीसे सी पिघल रही थी। &lt;br /&gt;जैसे जैसे वक्त गुजर रहा था मन मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी कि अब तक नहीं निकाल पाये उन चूहों को। माना कई कारण थे, निर्दोष लोग बंधक थे, ये चूहे गुर्रिला वार में दक्ष थे, हमारे कमांडोस के पास ज्यादा जानकारी उपल्ब्ध नहीं थी,(इन चूहों के पास ताज होटल के अंदर का पूरा नक्शा था, सैनिकों को ये बात पता चली उनके छूटे हुए सामान में से एक सीडी से। अगर उन्हों ने ताज के अंदर का नक्शा बना लिया था तो क्या ताज के मालिकों से हमारे सैनिकों को ताज का अंदर का नक्शा नहीं मिल सकता था। या सब लोग क्रिकेट के मैच के जैसे टी वी पर मैच देखने बैठ गये थे।) बताइए, अपने ही देश में हमारे कमांडोस को जरूरी जानकारी देने वाला कोई नहीं था, सब आसूँ बहाने में और जो शहीद हो गये उनकी जयजयकार करने में व्यस्त थे।  कमांडोस तो आये रात को दो बजे जब की रात दस बजे से ये साफ़ हो गया था कि आंतकवादी ताज में छुपे बैठे हैं, क्या किसी को इस बात का ख्याल आया कि ताज के अंदर के नकशे की जरूरत पड़ सकती है और कमांडोस के आने से पहले उसे तैयार रखना चाहिए। ऐसे में याद आ रहा था इसराइलों का इन्टेबी जाना और दुश्मन को दुश्मन के ही घर पर मार कर अपने देशवासियों को छुड़ा लाना।  दूसरे ही पल ये भी सोच रहे थे कि हमें क्या पता कि वहां क्या क्या किया गया, हमारी जानकारी तो मीडिया से मिली जानकारी पर ही आधारित है, शायद वो सब किया भी गया हो।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टी वी देखते देखते एक और ख्याल जो मन में उठा वो था जब नरीमन हाउस पर विजय पा ली गयी। वहां आस पास के लोगों ने सड़कों पर उतर कर इस जीत का जशन मनाया, गदगद हो कर सैनिकों का धन्यवाद किया गया, उन पर फ़ूल बरसाये गये। हम भी फ़ूले नहीं समा रहे थे और अपने कमांडोस पर उतना ही गर्व महसूस कर रहे थे जितना वहां की जनता जता रही थी। लेकिन हमने देखा कि कमांडोस इस सारी वाहवाही से अनछुए चुपचाप जाकर बसों में बैठ गये वापस ताज की तरफ़ जाने को। ये थे असली हीरो- जान पर खेल कर भी अपने काम को अंजाम तक पहुंचाने के बाद भी किसी तारीफ़ की अपेक्षा नहीं। मन में ये भाव कि इसमें बड़ाई क्या है, हमने अपना काम किया है जैसे सब करते हैं , हां ! काम ठीक ठाक संपन्न हो गया इस बात का संतोष है। एक कमांडो ने तो प्रेस फ़ोटोग्राफ़र को फ़ोटो लेने से भी मना कर दिया। हमारे जहन में कौंध रही थी इसके विपरीत उभरती सौरव गांगूली की हवा में कमीज लहराती फ़ोटो मानो पता नहीं सिर्फ़ अपना काम ही नहीं किया कोई जंग जीती हो। यहां जंग जीते हुए लोग ( जो शायद सौरव की ही उम्र के होगें) कितने संयत थे। फ़िर भी जनता का दिया धन्यवाद बड़ी विनम्रता के साथ हल्के से अभिवादन के साथ स्वीकार कर रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कहते हुए जरा झिझक सी महसूस हो रही है पर इमानदारी से बताएं तो हम भी चैनल बदल बदल कर देख रहे थे कि कौन सा चैनल सबसे अच्छी जानकारी दे रहा है (हालांकि इस बात की चिन्ता भी थी कि कहीं इस लाइव कवरेज से कमांडोस को अपना काम करने में  दिक्कत तो नहीं आ रही)। हमारा वोट गया 'इन्डिया टी वी' के नाम्। इन्डिया टी वी के केमरामैन महेश, रिपोर्टर सौरभ शर्मा, प्रकाश, सरिता सिंह का काम काबिले तारिफ़ रहा। और इसी चैनल के सचिन चौधरी जो कमांडोस के साथ ताज के अंदर थे और वहां से मोबाइल द्वारा रिपोर्टिंग कर रहे थे, इस बात का ध्यान रखते हुए कि ऐसी कोई जानकारी न दी जाए जो कमांडोस के लिए मुश्किल पैदा कर दे, काबिले तारिफ़ था। पहली बार हमारा ध्यान इन मीडियाकर्मियों की तरफ़ गया जो अपनी जान का खतरा उठाते हुए बिना खाये पिए, बिना सोये रिपोर्टिग करते रहे और फ़िर भी दर्शकों का ध्यान इस बात की ओर खीचते रहे कि मीडियाकर्मी जो ताज के बाहर डटे हुए थे उन्हें तो रिप्लेसमेंट मिल जाएगी लेकिन जो कमांडोस अंदर दो दिन से पोसिशन संभाले बैठे हैं वो भी बिन कुछ खाये, सोये उन चूहों को खोज रहे हैं, बंधकों को  छुड़ा रहे हैं। सबसे ज्यादा हैरानी तो हमें तब हुई जब इन्डिया टी वी के रिपोर्टर ने पकड़े हुए आंतकवादी के साथ हुई अपनी बातचीत दर्शकों तक पंहुचा दी। इतनी जल्दी ये रिपोर्टर उस आंतकवादी तक कैसे पहुंच गया, पुलिस ने उस आंतकवादी से बात कैसे करने दी इस रिपोर्टर को। सुना है सरकार ने अब इंडिया टी वी से जवाबतलब किया है कि उन्हों ने ऐसा क्युं किया। हम सरकार से पूछते हैं कि किसी को भी इस आतंकवादी के पास पहले जाने ही क्युं दिया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस आतंकी हमले में मरने वालों में जहां एक तरह कई नामी गिरामी लोग थे तो दूसरी तरह कई आम आदमी भी थे। दूसरों के जैसे हम भी उन सब के लिए उदास हैं, उनके परिवार के दुख में शामिल हैं। लेकिन मेरे ख्याल उन आतंकवादियों की तरफ़ भी जा रहे हैं, जिन्हें मैं गुस्से में चूहे कह रही हूँ। थे तो वो मुश्किल से बीस बीस साल के बच्चे, क्या देखा था उन्होंने जिन्दगी में। जिस तरह की ट्रेंनिग( शारीरिक और मानसिक) वो ले कर  आये थे यकीनन वो काफ़ी वक्त से उन आकाओं के साथ रहे होगें जो अपने स्वार्थ के लिए, अपने अहं के लिए आतंकवाद को जन्म देते हैं, उनके लिए ये बच्चे सिर्फ़ बलि के बकरे से ज्यादा कुछ न थे और ये बरगलाये हुए बच्चे इस बात से बेखबर थे। मुझे पक्का यकीन है कि इन में से कोई भी बच्चा न आई एस आई के या अल कायदा के सरगनाओ का बेटा रहा होगा। ये दिन थे इनके किसी कॉलेज की कैंटीन में गाने गाते हुए लड़कियों के निहारने के, भविष्य के सपने बुनने के, ये दिन थे इनके माता पिता के अपने बच्चों को परवान चढ़ता देख हर्षाने के, लेकिन हुआ क्या? इतनी जांबाजी से मरे तो भी दुनिया भर में थू थू हुई और इनके आकाओं ने सिर्फ़ इतना ही कहा होगा इनके मां बाप से ' सब किस्मत की बात है, ये अल्लाह की खिदमत करने गये हैं' ,अगर अल्लाह की खिदमत करना इतना ही सबब का काम है तो मुल्ला जी खुद क्युं नहीं ये पुण्य कमाते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हर तरफ़ (ये धर्म के ठेकेदार हो या नेता) इंसानी कौम अपनी मौज के लिए, अपने स्वार्थ के लिए आने वाले भविष्य की कौमों को खा रही है। हम सोच रहे हैं कि जानवरों में ज्यादा मानवता है या इंसानों में।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-9028763646173301394?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/qB-wk-ZsUTo/blog-post.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">9</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/11/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-8503034761529342977</guid><pubDate>Sun, 28 Sep 2008 05:54:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-28T11:24:32.469+05:30</atom:updated><title>आवाज़: चलो, एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों</title><description>&lt;a href="http://podcast.hindyugm.com/2008/09/mahendra-kapoor-milestone-in-singing.html"&gt;आवाज़: चलो, एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-8503034761529342977?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/m-5MSAHs4o4/blog-post_28.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/09/blog-post_28.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-5670902029717139865</guid><pubDate>Fri, 26 Sep 2008 16:20:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-27T06:17:47.727+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">किस्सागोई</category><title>चाँद की सैर</title><description>&lt;div&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#cc0000"&gt;&lt;span class="transl_class" id="0" title="Click to correct"&gt;&lt;span class=" transl_class" id="3" title="Click to correct"&gt;&lt;span class=" transl_class" id="4" title="Click to correct"&gt;चाँद&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span class="transl_class" id="1" title="Click to correct"&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span class="transl_class" id="2" title="Click to correct"&gt;सैर&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;font color="#cc0000"&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;font color="#000000"&gt;सुबह के सात बजते ही एफ़ एम गोल्ड पर पहले गाने की स्वर लहरियां गूंजी ।  " चांद को क्या मालूम चाहता है उसे कोई चकोर्…",&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;font color="#000000"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;font color="#000000"&gt; अहा!  जब दिन की शुरुवात इतनी मधुर है तो दिन तो मधुमास ही समझो। कार में रेडियो सुनने का मजा ही कुछ और है। बंद खिड़कियां, ए सी की ठंडक, आस पास की चिल्ल पौं को नो एन्ट्री, पूरा डब्बा(कार) संगीतमय हो लेता है। हाई वे पर तेज और तेज सरपट दौड़ती कार और संगीत की स्वर लहरियां , वक्त मानो थम सा जाता है। ये आधा घंटा पूरे दिन का सबसे हसीन वक्त होता है जब हम अपने साथ होते हैं। &lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;वाशी सिगनल पार करती हिचकोले खाती कार, हम सोच रहे थे आज कल चकौर तो न दीखते बम्बई में, हां यहां की सड़के जरूर चांद के प्रेम में चंद्र्यमान हो रही हैं। सिगनल पार होते ही पीछे से कुछ हल्की हल्की आवाज आने लगी। कार के हिचकोलों ने शायद  पीछे रखे औजारों को जगा दिया था और अब वे भी अपना बेसुरी तान जोड़ कर पूरे संगीत का मजा चौपट कर रहे थे। पड़ौसन से गपियाती मां अक्सर बच्चे की कुनमुनाहट को नजर अंदाज कर जाती है,  हम भी फ़िर संगीत में खो गये। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;दस किलोमीटर के करीब और आगे जाते जाते पीछे की खटर पटर इतनी बड़ गयी मानों भारत पाक सीमा पर गोला बारी हो रही हो। मजबूरन रुकना पड़ा। भुनभुनाते हम नीचे उतरे कि आज इन औजारों की अच्छी खबर लेते हैं , न वक्त देखते हैं न मौका जब देखो बजते रहते हैं। देखा तो औजार बिचारे तो चुपचाप बैठे थे लेकिन पीछे के टायर के परखच्चे उड़ चुके थे, बियोंड रिपेअर। अब इतनी सुबह कौन से टायरवाले की दुकान खुली होगी। आसपास देखा तो सब दुकानें बंद सिर्फ़ एक चाय वाला अपना भाखड़ा सजाए खड़ा था, सड़क पर ही एक बैंच डाल रखा था, कुछ ऑटो वाले बैठे अखबार के साथ सुबह की चाय का आनंद ले रहे थे, धंधे पर निकलने के लिए अभी बहुत जल्दी थी। उनमें से कोई भी हमारी खातिर अपनी चाय और अखबार का अलसाया आनंद छोड़ने को तैयार नहीं था। कलीम( हमारा हमेशा का टायर वाला)  की दुकान  तो खुली होगी लेकिन वो भी अभी कम से कम एक डेढ़ किलोमीटर दूर थी और गाड़ी तो अब अपने पैरों को सहलाती टस से मस न होने की मुद्रा में बैठी थी। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;जैसे तैसे कलीम को लिवाने उसकी दुकान पर पहुंचे। कलीम की दुकान के बाहर ही उसका एक दोस्त अपनी ऑटो में बैठा दूसरे ऑटो वाले से बतियाता दिख गया। कार के पास पहुंचते ही इस ऑटो वाले को भी चाय की तलब उठी, कलीम को चाय पीने के लिए आने को कहते हुए वो उस तरफ़ बढ़ चला, ठिठका, मुड़ा और पूछा ऑंटी चाय पियेगीं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;हैरानी को छुपाते हुए हमने न में सर हिलाया और मोबाइल पर व्यस्त हो गये।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;बम्बई के टैक्सी, ऑटो वालों के दोस्ताना अंदाजा के बारे में जानते तो थे पर ये तो हद्द ही थी। अगर हम उसका निमंत्रण स्वीकार कर लेते तो कल्पना कीजिए कि रोड पर रखी बैंच पर अपनी सफ़ेद वर्दी में बैठे चार पांच ऑटो वाले और हम, हाथ में गरमागरम कटिंग चाय, पास में नगर निगम का झाड़ू लगाता जमादार और उस के झाड़ू से उठती धूल चाय का स्वाद बड़ाती। बाप रे! &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;विनोद जी को फ़ोन पर सुबह के समाचारों की तर्ज पर पूरी स्थिति का जायजा देते हुए पूछा इस फ़टे टायर का क्या करें? जवाब आया "फ़ैंक दो, दूसरा खरीद लो"। तब तक कलीम अपना काम कर चुका था, और फ़टे टायर को डिक्की में रखने की तैयारी में था। हमने कहा भैया इसे फ़ैंक दो और अगर तुम्हें चाहिए तो तुम ले जाओ। उस की आखें कैरम की गोटी जितनी चौड़ाई, पर कुछ बोला नहीं, चुपचाप फ़टा टायर ऑटो में रखा और चाय के भाकड़े की ओर बढ़ गया। हम इस बात पर खुश कि चलो लेक्चर के लिए टाइम पर पहुंच जायेगें। साथ ही सोच रहे थे,  बेचारा!  