23.10.21

मित्र - ३४(शुक्रवार की फिल्म)

यहाँ पर एक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है कि सभी छात्रावासी फिल्मों के प्रति इतने उत्साहित नहीं थे। कुछ उस समय का उपयोग अध्ययन में करते थे। कुछ जो देखने को मिल जाये, उसी को देखकर संतुष्ट हो जाते थे, अन्यथा प्रयास नहीं करते थे। कुछ संभावनाओं पर दृष्टि अवश्य रखते थे पर स्वयं कुछ भी साहसिक करने से बचते थे। यदि कोई व्यवस्था ऐसी स्थापित हो जाये जो कि कष्टप्रद न हो और उसमें पकड़े जाने की संभावना भी कम हो तो वे उसमें सम्मिलित हो जाते थे। पूरे छात्रावास में लगभग दस ही ऐसे अग्रणी महारथी थे जो परिधि का विस्तार बढ़ाने के सतत प्रयत्न में लगे रहते थे। संतुष्टि शब्द उनके लिये नहीं था, सीमायें उनके लिये नहीं थी, उनकी आँखों में चमक तब आती थी जब उत्पात का कोई विचार योजना की परिपक्वता के निकट होता था।

ऐसे लोग अप्राप्य को ध्येय बनाये रहते हैं और व्यस्त रहते हैं। टीवी के सारे कार्यक्रमों में बस एक ही अप्राप्य रह गया था, शुक्रवार देर रात की फिल्म। उसको देखने की बात तो दूर, उसकी चर्चा भी चारित्रिक अपयश ला सकती थी। रात ११ बजे प्रारम्भ होने वाली यह फिल्म शयनकाल में पड़ती थी, वयस्कों के लिये थी और किसी प्रकार से उचित नहीं ठहरायी जा सकती थी। फिर भी कुछ साहसी उसे देखने के लिये प्रयत्नशील रहते थे।


रात्रि के कार्यक्रमों में सबसे बड़ी बाधा यह थी कि वे किसी के घर जाकर नहीं देखे जो सकते थे। यह न केवल उनका व्यक्तिगत समय होता है वरन सबके सोने का समय होता है। मुझे स्पष्ट याद है कि जब १९८६ में फुटबाल का वर्ल्डकप आ रहा था तो मैच मध्य रात्रि को आते थे। फुटबाल के प्रति न केवल मुझे प्रेम था वरन पिताजी का भी उत्साह देखते बनता था। हम लोग पशोपेश में थे कि क्या किया जाये? निर्णय यही हुआ कि टीवी लिया जाये। इस प्रकार हमारे घर में प्रथम टीवी आया।


शुक्रवार देर रात्रि के फिल्म के लिये छात्रावास के टीवी पर ही आश्रय था, शेष अन्य टीवी अचिन्त्य थे। एक बार अनुमति के लिये प्रार्थनापत्र लिखा गया। उत्सुकजन सार्वजनिक रूप से जो निर्लज्ज किये गये कि उसके बाद से वैधानिक उपायों से फिल्म देखने का विचार आना भी बन्द हो गया। अब जो भी करना था, गुप्त रूप से करना था।


टीवी कक्ष प्रारम्भिक वर्षों में भोजनालय के साथ वाले कक्ष में था, जो कि आधार तल में था। छात्रावास प्रथम तल में था। जब छात्रावास में संख्या बढ़ी तो टीवी कक्ष भोजनालय में समा गया और टीवी कक्ष प्रथम तल में चला गया। छात्रावास के कुछ और कक्ष भी तब प्रथम तल में आ गये। उस समय छात्रावास के कक्षों के बीच ही टीवी कक्ष था। दोनों ही समय टीवी एक बड़े पल्ले की लकड़ी की अल्मारी में रहता था और उस पर एक ताला लगा रहता था। ताले की चाभी छात्रावास प्रमुख के पास थी। साथ में एक ताला कक्ष में भी लगा दिया जाता था।


प्रथम तल के टीवी कक्ष में दो चाभियों की व्यवस्था करनी होती थी, या तो छात्रावास प्रमुख से माँग कर या पार कर या उसकी प्रतिलिपि बनवा कर। इसमें दूसरा और तीसरा उपाय अधिक उपयोग में आया क्योंकि चाभी देने का पूरा उत्तरदायित्व छात्रावास प्रमुख पर ही आता। जब आधार तल में टीवी कक्ष था तब भोजनालय और टीवी कक्ष के बीच में एक किवाड़ था। भोजनालय में ही ताला बन्द होता था, टीवी कक्ष का कपाट अन्दर से बन्द किया जाता था। भोजन के बाद बर्तनों की सफाई के समय यदि किवाड़ के अन्दर की चिटकनी खोल दी जाती थी तो भोजनालय के ताले की चाभी की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।


