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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:creativeCommons="http://backend.userland.com/creativeCommonsRssModule" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0"><channel><title>युवा सोच युवा खयालात</title><link>http://www.yuvarocks.com/</link><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/rss+xml" href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/kulwanthappy" /><description></description><language>en</language><managingEditor>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</managingEditor><lastBuildDate>Mon, 28 May 2012 11:35:08 PDT</lastBuildDate><generator>Blogger</generator><atom:id xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345</atom:id><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">399</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/rss+xml" href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/kulwanthappy" /><feedburner:info uri="blogspot/kulwanthappy" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><creativeCommons:license>http://creativecommons.org/licenses/by/2.0/</creativeCommons:license><feedburner:emailServiceId>blogspot/kulwanthappy</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><item><title>सोनाक्षी की दूसरी फिल्‍म और जन्‍मदिवस</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/OY6RpO0l2dQ/blog-post_28.html</link><category>सोनाक्षी सिन्‍हा</category><category>राउड़ी राठौड़</category><category>फिल्‍म जगत</category><category>अक्षय कुमार</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Mon, 28 May 2012 03:12:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-2093564865570761997</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-HxJORc4gZ5U/T8NPUgmky1I/AAAAAAAABss/21OJvX6lw24/s1600/sonakshi+sinha.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="188" src="http://3.bp.blogspot.com/-HxJORc4gZ5U/T8NPUgmky1I/AAAAAAAABss/21OJvX6lw24/s640/sonakshi+sinha.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सोनाक्षी सिन्‍हा, एक ऐसा नाम है। एक ऐसा चेहरा है। जो आज किसी पहचान का मोहताज नहीं। दबंग से पहले भले ही मायानगरी में होने वाली पार्टी में लोग उसको शॉटगन की बेटी के रूप में पहचानते हो, मिलते हो। मगर आज उसकी अपनी एक पहचान बन चुकी है। पहली ही फिल्‍म सुपर डुपर हिट और नवोदित अभिनेत्री पुरस्‍कार भी झोली में आन गिरा। ऐसा नहीं कि ऐसा केवल सोनाक्षी के साथ ही हुआ, पहले भी बहुत सी अभिनेत्रियों के साथ हुआ। मगर सोनाक्षी की आंखों में जो कशिश है, चेहरे पर जो नूर है, वो उसको बिल्‍कुल अलग करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां दो जून को सोनाक्षी पच्‍चीस साल की हो जाएगीं, वहीं उनकी दूसरी फिल्‍म राउड़ी राठौड़ उनके जन्‍मदिवस से ठीक एक दिन पहले रिलीज हो रही है। इस फिल्‍म में उनके ऑपोजिट अक्षय कुमार हैं, जिसके सितारे बॉक्‍स ऑफिस पर ठीक बिजनस नहीं कर रहे। मगर दिलचस्‍प बात तो यह भी है कि इस फिल्‍म को प्रभु देवा निर्देशित कर रहे हैं, जिन्‍होंने वांटेड से सलमान खान की फ्लॉप सिरीज पर विराम लगाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फिल्‍म के प्रोमो और गीत बताते हैं कि फिल्‍म पूरी तरह दक्षिण से प्रभावित है, आज कल छोटे पर्दे पर दक्षिण फिल्‍मों के हिन्‍दी रूपांतरणों का बोलबाला है। क्‍या प्रभु देवा छोटे पर्दे की तरह बड़े पर्दे पर भी दक्षिण की शैली से प्रभावित फिल्‍म को बॉक्‍स ऑफिस पर हिट करवा पाएंगे। अक्षय को तो फ्लॉप से ज्‍यादा फर्क नहीं पड़ेगा, मगर दबंग से सफलता की सिखर पर चढ़ बैठी सोनाक्षी को थोड़ा सा झटका जरूर लग सकता है, क्‍यूंकि अगले दिन जन्‍मदिवस जो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिस सिन्‍हा अभिनेत्री से पहले फैशन डिजाइनर थी, उन्‍होंने बकायदा इसकी तालिम भी ली हुई है। उन्‍होंने 2005 में आई फिल्‍म मेरा दिल लेके देखो के लिए परिधान डिजाइन किए थे। उन्‍होंने कई फैशन शो भी किए। मगर किसी की नजर इस चेहरे पर नहीं गई। फिर अचानक एक दिन एक समारोह में उस पर सलमान की निगाह पड़ गई, और उन्‍होंने उसको दबंग फिल्‍म में रोल के लिए ऑफर किया। इस फिल्‍म के लिए सोनाक्षी को काफी वजन कम करना पड़ा। मेहनत रंग लाई और फिल्‍म बॉक्‍स ऑफिस पर हिट हो गई। आज सोनाक्षी के पास आधा दर्जन से ज्‍यादा फिल्‍में हैं, जिसमें एकआध फिल्‍म को छोड़कर बाकी सब फिल्‍में अधिक उम्र के स्‍टारों के साथ हैं, जिनमें अक्षय कुमार, अजय देवगन और सलमान खान शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक जून को रिलीज होने वाली राउडी राठौर सुपरहिट तेलुगु फिल्म विक्रमारकुडु का हिंदी रीमेक है। कहानी की बात करें तो शिव (अक्षय कुमार) की जो एक चोर है। इस चोर का महिलाओं पर खूब जादू चलता है और वे उसकी दीवानी हो जाती हैं। प्रिया (सोनाक्षी सिन्हा) से शिव की मुलाकात एक ऐसी शादी में होती है जहां उसे बुलाया ही नहीं गया है। प्रिया का वह दीवाना हो जाता है। शिव की जिन्‍दगी में तब समस्या पैदा होती है जब छ: वर्ष की नेहा बेवजह उसे पिता मानने लगती है। शिव इसका पता लगाने की कोशिश करता है कि नेहा उसे अपना पिता क्यों मानती है। नेहा के प्यार और उसके प्रति जिम्मेदारी शिव को इंसान के रूप में बदल देती है। राउडी राठौर कहानी है शिव (अक्षय कुमार) की जो एक चोर है। इस चोर का महिलाओं पर खूब जादू चलता है और वे उसकी दीवानी हो जाती हैं। प्रिया (सोनाक्षी सिन्हा) से शिव की मुलाकात एक ऐसी शादी में होती है जहां उसे बुलाया ही नहीं गया है। प्रिया का वह दीवाना हो जाता है। शिव न केवल नेहा के अतीत से परिचित होता है बल्कि वह बिहार स्थित छोटे शहर के लोगों के लिए वहां के एमएलए और गुंडों के खिलाफ मसीहा बनकर उभरता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखना यह है कि सोनाक्षी अक्षय कुमार के साथ अपनी दूसरी हिट फिल्‍म देने में कामयाब होगी या नहीं। वैसे प्रभु देवा की भी यह दूसरी निर्देशित फिल्‍म है। इस फिल्‍म के निर्माताओं में संजय लीला भंसाली का भी नाम है, जो एक बेहतरीन निर्देशकों में गिने जाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-2093564865570761997?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=OY6RpO0l2dQ:XxCCLBO9OrQ:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/OY6RpO0l2dQ" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-28T15:42:36.053+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/-HxJORc4gZ5U/T8NPUgmky1I/AAAAAAAABss/21OJvX6lw24/s72-c/sonakshi+sinha.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_28.html</feedburner:origLink></item><item><title>जौहर यह भी</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/XsLbrmObujA/blog-post_26.html</link><category>राजस्‍थान पत्रिका</category><category>गुलाब कोठारी</category><category>अतिथि कोना</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Fri, 25 May 2012 23:42:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-3071261933626348875</guid><description>&lt;span style="font-size: large;"&gt;नोट&lt;/span&gt; (&lt;i&gt; यह &lt;/i&gt;&lt;a href="http://gulabkothari.wordpress.com/2012/05/26/%E0%A4%9C%E0%A5%8C%E0%A4%B9%E0%A4%B0-%E0%A4%AF%E0%A4%B9-%E0%A4%AD%E0%A5%80/" target="_blank"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;गुलाब कोठारी &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp; &lt;i&gt;जी का है, जो पत्रिका समूह के मालिक हैं. वे ऐसे मालिक संपादक हैं जो अपनी बात खरी-खरी कह जाते हैं, भले ही किसी को उनका कहा-लिखा बुरा लगे तो लगे) &lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;शास्त्र कहते हैं कि भारत भूमि कर्म क्षेत्र है। शेष धरा भोग क्षेत्र है। अभी तक हमारे जीवन में प्रकृति के अनेक कार्य करते दिखाई पड़ते हैं। आदमी और औरत की परिभाषा ऎसी किसी देश में नहीं है, जैसी भारत में है। मर्द वह है जो भीतर जीता है। औरत बाहर जीती है। यही ब्रह्म और माया का रूप है। दोनों फिर भी अलग नहीं हो सकते। कई स्त्रियां विधवा होकर जीती हैं। कुछ परित्यक्ता के रूप में। कुछ पति के साथ जला दी जाती थीं। इसके अलावा भी एक श्रेणी है, जहां पति के मरने की आशंका मात्र से स्त्री शरीर त्यागने की सोच लेती हैं। इसे ही जौहर कहते हैं। एक स्त्री का जौहर इतिहास में दर्ज हो गया और हजारों का जौहर राजनीति में खो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास में जितनी चर्चा मीरा बाई की है, उतनी ही बड़ी चर्चा पदि्मनी की भी है। अलाउद्दीन खिलजी की सेना के चित्तौड़गढ़ किले में प्रवेश के साथ ही महारानी पदि्मनी आग में कूद पड़ी। उसके लिए संकल्प की पवित्रता अघिक महत्वपूर्ण थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने जम्मू एवं कश्मीर प्रवास में मेरा भी साक्षात् एक जीवित पदि्मनी से हुआ। वह स्थान भी देखा, जहां जौहर में उनका साथ पुरूषों ने भी दिया। यह दृश्य निश्चित तौर पर अटारी की ट्रेन से ज्यादा वीभत्स रहा होगा, क्योंकि जो कुछ भी कृत्य था, अपनों के जरिए किया हुआ था। शत्रु के छू लेने मात्र की कल्पना भी भयावह थी। क्षण भर में मर जाना और सोच-विचारकर संकल्प के साथ मरने में बड़ा अन्तर होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मई 11 को जम्मू से चलकर राजोरी पहुंचा था। वहां सीधा बलिदान भवन गया। स्थानीय पार्षद भारत भूषण शर्मा हमारे साथ थे। बलिदान भवन स्थानीय तहसील का पिछवाड़े वाला हिस्सा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन् 1947 के युद्ध या बंटवारे की जंग में पाकिस्तानी कबायलियों के जत्थे पुंछ, राजौरी और जम्मू में आक्रमण कर रहे थे। इन क्षेत्रों में किसान ही थे। न उनके पास हथियार थे, न ही इस घटना के लिए कोई तैयार था। जैसे ही सूचना आई कि आक्रांता हमला करने आ रहे हैं, गांव के हिन्दू स्त्री-पुरूष तहसील भवन में इकट्ठे हो गए। गांव की रक्षा में तैनात महाराजा (जम्मू) हरिसिंह जी के प्रभारी अपने 25 लोगों के साथ भाग गए। आक्रांताओं की संख्या हजारों में थी। अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित भी थे। केन्द्र सरकार को भी महाराजा ने सेना भिजवाने की प्रार्थना की थी, जिसे ठुकरा दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबायलियों के आगे बढ़ने की सूचना, गांवों में लूटमार, कत्लेआम और बलात्कार की बातें आग की तरह फैल रही थीं। राजौरी की तहसील में बन्द महिलाओं ने अपने पुरूष समुदाय के समक्ष प्रस्ताव रखा कि उन्हें जहर खाने की स्वीकृति दी जाए। बच पाने का दूसरा उपाय नजर नहीं आ रहा। आप लोगों को तो वे तुरन्त मार देंगे। हमें नहीं मारेंगे। पता नहीं किस-किस तरह की यातनाओं से गुजरना पड़े। इसलिए आक्रांताओं के हाथों नहीं पड़ना चाहतीं। इस प्रस्ताव को पुरूषों ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। घटना के साक्षी दो पुरूष एवं एक महिला से हमारा साक्षात् बलिदान भवन में हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हीं में से श्रीमती रामदुलारी (76 वर्ष) ने आंखों देखा हाल हमको सुनाया। दोनों ही पुरूष भी वहीं बैठे रहे। रामदुलारी ने बताया कि एक-एक करके पुरूषों ने अपनी बहू-बेटियों को जहर बांटना शुरू कर दिया। देखते ही देखते इसका प्रभाव भी सामने आने लगा। दुर्भाग्यवश ही कहें कि जहर चुकता हो गया। महिलाएं अभी बाकी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीवानगी शत्रु से लड़ने की नहीं थी। शत्रु के दुर्व्यवहार से बचने की भी थी। भावनाएं चरम पर रही होंगी। स्‍त्रियों का दूसरा प्रस्ताव आया कि जिन-जिन के पास भी बंदूकें हैं, हमें मार दें। बंदूकें कम थी। दो-दो महिलाओं को एक-एक बार में मारा गया। गोलियां भी जल्दी ही समाप्त हो गई। तब फिर महिलाओं ने प्रार्थना की कि जल्दी करें। अपने शस्त्रों से हमारा गला काट दें। क्या माहौल रहा होगा। प्रस्ताव स्वीकार हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीमती रामदुलारी ने बताया कि पुरूषों ने अपनी कटारें, तलवारें निकाल ली, तहसील में ही बने एक कुएं के पास पहुंचे और एक-एक महिला का सिर काटकर कुएं में डालते गए। छोटे बच्चों को छोड़ दिया गया। स्वयं श्रीमती राम दुलारी बारह साल की थी। इनकी मां को इनका जीवित रहना मंजूर नहीं था। अपने ससुर की कटार से इनके सिर पर तीन वार किए। हमको इन्होंने सिर से पल्ला हटाकर वे घाव दिखाए। स्वयं तो बेहोश हो गई थी, कैसे बची, नहीं मालूम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव की आबादी लगभग चार हजार थी। आस-पास के गांवों से भी लोग भागकर राजौरी पहुंच गए थे। स्थानीय बाशिन्दे भी आक्रांताओं के साथ हो चुके थे। भीतर-बाहर मिलाकर लगभग बीस हजार लोग शहीद हो गए। यह सबसे बड़ा नरसंहार था। जिसे आज किसी भी रूप में याद नहीं किया जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहीद दिवस पर भी इनके लिए दो शब्द नहीं कहे जाते। जो बच्चे बच गए थे, वे भी पाकिस्तानियों के कब्जे में ही रहे। यह दिवाली की काली रात बनकर रह गई। किन्तु श्रीमती रामदुलारी ने कहा कि आप राजस्थान से आए हैं, जहां रानी पदि्मनी का जौहर इतिहास में दर्ज है। हमने भी उसी जौहर का अनुकरण करके दिखाया, जिस पर हम गर्व करते हैं। हमें खेद नहीं कि हमारी गाथा किसी ने सुनी या नहीं। केन्द्र सरकार ने घटना का उपयोग अपनी राजनीति करने में लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब महाराजा ने लोगों को बचाने के लिए सेना भेजने की गुहार दोहराई, तब केन्द्र ने जम्मू सरकार के समक्ष विलय स्वीकार करने की शर्त रखी। महाराजा ने शर्त स्वीकार की और छह माह बाद सेना पहुंची। बैसाखी के दिन, छह माह की गुलामी काटकर, लोगों ने स्वतंत्रता मनाई। आज भी उन्हें शिकायत नहीं है कि सरकार उनकी ओर झांकती भी नहीं है। तहसील भवन को स्मारक बनाने की स्वीकृति भी नहीं दी। तब के बच्चे आज बूढ़े हैं। स्मृतियां ही अब इनकी धरोहर रह गई हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-3071261933626348875?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/XsLbrmObujA" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-26T12:12:21.712+05:30</atom:updated><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_26.html</feedburner:origLink></item><item><title>मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/1jyHVxSVEXc/blog-post_24.html</link><category>साहित्य</category><category>कविता</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Wed, 23 May 2012 21:41:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-5854857789347279505</guid><description>&lt;div style="text-align: center;"&gt;माता पिता के ख्‍वाबों का जिम्‍मा है&lt;br /&gt;मेरे महबूब के गुलाबों का जिम्‍मा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जॉब से छुट्टी नहीं मिलती विद पे&lt;br /&gt;ऐसे उलझे भैया क्‍या नाइट क्‍या डे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगत सिंह की है जरूरत बेहोशी को&lt;br /&gt;मगर यह सपूत देना मेरे पड़ोसी को&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रांति आएगी, लिखता हूं यह सोचकर&lt;br /&gt;वो भी भूल जाते हैं एक दफा पढ़कर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्‍ना हो रामदेव हो लताड़े जाएंगे&lt;br /&gt;मैडलों के लिए बेगुनाह मारे जाएंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजबूर हूं, वरना मैं देश बदल देता।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-5854857789347279505?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=1jyHVxSVEXc:iWWc-KsOSOk:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/1jyHVxSVEXc" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-24T10:11:14.418+05:30</atom:updated><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_24.html</feedburner:origLink></item><item><title>हैप्‍पी अभिनंदन में सोनल रस्‍तोगी</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/aaSn7TeUpJk/blog-post_113.html</link><category>सोनल रस्‍तोगी</category><category>ब्‍लॉग जगत</category><category>हैप्‍पी अभिनंदन</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Wed, 16 May 2012 04:38:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-4709671593726850798</guid><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-eOhGYzp_Gc0/T7NXccJVYxI/AAAAAAAABqU/mvWX9DRwUuY/s1600/sonal+rastogi.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://2.bp.blogspot.com/-eOhGYzp_Gc0/T7NXccJVYxI/AAAAAAAABqU/mvWX9DRwUuY/s640/sonal+rastogi.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जुलाई 2009 की कड़कती दोपहर में &lt;a href="http://sonal-rastogi.blogspot.in/" target="_blank"&gt;''कुछ कहानियां कुछ नज्‍में''&lt;/a&gt; नामक ब्‍लॉग बनाकर गुड़गांव की सोनल रास्‍तोगी ने छोटी सी कविता 'नम आसमान' से ब्‍लॉग जगत में कदम रखा। तब शायद सोनल ने सोचा भी न होगा कि ब्‍लॉग दुनिया में उसकी रचनाओं को इतना प्‍यार मिलेगा। आज हजारों कमेंट्स, सैंकड़े अनुसरणकर्ता, सोनल की रचनाओं को मिल रहे स्‍नेह की गवाही भर रहे हैं। सोनल की हर कविता दिल को छूकर गुजर जाती है, चाहे वो सवाल पूछ रही हो, चाहे प्‍यार मुहब्‍बत के रंग में भीग रही हो, चाहे मर्द जात की सोच पर कटाक्ष कर रही हो। सोनल की कलम से निकली लघु कथाएं और कहानियां भी पाठकों को खूब भाती हैं। आज &lt;a href="http://www.yuvarocks.com/search?q=%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AA%E0%A5%80+%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8" target="_blank"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;हैप्‍पी अभिनंदन &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/a&gt;में हमारे साथ उपस्‍िथत हुई हैं ''कुछ कहानियां कुछ नज्‍में'' की सोनल रस्‍तोगी, जो मेरे सवालों के जवाब देते हुए आप से होंगी रूबरू। तो आओ मिले ब्‍लॉग दुनिया की इस बेहतरीन व संजीदा ब्‍लॉगर शख्‍सियत से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="http://www.yuvarocks.com/" target="_blank"&gt;कुलवंत हैप्‍पी- &lt;/a&gt;मैंने आपका ब्‍लॉग प्रोफाइल देखा। वहां मुझे कुछ नहीं मिला, तो फेसबुक पर पहुंच गया। वहां आपने कुछ लिखा है। मैं कौन हूँ ? इसका जवाब जब मिल जाएगा तब अगला सवाल पूछूंगी। क्‍या आपको इसका जवाब अभी तक नहीं मिला। अगर मिल जाए तो अगला सवाल क्‍या होगा?&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनल रस्‍तोगी-मुझे खुद से सवाल करने का शौक है, हर घटना पर हर मौके पर मैं खुद से बात करती हूँ, हर पात्र के ज़हन में उतरती हूँ, कभी कभी इसी जद्दोजहद में खुद को भूल जाती हूँ, मेरे होने का उद्देश्य कुछ साफ़ तो हुआ है.. अगला सवाल मेरे अस्तित्व की सार्थकता से जुड़ा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;कुलवंत हैप्‍पी - जुलाई 2009 की चीखती दोपहर में आपने 'कुछ कहानियां, कुछ नज्‍में' ब्‍लॉग बनाकर 'नम आसमान' से ब्‍लॉग जगत दस्‍तक दी। अब उस बात को चार साल होने जा रहे हैं। इस दरमियान ब्‍लॉग जगत में गुटबाजी एवं बहुत कुछ हुआ। कभी आप ब्‍लॉग विवादों से परेशान हूं या इसका शिकार?&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनल रस्‍तोगी - चार साल के छोटे से समय में मुझे एक नई दुनिया दिखाई दी जिसे लोग आभासी दुनिया कहते हैं, पर ये आभासी नहीं है, मुझे यहाँ बहुत से वास्तविक हमखयाल दोस्त मिले, ढेर सारा पढ़ने को और सीखने को भी, रही बात विवादों की तो उनसे बस एक तकलीफ होती है...लोगों की ऊर्जा सृजन की बजाय ..