क्या करेगा इस तार तार हुए टायर का, न ट्युब बची न बाहर का टायर, ज्यादा से ज्यादा अंदर का लोहा बेच लेगा, पांच रुपये किलो। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;तब तक कॉलेज आ गया और पूरा वाक्या जहन से खिसक लिया। दोपहर घर जाते वक्त सोचा कि चलो स्टेपनी के लिए एक पुराना टायर ही खरीद लिया जाए। सुबह कलीम से पूछा था, उसके पास तो मेरी गाड़ी के योग्य कोई टायर नहीं था पर अंदाजन पांच सौ तक आ जाएगा ये जानकारी उसने दे दी थी। दूसरी दुकान पर टायर उपलब्ध था, हमने पूछा कितने का? बोला आठ सौ। हम मन ही मन मुस्कुराए, अच्छा बेटा, हमें पागल समझा है क्या? बोले “नहीं हम तो पांच सौ देगें।” &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;थोड़ी ना नुकुर के बाद सौदा तय हुआ कि पांच सौ का पुराना टायर और तीन सौ की नयी ट्युब और फ़िटिंग फ़्री। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;हमने बड़े विजयी भाव से डिक्की खोली, कहा “रख दो”।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;उसके चेहरे पर उलझन देख पूछा “क्या हुआ,”?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;“काय में फ़िट करूं टायर, रिम  कहां है?”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;अब चौंकने की बारी हमारी थी। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;अरे! तुम टायर दोगे तो रिम न दोगे साथ में, बिना रिम टायर कैसा?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;हमारी बेवकूफ़ी पर खिलखिलाते हुए बोला,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;“मैडम! आप हो किस दुनिया में, नया टायर भी रिम के साथ नहीं आता। रिम लेने को जाओगे तो आठ सौ और देना पड़ेगा। वैसे आप ने रिम का किया क्या?”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;हमने दबी आवाज में कहा “वो तो हमने सुबह फ़ैंक दिया मतलब टायर वाले को दे दिया”।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;“हे भगवान! कौन से टायर वाले को दिया? अभी का अभी जाओ और उस से अपना रिम वापस मांगो”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;मन  कह रहा था अब  समझ में आया कलीम ने वो तार तार टायर क्युं सहेज के ऑटो में रख लिया था, बोले &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;“अब वो हमें क्युं वापस करेगा। वो कह देगा कि वो तो हमने बेच दिया तब हम क्या कर लेगें।”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;“अरे मैडम आप जा कर उसे मेरा नाम बोलना वो रिम वापस कर देगा।”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;हमें कोई उम्मीद तो न थी पर फ़िर भी पूछने में क्या जाता है सोच वापस मुड़ लिए। कलीम की दुकान पर पहुंचे। बाहर से ही इशारे से बुलाया। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;सकुचाते सकुचाते पूछा &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;“वो रिम्”। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;वो मुस्कुराया, मानो कहता हो सुबह तो बड़ी ठसक से कह गयी थी फ़ैंक दो। खीसे निपोरता हुआ रिम ले आया &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;“हैं हैं हैं! मैं तो तभी जानता था कि आप वापस आयेगीं, इसी लिए अलग रख दिया था”।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt; &lt;span class="transl_class" title="Click to correct"&gt;चैन की सांस लेते हुए हमने धन्यवाद की मुस्कुराहट फ़ैंकी और लौट लिए। हाथ रेडियो की तरफ़ बढ़े, “नहीं,  नहीं दोपहर को अभी इतने अच्छे गाने नहीं आते न जो हमें चांद पर पहुंचा दें। वैसे भी ये चाँद की सैर बहुत महंगी है।”……है न?……J&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/2UMMF-oBiUg&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/2UMMF-oBiUg&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-5670902029717139865?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/vcy2VTWQ_A8/blog-post_510.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">19</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/09/blog-post_510.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-1982392846195650088</guid><pubDate>Sun, 14 Sep 2008 06:19:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-14T14:13:20.408+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>जानने का हक है</title><description>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SMy99PCDiQI/AAAAAAAAAQs/Kc27I1opKl4/s1600-h/balcony+010.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 0pt 10px 10px; float: right; cursor: pointer;" src="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SMy99PCDiQI/AAAAAAAAAQs/Kc27I1opKl4/s320/balcony+010.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5245776525684607234" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानने का हक है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की ताजा खबर ये है कि विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि हमारा दिमाग और मन छुट्टी से लौट रहे हैं। आज 14 सेप्टेंबर है, गणपति जी के जाने का दिन आ गया, हर साल की तरह इस साल भी बरखा की झड़ी लगी है। ऊपर की फ़ोटो हमारे कमरे की बैकसाइड है लेकिन इसमें बरसती बरखा का जो आनंद हम ले रहे हैं वो आप को दिखाई नहीं दे पाएगा। सागर जी ने बताया कि इस बार उन्होंने अपने घर गणपति जी जी आराधना हमारे ब्लोग पर लगी आरती से की। जान कर अच्छा लगा कि उन्हें भी ये आरती पसंद आयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नीरज जी का न्यौता&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें याद आ रहा है 7 सितंबर, इस महिने का पहला इतवार्। सितंबर शुरु होते ही नीरज भाई का न्यौता आया था "अनिता जी आते इतवार को खपोली में कवि सम्मेलन का आयोजन किया है आप जरूर आइयेगा।" न्यौता आने के ठीक एक मिनिट पहले हम उनके बलोग पर खपौली में बहते बरसाती झरनों का आनंद उठा कर आ रहे थे। ऐसी बरसात और ऐसे झरनों को देख किसका मन न मचल उठेगा। मन तो ललचाया लेकिन अकेले इतनी दूर हम कभी गये नहीं । विनोद जी को पूछा " ले चलोगे?" बोले कोई ओप्शन है क्या? हम हंस दिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी जाने में एक सप्ताह बाकी था, दो दिन बाद कुलवंत जी का फ़ोन आया, खपौली चलने का न्यौता दोहराते हुए कहा कि बम्बई से कुछ पंद्रह लोग जा रहे हैं इस लिए हम बस कर रहे हैं । हमने कहा हम भी फ़िर बस में ही चलेगें। सिर्फ़ प्रकृति के साथ ही नहीं लोगों के साथ भी तो जुड़ना था। विनोद जी को पता चला तो उन्होंने राहत की सांस ली। हमारे बहुत ललचाने पर भी वो किसी कवि सम्मेलन को झेलने के लिए तैयार न थे। ये सोचते हुए कि हर आदमी को हफ़्ते भर कड़ी मेहनत करने के बाद एक दिन अपनी मर्जी से बिताने का हक्क है हमने भी साथ आने पर जोर नहीं दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो इतवार आ ही गया। इंद्र देव हम पर मेहरबान थे, रास्ते भर बरसात की फ़ुहारों का मजा लेते अंताक्षरी खेलते करीब डेढ़ घंटे में हम खपौली पहुंचे। खेल तो रहे थे अंतक्षारी लेकिन मन ही मन बस में बैठे सहयात्रियों पर नजर डाली तो देखा सिर्फ़ एक लड़की, महिमा ,को छोड़ दें तो सब या तो पचास पच्च्पन को छू रहे थे या उससे भी कहीं आगे निकले हुए थे। गाने वालों में महिमा ही सबसे खामोश थी बाकी सब बेसुरे गा रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बैरन यादाश्त&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भूषण स्टील पहुंचते ही नीरज जी अपने कुछ साथियों के साथ गेस्ट हाउस के बाहर ही स्वागत करते मिले। दुआ सलाम होते ही हम सब के आराम करने के लिए कई कमरे खोल दिए गये। मैं, महिमा, आशा शर्मा जी और अनामिका शाहनी एक कमरे में थी बाद में रेखा रौशनी जी भी हमारे कमरे में आ गयीं। एक बजे का वक्त, चाय के शुरुआती दौर के साथ आपस में परिचय का दौर चला। कुछ देर बाद अनामिका जी ने हमसे पूछा आप ने आशा जी को नहीं पहचाना? हमने ध्यान से उनकी तरफ़ देखा, दिमाग पर बहुत जोर दिया, कहीं किसी कवि सम्मेलन में, किसी ब्लोग पर देखा है क्या? लेकिन क्या करें हमारे दिमाग और मन की तरह हमारी यादाश्त भी हमारे बस में नहीं रहती ऐन मौके पर दगा दे जाती है। हमसे कुछ शर्मसार होते हुए हल्की सी मुस्कुराहट के साथ ना में सर हिलाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनामिका: अरे ये बहुत सारी फ़िल्मों में और टी वी सिरियलों में आ चुकी हैं अमिताभ बच्चन की मां का रोल भी निभा चुकी हैं। हमने आखें चौड़ी कर अपनी यादाश्त को झकझोरने की कौशिश की लेकिन वो टस से मस नहीं हुई। आशा जी ने हल्की सी मुस्कुराहट से हमें माफ़ किया। हमने उन्हें न पहचानने के अपराध की क्षमा मांगी और उन्हों ने तपाक से माफ़ कर दिया। जो हमने उनसे नहीं कहा वो ये कि जब हम अमिताभ बच्चन की फ़िल्म देखते हैं तो सिर्फ़ अमिताभ बच्चन को देखेगें न उसकी मां को थोड़े ही देखेगें। खैर, इस परिचय कार्यक्र्म के बाद खाने का दौर आया और फ़िर वापस हम अपने अपने कमरों में। कवि सम्मेलन शाम को 4 बजे शुरु होना था। अब गप्पबाजी का दौर चला। अनामिका जी किसी और कमरे में चली गयीं जहां उनके एक दूसरे मित्र ठहरे हुए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आप की आवाज&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आशा जी से गपियाते हुए हमने जो एक बात नोट की वो ये कि उनके व्यवहार में,वेश भूषा में, बातचीत में लेशमात्र भी फ़िल्मीपन नहीं था। एक बार भी उन्होंने ये जताने की कौशिश नहीं की कि वो फ़िल्मों से जुड़ी हैं और फ़िल्म आर्टिस्ट्स ऐसोशिएन कार्य समिति की मेम्बर हैं। उलटे वो हमारी ही तारिफ़ करने लगीं कि आप की आवाज सुन कर ऐसा लगता है कि आप अच्छा गाती होगीं, हमने हंस कर कहा जी गाती तो नहीं अल्बत्ता चिल्लाती जरूर हूँ। पलट कर पूछने लगीं फ़िल्मों में काम करोगी और हम ठठा कर हंस दिये लेकिन देखा वो तो एकदम सिरियस चेहरा लिए हमारी तरफ़ देखती रहीं। इतने में रेखा जी आ गयी और रेखा जी जहां हों वहां किसी और को बोलने का मौका मिलना मुश्किल है। बस यूं ही चार बज गये और हम सब हॉल में जा डटे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दुर्घटना&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मरियम गजाला, मिश्रा जी, कुलवंत जी, चेतन शाह, देवी नाग रानी, अनामिका जी, रेखा रौशनी जी, महिमा और भी न जाने कितने ही कवि वहां जमा थे। देवमणी पांडे जी ने मंच संभाला और एक एक कर कविताओं का दौर शुरु हुआ। हम इन शब्दों के सागर में आनंद विभोर होते मजे लूट रहे थे कि अचानक हम पर गाज आ गिरी जब देवमणी पांडे ने अचानक हमारा नाम ऐनाउंस कर दिया। हम हक्के बक्के उनको देख रहे थे, ये बिल्कुल अप्रत्याशित था, हम उन्हें इशारे से मना कर रहे थे कि तभी तपाक से हमें बुके भी पेश कर दिया गया, अब मरता क्या न करता कि तर्ज पर स्टेज पर जाना ही था। हम हाथ में कोई कविता लाए नहीं थे और याद हमें कुछ रहता नहीं है। मन कर रहा था कि धरती फ़ट जाए और हम उसमें समा जाए या जोर से तुफ़ान आ जाए और लोगों का ध्यान बंट जाए। हमने बड़ी असहाय नजर से देवमणि जी की तरफ़ देखा। बड़ी सहानुभूती जताते हुए बोले कि ठीक है आप अपना परिचय ही दे दिजिए, हम पता नहीं क्या बोल कर आ गये। बाद में कुलवंत जी और देवमणी जी ने हमसे माफ़ी मांगी कि इस तरह हमें ऐसी परिस्थति का सामना करना पड़ा। उन्हें इस बात का विश्वास था कि हर कवि अपनी जेब में अपनी एक दो कविताएं तो ले कर घूमता है और जैसे लोग बात बात में अपने विजिटिंग कार्ड निकाल कर बांटते हैं वैसे ही हर कवी हर जगह अपनी चार लाइना तो ठेलता ही रहता है। उनके हिसाब से हमें शुक्रगुजार होना चाहिए था कि हमें मौका दिया गया, अब उन्हें कैसे बताते कि हम तो कवि हैं ही नहीं न्। कविता सुनना और लिखना दो अलग अलग बाते हैं।