<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:blogChannel="http://backend.userland.com/blogChannelModule" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:pingback="http://madskills.com/public/xml/rss/module/pingback/" xmlns:trackback="http://madskills.com/public/xml/rss/module/trackback/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0">
  <channel>
    <title>Hindu Astrology</title>
    <description>Indian Culture And Astrology</description>
    <link>http://astrobix.com/hindudharm/</link>
    <docs>http://www.rssboard.org/rss-specification</docs>
    <generator>BlogEngine.NET 2.5.0.6</generator>
    <language>en-US</language>
    <blogChannel:blogRoll>http://astrobix.com/hindudharm/opml.axd</blogChannel:blogRoll>
    <blogChannel:blink>http://www.dotnetblogengine.net/syndication.axd</blogChannel:blink>
    <dc:creator>Acharya Shashikant</dc:creator>
    <dc:title>Hindu Astrology</dc:title>
    <geo:lat>0.000000</geo:lat>
    <geo:long>0.000000</geo:long>
    <atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/rss+xml" href="http://feeds.feedburner.com/astrobixdotcom-hinduastrology" /><feedburner:info uri="astrobixdotcom-hinduastrology" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><item>
      <title>परशुराम जयंती | Parshuram Jayanti | Parshuram Jayanti- Akshaya Tritiya | Parshuram Jayanti 2012</title>
      <description>&lt;p&gt;राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र,परशुराम जी भगवान विष्णु के अवतार थे. परशुराम भगवान शिव के अनन्य भक्त थे. वह एक परम ज्ञानी तथा महान योद्धा थे इन्ही के जन्म दिवस को परशुराम जयंती के रूप में संपूर्ण भारत में बहुत हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है. इस वर्ष परशुराम जयंती 23 अप्रैल 2012 दिन सोमवार को मनाई जाएगी. भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर देश भर में हवन, पूजन, भोग एवं भंडारे का आयोजन किया जाता है तथा परशुराम जी शोभा यात्रा निकली जाती है. विष्णु के अवतार परशुराम जी का पूर्व नाम तो राम था, परंतु को भगवान शिव से प्राप्त अमोघ दिव्य शस्त्र परशु को धारण करने के कारण यह परशुराम कहलाए.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;भगवान विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार के रूप में अवतरित हुए थे धर्म ग्रंथों के आधार पर परशुराम जी का जन्म अक्षय तृतीया, वैशाख शुक्लतृतीया को हुआ था जिसे परशुराम जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन व्रत करने और पर्व मनाने की प्रथा प्राचीन काल से ही चली आ रही है. परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था. &amp;nbsp;परशुराम ने शस्त्र विद्या द्रोणाचार्य से सीखी थी.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;भगवान परशुराम जयंती महत्व | Significance of Parshuram Jayanti&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि त्रेतायुग आरम्भ की तिथि मानी जाती है और इसे अक्षय तृतीया भी कहते है इसी दिन भगवान परशुराम जी का जन्म हुआ था. भागवत अनुसार हैहयवंश राजाओं के निग्रह के लिए अक्षय तृतीया के दिन जन्म परशुराम जी का जन्म हुआ. जमदग्नि व रेणुका की पांचवी सन्तान रूप में परशुराम जी पृथ्वी पर अवतरीत होते हैं इनके चार बड़े भाई रूमण्वन्त, सुषेण, विश्व और विश्वावसु थे अक्षय तृतीया को भगवान श्री परशुराम जी का अवतार हुआ था जिस कारण यह परशुराम जयंती के नाम से विख्यात है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;भगवान परशुराम जी शास्त्र एवम् शस्त्र विद्या के ज्ञाता थे. प्राणी मात्र का हित ही उनका सर्वोपरि लक्ष्य रहा. परशुराम जी &amp;nbsp;तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरूष रहे. परशुराम जी अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे उन्होंने दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की हर प्रकार से रक्षा व सहायता की. भगवान परशुराम जी की जयंती की अक्षततिथि तृतीया का भी अपना एक अलग महत्त्व है. इस तारीख को किया गया कोई भी शुभ कार्य फलदायक होता है. अक्षत तृतीया तिथि को शुभ तिथि माना जाता है इस तिथि में बिना योग निकाले भी कार्य होते हैं. भगवान परशुराम की जयंती हिंदू धर्मावलंबियों द्वारा बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है. प्राचीन ग्रंथों में इनका चरित्र अलौकिक लगता है. महर्षि परशुराम उनका वास्तविक नाम तो राम ही था जिस वजह से यह भी कहा जाता है कि &amp;lsquo;राम से पहले भी राम हुए हैं&amp;rsquo;.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;परशुराम जन्म कथा । Parshuram Katha&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;भगवान परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं में से एक कथा इस प्रकार है-&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;पोराणिक काल में महिष्मती नगरी पर हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था. वह बहुत अत्याचारी शासक था. जब क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो पृथ्वी माता, भगवान विष्णु के पास गई और अत्याचारियों का नाश करने का आग्रह किया तब भगवान विष्णु ने उन्हें पृथ्वी को वचन दिया कि वह धर्म की स्थापना के लिए महर्षि जमदग्नि के पुत्र में रूप में अवतार लेकर अत्याचारियों का सर्वनाश करेंगे इस प्रकार भगवान, परशुराम रूप में जन्म लेते हैं और पृथ्वी पर से पापियों का नाश कर देते हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;परशुराम ने कार्त्तवीर्य अर्जुन का वध कर दिया इसके बाद उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया और उनके रक्&amp;zwj;त से समन्तपंचक क्षेत्र में पाँच सरोवर भर दिये थे. अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका और तब परशुराम जी ने कश्यप ऋषि को पृथ्वी का दान कर दिया और स्वयं महेन्द्र पर्वत पर निवास करने लगते हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अपने भाग्य के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : &lt;a href="http://astrobix.com/fortune/fortuneyear"&gt;भाग्य रिपोर्ट&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/_AWDDOgk88durZR0S4ZuNxISO54/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/_AWDDOgk88durZR0S4ZuNxISO54/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/_AWDDOgk88durZR0S4ZuNxISO54/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/_AWDDOgk88durZR0S4ZuNxISO54/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/mO_rKkDTRSc" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/mO_rKkDTRSc/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/parshuram-jayanti-parshuram-jayanti-akshaya-tritiya-parshuram-jayanti-2012.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=fb9ef2c3-1844-46ae-b934-518244e54764</guid>
      <pubDate>Thu, 08 Dec 2011 15:55:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=fb9ef2c3-1844-46ae-b934-518244e54764</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=fb9ef2c3-1844-46ae-b934-518244e54764</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/parshuram-jayanti-parshuram-jayanti-akshaya-tritiya-parshuram-jayanti-2012.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=fb9ef2c3-1844-46ae-b934-518244e54764</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=fb9ef2c3-1844-46ae-b934-518244e54764</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>ऋषि दुर्वासा | Rishi Durvasa | Durvasa</title>
      <description>&lt;p&gt;ऋषि मुनियों की परंपरा में दुर्वासा ऋषि का अग्रीण स्थान रहा है इतिहास के आदिकालीन महान ऋषियों में यह प्रमुख स्थान रखते हैं, ऋषि दुर्वासा सतयुग, त्रैता एवं द्वापर युगों के एक प्रसिद्ध सिद्ध योगी महर्षि माने गए हैं हिंदुओं के एक महान ऋषि हैं जो अपने क्रोध के लिए जाने जाते रहे ऋषि दुर्वासा को भगवान शिव का अवतार माना जाता है. अपने ज्ञान एवं तपोबल के कारण उन्हें सभी से सम्मान प्राप्त हुआ सभी उन्हें आदरणीय मानते थे परंतु उनके क्रोध के कारण सभी उनसे भयभीत भी रहते थे वह छोटी- छोटी बातों पर श्राप दे दिया करते थे किंतु जल्द ही शांत भी हो जाते थे तथा अपने शाप को दूर करने का उपाय भी स्वयं ही बता देते थे.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;ऋषि दुर्वासा जन्म कथा | Birth Story of Rishi Durvasa&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;ऋषि दुर्वासा जी भगवान शिव के अंश से आविर्भूत हुए माने जाते हैं. इनके पिता महर्षि आत्रि और माता सती अनुसूइया जी थीं .महर्षि अत्रि जी ब्रह्मा के मानस पुत्र थे और उनकी पत्नी अनुसूया जी पतिव्रता थी जिस कारण एक बार उनके पातिव्रत धर्म की परीक्षा लेने हेतु देवी सरस्वती, लक्ष्मी ओर पर्वती जी अपने पतियों को उनके पास जाकर उनके सतीत्व की परीक्षा लेने को विवश करती हैं अत: ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही पत्नियों के अनुरोध पर अनसूयाजी के समक्ष प्रकट होते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;परंतु सती अनुसूइया जी के तपोबल के आगे वह हार जाते हैं और शिशु रूप में तीनों देव माता के पुत्र बन कर रहने लगेते हैं बाद में देव देवियों के अनुरोध पर अनसूया जी उन्हें मुक्त कर देती हैं और देव उन्हें वरदान देते हैं कि वह उन्हें पुत्रों के रूप में प्राप्त होंगे अत: ब्रह्मा जी चंद्रमा के रूप में, विष्णु दत्तात्रेय के रूप में और शिव जी दुर्वासा के रूप में उपस्थित होते हैं&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;एक अन्य कथा अनुसार कहा जाता है कि एक बार महर्षि अत्रि जी ने संतान की प्राप्ति के लिए ब्रह्मा जी से प्रार्थना करते हैं अत: भगवान ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार अपनी पत्नी सती अनुसूइया सहित वह ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना के लिए कठोर तपस्या करते हैं. इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश् उन्हें दर्शन देते हैं और उन्हें वरदान देते हैं कि वह तीनों उनके पुत्र रूप में जन्म लेंगे.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;कुछ समय पश्चात त्रिदेवों के अंश स्वरूप महर्षि अत्री के घर में तीन बच्चों का जन्म होता है जो त्रिलोकी में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले पुत्र होते हैं. इन तीनों पुत्रों के रूप में ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा का जन्म हुआ, विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्त जी का जन्म हुआ तथा भगवान शिव के अंश से महान ऋषि दुर्वासा &amp;nbsp;का जन्म होता है&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;ऋषि दुर्वासा का स्वभाव | Behaviour of Rishi Durvasa&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;ऋषि दुर्वासा जी जीवन-भर भक्तों की परीक्षा लेते रहे अपने महा ज्ञानी स्वरूप होने तथा सभी सिद्धियों के ज्ञान के बावजूद भी ऋषि दुर्वासा जी अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर पाते थे जो उनकी सबसे बड़ी कमी भी रही. उन्हें कभी-कभी अकारण ही भयंकर क्रोध भी आ जाता था. अपने क्रोध के लिए प्रचलित मुनि दुर्वासा जी किसी को भी श्राप दे देते थे. उन्होंने शकुन्तला को श्राप दिया और जिस कारण शकुंतला को अनेक कष्ट सहन करने पड़े. इसी प्रकार उनके क्रोध से कोई भी नहीं बच पाया आम जन से लेकर राजा, देवता , दैत्य, असुर सभी उनके इस क्रोध के भागी बने.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;ऋषि दुर्वासा के जीवन की प्रमुख घटनाएँ | Major Events in Life of Rishi Durvasa&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;दुर्वासा ऋषि जी ने अपनी साधना एवं तपस्या द्वारा अनेक सिद्धियों को प्राप्त किया था अष्टांग योग का अवलम्बन कर उन्हें अनेक महत्वपुर्ण उपलब्धियां प्राप्त हुई थीं उनके जीवन में अनेकों ऎसी घटनाएं रहीं हैं जो सदियों तक अविस्मरणिय रहीं हैं और जिनके होने से कई घटना क्रमों की उत्पत्ति हुई&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;ऋषि दुर्वासा और कुंती |&amp;nbsp;Durvasa and Kunti&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;एक बार कुंती के अतिथ्य सत्कार से प्रसन्न होकर वह उसे एक मंत्र प्रदान करते हैं जिसके द्वारा वह किसी भी देव का आहवान करके उस देव के अंश को जन्म दे सकती थी. इसी वरदान स्वरुप कुंती को कर्ण जैसे पुत्र समेत पांच पांडव प्राप्त हुए और जिनकी उत्पत्ति ने इतिहास में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;दुर्वासा और कृष्ण |&amp;nbsp;Durvasa and Krishna&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;एक बार दुर्वासा कृष्ण के स्वभाव की परीक्षा लेते हैं की प्रकार से उन्हें विचलित करने का प्रयास करते हैं पर कृष्ण हर अवस्था में शांत स्वभाव व्यक्त करते हैं और एक दिन ऋषि उन्हें अपनी जूठी खीर को शरीर पर मलने को कहते हैं. उनके आदेशनुसार कृष्ण अपने पूरे शरीर पर खीर लगा लेते हैं तो दुर्वासा प्रसन्न होकर कृष्ण को वरदान देते हैं कि सृष्टि का जितना प्रेम अन्न में होगा उतना ही तुम में भी होगा&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;दुर्वासा और राजा अंबरीष |&amp;nbsp;Durvasa and&amp;nbsp;Ambarisha&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;एक बारा दुर्वासा ऋषि महाराज अम्बरीष के राजभवन में पधारते हैं उस दिन राजा अंबरीष निर्जला एकादशी उपरांत द्वादशी व्रत पालन में थे. पूजा पाठ करने के पश्चात राजा ने ऋषि दुर्वासा को प्रसाद ग्रहण करने का निवेदन करते हैं ताकी वह अपना वर्त पूर्ण कर सकें परंतु ऋषि दुर्वासा यमुना स्नान करके ही कुछ ग्रहण करने की बात कहते हैं ओर चले जाते हैं. इधर पारण का समय समाप्त हो रहा होता है. अत: ब्राह्मणों के परामर्श पर राजा चरणामृत ग्रहण कर पारण करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस पर जब ऋषि दुर्वासा वहां पहुंच जाते हैं और जब उन्हें इस बात का बोध होता है तो उन्हें बहुत क्रोध आता है और वह राजा अम्बरीश को भस्म करने के लिए अपनी जटा से क्रत्या राक्षसी उत्पन्न करते हैं किंतु राजा बिना विचलित हुए भगवान विष्णु का स्मरण करने लगते हैं और वह राक्षसी जैसे ही उन पर आक्रमण करती है तो स्वत: ही अंबरीष का रक्षक सुदर्शन चक्र उसे भस्म कर देता है और दुर्वासा ऋषि को मारने के लिए सक्रिय हो जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अपनी रक्षार्थ दुर्वासाजी वहां से भागने लगते हैं परंतु उन्हें कहीं भी शरण नहीं मिलती तब वह शिवजी के पास जाते हैं भगवान शिव उन्हें विष्णु के पास भेजते हैं तब विष्णु जी उनसे कहते हैं कि यदि वह अपनी रक्षा करना चाहते हैं तो राजा अम्बरीष से क्षमा मांगें. इस पर ऋषि दुर्वासा अंबरीष के पास जाते हैं तथा अपने अपराध के लिए क्षमा मांगते हैं महर्षि दुर्वासा की यह दशा देखकर अंबरीष सुदर्शन चक्र की स्तुति कर उसे लौट जाने को कहते हैं इस प्रकार दुर्वासा ऋषि राजा के इस व्यवहार से अत्यंत प्रसन्न हो उन्हें आशीर्वाद देते हैं. इस तरह से अनेकों घटनाएँ है जिनसे हमें ऋषि दुर्वासा के जीवन का ज्ञान होता है और अनेक शिक्षाऐं भी प्राप्त होती है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/rgIktcOPI891HJbSq0l8kpKeP5Q/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/rgIktcOPI891HJbSq0l8kpKeP5Q/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/rgIktcOPI891HJbSq0l8kpKeP5Q/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/rgIktcOPI891HJbSq0l8kpKeP5Q/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/R64Dr1Sy0zU" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/R64Dr1Sy0zU/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/rishi-durvasa-durvasa.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=bc4629a2-44cb-459e-b1f6-34977095d535</guid>
      <pubDate>Tue, 06 Dec 2011 14:10:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu God </category>
      <category>Hindu Ritual</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=bc4629a2-44cb-459e-b1f6-34977095d535</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=bc4629a2-44cb-459e-b1f6-34977095d535</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/rishi-durvasa-durvasa.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=bc4629a2-44cb-459e-b1f6-34977095d535</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=bc4629a2-44cb-459e-b1f6-34977095d535</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>दत्तात्रेय जयन्ती | Dattatreya Jayanti | Dattatreya Jayanti Festival</title>
      <description>&lt;p&gt;दत्तात्रेय जयन्ती प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को मनाई जाती है. दत्तात्रेय के संबंध में प्रचलित है कि इनके तीन सिर हैं और छ: भुजाएँ हैं. इनके भीतर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों का ही संयुक्त रुप से अंश मौजूद है. इस दिन दत्तात्रेय जी के बालरुप की पूजा की जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;दत्तात्रेय जी के संबंध में कथा | Story of Dattatreya&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;प्राचीन ग्रंथों के अनुसार एक बार तीनों देवियों पार्वती, लक्ष्मी तथा सावित्री जी को अपने पतिव्रत धर्म पर बहुत घमण्ड होने लगा. नारद जी को जब इनके घमण्ड के बारे में पता चला तो वह इनका घमण्ड चूर करने के लिए बारी-बारी से तीनों देवियों के पास पहुंचें. सर्वप्रथम नारद जी पार्वती जी के पास पहुंचे और अत्रि ऋषि की पत्नी देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म का गुणगान करने लगे. देवी ईर्ष्या से भर उठी और नारद जी के जाने के पश्चात भगवान शंकर से अनुसूया का सतीत्व भंग करने की जिद करने लगी.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;उसके बाद नारद जी लक्ष्मी जी के पास गए और लक्ष्मी जी के समक्ष भी देवी अनुसूया के सतीत्व की बात आरम्भ करके उनकी प्रशंसा करने लगे. लक्ष्मी जी को भी उनकी तारीफ सुनना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. नारद जी के जाने के बाद वह भी विष्णु जी से अनुसूया देवी का सतीत्व भंग करने की जिद पकड़कर बैठ गई.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;विष्णुलोक से नारद जी सीधे ब्रह्मलोक जा पहुंचे और देवी सावित्री के सामने देवी अनुसूया की प्रशंसा का राग अलापने लगे. देवी सावित्री को उनकी प्रशंसा सुनना कतई भी रास नहीं आया. घमण्ड के कारण वह जलने-भुनने लगी. नारद जी के चले जाने के बाद वह भी देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म को भंग करने की बात ब्रह्मा जी से करने लगी.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों को अपनी पत्नियो के सामने हार माननी पडी़ और वह तीनों ही देवी अनुसूया की कुटिया के सामने एक साथ भिखारी के वेश में जाकर खडे़ हो गए. तीनों का एक ही मकसद होने से अनुसूया के द्वार पर एक साथ ही समागम हुआ. जब देवी अनुसूया इन्हें भिक्षा देने लगी तब इन्होंने भिक्षा लेने से मना कर दिया और भोजन करने की ईच्छा प्रकट की.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;देवी अनुसूया ने अतिथि सत्कार को अपना धर्म मानते हुए उनकी बात मान ली और उन्हें स्नान करने के लिए बोलकर स्वयं भोजन की तैयारी में लग गई. तीनों देव जब नहाकर आए तब अनुसूया श्रद्धा तथा प्रेम भाव से भोजन की थाली परोस लाई. लेकिन तीनों देवों ने भोजन करने से इन्कार करते हुए कहा कि जब तक आप नग्न होकर भोजन नहीं परोसेगी तब तक हम भोजन नहीं करेगें. देवी अनुसूया यह सुनते ही पहले तो स्तब्ध रह गई और गुस्से से भर उठी. लेकिन अपने पतिव्रत धर्म के बल पर उन्होंने तीनो की मंशा जान ली.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;उसके बाद देवी ने ऋषि अत्रि के चरणों का जल तीनों देवों पर छिड़क दिया. जल छिड़कते ही तीनों ने बालरुप धारण कर लिया. बालरुप में तीनों को भरपेट भोजन कराया. देवी अनुसूया उन्हें पालने में लिटाकर अपने प्रेम तथा वात्सल्य से उन्हें पालने लगी. धीरे-धीरे दिन बीतने लगे. जब काफी दिन बीतने पर भी ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश घर नही लौटे तब तीनों देवियों को अपने पतियों की चिन्ता सताने लगी.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;एक दिन उन तीनों को नारद जी से पता चला कि यह तीनों देव माता अनुसूया के घर की ओर गए थे. यह सुनते ही तीनों देवियाँ अत्रि ऋषि के आश्रम में पहुंची और माता अनुसूया से अपने-अपने पति के विषय में पूछने लगी. अनुसूया माता ने पालने की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह रहे तुम्हारे पति! अपने-अपने पतियों को पहचानकर उन्हें अपने साथ ले जाओ. लक्ष्मी जी ने चतुरता दिखाते हुए विष्णु जी को पहचानकर उठाया लेकिन वह भगवान शंकर निकले. इस पर सभी उनका उपहास करने लगे.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;तीनों देवियों को अपनी भूल पर पछतावा होने लगा. वह तीनों ही माता अनुसूया से क्षमा मांगने लगी. तीनों ने उनके पतिव्रत धर्म के समक्ष अपना सिर झुकाया. माता अनुसूया ने कहा कि इन तीनों ने मेरा दूध पीया है, इसलिए इन्हें बालरुप में ही रहना ही होगा. यह सुनकर तीनों देवों ने अपने - अपने अंश को मिलाकर एक नया अंश पैदा किया. इसका नाम दत्तात्रेय रखा गया. इनके तीन सिर तथा छ: हाथ बने. तीनों देवों को एकसाथ बालरुप में दत्तात्रेय के अंश में पाने के बाद माता अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के चरणों का जल तीनों देवो पर छिड़का और उन्हें पूर्ववत रुप प्रदान कर दिया.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/6VZaNQsHDBs6TnnI_C6wsXMu5pM/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/6VZaNQsHDBs6TnnI_C6wsXMu5pM/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/6VZaNQsHDBs6TnnI_C6wsXMu5pM/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/6VZaNQsHDBs6TnnI_C6wsXMu5pM/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/DQ8Jj3U2H3Y" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/DQ8Jj3U2H3Y/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/dattatreya-jayanti-dattatreya-jayanti-festival.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=05de0ede-1885-49c6-b73f-22c192248f00</guid>