विवादों को हवा देने में व्यर्थ चली जाती है और हम जैसे पाठक अच्छी पोस्टों की प्रतीक्षा करते हैं, अगर कुछ लंबा विवाद चल गया तो, ब्लॉगजगत से ब्रेक लेकर कोई किताब उठा लेते हैं और इंतज़ार करते है सब सामान्य होने का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;कुलवंत हैप्‍पी- मैं जब आपका ब्‍लॉग पढ़ रहा था। वहां हर रचना एक से बेहतर एक थी। मगर प्रतिक्रियाओं में बहुत बड़ा फर्क नजर आया। कुछ अच्‍छी पोस्‍टें भी कम कमेंट्स से गुजारा कर रही थी। क्‍या आप केमेंट्स के आधार पर पोस्‍ट का स्‍तर तय करती हैं या इसके बारे में आपका कोई अपना मापदंड है?&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनल रस्‍तोगी - तारीफ का शुक्रिया, मेरी रचनाएं ब्लॉग बनने के बाद मेरी डायरी से निकल कर वेब पर आ गई, कमेंट्स प्रोत्साहित तो करते हैं पर उनकी संख्या ज्यादा मायने नहीं रखती, अगर एक भी कमेन्ट ऐसा मिल गया जिसने रचना की आत्मा को समझ लिया बस दिल को संतुष्टि मिल जाती है, मेरी पोस्ट मेरे दिल से मेरी कल्पनाओं से जन्मी होती है, वो तो बस मेरी अभिव्यक्ति है ...जो मुझे सुकून देती है ...स्तर आप लोग तय करें [:-)]&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;कुलवंत हैप्‍पी- ''हर दिल की तमन्ना होती है, की उसको कोई प्यार करे''। कुछ याद आया सोनल जी। यह आपकी ही एक रचना की एक पंक्‍ित है, जो आपको कटहरे में खड़ा कर पूछ रही है, प्‍यार के बारे में आपकी वैसी ही राय है जैसी आपकी कलम से निकलती है या फिर फर्क है।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनल रस्‍तोगी- जो अहमियत रसगुल्ले में रस की होती है, वही मेरी लेखनी और ज़िन्दगी में प्यार की है, प्यार के बिना कोई भावना जन्म ही नहीं लेती दर्द, दुःख, जलन, क्षोभ, मुस्कराहट, सब कहीं न कहीं प्यार से जुड़े हैं, और सच ही तो है अगर नहीं तो आप ही बताइए ऐसा कौन सा दिल है जो प्यार नहीं चाहता। आपने शायद मेरी रचना "मोहब्बत मोहब्बत दिन रात मैं लिखूंगी" नहीं पढ़ी, वैसे भी मेरी आधे से ज्यादा रचनाएं प्यार पर ही है, प्रेम की गायिका हूँ मैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;कुलवंत हैप्‍पी - आपके प्रोफाइल पर चंद लाइनों के सिवाय कुछ नहीं मिला, इसलिए ब्‍लॉग जगत यह जानना चाहता है कि आप ब्‍लॉगिंग के अलावा असल जिन्‍दगी में और किन किन जिम्‍मेदारियों को अपने कंधों पर उठाकर चल रही हैं?&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनल रस्‍तोगी - मैं फर्रुखाबाद में जन्मी, माँ से पढ़ने का शौक मिला, स्कूल में लेखन को प्रोत्साहन, विवाह के बाद गुडगाँव आई, बस दिन में जॉब और फुर्सत के पलों में लेखन। मैं चाहती हूँ के ब्लॉग जगत मुझे मेरे लेखन से जाने बस मैं भी अपनी कहानी की तरह "रहस्यमयी" रहना चाहती हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;कुलवंत हैप्‍पी - ब्‍लॉग जगत पर जब भी कविताएं पढ़ने निकलता हूं तो कवित्रियों के ब्‍लॉग पर जाता हूं, मुझे लगता है कि कवियों से बेहतर होती है कवित्रियां, आपका इस बारे में क्‍या विचार है?&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनल रस्‍तोगी - कवि या कवियत्री मुझे कभी फर्क नहीं दिखा, उत्कृष्ट रचनाएं बस उत्कृष्ट रचनाएं होती हैं जो अपने पाठक का मन मोह लेती हैं कविता हो या कहानी, हर व्यक्ति की कविता कहने की विशेष शैली होती है, भावनाओं की पकड़ होती है जो आपको बाँध लेती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;कुलवंत हैप्‍पी - ब्‍लॉग जगत को आप अभिव्‍यक्‍ित का एक बेहतर माध्‍यम मानती हैं या नहीं ?&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनल रस्‍तोगी- ब्लॉगजगत ने डायरी के पन्नो में छुपी रचनाओं को आकाश सा विस्तार दिया है ना केवल अभिव्यक्ति बल्कि रचनाओं की समीक्षा, सुधार और प्रशंसा के अवसर दिए हैं और इससे मिलने वाला आत्मविश्वास आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, ब्लॉगजगत ने हमें वो करने का मौक़ा दिया है जो हम हमेशा से करना चाहते थे पर अपनी व्यस्तताओं के चलते नहीं कर पा रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;कुलवंत हैप्‍पी - आपकी जिन्‍दगी का कोई ऐसा लम्‍हा हम से सांझा करें, जो कुछ सीख देता हो, जो थोड़े में बहुत कुछ कहता हो।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनल रस्‍तोगी - ज़िन्दगी के ऐसे कई अनमोल लम्हों की पोटली मेरी माँ ने मुझे सौंपी है एक बार मुझे कहीं से एक जासूसी उपन्यास मिल गया, मैंने उसे पढ़ना शुरू किया थोडा अश्लील था मेरी माँ ने वो मुझसे माँगा और समझाया "अच्छा पढ़ोगी तो अच्छा सोचोगी, अच्छा सोचोगी तो अच्छा बोलोगी और अच्छा ही लिखोगी, आपकी भाषा और आपका व्यवहार और आपकी सोच पारिवारिक माहौल के साथ आप क्या पढ़ते है इसपर निर्भर करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;कुलवंत हैप्‍पी - कुछ दिन पहले वंदना की एक कविता को लेकर ब्‍लॉग जगत में हो हल्‍ला हो गया था। कुछ वैसी ही आपकी कविता है ''देह से परे''। जब महिलाएं प्‍यार मोहब्‍बत की कविताएं लिखती हैं तो वाह वाह लेकिन जब वह मर्दों की सोच पर कटाक्ष करने लगती हैं तो हो हल्‍ला क्‍यूं होने लगता है, इस बारे में आप क्‍या कहती हैं?&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनल रस्‍तोगी - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को है, किसी विषय पर हर व्यक्ति स्वतंत्र है अपने विचार रखने के लिए, अगर आपको नापसंद है या आपके विचारों से मेल नहीं खाते तो मत पढ़िए, टी वी, सिनेमा हर जगह यही बात लागू होती है चाहे "डर्टी पिक्चर" हो या "लज्जा " अगर कोई अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है तो आप उसे ना देखने या ना पढ़ने के लिए भी स्वतंत्र हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;कुलवंत हैप्‍पी - ब्‍लॉग जगत के नाम एक संदेश, जो आप देना चाहें।&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;सोनल रस्‍तोगी - हम सभी को एक सांझा मंच मिला है सार्थक लिखने और पढ़ने के लिए, छोटे बड़े शहरों और घटनाओ को वहीं के बाशिंदों की आँखों से देखने और जानने के लिए। हमारे उद्देश्य और सरोकार बहुत बड़े है, अभी तो शुरूआत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;सोनल रस्‍तोगी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया, जो आप ने अपने कीमती समय से समय निकालकर हम से बातचीत की।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-4709671593726850798?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/aaSn7TeUpJk" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-16T17:08:04.180+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-eOhGYzp_Gc0/T7NXccJVYxI/AAAAAAAABqU/mvWX9DRwUuY/s72-c/sonal+rastogi.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">16</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_113.html</feedburner:origLink></item><item><title>मेंढ़क से मच्‍छलियों तक वाया कुछेक बुद्धजीवि</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/FOg2EVvSmMY/blog-post_16.html</link><category>संपादकीय</category><category>सत्‍यमेव जयते</category><category>आमिर खान</category><category>कुलवंत हैप्‍पी</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Tue, 15 May 2012 23:38:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-4384077547933063079</guid><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-mfdPgzOXKfQ/T7NvIEtH-II/AAAAAAAABqg/udpph2A9VGk/s1600/machali.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="225" src="http://2.bp.blogspot.com/-mfdPgzOXKfQ/T7NvIEtH-II/AAAAAAAABqg/udpph2A9VGk/s640/machali.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अमेरिका और भारत के बीच एक डील होती है। अमेरिका को कुछ भारतीय मेंढ़क चाहिए। भारत देने के लिए तैयार है, क्‍यूंकि यहां हर बरसाती मौसम में बहुत सारे मेंढ़क पैदा हो जाते हैं। भारत एक टब को पानी से भरता है, और उसमें उतने ही मेंढ़क डालता है, जितने अमेरिका ने ऑर्डर किए होते हैं। भारतीय अधिकारी टब को उपर से कवर नहीं करते। जब वो टब अमेरिका पहुंचता है तो अमेरिका के अधिकारियों को फोन आता है, आपके द्वारा भेजा गया टब अनकवरेड था, ऐसे में अगर कुछ मेंढ़क कम पाएगे तो जिम्‍मेदारी आपकी होगी। इधर, भारतीय अधिकारी पूरे विश्‍वास के साथ कहता है, आप निश्‍िचंत होकर गिने, पूरे मिलेंगे, क्‍यूंकि यह भारतीय मेंढ़क हैं। एक दूसरे की टांग खींचने में बेहद माहिर हैं, ऐसे में किस की हिम्‍मत कि वो टब से बाहर निकले। आप बेफ्रिक रहें, यह पूरे होंगे। एक भी कम हुआ तो हम देनदार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनाब यहां के मेंढ़क ही नहीं, कुछ बुद्धिजीवी प्राणी भी ऐसे हैं, जो किसी को आगे बढ़ते देखते ही उनकी टांग खींचना शुरू कर देते हैं। आज सुबह एक लेख पढ़ा, जो सत्‍यमेव जयते को ध्‍यान में रखकर लिखा गया। फेसबुक पर भी आमिर खान के एंटी मिशन चल रहा है। कभी उसकी पूर्व पत्‍नी को लेकर और कभी गे हरीश को लेकर, लोग निरंतर आमिर को निशाना बना रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि आमिर कुछ नया नहीं कर रहे, वो पुराने घसीटे पिटे मुद्दे उठाकर हीरो बनने की कोशिश कर रहे हैं। पैसे के लिए कर रहे हैं। राजस्‍थान पत्रिका में दवेंद्र शर्मा लिखते हैं कि टैलीविजन वाले असली हीरोज को आगे लाएं, क्‍यूंकि लोग असली हीरोज को देखना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलो एक बार मान भी लेते हैं कि आमिर खान पैसे कमाने के लिए यह सब कर रहा है। वो लोगों की निगाह में हीरो बनना चाहता है। फिर मैं बुद्धिजीवियों से सवाल करता हूं कि आखिर आमिर खान कौन है। तो लाजमी है, जवाब आएगा अभिनेता। मेरा अगला सवाल होगा, अभिनेता क्‍या करता है। तो उनका जवाब होगा अभिनय। लोग भी तो यह कह रहे हैं कि आमिर अभिनय कर रहे हैं, अगर आमिर अभिनय नहीं करेगा तो कौन करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर इस अभिनय से किसी को फायदा होता है तो बुराई क्‍या है। पिछले दिनों एनडीटीवी न्‍यूज एंकर रविश कुमार ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर लिखा कि उसको अंग्रेजी पत्रिका आऊटलुक नहीं मिली, क्‍यूंकि उस पर आमिर का फोटो छपा था। जाने अनजाने में ही सही, लेकिन आऊटलुक को फायदा तो हुआ। अब लोगों को आमिर में रुचि कुछ ज्‍यादा होने लगी है, मतलब लोग आमिर को सुनना चाहते हैं, उसके बारे में पढ़ना चाहते हैं। हम को खुशी होनी चाहिए कि जो मुहिम कुछ आम लोगों ने शुरू की। आज उन मुद्दों को आमिर खान जैसी हस्‍ती का समर्थन मिल रहा है, चाहे वह अभिनय के तौर पर ही सही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न आना इस देस लाडो हो, अगले जन्‍म मोहे बिटिया कीजिये हो या चाहे बालिका बधु हो टेलीविजनों की एक अच्‍छी पहल थी बुराईयों के खिलाफ। बुराई के खिलाफ आवाज न सही, तो एक हूक ही काफी है, क्‍यूंकि डूबते को तिनके का सहारा होता है। बुराई के खिलाफ उठी आवाज को हम दबाने में जुट जाते हैं, और फिर कहते हैं कि बुराई तेजी से बढ़ रही है। बुराई के खिलाफ उठ रही आवाज को सुनो। आमिर है या अन्‍ना है, गली का कोई आम आदमी है। यह मत देखो। अगर कुछ कर नहीं सकते, तो करने वालों को मत रोको।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक छोटी सी कहानी कहते हुए अपनी बात को विराम देने जा रहा हूं। एक बच्‍चा दौड़ दौड़ कर समुद्र के किनारे गिरी हुई मछलियों को वापिस समुद्र में फेंक रहा था, तो उसके दादा ने कहा, बेटा किस किस को बचाओगे, तो बच्‍चे ने कहा, लो यह तो बच गई। लो यह भी बच गई। एक एक मच्‍छली को उठाकर वापिस समुद्र में फेंकते हुए बच्‍चा उक्‍त वाक्‍य बोलता हुआ आगे बढ़ रहा था। उम्‍मीद है कि बुराई के खिलाफ लड़ने वाले ऐसे ही आगे बढ़ते रहें। बोलने वाले बोलते रहेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-4384077547933063079?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/FOg2EVvSmMY" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-16T14:41:27.764+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-mfdPgzOXKfQ/T7NvIEtH-II/AAAAAAAABqg/udpph2A9VGk/s72-c/machali.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_16.html</feedburner:origLink></item><item><title>आमसूत्र कहता है; मिलन उतना ही मीठा होता है</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/Tq8XcN6BLJ0/blog-post_8312.html</link><category>संपादकीय</category><category>सुलगते मुद्दे</category><category>मैंगो स्‍लाइस</category><category>कैटरीना कैफ</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Tue, 15 May 2012 00:13:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-2424091242627288868</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-YdOW24e2K5M/T7ICCOw9H4I/AAAAAAAABqI/aYK2GLqEsTQ/s1600/katrina.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="188" src="http://1.bp.blogspot.com/-YdOW24e2K5M/T7ICCOw9H4I/AAAAAAAABqI/aYK2GLqEsTQ/s640/katrina.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आमसूत्र कहता है कि लालच को जितना पकने दो, मिलन उतना ही मीठा होता है। सबर करो सबर करो, और बरसने दो अम्‍बर को। गहरे पर सुनहरे रंग तैरने दो, बहक यह महकने दो, क्‍यूंकि सबर का फल मीठा होता है, मीठे रसीले आमों से बना मैंगो स्‍लाइस, आपसे मिलने को बेसबर है। आम का मौसम है। बात आम की न होगी तो किसकी होगी। मगर अफसोस के आम की बात नहीं होती। संसद में भी बात होती है तो खास की। आम आदमी की बात कौन करता है। अब जब उंगलियां 22 साल पुरानी इमानदारी पर उठ रही हैं तो लाजमी है कि खास जज्‍बाती तो होगा ही, क्‍यूंकि आखिर वह भी तो आदमी है, भले ही आम नहीं। जी हां, पी चिदंबरम। जो कह रहे हैं शक मत करो, खंजर खोप दो। वो कहते हैं बार बार मत बहस करो। कसाब को गोली मार दो। आखिर इतने चिढ़चिढ़े कैसे हो गए चिदंबरम। चिदंबरम ऐसे बर्ताव कर रहे हैं, जैसे निरंतर काम पर जाने के बाद आम आदमी करने लगता है। वो ही घसीटी पिट राहें। वो ही गलियां। वो ही चेहरे। वो ही रूम। वो ही कानों में गूंजती आवाजें। लगता है चिदंबरम को हॉलीडे पैकेज देने का वक्‍त आ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद मेरा सुझाव वैसा ही जैसा, दिलीप कुमार को देवदास रिलीज होने के बाद कुछ डॉक्‍टरों ने दिया था, अब आप थोड़ी कॉमेडी फिल्में करें अन्यथा आपको मानसिक विकार हो जाएंगे। मुझे भी लगता है कि अगर चिदंबरम को कांग्रेस ने थोड़ी सी राहत न दी तो उनको भी कुछ ऐसा ही हो सकता है, क्‍यूंकि अब वो जज्‍बाती होने लगे हैं। जब आदमी जज्‍बाती होता है तो छोटी छोटी बातें भी दिल को लगने लगती हैं। वो बात खास हो या आम हो। आम से याद आया, हमने बात आम से शुरू की थी। फिर क्‍यूं न आम पर ही लौटा जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो पंक्‍ितयां मैंने शुरूआत में लिखी, वह पंक्‍ितयां पाकिस्‍तानियों को स्‍लाइस बेचने के लिए शीतल पेय बनाने वाली कंपनी इस्‍तेमाल कर रही है। इस विज्ञापन को देखने के बाद एक बात दिमाग में खटकने लगी। हिन्‍दुस्‍तान और पाकिस्‍तान कभी एक हुआ करते थे। दोनों के बीच केवल एक लाइन का तो फासला है। मगर दोनों देशों में प्रसारित होने वाले एक ही कंपनी के विज्ञापन में इतना बड़ा फासला कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में जब स्‍लाइस बिकता है तो बड़े ग्‍लेमर के साथ बेचा जाता है, मगर जब वो ही पाकिस्‍तान में बेचने की बारी आती है तो शब्‍दों का जाल बुना। ऐसा क्‍यूं। वहां पर कैटरीना कैफ की कत्‍ल अदाओं से ज्‍यादा आम पर फॉकस किया जाता है। आमसूत्र क्‍या कहता है, यह बताया जाता है। दर्शकों को बंधने के लिए शब्‍दों का मोह जाल बुना जाता है। मगर जब इंडियन स्‍क्रीन होती है तो कैटरीना कैफ कत्‍ल अदाओं से हमले करते हुए हाथ में स्‍लाइस लेकर जीन्‍स टी शर्ट पहने एंटरी मारती है। अपने होंठों से, स्‍टाइल से, चाल से, बैठने के ढंग से, कपड़ों से, इशारों से विज्ञापन में भी कामुकता पैदा करने की कोशिश की जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत और पाकिस्‍तान में कितना बड़ा अंतर है। इस बात की पुष्‍टि करता है यह मैंगो स्‍लाइस का विज्ञापन। भारत में आजादी के नाम पर किस तरह ग्‍लेमर परोसा जाता है। यह तो हम सब जानते हैं। मगर पाकिस्‍तान में डर के कारण कितना संजीदा रहना पड़ता है, इस विज्ञापन से ही समझा जा सकता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;iframe allowfullscreen="" frameborder="0" height="315" src="http://www.youtube.com/embed/atlx71aqA94" width="560"&gt;&lt;/iframe&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-2424091242627288868?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=Tq8XcN6BLJ0:9F01pV069R0:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/Tq8XcN6BLJ0" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-15T12:43:28.407+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/-YdOW24e2K5M/T7ICCOw9H4I/AAAAAAAABqI/aYK2GLqEsTQ/s72-c/katrina.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_8312.html</feedburner:origLink></item><item><title>लेकिन मेरी भैंस तो गई पानी में</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/bvBO8aRBgIw/blog-post_15.html</link><category>संपादकीय</category><category>पीलिया</category><category>पत्रकारिता</category><category>व्‍यंग</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Mon, 14 May 2012 20:24:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-6092179975628505215</guid><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-tIzGTeHuOZQ/T7HPZA73QxI/AAAAAAAABp4/8kP-WBBSGD4/s1600/buffalo.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="290" src="http://3.bp.blogspot.com/-tIzGTeHuOZQ/T7HPZA73QxI/AAAAAAAABp4/8kP-WBBSGD4/s640/buffalo.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;पत्रकार क्‍लीन दास सुबह सुबह अपना साइकिल लेकर ऑफिस की तरफ कूच करते हैं। जैसे ही वो ऑफिस के पास पहुंचते हैं, तो उनकी आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। दफ्तर के सामने लगी चाय की लारी वाला गन्‍ने का जूस बनाने की तैयारी कर रहा है। पत्रकार क्‍लीन दास टेंशन में। आखिर चाय वाले को ऐसी क्‍या सूझी कि उसने चाय की जगह, गन्‍ने का जूस बनाने की ठान ली। क्‍लीन दास घोर चिंता में, अब मेरा क्‍या होगा, मेरा तो चाय के बिना चलता ही नहीं। इतने में क्‍लीन दास के अंदर का जिज्ञासु पत्रकार जागा, और चाय वाले से जाकर पूछने लगा, जो अब जूस वाला बनने की तैयारी कर रहा है, तुम को क्‍या हो गया, एक दम से गन्‍ने का जूस बनाने लग गए। चाय वाला बोला, सर आज का न्‍यूज पेपर नहीं पढ़ा आपने। पत्रकार चौंका, आखिर ऐसा क्‍या छपा है अख़बार में, जो चाय वाला जूस वाला बनने की ठान बैठा। अंदर का डर भी जागा। कहीं कोई बड़ी ख़बर तो नहीं छूट गई। लगता है आज संपादक से डांट पड़ेगी। पत्रकार क्‍लीन दास डर को थोड़ा सा पीछे धकेलते हुए बोलता है, आखिर अख़बार में ऐसा क्‍या छपा है, जो तुम चाय का कारोबार छोड़कर गन्‍ने का जूस बनाने लग गए। क्‍या बात करते हैं क्‍लीन दास सर। आज के फ्रंट पेज पर एक समाचार लगा है कि पत्रकारिता को पीलिया हो गया। बस फिर क्‍या था, मुझे याद आया, जब मुझे पीलिया हुआ था और डॉक्‍टर ने गन्‍ने का जूस पीने की सलाह दी थी। मैंने सोचा, अब अपने ऑफिस वाले चाय तो पीएंगे नहीं, तो क्‍यूं न गन्‍ने की लारी लगा लूं, आपको भी सुविधा रहेगी, और मेरा भी घर चलता रहेगा। चुप चुप चुप क्षुब्‍ध होकर पत्रकार क्‍लीन दास बोला। दुकान वाला चौंक गया, आखिर क्‍लीन दास को गुस्‍सा क्‍यूं आ गया। उसने ऐसा क्‍या कह दिया, जो पत्रकार को गुस्‍सा आ गया। क्‍लीन दास को विनम्र भाव में चाय वाला पूछता है, सर जी क्‍या वो ख़बर किसी ने झूठी प्रकाशित कर दी। पत्रकार क्‍लीन दास शांत होते हुए बोला, वो पीलिया और बीमारी वाला पीलिया अलग अलग है भाई। पत्रकारिता की भाषा तुम्‍हारी समझ से परे है। अच्‍छा अच्‍छा सर। मुझ गरीब को क्‍या पता, मैं तो समझा अपने ऑफिस वालों को पीलिया हो गया। इस लिए तो गन्‍ने के जूस की लारी लगा रहा था। साहिब पत्रकारिता को पीलिया हुआ है या नमूनिया मुझे नहीं पता, लेकिन मेरी भैंस तो गई पानी में।