<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898</id><updated>2026-08-12T23:27:05.243-07:00</updated><title type='text'>मनाचा कंदील</title><subtitle type='html'>सारे कळतंच न कळत घडते.... आभास हा !!</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default?redirect=false'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false'/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>47</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-8408689109272494465</id><published>2026-08-12T23:27:05.243-07:00</published><updated>2026-08-12T23:27:05.243-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>सबसे मुश्किल जाँच वो होती है, जहाँ आपका दिल पागलों की तरह यह दुआ कर रहा हो कि मुजरिम बेकसूर निकले।

नवंबर की उस उदास और खामोश दोपहर में, शर्मा निवास के बेडरूम का तापमान अचानक शून्य से भी नीचे गिर गया था. कमरे में हीटर नहीं था, खिडकियाँ बंद थीं, और बाहर की गुनगुनी धूप परदों से छनकर बिस्तर पर गिर रही थी, लेकिन सावी का पूरा शरीर किसी बर्फीले तूफान के बीच खडे होने जैसा काँप रहा था.

उसके कानों में एक अजीब सी, बहरी कर देने वाली भिनभिनाहट थी. यह आवाज किसी मशीन की नहीं थी, बल्कि उसके अपने ही दिमाग के पुर्जों के आपस में टकराने और टूटने की आवाज थी.

बिस्तर पर, उस भारी, खाकी रंग के&#39; जेड- डेल्टा- नाइन&#39; वाले सरकारी लिफाफे के ठीक बगल में, वो पानी से गला हुआ, मटमैला कागज का टुकडा पडा था. और सावी की आँखें उस टुकडे पर इस कदर गडी थीं, जैसे वो कोई कागज नहीं, बल्कि कोई ऐसा जहरीला साँप हो जो फन काढे बैठा हो और किसी भी पल उसे डस लेगा.

जो रास्ते दिखाई देते हैं, मंजिल अक्सर उनसे दूर होती है।

पेरिस की उस खूनी सर्विस लेन में कूरियर की कार के टायरों के पास मिला वो कागज.

और दूसरी तरफ, उसके दिमाग में गूँजती हुई कल शाम की वो आवाज. मनीष की आवाज. वही ठहराव, वही गहराई, वही अंदाज. जब वो ड्राइंग Room की दरी पर बैठकर रिया को स्कूल का होमवर्क करवा रहा था.

जो लफ्ज कागज पर मौन हैं, असली शोर उन्हीं की खामोशी में पलता है।

सावी ने अपने दोनों हाथों से अपने सिर को कसकर पकड लिया. वो इस सोच को अपने दिमाग से बाहर निकाल फेंकना चाहती थी. वो चाहती थी कि कोई उसके दिमाग की नसों को खींच दे, उसकी याददाश्त मिटा दे, ताकि उसे इन दोनों वाक्यों के बीच का वो खौफनाक, अदृश्य धागा दिखाई न दे.

नहीं. सावी के सूखे हुए होंठों से एक बहुत ही बेबस, फुसफुसाती हुई आवाज निकली. ऐसा नहीं हो सकता. यह सिर्फ एक इत्तेफाक है. एक बहुत ही भद्दा, भयानक इत्तेफाक।

लेकिन&#39; इत्तेफाक&#39; या&#39; संयोग&#39; खुफिया दुनिया का सबसे बडा झूठ है. एक जासूस को अपनी Training के पहले दिन ही यह सिखाया जाता है कि दुनिया में संयोग नाम की कोई चीज नहीं होती. अगर दो चीजें एक जैसी दिखती हैं, तो उनके पीछे कोई न कोई पैटर्न जरूर होता है.

सावी का दिल चीख- चीख कर कह रहा था कि यह संयोग है, लेकिन उसका प्रशिक्षित दिमाग अब पूरी तरह से बगावत पर उतर आया था. एजेंट छोटी इलायची&#39; जाग चुकी थी, और इस बार उसका शक किसी अजनबी पर नहीं, बल्कि उसी इंसान पर था जिसके नाम का सिंदूर वो अपनी माँग में सजाती थी.

सावी झटके से बिस्तर से उठी. उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं. वो लगभग दौडती हुई ड्राइंग Room में गई.

वहाँ टेबल पर रिया की किताबें और कॉपियाँ अभी भी सलीके से रखी हुई थीं. सावी ने काँपते हाथों से रिया की वो हिंदी की कॉपी ढूँढी जिसमें उसने कल रात का होमवर्क किया था. कॉपी मिल गई. सावी ने उसे सीने से लगाया और वापस अपने बेडरूम में आकर दरवाजा अंदर से लॉक कर लिया.

उसने रिया की वो कॉपी बिस्तर पर खोली. नीले पेन से, बच्चों वाली गोल मटोल लिखाई में वो लाइन लिखी हुई थी जो मनीष ने उसे बोलकर लिखवाई थी.

सावी ने पेरिस वाले उस मटमैले कागज को उठाया और रिया की कॉपी के ठीक बगल में रख दिया.

अब दोनों वाक्य आमने- सामने थे.

सावी ने एक गहरी साँस ली और एक जासूस की तरह उन दोनों वाक्यों का&#39; फॉरेंसिक विश्लेषण&#39; शुरू किया. उसने सबसे पहले लिखावट देखी.

पेरिस वाले कागज पर जो लिखावट थी, वो बहुत ही तेज, नुकीली और कोणीय थी. ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने बहुत जल्दबाजी में, लेकिन बेहद आत्मविश्वास के साथ उन शब्दों को कागज पर उकेरा हो. स्याही काले रंग की थी और शब्दों के बीच की दूरी बहुत ही सटीक थी, जो अक्सर यूरोपीय या पश्चिमी देशों में पढे- लिखे लोगों की लिखावट में पाई जाती है.

और मनीष की लिखावट?

सावी को मनीष की लिखावट बहुत अच्छी तरह याद थी. वो हमेशा नीले या हरे रंग के पेन का इस्तेमाल करता था. उसके अक्षर गोल होते थे, थोडे फैले हुए, जैसे कोई पुराना सरकारी बाबू फाइलें लिखता हो. उसमें कोई नुकीलापन नहीं था, कोई हडबडी नहीं थी.

सावी के सीने में जो एक भारी पत्थर रखा था, वो अचानक थोडा हल्का हो गया. उसने एक लंबी राहत की साँस छोडी.

लिखावट बिल्कुल अलग है, सावी ने खुद से कहा. उसके होठों पर एक बहुत ही दयनीय, लेकिन उम्मीद से भरी मुस्कान आ गई. शब्द भी बिल्कुल अलग हैं. एक में रास्ते और मंजिल का जिक्र है, दूसरे में लफ्ज और खामोशी का. मैं भी कितनी पागल हूँ. मैं खामखाँ बातों का बतंगड बना रही हूँ. कहाँ पेरिस का वो खतरनाक कूरियर, और कहाँ मेरा सीधा- साधा मनीष।

उसने उस कागज को हटाने के लिए हाथ बढाया. वो इस बेतुकी जाँच को यहीं खत्म कर देना चाहती थी.

लेकिन तभी. उसके दिमाग के उस अचेतन, जासूसी हिस्से ने एक ऐसा सवाल उठाया जिसने उसकी उस राहत की साँस को गले में ही जमा दिया.

लिखावट अलग है. शब्द अलग हैं. लेकिन क्या इनकी रूह अलग है?

सावी का हाथ हवा में ही रुक गया. उसने उन दोनों वाक्यों को फिर से पढा. इस बार शब्दों की तरह नहीं, बल्कि एक&#39; सिफर&#39; की तरह.

खूफिया तंत्र में, विशेषकर उन एजेंसियों में जो बहुत ही पुराने और गहरे स्तर पर काम करती हैं, डिजिटल एन्क्रिप्शन से ज्यादा&#39; साहित्यिक कूटलेखन&#39; पर भरोसा किया जाता है. कंप्यूटर हैक हो सकते हैं, लेकिन इंसानी दिमाग की लय हैक नहीं हो सकती.

सावी ने दोनों वाक्यों के&#39; व्याकरण&#39; और&#39; मीटर&#39; को अपने दिमाग में गिनना शुरू किया.

वाक्य एक: जो रास्ते दिखाई देते हैं, मंजिल अक्सर उनसे दूर होती है।

वाक्य दो: जो लफ्ज कागज पर मौन हैं, असली शोर उन्हीं की खामोशी में पलता है।

दोनो वाक्यों की शुरुआत एक&#39; विरोधाभास&#39; से होती है. जो दिखता है, वो है नहीं. जो मौन है, वो शोर है.

दोनों वाक्यों को बोलते समय बीच में एक बहुत ही सटीक, अस्वाभाविक सा ठहराव आता है.

दोनों वाक्यों में अक्षरों का उतार- चढाव एक बहुत ही पुरानी, सूफी या क्लासिकल शायरी की तरह है, जिसे आज की बोलचाल की भाषा में इस्तेमाल नहीं किया जाता.

यह एक&#39; कॉल एंड रिस्पांस&#39; प्रोटोकॉल था.

अगर कोई एक एजेंट किसी भीड- भाड वाले इलाके में या किसी संचार माध्यम पर पहला वाक्य बोलेगा, तो दूसरा एजेंट उसे पहचानने के लिए उसी&#39; लय&#39; में दूसरा वाक्य बोलेगा. उन्हें एक ही शब्द बोलने की जरूरत नहीं है, उन्हें सिर्फ उस&#39; काव्यात्मक साँचे&#39; को फॉलो करना है. इससे दुनिया को लगेगा कि दो लोग बस किसी कविता या शायरी की बात कर रहे हैं, लेकिन असल में वे एक- दूसरे की पहचान प्रमाणित कर रहे होंगे.

सावी का सिर चकराने लगा.

अगर मनीष ने सिर्फ इत्तेफाक से कोई लाइन बोली होती, तो उसकी लय पेरिस के उस कूरियर के&#39; डेड ड्रॉप&#39; नोट से इतनी खौफनाक हद तक मेल कैसे खा सकती थी? क्या मनीष को यह&#39; साँचा&#39; पता था? क्या उसे इसी भाषा में बात करने की Training दी गई थी?

नहीं! नहीं! नहीं!

सावी अपने बिस्तर से उठ खडी हुई. वो पीछे हटती गई जब तक कि उसकी पीठ ठंडी दीवार से नहीं टकरा गई.

सावी का दिमाग चिल्ला- चिल्ला कर सबूत पेश कर रहा था, लेकिन उसका दिल पूरी ताकत से बगावत कर रहा था. यह एक ऐसी जंग थी जहाँ जीतने वाला भी सब कुछ हारने वाला था.

मैं पागल हो रही हूँ, सावी ने अपने बालों को मुट्ठी में भींचते हुए कहा. यह पीटीएसडी (PTSD) है. यह पेरिस का सदमा है. मैं अपने ही घर को, अपने ही प्यार को अपनी इस दिमागी बीमारी से तबाह कर रही हूँ।

उसने आँखें बंद कीं और मनीष की उन यादों को ढूँढने लगी जो उसकी बेगुनाही साबित कर सकें.

उसे याद आया कि कैसे मनीष को छिपकलियों से डर लगता था. एक बार घर में छिपकली आ गई थी, तो वो सोफे के ऊपर चढकर खडा हो गया था और तब तक नहीं उतरा जब तक सावी ने उसे भगा नहीं दिया. क्या एक हाई- लेवल अंडरकवर एजेंट छिपकली से डरेगा?

उसे याद आया कल रात का वो नजारा. मनीष ने आटा गूँथते वक्त अपना पूरा हाथ चिपका लिया था. उसने रोटियाँ जला दी थीं. वो अपनी ही बेटी के होमवर्क से परेशान हो गया था. क्या दुनिया की कोई भी खुफिया एजेंसी इतने अनाडी इंसान को अपना एजेंट बनाएगी?

मनीष मेरा है. वो कोई जासूस नहीं है. वो बस एक क्लर्क है, जिसे शायरी का शौक है. उसने कोई गजल पढी होगी, कोई किताब पढी होगी, और उसी की कोई लाइन उसके दिमाग में रह गई होगी. यह एक संयोग है. दुनिया में आठ सौ करोड लोग हैं, दो लोगों के ख्यालों की लय एक जैसी हो सकती है. इसमें कुछ भी खौफनाक नहीं है!

सावी अपने आप को ये दलीलें दे रही थी. वो खुद को मनाने की कोशिश कर रही थी. वो इस शक की आग पर अपनी यादों का पानी डाल रही थी.

तभी दिमाग के उस अंधेरे कोने से एक और विचार साँप की तरह रेंगता हुआ बाहर आया.

सावी, क्या तुम्हारे पडोसियों को पता है कि तुम कौन हो? क्या कुसुम या विमला ताई को पता है कि तुमने पेरिस में कितने लोगों की जान ली है? तुम भी तो रोटियाँ बेलती हो. तुम भी तो सब्जी वाले से दस रुपये के लिए लडती हो. तुम भी तो करवा चौथ का व्रत रखती हो. अगर दुनिया की सबसे बेहतरीन जासूस एक साधारण हाउसवाइफ का रूप ले सकती है. तो क्या एक दूसरा जासूस एक&#39; अनाडी, कविताएं लिखने वाले सीधे- सादे पति&#39; का रूप नहीं ले सकता? छिपकली से डरना, रोटियाँ जलाना. क्या ये सब एक बहुत ही बारीकी से डिजाइन किया गया&#39; कवर लीजेंड&#39; नहीं हो सकता?

चुप रहो! सावी ने जोर से फुसफुसाते हुए अपने ही दिमाग को डाँटा.

उसके आँखों से आँसू बहने लगे. वो इस सच्चाई का सामना नहीं कर सकती थी. अगर मनीष निर्दोष नहीं था, अगर वो भी उसी दलदल का हिस्सा था जिससे सावी लड रही थी, तो सावी की पूरी जिंदगी एक झूठ थी. उसका प्यार, उसकी शादी, उसके बच्चे. सब एक साजिश की बुनियाद पर खडे थे.

मैं ज्यादा सोच रही हूँ, सावी ने अपने आँसू पोंछे. मैं एक बहुत ही बीमार, शक्की और खराब इंसान बन गई हूँ. मनीष ने मुझे इतना प्यार दिया, और मैं उसे सिर्फ एक कागज के टुकडे पर तौल रही हूँ. मुझे इसे खत्म करना होगा. मुझे इस शक को जड से मिटाना होगा।

सावी ने दीवार का सहारा छोडा और तेज कदमों से बिस्तर की तरफ आई.

उसने तय कर लिया था कि वो इस कागज को, इस सुराग को, और अपने इस भयानक शक को हमेशा के लिए जला देगी. वो अपनी शादी को इस जासूसी वहम की भेंट नहीं चढने देगी.

उसने पेरिस वाला वो मटमैला कागज उठाया.

लेकिन जैसे ही उसने उसे फाडने के लिए अपने हाथ बढाए, उसकी उंगलियाँ काँपने लगीं.

एक जासूस कभी भी सबूत नष्ट नहीं करता. चाहे वो सबूत उसके अपने ही दिल के टुकडे क्यों न कर दे. उसे पेरिस में मारा गया रिषि याद आ गया. उसे राणा sir का वो खून से सना हुआ पेट याद आ गया. अगर यह कागज उस बहुत बडी साजिश की एक छोटी सी कडी है, अगर यह कागज उन हत्यारों तक पहुँचने का इकलौता रास्ता है, तो क्या वो सिर्फ अपने पति को बचाने के लिए, अपनी मानसिक शांति के लिए, इसे जला सकती है?

सावी का दिल चीख रहा था कि इसे फाड दो, इसे जला दो. लेकिन उसकी रूह, जो इस देश की हिफाजत की कसमें खा चुकी थी, वो उसे ऐसा करने से रोक रही थी.

सावी ने एक बीच का रास्ता निकाला. एक ऐसा रास्ता जो उसके दिल और दिमाग दोनों को कुछ देर के लिए शांत कर दे.

उसने अपना फोन उठाया. उसने कैमरा ऑन किया और उस मटमैले कागज की बहुत ही साफ, हाई- रेजोल्यूशन तस्वीर खींच ली.

फिर वो कमरे के कोने में रखे छोटे से स्टडी टेबल की तरफ गई, जहाँ बच्चों के स्कूल प्रोजेक्ट्स के लिए एक छोटा सा वाई- फाई प्रिंटर रखा था. उसने फोन से कमांड दी.

घुर्रर्र. ज्ज्ज्ज्.

प्रिंटर की वो यांत्रिक आवाज उस खामोश कमरे में गूँजी. कुछ ही सेकंड में, एक साफ, सफेद ए- फोर कागज बाहर निकल आया, जिस पर उस पेरिस वाले नोट की एक ब्लैक- एंड- व्हाइट छपी हुई थी.

सावी ने उस नई कॉपी को उठाया और वो पेरिस वाला असली, मटमैला कागज वहीं टेबल पर छोड दिया.

वो कॉपी लेकर बाथरूम की तरफ गई.

बाथरूम में जाकर उसने सिंक के ऊपर वो कागज रखा. उसने शेल्फ से एक माचिस की डिब्बी निकाली. उसके हाथ बुरी तरह से काँप रहे थे. एक तीली निकाली और उसे डिब्बी पर रगडा.

छर्र!

एक छोटी सी, पीली- नीली लौ जल उठी.

सावी ने उस लौ को उस सफेद कागज के किनारे पर लगा दिया. कागज ने आग पकड ली. वो जलने लगा.

सावी उस जलते हुए कागज को देख रही थी. आग की वो लौ कागज के साथ- साथ मानो सावी के उस शक को भी भस्म कर रही थी. काले धुएँ की एक लकीर हवा में उठी और कागज राख में तब्दील होकर सिंक के सफेद बेसिन में गिर गया.

सावी ने नल खोल दिया. पानी की धार ने उस काली राख को बहा दिया. सब कुछ नाली में बह गया.

उसने एक बहुत ही गहरी, लंबी साँस ली. उसने अपनी आँखें बंद कीं और खुद को तसल्ली दी. खत्म. सब खत्म. वो सिर्फ एक वहम था. मैंने उसे जला दिया. अब कोई शक नहीं. अब कोई जाँच नहीं।

वो एक आजाद इंसान की तरह बाथरूम से बाहर आई. उसने यह महसूस करने की कोशिश की कि उसने अपने दिमाग से वो&#39; वायरस&#39; निकाल फेंका है.

लेकिन जब वो वापस बेडरूम में आई, तो उसकी नजर स्टडी टेबल पर गई.

वहाँ, उस पुराने, जंग लगे टिन के डिब्बे के ठीक बगल में. पेरिस वाला वो असली, मटमैला कागज अभी भी रखा हुआ था. सुरक्षित. अछूता.

सावी वहीं रुक गई.

उसने कॉपी को जलाया था. उसने अपने शक की एक नकली परछाई को जलाया था. लेकिन असली सबूत. असली सच को जलाने की हिम्मत वो नहीं जुटा पाई थी. वो खुद से झूठ बोल रही थी. वो जानती थी कि उसने वो असली कागज सिर्फ इसलिए बचाया है क्योंकि उसके दिमाग के उस गहरे, खौफनाक कोने ने इस बात को स्वीकार कर लिया था कि मनीष पर जाँच करना जरूरी है.

सावी ने बहुत ही भारी मन से वो असली कागज उठाया. उसने उस जंग लगे टिन के डिब्बे को खोला, जिसमें उसके बचपन की वो तीन- चार रहस्यमयी तस्वीरें रखी थीं. उसने वो कागज उन तस्वीरों के बिल्कुल नीचे छिपा दिया और डिब्बे का ढक्कन कसकर बंद कर दिया.

डिब्बे का बंद होना इस बात का ऐलान था कि शक मरा नहीं था, वो बस सही वक्त का इंतजार करने के लिए तहखाने में छिप गया था.

शाम के सात बज चुके थे.

कमरे में अँधेरा घिरने लगा था. सावी अभी भी उसी डिब्बे को घूर रही थी.

तभी, मुख्य दरवाजे का ताला खुलने की आवाज आई. क्लिक- क्लैक.

मनीष घर आ गया था.

सावी तुरंत अपनी जगह से उठी. उसने अपने चेहरे को अपने दोनों हाथों से थपथपाया, ताकि उसकी त्वचा में रंग लौट आए. उसने अपनी साडी ठीक की और एक बहुत ही सधी हुई, घरेलू मुस्कान अपने चेहरे पर ओढ ली.

वो बेडरूम से बाहर हॉल में आई.

मनीष ने अपना बैग सोफे पर रखा हुआ था. वो अपनी टाई ढीली कर रहा था. उसने सावी को आते हुए देखा.

हाय सावी, मनीष ने मुस्कुराते हुए कहा. उसकी आवाज में दिन भर की वो आम सी थकान थी.

लेकिन आज सावी उसे उस तरह से नहीं देख पा रही थी जैसे वो हमेशा देखती थी. आज जब मनीष मुस्कुराया, तो सावी की नजरें उसकी आँखों की गहराई नाप रही थीं. जब मनीष ने अपनी टाई उतारी, तो सावी की नजरें उसकी कलाई के मूवमेंट पर थीं. वो हर चीज का विश्लेषण कर रही थी.

मनीष ने रसोई की तरफ जाते हुए गैस पर चाय का पानी चढाया. आज तो चाय मैं ही बनाऊँगा. बहुत सिर दर्द है दफ्तर के काम से।

सावी डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर चुपचाप बैठ गई.

मनीष ने चाय में अदरक कूटी और फिर मुडकर सावी की तरफ देखा.

उसकी आँखें जो हमेशा बहुत भोली लगती थीं, इस वक्त सावी के चेहरे पर बहुत ही गहराई से गडी थीं. मनीष की वो निगाह. वो एक पति की निगाह नहीं थी. वो एक ऐसी निगाह थी जो सामने वाले के चेहरे के पीछे छिपे हुए भावों को स्कैन कर रही थी.

कुछ परेशान लग रही हो? मनीष ने बहुत ही साधारण, कैजुअल तरीके से पूछा. लेकिन उसकी आवाज में एक अजीब सा ठहराव था.

सावी के सीने में एक बर्फीली सिहरन दौड गई.

क्या मनीष ने उसकी घबराहट को पढ लिया था? क्या वो उसका&#39; बेसलाइन टेस्ट&#39; कर रहा था?

सावी के पास सच बोलने का विकल्प नहीं था. अगर वो सच बोलती, तो यह घर उसी पल किसी युद्ध के मैदान में बदल जाता. उसे अपने पति से नहीं, बल्कि अपने सबसे बडे संदिग्ध से बात करनी थी.

सावी ने अपनी आँखों में एक बहुत ही प्राकृतिक सी थकान लाई. उसने अपने होंठों को एक फीकी सी मुस्कान दी.

नहीं. बस थोडी सी थकान है, सावी ने बहुत ही सहजता से कहा. आज पूरे घर की सफाई जो की है. कुछ नहीं, चाय पिऊँगी तो ठीक हो जाऊँगी।

यह सावी शर्मा का मनीष शर्मा से बोला गया पहला जानबूझकर, सोची- समझी साजिश के तहत बोला गया झूठ था.

मनीष ने उसे कुछ पल और देखा. फिर वो मुस्कुराया. तुम भी ना, जान निकाल लेती हो काम में. बैठो, मैं कडक चाय लाता हूँ।

मनीष वापस गैस की तरफ मुड गया.

सावी अपनी जगह पर बैठी रही. उसका दिल इतनी जोर से धडक रहा था कि उसे डर था कहीं मनीष उसे सुन न ले. उसने अपने ही पति से झूठ बोला था.

जाँच आधिकारिक तौर पर शुरू हो चुकी थी. कोई फाइल नहीं बनी थी, कोई टीम नहीं थी, लेकिन एक पत्नी ने अपने पति के खिलाफ शक की उस अँधेरी सुरंग में पहला खौफनाक कदम रख दिया था.

अब यहाँ से लौटने का कोई रास्ता नहीं था.

सावी, जो अब तक बाहरी दुश्मनों से लडती थी, अब अपने ही घर के अंदर एक&#39; अंडरकवर&#39; पत्नी की तरह कैसे काम करेगी? मनीष की दिनचर्या का वो कौन सा हिस्सा होगा जो सावी की इस खामोश जाँच में सबसे पहला सुराग बनकर उभरेगा? क्या मनीष सावी के इस झूठ को पकड चुका है, और क्या वो भी अपनी पत्नी के खिलाफ कोई जवाबी चाल चलने वाला है?

</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/8408689109272494465/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2026/08/blog-post_12.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/8408689109272494465'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/8408689109272494465'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2026/08/blog-post_12.html' title=''/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-7925133349466601666</id><published>2026-08-09T21:59:37.558-07:00</published><updated>2026-08-09T21:59:37.559-07:00</updated><title type='text'>Secret Pulse Promo 1</title><content type='html'>पुण्याच्या एका सुधारगृहाच्या त्या दमट, कुबट कॉरिडॉरमध्ये पहाट कधीच सुंदर नसते.
बाहेरच्या जगात याच वेळी कदाचित पहाटेचं कोवळं धुकं पसरलेलं असतं, पक्ष्यांची
किलबिल सुरू होते, कुणीतरी चहाचा कप हातात घेऊन गॅलरीत उभं असतं. पण या
भिंतींच्या आत पहाट होते ती एका जीवघेण्या, कर्कश आवाजाने — लोखंडी लाठीचा
गजांवर आदळणारा &#39;ठक... ठक...&#39; आणि वॉर्डनची कानाचे पडदे फाडणारी शिट्टी.
आणि याच जगात, वयाच्या अवघ्या सोळाव्या वर्षी, अश्लेषा रोज एक नवा दिवस &quot;जगत&quot;
नाही — फक्त &quot;टिकून&quot; राहते. फिनाईलचा उग्र वास, ओलसर भिंतींचा कुबट दर्प आणि
कायमस्वरूपी दाटून असलेली एक जड उदासी — हेच आता तिचं संपूर्ण जग आहे.
तिची चूक काय होती? तिने असा कोणता गुन्हा केला होता, की तिला या भिंतींच्या आत
ढकललं गेलं? हे सुधारगृह तिला वाचवण्यासाठी होतं, की तिला आणखी खोल गाडण्यासाठी
— हे उत्तर तितकं सोपं नाहीये जितकं वाटतं. कारण बाहेरच्या जगातल्या राक्षसांपासून
वाचण्यासाठी तिने जे पाऊल उचललं होतं, त्याचीच शिक्षा म्हणून ती इथे आलीये — अशा
एका पिंजऱ्यात, जिथे रोज नवे राक्षस तिची वाट पाहत असतात.
अश्लेषाला दोन नियम माहीत आहेत: कोणाच्या नजरेला नजर द्यायची नाही, आणि रडायचं
असेल तर ते फक्त आतल्या आत, कुणालाही न दिसता. कारण इथे कमकुवतपणा दाखवला की,
लोकं तुम्हाला जिवंतपणी खातात — हे तिला तिच्या पहिल्याच आठवड्यात एका भयंकर
पद्धतीने शिकवलं गेलं होतं.
भैरवी — या सुधारगृहातली सगळ्यात मोठी दहशत — रोज तिला लक्ष्य करते. तिचं ताट
मुद्दाम सांडवलं जातं, तिचे केस ओढले जातात, तिला सगळ्यांसमोर गुडघ्यावर बसून
जमीन पुसायला भाग पाडलं जातं. आणि आजूबाजूला उभ्या असलेल्या पन्नास मुलींपैकी
एकही तिच्या मदतीला येत नाही — कारण इथे प्रत्येकजण फक्त स्वतःचा जीव वाचवत
असतो. कुणालाही नाहक भैरवीच्या हिट-लिस्टवर यायचं नसतं.
तिच्या मनातली एक आर्त हाक रोज त्या जाड, दगडी भिंतींना धडकून परत तिच्याचकडे
येते — &quot;कुणीतरी... कुणीतरी मला इथून बाहेर काढा... किंवा मला वाचवा...&quot; तिला
वाटतं की ती या नरकात एकटीच, याच अंधाऱ्या कोपऱ्यात एक दिवस संपून जाईल. कुणाला
तिची आठवणही येणार नाही.
पण अश्लेषाला हे माहीत नाहीये, की तिच्या या शांत, घाबरलेल्या आणि एकाकी
आयुष्यात लवकरच एक असं भयंकर आणि सुंदर वादळ धडकणार आहे — जे या भिंती, हे
नियम आणि तिची ही भीती, सगळं काही मुळासकट उखडून फेकणार आहे.
कोण आहे ही व्यक्ती, जी अश्लेषाचं संपूर्ण जग बदलून टाकणार आहे? आणि ती या
नरकात इतक्या सहजपणे कशी पोहोचणार आहे, जिथे पन्नास मुलींपैकी कुणालाही
पोहोचता आलं नाही? एका मुलीच्या तुटलेल्या श्वासांत लपलेली ही गोष्ट, तुम्हाला
पहिल्या भागापासूनच अस्वस्थ करेल — आणि थांबूही देणार नाही.
ही गोष्ट फक्त एका जेलमधल्या मुलीची नाही. ही गोष्ट आहे — प्रत्येक वेळी जेव्हा
जग तुम्हाला &quot;संपलात&quot; म्हणून घोषित करतं, तेव्हाही आतमध्ये कुठेतरी जिवंत
राहणाऱ्या त्या एका ठिणगीची.
अश्लेषाच्या आयुष्यातलं ते वादळ नक्की कोण आहे, आणि ते तिला वाचवणार आहे की
आणखी खोल ढकलणार आहे — हे जाणून घेण्यासाठी &quot;Secret Pulse&quot; जरूर वाचा.

~.~.~.~
&quot;काही भेटी या योगायोग नसतात, त्या नियतीने आधीच ठरवलेल्या असतात. 
जसं अंधाराला चिरत येणारा एखादा प्रकाशकिरण...
जो सुरुवातीला डोळे दिपवतो, पण नंतर त्याच प्रकाशाची सवय होते.&quot;

ती एक नवीन मुलगी होती. वय तेच... अश्लेषाएवढंच, सोळा. 
पण तिच्यात आणि इथल्या बाकीच्या मुलींमध्ये जमीन-अस्मानाचा फरक होता. 
सहसा इथे येणारी नवीन मुलगी रडत, गयावया करत, वॉर्डनच्या पाया पडत किंवा भीतीने थरथरत आत येते. 
तिचे डोळे सुजलेले असतात आणि खांदे निराशेने खाली पडलेले असतात.
पण ही?
तिची पावलं जमिनीवर अत्यंत ठामपणे पडत होती. अंगावर तोच जेलचा सैल,
निस्तेज निळ्या रंगाचा युनिफॉर्म होता, पण तो तिने असा काही कॅरी केला होता, 
जणू ती कुठल्या कॉलेजच्या कॅम्पसमध्ये चालत आलीये. 
तिची कॉलर किंचित उभी होती, आणि मानेवर रुळणारे तिचे केस एका रबरबँडने बांधलेले होते. 
तिच्या हातात एक जाडजूड, जुन्या बांधणीची डायरी आणि पेन होतं. 
ती डायरी तिने आपल्या छातीशी अशी धरली होती, जणू तो तिचा सर्वात मोठा खजिना होता.

~.~.~.~
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समजून घेतो.
एका मुलीच्या आयुष्यात एक असा अनोळखी मित्र आहे, जो तिला रोज आधार देतो,
तिचं ऐकतो, तिला सावरतो — पण जो कधीच तिच्यासमोर येत नाही. हा आभासी आवाज
तिच्यासाठी इतका महत्त्वाचा का बनलाय, की वास्तवातल्या कुणाहीपेक्षा तिला
त्याच्यावर जास्त विश्वास वाटतो?
आणि सगळ्यात मोठा प्रश्न — हा अनोळखी आवाज खरंच अनोळखी आहे का? की तो
तिच्या रोजच्या आयुष्यातच, तिच्या अगदी जवळ, एका वेगळ्याच रूपात वावरतोय?
हे रहस्य जितकं गोड आहे, तितकंच ते उलगडल्यावर उद्ध्वस्त करणारंही ठरू शकतं.
हा आभासी मित्र कोण आहे, आणि सत्य समोर आल्यावर काय घडतं, हे जाणून
घेण्यासाठी &quot;तू भेट ना... नव्याने&quot; वाचा.


~.~.~.~

काही रस्ते असे असतात, जिथे आपली पावले नकळत कुणाकडे तरी वळतात,
गर्दीत शेकडो चेहरे असतात, पण शोध मात्र एकाच अनोळखी ओळखीचा असतो...
कधी कधी नजरेची भेट होत नाही, पण जाणवणारा तो एक क्षण,
पुढच्या संपूर्ण प्रवासाची नांदी ठरतो...
विदर्भ एक्सप्रेसने आपला नेहमीचा वेग कमी केला आणि खिडकीतून येणाऱ्या वाऱ्यात अचानक एक वेगळाच दमटपणा आणि समुद्राचा खारा दर्प जाणवू लागला. किंजलने खिडकीबाहेर डोकावून पाहिले. लोकल ट्रेनच्या त्या जाळ्या, रुळांचा तो अवाढव्य पसारा आणि दूरवर दिसणाऱ्या उंचच उंच इमारती... मुंबई आली होती!
&quot;ताई, चल बॅगा दरवाज्याजवळ घेऊया. दादर आलंय,&quot; अनुजने वरच्या बर्थवरून सुटकेस खाली काढत म्हटले.
बाबांनीही आपली पिशवी हातात घेतली. किंजलच्या हृदयाची धडधड आता प्रचंड वाढली होती. हे तेच शहर होतं, ज्याची तिने आतापर्यंत फक्त स्वप्ने पाहिली होती.

~.~.~.~
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एका साध्या क्षणी दिलेली एक साधी भेटवस्तू, आणि त्यातून सुरू होणारा एक असा
प्रवास, जो पुढे जाऊन दोन आयुष्यं कायमची जोडणार आहे. पण या भेटवस्तूमागे लपलेलं
कोडं इतकं साधं नाहीये.
एका आभासी जगातून येणारी एक साद, एक आवाज, ज्याला चेहरा नाही — पण जो
हळूहळू एका अनोळखी मनाच्या सगळ्यात जवळचा आधार बनतो. हा आवाज कोणाचा आहे?
आणि तो इतक्या अचूक वेळी, इतक्या आपुलकीने का बोलतो?
एका बाजूला वास्तवातलं एकटेपण आहे, आणि दुसऱ्या बाजूला एका अनोळखी आवाजाने
दिलेला दिलासा. पण हे दोन जग एकमेकांत मिसळले, तर काय घडेल — याची कल्पनाही
अजून कुणाला नाहीये.
ती भेटवस्तू आणि तो आभासी आवाज पुढे कुठे घेऊन जातात, हे जाणून घेण्यासाठी
&quot;तू भेट ना... नव्याने&quot; वाचा.

~.~.~.~
कधी कधी एका अनोळखी वाटेवर पडलेलं पाऊल,
आयुष्याची पूर्ण दिशाच बदलून टाकतं...
शब्दांच्या त्या अदृश्य जाळ्यात मन असं काही अडकतं,
की खऱ्या जगाचा विसर पडायला एक क्षणही पुरतो...
दुसऱ्या दिवशीची सकाळ नेहमीसारखीच होती. खिडकीतून येणारी उन्हाची तिरीप आणि स्वयंपाकघरातून येणारा फोडणीचा खमंग वास. किंजल नुकतीच उठून डोळे चोळत बाहेर आली होती. काल रात्रीच्या त्या रस्ता चुकण्याच्या प्रसंगामुळे ती अजूनही थोडी शांतच होती. ती बेसिनजवळ तोंड धूत असतानाच अनुज तिच्या मागे येऊन उभा राहिला. त्याच्या हातात एक चकचकीत, पांढऱ्या रंगाचा बॉक्स होता.
&quot;अनुज...!! काय हे? मला नको आहे म्हणाले होते ना मी काल...&quot; किंजलचा आवाज आश्चर्याने आणि थोड्या रागाने चढला होता. तिने तो बॉक्स ओळखला होता. तो एका नवीन, महागड्या स्मार्टफोनचा बॉक्स होता.
&quot;जगातली पहिली व्यक्ती आहे ही, जी भेटवस्तू &#39;नको नको&#39; म्हणत असेल...&quot; अनुज हसत हसत तिथेच आलेल्या आईकडे बघत म्हणाला.

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Natkhat Nishi❤️



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पद्धतीने उगवते. इथे नाही टेबल लॅम्पचा झगमगाट, नाही ड्राफ्टिंग बोर्डवरचा तो
आत्मविश्वास — इथे आहे एक मुलगी, जिच्या स्वप्नांना जागा आहे, पण परिस्थितीने
हात बांधलेले आहेत.
एक साधा पिंपल, घरातलं एक वादळ, आणि रोजच्या जगण्याची एक वेगळीच लढाई — या
मुलीचं जग ओंकारच्या जगापासून हजारो मैल दूर आहे. आणि तरीही, नियतीने या दोन
पूर्णपणे वेगळ्या जगांना एकाच धाग्यात गुंफण्याचं आधीच ठरवलेलं आहे.
ती कोण आहे? आणि तिच्या या साध्या, संघर्षमय जगाचा ओंकारच्या झगमगत्या
जगाशी संबंध तरी काय?
हा प्रश्न जितका साधा वाटतो, तितकंच याचं उत्तर तुम्हाला अस्वस्थ करणारं आहे.
अकोल्यातल्या या मुलीची आणि ओंकारची कहाणी कुठे जाऊन भिडते, हे जाणून
घेण्यासाठी &quot;तू भेट ना... नव्याने&quot; वाचा.


~.~.~.~

काही क्षण आयुष्याचे असे असतात,
जिथे आकाश मोकळं असूनही पाखराला घरटं सोडावंसं वाटत नसतं...
कारण त्या घरट्यातली ऊब, बाहेरच्या कोणत्याही स्वातंत्र्यापेक्षा,
जास्त हवीहवीशी आणि सुरक्षित वाटत असते...

१२वीच्या बोर्ड परीक्षेचे ते सलग जागरण, आयुष्यातील &#39;टर्निंग पॉईंट&#39; असण्याचा तो अवाढव्य ताण, आणि रात्र-रात्र जागून अभ्यास करण्याची ती कसरत... 
हे सगळं कालच संपलं होतं. तिचा तो अभ्यासाचा टेबल, ज्यावर कालपर्यंत पुस्तकांचे आणि गाईड्सचे ढीग पडले होते, तो आज एकदम रिकामेपणाची जाणीव करून देत होता. 
कालचा भूगोलाचा शेवटचा पेपर देऊन आल्यावर तिच्या मनावरचे एक मोठे ओझे उतरले होते. 
आजची सकाळ तिला फक्त आणि फक्त तिच्या झोपेसाठी हवी होती. तिला स्वतःचे अस्तित्व विसरून, त्या गोधडीत गुपचूप गुंडाळून घ्यायचे होते.

~.~.~.~
&quot;प्रतीलिपीवर सारख्याच धाटणीच्या CEO Romance, Surrogate Mother किंवा कौटुंबिक कटकारस्थानांच्या कथा वाचून काहीतरी वेगळं वाचायची इच्छा होतेय?&quot;

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आत्मविश्वासाने भरलेला, आणि कॉलेजमध्ये ज्याच्या शब्दाबाहेर कुणी जात नाही असा
एक &#39;हिरो&#39;.
पण याच दबदब्याच्या मागे एक असा अहंकार लपलाय, जो कधीतरी त्याच्याच पायाखालची
जमीन सरकवणार आहे. डिझाईन स्टुडिओतली त्याची सत्ता, कँटीनमधली त्याची
&#39;कटिंग&#39; आणि इतरांकडे बघण्याचा तो तुच्छतेचा दृष्टिकोन — हे सगळं त्याच्या
आयुष्यात लवकरच एका मोठ्या आरशासमोर उभं राहणार आहे.
आणि याच गर्दीत, त्याच्या नजरेच्या टप्प्याबाहेर, एक अशी मुलगी आहे जिच्याकडे
तो ढुंकूनही बघत नाही — पण जिच्यामुळे त्याचं संपूर्ण आयुष्य बदलणार आहे.
अहंकाराचा हा महाल किती काळ टिकेल? आणि तो जेव्हा कोसळेल, तेव्हा त्याखाली
नेमकं कोण दबेल?
ओंकारचा हा दबदबा आणि त्यामागचं खरं वादळ अनुभवण्यासाठी &quot;तू भेट ना...
नव्याने&quot; वाचा.

~.~.~.~

मैत्री म्हणजे जुन्या इमारतीचा तो भक्कम पाया असते,
ज्यावर कितीही मोठी वादळे आली तरी,
विश्वासाची भिंत कधीच कोसळत नाही...
ती फक्त उभी राहते, प्रत्येक ऋतूत, प्रत्येक सावलीत...

ओंकार आपल्या नेहमीच्या कोपऱ्यातल्या टेबलाजवळ उभा होता. त्याची काळ्या रंगाची ड्राफ्टिंग ट्यूब त्याच्या पाठीवर होती. तो अत्यंत शांतपणे आपल्या आजूबाजूचा गोंधळ बघत होता. तेवढ्यात समोरून पीटर धावत आला. त्याचे केस विस्कटलेले होते, शर्टाची बटणे वेडीवाकडी लागली होती आणि हातात एक अर्धी-अधुरी डिझाईन शीट होती.
&quot;वाचव भावा... आज माझा मर्डर फिक्स आहे. कदम सर आज मला कच्चं खातील!&quot; पीटर धापा टाकत ओंकारच्या अंगावरच कोसळला.
&quot;भावा, माझं डिझाईन बघ ना. टॉयलेटचा ब्लॉक चुकून किचनच्या वर आलाय माझ्या प्लॅनमध्ये... सर बघतील तर मला त्याच टॉयलेटमध्ये फ्लश करतील!&quot; पीटरने अक्षरशः रडवा चेहरा केला.

