<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271</id><updated>2026-06-06T21:32:54.445-05:00</updated><category term="मुद्दों का बजार"/><category term="बहस बजार"/><category term="मेरी आवाज़ सुनो"/><category term="नाजायज औलादें"/><category term="कबिताई"/><category term="दोस्तो के खोखे"/><category term="थोडा रूमानी  हो जाये"/><category term="थोडा रूमानी हो जाये"/><category term="कहानी"/><category term="मि‍लेगा तो देखेंगे"/><category term="इतिहासी बजार"/><category term="मेरा नॉर्वे प्रवास"/><category term="पद्य के कोने"/><category term="फेसबुक के फ्रॉड"/><category term="सर्वाधिकार 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जी"/><category term="फ्री सेक्‍स का पोस्‍टमार्टम"/><category term="बाल बजार"/><category term="रोज़ एक प्रश्न"/><title type='text'>bajaar</title><subtitle type='html'>समाचार, वि‍चार, व्‍यवहार और सारा संसार </subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>461</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-2105743951731826868</id><published>2026-03-28T10:23:00.000-05:00</published><updated>2026-03-28T10:23:58.963-05:00</updated><title type='text'>होकर रहेगी नमाज, औकात में रहे बुलडोजर </title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;i&gt;&quot;इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आर्टिकल 25 की व्याख्या करते हुए कहा कि निजी जगह पर नमाज, दुआ या पूजा मौलिक अधिकार है, लेकिन धर्म के नाम पर दूसरे समुदाय के खिलाफ भड़काने की इजाजत संविधान नहीं देता।&quot;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjpuQjr1X08TQalmpHwlqOEXS2ROpn5HaFjyPUPZsPWgRkfcZuFa2DvkpbvLds_6he33oktVbt5i40flLm7WUQ90PxzoDZwq8ag5Wdxjh1NLTQPuTkbPt5Fr_zZS7YuLs1kHoDzMUbanp_UJYX6Q_QpOeeL6nTkNDElzYqqnAqDRWY4hlejsDVpVogEYcEd/s1280/WhatsApp%20Image%202026-03-28%20at%208.13.48%20PM.jpeg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;720&quot; data-original-width=&quot;1280&quot; height=&quot;180&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjpuQjr1X08TQalmpHwlqOEXS2ROpn5HaFjyPUPZsPWgRkfcZuFa2DvkpbvLds_6he33oktVbt5i40flLm7WUQ90PxzoDZwq8ag5Wdxjh1NLTQPuTkbPt5Fr_zZS7YuLs1kHoDzMUbanp_UJYX6Q_QpOeeL6nTkNDElzYqqnAqDRWY4hlejsDVpVogEYcEd/s320/WhatsApp%20Image%202026-03-28%20at%208.13.48%20PM.jpeg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://www.youtube.com/watch?v=pv87n7Jv40U&amp;amp;t=24s&quot;&gt;इलाहाबाद हाईकोर्ट&lt;/a&gt; ने कहा है कि भारत के संविधान का आर्टिकल 25 देश में हर धर्म के लोगों को इबादत के लिए इकट्ठा होने का हक देता है, लेकिन यह दुआ के बहाने एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ भड़काने की इजाजत नहीं देता। साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी आदमी की अपनी निजी जगह पर की जाने वाली दुआ या धार्मिक कार्यक्रम पर कोई रोक या रुकावट नहीं हो सकती, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। ये बातें जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहीं। याचिका में कहा गया कि योगी आदित्यानाथ का प्रशासन याचिकाकर्ता (मुनाजिर खान) को उस जगह पर नमाज पढ़ने से रोक रहा था, जहां याचिकाकर्ता का कहना है कि एक मस्जिद है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;याचिकाकर्ता का कहना था कि रमजान के दौरान बड़ी संख्या में लोग आकर नमाज पढ़ना चाहते हैं और एक समय पर नमाज पढ़ने वालों की संख्या पर कोई पाबंदी नहीं हो सकती। 27 फरवरी को इस मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश प्रशासन का फैसला खारिज कर दिया, जिसमें रमजान के दौरान नमाज पढ़ने वालों की संख्या सीमित की गई थी। कोर्ट ने कहा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है। बेंच ने यह भी कहा कि अगर पुलिस अधीक्षक और जिला कलेक्टर को कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर है और इसलिए वे इबादत करने वालों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो इस्तीफा दे देना चाहिए या अपना तबादला करवा लेना चाहिए, अगर वे कानून का राज लागू नहीं कर पा रहे हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;16 मार्च को जब यह मामला फिर से आया तो सबसे बड़ी बात यह हुई कि योगी आदित्यनाथ की सरकार न सिर्फ अपनी बात से पलट गई, बल्कि भरी अदालत में झूठ भी बोलने लगी। आगे सुनिए कि अजय सिंह बिष्ट की सरकार ने कैसे अदालत को बरगलाने की कोशिश की। 16 मार्च को हुई सुनवाई में एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल ने वकील प्रियंका मिधा की मदद से अदालत को यह समझाने की कोशिश की कि 27 फरवरी के ऑर्डर में 20 लोगों की पाबंदी का जिक्र याचिकाकर्ता के वकील की गलतबयानी की वजह से आ गया, और राज्य ने असल में कभी ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाई। कोर्ट ने अजय सिंह बिष्ट उर्फ आदित्यनाथ की सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 27 फरवरी का ऑर्डर खुली अदालत में दोनों पक्षों की मौजूदगी में दिया गया था। फिर जब ऑर्डर लिखा जा रहा था, तब राज्य की तरफ से कोई आपत्ति नहीं की गई।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोर्ट ने उस सप्लीमेंट्री हलफनामे को भी देखा, जिसमें उस जगह की तस्वीरें थीं। ये हलफनामा याचिकाकर्ता ने दिया था। यह सब देखने के बाद बेंच ने कहा कि जिस इमारत की बात हो रही है, वह आज की तारीख में मस्जिद नहीं है। हालांकि, यह देखते हुए कि उस जगह का इस्तेमाल पहले नमाज पढ़ने के लिए होता था, कोर्ट ने कहा कि उसी जगह पर नमाज पढ़ने वालों को कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। इस तरह कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए राज्य को कहा कि वह &#39;मरानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य&#39; मामले में अपने पहले के फैसले का पूरा ध्यान रखे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस मामले में इसी बेंच ने इस साल जनवरी में कहा था कि किसी भी नागरिक को धार्मिक पूजा करने के लिए कानून के तहत किसी भी तरह की अनुमति की जरूरत नहीं होती। यह भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के तहत उसका मौलिक अधिकार है, अगर वह अपनी निजी जमीन पर पूजा कर रहा हो। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कोई व्यक्ति या कोई समूह अपनी निजी जगह पर पूजा करता है और उसके खिलाफ कोई आपत्ति आती है, तो राज्य को उस पर ध्यान देना चाहिए। जरूरत पड़े तो पूजा की जगह और पूजा करने वालों को सुरक्षा भी दी जानी चाहिए। हालांकि राज्य ने कहा कि वह किसी भी धर्म के लोगों द्वारा अपनी निजी जमीन पर या अपने पूजा स्थल पर की जाने वाली पूजा में कोई दखल या रुकावट नहीं डालेगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी कहा कि वह यह सुनिश्चित करे कि 1995 से उस जगह पर चली आ रही परंपराओं का सख्ती से पालन हो। इस मामले को खत्म करते हुए कोर्ट ने &lt;a href=&quot;https://www.youtube.com/watch?v=pv87n7Jv40U&amp;amp;t=24s&quot;&gt;आर्टिकल 25 &lt;/a&gt;पर अहम बातें कहीं। कोर्ट ने कहा कि दुआ के लिए इकट्ठा होना अब्राहमिक धर्मों का एक हिस्सा है और यह कानून इबादत के लिए ऐसे इकट्ठा होने को सुरक्षा देता है। बेंच ने कहा, &#39;यहूदी शुक्रवार को शब्बत के लिए सिनेगॉग में इकट्ठा होते हैं। शनिवार उनके धर्म के अनुसार आराम और सोच का दिन होता है। ईसाई रविवार को चर्च में मास के लिए इकट्ठा होते हैं, और मुसलमान शुक्रवार की दोपहर की नमाज के लिए मस्जिद में इकट्ठा होते हैं। इसके उलट, हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म जैसे पूर्वी धर्मों में मंदिरों में पूजा के लिए इकट्ठा होने के कोई तय दिन नहीं होते। इन धर्मों के लोग त्योहारों के समय इकट्ठा होते हैं, जिसमें पूजा भी शामिल होती है।&#39;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बेंच ने साफ कहा कि आर्टिकल 25 दुआ के बहाने एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ भड़काने की इजाजत नहीं देता। बेंच ने कहा, &#39;(आर्टिकल 25) ऐसे कामों पर रोक लगाता है, जिनसे एक धर्म के लोग दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाएं और सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने का खतरा हो। ऐसा करने पर वह काम आर्टिकल 25 की सुरक्षा से बाहर हो जाएगा। ऐसा करने वाले व्यक्ति को आपराधिक कानून के तहत सख्त सजा मिल सकती है।&#39;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आर्टिकल 25 का मतलब यह नहीं है कि यह भारत में इस्लाम धर्म के लोगों को कोई खास दर्जा देता है। कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 25 धर्म और आस्था के मामले में पूरी तरह निष्पक्ष है। इसके तहत एक नास्तिक व्यक्ति भी अपनी सोच, समझ और विज्ञान के आधार पर यह मान सकता है, उसका पालन कर सकता है और उसका प्रचार कर सकता है कि भगवान का कोई अस्तित्व नहीं है। बेंच ने आगे कहा, &#39;इस गणतंत्र की ताकत इसकी सहनशीलता में है। यह देश 1.4 अरब लोगों का घर है और इसकी ताकत इसकी अलग-अलग धर्म, संस्कृति और भाषाओं की विविधता से आती है। दुनिया में ऐसा कोई दूसरा देश नहीं है, जहां इतने अलग-अलग धर्म, संस्कृति और भाषाएं सदियों से शांति और आपसी सम्मान के साथ साथ रह रही हों, और जिसे भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के तहत कानूनी मान्यता मिली हो।&#39;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन बातों के साथ ही रिट याचिका को खत्म कर दिया गया। साथ ही राज्य सरकार से कहा गया कि इस ऑर्डर की एक कॉपी उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) तक पहुंचाई जाए, ताकि इसे राज्य में कानून-व्यवस्था लागू करने वाले सबसे निचले स्तर के अधिकारियों तक पहुंचाया जा सके।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब आइए देखते हैं कि भारत के संविधान के आर्टिकल 25 में है क्या, ये कहता क्या है-&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में धर्म, आस्था और पूजा की आजादी बहुत अहम मानी जाती है। इसी आजादी को सुरक्षित करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 25 दिया गया है। यह अनुच्छेद हर नागरिक को अपनी अंतरात्मा के मुताबिक किसी भी धर्म को मानने, उस पर चलने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसमें नंबर 1 है आस्था की आजादी। अनुच्छेद 25 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सिर्फ धर्म मानने का ही नहीं, बल्कि ‘अंतरात्मा की आजादी’ का अधिकार देता है। यानी कोई व्यक्ति चाहे तो किसी धर्म को माने, बदल ले या किसी भी धर्म को न माने - यह उसका निजी फैसला है। एक नास्तिक व्यक्ति भी इसी अधिकार के तहत अपनी सोच पर कायम रह सकता है। नंबर 2 है धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार। यानी यह अनुच्छेद तीन अहम अधिकार देता है: एक, धर्म को मानना, दो, धर्म के अनुसार जीवन जीना और तीन, अपने धर्म का प्रचार करना। लेकिन यह प्रचार जबरदस्ती नहीं हो सकता। किसी को बहकाकर, दबाव डालकर या लालच देकर धर्म बदलवाना इस अधिकार के दायरे में नहीं आता।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नंबर 3 इसका प्वाइंट है सभी धर्मों के लिए बराबरी। अनुच्छेद 25 की एक और बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह निष्पक्ष है। इसमें किसी एक धर्म को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या कोई भी अन्य धर्म - सभी को बराबर हक मिलता है। यही भारत की धर्मनिरपेक्षता (secularism) की असली ताकत है। नंबर 4 है निजी और सार्वजनिक पूजा की आजादी। यह अनुच्छेद व्यक्ति को अपनी निजी जगह पर पूजा या इबादत करने की पूरी छूट देता है। साथ ही लोग सामूहिक रूप से भी इकट्ठा होकर धार्मिक गतिविधियां कर सकते हैं। लेकिन यह सब कानून और व्यवस्था के दायरे में रहकर ही होना चाहिए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नंबर 5 में यह सीमाएं भी देता है। यानी अनुच्छेद 25 पूरी तरह असीमित नहीं है। इस पर कुछ जरूरी शर्तें भी लागू होती हैं: एक, सार्वजनिक व्यवस्था (law and order), दो, नैतिकता (morality), और तीसरा है स्वास्थ्य (health)। अगर कोई धार्मिक गतिविधि इन चीजों को नुकसान पहुंचाती है, तो राज्य उस पर रोक लगा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी धार्मिक कार्यक्रम से हिंसा भड़कने का खतरा हो, तो प्रशासन हस्तक्षेप कर सकता है। हो सकता है अजय सिंह बिष्ट के प्रशासन ने इसी आधार पर रोक लगाई हो। नंबर 6 है सामाजिक सुधार का रास्ता। अनुच्छेद 25 राज्य को यह भी अधिकार देता है कि वह सामाजिक सुधार के लिए कानून बना सके, भले ही वह किसी धार्मिक प्रथा को प्रभावित करे। जैसे सती प्रथा या देवदासी प्रथा जैसी कुप्रथाओं पर रोक लगाना। नंबर 7 है विविधता में एकता की पहचान। भारत में अलग-अलग धर्म, परंपराएं और मान्यताएं हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अनुच्छेद 25 इन सबको साथ लेकर चलने की संवैधानिक नींव देता है। यह सुनिश्चित करता है कि हर व्यक्ति अपने विश्वास के साथ जी सके, बिना किसी डर या भेदभाव के। अनुच्छेद 25 सिर्फ एक कानूनी प्रावधान नहीं है, बल्कि भारत की आत्मा को दर्शाता है। यह व्यक्ति की आजादी, समानता और विविधता का सम्मान करता है। साथ ही यह संतुलन भी बनाए रखता है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता दूसरों के अधिकारों या समाज की शांति को नुकसान न पहुंचाए। इसी संतुलन की वजह से अनुच्छेद 25 भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक माना जाता है।&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/2105743951731826868/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/2105743951731826868' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/2105743951731826868'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/2105743951731826868'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2026/03/blog-post_28.html' title='होकर रहेगी नमाज, औकात में रहे बुलडोजर '/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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भी अब ढके छुपे ही सही, लेकिन इस मसले पर आवाज उठाने लगे हैं। एक दो नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तीन-तीन जजों ने इस मसले पर आवाज उठाई है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम पहले ऐसे जजों की हिफाज़त करने में नाकाम रहा है, जिन्होंने हिम्मत और ईमानदारी दिखाई। उन्होंने जज लोया का नाम तो नहीं लिया, लेकिन जुडिशरी के हालिया इतिहास में अगर हम जज लोया के साथ ऐसा होते नहीं देखते हैं तो क्या जस्टिस रंजन गोगोई, या जस्टिस चंद्रचूड़ के साथ ऐसा होते हुए देखते हैं।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि ऐसी बातों की वजह से जज अपने करियर की तरक्की के बजाय सही और ईमानदार रास्ता चुनने से पीछे हट सकते हैं। नाम तो नहीं लिया उन्होंने, लेकिन कहने को तो यह कहा ही जा सकता है कि जस्टिस अरुण मिश्रा बन सकते हैं या दीपक मिश्रा भी बन सकते हैं। जस्टिस दत्ता ने कहा कि कई जजों में बड़े भले के लिए नुकसान उठाने का हौसला और मजबूत यकीन रहा है। लेकिन आज के वक्त में कितने जज अपने करियर की तरक्की के बजाय ईमानदारी को आगे रखेंगे? क्या आप उनसे यह उम्मीद करते हैं कि जो बातें वो दूसरों को समझाते हैं, उन पर खुद भी ईमानदारी से अमल करेंगे? यह एक कड़वी सच्चाई है, जिसे मानना आसान नहीं है। पहले भी कई ऐसे मामले रहे हैं, जहां जो लोग इस रास्ते पर चले, उन्हें कॉलेजियम की तरफ से कोई हिफाज़त नहीं मिली, यानी यह यकीन नहीं दिलाया गया कि उन्हें उनकी ईमानदारी की वजह से परेशान नहीं किया जाएगा।&#39;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जस्टिस दत्ता &#39;न्यायिक शासन की नई सोच&#39; पर हुए &#39;पहले&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;https://www.youtube.com/watch?v=SFr9xByPARw&amp;amp;t=82s&quot;&gt;सुप्रीम कोर्ट&amp;nbsp;&lt;/a&gt;बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026&#39; में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम के लोगों को इस मौके पर आगे आना चाहिए और अपने साथ काम करने वाले जजों की हिफाज़त करनी चाहिए। उन्होंने जस्टिस बी.वी. नागरत्ना से भी अपील की, जो मंच पर मौजूद थीं और कॉलेजियम की मेंबर भी हैं। उन्होंने जस्टिस बीवी नागरत्ना से कहा कि &#39;कॉलेजियम के मेंबर के तौर पर मैं आपसे गुज़ारिश करता हूं कि आप आगे आएं और उन जजों के साथ खड़ी हों और उनकी हिफाज़त करें, जो वही करते हैं जो आपने अपने उस खास भाषण में कहा था।&#39; जस्टिस दत्ता, सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के एक भाषण का जिक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि जजों को सही फैसला लेने में झिझकना नहीं चाहिए, चाहे इसकी कीमत उन्हें अपने प्रमोशन के रूप में चुकानी पड़े या इससे हुकूमत में बैठे लोग नाराज़ हो जाएं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बता दें कि इसी महीने यानी मार्च में केरल हाई कोर्ट में हुए &#39;दूसरे टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर मेमोरियल लेक्चर&#39; में बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि &#39;भले ही जजों को पता हो कि गैर-लोकप्रिय फैसलों की कीमत उन्हें बतौर अपने प्रमोशन, या एक्सटेंशन में चुकानी पड़ सकती है, या इससे वो हुकूमत में बैठे लोगों की नजर में नीचे गिर सकते हैं। लेकिन यह बातें उनके फैसलों के रास्ते में नहीं आनी चाहिए। आखिर में हर जज का अपना मजबूत यकीन, हिम्मत और आज़ादी ही सबसे ज्यादा अहम होती है। जज के तौर पर हमें हमेशा अपने ओहदे की कसम का पालन करना चाहिए, जो उनका &#39;कानूनी फर्ज&#39; है, और अपने करियर पर पड़ने वाले असर की परवाह किए बिना उस पर खरा उतरना चाहिए।&#39; जस्टिस नागरत्ना की बात से भी कहीं न कहीं ये तो लगता ही है&amp;nbsp; कि जज लोया का भूत&amp;nbsp; आज तक जजों के सिर पर चढ़कर नाच रहा है। भारत के जज अब मोदी सरकार से क्या पूरी तरह डर चुके हैं, या कुछ जजाों में जस्टिस मुरलीधर या जस्टिस अुतल श्रीधरन जैसी हिम्मत बाकी है?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैसे जस्टिस दत्ता या जस्टिस नागरत्ना ही नहीं, जस्टिस उज्जवल भुइयां भी इस मसले पर बोले हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को वॉर्निंग दी कि जुडिशरी के कुछ हिस्सों में मौजूद &quot;राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार होने की मानसिकता&quot; के चलते आरोपी व्यक्तियों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा है। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रवृत्तियों के कारण लोग महीनों और सालों तक जेल में ही रह जाते हैं, खासकर उन मामलों में जहाँ कड़े कानून लागू होते हैं। जस्टिस भुइयां ने कहा “जुडिशरी के भीतर कई लोग ‘राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार’ होने की मानसिकता से ग्रस्त हैं। नतीजतन, लोग महीनों-महीनों तक जेलों में सड़ते रहते हैं।” जुडिशरी के भीतर कई लोग ‘राजा से भी ज़्यादा वफ़ादार’ होने की मानसिकता से ग्रस्त हैं। क्या जस्टिस भुइयां का इशारा उमर खालिद की ओर था, जिसे कि सभी जानते हैं कि सिर्फ और सिर्फ मोदी और अमित शाह के चलते जेल में रखा गया है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बात जब राजा की आ ही गई है, तो देखते हैं कि कैसे जस्टिस नागरत्ना ने मोदी सरकार की वो पोल भी खोली, जिसमें ये भगवा झंडे बार बार अदालत पहुंच जाते हैं। जस्टिस नागरत्ना ने सरकार के उस उल्टे रवैये को सामने रखा, जिसमें वो केसों के ढेर पर फिक्र भी जताती है, और खुद ही सबसे ज्यादा केस डालकर उस ढेर को बढ़ाती भी है। सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अदालतों में पड़े मुकदमों के ढेर को लेकर सरकार पर खुलकर बात की। उन्होंने साफ कहा कि केसों का ढेर बढ़ने के लिए सरकार भी जिम्मेदार है। उनका कहना था कि सरकार का तरीका सीधा नहीं है। एक तरफ वो कहती है कि केस ज्यादा हो गए हैं, दूसरी तरफ खुद ही सबसे ज्यादा केस डालती है और बार-बार अपील करती है, जिससे मसला और बड़ा हो जाता है। जस्टिस नागरत्ना ने सरकार के केस लड़ने के तरीके पर सख्त सवाल उठाए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने साफ कहा कि सरकार बहुत ज्यादा केस डालती है और हर बात पर अपील करती है, यही सबसे बड़ी वजह है केसों के ढेर की। उन्होंने कहा कि यह अजीब बात है कि सरकार खुद ही ढेर बढ़ाती है और फिर उसी पर चिंता भी जताती है। उन्होंने कहा, &quot;इससे एक अजीब हालत बन जाती है। सरकार खुद ही शिकायत करती है और खुद ही समस्या भी खड़ी करती है।&quot; उन्होंने कहा कि सरकार से उम्मीद होती है कि वो सोच-समझकर केस डाले, लेकिन इसके उलट वो हर केस को आखिर तक खींचती रहती है। उन्होंने कहा, &quot;सरकार से उम्मीद होती है कि वो एक अच्छा वादी बने, लेकिन ऐसा नहीं होता। वो हर केस को आख़िर तक लड़ती रहती है। सरकार सिर्फ एक पक्ष नहीं है, बल्कि सबसे ज्यादा केस पैदा करने वाली भी है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहीं जस्टिस दत्ता ने यह सवाल भी उठाया कि लोग क्यों कहते हैं कि कॉलेजियम सिस्टम नाकाम हो गया है। उन्होंने पूछा: अगर कॉलेजियम सिस्टम शुरू से ही संविधान का हिस्सा होता, तो डॉ. बी.आर. अंबेडकर इसके बारे में क्या कहते? डॉ. अंबेडकर की इस बात का हवाला देते हुए, &#39;संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं हैं, तो वह बुरा साबित होगा। और संविधान कितना भी कमजोर क्यों न हो, अगर उसे चलाने वाले लोग अच्छे हैं, तो वह अच्छा साबित होगा,&#39; जस्टिस दत्ता ने कहा कि आखिर में सही लोगों को चुनने की जिम्मेदारी जजों पर ही होती है। उन्होंने कहा कि जजों का चुनाव सिर्फ योग्यता से नहीं, बल्कि काबिलियत, ईमानदारी, स्वभाव और मेहनत को देखकर होना चाहिए। &#39;असली फैसला एक साफ और निष्पक्ष सोच पर होना चाहिए, जो पूरी तरह रिकॉर्ड पर मौजूद बातों पर टिका हो। फैसले जजों के दिए गए फैसलों, रिपोर्ट किए गए मामलों, पेशेवर जांच, लिखे गए काम और दस्तावेजों में दर्ज उनके व्यवहार के आधार पर होने चाहिए। और आखिरी बात, दूसरा पॉइंट भी बहुत अहम है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने कहा कि निजी जान-पहचान, सामाजिक करीबियां, लॉबिंग, गैर-औपचारिक सिफारिशें, या हुकूमत में बैठे लोगों के साथ कथित रिश्ते — चाहे वह न्यायिक हों, राजनीतिक हों या किसी और तरह के — इन सबको पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए।&#39; अपने भाषण में जस्टिस दत्ता ने यह भी राय दी कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाकर कम से कम 40 कर दी जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि आखिरी बार 2019 में जजों की संख्या बढ़ाकर 34 की गई थी, और उसके बाद से मामलों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। इससे पहले जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कोलेजियम की भी पोल खोली थी। इसी महीने यानी मार्च में उन्होंने कहा था कि कॉलेजियम में साफगोई की इतनी कमी है साफ़गोई में कि खुद जजों को भी अक्सर यह नहीं पता होता कि कॉलेजियम कैसे काम करता है और कहां बैठकर फैसले करता है। उन्होंने कहा था कि &quot;आपको यह सुनकर हैरानी होगी कि हमें सिर्फ यह नहीं पता कि क्या चल रहा है... हमें तो यह भी नहीं पता कि कॉलेजियम कहां बैठ रहा है।&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दरअसल मौजूदा सीजेआई सूर्यकांत जबसे आए हैं, तभी से कोर्ट कचेहरी के गलियारों में यह चर्चा आम है कि आखिर कॉलेजियम चला कौन रहा है। इसे सुप्रीम कोर्ट के जज साहबान चला रहे हैं या सरेंडर सिलेंडर मोदी सरकार चला रही है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जस्टिस मुरलीधर के रातोंरात ट्रांसफर को लेकर बदनाम हुए सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन के ट्रांसफर को लेकर फिर से बदनामी का भगवा चोला ओढ़ लिया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन सीनियॉरिटी में इस वक्त किसी न किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बनने की अहमियत रखते थे। लेकिन मोदी सरकार के कहने पर उनको मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में भेज दिया गया। न सिर्फ भेज दिया गया, बल्कि वहां उनकी सीनियॉरिटी सातवें नंबर पर बना दी गई, ताकि वो हाई कोर्ट के कॉलेजियम में भी न रहने पाएं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहीं उनसे जूनियर जज एसए धर्माधिकारी को सरेंडर मोदी के हक में फैसले सुनाने के चलते मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया। और सीजेआई संजीव खन्ना के बाद, या कि कहें कि पिछले सीजेआई बीआर गवई के बाद से जबसे ये नए वाले सीजेआई सूर्यकांत आए हैं, सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने अपनी डिटेल वेबसाइट पर डालनी ही बंद कर दी है। मतलब पहले जनता को हक था, और हक तो खैर अब भी है सब कुछ जानने का, लेकिन कॉलेजियम में सीजेआई सूर्यकांत ऐसा क्या कर रहे हैं कि हर चीज में पर्दादारी है। उनकी इसी पर्दादारी के खिलाफ रीढ़ सीधी रखने वाले कुछ जज बोलने लगे हैं। जाहिर है, कि पहले जज लोया, फिर जस्टिस मुरलीधर, फिर जस्टिस अतुल श्रीधरन, यानी जजों को ये मोदी सरकार आजादी से कहीं भी काम न करने देने को जिस तरह से आमादा है, कुछेक जज ही सही, लेकिन आवाज तो उठने ही लगी है।&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/4938964746050693525/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/4938964746050693525' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/4938964746050693525'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/4938964746050693525'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2026/03/blog-post.html' title=' सबको जज लोया बनाने पर उतारू मोदी-शाह'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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कहते हैं क्योंकि आलोचक नाम की संस्था का हाल अब कुछ आलू की चाट की तरह है। फिर चाहे आलूचक हिंदी साहित्य में हों, या राजनीति में। अब जैसे इसी मीम को जिसने बनाया, अगर उसका दिमाग पढ़ें तो उसे सिर्फ सड़कें दिख रही हैं, बल्कि नहीं भी दिख रही हैं। ऐसे ही सड़क पर बना गड्ढा दिख रहा है, मगर सड़क के नीचे की सुरंग नहीं दिख रही है। आलोचक का काम है गहरे से गहरे देखना, जैसा कि इन दिनों हिंदी साहित्य के गैंगेस्टर्स दो कमरों में गहरे से गहरे घुसकर देख रहे हैं। जबकि हिंदी साहित्य के वे गैंगेस्टर्स, जो आलूचक हैं, वे बस दरवाजे पर बिना दस्तक दिए लौट आ रहे हैं, और अपने पड़ोसी से पूछ रहे हैं कि- अरे मगर हुआ क्या था? बहरहाल, हम हिंदी साहित्य के इन गैंगेस्टरों पर बात नहीं कर रहे हैं, हम तो बस एक सुरंग की बात कर रहे हैं। एक सुरंग, जो आकाशीय चमत्कार से हमारे सामने आई। यह ईश्वर की कृपा है, जो वह हमें यह लीला दिखा रहे हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEg7IRqTVGEVpWo7MncVdpaseRMYAzt_GIhH_pu5u5Z_PsBd1Y1XoZtb9dDjEFqpNVuMFqDA34ult9jleGqnwo5Pr-McTQgHhIyhJZbbkGjQKW2aX4ow09EufLkrjAU8gS9MXuQMFWSDIom6GyXrhv1PvFiJcydyDLmZF29JJLdi2XSyJA7FzLTnD5ariIxs&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; data-original-height=&quot;1000&quot; data-original-width=&quot;1000&quot; height=&quot;436&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEg7IRqTVGEVpWo7MncVdpaseRMYAzt_GIhH_pu5u5Z_PsBd1Y1XoZtb9dDjEFqpNVuMFqDA34ult9jleGqnwo5Pr-McTQgHhIyhJZbbkGjQKW2aX4ow09EufLkrjAU8gS9MXuQMFWSDIom6GyXrhv1PvFiJcydyDLmZF29JJLdi2XSyJA7FzLTnD5ariIxs=w436-h436&quot; width=&quot;436&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आलूचक इसे सड़क में बना गड्ढा मानता है, लेकिन आलोचक इसे सुरंग मानते हैं। और आप जरा सुरंग के किनारों को देखिए। यह बिल्कुल नई सुरंग है। और सुंरग जब भी बनती है, तो जाहिर है कि उसमें सिर्फ दो सवालों के उत्तर होते हैं। सुरंग आ कहां से रही है, और सुरंग जा कहां को रही है। सीमित सूचनाओं के प्रतिमानी पुरुषों का ऐसा मानना है कि यह सुरंग सीजफायर के बाद इमरजेंसी में सरेंडर करने के लिए बनाई है। ऐसी अपुष्ट खबरें भी हैं कि सुरंग का नक्शा बक्से में बंद करके परिधानमंत्री निवास में मोर की रक्षा में रखा गया है। कोई पूछ सकता है कि परिधानमंत्री तो दिल्ली में, सुरंग ग्वालियर में ही क्यों? गुजरात में क्यों नहीं? ऐसे सवाल नादान ही पूछ सकते हैं। इतिहास के गंभीर अध्येता के उंगली दिल्ली से गुजरात कभी नहीं उठेगी। उसकी उंगली ग्वालियर की ओर ही उठेगी। ग्वालियर का सरेंडर का अपना सुनहरा अतीत रहा है। एक पूरी परंपरा रही है, जो गदर से लेकर अब तक दिल्ली आती-जाती रही है।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आलूचकों की दिक्कत यह होती है कि वे सही समय पर सही इतिहास नहीं याद कर सकते। पहले कुछ याद भी रखते थे, मगर अब हमारी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के कोर्स ज्यादा याद रखते हैं। मसलन, इन दिनों हिंदी साहित्य के गैंगेस्टरों के बीच एक से बढ़कर एक सूचनाएं फर्राटा भर रही हैं, जिनकी सत्यता का प्रमाण स्वयं उसका लेखक है। हिंदी साहित्य के इन लेखकों से क्या ज्यादा अच्छा नहीं होगा कि हम जीवन में उस सुरंग के बारे में जानें, जो पहले अपनी रियासत, और अब हमारे मुल्क के सरेंडर के लिए बनाई गई है? इस सुरंग को ध्यान से देखेंगे तो आपको दो जोड़ी कदमों के निशान भी दिखेंगे। यानी यह सुरंग न सिर्फ नई है, बल्कि यह हाल ही में प्रयोग में भी लाई गई है। आलोचक ने इस सुरंग को सेटेलाइट से भी देखा। यह सैटेलाइट से भी सुरंग ही दिखती है, गड्ढा नहीं दिखती। बड़ी बात यह कि नासा के सुरंग खोजी सैटेलाइट ने भी इसे सैटलाइट पर मार्क कर रखा है, जिसका नंबर है- SM014IN56. इतने सारे सबूतों को ध्यान में रखते हुए आलोचक आलूचकों से प्रार्थना करता है कि वे इस तस्वीर को वैसे ना देखें, जैसा इस मीम को बनाने वाला दिखाना चाह रहा है। इसे नासा की नजर से देखें।