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<?xml-stylesheet href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/atom10full.xsl" type="text/xsl" media="screen"?><?xml-stylesheet href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css" type="text/css" media="screen"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170</id><updated>2008-07-21T04:57:01.362+05:30</updated><title type="text">अज़दक</title><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false" /><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/posts/default" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>570</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><link rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/iEbD" type="application/atom+xml" /><feedburner:emailServiceId xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">921371</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">http://www.feedburner.com</feedburner:feedburnerHostname><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-6886931406301174990</id><published>2008-07-20T09:43:00.003+05:30</published><updated>2008-07-20T09:45:32.163+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुक्‍त गद्य के गल्‍प" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हिंदी" /><title type="text">पुरबिया फुटानीबाज का अवसादगीत</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp1.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SIK7nuj7WCI/AAAAAAAACcI/rdPpL6TrEvY/s1600-h/MeltingTar.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SIK7nuj7WCI/AAAAAAAACcI/rdPpL6TrEvY/s200/MeltingTar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5224944808891209762" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;महटियाये, लझरियाये&lt;/span&gt; आखिरकार बहरी अइबे करेंगे. बोलिये, बहिरी आये बिना कवनो उपाय है, साथी? नहीं, बताइये, कमरेड, हाऊ लांग चार बाई चार के अपना चौखटा में अड़े रहेंगे? मसिर्या गाय-गायके रात गहीन करेंगे, बेपरवाह गुमानी में अपना ही सलीब चढ़े रहेंगे? टाइम का टिलिक-टिलिक तS ठहरे हुए न है, जी, रोज आगे न जा रहा है? मालूम नहीं लोहियाजी अपना ‘इतिहास चक्र’ में का ज्ञान का भांग घोंटे थे, मगर हम तS देख रहे हैं, साथी, इतिहास चहुंओर लप्‍पड़ खा रहा है. लइका-लटकन सब ठीक से अखबार नहीं बांचता, इतिहास कहंवा ले बांचेगा, होज़ूर, जांचेगा? चायबासा में संतरा का एतना सब खेती था, महाराज, सब उजर रहा है, चीन का डैरेक्‍शन में देखिये, आंख मूंदल अइसा बिस्‍तारबाद है कि कलेजा दहल रहा है. आपका लगे हम मन का मुरझाइल हाल बताने आते हैं तS आपो महाराज, कवन जो है कि हमरा मने झांकते हैं? एत्तिला करते हैं उन्‍तीस तारीख को स्‍टेट कमेटी का मीटिन है, हमरा हाथे परचा थमाते हैं. फाइलबंद परचा और चार गो अखबारी कतरन अऊर एगो हुरहुराया मोपेड से आप अंदोलन का आग फैलाइयेगा? हद है, कमरेड, मन का आंखि मूंद के सूत गये हैं, कि पंचवी कच्‍छा का रट्टल अइसही लरबकई वाला क्रांति लाइयेगा? हम तS खैर, अपना सूली पर चढ़े हुए हैं कि सर्बेस्‍सर का कुआनो नदी में बहि रहे हैं, मालूम नहीं केतना जियल हैं केतना मरे हुए हैं, मगर आपका, कमरेड, तS क्रांति का किताबे सियाही नहाया हुआ है, फारसी का किताब से आप मगही का कच्‍छा ले रहे हैं? हम तS लझरियाये हैं, मगर आपे कौन सुझराये हैं, कि सीधा-सीधी अपना करम-पथ से महटियाये हैं, होज़ूर?</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_20.html" title="पुरबिया फुटानीबाज का अवसादगीत" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_20.html#comment-form" title="1 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/6886931406301174990/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/6886931406301174990" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/6886931406301174990" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-5642957051136055755</id><published>2008-07-19T12:00:00.004+05:30</published><updated>2008-07-19T12:46:34.879+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="देश" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमारा समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्‍लॉगिंग" /><title type="text">दिल्‍ली का अंत और शेल्‍केवाडियों के अनंत.. ?</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SIGL-tXpyaI/AAAAAAAACcA/9Mr6dQ1rN9Q/s1600-h/123.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SIGL-tXpyaI/AAAAAAAACcA/9Mr6dQ1rN9Q/s200/123.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5224610952173439394" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चिरकुटई&lt;/span&gt; के साथ मज़ा है कहीं आपका पीछा नहीं छोड़ती. &lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=480" target="_blank"&gt;ब्लॉगजगत में तो नहीं ही छोड़ती&lt;/a&gt;, यहां तो ख़ैर वह द आर्ट ऑफ़ फीलिंग है, मगर हिंदी ब्‍लॉगों से बाहर के बड़े संसार में भी अंतत: वह मुद्रास्फिति की तरह दौड़ रही चिरकुटई ही है- लगता है पिंड अब छोड़ी, तब छोड़ी, कल सुबह उठेंगे दूसरी चीज़ों की चर्चा करेंगे, महंगाई की बातों से मुख मलिन नहीं होगा, मगर ससुर, ख़्याली पुलाव ही पकते हैं, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;असल नहीं पकता&lt;/span&gt;. इसलिए कि असलवाले को महंगाई पकाती रहती है. पीछे-पीछे मुद्रास्फिति, आगे-आगे आप दौड़ते रहते हैं (विरले ही खुशनसीब जो महंगाई के पीछे नहीं, महंगाई उनके पीछे दौड़ रही हो. वर्ना ज़्यादा तो वे बदनसीब हैं जिनके जीवन में महंगाई ही महंगाई खड़ी है, वे कहीं नहीं खड़े हैं. जाने भलमनसी में, या चिरकुटई में, बेचारों ने सारी जगह महंगाई की मौज के लिए छोड़ दी है!). &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर, तो कह रहा था चिरकुटई कहीं पीछा नहीं छोड़ती. या &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मुद्रास्फिति&lt;/span&gt;. एक ही बात है. और ऐसा नहीं है कि शहर में ही उसके (महंगाई के) बिच्‍छू जेब में घुसे हुए हैं, कि आदमी जेब में हाथ डालने से डरे, गांवों तक में लोग जेबवाले कपड़ों के नज़दीक जाने से डर रहे हैं. भारतीय परम्‍परा की धोती ने किसी तरह लाज रखी हुई है. हालांकि मुद्रास्फिति कभी भी उसे उतार भी सकती है. जैसे सरकार को बुहार सकती है. लेकिन सरकार मुद्रास्फिति की जिरहों से बचते हुए, ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;परमाणु क़रार करा दो, देश को पता नहीं किस चमकते आसमान में पहुंचा दो&lt;/span&gt;’ के टिमटिमाते नारे के पीछे जाकर छिप गई है. साफ़ है सरकार ने ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;तारे ज़मीन पर&lt;/span&gt;’ नहीं देखी है. ज़मीन तो एक बार सरकार में पहुंचने के बाद कोई भी दल देखने से मुंह चुराने लगती है, और रही तारों-सितारों की बात, तो वह भी सिर्फ़ अमरीकी झंडे वाला देखती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विपक्ष भी ज़मीनी हक़ीक़त पहचानने की जगह, परमाणु करार के आगे-पीछे ही लुकाछिपी खेल रहा है. मुद्रास्फिति को चुनावी सिर पर चढ़ाने से बच रहा है, क्‍योंकि ऐसे राष्‍ट्रव्‍यापी मुद्दे के फटे में टांग फंसाने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि विपक्ष को फिर एक राष्‍ट्रव्‍यापी आंदोलन के फटे में टांग फंसाना पड़े. जबकि सच्‍चायी है विपक्ष किसी भी ऐसे फटे में नहीं उलझना चाहता जो उसे राजधानी से बाहर के फटेहाल दुनिया में भेजे. वह राजधानी में बैठे-बैठे, ताज्ज़ुब और हैरत चेहरों पर लाते-हटाते, मीडिया मीटिंग्‍स में मिनरल वॉटर की बोतलें सजाता-संभालता राष्‍ट्रव्‍यापी आंदालेन खड़ा करके राष्‍ट्रव्‍यापी (&lt;span style="font-style:italic;"&gt;या अमरीका सदृश पापी?&lt;/span&gt;) सरकार स्‍थापित कर लेना चाहता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले मुद्रास्फिति कहीं भी जाये, आपको पीछे से और मुझे गड्ढे की ओर दौड़ाये? &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ओह, आप समझ नहीं रहे, सरकार बचे या जाये, मुद्रास्फिति कहीं नहीं जानेवाली&lt;/span&gt;. महाराष्‍ट्र के कोल्‍हापुर में करवीर तालुका का &lt;a href="http://www.dnaindia.com/report.asp?newsid=1178035&amp;pageid=0" target="_blank"&gt;शेल्‍केवाडी चंद पागल किसानों का गांव होगा&lt;/a&gt; कि मुद्रास्फिति वहां दौड़ने की जगह अचकचाकर खड़ी हो गयी है, और गांव के अंदर नहीं, बाहर खड़ी है. अंदर गांववाले खड़े हैं, और आराम से खड़े हैं! अच्‍छा है सब शेल्‍केवाडी तक ही सीमित है, शेल्‍केवाडी समूचा मुल्‍क नहीं हुआ. क्‍योंकि सारा मुल्‍क शेल्‍केवाडी बन जाता तो इन द फर्स्‍ट प्‍लेस केंद्र में ऐसी सरकार नहीं होती, और किसी तरह हो गयी भी होती तो ऐसा बेहूदा प्रचार न करती कि ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;परमाणु करार होने दो, देशवासियों को चैन से सोने दो&lt;/span&gt;’. क्‍योंकि ऐसे मूर्खतापूर्ण झूठ का प्रचार करके जनसमर्थन नहीं, फिर जनविपुल चप्‍पल पाती!