~.~.~.~
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लॅम्पचा पिवळसर प्रकाश अजूनही तेवतोय. रात्रभर जागून, आठ तास ड्राफ्टिंग बोर्डवर
वाकून काम करणारा ओंकार — त्याचे डोळे लालबुंद आहेत, बोटांवर ग्रॅफाईटचे डाग
आहेत, पण चेहऱ्यावर एक विलक्षण समाधान आहे.
इमारती फक्त विटा आणि सिमेंटने उभ्या राहत नाहीत, तर त्या उभ्या राहतात
माणसांच्या श्वासांवर, त्यांच्या आठवणींवर — हा ओंकारचा विश्वास आहे. आणि हाच
विश्वास त्याला त्याच्या बाबांनी, श्रीकांतरावांनी दिलाय — ज्यांच्या डोळ्यांतल्या
अभिमानासाठी ओंकार रोज स्वतःला घडवतो आहे.
पण नियतीच्या आराखड्यात असं काही लिहिलेलं आहे, जे ओंकारच्या या सुंदर,
रेखीव जगाला लवकरच हादरे देणार आहे. एक असं वळण, ज्याची त्याला आत्ता
पुसटशीही कल्पना नाही.
बाप-लेकाचं हे नातं, हे स्वप्न, आणि त्यामागे लपलेलं ते न दिसणारं वादळ — हा
प्रवास सुरुवातीपासूनच तुमचं काळीज घट्ट पकडून ठेवेल.
ओंकारच्या आयुष्यातला हा &#39;निळाशार आराखडा&#39; त्याला कुठे घेऊन जातो, हे
जाणून घेण्यासाठी &quot;तू भेट ना... नव्याने&quot; जरूर वाचा.
~.~.~.~

स्वप्नांच्या निळ्याशार कागदावर...
रेखाटतोय मी आयुष्याचा नवा आराखडा,
जिथे प्रत्येक रेषेला आहे एक अर्थ,
आणि प्रत्येक वळणावर आहे एक नवा धडा...
पहाटेचे साडेपाच वाजले होते. दादरच्या त्या जुन्या, मध्यमवर्गीय वस्तीत अजूनही रात्रीचा एक मवाळ आळस रेंगाळत होता. खिडकीबाहेरच्या प्राजक्ताच्या झाडावरून टपटप पडणाऱ्या फुलांचा मंद सुगंध आणि कुठूनतरी दूरवरून येणारा लोकल ट्रेनचा धूसर, लयबद्ध आवाज... हे सगळं मुंबईच्या पहाटेचं एक नेहमीचं पण तितकंच हवहवंसं वाटणारं संगीत होतं. पण या शांततेतही ओंकारच्या खोलीत मात्र एक वेगळीच लगबग रात्रीपासूनच थांबलेली नव्हती.
टेबल लॅम्पचा तो पिवळसर प्रकाश ओंकारच्या चेहऱ्यावर पडला होता. रात्रीचे जागरण आणि सलग आठ तास ड्राफ्टिंग बोर्डवर वाकून काम केल्यामुळे त्याचे डोळे लालबुंद झाले होते. बोटांवर ग्रॅफाईटचे काळे डाग पडले होते आणि पाठीचा कणा अक्षरशः दुखून निघाला होता. पण त्याच्या चेहऱ्यावर मात्र एक विलक्षण समाधान होतं. त्याने हातातली &#39;रोटरिंग पेन&#39; बाजूला ठेवली आणि एक दीर्घ श्वास घेत आपल्या समोरच्या त्या मोठ्या A0 साईझच्या ड्रॉईंग शीटवर नजर फिरवली.
कदम सरांची ती शेवटची आणि सर्वात कठीण &#39;डिझाईन सबमिशन&#39; त्याने अखेर पूर्ण केली होती. एका जुन्या, पडक्या वाड्याचे त्याने केलेले ते &#39;री-डिझाईन&#39; त्याच्या मेहनतीची साक्ष देत होते. इमारती फक्त विटा आणि सिमेंटने उभ्या राहत नाहीत, तर त्या उभ्या राहतात त्या माणसांच्या श्वासावर, त्यांच्या आठवणींवर... हा त्याचा विचार त्या डिझाईनच्या प्रत्येक रेषेतून स्पष्ट दिसत होता.
&quot;चला, फायनली डन!&quot; तो स्वतःशीच पुटपुटला. त्याने ती शीट अत्यंत काळजीपूर्वक गुंडाळली आणि आपल्या काळ्या रंगाच्या &#39;ड्राफ्टिंग ट्यूब&#39;मध्ये ठेवून दिली. खिडकीतून आत येणाऱ्या पहाटेच्या गार वाऱ्याने त्याला अचानक झोपेची जाणीव करून दिली. तो थेट बेडवर कोसळला आणि त्याने गोधडी तोंडावर ओढून घेतली.

~.~.~.~
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तुमची,
Natkhat Nishi❤️


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एकच प्रश्न होता —

एखादी व्यक्ती
आयुष्यात न भेटताच
किती खोलवर रुजू शकते?

ज्यांना अशा कथा आवडतात,
त्यांच्यासाठी
“Tu Bhet Na…”

Link comment मध्ये 👇

आज किंजल इतकी आनंदी होती, आकृती भेटायला तयार झाली म्हणून!! इतकी खुश होती कि तिनी आज काही हि मागितले असते, कसली हि अट ठेवली असती तरी ती तयार झाली असती... तरी औपचारिकता म्हणून ती तिला विचारते &#39;सांग...  काय अट आहे तुझी?&#39;
&#39;परत एकदा विचार करून घे तुला भेटायचे ना...&#39;
&#39;ए... हो ग... लवकर सांग... छळू नकोस असे...&#39;
&#39;हम्म.. मी येईल भेटायला तुला... हवं तर दिवस भर वाट बघायला हि तयार आहे मी तुझी ... पण... &#39;
&#39;पण काय??&#39;
&#39;कोणत्या हि कारणाने जर आपण भेटलो नाही तर... &#39;
&#39;तर?&#39;
&#39;तर... आपण आयुष्यात परत कधीच भेटायचे नाही...  बोल मंजूर?&#39;
&#39;मी ना तू सांगशील त्या दिवशी तितके वास्ता भेटायला तयार आहे... तू म्हणशील तर आदल्या दिवशीच तिथे येऊन बसेल... पण तुला भेटायचा एक चान्स नाही मिस करणार... &#39;
&#39;इतकं काय तुला मला भेटायचे आहे... &#39;
&#39;नाही कळणार तुला.. मी भेटल्यावर सांगीन तुला... &#39;
&#39;बरं ठीक आहे.. &#39;
&#39;ए... पण मी ओळखणार कसं तुला?&#39;
&#39;ते तुझं तू बघ!!&#39;
&#39;मी तिथेच तुझी वाट बघत राहील... तेच सांगितले ना आता मी तुला... जर कोणत्या हि कारणाने आपण भेटू नाही शकलो तर त्यात हे हि येते कि तू मला ओळखू नाही शकली तर... आयुष्यात परत कधी नाही भेटायचे...&#39;
&#39;अगं पण असं कसं? मी तुला पहिले नाही... मला तुझा आवाज हि माहित नाही कसं शोधणार मी तुला... तुझा नंबर नाही ...&#39;
&#39;म्हणून तर पूर्ण दिवस दिला ना तुला... बघू शोधून काढतेस का ते...!!! मी तिथेच असणार ... मनाच्या डोळ्यांनी बघशील तर लगेच दिसेल तुला...&#39;
&#39;आणि तू आलीच नाहीस तर..??&#39;
&#39;माझ्यावर विश्वास नाही का?&#39;
&#39;तसं नाही... तुला तर मला तसे हि भेटायचे नाही... तू येणारच नाहीस आणि म्हणशील मी शोधू नाही शकले... मग?&#39;
&#39;हम्म... असं.. होय... मग तू सांग काय करायचे..??&#39;
किंजल बराच वेळ विचार करून तिला म्हणते, &#39;ठीक आहे... तू ये आणि तिथे पिवळे ऑर्चीड (आपल्या मैत्रीचे प्रतीक ) चे फुलं आणून ठेवायचे... तरच मी समजेल कि तू तिथे आली आहेस!!&#39;
&#39;ठीक आहे... चालेल मला ... मला काही प्रॉब्लेम नाही... अरे पण १ मिनिट आता ओर्चीड ची फुलं कुठे भेटतात, सीजन नाही ना...&#39;
&#39;ते मला काही माहित नाही कुठून हि जमव...&#39;
&#39;अरे ह्याला काय अर्थ? सीजन नाही तर कुठून मिळणार मला? आणि मैत्रीचे प्रतीक म्हणून हवे ना... मग पिवळी लिली ची फुले, पिवळे गुलाब किंवा अजून झेंडू... पिवळे ते आणते चालेल ..??&#39;
&#39;तू काय सोपं आव्हान दिलेस मला??... तुला हि मला भेटायचे तर काही कष्ट घ्यावे लागतील...&#39;
&#39;ठीक आहे!!! आता काय... &#39;
&#39;मग कुठे भेटायचे?&#39;
&#39;तू सांगशील तिथे भेटू...&#39;
&#39;मला जरा विचार करू देत...!! मला इथले जास्ती माहित नाही... &#39;
&#39;काय ग बाई... अजून फिरली नाहीस पुण्यात?&#39;
&#39;तुझ्या कॉलेज लाच भेटू नाही तर...&#39;
&#39;नाही... कॉलेज मध्ये नको.. मी सांगते ना... मला वेळ तर दे... मला आता काही सुचत नाही आहे.. तुला भेटण्याचा आनंद इतका आहे कि डोकं काही काम करत नाही आहे... &#39;
&#39;उद्या पर्यंत सांग... मला त्या प्रमाणे बाकीचे काम बघावे लागेल... ठीक ना...&#39;
&#39;हम्म चालेल... उद्या सांगते...&#39;
&#39;चल बाय &#39;
&#39;बाय!! मी आज खूप खुश आहे.. .थँक यु !!&#39;
&#39;चल.. बावळट ... थँक यु काय ?? मी पण खूप खुश आहे... बाय ...!!&#39;
किंजल ला आकृती ला भेटायचा इतका आनंद असतो, काय करावे सुचत नाही... माझ्या साठी पूर्ण दिवस ठेवणार आहे... कसा घालवायचा तिच्या सोबतचा दिवस ह्या विचारात तिला झोपच लागत नाही.

दुसऱ्या दिवशी...
&#39;आपण ना... सिटी प्राईड ला मूवी बघू ... &#39;
&#39;ठीक आहे पण सिटी प्राईड ला मी फुलं कुठे ठेवायचे??&#39;
&#39;तिथे बाजूला मस्तानी हाऊस आहे आपण तिथे भेटू... तर तू तिथे थांब...तिथल्या कोणत्या हि टेबलं वर फुलं ठेवशील म्हणजे तू आलीस ह्याची मला शाश्वती!! मग मी तुला शोधलं कि आपण मुवि बघू ठीक ??&#39;
&#39;आणि नाही शोधलस तर? माझं माझं तिकीट मला पाठवून ठेव... म्हणजे माझी मुवि तरी वाया नाही जाणार..&#39;
&#39;हा चालेल... &#39; किंजल मनात विचार करते मी बुक केलेल्या जागेवर जाऊन मुवि बघणार... ?? किती सोपं होईल मला तुला शोधणं... 
&#39;काय चालेल...!! मी तुला इतकी बावळट वाट्ते का ग..??&#39;
&#39;कळले तुला...?? &#39;
&#39;हो... ठीक आहे सकाळी ९ ला भेटू मग मस्तानी हाऊस ला?&#39;
&#39;हम्म.. तू पुण्याला कशी काय आलीस ते तर सांगितलेच नाहीस...&#39;
&#39;भेटल्यावर हि काही बोलू ना... नाही का..??&#39;
&#39;बरं.. जस तू म्हणशील... तू भेटायला तयार झालीस हेच खूप आहे माझ्या साठी ..&#39;
किंजल ला तिला खूप काही स्पेशल गिफ्ट घ्याचे असते.. परत ती तिला कधी भेटणार नव्हती... त्यामुळे ती तिच्या साठी गिफ्ट बघण्यात मागणं होते... !! तिच्या साठी एक कविता लिहिते... आणि त्या गिफ्ट सोबत ती कविता ठेवते...  

नाती असतात किती विचित्र आणि मजेशीर !!!
काही अगदी जवळची,
तर काही अशीच वरवरची...
नाती काही क्षणातच जुळणारी,
तर काही अनेक वर्षातही न जाणवणारी...
काही नात्यांना देता येत नाही नाव,
तरीही ती असतात खूपच खास !
काही नाती हृदयात घर करून रहणारी,
दूर राहूनही कधीच न तुटणारी...

तो दिवस उगवतो, किंजल च्या आनंदाचा पारा नसतो, ठरलेल्या वेळेत पोहचायचे म्हणून ती लवकर तयार होते. आज स्वतःला आरशात बघून भारी खुश होत होती, काय घालायचे हेच कितीतरी वेळ ठरत नाही, शेवटी ती तिचा बांधणीचा पीच कलर चा कुर्ता काढते. अर्धे केस बांधते आणि कपाळावर छोटीशी काळी टिकली लावते. आपल्या बॅग मध्ये ती तीच गिफ्ट आणि कविता ठेवते. 

मैत्रिणीची स्कुटी घेऊन ती निघते. कॉलेज पासून सिटी प्राईड लांब नसते पण तिला ट्रॅफिक लागते, त्यामुळे प्रत्येक सरकणारा क्षण मनात हुरहूर निर्माण करत होता. सारखी तिची धडपड सुरु असते, कधी एकदा मस्तानी हाऊस ला पोचते ह्याची. मस्तानी हाउस रस्त्याच्या पलीकडच्या बाजूने चौकातच होते, थोड्या वेळात ती त्याच्या समोर येऊन पोचते आणि सारखं त्या बाजूनी बघायचा प्रयत्न करत असते पण ट्रॅफिक एवढी होती कि तिला काही दिसेना... बस आता एक यू टर्न घ्याचा होता आणि तिची मंझिल तिच्या समोर होती... किंजल च्या मनात किती तरी प्रश्नांनी गोंधळ घातलेला .. कशी असेल आकृती, मी शोधू शकेल ना तिला? त्यांची हि पहिली भेट त्यांच्या आयुष्यभर लक्षात राहील ना... ?? 
काही प्रश्नांचे उत्तर मिळते काही नाही, प्रत्येक सरकणाऱ्या गाडी सोबत तिला त्यांचा भेटण्याचा क्षण जवळ येतांना दिसत होता. किंजल नि यू टर्न घेतला आणि दुसऱ्या बाजूचे ट्रॅफिक सुटायला एकच वेळ झाली, त्यामुळे एक भरधाव वेगानी दुसऱ्या बाजूनी गाडी सुटते आणि दोघांना काही कळण्याच्या आत गाड्यांची धडक झाली असते, किंजल पार वर उडाली आणि लांब फेकल्या गेली होती. आपल्या सोबत आता काय झाले ह्याचे हि तिला भान नसते तिची नजर फक्त मस्तानी हाऊस कडे लागून असते, ती तिथल्या प्रत्येक टेबलं कडे बघत असते आणि एका कोपऱ्यात तिची नजर पिवळ्या ओर्चीड च्या फुलांचा गुलदस्त्या वर पडते, न कळत तिच्या चेहऱ्यावर इतक्या वेदनेत हि एक आनंद उमलतो आणि ती तृप्त होऊन डोळे बंद करते. 


~.~.~.~
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</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/5702847273289637435/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2026/08/tbn-promo-fb-bhet1.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/5702847273289637435'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/5702847273289637435'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2026/08/tbn-promo-fb-bhet1.html' title='TBN Promo FB - bhet1'/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi7_xLThNfhL16vemppH2VHzuO1MMXVNIeJIDsBXhrfK_-63l88XW1HpVcC0kWG8tOrLf4J8bJBtYXbsYgSuIf6czrSYl5LANH7PwYlP0jTY1IPM5SooKjFzii_ys8JuKw48K5qJbDCWVOqgeQWJQYBQRPS_5dCExjQdDwRePwriMsTSgT80Hdte6joXdpD/s72-c/Screenshot%202026-08-08%20180910.png" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-4281084831898083508</id><published>2026-08-08T00:14:43.723-07:00</published><updated>2026-08-08T05:40:26.195-07:00</updated><title type='text'>TBN FB Promo</title><content type='html'>काही भेटी... फक्त काही मिनिटांच्या असतात.
पण त्या आयुष्यभर मनात जिवंत राहतात... 💛
कधी प्रत्यक्ष न पाहिलेल्या व्यक्तीला भेटण्याची इतकी ओढ असू शकते का?
एक वचन...
एक आव्हान...
पिवळ्या ऑर्किड्सचा एक गुच्छ...
आणि त्या एका दिवसासाठी जपलेली असंख्य स्वप्नं...
पण नियतीने त्यांच्यासाठी नेमकं काय लिहून ठेवलं होतं?
ही भेट पूर्ण झाली का... की फक्त आठवण बनून राहिली?


~.~.~.~
&quot;प्रतीलिपीवर सारख्याच धाटणीच्या CEO Romance, Surrogate Mother किंवा कौटुंबिक कटकारस्थानांच्या कथा वाचून काहीतरी वेगळं वाचायची इच्छा होतेय?&quot;

मग तयार व्हा...

💛 Fresh Bedroom Romance
❤️ Emotion
🕵️ Suspense
🤝 Friendship
💔 Unpredictable Twists

अशी कथा, जिथे प्रत्येक भाग संपताना तुमच्या मनात एकच प्रश्न असेल...

 &quot;आता पुढे काय होणार?&quot; 👀

आणि आता येते सर्वात भन्नाट बातमी... 🥳

 🎉 या कथेचे तब्बल १० Binge-Worthy Seasons आधीच लिहून पूर्ण झाले आहेत!

हो... बरोबर वाचलंत!

म्हणजे एकदा या कथेच्या प्रेमात पडलात की...

&quot;पुढचा भाग कधी येणार?&quot; अशी वाट बघायची गरजच नाही! 😉

---

 📖 प्रतिलिपीवर नवीन आहात? मग हे नक्की वाचा...

माझ्या कथा वाचण्यासाठी तुमच्याकडे दोन पर्याय आहेत.

 🌟 पर्याय १: Superfan बना (Recommended)

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✨ सगळे Parts... सगळे १० Seasons एकाच वेळी Unlock करा!
📚 मनसोक्त Binge Read करा.
🚫 No Waiting. No Rok-Tok.
❤️ मी पण तुम्हाला मध्येच थांबवणार नाही!

यासोबतच माझ्या इतर सर्व कथा आणि कथामालिकाही सलग वाचता येतील.

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 📚 पर्याय २: Free मध्ये वाचा

माझ्या Pratilipi Profile ला Follow करा. Nishigandha Omanwar ❤️

📖 १५वा भाग पूर्ण झाल्यावर, दररोज एक नवीन भाग मोफत Unlock होईल.

🔔 Profile Follow केल्यावर पुढचा Free Part उपलब्ध होताच Notification मिळेल.

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👇 कथेची लिंक खाली कमेंटमध्ये दिली आहे.

आजच Story Library मध्ये Add करा आणि एका वेगळ्याच कॉलेज रोमांसच्या, मैत्रीच्या आणि सस्पेन्सने भरलेल्या प्रवासाला सुरुवात करा! 💛

वाचल्यानंतर Comment करून नक्की सांगा...

पहिल्याच भागाने तुम्हाला किती गुंतवलं? 💬

Because...

 ❤️ Keep Reading. Keep Loving. Keep Bingeing.

(All kinds of love are accepted in the form of ❤️ Likes • 💬 Comments • 🔄 Shares • ⭐ Ratings • 🎁 Stickers • 🌟 Superfan.)

