<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-9062801385297364864</id><updated>2026-09-07T21:13:05.611+05:30</updated><category term="भोपाल"/><category term="पंकज शुक्‍ला"/><category term="साहित्‍य ब्‍लॉग"/><category term="pankaj shukla"/><category term="मप्र"/><category term="जल"/><category term="freedom fighters"/><category term="freedom fighters of india"/><category term="कविता"/><category term="पानी"/><category term="ak hangal"/><category term="bhikaji cama"/><category term="classical music"/><category term="elephant"/><category term="fanishwar nath renu"/><category term="gorakh 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center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj29oQlP9rESYiGvoYeYjnPyWwvNxJlgWQmLVHHw2aFcD19YuyJ0HUR-lWKrSqOBQuqVZeHCrwGwLFR9T4NI75yOYW5Pj6SyGOFsnE-XC9b5e7T1d5S39AyW6kO3G4egBwXmSyzNCsStwiG7pPpDVIDpMwc0FYiQVuaR70-jx6m0FU1foztTpx6xB1u3_A/s749/shailendra.jpeg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;506&quot; data-original-width=&quot;749&quot; height=&quot;216&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj29oQlP9rESYiGvoYeYjnPyWwvNxJlgWQmLVHHw2aFcD19YuyJ0HUR-lWKrSqOBQuqVZeHCrwGwLFR9T4NI75yOYW5Pj6SyGOFsnE-XC9b5e7T1d5S39AyW6kO3G4egBwXmSyzNCsStwiG7pPpDVIDpMwc0FYiQVuaR70-jx6m0FU1foztTpx6xB1u3_A/w320-h216/shailendra.jpeg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;1975 में एक फिल्‍म आई थी ‘दीवार’. कल्‍ट क्‍लासिक कही जाने वाली इस फिल्‍म के एक डायलॉग पर खूब तालियां बजती थी. डायलॉग है, ‘मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता’. सलीम-जावेद ने यह डायलॉग किस प्रेरणा से लिखा यह तो नहीं पता लेकिन इस फिल्‍म से 26-27 साल पहले एक युवा ने राजकपूर से कहा था, ‘मैं पैसों के लिए नहीं लिखता हूं…’ आज के ग्‍लोबलाइजेशन के इस युग में जब सारी ही चीजें पैसों के इर्दगिर्द रची-बुनी जा रही हैं तब अचरज होता है कि एक युवा फिल्‍म इंडस्‍ट्री में प्रवेश के द्वार को यूं बंद कर रहा था. तब भी राजकपूर को यही महसूस हुआ था.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन उस युवा के इसी अंदाज ने राजकपूर को कायल बना दिया और जब इस युवा ने फिल्‍म जगत में आना स्‍वीकार किया तो जैसे लोकप्रियता उनकी बांट जोह रहा थी. मैं पैसे के लिए नहीं लिखता कहने के पीछे की ताकत सिद्धांत की ताकत थी. एक प्रतिबद्धता थी. ऐसी प्रतिबद्धता जो जीवन की सबसे बड़ी बाजी तक कायम रही. अभिन्‍न मित्रों तथा वितरकों की सलाह, दबाव और असहयोग को नजर अंदाज करके साहित्यिक कृति ‘मारे गए गुलफाम’ के प्रति संवेदनशील बने रहना इसी प्रतिबद्धता के कारण संभव हो पाया था. खुद खत्‍म हो गए मगर साहित्‍य की आत्‍मा को ठेस पहुंचाना गवारा नहीं हुआ.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह अद्भुत शख्‍स थे कवि-गीतकार शैलेंद्र. ‘बरसात’, ‘आवारा’, ‘बूट पॉलिश’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘सीमा’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘गाइड’, ‘जंगली’, ‘बंदिनी’, ‘चोरी चोरी’, ‘दूर गगन की छांव में’, ‘जागते रहो’, ‘मधुमती’, ‘संगम’ तथा ‘मेरा नाम जोकर’ आदि जैसी फिल्‍मों के गीतकार शैलेंद्र. ‘तीसरी कसम’ के निर्माता शैलेंद्र. राजकपूर के ‘पुश्किन’ और फणीश्‍वरनाथ रेणु के ‘कविराज’ शंकर शैलेंद्र. जिन्‍होंने लिखा था, ‘सबकुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’. जिन्‍हें होशियार बनाने के लिए, मुनाफे कमाने के लिए सलाहें दी गई, मिन्‍नतें की गईं, दबाव बनाया गया, साथ छोड़ दिया गया मगर वे सबकुछ सह गए. गौर से देखा जाए तो शैलेंद्र के जीवन के तमाम रंगों में संवेदशीलता का रंग सबसे ज्‍यादा चमकीला, चटकदार और प्रभावी है. ‘मारे गए गुलफाम’ या कि ‘तीसरी कसम’ में हीरामन तो राजकपूर बने थे लेकिन इस कथा के दो हीरामन और हैं, कथा लिखने वाले फणीश्‍वरनाथ रेणु और इसे पर्दे पर उतारने वाले शैलेंद्र. हीरे से मन वाले रेणु, शैलेंद्र और राजकपूर.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मूलरूप से बिहार के निवासी केसरीलाल दास फौज में थे. जब वे रावलपिंडी में पदस्थ थे तब 30 अगस्त 1923 को बेटे का जन्‍म हुआ. नाम रखा गया शंकरलाल दास. शंकरलाल केसरीलाल दास. शंकरलाल की शिक्षा-दीक्षा मथुरा में हुई थी. स्कूली जीवन से ही कविताएं लिखने लगे तो उपनाम रखा शैलेंद्र. बाद में कवि का नाम हो गया शंकर शैलेंद्र. 1940 में रेलवे में नौकरी के सिलसिले में मुंबई आए. 1942 के अगस्त क्रांति में शामिल हुए और जेल भी गए. वे इंडियन नेशनल थिएटर शरीक हो गए और जेल गए. जेल से बाहर आने के बाद वे रेलवे में नौकरी करने लगे और भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़ गए. इप्‍टा के ही एक काव्य-पाठ कार्यक्रम में 1947 में राज कपूर ने शैलेंद्र को काव्य-पाठ करते सुना तो उनके मुरीद हो गए. राजकपूर ने फिल्‍म ‘आग’ के लिए गीत लिखने को आमंत्रित किया तो शैलेंद्र ने स्‍वाभिमान से कहा, मैं पैसों के लिए नहीं लिखता हूं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह पूरी कथा इसलिए बताई गई है कि बचपन से ही कविताएं लिखने वाले शैलेंद्र के मुंबई आगमन, भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने और इप्‍टा से जुड़ने और लिखने-पढ़ने ने एक ऐसे रचानाकार को गढ़ा जो जितना संवेदनशील था, उसका स्‍वर उतना ही प्रगतिशील था. शैलेंद्र हिंदी फिल्‍म जगत के सर्वाधिक प्रगतिशील गीतकारों में शुमार होते हैं. सहज काव्‍य उनके लेखन को लोकप्रिय बनाता है और वंचितों की फिक्र उन्‍हें लोकवादी. फिल्‍म ‘बरसात’ से शुरू हुआ गीतों का कारवां 1951 में जब ‘आवारा’ तक पहुंचा तो इसके शीर्षक गीत में शैलेंद्र का यही रूप नुमायां हुआ. इसमें शैलेंद्र ने लिखा: ‘आवारा हूं, गर्दिश में हूं, आसमान का तारा हूं’. ऐसे गीतों की सूची लंबी है. जैसे, ‘श्री 420’ का गीत ‘दिल का हाल सुने दिलवाला’, फिल्म ‘बूट पॉलिश’ का गीत ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है?’ आदि, आदि.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;वे अन्न-अनाज उगाते&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;वे ऊंचे महल उठाते&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कोयले-लोहे-सोने से&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;धरती पर स्वर्ग बसाते&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;वे पेट सभी का भरते&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;पर खुद भूखों मरते हैं.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह कविता शैलेंद्र की प्रगतिशीलता का आईना है. जैसे भगत सिंह को संबोधित करती कविता, ‘भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की/ देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फांसी की/ यदि जनता की बात करोगे तुम गद्दार कहाओगे/ बंब-संब की छोड़ो, भाषण दोगे, पकड़े जाओगे.’&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;‘तू जिंदा है तो ज़िंदगी की जीत में यकीन कर/ अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर’ जैसे गीत को कैसे भूला जा सकता है? बुझे मन को हौसला देने में इस गीत का कोई मुकाबला नहीं है. इसे जनगीत की तरह गाया जाता है. ऐसा ही एक गीत है जो नारा बन गया है. रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल को ताकत देने के लिए शैलेंद्र ने लिखा था:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हर जोर-जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मत करो बहाने संकट है, मुद्रा प्रसार इन्फ्लेशन है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इन बनियों और लुटेरों को क्या सरकारी कन्सेशन है?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;बंगले मत झांको, दो जवाब, क्या यही स्वराज तुम्हारा है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मत समझो हमको याद नहीं, हैं जून छियालिस की घातें&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जब काले गोरे बनियों में चलती थी सौदे की बातें&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;रह गयी गुलामी बरकरार, हम समझे अब छुटकारा है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1974 के आंदोलन में रेणु ने ‘हड़ताल’ शब्द की जगह ‘संघर्ष’ शब्द कर दिया और यह नारा वंचितों की लड़ाई का उद्घोष बन गया. संषर्घ की घोषणा करने वाले शैलेंद्र ने ही लिखा है:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जीना इसी का नाम है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हमारे पसंद के कई गीत है जिनकी सूची लंबी है. इन्‍हीं गीतों में से तीन को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला. 1958 में ‘यहूदी’ के गीत ‘ये मेरा दीवानापन है या मोहब्बत का सुरूर’, 1959 में ‘अनाड़ी’ के गीत ‘सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी’ तथा 1968 में ‘ब्रह्मचारी’ के गीत ‘तुम गाओ मैं सो जाऊं’ के लिए. आखिरी अवार्ड प्राप्‍त करने के लिए शैलेंद्र ज‍ीवित नहीं थे. यही पुरस्‍कार क्‍यों वे तो अपनी प्रतीक कृति ‘तीसरी कसम’ की सफलता को देखने के लिए भी जीवित नहीं रहे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;‘तीसरी कसम’ से जुड़ाव की कथा भी सरल रेखा सी है. बासु भट्टाचार्य से मिली ‘पांच लंबी कहानियां’ नामक पुस्‍तक में छपी रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पढ़ कर इतने प्रभावित हुए कि उसपर फिल्‍म बनाने का फैसला कर लिया. राजकपूर भी कथा सुन कर उछल पड़े लेकिन फिर चिंता जताई, कविराज, फिल्‍म निर्माण आपका क्षेत्र नहीं. आप गीत ही लिखो. शैलेंद्र कहां मानने वाले थे? अड़ गए, दर्द की यह कविता तो रजत पट पर उतारेंगे ही. जब मित्र की जिद थी तो राजकपूर ने भी मात्र एक रुपए में फिल्‍म करनी स्‍वीकार की. राजकपूर ही क्‍यों ‘तीसरी कसम’ फिल्म के निर्माण से जुड़े बासु भट्टाचार्य (निर्देशक), नवेंदु घोष (पटकथा-लेखक), बासु चटर्जी एवं बाबूराम इशारा (सहायक निर्देशक) ने भी अपने स्‍तर पर सहयोग किया. सबकुछ ठीक चल रहा था. खुद रेणु ने लिखा है कि फिल्‍म ठीक वैसी बन रही थी जैसी उन्‍होंने अपनी कहानी में कल्‍पना की थी. लेकिन बात अंत पर आ कर टिक गई. राजकपूर सहित तमाम वितरकों का मानना था कि अंत सुखद होना चाहिए. दुखांत से फिल्‍म चलेगी नहीं. शैलेंद्र इतने संवेदनशील कि कहानी की एक-एक पंक्ति को हूबहू रील में उतार देने का हर जतन कर रहे थे, उन्हें लेखक की मूल कृति में बदलाव कैसे स्‍वीकार होता? उन्‍होंने इंकार कर दिया. रेणु बुलाए गए. विशेषज्ञों की सभा हुई. शैलेंद्र यह कहते हुए बाहर चले गए कि मुझे बदलाव मंजूर नहीं. लेखक खुद तय करे. सुखांत अंत सुनाया गया. रेणु को वह अंत कैसे पसंद आता? नहीं कह कर वे बाहर चले आए. दोनों मित्र बाहर मिले और अपने एकमत होने पर खुश हुए.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मगर यह दुखांत फिल्‍म का ही नहीं शैलेंद्र का दुखांत भी साबित हुआ. राजकपूर अपने मित्र को वणिक बुद्धि में नहीं ढाल पाए. एक-एक कर यूनिट के सदस्‍य दूर होते गए. अंत में रह गए शैलेंद्र और ‘तीसरी कसम’. सोचा था फिल्‍म ढ़ाई-तीन लाख में बनेगी लेकिन बजट 22 लाख तक पहुंच गया. शैलेंद्र अपनी कृति के साथ अकेले थे. वितरकों ने हाथ खींच लिए तो बड़ी मुश्किल से फिल्‍म रिलीज हो पाई. बकाया मांगने वालों ने कोर्ट का वारंट ले रखा था सो शैलेंद्र अपनी फिल्‍म के प्रीमियर पर भी नहीं जा सके. पहली बार फिल्‍म को दर्शक ही नहीं मिले लेकिन फिल्‍म के शानदार बनने की तारीफ हुई.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ऐसी तारीफ कि खुद रेणु ने अपने मित्र को पत्र में लिखा था, ‘तस्वीर मुकम्मल हो गई और भगवान की दया से ऐसी बनी है कि वर्षों तक लोग इसे याद रखेंगे. अपने मुंह अपनी तारीफ नहीं- कोई भी व्यक्ति यही कहेगा. ‘सजनवां बैरी हो गए हमार’ तो ऐसा बन गया है कि पुराने ‘देवदास’ के ‘बालम आय बसो मेरे मन में’ की तरह युगों तक गाया जाएगा. मैं ही नहीं- कई लोग ऐसे हैं जो इस गीत को सुनकर आंसू मुश्किल से रोक पाते हैं.’&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ऐसी बनी थी ‘तीसरी कसम’ लेकिन इसकी सफलता देखने के लिए शैलेंद्र नहीं रहे. 29 सितंबर को उन्होंने रेणु को फिल्म के रिलीज होने की सूचना दी. 14 दिसंबर 1966 को महज 43 वर्ष के शैलेंद्र नहीं रहे. शैलेंद्र के गुजर जाने के बाद ‘तीसरी कसम’ देश भर में प्रदर्शित हुई और लोकप्रिय भी. फिल्‍म को राष्ट्रपति पुरस्कार मिला लेकिन यह सब देखने के लिए शैलेंद्र नहीं थे. वे जिन्‍होंने सबकुछ सीखा केवल व्‍यापार नहीं सीखा.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शैलेंद्र के असमय गुजर जाने का आघात रेणु के लिए इतना बड़ा था कि वे तीन साल कुछ लिख नहीं पाए. वे मानते थे कि न वे कहानी लिखते, न शैलेंद्र फिल्‍म बनाते और न उनकी असमय मौत होती. उन्होंने लिखा है कि शैलेन्द्र को शराब या कर्ज ने नहीं मारा, बल्कि वह एक ‘धर्मयुद्ध’ में लड़ता हुआ शहीद हो गया. उन्हें लगता था ‘तीसरी कसम’ के चक्कर में ही उनकी मृत्यु हुई, इसलिए उसके जिम्मेदार वही हैं. सोचने को बहुत कुछ है. जैसे शैलेंद्र या रेणु फिल्‍म का अंत बदलने को तैयार हो जाते. या फिल्‍म ग्रामीण परिवेश के हूबहू फिल्‍मांकन की शर्त को कुछ कर कम कर बजट घटा दिया जाता. वितरक तैयार हो जाते. ऐसा नहीं है कि राजकपूर से लेकर अन्‍य मित्रों ने शैलेंद्र की सहायात नहीं कि लेकिन तमाम सहायता के बाद भी कुछ कम पड़ गया. यह जो कम पड़ा यह तो फिल्‍म इंडस्‍ट्री में हमेशा से कम था लेकिन शैलेंद्र में कूट-कूट कर भरा हुआ था. संवेदनशीलता की पराकाष्‍ठा तक रचनात्‍मक आग्रह. ‘तीसरी कसम’ के निर्माण में आई तमाम बाधाओं के बाद भी हमारे हीरामन शैलेंद्र ने अपनी संवेदनशीलता, अपनी प्रतिबद्धता और अपनी प्रगतिशीलता के साथ किसी तरह का समझौता करने की कोई कसम नहीं खाई.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह भी तय है कि फिल्‍मों में नहीं आते तब भी शैलेंद्र प्रगतिशील रचनाकार होते. लेकिन तब फिल्‍म जगत को वे गीत नहीं मिलते जो शैलेंद्र ने लिखे हैं और जिनकी वजह से हिंदी सिनेमा प्रगतिशील कहलाने का गर्व कर सकता है. बाद में यह भी हुआ कि शैलेंद्र की जाति उजागर हुई. वे हिंदी सिनेमा के दलित गीतकार कहलाए. रैदास के बाद सबसे प्रमुख दलित चेतना का लेखक. वे न लिखते तो कैसे महसूस होता कि किसी की मुस्‍कुराहटों पर निसार होना ही जीवन है. कैसे पता चलता कि हम उस देश के वासी हैं जहां हमने गैरों को भी अपनाना सीखा, मतलब के लिए अंधे बनकर रोटी को नहीं पूजा हमने. हम जीने की तमन्‍ना और मरने के इरादे को कैसे जान पाते?&amp;nbsp; शैलेंद्र के जन्म को 100 बरस पूरे हो चुके हैं. उनके होने ने हमें मायने दिए हैं. हम उनके लिखे में सुख पाते हैं. और ‘तीसरी कसम’ को देख मन बरबस भीग जाता है, हीरामन के कारण भी और अपने हीरे जैसे मन के शैलेंद्र की याद में भी. जैसा कि बाबा नागार्जुन ने शैलेंद्र को श्रंद्धाजलि अर्पित करते हुए लिखा है:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;गीतों के जादूगर का मैं छंदों से तर्पण करता हूं&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;सच बतलाऊं तुम प्रतिभा के ज्योतिपुंज थे, छाया क्या थी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;भलीभांति देखा था मैंने, दिल ही दिल थे, काया क्या थी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जहां कहीं भी अंतर मन से, ऋतुओं की सरगम सुनते थे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ताज़े कोमल शब्दों से तुम रेशम की जाली बुनते थे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जन मन जब हुलसित होता था, वह थिरकन भी पढ़ते थे तुम&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;साथी थे, मजदूर पुत्र थे, झंडा लेकर बढ़ते थे तुम&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;युग की अनुगूँजित पीड़ा ही घोर घन घटा-सी गहराई&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;प्रिय भाई शैलेंद्र, तुम्हारी पंक्ति-पंक्ति नभ में लहराई&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तिकड़म अलग रही मुसकाती, ओह, तुम्हारे पास न आई&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;फिल्म जगत की जटिल विषमता, आखिर तुमको रास न आई&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ओ जन जन के सजग चितेरे, जब जब याद तुम्हारी आती&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आंखें हो उठती हैं गीली, फटने-सी लगती है छाती.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: #fefdfa; color: #333333; font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 पर 30 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/8926498991021001637/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_30.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/8926498991021001637'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/8926498991021001637'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_30.html' title='शैलेंद्र: प्रगतिशील चेतना का स्‍वर यानी हमारा हीरामन'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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term="freedom fighters"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="freedom fighters of india"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="pankaj shukla"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="sholay"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="एके हंगल"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पंकज शुक्‍ला"/><title type='text'>दादी-पिता बोले- हमने अंग्रेजों का नमक खाया है तुम क्रांतिकारी न बनो... तो इस एक्टर ने घर ही छोड़ दिया</title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiXFieiYHbu_MF2i1tJx0TkG6HsRTjoo2JXZDsgh_55m-2ztl3876iY-1EUupc4pv8vhGLUDD03tLX22i_hQ7kx-oRBcxsSLlGbPatgOJWtRVuwVVvGQsBmZAHFA3AsbEtHINICdkKQoBL1DsXZEWIb00UwlCPmBYkHXjFbc1lejiMLrRVG31crv0KiEzw/s593/ak%20hangal.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;450&quot; data-original-width=&quot;593&quot; height=&quot;243&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiXFieiYHbu_MF2i1tJx0TkG6HsRTjoo2JXZDsgh_55m-2ztl3876iY-1EUupc4pv8vhGLUDD03tLX22i_hQ7kx-oRBcxsSLlGbPatgOJWtRVuwVVvGQsBmZAHFA3AsbEtHINICdkKQoBL1DsXZEWIb00UwlCPmBYkHXjFbc1lejiMLrRVG31crv0KiEzw/s320/ak%20hangal.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सिर्फ एक डायलॉग या एक किरदार के किसी अभिनेता के संपूर्ण कार्य पर भारी होने का उदाहरण देना हो तो जो नाम याद आते हैं उनमें प्रमुख नाम होगा एके हंगल और फिल्‍म ‘शोले’ में रहीम चाचा के उनके किरदार का. ‘शोले’ का एक संवाद ‘इतना सन्‍नाटा क्‍यों है भाई’ हमारे जीवन का मुहावरा बन गया है. फिल्‍मों में चरित्र अभिनेता के रूप में लोकप्रिय एके हंगल के 98 बरस के जीवन में कई उतार चढ़ाव आए. देश के स्‍वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए, जेल भी गए. लंबे समय तक थिएटर किया. 50 बरस की उम्र में फिल्‍मों में आए और 97 वर्ष की उम्र व्‍हील चेयर पर रैंप वॉक किया और मृत्‍यु के कुछ माह पहले एनीमेशन फिल्‍म के लिए आवाज दी. एके हंगल का जीवन एक ऐसे हरफनमौल इंसान का जीवन है जिसने परिवार के दबाव के बावजूद अंग्रेजों की नौकरी नहीं की बल्कि घर छोड़ कर भाग जाना मुनासिब समझा. भगत सिंह के बड़े प्रशंसक एके हंगल पर जब शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे द्वारा प्रतिबंध लगाया गया तो आर्थिक रूप से बड़ा नुकसान झेलने के बाद भी वे अपने निर्णय पर अडिग रहे. उन्‍होंने इस प्रतिबंध पर प्रतिक्रिया में कहा था कि बाल ठाकरे नेता बड़े हैं तो हम भी स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;26 अगस्‍त उन्‍हीं जुझारू और प्रतिबद्ध कलाकार एके हंगल की पुण्‍यतिथि है. उनका पूरा नाम अवतार किशन हंगल है. उनका जन्‍म&amp;nbsp; फरवरी 1914 को सियालकोट (पाकिस्तान) में हुआ था. हालांकि, एक इंटरव्‍यू में उन्होंने बताया था कि जब किसी कार्य से जन्‍म तारीख पूछी गई थी तो उन्‍हें पता ही नहीं थी. फिर बातचीत में आजादी के दिन 15 अगस्‍त का ख्‍याल आया और यही उनकी जन्‍म तारीख मान ली गई. उनके बेटे विजय हंगल बताते हैं कि तब से एके हंगल का जन्‍मदिन 15 अगस्‍त को मनाया जाने लगा था. एके हंगल की उम्र 4-5 वर्ष थी तब मां का देहांत हो गया था. उसके बाद पिता बालक अवतार को ननिहाल से अपने पास पेशावर ले आए थे. एके हंगल ने अपने साक्षात्‍कारों और आत्‍मकथा ‘मैं एक हरफनमौला’ (वाणी प्रकाशन) में अपने जीवन तथा उसके उतार-चढ़ावों पर विस्‍तार से बात की है. बचपन में आजादी के संघर्ष का जिक्र करते हुए वे मामा जलियांवाला बाग की मिट्टी घर ले आए थे. उस वक्‍त घर में चलने वाली आजादी के संघर्ष की बातों का बालमन पर असर हुआ. फिर जब सीमांत गांधी कहे गए खान अब्दुल गफ्फार खान के लाल कुर्ती आंदोलन हुआ तो किशोरवय के एके हंगल भी उसमें शामिल हो गए. गौरतलब है कि पठान समुदाय के खान अब्‍दुल गफ्फार खान ने खुदाई खिदमतगार नामक संगठन बना कर लाल कुर्ती पहनने का आंदोलन चलाया था. यह गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन का हिस्‍सा था.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एके हंगल ने बचपन की एक और घटना का जिक्र करते हुए बताया है कि 23 अप्रैल 1930 को पेशावर के किस्सा-ख्वानी बाजार में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हुए कई भारतीय एकत्रित हुए थे. इस आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेज सरकार ने गढ़वाल रेजिमेंट को भेजा. ब्रिटिश अधिकारियों ने गोली चलाने का आदेश दिया तो रेजिमेंट के प्रमुख चंदर सिंह गढ़वाली ने निहत्‍थे देशवासियों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया. यह ब्रिटिश सरकार को नागवार गुजरा. गढ़वाली रेजीमेंट के बदले ब्रिटिश सैनिकों ने मासूम आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाईं. कई लोग मारे गए. आक्रोशित लोगों ने ब्रिटिश सैनिकों पर पत्‍थर फेंके. किशोर उम्र के एके हंगल भी इन लोगों में शामिल थें. उन्‍हें गोली नहीं लगी लेकिन ब्रिटिश सैनिकों की क्रूरता के शिकार हुए निहत्‍थे लोगों के खून के छींटें उन पर गिरे. बाद में उनका रूझान कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ हो गया जिसके कारण उन्‍हें पाक में जेल में भी रहना पड़ा.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उनके दादा और पिता ब्रिटिश शासन में सरकारी नौकरी में ऊंचे पदों पर थे. वे बताते हैं कि पढ़ाई पूरी होने के बाद उनके पिता युवा एके हंगल को लेकर अपने ब्रिटिश अधिकारी के पास ले गए. पिता ने आग्रह किया कि अंग्रेज अफसर बेटे की सरकारी नौकरी के लिए सिफारिश कर दे. अंग्रेज अफसर ने आवेदन पत्र पर लिखा, ‘रिकमंडेड इफ ही इज एज गुड एज हिज फादर’. अंग्रेजों के लिए अच्‍छा बनना उन्‍हें रास नहीं आया. दादी और पिता ने बहुत समझाने का प्रयास किया लेकिन एके हंगल नहीं माने. जब दादी ने यह कहते हुए दबाव डाला कि हमने इस सरकार का नमक खाया है तुम क्रांतिकारी न बनो तो एके हंगल ने पेशावर छोड़ दिया. वे घर से भाग कर अपनी बहन के यहां दिल्‍ली आ गए. एके हंगल ने ब्रिटिश नौकरी के बदले सिलाई सीखी. उन्‍हें कपड़ों की सूट की इंग्लिश कटिंग में मास्‍टरी हो गई थी. एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने बताया था कि महात्‍मा गांधी और गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर के निकटतम सहयोगी सीएफ एंड्रयूज के सूट भी एके हंगल ने सीले थे. एके हंगल को भी अच्‍छे कपड़े पहनने का शौक पूरे जीवन रहा. अपनी आत्‍मकथा में उन्‍होंने बताया कि एक कार्यक्रम में उनकी महिला प्रशंसक इस बात से खफा हो गई थी कि फिल्‍मों में अपनी छवि के अनुसार एके हंगल धोती कुर्ता पहन कर नहीं सूट पहन कर चले गए थे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्रांतिकारी तथा कम्‍युनिस्‍ट विचारों के कारण एके हंगल को जेल भी जाना पड़ा. फिर जब वे बंटवारे के बाद 1949 में भारत आ गए तो इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) से जुड़ गए. एके हंगल की अभिनय यात्रा इप्‍टा के माध्‍यम से बलराज साहनी और कैफ़ी आज़मी के साथ शुरू हुई.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब प्रख्‍यात निर्माता-निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने एके हंगल को नाटक में अभिनय करते देखा तो उन्हें फिल्मों में काम करने का न्यौता दिया. तथ्‍य बताते हैं कि एके हंगल ने पहली फिल्‍म राजकपूर अभिनीत ‘तीसरी कसम’ साइन की थी मगर जब फिल्‍म रिलीज हुई तो पता चला कि राजकपूर के बड़े भाई के उनके रोल पर कैंची चल गई थी. 50 साल की उम्र में फिल्‍मों में कॅरियर की शुरुआत कर रहे यह किसी भी कलाकार के लिए दिल तोड़ने जैसी बात ही है. हालांकि, पहली फिल्‍म ‘शागिर्द’ जब 1967 में रिलीज हुई तो एके हंगल छा गए. उसके बाद अपने फिल्मी कॅरियर में एके हंगल ने तकरीबन 225 फिल्मों में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, संजीव कुमार, धर्मेंद्र जैसे कलाकारों के साथ काम किया और बेहतर इंसान की छवि बनाई.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1936 से 1965 तक मंच पर अभिनय तथा 1966 से 2005 तक हिंदी फिल्मों में चरित्र अभिनेता के रूप में दिखाई दिए एके हंगल ने फरवरी 2011 को मुंबई में फैशन डिजाइनर रियाज गंजी के लिए व्हीलचेयर में रैंप वॉक किया था. उन्‍होंने मई 2012 में टीवी सीरियल ‘मधुबाला – एक इश्क एक जूनून’ में अतिथि भूमिका निभाई और वर्ष 2012 की शुरुआत में एनीमेशन फिल्म ‘कृष्ण और कंस’ में राजा उग्रसेन के चरित्र को अपनी आवाज दी. उम्र के सौ बरस के करीब पहुंचने तक एके हंगल शारीरिक और आर्थिक परेशानियों से घिर गए थे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;असल में, जीवन भर चरित्र भूमिकाएं निभाने के कारण एके हंगल कभी भी बहुत समृद्ध नहीं हो पाए. यहां तक कि जब उनके घर आयकर विभाग का छापा हुआ तो जांच दल यह जानकार चौंक गया था कि इतना बड़ा कलाकार किराए के मकान में रहता है. उनके घर से आय से अधिक सम्‍पत्ति तो दूर बेहतर जीवन जीने लायक पैसा भी नहीं मिला था. फिर जब वे अपना पुश्‍तैनी घर देखने पाकिस्तान गए तो वहां उन्‍हें पाकिस्तान दिवस समारोह में आमंत्रित किया और वे कार्यक्रम में शामिल हो गए. यह शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को नागवार गुजरा उन्‍होंने एके हंगल को ‘देशद्रोही’ करार देते हुए उनकी फिल्‍मों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया. उनकी फिल्में महाराष्ट्र और आसपास के टॉकीज से हटा दी गईं. उन्‍हें काम मिलना बंद हो गया. इसके बाद भी वे झुके नहीं बल्कि जवाब दिया कि वे देशद्रोही नहीं बल्कि एक स्वतंत्रता सेनानी हैं. करीब दो साल के बहिष्कार के बाद प्रतिबंध हटाया गया लेकिन तब तक एके हंगल का बतौर कलाकार काफी नुकसान हो चुका था. उम्र बढ़ने के साथ काम मिलना बंद हुआ और फिर एक समय ऐसा आया जब इलाज के लिए भी पैसा नहीं था तब बॉलीवुड ने सहायता की पेशकश की थी. हमेशा अपने विचार और काम के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध रहे अभिनेता एके हंगल ने 26 अगस्त, 2012 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;विचारों से वे कम्‍युनिस्‍ट थे तथा उम्र भर इस विचारधारों के अनुयायी बने रहे. वे गलत के खिलाफ आवाज जरूर उठाते थे. जब टेलर हुआ करते थे तो बंबई में ‘टेलरिंग वर्कर्स यूनियन’ का गठन किया और टेलर समुदाय के कठिनाइयों पर लड़ाई लड़ी. संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन की शुरुआत हुई तो वे भी इस आंदोलन का हिस्सा बने. गोवा मुक्ति के आंदोलन में भी उनकी भागीदारी थी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जबकि फिल्‍मों में उन्‍होंने ऐसे चरित्रों को जीवंत किया जो हमारे आसपास के लगते हैं. ऐसे अच्‍छे और सच्‍चे चरित्र जिन पर सबको विश्‍वास और आस्‍था होती है. अपनी इस छवि पर खुद एके हंगल ने एक बार टिप्‍पणी की थी कि पर्दे पर उनका चरित्र यदि पिस्‍तोल पकड़ कर खड़ा हो जाए तो भी दर्शक उस चरित्र को बुरा चरित्र नहीं मानेंगे. उन्‍होंने अपने अभिनय से यह विश्‍वास हासिल किया था. यह विडंबना है कि उनके जैसे चरित्र अभिनेता का उत्‍तरार्द्ध संकटग्रस्‍त गुजरा.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: #fefdfa; color: #333333; font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 पर 26 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/112114707442618130/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_26.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/112114707442618130'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/112114707442618130'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_26.html' title='दादी-पिता बोले- हमने अंग्रेजों का नमक खाया है तुम क्रांतिकारी न बनो... तो इस एक्टर ने घर ही छोड़ दिया'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जन्‍मदिन मुबारक हो गुलजार साहब…&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjNL1ifQy89FYcp9sIGkHkWQxrGzujkhUXyv8H0nv91n__33Glt5cQ-SgiwXKHT91iIKO44oZp04hJEah26RGY1lY_cG09rKpFXbpZA_F5NGAOoHUtPhgyT4yOID_ABfrvcNMzICLubONpmWBUYhrojcK7zeqWlT7Ibmgrre3lNQDrOLdRTeiuf2DJJZEY/s967/Gulzar.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;667&quot; data-original-width=&quot;967&quot; height=&quot;276&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjNL1ifQy89FYcp9sIGkHkWQxrGzujkhUXyv8H0nv91n__33Glt5cQ-SgiwXKHT91iIKO44oZp04hJEah26RGY1lY_cG09rKpFXbpZA_F5NGAOoHUtPhgyT4yOID_ABfrvcNMzICLubONpmWBUYhrojcK7zeqWlT7Ibmgrre3lNQDrOLdRTeiuf2DJJZEY/w400-h276/Gulzar.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जन्‍मदिन तो एक बहाना है वरना गुलजार साहब को याद करने के लिए एक फिल्‍म, एक गाना, एक किस्‍सा, एक त्रिवेणी, एक कविता, एक शेर या यूं कहिए एक पंक्ति ही काफी है. जाने कितने संवाद हैं, जाने कितने गाने हैं, जाने कितनी पंक्तियां हैं जो हमें याद रह गई हैं. कितने अफसाने हैं जो हमें अपने लगते हैं, कितना सुरीला लिखा गया है कि शब्‍द किसी राग से बजते हैं. पहले पहल तो अहसास नहीं होता लेकिन जब गुजर जाते हैं, जब सुन चुके होते हैं, जब पढ़ चुके होते हैं तो रेशम के धागे से लगी चोट की तरह शब्‍द, भाव ठहरे रह जाते हैं, एक कसक के साथ. ऐसा लिखा, ऐसा बनाया, ऐसा कहा कहीं भी देखें, पढ़ें, सुनें तो समझ लीजिए उसे गुलजार का स्‍पर्श हुआ है. छू कर जैसे सोना बना देने का हुनर होता है वैसे ही.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;18 अगस्‍त गुलजार का जन्‍मदिन है. 90 बरस की ओर कदम बढ़ा चुके गुलजार का लेखन बच्‍चों से लेकर बुजुर्गों तक के मन को छूता है. उनके लेखन के प्रभाव का विस्‍तार आसमान जैसा है, हर जगह कहीं न कहीं ठहरा, बसा और खिला हुआ आसमान. उनके चाहने वालों को मालूम है कि विभाजन की त्रासदी झेलने वाला यह लेखक गुलजार कहलाने के पहले संपूर्ण सिंह कालरा थे. बाद में जब गुलजार नाम अपनाया तो उनके रचे से हम गुलजार होते गए और वे संपूर्ण. उनका जन्‍म 18 अगस्त 1936 को झेलम जिले के दीना में हुआ था जो आज पाकिस्तान में है. गुलजार अपने पिता की दूसरी पत्नी की इकलौती संतान हैं. बचपन में ही मां का देहांत हो गया था. विभाजन हुआ तो उनका परिवार पंजाब के अमृतसर में आ गया और गुलजार मुंबई. गैरेज में बतौर मैकेनिक काम करना और शौकिया लिखना उनका काम था. फिर मशहूर निर्देशक बिमल राय, हृषिकेश मुखर्जी और हेमंत कुमार के सहायक के रूप में काम करने ने जीवन की दिशा बदल दी. बिमल राय को वह पिता की तरह मानते थे और उनके अंतिम समय में वैसी ही सेवा भी की.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1963 में आई फिल्म ‘बंदिनी’ का ख्‍यात गीत ‘मोरा गोरा रंग लइले’ गुलजार का फिल्‍मों के लिए लिखा गया पहला गीत था. 1968 में उन्होंने फिल्म ‘आशीर्वाद’ के संवाद लिखने के साथ ही संवाद लेखन आरंभ किया। निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म 1971 में आई ‘मेरे अपने’ थी। ‘अंगूर’, ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘खुशबू’, ‘लिबास’, ‘इजाजत’, ‘माचिस’ जैसी फिल्में उनके निर्देशन में बनी हैं। ‘चौरस रात’, ‘जानम’, ‘एक बूंद चांद’, ‘रावी पार’, ‘यार जुलाहे’, ‘पुखराज’, ‘रात पश्मीने की’, ‘रात, चांद और मैं’, ‘खराशें’ आदि किताबों में गुलजार को पढ़ा जा सकता है. इस सृजन यात्रा पर पद्मभूषण,साहित्य अकादमी, दादा साहेब फाल्के अवार्ड, नेशनल फिल्म अवार्ड, ग्रैमी अवॉर्ड तथा ‘जय हो’ गीत के लिए ऑस्‍कर जैसे अवार्ड गुलजार के हिस्‍से में आए हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ये सारी बातें तो वे हैं जो कहीं भी लिखी, पढ़ी जा सकती है. असल में गुलजार तो अपने हर पाठक, हर श्रोता, हर दर्शक के लिए ‘पुखराज’ हैं. पश्‍मीना रात का पुखराज चांद. बिमल राय से लेकर विशाल भारद्वाज तक गुलजार की अपनी यात्रा है और हम सब इसके सहयात्री लेकिन हर दौर में गुलजार अपने समकालीनों से कुछ अलग रहे, इतने खास जैसे आसमान में इंद्रधनुष. इस बात को ख्‍यात अभिनेत्री शबाना आजमी के एक अनुभव से समझा सकता है. गीतकार जावेद अख्‍तर पर किताब ‘जादूनामा’ के विमोचन तथा अन्‍य मौकों पर वे यह अनुभव बता चुकी हैं. शबाना ने बताया था कि वे एक धुन पर अटक गई थीं. उन्‍होंने अलग-अजग गुलजार और जावेद अख्तर से कहा कि वे इस धुन पर कुछ रोमांटिक लिख दें. दोनों ने ही लगभग एक मिनट में उस धुन पर रचना लिखी. दोनों का अंदाज एक दम जुदा था. गुलजार ने लिखा:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;‘आजा रे पिया मोरे, पिया मोरे आ, कासे कहूं पिया रे, मोरा लागे ना जिया’.