एक बार जब अल्मारी का ताला बदला पाया गया तो कुण्डी के बोल्ट खोलकर फिल्म देखी गयी। उस समय दो सावधानियाँ रखी जाती थी। पहली सावधानी यह कि जो भी आता था वह अपने बिस्तर पर तकिया के ऊपर चादर चढ़ाकर आता था जिससे यह पता न लगे कि कोई अनुपस्थित है। दूसरी सावधानी में टीवी कक्ष का प्रकाश बन्द रखा जाता था और खिड़की पर चादर लगा कर टीवी से बाहर आ रहे प्रकाश को भी रोक दिया जाता था।


यह बताना कठिन है कि इस प्रकार कितनी बार हमें शुक्रवार की फिल्म देखने में सफलता मिली। सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि उस समय शेष सभी लोग विशेषकर छात्रावास अधीक्षक सो गये हों। हमारे महती प्रयासों की सुन्दर संरचना पर तुषारापात उस समय हुआ जब चादर की झीने प्रकाश के पीछे दीपकजी दिखायी पड़े। उसके बाद से न केवल शुक्रवार हाथ से गया वरन दण्डस्वरूप अन्य फिल्मों से भी हाथ धोना पड़ा।


फिर भी सब कुछ हाथ से नहीं गया था, जानेंगे अगले ब्लाग में।

21.10.21

मित्र - ३३(शनिवार की फिल्म)

छात्रावास परिसर में कुछ ४ टीवी थे। यद्यपि कुछ की पहुँच छात्रावास के बाहर उन घरों में थी जहाँ पर टीवी होते थे, पर ऐसी संख्या बहुत कम थी और उन प्रयासों में दुगुना दुस्साहस था। एक तो बाहर निकल कर जाना, तीन घंटे के लिये और दूरदर्शन पर आने वाली फिल्म देखकर आना। इसमें पकड़े जाने की संभावना बहुत अधिक थी। साथ ही इस बात का भी भय था कि उनका छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी से भी परिचय था। इस स्थिति में हमारे प्रयास और भेद कब तक गुप्त रखे जा सकेंगे, इस बात पर भी संशय था। यदि तीन घंटे को बाहर जाने का साहस करने का अवसर ही रहा है, तो टाकीज में जाकर नयी फिल्म देखने का आनन्द क्यों न लिया जाये। संभवतः इन्हीं कारणों से यह प्रवृत्ति छात्रावासियों के मानस में अत्यन्त विरल मात्रा में थी।

एक टीवी छात्रावास में, एक प्रमुख छात्रावास अधीक्षक के घर में, एक छात्रावास अधीक्षक के घर में और एक छात्रावास सहायक के घर में था। यद्यपि बाद में कई अन्य सहायकों के घर में भी टीवी आ गये थे। प्रमुख छात्रावास अधीक्षक गृहस्थ थे अतः उनका टीवी प्रयोग की परिधि से बाहर था। रुचियाँ मिलने के कारण छात्रावास अधीक्षक का टीवी मुख्यतः क्रिकेट के लिये प्रयोग में आता था। छात्रावास का टीवी बिना अनुमति के अपना मुखमंडल नहीं खोलता था। शेष एक टीवी जो सहायक के यहाँ था उसी पर सभी की आशायें टिकी रहती थी।


पता नहीं कैसे प्रारम्भ हुआ पर कुछ अति उत्साही छात्रावासी शनिवार या रविवार की अनुमति न मिलने वाली एक फिल्म को वहाँ देखने जाने लगे। सहायकों का घर छात्रावास अधीक्षकों और प्रधानाचार्य के घरों से विपरीत दिशा में था। वहाँ पहुँचने के लिये छात्रावास के बीच से होकर जाना होता था। वह स्थान स्नानागार के पास भी था। वहाँ पहुँचने के लिये अधिक प्रयत्न की आवश्यकता नहीं थी और साथ ही पकड़े जाने की संभावना भी कम थी। कोई छात्रावास अधीक्षक यदि उस क्षेत्र के आसपास होता था तो वह सूचना त्वरित गति से वहाँ पहुँच जाती थी और सभी छात्रावासी विसर्जित होकर निर्विकार रूप कोई अन्य कार्य करते हुये प्रतीत होते थे।


सहायक नवगृहस्थ थे और टीवी भी उनके यहाँ नया ही आया था, बच्चों को आया देखकर वात्सल्यवश मना नहीं कर पाये होंगे। वैसे भी वह समय ऐसा था कि टीवी देखने आये आगन्तुक को मना नहीं किया जाता था। घर के टीवी को औरों के समक्ष प्रस्तुत करना ऐश्वर्य और औदार्य, दोनों के ही लक्षणों में गिना जाता था। रामायण और महाभारत के आने के बाद आगन्तुकों को बैठाकर टीवी दिखाना एक धार्मिक और पुण्य का कार्य भी समझा जाता था। हरि की अनंत कथा को प्रसारित होने में सहायक होने के कारण भक्त जैसा अनुभव होता था। कई गृहस्थ उस समय बालिका भोज या प्रसाद वितरण कर पुण्य को कई गुना बढ़ा लेते थे।