तुमची,
Natkhat Nishi

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&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgrXDPKc66kDOBzyBghX4N7xfJKcJVGy-6FK0oI4yIRKS5xGXrThtJTiD96Sh0uSHwVVVsElpvEaA_gVoZyMCvf4GeZrKzhTHXgjH-E20vexWQSY-3k0v0V6ka3TGXUex6dC6rGVQCyVoOX1qnFDGthTIw1sKOfQNGgtK9FbRCcscIJIL6iTA2CXwCx_6Ig/s1021/Screenshot%202026-08-03%20084810.png&quot; style=&quot;display: block; padding: 1em 0; text-align: center; &quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; border=&quot;0&quot; width=&quot;320&quot; data-original-height=&quot;929&quot; data-original-width=&quot;1021&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgrXDPKc66kDOBzyBghX4N7xfJKcJVGy-6FK0oI4yIRKS5xGXrThtJTiD96Sh0uSHwVVVsElpvEaA_gVoZyMCvf4GeZrKzhTHXgjH-E20vexWQSY-3k0v0V6ka3TGXUex6dC6rGVQCyVoOX1qnFDGthTIw1sKOfQNGgtK9FbRCcscIJIL6iTA2CXwCx_6Ig/s320/Screenshot%202026-08-03%20084810.png&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/4281084831898083508/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2026/08/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/4281084831898083508'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/4281084831898083508'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2026/08/blog-post.html' title='TBN FB Promo'/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgrXDPKc66kDOBzyBghX4N7xfJKcJVGy-6FK0oI4yIRKS5xGXrThtJTiD96Sh0uSHwVVVsElpvEaA_gVoZyMCvf4GeZrKzhTHXgjH-E20vexWQSY-3k0v0V6ka3TGXUex6dC6rGVQCyVoOX1qnFDGthTIw1sKOfQNGgtK9FbRCcscIJIL6iTA2CXwCx_6Ig/s72-c/Screenshot%202026-08-03%20084810.png" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-5983441499799521240</id><published>2022-03-25T05:25:00.003-07:00</published><updated>2022-03-25T05:25:59.676-07:00</updated><title type='text'>तुझ्या सोबतीची वाट...</title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;तुझ्या सोबतीची वाट...&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भगवद गीता- आपला धर्म ग्रंथ, पण ती कधी वाचावी, शिकावी त्यात भगवंतांनी काय सांगितले आहे हे जाणून घ्यावे मला कधीच ह्याचे कुतूहल वाटले नाही, त्याला कारण म्हणजे आयुष्याच्या उतार वयात देव देव तर करायचे आहे असा समज असणारी मी !&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पण आयुष्यात तू आलीस, तुझं ते अध्यात्मिक ज्ञान मला अचंबित करायचं, माझ्याच एवढी तू, पण किती समजदार, सहनशील? कसं जमतं, माझ्या सर्व प्रश्नांची उत्तरं मला गीतेत मिळणार म्हणालीस, एकदा माझ्या खातर गीता वाच म्हणालीस, मी पण चक्क घेतली वाचायला, अगदी न विसरता रोज एक अध्याय वाचून काढला, माझा हा प्रवास सुरु झाला!&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माझा असा समज झाला की तुला माझ्या आयुष्यात देवानी अध्यात्माकडे वळवण्यासाठी आणले, तुझं माझ्या आयुष्यात येण्याचं हेच कारण आहे! माझी अध्यात्माकडे ओढ वाढू लागली, नवीन नवीन गोष्टी समजत होत्या, किंवा एक नवा दृष्टिकोन मिळत होता.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अश्यातच मी जोडले गेले गीता परिवाराशी!&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गीता शिका, शिकवा, आचरणात आणा!!💐&lt;/p&gt;&lt;p&gt;माझ्या यासोबत अर्थात तू ही क्लास जॉईन केले, रोज सकाळी त्या क्लास साठी उठण्याची ओढ!! खूप सुंदर सुरवात व्हायची दिवसाची! किती किती चुकलं आपलं हे लक्षत आलं, गीता उतार वयात शिकायची नाही तर आयुष्यभर आचरणात आणायची गोष्ट आहे!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गीता शिकत असतांना आपण ही एक दुसऱ्याला समजू लागलो, एक दुसऱ्याच्या विचारांची देवान घेवान होऊ लागली,&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तू मला मी तुला ओळखू लागलो!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तू मला मी तुला गुंगूनू लागलो!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिवस सरत होते लेवल 1 ची परीक्षा संपली, खरं तर तुझ्या मूळ3च मी ही परीक्षा दिली!! काही स्वप्न रंगवणे सुरू झाले! गीता च्या सर्व परीक्षा पास करायच्या आहेत, एक दुसऱ्याला ध्येय देऊ लागलो!!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुझ्यामुळे माझा हा आध्यात्मिक प्रवास इतका सुंदर सुरू झाला आणि अजून ही सुरू आहे!&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पण मला खूप मोठे सुखद बक्षीस मिळाले, अगदी मन लावून गीता शिकण्याचे, एकाग्र राहण्याने!&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्याच भगवंतांनी माझी भेट घडवून दिली तुझ्या सोबत - गीता मैत्री मिलन कार्यक्रमामुळे! माझं एक स्वप्न पूर्णत्वाला गेले!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुझी भेट झाली!! बस अजून काय हवे होते!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मी हे सर्व समजत होते त्यांनी मला त्याच्या भेटीसाठी अग्रेसर करण्यासाठी केले होते, पण ह्या सर्व चक्रमागे करण होते तुझी माझी भेट घडवणे!!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आता असं वाटतं, गीता ला तू आयुष्यात नाही आणलं तर गीता नि तुला माझ्या आयुष्यात आणलं, माझी रुची गीतेत वाढणे, ते एकत्र गीता शिकणे, त्या सोबतच भेटीची ओढ निर्माण होणे... आणि चक्क गीता परिवाराने हा मिलन कार्यक्रम पुण्याला ठेवावा?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;त्यात तुला येत यावे?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हे स्वप्न पूर्ण करायला त्यानी किती प्लांनिंग केली असेल ना? किती सूत्र हलवले असतील त्यानी? तुला मला एक छताखाली आणण्यासाठी?&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;खूप कविता वाचल्या आज पर्यंत, खूप कथा वाचल्या&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक अपूर्ण स्वप्न वाल्या, पण मी त्याची खूप आभारी आहे, माझं स्वप्न पूर्ण झाले, तुला भेटता आले!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आता ही जी तज्झ्या सोबतीची वाट त्यांनी दाखवली आहे ना मला त्यावर चालत राहायचं!!&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgsGk4H_u7KkSE_ksmQgV3CHoawU63TxTk19ndnyX_ZU4HRUvoHaZowfLI32_v0TBacjqPngJy0yg091sgaKqgUJNoUEcuTM6GgBbReyUD_1muKDfxNAciDva9RIrM_DaqoL3loq9txNx6JhzfFS6wDYWqf0yH1SEh_0xu_yU8xXvX5KB8WUy5iO79ovQ/s1600/IMG-20220323-WA0059.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1200&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;240&quot; 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data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;240&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiL4Wb2odxuAp5YZAnhOubrgc_yBFoE6oZt8AmBr7vIV37WQsmdZ-Hi-cr1eMy1ZHhdbJNyPHUW1SgPtrWeo0-s4Iu9d7QMsAQIUBUnamotQD_uJ8ARcQWW2LtDWBj6LgSVaIXFYM7jiGklBtXNBD-rOnqKit3q4BtU0N_IyLu_anSAezrkjzu30isX3Q/s320/IMG-20220323-WA0064.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;Thank You Geeta Pariwar for these memories!!💐&lt;/div&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मी कशी ग विसरेल तुला ?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/5983441499799521240/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2022/03/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/5983441499799521240'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/5983441499799521240'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2022/03/blog-post.html' title='तुझ्या सोबतीची वाट...'/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgsGk4H_u7KkSE_ksmQgV3CHoawU63TxTk19ndnyX_ZU4HRUvoHaZowfLI32_v0TBacjqPngJy0yg091sgaKqgUJNoUEcuTM6GgBbReyUD_1muKDfxNAciDva9RIrM_DaqoL3loq9txNx6JhzfFS6wDYWqf0yH1SEh_0xu_yU8xXvX5KB8WUy5iO79ovQ/s72-c/IMG-20220323-WA0059.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-4705294501586546090</id><published>2022-02-28T09:39:00.002-08:00</published><updated>2022-02-28T09:39:52.562-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h1&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;,serif; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Calibri Light&amp;quot;; mso-ascii-theme-font: major-latin; mso-bidi-language: MR; mso-bidi-theme-font: major-bidi; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Calibri Light&amp;quot;; mso-hansi-theme-font: major-latin;&quot;&gt;सिक्रेट सायको – २&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/h1&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;आश्लेषा रूम
मध्ये पडल्या पडल्या त्या ट्रॉफी ला निहाळत बसली होती&lt;/span&gt;,&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; त्या वरच ठळक अक्षरातले ते शब्द ‘हिलिंग टच’
मनाला खूप स्पर्शून गेले होते&lt;/span&gt;,&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; ती ट्रॉफी
म्हणजे जादुई दरवाजा होता, आश्लेषा ला आपल्या सोबत ती तिच्या भूतकाळात घेवून गेली...
जिथून तिच्या ह्या प्रवासाला सुरवात झाली. &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;ते कॉलेज चे
सोनेरी दिवस, स्वप्न रंगवण्याचे दिवस आणि स्वप्नात रमायचे दिवस! मित्र मैत्रिणी
आणि खूप मज्जा मस्ती!&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;तेरी बातो में
दिल खो स गाया, प्यार केहते जिसको वो हो स गया...&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;खुश हु मेईन इतना
क्यू&lt;/span&gt;?&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; तेरे प्यार मेईन चमकू जैसे जुगनू... &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;तिला मिळालेली ती
पहिली शाबासकी... गुरुजींनी गर्वाने थोपात्लेली पाठ!&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;तीच ते शेवटच्या
वर्षी आपल्या थिसीस वर दिलेले भाषण अजून हि किती स्पष्ट ऐकायला येत होत तिला&lt;/span&gt;?&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;स्य्कॉलोजी मधली फ्रेड
ची थेरी, जी सांगते कि कोणत्या हि व्यक्तिमत्वाचे तीन भाग असतात, इड, इहो आणि सुपर
इगो.&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;हे तिन्ही इड,
इगो आणि सुपर इगो आपलयाला वागण्याला कारणीभूत असतात. &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;इड आपल्याला
आपल्या रोजच्या गरजा पूर्ण करायला मदत करत असतो जसं कि &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;सुपर इगो त्यात
आपल्याला २ गोष्टीतली काय बरोबर आणि काय चूक हे सांगत असते&lt;/span&gt;,&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; चांगल्या रस्त्यावर चालण्याला सांगत असते.
जेव्हा कि ह्या दोघंमध्ये समतोल राखण्याचे काम करत असते इगो.&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;औदितोरीम शांत
गंभीर झाले होते, आश्लेषा ला त्यामुळे समजले होते जरा डोक्यावरून चाललंय प्रकार...
त्यामुळे ती सर्वांना वेगळ्या पद्धतीने समजावण्याचा प्रयत्न करते. अचानक बोर्ड वर
काढलेले सर्व मिटवून ती बोर्ड वर लिहिते... दिल चाहता है!! ऐकल आहे हे नाव&lt;/span&gt;?&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;?&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;नवीनच चर्चेत
असलेली मूवी म्हणजे दिल चाहता है&lt;/span&gt;,&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; प्रत्येकाच्या
ओठी गाणी असलेली मूवी, प्रत्येकाला ती मूवी डायरेक्ट&lt;/span&gt; connect &lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;झाली, कॉलेज मध्ये सर्व मुल वो लाडकी है कहा
गात होते तर मुली&lt;/span&gt;,&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; जाणे क्यू लोग प्यार
करते है गात होते!&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;कोणी स्वत:ला आकाश
मध्ये शोधत होत तर कोणाला आपण समीर वाटत होतो! काही न काही कुठे तरी प्रत्येकाच्या
आयुष्यावर त्या मूवी नि छाप सोडली होती! पण आश्लेषा नि त्या मूवी ला एका वेगळ्या
लेवेल ला नेले !! &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;इतक्या गंभीर विषयावर
बोलतांना आश्लेषा नि असं मूवीचे नाव का लिहिले&lt;/span&gt;?&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; प्रत्येकाच्या
मनात ते प्रश्न सुरू असतांनाच आश्लेषा नि बोलायला सुरू केले..&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;आपल्या थेसिस ला
ह्या मूवी चा आधार घेवून खूप छान पद्धतीने समजावून सांगू लागली!!&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;“ह्या मूवी मध्ये
इड, इगो आणि सुपर हेरो सर्व आहेत म्हंटल मी तर काय तुम्हाला विश्वास बसेल&lt;/span&gt;?&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;” तिनी उलट प्रश्न केला सर्वांना. मूवी मध्ये
इड आणि इगो&lt;/span&gt;?&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; सर्वांच्या चेहऱ्यावर
प्रश्न स्पष्ट दिसत होते. आश्लेषा च्या चेहऱ्यावर मात्र एक गूढ स्मित आले होते. &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;ती पुढे नाव
लिहिते तीन बोर्ड वर... आकाश, समीर आणि सिड. तिची थेसिस होती आईसबर्ग ची ३ मैंद
च्या &lt;/span&gt;states&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; वर होती म्हणजे इड, इगो आणि सुपर इगो आणि दिल
चाहता है चे हे हिरो आता आपल्याला काय शिकवणार&lt;/span&gt;?&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;आश्लेषा सर्वांना
बघत सांगते असे बघत पुढे लिहू लागली!! &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;आकाश (अमीर खान) –
म्हणजे आपल्या मनाचे इड स्टेट दर्शवते – तो बेसिक प्लेझर नियमांवर चालतो, तो आपले
आयुष्य आपल्या गरजा भागाव्ण्यास्तही जगतो.&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;सिड (अक्षय खन्ना)
– म्हणजे सुपर इगो ला दर्शवतो. सुपर इगो आणि इड ह्यात नेहमी द्वंद्व सुरू असते, जे
बरोबर आहे ते करायचे कि आपल्या गरजा निभ्वाय्च्या&lt;/span&gt;?&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;समीर (सैफ आली
खान) – म्हणजेच इगो. त्याला सारख एक सुवर्ण बिंदू गाठवा लागतो इड आणि सुपर इगो
च्या मध्ये.&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;तर दिल चाहता है
मधले हे तीन पत्र नसून एकाच्या मनाच्या ३ स्थिती आहेत!&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;इतकी कॉम्पलीकेतेड
थेरी आश्लेषा नि विश्लेषण =करून इतक्या सोप्या पद्धतीने समजावून सांगितली होती!
तिचं बोलण संपते न स्माप्ते हाल मध्ये टाळ्यांचा कडकडत झाला! &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;“ए.. आशु...
मानले हा तुला...” जुही नि आश्लेषा ची तारीफ करत स्वताचीच कल्लर ताईत केली.&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;“का ग&lt;/span&gt;?&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;”&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;“मग काय मूवी बघतांना
पण तुझ्या डोक्यात हा अभ्यासच फिरत असतो न&lt;/span&gt;?&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;” जुई नि डोळा
मारत चिडवले.&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;आश्लेषा नि हलके
स्मित केले. &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;“&lt;/span&gt;AD&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;, आज तर तू जादूच केलीस!!” समोरून आशिष आला आणि
आश्लेषा च्या हृदयाची धडकन थांबली जणू&lt;/span&gt;,&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; सर्व &lt;/span&gt;black&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; &lt;/span&gt;out&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;... हृदयात बस&lt;/span&gt;,&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; गिटार ची धून सुरू झाली आणि ते अपोआप गावू
लागले... &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;आते जाते... &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;आते जाते&lt;/span&gt;, &lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;हँसते गाते&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;सोचा था मैं ने
मन में कई बार&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;वो पहली नज़र&lt;/span&gt;, &lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;हलका सा असर&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;करता है क्यों
दिल को बेक़रार&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;रुक के चलना&lt;/span&gt;, &lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;चल के रुकना&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;ना जाने तुम्हें
है किस का इंतज़ार&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;तेरा वो यकीं&lt;/span&gt;, &lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;कहीं मैं तो नहीं&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;लगता है यही
क्यों मुझको बार बार&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;यही सच है&lt;/span&gt;, &lt;b&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;शायद मैं ने प्यार किया&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;आशिष तिला विश
करून गेला सुद्धा तरी आश्लेषा त्यातच हरवलेली, तिकडून जुई सोबत बाकीची गांग येवून
आश्लेषा ला चिडवायला लागल्या. &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;“आमच्या स्कॉलर
ला कोणी तरी मात दिली तर...” जुई तिला खांद्याला खांद्यानी मारत म्हणली आणि सर्व
खिदळायला लागल्या!&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;“सय्या ने देखा
ऐसे... में पाणी पाणी हो गायी...” इशा लाल झालेल्या आश्लेषा चा चेहरा हातात घेवून म्हणाली
तशी आश्लेषा तिला धरून मारते.&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;त्यांची ती सर्व मस्ती
आठवून आज हि आश्लेषा च्या चेहऱ्यावर &lt;/span&gt;smile&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt; आली होती आणि
डोळ्यात पाणी भरून आले.&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span lang=&quot;MR&quot; style=&quot;font-family: &amp;quot;Kokila&amp;quot;,sans-serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-bidi-language: MR; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin;&quot;&gt;क्रमश:&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/4705294501586546090/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2022/02/blog-post_28.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/4705294501586546090'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/4705294501586546090'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2022/02/blog-post_28.html' title=''/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-4100100984155799692</id><published>2022-02-16T20:57:00.001-08:00</published><updated>2022-02-16T20:57:06.068-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;सिक्रेट सायको – १&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;२४ जानेवारी २०२२&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;जगातील महत्वाचे आणि मोठे साय्कोलोजी कॉन्फेरेंस भारतात, पुणे इथे भरले होते!&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;रिपोर्टर रिपोर्ट देत होते आप&amp;nbsp;आपल्या&amp;nbsp;चॅनेल&amp;nbsp;साठी... अशीच एक न्यूज&amp;nbsp;चॅनेल&amp;nbsp;वर झळकत होती.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;“२०२२ IIER ११७५&amp;nbsp;इंटरनॅशनल&amp;nbsp;कॉन्फेरेंस हि जगातील प्रमुख कॉन्फेरेंस आहे ज्यात&amp;nbsp;रिसर्चर्स&amp;nbsp;सायकॉलजी&amp;nbsp;च्या क्षेत्रात आपले नवीन संशोधन मांडतील...”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;घरी आरामात सोफ्यावर बसून घरचे न्यूज द्वारा&amp;nbsp;उपडेट&amp;nbsp;घेत होते!&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;“बाबा मला शिन चान बघायचं...”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;“थांब रे... ”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;“हे काय बोर बघत बसलात तुम्ही? प्लीज न बाबा... बदला न चानेल...”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;हट्ट वाढला तसा रिमोट मुलाच्या हातात देवून तो झोपायला गेला.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;तिकडे कॉन्फेरेंस मध्ये लोकांची गर्दी वाढू लागली होती! आज कॉन्फेरेंस एकाद्या फिल्म फेयर अवार्ड च्या फंक्शन पेक्षा कमी सजलेली नव्हती, त्याला शोभतील&amp;nbsp;&amp;nbsp;असेच कॉन्फेरेंस&amp;nbsp;अटेंड&amp;nbsp;करणारे होते, रेड कार्पेट चालून येणारे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&amp;nbsp;आज ची कॉन्फेरेंस जरा हटके होती आणि त्याला कारण होते ते म्हणजे पहिल्यांदा दिल्या जाणारे अवार्ड...&amp;nbsp;सायकोलॉजी&amp;nbsp;च्या क्षेत्रात पहिल्यांदा हा अवार्ड मिळणार होता कोणाला. त्यामुळे कोणाला हा&amp;nbsp;अवॉर्ड&amp;nbsp;मिळणार ह्याची चुरस लागली होती! त्यात नुकतेच धुमाकूळ घातलेल्या करोना मुळे प्रत्येकाकडे एक आपली&amp;nbsp;आगळी&amp;nbsp;वेगळी कथा&amp;nbsp;आणि&amp;nbsp;अनुभव&amp;nbsp;होताच! ह्या काळात&amp;nbsp;क्वचित&amp;nbsp;कोणी भेटेल ज्यांनी आपल्या जवळच्यांना निराश, हताश बघितले नसेल, डिप्रेशन ला जवळून बघितले नसेल? इतक्या सर्व लोकांमध्ये इतक्या सर्व कथांमध्ये, कोणाला मिळणार होता तो अवार्ड? सर्वांचे डोळे त्या अवार्ड वर लागले होते!&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;हॉल&amp;nbsp;मध्ये कुजबुज सरू होती! २४ -२५ जानेवारी म्हणजे मोठा दिवस होता!&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;तितक्यात रेड कार्पेट वर एक गाडी येवून थांबली, तुम्ही&amp;nbsp;विचार&amp;nbsp;कराल त्यातून एक&amp;nbsp;स्लिम&amp;nbsp;ट्रिम&amp;nbsp;अभिनेत्री बाहेर पडेल आणि मग ती हात हलवून तिथे जमा असलेल्या&amp;nbsp;पब्लिक&amp;nbsp;ला अभिवादन करेल, पण त्यातून निघाले एक ऐन्शितले गृहस्त,&amp;nbsp; त्यांना बघून तिथे उपस्थित जमावाची मात्र प्रतिक्रिया तीच होती! त्यांना बघून प्रत्येकाच्या चेहऱ्यावर स्मित आले, “योगी दादा!!” बस एकच नाव सर्वांच्या ओठी होते!&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;सर्वांना बघून त्यांनी फक्त विनम्र हात जोडून नमस्कार केला. चालायला त्रास होत होता त्यांना म्हणून त्यांना आधार द्यायला सोबत एक महिला होती! योगी दादा म्हणजे भारतातले मदर टेरीसा चे मेल&amp;nbsp;वरजन! दिन दुबळ्यांची&amp;nbsp;फक्त सहायता करायचे&amp;nbsp;असे&amp;nbsp;नाही&amp;nbsp;तर मनानी खचून गेलेल्यांना मार्ग दाखवण्याचे हि काम ते करायचे! भारतात&amp;nbsp;&lt;b&gt;मेंटल हेल्थ&lt;/b&gt;&amp;nbsp;हा विषय धरून उचलणारे, शारीरक स्वस्थ जितके महत्वाचे आहे&amp;nbsp;तितकेच&amp;nbsp;मेंटल स्वस्थ हि गरजेचे आहे ह्यावर भरभरून&amp;nbsp;व्याख्यान&amp;nbsp;आणि पुस्तकं फक्त लिहिणारे योगी दादा नव्हते तर ते अमलात आणून पीडितांना मदत हि करत होते! अनेक हजारो कहाण्या त्यांच्या जवळ होत्या काही&amp;nbsp;उरात&amp;nbsp;पुरलेल्या तर काही केस स्टडी झालेल्या.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;आज इतक्या दिवसांच्या त्यांच्या मेहनातीचे फळ म्हणून त्यांना ह्या कार्यक्रमाला चीफ गेस्ट म्हणून अमंत्रित केले होते! आपला तोल सांभाळत ते त्या कार्पेट वरून&amp;nbsp;हॉल&amp;nbsp;चा मार्ग चालत निघाले.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;बाहेर&amp;nbsp;रिपोर्टर&amp;nbsp;लोकांनी गर्दी&amp;nbsp;केली&amp;nbsp;होती योगी दादा एक वाक्य तरी त्यांच्यासाठी&amp;nbsp;बोलावे हा प्रयत्न होता&amp;nbsp;प्रत्येकाचा.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;योगी दादा सोबत सर्व मान्यवर&amp;nbsp;हॉल&amp;nbsp;मध्ये पोहचतात, योगी दादांना बघून त्याचं स्वागत टाळ्यांनी होतं.&amp;nbsp;टाळ्यांच्या&amp;nbsp;आवाजात&amp;nbsp;हॉल&amp;nbsp;गजबजला.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;ह्या वर्षी ची थीम होती&amp;nbsp;&lt;b&gt;“एक्क्सपेरिमेंटल&amp;nbsp;सायकॉलॉजि&amp;nbsp;इन&amp;nbsp;क्रॉस&amp;nbsp;कल्चर&amp;nbsp;सेटिंग&quot;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;वेगवेगळ्या प्रांतातून आपले अनुभव आणि रिसर्च वर बोलायला लोक आले होते.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;स्टेज वर&amp;nbsp;प्रेसेंटेटशन&amp;nbsp;द्यायला सर्व सेटअप&amp;nbsp;तयार&amp;nbsp;केले होते! मान्यवरांच्या खुर्च्या खाली पहिल्या रांगेत होत्या!&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;हॉल भरला होता, अंधार करण्यात आला आणि एक एक करत कार्यक्रमाला सुरवात झाली! इतका मोठा विखुरलेला विषय होता हा आणि तितकेच&amp;nbsp;भव्य&amp;nbsp;दिव्य प्रत्येकाचे अनुभव! कोरोनाच्या काळात कोणी अनुभवलं नव्हतं, विचार हि केला नव्हता इतका&amp;nbsp;एक्सपेरिमेंट&amp;nbsp;झाला सर्वांच्या साय्कोलोजी चा! जग तयार नव्हते ह्या महामारी साठी! आपल्या जवळच्या लोकांपासून लांब होणे काय असते हे तर आपण अनुभवतोच पण त्यांचे अंतिम दर्शन हि न करता यावे असं कधी होईल असा&amp;nbsp;विचार&amp;nbsp;हि कोणी केला नव्हता. सर्व एकत्र असून एकटे पडले होते. दिवस-रात्र बस उद्याचा दिवस कसा येयील ह्याची चिंता! सर्वात जास्ती त्रास&amp;nbsp;सहन&amp;nbsp;केला तो खालच्या&amp;nbsp;वर्गानी,&amp;nbsp;करून&amp;nbsp;का&amp;nbsp;होत&amp;nbsp;नव्हताआ, आजारी तर काही पडत नव्हते पण उपाशी राहून मारायचे दिवस आले होते!&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;सकाळची संध्याकाळ झाली....&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;वेळ होती अवार्ड देण्याची, स्टेजवर ट्रॉफी आणण्यात आली, मेडल्स आणण्यात आले! आपल्या आपल्या क्षेत्रातून उत्तम कामगिरी करणार्यांना आज सम्मानित करणार होते, ती&amp;nbsp;ट्रॉफी कोणाला मिळणार ह्याची उत्सुकता सर्वांना होती. एक एक करत सर्वांचे नाव पुकारण्यात आले.&amp;nbsp;मेडल&amp;nbsp;अन&amp;nbsp;सर्टिफिकेट&amp;nbsp;देऊन&amp;nbsp;गौरव&amp;nbsp;करण्यात&amp;nbsp;आला.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;“आणि आता मी&amp;nbsp;स्टेज&amp;nbsp;वर आमंत्रित करू इच्छितो आपल्या चीफ गेस्ट योगी&amp;nbsp;दादांना प्लीज&amp;nbsp;स्टेज&amp;nbsp;वर येवून तुमच्या हसते आमच्या&amp;nbsp;स्टार&amp;nbsp;ला हा अवार्ड द्यावा&amp;nbsp;हि&amp;nbsp;विनंती!”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;तसे योगी दादा उठू लागतात, त्यांना मदत करत त्यांना सोबत&amp;nbsp;स्टेज&amp;nbsp;वर बसवून त्यांच्या सोबतची महील वळते, तसे योगी दादा तिचा हात धरून तिला थांब म्हणतात, त्यांना काही त्रास होतोय का वाटून ती तिथेच थांबते.&amp;nbsp;तसं&amp;nbsp;त्या&amp;nbsp;चिठ्ठीत&amp;nbsp;नाव वाचून पुकारण्यात आले...&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;“आणि आपण सर्व ज्या क्षणाची खूप आतुरतेने वात बघत होतो तो क्षण आला आले... आज च्या संध्याकाळचा सर्वात&amp;nbsp;प्रेस्टीजियस&amp;nbsp;अवार्ड जात आहे... आश्लेषा देश्मुक ह्यांना....”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;आश्लेषा चा हात तसा योगी दादा सोडतात ती अविश्वासात त्यांना बघत होती, “अगं&amp;nbsp;खाली जावून परत वरती कशाला यायचं, मला&amp;nbsp;म्हाताऱ्याला&amp;nbsp;नको वाटलं&amp;nbsp;तसं .. म्हणून&amp;nbsp;थांबवून&amp;nbsp;घेतलं तुला...” ते डोळे मिचकावत म्हणले तिला...&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;आश्लेषा च्या डोळ्यात आनंदाश्रू आले! ती त्यांच्या समोर येवून उभी होते आणि ते तिच्या&amp;nbsp;हातात&amp;nbsp;ती झाकाक्णारी,&amp;nbsp;चकाकणारी&amp;nbsp;ट्रॉफी&amp;nbsp;&amp;nbsp;देतात...&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;आश्लेषा त्या&amp;nbsp;ट्रॉफी&amp;nbsp;ला बघतच राहते...&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;‘&lt;b&gt;&lt;i&gt;हीलिंग&amp;nbsp;टच&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;!!’ ती त्या वरचे शब्द स्वत:शी कितीदा वाचत होती! तिला विश्वासच बसत नव्हता, हि&amp;nbsp;ट्रॉफी&amp;nbsp;तिला मिळाली होती!&amp;nbsp;परतीच्या रस्त्यावर ती सारखी त्या&amp;nbsp;ट्रॉफी&amp;nbsp;ला बघत होती!&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;“दादा, मला कशी काय मिळाली?”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;“तू कामच असे केले आहेत बेटा!! अशीच चालत रहा, लोकांच दु:ख कमी केलं कि आपल्या पदरात आपो आप सु:ख पडतं!”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;आश्लेषा&amp;nbsp;हसत&amp;nbsp;होती! “यु&amp;nbsp;हीलड&amp;nbsp;सो&amp;nbsp;मेनी&amp;nbsp;पिपल...”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;ते वाक्य ऐकून आश्लेषा स्वत:शी हसली आणि स्वत:शीच म्हणली, “आय&amp;nbsp;हिल्ड&amp;nbsp;मायसेल्फ!!”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;आज आश्लेषा ला झोप काही येत&amp;nbsp;नव्हती! डोळे बांध केले कि&amp;nbsp;सारखे&amp;nbsp;ते शब्द कानात ऐकू यायचे!!&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;“तू न... तू तर सायको आहेस...” ते शब्द ऐकून तिला येत असलेली झोप निघून जायची!&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;“खरंच&amp;nbsp;यु आर सायको...”&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;सामन्य माणसाला असं बोलल्यावर राग येयील, पण आश्लेषा त्यावर मंद हसायची!&amp;nbsp;हवेहवेसे&amp;nbsp;वाटायचं&amp;nbsp;त&amp;nbsp;शब्द...&amp;nbsp;कधी&amp;nbsp;ऐकलं&amp;nbsp;नाही&amp;nbsp;की&amp;nbsp;मिस&amp;nbsp;करायची.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;पण आज ते शब्द कोण जाणे का तिच्या डोळ्यात पाणी आणत होते! नक्की ते&amp;nbsp;आनंदाश्रू&amp;nbsp;होते अवार्ड चे कि वेदनेने निर्माण केलेले?&amp;nbsp;आज&amp;nbsp;मिस&amp;nbsp;करत होती कदाचित&amp;nbsp;ती&amp;nbsp;स्वतःची&amp;nbsp;पदवी?&amp;nbsp;सायको ??&amp;nbsp;हीलिंग&amp;nbsp;टच&amp;nbsp;पेक्षा&amp;nbsp;ते&amp;nbsp;नाव&amp;nbsp;जस&amp;nbsp;हवेसे&amp;nbsp;वाट&amp;nbsp;होते?....&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;क्रमश:&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/4100100984155799692/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2022/02/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/4100100984155799692'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/4100100984155799692'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2022/02/blog-post.html' title=''/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-962235088239768366</id><published>2020-12-31T00:35:00.001-08:00</published><updated>2020-12-31T00:35:16.206-08:00</updated><title type='text'> द रुथलॅन्ड | #१ </title><content type='html'>&lt;p&gt;&amp;nbsp;द रुथलॅन्ड | #१&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;केयूर...र र र !!&quot; मागून हाक आली त्यामुळे तो थांबला. धीरज धापा टाकत त्याच्या जवळ आला, &quot;मित्रा तिकडे कुठे चाललास?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;केयूर त्याला काही कळलं नाही असं बघतो... &quot;अरे आत चल ना! किती मोठी लाँच पार्टी आहे!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;कशाची?&quot; केयूर त्यात काही रुची न दाखवत निघायला लागतो, मग वळून म्हणतो, &quot;हे न्यू इयर पार्टी अँड ऑल मला नाही आवडत!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;तुला माहित नाही?&quot; धीरज अष्टकर्याने बघतो तर केयूर मान हलवून नाही सांगतो. धीरज त्याला ओढतच स्वतः सोबत नेतो, तो दार ढकलतो, समोर अवाढव्य मोठ्या मैदानात मोठे मोठे बॅनर लावलेले, केयूर ते बॅनर वाचायचा प्रयत्न करतो, &quot;द रूथलँड, म्हणजे?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;अरे गेम च नाव आहे!!&quot; धीरज तुला काही की&amp;nbsp; माहित नाही असं बघतो!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;गेम?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;आज रात्री आपल्या शहरातलं, अरे शहरातलं काय भारतातील सर्वात मोठा गेम लाँच इव्हेंट आहे!! सर्वात मोठं, नवीन आणि भव्य...&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;कळलं.. तू काय त्यांचा मार्केटिंग एक्सिक्युटीव्ह आहेस का?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;केयूर असं काय करतोस यार, आपण जाऊयात ना त्या पार्टी ला...&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;अरे बोर असतात रे अश्या पार्ट्या वगैरे!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;अरे फ्री डिनर, डान्स, दारू, मुली आणि बरच काही आहे, आपलं न्यू इयर सेलिब्रेशन हि होऊन जाईल ते हि फुकटात!!&quot; केयूर त्याच्याकडे ब्लॅक बघतो, &quot;तुला माहिती ना ह्या अश्या पार्टीझ&amp;nbsp; मला नाही आवडत आणि त्यात मुली वगैरे, मला नाही जमत त्यांच्याशी बोलायला.&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;बरं बाबा नको बोलूस, पण माझ्या सोबत तर चल, तुझ्या शिवाय मला कोणी मित्र आहे का? मला तर एन्जॉय करू दे!!&quot; केयूर ते ऐकून हसतो आणि त्याला बघून म्हणतो, &quot;मला तर खूप मित्र आहेत ना तुला सोडून!!&quot; त्यावर धीरज हि हसला आणि त्याच्या खांद्यावर हात ठेवून तो त्याला आपल्या सोबत कॅन्टीन ला घेऊन जातो... सर्व कॉलेज मध्ये गेम चे पोस्टर्स, स्लोगन्स लागले होते, सर्व बघत केयूर धीरज ला म्हणतो, &quot;तयारी तर सॉलिड केली आहे ह्या लोकांनी, बघायला हरकत नाही काय आहे ते!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धीरज हि दात काढत आनंदानी त्याला सहमती देतो. &quot;संध्याकाळी ६ ला सुरु होणार आहे पार्टी, उशीर करू नकोस हा...