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Hegde</category><category>Mangalore</category><category>Film</category><category>Pub</category><category>CPM</category><category>chidambaram</category><category>Commonwealth</category><category>PDP</category><category>Amitabh</category><category>RSS</category><category>भारत</category><category>Karnataka</category><category>Indira Gandhi</category><category>Rahul Gandhi</category><category>police reforms</category><category>Sri Lanka</category><category>Career</category><category>History</category><category>Sonia Gandhi</category><category>Mayawati</category><category>Arjun</category><category>Police</category><category>फिल्म</category><category>Saffron</category><category>Budget</category><category>Valentine</category><category>Muthalik</category><category>Lalu</category><category>Khali</category><category>Shivraj Patil</category><category>Khilafat</category><category>Taliban</category><category>Amarnath Shrine Board</category><category>Protest</category><category>Elections</category><category>CBI</category><category>Hindi</category><category>Assam</category><category>Naxalites</category><category>Left</category><category>UP</category><category>Justice</category><category>OBC</category><category>Reporters</category><category>POTA</category><category>Emergency</category><category>Muslims</category><category>Stone Pelters</category><category>Hindutva</category><category>Manmohan Singh</category><category>Naxals</category><category>Pakistan</category><category>Bhopal</category><category>Corruption</category><category>Sanjeev Bhatt</category><category>Secularism</category><category>English</category><category>Narendra Modi</category><category>Godhra</category><category>ठाकरे</category><category>Prachand</category><category>America</category><category>Christian</category><category>Bangladeshi</category><category>जोधाबाई</category><category>Congress</category><category>Gandhi</category><category>Nandigram</category><category>Bodo</category><category>Gujarat</category><category>Ramdev</category><category>Yeddyurappa</category><category>Language</category><category>Varun Ghandi</category><category>Balkrishna</category><category>Food</category><category>Bharat</category><category>Advani</category><category>Binayak Sen</category><category>Agnivesh</category><category>Obama</category><category>Lokpal</category><category>Dalit</category><category>Afzal</category><category>Mushirul</category><category>India</category><category>Islam</category><category>Bukhari</category><category>MP's Salary</category><category>BJP</category><category>Maoist</category><category>बिहारी</category><category>Pranab Mukherjee</category><category>Terrorists</category><category>Poor</category><category>Nuclear Deal</category><category>Nepal</category><category>Poverty</category><category>Terror</category><category>India Inc.</category><category>Modi</category><category>Bhootnath</category><category>Politcs</category><category>Sarabjeet</category><category>Parliament</category><category>Commom Man</category><category>Anna</category><category>LTTE</category><category>US</category><category>तिब्बत</category><category>Kashmir</category><category>Communists</category><category>Mother's Day</category><title>भदेस भारत</title><description>भाषा में साहित्य का लालित्य भले न हो, ईमानदारी का भदेसपन ज़रूर होना चाहिए....</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>100</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/rss+xml" href="http://feeds.feedburner.com/bhadesbharatblogspotcom" /><feedburner:info xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" uri="bhadesbharatblogspotcom" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><feedburner:emailServiceId xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">bhadesbharatblogspotcom</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-8386737433708951564</guid><pubDate>Tue, 23 Aug 2011 08:20:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-08-23T14:07:10.196+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Bukhari</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Anna</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Muslims</category><title>यह इंसान महामूर्ख है या मुसलमानों का शातिर दुश्मन !</title><description>किसी एक ग्रुप के भीतर अगर आपको किसी एक व्यक्ति की मिट्टी पलीद करनी हो, तो दो तरीक़े होते हैं। पहला, आप उसके ख़िलाफ़ सही या ग़लत, किसी भी तरह के मसले पर दुष्प्रचार करें और उसे सबके लिए घृणा का पात्र बना दें। लेकिन इस रास्ते के अपने जोखिम हैं। क्योंकि जैसे ही आप किसी के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करना शुरू करते हैं, आपके विरोधी उसके स्वाभाविक मित्र बन जाते हैं और फिर जो तटस्थ होते हैं, वह भी आपके चरित्र का विश्लेषण शुरू कर देते हैं। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;तो इस काम के लिए दूसरा तरीक़ा ज़्यादा प्रभावी हो सकता है। आप पहले उस व्यक्ति के मित्र बन जाइए। फिर पूरे ग्रुप को यह भरोसा दिला दीजिए कि आपसे बड़ा उसका कोई शुभचिंतक नहीं है। इसके बाद आप ग्रुप को और उसमें सबसे ज़्यादा सम्मानित व्यक्तियों को अपने 'मित्र' की तरफ से ग़ालियां देना शुरू कर दीजिए और ग्रुप के श्रद्धेय प्रतीकों का अपमान करना शुरू कर दीजिए। कुछ ही दिनों में आपका 'मित्र' पूरे ग्रुप में घृणा का पात्र बन जाएगा। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी ने भारत के मुसलमानों की मिट्टी पलीद करने के लिए यही दूसरा रास्ता अपनाया है। उन्हें मुसलमानों का कितना समर्थन और भरोसा हासिल है, ये तो पता नहीं, लेकिन देश की सबसे प्राचीन और विख्यात मस्जिदों मे से एक के इमाम होने के कारण मीडिया और राजनेताओं के दरबार में इन्हें बहुत महत्व दिया जाता है। इनके पूज्य पिताजी ने एक बार सुप्रीम कोर्ट के उनके खिलाफ़ समन जारी करने को चुनौती देते हुए देश के सबसे बड़े न्यायालय को पागल क़रार दिया था और कोर्ट उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका था। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;ये मुसलमानों की रहनुमाई का दावा करते हैं और इसी बूते उन्होंने अण्णा के आंदोलन को मुस्लिम विरोधी क़रार देते हुए क़ौम को इससे दूर रहने की सलाह दी है। इनका कहना है कि भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे इस्लाम विरोधी हैं। इनसे कोई पूछे कि आज़ादी की लड़ाई में ये दोनों ही नारे केंद्र में रहे थे। तो क्या भारत की स्वतंत्रता का पूरा आंदोलन भी इस्लाम विरोधी था? बुखारी के इस मूर्खतापूर्ण बयान से क्या मुस्लिम इस देश की मुख्यधारा से कटे हुए नहीं प्रतीत होते हैं? वैसे भी यह कोई मज़हबी आंदोलन तो है नहीं कि इसमें किसी व्यक्ति को पूजा पद्धति के आधार पर अपना रुख तय करने की ज़रूरत हो।
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;यह आंदोलन विशुद्ध तौर पर एक सामाजिक आंदोलन है। इसलिए कोई भी व्यक्ति जो इसे मुसलमानों, पिछड़ों, दलितों या किसी भी दूसरे वर्ग के आधार पर समर्थन या विरोध का आह्वान कर रहा है, वह उस क़ौम का सबसे बड़ा दुश्मन है। रही भारत माता या वंदे मातरम नारे की बात, तो यह तो निजी विश्वास का मसला है। मैं हिंदू हूं और सनातन काल से यह देश मेरी मां है। यह मुझे मेरी पूजा पद्धति ने नहीं, मेरे खून में हज़ारों साल से बहते मेरे संस्कारों ने सिखाया है। यही खून इस देश के 20 करोड़ मुसलमानों की नसों में भी बह रहा है। चाहे लोभ से या भय से या फिर कुछ अन्य सामाजिक कारणों से, जब इन मुसलमानों के पूर्वजों ने इस्लाम अपनाया, तो उन्होंने अपनी पूजा पद्धति बदली, अपने श्रद्धा केंद्र बदले और प्रेरणा पुरुष बदले, लेकिन उनकी नसों में आज भी अपने हिंदू पूर्वजों का ही खून है। इसलिए यह देश उनकी भी मां ही है। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;बुखारी सरीखों का मानना है कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी की इबादत करना कुफ्र है, इसलिए भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे इस्लाम विरोधी हैं। पहली बात तो यह कि किसी की जय करना उसकी इबादत करना नहीं होता है और संस्कृत की प्राथमिक जानकारी रखने वाला भी यह बता देगा कि वंदना का अर्थ हमेशा पूजा के तौर पर नहीं होता है। इसके बावजूद अगर इन दोनों नारों से बुखारी को परेशानी है, तो ये नारे लगाना अण्णा के आंदोलन की कोई पूर्व शर्त नहीं हैं। इससे ऐसे तमाम वामपंथी जुड़े हैं, जो जन्म से भले हों, मन से कत्तई हिंदू नहीं हैं। तो बुखारी मुसलमानों के लिए कुछ नए नारे दे सकते थे। लेकिन वह ऐसा करेंगे नहीं। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;इसके बजाए वह मुसलमानों को पूरे देश के सामने खलनायक और देशविरोधी साबित करना चाहते हैं। क्योंकि तभी समाज उनके खिलाफ़ प्रतिक्रिया देगा और केवल तभी वह मुसलमानों को बता सकेंगे कि 90 करोड़ हिंदू तुम्हें खाना चाहते हैं और तुम केवल तभी सुरक्षित रह सकोगे, जब मेरी छत्रछाया में रहोगे। क्योंकि अगर देश का मुसलमान अण्णा के साथ खड़ा हो गया और उसने अपनी मज़हबी पहचान की ज़िद छोड़ दी, तो बुखारी की नेतागिरी का क्या होगा। तो अब गेंद मुस्लिम समाज के पाले में है। उसे ही यह तय करना है कि वह देश की मुख्यधारा में बहने को तैयार है या अपने क़ौम के इस शातिर दुश्मन की गोद में खेलने को। इस सवाल का जवाब तय करेगा कि भारत के भविष्य का इतिहास भारतीय मुसलमानों को किस पन्ने पर रखता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-8386737433708951564?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2011/08/blog-post_23.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-8172112662793202309</guid><pubDate>Mon, 22 Aug 2011 09:38:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-08-22T15:16:21.179+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">OBC</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Corruption</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Anna</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Dalit</category><title>मुझे भ्रष्टाचार से कोई प्रॉब्लम नहीं, लेकिन मैं अण्णा के साथ हूं</title><description>मेरी उम्र 34 साल है। मेरे पिता बिहार सरकार के तहत ग्रेड-ए अधिकारी थे और एक अत्यंत प्रतिष्ठित और वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त हुए। मैंने जीवन में आर्थिक तौर पर कोई अभाव नहीं देखा। भागलपुर के टीएनबी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान एक-दो बार बेटिकट यात्रा भी की, लेकिन कारण ग़रीबी नहीं, छात्र जीवन की स्वाभाविक अराजक वृत्ति रही। फिर भी, यह भरोसा हमेशा रहा कि अगर टीटीई ने पकड़ा तो उसे रिश्वत देने लायक पैसे हैं। पढ़ाई-लिखाई के बाद पत्रकार बना। तो पहले और अब, जब भी किसी सरकारी विभाग से साबका पड़ा, तो या तो रिश्वत देकर या अपने दूसरे पत्रकार मित्रों के संबंधों के बलपर कभी कोई ख़ास परेशानी नहीं हुई। कुल मिलाकर अगर सार-संक्षेप में कहूं तो अपनी अब तक की ज़िंदगी में मुझे भ्रष्टाचार से कभी समस्या नहीं हुई। उल्टे  कहूं, तो भ्रष्टाचार ने मुझे थोड़ी-बहुत सहूलियत ही दी है। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;यह कहानी केवल मेरी नहीं है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी भी मध्यवर्गीय व्यक्ति की थोड़ी-बहुत फेरबदल के साथ यही कहानी होती है। यह वर्ग ट्रेन में स्लिपर या एससी थ्री टीयर में चलता है। टिकट न भी हो तो 500 का पत्ता निकाल कर टीटीई साहब को देता है और ऐश से एक बर्थ पर पसर कर चलता है। यह वर्ग लाइसेंस, राशनकार्ड या पासपोर्ट बनवाने जाता है तो एजेंट को एकमुश्त 1000-2000 रुपए थमाता है और उसे सीधे अपने हाथ में पाता है। छोटे-मोटे काम के लिए 100-200 रुपए खर्च करने में उसे कोई परेशानी नहीं होती और यह भ्रष्टाचार कुल मिलाकर उसकी ज़िंदगी थोड़ी आसान कर रहा है। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;अब दूसरा वर्ग, जिसे उच्च या इलीट कहा जाता है, उसकी ज़िंदगी पर एक नज़र डालते हैं। इस वर्ग में अमूमन बड़े कारोबारी, सांसद, विधायक और प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी (आईएएस और आईपीएस) आते हैं। यही वर्ग दरअसल भ्रष्टाचार के बड़े हिस्से का जनक और पोषक होता है। नेताजी को चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों रुपए चाहिए होते हैं। बाबू साहब (आईएएस) उन्हें सरकारी तंत्र के छिद्र दिखाते हैं। बाबू साहब और नेताजी मिलकर नीतियों में ऐसी जलेबी छानते हैं जिससे किसी खास कारोबारी घराने या कंपनी के सैकड़ों करोड़ के वारे-न्यारे हो जाते हैं और उसमें से कुछ करोड़ नेताजी और बाबू साहब की झोली में भी आ गिरते हैं। पुलिस का खेल थोड़ा दूसरा है और ये हम सब जानते हैं, इसलिए इसका विस्तार नहीं करूंगा।
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;अब बचा तीसरा वर्ग, जिसे पिछड़ा, ग़रीब, निम्न मध्य वर्ग आदि-आदि नामों से जाना जाता है। नेताओं के जबानी जमा खर्च में यह वर्ग सबसे प्रीमियम होता है। अपने 15 साल के शासन में सैकड़ों करोड़ के घोटाले करने वाले लालू हों या अपने जन्मदिन पर हीरे के गहनों का भौंडा प्रदर्शन करने वाली बहन जी, इन सबका भाषण ग़रीबों, पिछड़ों और कमज़ोरों से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म होता है। यह वर्ग आपको दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अक्सर सैकड़ों की संख्या में जनरल बॉगी के आगे लाइन लगाए दिख जाएगा। कभी इनके साथ यात्रा की है आपने जनरल बॉगी में? आप कर ही नहीं पाएंगे, रहने दीजिए। 16-17 घंटों की यात्रा में कई ऐसे होते हैं, जो 1 मिनट के लिए भी बैठ नहीं पाते। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;टॉयलेट तक में लोग और सामान ठूंसे होते हैं, इसलिए लोगों के लिए पूरे रास्ते टॉयलेट तक जाना मुहाल होता है। उस पर जब टीटीई आता है, तो उसका व्यवहार लोगों के साथ ऐसा होता है, जैसे वे इंसान हो ही नहीं। उस टीटीई के साथ 1-2 वर्दीधारी सिपाही भी होते हैं। और आपको शायद विश्वास नहीं होगा, ये दोनों-तीनों मिलकर लोगों के बैग की तलाशी तक लेते हैं और क्योंकि इन्हें पता होता है कि सामने वाला अपनी 6-8 महीने की बचत लेकर घर जा रहा होगा, तो उनसे रुपए तक छीन लेते हैं। यह हक़ीकत है और इसमें एक लाइन भी अतिशयोक्ति नहीं है।
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;यही वर्ग जब लाइसेंस या राशन कार्ड बनवाने पहुंचता है, तो इसे इस टेबल से उस टेबल तक धक्के खिलाया जाता है, क्योंकि उसके पास रिश्वत देने के पैसे नहीं होते। यही वर्ग पुलिस वालों के डंडे भी खाता है और इलाके में कोई वारदात होने पर थानेदार की गालियां और अपमान भी झेलता है।
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;लेकिन आश्चर्यजनक तौर पर मीडिया में एक बहस को परवान चढ़ाया जा रहा है कि भ्रष्टाचार विरोधी अण्णा का आंदोलन दलित और पिछड़ा विरोधी है। साफ तौर पर ऊपर जिन वर्गों की बात है, उनका आधार जाति न होकर, पूरी तरह से आर्थक स्थिति है। लेकिन दलित और पिछड़े हितों के पैरोकार होने वालों का ऐसा दावा है कि यह पूरा आंदोलन केवल मेरे जैसे मध्यवर्गीय लोगों को शोशा है और इसमें पिछड़े और दलितों की कोई रुचि नहीं है। और कयोंकि यही लोग हैं, जो यह मानते हैं कि हर पिछड़ा और दलित ग़रीब और बेचारा है, तो हम भी यह मान लेते हैं कि जो तीसरा वर्ग है उसमें ज्यादातर हिस्सेदारी इन्हीं पिछड़े और दलित वर्गों की है।
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;तो अगर यह देश भ्रष्टाचार मुक्त हो जाए (हालांकि यह एक यूटोपिया है), तो इसका सबसे बड़ा फायदा क्या इसी तीसरे वर्ग को नहीं होगा? अब यह मेरी समझ से तो पूरी तरह बाहर है कि ऐसी बातें कर और माहौल बनाकर दलितवादी स्वार्थी तत्व क्या हासिल करना चाहते हैं। अलबत्ता इतना ज़रूर है कि इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो ख़ुद ही आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं और दलितवाद की मलाई चाभ रहे हैं और कुछ दूसरे चंगू या मंगू हैं, जो फेसबुक और ट्विटर जैसे माध्यमों का इस्तेमाल कर दलितवादी राजनीति की मलाई में अपने लिए हिस्सेदारी ढूंढ रहे हैं।
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;अण्णा के आंदोलन में विसंगतियां हो सकती हैं। उनकी कुछ या कई मांगें भी अव्यावहारिक हो सकती हैं। लेकिन उनकी सदिच्छा पर इस देश को भरोसा है और यही इस आंदोलन का सार है। देश अगर भ्रष्टाचार मुक्त हो सके या कम से कम यह बीमारी न्यूनतम स्तर पर आ सके, तो इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा उन्हीं को होगा, जिन्हें सदियों से उनके स्वाभाविक अधिकारों से वंचित रखा गया है। जिनके पास भ्रष्टाचार के राक्षस को भेंट करने के लिए चढ़ावा नहीं है और जो अपने न्यायोचित मांगों के लिए सबसे ज़्यादा अपमानित और प्रताड़ित होते हैं।
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के लिए तो यह आंदोलन देशभक्ति और समाजनिष्ठा का प्रतीक है, लेकिन ग़रीबों एवं कमज़ोरों के लिए यह उनके स्वाभिमान की लड़ाई है, अधिकारों की लड़ाई है और रोज़गार की लड़ाई है। जो भी लोग इसे पिछड़ो और दलितों का विरोधी बता रहे हैं, उनसे बड़ा उनका कोई दुश्मन नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-8172112662793202309?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2011/08/blog-post_22.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-7883316361558767697</guid><pubDate>Fri, 12 Aug 2011 17:51:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-08-12T23:51:27.762+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Gujarat</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Godhra</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Narendra Modi</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Sanjeev Bhatt</category><title>गुजराती आईपीएस अधिकारियों की क्रांति का राज़ क्या है?</title><description>गुजरात में 2002 के गोधरा बाद के दंगों ने चाहे मानवता को कभी न मिटने वाले घाव दिए हों, लेकिन इन्होंने देश पर एक बड़ा उपकार भी किया है। देश हर्ष मंदर, संजीव भट्ट, राहुल शर्मा, कुलदीप शर्मा, सतीश वर्मा, आर बी श्रीकुमार, रजनीश राय जैसे प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की एक पूरी फौज से रू-ब-रू हुआ, जो जनहित के लिए पूरी सरकार से टकराने और अपना करियर दांव पर लगाने की हिम्मत रखती है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे अधिकारियों की पीढ़ी केवल गुजरात में ही क्यों पैदा हो रही है? 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश में जीतेंद्र सिंह बबलू, धनंजय सिंह, स्वामी प्रसाद मौर्य, डी पी यादव, कदीर राना और योगेंद्र सागर जैसे जानेमाने जनसेवकों के खिलाफ चल रहे हत्या, बलात्कार जैसे मामलों के सारे मुकदमें पिछले 4 वर्षों में धीरे-धीरे उठा लिए गए हैं (इंडियन एक्सप्रेस पेज 1, 12 अगस्त)। माया सरकार के इन लाडलों के खिलाफ ये केस बनाने के लिए न जाने कितने ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाई होगी और न जाने कितनों ने अपनी जानें गंवाई होंगी। लेकिन इन 4 वर्षों में एक भी आईपीएस या आईएएस अधिकारी की अंतरात्मा नहीं जागी। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;पुणे में पुलिसिया गुंडई के दृश्य तीन दिनों से लगातार हम अपने टीवी स्क्रीनों पर देख रहे हैं। वहां एक पुलिस अफसर निशाने लगा-लगा कर खरगोशों की तरह किसानों का शिकार कर रहा था। कुछ टुच्चे पुलिसिए कारों और मोटरसाइकिलों पर गली के गुंडों की तरह डंडे और लात बरसा रहे थे। यह सब बिना राजनीतिक प्रश्रय और संकेत के तो हो नहीं रहा होगा? एक किसान को तो बाक़ायदा पुलिस हिरासत में लेकर गोली मार दी गई- यानी फ़र्ज़ी मुठभेड़। लेकिन किसी आईएएस और आईपीएस अधिकारी का ज़मीर नहीं जाग रहा। इसकी तुलना गुजरात से कीजिए। सोहराबुद्दीन, इशरत जहां और तुलसीराम प्रजापति- पुलिस के हाथों मारे गए ये तीन, सुप्रीम कोर्ट से लेकर कई आईपीएस अधिकारियों के लिए फर्ज़ और अन्याय के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बन गए हैं। इनमें सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति तो घोषित इनामी अपराधी थे। और इशरत जहां के आतंकवादियों से संबंध भी साबित हो चुके हैं। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;लेकिन आए दिन इन कथित फर्ज़ी मुठभेड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट अपनी सक्रियता दिखाता रहता है। कई अति वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जेल में है। अखबारों में सोहराबुद्दीन की एक तस्वीर छपती है, जिसमें वह एक अति पारिवारिक आम शहरी की तरह अपनी पत्नी के साथ ताजमहल के आगे बैठा दिखाया जाता है। दूसरी ओर अपनी पैशाचिक हंसी से न्याय व्यवस्था की हंसी उड़ाने वाला हरियाणा का पूर्व डीजीपी राठौड़ एक किशोरी को आत्महत्या के लिए मज़बूर करने और उसके भाई की ज़िंदगी तबाह करने के बावजूद ज़मानत पाकर मज़े लूट रहा है। किन्हीं माननीय न्यायाधीश की, किसी आईएएस या आईपीएस अफसर की आत्मा नहीं जागती।
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 1993 से 2009 के बीच 2,318 लोग पुलिसिया अत्याचार नहीं झेल पाने के कारण हिरासत में मारे गए। हम सब जानते हैं कि पुलिस हिरासत में हुई मौतें कैसे होती हैं। अपनी खाल बचाने के लिए या नियमित सत्कार करते रहने वाले किसी गुंडे या अपने किसी राजनीतिक आका को खुश करने के लिए किसी अपराध के लिए कोई ग़रीब पकड़ लिया जाता है। फिर हवालात में उसे उलटा लटकाया जाता है, उसके हलक में और कभी-कभी तो मलद्वार में भी डंडे डाले जाते हैं, बिजली के झटके लगाए जाते हैं, लातों-जूतों से पिटाई की जाती है और उससे अपराध कबूल करवाया जाता है। इसी पुलिसिया पराक्रम के दौरान कई बार पकड़ा गया आदमी मर जाता है। पूरा पुलिस महकमा, एसपी, एसएसपी, डीजीपी, डीआईजी, आईजी, डीएम और कानून-व्यवस्था से जुड़े सेक्रेटरी (आईएएस) सभी इन घटनाओं से अवगत होते हैं। माननीय न्यायालय को भी सब पता होता है। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;लेकिन किसी आईएएस या आईपीएस अफसर की आत्मा नहीं जागती। ख़ास बात यह है कि इन 2,318 लोगों में से 190 मौतें गुजरात में भी हुईं। लेकिन सोहराबुद्दीन, प्रजापति और इशरत की मौतों के लिए रात भर करवटें बदलने वाले गुजरात के कर्तव्यनिष्ठ आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को पुलिस हिरासत में मरते इन ग़रीबों पर कोई दया क्यों नहीं आती?
