<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:blogger="http://schemas.google.com/blogger/2008" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160</atom:id><lastBuildDate>Fri, 01 Nov 2024 07:35:59 +0000</lastBuildDate><title>सूरत-ए-हाल</title><description>समाज का आइना</description><link>http://suratehal.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (Raju Neera)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>21</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-4486010851471206085</guid><pubDate>Mon, 12 Aug 2013 07:46:00 +0000</pubDate><atom:updated>2013-08-12T13:16:35.831+05:30</atom:updated><title>ग्रामीण विकास के लिए जागरूक समूह</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
गांवों के विकास के लिए सरकार, स्वैच्छिक संस्थाएं एवं जन संगठन अलग-अलग तरीके से कार्य कर रहे हैं। ग्रामीण विकास को लेकर भारत सरकार पिछले कुछ सालों से ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रही है। गांवों में योजनाओं एवं संसाधनों में भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके बावजूद जिस तेजी से विकास होना चाहिए था, उस तेजी से संभव नहीं हो पा रहा है। गांव के अंदर से ऐसा कोई सहयोगी समूह या निगरानी तंत्र नहीं दिखाई पड़ रहा है, जो गांव में आने वाली योजनाओं की गुणवत्ता की निगरानी कर सके, लोगों को अपने व्यवहार परिवर्तन के लिए प्रेरित कर सके या सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया में भाग ले सके। इस तरह के प्रयोग कोई नए नहीं हैं, पर इन्हें मजबूत करने की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई स्वैच्छिक संस्थाएं एवं संगठन ऐसे प्रयोग किए हैं एवं कर रहे हैं। मंडला, झाबुआ एवं सीहोर में किशोरावस्था एवं प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर गठित किशोर-किशोरियों के समूह ने बेहतर कार्य किया था। उन्होंने न केवल प्रजनन एवं व्यक्तिगत साफ-सफाई की जरूरतों एवं आदतों में बदलाव किया बल्कि किशोरों ने नशा से तौबा करने का निश्चय भी किया। इसी तरह प्रदेश के कई जिलों में सक्रिय ग्रामीण समूहों ने महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के सामाजिक अंकेक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीहोर के कई पंचायतों में बाल सहयोगी समूह सक्रिय है, जो बाल स्वच्छता पर अपनी भूमिका निभा रहा है। समूह अपने अधिकार या विकास के बजाय शालाओं में पेयजल, शौचालय की व्यवस्था, व्यक्गित साफ-सफाई एवं शालाओं से बाहर भी बाल स्वच्छता को बेहतर बनाने के लिए सक्रिय है। इसमें बाल अधिकारों के प्रति संवेदनषील, बच्चों की बातों को पंचायत, ग्राम सभा और सेवादाताओं के समक्ष रखने में सक्षम होने के साथ-साथ समस्याओं के समाधान में सहयोग प्रदान करने वाले युवा शामिल हैं। ऐसे समूहों को ग्रामीण विकास से जुड़ी अन्य योजनाओं के प्रति भी सक्रिय होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चय ही जब ग्रामीण विकास पर सरकारें इतना व्यय कर रही हैं, तो स्थानीय सहयोगी समूह को ज्यादा सक्रिय होने की जरूरत है। ऐसे समूह सभी गांव में बन जाएं, तो बेहतर तरीके से सामाजिक एवं ग्रामीण विकास हो सकता है।&lt;/div&gt;
</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2013/08/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-7283299817183950418</guid><pubDate>Mon, 20 Aug 2012 06:56:00 +0000</pubDate><atom:updated>2012-08-20T12:26:47.325+05:30</atom:updated><title>रोजगार गारंटी पर आम आदमी</title><description>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
महात्मा
 गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना को लेकर हाल ही में केंद्रीय ग्रामीण
 विकास मंत्रालय द्वारा तैयार समीक्षा रिपोर्ट को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
 ने विमोचित किया। बहुत सारी उपलब्धियों के साथ-साथ कमियों पर टिप्पणी, 
सुझाव एवं नसीहतों के साथ उन्होंने अपना भाषण दिया। उम्मीद की जा सकती है 
कि देश के एक शीर्ष व्यक्ति द्वारा योजना की समीक्षा पर व्यक्त किए गए 
विचारों के परिप्रेक्ष्य में नीति निर्माता रोजगार गारंटी योजना में सुधार 
और आम आदमी तक योजना का बेहतर लाभ पहुंचाने के उपाय पर काम करेंगे। शीर्ष 
स्तर की इस समीक्षा के साथ-साथ एक आम आदमी की समीक्षा को भी जानना बड़ा 
दिलचस्प है। रोजगार गारंटी को लेकर श्योपुर जिले के गोरस एवं श्यामपुर के 
बीच हाइवे पर मिले एक आम आदमी का विचार बहुत ही रोचक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;बारिश में श्योपुर-सबलगढ़ हाइवे पर दोपहर के समय इकादुक्का गाड़ियों के 
आवागमन के बीच सामने से आता हुआ एक आदमी दिखाई दिया। वह पास के गांव में 
रहने वाला सहरिया आदिवासी था, जो अपनी गुम हो गई गाय को ढंूढ़ने के लिए इस 
खराब मौसम में निकला था। गांव की स्थिति एवं रोजगार गारंटी पर बातचीत में 
उसकी सबसे ज्यादा नाराजगी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर था। उसने 
बताया कि कैसे उसके गांव में तालाब बनाने की औपचारिकता पूरी की गई एवं जब 
उसने आवाज उठाने की कोशिश की, तो अधिकारियों ने उसकी आवाज दबा दी। कुछ ने 
यह भी कह दिया कि सहरिया आदिवासी दारू पीकर कुछ भी बक रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;उसने कपिलधारा योजना के तहत बन रहे कुएं को लेकर गंभीर बात की। 
कपिलधारा योजना में संशोधन का सुझाव देते हुए उसने बताया कि वर्तमान में 
जमीन का पानी बहुत ही नीचे चला गया है। ऐसी स्थिति में कुआं खोदने पर उसमें
 पानी निकलने की संभावना कम रहती है। यदि एक कुएं को 30-35 फीट तक भी खोद 
दिया जाए, तो पानी नहीं मिलता है। कुएं के निर्माण में बहुत ज्यादा राशि 
खर्च होती है। पानी नहीं निकलने से किसान के खेत का एक हिस्सा बेकार हो 
जाता है। उसका यह मानना था कि कपिलधारा योजना के तहत ट्यूबवेल की अनुमति 
देनी चाहिए। खेत पर एक छोटा खेत तालाब बनाकर उसके बीच में ट्यूबवेल लगा 
देना चाहिए, जिससे किसान को लगातार पानी भी मिलता रहे एवं वहां का भूजल भी 
रिचार्ज हो जाए। इस कार्य में भी लगभग उतना ही खर्च आएगा, जितना कुआं बनाने
 में खर्च होगा।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;यह तर्क बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि हम यह देख रहे हैं कि कपिलधारा
 के तहत कुआं बनाने के लिए जितनी राशि दी जाती है, उतने में खुदे गए कई 
कुओं से पानी नहीं निकल रहा है। बहुत सारे कुओं का निर्माण भी अधूरा पड़ा 
हुआ है। ऐसे में योजना के तहत कुछ ज्यादा राशि भी खर्च करनी पड़े, तो हमें 
एक आम आदमी की इस समीक्षा पर ध्यान देना चाहिए।&lt;/div&gt;
</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2012/08/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-3920427610429485917</guid><pubDate>Wed, 04 Apr 2012 12:06:00 +0000</pubDate><atom:updated>2012-04-04T17:46:18.473+05:30</atom:updated><title>गरीबों के हक पर कुंडली क्यों</title><description>ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की विसंगतियों को दूर कर इसे बेहतर बनाया जा  सकता है, पर गरीबों के प्रति बेरुखी, योजना के प्रति लापरवाही एवं  भ्रष्टाचार के कारण इसे प्राथमिकता से नहीं लिया जा रहा है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में गरीबी दूर करने के लिए एवं गरीबों को राहत देने  के उद्देश्य से आजादी के बाद लगातार योजनाएं एवं नीतियां बनाई गई, यहां तक  कि 1971 के आम चुनाव में ‘‘गरीबी हटाओ’’ का नारा भी दिया गया, पर दुखद बात  यह है कि आज भी गरीबी अपने विकराल रूप में मौजूद है। देश में गरीबी हटाने  के उपाय सफल नहीं हो रहे हैं, इसलिए गरीबों को हटाने की योजना पर अमल किया  जाने लगा है। अभी हाल ही में योजना आयोग ने गरीबी की परिभाषा बदलते हुए देश  में गरीबों की संख्या घटा दिया। योजना आयोग के इस रवैये की संसद के अंदर  एवं बाहर कड़ी आलोचना की जा रही है। योजना आयोग के इस रूख ने यह जतला दिया  कि देश में गरीबी दूर हो या न हो, पर गरीबों को उनके हाल पर छोड़कर उन्हें  गरीब मानने से इनकार कर दिया जाए।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;देश में गरीबी को लेकर जिस तरह के भी आंकड़ें पेश किए जाए, पर उनमें यह  साफ पता चलता है कि शहरों की तुलना में गांवों में ज्यादा गरीबी है। यही  वजह है कि गांवों से बड़े पैमाने पर शहरों की ओर पलायन होता है। पिछले कई  दशकों में गरीबी हटाने के किए गए प्रयासों के बाद केंद्र सरकार ने 2005 में  एक महत्वकांक्षी योजना को कानूनी दायरे में बांधकर लागू किया, जिसे शुरू  में नरेगा, फिर मनरेगा के नाम से जानते हैं। महात्मा गांधी राष्ट्रीय  ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना केंद्र सरकार की एक ऐसी योजना है, जिसके माध्यम  से गांवों से पलायन रोकने एवं गरीबी दूर करने का खाका खिंचा गया। पर मनरेगा  के सात साल बाद भी इसमें व्याप्त विसंगतियों को दूर नहीं किए जाने से  समस्याएं जस की तस बनी हुई है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मध्यप्रदेश में मनरेगा शुरू से ही विवादों में रहा है। कई स्वतंत्र  सर्वे में सामने आया कि करोड़ों का भ्रष्टाचार हो रहा है। ऐसे में गरीबी दूर  होने के बजाय गरीबों के नाम पर आ रही राशि से अधिकारियों, कर्मचारियों एवं  पंचायत प्रतिनिधियों की चांदी हो रही है। आश्चर्य की बात है कि इस योजना  को लागू हुए छह साल से अधिक हो गए, पर अभी तक गांवों में इसके नियमों के  बारे में लोगों तक जानकारी नहीं पहुंचाई जा सकी है। योजना के बारे में सभी  ग्रामीणों को मालूम है, पर योजना का लाभ नियमानुसार कैसे लें, काम नहीं  मिलने पर बेरोजगारी भत्ता कैसे लें, देर से भुगतान होने पर मुआवजा के