&quot; केयूर बरं ठीक आहे असं म्हणून मागवलेल्या बर्गर वर लक्ष देतो.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;ए... आणि काही तरी मस्त घालून येशील हा!&quot; केयूर धीरज च्या वाढणाऱ्या अपेक्षांना दुर्लक्ष करत सर्व ला ठीक आहे करत आपल्या बर्गर वर लक्ष केंद्रित करतो.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कॉलेज संपवून दोघे आपल्या घरी जातात, संध्याकाळच्या पार्टी साठी तयारी करायची होती, केयूर तर धीरज साठी चालला होता, धीरज आणि केयूर जीवाला जीव लावणारे मित्र, दोघे मुंबई च्या प्रसिद्ध &#39;हॅरोल्ड&#39; कॉलेज चे विद्यार्थी होते, सेकण्ड इयर ला शिकत, धीरज चा अभ्यासापेक्षा एक्सट्रा करिक्युलर ऍक्टिव्हिटी मधेच जास्ती लक्ष असायचं, त्याला आवडायचं म्हणून केयूर हि त्यात खेचला जायचा,&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज वर्षाचा शेवटचा दिवस, सर्व प्लॅन करत होते पार्टी साठी, डिस्क ला जायला, पण आता तर कॉलेज नीच त्यांची पार्टी ची सोय केली होती!! द रुथलॅन्ड च्या लाँच पार्टी मार्फत.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;घरी पोचला तसा केयूर शांत झोपला. त्याच्या वयाची मुलांची एव्हाना ३-३ ब्रेकअप झाले होते पण केयूर ला ब्रेकअप चा ब्र हि माहित नव्हता, तसं त्याला प्रेमाचा प्र तरी कुठे माहित होता, मुलींशी बोलायचं म्हंटल कि ह्याचा श्वास अडकायचा, जो पर्यंत बोलणार नाही तो पर्यंत प्रपोज होणार नाही, गाडी त्यामुळे पुढे कशी जाणार? आपण सिंगल बरे असं मत ठामपणे दर्शवणारा केयूर.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;केयूर ला जाग आली तेव्हा ६ वाजून गेले होते आणि धीरज त्याला फोन करून करून थकला होता, त्याच्या फोन च्या आवाजानेच केयूर ला जाग आली होती, फोन अजून हि वाजत होता त्या जाणिवेने तो फोन उचलतो, &quot;मी वाट बघतोय केयूर, कुठे आहेस? येत आहेस ना, डिच नको करुस!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धीरज च बोलणं ऐकून केयूर ची झोपच उडाली, हा इथे मस्त झोपला होता, तो त्याला आलो आलो करत फोन ठेवतो आणि पटकन तयारी ला लागतो, &quot;काय घालू?&quot; तो डोकं खाजवत कपाटासमोर उभा होता. त्यानी पटकन आपली ब्ल्यू जीन्स आणि व्हाईट टी-शर्ट काढलं, लगेच शॉवर घेऊन आला आणि केस सेट न करताच भरभर कपडे घालून तो निघाला, निघतांना त्याच्या लक्षात आलं, रात्री उशीर होईल तर आपलं लेदर जॅकेट खांद्यावर अडकवत तो धावपळ करतच बाईक जवळ पोचला, &#39;टर्मिनेटर!!&#39; तो स्वतःशी हसून बाईक कडे बघतो आणि तिची किस घेत तिला सांगतो, &quot;टर्मिनेटर, धीरज वाट बघतोय कॉलेज मध्ये हा माझी.. आता तुला मला वेळेत पोहोचवायचं आहे!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;रस्त्यावर गाडी धूम पळवत केयूर कॉलेज मध्ये पोहोचतो, ऑडिटोरियम ला धावत जातो, कचाकच गर्दी झाली होती सर्वत्र, धीरज ला कुठे शोधणार हा विचार मनात आलाच होता कि धीरज ची थाप त्याच्या खांद्यावर पडली, &quot;मला माहित होतं तू नाही शोधू शकणार म्हणून मग मी दारात पहारेकरी बनून थांबलो तुझी वाट बघत...&quot; धीरज त्याला किती ओळखतो म्हणून तो स्माईल करतो, दोघे समोर बघतात, डोळे दिपावुन टाकणारे फ्लॅश लाईट्स नि सर्वत्र उजेड केला होता आणि मागे कानठाळ्या बसतील अश्या आवाजात आमिर च गाणं वाजत होतं...&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;केयूर आणि धीरज अजून ते वातावरण आत्मसाद करत होते, तेव्हा माईक वर अनाउन्समेंट झाली,&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;कोई कहे केहता रहे... हम लोगों की ठोकर में है यह ज़माना!! राईट गाईज?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रेक्षकांतून होकार गुंजला... &quot;सो गाईज रेडी टू वेकम २१२१?&quot; परत होकार वाऱ्यात गुंजला!!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;अँड हाऊ अबाऊट द फर्स्ट ग्लिम्स ऑफ द रुथलॅन्ड?&quot; तिकडून को होस्ट चा आवाज आला...&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;ये... येस...!!&quot; करत सर्वत्र जल्लोष सुरु होता आज हॅरोल्ड ची वास्तू दणाणून टाकली होती सर्वांनी!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;ओके, चला तर मग... &quot; म्हणत दोघांनी ऐक मोठ्या स्क्रिन वरचा परदा काढला, &quot;रुथलॅन्ड ची सैर करू!! आज हा कार्यक्रम अख्या भारत देशात सुरु आहे!! रुथलॅन्ड ला आज सर्व भारतात लाँच करत आहोत, तुमच्या सारखेच प्रत्येक शहरात यंग जनरेशन क्रेझी होतं आहे, तुमचा जास्ती वेळ न घेता मी सांगतो रुथलॅन्ड नक्की आहे काय?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;सुहास, काय म्हणतोस सांगायचं का मग रुथलॅन्ड बद्दल...??&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;नक्कीच शालिनी, पण त्या आधी मी सॅम्पल किट वाटल्या होत्या त्या सर्वांना मिळाल्या का!!&quot; सुहास ऑडियन्स कडे माईक धरतो आणि सर्व एका सुरत हो म्हणून ओरडतात.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;काय आहे ह्यात?&quot; केयूर त्याच्या किट कडे बघत म्हणतो.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;श... शांत बस आणि ऐक रे...&quot; धीरज केयूर ला शांत बसवतो.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;आज आपण एक अश्या दिवशी जमलो आहोत जेव्हा २१२० ला बाय करून २१२१ चे स्वागत करणार आहोत!! त्याच सोबत आपण स्वागत करणार आहोत मॅजिक ब्रदर ह्यांनी बनवलेल्या गेम चा म्हणजेच द रुथलॅन्ड चा... तर तुम्हाला सर्वांना प्रश्न पडला असेल काय आहे हे रुथलॅन्ड?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;नक्कीच सुहास, मी तर खूप उत्सुक आहे जाणून घ्यायला...&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;शालिनी रुथलॅन्ड हा आर्टिफिशिअल इंटीलीजेंस वर आधारित एक गेम आहे!!&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;गेम आहे मग ह्यात एवढे खास काय?&quot; शालिनी सर्वांच्या वतीने प्रश्न मांडते.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;मला हा प्रश्न अपेक्षितच होता! हा गेम तुम्ही फक्त खळणारच नाही तर अनुभवू शकणार आहात, हा साधा सुद्धा विडिओ गेम नाही, हा गेम घेऊन जाईल तुम्हाला रुथलॅन्ड वर जे आपल्या नावाप्रमाणेच रूथलेस आहे, गेम मध्ये एन्ट्री केल्यावर वापस बघणे नाही आहे, रुथलॅन्ड वर तुम्हाला मिळणार आहे आयुष्याचे अनुभव, ब्रेथटेकिंग ऍडव्हेंचर आहेत इथे!! असे मोमेंट्स जे तुमच्या अंगावर शहारे आणतील!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;वाह!! मला तर राहवत नाही आहे, आत्ता खेळावासा वाटतोय हा गेम!!&quot; शालिनी अति उत्साहात म्हणाली.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;नक्कीच!!&quot; सुहास तिच्या डोळ्यात बघतो आणि मग इतरांना म्हणतो, &quot;पण शालिनी हे इतकं सोप्प नाही!&quot; शालिनी अर्थातच असं त्याला बघते, सुहास थांब मी सांगतोय असं बघत म्हणतो, &quot;हा गेम चालणार आहे १ महिना!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;१ महिना!!&quot; सर्व ऑडियन्स मध्ये खुस फूस सुरु झाली...&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;हो... १ महिना तुम्ही ह्या जगात नसणार आहात... तुम्ही ट्रासनपोर्ट केले जाणार आहात रुथलॅन्ड वर, तुम्ही तिथे&amp;nbsp; असणार आहात, नवीन नवीन अनुभव घेत!!&quot; ते ऐकून सर्वत्र शांतता पसरली, सर्वांच्या मनातले प्रश्न ओळखून सुहास पुढे म्हणतो, &quot;गाईज आम्हाला तुमचं शैक्षणिक नुकसान नाही करायचं... रुथलॅन्ड ची ट्रिप हि तुमच्या सुट्ट्या सुरु होतील तेव्हा सुरु होणार आहे!!&quot; सर्व अजून हि खुसफुसत होते, सर्वांना शांत करत सुहास पुढे म्हणतो, &quot;तर मग गाईज तुम्हाला आवडेल का खेळायला? आवडेल का जायला रुथलॅन्ड वर? कुठे आहे हे रुथलॅन्ड? खूप प्रश्न पडले आहेत ना?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सर्व नक्कीच, हो ना असे म्हणतात तेव्हा सुहास पुढे म्हणतो, &quot;आम्ही तुम्हा सर्वांसाठी एक गोल्डन चान्स घेऊन आलो आहोत, आज रात्री १२ वास्ता संपूर्ण भारतात जिथे जिथे हि लाँच पार्टी सुरु आहे, सर्वांची एक लॉटरी निघणार आहे... &quot; सर्व श्वास रोकुन सुहास काय बोलत आहे ऐकत होते, &quot;लॉटरी मध्ये भाग कसा घ्यायचा हाच प्रश्न आहे ना?&quot; तो स्वतःशी हसून म्हणतो, &quot;मी तुमच्या पर्यंत आता ज्या सॅम्पल किट वाटल्या आहेत त्यात बघा तुमचं हे लॉटरी च तिकीट पण आहे! जस्ट फील इट अँड पुट इट इन द लॉटरी बॉक्स!!&quot; सुहास स्टेज वर ठेवलेला बॉक्स दाखवतो!!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;हे काम तुम्हाला १२ च्या आधी करायचं आहे!! १२ ला भारतभरातील सर्व मिळालेली तिकीट आमचे सर्वर शफल करून २ लकी विनर काढतील!! त्यांना रुथलॅन्ड फ्री खेळायला मिळेल... हा ब्रेथटेकिंग अनुभव फ्री घेता येणार आहे!!&quot; सर्व तोंड वासून बघत होते, कान देऊन ऐकत होते, &quot;मग तुम्हाला व्हयचं ना तो लकी विनर!! कशासाठी थांबलात तर... उघडा आपली किट आणि घ्या ते तिकीट!! पण हा सावध रहा तिकीट जमा करायच्या आधी १० वेळा विचार करा, १ महिना रुथलॅन्ड वर रहावे लागेल! जमेल ना? जमणार असेल तरच नाव द्या... हा गेम कमजोर दिल वाल्यांसाठी नाही आहे! एकदा तुमचं नाव सिलेक्ट झालं तर मग तुम्हाला माघार घेता येणार नाही... कारण तुम्हीच बघा इतके लोक आहेत आतुर, त्यात जर तुमची निवड झाली आणि तुम्ही माघार घेतली तर तुम्ही किती लोकांच्या स्वप्नांवर पाणी घालणार, आणि आम्ही हि लॉटरी परत नाही काढू शकणार!! तेव्हा लॉटरी तिकीट सबमिट करतांना मनाशी दृढ निश्चय करून मगच टाका... हि आमची नम्र विनंती आहे!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धीरज मंत्रमुग्ध होऊन सुहास ला ऐकत होता, केयूर नि आपल्या हातातलं किट बघितलं, तो त्यावरचे इंस्ट्रक्शन वाचत होता, धीरज नि घाईत आपल्या किट मधून तिकीट काढून त्यात मागितलेली माहिती भरून पण टाकली, केयूर तिकीट वाचत होता, &quot;एवढी पर्सनल माहिती का हवी आहे ह्यांना... माझा ई-मेल ऍड्रेस पाहिजे ठीक आहे, घरचा ऍड्रेस घेऊन काय करायचं ह्यांना...&quot; केयूर चा अति शहाणपणा बघून धीरज ची चिडचिड वाढत होती, &quot;केयूर... भर ना रे पटकन... ते बघ स्टेज वर किती लाईन लागली आहे!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;अरे १२ पर्यंत वेळ आहे!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;म्हणून काय आपण १२ ची वाट बघायची आहे का...&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;बरं चिडू नकोस... मी भरतो!!&quot; केयूर जीवावर येऊन आपली माहिती भरत होता, तोपर्यंत धीरज नि आपल्या किट मध्ये अजून काय काय आहे बघायला सुरवात केली, त्यात रुथलॅन्ड च एक टी-शर्ट होतं आणि निऑन च वॉच, धीरच लगेच ते आपल्या मनगटावर चढवतो, रात्रीच्या अंधारात ते चमकत होते, &quot;अरे पण हे कसलं घड्याळ आहे? ह्याला काटे नाहीत, आकडे नाहीत, वेळ कसा कळणार?&quot; धीरज उत्सुकतेने घड्याळी ला बघत होता, केयूर नि आपली सर्व माहिती भरली, तिकीट ला बघतच तो धीरज ला चल म्हणतो. धीरज त्याच्या मागे मागे निघतो, &quot;केयूर... हि घड्याळ बघ ना, किती वाजलेत संग ना...&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;केयूर त्याच्या हात धरून मनगटावर बघतो आणि सांगतो, &quot;९:४० झालेत!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धीरज डोळे फाडून त्याला बघतो, &quot;कसं कळलं तुला? ह्या घड्याळी ला ना काटे आहेत ना आकडे...&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;पण माझ्या घड्याळी ला आहेत...&quot; केयूर त्याला आपलं घड्याळ दाखवतो आणि मोठ्याने हसतो!! &quot;अरे डंबो, ते काय तुला साधं सुध घड्याळ देणार होते का? काही असेल त्यात हि रुथलॅन्ड शी रिलेटेड गूढ लपलेलं...&quot; धीरज त्याला पॉईंट आहे असं बघतो!! दोघे जाऊन स्टेज पुढे उभे होते, स्टेज वर ठेवलेले पुतळे बघत केयूर च्या मनात प्रश्न सुरु होते... सुहास आणि शालिनी लोकांना काही अडचण आहे का ते बघत होते, सुहास त्यांच्या जवळ येऊन त्यांना विचारतो, &quot;काही अडचण नाही ना...&quot; धीरज मान हलवून नाही सांगतो..&lt;/p&gt;&lt;p&gt;केयूर त्याला म्हणतो, &quot;अडचण नाही एक प्रश्न आहे विचारू का?&quot; सुहास हो असं बघतो, &quot;ते पुतळे कोणाचे आहेत?&quot;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;ओह्ह... ते तर सांगायचं राहिलंच!!&quot; सुहास काही आठवलं असं बघून सॉरी म्हणत स्टेज वर चढतो आणि परत माईक वर बोलतो, &quot;गाईज तुम्ही गेम मध्ये असाल ना तेव्हा तुम्ही ह्या अवतारात असणार!! तुम्हाला ह्यांना भेटायचं का? आवडेल का?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शालिनी हि त्याला जॉईन झाली... &quot;हि आहे टिनसले आणि हा आहे एरियन!! तर गेम मधले तुमचे अवतार बघून कसं वाटतंय? कोणाला बनायला मिळेल टिनसले? तिचे डोळे बघा कसे चमकतायेत!!&quot; शालिनी सर्वांना हसून बघते. &quot;बघुयात इथून कोणाची निवड होते का गेम साठी!!&quot; सुहास शालिनी ला बघतो.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;... एवढेच नाही गाईज!! तुम्हाला सर्वांना आज इथे रुथलॅन्ड चा फील घेता येणार आहे!! मुलींना टिनसले&amp;nbsp; होऊन बघता येणार आहे तर मुलांना एरियन बनून!!&quot; सर्व कसं असं बघतात, आम्ही इथे सर्वत्र AI स्लॉट इन्स्टॉल केले आहे तुम्हाला तुमच्या मोबाईल वर एक टेम्पररी अँप इन्स्टॉल करायचं आहे, आणि बस... अँप वर पासवर्ड काय टाकायचा हे तुमच्या किट मध्ये दिलेला आहे, प्रत्येकाचा पासवर्ड वेगळा आहे तर आपला आपला पासवर्ड वापरा!! एन्जॉय गाईज!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धीरज आणि केयूर आपले तिकीट बॉक्स मध्ये टाकतात.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धीरज लगेच आपल्या मोबाईल वर अँप इन्स्टॉल करून पासवर्ड टाकून तयार होता, केयूर त्याचं अनुसरण करत आपल्या किट मधला पासवर्ड टाकतो... &quot;अरे हे काय ह्यांनी मला एरियन नाही बनवलं... मी टिनसले झालो आहे!!&quot; केयूर निराश झाला, &quot;चालतं रे चल ना आपण खेळू...&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दोघांनी आपले AI गोगल चढवले आणि दोघे गेम खेळण्यात मग्न झाले, &quot;अरे काय मस्त गेम आहे!!&quot; धीरज खेळतांना मोठ्यांनी ओरडत होता!! सुहास त्याच्या जवळ येऊन म्हणतो, &quot;तुम्हाला गेम आवडला ऐकून खूपच छान वाटले पण खरोखरच गेम खूप वेगळा आहे !! हे तर तुम्ही AI मुळे मोबाईल वर खेळू शकत आहात, कंटाळा आला कि मोबाईल बंद करता येईल....&amp;nbsp; पण खऱ्या गेम मध्ये कोणतीच पळवाट नाही आहे... &quot; केयूर आपले गॉगल काढून सुहास ला बघतो, तो मी खरं सांगत आहे असं त्याला बघतो आणि केयूर स्मित करायचा प्रयत्न करतो.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बराच वेळ गेम खेळून होतो, लाईफलाईन संपते तसा गेम संपतो, दोघे अगदी त्यांनी कसली धमाल केली हे एकमेकांना सांगायला आतुर होते ती चर्चा करतच ते तिथून निघतात, वातावरण अजून हि तापलेलं होतं, मागे गाणी सुरु होती! धीरज ची डान्स करायची इच्छा होती केयूर ला माहित होते, त्यामुळे ते सुद्धा सुरु असलेल्या मुलांच्या गोंधळात शामिल होतात, बराच वेळ दोघे डान्स करतात आणि मग भूक लागली आहे हे जाणवायला लागते!! दोघे मग जेवणाकडे वळतात, &quot;किती वाजले रे?&quot; केयूर धीरज ला विचारतो, तो मुद्दाम विचारत आहे हे धीरज ला माहित होते, &quot;अरे घड्याळ बघ ना तुझं!!&quot; केयूर त्याच्या मनगटाकडे बघून परत चिडवत म्हणतो, मग स्वतःच आपलं घड्याळ बघून म्हणतो, &quot;११ वाजले... धीरज... ह्या वर्षाचा शेवटचा तास!!&quot; धीरज ते ऐकून अरे हो रे असं त्याला बघतो! दोघे आपल्या प्लेट्स घेऊन एका निवांत ठिकाणी जाऊन जमिनीवर बसतात. एक मोठा श्वास सोडत केयूर म्हणतो, &quot;काही वेळात हे वर्ष संपणार, २१२१ आपल्या सोबत काय घेऊन येईल?&quot;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;नक्कीच चांगलंच असणार आहे २१२१ आपल्या साठी!!&quot; केयूर कसं काय असं बघतो...&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&quot;अरे मग सुरवातच झोंबलास्टीक होणार ना भावा... मग वर्ष पण तसंच जाणार ना...&quot; केयूर त्याला टाळी देत हो ना असं बघून हसतो आणि दोघे आपले ड्रिंक्स आणि जेवण एन्जॉय करत आपले त्या वर्षातले शेवटचे क्षण घालवतात. त्याचवेळी नवीन वर्षाच्या नवीन उमेद मनात जन्म घेत होत्या!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जसा जसा वेळ पुढे सरकत होता १२ कडे सर्वांचे लक्ष होते आज, फक्त नवीन वर्ष सुरु होणार म्हणून नव्हते तर रुथलॅन्ड वर ते लकी २ कोण व्यक्ती जाणार ते हि जाहीर होणार होते, त्यामुळे सर्वांच्या हृदयाची धडधड वाढलेली होती, भारतातला प्रत्येक तरुण हीच आशा लावून होता कि त्याचं नाव निवडून यावं, हा लकी चान्स त्याला मिळावा! नक्की कोणाच्या नशिबात रुथलॅन्ड होते हे कोणाला माहित नव्हते, समोर असेलेले क्षण एन्जॉय करण्यात सर्व मग्न होते!&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्रमश:&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgBjeahNcPY0lUUnWpRS84cDhx7SJF8xshZjDr90f_FlaDPSGSsF2kMoJVGt43Li3eksil9AOIMao3P5Obq3VTOEXaim9K3Ctc6YcqIVZPcQsxMgb6xMJ61F6PSz7WYdCexSt6WbWeaOo6L/s750/cover8.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;422&quot; data-original-width=&quot;750&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgBjeahNcPY0lUUnWpRS84cDhx7SJF8xshZjDr90f_FlaDPSGSsF2kMoJVGt43Li3eksil9AOIMao3P5Obq3VTOEXaim9K3Ctc6YcqIVZPcQsxMgb6xMJ61F6PSz7WYdCexSt6WbWeaOo6L/s320/cover8.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम्हाला एक वेगळ्या दुनियेच्या सफर वर घेऊन जायला आले आहे, मग तय्यार? २१२१ मधली, हो बरोबर वाचले २१२१ मधलीच आज पासून १०० वर्षानंतर ची हि निराळी दुनिया अनुभवायला? तुमच्यासाठी हि नवीन रोमांच&amp;nbsp; आणि ऍडव्हेंचर ची आगळी वेगळी कथा घेऊन आले आहे, आशा आहे तुम्हाला आवडेल! खाटा जास्ती मोठी नसणार आहे फक्त १०-१२ भाग असतील आणि मी रोज पोस्ट करणार आहे!!&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/962235088239768366/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2020/12/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/962235088239768366'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/962235088239768366'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2020/12/blog-post.html' title=' द रुथलॅन्ड | #१ '/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgBjeahNcPY0lUUnWpRS84cDhx7SJF8xshZjDr90f_FlaDPSGSsF2kMoJVGt43Li3eksil9AOIMao3P5Obq3VTOEXaim9K3Ctc6YcqIVZPcQsxMgb6xMJ61F6PSz7WYdCexSt6WbWeaOo6L/s72-c/cover8.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-6596476469666144342</id><published>2020-10-04T05:12:00.001-07:00</published><updated>2020-10-04T05:12:16.808-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;दिलं दोस्ती रीलोडेड (DDR)&amp;nbsp; #२&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;मीनल फोन वर बोलण्यात मग्न होती, कोणाशी तरी भांडत होती फोन वर, तिचं गरम डोकं लगेच चढलं होतं, ती कोणाशी काही न बोलता खोलीत निघून जाते आणि तयार होऊन कोणाला काहीच न बोलता निघून जाते...&lt;br /&gt;&quot;अशी काय हि काही न सांगता कुठे गेली ह्या वेळी?&quot; रेश्मा काळजी ने म्हणली.&lt;br /&gt;&quot;येईल ग इथेच गेली असेल...&quot; सुजय सांजवतो तिला.&lt;br /&gt;&quot;अरे पण सांगून नको का जायला?&quot; रेश्मा हातवारे करत काळजीने म्हणते, &quot;जेवायचं कसं करायचं?&quot;&lt;br /&gt;&quot;कोणाशी बिनसलं काय माहित हिचं&quot; एना पण काळजीत विचार करत म्हणली.&lt;br /&gt;&quot;अरे एवढं काय तुम्ही लोक...&quot; कैवल्य हि तयार झाला होता, &quot;आली असेल ऑडिशन गेली असेल...&quot;&lt;br /&gt;&quot;ऑडिशन ह्या वेळेला?&quot; रेशीम त्याला लाटणं दाखवत म्हणते, ते बाजूला करतं कैवल्य पाण्याची बाटली फ्रीज मधून काढून तिला पाणी पीत सांगतो, &quot;मी बाहेर जात आहे हा, आणि मी सांगून जात आहे मला ओरडायचं नाही...&quot; तो डोळे मोठे करून तिला बरं का असं बघतो.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;तू कुठे निघालास?&quot;&lt;br /&gt;&quot;अरे आता टार्गेट मीट नको का करायला, मी तर लागलो कामाला, एका प्रोड्युसर चा फोन होता, त्यांना भेटून येतो!&quot; कैवल्य समजवतो परत, रेश्मा हा, चांगलं आहे असं बघते.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;सर्व आपल्या कामात होते... बऱ्याच वेळानी दारावरची घंटी वाजते, रेश्मा किचन मध्ये बिझी असते, सुजय आपल्या लॅपटॉप वर काही करत असतो, आशु आडवा पडला होता मोबाईल वर खेळत, एना तिच्या खोलीत असते. दार उघडायला कोणी स्वतःहून तयार होतं नव्हतं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;बाहेर...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;माजघर? म्हणजे?&quot; मीनल तो प्रश्न ऐकून त्याच्या कडे रागाने बघत म्हणते, &quot;ह्या घरातली सर्व माणसं माजात असतात म्हणून त्याच तसं नाव आहे...&quot;&lt;br /&gt;&quot;ओह्ह्ह आय एम इम्प्रेसज्ड...&quot; तो पाटीवरून हात फिरवत ते वाचू लागते... &quot;ह्या घरातील सर्व पात्र काल्पनिक आहेत...&quot; मग वरून खाल पर्यंत मीनल ला बघतो... स्वतःशीच ते वाक्य परत बोलून हसतो, &quot;काल्पनिक... ह्ह &quot;&lt;br /&gt;मीनल अस्वस्थ होऊन दोरी परत ओढते, &quot;अरे वाह मस्त!! नवीन कल्पना आहे हि तर ... कोणाची कल्पना?&quot;&lt;br /&gt;&quot;नवीन काय त्यात? मंदिरात घंटी नाही बघितलिस का कधी?&quot; मीनल त्याच्यावर चिडते आणि रागात पुटपुटते, &quot;कुठे गेले हे सर्व... &quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;एना खोलीतून बाहेर डोकावते, &quot;आशा... दार उघड ना... &quot; ती त्याला ओरडते...&lt;br /&gt;&quot;मी का उघडू?? मी बिझी आहे... ए.. स्कॉलर कोण आलं बघ ना...&quot;&lt;br /&gt;सुजय लॅपटॉप मधून डोकं वर काढत बघतो, &quot;मी?? मी दार उघडू??&quot;&lt;br /&gt;&quot;हा मग??&quot;&lt;br /&gt;&quot;मी कामात आहे...&quot;&lt;br /&gt;&quot;मी पण कामात आहे...&quot; आशु आपल्या मोबाईल मध्ये गेम खेळत म्हणाला.&lt;br /&gt;तिकडून रेश्मा चा आवाज आला, &quot;दार उघडतंय का कोणी? नाही तर मी उघडते, भाजी करपलेली खावी लागली तर कोणी तक्रार करू नाही...&quot;&lt;br /&gt;आशु च्या कानात लगेच करपलेली भाजी ऐकून घंटी वाजली, तो उठून दार उघडायला जातो, समोर मीनल फणफणत होती, &quot;इतका वेळ लागतो दार उघडायला??&quot; त्याच्यावर बरसत ती सरळ खोलीत निघून जाते... तिच्या सोबत कोण आहे काय काही न सांगता... आशु त्याला एक ऑकवर्ड लुक देतो आणि तो आशु ला एक ऑकवर्ड लुक देतो, मग आशु त्याला म्हणतो, &quot;ये ना ये आत ये...&quot;&lt;br /&gt;तसा तो नाही नको करत आत जातो, तिथल्या टायर पासून बनवलेल्या एका खुर्चीत तो बसतो, आशु लगेच गडबड करत सुजय कडे जातो, &quot;स्कॉलर... ए स्कॉलर ...&quot; सुजल काही लक्ष देत नाही...&lt;br /&gt;&quot;स्कॉलर...&quot; आशु जरासा आवाज चढवतो आणि त्याचं शर्ट ओढतो.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;काय आहे आशु? मी कामात आहे ना... दिसत नाही का तुला?&quot;&lt;br /&gt;&quot;मीनल परत नवीन किरायदार घेऊन आली आहे आपल्या सोबत...&quot;&lt;br /&gt;&quot;काय??&quot; किरायदार शब्दानी सुजय च्या डोक्यात अलार्म झाला तो आश्चर्याने आशु कडे कुठे म्हणून बघतो, आशु त्याला दबक्या आवाजात म्हणतो, &quot;ते बघ तिकडे...&quot; सुजय मान वर करून बघतो, समोर कोणी बसलंय हे बघून तो परत आशु ला म्हणतो, &quot;कशावरून तो किरायदार आहे...&quot;&lt;br /&gt;&quot;अरे बॅग बघ ना त्याच्या...&quot;&lt;br /&gt;सुजय उठून उभा राहतो, &quot;अरे हे कोण आहे, मीनल अशी कशी करू शकते?&quot;&lt;br /&gt;&quot;आणि ह्या वेळेस तिनी मुलगा आणलाय सोबत... म्हणजे आपल्या रूम मध्ये अडचण... आधी ते तरी नव्हतं...&quot;&lt;br /&gt;सुजय तावातावाने कोण आलं आहे ते बघायला जातो, त्याच्या चेहेऱ्यावर नाखुषी स्पष्ट दिसत होती, तो त्याच्या समोर जातो तसं तो उठून उभा होता, सुजय च्या आणि आशु च्या चेहऱ्यावरच्या अस्वस्थता बघून तो आपला हात समोर करत म्हणतो, &quot;हाय!! मी उरवील...&quot;&lt;br /&gt;सुजय त्याचा हात हातात घेत म्हणतो, &quot;हाय, मी सुजय... तुम्ही इथे म्हणजे काय काम आहे ??&quot;&lt;br /&gt;उरवील थोडा संकोच करत त्याला बघतो, &quot;ते ताई सांगेल ना तुम्हाला??&quot;&lt;br /&gt;मीनल ला कोणी तरी इतका मान देत आहे ताई... वगैरे?? सुजय भुवया उंचावून आशु कडे बघतो आणि ते दोघे हा तुम्ही बसा असं त्याला बघून किचन मध्ये जातात, रेश्मा त्यांना असं फुसफुस करतांना बघून म्हणते, &quot;काय सुरु आहे तुमचं?&quot;&lt;br /&gt;&quot;ते आम्हाला वाटतंय, मीनल नी पैश्याची चणचण दूर करायला वेगळाच मार्ग शोधून काढला आहे...&quot;&lt;br /&gt;&quot;काय???&quot;&lt;br /&gt;&quot;ती ह्या वेळेस आपल्या सोबत माजघरात रहायला एका मुलाला घेऊन आली आहे??&quot;&lt;br /&gt;शीळ मारत रेश्मा म्हणते, &quot;ओह हो... नवीन एन्ट्री?&quot;&lt;br /&gt;&quot;काय हे... बघ त्याचा असर आपल्या सभ्य रूममेट लगेच शिट्टी वगैरे ... काय हे शोभत का तुला रेश्मा...&quot; सुजय आपली मान हलवून हे काही ठीक नाही असं तिला बघतो. रेश्मा हसत त्याला म्हणते, &quot;अरे तुम्ही का इतकं टेन्शन घेताय? मीनल ला माहित आहे आपण नाही ठेवून घेणार कोणाला, कोणी नवीन मेंबर नाही ना अड्जस्ट होणार...&quot;&lt;br /&gt;&quot;तेच ना आणि ह्या वेळेस ती मुलाला घेऊन आली आहे चक्क... ह्या आधी मुलींना घेऊन यायची, मुंबईत ह्या नवीन मुली कुठे जाणार असे कारण देऊन... पण हा तर चांगला बॉडी बिल्डर दिसतोय...&quot; आशु त्याच्या बॉडी वर एक नजर टाकतो आणि मग आपल्यावर एक टाकतो त्याची चिडचिड होणं साहजिक होतं...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;रेश्मा ला ह्या दोघांची सुरु असलेली धडपड बघून हसायला होत होतं, &quot;रेश्मा तुला हसायला येतंय ना, अगं पण तुला पण एका मेम्बर च जेवण बनवायचं काम वाढेल ना...&quot;&lt;br /&gt;&quot;आ... हा मी विचारच नाही केला... &quot; रेश्मा हातातलं भांडी पुसायचं कापड ओट्यावर फेकत मी बघते ह्या मीनल ला म्हणत निघते ...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;मीनल ला जाब विचारायला रेश्मा रागारागात निघते खरी पण खोलीत जाताच, एना घाबरलेली रूम च्या एका कोपऱ्यात उभी दिसते, रेश्मा तिला डोळ्यांनीच काय झालं विचारते... एना डोळ्यांनी मीनल कडे इशारा करते आणि घाबरून ती चिडलेली आहे, रागात आहे आणि फार आऊट ऑफ कंट्रोल आहे असं सांगते ... रेश्मा मी बघते असं तिला हाताने इशारा करते. एना हम्म असं डोकं हलवून बघ असं बघते.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;मीनल रागारागात कपाटातून कपडे काढून बेडवर फेकत होती, तिच्या सारख्या बेड ते कपाट फेऱ्या सुरु होत्या, स्वतःशी मोठ्या मोठ्याने बडबड सुरु होती, &quot;समजतात काय? आम्ही कोण? आता काय? का?&quot; ती स्वतःशीच बोलत होती, रेश्मा तिचा राग बघून तिच्या जवळ जाते, एक वेळ वळून एना ला बघते, सुजय आणि आशु हि आले होते, रेश्मा एक आवंढा गिळत मीनल कडे बघते, &quot;मीनल!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p data-mce-style=&quot;text-align: center;&quot; style=&quot;font-size: 18px; max-width: 100%; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img data-mce-src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=6adfbd9a-dd05-4e77-9a00-01872acf204d&amp;amp;width=648&amp;amp;type=jpg&quot; src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=6adfbd9a-dd05-4e77-9a00-01872acf204d&amp;amp;width=648&amp;amp;type=jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&quot;काय आहे?&quot; मीनल तिच्यावर ओरडते रेश्मा दचकून तिला बघते, &quot;ते बाहेर... &quot;&lt;br /&gt;&quot;काय आहे बाहेर?? माहित आहे मला... कोणता मोठा तिर मारला आहे त्यानी?? मुलगा म्हणून जन्माला येणं म्हणजे तो खूप मोठा लागून गेला का??&quot;&lt;br /&gt;रेश्मा नाही तसं नाही मी तसं नाही बोलत आहे असं बघते तिला.. .&lt;br /&gt;&quot;मी मुलगी आहे ह्यात माझा दोष आहे का?? कि मी माझ्या आई बाबांवर कमी प्रेम करते?? कि माझ्या परिवाराची काळजी नाही घेऊ शकतं काय नाही करू शकतं मी मुलगी आहे तर??&quot;&lt;br /&gt;मीनल ची बडबड काय सुरु होती, कशाचा राग करत आहे ती, रेश्मा वळून सर्वांना बघते, सुजय आणि आशु खोलीत आले होते, सुजय मीनल ला शांत करत म्हणतो, &quot;मीनल तू कोणाला घेऊन आली आहेस? आम्ही एवढंच विचारतोय... तुला माहित आहे ना आपल्या घरी अजून एक नवीन मेम्बर नाही अड्जस्ट होऊ शकतं!!&quot;&lt;br /&gt;&quot;मग ते त्याला जाऊन सांगा... &quot;&lt;br /&gt;&quot;आम्ही कसं जाऊन सांगणार.. तू घेऊन आलीस ना, तू जाऊन तसं कळव...&quot; आशु सर्वांना बघून हे कारण ठीक आहे असं बघतो..&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;का... रेश्मा ला घेऊन आली होती तेव्हा सर्वांनी मिळून विरोध केला होता ना... तसेच त्याला हि सर्व मिळून सांगा ना नाही आहे इथे जागा म्हणून?&quot; मीनल रागारागात आपले अश्रू पुसत हातातले कपडे फेकत म्हणते.&lt;br /&gt;&quot;अगं तो कोण कुठला आम्हाला काही माहित नाही, आम्ही कसं असं डायरेक्ट जाऊन सांगाच, तुला माहित आहे ना आपण नाही कोणाला अड्जस्ट करू शकतं मग तू आणायचंच नाहीस ना...&quot; सुजय समजावण्याचा सूर पकडून म्हणतो.&lt;br /&gt;&quot;मला हौस नाही!! त्याला घेऊन यावे लागले मला....&quot;&lt;br /&gt;&quot;का??&quot; सर्वांनी एकत्र विचारले.&lt;br /&gt;&quot;फोन आला होता तसा मला...&quot; मीनल जरा शांत झाली होती आता, ती नजर खाली रोकुन बघत उत्तर देते..&lt;br /&gt;&quot;कोणाचा??&quot; आशु सर्वांच्या वतीने विचारतो.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;बाबांचा!!&quot; मीनल अजून हि खाली बघत होती...&lt;br /&gt;&quot;काय?? तुझ्या बाबांचा फोन आला होता मीनल... &quot; मीनल पेक्षा रेश्मा आनंदी होती, &quot;अगं तू अशी चिडचिड का करत आहेस मग? इतक्या वर्षांनी त्यांचा फोन आला, तू खुश नाहीस? तुझे बाबा बोलले मीनल तुझ्याशी?? अगं मलाच किती आनंद होतोय...&quot;&lt;br /&gt;रेश्मा चे शब्द ऐकून मीनल चे डोळे परत पाणावले, &quot;हो... इतके वर्ष मी ज्यांच्या तोंडून बेटा म्हणून घ्यायला तरसले, ज्यांच्यासाठी मी मुलगा बनून स्वतः मी मुलगी असल्याचा विसर पाडला, त्यांचा फोन आला मला... &quot;&lt;br /&gt;&quot;मग??&quot; रेश्मा तिला बिलगते, &quot;खुश हो ना मग...&quot;&lt;br /&gt;&quot;पण तो फोन माझ्या साठी नव्हता... &quot;&lt;br /&gt;&quot;मग??&quot; रेश्मा गंभीर झाली तसे सर्व गंभीर झाले...&lt;br /&gt;&quot;त्याच्या साठीच होता, ज्याच्या साठी त्यांनी मला स्वतः पासून लांब केले... फक्त मी मुलगी म्हणून मला त्यांनी प्रेमानी कधी बाबा म्हणून हाक मारू दिली नाही कि कधी बेटा म्हणून माझ्या डोक्यावर मायेनी हाथ ठेवला नाही... इतके दिवस मी एकटी मुंबई सारख्या शहरात आपला कसां सांभाळ करत असेल ह्याची त्यांना कधी काळजी हि नाही वाटली आणि आज त्यांच्या मुलानी काय मुंबईत यायचे ठरवले ह्यांना लगेच त्याच्या सुरक्षिततेची काळजी वाटली, तो कुठे राहणार? त्याची खाण्यापिण्याची कशी सोय होईल? सर्व प्रश्न पडले त्यांना, पण कधी एक फोन करून मला विचारावंसं हि नाही वाटलं कि मीनल बेटा तू कशी आहेस?&quot;&lt;br /&gt;मीनल ला रेश्मा मिठीत घेते, मीनल खूप रडते, &quot;मी पण त्यांच्या रक्ताची आहे ना ग? माझी का नाही वाटतं त्यांना कधी काळजी? माझ्यासाठी का नाही तुटत त्यांचा जीव? का मी त्यांना आपली नाही वाटतं? का??&quot;&lt;br /&gt;रेश्मा, सुजय आणि आशु कडे बघते आणि त्यांना त्याला बघा असं बघते, ते आपल्या भावनांना आवरत रेश्मा ला मीनल ला सांभाळ असं बघत तिथून निघतात. आशु आपला चष्मा काढून डोळे पुसतो. ते हॉल मध्ये येतात, उरवील भिंतीवर लावलेले त्यांचे फोटो बघत असतो, त्यांची चाहूल लागताच तो वळून त्यांना बघतो आणि स्माईल करतो, &quot;छान आहेत पिक्स, तुम्हाला रेहमान आवडतात वाटतं?&quot; तो समोरचा रेहमान चा मोठा फोटो बघून विचारतो.&lt;br /&gt;&quot;हो ते आमचा अजून एक रूम मेट आहे कैवल्य तो त्या फिल्ड मध्ये आहे ना...&quot; सुजय त्याला स्पष्टीकरण देतो, एक नकोशी शांतता असते तिथे, मग सुजय सोफ्यावर बसत त्याला म्हणतो, &quot;तू मीनल चा भाऊ का?&quot;&lt;br /&gt;उरवील आनंदानी मान हलवतो... &quot;मघाशी नीट ओळख नाही झाली आपली... मी सुजय साठे. मी सॉफ्टवेर इंजिनियर आहे, IT कंपनीत आहे कामाला मी.&quot; उरवील वाह छान असं मान हलवून सांगतो.&lt;/p&gt;&lt;p data-mce-style=&quot;text-align: center;&quot; style=&quot;font-size: 18px; max-width: 100%; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img data-mce-src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=cb4d5b82-eca7-461a-a332-5b9648b0669b&amp;amp;width=454&amp;amp;type=jpg&quot; src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=cb4d5b82-eca7-461a-a332-5b9648b0669b&amp;amp;width=454&amp;amp;type=jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;आशु त्याला आपला हात हातात देतो खरा पण मीनल नी त्याच्या मुळे खूप काही सोसलं त्यामुळे न कळतंच त्याच्या मनात त्याच्या विषयी राग आला होता, &quot;हाय आणि आय एम द मिस्टर आशुतोष शिवलकर!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p data-mce-style=&quot;text-align: center;&quot; style=&quot;font-size: 18px; max-width: 100%; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img data-mce-src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=391e38be-5c32-45a4-b67f-4309d1d1a4c7&amp;amp;width=313&amp;amp;type=jpg&quot; src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=391e38be-5c32-45a4-b67f-4309d1d1a4c7&amp;amp;width=313&amp;amp;type=jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;त्याचं वाक्य ऐकून सुजय स्वतःशी बोलतो, &quot;नको तिथे ह्याला इंग्रजीत का बोलायचं असतं?&quot;&lt;br /&gt;उरवील हि गालात ते ऐकून हसतो, उरवील त्या दोघांना बघून हसतो आणि म्हणतो, &quot;आणि मी उरवील, कोल्हापूर वरून आलोय, मला पण ताई सारखं ऍक्टिंग मध्ये कॅरिअर करायचे, म्हणून मुंबईत आलो! अजून तर एवढीच ओळख आहे, लवकरच स्वतःची ओळख बनवेल अशी अशा आहे... तुम्ही सर्व माझी साथ द्याल ना?&quot; उरवील त्या दोघांना बघतो. सुजय हो असं बघतो.&lt;br /&gt;आशु सुजय ला कोपरा मारत त्याला नजरेने बोल त्याला असं बघतो, सुजय काय? असं करतो.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;तो आशु ला कीचन मध्ये घेऊन जातो, कोपऱ्यात येताच आशु त्याच्यावर बरसतो, &quot;तू सांग ना त्याला तो इथे नाही राहू शकतं&quot;&lt;br /&gt;&quot;काय?? मी का सांगू?