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;कारण चाहे जो भी हो, कम से कम दो ऐसे दयावंत, दयालु मानवाधिकारवादियों की कहानी तो हम सब को पता है। एक हैं गुजरात दंगों के समय वहां आईएएस रहे हर्ष मंदर, जो अब देश भर के वामपंथियों और हिंदू विरोधियों के भगवान हो गए हैं। इन्हें नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभियान छेड़ने के एवज़ में देश की सबसे ताकतवर गैर सरकारी संस्था राष्ट्रीय सलाहकार परिषद यानी एनएसी में सदस्यता का तोहफा दिया गया है। 
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;दूसरी मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ हैं। यह बात साबित हो चुकी है कि उन्होंने पैसे देकर बेस्ट बेकरी कांड की मुख्य गवाह को मोदी सरकार के खिलाफ किस तरह इस्तेमाल किया। मोदी के खिलाफ अपने इस अभियान में उन्होंने अपने दुष्प्रचार का प्रोपगेंडा कुछ इस तरह चलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने बेस्ट बेकरी की सुनवाई गुजरात से बाहर करवाने के निर्देश दिए। लेकिन अब उनकी करतूतों का काला चिट्‌ठा सामने आने के बावजूद वह कानून की गिरफ्त से बाहर हैं। उनके एनजीओ को विदेश से मिलने वाले करोड़ों रुपए से उनकी हिंदू विरोधी कारस्तानियां बदस्तूर जारी हैं।
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;पुणे के किसानों को मारने वाला पुलिसकर्मी हफ्ते भर बाद मीडिया से गायब हो जाएगा, मऊ के दंगों में खुली जीप पर घूमघूम कर कत्लेआम करवाने वाले मुख्तार अंसारी को हर कोई भूल चुका है, थानों में चीखचिल्ला कर दम तोड़ने वाले ग़रीबों की किसी को हवा भी नहीं लगती। लेकिन मोदी का भूत ज़िंदा रहना चाहिए। योंकि इसके बड़े फायदे हैं। इससे सोनिया का वरदहस्त भी मिल सकता है और करोड़ों रुपए का डोनेशन पाने वाले समाजसेवक होने का तमगा भी। तो क्या इसीलिए सारे क्रांतिकारी पुलिस अफसर गुजरात में ही पैदा हो रहे हैं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-7883316361558767697?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2011/08/blog-post_12.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-4037239881761840828</guid><pubDate>Mon, 01 Aug 2011 19:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-08-02T01:18:20.348+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Yeddyurappa</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">BJP</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Karnataka</category><title>भाजपा के लिए कहीं दक्षिण का वाटर लू न बन जाए कर्नाटक?</title><description>कर्नाटक दक्षिण भारत में भाजपा का वाटर लू तो साबित नहीं होने जा रहा। अगर हो जाए, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए और अगर न हो तो, यही मानना चाहिए कि भाजपा को सचमुच राम का सहारा है। कर्नाटक को दक्षिण भारत का गेटवे मानकर खुश होने वाले भाजपाइयों के लिए तीन सालों का वहां का शासन किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहा है। एक राष्ट्रीय और कैडर आधारित पार्टी के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में कंठ तक डूबा उसका एक मुख्यमंत्री पिछले करीब साल भर से उसे ब्लैकमेल कर रहा है और वह बेबस, लाचार नजर आ रही है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है? भारतीय दर्शन में लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मार्ग की शुचिता को बहुत महत्व दिया गया है। यह सही है कि आधुनिक भारतीय राजनीति में इस शुचिता की भी अपनी एक सीमा है। लेकिन अगर लक्ष्य केवल सत्ता हासिल करना न हो और आप एक विचारधारा के साथ राजनीति करने का दंभ भरते हों, तो उस सीमा तक की शुचिता तो आपको रखनी ही चाहिए। अगर आप नहीं रखेंगे, तो आपका हश्र वही होगा, जो कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी का हुआ है। साल 2008 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले कर्नाटक में सत्ता के मुहाने पर बैठी भाजपा के धैर्य का बांध टूट गया और उसने घोषित तस्करों, रेड्‌डी बंधुओं को अपनी गोद में बिठा लिया। ये रेड्‌डी बंधु, जिनका किसी राजनीतिक दल या विचारधारा से किसी तरह का कोई सरोकार नहीं था और जो पूर्ववर्ती सरकारों में मंत्री बन कर राज्य में लूट का तंत्र चला रहे थे, एकाएक भाजपा के प्रिय हो गए। बेल्लारी उनका चारागाह था और सुषमा स्वराज ने वहां से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा था। अब सुषमा जी को रेड्‌डी बंधुओं की कौन सी सेवाएं मिली थीं, यह तो वही जानें, लेकिन जिन भ्रष्ट स्मगलरों की कारस्तानी कर्नाटक के बच्चे-बच्चे को पता थी, उन्हें सार्वजनिक तौर पर अपना भाई और प्रिय बताकर सुषमा जी ने भाजपा की वैचारिक प्रतिबद्धता की जड़ों में मट्‌ठा डाल दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बहुत ही रोचक घटनाक्रञ्म है। करीब साल भर पहले इन्हीं रेड्‌डी बंधुओं ने येद्दयुरप्पा को खून के आंसू रुलाए। येद्दयुरप्पा ने रेड्‌डी बंधुओं की लूट पर अंकुश लगाई और उन तीनों भाइयों ने अकूत संपत्ति के बल पर खरीदे विधायकों के बूते मुख्यमंत्री को इस्तीफे के लिएम जबूर कर दिया। पार्टी हाईकमान आंखों पर पट्‌टी डाल कर सोया रहा। सुषमा जी ने अपने मुख्यमंत्री की जगह स्मगलर भाइयों को गले लगाया। फिर येद्दयुरप्पा भागे-भागे दिल्ली आए। दिल्ली में बैठे भाजपा नेताओं ने साफ कर दिया कि रेड्‌डी बंधु नाम के कैंसर से छुटकारा पाने का उनका कोई इरादा नहीं है। अत्यंत अपमानजनक परिस्थितियों में येद्दयुरप्पा को रेड्‌डी बंधुओं से समझौता करना पड़ा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके लोगों को, जिन्हें मंत्रिमंडल से निकाला गया था, फिर से शामिल करना पड़ा। क्या उसी समय भाजपा को रेड्‌डी बंधुओं को पार्टी से चिपकाने की अपनी गलती का सुधार नहीं करना चाहिए था? सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लंबी अवधि की राजनीति करने वाली एक राष्ट्रीय पार्टी एक सरकार के लिए अपनी मूलभूत जमीन कमजोर करने का जोखिम कैसे ले सकती है? लेकिन भाजपा ने यह जोखिम लिया। येद्दयुरप्पा को राजनीति का समीकरण समझ में आ गया। उसके बाद साल भर में उन्होंने अपने विधायकों को क्या घुट्‌टी पिलाई, किस तरह के फायदे दिए, किस तरह की छूट दी कि पूरा मामला पलट गया। आज कर्नाटक के 60 विधायक उनके साथ आंसू बहाने को तैयार हैं। यह ठीक है कि ये सभी उनके लिंगायत समुदाय से ही हैं। लेकिन ये लोग साल भर पहले भी तो लिंगायत ही थे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अब एक नजर येद्दयुरप्पा के इतिहास पर भी डालिए। साल 2004 विधानसभा चुनाव में भाजपा को 79 सीटें मिलीं और वह विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी। लेकिन कांग्रेस ने जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बनाया। मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे येद्दयुरप्पा इतने मायूस और हतोत्साहित हुए कि उन्होंने भाजपा छोड़ने का फैसला कर डाला। जेडीएस के एच डी देवेगौड़ा और उनके बेटे कुमारस्वामी के आगे मत्था टेकने पहुंच गए। हालांकि बाद में भाजपा ने उन्हें रोकने में सफलता पा ली, लेकिन 2008 के चुनावों में ऐसे नेता को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करना क्या वैचारिक दिवालियापन नहीं था। जब येद्दयुरप्पा का असली चरित्र सामने आ चुका था, तो क्यों नहीं पार्टी ने अगले चार साल में एक नया नेता तैयार किया जिसकी अगुवाई में चुनाव लड़ा जा सके?&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;ये वो सवाल हैं, जिन पर भाजपा को विचार करना होगा और इनके जवाब खोजने होंगे। कर्नाटक की घटनाओं का राज्य और देश में भाजपा की राजनीति पर चाहे जो असर हो, लेकिन देश के लोगों के मन में इन घटनाओं को जो असर हो चुका है, उसे धुलने में वर्षों लग जाएंगे। यह कीमत निश्चित तौर पर पांच साल तक कर्नाटक की सरकार चलाने के फायदों के मुकाबले बहुत ज्यादा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-4037239881761840828?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2011/08/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-7909189500599732158</guid><pubDate>Fri, 29 Jul 2011 07:39:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-07-29T13:15:00.172+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Congress</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Balkrishna</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">CBI</category><title>देश को आज सबसे ज़्यादा ख़तरा किससे है- बालकृष्ण से?</title><description>रामदेव के शिष्य बालकृष्ण आज की तारीख में देश के सामने कानून-व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश में तीन-तीन मेडिकल अफसरों की हत्या, विदेशी बैंकों में पड़े हजारों या लाखों करोड़ रुपए की काली रकम, मुंबई में हुआ ताजातरीन आतंकवादी हमला- सब पृष्ठभूमि में चले गए हैं। रोज बालकृष्ण के बारे में नई-नई खबरें आ रही हैं। उन्होंने नकली पासपोर्ट बनवाया, रिवॉल्वर खरीदा, पिस्तौल खरीदा और पता नहीं क्या-क्या। लेकिन बालकृष्ण के बारे में ये सारी सच्चाइयां सरकार के खिलाफ रामदेव के मोर्चा खोलने के बाद ही क्यों सामने आईं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह समझना मुश्किल नहीं है। हां, यह समझना मुश्किल जरूर है कि लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित कोई सरकार इस हद तक निर्लज्ज कैसे हो सकती है। इस पूरे प्रकरण से कोई एक बात सबसे साफ तौर पर साबित हुई है, तो वह यही है कि देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई की कोई संवैधानिक निष्ठा नहीं है और वह बस सरकार के दरवाजे पर बैठा एक पालतू कुत्ता है, जिसका काम केवल सरकार के इशारे पर दुम हिलाना, भौंकना और समय पड़ने पर काटना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार साल पहले ठीक इसी तरह का एक और मामला सामने आया था। असम के तेजपुर से कांग्रेस सांसद एम के सुब्बा पर आरोप लगे कि वह नेपाल के नागरिक हैं और फर्जी तरीकों से उन्होंने भारत की नागरिकता हासिल की। सीबीआई जांच करती रही और सुब्बा भारतीय संसद की शोभा बढ़ाते रहे। चार साल की जांच के बाद जनवरी 2011 में जाकर आखिरकार सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल किया जब सुब्बा पहले ही पांच साल तक सांसद होने की सारी शक्तियों, अधिकारों और फायदों का लाभ उठा चुके थे। आरोप पत्र में सुब्बा के नेपाली नागरिक होने की पुष्टि कर दी गई। लेकिन इसके बावजूद सुब्बा आज भी भारतीय नागरिकता के मजे लूट रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसकी तुलना बालकृष्ण के मामले से कीजिए। मई की शुरुआत में रामदेव की सरकार से भिड़ंत हुई। और तीन महीने बीतते-बीतते बालकृष्ण की गिरफ्तारी के लिए सीबीआई ने पैर पटकने शुरू कर दिए। उससे पहले तक बालकृष्ण की लिखी चिट्‌ठी दिखाते सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों से कोई पूछे कि पिछले कई सालों से, जब बालकृष्ण सार्वजनिक सभाओं में और टीवी चैनलों पर अपने आयुर्वेद ज्ञान का प्रदर्शन कर रहे थे, तब सरकारी मशीनरी को क्यों इस बात का इल्म नहीं हो सका कि बालकृष्ण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस सरकार से किसी तरह के जवाब की उमीद करना ही व्यर्थ है। बिना चेहरे, बिना जवाबदेही और बिना दिशा वाली इस सरकार की कमान एक ऐसी महिला के हाथ में है, जिसे चारणों और चाटुकारों से घिरे रहने की आदत हो, जिसने खुद कभी किसी सरकारी फैसले के लिए कोई जवाबदेही न ली हो, जो रिमोट कंट्रोल से शासन करने में विश्वास रखती हो और दिग्विजय सिंह जैसे निम्नस्तरीय नेता जिसके सबसे बड़े औज़ार हों, उससे आप क्या उमीद-कर सकते हैं। मत भूलिए कि इटली की इसी अंडर ग्रेजुएट के पीएम इन वेटिंग लाडले को आरएसएस जैसे संगठन लश्करे तोएबा से ज्यादा ख़तरनाक लगते हैं। तो अगर बालकृष्ण अगर आज इस देश की सबसे बड़ी समस्या हैं, तो इसमें आश्चर्य क्या है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-7909189500599732158?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2011/07/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-3065615970363004886</guid><pubDate>Wed, 01 Jun 2011 07:20:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-06-01T13:05:49.738+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Ramdev</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Corruption</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Lokpal</category><title>बाबा रामदेव को शीर्षासन की ज़रूरत है</title><description>बाबा जी का कहना है कि क्योंकि प्रधानमंत्री 121 करोड़ लोगों का प्रतिनिधि होता है, इसलिए उसे एक अफसरशाह (यानी लोकपाल) के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया जा सकता है। मेरे मन में बाबा जी की भलमनसाहत पर दो सवाल उठ रहे हैं। पहला, क्या सचमुच अपने देश में प्रधानमंत्री पूरी जनसंख्या का प्रतिनिधि होता है? क्या गुजराल, देवेगौड़ा और जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड अपने नाम करने जा रहे मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जनता ने अपना प्रधानमंत्री चुना है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चित तौर पर नहीं चुना है, बल्कि मनमोहन सिंह को तो किसी संसदीय क्षेत्र की जनता तक ने नहीं चुना है। लेकिन इस तर्क के तमाम विरोधी हो सकते हैं, जो यह साबित कर देंगे कि यहां तक कि नेहरू, इंदिरा गांधी, वी पी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी (जिनकी पार्टियों को वोट देने वाले वस्तुत: उन्हें ही प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट करते थे) जैसे प्रधानमंत्री भी देश की जनता के कुल मत का 50 फीसदी तक नहीं पा सके थे। इसलिए इस सवाल को फिलहाल बहस के लिए ठंडे बस्ते में डाल देते हैं कि भारत का प्रधानमंत्री वास्तव में देश की जनता का कितना प्रतिनिधि होता है या नहीं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अब दूसरा सवाल, क्या किसी को केवल इसीलिए लोकपाल के प्रति जवाबदेह नहीं होना चाहिए कि उसे जनता ने चुना है। तब तो एक थाना प्रभारी की उस क्षेत्र के सांसद या विधायक के सामने कानूनी तौर पर कोई हैसियत नहीं होना चाहिए। उसी तरह राज्य के लोकायुक्त को मुख्यमंत्री का चपरासी होना चाहिए और देश के मुख्य न्यायाधीश को प्रधानमंत्री का चारण होना चाहिए। प्रस्तावित लोकपाल को एक अफसरशाह बताना मूर्खता की हद है। इस लिहाज से तो मुख्य चुनाव आयुक्त भी एक अफसरशाह हैं और सेबी के प्रमुख और भारतीय रिज़र्व बैक के गवर्नर भी अफसरशाह हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या बाबा रामदेव भूल गए कि अभी कुछ ही महीने पहले एक भ्रष्ट आरोपी को किस निर्लज्जता के साथ मुख्य सतर्कता आयुक्त की कुर्सी पर बैठाने के लिए हर संभव कोशिश की गई थी। और वह कोशिश और किसी ने नहीं, 121 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि, घनघोर इमानदार डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने सिपहसालार पी चिदंबरम के साथ मिलकर की थी। हद तो यह कि पकड़े जाने पर सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने सफेद झूठ यह कहा कि उन्हें थॉमस पर लंबित आरोपों की जानकारी ही नहीं थी, जबकि थॉमस के चयन के लिए हुई तीन सदस्यीय पैनल की बैठक में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने साफ तौर पर इस मुद्दे को उठाया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर, लौटते हैं बाबा रामदेव के उसी तर्क की ओर। तो अगर 121 करोड़ लोगों का प्रतिनिधि इमानदारी का पुतला होता है, तो 20 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि रहे मुलायम यादव और मायावती चोर कैसे हो सकते हैं। तो उनके खिलाफ चलने वाले आय से ज्यादा संपत्ति बटोरने और ताज कॉरिडोर घोटाले का मामला भी तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। 15 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि रहे लालू पशुओं का चारा नहीं खा सकते और तमिलनाडु के कुछ करोड़ लोगों के प्रतिनिधि करुणानिधि का कुनबा 2जी की नीलामी में सैकड़ों करोड़ नहीं डकार सकता। फिर तो इस तर्क से हर सांसद, हर विधायक, हर पार्षद और वार्ड सदस्य और हर निर्वाचित प्रतिनिधि कानून के दायरे से बाहर होना चाहिए। क्या बेवकूफ़ी भरा तर्क है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां मामला निर्वाचित प्रतिनिधियों के किसी एक अफरसशाह के प्रति जवाबदेह होने का नहीं हैं। मामला है उस निर्वाचित प्रतिनिधि के देश और संविधान के प्रति जवाबदेह होने का। चाहे वह लोकपाल हो, कोई न्यायाधीश हो या कोई भी नियामक- वह कोई व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह एक संस्था होता है, जिसमें संविधान की शक्तियां निहित होती हैं। रामदेव का यह तर्क ठीक है कि भ्रष्ट तो लोकपाल भी हो सकता है। तो उसके लिए ज़रूरी उपाय किए जाने चाहिए। संविधान निर्माताओं ने चेक्स एंड बैलेंसेज के जिस सिद्धांत पर जवाबदेहियों का निर्धारण किया था, उसमें किसी व्यक्ति और संस्था को अवध्य नहीं माना गया। इसीलिए कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका सबको एक-दूसरे पर अंकुश रखने के कुछ अधिकार दिए गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आज़ादी के छह दशकों बाद वे चेक्स एंड बैलेंसेज नाकाफी साबित हो रहे हैं। भ्रष्टाचार का ज़हरीला पानी नाक के ऊपर से बह रहा है और इसके लिए तत्काल कुछ किए जाने की ज़रूरत है। लोकपाल का प्रयोग कितना सफल होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इसके अधिकारों को लेकर सरकार की ओर से जो चालबाजियां की जा रही हैं, वह अपने आप में इसके प्रभावी हो सकने का संकेत है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह समझने के लिए कोई वैज्ञानिक होना ज़रूरी नहीं है कि भ्रष्टाचार का मूल सत्ता और ताक़त है। जहां अधिकार और शक्तियां हैं, वहीं से भ्रष्टाचार का जन्म होता है। इसलिए इस पर सबसे क़रारा प्रहार भी सत्ता के शीर्ष से ही होना चाहिए। भूखों, नंगों और ज़िंदगी की जद्दोज़हद में पानी-पानी हो रहे लोगों पर तो कानून का डंडा चलाइए और विधायकों, सांसदों, मंत्रियों और सबके मुखिया प्रधानमंत्री को आरती दिखाइए। और फिर सपना देखिए एक भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का। ऐसे सपने देखने वालों को अपनी सोच की दिशा सीधी करने के लिए सिर के बल खड़ा होने की ज़रूरत है, चाहे वह योग गुरू बाबा रामदेव ही क्यों न हों।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-3065615970363004886?