<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452</id><updated>2018-06-24T09:01:17.278-07:00</updated><category term="आलेख"/><category term="टिप्पणी"/><category term="चिंतन"/><category term="हास्य-व्यंग्य"/><category term="विडंबना"/><category term="सुनो भाई साधो...."/><category term="टिपण्णी"/><category term="आपबीती"/><category term="कार्यक्रम"/><category term="बहस"/><category term="विचार मंथन"/><category term="विचार मंथन-1"/><category term="विचार मंथन-2"/><category term="विचार मंथन-3"/><category term="विचार मंथन-4"/><category term="विचार मंथन-5"/><category term="विचार मंथन-6"/><category term="संस्मरण"/><category term="सुनो भई साधो...."/><category term="सुनो भाई साधो....."/><title type='text'>इकतारा बोले....</title><subtitle type='html'>यकीन मानो कि सूरज पनाह मांगेगा...  &#xa;उतर गया कोई ज़र्रा अगर बगावत पर</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>64</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-1109587618450388812</id><published>2014-09-09T02:51:00.001-07:00</published><updated>2014-09-09T02:51:18.658-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="टिपण्णी"/><title type='text'>स्वानुभूति बनाम सहानुभूति का साहित्य</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;हिन्दी साहित्य में अभी दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श और स्त्री विमर्श का अभियान जोरों पर है। वैचारिक बहसों के अलावा तमाम विधाओं का रचनात्मक साहित्य इन्हीं के ईर्द, गिर्द घूम रहा है। लेकिन साहित्य के कुछ पुरोधाओं ने साहित्य का नए सिरे से वर्गीकरण करने की मुहिम छेड़ी है। उनका मानना है कि स्त्री की पीड़ा को स्त्री ही बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर सकती है क्योंकि वह प्रताड़ना झेलती है। वह जो लिखेगी उसकी स्वानुभूति की अभिव्यक्ति होगी। कोई पुरुष उनकी पीड़ा को चाहे जितनी खूबी के साथ किसी विधा में पेश करे वह स्वानुभूति का नहीं, सहानुभूति का साहित्य होगा। उसमें स्वाभाविकता का अभाव होगा। यही सीमांकन आदिवासी और दलित साहित्य के मामले में भी किया जा रहा है।&lt;br /&gt;पहली बात यह है कि सच्चा लेखक या रचनाकार किसी लिंग, समुदाय या क्षेत्र से बंधा नहीं होता। उसकी दृष्टि व्यापक होती है। वह सात समंदर पार बैठे लोगों की पीड़ा को उनसे कहीं ज्यादा सिद्दत से महसूस कर सकता है। यह संवेदनशीलता का मामला है। मार्क्स कभी भारत नहीं आए थे। लेकिन 1857 की क्रांति सहित भारतीय समाज के मुद्दों पर उन्होंने जितने सटिक लेख लिखे हैं संभवतः चश्मदीद लोग भी वैसा नहीं लिख सकते। यदि स्वानुभूति का साहित्य ही साहित्य है तो फिर एेतिहासिक पृष्ठभूमि पर उपन्यास लिखे ही नहीं जाने चाहिए क्योंकि 7 वीं सदी की विडंबनाओं की स्वानुभूति 21 वीं सदी में तो नामुमकिन है। इसलिए अपनी संकीर्ण मानसिकता के तहत साहित्य का छिछला सीमांकन करने वालों को अपने इस छिछोरेपन से बाज आना चाहिए। साहित्य का मूल्यांकन तो आने वाली पीढ़ियां करेंगी। साहित्य सृजन के किसी प्रयास पर कृपया बंदिश लगाने की कोशिश न करें। इससे साहित्य का नुकसान होग।.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-------देवेंद्र गौतम&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/1109587618450388812/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2014/09/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/1109587618450388812'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/1109587618450388812'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2014/09/blog-post.html' title='स्वानुभूति बनाम सहानुभूति का साहित्य'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-4247793774170821804</id><published>2013-03-21T08:44:00.011-07:00</published><updated>2013-03-21T08:50:00.691-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हास्य-व्यंग्य"/><title type='text'>पशु प्रताड़ना की चिंता तो कीटों की अनदेखी क्यों</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;आज पशु क्रूरता निवारण में कई सरकारी गैर सरकारी संस्थाएं लगी हुई हैं लेकिन पता नहीं क्यों कीट पतंगों की सुधि नहीं ली जाती. आखिर वह भी तो कुदरत के बनाये जीव हैं और डार्विन के सिद्धांतों को माना जाये तो उनका अस्तित्व मनुष्य जाति की उत्पत्ति से बहुत पहले से है. एक मायने में वे बंदर से भी प्राचीन पूर्वजों की श्रेणी में आयेंगे.&lt;br /&gt;हर दिन पता नहीं कितने करोड़ मच्छर बेमौत मारे जाते हैं. कितने ही काक्रोचों की बलि चढ़ती है.माना कि कीट-पतंगो की श्रेणी के जीव अल्पजीवी होते हैं. लेकिन क्या उन्हें स्वाभाविक मौत नसीब नहीं होनी चाहिए. उनकी हत्या के लिये दवायें खुलेआम बाजार में बिक रही हैं. उनका मूल्य उनकी मारक क्षमता के अनुरूप तय किया जाता है. कहीं कोई रोक-टोक नहीं. न जाने कितनी कंपनियां उन्हें मारने के आसान उपायों पर रात दिन शोध करा रही हैं. उनकी नन्ही सी जान सबकी आंखों में कांटा की तरह चुभती रहती है. उनके संरक्षण के लिये कोई कानून नहीं. हाल में गौरैया दिवस मनाया गया. अन्य कई पशुओं और चिड़ियाओं को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा प्रदान की जाती है. क्या आजतक किसी कीट के लिये कोई दिवस घोषित हुआ. उसके प्रति प्रेम या श्रद्धा का भाव प्रदर्शित किया गया. क्या कीट सुंदर नहीं होते. उन्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए. बताइये भला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---देवेंद्र गौतम&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/4247793774170821804/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2013/03/blog-post_7977.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/4247793774170821804'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/4247793774170821804'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2013/03/blog-post_7977.html' title='पशु प्रताड़ना की चिंता तो कीटों की अनदेखी क्यों'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-876652898249788696</id><published>2012-06-23T01:19:00.000-07:00</published><updated>2012-06-23T01:19:50.659-07:00</updated><title type='text'>वेब मीडिया को स्वावलंबी बनाने की जरूरत</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: white;&quot;&gt;विदेशो की तरह भारत में भी&amp;nbsp;वेब मीडिया तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है. हिंदी के&amp;nbsp;ब्लॉग्स, वेबसाइट्स और&amp;nbsp;न्यूज़&amp;nbsp;पोर्टलों को&amp;nbsp;&amp;nbsp;पूरी दुनिया में पढ़ा जा रहा है. अप्रवासी भारतीयों&amp;nbsp;के &amp;nbsp;लिए&amp;nbsp;भी अपनी मिटटी से जुड़े रहने का यह सर्वसुलभ माध्यम बन बनता जा रहा है. दरअसल प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की पहुंच की एक सीमा है जबकि वेब की कोई सीमा नहीं. दुनिया के किसी हिस्से में इसे मात्र एक क्लिक के जरिये देखा जा सकता है. सच पूछें तो&amp;nbsp;ग्लोबल गांव का का असल मीडिया वेब मीडिया ही है. एक सर्वेक्षण की मानें तो सिर्फ&amp;nbsp;करीब सवा अरब की आबादी वाले&amp;nbsp;भारत में ही 10 करोड़ से ज्यादा संख्या इंटरनेट यूजर्स की है और हिंदी के साइट्स की संख्या भी एक लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है. विभिन्न सरकारी योजनाओं के जरिये&amp;nbsp;जिस तरह गाँव-गाँव में पीसी टेबलेट्स बांटे जा रहे हैं और कंप्यूटर शिक्षा प्रदान की जा रही है आनेवाले समय में इस आकडे में जबरदस्त इजाफा होनेवाला है. निश्चित रूप से आनेवाले समय में प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक की तुलना में यह ज्यादा बड़ी आबादी तक पहुंच का माध्यम बननेवाला है. पश्चिमी देशों में तो कार्पोरेट कम्पनियों ने अपने उपभोक्ताओं तक अपने उत्पाद का प्रचार पहुँचाने के लिए वेब मीडिया को अपनी पहली पसंद के रूप में स्वीकार कर लिया है। इसीलिए अब वहां वेब का कुल विज्ञापन व्यवसाय में 80 फीसदी की हिस्सेदारी हो चुकी है. हिंदी वेबसाइट्स को अभी वित्तीय स्वावलंबन की ओर ले जाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है. &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अब समय आ चुका है कि सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर इस मीडिया को अपने पावों पर खड़ा करने की और ग्लोबल गांव के इस सबसे समर्थ और&amp;nbsp;सशक्त मीडिया को अपने पाओं पर खड़ा करने की पहल की जाये. सूचना मंत्रालय वेबसाइट्स को &amp;nbsp;डीएवीपी में सूचीबद्ध कर सरकारी विज्ञापनों से जोड़े और व्यवसाई वर्ग अपने उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने के लिए इसका इस्तेमाल करे. विज्ञापन एजेंसियां वेब के विज्ञापन के लिए तकनीकी तैयारी करें. यह ग्लोबलाइजेशन के इस दौर की ऐतिहासिक जरूरत है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----देवेंद्र गौतम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/876652898249788696/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/06/blog-post.html#comment-form' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/876652898249788696'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/876652898249788696'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/06/blog-post.html' title='वेब मीडिया को स्वावलंबी बनाने की जरूरत'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-7466751773973406475</id><published>2012-05-27T11:44:00.002-07:00</published><updated>2012-05-27T12:08:53.247-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कार्यक्रम"/><title type='text'>झारखंड जन संस्कृति मंच का राष्टीय सृजनोत्सव</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;रांची&amp;nbsp;के&amp;nbsp;पटेल&amp;nbsp;भवन में 26 से&amp;nbsp;28 मई 2012 तक आयोजित&amp;nbsp;&amp;nbsp;झारखंड जन&amp;nbsp;संस्कृति&amp;nbsp;मंच&amp;nbsp;के तीसरे&amp;nbsp;राज्य सम्मलेन&amp;nbsp;में&amp;nbsp;सामूहिकता&amp;nbsp;की&amp;nbsp;भावना&amp;nbsp;पर पूंजी, बाज़ार&amp;nbsp;और&amp;nbsp;सरकार&amp;nbsp;के&amp;nbsp;हमले&amp;nbsp;को चिंता&amp;nbsp;का&amp;nbsp;मुख्य&amp;nbsp;विषय&amp;nbsp;माना&amp;nbsp;गया. आदिवासी&amp;nbsp;संस्कृति&amp;nbsp;प्रकृति के&amp;nbsp;साथ&amp;nbsp;साहचर्य और&amp;nbsp;सामूहिकता की&amp;nbsp;संस्कृति&amp;nbsp;रही&amp;nbsp;है&amp;nbsp;इसलिए&amp;nbsp;उन्हें उजाड़ने&amp;nbsp;की&amp;nbsp;कोशिशें&amp;nbsp;हो रही&amp;nbsp;हैं, लूट&amp;nbsp;और&amp;nbsp;दमन&amp;nbsp;का&amp;nbsp;शिकार&amp;nbsp;बनाया जा&amp;nbsp;रहा है. सम्मलेन&amp;nbsp;को&amp;nbsp;राष्टीय सृजनोत्सव के रूप में&amp;nbsp;मनाया गया&amp;nbsp;जिसमें&amp;nbsp;छत्तीसगढ़, पश्चिम&amp;nbsp;बंगाल, बिहार, उत्तर&amp;nbsp;प्रदेश, दिल्ली&amp;nbsp;&amp;nbsp;आदि&amp;nbsp;कई&amp;nbsp;राज्यों के&amp;nbsp;साहित्यकारों, सांस्कृतिक &amp;nbsp;टीमों&amp;nbsp;की&amp;nbsp;भागीदारी हुई. उदघाटन&amp;nbsp;सत्र&amp;nbsp;के&amp;nbsp;दौरान&amp;nbsp;हिंदी के&amp;nbsp;प्रख्यात आलोचक&amp;nbsp;एवं&amp;nbsp;जन&amp;nbsp;संस्कृति&amp;nbsp;मंच&amp;nbsp;के&amp;nbsp;राष्ट्रीय&amp;nbsp;अध्यक्ष&amp;nbsp;डा. मैनेजर पाण्डेय&amp;nbsp;ने&amp;nbsp;ग्रीन&amp;nbsp;हंट को ट्रायबल हंट&amp;nbsp;करार&amp;nbsp;दिया.&amp;nbsp;उनके&amp;nbsp;अनुसार&amp;nbsp;सृजन&amp;nbsp;अथवा&amp;nbsp;निर्माण का काम&amp;nbsp;मजदूर,&amp;nbsp;किसान,&amp;nbsp;आदिवासी,&amp;nbsp;दलित यानी&amp;nbsp;साधारण&amp;nbsp;लोग&amp;nbsp;करते हैं&amp;nbsp;जबकि&amp;nbsp;विनाश का&amp;nbsp;काम&amp;nbsp;बड़े लोग&amp;nbsp;करते&amp;nbsp;हैं.&amp;nbsp;मनमोहन&amp;nbsp;सिंह&amp;nbsp;का&amp;nbsp;अर्थशास्त्र&amp;nbsp;जल,&amp;nbsp;जंगल,&amp;nbsp;ज़मीन&amp;nbsp;और&amp;nbsp;प्राकृतिक&amp;nbsp;संसाधनों की&amp;nbsp;लूट&amp;nbsp;की&amp;nbsp;ओर केंद्रित है.&amp;nbsp;प्रकृतिपुत्र&amp;nbsp;आदिवासी इसका&amp;nbsp;तीव्र&amp;nbsp;प्रतिरोध&amp;nbsp;करते&amp;nbsp;हैं&amp;nbsp;इसलिए&amp;nbsp;उन्हें&amp;nbsp;उजाड़ने का&amp;nbsp;अभियान&amp;nbsp;चलाया जा&amp;nbsp;रहा&amp;nbsp;है.इसके&amp;nbsp;खिलाफ संस्कृतिकर्मियों&amp;nbsp;को&amp;nbsp;आगे&amp;nbsp;आना होगा. लेकिन&amp;nbsp;संस्कृतिकर्म&amp;nbsp;के&amp;nbsp;समक्ष भी&amp;nbsp;गंभीर चुनौतियां&amp;nbsp;हैं. पूँजी&amp;nbsp;की&amp;nbsp;शक्तियां&amp;nbsp;तरह-तरह&amp;nbsp;के&amp;nbsp;प्रलोभन का&amp;nbsp;जाल&amp;nbsp;बिछाकर&amp;nbsp;संस्कृतिकर्म&amp;nbsp;को&amp;nbsp;अपने&amp;nbsp;शिकंजे में&amp;nbsp;लेने का&amp;nbsp;प्रयास&amp;nbsp;कर&amp;nbsp;रही&amp;nbsp;हैं. जाल&amp;nbsp;में&amp;nbsp;नहीं&amp;nbsp;फंसने&amp;nbsp;पर&amp;nbsp;हत्या तक&amp;nbsp;कर&amp;nbsp;दी&amp;nbsp; है. हाल के&amp;nbsp;वर्षों में कई&amp;nbsp;साहित्यकार&amp;nbsp;और&amp;nbsp;संस्कृतिकर्मी&amp;nbsp;शहीद हो गए. समकालीन जनमत&amp;nbsp;के&amp;nbsp;संपादक&amp;nbsp;रामजी&amp;nbsp;राय&amp;nbsp;ने&amp;nbsp;पेट के&amp;nbsp;बल पर&amp;nbsp;मनुष्यता&amp;nbsp;को&amp;nbsp;झुकाने&amp;nbsp;और&amp;nbsp;व्यक्तित्व के व्यवसायीकरण की&amp;nbsp;सरकारी साजिशों के खिलाफ&amp;nbsp;जोरदार सांस्कृतिक&amp;nbsp;प्रतिरोध&amp;nbsp;का&amp;nbsp;संकल्प&amp;nbsp;लेने&amp;nbsp;का आह्वान&amp;nbsp;किया. साहित्यकार&amp;nbsp;रविभूषण ने&amp;nbsp;कहा कि&amp;nbsp;जन&amp;nbsp;जीवित&amp;nbsp;रहेगा&amp;nbsp;तो&amp;nbsp;जन&amp;nbsp;विरोधी&amp;nbsp;ताकतें&amp;nbsp;ज्यादा&amp;nbsp;देर तक&amp;nbsp;टिकी नहीं&amp;nbsp;रह सकेंगी. डा. बीपी&amp;nbsp;&amp;nbsp;केसरी ने&amp;nbsp;ऐसी&amp;nbsp;सांस्कृतिक&amp;nbsp;टीमों की&amp;nbsp;जरूरत&amp;nbsp;पर&amp;nbsp;बल&amp;nbsp;दिया&amp;nbsp;जो&amp;nbsp;जनता के&amp;nbsp;बीच जायें&amp;nbsp;उसके सुख-दुःख&amp;nbsp;में&amp;nbsp;शामिल हों.&amp;nbsp;उनके&amp;nbsp;संघर्ष&amp;nbsp;को&amp;nbsp;अभिव्यक्ति&amp;nbsp;दें.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;सम्मलेन&amp;nbsp;के दूसरे दिन&amp;nbsp;आज का&amp;nbsp;समय और&amp;nbsp;संगठित संस्कृतिकर्म&amp;nbsp;की&amp;nbsp;चुनौतियां&amp;nbsp;तथा देशज साहित्य&amp;nbsp;में&amp;nbsp;प्रतिरोध&amp;nbsp;के&amp;nbsp;स्वर&amp;nbsp;विषय&amp;nbsp;पर&amp;nbsp;परिचर्चाओं का&amp;nbsp;आयोजन किया&amp;nbsp;गया. इसमें डा. मैनेजर&amp;nbsp;पाण्डेय&amp;nbsp;ने&amp;nbsp;सामूहिकता&amp;nbsp;में&amp;nbsp;सृजन&amp;nbsp;की&amp;nbsp;क्षमता को&amp;nbsp;विकसित&amp;nbsp;करने की&amp;nbsp;शक्ति&amp;nbsp;होने की&amp;nbsp;बात&amp;nbsp;कही&amp;nbsp;और&amp;nbsp;देश-समाज के&amp;nbsp;दुःख&amp;nbsp;को&amp;nbsp;व्यक्तिगत दुःख&amp;nbsp;से&amp;nbsp;बड़ा बताया. कथाकार रणेंद्र&amp;nbsp;ने&amp;nbsp;कहा कि&amp;nbsp;पूँजी&amp;nbsp;के&amp;nbsp;बढ़ते प्रभाव&amp;nbsp;ने&amp;nbsp;संस्कृतिकर्म&amp;nbsp;के&amp;nbsp;सभी&amp;nbsp;रूपों को&amp;nbsp;विलोपित करने&amp;nbsp;का&amp;nbsp;अभियान&amp;nbsp;चला&amp;nbsp;रखा है. मीडिया&amp;nbsp;का&amp;nbsp;एक बड़ा&amp;nbsp;हिस्सा&amp;nbsp;पूंजीवाद के&amp;nbsp;दलाल की&amp;nbsp;भूमिका में&amp;nbsp;आ&amp;nbsp;चूका है. आज&amp;nbsp;का रावण&amp;nbsp;दशानन नहीं सहस्त्रानन&amp;nbsp;है. सेमिनार को&amp;nbsp;&amp;nbsp;डा&amp;nbsp;रविभूषण, रामजी राय, छत्तीसगढ़&amp;nbsp;जसम के&amp;nbsp;जेबी नायक, शम्भू बादल, जनवादी&amp;nbsp;लेखक संघ&amp;nbsp;के&amp;nbsp;जे&amp;nbsp;खान, पश्चिम&amp;nbsp;बंगाल&amp;nbsp;के&amp;nbsp;अमित दास, इप्टा&amp;nbsp;के&amp;nbsp;उमेश नजीर, इलाहाबाद जसम&amp;nbsp;के&amp;nbsp;केके पाण्डेय&amp;nbsp;सहित अन्य लोगों ने&amp;nbsp;संबोधित किया. संचालन&amp;nbsp;भोजपुरी&amp;nbsp;और&amp;nbsp;हिंदी&amp;nbsp;के&amp;nbsp;साहित्यकार बलभद्र&amp;nbsp;ने&amp;nbsp;किया.&amp;nbsp;विषय&amp;nbsp;प्रवेश&amp;nbsp;जसम&amp;nbsp;के राष्ट्रीय महासचिव&amp;nbsp;प्रणय&amp;nbsp;कृष्ण ने&amp;nbsp;कराया.&amp;nbsp;अध्यक्षता&amp;nbsp;डा.&amp;nbsp;बीपी&amp;nbsp;केसरी&amp;nbsp;ने&amp;nbsp;की.&amp;nbsp;देशज&amp;nbsp;साहित्य&amp;nbsp;में&amp;nbsp;प्रतिरोध&amp;nbsp;के&amp;nbsp;स्वर&amp;nbsp;विषय&amp;nbsp;पर&amp;nbsp;रणेंद्र, कालेश्वर,&amp;nbsp;शिशिर&amp;nbsp;तुद्दु,&amp;nbsp;बलभद्र,&amp;nbsp;गिरिधारी&amp;nbsp;लाल&amp;nbsp;&amp;nbsp;गंझू, लालदीप गोप,&amp;nbsp;सरिका&amp;nbsp;मुंडा,&amp;nbsp;ज्योति&amp;nbsp;लकड़ा&amp;nbsp;आदि&amp;nbsp;ने&amp;nbsp;संबोधित&amp;nbsp;किया.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;-----देवेंद्र गौतम&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/7466751773973406475/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/7466751773973406475'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/7466751773973406475'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/05/blog-post.html' title='झारखंड जन संस्कृति मंच का राष्टीय सृजनोत्सव'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-8324060654402821553</id><published>2012-04-13T20:42:00.001-07:00</published><updated>2012-04-13T20:42:34.580-07:00</updated><title type='text'>fact n figure: अपना ही गिरेबां भूल गए निर्मल बाबा</title><content type='html'>&lt;div style=&quot;font-family: Tahoma, &#39;century gothic&#39;, Arial, verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 20px; text-align: left;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;background-color: white;&quot;&gt;आज तक चैनल पर निर्मल बाबा का इंटरभ्यू&amp;nbsp;उनपर लगे आरोपों का खंडन नहीं बन पाया. किसी सवाल का वे स्पष्ट जवाब नहीं दे सके. इस दौरान उनके चेहरे पर नज़र आती बौखलाहट इस बात की चुगली खा रही थी कि वे कोई पहुंचे हुए महात्मा नहीं बल्कि एक साधारण व्यापारी हैं. एक साधारण मनुष्य जो प्रशंसा से खुश और निंदा से दुखी होता है. जिसे राग, द्वेष जैसी वृतियां प्रभावित करती हैं. वे आरोपों का शांति से जवाब नहीं दे सके. यदि उनकी छठी इन्द्रिय सक्रिय है तो क्या उन्हें इस बात का पहले से इल्हाम नहीं हो जाना&amp;nbsp;चाहिए था कि वे विवादों से घिरने जा रहे हैं. इल्हाम होता तो वे इसका सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार होते और चेहरे पर कोई भाव आये बिना इसके निराकरण का मार्ग तलाश लेते. विवाद उठने के बाद दो दिनों तक उनका चुप्पी साध लेना इस बात को इंगित करता हुआ कि जो कुछ हुआ वह उनके लिए अप्रत्याशित था. उनका&amp;nbsp;इंटरभ्यू&amp;nbsp;देखने के बाद मुझे मजाज़ का एक शेर याद आ गया-&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;font-family: Tahoma, &#39;century gothic&#39;, Arial, verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 20px; text-align: left;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;background-color: white;&quot;&gt;&#39;सबका तो मुदावा कर डाला अपना ही मुदावा कर न सके&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;background-color: white; font-family: Tahoma, &#39;century gothic&#39;, Arial, verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 20px;&quot;&gt;सबके तो गिरेबां सी डाले अपना ही गिरेबां भूल गए.&#39;..............&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://www.factandfigure.com/2012/04/blog-post_4108.html&quot;&gt;fact n figure: अपना ही गिरेबां भूल गए निर्मल बाबा&lt;/a&gt;: &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;https://chrome.google.com/webstore/detail/pengoopmcjnbflcjbmoeodbmoflcgjlk&quot; style=&quot;font-size: 13px;&quot;&gt;&#39;via Blog this&#39;&lt;/a&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/8324060654402821553/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/04/fact-n-figure_13.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/8324060654402821553'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/8324060654402821553'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/04/fact-n-figure_13.html' title='fact n figure: अपना ही गिरेबां भूल गए निर्मल बाबा'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-7102586140232058120</id><published>2012-04-12T12:22:00.001-07:00</published><updated>2012-04-12T12:25:05.359-07:00</updated><title type='text'>fact n figure: निर्मल बाबा के विरोध का सच</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;div style=&quot;font-family: Tahoma, &#39;century gothic&#39;, Arial, verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 20px; text-align: left;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;background-color: white;&quot;&gt;निर्मल बाबा की पृष्ठभूमि खंगाली जा रही है. प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रोनिक मीडिया और इन्टरनेट मीडिया तक ने उनके विरुद्ध हल्ला बोल दिया है. हालांकि लखनऊ के दो बच्चों को छोड़ दें तो अभी तक किसी आम नागरिक ने उनके विरुद्ध कहीं कोई शिकायत दर्ज करने का प्रयास नहीं किया है. फिर भी मीडिया के लोगों ने आम लोगों की आंखें खोलने के अपने कर्तव्य का पालन किया है. मीडिया के लोग आम तौर पर विज्ञापनदाताओं की जायज़-नाजायज़ सभी हरकतों को संरक्षण दिया करते हैं. कितने ही काले कारनामों पर उन्होंने सफलतापूर्वक पर्दा &amp;nbsp;डाल रखा है. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name=&#39;more&#39;&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;background-color: white;&quot;&gt;आज की तारीख में देश के दर्जनों बड़े पत्रकार कई घोटालों में संलग्न होने के आरोपी हैं. जांच एजेंसियों के पास इसके प्रमाण भी हैं लेकिन उनपर हाथ नहीं डाला जा रहा है. उनका लिहाज़ किया जा रहा है. निर्मल बाबा भी बड़े विज्ञापनदाता हैं. 35&amp;nbsp; चैनलों पर उनके विज्ञापन प्रसारित हो रहे हैं. यदि वे आमजन की अंधभक्ति का दोहन कर रहे हैं और ईशकृपा की मार्केटिंग कर रहे हैं तो मीडिया को उसका हिस्सा भी दे रहे हैं. उनकी गल्ती यही है कि 35&amp;nbsp; चैनलों के अलावा जो मीडिया घराने हैं उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं. ध्यान देते तो यह हमले या तो नहीं होते या फिर उनकी धार कुछ कमजोर होती.