&quot;&lt;br /&gt;&quot;तू घर मालक आहेस ना?&quot; आशु नी एक्दम बरोबर पॉईंट मांडला होता, पहिल्यांदा सुजय ला त्यानी आपल्या हुशार उत्तरानी चूप केलं.&lt;br /&gt;&quot;अरे तू त्याच्या चेहऱ्यावरची निरागसता बघितलिस? त्याच्या डोळ्यातली स्वप्न बघितलिस?&quot;&lt;br /&gt;&quot;हे बघ स्कॉलर, मला ते काही माहित नाही, मला फक्त एवढं कळतं, त्याच्या मुळे आज मीनल रडली, आपली मीनल यार, चांगल्या चांगल्या मुलांना पाणी पाजणारी मीनल, तीच्या डोळ्यात पाणी आलं.. मी नाही राहणार अश्या मुलासोबत...&quot; आशु हळवा होतं म्हणतो, त्याला समर्थन देत एना तिथे आली,&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;बरोबर बोलतोय आशूटल्या, सुजा जा आणि त्याला बाहेर काढ, ह्या घरात मीनल ला रडवणारी व्यक्ती नाही राहू शकतं&quot;&lt;br /&gt;&quot;हे बघा.. जरा डोकं शांत ठेवा... तो आपल्या मीनल चा भाऊ आहे.. सख्खा!! त्याच्या कडे बघा, तो किती स्वप्न घेऊन आला आहे इथे... कधी आपण हि अशीच स्वप्न घेऊन आलो होतो!!&quot;&lt;br /&gt;&quot;हे बघ सुजा मला काही माहित नाही... तू सांगतो कि मी जाऊन सांगू?&quot; एना त्याला शेवटचं विचारते.&lt;br /&gt;&quot;नाही मी नाही सांगणार, मला त्याच्यात माझी पिहू दिसते, एक मोठा भाऊ म्हणून किंवा बहीण म्हणून आपण नाही आपल्या छोट्या भाऊ बहिणीची स्वप्न चिरडू शकत, मला नाही जमणार त्याला नाही म्हणणे... &quot; सुजय तेवढे बोलून तिथून निघून गेला...&lt;br /&gt;एना मी सांगते असं आशु ला बघून त्याच्या सोबत जाते, तिला बघून उरवील छान स्माईल देतो, &quot;हे किती छान आहे कुठून आणलं?&quot;&lt;br /&gt;&quot;आणलं नाही काही... ते मी बनवलं आहे...&quot; एना आनंदानी त्याला सांगते. हातातलं ते शोपीस निहारत उरवील म्हणतो, &quot;किती सुंदर बनवलं आहेस? मला शिकवशील बनवायला?&quot; एना लगेच डोकं हलवून हो का नाही असं बोलते, तिचे केस हि आनंदानी डोलत होते.&lt;br /&gt;&quot;पण मला तुझं नाव नाही कळलं ...&quot;&lt;br /&gt;&quot;मी एना... &quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p data-mce-style=&quot;text-align: center;&quot; style=&quot;font-size: 18px; max-width: 100%; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img data-mce-src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=b322dad7-2855-4bad-ba23-039d9c03e530&amp;amp;width=383&amp;amp;type=jpg&quot; src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=b322dad7-2855-4bad-ba23-039d9c03e530&amp;amp;width=383&amp;amp;type=jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&quot;तू पण इथे राहते?&quot; एना मान हलवून होकार देते, &quot;म्हणजे तू मीनल ताई ची रूममेट आहेस? मीनल ताई कुठे आहे? तिचा फ्लॅट वेगळा आहे का? आम्ही आलो तेव्हा पासून आलीच नाही परत!!&quot; उरवील च वाक्य ऐकून एना थक्क होती, उरवील मीनल ला ताई ताई करून किती प्रेमानी हाक मारत होता. ती आशु कडे बघते आशु अजून हि त्याच्यावर नाराजच होता.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;एना त्याला म्हणते, &quot;अरे आम्ही सर्व इथे एकत्र राहतो, आम्ही ६ जण आहोत, आत मध्ये आमची मुलींची रूम आहे, तू घर बघितलंस का आमचं??&quot;&lt;br /&gt;उरवील मान हलवून नाही म्हणतो, &quot;चल मी दाखवते....&quot; आशु एना ला हि रागानी बघत होता आता.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;एना त्याला म्हणते, &quot;हॉल तर बघितलाच आहेस तू... हे डिझाईन आयडिया माझ्या आहेत सर्व, आम्ही टायर पासून खुर्च्या बनवल्या आहेत&quot; उरवील हम्म इथे राहणारी लोक इंटरेस्टिंग आहेत हे तर मला बाहेरूनच कळले होते...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;का रे??&quot; एना प्रश्नार्थी बघते.&lt;br /&gt;&quot;ते दारावर वाचलं ना, सर्व पात्र काल्पनिक आहेत तेव्हाच कळलं...&quot; उरवील खळखळून हसतो तशी त्याच्या गालावर खळी पडते.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;ए... तुला पण खळी पडते मीनल सारखी सेम... &quot; एना उत्साहात म्हणते तसा उरवील ते ऐकून हा असं बघतो.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;ते समोर जातात तसं कैवल्यचं कीबोर्ड बघून उरवील त्यावरून आपली बोटं फिरवतो. खिडकीतून तो बाहेर डोकावतो... &quot;आणि इकडे आमची मुलींची खोली आहे... &quot; तो परत सर्व निहारत वापस येतो, बाथरूम च्या दारावर राणी चा फोटो बघून तो बघत राहतो, एना त्याच्या मनातला प्रश्न बघून तो राणी चा फोटो पलटवून त्याला बादशाह चा फोटो दाखवते... &quot;आपण युज करतांना बरोबर साइन बाहेर लावून जायचं हा...&quot;&lt;br /&gt;उरवील ओह्ह मस्त आयडिया असं डोळे मोठे करून बघतो...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;एना त्याला कीचन दाखवायला आणते, &quot;तुला हळू हळू घरातले सर्व रुल्स कळतील!! हे आपलं किचन... &quot;&lt;br /&gt;उरवील सर्वत्र नजर टाकत होता, &quot;चहा बनवता येतो?&quot;&lt;br /&gt;उरवील का असं घाबरून बघतो, एना त्याला काही हरकत नाही असं बघते, &quot;शिकशील!!&quot;&lt;br /&gt;दोघे तिथे बडबड करत उभे होते, रेश्मा पाठ करून उभी होती, आणि उरवील च्या चाहूलनीच तिचं डोकं फिरत होतं, त्यानी ह्यांना वयक्तीक काही त्रास दिला नव्हता पण त्याच्या मुळे मीनल नी खूप सहन केलं आहे हे तिच्या हि मनात घर करून होते, एना रेश्मा ला हाक मारते रेश्मा तिच्या कडे न बघतच हा असं बोलते, &quot;रेश्मा.. हा मीनल चा भाऊ आहे...&quot;&lt;br /&gt;&quot;हाय!!&quot; उरवील तिला हि छान स्माईल देण्याचा प्रयत्न करतो, तिची सारखी इकडून तिकडे हे भांड घे ते ठेव चालू होतं, शेवटी तो तिच्या समोर जाऊन उभा होतो, &quot;हाय!! मी उरवील!!&quot;&lt;/p&gt;&lt;p data-mce-style=&quot;text-align: center;&quot; style=&quot;font-size: 18px; max-width: 100%; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img data-mce-src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=0c9aae1f-a978-420c-ac3e-73c21ee95c04&amp;amp;width=506&amp;amp;type=jpg&quot; src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=0c9aae1f-a978-420c-ac3e-73c21ee95c04&amp;amp;width=506&amp;amp;type=jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;त्याला समोर बघून रेश्मा त्याच्या कडे न बघताच त्याला म्हणते, &quot;हाय...&quot;&lt;br /&gt;एना उरवील ला म्हणते, &quot;हि रेश्मा... कळलंच आहे ना तुला...&quot;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p data-mce-style=&quot;text-align: center;&quot; style=&quot;font-size: 18px; max-width: 100%; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img data-mce-src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=bc589d67-d009-4ff0-a488-c5eeb425baee&amp;amp;width=322&amp;amp;type=jpg&quot; src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=bc589d67-d009-4ff0-a488-c5eeb425baee&amp;amp;width=322&amp;amp;type=jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;मीनल कीचन मध्ये येते तशी उरवील ला बघून तिचं डोकं उठतं, ती रेश्मा च्या कानात ओरडते, &quot;हा अजून इथेच आहे??&quot;&lt;br /&gt;रेश्मा हि बघ ना असं बघते. &quot;सुजय नी ह्याला का नाही काढलं अजून?&quot;&lt;br /&gt;&quot;सुजा...&quot; ती रागात सुजय शी बोलायला जाते...&lt;br /&gt;ती तिथून निघते तसा उरवील तिला हाक मारतो तिच्या मागे जातो, &quot;ताई...&quot;&lt;br /&gt;मीनल रागात त्याच्याकडे वळून त्याला बघते, चुटकी वाजवून त्याला म्हणते, &quot;मी तुझी काही ताई वगैरे नाही मला ताई म्हणायचं नाही...&quot;&lt;br /&gt;&quot;ओके... मीनल दि म्हणू?&quot; मीनल त्याला रागानी लुक देते, तो तिच्या मागे मागे सांग न असं फिरतो.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;सुजा...&quot; मीनल जोऱ्यात ओरडते, मीनल चा आवाज ऐकून उरवील हि शांत होतो.&lt;br /&gt;सुजय काय झालं विचारतो, &quot;तू ह्याला अजून काढलं नाहीस?&quot;&lt;br /&gt;&quot;मीनल तो तुझा भाऊ आहे&quot;&lt;br /&gt;&quot;तर?? मी म्हंटल का तुला ठेव?&quot;&lt;br /&gt;&quot;नाही... पण मला नाही पटत आहे ते...&quot; सुजय खांदे वर करून म्हणतो.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;म्हणजे तू त्याला जा नाही म्हणणार?&quot;&lt;br /&gt;&quot;सॉरी मीनल, पण खरंच तू शांत डोक्यानी विचार कर, तो तुझा भाऊ आहे, ह्यात त्याची काही चूक आहे का? जसं तू मुलगी म्हणून जन्माला आली ह्यात तुझी चूक नाही, त्याची हि चूक नाही ना? त्यानी तुला कधी त्रास दिला आहे का?&quot;&lt;br /&gt;&quot;हे बघ स्कॉलर, तुझं ज्ञान नको देवूस... तिनी काय विचारलं, तू बाहेर जा म्हणणार आहेस कि नाही?&quot; आशु मीनल च्या बाजूनी येऊन उभा होतं म्हणाला.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;तितक्यात दारावरची बेल वाजली...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;उरवील मी बघतो असं म्हणत समोर जातो... उरवील सर्व विसरून आनंदानी उत्साहात दार उघडतो, त्याला समोर बघून समोरची मुलगी डोळे उघड झाप करत त्याला बघते, &quot;हाय...&quot; ती आपल्या केसांची बट बोटात गुंडाळत त्याला वरून खाल पर्यंत स्कॅन करत म्हणते.&lt;br /&gt;&quot;हाय!! मी उरवील...&quot; तो आपला हात तिच्या हातात देत म्हणतो.त्याचा हात हातात घेत ती सेक्सी आवाजात म्हणते...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&quot;मी प्रगल्भा..&quot;&lt;/p&gt;&lt;p data-mce-style=&quot;text-align: center;&quot; style=&quot;font-size: 18px; max-width: 100%; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img data-mce-src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=41e38158-66d7-42d6-93a4-5a5dd883542d&amp;amp;width=454&amp;amp;type=jpg&quot; src=&quot;https://static-assets.pratilipi.com/pratilipi/content/image?pratilipiId=6755373524389101&amp;amp;name=41e38158-66d7-42d6-93a4-5a5dd883542d&amp;amp;width=454&amp;amp;type=jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;&lt;br /&gt;ते नाव ऐकून घरात आत सुजल आणि आशु चा थरकाप उडतो तर मीनल आणि एना हि एकमेकींना बघून हा गेला असं एकमेकाला बघतात.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;क्रमश:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;हॅलो फ्रेंड्स,&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;तुम्ही भरभरून दिलेल्या प्रतिसादा बद्दल खूप खूप आभारी आहे. तुमचे प्रोत्साहन आहे ज्यामुळे मी ह्याला पुढे लिहिण्याचा प्रयत्न सुरु ठेवत आहे. आज चा भाग कसा वाटला नक्की सांगा?&lt;br /&gt;ज्यांनी सिरीयल बघितलं नाही आहे त्यांना पात्रांची ओळख व्हावी म्हणून मी आज च्या भागात फोटो टाकले आहे.&lt;br /&gt;आशा आहे कथा आवडत आहे आणि जशी ती पुढे जाईल तुम्हाला अजून इंटरेस्ट वाटेल.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;बाकी एक नवीन पात्र आलं आहे उरवील... तुम्हाला काय वाटतं, उरवील ला हे रहायला परवाणगी देतील?&lt;br /&gt;काय मीनल आपला राग सोडून त्याला आपल्या सोबत राहू देईल?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;आज भारताने इतकी प्रगती केली आहे पण तरी हि मुलगा मुलगी मध्ये भेद भाव होतो, आज असे कोणतेच क्षेत्र नाही जिथे मुली काम नाही करत, पण आज हि वंशाचा दिवा म्हणून प्रत्येकाला मुलगाच पाहिजे.&lt;br /&gt;कधी बदलेल समाजाचा हा विचार? काय गुन्हा केला आहे मुलींनी मुलगी म्हणून जन्म घेऊन? तिच्या ते हातात हि नाही? मग तो तिचा कसा गुन्हा?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;font-size: 18px;&quot;&gt;निशी&amp;nbsp;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/6596476469666144342/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2020/10/ddr.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/6596476469666144342'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/6596476469666144342'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2020/10/ddr.html' title=''/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-2781541425200554014</id><published>2020-07-19T05:44:00.001-07:00</published><updated>2020-07-19T05:44:42.499-07:00</updated><title type='text'>करले तू मुहब्बत | तेरे संग यारा | १ एडलैब्स में दिन</title><content type='html'>&lt;h1&gt;&lt;br /&gt;&lt;/h1&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“अवनी, चलो देर हो रही है; मैं शुरुआत मिस नहीं करना चाहती,
तुम्हे तैयार होने में कितना समय लग रहा है? &quot; तनवी ने बाहर आकर अपने झुमके पहनते
हुए आवाज लगाई।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;हाँ, बस हो गया, आ रही हूँ, मैं बहुत उत्साहित हूँ
चलो चलो हम आगे चलेंगे। ”, अवनी दौड़ते हुए आयी, चाबी उठाकर दोनों चल दी। दोनों ने
फ्लैट पर ताला लगा दिया और लिफ्ट के लिए समय बर्बाद नहीं करना चाहटी थी तो सीढ़ियों
के माध्यम से भाग गयी।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;तन्वी ने अवनी से स्कूटी की चाबी ली और वो एडलैब्स के लिए
चल पड़ी।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;अवनी एक शर्मीली, घरेलू विशिष्ट महाराष्ट्रीयन लड़की थी,
वह अपने माता-पिता पर बहुत अधिक निर्भर थी, जब वह स्कूल में थी, इसीलिए उसके माता-पिता
उसे शिक्षा के लिए पुणे भेजने के लिए बहुत तनाव में थे, जहाँ वह छात्रावास में रहने
वाली थी। &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;कुछ दिनों की बात थी जब वह तन्वी से मिली, जो केरल से थी,
वो एक स्वतंत्र लड़की थी जिसको अपने काम से इस दुनिया में अपने पदचिन्हों को छोड़ने
का फैसला किया था, उसके जाने के बाद भी, अवनी ने अपने विचारों को प्रतिबिंबित किया
और उन दोनों ने कभी भी जीवन का आनंद लेने का मौका नहीं छोड़ा। तन्वी से मिलने के बाद,
अवनी के माता-पिता को सुकून हुआ कि उनकी बेटी को एक अच्छा दोस्त मिल गया है, जो स्वतंत्र
था और अपनी देखभाल कर सकती थी। अवनी भावनात्मक रूप से बहुत जल्द तन्वी से जुड़ गई क्योंकि
तन्वी ने उन वर्षों में उसके माता-पिता की जगह ले ली थी, अवनी उससे हर बात के लिए सलाह
लेती थी। वे धीरे-धीरे एक-दूसरे पर निर्भर होने लगी। &#39;आज के लिए जियो&#39; ये उनका मंत्र
था जिसका उन्होंने पालन किया और वे दोनों जरूरत के समय एक दूसरे के लिए थी। वे इंजीनियरिंग
के प्रथम वर्ष से रूममेट थे और वे दोनों ऐसे अद्भुत दोस्त को उपहार देने के लिए कॉलेज
के छात्रावास के आभारी थे। तब से वे हमेशा साथ थे। अवनी को अपने परिवार से बहुत लगाव
और निर्भरता होने की वजह से शुरुआत में अक्सर घर याद अति थी, लेकिन बाद में तन्वी की
कंपनी ने उसे सब कुछ भुला दिया। इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद, दोनों कल्याणीनगर में
अवनि के फ्लैट में रहने चली गयी; पुणे के शानदार क्षेत्रों में से एक। यद्यपि उनकी
धाराएँ भिन्न थीं, वे एक ही कंपनी में नौकरी प्राप्त करने में सक्षम थी और अब वे पुणे
में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए काम कर ताहि थी। उनकी दिनचर्या बहुत व्यस्त थी, हर
सुबह उन्हें सुबह ६ बजे उठना पड़ता था और ऑफिस की बस के लिए तैयार होना पड़ता था, जो
सुबह ७ बजे दरवाजे पर अति थी, वे बस में आराम करती, एक बार जब वे ऑफिस पहुँचती केवल
एक चीज जो उन्हें चिंतित करती है वह थी उनकी पहली प्याली कॉफ़ी, अवनी को कॉफ़ी की लत
लग गई थी अगर उसे पूरे दिन के लिए कॉफ़ी का वो प्याला नहीं होता तो उसे सिरदर्द होता,
तन्वी ने कभी भी उसके साथ कॉफ़ी पीने का मौका नहीं गवाया, जिससे उसे मुस्कुराहट के
साथ दिन की शुरुआत करने का मौका मिलता। कुछ और दोस्त थे जो उन्हें कॉफी के लिए शामिल
होते; चर्चा का विषय घर के मामलों से वर्तमान मामलों से भिन्न होते, समूह में किसी
के पैर खींचने के लिए। इसके बाद वे अपने डेस्क पर वापस चले जाते और काम शुरू कर देते।
अवनि और तन्वी अलग-अलग प्रोजेक्ट्स और बिल्डिंग में थे, इसलिए ऑफिस कम्युनिकेटर पर
लगातार चैट के अलावा एक ही समय में वे एक साथ चाय और लंच ब्रेक पर साथ होते थे। अवनी
में अभी भी मासूमियत थी, तन्वी उसे अपनी छोटी बहन की तरह मानती थी और हर कदम पर उसका
मार्गदर्शन करती थी। तन्वी अपने फैसले लेने के लिए काफी परिपक्व हो गई थी और वह अपने
माता-पिता के साथ शिक्षा के लिए पुणे आने के लिए लड़ी, वे चाहते थे कि वह शादी कर ले,
लेकिन आज वह अपने फैसले से खुश थी। शाम को जब वे घर वापस आते, तो वे इतने थके होते
थे कि मैगी अपने स्वाद के कारण कई बार उनका पसंदीदा भोजन था, और थका देने वाले दिन
के बाद वे सबसे सरल और सबसे आसान भोजन कर सकते थे। सप्ताहांत पर वे जीवन का आनंद लेने
के लिए पूरा लाभ उठती, उनके पास हर सप्ताहांत के लिए एक योजना थी और यह सप्ताहांत बहुत
खास था। आज, वे बहुत उत्साहित थी; केवल इसलिए नहीं कि यह उनकी पहली फिल्म थी लेकिन
इसलिए भी क्योंकि यह उनके पसंदीदा नायक की वापसी फिल्म थी। आखिरी मिनट की उत्सुकता
से बचने के लिए तन्वी ने 3 दिन पहले ही फिल्म के टिकट लाए थे। तन्वी और अवनी यह अनुमान
लगाने में व्यस्त थीं कि फिल्म कैसी होगी, इस बात से अनजान कि उनके लिए नियति क्या
थी, वे पूरे रास्ते चैट कर रही थी। चूंकि वे हाली में अपने नए फ्लैट में शिफ्ट हुए
थे, वे मार्ग से बहुत परिचित नहीं थे। तन्वी अवनी के निर्देशानुसार गाड़ी चला रही थी,
जो उसने मार्ग के लिए आसपास के लोगों को रास्ता पूछ कर बना रखी थी, इस बीच अवनी ने
लाइव रेडियो कमेंट्री तनवी को सुननी शुरू कर दी।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;हे तन्नु, यह सुनो ... तुम्हारा पसंदीदा ट्रैक रेडियो
पर बज रहा है!&quot; और उसने अपने एक ईयरफोन को अनप्लग कर दिया और तन्वी के कान में
प्लग कर दिया।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;वाह! सोनू निगम वह बहुत प्यारे हैं ना ... चाहा है
तझको ...। तेरा मिलना पल दो पल का मेरी धड़कनें . ला .. ला… ला… ” तनवी ने गीत की ताल
पर अपना सिर हिलाते हुए गाया, तभी वे मल्टीप्लेक्स पहुंच गईं।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;मल्टीप्लेक्स में समृद्ध भीड़ थी, तन्वी ने प्रवेश द्वार
पर अवनी को उतार दिया और पार्किंग क्षेत्र में चली गई। उसने स्कूटी खड़ी की और प्रवेश
करने के लिए उतावली थी। अवनी वहां उसका इंतजार कर रही थी और अपने पर्स में कुछ खोज
रही थी। तन्वी उसके पास गई और हताशा होते हुए बोली, &quot;क्या? मुझे मत कहना अब की
टिकट लाना भूल गयी तुम??&quot;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;ओह?&quot; अवनी ने उसे परेशां होकर देखा और फिर से
अपनी खोज जारी रखी। कुछ समय बाद, जब तन्वी को लगा कि मूड खराब हो रहा है, उसने अवनी
को अपने साथ खींच लिया और दरवाजे पर खड़े आदमी को टिकट दिया। अवनी एक ही समय में हैरान
और खुश थी।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“मुझे पता था कि तुम उन्हें साथ लेना भूल जाओगी, इसलिए मैंने
उन्हें पहले ही अपने पर्स में रख लिया था। अब मुझे और कुछ स्पष्टीकरण नहीं चाहिए तो
तुम खोजना बंद करो...&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;... कुछ भी नहीं मिलने
वाला &quot;, तन्वी ने मुस्कुराते हुए कहा।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;लेकिन तनु, मैं टिकट नहीं भूली। जब मैं उन्हें लेने
गयी, तो वहा नहीं थी इसलिए मुझे यकीन था कि तुमने ली है। &quot;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“ओह हाँ तुम्हें पता था कि टिकट मेरे पास है और इसीलिए तुम
उन्हें अपने पर्स में देख रही थी है ना? बराबर ना?&quot; तन्वी ने अपनी भौंहों को ऊपर
उठाते हुए और अवनी को थोड़ा चुटकी लेते हुए कहा।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;ओम्म्म… हम्मम… &quot; अवनि हक्काबक्का रह गई और उसने
दर्द में रोते हुए अपनी बांह को मला जहाँ तन्वी ने चुटकी ली थी.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;छोड़ो यार. ... ऐसा होता है, समझाने की आवश्यकता नहीं
है। मुझे पता है कि तुम भी इस सब से बहुत उत्साहित हैं ”, तन्वी ने कहा।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;अवनी को सुकून महसूस हुआ और उसने भी बात को जाने दिया। फिर
से हवा उत्तेजित हो गई। एक एस्केलेटर था; अवनि पहले कभी एस्केलेटर पर नहीं गई थी। वह
उस पर सवार होने के लिए डर रही थी। तन्वी ने उसका ध्यान भटकाने और उसे खींचने की कोशिश
की लेकिन वह अनिच्छुक थी।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“वहाँ पहुँचने का कोई और रास्ता नहीं है? नहीं, रुको नहीं,
मुझे छोड़ दो मैं गिर जाऊंगा। मैं नहीं आ सकता यार… .तनु नहीं यह इतना आसान नहीं है,
तुम हँसो मत यार। ” अवनी एक छोटे से बच्चे की तरह व्यवहार कर रही थी, अपनी मम्मा को
सुनने के लिए तैयार नहीं थी। तन्वी ने यह बताने की बहुत कोशिश की कि यह बहुत मुश्किल
नहीं है, &#39;&#39; अवनि .. चलो, यह खतरनाक नहीं है, ठीक है .. देखो, मानो यह एक स्थिर सीढ़ी
है और तुम्हे केवल एक कदम ही चढ़ना है और फिर वहीं रहना है कुछ समय? क्या कहती हो?
कोशिश करते हैं? &quot;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;नहीं ...&quot; अवनी ने अपने चेहरे पर डरा लाते जवाब
दिया, घबराक्र उसने कुछ और तरफ&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;देखा और वो
देखकर चकित रह गई क्योंकि सभी लोगों ने उनके पीछे भीड़ लगा दी थी जो केवल उसकी शर्मिंदगी
में इजाफा करती थी। किसी ने क्षण भर के लिए एस्केलेटर को रोकने का सुझाव दिया। वह इसके
लिए सहमत हो गई और एस्केलेटर को उस समय के लिए रोक दिया गया जब वह उसमें सवार हुई और
फिर से शुरू हुआ। अब उसे अच्छा लगने लगा। उसने छोटी सवारी का आनंद लिया, लेकिन फिर
ऊपर पहुंचने पर वह विमुख होने से डर रही थी; लेकिन तन्वी उसका ध्यान भटकाने और उसे
सही समय पर एस्कलेटर से हटाने में सफल रही।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;हूश ... भगवान का शुक्र है कि मैं सुरक्षित हूं!&quot;
जैसे ही वह एस्कलेटर से बाहर आया, अवनि ने आहें भरी।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“जैसे कि तुम ऊपर नहीं पहोचती, हुह? तुम ना एक ऐसी कार्टून
हो.. तुम जानती हो ना...। तुम सभी का आकर्षण थी वह। ” तन्वी ने उसे छेड़ते हुए कहा।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;हाँ। मुझे पता है कि लोग मुझे चौड़ी आँखों से घूर रहे
थे।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;लेकिन अगर मेरा पैर उन सीढ़ियों के बीच फंस जाता तो मैं तनु
क्या कर सकती था? ” और उसने अपनी आँखें बड़ी कर के देखा जैसे ही उसने परिसर को स्कैन
किया, “अरे देखो वहाँ बहुत सारे अच्छे स्टॉल हैं। आओ हम कुछ विंडो शॉपिंग करते है।
” अवनि ने तन्वी को बाहर बुलाया, जो बेकाबू होकर हंस रही थी। अलग-अलग स्टॉल थे। वे
दोनों सामग्री की जांच करने के लिए उनमें से हर एक के पास गए।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;क्या लगता है कि ये मेरे नीले सलवार कमीज के साथ जाएंगे?&quot;
तन्वी ने अवनि को एक जोड़ी झुमकी दिखाते हुए कहा।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“कल जो सिलाई थी? &quot;हाँ, उसपे ये सुंदर नहीं दिखेंगे?&quot;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“उम्म हाँ वे ठीक लग रहे हैं, लेकिन मुझे ये पसंद आया मुझे
लगता है कि ये बेहतर होगा? क्या लगता है?&quot; अवनी ने उसे बाली की एक और जोड़ी दिखाते
हुए कहा&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“ओह्ह माय; वे बहुत सुंदर हैं और यह कंगन, झुमके, हार, पायल
का एक पूरा सेट है और यह बहुत प्यारा है, मुझे यह पसंद आया। मैं इसे खरीदूंगी । ” तन्वी
सेट पाकर खुश थी।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;अगली दुकान जूते की दुकान थी; वे दोनों वहाँ बैठे और सैंडल
की जोड़ी की पहन कर देख रही थी। एक दूसरे से पूछ रही थी कोनसा अच्छा था और जो अधिक
अनुकूल था, नवीनतम डिजाइन और सभी विश्लेषण चल रहा था। खरीदारी करने के बाद वे दूसरी
दुकान पर चले गए।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;थोड़ी देर बाद वे एक व्यक्ति को अपनी ओर आते हुए देख रही
थी, उसकी साँस फूली थी, वह उनके पास आया और कुछ हांफते हुए नीचे झुक गया, तन्वी और
अवनी ने उसे हैरान होकर देखा। वह अपना पेट पकड़े हुए था और फिर थोड़ी देर के बाद उसने
अपने हाथों को अवनि की तरफ उठाया, जिसमें एक बटुआ था। अवनी को आश्चर्य हुआ, उसने उसे
उससे लिया और उसे धन्यवाद दिया, तन्वी ने उसकी आँखों में सवालों के साथ अपने हैरान
होने वाले लुक को दिया, जैसे &quot;तुम इसे कहाँ भूल गयी थी?&quot;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;मैंने इसे दरवाजे पर पाया, इसमें आपकी तस्वीर देखी
और संयोग से मैंने आपको पहली मंजिल पर खरीदारी करते देखा .. तो ...&quot; उसने हवा
में हांफना बंद कर दिया।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;आह ... तुम इसे तब गिरा सकती हो जब एस्केलेटर के पास
हल्ला मचा रही थी&quot; तन्वी ने अपनी आँखें घुमाई।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;नहीं, नहीं ... यह प्रवेश द्वार पर था।&quot; आदमी
ने स्पष्ट किया।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;हो सकता है जब मैं अपने हैंडबैग में चाबी खोज रही थी
तो मैंने उसे गिरा दिया।&quot; अवनी ने मासूमियत के साथ स्पष्टीकरण दिया।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;हम्म सही&quot;, तन्वी ने कहा और उसकी ओर मुड़कर उसने
उसे धन्यवाद दिया।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“हाय मेरा नाम अथर्व है…। “ उसने हाथ मिलाने की प्रत्याशा
में अपना हाथ उसे दिया। तन्वी ने अपना सिर हिलाया और कहा, &quot;हाय, मैं तन्वी हूँ
...&quot; वह निराश लग रहा था इसलिए अवनि ने उसका हाथ पकड़ लिया, हाथ मिलाया और कहा,
&quot;हाय, मैं अवनी हूँ और मुझे पर्स लौटने के लिए आपका धन्यवाद बहुत बहुत ... भूतल
से बस इस बटुए को मुझे वापस करने के लिए ... &quot; &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;उसने प्रसन्न होकर कहा,&quot; आपका स्वागत है! &quot; &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;अवनि, अगली बार कृपया सावधान रहना, यह तुम्हारा सौभाग्य
था कि तुम्हे अपना बटुआ वापस मिल गया, धन्यवाद उस अच्छे लड़के का, और मैंने कई बार कहा
है कि तुम अपने बटुए में सब कुछ मत रखा करो, तुम्हारे पास सभी क्रेडिट कार्ड, डेबिट
कार्ड, पैन कार्ड और तुम्हारे बटुए में क्या क्या कार्ड नहीं हैं, क्या तुम समझती हो
कि यह गलती कितनी महंगी पद सकती है?&quot; तन्वी ने अवनी को चेतावनी दी कि वह सावधान
हो जाए | वे एक-दूसरे को सबसे छोटा विस्तार दिखाते रहे जिसने उन्हें मल्टीप्लेक्स के
बारे में उत्साहित किया और जो उन्हें मिला वह कुछ अनूठा था। मल्टीप्लेक्स की वास्तुकला
और वहां के विभिन्न स्टालों की प्रशंसा करने के बाद, उन्होंने खुद के लिए पर्याप्त
खरीदारी की थी और उन्होंने ऐसा सोचा क्योंकि अब फिल्म के लिए समय था, बाद में वे कुछ
सैंडविच लेकर कुर्सियों पर बैठकर अपने पैरों को थोड़ा आराम करने लगी उस लंबे खरीदारी
सत्र के बाद।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;मुझे लगता है कि हमने एक अच्छी बात की है, जल्दी आकर
हमें आस-पास देखने को मिल रहा है और खरीदारी भी कर रहे है। मुझे बहुत अच्छा लग रहा
है कि मुझे बहुत अच्छी चीजें मिलीं।&quot; मेरे द्वारा खरीदा गया पर्स इतना अनोखा है।
” अवनी के चेहरे पर संतुष्टि दिखाई दी।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;हाँ। मुझे भी वो अच्छा लगा लेकिन उस महिला के पास केवल
एक ही था। ” तन्वी निराश हुई।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;है ठीक है तुम इसे कुछ समय के लिए इस्तेमाल कर सकती
हो&quot;, अवनी ने कहा।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“ओह, मुझे इसके लिए तुम्हारी अनुमति की आवश्यकता नहीं है;
वैसे भी मैं इसे कल ऑफिस ले जा रहा हूं। ही ही ... ”अवनि ने भी हंसी में उसका साथ दिया।
दरवाजे खुलते ही दोनों भागी, उन्हें दरवाजे पर खड़े आदमी ने अपनी सीट के लिए निर्देशित
किया और फिर सबसे प्रतीक्षित क्षण आया ... फिल्म शुरू हुई। पहला दृश्य एक हत्या का
था। तन्वी उस दृश्य को नहीं देख पाई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपनी उंगलियों
में गैप के माध्यम से एक झलक पाने की कोशिश की, फिर एक गाना आया ... जहां शीर्षक दिखाए
गए और उन्होंने अपने पसंदीदा नायक का नाम प्रदर्शित हुवा और इस तरह फिल्म जारी रखी,
वे दोनों फिल्म में मग्न हो गयी। कुछ अंतराल में तन्वी ने अपना फोन निकाला और देखा
कि ४ मिस्ड कॉल थे, उसने नंबर की तलाश की लेकिन वह एक अज्ञात नंबर था। उसने प्रोफ़ाइल
की जाँच की, उसका फ़ोन सायलेंट था, उसने अपना फ़ोन प्रोफ़ाइल बदल कर रिंग कर दिया।
अगर उसके माता-पिता कॉल करेंगे और वह कॉल नहीं उठाएगी तो वे अनावश्यक रूप से तनाव में
आ जाएंगे, उसने खुद से सोचा। उसने फिर से नंबर की जाँच की, किसी ने उसे ४ बार फोन किया,
उसे एहसास नहीं था कि यह कौन हो सकता है, उसने सोचा, फिर उसने सोचा कि जो कोई भी हो,
ज़रूरत पड़ने पर उसे फिर से कॉल करेगा, और चूंकि यह अज्ञात नंबर है वह परेशान क्यों
हो रही है, इस पर ज्यादा ध्यान न देते हुए उसने अवनि से पॉपकॉर्न लिया, उन्होंने फिल्म
के बारे में बातें कीं, जो उन्होंने ट्रेलर और सभी में देखी थी, उससे कितनी अलग थी।
तभी तनवी को उसी अनजान नंबर से फोन आया। संकोच के साथ उसने कहा &quot;नमस्ते।&quot;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;क्या रितु वहाँ है?&quot; दूसरी तरफ एक अज्ञात आवाज
आयी।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;माफ़ करना?? आप किससे बोलना चाहते हैं? यहाँ कोई रितु
नहीं है, गलत नंबर! &quot; तन्वी ने फोन काट दिया।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;अवनी उससे कॉल के बारे में पूछने वाली थी लेकिन फिर फिल्म
शुरू हो गई। इसलिए वे दोनों कॉल के बारे में भूल गयी और वे फिल्म में मग्न हो गयी।
कुछ समय बाद फिर से तन्वी का मोबाइल एक उच्च स्वर में बजने लगा, शर्मिंदगी महसूस करते
हुए वह कॉल लेने के लिए हॉल से बाहर चली गई। उसने नंबर को देखा जो उसी अज्ञात नंबर
का था, उसने जवाब दिया &quot;हैलो ...&quot;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;नमस्ते, रितु वहाँ है? मुझे उससे बात करने की ज़रूरत
है कृपया मुझे पता है कि वह वहाँ है कृपया मुझे उससे कनेक्ट करें&quot;, दूसरी तरफ
हताश आवाज ने कहा।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;मुझे बहुत खेद है, लेकिन यह रितु का नंबर नहीं है,
आप कृपया दोबारा नंबर की जांच कर सकते हैं।&quot; शायद आपने गलत नंबर डायल किया है
”, तन्वी ने विनम्रता से जवाब दिया और वह अनजान इस अनजान आदमी की वजह से को फिल्म को
आंशिक रूप से मिस करने के लिए उसे कोसते हुए अपनी सीट पर वापस चली गई।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;ऐसा २-३&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;बार फिर
हुआ। तन्वी वास्तव में अब निराश हो गई थी। उसने अब कठोर होने का फैसला किया। आखिर वह
हर बार अपनी पसंदीदा हीरो के एक्शन सीन मिस करके अनजान नंबर अटेंड करने के लिए अपनी
सीट क्यों छोड़ दे। तन्वी ने फिर से अपने सेल प्रोफाइल को बदलकर सायलेंट कर दिया और
इस शख्स को डांटने के लिए उसे अपनी सीट पर वापस गयी, अवनी पहले से अस्वस्थ महसूस कर
रही थी।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&quot;क्या चल रहा
है?&quot; उसने उसे संकेत दिया।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;अरे, मैं नहीं जानती कि यह कौन है, यह एक गलत नंबर
है, वह कोई रितु के लिए पूछ रहा है, मैंने उसे कई बार बताया है कि रितु का नंबर नहीं
है लेकिन वह अभी भी मुझे फोन कर रहा है ..&quot;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;क्या सुनिश्चित हैं कि वह तुम्हारा कोई दोस्त नहीं
है? कोई प्रैंक खेल सकता है? ” अवनि फुसफुसाई।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&lt;o:p&gt;&amp;nbsp;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;नहीं ... मुझे उसकी आवाज सुनकर याद नहीं है।&quot;
तन्वी ने उलझन से कहा .. &quot;लेकिन तुम जानती हो क्या ...&quot;, अवनी ने उसे अब
फिल्म पर ध्यान देने और उसका विवरण बाद में देने के लिए कहा। जैसा कि तन्वी को उम्मीद
थी, अज्ञात नंबर फिर से उसके मोबाइल स्क्रीन पर चमक गया। फिल्म अपने चरमोत्कर्ष पर
थी और बहुत दिलचस्प होने के कारण वह कॉल कट करने के लिए दृढ़ थी, लेकिन उसने सोचा कि
शायद उस लड़की के साथ कुछ जरूरी काम हो। तो अनिच्छा से उसने कॉल का जवाब दिया, इससे
पहले कि वह कुछ भी कहे उसने डाटना शुरू कर दिया,&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“मिस्टर देखो, मुझे नहीं पता कि तुम कौन हो। मैं आपको विनम्र
होकर बताने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन आपको बता दूं कि यह रितु का नंबर नहीं है और
मैं किसी रितु को नहीं जानती। कृपया आपके द्वारा डायल किए गए नंबर की जांच करें। कृपया
मुझे फिर से परेशान न करें। मैं कुछ नहीं कर सकती अगर रितु ने आपको ये नंबर दिया। लेकिन
वास्तव में यह रितु का नंबर नहीं है, यह मेरा नंबर है इसलिए मुझे क्षमा करें।
&quot; तन्वी ने एक सांस में कहा और वह खुश थी कि उसने आखिरकार को यह कह दिया कि वह
परेशान है।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;कॉल समाप्त करने ही वाली थी तन्वी जब दूसरे छोर से आवाज ने
कहा, &quot;हाय, में माधव हु और वास्तव में मैं आपसे बात करना चाहता था।&quot; तन्वी
चौंक गई लेकिन उसने अपने झटके को पचाते हुए कहा, “मैं? क्यों? क्या मैं आपसे परिचित
हूं? कौन माधव? ” तन्वी ने यद् करने की कोशिश की, &quot;अगर मैं माधव को जानती हूं
तो अम्मा आह्ह्ह मुझे याद नहीं आ रहा&quot;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&quot;क्या आप ५ मिनट दे सकती हैं मैं आपको सभी कुछ बता दूंगा
...&quot; दूसरी तरफ की आवाज ने प्रार्थना की।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;“आह .. क्या ?? ५ मिनट ...&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes;&quot;&gt;&amp;nbsp; &lt;/span&gt;ठीक है ... हम बात कर सकते हैं, लेकिन अब कृपया
मुझे १५ - २० मिनट के बाद फोन करें। &quot; यह कहते हुए वह अपनी सीट पर जाने के लिए
मुड़ी लेकिन बोल्ड अक्षरों में स्क्रीन पर वह केवल लिखा देख सकती थी&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;