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2011/06/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-8129921187672918669</guid><pubDate>Mon, 17 Jan 2011 10:14:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-01-17T15:48:38.062+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Terrorism</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Muslims</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Hindu</category><title>जंगपुरा और पुष्प विहार में अंतर के नतीजों से डरिए</title><description>12 जनवरी, दिन बुधवार। दिल्ली के दो अलग-अलग हिस्सों में दो अवैध पूजा स्थलों को ढहाया गया। जंगपुरा में एक मस्जिद ज़मींदोज की गई और पुष्प विहार में एक मंदिर गिराया गया। लेकिन हमारे समाज और राजनीति पर इन दोनों घटनाओं के असर में फ़र्क था। आइए, इसके बाद हुई घटनाओं की कड़ी से इस अंतर को देखा जाए।&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;अगले दिन यानी 13 जनवरी को राजधानी के लगभग तमाम अखबारों में मस्जिद गिराए जाने की ख़बर पहले पेज पर थी। होना लाज़िमी भी था। सुबह 6 से 9.30 बजे तक मस्जिद गिरी और 11.30 बजे जामा मस्जिद के शाही इमाम वहां पहुंच गए। हज़ार से ज़्यादा की संख्या में मुस्लिम वहां इकट्ठे हो गए। स्थानीय विधायक (जो कि एक ग़ैर मुस्लिम हैं) अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ मुसलमानों के ख़िलाफ हुए इस अत्याचार पर आवाज़ बुलंद करने वहां पहुंच गए। दो और विधायक, मटिया महल के शोएब इक़बाल और ओखला के आसिफ़ मोहम्मद ख़ान वहां आ गए। ज़ाहिर है, वह जनप्रतिनिधि होने के नाते नहीं, बल्कि मुसलमान होने के नाते अपना फर्ज़ अदा करने पहुंचे थे। बात यहीं नहीं थमी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्जिद ढहने के बाद की पहली नमाज पास के थाने में पढ़ी गई। बाद के नमाज के लिए हज़ारों मुसलमान गिराई गई मस्जिद की जगह की ज़िद करने लगे, जो कि उन्हें बाद में दे दी गई। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और अपने नाम के आगे मुल्ला जुड़वाने के शौक़ीन मुलायम सिंह यादव ने उसी दिन घटनास्थल पर पहुंच कर घोषणा की कि यह मुसलमानों पर ज़ुल्म है। दिल्ली की मुख्यमंत्री कैसे पीछे रहतीं? वह भी भागी-भागी पहुंची। अल्पसंख्यकों के साथ हुए इस अत्याचार पर आंसू बहाया। फिर अगले दिन शाही इमाम के दरवाज़े पर मत्था टेकने जामा मस्जिद पहुंचीं। आधे घंटे की बैठक के बाद शाही इमान ने सच्चे देशभक्त की तरह मुसलमानों से शांति बरतने की अपील की और उन्हें बताया कि मस्जिद फिर वहीं बनेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीला जी ने उनसे वादा किया है कि पहले जिस ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा कर मस्जिद बनाई गई थी, उसे अब सरकार अपने खर्चे से (मतलब आम लोगों के खर्चे से) ख़रीद कर वक्फ़ बोर्ड को सौंपेगी। नतीजा- घटनास्थल पर मौजूद मुस्लिम श्रद्धालुओं ने डीडीए द्वारा बनाई गई चहारदिवारी ढाह दी और घटनास्थल पर एक अस्थाई मस्जिद बना दी गई। 12 जनवरी को मस्जिद तोड़े जाने के बाद से अब तक वहां हज़ारों मुसलमान मौजूद हैं और हर समय की नमाज मिलकर अदा कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब दूसरी घटना। पुष्प विहार का मंदिर गिराए जाने के बाद न कोई पत्ता हिला, न कंकड़ गिरा। एक अवैध इमारत को ढहाने की घटना को वहां के पूरे हिंदू समाज ने सहर्ष स्वीकार किया। नतीजतन, अखबार और टीवी के लिहाज से कोई ख़बर ही नहीं बनी। लेकिन जंगपुरा में हो रहा खेल जब अखबारों की सुर्खियां बन रहा हो, तो स्वाभाविक तौर पर राहुल गांधी के शब्दों में लश्कर-ए-तोएबा से भी ख़तरनाक कट्टर हिंदुओं पर कुछ करने का दबाव तो बना ही होगा। तो फिर शनिवार को पुष्प विहार में सड़कों पर जाम लगा। बीआरटी भी जाम की गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविवार को इंडियन एक्सप्रेस ने पांचवें पन्ने पर दो कॉलम में यह ख़बर लगाई, तो मुझे भी पहली बार पता चला कि पुष्प विहार में चार दिन पहले कोई मंदिर भी तोड़ा गया था। लेकिन इस खबर में एक ख़ास बात थी। जंगपुरा में इकट्ठा होने वाले, विरोध करने वाले और नारे लगाने वाले मुसलमान थे। पुष्प विहार मंदिर के लिए जमा होने वाले भाजपाई थे, विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस वाले थे। वहां कोई हिंदू नहीं था। जंगपुरा की जंग मुसलमानों की जंग है, लेकिन पुष्प विहार का विरोध भाजपाइयों और संघियों का पार्टी कार्यक्रम है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदुओं का न कोई सेकुलर शाही इमाम है, न कोई स्थानीय विधायक, न शोएब इक़बाल हैं, न आसिफ़ मोहम्मद ख़ान। न ही बगल के राज्य से भागा-भागा आने वाला कोई मुल्ला मुलायम है और न ही राज्य की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। हिंदुओं के लिए खड़े होने वाले केवल वही मुट्ठी भर लोग हैं, जो चिदंबरम जी और दिग्विजय सिंह की नज़र में हिंदू आतंकवादी हैं और राहुल गांधी की नज़र में पाकिस्तान की सेना से संचालित होने वाले लश्कर से भी ख़तरनाक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योकि इस देश के कम्युनिस्टों की आंखों पर तो हिंदू विरोध का पट्टी पड़ी है, इसलिए उनसे जागने की उम्मीद व्यर्थ है। लेकिन इन मुट्ठी भर बौद्धिक विकलांगों के अलावा जो देश की 98 फीसदी से ज्यादा आबादी है, उससे ज़रूर इस तरह की घटनाओं के निहितार्थ समझने की उम्मीद की जा सकती है। इस देश का मुसलमान देशभक्त है और मुख्यधारा के साथ चलना चाहता है, लेकिन इमाम, इक़बाल, ख़ान, मुलायम और शीला जैसों की दुकानदारी चलते रहने के लिए ज़रूरी है कि वह कूपमंडुक बना रहे और पूरे देश में उसकी छवि कट्टरपंथी और कानून के दुश्मन की बने। क्योंकि अगर ऐसा होगा, तभी बहुसंख्यक हिंदुओं के भीतर उसकी प्रतिक्रिया होगी, सुनील जोशी और असीमानंद जैसे नाम पैदा होंगे (यह मानते हुए कि वह दोषी हैं) और जब ऐसा होगा, तभी फिर उन्हें हिंदुओं का भय दिखा कर अपनी दावत चलती रहेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर किसी को इस सिद्धांत में कोई अतिशयोक्ति दिखती हो, तो वह अपने दो बच्चों या घर के दो सदस्यों के बीच यही प्रयोग(जंगपुरा और पुष्प विहार के अंतर का) दुहरा कर देख ले। वे तमाम हिंदू, जिन्हें बम विस्फोटों के मामलों में आरोपी बनाया गया है, एक ही गुट के हैं। मतलब अगर ये सारे आरोप सही भी हैं, तो ये हिंदू समाज के स्वभाव में आ रहे किसी बदलाव का संकेत नहीं करते। लेकिन कल्पना कीजिए, अगर वास्तव में चिदंबरम, दिग्विजय और राहुल गांधी की राजनीतिक बयानबाजी सच साबित हो जाए, तो भारत को पाकिस्तान बनने में कितना समय लगेगा, जहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक कानून का विरोध करने वाले (न कि उन्हें विशेष सुविधाएं देने की मांग करने वाले) गवर्नर की हत्या करने वाले पर फूल बरसाने वालों में पुलिसवाले और वकील तक शामिल थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए अगर आप इस देश के मुसलमानों के हितचिंतक हैं, तो जंगपुरा और पुष्प विहार का अंतर ख़त्म किए जाने के लिए आवाज़ उठाइए। लेकिन अगर आपको केवल राजनीति करनी है, तो कीजिए, लेकिन फिर इस ग़लतफ़हमी में मत रहिए कि इस आग की लपटों से आपका घर और आपके बच्चे बच जाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-8129921187672918669?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2011/01/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-7564675036339523430</guid><pubDate>Sat, 25 Dec 2010 11:41:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-12-26T16:36:31.342+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Maoist</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Binayak Sen</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Terrorism</category><title>हम सब माओवादी हैं, लेकिन...</title><description>बिनायक सेन को उम्रक़ैद की सज़ा सुनने के बाद उनकी पत्नी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अवसाद भरा दिन है। यह प्रतिक्रिया थोड़ी अजीब है। माओवाद और चाहे जिस भी तरह की समाजसेवा कर रहे हों, कम से कम देश में लोकतंत्र की जड़ें तो मज़बूत नहीं ही कर रहे हैं। अगर बिनायक सेन की पत्नी को लोकतंत्र की चिंता है, तो इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि शायद एक ग़ैर सरकारी संगठन चला रहे सेन छत्तीसगढ़ सरकार के माओवाद विरोधी उत्साह का मिथ्या शिकार बन रहे हों। आख़िर अपने देश में पुलिस महकमे की सबसे बड़ी विशेषताओं में किसी को कहीं भी और किसी भी अपराध के लिए जेल में डाल देना और फिर उसका अपराध साबित करना भी शामिल है ही। लेकिन फिर सेन के समर्थन में खड़े होने वालों और धरना-प्रदर्शन करने वालों की लिस्ट पर नज़र जाते ही, उनके निर्दोष होने की कहानी का पोपलापन सामने आने लगता है। सेन के मित्र वही लोग हैं, जो माओवादियों के मारे जाने पर मानवाधिकार की दुहाई देने लगते हैं और माओवादी हिंसा को वंचितों और अन्याय के शिकार हुए लोगों की क्रांति कह कर जश्न मनाते हैं। तो दाल में कुछ काला लगना स्वाभाविक है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फर्ज़ कीजिए की आपके बुज़ुर्ग पिताजी अपने पेंशन का चेक लेने जाएं और वहां क्लर्क 20 मिनट तक केवल इसलिए उन्हें लाइन में खड़ा रखे क्योंकि तेंदुलकर का शतक पूरा होने वाला था और वह क्रिकेट का दीवाना है, तो आप क्या करेंगे। क्या आपका खून नहीं खौलेगा और आपका मन नहीं होगा कि उस क्लर्क के मुंह में कालिख पोतकर, उसका सर मुंडा कर उसे पूरे शहर में घुमा देना चाहिए। अगर आप किसी मंत्री के बेटे या बेटी नहीं है, आपका कोई नज़दीकी संबंधी कहीं का सांसद, विधायक, डीएम, एसपी कोई अन्य प्रशासनिक अधिकारी नहीं है, तो मेरा दावा है कि आपने कम से कम एक दर्ज़न बार तो अपने किसी दोस्त या परिवार में यह प्रतिक्रिया ज़रूर दी होगी कि अमुक अधिकारी या क्लर्क या ड्राइवर या दुकानदार या डॉक्टर या इंजीनियर को चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए। आम लोगों की यह सबसे आम प्रतिक्रिया है, जो व्यवस्था के प्रति उनका गुस्सा व्यक्त करने के काम आता है। माओवादी आम आदमी के इसी गुस्से को अंजाम तक पहुंचाते हैं। बहुत अच्छा काम करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माओवादियों के तमाम समर्थक यहीं तक आकर रुक जाते हैं। लेकिन कहानी यहां से आगे बढ़ती है। माओवादी संगठन बनाते हैं और संगठन चलाने के लिए पैसा चाहिए होता है। पैसा ग़रीब किसान और मज़दूर नहीं दे सकते। तो उसके लिए कारोबारियों, ठेकेदारों और वेतनभोगियों की ज़रूरत होती है। अब कोई भी कारोबारी, ठेकेदार या वेतनभोगी अपनी मेहनत की कमाई में से माओवादियों को टैक्स तो दे नहीं सकता। तो, फिर वह अपने-अपने धंधों में बेइमानी करता है। और एक बार फिर कारोबारी, ठेकेदार, इंजीनियर या डॉक्टर की बेइमानी का अंतिम शिकार वहीं ग़रीब किसान और मज़दूर होते हैं, जिन्हें न्याय दिलाने के लिए माओवादियों ने इस सारी कहानी की शुरुआत की थी। तो, यहीं आकर मेरे अंदर का माओवादी भी मर जाता है। क्योंकि व्यक्तिगत तौर पर अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति जहां मुझे अपील करती है, वहीं संगठन बनाकर राज्य को चुनौती देने का सैद्धांतिक आवरण मुझे डराता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें दोष माओवादियों का ही नहीं है, यह तो संगठन का विज्ञान है। चाहे कथित खालिस्तान आंदोलन के नेता हों या कश्मीरी आतंकवाद के अगुवा या फिर उल्फा के अलंबरदार- सब ने करोड़ों की व्यक्तिगत संपत्तियां खड़ी की हैं और यह कोई गुप्त सूचना नहीं है। माओवादियों के प्रेरणा पुरुष नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड से पूछिए। सरकार को हर शोषण एवं अन्याय का मूल कारण बताकर और पूंजीवाद के जुमले गढ़ कर बिना जवाबदेही के अपहरण, हत्याएं और दूसरी आपराधिक गतिविधियां करना तो बहुत आसान है, लेकिन जब ख़ुद उन्हें ही देश का शीर्ष पद दे दिया गया तो वह निरर्थक विवाद पैदा करने और चीन के तलवे चाटने के अलावा कुछ नहीं कर सके। आजकल वह फिर आतंकवादी रास्तों पर लौटने की भूमिका तैयार कर रहे हैं।      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा यह सुविचारित मत है कि जंगल में घूमने वाले माओवादियों से ख़तरनाक क़ौम शहरों में रहने वाले कथित बुद्धिजीवी माओवादी हैं। बिनायक सेन की सज़ा पर एमनेस्टी इंटरनेशनल के लंदन कार्यालय से जताई गई चिंता की भाषा और तेवर देखिए। आपको समझ में आ जाएगा कि इन मानवाधिकार की आड़ में माओवाद बेच रहे ये कथित बुद्धिजीवी कितने ख़तरनाक हैं। गिलानी के साथ गलबहियां कर कश्मीर में भारतीय शासन को दुनिया का सबसे क्रूर और दमनकारी शासन बताने वाली अरुंधति राय इसी ख़तरनाक क़ौम का एक सिरा हैं। इसलिए जंगल को माओवादियों के सफाए से पहले इन शहरी माओवादियों को नकेल डालना बहुत ज़रूरी है, या कहें कि माओवाद पर विजय की पूर्व शर्त है। सवाल यह है कि रमन सिंह की सरकार की तरह क्या मनमोहन सिंह की सरकार भी इस पूर्व शर्त को पूरा करने का हिम्मत और इच्छा शक्ति रखती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-7564675036339523430?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/12/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-9031793761221362498</guid><pubDate>Fri, 15 Oct 2010 13:51:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-10-15T19:32:29.389+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Bukhari</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Secularism</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Hindu</category><title>ये हिंदू उदारता के वेस्ट बाईप्रोडक्ट्स हैं, इन्हें झेलते रहिए</title><description>इमाम अब्दुल्ला बुखारी ने पत्रकारों से भरे प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार को खुद भी पीटा और अपने गुंडों से भी पिटवाया। एक उर्दु अखबार के उस पत्रकार का दोष यह था कि उसने एक ऐसा सवाल पूछ लिया था, जो बुखारी को पसंद नहीं आया। सवाल था कि 1528 में अयोध्या के राम जन्मभूमि का खेसरा राजा दशरथ के नाम था। तो राजा रामचंद्र ही उसके स्वाभाविक उत्तराधिकारी होंगे। यह बात उच्च न्यायालय ने भी स्वीकार की है और सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जिलानी को भी इसकी जानकारी है। तो आपसी भाईचारे के लिए मुसलमान भाई क्यों नहीं राम जन्मभूमि हिंदुओं को सौंप देते। सवाल सुनने भर की देरी थी कि एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक मुस्लिम पूजा स्थल के मुख्य पुजारी ने गुंडों की भाषा में चिल्लाते हुए पत्रकार अब्दुल वहीद चिश्ती को गंदी और भद्दी गालियां दीं, उन्हें कौम का दुश्मन करार दिया और उनका सर कलम करने का आदेश दिया।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल्पना कीजिए कि इस घटना में बुखारी की जगह विश्व हिंदू परिषद या बजरंग दल का कोई नेता होता या किसी प्रतिष्ठित मंदिर के पुजारी होते, तो क्या होता। एनडीटीवी जैसे सेकुलर चैनल की अगुवाई में तमाम फेसबुकिए सेकुलरों ने हंगामा खड़ा कर दिया होता। देश के गृहमंत्री ने तो पहले ही आतंकवाद पर भगवा रंग पोत दिया है, अब हिंदू संगठन और पुजारियों के लिए भी नए-नए विशेषण गढ़े जा रहे होते। लेकिन देखिए सेकुलरिज्म का चमत्कार। सेकुलरों के मुंह पर ताला जड़ा है। बुखारी की गुंडागर्दी का यह पहला उदाहरण नहीं है। अभी कुछ साल पहले इसने जी न्यूज के एक पत्रकार (इत्तेफाक से वह भी मुस्लिम थे) पर भी हमला करवाया था। इसके बावजूद मुझे याद नहीं आता कि बात-बात में हिंदू प्रतीकों, संगठनों और परंपराओं पर नाक-मुंह बिचकाने वाले सेकुलरों ने कभी औपचारिकता के लिए भी इसके खिलाफ अपने जीमेल स्टेटस में या फेसबुक लेबल में विरोध दर्ज कराया हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही है भारत में सेकुलरिज्म का असली चरित्र। क्योंकि खुद को हिंदू विरोधी नहीं कह सकते, तो सेकुलर कहा जाता है। इन्हें मुसलमानों से भी प्रेम नहीं है। इन्हें बुखारियों, मदनियों और गिलानियों से प्रेम है। कोई मुसलमान इन लोगों के खिलाफ खड़ा होकर तो देखे, समर्थन तो दूर की बात ये सेकुलर उन्हें सहानुभूति देने तक नहीं आएंगे। अफसोस की बात यह है कि इसमें आप और हम तो क्या कहें, खुद ये सेकुलर भी कुछ नहीं कर सकते। इनकी मानसिक रचना ही कुछ ऐसी है, जन्मगत संस्कार ही कुछ ऐसे हैं। हिंदू संस्कृति और गौरव से जुड़ी हर बात का विरोध करने में इन्हें असीम आनंद का अनुभव होता है और उसी से उन्हें ऊर्जा भी मिलती है। इसलिए इनमें सुधार की उम्मीद व्यर्थ है। ये हिंदू परंपरा की उदारता के वेस्ट बाईप्रोडक्ट्स (कचरे) हैं, इन्हें झेलते रहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-9031793761221362498?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/10/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-6585662027749046207</guid><pubDate>Thu, 02 Sep 2010 10:19:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-09-02T15:52:08.147+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Saffron</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Naxals</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">chidambaram</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Terrorism</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Agnivesh</category><title>चिदंबरम साहब, मैंने आपको ग़लत समझा, मुझे माफ़ कर दीजिए</title><description>चिदंबरम साहब ने आतंकवाद को भगवा रंग दे दिया। बड़ा बवाल हुआ। भाजपा वाले हंगामा करने लगे और संघी आंखें चौड़ी तरेरने लगे। एक हिंदू होने और भारतीय इतिहास एवं संस्कृति में भगवा रंग का महत्व समझने के कारण मेरे मन में भी काफी उग्र प्रतिक्रिया हुई। एक-दो मित्रों के साथ चर्चा में मैंने चिदंबरम साहब को भला-बुरा भी कहा। लेकिन आज मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है। मैं चिदंबरम साहब से माफी मांगना चाहता हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     आज टीवी चैनलों पर मैंने सचमुच भगवा आतंकवाद का एक चेहरा देखा। भगवा चोले और भगवा पगड़ी में खड़ा वह आतंकवादी बड़ी निर्लज्जता से बिहार में नक्सलियों द्वारा चार पुलिसवालों के अपहरण को उचित ठहरा रहा था। वह कह रहा था कि क्योंकि बहुत से नक्सलियों को मामूली आरोपों के कारण जेल में बंद रखा गया है, इसलिए उन्हें छुड़ाने के लिए नक्सलियों का यह कृत्य सौ फीसदी सही है। वह सरकार को नसीहत (या शायद नक्सलियों की ओर से धमकी) दे रहा था कि वह नक्सलियों को प्रोवोक न करे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    मुझे तुरंत लगा कि मैंने चिदंबरम साहब को समझने में भूल कर दी। भगवा के पीछे छुपा अग्निवेश नाम का यह आतंकवादी सचमुच देश के लिए बहुत बड़ा खतरा है। किसी भी नक्सली से ज्यादा ख़तरनाक। क्योंकि यह आपके और हमारे बीच रहता है, मंचों पर शांति और मानवता की बातें करता है। ख़ास बात यह है कि वह ख़ुद चिदंबरम साहब और उनकी पार्टी की तरह सेकुलर है। चिदंबरम साहब की ही तरह उसका भी मानना है कि इस्लाम के नाम पर होने वाले हज़ारों विस्फोटों और लाखों क़त्लों के बावजूद इस्लामिक आतंकवाद शब्द ग़लत होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      और मुझे पूरा भरोसा है कि जब चिदंबरम साहब ने भगवा आतंकवाद को देश के लिए उभरता हुआ ख़तरा बताया था, तो ख़ुद भगवा में लिपटे रहने के बावजूद वह बहुत खुश हुआ होगा, क्योंकि इससे पूरे हिंदू समाज और हिंदू इतिहास पर कलंक के छीटें उड़ते हैं। लेकिन अब बात साफ हो गई है। चिदंबरम साहब का वैचारिक मित्र है यह आतंकवादी, इसलिए गृहमंत्री जी की राजनीतिक मज़बूरी भी समझनी चाहिए। सीधे अग्निवेश सरीखे आतंकवादियों के ख़तरे को बताने के बजाए उन्होंने उसे भगवा आतंकवादी क़रार दिया। कांग्रेसी हैं न बेचारे, तो उन्हें न हिंदू होने का मतलब पता है, न भगवा का। सो थोड़ी सी ग़लती कर गए। लेकिन अब मैं समझ गया हूं, इसलिए देश से प्रार्थना है कि वह चिदंबरम साहब को माफ़ कर दे और ख़ुद चिदंबरम साहब से प्रार्थना करता हूं कि वह मुझे माफ़ कर दें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-6585662027749046207?