&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;br /&gt;शेल्‍केवाडी के बारे में पढ़कर पता नहीं क्‍यों मैं तैश में आ गया हूं, कृपया आप भी थोड़ा आने की कोशिश करें.&lt;/span&gt;</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_19.html" title="दिल्‍ली का अंत और शेल्‍केवाडियों के अनंत.. ?" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_19.html#comment-form" title="2 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/5642957051136055755/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/5642957051136055755" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/5642957051136055755" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-5337518552943506915</id><published>2008-07-16T14:52:00.005+05:30</published><updated>2008-07-16T17:27:14.395+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="देश" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमारा समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विकास" /><title type="text">आधी-अधूरी टिल्‍ली तस्‍वीर सामने मत लाइये.. साफ़ तस्‍वीर दिखाइये!</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SH3CJ_IpSEI/AAAAAAAACb4/X5aJmrg5nKw/s1600-h/turbine-installation.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SH3CJ_IpSEI/AAAAAAAACb4/X5aJmrg5nKw/s200/turbine-installation.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5223544619641948226" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नोट चांपने का&lt;/span&gt; सुनहला मौका ताड़ रहे सांसदों के गुंडा गिरोहों में तो सरकार गिरने-बचाने के कयासों की सनसनी है ही, जो सांसद हैं और न गुंडा (नोट तो नहीं ही चांपने जा रहे), वे भी इस कयास के पीछे हलकान हो रहे हैं. न्‍यूक्लियर डील का सवाल फ़ि‍लहाल डल हो गया है. डील कीचड़ में कमल या किस तरह का दलदल था, इसके अंकगणितीय फ़ार्मूले कुछ इधर-उधर सर्कुलेशन में भले रहे हों, सीधी, साफ़-सुथरी व्‍याख्‍या अख़बारों व अन्‍य सूचना माध्‍यमों में सामने लाने की ज़रूरत पहले भी नहीं समझी गयी थी, अब तो सरकार &lt;span style="font-style:italic;"&gt;ये गिरी&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-style:italic;"&gt;वो बची&lt;/span&gt; के खेल में वह यूं भी पृष्‍ठभूमि के परदों के पीछे रहस्‍यवादी प्रतिमा बनकर जा छिपी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाममोर्चा भी घिसा हुआ यही गाना गा रहा है कि क़रार &lt;span style="font-style:italic;"&gt;अमरीका के हाथों जाना होगा&lt;/span&gt;, इस जाना होगा के &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;डिटेल्‍स&lt;/span&gt; क्‍या हैं, और उसे जनता के बीच कैसे प्रचारित किया जाये इसमें वाममोर्चे की बहुत दिलचस्‍पी नहीं लगती. क़रार पर इतनी देर बाद जाकर समर्थन लिया है, कुछ महीनों पहले सरकार से समर्थन वापस लेकर महंगाई के सवाल पर कोई राष्‍ट्रीय आंदोलन खड़ा करने की पहलकदमी कर सकती थी, मगर तब पता नहीं वह किस शुभ घड़ी का इंतज़ार कर रही थी. थोड़ा अंदर घुसकर सोचना शुरू करें तो फिर यह भी दिखने लगता है कि वाममोर्चे के सारे आंदोलन मीडिया की बैठकों को बुलाकर अपने पक्ष की सफ़ाई देने भर की ही है, पिछले वर्षों में देश में आंदोलन व आंदोलनकारी जहां कहीं रहे हों, वे अच्‍छा-बुरा और जो कुछ भी रहे हों, वाममोर्चे की पहलकदमियों का नतीजा नहीं ही रहे हैं.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर, वाममोर्चे की रहस्‍यवादी डुगडुगी बजती रहे, मैं &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;न्‍यूक्लियर डील के डिटेल्‍स&lt;/span&gt; की कह रहा था. इससे देश को ठीक-ठीक &lt;span style="font-style:italic;"&gt;नुकसान&lt;/span&gt; क्‍या होगा, और नहीं होगा तो &lt;span style="font-style:italic;"&gt;इसके फ़ायदे क्‍या हैं&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-style:italic;"&gt;कब तक होंगे?&lt;/span&gt; &lt;span style="font-style:italic;"&gt;कोई इसके बारे में ठीक-ठीक बतायेगा, जानने की जगहें दिखायेगा?&lt;/span&gt; क्‍योंकि न जानने का दुष्‍परिणाम यह होगा कि अंट-संट की सुनी-सुनायी पर हम सुखी होते रहेंगे. कल एक परिचित ने कैज़ुअली हमें सूचित किया कि देश की ऊर्जा ज़रूरतों का मात्र 3% अभी न्‍यूक्लियर एनर्जी सप्‍लाइ कर रही है, अमरीका के साथ डील हो गया तो यह प्रतिशत- &lt;span style="font-style:italic;"&gt;अगले और उसके बाद या पांच साल में नहीं&lt;/span&gt;- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;2030 तक&lt;/span&gt; बढ़कर 6% हो जायेगा. चूंकि हम एनर्जी की फ़ील्‍ड के, या इस क्षेत्र में राष्‍ट्रीय डिमांड व सप्‍लाइ के एक्‍सपर्ट नहीं हैं, हम परिचित के कहे को पत्‍थर की लकीर मानकर मुंह बाये सुनते रहे, अपनी एक्‍सपर्टीज़ से ज़ि‍रह को आगे किसी दिशा में ले जाने में फालतू और फिजूल महसूसते कर क्‍या सकते थे, खलिया झुंझलियाते रहे.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/07/blog-post_15.html" target="_blank"&gt;न्‍यूक्लियर कचरे का एक बड़ा प्रश्‍न&lt;/a&gt; तो है ही, लेकिन उससे अलग भी, मैं इस क्षेत्र को न जाननेवालों की तरफ़ से एक जिज्ञासा सामने रख रहा हूं, कि भाई लोगो, दिल्‍ली के राजनीतिक आपका और हमारा उलूक पीटते हुए अपने स्‍वार्थों की जो भी डमरू बजाते हों, एनर्जी के फ़ील्‍ड में डिमांड और सप्‍लाइ की भारतीय वास्‍तविकता दरअसल है क्‍या? &lt;a href="http://www.rediff.com/millenni/bittu.htm" target="_blank"&gt;हम कहां स्‍टैंड करते हैं?&lt;/a&gt; न्‍यूक्लियर कचरे से अलग कहीं खड़े होने की हमारे लिए कोई जगह सचमुच है या नहीं? राज्‍यवार बिजली की मांग और भरपायी का बैलेंस शीट कैसा है? कि महाराष्‍ट्र में जैसा हाल में हुआ कि &lt;a href="http://www.outlookindia.com/pti_news.asp?id=586540" target="_blank"&gt;परिवहन और आदिवासी विकास मंत्री के घर पुलिस पहुंची तो आदिवासियों के विकास के लिए लगाये मंत्री को उनके और परिवहन दोनों के विनाश में लिप्‍त पाया गया&lt;/a&gt;, चलिये, धर्मारावबाबा अटराम को पुलिस पा गयी मगर &lt;a href="http://www.tehelka.com/story_main39.asp?filename=Ne190708the_ganga.asp" target="_blank"&gt;भगीरथी के मुहाने से लेकर हरिद्वार और देश के दूसरे हिस्‍सों में जो भीमकाय बांधों की परियोजनायें चलायमान हैं&lt;/a&gt;, प्रोजेक्‍टेड एक्‍सपेंस से कूद-कूदकर अनइमैजिनेबल एक्‍सपेंस में जातीं (और उतनी ही आसानी से फिर प्रोजेक्‍टेड पॉवर जेनरेशन की बहुत सारी जगहों पर लगभग आधा बिजली पैदा करतीं) इन परियोजनाओं की जवाबदेही कौन पुलिस लेगी? ले सकेगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SH3B0x1QsGI/AAAAAAAACbw/7aAa6JK5bHk/s1600-h/india_quake_tidal_1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SH3B0x1QsGI/AAAAAAAACbw/7aAa6JK5bHk/s200/india_quake_tidal_1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5223544255293730914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.tehelka.com/story_main39.asp?filename=hub190708in_the.asp" target="_blank"&gt;टिहरी दुनिया का आठवां सबसे ऊंचा बांध है&lt;/a&gt;. मार्च 2008 तक इस पर 8,298 करोड़ इस पर फुंक चुके थे, प्रस्‍तावित खर्चे से कहीं-कहीं ज्यादा. प्रस्‍तावित ऊर्जा उत्‍पादन बताया गया था 2,400 मेगावॉट, फ़ि‍लहाल पैदा कर रही है महज़ 1000 मेगावॉट. अभी थोड़े दिन पहले सतलज में कटाव की गंभीर स्थिति के मद्देनज़र वहां 1,500 मेगावॉट की क्षमतावाले नथपा झकरी हाइडल प्रोजेक्‍ट को अस्‍थायी तौर पर बंद करना पड़ा था. खुद अमरीका में 654 बांधों को हटाने का काम हुआ है, 58 हटाये जाने का इंतज़ार कर रही हैं. देश का एक सबसे बड़ा, कैनयन बांध 100 मिलियन डॉलर्स के बड़े खर्चे पर हटाया गया. भगीरथी के गिर्द भारी परियोजनाओं के बंधाव से स्थिति यह हो गयी है कि 2030 तक ज़्यादा संभावना है कि गंगा एक मौसमी नदी भर बनकर रह जायेगी, इस प्रश्‍न पर हमारी बुद्धि चलती है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाराष्‍ट्र के आदिवासी इलाकों का ही एक और क़ि‍स्‍सा है. पैंतीस वर्षीय एक सामान्‍य मास्‍टर, &lt;a href="http://www.dnaindia.com/report.asp?newsid=1164452" target="_blank"&gt;हेरंब कुलकर्णी&lt;/a&gt; ने सर्वशिक्षा अभियान के डेपुटेशन पर &lt;a href="http://www.tehelka.com/story_main39.asp?filename=cr190708an_abject.asp" target="_blank"&gt;आदिवासी क्षेत्रों में 200 स्‍कूलों का दौरा किया&lt;/a&gt;, जो देखा उसे 99 पृष्‍ठों की एक मराठी किताब में दर्ज़ कर दिया- &lt;span style="font-style:italic;"&gt;शाला हैं, शिक्षा नहीं&lt;/span&gt;. अब आलम यह है कि महाराष्‍ट्र में जगह-जगह प्रा‍थमिक शाला के शिक्षक किताब की होली जला रहे हैं, क्‍योंकि हेरंब ने प्राथमिक शिक्षा में मास्‍टरों को दारु पीकर कक्षा में बैठे देखा था, कक्षा के छात्र नहीं मास्‍टर तक 981 का 9 से भाग करने में लरबराकर 19 के नतीजे पर पहुंच रहे थे] कुलकर्णी ने यह सब अपनी किताब में लिख दिया तो मास्‍टर चिंहुकने लगे हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे न्‍यूक्लियर डील के बारे में सवाल कर देने पर बहुत सारे लोग चिंहुकने लगते हैं कि अंधेरे की गड़ही में पड़े रहना चाहते हैं, ससुर ये देश में कभी विकास होने नहीं देंगे! &lt;span style="font-style:italic;"&gt;सवाल है किसी अमूर्त राष्‍ट्रीय विकास के नाम पर हर कहीं स्‍थानीय जनजीवन का भट्टा बैठा रहे इस विकास की गरदन थामनेवाली कोई जवाब तलब करनेवाली एजेंसी होगी या नहीं होगी?