&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जबकि जावेद अख्‍तर ने लिखा,&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;‘जा तोसे नहीं बोलूं, ओ जा रे, जा रे, तू न मेरा सनम, तू न मेरा पिया.’&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह अंदाज ही गुलजार को सबसे जुदां करता है. गुलजार के लिखे में चांद, प्रकृति, रात सबकुछ ऐसे हैं जैसे किसी ने कभी सोचा नहीं. ऐसे ही मैंने सोचा कि शायर गुलजार जब खुदा से बात करता है तो क्‍या बात करता होगा? तब मुझे ‘रात पश्‍मीने की’ में खुदा को संबोधित कुछ नज्‍म मिलीं, कुछ त्रिवेणी भी. हमारा अध्‍यात्‍म उस परम सत्‍ता से एकाकार होने का ही लक्ष्‍य देता है, हमारी सूफी परंपरा उसकी इबादत का अनूठा अंदाज है और ऐसे ही गुलजार खुदा के बारे में जब लिखते हैं तो कभी उसकी इबादत सा लगता है कभी खुदा से ऐसा नाता लगता है जिसे उलाहना, तंज, चुनौती दी जा सकती है. जैसे गुलजार लिखते हैं:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;पढ़ा लिखा अगर होता खुदा अपना&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मै जितनी भी जबाने जानता हूं&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;वो सारी आजमाई है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;खुदा ने एक भी समझी नहीं अब तक&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ना वो गर्दन हिलाता है, न हुंकार ही भरता है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कुछ ऐसा सोचकर शायद फरिश्तों ही से पढवा दे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कभी चांद की तख्ती पे लिख देता शेर गालिब का&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;धो देता है या कुतर के फांक जाता है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;पढ़ा लिखा अगर होता खुदा अपना&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;न होती गुफ्तगू तो कम से कम&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;चिठ्ठी का आना जाना तो लगा रहता.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वह सर्वोच्‍च सत्‍ता कौन है, कौन है जिसके इशारे पर कायनात चलती है, वह है भी या केवल एक ख्‍याल है, इस सवाल पर गुलजार कुछ यूं कहते हैं:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;बुरा लगा तो होगा ऐ खुदा तुझे,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दुआ में जब,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जम्हाई ले रहा था मैं-&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दुआ के इस अमल से थक गया हूं मैं!&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मैं जब से देख सुन रहा हूं,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तब से याद है मुझे,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;खुदा जला बुझा रहा है रात दिन,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;खुदा के हाथ मैं है सब बुरा भला-&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दुआ करो!&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;अजीब सा अमल है ये&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ये एक फर्ज़ी गुफ़्तगू&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;और एकतर्फा – एक ऐसे शख्‍स से,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ख्‍याल जिसकी शक्ल है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ख्‍याल ही सबूत है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जो ख्‍याल है वह सच में है. यही है और बिना आवाज किए दीवार से पीठ लगाए बैठा है:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मैं दीवार की इस जानिब हूं&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इस जानिब तो धूप भी है, हरियाली भी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ओस भी गिरती है पत्तों पर,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आ जाए तो आलसी कोहरा,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;शाख पे बैठा घंटों ऊंघता रहता है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;बारिश लंबी तारों पर नटनी की तरह थिरकती,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आंख से गुम हो जाती है,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जो मौसम आता है, सारे रस देता है!&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;लेकिन इस कच्ची दीवार की दूसरी जानिब,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;क्यों ऐसा सन्नाटा है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कौन है जो आवाज नहीं करता लेकिन-&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दीवार से टेक लगाए बैठा रहता है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अक्‍सर यह सवाल उठता है कि जब सबका खैरख्‍वाह वह ऊपर वाला है तो क्‍यों आसमान फटता है, क्‍यों आता है जलजला? क्‍यों जो अच्‍छा माना जाता है वह उठाता है तकलीफें, क्यों दानव लूटते है हर तरह के मजे? क्‍यों बुलाई सिर उठा कर चलती है हर दफे और क्‍यों अच्‍छाई को होना पड़ता है परेशान हर बार? सवाल कई हैं. जैसे यह सवाल:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;पिछली बार मिला था जब मैं&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;एक भयानक जंग में कुछ मसरूफ थे तुम&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;नए नए हथियारों की रौनक से काफ़ी खुश लगते थे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इससे पहले अन्तुला में&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;भूख से मरते बच्चों की लाशें दफ़्नाते देखा था&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;और इक बार.. एक और मुल्क में जलजला देखा&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कुछ शहरों के शहर गिरा के दूसरी जानिब लौट रहे थे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तुम को फलक से आते भी देखा था मैंने&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आस पास के सय्यारों पर धूल उड़ाते&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कूद फलांग के दूसरी दुनियाओं की गर्दिश&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तोड़ ताड़ के गैलेक्सीज के महवर तुम&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जब भी जमीं पर आते हो&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;भोंचाल चलाते और समंदर खौलाते हो&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;बड़े ‘इरैटिक’ से लगते हो&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;काएनात में कैसे लोगों की सोहबत में रहते हो तुम?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शायर खुदा को चुनौती भी देता है और सलाह भी. सलाह की बाजी पलट कर देखो शायद खुदा को बंदे की खुदी को तोड़ने का हुनर आ जाए:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाजी देखी मैंने –&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;काले घर में सूरज रख के,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तुमने शायद सोचा था,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मेरे सब मोहरे पिट जाएंगे,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मैंने एक चिराग जला कर,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;अपना रस्ता खोल लिया&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तुमने एक समंदर हाथ में लेकर, मुझ पर ढेल दिया&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;काल चला तुमने, और मेरी जानिब देखा&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मैंने काल को तोड़ के लम्हा लम्हा जीना सीख लिया&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मेरी खुदी को तुम ने चंद चमत्कारों से मारना चाहा&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मेरे इक प्यादे ने तेरा चांद का मोहरा मार लिया-&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मौत की शह देकर तुमने समझा था अब तो मात हुई&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मैंने जिस्म का खोल उतार के सौंप दिया और रूह बचा ली&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;पूरे का पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाजी.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;और गुलजार की त्रिवेणी में भी खुदा एक खास रूप में मिलता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;उम्र के खेल में इक तरफ़ा है ये रस्सा कशी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इक सिर मुझ को दिया होता तो इक बात भी थी.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मुझ से तगड़ा भी है और सामने आता भी नहीं.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जमीं भी उसकी, जमीं की ये नेमतें उसकी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ये सब उसी का है, घर भी, ये घर के बंदे भी.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;खुदा से कहिए, कभी वो भी अपने घर आए!&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;और यह त्रिवेणी जिसमें गुलजार ने जिंदगी की कश्‍मकश को लिख दिया है. यह हर उस शख्‍स का बयान है जैसे जिसकी पूरी उम्र उघड़ने और उघड़े को ढंकने में गुजरी है, गुजर रही है:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;अजीब कपड़ा दिया है मुझे सिलाने को&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कि तूल खींचूं अगर, अरज छूट जाता है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;उघड़ने, सीने ही में उम्र कट गई सारी.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 पर 18 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/3495968257116073227/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/3495968257116073227'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/3495968257116073227'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post.html' title=' गुलजार: उघड़ने, सीने ही में उम्र कट गई सारी'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiR5KSDuEPeRVgSH4rQlEsi-A14oSR8YB7PVjm0e2Qkmqmq_eMcI65NkEJ4kpjn1gbcD_NjDn5392J0aZzrvyFkOddxm5wHXiVtPfm_ZEkBskPT_ztj6GS7zUTGLFBMmfnHu_ZL-uvPo3f6V3y-FnGuglRGkXugrBV0oewohbIyvB5lslA/s220/pankaj%20shukla%20photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjNL1ifQy89FYcp9sIGkHkWQxrGzujkhUXyv8H0nv91n__33Glt5cQ-SgiwXKHT91iIKO44oZp04hJEah26RGY1lY_cG09rKpFXbpZA_F5NGAOoHUtPhgyT4yOID_ABfrvcNMzICLubONpmWBUYhrojcK7zeqWlT7Ibmgrre3lNQDrOLdRTeiuf2DJJZEY/s72-w400-h276-c/Gulzar.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9062801385297364864.post-5297295743748222628</id><published>2023-08-15T09:00:00.016+05:30</published><updated>2023-09-05T20:28:21.282+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="classical music"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="indian classical music"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="pankaj shukla"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ustad amir khan"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उस्ताद अमीर खान"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पंकज शुक्‍ला"/><title type='text'>उस्‍ताद अमीर खां: रियाज छूट जाता था इसलिए नहीं करते थे कार्यक्रमों के लिए यात्राएं</title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;गुंचे तेरी ज़िंदगी पे दिल हिलता है&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;सिर्फ एक तबस्सुम के लिए खिलता है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;गुंचे ने कहा कि इस चमन में बाबा&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ये एक तबस्सुम भी किसे मिलता है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEirkCYTLkyYWFv-mzWpq1JeL41whGcl8o7sKSuSTUK5jTnDpFoWXocbfKHXFGpJCm8XKKtyO1GsjJjceMFli8A8-33S9wJXf1LEIqc0Y7zaCDWNrLsFLNugZRUfnN90a1q0r-nMEAMSG535JDCyka6y8OBSFPf0786r1U4Z22xpNW69A7TsOwrCtLFyLZI/s765/Ustad%20Amir%20Khan.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;498&quot; data-original-width=&quot;765&quot; height=&quot;260&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEirkCYTLkyYWFv-mzWpq1JeL41whGcl8o7sKSuSTUK5jTnDpFoWXocbfKHXFGpJCm8XKKtyO1GsjJjceMFli8A8-33S9wJXf1LEIqc0Y7zaCDWNrLsFLNugZRUfnN90a1q0r-nMEAMSG535JDCyka6y8OBSFPf0786r1U4Z22xpNW69A7TsOwrCtLFyLZI/w400-h260/Ustad%20Amir%20Khan.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;फिल्‍म्‍स डिवीजन द्वारा बनाई गई अपनी बायोपिक में उस्‍ताद अमीर खां साहब यही एक शेयर पढ़ते हैं और मानो कहते हैं, तमाम संघर्षों के बाद भी मैं खुश हूं. वे अमीर खां साहब जिनके पहले तक हिंदुस्‍तानी संगीत की एक खास गायन शैली तराना अर्थहीन थी. संगीत विद्वान पं. विष्‍णु नारायण भातखंडे ने भी तराना को अर्थहीन ही करार दिया था. मगर दस सालों के शोध के बाद उस्‍तार अमीर खां ने तराना को अर्थ दिया. उन्‍होंने बताया कि अमीर खुसरो द्वारा इजाद किया गया तराना अर्थहीन नहीं बल्कि वह एक तरह का जप है और इस कारण मूल्‍यवान है. इसलिए उन्‍होंने तराने में कम शब्‍द रख कर उनका जप अधिक रखा और इस तरह वे अध्‍यात्‍म में एकाकार होते रहे. पंडित निखिल मुखर्जी को दिए साक्षात्कार में उस्‍ताद अमीर खां ने कहा था पहले गायक शब्‍द पर अधिक बल देते थे जबकि भाव को महत्‍व कम देते थे. जबकि अमीर खां साहब के गायन में स्‍वर्गिक भाव का अहसास होता है.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शब्‍द से भाव की संगीत यात्रा करवाने वाले उस्‍ताद गायक अमीर खां की 15 अगस्त को जयंती है. उनका जन्‍म 15 अगस्त, 1912 को हुआ था. उनके पिता शाहमीर खान भिंडी बाजार घराने के सारंगी वादक थे, जो इंदौर के होलकर राजघराने में बजाया करते थे. उनके दादा चंगे ख़ान तो बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में गायक थे. 1921 में अमीर अली की मां का देहांत हो गया था जब वे केवल नौ वर्ष के थे. अमीर और उनका छोटे भाई बशीर को पिता ने सारंगी की शिक्षा देनी आरंभ की. जल्द ही पिता को महसूस हुआ कि अमीर का रुझान वादन से ज़्यादा गायन की तरफ है. इसलिए उन्होंने अमीर अली को गायन की तालीम देने लगे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बालक अमीर के उत्‍साद अमीर खां बनने के पीछे दर्द और अपमान की दास्‍तानें हैं. डॉ. इब्राहिम अलद की पुस्‍तक में बचपन की एक अपमानभरी घटना का उल्‍लेख अमीर खां के बाल मित्र सितार वादक रामनाथ श्रीवास्‍तव ने किया है. वे बताते हैं कि पिता का व्‍यवहार उस जमाने के उस्‍तादों की तरह ही बेहद कड़क होता था. एकबार पिता ने सांरगी बजाने के दौरान किसी गलती पर नन्‍हे अमीर की गर्दन पर डिब्‍बा दे मारा था. इससे दुखी अमीर ने गायक की राह पकड़ ली. वे छिपछिप कर रियास किया करते थे. इसमें छोटे भाई बशीर की सारंगी पर संगत मिला करती थी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बचपन में ही एक घटना और हुई. इंदौर के प्रसिद्ध हार्मोनियम वादक बापराव अग्निहोत्री ने लिखा है कि एक बार इंदौर के गफूर बजरिया मोहल्‍ले में उस्‍ताद नसीरूद्दीन खां डागर का कार्यक्रम हुआ. वहां अमीर खां ने ‘मेरुदंड’ नामक ग्रंथ देखा. वे उसे लेकर पढ़ने लगे तो उस्‍ताद नसीरूद्दीन ने यह कहते हुए ग्रंथ छीन लिया कि यह बच्‍चों के काम का नहीं है. बालक अमीर इतने आहत हुए कि तय कर लिया उच्‍च श्रेणी के गायक बन कर ही दम लेंगे. बालसखा रामनाथ श्रीवास्‍तव से ‘मेरुदंड’ ग्रंथ लाने को कहा. रामनाथ ने भी दोस्‍त के भाव को समझा और कुछ ही दिनों में ‘मेरुदंड’ की कॉपी हाथ से लिख कर अमीर खां को दे दी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अपमान की ऐसी ही एक घटना का उल्‍लेख कला मर्मज्ञ प्रभु जोशी ने अपने आलेख में किया है. वे लिखते हैं कि उस्ताद अमीर खां की प्रतिभा को अस्वीकार का आरंभ तो उसी समय हो गया था, जब वे शास्त्रीय संगीत के एक दक्ष गायक बनने के स्वप्न से भरे हुए थे और रायगढ़ दरबार में एक युवतर गायक की तरह अपनी अप्रतिम प्रतिभा के बलबूते संगीत-संसार में एक सर्वमान्य जगह बनाने में लगे हुए थे. एक बार उनके आश्रयदाता ने उन्हें मिर्जापुर में सम्पन्न होने वाली एक भव्य-संगीत सभा में प्रतिभागी की बतौर भेजा, ताकि वे वहां जाकर अपनी गायकी की एक प्रभावकारी उपस्थिति दर्ज करवा के लौटें. लेकिन, उन्होंने जैसे ही अपना गायन शुरू किया रसिकों के बीच से उनके विरोध के स्वर उठने लगे. यह विरोध जल्द ही शोरगुल में बदल गयस. उस संगीत-सभा में प्रसिद्ध गायक इनायत खां, फैयाज खां और केशरबाई भी मौजूद थे. इन वरिष्ठ गायकों की बात भी श्रोताओं ने सुनी नहीं. इस घटना से हुए अपमान-बोध ने युवा गायक अमीर खां के मन में ‘अमीर‘ बनने के दृढ़ संकल्प से साथ दिया. वे जानते थे, एक गायक की ‘सम्पन्नता’, उसके ‘स्वर’ के साथ ही साथ ‘कठिन साधना’ भी है. नतीजतन, वे अपने गृह नगर इंदौर लौट आए.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उसने स्वर-साधना को अपना अवलम्ब बनाया, और ऐसी साधना ने एक दिन उसको उसकी इच्छा के निकट लाकर छोड़ दिया. शायद इसी की वजह रही कि बाद में, जब अमीर खां साहब देश के सर्वोत्कृष्ट गायकों की कतार में खड़े हो गये तो बड़े-बड़े आमंत्रणों और प्रस्तावों को वे बस इसलिए अस्वीकार कर दिया करते थे कि ‘वहां आने-जाने में उनकी ‘रियाज‘ का बहुत ज्‍यादा नुकसान हो जाएगा. प्रभु जोशी सच ही लिखते हैं कि कुल मिला कर यह रियाज के अखण्डता की बात ही थी. बहारहाल, अमीर खां साहब का सर्वस्व रियाज पर ही एकाग्र हो गया था. भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा गायक हुआ होगा, जिसके लिए ‘रियाज‘ इतना बड़ा अभीष्ट बन गया हो. उनके बारे में एक दफा उनके शिष्य रमेश नाडकर्णी ने जो एक बात अपनी भेंट में कही थी, वह यहां याद आ रही है कि ‘मौन में भी कांपता रहता था, खां साहब का कंठ. जैसे स्वर अपनी समस्त श्रुतियों के साथ वहां अखंड आवाजाही कर रहा है.’&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिल्म संगीत में भी उस्ताद अमीर खां का योगदान उल्लेखनीय है. ‘बैजू बावरा’, ‘शबाब’, ‘झनक झनक पायल बाजे’, ‘रागिनी’, और ‘गूंज उठी शहनाई’ जैसी फि‍ल्मों के लिए उन्होंने अपना स्वरदान किया. एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा था कि दूसरे संगीतकारों की तरह उन्‍होंने कभी फिल्‍मों में गाने से परहेज नहीं किया.&amp;nbsp; संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये उस्ताद अमीर खां को 1967 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. फिर 13 जनवरी 1974 का वह दिन जिसने एक कार दुर्घटना ने शास्त्रीय संगीत के इस महान गायक को हमसे छीन लिया है. हालांकि, संगीत में उन्‍होंने आसमान सा कद अर्जित किया लेकिन उनका पारिवारिक जीवन संतोषप्रद नहीं रहा. अलग-अलग कारणों से उन्‍हें चार बार शादियां करनी पड़ीं. उनके दो बेटे भी हुए लेकिन दोनों में से किसी ने भी भी संगीत की अपनी विरासत को आगे नहीं बढ़ाया. उनका एक बेटा इंजीनियर हुआ था भारत के बाहर बस गया जबकि दूसरा बेटा हैदर अली फिल्‍मी दुनिया में अभिनेता शाहबाज खान के नाम से चर्चित हुआ.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इंटरनेट पर उपलब्‍ध उस्ताद अमीर खां साहब के इंटरव्‍यू या गायन को सुन कर एक ही बात से सहमति होती है कि वे एक गायक नहीं, एक पूरे घराने की तरह मौजूद हैं, जिसमें उनके कई-कई शिष्य हैं, जो गा-गा कर अपने गुरु का ऋण उतार रहे हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 पर 15 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/5297295743748222628/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_15.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/5297295743748222628'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/5297295743748222628'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_15.html' title='उस्‍ताद अमीर खां: रियाज छूट जाता था इसलिए नहीं करते थे कार्यक्रमों के लिए यात्राएं'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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term="bhikaji cama"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="freedom fighters"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="freedom fighters of india"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="pankaj shukla"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पंकज शुक्‍ला"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भीखाजी कामा"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मैडम भीकाजी  कामा"/><title type='text'>मैडम कामा: तिरंगे में राष्‍ट्रीय एकता का भाव और विदेश में भारत की आजादी का घोष</title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiVRHJybldiw-gUaIwDoy8yIyuvNiNNP_4A_VHGvMnyHUhRYdzgeonY9PbrnybBch5Ycfz9EPz1LByYKGr7eFbyZp9m19yHL3SWOZPhMT3Puu-Igs4yL3oJIZ0WCZiW3PpYjsQeq7hB4VPZKLZ72M5W2dO5g_SKzew24fKycpk4EJBGFgjzMmy2T73-j18/s817/bheeka%20jee.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;817&quot; data-original-width=&quot;640&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiVRHJybldiw-gUaIwDoy8yIyuvNiNNP_4A_VHGvMnyHUhRYdzgeonY9PbrnybBch5Ycfz9EPz1LByYKGr7eFbyZp9m19yHL3SWOZPhMT3Puu-Igs4yL3oJIZ0WCZiW3PpYjsQeq7hB4VPZKLZ72M5W2dO5g_SKzew24fKycpk4EJBGFgjzMmy2T73-j18/s320/bheeka%20jee.jpg&quot; width=&quot;251&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;15 अगस्‍त करीब है. 15 अगस्‍त यानी हमारे देश की आजादी का दिन. वह दिन जब लाखों स्‍वतंत्रता सेनानियों का स्‍वप्‍न साकार हुआ था. वह क्षण जब भारत माता गुलामियों की बेडि़यों से मुक्‍त हुई थी. मुक्ति का वह पल जिसे देखने का स्‍वप्‍न लिए लाखों क्रांतिकारी, स्‍वतंत्रता संग्रामी सेनानी ताउम्र संघर्ष करते रहे. वह पल जिसे देखना सबसे बड़ा लक्ष्‍य था और हजारों सेनानियों ने इस लक्ष्‍य को पाने के लिए अपने जीवन की आहूति दे दी. ऐसी ही थी मैडम भीकाजी रूस्‍तम कामा. 13 अगस्‍त उनके देहांत की तारीख है मगर उनकी मृत्‍यु के 11 साल बाद 15 अगस्‍त को देश ने वह पल देखा जिसके लिए मैडम भीकाजी कामा ने जीवन समर्पित किया. वे वही महिला हैं जिन्‍होंने देश की आजादी का स्‍वप्‍न लिए पहली बार तिरंगा फहराया और विदेशों में भारत की गुलामी की सच्‍चाई बता कर भारत के पक्ष में जनमत बनाने का बेहद महत्‍वपूर्ण कार्य किया. उनकी पुण्‍यतिथि उनके जीवन और पहले तिरंगे को फहराने की गाथा जानने का दिन है.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मुंबई निवासी एक पारसी परिवार सोहराब जी के घर में 24 सितंबर 1861 को जन्‍मी बालिका का नाम भीकाजी रखा गया था.. बचपन में भीकाजी को मुन्‍नी कह का पुकारा जाता था और बाद में वे पूरी दुनिया में भारत की स्‍वतंत्रता की उद्घोषक बनी तो मैडम कामा कहलाईं. वे बचपन से ही कुशाग्र थीं और स्‍वतंत्रता आंदोलन में रूचि लेती थीं. देशभक्ति की उनकी बातें तथा क्रियाकलापों से भयभीत हो कर उनके पिता ने 3 अगस्त 1885 को उनका विवाह मुंबई के प्रसिद्ध वकील रुस्तम जी कामा से कर दिया. पिता ने सोचा था कि विवाह के बाद भीकाजी का मानस बदल जाएगा और वे ब्रिटिश सरकार विरोधी गतिविधियों से दूर हो जाएंगी. मगर वैवाहिक जीवन में तो कुछ और लिखा था. भीकाजी देश की मुक्ति के स्‍वप्‍न देख रही थीं ज‍बकि उनके पति वकील रुस्तम जी कामा उनसे एकदम उलट विचार व स्वभाव वाले व्यक्ति थे. वे ब्रिटिश सरकार के प्रति गहरी आस्था रखते थे. पति-पत्नी के विचार व दृष्टिकोण एकदम विपरीत थे. एक था अंग्रेजों का कट्टर समर्थक व दूसरा उनका तगड़ा विरोधी. विचारों का अंतर दोनों के दांपत्‍य में कांटें बिछाने लगा लेकिन मैडम कामा ने किसी तरह का समझौता नहीं किया बल्कि वे अधिक गंभीरता से ब्रिटिस सरकार विरोधी गतिविधियों में हिस्‍सा लेने लगीं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वर्ष 1896 में मुंबई में प्‍लेग ने हजारों लोगों को अपनी चपेट में ले लिया. भीकाजी कामा भी पीडि़तों की सेवा में जुट गईं. जाहिर है, बीमारों की सेवा करते करते वे भी प्‍लेग की चपेट में आनी थी. ऐसा हुआ और उनकी तबियत बिगड़ी और फिर मित्रों की सलाह और दबाव पर वे उपचार करवाने यूरोप गईं. उनका यूरोप जाना उपचार के लिए था मगर देश स्‍वतंत्रता की गतिविधियों वहां भी कम नहीं हुईं. उन्‍होंने यूरोपीय देशों में भारत की गुलामी की हकीकत उजागर करनी शुरू की.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अगस्त 1907 में मैडम कामा को पता चला कि जर्मनी स्थित स्टुटगार्ट में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन का आयोजन हो रहा है. सम्‍मेलन में विभिन्न देशों के हजारों प्रतिनिधि भाग ले रहे थे. भीकाजी को पूरी दुनिया के सामने पराधीन भारत की वास्‍तविक स्थिति को उजागर करने तथा देश की मुक्ति के लिए विश्व जनमत जुटाने का यह बेहतर अवसर प्रतीत हुआ. वे सम्‍मेलन में पहुंची और भारतीय परिधान साड़ी पहन कर जब वे मंच पर पहुंची तो उनके व्‍यक्तित्‍व की आभा से मंच दमक उठा. ‘मैडम कामा’ पुस्‍तक में लिखा है कि इस सम्‍मेलन में मैडम कामा ने कहा कि मां भारती के शिशु अंग्रेजों के अत्याचार व अपमान तले रौंदे जा रहे हैं. जो असहाय नीचे ही नीचे धंसते जा रहे हैं, उन्हें स्वराज्य की सुखद स्थिति की ओर बढ़ाओ. आगे बढ़ो! हम भारत के लिए और भारत भारतीयों के लिए यही हमारा ध्येय सूत्र है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वे यूरोप के साथ ही दुनिया के अनेक देशों में पहुंचती और भारत की स्‍वतंत्रता के लिए पहल करती. वे जहां भी भाषण देती देशवासियों को संगठित होकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रहीं। उनका संदेश था- ‘जाति का प्रश्न हमारी राह में नहीं आना चाहिए। हम सब भारतीय एक ही परिवार के हैं।’ वह चाहती थी कि भारतीयों में भाईचारे की भावना प्रबल होकर एकता स्थापित हो. वह चेतावनी देती थीं कि अंग्रेजों द्वारा दिया गया कोई भी काम या पद, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, कतई स्वीकार न किया जाए. उन्होंने आह्वान किया कि लोग अपने संसाधनों के सहारे ही जीना सीखें. अपने वाणिज्य, व्यापार, उद्योग, कला में भारतीयता को प्रोत्साहन देते हुए हर चीज को पूर्णतया भारतीय बना कर छोड़ें.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मैडम भीकाजी कामा ने अपने क्रांतिकारी विचारों को प्रचारित करने के लिए ‘वंदेमातरम्’ तथा ‘तलवार’ नामक पत्रों का सहारा लिया. उनके इन कार्यों को सम्‍मान देते हुए सहयोगी उन्हें ‘भारतीय क्रांति की माता’ मानते थे; जबकि अंग्रेज उन्हें कुख्यात महिला, खतरनाक क्रांतिकारी, अराजकतावादी क्रांतिकारी, ब्रिटिश विरोधी कहा करते थे. इतने परिश्रम और शारीरिक कष्‍ट के चलते वे बीमार रहने लगी. उनकी इच्‍छा थी कि वे अंतिम समय देश में व्‍यतीत करें. लेकिन ब्रिटिश सरकार तो उनसे भयभीत थी. अंग्रेज सरकार से अनुमति मिलती तभी वे भारत में प्रवेश कर सकती थीं. लंबी कानूनी व प्रशासनिक लड़ाई के बाद ब्रिटिश सरकार ने अनुमति दी लेकिन इस शर्त के साथ कि वे आजादी के संघर्ष में अब भाग नहीं लेंगी तथा क्रांतिकारियों से कोई संपर्क नहीं रखेंगी. मैडम कामा ने यह शर्त मानने से इंकार कर दिया मगर शुभचिंतकों ने आग्रह तथा दबाव डालकर उन्‍हें शर्त मानने को मजबूर कर दिया. वे कष्‍टप्रद समुद्री यात्रा कर वे अपने जन्मस्थल मुंबई पहुंची. बंदरगाह से उन्‍हें सीधे अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल में करीब आठ मा‍ह उनका इलाज चला और लेकिन तमाम उपचार उन्‍हें बचा नहीं सके और 13 अगस्त 1936 को उनका देहांत हो गया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत की स्‍वतंत्रता का स्‍वप्‍न पाले जीने वाली मैडम कामा ने पूरी दुनिया में जहां मौका मिला वहां भारत की स्‍वतंत्रता के लिए सहयोग का आह्वान किया. ऐसा ही एक दिन 22 अगस्त 1907 भी था जब जर्मनी में हुई इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांफ्रेंस में भीकाजी काम ने भारतीय स्वतंत्रता के ध्वज को फहरया था. यह भारत का ध्‍वज भी तिरंगा था लेकिन हमारे वर्तमान राष्‍ट्र ध्वज तिरंगे से जरा भिन्‍न था. संदर्भ बताते हैं कि भीकाजी द्वारा लहराए गए तिरंगे झंडे में तीन रंग हरा, पीला और लाल थे जो इस्लाम, हिंदुत्व और बौद्ध मत को प्रदर्शित कर रहे थे. ध्‍वज के बीच में देवनागरी लिपि में ‘वंदे मातरम्’ लिखा हुआ था. इस तरह मैडम कामा ने ख्‍याल रखा था कि ध्‍वज में देश की विभिन्न संस्‍कृतियों और धर्मों का प्रतिनिधित्‍व हो.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जर्मनी के स्टुटगार्ड में हुए ‘अंतर्राष्ट्रीय समाजवाद सम्मेलन’ में मैडम कामा ने यह तिरंगा झण्डा फहराते हुए अपील की थी:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;यह भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज है. इसका जन्म हो चुका है. हिन्दुस्तान के युवा वीर सपूतों के रक्त से यह पहले ही पवित्र हो चुका है. यहां उपस्थित सभी महानुभावों से मेरा निवेदन है कि सब खड़े होकर हिंदुस्‍तान की आजादी के इस ध्वज की वंदना करें।&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस भावुक अपील से प्रभावित हो कर वैश्विक समुदाय ने खड़े हो कर करतल ध्‍वनि से मैडम भीकाजी की भावनाओं से सहमति जताई. आजादी के बाद तिरंगे का रंग बदला, वंदेमातरम् की जगह पहले चरखा और फिर अशोक चक्र ने ली लेकिन भारत की एकता, अखंडता, विविधता की विशिष्‍टता के लिए देशभक्‍तों की भावनाओं में कोई अंतर नहीं आया. तिरंगा यात्राएं तथा तिरंगे को सलाम करने के लिए उठे हाथों के पीछे यही जज्‍बा है कि आजादी के मतवालों को याद कर आजादी को अखंड बनाए रखने का संकल्‍प दोहराया जा सके.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: #fefdfa; color: #333333; font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 पर 14 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/8251303690779888745/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_14.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/8251303690779888745'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/8251303690779888745'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_14.html' title='मैडम कामा: तिरंगे में राष्‍ट्रीय एकता का भाव और विदेश में भारत की आजादी का घोष'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' 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term="pankaj shukla"/><title type='text'> हमारी धर्म, संस्‍कृति, कला के प्रतीकों तक सिमट कर न रह जाएं हाथी</title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj-y_tCj4qeev8sNlQmtQaGlnulAYKYHQUFZxdD5pbZrmmumRD_RIyNjkFj1A1Ra8ZlVe_gZNHb8fgAkDH2J842hnUs-ByYt3WkYDdBsEuyAS49NfDZavA1gR93WPTkciidUdP-gSJqvJiJrLWXHH_fEof2LDrmo3h3sF0YyARHD-dOrd8QSa5SZOnHWzQ/s2048/elephant.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1407&quot; data-original-width=&quot;2048&quot; height=&quot;220&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj-y_tCj4qeev8sNlQmtQaGlnulAYKYHQUFZxdD5pbZrmmumRD_RIyNjkFj1A1Ra8ZlVe_gZNHb8fgAkDH2J842hnUs-ByYt3WkYDdBsEuyAS49NfDZavA1gR93WPTkciidUdP-gSJqvJiJrLWXHH_fEof2LDrmo3h3sF0YyARHD-dOrd8QSa5SZOnHWzQ/s320/elephant.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हाथी यानी गजराज हमारे इको सिस्‍टम का बेहद महत्‍वपूर्ण कड़ी है. यह हमारी पौराणिक आख्‍यानों, लोक कला और कथाओं, हमारी संस्‍कृति और साहित्‍य का अभिन्‍न हिस्‍सा है. प्रथम पूज्‍य कहे गए गणेश का रूप है गजानन. धैर्य और विवेक का प्रतीक ऐरावत हाथी देवराज इंद्र का वाहन है और ऐरावत समुद्र मंथन में से निकले 15 रत्‍नों में से 5 वां रत्‍न है. गीता में श्री कृष्‍ण कहते हैं कि वे हाथियों में ऐरावत हैं. सौंदर्य की प्रशंसा में नायिका गजगामिनी संबोधित की गई है. हिंदू धर्म में गजलक्ष्‍मी को राजलक्ष्‍मी की संज्ञा दी गई है.