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/09/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-7346356052824791445</guid><pubDate>Sat, 21 Aug 2010 11:12:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-08-21T16:50:19.132+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">India Inc.</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">MP's Salary</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Parliament</category><title>इंडिया इंक के डायरेक्टरों का वेतन 1 करोड़ सालाना तो होना ही चाहिए</title><description>सांसदों का वेतन तीन गुना होने पर पूरा देश गुस्से और घृणा से भरा हुआ है। मैं इस पूरे मसले के उठने के दिन से ही सोच रहा हूं कि ऐसा क्यों है? मुकेश अंबानी, रतन टाटा, नंदन नीलेकणी और ऐसे सैकड़ों लोग हैं जिनका मासिक वेतन भी कुछ करोड़ रुपयों में है, लेकिन उनके प्रति तो कभी हमें गुस्सा नहीं आता। एक इंजीनियर, प्रोफेसर या टेलीविजन पत्रकार का औसत वेतन भी 30-40 हज़ार रुपए हो चुका है, तो फिर सांसदों का वेतन 16 हज़ार रुपए क्यों होना चाहिए? इस बात से शायद ही कोई इंकार कर सकता है कि 10-15 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले, हर महीने सैकड़ों लोगों की मेजबानी करने वाले और हर हफ्ते किसी ने किसी के निजी कार्यक्रम में शामिल होने और गिफ्ट देने वाले सांसदों का वेतन बढ़ना चाहिए। फिर यह गुस्सा और घृणा क्यों? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है कि यह गुस्सा और घृणा सासंदों पर नहीं बल्कि उनके सांसदपने पर है? हमारे देश के छह दशकों के महान लोकतंत्र की यह सबसे बड़ी कमाई है कि हमारे यहां राजनेता गुंडागर्दी, अपराध, भ्रष्टाचार और हर तरह की सामाजिक बुराई का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुके हैं। एक राजनेता सांसद चुने जाने के लिए 10-10 करोड़ रुपए तक खर्च करता है। बढ़े हुए वेतन के साथ भी उसका पांच साल का वेतन होगा करीब 2.5 करोड़। तो क्या इसी के लिए वह 10 करोड़ रुपए खर्च करता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांसदों पर इस देश की सुरक्षा से लेकर कृषि और शिक्षा से लेकर कारोबार तक के लिए नीतियां और कानून बनाने की ज़िम्मेदारी है। हमारे सांसद अपनी इस ज़िम्मेदारी को कितनी अच्छी तरह निभाते हैं, हम सबको पता है। कई बार तो कोरम पूरा नहीं होने के कारण संसद में किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा तक टालनी पड़ती है। और तो और, संसद के अंदर सवाल पूछने जैसे अपने मूल कर्तव्य के पालन के लिए भी सांसदों द्वारा घूस लिए जाने की घटना सामने आ चुकी है। हर सांसद को उसके 5 साल के कार्यकाल में सीधे उसके माध्यम से खर्च करने के लिए 10 करोड़ की रकम मिलती है। इसके अलावा दसियों सरकारी योजनाओं के लिए मिलने वाली करोड़ों रुपए की अन्य रकम भी सांसदों के ज़रिए खर्च होती है। इनमें वास्तव में कितना कल्याण योजनाओं पर खर्च होता है और कितना जनप्रतिनिधियों की अगुवाई में सरकारी अधिकारियों के बंदरबांट में निकल जाता है, इसका अनुमान हर भारतीय को है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो अब जब लालू जी के नेतृत्व में तमाम सांसदों ने (वामपंथियों को छोड़कर) जब अपने को ग़रीबी का पुतला बना कर वेतन बढ़ाने के लिए अभियान छेड़ ही दिया है, तो यह देश के लिए एक अच्छा मौक़ा है। तमाम सांसदों को देश रूपी कंपनी के बोर्ड का डायरेक्टर मानते हुए 1-1 करोड़ रुपए सालाना वेतन दे दिया जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही उन्हें मिलने वाली अनगिनत अन्य सुविधाएं वापस ली जानी चाहिए। वे और उनकी पत्नियों के लिए ट्रेन में प्रथम श्रेणी की आजीवन यात्रा सुविधा के अलावा विमान में मुफ्त टिकट, लुटियंस ज़ोन में मुफ़्त बंगले आदि की सुविधाएं वापस लेना चाहिए। बोर्ड की यानी संसद की बैठकों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य करनी चाहिए। उनके लिए सीएल, पीएल, मेडिकल और सिक लीव तय होनी चाहिए और उससे ज्यादा छुट्टी लेने पर उन्हें विदाउट सैलेरी करना चाहिए। जो फंड उन्हें जनता के लिए दिया जाए, उसके एक-एक पैसे का हिसाब उसी तरह होना चाहिए जैसे किसी कंपनी के डायरेक्टरों के हस्ताक्षर से खर्च होने वाली रक़म का होता है। साथ ही भ्रष्टाचार के किसी भी मामले में पकड़े जाने पर उन्हें बोर्ड से बाहर किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू जी को प्रधानमंत्री बनने का बड़ा शौक़ है। सो एक दिन के लिए ही सही, एक छद्म संसद बनाकर वह प्रधानमंत्री तो बन ही गए। और इत्तेफाक़ तो देखिए, वह छद्म प्रधानमंत्री बने भी तो उसी काम के लिए, जिसके लिए वह वास्तव में प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते हैं- और ज्यादा पैसे बनाने के लिए। तो ये जिस योजना का ब्लूप्रिंट मैं यहां रख रहा हूं, वह निश्चित तौर पर ऐसे सांसदों के बूते की नहीं है जो लालू जैसे नेता को केवल अपना वेतन बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री मानने को तैयार हैं। तो फिर... । इस यूटोपिया को पाने के लिए किसी और नेता की ज़रूरत है, जो कम से कम अभी तो दृष्टिपटल पर नहीं। तो, तब तक हर मंच पर इसके लिए आवाज़ उठाते हुए उस नेतृत्व का इंतज़ार करते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-7346356052824791445?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/08/1.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-4232160817412637956</guid><pubDate>Fri, 20 Aug 2010 09:20:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-08-20T14:53:58.570+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Commonwealth</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Manmohan Singh</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Sonia Gandhi</category><title>सोनिया जी, आप महान हो, आपको शत-शत प्रणाम</title><description>सोनिया जी, आज सभी अखबारों में आपका बयान पढ़ा। आपने बहुत ही सख़्त चेतावनी दी है राष्ट्रमंडल के घोटालेबाजों को। आपने कहा है कि खेल आयोजन ख़त्म होने के बाद किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा। वाह, इसे कहते हैं टाइमिंग। जिस सरकार और जिस पार्टी में आपकी मर्ज़ी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता है, वहां अगर कहीं किसी को पहले आपके इस रुख़ का अहसास हो गया होता, तो सब गड़बड़ हो जाती। हज़ारों करोड़ की लूट नहीं हो पाती और देश की प्रतिष्ठा मटियामेट नहीं हो पाती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो खेल सालों पहले से तय थे, जिसकी निगरानी के लिए आपके लाडले के विराट व्यक्तित्व की छत्रछाया में 2005 में ही समिति का गठन हो चुका था, जिसके आयोजन क्षेत्र यानी दिल्ली में आपके दरबार में शीर्षासन करने वालों की सरकार 12 साल से है, जिन खेलों का सूत्रधार आपकी पार्टी का एक सांसद है, उन खेलों के आयोजन में हो रहा घोटाला महीनों से मीडिया की सुर्खियां बना रहा। लेकिन आपने पूरी तरह यह सुनिश्चित किया कि आपकी चेतावनी खेल शुरू होने से केवल 45 दिन पहले ही सामने आए। जब पहले ही 650 करोड़ रुपए के बजट पर 35,000 करोड़ रुपए की लूट हो चुकी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर इस देश के प्रधानमंत्री को भी तो केवल 59 दिन पहले ही इन खेलों पर पहली बार ध्यान देने की ज़रूरत महसूस हुई। ईमानदारी और सुराज के प्रति आपकी निष्ठा... वाकई बेजोड़ है। लेकिन ये देश में जो कैग और सीवीसी जैसे कुछ बदमाश संगठन हैं न, आपको परेशान करने पर तुले रहते हैं। दोनों ने टेलीकॉम मंत्री राजा के खिलाफ जांच शुरू कर दी है। दोनों कह रहे हैं कि राजा जी ने टेलीकॉम लाइसेंस देने में 26,000 करोड़ रुपए का घोटाला कर दिया। अब इतनी बड़ी बात कहने से पहले इन्हें आपसे भी तो सलाह ले लेनी चाहिए थी। लेकिन कोई बात नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए कानून मंत्रालय को राजा जी की सुरक्षा में उतार दिया है। आपके कानून मंत्रालय ने कैग और सीवीसी की औकात बताते हुए कह दिया है कि उन्हें न तो इस तरह घोटाले उजागर करने का अधिकार है और न ही उन्हें इसके लिए जिम्मेदारी दी गई है। अब अगर इतने से ही काम हो गया, तो ठीक है, लेकिन अगर ज्यादा हल्ला-हंगामा होगा, तो आप फिर एक बयान दे ही देंगी कि कानून को अपना काम करने दिया जाएगा। आपका बयान सारे अखबारों के पहले पन्ने की सुर्खी बन जाएगा और आपकी सरकार एक बार फिर सार्वजनिक जीवन में शुचिता का प्रतीक बन जाएंगी। आपकी यह रणनीति अचूक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इसीलिए आपका फैन हूं। आपको प्रधानमंत्री बनने से रोककर कुछ मूर्खों को ऐसा लगा कि वह उन्होंने आपके प्रभाव की सर्वव्यापी चादर पर कैंची चला दी। लेकिन अगले कुछ वर्षों के भीतर हरकिशन सिंह सुरजीत से लेकर लालू, मुलायम, अमर सिंह जैसे नेताओं को अपने दरबार में नाक रगड़वा कर आपने यह साबित कर दिया कि उन मूर्खों को आपके महान व्यक्तित्व का ज़रा भी आभास नहीं था। आपको राजनीति का नवसिखुआ मानने वालों से बड़ा बुद्धू कौन है? देखिए न, आपका गृहमंत्री नक्सलवाद के खिलाफ पूरी ताकत झोंक दे रहा है और आपके राहुल बाबा के ड्रीम प्रोजेक्ट उत्तर प्रदेश का पार्टी प्रभारी आए दिन उसी गृहमंत्री के खिलाफ अखबारों में लेख लिख रहा है और बयान दे रहा है। बीच-बीच में आपके दरबारी रिपोर्टर अखबारों में यह ख़बर भी देते रहते हैं कि पार्टी हाईकमान ने दिग्विजय जी को गै़रज़िम्मेदाराना बयान न देने की ताक़ीद कर दी है। अब बताइए न, वास्तव में जिस दिन आप दिग्विज जी को एक बार यह चेतावनी दे देंगी, उसके बाद उनकी जबान तालू से न चिपक जाएगी। लेकिन, राजनीति का यह गुर दशकों तक चप्पल घिस कर थोड़े ही सीखा जाता है, जो भाजपाई और वामपंथी समझ जाएंगे। यह तो आपको दैवी वरदान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के होने वाले प्रधानमंत्री और आपके सुपुत्र ग़रीब जनता के साथ मिट्टी की टोकरी कंधे पर उठाकर तस्वीरें खिंचवाते हैं और सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे ज़्यादा पिछड़े वर्गों के घरों में रात बिताते हैं। यह ज़रूर आप ही की समझदारी होगी। नहीं तो आपकी सरकार ने जिस तरह ग़रीबों का आटा गीला किया है और जीवन की मूलभूत सुविधाओं को भी लग्ज़री बना दिया है, उसके बाद भी आप की पार्टी ग़रीबों की सबसे हमदर्द होने का दावा करे, यह कमाल कैसे हो सकता था। आपकी प्रतिभा का लोहा तो देश को उसी दिन मान लेना चाहिए था, जब आपने एक मिट्टी के माधो को अपने परिवार की सवा सौ करोड़ लोगों की प्रजा का भाग्यनियंता तय कर दिया। क्या शानदार चुनाव था आपका। जैसे नरसिंह राव ने देश की हर समस्या का समाधान चुप्पी में ढूंढ लिया था, वैसे ही डॉ मनमोहन सिंह के लिए हर बीमारी का रामबाण इलाज मंत्रियों का समूह है, जिसे जीओएम कहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां तक कि सरकार के ही दो विभागों की आपसी लड़ाई में भी प्रधानमंत्री मामला जीओएम को ही सौंप देते हैं। इसीलिए तो राष्ट्रमंडल जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय को उन्होंने शीला दीक्षित और कलमाडी की बिटिया की शादी का आयोजन सरीखा बनवा दिया। वैसे ही, कश्मीर जैसे अहम राष्ट्रीय मसले पर वह कानों में तेल डाले सोए रहे और जब घाटी में आम लोगों का नक़ाब पहने अलगाववादियों के प्रदर्शन में 50 से ज़्यादा जानें चली गईं और पूरी जनता भारत विरोधी नारे लगाने लगी, तब उनकी ओर से पहला बयान आया। बयान भी क्या? अलगाववादियों के एजेंडे यानी स्वायत्तता और सुरक्षा बलों के विशेष अधिकार वाले कानून पर विचार करने का बयान। मानना पड़ेगा सोनिया जी आपकी पारखी नज़रों को। दस साल पहले आपने अपने एजेंडे को पूरा करने वाला एक ऐसा व्यक्ति तलाश लिया, जो शैक्षणिक डिग्रियों और करियर प्रोफाइल में तो इस देश की व्यवस्था का मज़बूत स्तंभ लगे, लेकिन 7, रेसकोर्स में बैठकर आपके एजेंडे पर मुहर लगाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे हरि अनंत, हरि कथा अनंता, उसी तरह आपकी भी महिमा अपरंपार है। पूरी धरती को कागज़ और सातों समुंदरों को स्याही बनाकर भी उसका गान नहीं किया जा सकता। उम्मीद है मेरी इस छोटी सी कोशिश में आपके जो बहुत सारे दूसरे चमत्कारों की चर्चा नहीं हो पाई है, उसके लिए आप मुझे माफ करेंगी। आप महान हैं, आपको शत-शत नमन।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-4232160817412637956?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/08/blog-post_20.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>5</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-3791497414630745989</guid><pubDate>Sat, 07 Aug 2010 11:10:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-08-07T16:48:47.233+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kashmir</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">India</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Muslims</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Hindu</category><title>कश्मीर को बचाना है तो यही एक रास्ता है</title><description>आज ज़ी न्यूज के क्राइम रिपोर्टर कार्यक्रम में तीन घटनाएं दिखाई गईं। पहली घटना में, हरिद्वार में बलात्कार के आरोपी दो वीडियो डायरेक्टरों को दारोगा जी थाने के बाहर खुलेआम पीट रहे थे। बाकी पुलिस वाले गंडों की तरह उन्हें घेर कर खड़े थे और सरगना अपनी गुंडागर्दी दिखा रहा था। दूसरी में, दिल्ली पुलिस ने एक पटरी कारोबारी को अतिक्रमण हटाने का विरोध करने के आरोप में हिरासत में लिया और दो घंटे बाद कारोबारी के घर वालों को उसकी लाश मिल गई। और तीसरी घटना, बेंगलुरु में एक पार्टी में हंगामा करने के आरोप में 16 छात्रों को थाने में लाने के बाद दारोगा ने उनकी पिटाई की और छोड़ने के लिए घूस मांगा। 15 हज़ार रुपए से शुरू की गई मांग आख़िरकार 300 रुपए प्रति छात्र पर आकर टिकी और वसूली के बाद छात्रों को छोड़ा गया। किसी एक छात्र ने मोबाइल फोन से इस घटना की वीडियो फ़िल्म बना ली और स्क्रीन पर नोट गिनता दारोगा साफ दिख रहा था। घटना का विश्लेषण कैसे किया जाएगा? पुलिस की दरिंदगी, ख़ाकी का रौब, पुलिसिया गुंडागर्दी, पुलिस की ब्रिटिश ज़माने की कार्यपद्धति इत्यादि-इत्यादि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब एक प्रयोग कीजिए। घटनाएं वही रहने देते हैं, जगह बदल देते हैं। पहली घटना हरिद्वार की जगह कश्मीर के पुलवामा की है, दूसरी श्रीनगर की और तीसरी नौशेरा की। अब देखिए, विश्लेषण के विशेषण बदल जाएंगे। भारतीय पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की दरिंदगी, भारतीय ख़ाकी का रौब, भारत की गुंडागर्दी, भारतीय बलों की कार्यपद्धति इत्यादि-इत्यादि। जिस कश्मीर में चंद वर्षों पहले आतंकवादियों की धमकियों के बावजूद लाखों की संख्या में सड़कों पर निकल कर लोगों ने लोकतांत्रिक ढंग से सरकार चुनने के लिए वोट दिया, उसी कश्मीर में आज सड़कों पर खुले-आम आज़ादी के नारे लग रहे हैं। जो खबरें आ रही हैं, उनसे तो यही लग रहा है कि इन नारों को पाकिस्तानी भोंपू की आवाज़ कह कर ख़ारिज कर देना सही नहीं होगा। इन नारों में बच्चों की, औरतों की और बूढ़े-बुज़ुर्गों की आवाज़ें भी शामिल हैं। यह अलग बात है कि ये सारी खबरें बचपन से पाकिस्तानी प्रोपेगेंडे और आतंकवाद समर्थक मस्जिदों से आने वाले &lt;a href="http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/07/blog-post.html"&gt;भारत विरोधी फतवों के बीच पले-बढ़े कश्मीरी रिपोर्टरों&lt;/a&gt; द्वारा फाइल की जा रही हैं, लेकिन फिर भी, बिना किसी विकल्प के मैं इन्हें सही मान लेता हूं। तो कुल मिलाकर तस्वीर यह बन रही है कि कश्मीर आज़ाद होना चाहता है। भारत एक औपनिवेशिक ताक़त है, जिसने कश्मीर पर कब्ज़ा कर रखा है और जिसके 7 लाख सैनिक चंगेज खां के सैनिकों की तरह हर कश्मीरी बच्चे को बंदूकों के संगीनों पर उछाल रहे हैं और हर कश्मीरी महिला की आबरू लूट रहे हैं। विश्वास मानिए, अपने देश में (कश्मीर के अलावा) इस तस्वीर को सच मानने वालों की एक पूरी जमात है। लेकिन जो लोग ऐसा मानते हैं, उनके लिए मैं अपना लेख यह कहते हुए यहीं समाप्त करता हूं कि उन्हें एक बार कम से कम हफ्ते भर के लिए श्रीनगर, और हो सके तो, कश्मीर के कस्बों में घूम आएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन लोगों को लगता है कि कश्मीर भारत का उसी तरह हिस्सा है, जैसा कि उनके अपने धड़ पर जमा सिर, वे मेरे साथ आगे चल सकते हैं। वहां वर्षों से हम देख रहे हैं, सुन रहे हैं कि कश्मीर में होने वाले हर भू-स्खलन, आने वाली हर बाढ़ और होने वाले हर हिमपात में देश के कोने-कोने से वहां पोस्टेड सैनिक कश्मीरियों की मदद करते हैं। हर वक्त किसी भी दिशा से होने वाले संभावित हमले का जोखिम झेलते हुए चौबीसों घंटे गश्त लगाते हैं। और जनता के प्रति दोस्ती के सैकड़ों व्यवहार करने के बाद भी जब हजारों की संख्या में लोग उनपर पत्थर फेंकते हैं, तो उन्हें संयम रखना होता है। इसके विपरीत आतंकवादियों को चाहे भय से या लालच से, वहां के घरों के पनाह मिलती है। वे घरों में रुकते हैं, रात को खाना खाते हैं, घर की लड़कियों का बलात्कार करते हैं और सुबह चले