लिए  क्या करना होगा एवं आखिरकार इस योजना का सही मायने में उन्हें लाभ कैसे मिल  पाएगा एवं यह उनके लिए क्यों उपयोगी है, जैसे कई सवालों का उत्तर  ग्रामीणों के पास नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि योजना का  क्रियान्वयन करने वाले नहीं चाहते कि लोगों को सही जानकारी हो। योजना में  पारदर्शिता, जवाबदेही एवं सामाजिक निगरानी का बहुत ही ज्यादा उपेक्षा की जा  रही है, जिसकी स्पष्ट वजह भ्रष्टाचार में लिप्तता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;प्रदेश सरकार एक ओर इस बात को लेकर अपना पीठ खुद थपथपा रही है कि  केंद्र सरकार ने मनरेगा को लेकर प्रमाण पत्र दिया है कि मध्यप्रदेश में  योजना का क्रियान्वयन बेहतर तरीके से हो रहा है। इतना बेहतर देश के किसी  अन्य राज्य में नहीं हो रहा है। सरकार यह भी दावा कर रही है कि शासन ने  अधिकतम पारदर्शिता की कोशिश एवं पारिश्रमिक जल्द से जल्द दिलवाने की  व्यवस्था की है। पर दूसरी ओर जमीनी स्तर पर देखा जाए, तो इसका स्पष्ट अभाव  दिख रहा है। प्रदेश में मनरेगा को लेकर भ्रष्टाचार के कई मामलों में आईएएस  अधिकारियों से लेकर नीचले स्तर के कर्मचारियों पर आरोप लगे हैं, पर  कार्रवाई करने के नाम पर सिर्फ नीचले स्तर के कर्मचारियों को दबोचा जा रहा  है, जबकि बिना उच्च अधिकारियों की मिली भगत के गांव स्तर के कर्मचारी या  पंचायत प्रतिनिधि भ्रष्टाचार नहीं कर सकते। सरकार ने भी समय-समय पर  कलेक्टर, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत के मुख्य  कार्यपालन अधिकारी आदि पर शुरुआती तौर पर कार्रवाई की है, पर उसका कोई  परिणाम नहीं निकल पाया एवं उनमें से अधिकांश वर्तमान में बेहतर जगह पर  पदस्थ हैं। एक तरह से यह कहा जा सकता है कि गरीबों के नाम पर आने वाले पैसे  पर जिन लोगों ने कुंडली मार लिया है, उन्हें कोई सजा नहीं मिल रही है एवं  इसी का परिणाम है कि योजना से भ्रष्टाचार को खत्म नहीं किया जा सका है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;गांव में मजदूरी समय से नहीं मिल रही है,  पर चूंकि काम की मांग मौखिक ज्यादा है, इसलिए ग्रामीण बेरोजगारी भत्ता की मांग  नहीं कर पा रहे हैं। गरीबों को यह लग रहा है कि इस योजना में काम  के इंतजार से बेहतर है कि अन्य काम की तलाश में पलायन कर लिया जाए। दूसरी  सबसे बड़ी समस्या देर से मजदूरी का भुगतान है। इसके पीछे भले ही कुछ भी तर्क  दिया जाए, पर देर से भुगतान पर मुआवजा देने से बचा जा रहा है एवं मजदूरी  के लिए गरीब मजदूर लंबा इंतजार करने को विवश हो रहे हैं। इन स्थितियों को  देखकर ऐसा लग रहा है कि सरकार की यह मंशा कतई नहीं है कि गरीब वर्ग के लोग  गरीबी से बाहर आएं। गरीबी की परिभाषा चाहे कुछ भी हो जाए, पर लोगों को  रोजगार एवं सामाजिक सुरक्षा दिए बिना सामाजिक एवं आर्थिक विकास में किसी  परिवर्तन की अपेक्षा नहीं की जा सकती।</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2012/04/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-1066974812481154568</guid><pubDate>Thu, 06 Oct 2011 09:05:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-10-06T14:38:16.610+05:30</atom:updated><title>तब और अब का दशहरा</title><description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;text-align:justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;Apple-style-span&quot; style=&quot;font-family: arial; font-size: 14px; line-height: 25px; &quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;कुछ दिन पूर्व नवरात्री एवं दशहरा को लेकर कुछ मित्रों से चर्चा हो रही थी। चर्चा में लगभग सभी अपने-अपने बचपन की यादों को ताजा कर रहे थे। बचपन में इस त्यौहारी मौसम का इंतजार, भागीदारी, घुमना, मस्ती करना जैसे कई प्रसंगों पर बातें। और अंत में उनदिनों की आज से तुलना करते हुए यह कहना कि वैसी रामलीला या दशहरा अब कहां देखने को मिलता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यह एक मुश्किल काम है कि पूर्व की तुलना वर्तमान से किया जाए। यदि आज के बच्चों को उन दिनों की तरह सहज एवं साधारण रामलीला देखने को मिले, तो वे शायद ही उन्हें देखने जाए। आज इतने ग्लैमराइज्ड तरीके से रावण का पुतला दहन कार्यक्रम आयोजित करने के बावजूद उसमें उमड़ने वाली भीड़ शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र के कमजोर तबके की ज्यादा होती है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जब हम अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं, तो उनदिनों की उत्सवधर्मिता आज से कई मायने में बेहतर थी। मुझे अपने बचपन की याद आज भी है, जब मैं गांव में रहा करता था। उन दिनों दशहरा का बेसब्री से इंतजार रहता था। मतलब कुछ खास होता था - दस दिनों की छुट्टी। दशहरा के पहले नवरात्री में नवदुर्गा की झांकियां और दसवें दिन रावण का पुतला दहन। उन दिनों गली-गली में नवदुर्गा की झांकियां नहीं होती थी और न ही हर गांव में या मोहल्ले में रावण दहन। शायद इसलिए इस आयोजन को देखने के प्रति खास लगाव होता था। मेरे गांव से शहर की दूरी लगभग 8 किलोमीटर है। वहीं रामलीला का बड़ा आयोजन होता था। रामलीला का आयोजन दस दिन तक और दसवें दिन यानी रावण दहन।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बहुत मजा आता था, जब रामलीला में अलग-अलग प्रसंगों में लोकगीतों की प्रस्तुति होती थी। ढोलक, हारमोनियम के वादन पर नायिकाओं द्वारा गीतों की प्रस्तुति देखते हुए यह नहीं लगता था कि रामलीला देख रहे हैं। बल्कि वह एक अलग टुकड़ा ही होता था, जो लोगों को दर्शक दीर्घा में बांधे रखने के लिए जरूरी होता था। लंबी तान पर चारों ओर घुमते हुए विरह का दृश्य हो, तो भी लोगों के चेहरे पर मुस्कराहट देखी जा सकती थी। कई ऐसे वाकये भी हुए, जब लंकेश की ओर के पात्रों के प्रति संवेदनाएं जाग जाती थी। ऐसा लगता था कि बेचारा! नाहक ही पंगा ले लिया है। क्या जरूरत थी, राम से पंगा लेने की। वैसे समय पर राम की ओर के पात्रों पर गुस्सा आता था। राक्षस पात्रों की भूमिका निभा रहे बच्चों के मासूम चेहरे महिलाओं की ममता के हकदार बन जाते थे।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कई बार पात्र अपना डायलॉग भूल जाते थे। उस समय हास्यास्पद स्थिति बन जाती थी। पर्दे के पीछे से पात्रों को डायलॉग पढ़कर सुनाया जाता था और फिर मंच पर पात्र उसे दोहराते थे। ऐसा नहीं है कि इस तरह की प्रस्तुति को कोई खराब कह दे या फिर खारिज कर दे। यह बता पाना मुश्किल है कि वह आस्था का कारण था या फिर लोक संस्कृति के प्रति सम्मान का।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उन दिनों की एक बात और ज्यादा मायने रखती थी, वह है साझा संस्कृति की। रामलीला का आयोजन समाज की ओर से किया जाता था। वह पूरे समाज की उत्सवधर्मिता थी। उसमें धर्म या जाति का सरोकार मायने नहीं रखता था। एक-दूसरे के प्रति सम्मान का खास ख्याल रखा जाता था। तब इस ओर ध्यान ही नहीं जाता था कि इसमें दूसरे धर्मावलंबियों की भागीदारी कितनी है। ऐसे आयोजन से एक-दूसरे के नजदीक आने के बहाने मिलते थे। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;निश्चय ही इस तरह से देखा जाए, तो तब और अब में बहुत फर्क नजर आता है। आज विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच कटुता की पाट चौड़ी की जा रही है, जिसकी वजह से कोई भी आयोजन सामाजिक कम, धार्मिक ज्यादा बनता जा रहा है। इससे समाज के विभिन्न समुदायों के बीच समभाव की भावना घटती जा रही है। अब दशहरा का आयोजन भव्यता और प्रतियोगी भाव का आयोजन बन गया है। ऐसे में अपने बचपन के दिनों वाले दशहरा को याद किया जाए, तो क्या गलत है?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2011/10/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-9044683673399674589</guid><pubDate>Fri, 01 Jan 2010 08:21:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-01-01T14:38:37.316+05:30</atom:updated><title>नदी छूट गयी, हमारी जिंदगी छूट गयी</title><description>एक बार फिर  समय की कसौटी &lt;span&gt;&lt;/span&gt;हमारे सामने  हैं। नए साल के रूप में। २००९ की विदाई के बाद २०१० तो आना ही था। और वो आ गया। पिछले साल की बेतरतीब ज़िन्दगी को कुछ सलीके में लाने की जद्दोजहद के साथ एक दूसरे को बधाइयाँ देते हुए। पर ज़िन्दगी को व्यवस्थित करने की हमारी यह रफ़्तार धीरे-धीरे धीमी पद जएगी महीने दर महीने और २०१० के अंत तक एक बार फिर बेतरतीब। और नए संकल्पों के साथ सलीके के ढलने की हमरी जिद और धीरे-धीरे फिर ज़िन्दगी का बेतरतीबी की ओर बढ़ते जाना। पर सवाल यह है कि जिसे हम सलीका कहते हैं क्या वास्तव में वो सलीका है भी या नहीं? शायद हम मशीन होते जाने की प्रक्रिया को सलीका कहते हैं, गोया ज़िन्दगी भी मशीन हो। तो ज़िन्दगी का सलीका है क्या?&lt;br /&gt;इसे हम नदी की धारा से समझ सकते हैं। मशीन से परे, अपनी ही चल में मस्त, कभी इधर तो कभी उधर, कभी कूदना तो कभी फांदना, कभी पतली तो कभी चौड़ी, कभी-कभी कहीं सूखी भी। पर क्या हमने कभी सोचा हैं कि नदी को सलीके में लाने की प्रक्रिया में हम नदी को ख़त्म कर देते हैं। हमारे सामने मरती हुई नदियों की फेहरिस्त है, शायद आपके पास भी होगी।&lt;br /&gt;ज़िन्दगी और नदी यानी अपने ही रौ में बहते जाने की कहानी।&lt;br /&gt;पर बात फिर वही आकर रुक जाती है कि ज़िन्दगी का सलीका है क्या? तो हमें ये अपने से ही पूछना होगा कि जिस सलीके कि ओर हम जाना चाहते हैं वो हमने तय किया है कि बाज़ार ने। आज बाज़ार  ही तो सब कुछ तय कर रहा है। ऐसे में हम जिस सलीके कि ओर बढ़ना चाहते हैं वो सलीका भी बाज़ार ने ही तय किया है। बिना किसी सोच के, बिना किसी विचार के हम वो करते जा रहे हैं जिसे बाज़ार ने तय किया है। बाज़ार तो चाहता है कि आप कुछ सोचें नहीं, कुछ सवाल खड़ा नहीं करे और जो तय है उसे करते जाएँ। तय तो यही है कि आप रात दिन लगे रहे काम काम पर, कुछ दिन कि छुट्टी आपको इतना पीछे कर देगी कि आपसे वे सब आगे निकल जायेंगे जो आपसे पीछे थे।