समस्या यह थी कि वह सहायक प्रधानाचार्यजी के अत्यन्त निकट थे, उनके व्यक्तिगत सहायक के रूप में। इस बात का भय रहना स्वाभाविक ही था कि कहीं उनके माध्यम से बात प्रधानाचार्यजी तक न पहुँच जाये। केवल वात्सल्य भाव ही था या नियम तोड़ने में सहभागिता का दोष या टीवी बन्द हो जाने का भय या कोई अन्य कारण, उन सहायक ने कभी भी यह बात प्रधानाचार्यजी को नहीं बतायी। यह बात अलग थी कि छात्रावास अधीक्षक को यह बात पता लगी पर उसका दण्ड छात्रावासियों की उद्दण्डता को ही मिला, सहायकों को विवशता का लाभ देकर प्रताड़ित नहीं किया गया।


आगे सहायकों के प्रकरण में यह उल्लेख रहेगा कि किस प्रकार सहायकगण हम लोगों की वेदना के प्रति मन ही मन अधिक संवेदी थे। यद्यपि सत्ता के प्रति प्रत्यक्ष रूप से निष्ठावान रहना उनके कर्तव्यों का अभिन्न अंग था पर परोक्ष रूप से और व्यवहारिकता के धरातल पर हमसे उनकी संवेदनायें अनुनादित थीं। हम छात्रावासियों ने सदैव ही सहायकों को अपने अनुकूल ही पाया था और कई स्वप्नों को जीवटता से जीने में अत्यन्त उपयोगी भी। आज भी छात्रावासियों की प्रफुल्लित यादों में सहायकों का आना जाना निर्बाध होता है, एक आवश्यक अंग की तरह।


छात्रावास के टीवी पर चित्रहार, रविवार पूर्वाह्न के कार्यक्रम और एक फिल्म देखते थे। क्रिकेट मैच बहुधा छात्रावास अधीक्षक के घर में देखने को मिल जाता था। छूट गयी दो फिल्मों में एक फिल्म छात्रावास सहायक के घर में देखना हो जाता था। इस सबके बाद भी कुछ छात्रावासियों का मन नहीं भरता था, उन्हें लगता था कि कोई भी मनोरंजन बिना मन को रंजित किये निकल न जाये, व्यर्थ न हो जाये। उनके महास्वप्नों का उत्कर्ष बिन्दु उन प्रयत्नों में परिलक्षित था जो शुक्रवार रात्रि की फिल्म देखने के लिये किये गये।


सब जानेंगे अगले ब्लाग में।

19.10.21

मित्र - ३२ (फिल्म और विकल्प)

मन सदा ही कुछ नया चाहता है, स्वयं को अपने स्वरूप से भिन्न रंगना चाहता है। मन को रंगने का उपक्रम मनोरंजन कहलाता है। मनोरंजन मन को सुख देता है, सुख राग उत्पन्न करता है, राग आकर्षण का हेतु है। टीवी के कार्यक्रम आपके अन्दर के मनोरंजन की थाह मापने लगे। प्रचार माध्यम उस आकर्षण को भुनाने लगे, विज्ञापन आपकी निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से उन कार्यक्रमों के बीच उपस्थित हो जाते जिन पर आपका मन लगा होता है। विज्ञापन मनोरंजन को प्रायोजित करने लगे, मनोहरण करने के लिये। फिल्में, चित्रहार, कथाश्रृंखलायें आदि मनोरंजन के साथ साथ दूरदर्शन की आय का साधन बनने लगीं। सप्ताह में एक के स्थान पर तीन फिल्में और दो चित्रहार हो गये।

बाहर की फिल्म देखने के असफल प्रयासों के प्रकरणों में दबे और क्षुब्ध छात्रावासी हृदयों को दूरदर्शन का यह विस्तार बड़ा ही आनन्द और उत्साह देने वाला था। सहज आशा के प्रवाह में पर शंकाओं की बाधायें खड़ी थी। एक चित्रहार, एक फिल्म और रविवार पूर्वाह्न के कार्यक्रम लगभग स्थिर हो चुके थे। जहाँ शुक्रवार देर रात को आने वाली फिल्म अपनी अनुमानित और अतिरंजित विषयवस्तु के कारण निषिद्ध थी, शनिवार की फिल्म आशा किरण की बनी हुयी थी। जब छात्रावास अधीक्षक का स्पष्ट निर्णय सुना कि एक सप्ताह में एक ही फिल्म देखने की अनुमति मिलेगी तो दुख भी हुआ और संतोष भी। दुख इस बात का दूरदर्शन के द्वारा प्रदत्त आधा मनोरंजन बिना सुख दिये ही व्यर्थ चला जायेगा। संतोष इस बात का था कि कम से कम एक फिल्म तो देखने को मिलेगी। पहले इस बात की संभावना भी रहती थी कि रविवार को कहीं ऐसी फिल्म न आ जाये जिसके लिये अनुमति न मिले। अब लगता था कि दो में कम से कम एक तो अनुमति योग्य होगी ही।