खैर, सिर्फ़ इस दुर्घटना के सिवा दिन बहुत अच्छा बीता। नीरज जी की खातिरदारी देख कर ऐसा लगता था मानों हम सब बराती हैं जो बिना दुल्हे के आ गये हैं। वापस लौटने के समय ही पता चला कि जिस बस से हम इतने आराम से खपौली आये हैं और वापस जा रहे हैं वो नीरज जी की भेजी हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वापसी में देवमणी पांडे जी सबको एक दूसरे कवि सम्मेलन में आने का निमंत्रण दे रहे थे जो हमारे घर के पास ही नेरुल में होने वाला था। बात आयी गयी हो गयी। परसों अरविंद राही जी ने फ़ोन दनदनाया और उसी नेरुल वाले कवि सम्मेलन में आने का आग्रह किया, ये हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित सर्व भाषा साहित्य सम्मेलन था। इसमें भी कई कवि नजर आये। देवी नागरानी ने सिंधी में कविता पढ़ी तो महात्रे साहब ने मराठी में, विष्णु शर्मा ने पंजाबी में पढ़ी और किसी ने मैथली में। लेकिन सबसे ज्यादा आंनद आया हमें जफ़र रजा साहब को सुनने का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके कुछ शेर जो मुझे याद रहे सुनिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नफ़स नफ़स तुझे महसूस कर रहा हूँ मगर,&lt;br /&gt;दिखाई देता है सदियों का फ़ासला मुझको।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सितम थी या कि अदा थी हिजाब था क्या था,&lt;br /&gt;मेरे रहे मगर अपना नहीं कहा मुझको।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;खुशनुमा दिन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे कल का दिन बहुत ही खुशनुमा दिन था, सुबह एक वीडियों देखा था "जानने का हक" और ये मेरे जेहन में ऐसा अटका कि अब तक नहीं निकला। इसे देखा तो था राइट टू इन्फ़ोरमेशन के संदर्भ में, लेकिन इस ऐक्ट के बारे में लिखने का हक्क दिनेशराय द्विवेदी जी को है। हम उम्मीद कर रहे हैं कि वो हमें इसके बारे में डिटेल में बतायेगें। अभी तो आप ये वीडियो देखें, मुझे पूरी उम्मीद हैं कि आप को भी अच्छा लगेगा, वैसे ये भी हो सकता है कि आप में से कइयों ने इसे पहले देखा होगा, लेकिन अच्छी चीज एक बार और देखी जा सकती है, है न?&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/oOSq2KtrWY4&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/oOSq2KtrWY4&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-1982392846195650088?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/hzzlGhBbklo/blog-post_14.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SMy99PCDiQI/AAAAAAAAAQs/Kc27I1opKl4/s72-c/balcony+010.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">24</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/09/blog-post_14.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-8102209063179070360</guid><pubDate>Tue, 02 Sep 2008 14:48:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-09-02T21:32:08.719+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>मोरया रे बप्पा मोरया रे</title><description>&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/NCyKAbz56gc&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/NCyKAbz56gc&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोरया रे बप्पा मोरया रे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल गणेश चतुर्थी है। महाराष्ट्र में गणेश पूजा का महत्त्व उतना ही है जितना बंगाल में दुर्गा पूजा का। चारों तरफ़ हर्षोल्लास का वातावरण है, ये बिगुल है कि त्यौहारों का मौसम आ चला। अब बीच में  श्राद्ध पक्ष को छोड़ दें तो दिवाली तक सब तरफ़ रौनक रहेगी। चतुर्थी तो कल है लेकिन अभी से सड़कों पर बजते ढोल मजींरों की आवाज हमारे अंदर के कमरे तक आ रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल सुबह से ही आरतियों का दौर जो शुरु होगा तो  दस दिन तक थमेगा नहीं। जहां एक तरफ़ लता मंगेशकर के स्वर गूंजेगें वहीं अनूप जलोटा के स्वर भी पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं। खास कर उनका एक भजन मुझे बहुत अच्छा लगता है &lt;br /&gt;"जाना था गंगा पार प्रभु केवट की नाव चढ़े " इस भजन में केवट की हौशियारी को अनूप जलोटा ने इतना मजे ले कर गाया है कि जब भी सुनते है मुस्कराये बिना नहीं रह पाते। वैसे गणेश जी की आरती तो सब जगह ही होती है लेकिन मराठी में गणेश आरती इतनी मधुर है कि जिसे मराठी नहीं समझ आती वो भी झूमे बगैर नहीं रह सकता। मेरी पंसद की दो आरतियां मराठी में प्रस्तुत कर रही हूँ , आशा है आप को भी इन्हें सुनने में उतना ही मजा आयेगा जितना हमें आता हैं। हम तो ये दोनों आरतियां दस दिनों तक हर गली कूचे में सुनेगे और इनके साथ जाती हुई बरसात का आंनद भी  लेगे। सोचा आप के साथ भी ये आंनद बांट लें  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://anitakumar.lifelogger.com/media/audio0/832735_ttvitishpl_conv.flv&amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://anitakumar.lifelogger.com/media/audio0/832735_ttvitishpl_conv.flv&amp;autoStart=false" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="20"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप को आरतियां अच्छी लगे और इसके बोल जानना चाहेगे तो मुझे युनूस जी के दरवाजे पर गुहार लगानी पड़ेगी…।:)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-8102209063179070360?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/GoYYe9QZpxc/blog-post.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">18</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/09/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-3050657442086643129</guid><pubDate>Tue, 29 Jul 2008 14:05:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-07-29T20:33:53.098+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">इधर उधर की</category><title>कुलबुलाहट</title><description>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;कुलबुलाहट&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इधर हम कुछ दिनों से कुछ नहीं लिख पा रहे। मन और मस्तिष्क दोनों छुट्टी पर हैं। उनके लौटने  का इंतजार है। हमने कई नोटिस भेजे हैं पर दोनों टस से मस नहीं हो रहे, बिमार हैं कह कर टाल दिया जब की हम जानते हैं कि दोनों बारिश की रिमझिम का मजा ले रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी ब्लोगरस की तरह हमें भी बहुत कुलबुलाहट हो रही है। जब नहीं रहा गया तो आज हमने मस्तिष्क को फ़ोन लगाया'अरे भई, नहीं आते तो मत आओ, वहीं से हमारे एक सवाल का जवाब दो, ये बहुत परेशान कर रहा है'।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क बोला मतलब अब हमारा भी वर्चुअल ऑफ़िस हो लिया, खैर क्या सवाल है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं- हम बाह्य मुखी हैं या अंतर्मुखी मतलब एक्स्ट्रोवर्ड या इन्ट्रोवर्ड?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क कुछ सोचते हुए बोला हम तब जवाब देगें जब मन भी हमारी बातचीत में शामिल हो, आखिरकार ये तो पॉलिसी डिसिजन है जी।हमने मन को भी फ़ोन लगाया, विडियो कोन्फ़्रेसिंग करवाई,( कित्ते पैसे खर्च हो गये, ब्लोगिंग की लत जो न करवाये कम है)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं- मस्तिष्क भाई, हमें इतनी कुलबुलाहट क्युं हो रही है? एक साल पहले भी कहां लिखते थे तब तो ऐसी बैचेनी नहीं होती थी, ब्लोगजगत के दोस्तों को इतना मिस न करते थे।क्या ये बाह्य मुखी होने की निशानी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन- लो! अब ये नयी बिमारी हमारे पल्ले बांध रही हो। हम तो ताउम्र ये समझे थे कि तुम अपनी तन्हाइयों में खुश रहती हो, फ़िर ये कुलबुलाहट की बात कहां से आ गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं- वही तो हम पूछ रहे हैं क्या ब्लोगजगत ने हमें बदल कर रख दिया है और हमें पता भी न चला कि कब हम अंतर्मुखी से बाह्य मुखी हो गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क अपनी पिछवाड़े वाली कोठरी से निकलता हुआ बोला अंतर्मुखी अपने ही विचारों और भावनाओं से ऊर्जा पाते हैं, और एक वक्त में एक ही काम करते हैं पूरी एकाग्रता के साथ्।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन- तब तो ये अंतर्मुखी हो ही नहीं सकती, देखा नहीं तुमसे और मुझसे कितना काम करवाती हैं, एक ही वक्त में तीन तीन चार चार काम करने को कहती हैं। लेक्चर बनाने को बैठती हैं तो मुझे दौड़ा देती हैं, जरा देख कर तो आओ ब्लोगजगत में क्या हो रहा है, ज्ञान जी का मक्खीमार का रिकॉर्ड  तीस तक पहुंचा कि नहीं, अनूप जी ने किसकी मौज ली, अजीत जी के बकलम में कौन आया, और भी न जाने कहां कहां जाने के लिए लंबी लिस्ट पकड़ा देतीं हैं। दौड़ते दौड़ते शाम हो जाती है पर इनकी लिस्ट तो शैतान की आंत की तरह खत्म ही नहीं होती। हांफ़ते हांफ़ते वहां का हाल सुनाता हूँ तो तुम्हें झट से दौड़ा देती हैं मेरे तो पैरों में छाले पड़ गये। मैं कहे देता हूँ मैं गणपति की छुट्टियों से पहले नहीं आने वाला। अवकाश अवधि बड़वाने की अर्जी देने वाला हूँ। देखो देखो, छुट्टी पर हूँ फ़िर भी चैन नहीं यहां भी फ़ोन ख्ड़का दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै- तुम तो शिकायतों का पुलिंदा हो जी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क हम दोनों की नोंक झोंक को नजर अंदाज करते हुए बोला सोचने वाली बात ये है कि अंतर्मुखी मितभाषी होते हैं और जो भी बोलते हैं बहुत सोच विचार कर बोलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन तपाक से चहचहाया- देखा! मैं न कहता था ये अंतर्मुखी हैं ही नहीं, इनके जैसा बातूनी देखा है कहीं और सोच विचार का तो नाम ही मत ओलो। जब तक तुम अपने पेंच कसते हो, इनकी जबां फ़िसल चुकी होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै- अरे हमेशा थोड़े ऐसा होता है वो तो जब हम एक्साइटेड होते हैं तब्…।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क - तुम दोनों यूं ही भिड़ते रहे तो मैं चला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मैं - अरे नहीं नहीं, फ़ोन मत रखना, तुम बोलो तुम बोलो, ऐ मन चुप बैठो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क- हम्म! अंतर्मुखी को अपनी निज जानकारी जग जाहिर करने में बड़ा संकोच होता है, तो तुम्…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम टप्प से बोले नहीं नहीं ये बात हम नहीं मानते, हमारे कई ऐसे ब्लोगर दोस्त हैं जो अंतर्मुखी हैं पर हम सबको उनकी पल पल की खबर रहती है वो भी बिना जासूस।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क परेशान होते हुए बोला तब हमें नहीं मालूम, किसी और को पूछो।हम छुट्टियों में ओवर टाइम नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बताइए जनाब किस से पूछें , क्या आप बता सकते हैं हम बाह्य मुखी हैं या अंतर्मुखी?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-3050657442086643129?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/JsRa0GPgnOo/blog-post_29.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">24</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/07/blog-post_29.