      <pubDate>Mon, 28 Nov 2011 13:30:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=05de0ede-1885-49c6-b73f-22c192248f00</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=05de0ede-1885-49c6-b73f-22c192248f00</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/dattatreya-jayanti-dattatreya-jayanti-festival.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=05de0ede-1885-49c6-b73f-22c192248f00</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=05de0ede-1885-49c6-b73f-22c192248f00</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>भैरवाष्टमी । कालाष्टमी । Bhairava Ashtami | Kala Bhairav Ashtami 2011</title>
      <description>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;मार्गशीर्ष कृष्ष्ण पक्ष अष्टमी के शुभ दिन भगवान शिव, भैरव रूप में प्रकट हुए थे. कालाष्टमी का व्रत इसी उपलक्ष्य में इस तिथि को किया जाता है . 18 नवंबर 2011 दिन शुक्रवार को भैरव अष्टमी मनाई जाएगी. भैरवाष्टमी को कालाष्टमी के नाम से भी मनाते हैं. भगवान भोले नाथ के इस भैरव रूप के स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के पाप, ताप एवं कष्ट दूर हो जाते हैं. भैरव जी की पूजा उपासना मनोवांछित फल देने वाली होती है. अत: &amp;nbsp;भैरव जी की पूजा अर्चना करने तथा भैरवाष्टमी के दिन व्रत एवं षोड्षोपचार पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायक माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार इस दिन श्री कालभैरव जी का दर्शन एवं पूजन मनवांछित फल देने वाला होता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;भगवान भैरवनाथ जी तंत्र-मंत्र की विद्याओं के ज्ञाता हैं , साक्षात रुद्र हैं. शिवपुराण में भैरव को भगवान शंकर का रूप कहा गया है. यही सृष्टि की रचना, पालन और संहारक हैं. इनका आश्रय प्राप्त करके भक्त निर्भय हो जाता है तथा सभी कष्टों से मुक्त रहता है. भैरवनाथ अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;भैरवाष्टमी कथा । Bhairav Ashtmi Katha&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;भैरवाष्टमी पर पौराणिक आख्यान मौजूद हैं इनके अनुसार एक बार श्री हरि विष्णु और ब्रह्मा जी के मध्य &amp;nbsp;विवाद उत्पन्न हो जाता है कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है. यह विवाद इस हद तक बढ़ गया कि भगवान शिव एक सभा का आयोजन करते हैं. इस सभा में महत्वपूर्ण ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध संत, उपस्थित होते हैं. इस सभा में एक निर्णय लिया जाता है जिसे भगवान श्री विष्णु तो स्वीकार कर लेते हैं किंतु भगवान ब्रह्मा जी इस निर्णय से संतुष्ट नहीं होते तथा महादेव का अपमान करने लगते हैं. शांत चित के भगवान शिव यह अपमान सहन न कर सके&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;और ब्रह्मा द्वारा अपमानित किये जाने पर भगवान शिव ने रौद्र रुप धारण कर लिया. भगवान शंकर प्रलय के रूप में नज़र आने लगे और उनका रौद्र रुप देखकर तीनो लोक भयभीत हो गए. भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए. भगवान भैरव (God Bhairav) श्वान पर सवार थे, इनके हाथ में दंड था हाथ में दण्ड होने के कारण यह दण्डाधिपति भी कहे जाते हैं. भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था. भैरव जी के इस रूप को देखकर ब्रह्मा जी को अपनी ग़लती का एहसास होता है. वह भगवान भोले नाथ एवं भैरव की वंदना करने लगते हैं. भगवान भैरव ब्रह्मा जी एवं अन्य देव और संत-साधुओं द्वारा वंदना करने पर शांत होते हैं. इस तरह भैरव जी की उत्पत्ति होती है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;भैरवाष्टमी व्रत पूजा विधि । Bhairava Ashtami Pooja Vidhi&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;शिव के भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों को भैरव नाथ (BHairo Nath) जी की षोड्षोपचार सहित पूजा करनी चाहिए व उन्हें आर्घ्य देना चाहिए. रात के समय जागरण करके भोले शंकर एवं माता पार्वती जी की कथा एवं भजन कीर्तन करना चाहिए तथा भैरव जी कथा का श्रवण- मनन करना चाहिए. मध्य रात्रि होने पर शंख, नगाड़ा, घंटा आदि बजाकर भैरव जी की आरती करनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;भगवान भैरव नाथ (Bhairo Nath) का वाहन श्वान अर्थात कुत्ता है. भैरव जी की प्रसन्नता हेतु इस दिन कुत्ते को भोजन दें. मान्यता अनुसार इस दिन प्रात: काल पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करके पितरों का श्राद्ध व तर्पण करके भैरव जी की पूजा व व्रत करने से समस्त विघ्न समाप्त हो जाते हैं तथा दीर्घायु &amp;nbsp;प्राप्त होती है. भैरव जी की पूजा व भक्ति करने से भूत, पिशाच एवं काल भी दूर दूर रहते हैं. व्यक्ति को कोई रोग दोष स्पर्श नहीं कर पाते हैं. शुद्ध मन एवं आचरण से ये जो भी कार्य करते हैं उनमें इन्हें सफलता मिलती है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;भैरवाष्टमी महत्व | Significance Of Bhairava Ashtami&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;काल भैरव के साथ साथ &amp;nbsp;इस दिन देवी कालिका जी की पुजा अर्चना एवं व्रत का भी विधान है. देवी काली की उपासना करने वालों को अर्ध रात्रि के बाद मां की उसी प्रकार से पूजा करनी चाहिए जिस प्रकार दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की पूजा का विधान है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है. भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अनेक समस्याओं का निदान होता है. &amp;nbsp;कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है. भैरव उपासना क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त करती है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;span style="color: #6b6b6b; font-family: Arial, Tohama, Helvetica, sans-serif; font-size: 14px; line-height: 18px;"&gt;शनि कि साढेसाती पर रिपोर्ट पाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें:&lt;/span&gt;&lt;a style="font-family: Arial, Tohama, Helvetica, sans-serif; font-size: 14px; line-height: 18px;" href="http://astrobix.com/horoscope/saturnsadesati/"&gt;शनि की साढे़साती&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/TOArte0_rzb8GQ5OiNzjzr14V7A/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/TOArte0_rzb8GQ5OiNzjzr14V7A/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/TOArte0_rzb8GQ5OiNzjzr14V7A/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/TOArte0_rzb8GQ5OiNzjzr14V7A/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/ptGwRDKcO28" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/ptGwRDKcO28/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/bhairava-ashtami-kala-bhairav-ashtami-2011.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=83edecaf-5a80-4178-be14-ba6350cb468a</guid>
      <pubDate>Wed, 02 Nov 2011 16:00:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <category>Hindu God </category>
      <category>Hindu Ritual</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=83edecaf-5a80-4178-be14-ba6350cb468a</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=83edecaf-5a80-4178-be14-ba6350cb468a</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/bhairava-ashtami-kala-bhairav-ashtami-2011.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=83edecaf-5a80-4178-be14-ba6350cb468a</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=83edecaf-5a80-4178-be14-ba6350cb468a</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>राहु और केतु ग्रह | Rahu and Ketu Planets</title>
      <description>&lt;p&gt;राहु नव ग्रहों में से एक ग्रह हैं, राहु अंधकार रूपी रथ में सवार होते हैं, इनके रथ को काले रंग के आठ घोड़े खींचते हैं. राहु के अधिदेवता काल तथा प्रत्यधि देवता सूर्य हैं. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार राहु की महादशा 18 वर्ष की मानी गई है. राहु को अशुभ ग्रह माना गया है. इसे छाया ग्रह कहा जाता है, राहु के सम्बन्ध में अनेक पौराणिक आख्यान है,राहु काल में कोई भी कार्य करना वर्जित माना जाता है. अत: किसी कार्य को शुरू करने से पहले राहु काल का विचार किया जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;राहु जन्म कथा | Rahu Story&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;राहु के विषय में कहा जाता है कि इनकी माता का नाम सिंहिका था और इनके पिता विप्रचित्ति थे. राहु के सौ भाई थे, जिन सभी में राहु अधिक प्रतिभावान थे. सिंहिका हिरण्यकशिपु की पुत्री थी. माता के नाम से राहु को सैंहिकेय भी कहा गया है. राहु ग्रह रूप में ब्रह्मा जी की सभा में विराजते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;राहु कथा | Rahu Story&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;एक समय समुद्रमंथन के दौरान जब दैत्यों और देवों को अमृत की प्राप्ति हुई तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप में अमृत को प्राप्त किया और अमृत देवताओं को पिलाने लगे. तभी उस समय राहु देवताओं का वेष बनाकर उनके मध्य में बैठ जाते हैं. परंतु सूर्य और चंद्रमा उन्हें पहचान लेते हैं और उनकी सच्चाई बता देते हैं. किंतु तब तक राहु अमृत को पी चुका होता है. भगवान &amp;nbsp;अपने तीक्ष्ण धारवाले सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट देते हैं. इस प्रकार चक्र से कटने पर भी उनकी मृत्यु नही होती तथा उनका कटा सिर राहु कहलाया और धड़ केतु के नाम से प्रसिद्ध हुआ और अमृत का संसर्ग होने से वह अमर हो जाते हैं. बैर होने के कारण राहु सूर्य और चंद्रमा को अपने अंधकार से भर देता है ग्रह रूप में राहु &amp;nbsp;चंद्रमा और सूर्य पर ग्रहण लगाता है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;राहु का स्वरूप | Rahu&amp;rsquo;s Appearance&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;राहु का भयंकर रूप वाले सिर पर मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर काले रंग के वस्त्रों को धारण किए रहते हैं. यह सिंह के आसन पर विराजमान हाथों में तलवार, ढाल, त्रिशूल और वरमुद्रा लिए होते हैं. राहु और केतु का शरीर एक है और ज्योतिष अनुसार राहु केतु छायाग्रह हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;शान्ति के उपाय | Rahu&amp;rsquo;s Remedies&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;राहु की शांति के लिये मृत्युंजय, जप तथा फिरोजा धारण करना उत्तम होता है. राहु की पीड़ा से बचने के लिए उड़द दाल, तिल तथा सरसों का प्रयोग करना उत्तम होता है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;केतु ग्रह | Ketu Planet&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;अमृत मंथन के समय भगवान विष्णु के सुद्रशन चक्र से कटने पर सिर राहु कहलाया और धड़ केतु कहलाया.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;केतु धुम्र वर्ण के विकृत मुँह वाले हैं यह काले वस्त्र धारण करते हैं. इनके एक हाथ में गदा और दूसरे में वरमुद्रा धारण किये रहते हैं. केतु की महादशा सात वर्ष की होती है केतु के अधिदेवता चित्रकेतु तथा प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;केतु के लिए दान | Donations for Ketu&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;केतु की प्रसन्नता हेतु दान की जानेवाली वस्तुओं में रत्न, तेल, काले तिल, कम्बल, शस्त्र, कस्तूरी इत्यादि आती हैं. &amp;nbsp;केतु की शांति हेतु लहसुनिया रत्न धारण कर सकते हैं. महामृत्यंजय मंत्र का जाप भी कर सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शनि कि साढेसाती पर रिपोर्ट पाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें:&lt;a href="http://astrobix.com/horoscope/saturnsadesati/"&gt;शनि की साढे़साती&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/mi9rQDeEE-PeF0b7FeTjLdLdeFQ/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/mi9rQDeEE-PeF0b7FeTjLdLdeFQ/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/mi9rQDeEE-PeF0b7FeTjLdLdeFQ/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/mi9rQDeEE-PeF0b7FeTjLdLdeFQ/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/7asnJeX8PM4" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/7asnJeX8PM4/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/rahu-ketu-planets.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=371e6081-ac40-4804-8f52-33bc50571cf9</guid>
      <pubDate>Mon, 24 Oct 2011 17:25:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu God </category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=371e6081-ac40-4804-8f52-33bc50571cf9</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=371e6081-ac40-4804-8f52-33bc50571cf9</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/rahu-ketu-planets.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=371e6081-ac40-4804-8f52-33bc50571cf9</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=371e6081-ac40-4804-8f52-33bc50571cf9</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>बृहस्पति ग्रह | Planet Jupiter | Jupiter  Birth Story </title>
      <description>&lt;p&gt;बृहस्पति ग्रह को गुरू भी कहा जाता है बृहस्पति जी देवताओं के गुरु हैं, यह ज्ञान और शिक्षण का प्रतिनिधित्व करते हैं. इनके द्वारा व्यक्ति बौद्धिकता के उच्च स्तर को पाता है. बृहस्पति धनु और मीन राशि के स्वामी हैं इनके देवता इंद्र और ब्रह्मा जी हैं. धर्म शास्त्रों द्वारा बृहस्पति जी के महत्व को बहुत सुंदर रूप में वर्णित किया गया है. यह समस्त देवी-देवताओं के गुरु हैं जो सत्य एवं सदाचार का संदेश देते हैं. देव बृहस्पति बुद्धि और वाक शक्ति के स्वामी कहे गए हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बृहस्पति का स्वरूप | Form of Jupiter&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;बृहस्पति पीले वस्त्रों को धारण किए हुए स्वर्ण के समान आभा देते प्रतीत होते हैं. इन्होंने मस्तक पर स्वर्णमुकुट तथा कंण्ठ में सुंदर माला को धारण किया हुआ है. यह कमल के आसन पर विराजमान हैं तथा अपने हाथों में दंड, रुद्राक्ष माला, पात्र को धारण किए हुए वरमुद्रा में होते हैं. इनका वाहन जो स्वर्णनिर्मित रथ है जिसपर पीले रंग के आठ घोड़े जुते रहते हैं&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;बृहस्पति अपने ज्ञान द्वारा देवताओं को उनका यज्ञ-भाग प्राप्त कराते हैं तथा उनके ज्ञान मार्ग बनते हैं तथा देवों की असुरों से रक्षा करते हैं. देव गुरू बृहस्पति जी ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या कि जिससे प्रसन्न हो भगवान शिव ने उन्हें देवगुरु का प्रदान किया. बृहस्पति जी पत्नियों के नाम शुभा, तारा ओर ममता हैं. बृहस्पति जी को देवमंत्री, देव पुरोहित, देवेज्य, इज्य, गुरु, सुराचार्य, जीव, अंगिरा और वाचस्पति इत्यादि नामों से भी जान जाता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बृहस्पति की शांति के उपाय | Remedies to Calm Jupiter&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;बृहस्पति ग्रह की शांति के लिए अमावस्या तथा बृहस्पतिवार के दिन व्रत करना चाहिए. पीला पुखराज धारण करें.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बृहस्पति के लिए दान |&amp;nbsp;Charity for Jupiter&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;बृह्स्पति के लिए दान में दी जाने वाली वस्तुओं में स्वर्ण, पीले वस्त्र, हल्दी, घृत, पुखराज, चना दाल, नमक, मधु और चीनी इत्यादि का दान देना उत्तम माना गया है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बृहस्पति जन्म कथा | Birth story of Jupiter&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;बृहस्पति जी को महर्षि अंगिरा और सुनीमा का पुत्र कहा गया है. देव गुरू के जन्म के विषय में पौराणिक कथाओं में लिखा गया है. इन कथाओं के अनुसार, महर्षि अंगिरस ने एक बार घोर तप किया इनकी इस कारण इनकी तपस्या का तेज और प्रभाव अग्नि से भी अधिक तीव्र हो जाता है. उस दौरान अग्नि देव भी तपस्या में रत होते हैं और महर्षि का तेज देख कर अपने को हीन समझने लगते हैं तथा दुखी भाव से ऋषि अंगिरा के समक्ष जाते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अग्नि देव ऋषि से कहते हैं कि हे मुनिवर आप प्रथम अग्नि हो गए हैं व आपके तेज के समक्ष मुझे दूसरा स्थान प्राप्त हुआ है. इस कारण मेरे इस रूप में मुझे कोई अग्नि नहीं मानेगा और मेरा सम्मान समाप्त हो जाएगा. अग्नि की करूण वाणी सुन ऋषि उनसे कहते हैं कि हे देव आप इस प्रकार निराश न हों आपका जो स्थान रहा है वही हमेशा रहेगा आपके सम्मान में कोई कमी न आएगी अत: तब महर्षि अंगिरा ने अग्नि देव को देवताओं को हवि पहुँचाने का कार्य प्रदान किया तथा स्वयं पुत्र रूप में अग्नि का वरण करते हैं. इस प्रकार अंगिरस ऋषि को अग्नि रूप में पुत्र बृहस्पति की प्राप्ति होती है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ज्ञान, शील और धर्म के अवतार बृहस्पति जी के संदर्भ में एक अन्य कथा है इसके अनुसार ऋषि अंगिरा की पत्नि को मृतवत्सा होने का दोष मिला होता है जिस कारण उनकी संतानें पैदा होते ही मर जाती थी. तब ब्रह्मा जी ने उन्हें पुंसवन व्रत करने को कहते हैं जिसके द्वारा वह इस दोष से मुक्ति प्राप्त कर सकती थी. सुनीमा ने पुत्र प्राप्ति हेतु सनतकुमारों से व्रत विधि को जाना और उनके द्वारा कहे गए विधि विधान से व्रतों को निष्ठा व आस्था के साथ संपूर्ण किया और भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें पुत्र रूप में बृहस्पति जी की प्राप्ति हुई.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अपना दैनिक राशिफल जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a href="http://astrobix.com/rashifal/?page=48"&gt;Daily Rashifal&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/wxrLCITthkVeIYt31GIQaDODGco/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/wxrLCITthkVeIYt31GIQaDODGco/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/wxrLCITthkVeIYt31GIQaDODGco/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/wxrLCITthkVeIYt31GIQaDODGco/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/Hthgi_YUdZE" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/Hthgi_YUdZE/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/planet-jupiter-jupiter-birth-story.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=84017314-1177-4b3a-bd4f-fe0b8c6bebd6</guid>