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;i&gt;&lt;b&gt;आत्‍म प्रेरक कथा&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-6092179975628505215?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/bvBO8aRBgIw" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-15T09:07:21.234+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/-tIzGTeHuOZQ/T7HPZA73QxI/AAAAAAAABp4/8kP-WBBSGD4/s72-c/buffalo.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_15.html</feedburner:origLink></item><item><title>सिर्फ नाम बदला है</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/IpjuHItTA_s/blog-post_14.html</link><category>संपादकीय</category><category>सुलगते मुद्दे</category><category>क्राइम पैट्रोल दस्‍तक</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Mon, 14 May 2012 01:22:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-6100390626409665025</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-_KV7rOdi8Rs/T7DAkVpSTRI/AAAAAAAABpg/9odGhxT5tRQ/s1600/crime+patrol+.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="208" src="http://3.bp.blogspot.com/-_KV7rOdi8Rs/T7DAkVpSTRI/AAAAAAAABpg/9odGhxT5tRQ/s640/crime+patrol+.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वो बारह साल की है। पढ़ने में अव्‍वल। पिता बेहद गरीब। मगर पिता को उम्‍मीद है कि उसकी बेटी पढ़ लिखकर कुछ बनेगी। अचानक एक दिन बारह साल की मासूम के पेट में दर्द उठता है। वो अपने मां बाप से सच नहीं बोल पाती, अंदर ही अंदर घुटन महसूस करने लगती है। आखिर अपने पेट की बात, अपनी सहेली को बताती है, और वो मासूम सहेली घर जाकर अपने माता पिता को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगली सवेर उसके माता पिता कुछ अन्‍य पड़ोसियों को लेकर स्‍कूल पहुंचते हैं और स्‍कूल में मीटिंग बुलाई जाती है। बिना कुछ सोच समझे एक तरफा फैसला सुनाते बारह साल की मानसी को स्‍कूल से बाहर कर दिया जाता है। टूट चुका पिता अपनी बच्‍ची को लेकर डॉक्‍टर के यहां पहुंचता है, तो पता चलता है कि बच्‍ची मां नहीं बनने वाली, उसके पेट में नॉर्मल दर्द है। मगर डॉक्‍टर एक और बात कहता है, जो चौंका देती है, कि मानसी का कौमार्य भंग हो चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरीब पिता अपनी बच्‍ची को किसी दूसरे स्‍कूल में दाखिल करवाने के लिए लेकर जाता है, तो रास्‍ते में पता चलता है कि उसकी बेटी को पेट का दर्द देने वाला कोई और नहीं, उसी की जान पहचान का एक कार चालक है, जो खुद दो बच्‍चों का बाप है। अगली सुबह मानसी को दूसरे स्‍कूल से भी निकाल दिया जाता है। बुरे वक्‍त में एक टीचर मानसी की मदद के लिए आगे आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीचर के कहने पर पुलिस अधिकारी कारवाई के लिए तैयार होता है। मगर गरीब पिता इज्‍जत की दुहाई देते हुए पीछे हट जाता है। अंत में एक समाज सेवी संस्‍था मानसी को किसी दूसरे स्‍कूल में दाखिला दिलाने में सफल होती है, और गरीब मजबूर पिता दोषी के खिलाफ कारवाई करने की बजाय हाथ जोड़कर दोषी को कहता है अब मुंह बंद रखना। भले की कुछ समय बाद मानसी पेट से दर्द से उभर आए, मगर क्‍या वह मासूम जिन्‍दगी भर बचपन में मिले इस दर्द से कभी उभर पाएगी।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;i&gt;&lt;b&gt;(क्राइम पैट्रोल दस्‍तक अनूप सोनी के साभार से)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी कुछ दिन पहले बाल यौन शोषण को लेकर एक बिल पास हुआ है। जो ऐसा करने वाले को दंडित करेगा। मगर हर गरीब पिता इस तरह दोषियों के आगे हाथ जोड़कर खड़ा होगा तो उक्‍त कानून दोषियों को दंडित कैसे कर पाएगा। ऐसे लोगों के खिलाफ चुपी नहीं, संग्राम होना चाहिए। यह क्राइम पैट्रोल दस्‍तक की मानसी थी, अनूप सोनी इससे भले ही महाराष्‍ट्र से कहे, लेकिन मैं तो इसे भारत से कहूंगा। यह भारत के किसी भी कोने में हो सकती है। जब कभी भी आपको ऐसी दस्‍तक सुनाई दे, तो आवाज उठाएं अन्‍याय के खिलाफ। एक जुर्म के खिलाफ। एक बेटी के हक में। वो अनामिका हो सकती, वो चुलबुल हो सकती, वो शांति हो सकती है, हमने तो सिर्फ नाम बदला है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-6100390626409665025?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/IpjuHItTA_s" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-14T13:59:55.836+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/-_KV7rOdi8Rs/T7DAkVpSTRI/AAAAAAAABpg/9odGhxT5tRQ/s72-c/crime+patrol+.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_14.html</feedburner:origLink></item><item><title>जब नेता फंसे 'बड़े आराम से'</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/Cj_jUAi36lA/blog-post_12.html</link><category>संपादकीय</category><category>सुलगते मुद्दे</category><category>राजनीति</category><category>व्‍यंग</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Fri, 11 May 2012 23:01:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-2509898375041902790</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-QhEhaVutSPQ/T637spsc9EI/AAAAAAAABo8/-JIapsqdimM/s1600/bade+aaram+se.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="202" src="http://3.bp.blogspot.com/-QhEhaVutSPQ/T637spsc9EI/AAAAAAAABo8/-JIapsqdimM/s640/bade+aaram+se.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बड़े आराम से। यह संवाद तो आप ने जरूर सुना होगा, अगर आप टीवी के दीवाने हैं। अगर, नहीं सुना तो मैं बता देता हूं, यह संवाद छोटे नवाब सैफ अली खान बोलते हैं, अमूल माचो के विज्ञापन में। अमूल माचो पहनकर सैफ मियां, एक हत्‍या की गुत्‍थी को ''बड़े आराम से'' सुलझा लेते हैं, क्‍यूंकि ''अमूल माचो'' इतनी पॉवरफुल बनियान है कि मरा हुआ आदमी खुद उठकर बोलता है कि उसका खून किसने किया। इस विज्ञापन को देखने के बाद सरकार को शक हुआ कि जो घोटाले बड़े आराम से सामने आए हैं, उसमें अमूल माचो का बड़ा हाथ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घोटालों के सामने आते ही सरकार ने गुप्‍त बैठक का आयोजन कर नेताओं को सतर्क करते हुए कहा कि वह ''अपना लक पहनकर चलें'' मतलब लक्‍स कॉजी पहनें, वरना पकड़े जाने पर सरकार व पार्टी जिम्‍मेदार नहीं होगी। गुप्‍त बैठक से निकलकर नेता जैसे ही कार में बैठकर लक्‍स कॉजी लेने के लिए निकले तो रास्‍ते में ट्रैफिक पुलिस वाले ने नेता की गाड़ी को रोक लिया। नेता गुस्‍से में आ गए, आते भी क्‍यूं न जनाब। आखिर परिवहन मंत्री हैं, और उनके वाहन को बीच रास्‍ते रोक दिया जाए, बुरा तो लगेगा ही। ट्रैफिक पुलिस वाला कहता है, सर जी जो रूपा फ्रंटलाइन पहनते हैं, वही फ्रंट में रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नते ही नेता का सिर चक्‍कर खा गया, साला अभी तो गुप्‍त बैठक में बोल रहे थे, अपना लक पहनकर चलें, अभी यह पुलिस वाला बोल रहा है जो रूपा फ्रंटलाइन पहनते हैं, वही फ्रंट में रहते हैं। नेता जी दुविधा में फंस गए, आखिर कौन सी पहनूं, फ्रंट वाली या लक वाली। नेता को दुविधा में देख बीरबल जैसा तेज दिमाग पीए बोलता है, सर जी दोनों की एक साथ क्‍यूं नहीं पहन लेते। बात नेता को जम गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेता तुरंत गाड़ी में बैठकर मॉल की ओर चल दिए। आखिर भाई नेता हैं, छोटी मोटी दुकान में थोड़ा न जाएंगे। नेता जैसे ही मॉल में पहुंचे तो टीवी चल रहा था, नीचे समाचारों की पट्टी चल रही थी, वो समाचार पट्टी को पढ़ने लगे ही थे कि अचानक स्‍क्रीन पर आकर अक्षय कुमार बनियान पहने कुछ गुंडा की पिटाई करने लगा। पिटाई करने के बाद जाते जाते ''होम डिलीवरी भी देता हूं। मैडम आपका बटन खुला है। फिट है तो हिट है बॉस।'' जैसे संवाद बोलता है। अब नेता के मन में फिर लड्डू फूटा। उसको एक नेता मित्र की याद आई। जो आशिक मिजाज था, वैसे अब नेताओं की छवि भी कुछ ऐसी बन गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सोचा, क्‍यूं न इसे भी खरीद लिया जाए। तीनों एक साथ पहनकर चलेंगे, बड़े आराम से। अगले दिन नेता तीनों पहनकर कार्यालय में पहुंच गए। इतने में उनका नाम भी एक घोटाले में आ गया। नेता ने अपनी पार्टी प्रमुख को फोन लगाकर बोला कि उन्‍होंने तो वैसा ही किया था, जैसा पार्टी ने कल मीटिंग में बताया, लेकिन मेरा नाम फिर भी घोटाले में कैसे आया गया। तो आगे से फोन में पार्टी प्रमुख गुस्‍सेल मूड में कहते हैं, क्‍या नेता लोग ही केवल नकली चीजें बेच सकते हैं, दुकानदार नकली ब्रांड नहीं बेच सकता, अरे गधे। फोन कट, नेता कैचअप।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-2509898375041902790?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=Cj_jUAi36lA:2HqncGgJRpY:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/Cj_jUAi36lA" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-12T11:31:03.165+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/-QhEhaVutSPQ/T637spsc9EI/AAAAAAAABo8/-JIapsqdimM/s72-c/bade+aaram+se.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_12.html</feedburner:origLink></item><item><title>अशोक उनका भाई था और मैं क्‍या था ?</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/Q7lMxQwRwm4/blog-post_11.html</link><category>सादत हसन मंटो</category><category>अशोक कुमार</category><category>अतिथि कोना</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Thu, 10 May 2012 23:44:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-4361993420386675028</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Y8TvXFggD9U/T6y1JQVV46I/AAAAAAAABow/-WgElm6efmg/s1600/Saadat.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="201" src="http://2.bp.blogspot.com/-Y8TvXFggD9U/T6y1JQVV46I/AAAAAAAABow/-WgElm6efmg/s640/Saadat.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(''सादत हसन मंटो (11 मई, 1912 – 18 जनवरी, 1955) उर्दू लेखक थे, जो अपनी लघु कथाओं, बू, खोल दो, ठंडा गोश्त और चर्चित टोबा टेकसिंह के लिए प्रसिद्ध थे। कहानीकार होने के साथ-साथ वे फिल्म और रेडिया पटकथा लेखक और पत्रकार भी थे। अपने छोटे से जीवनकाल में उन्होंने बाइस लघु कथा संग्रह, एक उपन्यास, रेडियो नाटक के पांच संग्रह, रचनाओं के तीन संग्रह और व्यक्तिगत रेखाचित्र के दो संग्रह प्रकाशित किए। कहानी में अश्लीलता के आरोप की वजह से मंटो को छह बार अदालत जाना पड़ा था, जिसमें से तीन बार पाकिस्तान बनने से पहले और बनने के बाद, लेकिन एक भी बार मामला साबित नहीं हो पाया। इनके कुछ कार्यों का दूसरी भाषाओं में भी अनुवाद किया गया है।'')&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांप्रदायिक तनाव जोरों पर था। एक दिन मैं और अशोक कुमार बम्‍बई टॉकीज से वापिस आ रहे थे। रास्‍ते में देर तक उसके घर बैठे रहे। शाम को उसने कहा, चलो मैं तुम्‍हें छोड़ आऊं। शॉर्टकट की खातिर वह मोटर को एक खालिस मुस्‍िलम मुहल्‍ले में ले गया। सामने से एक बारात आ रही थी। जब मैंने बैंड की आवाज सुनी तो मेरे होश गुम हो गए। एकदम अशोक का हाथ पकड़कर मैं चिल्‍लाया, ''दादामुनि! यह तुम किधर आ निकले। अशोक मेरा मतलब समझ गया। मुस्‍कराकर उसने कहा, फिक्र न करो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं फिक्र क्‍यों न? मोटर साइकिल ऐसे इस्‍लामी मुहल्‍ले में थी, जहां से किसी हिंदु का आना जाना हो ही नहीं सकता था। अशोक को कौन नहीं पहचानता था कि वह&amp;nbsp; हिन्‍दु है, एक बहुत बड़ा हिंदु, जिसकी हत्‍या करना महत्‍वपूर्ण हो सकता था। मुझको अरबी भाषा में कोई दुआ याद नहीं थी। कुरान शरीफ की कोई वक्‍त के मुआफिक आयत भी नहीं आती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन ही मन मैं अपने ऊपर लानतें भेज रहा था और धड़कते हुए दिल से अपनी जुबां में अनोखी सी दुआ मांग रहा था कि ए खुदा मेरी इज्‍जत बचाना। ऐसा न हो कि कोई मुस्‍लमान अशोक को मार दे, और मैं सारी उम्र उसका खून अपनी गरदन पर महसूस करता रहूं। यह गरदन कौम की नहीं, मेरी अपनी गरदन थी, मगर यह ऐसी जलील हरकत के लिए दूसरी जाति के सामने शरम और रंज के कारण झुकना नहीं चाहती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मोटर बारात के जुलूस के पास पहुंची तो लोगों ने चिल्‍लाना आरंभ कर दिया अशोक कुमार अशोक कुमार। मैं बिल्‍कुल नर्वस हो गया। अशोक स्‍टीयरिंग पर हाथ रखे खामोश था। मैं आतंक और भय के दायरे में बाहर निकलकर लोगों से यह कहने वाला था कि देखो होश की बात करो। मैं मुसलमान हूं, यह मुझे मेरे घर छोड़ने जा रहा है, कि दो नवयुवकों ने आगे बढ़कर बड़े आराम से कहा, अशोक भाई आगे रास्‍ता नहीं मिलेगा, इधर बाजू की गली से चले जाओ। अशोक भाई, अशोक उनका भाई था। और मैं कौन था। मैंने अपने पहनावे की ओर देखा, जो खादी का था, मालूम नहीं, उन्‍होंने मुझे क्‍या समझा होगा। मगर हो सकता है कि उन्‍होंने अशोक की मौजूदगी में मुझे देखा ही न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोटर जब इस्‍लामी मुहल्‍ले से निकली तो मेरी जान में जान आई। मैंने अल्‍लाह का शुक्र अदा किया, तो अशोक हंसा, तुम बेकार ही घबरा गए। आर्टिस्‍टों को ये लोग कुछ नहीं कहा करते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;सआदत हसन मंटो की किताब मीना बाजार के साभार से, जो पिछले दिनों शुक्रवार नामक हिन्‍दी पत्रिका में प्रकाशित हुआ।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलते चलते, इतना ही कहूंगा, 'बेटे तो हर रोज पैदा होते हैं, मगर तुम सा नसीब होता है किसी किसी को''।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-4361993420386675028?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=Q7lMxQwRwm4:Kkmro5NZLzM:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/Q7lMxQwRwm4" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-11T12:14:48.915+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-Y8TvXFggD9U/T6y1JQVV46I/AAAAAAAABow/-WgElm6efmg/s72-c/Saadat.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_11.html</feedburner:origLink></item><item><title>ठुकराने से मिली प्रेरणा</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/ovmTYRXNxNI/blog-post_10.html</link><category>एकटी कोबिता</category><category>संपादकीय</category><category>अरिबिंद</category><category>अतिथि कोना</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Wed, 09 May 2012 23:27:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-8747315122854388947</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-C4pDJX-EaZM/T6tfi8rQpFI/AAAAAAAABok/E6OIewRTseY/s1600/killfear.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="168" src="http://1.bp.blogspot.com/-C4pDJX-EaZM/T6tfi8rQpFI/AAAAAAAABok/E6OIewRTseY/s640/killfear.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;पहल तुमको ही करनी होगी। एक कदम से शुरू होती कोई भी यात्रा। एक कमरे से चंद पैसों से शुरू हुए काम आज दुनिया के सबसे बड़े बिजनस बन गए हैं। एक छोटी सी पहल, बदल देती है आपकी जिन्‍दगी। कुछ ऐसी ही छोटी सी पहल 1994 में एक युवक ने की, जिसका नाम है अरिबिंद सिंह।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अरिबिंद की एक पेजी मैगजीन &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;शिखर चंद जैन&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिलिए एक दिलचस्‍प शख्‍स से, जो बीते 18 सालों से एक पेज की अनूठी मैगजीन ''एकटी कोबिता'' निकाल रहा है। इसकी कोई मुद्रित कीमत नहीं है। आप चाहें जितने पैसे देकर खरीद सकते हैं। यह मैगजीन अधिकतम पचास रुपए तक बिक चुकी है। पत्रिका हिन्‍दी अंग्रेजी बांग्‍ला भाषाओं में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;जो आपकी इच्‍छा है, वही दें&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;कोलकाता के बाहरी इलाके में उत्तरी क्षेत्र में बसा है, बारानगर। यहीं रेलवे क्‍वार्टर में रहते हैं, रेलवे कर्मचारी अरिबिंद सिंह। अरिबिंद 1994 से (शुरुआत कोलकाता पुस्‍तक मेले से) अब तक लगातार देश की एक मात्र एक पेजी छिमाही साहित्‍यिक पत्रिका एकटी कोबिता निकाल रहे हैं। इस त्रिभाषा साहित्‍यक पत्रिका में कहानी के साथ साथ कविताएं भी प्रकाशित की जाती हैं। किताब की कीमत है, जो आपकी इच्‍छा है, वहीं दे। उनके इस अनूठे प्रयास की सराहना करते हुए इन्‍हें बीते साल 'लिम्‍का बुक ऑफ रिकार्ड्स'' में भी स्‍थान दिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;बचपन से पड़े सृजन के बीज&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;अरिबिंद की इस अनूठी पत्रिका के बीज तभी पड़ चुके थे, जब वे पांचवी कक्षा के विद्यार्थी थे। उनके एक शिक्षक बच्‍चों की रचनात्‍मक प्रतिभा निखारने के लिए उन्‍हें स्‍कूल के बगीचे में ले जाते और किसी फूल पर हाथों हाथ कविता रचने को कहते। इसके अलावा उनके पिता जो मिलिट्री ऑडिट में क्‍लर्क थे, नियमित डायरी लिखते थे। उनसे भी अरिबिंद को लिखने की प्रेरणा मिली। अरिबिंद की मां और पिता दोनों साहित्‍य प्रेमी भी थे। इसीलिए उन्‍होंने अपने एक बेटे का नाम ही रविंद्रनाथ रख दिया। इस प्रकार उन्‍हें बचपन से ही साहित्‍यिक माहौल मिला, जो आगे चलकर उनके लिए लाभदायक साबित हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;ठुकराए जाने पर मिली प्रेरणा&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;46 वर्षीय अरिबिंद के मन में साहित्‍यिक पत्रिका निकालने का ख्‍याल 1991 में आया। दरअसल वे अपनी लिखी रचनाएं विभिन्‍न अखबारों द्वारा अस्‍वीकृत कर दिए जाने से व्‍यथित और निराश हो चुके थे। बस तभी उन्‍होंने खुद की एक ऐसी मैगजीन निकालने का निश्‍चय किया, जिसकी कोई कीमत न हो। बस यही ख्‍वाहिश थी कि लोग उसे लें और पढ़ें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;लेखक, क्‍लर्क, गायन&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;अरिबिंद अपनी छमाही पत्रिका के हर अंक की 15000 कॉपियां छापते हैं। कुल मिलाकर लागत अक्‍सर वसूल हो जाती है। अरिबिंद रेलवे क्‍लर्क की नौकरी के साथ साथ आकाशवाणी केंद्र में गायक भी हैं। 2011 में उन्‍होंने ममता बनर्जी पर आधारित गीतों की सीडी ''बांग्‍लार बाघिनी ममता'' भी तैयार की थी। वे कई बार ममता बैनर्जी के घर भी जा चुके हैं। अरिबिंद की पत्‍नी सुमन और उसकी पांच वर्षीय बेटी सुधांगी उनके काम से काफी खुश हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;राजस्‍थान पत्रिका के साभार से&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;चलते चलते,&lt;/b&gt;&lt;/i&gt; इतना ही कहूंगा दोस्‍तो। जिन्‍दगी आपको मौके देती है, मगर हम जिन्‍दगी के इशारों को समझ नहीं पाते। अरिबिंद की रचनाओं को ठुकराया गया तो उनको खुद की मैगजीन शुरू करने का विचार आया। हमें ठोकर अक्‍सर कुछ नया सिखाने के लिए लगती है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-8747315122854388947?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=ovmTYRXNxNI:qlEYRDA8mcw:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/ovmTYRXNxNI" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-10T11:58:33.002+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/-C4pDJX-EaZM/T6tfi8rQpFI/AAAAAAAABok/E6OIewRTseY/s72-c/killfear.