23.2.21

मित्र -११

छात्रावास में किसी को एक दूसरे के बारे में यह ज्ञात नहीं था कि कौन धनाड्य परिवार से है, कौन मध्यमवर्गीय है और कौन आर्थिक कठिनाईयों के बीच पढ़ने भेजा गया है। सबका एक जैसा रहन सहन था, विद्यालय का वेष, छात्रावास में सीमित कपड़े, धन रखने की मनाही, खाने का सामान रखने की मनाही, घड़ी आदि उपकरणों पर रोक और ऐसे ही एकरूपता के नियम। वैसे भी बचपन में ये बातें विचार का अंग नहीं होती हैं। 

जिसके पास कुछ खाने का रहता था, वही छात्रावास में सबसे धनी समझा जाता था। यद्यपि सबके घर से सबके लिये आता था और हम सब मित्र उसे यथासंभव बाँटते भी थे, पर कईयों में अपने लिये बचा लेने की या कुछ आया भी है, यह न बताने की प्रवृत्ति होती थी। सामान रखने के लिये एक बक्सा होता था और अल्मारी में एक भाग। अल्मारी क्योंकि दिन में कई बार खुलती थी और कई बार साझा रहती थी, उसमें खाने का समान छिपाने की संभावना नगण्य थी। ऐसा धन केवल बक्से में ही रखा जा सकता था जो कि दीवार और तख्त के बीच में रखा रहता था। खाने के सामान में नैसर्गिक सुगन्ध सी रहती है, उसको बाहर न आने देने के लिये या तो एक और डब्बे में या थैलों में लपेट कर वह सामान रखा जाता था। बक्से में ताला लगा रहता था और चाभी स्वामी के पास या तकिया के नीचे। 

जब एक कमरे में ९ मित्र रहते हों तो एकान्त कहाँ मिल पाता है। घर से पूरा आया हुआ एक दिन में खाया भी नहीं जा सकता है। कई बार तो अपने मित्रों के लिये भेजा गया हिस्सा भी स्वयं ही खा जाने के लिये लोभ बना रहता था, ऐसी स्थिति में तो कई सप्ताह वह खाने का सामान चलता था। कई बार कम अवसर मिलने के कारण या कई दिनों तक रस लेकर खाने के क्रम में खाने के सामान में थोड़ी महक आ जाती थी। ऐसी स्थिति में या तो रहस्य का उद्घाटन हो जाता था या मित्रों में स्वतः ही बाँटकर पुण्य और यश ले लिया जाता था। यदि खाने के सामान में विकार नहीं आया है तो वह कब तक चलाया जायेगा, यह तथ्य तो विधि को भी पता नहीं रहता था। 

घर से आया हुआ सामान चुपके चुपके खाने के लिये बस तीन ही समय मिलते थे। पहला जिस समय कक्षायें चल रही हों। हमारा विद्यालय नीचे के तल में था और छात्रावास प्रथम तल में था। विद्यालय आने के बाद समाप्ति तक छात्रावास जाने की अनुमति नहीं थी और बहुधा कक्षप्रमुख का दायित्व रहता था कि ताला लगाया जाये। यदि कभी ताला नहीं लगाया गया या चाभी मिल गयी तो भी सीढियों के पास प्रधानाचार्यजी का कार्यालय या भोजनालय होने के कारण इस प्रयास में पकड़े जाने की संभावना बनी रहती थी। फिर भी कुछ योद्धा कक्ष में जाकर खा आते थे। 

दूसरा समय मिलता था सुबह पाँच बजे के पहले, जब सब सो रहे होते थे। बिना मंजन के कुछ खाना उतना रुचिकर नहीं होता है और ब्रह्ममुहूर्त में इतनी भूख भी नहीं लगती है। इस पर भी कुछ छात्र “आज करे सो अब” के सिद्धान्त का पालन करते हुये इसी शुभकार्य से दिन का प्रारम्भ करते थे। तीसरा समय मिलता था, रात को दस बजे के बाद, जिस समय लाइट बन्द कर दी जाती थी। यह समय मनोविज्ञान की दृष्टि से सर्वाधिक उपयुक्त था क्योंकि रात के समय ही घर की सबसे अधिक याद आती थी और जब घर की याद आये तो दुख कम करने के लिये घर से आये पकवान खाने से अच्छा और क्या उपाय हो सकता है। 