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;font-family: Tahoma, &#39;century gothic&#39;, Arial, verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 20px; text-align: left;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;background-color: white;&quot;&gt;फिलहाल उनके प्रारंभिक जीवन के जो खुलासे हुए हैं उनमें कुछ भी आपत्तिजनक नज़र नहीं आता. झारखंड के चतरा के निर्दलीय सांसद इन्दर सिंह नामधारी का साला होना या पूर्व में&amp;nbsp;कपडे का थोक व्यापार करना, ठेकेदारी करना कोई गुनाह नहीं है. वे कोई मंगल ग्रह से नहीं आये हैं कि धरती पर उनका कोई रिश्तेदार न हो. सोने का चम्मच लेकर नहीं पैदा हुए कि उन्हें जीवन में संघर्ष न करना पड़ा हो. ज्ञान चक्षु तो उम्र के किसी भी पड़ाव पर खुल सकते हैं. भगवान बुद्ध भी तो ज्ञान प्राप्त होने के पूर्व पत्नी और बच्चे को नींद में सोता छोड़ यानी अपनी जिम्मेवारियों को छोड़ कर भागे हुए एक कापुरुष ही कहे जा सकते हैं. लेकिन सुजाता के हांथों से खीर खाने के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ तो वे महान और युग प्रवर्तक बन गए. बाद में उन्हें विष्णु का नवां अवतार तक मान लिया गया.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;font-family: Tahoma, &#39;century gothic&#39;, Arial, verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 20px; text-align: left;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;background-color: white;&quot;&gt;निर्मल बाबा जिस तीसरी आंख का दावा करते हैं उसकी वास्तविकता क्या है यह एक बहस का विषय हो सकता है. अभी तक हमारी जानकारी में भगवान शिव तीन नेत्रों वाले माने गए हैं. उनके तीसरे नेत्र के खुलने पर कामदेव भस्म हो गए थे. उनका यह नेत्र कभी-कभार ही खुलता था. निर्मल बाबा की मानें तो उनका यह नेत्र हमेशा खुला ही रहता है लेकिन किसी को भस्म करने के लिए नहीं भक्तों तक ईश कृपा के निर्वाध वितरण के लिए. वे अपने भक्तों को त्याग और संयम की शिक्षा नहीं देते. महंगी से महंगी चीजें खरीदने और ऐश के साथ जीने की सलाह देते हैं. वे अध्यात्म की नहीं भौतिक जीवन को बेहतर बनाने की बात करते हैं. भारत में भक्तियोग का बोलबाला है. लोग अपनी समस्याओं से निजात पाने के लिए किसी दैवी शक्ति के चमत्कार के इंतज़ार में रहते हैं. उनकी इसी कमजोरी का लाभ निर्मल बाबा जैसे लोग उठाते रहे हैं और जबतक भक्तियोग की जगह कर्मयोग या ज्ञानयोग का प्रचालन नहीं बढेगा उठाते रहेंगे. एक निर्मल बाबा जायेंगे दस पैदा होंगे. जनता के साथ इस तरह की ठगी का यदि कोई ह्रदय से विरोध करता है और सिर्फ टीआरपी या प्रसार संख्या बढ़ने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं करते उन्हें जन चेतना को भक्तियोग से उबारने का प्रयास करना चाहिए.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;font-family: Tahoma, &#39;century gothic&#39;, Arial, verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 20px; text-align: left;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;background-color: white;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;background-color: white; font-family: Tahoma, &#39;century gothic&#39;, Arial, verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 20px;&quot;&gt;----देवेंद्र गौतम &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://www.factandfigure.com/2012/04/blog-post.html&quot;&gt;fact n figure: निर्मल बाबा के विरोध का सच&lt;/a&gt;: &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;https://chrome.google.com/webstore/detail/pengoopmcjnbflcjbmoeodbmoflcgjlk&quot; style=&quot;font-size: 13px;&quot;&gt;&#39;via Blog this&#39;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/7102586140232058120/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/04/fact-n-figure.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/7102586140232058120'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/7102586140232058120'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/04/fact-n-figure.html' title='fact n figure: निर्मल बाबा के विरोध का सच'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-9069764514662556355</id><published>2012-03-20T10:49:00.002-07:00</published><updated>2012-03-20T10:49:40.283-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="टिपण्णी"/><title type='text'>गरीबी मिटाने का नायाब फार्मूला</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;शहरी क्षेत्र में 28&amp;nbsp;.65 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र में 22&amp;nbsp;.42&amp;nbsp; रुपये में क्या-क्या किया जा सकता है उसकी क्रय शक्ति क्या हो सकती है..? कभी सोचा है आपने..? शायद नहीं लेकिन&amp;nbsp;हमारे देश के&amp;nbsp;योजना आयोग ने इसपर विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि एक परिवार के भरण-पोषण के लिए इतनी राशि काफी है. प्रतिदिन&amp;nbsp;इससे कम खर्च करने वाले ही गरीबी रेखा के अंदर आते है. इससे ज्यादा खर्च करने वाले बीपीएल नहीं माने जा सकते. वे एपीएल की श्रेणी में आयेंगे. इस फार्मूले का निर्धारण करने के साथ ही देश में गरीबों की संख्या 40&amp;nbsp;.72&amp;nbsp; करोड़ से घटकर 34&amp;nbsp;.47&amp;nbsp; करोड़ पर चली आई. क्यों! है न यह गरीबी मिटाने का अनूठा फार्मूला..?इस रेखा को छोटा करते जाइये गरीबी स्वयं कम होती जाएगी. इस लिहाज़ से जिन्हें न्यूनतम मजदूरी मिल रही है उन्हें अमीरों में गिना जाना चाहिए. उन्हें करदाताओं की श्रेणी में लाया जाना चाहिए. क्योंकि वे तो गरीबी रेखा से काफी ऊपर हैं. &lt;br /&gt;यह भारत ही है जहां शासन तंत्र जनता के साथ इस तरह का भद्दा मजाक कर सकता है और जनता चुप रह सकती है. दूसरा कोई देश होता तो इस अवधारणा के जनकों को उनके परिवार के साथ एक टेंट में कैद कर&amp;nbsp;भरण-पोषण के लिए इतनी ही रकम प्रतिदिन देकर देखती कि वे कैसे अपना परिवार चलाते हैं. अपनी बुनियादी जरूरतों को इतने पैसों में कैसे पूरा करते है. यदि वे कर दिखाते तो तो उनके चरण छूती. नहीं कर पाते तो गला................!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;----देवेंद्र गौतम&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/9069764514662556355/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/03/blog-post_20.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/9069764514662556355'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/9069764514662556355'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/03/blog-post_20.html' title='गरीबी मिटाने का नायाब फार्मूला'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-644060534184029443</id><published>2012-03-17T01:23:00.001-07:00</published><updated>2012-03-17T01:24:42.023-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="टिप्पणी"/><title type='text'>सरकार बनाई तो अब भुगतो</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विश्वविख्यात अर्थशास्त्री हैं. लेकिन उनका अर्थशास्त्र आम भारतीयों के पल्ले नहीं पड़ रहा है. बजट में रेल&amp;nbsp;किराया से लेकर तमाम जरूरी जिंसों के दाम बढ़ा दिए. टैक्स में कोई खास छूट नहीं दी. रसोई गैस और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की धमकी दे रहे हैं. फिर भी उनका दावा है कि इस बजट से महंगाई घटेगी. कैसे?....यह नहीं बता रहे. विद्वान आदमी हैं उन्हें समझाना चाहिए. यह चमत्कार कैसे होगा. उनकी सरकार बनते ही भारतीय जन की रसोई पर हमला शुरू हो गया. जो गैस एनडीए सरकार के ज़माने तक सहज उपलब्ध था वह दुर्लभ हो गया. अब एक वर्ष में सिर्फ 6 सिलिंडर उपलब्ध करने की घोषणा हो चुकी है. एक सिलिंडर में दो महीने तक किस रसोई में भोजन बनेगा मनमोहन डा ही बता सकते हैं. बाकी सिलिंडर अंतर्राष्ट्रीय कीमतों पर यानी सब्सिडी के बगैर मिलेंगे यह घोषणा तो की लेकिन गैस एजेंसियों को ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया. जनता त्राहि-त्राहि कर रही है लेकिन विपक्ष चुप है. यूपीए सरकार बनायीं तो अब पांच साल तक भुगतो. सिर्फ ममता जी ने रेल बजट पर नाराजगी जताई. उनकी मजबूरी थी. उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति करनी है जहाँ की जनता ट्राम भाड़ा में 25&amp;nbsp; पैसे की बढ़ोत्तरी पर भी उबल उठती है. आम जनता को महंगाई की चक्की में पीसने वाली सरकार के साथ उनकी दोस्ती को वहां के लोग कबतक बर्दास्त कर सकते हैं? विरोध तो जताना ही था. अन्य दलों ने भी सांकेतिक विरोध जताकर अपनी भूमिका का निर्वहन कर लिया. जिस तरह प्रधानमंत्री जी का कीमतें बढाकर महंगाई पर लगाम लगाने का दावा लोगों की समझ से परे है उसी तरह तरक्की के जो आंकड़े पेश किये जा रहे हैं उनका आम जनजीवन पर कोई असर समझ में नहीं आ रहा है. इस देश के लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि वे करें तो क्या करें. नागनाथ का विकल्प सांपनाथ हैं. कोई सही और भरोसेमंद विकल्प नज़र ही नहीं आ रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---देवेंद्र गौतम&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/644060534184029443/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/03/blog-post_17.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/644060534184029443'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/644060534184029443'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/03/blog-post_17.html' title='सरकार बनाई तो अब भुगतो'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-150765834297347689</id><published>2012-03-07T23:17:00.000-08:00</published><updated>2012-03-07T23:20:54.483-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="टिप्पणी"/><title type='text'>...दिलों में उदासी सड़कों पर  सन्नाटा?</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;आज 8 &amp;nbsp;मार्च का दिन है. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस. साथ ही होली की पूर्व संध्या भी. पूर्व संध्या बिहार और झारखंड के लिए. यूपी और दिल्ली सहित देश के कई प्रांतों में तो आज ही होली मनाई जा रही है. लेकिन इस बार न अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का और न ही होली का कोई उमंग दिखाई पड़ रहा है. पूरे माहौल में एक अजीब उदासी, एक अजीब सन्नाटा महसूस हो रहा है.&lt;br /&gt;आज सुबह रंगों के भय से हमने कुछ पुराने कपडे पहन लिए थे और सोचा था कि शहर में नहीं निकलेंगे. लेकिन करीब 10 &amp;nbsp;बजे गारी लेन के लिए निकलना पड़ा. हम इसके लिए तैयार थे कि कहीं से पिचकारी का रंग आएगा. कहीं रंग भरे गुब्बारे मरे जायेंगे. हालांकि यह भरोसा था कि जो भी होगा अशोक विहार कालोनी के बाहर ही होगा. रांची की इस कालोनी में एलीट क्लास के लोग रहते हैं. उनके बच्चे भी इंटरनेटी युग के अंतर्मुखी मिजाज़ के हैं. वे टीवी और नेट से चिपके होंगे. उन्हें गुब्बारे मारने की फुर्सत कहां. भारतीय संस्कृति के संस्कारों का ज्ञान कहां?&lt;br /&gt;बहरहाल हम डरते-डरते कोलोनी से बाहर निकले बाज़ार तक गए. जरूरी सामान ख़रीदे और लौट आये. न कहीं पिचकारी छूटी न गुब्बारे फूटे. यही हाल रहा तो आने वाले समय में पर्व-त्यौहार संभवतः औपचारिक आयोजन तक सिमट जायेंगे. होली मिलन के निमंत्रणों से ज्ञात होगा ही होली आ गयी है. क्या यह अपनी संस्कृति से अलगाव का द्योतक नहीं है.....?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;----देवेंद्र गौतम &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/150765834297347689/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/03/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/150765834297347689'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/150765834297347689'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2012/03/blog-post.html' title='...दिलों में उदासी सड़कों पर  सन्नाटा?'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-6931450717659774940</id><published>2011-11-28T21:41:00.001-08:00</published><updated>2011-11-28T21:59:08.127-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विडंबना"/><title type='text'>अरबों की दौलत मगर किस काम की</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;हाल में मेरे चचेरे भाई नगेन्द्र प्रसाद रांची आये. उन्होंने एक मसला रखा जिसने कई सवाल खड़े कर दिए..&amp;nbsp;वे घाटशिला में रहते हैं. घाटशिला झारखंड के&amp;nbsp;पूर्वी सिंहभूम जिले का का एक पिछड़ा हुआ अनुमंडल है. यहां कुल आबादी में&amp;nbsp;51&amp;nbsp;% आदिवासी हैं. सिंचित ज़मीन 20&amp;nbsp;% भी नहीं. कुछ वर्षा आधारित खेती होती है लेकिन बंज़र ज़मीन काफी ज्यादा है. नगेन्द्र जी ने एक आदिवासी परिवार के बारे में बताया जिसके पास 250&amp;nbsp;बीघा ज़मीन है लेकिन आर्थिक स्थिति साधारण है. उस परिवार के युवक अपनी ज़मीन मोर्गेज रखकर यात्री बस निकालना चाहते हैं. इसमें वे मदद चाहते थे. जानकारी मिली कि आदिवासी ज़मीन मॉर्गेज नहीं होती. राष्ट्रीयकृत बैंक, प्राइवेट बैंक या प्राइवेट फाइनांसर भी इसके लिए तैयार नहीं होते. कारण है टेनेंसी एक्ट. जिसके प्रावधान के अनुसार आदिवासी ज़मीन उसी पंचायत और उसी जाति&amp;nbsp;का कोई आदिवासी ही उपायुक्त की अनुमति लेकर खरीद सकता है. अन्यथा उसकी खरीद-बिक्री नहीं हो सकती. बिरसा मुंडा के आंदोलन उलगुलान के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह एक्ट बनाया था.&lt;br /&gt;&lt;a name=&#39;more&#39;&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;घाटशिला जैसे इलाके में भी इतनी ज़मीन का बाज़ार मूल्य आज की तारीख में करोड़ों नहीं अरबों में लगेगी. एक्ट की बंदिश नहीं होती तो थोड़ी ज़मीन बंधक रखकर या बेचकर वह परिवार कई बसें निकाल सकता था या नियमित आय का कुछ और स्रोत तैयार कर सकता था. एक आदिवासी वित्त निगम है जो उनकी मदद कर सकता था लेकिन बिहार से अलग हुए 11&amp;nbsp;&amp;nbsp;वर्ष हो चुकने के बावजूद उसकी परिसंपत्तियों का बंटवारा नहीं हो सका है. लिहाज़ा मृत पड़ा है. अब इस परिवार के युवक बस निकालने के वैकल्पिक उपायों को ढूंढने&amp;nbsp;में लगे हैं. वे सूबे के मुख्यमंत्री और सत्ता में बैठे&amp;nbsp;अन्य आदिवासी नेताओं के पास आकर पूछना चाहते हैं कि जिस एक्ट ने अरबों की दौलत होने के बावजूद उन्हें पाई-पाई का मुहताज बना रखा है उस कानून में किसी तरह के संशोधन की ज़रुरत वे क्यों नहीं महसूस करते. सत्ता में बैठे आदिवासी नेता तो लाल हो गए लेकिन अलग राज्य बनने से आम आदिवासियों का क्या भला हुआ. जिस जमाने में यह कानून बना था उस ज़माने में इसकी ज़रुरत थी लेकिन आज तो यह आदिवासियों के विकास में ही बाधक बन गया है. आज किसी आदिवासी को दारू पिलाकर ज़मीन नहीं हडपी जा सकती. वे जागरूक हो चुके हैं. अब इस एक्ट की कोई ज़रुरत नहीं. लेकिन अभी आदिवासियों के बीच से यह मांग खुलकर उठ नहीं पा रही है. आदिवासी नेताओं में सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी इस बात को समझ रहे हैं और खुलकर बोल रहे है. बाकी नेता इसमें किसी तरह का परिवर्तन या संशोधन की बात उठने पर लाल कपडे के सामने सांड की तरह भड़क उठते हैं. उन्हें लगता है इससे आदिवासी नाराज हो जायेंगे और उनका वोट बैंक गड़बड़ हो जायेगा. लेकिन सैकड़ों एकड़&amp;nbsp;ज़मीन वाला आदिवासी उद्योगपति कैसे बनेगा इसका जवाब उनके पास नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----देवेंद्र गौतम&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/6931450717659774940/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/11/blog-post_28.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/6931450717659774940'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/6931450717659774940'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/11/blog-post_28.html' title='अरबों की दौलत मगर किस काम की'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-2288626927600300366</id><published>2011-11-25T21:38:00.001-08:00</published><updated>2011-11-28T21:58:42.758-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चिंतन"/><title type='text'>जनजीवन को जटिल बनाते अपराधी</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;मुट्ठी&amp;nbsp;भर अपराधी और कमजोर&amp;nbsp;सरकारी&amp;nbsp;तंत्र आम आदमी के जीवन को जटिल बनाते जा रहे हैं. किसी ज़माने में एक खाताधारी की पहचान&amp;nbsp;पर बैंक बैंक अकाउंट खुल जाता था अब इसके लिए कई तरह के दस्तावेज़ प्रस्तुत करने पड़ते हैं. ट्रेन में सफ़र करना हो किसी दूसरे शहर में होटल में ठहरना हो तो पहचान पत्र की ज़रुरत पड़ती है. आमलोगों के लिए यह पहचान पत्र हासिल करना आसमान से तारे तोड़ लेन के समान है. &lt;br /&gt;&lt;a name=&#39;more&#39;&gt;&lt;/a&gt;जनगणना वाले जरूर घर-घर जाकर सर्वे करते हैं लेकिन वोटर लिस्ट तैयार करने वाले या दूसरे पहचान पत्र बनाने वाले बाबू घर-घर नहीं जाते. इसके लिए पैरवी करनी पड़ती है. एक सीधे-सादे गरीब आदमी के लिए पहचान पत्र बनवाना आसान नहीं होता लेकिन अपराधकर्मी जितने फर्जी नामों से चाहें आसानी से बनवा लेते हैं. दूसरी बात यह कि जिन्हें रोजी-रोटी के लिए बार-बार शहर बदलने होते हैं वे हर जगह नया पहचान पत्र कैसे हासिल करें. यह समस्या रहती है.सरकारी तंत्र ख़ुफ़िया जानकारी हासिल करने में पूरी तरह निकम्मी साबित हो रही है. आतंकवादी किसी भी शहर में गोला-बारूद के साथ आकर वारदात को अंजाम दे जाते हैं और सुरक्षा एजेंसियां हाथ मालती रह जाती हैं. घोटालेबाज बड़ी-बड़ी रकमें देश-विदेश के बैंकों में रखते हैं उन्हें कोई परेशानी नहीं होती लेकिन साधारण आदमी 10&amp;nbsp;-20&amp;nbsp; लाख भी जमा कर&amp;nbsp;ले तो सवालों की झड़ी लग जाती है. विदेशी बैंकों से कला धन वापस लाने की मांग होती है तो सरकार ऐसी मांग करने वालों की पिटाई&amp;nbsp;करवा देती है और काले धन के खातेधारियों के हितों का परोक्ष रूप से रक्षा करती दिखाई देती है. भारत की सवा सौ&amp;nbsp;करोड़ की आबादी में अपराधियों. जालसाजों, घोटालेबाजों की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं होगी लेकिन पूरी आबादी सरकार के तुगलकी नियमों की चक्की में पिस रही है. सिर्फ इसलिए की सरकार गलत तत्वों पर नज़र रखने में विफल है या फिर उनके साथ सांठगांठ&amp;nbsp;&amp;nbsp; कर अपनी चौकसी की खानापूर्ति के लिए आमलोगों को परेशान कर रही है. &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/2288626927600300366/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/11/blog-post_25.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/2288626927600300366'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/2288626927600300366'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/11/blog-post_25.html' title='जनजीवन को जटिल बनाते अपराधी'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-6194666996224506296</id><published>2011-11-14T07:00:00.001-08:00</published><updated>2011-11-14T11:01:25.867-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विचार मंथन"/><title type='text'>आणविक सृष्टि बनाम रासायनिक सृष्टि</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में कई अवधारणाएं प्रचलित रही हैं. भौतिक भी और आध्यात्मिक भी. भौतिकवाद की अवधारणा मुख्य रूप से डार्विन के विकासवाद पर टिकी है जिसमे पानी के बुलबुले में रासायनिक तत्वों के समन्वय से एककोशीय जीव&amp;nbsp;अमीबा और फिर उससे तमाम जलचरों, उभयचरों, थलचरों&amp;nbsp;और नभचरों की एक लंबी प्रक्रिया के तहत उत्पत्ति और विकास की बात कही गयी है. एक हद तक कोशा (सेल) विभाजन के बाद नर-मादा के अस्तित्व में आने और मैथुनी सृष्टि की बात कही गयी है. यह अवधारणा काफी वैज्ञानिक और विश्वसनीय भी लगती है.&lt;br /&gt;इधर अध्यात्म की दुनिया&amp;nbsp;में नज़र दौडाएं तो विभिन्न धर्मों में जीवन की उत्पत्ति की अवधारणाएं प्रस्तुत की गयी हैं लेकिन सबका सार यह है कि इस सृष्टि और उसमें जीवन की उत्पत्ति एक महाशून्य&amp;nbsp;से हुई है. दुर्गा सप्तसती&amp;nbsp;के प्राधानिकं रहस्यम के मुताबिक त्रिगुणमयी महालक्ष्मी ही&amp;nbsp;पूरी सृष्टि का आदि&amp;nbsp;कारण हैं. वे दृश्य (साकार) और अदृश्य (निराकार) रूप से सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त कर स्थित हैं. उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को शून्य देखकर तमोगुण से चतुर्भुजी&amp;nbsp;महाकाली और सत्वगुण से महासरस्वती को प्रकट किया.इसके बाद उन्हें नर और मादा के जोड़े उत्पन्न करने को कहा. खुद भी एक जोड़ा उत्पन्न किया जिससे ब्रह्मा, विष्णु, शिव नर और लक्ष्मी, सरस्वती और गौरी मादा के रूप में प्रकट हुए. यहां से मैथुनी सृष्टि की शुरुआत हुई. मैथुनी सृष्टि को हम रासायनिक सृष्टि भी कह सकते हैं.&lt;br /&gt;इससे यह परिलक्षित होता है कि मैथुनी&amp;nbsp;सृष्टि के पहले महाशून्य से&amp;nbsp;अमैथुनी सृष्टि हुई थी. महाशुन्य यानी कॉस्मिक रेज. कॉस्मिक रेज से ही परमाणुओं की उत्पत्ति मानी&amp;nbsp;जाती है. या फिर अणुओं तो तोड़ते जाने के बाद अंत में कॉस्मिक रेज या एब्सोल्यूट एनर्जी&amp;nbsp;शेष बचता है. इस&amp;nbsp;एब्सोल्यूट एनर्जी से ही परमाणुओं की उत्पत्ति होती है. इसका सीधा सा अर्थ&amp;nbsp;यह है कि &amp;nbsp;मैथुनी सृष्टि के पहले आणविक सृष्टि हुई थी या दोनों सृष्टियाँ कुछ समय तक समान रूप से जारी रही थीं. आणविक सृष्टि से उत्पन्न&amp;nbsp;हुए लोग अपने शरीर के परमाणुओं को &amp;nbsp;इच्छानुसार संगठित या विघटित कर सकते थे. वे मनचाहा आकार या स्वरूप धारण&amp;nbsp;कर सकते थे. उनका व्यक्तित्व भी तीन गुणों&amp;nbsp;सत्व, रज और तम से संचालित होता था लेकिन वे आणविक&amp;nbsp;होने के कारण शक्तिशाली&amp;nbsp;और जीवन मरण के चक्र से परे अर्थात&amp;nbsp;अमर&amp;nbsp;थे. इस वर्ग के जीवों को ही हिन्दू धर्म में&amp;nbsp;देवता और एनी धर्मों में फ़रिश्ता या देवदूत&amp;nbsp;माना गया और सर्वव्यापी बताया&amp;nbsp;गया. तमाम जीवधारी रासायनिक सृष्टि से आणविक सृष्टि में परिणत होने के प्रयास&amp;nbsp;में लगे रहते हैं. यह साधना के जरिये अपनी चेतना&amp;nbsp;को सूक्ष्मतम अवस्था में पहुंचाने के जरिये ही संभव है. तमाम पूजा पद्धतियां इसका मार्ग ही प्रशस्त करती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----देवेंद्र&amp;nbsp;गौतम&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(इस अवधारणा पर आपके विचार आमंत्रित हैं)&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/6194666996224506296/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/11/blog-post_14.