&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/8101143087744520512/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/8101143087744520512' title='0 Comments'/><link rel='edit' 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है, क्योंकि उनका घर तीन मंजिला इमारत पर है, जिसमें वो सबसे ऊपरी मंजिल पर रहते हैं। लॉन किस तरह से हमारे दिमाग में उगा है, इसके बारे में युवाल नोआ हरारी कुछ काम की बातें बताते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;float: left; margin-right: 1em; text-align: left;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEhapZh5-l870mVxMQcsoU2CBcMc0S9fXpLjp_cJkCroIpBQ-vtkYP44hjRBzJ8Urg3kW8lrvEkFhFLrRNYMoy6r6idvHImB9hsIm88DegUUsovkDrbIuWZArB3WBw_7oG1OJZT2d4ruzGpdJFXiUcBiiwr6u7GX0OiHVjjmCVtZeteCi5rM__aD_zI6Zxv4&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; data-original-height=&quot;1467&quot; data-original-width=&quot;2200&quot; height=&quot;213&quot; 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जमाईं, और यह अभिजात वर्ग की ख़ास पहचान बन गई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुव्यवस्थित लॉन ज़मीन की और ढेर सारे काम की मांग करते थे, ख़ासतौर से उससे पहले के दिनों में, जब घास काटने की मशीनें और पानी का छिड़काव करने वाले स्वचालित उपकरण नहीं हुआ करते थे। बदले में, वे कोई मूल्यवान चीज़ नहीं उपजाते थे। आप उन पर जानवरों तक को नहीं चरा सकते थे, क्योंकि वे घास को खाते और उसको रौंद देते। ग़रीब किसान लॉनों पर अपनी क़ीमती ज़मीन और वक़्त बर्बाद नहीं कर सकते थे। इसलिए सामन्ती क़िलों के प्रवेश-द्वार पर विशुद्ध घास के मैदान प्रतिष्ठा के ऐसे प्रतीक हुआ करते थे, जिनकी नक़ल कोई नहीं कर सकता था। वह आने-जाने वालों के सामने पूरी दबंगई के साथ यह दावा करता था : &#39;मैं इतना धनवान और ताक़तवर हूं, और मेरे पास खेत जोतने वाले इतने दास हैं कि मैं इस हरियाले वैभव को जुटाने में सहज समर्थ हूं&#39;। लॉन जितना ही बड़ा और स्वच्छ होता था, उतना ही वह राजवंश शक्तिशाली होता था। अगर आप किसी ड्यूक के घर जाते और उसके लॉन को बुरी हालत में देखते, तो आप समझ जाते कि वह ड्यूक मुश्किल हालात से गुज़र रहा है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह बेशक़ीमती लॉन अक्सर महत्त्वपूर्ण उत्सवों और सामाजिक कार्यक्रमों के आयोजनों का स्थल हुआ करता था, बाक़ी सारे समय दूसरे लोगों के लिए सख्त रूप से प्रतिबन्धित होता था। आज दिन तक, असंख्य महलों, सरकारी इमारतों और सार्वजनिक स्थलों पर लगे साइनबोर्ड लोगों को &#39;घास से दूर रहने की&#39; सख्त हिदायत देते हैं। मेरे पूर्व ऑक्सफ़ोर्ड कॉलेज में समूचा अहाता विशाल, आकर्षक लॉन से निर्मित हुआ करता था, जिस पर हमें साल में सिर्फ़ एक दिन चलने या बैठने की इजाज़त हुआ करती थी। अन्य दिनों में बेचारे उस छात्र की शामत आ जाती थी, जिसने घास के उस पवित्र मैदान को अपने पैरों से गन्दा कर दिया होता था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शाही महलों और सामन्ती क़िलों ने लॉनों को प्रभुत्व के प्रतीक में बदल दिया। जब परवर्ती आधुनिक काल में राजाओं को राजगद्दी से हटा दिया गया और सामन्तों के सिर क़लम कर दिए गए, तो नए राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री लॉन रखने लगे। संसदें, सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रपति भवन और अन्य सार्वजनिक इमारतें स्वच्छ हरी पत्तियों की अनेक कतारों में उत्तरोत्तर अपनी शक्ति की उद्घोषणा करती गईं। इसी के साथ-साथ लॉनों ने खेलों की दुनिया को भी जीत लिया। हज़ारों सालों से मनुष्य बर्फ से लेकर रेगिस्तान तक हर तरह के कल्पनीय मैदानों में खेलते आ रहे थे, लेकिन पिछली दो सदियों में वास्तविक महत्त्वपूर्ण खेल, जैसे कि फुटबॉल और टेनिस घास के मैदानों में खेले जाते रहे हैं। बशर्ते, ज़ाहिर है, आपके पास पैसा हो। रियो डि जनेरियो के फ़ावेलाओं (झुग्गियों) में ब्राजीलीय फुटबॉल की भावी पीढ़ी रेत और मिट्टी पर कामचलाऊ गेदों से खेल रही है, लेकिन समृद्ध उपनगरों में रईसों के बेटे उत्तम तरीक़े से तैयार लॉनों का आनन्द लेते हैं 1&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस तरह मनुष्यों ने लॉन को राजनैतिक शक्ति, सामाजिक हैसियत और आर्थिक समृद्धि से जोड़ लिया। आश्चर्य की बात नहीं कि उन्नीसवीं सदी में उभरते हुए बूर्चा वर्ग ने पूरे उत्साह के साथ लॉन को अपनाया। शुरू में अपने निजी आवासों पर इस तरह की विलासिता सिर्फ़ बैंककर्मियों, वकीलों और उद्योगपतियों के बूते की ही बात हुआ करती थी, लेकिन जब औद्योगिक क्रान्ति ने मध्य वर्ग का विस्तार किया और घास काटने की मशीनों तथा पानी के छिड़काव के स्वचालित उपकरणों को जन्म दिया, तो लाखों परिवार अचानक घरेलू लॉनों का रख-रखाव करने में समर्थ हो गए। अमेरिकी उपनगरों में स्वच्छ और सुव्यवस्थित लॉन रईस आदमी की विलासिता से मध्यवर्ग की ज़रूरत में बदल गए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह तब हुआ, जब उपनगरीय गिरजाघरों की पूजन-पद्धति में एक नए अनुष्ठान का योग हुआ। गिरजाघर में इतवार की सुबह की उपासना के बाद बहुत सारे लोग समर्पित भाव से अपने लॉनों की घास काटने छांटने लगे। सड़कों पर चलते हुए आप तत्काल किसी भी परिवार के लॉन के आकार और ख़ासियत से उस परिवार की समृद्धि और हैसियत का निश्चय कर सकते थे। जॉनेस परिवार किसी मुसीबत में फंसा है, इस बात को जानने का उनके घर के सामने के हिस्से के उपेक्षित पड़े लॉन से ज़्यादा पक्का संकेत और कुछ नहीं हो सकता। संयुक्त राज्य अमेरिका में घास आज मक्का और गेहूं के बाद सबसे व्यापक फ़सल है, और लॉन उद्योग (पौधे, खाद, घास काटने की मशीनें, पानी छिड़कने के उपकरण, माली) सालाना अरबों डॉलर का व्यापार करता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लॉन पूरी तरह से यूरोपीय या अमेरिकी जुनून नहीं रहा। जिन लोगों ने कभी वैली का भ्रमण नहीं किया, वे भी संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति का लुआख़ भाषण सुनने वाइट हाउस के लॉन में जाते हैं, हरे स्टेडियमों में महत्त्वपूर्ण फुटबॉल खेल खेले जाते हैं, और घास को काटने छांटने की बारी किसकी है, इस बात को लेकर होमर तथा बार्ट सिम्पसन आपस में झगड़ते हैं। सारी दुनिया के लोग लॉनों को सत्ता, पैसे और प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं। इसलिए लॉन दूर-दूर तक और हर तरफ़ फैल चुके हैं, और मुस्लिम दुनिया का दिल जीतने की तैयारी में हैं। क़तर का नया-नया स्थापित म्यूज़ियम ऑफ़ इस्लामिक आर्ट ऐसे भव्य लॉनों से घिरा हुआ है, जो हारून अल-रशीद के बग़दाद से ज़्यादा लुई चौदहवें के वर्साइल की याद दिलाते हैं। इनका आकल्पन और निर्माण एक अमेरिकी कम्पनी द्वारा किया गया था, और उनकी 100,000 वर्ग गज़ में फैली घास अरब के रेगिस्तान के बीचोंबीच - हरी बनी रहने के लिए ताज़ा पानी की अतिविशाल मात्रा की मांग करती है। इस बीच, दोहा और दुबई के उपनगरों में मध्यवर्गीय परिवार अपने लॉनों पर गर्व करने लगे हैं। अगर वहां सफ़ेद चोगे और काले हिजाब दिखाई न देते होते, तो आप आसानी-से ऐसा सोच सकते थे कि आप मध्य पूर्व की बजाय मध्यपश्चिम में कहीं पर हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लॉन का यह संक्षिप्त इतिहास पढ़ चुकने के बाद, अब आप जब अपने सपनों का मकान तैयार करने की योजना बना रहे होंगे, तब आप मुमकिन है कि सामने के परिसर में लॉन बनाने के बारे में दो बार सोचें। बेशक, आप अभी भी यह करने के लिए स्वतन्त्र हैं, लेकिन आप उस सांस्कृतिक बोझ को झटककर अलग करने के लिए भी स्वतन्त्र हैं, जो यूरोपीय सामन्तों, पूंजीपति मुग़लों और सिम्प्सनों ने आपको वसीयत में दिया है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/8782362123070111800/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/8782362123070111800' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/8782362123070111800'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/8782362123070111800'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2024/10/blog-post.html' title='संसार का पहला लॉन- कैसे लॉन हमारे दिमाग, फिर घर में घुसे '/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEhapZh5-l870mVxMQcsoU2CBcMc0S9fXpLjp_cJkCroIpBQ-vtkYP44hjRBzJ8Urg3kW8lrvEkFhFLrRNYMoy6r6idvHImB9hsIm88DegUUsovkDrbIuWZArB3WBw_7oG1OJZT2d4ruzGpdJFXiUcBiiwr6u7GX0OiHVjjmCVtZeteCi5rM__aD_zI6Zxv4=s72-c" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-1616566096980009949</id><published>2024-09-25T13:20:00.006-05:00</published><updated>2024-09-25T13:20:58.224-05:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पराधुनि‍क डायरी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस बजार"/><category 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style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;&lt;br /&gt;ये प्रयागराज के बड़े हनुमान मंदिर के पास पानी में तैरता आया पनडुब्बी सांप है (पानी में बैरियर वाली)। इलाहाबाद निवासी रवींद्र मिश्रा ने इसे एक जीव विज्ञानी ग्रुप पर शेयर किया है। जीव विज्ञानी इसे चेकर्ड कीलबैक के नाम से बुलाते हैं। लेकिन हम लोग इसे पनडुब्बी कहते थे। इस तस्वीर में इसका सफेद हिस्सा बहुत साफ दिख रहा है और इसपर बने चेक भी एकदम साफ दिख रहे हैं। गांव-गिरांव के तालाबों में यह अक्सर काले या स्लेटी रंग का दिखता है और पानी के बाहर इसकी गरदन बस एकाध फुट ही दिखती है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;हम &lt;span class=&quot;html-span xdj266r x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r xexx8yu x4uap5 x18d9i69 xkhd6sd x1hl2dhg x16tdsg8 x1vvkbs&quot; style=&quot;font-family: inherit; margin: 0px; overflow-wrap: break-word; padding: 0px; text-align: inherit;&quot;&gt;&lt;a class=&quot;html-a xdj266r x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r xexx8yu x4uap5 x18d9i69 xkhd6sd x1hl2dhg x16tdsg8 x1vvkbs&quot; style=&quot;color: #385898; cursor: pointer; font-family: inherit; margin: 0px; overflow-wrap: break-word; padding: 0px; text-align: inherit;&quot; tabindex=&quot;-1&quot;&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;लोग इसे पनडुब्बी सांप इसलिए कहते थे कि जैसे ही यह हमें आता देख, झट से डुबकी मार दे। अक्सर यह तालाब में कछुए की तरह भी सिर निकाले तैरता दिखता था, लेकिन कछुए की बहुत ही गंदी नकल करता था, तो हम लोग पकड़ पा जाते थे कि पनडुब्बी ही है। वैसे यह तालाब में ही नहीं रहता था। यह पानी से भरे धान के खेतों में भी दिखता था। चूंकि धान के खेत उथले होते हैं तो वहां यह कछुए की तरह ही तैरता था। कभी-कभार हममें से कुछ दोस्त इसकी कछुए वाली चालबाजी में गच्चा भी खा गए, और उन्होंने इसे कछुआ समझकर पकड़ने की कोशिश की। बदले में मिला एक तेज वार। पनडुब्बी काफी कटखन्ना होता है, तुरंत काटता है। बस गनीमत यही होती है कि इसमें जहर नहीं होता और गांव-जुआर के लोग यह बखूबी जानते हैं। माना जाता है कि उनके लार में थोड़ा सा जहर होता है, क्योंकि काटने पर अक्सर खुजली होती है और थोड़ी सूजन होती है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjYakKwljKi7AMZb_9fE-21LCmnDQZPKoYh5rWxEfRBttwFSkM3gN-rqKje-bjNzi_yTPPbJC52DuzMGOCPe_VEGrsFF1bu6Ddcn35klrOa2CJJ-s_vCMXIQimhbqu8fycQWHXN-IJGzUzm-86IcC5NDVQCSiCcf3eebQJEGFhRb_Q1AilRCxd2ywttWm6h/s1024/2.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;682&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;213&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjYakKwljKi7AMZb_9fE-21LCmnDQZPKoYh5rWxEfRBttwFSkM3gN-rqKje-bjNzi_yTPPbJC52DuzMGOCPe_VEGrsFF1bu6Ddcn35klrOa2CJJ-s_vCMXIQimhbqu8fycQWHXN-IJGzUzm-86IcC5NDVQCSiCcf3eebQJEGFhRb_Q1AilRCxd2ywttWm6h/s320/2.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो दुनिया में तरह-तरह के सांप पाए जाते हैं, पानी में रहने वाले भी। समुद्री पानी में जितने भी तरह के सांप पाए जाते हैं, लगभग सभी जहरीले होते हैं। कई तो इतने कि घंटे भर में अगर इलाज ना मिला तो जान निकलने में देर नहीं लगती। लेकिन पनडुब्बी धरती नाम के गोले में बस इसी ओर मिलता है। इसी ओर भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में। थोड़ा बहुत यह जावा, सुमात्रा, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, कम्बोडिया, लाओस, दक्षिणी चीन, इंडोनेशिया और मलेशिया में भी पाया जाता है, लेकिन थोड़ा बहुत ही। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;पनडुब्बी घासफूस नहीं खाता, और वैसे भी कोई सांप घासफूस नहीं खाता। सापों की देह की बुनावट ही कुछ ऐसी है कि उन्हें हाई प्रोटीन आहार चाहिए होता है। तो अपने कीलबैक महाराज मछलियों और मेंढक का सेवन करते हैं, चर्बी सहित। साहब बेहतरीन तैराक हैं और हमला करने में मगरमच्छ की कॉपी करते हैं, मतलब धीमे धीमे चुपचाप आना और अचानक झपट्टा मारना। लेकिन जब इस पर हमला होता है तो यह अपने शरीर को चपटा कर लेता है और फुफकारने जैसी आवाज़ें निकालता है ताकि दुश्मन को डराया जा सके। इसके चपटे शरीर के कारण यह बड़ा और खतरनाक दिखाई देता है, जिससे दुश्मन डर कर पीछे हट जाए। लेकिन अगर कोई इसे अच्छे से जानता हो तो वह शायद ना डरे। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;और अगर कोई इससे ना डरे तो ये बेचारा खुद डर जाता है। फिर यह तेजी से भागने की कोशिश करेता है और आमतौर पर पानी में कूद जाता है, जहां यह आसानी से तैर सकता है और शिकारियों से बच सकता है। यह एक नंबर का नाटकबाज होता है और अपने आप को बड़ा दिखाने, फुफकारने और छिपने का प्रयास करता है ताकि खतरे से बच सके। इसमें कोई बेजा बात नहीं है। इंसान भी तो यही करता है, चाहे वो किसी का भी नुकसान ना कर पाए। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;चेकर्ड कीलबैक के इवोल्यूशन पर केंद्रित कोई विस्तृत शोध नहीं है। यानी यह सांप कैसे बना, इसकी देह पर चेक्स कैसे बने, इसने पानी में रहना कैसे शुरू किया, इसने चपटा होना कैसे डिवेलप किया- इस तरह की बातों के सीधे-सीधे कोई जवाब हमारे सामने नहीं हैं। अगर किसी को इन सवालों के जवाब चाहिए, तो शायद पूरी एक उम्र लगानी होगी और वो हम भारतीयों के पास है नहीं। हम तो अभी तक कुत्तों को नहीं समझ पाए हैं, सांप तो बहुत दूर की चीज है। भले ये सांप-सपेरों का देश कहा जाता हो दुनिया भर में, लेकिन सांपों को लेकर हमारे यहां किसी भी लेवल की जागरूकता नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhAa423_P1gOGqyN6KXvrA2epAt99ECGs3IaLWYmKFiabrhYAXjwvxfqI96IJowT5W6KB9hWjc0P-8dy71kyqyGSzIm7u__k0u45FSSQsJ2bTuQ8_tP5SZMZyak3sVlolRAx3u8-FYdKtwpdUMXexbKyctJ8KReQbvUxpIIGBmZOIbeU-MVS9CCWC2-kzKy/s900/3.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;640&quot; data-original-width=&quot;900&quot; height=&quot;228&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhAa423_P1gOGqyN6KXvrA2epAt99ECGs3IaLWYmKFiabrhYAXjwvxfqI96IJowT5W6KB9hWjc0P-8dy71kyqyGSzIm7u__k0u45FSSQsJ2bTuQ8_tP5SZMZyak3sVlolRAx3u8-FYdKtwpdUMXexbKyctJ8KReQbvUxpIIGBmZOIbeU-MVS9CCWC2-kzKy/s320/3.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;ये सब तो बतकुच्चन है, असल बात ये है कि एक दूसरा रास्ता है जो कीलबैक चिचा के इवोल्यूशन से जुड़े कुछ मिलते जुलते जवाब दे सकता है। कीलबैक न सिर्फ तालाब के पानी या धान के खेतों में घुलमिल जाता है, बल्कि आप इसे ध्यान से देखेंगे और इससे मुलाकात और मुकालात करने वाले अच्छे से जानते हैं कि ये झाड़-झंखाड़ और घास में भी छुपे हुए होते हैं। ऐसे में हमें चलना होगा सांपों के छलावरण और प्राकृतिक चयन पर हुए शोधों की तरफ, जो इस सांप के इवोल्यूशन की समझ को बेहतर बनाते हैं। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;इन अध्ययनों में से एक थोड़ा ध्यान खींचता है और सवाल के सबसे पास पहुंचता है। इसके मुताबिब सांपों का रंग और पैटर्न का कनेक्शन उनकी प्रजनन सफलता के साथ भी है। जिन सांपों के पास बेहतर छलावरण होता है, वे न केवल शिकारियों से बचने में सक्षम होते हैं, बल्कि वे बेहतर तरीके से शिकार भी कर पाते हैं। यह उन्हें अधिक समय तक जीवित रहने और प्रजनन करने का अवसर देता है, जिससे उनके अनुकूल जीन पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार, चेकर्ड कीलबैक जैसे सांपों का चेक पैटर्न केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता को भी बढ़ाता है​। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;चेकर्ड कीलबैक में कई गोल दांत होते हैं, जो फिसलन वाली मछलियों को पकड़ने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, लेकिन आसानी से खून बहने का कारण बन सकते हैं। यह बताता है कि इसका इवोल्यूशन धरती से पानी की ओर भी हो सकता है। वैसे भी सांपों की इवोल्यूशन थ्योरी यह भी इशारा करती ही है कि सांपों के पूर्वज टेट्रापोड्स (चार पैरों वाले सरीसृप) थे, जो जमीन पर चलते थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि सांपों के पूर्वज स्क्वामेट्स (Squamates) नामक सरीसृप वर्ग से थे, जिनमें छिपकलियां और सांप दोनों शामिल हैं। सांपों का विकास समुद्री और जमीन दोनों प्रकार के जीवन से जुड़ा रहा है, और वे धीरे-धीरे अपने चार अंगों को खोते गए और एक लंबा, बिना अंग वाला शरीर विकसित किया। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;सांपों के विकास को समझने के लिए कई फॉसिल्स (जीवाश्म) का अध्ययन किया गया है। सबसे पुराने सांपों के फॉसिल्स में अंगों के अवशेष पाए गए हैं, जो बताते हैं कि उनके पूर्वज चार पैरों वाले जीव थे। यह भी देखा गया है कि सांपों का विकास छिपकलियों के समान हुआ है, जिनसे वे अपने शरीर के अंग खोकर अलग हुए। समय के साथ कुछ सांपों ने समुद्र और जलाशयों में जीवन के लिए खुद को अनुकूलित किया, जबकि अन्य ने जमीन पर रहना पसंद किया। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;जैसे-जैसे उनके पर्यावरण के अनुसार सांपों की आदतें बदलती गईं, उनके शरीर में भी बदलाव आते गए। जमीन पर रहने वाले सांपों ने अपनी त्वचा के रंग और पैटर्न को इस तरह विकसित किया, जिससे वे अपने परिवेश में छिप सकें और शिकारियों से बच सकें। वहीं पानी में रहने वाले सांपों ने लाखों वर्षों के इवोल्यूशन के दौरान तैरने की क्षमता को विकसित किया। इस अनुकूलन ने उन्हें जल निकायों में शिकार करने और शिकारियों से बचने में मदद की। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiffVI-u2GtYSggWlvVktUqJyqW6v6GovX3XrMQZFVSGZqfKwBbgxf8mJyM_bEZkReNeAJCttfSX3cU4mGm067KIN6VYUYM__Xdtf1mW3JykgaSv1Kja76jV_Dv4ZGOIcrc6q3nUQIMw49xfLqx4hWTHsmvrl2g_yDln41Nc8vXU7lEuF7UJ7WG7BNEXMJg/s1000/4.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;714&quot; data-original-width=&quot;1000&quot; height=&quot;228&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiffVI-u2GtYSggWlvVktUqJyqW6v6GovX3XrMQZFVSGZqfKwBbgxf8mJyM_bEZkReNeAJCttfSX3cU4mGm067KIN6VYUYM__Xdtf1mW3JykgaSv1Kja76jV_Dv4ZGOIcrc6q3nUQIMw49xfLqx4hWTHsmvrl2g_yDln41Nc8vXU7lEuF7UJ7WG7BNEXMJg/s320/4.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भारत में चेकर्ड कीलबैक (Xenochrophis piscator) तो है ही, ओलिव कीलबैक (Atretium schistosum) भी है जो नदियों, तालाबों और झीलों के पास पाया जाता है। इसका आहार मुख्य रूप से जलीय जीव होते हैं, और यह तैरने में कुशल होता है। डार्क-बेलीड मार्श स्नेक (Gerarda prevostiana) भी मिलता है जो मुख्य रूप से पश्चिमी घाट और भारत के तटीय क्षेत्रों में रहता है। यह जलीय शिकारियों से बचने और कीचड़ भरे इलाकों में तैरने में सक्षम होता है। एशियाई वाटर स्नेक (Homalopsis buccata) भी है जो भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में ताजे पानी के स्रोतों के पास पाया जाता है। यह धीमी गति से बहने वाली नदियों और तालाबों में मछलियों और अन्य छोटे जलीय जीवों का शिकार करता है। फॉरस्टेन्स कैट स्नेक (Boiga forsteni) भी है जो तैरने में सक्षम तो होता ही है, पेड़ों पर चढ़ने में माहिर होता है। यह सांप पानी में भोजन की तलाश में उतर सकता है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;मैं जानता हूं, मगर चलते चलते बस एक आखिरी सवाल। पनडुब्बी इस संसार में है क्यों? चेकर्ड कीलबैक हमारे साथ रह क्यों रह रहा है? दरअसल चेकर्ड कीलबैक सांप प्रकृति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इसके व्यवहार और शिकार संबंधी आदतें इसे पारिस्थितिकी तंत्र का एक आवश्यक हिस्सा बनाती हैं। यह मुख्य रूप से मछलियों, मेंढकों, और छोटे जल जीवों का शिकार करता है। यह इन प्रजातियों की आबादी को नियंत्रित करता है, जिससे पानी के निकायों में शिकार-शृंखला संतुलित रहती है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र में अन्य प्रजातियों को भी जीवित रहने का मौका मिलता है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;इसके बिना, इन प्रजातियों की आबादी अनियंत्रित रूप से बढ़ सकती है, जिससे जल निकायों की जैव विविधता प्रभावित हो सकती है​। चेकर्ड कीलबैक छोटे जल जनित कीड़ों और उनके लार्वा को खाता है, जो कृषि क्षेत्रों में एक तरह के कीट होते हैं। यह सांप इन कीटों की संख्या कम करता है, जिससे फसलों को नुकसान कम होता है और कीटनाशकों पर निर्भरता घटती है। इस प्रकार, यह सांप प्राकृतिक कीट नियंत्रण के रूप में कार्य करता है और हमारी धान की पैदावार बढ़ाता है। आगे से अगर आप चावल का एक कौर भरें तो एक बार कीलबैक यानी पनडुब्बी चिचा का भी शुक्रिया अदा करें। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjiOsetPku-0EzMKnq3BSrxI4DOegCIR86GdL8FErMOWveq5OMjOTFLIkHm7ChP6uBn5N-TMtvJ1qoOGqrSrrmfm8sVBUqJJa2VR7zhhYbZ4qHQLDikTdO83BB9w5tOV4Xqkng4mmI4PdUQvmfw4W4hhgAdSINZYYY5W2sk36Wr3J-tM0At0XN8EUubO-u-/s580/461252126_925601996252095_20491700696290905_n.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;544&quot; data-original-width=&quot;580&quot; height=&quot;300&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjiOsetPku-0EzMKnq3BSrxI4DOegCIR86GdL8FErMOWveq5OMjOTFLIkHm7ChP6uBn5N-TMtvJ1qoOGqrSrrmfm8sVBUqJJa2VR7zhhYbZ4qHQLDikTdO83BB9w5tOV4Xqkng4mmI4PdUQvmfw4W4hhgAdSINZYYY5W2sk36Wr3J-tM0At0XN8EUubO-u-/s320/461252126_925601996252095_20491700696290905_n.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;सबसे बड़ी बात यह कि सबसे ज्यादा कुर्बानियां भी पनडुब्बी के ही हिस्से में आई हैं। यह सांप न केवल शिकार करता है, बल्कि खुद भी बड़े पक्षियों और अन्य शिकारियों के लिए भोजन का स्रोत है। चील हो, बगुला हो या फिर मगरमच्छ या घड़ियाल ही क्यों न हो, सबको इसका स्वाद पसंद है। यह चक्र है जो कि पारिस्थितिक तंत्र की विविधता को बनाए रखने में मदद करता है, क्योंकि यह अन्य शिकारियों के लिए भोजन के रूप में काम करता है, जिससे उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक संतुलन बना रहता है​। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;x11i5rnm xat24cr x1mh8g0r x1vvkbs xtlvy1s x126k92a&quot; style=&quot;background-color: white; color: #050505; font-family: &amp;quot;Segoe UI Historic&amp;quot;, &amp;quot;Segoe UI&amp;quot;, Helvetica, Arial, sans-serif; font-size: 14px; margin: 0.5em 0px 0px; overflow-wrap: break-word; text-align: start; white-space-collapse: preserve;&quot;&gt;&lt;div dir=&quot;auto&quot; style=&quot;font-family: inherit;&quot;&gt;अंत में, यह हमारा सफाईकर्मी भी है क्योंकि यह वहां भी रहता है, जहां पानी के निकाय होते हैं। यह पानी में रहने वाले छोटे मृत या बीमार जीवों को खाकर पानी को साफ रखने में मदद करता है। इसके परिणामस्वरूप, जलाशयों की स्वास्थ्यवर्धक स्थिति बनी रहती है और अन्य जलीय जीवों के लिए अनुकूल पर्यावरण सुनिश्चित होता है​। मेरे ख्याल से इतना प्रकृति की इस महान पनडुब्बी को सलाम करने के लिए काफी होगा।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/1616566096980009949/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/1616566096980009949' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1616566096980009949'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1616566096980009949'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2024/09/blog-post.html' title='ये सांप है या प्रकृति का वरदान?'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhMuSye84KnY6P94rDDk4HHWKtKb4KW_EP0viPt44bGMvetIooSKKt6_MT7JkKDwQVsZ1Hm4mkj6xJB13l-q6EcPAIRyjnJyunBzt2JyMEauB2svxIuJgZugUHV0bUuQO2My0_Mz8Yr7_a7kYGohAq8Pb0I6oHSA0xAhZgF01dHdPElpA67ysP07KWbG7PM/s72-c/1.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-1610636902590536415</id><published>2024-08-17T10:56:00.001-05:00</published><updated>2024-08-17T10:56:14.142-05:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस बजार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुद्दों का बजार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मेरी आवाज़ सुनो"/><title type='text'>849 वॉर्निंग | सोती रही सेबी-&#39;अडानी&#39; बुच!</title><content type='html'>अडानी की जेबी बनकर सेबी सरगना बनी माधबी बुच के खिलाफ हिंडनबर्ग रिसर्च ताजे खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट में इसी हफ्ते एक नई याचिका डाली गई है। सुप्रीम कोर्ट से ये मांग की गई है कि उसने सेबी को जांच करने में कितना भी टाइम लगाने की छूट दे रखी है, उसे तुरंत वापस ले और अडानी पर लगे आरोपों की जांच पूरी करने के लिए एक टाइट टाइम लाइन दे। 3 जनवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को तीन महीने की मोहलत दी थी। यह मोहलत कब की बीत चुकी है और इंडियन इन्वेस्टर्स की जिल्लत शुरू हो चुकी है। 

याचिका दायर करने वाले एडवोकेट विशाल तिवारी ने याचिका में कहा है कि हिंडनबर्ग की नई रिपोर्ट ने लोगों और निवेशकों के मन में शक पैदा कर दिया है। अब सेबी के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह पेंडिंग इन्वेस्टिगेशन खत्म करे और रिपोर्ट दे। यह जनहित और उन निवेशकों के हित में है, जिन्होंने 2023 में अडानी ग्रुप में अपने करोड़ों रुपये गवां दिए हैं। सेबी की रिपोर्ट जानने का उनको अधिकार है। 

&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe class=&quot;BLOG_video_class&quot; allowfullscreen=&quot;&quot; youtube-src-id=&quot;du4aByQrvAk&quot; width=&quot;320&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/du4aByQrvAk&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;बता दें कि 2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद अडानी में पैसा लगाने वालों ने लाखों करोड़ रुपये गवां दिए थे। वहीं इस बार सेबी पर रिपोर्ट आने के बाद फिर से अडानी के शेयरों में 17 पर्सेंट से अधिक की गिरावट चल रही है और आम लोगों के 53 हजार करोड़ से भी अधिक डूब चुके हैं। वैसे जनवरी में अपने फैसले में सुप्रीमकोर्ट  ने माना था कि रिकॉर्ड में इस बात के पुख्ता सबूत हों कि सेबी की जांच पहली नजर में सेवापानी जैसी दिखे तो वह जांच को उससे वापस ले सकता है। संविधान के अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट को ये अधिकार है। यह फैसला सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की तीन जजों की बेंच ने 3 जनवरी 2024 को सुनाया था। तब सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि अगर सेबी की रिपोर्ट में फेवर दिखता है तो वह जांच एसआईटी को दे देगा। 

हालांकि अपने फाइनल फैसले में उसने सेबी को अडानी मामले की जांच से हटाने से इनकार कर दिया था। संविधान के अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार का प्रयोग सुप्रीम कोर्ट ने तभी करने को कहा था कि जब ये साबित हो जाए कि सेबी की रिपोर्ट में सेवापानी है और ये आई तो खुद जस्टिस ही फेल हो जाएगा। दरअसल, अदालत ने कहा था कि सेबी की जांच लोगों में भरोसा बढ़ा रही है। इतनी बड़ी जांच करने के लिए अदालत ने सेबी की पीठ भी थपथपाई थी। तब सेबी ने 24 में से 22 जांच पूरी कर ली थी। बाकी की दो जांचों में वह &quot;बाहरी एजेंसियों/संस्थाओं&quot; से इनपुट का इंतजार कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट में जांच की स्थिति पर यह अंतिम रिपोर्ट थी।

 इसके बाद से सेबी ने क्या किया, सेबी की मुखिया अडानी बुच ने इस मसले पर क्या किया, किसी को कुछ नहीं पता, अलबत्ता पिछले तीन चार दिनों में लोगों के 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक डूब चुके हैं। वहीं नई याचिका डालने वाले एडवोकेट विशाल तिवारी ने अपनी याचिका में मोदी और सेबी दोनों से हालात पर रिपोर्ट मांगी है। उन्होंने पूछा है कि क्या मोदी और सेबी ने कोर्ट की स्पेशलिस्ट कमिटी की उन सिफारिशों पर कार्रवाई की है, जो कमेटी ने सेबी ढांचे को मजबूत करने के लिए करी थीं? उन्होंने जुलाई में आए इलेक्शन रिजल्ट के बाद शेयर बाजार में आई गिरावट और निवेशकों को हुए घाटे पर भी मोदी और सेबी से डीटेल्ड रिपोर्ट मांगी है। 

यह याचिका एडवोकेट तिवारी ने फिर से 13 अगस्त को लगाई है, अखबारों में यह 13 अगस्त को खबर छपी थी। लेकिन इससे भी बड़ी खबर ये कि यही याचिका उन्होंने 5 अगस्त को भी लगाई थी। हिंदुस्तान टाइम्स के आर्थिक अखबार मिंट में खबर है कि तब सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने तिवारी के एप्लीकेशन को रजिस्टर्ड ही नहीं किया था, उल्टे मुंह मना कर दिया था और न सिर्फ मना कर दिया था, बल्कि इसे &quot;पूरी तरह से गलत&quot; बताया था। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने कहा था कि इसमें कोई उचित कारण प्रस्तुत नहीं किया गया है। रजिस्ट्रार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सेबी की जांच के लिए कोई टाइट टाइम लाइन नहीं बनाई थी, जैसा कि एडवोकेट तिवारी दावा कर रहे हैं। रजिस्ट्रार ने यह भी बताया कि कोर्ट ने स्पेशलिस्ट कमिटी की सिफारिशों या चुनाव के बाद निवेशकों को हुए नुकसान के बारे में रिपोर्ट देने के लिए कोई खास डायरेक्शन जारी नहीं किए हैं। 

रजिस्ट्रार साहब के इतने दावों के बावजूद निवेशकों को चुनाव और हिंडनबर्ग का ताजा खुलासा मिलाकर एक लाख करोड़ से ऊपर का नुकसान हो चुका है। कुल मिलाकर अब बात इस पॉइंट पर आकर टिक गई है कि क्या अडानी की जेबी सेबी मुखिया पक्षपात कर रही हैं या नहीं? और क्या अपने अडानी रिलेशन के बारे में उन्होंने सेबी या फिर सुप्रीम कोर्ट की बनाई स्पेशलिस्ट कमेटी बताया था या नहीं बताया था? यह स्पेशलिस्ट कमेटी सुप्रीम कोर्ट ने मई या जून 2023 में बनाई थी। इस स्पेशलिस्ट कमिटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज अभय मनोहर सप्रे ने की थी। बाकियों में बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज जेपी देवधर, सीनियर एडवोके सोमशेखर सुंदरेसन, बैंकर ओपी भट्ट, केवी कामथ के साथ साथ नंदन नीलेकणी भी शामिल थे। सेबी को इस कमिटी को बताना था कि वह अडानी ग्रुप के खिलाफ आरोपों की जांच किस तरह कर रही है। 