&lt;/span&gt; बात विकास के समर्थन व विरोध की नहीं, उस विकासरूपी कैलेंडर के डिटेल्‍स को ठीक-ठीक समझने की है, मुझे समझ नहीं आ रही, आपके आ रही हो तो कृपया हमसे अज्ञानियों की दिशा में भी थोड़ा ज्ञानदान करें?</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_16.html" title="आधी-अधूरी टिल्‍ली तस्‍वीर सामने मत लाइये.. साफ़ तस्‍वीर दिखाइये!" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_16.html#comment-form" title="3 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/5337518552943506915/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/5337518552943506915" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/5337518552943506915" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-1249461559499055511</id><published>2008-07-16T02:59:00.009+05:30</published><updated>2008-07-16T17:28:36.364+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पतनशील साहित्‍य" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मन की गांठ" /><title type="text">25,200 दिन ओन्‍ली? व्‍हाट् नॉनसेंस..</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SH0YBB4h_EI/AAAAAAAACbo/42Q1KFzV-zo/s1600-h/solon.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SH0YBB4h_EI/AAAAAAAACbo/42Q1KFzV-zo/s200/solon.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5223357548784122946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;छठवीं सदी&lt;/span&gt; ईसा पूर्व कभी एथेंस के कवि &lt;a href="http://encyclopedia.jrank.org/SIV_SOU/SOLON_7th_and_6th_century_nc_.html" target="_blank"&gt;सोलोन&lt;/a&gt; ने कहा था कि मान लिया आदमी की औसत उम्र सत्‍तर साल होती है (ओह, भाग्‍यवान थे एथेंस निवासी कि ईसा पूर्व छठवीं सदी में आदमी को सत्‍तर साल दे सकते थे, वर्ना तो अपने यहां अयोध्‍या, मगध, कौशल, यहां तक कि बहुत बाद-बाद के दिल्‍ली तक के शासनकालों में- औरत का तो ज़ि‍क्र न ही करें- आदमी को ले-देकर कितने वर्ष दे रहे थे? अभी कुछ सदियों पहले यूरोप तक में लोग पट्- पट् करके इस दुनियावी मंच से विदा लेते थे. पता नहीं खुशी-खुशी लेते थे, या जीवन भर रोते रहने के बाद जाते भी रोते-रोते ही थे? औरतों के मज़े का तो कहना ही क्‍या; प्‍लेग, हैजा, बाढ़, भूकंप से किसी तरह बच भी गयीं तो जचगी में पुन: ईश्‍वर की प्‍यारी हो सकें, इसका सुअवसर बचा ही रहता था).. देखिए, सत्‍तर की रोमांचक संख्‍या सुनकर मैं आरंभ में ही भटक गया. एथेंस निवासी ईसा पूर्व छठवीं सदी में भाग्‍यवान थे, अब पता नहीं उनके भाग्‍य का सूचकांक क्‍या है, मगर हम तो प्री और पोस्‍ट अयोध्‍या सभी कालों में कमर पर ज़रा सा कपड़ा डाले झोपड़े के बाहर गाय की दूध की चिंता में दुबले होते रहे हैं, या पड़ोस के गांव से गाय चुराने के ख़्याल से खामख़्वाह रोमांचित होकर असमय बीमार होते रहे हैं, तो हमारे दुर्भाग्‍य का क्‍या, जबसे सृष्टि में हमारा आविर्भाव हुआ है, घास और गुदड़ी की संगत में हम चिरंतन के अभागों के लिए उम्र के &lt;span style="font-style:italic;"&gt;सत्‍तर क्‍या और सात क्‍या?&lt;/span&gt;.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर मोर्टेलिटी के प्रति मेरी ऐसी निष्‍ठुर निस्‍पृहता संभवत: स्‍वस्‍थ्‍य लक्षण नहीं. &lt;span style="font-style:italic;"&gt;कुत्‍ते का जीवन व्‍यर्थ है क्‍योंकि उसकी मात्रा बड़ी नहीं? और हाथी की ज़्यादा है इसलिए कि उसकी उम्र लंबी है?&lt;/span&gt; मगर सोचकर ईमानदारी से बताइये, लंबी उम्र लेकर हाथी ने आखिर उखाड़ क्‍या लिया? दुनिया में आज आपको लंबी उम्र वाले हाथी ज़्यादा दीखते हैं, या श्‍वानउम्री कुत्‍ते? हद है लेकिन. लोग उम्र सहेज-सहेजकर रखते हैं, मगर मैं अपनी बहक सहेज नहीं पाता. एथेंस के कवि सोलोन के बारे में कह रहा था (सोचिये तो छठवीं सदी ईसा पूर्व यूनानी कवि क्‍या-क्‍या उल्‍टा-सीधा सोच लेता था, जबकि अपने यहां इक्‍कीसवीं सदी के पूवार्द्ध में भी, बिना कवि हुए तक हम कुछ सीधा कहां सोच पाते हैं?).. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर, सोलोन ने जो बहुत सारी उल्‍टी-सीधी बातें कहीं, उसमें अपने ज़माने के अमीर बादशाह, एशियायी लिदिया मुल्‍क के क्रोयसस की हेकड़ी यह कहकर खत्‍म करने की भी थी कि हे राजन, अपनी अमीरी पर अन्‍यथा गुमान न कर. क्‍योंकि मान लिया जाये आदमी की औसत उम्र सत्‍तर साल है, तो इसमें 25,200 दिन हुए, अब सवाल उठता है एटसेट्रा, एटसेट्रा.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन नहीं, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एक मिनट, सोलोन साहब&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-style:italic;"&gt;यू जस्‍ट सेड समथिंग प्रिटी शॉकिंग, सर?&lt;/span&gt; 25,200 दिन इन अ लाईफ़? &lt;span style="font-style:italic;"&gt;दैट्स इट? &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दैट्स गौडेम इट?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; इस संख्‍या को देखते ही मैं जकड़ गया हूं और तब से हिसाब लगाता बैठा हूं कि इसमें कितने दिन रेल की लेट-लतीफी के पीछे, कितना एमटीएनएल, बीएसएनएल और पता नहीं किन-किन &lt;span style="font-style:italic;"&gt;एलों&lt;/span&gt; के पीछे होम हुआ; चिट्ठि‍यां लिखने और चिट्ठि‍यों को पढ़कर रो-रोकर मन दीवाना कर लेने के कितने दिन रहे? रूठकर खाना छोड़ देने के? अख़बारों के बेमतलब के सप्‍लीमेंट और टेलीविज़न की चिरकुटइयों के पीछे जो खराब हुआ उसकी तो जितना न सोचा जाये उतना अच्‍छा. पहाड़ों की यात्रा के कितने दिन रहे? प्राचीन सभ्‍यताओं के रस-संचार की तह तक पहुंच लेने, या आधुनिक भावबोध की हवा से छाती भर लेने के? किसी झील के किनारे आंखें मूंदे लेटे रहने के? कितने सारे झगड़ों के, संगतों से पैर पटककर बाहर निकलने के रहे हैं, पैर सटाकर दिल जोड़ने के कितने रहे हैं? अपनी बातों से किसी छोटे बच्‍चे को खुशी में पागल करने के? समाज और कला के? कितने दिन? उंगलियों पर गिनकर चट खत्‍म हो जायें, &lt;span style="font-style:italic;"&gt;बस उतने?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं जानकर आपको बेचैनी हो रही है या नहीं, मैं हाथ में जलती सिगरेट लिए अचानक एकदम असहज महसूस कर रहा हूं. एक जीवन में, मेरे ख़्याल से, 25,200 क्‍या है, बहुत कम हैं. वह अ से लेकर ज्ञ तक की ठीक-ठीक यात्रा करने भर को भी काफी है, हो सकेगी? ओह, सिन्‍योर सोलोन, सडेनली नंबर्स सीम टू मेक सच ए फ़ार्स ऑव लाइफ, डोंट यू थिंक?</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/25200.html" title="25,200 दिन ओन्‍ली? व्‍हाट् नॉनसेंस.." /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/25200.html#comment-form" title="3 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/1249461559499055511/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/1249461559499055511" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/1249461559499055511" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-1816654712620026625</id><published>2008-07-15T09:11:00.002+05:30</published><updated>2008-07-15T09:19:05.639+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आधुनिक लोककथा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमारा समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जुसेप्‍पे से जिरह" /><title type="text">सब इतनी देर से क्‍यों समझ आता है?..</title><content type="html">&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अपने साथ&lt;/span&gt; मेरे लिये किताबों का बंडल लाये हो, मेरी आत्‍मा की भूख का तुम्‍हें स्‍मरण रहा, बहुत-बहुत शुक्रिया मित्र, मैं तुमसे झगड़ा करना नहीं चाहता! एक तुम्‍हीं तो हो जिसके आगे अब भी बिना लुकाव-छिकाव के मन की गांठें रख देता हूं. तुम्‍हारी राय जानने को तुम्‍हारी राह अगोरता हूं, तुमसे झगड़ा क्‍यों करूंगा, जुसेप्‍पे? कर सकता हूं? तुम्‍हारे स्‍नेह के पुल को जलाने के बाद फिर अपने पास बचेगा क्‍या. भारतीय मध्‍यवर्ग के गजर-मजर शहराती विकास के बीच किसी भी दिन उजड़ जानेवाले आदिवासियों का गांव नहीं हो जाऊंगा? मेरे लिए तुम्‍हारा स्‍नेह रोज़ पंद्रह मिनट आनेवाले पानी की तरह कीमती है, जुसेप्‍पे, मैं उन पंद्रह मिनटों का सूखना गवारा नहीं कर सकता, फ्रेंड! खुद के ऊपर मेरी डिपेंडेंसी की एक-एक परत तुम जानते हो, दोस्‍त, इसीलिए आग्रह कर रहा हूं मेरे बारे में फ़ैसले सुनाकर मुझे प्रोवोक मत करो. वैसे ही देखते हो जीवन कितना एज पर है, तुम्‍हारी तल्‍ख़ि‍यों से छिनककर हमारे बीच सब आग और धुआं हो जायेगा, मैं और-और अकेला हो जाऊंगा, तुम सुखी होगे? जानता हूं नहीं होगे, शायद मुझ सा बदहाल न होगे, लेकिन अकेले तो तुम भी होगे, जुसेप्‍पे, नहीं होगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्‍हारा ज़ि‍क्र आते ही तमारा कैसे खुशी में नहाने लगती थी, याद है तुम्‍हें? एक्‍सप्रेस रेल की तरह फिर उसका जुसेप्‍पे पुराण की रसवर्षा शुरू हो जाती थी. मैं