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/6194666996224506296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/6194666996224506296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/11/blog-post_14.html' title='आणविक सृष्टि बनाम रासायनिक सृष्टि'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-4743514956375133454</id><published>2011-11-06T02:54:00.000-08:00</published><updated>2011-11-06T02:54:52.045-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="टिप्पणी"/><title type='text'>टीम अन्ना को संयम और समन्वय की ज़रूरत</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अन्ना हजारे ने अपना ब्लॉग बंद करने का ऐलान किया है. उनकी नाराजगी का कारण उनका पत्र &amp;nbsp;समय से पहले सार्वजनिक कर दिया जाना है. उनहोंने जिस पत्रकार को ब्लॉग के&amp;nbsp;संचालन का जिम्मा दिया था उसने यह गलती की है. इसे आपसी समन्वय का अभाव और अति उत्साह का नतीजा ही कहेंगे. टीम अन्ना के सदस्य किसी मसले पर आपस में&amp;nbsp;सलाह मश्वरा करना और सार्वजनिक बयान देने अन्ना से बात करने या सोचने समझने की ज़रूरत नहीं समझते. उनहोंने अपने को भ्रष्टाचार विरोध का चैम्पियन और भारतीय जनमानस की आवाज़ मान लिया है. यही कारण है कि वे विवादास्पद बयान जारी कर दे रहे हैं. प्रशांत भूषण कश्मीर पर विचार प्रकट कर पीटाई खा जा रहे हैं तो &amp;nbsp;अरविंद केजरीवाल जूते का प्रहार झेल रहे हैं. बयान देने के मामले में स्वयं अन्ना भी संयम नहीं बरत रहे.&amp;nbsp;अडवाणी की रथयात्रा के पूर्व उनकी सलाह ठीक ऐसी ही थी. अडवाणी की यह कोई पहली रथयात्रा नहीं थी. यह उनकी राजनैतिक शैली का हिस्सा रही है. यदि वे भ्रष्टाचार के विरोध में रथयात्रा कर रहे थे तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार था. अन्ना को कोई भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का कॉपी राईट नहीं मिल गया है. इस बात को समझना चाहिए.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अन्ना के आंदोलन में जो अपार जनसमूह उमड़ पड़ा था वह इसलिए कि उन्होंने आम जनता के आक्रोश को स्वर दिया था. उनकी छवि साफ़ सुथरी&amp;nbsp;थी और उनके अन्दर&amp;nbsp;परिवर्तन की लम्बी लड़ाई के नेतृत्त्व की क्षमता दिखी थी. लेकिन वे यह बात नहीं समझ पाए कि उनकी&amp;nbsp;लड़ाई बड़े ही भ्रष्ट और शातिर किस्म के लोगों के साथ है जो पल में तोला और पल में रत्ती करने की कला&amp;nbsp;में माहिर&amp;nbsp;हैं. दरअसल टीम अन्ना अपनी प्रारंभिक जीत को पचा नहीं पाई और अति-उत्साह में उल-जुलूल हरकतें करने लगी. कांग्रेस उनके छिद्रान्वेषण में लगी रही और कुछ छिद्र ढूंड भी निकाले. निश्चित रूप से यह सबक सिखाने का अभियान था. इसके जरिये कांग्रेस ने अपने असली चरित्र को ujagar&amp;nbsp;किया. उसने बताया कि काला धन वापस लाने की बात करोगे तो आधी रात को पीटाई होगी&amp;nbsp;और भ्रष्टाचार विरोध करोगे तो तुम्हारी चड्ढी भी उतार फेकेंगे.&lt;span&gt;&amp;nbsp;इस किस्म के लोगों से लड़ने के लिए बड़े धैर्य और कूटनीतिक दक्षता की ज़रूरत होती है. यह माफियाई किस्म के आर्थिक लुटेरों का गिरोह है.&lt;span&gt;&amp;nbsp;इसके हाथ में दानवी&amp;nbsp;ताक़त है. सीधे-सादे लोगों को ये नचाकर फेंक देंगे.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;लेकिन यह भी सच है कि अब भारत के लोग राजनीति की माफियाई और मायावी संस्कृति को ज्यादा दिनों&amp;nbsp;तक नहीं बर्दास्त&amp;nbsp;&lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;कर पाएंगे. उन्हें विकल्प की तलाश है. टीम अन्ना यदि विकल्प बन दे पाई तो ठीक नहीं तो कोई दूसरी&amp;nbsp;ताक़त मैदान में आएगी. परिवर्तन की जन-आकांक्षा कोई swaroop तो ग्रहण करेगी ही.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;-----देवेंद्र गौतम&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/4743514956375133454/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/11/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/4743514956375133454'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/4743514956375133454'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='टीम अन्ना को संयम और समन्वय की ज़रूरत'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-2759941322731668666</id><published>2011-10-13T12:10:00.000-07:00</published><updated>2011-10-13T12:11:05.131-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आलेख"/><title type='text'>घोटाले का असली सूत्रधार?</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;background-color: white; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif;&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;h1 style=&quot;border-bottom-color: rgb(238, 238, 238); border-bottom-style: solid; border-bottom-width: 3px; color: #4d4a4a; font-family: &#39;Trebuchet MS&#39;, Arial, Helvetica, sans-serif; margin-bottom: 4px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; padding-bottom: 4px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 8px;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;font-size: large;&quot;&gt;घोटाले का असली सूत्रधार?&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;&lt;div class=&quot;article_metadata&quot; style=&quot;margin-bottom: 4px; padding-bottom: 12px; padding-left: 0px; padding-right: 0px; padding-top: 0px;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;font_size&quot; style=&quot;float: right; font-size: 11px; margin-bottom: 12px; text-align: right;&quot;&gt;Font size:&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://www.tehelkahindi.com/investigation/887.html&quot; style=&quot;color: black; text-decoration: none;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;Decrease font&quot; border=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.tehelkahindi.com/themes/tpl_4023/img/font_decrease.gif&quot; style=&quot;border-bottom-style: none; border-color: initial; border-color: initial; border-left-style: none; border-right-style: none; border-top-style: none; border-width: initial; border-width: initial; padding-left: 3px; vertical-align: bottom;&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;a href=&quot;http://www.tehelkahindi.com/investigation/887.html&quot; style=&quot;color: black; text-decoration: none;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;Enlarge font&quot; border=&quot;0&quot; src=&quot;http://www.tehelkahindi.com/themes/tpl_4023/img/font_enlarge.gif&quot; style=&quot;border-bottom-style: none; border-color: initial; border-color: initial; border-left-style: none; border-right-style: none; border-top-style: none; border-width: initial; border-width: initial; padding-left: 3px; vertical-align: bottom;&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=&quot;metadata_time&quot; style=&quot;color: #666666; font-size: 11px;&quot;&gt;20/06/2011 05:31:00&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div id=&quot;article_body&quot; style=&quot;font-size: 12px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 12px; overflow-x: hidden; overflow-y: hidden; width: 648px;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;image&quot; style=&quot;border-bottom-color: rgb(77, 74, 74); border-bottom-style: solid; border-bottom-width: 1px; border-left-color: rgb(77, 74, 74); border-left-style: solid; border-left-width: 1px; border-right-color: rgb(77, 74, 74); border-right-style: solid; border-right-width: 1px; border-top-color: rgb(77, 74, 74); border-top-style: solid; border-top-width: 1px; float: left; margin-right: 10px; padding-bottom: 4px; padding-left: 4px; padding-right: 4px; padding-top: 4px; width: 240px;&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;image&quot; src=&quot;http://www.tehelkahindi.com/thumbnail.php?file=/maran_396407363.jpg&amp;amp;size=article_small&quot; style=&quot;border-bottom-style: none; border-color: initial; border-left-style: none; border-right-style: none; border-top-style: none; border-width: initial;&quot; /&gt;&lt;span class=&quot;image_caption&quot; style=&quot;font-size: 11px; line-height: normal;&quot;&gt;पूर्व दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;2जी घोटाले में ए राजा और कलैनार टीवी को मिली 200 करोड़ की घूस तो उस रकम के मुकाबले बहुत छोटी है जो मारन बंधुओं को मैक्सिस समूह से मिली. आशीष खेतान और रमन किरपाल की तहकीकात&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;तमिलनाडु की सत्ता एक बार फिर संभालने के बाद मुख्यमंत्री जयललिता 14 जून को प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली आई थीं. इस मुलाकात के बाद उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें तमाम बातों के अलावा उन्होंने यह मांग भी कर डाली कि केंद्र सरकार में कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन अगर खुद इस्तीफा नहीं देते तो प्रधानमंत्री को ही उन्हें हटा देना चाहिए.&lt;br /&gt;जयललिता की यह मांग तहलका की उस तहकीकात के बाद आई थी जो साफ इशारा करती है कि संचार मंत्री रहते हुए मारन ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए एयरसेल कंपनी के पूर्व प्रमुख शिवशंकरन पर इस बात के लिए दबाव डाला कि वे अपनी कंपनी मैक्सिस समूह को बेच दें. इसके एवज में इस मलेशियाई कारोबारी समूह ने मारन बंधुओं को 700 करोड़ रु का फायदा पहुंचाया. कोई भ्रष्टाचार यदि सरकारी अधिकारियों और निजी क्षेत्र के लोगों की सांठ-गांठ से हुआ हो तो जांच एजेंसियां उसकी जांच करते हुए अक्सर लेन-देन का साक्ष्य जुटाने की कोशिश करती हैं. यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि सरकारी अधिकारी को घूस कैसे दी गई. नकद या फिर किसी और तरीके से.&lt;br /&gt;इस साल जनवरी में सीबीआई ने एक रियल एस्टेट कंपनी के मालिक शाहिद उस्मान बलवा और कलैनार टीवी के बीच हुए लेन-देन का पता लगाया था. जब बलवा की कंपनी स्वान टेलीकॉम को बेशकीमती 2जी स्पेक्ट्रम आवंटित हो गया तो इसके बाद बलवा की कंपनी ने द्रमुक सुप्रीमो करुणानिधि के परिवार के स्वामित्व वाले कलैनार टीवी को 200 करोड़ रुपये हस्तांतरित किए थे. सीबीआई ने करुणानिधि की बेटी और इस टीवी चैनल में 20 फीसदी की हिस्सेदार कनिमोरी को गिरफ्तार करने के लिए इस साक्ष्य को पर्याप्त माना था. 26 अप्रैल को दाखिल किए गए पूरक आरोपपत्र में जांच एजेंसी ने कहा था कि यह लेन-देन वैध नहीं था बल्कि इसकी प्रकृति से पता चलता है कि यह यूनिफाइड एक्सिस सर्विस लाइसेंस (यूएएसएल), स्पेक्ट्रम और गलत तरीके मिले अन्य फायदों के एवज में स्वान टेलीकॉम द्वारा दी गई घूस थी.&lt;br /&gt;&lt;span class=&quot;quote_right&quot; style=&quot;border-left-color: rgb(77, 74, 74); border-left-style: solid; border-left-width: 5px; color: #4d4a4a; display: inline; float: right; font-size: 11px; font-variant: small-caps; height: auto; margin-bottom: 10px; margin-left: 15px; margin-right: 0px; margin-top: 15px; padding-bottom: 15px; padding-left: 15px; padding-right: 15px; padding-top: 15px; width: 200px;&quot;&gt;अहम सवाल यह है कि क्या मैक्सिस-सन टीवी और मैक्सिस-सन एफएम सौदा इस हाथ दे-उस हाथ ले वाली तर्ज पर हुआ था&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name=&#39;more&#39;&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सूत्रों के मुताबिक सीबीआई अब केंद्रीय कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन के परिवार के स्वामित्व वाले सन टीवी नेटवर्क और मलेशियाई कंपनी मैक्सिस ग्रुप के बीच हुए एक ऐसे ही सौदे की जांच में जुटी है. इसमें बलवा और कलैनार टीवी के बीच हुए लेन-देन की रकम से कहीं ज्यादा लेन-देन हुआ है. सौदे में शामिल मैक्सिस ग्रुप के पास देश की सातवीं सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी एयरसेल की 74 फीसदी हिस्सेदारी है.&lt;br /&gt;नवंबर, 2006 में उस समय दूरसंचार मंत्री रहे मारन ने एयरसेल को 14 यूएएसएल दिए थे. 2जी स्पेक्ट्रम के ये लाइसेंस उसी कीमत पर दिए गए थे जिस कीमत पर राजा ने 2008 में स्वान, यूनिटेक और दूसरी कंपनियों को 2जी लाइसेंस दिए. एयरसेल ने 14 टेलीकॉम सर्कलों के लिए 1,399 करोड़ रुपये चुकाए थे. यह कीमत बोली की प्रक्रिया द्वारा 2001 में ही तय की गई थी जब भारत में दूरसंचार उद्योग शुरुआती चरण में था.&lt;br /&gt;एयरसेल को ये लाइसेंस दो साल की &#39;बेवजह&#39; देरी के बाद मिले थे और देरी मारन की अगुवाई वाले दूरसंचार विभाग की तरफ से की गई थी. नये क्षेत्रों में लाइसेंस पाने के लिए एयरसेल ने मई, 2004 में ही तब आवेदन कर दिया था जब मारन ने दूरसंचार मंत्री के तौर पर कार्यभार संभाला था. 2001 से 2009 के बीच हुए दूरसंचार लाइसेंसों के आवंटन के लिए गठित न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) शिवराज पाटिल की एक सदस्यीय समिति ने कहा है कि विभाग ने एयरसेल के आवेदन पर &#39;गैरजरूरी&#39;, &#39;आधारहीन&#39; और &#39;बेवजह&#39; आपत्तियां दर्ज की थीं. पाटिल ने यह रिपोर्ट 31 जनवरी को मौजूदा दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल को सौंपी है.&lt;br /&gt;जब मार्च, 2006 में मलेशियाई कारोबारी टी. आनंद कृष्णन ने एयरसेल में 74 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली तब जाकर कहीं कंपनी की फाइल ने गति पकड़ी. कृष्णन मूल रूप से श्रीलंकाई तमिल हैं. इसके पहले तक इस कंपनी का स्वामित्व शिवा समूह के प्रमुख सी. शिवशंकरन के पास था. इस कंपनी का पुराना नाम स्टर्लिंग इन्फोटेक ग्रुप था. कृष्णन ने एयरसेल की 74 फीसदी हिस्सेदारी के लिए 3,390.82 करोड़ रुपये चुकाए. आज करीब आठ अरब डॉलर की कुल कीमत के साथ एयरसेल देश की सातवीं सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी है. आनंद कृष्णन द्वारा एयरसेल को खरीदे जाने के छह महीने के अंदर मंत्रालय ने इस कंपनी को 14 कमाऊ सर्कलों के लिए लाइसेंस जारी कर दिए थे. इसके बाद एयरटेल एक छोटी कंपनी से काफी बड़ी कंपनी में तब्दील हो गई जिसकी मौजूदगी भारत के कई हिस्सों में थी. कैग द्वारा 2जी लाइसेंसों की कीमतों के निर्धारण को पैमाना माना जाए तो एयरसेल को दिए गए इन लाइसेंसों की कीमत तकरीबन 22,000 करोड़ रुपये होनी चाहिए थी. पर एयरसेल ने इसके लिए महज 1,399 करोड़ रुपये चुकाए.&lt;br /&gt;और दिलचस्प संयोग देखिए कि लाइसेंस मिलने के ठीक चार महीने बाद यानी फरवरी 2007 में आनंद कृष्णन ने अपने समूह की एक दूसरी कंपनी साउथ एशिया इंटरटेनमेंट होल्डिंग लिमिटेड (एसएईएचएल) के जरिए सन डायरेक्ट टीवी प्राइवेट लिमिटेड में चरणबद्ध तरीके से तकरीबन 600 करोड़ रुपये निवेश कर 20 फीसदी हिस्सेदारी हासिल कर ली. सन टीवी को दयानिधि के भाई कलानिधि और उनकी पत्नी कावेरी मारन चलाती हैं. इस निवेश को हरी झंडी आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने दी थी.&lt;br /&gt;और लगभग इसी समय मारन परिवार को सन डायरेक्ट टीवी के 12.6 करोड़ अतिरिक्त शेयर आवंटित किए गए ताकि उनकी हिस्सेदारी 80 फीसदी के स्तर पर बनी रहे.&amp;nbsp; हैरानी की बात थी कि मारन परिवार को ये 10 रुपये प्रति शेयर के भाव पर दिए गए जबकि मैक्सिस ग्रुप ने इन शेयरों के लिए इससे कहीं ऊंची कीमत चुकाई थी. कहा जा सकता है कि दोनों तरह से फायदा मारन परिवार को ही हुआ. मैक्सिस समूह ने जब महंगी कीमत पर शेयर खरीदे तो इसका फायदा मारन परिवार को ही मिलना था क्योंकि कंपनी की अधिकांश हिस्सेदारी उनके पास ही थी. इस सौदे से उन्हें सन डायरेक्ट टीवी की गतिविधियों के विस्तार के लिए रकम मिली जिसकी उन्हें उस समय सख्त जरूरत थी. जब यह सौदा हुआ था तो उस वक्त सन की डीटीएच कंपनी घाटे में थी. सन डायरेक्ट टीवी की 2007-08 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी का कुल राजस्व 61.16 करोड़ रुपये था जबकि कंपनी को उस साल 73.27 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था.दूसरी तरफ कम कीमत पर शेयर आवंटित होने का फायदा भी मारन परिवार को ही होना था.&lt;br /&gt;फरवरी, 2008 से जुलाई, 2009 के बीच मैक्सिस समूह ने मारन परिवार की दूसरी कंपनी साउथ एशिया एफएम लिमिटेड में 100 करोड़ रुपये का निवेश और किया. सन एफएम रेडियो नेटवर्क का स्वामित्व इसी कंपनी के पास है. मैक्सिस समूह की सहयोगी कंपनी साउथ एशिया मल्टीमीडिया टेक्नोलॉजीज लिमिटेड (एसएएमटी) ने साउथ एशिया एफएम लिमिटेड में 50 करोड़ रुपये की इक्विटी खरीदी. उसने प्रेफरेंस शेयर्स (ऐसे शेयर जिनके धारकों को लाभांश में प्राथमिकता दी जाती है.) में भी 43.9 करोड़ रुपये का निवेश किया. अब अहम सवाल यह है कि क्या मैक्सिस-सन टीवी और मैक्सिस-सन एफएम के सौदे इस हाथ दे-उस हाथ ले वाली उसी तर्ज पर हुए थे जिस पर बलवा और कलैनार टीवी के बीच 200 करोड़ रुपये का सौदा हुआ था? लगता तो ऐसा ही है. दोनों सौदे संबंधित दूरसंचार कंपनी को लाइसेंस और स्पेक्ट्रम आवंटित होने के बाद ही हुए. दोनों ही मौकों पर करुणानिधि के करीबी परिजनों को ही फायदा मिला.&lt;br /&gt;&lt;span class=&quot;quote_right&quot; style=&quot;border-left-color: rgb(77, 74, 74); border-left-style: solid; border-left-width: 5px; color: #4d4a4a; display: inline; float: right; font-size: 11px; font-variant: small-caps; height: auto; margin-bottom: 10px; margin-left: 15px; margin-right: 0px; margin-top: 15px; padding-bottom: 15px; padding-left: 15px; padding-right: 15px; padding-top: 15px; width: 200px;&quot;&gt;मारन के समय मंत्रालय ने न सिर्फ एयरसेल को नये लायसेंस जारी करने में देर की बल्कि पिछले लाइसेंसों के लिए स्पेक्ट्रम देने में भी देर लगाई&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कलैनार टीवी में ए राजा और उनके परिवार की कोई हिस्सेदारी नहीं है जबकि सन डायरेक्ट टीवी में दयानिधि के भाई कलानिधि और उनकी पत्नी की 80 फीसदी हिस्सेदारी है. इसलिए जहां तक लेन-देन से जुड़ी घटनाओं की बात है तो उन पर गौर करने पर पहली नजर में मारन ए राजा के मुकाबले कहीं ज्यादा साफ तरीके से संदेह के घेरे में दिखते हैं. जब केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी और अरुण शौरी दूरसंचार मंत्री थे तो पांच मार्च 2004 को एयरसेल की सहयोगी और मुख्य कंपनी शिवा वेंचर्स लिमिटेड की सहयोगी डिशनेट वायरलेस लिमिटेड ने मध्य प्रदेश समेत कुल आठ सर्कलों में यूएएसएल के लिए आवेदन किया था. उस समय तक एयरसेल सिर्फ चेन्नई और तमिलनाडु सर्कल में ही सेवाएं दे रही थी. आवेदन के ठीक एक महीने बाद दूरसंचार विभाग ने आठों सर्कलों के लिए आशय पत्र (एलओआई) जारी कर दिए. पर सात सर्कलों के लाइसेंस पर ही दस्तखत हुए. इनमें मध्य प्रदेश शामिल नहीं था. एयरसेल लिमिटेड के पास तमिलनाडु क्षेत्र का लाइसेंस था, एयरसेल सेल्युलर लिमिटेड के पास चेन्नई सर्कल का लाइसेंस था और बाद में डिशनेट वायरलेस लिमिटेड के पास अन्य सर्कलों का लाइसेंस था. ये तीनों कंपनियां एयरसेल के नाम से ही दूरसंचार सेवाएं मुहैया करा रही थीं और इन तीनों कंपनियों का स्वामित्व सी. शिवशंकरन के स्टर्लिंग इन्फोटेक समूह के पास था जो अब शिवा ग्रुप बन गया है.&lt;br /&gt;21 अप्रैल, 2004 को डिशनेट ने पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र में लाइसेंस के लिए आवेदन किया. तब तक उसे मध्य प्रदेश के लिए आशय पत्र जारी हो चुका था, पांच मई, 2004 को दूरसंचार विभाग ने पहली बार डिशनेट की फंडिंग पर सवाल उठाए. इसका परिणाम यह हुआ कि मध्य प्रदेश में इसके लाइसेंस और दूसरे क्षेत्रों के लिए किए गए इसके आवेदनों पर रोक लगा दी गई.&lt;br /&gt;26 मई, 2004 को मारन ने बतौर दूरसंचार मंत्री कार्यभार संभाला.&lt;br /&gt;जून, 2004 में डिशनेट ने दूरसंचार विभाग द्वारा उठाए गए सारे सवालों का विस्तृत जवाब भेज दिया.&lt;br /&gt;आठ जुलाई, 2004 को दूरसंचार विभाग के सचिव ने पूर्वी और पश्चिम उत्तर प्रदेश के लिए कंपनी को आशय पत्र जारी करने और मध्य प्रदेश के लिए लाइसेंस पर दस्तखत के लिए समय बढ़ाने की सिफारिश की. इस प्रस्ताव को मारन के पास मंजूरी के लिए भेजा गया.&lt;br /&gt;24 अगस्त, 2004 को मारन के निजी सचिव ने एक नोट में कहा कि उन्हें यह निर्देश दिया गया है कि डिशनेट और अन्य जगहों पर लाइसेंस रखने वाली उसकी सहयोगी कंपनी के स्वामित्व संबंधी विवरण मुहैया कराए जाएं. खास तौर पर तमिलनाडु और चेन्नई के लाइसेंस के बारे में जानकारी मांगी गई थी. यह भी पूछा गया था कि क्या डिशनेट और उसकी सहयोगी कंपनी ने कानूनों का उल्लंघन तो नहीं किया है. इस नोट के आधार पर डिशनेट को एक नोटिस जारी किया गया जिसका विस्तृत जवाब कंपनी ने विभाग को सौंपा.&lt;br /&gt;अगले चार महीने तक दूरसंचार विभाग ने विभिन्न स्तरों पर कंपनी के सामने कई कानूनी मसले उठाए. इसके बाद फाइल कानूनी सलाहकार को सौंपी गई लेकिन इसे 17 दिसंबर, 2004 को वापस ले लिया गया.&lt;br /&gt;1 मार्च, 2005 को डिशनेट ने हरियाणा, केरल, कोलकाता और पंजाब सर्कल के लाइसेंस के लिए भी आवेदन किया. यह फाइल दूरसंचार विभाग में घूमती रही और कोई निर्णय नहीं लिया गया. इस बीच दूरसंचार क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 49 से बढ़ाकर 74 फीसदी कर दी गई.&lt;br /&gt;अक्टूबर 2005 में मैक्सिस समूह ने एयरसेल के अधिग्रहण के लिए शिवशंकरण से संपर्क साधा.&lt;br /&gt;14 दिसंबर 2005 को दूरसंचार विभाग ने नये यूएएसएल दिशानिर्देश जारी किए जिनके अनुसार अब किसी भी सर्कल में कितनी भी कंपनियां सेवा मुहैया करा सकती थीं. इसके अलावा किसी भी कंपनी के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक ही सर्कल में सेवा दे रही एक से ज्यादा कंपनियों में 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी खरीदना भी प्रतिबंधित कर दिया गया.&lt;br /&gt;30 दिसंबर, 2005 को एयरसेल और मैक्सिस के बीच अधिग्रहण के सौदे पर दस्तखत हो गए. इसके बाद डिशनेट के लंबित आवेदन पर मंत्रालय में तेजी से काम शुरू हो गया.&lt;br /&gt;दो जनवरी, 2006 को डिशनेट को नये दिशानिर्देशों के मुताबिक जानकारी मुहैया कराने को कहा गया. कंपनी ने यह काम 17 दिन में कर दिया.&lt;br /&gt;12 जनवरी 2006 को एयरसेल ने कर्नाटक, राजस्थान, मुंबई और महाराष्ट्र सर्कल में यूएएस लाइसेंस हासिल करने के लिए आवेदन किया.&lt;br /&gt;फरवरी, 2006 में बिहार के लिए एयरसेल की सहयोगी कंपनी डिशनेट को शुरुआती स्पेक्ट्रम दिया गया. यह आवेदन 2004 के मई से लंबित था.&lt;br /&gt;तीन मार्च, 2006 को एयरसेल ने तीन और सर्कलों(दिल्ली, आंध्र प्रदेश और गुजरात) के लिए आवेदन किया.