&lt;br /&gt;पर आज एक बार फिर सोच लें, इस दौड़ में आपके साथ कौन-कौन हैं, कौन पीछे छूट गया, पीछे मुड़ कर देख ले तो जरा।&lt;br /&gt;अरे!!!! ये क्या, हम २०१० में आ गए और हमारी जिंदगी २००९ में रह गयी, नहीं-नहीं शायद उससे भी पीछे १९९० के पहले। ओह!!! ये क्या हो गया। हम इतने आगे निकल आये - नदी छूट गयी, हमारी जिंदगी छूट गयी।&lt;br /&gt;चलो हम  मुड़ चले, ले आयें अपनी नदी को, अपनी ज़िन्दगी को।</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2010/01/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-7984600932390901247</guid><pubDate>Mon, 11 Aug 2008 12:54:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-11T19:10:24.738+05:30</atom:updated><title>कभी-कभार</title><description>&lt;span class=&quot;&quot;&gt;कभी-&lt;/span&gt;कभार शीर्षक से आप यह न समझ बैठना कि मैंने अशोक जी के कॉलम पर कुछ लिखने का निर्णय लिया है। बात इससे बिल्कुल जुदा है। कभी कभार क्या से क्या हो जाता है, कुछ समझ में नहीं आता। आखिर यह कभी कभार का काल आता क्यूं है। पर इसको कभी कभार आना होता है तो आएगा ही, बचना मुश्किल है। इस कभी कभार वाले काल से गुजरते हुए बहुत खुश रहने वाला उदास हो जाता है तो उदास रहने वाला खुश हो जाता है। होने को तो कोई भी कारण हो सकता है पर कभी कभार कारण को पहचान पाना मुश्किल हो जाता है और ऐसा होता भी कभी कभार ही है। कल के दिन घंटों झील के किनारे सचिन बुन्देलखंडी के साथ बैठा रहा और कई बातें हुई, साथ ही मैंने फिशिंग करने की कोशिश भी कि पर एक भी हाथ नहीं आई। पूरे तालाब में कितनी मछलियाँ होंगी, एक अनुमान लगाया, पर मेरे हिस्से कि नहीं थी तो कांटे में नहीं आई। खैर, बात कभी कभार की हो रही थी और मैं आपको तालाब पर लेकर चला गया। वो भी भोपाल के बड़े तालाब पर, जहाँ जाकर लौटने को मन नहीं करता। पर कभी कभार ऐसा ही होता है, जाना कही और होता है और हम चले कही और जाते हैं। वापस आने की चाह होती है पर कभी कभार हम इतना आगे चले जाते है कि वापस आने के लिए कभी कभार बहुत सोचना पड़ता है। कभी कभार तो लौट ही नहीं पाते और कभी कभार जल्दी निर्णय ले लेते है वापसी का। बाज़ार भी तो है जो रोक देता है कोई भी नए निर्णय लेने से। पर बाज़ार भी क्या करे, उसकी तो आदत है। गलती तो अपनी  है कि हम उसके रस्ते चल पड़ते है। कभी कभार रास्ता बदलना भी पड़ता है और कभी कभार रास्ता ख़ुद ब ख़ुद बदल जाता है। रास्ता कभी कभार क्यूं बदलना पड़ता है यह समझ में नहीं आता या फिर जी चाहता है समझ कर भी नहीं समझा जाए।  हालत कभी कभार मुश्किल में होते है और कभी कभार कुछ सूझता नहीं किया क्या जाए। बहुत कुछ करने के बाद भी कभी कभार नतीजा सिफर ही होता है और कभी कभार... । कभी कभार मौसम भी  और कभी कभार अपने भी.... साथ।  &lt;span class=&quot;&quot;&gt;खैर &lt;/span&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;/span&gt;कभी कभार आप भी सोचे की कभी कभार ऐसा क्यों होता है।</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2008/08/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-400330008977051012</guid><pubDate>Fri, 25 Apr 2008 14:43:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-25T21:24:20.604+05:30</atom:updated><title>क्रिकेट के पहले और बाद में</title><description>भारत में खेलों की संख्या इतनी ज्यादा रही है कि उसकी गिनती तो दूर उतने खेलों में भाग लेना भी एक व्यक्ति के लिए मुश्किल रहा है। क्रिकेट की लोकप्रियता के पहले ग्रामीण अंचलों मे कई ऐसे खेल थे, जिन्हें खेलते हुए हम पले-बढ़े हैं पर ज्यों-ज्यों क्रिकेट लोकप्रिय होता गया हम (मैं) उन खेलों याद तो कर पाते हैं पर उनके नाम याद करने के लिए दिमाग पर जोड़ देना पड़ता है। बहुत ही मजेदार खेल हुआ करते थे, जो खेतों और बगीचा से जुड़े हुए थे। &lt;br /&gt;आंखमिचौली सबसे लोकप्रिय खेल हुआ करता था, जब शाम को सारे बच्चे इकट्ठे होकर गलियों में धूम मचाया करते थे। बगीचे में दोल्हा-पाती (पेड़ की डालियों पर लटकना और कूदना) खेलते हुए पेड़-पत्तों से दोस्ती करने का मजा ही कुछ और था। लौटते वक्त रास्तें के किसी खेत से मूली, गाजर, बैंगन, टमाटर, भिंडी आदि को कच्चे खाने का आनंद ही कुछ अलग था। स्कूलों में कबड्डी और बुढ़िया कबड्डी सबसे लोकप्रिय। हां, कांचा को तो मैं भूल ही गया। और भी न जाने क्या-क्या।&lt;br /&gt;यह मानना थोड़ा दुखदायी होगा कि क्रिकेट के बाद इन खेलों का अस्तित्व शायद ही बच पाएगा। हम इस बात का जिक्र &lt;a href=&quot;http://suratehal.blogspot.com/2008/04/blog-post_25.html&quot;&gt;पहले के पोस्ट&lt;/a&gt; में कर चुके हैं कि क्रिकेट को बढ़ाने में बाजारवाद का सबसे बड़ा हाथ है। &lt;br /&gt;आखिर इन खेलों में क्या खास रहा है कि इनके नहीं रहने से बाजार को लाभ मिलेगा। सारे खेलों की बात हम नहीं करें तो भी हम उपरोक्त तीन खेलों को केन्द्र में रखकर अपनी बात को आगे बढ़ाएं। &lt;br /&gt;बाजारवाद का यह मूलमंत्र होता है कि सामूहिकता को तोड़ा जाए। यदि गलियों में बच्चे एक साथ खेलेंगे तो उनमें सामूहिकता की भावना तो आएगी ही पर यदि इस खेल को खत्म करने के लिए दूसरे खेलों को बढ़ावा दिया जाए तब क्या होगा? रोज क्रिकेट। कभी किसी के साथ, तो कभी किसी के साथ, नए-नए रूप में। तो बच्चे गलियों में निकलेंगे या टी.व्ही. सेट से चिपके रहेंगे। एकल परिवार में उपभोक्तावाद को बढ़ाने में मदद तो मिलेगा ही।&lt;br /&gt;दूसरा महत्वपूर्ण खेल है पेड़-पौधों के साथ। इस खेल को खेलने से कहीं न कहीं बच्चों को अपने प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ाव महसूस करते हैं। यदि उनका प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ाव हो गया, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां संसाधनों का दोहन कैसे कर पाएंगी।&lt;br /&gt;तीसरा मामला स्कूल में खेले जाने वाले खेलों से जुड़ा है। अफसोसजनक बात है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए कमरे नहीं है, तो खेल का मैदान कहां से आएगा। यदि इन खेलों को बढ़ावा दिया जाएगा, तो इसके लिए स्कूलों में खेल के मैदान की मांग उठेगी। फिर बात बढ़ेगी और बेहतर शिक्षा की मांग उठेगी। क्या इससे सरकार को परेशानी नहीं होगी, क्या शिक्षा के व्यापार में उतरी कंपनियों को झटका नहीं लगेगा?&lt;br /&gt;उम्मीद है कि इन बातों को जानकर आप नए सिरे से इस मामले को समझ पाएंगे कि खेल की दुनिया में क्या हो रहा है और लिखे हुए से आगे की बात सोचेंगे।&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia&lt;/a&gt;, &lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia1&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2008/04/blog-post_998.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-2691679834033191607</guid><pubDate>Thu, 24 Apr 2008 18:34:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-25T00:06:46.575+05:30</atom:updated><title>क्रिकेट का बाजार भाव</title><description>पिछले दिनों से क्रिकेट में एक बूम आया है २० ट्वेंटी को लेकर। यह क्रिकेट का आधुनिकतम रूप है। इस पर यह बहस चलाई जा रही है कि सभ्य लोगों के खेल में इस तरह का बदलाव सही नहीं है। इसे बिकनी क्रिकेट कहा जा रहा है। यह ग्लैमर से भरपूर है। भारतीय दर्शकों के लिए जो क्रिकेटरों को भगवान मानते हैं और क्रिकेट की पूजा करते हैं यह बहुत ही रोमांचक बदलाव की तरह लग रहा है। यद्यपि कुछ पुराने क्रिकेटरों की तरह पुराने दर्शक यानी क्रिकेट प्रेमी इस बदलाव से नाखुश है। अब तो सचिन तेंदुलकर ने भी यह कह दिया कि इससे एकदिवसीय क्रिकेट का नुकसान होगा पर टेस्ट क्रिकेट का नहीं। कुछ इस तरह की आशंका उस समय भी जाहिर की गई थी, जब एकदिवसीय क्रिकेट को लाया गया था।&lt;br /&gt;जब एकदिवसीय क्रिकेट की अवधारणा को मूर्त रूप दिया जा रहा था तब उसके पैरोकारों ने यह कहा था, कि इससे क्रिकेट का पूरी दुनिया में विस्तार होगा। ऐसा हुआ नहीं। अब भी 20 ट्वेंटी के पैरोकार इसी बात की दुहाई दे रहे हैं।&lt;br /&gt;यदि इस खेल की बारीकियों को देखा जाये तो पता चलता है कि इसके पैरोकारों को क्रिकेट के विस्तार से कुछ लेना-देना नहीं है बल्कि यह बाजार के विस्तार का खेल है। ग्लैमर से भरपूर क्रिकेट के इस नवीनतम रूप में जिस तरह से खिलाड़ियों की बोली लगाई गई और इससे फिल्मी सितारों को जोड़ा गया है, वह इस बात की पुष्टि करता है। चुंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार ने तीसरी दुनिया में व्यापक विस्तार पा लिया है और उसे उपभोक्ताओं को रिझाने के लिए कई हथकंडे अपनाने पड़ रहे हैं। भारत जैसे विशाल मार्केट वाले देश में क्रिकेट बाजार को विस्तार देने के लिए एक महत्वपूर्ण जरिया है और इसे प्रमोट करने में दुनिया की नामी-गिरामी कंपनियों में होड़ मची हुई है। इस खेल को धन का खेल कहा जाता है। क्रिकेट सटोरियों का भी प्रिय खेल है और कई ऐसे स्कैंडल देखने को मिलते रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि क्रिकेट को बढ़ावा देने के पीछे खेल भावना का मामला नहीं है बल्कि सिर्फ बाजार के विस्तार का मामला है। यदि ऐसा नहीं होता तो क्यों सिर्फ इसी खेल को प्रमोट करने और इसके खिलाड़ियों को ज्यादा तव्वजों दिए जाने के मामले हमारे सामने होते।&lt;br /&gt;हमें यह देखना होगा कि खेल और ग्लैमर को अलग-अलग करने के लिए किस तरह की नीतियों की जरूरत होगी। खिलाड़ियों को विज्ञापनों में काम करने के मामले को लेकर भी नए सिरे से बहस चलाने की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia&lt;/a&gt;, &lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia1&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2008/04/blog-post_25.