दूसरे और तीसरे समय में एक विशेष सावधानी की आवश्यकता होती थी। बिस्तर से उठना, चाभी से ताला खोलना, डब्बा या थैला खोलना, सामान निकालना, वहीं बैठे बैठे खाना, तब सब एक एक करके बन्द करना, तब कक्ष के बाहर जाकर पानी पीकर आना और पुनः चद्दर या रजाई ओढ़कर सो जाना। देखने में यह बड़ा स्पष्ट सा क्रम लगता है पर इसमें तीन परिस्थितियाँ इसे विश्व का जटिलतम कार्य बना देती हैं। पहला तो आपको यह निश्चिन्त होना होता है कि कक्ष में सभी मित्र सो चुके हैं। देखा जाये तो यह सर्वाधिक कठिन कार्य है, धैर्य की सीमा। चद्दर ओढ़े जगते रहना और प्रतीक्षा करना कि सब सो गये हैं, इसके लिये ध्यान से भी अधिक एकाग्रता चाहिये। साथ ही यह भी ध्यान रखना पड़ता है, विशेषकर बगल वालों से कि वे आपको सोने का बहाना करते हुये पकड़ न लें। कई बार तो ऐसा हुआ ही होगा कि प्रतीक्षा में स्वयं ही निद्रा आ गयी होगी, शिकारी ही शिकार हो गया हो मानो।

दूसरी स्थिति है कि आपको उपरोक्त सारे कार्य अँधेरे में करने होते हैं। आपका मानसिक अभ्यास इस स्तर का होना चाहिये कि आप सबकी स्थिति की कल्पना आँख बन्द करके कर लें। आपके हाथ इतने अभ्यस्त होने चाहिये कि अँधेरे में ताले में चाभी डाल सकें, डब्बा खोल सकें। पैर बिना किसी से टकराये कक्ष के बाहर जा सके औऱ पानी पीकर बिना किसी को पता लगे वापस आ जाये। तीसरी स्थिति यह कि आपको यह सारा कार्य बिना किसी ध्वनि के करना है, कुशलता की पराकष्ठा है यह, अभ्यास का चरम है यह।

कई बार ऐसा हुआ ही होगा कि किसी पड़ोसी का पता चल गया होगा। ऐसी स्थिति में उससे समझौता करने की कला। बड़े बड़े देश यदि सीख लें तो यह विश्वशान्ति का हेतु बन सकता है। यदि समझौता हो गया तो आने वाली रात दोनों के द्वारा मिलकर प्रतीक्षा करने का क्रम। सर्वाधिक विनोदपूर्ण घटना अनुराग ने बतायी। एक मित्र ने इस तरह खाते हुये रात में देख लिया। समझौता करने के स्थान पर अगले दिन चाभी पार करके पूरा का पूरा खाने का सामान ही पार कर दिया। इस बात की केवल कल्पना ही की जा सकती है कि किसी का पूरा धन लुट गया हो और वह असहाय हो किसी से कह भी नहीं सकता, परिवाद भी नहीं कर सकता कि उसके साथ क्या हुआ? यदि करे तो कुटाई उसकी भी होती कि नियमों का उल्लंघन कैसे किया?

एक स्पष्टीकरण। घटनाओं से मेरा संबंध केवल दृष्टा का है, चुपके से खाने वाले और उसको उतने ही चुपके से पार करने वाले, दोनों ही मेरे मित्र हैं।

20.2.21

मित्र - १०

अभी कुछ दिन पहले एक व्याख्यान दे रहा था, वर्तमान परिदृश्य में खान पान में आये बदलाव के संबंध में। विषय बड़ा ही रोचक था और उससे भी रोचक उस पर परिचर्चा हुयी। किस प्रकार बाहर जाकर खाने की बाध्यता समाप्त होती जा रही है, खाद्य सीधे घर पहुँच रहा है, एप्प के माध्यम से। धीरे धीरे भीड़भाड़ वाले, मँहगे या अधिक किराये वाले स्थानों से खानपान व्यवसाय छोटे स्थानों पर और कालान्तर में ग्राहकों के और पास सरक जायेगा। मँहगे बर्तन और सहायकों का भी व्यय बचेगा, लाभ भी अधिक मिलेगा, उत्पाद की लागत कम आयेगी, प्रतियोगिता बढ़ेगी। एप्प बनाने वालों के लिये खानपान संबंधी प्राथमिकताओं और रुचियों का जो सूचना भण्डार आयेगा वह भविष्य में किसी भी व्यवसाय को स्थापित करने और स्थापित व्यवसायों को और भी प्रभावी बनाने में अत्यन्त सहायक होगा। 

खानपान व्यवसाय व्यक्ति पर केन्द्रित होता जा रहा है, व्यक्ति की रूचियों के अनुसार उत्पादन में सक्षम। रूचियाँ केवल स्वाद पर ही केन्द्रित नहीं हैं वरन स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है। जागरूक उपभोक्ता बिना उर्वरक या बिना कीटनाशक के खाद्यान्नों को वरीयता दे रहे हैं, भले ही उसके लिये व्यय अधिक करना पड़ता हो। पहली बार इस तरह की सब्जियाँ बंगलुरु में खायीं थी जब एक शुभचिन्तक मना करने के बाद भी एक टोकरी दे गये थे। स्वाद और स्वास्थ्य, दोनों ही दृष्टि से उत्तम। 