दैवयोग से यह एक ऐसी परिस्थिति थी जिसमें दोनों ही पक्षों को लगता था कि उनकी जीत हुयी थी। एक ही फिल्म होने से उसकी अनुमति मिलने से हमारी विजय, न मिलने से हमारी हार होती थी। यहाँ तीन फिल्में थी, एक प्रतिबन्धित, एक की अनुमति और एक की अनुमति नहीं। इस प्रकार सबके भाग में कुछ न कुछ था। कभी कभी संसाधन बढ़ा देने से दोनों पक्षों को ही विजय की अनुभूति होने लगती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से दोनों पक्षों के हाथ में कुछ न कुछ रहने से निष्कर्ष आनन्दमयी और दीर्घकालिक रहते हैं। जब कभी भी किसी विषय पर प्रतिपक्ष से समझौता वार्ता होती है तो आदान प्रदान की स्थितियाँ बनती हैं। आधार सिमटा होने पर या एक ही निश्चित विषय पर कई बार वार्तायें टूट जाने का भय रहता है। जो वस्तु या माँग पानी है, उसके साथ कई और वस्तुओं या माँगों को जोड़ देने से यह संभावना बनी रहती है कि कम से कम मूल माँग तो पूरी हो ही जायेगी। दोनों पक्ष अपनी माँगों पर पीछे जाते हैं, दोनों को एक जीत का भाव रहता है और दोनों को ही संतोष रहता है। आधुनिक प्रबन्धन में वार्तातन्त्र का विकास और क्रियान्वयन एक विशिष्ट विषय है।


समस्या विकल्पों में होती है। विकल्प भ्रमित करते हैं। प्रकृति की जटिलता भी ऐसी है कि हर विकल्प कुछ गुण तो कुछ दोष लिये रहता है। संसाधन इतने नहीं रहते हैं कि सारे विकल्प प्राप्त किये जा सकें। हमारे लिये जब एक ही फिल्म देखने की अनुमति रहती थी तो प्रश्न इस बात का उठता था कि कौन सी फिल्म देखी जाये, शनिवार की या रविवार की? तुलना बड़ी घातक होती है, एक को दूसरे से लड़ाती है। सप्ताहान्त में आने वाली दो फिल्मों ने कभी नहीं सोचा होगा कि छात्रावासी बैठकर उनके गुणदोषों का निर्धारण करेंगे कि कौन सी देखी जाये, कौन सी नहीं? तब कई स्वर बौद्धिक उठते हैं, कई अपने अनुभव से बात करते हैं, कई केवल अभिनेता या अभिनेत्री के नाम पर मुग्ध रहते हैं। कुल मिलाकर एक कार्य मिल जाता है कि क्या देखें और क्या नहीं? कुछ कहते हैं कि शनिवार की ही देख लो, पता नहीं रविवार को बिजली आये न आये? देखा जाये तो यह भी अत्यन्त व्यवहारिक दृष्टिकोण है कि जो हाथ में है, उसे भोग लो।


कभी कभी बच्चे किसी खिलौने आदि की माँग करते हैं तो बुद्धिमान अभिभावक उन्हें दो तीन और विकल्प बताकर चिन्तन में ठेल देते हैं। बच्चों को भी लगता होगा कि उनके अभिभावक उनके बारे में इतना अधिक सोचते हैं। इस प्रकार के भ्रम उत्पन्न कर कभी कभी बच्चों से विकल्पों का खेल खेला जाता है। “पर शर्माजी के बच्चे टिंकू का यही खिलौना तो दो दिन में टूट गया था”, एक और गुगली और निर्णय प्रक्रिया में बच्चा जूझता रहता है। हमें कभी कभी लगता था कि एक फिल्म का विकल्प देकर हमारी सम्मिलित निर्णय प्रक्रिया में विभ्रम उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा था।


समस्या तब आती है जब आपने विकल्प ठीक से नहीं चुना। प्रश्नपत्र में यदि विकल्प वाले प्रश्न में दुर्भाग्यवश अंक नहीं मिले तो दुख के साथ क्रोध इस बात पर आता है कि दूसरा प्रश्न हल कर लेना चाहिये था। परीक्षाओं में विकल्प को भी एक प्रश्न के रूप में लेना चाहिये। ८ में से ५ प्रश्न करना, यह सुविधा कम, दुविधा अधिक होती है। या तो ३ प्रश्न अत्यन्त कठिन हों तो शेष ५ प्रश्न सरलता से चुने जा सकते हैं। यदि सारे प्रश्न एक ही स्तर के हों तो विकल्प दुविधा बढ़ा जाते हैं। बहुधा ऐसे ५ प्रश्न चुन लिये जाते हैं जो कि अन्ततः हानिप्रद होते हैं।


एक फिल्म चुनने के प्रयास में हमारे साथ कई बार ऐसा हुआ। जिसे अच्छी फिल्म विचार कर देखा उसमें निराशा हुयी। देखा जाये तो यह निराशा भी मायावी थी, मानसिक थी। जब तक दोनों फिल्म नहीं देखी जायें तब तक इस बात का निर्णय कैसे होगा कि कौन सी फिल्म अच्छी है? जिस प्रकार लोग किसी और के सुखों कर देखकर व्यर्थ ही दुखी होते रहते हैं उसी प्रकार हम लोग भी न देखी हुयी फिल्म को देखी हुयी फिल्म से अच्छा मानकर दुखी हो लेते थे। 