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-1199259357608741587</guid><pubDate>Thu, 24 Apr 2008 18:27:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-24T23:58:15.645+05:30</atom:updated><title>बाजार की आंधी और आधी आबादी</title><description>पिछले कई दिनों से दोस्तों के बीच यह चर्चा का विषय रहा है कि क्या महिलाओं को उनके अधिकार मिल पाएंगे। यदि मिलेंगे तो किस प्रकार से - मांगने से या छिनकर। मांगने से अधिकारों का मिलना संभव नहीं दिखता, ऐसी राय सबकी थी पर छिनने के प्रति भी किसी ने सहमति नहीं दिखाई। संभवत: हमारा पुरुष होना इसका कारण रहा हो।&lt;br /&gt;यदि इस बहस में नहीं पड़ा जाए तो भी भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के बाद एक व्यापक बदलाव देखने को मिला है, वह यह कि महिलाएं पुरुषों न तो अधिकार मांग रही है और न ही छिन रही है बल्कि अपने अधिकारों का उपयोग खुद से आगे बढ़कर कर रही है। इस प्रक्रिया में यह साफ दिख रहा है, पुरुषों के सहारे के बिना या उनसे उलझे बिना महिलाओं को अधिकारों से लैस हो जाने पर पितृसतात्मक समाज उसे स्वीकार नहीं कर रहा है। &lt;br /&gt;यदि बिना विस्तार में गए कारणों को देखा जाए तो दो कारण साफ नजर आ रहे हैं। पहला यह कि समाज की मानसिकता में कोई बदलाव नहीें आया है और वह महिलाआेंं को उनके पुराने रूप में देखना चाहता है। दूसरा यह कि बाजारीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है और इसमें महिलाओं को कमोडिटी के रूप  में इस्तेमाल बढ़ा है। ऐसे में महिलाओं पर हिंसा तेज हुई है। बाजार और पितृसतात्मक समाज की दोनों तरफ से। &lt;br /&gt;इन स्थितियों को देखकर यह साफ लगता है कि बाजारवाद के खिलाफ आंदोलन तेज करना होगा और पुराने समाज की मानसिकता के खिलाफ लड़ाई तेज करनी होगी। तभी संभव की आधी आबादी अपने अधिकारों से लैस होगी।&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia&lt;/a&gt;, &lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia1&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2008/04/blog-post_6086.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-8080937187478079114</guid><pubDate>Thu, 24 Apr 2008 17:41:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-24T23:36:55.263+05:30</atom:updated><title>महिला स्वास्थ्य की चुनौतियां</title><description>मध्यप्रदेश में महिला स्वास्थ्य में सुधार लाना एक चुनौती है। यह चुनौती संसाधनों की कमी के कारण नहीं पैदा हुई बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, स्वास्थ्य सेवाओं के निचले ढांचे में सुधार का अभाव और विभिन्न योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाने के कारण है। यह साफ नजर आ रहा है कि जमीनी स्तर पर महिला स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए विकल्पों पर विचार नहीं किया जा रहा है। यद्यपि पिछले दशकों की तुलना में मातृत्व मृत्यु दर में कमी देखी जा रही है पर इसके बावजूद प्रदेश में अभी भी प्रति वर्ष 7700 मातृत्व मृत्यु हो रही है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों के तहत भी महिला स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके तहत यह निहित है कि वर्ष 2015 तक मातृत्व मृत्यु को तीन चौथाई कम करना है। यदि सरकारी आंकड़ों को ही देखें, तो 10 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश में मातृत्व मृत्यु का औसत 498 प्रति लाख था, जो कि वर्तमान में 379 प्रति लाख के स्तर पर आ गया है। मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य नीति के अनुसार वर्ष 2011 तक मातृत्व मृत्यु दर को 220 प्रति लाख के स्तर तक लाना है। यह लक्ष्य 1997 के 498 प्रति लाख मातृत्व मृत्यु दर के आधार पर रखा गया था। मीडियम टर्म हेल्थ सेक्टर स्ट्रेटजी- 2006 में 2005 की स्थिति में मातृत्व मृत्यु दर 400 प्रति लाख माना गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार बार-बार यह दर्शाने की कोशिश कर रही है कि प्रदेश में महिला स्वास्थ्य में व्यापक सुधार हुआ है। यह सही है कि जितनी योजनाएं चल रही है, उसका बेहतर क्रियान्वयन हो तो निश्चय ही गुणात्मक सुधार देखने को मिलेगा पर स्वास्थ्य विभाग का निचला ढांचा इतना कमजोर हो गया है कि इस दावे पर विश्वास करना संभव नहीं है कि प्रदेश में महिला स्वास्थ्य में व्यापक सुधार हुआ है। सरकार स्वयं इस बात को स्वीकार कर रही है कि प्रदेश में डॉक्टरों की भारी कमी है, खासतौर से महिला डॉक्टरों की तब महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य कैसे मिल रहा है? पिछले विधान सभा सत्र में महिला डॉक्टरों की कमी को लेकर बहुत कम समय के लिए, पर गंभीर चर्चा हुई थी, जिसमें यह कहा गया कि आयुष की महिला डॉक्टरों को प्रशिक्षित कर उन्हें ग्रामीण अंचलों में पदस्थ कर महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएगी पर अभी तक इस पर क्या हुआ, की जानकारी किसी को नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है, बल्कि इस पर अमल करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के प्रयास और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को निजी क्षेत्र को सौंपना, दोनों विरोधाभाषी काम है। स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपना, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की प्रक्रिया को उल्टी दिशा में ले जाने वाला कदम है। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण करने से तमाम सरकारी दावों के बावजूद महिला एवं बाल स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, तब न मातृ मृत्यु में कमी लाई जा सकती है और न ही बाल मृत्यु में। यह प्रदेश के लिए दुखद बात है कि बढ़ती आबादी के अनुपात में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार नहीं किया गया। इस स्थिति को सुधारने के बजाय इसे निजी हाथों में देने की तैयारी का अर्थ आम लोगों से स्वास्थ्य के बुनियादी अधिकार को छिनने की साजिश ही हो सकती है। अभी भी जिन समुदायों एवं इलाकों में महिला एवं बाल मृत्यु ज्यादा है, उन इलाकों से स्वास्थ्य केन्द्रों तक आना लोगों के लिए खर्चीला काम है, इस पर भी यदि स्वास्थ्य सेवाओं को निजी कर दिया गया, तो लोग स्वास्थ्य केन्द्रों में जाने के बजाय नीम-हाकिम एवं बाबाओं की शरण में ही जाएंगे। उसके बाद स्वास्थ्य की स्थिति सुधरेगी या फिर बिगड़ेगी, आसानी से समझा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि इन तथ्यों को देखा जाये, तो पता चलता है कि प्रदेश में मातृत्व स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए नीतिगत प्रयासों की ज्यादा जरूरत है। वर्तमान में सरकार मातृत्व स्वास्थ्य के लिए कई योजनाएं संचालित कर रही है, जिसमें - जननी सुरक्षा योजना, गर्भवती महिला हेतु सुविधा, संस्थागत प्रसव योजना, प्रसव हेतु परिवहन एवं उपचार योजना प्रमुख हैं। पर सवाल यह है कि इन योजनाओं का लाभ उन्हें मिल पा रहा है या नहीं। सिर्फ यही नहीं, बल्कि अस्पताल प्रबंधन का रवैया, गरीबी, अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव आदि कई कारण हैं, जो माहिला स्वास्थ्य में सुधार लाने की दिशा में चुनौती हैं।&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia&lt;/a&gt;, &lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia1&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2008/04/blog-post_5514.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-8634881625317923902</guid><pubDate>Wed, 23 Apr 2008 16:52:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-23T22:57:53.654+05:30</atom:updated><title>मीडिया की जनपक्षधरता</title><description>वर्तमान मीडि‍या न केवल बाजार के दबावों को झेल रही है बल्‍कि‍ सत्‍ता एवं अराजक तत्‍वों का भी दबाव उस पर बढ़ा है।  यह एक बड़ी वि‍डंबना है कि‍ यदि‍ मीडि‍या इन दबावों के बाद भी अपनी जनपक्षधरता के साथ चलना चाहे तो उसे अपने ही लोगों की आलोचना का शि‍कार होना पड़ता है। मीडि‍या बाजार के साथ कदम ताल करे और उसके बाद अपनी मजबूरी को जाहि‍र करे, इस बात को भी नजरअंदाज कि‍या जा सकता है, पर यदि‍ दूसरे अखबार या चैनल उसके जैसा चरि‍त्र नहीं रखना चाहे तो उसे खारि‍ज करने वालों में सबसे आगे उसके साथी माध्‍यम वाले ही होंगे। इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण नजर आ रहा है, वह यह है कि‍ यदि‍ कोई अखबार या चैनल यह संदेश देना चाहे कि‍ पाठक या दर्शकों की पसंद को वे प्रस्‍तुत करते हैं, तो वह झूठा साबि‍त होगा। यह मीडि‍या के साथ एक बड़ी समस्‍या है, न वह खुद जनपक्षीय रहना चाहती है और न ही अपने दूसरे बि‍रादराना माध्‍यमों को। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोपाल से प्रकाशि‍त दैनिक जागरण अखबार के बारे में कुछ दिन पूर्व एक विश्‍लेषक ने अपनी टिप्पणी कुछ इस तरह से दी - पिछले छह-सात दिनों में अंदर के पृष्ठों पर घुटन, संत्रास और पीड़ा झलक रही है, जो अपमार्केट होते जा रहे अखबारों में फिट नहीं बैठती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह महज एक टिप्पणी भर नहीं है बल्कि वर्तमान दौर की पत्रकारिता, मीडिया का रूख और बाजार के दबावों का वि‍श्‍लेषण है, जिसके माध्यम से हम इस बात का आकलन कर सकते हैं कि मीडिया किसके पक्ष में खड़ा है। सामान्य रूप से देखने में यह लगता है कि अखबार के लिए यह आलोचना है, पर यदि इसे आलोचना मान लिया जाए तो भी यह एक नई बहस को जन्म देता है कि आखिर क्या कारण रहा है कि भोपाल जागरण को अपमार्केटिंग के इस दौर में डाउनमार्केटिंग की दिशा में जाना ज्यादा बेहतर लग रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बिल्कुल सही है कि पिछले कुछ दिनों से जागरण का मिजाज बदला हुआ नजर आ रहा है, जिस पर आम जन की निगाहें तो जा ही रही है, साथ ही साथ अन्य अखबारों में भी चर्चाओं का दौर चल रहा है। इतना ही नहीं, अखबार के भीतर भी बहस का दौर जारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दबाव समूहों को नजरअंदाज करते हुए संपादक का यह निर्णय काबि‍ल-ए-तारि‍फ है कि सामाजिक प्रतिबद्वता से विचलन नहीं होगा और अखबार का रूख आंतरिक एवं बाह्य दबावों के बीच मानवीय रहेगा। संपादक ने सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्वता जाहिर करते हुए दो बार अपील भी प्रकाशि‍त की और प्रदेश के बौद्विक तबका से इस बात का आग्रह किया कि वे अपने लेखन से वंचित तबके की आवाज लाएं, जागरण उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम बनेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह है कि क्या अखबार का यह बदलाव यूं ही हो गया है या फिर इसके पीछे कोई प्रक्रिया रही है। नि:संदेह वर्तमान दौर की परिस्थितियां अखबार में ऐसे बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं। समाज में जिस तरह से अधिकारों को लेकर सजगता बढ़ी है और इसके लिए आमजन लगातार संघर्ष कर रहे हैं, उस परिस्थिति में अखबार द्वारा उनका नजरअंदाज किया जाना मुश्‍कि‍ल लगता है। यदि जनमुद्दों से अखबारों की दूरी बरकरार रही तो इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि पाठक अखबार का विरोध करना शुरू कर दें। सबसे अहम पहलु विश्‍वसनीयता और उत्तरदायित्व को लेकर है। अपमार्केट के दौर में जो खबरें परोसी जा रही हैं, उन खबरों क्या विश्‍वसनीयता होगी, क्या लोगों में अब इस बात की चर्चा नहीं होने लगी है कि मीडिया का विश्‍वास करना कठिन है। हिन्दी अखबारों के सामने एक अहम सवाल यह भी तो है कि उनके पाठक वर्ग में भी बदलाव आ रहा है और जो नया वर्ग है वह किसी न किसी रूप  में जन सरोकारों से वास्ता रखता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दैनिक जागरण ने जो राह अख्तियार किया है, उस पर वह लम्बे समय से टिका हुआ है। किसी टे्रंड को बदलने के लिए संयम की जरूरत होती है। संभव है कि इसके एवज में जागरण को कई लोगों का आलोचना भी झेलना पड़े, पर इसका अर्थ यह कतई नहीं लगाना चाहिए कि जो बदलाव किया गया है, वह सही दिशा में नहीं जा रहा है या फिर अपमार्केट के दौर में वह फिट नहीं है बल्कि इसकी ज्यादा संभावना है कि अखबारों के अपमार्केट में जाने की राह भी यही से निकलेगी और संभवना से इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले समय में अन्य अखबार भी इसी राह पर चलेंगे। हां, इस बदलाव पर कायम रहने के लिए दृढ़निश्‍चयी होना जरूरी है और इस प्रक्रिया को लंबे समय तक चलाये रखना भी जरूरी है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाजार के पैरोकार प्रचारित कर रहे हैं, विकास के मुद्दों पर बात करने की क्या जरूरत है, विकास की खबरों को पढ़ता कौन है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर भोपाल जागरण के इस उत्तरदायित्वबोध के कारण उसकी विश्‍वसनीयता में भी इजाफा हुआ है। समाज के वंचित और बहिष्कृत समुदाय के मुद्दे को अखबार में स्थान देते हुए उनकी आवाज को मुखरता देते हुए इसने सही मायने में मानवीयता को महत्व दिया है, जिसके गुम हो जाने की चिंता आज हर किसी को सता रही है।&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia&lt;/a&gt;, &lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia1&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2008/04/blog-post_23.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-4524427907672760136</guid><pubDate>Tue, 22 Apr 2008 15:30:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-22T21:43:56.429+05:30</atom:updated><title>श्‍वास, ब्‍लैक और तारे जमीं पर</title><description>पि‍छले तीन वर्षों में तीन अच्‍छी फि‍ल्‍में आईं - श्‍वास, ब्‍लैक और तारे जमीं पर। तीनों ही फि‍ल्‍मों में एक समानता थी, वह यह कि‍ इनकी वि‍षय-वस्‍तु बच्‍चों से जुड़ी है। फि‍ल्‍मांकन, छायांकन, संवाद, सीन, कहानी सभी मामले में ये फि‍ल्‍में सशक्‍त थी। बॉक्‍स ऑफि‍स पर श्‍वास थोडी पीछे रही पर ब्‍लैक और तारे जमीं पर ने तो अपने को सफल फि‍ल्‍मों में शुमार करवा लि‍या। श्‍वास को भले ही ब्‍लैक और तारे जमीं पर जि‍तनी सफलता नहीं मि‍ली हो पर उसे ऑस्‍कर की दौड़ में शामि‍ल होने का सौभाग्‍य जरूर मि‍ल गया। यद्यपि‍ उसे ऑस्‍कर तो नहीं मि‍ला पर वैश्‍ि‍वक ख्‍याति‍ जरूर मि‍ल गई।&lt;br /&gt;तीनों फि‍ल्‍मों को समीक्षकों ने मुक्‍तकंठ से प्रशंसा की पर इनमें जो बुनि‍यादी अंतर है, उसकी ओर कि‍सी का ध्‍यान नहीं गया। श्‍वास में एक ऐसे बच्‍चे की कहानी को दर्शाया गया है, जो गांव के वातावरण से आता है और जि‍सकी आर्थिक स्‍ि‍थति‍ बहुत बेहतर नहीं है। इसमें दर्शाये गए संघर्ष की थीम दूसरी फि‍ल्‍मों की तरह नहीं है पर इसके बावजूद तुलना इसलि‍ए जायज है कि‍ तीनों फि‍ल्‍मों का दौर एक है। अन्‍य दो फि‍ल्‍मों (ब्‍लैक और तारे जमीं पर) के बच्‍चे उच्‍च आय वर्ग के परि‍वार के हैं और उनके लि‍ए एक शि‍क्षक रखना या बोर्डिंग स्‍कूल में अपने बच्‍चे को भेजना आसान है पर सामान्‍य परि‍वार या ग्रामीण परि‍वेश के बच्‍चों के जीवन में ऐसा परि‍वर्तन कि‍स तरह से आएगा, इसका हल ढूंढने में ये फि‍ल्‍में नाकाम है।&lt;br /&gt;गांवों की शालाएं आज भी मूलभूत सुवि‍धाओं से वि‍हीन हैं, शि‍क्षक ढूंढे नहीं मि‍लते। इन हालात में ब्‍लैक और तारे जमीं पर के शि‍क्षकों जैसे शि‍क्षक मि‍लना उन बच्‍चों के लि‍ए तारे तोड़ कर लाने जैसा है।&lt;br /&gt;इस बात पर शक नहीं कि‍ ब्‍लैक और तारे जमीं पर ने अपने समय के सशक्‍त सवालों को उठाया है पर परि‍वेश के अभाव में या यूं कहे कि‍ बाजार के दबाव में ये एक खास वर्ग का प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करती नजर आती है।&lt;br /&gt;&lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia&lt;/a&gt;, &lt;a href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia1&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2008/04/blog-post_5394.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-5753337785633871844</guid><pubDate>Tue, 22 Apr 2008 14:20:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-22T20:48:10.112+05:30</atom:updated><title>नये दौर में नया दौर</title><description>फि‍ल्म नया दौर में अभि‍नेता दि‍लीप कुमार ने अपने बेहतर अभि‍नय से पूरे देश का ध्‍यान अपनी ओर आकर्षित कि‍या था। वाकई उनका अभि‍नय इस फि‍ल्‍म में देखने लायक है। लेकि‍न बात यहीं खत्‍म होने के बजाय यहीं से शुरू होती है। यह फि‍ल्‍म उस दौर की है, जब देश के वि‍कास की गति‍ दी जा रही थी। फि‍ल्‍म को देखते ही पहली नजर में इस बात का अहसास हो जाता है कि‍ इस पर नेहरूयीन समाजवाद का मुलम्‍मा चढा हुआ है।&lt;br /&gt;उस दौर की अधि‍कांश फि‍ल्‍में कुछ ऐसी ही हुआ करती थी पर हम बात न तो राज कपूर की करेंगे, न मनोज कुमार की और न ही दि‍लीप कुमार की। हम यहां सि‍र्फ फि‍ल्‍म की कहानी की ओर ध्‍यान दि‍लाना चाहते हैं। कहानी का मूल सार यह है कि‍ इसमें एक पूंजीपति‍ है, जो अपनी पूंजी का वि‍स्‍तार करना चाहता है और इसके लि‍ए वह नई-नई मशीनों को अपनी फैक्‍टरी में लगाता है और मजदूरों को नि‍काल देता है। गांव के अधि‍कांश लोग बेरोजगार हो जाते हैं। मालि‍क और मजदूर के बीच संघर्ष चलता है पर हि‍न्‍सक नहीं। फि‍ल्‍म का मुख्‍य केन्‍द्र मशीन और मानव के बीच के संघर्ष को दि‍खाना है। अंत में यह दिखाया जाता है कि‍ मानव की जीत होती है। संदेश यह है कि‍ मनुष्‍यों को हटाकर मशीनें न लगाई जाय बल्‍ि‍क मशीनों को सहयोगी की भूमि‍का में देखा जाय। वि‍कास के लि‍ए मशीनों को खारि‍ज करने के बजाय उसके बेहतर इस्‍तेमाल पर जोर दि‍या गया है।&lt;br /&gt;आज के दौर में इस फि‍ल्‍म को युवा पीढी न तो पसंद करेगा और न ही इस फि‍ल्‍म को प्रमोट कि‍या जाएगा। 1990 के बाद की दुनि‍या में ऐसी फि‍ल्‍में रूकावट मानी जाएगी। वजह साफ है, वैश्‍ि‍वक पूंजी के खि‍लाफ है यह फि‍ल्‍म।&lt;br /&gt;दुखद बात यह है कि‍ आज फि‍ल्‍मों को कला के ढांचे में बांध कर रखने की कोशि‍श की जा रही है। यह साजि‍श है। कला कि‍सके लि‍ए है क्‍या आम आदमी से या फि‍र समाज से कट कर कला जीवि‍त रह सकती है। यह वि‍चार करने की जरूरत है। साजि‍शन ऐसी फि‍ल्‍मों को समाज से बाहर कि‍या जा रहा है। नये दौर में नया दौर जैसी फि‍ल्‍मों की बहुत जरूरत है तमाम खामि‍यों के बावजूद। वैश्‍वीकरण की प्रक्रि‍या से लडने में ऐसी कला की जरूरत है जो अपनी तमाम व्‍यावसायि‍कता के बाद भी जनपक्षीय हों। &lt;a href=&quot;&lt;a onclick=&quot; href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;http://technorati.com/tag/blogathonindia&lt;/a&gt;&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia&lt;/a&gt;, &lt;a href=&quot;&lt;a onclick=&quot; href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia1&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;http://technorati.com/tag/blogathonindia1&lt;/a&gt;&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2008/04/blog-post_22.