जाते हैं। उनके खिलाफ़ कोई चूं नहीं करता। किसी भी किसी एक पुलिस वाले की निजी वहशियत और लालच, पूरी भारत सरकार की साज़िश क़रार दी जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले मुझे भी लगता था कि कश्मीर की समस्या का समाधान वहां की जनता के दिलों को जीत कर किया जा सकता है। लेकिन पिछले कुछ समय की घटनाओं ने इस तस्वीर का एक बिलकुल नया ही आयाम सामने आया है। पिछले साल अमरनाथ के यात्रियों के लिए वहां की सरकार ने कुछ सुविधाएं घोषित की थी। लेकिन जिस तरह वहां की जनता ने व्यापक पैमाने पर उन सुविधाओं का विरोध किया, उससे राज्य के अलगाववादियों का एजेंडा साफ हो गया। वैसे तो पाकिस्तान के रोडमैप पर चलने वाले आतंकवादियों का एजेंडा काफी सालों पहले उसी समय साफ हो गया था, जब चुन-चुन कर कश्मीरी हिंदुओं को घाटी के बाहर खदेड़ दिया गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उसके बाद से कांग्रेसियों, फारूक़ अब्दुल्ला सरीखे नेताओं और यासीन मलिक जैसे कथित उदारवादी अलगाववादियों के कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के समर्थन में दिए गए भ्रामक बयानों से यह ग़लतफ़हमी बनी रही कि यह एजेंडा कश्मीरी मुसलमानों का नहीं, मुट्ठी भर आतंकवादियों का है। पर, अमरनाथ यात्रियों को दी गई सुविधाओं के खिलाफ उठे आंदोलन ने यह ग़लतफ़हमी दूर कर दी। यह दरअसल उसी सत्य का प्रतिस्थापन था कि मुसलमान तभी तक सेकुलर रहता है, जब तक वह अल्पसंख्यक होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस देश में हज पर जाने वाले हर मुसलमान को 40 हजार रुपए की सब्सिडी (2009-10 में हज सब्सिडी के लिए सरकारी खजाने से 941 करोड़ रुपए खर्च किए गए) दी जाती है, वहां देश के हिस्से में तीर्थ जाने वाले हिंदुओं को सुविधा देने की सरकारी कोशिश स्थानीय मुसलमानों को इतनी नागवार क्यों गुजरनी चाहिए? वह भी तब जब अमरनाथ की यात्रा पर जाने वाले हर हिंदू को इसके लिए अतिरिक्त टैक्स देना होता है। अमरनाथ जाने वाले यात्रियों के लिए सरकार ने केवल 99 एकड़ (0.4 वर्ग किलोमीटर) ज़मीन अधिगृहित की थी। वो भी इस शर्त के साथ कि उस पर केवल यात्रा के सीजन में अस्थाई निर्माण किए जाएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कश्मीर के मुसलमानों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। इसके विरोध में 5 लाख मुसलमानों का जुलूस निकला, जो कश्मीर के इतिहास में किसी एक दिन में हुआ अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन है। यह है कश्मीरी मुसलमानों का सेकुलरिज़्म। अक्सर कहा जाता है कि अमरनाथ के लिए दी जाने वाली खच्चर या पालकी सेवा तो मुसलमान ही देते हैं या कि अमरनाथ के शिवलिंग की व्यवस्था एक मुसलमान परिवार करता है। यानी जब कमाई और चढ़ावे से फायदा लेने की बात आती है तो कश्मीरी मुसलमान सेकुलर हो जाता है, लेकिन जैसे ही श्रद्धालुओं को चंद सुविधाएं देने की बात आती है, तो वे सड़कों पर उतर आते हैं। वाह रे सेकुलरिज़्म।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कश्मीरी मुसलमानों ने साबित कर दिया है कि भारत उनके लिए केवल सुविधाएं और धन लूटने का ज़रिया भर है। आतंकवाद एक ऐसा कमाऊ पूत है, जिसका भय दिखा-दिखा कर कश्मीर के कई सियासी परिवार करोड़पति हो चुके हैं। कश्मीर में केवल सेना पर हर साल सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं और लाखों सैनिक अपने परिवारों से दूर हर समय जानलेवा हमले के साए में नारकीय जीवन जी रहे हैं। कश्मीर को भारत से जोड़े रखने के लिए पहली ग़लतफ़हमी तो यह ख़त्म करनी होगी कि कश्मीर, कश्मीरियों का है। इसलिए कि कश्मीरी की परिभाषा क्या है? क्या लाखों की संख्या में कश्मीरी से खदेड़े गए हिंदू कश्मीरी नहीं हैं? अगर हैं, तो दशकों से वे कश्मीर से बाहर क्यों हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालिया पत्थरबाज़ी और प्रदर्शनों में भी सोपोर में दो कश्मीरी हिंदुओं के घरों को जलाने की घटना सामने आई। अगर कश्मीर, कश्मीरियों का है तो सोपोर में हिंदुओं के घर क्यों जलाए गए। इसलिए, कि चाहे कम्युनिस्ट यह न मानें और कांग्रेसियों को यह मानने में जबान हलक में अटकती हो, लेकिन यही सच्चाई है कि कश्मीर में मौजूद हर हिंदू को वहां भारत की उपस्थिति का सूचक माना जाता है। अगर भारत कश्मीर को बचाना चाहता है, तो इस संकेत से इसकी दवा ढूंढनी होगी। कश्मीर, कश्मीरियों का नहीं भारत का है। जिसे भारत में नहीं रहना, वह यहां से जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कश्मीर को बचाना है तो एकमात्र उपाय है वहां का जनसंख्या संतुलन बदलना। मीडिया को वहां से बाहर निकालिए, दुनिया को चिल्लाने दीजिए। श्रीलंका ने दुनिया को दिखा दिया है कि अपनी घरेलू समस्याओं को सुलझाने के लिए केवल इच्छाशक्ति की ज़रूरत होती है, अमेरिका या यूरोप के समर्थन की नहीं। दो चरणों में कार्यक्रम बनाइए। पहले चरण में बड़े-बड़े शहर बसाइए और वहां घरों से निकाले गए कश्मीरी हिंदुओं को ससम्मान स्थापित कीजिए। दूसरे चरण में सेवानिवृत्त सैनिकों और अर्धसैनिक बलों की बस्तियां बसाइए। बस्तियां सुनते ही इजरायली बू आती है। लेकिन दोनों मामलों में कोई समानता नहीं है, इसलिए इस पर रक्षात्मक होने की कोई ज़रूरत नहीं है। जब तक कश्मीर में जनसंख्या का अनुपात 60 मुसलमानों पर कम से कम 40 हिंदुओं का न हो जाए, कश्मीर को भारत से जोड़े रखने के लिए इसी तरह बेहिसाब मेहनत, धन और जानें खर्च होती रहेंगीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-3791497414630745989?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/08/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>8</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-1437846029793845305</guid><pubDate>Thu, 01 Jul 2010 07:10:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-07-01T12:46:01.627+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Kashmir</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">India</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Bhuwan Bhaskar</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Stone Pelters</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Reporters</category><title>कश्मीर का हर रिपोर्टर कश्मीरी ही क्यों होना चाहिए?</title><description>एक सवाल है- गुजरात के दंगों की रिपोर्टिंग करने के लिए लगभग सभी चैनलों और अखबारों ने दिल्ली से अपने रिपोर्टर भेजे थे। कश्मीर की रिपोर्टिंग के लिए हमेशा कश्मीरियों को ही क्यों सबसे उपयुक्त माना जाता है? गुजरात के ज़्यादातर स्थानीय अखबारों और चैनलों ने गुजरात दंगों के दौरान मोदी सरकार की भूमिका की सराहना की, लेकिन उन्हें मोदी समर्थक और साम्प्रदायिक मानकर ख़ारिज कर दिया गया। कश्मीर की स्थानीय मीडिया की अलगाववादियों से सहानुभूति रखते हुए की जाने वाली रिपोर्टिंग पर सवाल क्यों नहीं उठाए जाते? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे मन में ये सवाल इसलिए आ रहे हैं, क्योंकि मैंने पिछले 4 दिनों में दसियों अखबारों और चैनलों की कश्मीर रिपोर्टिंग देखी है। मुझे एक भी रिपोर्टर ग़ैर कश्मीरी नहीं दिखा। तमामचैनलों के रिपोर्टरों की रिपोर्टिंग सुनी मैंने। सब पहले से आखिरी लाइन तक केवल यही बता रहे हैं कि सुरक्षा बलों की गोलियों से मारे गए बच्चों की उम्र 10 साल, 13 साल, 17 साल और ब्ला-ब्ला... थी। न एंकर ने यह पूछने की जहमत उठाई कि मारे गए इन बच्चों को क्या घर से उठा कर लाया गया था, न रिपोर्टर ने यह बताना उचित समझा कि ये बच्चे उन दंगाइयों में शामिल थे, जो सुरक्षा बलों पर पथराव कर रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़र्ज कीजिए, आपके शहर में धारा 144 लागू है। आपके घर के बाहर पुलिस की गोलियों की आवाज़ सुनाई दे रही है और लोग पुलिस वालों पर हमले कर रहे हैं। आप 9 साल के अपने छोटे भाई के साथ बाहर निकलते हैं और अपने भाई को एक पत्थर थमाते हुए कहते हैं कि सीधे पुलिस वाले के सर पर मारना। छोटा बच्चा है, आपने ख़ुद तो दीवार की ओट ले ली और बच्चा बेचारा सड़क के बीच मे आकर पत्थर चलाने लगा। पुलिस की रबर की गोली उसकी छाती में लगी और आपके नन्हे से भाई ने वहीं दम तोड़ दिया। आपके भाई का हत्यारा कौन है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सवाल कोई नहीं पूछ रहा है कि अगर पथराव करने वालों में 30 साल, 32 साल, 40 साल, 28 साल, 37 साल और इसी तरह बड़ी उम्र वाले शामिल हैं, तो मरने वाले केवल बच्चे ही क्यों हैं? क्या इसका मतलब यह नहीं कि कश्मीर के पत्थरबाज छोटे बच्चों को ह्युमन शील्ड के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं? कश्मीर में पत्थरबाजी की कहानी अब राज़ नहीं रह गई है। सबको पता है कि वहां पत्थरबाजी एक धंधा बन गया है। बेरोजगार युवकों को इसके लिए बाक़ायदा रुपए दिए जाते हैं। इसके लिए शहर के बाहर से पत्थर आयात किए जाते हैं और सुरक्षा बलों पर उन्हें फेंकने के लिए ज़खीरा तैयार किया जाता है। पत्थर फेंकने वाले गुस्से से भरे आंदोलनकारी नहीं होते, बल्कि पेशेवर और भावशून्य बेरोजगार युवक होते हैं, जिन्हें इसके बदले रुपए दिए जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर कश्मीर पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार इन बातों को क्यों नहीं उभारते? इसका जवाब आप ख़ुद सोचिए, क्योंकि कुछ सच्चाइयां ऐसी होती हैं, जिन्हें बोलना या सुनना बहुत कड़वा लगता है। जहां पूरे समाज में ही दिन-रात भारत के खिलाफ विष घोला जाता हो, जहां भारतीय दूरदर्शन से ज्यादा पाकिस्तानी टीवी का प्रोपेगेंडा असर करता हो, जहां शासन के आदेश से ज्यादा मस्जिद की घोषणाओं को तवज़्जो़ दी जाती हो, जहां हर भारतीय सैनिक की छवि हत्यारे और बलात्कारी के तौर पर स्थापित की जाती हो, उस माहौल में पले-बढ़े रिपोर्टर से कैसी रिपोर्टिंग की उम्मीद करेंगे आप? गुजरात की अदालतों तक को निष्पक्ष न मानने वाले हम भारतीय अगर कश्मीर की हर आवाज़ को सच मान रहे हैं, तो हमारी सोच के साथ कुछ गड़बड़ तो है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-1437846029793845305?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/07/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-7957910994261663099</guid><pubDate>Fri, 25 Jun 2010 08:17:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-06-25T13:52:23.740+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Santosh Hegde</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Yeddyurappa</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Corruption</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">BJP</category><title>लॉन्ग लिव हेगड़े, येद्दुरप्पा इज डेड</title><description>'पार्टी विद ए डिफरेंस' के भारतीय जनता पार्टी के दावे की हवा तो बहुत पहले निकल चुकी थी, अब कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े के इस्तीफे के बाद उसे अगर 'पार्टी विद एग ऑन इट्स फेस' (कालिख पुते चेहरे वाली पार्टी) कहा जाए, तो शायद ही कोई अतिशयोक्ति होगी। पब में लड़कियों को बाल पकड़ कर घसीटते हुए गुंडों का संरक्षण करने वाली कर्नाटक की भाजपा सरकार ने इस बार ईमानदारी को अपना निशाना बनाया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले साल जब कच्चे लोहे के तस्कर और राज्य के मंत्री रेड्डी भाइयों की ओर से सरकार गिराने की धमकियों के बाद टेलीविजन चैनलों पर येद्दुरप्पा का आंसू बहाता चेहरा हमने देखा था, तो लगा था कि एक ईमानदार, शरीफ राजनेता रेड्डी भाइयों की राजनीति का शिकार हो रहा है। मुझे उस समय भी आश्चर्य हो रहा था कि क्यों भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सरकार में मंत्री बनाए गए तीन तस्करों के आगे घुटने टेक रहा है। हो सकता है कि यही सरकार बचाने की कीमत रही हो, लेकिन अगर किसी भी कीमत पर सरकार बचाना ही राजनीति है, तो इस पार्टी के किसी भी नेता के मुंह से 'नैतिकता' और 'मूल्य' जैसे शब्द निकलते ही चार जूते लगाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश और लोकायुक्त हेगड़े ने इस्तीफा देते हुए जिन बातों का खुलासा किया है उसके बाद मुझे समझ में आ रहा है कि येद्दुरप्पा के आंसू दरअसल उनकी शराफत के नहीं, बल्कि उनकी नपुंसकता के आंसू थे। वे आंसू थे, जिंदगी भर के सपने यानी मुख्यमंत्री का पद छिनने के डर के। हेगड़े देश से विलुप्त होती उस दुर्लभ प्रजाति का हिस्सा हैं, जो ईमानदारी को अपना सर्वोच्च धर्म मानती है। उन्होंने रेड्डी भाइयों की तस्करी पर लगाम कस दिया था। कई भ्रष्ट वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने उनके डर से इस्तीफे दे दिए थे। उन्होंने जिन निष्ठावान और ईमानदार अधिकारियों की अपनी टीम बनाई थी, उनका कहना है कि तीन वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने कभी किसी जांच में हस्तक्षेप नहीं किया और कभी अपनी ज़िम्मेदारी को दूषित नहीं होने दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस शासन में जनप्रतिनिधि और पुलिस वाले अपना घर भरने में लगे हों, वहां हेगड़े ग़रीब और बेसहारा लोगों के लिए भगवान की तरह थे, जो अस्पताल से खदेड़ दी गई एक ग़रीब औरत के रात दो बजे किए गए फोन पर प्रतिक्रिया देते हुए अस्पताल फोन करते थे और उसके आठ महीने के बच्चे की भरती सुनिश्चत करवाते थे (हेगड़े के बारे में कर्नाटक में प्रचलित कई कहानियों में से एक)। ऐसे हेगड़े जब इस दर्द के साथ इस्तीफा देते हैं कि पूरी भाजपा सरकार भ्रष्टाचार का पोषण कर रही है, तो निर्लज्ज येद्दुरप्पा एक शातिर राजनेता की तरह यह बयान देते हैं कि उन्हें इस घटना से बहुत सदमा लगा है, लेकिन हेगड़े साहब का शर्मिंदा न करने के लिए वह उनसे इस्तीफा वापस लेने को नहीं कहेंगे। ठीक ही है। येद्दुरप्पा, रेड्डी और गडकरी से शर्मिंदा होने की तो उम्मीद की नहीं जा सकती, हेगड़े ही शर्मिंदा होने के लिए रह गए हैं अब।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिद्धांत गढ़ने और लच्छेदार ज़ुमले उछालने में भाजपा नेताओं का कोई सानी नहीं है। भय, भूख और भ्रष्टाचार मिटाने का दावा करने वाली यह पार्टी है, जिसके शासन वाले राज्यों में गुजरात को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा हो, जिसके मुखिया पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप न हों। ज्यादा भयंकर बात यह है कि इन आरोपों पर पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को कोई शर्म नहीं आती, उसके कानों पर जूं नहीं रेंगती। अगर उसका मुख्यमंत्री शातिर है, राज्य को लूट का अड्डा बना कर भ्रष्ट विधायकों को अपने काबू में रख रहा हो, तो इससे शीर्ष नेतृत्व को कोई परेशानी नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मरती हुई पार्टी के सांसों से उठती दुर्गंध है। मेरी चिंता यह है कि स्वामी विवेकानंद, शिवाजी महाराज, मदनमोहन मालवीय, डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार, बाल गंगाधर तिलक और ऐसे ही सैकड़ों खालिस चरित्रवान और देशभक्त महापुरुषों के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा देकर चुनाव जीतने वाली भाजपा का यह घिनौना चेहरा देश की जनता का भरोसा पूरे सिद्धांत से कमजोर कर देगा क्योंकि आखिरकार किसी भी राष्ट्र का चरित्र उसके नेता के भाषण से नहीं, बल्कि उसके कृत्य से बनता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-7957910994261663099?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_25.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-913024126567400406</guid><pubDate>Thu, 24 Jun 2010 06:46:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-06-24T12:34:41.671+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Jaswant Singh</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">RSS</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">BJP</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Advani</category><title>जसवंत की बाइज़्ज़त वापसी के साथ ही बेआबरू हुई भाजपा</title><description>भारतीय जनता पार्टी में जसवंत सिंह की वापसी हो गई है। जसवंत का पार्टी से निकाला जाना और उनकी पार्टी में वापसी, दोनों का भाजपा के इतिहास में खास महत्व रहेगा। मज़ेदार बात यह है कि भले ही ये दोनों घटनाएं आपस में एक दूसरे की पूरक दिख रही हों, मुझे लगता है कि ये दोनों ही पार्टी में आ रही ज़बर्दस्त गिरावट और उसके पतन की राह में दो महत्वपूर्ण मील के पत्थर है। जसवंत सिंह को निकालने के पीछे वजह बहुत ही साफ और तार्किक थी, लेकिन तरीक़ा बिलकुल अलोकतांत्रिक और ग़ैर-राजनीतिक था। खबरें ऐसी भी आई थीं कि तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और राजस्थान की भाजपा नेता वसुंधरा राजे की व्यक्तिगत राजनीति के कारण जसवंत की बलि ली गई। एक एंगल संघ का भी था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कारण जो भी रहा हो, जिस तरीके से यह पूरी कार्रवाई की गई, उससे साफ था कि यह पार्टी की अंदरूनी राजनीति का हिस्सा था। लेकिन इसके पीछे की वजह बिलकुल उचित थी। पार्टी के शीर्ष पर बैठा नेता अगर पार्टी के बुनियादी सिद्धांतों में ही यक़ीन नहीं रखता, तो उसके पार्टी में रहने का कोई कारण नहीं है। हालांकि जिस तरह शिमला की बैठक के लिए पहुंचने के बाद बिना स्पष्टीकरण मांगे राजनाथ ने उन्हें होटल में ही फोन कर के हटाए जाने की सूचना दी, वह पार्टी के व्यक्तिवादी और पतनशील होते जाने का एक लाजवाब उदाहरण था। मेरा स्पष्ट मत है कि यह विकल्प जसवंत को देना चाहिए था कि या तो वह अपनी लिखी क़िताब के उस हिस्से को एक्सपंज करें यानी वापस लें, जिसमें उन्होंने लिखा है कि जिन्ना विभाजन के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं या फिर स्वयं पार्टी छोड़ दें। लेकिन ऐसा नहीं किया गया और उन्हें आनन-फानन में पार्टी से निकाल दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उस घटना के क़रीब 10 महीने बाद पार्टी को यह लग रहा है कि बीती बातों को भुला देना चाहिए। 