&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg5JRxtwL3S7teiyr50XHZFejDO3OFxGQxl20izh0fePJyaehjXaBF6J1MFO5E5ETDp4Uyz1Y8v-v7PXB4nuaIkZE-Kioz_lgl-2_f_4IsYMKoCm7_Idl5FCHpxJCzZnTUgalmo6fGK2yhxBKmM3WlDEor6jj59-b_lXyAIHpA-Mzqn0OmLeiF07QQ1eUpP/s1366/sebi%20buch%20adani%20cover.jpg&quot; style=&quot;display: block; padding: 1em 0; text-align: center; clear: left; float: left;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; width=&quot;320&quot; data-original-height=&quot;768&quot; data-original-width=&quot;1366&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg5JRxtwL3S7teiyr50XHZFejDO3OFxGQxl20izh0fePJyaehjXaBF6J1MFO5E5ETDp4Uyz1Y8v-v7PXB4nuaIkZE-Kioz_lgl-2_f_4IsYMKoCm7_Idl5FCHpxJCzZnTUgalmo6fGK2yhxBKmM3WlDEor6jj59-b_lXyAIHpA-Mzqn0OmLeiF07QQ1eUpP/s320/sebi%20buch%20adani%20cover.jpg&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस बारे में इकोनॉमिक टाइम्स में एक खबर मिलती है जो सूत्रों के हवाले से बताती है कि बुच ने दिल्ली में पैनल से मुलाकात की और इस कमिटी को उनकी ब्रीफिंग सबसे पहली और इम्पॉर्टेंट ब्रीफिंग थी और इसके बाद उन्होंने कहा कि अब जब तक जरूरी न हो, वो कमेटी के सामने हाजिर नहीं होंगी। वकील विशाल तिवारी का कहना है कि यह साफ है कि बुच या सेबी ने स्पेशलिस्ट कमिटी के साने ये खुलासे नहीं किए हैं क्योंकि उनकी रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस बात का संकेत देता हो। तिवारी को लगता है कि कमिटी के सामने फैक्ट रखे ही नहीं गए।&quot; अब जरा इस कमिटी का भी हाल जान लीजिए। 

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिकाकर्ता जो कि लॉ स्टूडेंट हैं अनामिका जायसवाल, उन्होंने हितों के टकराव के आधार पर स्पेशलिस्ट कमिटी के दो मेंबरानों के खिलाफ अदालत में आपत्ति जताई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि भट्ट और सुंदरेसन के अडानी ग्रुप के साथ प्रफेशनल रिलेशंस हैं। हालांकि लोया से लेकर अडानी तक, हर केस की तरह इस केस को भी सुप्रीम कोर्ट ने निराधार बताते हुए खारिज कर दिया था। जायसवाल की वकील नेहा राठी ने स्क्रॉल डॉट कॉम को बताया कि स्पेशलिस्ट पैनल ने अपनी रिपोर्ट में सेबी के ढेरों फेल्योर का खुलासा किया है और यह भी इशारा किया है कि अडानी ने शेयर मार्केट में हेरफेर किया है। कमिटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सेबी अप्रैल 2016 से 13 विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की जांच कर रहा था, जो अडानी ग्रुप की कंपनियों में में पैसा लगा रहे थे और फिर भी फायदा उठाने वालों की पहचान नहीं कर पाया। 

सवाल उठता है कि सेबी पहचान नहीं कर पाया, या उसने पहचानने की कोशिश ही नहीं की? हिंडनबर्ग रिपोर्ट और संगठित अपराध और भ्रष्टाचार रिपोर्टिंग परियोजना साफ साफ इन निवेशकों और अडानी ग्रुप के बीच का रिलेशंस खोलते हैं जो कम  से कम कानून का उल्लंघन तो बताता है। स्पेशलिस्ट कमिटी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डीआरआई ने जनवरी 2014 में सेबी को अडानी ग्रुप के घोटाले के बारे में बताया था, जिसमें बिजली के इक्यूपमेंट्स के एक्सपोर्टे का दाम अधिक बताया गया था। यह कुल 6,278 करोड़ रुपये की हेराफेरी थी, इसके सबूत सीडी में दिए गए थे, फिर भी सेबी अपने अंग विशेष में दही जमाए रही। स्पेशलिस्ट कमिटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जनवरी 2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद भी, सेबी ने अडानी एंटरप्राइजेज के आईपीओ को तब जारी होने दिया, जब तक अडानी ने उनको खुद ही वापस नहीं ले लिया। 

रिपोर्ट में एक और बहुत ही बड़ी बात कही गई है। अप्रैल 2018 और दिसंबर 2022 के बीच अडानी ग्रुप को लेकर 849 ट्रेडिंग अलर्ट जारी हुए। इसके बावजूद सेबी सोई रही। बड़ी बात ये कि इन अलर्ट में से 603 प्राइस वॉल्यूम मूवमेंट के थे और 246 संदिग्ध अंदरूनी व्यापार के थे। एक दो नहीं, बल्कि साढ़े आठ सौ वॉर्निंग जारी होने के बावजूद सेबी ने तब तक कोई जांच शुरू नहीं की, जब तक कि भारतीय लोगों के एक डेढ़ लाख करोड़ स्वाहा नहीं हो गए। इतना ही नहीं, सेबी ने अडानी के लिए अपने ही नियम बदल डाले। खास तौर से विदेशी निवेशकों और सेबी के खुद के लिस्ट की गई लाइबिलिटीज और उसे पब्लिश करने के नियम तब बदल डाले। 

इन सब चीजों ने अडानी का रास्ता और आसान बनाया, ऐसा सुप्रीम कोर्ट की स्पेशलिस्ट कमिटी की रिपोर्ट कहती है। इतनी थू-थकार होने के बावजूद सेबी ने आज की तारीख तक अडानी पर अपनी जांच पूरी नहीं की है, जबकि स्पेशलिस्ट कमिटी ने मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। मजे की बात ये कि सुप्रीम कोर्ट भी आराम से उसे बार बार तारीख देता जा रहा है, देखिए कैसे। 2 मार्च , 2023 को अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को दो महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया था। अप्रैल में, सेबी ने अडानी की लिस्टेड, अनलिस्टेड और बरमूडा ट्रायंगल का का हवाला देते हुए छह महीने और मांगे। 

मई में, सुप्रीम कोर्ट ने इसे 14 अगस्त, 2023 तक का वक्त दे दिया। फिर सेबी ने सुप्रीम कोर्ट से 15 दिन और मांगे। इस साल 3 जनवरी को बिना सेबी के फाइनल रिपोर्ट दिए ही सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने उसी तरह से अडानी घोटाले पर आदेश जारी कर दिया, जैसे कि लोया केस में किया था। लोया केस में भी यही साहब थे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़। जनवरी वाले फैसले में फिर से सेबी को तीन महीने की मोहलत दे दी गई। फिर याचिकाकर्ता बार बार सुप्रीम कोर्ट से मांग करते रहे कि जांच का क्या हुआ, और सुप्रीम कोर्ट याचिकाएं खारिज करता रहा। इस पूरे वक्फे में निवेशकों के डेढ़ से दो लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गए।</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/1610636902590536415/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/1610636902590536415' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1610636902590536415'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1610636902590536415'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2024/08/849.html' title='849 वॉर्निंग | सोती रही सेबी-&#39;अडानी&#39; बुच!'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://img.youtube.com/vi/du4aByQrvAk/default.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-1984087915142863281</id><published>2023-01-29T11:53:00.003-06:00</published><updated>2023-01-29T11:56:23.696-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="असम डायरी"/><title type='text'>दस देवता और मटन पुराण AS05</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;आठ बजे अन्नप्राशन की पूजा शुरू होनी थी, मगर बिद्यापुर से आते-आते खुद पंडित दिजेन भट्ट लेट हो गए। बालीकोरिया से बिद्यापुर तीन चार किलोमीटर का ही फासला है, मगर दिजेन बाबू को अपने जुगाड़ी के साथ बालिकोरिया पहुंचने में ही साढ़े आठ या शायद नौ से ऊपर हो गए। वो आए, फिर केले का तना छीलकर उसे परत दर परत काटकर कामचलाऊ बरतन टाइप के बनाए गए। प्रसाद तैयार किया गया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यहां पूजा कोई सी भी हो, प्रसाद में रात के भिगोए चने, मूंग ही मिलते हैं, गन्ने का मौसम हुआ तो कटा हुआ गन्ना भी। इधर दिजेन बाबू चौकी पूरने में लगे थे। जैसे अपनी ओर सत्यनारायण की पूजा में चार कोनों पर केले का छोटा पौधा गाड़कर बीच में एक चौकी बनाई जाती है, इधर भी यही किया गया। मगर अपने यहां भगवान की फोटो या मूर्ति रखी जाती है, असम में इस चौकी पर भगवदगीता रखी जाती है। भगवतगीता असमिया में थी। डॉ सदानंद और उनका परिवार स्वयं को संकरदेव का वंशज कहता है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjAwDuK4-ahR9Pr71S_bDV2QSUqhF86TbXi9UqaSm78M-jbPyNXMx1pcVf5LfKT_spaQgxjWLjNkjsRDc13o3VSIfsqgs5l64_9KWCUOd6CLbpsH3AMF3rJ4TL5Zr6UPgzDv1-wJeWcqyRqT8zulGJLukn0IvFuzzLVreWxbVn-O6T2IQsb6TfKZdLD4g/s1024/IMG-20230106-WA0139.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;सिद्धार्थ&quot; border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;768&quot; data-original-width=&quot;1024&quot; height=&quot;240&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjAwDuK4-ahR9Pr71S_bDV2QSUqhF86TbXi9UqaSm78M-jbPyNXMx1pcVf5LfKT_spaQgxjWLjNkjsRDc13o3VSIfsqgs5l64_9KWCUOd6CLbpsH3AMF3rJ4TL5Zr6UPgzDv1-wJeWcqyRqT8zulGJLukn0IvFuzzLVreWxbVn-O6T2IQsb6TfKZdLD4g/w320-h240/IMG-20230106-WA0139.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;tr-caption&quot; style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;i&gt;देवताओं के सामने बैठे US में रहने वाले सिद्धार्थ&lt;/i&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;br /&gt;सिद्धार्थ ने बताया कि उनके परिवार में मूर्तिपूजा हमेशा से चली आ रही है। बल्कि लोकल दुर्गापूजा में दुर्गा की प्रतिमा इन्हीं के परिवार से जाती है। संकरदेव कायस्थ थे, इसलिए यह लोग भी कायस्थ हैं। संकरदेव की सबसे बड़ी जगह नगांव है, जो अपर असम और लोअर असम के ऐन बीच में है। वहीं मेरी साली यानी मेरी ससुराल पक्ष के लोग नामधारी हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तकरीबन दो दशक पहले तक नामधारियों में मूर्ति पूजा बिलकुल नहीं होती थी। बल्कि संकरदेव और उनके बाद माधवदेव ने यह पंथ ही इसलिए शुरू किया कि इस तरह की चीजों से हिंदू धर्म को निजात मिले और इसे वे लोग भी मान पाएं, जो हिंदू नहीं थे। अभी भी अधिकतर नामघरों में आपको कोई मूर्ति देखने को नहीं मिलेगी। बस गीता, एक जलता दिया और अपनी ओर बजने वाले नगाड़े का एक सेट।&amp;nbsp; हां, शंकर भगवान की फोटो जरूर अधिकतर नामघरों में देखने को मिलती है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;थाईलैंड या म्यांमार की ओर से असम में जो लोग शिफ्ट हुए, वे हिंदू नहीं थे, मगर अब लगभग वे सभी खुद को हिंदू ही कहते हैं। संकरदेव और उनके शिष्य रहे माधवदेव के समय और दोनों के काफी बाद तक यह लोग नामधारी हुए, नाम ग्रहण किया, मगर पिछले डेढ़-दो दशकों में बहुत सारे नामधारियों ने मूर्ति भी ग्रहण कर ली है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिजेन बाबू के जुगाड़ी ने केले के तने काटकर उन्हें परत दर परत अलग किया और उनके कुल आठ सेट बनाए। यहां पुजारी के हेल्पर को जुगाड़ी कहते हैं। इन आठ सेटों से मैंने अंदाजा लगाया कि यहां आठ देवता या तो बैठेंगे या फिर आठ देवताओं को भोग लगेगा। मगर दिशाएं तो दस हैं, तो देवता भी दस होने चाहिए थे! मैंने जुगाड़ी बाबू से अपनी जिज्ञासा बताई। वह बोले, आपने सही पकड़ा है। देवता दस ही हैं, मगर एक परत पर एक साथ हमने तीन देवता बैठाए हैं, और बाकी सब पर एक-एक विराजमान हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूजा और प्रसाद की इतनी मालूमात मेरे लिए काफी थी, इससे ज्यादा मुझे अगवान-भगवान में कोई रुचि भी नहीं। बल्कि उससे अधिक रुचिकर मुझे हर हाल में भोजन ही लगता है। दुनिया में ऐसे बहुतेरे हैं जो पकाने से लेकर खाने तक अपना गम गलत करने में लगे रहते हैं। अब मैं घर की बाड़ी की ओर बढ़ा। बाड़ी यानी घर का पीछे का हिस्सा। यहीं तालाब किनारे गूले खुदे थे, कड़ाह खदबदा रहे थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खाना पकाने वाले थे बापधन बाबू, जो कॉलेज रोड पर अब अपनी दुकान चलाते हैं। बापधन बाबू ने पहले नलबाड़ी कॉलेज की कैंटीन से अपना काम शुरू किया था। इनके हाथ का खाना कॉलेज के शिक्षकों को अच्छा लगा तो अब लगभग सभी शिक्षक अपने यहां होने वाले समारोहों में खाना इन्हीं से तैयार कराते हैं। जैसा कि पहले बताया, बापधन बाबू चावल, पुलाव, असमी मटन, मछली, मुरी घंटों (मछली का सिर तोड़कर उसमें 2-3 तरह की दाल डालकर), पनीर वेज, मिक्स वेज, बैंगन भाजा, पपीते का हलवा, चिली चिकन, सिवईं बनाने में लगे थे। आमतौर पर बैंगन भाजा गोल होता है, एक टिक्की की तरह। मगर यहां पतले-पतले बैंगनों को बीस से कई हिस्सों में काट लिया गया था, ऐसे कि जैसे कोई फूल। फिर उसे बेसन में डुबोकर तला जा रहा था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चूंकि मटन मुझे पसंद है, इसलिए मैंने बापधन बाबू से पूछा कि असमी मटन कैसे बना रहे हैं? मुझे उनके गूले के आसपास रेडीमेड मसाले दिख रहे थे। रेडीमेड मसाले तो अब मेरी ओर यानी अवध में भी खूब शुरू हो चुके हैं, वरना टीन ऐज तक मैं ऐसे भी ब्रह्मभोजों की व्यवस्था में शामिल रहा हूं, जिनमें पूरी तरह से घर में बने मसाले ही यूज किए जाते हैं। अब अगर किसी को पूरी और कद्दू की सब्जी बनानी हो, तो वैसे भी मसालों की बहुत जरूरत नहीं पड़ती।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अवध का आदमी ब्रह्मभोजों में यही जीमता रहा है, मगर इन दिनों वह भी रेडीमेड मसाला होने की कगार पर है। बापधन बाबू ने बताया कि हमारे यहां मटन में पपीता जरूर पड़ता है। एक तो यह मटन जल्दी गलाता है, दूसरे पचाने में भी मदद करता है। हम असमी लोग खाने पर जितना ध्यान देते हैं, उतना ही ध्यान पचाने पर देते हैं। केला और पपीता हमारी राष्ट्रीय दवाई है। मैं बोला, आप तो यह कम से एक पूरा बकरा पका रहे हैं, मगर किलो भर के हिसाब से मुझे बताइए, कैसे कौन सी चीज?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वह बोले, तेल डाला, आधी चम्मच चीनी डाली, फिर प्याज डालकर लाल होने तक भूनी। फिर अदरक-लहसुन डाला और इसे इसकी महक खत्म होने तक भूना। अब नमक-हल्दी मिलाकर मटन डाला और जब तक इसका पानी सूख न जाए, भूनते रहना है। मसाले हम लोग बहुत कम यूज करते हैं। एक किलो मटन है तो बस आधा चम्मच जीरा और इतना ही धनिया पाउडर। एक चम्मच मीट मसाला, रंग के हिसाब से कश्मीरी मिर्च। यह सब एक कटोरी में पानी मिक्स करके एक गिलास अतिरिक्त पानी के साथ डाला। इसे तब तक भूनेंगे, जब तक कि मीट का रंग सही न लगने लगे। जब रंग सही लगे तो एक गिलास पानी और डालना है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने कहा, यह तो आपका अभी का तरीका हुआ और फिर मैंने उनको अपने गांव का पारंपरिक तरीका बयान किया। अब बापधन बाबू ने जाकर असल राज खोला। बोले, सबसे पहले तो आप यह जान लीजिए कि हम तीखा और खट्टा कैसे यूज करते हैं। तीखे में अगर काली मिर्च पड़ेगी तो हरी मिर्च नहीं पड़ेगी। हरी पड़ेगी तो भूत झोलकिया नहीं पड़ेगी। भूत झोलकिया संसार की सबसे तीखी मिर्चों में से एक है। मैंने पूछा, भूत झोलकिया किस हिसाब से आप लोग डालते हैं? उन्होंने बताया, अगर बहुत तीखा खाने वाले हैं तो किलो भर में पूरी एक मिर्च भी डाल देते हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बता दूं कि पूरी एक मिर्च डेढ़ इंच से ऊपर की नहीं होती और अपनी ढेंपी पर पौन इंच का व्यास लिए होती है। अगर कम तीखा खाने वालों की दावत है तो इस मिर्च का पांचवां हिस्सा डालते हैं। आज की दावत में बापधन बाबू ने काली मिर्च का इस्तेमाल किया था। वैसे काली मिर्च हर मौके पर एक सेफ साइड मानी जाती है। ज्यादा हो भी जाए, तो भी जीभ या तलुओं को उतनी नहीं लगती, जितनी कि हरी या भूत झोलकिया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहीं खट्टे में अगर आम डाला तो इमली, अमरख या फिर आंवला नहीं पड़ेगा। आज के खट्टे में उन्होंने अमरख का इस्तेमाल किया था। अमरख से असमिया लोग बहुत पहले से पीलिया जैसी बीमारी भगाते रहे हैं। बहरहाल, पारंपरिक असमी मटन में नमक हल्दी मिले मटन का पानी सुखाने के बाद पपीता डालना है। पांच दस मिनट बाद काली मिर्च डाली और ऐसे कौरा कि मटन के हर ओर काली मिर्च लग जाए। एक गिलास पानी डाला। असमी मटन में पानी बहुत कम डालते हैं। मटन को इतना गलाते हैं कि वह खुद ही अपनी ग्रेवी तैयार कर ले।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;असमिया मटन पुराण से निपटने के बाद मैं घर के सामने पूजा स्थल पर पहुंचा। पूजा शुरू हो चुकी थी और सिद्धार्थ अपनी चौकी पर बैठ चुका था। पता चला कि अभी यह पूजा कम से कम दो-तीन बजे तक चलेगी। भास्कर को अपने भांजे को पहला अन्न चखाना था, सो वह भी उपवास पर था। उपवास के चलते वह मेरा तांबूल चबाने में साथ भी नहीं दे पा रहा था, और मैं लगातार बोर ही हो रहा था। वह तो शुक्र रहा कि डॉ सदानंद लगातार मुझे अपने दोस्तों से मिलवाते रहे, वरना इस तरह से तो मेरा वहां वक्त काटना मुश्किल था।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं अपने घर में होने वाली पूजाओं से भी दूर रहता हूं, और इसी तरह से बोर होता रहता हूं। एक बजे के लगभग खाना शुरू हो गया। पहली पांत में लगभग पचास-साठ लोगों ने खाया। भूख तो मुझे भी लगी थी लेकिन घर का आदमी होने के चलते पहली पांत में खा लेना बेजा बात समझी जाती। मगर दूसरी पांत तक न मुझसे इंतजार हुआ और न मेरी सास से बर्दाश्त हुआ। हम दोनों दूसरी पांत में बैठ गए। बापधन बाबू ने वाकई खाना बेहद लज्जतदार बनाया था। यह पहली बार था कि घर हो या होटल, मैंने बहुत खाया। पपीते का हलवा तो जबरदस्त था और बैंगन भाजा के तो कहने ही क्या। मेरी सास ने सबसे ज्यादा तारीफ असमिया स्टाइल वाले मटन की बांधी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खाने के बाद हमने तांबूल खाया। यह तांबूल सिद्धार्थ की बाड़ी का था और मुंह में रखते ही ऐसे घुल रहा था कि बनारसी पान क्या घुलेगा। आमतौर पर पेड़ से तांबूल तोड़ने के बाद इसे महीने दो महीने जमीन में गाड़कर सड़ाया जाता है, फिर इसे छीलकर इसमें से सुपारी निकाली जाती है। मगर यह ताजा टूटा तांबूल था। पेड़ से ताजे टूटे तांबूल का स्वाद और मजा दो महीने तक सड़े तांबूल और सूखी सुपारी से कहीं ज्यादा अच्छा होता है। मैंने एक के बाद एक कई तांबूल दबा लिए। असम पहुंचने के कई दिनों बाद भरपेट खाना खाया था तो नींद भी लगी थी। एक कमरे में जाकर मैं सो गया। शाम को हम सब वापस गुवाहाटी निकल लिए। सब इतने थके थे कि रास्ते में कहीं रुके भी नहीं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नलबाड़ी किस्सा समाप्त, अब मेघालय, फिर काजीरंगा शुरू होगा।&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/1984087915142863281/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/1984087915142863281' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1984087915142863281'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1984087915142863281'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2023/01/blog-post_4.html' title='दस देवता और मटन पुराण AS05'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjAwDuK4-ahR9Pr71S_bDV2QSUqhF86TbXi9UqaSm78M-jbPyNXMx1pcVf5LfKT_spaQgxjWLjNkjsRDc13o3VSIfsqgs5l64_9KWCUOd6CLbpsH3AMF3rJ4TL5Zr6UPgzDv1-wJeWcqyRqT8zulGJLukn0IvFuzzLVreWxbVn-O6T2IQsb6TfKZdLD4g/s72-w320-h240-c/IMG-20230106-WA0139.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-6585129435065277432</id><published>2023-01-29T11:44:00.006-06:00</published><updated>2023-01-29T11:55:58.210-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="असम डायरी"/><title type='text'>अहोमों की शादी, नामधारियों का उत्सव AS04</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;जैसे अपने यहां, मने ईस्ट यूपी में ब्रह्मभोज की शुरुआत गूला खोदने से होती है, ऐन वैसे ही यहां भी खाना बनाने वास्ते आग दहकाने के लिए गूले खोदे गए, फिर आग जलाने से पहले इनकी पूजा हुई। अग्नि पूजा कहीं न कहीं हम सारे भारतीयों को एक सी तपिश देती है। यूपी में आमतौर पर मेरी ओर, यानी फैजाबाद-सुल्तानपुर की ओर दो गूले खोदे जाते हैं, या फिर महज एक। पूरी-सब्जी एक साथ बनेगी, या फिर एक ही चूल्हे यानी गूले पर एक के बाद एक बनेगी। दावतों के चूल्हे को गूला शायद इसलिए कहते हैं क्योंकि यह जमीन में अंदर गोल आकार में खोदा जाता है। वैसे भी गूला शब्द गोला के ज्यादा पास है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjjOz2XXYrJdSXk35fcr0om-Plu6pkfDrsEr9MNFThLlMQX0ji_FAqA-RKUIcMKBC7NrPdJ7puYFCQzBM6guryxXGVfu8kBtK3ZEmaXxfhAFVF97GHkpfqtXSaX_b_xr3fYLMsRAhl_BcBltNaMbpXECCWV-MW1NHhjRArmJeV9cUGVW4EEI58eQ7CxBw/s1920/IMG_20230101_153832.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1080&quot; data-original-width=&quot;1920&quot; height=&quot;224&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjjOz2XXYrJdSXk35fcr0om-Plu6pkfDrsEr9MNFThLlMQX0ji_FAqA-RKUIcMKBC7NrPdJ7puYFCQzBM6guryxXGVfu8kBtK3ZEmaXxfhAFVF97GHkpfqtXSaX_b_xr3fYLMsRAhl_BcBltNaMbpXECCWV-MW1NHhjRArmJeV9cUGVW4EEI58eQ7CxBw/w400-h224/IMG_20230101_153832.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यहां भी इन्हें गूला ही कहते हैं। मगर यहां एक साथ तीन गूले खोदे गए। एक पर लगातार पानी गरम होता रहा, और बाकी दोनों पर पकवान पकते रहे। जैसे अब अपनी ओर गूलों के साथ-साथ एकाध गैस के चूल्हे भी रहने लगे हैं, यहां भी एक चूल्हा गैस का था। मने चार चूल्हे जले, जिनमें चावल, पुलाव, असमी मटन, मछली, मुरीघंटो (मछली का सिर तोड़कर उसमें 2-3 तरह की दाल डालकर), पनीर वेज, मिक्सवेज, बैंगन भाजा, पपीते का हलवा, चिली चिकन, सिवईं बनी। इन सबको जीमने के बाद आखीर में भुनी हुई सौंफ के साथ घर के पेड़ों से तोड़े तांबूल और घर में ही उगाए गए पान के पत्ते।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी ओर जिस तरह से गांव भर की महिलाएं पूरी बेलने और मर्द पिसान मर्दने आते हैं, मैं देखना चाहता था कि गांव के बाकी लोग इस भोज में क्या प्रबंध करते हैं। बदकिस्मती से गांव से आया पहला प्रबंधक वही दिखा, जिसके बारे में रात ही ताकीद कर दी गई थी कि इससे दूर रहो। यानी नबाज्योति। मुझे याद आया, मेरी ओर भी वही लोग सबसे कुशलता से ऐसी दावतों का प्रबंधन संभालते हैं, जिनके बारे में दावत देने वाले बहुत अच्छी राय नहीं रखते। फिर मामला अगर पटीदारों का हो, तो और भी चुभता हुआ होता है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मगर मुझे यह बात बेहद अच्छी लगती है। यह हमारे समाज के उन लोगों का अहिंसक प्रदर्शन है, जो कहीं न कहीं यह चाहते और मानते हैं कि सब एक ही घर या कबीले के हैं और भले उन्होंने कुछ अच्छा न किया हो, मगर आज तो अच्छा करके दिखा रहे हैं। जैसे ही मैं गूलों की ओर से मुख्य पूजास्थल पर आया, नबाज्योति बाबू मुझे ही ताड़ते मिले। वह तो अच्छा हुआ कि मुझे तुरंत मेरी साली के ससुर (मेरी साली ने ताकीद की है कि मैं उन्हें अपने रिश्ते का ससुर लिखने की जगह उसी का ससुर लिखूं) यानी डॉ सदानंद का साथ मिल गया, वरना फिर से मुझे कल रात वाली बातें सुनने को मिलतीं- दूर रहो उससे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;डॉक्टर साहब के पास पहुंचा तो उन्होंने मुझे शहर के लोगों से मिलवाना शुरू किया। बहुत लोग थे, बीस से अधिक। मुझे सबके नाम तो नहीं याद, मगर सिद्धार्थ के मामा प्रभाष दत्ता और बुआ इला दत्ता जरूर याद हैं। जैसे ही बुआजी ने यह सुना कि मैं जबसे असम आया हूं, तांबूल पर तांबूल चबाए जा रहा हूं, झट उन्होंने दावत दे डाली कि हमारे पेड़ों के तांबूल खाकर देखो, ऐसे तांबूल पूरे असम में कहीं नहीं मिलेंगे। बुआजी, मेरी शिकायत नोट करिए, बल्कि उसी पोटली में बांधिए, जिसमें कि मुझे शक है कि जरूर आपके घर का तांबूल बंधा था...&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बुआ से मिल ही रहा था कि डॉ सदानंद मुझे गेट की ओर खींच ले गए। वहां उनके चार दोस्त आए थे। उन्होंने उन सबसे मेरा परिचय कराया कि मैं उनकी बहू की बड़ी वाली बहन से ब्याहा हूं और इससे भी बड़ा मेरा परिचय यह है कि मैं अयोध्या से आया हूं, और मेरा घर अयोध्या में बन रहे नए राम जन्म भूमि मंदिर के पांच किलोमीटर की रेंज में है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आपस में परिचय चल ही रहा था कि मेरे सलिया ससुर बोले, मोदीजी ने तो मंदिर बनवा दिया! मैं भी तपाक से बोला, मोदी जी ने नहीं बनवाया। यह तो आपके असमिया भाई गोगोई ने बनवाया। उसी ने तो सुप्रीम फैसला दिया था। वह फैसला न देता तो क्या मोदी और क्या कोई दूसरी पार्टी मंदिर न बनवा पाती। इसी बीच उनके एक दोस्त ने कहा, मगर गोगोई साहब भी तो कई दिक्कतों में फंसे थे?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैंने कहा, हां, फंसे तो थे, मगर यह सब राजकाज का मामला है। आपने चाणक्यनीति पढ़ी है? उसमें यह सारे टंट-घंट दिए हुए हैं। वैसे एक तरह से डॉ साहब का कहना सही है ही कि मोदी जी ने मंदिर बनवा दिया। मगर कायदे कानून के हिसाब से मेरा बयान यही होगा कि गोगोई जी ने मंदिर बनवा दिया। मेरा यह कहना था कि मेरे सलिया ससुर के चार के चारों दोस्तों ने, जो मेरे से उम्र में और नहीं तो कम से कम बीस साल बड़े होंगे, मेरी पीठ ठोंकी, और बोले, यह सही कह रहा है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके बाद तो हाजरीन, मैं कहूं तो क्या ही कहूं। मेरे सलिया ससुर यानी डॉ सदानंद ने वहां आए ढेरों मेहमानों को खोज-खोज कर मुझसे मिलवाया। मैं थोड़ा इंट्रोवर्ड हूं तो कुछेक मौकों पर छुप भी जाता कि अभी डॉक्टर साहब फिर किसी से मुलाकात कराने लगेंगे। कुछ ही देर में तीन तल्ले मकान के हरेक कमरे में यह खबर पहुंच गई कि डॉक्टर साहब को मैं बहुत पसंद आया हूं और वो ब्रह्मभोज में आने वाले लगभग सभी लोगों से मुझे ही मिलवा रहे हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चूंकि मैं भी वहीं किसी तल्ले में था तो अलट-पलटकर यह खबर मेरे भी कानों में गूंजी। रश्क हुआ। कम से कम एक अनजान असमिया तो मुरीद हुआ! भले गोगोई साहब के नाम पर हुआ, मगर हुआ तो सही। जो लोग मुझे ठीक से जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि जुडिशरी की हिस्ट्री में मैंने बहुत कायदे से गोगोई साहब की क्लास लगाई है। मेरी चलती तो मैं उनको जेल कराकर ही मानता। मगर यह बात मैं वहां छुपा गया। कहीं कहीं खुद को ठीक से जानने न देना भी बहुत जरूरी होता है। रिश्तों में तो यह बात और भी कड़ाई से लागू होती है, खासकर इन दिनों के दिनों में।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस ओर पंडित जी अपना आसन लगा चुके थे। हमें बताया गया था कि सात-आठ बजे से पूजा शुरू हो जाएगी, मगर अब तो दस बजे को थे। मैं पूजा की जगह पर पहुंचा। मेरे सलिया ससुर नामधारी हैं, खुद मेरी भी ससुराल नामधारी है। बोरगोहनों की पारंपरिक शादी नामघर में ही होती है। बेहद सादा शादी समारोह। जिस तरह से अपने यहां हवन होने के पहले से लेकर हवन होने के बाद तक वर-वधु को धुंआ होना पड़ता है, ऐसा कोई चक्कर नामघरों में नहीं है। बोरगोहेन अहोम हैं और इनकी शादी को चक-लॉन्ग कहा जाता है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसमें 101 दिए जलाए जाएंगे। फिर पुरखों को याद किया जाएगा, जिसके बाद पुरानी वाली थाई में दूल्हा-दुल्हन कुछ मंत्र बोलेंगे। अगर किसी की औकात सौ दियों की ना हो, तो वह एक दिया जलाकर भी इन मंत्रों के साथ वह शादी कर सकता है, जिसके बारे में मुझे नहीं पता कि कानूनी मान्यता है या नहीं, मगर पारंपरिक और सामाजिक मान्यता पूरी है। बहरहाल, इतने से ही इनकी शादी पूरी हो जाती है, जिसके बाद दूल्हा-दुल्हन सहित मेहमान रोभा में जाते हैं। रोभा इनकी शादी में सजे पंडाल को कहते हैं। गुवाहाटी के जिस पहले होटल में मैंने असमिया थाली खाई थी, उसका नाम भी राभा ही था। मगर राभा यहां की कम्युनिटी है और रोभा मतलब पंडाल।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भास्कर ने भी इन्हीं दियों और मंत्रों के साथ शादी की थी और उसकी जिद यह थी कि यह शादी बिहू के दिन ही हो। बिहू के दिन में असल में असमिये पूरी तरह से पगला जाते हैं। असल में इस पागलपन की जड़ प्रेम और परंपरा का मिलाजुला वह वृक्ष है, जिसके वाकई पूरे राज्य को एक कर रखा है। जैसे अपनी ओर किसी और जाति या फिर गोत्र में शादी करने पर कत्ल हो जाते हैं, यहां ऐसा बिलकुल नहीं होता।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यहां तो बिहू होता है और आप जिस किसी से भी प्रेम करते हैं, बिहू के वक्त उससे कैसे भी करके शादी कर सकते हैं। पूरे समाज में इतनी हिम्मत नहीं कि इस वक्त हुई शादी पर एक भी सवाल उठा सके। मसलन, बोरगोहनों में आपस में शादी नहीं होती, मगर जाखलोबंधा में मेरी फुफेरी सास ने यह परंपरा तोड़ी और किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया। सब खुशी-खुशी दोनों शादी में शामिल हुए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अहोम राजाओं ने चाहे जो किया हो, या चाहे जो ना किया हो, असम को बिहू जैसे प्रेम करने के मौके देकर इसे वाकई दुनिया से एकदम अलहदा और अनोखा राज्य तो बना ही दिया है। अपने यूपी या बिहार में प्रेम करने के क्या ऐसा कोई भी उत्सव हैं? उत्तराखंड में? हरियाणाा में? दिल्ली में? राजस्थान में? कहीं हो ऐसा उत्सव तो कोई बताए?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;... जारी&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/6585129435065277432/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/6585129435065277432' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/6585129435065277432'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/6585129435065277432'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2023/01/blog-post_29.html' title='अहोमों की शादी, नामधारियों का उत्सव AS04'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjjOz2XXYrJdSXk35fcr0om-Plu6pkfDrsEr9MNFThLlMQX0ji_FAqA-RKUIcMKBC7NrPdJ7puYFCQzBM6guryxXGVfu8kBtK3ZEmaXxfhAFVF97GHkpfqtXSaX_b_xr3fYLMsRAhl_BcBltNaMbpXECCWV-MW1NHhjRArmJeV9cUGVW4EEI58eQ7CxBw/s72-w400-h224-c/IMG_20230101_153832.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-5805817905619487728</id><published>2023-01-12T00:31:00.002-06:00</published><updated>2023-01-29T11:55:45.380-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="असम डायरी"/><title type='text'>असम डायरी : यह रायबरुआ कौन जाति होते हैं? AS03</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjh8LHNVdpiCK9azScDso4l7o1XqykaGlLkGHW4njlkVQ7gI8N8Pn6YxXNYFUB6hi5knlH_GX4zHUd2cEbhK_Z9IJR4HjBv6fFpvGTUTcS6zCICHhRXuef4tbeUeXodmVUsAvznAms7uaEtw-PmslmBnNS8lQyvxVNHcxC-frJ7nNQ-ITgjvik1-OPU2A/s1525/n1.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;925&quot; data-original-width=&quot;1525&quot; height=&quot;194&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjh8LHNVdpiCK9azScDso4l7o1XqykaGlLkGHW4njlkVQ7gI8N8Pn6YxXNYFUB6hi5knlH_GX4zHUd2cEbhK_Z9IJR4HjBv6fFpvGTUTcS6zCICHhRXuef4tbeUeXodmVUsAvznAms7uaEtw-PmslmBnNS8lQyvxVNHcxC-frJ7nNQ-ITgjvik1-OPU2A/s320/n1.