आयुर्वेद भी हर व्यक्ति को उसकी प्रकृति के अनुसार ही भोजन करने को कहता है। यद्यपि भारतीय रसोई में स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त मसाले आयुर्वेदिक औषधियाँ हैं, वर्तमान पीढ़ी उसे अपनी पाककला में प्रयुक्त करना भूल चुकी है। देखा जाये तो परिवार के हर सदस्य का स्वास्थ्य एक विशेष प्रकार का भोजन करने से ही संवर्धित होगा। सबके लिये एक सा भोजन तो तभी हो जब सबकी प्रकृति एक सी हो और भोजन उस प्रकृति के अनुसार ही बना हो। मैं एक ऐसा भविष्य देखता हूँ जिसमें आयुर्वेद की वृहद स्वीकार्यता उद्यमियों को एक ऐसा तन्त्र बनाने के लिये प्रेरित करेगी जिसमें सबको एप्प के माध्यम से उसके स्वाद, स्वास्थ्य और प्रकृति के अनुसार भोजन पहुँचाया जा सके। साथ ही साथ परिवार भी इस प्रकार की रसोई चलायेंगे जिसमें इन सबका ध्यान रखा जा सके। 

इस परिप्रेक्ष्य में तब सामूहिक भोजन व्यवस्था का स्वरूप कैसा हो? जहाँ एक साथ सैकड़ों का भोजन बन रहा हो उसमें किस प्रकार के व्यंजन हों, किस प्रकार के अवयव हों, आधारभूत खाद्य हों या विशेष का संमिश्रण हो, पहले से पका हो या तात्कालिक पकाया जाये? 

रेलवे में ड्राइवर, गार्ड, टिकट स्टाफ जब भी अपनी ट्रेन लेकर दूसरे स्टेशन पर जाते हैं तो वे जहाँ विश्राम करने के लिये रुकते हैं उसे रनिंग रूम कहा जाता है। वहाँ पर भोजन की व्यवस्था रहती है। पहले के समय में सभी अपना राशन, मसाले, तेल आदि लेकर जाते थे और वहाँ के रसोईये को दे देते थे। साथ ही निर्देशित भी करते थे कि कैसा भोजन बनाना है, किन विशेष बातों का ध्यान रखना है। कुछ कर्मचारी तो अपने सामने बनवाते थे। धीरे धीरे ट्रेनें बढ़ीं, अधिक रसोईये लगने लगे, क्रम आने में समय लगने लगा। जो कर्मचारी घर से राशन नहीं ला पाते थे, रनिंग रूम आकर बाहर के हाट में लेने जाते थे। कुछ तरकारी आदि ताजा लेने जाते थे। कुछ मिलाकर बहुत चहल पहल रहती थी। इन कार्यक्रमों में जो विश्राम वाला पक्ष होता था और जिसके ऊपर संरक्षा निर्भर करती थी, वह उपेक्षित रह जाता था। विश्लेषण किये गये और अब एक ही तरह का खाना बनाकर रखा जाता है। साथ में पुरानी व्यवस्था भी चलने दी गयी। लगभग ८५ प्रतिशत से अधिक कर्मचारी नयी व्यवस्था में रम गये हैं। 

निरीक्षणों के समय यह चर्चा बहुत बार आयी है कि किस तरह का भोजन हो, क्या हो उस भोजन में, सादा रखें या गरिष्ठ रखें? जो भोजन बनायें या परोसें, उनको किस प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाये। रेलवे में यह पक्ष सीधा सीधा संरक्षा से जुड़ा माना जाता है। किसी को भोजन करके विश्राम करना है, किसी को भोजन करके ट्रेन चलानी है। वैसे तो कर्मचारी इस बात का स्वयं ही विशेष ध्यान रखते हैं पर भोजन भरपेट नहीं किया जा सकता है क्योंकि उससे झपकी आने की संभावना है। भोजन अधिक मसाले वाला या तेल वाला भी नहीं दिया जा सकता है क्योंकि वह भी मानवीय दक्षता को प्रभावित करता है। 

रेलवे के रनिंग कर्मचारियों को तो वापस आने पर परिवार के साथ बैठकर घर का भोजन मिल जाता है, छात्रावास में तो उसी भोजनालय का भोजन बार बार खाना होता है। अपने विद्यालय के छात्रावास का, आईआईटी का, रेलवे के प्रशिक्षण संस्थानों का, रेलवे के रनिंग रूमों का, रेलवे कैन्टीनों का, टिफिन सेवा का, नियमित होटलों का, सबका भोजन कभी न कभी किया है। कोई भोजन ऐसा लगा ही नहीं कि जिसमें मन रम जाये, कुछ भोजन खाये जा सके कुछ निभाये जा सके, कुछ न खाये जा सके और न निभाये जा सके। जब कभी भी उनको स्वादिष्ट बनाने के प्रयास किये गये, वे जीभ में और शरीर में और भी कड़वाहट घोल गये। 