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-1092921980195455661</guid><pubDate>Sun, 13 Jul 2008 18:18:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-07-14T00:32:52.327+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>और वो लटक लिए</title><description>&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;और वो लटक लिए&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;=============&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पता नहीं क्या बात है पर अचानक आत्महत्या की कई खबरें, चर्चाएं सुन रहे हैं। अनूप जी ने कहा, उनसे प्रेरित हो कर अकुंर जी बोले, दोनों को आई आई टी में हुई छात्रों की आत्महत्या ने द्रवित किया। पिछले ही हफ़्ते अपनी ही बिल्डिंग में एक नौकरानी के आत्महत्या के मामले ने हमें अंदर से हिला कर रख दिया, मृत्यु तो अब कई बार देख चुके पर आत्महत्या पहली बार देख रहे थे। फ़िर पिछले हफ़्ते ही अखबार में पढ़ा कि जिस पुल को पार कर हम रोज कॉलेज जाते हैं उसी से एक युवक, शायद हमारे ही कॉलेज का, अपनी प्रेमिका की आखों के सामने इस दुनिया से कूच कर गया। हम आते जाते सोचते रहे क्या वजह /मजबूरी रही होगी कि इन नयी खिलती कलियों ने ऐसा कदम उठा लिया। इनके सामने तो अभी पूरी जिन्दगी पड़ी थी, अभी तो सब सपने देखे भी न होगें, उन्हें पूरा करने की मशकत करना तो दूर की बात थी। मेरे जैसे लोग जो अपनी जिन्दगी जी चुके हैं वो ऐसा करने की सोचें तो बात समझ आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात तो है मरना इतना आसान नहीं है, आत्महत्या करने की सोचना एक बात है और कर जाने के लिए कदम उठा लेना दूसरी बात है, उसके लिए बड़ा जिगरा चाहिए या मन में समुद्र जितना दर्द या  डर। पर आदमी इतना क्युं डर जाए कि अपनी जान ही ले ले। कौन डराता है उन्हें इतना। ज्ञान जी के शब्द अगर चुराने की इजाजत हो तो कहूंगी कि मन में ऐसी ही हलचल चल रही थी।&lt;br /&gt;अनूप जी ने विश्लेषण करते हुए कहा कि लोग( खास कर आजकल की युवा पीढ़ी) असफ़लता के चलते, आर्थिक विपदाओं के चलते, तनाव, अकेलेपन के कारण,और कोई दूसरा रास्ता न समझ आने के कारण, यहां तक कि दूसरों की नकल लगाते हुए भी आत्महत्या कर लेते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकुंर जी ने भी लगभग वही बात दोहराई, आजकल लोगों की सहनशक्ति बहुत कम हो गयी है। आपसी रिश्तों का ह्रास अकेलेपन को बढ़ाए दे रहा है।  दोनों पोस्ट पर टिप्पणीयों में भी कई कारण साफ़ हुए पर दोनों पोस्ट में एक एक बात मार्के की थी, जिसका जिक्र जरूरी है, पहले तो अनूप जी की बात-&lt;br /&gt;“सामूहिक लक्ष्य में असफ़लता के चलते लोगों को आत्महत्या करने के किस्से नहीं सुनने को मिलते हैं। यह नहीं सुनाई देता कि क्रांति असफ़ल हो गयी तो नेता ने आत्महत्या कर ली, मार्च विफ़ल हो गया तो लीडर ने अपने को गोली मार ली, शिक्षा का उद्देश्य पूरा न हुआ तो बच्चों की शिक्षा के लिये दिन रात कोशिश करने वाला बेचैन शिक्षाशास्त्री लटक लिया। ”&lt;br /&gt;और अकुंर जी की पोस्ट में जो उन्हों ने बड़ी पते की कही वो ये कि "यदि हमने आर्थिक संपन्नता का भोग किया है तो इसके दुश्परिणामों को भी हमें ही झेलना पड़ेगा।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये दोनों बातें भी एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। सामूहिक लक्ष्य में असफ़लता के चलते लोग इस लिए आत्महत्या नहीं करते क्यों कि असफ़लता के लिए वो सिर्फ़ खुद को जिम्मेदार नही मानते, उल्टे ऐसा सोचते हैं कि अगर दूसरे हमारे आढ़े न आते तो हम यकीनन सफ़ल हो जाते, इस प्रकार जिम्मेदारी का विकेन्द्रिकरण कर अपने अहं को चोट पहुंचने से बचाये रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब व्यक्तिगत असफ़लता मिलती है तो किसको दोष दें , लोगों के काल्पनिक हमलों से ही बचने के लिए निपट लेते हैं। आत्म रोष तो होता ही है डर भी बेहद होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे ख्याल में आत्महत्या की बिमारी की जड़ में हमारा अपनी संस्कृति से दूर होना और पाश्चात्य संस्कृति  को अंधाधुंद अपनाना भी है। हमारी संस्कृति सिखाती है एक दूसरे के साथ जुड़ना, अपनी पहचान अपने घर परिवार से बनाना, पाश्चात्य संस्कृति सिखाती है अलगाववाद जिसमें मैं ही मैं सबसे ज्यादा महत्त्व रखता है। खून के रिश्तों से भी प्रतिस्पर्धा,अकेलापन तो होना ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी संस्कृति सिखाती है विनम्रता, सफ़ल असफ़ल होने वाले हम कौन, हम तो वही करते और पाते हैं जो ऊपर वाला चाहता है, ऐसी सोच असफ़लता से पैदा हुई निराशा से बचने के लिए  कवच का काम करती है, लेकिन पाश्चात्य   संस्कृति तो कहती है खुद को सर्वोपरि समझो, अपने आगे किसी को कुछ न समझो,  तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी होता है उसके लिए तुम खुद जिम्मेदार हो, तब असफ़लता हाथ लगे या उसका अंदेशा भी हो तो जोर का झटका तो लगना ही है। ऐसे में शर्म के मारे बच्चा किसी से कह भी नहीं सकता कि उसे कोई परेशानी है। ऐसा कहने का मतलब होगा ये मान लेना कि वो कमजोर है, नकारा है, अपनी जिन्दगी खुद नहीं संभाल सकता और ये मान लेना तो उसे मंजूर नहीं, स्वाभिमान दंभ होने की हद्द तक जो कूट कूट कर भरा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग ये समझते हैं कि लोग आत्महत्या तभी करते हैं जब उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता, पर मुझे तो लगता है कि आज कल लोग आत्महत्या का विकल्प एक बड़ा ही आसान विकल्प समझा जाता है और लोग उसे हमेशा साथ में रखते हैं। जिन्दगी के संघर्षों से जुझना बड़ा लंबा और मेहनत का काम है, जिन्दगी से निपट लेने में कुछ क्षण ही तो लगते हैं फ़िर  ऐसी जगह पहुंच जाते हैं जहां कोई कुछ कह भी नहीं सकता।&lt;br /&gt; मुझे नहीं लगता  कि आत्महत्या करने वाला (खास कर कच्ची उम्र वाला)वास्तव में ये विश्वास करता  है कि आत्महत्या के बाद जिन्दगी खत्म हो जायेगी। उसे लगता है मानों स्लेट पौंछ कर दूसरी कहानी लिखी जा सकेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनूप जी ने पूछा राम तो भगवान थे वो क्युं जा कर सरयु में समा गये। वैसे तो मैं ने धार्मिक किताबें कभी पढ़ी ही नहीं( वो सब रिटारयमैंट प्लान में आता है, वानप्रस्थ आश्रम के समय) पर जो कुछ रामायण के बारे में जानती हूँ  उसके आधार पर  मेरा अनुमान ये है कि राम जी की समस्या ये थी कि वो सारी जिन्दगी दूसरों के लिए जीते रहे, दूसरों को खुश करने के प्रयास में जिन्दगी निपटा ली। आज भी परिस्थति कुछ ज्यादा अलग नहीं, हम में से कई लोग दूसरों के लिए ही जीते हैं, खुद को क्या चाहिए, क्या अच्छा लगता है जब ये नहीं पता तो दूसरे को कैसे खुश रक्खा जाए कैसे पता होगा, सो बड़े क्न्फ़्युज्ड रह्ते हैं लोग। सिर्फ़ एक ही बात साफ़ होती है हम सबके दिमाग में , जन्म अपनी मर्जी से नहीं लिया, जीते भी हैं औरों की मर्जी से। अपने हाथ में तो बस एक ही चीज है अपनी मौत, जब चाहो गले लगा लो।  &lt;br /&gt;कई बार तो बच्चे सिर्फ़ अपने अति व्यस्त मां बाप को  दु:ख पहुंचाने के लिए जिन्दगी से निपट लेते हैं जैसे कुछ घर से भागने की योजना बनाते हैं। इन्हें लगता है घर से भाग कर  कहां जाएगें तो चलो जिन्दगी से भाग लो, आसान रहेगा। टिकट भी न कटाना पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर इस विषय पर तो ढेर सारी चर्चा हो सकती है और होनी भी चाहिए। इस चर्चा को शुरु करने के लिए अनूप जी को साधुवाद देना होगा।   &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-1092921980195455661?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/n4HJ1YT68PI/blog-post_13.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">15</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/07/blog-post_13.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-5837436919556792710</guid><pubDate>Mon, 07 Jul 2008 16:18:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-07-07T22:19:05.115+05:30</atom:updated><title>नकुल कृष्णा - भाग ५</title><description>&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;नकुल कृष्णा - भाग ५&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;====================&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;आप लोगों की बात मानते हुए, इस कहानी को थोड़ा और आगे ले जा रहा हूँ। छह में से चार सिफ़ारिश के पत्रों को यहाँ पेश करना चाह रहा था। इनमे से तीन कॉलेज के वरिष्ठ शिक्षक के लिखे हुए थे और चौथा उसके नाटक का दिग्दर्शक का लिखा हुआ था। दो और हैं जिनपर "गोपनीय़" का छाप लगा हुआ था और उनकी प्रतियाँ हमें उपलब्ध नहीं हुई। दोनों बेंगळूरु के कला और साहित्य के क्षेत्रों में बड़ी हस्तियाँ माने जाते हैं। इन लोगों ने क्या लिखा था, नकुल को भी नहीं पता था लेकिन विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि दोनों ने नकुल की ज़ोरदार तारीफ़ की थी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;पत्र लिखने वालों का नाम मिटाकर और यहाँ वहाँ कुछ असंगत/अप्रासंगित बातों को भी मिटाकर यहाँ पेश करना चाहता था। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;नकुल का लिखा हुआ निबन्ध मेरे पास अब नहीं है। उसे भी यहाँ प्रस्तुत करना चाहता था। नकुल को यों ही एक चिट्टी लिखी थी मैंने, इसकी एक प्रतिलिपि की माँग करते हुए। लगता है कि वह भाँप गया है कि मैं क्यों पूछ रहा हूँ। तपाक से उत्तर दिया है कि यह सभी Rhodes Trust के निजी और गोपनीय दस्तावेज़ हैं और इसे किसी सार्वजनिक मंच पर छापना वर्जित है। उसका कहना सही है। इस कारण, चाहते हुए भी, उन्हें ब्लॉग पर पेश नहीं करूँगा। यदि भविष्य में कभी अवसर मिला, और रुचि रखने वालो ब्लॉग जगत के मेरे नये मित्रों से भेंट होती है, तो अवश्य पढ़वाऊँगा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;एक दिन उसे पता चल ही जाएगा कि मैं अनिताजी के ब्लॉग पर क्या क्या उसके बारे में लिखा हूँ। अवश्य मुझे कोसेगा यह कह्कर "अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू" वाली बात हुई न यह? क्यों शरमिन्दा कर रहे हैं आप मुझे?" मैं कोई उत्तर नहीं दूँगा। इस उम्र में हमारी मानसिक स्थिति वह क्या समझेगा? एक बाप को उसकी आशाएं, सपने और आकांक्षाएं अपने होनहार बेटे के जरिए साकार होता देखकर जो मन की स्तिथी वह तब समझेगा जब स्वयं एक और भी होनहार बेटा या बेटी का बाप बनेगा, भविष्य में।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;नकुल आजकल छुट्टी मना रहा है और सुना है कि Oxford से कुछ दूर, एक गाँव में, अपने नए अन्तरराष्ट्रीय दोस्तों के साथ किसी खेत में अतिथि बनकर एक आधुनिक मकान में रह रहा है और वहाँ खेती, और पशु पालन के काम में अपने यजमान का हाथ बँटा रहा है। सब तरह का अनुभव चाहता है वह। मेरी पत्नि (जो आजकल USA में मेरी बेटी के साथ रह रही है, कुछ समय के लिए) टेलिफ़ोन पर आज इसकी सूचना दी थी। नकुल को पैसा नहीं मिल रहा लेकिन रहने और खाने पीने का पूरा और नि:शुल्क इन्तज़ाम यजमान ने कर दिया है। चलो अच्छा हुआ। आजकल शहर के बच्चे किसी किसान या ग्वाला को गाय का दूध दुहाते देखा भी नहीं होगा। आशा करता हूँ कि नकुल को स्वयं किसी स्वस्थ गोल-मटोल अंग्रेज़ी गाय से दूध दुहाने का अनुभव भी मिल जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SHJHphNHF8I/AAAAAAAAAPo/3qRo2ljXYH4/s1600-h/cow%20grazing.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5220313696689395650" style="CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SHJHphNHF8I/AAAAAAAAAPo/3qRo2ljXYH4/s320/cow%2520grazing.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;छ्ह महीने पहले उसने मुझे एक और मज़ेदार बात बतायी। किसी प्रोफ़ेस्सर अपने परिवार के साथ क्रिस्मस की छुट्टियों में कैंपस से कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहे थे और परिवार की बिल्ली को दिन में दो बार दूध पिलाने की और उस पर नजर रखने की जिम्मेदारी उसे सौंपा गये। बढ़ी खुशी के साथ नकुल ने बताया कि इस काम लिए उस ७५ पौंड मिले थे!&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;इस कहानी को समाप्त करते हुए, यह दो आखरी तसवीरें पेश कर रहा हूँ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;लगता है Oxford जाकर भी उसका लिखने का शौक मिटा नहीं।