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बालीकोरिया पहुंचते-पहुंचते शाम होने लगी थी। महीना दिसंबर-जनवरी का हो तो असम में तीन-साढ़े तीन बजे तक शाम होने लगती है और पांच-साढ़े पांच बजे तक रात हो जाती है। यहां मेरे सास मेरी मोहतरमा के साथ पहले ही दिल्ली से पहुंची हुई थीं। इन दिनों वर्क फ्रॉम होम ही चल रहा है, सो मुझे दफ्तर के जरूरी काम निपटाने थे। जो कमरा मुझे एलॉट हुआ था, वहां मैं अपना लैपटॉप लेकर बैठ गया। काम निपटाने के बाद वापस घर के मेन हॉल में पहुंचा तो डॉ सदानंद रायबरुआ आ चुके थे, कुछ देर में डॉ निबिर रायबरुआ भी आ पहुंचे। वह अपने साथ पढ़ने वाले किसी दोस्त के ढाबे से चिकन भुनवाकर लाए थे, और आते ही नए साल की पार्टी में कुछ लज्जत भरने के काम में लग गए। रात हमें छत पर आग जलानी थी और डॉ निबिर के पकाए चिकन के स्वाद के साथ सबने नए साल का खैरमकदम करना था। आग जलाने का जिम्मा मुझे सौंपा गया, यह कहकर कि एक तो यूपी वाला, ऊपर से ब्राह्मण- इससे जल्दी और इससे अच्छी आग भला कौन लगाएगा? मोहतरमा ने भी गवाही दी कि घर पर रखी कोयले की अंगीठी को यह यूपी वाला पांच-दस मिनट में दहका देता है।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अभी तैयारी हो ही रही थी कि मेरी तलब ने मुझे कुछ परेशान सा किया। मैं घर से बाहर निकल आया और अंधेरे में पैदल ही धुंआ उड़ाते हुए नामघर की ओर बढ़ा। रास्ते में गांव के ही एक साहब नबाज्योति टकरा गए। अपनी ओर के राहुल या विजय की तरह असम में भी आपको दो नाम खूब मिलेंगे- नबाज्योति और ध्रुबाज्योति। पहले असमी में कुछ पूछा, मैं बोला मुझे असमी नहीं आती, हिंदी आती है। फिर उन्होंने पूछा कि किसके घर? मैंने बताया। वह बोले, फिर तो आप हमारे भी मान्य हुए। अब आपको हमारे घर चलना पड़ेगा। मेरी तलब शांत नहीं हुई थी, मैं बड़ी अनिच्छा से उनके साथ चला। नामघर के पहले ही उनका घर था। गेट के अंदर घुसते ही बड़ा सा खाली दलान, जिसमें चूल्हा जलाकर उनकी पत्नी मुर्गी पका रही थीं। दुआ-सलाम हुई, परिचय हुआ। पता चला कि नबाज्योति अच्छे तैराक हैं और इन दिनों गुवाहाटी में कहीं तैराकी कोच हैं। उनकी पत्नी भी एनसीसी में रही हैं और बच्चा बारहवीं गुवाहाटी से कर रहा है। उनकी पत्नी ने तुरंत कढ़ाई से मुर्गी निकालकर मुझे पेश करनी चाही, पर मैंने बहाना बना दिया कि मैं नॉनवेज नहीं हूं। इस पर नबाज्योति घर के अंदर गए और स्पंज का रसगुल्ला दो बिस्कुट के साथ ले आए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं उनके घर था तो, मगर मेरी सहाफी नाक को चूल्हे पर पकती मुर्गी के अलावा भी कुछ गंध आ रही थी। उधर नबाज्योति कह रहे थे कि सिद्धार्थ को समझाते क्यों नहीं? यहां इतनी खेती-बाड़ी है, पिता का इतना बड़ा नाम है, अमेरिका में क्या रखा है? रसगुल्ले के बाद किसी तरह से बिस्कुट पानी से निगले और यह कहते हुए मैं वहां से उठ खड़ा हुआ कि आपका कहना बिलकुल वाजिब है, मैं आपकी बात आगे तक पहुंचा दूंगा। वह मेरे पीछे-पीछे मुझे छोड़ने घर तक आए। घर के बाहर जैसे ही उन्होंने डॉ सदानंद को देखा, तुरंत छुप गए। यानी मेरी सहाफी वाली नाक सही थी। अपनी नाक पर अपनी सहाफत लेकर मैं आगे बढ़ा। डॉ सदानंद नबाज्योति की परछाईं भी पहचानते थे। इससे पहले कि वो कुछ बोलें, मैंने बोल दिया- आपके गांव में कोई नबाज्योति हैं, वो मुझे अपने घर लेकर गए थे। डॉ सदानंद तुरंत बोले, उसके घर नहीं जाना चाहिए था। वह अच्छा आदमी नहीं है। एकाध बार जेल के चक्करों में भी पड़ चुका है। मैंने कहा, इसका कुछ-कुछ अंदाजा तो मुझे हो चला था, बस मेरे अंदाजे पर आपकी मुहर लगनी बाकी थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgPE6yfQ13fuW7kuGi7LMzEiiSRpc9PjFeYI0gC3a7AJYadMmZ6VS_5qhy0V1cYep8pNEqm-znmiiFkabfNstqV1xYt2moSGE84XAIASd6JeU4W1LBxnrd3Md73V0vdLfgSXvRHXboDJ_XYdPaWb5L4Y1eJCe998EW4nlIxGzwpp0E3WH71LgrPRK4fOg/s768/WhatsApp%20Image%202022-12-31%20at%209.55.38%20AM%20(1).jpeg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;489&quot; data-original-width=&quot;768&quot; height=&quot;204&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgPE6yfQ13fuW7kuGi7LMzEiiSRpc9PjFeYI0gC3a7AJYadMmZ6VS_5qhy0V1cYep8pNEqm-znmiiFkabfNstqV1xYt2moSGE84XAIASd6JeU4W1LBxnrd3Md73V0vdLfgSXvRHXboDJ_XYdPaWb5L4Y1eJCe998EW4nlIxGzwpp0E3WH71LgrPRK4fOg/s320/WhatsApp%20Image%202022-12-31%20at%209.55.38%20AM%20(1).jpeg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;वहां से मैं सीधे छत पर पहुंचा। डॉक्टर साहब की इकलौती बेटी, जो खुद भी डेंटिस्ट हैं- डॉ दीक्षिता रायबरुआ, उन्होंने तसले में आग लगा दी थी। आग भड़की नहीं थी, सो मैंने पहुंचते ही भड़का दी। साथ ही आग के आसपास बैठे लोगों को यह खबर भी दी कि नबाज्योति के घर से होकर आ रहा हूं। सबका वही कहना था, जो कुछ देर पहले डॉ सदानंद ने कहा था। इतने में देखता हूं कि नबाज्योति का फोन मेरे मोबाइल पर आने लगा था। डॉ दीक्षिता रायबरुआ ने पूछा, फोन नंबर भी दे आए? मैं बोला, अब कोई नंबर मांगता है तो सहाफी होने के नाते मुझे कभी भी हिचकिचाहट नहीं होती, सबको दे देता हूं। वह बोलीं, अब ये आपको परेशान करेगा। मैं बोला, वो मैं देख लूंगा, पहले आप मेरी सबसे बड़ी जिज्ञासा शांत करिए। मैंने यहां देखा कि मारवाड़ियों के घर अपने चैनल डोर की वजह से पहचान लिए जाते हैं। मगर आपके यहां बिहारी भी रहते हैं, बंगाली भी। सिर्फ बाहर से ही पहचानने हों तो उनके घर कैसे पहचाने जाएं?&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने बताया कि बिहारियों के घर हम ऐसे पहचानते हैं कि उनके छोटे से घर में बड़ी भीड़ रहती है। एक छोटे से घर में दस से पंद्रह लोग पाए जाते हैं। और बंगालियों के घर उनकी औरतों की आवाज से पहचानते हैं। अगर घर के अंदर से किसी औरत के चिल्लाकर बात करने की आवाज आ रही है तो हम समझ जाते हैं कि बंगाली है। मगर यह मेरे सवाल का जवाब नहीं था। मैंने फिर से सवाल को चैनल डोर पर केंद्रित किया। इस बार उनका कहना था कि बिहारी और बंगाली के घर के बाहर ऐसा कोई साइन नहीं मिलेगा, जो उन्हें मारवाड़ियों की तरह अलग करता हुआ दिखाएगा। उनके घर की बनावट भी यहीं के बाकी घरों की तरह होती है। फिर उन्होंने मुझसे सवाल पूछा, पूछा क्या, सवाल दागा- आपके यूपी में तो जात-पात बहुत चलता है? मैंने कहा, खूब, बल्कि जरूरत से ज्यादा। बल्कि खुद मेरे घर में खूब जात-पात और छूत-छिरकन है। उन्होंने बताया कि पढ़ने के लिए जब वह लखनऊ गई थीं तो पहले तो किराए पर कमरा ना मिले। बड़ी मुसीबत से एक कमरा मिला तो यूपी वालों को रायबरुआ न समझ में आए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi9P5VgR5qZhzC9VoPfEoiJljU7LD2MSM-x8ZuHIlwm3HOKr70Y6_hkkZ5pK3-vIDVfzzoXhnMcREPFlHnyNR9Ma7SHsP0IE2-3QDQsXSpwAHDMj2oEMuART5R4WJH49axq_tjAkC6mGTNGrQymuDKQhaCtWEtfUmNusNzbyTXpZDbepwYF0Oq1qYgUAg/s344/b2.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;282&quot; data-original-width=&quot;344&quot; height=&quot;262&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi9P5VgR5qZhzC9VoPfEoiJljU7LD2MSM-x8ZuHIlwm3HOKr70Y6_hkkZ5pK3-vIDVfzzoXhnMcREPFlHnyNR9Ma7SHsP0IE2-3QDQsXSpwAHDMj2oEMuART5R4WJH49axq_tjAkC6mGTNGrQymuDKQhaCtWEtfUmNusNzbyTXpZDbepwYF0Oq1qYgUAg/s320/b2.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;और फिर एक दिन मकान मालकिन ने पूछ ही लिया- ये रायबरुआ क्या चीज होते हैं? डॉक्टर साहिबा ने बताया- कायस्थ होते हैं। और जब उन्होंने यह किस्सा कॉलेज में अपने सीनियर से बयान किया तो सीनियर का कहना था, उसे बता देती कि तुम ब्राह्मण हो तो जब तक तुम रहती, तुमसे ज्यादा सवाल या किचकिच करने की जगह बड़े ठीक से रहती। मैं खिसियानी हंसी हंसा। यूपी की जो छूत-छिरकन और जात-पात की आदत है, उसकी वजह से इकलौता मैं ही नहीं हूं जो बाहर के प्रदेशों या देशों में बेइज्जत होता हूं, मेरी तरह और भी बहुतेरे हैं। मगर इससे यूपी को क्या, यूपी वालों को क्या? यूपी की छूत-छिरकन की इन कहानियों के साथ नया साल आया, हमने एक दूसरे को मुबारकबाद दी और अपने-अपने बिस्तरों के हवाले हुए। कल सुबह घर पर देवता बैठाए जाएंगे, कुछ लोग व्रत रहेंगे और सैकड़ों लोग जीमेंगे। कल हमारे यहां नलबाड़ी में ब्रह्मभोज है।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;....जारी&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/5805817905619487728/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/5805817905619487728' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/5805817905619487728'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/5805817905619487728'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2023/01/blog-post_12.html' title='असम डायरी : यह रायबरुआ कौन जाति होते हैं? AS03'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjh8LHNVdpiCK9azScDso4l7o1XqykaGlLkGHW4njlkVQ7gI8N8Pn6YxXNYFUB6hi5knlH_GX4zHUd2cEbhK_Z9IJR4HjBv6fFpvGTUTcS6zCICHhRXuef4tbeUeXodmVUsAvznAms7uaEtw-PmslmBnNS8lQyvxVNHcxC-frJ7nNQ-ITgjvik1-OPU2A/s72-c/n1.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-5237108185862081752</id><published>2023-01-11T03:32:00.003-06:00</published><updated>2023-01-29T11:55:29.042-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="असम डायरी"/><title type='text'>असम डायरी : अहोमों से मारवाड़ियों तक AS02</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjxxdw3czXXOHhkm1JjVVBkpvsCQAhoWIcTczSgNVIRnTHhCknVUOei6bIiEHR22F5H5DkDBtI5y0jKPWyqIJN3Ct92SeH4cJD3S-1m_35iq-_mi1ajEDyitdBzx3WB7QuyPwm6Ba_KRJgf7Ot9ch0c2U5UxgwsgH4gpkeMaZgkTv_-Ca_YtXbSjFPuxw/s346/b10.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;262&quot; data-original-width=&quot;346&quot; height=&quot;242&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjxxdw3czXXOHhkm1JjVVBkpvsCQAhoWIcTczSgNVIRnTHhCknVUOei6bIiEHR22F5H5DkDBtI5y0jKPWyqIJN3Ct92SeH4cJD3S-1m_35iq-_mi1ajEDyitdBzx3WB7QuyPwm6Ba_KRJgf7Ot9ch0c2U5UxgwsgH4gpkeMaZgkTv_-Ca_YtXbSjFPuxw/s320/b10.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कटे पहाड़ों से उपजी शर्म और जाम से जूझते हुए हम आगे बढ़े। आगे हमें ब्रह्मपुत्र पार करना था। पहले इसे पार करने के लिए लोहे का पुल था, मगर अब नया पुल बन गया है। बनावट में यह काफी-कुछ अयोध्या में सरयू पार करने के लिए बने पुल सा है, यानी कोई खास डिजायनिंग नहीं- बस एक साधारण सा पुल। नाम है सराईघाट पुल। सराईघाट वही जगह है जहां अहोम राजाओं और मुगलों की जंग हुई थी। मेरा साला बोरगोहेन है। अहोम राजाओं के दरबार में बोरगोहेन लोग राजा के सेकंड सबसे सीनियर काउंसलर हुआ करते थे। नंबर एक पर बरगोहांई थे। यहां पर असम पर बेहद प्रसिद्ध ट्रैवेलॉग- यह भी कोई देस है महाराज लिखने वाले अनिल कुमार यादव मुतमईन नहीं हैं। उनका मानना है कि बोरगोहेन और बरगोहांईं लोग एक ही हैं। बरगोहांईं अपने यहां के गुसाईं हैं। इसके लिए उन्होंने साहित्य अकादमी से सम्मानित असम के प्रसिद्ध साहित्यकार होमेन बरगोहांईं का नाम बताया।&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;वहीं मेरे साले के मुताबिक असम में बोरगोहनों की चार उपजातियां हैं- गोहेन, बोरपात्रागोहन, बोरगोहेन, बरगोहांईं। अंग्रेजी में इनकी स्पेलिंग ये होगी- &amp;nbsp;Gohain, Borpatragohain, Borgohain, Buragohain. असम या फिर नॉर्थ ईस्ट की सातों परियों की बात हो तो यह हमेशा याद रखना चाहिए बोर यानी बड़ा। वैसे एक मायने में यह ठीक वैसे ही है जैसे कि मिश्रा, शर्मा, तिवारी, पाण्डेय, त्रिवेदी, या फिर गुंसाईं। सब ब्राह्मण हैं, मगर सोसाइटी में काम सभी का एक सा नहीं है। इसी तरह सारे गोहाईं अहोम राजाओं के काउसंलर नहीं थे। सराईघाट पार करते हुए साले ने बताया कि सन 1671 में जब मुगलों ने यहां हमला किया तो लचित ने यहां आसपास के गावों से मिट्टी भरवा दी और किनारों को कम से कम सौ डेढ़ सौ फीट ऊंचा कर दिया। गुवाहाटी के आसपास की मिट्टी दरबर है। जैसे ईंट भट्टे से निकली राबिश। ताजी खुद मिट्टी तो रंग में भी सूखी राबिश जैसी दिखती है, यानी रेड और फेडेड रेड का मेल। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjo9mCCzeMGAvXPy1uyWb4a0aQKyhSdtsaYI_OVUP6VOSPxFBEOU-BIlSkltjSWbvRFSHLm95oZyAgi5kFD2xmxR_54gPl5oRg4WRo95MjmErv3gg6Gou4dDQ9Ce0EZOtAc816xNe79BYjI9PEmyT8M44KEuAt-n6bF1bZLXGfSPXIcRQeeJXcJF0Ksog/s4080/IMG_20221228_165847.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;2296&quot; data-original-width=&quot;4080&quot; height=&quot;180&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjo9mCCzeMGAvXPy1uyWb4a0aQKyhSdtsaYI_OVUP6VOSPxFBEOU-BIlSkltjSWbvRFSHLm95oZyAgi5kFD2xmxR_54gPl5oRg4WRo95MjmErv3gg6Gou4dDQ9Ce0EZOtAc816xNe79BYjI9PEmyT8M44KEuAt-n6bF1bZLXGfSPXIcRQeeJXcJF0Ksog/s320/IMG_20221228_165847.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस पहाड़ पर चढ़ना आसान नहीं होता। इसका अंदाजा मुझे यूं लगा कि पहली बार ब्रह्मपुत्र मैंने ऐसी ही उठान से देखा। कहीं मिट्टी में पैर धंस रहे थे तो कहीं सम थे। मैदानी होने के नाते मुझे इसका बिल्कुल भी अंदाजा नहीं लग पा रहा था कि कहां पैर रखने चाहिए और कहां कमर झुकानी चाहिए। मुगल सेना ने जब इन पर चढ़ने की कोशिश की तो अहोम सेना ने इन्हें ऊपर से ही काट डाला। वे अपनी मिट्टी का धंसान जानते थे, सो उनके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। धंसान से याद आया, जिस सड़क पर हम चल रहे थे, वह भी लेवल में नहीं थी। यहां की मिट्टी कहीं से भी धंस सकती है और इसीलिए गुवाहाटी में मेट्रो नहीं चल सकती। मेट्रो के लिए हुई सॉइल टेस्टिंग में गुवाहाटी फेल हो चुका है। बहरहाल, पूरी गुवाहाटी में आपको दीवारों पर इसी युद्ध के सरकारी विज्ञापन कलात्मक ढंग में देखने को मिलेंगे। ब्रह्मपुत्र के किनारों और ब्रह्मपुत्र के बीचोबीच होने वाले युद्ध। पता चला कि दीवारों पर ऐसी जंग खासकर तबसे उकेरी जा रही है, जबसे यहां बीजेपी की सरकार आई है। जंग का बखान इंसानी आदतों की उतनी ही बुरी चीजों में है, जितनी की खुद जंग है। फिर भी हमें लड़ने में ही सबसे ज्यादा रस मिलता है तो हम क्या करें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgithBO9fMe0Q48reoDMnp7tYqsfAEM3GLEcCxBVv4Vr5doPPls2EWGoeg1EPu9g3-168CnLjSjeiBuKUhEemYFFIE_OywNfdR6IeKPc2oEGzqvi6_dYkos4c0H6t_AYqk07OPzu_tqMrKfz6aOXMDqbJRwysGjI0UXUSERX0oO0gfSI6asKbxukwbbuA/s4080/IMG_20221231_142830.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;2296&quot; data-original-width=&quot;4080&quot; height=&quot;180&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgithBO9fMe0Q48reoDMnp7tYqsfAEM3GLEcCxBVv4Vr5doPPls2EWGoeg1EPu9g3-168CnLjSjeiBuKUhEemYFFIE_OywNfdR6IeKPc2oEGzqvi6_dYkos4c0H6t_AYqk07OPzu_tqMrKfz6aOXMDqbJRwysGjI0UXUSERX0oO0gfSI6asKbxukwbbuA/s320/IMG_20221231_142830.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;हम तकरीबन साढ़े ग्यारह पर पांजाबाड़ी गुवाहाटी से निकले थे, मगर ब्रह्मपुत्र पार करते-करते दो बजने को हो रहे थे। अभी तो हम नलबाड़ी के रास्ते में आधे भी नहीं आ पाए थे। अब तलाश शुरू हुई ढाबे की। हम बाजोइ नाम के ढाबे पर रुके। यहां असमिया थाली 80 रुपये की थी और यह पहली असमिया थाली थी, जो मुझे अब तक दूसरी जगहों पर खाए गए खाने में सबसे अच्छी लगी। असमी थाली में आपको पांच तरह की सब्जी, सलाद, चटनी, दो तरह की दाल बैंगन भाजे और पापड़ के साथ मिलती है। दाल एक अरहर की और एक यहां की लोकल उड़द की। यहां की काली उड़द हम लोगों की तरफ होने वाली उड़द से साइज में लगभग आधी होती है। सब्जी आमतौर पर एक आलू भुजिया, एक साग- अक्सर लाही का, कहीं कहीं नींबू की सब्जी, बीन्स, चना वगैरह होती है, जिसे मछली चाहिए, उसका भी इंतजाम इन्हीं पैसों में हो जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्सी रुपये में आप जितना खा सकते हों, यहां उतना खिलाया जाता है। यहां क्या, मेन गुवाहाटी में भी जितने होटलों में आप थाली ऑर्डर करेंगे, वे सब आपके पेट भरने तक आपको थाली की हर चीज परोसेंगे, कोई एक्स्ट्रा चार्ज नहीं। इससे पहले मैं 6 माइल गुवाहाटी पर राजबोंग्शी और राभा में भी खाया था, मगर बाजोइ वाली थाली ज्यादा सही लगी। एक खास बात और, यहां के होटलों-ढाबों में अधिकतर वेटर महिलाएं हैं। ढाबों की बात करें तो कई जगहों पर गल्ले से लेकर चूल्हे तक पर भी महिलाएं ही मिलती हैं। सुंदर, स्मार्ट और हर चीज एक प्रेमिल मुस्कान के साथ परोसने वाली। एकाध बार तो मुझे ऐसा भी फील हुआ कि जैसे कोई महिला वेटर बिहू मोड में परोस रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjSu86Wx04hmjzZlAxNFHZzqBv6m9MGWE932bOiBDzhudvi5vVIZ5LDSmmdYQEh1r2wvBjIEnrCy1Xm9Pl2on7zprDdBy3Lmy-36jY_kXrC0hc-YJ53RuEJ1FldfZ5pr03xhCXl96hkZ7RQO5-00YkaFDySdFLV-NuVsmqf35pGiJmknEVulMHg3TvTGg/s512/b8.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;383&quot; data-original-width=&quot;512&quot; height=&quot;239&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjSu86Wx04hmjzZlAxNFHZzqBv6m9MGWE932bOiBDzhudvi5vVIZ5LDSmmdYQEh1r2wvBjIEnrCy1Xm9Pl2on7zprDdBy3Lmy-36jY_kXrC0hc-YJ53RuEJ1FldfZ5pr03xhCXl96hkZ7RQO5-00YkaFDySdFLV-NuVsmqf35pGiJmknEVulMHg3TvTGg/s320/b8.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;वैसे इन दिनों समूचा असम बिहू मोड में है, घर-घर में बिहू की तैयारियां जोरों पर हैं। जिस दिन अपनी ओर खिचड़ी का नहान होता है, उस दिन इस ओर बिहू शुरू होता है। बिहू अहोम राजाओं ने शुरू कराया था और मुख्य बिहू सिवसागर के रंगमहल में आज भी मनाया जाता है। रंगमहल असम राज्य के प्रतीकों में है और लकड़ी के गैंडे-बारहसिंगे की तरह यहां इसके भी छोटे-बड़े हर साइज में मॉडल बिकते मिलेंगे। सिवसागर में ही मेरी नानी सास मेरे इंतजार में है, जिसने मेरे ब्याह में असम में सबसे पवित्र माने जाने वाले कांसे और पीतल के बर्तन भेजे थे। वैसे कांसे और पीतल के बिना क्या अपने यूपी में भी शादी पूरी हो सकती है? आई थिंक- नो। कांसे के ये बरतन अब तो बांग्लादेशी भी बनाने लगे हैं, वरना मुगलों से हुई लड़ाई के बाद जो मुसलमान सैनिक यहां घायल होकर जिंदा बचे रहे गए, उन्होंने यह काम संभाला, और उनके बाद उनकी पीढ़ियों ने। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाना खाने के बाद हमारा अगला पड़ाव था परिणिता की दुकान। इन्होंने नलबाड़ी गुवाहाटी के रास्ते में पूरी-सब्जी से अपनी दुकान शुरू की थी, जो चल निकली तो अब इनकी यहां पर तीन-तीन बड़ी दुकानें हो चुकी हैं, जो हमेशा भीड़ से भरी रहती हैं। यहां हमें मिठाई वगैरह खरीदनी थी। असम में रिवाज है कि आप किसी के घर जा रहे हों तो अपने नाश्ते का सामान खुद बंधवाकर ले जाइए, जो वहां चाय के साथ खुद भी खाइए, अपने मेजबान को भी खिलाइए। हमने यहां से दो तीन तरह की बरफी पैक कराई। नलबाड़ी में हमें बालीकोरिया जाना था। पहले यह नलबाड़ी का एक गांव था, मगर अब शहर डिवेलप होते हुए यहां तक पहुंचने को बेताब है तो कह सकते हैं कि यह एक अधगंवई इलाका है। मने गांव भी और शहर भी। मकान गांव जैसे कच्चे-पक्के भी मिलेंगे और शहर जैसे तीन तल्ला भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgYQ_Wxw-zA167lYqFjkHmixd8WH98eYWiNo8AxkpOI-LNfNG1f5fJ2MtMXXJwZTOds_riGsROxpBrwwBI1m3P4mJsUEdAIXmpsPSczFIbHmtaJkwruxuy7MPjzLz_TUtsIpBZEg-Q8B8nJEu_eFT2SycpDo2eiuch8UgLR11zTvu39xZ8dI-khKJqkQQ/s354/n2.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;243&quot; data-original-width=&quot;354&quot; height=&quot;220&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgYQ_Wxw-zA167lYqFjkHmixd8WH98eYWiNo8AxkpOI-LNfNG1f5fJ2MtMXXJwZTOds_riGsROxpBrwwBI1m3P4mJsUEdAIXmpsPSczFIbHmtaJkwruxuy7MPjzLz_TUtsIpBZEg-Q8B8nJEu_eFT2SycpDo2eiuch8UgLR11zTvu39xZ8dI-khKJqkQQ/s320/n2.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;यहां नोट करने लायक एक खास बात दिखी। नलबाड़ी में मारवाड़ी खूब हैं। जिस तरह से इनके जगह जगह पर मकान दिखते हैं, लगता है कि गुवाहाटी में इतने नहीं होंगे। सबके घरों के बाहर लोहे के स्लाइडिंग चैनल बने हुए हैं, और घर की हर खुली जगह, चाहे वो खिड़की हो, रौशनदान हो या बालकनी हो, लोहे की मजबूत ग्रिल से लैस होगी। मगर अब यही कल्चर धीमे-धीमे गुवाहाटी में नए बनने वाले लगभग सारे असमी घरों में लागू होने लगा है। वे भी मकानों में ग्रिल लगवाने लगे हैं। मैंने पूछा तो पता चला कि उल्फा के जमाने में इन पर वसूली के लिए खूब अटैक हुए। असम में बड़ा पैसा मारवाड़ियों के पास था। असम की आबादी के दस से पंद्रह फीसदी मारवाड़ी असम के कुल व्यापार का अस्सी से पचासी फीसदी कंट्रोल करते हैं। बिजनेसमैन हैं, करंसी नोट बहुतायत में इन्हीं के पास हैं तो जाहिर है कि कभी इनसे वसूली होती तो कभी इन लोगों ने खुद अपनी ताकत जताने के लिए उल्फा और आसु जैसी चीजों में पैसा लगाया। बहरहाल, यहां बस इसी पहचान के सहारे कोई भी मारवाड़ियों के घर पहचान सकता है। लोहे के गेट असमियों के घर के बाहर भी लगे हैं, मगर वो ठीक वैसे ही हैं, जैसे यूपी या उत्तराखंड में दिखते हैं। सरकाने वाला फोल्डिंग टाइप का चैनल गेट सिर्फ मारवाड़ियों के घर के बाहर दिखता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नलबाड़ी के प्रसिद्ध आई सर्जन डॉ. सदानंद रायबरुआ का परिवार हमारा मेजबान था। मेरी साली इन्हीं के सबसे बड़े लड़के से ब्याही है। लड़का-लड़की दोनों यूएस में रहते हैं, और इन्हीं के आठ महीने के सुपुत्र के अन्नप्राशन समारोह में हम पहुंचे थे। पहले डॉक्टर साहब का मकान एकदम असमिया स्टाइल में था। बस बांस और मिट्टी से बनी कच्ची दीवारों की जगह दीवारें पक्की थीं, मगर डिजाइन वही था जो पूरे असम के मकानों का डिजाइन है- टिन की छत। पीछे लंबी चौड़ी बाड़ी, यानी बागीचा और मछली के लिए तालाब। मगर कुछ साल पहले इसी घर के आगे तीन तल्ले का काफी बड़ा मकान बना लिया है और पुराना पीछे वाला मकान किराए पर चढ़ा दिया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhHizjhsitsxIiSmRdNz9uaZSm6Sw_dwCyFxOAatOaToiPLYTJE53KXjhniTJUFMjnccPIWlN9RkHx9-bEfKa72cUOuoxg7A1q2eHN8567ZIorV9yoTJmdD4rS50oWRSbcjpPeQY04VyQm59NWXt2yv6xiUnGJXWTFAAD0RPmKwzHvYV0FtktOYDcnsqA/s4080/IMG_20230101_125948.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;4080&quot; data-original-width=&quot;2296&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhHizjhsitsxIiSmRdNz9uaZSm6Sw_dwCyFxOAatOaToiPLYTJE53KXjhniTJUFMjnccPIWlN9RkHx9-bEfKa72cUOuoxg7A1q2eHN8567ZIorV9yoTJmdD4rS50oWRSbcjpPeQY04VyQm59NWXt2yv6xiUnGJXWTFAAD0RPmKwzHvYV0FtktOYDcnsqA/s320/IMG_20230101_125948.jpg&quot; width=&quot;180&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर साहब अपनी स्टूडेंट और उसके कुछ बाद की लाइफ तक किसी न किसी रूप से आरएसएस से जुड़े रहे हैं। अभी भी वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर वाले समर्थक हैं और आयुष्मान भारत योजना के तहत कैटरैक्ट ऑपरेशन करने में नलबाड़ी में अव्वल जगह बना रहे हैं। वाइफ, यानी कि किसी न किसी रिश्ते में मेरी सास मंजुला दत्ता रायबरुआ हैं जो नलबाड़ी कॉलेज में जूलॉजी की प्रफेसर तो रही ही हैं, वहां की एक्टिंग प्रिंसिपल के पद से अब रिटायर हो चुकी हैं। साइज में लगभग मेरी मम्मी की तरह, रंग और आदतों में भी। जैसे मेरी मम्मी घर में किसी को यूं ही बैठा या राह से गुजरता देखती हैं तो कुछ न कुछ खाने के लिए पूछती रहती हैं, और मैं उनसे परेशान होता रहता हूं, इन्होंने भी मेरा वही हाल किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपनी साली के पति यानी इनके लड़के सिद्धार्थ से पूछा कि क्या नौकरी के दिनों में भी ये ऐसी ही थीं तो वह बोला- हां। सिद्धार्थ प्रोजेक्ट मैनेजर है, अमेरिका में पोस्टेड है। पता चला कि सिद्धार्थ अकेला नहीं है, नलबाड़ी के बहुतेरे लोग अमेरिका में काम कर रहे हैं। इसकी वजह पूछने पर पता चला कि नलबाड़ी असम के दो तीन सबसे स्मार्ट जिलों में से एक है, यहां के बहुत सारे लोग अमेरिका और यूरोप में फैले हुए हैं। असम.ओआरजी के मुताबिक अमेरिका में दो चार हजार असमी लोग काम कर रहे हैं। और ये आज से नहीं, 1960 के भी पहले से वहां पर हैं और वहां पर इनका असोम संघ, असम सोसायटी ऑफ अमेरिका, असम एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका, असम साहित्य सभा नॉर्थ अमेरिका भी है। &lt;br /&gt;...जारी</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/5237108185862081752/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/5237108185862081752' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/5237108185862081752'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/5237108185862081752'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2023/01/blog-post_11.html' title='असम डायरी : अहोमों से मारवाड़ियों तक AS02'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjxxdw3czXXOHhkm1JjVVBkpvsCQAhoWIcTczSgNVIRnTHhCknVUOei6bIiEHR22F5H5DkDBtI5y0jKPWyqIJN3Ct92SeH4cJD3S-1m_35iq-_mi1ajEDyitdBzx3WB7QuyPwm6Ba_KRJgf7Ot9ch0c2U5UxgwsgH4gpkeMaZgkTv_-Ca_YtXbSjFPuxw/s72-c/b10.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-1086224536995759997</id><published>2023-01-10T06:43:00.006-06:00</published><updated>2023-01-29T11:55:11.057-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="असम डायरी"/><title type='text'>असम डायरी : धरती को शर्मिंदा करती गुवाहाटी AS01</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;table cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;float: left;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a 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बीजेपी मुख्यालय&lt;/i&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;b&gt;हम सब&lt;/b&gt; आज गुवाहाटी से नलबाड़ी जा रहे हैं। हम सब यानी मैं, मेरा साला, मेरी साले की वाइफ जो उसके तांबूल खाने पर उसे नाराज होकर कूट रही है, और इन दोनों का बेहद प्यारा सा बच्चा। यह बच्चा बोरगोहनों और बड़फुकनों की सम्मिलित संतान है, जिसने मेरी नाक में दम कर रखा है। नलबाड़ी मेरी साली की ससुराल है। उनके सुपुत्र महोदय अब 8 महीने के हो चुके हैं और कल सुबह उनका अन्नप्राशन समारोह है। गुवाहाटी से नलबाड़ी तकरीबन 50-60 किलोमीटर है, जैसे फैजाबाद से सुल्तानपुर, हरिद्वार से देहरादून, मेरठ से दिल्ली या बरेली से बदायूं। मगर फैजाबाद से सुल्तानपुर वाले या पिछले कुछ सालों से मेरठ से दिल्ली वाले रास्ते में जाम नहीं मिलता, यहां जाम खूब मिलता है। इसके चलते यह रास्ता ढाई से तीन घंटे और कभी-कभी चार घंटे तक का हो जाता है। यह जाम लगता इसलिए है क्योंकि गुवाहाटी में चार पहिया वाली गाड़ियां जरूरत से ज्यादा हो चुकी हैं, जिनपर शायद अभी यहां की सरकार कोई खास गंभीर नहीं है। यह मेरा नहीं, बल्कि इस शहर के तकरीबन हर कारवाले का कहना है। किसी भी शहर में अगर इतनी ज्यादा गाड़ियां हों तो मेरा मानना है कि ऑड-ईवन वाला प्रयोग सड़कों और लोगों को राहत देने के लिए इतना भी बुरा नहीं।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फिर गुवाहाटी से नलबाड़ी जाने वाला रास्ता चौड़ा किया जा रहा है तो इन दिनों जगह-जगह से खुदा पड़ा है, डायवर्जन अलग से बोनस में मिलता है। सड़क बनाने का यही सीजन होता है, यानी सर्दियों का। इसके बाद तो गर्मियां अपने साथ बाबा ब्रह्मपुत्र का वो पानी लेकर आती हैं, जो असम, यानी ऐसी जगह जो कहीं से भी सम नहीं है, उसे हर जगह भरकर सम कर देता है। ऐसे में सड़क तो दूर, लोगों के घरों में दो जून का भात ही बन जाए तो बड़ी बात है। असम में दो जून की रोटी नहीं, दो जून का भात चलता है। काजीरंगा में जब मैं बड़े शौक से धान की साढ़े तीन सौ किस्में रेकॉर्ड कर रहा था तो उन्हें दिखाने वाले ने कौतूहल से पूछा- आप तो रोटी वाले हैं ना? मैंने कहा, भैया, मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश का हूं और विशुद्ध भात वाला हूं। हमारे यहां जितने लोकगीत धान रोपने पर हैं, गेहूं पर उसके आधे तो दूर, चौथाई भी नहीं हैं। रोटी हमारे यहां बनती है, लोग खाते हैं, मगर ज्यादा शौक से भात ही खाते हैं। और एक बात, यूपी तो दूर, उत्तराखंड वालों का भी जीवनमंत्र भट-भात ही है। बेचारे का मुंह खुला का खुला रह गया था, मैं बोला कि बंद कर लो, मक्खी घुस जाएगी। मेरे इतना कहते ही वह ठठाकर हंस पड़ा, और फिर मुझे उसने इतने शौक से अपने सारे के सारे धान दिखाए कि उसका एक अलग अध्याय न लिखा तो बड़ी बेइमानी होगी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बहरहाल, वापस चलते हैं नलबाड़ी की ओर। बल्कि नलबाड़ी पहुंचने से पहले क्यों न रास्ते का पूरा जायजा लेते चलें। गुवाहाटी से जरा सा बाहर निकलते ही आपको बीजेपी का एक फाइव स्टार दफ्तर दिखेगा। पिछले साल अक्टूबर में भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने इसका फीता काटा था। यह समूचे नॉर्थ ईस्ट में बीजेपी का सबसे बड़ा दफ्तर और शायद यहां पार्टी की सबसे बड़ी प्रॉपर्टी भी है। इसके पास है बसिष्ठ मंदिर और एक साउथ इंडियन मंदिर। बसिष्ठ मंदिर अंदर है और साउथ इंडियन मंदिर सड़क किनारे ही है। असमिया में ब या श खूब होता है, मगर अक्सर वहां नहीं होता, जहां हम मानते हैं कि हिंदी में होना इसकी जरूरत है। इसीलिए हमारे यहां के वशिष्ट यहां आकर बसिष्ट हो जाते हैं, या फिर शंकर संकर में बदल जाते हैं, शिव सिव में। सिवसागर यहां का एक जिला है, जहां मेरी ननिहाल वाली ससुराल है। मैंने सुना है कि ननिया सास मुझे बड़े दिल से देखना चाहती हैं और यह मेरा वहां फिर से जाने का बहुत बड़ा बहाना भी है। खैर, गुवाहाटी से बढ़े तो नगांव, जाखलोबंधा, काजीरंगा, जोरहाट और फिर सिवसागर। कोई चाहे तो इसे शिवसागर कह सकता है, असमी लोग बुरा नहीं मानेंगे, मगर उनको कहना होगा तो वे सिवसागर ही कहेंगे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;table cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;float: left;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhi0OF3hRjbDhUEETlbJS2BTcfp7U7gus8Z4ydgiGc3BpZI-RA9ZENNMOO9iPJjBsurzf_ny_nVeOFD2NdT_VgOXSQyoaNxOh076m74SUYBRaWswxpPix_J477wyPMOdycvRcoS8FcimebcrFO-AEqdQ7HHejLSKOBadsHlpSShlgk6bteI-RQXBljjSQ/s1920/IMG_20221231_140105.jpg&quot; style=&quot;clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; 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गनीमत है। खुद मेरी मोहतरमा मुझसे शायद एकाध सेंटीमीटर आगे ही निकलती होंगी। अब इससे आगे चलें तो आपको दिखेगा होटल रैडिसन ब्लू। यह वही होटल है, जिसमें अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन चुके शिंदे अपने साथी विद्रोही शिवसैनिकों/विधायकों को लेकर इसलिए रुके थे कि पीछे बचे शिवसैनिकों में इतना दम नहीं कि वो असम पर हमला बोल सकें। जब मुगलों में दम नहीं था तो आज के शिवसैनिकों की क्या बिसात! और वो भी बचे हुए! खैर, यह तो मजाक की बात हुई। मेरे साले ने बताया कि जब ये लोग यहां पर रुके थे और डीलिंग-फीलिंग चल रही थी, तो वह भी यहीं पास वाले एक फ्लैट में रुका था, क्योंकि उसका एक दोस्त बीमार था। कई हलचलें उसने अपनी आंखों से नोट की थीं तब।