हाँ, भोजन सर्वाधिक सुग्राह्य तब लगा जब प्रशिक्षण के समय सायं को तैराकी करके या बैडमिण्टन खेलकर या दौड़कर शरीर को इतना थका दिया कि भोजन का स्वाद जानने की सुध ही नहीं रही। जब क्षुधा जागती है, सब अच्छा लगने लगता है। छात्रावास में रहकर पढ़ने वाले तो स्वयं को खेल में थका भी नहीं सकते हैं, यदि ऐसा करेंगे तो पढ़ेंगे कब। मोबाइल पीढ़ी के लिये तो यही छात्रावास और भी कठिन समय देंगे, बाहर जाकर खेलने की अभिरुचि जो सुप्तप्राय है। 

लंगर और अक्षयपात्र का प्रसाद कई बार प्राप्त किया है। सादा आहार भी कितना अच्छा लगता है, खिचड़ी भी कितना तृप्ति दे जाती है, पर हर दिन ईश्वर की कृपा कहाँ मिलती है? एप्प से आने वाला भोजन स्वाद बदलने के लिये तो अच्छा है पर नियमित लेना न पेट के लिये अच्छा है और न जेब के लिये। ले दे कर घर के खाने पर पूर्ण निर्भरता है और यह बात श्रीमतीजी को भलीभाँति ज्ञात भी है।

16.2.21

मित्र - ९

अभी कुछ दिन पहले प्रातः टहलते समय ठंड लग गयी। शीत के प्रभाव से उदर विकार हुआ और एक दिन घर पर ही विश्राम करना पड़ा, अगले दिन सब सामान्य हो गया। कुछ मित्रों के फोन आये थे जिनका उत्तर नहीं दे पाया था। एक मित्र अशोक को वापस फोन कर अन्य बातों के साथ अस्वस्थता का कारण बताया तो बोले कि प्रवीण भाई आप बहुत कोमल हो, तनिक में ठंड लग जाती है और तनिक में पेट अस्त व्यस्त हो जाता है। अशोक पुणे में रहते हैं, स्वयं अत्यन्त प्रसन्न रहते हैं और वातावरण को भी जीवन्त रखते हैं। यद्यपि मित्रों का अधिकार होता है आपके हित अहित में हस्तक्षेप करने का पर इस ‘कोमल’ वाले निर्णय पर मन विद्रोह कर बैठा। 

ठंड के क्षेत्र में पुणे और लखनऊ की कोई तुलना ही नहीं है। जब हम जैकेट और कनटोपा पहन बतिया रहे होते हैं तो अशोक टीशर्ट में पंखा चलाकर बैठे होते हैं। ऐसी कँपकपाती सुबह में तो कोई “कठोर” एक इंच भी शरीर खुला छोड़ देगा तो ठंड खा जायेगा। अब फरवरी में ठंड उतरने के समय इतनी ठंड बढ़ जाये तो भूल हो जाना स्वाभाविक ही है। पर ठंड का पेट पर इतना त्वरित प्रभाव पड़ जाये तब तो पेट संवेदनशील कहा जायेगा। वार्ता में केवल इस तथ्य को अपने निर्णय का आधार बनाये अशोक से जब एक प्रश्न पूछा तो संभवतः उनका दृष्टिकोण कुछ कोमल हुआ। 

प्रश्न सरल था कि आप कितने वर्ष घर का भोजन नहीं किये हो? अशोक कानपुर में नियमित घर से विद्यालय आते थे और जब कानपुर से पुणे जाकर कार्य प्रारम्भ किया तो एक वर्ष में उनका विवाह हो गया। उस एक वर्ष में भी कई सप्ताहान्त उन्होने अपने संबंधियों के घर भोजन किया था। अब जिन्हें जीवन भर घर के भोजन का सुख मिला हो उनका उदर स्थिर होना स्वाभाविक ही है। १७ वर्ष बाहर का भोजन करते रहने से मेरे उदर में कई दुर्बलतायें उत्पन्न हो गयीं। बाहर का खा कर स्वाद तो भूला ही, उदर की जठराग्नि पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अब शरीर पर कोई भी विकार आये, पहला प्रभाव उदर पर पड़ता है। 

घर का भोजन स्वादिष्ट होता है, पौष्टिक होता है और शरीर व मन को स्फूर्त रखता है। कितना भी ध्यान रखा जाये, भोजनालय के यह तीनों पक्ष पंगु होते हैं। सब्जी व अन्न खरीदने में धन बचाने की प्रवृत्ति, भोजन बनाते समय स्वच्छता का आग्रह न होना और भोजन बनाने वालों की मनःस्थिति, इन तीनों कारणों से भोजनालय के भोजन की गुणवत्ता कभी उत्कृष्ट नहीं हो पाती। जिस भावना में भोजन बनता है वह भावना अपना प्रभाव डालती है। जिस समर्पण से भोजन बनाने की पूरी प्रक्रिया की जाती है, उसी स्तर का स्वाद, पौष्टिकता और स्फूर्ति शरीर में आती है। 