&lt;br /&gt;13 मार्च 2006 को कंपनी को हिमाचल प्रदेश के लिए स्पेक्ट्रम आवंटित हो गया. यह भी तब से ही लंबित पड़ा था जब से मारन दूरसंचार मंत्री बने थे.&lt;br /&gt;मार्च, 2006 में टी आनंद कृष्णन ने कंपनी के शेयरधारकों को बताया कि कंपनी ने स्टरलिंग इन्फोटेक समूह से एयरसेल की 74 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने का काम पूरा कर लिया है.&lt;br /&gt;एक नवंबर, 2006 को 14 सर्कलों के लिए आशय पत्र जारी करने को हरी झंडी मिल गई. एक पखवाड़े के अंदर सभी 14 लाइसेंस जारी कर दिए गए. एयरसेल ने इसके लिए 1,399.47 करोड़ रुपये चुकाए और एयरसेल एक झटके में छोटी क्षेत्रीय कंपनी से पूरे भारत में मौजूदगी वाली बड़ी कंपनी बन गई.न्यायामूर्ति शिवराज पाटिल ने अपनी रिपोर्ट में मारन की देरी करने की कवायद पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है, &#39;अलग-अलग मौकों पर डिशनेट से मांगी गई सफाई अस्पष्ट और अप्रासंगिक थी.&#39; न्यायमूर्ति पाटिल ने यह भी कहा है कि कई मौकों पर मारन ने तय प्रक्रियाओं का भी पालन नहीं किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या शिवशंकरन पर कंपनी बेचने के लिए दबाव डाला गया ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;शिवशंकरन को अपनी कंपनी के बदले में 80 करोड़ डॉलर मिले थे. उस समय एयरसेल टेलीकॉम नौ सर्कलों में सेवाएं द रही थी और सात सर्कलों में सेवाएं शुरू करने के लिए लाइसेंस के उसके आवेदन मंत्रालय में लंबित थे. उस समय एयरसेल और ज्यादा सर्कलों में लाइसेंस आवेदन करना चाहती थी लेकिन वह ऐसा इसलिए नहीं कर पा रही थी क्योंकि उसके पहले के आवेदनों पर दूरसंचार मंत्रालय ने कोई फैसला नहीं लिया था. यदि एयरसेल को ये लाइसेंस मिलने के बाद बेचा जाता तो शिवशंकरन को और ज्यादा पैसा मिल सकता था. मारन से मिली 14 लाइसेंसों की अनुमति के बाद आज एयरसेल की मौजूदगी भारत के बड़े टेलीकॉम सर्कलों में है और इसका बाजार&amp;nbsp; मूल्य 7.5 - 8.0 अरब डॉलर है.&lt;br /&gt;2005 में मारन जब दूरसंचार मंत्री थे उस दौरान एक जून को शिवशंकरन ने उन्हें एक चिट्ठी (अगले पन्ने पर देखें) लिखी. इसमें यह आरोप लगाया गया था कि मंत्रालय में मौजूद कुछ शक्तिशाली तत्व पूरी कोशिश कर रहे हैं कि उनके आवेदनों को मंजूरी न मिले.मारन के कार्यकाल में उनके मंत्रालय ने न सिर्फ एयरसेल को नये लाइसेंस जारी करने में देर की बल्कि जिन सर्कलों के लिए कंपनी को उनके मंत्री बनने के पहले ही लाइसेंस मिल गए थे उनके लिए जरूरी शुरुआती स्पेक्ट्रम देने में भी देर की गई. जस्टिस पाटिल ने इसे अपनी रिपोर्ट में अतार्किक बताया है.&lt;br /&gt;मार्च, 2004 में (एनडीए शासन के दौरान) डिशनेट को बिहार और हिमाचल सर्कल के लिए लाइसेंस आवंटित किए गए थे (पांच और सर्कलों में लाइसेंस के अलावा). लेकिन उसे सेवाएं शुरू करने के लिए शुरुआती स्पेक्ट्रम नहीं दिया गया जो लाइसेंस के साथ ही जारी किया जाना चाहिए था. बिहार में स्पेक्ट्रम फरवरी, 2006 में दिया गया तो हिमाचल प्रदेश में मार्च, 2006 में. पाटिल ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया है. स्पेक्ट्रम उपलब्ध होने के बावजूद बिहार के लिए डिशनेट को यह आवंटित नहीं किया गया.&lt;br /&gt;इस संबंध में शिवशंकरन की बार-बार की दरख्वास्तों का दूरसंचार मंत्रालय पर कोई असर नहीं पड़ा. इसी बीच अक्टूबर, 2005 में मलेशिया की एक कंपनी मैक्सिस कम्यूनिकेशन से एयरसेल खरीदने का प्रस्ताव दे दिया.&amp;nbsp; उस समय तक दूरसंचार क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 74 फीसदी बढ़ाई जा चुकी थी. 30 दिसंबर, 2005 को मैक्सिस और एयरसेल के बीच कंपनी की हिस्सेदारी खरीदने का समझौता हुआ. कंपनी की बाकी 26 फीसदी हिस्सेदारी अपोलो हॉस्पिटल के रेड्डी परिवार ने खरीदी.&lt;br /&gt;हाल ही में खबरें आई हैं जिनके मुताबिक सीबीआई के सामने शिवशंकरन ने गवाही दी है कि मारन ने उन्हें अपनी कंपनी मैक्सिस समूह को बेचने के लिए मजबूर किया. एयरसेल बेचने के बाद शिव ग्रुप ने एक और टेलीकॉम कंपनी एस-टेल बना ली थी जिसे ए राजा के कार्यकाल में छह सर्कलों के लिए लाइसेंस मिला है. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में यह कंपनी भी सीबीआई की जांच के दायरे में है. तहलका ने जब शिवशंकरन से संपर्क किया तो उन्होंने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सौदे से जुड़ी गुत्थियां&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मार्च, 2006 में मैक्सिस ने एयरसेल में कुल 7,880.82 करोड़ रुपये का निवेश किया. मैक्सिस ने अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सहयोगी इकाई ग्लोबल कम्यूनिकेशन सर्विसेज होल्डिंग लिमिटेड के जरिए एयरसेल के 65 फीसदी शेयर खरीदे और नौ फीसदी शेयर अपनी एक और कंपनी डेक्कन डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड के जरिए खरीदे. डेक्कन डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड में मैक्सिस की 26 फीसदी की हिस्सेदारी है.&lt;br /&gt;टेलीकॉम क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों के मुताबिक कोई भी विदेशी कंपनी भारत में किसी कंपनी में 74 फीसदी से ज्यादा की हिस्सेदार नहीं हो सकती. मैक्सिस ने 3390.82 करोड़ रुपये में एयरसेल की सीधी हिस्सेदारी खरीदी थी जबकि 4490 करोड़ रुपये प्रिफ्रेंस शेयर की खरीद के जरिए निवेश किए गए थे. अब सवाल यह है कि एयरसेल में मैक्सिस के इतने भारी निवेश के बाद क्या अप्रत्यक्ष रूप से एयरसेल का नियंत्रण कंपनी के हाथ में नहीं आ गया था और क्या यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से जुड़े नियमों का उल्लंघन नहीं है? मैक्सिस के 7880.82 करोड़ रुपये के निवेश के मुकाबले रेड्डी परिवार ने डेक्कन डिजिटल के जरिए एयरसेल में 26 फीसदी की अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी के लिए सिर्फ 34.17 करोड़ रुपये का निवेश किया था. मैक्सिस-एयरसेल का सौदा होने के बाद मार्च, 2006 में मलेशिया स्टॉक एक्सचेंज, बुरसा मलेशिया को सूचना देते हुए मैक्सिस ने सेल्फडिक्लेरेशन दाखिल किया था कि एयरसेल में अपने निवेश से हुए मुनाफे में उसका हिस्सा 99.3 फीसदी होगा.&lt;br /&gt;सवाल ये भी हैं कि क्या&amp;nbsp; रेड्डी परिवार ने, अपने बड़े साझीदार के साथ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से जुड़े नियमों का उल्लंघन नहीं किया? मैक्सिस ने बतौर भारतीय साझीदार रेड्डी परिवार क्यों चुना? इस मामले में एक बात तो साफ है कि इसकी वजह रेड्डी परिवार की आर्थिक हैसियत कतई नहीं है. उन्होंने एयरसेल की एक होल्डिंग कंपनी में महज 34.17 करोड़ रुपये का निवेश किया है. तो क्या रेड्डी बंधु किसी तीसरे और प्रभावशाली व्यक्ति की तरफ से काम कर रहे थे जो सीधा इस सौदे में शामिल नहीं हो सकता था? (गौरतलब है कि दयानिधि के पिता मुरासोली मारन का 2003 में चेन्नई के अपोलो हॉस्पिटल में काफी लंबे समय तक इलाज चला था. यह माना जाता है कि इस दौरान उनकी काफी अच्छी देखभाल की गई थी और तभी से मारन और रेड्डी परिवार की नजदीकियां बढ़ीं).&lt;br /&gt;सीबीआई इन गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश कर रही है. दिसंबर, 2010 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के आधार पर वह 2001 के बाद आवंटित लाइसेंस और स्पेक्ट्रम के मामलों की जांच भी कर रही है. इस सिलसिले में उसने कुछ अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ जांच भी शुरू की है. सूत्रों के मुताबिक जांच अब&amp;nbsp; खत्म होने वाली है और सीबीआई जल्द ही यह तय करेगी कि 2जी घोटाले में और नये लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने की जरूरत है या नहीं.&lt;br /&gt;अपोलो हॉस्पिटल की निदेशक सुनीता रेड्डी ने तहलका के भेजे अपने लिखित स्पष्टीकरण में कहा है, &#39; हम आपको सूचित कर रहे हैं कि अपोलो हॉस्पिटल और डॉ प्रताप सी रेड्डी का टेलीकॉम सेक्टर में कोई निवेश नहीं है. हम आगे यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि सिंद्या सिक्युरिटीज&amp;nbsp;एंड इनवेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड, जिनके प्रोमोटर पी द्वारकानाथ रेड्डी और श्रीमति सुनीता रेड्डी हैं, ने एयरसेल में निवेश किया है और टेलीकॉम सेक्टर एक उभरता हुआ क्षेत्र है इसलिए यह पूरी तरह रणनीतिक निवेश है...हम आगे यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि सिंद्या सिक्युरिटीज एंड इनवेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड का एयरसेल में निवेश पूरी तरह भारतीय नियमों और सभी विनियामकों की मंजूरी/सहमति से हुआ था.&#39; तहलका ने कलानिधि मारन और दयानिधि मारन को भी कुछ सवाल भेजे थे लेकिन उनकी तरफ से हमें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैक्स ने सन डायरेक्ट और सन रेडियो में भारी निवेश किया&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि बताया जा चुका है मैक्सिस द्वारा एयरसेल के टेकओवर के बाद न सिर्फ एयरसेल के वे आवेदन मंजूर हो गए जो दो साल से भी ज्यादा वक्त से लटके पड़े थे, बल्कि सात नये टेल्कॉम सर्कलों में ऑपरेट करने के लिए दिए गए कंपनी के नये आवेदनों को भी चटपट मंजूरी मिल गई. पहले के सात और नये सात आवेदनों को मिलाकर कंपनी ने कुल 14 लाइसेंसों के लिए 1,399 करोड़ रु अदा किए. कैग के आकलन के मुताबिक अगर बोली के जरिये नीलामी होती तो इन 14 लाइसेंसों के एवज में सरकार की झोली में 22,000 करोड़ रु से भी ज्यादा की रकम आ सकती थी.&lt;br /&gt;मार्च 2007 में, यानी लाइसेंस मिलने के तीन महीने बाद मैक्सिस ग्रुप की एक कंपनी एस्ट्रो ऑल एशिया नेटवर्क्स ने अपनी एक सबसिडियरी साउथ एशिया एंटरटेनमेंट लि. के जरिए भारत में डीटीएच सेवा उपलब्ध कराने के लिए सन डायरेक्ट टीवी के साथ एक साझे उपक्रम का एलान किया.&lt;br /&gt;दो मार्च और 19 मार्च, 2007 को विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एस्ट्रो को सन डायरेक्ट में 20 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए जरूरी मंजूरियां दे दीं.&lt;br /&gt;10 दिसंबर, 2007 को एस्ट्रो ने सन डायरेक्ट के 39,677,420 शेयर खरीद लिए. इसके लिए 315.71 करोड़ रुपये चुकाए गए. अब एस्ट्रो की सन डायरेक्ट में 20 फीसदी हिस्सेदारी हो चुकी थी. फरवरी, 2008 से जनवरी, 2009 के दौरान एस्ट्रो ने सन डायरेक्ट में और 29,319,882 नये शेयर खरीद लिए जिसके लिए उसने 233.3 करोड़ रुपये चुकाए. नए शेयरों की खरीद इस तरह से की गई कि सन डायरेक्ट में मारन परिवार की हिस्सेदारी 80 फीसदी से नीचे न जाए और एस्ट्रो की 20 फीसदी से ऊपर. पांच दिसंबर, 2009 को एस्ट्रो ने 6,283,775 अतिरिक्त शेयर और खरीदे और इसके लिए कुल 50 करोड़ रुपये चुकाए. यह भी इसी अंदाज में हुआ कि एस्ट्रो की हिस्सेदारी 20 फीसदी ही बनी रहे.&lt;br /&gt;28 फरवरी, 2008 को एस्ट्रो ने अपनी सबसिडियरी साउथ एशिया मल्टीमीडिया टेक्नॉलॉजीज लि. के जरिए मारन ग्रुप के स्वामित्व वाली साउथ एशिया एफएम लि. (एसएएफएल) में 6.98 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी. इसके लिए 14.92 करोड़ रु चुकाए गए. एसएएफएल के पास भारत में 23 एफएम रेडियो स्टेशनों के लाइसेंस थे.&lt;br /&gt;जुलाई, 2009 में रेडियो उद्योग के क्षेत्र प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से जुड़े नियमों में बदलाव से एस्ट्रो को एसएएफएल में अपनी सीधी हिस्सेदारी बढ़ाने की छूट मिल गई. जुलाई, 2009 में हिस्सेदारी का यह आंकड़ा 20 फीसदी तक पहुंच गया. यह कुछ इस क्रम में हुआ.&lt;br /&gt;22 जून, 2009 को 19.23 करोड़ रु में एसएएफएल के 1,922,854 के नए इक्विटी शेयरों की खरीद की गई&lt;br /&gt;23 जुलाई, 2009 को 19.39 करोड़ में एसएएफएल के 19,389,198 नये इक्विटी शेयर खरीदे गए&lt;br /&gt;23 जुलाई 2009 को ही 13.84 करोड़ रु चुकाकर एएच मल्टीसॉफ्ट प्राइवेट लि. से एसएएफएल के 13,836,296 शेयरों की खरीद की गई. तीन अगस्त 2009 को एसएएफएल में 43,900, 136 सीसीपी शेयरों की खरीद के एवज में कुल 43.90 करोड़ रु चुकाए गए.&lt;br /&gt;रिश्वत के आरोपों को नकारते हुए मैक्सिस कम्युनिकेशन ने 24 मई को एक बयान जारी किया. इसमें उनसे कहा है कि एयरसेल में अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए शिवा ग्रुप पर कोई दबाव नहीं डाला गया था. कंपनी ने इस पर भी जोर दिया कि एयरसेल में मैक्सिस के निवेश और सन डायरेक्ट टीवी में एस्ट्रो के निवेश का आपस में कोई संबंध नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैक्सिस-सन डायरेक्ट सौदे में सीबीआई क्या तलाश रही है ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सीबीआई ने ए राजा पर लाइसेंस जारी करने में पहले आओ पहले पाओ नीति के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया है. जांच एजेंसी का आरोप है कि राजा ने 2001 की दरों पर ही लाइसेंस जारी कर दिए, बिना यह विचार किए हुए कि दूरसंचार क्षेत्र में इस दौरान अपार विस्तार हो चुका है. सीबीआई के मुताबिक स्वान और यूनिटेक जैसी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए राजा ने मनमाने तरीके से फैसले लिए. उन्हें 2001 की कीमत पर लाइसेंस दिए गए और आवेदनों में कई झोल होने के बावजूद. जांच एजेंसी के मुताबिक इसके एवज में उन्हें और कनिमोरी को कथित रूप से 200 करोड़ रु मिले जिन्हें डीएमके के टीवी चैनल कलैनार टीवी में निवेश की तरह दिखाया गया.&lt;br /&gt;अब सवाल उठता है कि क्या मारन ने भी ऐसा ही किया था. क्या उन्होंने भी पहले आओ- पहले पाओ की नीति का दुरुपयोग करते हुए मैक्सिस-एयरसेल सौदे के बाद एयरसेल को कथित रूप से फायदा पहुंचाया?&lt;br /&gt;कनीमोरी और अन्य के खिलाफ अपने पूरक आरोपपत्र में सीबीआई ने अपने इस दावे के समर्थन में 14 कारण गिनाए हैं कि कलैनार टीवी में 200 करोड़ का निवेश एक वास्तविक कारोबारी सौदा नहीं था. इसमें शेयरहोल्डरों के बीच कोई समझौता नहीं हुआ. बलवा ने अपनी सबसिडियरी कंपनी कूसेगांव फ्रूट्स एेंड वेजीटेबल्स में पैसा हस्तांतरित किया था जिसने इसे सिनेयुग को हस्तांतरित किया और यहां से पैसा कलैनार टीवी को गया. कलैनार और सिनेयुग का दावा था कि पैसे का हस्तांतरण कलैनार टीवी में 20 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए हुआ. उधर 2009 में कलैनार टीवी की बैलेंस शीट देखी जाए तो इसमें उस पैसे का एक हिस्सा ही दर्ज दिखता है. 25 करोड़ की इस रकम को असुरक्षित कर्ज के रूप में दिखाया गया है. आखिर में पूरी रकम इक्विटी यानी हिस्सेदारी में नहीं बदली गई बल्कि इसे कर्ज के रूप में दिखाया गया और वापस कर दिया गया. यह वापसी भी तब हुई जब 2010 में सीबीआई ने राजा को पूछताछ के लिए बुलाया.&lt;br /&gt;अब सवाल उठता है कि क्या मैक्सिस-सन डायरेक्ट टीवी सौदे और मैक्सिस-सन रेडियो सौदे में सब कुछ ठीक तरीके से हुआ. क्या सीबीआई को यह साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मिल पाएंगे कि ये सौदे भी बलवा-सिनेयुग-कलैनार सौदे की तरह आपसी फायदे के सौदे थे? जहां सीबीआई ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं वहीं जस्टिस पाटिल ने इस साल 31 मई को दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में मारन की भूमिका कई मौकों पर दोषपूर्ण पाई है. रिपोर्ट में एयरसेल के आवेदनों को बिना वजह लटकाए रखने का जिक्र तो है ही यह मारन की मनमानी के कई और उदाहरण भी उजागर करती है.&lt;br /&gt;रिपोर्ट कहती है कि आइडिया सेल्यूलर को इसके यूएएसएल आवेदन में हुई गड़बड़ियों को सुधारने के लिए एक साल का विस्तार दिया गया था. गौरतलब है कि आइडिया ने मुंबई सर्विस एरिया के लिए यूएएसएल के लिए तीन अगस्त, 2005 को आवेदन किया था. यह विस्तार सदस्य (वित्त) की मंजूरी के बिना दिया गया. उस समय के दिशानिर्देश कहते थे कि आवेदनों में हुई गड़बड़ियां सुधारने के लिए अधिकतम समय सीमा ज्यादा से ज्यादा तीस दिन की ही हो सकती है और वह भी सदस्य (वित्त) की मंजूरी के साथ ही मान्य होगी. मगर आइडिया सेल्यूलर के मामले में जो हुआ वह साफ तौर पर बताता है कि नियमों का उल्लंघन हुआ. जस्टिस पाटिल ने कहा भी है कि स्पष्ट तौर पर तय दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया.&lt;br /&gt;14 दिसंबर, 2004 को एस्सार स्पेसटेल प्रा. लि. ने असम, बिहार, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, पूर्वोत्तर, उड़ीसा, मध्य प्रदेश के लिए यूएएसल के लिए आवेदन किया था. 12 जनवरी, 2005 को दूरसंचार मंत्रालय ने एस्सार को इक्विटी स्ट्रक्चर में कमियों का ध्यान दिलाते हुए एक पत्र लिखा. पत्राचार 18 मई , 2006 तक चलता रहा. जस्टिस पाटिल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, &#39;सूचना मांगने और कमियां बताने का काम चरणबद्ध तरीके से हुआ.&#39; इससे मारन की नीतियों के संदेहास्पद होने का संकेत मिलता है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कैसे मारन ने स्पेक्ट्रम की कीमतों को वित्त मंत्रालय के दायरे से बाहर रखा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;डिशनेट-एयरसेल के आवेदन में हो रही असामान्य देरी और लाइसेंस से जुड़े कई दूसरे मामलों में मारन द्वारा की गई गड़बड़ी के अलावा जस्टिस पाटिल ने इस पहलू पर भी विस्तार से रोशनी डाली है कि किस तरह से मारन स्पेक्ट्रम की कीमत जैसे महत्वपूर्ण मसले को वित्त मंत्रालय के दायरे से बाहर रखवाने में सफल रहे. 23 फरवरी, 2006 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हरी झंडी मिलने के बाद मंत्रियों के एक समूह का गठन किया गया था. इसका काम था स्पेक्ट्रम के प्रभावी और अधिकतम इस्तेमाल से जुड़े मुद्दों तो देखना. इस समूह में रक्षामंत्री, गृहमंत्री, वित्तमंत्री, संसदीय कार्यमंत्री और दूरसंचार मंत्री शामिल थे. इसके कार्यक्षेत्र में स्पेक्ट्रम कीमतों के निर्धारण संबंधी सुझाव देना भी शामिल था.&lt;br /&gt;लेकिन 28 फरवरी, 2006 को मारन ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर स्पेक्ट्रम की कीमत को मंत्रिमंडलीय समूह के कार्यक्षेत्र से बाहर करने के लिए कहा. उन्होंने लिखा, &#39;एक फरवरी, 2006 को हुई हमारी मुलाकात आपको याद होगी. उस दौरान यह बात हुई थी कि मंत्रिमंडलीय समूह का दायरा सिर्फ रक्षा विभाग द्वारा खाली किए गए स्पेक्ट्रम तक ही होगा. आपने मुझे आश्वासन दिया था कि इसका कार्यक्षेत्र हमारे मनमुताबिक ही होगा और उस वक्त यह दायरा रक्षा विभाग द्वारा खाली किए जा रहे स्पेक्ट्रम तक ही सीमित था. अब मुझे यह जानकर हैरानी है कि इसका दायरा फैलता ही जा रहा है. इनमें से कुछ चीजें तो ऐसी हैं कि उनका मंत्रालय के सामान्य कामकाज से सीधा टकराव हो रहा है. यदि आप&amp;nbsp; संबंधित पक्ष को कार्यक्षेत्र की सीमाओं में हमारे द्वारा सुझाए गए सुधार करने के लिए निर्देश दे सकें तो मैं आपका अत्यंत आभारी रहूंगा.&#39;&lt;br /&gt;&lt;span class=&quot;quote_right&quot; style=&quot;border-left-color: rgb(77, 74, 74); border-left-style: solid; border-left-width: 5px; color: #4d4a4a; display: inline; float: right; font-size: 11px; font-variant: small-caps; height: auto; margin-bottom: 10px; margin-left: 15px; margin-right: 0px; margin-top: 15px; padding-bottom: 15px; padding-left: 15px; padding-right: 15px; padding-top: 15px; width: 200px;&quot;&gt;कैग के मुताबिक अगर बोली के जरिए नीलामी होती तो इन 14 लाइसेंसों के लिए सरकार को 22000 करोड़ रु से भी ज्यादा मिलते&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री ने उनकी बात मान ली और सात दिसंबर, 2006 को मंत्रिमंडलीय समूह के कार्यक्षेत्र का पुनर्निर्धारण करते हुए स्पेक्ट्रम की कीमतों से जुड़े प्रावधान को खत्म कर दिया गया. इसके छह महीने बाद, छह जून, 2007 को (13 मई, 2007 को मारन को हटाकर ए राजा को दूरसंचार मंत्री बना दिया गया था) वित्त मंत्रालय ने स्पेक्ट्रम की कीमत को मंत्रिमंडलीय समूह के कार्यक्षेत्र में शामिल करने की मांग की. लेकिन दूरसंचार विभाग के सचिव ने किसी भी तरह के फेरबदल से इनकार कर दिया. इस तरह मारन ने जो राह चुनी थी राजा उसी पर आगे बढ़ते रहे. यूएएसएल और स्पेक्ट्रम की कीमत से जुड़े सभी फैसले दूरसंचार विभाग ने वित्त मंत्रालय की मंजूरी के बिना ही लिए जबकि भारत सरकार के नियमों के मुताबिक यह जरूरी था.&lt;br /&gt;दोनों मंत्रियों ने स्पेक्ट्रम की कीमत का मुद्दा कैबिनेट और मंत्रियों के समूह के दायरे से दूर ही रखा. इसके बाद भी यह बाद हैरान करती है कि न तो सरकार और न ही प्रधानमंत्री कार्यालय में से किसी ने इस पर कोई सवाल खड़ा नहीं किया.&lt;br /&gt;संचार भवन में मारन का तीन वर्षीय कार्यकाल विवादों से भरपूर रहा था. उनके रतन टाटा के साथ बेहद तनावपूर्ण संबंध रहे. ये चर्चा चौफेर थी कि मारन बंधु टाटा स्काई में मोटी हिस्सेदारी चाहते थे. लेकिन जब टाटा ने उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया तब दूरसंचार विभाग ने टाटा टेलीसर्विसेज के विस्तार की राह में रोड़े अटकाना शुरू कर दिया. साल 2010 के मध्य में सामने आए नीरा राडिया और रतन टाटा की बातचीत के टेप में टाटा की मारन के प्रति गहरी नाराजगी और दूरसंचार मंत्री के रूप में ए राजा की पसंदगी जाहिर होती है. उसमें टाटा ने चिंता जताई थी कि अब मारन राजा के पीछे हाथ धोकर पड़ जाएंगे.&lt;br /&gt;इसी साल एक और पूर्व दूरसंचार मंत्री अरुण शौरी ने यह कहकर मारन को कटघरे में खड़ा किया कि टूजी घोटाले के असली सूत्रधार मारन थे. उनका कहना था, &#39;मारन के समय में ही शर्तों में एक और वाक्य जोड़ा गया जिसके मुताबिक एक सर्कल में ऑपरेटरों की अधिकतम संख्या पर कोई रोक-टोक नहीं होगी. इस तरह के बदलाव सिर्फ दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (टीआरएआई) के द्वारा ही प्रस्तावित हो सकते हैं. &#39;शर्तों में यह परिवर्तन 2005 में ही हो गया था जबकि ट्राई ने 2007 में जाकर इसकी संस्तुति की. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किस ज्योतिष ज्ञान की बदौलत मारन ने दो साल पहले ही यह संस्तुति कर दी थी? इससे साफ संकेत मिलता है कि असल में कुछ योजनाएं बनी थीं जो पूरी नहीं हो सकीं और जिन्हें बाद में ए राजा ने अंजाम दिया.&#39;&lt;br /&gt;तो क्या मारन ने टूजी घोटाले की नींव रखी थी? क्या एयरसेल-मैक्सिस-सन डाइरेक्ट टीवी के बीच हुआ सौदा उस पूरे घोटाले का एक नमूना भर था जिसे बाद में ए राजा ने बड़े पैमाने पर अंजाम दिया? इसका जवाब पुख्ता सबूतों में छिपा है और यहीं पर सीबीआई की असल परीक्षा होनी है |&lt;br /&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;....तहलका से |&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/2759941322731668666/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/2759941322731668666'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/2759941322731668666'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='घोटाले का असली सूत्रधार?'/><author><name>Ravindra Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12391603598676383419</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-ZTV8J6K9Z9Q/Tkj-dS4aU0I/AAAAAAAAAAQ/k3WKM5J0bik/s220/Ravindra%2BSinha.