फिर भी अनपाये को पाने का प्रयास कुछ छात्रावासियों न कभी छोड़ा ही नहीं। कुछ अनुमति वाली फिल्म तो देखते ही थे। साथ ही साथ जिसकी अनुमति नहीं मिलती थी उसे भी निपटा आते थे। कई बार जब शुक्रवार की फिल्म देखने के प्रयास हुये तब जाकर लगा कि हम सबके अन्दर फिल्म का आनन्द उठाने की इच्छा अदम्य है।


प्रयासों की न समाप्त होने वाली यही उर्ध्वाग्नि अगले ब्लाग में।

16.10.21

राम का निर्णय(संवेदना)

 

राम वन को चल दिये। नगरवासी उनके साथ रहने का निश्चय कर पीछे चलने लगे। राम ने आगामी रात्रि में ही सबको सोता हुआ छोड़कर चुपचाप अपनी यात्रा में बढ़ जाने का निश्चय किया। श्रृंगवेरपुर में मित्र निषादराज से भेंट करने के बाद राम प्रयागराज में मुनि भरद्वाज के आश्रम में गये और उनके सुझाने पर चित्रकूट में आकर रहने लगे।


इघर अयोध्या में अतिशय मानसिक पीड़ा और आत्मग्लानि के बोध से भरे राज दशरथ का माँ कौशल्या के महल में ही देहावसान हो गया। भरत को कैकेय से यथाशीघ्र बुलाया जाना, पिता की सकारण मृत्यु और भैया राम का वनगमन, स्वयं को दोनों का कारण मानना, अतीव लज्जा और क्रोध के भाव से अपनी माँ को धिक्कारना, भैया राम को लाने के लिये चित्रकूट के लिये सेना सहित प्रयाण करना, कथा का गतिक्रम चलता रहता है।


इस बीच राम के द्वारा लिये हुये वनगमन के निर्णय के बारे में पक्ष और प्रतिपक्ष के तर्क अवसान पा जाते हैं। सब शोकमना हो स्वीकार ही कर लेते हैं कि राम ने उचित किया। चित्रकूट प्रवास के प्रथम दिन राम पिता दशरथ को लेकर तनिक व्याकुल होते हैं और लक्ष्मण से आग्रह करते हैं कि वह वापस अयोध्या जायें और पिता का ध्यान रखें। विचार श्रृंखला के क्रम में यह बात उठती है कि किस प्रकार पिता परवश होते हैं और अपने आज्ञाकारी पुत्र के वनगमन के वर को स्वीकार कर लेते हैं। पिता की यह मनःस्थिति लक्ष्मण को उनकी सहायता हेतु वापस लौट जाने के लिये कही जाती है। यद्यपि लक्ष्मण सविनय मना कर देते हैं पर राम के हृदय की पीड़ा और अन्याय का निहित भाव राम के विलाप से व्यक्त होता है।


चित्रकूट से चलने के बाद एक अन्य प्रकरण में जब राक्षस विराध ने सीता को उठा लिया था तब सीता को भय से काँपते हुये देख राम की पीड़ा पुनः छलकी। उन्हें अकारण ही दुख देने के कैकेयी के मन्तव्य को कहते हुये तब राम कहते हैं। वन में हमारे लिये जिस दुख की प्राप्ति कैकेयी को अभीष्ट थी, वह आज दिख रहा है। संभवतः तभी वह मात्र भरत के लिये राज्य पाकर संतुष्ट नहीं हुयी। समस्त प्राणियों का प्रिय होने पर भी मुझको वन भेज दिया, लगता है माँ कैकेयी का मनोरथ आज सफल हुआ। राज्य के अपहरण और पिता की मृत्यु से मुझे उतना कष्ट नहीं हुआ जितना विदेहनन्दिनी को राक्षस के स्पर्श करने से हुआ। कैकेयी के कृत्य से राम दुखी थे, क्षुब्ध भी पर अपने वनगमन के निर्णय पर उनको कभी संशय नहीं रहा।


राम जानते थे कि धर्म का पालन सरल नहीं होता है। सरल विकल्प भी थे पर उन्होंने वन जाना सहर्ष स्वीकार कर लिया। यह अत्यन्त कठिन विकल्प था। परिवार का बिखराव, पिता का देहान्त, दो भाइयों का वन में भ्रमण, जनककुमारी को वन के कष्ट, भरत का अग्रज की भाँति ही तापस वेष में ग्राम से ही राज्य का संचालन, नगरवासियों का अपार दुख, विकल्प अत्यन्त कठिन था। मात्र कैकेयी और उसकी दासी प्रसन्न थी। वह सीमित प्रसन्नता भी पुत्र भरत का स्नेह खोकर दुख में बदल गयी। सरल विकल्प होता कि लक्ष्मण की मन्त्रणानुसार राम राज्य का अधिग्रहण कर लेते तो कैकेयी को छोड़ कर सब प्रसन्न रहते।