&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ और आगे बढ़े तो लाइम और स्टोन फैक्ट्रियां शुरू हुईं। मैं इन फैक्ट्रियों को बहुत अच्छे से पहचानता हूं। नब्बे के दशक की शुरुआत में देहरादून में जब अपनी मामी वाली लेडीज साइकिल से मैं रायपुर पोस्ट ऑफिस की रोड से निकलकर दुल्हनी नदी पार करते हुए डालनवाला की हफ्तिया हाट जाता था तो ये रास्ते में चूने सा सफेद धुंआ निकालती दिखती थीं। मुझे समझ में आ गया कि यहां जो भी टीले जैसे पहाड़ हैं, उनका हाल उत्तराखंड के लुटेरों की बदलौत लुट चुकी धरती की इस शान से कुछ अलग नहीं मिलने वाला। और वाकई कुछ आगे बढ़ने पर मुझे इन पहाड़ियों का वह हाल दिखा, जिसके बारे में मैं नहीं कहूंगा कि इसमें असम के शासन-प्रशासन का दोष है या लुटेरों का दोष है। या फिर उनको इस करतूत पर शर्म आनी चाहिए। मैं बस इतना कहता हूं कि हे पृथ्वी, हे प्रकृति, मैं समूची इंसानी कौम की इस करतूत के लिए भरे दिल से शर्मिंदा हूं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;table align=&quot;center&quot; cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a 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मैं महोबा होते हुए कानपुर से खजुराहो अपनी बुलेट से जा रहा था, मुझे एक आधा कटा एकदम खून सा लाल पहाड़ दिखा। मैं वहीं उसी वक्त गाड़ी खड़ी करके अपने घुटनों पर बैठ गया था, इस पछतावे से कि इंसानों ने यह क्या कर दिया। एकदम वही फीलिंग मुझे इन रास्तों पर एक दो नहीं बल्कि आधा दर्जन या फिर इससे ज्यादा कट चुके खत्म होने की कगार पर पहुंचे पहाड़ों को देखकर आई। जिस किसी ने भी यह किया है, मैं उसी महोबा वाले भरे दिल से उसे बद्दुआ देता हूं कि ब्रह्मपुत्र का पानी न तो कभी उसके घर से निकले, ना खेतों से। मैं जो कुछ कह रहा हूं, पूरे सबूत के साथ कह रहा हूं और मेरे पास इन सबकी विडियो साक्ष्य के रूप में मौजूद है। और साक्ष्य वगैरह तो दूर की बात, इस सड़क से औसतन हर रोज गुजरने वाली हजारों गाड़ियों में बैठे हजारों हजार लोग यह सीन देखते हैं। मेरा सवाल है कि उनकी हिम्मत कैसे हो जाती है यह सीन देखने की। यार, मौसम तो असम का भी बदल रहा है, बूरापहार में चाय की पत्तियां जरूरत से ज्यादा हरी होने लगी हैं। ऐनीवे, महोबा के सबूतों को दोबारा देखने की हिम्मत मेरी आज तक नहीं हो पाई है, असम में कटे-फटे पहाड़ों के इस विडियो को भी मैं दोबारा देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूं। एक बार फिर से साफ कर दूं कि इसकी शर्म सिर्फ और सिर्फ मुझे है, असमियों को हो या ना हो, भारतीयों को हो ना हो, इसका उससे कोई मतलब नहीं है।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;....जारी&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/1086224536995759997/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/1086224536995759997' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1086224536995759997'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1086224536995759997'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2023/01/blog-post_10.html' title='असम डायरी : धरती को शर्मिंदा करती गुवाहाटी AS01'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj-T-IL9Ku5tsq5ZrASZ2hSJTMqFhQM9mozgRfBc0uSY1-ZBHuxo_0wBZ8jYItPEGXIBAqAod7mm2sU258NMqvsxdylJkzKrjJEGs-KKZmOCTT2-mkLVoaPhtdaj3IYcZ-kQInfYN_Ihkc9WHLABQIy7qBpTxVV2Em9kImpztUL_bM3S2coWl7AXiOYgg/s72-w400-h225-c/IMG_20221231_133923.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-7354071060312200284</id><published>2023-01-10T01:40:00.004-06:00</published><updated>2023-01-29T12:02:54.059-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="असम डायरी"/><title type='text'>असम डायरी : कार्बियों के एक गांव से AS011</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;table cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;float: left;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhovQ9Jf27sga6nhFnHC2hD6HuAuRJciUWZiAyMGmsAHVhSNM4eUaMCVtb6yGsd9jR7xInfCBibwT31M_wUO5nyek_zW6XkKM9N-3l7WLNJnQvD36B0tqF5KXkytD38nPIljs1gvbWR5T1FXJjfi4W9aXQKv59xRWxETQ7Jk862yPNsAtHQcqZcJa_7UQ/s1920/IMG20230106125813_01.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1080&quot; data-original-width=&quot;1920&quot; height=&quot;180&quot; 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नहीं है। इंटरनेट पर भी इसके बारे में कुछेक लोगों ने ही लिखा है, वह भी अंग्रेजी में। दूसरे, इसका जो रास्ता है, उसकी शुरुआत में बहुत छोटा सा बोर्ड लगा है, जो एनएच 74 पर स्पीड को बीस-तीस की लिमिट में रखने की दर्जनों चेतावनियों के बावजूद सरपट गुजरती गाड़ियों से किसी को ठीक से दिख ही नहीं सकता। एक वजह यह भी है कि काजीरंगा घुमाने वाले यहां जितने भी गाइड्स हैं, उनका मरकज जंगल का वही चार पांच किलोमीटर का घेरा ही रहता है, जिसकी खातिर वह लोगों से अच्छे खासे पैसे लेते हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;table cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;float: left;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2dcMM3j0zS1a3vWAeRqYx5FrmU5xObECELRW9q768ooZz1rVLrEELq0_mr2Ev0YzPLXd4PVGXAcEHn4XvKcLGyYFG4BwuNmyKsvJLRzSOk_ihXrS8p4wGDSBImP9TLz4mANi78nRlSTVLeFO8wvWXF5RPkPnEie7Ev9oI8VySpj6CUMR4zXDZd1pIdA/s4096/IMG20230106135315.jpg&quot; 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मतलब है बूढ़ा पहाड़। यह कोई पहाड़ नहीं है, बल्कि छोटे-छोटे टीले हैं, जहां टाटा के लिए अब चाय उगाई जाती है। यहां हर ओर आपको चाय बागान दिखेंगे। इन दिनों दिसंबर-जनवरी में चाय कम तोड़ी जाती है और चाय के पेड़ों की छंटाई कर दी जाती है ताकि नई पत्ती उगे। चाय के पेड़ से हमेशा नई पत्ती ही तोड़ते हैं। ऐसी नई पत्ती, जिसका रंग धानी हो। हरी पत्तियां नहीं तोड़ी जातीं हैं। यहां पर सिलिमकोवा, कनिया एंग्जाई, इंजाई, बूरा सिंग चेहोन, लॉन्ग टोक्बी, लॉन्ग थिंग पांग्चो जैसे और भी कई गांव हैं। मगर हर गांव का नाम सिर्फ असमिया में ही लिखा है। वह तो शुक्र है कि मेरे साथ के सब लोग असमिया ही थे, वरना इन गावों के नाम पढ़ पाना मेरे बस से बाहर की बात थी। जैसा कि पहले बताया, यह सारे के सारे प्योर कार्बियों के गांव हैं। कार्बी जनजाति असम की पहली मूल जनजाति है और कभी इस पूरे इलाके में इन्हीं का राज था। मगर इस कभी को गुजरे कम से कम छह सात सौ साल हो चुके हैं। अब तो कार्बी जनजाति यहां के हरवाहे हैं, क्योंकि ज्यादा बड़े कामों पर अधिकतर दूसरी जातियों का कब्जा है। वहीं कार्बी शहरों में छोटे मोटे कामों में ही लग पाए हैं। मेरी ससुराल की एक रिश्तेदारी यहां से तकरीबन 50 किलोमीटर दूर जाखलोबंधा में है और उनके घर में एक कार्बी परिवार पारंपरिक असमिया घर बनाकर सालों से रह रहा है। उनके घर में रहने की कीमत यही है कि घर और खेतों के सारे काम संभालना। इससे एक बात तो साफ है कि यह जनजाति उसी काम में अव्वल है, जिससे कि दुनिया में नई सभ्यता की शुरुआत हुई, जिसे खेती-किसानी कहते हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;table cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;float: left;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh-kGkr2DezC3ARDaBuNm484HTSozWsk4BdmvaA7wZuf17ZlezZwUB13sljsd2zGPKcEyK9PVEPx8PSLhPSK8Ri7VbZVLRhktZ0xz1J_uGi5TOX-GAS_UOQItVuoaFIl2u06okbwMkjHbt9uc8fJrS2HeOeqa8wnyH8jWBTan9ZywzyydkazltLkA9ZXg/s1920/IMG20230106125736_01.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: 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मगर एक बार जो इन गावों में घूम लेगा, हम सबकी तरह वह भी इसी सुखद आश्चर्य से भर उठेगा कि यहां की साफ-सफाई और यहां के सलीकेदार लोग आज तक लोगों की नजरों से दूर कैसे। गांव की हर एक सड़क सलीके से बुहारी हुई, कहीं भी कूड़े का ढेर नहीं, ढेर तो छोड़िए- जिस तरह से अपने यहां जगह जगह पन्नियां उड़ा करती हैं, यहां कागज का एक कतरा या चाय की एक पत्ती भी सड़क के किनारे देखने को नहीं मिलती। जब हम पहुंचे तो कार्बियों का लंच आवर था। दूध, मछली, पोर्क, चावल और बांस से बनी तरह-तरह की खाने की चीजें इनका आहार है। गांव में स्कूल है, चर्च है और एक शायद नामघर भी दिखा था। नामघर असम के हर कोने में मिलते हैं और काजीरंगा से पहले पड़ने वाला नगांव जिला तो समझ लीजिए कि नामघर की राजधानी ही है। हिंदू संस्कृति की संस्कृत से भरपूर बेहद कठिन पूजा पद्धति को संकरदेव ने यहां आकर आसान किया था और लोगों को कोई मूर्ति पूजने की जगह नाम भजना सिखाया था। शायद इन्हें ही नामधारी समुदाय कहते हैं और इन नामधारियों की संख्या पूरे राज्य में सबसे ज्यादा है। इससे कोई मतलब नहीं कि कोई बोडो है, कार्बी है या फिर अहोम है, संकरदेव की लाई और फैलाई धार्मिक संस्कृति ने पूरे असम के लोगों को एक धागे में पिरो रखा है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;table cellpadding=&quot;0&quot; cellspacing=&quot;0&quot; class=&quot;tr-caption-container&quot; style=&quot;float: left;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgZ8K_PeUTNes0pvF1uryIz4mzGUYJjRdJPLOBBUsR49tLIGUh-ypKXs_PCpMCDiUukDB0YDo0amb5tRbHQMlN68aLd-VXwIx3QPXiC1u66mSBWTlvOD-ugBRweocYwTeU8JluDVcLdwOdf-W8CS3oI8KAnyGL0b4aVaPT7CSmqLxdY7D_ZidRo1jShQQ/s1920/IMG20230106130209_01.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; margin-bottom: 1em; margin-left: auto; margin-right: auto;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1080&quot; data-original-width=&quot;1920&quot; height=&quot;180&quot; 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है। मगर अभी तो काम का वक्त था, सो कई औरतें और कुछेक मर्द हमें खेतों में नजर आए। चाय के खेत थे तो पौधों की कटाई-छंटाई में लगे थे, कुछ और खेत थे तो उनमें । इन सारे गावों का चक्कर लगाते हुए जब हम अंत तक पहुंचे तो देखा कि दो लड़कियां हाथ में शायद कॉपी लेकर आ रही थीं। इनमें से एक मिनी स्कर्ट में थी। मैंने अपने साले, जो कि खुद भी असमिया हैं, उनसे पूछा कि यहां के गांवों में क्या लड़कियां स्कर्ट, खासकर शॉर्ट स्कर्ट पहन सकती हैं? उसका कहना था कि यह बेहद खुला समाज है और यहां पहनने-ओढ़ने और प्रेम करने पर कहीं भी रोक नहीं है। मैंने मन में सोचा, काश हमारे यूपी के गांव भी इन कार्बियों से कुछ सीख लेते।&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/7354071060312200284/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/7354071060312200284' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/7354071060312200284'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/7354071060312200284'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2023/01/blog-post.html' title='असम डायरी : कार्बियों के एक गांव से AS011'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhovQ9Jf27sga6nhFnHC2hD6HuAuRJciUWZiAyMGmsAHVhSNM4eUaMCVtb6yGsd9jR7xInfCBibwT31M_wUO5nyek_zW6XkKM9N-3l7WLNJnQvD36B0tqF5KXkytD38nPIljs1gvbWR5T1FXJjfi4W9aXQKv59xRWxETQ7Jk862yPNsAtHQcqZcJa_7UQ/s72-c/IMG20230106125813_01.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-5249632076230837905</id><published>2022-10-02T01:06:00.001-05:00</published><updated>2022-10-02T01:06:21.159-05:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पतीताकाश से"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ल से लेखक"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वापसी"/><title type='text'>वैष्णव की नई फिसलन</title><content type='html'>&lt;p&gt;वैष्णव का होटल चल निकला था। शहर भर में धूम थी। बाहर से जो भी आता, स्टेशन पर ही उसे होटल का शानदार विज्ञापन दिखता। विज्ञापन तो और भी थे, लेकिन वैष्णव के होटल जितना बड़ा विज्ञापन और कोई नहीं था। फिर बत्ती भी उसी विज्ञापन पर जलती। वैष्णव ने बिजली विभाग से मिलकर जुगाड़ गांठ रखा था कि किसी और के बोर्ड पर बत्ती जले, तो तुरंत उसे नोटिस पहुंचा दिया जाए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैष्णव ने सारे सवालों को उठने से पहले ही समाप्त कर दिया था। वह खुश था। पहले प्रभु की आरती में कड़वे तेल की बत्ती जलाता था, अब देसी घी की बत्तियां जल रही थीं। सब कुछ सही चल रहा था कि एक दिन होटल का मुख्य रसोइया भाग गया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा नहीं था कि वैष्णव उसे अच्छी तनख्वाह नहीं दे रहा था। मगर रसोइए को प्रेम हो गया था और वैष्णव उसे छुट्टी नहीं दे रहा था। छुट्टी के अलावा वैष्णव ने उसे ढेरों कसमें दीं, मगर जिन्होंने प्रेम किया है, वे जानते हैं कि प्रेम तो प्रेम ही होता है। चींटी की तरह प्रेमियों के भी पर निकल आते हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह भीषण आपदा थी, जिसके बारे में प्रभु ने वैष्णव को सपने में भी नहीं बताया था। वैष्णव ने प्रभु को उलाहना दी। माथा प्रभु की चौखट से टेक दिया। प्रभु ने सुन ली। वैष्णव आकर गल्ले पर बैठा तो देखा कि रसाइयों की कतार लगी है। सभी रसोइयों की विधिपूर्वक परीक्षा हुई। सबने एक से बढ़कर एक लजीज व्यंजन बनाकर दिखाए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मगर एक रसोइया था, जिसने कुछ भी बनाकर नहीं दिखाया। बल्कि वह परीक्षा देने वाले रसोइयों की लाइन में भी खड़ा नहीं हुआ। वह फूड इंस्पेक्टर का भतीजा था और लाइसेंस कमिश्नर का साला भी। वैष्णव ने उससे पूछा, ‘क्या बनाते हो?’ रसोइया बोला, ‘मैं किसी भी तरह का लाइसेंस बनाता हूं।’&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैष्णव संतुष्ट हुआ। फिर उसने पूछा, ‘और अगर किसी ग्राहक को तुम्हारा लाइसेंस पसंद न आया तो?’ रसोइया बोला, ‘सीएमओ मेरे चाचा लगते हैं, ग्राहक का इलाज हो जाएगा।’ और अगर तुमको भर्ती करने पर बाकियों ने शोर मचाया तो? वैष्णव ने पूछा। ‘लेबर कमिश्नर मेरे जीजा हैं।’&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सुनते ही वैष्णव ने बाकी रसोइयों को यह बोलकर वापस किया कि परिणाम रजिस्टर्ड डाक से आपके घर भेज दिए जाएंगे, और उस रसोइए को रख लिया। जब बाकी रसोइयों को इसका पता चला तो उन्होंने हंगामा कर दिया, धरने पर बैठ गए। कहने लगे कि हमारी योग्यता प्रमाणित है, फिर भी हमें नहीं रखा गया।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैष्णव डर गया। फिर से प्रभु के पास पहुंचा। प्रभु ने पूछा, ‘तुम वैष्णव हो?’ हां प्रभु। ‘फिर तुम झूठ कैसे बोल सकते हो?’ वैष्णव की बत्ती जल गई। उसने तुरंत बयान जारी किया कि नियुक्ति पूरे पारदर्शी तरीके से हुई है। प्रभु के अलावा हम और किसी की भी सिफारिश नहीं मानते।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बात प्रभु की थी। सारे असंतुष्ट वापस चले गए। फिर वैष्णव ने होटल के बगल एक जमीन खरीद ली, और सीएमओ की मदद से उस पर तुरंत एक अस्पताल बनवा लिया। अब वैष्णव लाइसेंसी खाने के साथ लाइसेंसी इलाज भी करने लगा।&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/5249632076230837905/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/5249632076230837905' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/5249632076230837905'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/5249632076230837905'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2022/10/blog-post.html' title='वैष्णव की नई फिसलन'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-207370765778168682</id><published>2021-04-06T02:55:00.004-05:00</published><updated>2021-04-06T02:55:33.146-05:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पतीताकाश से"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस बजार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुद्दों का बजार"/><title type='text'>योगी आदित्यनाथ ने पत्रकार को दी गाली</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 5 अप्रैल को कैमरे के सामने एक पत्रकार को चूतिया बोल दिया। हालांकि आप सभी वह विडियो देख ही चुके होंगे, जिसमें योगी आदित्यनाथ एएनआई के कैमरामैन को क्या करते हो, चूतियापने का काम करते हो कहते देखे और सुने जा रहे हैं, लेकिन जिनने न देखा हो, एक बार फिर से देख लीजिए, उसके बाद हम बताएंगे इस खबर के पीछे की ऐसी खबर, जिसमें इस चूतिया शब्द के आने ने एक नई ही कहानी लिख रखी है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस विडियो के सामने आते ही सबसे पहले तो बीजेपी आईटी सेल यह कहने पर जुट गई कि यह फेक है। एक चैनल में काम करने वाले कथित गोदी मीडिया एंकर दीपक चौरसिया ने कहा कि सीएम योगी के आपत्तिजनक शब्द बोलने का मामला। एडिटेड निकला सीएम योगी का Video, वीडियो के आखिरी 3 सेकेंड में जोड़े गए आपत्तिजनक शब्द। लेकिन अल्ट न्यूज ने बताया कि विडियो एकदम सच्चा है और सिर्फ एनआई ही नहीं, उस वक्त चैनल पर इसी बातचीत का लाइव चलाने वाले एबीपी गंगा न्यूज और नेटवर्क 18 न्यूज पर भी चला है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/G60PoHc1Dxg&quot; width=&quot;498&quot; youtube-src-id=&quot;G60PoHc1Dxg&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब सबसे पहले तो यह सवाल पैदा होता है कि मुंह पर चूतिया कहने जाने के बाद एएनआई ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी है? इसके जवाब में हमें आपको बताने के लिए दो खबरें हैं। पहली यह कि 5 मार्च तक एएनआई ने अपने कैमरामैन को पड़ी गाली पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। उनके ट्विटर हैंडल पर अभी तक इस बारे में कोई रिएक्शन नहीं आया है। वहीं दूसरी बात यह है कि यूपी सरकार एएनआई को एक करोड़ रुपए सालाना दे रही है अपनी कवरेज के लिए, तो रिएक्शन लगता नहीं कि आएगा। जाने माने पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने आदित्यनाथ सरकार की वह चिट्ठी अपने ट्विटर हैंडिल पर पोस्ट की है, जिसमें उसे एक करोड़ रुपए सालाना दिए जाने की बात है और जिसे आप स्क्रीन पर देख सकते हैं। यह चिट्ठी 27 अप्रैल 2018 को जारी की गई है, जिसमें एएनआई को एक करोड़ रुपए देकर यूपी सरकार अपने यूट्यूब चैनल पर अपनी क्लिपिंग चलवाने की बात भी है। पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह कहते हैं कि साल के एक करोड़ लेकर योगी सरकार के लिए प्रचार करने वाली ANI को अपने आत्मसम्मान की बिलकुल चिंता नहीं है। किस स्तर तक गिर सकती है यह सरकार? माफी मांगने की जगह वीडियो को झूठा ठहराने का प्रयास? अगर झूठा है तो असली वीडियो जारी कर मुक़दमा दर्ज कर दीजिए सभी पर। कोर्ट में फ़ैसला होगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहीं प्रसिद्ध पत्रकार रोहिणी सिंह इस मसले पर कहती हैं कि तानाशाह की प्रवृत्ति होती है, जितना झुकोगे वो तुम्हें उतना ही डराता जाएगा और जब आंख मिला कर बात करोगे तो डर कर भागेगा या तो अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करेगा। गाली मुख्यमंत्री दें, चलाएं उनके पसंदीदा चैनल और FIR उनपर करेंगे जो सवाल पूछते हैं? ये है आपका रामराज्य? शर्म नहीं आती? यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने चार स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए कहा कि पत्रकारों को दिये ‘मान्यवर’ के प्रवचन सुनिए मधुर, पर हेडफ़ोन लगा के सुनिए व ‘बच्चों से रखिए दूर!’ वैसे आपको बता दें कि ऐसी भी खबरें हैं कि इस विडियो को प्रसारित करने वालों पर यूपी सरकार मुकदमा दर्ज करा सकती है। अब जरा सुनिए कि इस पर पूर्व आईएएएस सूर्य प्रताप सिंह के क्या तेवर हैं, पांच मार्च को सूर्य प्रताप जी ने ट्वीट करके कहा है कि आज से योगी जी का गाली देने वाला वीडियो मीडिया को आईना दिखाने के लिए मैं रोज सुबह ट्वीट करूंगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/G60PoHc1Dxg&quot; width=&quot;479&quot; youtube-src-id=&quot;G60PoHc1Dxg&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं सरकार के पक्ष के सभी वीडियो एक्स्पर्ट्स, कानूनी जानकार और फ़ारेंसिक टीम को खुली चुनौती देता हूं की मुझे ग़लत साबित करें और गिरफ़्तार कर लें। याद रखिएगा, रोज सुबह करूंगा। गोदी पत्रकार दीपक चौरसिया के बारे में सूर्य प्रताप सिंह कहते हैं कि इस आदमी की नीचता देखिए। सच सामने आने के बाद भी ना ट्वीट हटाया और ना ही स्पष्टिकरण देने की लाज है इनमें। मीडिया का यह नीचतम स्तर भारत के इतिहास में पहली बार देखने को मिला है। जब सम्पादक स्तर के लोग ‘सत्ता’ के आगे ‘छम्मकछल्लो’ समान नृत्य कर रहे हैं। इन चेहरों को याद रखना। इस विडियो के सामने आने के बाद भारत में मीडिया की खबरों पर चलने वाली वेबसाइट भड़ास फॉर मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि सीएम योगी आदित्यनाथ से ऐसी उम्मीद न थी.&amp;nbsp; एक योगी नामधारी शख्स से ऐसी भाषा की तो कतई उम्मीद न थी. वह भी तब जब यह योगी इतने बड़े प्रदेश की सीएम की कुर्सी पर बैठा हो.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सीएम आदित्यनाथ योगी ने वीडियो न्यूज एजेंसी एएनआई के कैमरामैन को ‘चूतिया’ बोल दिया. उनका यह गुस्सा, यह अभद्र वचन लाइव टेलीकास्ट हो गया. इसके कारण हर ओर सीएम योगी की किरकिरी हो रही है. सीएम योगी के भक्त गण, आईटी सेल और नौकरशाही डैमेज कंट्रोल में जुट गई है. हर तरफ झूठ फैलाया जा रहा है कि सीएम योगी द्वारा गाली दिए जाने वाला वीडियो फर्जी है, एडिटेड है. साथ ही वीडियो शेयर करने वालों को मुकदमा झेलने की धमकी दी जा रही है. पर सच्चाई ये है कि सीएम योगी द्वारा गाली दिए जाने वाला वीडियो बिलकुल सही है. इस वीडियो का लाइव टेलीकास्ट भी दो भक्त चैनलों पर हो चुका है. दरअसल कोविड वैक्सीन लगवाने के बाद जब सीएम योगी से एएनआई का रिपोर्टर बाइट ले रहा था तो योगी के मुखारबिंदु से निकलने वाले शब्दों को तत्काल दो भक्त चैनलों ने लाइव प्रसारित करना शुरू कर दिया. इसी दौरान एएनआई की रिकार्डिंग में कुछ डिस्टर्बेंस होने से सीएम योगी का धैर्य चुक गया और कैमरामैन को चूतिया बोल बैठे. तब तक इस सदवचन का दो दो भक्त चैनलों पर प्रसारण भी हो चुका था.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यशवंत सिंह कहते हैं कि सीएम योगी द्वारा देश की जानी मानी वीडियो न्यूज एजेंसी एएनआई के कैमरामैन को गाली दिए जाने के मुद्दे पर पूरा मीडिया जगत खामोश है. निन्नायनबे फीसदी से ज्यादा चैनल तो भक्त चैनल में तब्दील हो चुके हैं. जो कुछ एक भक्त चैनल नहीं हैं वे भी डैमेज कंट्रोल की कवायद में फंस चुके हैं. अगर यही गाली अरविंद केजरीवाल या राहुल गांधी के मुंह से निकली होती तो भारतीय मीडिया अब तक आसमान सिर पर उठा चुका होता और पूरे देश की जनता को बता चुका होता कि ये नेता कितने गंदे हैं.&amp;nbsp; पर ये कांड बीजेपी के एक सीएम द्वारा किया गया है इसलिए उनका हर खून माफ. वहीं पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह इस मसले पर कहते हैं कि अब जब ‘गाली प्रकरण’ पर दूध का दूध और पानी का पानी हो चुका है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब मैं&amp;nbsp; @dgpup और&amp;nbsp; @ChiefSecyUP से अनुरोध करूंगा की मुख्यमंत्री के सभी सलाहकारों पर जनता को मुक़दमे की धमकी देने, अपने पद का दुरुपयोग कर डराने और भय का माहौल पैदा करने के जुर्म में मुक़दमा दर्ज किया जाए। वे कहते हैं कि आज की हरकत ने CM ऑफ़िस को पूरी तरह एक्स्पोज कर दिया। जब यह पत्रकारों को गाली दे सकते हैं, एक लाइव वीडियो को खुले आम एडिटेड बता कर मुक़दमा दर्ज करने की धमकी दे सकते हैं, तब यह किसी भी स्तर पर जा सकते हैं। मुझ पर निजी हमले होंगे, झूठे मुक़दमे लिखे जाएंगे, पर यह लड़ाई जारी रहेगी। सूर्य प्रताप सिंह ने एएनआई के संपादक जी से भी सवाल किया कि क्यूं&amp;nbsp; @ishaan_ANI जी? आज आप कुछ नहीं बोलेंगे, क्या आपमें भी आत्मसम्मान नहीं बचा? क्या आप भी अपनी संस्था के बारे में ऐसा सोचते हैं? आज दो बातें हो सकती हैं: 1. या तो ANI अपने आत्मसम्मान की रक्षा करेगा 2. या तो साबित हो जाएगा की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ठीक ही कह रहे थे।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/G60PoHc1Dxg&quot; width=&quot;435&quot; youtube-src-id=&quot;G60PoHc1Dxg&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रसिद्ध पत्रकार और फिल्ममेकर विनोद कापड़ी कहते हैं कि ANI पर भारी दबाव है कि वो सफ़ाई दे कि आदित्यनाथ का गाली देने वाला वीडियो EDITED है पर ANI भी अब चाहते हुए भी ये नहीं कर सकता क्योंकि गाली LIVE गई थी , जिसे बाद में ANI ने हटा दिया ( screenshotsDown pointing backhand index) नतीजा ये है कि अब कुछ बिकाऊ एंकरों को योगी के रफू पैबंद के काम पर लगा दिया गया है। हालांकि ये रफू पैबंद बहुत चलता नजर नहीं आ रहा है। सच और झूठ अलग अलग करने वाली विश्व प्रसिद्ध वेबसाइट अल्ट न्यूज ने इस क्योंकि इस झूठ के ताबूत में आखिरी कील गाड़ दी है और बता दिया कि योगी आदित्यनाथ ने जो बोला, वह सौ फीसद सच बोला। अब कमेंट में ये बताइए कि योगी आदित्यनाथ जो कह रहे हैं, वह क्या सिर्फ एनएनआई ही है, या फिर और कौन कौन हैं?&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/207370765778168682/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/207370765778168682' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/207370765778168682'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/207370765778168682'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2021/04/blog-post.html' title='योगी आदित्यनाथ ने पत्रकार को दी गाली'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://img.youtube.com/vi/G60PoHc1Dxg/default.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-6715603927328073034</id><published>2021-03-12T01:54:00.008-06:00</published><updated>2021-03-12T01:54:43.083-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस बजार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुद्दों का बजार"/><title type='text'>बधाई हो, भारत में तानाशाही आई है</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/IafLP1DlsBs&quot; width=&quot;516&quot; youtube-src-id=&quot;IafLP1DlsBs&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;डेमोक्रेसी पर दुनिया भर के देशों की लगातार रिसर्च करने वाले एक विदेशी इंस्टीट्यूट ने बताया है कि भारत अब चुनावी तानाशाही में बदल चुका है। पिछले साल इस इंस्टीट्यूट ने वॉर्न किया था कि भारत बस अपनी लोकतांत्रिक हालत खोने ही वाला है। स्वीडन के रिसर्च इंस्टीट्यूट वेरायटीज ऑफ डेमोक्रेसी, यानि की वी डेम ने पूरे एनालिटिकल डेटा के साथ अपनी यह रिसर्च रिपोर्ट पब्लिश की है और खास बात ये कि यह रिपोर्ट स्वीडन के विदेश मंत्री रॉबर्ट रिडबर्ग की मौजूदगी में पेश की गई। स्वीडन की गोथेनबर्ग यूनिवर्सिटी से जुड़े इस इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में कहा गया है कि खासतौर से 2019 के बाद से, जबसे नरेंद्र मोदी दोबारा सत्ता में आए, तबसे मीडिया, अकादमियां और सिविल सोसायटी कुचली जा रही हैं। 2019 के बाद से सेंसरशिप तो बिलकुल रूटीन की चीज बन गई है और पहले सरकारें ही सेंसर करती थी, अब तो भारत में जिसकी जो मर्जी आ रहा है, वो सेंसर कर दे रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदी के आने से पहले भारत सरकार सेंसरशिप जैसी चीजों का कभी कभार ही यूज करती थी। मोदी जी लगातार राजद्रोह, मानहानि जैसे कानूनों का तो यूज कर ही रहे हैं, जो भी उनके खिलाफ बोलता है, उस पर काउंटर टेररिज्म का भी इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसा कि हम अनुराग ठाकुर से लेकर कपिल मिश्रा तक को आतंकवादियों जैसा व्यवहार करते देख ही चुके हैं। आपको सिर्फ एक नंबर बताता हूं। ये नंबर और इस नंबर से जुड़ी बस एक लाइन की कहानी सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे। मोदी जी जबसे केंद्र की सरकार में आए हैं, उन्होंने सात हजार से ज्यादा लोगों पर देशद्रोह लगा डाला है। और ये देशद्रोह की धारा उसने अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों पर तो लगाया ही है, बीजेपी के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर भी लगाया है। स्वीडन की यह रिपोर्ट कहती है कि मोदी जी ने भारत की सिविल सोसायटी को लाचार कर दिया है और भारतीय संविधान में जो सेक्युलिज्म, यानी धर्मनिरपेक्षता शामिल है, उसे छिन्न भिन्न कर दिया है।