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-6762667508164656160</id><published>2011-09-24T12:15:00.000-07:00</published><updated>2011-09-24T12:15:36.168-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आलेख"/><title type='text'>कितना कमाते हैं भारतीय मंत्री?</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;क्या आप जानते हैं कि भारत सरकार के मंत्री कितना कमाते हैं या उनकी  संपत्ति किस रफ़्तार से बढ़ती है&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;?&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;आप  कितने भी कल्पनाशील हो जाएँ तो वहाँ तक नहीं पहुँच सकते जो आंकड़े बताते  हैं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;प्रधानमंत्री कार्यालय को जो विवरण इन मंत्रियों ने दिए हैं उसी के आधार पर  देखें तो मंत्रियों की संपत्ति दो वर्षों में औसतन &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;3.3 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ बढ़ गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;ये  सिर्फ़ औसत है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;एक  मंत्री की संपत्ति तो वर्ष &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2009 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;से  &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2011 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;के  बीच &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;1092 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;प्रतिशत बढ़ गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;जबकि दो और मंत्रियों की संपत्ति &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;828 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;और  &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;705 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;प्रतिशत बढ़ी है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;जिस एयर इंडिया के पास अपने कर्मचारियों को तनख़्वाह बाँटने के लिए पैसों  के लाले पड़े थे उसी विभाग के मंत्री रहे प्रफ़ुल्ल पटेल की संपत्ति &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2009 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;से  &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2011 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;के  बीच &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;42.20 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ रुपए बढ़ी है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;a name=&#39;more&#39;&gt;&lt;/a&gt;वे  &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;122.03 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ रुपयों की संपत्ति के साथ मंत्रिमंडल के सबसे धनी मंत्री  हैं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;&#39;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;मेल टुडे&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;&#39;  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;अख़बार के संपादक भारत भूषण के मुताबिक बढ़ती संपत्ति की इस जानकारी से  जनता में ये अहसास बढ़ेगा कि ये नेता उनकी आर्थिक दुर्दशा नहीं समझते&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;बीबीसी से विषेष बातचीत में भूषण ने कहा&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;, &quot;&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;अब  आम आदमी नेता नहीं बन सकता क्योंकि चुनाव में करोड़ों पैसा लगाने की ज़रूरत होती  है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;किसी भी पार्टी में देखें तो मंत्री वही लोग हैं जो बड़े व्यापारी  हैं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;तो  अब ऐसे ही लोग राजनीति में आएंगे जो ग़रीब लोगों का नेतृत्व नहीं करते  हैं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&quot;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;h2 style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #505050; font-family: Mangal, serif; letter-spacing: -0.15pt; line-height: 200%;&quot;&gt;पैसे कमाने की दर:&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #505050; letter-spacing: -0.15pt; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;प्रधानमंत्री कार्यालय में संपत्ति के जो विवरण मंत्रियों ने जमा किए हैं  उसका विश्लेषण किया है एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;एडीआर&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;)  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;और  नेशनल इलेक्शन वॉच &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;एनईडब्ल्यू&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;)  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;ने  मिलकर&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;इस  विश्लेषण में वर्ष &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2009  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग को दिए गए संपत्ति के ब्यौरे की  तुलना वर्ष &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2011  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;में प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपे गए विवरण से की गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;इसके अनुसार हाल तक केंद्रीय नागरिक विमानन राज्यमंत्री रहे प्रफ़ुल्ल पटेल  की संपत्ति जो वर्षों में &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;42.20 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ बढ़ी है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;यानी प्रतिमाह पौने दो करोड़ रुपयों से अधिक&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;जिस बीच वे इस विभाग के मंत्री रहे एयर इंडिया आर्थिक तंगी से जूझता  रहा&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;अलबत्ता उसने कर्ज़ लेकर &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;111 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;विमान लेने का जो फ़ैसला किया था&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;जिसे सीएजी की हाल की रिपोर्ट में दुर्भाग्यपूर्ण फ़ैसला बताया गया  है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;पिछले मंत्रिमंडल विस्तार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें पदोन्नत  कर कैबिनेट मंत्री बना दिया है और अब वे भारी उद्योग और सार्वजनिक उपक्रम विभाग के  मंत्री हैं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;आधिकारिक तौर पर एनसीपी के सांसद प्रफ़ुल्ल पटेल के व्यवसाय के बारे में  कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है क्योंकि लोकसभा की वेबसाइट पर उनके जीवन परिचय में  व्यवसाय का कॉलम खाली है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;लेकिन प्रफ़ुल्ल पटेल से ज़्यादा आश्चर्यजनक तरक़्क़ी की है डीएमके के  सांसद और केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री डॉ एस जनतरक्षकन ने&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;उनकी संपत्ति में अविश्वसनीय &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;1092 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;प्रतिशत बढ़ी है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;वर्ष &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2009  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;के  चुनाव के समय उनके पास &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;5.91 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ रुपयों की संपत्ति थी लेकिन दो साल में वह बढ़तर &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;70.42 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ हो गई&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;यानी उनकी संपत्ति प्रतिमाह &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2.68 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ रुपयों से भी अधिक बढ़ी&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;कांग्रेस की आंध्रप्रदेश की सांसद और टेक्सटाइल विभाग की राज्यमंत्री पी  लक्ष्मी की संपत्ति इसी अवधि में &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;1.73 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ रुपयों से बढ़कर &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;16.12 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ रुपए हो गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;यानी &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;828  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;प्रतिशत की वृद्धि&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;कांग्रेस के ही एक और सदस्य तुषार चौधरी की संपत्ति &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;705 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;प्रतिशत बढ़कर &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;24.66 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;लाख से बढ़कर &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;1.98  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ रुपए हो गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;वे  केंद्र सरकार में सड़क परिवहन विभाग के राज्यमंत्री हैं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;दिलचस्प ये है कि इन दोनों मंत्रियों के भी व्यवसाय की जानकारी लोकसभा की  वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;वैसे पैसा कमाने में युवामंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और मिलिंद देवड़ा भी  पीछे नहीं है जिनकी संपत्ति इसी अवधि में दोगुनी या उससे अधिक हो गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;डीएमके के प्रमुख करुणानिधि से बेटे एमके अलागिरि की संपत्ति &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;19.39 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;से  &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;34.82 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ हो गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;वे  रसायन और उर्वरक विभाग के मंत्री हैं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे की संपत्ति भी इसी अवधि में सौ प्रतिशत  बढ़ी है और &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;8.60  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;से  बढ़कर &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;17.80 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ हो गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार की संपत्ति इस अवधि में चार करोड़ से भी कम  बढ़ी है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;जबकि राजीव शुक्ला की संपत्ति &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;294 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;प्रतिशत बढ़कर &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;7.79 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;से  &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;30.66 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ हो गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #505050; font-family: Mangal, serif; letter-spacing: -0.15pt; line-height: 200%;&quot;&gt;कुछ की संपत्ति कम भी हुई&lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #505050; letter-spacing: -0.15pt; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;;&quot;&gt;:&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;एडीआर और एनईडब्ल्यू के विश्लेषण के अनुसार कुल &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;15 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;मंत्रियों की संपत्ति में वर्ष &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2009 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;से  &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2011 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;के  बीच कमी भी आई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;जिन मंत्रियों की संपत्ति में कमी आई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;उनमें वीरप्पा मोइली&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;फ़ारुक़ अब्दुल्ला&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;जयपाल रेड्डी&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;,  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;परनीत कौर&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;,  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;जयराम रमेश और जतिन प्रसाद हैं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;वीरप्पा मोइली के पास वर्ष &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2009 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;में &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2.93  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ की संपत्ति थी जो वर्ष &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2011 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;में घटकर &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;13.33  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;लाख रह गई&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;इसी तरह फ़ारुक़ अब्दुल्ला&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;परनीत कौर और जयपाल रेड्डी की संपत्ति में क़रीब &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;90 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;प्रतिशत की कमी आई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम की संपत्ति में &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;11 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;प्रतिशत की कमी आई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;. &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;वर्ष &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;2009  &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;में उनकी संपत्ति &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;27.39 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ की संपत्ति थी जो अब &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;24.40 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;करोड़ रुपए रह गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;पर्यावरण विभाग से ग्रामीण विकास मंत्रालय में लाए गए चर्चित मंत्री जयराम  रमेश की संपत्ति इसी अवधि में &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;74.06 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;लाख रुपए से घटकर &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;71.50 &lt;/span&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;लाख रह गई है&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;color: black; font-family: &#39;LucidaCalligraphy Italic&#39;; line-height: 200%;&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;HI&quot; style=&quot;color: #333333; font-family: Mangal, serif; line-height: 200%;&quot;&gt;जिन मंत्रियों की संपत्ति कम हुई है उनमें विदेश मंत्री एसएम कृष्णा भी  शामिल हैं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: #333333; line-height: 200%;&quot;&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/6762667508164656160/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/09/blog-post_24.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/6762667508164656160'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/6762667508164656160'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/09/blog-post_24.html' title='कितना कमाते हैं भारतीय मंत्री?'/><author><name>Ravindra Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12391603598676383419</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-ZTV8J6K9Z9Q/Tkj-dS4aU0I/AAAAAAAAAAQ/k3WKM5J0bik/s220/Ravindra%2BSinha.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-2754927962728031950</id><published>2011-09-05T12:42:00.000-07:00</published><updated>2011-09-05T12:42:10.988-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हास्य-व्यंग्य"/><title type='text'>झूठ के नामकरण —डॉ अखिलेश बार्चे</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;left&quot;&gt;पहाँ&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;दादा पायलागी! कैसे हैं. . .? कल जैसे ही दुकान के शुभारंभ का समाचार मिला मन प्रसन्न हो गया। अब आऊँगा तो लडडू ज़रूर खाऊँगा. . .सब आकी कृपा है. . .जी हाँ जी हाँ. . .।&quot;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;left&quot;&gt;दूरभाष पर कवि – मित्र की दूर शहर में रहने वाले एक  वरिष्ठ कवि से बातचीत हो रही है। कवि मित्र बात करते समय यों झुके हुए थे, मानो चरण  स्पर्श करने के बाद रीढ़ सीधी करने का समय ही नहीं मिल पा रहा हो। वास्तव&amp;nbsp; में वे एक  ऐसे सज्जन से बात करने में लगे थे जिनकी पहुँच पुरस्कार/चयन समितियों में अच्छी थी,  और जो जुगाड़मेंट के क्षेत्र में माहिर माने जाते थे। कविमित्र को जैसे ही पता लगा  कि इन सज्जन के तीसरे बेटे ने एस.टी.डी., पी.सी.ओ., फ़ोटोकॉपी की दुकान खोली है,  उन्होंने तुरंत अवसर का लाभ उठाया और दूरसंचार विभाग के तारों पर सवार होकर उनके  पाँव छू लिए।&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;left&quot;&gt;&lt;/div&gt;&lt;a name=&#39;more&#39;&gt;&lt;/a&gt;बात पूरी कर मेरे पास आकर बैठते हुए बोले, &quot;बुढ्ढ़ा बहुत  खुर्राट है, पर क्या करें! साहित्य के क्षेत्र में जमना है तो ऐसे लोगों के पाँव  छूने ही पड़ेंगे।&quot; मैंने देखा उनके चेहरे पर चंद मिनटों पहले जला हुआ खुशी का बल्ब  फक्क से बुझ गया था और वे कड़कड़ा रहे थे। बाद में बड़ी देर तक तथाकथित &#39;खुर्राट  बुढ्ढ़े&#39; को गालियाँ देते रहे। मैं समझ नहीं पा रहा था कि उनकी वह खुशी वास्तविक थी  या यह गुस्सा वास्तविक है। यह तो ज़ाहिर है कि उनके कथन में कुछ न कुछ असत्य अवश्य  था।&lt;br /&gt; &lt;div align=&quot;left&quot;&gt;सच पूछा जाए तो जीवन में हर आदमी कभी न कभी झूठ बोलता  है। झूठ की अपनी महत्ता, अपनी उपयोगिता है। सत्य बोलने वाले लोग सतयुग में भी बहुत  कम रहे होंगे इसलिए तो राजा हरिश्चंद्र का &#39;सत्यवादी&#39; होना आज तक याद किया जाता है।  धर्मराज युधिष्ठिर का छदम सत्य &#39;अश्वत्थामा हत: नरो वा कुंजरो वा&#39; पुराण प्रसिद्ध  है। और तो और बहुत सारे पौराणिक पात्र तो झूठा(छदम) रूप भी धारण करते थे। गौतम ऋषि  नदी पर स्नान के लिए गए तो एक देवता ने तुरंत गौतम ऋषि का डबल रोल लिया व पहुँच गए  अहिल्या के समीप। बाकी की कथा आपको मालूम ही है।&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;left&quot;&gt;झूठ का विकास मानव सभ्यता के विकास के साथ हुआ। जब मानव  असभ्य था वह सत्य के नज़दीक था, जब वह सभ्य हो गया, सत्य से दूर हो गया। अत्याधुनिक  व्यक्ति अत्यधिक झूठ बोलता है। कहते हैं &#39;झूठ के पाँव नहीं होते।&#39; शायद इसीलिए वह  उड़कर कभी भी, कहीं भी पहुँच जाता है। झूठ की व्यापकता इतनी है कि यह दुनिया के सभी  देशों में अपनी जड़ें जमा चुका है। यह भी &#39;बिन पग चले, सुने बिनु काना&#39; की स्थिति  में आ गया है। एक पुराना लोकगीत है, &#39;झूठ बोले कौवा काटे, काले कौवे से डरियो&#39; जिस  पर एक फ़िल्मी गीत की रचना हुई थी। मुझे आज तक किसी कौवे ने नहीं काटा, इसका मतलब यह  हुआ कि या तो यह बात झूठी है या आजकल झूठों की बढ़ती ताकत को देखकर कौवों में काँटने  की हिम्मत नहीं रही।&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;left&quot;&gt;भारतीय चिंतन में &#39;मनसा वाचा कर्मणा&#39; को बहुत महत्व  दिया गया है जिसका अर्थ है – &#39;जो मन में है वही कहो और जो कहा है वही करो।&#39; गोकुल  की गोपी बिना किसी लाग लपेट के कहती है – &#39;मन मोहना. . .बड़े झूठे&#39;। आज स्थिति ठीक  उल्टी हो गई है। जो मन में है उसे जुबाँ पर बिलकुल मत आने दो, और जो कह दिया वैसा  तो बिल्कुल मत करो। जब कोई नेता कहता है &#39;मैं पार्टी छोड़ने की बात सोच भी नहीं  सकता।&#39; तो जनता समझ जाती है कि उसने वर्तमान पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में घुसने  की जोड़–तोड़ शुरू कर दी है। या जब पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ने का खंडन करें तो  जनता ताड़ जाती है कि पेट्रोल–डीज़ल महँगा होने वाला है।&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;left&quot;&gt;सुनते हैं पहले आदमी इतना सच्चा होता था कि झूठ पकड़े  जाने पर उसका चेहरा फक्क हो जाता था। जब झूठ बढ़ने लगा तो झूठ पकड़ने की मशीन ईजाद की  गई। आजकल तो कई लोगों ने इस मशीन पर भी उसी तरह विजय पा ली है जैसे मच्छरों ने  डीडीटी पर या मलेरिया परजीवी ने ब्लड टेस्ट पर। एक समय एक विशेष प्रकार के झूठ का  नामकरण भी हुआ था – सफ़ेद झूठ। इसमें व्यक्ति इतनी होशियारी से झूठ बोलता था कि उसकी  शिनाख़्त ही नहीं हो पाती थी और सुनने वाला उसे पूरी तरह सच्चा समझ लेता था। &#39;सफ़ेद  झूठ&#39; ने लंबे समय तक संवादों, लेखों, कहानियों में अपना स्थान बना कर  रखा।&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;left&quot;&gt;सभी बदलने के साथ अब इस मामले में भी प्रगति हुई है।  झूठ की, और झूठ बोलने वालों की नई–नई किस्में तैयार होने लगी हैं। पहले रुपहले  पर्दे पर जिस अभिनय के आधार पर &#39;अभिनय सम्राट&#39; या &#39;ट्रेजेडी किंग&#39; की उपाधि मिलती  थी वह अभिनय अब ढेरों लोग, ख़ासतौर पर, नेतागण करने लगे हैं। मिसाल के तौर पर चुनाव  प्रचार के लिए निकला नेता किसी क्षण रुँधे गले से बोलता है, आँखों में आँसू भरकर  ज़ार–ज़ार रोने लगता है पर कुछ ही क्षणों बाद खुशी से गदगद होकर लोगों को बधाइयाँ  देने लग जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;left&quot;&gt;एक निष्णात झूठ जो इन दिनों खूब चल रहा है उसमें नामकरण  का प्रश्न भी चर्चाओं और गोष्ठियों में उठाया जा रहा है, मसलन किसी न्यूज़ चैनल पर  कैमरे के सामने मौजूद पार्टी प्रवक्ता कहता है, &#39;हम लोगों में कोई मतभेद नहीं हैं,  इस मसले पर सभी लोग एक मत हैं।