&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-family: &amp;quot;nirmala ui&amp;quot;, sans-serif; font-size: 12pt; line-height: 107%;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;mso-spacerun: yes;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;~~ एक शुरुवात!!~~&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/2781541425200554014/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2020/07/3.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/2781541425200554014'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/2781541425200554014'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2020/07/3.html' title='करले तू मुहब्बत | तेरे संग यारा | १ एडलैब्स में दिन'/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-1806102963227871018</id><published>2020-06-25T20:15:00.003-07:00</published><updated>2020-06-25T20:16:04.587-07:00</updated><title type='text'>नात तुझं माझं </title><content type='html'>&lt;div&gt;नात तुझं माझं&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नेहमीच माझी साथ देत आलीस, माझ्या तक्रारी ऐकत आलीस&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मला हसवत राहिलीस, मला सहन करत राहिलीस&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माझ्या आठवणी गोंजारत राहिलीस&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आज वळून बघता, स्वतःच विश्लेषण करता&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नाही कधी मी तुला समजलं, मनात येईल ते बोलून गेले&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सर्व माफ करून तू नेहमी हसत राहिलीस&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पण आज मला स्वतःचाच राग येतोय&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कोणाला सांगू आता कोण ऐकणार तुझ्या इतके मन लावून&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कोण हसवेल आता मला रडत असतांना?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तुझ्यात स्वतःला पहायचे मी कधी&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पण तुझ्यात परकेपणा जाणवतो आता मला&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मी स्वतःलाच हरवून बसले आता&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;माफ कर मला नाही निभवू शकले मैत्री,&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नाही आधार देऊ शकले तुला,&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नाही समजू शकले तुला, तुझ्या निस्वार्थ प्रेमाला&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तुझी साथ देण्यास मी जन्म पुन्हा घेईल...&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पुन्हा नाही त्या चूक करणार,&lt;/div&gt;&lt;div&gt;नाही तुला स्वतः पासून दुरावणार&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/1806102963227871018/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2020/06/blog-post_25.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/1806102963227871018'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/1806102963227871018'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2020/06/blog-post_25.html' title='नात तुझं माझं '/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-7427318701348640367</id><published>2020-06-25T20:15:00.000-07:00</published><updated>2020-06-25T20:15:03.199-07:00</updated><title type='text'>माझा तू</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
सागराला कुठे माहीत असतं&lt;br /&gt;
तो किती अथांग पसरला आहे&lt;br /&gt;
माझ्या मनातले सारे दुःख तो सामावून घेतो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फुलाला कुठे माहीत असतं&lt;br /&gt;
त्याचा सुगंध कीती मोहक आहे&lt;br /&gt;
बेधुंद काही क्षणांना मनात जन्म तो देतो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोराला कुठे माहीत असतं&lt;br /&gt;
त्याच्या पंखाचे रंग किती आकर्षक आहे,&lt;br /&gt;
परत मनाला एक जगण्याची आस लावून जातो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोकिळेला ही कुठे माहीत असतं&lt;br /&gt;
तिचा आवाज किती मंजुळ आहे&lt;br /&gt;
मनाच्या कोपऱ्यात काही आठवणी ती जगवते&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पावसाला ही हे माहीत नसतं&lt;br /&gt;
त्याच्या प्रत्येक थेंबात किती गारवा आहे&lt;br /&gt;
तापून उठलेल्या मनाला क्षणात शांत&amp;nbsp; करतो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तुला तरी कुठे माहीत आहे&lt;br /&gt;
तुझं माझ्या मनावर संपूर्ण राज्य आहे&lt;br /&gt;
माझ्या डोळ्यात तुझ्या मनाचे भाव उतरवतो&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/7427318701348640367/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2020/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/7427318701348640367'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/7427318701348640367'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2020/06/blog-post.html' title='माझा तू'/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-8364384772089713092</id><published>2019-12-06T18:33:00.002-08:00</published><updated>2019-12-06T18:43:24.026-08:00</updated><title type='text'>Happy Bday Garima</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
Dear Garima,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
I want to wish you with all my heart a very very happy birthday!!&lt;br /&gt;
today is your day!! im so happy for you!!&lt;br /&gt;
Six years, these six years are the best years of my life, this same day six years before brought a bundle of joy to my life... yes the joy of becoming a mother, the joy of holding you in my arms, frankly speaking i was so scared, thinking of the moment how will the moment be when I will actually feel you in my arms. I have no words to describe the feelings you gave me, caring for you all this time. you have grown from a baby to toddler to a mature grown up now, many times we need to take your suggestions, offcource do we have any choice?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
all these years they are so fresh in my mind beta, i just wish to rewind the clock or just stop time, I feel I cant have enough of you, I want to spend time with you, that is why I keep watching the video of you taking your first steps, blabbering those words... oh it feels it was yesterday... but no 6 years have passed and its a long time. I just want hug you and go back in time and stay there. you have brought so much love, joy and happiness in my life dear you have no idea. I value you more than anything in this world.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
I&#39;m trying my best to be a good Mom, Im learning and growing with you, I know I have failed a lot many times&lt;br /&gt;
still you have always come back to me with the same love and no anger for me in your heart.&lt;br /&gt;
I shout at you, I lose my patience, I need to understand you are juts a kid... you have your own frequency at which you do work. I understand, I know still I commit mistakes but believe me baccha I love You a lot!!! Mamma will never do anything to hurt you, hurting you will be the last thing she can think of.&lt;br /&gt;
Frankly speaking I have learnt a lot from you!!!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
You have always supported me... I still remember how difficult it was for us to travel from your daycare to home, I would carry you in the kangaroo bag and proudly drive my activa... people on road gave me looks...that was a moment of pride for me... offcourse I could carry you and drive because you supported me, if you would have been a cranky crying baby it would have not been possible. Im able to concentrate on my career too because you have been supportive. You are my priority and will always be.&lt;br /&gt;
Every success of mine as a mother is a success of us together. Im a sucessfull mother because of you!!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Loving, Forgiving, Frank, Mentoring, Transparent, Honest, Helping, Caring, Leadership, Bold &amp;amp; Beautiful, enthusiastic are few of your qualities to mention; do I need to mention talketive, keep them intact close to your heart as you grow. in fact many times I have come out of my bad mood just because of your talking.&lt;br /&gt;
Whatever I say or do today you will not understand the meaning but may be someday when you recall these memories you will know what you mean to me.&lt;br /&gt;
I want to wish you growth and happiness in all walks of life.&lt;br /&gt;
Finally I just want to Thank you sweet heart for choosing me as your mother and giving me this opportunity to expirience motherhood and grow as a Mother.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Wishing you a Happy Birthday!!! Have a great one!!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEha0abS4dT0cZjiXjcFVwBFQyhyQ_19F5lEagrY6kTU5vJsbj62N2lrlKEHeamG5Q7LlZ92ZntYUoTpyI6OAZ7jV8V_0JMM7U2tGuHbSXbSR1eRlOUrkawKogzqsvi0Ro63FsenpRxkYamJ/s1600/Garu.PNG&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;275&quot; data-original-width=&quot;351&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEha0abS4dT0cZjiXjcFVwBFQyhyQ_19F5lEagrY6kTU5vJsbj62N2lrlKEHeamG5Q7LlZ92ZntYUoTpyI6OAZ7jV8V_0JMM7U2tGuHbSXbSR1eRlOUrkawKogzqsvi0Ro63FsenpRxkYamJ/s1600/Garu.PNG&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiKfZY2BDayD6Ks5q95W32c5OKSKewwBeOO7UUmsaXn1NJ7O5D5GEK4DNJagjt36XsO8Ey6rts_9KZRwdPnlcjvAXNh-xazYWqm74XGvuWy5YfrL2TGtAkT6qLezqwM1EtzKgc1Yau7Ctmq/s1600/Garu.PNG&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;275&quot; data-original-width=&quot;351&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiKfZY2BDayD6Ks5q95W32c5OKSKewwBeOO7UUmsaXn1NJ7O5D5GEK4DNJagjt36XsO8Ey6rts_9KZRwdPnlcjvAXNh-xazYWqm74XGvuWy5YfrL2TGtAkT6qLezqwM1EtzKgc1Yau7Ctmq/s1600/Garu.PNG&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/8364384772089713092/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/12/happy-bday-garima.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/8364384772089713092'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/8364384772089713092'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/12/happy-bday-garima.html' title='Happy Bday Garima'/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEha0abS4dT0cZjiXjcFVwBFQyhyQ_19F5lEagrY6kTU5vJsbj62N2lrlKEHeamG5Q7LlZ92ZntYUoTpyI6OAZ7jV8V_0JMM7U2tGuHbSXbSR1eRlOUrkawKogzqsvi0Ro63FsenpRxkYamJ/s72-c/Garu.PNG" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-7587580755516126514</id><published>2019-10-06T23:18:00.001-07:00</published><updated>2019-10-06T23:18:32.299-07:00</updated><title type='text'>तू भेट ना... पर्व २... एक झलक ... </title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंजल च्या हातून फोन पडला... तीला काय ऐकले हे काही कळेना... काल सकाळी तर सर्व ठीक होते... हे काय घडले..?? काही समजेना... अनुज बाजूलाच होता त्याने फोन उचलून काय झाले म्हणून समोर विचारले... तिकडून मृणाल बोलत होती. अनुज हि धक्क्यात होता पण त्याला खचून चालणार नव्हते...&lt;br /&gt;
धावपळ करून अनुज ने मुंबई ची तिकीट काढून आणले... सर्व तयारी त्यानेच केली, पैश्याची जमवा जमव केली आणि घाई गडबडीत तो तिला घेऊन मुंबई ला पोचला...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंजल तर बोलायच्या मानस्थतीतच नव्हती... अजून हातावरच्या मेहेंदीचा रंग हि उतरला नव्हता, आनंदाचे क्षण नीट साजरे हि केले नव्हते, हे काय घडले. सारखे सारखे तिला तिनी घालवलेले ते क्षण आठवत होते, घरातले आनंदाचे वातावरण... स्वॅप पूर्ण झाल्याचा भास होता तो... हो भासच होता...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हॉस्पिटल ला पोहोचल्यावर अनुज ने मृणाल ला फोन लावला... ती सांगते तिथे ती दोघे लगबगीने पोचतात...&lt;br /&gt;
रात्र झाली होती बरीच. किंजल मृणाल जवळ जाते, मृणाल ला काय बोलावे कळत नव्हते... ती किंजल ला उराशी घेते आणि म्हणते.. &quot;सर्व ठीक होईल... घाबरू नकोस...&quot;&lt;br /&gt;
किंजल ला काय बोलावे सुचत नाहीं... ती फक्त म्हणते &quot;कसं काय?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;मला हि काहीच माहित नाहीं... काल दुपारी फोन आला पोलीस चा, त्याच्या गाडी च्या रजिस्ट्रेशन च्या वेळेस माझा पत्ता आणि नंबर दिला होता म्हणून त्यांना पोचता तरी आले माझ्या पर्यंत... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;मी बोललेले नको जाऊस गाडी नि... लांबचा प्रवास आहे... माझं कोण ऐकणार... &quot; किंजल मुसमुसत म्हणाली...&lt;br /&gt;
&quot;जा बघून ये त्याला... &quot; मृणाल तिला धीर देत म्हणाली...&lt;br /&gt;
किंजल मान हलवत नाहीं असे म्हणाली... &quot;मला शक्य नाहीं त्याला असे बघणे... &quot;&lt;br /&gt;
मृणाल तिला धीर देत म्हणते... &quot;ठीक आहे तू बस इथे, मी काही लागते का बघून येते... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;रूम कुठे आहे?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;अजून रूम मध्ये नाहीं शिफ्ट केले, ICU मध्ये आहे अंडर ऑबसेर्व्हशन... अजून शुद्ध आली नाहीं आहे ना... ४८ तास होतं आले त्यामुळे अजून हि काही सांगता येत नाहीं... रक्त हि खूप गेलेले ... &quot;&lt;br /&gt;
मृणाल चे बोलणे एकूण किंजल ला भुरळ येऊ लागली... &quot;किंजल... &quot; अनुज तिला खाली बाकावर बसवतो आणि मृणाल ला बघून म्हणतो... &quot;तिचा ऍक्सीडेन्ट झालेला तेव्हा पासून तिला रक्त बघितले, विचार वगैरे हि केला&amp;nbsp; कि खूप त्रास होतो... भीती बसली आहे तिच्या मनात.... तुम्ही हे सर्व जीजू बद्दल बोलताय त्यामुळे बहुदा जास्तीच हळवी झाली... &quot; अनुज मृणाल ला सांगतो आणि मी तुमच्या सोबत येतो बघायला असे म्हणतो... तो किंजल कडे बघतो... &quot;तू इथे थांबतेस? मी जाऊन येतो दीदी सोबत... &quot;&lt;br /&gt;
किंजल नजरेनेच हो म्हणते... ते गेल्यावर ती आपल्या हातातला कागद उघडते...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#39;माझं सारं विषव आता तूच आहेस ओंकार!! तुझ्या भावतीच माझे स्वप्न आणि मी आहे... गोल लिस्ट काय बनवू... २ वर्षाची काय... साऱ्या आयुष्याची हीच गोल लिस्ट आहे... तुझा हट्ट म्हणून लिहीत आहे ...&lt;br /&gt;
१. तुला नेहमी आनंदी ठेवणे...&lt;br /&gt;
२. तूच माझं सर्वस्व ... तुझी सारी स्वप्न माझी, तुझं दुःख माझं, तुझं हसणं माझं तू माझा मी तुझी...&lt;br /&gt;
३. तू म्हणशील ते करील... तशी राहील... तशी वागली...&lt;br /&gt;
४. तू तूच माझं सर्वस्व ...&#39;&lt;br /&gt;
वाचता वाचता डोळे पाणावले तिचे... परत ती फोल्ड करून वाचन बंद करते. स्वतःशीच विचार करत तिथे बसून असते. त्याच्या साठी प्रार्थना करत.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सकाळी...&lt;br /&gt;
डॉक्टर ओंकार ला तपासायला येतात. मृणाल आणि अनुज तिथेच असतात, ते डॉक्टर ला सर्व विचारपूस करतात... डॉक्टर शी बोलून अनुज बाहेर येतो.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हॉस्पिटल मध्ये मंद आवाजात रेडिओ वर गाणं लागलं होतं ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#39;कभी कभी अदिती जिंदगी में युहू कोई आपणा लागत है... कभी वो बिछड जाये तो सपना लगता है ऐसे में कोई कैसे अपने आसू को रोके और कैसे कोई सोचे एव्हरीथिंग गोंना बी ओके... ऐसे में कैसे कोई मुसरकराये और हसदे खुश होके... &#39;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंजल चा बाकावर बसल्या बसल्या डोळा लागला होता. अनुज तिच्या साठी नास्ता घेऊन येतो...&lt;br /&gt;
किंजल त्याच्या हातातली प्लेट बघून मान हलवून मला नको असे म्हणते... &quot;डॉक्टर येऊन गेलेत का?&quot; अनुज मान हलवून हो असे सांगतो...&lt;br /&gt;
&quot;काय म्हणाले ते? कधी येईल ओंकार ला शुद्ध? कसा आहे ओंकार आता?&quot; अनुज काही बोलण्याच्या मनस्थितीत नव्हता. &quot;अनुज प्लिज असा शांत नको राहूस काय म्हणाले डॉक्टर?&quot; किंजल अधीर झाली होती.&lt;br /&gt;
अनुज आपले अश्रू आवारात तिला जवळ घेतो आणि मान हलवत म्हणतो... &quot;किंजल... जीजू चा खूपच भयानक ... खूप लागले आहे त्यांना... डॉक्टर म्हणतायेत त्यांना डोक्याला खूप मार लागला आहे म्हणून शुद्ध येत नाहीं आहे आणि हृदयाच्या वाल्व रुपचर झालेत... त्यांचे फक्त २०% हृदय काम करत आहे सध्या त्यांची कंडिशन क्रिटिकल आहे आणि अश्या परिस्थितीत ... &quot; अनुज पुढे बोलायला घाबरू लागला...&lt;br /&gt;
&quot;चल... &quot; किंजल त्याचा हात झटकत म्हणाली... &quot;हि गंमतीची वेळ नाहीं अनुज... असं काही बोलून तू माझं हृदय फेल करशील हा... &quot; किंजल डोळे पुसत म्हणाली... अनुज गंभीर होऊन तिच्या कडे बघत होता... किंजल ला त्याच्या डोळ्यात बघायची हिंम्मत हि होतं नव्हती आता... त्याच्या डोळ्यातली भीती तिला जाणवू लागली होती... &quot;सत्य परिथिती शी जितक्या लवकर अवगत करशील स्वतःला तितकं चांगलं...&quot; तो तेवढे बोलून प्लेट तिथेच ठेवून आपले डोळे पुसत तिथून निघून जातो. किंजल ला तिच्या विचारात तिथेच सोडून...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बराच वेळ किंजल स्वतःशी विचार करत बसते... आता काय ऐकले आपण... ओंकार चे हृदय फक्त २० टक्के काम करत आहे... ?? कुठे कमी पडली माझ्या प्रेमाची? ओंकार ला मी एकटं का सोडलं? हे काय घडलं...?? ओंकार बोल ना रे माझ्याशी... ?? ती आपल्याच विचारात ओंकार ला बघायला निघते... पाय नेतील तिकडे... काही क्षणांनी ती स्तब्ध उभी राहते... समोर काचेचं पार्टीशन होते आणि त्या पलीकडे ओंकार... किंजल चा जणू श्वासच थांबला, ओंकार ला असे पट्ट्यांत बघून, एकीकडे रक्त चढवलेले, नळ्या लावलेले, प्राणवायू लावलेला... हातातल्या गोल लिस्ट च्या चिट्ठी चा चुरगळा झाला होता.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#39;आओगे जब तुम... साजणा... अंगण... फुल खिलेंगे... बारसेंग सावन...&lt;br /&gt;
नैना तेरे कजरले है.. नैनो पे हम दिल हारे है... अंजने में हि तेरे नैनो ने वादे किये कई सारे है हा सासो कि लय माध्यम चाले है... तोसे कहे है... दो दिल ऐसे मिलेंगे &#39;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्या गाण्याच्या हि आवाजात ठळक असे ऐकू येत होते ते ECG मशीन चा बीप बीप चा आवाज जे किंजल ला सांगत होते अजून त्याचे हृदय धडधडत आहे!! किंजल तिथेच बराच वेळ स्तब्ध उभी होती, ओंकार ला असे निशब्ध बघून काय करावे कळत नव्हते, कधी तो डोळे उघडेल आणि त्याचे ते निळे डोळे तिच्या शी काही न बोलता परत खूप काही बोलतील असे झाले होते तिला...&lt;br /&gt;
&quot;ओंकार... तुला वेळ घ्याचा घे... माझ्याशी नाहीं बोलायचे नको बोलूस... पण... हे सर्व थांबव हा... &quot; किंजल लांबूनच त्याला बघत म्हणाली...&lt;br /&gt;
किंजल आत जाऊन त्याच्या जवळ बसली...&lt;br /&gt;
तिच्या डोळ्या समोर त्या सकाळचे किंजल ओंकार खेळू लागले... सर्वांची नजर चुकवून दोघे घराच्या टेरेस वर भेटलेले...&lt;br /&gt;
&quot;लिहिलेस?&quot; ओंकार नि अधीर होऊन विचारले तर किंजल मान हलवून हम्म म्हणाली... &quot;दे ना मग... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;आधी तू दाखव... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;मी मागितले आहे ना मग आधी मला दाखव... &quot;&lt;br /&gt;
किंजल त्याच्या हातात रिकामी चिट्ठी देत म्हणाली.. &quot;प्रयत्न केला पण काही सुचले नाहीं... &quot; ती ओंकार चा त्या रिकाम्या चिट्ठी कडे बघून उतरलेला चेहरा बघून सॉरी असे बघत होती ... &quot;तुझी दे ना...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;नाहीं... मी तुला लिहायला सांगायचे काही कारण होते... मला माहीत आहे माझी बघून घेशील आणि झाले... तुझी गोल लिस्ट सर्व माझ्या गोल लिस्ट अवती भवती फिरेल...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;अरे असं कसं... माझी गोल लिस्ट माझी असणार ना... &quot; किंजल भांडू लागली... &quot;बरं... एक... एक गोल सांग... मग मी देईल ना माझी लिस्ट तेव्हा बाकीचे सांग... &quot;&lt;br /&gt;
ओंकार आपली लिस्ट बघून थोडा विचार करतो... मग पुढे भाव खात तिला म्हणतो ... &quot;ठीक आहे एक सांगेन... पण फक्त एक... &quot;&lt;br /&gt;
किंजल आनंदाने मान हलवत हो म्हणाली... ओंकार पुढे म्हणू लागला... &quot;मला माझी प्रेमकथा लिहायची आहे... ह्या जगाला ऐकवायची आहे!!&quot;&lt;br /&gt;
&quot;काय!! वेडा आहेस का..? जगाला ऐकवायची म्हणे... शांत बस... &quot; किंजल त्याला चिडवत म्हणाली...&lt;br /&gt;
&quot;का? तुला नाहीं वाटत आपली कहाणी ह्या जगाला कळावी... किती वेगळी सुरु झाली आपली कहाणी... कधी वाटले होते तुला इथे येऊन पोचेल?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;ते सर्व मान्य आहे... पण मला नाहीं सांगायचे कोणाला... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;का??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;तू माझ्या वर इतकं प्रेम करतोस बघून लोकांची नजर लागेल ना... &quot; किंजल त्याच्या हृदयावर डोकं ठेवून त्याची धडधड ऐकत म्हणाली...&lt;br /&gt;
&quot;ह्म्म्म...&quot; ओंकार तिच्या कपाळाचे चुंबन घेत म्हणाला...&lt;br /&gt;
&quot;ठीक आहे... कॅन्सल ...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;ए... असं नाहीं यार.. माझ्या,मुळे तुझी गोल लिस्ट नाहीं&amp;nbsp; बदलायची... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;मग आता काय करू? दुसरी कोणी धरावी लागेल जी माझ्यावर तुझ्या पेक्षा जास्ती प्रेम करेल... आणि मला कथा लिहायला प्रोत्साहित पण करेल... हो ना... &quot; ओंकार डोळा मारत तिथून पळ काढत म्हणाला...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;काय बोललास... &quot; असे म्हणत किंजल त्याला पकडायला त्याच्या मागे धावू लागली... त्यांना असे भांडताना प्रेम करताना बघून किंजल हि अचानक हसली आणि वर्तमानात आली... समोर ओंकार ला असे निश्चल बघून परत मनात असंख्य वेदना झाल्या...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये आईंना है या तू है जो रोज मुझको सवरे ...&lt;br /&gt;
इतना सोचने लगे क्यू मे आजकाल तेरे बरे&lt;br /&gt;
तू झील खामोशि की लॅब्जो कि में&amp;nbsp; एक लेहेर हू&lt;br /&gt;
एहसास कि तू है दुनिया छोटा सा में एक शहर हू...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;ओंकार... मी हि माझी गोल लिस्ट नाहीं बदलणार आहे... तू आणि तूच आहेस माझं सर्वस्व.. माझा गोल तूच ... तूच आणि तूच, मी नाहीं बदलणार ती,&amp;nbsp; तुझ्या चेहऱ्यावर स्माईल आणणे, तुला आंनदी ठेवणे हेच आहे माझं गोल... कळलं.. आज च उद्याच... २ वर्षाचं नाहीं तर अख्या आयुष्याचे... हो... तू काही हि बोल... ह्यातच माझा आनंद लपला आहे रे... आणि भांडायचे का तुला माझ्याशी... नाहीं हि अशी नसते गोल लिस्ट... भांड ना मग... ये ना... उठ ना... बोल ना... भांड ना.. चीड माझ्यावर... पण प्लिज... बोल... &quot; किंजल बोलता बोलता रडू लागली...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुद्द से है अगर तू बेखबर... रख लू में तेरा खयला क्या...&lt;br /&gt;
में दौड के पास आऊ... तू निंद में जो पुकारे... में रेत हू तू है दारिया... बैठी हू तेरे किनारा...&lt;br /&gt;
ये आईंना है या तू हॆ... जो रोज मुझको सवरे...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंजल बोलता बोलता हळवी झाली... &quot;तू मला नेहमी त्रास देतोस यार... तुला माहित आहे ना... तुझ्या डोळ्यात माझा जीव अडकलाय... बघू देत ना परत त्यांच्यात हरवू देत ना... उघड ना रे डोळे... हाक मार ना रे मला किंजल म्हणून... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तान्हाई का में जवाब हू... होगा मेरा भी असर तू अगर पढ ले में तेरी किताब हू&lt;br /&gt;
सिने पे मुझको सजाके जो रात सारी गुजारे... तो में सवेरे से केह दु.. मेरे शहर तू ना आये...&lt;br /&gt;
ये आईंना है या तू है...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
..... लवकरच येत आहोत तुम्हाला परत भेटायला&lt;br /&gt;
किंजल आणि ओंकार आपल्या परिवारासह...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ्रेंड्स,&lt;br /&gt;
सॉरी... खरंच पण हे लिहिल्या शिवाय चैन पडेना...&lt;br /&gt;
किंजल ओंकार सारखे डोकावून बघायचे.. कि कधी आम्हाला विचारणार... कधी काही काम देणार... असे...&lt;br /&gt;
आता जरा रिलॅक्स वाटतंय...&lt;br /&gt;
हो माहित आहे... मी रिलॅक्स झाले आणि तुमच्या डोक्यात चक्र सुरु झाले...&lt;br /&gt;
पण जास्ती दिवस नाही... सर्व काही कळेल... काय झाले कसं झालं , पुढे काय होणार वगैरे वगैरे... ओंकार वाचेल कि नाही... हिरो आहे तर वाचलाच पाहजे का?.. काय किंजल चे ओंकार शिवाय अस्तित्व नाहीं?&lt;br /&gt;
काय प्रत्येक लव्ह स्टोरी सुखातच संपते? आयुष्यात असे नेहमी सुखाचं राहील नेहमी असे नाहीं ना... दुःख हि आयुष्याचे अविभाज्य अंग आहे ..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज काही प्रश्न नाहीं सोडत आहे... कारण मला माहित आहे आज तुमच्याच मनात खूप प्रश्न आहेत... आणि तुम्ही आता म्हणताय काय हे निशी... अशी काय तू....&lt;br /&gt;
काय करू मी अशीच आहे... छळल्याशिवाय चैन मिळत नाहीं... आणि मी तर छळतच राहणार... बघा झेपते का तुम्हाला ते... म्हणतात ना जित्याची खोड मेल्याशिवाय जात नाहीं...या से काही आहे.. माझे मराठी इतकं विशेष नाहीं...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व काही कळेल... आणि जास्ती लांब नाही लवकरच कळेल... TLJ३ संपणार आहे लवकर...&lt;br /&gt;
त्रास होत असले तर सॉरी... पण मी कॉन्सन्ट्रेटे नव्हते करू शकत हे लिहिल्या शिवाय...!!&lt;br /&gt;
तर लवकरच घेऊन येईल किंजल ओंकार ची पुढची कहाणी...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मला कोणी विचारले तुझी फेव्हरेट कथा कोणती... ??&lt;br /&gt;
आई ग... किती सोपा तो प्रश्न? मी विचार करू लागले पण खरंच प्रत्येक कथा हि वेगळी आहे आणि ती लिहितांना वेगळे अनुभव, पण मी जेव्हा विचार केला एखादी कथा आवडीची म्हणजे काय? ती तुमच्या हृदयात एक वेगळे स्थान स्थापित करते ती... तर खरं तर मी TLJ२ लिहितांना ज्या इमोशनल फेज मधून गेले मला वाटले नव्हते कि त्याच्या पेक्षा अजून चांगली कथा मी लिहू शकेल... पण स्वतःची अपेक्षा मी खोटी ठरवली ... मी &#39;तू भेट ना&#39; लिहिली... आणि काय झाले सांगू?&lt;br /&gt;
हि कथा माझ्या खूपच जवळची आहे... ह्या कथे मुळे मला माझी आकृती भेटली आहे...&lt;br /&gt;
खरं... म्हणजे जी फक्त एक कल्पना होती माझी ती सत्यात उतरली आहे... आणि हो... मी हि बऱ्याच लोकांची आकृती होऊन त्यांना मदत केली... म्हणून हि कथा खूप जवळची झाली आहे... कल्पना अस्तित्वात साकार होणे... म्हणजे स्वप्नच पूर्ण होणे नाहीं का...??&lt;br /&gt;
तुम्ही सर्वांनी ह्या कथेला इतके प्रेम दिले मला खूपच भारी वाटतंय!!&lt;br /&gt;
जसे मी आधी पण बोलले आहे हो कथा जिथे पोचली आहे तिथवर पोचण्याचे श्रय पूर्ण पणे तुम्हा सगळ्यांना जाते. मी विचार हि नव्हता केला, तुम्ही विचार करायला भाग पडले...!!! मनापासून आभारी आहे... माझ्यातल्या लेखकाला काही नवीन लिहायला प्रेरणा देत राहण्यासाठी!!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निशी ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/7587580755516126514/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/7587580755516126514'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/7587580755516126514'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/10/blog-post.html' title='तू भेट ना... पर्व २... एक झलक ... '/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-8475286356800229291</id><published>2019-09-30T17:59:00.002-07:00</published><updated>2019-09-30T17:59:45.313-07:00</updated><title type='text'>१०  | TLJ ३ | श्वास माझा होशील का? </title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ती लाजते जेव्हा | पर्व ३ | श्वास माझा होशील का? - भाग १०&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पायावरून मोरपीस फिरवल्यावर होणाऱ्या संवेदनांनी रुपाली शहारून गेलेली ... जसा जसा हाथ वर फिरू लागला हळू हळू त्या संवेदना हि वाढू लागल्या... तिच्यावर होणाऱ्या त्या प्रेमाच्या वर्षावात ती ओली चिंब भिजून गेलेली. जसा त्याचा हाथ तिच्या कमरेवरून पोटाकडे वळला तसं सर्रर्रर्रर्र कण तिच्या अंगावर काटा आला.... तिचा श्वास चढू लागलेला, त्याने जसा तिचा पदर बाजूला केला तिच्या छातीत धडधडायला लागले...&lt;br /&gt;
तिच्या कानात तो म्हणाला... &quot;रुपाली मला तू खूप आवाडतेस... !! माझी होशील का...??&quot;&lt;br /&gt;
ते एकूण रुपाली स्वतःशीच हस्ते... लाजते... &quot;अजून किती तुझी व्हायची राहिली आहे रे... &quot;&lt;br /&gt;
असे म्हणत ती त्याचा चेहरा हातात घेते आणि त्याच्या ओठावर ओठ टेकवणार तेच तिची नजर त्याच्याशी मिळते... तेच डोळे ... रुपाली दचकून त्याला मागे ढकलते... आणि घाबरून उठून बसते...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज हि तिला दरदरून घाम फुटलेला... हे असे स्वप्न?? कोण होता तो? तिला प्रश्न पडत होते, ती पूर्ण आतून हलून गेली होती. इतकं वास्तववादी स्वप्न होतं, ह्यावर विश्वासच बसेना... पण एकीकडे स्वप्न होतं म्हणून कुठे तरी मनाला बरं सुद्धा वाटत होतं. वास्तवात ती असं काही करेल किंवा तिच्या हातून घडले तर ती स्वतःला कधी माफ करू नाही शकणार, आयुष सोबत दगा करायचा ती विचार हि मनात नव्हती आणू शकत मग हे असलं स्वप्न पडण्याचा काय अर्थ? विचारात असतांनाच ती बाजूला बघते तर आयुष नव्हता... घड्याळ पहिले तर रात्रीचे ३ वाजलेले...&lt;br /&gt;
&quot;३!! वाजले... आयुष कुठे आहे?&quot; तिच्या मनात प्रश्न आला... ती उठून त्याला बघू लागली, पण आयुष कुठेही दिसेना... त्याची ऑफिस ची बॅग हि नव्हती. आपल्याला फारच गाढ झोप लागलेली ह्याची जाणीव तिला होते&lt;br /&gt;
आणि काही विचार करण्याच्या आत तिच्या हातानी आयुष्य ला फोन लावला होता... पण फोन वाजत असून हि कोणी उचलत नव्हते. ती २-३ दा लावते. हळू हळू काळजी वाटू लागते. काय करायचे तिला काही समजत नाही. आनंद ला सांगावे म्हणून ती जाते...&lt;br /&gt;
समोर आरोही ला बघून रुपलाई संकोच करत तिला म्हणते.. &quot;वाहिनी... &quot; रुपाली आरोही ची झोप मोड केली म्हणून सॉरी म्हणते...&lt;br /&gt;
&quot;रुपाली... अगं काय झालं?&quot; आरोही डोळे चोळत तिला विचारते.&lt;br /&gt;
&quot;वाहिनी, आयुष चा फोन लागत नाही आहे तो अजून घरी आला नाही आहे... मला काही कळत नाही आहे... दादा आहेत का? त्यांना माहित आहे का कुठे गेला आयुष ते?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;आनंद तर रात्रीच घाई घाईत कुठे निघाले, मला काही बोललेच नाही...&amp;nbsp; थांब मी फोन करते त्यांना ... &quot; आरोही रुपाली ला बसायला सांगते आणि फोन आणायला जाते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिकडे पोलीस स्टेशन मध्ये...&lt;br /&gt;
&quot;अहो.. सर तुमचा गैरसमाज झाला आहे काही तरी... प्लिज सोडा त्याला... &quot; आनंद इन्स्पेक्टर ला समजावण्याचा प्रयत्न करत होता...&lt;br /&gt;
&quot;हे बघा ते तर आता उद्याच कळले... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;अहो पण गुन्हा काय आहे ते तरी कळेल का... आणि तुम्ही त्याला असं लॉकअप मध्ये कसं काय टाकू शकता?? काय पुरावा आहे तुमच्याकडे?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;कोट्यवधी रुपयांचा फ्राड करणारे तुम्ही लोक... आता पुरावे मागता आम्हाला... येतोय हा येतोय... पुरावा पण येतोय.... सकाळ पर्यंत देतो तुमच्या हातात... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;सर.. मला काय झालं आहे कळेल का??&quot; आनंद जरा आपला सूर नामवंत म्हणला.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तितक्यात आनंद ला आरोही चा फोन आला...&lt;br /&gt;
&quot;आनंद कुठे आहात तुम्ही?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;आरोही मी इथे एका कामात अडकलोय... येतो मी सकाळ पर्यंत सांगतो मग आल्यावर सर्व... फोन वर नाही काही बोलू शकत... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;बरं ... पण ते भाऊजी बद्दल माहित आहे का काही तुम्हाला?? ते अजून घरी नाही आलेत... आम्हाला खूप काळजी वाटतीय... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;आम्हाला म्हणजे रुपाली पण आली का तिथे?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हो... तिनेच सांगितलं ना... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;हे बघ... हा... आयुष माझ्या सोबत आहे... काळजी नका करू तुम्ही... &quot; रुपाली आरोही ला आनंद काय बोलतोय विचारात असते ती अधीर होते आणि फोन तिच्या कडून घेते...&lt;br /&gt;
&quot;दादा आयुष कुठे आहे माहित आहे का तुम्हला... मला खूप काळजी वाटत आहे... तो ठीक आहे कि नाही माहित नाही... फोन हि उचलत नाही आहे... &quot;&lt;br /&gt;
फोन कसा उचलणार... त्याचा फोन तर जप्त आहे... आनंद स्वतःशीच बोलला... रुपाली ला काय उत्तर द्यावे विचार करत तो तिला म्हणाला... &quot;हो हो... आहे आयुष हि माझ्या सोबत आहे... तुम्ही झोपा काळजी नका करू... &quot; आनंद चा आवाज डगमगत होता आणि रुपाली ला त्यामुळे शंका आली...&lt;br /&gt;
&quot;दादा सर्व ठीक आहे ना? तुम्ही कुठे आहात?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;कुठे म्हणजे... हे माझ्या कंपनीत आहॊत आम्ही... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;का? काय करताय तुम्ही इतक्य रात्रीचे तिथे... ?&quot; तितक्यात त्या इन्स्पेक्टर चा कोणावर ओरडण्याचा आणि त्याला मारण्याचा आवाज होतो जो रुपाली ऐकते, &quot;कोण आहे दादा तिकडे, का ओरडतायेत? मारामारी सुरु आहे का तिकडे? दादा तुम्ही कुठे आहात ना ? आयुष कुठे आहे... मला नीट कळेल का? मला खूप भीती वाटत आहे... प्लिज दादा ... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;हो हो... हे बघ रुपाली... &quot; आनंद चा नाईलाज होतो आणि त्याला सांगावे लागते&lt;br /&gt;
&quot;आम्ही इथे पोलीस स्टेशन ला आलो आहे... ह्यांचा आयुष ला घेऊन काही तरी गैर समाज झाला आहे... मी बघतोय काय आहे ते... तुम्ही काळजी करू नका मी येतो आयुष ला घेऊन सकाळी...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;पोलीस स्टेशन???&quot; रुपाली स्तब्ध झाली... तिच्या तोंडून पोलीस स्टेशन चे नाव ऐकून आरोही हि घाबरली...&lt;br /&gt;
&quot;हॅलो... रुपाली... काळजी करू नका आणि घरी सध्या कोणाला काही सांगू नका... हॅलो... ऐकताय का??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;दादा... मला आयुष शी बोलायचं... &quot;&lt;br /&gt;
आनंद आता काय सांगणार... आयुष लॉकअप मध्ये आहे बोलला तर ती अजूनच काळजी करेल... &quot;तो इन्स्पेक्टर शी बोलतोय... मी आता नाही देऊ शकत त्याला... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;कुठे आहात तुम्ही मला सांगा... मी आता येते तिकडे...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हे बघ रुपाली... मी आहे ना.. तू नको काळजी करू... मी घेऊन येतो त्याला सकाळी घरी...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;सकाळी का..?? आता का नाही??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;ते ज्यानी तक्रार केली आहे त्याच्या विरुद्ध ती व्यक्ती सकाळी येत आहे... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;कसली तक्रार आहे दादा ???&quot;&lt;br /&gt;
&quot;मी हि तेच माहिती करायचा प्रयत्न करतोय पण इथे कोणी उत्तर देईल कोणाला तर कळेल ना... तू काळजी नको करू मी सर्व कळवतो तुम्हाला मला कळले कि... आणि घरी तेव्हढं सांभाळा... चल चल ते आले इन्स्पेक्टर मी बोलतो त्यांच्याशी... &quot; असे म्हणत आनंद फोन ठेवतो...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रुपाली ला डोळ्या पुढे अंधारी येणेच बाकी होते... आरोही तिला सांभाळते आणि बेडवर बसायला लावते, ती पाणी देत रुपाली ला म्हणते... &quot;आनंद आहेत ना तिथे... तू काळजी नको करू. नक्कीच काही गैरसमज झाला असेल... &quot; रुपाली आपला चेहरा हातात घेऊन खाली मान घालून बसलेली...&lt;br /&gt;
&quot;वाहिनी मला काही कळत नाही आहे... आयुष येईल ना ठीक परत... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;हो ग... &quot; आरोही तिला जवळ घेत म्हणाली... तिला धीर देत होती पण स्वतःच्या मनात हि शंका होत्याच...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रुपाली आरोही जवळच बसून राहते, मनात सुरु असलेल्या विचारांना शांत करायचा प्रयत्न करत कसा बसा वेळ काढायचा प्रयत्न करत असतात. सकाळ कधी होते आणि कधी आयुष घरी परत येईल असे झाले होते दोघीना ... तो घरी आला कि हे विचारांचे चक्र थांबेल तरी... असं वाटत होत सारखं त्यांना...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सकाळी...&lt;br /&gt;
&quot;आई... आज तू सोडणार शाळेला...&quot; क्यू तयार होतांना म्हणाली...&lt;br /&gt;
&quot;हो शोना...आज आई सोडणार...&quot; रुपाली आपल्या आवाजात आनंद आण्याचा प्रयत्न करत म्हणाली..&lt;br /&gt;
&quot;का बाबा कुठे आहे? रोज तो सोडतो न...&quot;&lt;br /&gt;
रुपाली त्या प्रश्नानी दचकली... काही विचार करत म्हणाली... &quot;क्यू बाबा ला ना ऑपरेशन आले अचानक.. मग जावे लागले ना.. म्हणून आज आई सोडणार.. क्यू ला आई&amp;nbsp; नि सोडलेलं नाही चालणार का?&quot; रुपाली तिची पोनी घालून देत म्हणाली.&lt;br /&gt;
क्यू तशी तिच्या कडे वळते आणि म्हणते... &quot;चालेल ... का धावेल ना क्यू ची आई फेव्हरेट आहे ना... &quot; असे म्हणत ती रुपाली ला गालावर किसी देते आणि म्हणते... &quot;आय लव्ह यु टू आई... !!&quot;&lt;br /&gt;
रुपाली त्या वाक्य नि भानावर येते... आज तिनी क्यू ला आय लव्ह यु म्हण्टलेच नाही... ती स्वतःला रागावते आणि मग क्यू ला जवळ घेत म्हणते... &quot;आय लव्ह यु बेटा!!&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रुपाली घाई घाई नि क्यू आणि ध्रुव ला शाळेत सोडते. आणि मग तिथून आनंद ला फोन करते... त्यानी सांगितलेल्या पोलीस स्टेशन ला जमेल तितकं लवकर पोचते...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पोलीस स्टेशन ला पोचल्यावर तिथे आनंद, इन्स्पेक्टर आणि ऐक पांढरा कोट घातलेला माणूस गॉगल लावून&amp;nbsp; बसलेले दिसतात आणि ते काही चर्चा करत होते, आयुष तिला तिथे दिसत नाही... ती पटकन आनंद कडे जाते आणि त्याला विचारते... &quot;दादा आयुष कुठे आहे...&quot;&lt;br /&gt;
आनंद ऐक सुस्कारा सोडत तिला लॉक उप कडे दाखवतो... आयुष जमिनीवर आपल्या गुडघ्यावर डोकं ठेवून बसला होता. रुपाली त्याच्या जवळ जाते... &quot;आयुष!! काय हे... काय झाले तू इथे का??? आणि मला का नाही कळवलेस... ??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;रुप्स... तू इथे कशाला आली...? दादा नि सांगितले ना आम्ही येतो घरी... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;आधी मला सांग काय झाले आहे... मला खूप काळजी वाटत होती... &quot;&lt;br /&gt;
आयुष तिच्या कडे बघतो आणि डोळ्यात डोळे घालून म्हणतो... &quot;रुप्स... मी काहीच केले नाही आहे... आणि हे सांगत हि नाहीत अजून काय झाले ते...&quot;&lt;br /&gt;
आयुष चा हात हातात घेत रुपाली म्हणते...&quot;हे बघ... मला तुझ्यावर पूर्ण विश्वास आहे... आणि मी कायम तुझ्या सोबत आहे... मग हे तुझ्यावर कसला का आरोप करेनात ... &quot;&lt;br /&gt;
तितक्यात ऐक कॉन्स्टेबल येऊन आयुष ला बाहेर यायला सांगतो... आणि मग ते दोघे तिथे सुरु असलेल्या चर्चेत सामील होतात...&lt;br /&gt;
आनंद आयुष कडे उदास चेहऱ्याने बघतो... आयुष ला त्यामुळे काय चालू आहे काही कळत नाही... त्याला आनंद पुढे म्हणतो ... &quot;आयुष हे इन्शुरन्स कंपनीतुन आलेत... त्यांची अशी तुझ्या विरुद्ध तक्रार आहे कि काव्य जिवंत असतांना हि तू तिला मृत घोषित केले आणि त्यांच्या कंपनी कडून विम्याचे पैसे लुबाडले...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;काय!!!&quot; रुपाली आणि आयुष दोघे हि एक्दम रिऍक्ट झाले...&lt;br /&gt;
&quot;हॅलो... मिस्टर तुम्ही जे पण आहात... तुम्हाला सत्य माहित तरी आहे का??? आम्ही काही पैसे लुबाडले नाही... &quot; रुपाली रागा रागात त्याला बोलू लागली... रुपाली त्याच्या शी भांड्याच्या सुरात बोलत होती आणि त्याने जणू तो मंत्रमुग्ध संगीत ऐकत असावे असे चेहऱ्यावर हसू ठेवले होते... रुपाली आपले बोलून झाल्यावर त्याला विचारते.. &quot;कळले का??&quot; तसं तो आपला गॉगल काढतो... त्याचा गॉगल उतरताच रुपाली स्तब्ध होते... तेच डोळे... हो हे तेच डोळे होते जे तिला सारखे दिसत होते... तिला छळत होते. दिवस काय रात्र काय त्याच्या डोळ्यात बघून रुपाली च्या मनात वेगळेच विचार सुरु झाले... तिला न कळतच त्याचा राग येऊ लागला... त्याने काहीच केले नव्हते अजून तरी तिला त्याचा तिरस्कार वाटू लागला...&lt;br /&gt;
त्याचा चेहरा हि बघावासा वाटेना... तिला त्याच्या समोर उभे राहणे कठीण होऊ लागले... त्यात तिला आज सकाळी पडलेलं स्वप्न आठवून तर स्वतःचीच लाज वाटू लागली...&lt;br /&gt;
रुपाली मनात सुरु असलेल्या द्वंद्व शी सामना देत होती तेव्हा आयुष आणि आनंद&amp;nbsp; त्या माणसाला समजावण्याचा प्रयत्न करत होते...&lt;br /&gt;
&quot;हे बघा मिस्टर पीटर... काव्या खरंच सुसाईड करायला गेली होती पण नंतर ती वाचली... म्हणजे हे तेव्हा आम्हाला माहित नव्हते... &quot; आनंद चा पूर्ण गोंधळ उडालेला... त्याला कसं समजवावं...?? पण पीटर च हि त्यांच्या बोलण्याकडे लक्ष नव्हते त्याचे लक्ष होते ते रुपाली कडे...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनंद आणि आयुष चे बोलणे संपते तेव्हा पीटर त्या इन्स्पेक्टर कडे बघतो आणि म्हणतो... &quot;सर... आमची कंपनी ह्यांना ४८ तासांची मुदत देऊ इच्छित आहे, हे निर्दोष आहेत हे सिद्ध करण्या साठी...&amp;nbsp; जर ४८ तासात सिद्द करू शकले तर ठीक... नाही तर मी तक्रार लेखी नोंदवेल...&quot; तो रुपाली कडे बघत कुत्सित हसत म्हणाला.&lt;br /&gt;
&quot;म्हणजे अजून तुम्ही लेखी तक्रार नोंदवली नव्हती... &quot; आनंद रागाने त्याच्या कडे बघून म्हणाला... मग इन्स्पेक्टर कडे बघून म्हणाला ... &quot;हे तुम्ही ठीक नाही केले सर... माझा भाऊ ह्या शहरातला खूप मोठा नयूरो सुर्जन आहे... त्याचे हि नाव आहे, तुम्ही तक्रार नसतांना त्याला अटक कसे करू शकता... &quot;&lt;br /&gt;
पीटर त्याला चुटकी वाजवत आपल्या कडे बघायला लावतो आणि म्हणतो... &quot;काही गोष्टी नवा गावाच्या पलीकडे असतात राजा.... &quot; मग तो रुपाली कडे बघतो... &quot;तुम्हाला ह्या सर्वातून मी बाहेर काढू शकतो... संध्याकाळी भेटा मला... क्लब &#39;टल्ली ट्विस्ट&#39; मध्ये...&quot; तो त्यांना आपले कार्ड हातात देत म्हणाला मग रुपाली कडे वळून म्हणतो... &quot;तुम्हाला माझ्या कडून स्पेशिअल इन्व्हिटेशन मॅडम... याल ना...??&quot;&lt;br /&gt;
रुपाली रागाने फणफणतच त्यांच्या कडे बघते... तो तिथून निघून जातो...&lt;br /&gt;
आनंद इन्स्पेक्टर ला रागाने बघत होता... &quot;आम्ही काही नाही करू शकत साहेब... आम्हाला वरून जे करायला सांगतात ते करावे लागते... &quot;&lt;br /&gt;
