<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><rss xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" version="2.0"><channel><title>accounting concept ,commerce gk in hindi</title><description>accounting ,intermediate,b.com economics,company laws, theory knowledge gk questions,share,debenture,capital's definitions enterviews questions and many more trending news</description><managingEditor>noreply@blogger.com (Dk sharma)</managingEditor><pubDate>Wed, 9 Sep 2026 12:50:58 +0530</pubDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">57</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">25</openSearch:itemsPerPage><link>https://sharmaji72.blogspot.com/</link><language>en-us</language><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>accounting ,intermediate,b.com economics,company laws, theory knowledge gk questions,share,debenture,capital's definitions enterviews questions and many more trending news</itunes:subtitle><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email></itunes:owner><item><title>शेयर मार्केट काम कैसे करता है,शेयर मार्केट के प्रकार:  </title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2023/10/blog-post.html</link><category>Stock market</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Thu, 12 Oct 2023 21:30:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-907067190477492993</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;शेयर मार्केट काम कैसे करता है ?&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;शेयर मार्केट एक ऐसा बाजार है जहां लोग शेयर खरीदने और बेचने के लिए एक व्यापार का हिस्सा बन सकते हैं। यह वित्तीय बाजार एकत्रित धन को बढ़ावा देता है और उद्यमियों को पूंजीपति के लिए वित्तीय संसाधन प्रदान करने में मदद करता है। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम &lt;b&gt;शेयर मार्केट&lt;/b&gt; के काम के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे और यह जानेंगे कि शेयर मार्केट में व्यापार कैसे होता है।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;b&gt;शेयर मार्केट के प्रकार:&lt;/b&gt;&lt;/h2&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;शेयर मार्केट विभिन्न प्रकार के होते हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;प्राथमिक बाजार:&lt;/h3&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;&lt;span style="font-size: small;"&gt;प्राथमिक बाजार में कंपनियां अपने पहले सार्वजनिक अवसरों के लिए अपने शेयर बेचती हैं। यह नई कंपनियों के लिए आवंटन का स्रोत होता है और इन्वेस्टरों को उनके शेयर खरीदने की सुविधा प्रदान करता है।&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;सेकेंडरी बाजार:&lt;/h3&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp; &lt;span style="font-size: small;"&gt;सेकेंडरी बाजार में शेयर खरीदे और बेचे जाते हैं, जो पहले से ही प्राथमिक बाजार में आवंटित हो&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;blockquote style="border: none; margin: 0px 0px 0px 40px; padding: 0px;"&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;शेयर मार्केट में पैसे कैसे लगाएं&lt;/h2&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;p&gt;शेयर मार्केट में पैसे लगाना एक उच्च वापसी और निवेश का माध्यम हो सकता है, लेकिन यह निवेश शोध, जागरूकता और विचारशीलता की जरूरत रखता है। यदि आप शेयर मार्केट में निवेश करने की सोच रहे हैं, तो निम्नलिखित निर्देशों का पालन करके आप अपनी निवेशक्षमता को सुधार सकते हैं:&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;शेयर मार्केट की जागरूकता: &lt;/b&gt;पहले और सबसे महत्वपूर्ण चरण है शेयर मार्केट की जागरूकता प्राप्त करना। आपको शेयर मार्केट के नियम, नियमों, ट्रेंड्स, और विभिन्न निवेश विकल्पों के बारे में संपूर्ण जानकारी होनी चाहिए। इसके लिए आप वित्तीय समाचार पत्रों, वेबसाइटों, बुक्स और निवेशकों के मंचों का उपयोग कर सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;निवेशक प्रोफ़ाइल: &lt;/b&gt;अपनी निवेशक प्रोफ़ाइल निर्धारित करें। यह आपकी आर्थिक स्थिति, निवेश का उद्देश्य, निवेशक हॉराइजन (समय अवधि), और रिस्क बर्दाश्व क्षमता पर निर्भर करेगा।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>मुद्रा बाजार किसे कहते हैं  मुद्रा बाजार इन हिंदी , मुद्रा बाजार का मतलब</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2022/11/blog-post.html</link><category>अर्थयवस्था</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Wed, 16 Nov 2022 21:15:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-441974252302212882</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;मुद्रा बाजार से आशय&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;मुद्रा बाजार&lt;/b&gt; वह बाजार अथवा क्षेत्र है जिसमें अल्पकालीन पूंजी का लेनदेन होता है । मुद्रा बाजार में मुद्रा के क्रेता एवं विक्रेता एक दूसरे&amp;nbsp; से संपर्क कर, पारस्परिक प्रतियोगिता से निश्चित मूल्य पर&amp;nbsp; मुद्रा का क्रय विक्रय करते हैं।सरल शब्दों में मुद्रा बाजार वह बाजार है जहां उधार लेने वाली संस्थाएं एवं व्यक्ति पारस्परिक लेनदेन करते हैं और जहां अल्पकालीन प्रतिभूतियों का क्रय विक्रय होता है ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुद्रा बाजार में मुद्रा का क्रय विक्रय इस दृष्टिकोण से होता है कि मुद्रा उधार लेने वाली संस्थाएं वह व्यक्ति मुद्रा के बदले उनका मूल्य प्राप्त करती हैं। वह मूल्य&amp;nbsp; ब्याज की दर है। वास्तव में मुद्रा का मूल्य उसकी क्रय&amp;nbsp; शक्ति है और मुद्रा की कीमत उसकी ब्याज दर कहलाती है&lt;/p&gt;&lt;p&gt;विस्तृत अर्थ में &lt;b&gt;मुद्रा बाजार&lt;/b&gt; के अंतर्गत सभी प्रकार की व्यवसायियों के लिए वित्त व्यवस्था करने वाली संपूर्ण व्यवस्था का समावेश होता है, जबकि संकुचित अर्थ में इसके अंतर्गत अल्पकालीन जिलों को ही शामिल किया जाता है।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;मुद्रा बाजार की परिभाषा&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;मुद्रा बाजार की परिभाषा की बात की जाए मुद्रा बाजार को विभिन्न लोगों द्वारा परिभाषित किया गया है जो इस प्रकार हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1 सियर्स के अनुसार,&amp;nbsp; "मुद्रा बाजार वह बाजार अथवा क्षेत्र है जिसमें अल्पकालीन फौजी का लेन-देन होता है।"&lt;/p&gt;&lt;p&gt;2 प्रोफेसर चको&amp;nbsp; के अनुसार,&amp;nbsp; "मुद्रा बाजार की परिभाषा एक ऐसे स्थान के रूप में दी जा सकती है जहां अल्पकालीन को शो का क्रय विक्रय किया जाता है।"&lt;/p&gt;&lt;p&gt;3 जी० क्राउथर के अनुसार , "मुद्रा बाजार इन फर्मो संस्थाओं का सामूहिक नाम है जो निकट मुद्रा के लिए विभिन्न वर्गों में व्यवहार करते हैं।"&lt;/p&gt;&lt;p&gt;4 फेडरल रिजर्व बैंक (अमेरिका ) के एक प्रकाशन के अनुसार, "मुद्रा बाजार एक ऐसी मौद्रिक&amp;nbsp; परिसंपत्तियों की लेनदेन के लिए सक्रिय बाजार है जिसे वित्तीय संस्थाएं सामान्य व्यवसाय के अंतर्गत अपनी आर्थिक स्थिति को पर्याप्त तरल बनाए रखने के लिए रखती हैं।"&lt;/p&gt;&lt;p&gt;5 रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार, "मुद्रा बाजार अल्पकालीन मौद्रिक परिसंपत्तियों के क्रय विक्रय का केंद्र है।"&lt;/p&gt;&lt;p&gt;6 नेडलर हैलर एवं विपमैन के अनुसार, "मुद्रा बाजार व केंद्र है जहां पर अल्पकालीन पूंजी की मांग एवं पूर्ति का परस्पर समाशोधन होता है।"&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः मुद्रा बाजार की उचित परिभाषा के रूप में कहा जा सकता है कि मुद्रा बाजार का अभिप्राय उस समस्त क्षेत्र से है जहां पर मुद्रा तथा साख के क्रय विक्रय करने वाले परस्पर एक दूसरे के संपर्क में रहकर अल्पकाल के लिए मुद्रा और साख का क्रय विक्रय करते हैं।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;भारतीय मुद्रा बाजार के कार्य अथवा महत्व&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;मुद्रा बाजार भारतीय अर्थव्यवस्था में अनेक महत्वपूर्ण कार्य करता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;1 कम ब्याज पर उधार लेना -&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;मुद्रा बाजार सरकार को ट्रेजरी बिल के आधार पर कम ब्याज दरों पर अल्पावधि ऋण लेने में सहायता करता है । दूसरी ओर, यदि सरकार पत्र मुद्रा निर्गमित करती है। अथवा रिजर्व बैंक से उधार लेती है। तो इससे अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ता है वह मुद्रास्फीति की संभावना उत्पन्न हो सकती है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;2 व्यापार , वाणिज्य एवं उद्योग को सहायता&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;मुद्रा बाजार उन सार्वजनिक और निजी संस्थाओं को अल्पावधि ऋण उपलब्ध करता है। जिन्हें अपनी कार्यशील पूंजी की आवश्यकता ओं के लिए ऐसे धन की आवश्यकता होती है। यह व्यापारिक बैंक,बट्टा गृहों, दलालों एवं स्वीकृति गृहों के माध्यम से व्यापारिक बिलों पर बट्टा काटकर किया जाता है इस प्रकार मुद्रा बाजार से देश में वह देश के बाहर व्यापार वाणिज्य एवं उद्योग को सहायता प्रदान करता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;3 अतिरिक्त कोशो का प्रयोग&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;मुद्रा बाजार बैंकों को और अन्य संस्थाओं को अल्पावधि के लिए उनके अतिरिक्त कोशो को निवेश कराकर लाभ कमाने का अवसर प्रदान करती हैं।इन संस्थाओं में केवल व्यापारी बैंक ही नहीं अन्य वित्तीय संस्थाएं बड़ी गैर वित्तीय निगम राज्य सरकार एवं स्थानीय सरकारें भी शामिल हैं।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;4 बैंकों को रिजर्व बैंक से ऋण लेने की आवश्यकता नहीं होती&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;क्योंकि मुद्रा बाजार व्यापारिक बैंकों द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक से ऋण लेने की आवश्यकता को दूर करता है।यदि व्यापारी बैंकों के कोषों में आवश्यकता से कम राशि होती है तो वह मुद्रा बाजार से आवश्यक राशि उधार ले सकते हैं। व्यापारिक बैंक रिजर्व बैंक से ऊंची ब्याज दरों पर ऋण लेना पसंद नहीं करते वरण वह अपनी द्वारा दिए गए ऋण&amp;nbsp; को वापस लेना अधिक पसंद करते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; मुद्रा बाजार के उद्देश्य&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;मुद्रा बाजार के मुख्य उद्देश्य निम्न इस प्रकार हैं-&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1 &lt;b&gt;मुद्रा बाजार&lt;/b&gt; एक संतुलित आर्थिक प्रणाली की व्यवस्था करता है जिससे अल्पकालीन अधिक्यो तथा कमियों में सामंजस्य बना रहे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;2 अर्थव्यवस्था में तरलता को प्रभावित करने के लिए केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप हेतु एक केंद्र बिंदु का प्रावधान करता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;3&amp;nbsp; उचित मूल्य अथवा लागत पर उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए अल्पकालीन को कोषों के उपयोगकर्ताओं तक उचित पहुंच की व्यवस्था करता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;व्यापारिक बैंक, वित्तीय मध्यवर्ती, बड़ी-बड़ी कंपनियां एवं रिजर्व बैंक भारतीय मुद्रा बाजार के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। देश में कोसों का वशिष्ठ स्रोत होने के रूप में रिजर्व बैंक की एक अहम भूमिका निभाता हैतथा मुद्रा बाजार की व्यूह रचना में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है।रिजर्व बैंक विभिन्न पर पत्रों के माध्यम से बाजार में तरलता को घटाने व बढ़ाने में समर्थ है, जैसे-वैधानिक तरलता अनुपात चालू तरलता अनुपात आदि। रिजर्व बैंक की नीति अर्थव्यवस्था में सांप की उपलब्धता तथा लागत को नियंत्रित करती हैं।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; भारतीय मुद्रा बाजार की विशेषताएं&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;1 &lt;b&gt;भारतीय मुद्रा बाजार&lt;/b&gt; की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी द्विशासिता है। इसका अर्थ यह है कि इसके दो स्पष्ट अंग है - एक अंग संगठित है तथा दूसरा असंगठित।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;2 संगठित भाग में रिजर्व बैंक, स्टेट बैंक, विदेशी बैंक विभिन्न अन्य भारतीय बैंक हैं।अर्ध सरकारी तथा अन्य सम्मिलित पूंजी वाली कंपनियां भी संगठित मुद्रा बाजार में ऋण संबंधी लेनदेन की क्रियाओं में भाग लेते हैं। प्रतिभूतियों अथवा कोषागार विपत्रों का क्रय विक्रय दलालों के माध्यम से होता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;3 असंगठित बाजार में साहूकारों अथवा देसी बैंकरों का प्रभुत्व है। इनकी हुंडियों से जनना कठिन होता है कि वे व्यापारिक हैं अथवा केवल आर्थिक सहायता देने हेतु लिखी गई हैं। इसलिए बहुत कम बैंक इन हुंडियों में लेनदेन करते हैं। इसमें मुल्तानी हुंडिया अपवाद है क्योंकि प्राय सभी बैंक इन हुंडियों में व्यवसाय करते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;4 देश में पर्याप्त संख्या में व्यापारिक बिल ना लिखें जाने के कारण लंदन अथवा न्योयोर्क की भांति कटौती गृहो तथा स्वीकृत गृहों की स्थापना नहीं हुई है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>पुनर्निर्माण का अर्थ ,कंपनी का आंतरिक पुनर्निर्माण,  कंपनी का पुनर्निर्माण bataiye,  कंपनी का पुनर्निर्माण full , कंपनी का पुनर्निर्माण hindi mein</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2022/06/bataiye-full-hindi-mein.html</link><category>corporate accounting</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Sun, 26 Jun 2022 21:22:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-5745905517431431050</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;पुनर्निर्माण का अर्थ&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;पुनर्निर्माण&lt;/b&gt; शब्द के प्रयोग के संबंध में लेखाशास्त्रियों में मतभेद रहा है।कुछ लेखा शास्त्री जहां इसका अर्थ विस्तृत रूप में प्रकट करते हैं वहीं कुछ इसका अर्थ संकुचित अर्थ प्रकट करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;विस्तृत अर्थों में पुनर्निर्माण से आशय निम्नलिखित कार्य से है|&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;1 अंश पूंजी में कमी करना&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;2 अंश पूंजी का पुणे पूंजीकरण एवं पुनर्गठन&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;3 किसी विद्यमान कंपनी का समापन तथा उसके क्रय के लिए नई कंपनी का निर्माण करना। इसमें प्रथम जो कार्य (क्रम से एक एवं दो) आंतरिक&amp;nbsp; पुनर्निर्माण तथा अंतिम कार्य बाय पुनर्निर्माण कहलाता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;1 आंतरिक पुनर्निर्माण&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;आंतरिक पुनर्निर्माण&lt;/b&gt; कंपनी को आर्थिक सुदृढ़ता प्रदान करता है इसमें कंपनी की पूंजी में कमी अथवा परिवर्तन इस प्रकार किया जाता है कि कंपनी की संपत्ति&amp;nbsp; का सही प्रतिनिधित्व कर सकें आंतरिक पुनर्निर्माण में ना तो कंपनी का समापन होता है और ना ही किसी नई अथवा विद्यमान कंपनी द्वारा उसके व्यवसाय को क्रय किया जाता है इसे सुविधा अनुसार निम्न दो भागों में विभक्त करा स्पष्ट किया जा सकता है&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;2 बाह्य&amp;nbsp; पुनर्निर्माण&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;बाह्य पुनर्निर्माण &lt;/b&gt;के अंतर्गत केवल एक विद्यमान कंपनी का समापन तथा उसके व्यवसाय के क्रय करने के लिए एक नई कंपनी का निर्माण किया जाता है इसमें किसी अन्य विद्यमान कंपनी का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है बल्कि पुरानी कंपनी के नाम के अनुरूप ही नई कंपनी का स्थापना की जाती है तथा पुरानी कंपनी के अंश धारी ही प्रायः कंपनी के धारी होते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;यदि कपड़े का व्यवसाय करने वाली&lt;b&gt; K&lt;/b&gt; कंपनी लिमिटेड कई वर्षों से लगातार होने वाली हानि के कारण अपना समापन कर नई कंपनी 'new&amp;nbsp;&lt;b&gt; k&amp;nbsp; लिमिटेड&lt;/b&gt;' की स्थापना करें तो इसे बाय पुनर्निर्माण कहा जा सकता है ।