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_10.html</feedburner:origLink></item><item><title>तट पर रख कर शंख सीपियां</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/8-vSF3yf1G8/blog-post_6036.html</link><category>संपादकीय</category><category>प्रभाष जोशी</category><category>आलोक तोमर</category><category>अतिथि कोना</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Wed, 09 May 2012 06:57:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-1660058014017962977</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-6TSMDhVJl8o/T6p0DDgPtKI/AAAAAAAABoY/IJ2-y34T_9w/s1600/prabhash+joshi.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="146" src="http://2.bp.blogspot.com/-6TSMDhVJl8o/T6p0DDgPtKI/AAAAAAAABoY/IJ2-y34T_9w/s640/prabhash+joshi.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;भड़ास फॉर मीडिया व समाचार प्‍लस की ओर से 17 मई 2012, दिनांक गुरूवार को दिल्‍ली के दीन दयाल उपाध्‍याय मार्ग स्‍िथत उर्दू घर में बाद दोपहर 2:45 से 6:45 तक स्‍व.प्रभाष जोशी व आलोक तोमर की स्‍मृति को समर्पित व्‍याख्यान, सूफी संगीत और सम्‍मान समारोह आयोजित किया जा रहा है। स्‍वर्गीय प्रभाष जोशी का नाम पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े गर्व से लिया जाता है और आलोक तोमर प्रभाष जोशी के सबसे प्रिय शिष्‍य हैं। आलोक तोमर जी ओर से अपने गुरू प्रभाष जोशी की पुण्‍यतिथि पर लिखी विशेष पोस्‍ट आपके समक्ष रख रहा हूं।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; तट पर रख कर शंख सीपियां&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;आलोक तोमर&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रभाष जी की किसी शोक-श्रध्दांजलि सभा में, मैं नहीं गया। जाने को उनके पिछले जन्मदिन पर गांधी शांति प्रतिष्ठान भी नहीं जा पाया था और फोन पर उनसे डाट भी सुनी थी मगर शोक सभाओं में तो जानबूझ कर नहीं जा रहा। अब जब प्रभाष जी की अस्थियां गंगा और नर्मदा में विसर्जित हो चुकी हैं तो एक बार फिर मन की बात करने को जी चाह रहा है।&lt;br /&gt;बात करूं इसके पहले एक संस्मरण। मेरे शहर यानी चंबल घाटी के भिंड शहर में एक जमाने के समाजवादी छात्र नेता भूपत सिंह जादौन ने पत्रकारिता पर उनका भाषण करने के लिए आमंत्रित किया था। ठीक उसी दौरान मुरैना से प्रकाशित होने वाले एक अखबार ने उद्धाटन के लिए उन्हें निमंत्रण भेजा था। दोनों ने मुझे फोन कर के कहा था कि प्रभाष जी को आपको ही लाना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रभाष जी से बात की तो बोले, चलते हैं यार। तुम्हारे माता पिता से भी मिल आएंगे और मौका मिला तो जौरा चले चलेंगे जहां सुब्बा राव रहते हैं और जहां चंबल घाटी के इतिहास में डाकुओं का सबसे बड़ा समर्पण हुआ था। फिर बोले कि पंडित एक नई कार आई है, सुना है बहुत अच्छी है, स्कार्पिओ नाम है, अगर हो सके तो उसका इंतजाम कर लेना। प्रभाष जी जैसे सादा व्यक्ति जो जिंदगी भर या तो साइकिल पर चले या कंपनी की एंबेसडर कार में, से सुन कर अटपटा लगा मगर गुरु जी की आज्ञा थी। ग्वालियर में दोस्तों को बोला तो स्कार्पिओ का पूरा काफिला जमा हो गया। हमारे भिंड शहर ने एक साथ इतनी स्कार्पिओ गाड़ियां पहली बार देखी होगी। समारोह जैसे छोटे शहरो में होता हैं, हुआ और बाकी सबके अलावा अपने को भी शॉल भेंट की गई। मां श्र्रोताओं में से थी, सो मंच से उतर कर शॉल उन्हें ओढ़ा दी। पत्रकारिता के सरोकारों को ले कर भाषण में प्रभाष जी की कई बातों का खंडन करना पड़ा मगर अंत में जब प्रभाष जी बोले तो उनका गला भर आया और उन्होंने कहा कि मैं सोच भी नहीं सता था कि यह सोता हुआ शहर एक इतने जीते जागते बालक को पत्रकारिता के संसार में भेजेगा और उसे यह संस्कार भी देगा कि अपनी मां का आदर करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद कुछ देर सर्किट हाउस जहां भाजपा के लोकल नेता उन्हें घेरने वाले थे मगर भिंड में ठीक ठाक दादागीरी है इसलिए निवेदन और धमकी दोनों का इस्तेमाल कर के उन्हें भगा दिया। इसके बाद मुरैना जाना था, वह भी ग्वालियर होते हुए लेकिन प्रभाष जी घर गए और मेरे पिता के हम उम्र होने के बावजूद उनके चरण छूए और मां के सिर पर हाथ रखा। खाना भी वहीं खाया। चलते चलते शिकायत भी कर दी कि लड़का बिगड़ गया है। इसे वापस भिंड बुला लो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुरैना पहुंचते पहुंचते शाम हो गई थी। एक छोटे से होटल में कोई आधे घंटे की झपकी लेने के बाद प्रभाष जी ने एक घंटे लंबा भाषण दिया और भूदान यात्रा के दौरान चंबल की यादों को ताजा किया। जैसा छोटे शहरों में होता है, प्रभाष जी के जय के नारे लगे और चूंकि आदत राजनैतिक नारे लगाने की है, भीड़ ने कहा, देश का नेता कैसा हो, प्रभाष जोशी जैसा हो। प्रभाष जी ने मंच पर ही पीठ पर हाथ मारा और मुक्तिबोध के प्रसिध्द शब्दों में हंसते हुए सवाल किया कि पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? इसके बाद मैं मित्रों से मिलने सर्किट हाउस चला गया और प्रभाष जी ने रात 12 बजे की रेल पकड़ी और दिल्ली रवाना हो गए। अनवरत यात्री प्रभाष जी को अगले दिन मुंबई जाना था। पता नहीं यह अपार उर्जा उनमें कहां से आती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शताब्दी से जब ग्वालियर जा रहे थे तो बीच में तीन चार बार ट्रेन के बाथरूम में जा कर सिगरेट पी आया। अच्छा खासा कुल्ला कर के आया था मगर प्रभाष जी ने पकड़ लिया और हाथ पकड़ कर बोले कि अब छोड़ भी दो यार। प्रभाष जी का यह एक अकेला ऐसा आदेश है जिसका पालन मैं आज तक नहीं कर पाया।&lt;br /&gt;प्रभाष भी जौरा नहीं जा पाए। कहा था कि दोबारा आएंगे। लेकिन वह भी नहीं हुआ। मुरैना जिले में मेरे गांव के पास बरवाई गांव में राम प्रसाद बिस्मिल और पुतली बाई दोनों का जन्म हुआ था। प्रभाष जी वहां भी जाना चाहते थे। भिंड में इतनी लंबी भागदौड़ में वे मेरे घर के पास ही रहने वाले अपने जमाने के कुख्यात डाकू लुक्का उर्फ लोकमन दीक्षित से भी मिले। लोकमन दीक्षित चंबल के पचास और साठ के दशक के सबसे बड़े डाकू गिरोह मान सिंह की गैंग के मुखिया रह चुके थे और 1960 में बिनोवा भावे के सामने इस गैंग का समर्पण करवाने में प्रभाष जी की खास भूमिका थी। सुब्बा राव भी उसी जमाने के उनके साथी है।&lt;br /&gt;काम तो प्रभाष जी के साथ नौ साल आठ महीने किया और अगर वे निकाल नहीं देते तो और कई साल करता रहता। लेकिन मुझे उन्होंने न सिर्फ पत्रकारिता के संस्कार दिए, पहले लिख चुका हूं कि छह साल में सात पदोन्नतियां दी मगर एक गलतफहमी की वजह से एक झटके में बाहर भी कर दिया। इसके बावजूद जिस दिन रिटायर हो कर उन्हें आखिरी बार संपादक के तौर पर एक्सप्रेस बिल्डिंग छोड़नी थी, उनका फोन आया और पूछा कि गाड़ी में कितना पेट्रोल है? उस जमाने में मारुति 800 हुआ करती थी जो प्रभाष जी जैसे लंबे कद वाले व्यक्ति के लिए सुविधाजनक नहीं थी फिर भी उन्होने जिद की कि पंडित घर तो तुम्हारे साथ ही जाऊंगा। वह दृश्य मार्मिक था। जनसत्ता और एक्सप्रेस का पूरा स्टाफ बाहर निकल कर खड़ा था। ज्यादातर की आंखों में आंसू थे। वे ड्राइवर के साथ वाली सीट पर उसे पीछे कर के बैठे, सभी लोगों से हाथ जोड़े, कहा- भूल चूक माफ करना और मुझे कहा कि चलो। बहादुरशाह जफर मार्ग पार होने के पहले ही उन्हें बता दिया कि अपने पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं हैं। बोले- तेरे जैसा गेल्या नहीं देखा। मालवी में गेल्या का अर्थ पागल होता है या और सटीक अर्थ लगाए तो गेल्या का मतलब है खिसका हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जमुना का पुल पार हुआ। प्रभाष जी चित्र विहार में रहते थे। गाड़ी मोड़ने लगा तो बोले- इतनी जल्दी क्या है? चलते रहो, थोड़ी पंचायत करते है। इसके बाद लगातार पूछते रहे कि जनसत्ता छूटने के बाद गुजारा कैसे चल रहा है? अखबार समय पर पैसा भेजते हैं कि नहीं? फिर अचानक पूछा कि अगर मैं तुम्हारी तरह देश के अखबारों में लिखना शुरू करूं तो घर चल जाएगा? यह अवाक करने वाला सवाल था। मगर मेरा जवाब अटपटा मगर यथार्थ से जुड़ा हुआ था। मैंने कहा कि आप जिस तरह धुआंधार लिखते हैं और जब चाहे जिसका चाहे विकेट उड़ा देते हैं, आपको राज्य सरकारों से विज्ञापन लेने वाले अखबार झेल नहीं पाएंगे, और दबा कर और संभल कर आप लिखेंगे, तो पाठक आपको नहीं झेल पाएंगे। उस समय रात के ग्यारह बज रहे थे और जमुना पार में जहां जहां मकान बन रहे थे वहां रात को भी चाय वाले बैठे थे, सो दो तीन बार बगैर चीनी की चाय पिलाई और आखिरकार एक बजे घर लौटे। घर पर चिंता और परेशानी का माहौल था और उसकी एक वजह यह भी है कि सड़क पर गाड़ी ठोकने का मेरा अच्छा खासा रिकॉर्ड रहा है। गाड़ी से उतरे, दोनों हाथ मेरे सिर पर रखे, बाल सहलाए और कहा कि अच्छे से रहना और अभी मैं हूं, मेरी जब भी जरूरत पड़े, बताना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रभाष जी ने कहा था, अभी मैं हूं। सो जब तक मेरी सांस चलती है, प्रभाष जी मेरे लिए हैं। मैं अपनी आत्मा में यह पुष्टि नहीं करना चाहता कि वे चले गए। मैं नहीं चाहता कि मैं अपने आपको लगातार अनाथ महसूस करता रहूं। रही चिता और अस्थि विसर्जन की बात तो कविता में कहूं तो- तट पर रख कर शंख सीपियां उतर गया है, ज्वार हमारा। ज्वार उतरा है मगर प्रभाष जी नाम का समुद्र सूखा नहीं है। इस समुद्र को सुखाने के लिए हजारो सूरज चाहिए। इसीलिए मुझे क्षमा करें, मैं प्रभाषजी किसी श्रध्दांजलि सभा में नहीं जाऊंगा। उनके प्रति मेरी श्रध्दा मेरी निजी पूंजी हैं जिसे मैं किसी के साथ नहीं बांटना चाहता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.datelineindia.com/default.aspx" target="_blank"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;डेटलाइन इंडिया के साभार से&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-1660058014017962977?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/8-vSF3yf1G8" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-09T19:27:15.350+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-6TSMDhVJl8o/T6p0DDgPtKI/AAAAAAAABoY/IJ2-y34T_9w/s72-c/prabhash+joshi.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_6036.html</feedburner:origLink></item><item><title>वॉट्स विक्‍की डॉनर रिटर्न</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/k224F9qpb1Q/blog-post_09.html</link><category>संपादकीय</category><category>विक्‍की डॉनर</category><category>फिल्‍म जगत</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Wed, 09 May 2012 01:07:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-3044167767397812655</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-G8lJSh69NQA/T6jq9S5E5BI/AAAAAAAABoI/c_XqRQbSdw4/s1600/vicky+donor.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="196" src="http://3.bp.blogspot.com/-G8lJSh69NQA/T6jq9S5E5BI/AAAAAAAABoI/c_XqRQbSdw4/s640/vicky+donor.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मोबाइल के इनबॉक्‍स में नॉन वेज चुटकले। सिनेमा हॉल पर दो अर्थे शब्‍द हमको हंसाने लगे हैं। कॉलेज में पढ़ने वाले युवक युवतियों को विक्‍की डॉनर पसंद आ रहा है। उनको द डर्टी पिक्‍चर की स्‍लिक भी अच्‍छी लगती है। उनको दिल्‍ली बेली की गालियों में भी मजा आता है। वैसा ही मजा, जैसा धड़ा सट्टा लगाने वालों को बाबे की गालियों से, जिससे वह नम्‍बर बनाते हैं, और पैसा दांव पर लगाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिनेमा अपने सौ साल पूरे कर रहा है। पॉर्न स्‍टार अब अभिनेत्री बनकर सामने आ रही है। अब अभिनेत्री को अंगप्रदर्शन से प्रहेज नहीं, क्‍यूंकि अभिनय तो बचा ही नहीं। दर्शकों को सीट पर बांधे रखने के लिए दो अर्थे शब्‍द ढूंढने पड़ रहे हैं। भले ही हम एसीडिटी से ग्रस्‍त हैं, मगर मसालेदार सब्‍जी के बिना खाना अधूरा लगता है। बाप बेटा दो अर्थे संवादों पर एक ही हाल में एक साथ बैठकर ठहाके लग रहे हैं। बाप बेटी ''जिस्‍म टू'' मिलकर नई पीढ़ी के लिए सेक्‍स मसाला परोस रहे हैं। ठरकी शब्‍द गीतों में बजने लगा है और हम इसकी धुन पर झूमने लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस हमारी प्रॉब्‍लम यह है कि हमको खुलकर कुछ भी नहीं करना। हमको ऊपर से विद्रोह करना है। एक तरफ हम ''द डर्टी पिक्‍चर'' को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से नवाजते हैं और वहीं दूसरी तरफ टीवी पर प्रसारित होने से रोकते हैं। हमें सिनेमा हॉल में बेपर्दा होती हीरोइनें अच्‍छी लगती हैं, मगर पत्‍नी के सिर से सरका पल्‍लू भी संस्‍कृति का उल्‍लंघन नजर आता है। जब सेक्‍स एजुकेशन की बात आती है तो पूरा देश संस्‍कृति का हवाला देते हुए इसका विरोध करता है। हम को आधी अधूरी, लूका छिपी पसंद है। पिछले कुछ सालों से रुपहले पर्दे पर सेक्‍स परोसा जा रहा है, कभी हवा के नाम पर, कभी हेट स्‍टोरी के नाम पर। कभी ''द डर्टी पिक्‍चर'' के नाम पर, कभी विक्‍की डॉनर के नाम पर। उस पर हम को एतराज नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि इस पर एतराज होना चाहिए। हम मनोरंजन के नाम पर युवा पीढ़ी को गलत दिशा की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्‍साहन दे रहे हैं। मुझे याद है, जब दिल्‍ली बेली रिलीज हुई थी, तो आपकी अदालत में आमिर खान से रजत शर्मा ने सफाई मांगी थी। आमिर के शब्‍द थे, आज जो लोग देखते हैं, वो हमको परोसना पड़ता है। तो कुछ लड़कियों ने आमिर की स्‍पोट करते हुए कहा था, इससे लड़कियों को भी गालियां सीखने का मौका मिलेगा, ताकि हम भी लड़कों को उनकी भाषा में जवाब दे सकें। हम गांव की चौपाल से निकल कर शहर की तरफ आए थे। इस उम्‍मीद से कि हम अपनी बोली को बदलेंगे, एक नए समाज का सर्जन करेंगे, जहां गाली गालोच नहीं होगा। एक सभ्‍य भाषा होगी। मगर आज हम उनकी गालियों पसंद कर रहे हैं। दो अर्थे शब्‍दों को अहमियत दे रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्‍टर चढ्ढा की गालियां, सास बहू का शराब पीना, युवक स्‍पर्म दान करना, शादी का टूटना जुड़ना, स्‍पर्म डॉनर का बच्‍चे को गोद लेना। यह है विक्‍की डॉनर। जो बातें कहने की थी, वह तो मसाला डालने के चक्‍कर में कहीं दबकर मर गई। यह कोई पहली बार नहीं हुआ। फिल्‍म जगत में बहुत बार हुआ। मगर अफसोस। हमारी दोहरी सोच कब बदलेगी। हम कब देखें कि एक ही चश्‍मे से। विक्‍की डॉनर के किरदारों की तरह लापरवाह मत बनिए।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-3044167767397812655?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=k224F9qpb1Q:u2num_vFNBo:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/k224F9qpb1Q" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-09T13:37:45.312+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/-G8lJSh69NQA/T6jq9S5E5BI/AAAAAAAABoI/c_XqRQbSdw4/s72-c/vicky+donor.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_09.html</feedburner:origLink></item><item><title>वॉट्स विक्‍की डॉनर</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/YuCqSgAwxVY/blog-post_08.html</link><category>संपादकीय</category><category>विक्‍की डॉनर</category><category>फिल्‍म जगत</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Tue, 08 May 2012 02:45:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-2981610723202727472</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-G8lJSh69NQA/T6jq9S5E5BI/AAAAAAAABoI/c_XqRQbSdw4/s1600/vicky+donor.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="196" src="http://3.bp.blogspot.com/-G8lJSh69NQA/T6jq9S5E5BI/AAAAAAAABoI/c_XqRQbSdw4/s640/vicky+donor.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;विक्‍की डॉनर&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;को लेकर तरह तरह की प्रक्रिया आई और आ भी रही हैं। फिल्‍म बॉक्‍स आफिस पर धमाल मचा रही है। फिल्‍म कमाल की है। फिल्‍म देखने लायक है। मैं फिल्‍म को लेकर उत्‍सुक था, लेकिन तब तक जब तक मुझे इसकी स्‍टोरी पता नहीं थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे पहले पोस्‍टर से लगा कि विक्‍की डॉनर, किसी दान पुण्‍य आधारित है। शायद एक रिस्‍की मामला लगा। जैसे सलमान की चिल्‍लर पार्टी। मगर धीरे धीरे रहस्‍य से पर्दा उठने लगा। हर तरफ आवाज आने लगी, विक्‍की डॉनर, सुपर्ब। बकमाल की मूवी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं पिछले दिनों सूरत गया। वहां मैंने पहली दफा इसका ट्रेलर देखा। ट्रेलर के अंदर गाली गालोच के अलावा कुछ नजर नहीं आया। दान पुण्‍य तो दूर की बात लगी। &lt;br /&gt;इस ट्रेलर के अंदर डॉ.चढ्ढा एक संवाद बोलता है, ''जनानियों के जब बच्‍चे नहीं होते थे, तो ऋषि मुनियों को बुला लिया जाता था, बाबा कहता था तथास्‍तु।'' एवं इशारे में बहुत कुछ कहता है डॉक्‍टर चढ्ढा। इसको देखने बाद सोचा। मीडिया में किसी बात की सराहना हो रही है। गलियों की। गलत दिशा देने के प्रयास की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्‍ताना आई, जिसमें घर किराने पर लेने के लिए हम युवकों को 'गे' होने की ओर धकेलते हैं। फिल्‍म देसी ब्‍यॉज में जॉब न मिलने के अभाव में युवकों को लड़कियों का दिल बहलाने की तरफ मोटिवेट करते हैं। फिल्‍म रॉकस्‍टार में एक युवती के जरिए हम लड़कियों को शादी से पहले सब कर लेने की तरफ धकेलते हैं। मगर जब ''द डर्टी पिक्‍चर'' आती है तो हम कहते हैं, सिने दुनिया की ओर जा रही है, यह देखने की बजाय कि हम किस ओर जा रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब ''द डर्टी पिक्‍चर'' की स्‍िलक दो अर्थे संवाद बोलती है तो हम को अटपटा लगता है, मगर डॉक्‍टर चढ्ढा बात बात पर गाली देता है। वो अच्‍छा लगता है। फिल्‍म के ज्‍यादातर संवाद पंजाबी हैं। शायद कुछ को तो समझ भी नहीं पड़े होंगे। सोचने वाली बात है कि फिल्‍म किस पर बनी। स्‍पर्म पर बनी है। यह स्‍पर्म क्‍या है? क्‍या स्‍पर्म आम बात है? क्‍या ''द डर्टी पिक्‍चर'' से इसको अलग किया जा सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे दिमाग में एक और बात खनकी। सच में क्‍या फिल्‍म बेहतरीन श्रेणी में आती है? क्‍या असल में फिल्‍म सुपरहिट है? फिल्‍म के सुपरहिट होने के क्‍या मानक हैं? &lt;br /&gt;क्‍या इसको सफलता का मानक मान लिया जाए, कि अगर फिल्‍म बॉक्‍स ऑफिस पर लागत से ज्‍यादा पैसा बटोरे तो फिल्‍म सफल कम बटोरे तो असफल। या फिर कोई सफलता का कोई और मानदंड होना चाहिए। एक फिल्‍म बारह करोड़ बटोरती है और एक फिल्‍म डेढ़ सौ करोड़। क्‍या दोनों सुपरहिट की श्रेणी में आनी चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं कि इस विषय को पहली बार सिने जगत ने छूआ है। इससे पहले चोरी चोरी चुपके चुपके में एक सरोगेट मदर को हायर किया जाता है। जिसमें एक पत्‍नी अपने पति को दूसरी महिला से संबंध बनाने की आज्ञा देती है। अपने संतान मोह को पूरा करने के लिए। फिल्‍म एकलव्‍य में अमिताभ बच्‍चन अपनी मालिकन को संतान सुख प्रदान करता है। जब यह सब देखता हूं तो नाजायज शब्‍द मुझे बेईमानी नजर आता है। पुरानी फिल्‍मों में यह शब्‍द बहुत सुना। मगर नाजायज वास्‍तव में क्‍या है? क्‍या चोरी चोरी चुपके चुपके में प्रीति जिंदा की कोख से पैदा हुआ बच्‍चा नाजायज ? क्‍या फिल्‍म एकलव्‍य में पैदा हुआ बच्‍चा नाजायज नहीं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विक्‍की डॉनर क्‍या है? क्‍या ऐसे डॉनरों की समाज को जरूरत है? क्‍या हमारे बच्‍चे सेक्‍स से पहले स्‍पर्म के बारे में जानें? या आज का अशिक्षित वर्ग अपने स्‍वर्थ के लिए मनोरंजन के लिए नाजायज को भी जायज बनाने की तरफ कदम बढ़ा रहा है। एक तरफ इसको ''द डर्टी पिक्‍चर'' में गंदगी नजर आती है, वहीं दूसरी तरफ विक्‍की डॉनर में उनको बकमाल नजर आता है। विक्‍की जैसे युवक को डॉनर में तब्‍दील करने के लिए डॉक्‍टर चढ्ढा अश्‍लील सीडीयां उपलब्‍ध करवाता है तो हम को एतराज नहीं, मगर द डर्टी पिक्‍चर में विद्या दो अर्थी बात करती है तो बुरा मान जाते हैं हम। रॉकस्‍टार में लड़की एक अनजान युवक के साथ जंगली जवानी का आनंद उठाती है, तो भी हम कहते हैं इतना तो चलता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;चलते चलते&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt; मैं इतना ही कहूंगा कि हमारे स्‍वार्थ पूरे हों तो नाजायज कुछ नहीं, अगर हमारे स्‍वार्थ पूरे नहीं होते तो सब नाजायज है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;बहुत जल्‍द लौट रहा हूं&lt;br /&gt;.....