&#39; सारे दर्शकों को शत प्रतिशत विश्वास होता है कि  उसकी बात में ज़रा-सी भी सत्यता नहीं है। पार्टी में जूतम पौज़ार चल रही है। फिर भी  प्रवक्ता जी के बोलने में अद्वितीय आत्मविश्वास है। वह बार–बार कहते हैं, &quot;पार्टी  में मतभेदों की बात विरोधियों द्वारा फैलाई गई है, इनमें कोई सच्चाई नहीं है।&quot; अब  इस झूठ को आप क्या नाम देंगे? इसके सामने तो सफ़ेद झूठ भी पानी भरता प्रतीत होता है।  अगले दिन वही प्रवक्ता बड़ी शान से घोषणा करता है, &#39;पार्टी में अनुशासन बनाए रखने की  ख़ातिर चार लोगों को छ: वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित किया जाता  है।&#39;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;left&quot;&gt;विज्ञापनों की दुनिया ने &#39;रेशमी झूठ&#39; किंवा &#39;चमकीले  झूठ&#39; को घर–घर में प्रसारित कर दिया है। बुढ़ाते लोग अपने श्वेत केशों को अश्वेत  बनाने के लिए विज्ञापनी वस्तुएँ ख़रीदते हैं व खुद को जवान सिद्ध करते हैं। बालों को  काला करने के जादू ने स्त्री–पुरुष सभी को सम्मोहित कर रखा है। संधिकाल में जी रही  रमणियाँ, जो जवानी को जाने नहीं देना चाहतीं, अपनी त्वचा को रेशमी मुलायम बनाने के  प्रसाधनों का भरपूर दोहन कर रही हैं। जन्नत की हक़ीक़त भले ही सबको मालूम हो, दिल  को समझाने के लिए थोड़ी-सी लीपापोती में बुरा क्या है? आख़िर चमकीला झूठ चमक ही  बढ़ाएगा ना? सच बोलने में अक्सर ख़तरा रहता है। चोर को चोर या भ्रष्ट को भ्रष्ट कहना  कतई समझदारी नहीं है इसलिए चतुर सुजान अपनी वाक्पटुता से बात को सत्य असत्य से परे  ले जाते हैं, अपने पाँव पर कुल्हाड़ी नहीं मारते। यदि ज़रूरी ही हो तो &#39;सत्यं ब्रूयात  प्रियं ब्रूयात&#39; की सुरक्षित नीति अपनाते हैं। आंख़र, &#39;राजा नंगा है&#39; कहने की नासमझी  कोई नादान ही करता है। ऐसी ही नादानी व्यंग्यकार करता रहता है, जहाँ विसंगति देखता  है तुरंत बोल पड़ता है, पर इस बारे में कुछ बोलना भी बेकार है क्योंकि यदि वह समझदार  ही होता तो व्यंग्यकार क्यों बनता?&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/2754927962728031950/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/09/blog-post_7809.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/2754927962728031950'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/2754927962728031950'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/09/blog-post_7809.html' title='झूठ के नामकरण —डॉ अखिलेश बार्चे'/><author><name>Ravindra Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12391603598676383419</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-ZTV8J6K9Z9Q/Tkj-dS4aU0I/AAAAAAAAAAQ/k3WKM5J0bik/s220/Ravindra%2BSinha.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-993078046557551819</id><published>2011-09-05T12:09:00.000-07:00</published><updated>2011-09-05T12:13:19.282-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हास्य-व्यंग्य"/><title type='text'>हनुमान किसके हैं —अनुराग वाजपेयी</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;भगवान राम अयोध्या लौट आए थे। धोबी के कहने पर  लोकापवाद के डर से सीता माता को घर से निकाल चुके थे। समय काफी रहता था सो राजकाज  में काफी ध्यान देने लगे थे औऱ दरबार देर रात तक चलता रहता था। मर्यादा पुरुषोत्तम  का दरबार था इसलिए सब कुछ संयमित रहता था। नीति और आदर्श की बातें होतीं और शिष्ट  हास-परिहास चलता रहता। एक दिन अचानक एक अमर्यादित घटना हुई और उसे अंजाम भी दिया  राम के परम भक्त हनुमान जी ने। वे तमतमाते हुए आए और बिना अभिवादन किए रामचंद्र जी  बोले, &#39;&#39;मैं जा रहा हूँ अब नहीं लौटूँगा ये रखिए त्यागपत्र।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name=&#39;more&#39;&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;रामचंद्र जी ने पूछा, &#39;&#39;क्या हुआ वत्स। हनुमान बोले,  &#39;&#39;होना क्या है, मान सम्मान को ताक पर रखकर अपने से काम नहीं होता। आप वत्स-वत्स  कहते हैं और वहाँ नीचे धरती पर मेरे मंदिर तोड़े जा रहे हैं। राम बोले, &#39;&#39;क्या कह  रहे हो हनुमान, ऐसा भी कहीं होता है? तुम्हारी मूर्तियाँ तो हमारे साथ होती हैं,  फिर तुम्हारे मंदिर मेरे भी तो हुए, बताओ किसने किया है। यह धतकर्म मैं उसे यथोचित  दंड दूँगा। हनुमान जी बोले, &#39;&#39;एक तो आप ये ग़लतफहमी निकाल दीजिए कि मेरी मूर्तियाँ  केवल आपके मंदिरों में ही हैं। मेरे अपने सेपरेट मंदिर भी हैं जहाँ केवल मेरी विराट  रूप वाली मूर्ति होती है, शहरों में देखिए, राम मंदिर से ज़्यादा हनुमान मंदिर  प्रसिद्ध होते हैं। एक तो दिल्ली में ही है, ख़ास कनॉट प्लेस पर। और रही बात मंदिर  तोड़ने की तो मुझे पता लगा है कि वहाँ एक नगर में मेरा मंदिर अपने ही अपने भक्तों  को कहकर तुड़वा दिया है। रामचंद्र जी सकते में आ गए। बोले, हनुमान तुम्हें किसने  कहा कि मैंने तुम्हारा मंदिर तुड़वा दिया, मैं भला ऐसा क्यों करूँगा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;हनुमान बोले, मुझे उस राज्य के विधायकों ने बताया है  कि आपका नाम जपने वाली पार्टी की सरकार ने मेरा मंदिर तुड़वा दिया है। अब राम थोड़ा  सहज हुए, बोले, मैं समझ गया, इस विधायक प्रजाति ने तुम्हें बहकाया है।&lt;span lang=&quot;en-us&quot;&gt; &lt;/span&gt;&amp;nbsp;सुनो हनुमान, धरती की ये प्रजाति राक्षसों से भी चतुर होती है।  उनसे भी ज़्यादा मायावी, तरह-तरह के रूप रचने वाली। इन्होंने तोमुझे भी ठग लिया था,  बोले कि आपका अयोध्या में भव्य मंदिर बनाएँगे। चंदा भी खा गए और मंदिर बनाना तो दूर  मेरी मूर्ति को २० साल से खुले में रख छोड़ा है तुम इनकी बातों में न आओ हनुमान, ये  विधायक, सांसद और गेरुए वस्त्रधारी बाबा बड़े खतरनाक हैं। तुम्हें तो पता है सीता  को भी रावण ऐसे ही साधु बनकर उठा ले गया था। हनुमान का गुस्सा शांत नहीं हुआ। वे  बोले, &#39;&#39;आप मुझे बहला रहे हैं मुझे पक्का पता है, उस राज्य की राजधानी में मेरा  मंदिर तोड़ दिया गया है और उस ज़मीन को आपको नाम जपने वाली पार्टी ने अपनी शाखा  लगाने के लिए ले लिया है। मैं कैसे मान लूँ कि आपने मेरे बढ़ते जनाधार से घबराकर यह  कार्रवाही नहीं की है। राम ने पता किया तो मालूम हुआ कि घटना सच्ची है। वे बोले  वत्स, तुम्हारी बात सही है, पर तुम्हारी भाषा से लगता है कि विधायकों ने अपनी संगत  का तुम पर पर्याप्त असर छोड़ा है, तुम ऐसा करो उस राज्य में चले जाओ आज वहाँ इशी  विषय पर विधानसभा में भी चर्चा हो रही है। तु्म्हें सब खुद स्पष्ट हो  जाएगा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;हनुमान जी तत्काल सूक्ष्म रूपधर कर विधानसभा में पहुँच  गए। वहीं उन्हें पत्रकार का रूप धरे नारद जी भी मिल गए। हनुमान जी ने उन्हें प्रणाम  किया और आने का उद्देश्य बताया तो नारद उन्हें भी पत्रकार का रूप धरवा कर अपने साथ  प्रेस दीर्घा में ले गए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;विधानसभा का भवन अति विशाल और गरिमापूर्ण था। एक ओर  सत्तापक्ष और दूसरी ओर विपक्ष के बैठने के स्थान थे। विचारों से असहमत होने पर  शारीरिक प्रहार के लिए माइक आदि लगे हुए थे। सदन की कार्रवाई शुरू हुई और विपक्षी  पार्टी के एक विधायक ने कहना शुरू किया कि राजधानी में हनुमान जी का एक मंदिर कल  आधी रात गिरा दिया गया। नगर निगम के एक दस्ते ने भगवान की मूर्ति को अपने कब्जे में  ले लिया और पुलिस थाने में रख दिया। भगवान हनुमान तब से भूखे हैं, उन्हें भोग नहीं  लगा है और यह सब काम सत्ता में बैठी उस पार्टी के राज में हुआ है जो राम का नाम  लेकर सत्ता में आई है। यह शर्म की बात है कि रामनामी पार्टी ने अपनी संस्था के एक  विद्यालय को ज़मीन देने और वहाँ शाम को युवकों को धर्म रक्षा का ज्ञान देने का  प्रशिक्षण देने के लिए हनुमान जी का मंदिर तोड़ डाला।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;प्रेस दीर्घा में बैठे हनुमान जी ने नारद से कहा,  &#39;&#39;ऋषिवर कल यही बात स्वयं भगवान राम स्वीकार नहीं कर रहे थे। नारद जी ने कहा,  पवनपुत्र इतनी जल्दी निष्कर्ष मत निकालो, देखते जाओ। तभी सत्तापक्ष के कई सदस्य  अपने-अपने स्थान पर खड़े हो गए और चिल्लाने लगे कि यह झूठ है गलत है। इस पर विपक्षी  ने कहा, क्या यह भी झूठ है कि वहाँ सात साल से हनुमान जी का मंदिर था, रोज़ आरती  होती थी और हनुमान जी का मंदिर तोड़ने से व्यथित भक्त अनशन पर बैठे हुए हैं। हनुमान  जी की फिर मुठ्ठियाँ तन गई, इसी बीच नगर निगम के मंत्री खड़े हुए, उन्होंने काले  रंग का घुटनों तक का कुर्ता पहन रखा था और मुख से स्पष्ट लग रहा था कि पान वे सदन  में प्रवेश करने से ठीक पहले थूककर आए हैं और सुबह से दाँतों में जमे उस स्वादिष्ट  बीड़े के अभाव में काफी असहज महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा, इतना उत्तेजित होने  की ज़रूरत नहीं है, मैं अभी सारी स्थिति स्पष्ट कर देता हूँ। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;फिर उन्होंने रहस्य भरी मुस्कान के साथ वह मामला उठाने  वाले विपक्ष के विधायक की तरफ़ देखा और बोले, ये सच है कि नगर निगम ने हनुमान जी की  एक मूर्ति चबूतरे से उठाई है पर वहाँ मंदिर कभी नहीं था बल्कि एक चबूतरा बनाकर  मूर्ति रख दी गई थी और इसका मक़सद ज़मीन पर कब्ज़ा करना था क्योंकि उस इलाके में  ज़मीन के दाम लाखों में पहुँच चुके हैं यह भूमि माफिया की कोशिश थी जिसे नाकाम कर  दिया गया। मूर्ति थाने में है और पुलिस वाले हनुमान जी की पूजा कर रहे हैं, सरकार  ने विचार किया है कि थोड़े दिन बाद विधि विधान से थाने में ही मूर्ति की प्राण  प्रतिष्ठा कर दी जाएगी। प्रेस दीर्घा में हनुमान जी इधर-उधर झाँकने लगे। नारद से  बोले, तो ये कलजुगी भक्त मेरी मूर्ति का इस्तेमाल ज़मीनें कब्ज़ाने में कर रहे हैं?  नारद जी समझदार मुस्कुराहट बिखरते हुए बोले, तुम्हारी ही नहीं हनुमान सभी  देवी-देवताओं की मूर्तियों का अब यही प्रयोग हो रहा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;उधर सदन में फिर शोरगुल हो गया। विपक्षी विधायक बोला,  आप सदन को गुमराह कर रहे हैं वहाँ सात साल से ये मंदिर था आपने इसे तोड़ा है।  मंत्री ने भी एक काग़ज़ लहराते हुए उसी बुलंदी से कहा, उस कालोनी की विकास समिति ने  लिखकर दिया था कि मंदिर हटाया जाए। विपक्षी भी एक काग़ज़ लहराकर चीखा, विकास समिति  ने ऐसा कभी नहीं कहा, ये चिट्ठी है वे लोग तो आहत होकर धरने पर बैठे हुए हैं।  हनुमान जी बेचैन हो गए, उन्होंने नारद से पूछा, ये विकास समिति ने दो अलग-अलग पत्र  कैसे लिख दिए? नारद जी बोले, पत्र अलग-अलग नहीं है उस कॉलोनी में विकास समितियाँ ही  दो होंगी। एक इनके पक्ष वाली एक विपक्ष वाली। इस बीच सदन में ज़ोरदार हंगामा होने  लगा। सभी सदस्य खड़े होकर नारे लगाने लगे। तभी हाँफता हुआ एक विधायक घुसा, उसके गले  में भगवा दुपट्टा पड़ा था, उसने अपने पड़ौसी से हल्ले की वजह जानी और चिल्लाने लगा,  तुम विपक्षी किस मुँह से भगवान का नाम लेते हो, वे हमारे हैं हम उनका कुछ भी करें,  कहीं भी रखें तुम्हें क्या मतलब। हनुमान जी इस घोषणा से सिहर उठे। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;इसी बीच हंगामा बढ़ते देखकर अध्यक्ष ने दखल दिया। वे  बोले, इस बात का क्या प्रमाण है कि वहाँ मंदिर था। विपक्षी विधायक तैयारी से था  तुरंत फोटो लहराने लगा। अब सत्ता पक्ष थोड़ा दबा और उसका दुपट्टे वाला विधायक फिर  चिल्लाने लगा. तुम विधर्मी हो तुम्हें भगवान के बारे में बोलने कोई हक नहीं है।  हमने राम का मंदिर भी बनाने की शपथ खाई था, हनुमान का मंदिर भी बनाने की शपथ खाई थी  हनुमान का भी बनाएँगे। विपक्ष से आवाज़ आई, तुम मंदिर की केवल बात करते हो राम  मंदिर का ताला तो हमने खुलवाया था। फिर शोर, हो-हुल्लड़ शुरू हो गया। विपक्षी  विधायक फिर बोला, सरकार धर्म विरोधी हो गई है, मंत्री कहते हैं वहाँ मंदिर नहीं था,  ये हमारे एक और विधायक खड़े हैं जो सात साल से उस मंदिर में जा रहे हैं जो सात साल  से उस मंदिर में जा रहे हैं, बोलिए न, फिर हमेशा चुप रहने वाला वह विधायक भी पहली  बार बोला, &#39;हाँ मैं जाता हूँ। फिर शोरगुल शुरू हो गया और कुछ सुनाई नहीं  दिया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;प्रेस दीर्घा में बैठे हनुमान जी कान खुजाने लगे। नारद  जी बोले, &#39;महाराज इनमें कौन सच कह रहा है, कौन झूठ पता ही नहीं लग रहा। नारद जी  बोले, ये विधानसभा है हनुमान, यहाँ मुद्दे उछाले जाते हैं, सच झूठ का फ़ैसला तो  न्यायालय करता है, और वहाँ अगर मामला चला गया तो अगले कई युगों तक अटक जाएगा। दरअसल  हनुमान ये दोनों ही सच बोल रहे हैं और दोनों ही झूठ बोल रहे हैं। हनुमान ने कहा,  महाराज ये क्या उलटबाँसी है? नारद जी बोले, देखो, सच तो यह है कि वहाँ सात साल से  आपकी मूर्ति थी और झूठ ये कि मंदिर था, मंदिर वहाँ नहीं था। सच ये कि वहाँ ज़मीन का  दाम बड़ा महँगा है मूर्ति के सहारे उसे कब्जाने की योजना थी और झूठ ये कि विकास  समिति ने उसे हटाने को कहा था। इस तरह ये दोनों झूठे भी हैं और सच्चे भी हैं।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;हनुमान, तुम नहीं समझते, ये विपक्षी विधायक रातों रात  धार्मिक नहीं हो गए हैं इन्हें ज़मीन कब्जाने वालों ने यह मामला उठाने के लिए  प्रेरित किया है, कैसे तुम नहीं समझोगे वरना इससे पहले जब भूख से लोगों के मरने का  मामला उठा था तो ये बिलकुल खामोश थे। और ये सत्तापक्ष, इसके विधायकों को पता है कि  वहाँ शाखा लगनी है और वह शाखा जो संस्था लगवाती है उसके खिलाफ़ ये तो क्या इनके आका  भी नहीं जा सकते। ये विधायक बड़े मायावी होते हैं हनुमान तुम इनकी बातों में न आओ।  इनके कई रूप होते हैं, चुनाव प्रचार वाला अलग, जीतने वाला अलग, मंत्री बनने वाला  कुछ और, हारने वाला कुछ और। हनुमान एकदम से चौके, ये बात मेरे आराध्य राम भी कह रहे  थे। उन्हें अपनी गलती का भान हुआ। उन्होंने तुरंत सूक्ष्म रूप धरा और सीधे श्रीराम  के चरणों में जा पहुँचे। भगवान राम मंद-मंद मुस्कुराने लगे&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/993078046557551819/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/09/blog-post_05.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/993078046557551819'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/993078046557551819'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/09/blog-post_05.html' title='हनुमान किसके हैं —अनुराग वाजपेयी'/><author><name>Ravindra Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12391603598676383419</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-ZTV8J6K9Z9Q/Tkj-dS4aU0I/AAAAAAAAAAQ/k3WKM5J0bik/s220/Ravindra%2BSinha.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-3157879238376558354</id><published>2011-09-03T09:06:00.000-07:00</published><updated>2011-09-03T09:15:49.430-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हास्य-व्यंग्य"/><title type='text'>जिस रोज़ मुझे भगवान मिले</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: maroon; font-family: Mangal;&quot;&gt;जिस रोज़ मुझे भगवान  मिले&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://www.abhivyakti-hindi.org/lekhak/t/tarun_joshi.htm&quot;&gt;तरुण  जोशी&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;center&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;&#39;ना माया से ना शक्ति से भगवन मिलते हैं भक्ति से&#39;, एक  खूबसूरत गीत है और इसको सुनने के बाद लगा कि अगर मिलते होते तो भी प्रभु हमको मिलने  से रहते। क्योंकि माया हमें वैसे ही नहीं आती, शक्ति हममें इतनी है नहीं और भक्ति  हम करते नहीं, तो कुल जमा अपना चांस हुआ सिफ़र। लेकिन वो कहते हैं ना कि बिन माँगे  मोती मिले, माँगे मिले ना भीख तो एक दिन बिन बुलाए मेहमान से भगवान हम से टकरा ही  गए। अब इससे आगे का हाल अति धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत सज्जन और देवियाँ ना  पढ़ें, इसको पढ़कर आपके मन के क्षीरसागर में उठने वाले तूफ़ान के हम ज़िम्मेदार  नहीं होंगे और हमें गालियाँ देने को उठने वाले उफान के आप खुद ज़िम्मेदार  होंगे।&lt;/span&gt;  &lt;/div&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;भयानक रात में ट्रैक से लौटते हुए जंगल में जब रास्ता  भटक गए तो ऐसी परेशानी में हमेशा की तरह अपने खुदा को सोते से जगाने की गुहार लगाई  और तभी एक आदमी हमें दिख गया। साधारण से कपड़े पहने थे उसने, एक दो जगह से हवा आने  के लिए कपड़ों में बनाई खिड़कियाँ भी नज़र आ रही थी। मिलते ही हमने कहा, भय्या हम  रास्ता भटक गए हैं सही रास्ते पर कैसे आएँ पता हो तो ज़रा बता दो। वो आदमी बोला ठीक  है तुम मेरे पीछे-पीछे चलो तुम्हें रास्ता अपने आप मिल जाएगा। उत्सुकता वश जंगल पार  करते करते टाइम पास करने की गरज से या अंधेरी रात के सन्नाटे से उठने वाले अपने मन  के डर को कम करने के लिए हमने पूछ लिया वो कौन है और इस जंगल में रात के वक्त क्या  कर रहा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name=&#39;more&#39;&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;आदमी बोला, &quot;मैं भगवान हूँ&quot; और यहाँ शांति के साथ आराम  करने आया हूँ, हमें तुरंत महाभारत के समय की याद आ गई (याद है मैं समय हूँ) लेकिन  हम पूछ ही बैठे, &quot;शांति जी दिखाई नहीं दे रही&quot;। आदमी यानी कि भगवान थोड़ा सकपकाए  फिर बोले, &#39;&#39;मेरा मतलब मन की शांति से है।&#39;&#39; हमने भी तू शेर तो मैं सवा शेर की  तर्ज़ पर एक और सवाल पूछ लिया, &quot;तो कौन से भगवान हो? अगर शिव हो तो ये कपड़े क्यों  पहने हैं, ना साँप ना अर्धचंद्र ना भस्म और तो और गंगा भी नहीं दिखाई दे रही। और  अगर विष्णु तो ये साधारण से वस्त्र क्यों? ना मुकुट ना गहने बग़ैर शेषनाग कैसे और  ब्रह्मा हो तो पैदल क्यों? कमल कहाँ है?&#39;&#39; बोले, &#39;&#39;ये लोग कौन हैं?&#39;&#39; मैंने कहा,  &#39;&#39;बड़े पहुँचे हुए भगवान हैं, भगवन बोले लेकिन मैं तो एक ही हूँ ये कैसे हो सकता  है। ये ही नहीं अपने यहाँ तो सुनते हैं 33 करोड़ देवी देवता हैं जिन्हें हम भगवान  कहते हैं,&#39;&#39; कहने की बारी हमारी थी। हमारी बात सुन भगवान का मुँह खुला का खुला,  हमने सोचा हमारी बात दोहरा रहे हों, फिर लगा 33 कहने में मुँह तो नही खुलता। इसलिए  थोड़ा हिलाया, भगवान जैसे नींद से जागे हों बोले अच्छा गिनाओ। अब चित होने की बारी  हमारी थी हमें तो जैसे साँप सूँघ गया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घूस तो गए अब निकले  कैसे ये सूझ नहीं रहा था। 33 करोड़ सुना था, कौन हैं ये तो अपने फ़रिश्तों को भी  शायद ही मालूम हो। द्रौपदी की तरह लाज बचाने वाला कोई नहीं था अपनी इज़्ज़त खुद ही  बचानी थी सो हिम्मत कर गिनती शुरू करी। लेकिन 25 से ऊपर जाने के वांदे दिखने लगे  (हालत ख़राब होने लगी) फिर बड़ी कोशिश कर गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी नदियाँ और  चंद्र, मंगल, सूर्य जैसे ग्रह जोड़ संख्या किसी तरह 40 तक पहुँचाई। फिर सोचा दक्षिण  में लोग फ़िल्मी हीरोइनों के भी मंदिर बना देते हैं क्यों ना उनकी भी गिनती कर ली  जाय लेकिन अंदर से हमें लग गया था कि अपने पूर्वजों के साथ-साथ दुनिया की प्रमुख  हस्तियाँ भी गिनवाएँगे तो भी शायद ही 33 करोड़ का टच डाउन कर पाएँ। हम उस घड़ी को  कोस रहे थे जब किसी ने हमें 33 करोड़ देवी देवता होने की बात बताई थी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;नेताओं की देखा देखी बात बदलने की गरज से हमने दूसरा  मुद्दा छेड़ दिया। हमने पूछा, अच्छा ये बताएँ कि खुदा से रोज़ मुलाक़ात होती रहती  है या आप लोगों का भी वही रिश्ता है जो आप लोगों के बंदों का यानी मैं बड़ा, मैं  बड़ा। हमारे खुदा का मतलब विस्तार से समझाने के पश्चात भगवन नाराज़गी भरे शब्दों  में बोले, &quot;मैंने कहा ना मैं एक हूँ&quot;। हमने नहले पर दहला मारते हुए तुरंत कहा,  &quot;ज़रा ठीक ये याद कर लीजिए, हो सकता है कुंभ के मेले में आप लोग बिछुड़ गए  हों&quot;।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;ये सुन भगवन की भृकुटी तन गई, अपनी हालत उस मेमने की  तरह हो गई जिसने अचानक शेर देख लिया हो, बदकिस्मती ऐसी कि अपने भगवान को भी याद नही  कर सकते थे डर था कि कहीं ये आग में घी का काम ना कर दे। तभी गरजती-सी आवाज़ सुनाई  दी जैसे कोई नेता सरकार की पतलून उतारने के लिए या जनता से वोट माँगने के लिए गरजता  है, &#39;मैं एक ही हूँ, मैं ही हूँ जिसे तुम भगवान या खुदा कह रहे हो, मैं ही प्रारंभ  मैं ही अंत। मैं ही नारी मैं ही पुरुष, मेरा कोई रूप नहीं मैं हूँ निराकार। मैं ही  हूँ शक्ति पुंज, अनंत शक्तियों का संगम।&quot; अपनी सिट्टी-पिट्टी गुम, दिल इतने ज़ोर से  धड़कने लगा जैसे सैकड़ों मल्लिका शेरावत सामने आ खड़ी हों लेकिन मन में कहीं अपने  अर्जुन होने का एहसास हो रहा था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;नेताओं की तरह तुरंत पाला बदलते हुए अपना आत्म सम्मान,  अपना दिल-दिमाग़ सब कुछ अपनी जेब में रख हाथ जोड़ के हम बोल पड़े, &quot;बस भगवन बस सब  समझ गया। लेकिन शक का इलाज तो किसी वैध के पास है नहीं मन अभी भी शक कर रहा था कि  ये भगवान कैसे हो सकते हैं, इतनी देर से हमसे बात कर रहे हैं और हमको अभी तक एक बार  भी &quot;वत्स&quot; कहकर संबोधित नहीं किया। बातें तो बहुत पूछनी थी लेकिन डर इस बात का था  कि कहीं कोई श्राप ना दे दें। वैसे श्राप से ज़्यादा इस बात का डर था कि कहीं जंगल  में अकेला छोड़ दिया तो जंगली जानवर सूदख़ोरों की तरह बोटी-बोटी नोच  डालेंगे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;अपनी सोच में डूबे हम चुपचाप वैसे ही चल रहे थे जैसे  सीता और लक्ष्मण राम के पीछे-पीछे वनवास को चल दिए थे। तभी आवाज़ आई &#39;तुम्हारा नाम  क्या है वत्स&#39;? हमारे पैर से जैसे ज़मीन खिसक गई हो ऐसा झटका लगा जैसे किसी नेता को  कुर्सी छीन जाने पर लगता है। हमें लग गया कि ये जो भी है हमारा दिमाग़ पढ़ सकता है  इसलिए सोचने का काम तो करना ही नहीं है, बस बोलते जाओ अगर सोचने वाली बात इसने पढ़  ली तो हम तो सौ प्रतिशत काम से गए। तुरंत बोले, &quot;निठल्ला&quot;। भगवन ऐसे देख रहे थे  जैसे कह रहे हों ये भी कोई नाम हुआ, अच्छा काम क्या करते हो? अगला सवाल था। हमने  कहा, &#39;&#39;चिंतन, क्या?&#39;&#39; भगवन बोले, &#39;&#39;हमने फिर ज़ोर देकर कहा, &quot;निठल्ला चिंतन&quot;। भगवन  किसी नासमझ प्रेमिका जैसे बोले, &quot;वो क्या होता है&quot;? हमने समझाया, &quot;कहीं की ईंट कहीं  का रोड़ा, भानमती ने कुनबा जोड़ा।