मेरे विद्यालय के छात्रावास में स्थितियाँ इतनी निराशापूर्ण नहीं थीं। इन क्षेत्रों पर सबका विशेष ध्यान रहता था। जो भी भोजनालय प्रमुख नियुक्त होते थे, उनका यह प्रयास रहता था कि भोजन उत्तम दिया जाये। स्वयं सुबह सब्जी लेने जाना, अन्नादि को सुरक्षित व स्वच्छ वातावरण में रखना, पकाने के स्थान की सफाई करवाना, भोजन बनते समय स्वयं उपस्थित रहना और अपने सामने ही वितरण कराना। इन सबमें किसी ढील की संभावना नहीं थी क्योंकि प्रधानाचार्यजी भी वही भोजन करते थे। इन सब कार्यों में स्वयं लगे रहने के बाद भी भोजनालय के भोजन में वह बात नहीं आ पाती थी जो घर के खाने में आती है। 

आईआईटी में भोजन का स्तर विद्यालय के स्तर से कहीं कम था। एक छात्रावास में ३०० से भी अधिक का भोजन बनाने में न स्वाद आता था और न ही पौष्टिकता। एक कैन्टीन होती थी जो कि बहुत चलती थी, माह के प्रारम्भ में नगद से और माह के अन्त में उधार से। उन्ही दोनों स्थानों पर भोजन बदल बदल कर अच्छा खाने का भ्रम पालते रहते थे हम सब। 

इस बीच में दो कालखण्ड बड़े कष्टकर बीते जब कोई भोजनालय भी नहीं था। पहला १२वीं के बाद एक वर्ष आईआईटी की तैयारी घर से बाहर रहकर की थी। अनियमित भोजन, कई बार होटल में, कई बार स्वयं बनाने का प्रयत्न। उस समय तो अपने छात्रावास के भोजनालय की स्मृतियाँ सुखद लगने लगी थीं। दूसरा रहा आईआईटी के बाद जब बंगलुरु में नौकरी करने गये। उसका वृत्तान्त फिर कभी पर वहाँ पर भोजन को लेकर जो अनुभव हुये उसकी तुलना में विगत सब कुछ अच्छा लगने लगा। 

भोजन के संबंध में १७ वर्ष का कठिन छात्रावासीय अनुभव डीएनए का अभिन्न अंग बन गया है। छात्रावासियों के लिये तो भोजन के संबंध में न तो कठोर हृदय होता है और न ही कठोर उदर।

13.2.21

मित्र - ८

कहते हैं कि यदि ठीक से उगाया न हो, ठीक से पकाया न हो, ठीक से चबाया न हो, ठीक से खाया न हो और ठीक से पचाया न हो तो भोजन अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाता है। यहाँ तक तो ठीक है पर यदि हम छात्रावासियों के द्वारा भोजन के बारे में ठीक से बताया न जाये तो वह व्यतिक्रम कर दुष्प्रभाव छोड़ जाता है। ठीक वैसी ही स्थिति जैसे किसी कवि सम्मेलन में बड़े कवि को बोलने का अवसर न मिलने पर हो जाती है। यदि भोजन की बात चलती है तो उसमें छात्रावासियों का अनुभव के आधार पर चर्चा करने का प्रथम अधिकार है। कारण यह कि हमारे लिये भोजन एक अत्यन्त भावनात्मक विषय है। दो घटनाओं से इस तत्व को समझना और भी सरल हो जायेगा। 


पहली घटना पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय अब्दुल कलाम की है और दूसरी मेरे एक मित्र की। अपनी आत्मकथा में कलाम बताते हैं कि एक बार दिन भर की थकान के कारण उनकी माँ से रात के खाने में जो रोटी सिकीं, वो थोड़ा जल गयी थीं। उनके पिता ने बिना किसी प्रतिक्रिया के भोजन किया और माँ के द्वारा अपनी भूल इंगित करने पर भी कहा कि भोजन स्वादिष्ट था। जब कलाम ने अपने पिताजी से पूछा कि आपने जली रोटी पर माँ को कुछ क्यों नहीं कहा? पिता का उत्तर था कि जली रोटी उतना कष्ट नहीं देती जितना कठोर शब्द देते। 