New statesman पर उसकी लिखी हुई दो निबन्ध के अंश यहाँ पेश कर रहा हूँ। विस्तार से अगर आप पढ़ना चाहते हैं तो कड़ी देखिए। दूसरी कड़ी में Rhodes Scholarship पर उसका हाल ही में छपा हुआ लेख भी पढ़िए।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कड़ी है :&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a onclick="return top.js.OpenExtLink(window,event,this)" href="http://www.newstatesman.com/books/2008/03/india-adiga-white-china" target="_blank"&gt;http://www.newstatesman.com&lt;br /&gt;/books/2008/03/india-adiga-white-china&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a onclick="return top.js.OpenExtLink(window,event,this)" href="http://www.newstatesman.com/books/2008/05/rhodes-trust-ziegler-legacy" target="_blank"&gt;http://www.newstatesman.com/books/2008/05/rhodes-trust-ziegler-legacy&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नकुल पर इन लेखों के लिए प्रोत्साहित करने के लिए, अनिताजी को और आप सब पढ़ने वालों और टिप्पणी करने वालों को मेरा विनम्र नमन और हार्दिक धन्यवाद।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दो साल पहले मेरी माँ चल बसी थी। नकुल तो उनके लिए आँखों का तारा था। माँ की आजकल बहुत याद आती है। काश वह यह सब देखने के लिए जीवित होती। मुझे यकीन है कि स्वर्ग से भेजे गए उनकी दुआअओं का नतीजा है यह सब। गज़ब की महिला थी मेरी माँ। दो साल पहले मरणोप्रान्त, शोक पत्रों के उत्तर देते हुए और माँ को श्रद्धाँजली अर्पित करते हुए सभी निकट के रिश्तेदारों और दोस्तों को मैंने चिट्टी लिखी थी (अंग्रेज़ी में)। शायद यह पठनीय साबित हो। अनिता जी के अंग्रेज़ी चिट्ठे (Chirpings) पर इसे छापने के बारे में सोच रहा हूँ। आशा करता हूँ कि आप लोग इसे भी पढ़ने में रुचि रखेंगे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शुभकामनाएँ&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;गोपालकृष्ण विश्वनाथ&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SHJCCgSkz4I/AAAAAAAAAPY/GPo81WJWx2Q/s1600-h/Article+by+Nakul+in+New+statesman.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5220307528870842242" style="CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SHJCCgSkz4I/AAAAAAAAAPY/GPo81WJWx2Q/s320/Article+by+Nakul+in+New+statesman.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SHJCZTmaeBI/AAAAAAAAAPg/CxwPMrDr1x0/s1600-h/Article+in+New+Statesman+by+Nakul+on+Rhodes+Scholarship.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5220307920601380882" style="CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SHJCZTmaeBI/AAAAAAAAAPg/CxwPMrDr1x0/s320/Article+in+New+Statesman+by+Nakul+on+Rhodes+Scholarship.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-5837436919556792710?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/V_jqBAzkk2g/blog-post.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SHJHphNHF8I/AAAAAAAAAPo/3qRo2ljXYH4/s72-c/cow%2520grazing.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/07/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-284824465183530366</guid><pubDate>Fri, 04 Jul 2008 08:56:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-07-04T14:58:03.369+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>नकुल: भाग 4</title><description>&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;नकुल: भाग ४&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;============&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस चौथे किस्त में आपको यह बताना चाहता हूँ कि समाज सेवा और पर्यावरण रक्षा के क्षेत्र में नकुल की क्या भूमिका रही।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैं नहीं सोचता कि उसने यह सब इस छात्रवृत्ति हासिल करने कि लिए किया था क्योंकि इन गतिविधियों में बहुत पहले से वह सक्रिय था।हाँ, बाद में उसे अवश्य लाभ हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;समाज सेवा &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;करीब तीन साल पहले अचानक एक दिन वह एक भारी भरकम lap top घर ले आया। मैंने सोचा अपने किसी दोस्त का laptop उठाकर लाया है कुछ दिनों के लिए । लेकिन कुछ दिन बाद मैंने नोट किया वह लैपटॉप उसके पास अब भी है और घर में उसका उपयोग कभी करता नहीं था। उसके बारे में पूछा तो पता चला कि यह लैपटॉप किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की संपत्ति है (Microsoft ? या IBM? ठीक से याद नहीं) और अमानती तौर पर उसके पास कुछ समय के लिए रहेगा एक खास प्रोजेक्ट के सिलसिले में। शुरू शुरू में उस प्रोजेक्ट के बारे में वह बहस नहीं करना चाहता था हम लोगों के साथ शायद यह सोचकर के हम लोग इसका अनुमोदन नहीं करेंगे। वह शायद सोचता था कि हम उसको अपनी पढ़ाई की ओर ज्यादा ध्यान देने को कहेंगे ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;"नकुल अण्णा"&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्रोजेक्ट था Spreading computer awareness among the children of under privileged sections of society। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;नकुल इस प्रोजेक्ट में स्वयंसेवक बन गया था। इस काम के लिए उसे कुछ निर्धारित समय देना पढ़ता था और इसके लिए कंपनी उसे बदले में कुछ नहीं देती थी। हमारे घर से करीब एक किलोमीटर दूर, किसी स्लम जैसी एक कोलोनी में जाकर, वहाँ अति निम्न-वर्गीय जाती और झुग्गी झोपडियों में रहने वाले बच्चों को कंप्यूटर सिखाता था। सप्ताह में कोई तीन या चार घंटे समय निर्धारित किया था। किसी समाज सेविका से जुडकर, और इस झुग्गी कोलोनी के मुखिया की अनुमति लेकर, वहाँ एक अलग साफ़ सुथरा स्थान का इन्तजाम हुआ जहाँ बिजली का इन्तज़ाम भी हो गया। इन गरीब बच्चों को (१० से लेकर १६ साल तक और जो सरकारी स्कूलों में पढते थे) कंप्यूटर का मूल ज्ञान देने लगा। बहुत ही छोटे बच्चों को PC Paintbrush के बारे में बताकर, उनको mp3 संगीत सुनाकर, विडियो क्लिप्स दिखाकर उनका मनोरंजन करता था और बडे बच्चों को फ़ाईल मैनेजमेंट, Word, Excel, वगैरह के बारे में बताने लगा। &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;बच्चे बडे चाव से यह सब सीखने लगे थे और जब भी वह वहाँ जाता था सारे मुहल्ले में उसका जोरदार स्वागत होता था और बहुत ही छोटे बच्चे तो "नकुल अण्णा" "नकुल अण्णा" (नकुल भाई) पुकारते पुकारते उसके पीछे पीछे भागते आते थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मुझे बाद में पता चला इसके बारे में और एक दो बार मैं भी उसके साथ चलकर देखा वहाँ का माहौल । मुझे आश्चर्य हुआ। कितने प्यार से यह बच्चे उसका स्वागत करके और कितने चाव और रुचि के साथ उससे सीखते थे। बच्चों की लाइन लग जाती थी कंप्यूटर पे हाथ चलाने के अवसर के लिए। महिलाएं कमरे के बाहर खडी होकर खिड़कियों से अन्दर झाँककर देखती रहती थी अपने अपने बच्चे क्या सीख रहे हैं। मर्द तो हमारे लिए चाय-नाश्ता का इन्तजाम करने में लग जाते और कमरे के बाहर की भीड का नियंत्रण करने में लगे रहते थे। हम दोनों को एक अलग ही दुनिया का अनुभव हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आजकल बैंगलौर में इस श्रेणी के लोगों के बच्चे शिक्षित बनते जा रहे हैं।हर महीने के अंत में नकुल कंपनी के कुछ अफ़सरों और इस इलाके की समाज सेविका को रिपोर्ट करता था। प्रोजेक्ट कई महीनों तक चला था और अंत में नकुल को एक विशेष समारोह में बुलाकर उसे बधाई पत्र और सर्टिफ़िकेट देकर उसका सम्मान किया गया। इस नेक काम, बिना पूर्व योजना बनाए हुआ, सेलेक्शन में बहुत ही उपयोगी साबित हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;उसका संगीत प्रेम भी कमैटी ने नोट किया था। संगीत विद्यालय में स्वयं उच्च शिक्षा पाने के साथ साथ, वह नवागुन्तों को और बच्चों को संगीत सिखाता था इसी विद्यालय में जिसके कारण इस विद्यालय से भी प्रमाण पत्र मिला था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;GreenPeace &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;पर्यावरण के संबन्ध में उसके कुछ निबन्ध छपे थे। वह GreenPeace का सक्रिय सदस्य था और कई seminars में उसने भाग लिया था।जब भी GreenPeace को अपने काम में स्वयंसेवकों की आवश्यकता थी, वह सामने आ जाता था। इसके भी प्रमाण पत्र थे उसके पास।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;बिना योजना बनाए हुए ही, और अन्जाने में ही, उसकी गतिविधियाँ इस छात्रवृत्ति के लिए एक किस्म की तैयारी बन गई जो ऐन वक्त पर बहुत काम आया था।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसके अलावा अंतिम साक्षातकार से पहले उसे एक निबन्ध लिखना पढ़ा था। विषय था क्यों वह अपने को इस छात्रवृत्ति के लिए योग्य समझता है। इस निबन्ध पर सेलेक्शन कमैटी से बहस होती है। बड़ा कठिन विषय है। कैसे बिना डींग मारे, विनम्रता और आत्मविश्वास के साथ उसने अपने को योग्य ठहराया था, यह निबन्ध पढ़ने सी ही ज्ञात होगा। &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मैं कोशिश करूँगा नकुल से निबंध की एक प्रतिलिपी पाने की। चालाकी से हासिल करना पढ़ेगा। उस समय पढ़ा था इस निबन्ध को और अब मेरे पास उसकी प्रतिलिपी नहीं है। मैं तो बहुत प्रभावित हुआ था इस लेख को पढ़कर और मौका पाकर आप सब को भी पढ़वाऊँगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस पोस्ट के साथ मैं कुछ तस्वीरें पेश कर रहा हूँ जो मेरे पास तैयार हैं।बहुत कुछ इसपर लिखा जा सकता है पर मैं समझता हूँ अब इस लेख को समाप्त करूँ। जो रुचि रखते हैं और मुझसे सीधे संपर्क करके पूछते हैं उनको और आगे कुछ बता सकूँगा जो बहुत ही व्यक्तिगत है और ब्लॉग पर छापना शायद आप लोगों की राय में मुनासिब न होगा।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; यहाँ इसके बारे में इतना ही बताना काफ़ी है कि पिछले ८ साल से, मेरे पेशे से संबन्धित मैं कुछ अंतरराष्ट्रीय ई मेल चर्चा समूहों का सदस्य हूँ और कभी कभी विषय से हटकर हम इधर -उधर की बातें भी करते हैं। मेरे करीब सौ अन्तरराष्ट्रीय मित्र होंगे जिनसे मैं इस चर्चा समूह के बाहर, सीधा संपर्क करके non - technical और व्यक्तिगत बातें भी करता हूँ। यह पत्र व्यवहार अंग्रेज़ी में होता है। मैंने नकुल के बारे में यह खुशखबरी सब को दी थी।उत्तर में संसार के कोने कोने से, जान पहचान वालों और कुछ अज़नबियों से भी मुझे उत्तर प्राप्त हुआ जो शायद पठनीय हो। अगर आप लोग ठीक समझते हैं तो इस श्रृंखला में एक और किस्त जोड़ सकता हूँ और इन उत्तरों का सार छापता हूँ। अन्यथा इस कहानी को मैं यहीं समाप्त कर रहा हूँ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;अनिता जी को विशेष धन्यवाद देना चाहता हूँ। न सिर्फ़ उन्होंने इस विषय का चयन किया था बल्कि मुझे प्रोत्साहित भी किया कि इस विषय पर विस्तार से लिखूँ। वह आश्वासन भी देती रही कि यह विषय रोचक और पठनीय है। ब्लॉग जगत में अब तक मेरा कोई ठिकाना नहीं है और निकट भविष्य में होगा भी नहीं । इधर - उधर यायावर बनकर भटकता हूँ और Nukkad।info के पंकज बेंगाणी, ज्ञानदत्तजी और अनिता कुमार जी जैसे मित्रों का अतिथि बनकर काम चला लेता हूँ।और अंत में, इस लेख के सभी पढ़ने वालों और टिप्प्णी करने वालों को भी मेरा हार्दिक धन्यवाद।&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;गोपालकृष्ण विश्वनाथ,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जे पी नगर,&lt;/div&gt;&lt;div&gt; बेंगळूरुई &lt;/div&gt;&lt;div&gt;मेल आई डी:gvshwnth AT याहू डॉट कॉम&lt;/div&gt;&lt;div&gt;geevishwanath AT जीमेल डॉट कॉम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;कुछ तस्वीरें&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3ntWF_toI/AAAAAAAAAOw/JuAopIg0lr0/s1600-h/56.