&lt;br /&gt;...&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;.&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;वॉट्स विक्‍की डॉनर रिटर्न&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-2981610723202727472?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=YuCqSgAwxVY:0YNnfbecaQk:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/YuCqSgAwxVY" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-08T15:15:10.897+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/-G8lJSh69NQA/T6jq9S5E5BI/AAAAAAAABoI/c_XqRQbSdw4/s72-c/vicky+donor.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_08.html</feedburner:origLink></item><item><title>65 पन्‍नों की यह किताब एक ''आउटबस्ट'' है - राजीव रंजन प्रसाद</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/ggwhsDCaUyY/65.html</link><category>संपादकीय</category><category>बस्तर क्यों जाउं? मरने</category><category>अनिल पुसदकर</category><category>अतिथि कोना</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Mon, 07 May 2012 08:19:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-5662347705667230585</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-yN2GCGgBG28/T6fnPQ0bG8I/AAAAAAAABn8/5_IQyEyypug/s1600/bastar+kyun+jaun+marne.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="211" src="http://1.bp.blogspot.com/-yN2GCGgBG28/T6fnPQ0bG8I/AAAAAAAABn8/5_IQyEyypug/s640/bastar+kyun+jaun+marne.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जब शीर्षक सुना था तो अटपटा लगा – “बस्तर क्यों जाउं? मरने!” किंतु बाध्य हुआ इस वाक्यांश को देर तक सोचते रहने के लिये। 65 पन्नों की यह किताब एक आउटबस्ट है, अपनी सोच को एक प्रवाह में निकाल देने की कोशिश। आप किताब को हाँथ में लेने के बाद इसे यूँ ही नहीं रख सकते। आप इसे न पढ़ना चाहें तो भी पृष्ठ दर पृष्ठ केवल उलट लीजिये “अटपटे शीर्षक” का अर्थ साकार होने लगेगा। यह किताब एक शहीद-स्मारक की तरह है जिसमें हर पृष्ठ के उपरी हिस्से में उन शहीदों की तस्वीरें प्रकाशित हैं जिनकी जान नक्सली हिंसा के प्रतिफल में पूरी कायरता से कभी घात लगा कर तो कभी बारूदीसुरंग उड़ा कर ली गयी। 320 जवानों की तस्वीरें इस किताब में होना उन्हें श्रद्धांजलि देने का प्रयास सदृश्य है, क्योंकि हर पृष्ठ पर एक और तस्वीर अंकित है – अमर जवान ज्योति की। किताब का काला आवरण बस्तर के वर्तमान हालात को प्रतिबिम्बित करता है तथा “मरने” शब्द को “लाल” रंग से प्रस्तुत कर विचारधारा के नाम पर जारी जंग की विभीषिका दर्शाने की कोशिश की गयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात पत्रकार-पुलिस संवाद से आरंभ होती है किंतु किसी सिपाही के भीतर बस्तर में हुई पोस्टिंग से बचने भागने के कारणों की आड़ में नक्सलवाद के नासूर को कुरेदा गया है। बाटला हाउस प्रकरण को भूमिका की धुरी बनाया गया है जिसमें पुलिसिया शाहदत की निस्सारता को रेखांकित करते हुए लेखक नें पत्रकारों, नेताओं तथा समाजसेवियों पर भी प्रश्नचिन्ह लगाये हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार जब मीडिया के प्रति अपना रोष व्यक्त करता है; खबरो तथा टीआरपी के बीच के सम्बन्ध को उजागर करता है तो क्या आप उसे हल्के में के सकते हैं? पत्रकार कौम पर उबलता एक संवाद देखिये “...जैसे हाँथ में माईक पकड़े आपके भाई बंधु टीवी पर चीखते चिल्लाते हैं। सब मजबूर हो कर सुनते हैं। आपको भी आज वैसे ही मजबूर हो कर सुनना पड़ेगा...।“ लेखक उन सरकारी बस्तर नीतियों पर भी कटाक्ष करने से नहीं चूके जिनके कारण सुलग रहा है तथा सिपाही मनोबल हीन-डरा सहमा कार्य कर रहा है। एक संवाद यह भी देखिये – “...टुच्चे नेता की तरह ही बोलो। लगाओ अंट शंट आरोप। पूछो आड़े तिरछे सवाल। पूछो क्यों घूमते हो जंगलों में? थाने में ही रहो। मरने के लिये किसने कहा था?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक नें विभीषिका को स्पष्ट करने के लिये को कहानी बुनी है उसका पात्र कहता है – “..मेरा ट्रांस्फर मुफ्त में नहीं रुका है भैया....कहाँ से लाता मैं? घर बेच कर जुगाड़ किया है।....मेरे लिये पिता की अंतिम निशानी बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण था अपने बच्चों का पिता बने रहना।“ प्रेस की स्वच्छंदता पर कटाक्ष करते हुए पत्रकार - लेखक कहते हैं – “प्रेसबिल लाने की बात चली थी तो आप लोगों को वह काला कानून लगा था।....। आखिर क्यों डरते हो आप लोग कानून कायदे से? इस लिये न कि आपलोगों की लोगों को नंगा करने की आजादी छिन जायेगी?” कठोर सवाल और भी हैं – “मैं बस्तर जाउं और वापस आउं तिरंगे में लिपट कर? आपके लिये एक अच्छी ह्यूमन स्टोरी बनने के लिये जाउं बस्तर?” लेखक ने विभीषिका के चित्रण में भी कोताही नहीं की है – “आपको पता भी है जिस कॉफिन में लाश आती है उसमे लाश नहीं होती लोथड़े होते हैं? और वो भी अंदाज से कॉफिन में डाल दिये जाते हैं कि शायद ये टुकडा इसी लाश का होगा। देखा है कभी बस्तर का बारूदी विस्फोट?” या एक निरुत्तर करने वाला प्रश्न “...पुलिस में भी मरता कौन है? नया नया जवान, ज्यादा हुआ तो हवलदार और बहुत ज्यादा हुआ तो सब-इंस्पैक्टर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“अनिल जी के उस दुस्साहस की प्रसंशा करनी होगी जहाँ पत्रकार हो कर भी पत्रकारिता पर तरजनी उठाते उनके शब्द नहीं कांपते – “मैं नेशन की भी हालत जानता हूँ।...। गुजरात या तनावग्रस्त इलाके में एक आदमी मरता है तो दिन भर कुत्तों की तरह भौंकते हो आप लोग। भाषाई गुर्गे अगर 5 टैक्सी वालों को पीट देते हैं तो सारे देश को सिर पर चढ़ा लेते हो आप लोग। आपलोगों की ओबी वैन की रेंज में कोई बच्चा गढ्ढे मे गिर जाता है तो दिन रात वही दिखाते हो आप लोग। बच्चे का बोरवेल में गिरना राष्ट्रीय समस्या हो जाती है, वो राष्ट्रीय खबर हो जाती है। एर्राबोर में नक्सलियों का किया नरसंहार याद है आपको। छोटे-छोटे दुधमुहे बच्चे तक की गला रेतकर हत्या कर दी गयी थी। मरने वालों का आँकडा दर्जनो में था। क्या हुआ? क्या वह खबर नेशनल नहीं थी?...चलो मान लिया एर्राबोर के समय गलती हो गयी होगी। फिर रानीबोदली कैम्प में भी तो नक्सलियो ने वही कहर बरपाया था, तब भी दर्जनो लोग मारे गये थे?” यहाँ से किताब गंभीर मोड लेती है। समाजसेवी संगठनों और मानवधिकार की आड में हो रही राजनीति पर सवाल उठाते हैं लेखक – “...क्योंकि इस देश में अपराधियों को जिन्दा रहने का अधिकार है? क्योंकि लोगों के खून से होली खेलने के मानवाधिकार हैं? क्योंकि उन्हे मारने पर चिल्लाने वाले तुम जैसे लोग, इस समाज के ठेकेदार हैं? क्योंकि उन्हें मामूली सी भी खरोंच लग जाने पर हाईकोर्ट से ले कर सुप्रीमकोर्ट तक याचिकाओं की बाढ लगा देने वाले एनजीओ और दूसरे समाजसेवी संगठन हैं?” नक्सली मध्यस्तों पर भी प्रहार है किताब में – “फिर इसकी बात नक्सली क्यों मानते हैं? क्या ये उनका नेता है? क्या ये उनका रिश्तेदार है? है कौन बे ये और किस अधिकार से यहाँ आता है?” इसी प्रश्न को आगे बढा कर लेखक नें मानवाधिकार के नाम पर रंगे सियारों की कौम की पतलून ढीली कर दी है – “क्या हमारे मरने पर मानवाधिकार का हनन नहीं होता?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक ने सिपाहियों की ही नहीं उनकी शहादत के बाद विधवाओं और परिजनों की स्थिति पर भी गंभीरता से बात की है तथा अनुकंपा नीति पर भी प्रश्न खड़े किये हैं। पुस्तक के अंतिम पृष्ठों में मृतक सिपाही की विधवाओं से जुडे बेहद गंभीर सवाल उठाये गये हैं...। इस किताब को पढ कर यह आसानी से समझा जा सकता है कि दिल्ली से एक “तथाकथित मानवाधिकारवादी” गाली-गलौज की भाषा में इसका विरोध क्यों कर रहा था? यह भी कि एक पत्रकार निर्पेक्षता से जब अपनी ही आलोचना से गुरेज न करे तो कृति पर बहस होनी चाहिये। बस्तर में सिपाहियों के काम करने के हालात तथा शहीद के परिजनों के दशा पर यह किताब बिना लागलपेट के बात करती है। यह किताब व्यवस्था में सुधार की भी मांग करती है तथा नक्सलवाद के खिलाफ भी खडी होती है। यह एक आवश्यक किताब है, यह किताब बस्तर की मिट्टी को लाल-आतंकवाद से मुक्त कराने के लिये शहीद हुए सिपाहियों पर एक विनम्र श्रद्धांजलि भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्‍यानार्थ &lt;br /&gt;श्री राजीव रंजन प्रसाद आमचो बस्तर के लेखक हैं, जिन्‍होंने “बस्तर क्यों जाउं? मरने!” की समीक्षा की। “बस्तर क्यों जाउं? मरने!” छतीसगढ़ के वरिष्‍ठ पत्रकार अनिल पुसदकर जी द्वारा लिखी पुस्‍तक है, जो पिछले दिनों बाजार में आई।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-5662347705667230585?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=ggwhsDCaUyY:cJm-5cQcB84:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/ggwhsDCaUyY" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-07T20:50:30.187+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/-yN2GCGgBG28/T6fnPQ0bG8I/AAAAAAAABn8/5_IQyEyypug/s72-c/bastar+kyun+jaun+marne.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/65.html</feedburner:origLink></item><item><title>मुलाकात :- रिचर्ड ब्रॉनसन; जब खरगोश खा गए पेड़</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/YRaR-vAPNZY/blog-post_07.html</link><category>संपादकीय</category><category>वर्जिन</category><category>रिचर्ड ब्रॉनसन</category><category>screw it just do it</category><category>जीवन के सबक</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Mon, 07 May 2012 00:44:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-1767126859584758115</guid><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Fn98x3dxXFs/T6eEpcPANkI/AAAAAAAABns/3jYVNl1kQdU/s1600/richard+branson.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="190" src="http://2.bp.blogspot.com/-Fn98x3dxXFs/T6eEpcPANkI/AAAAAAAABns/3jYVNl1kQdU/s640/richard+branson.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;कल रात करीबन दो घंटों तक रिचर्ड ब्रानसन से बातचीत की। बेहद रोचक व्‍यक्‍ित हैं रिचर्ड ब्रानसन। दुनिया उनको एक बिजनसमैन के रूप में जानती है या फिर यूके के सबसे अमीर चौथे व्‍यक्‍ित के रूप में। वर्जिन ग्रुप के मालिक हैं रिचर्ड ब्रानसन। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे कहां राजा भोज कहां गंगू तेली। मतलब कहां रिचर्ड ब्रानसन और कहां मैं। यह बात भी सच है, उसको हिन्‍दी नहीं आती और मुझे फराटेदार इंग्‍लिश। फिर भी हैरत की बात यह है कि मैंने उनको दो घंटों तक पूर्ण रूप से सुना और उनको समझा। वो मेरे सामने थे, उनकी आवाज मेरे कानों के पर्दो से गुजरती हुई मेरे मन और दिमाग पर अपना असर छोड़ रही थी। मैं सोच रहा था, इतना बड़ा बिजनसमैन। और हरकतें ऐसी करता है जैसे वो अभी अभी युवा हुआ हो। मैं फिर कहता हूं बेहद रोचक व्‍यक्‍ित। दिलचस्‍प व्‍यक्‍ितत्‍व का मालिक है रिचर्ड ब्रानसन। डिसलेक्‍िसया की बीमारी से ग्रस्‍त व पढ़ाई में बिल्‍कुल निकम्‍मा, लेकिन असल जिन्‍दगी में दुनिया के नम्‍बर वन बिजनसमैनों की श्रेणी में शुमार है, रिचर्ड ब्रॉनसन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिचर्ड ब्रानसन कहते हैं कि अख़बार वाले उससे और उसके वर्जिन कंपनी के साथियों को ''स्‍वर्ग में रहने वाले विद्रोही'' कहते हैं। जब रिचर्ड ब्रानसन खुद को विद्रोही कहता है तो उसको सुनने की रुचि और तीव्रता से बढ़ जाती है, क्‍योंकि विद्रोही सुनते ही एप्‍पल फेम स्‍टीव जॉब्‍स के शब्‍द दिमाग में दौड़ने लगते हैं, विद्रोहियों की सुनो, पागलों की सुनो, संकट पैदा करने वालों की सुनो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्‍टीव जॉब्‍स के शब्‍दों ने मुझे रिचर्ड ब्रानसन के और करीब कर दिया। अब मुझे उनकी बातों में और दिलचस्‍पी पैदा होने लगी। रिचर्ड ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, मीडिया वाले झूठ नहीं कहते हमारे बारे में क्‍यूंकि हम लोग डटकर मेहनत और अपने बीचों पर जमकर मौज मस्‍ती करते हैं। मैंने जिन्‍दगी में हर कदम नियमों का पालन नहीं किया, लेकिन जीवन की इस राह पर चलते चलते मैंने कई सबक सीखे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ पल ठहरते हुए रिचर्ड कहता है, मेरी सफलता का राज एक ही है, बस कर डालें! मेरे इस राज के कारण वर्जिन का पूरा स्‍टाफ मुझे डॉ. यस के नाम से पुकारता है। ऐसा नहीं कि पूरे परिवार में केवल मैं ही ऐसा था जो बस कर डालें! के नियम का अनुसरण करता था। मेरे परिवार में मेरी मां और मेरे दादा के चचेरे भाई भी ऐसे ही थे। मेरी मां ईव, जो युद्ध के दौरान पायलट बनना चाहती थी, और उन्‍होंने हेस्‍टन एयरफील्‍ड जाकर पायलट बनने का प्रस्‍ताव रखा। आगे से दो टूक जवाब मिला, महिलाओं को पायलट बनने की आज्ञा नहीं। उसने चमड़े का फ्लाइंग जैकेट पहना और अपने सुनहरे बालों को चमड़े के हेलमेट में छुपा लिया। कुछ दिनों तक गहरी आवाज में बोलने का अभ्‍यास किया। अंत उनको पयालट की जॉब मिल गई। इतना ही नहीं, उनके सिखाए हुए पायलटों ने ही बैटल ऑफ ब्रिटेन में लड़ाकू विमान उड़ाए। फिर उन्‍होंने एयर होस्‍टेस बनने का मन बनाया, लेकिन उसके लिए नर्स प्रशिक्षण व स्‍पेनिश भाषा पर प्रभुत्‍व होना जरूरी था, जो दोनों उनके पास नहीं थे। फिर भी उन्‍होंने एयरलाइन के नाइट पोर्टर से बात करके अपने इस लक्ष्‍य को पाया। और कहती थी बस कर डालें!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दादा के चचेरे भाई महशूर खोजी कैप्‍टेन रॉबर्ट स्‍कॉट, जो दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाले दूसरे व्‍यक्‍ित थे, जिनको दुनिया ने बुला दिया, क्‍योंकि श्रेय हमेशा पहले को मिलता है। हालांकि अंटार्कटिका के ऊपर गुब्‍बारे में पहली उड़ान भरने की उपलब्‍िध भी उनके नाम है, मगर लोगों ने इसको भी याद नहीं रखा। उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई, उनको अफसोस था कि उनसे पहले ही कोई दक्षिणी ध्रुव पर पहुंच गया। मुझे कभी किसी बात का अफसोस नहीं हुआ, क्‍यूंकि मेरा एक नियम है ''मजे करें, जमकर मेहनत करें, पैसा अपने आप आएगा''।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैसा कमाने का मेरे पास कोई मंत्र नहीं, मैं तो बस मेहनत करता हूं जमकर। बीमारी के कारण स्‍कूली गणित तो समझ नहीं आता था, मगर नौ साल की आयु से ही पैसे का गणित समझ में आने लगा। मैंने एक मित्र को लेकर नौ वर्ष की &lt;br /&gt;आयु में ही अपने खेत के अंदर क्रिसमिस ट्री लगाने की योजना बनाई। उस समय बीजों का थैला 5 पौंड मिल रहा था। मैंने सोचा, मैं क्रिसमिस ट्री को दो पौंड के हिसाब से बेचूंगा, हमने ट्री के करीबन चार सौ बीज लगाए। डेढ़ साल के अंदर हम इनको बेचकर करीबन 795 पौंड कमा सकते थे, जो बहुत बड़ा लाभ था। मगर खरगोशों ने मेरे प्‍लान को ध्‍वस्‍त कर दिया। फिर क्‍या था, हमने अपना इनवेस्‍टमेंट निकालने के लिए खरगोशों की बलि चढ़ा डाली। हमने उनका शिकार कर उनको बेच डाला, जिससे पैसे वापिस निकाले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने हर मामले में रिस्‍क लिए हैं, चाहे वो कोई टापू खरीदने का मामला हो, चाहे सोलह साल की उम्र में स्‍टूडेंट नामक पत्रिका निकालने का, चाहे जमैका जाने के बाद मुफ्त में आइलेंड घूमने का, चाहे एक जहाज किराए पर लेने का। जब मैं जमैका गया, तो देखा वहां बेहतरीन म्‍यूजिक बज रहा था, जो मुझे अच्‍छा लगा, मैंने तुरंत उस बैंड को साइन करने का सोचा, जो मेरे पास नगदी थी, वो मैंने इस&amp;nbsp; बैंड को साइन करने में लूटा दी। अब मेरे पास कुछ नहीं था। अब मुझे छुट्टियों का आनंद भी लेना था। तो मेरे दिमाग में टापू खरीदने का विचार आया। मैंने तुरंत, एक एजेंट को फोन लगाया और कहा कि मुझे कुछ टापू खरीदने हैं। तब मैंने अपना परिचय एक म्‍यूजिक कंपनी के मालिक का दिया, जो मैं वास्‍तव में था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने मुझे कई टापू अपने जहाज पर बिना किसी खर्च पानी के घूमाए, मैंने इस बेहद आनंद लिया। मैंने सारे टापू रिजेक्‍ट कर दिए। टापूओं की सैर करते हुए इन्‍हें खरीदने का विचार पक्‍का हो गया। मगर पैसे नहीं थे, ऐसे में मैंने एजेंट से पूछा कि कोई और भी टापू है, जो तुमने मुझे न दिखाया हो। उसने कहा, बिल्‍कुल। वो मुझे वहां ले गया। वो बेहद प्‍यारा था, मगर मेरे पास पैसे नहीं थे, और टापू पर पीने का साफ पानी नहीं था। उसने तीस लाख पौंड मांगे, मैंने केवल दो लाख पौंड देने का प्रस्‍ताव रखा, डील कहां जमने वाली थी। हम वापिस आ गए। पैसे थे नहीं, आगे की पूरी यात्रा करनी थी। ऐसे में मैंने जहाज को किराये पर लिया, जिसका किराया करीबन 2000 पौंड था। मैंने उसको पर यात्री पर बांट दिया और एक काले ब्‍लैक बोर्ड पर निर्धारित कीमत लिख दी, जो पूर्ण रूप में सफल रही। यह जोखिम था, बहुत बड़ा, मगर इस जोखिम की बजाय से हम वार्जिन एयरलाइन खड़ी कर पाए, जिसको रोकने के लिए ब्रिटिश एयरलाइन ने बहुत जोर लगाया था। मगर मैंने भी न हारने की कसम खा रखी थी, ऐसे मैंने अपने दोस्‍त निक से वार्जिन म्‍यूजिक कंपनी के शेयर खरीदे। आज हमारे पास वो टापू भी हैं, जिन्‍हें हम खरीदना चाहते थे। वो सौदे उतनी ही राशि में तय हुए, जितनी मैंने प्रस्‍ताव में रखी थी। खरगोश जब मेरे क्रिसमिस ट्री खा गए थे, तो मुझे समझ में आया कि पैसे पेड़ों पर नहीं उगते, इस लिए कहता हूं, बहुत सारे काम हैं, जो आप अपने घर से शुरू कर सकते हैं, और आप सफल हो सकते हैं। बस कर डाले! शुरूआत एक कदम से होती है, फिर यात्रा कितनी ही लम्‍बी क्‍यूं न हो। ऐसे कितने ही लोग हैं, जो अपनी जॉब से संतुष्‍ट नहीं, लेकिन फिर भी चिपके हुए हैं। अगर आप साहस नहीं कर सकते तो शिकायत भी मत करें। बस जॉब है, उस में मजा करें। फिर मिलेंगे, हैप्‍पी, बातें बहुत सारी हैं, लेकिन तुम्‍हारी बस आ गई, और आधी रात हो चली है। मेरे किताब बंद करते ही मेरे मन में अपनी अमिट छाप छोड़ते हुए रिचर्ड ब्रानसन गायब हो गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बातचीत पुस्‍तक &lt;i&gt;&lt;b&gt;''जीवन के सबक''&lt;/b&gt;&lt;/i&gt; व &lt;i&gt;&lt;b&gt;screw it just do it&lt;/b&gt;&lt;/i&gt; आधारित है, इस किताब के द्वारा उक्‍त सब बातें रिचर्ड ब्रॉनसन ने मुझे बताई। अगर आप भी रिचर्ड ब्रानसन को पूरी तरह से जानना चाहते हैं तो उक्‍त पुस्‍तक जरूर खरीदें, क्‍योंकि एक लेखक ने कहा है कि जब आप किसी की किताब पढ़ रहे होते हैं तो आप उससे बात कर रहे होते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-1767126859584758115?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=YRaR-vAPNZY:n9-QSnE06Ao:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/YRaR-vAPNZY" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-07T13:45:59.231+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-Fn98x3dxXFs/T6eEpcPANkI/AAAAAAAABns/3jYVNl1kQdU/s72-c/richard+branson.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_07.html</feedburner:origLink></item><item><title>"सत्यमेव जयते" को लेकर फेसबुक पर प्रतिक्रियाओं का दौर</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/KRkVlyhasbQ/blog-post_06.html</link><category>आमिर खान</category><category>facebook</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Sun, 06 May 2012 00:21:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-341781941752551413</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://corunna-mi.gov/images/stories/FacebookFiles/find_us_on_facebook.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="193" src="http://corunna-mi.gov/images/stories/FacebookFiles/find_us_on_facebook.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‎&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100000025164251" target="_blank"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;Ajit Anjum &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;स्टार प्लस पर सत्यमेव जयते देख रहा हूं ....