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बीजेपी यानी मोदी जी ने फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशंस रेग्युलेशन एक्ट यानी एफसीआरए का यूज सिविल सोसायटी को कमजोर करने के लिए जमकर किया है। याद रखें, जिस भी लोकतांत्रिक देश में सिविल सोसायटीज कमजोर होती हैं, लोकतंत्र में इसका मतलब तानाशाही माना जाता है। हालांकि बीजेपी और संघ से जुड़े जितने भी संगठन हैं, इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वो धड़ल्ले से विदेशों से पैसा मंगा रहे हैं। इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि मोदी जी ने अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट यानी कि यूपा को सिर्फ अपने राजनीतिक विरोधियों पर यूज किया है और उन पर सभी लोगों पर किया है, जो उनकी नीतियों का विरोध करते हैं या फिर विरोध करने के लिए सड़क पर उतरे। आपको बता दें कि यह रिपोर्ट साल 2021 की है, जो बुधवार 10 मार्च को जारी हुई है। कोई भी इसे वी डेम डेमोक्रेसी रिपोर्ट के नाम से गूगल पर सर्च करके पढ़ सकता है, यह पूरी तरह से फ्री है। यह रिपोर्ट कहती है कि इन सारे फैक्ट्स की रौशनी में यह घोषित करने में उन्हें कोई हिचक नहीं है कि पिछले दस सालों के बाद भारतीय लोकतंत्र अब एक चुनावी तानाशाही में बदल चुका है। अच्छा, एकबारगी कोई कह सकता है कि स्वीडन की क्या औकात, या नॉर्वे की क्या औकात या फिर कोई बड़ा भक्त हुआ तो ये भी कह सकता है कि अमेरिका की क्या औकात। लेकिन अगर हम वाकई भारत की डेमोक्रेसी को लेकर या सिर्फ डेमोक्रेसी को ही लेकर चिंतित हैं तो इसके बारे में और जानना चाहते हैं तो हमें पिछले कुछ सालों में आई सारी रिपोर्टें देखनी चाहिए। आखिर मोदी जी भी तो अपने मर्जी का सर्वे लेकर आते हैं, उनके भी रिजल्ट देखने चाहिए। तो चलिए, सारी तो नहीं, लेकिन मेन मेन देखने की कोशिश करते हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/IafLP1DlsBs&quot; width=&quot;528&quot; youtube-src-id=&quot;IafLP1DlsBs&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पिछले हफ्ते, यानी मार्च 2021 की शुरुआत में ही अमेरिकी थिंक टैंक फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा था कि भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार के शासन में भारत में लोकतांत्रिक स्वतंत्रता लगातार गिर रही है और ‘भारत ने एक वैश्विक लोकतांत्रिक अगुवा का रास्ता बदलकर एक संकीर्ण हिंदु हितकारी देश का रुप अख्तियार कर लिया है। और इसकी कीमत समावेशी और समान अधिकारों को तिलांजलि देकर चुकाई जा रही है।‘ यह कहना है लोकतांत्रिक संस्था फ्रीडम हाऊस का, जिसने भारत की रैंकिंग स्वतंत्र देश से घटाकर ‘आशंकि स्वतंत्र’ देश के रूप में की है। आपको बता दें कि फ्रीडम हाऊस अमेरिकी सरकार से मदद पाने वाला एक स्वतंत्र लोकतंत्र रिसर्च इंस्टीट्यूट है। अपनी रिपोर्ट में इस संस्था ने कहा है कि भारत में मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं, पत्रकारों को धमकियां देने और उत्पीड़न की घटनाओं और अत्यधिक अदालती हस्तक्षेप की घटनाओं में बहुत तेजी आई है। रिपोर्ट कहती है कि इन सबमें तेजी 2014 में नरेंद्री मोदी की अगुवाई में बीजेपी की सरकार आने के बाद हुई है। फ्रीडम हाऊस की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने विश्व में लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाने वाले देश के तौर पर अपना रुतबा बदलकर चीन जैसे देशों की तरह एक तानाशाही रुख अपना लिया है। मोदी और उनकी पार्टी ने भारत को एक अधिनायकवादी राष्ट्र के रूप में बदल दिया है। एक सर्वे मोदी का भी देख लेते हैं। 10 फरवरी को आजतक ने खबर छापी कि अमेरिका में रह रहे भारतीयों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अभी भी सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं. कार्नेगी सेंटर फॉर एनडाउमेंट ऑफ़ पीस के सर्वे के मुताबिक अमेरिका में रह लोगों का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर भरोसा अभी भी कायम है. हालांकि भारत में लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति को लेकर भारतीय अमेरिकियों की राय बंटी हुई है. यह सर्वे पिछले साल यानी 2020 में एक सितंबर से बीस सितंबर के बीच ऑनलाइन करवाया गया था.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गजब बात तो यह कि जहां स्वीडन के वी डेम में करोड़ों लोगों की हिस्सेदारी थी, दस साल की रिसर्च थी, वहीं इस सर्वे में सिर्फ 1200 लोगों ने हिस्सा लिया और भारत भर के सारे मीडिया हाउसों ने इसे हाथोहाथ लिया। आज अभी जब मैं वीडेम की रिसर्च रिपोर्ट की खबर बना रहा हूं, हिंदी में यह खबर दोपहर तक कहीं नहीं आई है, जबकि इसकी रिपोर्ट बुधवार को ही जारी हो चुकी थी। बहरहाल, इस सर्वे में शामिल लोगों से जब पूछा गया कि क्या भारत सही रास्ते पर है तो 36 फीसदी ने कहा कि हां, सही रास्ते पर है, मगर इस सर्वे में भी 39 प्रतिशत लोगों ने कहा कि नहीं, भारत सही रास्ते पर नहीं है। मगर यह बात भारतीय मीडिया हाउसों ने हाइलाइट नहीं की। ऐसे ही एक सर्वे जनवरी 2021 में आया था, जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक अमेरिकी डाटा फर्म ने अपने सर्वे में दुनिया का सबसे लोकप्रिय और स्वीकार्य राजनेता माना है। अमर उजाला में छपी खबर बताती है कि दुनियाभर के राजनेताओं की लोकप्रियता पर नजर रखने वाली कंपनी मॉर्निंग कंसल्टेंट ने अपने सर्वे में कहा है कि 75 फीसदी लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है। वहीं, 20 फीसदी ने उन्हें स्वीकार नहीं किया है। कुल मिलाकर 55 फीसदी लोगों ने माना है कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी दुनिया के सबसे स्वीकार्य राजनेता हैं। यह सर्वे अमेरिका, फ्रांस, ब्राजील, जापान समेत दुनिया के 13 लोकतांत्रिक देशों में हुआ था। जब जब भारत की डेमोक्रेसी को लेकर कोई रिसर्च रिपोर्ट या कोई सर्वे आती है या कोई बड़ा आदमी कोई बात कहता है तो मोदी जी फटाक से एक सर्वे करा डालते हैं। आपको बता दें कि दुनिया भर में सर्वे करने वाली हजारों कंपनियां हैं, जिन्हें आप पैसे देकर मनचाहा सर्वे करा सकते हैं और मनचाहा रिजल्ट भी पा सकते हैं। मगर किसी कंपनी से कहीं ज्यादा मायने एक रिसर्च इंस्टीट्यूट रखता है, जो जनता के पैसे से बिना किसी लाभ या फायदे के लिए चलता है। तो फिर से एक बार वापस हम अपनी डेमोक्रेसी की तरफ चलते हैं और देखते हैं कि कबसे इसका महासत्यानाश शुरू हुआ है।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/IafLP1DlsBs&quot; width=&quot;519&quot; youtube-src-id=&quot;IafLP1DlsBs&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पिछले महीने यानी फरवरी में खबर आई कि भारत लोकतंत्र सूचकांक में दो स्थान नीचे फिसल गया है. &#39;2020 लोकतंत्र सूचकांक&#39; की वैश्विक रैंकिंग में भारत दो स्थान फिसलकर 53वें स्थान पर आ गया है. &#39;द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट&#39; (ईआईयू) ने कहा कि प्राधिकारियों के &#39;लोकतांत्रिक मूल्यों से पीछा हटने&#39; और नागरिकों की स्वतंत्रता पर &#39;कार्रवाई&#39; के कारण देश 2019 की तुलना में 2020 में दो स्थान फिसल गया. हालांकि भारत इस सूची में अपने अधिकतर पड़ोसी देशों से ऊपर है.&amp;nbsp; ईआईयू ने बताया कि नरेंद्र मोदी ने &#39;भारतीय नागरिकता की अवधारणा में धार्मिक तत्व को शामिल किया है और इसे कई आलोचक भारत के धर्मनिरपेक्ष आधार को कमजोर करने वाले कदम के तौर देखते हैं. इस रिपोर्ट में भारत को अमेरिका, फ्रांस, बेल्जियम और ब्राजील के साथ &#39;त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र&#39; के तौर पर वर्गीकृत किया गया है. ईआईयू की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत और थाईलैंड की रैंकिंग में &#39;प्राधिकारियों के लोकतांत्रिक मूल्यों से पीछे हटने और नागरिकों के अधिकारों पर कार्रवाई के कारण और गिरावट आई.&#39; विडियो की शुरुआत में स्वीडन के जिस वी डेम इंस्टीट्यूट के बारे में बताया, उसने पिछले साल यानी 2020 में बताया था कि नरेंद्र मोदी की सरकार में मीडिया, नागरिक समाज और विपक्ष के लिए कम होती जगह के कारण भारत अपना लोकतंत्र का दर्जा खोने की कगार पर है. तब इसने बताया था कि 2001 के बाद पहली बार ऑटोक्रेसी यानी निरंकुशतावादी शासन बहुमत में हैं और इसमें 92 देश शामिल हैं जहां वैश्विक आबादी का 54 फीसदी हिस्सा रहता है. इसमें कहा गया है कि प्रमुख जी-20 राष्ट्र और दुनिया के सभी क्षेत्र अब ‘निरंकुशता की तीसरी लहर’ का हिस्सा हैं, जो भारत, ब्राजील, अमेरिका और तुर्की जैसी बड़ी आबादी के साथ प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर रहा है. रिपोर्ट की प्रस्तावना कहा था कि भारत ने लगातार गिरावट का एक रास्ता जारी रखा है, इस हद तक कि उसने लोकतंत्र के रूप में लगभग अपनी स्थिति खो दी है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दो साल पहले मशहूर पत्रकार प्रताप भानु मेहता ने एक कॉन्क्लेव में कहा था कि एक बात तो साफ़ है कि भारतीय लोकतंत्र ना केवल ख़तरे में है. 2019 के चुनाव में दांव पर बहुत कुछ लगा है लेकिन उम्मीद बहुत कम है. ऐसा क्यों है, क्योंकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि लोकतंत्र बचेगा या नहीं. पिछले कुछ सालों में जो माहौल बना है उससे बीते 10-15 सालों में जो उम्मीदें जगाई थीं वो सब दांव पर लगा हुआ है. जाहिर है कि इन सारी रिपोर्टों के आने के बाद यह कहना मायूब न होगा कि हम भारतीय अपने देश को और ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की लड़ाई लगातार हारते जा रहे हैं। प्रताप भानु मेहता का कहना अब सही हो रहा है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/6715603927328073034/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/6715603927328073034' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/6715603927328073034'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/6715603927328073034'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2021/03/blog-post_12.html' title='बधाई हो, भारत में तानाशाही आई है'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://img.youtube.com/vi/IafLP1DlsBs/default.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-8312666923311526995</id><published>2021-03-10T01:34:00.002-06:00</published><updated>2021-03-10T01:34:07.811-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस बजार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुद्दों का बजार"/><title type='text'>महिलाओं ने मांगा इस्तीफा, सीजेआई बोले- सवाल नहीं कर सकते</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/x-GnaWl_4g8&quot; width=&quot;488&quot; youtube-src-id=&quot;x-GnaWl_4g8&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;पिछले महज हफ्ते भर में समूचे देश भर से पांच हजार से ज्यादा लोगों ने एक ऑनलाइन पेटीशन साइन करके मांग की है कि भारत के चीफ जस्टिस एसए बोबडे तुरंत अपनी कुर्सी छोड़ दें। इतना ही नहीं, तकरीबन चार हजार से अधिक महिलाओं ने चिट्ठी लिखकर मांग की है कि अब उन्हें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उस दिन कोर्ट में जिस तरह से उन्होंने बलात्कार के आरोपी से पूछा कि क्या वो उस महिला से शादी कर लेगा, जिसका कि उसने बलात्कार किया है, उसके बाद से सीजेआई बोबडे लगातार महिलाओं के निशाने पर हैं। मामला बढ़ता देखकर सोमवार को उन्होंने सफाई भी दी कि वो महिलाओ का बहुत सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा कि उनको गलत समझा जा रहा है। उनकी सोच एकदम ऐसी नहीं है। उन्होंने कहा कि वे महिलाओं का सर्वोच्च सम्मान करते हैं, उन्होंने रेपिस्ट से शादी का प्रस्ताव कभी नहीं दिया और इस मसले पर मीडिया ने गलत रिपोर्टिंग की। इंग्लैंड का अखबार द गार्डियन इस बारे में लिखता है कि बोबडे साहब से पहले जो सीजेआई थे, गोगोई साहब, वो भी अपने ही एक महिला स्टाफ के साथ मीटू मामले में आरोपी बनाए थे। उनपर भी सेक्सुअल असॉल्ट का आरोप था, मगर उनको जुडिशरी ने छोड़ दिया। अब जरा देखिए कि बोबडे साहब के उस कमेंट पर, जिस पर उन्होंने बलात्कारी से यह पूछा था कि तुमने जिससे रेप किया, उससे शादी करोगे या नहीं, उस पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की जो बेंच बैठी, उसमें क्या हुआ। आपको कसम है, भाषा की शालीनता बनाए रखिएगा। बहरहाल, चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम की बेंच ने पिछले हफ्ते बलात्कार के एक मामले की सुनवाई पूरी तरह से गलत तरीके से किए जाने पर असंतोष व्यक्त किया, जिसमें उसने कथित तौर पर एक बलात्कार के आरोपी से पूछा था कि क्या वह पीड़िता से शादी करने जा रहा है।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुनवाई की शुरुआत में चीफ जस्टिस बोबडे ने साफ किया कि उन्होंने नारीत्व को सर्वोच्च सम्मान दिया है। सीजेआई ने कहा कि उन्होंने पूछा क्या आप शादी करने जा रहे हैं? हमने उसे शादी करने का आदेश नहीं दिया। CJI बोबडे की बेंच ने कहा कि उस मामले में अदालती कार्यवाही की पूरी तरह से गलत रिपोर्टिंग की गई। क्या उससे शादी करोगे पूछने और जाओ और शादी करो का आदेश देने में बहुत अंतर है। आरोपी से तो बस पूछा गया था? मीडिया और एक्टिविस्टों ने इसे दूसरा एंगल दे दिया है। जज साहब जब यह बोले तो मोदी जी, मतलब भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बिना देर लगाए कहा, यस माई लॉर्ड, यू आर राइट। कथित गलत बयानबाजी को सुप्रीम कोर्ट की इमेज खराब करने वाला करार दिये जाने के बाद, चीफ जस्टिस बोबडे ने तुषार मेहता से भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 को पढ़ने के लिए कहा, जिसमें कहा गया है कि धारा 165 सवाल करने या पेश करने का ऑर्डर देने की अदालती ताकत जज प्रॉपर फैक्ट्स का पता लगाने के लिए या उनका उचित सबूत पाने के लिए, किसी भी रूप में, किसी भी समय, किसी भी साक्षी या पक्षकारों से, किसी सुसंगत या विसंगत फैक्ट के बारे में कोई भी सवाल, जो वह चाहे, पूछ सकेगा तथा किसी भी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश दे सकेगा। और न तो पक्षकार और न उनके एजेंट इसके हक़दार होंगे कि वे किसी भी ऐसे सवाल या ऑर्डर के प्रति कोई भी आक्षेप करें, न ऐसे किसी भी सवाल के जवाब में दिए गए किसी भी जवाब पर किसी भी साक्षी की अदालत की इजाजत के बिना एंटिसिपेशन के हकदार होंगे। जब वकील बीजू ने कोर्ट की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए एक सिस्टम के बारे में बात की तो सीजेआई बोबडे ने कहा कि हमारी प्रतिष्ठा हमेशा बार के हाथों में होती है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/x-GnaWl_4g8&quot; width=&quot;485&quot; youtube-src-id=&quot;x-GnaWl_4g8&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसके बाद बेंच ने लड़की के माता-पिता के साथ बात करने की इच्छा जताई और मामले को शुक्रवार 12 मार्च तक के लिए स्थगित कर दिया। तो ये तो अदालत में सोमवार को जो कुछ भी हुआ, वह था। कुल मिलाकर इसका मतलब है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के मुताबिक वे जो चाहें, पूछ सकते हैं, और कोई ये नहीं पूछ सकता कि ऐसा कुछ पूछते वक्त जज साहब के दिमाग में क्या चल रहा था। लेकिन क्या यह मामला सिर्फ यह कह देने से खत्म हो जाने वाला है, जैसा कि कानून में कहा गया है? बोबडे साहब ने जो सवालात पूछे, उससे भारत भर के महिला संगठनों और एक्टिविस्ट और बुद्द्जीवियों में घनघोर नाराजगी है। इसी गुस्से को उन्होंने चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया के नाम लिखे एक ओपन लेटर में व्यक्त किया है। आइए देखते हैं कि इस ख़त का मजमून क्या है ? कौन से सवाल पूछ कर नाराजगी जताई गई है। इस चिट्ठी में लिखा है कि माननीय चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, हम भारत की महिलाओं से जुड़े आंदोलनों के, प्रगतिवादी सोच से जुड़े आंदोलनों के प्रतिनिधि हैं। मीडिया के ज़रिये पता चला कि आरोपी मोहित सुभाष चव्हाण बनाम महाराष्ट्र सरकार केस में आपने जो टिप्पणी की है वो काफी आपत्तिजनक है। उससे हम आक्रोशित हैं। आपका सवाल था कि क्या आरोपी, पीड़िता से शादी करेगा? ये सुझाव मात्र भी एक पीड़िता को एक ज़िंदगी भर के रेप में धकेलने वाला था। ये बात हमें घृणा से भर देती है कि एक महिला को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के सामने सिडक्शन, रेप और शादी जैसे शब्दों के मायने एक्सप्लेन करने पड़ें। भारत में महिलाएं ऐसे लोगों से घिरी हुई हैं, जिन्हें लगता है कि&amp;nbsp; रेप के लिए आरोपी से ‘कॉम्प्रोमाइज़’ करने से उनकी तकलीफ़ का समाधान हो जायेगा। इस पत्र में आगे लिखा है कि बस बहुत हो चुका&amp;nbsp; आपके शब्द कोर्ट की गरिमा को नीचे गिराने वाले हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/x-GnaWl_4g8&quot; width=&quot;529&quot; youtube-src-id=&quot;x-GnaWl_4g8&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जैसे प्रतिष्ठित पद से देश की अन्य अदालतों, पुलिस और अन्य एजेंसियों तक ये संदेश जा रहा है कि भारत में महिलाओं के लिए न्याय उनका संवैधानिक अधिकार ही नहीं है। वहीं रेपिस्ट को ये मैसेज जा रहा है कि शादी, रेप का लाइसेंस है। चीफ जस्टिस से इस सुझाव के लिए माफ़ी की अपेक्षा करते हुए साफ़ लिखा है कि हम कहना चाहेंगे कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को 1 मार्च 2021 को कोर्ट में कहे अपने इन शब्दों को वापस लेना चाहिए, माफी मांगनी चाहिए। बिना एक पल गंवाए पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। चीफ जस्टिस के नाम ये ओपन लेटर लिखने वालों में महिला अधिकारों की बात करने वाले तमाम नाम शामिल हैं। एनी राजा, मरियम धवले, कविता कृष्णन, मीरा संघमित्रा आदि जैसे तमाम नाम हैं। साथ ही तमाम ग्रुप और एक्टिविस्ट भी इस मुहिम में शामिल हैं। एक तरफ जहां बोबडे साहब की महिला विरोधी हरकत के चलते महिलाएं बेहद नाराज हैं, वहीं उनकी इस हरकत पर देश दुनिया के बड़े अखबारों या मीडिया हाउसों में एक बार फिर से भारत की जुडिशरी की छवि वाकई धूमिल हुई है। अदालत और कानून चाहे जो समझे या कहे, मगर जिस तरह के तथ्य पूरी दुनिया के सामने हैं, उससे कोई भी यह आरोप बड़ी आसानी से लगा सकता है कि इंडियन जुडिशरी में महिलाओं की इज्जत तो हो सकता है कि बहुत है, मगर औकात कुछ भी नहीं है। बोबडे साहब के बहाने, जैसा कि हमने पहले बताया कि द गार्डियन अखबार ने पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई के भी तार छेड़ दिए हैं और यह कहने की कोशिश की है कि इंडियन जुडिशरी तो भई, बस ऐसी ही है। क्योंकि महिला संगठनों की जो चिट्ठी हमने आपको सुनाई, वह सोमवार को आए बोबडे साहब के कमेंट से पहले उनको लिखी गई थी, और जैसा कि देखा जा सकता है कि अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के पीछे कहीं न कहीं छुपने की कोशिश की और महिला संगठनों की नाराजगी को धारा 165 लगाकर खारिज कर दिया। जो शब्द इज्जत और औकात यूज किया गया, उसके बारे में भी तथ्य बड़े साफ हैं। औरत की इज्जत सुप्रीम कोर्ट में बहुत है, जिसके बारे में बोबडे साहब ने बयान दे ही दिया है। रही बात औकात की तो भारतीय जुडिशरी में कितनी महिला जज हैं, सुप्रीम कोर्ट में कितनी महिला जज हैं, हाई कोर्टों में कितनी महिला जज हैं, उनके नंबर्स बड़ी आसानी से गूगल पर देखे जा सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/8312666923311526995/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/8312666923311526995' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/8312666923311526995'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/8312666923311526995'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2021/03/blog-post_92.html' title='महिलाओं ने मांगा इस्तीफा, सीजेआई बोले- सवाल नहीं कर सकते'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://img.youtube.com/vi/x-GnaWl_4g8/default.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-7723258915243637894</id><published>2021-03-10T01:32:00.003-06:00</published><updated>2021-03-10T01:32:11.112-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस बजार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुद्दों का बजार"/><title type='text'>मोदी राज में कैग की ऑडिटिंग का बुरा हाल</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/2A2x_igPRSI&quot; width=&quot;506&quot; youtube-src-id=&quot;2A2x_igPRSI&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;क्या आप जानते हैं कि 2018 में कैग ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि 2013-14 से 2015-16 के बीच एफसीआई ने हरियाणा के कैथल में अडानी ग्रुप के गोदाम में इसकी औकात के मुताबिक गेहूं नहीं रखा और खाली जगह का किराया भरती रही? इसके चलते 6।49&amp;nbsp; करोड़ रुपये फालतू में खर्च हो गए। मोदी सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, जिसके अंडर में एफसीआई आता है, उसने कैग को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि इस पैराग्राफ को रिपोर्ट से हटाया जाना चाहिए। इस पैराग्राफ बोले तो जो मोदी जी ने अडानी जी को खाली डब्बों के पैसे दे दिए, उस पैराग्राफ को। मगर कैग ने कहा है&amp;nbsp; कि ये पैराग्राफ हटाया नहीं जा सकता है और उनका आकलन सही है। पूरा खुलासा वेबसाइट ‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में किया है। ये जो साढ़े छह करोड़ मोदी जी ने अडानी जी को फ्री फंड में दे दिए, इसके बारे में कैग ने एफसीआई को फटकार लगाते हुए लिखा था कि इस फालतू के खर्च के चलते टैक्सपेयर्स का साढ़े छह करोड़ बेवजह खर्च किया गया है। मंत्रालय अब कैग के पीछे पड़ा है कि इसे हटा दे, मगर कैग हटाने का नाम नहीं ले रहा है। हो सकता है कि इस बात से एकबारगी किसी को फख्र महसूस होने लगे कि कोई तो है, जो सही से हिसाब किताब पर ध्यान दे रहा है। मगर आगे जो हम बताएंगे, वो ऐसे किसी भी फख्र को मिनटों में छूमंतर करने वाला है। एक आरटीआई से भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट्स को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को आरटीआई के तहत जो जानकारी मिली है, वह चीख चीखकर बता रही है कि साल 2015 से 2020 के बीच कैग की की रिपोर्ट में 75 फीसदी की गिरावट आई है। साल 2015 में कैग ने 55 रिपोर्ट्स पेश की थी, लेकिन 2020 तक इसकी संख्या घटकर महज 14 रह गई है।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कैग रिपोर्ट में 75 प्रतिशत की गिरावट मामूली बात नहीं है। इसका एक मतलब यह भी है कि मोदी जी जो कर रहे हैं, कैग उसका चौथाई या आधा नहीं, सीधे सीधे पौना काम चेक ही नहीं कर रहा है। ऐसे में बिना कैग रिपोर्ट के यह पता ही नहीं चल सकता कि मोदी जी किस मद में कहाँ क्या खर्च कर रहे हैं और उससे बड़ी बात यह कि कहां बेवजह खर्च कर रहे हैं। दरअसल कैग की रिपोर्ट्स के जरिये ही सरकार की वित्तीय जवाबदेही तय होती है और अगर सरकार द्वारा कोई अनियमितता की जा रही है तो उसका भी खुलासा होता है। अब जैसे इसी सूचना में पता चला कि आज तक मोदी जी ने नोटबंदी की ऑडिटिंग ही नहीं होने दी है। वो नोटबंदी की ऑडिटिंग क्यों नहीं होने देना चाहते, इसका अंदाजा आपको इसी से लग सकता है कि कैग रिपोर्ट कांग्रेस की अगुवाई वाली मनमोहन सिंह की सरकार को इन्ही रिपोर्ट्स की वजह से हार का सामना करना पड़ा था। क्योंकि यूपीए के कार्यकाल के दौरान हुए ये घोटाले चुनाव का मेन मुद्दा बन गए थे। 2 जी आवंटन, कोयला आवंटन, आदर्श हाउसिंग सोसायटी और 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स का घोटाला ये सब नाम तो सबको याद ही होंगे। ये सब के सब कैग रिपोर्ट से ही उजागर हुए थे। यूपीए सरकार के कार्यकल के दौरान हुए इन तमाम घोटालों को भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट्स ने उजागर किया था। इसके चलते तत्कालीन यूपीए सरकार की छवि की धज्जियाँ उड़ गई थी। और इसका फायदा भाजपा ने खूब उठाया था।&amp;nbsp; यहाँ तक की साल 2014 के चुनाव में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा बना और मोदी सरकार सत्ता में आ गई। लेकिन जब से बीजेपी, खासकर हम दो हमारे दो की सरकार सत्ता में आई है, कैग को उसने करीने से ठिकाने लगा दिया है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लोकपाल आंदोलन की बेंच पर बेताल की तरह सवार होकर मोदी सरकार आई थी। लेकिन एक बार सत्ता में आने के बाद व्यवस्था में पारदर्शिता की बात भुला ही दी गई।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/2A2x_igPRSI&quot; width=&quot;467&quot; youtube-src-id=&quot;2A2x_igPRSI&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;और तो और जो इसके पहले यूपीए सरकार के दौरान पारदर्शिता थी वो भी सिरे से गायब है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘एनडीए सरकार के शुरुआती वर्षों के दौरान संसद में कैग की रिपोर्ट की संख्या 10 वर्षों में सबसे अधिक थी। लेकिन उसके बाद संख्या में लगातार गिरावट आई है।’ एक बार कैग के काम की भी थोड़ी जानकारी ले ली जाये और उसका महत्त्व समझ लिया जाये। भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक भारत के संविधान के तहत एक स्वतंत्र प्राधिकरण है। इस संस्था के जरिए संसद और राज्य विधानसभाओं के लिये सरकार और अन्य सार्वजनिक प्राधिकरणों (सार्वजनिक धन खर्च करने वाले) की जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है और यह जानकारी जनसाधारण को दी जाती है। लेकिन फिलहाल ये जानकारी किसी को नहीं मिल रही है। सबको मालूम ही है कि रफायल विमान सौदा कितना बड़ा मामला रहा है लेकिन हैरत की बात यह है कि सरकार इस मामले में ज्यादा जवाबदेही से बचती रही है और यह बात आरटीआई के जवाब से भी सामने आई है। रिपोर्ट से पता चलता है कि रक्षा ऑडिट रिपोर्ट के संख्या में काफी गिरावट आई है। साल 2017 में इस तरह की आठ ऑडिट रिपोर्ट संसद में पेश की गई थी, लेकिन पिछले साल यह संख्या शून्य रही। रेलवे ऑडिट रिपोर्ट्स के मामले में भी यही हाल है। 2017 में 5 रिपोर्ट आई थी लेकिन पिछले साल 1 ही आई। नोटबंदी जैसा बड़ा कदम मोदी सरकार ने उठाया था। बहुत लोग इसे आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला तक कह रहे थे। इसके बारे में तो जरूर रिपोर्ट आणि चाहिए थी। इससे सरकार का पक्ष और मकसद साफ़ होता लेकिन हैरत ये कि नोटबंदी जैसे विवादित मामलों की भी कैग ने ऑडिटिंग नहीं की, जो बेहद अजीब बात है। जबकि नोटबंदी सरकार का एक फ़िज़ूल कदम साबित हुआ। तो यह बाते पता लगनी चाहिए 1,000 रुपये के नोट को बैन करने से क्या प्रभाव पड़ा?&amp;nbsp; नोटबंदी की किसी बात का कुछ पता नहीं चला।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जबकि इस मामले में संस्था की जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी।&amp;nbsp; इस सुस्ती का जवाबदेह कौन है कोई खबर नहीं है। कैग के इस लचर प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए पूर्व आईएएस अधिकारी जवाहर सरकार ने कहा कि कैग अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं निभा रहा है, जो फंड के खर्च की ऑडिटिंग करना है। आरटीआई की इस रिपोर्ट पर लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने कहा कि कैग को यह पता लगाना होता है कि क्या पैसा सही तरीके से और नियम-कानूनों के मुताबिक खर्च किया गया है। कैग को सरकार के इन सभी लेनदेन की जांच करनी होती है। इसका मतलब है कि कैग ने ऑडिट के लिए कम मामलों को उठाया या फिर उन्हें खर्च में कुछ भी गलत नहीं लगा।’ मामला केंद्र तक सीमित नहीं है केंद्र के साथ ही बीते कुछ सालों में विधानसभाओं में ऑडिट रिपोर्ट्स पेश करने में भी ख़ासी देर हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि रिपोर्ट पेश होने में हुई देर से उसका प्रभाव कम हो जाता है, साथ ही सरकार में ग़ैर-जवाबदेही के चलन को बढ़ावा भी मिलता है। वित्तीय वर्ष 2017-18 से संबंधित कम से कम नौ राज्यों के लिए कैग की ऑडिट रिपोर्ट अभी भी विधायकों और नागरिकों के लिए उपलब्ध नहीं है, जबकि वित्तीय वर्ष को खत्म हुए 30 महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है। ये राज्य आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल हैं। इस तरह की देरी के चलते रिपोर्ट पेश होने के बाद वाले कामों जैसे लोक लेखा समिति यानी पीएसी और सार्वजनिक उपक्रम समिति यानी सीओपीयू की निगरानी प्रक्रियाओं पर गहरा प्रभावित पड़ता है। क्योंकि जब रिपोर्ट ही पेश नहीं होगी तो आगे कोई एक्शन कैसे लिया जायेगा। इस वजह से संबंधित मामले पर विभागों द्वारा एक्शन टेकन रिपोर्ट यानी एटीआर जमा करने में भी देरी होती है। यह ऑडिट रिपोर्ट के असर को प्रभावित करता है। अब&amp;nbsp; यह सवाल उठता है कि ऑडिट रिपोर्ट को पेश करने में हुई देरी के लिए कौन जिम्मेदार है?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्या चुनी हुई सरकारों को दोषी ठहराया जाना चाहिए? या फिर कुछ हद तक या कुछ मामलो में कमियां राष्ट्रीय लेखा परीक्षक संस्थान में भी है? जो भी हो यह जिम्मेदारी तो सरकार की है ही की वह विभिन्न मामलों में जो भी विवाद है उसमे अपनी स्थिति साफ़ करे। और यह सफाई ओडिट रिपोर्ट के जरिये ही पेश की जा सकती है। तमाम वित्तीय अनियमितताओं को लेकर सरकार पहले ही तमाम सवालों के घेरे में खड़ी है सबसे बड़ा मामला&amp;nbsp; नोटबंदी और रक्षा सौदे हैं। इसलिए ऐसा लगता है कि सरकार की खुद ही कोई दिलचस्पी&amp;nbsp; इन रिपोर्ट्स में नहीं बची है। इसलिए कोई न कोई वजह खोजकर जानबूझकर देरी की जा रही है।&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/7723258915243637894/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/7723258915243637894' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/7723258915243637894'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/7723258915243637894'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2021/03/blog-post_10.html' title='मोदी राज में कैग की ऑडिटिंग का बुरा हाल'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://img.youtube.com/vi/2A2x_igPRSI/default.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-1305780835016822326</id><published>2021-03-08T22:11:00.006-06:00</published><updated>2021-03-08T22:11:39.705-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कबिताई"/><title type='text'>तोहरे कागज के टुकड़न कै, का करिहैं बतलाओ राम</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;जौ तू मनई हौ असली तौ&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बात हमार ई लिहौ तू मान&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राम नाम पै लाखौं लुटावौ&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अइसे ना खुश होइहैं राम&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चार आना या आठ आना&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाहे जेतना लगावौ दाम&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तोहरे कागज के टुकड़न कै&lt;/p&gt;&lt;p&gt;का करिहैं बतलाओ राम&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राम प्रेम परतापी राजा&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;के उनका दै पाए दान&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनके नाम जे चंदा मांगै&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ओकर देह कै दिहौ तू जाम।