ते तिघे तिथून घरी जायला निघतात... सर्वांच्या डोक्यात आपण काय ऐकले ते घुटमळत होते...&lt;br /&gt;
रुपाली आयुष कडे बघते... एकाच दिवसात त्याचा चेहरा उतरला होता &quot;आयुष... मला सांगितले का नाहीस... मी किती काळजीत होते ... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;काय सांगणार बघ तुला?? मलाच आता कळतंय सर्व... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;आता काय आयुष?? कसं सिद्ध करणार आपण तू निर्दोष आहेस...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हम्म... तसं पाहिलं तर आपल्या कडून फ्राड तर झाला आहे ना... काव्या जिवंत असतांना तिच्या विमा चे पैसे उचलले होते... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;अरे पण ते तर नंतर कळले ना... तेव्हा तुम्हाला कुठे माहित होते ती जिवंत आहे...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हम्म... तेच तर आहे ना... तेच सिद्ध करावे लागेल.. &quot;&lt;br /&gt;
&quot;कसं करणार...??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;बघू काय होते ते... निघेल काही मार्ग... बोलावले आहे ना त्यानी आपल्याला संध्याकाळी...&quot; आयुष त्या पीटर चे कार्ड बघत म्हणाला...&lt;br /&gt;
&quot;काय हे नवीन आता... &quot; रुपाली स्वतःशी बोलली आणि मग आयुष च्या खांद्यावर डोकं ठेवून बसते... त्याचा हात हातात घेते आणि म्हणते... &quot;आयुष मला सोडून कुठे जाणार नाहीस ना... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;नाही ग राणी मी कायम इथेच आहे तुझ्या सोबत...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;तू काळजी करू नकॊस... सर्व ठीक होईल... मी तुला काही होऊ देणार नाही... &quot; रुपाली त्याला बिलगत म्हणाली...&lt;br /&gt;
&quot;माला माहीत आहे ते... &quot; आयुष तिच्या कपाळाचे चुंबन घेत म्हणाला.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रमश:&lt;br /&gt;
----------&lt;br /&gt;
फ्रेंड्स,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काही तांत्रिक अडचणी मुळे तुम्हाला मागचा भाग दिसत नसेल तर प्लिज menishigandha .ब्लॉगस्पॉट.कॉम वर वाचा.. मी बऱ्याच दा पुनः प्रकाशित करायचा प्रयत्न केला...&lt;br /&gt;
प्रतिलिपी वर हे असे प्रॉब्लेम का सुरु झालेत माहित नाही... माझा काल फोन मध्ये सिस्टिम उपडेट झाला त्यात सर्व अँप उपडेट झालेत त्या मुळे हे होतंय का माहित नाही... तू भेट ना चा ३४ पार्ट च्या वेळेस हि अशीच अडचण आली होती आणि तेव्हा सुद्धा माझा फोन उपडेट झाला होता.&lt;br /&gt;
तुम्हाला झालेल्या त्रासबद्दल क्षमस्व आहे...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आणि हो मी आता २ दिवस नाही आहे. पुढचा भाग आता ४ तारखेला टाकेल...&lt;br /&gt;
कशी वाटत आहे कथा?&lt;br /&gt;
अभिप्राय नक्की कळवा...&lt;br /&gt;
वाचत रहा.. ती लाजते जेव्हा... पर्व ३ (श्वास माझा होशील का...?)&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;- निशी&lt;br /&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/8475286356800229291/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/09/tlj_80.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/8475286356800229291'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/8475286356800229291'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/09/tlj_80.html' title='१०  | TLJ ३ | श्वास माझा होशील का? '/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-467171404039097368</id><published>2019-09-29T02:01:00.000-07:00</published><updated>2019-09-29T02:01:28.021-07:00</updated><title type='text'>८ | TLJ ३ | श्वास माझा होशील का? </title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
ती लाजते जेव्हा | पर्व ३ | श्वास माझा होशील का? - भाग ८&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज शिवानी खूप खुश होती... पण मनात एक शंका आली... आनंद नि तिला हे प्रोमोशन त्यांच्या वयक्तिक ओळखी मुळे तर नाही दिले? इतक्या लवकर इतके मोठे प्रोमोशन ती खरंच डीसर्व करते?&lt;br /&gt;
ती आनंद च्या केबिन मध्ये जाते... तिला बघून आनंद तिला आनंदाने हाथ समोर करत काँग्रट्स म्हणतो... पण शिवानी च्या चेहऱ्यावर त्याला अपेक्षित आनंद दिसत नाही...&lt;br /&gt;
&quot;काय झालं शिवानी तुम्ही खुश नाही का तुमच्या प्रोमोशन नि?&quot;&lt;br /&gt;
शिवानी शांत होती... &quot;आनंद मला नाही वाटत मी इतकी मोठी जबाबदारी हॅन्डल करू शकेल...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;का शिवानी... आत्ता हि सर्व तुम्हीच तर बघताय... हे फक्त कागदावर तुमची पोसिशन ची पुष्टी करत आहे... ह्या आधी तुम्ही तेच काम करत आहात... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;आनंद मला... नाही वाटत मी करू शकेल...&quot; शिवानी काळजी ने म्हणली.&lt;br /&gt;
&quot;तुम्ही काळजी का करताय... मी आहे तुमच्या सोबत... मी काही तुम्हाला एकटं टाकून नाही जात आहे... &quot; आनंद दिला धीर देतो.&lt;br /&gt;
&quot;पण हा इतका म्हणत्वाचा प्रोजेक्ट आहे... आपल्या कंपनी साठी खूप म्हणत्वाचा आहे छोटीशी चूक पण खूप भुदंड देऊ शकते...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;तुम्हाला काय वाटते मी माझ्या कंपनी चा इतका म्हणत्वाचा निर्णय असाच घेईल? मी खूप विचारपूर्वक तुम्हाला हि जबाबदारी देत आहे... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;पण...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;तुम्हाला नसेल पण मला आहे तुमच्या वर विश्वास... तुम्ही करू शकता... मी बघितली आहे तुम्ही घेतलेली मेहनत...&quot; आनंद शिवानी ला धीर देत म्हणाला... &quot;मी आज च्या आपल्या पार्टीत हे सर्वां समोर घोषित करणार आहे...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;पार्टी?&quot; शिवानी आश्चर्याने बघते...&lt;br /&gt;
&quot;बघा तुम्ही इतके मग्न आहात कि तुम्हाला दादा च्या यशाची पार्टी हि लक्षात राहिली नाही... &quot; शिवानी ला तो काय बोलतोय काही कळत नव्हते... तिच्या चेहऱ्यावरचे भाव बघून आनंद पुढे म्हणतो...&lt;br /&gt;
&quot;वाहिनी... आज आपल्या डायमंड च्या बिझनेस च्या २५ वर्षाच्या अनिव्हर्सरी निमित्य आपण नवीन स्टोर चे उदघाटन करत आहोत आणि हे स्टोर पूर्णपणे दादा च्या नेतृत्व खाली राहणार आहे... दादा चे हे किती मोठे यश आहे... आणि हे तुमचे... खरं म्हणजे आज ची पार्टी तुमच्या दोघांचे यश साजरे करायची पार्टी आहे... &quot; शिवानी सर्व ऐकून शांत होती... तिला हे काही आठवतच नव्हते... ती स्वतःशीच विचारात होती... ती तिथून आपल्या डेस्क वर येते...&lt;br /&gt;
&quot;रंजीत माझ्याशी कधी बोलला हे सर्व?? मला आठवत का नाही आहे... नाही हा माझ्या शी बोललाच नाही आहे... &quot; ती रंजीत ला फोन लावते...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;मग... कशी झाली मॅडम मीटिंग?&quot; फोन उचलल्या उचलल्या म्हणाला.&lt;br /&gt;
&quot;रंजीत... तू मला काही सांगितले का नाही... &quot; शिवानी ला त्याला एक्दम विचारावेसे वाटले पण ती स्वतःला शांत करत त्याला म्हणली... &quot;रंजीत तुला मला काही सांगायचे आहे का?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हम्म... हो... पण आधी तू घरी ये मग बोलणार... &quot; शिवानी चे तो काही एकात नसल्याने ती फोन ठेवते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिवानी घरी पोचते... तशी ती रंजीत ला गाठते...&lt;br /&gt;
&quot;ह्म्म्म बोल आता ... काय सांगायचे आहे तुला...&quot; शिवानी अधीर झाली होती...&lt;br /&gt;
&quot;किती अधीरता... ती... आधी तुझी मीटिंग कशी झाली ते सांग... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;रंजीत !!! प्लिज... मला सांगशील का?? बरं... चांगली झाली माझी मीटिंग... आता तू सांगशील का...??&quot;&lt;br /&gt;
रंजीत तिचे डोळे झाकतो आणि तिला म्हणतो एक मिनिट असंच थांब हा... &quot;काय सुरु आहे रंजीत ... मला ना आधी ऐकायचे आहे तू नंतर दाखव काय ते... तुला वाटते तू नाही सांगितले तर मला काही कळणार नाही ना...&quot; शिवानी चा पारा चढत होता. पण तितक्यात रंजीत ने तिचे मानेवरचा केस एका बाजूला घ्यायला लावले आणि तिला काही कळण्याच्या अगोदर त्याने तिला आरश्या समोर उभे केले... &quot;ह्म्म्म बघ आता, उघड डोळे &quot;&lt;br /&gt;
शिवानी डोळे उघडते तर तिच्या गळ्यात निळ्या रंगाचा इमरल्ड चा तिच्या बांधायला शोभेल असा नाजूक सा सेट होता. ती आरशातून रंजीत ला बघते... &quot;काय हे?? कशा साठी??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;खरं तर काल रात्रीच बोलायचे होते, काही सांगायचे होते पण तू खूप म्हणत्वाच्या मीटिंग च्या तयारीत बिझी होतीस ना... म्हणून थांबलो... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;अरे पण का?&quot; शिवानी अजून हि धक्क्यातून बाहेर आली नव्हती...&lt;br /&gt;
&quot;आज संध्याकाळी म्हणजे आता काही वेळाने... आपल्या कडे एक पार्टी आहे... देसाई काकांच्या मदतीने मी आपले पहिले डायमंड स्टोर खोलतोय... त्यांच्या मार्गदर्शनाखाली... DD ची नवीन ब्रांच आणि त्याचा मालक मी म्हणजे आपण असणार आहोत...!! देसाई काकांचा नवीन पार्टनर&quot;&lt;br /&gt;
शिवानी नि तोंडाला हाथ लावून घेतलेला... &quot;काय!!&quot; ती आंनदाने त्याला मिठी मारते, &quot;इतकी मोठी बातमी रंजीत... काल का नाही सांगितली? माझी तयारी झाली तेव्हा तर सांगू शकत होतास ना... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;मी प्रयत्न केला होता पण तू म्हणालीस सांगायची गरज नाही... &quot; रंजीत डोळे गोल फिरवत म्हणाला...&lt;br /&gt;
शिवानी त्याला पोटात कोपऱ्याने मारते तसं तो म्हणतो...&lt;br /&gt;
&quot;तुझं लक्ष विचलित नव्हतं करायचं... चल आता पटकन तयार हो!!&quot; रंजीत तिच्या हातात त्याने तिच्या साठी चॉईस करून आणलेला ड्रेस हातात देत म्हणला... शिवानी बघते तर त्या सेट ला मॅच होईल असा त्याचा निळा रंग होता... ती हातात घेऊन बघू लागते आणि डोळे चक्रावून जातात... &quot;रंजीत... तू हा ऑनलाईन बोलावला आहेस का?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;नाही का... मी दुकानात जाऊन सिलेक्ट करून आणला आहे...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;रंजीत .... मी हा घालू आज?&quot; शिवानी ला विश्वासच बसत नव्हता...&lt;br /&gt;
&quot;हो... आज साठी खास आणला आहे मी... &quot; रंजीत ला ती अशी का विचारतोय हे कळत नव्हते.&lt;br /&gt;
&quot;नक्की?? तू बघितल्यास ना ह्या ड्रेस ला??&quot; ती त्याला ड्रेस दाखवत म्हणली...&lt;br /&gt;
&quot;काय झालं? इतके का प्रश्न येतात तुला... आवडला नाही का तुला... ?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;अरे... बॅकलेस आहे ड्रेस रंजीत... मी नाही पार्टीत घालणार... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;का??&quot; रंजीत आस्चर्यने म्हणाला..&lt;br /&gt;
&quot;का म्हणजे..? देसाई काका, काकू आणि बरीच लोक असतील, सर्व असतील पार्टीत... मी त्यांच्या समोर हा ड्रेस घालू... नाही नाही...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;मी इतक्या आवडीने आणला आहे... आज साठी ...प्लिज .. घाल ना...&quot; रंजीत केविलवाणा बघत होता तिला&lt;br /&gt;
&quot;नाही रंजीत... मी तुला घालून दाखवते पण पार्टीत नाही....&quot;&lt;br /&gt;
&quot;माझ्या साठी... प्लिज... &quot; रंजीत हट्टाला पेटलेला...&lt;br /&gt;
&quot;बघ हा... नंतर तूच पछतावशील... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;नाही... आणि मी का&amp;nbsp; पछतावशील...?? मी सांगतोय ना... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;हम्म... बघ... मी अशी साधी राहते तेच तुझ्या साठी चांगले आहे... कोणाच्या मनात भरले तर?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;तू मला धमकी देतेस? सांग ना हिंम्मत नाही घालायची... &quot; रंजीत तिला चिडवत म्हणाला&lt;br /&gt;
&quot;तू मला चॅलेंज करू नकोस हा... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;केले चल... आज पार्टीत हा ड्रेस घालून येऊन दाखव... &quot; रंजीत बेत लावत म्हणाला..&lt;br /&gt;
&quot;आणि आले तर मला काय ?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;तू मागशील ते... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;बघ हा... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;कधी आपला शब्द माघारी घेतला आहे का..??&quot; रंजीत भुवया उंचावत म्हणाला..&lt;br /&gt;
&quot;उम्म्म ठीक आहे... मला हि तुला काही दाखवायचे आहे... &quot; शिवानी आपल्या हॅन्डबॅग मधून इन्व्हलोप काढत म्हणाली, तो इन्व्हलोप त्याच्या हातात देत ती त्याला नजरेने बघ म्हणते... रोबोमाईंड चा इन्व्हलोप बघून रंजीत डोळे मोठे करून बघतो मग त्यातले लेटर काढून वाचू लागतो...&lt;br /&gt;
&quot;ओह माय माय... !!! शिवानी... तू आता रोबोमाईंड ची प्रोजेक्ट दिविजन हेड आहेस!!&quot; शिवानी आनंदाने मान हलवते...&amp;nbsp; &amp;nbsp;रंजीत तिला उचलून घेतो आणि २-३ गोल गिरक्या मारतो... &quot;तुला माहित आहे मला ह्या बातमी नि किती आनंद होतोय!!!&quot; तिला खाली उतरवत तो म्हणतो.&lt;br /&gt;
&quot;हो... तुझ्या मुळेच आहे हे सर्व... तूच तर जॉब परत जॉईन करायला प्रोसाहन दिलेस... शिवानी त्याच्या छातीवर डोकं ठेवत म्हणाली... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;ए... मी विसरलो... काँग्रट्स!!&quot; रंजीत चे बोल एकूण शिवानी त्याच्या कडे बघते ...&lt;br /&gt;
&quot;असे... रुके सुके?&quot; रंजीत तिच्या कडे काही कळले नाही असे बघतो... शिवानी आपल्या टाचा उंचावत त्याच्या गळ्याभवती आपले हाथ घालते आणि त्याच्या कपाळाचे चुंबन घेते आणि म्हणते... &quot;थँक यु...&quot; मग दोन्ही गालावर देते आणि ओठांचे चुंबन घेत म्हणते... &quot;काँग्रट्स... अशीच प्रगती करत रहा... १ नाही असे अनेक स्टोर चा तू मालक हो...&quot;&lt;br /&gt;
रंजीत तिला स्वतःकडे ओढून घेतो आणि म्हणतो... &quot;प्रत्येक प्रगतीला अशीच शाबासकी मिळणार असेल तर मेहनत करायला अजून हुरूप येईल... &quot; दोघे बराच वेळ एकमेकात गुंतलेले...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;तू नझ्म नझ्म सा मेरे होटोन पे ठहर जा.. में ख्वाब ख्वाब सा तेरी आँखों में जागु रे...&lt;br /&gt;
तू इत्र इत्र सा मेरे सासो में बिखर जा...&lt;br /&gt;
तू इश्क इश्क सा मेरे रुह में आके बस जा... जिस और तेरी शहनाई ऊस और में भागू रे... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रात्री पार्टी मध्ये ...&lt;br /&gt;
घरचे सर्व मंडळी जमा झाली होती... घरच्या टेरेस वर रूफ टॉप पार्टी ठेवली होती...&lt;br /&gt;
रुपाली, आरोही आनंद आणि आयुष नि पार्टी च्या सर्व तयाऱ्या केल्या होत्या. जवळचेच काही नातेवाईक आणि बुझिनेस चे काही महत्वाच्या लोकांना बोलावले होते... त्यात आनंद नि आपल्या कंपनी च्या आज आलेल्या जर्मन क्लायंट ला हि बोलावले होते..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#39;गोरिया रे... छोरीया रे तेरा जलवा देखा तो दिल हुवा मिल्खा बडी तेज भागे रे... मन मा इमोशन जागे रे...&lt;br /&gt;
दिल जगह से हिल गया रे... तुकडो में निकाल दिल का छिलका ... मन मा इमोशन जागे रे ... &#39;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिवानीने रंजीत च्या आग्रहाखातर त्याने तिच्या साठी आणलेला ड्रेस घातला होता. ती एकाद्या सीताऱ्या सारखीच दिसत होती, त्या लॉन्ग स्लिमफिट निळ्या ड्रेस चा रंग तिच्या चॉकलेटी त्वचा ला अजून तेजोमय करत होते... रंजीत तर तिला बघतच राहतो त्याच्या अपेक्षेपेक्षा शिवानी किती तरी पटीने सुंदर दिसत होती... शिवानी दरवाज्यातून आत आली ते रंजीत च्या नजरेला नजर देत... दोघे एकमेकां पासून नजर हटवत नव्हते... शिवानी भुवया उंचावत त्याला नजरेने कशी दिसते विचारते... रंजीत पापण्या मिटतो आणि &#39;बेधुंद करणारी&#39; असे साहतो तशी शिवानी स्वतःशी हस्ते... आणि मी जिंकले असे म्हणते तर रंजीत तिच्या जवळ जातो आणि कानात म्हणतो... &quot;मी तर तुझा गुलाम आहे कधी पासून... जे सांगशील ते करायला तयार...तसं मी हारून हि जिंकलोय!!!... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;हो का... पण मला खूप अवकवर्ड वाटतंय ना... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;अरे... तू इतकी सुंदर दिसतेस ना... का काळजी करतेस... &quot; रंजीत काही बोलतच होता तेव्हा आनंद तिथे त्यांचे जर्मन क्लायंट घेऊन येतो... आणि तो रंजीत ची ओळख करून देतो आणि सांगतो कि तो नवीन स्टोर चा मालक आहे... रंजीत ला जाम भारी वाटते .. काही वेळ ते रंजीत शी बोलतात पण त्यांची नजर शिवानी वरच असते... सकाळीच ओळख झाली होती पण सकाळी जी प्रोफेशनल शिवानी होती तिचा आता लुक पूर्ण बदलून गेलेला. शिवानी हि त्यांच्या शी मोकळेपणाने बोलते जे रंजीत ला आवडत नाही... ते तिथून गेल्यावर रंजीत गाल फुगवून बसतो... शिवानी त्याचा असा चेहरा पडलेला बघून म्हणते... &quot;काय झालं रे एक्दम चेहरा पडायला...??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;तू त्यांच्या शी का बोललीस?&quot; रंजीत रागावलेल्या सुरत म्हणला..&lt;br /&gt;
&quot;रंजीत मला काम करायचे आहे त्यांच्या सोबत बोलावे तर लागणारच ना आज तर पहिली मीटिंग झाली ... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;तो कसं बघत होता तुझ्या कडे... पाहिलेस ना...???&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हे बघ... मी आधीच बोलले ना... मी साधी राहिलेली तुझ्या साठी चांगले आहे... तुलाच हवं होत मी हा ड्रेस घालून यावे पार्टीत....साडी घातली असती ना मी नाही तर ??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हम्म... जाऊदे... बघू देत त्याला किती हि... पण तू आहेस तर माझीच ना... &quot; रंजीत तिच्या पाठीवरून हळुवार हाथ फिरवत म्हणाला...&lt;br /&gt;
&quot;हम्म...&quot; शिवानी त्याचे गाल गुच्छे घेत म्हणाली... &quot;नेहमी साठी...&quot;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
रुपाली आनंदात होती सर्व पार्टी ची मज्जा घेत होते...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व केक कट करायला जमतात... जसे सगळे जमतात आनंद सर्वांना लक्ष द्यायला सांगतो आणि म्हणतो ...&lt;br /&gt;
&quot;आज चा दिवस खूप खास आहे... खूप काही अर्थांनी खास आहे... आज आई बाबांची ३०वी एनिवर्सरी आहे आणि आजच DD म्हणजे देसाई डायमंड चे २५वे वर्धापन दिवस आहे... तर ह्या सिल्वर जुबली च्या निमित्ताने आम्ही आमच्या पार्टनर रंजीत सोबत नवीन स्टोर ओपन करण्याचे घोषित करत आहोत... &quot;&lt;br /&gt;
सर्व जण टाळ्यांनी रंजीत च स्वागत करतात जस आनंद त्याला आपल्या जवळ बोलावतो...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वांना शांत करत आनंद पुढे म्हणतो... &quot;अजून एक बातमी द्याची आहे... तुम्हाला तर माझी कंपनी रोबोमाईंड&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;माहित आहे, आज आपल्यात आमचे जर्मन क्लायंट आले आहेत इथे&quot; आणि तो अल्बर्ट ला बोलावतो...&lt;br /&gt;
&quot;आत्ताच अल्बर्ट नि मला निश्चित केले आहे कि ते आमच्या कंपनी सोबत मल्टि बिलियन डील करणार आहेत आणि हा प्रोजेक्ट बघणार आहेत आमच्या प्रोजेक्ट डिव्हिजन च्या हेड शिवानी... &quot; आनंद शिवानी ला हि बोलावतो...&lt;br /&gt;
शिवानी ला आश्चर्याचा धक्का बसतो... ती रंजीत च्या बाजूनी जाऊन उभी राहते.. सर्व टाळ्यांनी आनंद साजरा करतात. शेवटी आनंद अनंत आणि अंकिता ला बोलावतो... त्यांच्या सोबत त्यांचा अनिव्हर्सरी केक येतो...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केक कट झाल्यावर सगळे गाण्याच्या बिट वर डान्स करू लागतात...&lt;br /&gt;
सर्व चिल्लर पार्टी तोंडावर मास्क लावून डान्स करू लागतात... धिंगा मस्ती सुरु होते...&lt;br /&gt;
&#39;कमारिया... कमारिया... आज बिजली भी गिरवानी है... कमारिया हिला रे हिला &#39;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जसा जसा रात्री चा अंधार पसरू लागतो पार्टीत हळू हळू&amp;nbsp; रंग चढू लागतो...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
अचानक रुपाली ची नजर कोणाच्या नजरेशी भिडते... ह्याला कोणी बोलावले? ती स्वतःशी विचार करते&lt;br /&gt;
ती नजर तिला टोचते... त्या व्यक्ती नि तोंडावर मास्क लावला होता, पण त्याचे डोळे दिसत होते... त्याची नजर रुपाली ला खटकते... त्या क्षणानंतर तीला काही चैन पडेना...&lt;br /&gt;
ती त्या व्यक्तीला शोधू लागते, ती बेचैन झालेली, कुठे पहिले होते मी ह्याला? ती स्वतःशी आठवण्याचा प्रयन्त करत होती...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तितक्यात आयुष तिला काही सांगायला येतो... आयुष ला बघून रुपाली च्या डोळ्या पुढे अंधारी येऊ लागते, तीला चक्कर येते आणि ती बेशुद्ध होते. आयुष तिला धरतो आणि पद्मा पासून वाचवतो...&amp;nbsp;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#39;तू अखिया मिलके... इश्क में गल्ला तू मेनू समजणं... बम डीगी डीगी बम बम !!&amp;nbsp; &#39; मागे सुरु होते...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आयुष तिला एका खुर्चीत बसवतो पाणी शिंपडून तिला शुद्धीवर आणायचा प्रयत्न करतो ... बाकी कोणाला त्रास नको म्हणून तो रंजीत ला सांगून तिला खाली रूम वर घेऊन जातो....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-------&lt;br /&gt;
क्रमश:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाय फ्रेंड्स,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहिले तर तुम्हा सर्वांना नवरात्रीच्या खूप खूप शुभेच्छा... दांडिया, रंगे बी रंगे कपडे... मेजवानी ... गाणे डान्स मज्जाच मज्जा.... हो ना... आता संध्याकाळी लागतील जोर दार लाऊड स्पीकर वर दांडिया सॉंग्स!! त्या बिट्स वर वाजतील टिपऱ्या वाजतील ... मज्जा च मज्जा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मला ना एक कल्पना सुचली... सर्वांनी आपल्या मोबाईल वर एकच गाणं लावलं आणि हेडफोन लावून डान्स केला तर??? कसलं मस्त ना...?? म्हणजे दुसऱ्या कोणाला डिस्टर्ब पण नाही आणि तुमचं एन्जॉयमेंट पण फुल्ल!!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माझं जरा डोकं कुठे हि धावते... पण सोसायटी मध्ये ह्या कल्पनेचे विचार करायला हरकत नाही ना हे ऑपशन राबवायला... नॉइज पोल्युशन कमी होईल ना तितकेच!!&lt;br /&gt;
थँक यु थँक यु ... !! मी हुशार आहे हो... लहान असतांनापासुनच... गर्व नाही करत पण... साधी सरळ आहे मी!!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम्म... कसा वाटला आज चा भाग??&lt;br /&gt;
हो हो कळेल... ती नजर कोणाची आणि रुपाली त्याला बघून का बेशुद्ध झाली सर्व कळेल...&lt;br /&gt;
नेक्स्ट भाग कधी?? गुड question !! लवकरच... गुड आन्सर !!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज भाग का नाही टाकला?? अजून नाही आला??&lt;br /&gt;
अजून भाग का नाही आला... ?&lt;br /&gt;
नेक्स्ट भाग कधी?&lt;br /&gt;
नेक्स्ट भाग लवकर टाक...&lt;br /&gt;
तुमचे असे हक्कानी येणारे प्रश्न आणि टिप्पण्या हि आवडतात अहो... पण प्लिज जरा समजा ना... मला हि घर आहे ओ... नवरात्री आहे तयारी आहे... पर्सनल लाईफ हि आहे... काय करू... मी एक हॉबी म्हणून लिहिते हो... फुल्ल टाइम प्रोफेशिअन नाही ना.. सर्व सांभाळून करावे लागते... मला कळते तुमची अधीरता पण जरा patience हवा ना... मी रोज एक भाग टाकते तरी अजून किती लवकर करू प्रकाशित???&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर एन्जॉय नवरात्री गाईस!!! माझी आठवण काढत रहा... मी उद्या भेटणार आहेच!! पक्का...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिप्राय नक्की कळवा...&lt;br /&gt;
वाचत रहा.. ती लाजते जेव्हा... पर्व ३ (श्वास माझा होशील का...?)&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;- निशी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/467171404039097368/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/09/tlj_29.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/467171404039097368'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/467171404039097368'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/09/tlj_29.html' title='८ | TLJ ३ | श्वास माझा होशील का? '/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-8112787594361557449</id><published>2019-09-27T20:30:00.003-07:00</published><updated>2019-09-27T20:34:36.651-07:00</updated><title type='text'>६ | TLJ ३ | श्वास माझा होशील का?</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
ती लाजते जेव्हा | पर्व ३ | श्वास माझा होशील का? - भाग ६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रात्र बरीच उलटून गेली होती ... शिवानी अजून हि आपल्या लॅपटॉप वर काम करत बसली होती. उद्या खूप महत्वाची मीटिंग होती आणि त्याच्याच तयारीत ती लागली होती. रंजीत ने येऊन तिला कॉफी आणून दिली... तिला कॉफी देत म्हणाला, &quot;आज खूप काम आहे का?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हम्म ..&quot; शिवानी त्याच्या कडे न बघता म्हणाली. त्याने परत कॉफी चा मग पुढे केला... &quot;घेते ना... थांब ना आणि तू का जागा आहेस अजून? झोप ना...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हम्म... तू नाहीस ना बाजूला... मग झोपच येत नाही मला... &quot; रंजीत तिच्या डोळ्यात बघत म्हणाला...&lt;br /&gt;
शिवानी त्याच्या हातातून कॉफी घेत म्हणते ... &quot;प्लिज... नको ना जगूस राज्या ... मला अजून बराच वेळ लागेल... झोप तू... येते मी...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;इतकं काय काम आहे... मी काही मदत करू का... &quot; रंजीत तिच्या लॅपटॉप मध्ये लक्ष घालत म्हणाला...&lt;br /&gt;
&quot;उद्या क्लायंट मीटिंग आहे त्या साठी काही रिपोर्ट तयार करायचे आहेत, नवीन जॉईन झालेल्या ट्रेनी नि काही चुका करून ठेवल्या आहेत त्याच सुधारत आहे... &quot; शिवानी डोक्याला हाथ लावून बसलेली... रंजीत तिचे डोके चेपून देतो...छान चोळून देतो...&amp;nbsp; &quot;उम्म्म रंजीत मी झोपेल तू असं चोळत राहिलास अजून काही वेळ तर.... मी ठीक आहे... &quot; शिवानी त्याचे हाथ दहरुन त्याला आपल्या समोर यायला लावत म्हणली...&lt;br /&gt;
&quot;काय झालं? झोप नाही येत का..??&quot;&lt;br /&gt;
रंजीत मान हलवून हो म्हणतो... &quot;मी काही मदत करू का सांग ना... &quot; शिवानी मान हलवून नाही म्हणते आणि परत कमला लागते... रंजीत खाली वाकून तिच्या गाळाचे चुंबन घेतो आणि मग आपल्या साठी खुर्ची घेऊन येतो आणि तिच्या बाजूला बसतो... त्याच्या जवळ थांबण्याने शिवानी ला छान वाटते, तीनि न मागता तो तिच्या साठी थांबून होता. बराच वेळ तो आपल्या मोबाईल मध्ये काही करत बसतो... मग गाणी लावून ऐकत बसतो, बराच वेळ आपले काम केल्यावर सर्व नीट झाले ह्याची शहनिशा करून शेवटी आपला लॅपटॉप बंद करत शिवानी त्याला म्हणते &quot;झाले... चल!!&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रंजीत उठतो आणि मोबाइलला बंद करतो तितक्यात छान गाणे सुरु होते... रंजीत तिला थांबवतो आणि म्हणतो... ऐक ना... आणि स्पीकर ऑन करतो...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केह दु तुम्हे... या चूप रहू... दिल में मेरे आज क्या है... ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रंजीत कोणत्या डिरेकशन नि चाललेला लक्षात येताच शिवानी त्याच्या कडे बघून हस्ते आणि म्हणते...&lt;br /&gt;
&quot;सांगायची काही गरज आहे का... ??&quot; आणि ती झोपायला जाऊ लागते... रंजीत तिला थांबवतो&lt;br /&gt;
&quot;न सांगता कळणार आहे का तुला...???&quot; शिवानी त्याच्या डोळ्यात बघते आणि काय असे नजरेनेच म्हणते&lt;br /&gt;
रंजीत तिच्या जवळ जातो आणि तिच्या कानावर आलेले केस बाजूला करतो, त्याच्या त्या हलक्या स्पर्शाने शिवानी शहारते, रंजीत पुढे तिच्या कानात म्हणतो.... &quot;उद्या साठी ऑल द बेस्ट !! तू बेस्ट आहेस... तुला कोणाची तोड नाही...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिवानी हस्ते&amp;nbsp; आणि थँक यु म्हणते... &quot;बस... इतकेच सुरु आहे नक्की?&quot;&lt;br /&gt;
रंजीत डोळ्यानेच हो म्हणतो...&lt;br /&gt;
&quot;हम्म... मला वाटले...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;काय??&quot; रंजीत डोळे मोठे करून विचारते...&lt;br /&gt;
शिवानी स्वतःशीच विचार करून लाजत डोळे गोल फिरवत ... &quot;काही नाही&quot; म्हणते... तास रंजीत तिला स्वतःकडे ओढून मिठीत भरतो... डोळ्यांनी काय?? काय वाटले तुला..?? आणि तिला उचलून घेतो... &quot;अरे... उतरावं मला... रंजीत... काय करतोस...&quot;&lt;br /&gt;
रंजीत कुठे आता तीच काही ऐकणार होता...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रुपाली च्या डोळ्यांवर पट्टी बांधली होती... तिचा हाथ धरून त्याने तिला न्यायचे तिथे आणले होते... लोणावळ्याच्या हिरव्यागार दर्यांच्या भवती होते ते, पण रुपाली ला हे सर्व अजून दिसले नव्हते... गाडीत पूर्ण रस्ताभर ती सारखे प्रश्न विचारात होती &quot;कुठे चाललो आहे ते तर सांग... &quot; पण तिला उत्तर काही मिळाले नव्हते... तिला दरीच्या जवळ उभे करून त्याने तिच्या डोळ्यांवरची पट्टी काढली...&lt;br /&gt;
रुपाली समोरचे मोकळे आकाश बघून खुश झाली ... गार वारं अंगावर शहारे आणत होता... वाऱ्यावर तिचे केस उडत होते. पावसाळ्याचे दिवस असल्याने सर्वत्र डोळ्यांना नैनरम्य असे हिरवी वृक्षवल्ली दिसत होती. ती आजू बाजू ला बघते पण आयुष्य कुठे दिसत नाही... जवळच कार पार्क केलेली दिसते... काही आणायला गेला असेल असा विचार करत रुपाली आजू बाजू ला निहारात बसते... तितक्यात बाजूला कोणी तिच्या सारखेच वारं आणि निसर्ग निहारात उभे आहे असे वाटते, म्हणून ती बघते ... ती बघते तर आयुष्य बाजूला उभा होता आणि तिच्या कडे मोठी स्माईल देऊन बघत होता.... ती त्याला नजरेनेच काय असे म्हणते... त्याला खूप काही बोलायचे होते बहुदा... त्याच्या डोळ्यात तिला बरेच प्रश्न आणि बरंच काही दिसत होते.... ती त्याला पुढे काही बोलेल तितक्यात त्याच्या मागून एक व्यक्ती आपला चेहरा दाखवतो, त्याला बघून रुपाली घाबरते पण तिला काही कळण्याच्या अगोदरच त्याने आयुष्य ला त्या दरीत ढकलून दिले...&lt;br /&gt;
&quot;आयुष्य श श श......&quot; रुपाली ची किंचाळी निघाली....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रमश:&lt;br /&gt;
------&lt;br /&gt;
हाय फ्रेंड्स,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बस बस ... बत्तीशी बंद करा आपली... अहो किती ती मोठी स्माईल... घरचे विचारत नाही का तुम्हाला का हस्ताय असे वेड्या सारखे?? मला तर विचारतात बाबा जेव्हा पण मी तुमच्या कंमेंट्स वाचून एकटीच हसत असते...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मग कसा वाटला आज चा भाग?&lt;br /&gt;
अजून हि सध्या किंजल आणि ओंकार डोक्यातून गेले नाहीत ...&lt;br /&gt;
काही दिवस वेळ कमी असल्यामुळे कदाचित भाग छोटे असतील.. तर प्लिज तक्रार करू नाही..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काय वाट्ते... कशी वाटली सुरवात?&lt;br /&gt;
आज काही जस्ती नाही बोलणार ... एक गाणे ऐकवते ... त्यात माझ्या मनातल्या सर्व भावना आहेत ...&lt;br /&gt;
म्हणजे काही दिवस झालेत आपल्याला बोलून पण कधी कधी काही न बोलता बरच काही बोलता येत ना...&lt;br /&gt;
तर भावना समजतात का माझ्या बघा...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थोडे हसावे थोडे रुसवे ...नाते रुजावे असे ...&lt;br /&gt;
तुझया सुखाचे माझ्या सुखाशी धागे जुळावे जसे ...&lt;br /&gt;
तू आणि मी ... मौनातले बोलणे ... !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथेकडे वळूयात ...&lt;br /&gt;
मला खूप जणांनी प्रश्न विचारले तुम्ही थ्रिलर सुस्पेन्स कथा लिहिता का?&lt;br /&gt;
तर माझे उत्तर नाही असे होते... का?? कारण मला फक्त प्रेम आणि मैत्री हाच विषय आवडतो लिहायला...&lt;br /&gt;
पण परत विचार केला का नाही?? एक वेगळे काही ट्रय कराचे...&lt;br /&gt;
तर घेऊन येत आहे तुमच्या साठी... थ्रिलर सुस्पेन्स नि भरलेली हि लव्ह स्टोरी ...&amp;nbsp; माझ्या ह्या प्रयत्नाला तुमची साथ मिळेल हि आशा...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तुमच्या हि मनात प्रश्न आलेच असतील ना... नसतील आले तर मी कशासाठी आहे...&lt;br /&gt;
हे घ्या प्रश्नांची लिस्ट विचार करायला... उद्या पर्यंत मी परत भेट पर्यंत...&lt;br /&gt;
१. कोण आहे तो माणूस ज्याने आयुष्य ला ढाककल्ले...??&lt;br /&gt;
२. रुपाली का घाबरलेली?&lt;br /&gt;
३. आयुष्य ला काय झाले? काय आयुष्य ची ह्या कथेत एन्ट्री च्या आधीच एक्सिट?&lt;br /&gt;
४. का निशी का तू असे का केले... का मारलस आयुष्य ला... हो... हो देईल ना निशी उत्तर उद्याच्या भागात...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिप्राय नक्की कळवा...&lt;br /&gt;
वाचत रहा.. ती लाजते जेव्हा... पर्व ३ (श्वास माझा होशील का...?)&lt;br /&gt;
&lt;div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/8112787594361557449/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/09/tlj.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/8112787594361557449'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/8112787594361557449'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/09/tlj.html' title='६ | TLJ ३ | श्वास माझा होशील का?'/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-6447979747748930950</id><published>2019-07-12T02:47:00.002-07:00</published><updated>2019-07-12T02:47:48.900-07:00</updated><title type='text'>क्षितिजा पलीकडचे</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;आदी... आज कुठला दिवस आहे आठवते का तुला... चल लवकर उठ&quot; तिचा आवाज ऐकून आदी नि स्वतःला पांघरुणात झाकून घेतले.. त्याला त्या २ मिनिटात भरपूर मनसोक्त झोप घ्याची होती. त्याला माहित होते ती लगेच नेहमीप्रमाणे तिथे येईल, त्याचे पांघरून काढून त्याची सकाळची गोड किस घेईल... आणि त्याच्या दिवसाची गोड सुरवात होईल, त्याला जाणीव होत होती कि ती रूम मध्ये आली आहे आणि साऱ्या वस्तू आवारात आहे... कधी कधी तर तो त्या सकाळच्या किस साठी झोपायचे नाटक करत रहायचा.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;आदी... शोना उठ ना.. आज कोणता दिवस आहे? कुठे जायचे .. आहे आठवते का... &quot; त्याला फ़ुटबाँल रॅक मध्ये ठेवत तिने आवाज दिला, त्याच्या बेडशेजारी येऊन बसली आणि त्याच्या तोंडावरून पांघरून काढले, तिच्या सुगंधाने आदी चा श्वास भरून गेला, मनभरून त्याला बघितल्यावर तिने त्याला त्याची इतक्या वेळ वाट पाहत असलेली किस दिली. पण आदी चे कसले पोट भरते... तो घट्ट डोळे बंद करून परत झोपण्याचे नाटक करू लागला... त्याचे ते नाटक बघून ती थोडं आपला स्वर वाढवत म्हणाली, &quot;मला माहित आहे आदी तू जागा आहेस... लवकर उठलास तर बरं होईल.. उठ आणि ....&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिचे वाक्य पूर्ण होण्या आधी आदी उठून बसला आणि म्हणाला, &quot;आई... तुला कसे कळते ग आधीच सगळे... &quot; आदी पांघरून बाजूला करत म्हणाला.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;कारण मी तुझी आई आहे... &quot; असे म्हणतात सायली नि त्याला कडेवर उचलून घेतले आणि बाथरूम मध्ये घेऊन गेली.. त्याला तयार करून देत त्याच्या मनातल्या साऱ्या प्रश्नांचे जमेल तसे उत्तर देते. सायली त्याला पटपट भरवून तयार ठेवते. तितक्यात आर्यन येतो.. &quot;मग चॅम्प तयार का आजच्या मोठ्या दिवसासाठी...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;हो!! &quot; आदी त्याला टाळी देत म्हणाला. &quot;तू पण येणार आहेस पप्पा...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;बिलकुल... माझ्या शोन्याचा आज शाळेचा पहिला दिवस आणि मी नाही येणार!!&quot; असे म्हणत ते सर्व कार मध्ये बसतात आणि शाळेला जायला निघतात.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आर्यन आणि सायली नुकतेच बदली होऊन दिल्ली ला आले होते. त्यांनी आपल्या&amp;nbsp; ५ वर्षाच्या मुलाचे म्हणजे आदी चा दाखला एका नामांकित शाळेत करून घेतला होता आणि आज त्याचा शाळेचा पहिला दिवस होता.... आदी नि आपल्या शिक्षिकेला दह्याला बागेतले एक गुलाबाचे फुल घेतले असते.त्याला शाळेत सोडून आर्यन आणि सायली निघून जातात. आर्यन शाळेत आपल्या शिक्षिकेला गुलाबाचे फुल देण्याकरिता त्यांची वाट पाहत बाहेर थांबला असतो,... त्याच्या बाजूला एक मुलगी उभी असते, टपोरे डोळे, दोन वेण्या घातलेली, नाजूक बांधा&amp;nbsp; तिच्या हि हातात गुलाबाचे फुल असते... त्याचं हातातले फुल बघून ती गोड हस्ते आणि विचारते &quot;तू हे रिया मॅम ला द्यायला आणले आहे..&quot; आदी मान हलवून हो म्हणतो. &quot;मी पण...&quot; तीच पुढे म्हणते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तितक्यात रिया मॅम येतात त्या दोघांकडून फुल घेऊन त्या दोघांना धन्यवाद देतात. वर्ग सुरु होतो... आदी न कळतच जाऊन त्या मुलीच्या शेजारी बसतो... ती त्याला आपला हाथ देत म्हणते, &quot;हाय, मी विराली ...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;हाय... माझे नाव आदी...&quot; ती परत त्याला छान गोड स्माईल देते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यांच्या मैत्रीची सुरवात होते, रोज दोघे एकमेकांशेजारी बसायचे... दोघे हि हुशार, कोणता हि प्रश्न विचारला कि वर्गात पहिले उत्तर त्यांच्या कडूनच मिळणार... खेळ असो कि अभ्यास साऱ्या शाळेत दोनच नाव असायचे आदी नि विराली. दोघांना हि जिंकायची जितकी सवय झाली असते तितकीच एकमेकांची सवय झाली असते. हळू हळू दोघे मोठे होतात... १०... १२.. दोघे उत्तम गुण घेऊन पास होतात... दोघांच्या हि मनात त्यांना माहित होते आपण एकमेकांवर प्रेम करतो पण ते प्रेम अव्यक्त होते. शेवटी एक दिवस येतो जेव्हा आदी आपल्या मनातले विरली&amp;nbsp; ला एका कागद वर लिहून देतो आणि घरी जाऊन वाचून उत्तर सांगायला सांगतो... त्या दिवशी आदी पहिल्यांदा तिची ती झुकलेली नजर बघतो... नाही तर विराली&amp;nbsp; नेहमी तोर्यातच असायची... कदाचित आज तिला वाचण्याआधीच माहित होते त्या चिट्ठीत काय लिहिले होते... घरी जाऊन कधी वाचते असे तिला झालेलले... घरी पोचल्या क्षणी ती आपल्या खोलीत धावून जाते आणि दार लावून घेते... हृदयाची धडधड वाढलेली... हातात गुंडाळून ठेवलेली ती चिट्ठी तिने नीट बघितली थरथरत्या हाताने तिने ती उघडली, डोळ्यां पुढे अक्षर होते पण काही समजेना...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थोडं स्वतःला सावरत मग ती वाचू लागली,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;&lt;b&gt;पुन्हा एकदा तुझ्या प्रेमात पडावेसे वाटते...&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;&lt;b&gt;कोण ग तो तुझा म्हटल्यावर गुलाबी झालेले गाल बघून&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;&lt;b&gt;पुन्हा एकदा तुझ्या प्रेमात पडावेसे वाटते....&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;&lt;b&gt;रोज निरोप घेताना पुन्हा कधी भेटशील म्हणताना पाणावलेले डोळे आणि कपकपनारा कंठ बघून&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;&lt;b&gt;पुन्हा एकदा तुझ्या प्रेमात पडावेसे वाटते....&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;&lt;b&gt;कारण नसताना तासभर फोनवर भांडायच स्वतः राग करून फोनही ठेवायचं फोन ठेवल्यानंतर मिनिटात आलेला मँसेज बघून&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;&lt;b&gt;पुन्हा एकदा तुझ्या प्रेमात पडावेसे वाटते....&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;&lt;b&gt;नकळत स्पर्श झाल्यावर तुझ्या हृदयाचा चुकणार ठोका आणि थरथरणारे ओठ बघून&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;&lt;b&gt;पुन्हा एकदा तुझ्या प्रेमात पडावेसे वाटत....&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;&lt;b&gt;मला पुन्हा पुन्हा तुझ्या प्रेमात पडावेसे वाटते... तुला??&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनात कारंजे... प्रेमाची जादू परत परत ती ते शब्ध वाचते, खूप विचार करून आपले उत्तर लिहिते..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माझे तुझ्यावरचे प्रेम हे एका कागदा सारखे आहे, एक असा कागद ज्यावर तू तुझी भावनालिहू शकतेस , तुझा राग खरडू शकतेस ,तुझे आश्रू पुसण्यासाठी मला वापरू शकतेस , फक्त वापरून झाल्यावर मला फेकून देऊ नकोस, कारण मला सदैव तुझ्याबरोबर राहायचे आहे. पण हो, जर तुला खूप थंडी वाजून आली तर मात्र उब मिळविण्यासाठी तू मला जाळू शकतेस.....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