&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बौद्ध धर्म में हाथी मानसिक दृढ़ता और बुद्ध के गर्भ में आने के प्रतीक हैं. हिंदू मंदिरों और बौद्ध गुफाओं में हाथी उकेरे गए हैं. मध्‍य प्रदेश में भोपाल के पास भीमबेटका गुफाएँ हाथियों की सबसे पुरानी पेंटिंग हैं, जो लगभग 10,000 वर्ष पुरानी बताई जाती हैं. मुंबई के पास घारापुरी द्वीप को एलीफेंटा गुफाओं के नाम से जाना जाता है. हाथी की नक्काशी और अकेली हाथी की मूर्तियां उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर और दक्ष प्रजापति मंदिर जैसे स्‍थलों पर पाई जाती हैं. ‘हस्ती आयुर्वेद’ एक ग्रंथ है जो हाथियों का आयुर्वेद है. इसे गजयुर्वेद या गजचिकित्सा कहा जाता है जो हाथियों की विभिन्न बीमारियों के उपचार की विधियां बताता हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;विस्‍तार दिया जाए तो कई संदर्भ और प्रतीक का उल्लेख किया जाएगा. मगर मुद्दा कुछ ओर है. इस सबको बताने के पीछे लक्ष्‍य है कि हाथी यानी गजराज हमारे जीवन का हिस्‍सा रहे हैं, इतना महत्‍वपूर्ण अंग कि उनकी उपस्थिति हमारे धर्म, कला-संस्‍कृति, साहित्‍य व आर्थिकी में विशिष्‍ट रही है. अब भय लग रहा है कि शक्ति, धैर्य, विवेक के प्रतीक गज कहीं वास्‍तव में ही प्रतीक बन कर ही न रह जाएं. इनकी सिमटी संख्‍या यह भय पैदा कर रही है. ये चिंताएं और भय केवल भारत की ही नहीं है बल्कि पूरी दुनिया की हैं. तभी 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय हाथी दिवस मनाया जाता है. यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे धर्म, हमारी कहानियों और हमारे लिए प्रतीक हाथी को बचाने के प्रयास तेज करना है. इस दिन की शुरुआत 2012 में कनाडाई पेट्रीसिया सिम्स और थाईलैंड के एलिफेंट रीइंट्रोडक्शन फाउंडेशन की एचएम क्वीन द्वारा की गई थी. हर साल की तरह 12 अगस्त को एक नई योजना, एक नए रोडमैप के साथ हाथी बचाने की पहल पर बल दिया जाता है. विश्‍व हाथी दिवस 2023 की थीम ‘वन्‍य प्राणियों के अवैध व्‍यापार पर रोक’ लगाना है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हाथी के संरक्षण की पहल कितनी महत्‍वपूर्ण है यह इस बात से समझा जा सकता है कि हर साल 16 अप्रैल को विश्‍व हाथी बचाओ दिवस मनाया जाता है. कोशिश यही है कि पूरी दुनिया हाथी महत्‍ता को जाने तथा उन्‍हें बचाने के जतन करें. अन्‍य लुप्‍त होते वन्‍य प्राणियों की तरह ही हमारे विकास ने हाथियों के अस्तित्‍व को संकट में डाला है. वनों में बढ़ते अतिक्रमण तथा वन संसाधनों पर शहरी इंसान के कब्‍जे ने वन प्राणियों के लिए खतरा बढ़ा दिया है. इस तरह पिछले कुछ सालों में एशियाई हाथियों का आवास भी कम हुआ और हाथी दांत के लिए हाथियों का शिकार भी खूब हुआ. जरा सर्च करें तो पाएंगे कि 1980 में एशिया में लगभग 93 लाख हाथी थे और अब इनकी संख्‍या लगातार घट रही है. एक साल पहले तक यह संख्‍या कम हो कर 50 हजार तक पहुंच गई है. इनमें से भी 55 फीसदी हाथी यानी 27 हजार हाथी भारत में हैं. भारत में हाथियों के रहवासी स्थल 10 हैं. ये 27 हजार से अधिक हाथी 15 राज्यों में 10 रहवास क्षेत्रों तथा 33 हाथी अभयारण्यों में रहते हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत के लिहाज से देखें तो इंसान हाथियों के प्राकृतिक आवास क्षेत्र में बस गए हैं और बेदखल कर दिए गए हाथी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गोवा और मध्य प्रदेश के उन क्षेत्रों चले गए जहां उनका पारंपरिक आवास नहीं है. स्‍वाभाविक है कि इंसान के साथ उनका संघर्ष होगा. अध्‍ययन बताते हैं कि अपने मुख्‍य आहार वाली वनस्‍पतियों के खत्‍म होने के कारण भोजन और पानी की तलाश हाथी एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पहुंच गए हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अपना प्राकृतिक आवास छिन लिए जाने से हाथी का स्‍वभाव भी बदलता जा रहा है. वे उन स्‍थलों पर ठहर जाते हैं जहां उन्‍हें अपने खाने लायक वनस्‍पति और रहने को जगह मिलती है। छत्‍तीसगढ़ और मध्‍य प्रदेश का सीमावर्ती क्षेत्र हाथियों के इसी बदले स्‍वभाग का गवाह बन रहा है. हाथियों के झुंड के आने से किसानों की फसलें बर्बाद होती है तो उनसे बचने के लिए शोर किया जाता है. और जब किसानों का धैर्य टूटने लगता है तो वे करंट के तार बिछा कर हाथियों को भगाने का जतन करते हैं. नजीतन आंकड़ें बताते हैं कि पिछले दस सालों में करंट लगने के कारण हमारे देश में ही 482 हाथियों की मौत हुई है. पहले हमने पालतू हाथी को अपने महावत के साथ शहरों-गांवों में घूमते देखा है. मगर अब आंकड़ें बताते हैं कि इंसानों और हाथियों के संघर्ष में अधिकांश जान महावत की जाती है. वह महावत जो हाथी के साथ सबसे ज्‍यादा समय गुजारता है. इसका कारण यह है कि महावतों को हाथी के साथ रहने या उसे पालने का कुशल पता नहीं होता. हाथी के पालन और देखरेख का कौशल समय के साथ लुप्‍त होता जा रहा है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हाथी के संरक्षण की फिक्र कर रहे प्रकृति प्रेमी पिछले दिनों सरकार के उस निर्णय से चिंतित हो गए है जिसमें वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलिफैंट को एक कर दिया है. अब दोनों प्रोजेक्‍ट ‘प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलिफैंट डिवीजन’ नामक नए डिवीजन के तहत मिला दिया गया है. यह प्रस्‍ताव 2011 में भी लाया गया था. तब राष्ट्रीय वन्यजीव स्थायी समिति के विशेषज्ञों की आपत्तियों के बाद इस प्रस्‍ताव को रोक दिया गया था. अब इसे लागू कर दिया गया है. यह बात अच्‍छी है कि प्रोजेक्‍ट टाइगर ने बेहतर सफलता प्राप्‍त की है और देश में बाघ की तादाद 2010 की 1706 बाघ की तुलना में 2023 में बढ़ कर 3167 हो गई है लेकिन फिक्र तो हाथी की है. चिंता का कारण यह है कि बाघ संरक्षण के लिए धन आवंटन 2018-19 से घट रहा है. अब दोनों प्रोजेक्‍ट को मिला देने से भय है कि हाथी के संरक्षण का पैसा प्रोजेक्ट टाइगर पर खर्च होने लगेगा. धन के बंटवारे में अंतर के अलावा वन्य प्राणी विशेषज्ञों का तर्क है कि बाघ और हाथी दोनों की प्रकृति अलग है और दोनों ही प्रोजेक्ट्स के लक्ष्‍य व चुनौतियां अलग-अलग हैं. उन्हें एक साथ मिला देने से दोनों के ही संरक्षण के प्रयासों को नुकसान पहुंचेगा.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सहअस्तिव के दर्शन को मानने वाले देश भारत में हमें हाथी जैसे बड़े प्राणी के रहने तथा खाने की फिक्र करनी होगी. यह दुर्भाग्‍य है कि वन्‍य प्राणियों को लुप्‍त होने से बचाने के लिए प्रोजेक्‍ट चलाने पड़ रहे हैं लेकिन केवल प्रोजेक्‍ट चलाने और संख्‍या बढ़ा देने से काम नहीं चलेगा. यदि ऐसे प्रोजेक्‍ट सफलता के बाद वन्‍य प्राणी बढ़ते हैं तो उनके जिंदा रहने की फिक्र भी करनी होगी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: #fefdfa; color: #333333; font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 पर 12 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/3379385074303299799/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_12.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/3379385074303299799'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/3379385074303299799'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_12.html' title=' हमारी धर्म, संस्‍कृति, कला के प्रतीकों तक सिमट कर न रह जाएं हाथी'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjUTsqKp_EkhiTORNRORPRG9PEbIHLXsXUc6IU8ofwo9kSXQRwNxY_GrDyTr4eknJ2vleOf8F0NUnY6KhQ-bvnae0v8KfS-9slYZMX5Ney9pXtJQX3yrB55HRUuynUhR6oK0DXEU3CDUNhf_0eyH3Z_O8gO642gYj6PPY-A8FkHF2v6nhvquqAbv4GDlvA/s1200/rahat-indori.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1000&quot; data-original-width=&quot;1200&quot; height=&quot;267&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjUTsqKp_EkhiTORNRORPRG9PEbIHLXsXUc6IU8ofwo9kSXQRwNxY_GrDyTr4eknJ2vleOf8F0NUnY6KhQ-bvnae0v8KfS-9slYZMX5Ney9pXtJQX3yrB55HRUuynUhR6oK0DXEU3CDUNhf_0eyH3Z_O8gO642gYj6PPY-A8FkHF2v6nhvquqAbv4GDlvA/s320/rahat-indori.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;फूलों की दुकानें खोलो, खुशबु का व्यापार करो&lt;/b&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इश्क खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ऐसी शायरी लिखने और उसे पढ़ने के अपने अलहदा अंदाज के कारण मुशायरा लूट लेने वाले शायर राहत इंदौरी अब नहीं हैं. यूट्यूब, फेसबुक, इंस्‍टा और रील्‍स वाली सोशल मीडिया की दुनिया को यह अहसास नहीं है, मगर मुशायरों के श्रोता तो आज अपने महबूब शायर का न होना शिद्दत से महसूस करते हैं. वे उस अंदाज को याद करते हैं जो शायरी को हर्फ से आगे ले जाकर श्रोताओं के अनुभव से जोड़ा देता था. आसमान में देख कर शायरी पढ़ने का वह अंदाज, आवाज में उतार-चढ़ाव का वह जादू और आम शब्‍दों की कारीगरी ऐसी कि वे होते थे तो बस वे ही होते थे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राहत साहब की याद आने पर इंटरनेट पर पड़े ढ़ेरों वीडियो को देख-सुना जा सकता है मगर देश-दुनिया में मुझ जैसे लाखों श्रोता हैं जो मुशायरों में उनका न होना मिस करते हैं. वे जो हर वाकये पर सोचते हैं कि वे होते को क्‍या लिखते? रंग बदलती दुनिया में नए चेहरे पर उनका तंज क्‍या होता? राजनीति और मोहब्‍बत के रूख पर उनका नया लिखा कैसा होता? साल 2020 में 11 अगस्‍त की वह शाम थी जब राहतें बांटने वाला जिंदादिल शायर इस दुनिया से रूखसत हो गया था. कोरोना से जो हमें गहरे जख्‍म दिए हैं उनमें एक यह जख्‍म भी है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को इंदौर में हुआ था. उनके पिता रफ्तुल्लाह कुरैशी कपड़ा मिल के कर्मचारी थे. परिवार की आर्थिक हालत को देखते हुए राहत ने 10 साल की उम्र में ही उन्होंने साइन बोर्ड बनाने शुरू कर दिए थे. यही वह दौर था जब वे शायरी की ओर आकर्षित हुए. उनके शायर बनने की कहानी भी कई बार बताई गई है. सड़कों पर साइन बोर्ड लिखने का काम था तो जाहिर उनकी लिखावट सुंदर थी. एक मुशायरे के दौरान उनकी मुलाकात मशहूर शायर जां निसार अख्तर से हुई. जां निसार अख्‍तर से ऑटोग्राफ लेते वक्त राहत ने शायर बनने की ख्‍वाहिश जताई तो जां निसार अख्तर ने कहा कि पहले 5 हजार शेर याद कर लें फिर वे खुद ब खुद शायरी लिखने लगेंगे. राहत इंदौरी ने तुरंत बताया कि उन्‍हें 5 हजार शेर तो पहले से ही याद है. इस पर जां निसार अख्तर ने जवाब दिया कि फिर देर किस बात की है, तुम तो शायर हो, संभालो स्टेज.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह प्रेरणा काम कर गई और वे शायरी करने लगे. साथ ही साथ उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से 1973 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तमाम बड़े शायरों के बीच राहत इंदौरी ने अपनी लेखनी से ही नहीं बल्कि मुशायरा पढ़ने के अपने अंदाज से भी अपनी खास पहचान बनाई और प्रसिद्धि पाई. उनका अंदाज ऐसा था जैसे वे शायरी नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि एक कुशल पेंटर है जो चित्र बना रहा है. उनके शब्‍द श्रोताओं के ख्‍याल में दृश्‍य बनाने लगते थे. कई लोगों ने राहत इंदौरी के इस अंदाज की नकल करने की कोशिश की लेकिन श्रोताओं ने सभी को नकार दिया. कोई भी उनकी तरह नकल कर शायरी पढ़ता है तो राहत ही याद आते हैं और इस तरह उनकी नकल करने की कोशिश विफल प्रयास साबित होती है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राहत इंदौरी की शायरी केवल मंच पर ही नहीं पढ़ी गई बल्कि वह कई-कई जगह छापी गई है. विद्यार्थियों ने इस शायरी को जान-समझ कर लिखने के सबक याद किए हैं. देश-दुनिया के मुशायरों और कवि सम्‍मेलनों में उनकी शायरी चाव से सुनी गई तो बॉलीवुड क्‍यों पीछे रहता भला? ‘बेगम जान’, ‘मर्डर’, ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’, ‘मिशन कश्मीर’, ‘इश्क’, ‘घातक’, ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ जैसी ख्‍यात फिल्‍मों के गीत राहत इंदौरी ने लिखे हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालांकि, राहत इंदौरी ने अपनी शायरी में अपने वक्‍त के मिजाज पर खूब तंज किए हैं. उनकी शायारी सामाजिक, राजनीतिक स्थितियों पर गहरी नजर रखती है फिर भी उर्दू शायरी तो मोहब्‍बत की जुबां है और राहत इंदौरी की शायरी इससे जुदां नहीं है. राहत इंदौरी की पुण्‍यतिथि पर उनकी शायरी के मुख्‍तलिफ रंग को देखना सुकूनबख्‍श काम होगा.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पर&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उस की याद आई है सांसों जरा आहिस्ता चलो&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मुंतजि‍र हूं कि सितारों की जरा आंख लगे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;चांद को छत पे बुला लूंगा इशारा कर के.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फूंक डालूंगा किसी रोज मैं दिल की दुनिया&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ये तिरा खत तो नहीं है कि जिला भी न सकूं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दोस्ती जब किसी से की जाए&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दुश्मनों की भी राय ली जाए.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मैं इंतिजार में हूं तू कोई सवाल तो कर&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यकीन रख मैं तुझे ला-जवाब कर दूंगा.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;महकती रात के लम्हों नजर रखो मुझ पर&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;बहाना ढूंढ़ रहा हूं उदास होने का.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कहां हो आओ मिरी भूली-बिसरी यादो आओ&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;खुश-आमदीद है मौसम उदास होने का.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;अभी गनीमत है सब्र मेरा, अभी लबालब भरा नहीं हूं मैं&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;वो मुझको मुर्दा समझ रहा है, उसे कहो मरा नहीं हूं मैं.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अड़े थे जिद पे के सूरज बनाके छोड़ेंगे&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पसीने छूट गए एक दीया बनाने में.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मेरी निगाह में वो शख्स आदमी भी नहीं&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जिसे लगा है ज़माना खुदा बनाने में.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ये चंद लोग जो बस्ती में सबसे अच्छे है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इन्ही का हाथ है मुझको बुरा बनाने बनाने.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मैं मर जाऊं तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: #fefdfa; color: #333333; font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 पर 11 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/6421545390816826295/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_11.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/6421545390816826295'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/6421545390816826295'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_11.html' title='राहत इंदौरी: वे होते थे तो बस वे ही होते थे'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgVeBrSQ7qsueq-nnd-b0BXonkzxwQSa7R4n15rYzjaDo6ykbIvEmT5nBFxV_rSsheNlE6_WrxXCz6irAGgcfxl46IpaoBZCZQyqcYw7ed-bgNRyTE5DcSwr0RIhLbyVQYMlJp45BMbDJlVfrdXCIp3KM5fqruE-gb7UdBJ5AW-NTLbkxGg4yQbevhvJak/s290/august%20kranti.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;174&quot; data-original-width=&quot;290&quot; height=&quot;192&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgVeBrSQ7qsueq-nnd-b0BXonkzxwQSa7R4n15rYzjaDo6ykbIvEmT5nBFxV_rSsheNlE6_WrxXCz6irAGgcfxl46IpaoBZCZQyqcYw7ed-bgNRyTE5DcSwr0RIhLbyVQYMlJp45BMbDJlVfrdXCIp3KM5fqruE-gb7UdBJ5AW-NTLbkxGg4yQbevhvJak/w320-h192/august%20kranti.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;9 अगस्‍त भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह ऐतिहासिक दिन है जब देश ने एक हो कर हुंकार भरी थी- क्विट इंडिया, अंग्रेजों भारत छोड़ो. ब्रिटिश साम्राज्‍य को उखाड़ फेंकने की जो कोशिश कई-कई आंदोलनों के जरिए की जा रही थी वह अंतत: उस आंदोलन पर आ कर टिक गई जिसे में अगस्‍त क्रांति कहते हैं. गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा देकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए पूरे भारत के युवाओं का आह्वान किया था.&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;साल था 1942 और स्‍थान था मुंबई का गोवालिया पार्क जिसे बाद में अगस्‍त क्रांति मैदान नाम दिया गया. इस आंदोलन की नींव 4 जुलाई 1942 को पड़ी थी जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर निर्णय लिया कि कि दूसरे विश्‍व युद्ध के समय किया वादा पूरा नहीं होता है और अंग्रेज भारत छोड़ कर नहीं जाते हैं तो देश भर में नागरिक अवज्ञा आंदोलन किया जाएगा. तथ्‍य बताते हैं कि इस निर्णय पर कांग्रेस में दो मत थे. कांग्रेसी नेता चक्रवर्ती गोपालाचारी इसके पक्ष में नहीं थे. विरोध करते हुए उन्‍होंने पार्टी छोड़ दी. वहीं सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अशोक मेहता और जयप्रकाश नारायण ने इस प्रस्‍ताव का समर्थन किया. मुस्लिम लीग, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा इस आंदोलन में कांग्रेस के साथ नहीं आए.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गांधी जी द्वारा तय दिशा के अनुसार आंदोलन की रूपरेखा बनी और 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू करने का निर्णय ले लिया. 9 अगस्‍त की सुबह से ही कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं मगर गांधी जी के भाषण से मिली ऊर्जा पूरे देश में फैल गई और लगभग पूरे देश ने एक स्‍वर में कहा, अंग्रेजों भारत छोड़ो.कांग्रेस समिति में दिया गया गांधी जी का भाषण इस‍ लिहाज से बेहद महत्‍वपूर्ण है. गांधी जी ने अपने भाषण में कुछ बातें साफ करना चाही थीं और कहा था कि कई लोग मुझसे यह पूछते है की क्या मैं वही इंसान हूं जो मैं 1920 में हुआ करता था, और क्या मुझमे कोई बदलाव आया है. मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि मैं वही मोहनदास गांधी हूं जैसा मैं 1920 में था.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गांधी जी ने 1920 का जिक्र इसलिए किया क्‍योंकि 1 अगस्‍त 1920 को असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ था. इसके पहले 1919 में जलियांवाला बाग हत्‍याकांड हो चुका था. कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 4 सितंबर 1920 को आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ. जनता से आग्रह किया गया था कि वे स्कूलो, कॉलेजो और न्यायालय न जाएं तथा अंग्रेजों का कर न चुकाएं. सभी अंग्रेज सरकार के साथ असहयोग करें. गांधी जी का मानना था कि यदि असहयोग का ठीक ढंग से पालन किया जाए तो भारत एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त कर लेगा. लेकिन फरवरी 1922 में किसानों के एक समूह ने गौरखपुर जिले के चौरी चौरा में एक पुलिस थाने में आग लगा दी. इस अग्निकांड में कई पुलिस वालों की जान चली गई. हिंसा भड़कने पर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन तत्काल वापस लेना पड़ा. उन्होंने जोर दिया कि, ‘किसी भी तरह की उत्तेजना को निहत्थे और एक तरह से भीड़ की दया पर निर्भर व्यक्तियों की घृणित हत्या के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है’.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसीलिए 1920 का जिक्र कर भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान करते हुए गांधी जी ने साफ किया था कि वे हिंसा से उतनी ही नफरत करता हैं जितनी 1920 में किया करते थे. उन्‍होंने कहा कि मेरे वर्तमान प्रस्ताव और पहले के लेख और स्वभाव में कोई विरोधाभास नही है. मैं चाहता हूं कि आप सभी इस बात को जाने कि अहिंसा से ज्यादा शुद्ध और कुछ नहीं है, इस बात को मैं आज कह भी रहा हूं और अहिंसा के मार्ग पर चल भी रहा हूं. हमारी कार्यकारी समिति का बनाया हुआ प्रस्ताव भी अहिंसा पर ही आधारित है और हमारे आंदोलन के सभी तत्व भी अहिंसा पर ही आधारित होंगे. भगवान ने मुझे अहिंसा के रूप में एक मूल्यवान हथियार दिया है. मैं और मेरी अहिंसा ही आज हमारा रास्ता है. यदि आप में से किसी को भी अहिंसा पर भरोसा नहीं है तो कृपया करके इस प्रस्ताव के लिये वोट ना करें.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;‘करो या मरो’ का नारा देते हुए गांधी जी ने कहा था कि अब मुझे डरने की बजाए आगे देखकर बढ़ना होगा. हमारी यात्रा ताकत पाने के लिए नहीं बल्कि भारत की आजादी के लिए अहिंसात्मक लड़ाई के लिए है. हिंसात्मक यात्रा में तानाशाही की संभावनाएं ज्यादा होती है जबकि अहिंसा में तानाशाही के लिए कोई जगह ही नही है. एक अहिंसात्मक सैनिक खुद के लिये कोई लोभ नही करता, वह केवल देश की आजादी के लिये ही लड़ता है. कांग्रेस इस बात को लेकर बेफिक्र है की आजादी के बाद कौन शासन करेगा. आजादी के बाद जो भी ताकत आएगी उसका संबंध भारत की जनता से होगा और भारत की जनता ही ये निश्चित करेंगी की उन्हें ये देश किसे सौपना है. हो सकता है कि भारत की जनता अपने देश को पेरिस के हाथों सौंपे. कांग्रेस सभी समुदायों को एक करना चाहती है ना कि उनमें फुट डालकर विभाजन करना चाहती है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आजादी के बाद भारत की जनता अपनी इच्छानुसार किसी को भी अपने देश की कमान संभालने के लिये चुन सकती है और चुनने के बाद भारत की जनता को भी उसके अनुरूप ही चलना होंगा. मैं जानता हूं कि अहिंसा परिपूर्ण नहीं है और ये भी जानता हूं कि हम अपने अहिंसा के विचारों से फि‍लहाल कोसों दूर है लेकिन अहिंसा में ही अंतिम असफलता नहीं है. मुझे पूरा विश्वास है, छोटे-छोटे काम करने से ही बड़े-बड़े कामों को अंजाम दिया जा सकता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गांधी जी ने कार्यसमिति में कहा था कि मेरा इस बात पर भरोसा है कि दुनिया के इतिहास में हमसे बढ़कर और किसी देश ने लोकतांत्रिक आजादी पाने के लिये संघर्ष किया होगा. मेरा इस बात पर पूरा विश्वास है की जब हिंसा का उपयोग कर आजादी के लिये संघर्ष किया जाएगा तब लोग लोकतंत्र के महत्त्व को समझने में असफल होंगे. जिस लोकतंत्र का मैंने विचार कर रखा है, उस लोकतंत्र का निर्माण अहिंसा से होगा, जहां हर किसी के पास समान आजादी और अधिकार होंगे. जहां हर कोई खुद का शिक्षक होंगा और इसी लोकतंत्र के निर्माण के लिए आज मै आपको आमंत्रित करने आया हूं. एक बार यदि आपने इस बात को समझ लिया तब आप हिंदू और मुस्लिम के भेदभाव को भूल जाओगे. तब आप एक भारतीय बनकर खुद का विचार रखोगे और आजादी के संघर्ष में साथ दोगे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गांधी जी यह विचार भी बेहद महत्‍वपूर्ण था कि कुछ लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद और ब्रिटिश लोगों के बीच के अंतर को भूल चुके है. उन लोगों के लिए दोनों ही एक समान है. उनकी यह घृणा जापानियों को आमंत्रित कर रही है. यह काफी खतरनाक होगा. इसका मतलब वे एक गुलामी की दूसरी गुलामी से अदला बदली करेंगे. हमें इस भावना को अपने दिलो दिमाग से निकाल देना चाहिए. हमारा झगडा ब्रिटिश लोगों के साथ नही हैं बल्कि हमें उनके साम्राज्यवाद से लड़ना है. ब्रिटिश शासन को खत्म करने का मेरा प्रस्ताव गुस्से से पूरा नही होने वाला. हम हमारे महापुरुषों के बलिदानों को नही भूल सकते हैं. मैं जानता हूं की ब्रिटिश सरकार हमसे हमारी आजादी छीन नहीं सकती लेकिन आजादी के लिए हमें एकजुट होना होगा. हमें खुद को घृणा से दूर रखना चाहिए.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस तरह भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई. पूरे देश ने ही गांधी जी के आह्वान को स्‍वीकार किया और अंतत: ब्रिटिश सरकार को देश छोड़ना पड़ा। लेकिन जाते-जाते वे घृणा और विद्वेष का ऐसा बीज बो गए जिसने देश को विभाजन की कगार पर पहुंचा दिया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;background-color: #fefdfa; color: #333333; font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 पर 9 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/7080883997025376215/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_9.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/7080883997025376215'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/7080883997025376215'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/blog-post_9.html' title='अगस्‍त क्रांति: गांधी जी रोक दिया था भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लेने से'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgHa3SMKAFCwIHP9PlPMVINvb_Una7c0Nw4VAzyMo-V7d5TRAAIysUCrGse55H9YaUebmzm4Z0AMcdIgUVyJuydkYnVNBCAWxbk0brLsxtu2YiA4JOQVkKbZDnMFGXpFVXaeMPmYvI15dA2_XaXNRCvR1QowsmapgE2QQ-R_l1FJ93rcqcdjWBLiRUB-Bw/s620/Oppenheimer.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;413&quot; data-original-width=&quot;620&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgHa3SMKAFCwIHP9PlPMVINvb_Una7c0Nw4VAzyMo-V7d5TRAAIysUCrGse55H9YaUebmzm4Z0AMcdIgUVyJuydkYnVNBCAWxbk0brLsxtu2YiA4JOQVkKbZDnMFGXpFVXaeMPmYvI15dA2_XaXNRCvR1QowsmapgE2QQ-R_l1FJ93rcqcdjWBLiRUB-Bw/w400-h266/Oppenheimer.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यह 1945 की बात है. 6 अगस्त 1945 की सुबह. वह सुबह जापान के शहर हिरोशिमा में रोज की तरह थी. मगर कुछ घंटों बाद यह सुबह और शहर दोनों ही दुनिया के सबसे त्रासद वक्‍त में तब्‍दील हो गए. मारियाना द्वीप से उड़ान भरकर पहुंचे अमेरिकी विमान ने जापान के इस शहर पर परमाणु बम गिरा दिया. यह दुनिया का पहला परमाणु बम विस्‍फोट था. 10 सेकंड में खुशहाल हिरोशिमा आग के शहर में बदल गया. 70,000 से अधिक लोग भस्‍म हो गए. दुनिया के इस कोने में मानवता का चीत्‍कार रही थी तो अमेरिका में बैठे रॉबर्ट ओपेनहाइमर जरूर खुश हुए होंगे. लेकिन अपने बम की सफलता की यह खुशी लाखों प्राणियों और प्रकृति के उजाड़ होने पर टिकी थी. कितने दिन टिकी रहती? वे कुछ ही समय में ग्‍लानि से भर गए और जब राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन से मिले तो ग्‍लानि में कहा मेरे हाथ खून से रंगे हुए हैं.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;6 अगस्‍त को हिरोशिमा दिवस है और हिरोशिमा को तबाह करने वाला परमाणु बम बनाने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर पर बनी फिल्‍म सफलता के कीर्तिमान छू रही है. इस बहाने से दोनों पर बात की जा सकती है और इस निष्‍कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि आविष्‍कार कितना ही अच्‍छा क्‍यों न हो यदि उसका उपयोग मानवता, प्रकृति और मूल्‍यों के खिलाफ हुआ है तो वह निकृष्‍टतम है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर का जन्म न्यूयॉर्क में 22 अप्रैल 1904 को हुआ था. महज 9 साल की उम्र से वह अलग-अलग भाषाओं के साहित्य पढ़ने लगे. विज्ञान में रूचि ने उन्‍हें वैज्ञानिक बना दिया. 1939 में जब दूसरा विश्‍व युद्ध शुरू हुआ तो सेकंड्स में विध्‍वंस के ख्‍याल ने जोर पकड़ा और इस दौड़ में आगे निकलने के लिए परमाणु बम की कोशिशें तेज हो गईं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1942 में अमेरिका ने मैनहट्टन जिले में परमाणु बम बनाने का कार्य ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ के नाम से शुरू किया. इस प्रोजेक्‍ट का नेतृत्‍व वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने किया. वैज्ञानिकों की रात दिन की मेहनत का परिणाम था कि तीन साल बाद अमेरिका परमाणु बम के पहले परीक्षण में सफल हुआ. 16 जुलाई 1945 की सुबह दुनिया का पहला परमाणु बम परीक्षण हुआ.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस परीक्षण के 22वें दिन अमेरिका ने जापान को कमजोर करने के लिए हिरोशिमा पर पहला परमाणु बम गिरा दिया. असल में, 1939 में शुरू हुए दूसरे विश्व युद्ध को छह साल हो चुके थे, लेकिन लड़ाई का अंत नजर नहीं आ रहा था. युद्ध में अमेरिका लगातार जापान पर बम गिरा रहा था. अगस्त 1945 तक अमेरिकी द्वारा की गई बममारी से 3 लाख से ज्‍यादा लोगों ने अपना जीवन खो दिया था. जापान लगातार हमले कर रहा था तब अमेरिका ने ये मान लिया कि सिर्फ पारंपरिक बमबारी के जरिए जापान झुकने वाला नहीं है तो जापान को क्षण में ध्‍वस्‍त करने के लिए परमाणु बम गिरा दिया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हिरोशिमा पर हमले के तीसरे दिन अमेरिका ने 9 अगस्त 1945 की सुबह 11 बजे जापान के नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया था. हजारों लोगों की जान एक क्षण में चली गई और भारी क्षति उठा कर जापान ने झुकना स्‍वीकार कर लिया. अमेरिका का प्रभुत्‍व स्‍थापित हुआ और दूसरा विश्व युद्ध समाप्‍त हुआ. परमाणु हमले के कई सालों बाद तक जापान के इन शहरों के आसपास के शहरों में परमाणु विकिरण के कारण दिव्‍यांग बच्चे पैदा होते रहे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;परमाणु विभीषिका झेलने के बाद जापान ने परमाणु शक्ति के शांतिपूर्ण इस्तेमाल और कभी परमाणु बम नहीं बनाने का संकल्प लिया, लेकिन दुनिया के तमाम दूसरे देशों ने परमाणु ताकत जुटाने की होड़ जगजाहिर है. 2020 में दुनियाभर में 3,720 परमाणु बम तैनात थे. 2021 में ये बढ़कर 3,825 हो गए थे. मतलब दुर्भाग्‍य से अब जो भी हिरोशिमा-नागासाकी होगा वह अधिक तबाही का गवाह बनेगा.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अब बात करते हैं ओपेनहामइर की. परमाणु बम से हुई मानवता की क्षति का दोष ओपेनहाइमर ने स्‍वयं पर लिया. इस आत्‍मग्‍लानि से उभरने में ‘भगवद् गीता’ उनका संबल बनी. उन्होंने एक बार कहा था कि परमाणु बम बनाते समय नतीजों को सोचकर जब वह डर जाते थे तो उनकी उलझन गीता से कम हो जाती थी. गीता में लिखी इस बात ने उन्हें काफी प्रोत्साहित किया कि- ‘कर्म किए जाओ फल की चिंता मत करो.’&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संदर्भ बताते हैं कि 1929 में ओपेनहाइमर जब अपने देश अमेरिका लौटे तो वह साहित्य और दर्शन की किताबें पढ़ने लगे थे. इसी समय उन्होंने भगवद् गीता भी पढ़ी थी. ओपेनहाइमर गीता पढ़कर काफी प्रभावित हुए थे. वह मानते थे कि इस किताब से उन्हें दार्शनिक सोच की बुनियाद मिली थी. वह जब भी उलझन में होते थे तो इससे उन्हें शांति मिलती थी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तथ्‍य यह भी कि परमाणु हमले के बाद जब अमेरिकी राष्ट्रपति के बुलावे पर ओपेनहाइमर उनसे मिलने राष्ट्रपति भवन गए तो ओपेनहाइमर ने राष्‍ट्रपति से कहा था कि वे महसूस करते हैं कि उनके हाथ खून से रंगे हुए हैं. हालांकि, राष्‍ट्रपति को उनकी यह बात पसंद नहीं आई और ओपेनहाइमर को कमजोर व भावनात्‍मक इंसान करार दे दिया गया. ओपेनहाइमर लगातार अमेरिकी सरकार के कदम का पुरजोर विरोध करते रहे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ओपेनहाइमर को सरकार के खिलाफ जाने की सजा मिली. 1954 में उन पर सोवियत रूस का जासूस होने का आरोप लगा. अमेरिकी सरकार ने उन्हें सिक्योरिटी क्लियरेंस अप्रूवल देने से मना कर दिया. उन्हें देश के टॉप साइंटिस्ट की लिस्ट से ब्लैकलिस्ट कर दिया गया. ओपेनहाइमर की बाकी की जिंदगी देशद्रोही और गद्दार के लांछन के साथ बीती.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;18 फरवरी 1967 को प्रिंसटन स्थित घर में गले के कैंसर से ओपेनहाइमर की मौत हो गई. मृत्यु से ठीक पहले 1966 में तत्‍कालीन राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन उन्हें एटॉमिक एनर्जी कमीशन का सर्वोच्च सम्मान एनरिको फर्मी अवॉर्ड से सम्मानित किया. आखिरकार ओपेनहाइमर के निधन के 55 साल बाद 2022 में अमेरिकी सरकार ने उनकी वफादारी पर मुहर लगाते हुए उनका सिक्योरिटी क्लियरेंस बहाल किया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;परमाणु बम के निर्माता ओपेनहाइमर और परमाणु बम के विध्‍वंस को झेल चुके जापान ने तो इसके विनाश को पहचाना और सबक लिए. गीता के मार्ग को हर कर्म का स्‍वीकृति मान लेना हमारी समझ का दोष हो सकता है, गीता दर्शन का नहीं। गीता हमें आत्‍म बंधन से मुक्‍त होना सीखाती है, तभी कहती है कर्म करो फल की चिंता न करो, लेकिन वह फल आपके हिस्‍से का परिणाम नहीं है, उस फल या परिणाम की चिंता तो करनी चाहिए जो मानवता के हिस्‍से में आता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/1847334983822320374/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/2023.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1847334983822320374'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1847334983822320374'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/08/2023.html' title='हिरोशिमा दिवस 2023: जापान और ओपेनहाइमर के सबक को भूला बैठी दुनिया'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiR5KSDuEPeRVgSH4rQlEsi-A14oSR8YB7PVjm0e2Qkmqmq_eMcI65NkEJ4kpjn1gbcD_NjDn5392J0aZzrvyFkOddxm5wHXiVtPfm_ZEkBskPT_ztj6GS7zUTGLFBMmfnHu_ZL-uvPo3f6V3y-FnGuglRGkXugrBV0oewohbIyvB5lslA/s220/pankaj%20shukla%20photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgHa3SMKAFCwIHP9PlPMVINvb_Una7c0Nw4VAzyMo-V7d5TRAAIysUCrGse55H9YaUebmzm4Z0AMcdIgUVyJuydkYnVNBCAWxbk0brLsxtu2YiA4JOQVkKbZDnMFGXpFVXaeMPmYvI15dA2_XaXNRCvR1QowsmapgE2QQ-R_l1FJ93rcqcdjWBLiRUB-Bw/s72-w400-h266-c/Oppenheimer.