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219082309403129474" style="CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3ntWF_toI/AAAAAAAAAOw/JuAopIg0lr0/s320/56.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3oMDrGuSI/AAAAAAAAAPA/HRbkQMbuVs0/s1600-h/12.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219082837034449186" style="CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3oMDrGuSI/AAAAAAAAAPA/HRbkQMbuVs0/s320/12.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt; &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3n9SBl9OI/AAAAAAAAAO4/DvMsL2VcYqk/s1600-h/34.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219082583188829410" style="CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3n9SBl9OI/AAAAAAAAAO4/DvMsL2VcYqk/s320/34.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3nNRlpNbI/AAAAAAAAAOo/rqn6FCYpQbE/s1600-h/78.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219081758437881266" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3nNRlpNbI/AAAAAAAAAOo/rqn6FCYpQbE/s320/78.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3m-y-mxcI/AAAAAAAAAOg/iVMYCl4AVgQ/s1600-h/910.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219081509702911426" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3m-y-mxcI/AAAAAAAAAOg/iVMYCl4AVgQ/s320/910.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3mK8avHaI/AAAAAAAAAOQ/B45DYFPswns/s1600-h/1314.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219080618883620258" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3mK8avHaI/AAAAAAAAAOQ/B45DYFPswns/s320/1314.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3mt12BzVI/AAAAAAAAAOY/HprdoK2WjHk/s1600-h/1112.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219081218414464338" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3mt12BzVI/AAAAAAAAAOY/HprdoK2WjHk/s320/1112.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt; &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3mK8avHaI/AAAAAAAAAOQ/B45DYFPswns/s1600-h/1314.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-284824465183530366?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/3m0ipy7c4_E/4.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SG3ntWF_toI/AAAAAAAAAOw/JuAopIg0lr0/s72-c/56.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/07/4.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-1157066993956284376</guid><pubDate>Wed, 02 Jul 2008 11:26:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-07-02T17:42:46.086+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>नकुल कृष्णा: भाग 3</title><description>&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;नकुल कृष्णा: भाग ३&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;========&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;तीसरे किस्त में आपको यह बता दूँ कि नकुल ने ऐसा क्या किया अपने को इस छात्रवृत्ति के योग्य बनने के लिए। जैसा मैंने बताया, योग्यता के लिए तीन शर्तें और छह लोगों से सिफ़ारिश की चिठ्ठियों की जरूरत थी। &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पहली शर्त &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पहली शर्त थी शिक्षा में लगातर उत्तम प्रदर्शन। इसे साबित करना सबसे आसान था।स्कूल और कॉलेज के रिपोर्ट कार्डस से यह साफ़ ज़ाहिर था कि नकुल सदैव एक उत्तम विद्यार्थी रहा है और स्कूल और कॉलेज में उसके सदा अच्छे नंबर आये हैं। यह जरूरी नहीं था कि छात्र कोई गोल्ड मेडलिस्ट रहा हो या बोर्ड परीक्षाओं में टॉप्पर रहा हो। बस consistently excellent academic performance काफ़ी था। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;दूसरी शर्त&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;दूसरी शर्त थी कि नियमित पाठ्यक्रम के बाहर की गतिविधियों (extra curricular activities) में राष्ट्रीय स्तर पर सफ़लता। बस इसमें तो नकुल ने आसानी से बाजी मार ली। स्कूल और कॉलेज में वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में शायद ही कभी उसने पहला पुरस्कार नहीं जीता हो। जब हाई-स्कूल में था तो डिस्कवरी चैनल के आयोजित अखिल भारतीय वाद-विवद प्रतियोगिता में बैंगलौर में पहले नंबर पाकर, चेन्नैई में हुई ऑल इन्डिया फ़ाईनल्स में अपने शहर का प्रतिनिधित्व करके , चौथा नंबर पाया था और बाद में पता चला judges में भी मतभेद हुआ था और उनमें से एक ने नकुल को पहले या दूसरे नंबर पर रखना चाहा था। अन्तिम निर्णय जब घोषित हुआ तो वह तीसरा स्थान पाने से बाल-बाल चूका था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;रंगमंच&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;English Theatre उसके लिए passion और एक तरह का नशा था। Shakespeare के कई Dialogues तो उसे कंठस्थ था। अपने दोस्तों के एक theatre group में शामिल हो गया। उन लोगों का व्यंग्य-नाटक "Butter and Mashed banana" तो सारे भारत में अंग्रेज़ी रंगमंच की दुनिया में hit हुआ था। देश में कई जगहों पर उसका प्रदर्शन हुआ था। National Center for Performing arts, Mumbai में एक अखिल भारतीय Theatre festival में इस नाटक ने तीन awards जीते थे। Best play, Best direction और नकुल को इस festival का Best actor घोषित किया गया। Mumbai Mirror में उसकी एक रंगीन तसवीर भी छपी थी, हाथ में अवार्ड लिए हुए। Rave reviews भी पढ़ने को मिले थे। काश मैं यह तसवीर संलग्न कर सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मेरे कंप्यूटर से किसी कारण मिट गया है और मुझे तारीख याद नहीं, नहीं तो इस अखबार के online edition से download कर लेता। नकुल से पूछने से डरता हूँ इसके विवरण। उसे यह अभी तक मालूम नहीं के उसके बारे में मैं इतना सब कुछ लिख रहा हूँ । अगर पता चला तो नाराज़ हो जाएगा। वह तो मुझसे भी ज्यादा विनम्र है और एकदम publicity shy है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इसी नाटक का प्रदर्शन मुंबई में Kala Ghoda festival में भी हुआ। मुम्बई के Prithivi Theatre, पुणे में Film and Television Institute, और पॉन्डिचेरी में भी हुआ था। Indian Institute of Management में भी उसे विशेष आमंत्रण मिला इस नाटक का प्रदर्शन करने के लिए और हमने सुना है नाटक चलते चलते इसका सीधा प्रसारण भी भारत के अन्य IIM में भेजा गया था। इसके अलावा नकुल एक उच्च कोटी का लेखक है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;स्वावलंबी&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जबसे कॉलेज जाने लगा, मुझसे एक रुपया भी जेब खर्च के लिए माँगा नहीं। Print media में और कई web sites पर उसके लेख मिल जाएंगे। अठारह साल की आयु से ही जेब खर्च पैसा खुद कमा लेता था। Outlook Traveler के लिए वह राज्य में भ्रमण करके लेख भेजता रहा और अपने जेब खर्च के पैसे कमा लेता था। अन्तर्जाल में Openspace।org पर भी उसके कुछ लेख मिल जाएंगे जिससे वह कभी कभी कुछ कमा लेता था। नकुल एक कवि भी है और उसके कई प्रशंसक हैं। बैंगलौर में कई बार अपनी अंग्रेज़ी कविताओं को जाने माने कवियों के सामने पढ़ने का मौका मिला। बैंगलौर में प्रतिष्ठित book release functions में हाजिर होता था और उसको प्रसिद्ध लेखकों के साथ मंच पर बैठे देखा हूँ अखबार के चित्रों में। लेखक के नए किताबों से कुछ अंश पढ़ने के लिए भी उसे आमंत्रण मिलता रहा है। जब विश्वविख्यात लेखक विक्रम सेठ बैंगळूरु आये थे, उनके पीछे पढ़ गया था और जब तक अपनी निजी कॉपी को उनसे हस्ताक्षर नहीं करावाया उस महान हस्ती से, वह वहीं डटा रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बैंगलौर में English theatre circles में वह एक जाना पहचाना व्यक्ति है और कभी कोई मौका नहीं छोड़ता भारत के विख्यात अंग्रेज़ी रंगमंच के सितारों से मिलने में और उनके साथ समय बिताने में। कभी सारा दिन उनके साथ चक्कर काटता रहता था और अपने मोबईल भी बन्द रखता था ताकि उसकी माँ उसे यह भी नहीं पूछ सके कि भाई कब घर आ रहे हो? खाना ठंण्डा हो रहा है! सुना है कि आमोल पालेकर, नसीरुद्दीन शाह, अलइक पदमसी जैसे लोगों से मिलने का अवसर भी मिला था उसे। मुबई में Prithvi Theatre में उसको शशी कपूर के सामने अपना अभिनय का प्रदर्शन करने का अवसर मिला था। और भी उदाहरण दे सकता हूँ लेकिन यह Name Dropping से मुझे भी चिढ़ है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;अब क्या कहें?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कई बार, उसको मुम्बई जाना पढ़ता था नाटक के सम्बन्ध में और कभी कभी हम डर गये थे कि इसकी पढाई की क्या होगी? कहीं यह भटक तो नहीं रहा है? मुझे तो इन रंगमंच वालों का डर भी रहता था। हम लोगों से भिन्न हैं यह लोग। यहाँ बैंगलौर में उसका संपर्क रंगमंच के कुछ लंबे बाल और दाढ़ी वालों से, पायजामा/कुर्ता और चप्पल पहने हुए और कंधे पर एक कपडे का थैला लटका कर घूमने वाले लोगों से होता रहता था। मुझे कुछ अजीब लगता था पर उसे रोकने के लिए मेरे पास कोई logical कारण नहीं था। हमने तय किया थ कि पढ़ाई में उन्नति के हिसाब से उससे निपटेंगे। आखिर प्राथमिकता पढ़ाई को दी जानी चाहिए, न इस ड्रामेबाजी को! उसके लिए तो सारी जिन्दगी पड़ी है, पढ़ाई पूरी करने के बाद। पर हमें उसे डाँटने का अवसर मिला ही नहीं! कॉलेज में हर exam और test में अव्वल नंबर पाता रहा और वह तो अपने शिक्षकों का favourite बना रहा। मुझे नहीं मालूम कहाँ से समय निकाल लेता था अपने पाठ्यक्रम के लिए। रात को देर तक सोता नहीं था और पढ़ाई करता रहा होगा। कई बार उसके बन्द कमरे में बत्ती जलती मिली हमें रात बारह बजे के बाद भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एक बार उसको और उसके साथियों को किसीने हवाई टिकट खरीदकर, और मुम्बई के Oberoi Sheraton में कमरा बुक करके अपना नाटक stage करने के लिए बुलाया था। हम तो आश्चर्यचकित रह गए। हमें तो ऐसे होटलों को बाहर से निहारने का अवसर ही मिला था अपने जीवन में। कभी हिम्मत भी नहीं होती थी इन Five Star होटलों के अन्दर झाँकने की भी! Fancy मूँछो और पगड़ी वाला दर्वान तक ही हमारी पहुँच थी! सुबह का निकला नकुल रात को ही विमान द्वारा वापस आया था हाथ में १६,०००/- रुपये की नकद के साथ! वह अपने कमाए हुए पैसे ज्यादातर किताबों और डीवीडी/कैसेट पर खर्च करता था।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;संगीत&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;संगीत तो उसका एक और शौक है। इतना अच्छा गाता है कि पूछिए मत।मेरी स्वर्गवसी माँ के आँखों में आँसू आ जाते थे उसके कुछ गाने सुनने के बाद. आवाज़ भी अतयंत मधुर है और शास्त्रीय संगीत की theory का बहुत ही अच्छा ज्ञान है। १२ साल की आयु में ही, उसने हमें यह कहकर चौंका दिया था कि मैं शास्त्रीय संगीत सीखना चाहता हूँ। आजकल बच्चे फ़िल्म संगीत या pop music में ही रुचि रखते हैं। शास्त्रीय संगीत तो हम उनपर जबरदस्ती करके थोंपते हैं खासकर हमारी संप्रदाय में। लेकिन यहाँ तो वह स्वयं हमारे पास आकर इसकी माँग की। इस मौके का फ़ायदा उठाकर, झट से मेरी पत्नि यहाँ एक जाने माने कर्नाटक शैली में गाने वाली रेडियो आर्टिस्ट से संपर्क करके उसे एक संगीत विद्यालय में भर्ती करा दी। आठ साल से संगीत सीख रहा है और पिछले दो या तीन साल से मंच पर भी कई बार, तबला, मृदंग और तंबूरे के साथ अपना हुनर का प्रदर्शन कर चुका है। एक कैसेट और सीडी भी रिलीस हुआ है उसका। लेकिन उसका नाम कर्नाटक संगीत जगत में अभी तक पह्चाना नहीं जाता। और कई साल का परिश्रम आवश्यक है इसके लिए और अब उसकी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। हमने उससे संगीत से अपना संपर्क जारी रखने की सलाह दी है और उससे कह दिया के जब कभी मौका या समय मिलता हैं अपना अभ्यास जारी रखना। एक दिन वह समय जरूर आएगा जब वह संगीत से अपना सम्बन्ध फ़िर से जोड़ने के लिए तैयार हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका रंगमंच में राष्ट्रीय स्तर पर सफ़लता के कई प्रमाण तैयार थे दिल्ली में साक्षातकार के समय।