जिंदगी लाइव की ऋचा अनिरुद्ध की याद आ रही है ....कंसेप्ट के लेवल पर बहुत कुछ मिलता जुलता ...एंकर , गेस्ट से लेकर दर्शकों को रोते देख रहा हूं ...इमोशनल और शॉकिंग मोमेंट ....कोख में बेटियों के कत्ल की दास्तां ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमिर चाहते तो वो भी दस का दम वाला पॉपुलर फार्मेट चुन सकते थे ...चाहते तो गेम शो कर सकते थे ...लेकिन आमिर ने ऐसा शो करने का फैसला किया है ..इसलिए वो बधाई के पात्र हैं ...अब ये शो हिट हो या न हो ( तथाकथित रेटिंग के पैमाने पर ) मैं अपनी राय नहीं बदलूंगा ......सत्यमेव जयते बहुतों को अच्छा लगा होगा ...बहुतों तो चलताऊ ...बहुतों को ऐवैं ....कुछ साथियों ने मेरे स्टेटस के जवाब में ये भी लिखा है कि इसे रेटिंग नहीं मिलेगी ...... न मिले ..लेकिन क्या उसके आधार पर आप मान लेंगे कि ऐसे शो की जरुरत नहीं ...तो फिर क्या सिर्फ लोग दस का दम या नच बलिए या नाच गाने वाला ही शो देखना चाहते हैं ...अगर यही सच है कि तो फिर क्यों कहते हैं कि कोई चैनल गंभीर मुद्दों को उठाने वाला शो नहीं बनाता ....मैं तो स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर को भी इसके लिए बधाई देता हूं ..जिन्होंने हर हफ्ते चार करोड़ ( शायद ) खर्च करने ये जोखिम लिया है ...चाहते तो इससे आसान रास्ता पकड़ सकते थे ...दस का दम या नच के दिखा जा या फिर कोई गेम शो बना सकते थे ...लेकिन सत्यमेव जयते बनाया ...ये एंटरटेनमेंट चैनल का सरोकारी चेहरा है ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्यमेव जयते जैसे शो के लिए आमिर को सलाम ....ऐसे शो की जरुरत थी ... कम से कम ऐसे लोग तो शर्मिंदा हों जो बेटियां को दुनिया में आने से पहले मार देते हैं ...कोख में कत्ल करते हैं क्योंकि उन्हें बेटा चाहिए ....और हां , ऐसे काम सासु माएं ज्यादा करती हैं और करवाती है ...जो खुद भी एक मां होती है ...औरतों की कंडिशनिंग ऐसी होती है कि जब वो बहु होती तो उसकी भूमिका अलग होती है ..बेटी होती है तो अलग होती है और सास होती है तो अलग होती है ...हमने बचपन से अपने आस पास ऐसे माहौल को देखा है , जहां बेटा चाहिए ..बेटा ही होना चाहिए ..बेटी से वंश कैसे चलेगा ..जैसे गूंजते सवालों के बीच गर्भ में बच्चा पलता है .....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले तो लोग कहते हैं कि चैनलों पर कोई गंभीर कार्यक्रम नहीं होते ...समाज को झकझोरने वाले मुद्दों पर शो नहीं बनते ..चैनलों पर सरोकार वाले शो नहीं दिखते ...जब बनते हैं तो कहते हैं बहुत घिसा -पिटा था ...नया क्या है ..बहुत गरिष्ठ है ...अपच है ..बहुत गंभीर है ...इतना बोझिल शो इंटरटेनमेंट पर कोई क्यों देखेगा ...अरे भाई साहब , भ्रूण हत्या से जुड़े शो में आप दस का दम या केबीसी का मजा क्यों तलाश रहे हैं ...ये तो वही बात हुई न कि पी साईनाथ के लेख में रागदरबारी या पेज थ्री का मजा खोज रहे हैं ...तो फिर हिन्दू नहीं , दिल्ली टाइम्स ही पढ़िए न ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="https://www.facebook.com/shivam.misra" target="_blank"&gt;Shivam Misra&amp;nbsp; &lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;‎"सत्यमेव जयते" मे आज अमीर खान ने एक बेहद जरूरी मुद्दे को अपनी आवाज़ दी है ... एक सार्थक प्रस्तुति जो हमारे समाज के एक बेहद दुखद और घिनोने रूप को सामने लाती है|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कैसी हवस है ... कैसी चाहत है 'कुल दीपक' पाने की जो हर साल लगभग दस लाख बेटियों की हत्या कर रही है ... उनके पैदा होने से पहले ही ????&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अमीर खान और उनकी पूरी टीम को इस सार्थक प्रयास के लिए साधुवाद देता हूँ !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय आ गया है जब हमे मिल कर अपनी खुद की और समाज की यह घिनोनी सोच बदलनी होगी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेटियों की हत्या बंद करनी ही होगी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="https://www.facebook.com/sachin.khare" target="_blank"&gt;Sachin khare&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;मित्रों,&lt;br /&gt;मैं नहीं जानता आमिर खान को किन्तु मैं बस एक बात जानता हूं उन 100 डाक्टरों को जेल में होना चाहिये और उनकी दुकान बंद होनीं चाहिये जिन्हें #Satyamevjayate की उस डाक्यूंमेंट्री में दिखाया गया है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदी आपके पास उनके नाम और अन्य जानकारियां हैं तो साझा कीजिये.. उन्हें उनके अंजाम तक अब हम पहुंचायेंगे.. कानूंन को जो करना है करता रहे किन्तु तबतक उनकी दुकान बंद करनीं ही होगी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विचार को फेसबुक पर अपनें तरीके से फैला दीजिये.. छोड़ना नहीं है इन कसाइयों को..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वन्दे मातरम..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="https://www.facebook.com/ajaykumarjha1973" target="_blank"&gt;अजय कुमार झा&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;आज भांड बन चुके टीवी चैनलों और जोकर बन चुके समाचार चैनलों की चौबीस घंटों की बकर से , अलग तो निश्चित रूप से लगा "सत्यमेव जयते " । मुद्दा - कन्या भ्रूण हत्या ..समस्या , पीडित , विशेषज्ञों , खबरनवीसों , आरोपियों से सीधे बात करने के साथ बहुत सारा दृश्य फ़िल्मांकन भी ..और आखिर में कम से कम एक प्रयास भी ..,,मुझे तो प्रभावित किया , इस कार्यक्रम ने, लेकिन बहुत से अन्य पहलू भी हैं अभी इस मुद्दे से जुडे हुए ..... जल्दी ही लिखूंगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई दुनिया के संपादक &lt;i&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;a data-hovercard="/ajax/hovercard/user.php?id=1036087527" href="https://www.facebook.com/jaideep.karnik" id="js_25" target="_blank"&gt;Jaideep Karnik&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;आमिर खान ने बता दिया की आज देश को सपने दिखाने की बजाय सच दिखाकर जगाना जरूरी है!&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="https://www.facebook.com/srijanshilpi" target="_blank"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;Srijan Shilpi&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आमिर खान ने जो पहल की है, देश के मानस को जगाने की, अपने दौर की सबसे अहम समस्याओं को समझने और उनका हल तलाशने की वह न सिर्फ काबिलेतारीफ है, बल्कि उसमें हम सब का सहयोग अपेक्षित है। एक कलाकार वह करके दिखाने जा रहा है, जो वास्तव में लोकतंत्र के चारों स्तंभों को मिलकर बहुत पहले कर लेना चाहिए था, पर वे विफल रहे। आमिर की पहल सफल हो.....सार्थक हो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;a href="https://www.facebook.com/profile.php?id=554793132" target="_blank"&gt;@Ravish Kumar NDTV&lt;/a&gt; &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;जितना दर्शकत्व को समझा है उससे यही जाना है कि बड़ा ही निष्ठूर तत्व है । सत्यमेव जयते इसलिए नहीं देखेगा कि आमिर ने बनाया है या इरादा नेक है। ग़रीबी दूर करने का एक ही जादू , दूरदृष्टि पक्का इरादा जैसे स्लोगनों की हालत देख चुका है । हाँ अगर बात में दम है, कहने के तरीके में दम है तो वह सिर आँखों पर लेगा । आमिर ने एक बड़ी चुनौती उठाई है और हमें दी भी है । मैं देख नहीं सका हूं । प्रतिक्रियाओं में आए उतार चढ़ाव के आधार पर कह रहा हूं । एक ही नाकामी समझ आ रही है । लोग आमिर के बारे में ज़्यादा बातें कर रहे हैं, कन्या भ्रूण हत्या के बारे में कम । अगर यही हकीकत है तो सत्यमेव जयते फेल । दिल पे लगेगी तभी बात बनेगी । दिल पे आमिर को नहीं लगाना था, मुद्दे को लगना था । वर्ना ग्रामीण मंत्रालय के तहत आने वाले तमाम मुद्दों के ब्रांड एंबेसडर की तरह बनकर रह जायेंगे । उम्मीद तो यही है कि सत्यमेव जयते सफल हो । पैसे की दरिद्रता का रोना रोने वाले नूझ पैनलों के दौर में आमिर के नाम पर करोड़ों रुपये लगाने का इरादा एक नई उम्मीद है । बेहतर कंटेंट पर मार हो तो लड़ाई जमेगी वर्ना इसलिए लोग प्राइमटाइम नहीं देखेंगे कि रवीश कुमार सो काॅल्ड अच्छा बंदा है बल्कि तभी देखेंगे जब इसमें दम होगा । देखने की रोचकता होगी । सत्यमेव जयते देखने के लिए बेचैन हूं । इसे चलना चाहिए । टीवी का भला होगा और कमाई भी । फिर जल्दी ही आप चिरकुट भौकालेंकरों से मुक्त हो जायेंंगे । देखिये प्राइमटाइम अजय देवगन के साथ । आमिर को शुभकामनायें ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object height="300" width="300"&gt;&lt;param name=movie value=http://widget.startv.in/video/Mt7MtBVq9kG8nPC/LU5gpbEn5U1dk&gt; &lt;/param&gt;&lt;param name=wmode value=transparent&gt; &lt;/param&gt;&lt;param name=allowFullScreen value=true&gt; &lt;/param&gt;&lt;param name=allowscriptaccess value=always&gt; &lt;/param&gt;&lt;embed src=http://widget.startv.in/video/Mt7MtBVq9kG8nPC/LU5gpbEn5U1dk type=application/x-shockwave-flash allowscriptaccess=always allowfullscreen=true wmode=transparent width=300 height=300&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-341781941752551413?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/KRkVlyhasbQ" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-06T15:29:04.720+05:30</atom:updated><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">11</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_06.html</feedburner:origLink></item><item><title>ये भी कोई जिंदगी है</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/5vw4rWuTZbk/blog-post_04.html</link><category>वृद्धग्राम</category><category>संपादकीय</category><category>हरमिन्दर सिंह</category><category>ब्‍लॉग जगत</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Fri, 04 May 2012 03:28:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-4993350225684702621</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-FjRyHyjLHm0/T6OvNaeXmeI/AAAAAAAABnI/o6bH9162Ec8/s1600/old+Man.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="180" src="http://3.bp.blogspot.com/-FjRyHyjLHm0/T6OvNaeXmeI/AAAAAAAABnI/o6bH9162Ec8/s640/old+Man.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;आज ब्‍लॉगस्‍पॉट का अगला ब्‍लॉग बटन दबाया तो हरमिंदर के&amp;nbsp; &lt;a href="http://100year.blogspot.in/" target="_blank"&gt;वृद्धग्राम&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पहुंच गया। जहां हरमिंदर व काकी दोनों बतियाते हुए वृद्धों व बुढ़ापे के बारे में कई मार्मिक पहलूओं से अवगत करवा रहे थे। गांव की छानबीन करने से पता चला कि अतिथि तो यहां निरंतर पहुंच रहे हैं, मगर पिछले कई महीनों से हरमिंदर सिंह यहां नहीं आए, जबकि इस गांव के चर्चे अख़बारों व वेबसाइटों पर हो चुके हैं। आपके समक्ष वृद्धग्राम से लिया एक लेख रखते हुए अलविदा लेता हूं। कुलवंत हैप्‍पी, युवा सोच युवा खयालात।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;हरमिंदर की कलम से&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जमीन पर सोने वालों की भी भला कोई जिंदगी होती है। हजारों दुख होते हैं उन्हें, मगर बयां किस से करें? हजारों तकलीफों से जूझते हैं और जिंदगी की पटरी पर उनकी गाड़ी कभी सरपट नहीं दौड़ती, हिचकौले खाती है, कभी टकराती है, कभी गिर जाती है। एक दिन ऐसा आता है जब जिंदगी हार जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे लोगों में बच्चे, जवान और बूढ़े सभी होते हैं जिन्हें पता नहीं कि वे किस लिये जी रहे हैं। बस जीते हैं। कई बूढ़े अपने सफेद बालों को यह सोचकर शायद न कभी बहाते हों कि अब जिंदगी में क्या रखा है, दिन तो पूरे हो ही गये।&lt;br /&gt;उन्हें जिंदगी का तजुर्बा होता है। ऐसे वृद्धों को कोई अच्छी निगाह से नहीं देखता, सब उन्हें गलत समझते हैं। उनके हालातों की तरफ कोई ध्यान नहीं देता। सड़क उनका घर, उनका सब कुछ होती है। वे कहीं भी गुजार सकते हैं। आखिर एक रात की ही तो बात है। अगले दिन कहीं ओर, किसी ओर जगह उनका आशियाना होगा, लेकिन वे बेफिक्र भी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृद्धों को मैंने कई बार प्लेटफार्म पर देखा है। वे बिना उद्देश्य के जिये जा रहे हैं। उनका जीवन किसी के लिये उपयोगी नहीं रहा। इनमें से बहुत से ऐसे हैं जो अपनों ने घर से बेघर किये हैं। वृद्धग्राम की शुरुआत में इसी साल के प्रारंभ में करने की सोच रहा था, लेकिन मैं काफी समय तक इन उम्रदराजों का अध्ययन करता रहा। मेरी ऐसे लोगों से लंबी मुलाकातें भी हुयीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ने बताया कि उन्हें पता नहीं कि वे कहां के रहने वाले हैं। जब से पैदा हुये, जमीन पर सोये हैं, रुखी-सूखी खायी है और मोहताजी में जिये हैं। कई ने बताया कि उनका भी एक परिवार था, वे भी कभी शान से रहते थे। औलाद धोखा दे गयी, क्या करें। उनके आंसुओं के कतरे मैंने अपने जेहन में संभाल के रखे हैं, धीरे-धीरे वृद्धग्राम पर बहा रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक वृद्ध बृजघाट मिले थे।(हरिद्वार की तरह की यहां से भी गंगा गुजरती है और गंगा स्नान का प्रत्येक कार्तिक पूर्णिमा को यहां विशाल मेला लगता है। बृजघाट उत्तर प्रदेश में स्थित है।) उनका नाम दीनानाथ है. वे काफी दुखी थे। वे बृजघाट के तट पर रामभक्ति में लीन रहते हैं। अपनों ने उन्हें कई साल पहले पराया बना दिया। वे उदास मन से कहते हैं,‘‘बहुओं के आने के बाद घर का माहौल बदल गया। दोनों बेटे उनकी ओर की कहने लगे। बेटी है नहीं, पत्नि को स्वर्ग सिधारे कई वर्ष बीत गये। मैं ठहरा बूढ़ा क्या कर सकता हूं, उन्हें मेरी जरुरत नहीं लगी। सो निकाल दिया घर से।’’ इतना कहकर वे रोने लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीनानाथ जी आगे कहते हैं,‘‘मैं यहां चला आया। यहां कुछ आश्रम हैं, श्रृद्धालु आते रहते हैं। कुछ न कुछ मिल ही जाता है। अब इस बुढ़ापे में और चाहिये ही क्या, आसरा और दो वक्त की रोटी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे अब अन्य तीर्थस्थलों को देखना चाहते हैं। कहते हैं कि आखिरी समय में जितना भगवान का नाम लिया जाये उतना कम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बृजघाट के घाट पर अनेकों साधु-संतों के आश्रम हैं। यहां बहुत से बूढ़े आपको किसी आस में बैठे मिल जायेंगे। इनकी आंखें थकी हुयी हैं, ये जर्जर काया वाले हैं, किसी की प्रेरणा नहीं बने, हां, इन्हें लोग दया दृष्टि से जरुर देखते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-4993350225684702621?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=5vw4rWuTZbk:2Is3t3dZLA8:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/5vw4rWuTZbk" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-04T16:00:37.657+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/-FjRyHyjLHm0/T6OvNaeXmeI/AAAAAAAABnI/o6bH9162Ec8/s72-c/old+Man.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_04.html</feedburner:origLink></item><item><title>नटराजन का ख्‍वाब; पिंजरे की बुलबुल</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/_H1JZHxvs_M/blog-post_02.html</link><category>राहुल गांधी</category><category>सुलगते मुद्दे</category><category>मीडिया</category><category>सोनिया गांधी</category><category>मीनाक्षी नटराजन</category><category>कांग्रस</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Wed, 02 May 2012 07:01:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-4192436780030411797</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-X702kAPXcsA/T6IQUgUEAmI/AAAAAAAABm0/CNO5EabqGA8/s1600/Meenakshi.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="192" src="http://2.bp.blogspot.com/-X702kAPXcsA/T6IQUgUEAmI/AAAAAAAABm0/CNO5EabqGA8/s640/Meenakshi.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;एक के बाद एक घोटाला उछलकर बाहर आ रहा है। कांग्रेस की छवि दिन ब दिन महात्‍मा गांधी की तरह धूमिल होती जा रही है। कांग्रेस के नेता पूरी तरह बुखला चुके हैं, वो अपने निकम्‍मे नेताओं को सुधारने की बजाय पूरी शक्‍ति मीडिया को ''पिंजरे की बुलबुल'' बनाने पर खर्च कर रहे हैं, जो लोकतंत्र के बिल्‍कुल उल्‍ट है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद कांग्रेस के नेता पानी के बहा को नहीं जानते, वो सोचते हैं कि पानी के बहा को बड़े बड़े बांध बनाकर रोका जा सकता है, लेकिन वो नहीं जानते कि पानी अपना रास्‍ता खुद बनाता है, पानी जीवन है तो विनाश भी है। अगर आप मीडिया के मुंह पर ताला जड़ेंगे तो लोग अपनी बात कहने के लिए दूसरे साधनों को चुनेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजों के वक्‍त इतना बड़ा और इतना तेज तर्रार मीडिया भी तो नहीं था, मगर फिर भी जनमत तैयार करने में मीडिया ने अहम योगदान अदा किया था। कांग्रेसी नेता की पोल किसी अधिकारिक मीडिया ने तो नहीं खोली, जिस पर मीनाक्षी नटराजन बिल लाकर नकेल कसना चाहती हैं। शायद मीनाक्षी नटराजन राहुल बाबा की दोस्‍ती में इतना व्‍यस्‍त रहती हैं कि उनको वो लाइन भी याद नहीं होगी, जो लोग आम बोलते हैं, ''एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा दरवाजा आपके लिए खुलता है''।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस बिल को कांग्रेस ने मीनाक्षी की निजी राय बताकर पूरे मामले से पल्‍लू झाड़ लिया, क्‍या मीनाक्षी ने उस बिल को लाने की बात करने से राहुल गांधी से एक बार भी सलाह विमर्श नहीं किया? क्‍या अब कांग्रेस के नेता इतने बड़े हो चुके हैं, जो अपनी निजी राय के अनुसार बिल बनाने की बात करने लगे हैं? या फिर नेता ऐसा सोचने लगे हैं कि जिस पर राहुल बाबा ने मोहर लगा दी, वो निजी राय नहीं एक विधयेक बन जाता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया को ''पिंजरे की बुलबुल'' बनाने से कांग्रेस की छवि सुधरने वाली नहीं, क्‍यूंकि सफेद कुर्ते पर इतने दाग लग चुके हैं, जो महंगे से महंगे सरफ इस्‍तेमाल करने से भी जाने वाले नहीं। अब तो कांग्रेसी नेताओं को लिबास ही चेंज करना होगा। सच कहूं तो उनको 10 जनपद छोड़ना होगा, क्‍यूंकि वहां एक इटली की मेम रहती है, जो इटली से आई है, भारत को अच्‍छी तरह से नहीं जानती, और उसका एक पुत्र भी है, जो कुछ नेताओं की मक्‍खनबाजी से बेहद खुश है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी समझदार ने कहा है कि अगर आप अपना रिमोट किसी और के हाथों में देते हैं तो आप भूल जाइए कि आप कुछ अपनी मर्जी का कर पाएंगे। आज कल कांग्रेसी नेताओं का रिमोट सोनिया के हाथ में है, और राहुल गांधी का रिमोट कुछ कांग्रेसी नेताओं के हाथ में। ऐसे में कांग्रेस का क्‍या हश्र होने वाला है, यह तो राम जाने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक बात कांग्रेस को समझ लेनी चाहिए कि मीडिया को पिंजरे की बुलबुल बनाने से बेहतर होगा कि कांग्रेस के भीतर बैठे भ्रष्‍ट लोगों को कांग्रेस आउट करे, नहीं तो कांग्रेस को लोग आउट कर देंगे, चाहे बेटिंग के लिए कांग्रेस के पास सचिन नाम का बेस्‍टमैन ही क्‍यूं न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;चलते चलते- &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;कांग्रेस डॉक्‍टर के पास गई, मगर डॉक्‍टर था नहीं, वो पास की शॉप पर पूछने गए, दुकानदार ने पूछा, आप कौन हैं, और डॉक्‍टर से क्‍यूं मिलना चाहते हैं तो कांग्रेस बोली मैं कांग्रेस हूं, देश की सबसे बड़ी पार्टी, अच्‍छा अच्‍छा दुकानदार बोला, आपको डॉक्‍टर की नहीं, मैन्टोफ्रेश, सेंटरफ्रेश व हैप्‍पीडंट की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;और आपको क्‍या लगता है? लिखिए बेबाक।