      <pubDate>Mon, 24 Oct 2011 12:10:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu God </category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=84017314-1177-4b3a-bd4f-fe0b8c6bebd6</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=84017314-1177-4b3a-bd4f-fe0b8c6bebd6</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/planet-jupiter-jupiter-birth-story.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=84017314-1177-4b3a-bd4f-fe0b8c6bebd6</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=84017314-1177-4b3a-bd4f-fe0b8c6bebd6</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>मंगल ग्रह | The Mars |  Birth Story of Mars | Mangal grah</title>
      <description>&lt;p&gt;ज्योतिष शास्त्र में दिए गए नव ग्रहों में से एक ग्रह मंगल है. मंगल देव उग्र, ओज युक्त तेज से पूर्ण ग्रह है. मंगल देव को संस्कृत में अंगारक भी कहते हैं. मंगल देव लाल रंग लिए हुए हैं इन्हें भौम अर्थात 'भूमि का पुत्र' कहा जाता है. यह युद्ध के देवता हैं और ब्रह्मचारी हैं. मंगल भगवान को पृथ्वी की संतान माना गया है. यह वृश्चिक और मेष राशि के स्वामी हैं. इनकी प्रकृति तमस गुण वाली मानी गई है. अपने में अद्वितीय तेज से मंगल देव सभी को प्रभावित करते से दिखाई देते हैं. मंगल देव ऊर्जावान कार्रवाई, आत्मविश्वास तथा अहंकार का प्रतिनिधित्व करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;मंगल भगवान का स्वरूप |&amp;nbsp;The Form of Mars&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;मंगल भगवान का स्थान नव ग्रहों में आता है यह कुज नाम से भी जाने जाते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार मंगल ग्रह शक्ति, वीरता और साहस के परिचायक है तथा धर्म रक्षक माने जाते हैं. मंगल देव को चार हाथ वाले, त्रिशूल और गदा धारण किए दर्शाया गया है. भगवान मंगल की पूजा से मंगल शांति प्राप्त होती है तथा कर्ज से मुक्ति धन लाभ प्राप्त होता है .मंगल के रत्न रूप में मूंगा धारण किया जाता मंगल देव दक्षिण दिशा के संरक्षक माने जाते हैं. इनका वाहन एक मेढा़ (भेड़ा) है तथा यह मंगल-वार के स्वामी हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;मंगल भगवान जन्म कथा | Birth Story of Mars&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;मत्स्य पुराण तथा स्कंध पुराण आदि में मंगल देव के विषय में विस्तार पूर्वक उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार उज्जैन में ही मंगल भगवान की उत्पत्ति हुई थी. मंगल देव के जन्म की कथा के बारे में पुराणों उल्लेख मिलता है. जिसके अनुसार अंधकासुर नामक एक राक्षस था उसने भगवान शिव की उपासना की तथा वर्षों तक उनकी तपस्या में लीन रहा. भगवान शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं. अंधकासुर भगवान से वरदान मांगता है कि मेरी रक्त बूंदे जहां भी गिरे वहीं पर मैं फिर से जन्म लेता रहूँ.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस पर भगवान उसे यही वरदान प्रदान करते हैं इस वरदान को पाकर दैत्य अंधकासुर चारों ओर तबाही फैला देता है. शिव के वरदान स्वरूप कोई भी उसे हरा नहीँ पाता जिस कारण सभी लोग प्रभु से पार्थना करते हैं की वो उन्हें इस संकट से आन उबारें. तब भगवान शिव अंधकासुर से युद्ध करते हैं इस बीच भयंकर युद्ध होता है दोनों के बीच भीषण युद्ध होता है. भगवान शिव जितनी बार भी अपने त्रिशूल से उसे मारते हैं वह अगले ही पुन: जीवित हो जाता है. उसका रक्त गिरते ही अनेक अंधकासुर उत्पन्न हो जाते हैं. इस लम्बे युद्ध को करते करते भगवान शिव थक जाते हैं और उनके शरीर से पसीने की कुछ बूंदें उज्जैन की भूमि पर गिरती हैं और उन बूँदों के गिरने से पृथ्वी दो भागों में बंट जाती है जिसमें से मंगल देव का जन्म होता है. और इस बीच दैत्य का सारा रक्त मंगल में समा जाता है जिससे उसका अंत होता है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;अन्य कथा | Other Story&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;वाराह कल्प समय जब हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को जबरन अपने पास रख लिया तब पृथ्वी के उद्धार के लिये भगवान विष्णु ने वराहावतार लिया और दैत्य हिरण्याक्ष को मारकर पृथ्वी को मुक्त किया. भगवान को देखकर पृथ्वी देवी अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उनके मन में भगवान को पति रूप में पाने की इच्छा हुई. पृथ्वी की इच्छा पूर्ण करने हेतु भगवान ने देवी पृथ्वी के साथ कुछ समय व्यतीत किया. इस प्रकार पृथ्वी देवी और भगवान के मिलन से मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई. ऐसे विभिन्न कल्पों में मंगल ग्रह की उत्पत्ति की विभिन्न कथाएँ हैं मौजूद हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;मंगल की शांति के उपाय | Remedies for Mars&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;मंगल ग्रह की शांति के लिये भगवान शिव की पूजा करें. मंगलवार का व्रत करें तथा हनुमान चालीसा का पाठ करें. मंगल के लिए दान में ताँबा, सोना, गेहूँ, लाल वस्त्र, गुड़, केसर, लाल चन्दन, लाल पुष्प, मसूर की दाल इत्यादि वस्तुओं को दिया जा सकता है. मंगल की महादशा सात वर्षों तक रहती है. यह मेष तथा वृश्चिक राशि के स्वामी हैं और इनका रत्न मूँगा है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शनि कि साढेसाती पर रिपोर्ट पाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a href="http://astrobix.com/horoscope/saturnsadesati/"&gt;शनि की साढे़साती&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Q-lWrzJAhwcz28woxIe2acV25mQ/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Q-lWrzJAhwcz28woxIe2acV25mQ/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Q-lWrzJAhwcz28woxIe2acV25mQ/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Q-lWrzJAhwcz28woxIe2acV25mQ/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/4Vya8TfrNP8" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/4Vya8TfrNP8/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/mars-birth-story-mars-mangal-grah.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=6d24cb78-2a0b-4501-9a79-2a3e839af11b</guid>
      <pubDate>Sat, 22 Oct 2011 18:00:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu God </category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=6d24cb78-2a0b-4501-9a79-2a3e839af11b</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=6d24cb78-2a0b-4501-9a79-2a3e839af11b</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/mars-birth-story-mars-mangal-grah.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=6d24cb78-2a0b-4501-9a79-2a3e839af11b</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=6d24cb78-2a0b-4501-9a79-2a3e839af11b</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>शनि ग्रह | The Saturn I Saturn Birth Story | Shani Dev</title>
      <description>&lt;p&gt;शनि हिन्दू ज्योतिष में नौ मुख्य ग्रहों में से एक हैं. शनि शनिवार के स्वामी हैं. शनि अन्य ग्रहों की तुलना मे धीमे चलते हैं इसलिए इन्हें शनैश्च भी कहा जाता है. शनि, सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया के एक पुत्र हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार शनि के जन्म के पश्चात जब शनि ने सूर्य को देखा तो सूर्य को कोढ़ हो जाता है या कहें कि सूरज ग्रहण में चले गए थे अत: शनि का अपने पिता सूर्य से वैर माना गया है और ज्योतिष पर शनि के प्रभाव का साफ़ संकेत मिलता है. शनि ग्रह वायु तत्व और पश्चिम दिशा के स्वामी हैं. बुध और शुक्र इनके मित्र ग्रह हैं. तुला राशि में यह उच्च तथा मेष राशि में नीच के होते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;शनि का स्वरूप | The Form of Saturn&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;शनि देव को काला या कृष्ण वर्ण का बताया जाता है इन्हें काला रंग अधिक प्रिय है. शनि देव काले वस्त्रों में सिर पर स्वर्ण मुकुट गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्रों से सुशोभित हैं. एक हाथ में &amp;nbsp;तलवार, तीर और दो खंजर लिए हुए लोहे के रथ को खिंचते गिद्ध पर सवार होते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिदेव का जन्म ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि के दिन हुआ है. जन्म के समय से ही शनि देव श्याम वर्ण, लंबे शरीर, बड़ी आंखों वाले और बड़े केशों वाले थे. यह न्याय के देवता हैं, &amp;nbsp;योगी, तपस्या में लीन और हमेशा दूसरों की सहायता करने वाले होते हैं शनि ग्रह को न्याय का देवता कहा जाता है यह जीवों सभी कर्मों का फल प्रदान करते हैं. इन्हें भृत्य भी कहा गया है. शनि देव महापराक्रमी &amp;nbsp;न्यायाधीश हैं इनके प्रभाव से कोई अछूता नहीं रहता यह किसी के साथ अन्याय नहीं करते. स्वभाव से उग्र और हठी &amp;nbsp;हैं अपने पिता सूर्य से इनके संबंध कभी भी ठीक नहीं रहे.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;शनि जन्म कथा | Birth Story of Saturn&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;सूर्य का रूप परम तेजस्वी है इन्हीं से सभी प्रकाशमान हैं. सूर्य देव का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्री संज्ञा से हुआ कुछ समय पश्चात उन्हें तीन संतानो के रूप में मनु, यम और यमुना की प्राप्ति हुई. इस प्रकार कुछ समय तो संज्ञा ने सूर्य के साथ निर्वाह किया परंतु संज्ञा सूर्य के तेज को अधिक समय तक सहन नहीं कर पाईं उनके लिए सूर्य का तेज सहन कर पाना मुश्किल होता जा रहा था . इसी वजह से संज्ञा ने अपनी छाया को पति सूर्य की सेवा में छोड़ कर वहां से चली चली गईं. कुछ समय बाद छाया के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;शनि के रत्न और उपरत्न | Gemstones of the Planet Saturn&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;शनि के रत्न और उपरत्नों में नीलम,नीली ,नीलमणि, जामुनिया, नीला कटेला इत्यादि आते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;शनि सम्बन्धी दान पुण्य | Donations for the Saturn&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;शनि के लिए दान में दी जाने वाली वस्तुओं में व्यक्ति को अपने वजन के बराबर काले चनों को दान में देना चाहिए इसके अतिरिक्त काले कपडे, जामुन, काली उडद, काले जूते, तिल, लोहा, तेल, नीलम ,कुलथी,काले फ़ूल,कस्तूरी सोना आदि वस्तुओं को शनि के निमित्त दान में दे सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;शनि शांति उपाय | Remidies for Saturn&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;शनि की कृपा एवं शांति प्राप्ति हेतु तिल , उड़द, कालीमिर्च, मूंगफली का तेल, आचार, लौंग, तेजपत्ता तथा काले नमक का उपयोग करना चाहिए, शनि देव को प्रसन्न करने के लिए हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शनि कि साढेसाती पर रिपोर्ट पाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a href="http://astrobix.com/horoscope/saturnsadesati/"&gt;शनि की साढे़साती&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/oLLNiAI1Rf9-Qm2mFAkqvZ_BXqk/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/oLLNiAI1Rf9-Qm2mFAkqvZ_BXqk/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/oLLNiAI1Rf9-Qm2mFAkqvZ_BXqk/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/oLLNiAI1Rf9-Qm2mFAkqvZ_BXqk/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/22eJzfEXre4" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/22eJzfEXre4/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/saturn-saturn-birth-story-shani-dev.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=54dddc1e-39f0-4bdf-a006-d74d04677e1a</guid>
      <pubDate>Sat, 22 Oct 2011 17:10:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu God </category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=54dddc1e-39f0-4bdf-a006-d74d04677e1a</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=54dddc1e-39f0-4bdf-a006-d74d04677e1a</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/saturn-saturn-birth-story-shani-dev.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=54dddc1e-39f0-4bdf-a006-d74d04677e1a</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=54dddc1e-39f0-4bdf-a006-d74d04677e1a</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>बुध ग्रह | The Mercury |  Mercury Birth Story </title>
      <description>&lt;p&gt;बुध ग्रह चन्द्र और तारा के पुत्र हैं. यह रजो गुण वाले हैं और वाणी का प्रतिनिधित्व करते हैं. बुध शांत एवं सौम्य प्रवृत्ति के ग्रह हैं. बुध ग्रह के अधिदेवता एवं प्रत्यधिदेवता भगवान विष्णु हैं यह मिथुन तथा कन्या राशि के स्वामी हैं. बुध की महादशा 17 वर्ष की होती है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बुध के जन्&amp;zwj;म की कहानी | The Mercury Birth Story&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;एक समय देवताओं के गुरू बृहस्&amp;zwj;पति जी स्त्री का रूप धारण करने की इच्छा लिए ब्रह्मा जी के पास जाते हैं और उनसे जिद्द करते हैं कि वह उन्हें स्त्री का रूप प्रदान करें उनके हठ के समक्ष ब्रह्मा जी उन्हें स्त्री का रूप दे देते हैं. ब्रहस्पति स्त्री &amp;nbsp;के रूप में विचरण कर रहे होते हैं तभी उनपर चंद्रमा की दृष्टि पड़ती है और चंद्रमा स्त्री रूपी गुरू का शील भंग कर देते हैं. इस घटना से व्यथित गुरू ब्रह्मा जी के समक्ष जाते हैं. परंतु ब्रह्मा जी उनसे कहते हैं कि अब उन्हें नौ माह तक स्त्री के ही रूप में रहना पड़ेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस प्रकार समय व्यतीत होता है और नौ महीने पश्चात बुध का जन्म होता है. बालक के जन्म के उपरांत बृहस्पति स्त्री रूप का त्याग कर देते हैं. ऐसे में प्रकृति बुध को अपनाती है. बुध के साथ राहु और शनि जैसे मित्र जुड गए लेकिन बाद में बुध, शुक्र से ज्ञान पाकर सूर्य की शरण में जाते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;बुध के जन्म के विषय में एक अन्य पौराणिक कथा प्रचलित रही है जिसके अनुसार चंद्रमा देवताओं के गुरु बृहस्पति के शिष्य थे. विद्या अध्ययन की समाप्ति पर जब चंद्रमा ने गुरु को दक्षिणा देने चाही तो बृहस्पति उनसे कहते हैं कि इस दक्षिणा को वह उनकी पत्नी तारा को दें.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस पर चन्द्रम गुरु पत्नी को दक्षिणा देने जाते हैं किंतु गुरु पत्नी तारा का सौंदर्य देख उनपर मोहित हो जाते हैं और उसे जबरन अपने साथ ले जाने लगते हैं. तारा चंद्र को समझाने का प्रयास करती हैं किंतु वह नहीं मानते.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;तथा अपना दुराग्रह नही छोडते इस पर गुरू बृहस्पति और देवता सभी उन्हें समझाने का प्रयास करते हैं परंतु चंद्रमा के न मानने पर उनके मध्य युद्ध होता है इस युद्ध में गुरू की हार होती है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;जब भगवान शिव को चन्द्रमा के इस नीच कृत का पता चलता है तो वह क्रोधित हो उसे दंड देने के लिये चल पड़ते हैं चन्द्रमा दैत्यों असुरों, शनि और मंगल के सहयोग से भगवान शिव से युद्ध करते हैं इस युद्ध से चारों ओर विध्वंस मच जाता है. तब भगवान ब्रह्मा जी के हस्तक्षेप से चन्द्रमा गुरु पत्नी तारा को लौटा देते हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;एक वर्ष पश्चात तारा एक तेजस्वी पुत्र को जन्म देती हैं. उस बालक के पिता चन्द्रमा होते हैं. चन्द्रमा ने उस पुत्र को ग्रहण किया और उसका नाम बुध हुआ.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बुध ग्रह के लिये दान | Donations For The Mercury&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;बुध के लिए दान की जाने वाली वस्तुओं में मूँगा, पन्ना, स्वर्ण, कपूर, मूंग दाल, चीनी तथा घी का दान करना चाहिये.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बुध ग्रह के रत्न उपरत्न | Gemstones of The Planet Mercury&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;बुध ग्रह के रत्नों में पन्ना और सुलेमानी होते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बुध की शांति के उपाय | Remedies for Mercury&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;बुध ग्रह की शांति के लिये अमावस्या का व्रत करें. पन्ना रत्न को धारण करना चाहिये.बुध को इलायची तथा चंपा की सुगंध प्रिय होती है. चंपा का इत्र और तेल का प्रयोग बुध की दृष्टि से उत्तम है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बुध&amp;nbsp; का स्वरूप | The Form of Mercury&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;बुध भगवान पीला वस्त्र धारण किए सिर पर सोने का मुकुट तथा गले में सुन्दर पुष्प माला पहने हुए कांति युक्त दिखाई देते हैं. हाथों &amp;nbsp;में तलवार, ढाल, गदा और वरमुद्रा धारण किये हैं. बुध देव का वाहन सिंह है यह श्वेत रथ और प्रकाश से दीप्त हैं. नवग्रह में इनकी पूजा ईशानकोण में की जाती है इनका प्रतीक वाण है तथा रंग हरा है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शनि कि साढेसाती पर रिपोर्ट पाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें:&lt;a href="http://astrobix.com/horoscope/saturnsadesati/"&gt;शनि की साढे़साती&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/rxhUz4k3PA7hW58ZLEWx9_7yy0A/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/rxhUz4k3PA7hW58ZLEWx9_7yy0A/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/rxhUz4k3PA7hW58ZLEWx9_7yy0A/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/rxhUz4k3PA7hW58ZLEWx9_7yy0A/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/ZpbjGu4rUq0" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/ZpbjGu4rUq0/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/mercury-mercury-birth-story.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=ca2c720d-8b7f-48ae-8922-40c24a8068b8</guid>
      <pubDate>Fri, 21 Oct 2011 17:10:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu God </category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=ca2c720d-8b7f-48ae-8922-40c24a8068b8</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=ca2c720d-8b7f-48ae-8922-40c24a8068b8</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/mercury-mercury-birth-story.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=ca2c720d-8b7f-48ae-8922-40c24a8068b8</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=ca2c720d-8b7f-48ae-8922-40c24a8068b8</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>चंद्र ग्रह | The Moon | Moon Story | Som Deva</title>