अपने कॉलेज के वरिष्ठ प्रोफ़ेस्सरों से इतनी बढिया सिफ़रिश की चिठ्ठियाँ जुटाकर ले गया कि कोई भी प्रभावित हो जाएगा। इन चिठ्ठियों के कुछ अंश बाद में संलग्न करूंगा अपने अंतिम किस्त में। मुझे यकीन ही नहीं होता है कि आजकल के शिक्षक इस तरह के भावपूर्ण सिफ़ारिश की चिठ्ठियाँ लिखने के लिए तैयार हो जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;प्रधानमंत्री से मुलाकात&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अगली किस्त में यह बताऊँगा कि तीसरी शर्त, यानी, समाज सेवा और पर्यावरण के संबन्ध में उसने क्या किया अपने को और भी योग्य साबित करने के लिए। जाते जाते एक और मज़ेदार बात आप को बता दूँ।ज्ञानजी के ब्लोग पर मैंने ए पी जे अबदुल कलाम के साथ मेरा १९८६ में भेंट के बारे में बताया था जब वे राष्ट्रपति नहीं थे।२१ सितंबर, २००७ को नकुल को इससे भी अच्छा मौका मिला था किसी सेलेब्रिटी से मिलने का। अगले दिन उसे Oxford जाना था और एक दिन पहले हम तीन (नकुल, मेरी पत्नि ज्योति और मैं) दिल्ली पहुँचे थे। नकुल सीधा हवाई अड्डे से सफ़दरजंग रोड के लिए रवाना हुआ प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से मिलने। सभी पाँच स्कॉलरों को प्रधान मंत्री के साथ १० मिनट बिताने का मौका मिला था। दिल्ली में स्थित Rhodes selection committee ने इसका आयोजन किया था। मनमोहन सिंहजी स्वयं Rhodes Scholarship में दिलचस्पी लेते हैं। किसी जमाने में वे सेलेक्शन कमैटी के अध्यक्ष रहे थे। Security वालों ने किसी को camera तक अन्दर ले जाने नहीं दिया और इस भेंट का हमारे पास कोई तस्वीर नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में उसी शाम एक send off party के अवसर पर लिए गए दो चित्र संलग्न कर रहा हूँ।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पहले में भारत के&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmkOS5xyI/AAAAAAAAANs/TO82FHMwI8o/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5218377365737555746" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmkOS5xyI/AAAAAAAAANs/TO82FHMwI8o/s320/%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B2-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; वर्ष २००७ के पाँच Rhodes Scholars की तसवीर देखिए ।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बाएं से:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१)कुमारी अनिषा शर्मा (दिल्ली के St Stephens college की छात्रा)&lt;br /&gt;२)बैंगलौर से राहुल बत्रा (एक computer science engineer) जो Afro Asian Games में तैराकी में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुका है)&lt;br /&gt;३)बैंगलौर के National Law school से कुमारी रम्या रघुराम&lt;br /&gt;४)हैदराबाद के NALSAR से राघवेंद्र शंकर&lt;br /&gt;५)मेरा बेटा नकुल (नीले कुर्ते में)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तसवीर में नकुल तो नहीं दिखाई दे रहा है लेकिन मेरी पत्नि ज्योति को आप देख सकते हैं (orange saree with blue border)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5218377123397476690" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s320/%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B2-2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िर मिलेंगें एक दो या तीन &lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;दिन के बाद। &lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;सबको मेरी शुभकामनाएं &lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;गोपालकृष्ण विश्वनाथ&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmkOS5xyI/AAAAAAAAANs/TO82FHMwI8o/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-1.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmkOS5xyI/AAAAAAAAANs/TO82FHMwI8o/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-1.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmWHghoVI/AAAAAAAAANk/5AXsf72Yzxg/s1600-h/à¤¨à¤à¥à¤²-2.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-1157066993956284376?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/INTFU0z4g-Y/3.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGtmkOS5xyI/AAAAAAAAANs/TO82FHMwI8o/s72-c/%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B2-1.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/07/3.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-7364616776585725243</guid><pubDate>Mon, 30 Jun 2008 09:26:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-06-30T15:31:53.201+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>नकुल कृष्णा: भाग २</title><description>&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;नकुल कृष्णा: भाग २&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;===============&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#333333;"&gt;अनिता जी को, और सभी शुभचिंतकों को आभार।आप कि प्रतिक्रियाएं पढ़कर दिल भर गया।दिल हलका भी हुआ यह जानकर के कोई मुझे गलत नहीं समझेगा।मुझे डर था कि कहीं कोई यह न समझे के मैं अपने ही बेटे का नाजायज़ बडप्पन कर रहा हूँ।&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;अब आप लोगों से आश्वासन मिल गया है कि यह लेख पठनीय और उपयोगी होगा और अब यह लेख जारी रखने के लिए मुझे प्रोत्साहन भी मिल गया ।&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;पहले Rhodes छात्रवृत्ति के बारे में कुछ मूल जानकारी देना चाहता हूँ।जो और भी अधिक जानकारी चाहते हैं वे मुझसे सीधा संपर्क कर सकते हैं मेरा e mail id अंत में दे रहा हूँ। &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;Cecil Rhodes, एक अंग्रेजी व्यापारी थे जो अफ़्रीका में कई साल रहकर बहुत धन जुटाने में सफ़ल हुए थे। Rhodesia उनके नाम पर ही बना था (अब नाम बदलकर Zimbabwe बन गया है)। १९०२ में उनके देहांत के बाद उनकी अपार संपत्ति में से उनके वसीयतनामे के अनुसार, Rhodes छात्रवृत्तियाँ घोषित की ।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;यह केवल USA, Canada, और अन्य Commonwealth राज्यों के छात्रों के लिए आरक्षित हैं और केवल Oxford University में पढ़ाई करने के लिए दी जाती है। विश्व में किसी और विश्वविध्यालय के लिए नहीं दी जाती। हर साल करीब ९० छात्रवृत्तियाँ घोषित की जाती है जिसमें से ३२ USA के लिए, Canada, Australia, South Africa के लिए ९(प्रत्येक) और भारत के लिए केवल ५ घोषित हुई है। अन्य Commonwealth राज्यों (जैसे सिंगापोर, मलेयसिया, वगैरह के लिए और भी कम हैं)। सभी विषयों के लिए (जो Oxford University में पढ़ाई जाती है), यह छात्रवृत्ति उपलव्ध है (Science, Engineering, Humanites, Law, Agriculture, Medicine)।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;यह दो साल के लिए दी जाती है और विशेष परिस्थितियों में तीन साल के लिए। छात्र/छात्रा की आयु १९ से लेकर २५ तक हो सकती है। आजकल छात्रवृत्ति की रकम है करीब १००० pounds प्रति महीना।इसके अलावा कॉलेज के फ़ीस नहीं देनी पढ़ती और अपने देश से आने जाने का खर्च भी दिया जाता है। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;मेरे बेटे ने बताया कि यह रकम भारत के छात्रों के लिए जरूरत से ज्यादा है और इस रकम से वह आराम से रह सकता है और काफ़ी कुछ बचा भी लेता है।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;हर देश में Rhodes Trust की एक Selection committee होती है और अगस्त के महीने में अर्जियाँ स्वीकार की जाती हैं, सितम्बर में क्षेत्रीय Interviews होते हैं (मुम्बई, दिल्ली, कोलकाता, और बैंगलौर में) और छाँटने के बाद अन्तिम Interview और selection दिसम्बर में दिल्ली में की जाती है।committee में देश के जाने माने हस्तियों को शामिल किया जाता है। एक ज़माने में प्रधान मन्त्री मनमहोन सिंह इस कमिटी में थे (शायद committe की अध्यक्ष भी थे?)। आजकल Infosys के Chairman श्री नारायणमूर्ति, रंगमंच के प्रसिद्ध कलाकार और लेखक गिरिश कर्नाड, इस कमिट्टी के सदस्य हैं। इन्होंने मेरे बेटे नकुल का जोरदार interview लिया था।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;Cecil Rhodes की वसियतनामे के अनुसार, इन छात्रों के निम्नलिखित गुण/योगयताएं होनी चाहिएं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;1)Exceptionally brilliant and consistent Academic record throughout (School and College)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt; 2)Outstanding achievements at national level in extra curricular activites  ।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt; 3)Proven record of social service and committment to social causes and एनवायरनमेंट।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;Rhodes trustके नियमों के अनुसार (उन्हीं के शब्दों में):-------------------------------------Qualities of intellect, character and leadership are what the committee will be looking for in a candidate। A Rhodes Scholar should not be one-sided or selfish। Intellectual ability must be founded upon sound character and integrity of character upon sound intellect। Cecil Rhodes regarded leadership consisting of moral courage and interest in one's fellow beings, as the more aggressive qualities. It was his hope that a Rhodes Scholar would come to esteem the performance of public duties as the highest aim. -------&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;इसके अलावा, हर छात्र की अर्जी के साथ समाज के किसी अच्छे जाने माने, और अपने अपने क्षेत्रों में सक्षम, कामयाब और जिम्मेदार नागरिकों से समर्थन और सिफ़ारिश की आवश्यकता है लेकिन पर्याप्त नहीं। यह जरूरी नहीं के वे celebrities हों लेकिन उनका उम्मीद्वार को निजी तौर से जानना जरूरी है।अपनी अर्जी के साथ छात्र/छात्रा को १००० शब्दों के अन्दर एक निबन्ध लिखना पड़ता है जिसपर सेलेक्शन कमिटी अपने अंतिम साक्षातकार के समय छात्र के साथ बहस करेगी।ज़ाहिर है के जो भी छात्र यह सभी शर्तें पूरी करता है, और सफ़ल हो जाता है, वह कोई साधारण छात्र नहीं होगा। देश के हर कोने से हर विषय में रुचि रखने वाले हज़ारों छात्रों से अर्जियाँ मिलती होंगी और छाँटकर कुछ छात्र/छात्रओं को देश के चार क्षेत्रीय बुलाया जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;जब इस छात्रवृत्ति के लिए अर्जी देने के लिए नकुल ने इच्छा जाहिर की, तो मैं ने केवल मुस्कुराकर उससे कह दिया, हाँ जो भी खर्च हो बता देना, हम तैयार हैं और "Best of Luck!"। उत्तर में वह भी मुस्कुराकर धन्यवाद कहा। उस समय मैं इस Scholarship के बारे में इतना सब जानता ही नहीं था। सुन चुका था इसके बारे में लेकिन कभी इसके बारे में अधिक जानने की कोशिश नहीं की थी। हम धरती पर रेंगने वाले, तारें तोड़ने के बारे में क्या सोचेंगे!&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;मैं जानता था के मेरा बेटा होनहार है लेकिन कभी सोचा भी नहीं था के यह इस हद तक कामयाब होगा। अर्जी भेजने में हमारा क्या बिगडेगा? मुझे ठीक याद नहीं हमने अर्जी देने में कितने खर्च किए लेकिन वह तो शायद एक हज़ार रुपयों सी ज्यादा नहीं हुआ होगा। अर्जी देने के बाद मैं इस मामले को भूल गया था। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;सेप्टेंबर के महीने में जब preliminary interview के लिए उसे बैंगलौर में Indian Institute of Science में बुलाया गया, मैं भी साथ गया था उसे अपनी गाड़ी में पहुँचाने के लिए। वहाँ दक्षिण भारत के चमकते सितारों की भीड़ जब मैने देखी, तो मेरी सभी उम्मीदें गायब हो गईं। कई उम्मीद्वारों से मिलकर इधर-उधर की बातें भी की। एक से एक बढ़कर निकले यह छात्र/छात्राएं और मैं सोचने लगा था कैसे इन लोगों में से केवल पाँच को चुनेंगे! मुझे तो सभी योग्य लग रहे थे।एक अनोखा अनुभव था वह। अधिकाँश लोग २४ या २५ साल के लगते थे और सब ने अपनी अपनी पढ़ाई पूरी भी की थी और PhD या किसी अन्य विषय में Oxford में MA/MSc वगैरह करने के इच्छुक थे। कईओं की तो डरावने वाली दाढ़ी/मूँछें भी थीं इनके सामने मेरा नकुल तो दूध पीता हुआ एक बच्चा लगता था। मैंने सोचा, चलो यह भी जीवन में एक अनुभव है नकुल के लिए। जब नवंबर में सूचना मिली कि नकुल preliminary round में सफ़ल हुआ है तो हम अत्यंत खुश हुए। चलो, इस विशाल देश के लाखों विद्यार्थियों में से केवल १९ चुने हुए श्रेष्ठ विद्यार्थियों में से वह एक है। क्या यह कम है? हम बस इससे ही खुश होने के लिए तैयार थे। हम चिन्तित भी हुए। मंज़िल के इतने पास आकर अगर वह वहाँ तक पहुँच नहीं सका, तो उस बेचारे पर क्या बीतेगी? क्या असफ़लता का सामना maturity के साथ कर पाएगा?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt; २, दिसम्बर, 2006 को दिल्ली में उसका अन्तिम साक्षातकार हुआ।पत्नि और मैं भी उसके साथ जाना चाहते थे लेकिन उसने साफ़ मना कर दिया और हम पति-पत्नि बैंगलौर में सुबह १० बजे से लेकर ३ बजे तक नाखून काटते काटते कैसे समय बिताए यह हमें आज भी याद है।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;दोपहर के ३ बजे जब अमेरिका से फ़ोन आया (मेरी बेटी से जो रात भर जागकर उसके लिए प्रार्थना करती रही) और वह फोन पर ही चीखती चिल्लाती नकुल की सफ़लता की घोषिणा की, तो हमारी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं है। पत्नी तो रोने लगी थी और लिपट गई थी मुझसे। मुझे भी जीवन में पहली बार वह "lump in one's throat" का अनुभव हुआ। भाई बहन के बीच इतना प्यार था कि नकुल ने सबसे पहले खुशखबरी अपने से ९ साल बडी दीदी को ही दी और कहा कि माँ और पिताजी को तुम ही फ़ोन करके बता दो! वह जानता था के उसकी दीदी उसके लिए अमेरिका में बैठी रात भर जाग रही है।उस शाम मन्दिर में जाकर न जाने कितने नारियल फ़ोड़े हम लोगों ने।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt; अब कैसे और क्यों नकुल को सफ़लता मिली, यह अगली कड़ी में बताऊंगा।फ़िलहाल, ये दो चित्र संलग्न कर रहा हूँ।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;पहले में Times of India में छपा उसका एक प्रोफ़ाइल&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGinGfXfg3I/AAAAAAAAANE/Ah_gq4ymZE4/s1600-h/profile+of+nakul+in+bangalore+times+feb+12.jpg"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5217603898249806706" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGinGfXfg3I/AAAAAAAAANE/Ah_gq4ymZE4/s320/profile+of+nakul+in+bangalore+times+feb+12.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुसरे में selection की घोषणा के तुरन्त बाद, सफ़ल छात्रों के साथ पूरी सेलेक्शन कमिट्टी का एक समूह चित्र।नकुल पीछे, बाएं तरफ़ से तीसरे स्थान पर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGinYoD0uTI/AAAAAAAAANM/CFzDZ580eTQ/s1600-h/Rhodes+Scholars+and+Selection+committee+group+photo+after+selection.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5217604209820875058" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" height="186" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGinYoD0uTI/AAAAAAAAANM/CFzDZ580eTQ/s320/Rhodes+Scholars+and+Selection+committee+group+photo+after+selection.jpg" width="319" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शेष अगली कड़ी में।शुभकामनाएंगोपालकृष्ण विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरुemail id:gvshwnth AT याहू डॉट कॉम geevishwanath AT जीमेल डॉट कॉम)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-7364616776585725243?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/sFCRIO3bc5g/blog-post_30.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGinGfXfg3I/AAAAAAAAANE/Ah_gq4ymZE4/s72-c/profile+of+nakul+in+bangalore+times+feb+12.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/06/blog-post_30.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-7602661769757738737</guid><pubDate>Sat, 28 Jun 2008 01:20:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-06-28T07:02:37.526+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लेख</category><title>नकुल कृष्णा: एक चमकता सितारा</title><description>&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGWSOzdJ8sI/AAAAAAAAAMU/KA0PCuGc2Wg/s1600-h/Times+of+India+front+page+Fe+5+2007+(Nakul+is+in+blue+Kurtaa).jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216736526406906562" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGWSOzdJ8sI/AAAAAAAAAMU/KA0PCuGc2Wg/s320/Times+of+India+front+page+Fe+5+2007+(Nakul+is+in+blue+Kurtaa).jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;नकुल कृष्णा: एक चमकता सितारा&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;ये रही नकुल की तस्वीर जो 5 फ़ेब्रुअरी 2007 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुख्य पृष्ट पर छ्पी थी। नकुल को आप नीले कुर्ते में देख सकते हैं। लावण्या जी ने अपनी टिप्पणी में बताया कि बिल क्लिंटन  को भी ये स्कॉलरशिप मिला था, तो शायद हम भावी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को देख रहे हैं।  नकुल के बारे में और अगली पोस्ट में।  &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-7602661769757738737?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/6MrhhpQyucA/blog-post_28.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_e4U_uoehqKs/SGWSOzdJ8sI/AAAAAAAAAMU/KA0PCuGc2Wg/s72-c/Times+of+India+front+page+Fe+5+2007+(Nakul+is+in+blue+Kurtaa).jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/06/blog-post_28.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8623065565625964408.post-1290703660178845876</guid><pubDate>Fri, 27 Jun 2008 14:32:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-06-27T20:55:36.631+05:30</atom:updated><title>नकुल कृष्णा: एक चमकता सितारा</title><description>आजकल परिक्षा परिणाम निकलने का मौसम है, एक एक कर हर क्लास के रिजल्टस निकल रहे हैं और कहीं खुशी कहीं गम। टीचर होने के नाते अक्सर बच्चों के मां बाप से भी पाला पड़ता रहता है। आजकल की कट थ्रोट कंपीटीशन वाली दुनिया में विरले ही ऐसे मां बाप होगें जो अपने बच्चों के कार्यकलाप से पूरी तरह मन से संतुष्ट हों। ऐसे में किसी मां बाप का ये कहना कि हमारा बेटा हमारे घर की शान है कानों में संगीत घोलता है। विश्वनाथ जी एक ऐसे ही भाग्यशाली पिता है। मुझे खुशी है कि विश्वनाथ जी ने मेरा आग्रह स्वीकार कर अपने बेटे के बारे में हमें बताने का मन बना लिया है और मैं गर्व से इतरा रही हूँ कि एक होनहार बच्चे की गौरव गाथा मेरे ब्लोगपटल पर लिखी जाएगी। विश्वनाथ जी , मेरे ब्लोग को ये ईज्जत देने के लिए सहस्त्र नमन और धन्यवाद ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलोक जी ने अभी हाल ही में ज्ञान जी की एक पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि हर आदमी अपने आप में एक उपन्यास होता है, हर आदमी के अंदर पांच सात आदमियों की कहानियां छुपी होती हैं। मुझे भी ऐसा ही लगता है। और अगर कहानी एक प्रतिभावान व्यक्ति की हो रही हो तो एक ही पोस्ट में निपटाना उसके साथ और पाठकों के साथ अन्याय होगा, इस लिए मैं आशा करती हूँ कि विश्वनाथ जी नकुल की पूरी कहानी सुनाएगे, सिर्फ़ झलक नहीं दिखलायेगें। विश्वनाथ जी, हम बिल्कुल बोर न होगें, मुझे पूरा विश्वास है कि नकुल की कहानी न सिर्फ़ रोचक होगी बल्कि कइयों के लिए प्रेरणादायक भी होगी। शुरु हो जाइए, हम सुन रहे हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;============================&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;नकुल कृष्णा: एक चमकता सितारा&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;========================&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे बेटे का नाम है, नकुल कृष्णा, और अगले महीने में वह बाईस साल को हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेंगळूरु में St Joseph's College से BA (first class with distinction) पास करने का बाद आजकल उसकी पढ़ाई Oxford University (UK) में जारी है।&lt;br /&gt;२००७ में भारत के पाँच चुने हुए Rhodes Scholars में से वह एक है। इस अन्तर-राष्ट्रीय और बहुत ही प्रतिष्ठित (और साथ ही अत्यंत भारी रकम वाली) छात्रवृत्ति के बारे जानकारी, क्या क्या गुण और योगयताएं होनी चाहिए, कैसे मेरा बेटा नकुल Rhodes Scholar बनने में सफ़ल हुआ, इन सभी विषयों पर काफ़ी कुछ लिखा जा सकता है जो शायद आपको और अन्य पाठकों को रोचक लगे। अन्य विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत भी बन सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बाप को अपने बेटे पर गर्व करना स्वाभाविक है और इस विषय पर लिखना मेरे लिए गर्व और खुशी की बात होगी।लेकिन मैं अपना ढिंढोरा पीटना नहीं चाहता।बिना आपके और अन्य मित्रों की सम्मति और प्रोत्साहन मिले, मैं यह प्रोजेक्ट शुरू नहीं करना चाहता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िलहाल इतना ही कहूँगा कि एक अच्छे विद्यार्थी होने के अलावा, वह एक अच्छा लेखक, नाटककार, कवि, समाज सेवक और शास्त्रीय गायक भी है जिसके बल पर वह Rhodes Scholar बना। बचपन से ही मेरे लिए और मेरी पत्नि के लिए वह एक आदर्श बेटा बनकर रहा है और हमारे परिवार की शान है। ईश्वर की असीम कृपा है हम दोनों पर जो हमें ऐसा बेटा मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके और बेंगळूरु से दो अन्य विद्यार्थियों का इस scholarship के लिए चुने जाने की खबर, पिछले साल Times of India के मुखपृष्ठ पर उसकी तसवीर सहित छपी थी. यह तसवीर संलग्न है इस ब्लॉग पोस्ट के साथ।अगर इस पोस्ट को इस तसवीर के साथ आप अपने ब्लॉग पर छापने योग्य समझती हैं तो बड़ी कृपा होगी।&lt;br /&gt;उसके "प्रोफ़ाइल" के साथ, कुछ दिन बाद एक और चित्र इसी अखबार में छपा था जो बाद में भेजूँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के लिए बस इतना ही।आपको और हिन्दी जालजगत के मेरे नये मित्रों को शुभकामनाएं।&lt;br /&gt;गोपालकृष्ण विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;नकुल की फोटो  अगली  पोस्ट में दिखाएँगे  , लोड  नही कर  पाए ....:)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img src="http://www.globetrackr.com/dynimg/5e304ce2afc1245ebaebe98e12725f20/trackonly.gif" /&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8623065565625964408-1290703660178845876?l=anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/anitakumar3/~3/fK3AFQz9BL8/blog-post_27.html</link><author>anitakumar3@gmail.com (anitakumar)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">9</thr:total><feedburner:origLink>http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/2008/06/blog-post_27.html</feedburner:origLink></item></channel></rss>