बरजकर बेवक़ूफ़ को चुप कराता था कि मेरे ही आगे मेरे दोस्‍त का मीठा घोल रही हो? उस बदमाश की नस-नस जानता हूं, इतना प्रेम में मत पड़ो कि बाद में तक़लीफ़ होने लगे. फिर वही तो हुआ न? हमेशा बोलती रहनेवाली तमारा एकदम से चुप हो गई. इतना ज़्यादा-ज़्यादा प्रेम करने का यही परिणाम होता है, मित्र, कि व्‍यक्ति फिर उतनी ही मात्रा में तक़लीफ़ बर्दाश्‍त करे? मैंने तभी बेवक़ूफ़ से कहा था इस तरह खुशी में पागल मत बनो, जुसेप्‍पे को जुसेप्‍पे ही रहने दो, येव मोंतां और एलेन देलों मत बनाओ. लेकिन तब मेरी बात सुनने की तमारा को फ़ुरसत कहां थी, घड़ी भर के लिए चुप होकर मुझे हैरत से देखती थी, फिर चेहरे पर हाथ धरकर बच्‍चों सी हंसती रहती थी. अब क्‍यों नहीं हंसती? कहां चली गयी सारी हंसी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आई अम सॉरी, जुसेप्‍पे. आई डिडिंट मीन टू हर्ट यू. ऑर पास जजमेंट ऑन तमारा, एज़ इफ़ हर इन्‍नोसेंस एंड नाइविटी सर्व्‍ड हर गुड, आई डोंट नो वेदर शी लर्टं एनी लेसन, बट पेड द प्राइस डियरली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय रहते हमें चीज़ें अपने वास्‍तविक शक्‍ल में क्‍यों नहीं दिखतीं, दोस्‍त? हमेशा उनके गुज़र जाने के बाद ही हमारी उनके बारे में समझ और पहचान क्‍यों बनती है? मैं सिर्फ़ तमारा के दुख की बात नहीं कर रहा, तुम अपनी ही देखो? इतने लंबे समय तक फ़ेल्‍त्रीनेल्‍ली से तुम्‍हारे जुड़े रहने का क्‍या तुक था? आतों चाहता था तुम उसके साथ सिसली में रहकर बच्‍चों की किताबों की एक सीरिज़ निकालो, मिलान और उसकी अवास्‍तविक दुनिया से बाहर निकल लेने का कितना अच्‍छा मौका था, लेकिन तुम सिसली नहीं गये, मेरे नहीं पूछने पर भी बताते रहते थे कि आतों सेंटिमेंटल और इन्‍ट्यूटिव है! लेकिन सिसली नहीं जाने की, तुम भी जानते हो, वजह आतों का सेंटिमेंटल और इन्‍ट्यूटिव होना नहीं था, वह सेंटिमेंटल और इन्‍ट्यूटिव था इसीलिए तो उस पागल बुड्ढे पर तुम इतना जान छिड़कते थे! तुम सिसली इसलिए नहीं गये क्‍योंकि तुम्‍हें लगता था फ़ल्‍त्रीनेल्‍ली तुम्‍हें एक लाईन ऑव न्‍यू अमेरिकन राइटर्स कंपाइल करने न्‍यूयॉर्क भेजेगी, तुम्‍हारे मध्‍यवर्गीय आकांक्षाओं में उस बेचारे आतों के सपने होम हुए! और बुड्ढे ने कभी इसका तुम्‍हें दोष भी नहीं दिया. तुम न्‍यूयॉर्क में थे तब तुम्‍हें कार्ड भेजता रहा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि अंदर-अंदर तुम्‍हें सिसली ट्राई नहीं करने की बाद में कितनी तक़लीफ़ हुई थी! हमारी तरह के अभागों को हमेशा होती है. लेकिन वक़्त रहते नहीं होती! व्‍हाई डज़ इट हैपेन लाइक दिस, जुसेप्‍पे, यू आनसर मी?..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-style: italic;"&gt;(जारी)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_15.html" title="सब इतनी देर से क्‍यों समझ आता है?.." /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_15.html#comment-form" title="3 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/1816654712620026625/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/1816654712620026625" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/1816654712620026625" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-3608714639935612615</id><published>2008-07-14T10:21:00.004+05:30</published><updated>2008-07-14T10:34:50.066+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आधुनिक लोककथा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सुख" /><title type="text">कटहल का सुख.. या सुख के कटहल</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SHrbpVbFGCI/AAAAAAAACbg/NI0rmonKhB4/s1600-h/kathal.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SHrbpVbFGCI/AAAAAAAACbg/NI0rmonKhB4/s200/kathal.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5222728221061355554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्‍या मतलब है&lt;/span&gt; इस तरह के सवाल का कि रुपेश प्रसाद खुश रहते हैं या नहीं रहते, या उनके जीवन में सुख के अवसर आते हैं? कितना, और कब-कब आते हैं? इस तरह की बेहूदी बात सुनकर रुपेश प्रसाद को झुंझलाहट होती है, लगता है सवाल पूछनेवाला फालतू और बेवक़ूफ़ है, बैठे-बिठाये साले को मस्‍ती चढ़ रही है. या हरमख़ोर उन्‍हें किसी जाल में उलझाने की कोशिश कर रहा है? और अपनी बात साफ़-साफ़ रखने में वह सावधान न रहे तो फंस जायेंगे. खामख़ा गले में एक नयी फांस पड़ेगी, डाक्‍टर के यहां फिर से दवाई-टेबलट की टहल करनी होगी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीधी बात है रुपेश प्रसाद खुश कैसे नहीं रहते, बहुत खुश रहते हैं. और सुख के अवसर का क्‍या है, रोज़ ही आती रहती है स्‍साली! अभी परसों ही तो कितना सुखी हुए थे. नहीं, लेकिन &lt;span style="font-style:italic;"&gt;परसों हुए थे&lt;/span&gt;? परसों ही तो पप्‍पू दीवार फांदकर मलयालन के कटहल के पेड़ पर कटहल चुराने चढ़ा था और उस बदशकल औरत की आंख खुल गयी थी और बदकार आंगन में आके जोर-जोर से हल्‍ला करने लगी थी, और पप्‍पू पता नहीं 302 का दफा हो जायेगा या पुलिस जाने जेहल में डालकर कितनी बड़ी सज़ा दे देगी, बिना दायें-बायें देखे, पता नहीं कितने ऊपर चढ़ा था हरामी, धम्‍म से नीचे कूदा, और मलयालन वहीं तीन हाथ की दूरी पर हूक रही थी, लौंडा पत्‍ते की तरह कांप रहा था, मगर उठकर फिर भागा नहीं. फूट-फूटकर रोने लगा. शायद भाग नहीं सकता था उसके दुख में रो रहा था. उसका रोना शुरू करते ही मलयालन चुप हो गई, पता नहीं मलयाली में क्‍या गिट-बिट बोलती अंदर से एक पका हुआ कटहल उठाकर लायी और पप्‍पू के बगल में रखकर देखने लगी कि चुप होकर अब कटहल उठाता है या नहीं. लेकिन पप्‍पू चुप होने की जगह और जोर-जोर से रोने लगा. साहू के मकान पर कुछ छत्तिसगढ़ि‍या लेबर काम रहे थे, उसमें से दो लोगों ने सहारा देकर खड़ा करने की कोशिश की तब जाकर साफ़ हुआ लौंडे की हड्डी टूट गई थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़ि‍स्‍सा याद आते ही रुपेश प्रसाद को एक बार फिर अपने बेवक़ूफ़ साले पर गुस्‍सा आया. डाक्‍टर के यहां पलस्‍तर-सलस्‍तर पर जो खरचा हुआ सो अलग, कंचन के घर में सब यही समझेंगे कि पाहुन बच्‍चा को पड़ोस में भेज-भेजके चोरी करवा रहे थे! जबकि पप्‍पू से छोटे की उमर में भी रुपेश प्रसाद के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ कि वो किसी पेड़ पर कटहल चुराने चढ़े हों और धरा गये हों. और ऐसा भी नहीं कि कहीं साला बजका के लिए कोंहड़े का फूल तोड़ने गया था! कटहल के फेर में पड़ा जिसे न वह खाते हैं, न कंचन हाथ लगाती है, और बबुनी तो कटहल देखकर रोने लगती है. फिर किस बास्‍ते हरामी आठ किलो के कटहल के फेर में पड़ा था? सिर्फ़ इसलिए कि आठ किलो की चीज़ मुफ़्त में हाथ आयेगी?.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं, परसों खुश नहीं थे रुपेश प्रसाद. परसों क्‍या कल तक हाथ में खुजली हो रही थी कि गर्दन पकड़कर चार लप्‍पड़ लगायें लौंडे को. कंचन का रोना-धोना देखकर चुपाये रहे. लेकिन बबुनी पता नहीं क्‍या देखकर उछल-उछलकर हंस रही थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर परसों नहीं हुए थे तो आखिरी मर्तबा कब खुश हुए थे रुपेश प्रसाद? पिछले इतवार पापाजी ने कहा था पंद्रह-बीस दिन के लिए आकर उसके यहां ठहरेंगे, तब हुए थे? मगर उनके आने पर रुपेश प्रसाद को खुशी होती है, खुद पापाजी कहां होते हैं. पंद्रह दिन के लिए कहकर आते हैं, छह दिन नहीं निकलता, गांव वापसी के लिए छटपटाने लगते हैं. वहां क्‍या है, यहां सब सुविधा-सहूलियत है लेकिन पापाजी ज़ि‍द पर अड़े रहते हैं कि नहीं, गांव में अकाज होगा. रुपेश प्रसाद को पहले मालूम नहीं था, रात में कंचन ने बताया तब जाने कि पापाजी टट्टी में दरवाज़ा खोलकर बैठते हैं. दरवाज़ा बंद करने से बोलते हैं अंदर घबराहट होती है. अच्‍छी मुसीबत है. जितने दिन यहां रहते हैं कंचन भी घबरायी सोनेवाले कमरे से बाहर नहीं आती. रसोई में भी पल्‍लू खींचकर ऐसे जाती है जैसे बबुनी के लिए दूध की चोरी करने गयी हो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन में यह सब उल्‍टा-सीधा तो चलता ही रहता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रुपेश प्रसाद खुश नहीं, या उनके जीवन में सुख के अवसरों की कमी है. अभी कल ही की तो बात है (लेकिन कल बैंक कहां गये थे? ख़ैर, जब भी गये थे), कि काउंटर के आगे लंबी लाईन में अपना कागज़-पत्‍तर जांचते वह ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;ओ, नील गगन के तले&lt;/span&gt;’ गुनगुनाने लगे थे. आजू-बाजू चार लोगों ने उनको घूरकर देखा भी था, मगर रुपेश प्रसाद, लापरवाह, अपने सुख में सुखी गुनगुनाते रहे थे. बैंक में उनका पेपर रिजेक्‍ट हो गया था, और अपने प्रति भेदभाव की बात सोचकर रुपेश प्रसाद को बहुत गुस्‍सा आया था, लेकिन शाम को दोस्‍त की फैक्‍टरी से एक दूसरा काम निकलवा कर घर लौटे तो कंचन उत्‍साह से उनको आंगन लिवाकर गयी, दीवार पर बांस से चढ़ायी लता में सेम की ताज़ा-ताज़ा निकली फलियां दिखायीं तो पत्‍नी के साथ-साथ रुपेश प्रसाद भी एकदम से मुस्‍कराकर खुशियाने लगे थे, बबुनी भी उनकी गोद में हाथ बजा-बजाकर चहकती रही थी! ओह, ऐसा नहीं कि जीवन में सुख के अवसर नहीं आते, रोज़-रोज़ आते हैं.