इतने लोगों को कष्ट देने का विकल्प राम ने क्यों चुना? यद्यपि राम स्वयं ही वन जाकर समस्या का निदान करते हुये प्रतीत हुये, पर उन्हें इस बात का भान तो था कि किस प्रकार सब अस्तव्यस्त हो जायेगा। यद्यपि राजपरिवार के स्थायित्व पर पहला कठोर प्रहार माँ कैकेयी का था पर क्या राम शेष अस्तव्यतता रोक सकते थे। क्या सत्य का मार्ग परिवार, समाज, नगर आदि के कष्टों से भी बढ़कर था?


व्यवहारिकता के परिप्रेक्ष्य में लक्ष्मण के विचार अत्यन्त तर्कसंगत लगते हैं। गुरु वशिष्ठ का सीता को युवराज्ञी बनाने के लिये धर्मसम्मत व्याख्या करना, पिता को स्वयं को कारागार में डाल देने को प्रस्तुत होना, माँ कौशल्या का वन न जाने की प्रत्याज्ञा देना, इन सबके ऊपर राम ने वनगमन को चुना। पिता को न कभी दोषमुक्त किया, न कभी अपने वनगमन का दोष ही दिया।


प्रयास और प्रभाव की दृष्टि से पुरुषार्थों में काम तात्कालिकता का द्योतक है, अर्थ का क्षेत्र तनिक बड़ा होता है, धर्म का कालखण्ड विस्तृत होता है और मोक्ष का अपरिमित। राम ने काम और अर्थ की तुलना में धर्म को चुना। दीर्घकालिक दृष्टि और सैद्धान्तिक आग्रह के मार्ग में यदि कष्ट आये तो राम ने सहे।


भरत के चित्रकूट आगमन पर वनगमन पर एक बार पुनः विस्तृत चर्चा हुयी। भरत, वशिष्ठ, जाबालि ने अपने विचारों को प्रस्तुत किया पर राम ने सबका शमन किया और पिता की आज्ञा को ही सर्वोपरि मानने का ही निश्चय किया। पिता की परवशता, अयोध्या का कल्याण, कुलपरम्परा, नास्तिकता के सिद्धान्त और धर्म के व्यवहारिक पक्ष को अस्वीकार करते हुये राम अपने निर्णय पर दृढ़ रहे। समस्त अयोध्या की प्रार्थना और करुणामयी आग्रह पर भी राम विचलित नहीं हुये। अन्ततः भरत का मान रखते हुये उन्होंने अपनी खड़ाऊँ दे दी जिन्हें भरत ने प्रतीक बनाकर तापस वेष में ही चौदह वर्ष तक शासन किया।


राम के वनगमन का प्रकरण और सम्बन्धित संवाद राम के वैशिष्ट्य और प्रखर निर्णय प्रक्रिया को व्याख्यायित करते हैं। वर्तमान में राम सर्वपूजनीय हैं पर उस समय की कल्पना कीजिये कि १८ वर्ष का एक युवा राजकुमार जो कि अपनी सामर्थ्य ताड़का वध और शिवधनुष भंग कर स्थापित कर चुका था, सहसा सब त्यागकर वन चला जाता है। उस काल के जनों में राम का सम्मान कितना बढ़ गया होगा? कालान्तर में राक्षस उन्मूलन, संगठनशक्ति और रावणवध के पश्चात उनका राजा बनना सबके लिये अत्यन्त उत्साह और हर्ष का विषय होगा। रामराज्य के उत्कर्ष और राम के व्यक्तित्व से संलग्न इतिहास ने ही वाल्मीकि को प्रेरित किया होगा कि वह राम का चरित्र आने वाली पीढ़ियों के लिये संरक्षित करें।


राम को वाल्मीकि ने एक संवेदित राजकुमार के रूप में प्रस्तुत किया है जिसने अपने निर्णयों से अपना उत्कृष्ट उत्कर्ष गढ़ा। ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो असामान्य था। जब केवल वनगमन के निर्णय पर ही अध्याय लिखे जा सकते हैं तो राम का सम्पूर्ण चरित्र कितना अनुकरणीय होगा, उसकी कल्पना करना कठिन है। मेरे राम मुझे शक्ति दें कि उनके वनगमन से आज भी जो दुख मेरे मन में व्याप्त है, उसका निवारण कर सकूँ। जय श्री राम।

14.10.21

राम का निर्णय (प्रयाण)

 