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/06/blog-post_15.html" target="_blank"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;उचंत खाता किसे कहते है ?क्या होता है उचंत खता ?&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/06/blog-post_15.html" target="_blank"&gt;संचय या उचंती या उदरत खाते का प्रयोग&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/07/blog-post.html" target="_blank"&gt;डिस्काउंट क्या होता है ?&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/07/blog-post.html"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;डिस्काउंट के प्रकार&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;आंतरिक पुनर्निर्माण एवं बाह्य&amp;nbsp; पुनर्निर्माण में अंतर&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;ol style="text-align: left;"&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;संख्या -&lt;/b&gt; आंतरिक पुनर्निर्माण की योजना में केवल एक विद्यमान कंपनी ही सम्मिलित होती है । जबकि बाह्य पुनर्निर्माण की योजना में दो कंपनियां सम्मिलित होती है एक क्रेता कंपनी तथा दूसरा विक्रेता कंपनी।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;समापन- &lt;/b&gt;आंतरिक पुनर्निर्माण में विद्यमान कंपनी का समापन नहीं होता। जबकि बाह्य पुनर्निर्माण में विद्यमान कंपनी का समापन होना आवश्यक है।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;निर्माण-&lt;/b&gt;आंतरिक पुनर्निर्माण में किसी नई कंपनी का निर्माण नहीं होता।जबकि बाह्य पुनर्निर्माण में विद्यमान कंपनी के व्यवसाय के क्रय के लिए नई कंपनी की स्थापना की जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;उद्देश्य-&lt;/b&gt; आंतरिक निर्माण का मुख्य उद्देश्य कंपनी की पूंजी में परिवर्तन कर आंतरिक वित्तीय व्यवस्था में सुधार करना है।जबकि बाह्य पुनर्निर्माण का मुख्य उद्देश्य कंपनी के स्वरूप, उद्देश्य, स्थान, पूंजी, आदि में परिवर्तन कर कंपनी को भविष्य में होने वाली हानियों से सुरक्षा प्रदान करना है।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;पूजी न्यूनीकरण खाता- &lt;/b&gt;आंतरिक पुनर्निर्माण में अंश पूंजी में कमी के लिए पूंजी न्यूनीकरण खाता खोला जाता है।जबकि बाह्य पुनर्निर्माण में पूंजी न्यूनीकरण खाता नहीं खोला जाता है इस में विद्यमान कंपनी की संपत्तियां एवं दायित्व प्राय वसूली खाते में अंतरित होती हैं।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;.नाम में परिवर्तन- &lt;/b&gt;इसमें कंपनी का नाम परिवर्तित नहीं होता। जबकि बाह्य पुनर्निर्माण में कंपनी का नाम परिवर्तित होता है।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भारतीय स्टेट बैंक के कार्य</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2022/04/State-Bank-of-India.html</link><category>बैंकिग</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Tue, 5 Apr 2022 19:53:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-98009787037682208</guid><description>&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&amp;nbsp;भारतीय स्टेट बैंक के कार्य&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;भारतीय स्टेट बैंक&lt;/span&gt; &lt;/b&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;उद्योग एवं वाणिज्य क्षेत्र को साख सुविधाएं प्रदान करता है। भारतीय स्टेट बैंक का मुख्य कार्य ग्रामीण क्षेत्रों तथा छोटी मंडी कस्बों में नई शाखाओं की स्थापना करके देश में बैंकिंग क्षेत्र का संतुलित विकास करना भारतीय स्टेट बैंक द्वारा देश में विभिन्न क्षेत्रों में शाखाएं खोल कर बैंकिंग क्षेत्र में संतुलित विकास के साथ-साथ लोगों को साख सुविधा उपलब्ध कराई गई है । भारतीय स्टेट बैंक का प्रमुख कार्य देश में अधिक प्रेषण सुविधाएं प्रदान करना तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बचत की गतिशीलता को प्रदान करना । भारतीय स्टेट बैंक भारतीय रिजर्व बैंक की एक अभिकर्ता के रूप में भी कार्य करता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955&lt;/b&gt; के अनुसार भारतीय स्टेट बैंक के निम्नवत कार्य है ।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;ol style="text-align: left;"&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;भारतीय रिजर्व बैंक के अभिकर्ता के रूप में भारतीय स्टेट बैंक को कार्य करना पड़ता है। ऐसे स्थानों पर जहां भारतीय रिजर्व बैंक कार्य नहीं करता है वहां भारतीय स्टेट बैंक भारतीय रिजर्व बैंक के अभिकर्ता के रूप में कार्य करता है तथा भारत सरकार की ओर से रुपया स्वर्ण तथा प्रतिभूतियों लेनदेन तथा अन्य भुगतान करता है। इसके अतिरिक्त समय समय पर भारतीय रिजर्व बैंक के आदेशानुसार अन्य कार्य भी&amp;nbsp; करता है।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;माल देयता वाली कंपनियों के अंशो तथा ऋण पत्रो, नगरपालिका तथा जिला&amp;nbsp; बोर्डो के ऋण प्रपत्रों तथा कंपनियों के पूर्णतया अंशो को जमानत के आधार पर ऋण प्रदान करना।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;हुंडियो तथा अन्य बेचनीय उधार प्रपत्रों को स्वीकार करना। बट्टा करना बेचना, खरीदना आदि&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;सभी प्रकार के बॉन्ड, प्रमाण पत्रों को जमा के रूप में सुरक्षित रखने के लिए स्वीकार करना।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;बैंक की पूंजी का सरकारी&amp;nbsp; ऋण पत्रों, अंशो, डिवेंचर इत्यादि में निवेश करना।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम के अनुसार किसी भी पंजीकृत सरकारी बैंक के अभिकर्ता के रूप में कार्य करना।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;हूंडियो को बनाना तथा भारत से बाहर भुगतान होने वाले शाख पत्रों का प्रदान करना।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;किसी भी ऐसे कार्य को करना जिसकी&amp;nbsp; आज्ञा केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक तथा बैंक की केंद्रीय संचालन मंडल द्वारा दी जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;भारतीय रिजर्व बैंक की अनुमति से बैंकिंग कंपनियों की पूंजी में अंश प्राप्त करना तथा उसके अंशो को खरीदना।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;सोना एवं चांदी का क्रय विक्रय करना।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;जमा के रूप में नकदी प्राप्त करना तथा नगद खाता खोलना&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;समय-समय पर निवृत्त कोषों को अर्थ सहायता से प्रेषित करना।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;बैंक की सामान्य काल को संचालित करने के लिए रुपया उधार लेना तथा इस प्रकार के ऋण प्राप्त करने के लिए बैंक की परिसंपत्ति का जमानत रखना&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;पूंजी अंशो तथा डिवेंचर आदि की हामी करना&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;div&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/06/blog-post_15.html" target="_blank"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;उचंत खाता किसे कहते है ?क्या होता है उचंत खता ?&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/06/blog-post_15.html" target="_blank"&gt;संचय या उचंती या उदरत खाते का प्रयोग&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/07/blog-post.html" target="_blank"&gt;डिस्काउंट क्या होता है ?&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/07/blog-post.html"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;डिस्काउंट के प्रकार&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;भारतीय स्टेट बैंक के वर्जित&amp;nbsp; कार्य&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;ol style="text-align: left;"&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम 1955 के अंतर्गत कुछ ऐसे कार्य भी हैं जिनको भारतीय स्टेट बैंक संचालित नहीं कर सकता।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;भारतीय स्टेट बैंक अपने कार्यालय के लिए किसी भी अचल संपत्ति का करें नहीं कर सकता।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;भारतीय स्टेट बैंक कंपनी अचल संपत्ति तथा अपने शेयर्स की जमानत पर ऋण नहीं प्रदान कर सकता&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;भारतीय स्टेट बैंक कैसे विनिमय बिलों को भुला नहीं सकता जिन पर दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों के हस्ताक्षर नहीं हो&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;भारतीय स्टेट बैंक उद्योगों को मध्यकालीन ऋण उनकी संपत्ति की जमानत पर 7 वर्ष के लिए प्रदान कर सकता है परंतु यह किसी दशा में 10 वर्ष से अधिक नहीं हो सकता।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;भारतीय स्टेट बैंक दिलों को पुनः भुला नहीं सकता है तथा ना ही उनकी जमानत के आधार पर उधार दे सकता है जिनकी परिपक्वता अवधि 6 माह से अधिक नहीं होती हैं कृषि साख हुंडियों की अवधि 15 माह तक हो सकती है।&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;&lt;br /&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भारतीय स्टेट बैंक का इतिहास इन हिंदी</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2022/03/State-bank-india-hindi.html</link><category>बैंकिग</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Fri, 25 Mar 2022 14:18:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-2437231624759266430</guid><description>&lt;blockquote style="border: none; margin: 0px 0px 0px 40px; padding: 0px;"&gt;&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;भारतीय स्टेट बैंक का इतिहास इन हिंदी&lt;/h1&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;p&gt;नमस्कार दोस्तों अगर आप &lt;b&gt;भारतीय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को हिंदी&lt;/b&gt; में जानना चाहते हैं तो आप बिल्कुल सही जगह है&amp;nbsp; ये आर्टिकल आप के लिए हि है ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस आर्टिकल में आप को बताएंगे कि कैसे स्टेट बैंक का उदय हुआ और&amp;nbsp; &amp;nbsp;भारतीय स्टेट बैंक को एसबीआई&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारतीय स्टेट बैंक के उदय की शुरुआत 19वीं सदी के पहले दशक में 2 जून 1806 को &lt;b&gt;बैंक ऑफ कोलकाता &lt;/b&gt;की स्थापना के साथ हुआ। 3 वर्ष बाद इस बैंक को अपना चार्टर्ड प्राप्त हुआ और उसे 2 जनवरी 1809 को बैंक ऑफ़ बंगाल के रूप में पुनर्गठित किया गया यह एक अद्वितीय संस्था और ब्रिटेन शासित भारत का प्रथम संयुक्त पूंजी बैंक था जिसे बंगाल सरकार द्वारा प्रायोजित किया गया था। बैंक ऑफ़ बंगाल के उपरांत बैंक ऑफ मुंबई की स्थापना 15 अप्रैल 1840 को तथा बैंक ऑफ मद्रास की स्थापना 1 जुलाई 1843 को की गई। इन तीनों बैंकों को मिलाकर 27 जनवरी 1921 को इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का गठन किया गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;इंपीरियल बैंक &lt;/b&gt;के ने अपने अस्तित्व के बाद से साढे तीन दिनों के दौरान कार्यालयों, आरक्षित वीडियो, जमाराशियों, निवेश हूं एवं अग्रिम के रूप में बहुत ही प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की। कुछ मामलों में यह वृद्धि 6 गुना से भी अधिक है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूर्ववर्तियों से विरासत में प्राप्त वित्तीय स्थिति और सुरक्षा व्यवस्था ने&amp;nbsp; &amp;nbsp;असंदिग्ध रूप से बैंक को एक ठोस और मजबूत प्लेटफार्म प्रदान किया। वर्ष 1951 मैं जब प्रथम पंचवर्षीय योजना शुरू हुई तो देश के ग्रामीण क्षेत्र के विकास को इसमें सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई उस समय एक इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया सहित देश के वाणिज्य बैंकों का कार्यक्षेत्र शहरी क्षेत्र तक सीमित था तथा वह ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक पुनर्निर्माण की भाभी अशोक अदाओं को पूरा करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे।अतः सामान्यतः देश की समग्र आर्थिक स्थिति और विशेषतः ग्रामीण क्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति ने इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का अधिग्रहण कर उसमें सरकार की भागीदारी वाले और सरकार द्वारा प्रायोजित एक बैंक की स्थापना करने की सिफारिश की जिसमें पूर्ववर्ती राज्यों के स्वामित्व वाले तथा राज्य के सहयोगी बैंकों का एकीकरण करने का भी प्रस्ताव किया गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तदनुसार मई 1955 में संसद में एक अधिनियम पारित किया गया&amp;nbsp; 1 जुलाई, 1955 को भारतीय स्टेट बैंक का गठन किया गया इस प्रकार भारतीय बैंक की प्रणाली का एक चौथाई से भी अधिक संसाधन सरकार के सीधे नियंत्रण में आ गया&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;भारतीय स्टेट बैंक का उदय&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;भारतीय स्टेट बैंक का अभ्युदय 1 जुलाई , 1955 को इंपीरियल बैंक की राष्ट्रीयकरण के फलस्वरूप हुआ। अगस्त 1955 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा गठित भारतीय ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति की अनुशंसा पर बैंक का राष्ट्रीयकरण किया गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उक्त समिति में ग्रामीण साख की स्थिति में सुधार के लिए तथा देश में व्यापार एवं उद्योग के विकास के लिए अधिक प्रेषण सुविधाएं प्रदान करने के उद्देश्य से अपने प्रतिवेदन में कहा था की देश में एक ऐसे &lt;b&gt;शक्तिशाली बैंक की स्थापना&lt;/b&gt; हो जिसकी शाखाएं संपूर्ण देश में हो समिति ने यह भी सुझाव दिया था कि ऐसे बैंक की स्थापना इंपीरियल बैंक तथा अन्य सरकारी बैंकों के एकीकरण के फलस्वरूप की जा सकती है। इसकी फलस्वरुप सरकार ने भारतीय ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति की अनुशंसाओं को स्वीकार कर लिया और इंपीरियल बैंक का&amp;nbsp; राष्ट्रीयकरण किया।