      <description>&lt;p&gt;चन्द्र देव को सोम देव भी कहा जाता है. नवग्रहों में इन्हें दूसरा स्थान प्राप्त है यह नक्षत्रों के स्वामी कहे जाते हैं. चंद्रमा कर्क राशि के स्वामी हैं. &amp;nbsp;इन्हें नक्षत्रों का भी स्वामी माना गया है. इनके अधिदेवता भगवान शिव तथा देवी उमा हैं. चन्द्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की &amp;nbsp;सत्ताईस कन्याओं से हुआ था और यही सत्ताईस कन्याएं नक्षत्रों के रूप में भी जानी जाती हैं तथा नक्षत्रों के भोग से एक चन्द्र मास पूर्ण होता है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;चंद्र देव जन्म कथा |&amp;nbsp;&lt;span style="font-family: Arial; white-space: pre-wrap;"&gt;Lord Moon Birth Story&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;चंद्र देव के विषय में अनेकों तथ्य उपलब्ध होते हैं जिनके अनुसार भगवान चंद्रमा का स्वरूप का बोध हो पाता है. वेद- पुराणों में चंद्र देव को महत्वपूर्ण रूप प्राप्त है. इनकी उत्पत्ति के बारे में बताया गया है कि जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि कि रचना हेतु अपने मानस पुत्रों की रचना की तब इन मानस पुत्रों में से एक पुत्र ऋषि अत्रि हुए जिन्हें सृष्टि के विस्तार का कार्य सौंपा गया. &amp;nbsp;ऋषि अत्रि का विवाह ऋषि कर्दम की पुत्री अनुसुइया से हुआ जिनसे से दुर्वासा ,दत्तात्रेय व सोम तीन पुत्र हुए थे और सोम चन्द्र का ही एक नाम कहा गया है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;पद्म पुराण के अनुसार महर्षि अत्रि ने अनुत्तर नामक कठिन तप किया और इसी कठोर तप को करते हुए एक दिन ऋर्षि अत्रि के नेत्रों से जल की कुछ बूंदे गिर पड़ी जिन्हें दिशाओं ने स्त्री रूप में पुत्र प्राप्ति की कामना हेतु ग्रहण कर लिया. किंतु दिशाएं उस तेजयुक्त-प्रकाशमान गर्भ को सहन न कर सकीं इस कारण वह उसे त्याग देती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;तब भगवान ब्रह्मा जी उस गर्भ को पुरुष का रूप प्रदान करते हैं जो चंद्र देव के नाम से जाने गए. ब्रह्मा जी ने चंद्रमा को नक्षत्र,वनस्पतियों ,ब्राह्मण व तप का स्वामी बनाया. देवताओं और ऋषियों इत्यादि सभी ने चंद्र देव की स्तुति की उन्हें पूजनीय स्थान प्राप्त हुआ.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;एक अन्य पौराणिक कथा अनुसार जब देवों और दैत्यों ने मिलकर क्षीर सागर का मंथन किया तो उसमें से चौदह रत्न निकले थे. चंद्रमा इन्हीं चौदह रत्नों में से एक माने गए. भगवान शिव ने चंद्र को अपने मस्तक पर धारण किया.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;चन्द्रमा कथा | Moon Story&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;दक्ष प्रजापति की सत्ताईस कन्याएँ थीं, जिनका विवाह चंद्रमा के साथ हुआ था. इन सभी में से रोहिणी ही चंद्रमा को अत्यधिक प्रिय थी. रोहिणी के प्रति ही चंद्रमा का प्रेम देख अन्य पत्नियाँ बहुत दुखी होती थी. अत: उन्होंने अपनी यह व्यथा पिता दक्ष से कही. दक्ष प्रजापति ने चंद्रदेव को अनेक प्रकार से समझाया लेकिन रोहिणी के प्रति उनका अनुराग कम न हो सका अंततः दक्ष ने कुद्ध होकर चंद्रमा को क्षयग्रस्त हो जाने का शाप दे दिया. शाप के प्रभाव स्वरूप चंद्रमा क्षयग्रस्त हो गए उनके क्षयग्रस्त होते ही पृथ्वी की समस्त वनस्पतियां भी क्षीण हो गईं. चारों ओर हाहाकार मच गया.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;चंन्द्रमा ने दक्ष से क्षमायाचना कि और मृत्युंजय भगवान&amp;zwnj; शिव की आराधना की और उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वर प्रदान किया और कहा कि कृष्णपक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी, तथा शुक्ल पक्ष में तुम्हारी एक-एक कला बढा़ करेगी और पूर्णिमा को तुम्हें पूर्ण चंद्रत्व प्राप्त होता रहेगा. इस प्रकार चंद्रमा का उद्धार हुआ तथा उनके क्षय की अवधि पाक्षिक हो गई.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;चंद्रमा का स्वरूप |&lt;span style="font-family: Arial; white-space: pre-wrap;"&gt;Lord Moon&amp;rsquo;s Appearance&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;भगवान चंद्र &amp;nbsp;गौर वर्ण के हैं तथा सोलह कलाओं से पूर्ण हैं. &amp;nbsp;सोम के रूप में यह सोमवार के स्वामी हैं. इनके वस्त्र, अश्व और रथ श्वेत हैं. चंद्र देव मस्तक पर स्वर्णमुकुट तथा गले में मोतियों की माला धारण किए हुए कमल के आसन पर विराजमान हैं. एक हाथ में गदा है और दूसरे हाथ से वरमुद्रा में स्थित हैं. यह अपने दस घोड़ों और तीन पहियों वाले वाले वाहन रथ पर आरूढ़ हैं. ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को शीतलता का कारक. मन नक्षत्रों, औषधियों, रसीले पदार्थों एवं जल का स्वामी कहा गया है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;चंद्रमा के लिए दान | Donations for Moon&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;चंद्रमा के लिए चावल, दूध, दही, मिश्री जैसे श्वेत खाद्य पदार्थ, चांदी, मोती, श्वेत वस्त्र और चंदन इत्यादी वस्तुएं दान की जाती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;चंद्र ग्रह के रत्न उपरत्न | Gemstones Related with Moon&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;चंद्रमा ग्रह के रत्नों में मोती तथा मूनस्टोन आते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;चंद्रमा की शांति के उपाय |&amp;nbsp;Remedies for Moon&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;चंद्र ग्रह की शांति के लिये भगवान शिव की पूजा करें. सोमवार के दिन शिवलिंग पर जलाभिषेक करें. चंद्रमा की अनुकूलता के लिए दूध और दूध से बने पदार्थों चीनी तथा श्वेत वस्तुओं का दान करें. इसके अतिरिक्त सोमवार का व्रत करें तथा मोती रत्न को धारण करें.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शनि कि साढेसाती पर रिपोर्ट पाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें&amp;nbsp; :&lt;a href="http://astrobix.com/horoscope/saturnsadesati/"&gt;शनि की साढे़साती&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/o0MgvvOrKFsYJCvEVXkm9HswH68/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/o0MgvvOrKFsYJCvEVXkm9HswH68/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/o0MgvvOrKFsYJCvEVXkm9HswH68/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/o0MgvvOrKFsYJCvEVXkm9HswH68/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/k3BwMQ-l9mg" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/k3BwMQ-l9mg/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/the-moon-moon-story-som-deva.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=4f1990ff-9bfa-4855-8ce1-5817b0e39681</guid>
      <pubDate>Fri, 21 Oct 2011 16:30:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu God </category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=4f1990ff-9bfa-4855-8ce1-5817b0e39681</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=4f1990ff-9bfa-4855-8ce1-5817b0e39681</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/the-moon-moon-story-som-deva.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=4f1990ff-9bfa-4855-8ce1-5817b0e39681</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=4f1990ff-9bfa-4855-8ce1-5817b0e39681</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>सूर्य देव | Surya Dev  | Birth Story of Sun | The Form of Sun</title>
      <description>&lt;p&gt;
&lt;p&gt;सूर्य देव नव ग्रहों में प्रमुख स्थान रखते हैं. यह सभी के नायक रूप में सौर देवता हैं. बारह आदित्यों में से एक अर्थात सूर्य देव अदिति के बारह पुत्रों (आदित्यों) में एक हैं, कश्यप और उनकी पत्नियों में से एक पत्नि अदिति के पुत्र हैं. धर्म ग्रंथों में सूर्य देव को विश्व के प्राण कहा गया है . इन्हीं के द्वारा संपूर्ण ब्रह्माण प्रकाशमान है इन्हीं से शक्ति पाकर पृथ्वी में जीवन का संचार संभव हो पाया है. वेदों ने सूर्य की महिमा का गुणगान किया है. ऋग्वेद तथा यजुर्वेद ने "चक्षो सूर्यो जायत" कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;सूर्य जन्म कथा | Birth Story of Sun&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;पौराणिक आख्यानों में भगवान सूर्य के बारे में विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है. सूर्य देव की उत्पत्ति के विषय में एक कथा प्रचलित है जिसमें इन्हें महर्षि कश्यप और अदिति का पुत्र कहा गया है अदिति के पुत्र होने के कारण ही इन्हें आदित्य भी कहा जाता है. कथा इस प्रकार है एक समय दैत्यों का प्रभुत्व खूब बढ़ने लगत है. दैत्य की शक्ति के आगे देवता परास्त हो जाते हैं और स्वर्ग पर राक्षसों का साम्राज्य स्थापित हो जाता है. इस विपत्ति में सभी निराशभाव से भटकने लगते हैं. देवों के यह दुर्दशा देखकर देव-माता अदिति भगवान सूर्य की उपासना करती हैं. आदिति की तपस्या से प्रसन्न हो भगवान सूर्य उन्हें दर्शन देते हैं और उन्हें वरदान देते हैं कि वह उनकी इच्छा को पूर्ण करने के लिए अपने हज़ारवें अंश से उनके पुत्र रूप में जन्म लेंगे तथा उनके देव पुत्रों की रक्षा करेंगे,.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस प्रकार भगवान के कथन अनुसार कुछ समय के उपरान्त देवी अदिति गर्भवती होती हैं.संतान की मंगल-कामना के लिए देवी अदिति अनेक प्रकार के व्रत व पूजा पाठ करती हैं. उनके इस कार्य को देखकर महर्षि कश्यप चिंतित हो जाते हैं तथा उनसे कहते हैं कि हे अदिति तुम गर्भवती हो, तुम्हें अपना ध्यान रखना चाहिए किंतु परन्तु तुम व्रत-उपवास के द्वारा अपने शरीर को कष्ट दे रही हो तुम्हारे ऎसा करने से तुम्हारा गर्भ नष्ट हो सकता है. स्वामी की बात को सुन अदिति उनसे कहती हैं कि स्वामी आप चिन्ता न करें. मेरा गर्भ दिव्य सूर्य शक्ति का तेज है यह सदा अविनाशी है और उसे कुछ नहीम होगा.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;निशचित समय तथा शुभ घडी़ में देवी अदिति के गर्भ से भगवान सूर्य का जन्म होता है. वह देवताओं के नायक बनते हैं और असुरों को परास्त कर देवों का प्रभुत्व कायम करते हैं. भगवान सूर्य के विषय में सूर्योपनिषद, भविष्य पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्म पुराण, मार्कण्डेय पुराण तथा साम्बपुराण इत्यादि ग्रंथ वर्णित हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;सूर्य ग्रह के लिये दान | Donations For The Sun&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;सूर्य ग्रह के दुष्प्रभाव से मुक्त होने के लिये अनेक वस्तुओं को दान में दिया जाता है जैसे गेंहूं, लाल और पीले रंग के वस्त्र , लाल मिठाई, स्वर्ण, गुड और तांबा धातु इत्यादि वस्तुएं दान में दि जा सकती हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;सूर्य ग्रह के रत्न उपरत्न | Gemstones of The Planet Sun&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;सूर्य ग्रह के रत्नों मे माणिक और उपरत्नो में लालडी, तामडा हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;सूर्य का स्वरूप | The Form of Sun&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;सूर्य भगवान के केश एवं हस्त स्वर्ण के हैं. उनके रथ को सात घोड़े खींचते हैं, जो सात चक्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह रवि रूप में "रविवार" के स्वामी हैं. सूर्य राज्य सुख, सत्ता, ऐश्वर्य ,वैभव जैसे गुण प्रदान करता है. सूर्य सौरमंडल का प्रथम ग्रह है, यही सम्पूर्ण सौर जगत का आधार स्तम्भ है इन्हीं से शक्ति प्राप्त करके ग्रह,उपग्रह,नक्षत्र आदि इनके चारों ओर विचरण करते हैं. सूर्य सिंह राशि का स्वामी है. ज्योतिष में सूर्य देव को मस्तिष्क का अधिपति कहा गया है. सूर्य की दो पत्नियाँ संज्ञा और छाया हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;span style="color: #6b6b6b; font-family: Arial, Tohama, Helvetica, sans-serif; font-size: 14px; line-height: 18px;"&gt;&lt;span style="color: #000000;"&gt;शनि कि साढेसाती पर रिपोर्ट पाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें &lt;/span&gt;:&lt;a href="http://astrobix.com/horoscope/saturnsadesati/"&gt;शनि की साढे़साती&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/5il73NOq7jonLeJ7BDj_ZtiXcyc/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/5il73NOq7jonLeJ7BDj_ZtiXcyc/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/5il73NOq7jonLeJ7BDj_ZtiXcyc/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/5il73NOq7jonLeJ7BDj_ZtiXcyc/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/9Uytgde1FLk" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/9Uytgde1FLk/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/surya-dev-birth-story-sun-form-Sun.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=268b5b7e-16ee-42cd-854d-cbb6bec3ddb2</guid>
      <pubDate>Mon, 17 Oct 2011 12:30:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu God </category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=268b5b7e-16ee-42cd-854d-cbb6bec3ddb2</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=268b5b7e-16ee-42cd-854d-cbb6bec3ddb2</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/surya-dev-birth-story-sun-form-Sun.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=268b5b7e-16ee-42cd-854d-cbb6bec3ddb2</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=268b5b7e-16ee-42cd-854d-cbb6bec3ddb2</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title> भीष्म पंचक | Bhishma Panchaka | Punch Bhiku</title>
      <description>&lt;p&gt;भीष्म पंचक को पंच भीखू के नाम से भी जाना जाता है. कार्तिक माह में भीष्म पंचक व्रत का विशेष महत्व है. यह व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी से आरंभ होता है तथा पूर्णिमा तक चलता है. इस बार 6 नवंबर से भीष्म पंचक व्रत का आरंभ होगा और दस नवंबर पूर्णिमा तक यह व्रत रहेगा. कार्तिक स्नान का बहुत महत्व होता है. अत: कार्तिक सनान करने वाले सभी लोग इस व्रत को करते हैं. भीष्म पितामह जी ने भी इस व्रत को किया था इसलिए यह भीष्म पंचक नाम से प्रसिद्ध हुआ&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;भीष्म पंचक व्रत कथा | Bhishma Panchak Vrat Katha&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;महाभारत युद्ध के बाद जब पांण्डवों की जीत हो गयी तब श्री कृष्ण भगवान पांण्डवों को भीष्म पितामह के पास ले गये और उनसे अनुरोध किया कि वह पांण्डवों को ज्ञान प्रदान करें. शर सैय्या पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतिक्षा कर रहे भीष्म ने &amp;nbsp;कृष्ण के अनुरोध पर कृष्ण सहित पाण्डवों को &amp;nbsp;राज धर्म, वर्ण धर्म एवं मोक्ष धर्म का ज्ञान दिया. भीष्म द्वारा ज्ञान देने का क्रम एकादशी से लेकर पूर्णिमा तिथि यानि पांच दिनों तक चलता रहा. भीष्म ने जब पूरा ज्ञान दे दिया तब श्री कृष्ण ने कहा कि आपने जो पांच दिनों में ज्ञान दिया है यह पांच दिन आज से अति मंगलकारी हो गया है. इन पांच दिनों को भविष्य में भीष्म पंचक व्रत के नाम से जाना जाएगा.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;भीष्म पंचक व्रत पूजा विधि | Bhishma Panchak Vrat Pooja Vidhi&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;भीष्म पंचम व्रत में चार द्वार वाला एक मण्डप बनाया जाता है. मंडप को गाय को गोबर से लीप कर मध्य में एक वेदी का निर्माण किया जाता है. वेदी पर तिल रखकर कलश स्थापित किया जाता है. इसके बाद भगवान वासुदेव की पूजा की जाती है. इस व्रत में कार्तिक शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तिथि तक घी के दीपक जलाए जाते हैं. भीष्म पंचक व्रत करने वाले को पांच दिनों तक संयम एवं सात्विकता का पालन करते हुए यज्ञादि कर्म करना चाहिए. &amp;nbsp;इस व्रत में गंगा पुत्र भीष्म की तृप्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण का भी विधान है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;पंच भीखू कथा | Punch Bhiku Story&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;पंच भीखू व्रत में एक कथा का भी उल्लेख आता है. इस कथा के अनुसार एक नगर में एक साहूकार था. इस साहूकार की पुत्रवधु बहुत ही संस्कारी थी. वह कार्तिक माह में बहुत ही पूजा-पाठ किया करती थी. कार्तिक माह में वह ब्रह्म मुहुर्त में ही गंगा स्नान के लिए जाती थी. जिस नगर में वह रहती थी, उस नगर के राजा का बेटा भी गंगा स्नान के लिए जाता था. उसके अंदर बहुत अहंकार भरा था. वह कहता कि कोई भी व्यक्ति उससे पहले गंगा स्नान नहीं कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;जब कार्तिक स्नान के पांच दिन रहते हैं तब साहूकार की पुत्रवधु स्नान के लिए जाती है. वह जल्दबाजी में हार भूल जाती है और वह हार राजा के लड़के को मिलता है. हार देखकर वह उस स्त्री को पाना चाहता है. इसके विषय में यह कहा गया है कि वह तोता रखता ताकि वह उसे बता सके कि साहूकार की पुत्रवधू आई है. लेकिन साहूकार की पुत्रवधु भगवान से अपने पतिव्रता धर्म की रक्षा करने की प्रार्थना करती है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;भगवान उसकी रक्षा करते हैं और रोज रात में साहूकार के बेटे को नींद आ जाती है. जब सुबह तोते से पूछता है तब वह कहता है कि वह स्नान करने आई थी. पांच दिन स्नान करने बाद वह तोते से कहती है कि मैं पांच दिन तक स्नान कर चुकी हूं तुम अपने स्वामी से मेरा हार लौटाने को कह देना. राजा के पुत्र को समझ आया कि वह कितनी श्रद्धालु है. कुछ समय बाद उसे कोढ़ हो जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;राजा को जब कोढ़ होने का कारण पता चलता हे तब वह इसके निवारण का उपाय ब्राह्मणों से पूछता है. &amp;nbsp;ब्राह्मण कहते हैं कि यह साहूकार की पुत्रवधु को अपनी बहन बनाए और उसके नहाए हुए पानी से स्नान करे तब यह ठीक हो सकता है. राजा की प्रार्थना को साहूकार की पुत्रवधु स्वीकार कर लेती है और राजा का पुत्र ठीक हो जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;पंच भीखू व्रत महत्व | Importance of Punch Bhiku Vrat&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;यह व्रत अति मंगलकारी और पुण्यदायी होता है. जो श्रद्धापूर्वक इस व्रत को रखेंगे उन्हें मृत्य पश्चात उत्तम गति प्राप्त होगी. यह व्रत पूर्व संचित पाप कर्मों से मुक्ति प्रदान करने वाला और कल्याणकारीहोता है. जो भी यह व्रत रखता है वह सदैव स्वस्थ रहता है तथा उसे प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. स्वयं भीष्म पितामह जी ने भी इस व्रत को किया था&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शनि कि साढेसाती पर रिपोर्ट पाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a href="http://astrobix.com/horoscope/saturnsadesati/"&gt;शनि की साढे़साती&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/_NFAYQF1fEZ6z9bCeeBT73q23Ag/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/_NFAYQF1fEZ6z9bCeeBT73q23Ag/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/_NFAYQF1fEZ6z9bCeeBT73q23Ag/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/_NFAYQF1fEZ6z9bCeeBT73q23Ag/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/JtnX6llInNg" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/JtnX6llInNg/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/bhishma-panchaka-punch-bhiku.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=6f6c358a-6395-4e9a-ad0b-9006fb5ebed0</guid>
      <pubDate>Sun, 09 Oct 2011 11:30:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu Ritual</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=6f6c358a-6395-4e9a-ad0b-9006fb5ebed0</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=6f6c358a-6395-4e9a-ad0b-9006fb5ebed0</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/bhishma-panchaka-punch-bhiku.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=6f6c358a-6395-4e9a-ad0b-9006fb5ebed0</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=6f6c358a-6395-4e9a-ad0b-9006fb5ebed0</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>गुरू नानक जयंती |  Guru Nanak Jayanti | Guru Nanak Birthday | Biography of Guru Nanak</title>