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9062801385297364864.post-6188195746952573050</id><published>2023-07-31T17:58:00.001+05:30</published><updated>2023-10-02T18:02:32.380+05:30</updated><title type='text'>प्रेमचंद: हिंदी वाले इन्‍हीं की बदौलत दूसरी भाषा वालों के सामने इठला सकते हैं</title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj4jHsrKcGm7RsO_GW3GDU1jd1mvgdrVTQxNR0o6ZbBt8rN8o8zL_mCcd9QicS8t9n49YDa4qE6F0M02R6wbbH5YMT__ke0lfSD5ZNB3f06CMk6aW-t3THClgILDa719SOUfGeKCccFW3k1c_4Fbcz2IPLHjGxfOZj4whxfe9s1LO7I6vZbwX74N8r6rN8/s275/PREMCHAND.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; display: inline !important; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em; text-align: center;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;183&quot; data-original-width=&quot;275&quot; height=&quot;266&quot; 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लिहाज से अपने समय से आगे थे और आज भी अधिक प्रासंगिक मालूम होते हैं. उनकी रचनाओं को पढ़ कर लगता ही नहीं है ये रचनाएं सौ साल पहले लिखी गई थीं. हमें यूं लगता है जैसे ये हमारे समय में ही लिखी गई हैं, हमारा वह समय जब नैतिकता, मूल्‍यों और मानवता का ह्रास हो रहा है. मुंशी प्रेमचंद के नाम से मशहूर साहित्‍यकार का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव है. 31 जुलाई 1880 को उत्‍तर प्रदेश के लमही में जन्‍मे प्रेमचंद का देहांत 8 अक्टूबर 1936 को हुआ. वर्ष 1901 से ही प्रेमचंद की साहित्यिक यात्रा आरंभ हो गई थी. शुरुआत में वो नवाब राय के नाम से उर्दू में लिखा करते थे. उनका पहला उर्दू उपन्यास “असरारे मआबिद” है यह धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ. 1908 में प्रकाशित पहला कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण था. अंग्रेज सरकार ने इस संग्रह को प्रतिबंधित कर सभी प्रतियां जब्त कर ली थीं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उन्‍हें भविष्य में न लिखने की हिदायत दी गई थी. यही कारण है कि उन्‍होंने अपना नाम बदल कर प्रेमचंद रख लिया था. 1918 में उनका पहला उपन्यास ‘सेवासदन’ प्रकाशित हुआ. लोकप्रिय हुए इस उपन्‍यास के बाद वे उर्दू के बाद हिंदी में समान रूप से ख्‍यात हो गए. प्रेमाश्रम, रंगभूमि, सेवासदन, निर्मला, कर्मभूमि, गोदान, गबन उपन्यास और पूस की रात, बड़े घर की बेटी, कफन, पंच परमेश्वर, दो बैलों की कथा, बूढी काकी जैसी कहानियां प्रेमचंद के रचना संसार की प्रतीक रचनाएं हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ऐसी रचनाएं जिनके संदर्भ में साहित्‍यकार बनारसी दास चतुर्वेदी ने कहा है कि हिंदी वाले उन्हीं की बदौलत आज दूसरी भाषा वालों के सामने मूंछों पर ताव दे सकते हैं. यद्यपि इस बात में संदेह है कि प्रेमचंद हिंदी भाषा-भाषी जनता में कभी उतने लोकप्रिय बन सकेंगे जितने कविवर मैथिलीशरण जी हैं. पर प्रेमचंद के सिवा भारत की सीमा उल्लंघन करने की क्षमता रखने वाला कोई दूसरा हिंदी कलाकार इस समय हिंदी जगत में विद्यमान नहीं. लोग उनको उपन्यास सम्राट कहते हैं, पर कोई भी समझदार आदमी उनसे दो ही मिनट बातचीत करने के बाद समझ सकता है कि प्रेमचंद में साम्राज्यवादिता का नामोनिशान नहीं है. कद के छोटे है, शरीर निर्बल-सा है. चेहरा भी कोई प्रभावशाली नहीं और श्रीमती शिवरानी देवी हमें क्षमा करें, यदि हम कहे कि जिस समय ईश्वर के यहां शारीरिक सौंदर्य बंट रहा था. प्रेमचंद जरा देर से पहुंचे थे. पर उनकी उन्मुक्त हंसी की ज्योति पर, जो एक सीधे-सादे सच्चे स्नेहमय हृदय से ही निकल सकती है, कोई भी सहदया सुकुमारी पतंगवत अपना जीवन निछावर कर सकती है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रेमचंद का संपूर्ण जीवन साहित्‍य को समर्पित था. उन्‍होंने खूब लिखा, तमाम विपरीत परिस्थि‍तियों में भी ‘हंस’ का संपादन किया. लेकिन इस संघर्षों तथा विपरीत स्थितियों का स्‍वयं के व्‍यक्तित्‍व पर असर नहीं पड़ने दिया. बनारसी दास चतुर्वेदी अपने संस्‍मरण में लिखते हैं, प्रेमचंदजी ने बहुत से कष्ट पाए हैं, अनेक मुसीबतों का सामना किया है, पर उन्होंने अपने हृदय में कटुता को नहीं आने दिया. वे शुष्क बनियापन से कोसों दूर रहे. प्रेमचंदजी में सबसे बड़ा गुण यही है कि उन्हें धोखा दिया जा सकता है. जब इस चालाक साहित्य-संसार में बीसियों आदमी ऐसे पाए जाते हैं, जो दिन-दहाड़े दूसरों को धोखा दिया करते हैं, प्रेमचंदजी की तरह के कुछ आदमियों का होना गनीमत है. उनमें दिखावट नहीं, अभिमान उन्हें छू भी नहीं गया और भारत व्यापी कीर्ति उनकी सहज विनमता को उनसे छीन नहीं पाई.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रख्‍यात लेखिका महादेवी वर्मा ने लिखा है, प्रेमचंद के व्यक्तित्व में एक सहज संवेदना और ऐसी आत्मीयता थी. जिस युग में उन्होंने लिखना आरंभ किया था, उस समय हिंदी कथा-साहित्य जासूसी और तिलस्मी कौतूहली जगत में ही सीमित था. उसी बाल-सुलभ कुतूहल में प्रेमचंद उसे एक व्यापक धरातल पर ले आए, जो सर्व सामान्य था. उन्होंने साधारण कथा, मनुष्य की साधारण घर-घर की कथा, हल-बैल की कथा, खेत-खलि-हान की कथा, निर्झर, वन, पर्वतों की कथा सब तक इस प्रकार पहुंचाई कि वह आत्मीय तो थी ही, नवीन भी हो गई.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रेमचंद के जीवन संघर्षों को कई साहित्‍यकारों ने करीब से देखा है और उनके व्‍यक्तित्‍व के प्रति आदर व्‍यक्‍त किया है. महादेवी वर्मा अपने संस्‍मरण में यही बात रेखांकित करती हैं. वे लिखती हैं कि प्रेमचंद ने जीवन के अनेक संघर्ष झेले और किसी संघर्ष में उन्होंने पराजय की अनुभूति नहीं प्राप्त की. पराजय उनके जीवन में कोई स्थान नहीं रखती थी. संघर्ष सभी एक प्रकार से पथ के बसेरे के समान ही उनके लिए रहे. वह उन्हें छोड़ते चले गए. ऐसा कथाकार जो जीवन को इतने सहज भाव से लेता है, संघर्षों को इतना सहज मानकर, स्वाभाविक मानकर चलता है, वह आकर फिर जाता नहीं. उसे मनुष्य और जीवन भूलते नहीं. वह भूलने के योग्य नहीं है. उसे भूलकर जीवन के सत्य को ही हम भूल जाते हैं. जिस पर उन्होंने विश्वास किया, जिस सत्य को उनके जीवन ने, आत्मा ने स्वीकार किया उसके अनुसार उन्होंने निरंतर आचरण किया. इस प्रकार उनका जीवन, उनका साहित्य दोनों खरे स्वर्ण भी हैं और स्वर्ण के खरेपन को जांचने की कसौटी भी है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;काम के प्रति प्रेमचंद का आग्रह कैसा था, यह बनारसीदास चतुर्वेदी के संस्‍मरण से ही समझा जा सकता है. वे लिखते हैं, यदि प्रेमचंद को अपनी डिक्टेटर शिवरानी देवी का डर न रहे तो वे चौबीस घंटे यही निष्काम कर्म कर सकते हैं. एक दिन बात करते-करते काफी देर हो गई घड़ी देखी तो पता लगा कि पौन दो बजे हैं. रोटी का वक्त निकल चुका था. प्रेमचंद ने कहा ‘खैरियत यह है कि घर में ऊपर घड़ी नहीं है, नहीं तो अभी अच्छी खासी डांट सुननी पड़ती. घर में एक घड़ी रखना, और सो भी अपने पास बात सिद्ध करती है कि पुरुष यदि चाहे तो स्त्री से कहीं अधिक चालाक बन सकता है और प्रेमचंद में इस प्रकार का चातुर्य बीजरूप में तो विद्यमान है ही.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बकौल बनारसीदास चतुर्वेदी प्रेमचंद में मानसिक स्फूर्ति चाहे कितनी ही अधिक मात्रा में क्यों न हो, शारीरिक फुर्ती का प्रायः अभाव ही है. यदि कोई भला आदमी प्रेमचंद तथा कथाकार सुदर्शन को एक मकान में बंद कर दे तो सुदर्शन तिकड़म भिड़ाकर छत से नीचे कूद पड़ेंगे और प्रेमचंद वही बैठे रहेंगे. यह दूसरी बात है कि प्रेमचंद वहां बैठे-बैठे कोई गल्प लिख डालें. जम के बैठ जाने में ही प्रेमचंद की शक्ति और निर्बलता का मूल स्रोत छिपा हुआ है. प्रेमचंद ग्रामों में जमकर बैठ गए और उन्होंने अपने मस्तिष्क के सुपरफाइन कैमरे से वहां के चित्र-विचित्र जीवन का फिल्म ले लिया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जीवित रहते हुए भी प्रेमचंद के नाम के साथ विवाद जुड़े थे, खासकर हंस के प्रकाशन के दौरान. उनके निजी जीवन पर भी तंंज किए गए.&amp;nbsp; आज भी प्रेमंचद और उनके साहित्‍य को तरह-तरह की दृष्टि से देखा जा रहा है. उनकी आलोचना की जा रही है मगर जो उन्‍होंने जिया और रचा है, वह आज के समय में भी एक व्‍यक्ति को ठीक एक समूह के बस की भी बात नहीं है. इसीलिए प्रेमचंद का लिखा हमें पसंद आता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;background-color: #fefdfa; color: #333333; font-family: Arial, Tahoma, Helvetica, FreeSans, sans-serif; font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/6188195746952573050/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/6188195746952573050'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/6188195746952573050'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/07/blog-post.html' title='प्रेमचंद: हिंदी वाले इन्‍हीं की बदौलत दूसरी भाषा वालों के सामने इठला सकते हैं'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiR5KSDuEPeRVgSH4rQlEsi-A14oSR8YB7PVjm0e2Qkmqmq_eMcI65NkEJ4kpjn1gbcD_NjDn5392J0aZzrvyFkOddxm5wHXiVtPfm_ZEkBskPT_ztj6GS7zUTGLFBMmfnHu_ZL-uvPo3f6V3y-FnGuglRGkXugrBV0oewohbIyvB5lslA/s220/pankaj%20shukla%20photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiPzxxmxjteTd5DPGiHiF7ptBeF1wCDO_WugRxRtouiWp3g64n_w3l4wd71-tROjZFFVrTNKBCzZ6o3iAuSIaFFEEUErnKAVWwryA44Hye_BDGAeTUyQrHgn-uFS93_bE_7u4jHRTuZ9SiK6GB3Aa_y2o9x41jKPLpev3lGFLRIWCwzUt25sxSohcOav5c/s1600/apj-abdul-kalam.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;960&quot; data-original-width=&quot;1600&quot; height=&quot;192&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiPzxxmxjteTd5DPGiHiF7ptBeF1wCDO_WugRxRtouiWp3g64n_w3l4wd71-tROjZFFVrTNKBCzZ6o3iAuSIaFFEEUErnKAVWwryA44Hye_BDGAeTUyQrHgn-uFS93_bE_7u4jHRTuZ9SiK6GB3Aa_y2o9x41jKPLpev3lGFLRIWCwzUt25sxSohcOav5c/s320/apj-abdul-kalam.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;वह 27 जुलाई 2015 की शाम थी. भारत के पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग में व्याख्यान दे रहे थे. इस दौरान उन्हें जोरदार कार्डियक अरेस्ट हुआ और वे बेहोश हो कर गिर पड़े. यह दिल का दौरा इतना ताकतवर था कि उन्‍हें बचाया नहीं जा सका. जीवन भर अपने कार्य के प्रति समर्पित और निष्‍ठावान रहे डॉ. कलाम का इस तरह सक्रिय रहते हुए निधन भी जैसे उनकी कर्मठता का अभिनंदन था. डॉ. कलाम को प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह (एस.एल.वी. तृतीय) प्रक्षेपास्त्र बनाने का श्रेय हासिल है. कलाम ने ही पोखरण में दूसरी बार परमाणु परीक्षण कर देश को परमाणु हथियार निर्माण की क्षमता दिलवाई. वे ऐसे तीसरे राष्ट्रपति हैं जिन्हें भारत रत्न से सम्‍मानित किया गया.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु में रामेश्वरम के धनुषकोडी गांव में जन्‍मे डॉ. कलाम का जीवन आसान नहीं रहा. मध्‍यमवर्गीय संयुक्‍त परिवार में जन्‍मे अबुल पाकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम के भारत रत्‍न डॉ. एपीजे अब्‍दुल कलाम बनने तक के सफर में अनेक मील के पत्‍थर हैं जो हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत हो सकते हैं. इस सफलता के पीछे के कारकों को उन्‍होंने अपनी पुस्‍तक ‘द ट्री लाइफ’ में दर्ज किया है. ‘क्या मैं अकेला हूं’ शीर्षक से वे लिखते हैं:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मैं और मेरे मित्र प्रो. विद्यासागर हवाई जहाज से हैदराबाद से दिल्ली आ रहे थे. हमारा हवाई जहाज घने बादलों में परत-दर-परत ऊपर उठता हुआ ऊंची उड़ान भर रहा था. उस अद्भुत दृश्य ने हमारी अंतरात्मा को झकझोर दिया. उसके बाद, एक दिन हम एशियाड विलेज कांप्लैक्स के बागीचे में घूम रहे थे तो वहां फूलों से लदे हुए नागफनी के खूबसूरत पौधे ने एक ईश्वरीय अनुभव से हमारी आत्मा को भिगो दिया और मुझे ‘जीवन वृक्ष’ लिखने के लिए प्रेरित किया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सांप्रदायिक सोच हमारे देश में हमेशा से एक मसला रही है. इस सोच देश को कई हिस्‍सों में बांट दिया है. मुस्लिम परिवार में जन्‍मे डॉ. कलाम का भी इस सोच से सामना हुआ होगा. उन्‍होंने ऐसे मामलों पर अपने अनुभव को यूं लिखा है:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जब भी मैं सांप्रदायिकता और सामाजिक असमानता की बातें सुनता हूं तो मुझे रामेश्वरम् के अपने प्राइमरी स्कूल की एक घटना तुरंत याद आ जाती है. मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ता था. हमें पढ़ाने के लिए स्कूल में एक नए शिक्षक आए थे. मैं हमेशा अपने परम मित्र रामनाथन के साथ सबसे आगे की पंक्ति में बैठा करता था. नए शिक्षक एक ब्राह्मण और एक मुसलिम विद्यार्थी का कक्षा में एक साथ बैठना समझ न सके. शिक्षक ने अपनी समझ से सामाजिक व्यवस्था का पालन करते हुए मुझे पीछे के बेंच पर बैठने के लिए कहा. मुझे यह सुनकर बहुत क्रोध आया और मेरा मित्र रामनाथन भी इससे बहुत विचलित हुआ. मैं आगे से उठकर आखिरी बेंच पर जा बैठा. यह देखकर रामनाथन ने रोना शुरू कर दिया. रामनाथन का रोता चेहरा मुझे आज भी याद है. हमारे पिता और परिजनों को जब इस घटना के बारे में पता चला तो अध्यापक को बुलाकर समझाया गया कि उन्होंने बहुत घृणित कार्य किया है. लगभग 50 वर्ष पूर्व, हमारे परिजनों के मजबूत विश्वास ने उस अध्यापक के विचार बदल दिए.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिर जब देश आजाद हुआ तब भी सांप्रदायिक दंगों ने बाल मन को प्रभावित किया था. उस दौरान महात्‍मा गांधी भूमिका पर किशोर अब्‍दुल कलाम क्‍या सोचते थे, यह यूं व्‍यक्‍त हुआ है:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;15 अगस्त, 1947 को हमारे हाई स्कूल के अध्यापक श्रद्धेय अय्यादुरै सोलेमन मुझे पं. जवाहरलाल नेहरू की मध्य रात्रि में दी जानेवाली स्वतंत्रता दिवस की तकरीर सुनाने के लिए ले गए. उन दिनों सभी घरों में रेडियो नहीं हुआ करते थे. नेहरूजी की तकरीर ने हमें द्रवित कर दिया. अगली सुबह सभी समाचार पत्रों ने इस महत्त्वपूर्ण घटना को अपना मुख्य समाचार बनाया. परंतु साथ ही एक अन्य समाचार भी छपा था, जो आज भी मेरी स्मृति में ताजा है. यह था कि कैसे सांप्रदायिक दंगों से पीडित परिवारों का कष्ट दूर करने के लिए गांधीजी नंगे पाँव नौआखली में घूम रहे थे. साधारणतः राष्ट्रपिता होने के नाते महात्मा गांधी को उस समय सत्ता हस्तांतरण और राष्ट्रीय ध्वज को फहराना देखने के लिए राजधानी में होना चाहिए था. जबकि वे उस समय नौआखली में थे, यही महात्मा की महानता थी. इसने मेरे हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ी.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जमीन से जमीन पर मार करने वाली अग्नि मिसाइल और पृथ्वी मिसाइल का सफल परीक्षण का श्रेय डॉ. कलाम को जाता है. उन्‍होंने स्‍वदेशी तकनीक से अग्नि मिसाइल का निर्माण किया था. क्‍या आप जानते हैं, आयुध क्षमता निर्माण व विकास में जुटे वैज्ञानिक डॉ. कलाम को प्रकृति ने सदैव प्रेरणा दी है. यानी शस्‍त्रों की मारकता के पीछे फूलों सी सुकोमल सोच की शक्ति थी. हथियारों के बुद्धिमत्‍तापूर्ण और संयमित उपयोग के लिए यह एक तरह का संदेश है. डॉ. कलाम लिखते हैं:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;पिछले अनेक वर्षों से हम मध्यम दूरी की जिस अग्नि मिसाइल पर कार्य करते आ रहे थे उसे प्रक्षेपण के लिए चांदीपुर में प्रक्षेपण स्थल पर स्थापित कर दिया गया था. हमें अगले दिन उसका प्रक्षेपण करना था. मैं प्रक्षेपण स्थल से लांच ऑथोराइजेशन बोर्ड के लिए कंट्रोल सेंटर जा रहा था. मैं विचारमग्न था क्योंकि हमारे पिछले दो प्रयासों के दौरान प्रक्षेपण प्रतिक्रिया में कुछ गड़बड़ी पैदा हो गई थी. हालांकि हम काफी संतुष्ट थे कि हम मिसाइल को सुरक्षित रखने में सफल हुए थे. तभी कार की खिड़की से मैंने बाहर देखा और मेरी नजर सड़क के साथ-साथ बने तालाबों में खिली रंग-बिरंगी कुमुदनियों पर पड़ी. सुबह-सवेरे की ठंडी मनमोहक हवा के साथ इधर-उधर डोल रही इन कुमुदनियों का नृत्य देखने के लिए मैं कार से उतर पड़ा. इस अल्पविश्राम ने मुझे शांति प्रदान की और मैं तनाव मुक्त हो गया. एक बार फिर मैं चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार था. अगले दिन अग्नि को छोड़ा गया और शेष तो अब इतिहास है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह ऐतिहासिक कार्य करने वाले वैज्ञानिक किस मानसिक और भावनात्‍मक दौर से गुजरते हैं यह हमें पता ही नहीं होता है. देश के वैज्ञानिकों और उनके परिजनों के समर्पण और संघर्ष को डॉ. कलाम ने यूं बताया है:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;अग्नि के सफल परीक्षण ने पूरे देश को उल्लासित कर दिया था. अग्नि के निर्माण के समय एक घटना घटी. अग्नि के निर्माण कार्य में लगे होने के कारण लगभग चालीस दिन से अपने घर-परिवार से दूर एक वैज्ञानिक ने, जो इस कार्य में विशेष निपुण है, अपने घरवालों का कुशलक्षेम जानने के लिए उन्हें हैदराबाद फोन किया. उनकी पत्नी ने फोन उठाया, पर ज्यादा बात न कर फोन उनके पिता को थमा दिया. पिता ने उनसे बातचीत की और उन्हें आश्वस्त किया कि वे सब हैदराबाद में कुशल से हैं और जानना चाहा कि वह कब घर लौट रहे हैं. कुछ दिन बाद अग्नि के सफल प्रक्षेपण के पश्चात् जब वे लौटे तो पत्नी को रोते हुए देख काफी व्याकुल हुए. तब उन्हें पता चला कि एक सप्ताह पूर्व उनकी पत्नी के भाई की एक दुर्घटना में असमय मृत्यु हो गई थी. अग्नि-निर्माण के कार्य में बाधा न पड़े, यह सोचकर घरवालों ने उन्हें यह खबर नहीं दी थी. ऐसे परिवारों को मैं झुककर सलाम करता हूं.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब हम सफल होते हैं तो हमें अपने माता-पिता, अपने शिक्षक, अपने मित्र, प्रेरणास्रोत याद आते हैं. अपनी सफलता में इन सभी का योगदान होता है. ‘अम्मी-अब्बा मैं आपका शिशु’ शीर्षक में डॉ. कलाम लिखते हैं:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;1990 के गणतंत्र दिवस के दिन मुझे एक सुखद समाचार मिला. भारत के राष्ट्रपति ने मुझे पद्मविभूषण से सम्मानित किया है. इस खुशी के मौके पर मैंने अपना कमरा संगीतमय वातावरण से भर दिया और वह संगीत मुझे किसी अन्य देश और काल में ले गया. मैं पुरानी यादों में खो गया. अपने कल्पना लोक में घूमता हुआ मैं रामेश्वरम् पहुंचा और अपनी मां के गले जा लगा. मेरे पिता मेरे बाल अपने हाथों से संवार रहे थे. मस्जिद वाली सड़क पर इकट्ठी हुई भीड़ को जलालुद्दीन ने यह समाचार दिया. लक्ष्मण शास्त्री ने मेरे माथे पर तिलक लगाया. फादर सोलोमन ने अपने पवित्र क्रॉस के लॉकेट पर हाथ रखकर मुझे आशीर्वाद दिया. मैंने प्रो. विक्रम साराभाई को मुस्कराते हुए देखा. बीस साल पहले उनके लगाए बिरवे में फल आ गए थे. मेरा हृदय कृतज्ञता से भर गया.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&amp;nbsp;(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/2101636669253721603/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' 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style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;छोटी सोच मत रखो. भगवान से लौकी और कद्दू के लिए प्रार्थना न करें, जबकि आपको हर दिल में शुद्ध प्रेम और शुद्ध ज्ञान के लिए प्रार्थना करनी चाहिए.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgx43JnRGL9syhvxXOmW__OWB763fZ8vKCnaCXdXG0bmzBJ8VFlsnp1J0N2mBNGJcYqSipyiXdlb08ck9d6ameMMhtiC1HpHGUzxiWQjK047FWmpjZE7YwPjUR4XJHgvcAEHMiGDStqZ0404h8R0pzrLtCkXLP_2vjnVwk9a00cXZiWsPV4i1A1cH0K1F8/s480/c316fb66eea8e5aacb33494b6debc0e5.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;480&quot; data-original-width=&quot;480&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgx43JnRGL9syhvxXOmW__OWB763fZ8vKCnaCXdXG0bmzBJ8VFlsnp1J0N2mBNGJcYqSipyiXdlb08ck9d6ameMMhtiC1HpHGUzxiWQjK047FWmpjZE7YwPjUR4XJHgvcAEHMiGDStqZ0404h8R0pzrLtCkXLP_2vjnVwk9a00cXZiWsPV4i1A1cH0K1F8/s320/c316fb66eea8e5aacb33494b6debc0e5.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यह प्रेरक वाक्‍य श्री मां शारदा देवी (सारदा देवी) का है. शारदा देवी यानी नाम सारदामणि मुखोपाध्याय. उनका परिचय केवल इतना नहीं है कि वे बंगाल के उन्नीसवीं सदी के संत रामकृष्ण परमहंस की पत्नी और आध्यात्मिक सहयात्री थीं, बल्कि वे उस वक्‍त की सामाजिक उन्‍नति और मानवीय चेतना के विकास की अग्रदूत भी थीं. रामकृष्ण मठ के अनुयायी उन्हें श्री मां संबोधित करते हैं तो इसका कारण है कि उन्‍होंने प्राणी मात्र में भेद नहीं किया. फिर चाहे स्‍वामी विवेकानंद जैसा प्रखर आध्‍यात्मिक पुरूष सामने हो या डाकू अजमद या कोई चींटी, श्री मां शारदा देवी ने सभी को समान स्‍नेह और ममता प्रदान की. स्वयं अशिक्षित होने के बावजूद शारदा देवी ने महिलाओं के लिए शिक्षा की वकालत की.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शारदा देवी का जन्म कलकत्ता के पास एक छोटे से गांव जयरामबती में 22 दिसंबर 1853 को हुआ था. उस समय की परंपरा के अनुसार पांच साल की उम्र में उनकी शादी रामकृष्ण से हो गई थी. जब वे अठारह वर्ष की हुईं तब हुगली नदी के किनारे स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर पहुंची जो रामकृष्‍ण परमहंस की कर्मभूमि है. विवाहित होने के बावजूद दोनों ने गृहस्थ और मठवासी जीवन के आदर्शों को दर्शाते हुए अखंड ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत किया. कहा जाता है कि एक पुजारी के रूप में रामकृष्ण ने शारदा देवी को देवी काली के स्थान पर बैठाया और अनुष्ठानपूर्वक षोडशी पूजा की. रामकृष्ण ने शारदा को दिव्य मां का अवतार माना और उन्हें श्री मां संबोधित किया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;श्री मां शारदा का दिन सुबह 3 बजे शुरू होता था. गंगा में अपना स्नान समाप्त करने के बाद, वह सुबह होने तक मंत्र जप और ध्यान किया करती थीं. ध्यान के घंटों को छोड़कर, उनका अधिकांश समय रामकृष्ण और उनके भक्तों के लिए खाना पकाने में व्यतीत होता था. रामकृष्ण परमहंस के निधन के बाद शारदा देवी धार्मिक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहीं. रामकृष्ण ने उन्हें अपने निधन के बाद अपना मिशन जारी रखने का आदेश दिया था और चाहते थे कि उनके शिष्य उनके और उनके बीच कोई अंतर न करें. वे अगले चौंतीस वर्षों तक आंदोलन की आध्यात्मिक मार्गदर्शक बनी रहीं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अमेरिकी सूफी लेखक लेक्स हिक्सन ने अपनी पुस्‍तक ‘ग्रेट स्वान’ में संत रामकृष्ण परमहंस के साथ मुलाकातों को वर्णन किया है. इस पुस्तक में हिक्सन ने मां शारदा से भेंट के अनुभवों पर भी लिखा है. इसमें दर्ज है कि शारदा देवी को उनकी महिला साथी सुबह तीन बजे न जागने की सलाह देती हैं. शारदा देवी कहती हैं कि सुबह तीन बजे से पहले जागना और आधी रात के बाद ही निवृत्त होना कठिन काम है. लेकिन मैं कैसे ज्‍यादा सो सकता हूं? मैं प्राणियों की कष्टदायी पीड़ा से भली-भांति परिचित हूं. मेरे दिल की गहराई में चुपचाप दिव्य नाम दोहराने से, यह सार्वभौमिक पीड़ा धीरे-धीरे लालसा में बदल जाती है और अंततः रोशनी बन जाती है. मैं इस स्थिति को इतना स्पष्ट रूप से देखती हूं कि मेरे लिए सोने के लिए प्रार्थना करना बंद करना मुश्किल है, यहां तक कि एक घंटे के लिए भी नहीं. मैं कभी-कभी सोची हूं कि मैं सीमित मानव शरीर के बजाए यदि अनंत दिव्य रूप में प्रकट होती तो शायद पीड़ित प्राणियों के लिए और अधिक करने में अधिक सक्षम होती. वे हर हाल में प्रत्‍येक जीवित प्राणी की देखभाल करने को महत्‍व देती थी. एक बार का किस्‍सा है कि कक्ष में आई चींटी को किसी ने मारना चाहा तो उन्‍होंने उसे रोक दिया। श्री मां ने कहा कि उस चींटी में उन्‍हें रामकृष्‍ण परमहंस की छवि दिखाई दी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संदर्भ बताते हैं कि जो भी श्री मां के सानिध्‍य में आया उनकी कृपा का पात्र बना। यूं तो स्‍वामी रामकृष्ण परमहंस प्रख्‍यात संत स्‍वामी विवेकानंद के गुरु थे. स्‍वामी विवेकानंद अपने गुरु जितना ही बल्कि उनसे कुछ अधिक महत्‍व गुरु मां शारदा देवी को देते थे. वे अपने जीवन का हर महत्‍वपूर्ण निर्णय श्री मां की आज्ञा से ही लेते थे. किस्‍सा है कि जब विश्व धर्म सम्मेलन के लिए अमेरिका जाने का प्रस्‍ताव आया तो वे श्री मां से आज्ञा लेने पहुंचे. तुरंत कोई उत्‍तर देने की जगह श्री मां ने कहा कि मैं सोचकर बताती हूं. यह अचरज वाली बात थी. स्‍वीकृति या अस्‍वीकृति एक क्षण में ही दी जा सकती थी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कुछ देर बाद शारदा देवी भोजन पकाने के लिए रसोई में चली गईं. स्‍वामी विवेकानंद भी साथ थे. उन्होंने सब्जी काटने के लिए चाकू मांगा. स्‍वामी विवेकानंद चाकू लाकर दे दी. इस प्रक्रिया के तुरंत बाद शारदा देवी ने प्रसन्‍न हो कर स्वामी विवेकानंद को अमेरिका जाने की अनुमति दे दी. यह घटनाक्रम चौंकाने वाला था. स्‍वामी विवेकानंद ने प्रश्‍न किया कि आप तो विचार करने वाली थीं. अब तुरंत ही स्‍वीकृति कैसे दे दी? इसमें क्या रहस्य है?’&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शंका का समाधान करते हुए श्री मां बताया कि चाकू मांग कर उन्‍होंने असल में परीक्षा ली थी. वे देखना चाहती थी कि विवेकानंद चाकू कैसे देते हैं? वे खुश हुई कि विवेकानंद ने धार वाला हिस्‍सा अपनी ओर रख कर हत्‍थे वाला हिस्‍सा श्री मां की ओर रखा. इससे पता चला कि वे दूसरों की सुरक्षा के लिए स्‍वयं खतरा उठाने को तैयार हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गुरु रामकृष्‍ण परमहंस के निधन के उपरांत स्‍वामी विवेकानंद हमेशा श्री मां की चिंता किया करते थे. अपने गुरुभाई को एक पत्र में उन्‍होंने लिखा था कि मां कितनी अनमोल हैं इस बात को लोग अभी नहीं समझेंगे. धीरे-धीरे समझेंगे. तुम्हें पता है कि हमारा देश दूसरे देशों के मुकाबले इतना कमजोर और पिछड़ा है क्योंकि यहां शक्ति (नारी) का अपमान किया जाता है.’&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;श्री मां ने आध्‍यात्मिक उन्‍नति के लिए तो मार्ग प्रशस्‍त किया ही बालिका शिक्षा को लेकर भी वे अत्‍यधिक आग्रही थीं. 1895 में स्वामी विवेकानंद इंग्लैंड गए थे तब उनके विचारों से एक युवती मार्गरेट नोबल प्रभावित हुई थी. 28 जनवरी 1898 को मार्गरेट नोबल भारत आईं और यहीं की हो कर रह गईं. 25 मार्च 1898 को स्वामी विवेकानंद ने उन्‍हें ‘ब्रह्मचारिणी’ व्रत की दीक्षा देकर उनका नाम ‘निवेदिता’ रखा. भगिनी निवेदिता ने उसी वर्ष कोलकाता मे ‘निवेदिता बालिका विद्यालय’ की स्थापना की. निवेदिता स्कूल का उद्घाटन श्री मां शारदा ने किया था. उन्‍होंने भगिनी निवेदिता को अपनी पुत्री की तरह स्नेह दिया. भगिनी निवेदिता ने अपने गुरु की प्रेरणा से ऐसे समय में स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में कार्य किया जब संभ्रांत लोग भी अपनी लड़कियों को स्कूल भेजना पसंद नहीं करते थे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मां शारदा द्वारा पीडि़तों की सेवा और भेद न करने के कई किस्‍से प्रचलित हैं. जैसे कहा जाता है कि विवाह उपरांत जब वे 18 वर्ष की उम्र में पित रामकृष्‍ण के पास आ रही थीं तो रास्‍ते में घना जंगल आता था. पैर में मोच के कारण वे तेज नहीं चल पा रही थीं. समूह के लोगों पर खतरा भांप कर उन्‍होंने उन्‍हें जाने के लिए कह दिया. वे अकेली रह गई थीं. रात में रास्‍ते में डाकुओं ने घेर लिया. जब डाकुओं ने पूछा कि वे अकेली क्‍यों हैं, तो उत्‍तर दिया कि अकेली कहां है, उनके पिता और भाई तो हैं न साथ में. डाकुओं के लिए यह आश्‍चर्य का विषय था कि एक महिला उनसे डर नहीं रही है बल्कि उन्‍हें भाई और पिता कह रही हैं. डाकुओं की आंखें भर आईं. श्री मां के पैर की स्थिति देख डाकुओं ने उनसे अपने घर चलने का आग्रह किया. छुआछूत को किनारे रख कर वे डाकुओं के घर में रात रूकी. डाकु सम्‍मान उन्हें लेकर श्री रामकृष्‍ण के निवास पर पहुंचे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;श्री मां की शरण में आने वाला हर व्यक्ति उनके लिये पुत्रवत था. अनेक डाकू बदमाश उनके वात्सल्य और ममता भरे व्यवहार से सुधार के रास्ते पर चलने लगे थे. ऐसा ही एक किस्‍सा है कि एक डाकू अजमद का. मां शारदा ने अमजद के द्वारा भक्तिपूर्वक लाए हुए फल-फूल को स्वीकार किया और उससे कभी घृणा नहीं की. यह अपनापन सब देखकर अमजद और उसके साथी आनंद से भर गए. एक दिन अमजद को मां ने भोजन पर बुलाया. जब भतीजी नलिनी ने छुआछूत का ध्‍यान रख कर अमजद की थाली में रोटी दूर से फेंक कर दद तो श्री मां ने उन्‍हें रोकते हुए कहा कि इस तरह फेंक कर परोसने से किसको अच्छा लगेगा? क्या वह प्रसन्नता से भोजन कर पाएगा? श्री मां ने स्‍वयं अपने हाथों से अमजद का परोस कर खाना खिलाया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ये सब उदाहरण भले ही श्रद्धा में कहे गए किस्‍सों की तरह लगे लेकिन समझा जाना चाहिए कि 19 वीं और 20 वीं शताब्‍दी के भारतीय खासकर बंगाली समाज में भेदभाव और छुआछूत की क्‍या स्थिति थी और किस तरह अपने आचरण और व्‍यवहार से संतों ने इस भेद को मिटाने का कार्य किया है. श्री मां शारदा ने कोई किताब नहीं लिखी लेकिन शिष्‍यों ने उनके कथनों को संग्रहित किया है. उनका जीवन ही उनका संदेश था. मानवता की सेवा करते हुए कठिन परिश्रम एवं बार-बार मलेरिया के कारण उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया और 20 जुलाई 1920 को श्री मां शारदा ने देह त्याग दी. आज सौ बरसों बाद भी जब उनके समय जैसी परिस्थितियां अपने आसपास पाते हैं तो उनका अंतिम कथन याद आता है. मृत्यु से पहले मां शारदा ने अपने दुःखी भक्तों को सलाह दी थी:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;‘यदि आप मन की शांति चाहते हैं, तो दूसरों में दोष न ढूंढें. बल्कि अपने दोष देखें. पूरी दुनिया को अपना बनाना सीखो. कोई भी पराया नहीं है मेरे बच्चे: यह पूरी दुनिया तुम्हारी अपनी है.’&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/2235687932344784076/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/07/blog-post_20.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/2235687932344784076'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/2235687932344784076'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/07/blog-post_20.html' title=' श्री मां शारदा देवी: भगवान से लौकी-कद्दू नहीं, शुद्ध प्रेम व ज्ञान मांगों'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgQYPQGCcC4J_Na_olbX95vxGF3Y8NYkmzuPP06cT45JltOyjKFMvHkr4ZWCjAJNgmiuzekG84ZsM_qUyjdJ964FxfAvUzpl8L73MqEK496YU1y0bhvSdoeOI-cu3v7Xn_yC1yF75It7oxIjQWvitrCcVl1Ci6zmqN31miZqYkqB7U-izK3KQGbVPivMXA/s1200/mani%20kaul.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;815&quot; data-original-width=&quot;1200&quot; height=&quot;217&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgQYPQGCcC4J_Na_olbX95vxGF3Y8NYkmzuPP06cT45JltOyjKFMvHkr4ZWCjAJNgmiuzekG84ZsM_qUyjdJ964FxfAvUzpl8L73MqEK496YU1y0bhvSdoeOI-cu3v7Xn_yC1yF75It7oxIjQWvitrCcVl1Ci6zmqN31miZqYkqB7U-izK3KQGbVPivMXA/s320/mani%20kaul.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जब भी इंतजार शब्‍द सुनता या पढ़ता हूं तो मुझे बरबस मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ याद आ जाती है. इसके समानांतर याद आती है मणि कौल की फिल्‍म ‘उसकी रोटी’. यह कहना मुश्किल है कि मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ पढ़ते वक्‍त इंतजार और स्‍त्री मन की बारीकियों को अधिक गहराई से महसूस किया या मणि कौल की फिल्‍म को देखते वक्‍त. बल्कि यूं कहना चाहिए कि मणि कौल तक आते-आते मोहन राकेश की कहानी सिनेमा की कविता बन गई. ऐसी कविता जिसे ठहर कर पढ़ेंगे/सुनेंगे तो उसके दृश्‍य आपको शब्‍दों के पार ले जाएंगे. फिल्‍म के अधिकांश हिस्‍से में शब्‍द नहीं हैं, वहां ध्‍वनियां हैं जो मन के भावों को व्‍यक्‍त करती हैं. ऐसी ही है यह फिल्‍म जिसके संवाद तो ठीक ध्‍वनियां हमसे अधिक बात करती हैं, वे ध्‍वनियां जो हमारे आसपास रोज गूंजती है मगर हम उन्‍हें अनसुना कर देते हैं. मणि कौल उन ध्‍वनियों से कथा को मायने देते हैं, आगे बढ़ाते है और ‘उसकी रोटी’ मोहन राकेश की कहानी से आगे पर्दे पर मणि कौल की कविता बन जाती है.