दूसरी घटना आईआईटी के भोजनालय की है। वहाँ जब भी कुछ विशेष बनता था तो सीमित मात्रा में मिलता था। भरे हुये शिमलामिर्च बने थे जो मेरे एक मित्र को अत्यन्त प्रिय थे। जब उसने एक अतिरिक्त के लिये आग्रह किया तो कर्मचारी ने मनाकर दिया। क्रोध और आवेश के अतिरेक में मेरे मित्र ने मिला हुआ शिमलामिर्च भी क्रिकेट की बाल की तरह सामने वाली दीवार पर फेंक कर मारा। पूरे भोजनालय को पार करता हुआ शिमलामिर्च का हरा आवरण और भरे हुये पीले आलू दीवार पर छप गये थे। 


दोनों ही घटनायें अपवाद की श्रेणी में आती हैं। मेरा मन्तव्य इन घटनाओं का विश्लेषण करना या उनसे शिक्षा ग्रहण करना नहीं है वरन एक छात्रावासी के लिये इन दोनों घटनाओं के साधर्म्य और वैधर्म्य को दिखाना है। इन्हीं परिस्थितियों में छात्रावासी की क्या भिन्न प्रतिक्रिया होती है या इन्हीं प्रतिक्रियाओं में छात्रावासी के लिये क्या भिन्न कारण होते हैं। कारण और प्रतिक्रिया से साधर्म्य और वैधर्म्य। 


वैवाहिक जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में श्रीमतीजी हमसे इस बात को लेकर खिन्न रहती थीं कि भोजन करने के बाद हम उसके बारे में कुछ कहते नहीं थे। कोई प्रतिक्रिया नहीं, या कुछ पूछा जाये तो अच्छा है, बस इतना ही। कालान्तर में उन्होंने भी समझ लिया कि यदि दो रोटी अधिक खा गये तो भोजन बहुत स्वादिष्ट बना है। भोजन जब स्तरीय नहीं बन पाता था या कुछ भूल हो जाती थी तब भी पहली बार में लिया हुआ पूरा भोजन ग्रहण कर ही उठना होता था। थाली में कुछ भी शेष छोड़ना भारतीय संस्कृति में असभ्यता की श्रेणी में आता है अतः श्रीमतीजी को कभी यह पता ही नहीं चला कि हम उनको कष्ट नहीं पहुँचाना चाहते हैं या संस्कृति की अवहेलना नहीं करना चाहते हैं। यह तथ्य बहुत वर्षों बाद, बहुत भूलों पर बार बार तटस्थ रहने के बाद और भावनात्मक रूप से बहुत कुरदेने के बाद ही उद्घाटित हो पाया कि भोजन न छोड़ने में या कुछ कटु न बोलने में उपरोक्त ये दोनों ही कारण नहीं थे। 


माँ के हाथ का नियमित रूप से भोजन दस वर्ष में ही छूट गया था। उसके १७ वर्ष बाद श्रीमतीजी का जीवन में पदार्पण हुआ। बीच का कालखण्ड भोजन की दृष्टि से ईश्वरीय कृपा पर आश्रित रहा। भिन्न भिन्न भोजनालयों में जैसा मिला, जितना मिला, जब मिला, स्वीकार किया, निर्विकल्प हो। महेन्द्र बता रहे थे कि भोजन का स्तर ठीक नहीं होने के कारण कई बार वह आधा पेट ही खा पाते थे। उनका छात्रावास में आगमन हम लोगों के कुछ वर्षों बाद हुआ, संभवतः तब तक उन्हें क्षुधा साधने का तनिक अभ्यास हो गया होगा। मेरा पूरा विश्वास है कि यदि प्रारम्भ से हमारे साथ रहते तो उनके पेट को कभी अर्धतृप्त नहीं रहना पड़ता। हाँ यदि सौभाग्यवश पिछला भोजन स्वादिष्ट रहा और उदरस्थ हो हमने खाया तो वर्तमान में कम खाकर भी कार्य चलाया जा सका। पर इस तरह के अवसर महीने में एक या दो बार से अधिक कभी नहीं रहे। 


इतने वर्षों तक बाहर का भोजन करते रहने से जीवन में तीन अन्तर आये। पहला घर के भोजन से स्नेह बढ़ गया और होटल आदि के भोजन से वितृष्णा। जब श्रीमतीजी उलाहना देती थीं कि आप कृपण हैं और पैसे बचाने के लिये बाहर खाने नहीं जाते हैं, तो वह आंशिक रूप से असत्य होती थीं। दूसरा अन्तर यह आया कि जब भी जितना भोजन प्राप्त हुआ ईश्वर का प्रसाद मान कर ग्रहण किया। यदि पता नहीं हो कि अगला भोजन कब मिलेगा और वह खाने योग्य होगा कि नहीं, स्वादिष्ट होगा कि नहीं, तब कुछ भी अग्राह्य नहीं रह जाता है। भोजन ही नहीं वरन चाय तक को मना न करने का स्वभाव सा बन गया। तीसरा अन्तर यह कि स्वाद के ऊपर नियन्त्रण सा हो गया। देखा जाये तो भोजन का कालखण्ड जीभ में कुछ क्षणों के लिये ही होता है। दार्शनिक रूप से इस तथ्य को समझ लेने से कम या अधिक नमक, मसाला या तेल जीवन में क्या अर्थ रखता है? 