      <description>&lt;p&gt;गुरू नानक देव जी के जन्म दिवस को गुरू नानक जयंती के रूप में मनाया जाता है. गुरू नानक देव सिखों के प्रथम गुरू थे. इनका जन्म 15 अप्रैल 1469 ई. में तलवंडी रायभोय (ननकाना साहब) नामक स्थान पर हुआ था. &amp;nbsp;इनके जन्म दिवस को प्रकाश उत्सव (प्रकाशोत्सव ) भी कहते हैं, जो कार्तिक पूर्णिमा के शुभ दिन मनाया जाता है. कार्तिक पूर्णिमा को सिख श्रद्धालु गुरु नानक जी के प्रकटोत्सव के रूप में धूम-धाम से मनाते हैं. गुरु नानकदेव एक समन्वयवादी संत थे. गुरु ग्रंथ साहब में सभी संतों एवं धर्मो की उक्तियों को सम्मिलित कर उन्होंने &amp;nbsp;समन्वयवादी दृष्टिकोण का परिचय दिया. वह आजीवन परोपकार एवं दीन-दुखियों की सेवा में लगे रहे.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;जीवन परिचय | Biography&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;गुरु नानकदेवजी का प्रकाश ऐसे समय में हुआ था जब देश इतिहास के सबसे अँधेरे युगों में था. उस समय अंधविश्वास एवं आडंबरों का बोलबाला था और धार्मिक कट्टरता तेजी से बढ़ रही थी. श्री गुरु नानकदेव संत, कवि और महान समाज सुधारक थे. नानक देवजी के पिता बाबा कालूचंद्र बेदी और माता तृप्ता जी थी. बचपन से ही नानक जी का मन आध्यात्मिक भावों से जुडा़ रहता था. पंडित और मौलवी सभी नानकदेवजी की विद्वता से प्रभावित हुए बिना न रह सके. पत्नी सुखमणि (सुलक्षणा) से उन्हे दो पुत्र भी हुए थे, परंतु उनका मन गृहस्थी में कभी नहीं लगा और वह मानव सेवा में लगे रहे.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ईश्वर एक है. सदैव उसकी उपासना करो, वह सब जगह और सभी में मौजूद है, उस ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं होता, मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके जरूरतमंद को भी कुछ दो, सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं,&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है, जैसी शिक्षाओं को उन्होंने सभी के मध्य पहुँचाने का प्रयास किया. जीवनभर धार्मिक यात्राओं के माध्यम से लोगों को मानवता का उपदेश देते रहे और 70 वर्ष की साधना के पश्चात सन्&amp;zwnj; 1539 ई. में परम ज्योति में विलीन हो गए.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;गुरू नानक जी के विचार सिद्धांत | Consider the Principle of Guru Nanak&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;गुरूनानक देव जी के उपदेश एवं शिक्षाएं आज भी उनके अनु&amp;zwj;यायियों के लिए जीवन का आधार हैं. उनके दिए गए सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं. उन्होंने लोगों को समझाया कि सभी इंसान एक दूसरे के भाई हैं. ईश्वर सभी का है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे एक नूर तेसब जग उपज्या, कौन भले को मंदे. &amp;nbsp;एक पिता की संतान होने के बावजूद हम ऊंचे-नीचे कैसे हो सकते है. पाँच सौ वर्षों पूर्व दिए उनके उपदेशों का प्रकाश आज भी मानवता को आलोकित कर रहा है. नानक देव जी सिख धर्म के संस्थापक रहे, मानव धर्म के उत्थापक तथा सिखों के आदि गुरु थे. नानकदेव जी ने अपनी शिक्षा से लोगों में एकता और प्रेम को बढ़ावा दिया.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;गुरू नानक जयंती महत्व | Importance of Guru Nanak Jayanti&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;गुरु नानक जयंती बहुत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है. गुरु पर्व के अवसर पर &amp;nbsp;सभी तरफ महोत्सव जैसा माहौल बना रहता है. गुरुद्वारों में विशेष आयोजन होता है, पूजा-अर्चना की जाती है. जलूस एवं शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं. इस जुलूस में हाथी, घोड़ों आदि के साथ नानकदेव के जीवन से संबंधित सुसज्जित झांकियां बैंड-बाजों के साथ निकाली जाती हैं. गुरुद्वारों में भजन, कीर्तन, सत्संग, प्रवचन के साथ-साथ लंगर का आयोजन होता है जिसमें बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/yMzwh7L3l5tb1fuOakpjmoYTyts/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/yMzwh7L3l5tb1fuOakpjmoYTyts/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/yMzwh7L3l5tb1fuOakpjmoYTyts/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/yMzwh7L3l5tb1fuOakpjmoYTyts/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/_PylzGZgzK4" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/_PylzGZgzK4/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/guru-nanak-jayanti-guru-nanak-birthday-biography-guru-nanak.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=c6aa55fd-f58b-4c24-a096-8c0ba3c48a78</guid>
      <pubDate>Sun, 09 Oct 2011 10:50:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu Ritual</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=c6aa55fd-f58b-4c24-a096-8c0ba3c48a78</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=c6aa55fd-f58b-4c24-a096-8c0ba3c48a78</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/guru-nanak-jayanti-guru-nanak-birthday-biography-guru-nanak.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=c6aa55fd-f58b-4c24-a096-8c0ba3c48a78</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=c6aa55fd-f58b-4c24-a096-8c0ba3c48a78</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>कार्तिक स्नान 2011| Kartik Snan | Kartik Snan 2011 | Significance of Kartik Month</title>
      <description>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;img src="/hinduism/image.axd?picture=2011%2f10%2fsnan1.jpeg" alt="" /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;प्रतिवर्ष कार्तिक माह आरम्भ होते ही पवित्र स्नान का भी शुभारम्भ हो जाता है. इस माह तड़के उठकर महिलाएं तथा पुरुष पवित्र स्नान के लिए जाते हैं. कार्तिक माह में कार्तिक पूर्णिमा का महत्व और भी अधिक माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार भी कार्तिक माह की पूर्णिमा को लिया था. इस दिन गंगा स्नान, दीपदान आदि का बहुत महत्व है. इसके अतिरिक्त व्यक्ति अपनी क्षमतानुसार भी दानादि कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस दिन दान का बहुत महत्व माना गया है. त्रिदेवों ने इस दिन को महापुनीत पर्व कहा है. इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहा जाता है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा कृत्तिका नक्षत्र में स्थित हो और सूर्य विशाखा नक्षत्र में स्थित हो तब "पद्म योग" बनता है. इस योग अपना विशेष महत्व है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;कार्तिक पूर्णिमा पूजा विधि | Kartik Purnima Puja Vidhi&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;इस दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर पूरा दिन निराहार रहते हैं और भगवान विष्णु की आराधना करते हैं. श्रद्धालुगण इस दिन गंगा स्नान के लिए भी जाते हैं. जो गंगा स्नान के लिए नहीं जा पाते वह अपने नगर की ही नदी में स्नान करते हैं. भगवान का भजन करते हैं. संध्या समय में मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाते हैं. लम्बे बाँस में लालटेन बाँधकर किसी ऊंवे स्थान में "आकाशी" प्रकाशित करते हैं. इस व्रत को करने में स्त्रियों की संख्या अधिक होती है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस दिन कार्तिक पूर्णिमा का व्रत करने वाले व्यक्ति को ब्राह्मण को भोजन अवश्य कराना चाहिए. भोजन से पूर्व हवन कराएं. संध्या समय में दीपक जलाना चाहिए. अपनी क्षमतानुसार ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देनी चाहिए. कार्तिक पूर्णिमा के दिन रात्रि में चन्द्रमा के दर्शन करने पर शिवा, प्रीति, संभूति, अनुसूया, क्षमा तथा सन्तति इन छहों कृत्तिकाओं का पूजन करना चाहिए. पूजन तथा व्रत के उपरान्त वृष(बैल) दान से व्यक्ति को शिवलोक प्राप्त होता है. जो लोग इस दिन गंगा तथा अन्य पवित्र स्थानों पर श्रद्धा - भक्ति से स्नान करते हैं, वह भाग्यशाली होते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;लपसी - तपसी की कहानी | Story of Lapsi Tapsi&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;प्राचीन समय की बात है. एक नगर में दो व्यक्ति रहते थे. एक नाम लपसी था और दूसरे का नाम तपसी था. तपसी भगवान की तपस्या में लीन रहता था. लेकिन लपसी सवा सेर की लस्सी बनाकर भगवान का भोग लगाता और लोटा हिलाकर जीम स्वयं जीम लेता था. एक दिन दोनों स्वयं को एक-दूसरे से बडा़ मानने के लिए लड़ने लगे. लपसी बोला कि मैं बडा़ हूं और तपसी बोला कि मैं बडा़ हूँ. तभी वहाँ नारद जी आए और पूछने लगे कि तुम दोनों क्यूं लड़ रहे हो? तब लपसी कहता है कि मैं बडा़ हूं और तपसी कहता है कि मैं बडा़ हूँ. दोनों की बात सुनकर नारद जी ने कहा कि मैं तुम्हारा फैसला कर दूंगा.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अगले दिन तपसी नहाकर जब वापिस आ रहा था, तब नारद जी ने उसके सामने सवा करोड़ की अंगूठी फेंक दी. तपसी ने वह अंगूठी अपने नीचे दबा ली और तपस्या करने बैठ गया. लपसी सुबह उठा, फिर नहाया और सवा सेर लस्सी बनाकर भगवान का भोग लगाकर जीमने लगा. तभी नारद जी आते हैं और दोनों को बिठाते हैं. तब दोनों पूछते है कि कौन बडा़ है? तपसी बोला कि मैं बडा़ हूँ. नारद जी बोले - तुम गोडा़ उठाओ और जब गोडा़ उठाया तो सवा करोड़ की अंगूठी निकलती है. नारद जी कहते हैं कि यह अंगूठी तुमने चुराई है. इसलिए तेरी तपस्या भंग हो गई है और लपसी बडा़ है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;सभी बातें सुनने के बाद तपसी नारद जी से बोला कि मेरी तपस्या का फल कैसे मिलेगा? तब नारद जी उसे कहते हैं - तुम्हारी तपस्या का फल कार्तिक माह में पवित्र स्नान करने वाले देगें.उसके आगे नरद जी कहते हैं कि सारी कहानी कहने के बाद जो तेरी कहानी नहीं सुनाएगा या सुनेगा, उसका कार्तिक का फल खत्म हो जाएगा.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Oqzktprmn1Y8OkKb7G_BGWUHOKQ/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Oqzktprmn1Y8OkKb7G_BGWUHOKQ/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Oqzktprmn1Y8OkKb7G_BGWUHOKQ/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Oqzktprmn1Y8OkKb7G_BGWUHOKQ/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/eh4siMZoXLk" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/eh4siMZoXLk/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/kartik-snan-kartik-snan-2011-significance-kartik-month.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=68855201-9f0b-4300-bb08-d7ae9ad9f005</guid>
      <pubDate>Sat, 08 Oct 2011 16:40:00 +1400</pubDate>
      <category>Hindu Ritual</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=68855201-9f0b-4300-bb08-d7ae9ad9f005</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=68855201-9f0b-4300-bb08-d7ae9ad9f005</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/kartik-snan-kartik-snan-2011-significance-kartik-month.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=68855201-9f0b-4300-bb08-d7ae9ad9f005</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=68855201-9f0b-4300-bb08-d7ae9ad9f005</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title> बैकुण्ठ चतुर्दशी | Vaikunth Chaturdashi | Vaikunth Chaturdashi 2012</title>
      <description>&lt;p&gt;कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को बैकुण्ठ चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है. इसे वैकुण्ठ चौदस भी कहते हैं. इस दिन श्रद्धालुजन व्रत रखते हैं. यह व्रत कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी, जो अरुणोदयव्यापिनी हो, के दिन मनाया जाता है. इस चतुर्दशी के दिन यह व्रत भगवान शिव तथा विष्णु जी की पूजा करके मनाया जाता है. जिस रात्रि में चतुर्दशी अरुणोदयव्यापिनी हो, उस रात्रि में व्रत-उपवास रखा जाता है. अगले अरुणोदय में इस व्रत की पूजा तथा पारणा की जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस वर्ष यह व्रत सोमवार, 26 नवम्बर 2012 को रखा जाएगा. अरुणोदयकाल में भगवान शिव तथा विष्णु की पूजा की जाएगी तथा व्रत का पारण किया जाएगा.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बैकुण्ठ चतुर्दशी की पूजा | Worship of Vaikunth Chaturdashi&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;इस दिन सुबह-सवेरे दिनचर्या से निवृत होकर स्नान आदि करें. उसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें. भगवान विष्णु&amp;nbsp;की विधिवत रुप से पूजा - अर्चना करें. उसके बाद धूप-दीप, चन्दन तथा पुष्पों से भगवान का पूजन तथा आरती करें.&amp;nbsp;इस भक्तों को भगवान विष्णु की कमल पुष्पों के साथ पूजा करनी चाहिए और भगवान विष्णु का निर्मल मन से ध्यान करना चाहिए. इस दिन विष्णु जी के मंत्र जाप तथा स्तोत्र पाठ करने से बैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बैकुण्ठ चतुर्दशी की कथा | Story of Vaikunth Chaturdashi&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;एक बार की बात है कि नारद जी पृथ्वीलोक से घूमकर बैकुण्ठ धाम पंहुचते हैं. भगवान विष्णु उन्हें आदरपूर्वक बिठाते हैं और प्रसन्न होकर उनके आने का कारण पूछते हैं. नारद जी कहते है कि - प्रभु! आपने अपना नाम कृपानिधान रखा है. इससे आपके जो प्रिय भक्त हैं वही तर पाते हैं. जो सामान्य नर-नारी है, वह वंचित रह जाते हैं. इसलिए आप मुझे कोई ऎसा सरल मार्ग बताएं, जिससे सामान्य भक्त भी आपकी भक्ति कर मुक्ति पा सकें. यह सुनकर विष्णु जी बोले - हे नारद! मेरी बात सुनो, कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को जो नर-नारी व्रत का पालन करेंगें और श्रद्धा - भक्ति से मेरी पूजा करेंगें, उनके लिए स्वर्ग के द्वार साक्षात खुले होगें.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इसके बाद विष्णु जी जय-विजय को बुलाते हैं और उन्हें कार्तिक चतुर्दशी को स्वर्ग के द्वार खुला रखने का आदेश देते हैं. भगवान विष्णु कहते हैं कि इस दिन जो भी भक्त मेरा थोडा़ सा भी नाम लेकर पूजन करेगा, वह बैकुण्ठ धाम को प्राप्त करेगा.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;कार्तिक बैकुण्ठ चौदस का महत्व | Significance of Vaikunth Chaudas&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी का बैकुण्ठ चौदस नाम भगवान शिव का दिया गया है. यह व्रत विष्णु जी तथा शिव जी के "ऎक्य" का प्रतीक है. प्राचीन मतानुसार एक बार विष्णु जी काशी में शिव भगवान को एक हजार स्वर्ण कमल के पुष्प चढा़ने का संकल्प करते हैं. जब अनुष्ठान का समय आता है, तब शिव भगवान, विष्णु जी की परीक्षा लेने के लिए एक स्वर्ण पुष्प कम कर देते हैं. पुष्प कम होने पर विष्णु जी अपने "कमल नयन" नाम और "पुण्डरी काक्ष" नाम को स्मरण करके अपना एक नेत्र चढा़ने को तैयार होते हैं. भगवान शिव उनकी यह भक्ति देखकर प्रकट होते हैं. वह भगवान शिव का हाथ पकड़ लेते हैं और कहते हैं कि तुम्हारे स्वरुप वाली कार्तिक मास की इस शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी "बैकुण्ठ चौदस" के नाम से जानी जाएगी.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;भगवान शिव, इसी बैकुण्ठ चतुर्दशी को करोडो़ सूर्यों की कांति के समान वाला सुदर्शन चक्र, विष्णु जी को प्रदान करते हैं. इसी दिन शिव तथा विष्णु जी कहते हैं कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहेंगें. मृत्युलोक में रहना वाला कोई भी व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह अपना स्थान बैकुण्ठ धाम में सुनिश्चित करेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इसी दिन पितामह भीष्म ने भगवान कृष्ण से वर प्राप्त किया था. इसलिए इस व्रत को भीष्म पंचमी या पंच भीखू भी कहा गया है. भीष्म पंचमी का व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी से आरम्भ होकर पूर्णिमा तक चलता है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;कार्तिक शुक्ल चौदस के दिन ही भगवान विष्णु ने "मत्स्य" रुप में अवतार लिया था. इसके अगले दिन कार्तिक पूर्णिमा के व्रत का फल दस यज्ञों के समान फल देने वाला माना गया है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/xnhMovSeXIwErbM1eGjZlqPZ8G0/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/xnhMovSeXIwErbM1eGjZlqPZ8G0/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/xnhMovSeXIwErbM1eGjZlqPZ8G0/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/xnhMovSeXIwErbM1eGjZlqPZ8G0/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/Ciw5QoP4yqk" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/Ciw5QoP4yqk/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/vaikunth-chaudas-vaikunth-chaturdashi-2012.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=4b27b3d8-0227-4a60-b2c4-2328c1c5d467</guid>
      <pubDate>Sat, 08 Oct 2011 15:40:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <category>Hindu Ritual</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=4b27b3d8-0227-4a60-b2c4-2328c1c5d467</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=4b27b3d8-0227-4a60-b2c4-2328c1c5d467</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/vaikunth-chaudas-vaikunth-chaturdashi-2012.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=4b27b3d8-0227-4a60-b2c4-2328c1c5d467</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=4b27b3d8-0227-4a60-b2c4-2328c1c5d467</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>कार्तिक माह माहात्म्य | Kartik Month Significance | Story of a Worm and a Insect</title>
      <description>&lt;p&gt;आश्विन माह की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. इसी दिन से कार्तिक माह का स्नान आरम्भ माना जाता है. यह स्नान कार्तिक माह की पूर्णिमा पर समाप्त होता है. इस वर्ष यह पवित्र स्नान 11 अक्तूबर से आरम्भ होगा और 10 नवम्बर तक चलेगा. इस पूरे माह में सुबह-सवेरे पवित्र नदियों पर स्नान करने का महत्व है. पुराणों के अनुसार इस माह का प्रत्येक दिन पर्व के समान है. इस माह में स्नान - दान तथा व्रत से पुण्य कर्मों के फलों में वृद्धि होती है. इस माह में दीपदान का अपना विशेष महत्व है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;कार्तिक माह में इल्ली तथा घुण की कहानी | Katik Month- Story of a Worm and a Insect&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;बहुत समय पहले एक इल्ली थी और एक घुण था. कार्तिक माह का आरम्भ होने पर इल्ली ने घुण से कहा कि चलो आओ कार्तिक नहा लें. तब घुण ने कहा कि तू ही नहा लें. मेरे तो मोठ तथा बाजरा पडे़ हैं. मैं नहीं नहाउंगा. मैं तो हरे-हरे बाजरे का सीटा खाउंगा और ठण्डा-ठण्डा पानी पीऊंगा. यह सुनकर इल्ली राजा की लड़की के पल्ले से चिपकर चली गई. लेकिन घुण वहीं पडा़ रहा. वह नहीं नहाया. कार्तिक खतम होने के बाद दोनों मर गए. मरने के बाद इल्ली ने कार्तिक स्नान के कारण राजा के घर जन्म लिया. लेकिन घुण ने कार्तिक स्नान नहीं किया था इसलिए वह राजा के घर गधा बनकर रहने लगा.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;बडे़ होने पर राजा की लड़की बनी इल्ली का विवाह तय हुआ और विवाह के बाद वह ससुराल जाने लगी तो उसकी बैलगाडी़ रुक गई. राजा-रानी ने कहा कि बैलगाडी़ क्यूं रुक गई! तुझे जो मांगना है, वह मांग ले. तब लड़की ने कहा कि यह गधा मुझे दे दो. राजा-रानी हैरान हुए. वह बोले कि यह तुम क्या माँग रही हो. तुम चाहो तो धन-दौलत ले जाओ. यह गधा कोई ले जाने की चीज है. लेकिन लड़की नहीं मानी. हारकर राजा-रानी ने वह गधा रथ के साथ बाँध दिया. गधा फुदक-फुदक कर चलने लगा. अपने ससुराल के महल में पहुंचने पर लड़की वह गधा महल की सीढी़ के नीचे बाँध दिया.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;एक दिन जब वह सीढी़ उतर रही थी तब वह गधा बोला कि ऎ सुन्दरी, थोडा़ पानी पिला दे. तब वह बोली आ अब पहले तू नहा ले. पहले जन्म में तूने कहा था कि मैं पहले बाजरा खाऊंगा और ठण्डा-ठण्डा जल पीऊंगा. उन दोनों के आपस की यह बात देवरानी तथा जेठानी सुन लेती हैं. दोनों जाकर लड़की के पति को सिखाती हैं कि तुम्हारी पत्नी जादूगरनी है. वह जानवरों से बात करती है. तब उसके पति ने जवाब दिया - मैं आपकी बातें तभी मानूंगा जब मैं स्वयं अपने कानों से यह सब सुन लूंगा और अपनी आंखों से देख लूंगा.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अगले दिन राजकुमार छिपकर बैठ जाता है. उस दिन भी लड़की बनी इल्ली तथा गधा बना घुण वही बात करते हैं तो उसका पति तलवार निकालकर खडा़ हो जाता है और कहता है कि तुम जानवर से बात कर रही हो! तुम मुझे सच बताओ, क्या बात है? अन्यथा मैं तलवार से तुम्हें मार दूंगा. उसकी पत्नी उससे विनती करती है कि तुम औरत का भेद मत खोलो. लेकिन वह नहीं मानता. हारकर लड़की को सारी बात बतानी पड़ती है. वह कहती है कि पिछले जन्म में मैं इल्ली थी और यह गधा घुण था. मैने इसे कार्तिक नहाने के लिए बहुत कहा लेकिन यह नहीं माना. राजा की लड़की के पल्ले से लगकर नहाने से मैंने राजा की लड़की के रुप में जन्म लिया और यह घुण नहीं नहाया तो यह गधा बन गया. इसलिए मैं इससे पिछली बात कर रही थी.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अपनी पत्नी की बात सुनकर वह बहुत हैरान हुआ और कहने लगा कि कार्तिक स्नान से इतना पुण्य मिलता है? तब उसकी पत्नी बोली कि मेरे कार्तिक स्नान के कारण ही तो मैं राजा के घर जन्मी हूँ और मेरा विवाह एक राजकुमार से हुआ है. मुझे सभी तरह का राजपाट मिला है. यह सुनकर पति बोला कि यदि कार्तिक स्नान का इतना अधिक महत्व है तब हम दोनों जोडे़ में यह स्नान करेंगें और जितना हो सकेगा उतना दान-पुण्य भी करेगें. इससे हमें भविष्य में भी शुभ फलों की प्राप्ति हो. उसके बाद दोनों पति-प्त्नी जोडे़ से कार्तिक स्नान करने लगे और उनके पास पहले से भी अधिक धन-सम्पदा एकत्रित हो जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/-GdRxA3HQfK_oB3aG2ccOxjV6SE/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/-GdRxA3HQfK_oB3aG2ccOxjV6SE/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/-GdRxA3HQfK_oB3aG2ccOxjV6SE/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/-GdRxA3HQfK_oB3aG2ccOxjV6SE/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/w59HvtGPpZM" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/w59HvtGPpZM/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/kartik-month-significance-story-worm-insect.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=dbc75f69-90ec-4039-8b6e-ef792956dc55</guid>