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हिंदी फिल्‍म जगत जिस समानांतर सिनेमा की राह चला है उसमें मणि कौल का स्‍थान प्रमुख हैं. एफटीआईआई से स्नातक और ऋत्विक घटक के शिष्य मणि कौल ने महज 24 वर्ष की उम्र में ‘उसकी रोटी’ फिल्म बनाई और समानांतर सिनेमा की नई इबारत लिखनी शुरू की. फिल्म की कहानी सुच्चा सिंह और उसकी पत्नी बालो के जीवन पर केंद्रित है. इस फिल्‍म को रचने में मणि कौल ने श्‍वेत-श्‍याम को पूरी विविधता के साथ प्रस्‍तुत किया है. आज के इस समय में जब शोर ही अभिव्‍यक्ति का पर्याय मान लिया गया है तब सन्‍नाटे और ध्‍वनियों का तालमेल कथा को तो आगे बढ़ाता ही है दर्शकों को रोक कर रखता है. ठहरने पर मजबूर करता है. वन मिनट रीड के दौर में यह ऐसा सिनेमा है जहां एक संवाद के आने की प्रतीक्षा खास तरह का प्रभाव उत्‍पन्‍न करती है. रफ्तार होती जिंदगी में जब ध्‍वनियां अनचिन्‍ही कर दी गई हैं तब ‘उसकी रोटी’ जैसी फिल्‍म हमें ध्‍वनियों को समझने का अभ्‍यास करवाती हैं. या यूं समझिए कि यह समय के साथ रहना सिखाती हैं. ठीक इस सिद्धांत की तरह कि शब्‍द तब ही हो जब वे मौन को तोड़ें. अन्‍यथा तो कामकाज की ध्‍वनियां, पानी, बर्तन, हवा, गाड़ी की आवाजें ही संवाद स्‍थापित करने में सक्षम होती हैं. ये ध्‍वनियां ही तो स्‍त्री मन विकटता भी जताती हैं और भीतरी उथलपुथल जाहिर करती हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एक साक्षात्कार में स्‍वयं मणि कौल ने कहा है कि यदि एक टेबल पर रखे अमरूद को ट्रायपॉड पर रखा कैमरा शूट कर रहा हो तो टेबल, अमरूद, और कैमरा सभी स्थिर हैं एकमात्र जो चलायमान है वह है समय. मूमेंट ही मूवमेंट है. मुझे लगता है, मणि कौल की फिल्‍मों में मूमेंट ही मूवमेंट है. यहां सन्‍नाटा ही ध्‍वनियां गढ़ता है और ध्‍वनियां हमारे भीतर सन्‍नाटा बुनती है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह बात और है कि फिल्‍म की गति को लेकर मणि कौल हमेशा आलोचना के केंद्र में रहे. यहां कला समीक्षक प्रयाग शुक्‍ल की यह बात एकदम उपयुक्‍त जान पड़ती है कि जब ‘उसकी रोटी’ फिल्म रिलीज हुई थी तो उसे यह कहकर बहुतों के द्वारा कोसा गया था कि वह अत्यंत शिथिल और उबाऊ है, कि उसके ‘विलंबित लय’ वाले संवाद अत्यंत असहज लगते हैं. तब इस बात को भुला दिया गया था कि संवादों की इस प्रकार की अदायगी का अपना अर्थ और मर्म है. दुर्भाग्यवश मणि कौल के सिनेमा को लेकर यह बात इतनी बार दुहराई गई कि आम दर्शक का ध्यान तो उसकी ओर से कटता ही गया, जिन्हें हम प्रबुद्ध दर्शक कहेंगे वे भी उनके सिनेमा को लेकर उस तरह उत्साहित नहीं हुए, जिस तरह कि होना चाहिए. उदयन वाजपेयी की एक पुस्तक ‘अभेद आकाश’ जरूर एक अपवाद की तरह सामने आई और कुछ कवियों-लेखकों सिने-प्रेमियों की वे टिप्पणियां भी जो मणि कौल के सिनेमा को ‘खारिज’ करने की जगह उसकी खोज-परक यात्रा को समझने का यत्न करती हुई मालूम पड़ीं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मणि कौल ने अपनी अधिकांश फिल्मों को हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर ही केंद्रित किया हैं. ‘उसकी रोटी’ से शुरू हुआ सफर मोहन राकेश की कृति पर ‘आषाढ़ का एक दिन’, विजयदान देथा की रचना पर ‘दुविधा’, मुक्तिबोध की रचना पर ‘सतह से उठता आदमी’, विजय तेंदुलकर के नाटक पर ‘घासीराम कोतवाल’; फ्योदोर दोस्तोव्स्की की रचना पर ‘इडियट’ तथा विनोद कुमार शुक्ल की रचना पर ‘नौकर की कमीज’ तक पहुंचता है. एक लेखक की कृति पर उसकी उपस्थित में फिल्‍म बनाना एक खास तरह का जोखिम भी होता है और सृजन का अनूठा अवसर भी देता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब मैं कहता हूं कि मोहन राकेश की ‘उसकी रोटी’ कहानी और मणि कौल की फिल्‍म ‘उसकी कहानी’ की विषय वस्‍तु एक है मगर दोनों मुझ में अलग-अलग आकाश गढ़ती हैं. तब ख्‍याल आता है कि जब एक लेखक ने अपनी कृति को मणि कौल के नजरिए से पर्दे पर देखा होगा तो क्‍या अनुभव किया होगा? इस सवाल का उत्‍तर ‘समालोचन’ के लिए दिए साक्षात्‍कार में विनोद कुमार शुक्‍ल से मिलता है. उनके उपन्‍यास ‘नौकर की कमीज’ पर मणि कौल ने फिल्म बनाई है. जब फिल्‍म बन रही थी तब विनोद कुमार शुक्‍ल भी साथ थे. वे बताते हैं कि तब बनती हुई फिल्म का दर्शक था. अपने गढ़े हुए पात्र संतू को मैं देख रहा था. बाद में शूटिंग के दौरान मुझे लगने लगा कि मैंने इसी संतू को देख कर उपन्यास के संतू को लिखा है. दोनों संतू भी एक दूसरे को जान गए यानी उपन्यास के और फिल्म के संतू. यह जुड़वां की तरह दूसरी रचना थी. पर चचेरे की तरह. शक्ल-सूरत में कहीं मेल था कहीं मेल नहीं भी था.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;विनोद कुमार शुक्‍ल कहते हैं कि मुझसे&amp;nbsp; बहुत पूछा गया कि उपन्यास के साथ न्याय हुआ या नहीं. मैं मानता हूं फिल्म मणिकौल की अपनी रचना है. उपन्यास मेरी. और रचना करना न्याय करना है, अपराध नहीं. मेरे लिए फिल्म को बनते हुए देखना उपन्यास को बनते हुए देखना था. मणि कौल ने उपन्यास को बनाया था. उपन्यास को टूटते हुए मैंने नहीं देखा.एक लेखक यदि इस तरह संतुष्‍ट हो जाए तो समझा जाना चाहिए कि किस ऊंचाई का सिनेमा रचा गया है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मणि कौल पुणे के फिल्म संस्थान में ऋत्विक घटक के छात्र थे. उन्होंने पहले अभिनय और फिर निर्देशन का कोर्स किया और निर्देशन को ही अपना रचनात्मक जुनून बनाया. मणि कौल जिस एफटीटीआई में पढ़े हैं उसी संस्‍थान के छात्र रहे सुदीप सोहनी लिखते हैं कि मणि कौल स्पेस और टाइम के फिल्मकार हैं. उनकी फिल्में देखने के लिए धैर्य चाहती हैं. वे खुद इस ‘देखना’ पर हमेशा तवज्जो देते रहे. पर उनके लिए कभी भी सिनेमा दृश्य माध्यम नहीं रहा बल्कि वो इसे ‘टेम्पोरल मीडियम’ कहते थे. जो समय के सापेक्ष चल रहा. दृश्यों में, ध्वनि में, गति में, लय में और अपने परिवेश में- जिसमें तात्कालिकता पूरी स्वच्छंदता के साथ उपस्थित रह सकती है. इस विचार के आसपास भी अगर हम कुछ चहल-कदमी करें तो जटिल लगने वाली और समझ में न आने वाली मणि की फिल्मों के भीतर जाने का दरवाज़ा यहां से खुलता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सुदीप जब लिखते हैं कि जिस देश में लगभग हर तरह का विचार और कलाएं सदियों से पनप रही थीं और अपने आधुनिक रूप में समृद्ध थीं; वहीं सिनेमा को रस और विचार से अलग केवल ‘एक्सप्लोर’ करने और ‘इंटरप्रेट’ करने का मौका देने के बावजूद मणि कौल आम दर्शकों द्वारा नकार दिए गए, तो हमें हमारे सिनेमा समाज की विडंबना समझ आती है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बहरहाल, मणि कौल का सिनेमा हमें ठहरने को मजबूर करता है. जैसे किसी कहानी या कविता की पंक्ति हमें रूकने पर विवश कर देती है. आज मणि कौल और उनके सिनेमा का जिक्र खासतौर से इसलिए कि आज उनकी पुण्‍यतिथि है. 25 दिसंबर 1944 को राजस्थान के जोधपुर जन्‍मे मणि कौल का निधन 6 जुलाई 2011 को गुड़गांव में निधन हुआ था. बेशक वे आज नहीं है मगर उनकी फिल्‍में सिनेमा विद्यार्थियों के लिए सबक हैं तो फिल्‍म प्रेमियों के लिए इंसानी मनोभावों को पर्दे पर देखने का दिलचस्‍प वितान.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&amp;nbsp;(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/1560075857236029805/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/07/blog-post_6.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1560075857236029805'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1560075857236029805'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/07/blog-post_6.html' title='मणि कौल का सिनेमा: रजत पट पर स्‍वर्णिम साहित्‍य रचना'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiR5KSDuEPeRVgSH4rQlEsi-A14oSR8YB7PVjm0e2Qkmqmq_eMcI65NkEJ4kpjn1gbcD_NjDn5392J0aZzrvyFkOddxm5wHXiVtPfm_ZEkBskPT_ztj6GS7zUTGLFBMmfnHu_ZL-uvPo3f6V3y-FnGuglRGkXugrBV0oewohbIyvB5lslA/s220/pankaj%20shukla%20photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgQYPQGCcC4J_Na_olbX95vxGF3Y8NYkmzuPP06cT45JltOyjKFMvHkr4ZWCjAJNgmiuzekG84ZsM_qUyjdJ964FxfAvUzpl8L73MqEK496YU1y0bhvSdoeOI-cu3v7Xn_yC1yF75It7oxIjQWvitrCcVl1Ci6zmqN31miZqYkqB7U-izK3KQGbVPivMXA/s72-c/mani%20kaul.jpg" height="72" 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जांच हुई तो पता चला कि वह सिकल सेल एनीमिया के रोगी हैं. उनके परिजनों की जांच की गई तो पता चला कि दो बहन सिकल सेल वाहक निकले.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसके बाद से परिवार की स्थिति में बदलाव आया है. इलाज बदस्‍तूर जारी है, मगर अब रोग न फैलने का तरीका पता चल गया है. सरकार भी इस मुहिम में जुट गई है कि सिकल सेल वाहक ओर रोगियों का डेटा बेस तैयार कर लिया जाए ता‍कि इस आनुवांशिक रोग को फैलने से रोकने के लिए शादी के पहले उचित सलाह दी जा सके.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह रोग जनजातीय आबादी में अधिक फैला हुआ है इसलिए चिंता का कारण भी है. अब तक उपलब्‍ध आंकड़ें बताते हैं कि देश में करीब 10.30 करोड़ लोग सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित हैं. इनमें सबसे अधिक छत्तीसगढ़ में दो करोड़ 55 लाख 40 हजार 192 लोग पीड़ित हैं. दूसरे स्थान पर मध्य प्रदेश है. एमपी में एक करोड़ 53 लाख 16 हजार 784 लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं. तीसरे स्थान पर महाराष्ट्र है, जहां एक करोड़ से ज्यादा मरीज हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;बीमारी और शादी का क्या कनेक्शन?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नवंबर 2021 में मध्‍य प्रदेश के आदिवासी बहुल अलीराजपुर और झाबुआ जिलों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया था. इसके तहत दोनों जिलों में दस लाख लोगों की जांच की गई. जांच किए गए 9 लाख 93 हजार 114 व्यक्तियों में से 18 हजार 866 को वाहक के रूप में तथा 1,506 को रोगी के रूप में पाया गया. इसके बाद राज्य के सभी 89 आदिवासी ब्लॉकों में परियोजना का विस्तार किया गया है. इसके साथ ही सिकल सेल वाहक और रोगी को विवाह-पूर्व परामर्श और कार्ड दिए गए हैं, जिससे विवाह के समय सावधानी रखी जा सके. छत्तीसगढ़ ने हिंदी और अंग्रेजी में ‘सिकल कुंडली’ भी तैयार की है कि विशिष्ट सिकल सेल स्थिति वाले दो व्यक्तियों को शादी करनी चाहिए या नहीं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लोगों को समझाया जा रहा है कि सिकल सेल एनीमिया ऐसा रक्त विकार है, जिसमें लाल रक्त कोशिकाएं जल्दी टूट जाती हैं जिसके कारण एनीमिया तथा अन्य स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं जैसे फेफड़ों में संक्रमण, गुर्दे और यकृत की विफलता, स्ट्रोक आदि होती हैं. समस्‍या बढ़ने पर मृत्यु की आशंका रहती है. सिकल सेल की समस्‍या दो तरह से होती है. एक सिकल सेल वाहक होते हैं जिनमें कोई लक्षण नहीं होते हैं या बहुत कम लक्षण दिखाई देते हैं. दूसरे होते हैं, सिकल सेल रोगी जिनमें गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं. सिकल सेल वाहक में गंभीर लक्षण नहीं होते हैं तो उन्‍हें कोई समस्‍या नहीं होती है मगर वे अगली पीढ़ी में असामान्य जीन को संचारित करते हैं, यानी उनके बच्‍चे सिकल सेल एनीमिया पीड़ित हो सकते हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सिकल सेल को यह नाम लैटिन भाषा से मिला है. लैटिन में सिकल का अर्थ हंसिया होता है. जब लाल रक्त कोशिकाओं का आकार का लचीलापन खत्‍म हो जाता है और वह अर्द्ध गोलाकार एवं सख्त हो जाते हैं जिसे सिकल सेल कहा जाता है. यह धमनियों में अवरोध उत्पन्न करती हैं जिससे शरीर में हीमोग्लोबिन व खून की कमी होने लगती है इसलिए इसे सिकल सेल एनीमिया कहा जाता है. इस रोग में व्यक्ति के शरीर में अलग-अलग प्रकार की शारीरिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं- जैसे कि हाथ-पैरों में दर्द, कमर के जोड़ों में दर्द होना, अस्थि रोग, बार-बार पीलिया होना, लीवर पर सूजन आना, मूत्राशय में रुकावट और दर्द, पित्ताशय में पथरी होना.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;माता-पिता से बच्चों को हो जाती है ये बीमारी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह रोग आनुवांशिक है. हर व्यक्ति को अपने माता-पिता के माध्यम से एक जीन मिलता है. यदि माता और पिता में सिकल सेल के गुण अथवा सिकल सेल का रोग नहीं है तो उनके बच्चों को यह रोग नहीं होता है. यदि माता अथवा पिता दोनों में से कोई भी एक व्यक्ति सिकल वाहक होगा तो उसके बच्चे के सिकल वाहक होने 50 फीसदी आशंका होती है. लेकिन इसमें से किसी भी बच्चे को सिकल रोग नहीं होती है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यदि माता पिता दोनों ही सिकल वाहक होंगे तो उनके 25 फीसदी बच्चों को सिकल रोग, 50 फीसदी बच्चे सिकल वाहक और मात्र 25 फीसदी सामान्य बच्चे होने की संभावना रहती है. खतरे की बात यह है कि यदि माता-पिता में से कोई भी एक व्यक्ति सिकल रोगी होता है और दूसरा व्यक्ति सामान्य है तो 100 यानी कि सभी बच्चे सिकल वाहक हो सकते है परंतु सिकल रोगी नहीं. यदि माता-पिता दोनों में से एक व्यक्ति सिकल रोग वाला और एक व्यक्ति सिकल वाहक वाला होगा तो उनके 50 फीसदी बच्चे सिकल रोग वाले होंगे और 50 फीसदी बच्चे सिकल वाहक वाले होंगे. यदि माता पिता दोनों सिकल रोग वाले होंगे तो 100 फीसदी यानी कि सभी बच्चे सिकल रोग वाले ही जन्म लेंगे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हल्की नहीं, बड़ी खतरनाक है ये बीमारी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसे नाम के कारण सामान्‍य एनीमिया नहीं मानना चाहिए, क्‍योंकि इस रोग का यूं कोई कारगर इलाज नहीं है. इससे बचाव ही इसका इलाज है. मतलब यदि शादी के पहले जिस तरह कुंडली मिलाई जाती है उसी तरह ब्‍लड टेस्‍ट करवा कर सिकल सेल एनीमिया रोग या वाहक की जानकारी पता कर ली जाए तो आने वाली पीढ़ी को सिकल रोग से बचाया जा सकता है. यही वजह है कि इसके खतरों और प्रसार के प्रतिलोगों को जागरूक करने के लिए हर साल 19 जून को विश्व सिकल सेल जागरूकता दिवस मनाया जाता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सिकल सेल रोग संगठनों के वैश्विक संगठन ने सिकल सेल रोग की स्थिति जानने के लिए आधुनिक उन्नत तकनीक के उपयोग का आग्रह किया है. इस जागरूकता अभियान का मकसद यह सुनिश्चित करना भी है कि विवाह करने वाले दोनों व्यक्तियों में सिकल वाहक अथवा सिकल रोग नहीं होना चाहिए. इसी तरह यदि परिवार में किसी भी सदस्य को सिकल सेल एनीमिया है तो परिवार के सभी सदस्यों के रक्त की सिकल सेल की जांच करवाई जानी चाहिए.&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/1791723678639055662/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/06/blog-post_19.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1791723678639055662'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1791723678639055662'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/06/blog-post_19.html' title='शादी के पहले यह ‘कुंडली’ नहीं मिलाई तो खतरे में पड़ जाएगी जान'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiR5KSDuEPeRVgSH4rQlEsi-A14oSR8YB7PVjm0e2Qkmqmq_eMcI65NkEJ4kpjn1gbcD_NjDn5392J0aZzrvyFkOddxm5wHXiVtPfm_ZEkBskPT_ztj6GS7zUTGLFBMmfnHu_ZL-uvPo3f6V3y-FnGuglRGkXugrBV0oewohbIyvB5lslA/s220/pankaj%20shukla%20photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9062801385297364864.post-4596195579697794347</id><published>2023-06-18T23:54:00.001+05:30</published><updated>2024-02-18T23:55:45.037+05:30</updated><title type='text'>Father&#39;s Day 2023: जिंदगी के थिएटर में &#39;शक्ति&#39; की स्क्रिप्‍ट</title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiLA5DfKAC2-zwtJqSaZwvQoA1rtPgG-adp3ds6KEm1WUeT2nPqFzODWTbabRxiEk6xYyQ2GDVCJ5RTWvcsFMRcY6FnlrVeFF31ZZB7d3E7UmF3K7FVKXwsoY7Fys8f2MwktcsBvMSMmWKj-bdgQst3BTM6grylnZD7GRpRA36pKMGXKmtH9E2f8Lz2kLk/s500/22shakti1.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;306&quot; data-original-width=&quot;500&quot; height=&quot;196&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiLA5DfKAC2-zwtJqSaZwvQoA1rtPgG-adp3ds6KEm1WUeT2nPqFzODWTbabRxiEk6xYyQ2GDVCJ5RTWvcsFMRcY6FnlrVeFF31ZZB7d3E7UmF3K7FVKXwsoY7Fys8f2MwktcsBvMSMmWKj-bdgQst3BTM6grylnZD7GRpRA36pKMGXKmtH9E2f8Lz2kLk/s320/22shakti1.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आज फादर्स डे है. पिता को समर्पित एक दिन. ये डे मनाने की संस्कृति पर बहुतों को आपत्ति हो सकती है और है भी, मगर इस संस्‍कृति का दूसरा पहलू है कि अगर ये दिन न होते तो कई रिश्‍तों में अभिव्‍यक्ति की राह कभी खुलती ही नहीं. कभी कहा ही नहीं जा सकता था कि हम परवाह करते हैं. कभी जतलाया ही नहीं जा सकता था कि किसी के होने या न होने के हमारे लिए क्‍या मायने हैं. रिश्‍तों के ताने-बाने में कुछ शहद सा मीठापन किसी गहराई में छिपा रहता, बहुत कुछ कसैला तराई में बना रहता उस रिश्‍ते को कड़वा बनाते हुए. शायद ये दिन नहीं होते तो हमारी कोमल भावनाएं कभी व्‍यक्त ही नहीं होती और व्‍यक्‍त होती भी तो फिल्‍म ‘शक्ति’ के अंतिम सीन की तरह.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;1982 में आई फिल्‍म ‘शक्ति’ और उसके क्‍लाइमेक्‍स की बात इसलिए क्‍योंकि मुझ जैसे कई लोगों को लगता है कि भारतीय पिता-पुत्र के रिश्‍ते के ताने-बाने को बताती यह कुछ चुनिंदा फिल्‍मों में से एक है. रमेश सिप्‍पी की अपने बैनर के बाहर निर्देशित की गई पहली फिल्‍म, सलीम जावेद की जोड़ी का कमाल, कई फिल्‍मों में अमिताभ की प्रेमिका बन चुकी राखी का इस फिल्‍म में अमिताभ की मां का किरदार निभाने जैसी विशिष्‍ट बातों के साथ दिलीप कुमार और अमिताभ बच्‍चन का एक साथ पर्दे पर आना इस फिल्‍म की चर्चा के लिए काफी है. मगर आज उन सब की बात नहीं. आज तो पिता के नाम दिन है तो इस रिश्‍ते की बात.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारतीय समाज में पुत्री को पिता के निकट माना जाता है और पुत्र को मां के. पिता और पुत्र के रिश्‍ते में मर्यादा, अनुशासन, सख्‍ती और खामोशी ने हमेशा दूरी का तार खींच कर रखा है. ऐसे कई पिता रहे हैं जिन्‍होंने मर्यादा के चलते बच्‍चों से कभी खुल कर बात भी नहीं की. पिता-पुत्र के बीच संवाद का सेतु हमेशा मां रही है. इस सामाजिक गूथन के दौर में आई फिल्‍म ‘शक्ति’ पिता-पुत्र के बीच गल‍तफहमियों से उपजी दरार का बेहद सटीक और मार्मिक चित्रण है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आपको याद दिला दूं कि फिल्म में पिता अश्विनी (दिलीप कुमार) की अनदेखी से नाराज होकर पुत्र विजय (अमिताभ बच्चन) गलत रास्ते पर चल पड़ता है. अपराध का शिंकजा कसता चला जाता है. दूरियां और बढ़ती जाती हैं. एक तरफ फर्ज और ईमानदारी के रास्‍ते पर चलता पिता है तो दूसरी तरफ पिता के फर्ज को बोझ मानता आक्रोशित पुत्र विजय. फिल्‍म में एक मौका ऐसा आता है जब दिलीप कुमार को बेटे अमिताभ के केस से हटने का संकेत देते हुए पुलिस कमिश्‍नर अशोक कुमार कहते हैं कि वे पुलिस अधिकारी पिता को फर्ज के इम्तिहान में नहीं डालना चाहते तो दिलीप कुमार कहते हैं, सवाल फर्ज का नहीं हक का भी है. अपनी बरसों की नौकरी में मैंने जाने कितने मुजरिमों की कलाई में हथकड़ी पहनाई है. अगर आज बेटे को हथकड़ी पहनाते समय मेरे हाथ कांप जाएं तो मुझे क्‍या हक था उन मुजरिमों की कलाइयों में हथकडी पहनाने का? वे सब भी तो किसी न किसी के बेटे थे. अब तो फर्ज निभाने की आदत हो गई है. इस उम्र में ये आदत कहां छूटेगी?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जरा ठहर कर सोचेंगे तो अपने आसपास ऐसे कितने ही किरदार दिखाई दे जाएंगे जिन्‍होंने अपने कर्तव्‍य के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया. जो फर्ज निभाने से कभी रूके ही नहीं. उनके इस कर्तव्‍य बोध से पूरा परिवार तकलीफ में रहा मगर उनके उसूलों पर आंच आना किसी को मंजूर नहीं हुआ. फिल्‍म में एक ऐसा भी दृश्‍य है जब पत्‍नी शीतल (राखी) पति अश्‍विनी से कहती है कि विजय को जेल ही जाना है तो आपके ही हाथों क्‍यों? मेरा दु:ख क्‍यों बढ़ाना चाहते हैं? जवाब में दिलीप कुमार कहते हैं, मेरा गरूर यही है कि मैंने कभी बेइमानी नहीं की, कभी अपने फर्ज से मुंह नहीं मोड़ा, कभी अपने जमीर की आवाज को दबाया नहीं. लेकिन इस गरूर के टूटने से तुम्‍हारा दु:ख कम हो सकता है तो मैं वहीं करूंगा जो तुम चाहोगी. पति के गरूर का टूटना पत्‍नी को कैसे पसंद आ सकता था? वह कहती है, मैं ये नहीं चाहती कि मेरी खातिर आप अपनी नजरों से गिर जाएं. मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूं कि किसी भी तरह से हमारा बेटा हमारे पास वापिस चला आए. अगर आप मेरे लिए अपने उसूल बदलने के लिए तैयार हो सकते हैं तो क्‍या वो मेरे लिए अपना रास्‍त नहीं बदल सकता?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तब हमें मां के ऐसे कई रूप याद आ जाते हैं जो पति और पुत्र के बीच पसरे मौन को, तनाव को पिघलाने के जतन करती है. वह दोनों किनारों को जोड़ने वाली नदी बन जाना चाहती है. इस कोशिश में शीतल बेटे विजय के पास जाती भी है लेकिन अपराधी बन चुका बेटा कहता है कि मैं जान गया हूं कि जुर्म तब होता है जब उसे साबित किया जाए. मुजरित तब होता है जब उसे पकड़ा जाए. उनसे कहिए कि सबसे पहले मेरे खिलाफ सबूत लाएं. गवाह ढूंढ़े. तब मां शीतल एक ताना, एक उलाहना दे कर लौट आती है कि वाह बेटे वाह. बहुत कलेजे को ठंडक पहुंचाई आज. दस बार मरोगे और दस बार पैदा होओगे तब भी उनके जैसे नहीं बन पाओगे. तुम वह नहीं हो जो मेरा घर छोड़ कर आया था. शायद मुझे किसी ने गलत पता दे दिया था.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बीमार मां को लेने आया बेटा विजय कहता है, मेरे साथ चलो, मैं बड़े अस्‍पताल में इलाज करवाऊंगा. इस घर में तुम्‍हें क्‍या आराम मिलेगा? उसूलों का बोझ उठाने का जिसे शौक है उसे उठाने दो. तब मां कहती है, वो कितने ऊंचे ओहदे पर हैं, चाहे जितना पैसा आ सकता है लेकिन मेरे घर में बेइमानी का एक पैसा नहीं आया. मैं अभी इतनी कमजोर नहीं हुई कि अपने पति की ईमानदारी का बोझ नहीं उठा सकूं. बेइमानी का पैसा मेरे लिए जहर है. क्‍या तुम मां को दवा में जहर मिला कर पिलाएगा?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ऐसी उलझनों के बीच पिता-पुत्र के बीच एक संवाद है. समुद्र किनारे फिल्‍माए गए इस संवाद में लहरों के शोर ने डायलॉग में भावों का ज्‍वार दिखाने का काम बखूबी किया है. पिता से मिलने आया विजय जब पूछता है कि मुझे यहां क्यों बुलाया तो पिता अश्विनी कहते हैं, इसलिए कि जहां तुम रहते हो वो जगह मेरा घर से इतनी दूर है कि तुम्हारा आना मुश्किल होता. तो पुलिस स्टेशन बुला लिया होता. वह तो मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं है. तब‍ पिता कहते हैं, जो भी हो विजय मगर अब भी तुम मेरे बेटे ही हो. मैं नहीं चाहता तुम्हारा अंजाम वो हो जो… यह कहते हुए दिलीप कुमार चुप हो जाते हैं, मानो पिता का दिल अपने बेटे को अपराधी पुकारना भी नहीं चाहता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बेटा विजय बार-बार पिता को उसके उसूलों के लिए ताने मारता है. कहता है, जिस कानून ने आपको मेरे लिए अजनबी बना दिया मैं अपने आप को उस कानून के हवाले कैसे कर सकता हूं? जब पिता अश्विनी कहते हैं कि अगली बार तुम एक बाप से मिलोगे या पुलिस अफसर से इसका फैसला खुद तुम को करना होगा. जब विजय का जवाब आता है, यह फैसला तो आप कई बरस पहले मेरे बचपन में ही कर चुके थे जब मैं उन बदमाशो के अड्डे में कैद था. मैने फोन पर अपने बाप से बात की थी और दूसरी तरफ एक पुलिस ऑफिसर की आवाज सुनाई दी थी. आज भी आपके तरीके में एक पुलिस ऑफिसर के लहजे की बू आती है. पुत्र के कड़वे बोल के आगे पिता खामोश रह जाता है, यह मानते हुए कि बच्‍चे की उद्दंडता का पिता भला क्‍या जवाब दे?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कैद में पहुंचे विजय को जब पिता अश्विनी बताते हैं कि उसे कत्‍ल के इल्‍जाम में गिरफ्तार करवाने की साजिश करने वाला जेके है तो विजय कहता है मैं तो इतना जानता हूं कि जिसके सामने मुझे बेकसूर गिरफ्तार किया गया, जो मुझे बचा सकता था लेकिन खामोश तमाशा देखता रहा. वो कौन है, मेरा अपना बाप. और यूं खामोश तमाशा मेरे बाप ने पहली बार नहीं देखा है. जब विजय कहता है कि उसे हर उस कानून से नफरत है जिसे उसका पिता मानता है तो दर्शकों को विजय के मन में बचपन से बनी एक गलतफहमी के विराट हो जाने का दंश महसूस होता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मां शीतल (राखी) की मौत के बाद तो पिता-पुत्र के बीच का सेतु भी बह गया. बहुत चुभता है यह डायलॉग जब पत्‍नी के शव के पास विलाप करते हुए अश्विनी कहता है कि विजय तुम्‍हारी बात ही मानेगा, वह मेरी बात नहीं सुनेगा. पिता की यह असहायता भीतर तक कचोट जाती है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अंत में जब पिता अश्विनी के हाथों बेटे विजय को गोली लगती है तो सारे दर्शक यह मान ही बैठे थे कि अब पिता और पुत्र के बीच जुड़ाव की कोई गुंजाइश ही नहीं है तब एक नाजुक और भावुक दृश्‍य बुना गया है. दम तोड़ने के पहले विजय कहता है, बहुत कोशिश की कि अपने दिल से आपकी मुहब्‍बत निकाल दूं लेक‍िन मैं हमेशा आपसे प्‍यार करता रहा. चाहा कि न करूं लेकिन ऐसा क्यूं? जवाब में पिता आर्द्र स्‍वर में कहते हैं, इसलिए कि मैं भी तुमसे मुहब्‍बत करता हूं बेटे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तब विजय कातर स्‍वर में पूछता है, तो कहा क्‍यों नहीं डैड?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस क्‍यों का जवाब किसी पिता के पास नहीं होता था. इस क्‍यों का जवाब कई बेटों को कभी मिल नहीं सका. पिता के गोद में बेटे का शव है और आखिर में पंक्तियां सुनाई देती है:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ऐ आसमां बता क्‍या तुझको है खबर,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ये मेरे चांद को किस की लगी नजर&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मुझसे कहां न जाने कोई भूल हो गई,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मांगी थी जो दुआ कबूल न हुई ….&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तभी याद आता है, यही तो वह गाना था जो शुरुआत में नन्‍हे विजय के साथ माता-पिता गाते हैं:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मांगी थी एक दुआ जो कबूल हो गई, उम्‍मीद की कली खिल के फूल हो गई.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शक्ति में दिखाए पिता और पुत्र के फर्ज और उम्‍मीदों के इस द्वंद्व को कई परिवारों ने जिया है. कई पुत्र अंत तक अपने पिता को गलत ही मानते रहे. कई पिता अपने पुत्र को समझ ही नहीं पाए. हम दिल और दिमाग के निर्णय की बात करते हैं. ऐसे मामलों में दिमाग का निर्णय कुछ भी रहे, हमारा दिल तो दोनों को सही मानता है. वह फैसला कर ही नहीं पता कि कौन गलत है और कौन सही? लगता है, जरा वह झुक जाता, जरा वह समझ लेता. जरा वह अपने दिल को बड़ा करता, जरा वह आत्‍मीयता का हाथ बढ़ा देता. जरा वह सुन लेता, जरा वह कह देता. यही कारण है कि ऐस दिवस पर हमें अपने दिल की बात कहने की गुंजाइश मिल जाती है. शायद, हम कह पाएं तो ‘शक्ति’ के क्‍लाइमेक्‍स जैसा हमारी जिंदगी में न हो. कुछ ऐसा कि अंत में पूछना पड़े, मुझसे मुहब्‍बत थी तो आपने अब तक क्‍यों नहीं कहा डैड? तुमने भी कब समझना चाहा मेरे बच्‍चे?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: right;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;b&gt;(न्‍यूज 18 हिंदी में प्रकाशित ब्‍लॉग)&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/4596195579697794347/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/06/fathers-day-2023.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/4596195579697794347'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/4596195579697794347'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/06/fathers-day-2023.html' title='Father&#39;s Day 2023: जिंदगी के थिएटर में &#39;शक्ति&#39; की स्क्रिप्‍ट'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiR5KSDuEPeRVgSH4rQlEsi-A14oSR8YB7PVjm0e2Qkmqmq_eMcI65NkEJ4kpjn1gbcD_NjDn5392J0aZzrvyFkOddxm5wHXiVtPfm_ZEkBskPT_ztj6GS7zUTGLFBMmfnHu_ZL-uvPo3f6V3y-FnGuglRGkXugrBV0oewohbIyvB5lslA/s220/pankaj%20shukla%20photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhbkoaPB1DTXcGkEz5B9g6gKGpfLV_Zh2-TAOTYSDX9kZUpNTed0Fgq6M586OWXzAoEvbyUmQaV5UEhcwjGaKVvgXgZIcCKDoSr144JUuCdnOKDs_rc201CShqceq8bgDIEqJ4WIbdAWSJ1IpE6hbSADOc3Rg6ujRp_gx11i6A2GoOzAs2qqJhIBqi1zlQ/s500/Shiv_Kumar_Batalvi,_1970.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;500&quot; data-original-width=&quot;402&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhbkoaPB1DTXcGkEz5B9g6gKGpfLV_Zh2-TAOTYSDX9kZUpNTed0Fgq6M586OWXzAoEvbyUmQaV5UEhcwjGaKVvgXgZIcCKDoSr144JUuCdnOKDs_rc201CShqceq8bgDIEqJ4WIbdAWSJ1IpE6hbSADOc3Rg6ujRp_gx11i6A2GoOzAs2qqJhIBqi1zlQ/s320/Shiv_Kumar_Batalvi,_1970.jpg&quot; width=&quot;257&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;पंजाबी साहित्य में जब भी प्यार-मोहब्बत और ग़म की चर्चा होगी शिव कुमार बटालवी का जिक्र जरूर किया जाएगा. पंजाबी भाषा के विख्यात कवि शिव कुमार रोमांटिक कविताओं के लिए सबसे ज्यादा जाने जाते हैं. उनके गीत-कविताओं में भावनाओं का उभार ज्वार लेता है, करुणा की गहराई है तो जुदाई में प्रेमी के दर्द छलक पड़ता है. अमृता प्रीतम ने इन्हें “बिरहा का सुल्तान” कहा था. सच में शिव कुमार तो साहित्य जगत का वह अलमस्त फकीर है जो प्रेम की दुनिया में मगन रहता है, और नदी के पानी की तरह बस बहता, और बहता ही रहता है. शिव कुमार बटालवी से जब कोई उनके हाल-चाल पूछता है तो वे खुद को आशिक बताते हुए कहते हैं- फकीरों का हाल क्या पूछते हो, हम तो नदियों से बिछड़े पानी की तरह हैं. हम आंसूओं से निकले हैं और हमारा दिल जलता है.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;की पुच्छदे हाल फ़कीराँ दा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;साडा नदियों बिछड़े नीरां दा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;साडा हंझ दी जूने आयां दा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;साडा दिल जल्या दिलगीरां दा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कितना दर्द समेटे हुए हैं ये पंक्तियां. यहां शिव कुमार कहते हैं- “मैं दर्द को ही काबा मानता हूं और पीड़ा को अपना कहता हूं.”&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मेरे गीत वी लोक सुणींदे ने&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;नाले काफ़र आख सदींदे ने&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मैं दरद नूं काअबा कह बैठा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;रब्ब नां रक्ख बैठा पीड़ां दा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शिव कुमार बटालवी का जन्म 23 जुलाई, 1936 को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की शकरगढ़ तहसील के गांव बड़ा पिंड लोहटिया में हुआ था. भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनका परिवार गुरदासपुर जिले के बटाला चला आया.बताते हैं शिव कुमार बटालबी प्रेमी थे और प्रेम में नाकामी वजह से उनकी रचनाओं में विरह और दर्द का भाव बहुत अधिक है. कहा जाता है कि शिव कुमार को विख्यात पंजाबी लेखक गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी की बेटी से प्यार हो गया था.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;गुम है गुम है गुम है&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;गुम है गुम है गुम है&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;साद मुरादी सोहणी फब्बत&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;गुम है गुम है गुम है&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;सूरत उसदी परियां वरगी&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;सीरत दी ओह मरियम लगदी&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;लम्म सलम्मी सरूं क़द दी&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;उम्र अजे है मर के अग्ग दी&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्यार में डूबे शिव कुमार बटालवी अपनी माशूका के लिए लिखते हैं-&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मुझ को तेरा शबाब ले बैठा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;रंग, गोरा गुलाब ले बैठा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दिल का डर था कहीं न ले बैठे&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ले ही बैठा जनाब ले बैठा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जब भी फुर्सत मिली है फर्ज़ों से&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तेरे रुख़ की किताब ले बैठा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कितनी बीती है कितनी बाकी है&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मुझ को इस का हिसाब ले बैठा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मुझ को जब भी है तेरी याद आई&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दिन-दहाड़े शराब ले बैठा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;अच्छा होता सवाल ना करता&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मुझ को तेरा जवाब ले बैठा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;‘शिव’ को इक ग़म पे ही भरोसा था&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ग़म से कोरा जवाब ले बैठा।&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन बटालवी का प्यार परवान नहीं चढ़ सका. प्रेमियों के बीच जातिभेद सामने आ गया. प्यार में नाकामी ने उन्हें बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया. प्यार में टूटन की पीड़ा उनकी कविता में तीव्रता से परिलक्षित होती है.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शिव कुमार बटालवी का पहला कविता संग्रह 1960 में पीड़ां दा परागा (दु:खों का दुपट्टा) प्रकाशित हुआ. यह संग्रह प्रकाशित होते ही साहित्यिक हलकों में छा गया. इसके बाद उनकी महत्वपूर्ण कृति महाकाव्य नाटिका ‘लूणा’ प्रकाशित हुई तो इसने ने भी कामयाबी के लहरा दिए. ‘लूणा’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 1967 में साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले शिव कुमार बटालवी सबसे कम उम्र के साहित्यकार बन गये. ‘लूणा’ को आधुनिक पंजाबी साहित्य की एक महान कृति माना जाता है. यह महाकाव्य है. इसमें लूणा का ब्याह सियालकोट के राजा के साथ होता है, लेकिन लूणा राजा के बेटे पूरण से मोहब्बत करने लगती है. लूणा दरअसल के नकारात्मक किरदार है, लेकिन शिव कुमार ने इस किरदार को सच्ची मोहब्बत, त्याग और समर्पण की मिसाल बताते हुए नए सिरे गढ़ा है.