&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/1305780835016822326/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/1305780835016822326' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1305780835016822326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1305780835016822326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2021/03/blog-post_41.html' title='तोहरे कागज के टुकड़न कै, का करिहैं बतलाओ राम'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-5847231405354509999</id><published>2021-03-08T22:10:00.005-06:00</published><updated>2021-03-08T22:10:55.212-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कबिताई"/><title type='text'> राम रसायन निकला चंदा </title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;राम रसायन निकला चंदा&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राम नाम कै होय रहा धंधा&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राम राम कहिके गोहरावैं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राम जौ निकरैं, चक्कू देखावैं&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राम नाम कै लूट रही तब&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अब तौ राम का नोच उड़ावैं&lt;/p&gt;&lt;p&gt;राम नाम का कै दिहिन गंदा&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिखैं गली मा तौ मारौ डंडा।&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/5847231405354509999/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/5847231405354509999' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/5847231405354509999'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/5847231405354509999'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2021/03/blog-post_8.html' title=' राम रसायन निकला चंदा '/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-7197555525556835881</id><published>2021-03-04T23:23:00.001-06:00</published><updated>2021-03-04T23:23:07.118-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अब मैं मरती हूँ"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस बजार"/><title type='text'>दिख ही गई सीजेआई बोबडे की स्त्री विरोधी मानसिकता</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;सोमवार एक मार्च को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे ने एक रेप पीड़िता के लिए ऐसा फैसला दे दिया, कि लोगों को पूछना पड़ रहा है कि आखिर अदालत में ये सब हो क्या रहा है। हर तरफ सीजेआई बोबडे के इस फैसले की मुखालफत जारी है। महिलाओ ने खास तौर पर इस पर नाराजगी जताते हुए इसे स्त्री विरोधी बताया है। इस फैसले में जो कहा गया है उससे सवाल उठता है कि कोर्ट के फैसले भी बोलीवुड की तरह अब फिल्मी ही होंगे क्या ? या फिर जस्टिस बोबडे ये देश की सुप्रीम कोर्ट के बजाय कहीं किसी खाप पंचायत में तो नहीं जाकर बैठ गए? दरअसल मामला कुछ यूं है कि&amp;nbsp; सुप्रीम कोर्ट में रेप के आरोपी&amp;nbsp; की याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेआई बोबडे ने उससे पूछा कि क्या वह पीड़ित महिला से शादी करेगा? उन्होंने कहा कि अगर वह पीड़िता से शादी करने को तैयार है तो उसे राहत दी जा सकती है। रेप का ये आरोपी सरकारी कर्मचारी है उसने गिरफ्तारी से राहत के लिए &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/gp5VPy6AifI&quot; width=&quot;468&quot; youtube-src-id=&quot;gp5VPy6AifI&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उसके वकील का कहना था कि गिरफ्तारी होने पर उसे नौकरी से सस्पेंड कर दिया जाएगा। उसकी ये दलीलें सुनने के बाद सीजेआई बोबडे ने कहा, &quot;अगर आप शादी करना चाहते हैं तो हम आपकी मदद कर सकते हैं। अगर नहीं तो आपको अपनी नौकरी गंवानी पड़ेगी और जेल जाना पड़ेगा। आपने लड़की से छेड़खानी की, उसका रेप किया।&quot; क्योंकि मोहित नाम का यह आरोपी व्यक्ति पहले से शादी –शुदा है इसलिए उसके वकील ने बताया कि शादी भी नहीं हो सकती है। सवाल यह है कि क्या इस तरह के फैसले से उस पीडिता को न्याय मिल सकता है जिसके साथ इतना वीभत्स कृत्य किया गया हो। क्या सजा से बचने के लिए आरोपी शादी का प्रस्ताव दे तो उस पर रहम करना चाहिए ? एक सवाल यह भी है कि सीजेआई बोबडे का काम पीड़ित को न्याय देना है या फिर वे वहां बलात्कारियों की शादी कराने के लिए बैठाए गए हैं? और इससे भी बड़ा सवाल महिलाओं की तरफ से यह है कि ऐसी महिला विरोधी मानसिकता के साथ किसी भी शख्स को क्या सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बनने का हक है? क्यों नहीं सीजेआई बोबडे को महिलाओं का सम्मान करते हुए स्वेच्छा से अपनी गलती मानते हुए कुर्सी छोड़ देनी चाहिए? फिल्म अभिनेत्री तापसी पन्नू ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी ने लड़की से यह सवाल पूछा कि क्या वह दुष्कर्म करने वाले शख्स से शादी करना चाहती है या नहीं? क्या यह सवाल है? यही हल है या सजा? एकदम घटिया। वहीं माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य वृंदा करात ने भारत के चीफ जस्टिस एस ए बोबडे को पत्र लिख कर उनसे वह टिप्पणी वापस लेने का आग्रह किया है, जिसमें उन्होंने बलात्कार के मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी से पूछा था कि क्या वह पीड़िता के साथ विवाह करने के लिये तैयार है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वैसे अदालत में यह कोई पहली बार नहीं है कि उसका महिला विरोधी चेहरा दिखा है। असल में हमारी अदालतें अपनी जड़ से ही महिला विरोधी हैं। पिछले साल यानी दस जुलाई 2020 में एक बहुत ही विचित्र घटना हुई जो बताती है कि हमारा अदालती सिस्टम किस कदर स्त्री विरोधी हो चुका है। ये घटना&amp;nbsp; बिहार के अररिया जिले की है। जहां सामूहिक दुष्कर्म की शिकार युवती को ही जेल भेज दिया गया। उस पर न्यायिक कार्य में कथित तौर पर बाधा डालने का आरोप लगाया गया। हुआ ये कि इस केस में युवती के किसी परिचित ने ही अपने दोस्तों के साथ मिलकर उसका रेप किया था और शिकायत करने पर उसे ही जेल जाना पड़ गया था। जब घटना सामने आई तो हंगामा मच गया। इस घटना पर देश के जाने माने वकीलों और सामाजिक संस्थाओं ने पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश से दखल देने की अपील करते हुए एक पत्र लिखा . 15 जुलाई 2020 को लिखे पत्र में साफ़ कहा गया कि ऐसा मामला पहली दफा सुनने में आया है कि मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज कराने आई बलात्कार पीड़ित युवती व उसके दो सहयोगियों को उसकी मनोदशा को संवेदनशीलता के साथ देखे बिना अदालत की अवमानना के आरोप में माननीय मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक हिरासत में लेने का निर्देश जारी किया गया। तीनों को न्यायिक हिरासत में लेकर वहां से 240 किलोमीटर दूर दलसिंहसराय जेल भेज दिया गया। लगभग 376 वकीलों द्वारा लिखे पत्र का नतीजा था कि&amp;nbsp; इन पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने इन पत्रों को जनहित याचिका (पीआइएल) में बदल दिया। इस तरह के मामलों की जैसे पूरे देश में ही झड़ी लगी हो।&amp;nbsp; एक मामला 2018 का है जब सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के एक आरोपी की सजा में बदलाव करने या संशोधन करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी निहित शक्तियों का उपयोग किया था। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी द्वारा जेल में बिताए गए दिनों को ही पर्याप्त सजा माना था ताकि पीड़िता या शिकायकर्ता को कोई और कष्ट न झेलना पड़े क्योंकि घटना के तुरंत बाद आरोपी से उससे शादी कर लिया था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;260&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/gp5VPy6AifI&quot; width=&quot;482&quot; youtube-src-id=&quot;gp5VPy6AifI&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अब यहां सवाल ये है कि शादी करने या करवाने से अपराध कम हो जाता है क्या ? क्या यह संभव नहीं है कि कई बार शातिर अपराधी सजा से बचने के लिए भी शादी का फैसला कर सकता है। और कोई पीडिता समाज की उपेक्षा से बचने के लिए राजी भी हो सकती है लेकिन इसका परिणाम अंतत उस पीड़ित स्त्री को ही भुगतना पड़ता है जैसा की दिल्ली में हुए 2017 में एक केस में हुआ था। मामला कुछ ऐसा था कि इसमें एक रेप पीडिता और रेप आरोपी की शादी की गई थी। कुछ ही दिनों बाद आरोपी उस लड़की से छुटकारा पाने की सोचने लगा। उसने अपनी ही पत्नी के अश्लील वीडिओ बनाकर उन्हें वायरल करने की धमकी दी। तंग आकर लड़की ने रिपोर्ट की तब जाकर पुलिस को पता चला यह हरकत उसका पति कर रहा था। वो उसे तमाम धमकियां भी देता था जिससे लड़की खुद भाग जाये। शायद इस तरह करायी गई शादी का यही हश्र होता है। एक निहायत बचकाना फैसला बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने कुछ ही अरसा पहले 19 जनवरी को २०२१ दिया था इसमें एक मामले में जस्टिस पुष्पा वी। गनेदीवाला की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि टॉप को हटाए बिना किसी नाबालिग लड़की का ब्रेस्ट छूना यौन हमले की श्रेणी में नहीं आएगा, लेकिन इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत किसी महिला का शीलभंग करने का अपराध माना जाएगा। हैरत की बात यह है कि ऐसा फैसला एक महिला जज की पीठ से आया था। जिसमे पाक्सो एक्ट के तहत यौन हमले की व्याख्या कुछ इस तरह की गई। कहा गया कि यौन इरादे और स्किन-टू-स्किन कांटैक्ट के बिना किसी बच्चे के ब्रेस्ट को जबरन छूना यौन अपराधों से बच्चों को बचाने के लिए बने विशेष कानून प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (पोक्सो) एक्ट के तहत यौन हमला नहीं है।&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस फैसले से महिला संगठनो सहित तमाम लोगो ने नाराजगी जताई। गुजरात की एक महिला देवश्री त्रिवेदी ने इस फैसले से नाराज होकर तमाम जगह कंडोम के पैकेट ही भेज दिए और जज पुष्पा गनेदीवाला को निलंबित करने की मांग की। एक और मामला बेहद भयावह है जिसमे ये सुनकर ही गुस्सा आ जाये कि आखिर कोई न्यायधीश ऐसी सलाह कैसे दे सकता है। मामला दिल्ली की अदालत का है जहां भूरा नाम के आदमी पर रेप का केस था। युवक ने&amp;nbsp; अस्पताल में काम करने वाली एक नर्स के साथ बलात्कार किया था और फिर उसकी एक आंख निकाल ली थी। मुक़दमे में जब दोषी ने पीड़ित महिला के संग शादी का सुझाव दिया था तो न्याधीश ने पीड़ित महिला को सुझाव पर गौर करने को कहा था। न्यायाधीश की सलाह के बावजूद नर्स ने भूरा के साथ शादी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था जिसके बाद अदालत ने भूरा को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी। इतने हिंसक व्यव्हार के बाद किसे कोई स्त्री ऐसे इन्सान से शादी करने का सोच सकती है इसे एक पुरुष न्यायाधीश ही सोच सकता है। जाहिर है आरोपी तो शादी का प्रस्ताव अपने बचाव में दे रहा। शारीरिक और मानसिक चोट देने वाले से शादी का फैसला करना आसन नहीं है। जिसने किया भी कोर्ट की सलाह के बाद मज़बूरी में ही किया होगा। जबलपुर की एक अदालत भी ऐसे ही एक फैसले में आरोपी&amp;nbsp; कमलनाथ पटेल और पीड़ित लड़की की शादी अदालत परिसर में बने मंदिर में ही करा चुकी है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी तरह का एक और केस पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का है। इस केस में एक नाबालिग का गैंगरेप चार लोगों ने किया। इनमें से एक आरोपी ने 1 दिसंबर 2019 को ज़मानत के लिए याचिका लगाई कहा कि उसने जेल में विक्टिम के साथ शादी कर ली है। कोर्ट ने उसे ज़मानत दे दी। पर बाकी तीन आरोपियों की याचिका खारिज़ कर दी। कोर्ट ने जमानत इस चेतावनी के साथ दी कि अगर आरोपी ने लड़की को तलाक देने की भी कोशिश करता है तो भी उसकी ज़मानत रद्द हो जाएगी। और अगर आरोपी आने वाले समय में शादी तोड़ेगा तो भी उसके खिलाफ उचित आपराधिक कार्यवाही भी की जाएगी।&amp;nbsp; जहां शादी वाली सलाह से काम नहीं चला वहां भाई बनाने की सलाह भी दी गई। रक्षाबंधन सलाह मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की है। एक महिला का रेप करने पर आरोपी को जमानत दी गई और उसे कहा गया कि&amp;nbsp; शिकायतकर्ता के घर जाए उसकी रक्षा का वचन देकर उससे&amp;nbsp; &quot;राखी बांधने&quot; का अनुरोध करे। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अपर्णा भट और आठ अन्य महिला वकीलों ने इस जमानत आदेश में चुनौती दी। इस तरह की सलाह बेहद ही हास्यास्पद है। पीड़िता की तकलीफ़ को बढ़ाने वाली है। कोर्ट ने महज शादी करने ,भाई बनाने की की सलाह दी हो यहीं तक सीमित नहीं है उसने एक मामले में सास की भूमिका भी निभा डाली। 19 जून 2020 का एक फैसला गुआहाटी का है जिसमें&amp;nbsp; हाईकोर्ट ने ‘सिंदूर’ लगाने और ‘चूड़ी’ पहनने से इनकार करने पर एक व्यक्ति को अपनी पत्नी से तलाक लेने की अनुमति दे दी। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, ‘चूड़ी पहनने और सिंदूर लगाने से इनकार करना यह दर्शाएगा कि वह अपने पति साथ इस शादी को स्वीकार नहीं करती है।&amp;nbsp; समझ से परे है कि फैसले में ऐसी बातें किसी स्मृति या शास्त्र के हिसाब से कही गईं हैं या फिर संविधान के हिसाब से।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: left;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/gp5VPy6AifI&quot; width=&quot;485&quot; youtube-src-id=&quot;gp5VPy6AifI&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में ही एक केस में रेप के एक आरोपी को हाईकोर्ट से एक टैटू की वजह से ज़मानत मिल गई। आरोपी के वकील ने कहा कि शिकायत करने वाली महिला शादीशुदा है और आरोपी के साथ सहमति से रिलेशन में थी। अपनी इस दलील के पीछे वकील ने सबूत के तौर पर महिला के हाथ पर बने एक टैटू का ज़िक्र किया जिसमें आरोपी व्यक्ति का नाम लिखा है। आरोपी के वकील ने कहा कि महिला भी आरोपी से प्यार करती थी, जिसका सबूत ये टैटू है। इस पर शिकायतकर्ता महिला ने कहा कि ये टैटू उसके हाथ पर जबरन बनवाया गया है। लेकिन कोर्ट ने महिला की इस बात को ना मानते हुए कहा कि “सामने वाले की रज़ामंदी के बगैर टैटू बनाना कोई आसान काम नहीं है। हमारी राय में टैटू बनाना एक कला है और उसे बनाने के लिए एक विशेष प्रकार की मशीन की ज़रूरत होती है। शिकायतकर्ता के हाथ पर जहां ये टैटू बनाया गया है, वहां बनाना आसान नहीं। वो भी तब, जब उसने इस बात का विरोध किया हो। इस तरह के ना जाने कितने फैसले हैं जो बहुत सारे सवाल खड़े करते हैं। इनमे एक अहम् सवाल है कि क्या इस तरह के फैसलों का एक बड़ा कारण न्यायपालिका में पुरुष वर्चस्व है। पूरे भारत में उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में 1,113 न्यायाधीशों की कुल स्वीकृत संख्या में से केवल 80 महिला न्यायाधीश हैं।&amp;nbsp; इन 80 महिला जजों में से, सुप्रीम कोर्ट में केवल दो हैं, और अन्य 78 विभिन्न उच्च न्यायालयों में हैं, जो कुल न्यायाधीशों की संख्या का केवल 7।2 प्रतिशत है। इस सख्या को और बढ़ाने की जरुरत है। माना कि कुछ केसेज गलत हो सकते हैं लेकिन कुछ की वजह से तमाम पीड़ित महिलाओं की हक़तलफी ना हो जाये। कोर्ट कम से कम पीड़िता लिए इतना संवेदनशील हो कि सलाह उसके लिए सजा न बन जाये।&lt;p&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/7197555525556835881/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/7197555525556835881' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/7197555525556835881'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/7197555525556835881'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2021/03/blog-post.html' title='दिख ही गई सीजेआई बोबडे की स्त्री विरोधी मानसिकता'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://img.youtube.com/vi/gp5VPy6AifI/default.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-7006603240170651230</id><published>2021-02-27T06:20:00.003-06:00</published><updated>2021-02-27T06:20:35.950-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस बजार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुद्दों का बजार"/><title type='text'>ईवीएम के जरिए लोकतंत्र पर डाका </title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/V-7P-xtDY_g&quot; width=&quot;320&quot; youtube-src-id=&quot;V-7P-xtDY_g&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;क्या ईवीएम को लेकर भारत का चुनाव आयोग हम सभी से कोई बड़ा झूठ बोल रहा है? क्या ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग हम सभी से अभी तक कोई ऐसी बात छुपाता आया है, जिससे कि हमारे लोकतंत्र को कहीं न कहीं कोई बड़ा धक्का लग रहा है? ईवीएम को लेकर देश भर के लोगों के दिमाग में ढेरों सवाल चल रहे हैं, लेकिन अब ईवीएम को लेकर पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने बड़ा खुलासा किया है। आपको बता दें कि पूर्व आईएएस कन्नन गोपीनाथन ने ईवीएम पर इतना बड़ा खुलासा तकरीबन साल भर से अधिक के इंतजार के बाद किया है। बल्कि उनकी मानें तो जब वे सर्विस में थे, तभी से उनका इलेक्शन कमीशन के साथ इस मसले पर पत्राचार चल रहा है। चुनाव आयोग को उनके सवालों का जवाब देते नहीं बन रहा है। अब इधर उधर की बात बंद और सीधे ईवीएम पर हुए महाखुलासे की ओर चलते हैं। आपको बता दें कि जब मोदी सरकार ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया था तो इसके विरोध में आईएएस अधिकारी रहे कन्नन गोपीनाथन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने कहा है कि चुनाव आयोग बार-बार दावा करता है कि वीवीपैट यानी वो मशीन, जिससे कि वोट देने के बाद पर्ची निकलती है और ईवीएम के साथ किसी एक्सटर्नल डिवाइस यानी बाहरी मशीन को नहीं जोड़ा नहीं जाता। लेकिन ईवीएम और वीवीपैट बनाने वाली कंपनी बीइएल यानी भारत इलेक्ट्रिकल लिमिटेड के मैनुअल से यह शीशे की तरह साफ होता है कि वीवीपैट को ऑन करने के लिए किसी बाहरी लैपटॉप या कंप्यूटर की ज़रूरत होती है। कन्नन पूछते हैं कि अगर वीवीपैट स्टैंडअलोन डिवाइस है तो उसकी कमीशनिंग के लिए लैपटॉप या कंप्यूटर की ज़रूरत क्यों पड़ती है? कन्नन गोपीनाथन के इन सवालों से चुनाव आयोग का यह दावा संदेह के दायरे में आ गया है कि ईवीएम एक स्डैंडअलोन मशीन है, जिसे किसी बाहरी मशीन से नहीं जोड़ा जाता। ईवीएम के साथ वीवीपैट जोड़ने के पीछे 2012 में आया सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला है, जिसमें उसने कहा था कि लोगों के विश्वास के लिए ईवीएम के साथ वीवीपैट जोड़ा जाना चाहिए। उसके बाद से देश भर में होने वाले चुनावों में ईवीएम से वीवीपैट जोड़ने की कवायद चल रही है&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/mT2CIT5dmyM&quot; width=&quot;320&quot; youtube-src-id=&quot;mT2CIT5dmyM&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आपको बता दें कि ईवीएम के बारे में चुनाव आयोग ने अपनी वेबसाइट पर साफ साफ लिखा है कि ईवीएम एक स्टैंड अलोन डिवाइस है, यानी कि इसे चलाने के लिए किसी दूसरी डिवाइस की जरूरत नहीं पड़ती। इसके अलावा इसे किसी भी नेटवर्क से रिमोट से भी कनेक्ट नहीं किया जा सकता है। चुनाव आयोग यह भी कहता है कि ईवीएम को चलाने के लिए किसी ऑपरेटिंग सिस्टम की भी जरूरत नहीं होती। इसलिए चुनाव आयोग यह दावा करता है कि ईवीएम से किसी भी तरह की छेड़छाड़ मुमकिन नहीं है। लेकिन कन्नन गोपीनाथन ने ईवीएम को लेकर जो सवाल खड़े किए हैं, वे चुनाव आयोग के इन दावों को धुंए की तरह उड़ा रहे हैं। पूर्व आईएएस कन्नन गोपीनाथन का कहना है कि चुनाव आयोग बार-बार दावा करता है कि वीवीपैट और ईवीएम के साथ किसी एक्सटर्नल डिवाइस यानी बाहरी मशीन को जोड़ा नहीं जाता, लेकिन ईवीएम और वीवीपैट बनाने वाली कंपनी बीइएलके यानी भारत इलेक्ट्रिकल लिमिटेड के मैनुअल में बिलकुल साफ साफ लिखा है कि वीवीपैट को शुरू करने के लिए बाहरी लैपटॉप या कंप्यूटर की ज़रूरत होती है। स्क्रीन पर आप जो कटिंग देख रहे हैं, वह खुद चुनाव आयोग के मैन्यूअल की है और जिसमें खुद आयोग डेस्कटॉप या लैपटॉप से कनेक्ट करने की बात करता है। कन्नन गोपीनाथन का कहना है कि इस हिसाब से तो फिर ज्यों ही ईवीएम से जुड़ी वीवीपैट मशीन लैपटॉप या कंप्यूटर से जुड़ती है, वैसे ही चुनाव आयोग का मशीन के स्टैंड अलोन के दावे में कहीं न कहीं एक सेंध जरूर लग जाती है। शनिवार को हुई कन्नन गोपीनाथन से हुई हमारी बातचीत में उन्होंने बार बार कहा कि इसका मतलब यह बिलकुल न समझें कि हम चुनाव पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि हमें दिख रहा है कि कहीं न कहीं एक दरवाजा खुला हुआ है और हम सिर्फ ये कह रहे हैं कि चुनाव आयोग कम से कम एक बार इसे चेक तो कर ले, हम सबको बता तो दे कि दरवाजा खुला है या बंद, या फिर अगर खुला था तो उसे बंद कर दिया गया है।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/c2crWrcSGAw&quot; width=&quot;320&quot; youtube-src-id=&quot;c2crWrcSGAw&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;वैसे बात सिर्फ मशीन को शुरू करने की होती, तो भी गनीमत थी। पूर्व आईएएस अधिकारी ने इसके लिए उपयोग में लाए जाने वाले एक एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर की भी पोल खोली है, जिसके बारे में चुनाव आयोग का दावा है कि ईवीएम को चलाने के लिए किसी ऑपरेटिंग सिस्टम की जरूरत नहीं होती। गोपीनाथन ने बताया है कि एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर के ज़रिए ईवीएम और वीवीपैट पर उम्मीदवारों के नाम और उनके चुनाव चिह्नों को लोड करने के लिए लैपटॉप का इस्तेमाल किया जाता है। और लैपटॉप या डेस्कटॉप बिना किसी ऑपरेटिंग सिस्टम के काम नहीं करता है। यानि ईवीएम से किसी न किसी हालत में एक ऑपरेटिंग सिस्टम कनेक्ट किया जा रहा है, क्योंकि उसके बगैर ईवीएम चलेगी ही नहीं। कन्नन ने ईवीएम-वीवीपैट मशीनों की मैन्युफैक्चरिंग और खरीद को लेकर भी सवाल उठाए हैं। कन्नन का कहना है कि चुनाव आयोग दावा करता है कि ये मशीनें बीइएल/इसीआईएल द्वारा बनाई जाती हैं, लेकिन उनका दावा है कि बीईएल की ई-प्रोक्योरमेंट साइट पर मशीन की पीसीबी समेत कई कंपोनेंट के लिए टेंडर मंगाए गए हैं। कन्नन ने सवाल उठाया है कि अगर उपकरणों का निर्माण बीइएल/इसीआईएल&amp;nbsp; द्वारा किया जाता है, तो पीसीबी के लिए टेंडर क्यों आमंत्रित किए गए? और अगर टेंडर जारी ही किए गए तो वह टेंडर किन कंपनियों को दिए गए, या किसी सरकारी कंपनी को दिए गए या प्राइवेट, इसकी जानकारी नहीं दी गई है। कन्नन जी ने इन सभी सवालों पर चुनाव आयोग से जवाब मांगे हैं। गोपीनाथन ने निर्वाचन आयोग के प्रवक्ता को ट्विटर पर टैग करते हुए लिखा है कि अगर मैं गलत हूं तो मुझे जवाब देने और गलत साबित करने की ज़िम्मेदारी आपकी है, ताकि मैं भ्रामक जानकारी न फैला सकूं और अगर मेरी बात में सच्चाई है, तो इसे संज्ञान में लेकर सुधार करना भी आपकी जिम्मेदारी है। कन्नन का कहना है कि चुनाव आयोग की ओर से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/pWyJumKWGkA&quot; width=&quot;320&quot; youtube-src-id=&quot;pWyJumKWGkA&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;जबकि इस मामले में और भी कई लोगों ने आरटीआई लगा रखी है, चुनाव आयोग उनको भी जवाब नहीं दे रहा है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में इलेक्शन कमीशन ने जो एफिडेविट दाखिल किया है, उसमें उसे ईवीएम को स्टैंड अलोन डिवाइस बता रखा है। कन्नन पूछते हैं कि अगर वह स्टैंड अलोन डिवाइस है तो वीवीपैट को जिस उम्मीदवार को वोट दिया, उसे छापने का कमांड कहां से मिलता है? इसका मतलब है कि ये कमांड उसमें कहीं न कहीं से फीड किया गया है। गोपीनाथन का दावा है कि पेपर ट्रेल मशीनों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) को छेड़छाड़ की चपेट में ले लिया। आपको याद दिला दें कि साल 2017 के गोवा विधानसभा चुनावों के बाद से सभी ईवीएम के साथ मतदाता-सत्यापित पेपर ऑडिट ट्रेल मशीनों का इस्तेमाल किया गया है। आम चुनाव के दौरान दादर और नगर हवेली में निर्वाचन अधिकारी रहे गोपीनाथ ने फरवरी 2019 में चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित ‘मैनुअल ऑन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन और वीवीपीएटी’ के नए संस्करण का हवाला देते हुए कहा है कि वो अभी भी अपने इस पक्ष पर कायम हैं, सिवाय इसके कि वीवीपैट के साथ हुए पहले चुनाव ने उनका भरोसा छीन लिया है। वीवीपैट ने ईवीएम कवच में एक छेद कर दिया है और इस प्रोसेस को हैकिंग के लिए रिस्पॉन्सिबल बना दिया है। कन्नन ने कहा कि अब ये चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बनती है कि वह मुझे गलत साबित करे। उन्होंने कहा कि अगर वे जनता के बीच में कुछ भी गलत शक डाल रहे हैं तो भी इलेक्शन कमीशन की जिम्मेदारी बनती है कि मुझे गलत साबित करे। मगर शायद राजनीतिक पार्टियां अभी तक इस पर कोई सवाल नहीं उठा रही हैं तो नागरिक के सवाल उठाने का शायद उनके यानी इलेक्शन कमीशन के लिए कोई मतलब नहीं है। लेकिन कन्नन ने ये जोर देकर कहा कि उनके कहे का यह मतलब बिलकुल भी ना निकाला जाए कि वे ये कह रहे हैं कि 2019 का चुनाव हैक हो गया था।&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/Pg9EGPpDv9E&quot; width=&quot;320&quot; youtube-src-id=&quot;Pg9EGPpDv9E&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;ऐसा बिलकुल नहीं है। मगर हमने जो लूप होल दिखाया है, कम से कम उनको इसका तो जवाब देना चाहिए। एक दरवाजा खुल रहा है, जब आप ईवीएम को बाहरी डिवाइस यानी लैपटॉप या डेस्कटॉप से कनेक्ट करते हैं तो एक दरवाजा खुलता है। हम बस इतना कह रहे हैं कि एक बार उसे चेक करके हम सबको मुतमईन कर दिया जाए कि भाई दरवाजा बंद है। वहीं राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर एक बार फिर से गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस सिलसिले में पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन के उठाए प्रश्नों का समर्थन करते हुए चुनाव आयोग से उनका जवाब देने की मांग भी की है। कांग्रेस नेता ने कहा है कि कन्नन गोपीनाथन ने ईवीएम को लेकर जो खुलासे किए हैं, उनसे चुनाव आयोग के दावों पर सवालिया निशान लग गया है। दिग्विजय सिंह ने कहा है कि आयोग दावा करता रहा है कि ईवीएम एक स्डैंडअलोन मशीन है, जिसे किसी बाहरी मशीन से नहीं जोड़ा जाता, लेकिन कन्नन गोपीनाथ ने जो जानकारियां दी हैं, उनसे आयोग का यह दावा संदेह के दायरे में आ गया है। दिग्विजय सिंह ने कहा है कि चुनाव आयोग बार-बार दावा कर चुका है कि ईवीएम में वन टाइम प्रोग्रामेबल चिप होती है, यानी एक ऐसी चिप जिसे एक ही बार प्रोग्राम किया जा सकता है, लेकिन ऐसी बहुत सी रिपोर्ट्स हैं, जिनमें दावा किया गया है कि वीवीपैट में मल्टी प्रोग्रामेबल चिप लगी है। मल्टी प्रोग्रामेबल चिप का मतलब है ऐसी चिप जिसे बार-बार प्रोग्राम किया जा सकता है। दिग्विजय सिंह ने कहा है कि अगर ऐसा है तो इसका यह भी मतलब हो सकता है कि कंट्रोल यूनिट को मैसेज देने का काम वीवीपैट से किया जाता है, बैलेट यूनिट से नहीं। दिग्विजय सिंह ने कहा है कि निर्वाचन आयोग को कन्नन गोपीनाथन के उठाए गंभीर सवालों का जवाब ज़रूर देना चाहिए। कांग्रेस नेता ने कहा कि कन्नन खुद चुनाव संपन्न कराने की प्रक्रिया में शामिल रह चुके हैं। ऐसे में निर्वाचन आयोग को उनकी शंकाओं का जवाब जरूर देना चाहिए, लेकिन क्या आयोग जवाब देगा? ये तो आने वाले दिनों में ही पता चल पाएगा।&lt;p&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/7006603240170651230/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/7006603240170651230' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/7006603240170651230'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/7006603240170651230'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2021/02/blog-post_27.html' title='ईवीएम के जरिए लोकतंत्र पर डाका '/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://img.youtube.com/vi/V-7P-xtDY_g/default.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-1949156263240983210</id><published>2021-02-16T01:12:00.005-06:00</published><updated>2021-02-16T01:12:40.693-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस बजार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुद्दों का बजार"/><title type='text'>रंजन गोगोई : पाप इतने कि सदियां भुगतेंगी </title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/pH6VhYTXXR4&quot; width=&quot;320&quot; youtube-src-id=&quot;pH6VhYTXXR4&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;br /&gt;अक्टूबर 2018 में जब रंजन गोगोई सीजेआई बने तो उनके सामने राफेल लड़ाकू जहाजों का मामला आया। नरेंद्र मोदी ने फ्रेंच कंपनी डसॉल्ट एविएशन से 36 लड़ाकू जहाज खरीदने के लिए सौदा किया था। रंजन गोगोई के नेतृत्व में तीन जजों की बेंच ने भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच हुए समझौते से रिलेटेड चार याचिकाएं सुनीं. विपक्ष का आरोप था कि सरकार ने इन जहाजों की कीमत जानबूझकर इतनी बढ़ाई कि जिससे इस सौदे से जो लोग जुड़े हैं, उनके बेवजह का फायदा मिल सके. इस मामले में गोगोई ने ट्रांसपेरेंसी की हर थ्योरी सुप्रीम कोर्ट के गेट नंबर दो पर लगे कूड़ेदान में फेंक दी और इन जहाजों के दाम से रिलेटेड सारी जानकारी एक सीलबंद लिफाफे में मंगा ली। इसके बाद उन्होंने एयरफोर्स के अफसरों के साथ एक अनौपचारिक मीटिंग की और फिर सारी याचिकाएं खारिज कर दीं. इनकी अंधेरगर्दी तो ये कि इन्होंने राफेल से जुड़े अंतिम फैसले में सीएजी की एक रिपोर्ट का हवाला दिया। कैग की ऐसी रिपोर्ट, जो न तो उस वक्त तक संसद में पेश की गई थी और न ही पब्लिकली अवेलबल थी. एक तरह से वह फर्जी रिपोर्ट थी। गोगोई ने अपने फैसले में कहा कि हमारे सामने जो चुनौती है उसकी छानबीन हमें राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में करनी होगी क्योंकि इन जहाजों को हासिल करने का मामला देश की संप्रभुता की नजर से बेहद इम्पॉर्टेंट है. पूरी दुनिया राफेल का रेट जानती है, बस गोगोई साहब नरेंद्र मोदी की ही तरह यही चाहते थे कि बस भारत के लोग इसका रेट ना जानें।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूसरे नंबर पर है कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का मामला&lt;/p&gt;&lt;p&gt;5 अगस्त, 2019 को गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में घोषणा की कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म किया जाता है. इसके बाद समूचे कश्मीर की जनता को अनिश्चित काल के लिए लॉकडाऊन में डाल दिया, इंटरनेट बंद कर दिया और हर तरफ बड़ी बड़ी बंदूकें लेकर जवान लगा दिए। फिर पूरे राज्य भर में गिरफ्तारियां की गईं, लोगों को नजरबंदी में रखकर उनकी जो यातना शुरू हुई, वो अभी तक जारी है। इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट में दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर हुईं. दोनों याचिकाओं पर गोगोई की ही बेंच ने सुनवाई की और अगर कहें कि कुछ भी नहीं सुना तो कोई मायूब बात नहीं होगी। एक याचिका तो उन्होंने दायर होने के बाद 18 दिनों तक सुनवाई के लिए लिस्ट ही नहीं की. जब लिस्ट में डाला, तो भी गोगोई ने केंद्र को न तो कोई नोटिस भेजा और न यह जानने की कोशिश की कि लोग गैरकानूनी ढंग से हिरासत में रखे गए हैं या नहीं. उलटे उन्होंने याचिकाकर्ताओं को कहा कि वे बंदियों से कश्मीर में जाकर मिलें. और वापस लौटने पर वे अपनी वहां की यात्रा के बारे में एक हलफनामा यहां जमा करें.