'बीती बातें' !!! राष्ट्रीय जीवन के सार्वभौम सिद्धांत क्या कभी पुराने पड़ सकते हैं? ख़ास बात यह है कि जसवंत ने इस दौरान एक बार भी जिन्ना या सरदार पटेल पर अपने विचारों में बदलाव का संकेत तक देना ज़रूरी नहीं समझा। यानी जसवंत ने अपनी निजी साख पर तो धूल का एक कण तक नहीं लगने दिया, लेकिन पार्टी के कर्णधारों ने पार्टी की साख को पूरे कालिख में ही रंग दिया। वाह री कैडर आधारित पार्टी की सैद्धांतिक निष्ठा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अब मामला बातों और मुद्दों का तो है ही नहीं, अब मामला ताकतवर शख़्सियतों की व्यक्तिगत इच्छाओं का है। आपकी शक़्ल मुझे अच्छी लगती है, आप रोज़ सुबह-शाम मेरे को हाज़िरी देते हैं, आप मेरी हर हां में हां मिलाते हैं, पार्टी में आपका रहना मेरी व्यक्तिगत ताक़त को बढ़ाता है, तो आप पार्टी के लिए अपरिहार्य हैं। और फिर जिन्ना तो आडवाणी की भी कमज़ोर नस हैं। जसवंत की वापसी एक तरह से आडवाणी के पाकिस्तान में दिए बयान पर पार्टी की मुहर है। साथ ही यह इस बात का भी सबूत है कि भाजपा पर से संघ का नियंत्रण पूरी तरह ख़त्म हो गया है। यह इस बात का भी सबूत है कि भारतीय जनता पार्टी में सामूहिक नेतृत्व अब केवल भाषणबाजी का विषय रह गया है और सिद्धांत की राजनीति केवल अगरबत्ती दिखाने की धार्मिक कवायद रह गई है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-913024126567400406?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_24.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-6745839414740216944</guid><pubDate>Tue, 22 Jun 2010 08:23:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-06-22T13:57:45.089+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Congress</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Anderson</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Indira Gandhi</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Emergency</category><title>हर दिन लग रहा है कांग्रेस का आपातकाल</title><description>आडवाणी का कहना है कि एंडरसन को भारत से भगाना आपातकाल जैसी घटना थी। उन्होंने इस सूची में एक तीसरी घटना को भी शामिल किया है- इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुआ सिक्खों का सामूहिक नरसंहार। सूची पूरी हो गई। लेकिन क्या सचमुच पूरी हो गई? आपातकाल में बुराई क्या थी? मेरी जैसी जिस पीढ़ी ने उन ढाई सालों को महसूस नहीं किया है, झेला नहीं है, उसके लिए यह समझना बहुत मुश्किल है। इसलिए कि हम कहीं आपातकाल का इतिहास नहीं पढ़ते। आज़ादी के दौरान हुए अत्याचारों को तो हम फिर भी जानते हैं, लेकिन आपातकाल के दौरान क्या हुआ, हमें नहीं पता। अगर ग़ैर कांग्रेसी नेताओं के भाषणों और कुलदीप नैयर जैसे कुछ पत्रकारों को छोड़ दें, तो कभी कोई आपातकाल की विभीषिका के बारे में नहीं बताता। लगता है जैसे, देश को आपातकाल से कोई परेशानी नहीं थी, कोई नुकसान नहीं था। क्या यही सच है? उलटे हमारी पीढ़ी के लोगों को तो बहुत बार यही बताया जाता है कि उस समय ट्रेनें बिलकुल समय पर चलती थीं और भ्रष्टाचार लगभग ख़त्म हो चुका था। तो क्या सचमुच आपातकाल देश का एक ऐसा स्वर्णकाल था, जिसमें नेताओं और पत्रकारों को छोड़ कर किसी को कोई तकलीफ नहीं थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है इसका जवाब 'हां' में होना चाहिए। भारत में आम जनता बिलकुल ही आम है। उसका सिद्धांत वाक्य है- कोउ नृप होए हमें का हानि। डॉक्टर को अपनी क्लिनिक चलने से मतलब है, इंजीनियर को अच्छी सैलेरी वाली नौकरी से मतलब है, दुकानदार को अपनी दुकान चलने से मतलब है और अब तो पत्रकार को भी खूब चमक-दमक वाले और ऊंचे वेतन के करियर से ही मतलब रह गया है। यही कारण है कि समाज का आम इंसान आपातकाल को किसी डरावने सपने की तरह याद नहीं करता। लेकिन मेरी व्यक्तिगत समझदारी यह है कि आपातकाल ने आम लोगों को जितना नुकसान पहुंचाया, उतना किसी को नहीं। आपातकाल ने इस पूरे देश की नसों में एचआईवी के ऐसे कीटाणु छोड़े, जो सालों निष्क्रिय रहने के बाद अपना असर दिखा रहे हैं। आपातकाल भले ही ढाई साल में खत्म हो गया हो, लेकिन आपातकाल के संस्कार देश अब तक झेल रहा है। यह संस्कार दरअसल कांग्रेस के खून में है और क्योंकि कांग्रेस इस देश की सबसे स्वाभाविक शासक है और इसलिए आपातकालीन एचआईवी भी पूरे देश के खून में समा चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपातकाल क्यों बुरा था? दरअसल देश में राजनेताओं का अहंकार और उनकी महत्वाकांक्षा आजादी के तुरंत बाद से ही अपना रंग दिखाने लगी थी। इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू का राजनीतिक कद इतना बड़ा था कि तमाम संस्थाएं उनके सामने बौनी नज़र आती थीं। इस कारण सत्ता के कर्णधारों और शासन की संस्थाओं के बीच कभी टकराव नहीं हुआ। नेहरू के बाद शास्त्री जी आए, जो नेता के लिबास में संत के समान थे। और इसलिए उनके छोटे से शासनकाल में भी देश की संस्थाओं की निष्ठा और पवित्रता बहुत हद तक अक्षुण्ण रही। लेकिन इंदिरा गांधी के समय से चीजें बदलने लगीं। इंदिरा गांधी को सिंडिकेट ने गूंगी गुड़िया क़रार दिया था और कोई यह मानने को तैयार नहीं था कि उनकी सत्ता को चुनौती नहीं दी जा सकती। क्योंकि देश की संस्थाएं देश के संविधान के प्रति जवाबदेह होती हैं, इसलिए अगर सत्ता और संस्था में से कोई भी एक भ्रष्ट हो जाए, तो दोनों में टकराव निश्चित है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का निर्वाचन अवैध ठहराया और आपातकाल लागू हो गया। इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस को यह समझ में आ गया देश पर लंबे समय तक निर्बाध शासन करने के लिए यहां की संस्थाओं को भ्रष्ट करना आवश्यक है। आपातकाल से यह काम शुरू हो गया। कांग्रेस ने देश की संवैधानिक जड़ों में मट्ठा डालना शुरू किया। संविधान की शपथ लेने वाले आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की सेवानिवृत्ति के बाद राजदूत, राज्यपाल और ऐसे पदों पर नियुक्ति शुरू हो गई ताकि सारे वरिष्ठतम अधिकारी यह समझ लें कि सरकार का साथ देने में क्या फायदे हैं। उच्च और उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को मानवाधिकार आयोग जैसे शक्तिशाली और सुविधायुक्त पदों पर बैठाया जाने लगा, जिससे उनके सामने हमेशा सरकार से पंगा न लेने का लोभ बना रहे। तमाम समितियों, आयोगों और ऐसे दूसरे वैधानिक पदों पर नियुक्तियों के लिए कोई तय मानदंड न बनाकर भ्रष्टाचार के रास्ते साफ रखे गए। इन सारी प्रक्रियाओं का सारांश इंदिरा के समय देश का प्रथम नागरिक, संविधान का केयरटेकर और तीनों सेनाओं का प्रमुख यानी राष्ट्रपति बनने वाले एक व्यक्ति का वह बयान है, जिसमें उसने कहा था कि वह इंदिरा गांधी के घर झाड़ू तक लगाने के लिए तैयार है। इंदिरा जी गईं, आपातकाल गया, लेकिन कांग्रेस ने संस्थाओं को भ्रष्ट करने का संस्कार आत्मसात कर लिया। चुनाव आयोग में नवीन चावल की नियुक्ति और प्रोन्नति इसका सबसे प्रकट उदाहरण है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इसी कड़ी में सबसे ताजा उदाहरण है यूलिप पर सेबी और इरडा में हुई लड़ाई पर सरकार का फैसला। सेबी और इरडा के बीच यूलिप (शेयर बाजार में निवेश के साथ बीमा सुविधा देने वाला उत्पाद) पर अधिकार को लेकर झगड़ा चल रहा था। सेबी के प्रमुख सी बी भावे और इरडा के जे हरिनारायण को सरकार की ओर से निर्देश मिले कि वे हाईकोर्ट में एक संयुक्त याचिका दाखिल करें। लेकिन भावे ने अपनी पहल पर मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने का फैसला किया। फिर क्या था, सरकार को गुस्सा आ गया। सरकार की ओर से हरिनारायण को संपर्क किया गया और कहा गया कि एक मसौदा तैयार करें ताकि यूलिप पर इरडा का नियंत्रण हो सके। यानी एक अभिभावक ने दो बच्चों की लड़ाई में फैसला लिखने का अधिकार इसलिए एक के हाथ में दे दिया, क्योंकि दूसरे ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया। क्या सरकारें ऐसे काम करती हैं? यूलिप में आम लोगों के लाखों करोड़ रुपए लगे हैं, इस भरोसे पर कि सरकार उनके हितों की निगहबान है। लेकिन सरकार केवल अपने अहंकार को तुष्ट करने के लिए किसी एक रेगुलेटर को इसकी कमान थमाने का फैसला कर रही है। अब सोचिए प्रणव मुखर्जी के एहसानों से दबे जे हरिनारायण इरडा प्रमुख के हैसियत से निवेशकों के हितों की सुरक्षा करेंगे या सरकार और कांग्रेस पार्टी के हितों की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही कांग्रेस की कार्यसंस्कृति है, जो उसे इंदिरा गांधी और आपातकाल से विरासत में मिली है। संस्थाओं को भ्रष्ट करने की कार्यसंस्कृति। संवैधानिक पदों को भ्रष्ट करने की कार्यसंस्कृति। यह केवल एंडरसन को भगाने में नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस सरकारों के हर दिन के कामकाज का अभिन्न हिस्सा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-6745839414740216944?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_22.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-355481131146676119</guid><pubDate>Sun, 20 Jun 2010 11:16:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-06-20T16:53:10.242+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Bihar</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Narendra Modi</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Nitish Kumar</category><title>क्या यह सचमुच गुजरात को बिहार का स्वाभिमानी जवाब है?</title><description>बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आखिरकार गुजरात को 5 करोड़ रुपए लौटा ही दिए। बहुत ही अजीब सी घटना है। जैसे, स्कूल के एक बच्चे ने किसी दिन चार दोस्तों के बीच मजाक में इस बात का जिक्र कर दिया हो कि उसने अपने फलां दोस्त को अपनी टिफिन में से एक परांठा खिलाया था और परांठा खाने वाले बच्चे को बात इतनी बुरी लगी हो कि अगले दिन वह मां से जबरन परांठा बनवा कर लाया हो और पूरे स्कूल के सामने अपने दोस्त के सामने परांठा फेंक कर हेठी से कहा हो, 'ले! उस दिन खाई थी, आज वापस कर दी।' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीतीश कुमार ने कुछ ऐसी ही बचकानी हरकत की है कोसी आपदा फंड से पैसे लौटा कर। मैंने जब से खबर सुनी, सोच ही रहा था कि इसका विश्लेषण कैसे करना चाहिए? पहले मुझे लगा, यह उभरते हुए बिहार का आत्मसम्मान है। कुछ ऐसा ही आत्मसम्मान लाल बहादुर शास्त्री ने भी तो अमेरिका को दिखाया था, जब उन्होंने वहां जानवरों को खिलाए जाने वाले पीएल-80 किस्म की गेहूं का आयात बंद कर हरित क्रांति का नारा दिया था। लेकिन क्या वास्तव में गुजरात सरकार का विज्ञापन बिहार का अपमान करने की मंशा से दिया गया था? नीतीश के पैसा लौटाने की घोषणा के अगले दिन पटना के गांधी मैदान में भाषण देते हुए नरेंद्र मोदी ने जो कहा, कम से कम उससे तो ऐसा लगता नहीं। मोदी ने बिहार को लातूर भूकंप के समय मदद देने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने यहां तक कहा कि वह गुजरात में रहने वाले लाखों बिहारियों के प्रतिनिधि के तौर पर उनका कुशल क्षेम देने उनके घर आए हैं और उन्होंने गुजरात के विकास में बिहारियों के योगदान के लिए भी बिहार को धन्यवाद दिया। फिर यह मानने का कोई कारण नहीं है कि नीतीश की प्रतिक्रिया उभरते बिहार के आत्मसम्मान पर लगे चोट का जवाब है। तो यह क्या है?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सरकारी विज्ञापन देने की प्रक्रिया हम सब को पता है। वह मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या रेल मंत्री तय नहीं करते। अभी हाल में क्या हमने भारत सरकार के एक विज्ञापन में पाकिस्तानी सेनाधिकारी की तस्वीर नहीं देखी थी? क्या हाल ही में रेल मंत्रालय के एक विज्ञापन में दिल्ली को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं दिखाया गया था? मीडिया में कुछ हो-हंगामे के अलावा विपक्ष तक ने उन विज्ञापनों को तूल नहीं देकर समझदारी का ही परिचय दिया। लेकिन नीतीश में यह समझदारी नहीं है। क्या सच में नीतीश में समझदारी नहीं है? पिछले चार साल का जद (यू)- भाजपा गठबंधन का शासनकाल दरअसल नीतीश का वन मैन शो ही है। नतीश की कार्यप्रणाली कुछ-कुछ कांग्रेस के गांधी परिवार सी है। शासन की सारी शक्ति नीतीश से निकलती है और वहीं समाप्त होती है। इन चार सालों ने नीतीश को नेता से प्रशासक बना दिया है। अंग्रेजी में बात ज्यादा साफ होगी- नीतीश अब लीड नहीं करते, एडमिनिस्टर करते हैं। उनका अहंकार संगठन और शासन दोनों से बड़ा हो गया है और इसलिए उन्हें ऐसी कोई बात बर्दाश्त नहीं, जो उनके अहंकार को चुनौती देती हो।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बिहार में पिछले चार साल के शासनकाल में मुस्लिम तुष्टीकरण का जो नंगा खेल खेला जा रहा है, वह अद्भुत है। क्योंकि भाजपा सरकार का हिस्सा है, इसलिए मुस्लिमपरस्ती के ऐसे दसियों मसले हैं, जो न मीडिया में आ रहे हैं और न ही लोगों की जानकारी में। लेकिन नीतीश कुमार का लक्ष्य बहुत साफ है। उन्हें न तो बिहार के आत्मसम्मान की चिंता है, न बिहारियों की अपेक्षाओं की। उन्हें मुसलमानों का वोट चाहिए। किसी भी कीमत पर। क्योंकि तभी वह भाजपा को दुलत्ती मार कर अपने बूते सरकार में आ सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह स्थिति बहुत करीब भी है। क्योंकि मुसलमान, महादलित (नीतीश की नई परिभाषा में) और कुर्मी एवं कोइरी उनके साथ हैं। यादव, ओबीसी की कई जातियां और मुसलमानों का एक वर्ग लालू के साथ है। अगड़ी जातियां कुछ तो जद (यू) के बागी नेताओं के साथ टूटेंगी और बाकी कांग्रेस के हलका सा भी मजबूत होते ही, उसकी झोली में जा गिरेंगी। भारतीय जनता पार्टी अपनी भ्रमित राजनीति और सुशील मोदी जैसे स्वार्थी तथा पदलोलुप नेताओं के कारण मटियामेट होने ही जा रही है। ऐसे में नीतीश के सामने वह विज्ञापन एक धारदार हथियार के तौर पर हाथ आया, जिसे भुनाने के लिए उन्होंने तुरंत वार कर दिया।&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;कुल मिलाकर इस घटना से तीन बातें बहुत साफ तौर पर सामने आई हैं। एक, नीतीश की प्रतिक्रिया केवल एक शातिर और अहंकारी राजनेता की राजनीतिक चाल है। दूसरी, नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व का मजबूत उम्मीदवार बना कर पेश किया है। और तीसरी बात यह, कि भारतीय राजनीति में मुसलमानों को खुश करने के लिए कोई दल या नेता किसी भी स्तर तक जा सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-355481131146676119?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/06/blog-post_20.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>6</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-1760472234128260128</guid><pubDate>Fri, 18 Jun 2010 07:56:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-06-18T13:34:00.767+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">US</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Bhopal</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Arjun</category><title>अभी और होंगे बहुत से भोपाल</title><description>मैक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम की तरफ से हुई तबाही और उस पर सख़्त अमेरिकी रुख़ के बाद कंपनी द्वारा चुस्ती से कार्रवाई करते हुए 20 अरब डॉलर का मुआवज़ा दिए जाने की घटना से भारतीयों के मन में क्षोभ है, गुस्सा है। अमेरिकी भेदभाव का गुस्सा। यूनियन कार्बाइड और डाओ केमिकल की उदासीनता का गुस्सा। यह गुस्सा इस बात का प्रमाण है कि अभी और भी बहुत से यूनियन कार्बाइड होने बाकी हैं। यह गुस्सा इस बात का प्रमाण है कि भारत अब भी ग़ुलाम मानसिकता के साथ जी रहा है। आंखों में महाशक्ति बनने के सपने के बावजूद हृदय की गहराइयों में हम ग़ुलाम हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई हमारे देश में आकर हमारी ही धरती पर क़त्ल-ए-आम करके चला जाता है और उसे न केवल क़त्ल करने के बाद निकलने में, बल्कि क़त्ल करने में भी वे लोग सहयोग देते हैं, जिनके लिए हम जय-जयकार के नारे लगाते हैं। फिर भी, हमारा गुस्सा ओबामा और बीपी पर निकलता है। चुरहट लॉटरी में करोड़ों की रकम डकारने वाले (जिसमें यूनियन कार्बाइड ने भी कुछ करोड़ रुपए का 'अनुदान' दिया था) अर्जुन सिंह तिल-तिल मरने वाले उस समाज में आज भी सुरक्षित घूम रहे हैं। उनके घर में अब भी आग नहीं लगाई गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एंडरसन को देश से निकालने में सूत्रधार की भूमिका निभाने वाले राजीव गांधी की बेवा आज भी चुपचाप मूर्ख, जाहिल और तलवे चाटने वाले कांग्रेसियों की भगवान बनी हुई है, 6 साल के अपने केंद्रीय शासनकाल और 10 वर्षों से ज्यादा से अपने राज्य शासन के दौरान चुपचाप भोपाल को मरते देखने वाली और वोट मांग कर सत्ता का जश्न मनाने वाली भारतीय जनता पार्टी के निर्लज्ज नेता अब भी अपने एयरकंडीशन मीडिया रूम में बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। उनके घर और कार्यालय अब भी मटियामेट नहीं हुए। तो ओबामा और बीपी की न्यायप्रियता पर सवाल उठाना क्या केवल हमारी नपुंसक ग़ुलाम मानसिकता का परिचायक नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुलसीदास 500 साल पहले ही कह गए थे- समरथ को नहीं दोष गोसाईं। जनसंहार के हथियारों की काल्पनिक कहानी बनाकर इराक को नेस्तोनाबूद कर देने की कहानी दरअसल अमेरिका के सामर्थ्य की ही कहानी है। दूसरी तरफ महाशक्ति बनने की गाल बजाने वाला भारतीय नेतृत्व है, जो पाकिस्तान की ज़मीन में तमाम आतंकवादियों की जड़े होने के पुख्ता प्रमाण के बावजूद वर्षों से अमेरिका से अनुरोध ही करता जा रहा है कि वह पाकिस्तान को रोके। भीख में केवल रोटी के टुकड़े मिलते हैं, आत्मसम्मान और जीने का अधिकार नहीं। यह बात पता नहीं भारत की जनता कब समझेगी। अपनी बहन और बेटी की इज़्जत बचाने के लिए अगर हम गांव के ज़मींदार का दरवाजा खटखटाएंगे, तो बदले में वह उसी बहन और बेटी का एक रात का नजराना तो मांगेगा ही। अपने बुजुर्ग पिता के सम्मान के लिए अगर हम अपने पड़ोसी के आगे गिड़गिड़ाएंगे, तो अपनी महफिल में पानी पिलाने के लिए हमारे पिताजी की सेवाएं तो वह मांगेगा ही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले मेरे एक मित्र हैं, जिन्होंने एक दिन कहा कि भोपाल गैस पीड़ितों ने सैकड़ों की संख्या में वर्षों तक जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन किया और बदले में उन्हें क्या मिला? धोखा, अन्याय और मौत। यही लोग अगर हाथ में हथियार लेकर सड़कों पर उतर जाएंगे, तो उन्हें माओवादी कहकर उनके खिलाफ सेना उतार दी जाएगी। नैतिकता, अध्यात्म और राष्ट्रवाद के तर्क की कसौटी पर इसके खिलाफ बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन भावुकता के मोर्चे पर क्या वास्तव में यह लाजवाब नहीं है? जिसके घर दिन-रात मौत का तांडव हो रहा हो, जिसके देखते-देखते जिसकी पीढ़ियां अपंगता और लाचारी के अंधकूप में समा गई हों, वह नैतिकता, अध्यात्म और राष्ट्रवाद के तर्क समझेगा या नक्सलवाद के करारे जवाब का तर्क। यहां मजेदार बात यह है कि अर्जुन सिंह का बचाव करने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह नक्सवादियों के ज़बर्दस्त पैरोकार भी रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोपाल पर चल रहे हंगामें में रोज नए खुलासे हो रहे हैं। लेकिन इन खुलासों से जितने जवाब मिल रहे हैं, उनसे कहीं ज्यादा सवाल खड़े हो रहे हैं। इन तमाम सवालों के बीच एक जवाब तो मुझे साफ समझ आ रहा है कि पिछले हजार सालों में हम भारतीयों की ग़ुलाम मानसिकता और परमुखापेक्षी स्वभाव में कुछ भी बदलाव नहीं आया है। जब तक हम अपने घर की सुरक्षा के लिए अमेरिका, चीन और पाकिस्तान से भीख मांगते रहेंगे, तब तक कई यूनियन कार्बाइड कई भोपाल बनाते रहेंगे और हमारी कई पीढ़ियां मानसिक और शारीरिक तौर पर विकलांग पैदा होती रहेंगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-1760472234128260128?