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-4192436780030411797?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/_H1JZHxvs_M" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-04T14:07:37.212+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-X702kAPXcsA/T6IQUgUEAmI/AAAAAAAABm0/CNO5EabqGA8/s72-c/Meenakshi.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post_02.html</feedburner:origLink></item><item><title>राज्यसभा बिकाऊ क्यों है ?</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/UMMJfSbTr60/blog-post.html</link><category>सुलगते मुद्दे</category><category>पुण्‍य प्रसून बाजपेयी</category><category>अतिथि कोना</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Wed, 02 May 2012 01:19:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-3477087036202701588</guid><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-H5lzdyYWZZA/T6DuE12UTeI/AAAAAAAABlc/MMSyPGT0G0g/s1600/PP+BAJPAI.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="204" src="http://3.bp.blogspot.com/-H5lzdyYWZZA/T6DuE12UTeI/AAAAAAAABlc/MMSyPGT0G0g/s640/PP+BAJPAI.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;झारखंड में बीजेपी की आत्मा जागी और उसने तय किया कि राज्यसभा चुनाव में विधायकों की खरीद-फरोख्त को देखते हुये वह चुनाव में वोट भी नहीं डालेगी। यानी झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिये पांच उम्मीदवारों की होड़ में उसके विधायक किसी को वोट नहीं डालेंगे। तो क्या यह मान लिया जाये कि चुनाव का बायकॉट बिगड़ी चुनावी व्यवस्था में सुधार का पहला कदम है। और आत्मा जगाकर खामोश बैठी बीजेपी का सच तो यही है कि जब चुनाव आयोग ने ही राइट टू रिजेक्ट का सवाल यह कहकर खड़ा किया कि ईवीएम में आखरी कालम खाली छोड़ा जाये तो ससंद के भीतर आडवाणी समेत संसद ने एक सुर में इसे नकारात्मक वोटिंग करार दिया था। इसके बाद मामला ठस हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में इस दौर में जिस तरह से संसदीय राजनीति में सत्ता के हर रंग को लोकतंत्र का रंग बना दिया गया है उसमें लोकतंत्र ही कैसे ठस हो गई है, यह राजयसभा की तस्वीर उभार देती है। पिछले साल राज्यसभा के कुल 245 सदस्यों में से 128 सदस्य उघोगपति, व्यापारी, बिल्डर या बिजनेसपर्सन रहे। यानी राज्यसभा के आधे सांसदो का राजनीति से सिर्फ इतना ही लेना-देना रहा कि राजनीतिक दलों का दामन पकड़कर अपने धंधो को फलने-फूलने के लिये संसद पहुंच गये। संसद सदस्य बनते ही सारे अपराध भी ढक गये और विशेषाधिकार भी मिल गये। यानी नोट के बदले कैसे राज्यसभा को ही धंधे के लाभ में बदला जा सकता है, उसका खुला नजारा नीतियों के जरीये ही उभरता है। मौजूदा वक्त में राज्यसभा के सांसद के तौर पर सबसे ज्यादा उद्योगपति और बिजनेस पर्सन हैं। इनकी तादाद करीब 86 है। जबकि बिल्डर और व्यापारियों की संख्या करीब 40 है । और इसमें से अधिकतर सांसदों की भूमिका राज्यसभा में पहुंचने से पहले किसी पार्टी विशेष के नेताओं के लिये हर सुविधा मुहैय्या कराने की ही रही है। और इस दायरे में क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी, हर क्षेत्रीय स्तर के राजनीतिक दल आये हैं। हालांकि वामपंथियों ने इस रास्ते से परहेज किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के खाते में 54 सांसद ऐसे आते हैं जिन्हे धंधे के अक्स में राज्यसभा तक पहुंचाया गया। वहीं क्षेत्रीय दलों के जरीये करीब 70 सांसद राज्यसभा में विधायकों की कीमत लगाकर पहुंचे। इनमें से राज्यसभा के 20 सदस्य तो ऐसे हैं जो राजनीतिक दलो की बैठको से लेकर कार्यकर्ताओं के हवाई टिकट का जिम्मा लेकर लगातार पार्टी की सेवा का तमगा लगाकर राज्यसभा की जुगाड़ में लगे रहे और एक वक्त के बाद मान लिया गया कि यह पार्टी के ही सेवक हैं। इस परिभाषा में झारखंड के उद्योगपति आर के अग्रवाल से लेकर नागपुर के बिजनेसपर्सन अजय संचेती को डाला जा सकता है। दोनों ही अगले महीने राज्यसभा के सांसद के तौर पर शपथ लेंगे। लेकिन शपथ लेने के बाद धंधों से जुडे सांसदों के लिये राज्यसभा का मतलब है क्या, यह भी अलग अलग क्षेत्रों के लिये बनने वाली संसद की स्टैडिंग कमेटी के जरीये समझा जा सकता है। मसलन फाइनेंस की स्टैंडिंग कमेटी के कुल 61 सदस्यों में 19 सदस्य ऐसे हैं जिनके अपने फाइनेंस पर संकट गहरा सकता है अगर वह स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य ना हो तो। इसी तर्ज पर कंपनी अफेयर की स्टैडिंग कमेटी में राजयसभा के 6 सांसद ऐसे हैं जो द कई कंपनियों के मालिक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह हेल्थ और मेडिकल एजूकेशन की स्टैडिंग कमेटी में 3 सांसद ऐसे हैं, जिनके या तो अस्पताल हैं या फिर मेडिकल शिक्षा संस्थान। जाहिर है यह खेल राज्यसभा में पहुंचकर कितने निराले तरीके से खेला जा सकता है, यह किंगफिशर के मौजूदा हालात को देखकर भी समझा जा सकता है। यूपीए-1 के दौर में जब प्रफुल्ल पटेल नागरिक उड्डयन मंत्री थे तब किंगफिशर के मालिक विजय माल्या राज्यसभा के सदस्य बनकर पहुंचे। उन्हें राज्यसभा पहुंचाने वालों में कांग्रेस और बीजेपी दोनो का ही समर्थन मिला। और प्रफुल्ल पटेल ने विजय माल्या को नागरिक उड्डयन की संसद की स्थायी समिति का सदस्य बनवा दिया। और जब तक विजय माल्या संसदीय कमेटी के सदस्य रहे तब तक इंडियन-एयरलाइन्स की जगह किंगफिशर ही सरकारी विमान बन गया। यानी सारी सुविधाएं किंगफिशर को मिलने लगी। और क्रोनी कैपटलिज्म की दुहाई देकर जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रफुल्ल पटेल का मंत्रालय बदला तो झटके में किंगफिशर का अंदरुनी सच सामेन आने लगा। यही हालात बतौर पेट्रोलियम मंत्री के तौर पर रिलायंस को लाभ पहुंचाकर मुरली देवडा ने किया और यही लाभ यूपीए-1 में कंपनी अपेयर मंत्री बने लालू के करीब उन्हीं के पार्टी के राज्यसभा सदस्य प्रेमचंद गुप्ता ने उठाया। राजनीति के ककहरे से दूर कई कंपनियों के मालिक प्रेमचंद गुप्ता की खासियत लालू यादव को सीढी बनाकर देश का मंत्री बनने का था। तो वह बन गये और आज भी लालू के पीछे खड़े होकर सांसद का तमगा साथ लिये है। लेकिन संकट इतना भर नहीं है। राज्यसभा सासंदों की फेरहिस्त में राज्यसभा के डिप्टी स्पीकर एसएस अहलूवालिया सरीखे सांसद अंगुली पर गिने जा सकते हैं, जिन्होंने राज्यसभा में 16 बरस गुजारने के बाद भी अपने लिये एक घर भी नहीं बना पाया। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि राज्यसभा में साठ फीसदी सदस्य छह बरस में कई कंपनियों के मालिक से लेकर अस्पताल, शिक्षण संस्थान या होटल के मालिक बन जाते हैं। यानी जो धंधे में नहीं होते वह भी राज्यसभा में आने के बाद धंधे शुरु कर लेते हैं। क्योंकि इनकी जिम्मेदारी आम जनता को लेकर कुछ भी नहीं होती। और संसद के बाहर सड़क पर आम आदमी कैसे जीवन जी रहा है, इसका कोई असर भी राज्यसभा के सदस्यों की सेहत पर नहीं पड़ता। यहीं से संसद की एक दूसरी कहानी भी शुरु होती है जो राज्यसभा सदस्यों के देश चलाने की थ्योरी और लोकसभा के सदस्यो के प्रेक्टिकल के बीच लकीर खिंचती है। गर मनमोहन सरकार पर नजर डाले तो दर्जन भर मंत्री ऐसे हैं जो राज्यसभा से आते हैं। इनके दरवाजे पर कभी आम वोटरो की लाइन नजर नहीं आयेगी जैसी लोकसभा में चुन कर पहुंचे सांसद या मंत्रियों के घर के बाहर नजर आती है। राज्यसभा सांसद-मंत्रियों से मिलने वाले 90 फीसदी लोग उनके पहचान वाले के बाद किसी न या फिर क्लाइंट होते हैं। मसलन वाणिज्य मंत्री आंनद शर्मा चाहे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में किसानों की बोली लगा दें, उनके घर या दफ्तर में कभी किसान नहीं पहुंचेगा। लेकिन जब कमलनाथ वाणिज्य मंत्री थे तो वह विश्व बैंक या डब्लूटीओ के सामने किसानों के सवाल पर नतमस्तक इसलिये नहीं हो सकते थे क्योंकि उन्हें कल अपने चुनाव क्षेत्र छिंदवाडा में ही किसानों के सवालों का जवाब देना मुश्किल होता। या फिर मंत्री रहते हुये लोकसभा सांसद को घेरने के लिये उसके चुनावी क्षेत्र में विपक्ष सक्रिय हो सकता है लेकिन राज्यसभा सांसद के मंत्री रहते किसी जनविरोधी निर्णय को लेकर कोई विरोध कहां हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौजूदा हालात में यह सवाल मनमोहन सिंह को लेकर भी उठ सकते है और उसका एक कटघरा कांग्रेस के राजनीतिक एजेंडे से दूर सरकार के कामकाज से भी झलक सकता है। जहां खांटी कांग्रेस परेशान दिखेंगे कि सरकार की नीतिया उनके वोटबैंक से दूर होती जा रही हैं। जो भविष्य में कांग्रेस को संकट में डाल सकती है और राज्यों के चुनाव में डालना शुरु कर दिया है। मगर इस पूरी कवायद में देश कितना पीछे छूटता जा रहा है और संसदीय लोकतंत्र का मतलब ही कैसे सत्ता समीकरण हो चला है। और सत्ता ही लोकतंत्र है। क्योंकि राज्यसभा से इतर चुनाव प्रक्रिया भी झारखंड में ही बिना किसी विचारधारा बिना किसी राजनीतिक दल के एक निर्दलीय विधायक को मुख्यमंत्री बना देती है। और मधुकोडा दो बरस तक मुख्यमंत्री भी रहते हैं और 200 करोड से ज्यादा की लूटपाट भी करते हैं। जेल भी जाते हैं और वर्तमान में मनमोहन सरकार को समर्थन देकर सरकार बचाने की कवायद करते हुये संसद में शान से बैठे हुये नजर भी आते हैं। तो अपराधी है कौन संसदीय राजनीति या लोकतंत्र की परिभाषा। क्योंकि दोनो दायरे में संविधान ही विशेषाधिकार देता है। जिसे आम आदमी चुनौती भी तभी दे सकता है जब वह खुद दागदार होकर इस दायरे में खड़ा होने की ताकत जुटा ले। &lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;नोट - यह लेख उनके ब्‍लॉग &lt;a href="http://prasunbajpai.itzmyblog.com/" target="_blank"&gt;प्रसूनवाजपेयी डॉट इट्समायब्‍लॉग डॉट कॉम &lt;/a&gt;से लिया गया है।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक के बारे में&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(पुण्य प्रसून बाजपेयी ज़ी न्यूज़ (भारत का पहला समाचार और समसामयिक चैनल) में प्राइम टाइम एंकर और सम्पादक हैं। पुण्य प्रसून बाजपेयी के पास प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 20 साल से ज़्यादा का अनुभव है। प्रसून देश के इकलौते ऐसे पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी पत्रकारिता में बेहतरीन कार्य के लिए वर्ष 2005 का ‘इंडियन एक्सप्रेस गोयनका अवार्ड फ़ॉर एक्सिलेंस’ और प्रिंट मीडिया में बेहतरीन रिपोर्ट के लिए 2007 का रामनाथ गोयनका अवॉर्ड मिला।)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-3477087036202701588?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/UMMJfSbTr60" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-03T16:17:11.184+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/-H5lzdyYWZZA/T6DuE12UTeI/AAAAAAAABlc/MMSyPGT0G0g/s72-c/PP+BAJPAI.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/05/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>'सचिन' की जगह 'आमिर' होता तो अच्‍छा लगता</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/qopdPk4DJp4/blog-post_4336.html</link><category>संपादकीय</category><category>राजनीति</category><category>आमिर खान</category><category>सचिन तेंदुलकर</category><category>क्रिकेट</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Fri, 27 Apr 2012 07:43:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-8768681874201444396</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-J2SRvZZY_Fk/T5qwWrewCqI/AAAAAAAABjM/59LS8WLlhlE/s1600/sachin+amir.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="180" src="http://4.bp.blogspot.com/-J2SRvZZY_Fk/T5qwWrewCqI/AAAAAAAABjM/59LS8WLlhlE/s640/sachin+amir.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं सचिन की जगह आमिर का नाम किसी फिल्‍म के लिए नहीं बल्‍कि राज्‍य सभा सांसद के लिए सुझा रहा हूं। दोनों ही भारत की महान हस्‍तियों में शुमार हैं। दोनों ही अपने क्षेत्र में दिग्‍गज हैं। दोनों का कद काठ भी एक सरीखा है। मगर सोच में अंतर है, जहां आमिर खान सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखता है, वहीं सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के मामलों में भी ज्‍यादा स्‍पष्‍ट राय नहीं दे पाते। सचिन को क्रिकेट के मैदान पर शांत स्‍वभाव से खेलना पसंद है, मगर आमिर खान को चुनौतियों से आमना सामना करना पसंद है, भले ही उसकी फिल्‍म को किसी स्‍टेट में बैन ही क्‍यूं न झेलना पड़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न मैं आमिर का प्रसंशक नहीं हूं, और न सचिन का आलोचक। मगर कल जब अचानक राज्‍य सभा सांसद के लिए सचिन का नाम सामने आया तो हैरानी हुई, यह हैरानी मुझे ही नहीं, बल्‍कि बहुत से लोगों को हुई, केवल सचिन के दीवानों को छोड़कर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैरानी तो इस बात से है कि उस सचिन ने इस प्रस्‍ताव को स्‍वीकार कैसे कर लिया, जो भारतीय क्रिकेट टीम की कप्‍तानी लेने से इसलिए इंकार करता रहा कि उसके खेल पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सचिन का नाम सामने आते ही हेमा मालिनी का बयान आया, जो शायद चुटकी से कम नहीं था, और उसको साधारण समझा भी नहीं जाना चाहिए, जिसमें हेमा मालिनी कहती हैं कि राज्‍यसभा रिटायर लोगों के लिए है। अगर हेमा मालिनी, जो राज्‍य सभा सांसद रह चुकी हैं, के बयान को गौर से देखते हैं तो पहला सवाल खड़ा होता है कि क्‍या सचिन रिटायर होने वाले हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता, क्‍योंकि कुछ दिन पहले तो ख़बर आई थी कि सचिन ने कहा है, अभी उनमें दम खम बाकी है, और वह लम्‍बे समय तक क्रिकेट खेलेंगे। अगर सचिन अभी और क्रिकेट खेलना चाहते हैं। यकीनन वह रिटायर नहीं होने वाले, तो फिर राज्‍य सभा सांसद बनने का विचार उनके मन में कैसे आया?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है कि क्रिकेट जगत से जुड़े कुछ राजनीतिक लोगों ने सचिन को फ्यूचर स्‍िक्‍यूर करने का आइडिया दे दिया होगा। यह आईडिया भी उन्‍होंने सचिन के अविवा वाले विज्ञापन से ही मारा होगा, क्‍यूंकि हक मारना तो नेताओं की आदत जो है। यह याद ही होगा न, इस विज्ञापन में सचिन सबको लाइफ स्‍क्‍ियूर करने की सलाह देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन की जगह आमिर को मैं इसलिए कहता हूं, क्‍यूंकि वह सामाजिक मुद्दों को लेकर बेहद संवेदनशील है, उसके अंदर एक आग है, जो समाज को बदलना चाहती है। अगर सचिन राजनीति में कदम रखते हैं तो मान लीजिएगा कि भारतीय राजनीति को एक और मनमोहन सिंह मिल गया। चुटकला मत समझिएगा, क्‍यूंकि मुझे चुटकले बनाने नहीं आते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलते चलते इतना ही कहूंगा, देश की राष्‍ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी, जो देश की प्रथम नागरिक हैं, ऐसे लोगों का चुनाव करें, जो राजनीति में आने की दिली इच्‍छा रखते हों,और जिन्‍दगी में वह समाज सुधार के लिए अड़ भी सकते हों, वरना राज्‍य सभा में अगर कुछ कुर्सियां खाली भी पड़ी रहेंगी तो कोई दिक्‍कत नहीं होगी जनता को, क्‍यूंकि न बोलने वाले लोगों का होना भी न होने के बराबर है, जैसे कि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी, पता नहीं कब बोलते हैं, बोलते भी हैं तो इंग्‍लिश में जो ज्‍यादातर भारतीयों को तो समझ भी नहीं आता, जबकि मैडम सोनिया हिन्‍दी में भाषण देती हैं, जो मूल इटली की हैं, इसको कहते है डिप्‍लोमेसी।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-8768681874201444396?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=qopdPk4DJp4:c7YZI3OHOLk:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/qopdPk4DJp4" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-04-27T20:17:57.496+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/-J2SRvZZY_Fk/T5qwWrewCqI/AAAAAAAABjM/59LS8WLlhlE/s72-c/sachin+amir.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">9</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/04/blog-post_4336.html</feedburner:origLink></item><item><title>गब्बर ने बदल दी हमारी सोच</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/3xhqZ24UCi0/blog-post_27.html</link><category>संपादकीय</category><category>सकारात्‍मक सोच का आईना</category><category>गब्‍बर सिंह</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Fri, 27 Apr 2012 00:44:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-4234360043697563367</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-W4d88qytzno/T5pN2BF_8QI/AAAAAAAABi8/CyB46S-Fmxg/s1600/Gabbar+singh.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" src="http://2.bp.blogspot.com/-W4d88qytzno/T5pN2BF_8QI/AAAAAAAABi8/CyB46S-Fmxg/s640/Gabbar+singh.JPG" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;क्यों पसंद है निगेटिव चरित्र ?&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(लेखक अनिरुद्ध जोशी ''शतायु''&amp;nbsp; &lt;a href="http://anirudh29.blogspot.in/" target="_blank"&gt;सकारात्मक सोच का आईना&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;ब्‍लॉग पर कभी कभार लिखते हैं, और&amp;nbsp; आप उनको नियमित वेबदुनिया डॉट कॉम&amp;nbsp; पर पढ़ सकते हैं, क्‍योंकि वह इस संस्‍थान में कार्यरत&amp;nbsp; हैं&amp;nbsp; ) &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक 'जज' होता है। जिस व्यक्ति के भीतर जज जितनी ताकत से है वह उतनी ताकत से अच्छे और बुरे के बीच विश्लेषण करेगा। निश्चित ही ऐसा व्यक्ति स्वयं में सुधार कर भी लेता है जो खुद के भीतर के जज को सम्मान देता है। अच्छाइयाँ इस तरह के लोग ही स्थापित करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अफसोस की भारतीय फिल्मकारों के भीतर का जज मर चुका है। और उन्होंने भारतीय समाज के मन में बैठे जज को भी लगभग अधमरा कर दिया है। ऐसा क्यों हुआ? और, ऐसा क्यों है कि अब हम जज की अपेक्षा उन निगेटिव चरित्रों को पसंद करते हैं जिन्हें हम तो क्या 11 मुल्कों की पुलिस ढूँढ रही है या जिन पर सरकार ने पूरे 50 हजार का इनाम रखा है और जो अपने ही हमदर्द या सहयोगियों को जोर से चिल्लाकर बोलता है- सुअर के बच्चों!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल हर आदमी के भीतर बैठा दिया गया है एक गब्बर और एक डॉन। एक गॉडफादर और एक सरकार। अब धूम-वन और टू की पैदाइश बाइक पर धूम मचाकर शहर भर में कोहराम और कोलाहल करने लगी है। शराब के नशे में धुत्त ये सभी शहर की लड़की और यातायात नियमों के साथ खिलड़वाड़ करने लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह दौर गया जबकि गाइड के देवानंदों और संगम के राजकुमारों में बलिदान की भावना हुआ करती थी। 60 और 70 के दशक में नायक प्रधान फिल्मों ने साहित्य और समाज को सभ्य और ज्यादा बौ‍द्धिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जबकि रूस से हमारे सम्बंध मधुर हुआ करते थे और साम्यवाद की सोच पकने लगी थी, लेकिन इसके परिणाम आना बाकी थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब आया गब्बर, तो उसने आकर बदल दी हमारी समूची सोच। शोले आज भी जिंदा है जय और विरू के कारण नहीं, ठाकुर के कारण भी नहीं गब्बर के कारण।