.... दोघांची मैत्री आता प्रेमाचे रूप घेते... दोघांच्या घरी सांगण्याचे ठरवतात. दोघांचे घरचे त्यांच्या मर्जी खातर लग्नाला तयार होतात आणि भेटायला तयार असतात. दोघांच्या आनंदाचे पारे नसते. भेटण्याची वेळ आणि दिवस ठरतो तसे विराली आपल्या आई बाबांना घेऊन कॅफे शॉप मध्ये येऊन बसली असते. ती आपल्या आई बाबांना आनंदाने आदी बद्दल सांगत असते कसा तो तिला समजून घेतो आणि ते दोघे किती एकसारखे आहेत... त्यांची जोडी तर वरून देवानेच बनवून पाठवली आहे. विरालीचे गोड कौतुक अजून संपलेच नसते जेव्हा तिला समोरून आदी आपल्या आई बाबा सोबत येताना दिसतो... ती आपल्या आई बाबांना त्याची आणि त्याच्या आई बाबा शी ओळख करून देते...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;सायली??&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;पायल!!&quot; दोघी एकमेकीला बघून प्रश्नार्थी नजरेने बघतात. आणि लगेच दोघी म्हणतात... &quot;नाही नाही... हे लग्न शक्य नाही... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;हो मुळीच नाही... हे लग्न शक्य नाही...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवढे म्हणून दोघी आप आपल्या नवऱ्याला घेऊन तिथून निघून जातात... विराली आणि आदी ला काही समजण्याच्या आत त्यांनी पाहिलेली स्वप्न तुटली असतात...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;अरे पण का शक्य नाही हे लग्न... काही कारण तर हवे ना...&quot; विराली रागारागाने म्हणाली...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;तेच ना... काही न सांगता निघून गेल्या... मला वाटते त्या आधीपासून ओळखतात एकमेकीला...&quot; आदी आपली शंका व्यक्त करत म्हणाला... दोघांचे डोके चालू लागते... &quot;हम्म... ह्या एकमिकीच्या शत्रू असतील....&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;नाही.. रे... सांगितले असते ना मग त्यांनी ... मला काही तरी घोळ वाटतोय...&quot; विराली गहण विचार करत म्हणाली...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;बरेच दिवस दोघे कारण जाणून घेण्याचे प्रयन्त करू लागतात पण सर्व व्यर्थ... विराली साठी स्थळ येऊ लागतात पण तीने स्पष्ट केले असते लग्न करेन तर आदी शी नाही तर लग्न नाही करणार...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विराली च्या हट्टापायी पायल ला हार मानावी लागते...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;ठीक आहे.. तयार राहा... उद्या तुला कुठे न्याचे आहे... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;मी कुठेच येणार नाही...&quot; विराली उर्मटपणे उतर देते...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;आदी ला हि घेऊन ये... त्याच्या आई बाबा सोबत... तुला कारण हवे ना मी का ह्या लग्नाला नाही म्हणत आहे... उद्या कळेल..&quot; ते एकूण विराली डोळ्यातले अश्रू पुसत म्हणाली... &quot;खरं?? ठीक आहे...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुसऱ्या दिवशी आदी आपल्या आई बाबांना घेऊन विराली च्या घरी येतो...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सायली पायल च्या कानात काही कुजबुजत... &quot;तुला नक्की खात्री आहे तुला ह्यांना सर्व काही सत्य सांगायचे आहे??&quot; तिचे वाक्य ऐकून पायल म्हणते, &quot;त्या शिवाय हि मुलगी काही लग्न करणार नाही...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व आपल्या गाड्या काढतात आणि निघतात... &quot;आपण कुठे चाललोय आई.. एवढा काय सस्पेन्स?&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;पुण्याला...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;काय?? पुण्याला... का पण... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;कळेल म्हणले ना... तिथे &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सगळे विमानाने पुण्याला येतात, पुण्याला पोचल्यावर पायल सगळ्यांना एका प्रयोग शाळेत घेऊन जाते, संशोधन लॅब खूप मोठी असते आणि आधुनिक उपकरणांनी पूर्ण असते, पायल तिथल्या रिसेप्टिनिस्ट ला सांगते, &quot;डॉक्टर आचार्य आहेत का? त्यांना सांगा पायल सिन्हा त्यांना भेटायला आल्या आहते.&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;मॅडम सर खूप बिझी असतात त्यांची आधी अपॉइंटमेंट घ्यावी लागेल...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;मी त्यांना फोन वर बोलले होते त्यांनीच आज यायला सांगितले होते..&quot; पायल स्पष्टीकरण देत म्हणाली.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ती एक कॉल करते आणि मग त्यांना आत जायला सांगते... त्यांच्या सोबत तिथला एक कर्मचारी येतो त्यांना तो आपल्या मागे यायला सांगतो... विराली आणि आदी इतकी आधुनिक लॅब बघून दंग राहतात, त्यांची उत्सुकता पूर्ण ताणली गेली असते कि त्यांच्या लग्नाचा आणि ह्या माणसाचा काय संबंध आहे...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एका केबिन मध्ये आणून त्यांना बसायला सांगून तो कर्मचारी निघून जातो. सर्व काही एकाद्या इंग्रजी चित्रपटात दाखवतात तसे सुरु असते त्या वातावरणात विराली घाबरलेली असते ती आदी च्या शेजारी उभी असते. तितक्यात आचार्य सर येतात, एक वृद्ध पुरुष डोळ्यावर भिंगाचा चष्मा, आपल्या पांढऱ्या केसांना मॅटचिंग असा पंधरा कोट घालून येतात, &quot;अरे पायल... बऱ्याच दिवसांनी आलीस... बोल... काय झाले.. .काय म्हणत्वाचे बोलायचे होते तुला कि दिल्ली वरून पाहिलं विमान घेऊन आलीस इथे... &quot; त्यांचे लक्ष केबिन मध्ये बसलेल्या बाकी लोकांकडे जाते... ते सायली ला बघून काही आठवण्याचा प्रयत्न करतात ... &quot;उम्म्म ... मी आपल्याला कधी भेटलो आहे का... आज काळ काही लक्षात राहत नाही... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;सर तुम्ही मला ओळखले नाही... मी सायली, पायल सोबत एक्सपिरिमेंट साठी यायचे...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;अरे हो... तेच म्हणतो मी कुठे बघितले... कशे आहेत तुम्ही...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;मी ठीक आहे सर... हे माझे मिस्टर आणि हा मुलगा आदी...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;आदी... हम्म किती मोठा झाला... &quot; तिच्या कानात काही खुसफुस करत ते&amp;nbsp; म्हणतात&amp;nbsp; ... &quot;काही प्रॉब्लेम झाला का... ??&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सायली मान हलवून नाही असे सांगते.. .&quot;मग तुम्ही सगळे इथे कसे काय...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;सर... हि माझी मुलगी विराली...&quot; पायल पुढे बोलत म्हणाली..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;विराली... आठवते मला ह्या दोघांना जन्मल्या जन्मल्या हातात घेतलेले.. &quot; आचार्य सर जरा भारावून जात म्हणले...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;सर... हे दोघे आता लग्न करायचे म्हणतात ...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;काही हि काय... ते शक्य नाही... &quot; प्रश्न पूर्ण होण्या आधीच ते शक्यता लाथाडून लावतात...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;एक मिनिट... &quot; विराली सगळ्यांना मध्ये थांबवत म्हणाली... &quot;आम्हाला कोणी सांगेल का काय चाललेय? आपण इथे माझ्या आणि आदी च्या भविष्य बद्दल बोलतोय... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिला शांत करत आचार्य सर म्हणाले... &quot;हो हो... सर्व काही सांगतो बेटा ... मला सांग तू कधी आजारी पडलीस का?&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खूप विचार करून विराली आठवायचा प्रयत्न करते पण आपण कधी आजारी पडलोय हे तिला आठवत नाही... ती सर्व काही आठवून संकोच व्यक्त करत नाही म्हणाली... आचार्य सर मग आदी कडे वळतात आणि त्याला हि तोच प्रश्न विचारात...&quot;आदी तू??? कधी आजारी पडलास का??&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदी नि आपले उत्तर विराली ला प्रश्न विचारला तेव्हाच तयार ठेवला होता पण त्याच्या मनात आता वेगळेच चक्र सुरु झाले... &quot;आम्ही कधी आजारी पडलो नाही म्हणजे आम्ही माणूस नाही?? आम्ही मशीन किंवा रोबोट आहोत का?? म्हणजे तुम्ही आमच्यावर एक्सपिरिमेंट करत आहेत...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;ह्म्म्म... बरोबर... तुझे हे जे विचार चक्र सुरु झाले ना.. तुझ्या बाबांना तरी हा विचार आला का कधी? आपली मुले आजारी पडत नाही... का ?? कधी विचार केला का त्यांनी?&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;मी एक रोबोट आहे?? शक्यच नाही... नाही नाही... मी हे मान्य करूच शकत नाही...&quot; आदी स्वतः कडे निरखून बघू लागला...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;नाही नाही... तुम्ही रोबोट नाहीत बाळा... तुम्ही डिझायनर बेबी आहेत... ह्या जगातले पहिले वहिले...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;काय??&quot; आदी विराली दोघे एक्दम म्हणाले..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;आज पासून २५ वर्ष आधी ... &quot; आचार्य सर त्यांना हकीकत सांगू लागले... &quot; मी तरुण हुशार आणि ह्या जगावर आपली छाप सोडण्याच्या ठाम निश्चयाचा होतो... मला मानव जाती साठी खूप काही करायचे होते.. खूप कष्टानी मी असा उपाय शोधून काढला ज्याने मनुष्य स्वतः मध्ये रोगप्रतिकारक शक्ती निर्माण करू शकतील.. मी माझ्या वरिष्ठांशी बोललो त्यांना माझे संशोधन दाखवले... पण त्यांना ते नाही पटले.. पण मला स्वतःला सिद्ध करायचे होते मी पेपरात जाहिरात दिली, मला बराच&amp;nbsp; चांगला प्रतिसाद मिळाला, अश्या बऱ्याच स्त्रिया होत्या ज्यांना मूल हवे होते पण काही ना काही कारणांनी त्या ह्या सुखाला मुकल्या होत्या मी सगळ्यांचे काही टेस्ट केले आणि त्यातल्या १० जणींची निवड केलेली... त्यात तुमच्या आई ची निवड झाली होती... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदी आणि विराली एकमेकांकडे आश्चर्याने पाहत होते आपण काय ऐकतोय ह्या सर्व गोष्टींवर कसा विश्वास ठेवावा हेच कळेना...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर पुढे बोलू लागले... &quot;डिझायनर बेबी म्हणजे काय? आपल्या बाळाचे जिन्स आपण बदलून आपल्याला पाहिजे तश्या निवडायच्या, अश्या काही जिन्स ज्या अनुवांशिक आजार पुढच्या पिढीला देतात त्या बदलून टाकायच्या ज्याने पुढच्या पिढीला तो आजार होणारच नाही... थोडक्यात सांगायचे तर आपल्या बाळाचे डोळे कोणत्या रंगाचे व्हावेत, केस कसे असावेत, त्याचा रंग कसा हवा हे सर्व आपण ठरवू शकतो... त्याने आजी चे डोळे घ्यावे, आई चे ओठ, अत्याचा बोलकेपणा, बाबांचा मोकळेपणा... हे सर्व आपण त्याच्या जन्माच्या अगोदरच ठरवू शकतो... तुम्ही कधी कोणत्या स्पर्धेत भाग घेतलात आणि हरलात?&quot; परत आदी आणि विराली आठवू लागतात पण त्यांना अशी कोणतीच स्पर्धा आठवत नाही... ते दोघे नकारार्थी मान हलवतात...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;कारण... मी सांगतो... तुमच्या मेंदूची ठेवण ह्या बाकी मुलांपेक्षा वेगळा आहे... तुमची आकलन शक्ती वेगळी आहे... तुम्ही म्हातारे झालात तरी तुमची मेंदूची आकलन शक्ती १६ वर्षाच्या व्यक्ती सारखी असेल... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वतःच्या कानावर विश्वास बसे नासा झाला, आदी आणि विराली ला खुश व्हावे कि दुखी कळत नव्हते... &quot;म्हणजे आज पर्यंत मी जे यश मिळवले आहे ते माझ्या मेहनतीच्या बळावर नाही तर मी बाकी मुलांच्या तुलनेने वेगळी रचना घेऊन जन्म घेतला म्हणून...?? बरोबर ना??&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;हो.. पण ह्या साठी तुम्ही आपल्या आई ला धन्यवाद दिला पाहिजे त्या जर माझे बोलणे समजावून घेऊन तयार झाल्या नसत्या तर हे शक्य नव्हते.. . म्हणजे आज च्या कळत आपण जिन्स, टेस्ट ट्यूब बेबी हे सर्व सर्वसाधारणपने ऐकतो पण आज पासून २५ वर्षे आधी हे सर्व काही नवीन होत कोणी आपल्या बाळा साठी इतके मोठे पाऊल उचलेल का ह्याची मला खात्री हि नव्हती... माझा प्रयोग यशस्वी झाला पण मी हे सर्व कायद्याने केले नसल्याने मी हे कोणाला सांगू शकलो नाही... पण माझ्या प्रयोगाचे यश हे तुमच्या यशात आहे...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक मोठा श्वास घेत सर शांत झाले...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विराली त्यांना म्हणली, &quot;ठीक आहे आम्ही डिझायनर&amp;nbsp; बेबी आहोत पण त्याचा अर्थ असा तर नाही ना कि तुम्ही आमच्या कडून आमचे हक्क हिरावून घ्याल... आम्ही दोघे हि बलिग आहोत आणि लग्न करायचा आम्हाला हक्क आहे... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;विराली... मी कुठे लग्न करू नका म्हणालो... ?? तुमचे आई बाबा तयार नाहीत... &quot; ते सायली आणि पायल कडे बघतात...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदी अजून हि गोंधळलेला असतो... &quot;म्हणजे सर तुम्हाला असे म्हणायचे आहे कि डिझायनर बेबी ला जन्म द्यायला शारीरिक संबंध येण्याची गरज नाही... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;हम्म ... बरोबर... पण ते तुमच्या हातात आहे... त्या काळात हि नैसार्गिग गर्भधारणा होऊन प्रसूती होऊ शकेल...&quot; त्यांनी मान होकारार्थी हलवली...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;कोण नैसार्गिग रित्या जन्म देईल? कोणाला हवे असेल कि आपले मूल आजारी पडावे अश्या जगात जिथे बाकी सगळे रोग प्रतिकारक शक्ती घेऊन जन्माला येतील? नाही... कोणालाच नाही वाटणार... पण मग अश्या प्रयोगाचा काय उपयोग ज्याने जगातून प्रेम संपून जाईल.. ?? मी मान्य करतो तुमच्या ह्या प्रयोग मुले आपण माणुसकीची खूप मदत करू शकू... पण काय तुम्ही हा विचार केला कि प्रेमाशिवाय ह्या जगाचे काय होईल..??? आपण श्रुष्टि च्या नियम विरुद्ध वागतोय?&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;हम्म... अगदी बरोबर म्हणतोस तू... कदाचित मी जेव्हा हा प्रयोग हातात घेतला तेव्हा मी इतका प्रौढ विचार करत नव्हतो... म्हणूनच माझ्या वरिष्ठानी ह्याला सहमती दिली नाही...&quot; ते जरा शांत बसतात आचार्य सरांच्या डोक्यात एक भन्नाट कल्पना येते ... ते पुढे म्हणतात, &quot;.. पण तुम्ही आता दोन्ही ध्येय सद्य करू शकता... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;काय कसे??&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;तुम्ही दोघे एकमेकांवर प्रेम करता... बरोबर??&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;हो...&quot; दोघे ठामपणे सांगतात ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;म्हणजे तुमची संतती तुमच्या प्रेमातून उत्पन्न होईल??&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;अर्थात... पण त्या साठी आधी लग्न करावे लागेल...&quot; विराली व्यंग्यात्मक म्हणाली...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;काळजी करू नका... मी देतो लावून तुमचे लग्न... &quot; त्यांचे बोलणे ऐकून दोघांचा चेहरा खुलला...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;कसे... तयार कसे कराल ह्यांना...&quot; आदी त्यांच्या कानात फुसफुसला...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थोडा विचार करत ते पुढे म्हणले... &quot;आपण एक प्रयोग करू... &quot; त्यांचे ते वाक्य ऐकून सायली आणि पायल दोघी काळजी नि एकमेकींना बघतात...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;हे बघा.. .तुम्ही काळजी करायचे काहीच कारण नाही... आता धोका पत्करायची तयारी ह्या दोघांची हवी...&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;धोका?? कसला धोका...&quot; विराली घाबरून म्हणाली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;धोका नाही खरं तर ... मज्जा मज्जा आहे... &quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;सर... प्लिज नीट सांगा... काहीच कळत नाहीय...&quot; आदी काळजीने म्हणाला.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपल्या डोक्यातली भारी कल्पना सगळयांना ते सांगू लागतात त्यांच्या चेहऱ्यावर वेगळेच तेज असते...&quot;बघा... तुमची संतती प्रेमानी जन्म घेईल... आणि त्या संततीत तुमचे जिन्स येतील ह्याचा अर्थ तुमच्या मधले गुण सर्व त्यांच्या येतील... रोग प्रतिकारक शक्ती.. बुद्धी, शक्ती सर्व काही .. म्हणजे... तुमच्या पासून जे सुरु होईल ती एक अशी दुनिया असेल ज्यांना आजार होणारच नाही आणि त्यांचा जन्म सुद्धा नैसर्गिक रित्या होईल... म्हणजेच त्यांना&amp;nbsp; बेस्ट ऑफ बोथ वर्ल्ड मिळेल... तुम्ही त्या नवीन जगाचे ऍडम अन इव्ह असाल....&quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व ते ऐकून जणू मोहूनच जातात आदी आणि विराली तर आधीपासूनच तयार असतात आणि आता हे सर्व कळल्यावर तर ठामपणे एकमेकांसाठी उभे राहतात.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यांचे आई बाबा हि तयार होतात...थाटामाटात त्यांचे लग्न लावून देतात ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोघांना आपल्या पहिल्या रात्रीचे वेध लागले असतात ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;&lt;i&gt;&quot;ये चंद्राला या जागवू या जरा... ये रातीला या चातुया जरा.. संगतीने खेळू खेळ हा... सर सर मावळतो वेळ हा...&amp;nbsp; घे जवळ तू मला मी तुला पांघरू मधाहुनी मधुर मेल हा... सर सर मावळतो वेळ हा... &quot;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आणि... ती वेळ येते जेव्हा विराली सगळ्यांना ती गोड बातमी ... काही दिवसांनी ती एका गोंडस मुलीला जन्म देते आणि अश्या प्रकारे सुरवात होते एका अश्या विश्वाचे जिथे रोग नाहीत... रोगी नाहीत... 1000&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कदाचित असे हे जग ह्या &lt;b&gt;&lt;i&gt;क्षितिजा पलीकडे&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; कुठेतरी आहे...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज पासून १००० वर्षानंतर आपल्या सगळीकडे सगळे असेच जिन्स बदललेली माणसे असतील...&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/6447979747748930950/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/6447979747748930950'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/6447979747748930950'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/07/blog-post.html' title='क्षितिजा पलीकडचे'/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-210992636548155898.post-7415454586215523195</id><published>2019-07-12T02:47:00.001-07:00</published><updated>2019-07-12T02:47:31.016-07:00</updated><title type='text'>ताऱ्यांच्या बेटावर </title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
ताऱ्यांच्या बेटावर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj2GcVT_G6OfH-h-PeHxOuLhNPG5opEGW2LRz3g-3AP_YsaPg3RFIY6OMUQ4dthgXzb6eJXcm7U1UI7y2vsVY3lU5oCtVWdlfkoLKIe7lij_vnsn-gS27BPKNx45nYWmSIeQdKl_t72_4hg/s1600/BeyondHorizon.JPG&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;681&quot; data-original-width=&quot;986&quot; height=&quot;221&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj2GcVT_G6OfH-h-PeHxOuLhNPG5opEGW2LRz3g-3AP_YsaPg3RFIY6OMUQ4dthgXzb6eJXcm7U1UI7y2vsVY3lU5oCtVWdlfkoLKIe7lij_vnsn-gS27BPKNx45nYWmSIeQdKl_t72_4hg/s320/BeyondHorizon.JPG&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;सर ओमिक्रोन वर जाणारे आपले यान तयार आहे. विश्वनाथ सर ठरल्या वेळी निघू शकतात.&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हम्म, ठीक आहे... विश्वा शी मला काही बोलायचे आहे त्याला पाठव... &quot; असे आदेश देत विवेक परत आपल्या कामात व्यस्त झाले.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काही वेळाने विश्वनाथ तिथे पोचतो,&lt;br /&gt;
&quot;आपण मला बोलावले सर?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;विश्वा ये, मला काही बोलायचे होते महत्वाचे...&quot; त्यांनी खुर्ची समोर करत त्याला बसायला सांगितले, विश्वा बसतो आणि त्यांच्या कडे आता निघायच्या या वेळी त्यांना काय बोलायचे आहे अश्या प्रश्नार्थी नजरेने त्यांच्या कडे बघू लागतो. ते खूप विचार करून पुढे बोलतात, &quot;विश्वा मी कधीच तुला आपल्याहून परके नाही समजलो उलट तुला माझ्या मुलाप्रमाणे प्रेम केले, तुझ्या हट्टापायी मी ह्या कामगिरीवर तुला पाठवायला तयार झालो, तुला हि माहित आहे आणि मला हि बहुतेक हे एकमार्गी तिकीट असणार आहे. ओमिक्रोन वर जीवन जगण्यासाठी उपयुक्त गोष्टी आहेत कि नाही, तिथे काय आहे आपण नीट काहीच प्रमाणित करू शकलो नाही आहोत. खरं म्हणजे असे तुलाच काय कोणाला हि तिथे पाठवणे खूप धोक्याचे आहे, तुझ्या सोबत आम्ही प्राणवायू चे जास्तीचे सिलेंडर पाठवत आहोत ज्याने तुला तिथे १ आठवडा तरी घालवता येईल. पृथ्वी पासून ११ प्रकाश वर्ष लांब आहे हा तारा. तुला बाकी सर्व काही माहित आहे, तू जाण्या अगोदर चांगला अभ्यास केला अशील.. मी अशा करतो... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;नाही सर... मला माफ करा... मी ह्या अभियानास जायला तयार झालो त्या मागचे कारण वेगळे आहे.. आई बाबा जाऊन २ वर्ष झालेत पण अजून हि त्यांच्या शिवाय रात्री झोप लागत नाही. बाकी कोणाकडे बघून जगावे असे कोणी नाही, जसे तुम्ही म्हणालात होऊ शकते हे माझ्यासाठी एकमार्गी तिकीट आहे आणि मी तिथून परत नाही येऊ शकणार... पण त्याने मला काहीच फरक नाही पडणार सर, दुसरे कोणी आपल्या परिवाराला सोडून जाईल, त्यांच्या डोक्यावर टांगती तलवार ठेवून.. माझे इथे वाट पाहणारे कोणी नाही... त्यामुळे तुम्ही काही काळजी करू नका... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;काळजी करू नको??? अरे तू माझ्या मुलासारखा आहेस.... &quot; विवेक हळवे होत म्हणले.&lt;br /&gt;
&quot;माफ करा सर... मुलासारखा आहे ना... नका जास्ती काही अपेक्षा ठेवू....&quot; विशवनाथ ठाम होता आपल्या बोलण्यात.&lt;br /&gt;
विवेक जरा नाराज झाले त्याच्या त्या बोलण्याने... मग काही वीचार कात म्हणाला, &quot;ठीक आहे मी या अभियानाचा प्रमुख म्हणून तुला सांगतोय... हे मिशन यशस्वी व्हायला&amp;nbsp; हवे... अजून नासा ला सुद्धा माहित नाही आहे कि आपण तुला आत्ता नवीन शोधलेल्या ताऱ्यावर म्हणजे ओमिक्रोन वर पाठवतोय.. आत्ता पर्यंतच्या अंतरिक्ष अभियानातले हे खूप म्हणत्वाचे अभियान आहे पहिल्यांदा कोणी एका ताऱ्यावर जाणार आहे... &quot;&lt;br /&gt;
विश्वा आपली मान होकारार्थी हलवतो आणि म्हणतो, &quot;मला अभिमान आहे सर या गोष्टीचा, मी तुम्हाला निराश नाही करणार... मी परत येईल ते खुशखबर घेऊन...!! &quot;&lt;br /&gt;
&quot;आपल्या नावा प्रमाणेच... या विश्वालाच काय तर या ओमिक्रोन वर विजय मिळवून काम फत्ते करून ये...&quot;&lt;br /&gt;
विवेक त्याला निघण्या अगोदरचे शेवटचे गळे भेटतो. दोघांचे हि डोळे न कळत पाणावतात. विश्वा त्यांना सलामी देऊन तिथून निघून जातो, तो आपल्या यान कडे वळतो त्याचा पूर्ण तपशील करून घेतो... सर्व काही व्यवस्थित आहे कि नाही ह्याची स्वतः खात्री करून घेतो...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थोड्याच वेळात ती वेळ आली असते जेव्हा यानाला भरारी घ्यायची असते, विश्वनाथ आपले स्पेससूट घालून तयार असतो.त्याने आपली जागा घेतली असते... सर्व पहिली ताऱ्यावर घेणाऱ्या यानाची भरारी बघायला स्पेससेंटर वर तयार असतात आणि गिनती सुरु होते... १०...९...८....&amp;nbsp; &amp;nbsp;३...२...१..०.... एका झटक्या सोबत ते यान विश्वा ला घेऊन निघते... सर्वांच्या काळजात तीर सोडून.... विश्वा यानात बेफिकीर बसला असतो, पहिली वेळ होती त्याची अंतरिक्षात जायची आणि ते हि एकटा, डेरिंग लागते पण विश्वा काही कमी नव्हता, आजू बाजू ला काय दिसते म्हणून डोकावून बघू लागला तर अंधारच अंधार, पृथ्वीच्या वातावरणाच्या बाहेर पडलोय हे त्याच्या लक्षात आले, आता हे अंधार काय बघत राहायचे म्हणून त्याने झोप काढून घ्यावी असे ठरवले...म्हणून तो डोळे बंद करतो... आपले सारे आयुष्य त्याच्या डोळ्या पुढून सर्रर्र निघून गेले... २ वर्ष पूर्वी आई बाबा एका कार ऍक्सीडेन्ट मध्ये वारले, विश्वा तेव्हा ट्रेनिंग ला हैदराबाद ला होता, त्याला ट्रेनिंग सोडून त्यांचे अंतिम दर्शन हि घेता आले नव्हते. तेव्हा पासून रोज स्वप्नात आई बाबांना बघायचा, तो जणू या कामगिरीवर त्यांनाच शोधायला निघाला होता, ओमिक्रोन कसे असेल काय असेल, जगू शकू कि नाही, वापस जात येईल कि नाही ह्या सर्व प्रश्नाचे त्याला जणू काही फिकीरच नव्हती. एक थ्रिल अनुभवायला म्हणून तो तयार झालेला, त्याचे वय हि जास्ती नव्हते २५ वर्ष होते त्यामुळे अल्लडपणा काही अजून पूर्ण गेला नव्हता. काही करून दाखवण्याची इच्छा मात्र होती.&lt;br /&gt;
&quot;विश्वा... स्टेटस काय आहे... कॉपी विश्वा.. तू ऐकू शकतोस का आम्हाला... स्टेटस काय आहे...&quot; सेंटर वरून आलेल्या आवाजाने त्याची तंद्री तुटते... &quot;Y389 कॉपी सर... सर्व काही ठीक चालले आहे... यान निर्धारित गतीने व्यवस्थित चालले आहे...&quot;&lt;br /&gt;
विश्वा जरा पाय मोकळे करावे म्हणून आपल्या जागे वरून उठतो, गुरुत्वाकर्षण नसल्या मुळे तो यानात उडूच लागतो...&lt;br /&gt;
अश्या बऱ्याच काही क्षणानंतर त्याचे यान ओमिक्रोन वर येऊन पोचते. विश्वा ची छाती गर्वाने भरून जाते, जसा तो यानातून बाहेर पडू लागतो&amp;nbsp; त्याच्या कानात लोकांचे ओरडणे गुंजू लागते... &quot;विश्वा विश्वा... !!! विश्वा...!!!&quot; एका ताऱ्यावर जाणारा तो पहिला मानव होणार होता. मेल्यावर लोक तारा होतात असे त्याने ऐकले होते... आज तो एका तार्याची सैर करणार होता. तो क्षण आपल्या आठवणीत रुजू करत त्याने पहिले पाऊल ठेवले, त्याला आश्चर्य वाटले, पृथ्वी सारखेच आपले वजन जाणवू लागले, &quot;चला फेरफटका तर मारता येईल&quot; असा विचार करत त्याने दुसरे पाऊल ठेवले... पहिली नजर चौफेर ठेवतो आणि त्याला एक मिनिटाला शंका येऊन जाते... नक्की आपण ओमिक्रोन वर आलोय कि वापस पृथ्वीवर आलोय? सगळी कडे पहाड, अवकाश , हिरवळ असते, पण माती मात्र वेगळी असते काळी चमकणारी... आजू बाजू चे मातीचे खडकाचे नमुने तो गोळा करतो. पृथ्वीवर नेवून त्याला संशोधन करण्यात मदत होईल असा विचार असतो, तोंडावर मास्क आणि पाठीवर प्राणवायू चे सिलेंडर असल्या मुळे जरा कठीण जाते वाकणे. फेर फटका मारत मारत तो आपल्या यानापासून बराच लांब निघून येतो... त्याला तिथे एक तळे सारखी लँडस्केप दिसते, कोणते द्रव्य आहे ते तपासायला तो तिथले द्रव्य आणलेल्या बॉटल मध्ये भरत असतो, तो वाकून बॉटल भारत असतो तितक्यात त्याला त्या द्रव्यात काही हलताना दिसल्याचा भास होतो, तो सावध होतो, इथे काही हि असू शकते ह्याची जाणीव त्याला होते, जलपरी दिसल्या सारखे वाटते, उत्सुक होऊन तो मागे मागे जाऊ लागतो, थोड्या वेळाने तिचे हि लक्ष त्याच्या कडे जाते... ती त्या द्रव्यातच एक उंच उडी मारून त्याला दर्शन देते... तिला बघून जणू विश्वा चा श्वासच थांबतो... लांबसडक सोनेरी केस, सोनेरी अंग त्या क्षणात त्याला तिला आपल्या ताब्यात घेण्याचा मोह होतो, तो तिच्या मागे पळत जातो, बरेच प्रयत्न करून तो तिला पकडून बाहेर काढतो... तिला तिथे बांधून ठेवून तो मनात विचार करतो इथे अजून हि अश्या जलपर्या असतील... तो अजून शोधू लागतो... ह्या धावपळीत त्याला वेळेचे भान राहत नाही, त्याच्या सिलेंडर मधील प्राणवायू संपत होता, त्याच्या हाताला बांधलेले प्राणवायू सिलेंडर चे घड्याळ वाजू लागते ते बघून त्याच्या लक्षात येते कि सिलेंडर लवकरच संपणार आहे आणि त्याला ते बदलावे लागेल, आपल्या यानापासून तो बराच लांब आला असतो त्या मुळे तो पटकन&amp;nbsp; परत निघू लागतो... तो अर्ध्या रस्त्यात पोचला असतो तेव्हा त्याचे सिलेंडर संपते, प्राणवायू चा सोत्र संपल्यामुळे त्याला त्रास होऊ लागतो हळू हळू चालणे कठीण होऊ लागते, त्याचे शरीर त्याची साथ सोडू लागते, तिथेच पडतो, न राहून शेवटी तो आपले तोंडावरचे मास्क काढतो आणि मोठ मोठ्याने खोकलू लागतो, त्याच्या आश्चर्याने तो अजून हि जिवंत असतो... त्याच्या आनंदाचा पारा राहत नाही... तो लगेच ते सर्व जड सिलेंडर, मास्क, बूट, कपडे सर्व काढून टाकतो... हवेत मोकळा श्वास घेतो... &quot;व्वा, म्हणजे इथल्या वातावरणात सुद्धा प्राणवायू असला पाहिजे... &quot; तो स्वतःशी पुटपुटतो, म्हणजे इथे मनुष्य जगू शकतो... हम्म पण खाण्या पिण्याचे काय... त्याला ती जलपरी आठवते... मासे हि असतील.. जलपरी आहे म्हणजे...??? स्वतःशी विचार करत तो परत त्या तळ्यापाशी जायला निघतो. तिथे पोचल्यावर तो त्या ठिकाणी बघायला जातो जिथे त्याने जलपरी ला बांधून ठेवले होते तिथे जाऊन बघतो तर जलपरी नसते... त्याला आश्चर्याचा धक्का बसतो.. तिथे एक तरुणी असते... आपल्या डोळ्यावर त्याचा विश्वासच बसत नाही, तो डोळे मोठे करून तिला बघत असतो, तेच सोनेरी केस आणि तेच टपोरे मत्स्य सारखे डोळे, तिचे तो चमकणारे अंग, ती त्याला काही म्हणू लागते... खुणावत असते पण त्याला काही तिची भाषा कळत नाही. तो मग तिला आपल्या जवळचा एक अनुवाद करणारे यंत्र कानात लावून देतो आणि तसेच यंत्र स्वतः हि लावतो... काही वेळ ते दोन्ही यंत्र स्वतःला प्रोग्रॅम करतात आणि मग त्याच्या हातावरच्या घड्याळीवर एक लाईट जाळतो ज्याने त्याला कळते कि यंत्राचे एकमेकांशी प्रोग्रॅम यशस्वी झाले... आता तो जे काही बोलेल ते तिच्या कानाला लावलेले यंत्र तिच्या भाषेत अनुवाद करून तिला ऐकवेल... आणि ती जे बोलेल ते विश्वाच्या कानातले यंत्र त्याच्या भाषेत अनुवाद करून देईल... विश्वा तिला विचारतो, &quot;तुझे नाव काय?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;तुहिरा!!&quot; ती कळवळत सांगते&lt;br /&gt;
&quot;तू इथे कशी आलीस...?? तू इथेच राहतेस का?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;आधी मला सोडव मग मी सर्व प्रश्नाचे उत्तर देईल...&quot; तिचे ते बोलणे ऐकून विश्वा स्वतःला सावध करतो, जी जलपरीतून स्वतःला मुलीत रूपांतर करू शकली ती अजून खूप काही करू शकेल मला स्वतःलाच सावध राहावे लागेल. स्वतःशी असा विचार करून तो तिला म्हणतो, &quot;तू माझ्या कैदीत आहेस त्यांमुळे मी सांगेल तसे होईल... आधी तू इथे काय करतेस ते सांग... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;मी... मी त्या तळ्यात अडकले होते... मी इथे खूप लांबून आले आहे, मी वेगळ्या ग्रहावर राहते... माझ्या ग्रहाचे नाव ह्यूगो आहे... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;ह्युगो.. .??? कुठे येते हे... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;हे बघ... मी तुला काहीच हानी नाही पोहचवणार ... मला खूप यातना होत आहे, तू मला सोडल असते तर मी तुला इथल्या अजून काही गोष्टी दाखवीन ज्या तू कल्पना हि नाही करू शकत... &quot;&lt;br /&gt;
विश्वा ला वाटते हिने आपल्या आधी इथे बरंच काही बघून ठेवले आहे हिची आपल्याला मदत होईल, त्यामुळे तो तिला सोडतो... &quot;तू त्या द्रव्यात जलपरी कशी झालेलीस?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;मी नाही झाली... ते जादुई द्रव्य आहे... इथे तुला ज्या वेळी ज्या गोष्टी ची गरज असते ते तुला आपोआप मिळते... तसे मला त्या द्रव्यात पोहता येत नव्हते म्हणून मी मासा झालेले, म्हणजे मी ते द्रव्य तपासले आहे ते H2o आहे... आपण तो प्यायला वापरू शकतो, खूप सौम्य आहे...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;H2O... काय?? ते पाणी आहे...&quot; विश्वा आनंदाने उद्गारला... &quot;म्हणजे खरेच इथे मानवी जीवन ...&quot;&lt;br /&gt;
त्याचे वाक्य पूर्ण होण्या आधीच ती त्याला म्हणते... &quot;चल मी तुला इथली सर्व श्रुष्टि दाखवते...&quot;&lt;br /&gt;
ते दोघे निघतात... विश्वा ला आपण पृथ्वीवरच फिरत आहोत असा भास होत असतो, मोठे मोठे डोंगर.. सर्वत्र हिरवळ, नजर जाईल तिथवर मोकळे आकाश आणि जमिनीला हिरवा शालू नेसवलेला ...&amp;nbsp; समोर एक मोठे पहाड असते.. &quot;तिकडे.. त्या पहाडावर काय आहे? गेलीस का कधी इतक्या लांब?&quot; विश्वा तुहिरा ला उत्सुकतेने विचारतो..&lt;br /&gt;
&quot;जायचे तुला?&quot; ती भुवया उंचावत विचारते... विश्वा मान हलवत हो म्हणतो...&lt;br /&gt;
तुहिरा आपले हाथ पसरवते आणि त्याला म्हणते &quot;धावत ये तिथून आणि उडी मर ...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;काय? इतक्या उंचावरून उडी मारू... ?? वेड लागलंय कि काय?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;बघ तुला काय ठीक वाटते... &quot; असे म्हणतात ती आपले हाथ पसरवते आणि धावत पहाडाच्या चोटीवरून उडी मारते... विश्वा धावत जाऊन तिला थांबवण्याचा प्रयत्न करतो पण उशीर झाला असतो तिने उडी मारली असते... ती परत वर गिरक्या घेत झेप घेते ... विश्वा चा आपल्या डोळ्यांवर विश्वासच बसत नाही... तुहिरा एका पक्षी सारखी उडत असते... तिला पंख आले असतात... तो ओरडून तिला विचारतो... &quot;तू पंख कुठून आणलेस...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;माझ्यावर विश्वास ठेव... उडी मार....&quot; तुहिरा आनंदाने सांगते&lt;br /&gt;
विश्वा धावत येऊन हाथ पसरवून उडी मारतो... तसे त्याचे हाथ पंखात बदलतात... &quot;उह्ह हू ..... व्वा व....&quot; तो जोऱ्यात किंचाळतो... &quot;तुहिरा मला खूप मज्जा वाटतीय!!!&quot;&lt;br /&gt;
ते दोघे उडत उडत त्या समोरच्या पहाडावर पोचतात... &quot;म्हणजे... इथे काय आहे??&quot; आपण आत्ताच अनुभवलेल्या जादूचे संशोधन करू इच्छित विश्वा म्हणाला म्हणजे जसे मी कल्पवृक्ष बद्दल ऐकले होते, तसे इथे आपल्या मनातल्या सर्व इच्छा पूर्ण होतात...&lt;br /&gt;
तुहिरा त्याला म्हणाली, &quot;सर्व इच्छा... पण साफ मानाने मागितलेल्या ...&quot;&lt;br /&gt;
मग काही संकोच करत विश्वा म्हणाला, &quot;मग तू त्या तळ्यात का अडकून होतीस? बाहेर येण्याची इच्छा नव्हती झाली तुला??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;झाली होती ना... म्हणून तर तू आलास इथे ....&quot; तुहिरा चे बोलणे ऐकून विश्वाचे डोळे चमकतात... तिच्या बोलण्यात तथ्य हि असेल... तो स्वतःशी विचार करू लागला..&lt;br /&gt;
पाण्याचा एक मोठा झरा हि असतो तिथे...त्याचा खळखळ पाणी पडतानाचा आवाज ऐकून तो दोघे त्या दिशेनी जातात, समोर बघतात तर मोठा पांढरा शुभ्र पाण्याचा झरा होता आणि झऱ्याच्या खाली मोठे तलाव.... विश्वा त्यात जाऊन मनसोक्त डुबकी मारतो, त्याच्या पाठोपाठ तुहिरा हि पाण्यांत उडी मारते मत्स्य सारखे जलतरंग क्रीडा करून येतात... दोघे पकडा पकडी खेळतात...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&quot;मत्स्य सारखे पोहून झाले, पक्ष्यासारखे उडून झाले... मला ना ह्या वाऱ्या सोबत धावायची इच्छा आहे... घोड्या सारखी? पूर्ण होईल?&quot; विश्वा तिच्या कडे बघत म्हणाला...&lt;br /&gt;
&quot;धावून बघ... &quot; ती खांदे वर करत होऊ हि शकते असे भाव देत त्याला म्हणाली.&lt;br /&gt;
&quot;पण हे सर्व कसे शक्य आहे.. इथे काय रहस्य आहे... कोणती शक्ती आहे..&quot;&lt;br /&gt;
&quot;वैज्ञानिक साहेब... कधी कधी मनसोक्त काही अनुभव हि घ्याचे असतात ....&quot; तुहिरा त्याला निहारात म्हणते...&lt;br /&gt;
विश्वा हळू हळू धावायला सुरु करतो आणि जसा जसा तो वेग घेऊ लागतो त्याला कळते कि त्याचे पाय घोड्या सारखे वाऱ्याच्या वेगाने धाव घेतायेत... तो परत जुन्या तळ्या&amp;nbsp; पाशी येतो... तिथली माती हातात घेतो त्यात काही तुकडे चमकत असतात.. तितक्यात तुहिरा तिथे उडत येते, त्याला माती निरखून बघताना पाहून विचारते &quot;काय झाले...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हे चमकणारे कोणते पदार्थ आहे?&quot; विश्वा चे संशोधक मेंदू सारखे त्याला प्रश्न विचारात असते&lt;br /&gt;
&quot;तें कार्बन आहे...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;कार्बन... म्हणजे हे हिरा आहे ??? &quot; विश्वा आपल्या हातातली माती झटकत त्या हिर्या कडे बघत म्हणाला... इथल्या मातीत हिरे आहेत ... मी इथून ५-६ जरी घरी परत घेऊन गेलो तर पृथ्वी वरचा सर्वात श्रीमंत व्यक्ती होईल...&lt;br /&gt;
तुहिरा त्याच्या मनातले विचार ओळखते...&quot;तुला अजून हि परत जायचे आहे?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;अर्थात.. मी इथे फक्त ७ दिवसांसाठी आलो आहे... माझी लोक माझी वाट पाहत आहेत... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;तुझी लोक? खरंच? कोणी वाट पाहत आहे तुझी?? ७ दिवस? ७ दिवस कधी ची होऊन गेलीत तुझ्या पृथ्वीवरची....&quot;&lt;br /&gt;
&quot;काय?? कसे काय...तें शक्य नाही...&amp;nbsp; रात्र तर झालीच नाही...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;तू ओमिक्रोन वर आहेस... हा तारा आहे... ह्याला स्वतःचा प्रकाश आहे... इथे रात्र कशी होईल... &quot; तुहिरा त्याला स्पष्टीकरण देत म्हणाली...&lt;br /&gt;
विश्वा ला धक्का बसतो... आपण इतके म्हणत्वाचे कसे काय विसरलो कसे झाले..हे ... &quot;पण मला माझ्या टीम ला सांगावे लागेल... इथले हे जादुई जग त्यांना दाखवावे लागेल... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;खरंच? म्हणजे या सुंदर विश्वाची सुद्धा तुला पृथ्वी सारखी दयनीय अवस्था बघायची आहे.. ?&quot;&lt;br /&gt;
विश्वा तुहिरा कडे अविश्वासाने बघतो... आणि विचार करतो, &quot;हिला कसे हे सर्व माहित... पृथ्वी वर तर हि कधी आली नाही.. मग दयनीय अवस्था आहे पृथ्वीची का म्हणतीय??&quot; तो मनात विचार करतो...&lt;br /&gt;
&quot;ह्युगो वर आम्ही मनातले ओळखू शकतो...&quot; तुहिरा त्याचे चलबिचल मनस्थिती पाहून आपल्या रहस्याचा खुलासा करते...&lt;br /&gt;
&quot;काय?&quot; विश्वा चा परत विश्वास बसेना.....&lt;br /&gt;
&quot;तुझे डोळे पापण्या तुझ्या मनात चाललेल्या भावनां प्रमाणे हालचाल करतात मला त्या वाचता येतात... त्या मुळे तू काही बोलला नाहीस तरी मी तुझ्या मनातले ओळखू शकते... तू जेव्हा त्या हिरव्या पहाडात इथल्या हिरवळीत व्यस्त स्वच्छंद वावरत होतास... तेव्हा तुझ्या मनात चाललेले विचार हि मला कळलेले, तुला हि असेच वाटते ना कि पृथ्वी वर जेव्हा जीवनाची सुरवात झाली असेल पृथ्वी पण इतकीच सुंदर असणार....&quot;&lt;br /&gt;
विचार करत तो हे काबुल करतो कि हो त्याच्या मनात हे सर्व विचार येऊन गेले...&quot;पण हे मस्त आहे मनातले ओळखणे खरंच... व्वा मला शिकवशील...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;नक्की... पण एका अटीवर... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;अट?? कसली?&quot; शंकेने विश्वा म्हणतो..&lt;br /&gt;
&quot;तू ह्या जागा बद्दल अजून कोणालाच काही नाही सांगायचे....&quot; तुहिरा आपली अट सांगते&lt;br /&gt;
&quot;मी भले नाही सांगणार पण तुझ्या ग्रहावरचे इथे आले म्हणजे...?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;माझ्या ग्रहावरचे लोक हे समजून शांत आहेत कि मी इथे मेली, मी ह्या पाण्यांत अडकली असल्याने त्यांना इथले काही सांगू नाही शकले...&quot;&lt;br /&gt;
विश्वा स्वतःशीच हसला... आपण एका अश्या जागी आलो आहोत जिथे आपल्याला पाहिजे ते सर्व काही आहे.. तो विचारात मग्न असतो तेव्हा तुहिरा म्हणते... &quot;हो... नक्की...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;काय??&quot; विश्वा गोंधळून विचारतो... कारण तो काही बोललाच नसतो...&lt;br /&gt;
&quot;आपण ह्या जगाचे सौंदर्य असेच जपून ठेवुयात... इथे कोणते संशोधन नाही काही नाही होणार... &quot; विश्वा तिच्या कडे बघत राहतो... आणि त्याच्या लक्षात येते हिला मनातले विचार कळतात ... ते लक्षात येताच तो विचार करतो &quot;मला आता मनात विचार करताना सावध रहावे लागेल... &quot;&lt;br /&gt;
तुहिरा तें कळून हस्ते.. विश्वा परत गोंधळतो... &quot;अगं, एक सांग.. तू तें यंत्र का घेतलेस माझ्याकडून.. तुला न बोलताच कळते सर्व... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;मला कळते पण तुला थोडीच कळते... तुला तर त्याची गरज लागली असती ना... &quot;&lt;br /&gt;
&quot;हम्म.. &quot; विश्वा विचार करत म्हणाला... &quot;पण हे डेंजर आहे.. म्हणजे मी मनात कोणता विचार नाही करू शकत...??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;हम्म... करू शकतोस पण मी नाही सांगणार कसे ... मला तुझ्या मनातले सर्व काही कळायला हवे...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;उम्म...&quot; विश्वा नाराज झाला...&lt;br /&gt;
&quot;अरे मी तुला विचार ओळखता येतात सांगितले तेव्हाच उपाय हि सांगितलं... मी डोळे वाचून मनातले ओळखते... तू डोळे बंद करून काही विचार केलास तर मग कसे ओळखता येईल मला?&quot;&lt;br /&gt;
&quot;अरे हो...&quot; विश्वा आनंदला... &quot;लोक एकांत शोधतात पण आपण तर एकांतातच आहोत... आपण बोर होऊन जाऊ...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;आपण आपले छोटेसे विश्व् इथेच निर्माण केले तर?&quot; तुहिरा आपला विचार मांडत म्हणाली जे विश्वा ला हि पटते. तो तिच्या विचारांशी आपली सहमती दर्शवतो...&lt;br /&gt;
विश्वा चे यान हे त्यांचे घर बनते, तिथल्या वनस्पती खाऊन ते आपला उदर निर्वाह करू लागतात ....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिकडे पृथ्वीवर&lt;br /&gt;
विश्वा चा बरेच दिवस काही संपर्क होत नसल्याने पृथ्वी वर ओमिक्रोन ला निषेध क्षेत्र घोषित केले जाते. विश्वा इतिहासात शामिल झाला असतो...त्याच्या बहादुरी चे किस्से सर्व एका दुसर्या सांगतात कसा तो एकटा त्या ताऱ्यावर संशोधन करायला गेला... नासा सुद्धा ओमिक्रोन ला जीवन जगण्या योग्यतेच्या शक्यतेच्या यादीतून काढून टाकते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओमिकॉर्न वर ...&lt;br /&gt;
&quot;तुहिरा मी तुला या आकाश गंगेच्या सर्व ताऱ्यांच्या साक्षी ने जन्मो जन्मासाठी स्वीकारतो... &quot; ते वाक्य ऐकून तुहिरा त्याच्या कुशीत शिरते... दोघे असे विश्व् निर्माण करायचा निर्णय घेतात ज्याने पुढची १०००० वर्षे त्या बेटावरचे निसर्ग सौंदर्य टिकून राहीन. आपल्या येणाऱ्या पिढीला निसर्गाची जाणीव राहावी म्हणून ते पृथ्वीवरच्या संशोधनाच्या&amp;nbsp; कहाण्या बनवतात, त्यांनी मानव जाती ला झालेल्या कष्ट आणि कसे मानवाने स्वतःच स्वतःचा काळ निवल्डला हे दर्शवतो... त्या कहाण्या तिथे प्रचलित करतात ज्याने पुढची पिढी आपल्या जवळ असलेल्या निसर्गाच्या संपत्ती चा मान ठेवेल...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्वा जेव्हा या मिशनवर आला होता त्याला त्याच्या साठी इतके सुंदर विश्व् वाट पाहतंय हे माहीतच नव्हते...&lt;br /&gt;
विश्वा आणि तुहिरा त्या ताऱ्याच्या बेटाला आपल्या प्रेमाने प्रेमाचे बेट बनवतात ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाप्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
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रात्रीचा अंधार पसरलेला त्यात पावसाने भर घातलेली, धो धो पाऊस पडत होता आणि थांबायचं नाव घेत नव्हता. साऱ्या रेटली वीज गेलेली, कुठे तरी शॉर्ट सर्किट झालेले संता आणि बंता आपली रात्रपाळी देत होते, अचानक संता ला काही जाणवले आणि तो एका दिशेने धावत गेला त्याच्या मागे मागे बंता हि गेला..&lt;br /&gt;
&quot;काय झाले?&quot; बंता ने त्याला विचारले... काही न बोलता तो असा धावत का निघाला हे बंता ला कळले नाही.&lt;br /&gt;
&quot;मी तिथे काही तरी हलताना पहिले... &quot; संता त्या दिशेने बोट दाखवत म्हणाला...&lt;br /&gt;
&quot;अरे भास झाला असेल तुला... इतक्या रात्री अंधारात कोण जाणार आहे त्या नाल्याकडे...&quot;&lt;br /&gt;
&quot;थांब बघून येतो ... &quot; संता पुढे होत म्हणाला...&lt;br /&gt;
&quot;अरे कुत्रा वगैरे असेल काही... नको जाऊस मला भिति वाटते ... तू इथेच थांब&quot; बंता आजू बाजू ला बघत घाबरून म्हणाला.. सगळीकडे अंधार आणि शुकशुकाट पसरलेला फक्त पावसाचा आणि वाऱ्याचा आवाज येत होता..&lt;br /&gt;
&quot;अरे आता इतक्या जोऱ्यात वीज कडकली... मला त्या विजेच्या उजेडातच इथे काही तरी हलताना दिसले... खूप मोठे होते, त्या विजे बरोबर आकाशातून तर नाही पडले? कोणाला काही झाले असेल तर.. मदत हवी असेल टॉर्च बघू..&quot; संता चिडून म्हणाला..&lt;br /&gt;
बंता त्याच्या हातात टॉर्च न देता त्याला म्हणाला, &quot;संभाळून... अंधार आहे ना..&quot; टॉर्च चा लाईट दाखवत तिथे काही न दिसल्याने तो म्हणाला&amp;nbsp; &quot;बघ काही नाही आहे तिथे..&quot; आपल्या हातातली काठी बंता ने संता ला दिली, संता ने तिथे पडलेल्या त्या हिरव्या वस्तूला&amp;nbsp; डिवचण्याचा प्रयन्त केला... काही हालचाल नाही झाली...&lt;br /&gt;
&quot;बघ मी म्हणालो ना काही नाही आहे तिथे... &quot; बंता वळत म्हणाला.. &quot;चल आता&quot;&lt;br /&gt;
&quot;पण काठीला हा पदार्थ चिटकला आहे... &quot; संता काठीवरून काढण्याचा प्रयत्न करत म्हणाला. संता जितकी वर काठी करून बघायचा प्रयन्त करी तो पदार्थ तितका लांब होई आणि परत काठी जमिनी ला टेकवली कि परत एक छोटासा बॉल बनून जाई.&lt;br /&gt;
&quot;अरे चल... काही नाही आहे... मुलांनी चुईंग गम खाऊन टाकले असेल... &quot; वळून बंता संता कडे बघतो&amp;nbsp; तर संता गायब... टॉर्च इकडे तिकडे करून बघू लागला तर त्याचे डोळेच पांढरे पडले, समोर एक मोठे&amp;nbsp; हिरवे सरपटणारे प्राणी उभे होते, हो सरपटणारा प्राणी उभे होते... त्याच्या शेपटी वर, त्याला ३ तोंड होती आणि प्रत्येक तोंडाला ४ डोळे! आणि त्याच्या बाजूला संता च्या हातातली ती काठी... त्याच्या तोंडून लाळ टपकत होती आणि काही कळण्याच्या आत त्याने बंता वर ताव मारली आणि तो त्याचे भक्ष बनला होता.&lt;br /&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiPOJKyreSxY1Ms2srmEvt9Zvy5BwxpoiSBmXyu_RViIkZ_aR3TWhuxGd3rO4ERii45U7NCTsXSSf81JDeZPfYPmtneZ4sCgXZhCzqLEwV1QUG5PzBtwitsPExdetgnb-ED_Yd1TiTrX9y8/s1600/shh.JPG&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;419&quot; data-original-width=&quot;898&quot; height=&quot;149&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiPOJKyreSxY1Ms2srmEvt9Zvy5BwxpoiSBmXyu_RViIkZ_aR3TWhuxGd3rO4ERii45U7NCTsXSSf81JDeZPfYPmtneZ4sCgXZhCzqLEwV1QUG5PzBtwitsPExdetgnb-ED_Yd1TiTrX9y8/s320/shh.JPG&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
परत सर्व वातावरण शांत... तोच शुकशुकाट... येणाऱ्या जाणाऱ्याला फक्त पावसाचा आणि वाऱ्याचा आवाज ऐकू येत होता...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिथून काही वेळाने दुसरी २ मुले जात असतात&amp;nbsp; ...&lt;br /&gt;
&quot;ए तिकडे काही तरी हल्ले...&amp;nbsp; &quot; बबली घाबरून बंटी चा हाथ धरत म्हणाली...&lt;br /&gt;
&quot;कुठे??&quot;&lt;br /&gt;
&quot;तिकडे...&quot; बबली बोट दाखवत म्हणाली... ते दोघे तिकडे जातात&lt;br /&gt;
&quot;ए हे काय आहे...किती गुळगुळीत बॉल आहे... घेऊन जायचा?!!!&quot; बंटी बबली ला तो हिरवा पदार्थ हातात घेऊन दाखवत म्हणाला..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
... म्हणून मुलांनो जी वस्तू आपली नाही त्याला हाथ लावू नाही...&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://menishigandha.blogspot.com/feeds/7679906493116060228/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/07/blog-post_38.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/7679906493116060228'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/210992636548155898/posts/default/7679906493116060228'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://menishigandha.blogspot.com/2019/07/blog-post_38.html' title='शुश..!! कोणी आहे... '/><author><name>N!$hi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08658227487055118623</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg2iLFWgci85grgvuBOc9k6am4fTA2F3QOJ-JDc6G8ljZ7-XoQwRxRr7bK6qj5GnWrUZTMpNB3IXFp_tF73qco9zjmyRCSsU3cc0FwrlPmdo32dSCCNbs1pgxyqWPbY6A/s220/nishi.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiPOJKyreSxY1Ms2srmEvt9Zvy5BwxpoiSBmXyu_RViIkZ_aR3TWhuxGd3rO4ERii45U7NCTsXSSf81JDeZPfYPmtneZ4sCgXZhCzqLEwV1QUG5PzBtwitsPExdetgnb-ED_Yd1TiTrX9y8/s72-c/shh.JPG" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry></feed>