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, फिर भी, सवाल रहता ही है, कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आप खुश रहते हैं, या नहीं?&lt;/span&gt; या आपके जीवन में सुख का अवसर कब, कितना आता है?..</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_14.html" title="कटहल का सुख.. या सुख के कटहल" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_14.html#comment-form" title="6 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/3608714639935612615/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/3608714639935612615" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/3608714639935612615" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-7099692473411485480</id><published>2008-07-12T13:57:00.004+05:30</published><updated>2008-07-12T14:37:04.924+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सिनेमा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वीडियो क्लिपिंग्‍स" /><title type="text">खुशी के इंतज़ार का गाना..</title><content type="html">&lt;p style="FLOAT: left; 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&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;strong&gt;माली&lt;/strong&gt; बड़ा देश नहीं, अलबत्‍ता &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Music_of_Mali" target="_blank"&gt;वहां का संगीत&lt;/a&gt; बड़ा है. छोटे से उस अफ्रीकी देश में बड़े-बड़े संगीतक तोपची हैं. माली के संगीत से अपना थोड़ा-बहुत परिचय रहा है, मगर यह नहीं मालूम था कि वहां सिनेमा भी रसवर्षा करती रही है, और बहुत मिठास में डूबी, डुबा-डुबा कर करती रही है, &lt;a href="http://www.africanfilmny.org/network/news/Isissako.html" target="_blank"&gt;अब्‍देरर्हमान सिस्‍सको&lt;/a&gt; उस छोटे सिनेमा के एक बड़े हस्‍ताक्षर हैं, हालांकि फ़ि‍ल्‍में उन्‍होंने संजय लीला भंसाली और अशुतोष गावरीकर की तरह बड़ी नहीं, निहायती छोटी बनायी हैं, मगर ओह, कैसी तो मीठी बनायी हैं. उन पर कभी &lt;a href="http://cilema.blogspot.com/" target="_blank"&gt;सलीमा&lt;/a&gt; में तसल्‍ली और विस्‍तार से बात करेंगे, फ़ि‍लहाल यहां उनकी फ़ि‍ल्‍म '&lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0308363/" target="_blank"&gt;वेटिंग फ़ॉर हैप्‍पीनेस&lt;/a&gt;' की एक छोटी-सी क्लिपिंग देखिए.</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_8799.html" title="खुशी के इंतज़ार का गाना.." /><link rel="enclosure" type="video/mp4" href="http://www.blogger.com/video-play.mp4?contentId=2636aae85d83993f&amp;type=video%2Fmp4" length="0" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_8799.html#comment-form" title="5 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/7099692473411485480/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/7099692473411485480" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/7099692473411485480" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-6259837520067866052</id><published>2008-07-12T09:59:00.004+05:30</published><updated>2008-07-12T10:28:43.784+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पतनशील साहित्‍य" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="एक पतित पति के नोट्स" /><title type="text">रसोई में खड़ा भारतीय आदमी.. संभव है? सही?</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp1.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SHg5yuC1DqI/AAAAAAAACbY/Uq98TiDJrE4/s1600-h/rasoi+craft.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SHg5yuC1DqI/AAAAAAAACbY/Uq98TiDJrE4/s200/rasoi+craft.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5221987311452229282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;स्‍टेटमेंट&lt;/span&gt; स्थितियों को स्‍ट्रेटेन आऊट करनेवाले कमेंट हो सकते हैं, मगर ज़रूरी नहीं स्थितियों की वस्‍तुगत समीक्षा करते हों, और यह तो कतई ज़रूरी नहीं कि स्‍ट्रेट भी हों! माने इस कथन में वक्रता की आपको दुबास नहीं आती? भारतीय आदमी? &lt;span style="font-style:italic;"&gt;खड़ा?&lt;/span&gt; संभव है? &lt;span style="font-style:italic;"&gt;वह भी रसोई में?&lt;/span&gt; माने दुनिया कहां से कहां जा रही है (हमेशा कहीं न कहीं जाती रही है), और भारतीय आदमी गिरा हुआ है यह बात समझ आती है, मगर खड़ा है? बच्‍चों की मासूमियत की छाती पर अपने घोर स्‍वार्थों की व्‍यावहारिकता में, या बीवी की बराबरी की भोली, ज़रूरतमंद आकांक्षाओं को लात लगाता, साहब की जी-हुज़ूरी बजाता, रोज़ आदमी होने के स्‍केल पर थोड़ा और नीचे जाता पड़ा है वहां तक भी अपनी वस्‍तुस्थिति में कथन कढ़ी हुई लगती है, मगर उसे रसोई में खड़ा करने की बात करते ही लगता है हम आदमी को उसके पैरों पर नहीं, भारतीय हक़ीक़त को सिर के बल खड़ा कर रहे हैं. पहले जहां कहीं भी रहे हों, ऐसा कहते ही एक भारी रुमानियत में उतर रहे हैं.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतत: सवाल उठता ही है कि रसोई (भारतीय) में कितनी जगह होगी, और जितनी भी होगी, आदमी उस रसोई में पिसती औरत के हाल पर हंसने से अलग आखिर क्‍या करने वहां जायेगा? ठीक है, माना, ऐसे क्षण भी होंगे जब औरत पिस नहीं रही होगी, न पीस रही होगी, और आदमी बच्‍चों पर अपनी हिंसा और साहब की जी-हुज़ूरी से सुभीते और फ़ुरसत में होगा.. एक आंतरिक सहजता में, अपनी आत्‍मा में भी मलिन-मलेच्‍छ नहीं, सरल मनुष्‍य होगा, तब भी अंतत: वह रसोई का करेगा क्‍या? या रसोई उसका? क्‍या वह दोनों आपस में नितांत अपरिचित नहीं बने रहेंगे? &lt;span style="font-style:italic;"&gt;मुसलमान मित्र होने का मतलब यह होता है कि कश्‍मीर के संबंध में मित्र के संग हमारी समझ का अपरिचय खत्‍म हो जाये?&lt;/span&gt;.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं, आप ज़रा कल्‍पना कीजिये भारतीय आदमी रसोई में खड़ा है. सामने शेल्‍फ़ में गिलासों की पंक्ति है, खड़ी दीख रही है. लेकिन दारू का कोई बोतल आसपास खड़ा, या पड़ा किसी भी शक्‍ल में नहीं दिख रहा. ऐसी सूरत में रसोई में आदमी गिलासों पर अपनी लाचारी के अक़्स को निरखता खड़ा रहेगा भी तो कितनी देर रहेगा? उसके बाद फ्रिज़ में अपनी गिरी हुई अर्थव्‍यवस्‍था की अनर्थता का एक सरसरी मुआयना करेगा? लेकिन फिर, उसके अनंतर? वह सिंक में गिरे बर्तनों की ओर तो नहीं ही जायेगा. न इलायची और दालचीनी की पतली शीशियों के पीछे छिपाकर, दबाकर रखी पत्‍नी की पुरानी चिट्ठि‍यों की ओर. जायेगा? नहीं, इतने वर्षों के व्‍याहोपरांत पत्‍नी पर चीखने का उसमें सहज आत्‍मविश्‍वास आ गया हो, मगर उसके अंतर्तम में झांकने, व उसका भरोसामंद होने का कहां आया है? मैं यूं ही नहीं कह रहा, आप किसी भी कोण से भारतीय आदमी को रसोई में खड़ा करने की कोशिश कीजिये, आदमी तो आपके हाथ नहीं ही आयेगा, &lt;a href="http://shabdavali.blogspot.com" target="_blank"&gt;मिस्‍टर वडनेरकर&lt;/a&gt; से आप &lt;span style="font-style:italic;"&gt;भैंस क्‍या जाने अदरक का स्‍वाद&lt;/span&gt; जैसे मुहावरे का अर्थ पूछते हुए स्‍वयं को किसी कठघरे में खड़ा ज़रूर पायेंगे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अंत में फिर साफ़ कर देना चाहता हूं कि पहली बात तो बदलती हुई दुनिया में भारतीय आदमी कहीं खड़ा है इस कथन में सफ़ेद झूठ न सही, धूसर झूठ तो काफी मात्रा में उपस्थि‍त है. रही बात उसके रसोई में खड़ा होने की, तो रसोई उस पर खड़ी भले हो, उसके रसोई में खड़ा होने की बात बेमानी है. इस तरह की ऊल-जुलूल खामख़्याली भी चंद बहकी हुई भारतीय औरतों की सनक समझी जाये, भारतीय आदमी की संभावित वास्‍तविकता तो किसी भी सूरत में नहीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रसोई में खड़े भारतीय आदमी का स्‍टेटमेंट झूठ है. &lt;/span&gt;</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_12.html" title="रसोई में खड़ा भारतीय आदमी.. संभव है? सही?" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_12.html#comment-form" title="3 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/6259837520067866052/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/6259837520067866052" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/6259837520067866052" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-1899949922651136366</id><published>2008-07-11T10:28:00.006+05:30</published><updated>2008-07-11T11:14:56.241+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="इतिहास" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आधुनिक लोककथा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमारा समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जुसेप्‍पे से जिरह" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="michael d yates" /><title type="text">लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ: दो</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SHbq3M3oFmI/AAAAAAAACaY/650cQyFtX2A/s1600-h/capitalism-bound.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SHbq3M3oFmI/AAAAAAAACaY/650cQyFtX2A/s200/capitalism-bound.