&lt;b&gt;भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम 1955&lt;/b&gt; के अंतर्गत इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया की समस्त परीसंपत्ति तथा देयताओ को प्राप्त करके भारतीय स्टेट बैंक की स्थापना की गई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1959 में भारतीय स्टेट बैंक (अनुषंगी बैंक) अधिनियम पारित किया गया, जिसके फलस्वरूप भारतीय स्टेट बैंक ने पूर्ववर्ती राज्यों के सात सहयोगी बैंकों का अनुषंगी के रूप में अधिग्रहण किया। इस प्रकार भारतीय स्टेट बैंक का प्रादुर्भाव सामाजिक उद्देश्य के लिए नए दायित्व के साथ हुआ। भारतीय स्टेट बैंक से संबंध किए गए 7 बैंकों को भारतीय स्टेट बैंक का अनुषंगी बैंक कहा जाता हैं। भारतीय स्टेट बैंक की अनुषंगी बैंक निमनवत है&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;ol style="text-align: left;"&gt;&lt;li&gt;स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर&lt;/li&gt;&lt;li&gt;स्टेट बैंक ऑफ इंदौर&lt;/li&gt;&lt;li&gt;स्टेट बैंक आफ सौराष्ट्र&lt;/li&gt;&lt;li&gt;स्टेट बैंक ऑफ&amp;nbsp; त्रावनणकोर&lt;/li&gt;&lt;li&gt;स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद&lt;/li&gt;&lt;li&gt;स्टेट बैंक ऑफ इंडिया पटियाला&lt;/li&gt;&lt;li&gt;स्टेट बैंक ऑफ मैसूर&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;वर्तमान में सरकार ने भारतीय स्टेट बैंक के सहयोगी बैंकों के उसमें विलय का निर्णय लिया है। इसी क्रम में स्टेट बैंक आप सौराष्ट्र और स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का भारतीय स्टेट बैंक में विलय कर दिया गया। फलते &lt;b&gt;वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक के सहयोगी बैंकों की संख्या&lt;/b&gt; 5 रह गई है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ प्रश्न और उत्तर&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;प्रश्न कौन सा बैंक है?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 1.&amp;nbsp; एसबीआई कौन सा बैंक है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;उत्तर :- स्टेट&lt;/b&gt;&amp;nbsp;बैंक को ही एसबीआई के नाम से जानते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 2. स्टेट बैंक का मालिक कौन है ?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;उत्तर :- &lt;/b&gt;भारतीय स्टेट बैंक का मालिक भारत सरकार है ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 3. स्टेट बैंक&amp;nbsp; या एसबीआई का मुख्यालय कहां है ?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;उत्तर&amp;nbsp; :- &lt;/b&gt;भारतीय स्टेट बैंक यानी&amp;nbsp; एसबीआई का मुख्यालय महाराष्ट्र राज्य के मुंबई शहर में है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 4.&amp;nbsp; एसबीआई का स्थापना कब हुआ था ?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;उत्तर :-&amp;nbsp; &lt;/b&gt;मई1955 में संसद में एक अधिनियम पारित किया गया&amp;nbsp; 1 जुलाई, 1955 को भारतीय स्टेट बैंक का गठन किया ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;प्रश्न 5. भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष या चेयरमैन का नाम ?&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;उत्तर :- &lt;/b&gt;भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन 7 अक्टूबर 2020 से&amp;nbsp; &lt;b&gt;दिनेश कुमार खारा &lt;/b&gt;है&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;span&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;!--more--&gt;&lt;/span&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भारत के केंद्रीय बैंकों के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2022/03/reserve-bank-india.html</link><category>बैंकिग</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Tue, 15 Mar 2022 22:54:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-8649900385183392335</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;भारत के केंद्रीय बैंकों के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;हिल्टन यंग आयोग की अनुशंसा पर 1 अप्रैल 1935 को की गई।यद्यपि इसके पूर्व देश में &lt;b&gt;केंद्रीय बैंक की स्थापना&lt;/b&gt; की दिशा में अनेकों गंभीर प्रयास किए गए थे, परंतु कोई सार्थक एवं सफल परिणाम नहीं प्राप्त हुआ था। भारत में केंद्रीय बैंक की स्थापना का सर्वप्रथम प्रयास 1973 में बंगाल के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज ने किया। वारेन हेस्टिंग्ज ने 1973 में ब्रिटिश सरकार को जनरल बैंक ऑफ़ बंगाल एंड बिहार की स्थापना का सुझाव दिया था। इसके बाद 1807-08मैं मुंबई सरकार के एक सदस्य रावण रिचर्ड धारा एक जनरल बैंक की योजना का प्रस्ताव किया गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना के घटनाक्रम &lt;/b&gt;में एक नाम जॉन मेनार्ड कींस का भी आता है। 1931 में गठित भारतीय वित्त एवं मुद्रा के रॉयल आयोग के एक सदस्य के रूप में किंस ने "proposal for the establishment of Bank of India"नाम से एक ज्ञापन दिया था। किंग्स द्वारा प्रस्तावित इस बैंक को केंद्रीय तथा वाणिज्यिक बैंक इन दोनों का काम करना था परंतु द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने के कारण किन से की जाए योजना मूर्त रूप नहीं ले सकी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1920 में ब्रूसेल्स में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सम्मेलन में &lt;b&gt;केंद्रीय बैंकों की स्थापना&lt;/b&gt; को सभी देशों से अनिवार्य रूप से करने को कहा गया। इसी समय भारत में पूर्व गठित तीनों प्रेसिडेंसी बैंकों का गठन करके इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की गई जो &lt;b&gt;केंद्रीय बैंक की स्थापना&lt;/b&gt; की दिशा में उठाया गया एक प्रमुख कदम था। यद्यपि इंपीरियल बैंक की स्थापना किस उद्देश्य से की गई कि केंद्रीय बैंक का भी कार्य संपादित करेगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगस्त 1925 में हिल्टन आयोग का गठन किया गया। वेतन आयोग के गठन का उद्देश्य भारत में विनिमय तथा मुद्रा प्रणाली की जांच करके तथा उनमें आवश्यक सुधार के लिए सुझाव देना था। वेतन आयोग द्वारा 1926 में देश में मुद्रा तथा साख मुद्रा की प्रचलित प्रणाली के संदर्भ में असंतोष व्यक्त किया गया और आयोग ने अपनी रिपोर्ट में देश में एक &lt;b&gt;केंद्रीय बैंक की स्थापना&lt;/b&gt; की अनुशंसा की।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हिल्टन आयोग की अनुशंसा को मूर्त रूप देने के लिए जनवरी 1927 में सरकार द्वारा विधानसभा में एक विधेयक प्रस्तुत किया गया। परंतु यह कतिपय विरोधाभास के कारण नहीं हो सका। इसके पश्चात 1935 में भारतीय संवैधानिक सुधारों की इस बिंदु पर पुण्य चिंतन किया गया तथा केंद्रीय सरकार की जिम्मेदारी भारतीय हाथों में देने से पूर्व &lt;b&gt;भारत में रिजर्व बैंक की स्थापना&lt;/b&gt; को आवश्यक समझा गया। इस उद्देश्य से भारतीय विधानसभा में 8 सितंबर,1933 को एक विधेयक प्रस्तुत किया गया जिसको विधानसभा की स्वीकृति प्राप्त होने के बाद 6 मार्च, 1934 को गवर्नर जनरल द्वारा भी अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी गई। परिणाम उत्तर 1 अप्रैल, 1935 से भारतीय रिजर्व बैंक अपने अस्तित्व में आ गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अप्रैल, 1937 में बर्मा की भारत से अलग हो जाने के बाद तथा अगस्त,1947 में देश का विभाजन हो जाने के कारण &lt;b&gt;भारतीय रिजर्व बैंक &lt;/b&gt;के कार्य क्षेत्र में काफी परिवर्तन हो गया बर्मा के अलग राज्य बन जाने के बाद भी 5 जून, तक भारतीय रिजर्व बैंक ने वर्मा के मुद्रा अधिकारी तथा 31 मार्च, 1947 तक वर्मा सरकार के बैंकर के रूप में कार्य किया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगस्त 1947 में देश के विभाजन के बाद नया देश बना। पाकिस्तान के लिए भी भारतीय रिजर्व बैंक ने 30 जून, 1948 तक केंद्रीय बैंक के रूप में कार्य। 1 जनवरी, 1949 को भारतीय रिजर्व बैंक का सरकार द्वारा राष्ट्रीयकरण किया गया।&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना के उद्देश्य</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2022/02/blog-post_25.html</link><category>अर्थयवस्था</category><category>बैंकिग</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Fri, 25 Feb 2022 14:46:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-6042614034081097882</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना के उद्देश्य&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम&lt;/b&gt; 1934 में कहा गया है कि बैंक नोट जारी करने की शक्ति एवं नियमित विभाग तथा भारत में मुद्रण की स्थिरता के उद्देश्य से आरक्षित को रखने तथा सम्मानित मुद्रा तथा ऋण प्रणाली को देश के हित में प्रयोग करेगा। भारत में केंद्रीय बैंक के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना के निम्नवत उद्देश्य हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1 मुद्रा एवं साख मुद्रा नीति में समन्वय स्थापित करना।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;2 रुपए के आंतरिक तथा बाय मूल्यों में स्थिरता कायम करना।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;3 बैंकों के नगद कोशो का केंद्रीकरण करना।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;4 देश में बैंकिंग प्रणाली का विकास करना।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;5 मुद्रा बाजार का नियमित एवं संगठित रूप में से विकास करना।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;6 कृषि साख की वित्त व्यवस्था सुनिश्चित करना।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;7 विदेशों से मौद्रिक संबंध कायम करना।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;8 बैंकिंग की आदतों को बढ़ावा देकर भक्तों को संस्थागत करना।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;9 अखिल भारतीय तथा क्षेत्रीय स्तर पर उद्योगों के लिए विधिक वित्त एवं व्यापक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए बहुत सी विशिष्ट वित्तीय संस्थाओं की स्थापना अथवा विकास करना।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;10 सरकार के सामाजिक न्याय तथा इस सीतापुर आर्थिक विकास की गति को बढ़ाने में सहायता देना।&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भारत में बैंकिंग का विकास के चरण , भारत में बैंकिंग का इतिहास , भारत में बैंकिंग क्षेत्र सुधार कब प्रारंभ हुआ , भारत में बैंक का इतिहास , भारत में स्थापित पहला बैंक , भारत का पहला व्यापारिक बैंक। , भारत में बैंक की स्थापना कब हुई</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2022/02/blog-post.html</link><category>बैंकिग</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Sat, 5 Feb 2022 12:42:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-2839539192901417206</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;भारत में बैंकिंग का विकास के चरण या अवधि&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;भारत में बैंकिंग प्रणाली&lt;/b&gt; के विकास को सात चरणों में विभाजित किया जा सकता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;प्रथम चरण 1806 तक&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;18 वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुंबई तथा कोलकाता में कुछ एजेंसी ग्रहों की स्थापना की। इन एजेंसी गृहों का वित्तपोषण ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा ही किया जाता था।इन एजेंसी गृहों का प्रमुख कार्य ईस्ट इंडिया कंपनी को सैनिक आवश्यकताओं के लिए रुपया ऋण देना, कागजी मुद्रा का निर्गमन करना तथा लाभों से नीक्षेप स्वीकार करना था। यूरोपीय &lt;b&gt;बैंकिंग&lt;/b&gt; पद्धति पर आधारित भारत का पहला बैंक विदेशी पूंजी के सहयोग से एलेग्जेंडर एंड कंपनी द्वारा बैंक ऑफ हिंदुस्तान के नाम से 1770 में कोलकाता में स्थापित किया गया था। परंतु यह बैंक शीघ्र ही असफल हो गया ।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;द्वितीय चरण 1806 से 1860 तक&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;1813 ईस्ट इंडिया कंपनी के वाणिज्य अधिकार समाप्त होने के साथ ही एजेंसी गृहों की पतन की प्रक्रिया शुरू हो गई। इसके बाद देश में निजी अंश धारियों द्वारा तीन प्रेसीडेंसी बैंकों की स्थापना की गई जो इस प्रकार हैं -1806 में बैंक ऑफ बंगाल , 1840 में बैंक ऑफ मुंबई तथा 1843 में बैंक ऑफ मद्रास । इन तीनों प्रेसीडेंसी बैंकों के स्वामी निजी शेयर होल्डरो के थे परंतु इनकी शेयर पूंजी में सरकार का भी कुछ अंश था अतः सरकार द्वारा इन तीनों बैंकों पर नियंत्रण रखा जाता था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन तीनों प्रेसिडेंसी बैंकों को सरकार के बैंकर के सभी अधिकार प्राप्त थे। परंतु 1862 के बाद भारत सरकार द्वारा इन बैंकों से नोट निर्गमित करने का अधिकार वापस ले लिया गया। 1991में इन तीनों प्रेसिडेंसी बैंकों को वापस में मिलाकर के इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की गई। 1 जुलाई 1955 को इंपीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा इसका नाम भारतीय स्टेट बैंक रखा गया।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;तृतीय चरण (1860 से 1913 तक)&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;भारत सरकार ने 1860 मैं एक संयुक्त पूंजी कंपनी अधिनियम पारित किया गया। इसके अंतर्गत बैंकों के गठन संबंधी शब्दों को काफी उदार बना दिया गया तथा सीमित देयता के आधार पर देश में बैंकों के गठन को अनुमति दी गई इस अधिनियम के पारित होने के बाद देश में &lt;b&gt;बैंकिंग विकास &lt;/b&gt;को एक नई दिशा मिली।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1865 मैं इलाहाबाद बैंक, 1881 में एलाइंस बैंक ऑफ शिमला, तथा अवध कमर्शियल बैंक, 1894 पंजाब नेशनल बैंक तथा 1901 मैं पीपुल्स बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की गई। सीमित देयता के आधार पर 1881 म स्थापित अवध कमर्शियल बैंक भारतीयों द्वारा संचालित पहला बैंक था। पूर्णरूपेण भारतीयों का पहला बैंक पंजाब नेशनल बैंक था । जिसकी स्थापना 1894 मैं की गई थी। 1906 में बैंक ऑफ इंडिया, 1960 में बैंक ऑफ बड़ौदा, 1911 में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया तथा 1913 में बैंक ऑफ मैसूर की स्थापना की गई।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&lt;b&gt;चतुर्थ चरण (1913 से 1939 तक)&lt;/b&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस अवधि में भारत में &lt;b&gt;बैंकिंग&lt;/b&gt; क्षेत्र के सम्मुख प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ जाने के कारण संकट उत्पन्न हो गया भारतीय बैंकों से लोगों का विश्वास अचानक समाप्त हो गया। फलते जमा करताओ द्वारा अपना नीक्षेप निकालने की प्रक्रिया शुरू हो गई। भारतीय बाजार में मुद्रा की कमी हो गई थी। प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के भारत में बैंकिंग विकास की दर एक बार पुनः त्वरित हुई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1921 में तीनों प्रेसिडेंसी बैंकों का आपस में विलय करके इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की गई। 1930 की व्यापक मंदी का भी भारतीय &lt;b&gt;बैंकिंग&lt;/b&gt; व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ा 1930 में ही केंद्रीय बैंक की जांच समिति का गठन किया गया। समिति ने अपने प्रतिवेदन में सुझाव दिया था कि देश में एक सुद्दरीन,सुव्यवस्थित एवं सू संगठित बैंकिंग व्यवस्था की स्थापना के लिए एक केंद्रीय बैंक की स्थापना तथा व्यापक बैंकिंग अधिनियम बनाने पर बल दिया जाय। 1934 में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम पारित किया गया। फलता 1 अप्रैल, 1935 से भारतीय रिजर्व बैंक ने कार्य करना शुरू कर दिया।