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/06/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>8</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-3061840029243420374</guid><pubDate>Thu, 20 May 2010 07:14:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-05-20T12:53:31.533+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Naxalites</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Terrorists</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Communists</category><title>शहरों में पलते ज़हरीले नक्सलियों से निपटना भी ज़रूरी</title><description>नक्सलबाड़ी से पैदा हुआ आंदोलन बहुत पहले जनता से कट कर आतंकवाद की श्रेणी में पहुंच चुका है, लेकिन मेट्रो शहरों में रहने वाले अधिसंख्य वामपंथी इसे अब भी नक्सली आंदोलन कहने में ही फ़ख़्र महसूस करते हैं। मज़ेदार बात यह है कि ग़रीबों, मज़दूरों और किसानों की लड़ाई लड़ने वाले इन वामपंथियों में से शायद ही किसी का जन्म खेतों में, कारखानों में या झुग्गियों में जारी शोषण और अन्याय के बीच हुआ हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन वामपंथियों का जन्म हुआ है जेएनयू में, बीएचयू में और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में। मार्क्स, लेनिन, हीगल, स्तालिन, माओ, चे गुएरा और फिदेल कास्त्रो की किताबों ने इनका उपनयन संस्कार किया है और सिगरेट के धुएं और दुनिया में मौजूद हर व्यवस्था को ग़ालियां देने की अराजक मानसिकता के बीच इनकी दीक्षा हुई है। शोषण और अन्याय इनके लिए केवल बौद्धिक जुगाली का ज़रिया हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही कारण है कि ये ख़ुद तो यूपीएससी की परीक्षाओं में बैठकर बुर्ज़ुआ व्यवस्था के शीर्ष पर पहुंचने के सपने पालते हैं, दिन-रात अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने और नया फ्लैट खरीदने के लिए ईएमआई का इंतज़ाम करने के जुगाड़ में लगे रहते हैं, महंगी गाड़ियों के नए-नए मॉडलों को ललचाई नज़रों से सिर घुमा-घुमा कर देखते हैं और नक्सलियों की हत्याओं को पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण से मुक्त करने के लिए छेड़ा गया ज़ेहाद क़रार देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह उसी तरह का ज़ेहाद है, जिसका रूप इस्लामी आतंकवाद के रूप में पूरी दुनिया में दिख रहा है। तालिबान की तरह ही नक्सलियों की दुनिया में मतभेद या असहमति की कोई जगह नहीं है। हज़ारों करोड़ का बजट रखने वाले सर्वहारा नक्सलियों के इलाकों में विकास की व्यथा-कथा और उसमें नक्सलियों की भूमिका पर काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य तो यह है कि हर बात में विदेशी लेखकों और विदेशी नेताओं के सिद्धांतों का उद्धरण देने वाले पढ़ाकू वामपंथियों को दिन के उजाले की तरह साफ ये तथ्य नहीं दिखते। आश्चर्य यह है कि 75 जवानों की हत्या को दो पक्षों की लड़ाई का स्वाभाविक परिणाम मानने वाले इन बुद्धिजीवियों की जान इस बात से सूखने लगती है कि कहीं सरकार सेना या वायु सेना का इस्तेमाल न शुरू कर दे। यानी नक्सली मारें तो युद्ध और जब मरें तो सामंती शासन का शोषण।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये वामपंथी बुद्धिजीवी भी नक्सली हत्यारों से कम नहीं हैं क्योंकि ये उन कुकृत्यों को बौद्धिक आधार देते हैं। ये नक्सल आतंकवाद के प्रवक्ता हैं, तो ये हत्यारे क्यों नहीं? दरअसल सरकार को जंगल के नक्सली हत्यारों और शहरों में एयरकंडीशन में बैठने वाले बुद्धिजीवी हत्यारों, दोनों से एक ही तरह निपटने की जरूरत है। अखबारों, विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में बैठे ये वामपंथी बुद्धिजीवी देश के लिए ज़्यादा बड़ा खतरा हैं, क्योंकि ये दरअसल वह विचार हैं जो हत्यारे पैदा करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नक्सलियों के सफाए के बाद भी अगर ये बचे रहे, तो वामपंथी आतंकवाद किसी-न-किसी और रूप में समाज को निगलने के लिए सामने आएगा। पूरी दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि सर्वहारा की मदद से सत्ता में पहुंचने के बाद वामपंथ ने सबसे पहले उसी सर्वहारा की व्यक्तिगत स्वतंत्रता खत्म की है और फिर उसकी हर मांग का जवाब गोलियों और फांसियों से दिया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-3061840029243420374?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/05/blog-post_20.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>11</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-1463938181675518920</guid><pubDate>Thu, 13 May 2010 07:45:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-05-13T16:58:35.669+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Poverty</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Politcs</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Poor</category><title>जब ग़रीबी और पिछड़ापन स्टेटस सिंबल बन जाए...</title><description>कल्पना कीजिए, निठारी की दर्दनाक हत्याओं के एक आरोपी कोली की मौत की सज़ा पर सबसे सर्द और मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया क्या हो सकती है? मेरे ऑफिस के एक सहयोगी की प्रतिक्रिया से मुझे इस सवाल का जवाब मिला। उन्होंने कहा, 'ग़रीब था, इसलिए मौत की सज़ा मिल गई।' उनकी इस प्रतिक्रिया की पृष्ठभूमि में पंढेर को यही सज़ा न मिलना था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंढेर को सज़ा न मिलना, इस देश की उसी भ्रष्ट और नाकार न्याय प्रक्रिया का नतीजा तो हो सकता है, जिस पर हमने सैकड़ों फिल्में भी बनाई हैं और हजारों लेख भी लिखे हैं, लेकिन कोली की सज़ा को 'एक ग़रीब की सज़ा' कहने की मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया इस तथ्य को पूरी तरह नज़रअंदाज करती है कि जिन मासूम लड़कियों का क़त्ल किया गया (और कोली ने तो उन मृत नाबालिग शरीरों का मांस तक खाया), वे किसी करोड़पति की बेटियां नहीं थीं। वैसे यह घटिया तर्क भी मैं उस मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया के जवाब में ही दे रहा हूं, क्योंकि अगर वे करोड़पति की बेटियां होतीं, तो क्या कोली और पंढेर के वे कुकर्म उचित ठहराए जा सकते थे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर, कोली की सज़ा-ए-मौत पर आने वाली यह तो एक प्रतिक्रिया है, लेकिन दरअसल देखा जाए तो यह प्रतिक्रिया इस देश में पिछले दो दशकों से चल रही राजनीति के कारण तैयार हुए हमारे मानस की स्वाभाविक आवाज़ है। इस देश की राजनीति ने हमें हर उस बात से प्रेम करना सिखा दिया है, जिसे घोर सामाजिक-आर्थिक विकृति मानते हुए हमें घृणा करना चाहिए। लालू ने ख़ुद को चपरासी का बेटा बताया और पूरे बिहार के चपरासियों को उनमें अपना बेटा नज़र आने लगा। यह अलग बात है कि लालू अपने रोते हुए बेटे को चुप कराने के लिए सरकारी हेलीकॉप्टर में बनारस तक की सैर कराते रहे और राज्य भर के चपरासी अपने साहबों को पानी ही पिलाते रहे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुलायम ने अपने को ग़रीब का बेटा बताया। देश का रक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होंने गर्व से घोषणा की कि उनके पूरे खानदान में कोई हवलदार तक नहीं बन सका और वह देश की रक्षा सेनाओं के मुखिया बन गए। यह अलग बात है कि उत्तर प्रदेश के तमाम ग़रीब अब भी हवलदारों के डंडे और गालियां खाने को मज़बूर हैं और मुलायम के विदेश शिक्षित बेटे अपने ग़रीब पिता की विरासत संभालने के लिए तैयार हैं। मायावती सत्ता में आईं तो उन्होंने ख़ुद को दलित की बेटी बताया। यह अलग बात है कि अपनी मूर्तियां लगाने में 250 करोड़ रुपए खर्च करने वाली इस दलित की बेटी के पास दंतेवाड़ा में मारे गए सीआरपीएफ के जवानों को देने के लिए पैसे नहीं थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करोड़ों लोगों का दीवानगी के हद तक समर्थन पाने वाले इन नेताओं ने भारतीय जनमानस के मनोविज्ञान में एक मौलिक बदलाव किया है। ग़रीब होना, पिछड़ा होना, अछूत होना, अनपढ़ होना अब किसी के मन में आक्रोश पैदा नहीं करता। ये दरअसल सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के अलग-अलग रास्ते बन गए हैं। अछूत समाज से आने वाला युवक अब अंबेडकर की तरह इस सामाजिक कुरीति को उखाड़ फेंकने के लिए लड़ाई नहीं करता। अब तो वह रिक्शे पर लाउडस्पीकर से यह घोषणा करने में ज्यादा फायदा देखता है कि वह अछूत है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़रीब के घर पैदा होना किस तरह किसी की महानता का हिस्सा हो सकता है, मुझे समझ नहीं आता। ग़रीबी भी दो तरह की होती है- &lt;a href="http://bhadesbharat.blogspot.com/2007/11/blog-post_19.html"&gt;एक, अकर्मण्यता से पैदा होती है&lt;/a&gt; और दूसरी, वैराग्य से पैदा होती है। गांधी की ग़रीबी वैराग्य से पैदा हुई थी, लेकिन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास चरस के एक कश के लिए 2-2 रुपए के कबाड़ की चोरी करने वाले की ग़रीबी अकर्मण्यता से पैदा हुई है। लेकिन लालू और मायावती छाप राजनीति ने हमारी मानसिकता ऐसी बना दी है कि हम ग़रीब चरसी की ग़ुरबत को भी उसका गुण ही मानने लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे एक बहुत ही समझदार और अध्ययनशील मित्र हैं। उनसे एक दिन किसी ने मज़ाक में पूछा कि सीआरपीएफ के दो जवानों ने दो माओवादियों को रक्तदान किया है। आपकी प्रतिक्रिया? उन्होंने कहा, 'एक ग़रीब ने दूसरे ग़रीब को खून दिया है।' आश्चर्य है कि जिस दिन खून लेने वाले ग़रीबों ने खून देने वाले ग़रीबों को दंतेवाड़ा में गोलियों से छलनी किया था, उस दिन उनकी प्रतिक्रिया थी कि मारने वाले कोई खाना बांटने तो जा नहीं रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानमाने पत्रकार पी साईंनाथ ने एक किताब लिखी है- 'हू लव्स ड्राउट'। यह किताब देश के प्रशासन और अधिकारी तंत्र पर केंद्रित है। यह बात समझ में भी आती है, क्योंकि हर बाढ़, हर सूखे, हर भूकंप और हर आपदा में कई विधायक, मंत्री, अफसरशाह और बाबू करोड़पति बन जाते हैं। तो स्वाभाविक है कि उन्हें इन आपदाओं से प्यार भी होगा, इनका इंतजार भी होगा। लेकिन जो बात समझ में नहीं आती है, वह ये है कि 'हाउ कैन ए पर्सन लव द ट्रैजेडी, व्हिच लव्स हिम ऐज इट्स फॉडर'। ये आश्चर्यजनक नहीं तो क्या है। ग़रीबी, जातिवाद, अशिक्षा जिन लोगों को अपना चारा बना रही है, वही इनसे प्यार करने लगे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भारतीय राजनीति का चमत्कार है। और यह उन समझदार लोगों की उस उदासीनता का भी जवाब है जिसमें वे कंधे उचका कर कहते हैं, 'कोउ नृप होए, हमें का हानी'। राजनीति की दिशा एक पूरे राष्ट्र को नपुंसक बना सकती है, यथास्थितिवादी बना सकती है या फिर पौरुष और तेज से भर सकती है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि राजनीति का संबंध राष्ट्र से हो। जब तक राजनीति का संबंध सत्ता से बना रहेगा, हम अपने समाज के मनोविज्ञान में ऐसा ही ज़हर घोलते रहेंगे। यह सुनने में कुछ-कुछ यूटोपिया सा लगता है, लेकिन कुछ बनाने के लिए पहले उसकी कल्पना तो करनी ही होती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-1463938181675518920?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/05/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>9</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-2181226227993312371</guid><pubDate>Sun, 28 Feb 2010 05:48:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-02-28T20:39:07.765+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Budget</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Pranab Mukherjee</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Commom Man</category><title>आम जनता की उम्मीदों से उदासीन 'आम आदमी का बजट'</title><description>वित्त वर्ष 2010-11 के लिए पेश बजट प्रस्तावों को 48 घंटे बीत चुके हैं। हर बार की तरह इस बार भी कुछ प्रस्तावों के राजनीतिक महत्व को देखते हुए सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए हैं और कुछ प्रस्ताव केवल अर्थवेत्ताओं में ही चर्चा का विषय बन सके हैं। जैसे कोई भी व्यक्ति, विषय या समाज संपूर्ण (परफेक्ट) नहीं होता, उसी तरह यह बजट भी नहीं है। इसीलिए इसे कोई भी एक नाम देकर सर पर चढ़ा लेना या खारिज कर देना बचकानापन होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे विचार से प्रणव मुखर्जी का इस बार का बजट उम्मीदों, उदासीनताओं और उपेक्षाओं का सम्मिलित दस्तावेज है। वेतनभोगी जनता के लिए इसने जहां उम्मीद और उत्साह का पिटारा खोला है, वहीं हर दिन अपनी आजीविका के लिए जूझने वाले करोड़ों गरीबों और मजदूरों के लिए यह बजट उदासीनता का दर्द है। और इसमें उपेक्षा मिली है फिर देश के उस हिस्से को, जिसके लिए जबानी खर्च सबसे ज्यादा किया जाता है, यानी किसानों को। देश की आर्थिक वृद्धि दर दहाई अंक में ले जाने की इस सरकार की प्रतिबद्धता संदेह से परे है। लेकिन, ऐसी स्थिति में कृषि को लेकर सरकार में दृष्टि का अभाव (lack of vision) बहुत अखरता है। जबकि स्वयं सरकार भी यह मानती है कि कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4 फीसदी तक पहुंचाए बिना देश के जीडीपी को 10 फीसदी की रफ्तार दे पाना संभव नहीं है, तो फिर कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए महज 400 करोड़ रुपए का आवंटन उदासीनता का दर्दनाक उदाहरण है। वित्त मंत्री फसलों को पानी मिलने के लिए इंद्र देवता से प्रार्थना करने के लिए तो तैयार हैं, लेकिन सिंचाई सुविधाएं बढ़ाने के लिए उनकी झोली में केवल 300 करोड़ रुपए हैं। मेरा साफ मानना है कि कृषि ऋण माफी जैसी योजनाएं सरकारी पैसे का घनघोर दुरुपयोग है और इससे एक ओर तो वास्तविक ज़रूरतमंदों की कीमत पर ग़लत और ग़ैर ज़रूरतमंदों को फायदा पहुंचाया जाता है, वहीं आगे से कर्ज लेकर उसे पचा जाने की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिलता है। इसके बदले अगर 80,000 करोड़ रुपए की रकम देश की सिंचाई व्यवस्था ठीक करने और कृषि उपज बढ़ाने पर खर्च की जाए तो यह केवल एक साल के लिए किसानों के लिए राहत के दरवाजे नहीं खोलेगा, बल्कि उनकी उत्पादकता और आमदनी बढ़ाकर उन्हें और ज्यादा कर्ज समय पर वापस करने के लिए सक्षम बनाएगा। इस दिशा में कोल्ड स्टोरेज शुरू करने के लिए जरूरी उपकरणों के आयात पर सीमा शुल्क 5 फीसदी कम करने और सेवा कर से पूरी छूट एक स्वागतयोग्य घोषणा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेतनभोगियों के लिए ज़रूर यह बजट एक बोनांजा है, जिन्हें स्लैब में हुए बदलाव से भारी राहत मिलेगी। लेकिन यहां भी, अच्छा होता अगर वित्त मंत्री स्लैब की जगह छूट की दरें बढ़ा देते। ऐसा होने से हर आय वर्ग के लोगों को बराबर फायदा होता, जबकि मौजूदा स्थिति में ज्यादा पैसा कमाने वालों को छूट भी ज्यादा मिलेगी और कम वेतन वालों के हाथ कुछ खास नहीं आएगा। इस तरह का विरोधाभास विडंबना ही है। इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड में निवेश को 80 सी के तहत 1 लाख रुपए के ऊपर जोड़ा जाना एक अच्छा कदम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उद्योग जगत इस बजट से काफी खुश है, जिसकी एक झलक बजट पेश होने के दौरान शेयर बाजार में आई भारी बढ़त से मिली। हालांकि इसमें भी 'कुछ बहुत अच्छा होने' से ज्यादा 'कुछ बहुत बुरा ने होने' की भूमिका ज्यादा थी, जिसका संकेत बीएसई के 30 शेयरों वाले सूचकांक सेंसेक्स के अपने दिन के शीर्ष स्तर से 240 अंक नीचे बंद होने से मिलता है। उत्पादन और सीमा शुल्क में मिली छूट के चरणबद्ध तरीके से वापस होने को लेकर बाजार लगभग तैयार था। वैकल्पिक न्यूनतम कर (मैट) को 15 से बढ़ाकर 18 फीसदी किया जाना जरूर एक नकारात्मक सरप्राइज था, लेकिन कॉरपोरेट टैक्स पर सरचार्ज को 10 से घटाकर 7.5 फीसदी करने के फैसले से बहुत हद तक इसकी भरपाई हो गई। इनके अलावा नए होटलों पर निवेश को डिडक्शन से जुड़े फायदे देने और शोध एवं अनुसंधान पर वेटेड डिडक्शन में बढ़ोतरी से क्रमशः होटल और फ़ार्मा सेक्टर को फायदा होने की उम्मीद है। अति लघु, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए बजट आवंटन में 30 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी कर उसे 2,400 करोड़ रुपए कर दिया गया है, जिससे निश्चत तौर पर उभरते हुए उद्योगों के विकास में मदद मिलेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामाजिक एवं जनकल्याण के लिए वित्त मंत्री ने काफी गंभीरता दिखाई है। कुल 3,73,000 करोड़ रुपए के बजट में से 37 फीसदी सामाजिक क्षेत्र के लिए आवंटित किए गए हैं, जबकि 25 फीसदी ग्रामीण क्षेत्र में आधारभूत ढांचे के विकास के लिए दिया गया है। पेयजल की हालत में सुधार के लिए 1,300 करोड़ रुपए बढ़ाए गए हैं, जबकि सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए आवंटन को 2,600 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 4,500 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इससे सरकार की मंशा तो ज़ाहिर हो जाती है, लेकिन यह पता नहीं चलता कि क्या वास्तव में एक साल बाद देश की जनता को पीने का बेहतर पानी ज्यादा सुलभ हो जाएगा, यह पता नहीं चलता कि क्या 28 फरवरी 2011 को जब भारत के वित्त मंत्री अगला बजट पेश करने के लिए खड़े होंगे, तब क्या हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा पाने वाले बच्चों की संख्या अपेक्षित तौर पर बढ़ चुकी होगी, क्या शुरुआती 2-3 वर्षों में स्कूल छोड़ कर मजदूरी में लगने वाले बच्चों की संख्या में अपेक्षित सुधार आएगा, क्या बच्चों को जन्म देते समय मरने वाली मांओं की संख्या इस रकम के अनुपात में ही घटेगी और क्या जीवन की रोशनी देखने से पहले ही मौत की आगोश में समाने वाले नौनिहालों की संख्या में अपेक्षित कमी आएगी। यह सब कुछ इसलिए पता नहीं चलता क्योंकि बजट घोषणाओं को अमली जामा पहना सकने का सरकारी रिकॉर्ड बहुत ख़राब है। स्वयं वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में स्वीकार किया, 'वास्तव में, आने वाले वर्षों में, यदि कोई कारक हमें एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में हमारी क्षमता को साकार करने में बाधक हो सकता है तो वह हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणालियों की अड़चन है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बजट जिस एक मोर्चे पर सबसे ज्यादा नाकाम हुआ है, वह है महंगाई का। अपनी जेब बचाने के लिए त्राहि-त्राहि करती जनता के प्रति वित्त मंत्री की उपेक्षा भयानक है। उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी से जहां सीमेंट और स्टील जैसी कमोडिटी की कीमतें बढ़नी तय है, वहीं पेट्रोल-डीजल पर शुल्क बढ़ाने का प्रस्ताव कर मुखर्जी ने एक तरह से आम जनता के ज़ख़्मों पर नमक मल दिया है। हो सकता है कि राजनीतिक दबाव में यह प्रस्ताव वापस लेना पड़े, लेकिन इसने यह तो बता ही दिया है कि इस सरकार की प्राथमिकता सूची में आम आदमी का दुख और उसकी पीड़ा कहीं नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 74 रुपए प्रति बैरल (160 लीटर) के हिसाब से कच्चे तेल की कीमत इस समय करीब 21.46 रुपए प्रति लीटर पड़ता है। अब रिफाइनिंग और परिवहन चार्ज लगाने के बाद भी किसी तरह यह 44 रुपए प्रति लीटर नहीं हो सकता। पेट्रोल पर हम जो हर रुपया देते हैं, उसमें से 51.36 पैसे सरकार की जेब में जाते हैं। इस पर भी अगर सरकार रोना रोती है, तो यह केवल उसकी लूट वृत्ति ही दर्शाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजकोषीय घाटे को लेकर सरकार बहुत चिंतित रही है। इस संदर्भ में जिस तरह अगले दो वर्षों में इसके कम होकर जीडीपी का केवल 4.1 फीसदी रह जाने की उम्मीद जताई गई है, उसमें मुझे खुश होने की कोई वजह नजर नहीं आती। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपिनयों में हिस्सा बेचकर 40,000 करोड़ रुपए और 3जी स्पेक्ट्रम की बिक्री से 35,000 करोड़ रुपए जुटाने की योजना बना रही है और इसी के भरोसे राजकोषीय घाटा कम करने की उम्मीद कर रही है। यह कुछ इसी तरह है जैसे आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों से लिया कर्ज़ उतारने के लिए अपने घर के सामान और पत्नी के ज़ेवर बेचने का जुगाड़ कर रहे हों। बेहतर हो सरकार अपना भुगतान संतुलन (बीओपी) ठीक करने के लिए निर्यात बढ़ाए, उत्पादन बढ़ाए और लोगों की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाए। विनिवेश और स्पेक्ट्रम की बिक्री जैसे उपायों से होने वाली आमदनी को सड़क, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं के विकास में लगाया जाए ताकि रोजगार बढ़े और जीडीपी की वृद्धि दर भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि यह बजट शेयर बाज़ार और उद्योग जगत के लिए तो अच्छा है, लेकिन आम लोगों के लिए पूरी तरह उदासीन है। अब विचारणीय यह है कि किसी भी बाजार या उद्योग की आमदनी का आखिरी स्रोत तो आम जन ही है, ऐसे में आम जनता की जेब और मन पर कुठाराघात करने वाला कोई भी बजट या प्रस्ताव लंबी अवधि में उद्योग या बाजार का भी भला नहीं कर सकता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-2181226227993312371?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/02/blog-post_28.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-5368702822698307030</guid><pubDate>Tue, 23 Feb 2010 07:50:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-02-23T13:31:17.150+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Language</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Hindi</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">English</category><title>अंग्रेजी की इस उपेक्षा पर मैं खुश हूं लेकिन...</title><description>लेकिन यह एक सैडिस्ट एप्रोच है। कोई हमारा दुश्मन ही सही, उसकी उपेक्षा या दुर्दशा पर खुश होना तो हमारे व्यक्तित्व की एक बड़ी कमी है। फिर भाषा कोई भी हो, हमारी दुश्मन कैसे हो सकती है? अंग्रेजी हो या फ्रेंच, जर्मन हो या हिब्रू- सारी भाषाएं एक समाज विशेष, समय विशेष और विचार विशेष के महल में घुसने का दरवाजा ही तो हैं। फिर भी, भारत में अंग्रेजी केवल एक भाषा नहीं है। यह एक हथियार है, समाज के कमजोर, पिछड़े और गरीब तबके से आने वाली प्रतिभाओं की हत्या करने का। यह एक चोर दरवाजा है, समाज के धनाढ्य और प्रभावशाली वर्ग (वामपंथी मित्रों की शब्दावली में बुर्जुआ वर्ग) के सत्ता के गलियारों में पहुंचने का। इसीलिए इस देश में हिंदी की, तमिल की, गुजराती की, कोंकणी की, मलयालम की, तेलुगू और उड़िया की, असमिया और जनजातीय भाषाओं की, कश्मीरी और पंजाबी की तथा इस देश की मिट्टी से जुड़ी तमाम भाषाओं और उनके साहित्य की उपेक्षा कोई खबर नहीं है, लेकिन अंग्रेजी की उपेक्षा एक खबर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रपति ने अपना अभिभाषण हिंदी में पढ़ा। इसमें कोई खबर नहीं। अपनी जनसभाओं में सोनिया और लालकिले से मनमोहन भी अपना भाषण हिंदी में ही पढ़ते हैं। खबर यह है कि राष्ट्रपति के भाषण का अंग्रेजी अनुवाद नहीं हुआ था। जी हां, यही खबर है। क्योंकि इस देश में अंग्रेजी में कुछ अनुवाद नहीं होता (कुछ नहीं मतलब, लगभग कुछ नहीं)। रचनात्मकता और चिंतन की भाषा अंग्रेजी है और अनुवाद की भाषा हिंदी एवं दूसरी भारतीय भाषाएं हैं। दस जनपथ और पीएमओ की एक चिड़िया से भी मेरा परिचय नहीं होने के बावजूद मैं दावा कर सकता हूं कि सोनिया की जनसभाओं और मनमोहन के लालकिले के भाषण अंग्रेजी में लिखे जाते होंगे, फिर उनका हिंदी अनुवाद होता होगा और फिर उन्हें रोमन में लिखा जाता होगा। संसद के हर विधेयक, हर प्रस्ताव, तमाम मंत्रालयों के गजट और विचार पत्र- सभी मूलरूप से अंग्रेजी में लिखे जाते हैं और हिंदी के प्रति सरकार की निष्ठा ज़ाहिर करने के लिए उन्हें उसमें अनुवाद किया जाता है। राजस्थान जैसे राज्य से आने के बावजूद ज्यादातर समय मैंने राष्ट्रपति को अंग्रेजी में ही संवाद करते सुना है। ऐसे में यह मेरे लिए बहुत बड़ी खबर है कि राष्ट्रपति का अभिभाषण हिंदी में ही सोचा गया और लिखा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे हमेशा इस बात पर आश्चर्य होता रहा है कि देश की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं के राजनेताओं और कर्णधारों के लिए हिंदी दुश्मन क्यों होती है, जबकि सभी भाषाओं को अंग्रेजी के कारण अपमान और उन्मूलन का ख़तरा झेलना पड़ रहा है। जितनी समझदारी अब तक बनी है मेरी, उसके मुताबिक तो यही लगता है कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ख़ुद सरकारी रवैया है। अब यही उदाहरण देखिए। राष्ट्रपति के अभिभाषण का अंग्रेजी अनुवाद किया ही नहीं गया। स्वाभाविक है कि जिन प्रांतों के नेता, सांसद, मंत्री हिंदी (देवनागरी में) पढ़ना नहीं जानते, उनके मन में आक्रोश का एक बीज और डल गया। उन्हें यह अहसास करा दिया गया कि हिंदी के बढ़ने का मतलब उनकी लाचारी और बेचारापन है। लेकिन इसका यह निष्कर्ष कतई नहीं है कि अंग्रेजी हमारे देश की अपरिहार्य मजबूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय भाषाओं को आपस में प्रेम करने के लिए अंग्रेजी का बंधन नहीं चाहिए। यह जिम्मेदारी देश के सबसे ज्यादा लोगों में बोली और उससे भी ज्यादा लोगों में समझी जाने वाली हिंदी की है। हिंदी के विकास के नाम पर जारी होने वाले करोड़ों के फंड से आधे की कटौती कीजिए और उसमें बाकी दूसरी भारतीय भाषाओं को हिस्सा दीजिए। हिमालय सी मशीनरी वाली भारत सरकार के लिए एक अभिभाषण को ही नहीं, तमाम जरूरी सरकारी कागजों को आठवीं अनुसूची की सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद करना नामुमकिन नहीं है। थोड़ा कठिन जरूर है, लेकिन ठान लेने पर अगर सरकार देश के दूरदराज के गांवों, रेलवे स्टेशनों, झुग्गियों और शहरों में मौजूद करोड़ों शिशुओं को पोलियो ड्रॉप पिला सकती है, तो यह बहुत छोटा काम है। और देश की सच्ची प्रतिभाओं को उभरने के लिए बराबरी का मौका देने और सामाजिक न्याय को सच्चे रूप से स्थापित करने में इस कदम की जितनी महान भूमिका हो सकती है, उसे देखते हुए इस पर होने वाला कोई भी खर्च और परिश्रम कम ही होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-5368702822698307030?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2010/02/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>8</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-4327246798055994471</guid><pubDate>Wed, 25 Nov 2009 08:28:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-11-25T14:05:10.371+05:30</atom:updated><title>लिब्रहान साहब की रिपोर्ट का इंतजार अब भी जारी है</title><description>तीन दिनों से हर तरफ लिब्रहान साहब छाए हुए हैं। स्वाभाविक भी है। 17 साल की मेहनत, करीब 4 दर्जन बार का एक्सटेंशन और करोड़ों रुपए की रकम लगाने के बाद आखिरकार उन्होंने इतना बड़ा खुलासा किया है कि बाबरी ढांचे का विध्वंस कोई औचक घटना नहीं थी, बल्कि आरएसएस ने बहुत सावधानी से पहले ही इसकी योजना बना ली थी। उन्होंने यह भी बताया है कि अटल बिहारी वाजपेयी साम्प्रदायिक संघ परिवार के उदारवादी चेहरा मात्र थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिब्रहान महोदय मुस्लिम संगठनों से भी नाराज हैं कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई, यह अलग बात है कि उन संगठनों को उन्होंने कभी गवाही के लिए बुलाया ही नहीं। कल्याण सिंह से वह बहुत नाराज हैं कि उन्होंने पूरा तंत्र पंगु बना दिया। यह अलग बात है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के बारे में उनका मानना है कि उन बेचारे को राज्यपाल की रिपोर्ट ही नहीं मिली, इसलिए उनका कुछ न करना पूरी तरह उचित है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है न कमाल की बात। जिस बात को पूरा देश देख रहा था, समझ रहा था, उस पर कार्रवाई के लिए प्रधानमंत्री को राज्यपाल की रिपोर्ट की दरकार थी। लिब्रहान साहब ने एक-दो बातें और दिलचस्प कही हैं। जैसे, उन्होंने कहा है कि संघ परिवार ने अपने जिन साम्प्रदायिक तत्वों को भारतीय प्रशासनिक तंत्र में घुसा दिया है, वह अब भी देश के विभिन्न हिस्सों में फल-फूल रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन दिन से ये सारी खबरें मीडिया में गूंज रही हैं। अच्छा भी है, देशहित में खोली गई इन खुफिया सूचनाओं को आखिर अंतिम पंक्ति में बैठे देशवासी तक तो पहुंचना ही चाहिए। मुझे परेशानी केवल एक बात से हो रही है, कि कहीं भी अब तक इन निष्कर्षों का आधार नहीं बताया जा रहा है। वे कौन से तथ्य हैं, किनकी गवाहियां हैं, जिनके आधार पर लिब्रहान साहब ने ये सारे निष्कर्ष निकाले हैं। क्योंकि अब तक जितनी बातें मीडिया में आई हैं, उनमें मुझे रिपोर्ट कम और संपादकीय ज्यादा नजर आ रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनती बातें लिब्रहान साहब के हवाले से कही जा रही हैं, वे हम पिछले 17 वर्षों से लालू जी, मुलायम जी, सीताराम येचुरी जी, अर्जुन सिंह जी और देश के तमाम स्वनामधन्य सेकुलरों से सुनते ही आ रहे हैं। तो 17 वर्षों की जांच का सबब क्या है? जरूर होगा। परसों लिब्रहान महोदय ने नाराज होकर कहा कि वे ऐसे चरित्रहीन नहीं हैं कि रिपोर्ट मीडिया में लीक करें। यानी स्वाभाविक तौर पर यह भी माना चाहिए कि पूर्व न्यायाधीश रहे चुके और एक सदस्यीय आयोग के सर्वेसर्वा लिब्रहान महोदय ने &lt;br /&gt;जो कुछ भी अपनी रिपोर्ट में लिखा है, वह ठोस सबूतों के आधार पर ही कहा जा रहा होगा, न कि अपने व्यक्तिगत विचार और आग्रह के आधार पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब क्योंकि रिपोर्ट संसद के पटल पर रखी जा चुकी है, तो उम्मीद है संपादकीय के पीछे की मजबूत नींव, यानी तथ्य भी धीरे-धीरे मीडिया में आएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-4327246798055994471?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2009/11/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-1400721984689425484.post-2125830687693100703</guid><pubDate>Thu, 10 Sep 2009 07:53:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-10T13:37:45.853+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Islam</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Taliban</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">Hindu</category><title>अब रामनारायण का बेटा भी ज़िहाद करेगा</title><description>ये रामनारायण पाकिस्तानी की कहानी है। दो बेटियों का बाप। पत्नी जीवित तो है, लेकिन लापता है। मिलने की उम्मीद भी नहीं, क्योंकि अब उन दोनों के बीच केवल सैकड़ों मीलों की दूरियां ही नहीं, बल्कि हिन्दुस्थान और पाकिस्तान की सर्द, शुष्क सरहद भी है। उम्मीद अगर किसी दिन पैदा हो भी जाए, तो शायद रामनारायण में अपनी जीवनसंगिनी को फिर से पाने की इच्छा ही न हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए नहीं कि उसकी पत्नी का अनगिनत बार बलात्कार किया गया है और इसलिए भी नहीं कि उसे जबरन मुसलमान बनाया जा चुका है, बल्कि इसलिए कि उसके अंदर अपनी पत्नी का नया रूप देख पाने का साहस नहीं है। हर दिन उसे प्यार से भोजन कराने वाली, बीमार होने पर उसकी अनथक सेवा करने वाली और उसके हर दुख में उससे ज्यादा दुखी होने वाली उसकी अर्धांगिनी का नया रूप कैसा होगा, इसकी सोच भी उसे सिहरा देती है। इसलिए अब रामनारायण उसे याद भी नहीं करना चाहता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब वह हिन्दुस्थान में है। वह संतुष्ट रहना चाहता है अपनी उन दो बेटियों को देखकर जो तालिबान की दरिंदगी का शिकार बनने से बच गईं। मुसलमान तो अपनी बेटियों के साथ वह खुद भी बन गया था, लेकिन आस्था केवल पूजा पद्धति बदलने का तो नाम नहीं है। कम से कम एक आस्थावान हिन्दू तो यह मानता ही है। इसलिए रामनारायण अपनी बेटियों के किसी तालिबानी नेता का हवस बनने से पहले पाकिस्तान से भागने में कामयाब रहा और अब उसे उम्मीद है तो बस इस बात की कि भारत उसे अपनी गोद में जगह देगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे इस देश में एक बड़ी प्रजाति ऐसी है जिनके लिए रामनारायण एक कारतूस है, उन लोगों पर दागने लायक जो बंगलादेशी घुसपैठियों को यहां से निकालने की बात करते हैं। असम की कांग्रेसी सरकारों और पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने इन्हीं प्रजातियों का प्रतिनिधित्व किया है और बंगलादेशी मुसलमानों को इस हद तक भारत में बसाने की साज़िश की है कि पूरे पूर्वोत्तर पर अलगाववाद का खतरा मंडरा रहा है। इस सेकुलर प्रजाति की अंतरात्मा चीख-चीख कर कहती है कि अगर घुसपैठियों को निकालने की शुरुआत करनी ही तो वह रामनारायण से ही करनी चाहिए। लेकिन ख़ैर! यह विषयांतर हो जाएगा। मैं मूल मुद्दे पर लौटता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर की कहानी आज टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड स्टोरी है। इस कहानी को पढ़ने के बाद से मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है। रामनारायण की जो पत्नी अब मुसलमान बन चुकी है क्योंकि तालिबान ने कई बार बलात्कार कर उसका मतांतरण कर दिया है, तो उसके मन की हालत क्या होगी? उसके मन में इस्लाम के प्रति कितनी श्रद्धा, प्रेम या घृणा होगी। लेकिन लाख आक्रोश के बाद भी वह हर अजान के साथ सजदे में बैठती होगी, वो तमाम प्रक्रिया पूरी करती होगी, जिसके न करने पर उसके साथ फिर जिस्मानी और मानसिक बलात्कार किया जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर सैकड़ों बलात्कारों के बाद हो सकता है कि उसकी कोई संतति भी पैदा हो। वह बच्चा होश संभालने के साथ ही तालिबान मदरसे में जाएगा। उसे बताया जाएगा कि कश्मीर में हिंदू सैनिक उसके क़ौम की औरतों की इज़्ज़त लूटते हैं। उसे मुंबई और गुजरात के दंगों की तस्वीरें दिखाई जाएंगी कि किस तरह भारत में इस्लाम ख़तरे में है। और फिर रामनारायण की पत्नी के जबरन शोषण से पैदा वही बच्चा हाथ में एके 47 लेकर ज़िहाद का पैगाम फैलाने भारत आएगा। मंदिरों, स्टेशनों और बाजारों में लोगों के परखच्चे उड़ा कर आततायी हिंदुओं को सबक सिखाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश के उन सभी आतंकवादियों की कहानी कुछ ऐसी ही नहीं है, जो ज़िहाद को अपना नया मज़हब मान बैठे हैं। यह एक हक़ीक़त है कि तीनों देशों के करीब 40 करोड़ मुसलमानों (मोटी गणना से) में शायद ही 1 फीसदी भी ख़ालिस पश्चिम एशियाई वंशावली से हों। तो इन 40 करोड़ मुसलमानों में कितने यह दावा कर पाएंगे कि उनके दादे-परदादाओं ने इस्लाम का अध्ययन कर, उसे ईश्वर को पाने का ज्यादा आसान रास्ता मानकर हिंदू मान्यताओं और परंपराओं का त्याग किया था। यानी इन 40 करोड़ में से 39 करोड़ 99 लाख 99 हज़ार मुसलमानों के पूर्वज ऐसे हिंदू थे, जिन्होंने इतिहास के किसी-न-किसी मोड़ पर, किसी-न-किसी मज़बूरी में इस्लाम स्वीकार किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें से लाखों ने हिंदू समाज की उपेक्षा और अमानवीय परंपराओं के खिलाफ इस्लाम को अपना तारणहार माना होगा और करोड़ों ने अपनी बहुओं, बेटियों, बहनों और बीवियों के बलात्कार के बाद, अपने पिता, मां, बेटों और पोतों की अपनी आंखों के सामने हत्या के बाद या फिर उनकी जान बचाने के लिए इस्लाम स्वीकार किया होगा। लेकिन जैसा कि एक बार विवेकानंद ने कहा था कि एक हिंदू के मतांतरित होने का मतलब केवल यह नहीं कि हिंदू समाज से एक सदस्य की संख्या घट गई, बल्कि इसका मतलब यह भी है कि हिंदू समाज के एक शत्रु की संख्या बढ़ गई। तो शायद इसीलिए आज भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश के ज्यादातर मुसलमान हिंदुओं को अपने दुश्मन की तरह ही देख पाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे याद नहीं करना चाहते कि उनके अंदर भी एक हिंदू का ही खून दौड़ रहा है और कि हो सकता है कि उनके दादा या परदादा ने इस उम्मीद में इस्लाम ग्रहण किया हो, कि एक दिन उनके बच्चे वापस अपनी मूल परंपरा में लौट आएंगे। लेकिन, आज की तारीख़ में यह एक कपोल कल्पना जैसी ही लगती है। फिर भी, क्या मेरे मुस्लिम मित्र एक बार यह विचार करने का साहस नहीं कर सकते कि उनके अंदर भी गंगा, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी का ही पानी खून बन कर दौड़ रहा है। चाहे उनका मज़हब आज इस्लाम हो, लेकिन उनकी राष्ट्रीयता भी हिंदू ही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1400721984689425484-2125830687693100703?l=bhadesbharat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://bhadesbharat.blogspot.com/2009/09/blog-post_10.html</link><author>noreply@blogger.com (भुवन भास्कर)</author><thr:total>6</thr:total></item></channel></rss>