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शिव कुमार की नज़्मों में आम जनता की हूंक सुनाई देती है. दरअसल, वे जनता के कवि हैं. उनकी कविताएं लोकगीत के रूप में गाई और गुनगुनाई जाती हैं. पंजाब की फिज़ाओं में आज भी कहीं न कहीं ‘मैं कंडयाली थोर वे सजणा’ या ‘जिंदू दे बागीं दरदाँ दा बूटड़ा’ जैसे गीतों की गूंज सुनाई पड़ ही जाती है. मैनूं विदा करो (मुझे विदा करो), अलविदा (विदाई), सोग (शोक) समेत ना जाने कितनी रचनाएं हैं जिनमें शिव कुमार बटालवी की निराशा और मृत्यु की प्रबल इच्छा दिखाई पड़ती है.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मैंनू विदा करो&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;असां ते जोबन रुत्ते मरना,&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मर जाणां असां भरे भराए,&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हिजर तेरे दी कर परिकरमा..&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;(मुझे विदा करो. हमें तो यौवन की ऋतु में मरना है, मर जाएंगे हम भरे पूरे तुम से जुदाई की परिक्रमा पूरी करके)&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;36 साल की उम्र में शराब की दुसाध्य लत के कारण हुए लीवर सिरोसिस के कारण 7 मई 1973 को पठानकोट के किरी मांग्याल में अपने ससुर के घर पर शिव कुमार बटालवी ने अंतिम सांस ली. उनके अंतिम दिनों के बारे में एक किस्सा मशहूर है कि शिव कुमार बटालवी 1972 में इंग्लैंड गए थे. चूंकि वे मशहूर कवि थे तो इंग्लैंड में उनसे मिलने के लिए लोगों का तांता लगा रहता था. इस मेल-मिलाप में दिन-रात शराब और शायरी का दौर चलता रहता. वे वहां कई महीने रहे. इंग्लैंड प्रवास के दौरान उन्होंने बहुत ज्यादा शराब का सेवन किया. जब वे हमवतन वापस आए तो शराब की बहुत ज्यादा लत लगने के कारण उनकी शरीर अंदर से खराब हो चुका था. इलाज के लिए वे अपनी सुसराल किरी मांग्याल आ गए और यहीं इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उनकी एक कविता है, जिसमें वह लिखते हैं- हमें तो जवानी के मौसम में ही मरना है. ऐसे ही भरे-भराए शरीर से लौट जाना है. इन पंक्तियों को पढ़कर लगता है कि शायद उन्होंने ये अपने लिए ही लिखी थीं-&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;असाँ ताँ जोबन रुत्ते मरना&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मुड़ जाणा असाँ भरे-भराए&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हिजर तेरे दी कर परकरमा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;असाँ ताँ जोबन रुत्ते मरना&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शिव कुमार बटालवी की कई रचनाओं का इस्तेमाल हिंदी फिल्मों में किया गया है. समय-समय पर गायक बटालवी के गीतों को अपने सुरों में पिरोकर प्रस्तुत करते रहे हैं. दीदार सिंह परदेसी, जगजीत सिंह-चित्रा सिंह, सुरिंदर कौर, नुसरत फतेह अली खान, रब्बी शेरगिल, हंस राज हंस, महेंद्र कपूर ने बटालवी की रचनाओं को अलग-अलग अंदाज में प्रस्तुत किया है.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: right;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 हिंदी में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/1145009340846209594/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/06/blog-post_6.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1145009340846209594'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1145009340846209594'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/06/blog-post_6.html' title='शिव कुमार बटालवी: प्रेम का कवि और बिरह का सुल्तान, जिसे दर्द में काबा और पीड़ा में अपनापन झलकता है'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiR5KSDuEPeRVgSH4rQlEsi-A14oSR8YB7PVjm0e2Qkmqmq_eMcI65NkEJ4kpjn1gbcD_NjDn5392J0aZzrvyFkOddxm5wHXiVtPfm_ZEkBskPT_ztj6GS7zUTGLFBMmfnHu_ZL-uvPo3f6V3y-FnGuglRGkXugrBV0oewohbIyvB5lslA/s220/pankaj%20shukla%20photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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सबसे बड़ा सहायक प्‍लास्टिक आज पर्यावरण और सेहत के लिए उतना ही बड़ा और व्‍यापक खतरा बन कर डरा रहा है. इसी घातक ताकत के कारण दुनिया ने आह्वान किया है कि सब मिलकर इस प्‍लास्टिक से पृथ्‍वी को बचाएं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कितना आसान होता है, किसी पॉलीथिन, किसी प्‍लास्टिक के टुकड़े को गुड़ीमुड़ी कर झट से फेंक देना. कितना आसान होता है, कोल्‍ड ड्रिंक और पानी की बोतल, किसी पैकिंग का प्‍लास्टिक रैपर को यहां-वहां फेंक देना. यहां-वहां मतलब माउंट एवरेस्‍ट जैसे गगनचुंबी पहाड़ पर तो समुद्र की तलहटी जैसी गहराई पर. अपने आसपास भी, नदी और पहाड़ पर भी. खेत में, चलती ट्रेन से, जहां मन किया वहां. क्‍या आपने सोचा है, कि बड़े प्‍लास्टिक के कचरे को तो चलो कोई साफ कर भी देगा मगर बोतल के ढक्‍कन को बंद करने के लिए लगाई गई सील या उससे भी छोटे प्‍लास्टिक के टुकड़े को हम जो फेंक देते हैं, लापरवाही से, उसे कोई उठाने आने वाला नहीं है. वह तो जमीन में, पानी में, पहाड़ पर, खाई में, जंगल में पड़ा रहेगा, बरसों बरस और धरती को, इसके पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता रहेगा. वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब खेत में हल चला कर मिट्टी की पलटी करने पर पॉलीथिन भी निकला करेगा. यह तो साबित ही हो चुका है कि हमारे द्वारा फेंका गया प्‍लास्टिक का कूड़ा शहरों में सीवेज को जाम कर जलभराव का कारण बनता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यही कारण है कि गुजरात के अहमदाबाद में प्लास्टिक के साथ ही कागज के कप में चाय-काफी परोसने पर रोक लगा दी गई है क्‍योंकि वहां एक दिन में 20 लाख से ज्यादा प्लास्टिक और पेपर कप कचरे में फेंके जाते हैं. चंडीगढ़ में प्‍लास्टिक की तमाम तरह की पैकिंग पर भी रोक है. सरकार सिंगल यूज प्‍लास्टिक को प्रतिबंधित कर ही चुकी है. इसके बाद भी हालात क्‍या हैं, यह जानना बेहद जरूरी है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हाल ही में एक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था इसमें बताया गया था कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवेरेस्ट असल में ‘कूड़े के पहाड़’ बन रहा है. बेस कैंप के पास सैकड़ों खाली पड़े फूड कंटेनर, ऑक्‍सीजन टैंक, रैपर बिखरे नजर आ रहे हैं. 29 मई 2053 को तेनजिंग नोर्गे और एडमंड हिलेरी ने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ को विजय किया था. इस घटना के सत्‍तर साल बाद आज उस चोटी पर कचरे का पहाड़ हमारी लापरवाही का सबूत है. पहाड़ पर चढ़ कर रिकार्ड अपने नाम करने वाले पर्वतारोह उस पहाड़ के पर्यावरण को लेकर बिल्कुल सतर्क नहीं हैं. नेशनल ज्योग्राफिक का अनुमान है हक एवरेस्ट पर जाने वाला हर पर्वतारोही लगभग आठ किलोग्राम कचरा पैदा करता है. इनमें फूड कंटेनर, टेंट और खाली ऑक्सीजन टैंक शामिल होते हैं. वे कचरा साथ नहीं लाते और इसकी सफाई के लिए सरकारों को अलग से पैसा खर्च करना पड़ता है. जबकि कितना बेहतर हो कि जो सामान ले जा रहा है वही कचरा अपने साथ लाए भी? लेकिन ऐसा होता कहां है?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चिंता का कारण यह कि सूक्ष्‍म रूप में प्‍लास्टिक ध्रुवों पर जलचर के रक्‍त में भी पहुंच चुका है. यह प्‍लास्टिक हमारे रक्‍त में भी है. यह समय उन चेतावनियों को याद करने का भी है जब शोध बताते हैं कि प्‍लास्टिक खाद्य सामग्री के साथ हमारे पेट में जा रहा है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आज जब प्‍लास्टिक के समाधान की चिंता और आह्वान के साथ विश्‍व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है तो हमारे लिए यह जान लेना भी आवश्‍यक है कि दुनिया फिलहाल हर साल 35 करोड़ टन प्लास्टिक का कचरा फैला रही है. यह कचरा जैवविविधता, हमारी सेहत और खेती यानी हमारे आहार के लिए खतरा बन चुका है. जब हम प्‍लास्टिक के इन खतरों की बात करते हैं तो कुछ आविष्‍कार याद आते हैं. जैसे वह एंजाइम जो सदियों में नष्‍ट होने वाले प्‍लास्टिक को चंद घंटों में खत्‍म कर सकता है. मगर यह एंजाइम भी प्‍लास्टिक के बेतहाशा उपयोग की छूट नहीं देता है क्‍योंकि हमारी लापरवाही तब भी भारी है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्‍लास्टिक के इन्‍हीं खतरों को देखते हुए संयुक्‍त राष्‍ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम ने एक रोडमैप तैयार किया है. बीते सप्‍ताह जारी हुई यह रिपोर्ट 2040 तक दुनिया भर में प्लास्टिक प्रदूषण को 80 प्रतिशत तक कम करने का आह्वान करती है. इसमें कहा गया है कि सबसे पहले प्‍लास्टिक के कचरे का कम करना होगा. इसके लिए प्‍लास्टिक के फिर से उपयोग, रीसाइकल करना और उत्पादों में विविधता लाने के सुझाव दिए गए हैं. आकलन है कि फिर से उपयोग के प्‍लास्टिक को बढ़ावा देकर 2040 तक 30 प्रतिशत प्लास्टिक प्रदूषण को कम किया जा सकता है. प्लास्टिक रैपर, पाउच और पै‍क आइटम जैसे उत्पादों में प्‍लास्टिक के बदले अन्य सामग्रियों को अपनाने से प्लास्टिक प्रदूषण में 17 प्रतिशत की कमी लाई जा सकती है. चुनौती यह है कि यदि प्लास्टिक उत्पादन पर लगाम लगाने में पांच साल की देरी होती है तो 2040 तक 80 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक प्रदूषण बढ़ सकता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसी आह्वान के बीच ग्रीनपीस ने चेताया है कि रीसाइक्लिंग प्लास्टिक प्रदूषण का रामबाण इलाज नहीं है. इसपर हुआ अध्ययन बताता है कि रीसाइकिल करने से वास्तव में प्लास्टिक का जहरीलापन बढ़ जाता है. ‘फॉरएवर टॉक्सिक: द साइंस ऑन हेल्थ थ्रेट्स फ्रॉम प्लास्टिक रीसाइक्लिंग’ बताती है कि खतरे से निपटना है तो प्लास्टिक उत्पादन को सीमित और कम करने के ही प्रयास होने चाहिए. यह रिपोर्ट बताती है कि प्लास्टिक में 13,000 से अधिक केमिकल्स होते हैं जिनमें से 3,200 इंसानी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माने जाते हैं. रीसायकल प्लास्टिक में बहुत ज्यादा मात्रा में केमिकल होते हैं जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ये सभी रिपोर्ट हमें आगाह कर रही हैं कि प्‍लास्टिक के उपयोग को कम करने को लेकर हमने बड़े कदम नहीं उठाए तो 2060 तक प्लास्टिक उत्पादन तिगुना करना पड़ेगा और इतना प्‍लास्टिक कितना नुकसान पहुंचाएगा, समझा जा सकता है. हमें यह समझ लेना होगा कि फिलहाल ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो प्‍लास्टिक को खत्‍म कर दे या उसके नुकसान से हमें बचा ले. यह ताकत हमारे पास ही हैं कि हम खुद अपनी सुरक्षा करें और प्‍लास्टिक के प्रति बेपरवाही का व्‍यवहार छोड़ें. ऐसे मनाएंगे तो पर्यावरण दिवस तो हमारी पृथ्‍वी और मन का पर्यावरण अच्‍छा बना रहेगा.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/6442117493987172613/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/6442117493987172613'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/6442117493987172613'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/06/blog-post.html' title='विश्‍व पर्यावरण दिवस: प्‍लास्टिक प्रदूषण से हमें एक ही शक्ति बचा सकती है'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiR5KSDuEPeRVgSH4rQlEsi-A14oSR8YB7PVjm0e2Qkmqmq_eMcI65NkEJ4kpjn1gbcD_NjDn5392J0aZzrvyFkOddxm5wHXiVtPfm_ZEkBskPT_ztj6GS7zUTGLFBMmfnHu_ZL-uvPo3f6V3y-FnGuglRGkXugrBV0oewohbIyvB5lslA/s220/pankaj%20shukla%20photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9062801385297364864.post-4320376272355967813</id><published>2023-06-03T09:30:00.001+05:30</published><updated>2023-10-02T22:01:38.350+05:30</updated><title type='text'>विश्‍व साइकिल दिवस: अनूठी है यह &#39;साइकिल&#39; और इसकी सवारी</title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiabQGs1pv69WUnfvT88Kg5uJw3r_BRSA0De2ngRBzv_sojaAQpFVuB7ENEZHOUqb78S3GCU-UWKk5cycRQY-9W-hnc9oUWQ1peZKR4bv6qLqwnSGOt91hPvghi89WQN2-vG0_dTVtBwN5EMhKLAxr8PyWLzCq8ZVnGjJxSUfwxgDqs_l7_skZ1_88NOdU/s1200/cycle.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;975&quot; data-original-width=&quot;1200&quot; height=&quot;520&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiabQGs1pv69WUnfvT88Kg5uJw3r_BRSA0De2ngRBzv_sojaAQpFVuB7ENEZHOUqb78S3GCU-UWKk5cycRQY-9W-hnc9oUWQ1peZKR4bv6qLqwnSGOt91hPvghi89WQN2-vG0_dTVtBwN5EMhKLAxr8PyWLzCq8ZVnGjJxSUfwxgDqs_l7_skZ1_88NOdU/w640-h520/cycle.jpg&quot; width=&quot;640&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आज जब सड़क पर अपनी गाड़ी से गुजरता हूं और किसी साइकिल सवार को पास से गुजरते देखता हूं तो अपनी गाड़ी जरा स्‍लो कर उसके लिए रास्‍ता बना देता हूं. मुझे वे दिन याद आ जाते हैं जब साइकिल चलाया करता था और किसी गाड़ी को राह देने के फेर में ब्रेक लगाने के बाद फिर साइकिल चलाने के लिए पूरी ताकत लगानी पड़ती थी. यह आदत मुझ में तब से आ गई है जब बाइक चलानी सीखी थी. बाइक से कार तक की यात्रा तो हुई मगर साइकिल की सवारी आज भी जेहन में सुहानी याद की तरह बसी हुई है. हममें से कई के जीवन में साइकिल आज भी बनी हुई लेकिन अब सेहत की फिक्र लिए वजन घटाने और फिट बनने के उपक्रम के रूप में.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यही वजह है कि हर साल 3 जून को साइकिल दिवस मनाने की शुरुआत की गई. ज्‍यादा दिन नहीं हुए हैं, इस दिन को मनाने की शुरुआत 2018 में हुई है और वजह भी वहीं है, लोगों को अपनी सेहत व पर्यावरण के प्रति सजग करना. विश्व साइकिल दिवस 2023 की थीम है, ‘सतत भविष्य के लिए एक साथ सवारी’ Riding Together for a Sustainable Future. एक साथ साइकिल की सवारी, जब यह वाक्‍य पढ़ा और लिख रहा हूं तो कल्‍पना में जाने कितनी छवियां तैर गई हैं जब साथ-साथ साइकिल चलाई गई थी. स्‍कूल के दिनों में दोस्‍तों के समूह के साथ साइकिल की रोमाचंक यात्राएं तो कभी मौजी मन के साथ अकेले में घंटी की ट्रीन-ट्रीन बजाते हुए की गई साइकिल की सवारी याद हो आई. अपने कपड़ों पर दाग मंजूर मगर साइकिल पर निशान भी मंजूर नहीं. चैन चढ़ाने का हुनर. फिल्‍मों के वे दृश्‍य याद हो आए जब नायक-नायिकाओं ने साइकिल की सवारी की, गीत गाएं. जाने कितनी यादें.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिर धीरे-धीरे सुविधाएं बदली और साइकिल की भूमिका भी. तब साइकिल के कुछ प्रकार थे. आज साइकिल कई-कई प्रकार और डिजाइन में उपलब्‍ध है. बड़े समाज के लिए साइकिल आज भी आजीविका उपार्जन का सहायक साधन है और लगभग उतना ही बड़ा समाज है जिसके लिए साइकिल सेहत पाने का साधन. इस तरह समाज का एक और बंटवारा हुआ है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लेकिन आज जब हम विश्‍व साइकिल दिवस पर भविष्‍य की बात कर रहे हैं तो मुझे एक दूसरी ‘साइकिल’ की याद आ रही है. यह ‘साइकिल’ है इकतारा प्रकाशन भोपाल की बाल पत्रिका. बच्‍चों को इसका परिचय देते हुए इसके बारे में क्या खूब कहा गया है, ये साइकिल भी तुम्हारी साइकिल की ही तरह है. इसमें भी दो पहिए हैं. एक में अपने आसपास की हवा है जिसमें हम साँस लेते हैं. उसमें धूल है, धुंआ है और मोगरे की खुशबू भी है. दूसरे पहिए में चिड़िया के पंखों से टकराकर लौटी हवा है. इसमें उड़ानें हैं, सपने हैं. यह तुम्हारी भाषा में बोलती है. तुम्हारी भाषा जानती है. इसमें तुम्हारे ठीक पास की अनदेखी दुनिया की कहानी है. जो बार-बार हमारे घर की घंटियां बजाती है मगर अनजान रहती है. ठीक वैसे जैसे जागने से पहले एक लड़का पेपर फेंक जाता है, चुपचाप. साइकिल जागी हुई तथा चुपचाप दोनों, दुनिया की पड़ताल करती है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कितनी सुंदर बात है कि यह ‘साइकिल’ बच्‍चों से जागी और चुप दोनों तरह की दुनिया की बात करती है. मोबाइल के संसार में कैद बच्‍चों को कल्‍पना के आकाश में ले जाती है. पत्रिका का रंग-रूप, संयोजन, सामग्री इतनी प्रभावी कि बच्‍चे तो ठीक बड़े भी इसे एकबार हाथ में ले लें तो पूरी पढ़े बिना रखते नहीं है. सामग्री की विशिष्‍ट के बारे में क्‍या ही कहा जा सकता है? इस बारे में वरिष्‍ठ साहित्‍यकार कवि, उपन्यासकार, कथाकार विनोद कुमार शुक्ल का यह कहना ही काफी है: साहित्य इत्यादि की पत्रिकाओं में मैंने अब तक जो लिखा पाठकों को सोचकर नहीं लिखा. जो लिख सकता था वही लिखा. इसे कौन पढ़ेगा? या कोई पढ़ेगा! के सुनसान में यह लिखा हुआ छोड़ देता था. साइकिल में यह सोचकर लिखता हूं कि बच्चे पढ़ेंगे. ‘साइकिल’ ने मुझे इस उम्र में पास और दूर के बच्चों तक पहुंचने में मदद की.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस साइकिल की अपनी दुनिया है. अपने रंग है. इसका हैंडल बच्‍चों का सर्जन और रचनात्‍मकता के आमसान की ओर ले जाता है. इसकी यात्रा करते हुए आनंद की घंटियां बजती हैं. इसकी पुर्जे-पुर्जे में मनभावन संग बसता है. यह बच्‍चों के विकास मार्ग को न अवरूद्ध करती है और किसी दिशा में मोड़ती है. वास्‍तव में यह पंख फैलाती है और एक सुहानी उड़ान के लिए आमंत्रित व तैयार करती है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अधिक गहराई की बात करूं तो कक्षा 4 से 8 तक के बच्‍चों को ध्‍यान में रखकर प्रकाशित की जा रही यह पत्रिका बच्‍चों को भाषा का अभ्‍यास करवाती है. भाषा के नए रंग-रूप, नए मुहावरों से परिचित करवाती है. यह दायरों को बांधती नहीं, तोड़ती है. यहां कविता अपने भाव में हैं, छंद और तुकबंदी के विन्‍यास में सिमटी नहीं हैं. तय करना मुश्किल होता है कि चित्र अधिक प्रभावी या लेखन और अंत में हम पाते हैं कि दोनों लाजवाब. यानी तो है न साथ-साथ विकास का दृष्टिकोण?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;‘साइकिल’ और ऐसी ही कई बेजोड़ पुस्‍तकें तैयार कर रहे इकतारा के सुशील शुक्‍ला और चंदन यादव की यह राय मायने रखती है कि ‘साइकिल’ में हमारी कोशिश रहती है कि उसकी सामग्री बच्चों को एक पाठक के रूप में तैयार कर सके. पढ़ने के प्रति उनकी रुचि जागे. इसके लिए कई चीजें जरूरी हैं मसलन, विविधता से भरी सामग्री मसलन, उसकी प्रस्तुति सामग्री की प्रस्तुति पाठक को आकर्षित करती है कि नहीं? जिस भाषा में सामग्री पेश की जाती है वह पुरानी धूल खाई भाषा तो नहीं है? वह आज की और बोलचाल की भाषा है कि नहीं? उसमें जीवन झलकता है कि नहीं या वह सिर्फ किताबी भाषा है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बेहद कल्पनाशील, सवाली और जिज्ञासु बच्‍चों और उनके आसपास फैली दुनिया के बीच बने एक पुल का नाम है ‘साइकिल’ जहां से वे अपनी तरह से, अपनी भाषा और अपने रंग में दुनिया को देखते हैं. ‘साइकिल’ के जरिए वे ऐसी जगह पर पहुंचते हैं जहां बराबरी से बात की जाती है, जहां सीमा रेखाएं नहीं खींची जाती बल्कि कल्पनाओं में एक पंख और जोड़ दिया जाता है. बच्चों को रट्टू तोता बनाए रखने की मुहिम पर प्रहार है यह ‘साइकिल’.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;और जब इकतारा कहता है कि ‘साइकिल’ बच्‍चों को अनुयायी, संकीर्ण और कूपमंडूक बनाए रखने के चक्र के खिलाफ एक जुगनू बराबर प्रस्ताव है तो हम पाते हैं यह जुगनू भर नहीं है, भोर की किरण है और इसका उजास सब बच्‍चों तक पहुंचना चाहिए. विश्‍व साइकिल दिवस पर इस ‘साइकिल’ की ट्रिन-ट्रिन भी सुनिए, अपना भविष्‍य बेहतर बनाने के लिए सृजन संसार साथ-साथ सवारी के लिए बुला रहा है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/4320376272355967813/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/06/blog-post_3.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/4320376272355967813'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/4320376272355967813'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/06/blog-post_3.html' title='विश्‍व साइकिल दिवस: अनूठी है यह &#39;साइकिल&#39; और इसकी सवारी'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiGxw9qkcp4N4k4aU0BjKpWfM5Ab2yosTREXuio7xZad5TGaMtSeUXNcotPD-x3mdrCJyMd_P9z-cK6Py2xHpAUAs6TaG0FMg1e8GGKikw_fYYLzYgccdDgbzXVTOS30XwXOsv_xrB801IObbODPVjlbG8VVLS_X2jVJhi_DTifeGjsI7doRn2iX0zdPYo/s623/daag.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;381&quot; data-original-width=&quot;623&quot; height=&quot;245&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiGxw9qkcp4N4k4aU0BjKpWfM5Ab2yosTREXuio7xZad5TGaMtSeUXNcotPD-x3mdrCJyMd_P9z-cK6Py2xHpAUAs6TaG0FMg1e8GGKikw_fYYLzYgccdDgbzXVTOS30XwXOsv_xrB801IObbODPVjlbG8VVLS_X2jVJhi_DTifeGjsI7doRn2iX0zdPYo/w400-h245/daag.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;हजारों काम मोहब्बत में हैं मजे के दाग&lt;/b&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मोहब्‍बत दाग देहलवी ने जब यह शेर कहा तो बहुत मशहूर हुआ क्‍योंकि उनके पहले मिर्जा गालिब कह चुके थे, ‘इश्क ने ‘गालिब’ निकम्मा कर दिया, वर्ना हम भी आदमी थे काम के.’ अपनी शायरी से मिर्जा गालिब, मौमिन, जौक जैसे बुजुर्ग शायरों की तारीफ पाने वाले दाग देहलवी ने उर्दू का इतना सहज इस्‍तेमाल किया कि अवाम के प्रिय शायर हो गए. उनकी शायरी मोहब्‍बत की शायरी मानी जाती है मगर उनके जीवन का भी अजीब रंग था कि मोहब्‍बत पाने के लिए उन्‍होंने तवायफे काम पर रखी हुई थी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दाग देहलवी का असली नाम नवाब मिर्जा खां था. उनका जन्‍म 25 मई 1831 को दिल्ली में हुई था. दाग देहलवी के पिता शम्सुद्दीन खां ने नाइंसाफी के लिए अंग्रेजों के खि‍लाफ आवाज उठाई. ब्रिटिश रेजिडेंट के कत्ल की भी साजिश के आरोप में उसे 1835 फांसी दे दी गई. पिता की फांसी के समय दाग देहलवी मात्र चार साल और चार महीने के थे. अंग्रेजों के भय से दाग देहलवी की मां वजीर बेगम कई वर्षों तक छिप कर रहीं और इस दौरान दाग देहलवी अपनी मौसी के यहां रहे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;संदर्भ बताते हैं कि कई वर्षों के भटकाव के बाद जब दाग की मां वजीर बेगम ने आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के पुत्र और उत्तराधिकारी मिर्जा फखरू से विवाह कर लिया. इस शादी के बाद दाग देहलवी भी लाल किले में आ गए यहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई. मिर्जा फखरू के देहांत के बाद इन्‍हें लाल किले से बाहर कर दिया गया. लेकिन लाल किले में बीते 12-14 सालों में दाग देहलवी ने उर्दू शायरी में नाम पा लिया था. ऐसे समय में जब फारसी में शायरी की जा रही थी तब दाग ने उर्दू को खास अंदाज से अपनी शायरी में आजमाया. लाल किले से निकलने के अगले साल ही 1857 की क्रांति हो गई. आशियाना बिखरने के बाद वे दर-बदर के हो गए. दिल्‍ली से वे रामपुर पहुंचे और कुछ बरस बाद वहां से हैदराबाद.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हैदराबाद का शुरुआती जीवन तकलीफों में गुजरा फिर नवाब से राहत मिली. बीवी के देहांत के बाद दाग अकेले हो गए थे और मन बहलाने के लिए उन्होंने एक साथ कई तवायफों को नौकर रखा था. दाग देहलवी से इन तवायफों का रिश्ता शाम की महफिलों तक ही था. दाग देहलवी की गज़लों की शौहरत में इन सुरीली आवाज़ों का भी बड़ा योगदान था. दाग देहलवी की शायरी के प्रसिद्ध होने का एक और कारण था कि उन्‍होंने वक्‍त के हिसाब से न केवल गजलें लिखी, बल्कि धुन तैयार कर उन्‍हें तब की नामचीन तवायफों और कोठेवालियों को याद करवाया. इस तरह अगले ही दिन उनकी गजलें शहर में मशहूर हो जाती. उस वक्‍त की मशहूर गायिकाओं से चर्चित हुई दाग की गजलों का कारवां समकालीन गजल गायकों नूरजहां, बेगम अख्तर, फरीदा खानम, आबिदा परवीन, गुलाम अली, मेहदी हसन, जगजीत सिंह, पंकज उधास की आवाज के जरिए हम तक पहुंचा है. हैदराबाद में ही साल 17 मार्च 1905 में उनका देहांत हो गया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दाग देहलवी ने अपने जीवन में खूब लिखा है. बताते हैं कि उनका एक ‘दीवान’ 1857 में लूट लिया गया था, जिसकी कोई खबर नहीं मिली. जब वे हैदराबाद में रह रहे थे तब दूसरा दीवान कोई चुरा ले गया मगर इसके बावजूद दाग देहलवी के पांच दीवान ‘गुलजारे दाग’, ‘महताबे दाग’, ‘आफ़ताबे दाग’, ‘यादगारे दाग’, ‘यादगारे दाग- भाग-2’ प्रकाशित हुए जिनमें 1038 से ज्‍यादा गजलें, रुबाईयां, सलाम मर्सिये आदि शामिल हैं. उन्होंने कम से कम फारसी लफ्जों का इस्तेमाल करके उर्दू शेर लिखे. दाग को अपने वक्त का सबसे बेहतरीन रोमांटिक शायर कहते हुए माना जाता है कि दाग वो शायर हैं जिन्होंने उर्दू गजल को निराशा से निकाल कर मोहब्बत के रास्ते पर ला खड़ा किया. उनके बहुचर्चित कुछ शेर यूं हैं:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आप पछताएं नहीं जौर से तौबा न करें&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आप के सर की कसम ‘दाग’ का हाल अच्छा है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आशिकी से मिलेगा ऐ जाहिद&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;अभी आई भी नहीं कूचा-ए-दिलबर से सदा&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;खिल गई आज मेरे दिल की कली आप ही आप.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अदम की जो हकीकत है वो पूछो अहल-ए-हस्ती से&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मुसाफिर को तो मंजिल का पता मंजिल से मिलता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इलाही क्यूं नहीं उठती कयामत माजरा क्या है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राह पर उनको लगा लाए तो हैं बातों में&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;और खुल जाएंगे दो-चार मुलाकातों में.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हम देखने वालों की नजर देख रहे हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ये तो कहिए इस खता की क्या सजा&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मैं जो कह दूं आप पर मरता हूं मैं.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जिन को अपनी खबर नहीं अब तक&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वो मिरे दिल का राज क्या जानें.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आइना देख के कहते हैं संवरने वाले&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जो रंज की घड़ी भी खुशी से गुजार दे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;वफा करेंगे, निबाहेंगे, बात मानेंगे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मिलाते हो उसी को खाक में जो दिल से मिलता है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मिरी जां चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फलक देता है जिन को ऐश उन को गंम भी होते हैं&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जहां बजते हैं नक़्क़ारे वहां मातम भी होता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/7102143825691878619/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/05/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/7102143825691878619'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/7102143825691878619'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/05/blog-post.html' title='दाग देहलवी: जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiR5KSDuEPeRVgSH4rQlEsi-A14oSR8YB7PVjm0e2Qkmqmq_eMcI65NkEJ4kpjn1gbcD_NjDn5392J0aZzrvyFkOddxm5wHXiVtPfm_ZEkBskPT_ztj6GS7zUTGLFBMmfnHu_ZL-uvPo3f6V3y-FnGuglRGkXugrBV0oewohbIyvB5lslA/s220/pankaj%20shukla%20photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiGxw9qkcp4N4k4aU0BjKpWfM5Ab2yosTREXuio7xZad5TGaMtSeUXNcotPD-x3mdrCJyMd_P9z-cK6Py2xHpAUAs6TaG0FMg1e8GGKikw_fYYLzYgccdDgbzXVTOS30XwXOsv_xrB801IObbODPVjlbG8VVLS_X2jVJhi_DTifeGjsI7doRn2iX0zdPYo/s72-w400-h245-c/daag.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9062801385297364864.post-725293294219709107</id><published>2023-05-17T10:30:00.001+05:30</published><updated>2023-10-02T22:37:39.511+05:30</updated><title type='text'> फड़के स्‍टूडियो: अंग्रेज पत्रकार के कमेंट ने मोम को पत्‍थर में बदल दिया</title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मांडव जा रहे हो तो धार के फड़के स्‍टूडियो जरूर जाना. बाज बहादुर और रानी रूपमति के प्रेम के किस्‍सों के लिए मशहूर मांडू जाने वाले हर शख्‍स को यह सलाह जरूर दी जाती है. बचपन में हमें भी मिली थी जब कक्षा पांचवी के बच्‍चों को स्‍कूल की ओर से शैक्षणिक भ्रमण पर ले जाया गया था. खांडेराव पहाड़ी पर बना तीन कमरों का स्‍टूडियो जहां के बारे में कुछ पता नहीं था मगर ज्‍यों ही दरवाजा खुला हम बच्‍चों की आंखें फटी की फटी रह गईं. रोशन केबिन में रखी मूर्तियां इतनी सजीव की आंखों को मल-मल कर देखा गया वाकई में मूर्तियां हैं या किसी को बुत बना कर बैठा दिया गया है. बोलती सी आंखें, मुस्‍कुराने को तत्‍पर होंठ, उम्र की गवाह झुर्रियां, कपड़ों पर सिलवटों की तराश ऐसी कि मन करें हथेली घूमा कर ठीक कर दें. सब यूं खामोश की यदि गलत हरकत हुई तो बुजुर्ग जो मूर्ति बने बैठे हैं बोल ही पड़ेंगे एकदम.&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhCd384xl5z3yqs2hg4z_1C6outBQXFjbrHWmiubO3A4mAd4YJ_YmgohGREXlqxZ00eACN7TKUuv9i14N17CHzguIGO1M3mcJgb1GnICBZfv5JPFwhOPSVZLEyvpejDHXs4Hrl4X3ZCqCi9yztIUbZYtLwwELIfivHj7WDTX4e_VdQlRP5j0qqIGzW6bAg/s700/FADKE-STUDIO-16842360623x2.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;446&quot; data-original-width=&quot;700&quot; height=&quot;255&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhCd384xl5z3yqs2hg4z_1C6outBQXFjbrHWmiubO3A4mAd4YJ_YmgohGREXlqxZ00eACN7TKUuv9i14N17CHzguIGO1M3mcJgb1GnICBZfv5JPFwhOPSVZLEyvpejDHXs4Hrl4X3ZCqCi9yztIUbZYtLwwELIfivHj7WDTX4e_VdQlRP5j0qqIGzW6bAg/w400-h255/FADKE-STUDIO-16842360623x2.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वह 80 के दशक की बात थी जब पहली बार फड़के स्‍टूडियो गया था और आज 21 वीं सदी के 22 साल गुजर गए हैं. फड़के स्‍टूडियो का रंग रोगन जरूर बदल गया है मगर जो नहीं बदला वह है इन प्रतिमाओं का जीवंत होने का अहसास. पत्‍थरों में प्राण फूंक देना यदि कहावत है तो दावे से कहा जा सकता है कि यह कहावत ऐसी शिल्‍प को देख कर कही गई होगी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;धार के फड़के स्‍टूडियो जो भी गया है वह ऐसे मनोभावों और इन प्रतिमाओं के रचियता के प्रति श्रद्धा भाव से भरे बिना नहीं लौटा है. इन प्रतिमाओं के शिल्‍पकार रघुनाथ कृष्ण फड़के की 17 मई को पुण्‍यतिथि है. रघुनाथ कृष्ण फड़के का जन्‍म 27 जनवरी 1884 को मुंबई के पास वसई में एक साधारण परिवार में हुआ था. उनके पिता कृष्णा जी वसई के दरबार में कार्यरत थे. साधारण परिवार में जन्‍मे रघुनाथ के मूर्तिकार होने के पीछे की कहानी भी दिलचस्‍प है. रघुनाथ‍ को बचपन से ही मूर्तिकला का शौक था. पेंटर श्रीनिवासराव हरपनहल्ली उनके पहले शिक्षक थे. उन्होंने रघुनाथ में मूर्तिकला की गुणवत्ता को पहचाना. उनके प्रोत्साहन से फड़के ने एक बूढ़े आदमी की पहली मूर्ति बनाई. उसी मूर्ति को बॉम्बे आर्ट सोसाइटी प्रदर्शनी में राज्यपाल द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था. फड़के की इसी मूर्ति को बाद में भारत सरकार ने इंग्लैंड के वेम्बली और अमेरिका के फिलाडेल्फिया में प्रदर्शनियों के लिए भेजा था.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मराठी विश्‍वकोश के अनुसार&amp;nbsp; 1917 के दौरान रघुनाथ फड़के ने मुंबई में ‘मूविंग वैक्स पेंटिंग्स’ की एक प्रदर्शनी आयोजित की. इस चित्र प्रदर्शनी को काफी प्रतिसाद मिला. उन्हें अच्छी आमदनी भी हुई. उन्होंने अपने मोम के पुतलों को 1925 में वेम्बली इंग्लैंड में प्रदर्शनी के लिए भेजा. प्रदर्शनी भी वहां बहुत लोकप्रिय हुई. उन्होंने 1917 से 1927 तक दस वर्षों तक ऐसी प्रदर्शनियों का आयोजन किया. भारत की आजादी के दौर में भी उन्‍होंने अपनी प्रदर्शनियों में उन्होंने हिंदमाता के शोक, लाला लाजपतराय, लोकमान्य तिलक, दादाभाई नवरोजी और उनके आसपास के अन्य नेताओं के साथ-साथ महात्मा गांधी की कैद आदि विषयों को प्रस्तुत किया. मोम के इन पुतलों को देखकर लोग हैरान रह जाते थे. अंग्रेजी अखबार हेराल्ड ने भी उनकी कला की प्रशंसा की लेकिन ब्रिटिश पत्रकार और द बॉम्बे क्रॉनिकल के संपादक बीजी हॉर्निमैन की टिप्‍पणी ने उनकी जिंदगी बदल दी. पत्रकार हॉर्निमैन ने फड़के के&amp;nbsp; एक मोम शिल्पकार होने पर उपहास करते हुए सुझाव दिया कि उन्हें तो मूर्तिकार बनना चाहिए. इस आलोचना से रघुनाथ फड़के का दिल टूट गया. इतना उदास हुए कि मोम की प्रतिकृति की अपनी प्रदर्शनी को सफलता की ऊंचाई पर बंद कर दिया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तभी लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी से उनकी पहचान हुई. लोकमान्य तिलक ने उन्हें पुणे में शिवाजी मंदिर के लिए शिव छत्रपति की एक प्रतिमा बनाने का काम सौंपा. शिव राय की यह पहली संगमरमर की स्मारक मूर्ति 1923 में शिवाजी मंदिर में स्थापित की गई थी. फिर 1932 में फड़के को गिरगांव चौपाटी पर लोकमान्य तिलक की आदमकद मूर्ति लगाने का काम मिला. लोकमान्य तिलक की इस मूर्ति को देखने के बाद ब्रिटिश पत्रकार बीजी हॉर्निमैन ने मूर्तिकार के रूप में फड़के की भी प्रशंसा की. जिस पत्रकार से आलोचना मिली थी उसी से मूर्तिकार के रूप में तारीफ सुन कर रघुनाथ कृष्‍ण फड़के किस संतोष का अनुभव किया होगा समझा जा सकता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वे केवल मूर्तिकार नहीं थे बल्कि संपूर्ण सर्जक थे. उन्‍होंने रत्नाकर पत्रिका के अप्पासाहेब गोखले के कारण साहित्य की ओर रुख किया. उन्होंने रत्नाकर, नवनीत, मनोरंजन पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया; और वे ‘टीकाकर फड़के’ के नाम से प्रसिद्ध हुए. 1937 में वे धार में आयोजित मध्य भारतीय साहित्य सम्मेलन की कला और कविता परिषद के अध्यक्ष थे. साहित्य के साथ-साथ उन्होंने संगीत, नाटक, ज्योतिष में भी रुचि ली. फड़के का नाट्यपरमर्ष संग्रह बहुत लोकप्रिय हुआ. उन्होंने तरुण साहित्य माले (1937) द्वारा प्रकाशित हास्य रचनाओं की एक पुस्तक ‘स्वालविराम’ भी लिखी. उन्होंने तबले पर भास्करबुवा बखले, बालकृष्णबुवा इचलकरंजीकर, अमन अली खान जैसे प्रसिद्ध गायकों के साथ संगत की.