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;पंचम चरण (1939 से 1947 तक)&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस अवधि को &lt;b&gt;बैंकिंग&lt;/b&gt; विस्तार की अवधि कहा जाता है क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के कारण जनित मुद्रास्फीति सीजन सामान्य की मौद्रिक आय में वृद्धि हुई। फालतू सभी बैंकों की मांग नीक्षेप की मात्रा में वृद्धि हुई। इस अवधि में नए बैंकों की स्थापना के साथ-साथ पुराने बैंकों द्वारा नई - नई शाखाएं खोली गई। यूनाइटेड कमर्शियल बैंक तथा हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक आदि की स्थापना हुई।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;षष्टम चरण (1947 से 1991 तक)&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस चरण में भारतीय रिजर्व बैंक का 1 जनवरी,1949 को राष्ट्रीयकरण किया गया तथा 1949 में भारतीय बैंकिंग अधिनियम पारित किया गया।इस अधिनियम के अंतर्गत अनुसूचित बैंकों का निरीक्षण करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को अधिक व्यापक अधिकार प्रदान किया गया। देश में, विशेषता ग्रामीण क्षेत्रों में, &lt;b&gt;बैंकिंग&lt;/b&gt; सुविधाओं कि विकास के लिए इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का 1 जुलाई,1955 को राष्ट्रीयकरण किया गया तथा इसका नाम बदलकर भारतीय स्टेट बैंक कर दिया गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;19 जुलाई, 1969 तथा 15 अप्रैल, 1980 को कर्म से 14 तथा 6 बड़े व्यावसायिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया।इसके पूर्व 1975 में क्षेत्रीय ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना करने की प्रक्रिया शुरू की गई। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों को वित्तीय संसाधन अधिक मात्रा में उपलब्ध कराए जा सके।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;सप्तम चरण (1991 से अब तक)&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;भारत में बैंकिंग इतिहास &lt;/b&gt;का सातवां चरण 1991 के बाद शुरू होता है। 1991 में नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद 1993-94 में निजी क्षेत्र में पुनः बैंक खोलने की अनुमति दे दी गई।इसके साथ ही विदेशी बैंकों को भी भारत में अपना विस्तार करने तथा नई शाखाएं खोलने की अनुमति दे दी गई&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>बैंकिंग का इतिहास  , बैंकिंग शब्द का इतिहास , बैंकिंग शब्द की उत्पत्ति , banking ka itihas ,  बैंकिंग के बारे में बताइए ,  हिस्ट्री ऑफ़ बैंकिंग इन इंडिया , बैंकिंग किसे कहते हैं, ?</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2022/01/banking-ka-itihas.html</link><category>बैंकिग</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Sat, 15 Jan 2022 15:34:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-7129618734639777304</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;बैंकिंग शब्द का इतिहास&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;भारत में &lt;b&gt;बैंकिंग का इतिहास&lt;/b&gt; जाने से पहले चलिए जान लेते हैं बैंकिंग शब्द की उत्पत्ति कहां से हुई&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;बैंक शब्द की उत्पत्ति&lt;/b&gt; इटालियन शब्द बैंकों ( banco) से हुई है। इस मत के अनुसार प्राचीन समय में इटली में बैंकों शब्द का अर्थ बैंचो पर बैठकर मुद्रा बदलने से था।उस समय इटली के सर्राफ एवं सुनार बैंचो पर बैठकर मुद्रा परिवर्तन का कार्य करते थे। कोई भी व्यक्ति इनसे अपनी इच्छा अनुसार मुद्रा परिवर्तित करवा सकता था। इनके पास विभिन्न मुद्राओं के कोष होते थे। बाद में बैंक शब्द का प्रयोग साख की व्यवस्था करने वाली संस्थाओं के रूप में किया जाने लगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;द्वितीय मत के अनुसार बैंक शब्द की उत्पत्ति जर्मनी भाषा की बैंक (banck)&amp;nbsp; शब्द से हुई है। इसका आशय संयुक्त स्कंध कोश से है।यह कहा जाता है कि 1171 में वेनिस राज्य में आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ । इससे मुक्ति के लिए वहां के राजा ने जनता से ऋण लिया। इस ऋण कोष के लिए बैंक (banck) शब्द काम में लिया गया। बाद में यही शब्द banco,bancke तथा bank बना।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आधुनिक बैंकों की शुरुआत 1157 में इटली में बैंक ऑफ वेनिस&amp;nbsp; की स्थापना से माना जाता है। इसके पश्चात 1401 में बैंक ऑफ बार्सिलोना तथा 1407 में बैंक आफ जेनेवा की स्थापना हुई। 1609 में हालैंड में बैंक ऑफ एमस्टरडम की स्थापना हुई। जिसे 17 वी शताब्दी का महान बैंक माना जाता है। इसकी बाद से ही आधुनिक बैंकिंग का वास्तविक विकास शुरू हुआ। 1694 में बैंक ऑफ इंग्लैंड की स्थापना हुई। यह बैंक आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था की सबसे प्राचीन इकाई माना जाता है।18 वीं शताब्दी में &lt;b&gt;बैंकिंग&lt;/b&gt; क्षेत्र में संयुक्त पूंजी वाली कंपनियों का प्रवेश हुआ।यहीं से बैंकिंग विकास की प्रक्रिया विश्व में शुरू होती है&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>मुंबई शेयर बाजार स्थापना , mumbai share bazar sthapna,  मुंबई शेयर बाजार का इतिहास, मुंबई शेयर बाजार की स्थापना मुंबई शेयर बाजार की जानकारी</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2022/01/mumbai-share-bazar-sthapna.html</link><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Wed, 5 Jan 2022 14:56:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-1458541175144039948</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;मुंबई शेयर बाजार की स्थापना&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;मुंबई शेयर बाजार की स्थापना &lt;/b&gt;जानने से पहले चलिए जान लेते हैं कि दुनिया में सबसे पहली शेयर बाजार का जन्म कब और कहां हुआ ऐसा माना जाता है कि दुनिया की सबसे पहली शेयर बाजार का जन्म 1531 के लगभग बेल्जियम के एंडवर्ष शहर में हुआ था वैसे, &lt;u&gt;विश्व&amp;nbsp; का सबसे पहला संगठित शेयर बाजार 1602 एम्सटर्डम, नीदरलैंड&lt;/u&gt; में&amp;nbsp; स्थापित हुआ था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1840 में दलाल बरगद के पेड़ के नीचे खड़े होकर शेयरों का सौदा किया करते थे। वहीं से एक एसोसिएशन बनने का विचार आया और बीएसइ का जन्म हुआ&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रेमचंद रोयचंद ऐसे &lt;b&gt;पहले भारतीय शेयर दलाल&lt;/b&gt; थे जो अंग्रेजी पढ़ लिख सकते थे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बीएसई और दलाल स्ट्रीट अब एक समान है। लेकिन वास्तव में इस एक्सचेंज का प्रथम जन्म स्थल 1840 मैं एक बरगद का वृक्ष था। फिलहाल जहां हारनीमन सर्कल है, वहां टाउन हॉल के पास बरगद के वृक्ष के नीचे दलाल लोग एकत्रित होते थे और शेयरों का सौदा करते थे। एक दशक के बाद यह दलाल मोडोज स्ट्रीट और महात्मा गांधी रोड जंक्शन के बरगद&amp;nbsp; के सगन छाया के नीचे जुटने लगे। शेयर दलालों की संख्या बढ़ने पर उन्हें नए स्थान पर जाना पड़ता था यह सिलसिला जारी रहा और अंत में 1874 में उन्हें एक अस्थाई जगह मिल गई जिसे अब दलाल स्ट्रीट के नाम से जाना जाता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुंबई स्टॉक एक्सचेंज भारत और एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है । &lt;b&gt;मुंबई शेयर&amp;nbsp;बाजार की स्थापना 1875 &lt;/b&gt;में एक एसोसिएशन के रूप में हुई थी। जिसका नाम'नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स एसोसिएशन' था। हालांकि, इस एसोसिएशन से पहले ही शेयरों की खरीद-फरोख्त शुरू हो चुकी थी ।&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र,  भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में बताइए,  भारतीय अर्थव्यवस्था के कितने क्षेत्र हैं?, भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रकार, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण पहलू</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/12/blog-post.html</link><category>अर्थयवस्था</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Thu, 23 Dec 2021 22:01:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-2767889449588883184</guid><description>&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;भारतीय अर्थव्यवस्था&lt;/b&gt; को क्षेत्रों के आधार पर निम्नलिखित रूप से विभाजित किया गया है जो इस प्रकार है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;प्राथमिक क्षेत्र&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;भारत की बात की जाए तो प्राथमिक क्षेत्र में भारत की चार व्यवसाय&amp;nbsp; क्षेत्र को&amp;nbsp; सम्मिलित किया गया है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;1 कृषि तथा पशुपालन&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;2 वन उद्योग तथा लट्ठे बनाना&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;3 मछली पालन&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;4 खनन और उत्खनन&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;द्वितीयक क्षेत्र&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;द्वितीय क्षेत्र में उद्योग, पंजीकृत निर्माण, गैर पंजीकृत निर्माण, निर्माण कार्य तथा बिजली, गैस और जलापूर्ति आदि को सम्मिलित किया गया है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;तृतीयक क्षेत्र&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;क्षेत्र में कुल 6 व्यवसाय को सम्मिलित किया गया है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;1 परिवहन व संचार&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;2 व्यापार, होटल तथा जलपान गृह&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;3&amp;nbsp; बैंक तथा बीमा&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;4 स्थावर संपदा,आवास गृहों का स्वामित्व तथा व्यावसायिक सेवाएं,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;5 सार्वजनिक सेवाएं&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;6 अन्य सेवाएं&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;चतुर्थक क्षेत्र&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;चतुर्थक क्षेत्र में विदेशी क्षेत्र को सम्मिलित किया जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;b&gt;Note&lt;/b&gt;-&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;केंद्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा अपनी राष्ट्रीय आय की पहली श्रृंखला में भारतीय अर्थव्यवस्था को 13 क्षेत्रों में विभाजित किया गया था परंतु केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने अपनी द्वितीय श्रृंखला, जो 1966-67 में जारी की गई थी, मैं भारतीय अर्थव्यवस्था को 3 क्षेत्रों में बांटा गया है प्राथमिक द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र में विभाजित किया&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;इन क्षेत्रों को 13 क्षेत्रों में विभाजित किया गया है यही वर्गीकरण आज भी चल रहा है ।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="background-color: white; max-height: 999999px;"&gt;&lt;b&gt;भारतीय अर्थव्यवस्था&lt;/b&gt; में सेवा &lt;b&gt;क्षेत्र&lt;/b&gt; का योगदान कई गुना है सकल घरेलू उत्पाद में इसका हिस्सा 55% है, 10% की वार्षिक दर से बढ़ रहा है रोजगार के लगभग एक चौथाई का योगदान है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;b style="background-color: white; color: #4d5156; font-family: Roboto, &amp;quot;Helvetica Neue&amp;quot;, Arial, sans-serif; max-height: 999999px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title> नॉस्ट्रो खाता किसे कहते हैं? , वोस्ट्रो खाता किसे कहते हैं? , Nastro vastro khata</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/12/nastro-vastro-khata.html</link><category>public finance</category><category>अर्थयवस्था</category><category>भारतीय बहीखाता प्रणाली</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Mon, 13 Dec 2021 09:17:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-7892297586349336267</guid><description>&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;नॉस्ट्रो खाता किसे कहते हैं?&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;विदेशों में स्थित विदेशी बैंकों के साथ विदेशी मुद्रा में भारतीय बैंकों द्वारा रखे गए खाते को &lt;b&gt;नॉस्ट्रो अकाउंट &lt;/b&gt;कहते हैं जिसका अर्थ होता है -आपके साथ हमारे खाते (aur accounts with you)। जिस देश में या खाता खोला जाएगा, खाते की मुद्रा उसी देश की होगी सभी विदेशी विनिमय व्यवहार इसी खाते के माध्यम से होंगे&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;वोस्ट्रो खाता किसे कहते हैं?&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;विदेशी बैंकों द्वारा भारतीय बैंकों के साथ खोले गए रुपया खाता को वोस्ट्रो खाता कहते हैं। विनिमय नियंत्रण की दृष्टि से इस खाते को &lt;b&gt;नान रेजिडेंस अकाउंट&lt;/b&gt; कहते हैं&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>समाजवादी अर्थव्यवस्था किसे कहते है , समाजवादी अर्थव्यवस्था के गुण , समाजवादी अर्थव्यवस्था की विशेषता , समाजवादी अर्थव्यवस्था वाले देश, समाजवादी अर्थव्यवस्था का अर्थ बताइए</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/11/blog-post.html</link><category>अर्थयवस्था</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Mon, 8 Nov 2021 22:51:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-5792356534115398495</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;समाजवादी अर्थव्यवस्था&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;समाजवादी अर्थव्यवस्था&lt;/b&gt; वह अर्थव्यवस्था है जिसमें उत्पादन की भौतिक संसाधनों पर समाज या समुदाय का स्वामित्व होता है और जिनका संचालन एवं उपयोग समाज या समुदाय के प्रतिनिधियों द्वारा सामान्य आर्थिक नियोजन या योजना के आधार पर किया जाता है इस सामाजिक नियोजित उत्पादन का लाभ समाज के सभी सदस्यों को समानता के अधिकार के साथ मिलता है&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;समाजवादी अर्थव्यवस्था की विशेषताएं&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;समाजवादी अर्थव्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं हो सकती हैं&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1&amp;nbsp; उत्पादन की संसाधनों का सार्वजनिक स्वामित्व&lt;/p&gt;&lt;p&gt;2&amp;nbsp; केंद्रीय आर्थिक नियोजन&lt;/p&gt;&lt;p&gt;3&amp;nbsp; वर्गहीन समाज की स्थापना&lt;/p&gt;&lt;p&gt;4 उत्पादन का स्वरूप&lt;/p&gt;&lt;p&gt;5 साधनों का अनुकूलतम उपयोग&lt;/p&gt;&lt;p&gt;6&amp;nbsp; आय का सामान्य वितरण&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;7&amp;nbsp; समता एवं सामाजिक न्याय&lt;/p&gt;&lt;p&gt;8 समाज का हित सर्वोपरि&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है , मिश्रित अर्थव्यवस्था किसे कहते हैं , मिश्रित अर्थव्यवस्था की विशेषताएं , मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है  in hindi,  मिश्रित अर्थव्यवस्था का मतलब</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/10/in-hindi.html</link><category>मिश्रित अर्थव्यवस्था</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Wed, 27 Oct 2021 14:20:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-519391251620195687</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;मिश्रित अर्थव्यवस्था&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;मिश्रित अर्थव्यवस्था&lt;/b&gt; एक ऐसी आर्थिक प्रणाली है जिसके अंतर्गत समाज के सभी वर्गों के कल्याण में वृद्धि के लिए सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों के दायित्व को निश्चित किया जाता है इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में अर्थव्यवस्था का लक्ष्य शोषण के बिना आर्थिक विकास करना होता है निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों को इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संभव प्रयास करने को कहा जाता है मिश्रित अर्थव्यवस्था का लक्ष्य पूंजीवादी दोषों को दूर करना तथा समाजवाद के दोषों&amp;nbsp; से बचना होता है।