      <pubDate>Fri, 07 Oct 2011 15:50:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <category>Hindu Ritual</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=dbc75f69-90ec-4039-8b6e-ef792956dc55</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=dbc75f69-90ec-4039-8b6e-ef792956dc55</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/kartik-month-significance-story-worm-insect.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=dbc75f69-90ec-4039-8b6e-ef792956dc55</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=dbc75f69-90ec-4039-8b6e-ef792956dc55</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>गोपाष्टमी | Gopashtami | Gopastami 2012 | Gopastami Festival</title>
      <description>&lt;p&gt;कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को "गोपाष्टमी" के नाम जाना जाता है. इस वर्ष यह पर्व 21 नवम्बर 2012,बुधवार के दिन मनाया जाएगा. यह पर्व ब्रज प्रदेश का मुख्य त्यौहार है. जो गौओं का पालते हैं वह सब भी इस पर्व को मनाते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;गोपाष्टमी पर्व विधि | Rituals of Performing Gopashtami&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;इस दिन प्रात: काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हो स्नान आदि करते हैं. प्रात: काल में ही गौओं को भी स्नान आदि कराया जाता है. इस दिन बछडे़ सहित गाय की पूजा करने का विधान है. प्रात:काल में ही धूप-दीप, गंध, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड़, जलेबी, वस्त्र तथा जल से गाय का पूजन किया जाता है और आरती उतारी जाती है. इस दिन कई व्यक्ति ग्वालों को भी उपहार आदि देकर उनका भी पूजन करते हैं. इस दिन गायों को सजाया जाता है. इसके बाद गाय को गो ग्रास देते हैं और गाय की परिक्रमा करते हैं. परिक्रमा करने के बाद गायों के साथ कुछ दूरी तक चलना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;संध्या समय में जब गाय घर वापिस आती हैं तब उनका पंचोपचार से पूजन किया जाता है. गाय को साष्टांग प्रणाम किया जाता है. पूजन करने के बाद गाय के चरणों की मिट्टी को माथे से लगाया जाता है. ऎसा करने से व्यक्ति को चिर सौभाग्य की प्राप्ति होती है. इसके बाद गायों को खाने की वस्तुएं दी जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;गोपाष्टमी का महत्व | Significance of Gopashtami&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;प्राचीन मान्यताओं के अनुसार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से सप्तमी तिथि तक भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी अंगुली पर धारण किया था. आठवें दिन हारकर अहंकारी इन्द्र को श्रीकृष्ण की शरण में आना पडा़ था. इसी दिन अष्टमी के दिन वह भगवान कृष्ण से क्षमा मांगते हैं. उसी दिन से कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी का यह त्यौहार मनाया जाता है. एक मान्यतानुसार इसी दिन भगवान कृष्ण को गाय चराने के लिए वन में भेजा गया था.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;भारत के अधिकतर सभी भागों में यह पर्व मनाया जाता है. विशेष रुप से गोशालाओं में यह पर्व बहुत महत्व रखता है. बहुत से दानी व्यक्ति इस दिन गोशालाओं में दान-दक्षिणा देते हैं. इस दिन सुबह से ही गायों को सजाया जाता है. उसके बाद मेहंदी के थापे तथा हल्दी अथवा रौली से पूजन किया जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;गोपाष्टमी मनाने का कारण | Reason to Celebrate Gopashtami&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;गौ अथवा गाय भारतीय संस्कृति का प्राण मानी जाती हैं. इन्हें बहुत ही पवित्र तथा पूज्यनीय माना जाता है. हिन्दु धर्म में यह पवित्र नदियों, पवित्र ग्रंथों आदि की तरह पूज्य माना गया है. शास्त्रों के अनुसार गाय समस्त प्राणियों की माता है. इसलिए आर्य संस्कृति में पनपे सभी सम्प्रदाय के लोग उपासना तथा कर्मकाण्ड की पद्धति अलग होने पर भी गाय के प्रति आदर भाव रखते हैं. गाय को दिव्य गुणों की स्वामिनी माना गया है और पृथ्वी पर यह साक्षात देवी के समान है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;गोपाष्टमी को ब्रज संस्कृति का एक प्रमुख उत्सव माना जाता है. भगवान कृष्ण का "गोविन्द" नाम भी गायों की रक्षा करने के कारण पडा़ था. क्योंकि भगवान कृष्ण ने गायों तथा ग्वालों की रक्षा के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाकर रखा था. आठवें दिन इन्द्र अपना अहं त्यागकर भगवान कृष्ण की शरण में आया था. उसके बाद कामधेनु ने भगवान कृष्ण का अभिषेक किया और उसी दिन से इन्हें गोविन्द के नाम से पुकारा जाने लगा. इसी दिन से अष्टमी के दिन गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/MvuAw7bU-kcAIwPxDLOAO6uLH1o/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/MvuAw7bU-kcAIwPxDLOAO6uLH1o/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/MvuAw7bU-kcAIwPxDLOAO6uLH1o/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/MvuAw7bU-kcAIwPxDLOAO6uLH1o/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/cCPwMe8b6AE" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/cCPwMe8b6AE/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/gopashtami-gopastami-2012-gopastami-festival.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=faf274e6-7fc8-4c82-8a96-eff91a8e4397</guid>
      <pubDate>Fri, 07 Oct 2011 13:20:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <category>Hindu Ritual</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=faf274e6-7fc8-4c82-8a96-eff91a8e4397</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=faf274e6-7fc8-4c82-8a96-eff91a8e4397</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/gopashtami-gopastami-2012-gopastami-festival.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=faf274e6-7fc8-4c82-8a96-eff91a8e4397</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=faf274e6-7fc8-4c82-8a96-eff91a8e4397</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>आंवला नवमी | अक्षय नवमी | Amla Navami | Akshya Navami | Kushmand Navami</title>
      <description>&lt;p&gt;कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को आंवला नवमी के रूप में मनाया जाता है. आँवला नवमी को अक्षय नवमी भी कहते हैं. आँवला नवमी के दिन स्नान, पूजन, तर्पण तथा अन्नदान करने का बहुत महत्व होता है. इस दिन किया गया जप, तप, दान इत्यादि व्यक्ति को सभी पापों से मुक्त करता है तथा सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला होता है. मान्यता है कि सतयुग का आरंभ भी इसी दिन हुआ था. इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने का विधान है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आंवले के वृक्ष में सभी देवताओं का निवास होता है तथा यह फल भगवान विष्णु को भी अति प्रिय है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;आंवला नवमी कथा | Amla Navami Story&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;प्राचीन समय की बात है, काशी नगरी में एक वैश्य रहता था. वह बहुत ही धर्म कर्म को मानने वाला धर्मात्मा पुरूष था. किंतु उसके कोई संतान न थी. इस कारण उस वणिक की पत्नी बहुत दुखी रहती थी. एक बार किसी ने उसकी पत्नी को कहा कि यदि वह किसी बच्चे की बलि भैरव बाबा के नाम पर चढा़ए तो उसे अवश्य पुत्र की प्राप्ति होगी. स्त्री ने यह बात अपने पति से कही परंतु वणिक ने ऐसा कार्य करने से मना कर दिया. किंतु उसकी पत्नी के मन में यह बात घर कर गई तथा संतान प्राप्ति की इच्छा के लिए उसने किसी बच्चे की बली दे दी, परंतु इस पाप का परिणाम अच्छा कैसे हो सकता था अत: उस स्त्री के शरीर में कोढ़ उत्पन्न हो गया और मृत बच्चे की आत्मा उसे सताने लगी.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;उस स्त्री ने यह बात अपने पति को बताई. पहले तो पति ने उसे खूब दुत्कारा लेकिन फिर उसकी दशा पर उसे दया भी आई. वह अपनी पत्नी को गंगा स्नान एवं पूजन के लिए कहता है. तब उसकी पत्नी गंगा के किनारे जा कर गंगा जी की पूजा करने लगती है. एक दिन माँ गंगा वृद्ध स्त्री का वेश धारण किए उस स्त्री के समक्ष आती है और उस सेठ की पत्नी को कहती है कि यदि वह मथुरा में जाकर कार्तिक नवमी का व्रत एवं पूजन करे तो उसके सभी पाप समाप्त हो जाएंगे. ऎसा सुनकर वणिक की पत्नी मथुरा में जाकर विधि विधान के साथ नवमी का पूजन करती है और भगवान की कृपा से उसके सभी पाप क्षय हो जाते हैं तथा उसका शरीर पहले की भाँति स्वस्थ हो जाता है, उसे संतान रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;आँवला नवमी पूजा | Amla Navami Puja&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;प्रात:काल स्नान कर आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है. पूजा करने के लिए आँवले के वृक्ष की पूर्व दिशा की ओर उन्मुख होकर शोड्षोपचार पूजन करना चाहिए. दाहिने हाथ में जल, चावल, पुष्प आदि लेकर व्रत का संकल्प करें. आंवले की जड़ में दूध चढा़एं, कर्पूर वर्तिका से आरती करते हुए वृक्ष की सात बार परिक्रमा करें. आंवले के वृक्ष के नीचे ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा दान आदि दें तथा कथा का श्रवण करें. घर में आंवले का वृक्ष न हो तो किसी बगीचे में या गमले में आंवले का पौधा लगा कर यह कार्य सम्पन्न करना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;आँवला नवमी महत्व | Importance of Amla Navami&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;कार्तिक शुक्ल पक्ष की आंवला नवमी का धार्मिक महत्व बहुत माना गया है. आंवला नवमी की तिथि को पवित्र तिथि माना गया है. इस दिन किया गया गौ, स्वर्ण तथा वस्त्र का दान अमोघ फलदायक होता है. इन वस्तुओं का दान देने से ब्राह्मण हत्या, गौ हत्या जैसे महापापों से बचा जा सकता है. चरक संहिता में इसके महत्व को व्यक्त किया गया है. जिसके अनुसार कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन ही महर्षि च्यवन को आंवला के सेवन से पुनर्नवा होने का वरदान प्राप्त हुआ था.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/LpylyOK4YPH9aZZ-_f2zH_ujtms/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/LpylyOK4YPH9aZZ-_f2zH_ujtms/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/LpylyOK4YPH9aZZ-_f2zH_ujtms/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/LpylyOK4YPH9aZZ-_f2zH_ujtms/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/gEiv3rZpi6E" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/gEiv3rZpi6E/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/amla-navami-akshya-navami-kushmand-navami.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=1de8b924-1660-431b-b9c7-62016154440c</guid>
      <pubDate>Wed, 05 Oct 2011 12:40:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=1de8b924-1660-431b-b9c7-62016154440c</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=1de8b924-1660-431b-b9c7-62016154440c</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/amla-navami-akshya-navami-kushmand-navami.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=1de8b924-1660-431b-b9c7-62016154440c</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=1de8b924-1660-431b-b9c7-62016154440c</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>सूर्य षष्ठी | Surya Shasti | Surya Shasti Vrat </title>
      <description>&lt;p&gt;सूर्य षष्ठी का त्यौहार कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक प्रमुख हिन्दू त्यौहार है. इसे डाला छठ भी कहते हैं. सूर्योपासना का यह पर्व संपूर्ण भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता रहा है. कार्तिक माह में आने वाली षष्ठी को सूर्य षष्ठी के व्रत रूप में मानाते हैं. सूर्य षष्ठी में सूर्य की पूजा की जाती है. भगवान सूर्य की आराधना करते हुए लोग गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर के किनारे सूर्य षष्ठी पूजा को करते हैं. इस वर्ष यह पर्व 19 नवंबर 2012 दिन सोमवार को मनाया जाएगा.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;सूर्य षष्ठी पौराणिक संदर्भ | Surya Shasti Mythology&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;कार्तिक माह की शुक्ल षष्ठी को यह व्रत किया जाता है. इस व्रत के विषय में एक कथा प्रचलित है इसके अनुसार प्राचीन समय में बिंदुसार नामक तीर्थ में महिपाल नाम का एक वैश्य रहा करता था. वह वैश्य धर्म कर्म इत्यादि में विश्वास नहीं करता था, भगवान को नहीं मानता था. एक बार वह सेठ सूर्य देव की प्रतिमा के सामने ही मल मूत्र त्याग करने लगता है. उसके इस घृणित कृत से भगवान सूर्य देव उससे क्रोधित हो जाते हैं और उसे नेत्रहीन होने का शाप मिलता है जिसके परिणाम स्वरूप उसकी आँखों की रोशनी कम होने लगती है और कुछ समय बाद वह पूर्ण रूप से नेत्रहीन हो जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अपनी दुर्दशा से दुखी हो उस व्यक्ति ने जान देने की सोची और गंगा में कूदने का निश्चय कर नदी कि ओर चल पडा़. मार्ग में उसे नारद जी मिलते हैं वह उस वैश्य को रोक कर उसका हाल चाल पूछने लगते हैं. नेत्रहीन सेठ अपनी व्यथा को बताते हुए रोने लगता है, वह &amp;nbsp;नारद जी से कहता है कि वह सांसारिक सुख-दुख से परेशान हो आत्महत्या करने जा रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;सेठ की करूणा भरे वचन सुनकर नारद जी उसे कहते हैं कि हे अज्ञानी सेठ तेरी यह दुर्दशा भगवान सूर्य के क्रोध के कारण हुई है तूने जो अनुचित कृत किया उसी का फल भोग रहा है तू, अत: यदि तुझे इन सभी कष्टों से मुक्त होना है तो तू कार्तिक मास की षष्ठी को व्रत कर और भगवान सूर्य की पूजा अर्चना करके उनसे अपने पापों की क्षमा याचना कर तभी तेरा यह कष्ट दूर हो सकेगा.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;तब वह वाणिक नारद जी के कथन अनुसार सूर्य षष्ठी का व्रत करता है तथा अपने पापों की क्षमा मांगता है सूर्य भगवान उससे प्रसन्न हो उसे पुन: नेत्र ज्योति प्रदान करते हैं. इस प्रकार यह सूर्य षष्ठी व्रत सभी सुखों को प्रदान करने वाला व्रत है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;सूर्य षष्ठी व्रत पूजा | Surya Shasti Vrat Puja&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;सूर्य षष्ठी व्रत भगवान सूर्य की उपासना का पर्व है. इस पर्व का आयोजन कार्तिक माह के आरंभ के साथ ही शुरू हो जाता है इस पर्व के उपलक्ष में भगवान सूर्य की पूजा का विशेष महत्व होता है. सूर्य षष्ठी व्रत में भगवान सूर्य की पूजा उपासना की जाती है इस दिन व्रती अपने सभी कार्यों को पूर्ण कर भगवान आदित्य का पूजन करता है. उन्हें जल द्वरा अर्घ्य दिया जाता है. पूजा की विधी में फल, विभिन्न प्रकार के पकवान एवं मिष्ठान को शामिल किया जाता है इस दिन सूर्य की किरणों को अवश्य ग्रहण करना चाहिए. पूजन तथा अर्घ्य देने के समय सूर्य की किरणें अवश्य देखनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;सूर्य षष्ठी व्रत महत्व | Importance of Surya Shasti Vrat&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;सूर्य षष्ठी पर्व के अवसर पर परिवार के सभी सदस्य स्वच्छता का विशेष ध्यान रखते हैं. सूर्य षष्ठी पर्व के दिन पूजा का सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के फल, केले की पूरी गौर, नारियल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम इत्यादि को रखा जाता है. इस व्रत का बहुत महत्व रहा है इसे करने से घर में धन धान्य की वृद्धि होती है. तथा परिवार में सुख समृद्धि का आगमन होता है. इस व्रत को करने से चर्म तथा नेत्र रोगों से मुक्ति मिलती है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/68tFEJR8uTM_16pU8T4wgwDo32U/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/68tFEJR8uTM_16pU8T4wgwDo32U/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/68tFEJR8uTM_16pU8T4wgwDo32U/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/68tFEJR8uTM_16pU8T4wgwDo32U/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/aA9iy2CK4qs" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/aA9iy2CK4qs/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/surya-shasti-surya-shasti-vrat.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=34f8ba91-2f71-4cdd-b76b-bf38ec1b067f</guid>
      <pubDate>Wed, 05 Oct 2011 12:20:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=34f8ba91-2f71-4cdd-b76b-bf38ec1b067f</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=34f8ba91-2f71-4cdd-b76b-bf38ec1b067f</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/surya-shasti-surya-shasti-vrat.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=34f8ba91-2f71-4cdd-b76b-bf38ec1b067f</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=34f8ba91-2f71-4cdd-b76b-bf38ec1b067f</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>अहोई अष्टमी | Ahoi Ashtami | Ahoi Ashtami 2012</title>
      <description>&lt;p&gt;कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई अष्टमी के रूप में मनाते हैं. अहोई अष्टमी का व्रत महिलायें अपनी सन्तान की रक्षा और उसकी लंबी उम्र की कामना के लिए रखती हैं. इस वर्ष 2012 को अहोई अष्टमी 7 नवम्बर बुधवार के दिन मनाई जाएगी परंतु कुछ व्यक्ति जिस वार की दीवाली पड़ती है उससे ठीक आठ दिन पहले वाले वार या दिन को अहोई अष्टमी का व्रत रखते हैं. जैसे इस वर्ष दीवाली 13&amp;nbsp;नवम्बर&amp;nbsp;मंगलवार के दिन है, इसलिए उससे आठ दिन पहले 6&amp;nbsp;मंगलवार&amp;nbsp;के दिन अहोई का व्रत रखेंगे.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;अहोई अष्टमी व्रत कथा | Ahoi Ashtami Vrat Katha&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;प्राचीन काल में एक साहूकार रहा करता था. साहूकार की पत्नि चंद्रिका बहुत गुणवती थी. उसकी बहुत संताने थी वह अपने परिवार के साथ सुख से जीवन यापन कर रहा होता हैं. एक बार साहूकार की स्त्री घर की लीपा-पोती हेतु मिट्टी लेने खदान में जाती है और कुदाल से मिट्टी खोदने लगती है, परंतु उसी जगह एक सेह की मांद होती है और अचानक उस स्त्री के हाथ से कुदाल सेह के बच्चे को लग जाती है जिससे सेह का बच्चे की मृत्यु हो जाती है&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस घटना से साहूकार की पत्नी को बहुत दुख होता है मन में पश्चाताप का भाव लिए वह घर लौट जाती है. परंतु कुछ दिनों उसकी संताने एक एक करके मरने लगती हैं, अपने बच्चों की अकाल मृत्यु से पति पत्नि दुखी रहने लगते हैं. बच्चों की शोक सभा में जब साहूकारकी पत्नी विलाप करती हुई उन्हें बताती है कि उसने जान-बूझ कर कभी कोई पाप नहीं किया लेकिन&amp;nbsp;एक बार अंजाने में उससे एक सेह के बच्चे की हत्या हो गई थी.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;यह सुनकर औरतें साहूकार की पत्नी को दिलासा देती हैं और उसे &amp;nbsp;अष्टमी माता की पूजा करने को कहती हैं. साहूकार की पत्नी सेह और सेह के बच्चों का चित्र बनाकर अहोई माता की पूजा करती है और माँ से अपने अपराध की क्षमा-याचना करती है. तब माँ प्रसन्न हो उसकी होने वाली संतानों को दीर्घ आयु का वरदान देती हैं तभी से अहोई व्रत की परंपरा प्रचलित हो गई.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;एक अन्य कथा अनुसार, प्राचीन काल में दतिया नगर में चंद्रभान नाम का एक साहूकार रहता था. उसकी बहुत सी संताने थी, परंतु उसकी संताने अल्प आयु में ही अकाल मृत्यु को प्राप्त होने लगती हैं. अपने बच्चों की अकाल मृत्यु से पति पत्नी दुखी रहने लगते हैं. कोई संतान न होने के कारण वह पति पत्नी अपनी धन दौलत का त्याग करके वन की ओर चले जाते हैं और बद्रिकाश्रम के समीप बने जल के कुंड के पास पहुँचते हैं तथा वहीं अपने प्राणों का त्याग करने के लिए अन्न जल का त्याग करके बैठ जाते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस तरह छह दिन बीत जाते हैं तब सातवें दिन एक आकाशवाणी होती है कि, हे साहूकार तुम्हें यह दुख तुम्हारे पूर्व जन्म के पाप से मिल रह है अत: इन पापों से मुक्ति के लिए तुम्हें अहोई अष्टमी के दिन व्रत का पालन करके अहोई माता की पूजा अर्चना करना जिससे प्रसन्न हो अहोई मां तुम्हें पुत्र की दीर्घ आयु का वरदान देंगी. इस प्रकार दोनो पति पत्नी अहोई अष्टमी के दिन व्रत करते हैं और अपने पापों की क्षमा मांगते हैं. अहोई माँ प्रसन्न हो उन्हें संतान की दीर्घायु का वरदान देतीं हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;अहोई अष्टमी पूजा | Ahoi Ashtami Puja&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;अहोई अष्टमी के दिन पूजा पाठ करके अपनी संतान की दीर्घायु एवं सुखमय जीवन हेतु कामना करते हुए व्रत करना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अहोई माता की पूजा के लिए गेरू से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाते हैं तथा साथ ही सेह और उसके बच्चों का चित्र भी बनाते हैं. सन्ध्या समय माँ का पूजन करने के उपरांत अहोई माता की कथा सुनते हैं. पूजा के बाद सास के पैर छू कर आर्शीवाद प्राप्त कर तारों की पूजा करके जल चढ़ाते हैं. इसके पश्चात व्रती जल ग्रहण करके व्रत का समापन करता है&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/q4glqHLKvfTDz959cZQyVwdpHFs/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/q4glqHLKvfTDz959cZQyVwdpHFs/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/q4glqHLKvfTDz959cZQyVwdpHFs/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/q4glqHLKvfTDz959cZQyVwdpHFs/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/IDRgxuQLLKg" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/IDRgxuQLLKg/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/ahoi-ashtami-ahoi-ashtami-2012.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=024d1aea-a513-42fe-b992-76bb185fa9e5</guid>