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्तिजा मुफ्ती ने जब सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि वह उन्हें अपनी मां से मिलने की इजाजत दे, जिन्हें अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से ही हिरासत में रखा गया है. तो गोगोई बोला कि अगर वहां के स्थानीय सरकारी अधिकारी मानेंगे, तभी वे अपनी मां से मिल सकती हैं। अदालत में ही गोगोई ने इल्तिजा मुफ्ती से पूछा कि तुम श्रीनगर में घूमना क्यों चाहती हो? आजकल तो वहां बहुत ठंड है. इस बात पर तो गोगोई साहब, एक गंदी सी गाली मेरी तरफ से स्वीकार करें, जो मैं नहीं बक रहा हूं और इस अपराध में मैं जेल जाने के लिए तैयार हूं। शर्म तो आपको नहीं आती, मगर हमें आती है कि हमें ऐसा जज मिला, जो बच्चे को मां से ना मिलने दे। इतना अमानवीय? खैर, इसी तरह की गंदगी उन्होंने इंटरनेट पर रोक की याचिका पर भी फैलाई. कश्मीर टाइम्स अखबार की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने एक याचिका दाखिल की जिसमें राज्य में खबरों पर लगाई गई पाबंदी को चुनौती दी गई थी. याचिका दायर किए जाने के पांच महीने बाद गोगोई ने फैसला तो दिया, मगर इंटरनेट पर लगी रोक नहीं हटाई। ऐसे ही कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद को इस शर्त पर श्रीनगर जाने दिया कि वो अपनी यात्रा में न तो किसी राजनीतिक रैली में जाएंगे और न कोई पॉलिटिकल एक्टिविटी करेंगे. जम्मू कश्मीर में नाबालिगों को हिरासत में रखने को चुनौती देने से वाली याचिका में भी गोगोई ने खूब टाल-मटोल की. बाद में गोगोई ने जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को कहा कि वह एक रिपोर्ट भेजें कि क्यों उनकी अदालत तक पहुंचना मुश्किल है. इसके बाद उन्होंने अवैध रूप से जेल में बंद अपने बच्चे को तलाशते याचिकाकर्ता को धमकाया कि अगर जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट से यह संकेत मिलता है कि आपने जो कहा वह गलत है तो इसके नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहिए.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तीसरा है बाबरी मस्जिद राम मंदिर मामला&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/pH6VhYTXXR4&quot; width=&quot;320&quot; youtube-src-id=&quot;pH6VhYTXXR4&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अयोध्या में बाबरी मस्जिद वर्सेस राम मंदिर विवाद में गोगोई साहब ने तो शायद कायदे कानून की हर किताब फाड़कर सुप्रीम कोर्ट के पास ही मौजूद हैदराबाद हाउस में ले जाकर जला दी। इस महाविचित्र फैसले में गोगोई साहब ने बताया कि राम की मूर्तियों को अवैध ढंग से विवादित स्थल में रखा गया और बाबरी मस्जिद का ध्वस्त किया जाना भी अवैध था. मुस्लिमों के खिलाफ किए गए इन अवैध कृत्यों को मानने के बावजूद कोर्ट ने यह आदेश दिया कि भले वहां मस्जिद रही हो, मगर अब राम मंदिर बनेगा। और हरजाने के तौर पर सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को अयोध्या में किसी अन्य स्थान पर पांच एकड़ जमीन दी जाए. इस पर टूजी मामले में फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के रिटार्यड जस्टिस अशोक कुमार गांगुली ने कहा कि अल्पसंख्यकों की पीढ़ियों ने वहां मस्जिद देखी. उसे तोड़ा गया. उन्होंने पूछा कि कैसे इस फैसले में कहा गया कि अगर किसी जगह नमाज पढ़ी जाती है तो किसी उपासक का इस विश्वास को खारिज नहीं किया जा सकता कि वह जगह मस्जिद है. चलो 1856-57 में वहां नमाज नहीं पढ़ी जा रही थी, पर 1949 में तो पक्का पढ़ी जा रही थी. इसका सबूत भी है. तो जब हमारा संविधान लागू हुआ, उस वक्त वहां नमाज पढ़ी जा रही थी. अगर किसी जगह नमाज पढ़ी जाती है और उस जगह को मस्जिद माना जाता है। ऐसे में यह फैसला संविधान को तोड़ देता है। इंडिया टुडे की ना सही, किसी कॉन्क्लेव में गोगोई साहब क्या कभी बताएंगे कि संविधान को तोड़ने का अधिकार वो कहां से लेकर आए?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;और अगला, यानी कि चौथा है पोस्टिंग प्रमोशन का मामला&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब गोगोई चीफ जस्टिस थे, तब उनकी निगरानी में ढेरों कंट्रोवर्सियल पोस्टिंग्स हुईं. पहले सौमित्र सैकिया को गौहाटी हाईकोर्ट में एडिशनल जज बनाया, जो किसी जमाने में गोगोई के जूनियर थे. इसी तरह जज सूर्यकांत की नियुक्ति की गई, जिनके बारे में हमने पहले भी बताया था कि अब सुप्रीम कोर्ट में प्रॉपर्टी डीलर जज आ रहे हैं। जस्टिस सूर्यकांत पर भ्रष्टाचार और टैक्स चोरी के भी आरोप थे. ऐसे ही संजीव खन्ना की नियुक्ति की गई और यह नियुक्ति करते वक्त कोलेजियम की उस रिकमेंडेशन की अनदेखी की गई जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट में खन्ना के सीनियर प्रदीप नंदराजोग को प्रमोट करने बात कही गई थी. इसी तरह दिनेश माहेश्वरी को सुप्रीम कोर्ट में एंट्री मिली, जबकि उन पर आरोप थे कि वे कार्यपालिका के प्रभाव में काम करते हैं. गोगोई पर अपने बचपन के दोस्त और कलीग अमिताभ राय की पोस्टिंग में देर लगाने का भी आरोप है. जिससे दोनों की पदोन्नतियां एक साथ न हो सकें.&amp;nbsp; 2000 में दोनों के नामों की सिफारिश साथ-साथ हुई. 2001 में गोगोई&amp;nbsp; जज बन गए और अमिताभ राय इसके 17 महीनों बाद जज बने. अगर फाइलें साथ-साथ चली होतीं, तो कुल मिला कर अमिताभ राय गोगोई से सीनियर हो जाते और तब शायद अमिताभ राय भारत के चीफ जस्टिस के पद से और गोगोई गौहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पद से रिटायर होते. कहते हैं कि तत्कालीन कानून मंत्री अरुण जेटली और गोगोई&amp;nbsp; बड़े अच्छे दोस्त थे और जेटली ने ही गोगोई को कहा था कि अमिताभ राय कभी भी गोगोई से सीनियर नहीं होंगे. अपने बचपन के मित्र के साथ ऐसा सुलूक करने वाला किस तरह का व्यक्ति हो सकता है, आप सभी ज्यादा अच्छे से समझ सकते हैं।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;iframe allowfullscreen=&quot;&quot; class=&quot;BLOG_video_class&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://www.youtube.com/embed/pH6VhYTXXR4&quot; width=&quot;320&quot; youtube-src-id=&quot;pH6VhYTXXR4&quot;&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;और आखिरी यानी पांचवा है सीएए / एनआरसी का मामला&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;अगर पूछें कि गोगोई ने मोदी शाह की जोड़ी को ऐसा कौन सा तोहफा दिया, जो राम मंदिर मुद्दे से कहीं ज्यादा बड़ा है तो उसका सिर्फ और सिर्फ एक ही जवाब है, नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस यानी एनआरसी। राम मंदिर के बाद बीजेपी इसी में अपना राजनीतिक भविष्य देख रही है। अक्टूबर 2013 से अक्टूबर 2019 तक गोगोई ने एनआरसी के कई मामलों की सुनवाई की. उनके जरिए उन्होंने एक खाका तैयार किया जिससे राज्य में विदेशियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जा सके. इसके लिए उन्होंने जो तरीका सुझाया वह इतना भयानक था कि जिसमें गड़बड़ी होनी तय थी और इसकी वजह से लाखों भारतीयों की नागरिकता जाने का खतरा था. सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने राज्य के डिटेंशन सेंटर्स की अमानवीय हालत के खिलाफ एक याचिका लगाई, पर गोगोई के चलते नतीजा सिफर रहा। फिर हर्ष मंदर ने कहा कि गोगोई को इस मामले की सुनवाई से अलग किया जाए। इसकी वजह उन्होंने बताई कि सुनवाई के दौरान गोगोई का व्यवहार पूरी तरह से पूर्वाग्रह ग्रस्त है. हर्ष मंदर की यह याचिका भी खारिज कर दी गई. मोदी सरकार ने कुछ आदेश पारित किए, जिसमें भारत में प्रवेश के लिए जो नियम तैयार किए गए उसमें धार्मिक भेदभाव को भी जोड़ दिया गया.&amp;nbsp; नागरिकता संशोधन कानून पारित किया, जिसमें इस बात का प्रावधान है कि गैर मुस्लिम समुदायों के अधिकांश लोगों के लिए अब नागरिकता लेना आसान हो जाएगा. गोगोई के ही चलते सीएए और देशव्यापी एनआरसी का खतरा भारत के लगभग बीस करोड़ मुसलमानों सहित 50 करोड़ से अधिक एससी, एसटी ओबीसी और आदिवासियों की नागरिकता पर मंडराने लगा है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/1949156263240983210/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/1949156263240983210' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1949156263240983210'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1949156263240983210'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2021/02/blog-post.html' title='रंजन गोगोई : पाप इतने कि सदियां भुगतेंगी '/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://img.youtube.com/vi/pH6VhYTXXR4/default.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-6456083262796080999</id><published>2021-01-24T09:01:00.002-06:00</published><updated>2021-01-24T09:48:26.250-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जि‍नमें हूं मैं"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="थोडा रूमानी  हो जाये"/><title type='text'>एक सुबह जब शाम हुई</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgDHS39nrEFT1fQq46o1zkwdw-PbjtZLyqyX1oKMXxfdtoq_H-4isR44YriOlxLGWH7IDHHYi3pyU5UfyBhdnNjUj346Lqfp8nfMJ985kxvNOWtaiQsUYHya0WgXCaicCsTSopTxrw5HF4w/s1600/koh.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;900&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgDHS39nrEFT1fQq46o1zkwdw-PbjtZLyqyX1oKMXxfdtoq_H-4isR44YriOlxLGWH7IDHHYi3pyU5UfyBhdnNjUj346Lqfp8nfMJ985kxvNOWtaiQsUYHya0WgXCaicCsTSopTxrw5HF4w/s320/koh.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;दिन निकला। दिन क्या निकला, उसके निकलने से पहले शाम निकली। तड़के से मैं करवटें बदल रहा था कि दिन निकले, उजाला हो तो मैं बिस्तर से निकलूं। काफी देर तक जब दिन की कोई आहट नहीं मिली तो मैंने कंबल फेंका। सर्दी अचानक बढ़ चुकी थी। ठीक वैसी ही, जैसे कि जाती जनवरी की शामें अचानक से गहरी और ठंडी होने लगती हैं। एक पल को मुझे लगा कि कहीं मैं दोपहर के खाने के बाद तो नहीं सोया था। मगर देह पर मौजूद सोने वाले कपड़ों ने मुझे टहोका, कि नहीं, ये सुबह ही है और ये वही सुबह है, जिसका मैं पिछले दो तीन घंटों से इंतजार कर रहा था। ये वही सुबह है, जिसके लिए मैंने अपना वह सपना तोड़ दिया था, जिसमें मैं उड़ीसा के कोर्णाक मंदिर के गलियारे में लड़की से औरत बनने को उतारू किसी लड़की के साथ घूम रहा था। सपने में मंदिर था, मंदिर के पत्थर थे, बुर्ज थे, हवा के अलसाए झोंके थे और सबसे बड़ी बात तो ये कि सपने में गरमी थी। मेरे उस्ताद शम्सुर्रहमान फारुकी साहब एक जगह पर लिखते हैं कि हम हिंदुस्तानियों के लिए गर्मी से ज्यादा सर्दी तकलीफदेह है और ये लिखने से पहले पता नहीं जमानत में या यूं ही वे कैफी आजमी साहब का एक मिसरा नज्र करते हैं-&amp;nbsp;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सो सपना था, सपने में गर्म हवा भी थी जो शायद इस डर से सपने में डोल रही थी कि बाहर बहुत सर्दी है और सर्दी के डर से हमारे हिंदुस्तान में आज का दिन रोज के दिन की तरह निकलने से इन्कार कर रहा है। आज हिंदुस्तान में आने के लिए उसे कल की शाम का भी साथ चाहिए, भले कल की शाम से ही उसके डर की वजह शुरू हुई हो। मैं सोचने लगा, जीवन में मैंने भी ऐसे लोगों का साथ खूब जोड़ा है, जो मेरा नुकसान करते रहे, जिनसे कहीं न कहीं मैं डरता रहा, फिर भी शायद किसी बड़े डर की वजह से मैंने नुकसान का साथ नहीं छोड़ा और शायद यही वजह है कि आज मैं घाटे में हूं। लोगों को लगता है कि ये बहुत नफा मार रहा है, लेकिन नफा मुझे उस जूते की तरह लगता रहा है, जो मुझे देखने में तो बहुत अच्छा लगता है, मगर उसे बर्दाश्त करने की काबलियत अपने पास न होने की वजह से मैं उसे देखकर ही संतोष कर लेता रहा हूं। तो क्या यह मेरा संतोष है जो मेरे नुकसान की वजह है? हिंदुओं के धर्मग्रंथों में तो बहुत कहा गया है कि संतोष ही परमधन है, तो क्या मेरा सारा नुकसान मेरे इस परमधन की वजह से हुआ? क्या मुझे संतोष नहीं करना चाहिए? मगर मैं संतोषी कब था? दुनिया की कोई भी चीज मेरे अंदर यह परमधन नहीं भर पाई, और शायद नहीं ही भर पाएगी। मैं संतोषी नहीं हूं। संतोष ने मुझे इतना दिक्क किया कि आखिरकार मैंने कंबल दूर फेंक दिया और उससे चार गज और दूर मैंने संतोष को फेंका। इसलिए भी फेंका कि पिछले दिन भर और आधी रात तक की मेहनत के बाद मैं नींद से संतुष्ट नहीं था। मैं सुबह से भी संतुष्ट नहीं था, जो इतनी मेहनत, इतने इंतजार के बाद आई, मगर शाम से हाथ मिलाकर आई। सुबह ऐसे भी कहीं आती है? भुनभुनाते हुए मैंने बिस्तर छोड़ा, कि आज मैं इस सुबह को नहीं छोड़ूंगा। इसी की खातिर मैंने सपने में बहती गर्म हवा छोड़ी, खुला आंगन छोड़ा, और सबसे बड़ी बात जो रही, वह बताने की नहीं है, कोई कहेगा, तो भी नहीं बताउंगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुबह मैंने बिस्तर छोड़ा। रात के छोड़े हुए कपड़े कैसे-कैसे करके अपने बदन पर डाले और कमरे से बाहर आया। बाहर शाम होने को थी। बल्कि ये दिन ऐसा दिन था कि दिन निकलने के साथ ही शाम अपने होने की जिद लिए गठरी बनी बैठी थी। शाम को सर्दी बहुत लग रही थी, लेकिन किसी भी मौसम, या किसी भी दिन या किसी भी चीज से ज्यादा बड़ी चीज जिद होती है। शाम सुबह से ही अपनी जिद पर थी। एकबारगी मैंने सोचा कि आज मैं दिन से हार मान लूं क्या? फिर मैंने सोचा कि हर किसी से हारने के बाद अगर मैं दिन से भी हार गया, तो फिर अगले दिन में जाना और फिर उसके भी अगले दिन में जाना मुसीबत हो जाएगा। दिन अपना दरवाजा एक बार किसी के लिए बंद कर लेता है तो जल्दी खुलना मुश्किल हो जाता है। कई लोग तो पूरी उम्र खुद को रात का राही कहते रहे हैं। कई लोग आज तक अवध की शाम से नहीं निकल पाए, उनके जीवन में सुबह हुई ही नहीं। फिर शाम से मेरी उतनी दोस्ती भी नहीं रही, क्योंकि मेरे पेशे सहाफत की कुछ ऐसी मजबूरियां हैं कि हम लोग जब इस पेशे में आते हैं तो अपनी हर शाम मुल्तवी करके आते हैं। जब दुनिया शाम की रंगीनियत से दो चार हुई रहती है, हम लोग दुनिया से उड़ते रंगों की रपट लिखने में मगशूल होते हैं। क्या करें, पेशा ही ऐसा है। दुनिया जब रंग बिगाड़ती है, बदलती है तो हम दुनिया भर को बताने की तैयारी में लगते हैं कि रंग बिगड़ चुका है- बदल चुका है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब भी मैं शाम देखता हूं, एक बार यह जरूर सोचता हूं कि किसी और पेशे में होता तो कम से कम शाम देख लेता। जब तक मैं इस पेशे में नहीं था, या कि यूं कहें कि जब मैं कहीं भी नहीं था तो अपने बारा पत्थर के मैदान शाम का आसमान देख रहा होता था। पहले पीला, फिर नारंगी और फिर लाल होते हुए सबकुछ गाढ़े नीले में तब्दील होते देखता। मैं चित्रकार नहीं हूं और तब भी इसके बारे में नहीं सोचा, जब इतने सारे रंग मेरे सामने खेल रहे होते। बल्कि कभी कभी मुझे खुद से चिढ़ होती है कि मैंने इतने सुंदर सुंदर रंग देखे हैं, फिर भी जब बात रंग चुनने की हो तो मैं हमेशा कोई न कोई वाहियात रंग चुनता हूं। मेरे जीवन की सारी चित्रकारी सिर्फ इसी वजह से धरी रह गई, क्योंकि मुझे रंग देखने तो आते हैं, मगर चुनने नहीं आते। मेरे घर के सामने एक नीम का पेड़ है, जिसे मैं बचपन से देखता आ रहा हूं। मगर क्या मजाल कि मैं कभी भी उसके लिए एकदम सही सब्ज चुन पाऊं। फिर भी मैं रोज शाम का इंतजार किया करता, और अपने आप से शर्त लगाता कि आज वाला लाल कल वाले लाल से ज्यादा लाल होगा। बहुत बाद में जब मैंने पहाड़ देखे, वहां की शाम देखी तो नोट किया कि जितनी लाल, जितनी नर्म और जितनी रोमानी हमारे मैदानों की शाम होती है, उतनी पहाड़ों की शाम नहीं होती। बल्कि अगर कोई मुझे इसके लिए सजा न दे तो मैं ये भी कहूंगा कि पहाड़ों की शाम बेहद खुरदुरी और जकड़न से भरी होती है, जिसमें एक रंग डर का भी होता है। डर यह कि बाहर निकले तो जाने कौन खा जाए, जाने कहां से पैर फिसल जाए या जाने कौन सा कीड़ा-मकोड़ा काट ले। मैदानों की शाम बेखौफ होती है और शायद यही वजह है कि उसमें लाल, पीले और नीले के जितने शेड्स होते हैं, उतने मुझे कहीं भी देखने को नहीं मिले। कुछ लोग समुद्र का जिक्र कर सकते हैं, लेकिन समुद्र भी मैदान में ही होते हैं, पहाड़ों में नहीं होते। रंगों को फैलने के लिए बहुत ढेर सारी जगह चाहिए होती है, जिनमें धरती की सिकुड़न बेवजह शोर मचाती है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मगर मैं यह क्या सोच रहा हूं? मैं यह क्या कह रहा हूं और आखिर क्यों कह रहा हूं? मैं तो सुबह के इंतजार में था और भले ही शाम के साथ हुई, मगर सुबह तो हुई ही। फिर मुझे किस चीज से इतनी शिकायत है? और फिर शिकायतों का बंडल तो शाम तले खुलता है, अभी तो सुबह हुई है? सुबह से कैसी शिकायत? वह तो नया दिन लेकर आई है। नया दिन, जिसमें वह सब कुछ होगा, जो उस दिन से पहले कभी नहीं हुआ। नया दिन, जिसमें उस दिन से पहले वह सारी चीजें सामने आएंगी, जो पिछले हजारों हजार दिनों से सामने आने से रह गई हैं। मुझे नए का स्वागत करना चाहिए, मगर मैं खीझ रहा हूं। मुझे सुबह का स्वागत करना चाहिए, मगर मैं उससे मुंह फेरकर बैठा हूं। अगर किसी सुबह दिन शाम के साथ आ जाएगा तो क्या मुझे बर्दाश्त नहीं होगा? आखिर मोहल्ले की सारी लड़कियों की शादी हुई, मैंने बर्दाश्त की और आज भी मोहल्ले में वापस जाना नहीं छोड़ा। ना चाहते हुए भी कानून की मोटी मोटी और नीरस किताबें मैं बर्दाश्त करता रहा हूं। बेमन से ही सही, मगर आंकड़ों की फेहरिस्त को घंटों बर्दाश्त करता हूं, फिर एक अदद सुबह मुझसे बर्दाश्त क्यों नहीं हो रही है?&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;.... नहीं पता कि जारी या खत्म।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक सुबह जब शाम हुई&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नींद तो यूं ही तमाम हुई&lt;/p&gt;&lt;p&gt;काम न कोई हो पाया&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाक लाल औ जाम हुई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;और ये मिसरे कैफी साहब के नहीं हैं, बल्कि ये मिसरे किसी के भी नहीं हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/6456083262796080999/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/6456083262796080999' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/6456083262796080999'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/6456083262796080999'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2021/01/blog-post.html' title='एक सुबह जब शाम हुई'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgDHS39nrEFT1fQq46o1zkwdw-PbjtZLyqyX1oKMXxfdtoq_H-4isR44YriOlxLGWH7IDHHYi3pyU5UfyBhdnNjUj346Lqfp8nfMJ985kxvNOWtaiQsUYHya0WgXCaicCsTSopTxrw5HF4w/s72-c/koh.jpg" 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बात तनिक पुरानी है। सितंबर सन 1973 की। साउथ अमेरिकी देश चिली में अमेरिका ने सेना के एक गुट से विद्रोह करा दिया। इनका इरादा तख्तापलट करके सत्ता हथियाने का था। उस वक्त चिली में लोक कल्याणकारी जनवादी सरकार बनी थी। इस सरकार में चिली की तकरीबन आधा दर्जन कम्यूनिस्ट पार्टियां शामिल थीं। चिली में एक अरसे से ठीक वैसे ही लोगों का शासन था, जैसा कि हम भारत में कांग्रेस, बीजेपी और बिना कोई विचारधारा वाली क्षेत्रीय पार्टियों के शासन में देखते हैं। लब्बोलुआब यह कि बस लूटो खाओ और कोई बोले तो मोदी और शाह बन जाओ। इन लोगों को जनवादियों का शासन बर्दाश्त नहीं हो रहा था। एक वजह यह भी थी कि राष्ट्रपति सल्वादोर अलांदे की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही थी।&lt;br /&gt;
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उधर सेना और तथाकथित डेमोक्रेट्स की नेतागिरी सेना का ही एक अफसर आगस्तो पिनोचेट कर रहा था। उसने सल्वादोर की रातों-रात हत्या करा दी। इसके लिए उसे अमेरिका ने पैसा दिया था। तब रिचर्ड निक्सन अमेरिका के राष्ट्रपति थे। जानकार बताते हैं कि जब सागा को मारा जा रहा था तो उस कमरे में आगस्तो भी मौजूद था। उसी रात चिली भर में हजारों लोगों को जेल में ठूंस दिया गया, दर्जनों लोगों को गोली मार दी गई, जिनमें चिली एयरफोर्स के ब्रिगेडियर अल्बर्तो आतुरो मिगुएल बैचले, उनकी आर्कियोलॉजिस्ट पत्नी एंजेला जेरिया गोम्ज और बेटी मिशेल बैचले भी थी। ब्रिगेडियर ने पिनोचेट के शासन का विरोध किया था। ऐवज में पिनोचेट ने ब्रिगेडियर अल्बर्तो बैचले को तब तक यातना दी, जब तक की उनकी मौत नहीं हो गई। यातना का यह दौर कई महीनों तक चला।&lt;br /&gt;
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&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBoCtzvh8CH0XwKOMbeBV6hB9RJNwvbyySqFlTJmnr_v-x5YEihzzE-kun4bw1UnL1h_dGGCrts0JB_wKffGFvPRrUE2kLx44mzaF4pYKH1BAEiD2g2ExNE7INIbztb0_iXUbsqGtEsqs4/s1600/unnamed.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;400&quot; data-original-width=&quot;400&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBoCtzvh8CH0XwKOMbeBV6hB9RJNwvbyySqFlTJmnr_v-x5YEihzzE-kun4bw1UnL1h_dGGCrts0JB_wKffGFvPRrUE2kLx44mzaF4pYKH1BAEiD2g2ExNE7INIbztb0_iXUbsqGtEsqs4/s320/unnamed.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
ब्रिगेडियर की बेटी मिशेल ने मुल्क में तानाशाही को हम भारतीयों से भी अधिक नजदीक से देखा। पिनोचेट ने चिली के 29वें राष्ट्रपति/तानाशाह के रूप में कुर्सी हथियाई और उसके बाद वहां की सरकारी संस्थाएं बेच दीं, बैंक बेच दिए, बाजार बेच दिए, व्यापारी बेच दिया, मतलब, जो कुछ भी उसके दिमाग में आया, सब बेच दिया और जो उसके दिमाग में अमेरिका ने भरा, वह भी बेच दिया। पिनोचेट की यह बेखौफ बिकवाली लगातार सत्रह साल तक चलती रही, शुक्र मनाइये कि अभी बीजेपी वालों को छह साल ही हुए हैं। पिनोचेट ने एक कमेटी बनाई और उससे चिली का संविधान पूरा बदलवा दिया। सन 85 आते-आते चिली में वही हाल हो गया, जैसा कि अभी नोटबंदी के बाद शुरू हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिनोचेट चिली पर सन 90 तक शासन करता रहा। जब रिटायर हुआ तो सेनाध्यक्ष बन बैठा और जनता पर वैसा ही अत्याचार कराता रहा, जैसा इन दिनों मोदी जी की तरह तरह की सेनाएं कर रही हैं, बल्कि इससे भी बुरा। सन 98 तक वो जबरदस्ती सेनाध्यक्ष बना रहा और जब रिटायर हुआ तो बिना चुनाव लड़े अपने आप सांसद बन बैठा। वैसे वह मरने तक संसद का सदस्य बना रहे, इसके लिए उसने तरकीब की हुई थी। जब वह संविधान बदलवा रहा था, तभी उसने अपने लिए संसद का सदस्य बने रहने की बात उसमें डलवा ली थी। मतलब जब तक इसने जिंदा रहना था, तब तक जुल्म करते रहना था, इसकी इसने पूरी व्यवस्था करा ली थी। मोदी जी चाहें तो पिनोचेट से भी सीख ले सकते हैं, आखिर डोलांड ट्रंप उनको भी बहुत-बहुत मानते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सांसद बनने के बाद एक बार पिनोचेट लंदन गया इलाज कराने। वहां पर उसे मानवाधिकारों के उल्लंघन के सैकड़ों मामलों के आरोप में इंटरपोल ने गिरफ्तार कर लिया। दो साल तक तो पिनोचेट वहां बंद रहा। सन 2000 में सेहत खराब होने का बहाना बनाकर वह वापस चिली लौटा। चार साल तक चिली में ही रहा, कहीं बाहर नहीं निकला। चार साल बाद चिली के ही एक जज जॉन गज्मॅन तापिया ने फैसला दिया कि पिनोचेट की हेल्थ टनाटन है, इन पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इस फैसले के दो साल बाद यानी 2006 में पिनोचेट मर गया। जब वह मरा, उसके ऊपर तीन सौ क्रिमिनल चार्जेस पेंडिंग थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बहरहाल, एक बार फिर से लौटते हैं मिशेल बैचले पर। ब्रिगेडियर की बेटी चिली की पहली चुनी हुई समाजवादी राष्ट्रपति बनी, और बेहद लोकप्रिय भी। 2006 में एक बार तो 2014 में एक बार। मिशेल चिली की पहली महिला राष्ट्रपति भी हैं। और ब्रिगेडियर की इस बेटी की चिली में लोकप्रियता की सिर्फ और सिर्फ एक ही वजह है- मानवाधिकारों के प्रति उनका डेवोशन। जब वे चिली की राष्ट्रपति नहीं होती हैं तो दुनिया भर में घूम-घूमकर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करती हैं। राष्ट्रपति बनने से पहले भी वे मानवाधिकारों के लिए काम करती थीं, अब तो खैर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की हाई कमिश्नर हैं ही।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्हीं मिशेल ने ही सुप्रीम कोर्ट में नागरिकता संशोधन अधिनियम के लिए याचिका दाखिल की है। भारत को और सुप्रीम कोर्ट को इनका आभारी होना चाहिए कि मिशेल ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में याचिका दाखिल की है। वरना मिशेल चाहें तो जेनेवा से ही मोदी जी, शाह जी और इनकी सेना के खिलाफ इतने वारंट तो जारी कर ही सकती हैं, जितने अभी दिल्ली में लोग मर गए। और यकीन मानिए, ये सारे वारंट उन सारे देशों में तामील होंगे, जिन्होंने यूएन ह्यूमन राइट कमीशन के चार्टर पर साइन किए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो हे विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मिस्टर रवीश कुमार, जिस तरह का आपका बयान है कि संसद भारत में कुछ भी कर सकती है तो भारत के बाहर रहने वाले लोग भी यही कुछ भी भारत के तानाशाहों के साथ भी कर सकते हैं। और बोबडे साहब, आप तो अंतराष्ट्रीय कानूनों के प्रकांड पंडित हैं, आप तो साफ साफ जानते हैं कि मिशेल ने सीन में एंट्री ले ली है तो अब मामला कहां तक पहुंच चुका है। क्या इससे बड़ी कोई और बेइज्जती हमारे लिए होगी कि पीएम और होम मिनिस्टर के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के वारंट इश्यू हो जाएं?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/1681799116266001280/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/1681799116266001280' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1681799116266001280'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/1681799116266001280'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2020/03/blog-post_3.html' title='मिशेल बैचले : शुक्र मनाइये कि वे खुद सुप्रीम कोर्ट आई हैं'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjBoCtzvh8CH0XwKOMbeBV6hB9RJNwvbyySqFlTJmnr_v-x5YEihzzE-kun4bw1UnL1h_dGGCrts0JB_wKffGFvPRrUE2kLx44mzaF4pYKH1BAEiD2g2ExNE7INIbztb0_iXUbsqGtEsqs4/s72-c/unnamed.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7278137563363677271.post-4293230983724087142</id><published>2020-03-01T08:23:00.001-06:00</published><updated>2020-03-01T08:23:25.618-06:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अब मैं मरती हूँ"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कबिताई"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस बजार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुद्दों का बजार"/><title type='text'>कौन मरा है? किसका बेटा?</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
कौन मरा है&lt;br /&gt;
किसका बेटा&lt;br /&gt;
अभी यहीं था&lt;br /&gt;
पलंग पे लेटा&lt;br /&gt;
किसने थी&lt;br /&gt;
आवाज लगाई&lt;br /&gt;
किसने शामत&lt;br /&gt;
नियति बनाई&lt;br /&gt;
किसने मारा&lt;br /&gt;
पहला पत्थर&lt;br /&gt;
किसने ली&lt;br /&gt;
पहली अंगड़ाई&lt;br /&gt;
जांच करो भाई&lt;br /&gt;
जांच करो&lt;br /&gt;
किसने पहले&lt;br /&gt;
आग लगाई&lt;br /&gt;
मगर सुनो तो&lt;br /&gt;
हमको दे दो&lt;br /&gt;
बेटे की जो&lt;br /&gt;
लाश है आई&lt;br /&gt;
दे दो दे दो&lt;br /&gt;
जहां छुपाई&lt;br /&gt;
रोक के रखी&lt;br /&gt;
हमने रुलाई&lt;br /&gt;
रोना है अब&lt;br /&gt;
खून पर अपने&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
सब जून पर अपने&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
पी पीकर पानी&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
जो छंटी जवानी&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
क्यों ईंट उठाई&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
अब लाश जलाई&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
पहले नहीं सोचा&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
लो भीगा अंगोछा&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
कि तब क्यों बोले&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
कि आ अब रो लें&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
हर इक नारों पर&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
दंगों के मारों पर&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
क्यों आग लगाई&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
क्यों बुझ ना पाई&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
ये फेर जो आया&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
सब घेर के आया&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
अब उन आवाजों पर&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
टूटे साजों पर&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
सब रूठ चुका है&lt;br /&gt;
रोना है&lt;br /&gt;
सब टूट चुका है&lt;br /&gt;
होता सलामत&lt;br /&gt;
बच्चा अपना&lt;br /&gt;
पूरा करता&lt;br /&gt;
अपना सपना&lt;br /&gt;
मार पीट&lt;br /&gt;
दंगा फसाद में&lt;br /&gt;
बच्चा मरा&lt;br /&gt;
और मर गया सपना।&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
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&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bajaar.blogspot.com/feeds/4293230983724087142/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment/fullpage/post/7278137563363677271/4293230983724087142' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/4293230983724087142'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7278137563363677271/posts/default/4293230983724087142'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bajaar.blogspot.com/2020/03/blog-post.html' title='कौन मरा है? किसका बेटा?'/><author><name>Unknown</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiMNASnRK1Oeihkmq9sjupItYeIFbav9zW-Tc_m3GzLTk3uGTeOVe5MJHaXUwRLbkmfR4h96caoQmkYf3R0I94XRYPvZ9SB8YzH23tXGxN24MoMScfAb05w41I_lNcNMqfTDTU_OGrxtwdg/s72-c/87529547_256482382010767_1314627650366472192_o.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry></feed>