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;मिश्रित अर्थव्यवस्था की विशेषताएं&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;1&amp;nbsp; सार्वजनिकतथा निजी क्षेत्रों का अस्तित्व&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;2&amp;nbsp; उद्योगों का वर्गीकरण&lt;/p&gt;&lt;p&gt;3 आर्थिक नियोजन&lt;/p&gt;&lt;p&gt;4 बाजार प्रणाली विद्यमानता&lt;/p&gt;&lt;p&gt;5 सरकार की केंद्रीय भूमिका&lt;/p&gt;&lt;p&gt;6 सामाजिक कल्याण को प्रधानता&lt;/p&gt;&lt;p&gt;7 सामाजिक कल्याण के पीछे लाभ की प्रेरणा&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>पूंजीवादी अर्थव्यवस्था किसे  कहते हैं? पूंजीवादी अर्थव्यवस्था क्या है पूंजीवादी किसे कहते हैं पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का अर्थ , पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की परिभाषा </title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/10/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Fri, 15 Oct 2021 20:37:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-8127630498209946596</guid><description>&lt;p&gt;पूंजीवादी अर्थव्यवस्था&amp;nbsp; किसे कहते हैं?&lt;/p&gt;&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;पूंजीवादी अर्थव्यवस्था&amp;nbsp;&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;आर्थिक प्रणाली का वह&amp;nbsp; स्वरूप पूंजीवाद कहलाता है जिसके अंतर्गत उत्पादन के साधनों का एक बड़ा भाग पूजीपतियों कि उद्योगों में भी नियोजित होता है पूजीपतियों का उद्योग वह उद्योग होता है जिसमें उत्पत्ति के भौतिक साधनों का स्वामित्व निजी व्यक्तियों के हाथ में होता है वे अपनी इच्छा अनुसार इन साधनों को ऐसी वस्तुओं एवं सेवाओं के पादन में लगाते हैं जिन से उनको अधिकतम लाभ प्राप्त होने की संभावना रहती है&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विशेषताएं क्या होती हैं?&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के निम्नलिखित विशेषताएं हो सकती हैं&lt;/p&gt;&lt;p&gt;1 उत्पत्ति के साधनों पर निजी स्वामित्व&lt;/p&gt;&lt;p&gt;2 अधिकतम लाभ प्राप्त करने का लक्ष्य&lt;/p&gt;&lt;p&gt;3 उपभोक्ता संप्रभु होता है&lt;/p&gt;&lt;p&gt;4&amp;nbsp; उद्यमों के चुनाव&amp;nbsp; की स्वतंत्रता&lt;/p&gt;&lt;p&gt;5 निजी उद्यमों का महत्व&lt;/p&gt;&lt;p&gt;6 बचत तथा विनियोग की स्वतंत्रता&lt;/p&gt;&lt;p&gt;7 केंद्रीय आर्थिक नियोजन का अभाव&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title> मांग की लोच , मांग की लोच क्या है? मांग की लोच का महत्व , mang ki loch kise kahate hain ,  mang ki loch ka niyam,  mang ki loch ki paribhasha</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/09/mang-ki-loch-kise-kahate-hain-mang-ki.html</link><category>मांग की लोच</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Sun, 26 Sep 2021 21:45:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-6618537195143514393</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;मांग की लोच की भूमिका&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;कीमत और मांगी गई मात्रा के बीच संबंध को बतलाती है। यह इस बात का संकेत देती है कि&amp;nbsp; &amp;nbsp;विभिन्न कीमतों पर एक वस्तु की कितनी मात्रा मांगी जाएगी यह बतला देना&amp;nbsp; आवश्यक है। की अर्थशास्त्री मांग और मांगी गई मात्रा के अंतर को बतलाते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मांग वे मात्राएं हैं जो क्रेता समय की एक निश्चित अवधि में विभिन्न या वैकल्पिक कीमतों पर खरीदने की इच्छुक तथा योग्य होते हैं इसकी विपरीत मांगी गई मात्रा एक विशेष राशि है जो क्रेता&amp;nbsp; एक निश्चित कीमत पर खरीदने के इच्छुक तथा योग्य होते हैं ।&amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;b&gt;&amp;nbsp;उदाहरण के लिए &lt;/b&gt;- ₹1 प्रति आइसक्रीम पर उपभोक्ता द्वारा चार आइसक्रीम को खरीदने की इच्छा तथा योग्यता मांगी गई मात्रा का उदाहरण है जबकि उपभोक्ता द्वारा एक रुपए पर चार आइसक्रीम ₹2 पर इन आइसक्रीम ₹3 पर दो आइसक्रीम खरीदने की योग्यता तथा इच्छा मांग का उदाहरण है&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;मांग का नियम&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;मांग का नियम यह बतलाता है कि अन्य बातें समान रहने पर किसी वस्तु की कीमत कम होने पर उसकी मांग बढ़ जाती है। अर्थात किसी वस्तु की कीमत तथा मांगी गई मात्रा के विपरीत संबंध है परंतु यह संबंध आनुपातिक नहीं है&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अर्थात यह आवश्यक नहीं है कि वस्तु&amp;nbsp; की कीमत आधी हो जाने पर वस्तु की मांग दोगुनी हो जाएगी।मांग का नियम तो कीमत में होने वाले परिवर्तन के फल स्वरुप मांग में होने वाले परिवर्तन की दिशा को प्रकट करता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः मांग के नियम के अध्ययन से किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने के फलस्वरूप उस वस्तु के मांग में होने वाले परिवर्तन की दिशा के बारे में पता चलता है। अर्थात नियम यह बतलाता है कि कीमत की गिरने मांग में विस्तार तथा कीमत के बढ़ने से मांग में संकुचन होता है। परंतु इससे यह पता नहीं चलता कि कीमत में परिवर्तन के फल स्वरुप वस्तु की मांग में कितनी मात्रा में परिवर्तन होता है इस प्रकार मांग का नियम एक प्रकार से केवल गुणात्मक कथन है&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;मांग की लोच&lt;/b&gt; की धारणा से ज्ञात होता है कि कीमत में अनुपातिक परिवर्तन के फल स्वरुप वस्तु की मांगी गई मात्रा में कितना अनुपातिक परिवर्तन होता है। लोच,किसी कारण और उसके प्रभाव के बीच एक अनुपात है। जो सदा प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लोच का अनुमान&amp;nbsp; लगाने के लिए प्रभाव में प्रतिशत परिवर्तन को कारण में प्रतिशत परिवर्तन द्वारा भाग किया जाता है। उदाहरण के लिए मांग की कीमत लोच की मान्यता है कि कीमत में परिवर्तन कारण और मांग की मात्रा में परिवर्तन प्रभाव है। अतःमांग की कीमत लोच वस्तु की कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के फल स्वरुप मांगी गई मात्रा में हुए प्रतिशत परिवर्तन के अनुपात को बतलाती है। मांग की लोच एक संख्यात्मक कथन है। मान लीजिए सिम की कीमत में 20% वृद्धि हो जाती है। इसके फलस्वरूप राम की सिमो के लिए मांग&amp;nbsp; 50% कम हो जाती हैं। और मोहन की सिमो की मांग 10% कम हो जाती है। तब यह कहा जाएगा कि राम के लिए सिमो की मांग की लोच अधिक लोचदार है और मोहन के लिए सिमो की मांग कम लोचदार है ।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;मांग की लोच का अर्थ&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;अर्थशास्त्र की मांग की लोच का उल्लेख सबसे पहले&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रोफ़ेसर जे एस मिल&amp;nbsp; तथा कुरनो ने किया था परंतु इस धारणा का वास्तविक विकास डॉ मार्शल ने अपनी पुस्तक "&lt;b&gt;अर्थशास्त्र के सिद्धांत"&lt;/b&gt;&amp;nbsp; में किया था मांग की लोच एक तकनीकी धारणा है लोंच एक तत्वों में होने वाले परिवर्तन के कारण दूसरे तत्व में होने वाला परिवर्तन के अनुपात का माप है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किसी वस्तु की मांग, विशेष रूप से, उसकी कीमत, उपभोक्ता की आय तथा संबंधित वस्तु की कीमत पर निर्भर करती है। 'मांग की लोच' से यह ज्ञात होता है कि किसी वस्तु की कीमत अथवा उपभोक्ता की आय अथवा संबंधित वस्तुओं की कीमत में परिवर्तन होने से उसकी मांग की मात्रा में कितना परिवर्तन हुआ है।&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;प्रोफ़ेसर। डुली के शब्दों में &lt;i&gt;"एक वस्तु की कीमत,उपभोक्ता की आय तथा संबंधित वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने से उस वस्तु की मांगी गई मात्रा में होने वाले परिवर्तन के माप&amp;nbsp; को मांग की लोच कहा जाएगा"&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः&lt;b&gt; मांग की लोच मुख्य रूप से तीन प्रकार की हो सकती है&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;h4 style="text-align: left;"&gt;1 मांग की कीमत लोच&lt;br /&gt;2 मांग की आय लोच&lt;br /&gt;3 मांग की आड़ी&amp;nbsp; लोच&amp;nbsp;&lt;/h4&gt;&lt;p&gt;अतएवं मांग की लोच,भांग की किसी संख्यात्मक निर्धारित में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन तथा उसके फलस्वरूप मांग की मात्रा में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन का अनुपात है&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>types of demand functions, types of demand in hindi, types of demand class 12    मांग के प्रकार,मांग के प्रकार कितने होते हैं, मांग के प्रकार लिखिए, मांग  प्रकार के बारे में विस्तार से बताइए, </title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/09/types-of-demand-functions-types-of.html</link><category>Theory of demand</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Sun, 5 Sep 2021 16:43:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-4904671048536344025</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;मांग के प्रकार कितने होते हैं&amp;nbsp;&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;मांग के मुख्य प्रकार निम्नलिखित है&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;1 कीमत मांग price demand&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;मांग के&amp;nbsp; प्रकार&amp;nbsp;&lt;/b&gt; मे से एक कीमत मांग को हम ऐसे समझ सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;कीमत मांग किसी वस्तु की कीमत तथा मांग में संबंध प्रकट करती है। इससे&amp;nbsp; ज्ञात होता है कि किसी वस्तु की विभिन्न कीमतों पर उस वस्तु की कितनी मात्रा की मांग की जाएगी। कीमत मांग को एक समीकरण द्वारा भी प्रकट किया जा सकता है इस समीकरण को &lt;b&gt;कीमत मांग फलन&lt;/b&gt; कहा जाता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;b&gt;Dà=f(Pà)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसे पढ़ा जाएगा वस्तु A की मांग (Dà), वस्तु A की कीमत (Pà) का पालन (f) है । अर्थात वस्तु&amp;nbsp; A की मांग, वास्तु A की कीमत पर निर्भर करती है।&lt;b&gt;कीमत मांग &lt;/b&gt;का अनुमान लगाते समय यह मान लिया जाता है कि उपभोक्ता की आय, अस्थाना पत्र वस्तुओं की कीमतें, उपभोक्ता की रुचि अर्थात,अन्य बातें सामान्य रहेगी । हमारा सबका साधारणतया यह अनुभव है कि&amp;nbsp; अन्य बाते सामान रहने पर जब किसी वस्तु की कीमत बढ़ती है तो मांग कम हो जाती है अतएव कीमत मांग फलन से ज्ञात&amp;nbsp; &amp;nbsp;होता है कि मांग कीमत का विपरीत फलन है । इसका अर्थ यह हुआ कि कीमत की कम होने पर मांग बढ़ती है तथा कीमत के बढ़ने पर मांग कम हो जाती है। कीमत तथा मांग के संबंध को ही मांग का नियम कहा जाता है।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;2 आय मांग&amp;nbsp; income demand&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;आय मांग,&lt;/b&gt; अन्य बाते सामान रहने पर किसी उपभोक्ता की आय&amp;nbsp; तथा वस्तु की मांग के संबंध को प्रकट करती है इससे&amp;nbsp; ज्ञात होता है की एक उपभोक्ता आय की विभिन्न स्तरों पर किसी वस्तु की कितनी मात्रा खरीदेगा। आय याा मांग इस समीकरण द्वारा प्रकट किया जा सकता है आ इस समीकरणों को&lt;b&gt; आय मांग फलन &lt;/b&gt;कहा जाता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;b&gt; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; Da =&amp;nbsp; f(y)&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसे पढ़ा जाएगा वस्तु A की मांग उपभोक्ता की आय y का फलन है। साधारण वस्तुओं की मांग का आय का प्रत्यक्ष फनल है । अर्थात आय बढ़ने पर मांग बढ़ती है तथा आय कम होने पर मांग कम होती है इसके विपरीत निम्नकोटी के पदार्थों या घटिया पदार्थों की मांग आय का विपरीत फलन है। अर्थात आय कि बढ़ने पर मांग कम होती है तथा आय के कम होने पर मांग बढ़ती है इन पदार्थों को &lt;b&gt;गिफिन पदार्थ&lt;/b&gt; कहा जाता है अर्थात गीफिन पदार्थ वे पदार्थ है जिनकी मांग आगे बढ़ने पर कम हो जाती है।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;3 आड़ी मांग&amp;nbsp; cross demand&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;आड़ी मांग अन्य बाते सामान्य रहने पर, किसी वस्तु A की मांग पर उससे संबंधित किसी अन्य वस्तु&amp;nbsp; B की कीमत के संबंध को प्रकट करती है इससे प्रकट होता है कि वस्तु B की विभिन्न कीमतों पर वस्तु A की कितनी मात्राओं की भी मांग की जाएगी।इसे गणित के निम्नलिखित समीकरण के रूप में प्रकट किया जा सकता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp; &lt;i&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; Da =&amp;nbsp; f (pb)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसे पढ़ा जाएगा वस्तुएं A की मांग Dà ,वस्तु B की कीमत pb की पालन f है। प्रतिस्थापन वस्तुएं जैसे चाय की आडी मांग काफी की कीमत का प्रत्यक्ष फलन है अर्थात कॉपी की कीमत बढ़ने पर चाय की मांग बढ़ेगी तथा काफी की कीमत कम पर चाय की मांग कम होगी । इसकी विपरीत पूरक वस्तुओं जैसे स्याही तथा पेन की आड़ी मांग पेन की कीमत का विपरीत फलन है। अर्थात पेन की कीमत बढ़ने पर स्याही की मांग कम होगी । इसके विपरीत पेन की कीमत कम होने पर स्याही की मांग बढ़ेगी ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/08/theory-of-demand-definition-of-demand.html"&gt; मांग का अर्थ  , Theory of demand , मांग की परिभाषाएं  , definition of demand  theory of demand and supply, theory of demand class 12, theory of demand bcom 1st year, theory of demand and supply in economics, theory of demand class 11&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title> मांग का अर्थ  , Theory of demand , मांग की परिभाषाएं  , definition of demand  theory of demand and supply, theory of demand class 12, theory of demand bcom 1st year, theory of demand and supply in economics, theory of demand class 11</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/08/theory-of-demand-definition-of-demand.html</link><category>Theory of demand</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Mon, 16 Aug 2021 21:45:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-5314479284853873939</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; मांग का अर्थ Theory of demand&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;अर्थशास्त्र में &lt;b&gt;मांग का अर्थ&lt;/b&gt; प्रयोग विशेष अर्थों में किया जाता है।