&quot; ये होता है। जनता की तरह भगवन बोले, &#39;&#39;अच्छा  जाने दो जैसे कह रहे हों जब निठल्ला चिंतन समझ में नहीं आया तो भानमती के कुनबे की  बात कैसे समझ में आएगी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;फिर प्यार से बोले, &#39;&#39;अच्छा अब हमारे भगवान होने पर  यकीन आया कि नहीं।&#39;&#39; हाथ जोड़ अपनी सारी हिम्मत जुटा हम बोलें, &quot;क्षमा प्रभु, लेकिन  मन में कई संशय है।&#39;&#39; जैसे?, रहने दो प्रभु मान लिया आप ही हो पालनहार, हमारी इस  जंगल से नैय्या पार लगा दो बस। भगवन किसी प्राइवेट बैंक का लोन लेने के लिए समझाने  वाले एजेंट की तरह मिठास घोलते हुए बोले, &quot;कोई संशय लेकर यहाँ से मत जाओ, पूछो क्या  पूछना है।&quot; हमने हिम्मत कर कहा, &#39;&#39;अपना विराट स्वरूप मत दिखाईएगा मैं कोई अर्जुन  नही, समझ और झेल नही पाऊँगा।&#39;&#39;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;थोड़ा साहस दिखा मैं फिर से शुरू हुआ, एक बात बताओ  भगवन, &#39;&#39;मस्जिद में औरतों और आदमियों के लिए अलग-अलग स्थान क्यों, उनके लिए समान  नियम क्यों नहिं।&#39;&#39; &#39;&#39;अब ये तो उन्हीं से पूछो जिसने मस्जिद बनाई मेरा काम तो  सिर्फ़ आदमी बनाना (जन्म देना) और मिटाना (मारना) है,&#39;&#39; भगवन बोले। अच्छा ये बताइए  कि किसी-किसी मंदिर में रजस्वला स्त्री के प्रवेश में प्रतिबंध क्यों? भगवन बोले,  &#39;&#39;एक बार कहा ना ये मस्जिद बनाने वाले जाने,&#39;&#39; मैंने बीच में टोका, &#39;&#39;भगवन मैं  मंदिर की बात कर रहा हूँ, दोनों में फर्क है।&#39;&#39; &#39;&#39;क्या फर्क है?&#39;&#39; भगवन बोले,  &#39;&#39;दोनों में तुम मुझे ही पूजते हो बावजूद इसके कि मैं ना किसी मंदिर में रहता हूँ  ना किसी मस्जिद में।&#39;&#39;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;भगवन ने उलटा सवाल दाग दिया, &#39;&#39;अच्छा ये बताओ कि एक  शहर में कुल मिलाकर कितने मंदिर मस्जिद होंगे?&#39;&#39; मैंने जवाब दिया, &#39;&#39;सारे धार्मिक  स्थल मिला कम से कम 30-40 तो होंगे ज़्यादा भी हो सकते हैं।&#39;&#39; ये सुन भगवन  मुस्कराने लगे, &#39;&#39;मैंने इसकी वजह पूछी तो जवाब मिला, &quot;अब मैं तुम्हारे 33 करोड़  भगवानों का गणित समझ गया इसलिए।&#39;&#39; बात काट हमने कहा, &#39;&#39;फिर काहे मंदिर के अंदर की  मूर्त को इतना सजा के क्यों रखा जाता है जब आप वहाँ नहीं रहते। तुम खुद सोचो कोई  किसी पत्थर के अंदर कैसे रह सकता है,&#39;&#39; भगवन ने पलट वार किया। &#39;&#39;हर इंसान के अंदर  मेरा भी एक अंश रहता है लेकिन उसे कोई नहीं ढूँढता, तुमने जो राम कृष्ण गिनाए थे वो  क्या पत्थर से निकले थे।&#39;&#39;&lt;br /&gt;मैंने कहा, &#39;&#39;नहीं,&#39;&#39; बात में वज़न था, सोचने लगा बात  तो सही है वो भी हमारी ही तरह इंसान थे और अंत में इनसानों की तरह मृत्यु को  प्राप्त हुए अब भला भगवान कैसे मर सकते हैं। कैसे भला एक बहेलिया एक तीर से भगवान  को मार सकता है, भगवान की संतान भी भगवान होनी चाहिए फिर लव-कुश को काहे लोग नही  पूजते। भगवान के माँ-बाप भी भगवान होने चाहिए फिर दशरथ सिर्फ़ एक राजा बनके क्यों  रह गए इतिहास के पन्नों पर। मैं खुद ही अपने सवालों में उलझने लगा था।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;सामने रोड दिखाई देने लगी थी यानी कि मैं फिर सही  रास्ते पर आने वाला था। रोड पर पहुँच मैं किसी गाड़ी का इंतज़ार करने लगा। दूर से  एक गाड़ी आ रही थी, सोचा जब तक गाड़ी पास आती है क्यों ना एक सवाल और दाग़ दिया  जाय। अच्छा प्रभु ये बताइए कि यहाँ इंसान एक दूसरे के खून के प्यासे क्यों हो रहे  हैं, आतंकवाद, धार्मिक उन्माद, भूकंप, बाढ़, प्राकृतिक आपदाएँ ये सब क्यों? सुख और  खुशी के साथ सब मिलकर क्यों नहीं रहते? भगवन बोले, &quot;बेवक़ूफ़ अगर ये सब ठीक कर दिया  तो धरती स्वर्ग ना हो जाएगी, जब कोई दुख ही नहीं रहेगा तो फिर मुझे कौन  पूछेगा।&#39;&#39;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;मुझे अपने को बेवक़ूफ़ कहे जाने पर बड़ा गुस्सा आया,  जंगल निकल चुका था अब इतना डर भी नहीं था इसलिए नाराज़गी दिखाने के लिए पीछे मुड़ा  तो देखा वहाँ कोई नहीं। जो इतनी देर से अपने को भगवान बता रहा था उसका दूर-दूर तक  कोई पता नहीं। सिर्फ़ जंगल दिखाई दे रहा था, अपनी तो खोपड़ी ही घूम गई तभी बस वाले  ने ज़ोर से हौर्न बजाया, मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। घड़ी का अलार्म बज रहा था, 7 बज  गए थे यानी कि काम पर जाने का वक्त हो गया था। मैं आँखे मलता बाथरूम की ओर चल दिया।  पड़ोस से कहीं गाने की आवाज़ आ रही थी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सब को सन्मति दे  भगवान।&lt;br /&gt;माँगों का सिंदूर ना छूटे, माँ बहनों की आस ना टूटे,&lt;br /&gt;देह बिना भटके ना  प्राण, सबको सन्मति दे भगवान।&lt;br /&gt;ओ सारे जग के रखवाले, निर्बल को बल देने  वाले,&lt;br /&gt;बलवानों को दे दे ज्ञान, सबको सन्मति दे भगवान।। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-family: Mangal;&quot;&gt;मैं तैयार हो ऑफ़िस को चल दिया, रास्ते में हर आदमी को  ग़ौर से देखता जा रहा था सोच रहा था आज से सबके साथ प्यार से पेश आना है, सबको  इज़्ज़त देनी है क्योंकि किसे क्या पता ना जाने किस भेष में नारायण मिल जाय।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/3157879238376558354/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/09/blog-post_03.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/3157879238376558354'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/3157879238376558354'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/09/blog-post_03.html' title='जिस रोज़ मुझे भगवान मिले'/><author><name>Ravindra Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12391603598676383419</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-ZTV8J6K9Z9Q/Tkj-dS4aU0I/AAAAAAAAAAQ/k3WKM5J0bik/s220/Ravindra%2BSinha.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-3231706301497449106</id><published>2011-09-03T08:27:00.000-07:00</published><updated>2011-09-03T08:27:33.448-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आलेख"/><title type='text'>उठो जवानो तुम्‍हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;h2&gt;उठो जवानो तुम्‍हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है&lt;/h2&gt;&lt;div&gt;एक कहावत है, प्याज़ भी खाया और जूते भी खाए. ज़्यादातर लोग इस कहावत को जानते तो  हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता है कि इसके पीछे की कहानी क्या है. एक बार किसी  अपराधी को बादशाह के सामने पेश किया गया. बादशाह ने सज़ा सुनाई कि ग़लती करने वाला या  तो सौ प्याज़ खाए या सौ जूते. सज़ा चुनने का अवसर उसने ग़लती करने वाले को दिया. ग़लती  करने वाले शख्स ने सोचा कि प्याज़ खाना ज़्यादा आसान है, इसलिए उसने सौ प्याज़ खाने की  सज़ा चुनी. उसने जैसे ही दस प्याज़ खाए, वैसे ही उसे लगा कि जूते खाना आसान है तो  उसने कहा कि उसे जूते मारे जाएं. दस जूते खाते ही उसे लगा कि प्याज़ खाना आसान है,  उसने फिर प्याज़ खाने की सजा चुनी. दस प्याज़ खाने के बाद उसने फिर कहा कि उसे जूते  मारे जाएं. फैसला न कर पाने की वजह से उसने सौ प्याज़ भी खाए और सौ जूते भी. यहीं से  इस कहावत का प्रचलन प्रारंभ हुआ. आज&lt;br /&gt;&lt;a name=&#39;more&#39;&gt;&lt;/a&gt; कांग्रेस पार्टी के लिए यह कहा जा सकता है कि  अन्ना के मामले में उसने सौ जूते भी खाए और सौ प्याज़ भी.&lt;br /&gt; अन्ना हज़ारे का आंदोलन आज़ाद भारत का सबसे बड़ा आंदोलन बन गया है. अन्ना को देश के  कोने-कोने से जनता का समर्थन मिल रहा है. आज सरकार के साथ-साथ देश के सभी राजनीतिक  दलों के सामने यह आंदोलन सबसे बड़ी चुनौती है. समस्या यह है कि हर राजनीतिक दल अन्ना  के आंदोलन को समझने में भूल कर रहा है. यह आंदोलन स़िर्फ जन लोकपाल का आंदोलन नहीं  है. यह आंदोलन पिछले 20 सालों से चल रही नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के खिला़फ है. यह  20 सालों की सरकारी योजनाओं और नीतियों के खिला़फ जनता का फैसला है. सरकार विकास के  आंकड़े दिखाकर भ्रम फैलाने को सुशासन कहना पसंद करती है. हक़ीक़त यह है कि शहर रहने के  लायक नहीं रहे. कुछ मेट्रो शहरों को छोड़कर देश में कहीं पर 24 घंटे बिजली नहीं है.  दिल्ली जैसे शहर में सा़फ पानी नहीं है. छोटे शहरों में ढंग की चिकित्सा सुविधाएं  नहीं हैं. नौजवानों का भविष्य अंधकारमय है. आम आदमी का जीवन नारकीय हो गया है. किसी  भी अस्पताल में जाइए, वहां डॉक्टर गिद्धों की तरह मरीज़ों से पैसे लूटते मिल जाएंगे.  सरकारी दफ्तरों में बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता है. सरकार ने पूरे देश को एक  ऐसे भंवर में डाल दिया है, जहां जीवित रहना ही एक अभिशाप बन गया है. लोग पूरी  व्यवस्था से तंग आ चुके हैं. लोगों में नाराज़गी है कि सरकार उनकी परेशानी और  दु:ख-दर्द को खत्म करना तो दूर, उसे समझने का भी प्रयास नहीं कर रही है. यही अन्ना  के आंदोलन के समर्थन का आधार है. इस आंदोलन में शहरी मध्य वर्ग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले  रहा है. इसलिए कुछ लोगों को लगता है कि अन्ना का आंदोलन इंटरनेट के&amp;nbsp; ज़रिए फैला हुआ  आंदोलन है. देश चलाने वालों, सभी राजनीतिक दलों और उद्योगपतियों को सचेत हो जाना  चाहिए, क्योंकि अगर इस आंदोलन में ग्रामीण और आदिवासी शामिल हो गए तो यह मान लीजिए  कि इस देश का प्रजातंत्र खतरे में आ जाएगा. जो लोग यह समझ रहे हैं कि यह आंदोलन  स़िर्फ जन लोकपाल के लिए है तो यह उनकी एक बड़ी भूल होगी. जन लोकपाल इस जनांदोलन का  स़िर्फ तात्कालिक कारण है. और वह भी इसलिए, क्योंकि कांग्रेस पार्टी के नेताओं और  मंत्रियों ने लोकपाल के मामले में राजनीतिक फैसले न करके प्रशासनिक फैसले लेने का  जुर्म किया है.&lt;br /&gt; &lt;blockquote&gt; &lt;span style=&quot;color: navy;&quot;&gt;जे पी आंदोलन के दौरान चंद्रशेखर ने इंदिरा गांधी  से कहा था कि जे पी के खिला़फ तीखे बयान देने से पार्टी को बचना चाहिए. फक़ीर और  राजा के बीच जब भी जंग होती है तो जीत हमेशा फक़ीर की होती है. इसलिए फक़ीरों और  संतों से नज़रें झुका कर बात करनी चाहिए. यह सुनकर इंदिरा गांधी तिलमिला उठी थीं. आज  देश में वैसा ही माहौल है. दु:ख इस बात का है कि कांग्रेस पार्टी में आज कोई  चंद्रशेखर नहीं है.&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी ग़लती यह है कि लोकपाल क़ानून बनाने के मामले में  उसने टीम अन्ना के साथ धोखा किया, देश की जनता के सामने झूठ बोला. जब जंतर-मंतर पर  अन्ना का आंदोलन हुआ और एक संयुक्त समिति बनाई गई तो सरकार ने यह वायदा किया कि  दोनों पक्ष मिलकर लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करेंगे. दोनों पक्षों के बीच कई बार  बातचीत हुई, लेकिन जब सरकार ने लोकपाल बिल तैयार किया तो उसने टीम अन्ना के सुझावों  को दरकिनार कर दिया. इसका हल निकल सकता था, अगर प्रधानमंत्री ने इसमें मध्यस्थता की  होती. सिविल सोसायटी के सुझावों को लोकपाल में शामिल करके संसद में उन पर अलग  वोटिंग कराई जा सकती थी. अगर ऐसा होता तो अन्ना भूख हड़ताल पर नहीं जाते, लेकिन  सरकार ने कड़ा रु़ख अपनाया. सरकार की तऱफ से अन्ना की टीम को सा़फ-सा़फ यह कह दिया  गया कि आपको जो भी सुझाव देना है, स्टैंडिंग कमेटी के सामने दे सकते हैं. सत्ता का  नशा कहिए या फिर क़ानून के ज्ञाता होने का अहंकार, कपिल सिब्बल ने जब भी अपनी ज़ुबान  खोली, वह एक तानाशाह नज़र आए. डॉ. मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, कपिल सिब्बल, चिदंबरम  और मनीष तिवारी बोलते चले गए, अन्ना हजारे को जनता का समर्थन बढ़ता चला गया.  सर्वोच्च कोटि का वकील होने और जनता का प्रतिनिधि होने में एक अंतर होता है.  प्रजातंत्र में राजनीतिक सवालों का जवाब संविधान और सीआरपीसी की धाराओं से नहीं  दिया जाता है. इससे टीवी चैनलों पर होने वाली बहस को तो जीता जा सकता है, लेकिन यह  जनता के दिलों पर राज करने का रास्ता बिल्कुल नहीं बन सकता. मौजूदा सरकार में वकील  से मंत्री बने लोगों को यही बात समझ में नहीं आई. कांग्रेस के प्रवक्ता और मंत्री  बहस करते गए और लोगों की नाराज़गी बढ़ती चली गई.&lt;br /&gt; टीम अन्ना के पास अनशन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा. वैसे भी अन्ना पहले  ही यह कह चुके थे कि अगर सरकार ने जन लोकपाल बिल को संसद में पेश नहीं किया तो वह  अनशन करेंगे. यहां सरकार से एक और चूक हुई. सरकार ने लोकपाल का सारा श्रेय खुद लेने  के चक्कर में विपक्ष को इस मामले से दूर ही रखा. यही वजह है कि इस मुद्दे पर कोई एक  मत नहीं बन सका. जब अन्ना ने अनशन का ऐलान किया, तब लोकपाल के मुद्दे पर कांग्रेस  पार्टी की बैठक हुई. कई बड़े नेता इसमें शामिल थे. इस बैठक में रक्षा मंत्री ए के  एंटोनी, सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी और ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश  ने जनता की भावनाओं को महत्व देने की बात कही थी, लेकिन वित्त मंत्री प्रणब  मुखर्जी, गृह मंत्री चिदंबरम ने इसे नकार दिया. कपिल सिब्बल ने क़ानूनी पक्ष रखा था.  इस बैठक में शामिल हुए कांग्रेस पार्टी के नेता जनता के मूड को नहीं समझ सके. सरकार  ने अन्ना का विरोध करने का फैसला ले लिया. किसी भी नज़रिए से इसे राजनीतिक फैसला  नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि जनमत अन्ना के साथ था. कांग्रेस ने खुद अपने पैर पर  कुल्हाड़ी मार ली.&lt;br /&gt; &lt;blockquote&gt; &lt;span style=&quot;color: navy;&quot;&gt;इस आंदोलन में जो लोग शामिल हो रहे हैं, वे धन्य  हैं. जो लोग अब तक शामिल नहीं हुए हैं, उनके पास मौक़ा है. अन्ना का आंदोलन लोकपाल  तक ही सीमित नहीं रहने वाला है. आने वाले दिनों में न्यायिक व्यवस्था में सुधार के  लिए आंदोलन होगा, चुनाव सुधार के लिए आंदोलन होगा. घर में बैठने का व़क्त खत्म हो  गया है. हमें व्यवस्था परिवर्तन के लिए सड़कों पर उतरना  होगा.&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;कांग्रेस पार्टी के एक प्रवक्ता हैं मनीष तिवारी. पहले उनके इस बयान को देखिए.  कांग्रेस की एक स्पेशल प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा, हम किशन बाबूराव उ़र्फ  अन्ना हज़ारे से पूछना चाहते हैं कि तुम किस मुंह से भ्रष्टाचार के खिला़फ अनशन की  बात करते हो. ऊपर से नीचे तक तुम भ्रष्टाचार में खुद लिप्त हो. इसके अलावा मनीष  तिवारी ने अन्ना को एक दिमाग़ी तौर पर बीमार प्राणी बताया. मनीष तिवारी के इसी बयान  ने उन्हें विलेन बना दिया. देश की जनता के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी के कई सांसद  मनीष तिवारी से नाराज़ हैं. मनीष तिवारी जनता की नज़रों से तो गिरे ही, अब पार्टी भी  उनका साथ नहीं दे रही है. उन्हें मीडिया से दूर रहने की हिदायत दी गई है. वह उदास  हैं, क्योंकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उनका साथ छोड़ दिया. जबकि हक़ीक़त यह है कि  अन्ना हज़ारे पर हमला करने का फैसला मनीष तिवारी ने नहीं, बल्कि पार्टी के नेताओं ने  लिया था. अन्ना ने जब जय प्रकाश पार्क में धारा 144 लागू होने के बावजूद अनशन करने  का अपना फैसला सुनाया तो पत्रकारों ने कांग्रेस के प्रवक्ताओं से इस पर प्रतिक्रिया  मांगी. पार्टी की ओर से जवाब यह मिला कि सारे सवालों का जवाब रविवार को स्पेशल  प्रेस कांफ्रेंस में दिया जाएगा. आम तौर पर कांग्रेस पार्टी रविवार को प्रेस  कांफ्रेंस नहीं करती है. मनीष तिवारी ने अन्ना को एक ही सांस में फासीवादी, माओवादी  और अराजकतावादी क़रार दिया. मनीष तिवारी ने जिस लहज़े में अन्ना पर हमला बोला, जैसी  उनकी बॉडी लैंग्वेज थी, उससे कांग्रेस पार्टी की छवि सत्ता के नशे में चूर एक  अहंकारी पार्टी की बन गई. 14 अगस्त यानी रविवार की स्पेशल प्रेस कांफ्रेंस कांग्रेस  पार्टी के गले की फांस बन गई.&lt;br /&gt; इस ग़लती के बावजूद कांग्रेस संभल सकती थी, लेकिन वह अपने ग़लत फैसले को सही साबित  करने के चक्कर में एक के बाद एक ग़लतियां करती चली गई. पहले अन्ना पर भ्रष्टाचार का  आरोप लगाया गया. कांग्रेस को लगा कि जिस तरह उसने बाबा रामदेव पर आरोप लगाकर उनके  आंदोलन की हवा निकाल दी थी, वही हाल अन्ना का होगा, लेकिन यह रणनीति नाकाम हो गई.  कांग्रेस पार्टी यह नहीं समझ सकी कि अन्ना बाबा रामदेव नहीं हैं. बाबा रामदेव की  तरह उनके पास हज़ारों करोड़ का साम्राज्य नहीं है. अन्ना सचमुच में फकीर हैं, एक संत  हैं. इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद कांग्रेस को संभलने का दूसरा मौक़ा 15 अगस्त को  मिला, जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले से देश को संबोधित किया. पूरे देश  की नज़रें मनमोहन सिंह पर टिकी हुई थीं कि वह अपने भाषण में अन्ना के बारे में क्या  कहने वाले हैं. भ्रष्टाचार और महंगाई पर प्रधानमंत्री से जो उम्मीद थी, वह उससे ठीक  उलटा बोले. सरकार ने संभलने के बजाय एक और ग़लती कर दी. मनमोहन सिंह ने लाल किले से  अन्ना पर हमला कर दिया. उन्होंने कहा कि उनके पास जादू की छड़ी नहीं है कि वह एक  झटके में भ्रष्टाचार और महंगाई को खत्म कर देंगे. ऐसे बयान देकर सरकार जनता में ग़लत  संदेश देती है. प्रधानमंत्री के पास अगर जादू की छड़ी नहीं है तो क्या आंखें भी नहीं  हैं? उनकी कैबिनेट का एक साथी एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ रुपये का घोटाला कर देता है  और उन्हें मालूम नहीं पड़ता है. जबकि अब पता चल रहा है कि इस घोटाले के दौरान ए राजा  की तऱफ से हर फैसले के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर बताया जा रहा  था. क्या प्रधानमंत्री यह दलील दे सकते हैं कि उन्हें मालूम नहीं है. अगर  प्रधानमंत्री को यह मालूम न हो कि किस मंत्रालय में क्या चल रहा है तो इसका मतलब यह  हुआ कि दिल्ली में सरकारी तंत्र नष्ट हो चुका है. क्या हर मंत्रालय के संयुक्त सचिव  का प्रधानमंत्री कार्यालय से रिश्ता खत्म हो गया है? मनमोहन सिंह को देश की जनता को  यह बताना चाहिए कि आ़खिर प्रधानमंत्री कार्यालय का काम क्या है. यही वजह है कि देश  की जनता ने मनमोहन सिंह के भाषण को नकार दिया. लोगों की नाराज़गी बढ़ गई. अन्ना ने  जनता के मूड को समझा और उन्होंने पहला मास्टर स्ट्रोक 15 अगस्त की शाम को खेला, जब  वह अचानक राजघाट पहुंच गए. पूरा देश अन्ना को देख रहा था. छुट्टी का दिन था, लोग  टीवी के सामने बैठे रहे. थोड़ी ही देर में वहां भीड़ जुटने लगी. अन्ना को कुछ कहने की  भी ज़रूरत नहीं पड़ी. बस उठने से पहले उनकी आंखों से कुछ आंसू गिरे और पूरे देश में  अन्ना की लहर दौड़ गई.&lt;br /&gt; 15 अगस्त की रात शांतिपूर्वक बीत गई. 16 अगस्त की सुबह अन्ना हजारे को राजधानी  दिल्ली के मयूर विहार में हिरासत में ले लिया गया. यहां धारा 144 नहीं लगी थी.  पुलिस ने अन्ना और उनके साथियों से यह कहा कि आपको वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के पास  जाना है. जब वे वहां पहुंचे तो उनसे मोबाइल फोन और बाकी सामान निकाल कर बाहर रखने  को कहा गया और फिर उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया गया. पुलिस ने गिरफ्तारी  की वजह यह बताई कि अन्ना और उनके साथियों से दिल्ली में क़ानून व्यवस्था बिगड़ने का  खतरा है. सरकार ने अन्ना की गिरफ्तारी को दिल्ली पुलिस की कार्रवाई बताकर अपनी  गर्दन बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन सरकार की इस दलील पर किसी ने विश्वास नहीं  किया. लोगों को लगा कि अन्ना के साथ अन्याय हुआ है. देश भर में लोग सड़कों पर आने  लगे. कई कंपनियों ने अपने दफ्तर बंद कर दिए. एक के बाद एक कई संगठन इस आंदोलन से  जुड़ते चले गए. बड़ी संख्या में बच्चे-बूढ़े, छात्र-नौजवान और महिलाएं राजधानी दिल्ली  की सड़कों पर निकल पड़े.&lt;br /&gt; यहां अन्ना ने फिर एक मास्टर स्ट्रोक खेला. उन्होंने प्रशासनिक कार्रवाई का जवाब  एक राजनीतिक चाल से दिया और जेल के अंदर ही अनशन शुरू कर दिया. एक तऱफ संसद में  सरकार को विपक्ष की मार पड़ रही थी, दूसरी तरफ देश की जनता सड़क पर खड़ी थी. संसद में  विपक्ष प्रधानमंत्री का बयान चाह रहा था, लेकिन सरकार ने उसकी मांग को ठुकरा दिया.  चारों तऱफ से घिरने के बावजूद सरकार का रवैया नरम नहीं हुआ. संसद नहीं चली, लेकिन  अगले दिन तक सरकार पर इतना दबाव पड़ गया कि कांग्रेस के कोर ग्रुप ने यह फैसला लिया  कि प्रधानमंत्री बयान देंगे, लेकिन प्रधानमंत्री से एक भयंकर भूल हो गई. संसद में  उन्होंने यह कह दिया कि अन्ना ने जो रास्ता चुना है, वह लोकतंत्र के&amp;nbsp; लिए नुक़सानदेह  है. प्रधानमंत्री के बयान ने आग में घी का काम किया. जनता का सरकार से विश्वास ही  उठ गया. आंदोलन और तेज़ हो गया. कांग्रेस के नेता अलग-अलग जगहों पर ग़ैर ज़िम्मेदाराना  बयान देते नज़र आए. राशिद अलवी ने यह कहकर चौंका दिया कि अन्ना के आंदोलन के पीछे  विदेशी ताक़तों का हाथ है. पूरी घटना देखने के बाद ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी  में कोई राजनीतिक फैसले लेने वाला है भी या नहीं.&lt;br /&gt; जन समर्थन देखकर केंद्र सरकार सहम गई. आंदोलन के तेवर को देखते हुए अन्ना की  रिहाई का आदेश दे दिया गया. इसके बाद अन्ना ने सबसे बड़ा फैसला तब लिया, जब उन्होंने  कहा कि वह अपनी शर्तों पर जेल से बाहर जाएंगे. वह जेल के अंदर अनशन करते रहे. जेल  के बाहर जनता उनके समर्थन में सड़कों पर उतरती रही. अन्ना का आंदोलन जंगल की आग की  तरह देश के हर छोटे-बड़े शहरों में फैल गया. अन्ना लोकपाल बिल के संसद में पास होने  के लिए आंदोलन कर रहे हैं. सरकार और टीम अन्ना के बीच बातचीत होती रही. पहले दिल्ली  पुलिस ने उन्हें अनशन के लिए तीन दिनों का व़क्त दिया था, बाद में पुलिस ने अन्ना  को अनशन के लिए रामलीला मैदान और 15 दिनों का व़क्त दे दिया. अन्ना जब जेल से बाहर  निकले तो जनसैलाब उमड़ पड़ा. पांच-पांच किलोमीटर तक पैर रखने की जगह नहीं थी. अन्ना  की एक झलक पाने के लिए लोग बारिश में भीग कर इंतजार करते रहे. रामलीला मैदान  पहुंचते ही उन्होंने ऐलान कर दिया कि जब तक सरकार जन लोकपाल बिल को संसद में पास  नहीं कराती है, तब तक यह आंदोलन चलता रहेगा, अनशन जारी रहेगा.&lt;br /&gt; 1950 में ब्रिटेन के डब्ल्यू एच मोरिस-जोंस ने आधुनिकता, पारंपरिकता और संतों या  सेंटली इडियम को भारतीय राजनीति के तीन महत्वपूर्ण आधार बताए थे. भारत के संविधान,  संसद एवं न्यायालय को आधुनिक और राजनीति में जाति एवं संप्रदाय को पारंपरिकता से  जोड़ा था, लेकिन मोरिस-जोंस ने संतों की भूमिका को अनोखा बताया. उन्होंने भारत में  त्याग करने वाले संतों की विशेष भूमिका बताई थी. इस श्रेणी में महात्मा गांधी,  विनोबा भावे, राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण को गिना जा सकता है, जिनका जीवन  त्याग और संघर्ष की कहानी है. ये नेता लोगों के दिलों में इसलिए बसे, क्योंकि लोगों  को लगता था कि ये तो संत हैं. अन्ना हजारे की सादगी और उदारता लोगों के दिलों में  बस गई. लोगों को अन्ना में गांधी दिखते हैं, विनोबा दिखते हैं, जेपी दिखाई देते  हैं. कांग्रेस पार्टी के नेताओं और सरकार के मंत्रियों को अन्ना में एक  भ्रष्टाचारी, फासीवादी, माओवादी और अराजकतावादी नज़र आया.