सुमन्त्र का मन कैकेयी की कुटिल गति देखकर बिद्ध था। प्रातः से ही कैकेयी के आचरण ने उनको व्यथित कर रखा था। दशरथ और राम के बीच का यह संवाद सुनकर राज परिवार में मर्यादा का यथासम्भव मान रखने वाले सुमन्त्र का धैर्य भी टूट गया। मूर्च्छित दशरथ राम के कन्धे पर टिके थे, कक्ष में मचा हाहाकार शान्त हो चुका था, सबको व्यग्रता से प्रतीक्षा थी कि दशरथ की चेतना वापस लौटे। राम को आज्ञा पाने और शीघ्रता से वनगमन की आकुलता थी। संताप और समय की स्तब्धता ने सुमन्त्र को अवसर दिया कि वह कैकेयी को समझायें और अपना हठ त्यागने को प्रेरित करें। तनिक क्रोध भरे कंपित स्वर में सुमन्त्र ने कहा। 


देवि, जब तुमने अपने पति राजा दशरथ का ही त्याग कर दिया है तो हे कुलघातिनी, ऐसा कोई कुकर्म शेष नहीं रहा जो तुम न कर सको। जिस प्रतापी राजा ने तुम्हें इतना मान दिया, इतना ऐश्वर्य दिया, उसको इतना संताप न दो, इतना अपमान न करो। कुल की परम्परा से च्युत हो और अधर्मपूर्वक यदि तुम कार्य करोगी तो कौन ब्राह्मण, धर्मज्ञ, नगरवासी या सेवक यहाँ रुकेगा? तब किस पर तुम राज्य करोगी? 


मुझे लगता है देवि कि तुम्हारा स्वभाव भी तुम्हारी माता पर गया है। तुम्हारी माता के दुराग्रह से हम परिचित हैं और यह भी जानते हैं कि किस प्रकार एक साधु द्वारा तुम्हारे पिता को दिये गये वर से ज्ञात किसी तथ्य को जानने के लिये उन्होंने हठपूर्वक आचरण किया था। तथ्य बताने पर तुम्हारे पिता की मृत्यु निश्चित थी पर मना करने पर भी तुम्हारी माँ नहीं मानी। तब साधु से विमर्श करके तुम्हारे पिता ने तुम्हारी माँ को घर से निकाल दिया था। आज तुम अपनी माँ के समान ही हठ पर अड़ी हो। यह रघुकुल की ही मर्यादा और कुलपरम्परा है कि तुम्हें अपनी माँ जैसा दण्ड नहीं मिल रहा है। अभी भी चेत जाओ और राम को वन जाने से रोक लो। अपयश मत पाओ। राम सा आज्ञाकारी पुत्र त्याग कर तुम कहीं प्रसन्न नहीं रहोगी। सुमन्त्र के तीक्ष्ण, उद्वेलित और सार्वजनिक रूप से अपमानित करने वाले वचनों से भी कैकेयी के मुख पर कोई विकार नहीं आया। अपने वर पूर्ण होने के इतने निकट आ वह और भी कठोर हो गयी थी।


दशरथ चेतते हैं, राम को अपने समीप पाकर उनका हृदय शक्ति पा जाता था। सुमन्त्र को इस प्रकार कैकेयी को समझाते हुये सुनते भी हैं। मन में एक निश्चय कर सुमन्त्र को आज्ञा देते हैं। सूत, तुम रत्नों से भरी चतुरङ्गिणी सेना राम के साथ वन भेजो। वणिजों, सेविकाओं और राम के समस्त सहायकों को प्रचुर धन सहित राम के साथ जाने की आज्ञा दो। कोष, अन्न और समस्त मनोवाञ्छित भोगों से सम्पन्न कर राम को यहाँ से भेजा जाये। शेष अयोध्या का पालन भरत करेंगे। पूर्व में सुमन्त्र के वचनों से आहत हुयी और मन में क्रोध समाये कैकेयी तमतमा कर सहसा बोल उठी कि महाराज आप ऐसा नहीं कर सकते, तब भरत के लिये शेष ही क्या रहेगा? दशरथ ने कहा कि इस प्रकार का कोई प्रतिबन्ध तो तूने अपने वरों में नहीं लगाया था। कैकेयी का क्रोध अब कुल पर लक्षित हो गया था, वह बोली कि जिस प्रकार आपके पूर्वज राजा सगर ने अपने पुत्र असमञ्ज को राज्य से निकाल दिया था उसी प्रकार आप राम को निष्काषित कर राज्य के द्वार सदा के लिये बन्द कर दीजिये। जानबूझकर की गयी इस अपमानपूर्ण तुलना पर कक्ष में सभी लोग कैकेयी को धिक्कारने लगे। तब राज्य के आदरणीय और वयोवद्ध मन्त्री सिद्धार्थ आगे बढ़कर कैकेयी से तथ्यों को स्पष्ट करते हैं।