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5221619052050912866" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अनुभूति हुई&lt;/span&gt; मानो सामने दीवार पर कोई ताओ पेंटिंग देख रहा हूं. सुदूर के लैंडस्‍केप की एक दबी हुई पेस्‍टल झांकी. गौर से देखने पर कोहरे के धुंधलके के पार बमुश्किल नज़र आता पहाड़ि‍यों के घुमाव हैं, पता नहीं किस तो जंगली वृक्ष के छोटे-छोटे जंगली फल हैं, और सबसे आगे बांस की एक झाड़ का नाज़ुक, महीन चमकता हरा पत्‍ता. फिर लगा नहीं, ताओ चित्र नहीं, अट्ठारह-बीस वर्ष पहले जंगल में पिकनिक मनाने गये दांत निपोरे दोस्‍तों की एक सामुहिक फ़ोटो है, दायीं ओर सामने चमकते चेहरे वाला पेनांग जो एक गुरिल्‍ला रेडियो नेटवर्क पर सरकार-विरोधी सामग्री पेश करने के एवज में चार वर्षों के जेल की सज़ा पाये था, अब अपने काऊंटी में नई आर्थिक नीतियों के क्रियान्‍वयन में सरकारी सलाहकार की नौकरी बजा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- यार, ये कहां का रोना-गाना लेकर तुम बैठ गये? क्‍या करना है मुझे मौर्यों की स्‍टेट पॉलिसी और इनकम डिसपैरिटी से.. तुम अपनी सुनाओ! बच्चियों के बारे में बताओ, तमारा.. तमारा कैसी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- सुखी है. मैं सुखी हूं, बच्चियां सुखी हैं, बच्चियों की मां सुखी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- व्‍हाट डू यू मीन सुखी है? पिछली बार फ़ोन पर तुम्‍हारे हाल-चाल की बाबत पूछा था तो एकदम से चुप हो गई थी, आफ्टर गल्पिंग सम एंगर डाऊन, द ओन्‍ली लाईन शी वुड मैनेज वॉज़ दैट शी डिडिंट वॉन्‍ट टू टॉक अबाऊट यू!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- &lt;span style="font-style:italic;"&gt;सो?&lt;/span&gt; परहैप्‍स दैट्स व्‍हाट शी वॉन्‍ट्स टू डू, नॉट टॉक अबाऊट मी. इफ दैट कीप्‍स हर हैप्‍पी, आई अम हैप्‍पी फॉर हर. मौर्यंस की इनकम डिसपैरिटी की बात नहीं सुनकर तुम सुखी रहते हो तो इट्स फाईन विद् मी, मैं पलटकर तुमसे सवाल नहीं करूंगा कि व्‍हॉट डू यू मीन कहां का रोना-गाना लेकर बैठ गये. यू रिमेम्‍बर देयर वॉज़ दिस लाईन बाई &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गेटे&lt;/span&gt; दैट यू हैड पुट ऑन इन अ फ़्रेम बिसाइड युअर बुक्‍स- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ही हू कैन नॉट ड्रॉ ऑन थ्री थाउजैंड ईयर्स इस लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ&lt;/span&gt;?.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे गुस्‍सा आया. किसलिए आया था बदमाश, मेरा मज़ाक उड़ाने? क्या कहता उससे? कि नो, नो, आई रिमेम्‍बर गेटे? लेकिन वह सच्‍चायी होती? सच्‍चायी यही नहीं थी कि आई वॉज लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ? मैं ही क्‍यों, आसपास हर कोई वही नहीं कर रहा था? पूरा देश वही नहीं कर रहा था, &lt;span style="font-style:italic;"&gt;लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ?&lt;/span&gt; एक डिपेंडेंट इकॉनमी, ताक़तवर मुल्‍कों के डिक्‍टेट पर चलनेवाली इकॉनमी के पास क्‍या होता है- उसका चिथड़ा वर्तमान, और भविष्‍य के रुमानी झूठ होते हैं, इतिहास-बोध कहां होता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;Do we remember anything other than the neo-liberal dictates of &lt;a href="http://www.alternet.org/story/75645/" target="_blank"&gt;Thomas Friedman&lt;/a&gt;? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“…a country must either adopt, or be seen as moving forward, the following golden rules: making the private sector the primary engine of its economic growth, maintaining a low rate of inflation and price stability, shrinking the size of its state bureaucracy, maintaining as close to a balanced budget as possible, if not a surplus, eliminating and lowering tariffs on imported goods, removing restriction on foreign investments, getting rid of quotas and domestic monopolies, increasing exports, privatizing state-owned industries and utilities, deregulating capital markets, making its currency convertible, opening its industries, stock and bond markets to direct foreign ownership and investments…”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस डिक्‍टेट से यंत्रबिद्ध, मंत्रमुग्‍ध बंधे-बंधे समूचे मुल्‍क को उसके पीछे भेड़-बकरी की तरह हांकने से अलग हमारी सरकार को कुछ दीखता है? इस अर्थव्‍यवस्‍था में बाज़ार है, व्‍यक्ति है, वही इसको चलानेवाले सर्वेसर्वा हैं, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;समाज नहीं है&lt;/span&gt;. ढकोसले और झूठ के प्रपंच हैं, बहुजनहित तो नहीं ही है. मगर किसी को दिखता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग सन् अस्‍सी से दुनिया पर कब्‍ज़ा किये इस अर्थनीति के पुरोधा अपने प्रचार भोंपू पर रोज़ गरजकर बोलते हैं कि इन्‍हीं रास्‍तों पर चलकर गरीब मुल्‍कों में अमीरी आयेगी, मगर इसके जवाब से कतराकर बच निकलते हैं कि अमीर और गरीब मुल्‍कों में पैसों की गैरबराबरी कैसे जायेगी. या मुल्‍कों के भीतर की आर्थिक गैरबराबरी. या इसका जवाब नहीं देते कि क्‍यों अचानक उठान की तरफ उड़ती अर्थव्‍यवस्‍था (अपनी नीतियों की प्रशस्ति में जिसका उदाहरण चीख़-चीख़कर दुनिया को बताया जाता रहा) अचानक एकदम से भरभराकर बैठ क्‍यों जाती है (थाइलैण्‍ड, अर्जेंटिना, मैक्सिको के पिछले पंद्रह वर्षों का इतिहास हमें दिखता है? जिसकी फिर बड़े अलमबरदार व्‍याख्‍या नहीं करते, स्‍थानीय प्रशासन पर उसका दोषारोपण करके नीतिगत पराजयों से पल्‍ला झाड़ते हैं). &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह नये किस्‍म का महीन, और ज़्यादा ख़तरनाक जायंट कॉरपोरेशंस का कॉरपोरेट उपनिवेश‍वाद है, जिसके पीछे-पीछे गरीब मुल्‍कों की सरकारें पैरों के बीच पूंछ डाले घूम रही हैं, इससे जो पहले से ही अमीर हैं, उनकी और अमीरी आयेगी, गरीबों की गरीबी नहीं जायेगी, अमरीका तक में नहीं गयी है- मैं फैलकर गरजना चाहता हूं, मगर फिर याद आता है आई अम लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ, और मैं कुछ कहने की जगह जुसेप्‍पे के लाये &lt;a href="http://monthlyreview.org/ahowa.htm" target="_blank"&gt;किताबों के बंडल&lt;/a&gt; का जखीरा खोलकर &lt;a href="http://monthlyreview.org/080401li.php" target="_blank"&gt;देखने लगता हूं&lt;/a&gt;..</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_11.html" title="लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ: दो" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_11.html#comment-form" title="4 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/1899949922651136366/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/1899949922651136366" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/1899949922651136366" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-7258569426164083679</id><published>2008-07-10T19:26:00.003+05:30</published><updated>2008-07-10T19:57:41.268+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्‍लॉगिंग" /><title type="text">ओह, कैसे तो आनंद के पूर्वाभास!</title><content type="html">&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;यह अच्‍छा है.&lt;/span&gt; हिंदी ब्‍लॉगों को विज्ञापनों से कमाई होने की बातें हो रही थीं, वह कमाई तो पता नहीं कब किसी के लोकल हवाई चप्‍पल खरीदने के काम आती, उससे पहले हैकिंग की मुंह दिखाई हो गई! घबराहट (और &lt;span style="font-style:italic;"&gt;किंकर्तव्‍यविमूढ़ता?&lt;/span&gt;) में जाने सुबह से मुंह के साथ-साथ लोगों ने और क्‍या-क्‍या देख लिया होगा, अपनी विहंगम कल्‍पनाशक्ति की संभावित यात्राओं से अचकचाकर इसीलिए ब्‍लॉगवाणी पर एक नज़र डलते ही मैंने दस बजे कंप्‍यूटर बंद कर दिया था, और बाद में भी बंद ही किये रखा था. शाम को देख रहा हूं डीएल कारनेगी के मौसेरे भाई &lt;a href="http://dilkarnegi.icn.in/?p=9" target="_blank"&gt;दिलहज़ार नेगी युद्धजर्जर मैदान पर पानी के छींटे छोड़ गये हैं&lt;/a&gt;. हालांकि हैकरों पर तेज़ाब के छींटे कैसे छोड़ें, इसकी भाई दिलदार ने कोई सलाह नहीं दी है. कलकतिया &lt;span style="font-style:italic;"&gt;शिबोकोमार मिसरा&lt;/span&gt; ने भी &lt;a href="http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/07/blog-post_10.html" target="_blank"&gt;लादेन की कविताई&lt;/a&gt; का ज़ि‍क्र किया है, प्रसंगवश हैकरी की बेहयायी का भी कर सकते थे, मगर चूंकि तबतक &lt;span style="font-style:italic;"&gt;शामेर चाह&lt;/span&gt; का &lt;span style="font-style:italic;"&gt;बोखोत&lt;/span&gt; हो गया था, भलमनई भलमनसी करते-करते रह गये. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो इसे हिंदी ब्‍लॉगिंग में रीतिकालीन अंगड़ाइयों के अलसाये कल-कल काल का अवसान व आधुनिक हड़बड़ाये, अलबलाये भयबोध का प्रारम्‍भ समझा जाये? माने अब कविता करने, एचटीएमएल सिखाने वाले ही नहीं, सीखनेवाले भी किसी क्षण, या कहें, प्रतिक्षण मुकेश गायित ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;कल खेल में हम हों न हों&lt;/span&gt;’ गाने को तैयार रहें? &lt;span style="font-style:italic;"&gt;यह अच्‍छा है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी रूप में अच्‍छा नहीं. माने ऐसी चीज़ का क्‍या मतलब कि कोई अदृश्‍य, अजानभाषी किसी के ब्‍लॉग में घुसकर अगड़म-बगड़म कुछ भी छोड़ जाये (जैसे मेरे ब्‍लॉग पर गणित के सवाल) जिसे देखने पर ब्‍लॉगजनक के व्‍यवहार में वैसा ही संकोच घर कर जाये जैसे एक पिता के अंदर हाईस्‍कूल में पढ़नेवाली अपनी छात्रा कन्‍या को किसी अजनबी की संगत में स्‍थानीय सिनेमा के बाहर मैटिनी शो के छूटने पर देखकर होता है. पता नहीं क्‍यों ऐसे पिताओं, व उनके ऐसे संकोचों की सोचकर मन प्रमुदित नहीं हो रहा. अच्‍छा होता कलुषित हो रहे ऐसे ब्‍लागाकारी पिता दुषित, दुष्‍ट मेरे दुश्‍मन होते, और मैं अपने ब्‍लॉग पर महज कुछ शब्‍द होने के, स्‍पैम शाहकार होता? अच्‍छी बात नहीं, निवाड़ नेगी ने स्‍पैम से अपने ब्‍लॉग को बचाने के कुछ नुस्‍खे सुझाये हैं, स्‍पैम बुनने और बनाने का नहीं सुझाया है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर, नेगीजी न सही, नागाजी हम ही सही. कूदते-कांखते एक दिन सीख ही लेंगे. अभी जीवन में कितना कुछ सीखने को है, नहीं है? आसपास कोई छुपा रुस्‍तम, कोई दबा गुरू स्‍पैमशास्‍त्र के औज़ार दाबे पड़ा हो तो कृपया इस गरीब को ख़बर करे. क्‍योंकि, इन पर हाथ की रवानी हो जाती तो अच्‍छा रहता. अमल, विमल, कमल की तो रहने दें, सारे इंद्रजीतों के माथे बसाइन, बरसाती मक्‍खी की तरह वो भिन-भिन करके सुर में गाता कि ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;कल खेल में तुम हो न तो?&lt;/span&gt;’, और बड़े-बड़े ब्‍लाग और बुद्धि के तोप मिनमिनाते हाथ जोड़े गुज़ारिश करते कि भइया, बाबू, ऐसा अशुभ नहीं बोलते.. ओह, ऐसी मीठी-मीठी कराहें सुनना कितना आनंदकर रहता!..</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_7653.html" title="ओह, कैसे तो आनंद के पूर्वाभास!" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_7653.html#comment-form" title="4 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/7258569426164083679/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/7258569426164083679" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/7258569426164083679" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-5354046946078616410</id><published>2008-07-10T09:34:00.006+05:30</published><updated>2008-07-11T10:11:01.614+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="इतिहास" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आधुनिक लोककथा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमारा समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जुसेप्‍पे से जिरह" /><title type="text">जुसेप्‍पे से जिरह: एक</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SHWLSCaLSoI/AAAAAAAACaQ/cXygtJi2gbo/s1600-h/laotze.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SHWLSCaLSoI/AAAAAAAACaQ/cXygtJi2gbo/s200/laotze.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5221232485006527106" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जुसेप्‍पे से बहुत सारी बातें पूछनी थीं&lt;/span&gt;, पहले तो यही कि बारह वर्षों पुरानी प्रकाशन वाली उसकी नौकरी खटाई में पड़ी थी, वहां से सम्‍माननीय तरीके से निकलने को वह हाथ-पैर मार रहा था, उसका क्‍या हुआ. दूसरे एक पेरुवियन आर्किटेक्‍ट के पीछे उसकी बीवी पागल होती रही थी, वह कहानी कहां पहुंची. दोनों बच्चियां अभी भी अपनी नानी के यहां ही थीं, या तमारा अपने मां के यहां से उठालकर उन्‍हें घर लिवा लाई थी? जुसेप्‍पे से मैं हमेशा कहता रहा हूं कि प्‍यारे, महीने-आध में घरवाली को डांस न सही कहीं आऊटिंग पर ही ले जाया करो, शहर के छोर पर गाड़ी में पेट्रोल भरवाते वक़्त बाजू के ‘जेलातेरिया’ से उसके लिए जेलातो खरीदते समय उससे पूछ लिया करो क्‍या फ्लेवर चाहती है? लेकिन नहीं, मेरी नसीहतों को सुनकर जुसेप्‍पे हंसने लगता. या मेरी दुखती नस पर पिन चुभोने की हिंसा बालसुलभ सरलता में किये सवाल करता- “और? फ़ि‍ल्‍म बनाने के लिए तुम्‍हें कोई प्रोड्यूसर मिला या नहीं? एक बात बताना, तुम किसी को खोज भी रहे हो, या यूं ही बहके-बहके फ़ि‍ल्‍ममेकर होने का सपना देखते हो?” या फिर मूड में रहता तो मुझे लाओत्‍शे का दर्शन समझाने लगता.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;“You know, sweetie what. Nothing lasts. So do not become attached to anything. All that exits will perish; therefore rise above it, maintain your distance, do not try to become somebody, do not try to pursue or possess something. Act through inaction: your strength is weakness and helplessness; your wisdom, naiveté and ignorance. If you want to survive, become useless, unnecessary to everyone. Live far from others, become a hermit, be satisfied with a bowl of rice, a sip of water. And most important—observe the Tao.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं हतप्रभ होकर तमारा के बारे में सोचता, दोनों बच्चियां- अंकिना और उमा के बारे में सोचता. ऐसे ही नहीं है कि तमारा रात के तीन बजे उठकर किचन में कॉफ़ी बनाने लगती है, या सुबह सात बजे अपने बिस्‍तर में होने की जगह नब्‍बे किलोमीटर दूर अपने मां के घर पर पायी जाती है! या किसी पेरुवियन आर्किटेक्‍ट की मीठी बातों से वह मुस्‍कराने लगी है.. तो उसमें उस बेचारी का क्‍या कसूर? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;Observe the Tao, my foot! If I ask what is Tao, would you answer me, Mr. Knowledgeable Giuseppe, would you? I know your answer! It’s impossible to say, because the essence of Tao is its vagueness and inexpressibleness, that’s what you would say. If Tao lets itself defined as Tao, then its not genuine Tao, isn’t it?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;चीन की दीवार की ही तरह एक भयभीत सभ्‍यता का बेमतलब दर्शन नहीं ताओ?&lt;/span&gt; मैं खीझकर अपने मित्र से जिरह करना चाहता. दो हज़ार वर्षों तक जब कभी राजकीय खज़ाने में ज़रा माल-मत्‍ता इकट्ठा हुआ, लोग चींटियों की तरह हांक-हांक कर उस महान दीवार को खड़ा करने में जोत दिये जाते. न उस दीवार की कोई निरंतरता है, न बनावट की एकरूपता, न स्‍थापत्‍य है, न लोकोपकार का कोई अंश. &lt;span style="font-style:italic;"&gt;किसी भी बाहरी तत्‍व से स्‍वयं को किसी भी सूरत में बचाये रखने की एक भयग्रस्‍त मानसिकता से अलग क्‍या है वह दीवार?&lt;/span&gt; और वही है तुम्‍हारा ताओ और तुम्‍हारे लाओत्‍शे! जिनके जीवन का ठीक पता नहीं, जो एक सशंकित, भयग्रस्‍त मानस को छिपे रहकर स्‍वयं को बचाये लेने की सीख देते हैं? &lt;span style="font-style:italic;"&gt;क्‍या है ताओ, सरवाइवर की फिलॉसफ़ी?&lt;/span&gt;.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माफ़ करो, जुसेप्‍पे, मैं ताओ, या लाओत्‍शे पर कोई फ़ैसला नहीं सुना रहा. चीन के बारे में मैं क्‍या जानता हूं, या तुम क्‍या जानते हो. सभ्‍यताएं इतनी विहंगम, इतनी विकराल, गुंफित व गहरी होती हैं कि उनका एक ज़रा सा हिस्‍सा समझना एक समूचे जीवन की कसरत हो सकती है. संस्‍कृति एक ऐसा रहस्‍यभरा महल है जिसमें जाने कितने सारे कमरे, गलियारे, बालकनी, और कोने-अंतरे होते हैं, कहां-कहां, कैसी-कैसी तो परतें होती हैं, वह तुम्‍हारे-मेरे थाह में आने की चीज़ है? और &lt;span style="font-style:italic;"&gt;उस पराये लोक के बारे में तुम ऐसे आत्‍मविश्‍वास से बातें करते हो?&lt;/span&gt; &lt;span style="font-style:italic;"&gt;उचित करते हो?&lt;/span&gt;.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर कमरे में मैं नींबू की चाय लिये दाखिल हुआ तो जुसेप्‍पे के सामने मेज़ पर लाओत्‍शे या कन्‍फ़्यूशियस की किताब नहीं, एक पुराना मुड़ा-तुड़ा अट्ठारहवीं सदी के आखिर का भारतीय नक़्शा था. मैंने कहा अब किसकी जान के पीछे पड़े हो, तो जुसेप्‍पे मुस्‍कराने लगा, कहा- “तुम्‍हें मालूम है मौर्यों के वक़्त राष्‍ट्रीय आय का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा अधिकारियों के वेतन और सार्वजनिक कार्यों में लगता था? राष्‍ट्रीय आय का एक काफी बड़ा हिस्‍सा अब भी निजी कंपनियों के मालिकों के घर जा रहा है, बस फर्क़ यही हुआ है कि ठीक आज़ादी के बाद सार्वजनिक कार्यों पर भी खर्च होता था, उस ज़ि‍म्‍मेदारी से सरकारें धीरे-धीरे अब पल्‍ला झाड़ रही हैं. देखो, प्रधानमंत्री, पुरोहित और सेनाध्‍यक्ष 48,000 पण पाते थे, कोषाध्‍यक्ष और मुख्‍य समाहर्ता 24,000 पण. लेखापाल और लिपिकों के हिस्‍से 500 पण आता था, मंत्री पाते थे 12,000 पण जबकि शिल्पियों को 120 पण दिये जाते थे. हिसाब लगाकर देखो तो एक एक लिपिक और उच्‍च्‍तम अधिकारी के वेतन में 1:96 का अनुपात बैठता है, और एक शिल्‍पी और मंत्री के वेतन में 1:100 का अनुपात. आज एक बड़ी कंपनी के सीईओ और तुम-से फटीचर की आमदनी का अनुपात क्‍या है?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं दीवार पर पता नहीं क्‍या देखते हुए बुदबुदाया- अनुपात तब बनेगा जब कोई आमदनी होगी. मेरी कोई आमदनी नहीं है.