&lt;br /&gt; राजनेताओं और देश की जनता के नज़रिए में अगर इतना बड़ा फर्क़ जहां होगा, वहां तो  आंदोलन होना निश्चित है. इसके बावजूद अगर सत्ता का अहंकार राजनेताओं के सिर पर चढ़कर  बोलेगा तो क्रांति होने से कोई नहीं रोक सकता है.&lt;br /&gt; यह बात कहनी पड़ेगी कि संसद के बाहर पूरे देश में जो नज़ारा था, उससे संसद का  औचित्य ही खत्म हो गया, क्योंकि प्रजातंत्र में तो सांसद जनता के प्रतिनिधि मात्र  हैं. जब जनता खुद ही सड़क पर उतर कर जन लोकपाल की मांग करने लगे तो उसे प्रतिनिधियों  की ज़रूरत नहीं पड़ती है. कई लोग यह मानते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है. जब सत्तर  के दशक में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन शुरू हुआ, तब भी हालात यही थे. जयप्रकाश  नारायण पर भी कांग्रेस पार्टी विदेशी एजेंट और अराजकतावादी होने का आरोप लगा रही  थी. पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर उस व़क्त कांग्रेस में थे. वह इंदिरा  गांधी से मिले और कहा कि जयप्रकाश नारायण के खिला़फ इस तरह के बयान से कांग्रेस को  बचना चाहिए. इंदिरा गांधी तिलमिला उठीं, लेकिन चंद्रशेखर ने दो टूक कहा कि फकीर और  राजा के बीच जब भी जंग होती है तो जीत हमेशा फकीर की होती है. इसलिए फकीर और संतों  से नज़रें झुका कर बात करनी चाहिए. आज देश में वैसा ही माहौल है. दु:ख इस बात का है  कि कांग्रेस पार्टी में आज कोई चंद्रशेखर नहीं है. देश की जनता को अन्ना को धन्यवाद  देना चाहिए, क्योंकि उन्होंने परेशानी से जूझ रहे देश को जगाने का काम किया है. इस  आंदोलन में जो लोग शामिल हो रहे हैं, वे धन्य हैं. जो लोग अब तक शामिल नहीं हुए  हैं, उनके पास मौक़ा है. अन्ना का आंदोलन लोकपाल तक ही सीमित नहीं रहने वाला है. आने  वाले दिनों में न्यायिक व्यवस्था में सुधार के लिए आंदोलन होगा, चुनाव सुधार के लिए  आंदोलन होगा. घर में बैठने का व़क्त खत्म हो गया है. हमें व्यवस्था परिवर्तन के लिए  सड़कों पर उतरना होगा. आज राम गोपाल दीक्षित की एक कविता याद आती है:-&lt;br /&gt; &lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: red;&quot;&gt;&lt;strong&gt;कौन चलेगा आज  देश से भ्रष्टाचार मिटाने को,&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: red;&quot;&gt;&lt;strong&gt;बर्बरता से  लोहा लेने, सत्ता से टकराने को,&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: red;&quot;&gt;&lt;strong&gt;आज देख लें  कौन रचाता मौत के संग सगाई है,&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: red;&quot;&gt;&lt;strong&gt;उठो जवानो,  तुम्हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;color: red;&quot;&gt;&lt;b&gt;by Dr. Manish &amp;nbsp;Kumar&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/3231706301497449106/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/09/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/3231706301497449106'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/3231706301497449106'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='उठो जवानो तुम्‍हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है'/><author><name>Ravindra Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12391603598676383419</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-ZTV8J6K9Z9Q/Tkj-dS4aU0I/AAAAAAAAAAQ/k3WKM5J0bik/s220/Ravindra%2BSinha.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-4018769225672854806</id><published>2011-08-30T10:38:00.000-07:00</published><updated>2011-09-01T00:25:43.574-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आलेख"/><title type='text'>Anna &amp; his cap</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;div class=&quot;w100p&quot;&gt;&lt;h1 class=&quot;fs140&quot;&gt;अन्ना टोपी और कैंडल लाइट डिनर&lt;/h1&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;w100p&quot; id=&quot;fullDesNews&quot;&gt;&lt;div class=&quot;vSprt subTBLn&quot;&gt;&lt;div style=&quot;float: right;&quot;&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;cb&quot;&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div id=&quot;PATHKONC_DIV&quot; style=&quot;display: block;&quot;&gt;&lt;div align=&quot;left&quot; class=&quot;f1&quot;&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;left&quot; class=&quot;fl&quot;&gt;&lt;div class=&quot;mb10&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; class=&quot;mr10&quot; height=&quot;224&quot; src=&quot;http://images.bhaskar.com/web2images/www.bhaskar.com/2011/08/30/images/anna1_f.jpg&quot; width=&quot;288&quot; /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;graybox&quot; style=&quot;margin: 10px 10px 0px 0px; width: 270px;&quot;&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=&quot;introTxt&quot; closure_uid_w0bolz=&quot;128&quot; id=&quot;print_div&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जिस सड़क के अगले चौराहे पर बाजार होता है, वह किधर से आती है, यह तो पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि वह हमारे बहुत करीब से गुजरती है। जब अन्ना हजारे हमारे भीतर के स्वप्न को संबोधित कर रहे थे, उसी वक्त एक दूसरे स्तर पर कुछ और भी घट रहा था। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name=&#39;more&#39;&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class=&quot;introTxt&quot; closure_uid_w0bolz=&quot;128&quot; id=&quot;print_div&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ना नामक विशालकाय वृक्ष के सहारे बाजार की बेल भी फल-फूल रही थी। देखा जाए तो बाजारवाद के फंडे ज्यादा जटिल नहीं हैं। मुनाफा बाजार की धुरी है। बाजार मुनाफे की भाषा बखूबी पहचानता है और जहां मुनाफा हो, बाजार की बयार भी उसी ओर बहती है। फिर भले वह क्रिकेट मैच हो, फिल्मी गीत हो या कोई अनशन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुआ यूं कि हाल ही में मेरी नजर चिप्स के एक विज्ञापन पर पड़ी। देश का युवा बारिश में भीगते हुए बदलाव लाने की बात कर रहा है और सबके हाथों में मोमबत्तियां हैं। इतने में हीरो चिप्स लेकर एक लड़की के पास जाता है और पूछता है : ‘कैंडल लाइट मार्च के बाद कैंडल लाइट डिनर पर चलें!’ चूंकि वह यह पूछते हुए लड़की को चिप्स ऑफर करता है, तो वह मना नहीं कर पाती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लब्बोलुआब यह कि बदलाव की बगावत के दौरान आप दिल भी लगा सकते हैं। ऐसा ही एक और वाकया देखने को मिला। जब अन्ना का अनशन चल रहा था, तब मेरे एक दोस्त के पास एक ई-मेल आया। शीर्षक था ‘आई एम अन्ना’। यह जुमला अब ‘गुड मॉर्निग’ और ‘हाऊ आर यू’ की तरह आम हो चला है, इसके बावजूद उसने मेल खोला। मेल का मसौदा कुछ इस तरह था : ‘देश में इस वक्त जो मुहिम चल रही है, आप उससे वाकिफ होंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस वक्त सच का साथ देना जरूरी है और सही को चुनना भी। सही जीवनसाथी चुनना भी बहुत अहम है। यदि आप सही जीवनसाथी चुनना चाहते हैं, तो फलां-फलां मैट्रिमोनी पर लॉग-इन करें।’ मजे की बात यह है कि खुद अन्ना ने भी नहीं सोचा होगा कि इस तरह उनके आंदोलन की एक मार्केट वैल्यू बनेगी और उसे भुनाने के लिए बाजार अपनी आस्तीनें चढ़ा लेगा। अन्ना टोपी का एक स्टाइल स्टेटमेंट बन जाना इसी की बानगी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि सिर्फ प्रोडक्ट मार्केटिंग के लिए ही इस आंदोलन का सहारा लिया गया। टीवी सीरियल्स भी पीछे नहीं थे। शरद जोशी की कहानियों पर आधारित एक धारावाहिक के एक सुपरिचित किरदार पिछले दिनों एक एपिसोड में अन्ना टोपी पहने नजर आए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है आंदोलन में भागीदारी करने का यह उनका अपना तरीका हो, लेकिन हमें तो यही लगा कि जिस तरह होली-दिवाली के मौके पर हमारे सीरियलों में भी त्योहार मनाए जाते हैं, ठीक उसी तरह इस आंदोलन के दौरान भी हमारे सीरियल उसी के रंग में रंग जाना चाहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलबत्ता इन तमाम गतिविधियों से ये फॉमरूले भी गढ़े जा सकते हैं कि एक अच्छा व्यापारी वही है, जो मौजूदा मुद्दों का रुख अपने प्रोडक्ट की ओर मोड़ना जानता हो और जिसे जनता की नब्ज पर हाथ रखना आता हो। जिसने जनता की नब्ज थाम ली, उसका हाथ जनता की जेब से भला कब तक दूर रह सकता है! हालांकि बाजार यह फॉमरूला जमाने से आजमाता आ रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें सबसे आगे हैं चॉकलेट कंपनियां, जो भारत में मीठे के मायने बदल देने को तत्पर हैं। चॉकलेट के विज्ञापनों का ही असर है कि इस बार राखी पर मुझे एक बहन भाई को मिठाई की जगह चॉकलेट खिलाती दिखाई दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनेक युवाओं को ‘डर के आगे जीत है’ का नारा भाया है। गुस्ताखियों का गुणगान करने वाले ऐसे नारे भला उन्हें क्यों न भाएंगे और अगर उन्हें भाएंगे तो बाजार द्वारा क्यों न भुनाए जाएंगे? बहरहाल, लगता तो यही है कि जब तक अन्ना की मशाल जलती रहेगी, बाजार भी अपनी खिचड़ी पकाता रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अच्छा व्यापारी वही है, जो मौजूदा मुद्दों का रुख अपने प्रोडक्ट की ओर मोड़ना जानता हो और जिसे जनता की नब्ज पर हाथ रखना आता हो। जिसने जनता की नब्ज थाम ली, उसका हाथ जनता की जेब से भला कब तक दूर रह सकता है!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=&quot;introTxt&quot; closure_uid_w0bolz=&quot;128&quot; id=&quot;print_div&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=&quot;introTxt&quot; closure_uid_w0bolz=&quot;128&quot; id=&quot;print_div&quot; style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;Source: शरबानी बैनर्जी &amp;nbsp; | &amp;nbsp; Last Updated 00:32(30/08/11)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/4018769225672854806/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/anna-his-cap.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/4018769225672854806'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/4018769225672854806'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/anna-his-cap.html' title='Anna &amp; his cap'/><author><name>Ravindra Sinha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12391603598676383419</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-ZTV8J6K9Z9Q/Tkj-dS4aU0I/AAAAAAAAAAQ/k3WKM5J0bik/s220/Ravindra%2BSinha.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-4074888502511914200</id><published>2011-08-26T22:52:00.000-07:00</published><updated>2011-08-26T22:52:20.266-07:00</updated><title type='text'>http://www.factandfigure.com/2011/08/maoist-violence-in-india-its-historical.html</title><content type='html'>&lt;a href=&quot;http://www.factandfigure.com/2011/08/maoist-violence-in-india-its-historical.html#.TliF8F32GTY.blogger&quot;&gt;http://www.factandfigure.com/2011/08/maoist-violence-in-india-its-historical.html&lt;/a&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/4074888502511914200/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/httpwwwfactandfigurecom201108maoist.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/4074888502511914200'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/4074888502511914200'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/httpwwwfactandfigurecom201108maoist.html' title='http://www.factandfigure.com/2011/08/maoist-violence-in-india-its-historical.html'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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href=&quot;http://seniorcitizensdg.blogspot.com/2011/08/blog-post_23.html&quot;&gt;senior citizens: राजनैतिक संतों की परंपरा&lt;/a&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/3347410700097507530/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/senior-citizens.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/3347410700097507530'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/3347410700097507530'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/senior-citizens.html' title='senior citizens: राजनैतिक संतों की परंपरा'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-7596964580309905414</id><published>2011-08-22T09:12:00.000-07:00</published><updated>2011-08-22T09:12:49.591-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हास्य-व्यंग्य"/><title type='text'>भ्रष्टपाल विधेयक भी लाने होगा</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&amp;nbsp;ये टीम अन्ना तो हाथ धोकर भ्रष्टाचार के पीछे पड़ गयी है. लगता है कि इसका नामो-निशान ही मिटाकर दम लेगी. कोई उन्हें समझाए कि भ्रष्टाचार हर किसी के वश की बात नहीं है. यह भी एक कला है जिसे लंबी साधना के बाद हासिल किया जाता है. कुछ लोगों ने तो अपना पूरा जीवन ही इसकी साधना में होम कर दिया है. अब जीवन के इस मुकाम पर आकर वे इसे छोड़ दें...यह उचित है..? अपनी जीवन भर की साधना को वे त्याग दें. यह मुनासिब है...? इस कला के माहिर कलाकार कोई अंतरिक्ष से नहीं आये हैं. वे भी इसी मुल्क के निवासी हैं. उनके भी कुछ मौलिक अधिकार हैं. &amp;nbsp;जिस तरह मानव का मानवाधिकार होता है उसी तरह भ्रष्टाचारियों का भी भ्रष्टाधिकार होता है. उसकी रक्षा की भी व्यवस्था होनी चाहिए. यह अलग बात है कि इस विधा के कलाकारों ने तांडव नृत्य की शैली अपना ली थी. यह उनकी गलती थी. उन्हें पॉप डांस तक सीमित रहना चाहिए था. लेकिन अब गलती हो ही गयी तो इसकी इतनी बड़ी सजा कि नामो-निशान ही मिटा दिया जाये. टीम अन्ना यह जान ले कि भ्रष्टाचार रक्तबीज की तरह होता है. आप उसका गला काट सकते हैं लेकिन उसके खून के हर बूंद से एक नया भ्रष्ट पैदा होने से नहीं रोक सकते. वो तो कपील जी, दिग्विजय जी, चिदंबरम जी, मनीष जी मामले को टेकल नहीं कर पाए और हवा को आंधी बना दिया. हमारी महारानी भी बीमार पड़ गयीं वरना सदाचारियों की हर मुहीम का माकूल जवाब दिया जाता. खैर टीम अन्ना के कहने पर तो नहीं लेकिन जनता की भावनाओं का आदर करते हुए जनलोकपाल विधेयक पारित करा दिया जायेगा लेकिन हमारी भी एक शर्त होगी. इसके साथ ही एक भ्रष्टपाल विधेयक भी लाने होगा. उनके अधिकारों की रक्षा भी करनी होगी. इसमें एक चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक की सुरक्षा की व्यवस्था रहेगी. एकतरफा कानून बनाना कहां का न्याय है..? यह कोई प्रजातंत्र नहीं होगा. टीम अन्ना इस शर्त को मानने के लिए तैयार हो फटाफट समझौता हो जायेगा. तुम्हारी भी जय-जय..हमारी भी जय-जय...न तुम हारे न हम हारे. &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/7596964580309905414/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/blog-post_22.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/7596964580309905414'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/7596964580309905414'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/blog-post_22.html' title='भ्रष्टपाल विधेयक भी लाने होगा'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-7086116925055331175</id><published>2011-08-17T10:39:00.001-07:00</published><updated>2011-08-17T11:23:59.063-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="टिप्पणी"/><title type='text'>मसखरे हीरो नहीं बन सकते</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;यह एक ध्रुव सत्य है कि हीरो मसखरी कर सकता है लेकिन मसखरे हीरो नहीं बन सकते. ठीक उसी तरह जिन्हें राजनीति की समझ नहीं हो, जो स्थितियों को सही आकलन नहीं कर सकते वे तानाशाह नहीं बन सकते. अन्ना के आंदोलन के साथ मनमोहन सरकार ने इंदिरा गांधी के अंदाज में निपटने का प्रयास किया और अपनी भद पिटा ली. अन्ना को गिरफ़्तारी और जेल का भय दिखने की कोशिश की. उनकी टीम के लोगों को तिहाड़ जेल भेज कर उनके आंदोलन को नेत्रित्वविहीन &amp;nbsp; करने की कोशिश की लेकिन देश भर में ऐसा जन सैलाब उमड़ा की सरकार के पसीने छूट गए. सात दिन की न्यायिक हिरासत की व्यवस्था की और शाम होते-होते उनको जेल से बाहर आने के लिए मिन्नतें करने लगे. एक-एक कर उनकी तमाम शर्तें स्वीकार करनी पड़ी. प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह तक अपरिपक्व बयान जारी कर आलोचना के पात्र बने. गृह मंत्री को अपनी यू टर्न लेना पड़ा. कांग्रेस के मुताबिक उसका विरोध उसकी शर्तों के आधार पर करना चाहिए. इसकी अनुमति लेकर. कांग्रेस की इस पीढ़ी को यह बात समझ में नहीं आती कि विरोध अनुमति लेकर नहीं किया जाता. अन्ना गांधीवादी और अहिंसक तथा शांतिपूर्ण आंदोलन के पक्षधर हैं इसलिए अनशन के लिए जगह देने की गुजारिश की वरना क्या माओवादियों ने कभी सरकार के पास आवेदन दिया कि वे रेल की पटरी उड़ना चाहते हैं कृपया इसकी अनुमति प्रदान की जाये. या वे पुलिस वाहन को लैंडमाइन विस्फोट कर उड़ना चाहते हैं इसकी अनुमति दी जाये. कानून के दायरे में रहकर यदि कोई शांतिपूर्ण विरोध करना चाहता है तो उसपर दमनचक्र चलाना या उसपर शर्तें लादना यह बतलाता है कि सरकार गांधी की भाषा सुनने को तैयार नहीं माओ की भाषा में बोलो तो कोई समस्या नहीं. जेपी आंदोलन के बाद बोध गया महंथ के विरुद्ध संघर्ष वाहिनी के अहिंसक वर्ग संघर्ष को भी इसी तरह कुचला गया था जिसका नतीजा बाद के वर्षों में हिंसक आंदोलनों में अप्रत्याशित वृद्धि के रूप में सामने आया और देश आजतक माओवादी और आतंकवादी हिंसा के रूप में झेल रहा है. मनमोहन सिंह जी की पूरी मंडली इस बात को नहीं समझ रही है कि इस मुद्दे को यदि अन्ना की जगह किसी हिंसक संगठन ने लपक लिया और उसे ऐसा जन समर्थन मिल गया तो क्या होगा. क्या दिल्ली पुलिस या भारतीय पुलिस उसे संभल सकेगी. दुर्भाग्य है कि देश की ऐसे अपरिपक्व और नासमझ लोगों के हाथ में है और अगले चुनाव तक इसे झेलना जनता की मजबूरी है. आज देश का बच्चा समझ रहा है कि किसके विदेशी बैंक खाते को बचाने के लिए देश की प्रतिष्ठा और एक एक गौरवपूर्ण पृष्ठभूमि वाली पार्टी की गरिमा को दावं पर लगाया जा रहा है. कहीं यह व्यक्तिगत निष्ठां पूरे संगठन की ताबूत में आखिरी कील न बन जाये. इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----देवेंद्र गौतम &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/7086116925055331175/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/blog-post_17.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/7086116925055331175'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/7086116925055331175'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/blog-post_17.html' title='मसखरे हीरो नहीं बन सकते'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh4.googleusercontent.com/-YkJpT0iiPCE/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAA2Y/QPBNg4yNjS0/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6810266099797274452.post-2217394931457780175</id><published>2011-08-09T07:04:00.000-07:00</published><updated>2011-08-09T07:11:34.838-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विडंबना"/><title type='text'>खैरात बांटो और राज करो</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;अंग्रेजों ने एक नीति बनायीं थी बांटो और राज करो. आजाद भारत की सरकारों ने उसमें थोड़ी तब्दीली की है. इनकी नीति है-खैरात बांटो और राज करो. मैं पूछूंगा-खैरात बांटकर राहत पहुंचाई जा सकती है लेकिन इसके जरिये&amp;nbsp;गरीबी दूर की जा सकती है क्या...? आप कहेंगे नहीं... लेकिन सरकारी तंत्र कहेगा हां! खौफ यह है कि&amp;nbsp;गरीब जनता आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो जाएगी तो नेताओं की सूरत और सीरत को समझने लगेगी. यही भय और यही मानसिकता गरीबी का उन्मूलन में बाधक है. प्राकृतिक संपदा के दृष्टिकोण से झारखंड देश का सबसे समृद्ध राज्य है. यहां आदिवासियों के &amp;nbsp;हितों की रक्षा के नाम पर मुख्यमंत्री पद अघोषित रूप से जनजातियों के लिए आरक्षित रहा है. लेकिन राज्य गठन के एक दशक बाद नेता घोटालों के जरिये अरबपति बन गए जनता वहीं की वहीं रही.&amp;nbsp;अभी हाल में योजना&amp;nbsp;आयोग&amp;nbsp;ने राज्य के 24  जिलों में 14  को देश के अति गरीब जिलों में सूचीबद्ध किया है. झारखंड सरकार के लिए यह आत्ममंथन का विषय था. लेकिन ऊपर से निर्देश आया कि वहां बड़े पैमाने पर अतिरिक्त अनाज का वितरण किया जाये. ये अधिकांश जिले जनजातीय बहुल हैं. इनमें सिंहभूम जिला भी शामिल है जहां लौह और स्वर्ण अयस्क का विशाल भंडार है. जहां पूर्व मुख्य मंत्री मधु कोड़ा के कार्यकाल में चार हज़ार करोड़ का माइंस आवंटन घोटाला उजागर&amp;nbsp;हुआ. झारखंड सरकार या विपक्ष के किसी नेता ने यह सवाल नहीं उठाया कि&amp;nbsp;यह स्थिति क्यों है और उन जिलों के लोगों के आर्थिक उत्थान के लिए कौन सी रणनीति अपनाई जाएगी. बिचौलियों को कैसे किनारे किया जायेगा और रोजगार परक&amp;nbsp;योजनाओं का लाभ आम जनता तक पहुंचाने का क्या उपाय किया जायेगा. बस खैरात बांटो और चुनाव के समय अपने अहसान गिनाकर वोट बटोर लो. यही सत्ता सुख प्राप्त करने का बीजमंत्र है. मध्यम वर्ग पर महंगाई का बोझ डालो और गरीबों को खैरात देते रहो. उसे अपने पैरों पर खड़ा मत होने दो सत्ता पर पकड़ बनी रहेगी. नागनाथ गए तो सांपनाथ आयेंगे. मानव जाति को सत्ता से दूर रखो. यह राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;-----देवेंद्र गौतम&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/feeds/2217394931457780175/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/blog-post_09.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/2217394931457780175'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6810266099797274452/posts/default/2217394931457780175'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ghazalganga-ghazalganga.blogspot.com/2011/08/blog-post_09.html' title='खैरात बांटो और राज करो'/><author><name>devendra gautam</name><uri>https://plus.google.com/109110349721687761048</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' 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