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-7633209381574106173</guid><pubDate>Mon, 21 Apr 2008 15:51:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-21T21:57:01.721+05:30</atom:updated><title>सूखी धरती पर राजनीति की फसल</title><description>मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में भयावह सूखा पड़ा है पर लोगों को राहत नहीं मिल रहा है। इस क्षेत्र में न खाने को अन्न है और न ही पीने को पानी। विकल्प सिर्फ़ एक ही है - पलायन। लोगों का पलायन जारी है और उन्हें रोकने के लिए किए जा रहे तमाम उपाय नाकाम हैं। हाल ही में कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी ने इस क्षेत्र का दौरा कर राजनीति को गरमा दिया है। भाजपा, कांग्रेस और बसपा में राजनीतिक खिंचातानी शुरू हो गई है। लोग एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं पर लोगों को राहत नहीं मिल रहा है। पानी के लिए महिलाओं को आधा दिन बिताना पड़ता है, तब जाकर वे चार-छः घड़ा पानी जुटा पाती आती है। मवेशियों को लोग खुला छोड़ रहे है। कोई विकल्प नहीं है। लोग कर्ज में डूब गए हैं। बुजुर्ग भूखमरी के कगार पर हैं। पर किसी पार्टी में एकजुट होकर हल निकालने और राहत पहुँचाने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है उल्टे सूखी धरती पर राजनीति की फसल काटने की तैयारी हो रही है, क्योंकि कुछ महीने बाद ही मध्यप्रदेश में विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं।&lt;br /&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;&lt;a onclick=&quot; href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;http://technorati.com/tag/blogathonindia&lt;/a&gt;&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia&lt;/a&gt;, &lt;a href=&quot;&lt;a onclick=&quot; href=&quot;http://technorati.com/tag/blogathonindia1&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;http://technorati.com/tag/blogathonindia1&lt;/a&gt;&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;&lt;strong&gt;blogathonindia1&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2008/04/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-2821770377363135457</guid><pubDate>Sat, 05 Jan 2008 13:14:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-01-05T19:31:41.410+05:30</atom:updated><title>अधूरापन</title><description>मैंने एक बार फिर आपके लिए कविता पोस्ट की है, पर इस पर विचार करने की जरूरत है। मैं चाहता हूँ कि इसे &lt;a href=&quot;http://naiebaraten.blogspot.com/&quot;&gt;सचिन लुधियानवी&lt;/a&gt; &#39;गौर&#39; से पढ़ें। हाँ, मैं अगली पोस्ट में ३१ दिसम्बर और बाज़ार पर बात करूँगा। यह बहुत जरूरी है। बाज़ार ने आदमी और आदमी के बीच दूरी बढ़ाने के साथ-साथ उनके बीच अविश्वास भी बढ़ाया है। बात करेंगे हम। इंतजार करिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-size:180%;color:#ff0000;&quot;&gt;अधूरापन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात के बाद&lt;br /&gt;अगली सुबह&lt;br /&gt;नई होती है मेरे लिए&lt;br /&gt;बार-बार इस अहसास से&lt;br /&gt;कि पुनर्जन्म हुआ है&lt;br /&gt;बीता हुआ कल&lt;br /&gt;बीती सदी की तरह लगता है&lt;br /&gt;अधूरे कामों की फेहरिस्त&lt;br /&gt;लंबी हो जाती है&lt;br /&gt;बीते कल से जुड़ने का जरिया बन जाते हैं अधूरे काम&lt;br /&gt;पीढ़ी-दर-पीढ़ी&lt;br /&gt;अधूरे कामों को पूरा करते आ रहे हैं हम&lt;br /&gt;काम को पूरा करना अकेले के बस में नहीं&lt;br /&gt;इस तरह अधूरे काम जोड़ते हैं&lt;br /&gt;पिछ्ले दिन को अगले दिन से&lt;br /&gt;पिछली पीढ़ी को अगली पीढ़ी से&lt;br /&gt;आदमी को आदमी से</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2008/01/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-200955990544486911</guid><pubDate>Sat, 22 Dec 2007 14:39:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-12-22T20:28:39.713+05:30</atom:updated><title>समकालीन विडंबना</title><description>एक कविता इस ब्लोग पर मैं फिर दे रहा हूँ। सवाल यह है कि लेख क्यों नहीं, वह इसलिए कि, जो मैं कहना चाहता हूँ उसके लिए आप सभी को  हजार शब्द पढ़ने के लिए क्यों कष्ट उठाने दूँ, यह कविता उसकी अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त है। पढे और प्रतिक्रिया करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;font-size:130%;&quot;&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(255, 0, 0);&quot;&gt;समकालीन&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(255, 0, 0);&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(255, 0, 0);&quot;&gt;विडंबना&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 153, 0);&quot;&gt;मुझे&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 153, 0);&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 153, 0);&quot;&gt;कुछ&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 153, 0);&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 153, 0);&quot;&gt;करना&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 153, 0);&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(0, 153, 0);&quot;&gt;चाहिए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(255, 204, 51);&quot;&gt;सिवाए&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(255, 204, 51);&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(255, 204, 51);&quot;&gt;सोचने&lt;/span&gt;  &lt;span style=&quot;color: rgb(255, 204, 51);&quot;&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span style=&quot;color: rgb(255, 204, 51);&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(255, 204, 51);&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(204, 0, 0);&quot;&gt;मैं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(204, 0, 0);&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(204, 0, 0);&quot;&gt;कुछ&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(204, 0, 0);&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(204, 0, 0);&quot;&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(204, 0, 0);&quot;&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style=&quot;color: rgb(204, 0, 0);&quot;&gt;करता&lt;/span&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2007/12/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-6719085887509421042</guid><pubDate>Fri, 16 Nov 2007 15:16:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-05-24T11:34:55.009+05:30</atom:updated><title>खूबसूरत लड़कियां</title><description>खूबसूरत लड़कियां&lt;br /&gt;नहीं मिलती आसानी से&lt;br /&gt;होती हैं कई प्रतियोगिताएं&lt;br /&gt;मिस सिटी से मिस यूनिवर्स तक&lt;br /&gt;अब मिसेज भी होने लगी&lt;br /&gt;इसके बावजूद नहीं मिलती&lt;br /&gt;उनके चेहरे पर लि‍पे होते हैं&lt;br /&gt;प्रायोजकों के लेप&lt;br /&gt;हर अंग पर लिपटी होती है&lt;br /&gt;आयोजकों की चिंदियां&lt;br /&gt;फिर भी नहीं होती वे खूबसूरत&lt;br /&gt;उनके चेहरे पर चमकता है बाजार&lt;br /&gt;अंतत: खारिज हो जाती हैं अगले साल&lt;br /&gt;खूबसूरत लड़कियां नहीं मिलती प्रतियोगिताओं से&lt;br /&gt;खूबसूरत लड़कियां जूझती हैं जीवन से&lt;br /&gt;उनके चेहरे पर चमकती हैं पसीने की बूंदे&lt;br /&gt;उनके दिल में होती हैं निश्‍च्‍छलता&lt;br /&gt;नहीं जानती वे बाजार भाव&lt;br /&gt;वे  बिकाऊ नहीं होती</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2007/11/blog-post_16.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-5664400383519142481</guid><pubDate>Wed, 07 Nov 2007 15:51:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-05T12:34:50.039+05:30</atom:updated><title>भोपाल  भी आ गया मॉल की चपेट में</title><description>&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;नि:संदेह &lt;a href=&quot;http://www.bhelbhopal.com/bhopal_overview.htm&quot;&gt;भोपाल को जिन खूबियों&lt;/a&gt; के कारण जाना जाता था, उसमें एक बहुत ही महत्‍वपूर्ण खूबी यह थी कि भोपाल अपने को बाजार से बचाये रखा था। बड़े फख्र के साथ हम यह कहा करते थे कि भोपाल में कोई शॉपिंग मॉल नहीं है और न ही यहां के लोगों को इसकी जरूरत है। हां, कुछ लोग थे, जिन्‍हें मॉल से खरीददारी करने का शौक था और है भी, वे महज पांच घंटे की दूरी तय करके इंदौर जाते थे और वहां से खरीददारी करते थे। वे अभिमान के साथ कहा करते थे कि हम इंदौर के अमूक शॉपिंग मॉल से खरीददारी करके आये हैं। पर फिर भी हमारा अनुमान था कि भोपाल की बहुसंख्‍यक जनता मॉल को नहीं चाहती, और नहीं चाहती का मतलब नहीं चाहती।&lt;br /&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;&lt;br /&gt;पिछ्ले&lt;/span&gt; दिनों जब रिलायंस फ्रेश का भोपाल में विरोध हुआ था, तब लगा था कि की जनता विकास की अंधी दौड़ में शामिल नहीं होना चाहती, जिसमें समाज के वंचित तबके को जगह ही नहीं मिले और वह समाज से पूरी तरह बहिष्‍कृत हो जाए। क्‍योंकि शहरी विस्‍थापन इस पूंजीवादी व्‍यवस्‍था का एक क्रूर रूप है, जिसका एक महत्‍वपूर्ण घटक बाजारवाद भी है। इन परिस्थितियों में भोपाल को अपनी पुरानी पहचान को बनाये रखने के लिए यह जरूरी था कि उन शक्तियों का विरोध किया जाय, जो पहचान पर हमला करती हो। भोपाल राजधानी होते हुए भी व्‍यावसायिक गतिविधियों का केन्‍द्र नहीं रहा है। भोपाल के लोगों को इस बात का इल्‍म ही नहीं था कि सिर्फ नहीं चाहने भर से ही बाजार का विरोध नहीं हो सकता, बल्कि विरोध के तेवर साफ-साफ नजर भी आने चाहिए। पिछले कुछ समय से बड़ी-बड़ी कंपनियों के आउटलेट भोपाल में खुलते जा रहे थे, जो बाजार को हावी हो जाने के लिए रास्‍ता तैयार कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार भोपाल अपने को बाजार के हवाले कर ही दिया और यहां एक बड़ी कंपनी का मॉल खुल गया। मॉल का खुलना उतना आश्‍चर्यजनक नहीं था, जितना उसको मिले रिस्‍पांस को देखना आश्‍चर्यजनक था। एक साथ दर्जनों पेयमेण्‍ट काउण्‍टर पर दर्जनों की लाइन (बिलिंग के लिए)।