      <pubDate>Tue, 04 Oct 2011 12:10:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=024d1aea-a513-42fe-b992-76bb185fa9e5</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=024d1aea-a513-42fe-b992-76bb185fa9e5</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/ahoi-ashtami-ahoi-ashtami-2012.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=024d1aea-a513-42fe-b992-76bb185fa9e5</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=024d1aea-a513-42fe-b992-76bb185fa9e5</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>करक चतुर्थी । करवा चौथ | Karak Chaturthi | Karak Chaturthi Vrat | Karak Chaturthi 2012 | Karva Chauth</title>
      <description>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;img src="/hinduism/image.axd?picture=2011%2f10%2fimage+karvachoth.jpeg" alt="" /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;करक चतुर्दशी व्रत कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन मनाया जाता है. करक चतुर्दशी को करवा चौथ के नाम से भी जाना जाता है. करक चतुर्दशी का यह पवित्र पर्व सौभाग्यवती(सुहागिन) स्त्रियाँ मनाती हैं. पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन चंद्रमा की पूजा की जाती है. इसी के साथ देवी गौरी भगवान शिव एवं गणेश जी की पूजा अर्चना की जाती है. करवाचौथ के दिन उपवास रखकर रात्रि समय चन्द्रमा को अ&amp;zwnj;र्घ्य देने के उपरांत ही भोजन करने का विधान है. करक चतुर्दशी या करवा चौथ मुख्यत: भारत के अनेक विभिन्न भागों में उत्साह के साथ मनाया जाता है. &amp;nbsp;इस वर्ष करक चतुर्दशी या करवाचौथ 2 नवम्बर दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;करक चतुर्थी कथा | Karak Chaturthi Story&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;करक चतुर्दशी के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार, करवा नाम की एक स्त्री थी वह बहुत पतिव्रता थी. वह अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के पास एक गाँव में रहती थी. एक बार करवा का पति नदी के किनारे कपड़े धो रहा था होता है. तभी अचानक वहां एक मगरमच्छ आता है और वह उसके पति का पाँव अपने मुँह में दबा लेता है तथा उसे नदी में खींचकर ले जाने लगता है. तब उसका पति जोर जोर से अपनी पत्नि को करवा, करवा, करवा कह के मदद के लिए पुकारने लगता है. पति की आवाज़ सुन कर करवा भागी भागी वहां पहुंची है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;पति को मगर के चंगुल में फंसा देख मगर को कच्चे धागे से बाँध देती है व यमराज से पति के जीवन की रक्षा करने को कहती है. करवा की कुरूण व्यथा देख कर यमराज उनसे कहते हैं की वह मगर को मृत्यु नहीं दे सकते क्योंकि उसकी आयु शेष है, परंतु करवा के पति-धर्म को देख यमराज मगरमच्छ को यमपुरी भेज देते हैं. करवा के पति को दीर्घायु प्राप्त होती है तथा यमराज करवा को प्रसन्न हो उसे वरदान देते हैं. कि जो भी स्त्री कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को व्रत का पालन करेगी वह सौभाग्यवती होगी. तब से करवा-चौथ व्रत को मनाने की परंपरा चली आ रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;धर्म ग्रंथों में एक महाभारत से संबंधित अन्य पौराणिक कथा का भी उल्लेख किया गया है. इसके अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं व दूसरी ओर पांडवों पर कई प्रकार के संकटों से आन पड़ते हैं. यह सब देख द्रौपदी चिंता में पड़ जाती है वह भगवान श्री श्रीकृष्ण से इन सभी समस्याओं से मुक्त होने का उपाय पूछती हैं&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;श्री कृष्ण द्रौपदी से कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवा चौथ का व्रत रहे तो उसे इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है. भगवान कृष्ण के कथन अनुसार द्रौपदी विधि विधान सहित करवा चौथ का व्रत रखती हैं जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;करक चतुर्थी । करवा चौथ पूजा | Karva Chauth Puja&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;कार्तिक माह कि कृष्ण चन्द्रोदयव्यापिनी चतुर्थी के दिन किया जाने वाला करक चतुर्थी व्रत स्त्रियां अखंड़ सौभाग्य की कामना के लिए करती हैं. इस व्रत में शिव-पार्वती, गणेश और चन्द्रमा का पूजन किया जाता है. इस शुभ दिवस के उपलक्ष्य पर सुहागिन स्त्रियां पति की लंबी आयु की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. पति-पत्नी के आत्मिक रिश्ते और अटूट बंधन का प्रतीक यह करवाचौथ या करक चतुर्थी व्रत संबंधों में नई ताज़गी एवं मिठास लाता है. करवा चौथ में सरगी का काफी महत्व है. सरगी सास की तरफ से अपनी बहू को दि जाने वाली आशीर्वाद रूपी अमूल्य भेंट होती है&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;सरगी के रूप में सास अपनी बहू को विभिन्न खाद्य पदार्थ एवं वस्त्र इत्यादि देती हैं. यह सरगी, सौभाग्य और समृद्धि का रूप होती है. सरगी के रूप में खाने की वस्तुओं को जैसे फल, मीठाई आदि को व्रती महिलाएं व्रत वाले दिन सूर्योदय से पूर्व प्रात: काल में तारों की छांव में ग्रहण करती हैं. तत्पश्चात व्रत आरंभ होता है. इस दिन स्त्रियां साज, श्रृंगार करती हैं हाथों में मेंहदी रचाती हैं और पूजा के समय नए वस्त्र पहनती हैं&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शाम को कथा सुनने के बाद अपनी सासु माँ के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं और उन्हें करवा समेत अनेक उपहार भेंट करती हैं. रात्रि समय चांद निकलने के पश्चात अनेक पकवानों से करवा चौथ की पूजा की जाती है तथा चांद को अर्ध्य देकर उसकी पूजा करते हैं. चंद्र दर्शन के बाद पति का चेहरा देखकर पत्नी, पति के हाथों से जल पीती हैं और अपने व्रत को पूर्ण करती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : &lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/3i7yxR7x9K6_o0eg2dpPCm9gioM/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/3i7yxR7x9K6_o0eg2dpPCm9gioM/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/3i7yxR7x9K6_o0eg2dpPCm9gioM/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/3i7yxR7x9K6_o0eg2dpPCm9gioM/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/iZKUaRcGDwI" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/iZKUaRcGDwI/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/karak-chaturthi-karak-chaturthi-vrat-karak-chaturthi-2012-karva-chauth.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=5d732a1e-5fab-4ef0-9c6b-cf658976abe7</guid>
      <pubDate>Mon, 03 Oct 2011 15:30:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=5d732a1e-5fab-4ef0-9c6b-cf658976abe7</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=5d732a1e-5fab-4ef0-9c6b-cf658976abe7</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/karak-chaturthi-karak-chaturthi-vrat-karak-chaturthi-2012-karva-chauth.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=5d732a1e-5fab-4ef0-9c6b-cf658976abe7</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=5d732a1e-5fab-4ef0-9c6b-cf658976abe7</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>दिवाली 2012 | Diwali 2012 | Diwali | Diwali Puja</title>
      <description>&lt;p&gt;&lt;img src="/hinduism/image.axd?picture=2011%2f10%2fdiwali.jpeg" alt="" /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली का पर्व हर वर्ष मनाया जाता है. इस वर्ष दीवाली का यह त्यौहार 13 नवम्बर 2012, दिन मंगलवार को मनाया जाएगा. भारतवर्ष में हिन्दुओं का यह प्रमुख त्यौहार है. इस दिन हर घर रोशनी से सजा होता है. प्राचीन समय में दिवाली को वैश्यों का प्रमुख त्यौहार माना जाता था. इस दिन से वह व्यापार संबंधी नए बहीखाते आरम्भ करते हैं. बिना धन के व्यापार का कोई अर्थ नहीं होता है. इसलिए व्यापारी वर्ग इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा आराधना करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इस दिन सभी लोग सुबह से ही घर को सजने का कार्य आरम्भ कर देते हैं. संध्या समय में दीये जलाते हैं. लक्ष्मी तथा गणेश पूजन करते हैं. आस-पडौ़स में एक-दूसरे को मिठाइयों का आदान-प्रदान किया जाता है. रिश्तेदारों तथा मित्रों को मिठाइयों का आदान-प्रदान कई दिन पहले से ही आरम्भ हो जाता है. रात में बच्चे तथा बडे़ मिलकर पटाखे तथा आतिशबाजी जलाते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;धन तेरस । धन त्रयोदशी |&amp;nbsp;Dhanteras |&amp;nbsp;Dhantrayodashi&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;दिवाली का त्यौहार पांच दिन तक मनाया जाता है. इस त्यौहार की तैयारी कई दिन पहले ही आरम्भ हो जाती है. घर की लिपाई-पुताई होती है. रंग-रोगन होता है. घर की पूरी सफाई की जाती है. दिवाली से दो दिन पहले धन-तेरस अथवा धन त्रयोदशी का त्यौहार मनाया जाता है. इस दिन नए बर्तन खरीदने की परंपरा है. इस दिन स्वर्ण अथवा रजत आभूषण खरीदने का भी रिवाज है. अपनी - अपनी परम्परानुसार लोग सामान खरीदते है. संध्या समय में घर के मुख्य द्वार पर एक बडा़ दीया जलाया जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;छोटी दिवाली । नरक चतुर्दशी | Choti Diwali | Narak Chaturthi&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;बडी़ दिवाली से एक दिन पहले छोटी दिवाली का त्यौहार मनाया जाता है. इस दिन को नरक चतुर्दशी अथवा नरका चौदस भी कहते हैं. इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था. इसलिए इसे नरका चौदस कहा जाता है. इस दिन संध्या समय में पूजा की जाती है और अपनी - अपनी परंपरा के अनुसार दीये जलाए जाते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;बडी़ दिवाली | Badi Diwali&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;पांच दिन के इस पर्व का यह मुख्य दिन होता है. इस दिन सुबह से ही घरों में चहल-पहल आरम्भ हो जाती है. एक-दूसरे को बधाई संदेश दिए जाते हैं. घर को सजाने का काम आरम्भ हो जाता है. संध्या समय में गणेश जी तथा लक्ष्मी जी का पूजन पूरे विधि-विधान से किया जाता है. पूजन विधि में धूप-दीप, खील-बताशे, रोली-मौली, पुष्प आदि का उपयोग किया जाता है. पूजन के बाद मिठाई खाने का रिवाज है. बच्चे और बडे़ मिलकर खूब आतिशबाजी चलाते हैं. बम-पटाखे फोड़ते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;अन्नकूट । गोवर्धन पूजा । विश्वकर्मा दिवस |&amp;nbsp;Annakut |&amp;nbsp;Govardhan Puja |&amp;nbsp;Vishwakarma Divas&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;दिवाली से अगले दिन अन्नकूट का पर्व मनाया जाता है. इस दिन मंदिरों में सभी सब्जियों को मिलाकर एक सब्जी बनाते हैं, जिसे अन्नकूट कहा जाता है. मंदिरों में इस अन्नकूट को खाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी होती है. अन्नकूट के साथ पूरी बनाई जाती है. कहीं-कहीं साथ में कढी़-चावल भी बनाए जाते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इसी दिन रात्रि समय में गोवर्धन पूजा भी की जाती है. गोवर्धन पूजा में गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है और उसे भोग लगाया जाता है. उसके बाद धूप-दीप से पूजन किया जाता है. फिर घर के सभी सदस्य इस गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इसी दिन विश्वकर्मा दिवस भी मनाया जाता है. इस दिन मजदूर वर्ग अपने औजारों की पूजा करते हैं. फैक्टरी तथा सभी कारखाने इस दिन बन्द रहते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;भैया दूज |&amp;nbsp;Bhai Dooj&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;दिवाली का पर्व भैया दूज या यम द्वित्तीया के दिन समाप्त होता है. यह त्यौहार कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वित्तीया को मनाया जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक करती हैं और मिठाई खिलाती हैं. भाई बदले में बहन को उपहार देते हैं. &amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;span style="color: #6b6b6b; font-family: Arial, Tohama, Helvetica, sans-serif; line-height: 18px; font-size: small;"&gt;&lt;span style="color: #6b6b6b; font-family: Arial; line-height: 18px; white-space: pre-wrap;"&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #6b6b6b; font-family: Arial; line-height: 18px; white-space: pre-wrap;"&gt; : &lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ttN75OQVJ9Knq7zfFALV5Sn8ZgI/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ttN75OQVJ9Knq7zfFALV5Sn8ZgI/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ttN75OQVJ9Knq7zfFALV5Sn8ZgI/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ttN75OQVJ9Knq7zfFALV5Sn8ZgI/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/B_p3qck51zc" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/B_p3qck51zc/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/diwali-2011-diwali-diwali-puja.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=c7e61050-f758-425d-88ce-f9f7d8b253c5</guid>
      <pubDate>Mon, 03 Oct 2011 11:10:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=c7e61050-f758-425d-88ce-f9f7d8b253c5</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=c7e61050-f758-425d-88ce-f9f7d8b253c5</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/diwali-2011-diwali-diwali-puja.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=c7e61050-f758-425d-88ce-f9f7d8b253c5</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=c7e61050-f758-425d-88ce-f9f7d8b253c5</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>धनत्रयोदशी | धनतेरस | Dhantrayodashi  | Dhantrayodashi 2012 | Dhanteras Diwali 2012</title>
      <description>&lt;p&gt;&lt;img src="http://astrobix.com/hindudharm/image.axd?picture=2011%2f10%2fdhantrayodashi.jpeg" alt="" /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;हिंदुओं के महत्वपूर्ण त्यौहार दीवाली का आरंभ धन त्रयोदशी के शुभ दिन से हो जाता है. इस समय हिंदुओं के पंच दिवसीय उत्सव प्रारंभ हो जाते हैं जो क्रमश: धनतेरस से शुरू हो कर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली फिर दीवाली, गोवर्धन (गोधन) पूजा और भाईदूज तक उत्साह के साथ मनाए जाते हैं. पौराणिक मान्यताओं अनुसार धनतेरस के दिन ही भगवान धन्वंतरि जी का प्रकाट्य हुआ था, आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि समुद्र मंथन के समय इसी शुभ दिन अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे. इस कारण इस दिवस को धनवंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है. धनत्रयोदशी के दिन संध्या समय घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाए जाते हैं. इस वर्ष धन तेरस, रविवार, कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष 11 नवम्बर, 2012 को मनाया जाएगा.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;धन त्रयोदशी कथा | Dhan Trayodashi Story&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;धन त्रोदोदशी के पर्व के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है इस कथा के अनुसार &amp;nbsp;समुद्र-मन्थन के दौरान भगवान धन्वन्तरि इसी दिन समुद्र के दौरान एक हाथ में अमृतकलश लेकर तथा दूसरे हाथ में आयुर्वेदशास्त्र लेकर प्रकट होते हैं उनके इस अमृत कलश और आयुर्वेद का लाभ सभी को प्राप्त हुआ धन्वंतरि जी को आरोग्य का देवता, एवं आयुर्वेद का जनक माना जाता है. भगवान धनवीतरि जी तीनों लोकों में विख्यात देवताओं के वैद्य और चिकित्सा के देवता माने गए हैं. इसके साथ ही साथ यह भगवान विष्णु के अंशावतार भी कहे जाते हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;यमदेव की पूजा करने तथा उनके नाम से दीया घर की देहरी पर रखने की एक अन्य कथा है जिसके अनुसार प्राचीन समय में हेम नामक राजा थे, राजा हेम को संतान रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है. वह अपने पुत्र की कुंडली बनवाते हैं तब उन्हें ज्योतिषियों से ज्ञात होता है कि जिस दिन उनके पुत्र का विवाह होगा उसके ठीक चार दिन के बाद उनका पुत्र मृत्यु को प्राप्त होगा. इस बात को सुन राजा दुख से व्याकुल हो जाते हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;कुछ समय पश्चात जब राजा अपने पुत्र का विवाह करने जाता है तो राजा की पुत्रवधू को इस बात का पता चलता है और वह निश्चय करती है कि वह पति को अकाल मृत्यु के प्रकोप से अवश्य बचाएगी. &amp;nbsp;राजकुमारी विवाह के चौथे दिन पति के कमरे के बाहर गहनों एवं सोने-चांदी के सिक्कों का ढेर बनाकर लगा देती है तथा स्वयं रात भर अपने पति को जगाए रखने के लिए उन्हें कहानी सुनाने लगती है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;मध्य रात्रि जब यम रूपी सांप उसके पति को डसने के लिए आता है तो वह उन स्वर्ण चांदी के आभूषणों के पहाड़ को पार नहीं कर पाता तथा वहां बैठकर राजकुमारी का गाना सुनने लगाता है. ऐसे सारी रात बीत जाती है और सांप प्रात: काल समय उसके पति के प्राण लिए बिना वापस चला जाता है. इस प्रकार राजकुमारी अपने पति के प्राणों की रक्षा करती है मान्यता है की तभी से लोग घर की सुख-समृद्धि के लिए धनतेरस के दिन अपने घर के बाहर यम के नाम का दीया निकालते हैं और यम से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें अकाल मृत्यु के भय से मुक्त करें.