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब उनकी मूर्तिकला की प्रशंसा धार तक पहुंची तो धार नरेश उदाजीराव पवार की घुड़सवारी की मूर्ति का काम मिला. यह प्रतिमा धार के प्रवेश द्वार पर स्थापित है. कहा तो यह भी जाता है कि 1930 में धार के महाराज उदाजीराव ने अपनी मां लक्ष्मीबाई की प्रतिमा बनाने के लिए उन्हें धार बुलाया था. 1933 में धार में स्टूडियो बनाकर उन्होंने मूर्तिकला का प्रशिक्षण देना शुरू किया. शिष्यों शंकरराव दवे, दिनकरराव दवे, राजाभाऊ मेहुणकर और श्रीधर मेहुणकर ने अपने गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाया है. 1961 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया. 1971 में उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई. 17 मई 1972 को धार के खांडेराव हिल स्थित अपने स्‍टूडियो में उनका निधन हो गया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कलामर्मज्ञ रघुनाथ कृष्ण फड़के के निधन को 51 बरस हो गए हैं मगर उनके शिल्‍प आज भी दर्शकों को वैसा ही अचंभित, चमत्‍कृत और स्‍तब्‍ध करते हैं जैसा निर्माण के वक्‍त करते थे. राजा भोज की नगरी धार इतने बरसों से रघुनाथ कृष्ण फड़के के शिल्‍प के कारण भी ख्‍यात है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/725293294219709107/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/05/blog-post_17.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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छुट्टी पर गई है जैसे।’&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बीते दिनों जब मध्‍य प्रदेश और देश के अन्‍य हिस्‍सों में औचक बारिश और ओलावृष्टि हुई तो सोशल मीडिया पर ऐसे ही मैसेज चल पड़े। कुछ ने इस मैसेज पर ठहाका मार दिया, कुछ किसानों की दशा पर अफसोस जता कर रह गए। किसी ने गर्मी से राहत महसूस की तो किसी को लगा कि बर्फ से भी सड़क देखने के लिए कश्‍मीर, शिमला जाने की जरूरत नहीं है। प्रकृति ने हमें यही यह दृश्‍य उपलब्‍ध करवा दिया है। बहुत कम लोगों ने ठहर कर एक पल सोचा होगा कि प्रकृति का यह बदला व्‍यवहार उनका कंठ सूखा देगा।&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg22YZ5fpKJqD0UsLcAnA6UfIaZvgmDpwRBo1KQf3EiwOQnjL4Q6hRzsUW_77rktsfWJL5L80xSUNowu7heEks6QipRcHJ7CBADgr5UWs65uzh1rs9StZj2cfT82AyKkFlFaXfRGLBLKI81MVKdunfgtY-_cIIH7F3nU5pzvrwPnW50bThP-H4WfnL4/s942/water%20day.jpg&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;522&quot; data-original-width=&quot;942&quot; height=&quot;221&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg22YZ5fpKJqD0UsLcAnA6UfIaZvgmDpwRBo1KQf3EiwOQnjL4Q6hRzsUW_77rktsfWJL5L80xSUNowu7heEks6QipRcHJ7CBADgr5UWs65uzh1rs9StZj2cfT82AyKkFlFaXfRGLBLKI81MVKdunfgtY-_cIIH7F3nU5pzvrwPnW50bThP-H4WfnL4/w400-h221/water%20day.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बहुत कम लोग इसलिए कह रहा हूं क्‍योंकि अधिकांश यह मानते हैं कि जितना पानी बरसेगा उतना धरती के नीचे और ऊपर जमा हो जाएगा। इस तरह हमारे लिए आवश्‍यक पानी की आपूर्ति सतत होती रहेगी। इसी सोच के तहत लोग मानते हैं कि ग्‍लेशियर का पिघलना भी तो अच्‍छा है, ग्‍लेशियर से पिघला पानी हमारे जलस्रोतों में जल स्‍तर बढ़ाएगा ही। कितनी मासूम है यह सोच? या कह लीजिए कितनी आपराधिक है यह सोच कि हम अपने अज्ञान, लापरवाही, स्‍वार्थ और लालच में समूची धरती को नष्‍ट कर रहे हैं। उसके पानी के खत्‍म कर रहे हैं और यह भूले जा रहे हैं कि पानी नहीं होगा तो कुछ नहीं रहेगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पानी की बात इसलिए क्‍योंकि आज विश्‍व जल दिवस है। आज के दिन भी अगर हम पानी की बात नहीं करेंगे तो कब करेंगे? आज से यदि हम पानी के प्रति सजग नहीं होगे तो कब होंगे? अगर आपने यह पढ़ा है कि धरती पर 70 फीसदी पानी है और जल संकट भोगने के बाद भी यह सोचते हैं कि यह जो 70 फीसदी पानी है यह आपकी प्‍यास बुझा देगा या आपकी जान बचा लेगा तो आप सबसे ज्‍यादा भ्रम में है। रहीम तो बरसों पहले कह गए थे, ‘बिन पानी सब सून’ मगर हमने बस इस दोहे को रटा भर है, इससे सीखा नहीं है। परिणाम यह हुआ कि अब बार-बार वैज्ञानिक चेता रहे हैं कि धरती पानी खत्‍म हो रहा है। जितना पानी खत्‍म हो रहा है, हमारे गले के आसपास मृत्‍यु का घेरा उतना ही कस रहा है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पानी का संकट कितना गहरा है, इसे दो बातों से समझते हैं। एक हमारे अनुभव और दूसरे वैज्ञानिक शोध और चेतावनियां। पहले अपने अनुभव की बात। हममें से कई लोग यह जानते हैं कि कुछ बरस पहले नलकूप की संख्‍या बहुत कम हुआ करती थी। तब 50-60 फीट की गहराई पर भूजल मिल जाया करता था। अब लगभग हर घर में अपना निजी बोरवेल है और पानी 300 से 600 फीट नीचे तक पहुंच गया है। तब आमतौर बरसाती नदियां ही गर्मियों में सूखा करती थी। अब सदानीरा कही जाने वाली नदियां भी आधे साल तक सूखी रहती हैं। तब नदी की रेत को जरा सा हटाने पर पानी की झिरी फूट पड़ती थी। अब तो नदियों को रेत से भी खाली कर दिया गया है। अधिकांश नदियों को हमारे कारखानों, उद्योगों और सीवेज का पानी ने जहरीला बना दिया है। तब हमारे आसपास पेड़ हुआ करते थे। अब हमने पेड़ काट दिए और सीमेंट कांक्रीट का जंगल खड़ा का दिया है। धरती को सीमेंट-कांक्रीट से इतना ढ़ंक दिया कि सतह का पानी रीस कर भूगर्भ में पहुंच भी नहीं पाता है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अलग-अलग तरह की मिट्टी की जलग्रहण क्षमता अलग-अलग होती है। हमारे शहरों का नियोजन तथा घरों की डिजाइन उस मिट्टी के अनुरूप होनी चाहिए लेकिन हमने नकल कर करके एक जैसे निर्माण कर लिए हैं। भोपाल के वाटर रिचार्जिंग पैटर्न पर पीएचडी करने वाली टाउन प्‍लानर डॉ. शीतल शर्मा भोपाल का ही उदाहरण देते हुए बताती हैं कि हरियाली और खुलापन लिए आर्किटेक्‍ट भोपाल की पहचान हुआ करते थे। फिर हमने आंगन और खुली जमीन को खत्‍म कर सीमेंट-कांक्रीट की इमारतें बनानी शुरू की। खुला हिस्‍सा छोड़ना लगभग खत्‍म हो गया है। हर जगह सीमेंट-कांक्रीट या फर्शी-टाइल्‍स बिछा दी गई है। कुछ समय पहले बरसात का 70 फीसदी तक पानी जमीन में जाता था। अब बारिश का 10-15 फीसदी भी भूगर्भ में नहीं जा पता है। अधिकांश पानी सतह पर रह जाता है और इस पानी से नदी, नाले&amp;nbsp; उफन जाते हैं। थोड़ी सी बरसात से सड़कों पर पानी भर जाता है और हम समझते हैं कि बहुत बारिश हो गई, जबकि धरती तो प्‍यासी ही रह जाती है। यदि नालों के आसपास पेड़ लगाए जाएं और नालों को नीचे से पक्का नहीं किया जाए तो बारिश का 70 फीसदी से अधिक पानी जमीन में जा सकता है। हमने नालों के आसपास पेड़ तो काटे ही नालो को भी पक्‍का कर दिया है। यहां तक कि पेड़ के तने के आसपास भी पक्‍का कर दिया है ताकि उसकी जड़ों तक भी पानी नहीं पहुंच पाए।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नल जल योजनाएं भी पर्याप्‍त पानी देने में सफल नहीं हो रही है। जबकि एक इंसान को अपनी दैनिक आवश्‍यकताओं के लिए प्रतिदिन कम से कम 20 लीटर पानी तो चाहिए ही। कुछ लोग हर‍ दिन 200 लीटर से भी ज्‍यादा पानी अपनी लापरवाही से बर्बाद कर रहे हैं। कुछ दशक पहले तक यदि कोई कहता था कि पानी खरीद कर पीना पड़ेगा तो उसे हैरत से देखा जाता था। तब प्‍याऊ खोलना धर्म का काम समझा जाता था। अब देश में बोतलबंद पानी का कारोबार ही 21 हजार करोड़ से ज्‍यादा का है। टेंकर, नल जल और अन्‍य साधनों से पानी पाने का खर्च तो अलग है।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अब बात वैज्ञानिकों द्वारा दी जा रही चेतावनियों की। वैज्ञानिक समय समय पर बता रहे हैं कि पर्यावरण असंतुलन नहीं रोका गया और पानी का सही प्रबंधन नहीं किया तो दुनिया की बड़ी आबादी को पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलेगा। इसी चिंता के तहत 50 साल के इतिहास में पहली बार इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस सम्‍मेलन में 6500 से ज्यादा विशेषज्ञ और अलग-अलग देशों के राष्ट्राध्यक्ष और मंत्री मिल कर पानी को बचाने की बात करेंगे। यह सम्‍मेलन आयोजित करना बेहद आवश्‍यक हो गया है क्‍योंकि संयुक्त राष्ट्र की ही ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के दो अरब लोगों यानी 26 फीसदी आबादी को साफ और सुरक्षित पेयजल नहीं मिल रहा है। रिपोर्ट बताती है कि ग्लोबल वॉर्मिंग की समस्या और बढ़ने वाली है। जहां पानी का संकट है, उन इलाकों में पानी की ज्‍यादा कमी होगी।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ग्लेशियर से जुड़े एक अध्ययन में बताया गया है कि बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर अभूतपूर्व तरीके से पिघल रहे हैं और इस सदी के अंत तक दुनिया के दो-तिहाई ग्लेशियर गायब हो सकते हैं। ग्‍लेशियर पिघलेंगे तो बेमौसम पानी मिलेगा और समुद्र का जलस्‍तर बढ़ने से कई क्षेत्र डूब जाएंगे जबकि गर्मियों में भीषण जल संकट खड़ा हो जाएगा। ग्‍लेशियर के पिघलने की तो जो यह कुतर्क देते हैं कि ग्‍लेशियर पिघलेंगे तो पानी तो हमारी नदियों में ही आएगा, उन्‍हें जरा हिमालय के तराई वाले क्षेत्र तथा लेह लद्दाख जा कर देखना चाहिए। बुंदेलखंड में यदि जलसंकट के कारण पलायन होता है तो लेह जैसे क्षेत्र में भी पानी के संकट के कारण पलायन होता है। यहां ग्‍लेशियर के पिघलने के कारण ठंडे मौसम में हर तरफ पानी होता है तो गर्मियों में जब पानी की आवश्‍यकता होती है तब ग्‍लेशियर वाला पानी भी सूख जाता है। यह ठीक वैसा है कि अभी वसंत और चैत्र माह में बारिश और ओले गिर रहे हैं और मानसून में बारिश हो ही नहीं या कुछ घंटों की भारी बारिश के बाद हफ्तों आसमान से बूंद भी न टपके। एक साथ गिरे पानी को संभालने के हमारे पास संसाधन नहीं है और पानी के रीस कर धरती में समाने के सारे रास्‍ते हमने लगभग बंद कर दिए हैं।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सिर्फ इसलिए पानी की चिंता नहीं करनी चाहिए क्‍योंकि धरती के भीतर और ऊपर का पानी सूख रहा है बल्कि अपने स्‍वार्थ से संचालित हम इंसानों को अपने और आने वाली पीढ़ी के बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य के लिए भी पानी की फिक्र करनी होगी। क्‍योंकि आंकड़ें बताते हैं कि भारत में हर रोज पांच साल से कम उम्र के 500 बच्‍चों की मौत डायरिया के कारण होती है। पीने को साफ पानी नहीं मिलना डायरिया का प्रमुख कारण है। 21 फीसदी संक्रामक रोग गंदे पानी के कारण होते हैं। आबादी और पेयजल स्रोत का आकलन करें तो हमारे देश में दुनिया की कुल आबादी के 18 फीसदी लोग रहते हैं लेकिन पूरी दुनिया के कुल जल स्रोतों में से मात्र 4 फीसदी स्रोत ही हमारे देश में हैं। हमें यह समझ लेना चाहिए कि साफ पेयजल बता कर बेचा जा रहा पानी भी शुद्ध हो इसकी गारंटी नहीं है। अपने घर में जिस वॉटर प्‍यूरीफायर का आप उपयोग कर रहे हैं वह पानी के कई महत्‍पूर्ण खनिज को भी खत्‍म कर देता है जिसके परिणामस्‍वरूप बी 12 जैसे सुक्ष्‍म पोषक तत्‍वों की कमी हम सभी भोग रहे हैं।&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हमारी कृषि मुख्‍यत: बारिश के पानी पर ही निर्भर है। तथ्‍य बताते हैं कि दुनिया जितनी गर्म हो रही है, जितना कोयला, तेल, गैस, बिजली म जला रहे हैं, जितना प्रदूषण हम फैला रहे हैं, जितना वन क्षेत्र हम नष्‍ट कर रहे हैं, उतना ही बारिश का पैटर्न भी बदलेगा। बारिश का तरीका बदलेगा तो हमारी कृषि कैसे सुरक्षित रह पाएगी? उपज से हमारा भोजन भी तैयार होता है और खेती कार्य लाखों लोगों की आमदनी और आजीविका का सबसे प्रमुख साधन है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जल संरक्षण, जल प्रबंधन और जल शोधन पर कार्य नहीं करना आत्‍मघाती समाज और तंत्र तैयार करना है। पानी की फिक्र करना सरकार, विश्‍व समुदाय या निकायों की जिम्‍मेदारी ही नहीं है, यह समाज, परिवार और व्‍यक्तिगत हमारा भी दायित्‍व है। बेहतर होगा कि इस जल दिवस पर हम स्‍वयं अपने आसपास गहराते जल संकट को महसूस कर केवल अपने स्‍तर पर पानी का संरक्षण शुरू कर दें। यह व्‍यक्तिगत पहल सरकारी स्‍तर पर नीतिगत पहल करने के लिए तंत्र को मजबूर कर देगी। वरना जैसा जन होंगे वैसा तंत्र होगा। जो चल रहा है वही चलता रहा तो वह स्थिति ज्‍यादा दूर नहीं है जैसा सैमुअल टेलर कोलरिज ने अपनी कविता में कहा है,&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;पानी, पानी, हर जगह, पीने के लिए एक बूंद नहीं!&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;(water water everywhere not a drop to drink)&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: x-small; font-weight: normal;&quot;&gt;(हमसमवेत में 22 मार्च को प्रकाशित)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/1399639513116913105/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/03/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1399639513116913105'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1399639513116913105'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/03/blog-post.html' title='हमारी लापरवाहियों से ऐसे ही गहराएगा जल संकट'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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term="शहरयार"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्‍य ब्‍लॉग"/><title type='text'> ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान... सीने में जलन...&#39; लिखने वाले शहरयार की जिंदगी भी रोचक दास्तां है</title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjmWbCJw9g6T0fQ_MILPdJiZu3vM4ZXwSK7xnN2scKEt1NLg5W1o9AjZ6ktZVNtFaXkP6D7iOcpUxOTfV83Bzn-q9Wx59t4GPQ8-M01NCvkO_E3lr4pegz7VhRcwftD0FxbUENJ1GvO33Wi0rwZFMJb-jRjnKNj5d9r2rVG8b31R4j49Gy_-X6h8sJZ/s1200/uxndsdebpe-1529124181.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;630&quot; data-original-width=&quot;1200&quot; height=&quot;210&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjmWbCJw9g6T0fQ_MILPdJiZu3vM4ZXwSK7xnN2scKEt1NLg5W1o9AjZ6ktZVNtFaXkP6D7iOcpUxOTfV83Bzn-q9Wx59t4GPQ8-M01NCvkO_E3lr4pegz7VhRcwftD0FxbUENJ1GvO33Wi0rwZFMJb-jRjnKNj5d9r2rVG8b31R4j49Gy_-X6h8sJZ/w400-h210/uxndsdebpe-1529124181.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;शहरयार का जिक्र करते ही कोई भी पूछ सकता है, कौन शहरयार? और जब कहें कि ‘उमराव जान’ के गीत ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए’, ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं’, ‘जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने’ लिखने वाले शहरयार. तब सामने वाला कहेगा, अच्‍छा वे शहरयार. वे शहरयार जिन्‍होंने लिखा है, ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’. वे शहरयार जो कम बोलते थे मगर उनकी शायरी जनता के सिर चढ़ कर बोलती थी. जिनकी शायरी को साहित्‍य अकादेमी, ज्ञानपाठी आदि सम्‍मानों से नवाजा गया वे शहरयार. वे उर्दू के चौथे साहित्यकार हैं जिन्हें ज्ञानपीठ सम्मान मिला. उनके पहले फिराक गोरखपुरी, कुर्रतुल ऐन हैदर और अली सरदार जाफरी को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है. वे शहरयार जिन्‍हें हिंदी और उर्दू भाषा के बीच का पुल कहा जाता है. आज उन्‍हीं शहरयार की पुण्‍यतिथि है.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अखलाक मुहम्मद खान यानी शहरयार का जन्‍म 16 जून 1936 को अलोनी जिला बरेली में हुआ था. 1948 में उनके बड़े भाई का तबादला अलीगढ़ हुआ तो वे अलीगढ़ आ गए और वहीं के हो कर रह गए. घर परिवार में कोई शायर नहीं था. पिता पुलिस इंस्‍पेक्‍टर थे और जाहिर है वे बेटे को भी पुलिस महकमे में ही देखना चाहते थे. अखलाक खान को पढ़ाई के दौरान हॉकी से जुनून की हद तक लगाव था. मगर जिंदगी में कोई आया और शायरी भी दाखिल हो गई. शहरयार ने ही अपने साक्षात्कारों में बताया है कि अलीगढ़ में उनकी मुलाकात खलीलुल रहमान आजमी से हुई. आजमी की दोस्‍ती ने उन्‍हें शायरी से मिलवाया. खलीलुल रहमान के ही कहने पर अखलाक खान ने बतौर शायर ‘शहरयार’ नाम अपनाया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चुनिंदा मंचों पर अपनी शायरी से मुखर रहने वाले शहरयान निजी जीवन में खामोश इंसान थे. मुशायरों में भी वे कम ही जाते थे. ‘उमराव जान’ जैसी फिल्‍म के गाने लिख कर रातोंरात चर्चित हुए शहरयार को धुन पर गीत लिखना रास नहीं आया और वे अदब की दुनिया में ही रहे. डॉ. प्रेमकुमार की किताब ‘बातों-मुलाकातों में शहरयार ने अपने जीवन के कुछ राज खोले हैं. लेखन के शुरुआती पर वे बताते हैं कि जब मैंने तय किया कि मुझे थानेदार नहीं बनना है तो घर से अलग होना पड़ा. तब मैं खलीलुर्रहमान के साथ रहने लगा. शुरू में मेरी जो चीजें छपीं, ऐक्चुअली वो मेरी नहीं हैं. बाद में अचानक कोई मेरी जिंदगी में आया…नहीं, यह कांफीडेंशियल है… कहते हुए शहरयार उस व्‍यक्ति के बारे में अपनी बात को छिपा जाते हैं. उनकी संवेदनशीलता इस कहन में झलकती है कि इस उम्र में मैं कितना ही रुसवा हो जाऊं, किसी और को रुसवा क्यों करूं?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वे इस प्रसंग को छोड़ आगे बढ़ते हैं और बताते हैं कि तब दुनिया मुझे अजीब लगने लगी और फिर मैं शायरी करने लगा. बीए के आखिरी साल में शेर लिखने की रफ्तार तेज हो गई. एमए में साइकोलॉजी में दाखिला लिया और जल्दी ही अहसास हुआ कि फैसला गलत लिया है. दिसंबर में नाम कटा लिया. फिर चार-छह महीने केवल शायरी की – खूब छपवाई. ऊपर वाले की मुझ पर…. हां, यूं मैं मार्क्सिस्ट हूं फिर भी मानता हूं कि कोई शक्ति है; कोई बड़ी ताकत है जो मेरी चीजों को तय करती रही है. उर्दू की बहुत अच्छी मैगजींस में मेरी चीजें छपने लगीं. तेज रफ्तारी से सामने आया. फिर एमए उर्दू में ज्वाइन किया.’&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;साफगोई देखिए कि शहरयार जोर दे कर स्‍वीकार करते हैं कि वे मार्क्‍सवादी हैं मगर एक परम सत्‍ता पर भरोसा करते हैं. शहरयार निजी जीवन के मामले में कम ही बोले हैं. शहरयार की अपनी बेगम नजमा के साथ मन नहीं मिला था. उनके एकांत और खामोश मिजाजी के पीछे इसे भी एक कारण माना जाता है. पत्‍नी नजमा के लिए वे क्‍या सोचा करते थे, उनकी नज्‍म ‘नजमा के लिए’ में दिखाई देता है. इस नज्‍म में वे लिखते हैं:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;क्या सोचती हो&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दीवार-ए-फरामोशी से उधर क्या देखती हो&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आईना-ए-ख्‍वाब में आने वाले लम्हों के मंजर देखो&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आंगन में पुराने नीम के पेड़ के साए में&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;भय्यू के जहाज में बैठी हुई नन्ही चिड़िया&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;क्यूं उड़ती नहीं&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जंगल की तरफ जाने वाली वो एक अकेली पगडंडी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;क्यूं मुड़ती नहीं&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;टूटी जंजीर सदाओं की क्यूं जुड़ती नहीं&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इक सुर्ख गुलाब लगा लो अपने जूड़े में&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;और फिर सोचो.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शहरयार के मिजाज पर कमलेश्‍वर ने लिखा है, उन्होंने अपनी शायरी में मानवीय मूल्यों को सबसे आगे रखा. शायरी हो या अफसाना शहरयार बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि जो लिखना है जमकर लिखो और इतना लिखो कि अपने लिखे को भी जी भर के खारिज कर सको, जिससे साहित्य जो सामने आए तो खूबसूरत और असरदार बन सके. इसके साथ ही वह बहसों में न हिस्सा लेते हैं और न शरीक होते हैं क्योंकि वह किसी भी कीमत पर अपना सकून खोना नहीं चाहते.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब फिल्‍मों में गाने खास कर ‘उमराव जान’ का जिक्र हुआ तो शहरयार ने डॉ. प्रेमकुमार को दिए अपने इंटरव्‍यू में बताया था कि मुझे जिंदगी में बहुत सी चीजें फि‍ल्म के गानों की मकबूलियत से मिलीं. वे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वे जब इलाज के लिए ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट जाते थे तो उन्‍ळें लाइन में खड़ा नहीं होना पड़ता था. वहां डॉक्‍टर बिना कार्ड ही उनकी जांच कर लेते थे. वे बहुत खुशी से जांच करते थे. ट्रेन या हवाई जहाज में रिजर्वेशन करवाना हो या एएमयू की एक्जिक्यूटिव या कोर्ट के इलेक्शन का मसला हो ‘उमराव जान’ के गानों ने हमेशा मदद की है. मुशायरा चाहे देश का हो या विदेश का शहरयार का सिर्फ एक ही परिचय काफी होता था, ‘उमराव जान’ के गीतकार.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बाद में ‘दामन’, ‘फासले’, ‘द नेमसेक’ आदि फिल्‍मों के लिए गीत लिखे मगर मन फिल्‍मी दुनिया में रमा नहीं. इसका कारण शहरयार ने यूं बताया है, मेरा एक उसूल है कि मैं किसी ऐसी फि‍ल्म में गाने नहीं लिख सकता, जिसमें गाना कहानी का पार्ट न हो और जिसमें पोयट्री की गुंजाइश न हो. हम दनादन धुन पर तुरंत नहीं लिख सकते. उन्‍होंने बताया था कि पिता का कहना था कि यह तो आदमी को मालूम नहीं हो पाता कि वह क्या कर सकता है, लेकिन यह बहुत आसानी से मालूम हो जाता है कि वह क्या नहीं कर सकता. जब यह मालूम हो जाए तो ऐसा काम करने के बाद सिवाय जिल्लत के कुछ नहीं मिलता. शहरयार ने जान लिया था कि वे क्‍या कर सकते हैं और यह जान कर उन्‍होंने जो किया उसने उन्‍हें शायरी का शहरयार (बादशाह) बना दिया. उनके लिखे को पढ़ना हमेशा चैन देता है तो ठिठकने पर मजबूर भी करता है, जैसे आज वे नहीं है तो महसूस होता है कहीं कुछ कम है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जिंदगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हर घडी होता है अहसास कहीं कुछ कम है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अब जिधर देखिए लगता है कि इस दुनिया में&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कहीं कुछ ज़्यादा है, कहीं कुछ कम है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;वो देख लो वो समंदर खुश्क होने लगा&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जिसे था दावा मेरी प्यास को बुझाने का.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हर मुलाकात का अंजाम जुदाई क्यूं है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अब तो हर वक्‍त यही बात सताती है हमें&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूं है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मैं देखता रहा दरिया तिरी रवानी को.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किस्सा-ए-दर्द में ये बात कहां से आई&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मैं बहुत हंसता हूं जब कोई सुनाता है मुझे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;ख़्वाब देखने की हसरत में तन्हाई मेरी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आंखों की बंजर धरती में नींदें बोती है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;खुद को तसल्ली देना कितना मुश्किल होता है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कोई कीमती चीज अचानक जब भी खोती है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;वो बेवफा है हमेशा ही दिल दुखाता है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मगर हमें तो वही एक शख्‍स भाता है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अजीब चीज है ये वक्‍त जिसको कहते हैं&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कि आने पाता नहीं और बीत जाता है.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b style=&quot;color: #404040; font-family: &amp;quot;Noto Serif&amp;quot;, &amp;quot;Droid Serif&amp;quot;, sans-serif; font-size: small;&quot;&gt;(न्‍यूज 18 में 13 फरवरी 2023 को प्रकाशित ब्‍लॉग।)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/962810174509683277/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/02/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/962810174509683277'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/962810174509683277'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/02/blog-post.html' title=' ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान... सीने में जलन...&#39; लिखने वाले शहरयार की जिंदगी भी रोचक दास्तां है'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiR5KSDuEPeRVgSH4rQlEsi-A14oSR8YB7PVjm0e2Qkmqmq_eMcI65NkEJ4kpjn1gbcD_NjDn5392J0aZzrvyFkOddxm5wHXiVtPfm_ZEkBskPT_ztj6GS7zUTGLFBMmfnHu_ZL-uvPo3f6V3y-FnGuglRGkXugrBV0oewohbIyvB5lslA/s220/pankaj%20shukla%20photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" 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class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhqhVdDbyngJB_LTl6R8SP_8RaD6eiWcBBlzZvw72A38G40A-fy_66g9VZl0R6HDRFnA2IzwwcLAYjY463f_kUKl31u4H0eH4GqCFGIwD8CCBkuKiZpodXs9I7lenI3egUdBHLs1ICzqtAYOyGegwionY-PY-RZ_gyioRq1H5P-Ihxdha2cCn31F6jA/s750/kavi-pradeep.jpeg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;348&quot; data-original-width=&quot;750&quot; height=&quot;185&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhqhVdDbyngJB_LTl6R8SP_8RaD6eiWcBBlzZvw72A38G40A-fy_66g9VZl0R6HDRFnA2IzwwcLAYjY463f_kUKl31u4H0eH4GqCFGIwD8CCBkuKiZpodXs9I7lenI3egUdBHLs1ICzqtAYOyGegwionY-PY-RZ_gyioRq1H5P-Ihxdha2cCn31F6jA/w400-h185/kavi-pradeep.jpeg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कवि प्रदीप… यह नाम सुनते ही हमारे ख्‍याल में एक साथ कई गीत बज उठते हैं. ‘ ऐ मेरे वतन के लोगों’, ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिंदुस्‍तान हमारा है’, ‘चल चल रे नौजवान’, ‘हम लाए हैं तूफान से कश्‍ती निकाल कर’, ‘दूसरा का दुखड़ा दूर करने वाले’, ‘टूट गई है माला’. एक के बाद एक बेहद लोकप्रिय गीतों की शृंखला याद हो आती हैं. ऐसे भी गीत जो टैग लाइन बन गए हैं. जैसे फेरी वाला जब ऊंची आवाज में कहता है, चने जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार, तब उसे कहां याद रहता है कि इन पंक्तियों को कवि प्रदीप ने लिखा है. हमारे समय में मानवता के पतन से दु:खी हो कर जब हम कहते हैं कि कितना बदल गया इंसान तब बरबस कवि प्रदीप याद हो आते हैं. वहीं प्रदीप जिनके लिखे गीत को गा कर इंदिरा गांधी अपने बचपन की ‘वानर सेना’ में जोश भरती थी. प्रदीप का लिखा ‘आओ बच्‍चों तुम्‍हें दिखाएं झांकी हिंदुस्‍तान की’ बाल सभाओं में सबसे ज्‍यादा गाए जाने वाले गीतों में से एक है. बरसों तक इन्‍हीं के भजनों से जाने कितने घरों में सुबह रोशन हुआ करती थी. कवि प्रदीप का एक परिचय देशभक्ति का संचार करने वाले गीत हैं तो दूसरा परिचय वे भजन हैं जिन्‍होंने हमें समय के पहले सचेत किया.&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आज उन्‍हीं कवि प्रदीप की जयंती है. 6 फरवरी 1915 में मध्य प्रदेश के उज्जैन के बड़नगर में एक बाल का जन्‍म हुआ जिसे नाम मिला रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी. घर में रामचंद्र को रामू कहा जाता था. बड़े भाई कृष्‍ण वल्‍लभ द्विवेदी अनुवादक, लेखक, कवि थे. उनकी विद्वता का असर छोटे भाई रामू पर भी हुआ. बड़े भाई गद्य के मनीषी थे तो छोटे भाई रामचंद्र ने काव्‍य को चुना. प्रदीप के नाम से लेखन शुरू किया और शुरुआती लेखन से ही श्रोताओं को मंत्रमुग्‍ध कर दिया. 15-16 बरस की उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए. अंग्रेजों की लाठियां खाईं. महीनों अस्पताल में भर्ती रहे. यहीं से देशभक्ति के गीतों का लेखन शुरू हुआ.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सुधीर निगम द्वारा लिखी गई जीवनी में कवि प्रदीप के जीवन के बारे में विस्‍तार से बताया गया है. इसके अनुसार अहमदाबाद में काव्‍य पाठ के बाद एक परिचित के साथ मुंबई जाना हुआ और संयोग ऐसा बना कि कवि प्रदीप प्रख्‍यात फिल्‍मकार हिमांशु राय से उनके दफ्तर में मिले. उस समय वहां देविका रानी, अशोक कुमार, लीला चिटनिस, निर्देशक फ्रेंज आस्टिन, शषधर मुकर्जी और अमिय चक्रवर्ती जैसी हस्तियां मौजूद थीं. हिमांशु राय ने प्रदीप से एक गीत सुनाने के लिए कहा. यह फिल्मों में उनकी प्रवेश परीक्षा थी. प्रदीप ने गाया-&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तुम हो कहो, कौन?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;अब तो खुलो, प्राण, मुंदकर रहो यों न!&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रदीप का काव्‍य और स्वर जादू कर गया. हिमांशु राय ने फिल्‍म निर्माण कंपनी बाम्बे टॉकीज में गीतकार की नौकरी की पेशकश कर दी. मासिक वेतन पर मामला अटक गया. लोग हैरत में थे कि किशोर प्रदीप कैसे दिग्‍गज हिमांशु राय को इंकार कर रहे हैं. असल में प्रदीप को दो डर थे. एक तो यह कि वे हिमांशु राय के मन का चाहा लिख पाएंगे या नहीं और दूसरा, उन्‍हें लग रहा था कि वेतन के रूप में 60-70 रुपए मिलेंगे. मगर हिमांशु राय ने 200 रुपए वेतन तय किया तो वे हैरान रह गए. इतना वेतन तो बड़े बड़े अभिनेताओं का भी नहीं था. राजकपूर का भी मासिक वेतन 170 रुपए था.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस तरह कवि प्रदीप का फिल्‍मों में लेखन आरंभ हुआ. 1940 में आई शषधर मुकर्जी की फिल्म ‘बंधन’ (1940) में सभी 12 गीत प्रदीप ने लिखे थे. इस फिल्म का एक गीत उस समय चर्चित हुआ जो आज भी प्रेरणादायी बना हुआ है. वह गीत यूं है:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दूर तेरा गांव&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;और थके पांव&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;फिर भी तू हरदम&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आगे बढ़ा कदम&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;रुकना तेरा काम नहीं&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;चलना तेरी शान&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;चल-चल रे नौजवान&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;चल-चल रे नौजवान.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;देश के नवयुवकों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के लिए लिखा गया यह गीत इतना पसंद किया गया कि हर जगह गाया जाने लगा. यह गीत जन जागरण के लिए प्रभात फेरियों का मंत्र बन गया. सिंध और पंजाब की विधान सभाओं ने इस गीत को राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी. बीबीसी. लंदन में कार्यरत बलराज साहनी ने गीत को कई बार प्रसारित किया. अहमदाबाद में महादेव भाई ने इस गीत की उपमा&amp;nbsp; ‘चरैवेति चरैवेति’ मंत्र से की. कई सिनेमा घरों में दर्शकों की मांग पर इस गीत को दोबारा दिखाना पड़ता था. संदर्भ बताते हैं कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने प्रदीप को बताया था, अपनी किशोरावस्‍था&amp;nbsp; में इंदिरा प्रभात फेरियों में ‘चल चल रे नौजव़ान’ गाकर अपनी ‘वानर सेना’ की परेड कराती थीं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यहां बताता दूं कि जब आप कहीं सुने कि ‘चना जोर गरम लेलो’ तब याद कीजिएगा कि यह गीत 1940 की फिल्म ‘बंधन’ का है जिसे कवि प्रदीप ने लिखा है. यह भी एक तथ्‍य है कि 1941 में आई फिल्‍म ‘झूला’ के गीत ‘न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे’ गायक अभिनेता अशोक कुमार को इतना पसंद आया था कि उन्होंने इसे अपनी अंतिम यात्रा में बजाने की इच्‍छा जताई थी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिर 1943 में प्रदीप और अनिल विश्वास के गीत- संगीत से सजी फिल्‍म ‘किस्‍मत’ ने एक और कीर्तिमान रच दिया. इस फिल्‍म का कालजयी गीत है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दूर हटो ऐ दुनिया वालो ये हिंदुस्तान हमारा है.