&lt;br /&gt;भोपाल में प्रवेश कर चुकी यह मॉल संस्‍कृति का परिणाम क्‍या होगा, यह तो बाद की बात है, पर मंझोले एवं छोटे दुकानदारों के लिए मुश्किलों का दौर शुरू तो हो ही गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे दु:खद बात तो यह है कि अब मैं किसी से यह नहीं कह सकता कि भोपाल में मॉल नहीं है और यह शहर अभी भी अपने निम्‍न एवं मध्‍य वर्गीय चरित्र को जी रहा है।&lt;/div&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2007/11/blog-post_07.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-7825809919573940926</guid><pubDate>Tue, 06 Nov 2007 15:53:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-05T12:31:24.393+05:30</atom:updated><title>वंचितों पर बाजार का दबाव</title><description>&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;साल-दर-साल बाजार का विस्तार होता जा रहा है। बड़े शहरों से बाहर निकल कर बाजार गांवों में पहुंच चुका है. बाजार को जाति एवं वर्ग भेद से कोई लेना-देना नहीं है। वह बिना किसी भेदभाव के सभी को उपभोक्ता में बदल रहा है, क्या अमीर-क्या गरीब। उसके पास सभी के उपभोग के लिए छोटे-बड़े आयटम हैं। नहीं खरीद सकने वालों के लिए ऋण की व्यवस्था है - बहुत ही सरल एवं आसान किश्‍तों पर (ऋण लेने वाले इसकी सरलता जानते हैं)। यूं तो पूरे साल भर किसी न किसी बहाने बाजार लोगों को लुभाता है पर दशहरा से लेकर दीपावली के बीच बाजार आक्रामक हो जाता है। भारत में इस अवधि का अपना खास महत्व है और अभावों के बावजूद हर हाल में कुछ न कुछ खरीदारी का रिवाज है। तब जब बाजार हावी नहीं था, अभावग्रस्त समुदाय अति जरूरी समानों की खरीददारी करता था पर अब उन पर बाजार का दबाव हावी हो गया है। विभिन्न कंपनियां इतने लुभावने अंदाज में बाजार में आई हैं कि व्यक्ति अपने को कब तक और कैसे अपने को रोक पाए, वह समझ नहीं रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाज़ार के अध्ययर्नकत्ताओं का कहना है कि बड़े शहरों में लोगों में निवेश के प्रति ज्यादा रूझान हुआ है और छोटे शहरों में उपभोक्ता वस्तुओं के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा है। यानी यह साफ दिख रहा है कि निम्न मध्यवर्ग और निम्न वर्ग में उपभोक्ता वस्तुओं के प्रति रूझान बढ़ा है (बढ़ाया जा रहा है)। यद्यपि उदारवाद के पैरोकारों का कहना है कि लोगों में खरीदने की क्षमता (परचेजिंग कैपिसिटी) में इजाफा हुआ है क्योंकि लोगों के वेतन और भत्तों में भारी बढ़ोतरी हुई है। ये वही लोग हैं जो इंडिया शाइनिंग की बात करते थे। पर वे समाज के स्याह पक्ष को भूल जाते हैं, जिसमें समाज की बड़ी आबादी जीने के लिए अभिशप्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाजार नए जीवन मूल्य गढ़ रहा है। बाजार ही तय कर रहा है कि लोग क्या पहने, क्या खाये, क्या पीये या यूं कहें कि कैसे जिएं? बाजार लोगों को सोचने का मौका नहीं देना चाहता। एक से बढ़ कर एक लुभावने उपहारों एवं छूट के बीच यह स्लोगन कि यह मौका बस आज के लिए है और यदि चूक गए तो यह मानो कि आपने जीवन के एक बहुमूल्य अवसर को खो दिया। बाजार ने एक ऐसी प्रतियोगिता के बीच लोगों को लाकर खड़ा कर दिया है, जिसकी होड़ में शामिल होकर पूरा का पूरा तबका गरीबी के दुश्‍चक्र में शामिल हो रहा है। यह प्रतियोगिता सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर है। यदि आपने बड़ी खरीददारी नहीं की या फिर आपके पास कुछ ब्राण्ड के खास आइटम नहीं है, तो इसे समाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्‍न बना दिया जाता है, यानी भले ही ऋण लेकर खरीददारी करें पर खरीददारी जरूर करें। निम्न वर्ग साहूकर से ऋण ले या फिर बैंकों से, किसी का परिणाम जीवन के सुकून को खत्म करने वाला ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाजार की चपेट में आकर वंचित समुदाय का जीवन कैसे दुरूह हो जाता है, इसे हाल की घटनाओं से अच्छी तरह समझा जा सकता है. नर्मदा बांध के विस्थापितों को जब मुआवजा राशि मिली, तब प्रभावित जिलों में दो-पहिया वाहन कंपनियों ने अनेक लुभावने स्लोगन और छूट के मार्फत बड़ी संख्या में वाहनों को बेचा। आलम यह रहा कि जिन्हें वाहन चलाना नहीं आता था, उन्होंने भी वाहन खरीदा और दो पहिया वाहनों के लिए ड्राइवरों को रखा। परिणाम यह हुआ कि मुआवजे में मिली राशि उपभोग की भेंट चढ़ गई और वे दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;इसी तरह जब &lt;a href=&quot;http://www.bhopal.net/&quot;&gt;भोपाल गैस त्रासदी&lt;/a&gt; का प्रेरोटा आधार पुन: मुआवजा दिया जा रहा था तब भी बाजार में उछाल आया था और जो पैसा लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए था वह बाजार की भेंट चढ़ गया। यद्यपि &lt;a href=&quot;http://en.wikipedia.org/wiki/Bhopal&quot;&gt;भोपाल&lt;/a&gt; का यह चरित्र नहीं रहा है कि वह बाज़ार के दबाव में बहे, पर बाज़ार कि ताकतें इसके लिए पुरजोर कोशिशें कर रही हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान में जब लोगों के जीवन से मूलभूत सुविधाएं दूर होती जा रही है और शिक्षा एवं स्वास्थ्य महंगी होती जा रही है, तब वंचितों पर बढ़ता बाजार का दबाव उनके लिए घातक है। बाजार के दबाव में बनी परिस्थितियों के बीच उनके द्वारा खरीदे गए छोटी-मोटी उपभोक्ता वस्तुओं के कारण मध्य वर्ग यह मानने को कतई तैयार नहीं कि वे गरीब हैं और त्रासदी यह है कि सरकार ने भी अन्य कारणों के साथ-साथ इस कारण से भी उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर धकिया दिया है और उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं से वंचित कर दिया है। इस तरह से वे सामाजिक एवं आर्थिक दोनों तरह से बहिष्कृत हो रहे हैं। &lt;/div&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2007/11/blog-post_06.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-2975988135582183790</guid><pubDate>Tue, 06 Nov 2007 15:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-06T21:16:29.144+05:30</atom:updated><title>मध्यप्रदेश में विकास की चुनौतियां</title><description>&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt; मध्यप्रदेश अब 51 साल का हो गया, एक विकसित राज्य होने के लिए इतना समय काफी होता है पर प्रदेश में विकास की राह में कई चुनौतियां हैं। बुनियादी सुविधाओं शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सड़क में सुधार लाये बिना प्रदेश को विकसित राज्यों की कतार में खड़ा नहीं किया जा सकता। शिक्षा या स्वास्थ्य के ढांचे में सुधार लाने की बात हो या फिर अन्य समस्याओं के समाधान की बात हो, यहां संसाधनों की कमी नहीं है बल्कि इन समस्याओं की जड़ में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, बेहतर प्रबंधन का अभाव, मूलभूत सेवाओं के निचले ढांचे में सुधार का अभाव है वर्तमान में प्रदेश विकास के उड़नखटोले पर सवार है पर यह साफ नजर आ रहा है कि जमीनी स्तर पर मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए विकल्पों पर विचार नहीं किया जा रहा है। यद्यपि पिछले दशकों की तुलना में सुधार देखने को मिल रहा है पर इसके बावजूद इसे संतोषजनक नहीं माना जा सकता। आर्थिक विकास में आगे निकलने के लिए प्रदेश कई कवायद कर रहा है पर यह आर्थिक विकास सामाजिक विकास को गति दिए बिना असंतुलित ही होगा और आम लोगों की पहुंच से बुनियादी सुविधाएं अधिक दूर हो जाएंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रदेश को विकसित बनाने के लिए यह जरूरी है कि शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य बुनियादी सुविधाओं को सहजता से आम लोगों तक पहुंचाने के प्रयास किए जाएं। प्रदेश में सामाजिक विकास की स्थिति न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि दूसरे राज्यों की तुलना में भी प्रदेश की स्थिति खराब है। सामाजिक विकास की स्थिति में यदि प्रदेश को देखा जाए, तो यहां अभी भी भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, लैंगिक भेदभाव, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव व्याप्त हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रदेश में आज भी 44.77 लाख परिवार गरीबी की रेखा के नीचे और 15.81 लाख परिवार अति गरीबी के दायरे में आते हैं। प्रदेश के किसान कर्ज में डूबे हुए हैं। खेती में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आमंत्रित कर किसानों एवं छोटे व्यापारियों की स्थिति दयनीय बनाई जा रही है।  सरकारी दावों के अनुसार शालाओं से बाहर के बच्चों की संख्या एक लाख से भी कम है पर प्रदेश में बाल मजदूरों की संख्या 10 लाख से भी अधिक है। दलित एवं आदिवासी समुदाय के बच्चे, जिनमें लड़कियों की संख्या ज्यादा है, साथ ही बड़े शहरों के झुग्गी-बस्ती में रहने वाले बच्चों का सकल नामांकन अनुपात कम है। प्रदेश में प्राथमिक स्तर बालिकाओं का सकल नामांकन अनुपात 0.88 प्रतिशत है, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक स्तर पर शाला त्यागी बच्चों का दर 20 प्रतिशत, जिसमें लड़कियों का प्रतिशत ज्यादा है, यानी प्रदेश में शिक्षा में लैंगिक भेदभाव अभी भी खत्म करना दूर की बात है। 6 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले मध्यप्रदेश में लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्या आदिवासियों की हैं, आदिवासी बच्चों में कुपोषण की स्थिति ज्यादा भयावह है। प्रदेश में तीन वर्ष तक के कुपोषित बच्चों की संख्या 1998-99 में 53.5 प्रतिशत की तुलना में 2005-06 में 60.3 प्रतिशत हो गई है। मध्यप्रदेश में पिछले दशकों की तुलना में मातृत्व मृत्यु दर में कमी देखी जा रही है पर इसके बावजूद प्रदेश में अभी भी प्रति वर्ष 7700 मातृत्व मृत्यु हो रही है। 