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;धनतेरस कथा | Dhanteras katha In hindi&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;एक बार भगवान विष्णु जी देवी लक्ष्मी के साथ पृथ्वी में विचरण करने के लिए आते हैं. वहां पहुँच कर भगवान विष्णु लक्ष्मी जी सकते हैं कि वह दक्षिण दिशा की ओर जा रहे हैं अत: जब तक वह आपस न आ जाएं लक्ष्मी जी उनका इंतजार करें और उनके दिशा की ओर न देखें. विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी जी बैचैन हो जाती हैं और भगवान के दक्षिण की ओर जाने पर लक्ष्मी भी उनके पीछे चल देती हैं. मार्ग में उन्हें एक खेत दिखाई पड़ता है उसकी शोभा से मुग्ध हो जाती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;खेत से सरसों के फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करती हैं और कुछ आगे जाने पर गन्ने के खेत से गन्ने तोड़ कर उन्हें खाने लगती हैं. तभी विष्णु जी उन्हें वहां देख लेते हैं अपने वचनों की अवज्ञा देखकर वह लक्ष्मी जी को क्रोधवश श्राप देते हैं कि जिस किसान के खेतों में उन्होंने बिना पूछे आगमन किया वह उस किसान की बारह वर्षों तक सेवा करें. इतना कहकर विष्णु भगवान उन्हें छोड़ कर अंतर्ध्यान हो जाते हैं. देवी लक्ष्मी वहीं किसान के घर सेवा करने लगती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;किसान बहुत गरीब होता है उसकी ऐसी दशा देख कर लक्ष्मी जी उसकी पत्नि को देवी लक्ष्मी अर्थात अपनी मूर्ति की पूजा करने को कहती हैं. किसान कि पत्नि नियमित रूप से लक्ष्मी जी पूजा करती है तब लक्ष्मी जी प्रसन्न हो उसकी दरिद्रता को दूर कर देती हैं. किसान के दिन आनंद से व्यतीत होने लगते हैं और जब लक्ष्मीजी वहां से जाने लगती हैं तो वह लक्ष्मी को जाने नहीं देता. उसे पता चल जाता है कि वह देवी लक्ष्मी ही हैं अत: किसान देवी का का आंचल पकड़ लेता है. तब भगवान विष्णु &amp;nbsp;किसान से कहते हैं की मैने इन्हें श्राप दिया था जिस कारण वो यहां रह रही थी अब यह शाप से मुक्त हो गईं हैं.सेवा का समय पूरा हो चुका है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;इन्हें जाने दो परंतु किसान हठ करने लगता है तब लक्ष्मी जी किसान से कहती हैं कि 'कल तेरस है, मैं तुम्हारे लिए धनतेरस मनाऊंगी तुम कल घर को लीप-पोतकर स्वच्छ रखना संध्या समय दीप जलाकर मेरा पूजन करना इस दिन की पूजा करने से मैं वर्ष भर तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी. यह कहकर देवी चली अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कहे अनुसार लक्ष्मी पूजन किया और उसका घर धन-धान्य से भरा रहा अत: आज भी इसी प्रकार से हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा कि जाती है. ऎसा करने से लक्ष्मी जी का आशिर्वाद प्राप्त होता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;धनत्रयोदशी पूजा | Dhantrayodashi Puja&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;धन त्रयोदशी के दिन घरों को लीप पोतकर कर स्वच्छ किया जाता है ,रंगोली बना संध्या समय दीपक जलाकर रोशनी से लक्ष्मी जी का आवाहन करते हैं. धन त्रयोदशी के दिन नए सामान, गहने, बर्तन इत्यादि ख़रीदना शुभ माना जाता है. इस दिन चांदी के बर्तन ख़रीदने का विशेष महत्व होता है. मान्यता अनुसार इस दिन स्वर्ण, चांदी या बर्तन इत्यादी खरीदने से घर में सुख समृद्धी बनी रहती है. इस दिन आयुर्वेद के ग्रन्थों का भी पूजन किया जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;आयुर्वेद चिकित्सकों का यह विशेष दिन होता है आयुर्वेद विद्यालयों, तथा चिक्कित्सालयों में इस दिन भगवान धन्वन्तरि की पूजा की जाती है. आरोग्य प्राप्ति के लिए तथा जिन व्यक्तियों को शारीरिक एवं मानसिक बीमारियां अकसर परेशान करती रहती हैं, उन्हें भगवान धनवंतरि &amp;nbsp;का धनत्रयोदशी को श्रद्धा-पूर्वक पूजन करना चाहिए ऐसा करने से आरोग्य की प्राप्ति होगी. &amp;nbsp;धनत्रयोदशी को &amp;nbsp;यम के निमित्त दीपदान भी करते हैं जिससे व्यक्ति अकाल मृत्यु के भय से मुक्त होता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;span style="color: #6b6b6b; font-family: Arial, Tohama, Helvetica, sans-serif; line-height: 18px; font-size: small;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #6b6b6b; font-family: Arial; line-height: 18px; white-space: pre-wrap;"&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : &lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4gWUtXh2JwnSaPyeRHzzV4sldj4/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4gWUtXh2JwnSaPyeRHzzV4sldj4/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4gWUtXh2JwnSaPyeRHzzV4sldj4/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4gWUtXh2JwnSaPyeRHzzV4sldj4/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/n_JhVLupClE" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/n_JhVLupClE/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/dhanteras-dhanteras-story-dhantrayodashi-festival-dhanteras-festival-dhanvantari-triodasi.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=b2f96172-23bd-45f6-946c-0240890867aa</guid>
      <pubDate>Sat, 01 Oct 2011 12:30:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <category>Hindu Ritual</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=b2f96172-23bd-45f6-946c-0240890867aa</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=b2f96172-23bd-45f6-946c-0240890867aa</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/dhanteras-dhanteras-story-dhantrayodashi-festival-dhanteras-festival-dhanvantari-triodasi.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=b2f96172-23bd-45f6-946c-0240890867aa</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=b2f96172-23bd-45f6-946c-0240890867aa</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>गोवत्स द्वादशी 2012 | Govatsa Dwadashi 2012 | Govatsa Dwadashi</title>
      <description>&lt;p&gt;यह त्यौहार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मनाया जाता है. वर्ष 2012 में यह त्यौहार 10 नवम्बर, दिन शनिवार को मनाया जाएगा. इस दिन गायों तथा उनके बछडो़ की सेवा की जाती है. सुबह नित्यकर्म से निवृत होकर गाय तथा बछडे़ का पूजन किया जाता है. आधुनिक समय में कई लोगों के घरों में गाय नहीं होती है. वह किसी दूसरे के घर की गाय का पूजन कर सकते हैं. यदि घर के आसपास भी गाय और बछडा़ नहीं मिले तब गीली मिट्टी से गाय तथा बछडे़ को बनाए और उनकी पूजा करें. इस व्रत में गाय के दूध से बनी खाद्य वस्तुओं का उपयोग नहीं किया है;&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;गोवत्स द्वादशी पूजा विधि | Govatsa Dwadashi Puja Vidhi&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इस दिन दूध देने वाली गाय को बछडे़ सहित स्नान कराते हैं. फिर उन दोनों को नया वस्त्र ओढा़या जाता है. दोनों के गले में फूलों की माला पहनाते हैं. दोनों के माथे पर चंदन का तिलक करते हैं. सींगों को मढा़ जाता है. तांबे के पात्र में सुगंध, अक्षत, तिल, जल तथा फूलों को मिलाकर दिए गए मंत्र का उच्चारण करते हुए गौ का प्रक्षालन करना चाहिए. मंत्र है -&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृतेI&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नम:II &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ऊपर लिखे मंत्र का अर्थ है कि समुद्र मंथन के समय क्षीर सागर से उत्पन्न सुर तथा असुरों द्वारा नमस्कार की गई देवस्वरुपिणी माता, आपको बार-बार नमस्कार है. मेरे द्वारा दिए गए इस अर्ध्य को आप स्वीकार करें. इस विधि को करने के बाद गाय को उड़द से बने भोज्य पदार्थ खिलाने चाहिए और निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए प्रार्थना करनी चाहिए. मंत्र है -&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सुरभि त्वं जगन्मातर्देवी विष्णुपदे स्थिता I&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस II&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;तत: सर्वमये देवि सर्वदेवैरलड्कृते I&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;मातर्ममाभिलाषितं सफलं कुरु नन्दिनी II&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;उपरोक्त प्रार्थना का अर्थ है कि हे जगदम्बे, हे स्वर्गवासिनी देवी, हे सर्वदेवमयी आप मेरे द्वारा दिए इस अन्न को ग्रहण करें. सभी देवतओं द्वारा अलंकृत माता नन्दिनी आप मेरा मनोरथ पूर्ण करें. गऊ माता का पूजन करने के बाद गोवत्स की कथा सुनी जाती है. सारा दिन व्रत रखकर रात्रि में अपने इष्टदेव तथा गौमाता की आरती की जाती है. उसके बाद भोजन ग्रहण किया जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;गोवत्स द्वादशी की कथा | Govatsa Dwadashi Katha&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;प्राचीन समय में पूर्व भारत में सुवर्णपुर नाम का नगर था. उस नगर में देवदानी राजा राज्य करता था. उसके पास एक गाय और एक भैंस थी. राजा की दो रानियाँ थी. एक नाम सीता तो दूसरी का नाम गीता था. सीता भैंस से सहेली के समान प्यार करती थी और गीता गाय से सहेली के समान और बछडे़ से पुत्र समान प्यार करती थी. एक दिन भैंस सीता से कहती है कि गाय, बछडा़ होने पर गीता रानी मुझसे ईर्ष्या करती है. सीता कहती है यदि ऎसी बात है तब मैं सब ठीक कर लूंगी. सीता उसी दिन गाय के बछडे़ को काटकर गेहूं की राशि में दबा देती है. इस बात के विषय में किसी को भी पता नहीं चला.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;राजा जब भोजन करने बैठा तो मांस तथा खून की वर्षा होने लगी. महल में सभी ओर खून तथा मांस दिखाई देने लगा. राजा के भोजन की थाली में मल-मूत्र दिखाई देने लगा. ऎसा देखकर राजा को बहुत चिन्ता हुई. उसी समय आकाशवाणी होती है कि हे राजा! तेरी रानी ने गाय के बछडे़ को काटकर गेहूं की राशि में दबा दिया है. इसी कारण यह सब हो रहा है. कल गोवत्स द्वादशी है. इसलिए आप कल भैंस को नगर से बाहर निकालें और गाय तथा बछडे़ की पूजा करें. आप कल गाय का दूध तथा कटे फलों का भोजन में त्याग करें. इससे तुम्हारा पाप नष्ट हो जाएगा और बछडा़ भी जिन्दा हो जाएगा&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :&lt;a href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ILxfY4mIVg9tqBSW-efZH4Ta9OA/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ILxfY4mIVg9tqBSW-efZH4Ta9OA/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ILxfY4mIVg9tqBSW-efZH4Ta9OA/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/ILxfY4mIVg9tqBSW-efZH4Ta9OA/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/QBdS_lJIrTU" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/QBdS_lJIrTU/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/govatsa-dwadashi-2012-govatsa-dwadashi.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=bef90295-e199-416d-b1d1-f1acfd7b908a</guid>
      <pubDate>Fri, 30 Sep 2011 15:50:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=bef90295-e199-416d-b1d1-f1acfd7b908a</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=bef90295-e199-416d-b1d1-f1acfd7b908a</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/govatsa-dwadashi-2012-govatsa-dwadashi.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=bef90295-e199-416d-b1d1-f1acfd7b908a</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=bef90295-e199-416d-b1d1-f1acfd7b908a</feedburner:origLink></item>
    <item>
      <title>नरक चतुर्दशी | नर्क चतुर्दशी | Narak Chaturdashi | Narak Chaturdashi 2012 | Choti Deepavali 2012 | Roop Chaturdashi Pooja | Choti Diwali Pooja</title>
      <description>&lt;p&gt;&lt;img src="http://astrobix.com/hindudharm/image.axd?picture=2011%2f10%2fNarakChaturdashi.jpeg" alt="" /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;कार्तिक माह के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है. नरक चतुर्दशी को नरक चौदस, रुप चौदस, रूप चतुर्दशी, नर्क चतुर्दशी या नरका पूजा के नाम से भी जानते हैं. मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन मुख्य रूप से मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है. इस वर्ष 2012 को नरक चतुर्दशी 12 नवम्बर दिन सोमवार के दिन मनाई जाएगी.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली भी कहा जाता है. दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के दिन संध्या के पश्चात दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं. नरक चतुर्दशी का पूजन कर अकाल मृत्यु से मुक्ति तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यमराज जी की पूजा उपासना की जाती है. इस रात्रि के पूजन एवं दीप जलाने की प्रथा के संदर्भ में पौराणिक कथाएं तथा कुछ लोक मान्यताएं प्रचलित हैं जो इस पर्व के महत्व को परिलक्षित हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;नरक चतुर्दशी पर्व से जुड़ीं कुछ कथाएं | Naraka Chaturdashi Story&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;नरक चतुर्दशी के पर्व के साथ अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. एक पौराणिक कथा के अनुसार रन्ति देव नामक एक राजा हुए थे. वह बहुत ही पुण्यात्मा और धर्मात्मा पुरूष थे सदैव धर्म कर्म के कार्यों में लगे रहते थे. जब उनका अंतिम समय आया तो यमराज के दूत उन्हें लेने के लिए आते हैं. और राजा को नरक में ले जाने के लिए आगे बढते हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;यमदूतों को देख कर राजा आश्चर्य चकित हो उनसे पूछते हैं कि मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया है तो फिर आप लोग मुझे नर्क में क्यों भेज रहे हैं. कृपा कर मुझे मेरा अपराध बताएं जिस कारण मुझे नरक का भागी होना पड़ रहा है. राजा की करूणा भरी वाणी सुनकर यमदूत उनसे कहते हैं कि, हे राजन एक बार तुम्हारे द्वार से एक ब्राह्मण भूखा ही लौट गया जिस कारण तुम्हें नरक जाना पड़ रहा है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;यह सुनकर राजा यमदूतों से विनती करते हुए कहते हैं कि वह उसे एक वर्ष का और समय देने की कृपा करें. राजा का कथन सुनकर यमदूत विचार करने लगते हैं और राजा की आयु एक वर्ष बढा़ देते हैं. यमदूतों के जाने पर राजा इस समस्या के निदान के लिए ऋषियों के पास जाता हैं, उन्हें सारा वृतान्त सुनाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;ऋषि राजा से कहते हैं कि यदि राजन कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें. ब्रह्मणों को भोजन करवा कर उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें तो वह इस पाप से मुक्त हो सकते हैं. ऋषियों के कथन अनुसार राजा कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करता है और इस प्रकार राजा पाप मुक्त हो कर विष्णु लोक में स्थान पाता है. तभी से पापों एवं नर्क से मुक्ति हेतु कार्तिक चतुर्दशी व्रत प्रचलित है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;एक अन्य कथा अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक माह को कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध करके, देवताओं व ऋषियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलवाई थी. इसके साथ ही साथ श्री कृष्ण भगवान ने सोलह हजार कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त करवाया था. इस उपलक्ष पर नगर वासियों ने नगर को दीपों से प्रकाशित किया और उत्सव मनाया तभी से नरक चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाने लगा.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;रूप चतुर्दशी | Roop Chaturdashi&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी भी कहते हैं. रूप चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करनी चाहिए ऎसा करने से रूप सौंदर्य की प्राप्ति होती है. रूप चतुर्दशी से संबंधित एक कथा भी प्रचलित है मान्यता है कि प्राचीन समय पहले हिरण्यगर्भ नामक राज्य में एक योगी रहा करते थे. एक बार योगीराज ने प्रभु को पाने की इच्छा से समाधि धारण करने का प्रयास किया. अपनी इस तपस्या के दौरान उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पडा़. उनकी देह पर कीड़े पड़ गए, बालों, रोओं और भौंहों पर जुएँ पैदा हो गई.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;अपनी इतनी विभत्स दशा के कारण वह बहुत दुखी होते हैं. तभी विचरण करते हुए नारद जी उन योगी राज जी के पास आते हैं और उन योगीराज से उनके दुख का कारण पूछते हैं. योगीराज उनसे कहते हैं कि, हे मुनिवर मैं प्रभु को पाने के लिए उनकी भक्ति में लीन रहा परंतु मुझे इस कारण अनेक कष्ट हुए हैं ऎसा क्यों हुआ? योगी के करूणा भरे वचन सुनकर नारदजी उनसे कहते हैं, हे योगीराज तुमने मार्ग तो उचित अपनाया किंतु देह आचार का पालन नहीं जान पाए इस कारण तुम्हारी यह दशा हुई है.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;नारद जी के कथन को सुन, योगीराज उनसे देह आचार के विषय में पूछते हैं इस पर नारदजी उन्हें कहते हैं कि सर्वप्रथम आप कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन व्रत रखकर भगवान की पूजा अराधना करें क्योंकि ऎसा करने से आपका शरीर पुन: पहले जैसा स्वस्थ और रूपवान हो जाएगा. तब आप मेरे द्वारा बताए गए देह आचार को कर सकेंगे. नारद जी के वचन सुन योगीराज ने वैसा ही किया और उस व्रत के फलस्वरूप उनका शरीर पहले जैसा स्वस्थ एवं सुंदर हो गया. अत: तभी से इस चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी के नाम से जाना जाने लगा.&lt;/p&gt;
&lt;h2&gt;नरक चतुर्दशी पूजा । छोटी दिवाली पूजा विधि | Naraka Chaturdashi Pooja&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;नरक चतुर्दशी के दिन सुबह के समय आटा, तेल और हल्दी को मिलाकर उबटन तैयार किया जाता है. इस उबटन को शरीर पर लगाकर, अपामार्ग (चिचड़ी) की पत्तियों को जल में डालकर स्नान करते हैं. इस दिन विशेष पूजा की जाती है जो इस प्रकार होती है, सर्वप्रथम एक थाल को सजाकर उसमें एक चौमुख दिया जलाते हैं तथा सोलह छोटे दीप और जलाएं तत्पश्चात रोली खीर, गुड़, अबीर, गुलाल, तथा फूल इत्यादि से ईष्ट देव की पूजा करें. इसके बाद अपने कार्य स्थान की पूजा करें. पूजा के बाद सभी दीयों को घर के अलग अलग स्थानों पर रख दें तथा गणेश एवं लक्ष्मी के आगे धूप दीप जलाएं. इसके पश्चात संध्या समय दीपदान करते हैं जो यम देवता, यमराज के लिए किया जाता है. विधि-विधान से पूजा करने पर व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो प्रभु को पाता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;शुभ मुहूर्त जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : &lt;a title="शुभ मुहूर्त" href="http://astrobix.com/muhurta/muhurtafind/"&gt;शुभ मुहूर्त&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/g8U63Ipf1GWX-GXy9iBLAv5Z90s/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/g8U63Ipf1GWX-GXy9iBLAv5Z90s/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/g8U63Ipf1GWX-GXy9iBLAv5Z90s/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/g8U63Ipf1GWX-GXy9iBLAv5Z90s/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~4/t8Vlcjtg1fc" height="1" width="1"/&gt;</description>
      <link>http://feedproxy.google.com/~r/astrobixdotcom-hinduastrology/~3/t8Vlcjtg1fc/post.aspx</link>
      <comments>http://astrobix.com/hindudharm/post/narak-chaturdashi-narak-chaturdashi-2012-choti-deepavali-2012-roop-chaturdashi-pooja-choti-diwali-pooja.aspx#comment</comments>
      <guid isPermaLink="false">http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=57cce4e1-e7ba-42d8-9c73-5e3c91131748</guid>
      <pubDate>Fri, 30 Sep 2011 12:30:00 +1400</pubDate>
      <category>Fasts</category>
      <category>Festivals</category>
      <category>Hindu Ritual</category>
      <dc:publisher>techsupport</dc:publisher>
      <pingback:server>http://astrobix.com/hindudharm/pingback.axd</pingback:server>
      <pingback:target>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=57cce4e1-e7ba-42d8-9c73-5e3c91131748</pingback:target>
      <slash:comments>0</slash:comments>
      <trackback:ping>http://astrobix.com/hindudharm/trackback.axd?id=57cce4e1-e7ba-42d8-9c73-5e3c91131748</trackback:ping>
      <wfw:comment>http://astrobix.com/hindudharm/post/narak-chaturdashi-narak-chaturdashi-2012-choti-deepavali-2012-roop-chaturdashi-pooja-choti-diwali-pooja.aspx#comment</wfw:comment>
      <wfw:commentRss>http://astrobix.com/hindudharm/syndication.axd?post=57cce4e1-e7ba-42d8-9c73-5e3c91131748</wfw:commentRss>
    <feedburner:origLink>http://astrobix.com/hindudharm/post.aspx?id=57cce4e1-e7ba-42d8-9c73-5e3c91131748</feedburner:origLink></item>
  </channel>
</rss>