देवि, असमञ्ज दुष्ट बुद्धि का था, मार्ग पर खेल रहे बालकों को सरयू में फेंक देने को अपना मनोरञ्जन समझता था। प्रजाजनों द्वारा राजा सगर को जब इस संदर्भ में निवेदन किया गया तो उन्होंने मन्त्रियों के साथ राजकुमार के अन्य कार्यकलापों के बारे में मन्त्रणा कर उसे राज्य से बाहर भेजने का निर्णय किया था। राज्य के हित में सगर ने अपने अहितकारी पुत्र को त्याग दिया था। देवि, राम ने कौन सा अपराध किया है? हम सब लोग राम में एक भी अवगुण नहीं देखते हैं। यदि तुम्हें किञ्चित भी कोई दोष दिखता हो कहो पर इस प्रकार अनर्गल प्रलाप मत करो। अभी भी चेत जाओ और लोकनिन्दा से बचो। यह सुनकर दशरथ कैकेयी को झिड़कते हुये बोले, “पापरुपणी, तेरी सारी चेष्टायें साधुपुरुषों के विपरीत हैं। मैं भी सारा राज्य त्याग कर राम के पीछे चला जाऊँगा, तू राज्य का सुख भोग”।


माँ कैकेयी के प्रति पिता की क्षुब्धता और सभा में व्याप्त आकुलता देख राम अत्यन्त विनीत स्वर में कहते हैं। पिताजी, मैं समस्त भोगों का त्याग कर चुका हूँ और वन में वन के द्वारा ही जीवन निर्वाह करना चाहता हूँ। मुझे सेना से क्या प्रयोजन? उत्तम हाथी का त्याग कर बाँधे जाने वाले रस्से से क्या आसक्ति? मुझे तो माँ कैकेयी वल्कल वस्त्र ला दें।


राम और लक्ष्मण दोनों ने ही पिता के सामने ही वल्कल वसन धारण कर लिये। कक्ष में सबकी आँखों में अश्रु छलक आये। चीर धारण में कुशल न होने के कारण सीता रुद्ध और लज्जा भरे स्वर में राम को सहायता के लिये पुकारती है। राम राजस्त्रियों के बीच पहुँच कर सीता को वल्कल वस्त्र बाँधना बताते हैं। वहाँ उपस्थित मातायें और सभी नारियाँ राम से तनिक खिन्न स्वर में कहती है कि हे राम सीता को इस प्रकार वन में रहने की आज्ञा नहीं दी गयी है। माताओं के इस प्रकार कहने पर भी राम ने सीता को वल्कल वस्त्र पहना दिये। यह देखकर प्रशान्त स्वभाव के गुरु वशिष्ठ के भी नेत्रों में करुणाश्रु छलक आये। वह सीता को रोककर कुपित स्वर में कैकेयी से बोले। 


“अधर्मप्रवृत्त दुर्बुद्धि कैकेयी, तू कैकेयराज के कुल का कलङ्क है। राजा से छल कर अब पुनः अपनी सीमा लाँघ रही है। सीता राम की अर्धाङ्गिनी हैं। राम के पश्चात उनका इस सिहांसन पर अधिकार है। वह अब राम को प्रस्तुत हुये सिंहासन पर बैठेंगी। देवी सीता वन नहीं जायेंगी।”


गुरु वशिष्ठ से धर्म और नीति की व्याख्या सुन और सीता का अधिकार जानकर कैकेयी का मद तनिक ठहर गया। गुरु वशिष्ठ आगे कहते हैं। “यदि देवी सीता फिर भी वन जाती हैं तो हम सब और नगरवासी भी वन चले जायेंगे। और जिस भरत से बिना मन्त्रणा किये तूने यह प्रपंच रचा है, वह भरत भी तुझे धिक्कारेगा क्योंकि अयोध्या में कोई ऐसा नहीं है जो राम से स्नेह न करता हो। देवी सीता वल्कल वसन धारण नहीं करेंगी।” सीता सब सुनकर भी संकोचवश पति के समान ही वल्कल वसन धारण किये रही। यह देख दशरथ ने कैकेयी को धिक्कारते हुये सीता पर वल्कल वसन पहनने की बाध्यता समाप्त कर अपनी अभिरुचि, गरिमा और सुख के अनुसार वस्त्र और आभूषण धारण करने की व्यवस्था और आज्ञा दी।


दशरथ ने सुमन्त्र को रथ से राम को वन तक छोड़ आने की आज्ञा दी। राम ने पिता दशरथ से माँ कौशल्या के शोकनिवारण हेतु विशेष स्नेह देने की प्रार्थना की। माँ कौशल्या ने सीता को चौदह वर्ष के लिये पर्याप्त वस्त्र और आभूषण दिये और पति के साथ वन में जीवन निर्वाह करने के सूत्र दिये। माँ सुमित्रा ने पुत्र लक्ष्मण को नीति और सेवा सम्बन्धी शिक्षा और आशीर्वाद दिया। सबको अश्रु में छोड़ और पिताजी और माताओं की परिक्रमा कर राम लक्ष्मण और सीता सहित कक्ष से बाहर निकल गये। 


राम मुखमण्डल पर अपने गुरुतर निर्णय को शान्त पर सगर्व भाव से धारण किये थे। वह क्रियान्वयन की रूपरेखा बनाते रथ पर चढ़ते हैं। सुमन्त्र रथ को हाँकते हैं, नगरवासी राम को शोकमना हो वनगमन करते देखते हैं। उनका प्रिय राजकुमार राम अपनी अयोध्या छोड़ रहा है।