आम बोलचाल की भाषा में अच्छा आवश्यकता तथा मांग शब्दों का प्रयोग एक ही अर्थ में किया जाता है परंतु अर्थशास्त्र में इन शब्दों के विभिन्न अर्थ होते हैं आपकी कार लेने की इच्छा है परंतु आपके पास पर्याप्त धन नहीं है तो आप यही इच्छा आर्थिक दृष्टि से केवल इच्छा ही है। मांग नहीं&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;परंतु यह पर्याप्त धन होते हुए भी आप इनको कार पर खर्च करना नहीं चाहते तो यह केवल आवश्यकता ही कहलाये गी मांग नहीं यह इच्छा उसी स्थिति में मांग का रूप धारण करेंगी जिस स्थिति में (अर्थात एक निश्चित समय और निश्चित कीमत पर) आप कार खरीदने के लिए तैयार हैं इस बात का स्पष्टीकरण आवश्यक है कि एक निश्चित निश्चित समय के संबंध में ही मांग का उल्लेख किया जाना चाहिए। अतः "यदि मांग को प्रभावित करने वाले अन्य तत्व समान रहे तो मांग किसी पदार्थ की वह मात्रा है जिसे एक उपभोक्ता समय की एक निश्चित अवधि में एक निश्चित कीमत पर खरीदने के लिए इच्छुक है या योग्य है"।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;मांग की परिभाषाएं definition of demand&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;1 प्रोफेसर वीरा अंस्टे &lt;/b&gt;के अनुसार ,"&lt;b&gt;मांग किसी पदार्थ की वह मात्रा है जो एक दिए हुए समय में एक दी हुई कीमत पर खरीदी&amp;nbsp; जाती है।"&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;2 प्रोफेशन बेनहम&lt;/b&gt; के अनुसार,&amp;nbsp;&lt;b&gt; "एक निश्चित कीमत पर किसी वस्तु की मांग उसकी वह मात्रा है जो उस कीमत पर एक निश्चित समय में खरीदी जाएगी"&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उपयुक्त परिभाषाओं से यह ज्ञात होता है कि वस्तु में पांच तत्व होते हैं (1) वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा , (2) इच्छा को पूरा करने के लिए धन (3) धन खर्च करने के लिए तत्परता (4 )वस्तुओं की मांगी गई&amp;nbsp; मात्रा तथा कीमत में संबंध&amp;nbsp; (5) मांगी गई मात्रा का समय से संबंध उपरोक्त तत्वों की सहायता से, आवश्यकता तथा मांग का अंतर स्पष्ट किया जा सकता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मांग के पांच तत्व होते हैं जबकी आवश्यकता के पहले तीन तत्व होते है। मांग किसी वस्तु की एक निश्चित कीमत पर खरीदी जाने वाली मात्रा को प्रकट करती है। जबकि आवश्यकता उस वस्तु की इच्छा पूरी करने की शक्ति को प्रकट करती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;देखने के लिए क्लिक करे&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/09/types-of-demand-functions-types-of.html" target="_blank"&gt;मांग के प्रकार,मांग के प्रकार कितने होते हैं, मांग के प्रकार लिखिए, मांग  प्रकार के बारे में विस्तार से बताइए, &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भारतीय बहीखाता प्रणाली में सुधार के लिए सुझाव</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/08/blog-post.html</link><category>भारतीय बहीखाता प्रणाली</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Fri, 6 Aug 2021 23:03:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-5745788808846215301</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;भारतीय बहीखाता प्रणाली में सुधार के लिए सुझाव&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;वैसे तो भारतीय बहीखाता प्रणाली अंग्रेजी की दोहरा लेखा प्रणाली से काफी सरल एवं सुविधाजनक है लेकिन फिर भी इसे और अधिक उपयोगी बनाने के लिए उपरोक्त कमियों को दूर करना आवश्यक है जो इस संबंध में निम्न सुधार किए जाने चाहिए&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;1 सुविधाजनक बहीया&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;लंबी-लंबी बहिंयो कि मैं स्थान पर जिल्ददार सुविधाजनक रजिस्टरओं का भी प्रयोग होना चाहिए जिसमें पृष्ठ संख्या भी मुद्रित होनी चाहिए जिससे जालसाजी की संभावना नहीं रहेगी&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;2 उधार लेन दिनों का अलग लेखा&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;उधार लेने देने का लेखा रोकड़ बही में नहीं होना चाहिए खून के लिए अलग बहिया होनी चाहिए जिससे उधार पर क्रय विक्रय की झांसी की शीघ्रता से ज्ञात की जा सके।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;3 रोकड़ बही में सुधार&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;रोकड़ बही में रोकड़ व्यवहारों के साथ-साथ छूट तथा बैंक संबंधी लेन देन का भी लेखा होना चाहिए छोटी-छोटी दैनिक खर्चों के लिए अलग से&amp;nbsp; रोकड़ बही रखी जानी चाहिए। कच्ची पक्की रोकड़ बही के स्थान पर केवल एक रोकड़ बही का प्रयोग होना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;4 व्यापार खाता तथा लाभ हानि खाता&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली में भी एक सकल लाभ तथा सकल हानि ज्ञात करने के लिए व्यापार खाता तथा शुद्ध लाभ हानि जानने के लिए पृथक से लाभ हानि खाता बनाया जाना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;5 समायोजनाओं का समावेश&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;अदत्त व पूर्वदत्त व्यय,उपार्जित एवं अनुपार्जित एवं अन्य आवश्यक समायोजन का अंतिम खाता बनाते समय उचित लेखा किया जाना चाहिए जिससे व्यापार वर्ष के वास्तविक लाभ हानि का पता चल सके संचिती&amp;nbsp; की भी समुचित व्यवस्था होनी आवश्यक है।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;6 खर्चों के अलग-अलग खाते&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;प्रत्येक प्रकार की व्यापारिक व्ययो के लिए अलग-अलग खाते खोले जाने चाहिए जिससे कि किसी भी समय यह पता लग सके कि किसी निश्चित मद पर कितना व्यय हुआ है।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;7 पूंजीगत एवं आयगत मद में अंतर&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली में पूंजीगत एवं आयगत का अलग-अलग विभाजन होना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;8 स्वकीय संतुलन प्रणाली का प्रयोग&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली में स्वकिय संतुलन प्रणाली का प्रयोग किया जाना चाहिए जिसे अशुद्धियों को ढूंढने में कोई कठिनाई न हो&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;9 खानेदार बाहीयों का प्रयोग&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;इसके अंतर्गत खानेदार&amp;nbsp; बहिया प्रयोग में लाई जानी चाहिए जिससे कुछ विशिष्ट बातें की विषय में शीघ्रता से जानकारी मिल सके&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;10 वापसी&amp;nbsp; बहिया&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;इसमें अन्य बहिंयों के साथ क्रय एवं विक्रय वापसी बही का भी&amp;nbsp; &amp;nbsp;प्रयोग होनी जानी चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;11 प्राप्त एवं देय बिल बही&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;हुंडी के स्थान पर प्राप्त पर&amp;nbsp; प्राप्य बिल तथा देय&amp;nbsp; &amp;nbsp;विल वही का प्रयोग किया जाना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;12 चल संपत्तियों का मूल्यांक&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चल संपत्तियों का मूल्यांकन उनके प्राप्त होने वाले मूल्य पर ही किया जाना चाहिए&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भारतीय बहीखाता प्रणाली के गुण एवं दोष ,  bhartiya bahikhata pranali  , भारतीय बहीखाता प्रणाली , भारतीय बहीखाता प्रणाली के दोष</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/07/blog-post_25.html</link><category>भारतीय बहीखाता प्रणाली</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Sun, 25 Jul 2021 18:51:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-3206626511796774932</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; भारतीय बहीखाता प्रणाली&lt;/h1&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली के गुण&amp;nbsp;bhartiya bahikhata pranali&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;1 मितव्ययी&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली (bhartiya bahikhata pranali)&lt;/b&gt;के अंतर्गत उपयोग की जाने वाली बहिय&amp;nbsp; सस्ती होती हैं। यह विभिन्न आकार प्रकार&amp;nbsp; की भी मिलती है ।व्यापारी अपनी व्यापार की आवश्यकता अनुसार उन्हें खरीद सकता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;2 टिकाऊ बाहिया&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;बाहीयो&amp;nbsp; का कागज काफी मजबूत और कबर काफी मजबूत होता है।इस कारण इन बहीयों को कई वर्षों तक आवश्यकतानुसार संभाल कर रख सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;3 सलो ( कॉलम) का उपयोग खाने के लिए&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;बहायो में पहले से ही सल&amp;nbsp; पड़े रहते हैं जो खनो का कार्य करते हैं अलग से रेखाएं नहीं खींचनी पड़ती है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;4 सरलता&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;यह प्रणाली अत्यंत सरल होती है मंदबुद्धि वाला व्यक्ति कुछ समय में ही से सीख कर आसानी से हिसाब किताब रख सकता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;5 देसी भाषा का प्रयोग&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली को लिखने के लिए किसी भी भारतीय भाषा या स्थानीय भाषा का प्रयोग किया जा सकता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;6 लोचता&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली में पर्याप्त लोचता पाई जाती है। व्यापारी व्यापार की आवश्यकता के हिसाब से बहीयों की संख्या कम या ज्यादा कर सकता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;7 काली स्याही का प्रयोग&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली में बही खाता लिखने के लिए काली शाही का प्रयोग किया जाता था जो ज्यादा टिकाऊ रहती थी।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;8 नियम&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली लिखने के लिए नियम काफी लचीले होते थे। उनका कठोरता से पालन करना आवश्यक नही&amp;nbsp; था&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;9 कम अशुद्धियां&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली की रकम को दोबारा अलग-अलग लिखने से गलती ना कम होती थी।किसी व्यवहार में अगर कई मद हैं तो उनका जोड़ी एक बार और नीचे भी लगाया जाता था ।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;10 मान्यता प्राप्त&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली न्यायालय, आयकर, विक्रय कर कानून द्वारा मान्यता प्राप्त है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;11 खाताबही में सरलता&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;भारतीय बहीखाता&amp;nbsp; प्रणाली&lt;/b&gt; में प्रारंभिक लेखों की पुस्तकों से खाते वही में खतौनी करना अत्यंत सरल है। क्योंकि इस प्रणाली में जमा पक्ष कि खतौनी जमा पक्ष में और नामें पक्ष की खतौनी नामे पक्ष में ही की जाती है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;12 संदर्भ&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;खाता बही में खतौनी करते समय प्रारंभिक बहिंयो में पृष्ठ संख्या और खातों में पृष्ठ संख्या व मिती लिखते हैं । इसलिए कोई भी प्रविष्टि आसानी से पता लगाई जा सकती है। संदर्भ ढूंढने में कठिनाई नहीं होती ।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;13 वैज्ञानिकता एवं पूर्ण पद्धति&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली दोहरा लेखा सिद्धांतों पर ही आधारित है इसलिए यह पूर्ण एवं वैज्ञानिक पद्धति है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;14 अंतिम खाते&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली के अंतर्गत लाभ हानि व चिट्ठा बनाया जाता है जिससे&amp;nbsp; व्यापार की आर्थिक परिणाम एवं आर्थिक स्थिति का पता आसानी से चल जाता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;15 भारतीय संस्कृति की परिचायक&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली का जन्म भारत में सदियों पूर्व हुआ था यह प्रणाली भारतीय संस्कृति एवं धर्म के अनुकूल है इसलिए इसमें लेखा शुरू करने से पूर्व इष्टदेव का स्मरण करना, खाते की नाम के आगे श्री, भाई का उपयोग करके व्यापारी को सम्मान देना भारतीय गरिमा के अनुकूल ही है यही कारण है कि आज भी अपने प्रणाली प्रचलित है।&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली के दोष&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली में वैसे कई दोष नहीं है यह पूर्ण रूप से वैज्ञानिक एवं परिपूर्ण प्रणाली है, हां दोहरा लेखा प्रणाली की तुलना में कई कमियां अवश्य हैं जो इस प्रकार&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;1 असुविधा&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली के अंतर्गत लंबी लंबी बहीया प्रयोग में लाई जाती है जिनके प्रयोग में काफी असुविधा होती है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;2 धोखाधड़ी की संभावना&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;भाइयों की सिलाई दोष पूर्ण होती है तथा पन्नों का क्रम संख्या भी नहीं छपी होती है डोरी को ढीला कर के किसी भी पन्ने को आसानी से निकला जा सकता है। इस प्रकार जाल साझी एव छल कपट की पूर्ण संभावना रहती है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;3 रोकड़ संबंधी दोष&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस पद्धति के अंतर्गत रखी जाने वाली रोकड़ बही में उधार लेन-देन का भी लिखा होता है जो उचित नहीं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;4 माल खाता&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;अधिकांश व्यापारी पद्धति के अंतर्गत माल खाता बना कर ही लाभ हानि ज्ञात करते है। जिससे सकल लाभ या हानि का ठीक-ठीक पता नहीं चलता।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;5 समायोजन लेखो का न होना&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस पद्धति में अंतिम खाते बनाते समय प्राय समायोजन लखो का ध्यान नहीं रखा जाता है । इस प्रकार लेखे अवधि वास्तविक लाभालाभ का निर्धारण विवेक पूर्ण नहीं होता&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;6 संचिती की व्यवस्था ना होना&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस पद्धति में संचिति करने की कोई व्यवस्था नहीं होती है अतः संकटकालीन स्थिति में काफी घटनाएं होती है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;7 पूंजीगत एव लाभगत मदो में अंतर ना होना&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस&amp;nbsp; पद्धति में अंतर्गत प्राय पूंजीगत&amp;nbsp; लाभ गत के मादो में अंतर नहीं पाया जाता जिससे लाभ हानि का निर्धारण विवेक पूर्ण एव यथार्थ रूप से नहीं हो पाता।