इस परिप्रेक्ष्य में देखने से पहली घटना के प्रतिक्रियाहीन पति होने के बाद भी मेरा किसी को मानसिक कष्ट न पहुँचाने का मन्तव्य नहीं रहा। प्रतिक्रिया इसलिये नहीं हुयी कि भोजन कभी अप्रिय लगा ही नहीं, या तो सामान्य लगा या स्वादिष्ट। दूसरी घटना के नायक की भाँति दूसरी शिमलामिर्च की इच्छा तो सदा रही पर आवेश इतना कभी नहीं आया कि पहली वाली शिमलामिर्च भी फेंक दें। 


जब भोजन का विषय इतना भावनात्मक हो तो उससे जुड़े और भी प्रकरण आगे के ब्लागों में प्रकट होंगे।

9.2.21

मित्र - ७

किसी भी छात्र के लिये दस वर्ष की अवस्था में अपने घर से दूर छात्रावास में रह कर पढ़ना कुछ स्वाभाविक प्रश्न उठाता है। ऐसा नहीं था कि मेरा घर किसी गाँव या कस्बे में हो, हमीरपुर जिला मुख्यालय है। ऐसा भी नहीं था कि सरस्वती शिशु मन्दिर में प्राप्त प्रारम्भिक शिक्षा में कोई न्यूनता रही हो। यदि ऐसा होता तो दीनदयाल विद्यालय की प्रवेश परीक्षा में मेरा ५वाँ स्थान नहीं आता। अपने छात्रों के प्रति आचार्यों का समर्पण अद्वितीय था। हर माह में एक बार घर आकर छात्र के सभी विषयों का आकलन, अन्य पक्षों पर चर्चा, अभिभावकों से स्पष्ट अपेक्षा और भविष्य का मार्गदर्शन, कौन सा विद्यालय करता था या करता है? यह तब हमें बड़ी सामान्य सी बात लगती थी पर जिस तरह के अभिभावक सम्मेलन अपने बच्चों के लिये हमने किये हैं, उसके बाद से हमारी धारणा बदल गयी। विस्तार, गहराई, विश्लेषण और आत्मीयता, इन सभी क्षेत्रों में हमारे आचार्यों का कोई सानी नहीं था। एक भय सा रहता था उस दिन कि किन उद्दण्डताओं को बताया जायेगा, किन प्रश्नों को दिखाया जायेगा, अभिभावकों से और किन तथ्यों को जाना जायेगा। दोनों छोर, आचार्य और अभिभावक, एक साथ, युगपत, न अधिक खिंचाव, न अधिक ढिलाई।


प्रारम्भिक शिक्षा में विकल्प अधिक नहीं थे। सरकारी प्राइमरी विद्यालय थे, २-३ अन्य निजी विद्यालय और सरस्वती शिशु मन्दिर। अन्य विद्यालय न पाठ्यक्रम में, न अनुशासन में और न ही आचार्यों के समर्पण में सरस्वती शिशु मन्दिर के सामने कहीं ठहरते थे। मुझे यह तथ्य ज्ञात नहीं है कि आचार्यों का चयन कैसे किया जाता था पर जो भी चयन की प्रक्रिया थी, उन आचार्यों के कारण ही विद्यालय का एक नाम था। विद्यालय भवन के नाम पर कुछ भी न होने बाद भी स्तरीय शिक्षा देने में सक्षम था मेरा विद्यालय। एक तथ्य जिस पर गर्व रहा और पीड़ा भी कि कैसे इतने कम वेतन में भी आचार्यों ने कभी अपने मानक ढीले नहीं पड़ने दिये। सभी आचार्यों के नाम और उनके विषय आज भी स्मृति में हैं, आदर और कृतज्ञता सहित।


माध्यमिक शिक्षा के नाम पर हमीरपुर में दो विकल्प थे, जीआईसी और विद्यामन्दिर। मेरे कई मित्र और बान्धव इन्हीं विद्यालयों में पढ़े हैं और अपने प्रयासों से आगे तक भी गये हैं। जीआईसी सरकारी विद्यालय था जो बहुत समय तक अपनी गुणवत्ता बनाये रखने में सक्षम रहा। विद्यामन्दिर एक स्थानीय संस्था द्वारा संचालित था और दो तीन समर्पित अध्यापकों के रहने तक ही ठीक रहा। कालान्तर में दोनों विद्यालय अध्यापकों की अनमयस्कता, छात्रों की अनुशासनहीनता और ट्यूशन उद्योग की भेंट चढ़ गये।