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(जारी)&lt;/span&gt;</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_10.html" title="जुसेप्‍पे से जिरह: एक" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_10.html#comment-form" title="0 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/5354046946078616410/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/5354046946078616410" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/5354046946078616410" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-5335622977308689590</id><published>2008-07-08T10:42:00.004+05:30</published><updated>2008-07-08T10:58:22.265+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमारा समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="किताबी दुनिया" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्‍लॉगिंग" /><title type="text">मैं वही, वही बात, नया दिन, नयी रात..</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SHL6XkR1wmI/AAAAAAAACaA/GBKUNhhPXjQ/s1600-h/harsh+damodaran.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SHL6XkR1wmI/AAAAAAAACaA/GBKUNhhPXjQ/s200/harsh+damodaran.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5220510200858264162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;डाऊनटाउन&lt;/span&gt; भले अपने में गुलज़ार, उमगता, सात एंगलों में सजता चलता हो, सबर्ब के कचर-मचर में उलझे, गोता लगाते हमारे जीवन में डाऊनवर्ड्स के तेज़ लीप्‍स जितने हों, टाउनवर्ड्स के कहां हैं. फिर (हमारे मन के ही अनुरूप) देह की चंचल विस्‍तारता व उपनगरीय रेलों की मारक दुर्बेधता का ऐसा अनूठा मेल है, कि शहर जाना कहां हो पाता है. रेल के अंदर तो कोई मेरा डबल होगा जो सालान-छमाही कभी उसके मार्फ़त शहर का रूख करता हो, मैं खुद तो &lt;span style="font-style:italic;"&gt;‘यादों की बारात’&lt;/span&gt; के &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;धर्मेंद्र&lt;/span&gt; की तरह रेल की छतों पर से दौड़ता हुआ भी नहीं करता.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओह, गुनी &lt;a href="http://halchal.gyandutt.com/2008/07/blog-post_08.html" target="_blank"&gt;ज्ञानदत्‍त जी सलाह दे रहे हैं&lt;/a&gt; फिर भी मैं अपनी (&lt;span style="font-style:italic;"&gt;चिरंतन की?&lt;/span&gt;) आत्‍मलीनता और नाटकीयता से बाज नहीं आ रहा. मगर इसका पॉडकास्‍ट नहीं बनाया, वह काफी नहीं? इस छोटे से जीवन में क्‍या कितना काफी है का अंदाज़ अब कभी ठीक-ठीक हो भी पायेगा? लड़ाइयां लड़ने को, छलांगें मारने को और प्रेम व जाने क्‍या-क्‍या की चोटें मुंह पर लेने को.. मतलब जीवन जो जीने को बचा है, उसका अंदाज़? ख़ैर, उसका तो क्‍या होगा, किताबें ही जो पढ़ने को बची हैं, उन्‍हीं का अंदाज़? हो पायेगा? या तोड़-तोड़कर जो मैं वाक्‍य जोड़ता चलता हूं, इस आदत से उबरने, निजात पाने की किसी तय तिथि का?.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओह, चूल्‍हे में जाये सब! खामख़ा लोग चढ़ाते, चढ़ाके उतारते माने खामख़ा बहकाते रहते हैं!.. या शायद मैं ही हूं कि बहकता रहता हूं. और दुखों के काले-काले इतने सारे घनेरे बादल हैं, फिर भी, देखिये, हर वक़्त बेमतलब दांत निपोरे, चहकता रहता हूं. अभी ही नहीं, कल भी वही कर रहा था, किसी बच्‍चे की एसी वाली गाड़ी में लदकर शहर जाने का मौका मिला तो रास्‍ते भर रहा. चहकता. हालांकि रास्‍ते भर गले में अजगर की माला चढ़ाये ‘ख़तरों का खिलाड़ी’ अक्षय कुमार और ‘कहानी हमारे महाभारत की’ (‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;कहानी हमारे&lt;/span&gt;’ और ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;की&lt;/span&gt;’ 6 पॉयंट और ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;महाभारत&lt;/span&gt;’ 84 पॉयंट साईज़ में) के भीमकाय बिलबोर्ड्स &lt;span style="font-style:italic;"&gt;बाज़ार कितना आक्रामक हो रहा है&lt;/span&gt; की धारणाएं बुनते मेरे उत्‍साह को पस्‍त करने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे थे, लेकिन मैं भी बेशर्म पूरी तरह ध्‍वस्‍त हो जाऊं की जगह, बार-बार ‘&lt;a href="http://pustak.org/bs/home.php?bookid=396" target="_blank"&gt;सतह से उठता आदमी&lt;/a&gt;’ हो जा रहा था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी उठे हुए मानस में यहां होते और वहां हवाते बालार्ड पायर &lt;a href="http://www.orientlongman.com/view_books.asp?categoryID=14" target="_blank"&gt;ऑरियेंट लॉंगमैन&lt;/a&gt; की किताबों की दुकान पहुंचा. इमारत अपनी जगह सलामत थी मगर दुकान, पता चला, इस अप्रैल से बंद की जा चुकी है. यानी एक और पुराना किताबी सेटलमेंट नयी ज़रूरतों के आगे होम हुआ! ठीक बगल में लगे ऑरियेंट के प्रशासनिक और मार्केटिंग दफ़्तर के रिसेप्शन पर बैठी महिला से मैं अपनी झुंझलाहट ज़ाहिर करने लगा तो वह मुस्‍करा कर बताने लगी कि शो विंडो और किताबों की प्रदर्शनी नहीं है तो क्‍या हुआ, सामने कैटलॉग में उनकी लिस्‍ट है, ऊपर स्‍टोररूम में किताबें हैं, स्‍पेस मैनेजमेंट का समझदार एक्सिक्‍यूज़न है, मेरी दिक़्क़त क्‍या है? मैं महिला से कहना चाहता था अंधेरी से इतनी दूर किताबों को देखने, छूने, टटोलने के मोह में आया था, लेकिन इस कहने का अब क्‍या मतलब बनता? जिस तरह से ‘यादों की बारात’ के धर्मेंद्र की तरह रेल की छत पर चढ़ने से रह गया था, उसी तरह से रिसेप्‍शन की महिला से भी पूछते-पूछते रह गया. मतलब नहीं बनता..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसका बनता वह करवाया. साथ के बच्‍चे को &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jadunath_Sarkar" target="_blank"&gt;जदुनाथ सरकार&lt;/a&gt; की ‘&lt;a href="http://books.rediff.com/bookshop/bkproductdisplay.jsp?The-Fall-of-the-Mughal-Empire-(In-4-Vols.-Set)&amp;prrfnbr=81872064&amp;pvrfnbr=82515558&amp;multiple=false&amp;frompg=&amp;isbngroup=8125032452" target="_blank"&gt;द फॉल ऑफ़ मुग़ल एंपायर&lt;/a&gt;’ और खुद को &lt;a href="http://permanent-black.blogspot.com/" target="_blank"&gt;हर्ष दामोदरन&lt;/a&gt; की ‘&lt;a href="http://www.hindu.com/br/2008/07/08/stories/2008070850081500.htm" target="_blank"&gt;इंडियाज़ न्‍यू कैपिटलिस्‍ट्स&lt;/a&gt;’ खरीदवाई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कब और क्‍या-क्‍या पढ़ेगा आदमी, कुछ अंदाज़ है मुझे? अभय ने कल हाथ में अरविंद अदिगा का पहला उपन्‍यास ‘&lt;a href="http://www.independent.co.uk/arts-entertainment/books/reviews/the-white-tiger-by-aravind-adiga-823472.html" target="_blank"&gt;द व्‍हाइट टाइगर&lt;/a&gt;’ भी थमा दिया कि लो, इसे भी झेलो.. मगर मैं असमंजस में हूं एक छोटे से जीवन में अंतत: कितना कुछ ठिल सकता है, ठिलेगा? आदमी कितना झेल सकता है, झेलेगा?..</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_08.html" title="मैं वही, वही बात, नया दिन, नयी रात.." /><link rel="replies" type="text/html" href="http://azdak.blogspot.com/2008/07/blog-post_08.html#comment-form" title="4 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://azdak.blogspot.com/feeds/5335622977308689590/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/5335622977308689590" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/5335622977308689590" /><author><name>Pramod Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2179815305421953170.post-1574490199336387278</id><published>2008-07-05T10:17:00.007+05:30</published><updated>2008-07-05T12:16:47.172+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमारा समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हिंदी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्‍लॉगिंग" /><title type="text">किसे हिंदी की ज़रूरत है?</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SG7_1Ypit-I/AAAAAAAACZ4/LeihovaBwbY/s1600-h/Nat_Hindi.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp3.blogger.com/_5ov4XIuU0i0/SG7_1Ypit-I/AAAAAAAACZ4/LeihovaBwbY/s200/Nat_Hindi.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219390310783825890" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;दिल्‍ली के बारहवीं पास&lt;/span&gt; छात्रों में बतौर ऑनर्स हिंदी चुनने में अनिच्‍छा पर &lt;a href="http://masijeevi.blogspot.com/2008/07/blog-post_05.html" target="_blank"&gt;मसिजीवी का दुख&lt;/a&gt; देखा. लेकिन मुझे दुख की कोई तुक नहीं दिख रही. भई, समूचा देश जब अंग्रेजी की बरसात में भींज-भींजकर नाइके और मैकडॉनल्‍ड का हो-हो जाना चाहता है, बेचारा बच्‍चा हिंदी विभाग की चिरकुटइयों में आखिर क्‍यों सिर घुसायेगा? फंसायेगा? बस इसीलिए कि किसी हिंदी हुलुलु चैनल के टनल में स्ट्रिंगर की ठौर पायेगा? &lt;span style="font-style:italic;"&gt;हिंदी का झुनझुना थामने को इतनी वजह पर्याप्‍त वजह है?&lt;/span&gt; आज के उपयोगितावादी समय में जबकि इंजीनियरिंग कॉलेज़ेस तक में नियुक्ति के लिए खोजने पर शिक्षक मिल नहीं रहे (दो दिन पहले महाराष्‍ट्र पर ऐसी ही एक रपट