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;8 बैंक तथा छूट की व्यवस्था ना होना&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इसमें बैंक व छूट के लिए अलग से कोई खाना नहीं होता है&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;9 लंबी प्रक्रिया&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इसमें कच्ची और पक्की दोनों रोकड़ बही रखी जाती है जिनसे कार्य दोगुना हो जाता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h2&gt;&amp;nbsp;clich for view&amp;nbsp;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/07/blog-post.html"&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली से आशय&lt;/a&gt;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भारतीय  बहीखाता प्रणाली की विशेषताएं और लोकप्रियता के कारण , भारतीय बहीखाता प्रणाली से आशय</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/07/blog-post_14.html</link><category>भारतीय बहीखाता प्रणाली</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Wed, 14 Jul 2021 19:43:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-4675879112571908696</guid><description>&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/h2&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/07/blog-post.html"&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली से आशय&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/h2&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;भारतीय बहीखाता प्रणाली की विशेषताएं और लोकप्रियता के कारण&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली आज भी लोकप्रिय हैं। इसकी विशेषता है इसका कारण है जो कि निम्नलिखित है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;1 सरलता&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&amp;nbsp;यह पद्धति बहुत ही सरल है। कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी इसे कुछ ही समय में इसको सीख सकता है।यहां तक कि सामान्य पढ़ा लिखा व्यक्ति भी इस पद्धति को सीकर हिसाब किताब आसानी से रख सकता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;2 मितव्य&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;यह पद्धति अत्यंत सस्ती है। एक तो बाहियो की संख्या कम होती है। दूसरा रजिस्टर ओं की तुलना में बढ़िया सस्ती पड़ती हैं तीसरा बहीयो को लिखने वाला भी कम वेतन में मिल जाता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;3 देशी भाषा का प्रयोग&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;भारतीय प्रणाली में लेखा&amp;nbsp; किसी भी भारतीय भाषा में किया जा सकता है । हिंदी, उर्दू, गुजराती, मराठी,गुरुमुखी ,&amp;nbsp; सिंधी, बांग्ला आदि। सभी भाषाओं में इसे लिखा जा सकता है उत्तर भारत में अधिकांश व्यापारी इसे मुड़िया भाषा में लिखते है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;4 गोपनीयता&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;देश एवं स्थानीय भाषा में लिखे जाने के कारण बाहरी व्यक्ति इन खातों को आसानी से समझ नहीं सकता इसलिए इसे लिए बहीखाते&amp;nbsp; गोपनीय बने रहते हैं।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;5 वैज्ञानिकता&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;भारतीय बहीखाता&amp;nbsp; पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। और दोहरा लेखा प्रणाली पर ही आधारित है। इसमें हमेशा एक ही पक्ष में लिखा किया जाता है जैसे यदि प्रारंभिक पुस्तकों में कोई लेखा&amp;nbsp; जमा पक्ष में किया जाता है तो अंत तक वह जमा पक्ष में ही लिखा जाएगा, अंग्रेजी प्रणाली के सामान्य विपरीत पक्षों में नहीं&amp;nbsp;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;6 लोचता&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली में लोच्ता का गुण पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।अर्थात&amp;nbsp; आवश्यकता पड़ने पर व्यापार वृद्धि के साथ-साथ बहियो की संख्या बढ़ाई जा सकती है। और व्यापार के घटने के समय बहियों की संख्या घटाई जा सकती है। अतः परिवर्तित परिस्थितियों में इसमें अनुकूल परिवर्तन किया जा सकता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;7 कम बहियाे का प्रयोग&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इस प्रणाली में केवल रोकड़ बही&amp;nbsp; व&amp;nbsp; खाता बही रखकर ही काम चलाया जा सकता है। आवश्यकतानुसार व सुविधा के लिए नकल बहिया (जमा नकल बही व नाम नकल बही) भी रखी जा सकती है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;8 सिद्धांत&amp;nbsp;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;भारतीय बहीखाता&amp;nbsp; प्रणाली की लिखने की कुछ पक्के सिद्धांत हैं। जिनके कारण भारत पर अंग्रेजी सम्राट के दीर्घकालीन शासन&amp;nbsp; के बाद भी अंग्रेजी प्रणाली लोकप्रिय ना हो सकी और भारतीय बहीखाता प्रणाली आज भी लोकप्रिय है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;9 सादगी&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;इसमें व्यवहारों का विवरण बाहियों में ही लिख दिया जाता है। जोड़ आदि भी वही वही लगा दिया जाता है जहां व्यवहारों का लेखक समाप्त होता है।&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;10 दिनांक&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली में हिंदी मिति एवं संवत के साथ-साथ अंग्रेजी तारीख भी लिख दी जाती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/07/blog-post_25.html"&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली के गुण एवं दोष  , भारतीय बहीखाता प्रणाली , भारतीय बहीखाता प्रणाली के दोष&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>भारतीय बहीखाता प्रणाली , भारतीय बहीखाता प्रणाली क्या है, भारतीय बहिखाता  प्रणाली की परिभाषा</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/07/blog-post.html</link><category>भारतीय बहीखाता प्रणाली</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Mon, 5 Jul 2021 21:38:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-1390576416635664600</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;भारतीय बहीखाता प्रणाली से आशय&lt;/h1&gt;&lt;div&gt;हमारे देश में अति प्राचीन काल से &lt;b&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली&lt;/b&gt; का प्रचलन रहा है। आज यूरोप के जो देश&amp;nbsp; विकसित कहे जाते हैं।, एक समय में जंगली अवस्था में थे और तब भारत अपनी व्यापार और उद्योग धंधों के लिए विश्वविख्यात था ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उस समय हमारे देश में हिसाब किताब रखने की जिस विधि का प्रयोग किया जाता था वह &lt;b&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली&lt;/b&gt; ही थी। अथर्ववेद, मनुस्मृति, और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं की अति प्राचीन काल से हमारे देश में यह प्रणाली सफलतापूर्वक कार्यशील थी और आज भी है। यह पूर्णतया एक सुदृढ़ एवं उन्नत प्रणाली है। यह प्रणाली पूर्ण एवं वैज्ञानिक है।विद्वानों का मत है कि यह प्रणाली कई मायने में द्वीप्रविष्टि प्रणाली से भी श्रेष्ठ है।इसमें आज भी ऐसे गुण विद्यमान हैं जो अंग्रेजी प्रणाली&amp;nbsp; से अधिक वैज्ञानिक और भारतीय परिस्थितियों के हैं । लेकिन आज की परिस्थिति में इस प्रणाली का प्रयोग बहुत ही कम किया जा रहा है आज भी बड़े-बड़े व्यापारी लिमिटेड कंपनियां इस&amp;nbsp; प्रणाली का प्रयोग कर रहे हैं। छोटी-छोटी व्यापारी तो इस प्रणाली का ही प्रयोग करते हैं। भारत में उपयोग होने के कारण इसकी भाषा और लिपि में&amp;nbsp; भेद अवश्य&amp;nbsp; रहता है। उत्तर भारत में इसे मीडिया भाषा में लिखा जाता है जिसने देखने में आसानी रहती है। एक भाषा को बाहर वाला व्यक्ति समझ नहीं सकता। बहीखाता की गोपनीयता बनी रहती है।&lt;/div&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;भारतीय बहिखाता&amp;nbsp; प्रणाली की परिभाषा&lt;/h2&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली&lt;/b&gt; की कोई विशेष&amp;nbsp; परिभाषा नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;विशेष प्रकार समझा जा सकता है भारतीय बहीखाता लेखांकन करने की वह विधि है। जिसको भारत में देखा कार्य करने के प्रयोग में लाया जाता था भारतीय परंपरा व निश्चित सिद्धांतों के आधार पर यह किसी भी भारतीय भाषा में लिखी जा सकती थी। भारत की कोई भी भाषा हो सकती है। हिंदी, गुजराती, मारवाड़ी, मराठी, सिंधी, गुरुमुखी ,बांग्ला, उर्दू आदि। भारत में इसे &lt;b&gt;महाजनी बही खाता प्रणाली &lt;/b&gt;भी कहते हैं। हिंदी में इसे प्राय मुड़िया भाषा में लिखा जाता था। परंतु वर्तमान समय में व्यापारी हिंदी भाषा में ही लिख लेते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;(देखने के लिए क्लिक करे)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/07/blog-post_14.html" target="_blank"&gt;भारतीय बहीखाता प्रणाली की विशेषताएं और लोकप्रियता के कारण&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>ख्याति मूल्याङ्कन की विधिया   ,  ख्याति मूल्यांकन की क्रय  प्रतिफल विधि , ख्याति मूल्याङ्कन की पारस्परिक सहमति विधि , ख्याति मूल्याङ्कन की सकल प्राप्ति विधि</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/06/blog-post_24.html</link><category>what is goodwill</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Thu, 24 Jun 2021 14:10:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-3825483888905792414</guid><description>&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;h1&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;ख्याति मूल्याङ्कन की विधिया&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;&lt;div&gt;&lt;p&gt;{ख्याति के बारे मे&amp;nbsp;जानने के लिए यहाँ क्लिक करे}&amp;nbsp;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/10/----.html" style="font-size: large;" target="_blank"&gt;गुडविल goodwill क्या है? ख्याति का अर्थ एवं परिभाषा, ख्याति कितने प्रकार की होती है?&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/03/goodwill.html"&gt;ख्याति के मूल्यांकन की आवश्यकता, ख्याति की लेखांकन विशेषताएं, ख्याति की अवधारणाएं&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;5 ख्याति मूल्यांकन की&amp;nbsp;क्रय&amp;nbsp; प्रतिफल विधि purchase consideration method&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इस विधि के अंतर्गत ख्याति की गणना क्रय मूल्य की राशि में से शुद्ध संपत्तियों का मूल्य घटाकर की जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;शुद्ध संपत्तियों के मूल्य की गणना क्रय की गई वार्षिक संपत्तियों&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;(अवास्तविक संपत्तियों जैसे- प्रारंभिक व्यय,अंशो एवं ऋणपत्रो पर&amp;nbsp; कमीशन आदि को छोड़ कर ) की क्रय मूल्य (बाजार मूल्य या वसूली मूल्य) मैं से स्वीकार किए गए दायित्वों की राशि घटाकर की जा सकती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;सूत्र:&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;b&gt; शुद्ध संपत्तियां=वास्तविक संपत्तियां-स्वीकार किए गए दायित्व&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;ख्याति =क्रय मूल्य -शुद्ध संपत्तियां&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;नोट-&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; यदि क्रय मूल्य में से&amp;nbsp; शुद्ध संपत्तियों का मूल्य अधिक हो तो ख्याति शून्य होगी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;6 ख्याति मूल्याङ्कन की&amp;nbsp;पारस्परिक सहमति विधि (Mutual agreement method)&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इस विधि के अंतर्गत &lt;b&gt;&lt;i&gt;ख्याति का मूल्यांकन&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; क्रेता एवं विक्रेता कि पारस्परिक सहमति के आधार पर अथवा दोनों पक्षों (क्रेता एवं विक्रेता) की सहमति से किसी तीसरे स्वतंत्र पत्रकार द्वारा किया जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इस विधि का प्रयोग उन व्यवसायों में किया जाता है जहां व्यवसाय की लभोपर्जन शक्ति के आंकड़े उपलब्ध नहीं होते।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;7 ख्याति मूल्याङ्कन की&amp;nbsp;सकल प्राप्ति विधि (gross receive method)&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इस विधि में &lt;i&gt;ख्याति की गणना&lt;/i&gt; लाभ के स्थान पर निश्चित वर्षों की आवर्ती प्रकृति की प्राप्तियो के औसत&amp;nbsp; को किसी निश्चित संख्या से गुणा कर की जाती है। इस विधि में लाभों को आधार न मानकर&amp;nbsp; कुल प्राप्तियां/ आगमन/फीस को आधार माना जाता है इस विधि का प्रयोग पेशेवर व्यक्तियों&amp;nbsp; &lt;b&gt;जैसे &lt;/b&gt;: डॉक्टर ,इंजीनियर ,वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट, द्वारा किया जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;कंपनी में ख्याति की गणना&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;एक कंपनी में&amp;nbsp; ख्याति की गणना में निम्न तथ्य ध्यान में रखे जाने आवश्यक है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;h4 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;1 नियोजित पूंजी की गणना&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/h4&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;एकाकी व्यापार एवं साझेदारी व्यापार में सामान्यतः औसत नियोजित पूंजी की गणना वास्तविक संपत्तियों में से&amp;nbsp; बाह्य दायित्व की राशि&amp;nbsp; तथा लाभ की आधी राशि घटक की जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;किंतु कंपनी की दशा में दायित्व में स्पष्ट संकेत के अभाव में पूर्वाधिकार अंश पूंजी एवं ऋण पत्रों की राशि भी घटाई जानी चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;h4 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;2 औसत लाभ की गणना&lt;/span&gt;&lt;/h4&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;यदि पूर्वाधिकार अंश पूंजी की राशि दायित्व की भांति वास्तविक संपत्तियों में से घटा दी गई हो तो इन अंशो पर लाभांश की राशि भी औसत लाभ में से घटा दी जानी चाहिए इसी प्रकार ऋण पत्र की राशि दायित्व में सम्मिलित होने पर ऋण पत्र पर ब्याज की राशि भी लाभ में से घटाई जानी चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/06/blog-post.html" target="_blank"&gt;&lt;span&gt;अंश पूँजी के प्रकार&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/06/what-is-trial-balance-its-definition.html" target="_blank"&gt;तलपट क्या है तलपट कैसे बनते है&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/07/meaning-definition-characteristics-of-company.html" target="_blank"&gt;कंपनी का आशय , कंपनी की परिभाषाएं&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/08/classification-of-company.html" target="_blank"&gt;कंपनी का वर्गीकरण (classification of company&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;h4 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;3 सामान्य लाभ दर की गणना&lt;/span&gt;&lt;/h4&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;यदि प्रश्न में लाभ की सामान्य दर का उल्लेख ना हो तो ऐसी स्थिति में उसी कंपनी अथवा उसके सामान अन्य कंपनी के गत वर्षो में घोषित लाभांश की औसत दर ही सामान्य लाभ की दर मानी जा सकती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>ख्याति मूल्याङ्कन की विधिया  ,  ख्याति का  मूल्यांकन  पूंजीकरण विधि  कैसे करते है ?