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;‘चल चल रे नौजवान’ के बाद यह ऐसा गीत था जो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का नारा बन गया था.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जनता एकजुट हो गई. ब्रिटिश सरकार को यह नागवार गुजरा. डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स की दफा 26 के तहत गीतकार प्रदीप पर जांच बैठा दी गई. अभियोजन अधिकारी धर्मेंद्र गौड़ ने मामले की जांच के बाद लिखा कि ‘इस गाने में प्रदीप ने जर्मनी और जापान को अपना निशाना बनाया है अंग्रेजों को नहीं. प्रदीप धोती कुर्ता पहनते जरूर है पर कांग्रेसी नहीं हैं और क्रांतिकारी भी नहीं हैं.’ मामला खत्म हुआ. वास्तव में प्रदीप ने चतुराई दिखाई थी। वे जानते थे कि इस गीत पर अंग्रेज हायतोबा मचाएंगे, इस कारण उन्होंने गीत में एक पंक्ति डाल दी थी- ‘तुम न किसी के आगे झुकना, जर्मन हो या जापानी.’ यही पंक्ति अभियोजन अधिकारी की रिपोर्ट का आधार बनी और चाह कर भी अंग्रेज सरकार कवि प्रदीप पर कार्रवाई नहीं कर सकी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कवि प्रदीप ने अपने जीवन में लगभग 1700 गाने लिखे. फिल्मों और फिल्म वालों का रवैया बदलने लगा तो उन्होंने 1988 में फिल्मों में लिखना बंद कर दिया. निर्माता पहले से बनाई गई धुनों पर गीत लिखवाना चाहते थे जबकि प्रदीप का कहना था कि मुर्दे का कफन पहले खरीदोगे तो मुर्दे को उसकी साइज का काटना पड़ेगा यह मैं नहीं कर सकता. 1997 में कवि प्रदीप को सिनेमा में भारत के सर्वोच्च पुरस्कार, लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 11 दिसंबर 1998 को कवि प्रदीप की मृत्यु हो गई थी. वे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके गीत आज भी अमर हैं. खासकर ‘ऐ मेरे वतन के लोगों… तुम खूब लगा लो नारा’.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस गीत की रचना प्रक्रिया और प्रस्‍तुति भी एक कथा है. यह गीत भारत-चीन युद्ध के शहीदों को याद कर लिखा गया था. लता मंगेशकर ने इसे पहली बार 27 जनवरी, 1963 को दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में गाया था. यह कार्यक्रम युद्ध के बाद सैनिकों को आर्थिक मदद देने के लिए आयोजित किया गया था. सभी मशहूर संगीतकारों ने यहां अपना एक-एक देशभक्ति गीत प्रस्‍तुत किया था. संगीतकार सी. रामचंद्र के पास कोई गाना नहीं था. ऐसे गीत लिखने के आग्रह के साथ कवि प्रदीप के पास पहुंचे. इस आग्रह पर जो गीत बना वह है, ‘ऐ मेरे वतन के लोगों.’&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कवि प्रदीप के अनुसार एक दिन ऐसे ही माहिम बीच पर टहल रहे थे. उनके दिमाग में एक लाइन कौंधी और एक पूरा पैरा तैयार हो गया. उस वक्‍त उनके पास कागज-पेन था नहीं. तुरंत एक राहगीर से पेन मांगा और सिगरेट का डिब्बा फाड़कर उस पर गीत लिख दिया. उन्‍होंने गीत के कुल सौ पैराग्राफ लिखे थे. गीत को गाने की बारी आई तो सी. रामचंद्र से लता मंगेशकर की बातचीत बंद थी इसलिए आशा को चुना गया. कवि प्रदीप की इच्‍छा थी कि लता इस गीत को गाए. सी. रामचंद्र तो बात करते नहीं थे, लिहाजा कवि प्रदीप ने ही पहल की. लता उनकी बात टाल नहीं सकीं. तय हुआ कि यह गीत दोनों बहनें लता और आशा गाएंगी मगर ऐनवक्‍त पर आशा भोंसले बीमार पड़ गई और लता मंगेशकर ने यह गीत गाया.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लता ने जब कवि प्रदीप का लिखा गीत गाया तो एक इतिहास बन गया. मोहम्‍मद रफी ने फिल्म ‘लीडर’ का गीत ‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं’ गाया. लग रहा था इसके आगे क्‍या कोई गीत होगा?&amp;nbsp; लेकिन लता के पहली पंक्ति गाते ही स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया. सब स्‍तब्‍ध. आंखों में आंसू. गाना पूरा होने के बाद पंडित नेहरू ने लता मंगेशकर को पास बुला कर कहा ‘लता, तुमने आज मुझे रुला दिया’.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पं. नेहरू तो क्‍या उस कार्यक्रम में कौन होगा जो यह गीत सुन कर रोया नहीं होगा? कौन होगा जो प्रदीप के गीतों को सुन कर आज भी दो पल सोचने को मजबूर न होगा?&amp;nbsp; यह सच ही है कि जो प्रदीप के गीतों को सुन पर अप्रभावी रह गया उसे अपनी संवेदना के स्‍तर को जरूर टटोलना चाहिए. कौन होगा जो आज के हालत को देख-जान कर कवि प्रदीप की पंक्तियों में न कहता होगा:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;सूरज ना बदला, चांद ना बदला, ना बदला रे आसमान,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आया समय बड़ा बेढंगा, आज आदमी बना लफंगा,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कहीं पे झगड़ा, कहीं पे दंगा, नाच रहा नर होकर नंगा,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;छल और कपट के हांथों अपना बेच रहा ईमान,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;राम के भक्त, रहीम के बंदे, रचते आज फरेब के फंदे,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कितने ये मक्कार ये अंधे, देख लिए इनके भी धंधे,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इन्हीं की काली करतूतों से हुआ ये मुल्क मशान,&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;(न्‍यूज 18 में 6 फरवरी 2023 को प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/2586569619436211171/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/02/blog-post_6.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/2586569619436211171'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/2586569619436211171'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/02/blog-post_6.html' title='कवि प्रदीप: जब एक लाइन ने अंग्रेज सरकार को कर दिया था असहाय'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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term="साहित्‍य ब्‍लॉग"/><title type='text'>&#39;फिर छिड़ी रात बात फूलों की&#39; वाले शायर के एक शेर ने बदल दिया था निजाम</title><content type='html'>&lt;div style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhzvDWjFTODQlg4aO6PPN4F4HqIAJPaDqGH4zkk8q8zrABu7iHZZtqelbNLU0DHoqjsj7Ymnp7fWW3fXRwH_PUI4YS3bV7PLPYGVyibdF6BMSWTq-16Ly2TkLDDVitVdn4YTAIgrV-OuzjAHeNkptjcSrR6ayNP_YB2OtbsrvjR8dmlqjuFS4LmjfKs/s875/Makhdoom2.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;536&quot; data-original-width=&quot;875&quot; height=&quot;245&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhzvDWjFTODQlg4aO6PPN4F4HqIAJPaDqGH4zkk8q8zrABu7iHZZtqelbNLU0DHoqjsj7Ymnp7fWW3fXRwH_PUI4YS3bV7PLPYGVyibdF6BMSWTq-16Ly2TkLDDVitVdn4YTAIgrV-OuzjAHeNkptjcSrR6ayNP_YB2OtbsrvjR8dmlqjuFS4LmjfKs/w400-h245/Makhdoom2.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;‘रात भर आपकी याद आती रही’, ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की’ और ‘इक चमेली के मंडुए तले’ जैसे गीत आपको याद तो होंगे. क्‍या इनके रचनाकार को जानते हैं? शायद नहीं. ये गीत शायर मखदूम मोहिउद्दीन के लिखे हुए हैं. खासबात यह है कि उन्‍होंने कभी फिल्‍मों के लिए लिखा ही नहीं था. उनकी रचनाओं की लोकप्रियता ऐसी थी कि फिल्‍मकारों ने शायरी का बतौर गीत इस्‍तेमाल किया. वे तो एक ऐसे शायर थे जो एक हाथ में कलम रखते थे तो दूसरे हाथ में बंदूक.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बंदूक? जी हां, आपने सही पढ़ा. वे ऐसे शायर थे जिन्‍होंने लिखा तो फूलों की बात को शब्‍द दिए और हैदराबाद को आजाद भारत में मिलाने की बारी आई तो निजाम के खिलाफ बंदूक थाम ली. जो इतना मजाकिया थे कि खुद के किस्‍सों को दिलचस्‍पी से सुनाते थे और मौका आने पर मुशायरे में शायरा को हमले से बचाने के लिए चीते सी फुर्ती लिए एक शख्‍स से भिड़ गए थे.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आज उन्‍हीं मखदूम मोहियुद्दीन की जयंती है और इस दिन उनकी रचनाओं और साहित्‍य जगत में फैले उनके किस्‍सों की बात करते हैं. मखदूम मोहिउद्दीन का जन्‍म 4 फरवरी 1908 को हैदराबाद रियासत के अंडोल गांव (अब जिला मेडक) में हुआ था. बचपन में पिता के देहांत के बाद चाचा ने उनकी परवरिश की. शायरी के लिए याद किए जाने वाले मखदूम मोहिउद्दीन वास्‍तव में कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के कार्यकर्ता पहले थे, शायर बाद में. लाल झंडे तले क्रां‍ति के लिए उन्‍होंने शायरी को ‘टूल’ बनाया. आजादी के संघर्ष और फिर हैदराबाद राज्य के निजाम के खिलाफ 1946-1947 के तेलंगाना विद्रोह में अपनी शायरी से क्रांति जगाने का काम किया. नर्म मिजाज शायर मखदूम मोहिउद्दीन निजाम की सेना का भी मुकाबला करने के लिए कलम के साथ बंदूक लिए भी उठाए घूमते थे.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कलम और बंदूक की धमक इतनी थी कि निजाम ने उन पर पांच हजार का इनाम घोषित किया था. इतना ही नहीं हैदराबाद के तत्कालीन निजाम मीर उस्मान अली खान ने लोगों को भड़काने का आरोप लगाकर मख़दूम को जान से मारने का आदेश दिया था.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कलम की ताकत से भी मखदूम ने निजाम को झुकने पर मजबूर कर दिया था. यह वाकया मखदूम के खास दोस्‍त मोहम्मद मेहदी ने उनके प्रशंसकों बताया है. उन दिनों हर स्कूल में पहले निजाम की शान में एक तराना पढ़ा जाता था. मखदूम ने इस तराने के खिलाफ एक शेर लिख दिया जो बहुत प्रसिद्द हो गया. लोगों ने निजाम को बताया कि मखदूम ने एक शेर लिखा है और जब जब निजाम की तारीफ में वह तराना गाया जाता है तो लोग मखदूम का शेर याद कर हंसने लगते हैं. अपनी हंसी उड़ती देख कर निजाम ने तराना गाने का नियम खत्‍म कर दिया.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मखदूम के तेलंगाना में किसानों के साथ किए गए संघर्ष को पर उर्दू के उपन्यासकार कृश्न चंदर ने ‘जब खेत जागे’ उपन्यास लिखा है. इस पर गौतम घोष ने तेलुगू में ‘मां भूमि’ फिल्म बनाई. विमल रॉय ने जब चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की मशहूर कहानी पर ‘उसने कहा था’ फिल्म बनाई तो उसमें मखदूम की नज्‍म ‘जाने वाले सिपाही से पूछो’ का उपयोग गीत के रूप में किया था. युद्ध के लिए सिपाही अपने परिवार को छोड़ कर जा रहा है. यह नज्‍म उसके जाने के समय के माहौल को बताती है.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;font-weight: bold; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जाने वाले सिपाही से पूछो&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;font-weight: bold; text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;वो कहां जा रहा है&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: 700;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कौन दुखिया है जो गा रही है&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भूखे बच्‍चों को बहला रही है&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लाश जलने की बू आ रही है&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ज़िंदगी है कि चिल्‍ला रही है.&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कितने सहमे हुए हैं नजारे&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कैसे डर डर के चलते हैं तारे&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्‍या जवानी का खून हो रहा है&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सुर्ख हैं आंचलों के किनारे.&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गिर रहा है सियाही का डेरा&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हो रहा है मेरी जाँ सवेरा&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ओ वतन छोड़कर जाने वाले&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;font-weight: bold;&quot;&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;खुल गया इंकलाबी फरेरा.&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;‘सरमाया मखदूम’ पुस्‍तक में मखदूम मोहिउद्दीन के दोस्‍तों और करीबियों ने उनकी जीवन यात्रा पर अपने अनुभव लिखे हैं. ‘मखदूम मोहिउद्दीन: यादों में बसा आदमी’ शीर्षक से लेख में मुज्‍तबा हुसैन लिखते हैं कि खुद अपना मजाक उड़ाने में उनका कोई सानी नहीं था. मुज्‍तबा हुसैन उनके एक किस्से का जिक्र करते हैं.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एक बार मखदूम अलसुबह ओरिएंट होटल पहुंचे और बैरा से पूछा, निहारी है?&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बैरा बोला, ‘नहीं है.‘&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मखदूम ने पूछा, ‘आमलेट है?’&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बैरा बोला, ‘नहीं.’&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मखदूम ने फिर पूछा, ‘खाने के लिए कुछ है?’&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बैरे ने जवाब दिया, ‘इस वक़्त तो कुछ नहीं है.‘&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस पर मखदूम बोले, ‘ये होटल है या हमारा घर कि यहां कुछ भी नहीं है!’&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उम्र के आखिरी चरण में भी वे इंकलाबी थे. उनके इंतकाल से दो बरस पहले की बात है. हैदराबाद में एक बड़ा मुशायरा बरपा था. मखदूम डायस पर बैठे थे और एक शाइरा माइक पर कलाम सुना रही थी. डायस के नीचे एक तगड़ा शख्स नशे में धुत्त बैठा शायरा को घूरे जा रहा था. फिर उसके जी में ना जाने क्या आई कि उसने अचानक शायरा की तरफ छलांग लगाई. मखदूम ने भी चीते जैसी फुर्ती के साथ उस शख्स की तरफ़ छलांग लगाई. सेकंडों में उस शख्स को डायस से नीचे गिराया और उसके सीने पर सवार हो गए. मैं कैसे बताऊं कि बीस-पच्चीस बरस बाद मखदूम के अंदर छिपे हुए इंकलाबी को फिर एक बार देखकर कितनी खुशी हुई. लोगों ने मखदूम की इस अदा की दाद भी उसी तरह दी जिस तरह उनके कलाम पर दिया करते थे.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मखदूम अक्सर अपने परिचितों को जानबूझकर छेड़ते भी रहते थे. ऐसा ही एक किस्सा है पेंटर को दी चुनौती का. मुज्‍तबा हुसैन ने लिखा है कि एक रात सुलेमान अरीब के घर हैदराबाद के मशहूर आर्टिस्ट सईद बिन मुहम्मद आए हुए थे. मखदूम ने उनसे कहा कि शायरी पेंटिंग से कहीं ज्यादा ताकतवर माध्‍यम है.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सईद मुहम्मद ने जवाब दिया, पेंटिंग और शायरी का क्‍या मुकाबला? तुम जो चीज शायरी में नहीं कह सकते हो वह हम रंगों में कह देते हैं. तुम कहो तो सारी उर्दू शायरी को पेंट करके रख दूं.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मखदूम बोले, सारी उर्दू शायरी तो बहुत बड़ी बात है, तुम इस मामूली मिस्रे को ही पेंट कर दो. मिसरा था- ‘पंखुड़ी इक गुलाब की सी है.’&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सईद बिन मुहम्मद बोले, ‘यह कौन सी मुश्किल बात है. मैं कैनवास पर गुलाब&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;की एक पंखुड़ी बना दूंगा.’&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मखदूम बोले, ‘पंखुड़ी गुलाब की तो पेंट हो गई मगर ‘सी’ को कैसे पेंट करोगे?’ सईद बिन मुहम्मद बोले, ‘सी’ भी भला कोई पेंट करने की चीज है?’&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मखदूम बोले, ‘मिस्रे की जान तो ‘सी’ ही है. सईद! आज मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा जब तक तुम ‘सी’ को पेंट नहीं करोगे.’&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह सुनते ही सईद बिन मुहम्मद वहां से भाग खड़े हुए.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब हम मखदूम के बारे में पड़ताल करते हैं तो कई किस्‍से सुनाई देते हैं. एक और दिलचस्प वाकया है. मखदूम ने विधानसभा का चुनाव लड़ा था. इस चुनाव में उनके ही शेर का जबर्दस्‍त इस्‍तेमाल हुआ. शेर है:&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;चलो तो जमाने को अपने साथ ले के चलो.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चुनाव में प्रचार के दौरान इस शेर को बदल कर लिखा गया:&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;चलो तो जनाने को अपने साथ ले के चलो.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यानी कि मतदान के दिन अपने साथ महिलाओं को भी लेकर चलो ताकि इस इंकलाबी शायर को ज्‍यादा से ज्‍यादा वोटों से जिताया जा सके. हैदराबाद के भारत विलय के बाद हुए चुनाव में वे जीत कर आंध्र प्रदेश विधानसभा में पहुंचे. मखदूम ने हैदराबाद में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी. वे कामरेड एसोसिएशन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे. मखदूम मोहिउद्दीन की प्रकाशित कृतियों में उनके तीन काव्य-संग्रह ’सुर्ख सवेरा’, ’गुले-तर’ और ’बिसात्-ए-रक़्स’ प्रमुख हैं. ‘बिसात-ए-रक़्स’ के लिए उन्हें 1969 का साहित्य अकादमी अवार्ड भी प्राप्त हुआ है.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वे बेहद अनुशासति थे. सारा दिन पार्टी का काम करते थे और शाम का थोड़ा वक्त दोस्तों में गुजारते थे. जहां अहसास हुआ कि वक्त जाया हो रहा है, झट से उठ जाते थे और महफि‍ल से गायब. वो दुनिया से गए भी इसी तरह यानी एकदम से चल दिए. संदर्भ बताते हैं कि मखदूम मानते थे कि प्रेम और युद्ध की कविता अलग-अलग नहीं होती, आखिर हम युद्ध भी तो प्रेम के लिए करते हैं और बिना प्रेम के युद्ध भी नहीं कर सकते. शायद यही कारण है इस गैरमामूली फिलासफी को जीने वाला इंसान ने जीवन भर ही नहीं मौत के बाद भी खूब प्‍यार पाया. तारीख गवाह है कि 25 अगस्त, 1969 को जब मखदूम की मृत्यु हुई तो हजारों लोग दहाड़ें मार-मार कर रो रहे थे जैसे कि उनके परिवार के किसी अपने की मृत्यु हुई हो.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उनकी कुछ रचनाओं का जिक्र किए बगैर जयंती पर उन्‍हें याद करना अधूरा ही रहेगा.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आप की याद आती रही रात भर&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;चश्मे नम मुस्कुराती रही रात भर.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;रात भर दर्द की शम्मा जलती रही&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;गम की लौ थरथराती रही रात भर.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;बांसुरी की सुरीली सुहानी सदा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;याद बन बन के आती रही रात भर.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;याद के चांद दिल में उतरते रहे&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;चाँदनी जगमगाती रही रात भर.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कोई आवाज आती रही रात भर.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिर छिड़ी रात बात फूलों की&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;रात है या बरात फूलों की.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फूल के हार फूल के गजरे&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शाम फूलों की रात फूलों की.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आप का साथ साथ फूलों का&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आप की बात बात फूलों की.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मिल रही है हयात फूलों की.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कौन देता है जान फूलों पर&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कौन करता है बात फूलों की.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;इश्क के शोले को भड़काओ कि कुछ रात कटे&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;दिल के अंगारे को दहकाओ कि कुछ रात कटे.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दीप जलते हैं दिलों में कि चिता जलती है&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अब की दीवाली में देखेंगे कि क्या होता है.&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;एक झोंका तिरे पहलू का महकती हुई याद&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;एक लम्हा तिरी दिलदारी का क्या क्या न बना.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;(4 फरवरी 2023 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/5515157889187691437/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/02/blog-post_4.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/5515157889187691437'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/5515157889187691437'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/02/blog-post_4.html' title='&#39;फिर छिड़ी रात बात फूलों की&#39; वाले शायर के एक शेर ने बदल दिया था निजाम'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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पांडेय"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पंकज शुक्‍ला"/><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्‍य ब्‍लॉग"/><title type='text'>जन कवि गोरख पांडेय पुण्‍यतिथि: आएंगे, अच्छे दिन आएंगे</title><content type='html'>&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh7RUOgut0OedP-OVUMe8PJTeOrpca4T2OixsvQ2BvgYGFDSrNdDJFK_AT6teqVnAjbobqC73IUNYBAfzO8k8F1DKeNw787QRYJALdlGOprq9c3p-iZcE05F6VH4JCfxfN6CVTaSWeJj_tVzg8fWoADQegHTfg94iva9yzw8ydQe1BAkG3VnwO5o0PQ/s1280/7ee4ada2-7b63-4d21-9b7c-937e62703476.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; data-original-height=&quot;1280&quot; data-original-width=&quot;844&quot; height=&quot;400&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh7RUOgut0OedP-OVUMe8PJTeOrpca4T2OixsvQ2BvgYGFDSrNdDJFK_AT6teqVnAjbobqC73IUNYBAfzO8k8F1DKeNw787QRYJALdlGOprq9c3p-iZcE05F6VH4JCfxfN6CVTaSWeJj_tVzg8fWoADQegHTfg94iva9yzw8ydQe1BAkG3VnwO5o0PQ/w264-h400/7ee4ada2-7b63-4d21-9b7c-937e62703476.jpg&quot; width=&quot;264&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;दु:ख की रेखाएं मिट जाएंगी&lt;/b&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;खुशियों के होंठ मुस्कुराएंगे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;सपनों की सतरंगी डोरी पर&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;मुक्ति के फरहरे लहराएंगे&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आएंगे, अच्छे दिन आएंगे …&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उम्‍मीद की ऐसा कविता लिखने वाले जन कवि गोरख पांडेय की आज पुण्‍यतिथि है. आज से 34 साल पहले दिल्‍ली के जेएनयू में अपनी मानसिक बीमारी से तंग आ कर इस कवि अपना जीवन खत्‍म कर लिया था. उम्‍मीद और हक की बातें करने वाला कवि निराशा की राह चल पड़ा लेकिन आज भी उनकी कविताएं और भोजपुरी गीत हौसला और आस में गाई जा रही हैं.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गोरख पांडेय का जन्म उत्‍तर प्रदेश के देवरिया जिले के मुंडेरवा गांव में सन् 1945 में हुआ था. वे बनारस‍ हिंदु विश्‍वविद्यालय से होते हुए उच्‍च शिक्षा के लिए जेएनयू तक पहुंच गए थे. गोरख पांडेय ने 1969 से ही नक्सलवाड़ी आंदोलन के प्रभाव में आ कर जनसंघर्ष के गीत लिखे. ब्राह्मण परिवार में जन्‍मे गोरख पांडेय ने अपनी जनेऊ उतार दी थी. वे गांव की गरीब बस्तियों में जाते थे. गरीबों के साथ रह कर उनकी पीड़ा को समझते, उनके साथ खाते-पीते और उनकी भाषा में प्रतिरोध का साहित्‍य रचा करते थे. वे इन विचारों को लिखते और गाते ही नहीं थे बल्कि जीते भी थे. जब वे गांव आते तो अपने खेतों में काम करने आने वाले मजदूरों से कहते थे कि खेत पर कब्जा कर लो. पिता ललित पांडेय जब रोकते तो कहा करते थे कि इतने खेतों का क्या करेंगे? गरीबों में बांट दीजिए.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह बात वे कविताओं और गीतों में लिखते भी रहे. उनकी कविताएं हर तरह के शोषण से मुक्त दुनिया की चाह की आवाज बनती रही है. जब गोरख पांडेय ने अपना जीवन खत्‍म किया तब वे जेएनयू में रिसर्च एसोसिएट थे. मृत्यु के बाद उनकी रचनाओं के तीन संग्रह प्रकाशित हुए हैं –स्वर्ग से विदाई (1989), लोहा गरम हो गया है (1990) और समय का पहिया (2004).&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उनके लेखन को जन गीत की दिशा किसान आंदोलन से मिली थी. एक साक्षात्‍कार में उन्‍होंने बताया था कि नवगीत आंदोलन के दौर में मैंने पहला गीत ‘आंगन में ठहरा आकाश, धीरे-धीरे धुंधला हो गया, लिखा था. ये गीत रूमानी भावनाओं, अजनबियत और अलगाव के अस्तित्ववादी चिंतन के मेल-जोल से बने थे. सन् 1968 में किसान-आंदोलन से जुड़ा. वहां ऐसे गीतों की क्या आवश्यकता थी? मुझे अपनी रचना अप्रासंगिक और व्यर्थ होती दिखाई पड़ी. तब मैंने ‘नक्सलबाड़ी के तुफनवा जमनवा बदली’ जैसे गीत लिखे. 1976 में दिल्ली आया, उसके बाद के कई साल क्रांतिकारी-लोकप्रिय रचना की तलाश के रहे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तभी समाजवाद जैसा गीत लिखा गया जो आज भी गाया जा रहा है:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हाथी से आई, घोड़ा से आई&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;अंगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद…&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अपने समय की गरीबी, छुआछूत, भेदभाव के खिलाफ मुखर हुए गोरख पांडेय के जीवन खत्‍म कर देने का कारण भले ही मानसिक अस्थिरता रही हो मगर वे भावनात्मक रूप से उद्वेलन झेल रहे होंगे तब ही अपनी मानिसक स्थिति के आगे झुक गए. वह भावनात्‍मक सघनता का पात उनकी इस रचना में देखा जा सकता है जो अपनी प्रिय बुआ के नाम लिखी थी:&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;‘लेकिन बुआ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;तुम अब भी छुआछूत क्यों मानती हो?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;पिता के सामंती अभिमान के हमलों से कवच की तरह&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हमारी हिफाजत करने के बावजूद&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;रामधनी चमार को नीच क्यों समझती हो&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;जो जिंदगी भर हमारे घर हल चलाता रहा&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;हमेशा गरीब रहा&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;और पिता का जुल्म सहता रहा? क्यों?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आखिर क्यों सबकी बराबरी में तुम्हें यकीन नहीं होता?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;बोलो&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;चुप मत रहो बुआ।’&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;‘गोरख पांडेय: संकलित गद्य रचनाएं’ पुस्‍तक में उनके इंटरव्‍यू प्रकाशित हुए हैं. ‘गोरख पांडेय से मनोहर नायक की बातचीत’ शीर्षक से प्रकाशित इंटरव्‍यू में मनोहर नायक के सवाल पर गोरख पांडेय ने कविता को लेकिर अपनी चिंता जाहिर की थी. उन्‍होंने कहा था कि कविता मनुष्य की भाषिक अभिव्यक्ति का बुनियादी रूप है. इस बीच समस्या यह रही है कि कविता देश के आम जीवन की धारा से कटती चली गयी. गीत को ऐतिहासिक तौर पर अप्रासंगिक बताने की कोशिश की गयी. यह कविता के ढांचे को योरोपीय कविता के ढांचे में ढालने की कोशिश थी. यह स्थिति भारतीय जीवन-हलचल में शामिल होने की भूमिका नहीं निभाती. कविता धीरे-धीरे चंद साहित्यकारों या कुलीन लोगों के बीच की चीज़ होकर रह गई. मेरी चिंता यही है, कि कैसे कविता को फिर से जनता के जीवन और उसकी आजादी के संघर्षों का वाहक बनाया जाए.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब उनसे पूछा गया कि कविता से आप समाज में किस तरह के काम लेना चाहते हैं? तब गोरख पांडेय ने कहा था कि कविता एक आध्यात्मिक, वेदांत नहीं है. वह रचना होती है. जनता में आवेग और विचार बिखरे होते हैं. चिंतक उन्हें एक सूत्र में बांधता है. कविता भी बिखरी भावनाओं को सौंदर्य-बोध से संगठित दिशा की ओर ले जाने की कोशिश करती है. कविता प्रमाणिक रूप से जनांदोलन की जमीन तैयार कर सकती है. यदि वह परिवर्तन की बजाय यथास्थिति की तरफदार होगी तो समाज में वैसा ही असर पैदा करेगी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गोरख पांडे के जीवन आचरण को देखना, समझना हो तो उनकी रचनाओं को ही देखना काफी है. उनकी कुछ चर्चित कविताओं पर एक नजर :&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ये आंखें हैं तुम्हारी&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तकलीफ का उमड़ता हुआ समुंदर&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस दुनिया को&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;उनका डर&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वे डरते हैं&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किस चीज से डरते हैं वे&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तमाम धन-दौलत&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद?&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वे डरते हैं&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कि एक दिन&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;निहत्थे और ग़रीब लोग&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उनसे डरना&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बंद कर देंगे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;कुर्सी&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब तक वह जमीन पर था&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कुर्सी बुरी थी&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जा बैठा जब कुर्सी पर वह&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जमीन बुरी हो गई.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;2&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उसकी नजर कुर्सी पर लगी थी&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कुर्सी लग गई थी&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उसकी नजर को&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उसको नजरबंद करती है कुर्सी&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जो औरों को&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नजरबंद करता है।&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;3&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;महज ढांचा नहीं है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लोहे या काठ का&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कद है कुर्सी&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कुर्सी के मुताबिक वह&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बड़ा है छोटा है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;स्वाधीन है या अधीन है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;खुश है या गमगीन है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कुर्सी में जज्ब होता जाता है&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एक अदद आदमी.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;आशा का गीत&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आएंगे, अच्छे दिन आएंगे&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गर्दिश के दिन ये कट जाएंगे&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सूरज झोपड़ियों में चमकेगा&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बच्चे सब दूध में नहाएंगे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जालिम के पुर्जे उड़ जाएंगे&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मिल-जुल के प्यार सभी गाएंगे&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मेहनत के फूल उगाने वाले&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दुनिया के मालिक बन जाएंगे&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दु:ख की रेखाएं मिट जाएंगी&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;खुशियों के होंठ मुस्कुराएंगे&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सपनों की सतरंगी डोरी पर&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मुक्ति के फरहरे लहराएंगे.&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;b&gt;(29 जनवरी 23 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchhapni.blogspot.com/feeds/1558536894535416515/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/01/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1558536894535416515'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9062801385297364864/posts/default/1558536894535416515'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchhapni.blogspot.com/2023/01/blog-post.html' title='जन कवि गोरख पांडेय पुण्‍यतिथि: आएंगे, अच्छे दिन आएंगे'/><author><name>पंकज शुक्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06786821709886983562</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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