10 वर्ष पूर्व  मध्यप्रदेश में मातृत्व मृत्यु का औसत 498 प्रति लाख था, जो कि वर्तमान में 379 प्रति लाख के स्तर तक ही आ पाया है। अप्रैल 2007 तक मध्यप्रदेश में 2201 एच.आई.वी. पॉजीटिव केस पाए गए हैं, जिनमें से 86 प्रतिशत 11 से 45 वर्ष के व्यक्तियों में पाया गया है। 1998 से लगातार प्रतिवर्ष औसतन 200 एच.आई.वी. पॉजीटिव केस बढ़ रहे हैं। प्रदेश में मलेरिया की स्थिति को देखा जाए तो देश में होने वाले तमाम मलेरिया प्रकरणों में से 24 प्रतिशत प्रकरणों का योगदान मध्यप्रदेश की तरफ से होता है। प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम (एक तरह का सबसे गंभीर मलेरिया) के 40 फीसदी प्रकरण मध्यप्रदेश में दर्ज होते हैं। मलेरिया के कारण होने वाली कुल मौतों में से केवल मध्यप्रदेश में ही 20 प्रतिशत होती हैं। मध्यप्रदेश में टी.बी. का प्रकोप भी खतरनाक स्तर पर है। मीडियम टर्म हेल्थ सेक्टर स्ट्रेटजी- 2006 के अनुसार 2005 में 85 व्यक्ति प्रति लाख टी.बी. से ग्रसित थे। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2006 में 111 मरीज प्रति लाख चिन्हित किए गए। वर्ष 2007 में जनवरी से मार्च तक की स्थिति में 104 प्रति लाख टी.बी. के मरीज चिन्हित किए गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य की औद्योगिक नीतियों के तहत जिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को प्रदेश में आमंत्रित किया गया है, उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का बंटाधार कर दिया है। नदियों किनारे स्थित कारखाने अपने अवषिष्टों को यूं ही फेंक रहे हैं, जिससे आस-पास के खेतों की उवर्रता खत्म हो रही है और भू-जल के साथ-साथ नदियां भी प्रदूषित हो रही है। बहुराष्ट्रीय कम्परियों को भूजल दोहन के असीमित अधिकार दिए जा रहे हैं और पानी का निजीकरण किया जा रहा है। प्रदेश में पानी को लेकर अक्सर हिंसक झड़प की खबर आती है। भूजल स्तर गिर जाने से, पानी में कारखानों के अवषिष्ट पदार्थों एवं रसायनों के घुल जाने से भूजल में नाइट्रेट बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश में फ्लोरोसिस रोग से पीड़ितों की संख्या बढ़ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2020 तक झुग्गी बस्ती में रहने वाली कुल जनसंख्या में से कम से कम 10 करोड़ लोगों के जीवन स्तर में सुधार करने का लक्ष्य है। पर ग्रामीणों की आजीविका खत्म करना, जंगल के आश्रितों को विस्थापित करना, खेती में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को आमंत्रित कर किसानों एवं खेत मजदूरों को बेदखल करने और उसके बाद शहरों पर बढ़ते दबाव एवं अवैध कॉलोनियों के विकसित होने से प्रदेश की स्थिति और खराब हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि प्रदेश में 51 सालों के बाद भी बुनियादी सुविधाओं का लाभ निचले स्तर तक नहीं पहुंच पाया है, तो इस पर व्यापक बहस चलाए जाने की जरूरत है, ताकि सही मायने में विकास का लाभ वंचित समुदाय वंचित भी ले सके।&lt;/div&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2007/11/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8105571764722370160.post-8245862126819915118</guid><pubDate>Sat, 13 Oct 2007 11:52:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-06T21:42:50.059+05:30</atom:updated><title>मुद्दों की पत्रकारिता</title><description>&lt;p class=&quot;MsoNormal&quot; style=&quot;TEXT-INDENT: 0.5in; FONT-FAMILY: arial; TEXT-ALIGN: justify&quot;&gt;&lt;span class=&quot;&quot;&gt;पिछले 15 वर्षों में मीडिया के स्वरूप में बहुत तेज बदलाव देखने को मिला है। सूचना क्रांति एवं तकनीकी विस्तार के चलते मीडिया की पहुंच व्यापक हुई है। इसके समानांतर भूमंडलीकरण, उदारीकरण एवं बाजारीकरण की प्रक्रिया भी तेज हुई है, जिससे मीडिया अछूता नहीं है। नए-नए चैनल खुल रहे हैं, नए-नए अखबार एवं पत्रिकाएं निकाली जा रही है और उनके स्थानीय एवं भाषायी संस्करणों में भी विस्तार हो रहा है। मीडिया के इस विस्तार के साथ चिंतनीय पहलू यह जुड़ा गया है कि यह सामाजिक सरोकारों से दूर होता जा रहा है। मीडिया के इस बदले रूख से उन पत्रकारों की चिंता बढ़ती जा रही है, जो यह मानते हैं कि मीडिया के मूल में सामाजिक सरोकार होना चाहिए।&lt;br /&gt;भारत में मीडिया की भूमिका विकास एवं सामाजिक मुद्दों से अलग हटकर हो ही नहीं सकती पर यहां मीडिया इसके विपरीत भूमिका में आ चुका है। मीडिया की प्राथमिकताओं में अब शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, विस्थापन जैसे मुद्दे रह ही नहीं गए हैं। उत्पादक, उत्पाद और उपभोक्ता के इस दौर में खबरों को भी उत्‍पाद बना दिया गया है, यानी जो बिक सकेगा, वही खबर है। दुर्भाग्य की बात यह है कि बिकाऊ खबरें भी इतनी सड़ी हुई है कि उसका वास्तविक खरीददार कोई है भी या नहीं, पता करने की कोशिश नहीं की जा रही है। बिना किसी विकल्प के उन तथाकथित बिकाऊ खबरों को खरीदने (देखने, सुनने, पढ़ने) के लिए लक्ष्य समूह को मजबूर किया जा रहा ह। खबरों के उत्पादकों के पास इस बात का भी तर्क है कि यदि उनकी &#39;&#39;बिकाऊ&#39;&#39; खबरों में दम नहीं होता, तो चैनलों की टी.आर.पी. एवं अखबारों का रीडरशिप कैसे बढ़ता?&lt;br /&gt;इस बात में कोई दम नहीं है कि मीडिया का यह बदला हुआ स्वरूप ही लोगों को स्वीकार है, क्योंकि विकल्पों को खत्म करके पाठकों, दर्शकों एवं श्रोताओं को ऐसी खबरों को पढ़ने, देखने एवं सुनने के लिए बाध्य किया जा रहा है। उन्हें सामाजिक मुद्दों से दूर किया जा रहा है।&lt;br /&gt;ऐसी ही परिस्थितियों के बीच मीडिया में विकास के मुद्दों को बढ़ावा देने का कार्य कर रही भोपाल की एक संस्था विकास संवाद ने कुछ दिन पूर्व चित्रकूट में राष्ट्रीय मीडिया संवाद का आयोजन कर नई उम्मीदें जगाई हैं। संभवत: देश में यह पहला आयोजन है, जिसमें 7 राज्यों – मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड, बिहार, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब के पत्रकारों ने भाग लिया। संवाद में संपादक, वरिष्ठ पत्रकार, स्वतंत्र पत्रकार, वरिष्ठ उप संपादक, उप संपादक, संवाददाता, जिला संवाददाता, पत्रकारिता के प्राध्यापक एवं पत्रकारिता के विद्यार्थियों ने शिरकत की।&lt;br /&gt;संवाद का स्वरूप अनौपचारिक था, जिसमें प्रतिभागियों को अपने अनुभवों एवं अतीत को खंगालने का मौका मिला। संवाद की शुरुआत पत्रकारों ने अपने सफर के साथ ही शुरू कर दी थी। आयोजन में विभिन्न संस्थानों के पत्रकार काम के दबाव के बाहर आकर एक दूसरे से मिले। कई पत्रकार पिछले 4-5 वर्षों से फोन पर चर्चा करते रहे थे, पर आपस में कभी मिले ही नहीं थे, कई पत्रकार वर्षों बाद आमने-सामने हुए। सभी ने अपनी यादों के गर्द को साफ करना शुरू कर दिया - किस मकसद के लिए है पत्रकारिता, किस ओर जा रही है पत्रकारिता, किन-किन दबावों को झेल रही है पत्रकारिता, कौन कहां क्या कर रहा है, के साथ-साथ हास-परिहास।&lt;br /&gt;राष्ट्रीय मीडिया संवाद को कई सत्रों में विभाजित किया गया था, पर ऐसा नहीं था कि उसमें तब्दीली न की जा सके। पूरी स्वतंत्रता थी कि सामूहिक रूप से तय कर चर्चा को आगे बढ़ाया जाये और ऐसा हुआ भी. रात को सभी पत्रकारों ने अपने जीवन के दूसरे पक्ष को टटोला, जिस फन को भूल गए थे उसे याद किया, पद और शक्ति का चोला एक ओर रखकर आयोजन स्थल को कम्यून बना दिया, सभी बराबर और सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।&lt;br /&gt;राष्ट्रीय मीडिया संवाद में कुई गंभीर चर्चाएं हुई - क्या है विकास, एकांगी विकास, समग्र विकास, शहरी एवं ग्रामीण विकास में अंतर, विस्थापन, स्वास्थ्य, बच्चों के अधिकार, विकास में महिलाओं की स्थिति, समानता एवं उसके विभिन्न पहलू, वैकल्पिक मीडिया, मुख्यधारा के मीडिया में स्पेस की समस्या का समाधान, अपनी भूमिकाएं आदि कई मुद्दों पर चर्चा की गई। अति व्यस्त माने जाने वाले पत्रकारों ने इन चर्चाओं के लिए दो दिन को नाकाफी माना और लगातार ऐसे संवाद के आयोजित करने एवं इसको विस्तार देने पर बल दिया। संवाद में दैनिक जागरण, प्रभात खबर, जोहार सहिया, अमर उजाला, पी.एन.एन. हिन्दी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, नवभारत, सप्रेस, न्युज टुडे, राज एक्सप्रेस, माय न्यूज डॉट इन, हिन्दुस्तान टाईम्स सहित कई अन्य संस्थानों के पत्रकार शामिल हुए। माखनलाल पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय (भोपाल), दिल्ली वि.वि. एवं चित्रकूट ग्रामोदय वि.वि. के पत्रकारिता विभाग के प्राध्यापक एवं विद्यार्थी भी संवाद में शामिल हुए।&lt;br /&gt;विकास संवाद ने पिछले वर्ष पचमढ़ी में एक राज्य स्तरीय मीडिया संवाद की शुरुआत छोटे समूह के साथ की थी। उसके बाद मध्यप्रदेश के विभिन्न प्रमुख शहरों के उन पत्रकारों को एक मंच पर लाने की कोशिश की गई जो सामाजिक सरोकार एवं विकास पत्रकारिता के प्रति गंभीर हैं। कई क्षेत्रीय मीडिया संवाद के आयोजन भी किए गए। महज एक वर्ष में सैकड़ों पत्रकार मीडिया संवाद से जुड़ चुके हैं और विकास के विभिन्न मुद्दों पर वि‍श्लेषणात्मक और तथ्यपरक समाचारों एवं लेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण कर रहे हैं। विकास संवाद द्वारा विभिन्न मुद्दों पर जारी सरकारी एवं गैर सरकारी रिपोर्ट्स, सर्वे, आंकड़ों आदि का विश्‍लेषण कर समय-समय पर पत्रकारों को उपलब्ध कराया जाता है।&lt;br /&gt;राष्ट्रीय मीडिया संवाद में एक बात बहुत ही स्पष्ट रूप से उभरकर आई कि बाजार एवं व्यावसायिक दबावों के बीच सामाजिक सरोकार से जुड़ी पत्रकारिता हो सकती है और नई चुनौतियों पर चर्चा एवं नई राह तलाशने के लिए ऐसे आयोजन लगातार किए जाने की जरूरत है।&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;</description><link>http://suratehal.blogspot.com/2007/10/blog-post_13.html</link><author>noreply@blogger.com (Raju Neera)</author><thr:total>0</thr:total></item></channel></rss>