</title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/06/blog-post.html</link><category>what is goodwill</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Tue, 15 Jun 2021 20:41:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-3351852508685280566</guid><description>&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;h1&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;ख्याति मूल्याङ्कन की विधिया&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;&lt;p&gt;{ख्याति के बारे मे&amp;nbsp;जानने के लिए यहाँ क्लिक करे}&amp;nbsp;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/10/----.html" style="font-size: large;" target="_blank"&gt;गुडविल goodwill क्या है? ख्याति का अर्थ एवं परिभाषा, ख्याति कितने प्रकार की होती है?&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/03/goodwill.html"&gt;ख्याति के मूल्यांकन की आवश्यकता, ख्याति की लेखांकन विशेषताएं, ख्याति की अवधारणाएं&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;3 ख्याति का&amp;nbsp; मूल्यांकन&amp;nbsp;&amp;nbsp;पूंजीकरण विधि&amp;nbsp; कैसे करते है ?&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इस विधि के अंतर्गत लाभों का &lt;b&gt;पूंजीकरण&lt;/b&gt; मूल्य ज्ञात कर &lt;b&gt;ख्याति&lt;/b&gt;&amp;nbsp; गणना की जाती है पंजीकृत मूल्य से आशय वास्तविक लाभ की राशि अर्जित करने के लिए व्यावसाय में आवश्यक पूंजी की राशि से है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;1 औसत लाभ के पूंजीकरण द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;2 अधिलाभ के पूंजीकरण द्वारा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;1 औसत लाभ के पूंजीकरण द्वारा&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इस विधि के अंतर्गत सर्वप्रथम औसत लाभ की गणना औसत लाभ की विधि की भांति ही की जाती है तत्पश्चात उक्त लाभ का सामान्य दर के आधार पर पूंजीकृत मूल्यों के आधार पर ज्ञात किया जाता है&amp;nbsp; यह मूल्य सामान नियोजित पूजी कहलाती हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="background-color: #04ff00; font-size: large;"&gt;सामान्य नियोजित पूजी&amp;nbsp; = (औसत लाभ&amp;nbsp; × 100)/ सामान्य दर&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;उपरोक्ततानुसार ज्ञात सामान्य पूजी में से औसत नियोजित पूंजी की राशि घटाने पर प्राप्त अधिक की राशि ख्याति कहलाती है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="background-color: #04ff00; font-size: large;"&gt;ख्याति = सामान्य नियोजित पूंजी - औसत नियोजित पूंजी&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h3 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;2 अधिलाभ के पूंजीकरण द्वारा&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/h3&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इस विधि के अंतर्गत सर्वप्रथम अधिलाभ की गणना अधिलाभ&amp;nbsp; विधि की भांति ही की जाती है। तत्पश्चात उक्त अधिलाभ का सामान्य&amp;nbsp; दर के आधार पुंजिकृत मूल्य निम्न सूत्र के आधार पर लिया जाता है । यह मूल्य ख्याति कहलाती है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="background-color: #04ff00; font-size: large;"&gt;ख्याति&amp;nbsp; =&amp;nbsp; (अधिलाभ ×100)/ सामान्य दर&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;4 वार्षिकी पद्धति ( annuity method)&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;यह विधि ख्याति के मूल्यांकन की स्वतंत्र विधि नहीं है बल्कि अधिलाभ विधि का ही एक संशोधित रूप है।&amp;nbsp; इस विधि के अंतर्गत अधिलाभ की राशि ज्ञात कर इस बात का अनुमान लगाया जाता है कि व्यवसाय में यह अधिलाभ कितने वर्षों तक प्राप्त हो सकेगा तत्पश्चात अधिलाभ की&amp;nbsp; वार्षिकी का वर्तमान मूल्य सारणी अथवा सूत्र द्वारा ज्ञात कर जांच की गणना की जाती है&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;जो निम्न प्रकार है&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;यदि एक रुपए की वार्षिकी का वर्तमान मूल्य ज्ञात हो&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="background-color: #04ff00; font-size: large;"&gt;ख्याति = अधिलाभ × वार्षिकी&amp;nbsp; का वर्तमान मूल्य&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;यदि एक रुपए की वर्तमान मूल्य पर प्रतिवर्ष देय वार्षिकी की राशि का उल्लेख हो&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="background-color: #04ff00; font-size: large;"&gt;ख्याति = अधिलाभ ÷वार्षिकी की राशि&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इसे निम्नानुसार और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;उदाहरण&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;एक व्यवसाय से संबंधित निम्नलिखित संमक उपलब्ध है:&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अनुमानित लाभ = 2500&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अधिलाभ की अनुमानित अवधि = 4 वर्ष&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ख्यात की गणना कीजिए।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;1 यदि 5% की दर से 4 वर्षों के लिए विनियोजीत ₹1 वार्षिक का वर्तमान मूल्य ₹ 3.5459 है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;2 यदि 5% की दर पर 4 वर्षों के लिए प्रति वर्ष विनियोजित ₹ 0.282012 की वार्षिक की राशि का वर्तमान मूल्य ₹ 1 है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;पहली स्थिति&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ख्याति = अधिलाभ × वार्षिकी का वर्तमान मूल्य&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ख्याति = 2500 × 3.5459 = 8864.87&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;द्वितीय स्थिति में&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ख्याति = अधिलाभ / वार्षिकी की राशि&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ख्याति =2500/0.882812 = 8864.87&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यदि वार्षिकी का वर्तमान मूल्य 1 से अधिक है तो इसका अधिलाभ से गुणा कर गणना की जाती है तथा इसके विपरीत वर्तमान मूल्य में नियोजित राशि 1 से कम होने पर&amp;nbsp; अधिलाभ&amp;nbsp; का इससे&amp;nbsp; भाग देकर ख्याति&amp;nbsp; की गणना की जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;(आगे की विधिया देखने के लिए क्लिक करे )&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/06/blog-post_24.html"&gt;ख्याति मूल्यांकन की क्रय  प्रतिफल विधि , ख्याति मूल्याङ्कन की पारस्परिक सहमति विधि , ख्याति मूल्याङ्कन की सकल प्राप्ति विधि&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title> ख्याति मूल्याङ्कन की विधिया ,अधिलाभ  विधि किसे कहते है? ,  adhilabh ka mulyankan kaise karte hai </title><link>https://sharmaji72.blogspot.com/2021/06/adhilabh-ka-mulyankan-kaise-karte-hai.html</link><category>what is goodwill</category><author>noreply@blogger.com (Dk sharma)</author><pubDate>Fri, 4 Jun 2021 22:31:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3473627311002529103.post-6370652897658237267</guid><description>&lt;h1 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;ख्याति मूल्याङ्कन की विधिया&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/h1&gt;&lt;h2 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;2&amp;nbsp; अधिलाभ&amp;nbsp; विधि किसे कहते है? what is super profit method&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;हेलो स्टूडेंट तो आप लोग कैसे हैं आशा करते हैं अच्छे ही होंगे तो आज हम लोग पढ़ने वाले हैं &lt;b&gt;अधिलाभ विधि&amp;nbsp;&lt;/b&gt; सुपर प्रॉफिट मेथड चलिए शुरू करते हैं अगर आपको ख्याति के बारे में जानना है तो इस लिंक पर क्लिक करें जो ब्लू कलर के हैं&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2020/10/----.html" style="font-size: large;" target="_blank"&gt;गुडविल goodwill क्या है? ख्याति का अर्थ एवं परिभाषा, ख्याति कितने प्रकार की होती है?&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;h2&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/03/goodwill.html"&gt;ख्याति के मूल्यांकन की आवश्यकता, ख्याति की लेखांकन विशेषताएं, ख्याति की अवधारणाएं&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अधिलाभ विधि&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इस विधि के अंतर्गत अधिलाभ की राशि का वर्षों की संख्या से गुणा कर ख्यात की गणना निम्नानुसार की जाती है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ख्याति=अधिलाभ× वर्षों की संख्या&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;Goodwill=&amp;nbsp; super profit × number of years&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;h4 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अधिलाभ (super profit)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/h4&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;सामान्यतः अपेक्षित लाभ की तुलना में कमाया गया अधिक लाभ अधिलाभ कहलाता है। इसकी गणना निम्न प्रकार की जा सकती है&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अधिलाभ =वास्तविक औसत लाभ-सामान्य लाभ&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;Super profit = actual average profit - normal profit&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इसमें वास्तविक औसत लाभ की गणना औसत लाभ विधि की भांति ही की जाती है तथा सामान्य लाभ की गणना निम्नानुसार की जाती है&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;सामान्य लाभ = औसत नियोजित पूंजी×सामान्य दर /100&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;normal profit = average capital employed × normal rate/100&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;यदि फर्म अधिलाभ की स्थिति में है तो ख्याति का सकारात्मक मुल्ले होगा, इसके विपरीत यदि फार्म में अधिलाभ की स्थिति ना हो तो ख्याति का मूल्य नकारात्मक होगा&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h4 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;वर्षों की संख्या -&amp;nbsp; वर्षों की संख्या का निर्धारण व्यापार की स्थिति, सरकारी नीतियां, आदि पर निर्भर करता है। इस संबंध में सामान्यतः तीन या पांच वर्षों की संख्या उचित मानी जा सकती है।&lt;/span&gt;&lt;/h4&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;span style="background-color: #04ff00;"&gt;उदाहरण के लिए&lt;/span&gt; -31 मार्च 2020 एक फर्म की पूंजी ₹200000 है उसने 31 मार्च&amp;nbsp; 2021 को समाप्त वर्ष के लिए 60000 लाभ अर्जित किया इस अवधि में औसत फर्म&amp;nbsp; लाभ 17% की दर से अर्जित करती है तो अधिलाभ होगा&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;फार्म का लाभ=60,000&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;सामान्य लाभ ( 200000 ×17/ 100) =&amp;nbsp; 34000&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अधिलाभ = 60,000-34000&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;= 26000&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ख्याति का मूल्य= अधिलाभ × क्रय वर्षों&amp;nbsp; की संख्या( अनुमानित 5 वर्ष)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;= 26000× 5 = 130000&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h4 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;औसत नियोजित पूंजी की गणना&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/h4&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;औसत नियोजित पूजा की गणना के लिए व्यापार में लगे समस्त चल एवं अचल संपत्तियों (ख्याति, गैर व्यापारिक संपत्तियां, विनियोग, प्रारंभिक व्यय, लाभ हानि , विवरण पत्र की हानि, अंशो एवं ऋणपत्रों पर कमीशन, बट्टा, आदि को सम्मिलित ना करते हुए) वास्तविक मूल्य अर्थात बाजार मूल्य अथवा वसूली मूल्य के योग में से अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन ऋणों की राशि (कंपनी की दशा में पूर्वाधिकार अंश पूंजी की राशि) घटाकर व्यापार में नियोजित पूंजी की राशि ज्ञात कर ली जाती है। इसमें वर्ष&amp;nbsp; में लाभ की आधी&amp;nbsp; राशि घटाकर औसत नियोजित पूंजी ज्ञात कर ली&amp;nbsp; जाती है।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इसकी गणना वर्ष के प्रारंभ एवं वर्ष के अंत की पूंजी के योग को दो से विभक्त कर&amp;nbsp; अथवा वर्ष के अंत की पूंजी में चालू वर्ष का आधा लाभ घटाकर&amp;nbsp; अथवा&amp;nbsp; वर्ष की प्रारंभिक की पूंजी में से चालू वर्ष का आधा लाभ जोड़कर भी किया जा सकता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;h4 style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;सामान्य दर की गणना&lt;/span&gt;&lt;/h4&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;सामान्य दर वह दर है जिसे व्यवसाई सामान्यता: व्यवसाय से प्राप्त करने की अपेक्षा रखता है इस दर से कम लाभ होने पर भी अपना व्यवसाय प्रारंभ नहीं करते। सामान्य लाभ दर पर विचार करते समय व्यवसाय की प्रकृति, सन्निहित जोखिम, उचित प्रबंधकीय एवं अन्य संबंधित परिस्थितियों को अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। प्राय प्रश्न में इसका स्पष्ट उल्लेख होता है। स्पष्ट उल्लेख ना होने पर इसकी गणना ब्याज की सामान्य दर तथा जोखिम के अतिरिक्त दर का योग कर की जा सकती है।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;इसी निम्नानुसार अधिक स्पष्ट समझा जा सकता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;ख्याति = अधिलाभ × वर्षों की संख्या&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="background-color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अथवा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ख्याति = ( वास्तविक औसत लाभ - सामान्य लाभ)×वर्षों की संख्या&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;सामान्य लाभ = औसत नियोजित पूंजी × सामान्य दर/100&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;औेसत नियोजित पूंजी = [गैर व्यापारिक संपत्तियों को छोड़कर समस्त वास्तविक संपत्तियां - (बाह्य दायित्व +पूर्वाधिकार अंश पूंजी+चालू वर्ष का आधा लाभ)]&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="background-color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अथवा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;(प्रारंभिक पूंजी + अंतिम पूंजी )/2&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="background-color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अथवा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;वर्ष के अंत की पूंजी - चालू वर्ष का आधा लाभ&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="background-color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अथवा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;वर्ष के प्रारंभ की पूंजी + चालू वर्ष का आधा लाभ&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: medium;"&gt;अगली विधि जानने के लिए क्लिक करे -&lt;a href="https://sharmaji72.blogspot.com/2021/06/blog-post.html"&gt;ख्याति मूल्याङ्कन की विधिया  ,  ख्याति का  मूल्यांकन  पूंजीकरण विधि  कैसे करते है ?&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item></channel></rss>