स्थानीय शिक्षा के इस परिदृश्य में कानपुर स्थित दीनदयाल विद्यालय एक स्पष्ट हस्ताक्षर था। इसकी प्रसिद्धि और माँग बहुत अधिक थी और इसमें प्रवेश परीक्षा होती थी। छात्रावास संबद्ध होने के कारण यह बाहर से आने वाले छात्रों के लिये सुविधाजनक था। उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त बिहार और मध्यप्रदेश के भी छात्र अधिक संख्या में यहाँ के छात्रावास में आकर रहे हैं। इस विद्यालय के बारे में जानकारी आचार्यों के माध्यम से ही हुयी थी। विद्यालय के बारे में उनका आकलन और मेरे लिये उनकी संस्तुति, दोनों ही सटीक थे। बाहर के छात्रों के लिये ही नहीं वरन कानपुर के स्थानीय मित्रों के लिये भी दीनदयाल विद्यालय आशा की किरण था। सबके अपने व्यक्तिगत कारण तो भिन्न होंगे पर अपनी स्थापना के कुछ ही वर्षों में विद्यालय के द्वारा अपना एक विशिष्ट स्थान बना लेना सबका साझा कारण था।


मेरे लिये अच्छे मित्रों का होना, इसका आधारभूत कारण विद्यालय का अच्छा होना था। ७ वर्षों तक मित्र अपनी बौद्धिक गुणवत्ता बनाये रखे, इसका आधारभूत कारण विद्यालय का उस कालखण्ड में अच्छा बने रहना था। बोर्ड की और प्रतियोगी परीक्षाओं में मित्रों ने अद्भुत परिणाम दिये, इसका आधारभूत कारण विद्यालय का सतत अच्छा करते रहना था। मित्रों में अनुशासन बना रहा, भटकन सीमाबद्ध रही, इसका आधारभूत कारण विद्यालय का अपने अच्छेपन को सयत्न बचाये रखना था। आज भी हम मित्र सद्भाव और उत्साहपूर्वक जुड़े हुये हैं, इसका आधारभूत कारण भी विद्यालय का उस अच्छाई को पल्लवित व पोषित करना था।


बीते कई दशकों में मैंने व्यवस्थाओं को ढहते हुये देखा है। कोई एक कारण ही दीमक की तरह पूरे तन्त्र को चपट जाता है। क्या कारण रहा कि जिस प्रवाह में अन्य शिक्षातन्त्र ठहर न पाये, हमारा विद्यालय स्थिर खड़ा रहा? वह क्या बात रही जो सामान्य दृष्टि से नहीं दिखी। यदि दिख जाती तो उसे अन्य विद्यालय अपने में उतार कर श्रेष्ठ बन सकते थे। एक सुदृढ़ तत्व जो अभिभावकों और आचार्यों में समान रूप से विद्यमान था, वह था भारतीय परंपरा और मूल्यों के प्रति स्नेह। मन में भले ही यह चाह रही हो कि बच्चा अच्छी अंग्रेजी बोल ले पर पाश्चात्य सभ्यता की पद्धतियों के प्रति एक उपेक्षा का भाव बना रहा। यह विकल्प रहा तो कान्वेन्ट में भेजने का कोई अर्थ नहीं लगा अभिभावकों को। आचार्यों का विषयगत ज्ञान अन्य विद्यालयों की तुलना में भले ही अधिक न हो पर उनकी निष्ठा और संप्रेषण शत प्रतिशत थे। एक वृहद विचार की परिणिति का आकार लेता रहा विद्यालय का दिशाक्रम।


हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि सफल प्रयोगों के बाद भी उनका पल्लवन, पोषण और द्विगुणन नहीं हो पाता है। शिक्षा व्यवस्था की सफलता का मानक तो यही होगा कि वह आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े, समाज, नगर या परिवार के बालक को उसकी क्षमता के आधार पर अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दे। मेरे दोनों विद्यालयों ने मेरे लिये और मेरे मित्रों के लिये यह किया, एक दो वर्ष नही, कई दशकों तक। वह कौन सा मूल तत्व था जो अन्य स्थानों में या अन्य तन्त्रों में स्थापित नहीं किया जा सका? यदि ऐसा ही रहा तो सफल प्रयोग अपनी सफलता पर आत्ममुग्ध हो अपना जीवन जी लेंगे और कालान्तर में उनकी कोई उपयोगिता नहीं रह पायेगी। क्यों नहीं ऐसा हो पाया कि बिना प्रवेश परीक्षा के सभी आवेदक छात्रों को विद्यालय में प्रवेश मिला हो? क्यों नहीं ऐसा हुआ कि बाहर से आने वाले किसी भी छात्र के लिये छात्रावास मना नहीं किया गया हो? क्यों नहीं हर नगर में एक दीनदयाल विद्यालय या हर गाँव में एक सरस्वती शिशु मन्दिर खुल पाया हो?


उत्तर अब भी प्रतीक्षारत हैं।