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनने से ज्यादा हम बोलना चाहते हैं और 90 फीसदी मन निर्मित होता है देखने से ऐसा मनोवैज्ञानिक मानते हैं। जब हम सोते हैं तब भी स्वप्न रूप में देखना जारी रहता है। मन पर दृष्यों से बहुद गहरा असर पढ़ता है। दृश्यों के साथ यदि दमदार शब्दों का इस्तेमाल किया जाए तो सीधे अवचेतन में घुसती है बात। इसीलिए आज तक बच्चे-बच्चे को 'गब्बर सिंह' के डॉयलाग याद है। याद है 'डॉन' की अदा और डॉयलाग डिलेवरी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाषा और दृश्‍य से बाहर दुनिया नहीं होती। दुनिया के होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे फिल्मकारों को यह बात कब समझ में आएगी की वह जो बना रहे हैं वह देश के वर्तमान के साथ खिलवाड़ करते हुए एक बहुत ही भयावह भविष्य निर्मित कर रहे हैं, यह जानते हुए कि हमारा मुल्क भावनाओं में ज्यादा जीता और मरता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शोले से जंजीर, जंजीर से डॉन, खलनायक, कंपनी और फिर एसिड फैक्ट्री तक आते-आते हमारी सोच और पसंद को शिफ्ट किया गया। यह शिफ्टिंग जानबूझकर की गई ऐसा नहीं है और ना ही अनजाने में हुई ऐसा भी नहीं। छोटी सोच और बाजारवाद के चलते हुई है यह शिफ्टिंग। अब हमें पसंद नहीं वह सारे किरदार जो प्रेम में मर जाते थे अब पसंद है वह किरदार जो अपने प्रेम को छीन लेते हैं। प्रेमिका की हत्या कर देते हैं और फिर जेल में पागलों से जीवन बीताकर पछताते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्मकार निश्चित ही यह कहकर बचते रहे हैं कि जो समाज में है वही हम दिखाते हैं। दरअसल वह एक जिम्मेदार शिक्षक नहीं एक गैर जिम्मेदार व्यापारी हैं। यह कहना गलत है कि फिल्में समाज का आइना होती है। साहित्य समाज का आईना होता हैं। क्या दुरदर्शन पर कभी आता था 'स्वाभीमान' हमारे समाज का आईना है? एकता कपूर की बकवास क्या हमारे समाज का आईना है? आप खुद सोचें क्या 'सच का सामना' हमारे समाज का सच है?.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-4234360043697563367?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=3xhqZ24UCi0:TA_0keDrEG0:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/3xhqZ24UCi0" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-05-02T11:28:25.196+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-W4d88qytzno/T5pN2BF_8QI/AAAAAAAABi8/CyB46S-Fmxg/s72-c/Gabbar+singh.JPG" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/04/blog-post_27.html</feedburner:origLink></item><item><title>बोफोर्स घोटाला, अमिताभ का बयान और मेरी प्रतिक्रिया</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/qpIp5PkJ2CE/blog-post_26.html</link><category>संपादकीय</category><category>सुलगते मुद्दे</category><category>कुलवंत हैप्‍पी</category><category>बोफोर्स घोटाला</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Thu, 26 Apr 2012 00:06:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-3614573828159602051</guid><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-zyZgtzRkfTA/T5lLOzQsIVI/AAAAAAAABis/jZQyS0HQ9bc/s1600/amitabh+bachchan.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="210" src="http://4.bp.blogspot.com/-zyZgtzRkfTA/T5lLOzQsIVI/AAAAAAAABis/jZQyS0HQ9bc/s640/amitabh+bachchan.jpg" width="640" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;बोफोर्स घोटाला, कब सामने आया, यकीनन जब मैं तीसरा बसंत देख रहा था, यानि 1987, इस घोटाले का पर्दाफाश अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र द हिंदु की संवाददाता चित्रा सुब्रह्मण्‍यम ने किया, मगर सीबीआई ने इस मामले में चार्जशीट उस समय दाखिल की, जब मैं पांच साल पूरे कर छठे की तरफ बढ़ रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद सरकारें बदली, स्‍थितियां परिस्‍थितियां बदली, मैं भी समय के साथ साथ बड़ा होता चला गया। लेकिन मुझे इस घोटाले की जानकारी उस समय मिली जब इस घोटाले के कथित दलाल ओत्तावियो क्‍वोत्रिकी की हिरासत के लिए सीबीआई जद्दोजहद कर रही थी, और मैं एक न्‍यूज वेबसाइट के लिए कीबोर्ड पर उंगलियां चला रहा था, तकरीबन तब मैं पच्‍चीस साल का हो चुका था, और यह घोटाला करीबन 22 साल का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप सोच रहे होंगे कि घोटाले और मेरी उम्र में क्‍या तालुक है, तालुक है पाठक साहिब, क्‍यूंकि जब यह घोटाला हुआ तो राजीव गांधी का नाम उछलकर सामने आया, चूंकि वह उस समय प्रधानमंत्री बने थे, और राजीव गांधी प्रधानमंत्री कब बने, जब इंदिरा गांधी का मौत हुई, और जब इंदिरा की मौत हुई, तब मैं पांच दिन का था, एक वो ही ऐसी घटना है, जिसने मेरे जन्‍मदिन की पुष्‍टि की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्‍वीडन के पुलिस प्रमुख स्‍टेन लिंडस्‍ट्रॉम ने कल जब 25 साल बाद अपने मरे हुए जमीर को जगाते हुए कहा कि अमिताभ बच्‍चन का नाम घोटाले में शामिल करने के लिए उन पर दबाव डाला गया था। और मुझे सबसे ज्‍यादा हैरानी तो तब हुई, जब अमिताभ बच्‍चन ने अपने ब्‍लॉग पर लिखा, चलो पच्‍चीस साल बाद तो मुझे राहत मिली, लेकिन उसकी भरपाई कौन करेगा, जो पच्‍चीस साल मैंने आरोप का दंश झेला, और मीडिया ने ख़बर बनाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमिताभ बच्‍चन को शायद पता नहीं कि आरोप का दंश किसे कहते हैं। अगर वह सच में जानना चाहते हैं कि आरोप का दंश किसे कहते हैं तो उनको गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ देखना चाहिए, जो पिछले दस सालों से दंगों के आरोप का दंश झेलते आ रहे हैं। शायद ही उनकी कोई प्रेस कांफ्रेंस ऐसी गई होगी, जिसमें मीडिया ने उनसे दंगों से संबंधित प्रश्‍न नहीं पूछे। स्‍िथतियां तो कई बार ऐसी पैदा हुई कि उनको लाइव शो छोड़कर भी जाना पड़ा। मुझे तो एक भी ऐसा मौका याद नहीं आ रहा, जब मीडिया ने अमिताभ बच्‍चन से बोफोर्स घोटाले के बारे में भूलकर भी कोई प्रशन पूछा हो, या कभी मीडिया ने उनका नाम कहीं उछाला हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमिताभ का नाम इस घोटाले से जुड़ा था, और उनको क्‍लीन चिट मिल गई, मुझे भी तब पता चला, जब अमिताभ ने इस पर खुशी जताई और मीडिया ने उसको हाईलाइट किया। मेरे ध्‍यान में शायद यह पहला मामला है, जब मीडिया ने आरोपी के साथ दोषी जैसा व्‍यवहार नहीं किया, और बेगुनाह होने पर उसको एक अच्‍छा डिस्‍पले दिया, मीडिया की अगर यह पहल है तो अच्‍छी बात है, अगर स्‍पेस की भरपाई के लिए स्‍पेस दिया गया है तो अफसोस की बात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफसोस इसलिए कि हम जिस घोटाले की जांच के लिए पिछले ढ़ाई दशक में करोड़ों रुपए खर्च चुके हैं, उस मामले में हमको मिली तो मिली केवल क्‍लीन चिट, क्‍या सरकार को जनता का पैसा केवल क्‍लिन चिट हासिल करने के लिए मिला है। हैरानी तो इस बात से भी हो रही है कि स्‍टेन का बयान 25 साल बाद ही क्‍यूं आया? और तब आया जब कांग्रेस की छवि देश के अंदर बिगड़ती जा रही है, और दूसरी बात देश में राष्‍ट्रपति के पद को लेकर भी नामों का चयन किया जा रहा है, कहीं पिछली बार की तरह इस बार भी तो अमिताभ का नाम उभरकर सामने आने वाला तो नहीं। उक्‍त दोनों संयोगों को देखने के बाद मुझे लगता है, कहीं स्‍टेन का यह बयान भी तो किसी दबाव के चलते तो नहीं आया। शायद पुष्‍टि के लिए 25 साल और इंतजार करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलते चलते इतना ही कहूंगा, ए मेरी सरकार हर घोटाले में क्‍िलन चिट पहले ही दे देना, क्‍यूंकि मेरे देश का धन मेरी जनता के काम आ सके, नहीं तो हर बार एक ही कहावत दोहरानी पड़ेगी ''खाया पीया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना''।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद रहे कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डालर का था। आरोप है कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत के साथ सौदे के लिए 1.42 करोड़ डालर की रिश्वत बांटी थी, मगर भारतीय सरकार ने जांच के लिए 256 करोड़ खर्च किए, और बदले में मिला ठेंगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-3614573828159602051?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=qpIp5PkJ2CE:pQBAydC_ax0:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/qpIp5PkJ2CE" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-04-26T19:05:34.330+05:30</atom:updated><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/-zyZgtzRkfTA/T5lLOzQsIVI/AAAAAAAABis/jZQyS0HQ9bc/s72-c/amitabh+bachchan.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/04/blog-post_26.html</feedburner:origLink></item><item><title>13 साल की लड़की का माँ बनना</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/yJjAPZT1Yz8/13.html</link><category>संपादकीय</category><category>अतिथि कोना</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Wed, 25 Apr 2012 00:25:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-2682589433988260889</guid><description>&lt;div class="addthis_toolbox addthis_default_style addthis_32x32_style" style="text-align: justify;"&gt;कल  बाद दोपहर खाने के लिए केले लेने हेतु सेक्‍टर 21 गांधीनगर स्‍थित रिलायंस  फ्रेश में गया, क्‍यूंकि अभी के दिनों में इसके सिवाए केले कहीं नहीं  मिलते, खासकर इसके आस पास के क्षेत्र में। यहां पर मैंने किशोरी को देखा,  जो बच्‍चे को स्‍तनपान करवाते हुए मेरे मोटर साइकिल के आगे से गुजरी। मैं  दंग रह गया। मैं हैरान इस लिए था कि इतनी छोटी उम्र में यह सचमुच मां बन गई  या फिर लोगों से पैसे ऐंठने का एक नया प्‍लान है। जैसे मैंने थोड़ी दूर  जाकर मोटरसाइकिल पार्किंग में खड़ा कर पीछे मुड़कर देखा तो वह दूर निकल गई  थी, और मैं अपनी हैरानगी को साथ लेकर अपना काम निबटाने चला गया। फिर मैंने  यह बात अपनी पत्‍नी को बताई तो उसने कहा, ऐसा नहीं हो सकता था, क्‍यूंकि जब  तक लड़की का मासिक धर्म शुरू नहीं होता, तब तक वह मां नहीं बन सकती। आज जब  मैं नवभारत डॉट कॉम से गुजर रहा था, तो मेरी निगाह नितिन सबरंगी के लेख पर  पड़ी, जिसका शीर्षक था, 13 साल की लड़की का माँ बनना, शायद यह सब संयोग  है। ऐसा हो सकता है या नहीं, के बारे में भी मैंने सर्च किया तो पता चला कि  दस फीसदी लड़कियों का मासिक धर्म केवल 11:11 साल में शुरू हो जाता है,  जबकि 90 फीसदी लड़कियों का मासिक धर्म 13.75 में शुरू होता है। नितिन  सबरंगी का लेख, हम को समाज के खिनौने चेहरे से रूबरू करवाने जा रहा है। ऐसे  मुद्दों पर मीडिया कब तेज धार कलम से वार  करेगा।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;i&gt;&lt;b&gt;कुलवंत हैप्‍पी, युवा सोच युवा खयालात&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/%20http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/lekhan/"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;नितिन सबरंगी की कलम से/अतिथि कोना&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ  बनना किसी के लिये भी खुशी की बात हो सकता है, लेकिन उसके लिये यह ऐसा  जख्म है जिसकी टीस उसे जिंदगी भर रहेगी। उसका गुनाह शायद इतना भर रहा कि वह  उन गरीब की बेटी थी। जिनके बारे में कुछ नहीं जानती। दूसरों के टुकड़ों पर  किसी तरह जिंदगी पलती रही। 13 साल की कच्ची उम्र में एक इंसानरूपी भेड़िये  की हवस का शिकार होकर वह मासूम बिन ब्याही माँ बन गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिस्तर  पर पड़ी रानी (बदला हुआ नाम) अब स्कूल जाना छोड़ देगी। खुद खेलने की उम्र  में वह अपने बच्चे की परवरिश करेगी। कथित सभ्य समाज की यह वह नंगी हकीकत  है, जिसे देखना-सुनना मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाला है। कानून के  पहरेदारों को शिकायत का इंतजार है, तो ऐसे संगठनों की कमी नहीं जो अब  ढिंढोरा पीटकर अपनी मौजूदगी दर्ज करायेंगे। कुंवारी माँ इस काबिल भी नहीं  कि ऐसी चुनौती दे सके जिससे आरोपी को सजा मिले जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रांची  की एक झोपड़ी में होटल चलाने वाले दंपती को रानी दो साल की उम्र में सड़क  पर मिली। उसके अपने माता-पिता उसे कभी लेने नहीं आये। दंपती ने उसे पाला ओर  अपने साथ ही काम पर लगा लिया। वक्त बीतने के साथ रानी 13 साल की हो गई। एक  कच्ची उम्र में लोग उसे गलत निगाह देखते थे। रानी का पेट बढ़ना शुरू हुआ,  तो दंपती ने उसका निकलना बंद कर दिया। दर्द बढ़ता गया, तो अस्पताल ले जाया  गया जहां उसने एक बेटी को जन्म दिया। उसकी कोख में अंगारे भरने वाला एक  गार्ड था। वह अक्सर होटल पर आता था ओर रानी को अकेले पाकर खान की चीजों का  लालच देकर उसके साथ गलत हरकते करता था। होटल चलाने वाला दंपती चाहता है कि  वह अब रानी का विवाह गार्ड के साथ ही कर देंगे उन्हें शायद एक बच्ची के मां  बनने से लेकर कम उम्र में शादी के बीच कानून के मायने नहीं पता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह  मामला पुरूषों की मानसिकता को दर्शाने के लिये भी काफी है कि लड़कियों को  किन नजरों से देखा जाता है। यौन शोषण के अधिकांश मामलों में अपना का ही हाथ  होता है। कन्या उद्वार के नाम पर कई सरकारी व गैर सरकारी संगठन काम करते  हैं, लेकिन क्या वाकई उद्वार हो पाता है? रानी को इससे क्या उसे अपने साथ  हुए गुनाह का अंदाजा भी नहीं है। कभी न भरने वाले जख्म ओर कलंक को लेकर उसे  जीना पड़ेगा। उसके असल माता पिता भी कोढ़ग्रस्त इंसानियत के पुतले हैं  जिन्होंने अपनी बेटी को सड़क पर छोड़ दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;(लेखक  पेशे से पत्रकार हैं। अपराध से जुड़ी सत्य घटनाओं पर आधारित कहानियों का  संकलन एवं लेखन करते हैं, इनका लेखन नाम से नवभारत डॉट कॉम पर ब्‍लॉग भी  है)&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;    &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-2682589433988260889?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=yJjAPZT1Yz8:gSphSohk0k4:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/yJjAPZT1Yz8" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-04-26T17:33:15.037+05:30</atom:updated><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/04/13.html</feedburner:origLink></item><item><title>महिलाओं को चाहिए तराशे हुए वक्ष, मर्दों को चुस्‍त की चाहत</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~3/fCq4t6q1ggY/blog-post_24.html</link><category>संपादकीय</category><category>इंडिया टूडे</category><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><pubDate>Tue, 24 Apr 2012 04:19:00 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-136558085647337345.post-3461490259443268554</guid><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हैरानी हो रही है कि&lt;i&gt;&lt;b&gt; ''युवा सोच युवा खयालात'&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;' यह क्‍या लिख रहा है, लेकिन जनाब यह मैं नहीं हिन्‍दी की बेहद लोकप्रिय पत्रिका इंडिया टूडे अपने नए अंक की कवर स्‍टोरी 'उभार का सनक' के साथ उक्‍त पंक्‍ित को लिख रही है, जो अंक उसने मई महीने के लिए प्रकाशित किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसको लेकर बुद्धजीवियों व मीडिया खेमे में बहस छिड़ गई कि एक पत्रिका को क्‍या हो गया, वो ऐसा क्‍यूं कर रही है। मुझे लगता है कि इसका मूल कारण कंटेंट की कमी, और ऊपर से बढ़ता महंगाई का बोझ है। पत्रिका खरीदने से लोग कतराने लगे हैं, ऐसे में भला जॉब खोने का खतरा कोई कैसे मोल ले सकता है, जाहिर सी बात है कि अगर आमदनी नहीं होगी, तो जॉब सुरक्षित नहीं रहेगी, हो सकता है कि इस बार इंडिया टूडे ने अपनी गिरती बिक्री को बचाने के लिए इस तरह की भाषा व पोस्‍टर का प्रयोग किया हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर दूसरी ओर देखें तो शायद इंडिया टूडे कुछ गलत भी नहीं कह रहा, आज सुंदर बनना किसे पसंद नहीं, युवा रहना किसकी चाहत नहीं, खुद को सबसे खूबसूरत व युवा दिखाने की होड़ ने लाइफस्‍टाइल दवा बाजार को संभावनाओं से भर दिया, व्‍यक्‍ित आज बीमारी से छूटकारा पाने के लिए नहीं, बल्‍कि सुंदर व आकर्षित दिखने के लिए दवाएं खा रहा है। अगर यह बात सच नहीं तो आए दिन अखबारों में ग्रो ब्रेस्‍ट व मर्दाना ताकत बढ़ाओ जैसे विज्ञापनों का खर्च कहां से निकलता है, अगर वह बिकते नहीं। जवाब तो सब के पास है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद ऐसे विषयों पर स्‍टोरी करना तब गलत नजर आता है, जब यह स्‍टोरी केवल बीस फीसद हिस्‍से पर लागू होती हो, इन चीजों के आदी या तो मायानगरी में बसने वाले सितारें हैं या फिर कॉलेजों में पढ़ने वाले कुछेक छात्र छात्राएं या फिर सुंदरता के दीवाने पुरुषों की कसौटी पर खरी उतरने ललक में जद्दोजहद कर रही महिलाएं। मगर मजबूरी का दूसरा नाम, तो आप सभी जानते हैं। शायद इंडिया टूडे की भी कोई मजबूरी रही होगी, इस स्‍टोरी को इस तरह कवर स्‍टोरी बनाने के पीछे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे इंडिया टूडे ने एक शब्‍द का इस्‍तेमाल किया है सनक, सनक अर्थ शायद क्रेज या चलन होता है। और जब भी किसी चीज का चलन बढ़ता है तो मीडिया उस पर अपनी प्रतिक्रिया देने से पीछे तो कभी हटता नहीं, फिर इस चलन को लेकर इंडिया टूडे ने पहले मोर्चा मार लिया कह सकते हैं। हर आदमी को क्रेज ने मारा है, किसी को अगले निकलने के, किसी को रातोंरात सफल अभिनेत्री बनने के, किसी को अपने सह कर्मचारियों को पछाड़ने के, किसी को अपने प्रतियोगी से आगे निकलने के। अब हिन्‍दी समाचार चैनलों को ही देख लो, एक दूसरे से पहले स्‍टोरी ब्रेक करने के क्रेज ने मार डाला, स्‍टोरी ब्रेक करने के चक्‍कर में भाषा का सलीका बदल जाता है, एक न्‍यूज रिपोर्ट या एंकर क्रोधित हो उठता है। पंजाब में प्रकाशित होने वाले पंजाब केसरी के फिल्‍मी दुनिया पेज की कॉपियां सबसे ज्‍यादा बिकती हैं, क्‍यूंकि वह वो छापता है, जो कोई दूसरा नहीं छापता, ऐसे में उसका मुकाबला करने के लिए दूसरे ग्रुपों को भी उसी दौड़ में शामिल होना पड़ेगा, क्‍यूंकि पैसा नचाता है, और अश्‍लीलता बिकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अश्‍लीलता बिकती है व पैसा नचाता है से याद आया, पूजा भट्ट व महेश भट्ट को ही देख लो, आखिर कैसा सनक है कि बाप बेटी जिस्‍म 2 को लेकर बड़े उत्‍सुक हैं, सन्‍नी को लेने का फैसला महेश भट्ट ने किया, और फिल्‍म बनाने का पूजा भट्ट ने, वहां बाप बेटी के बीच सब कुछ नॉर्मल है, उनको कुछ भी अजीब नहीं लगता, ऐसा लगता है कि पैसे की चमक हर चीज को धुंधला कर देती है, तो शर्म हया क्‍या भला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;चलते चलते&amp;nbsp; &lt;/i&gt;&lt;/b&gt;इतना ही कहूंगा कि पैसा नचाता है, दुनिया नाचती है। शायद इंडिया टूडे हिन्‍दी पत्रिका वालों की भी कुछ ऐसी ही कहानी होगी, वरना इतनी इज़्ज़तदारपत्रिका ऐसी स्‍टोरी को इस तरह एक्‍सपॉज नहीं करती, वैसे भी मीडिया में कुछ वर्जित नहीं रहा। जो मीडिया आज इंडिया टूडे पर उंगली उठा रहा है, वही मीडिया विदेशी महिला अदाकारों की उस बात को बड़ी प्रमुखता से छापता है, जिसमें वह कहती हैं उसने कब कौमार्य भंग किया, कितनी दवाएं व सर्जरियां करवाकर अपनी ब्रेस्‍ट का साइज बढ़ाया। इतना ही नहीं, कुछेक न्‍यूज वेबसाइटों पर तो एक कोने में अभिनेत्रियों की हॉट से हॉट तस्‍वीरें रखी मिलेगीं, और लिखा मिलेगा एडिटर की चॉव्‍इस, अगर एडिटर की चॉव्‍इस ऐसी होगी, तो अखबार कैसा होगा, मैगजीन कैसी होगी जरा कल्‍पना कीजिए, मैं फिर मिलूंगा, किसी दिन किसी नई चर्चा के साथ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/136558085647337345-3461490259443268554?l=www.yuvarocks.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?a=fCq4t6q1ggY:w3I1Tht0OCw:yIl2AUoC8zA"&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~ff/blogspot/kulwanthappy?d=yIl2AUoC8zA" border="0"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;
&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/kulwanthappy/~4/fCq4t6q1ggY" height="1" width="1"/&gt;</description><atom:updated xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">2012-04-25T20:41:20.983+05:30</atom:updated><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total><feedburner:origLink>http://www.yuvarocks.com/2012/04/blog-post_24.html</feedburner:origLink></item></channel></rss>

