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<?xml-stylesheet href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/rss2full.xsl" type="text/xsl" media="screen"?><?xml-stylesheet href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css" type="text/css" media="screen"?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-12465571</atom:id><lastBuildDate>Thu, 12 Jun 2008 21:52:02 +0000</lastBuildDate><title>देश-दुनिया</title><description /><link>http://desh-duniya.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (Hindi Blogger)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>134</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" type="application/rss+xml" /><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-7647023173027960903</guid><pubDate>Thu, 12 Jun 2008 08:05:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-06-12T14:45:02.866Z</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नोम चोम्स्की</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">निम चिम्पस्की</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">भाषा</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">विज्ञान</category><title>निम चिम्पस्की की करूण कथा</title><description>&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SFD5waMB48I/AAAAAAAAAIo/LuCkJ6KL8Ac/s1600-h/nimchimpsky.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SFD5waMB48I/AAAAAAAAAIo/LuCkJ6KL8Ac/s320/nimchimpsky.jpg" border="0" alt="निम चिम्पस्की"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5210939378926478274" /&gt;&lt;/a&gt;बन्दरों पर &lt;a href="http://halchal.gyandutt.com/2008/06/blog-post_11.html"&gt;पंकज अवधिया जी का रोचक शोध&lt;/a&gt; पढ़ने के तुरंत बाद एक चिंपांज़ी पर हुए दुखद शोध के बारे में पढ़ने का मौक़ा मिला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कहानी है निम चिम्पस्की नामक चिंपांज़ी की. मशहूर भाषाविद &lt;a href="http://desh-duniya.blogspot.com/2006/03/blog-post_16.html"&gt;नोम चोम्स्की&lt;/a&gt; के नाम पर उसे ये पहचान दी गई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात है 1973 की, जब अमरीका में कोलंबिया विश्वविद्यालय में वानरभाषा पर एक अभूतपूर्व प्रयोग करने का फ़ैसला किया गया. इस प्रयोग को 'प्रोजेक्ट निम' नाम दिया गया, और प्रयोग में शामिल चिंपांज़ी को निम चिम्पस्की नाम देना तय किया गया. दरअसल मनोविज्ञानी प्रोफ़ेसर हर्बर्ट टेरेस नोम चोम्स्की के एक मशहूर सिद्धांत को ग़लत साबित करके दिखाना चाहते थे. चोम्स्की का मानना है कि हमारी भाषाएँ मानव मस्तिष्क में केंद्रित कुछ विशेष नियमों से बंधी होती हैं, इसलिए ये मनुष्य मात्र के लिए ही संभव हैं. वानर जाति में मनुष्यों जैसा भाषा ज्ञान होने की संभावना को चोम्स्की सिरे से ख़ारिज करते हैं. अधिकांश वैज्ञानिकों की राय भी यही है कि दो जीव प्रजातियों के बीच भाषाई संबंध की बात कपोल कल्पना है, न कि अनुसंधान का विषय.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन प्रोफ़ेसर टेरेस चिंपांज़ी को मूक-बधिर समुदाय की भाषा &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/American_Sign_Language"&gt;अमेरिकन साइन लैंग्वेज&lt;/a&gt; सिखा कर न सिर्फ़ चोम्स्की को ग़लत साबित करना चाहते थे, बल्कि इस मान्यता के ख़िलाफ़ भी सबूत जुटाना चाहते थे कि मनुष्य और जानवरों के बीच मुख्य अंतर का आधार भाषा ही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओकलाहोमा के Institute for Primate Studies की एक 18 वर्षीय मादा चिंपांज़ीं के एक दुधमुंहें बच्चे को इस प्रयोग के लिए चुना गया. उसे निम चिम्पस्की नाम देकर प्रोफ़ेसर टेरेस की शिष्या रही स्टेफ़नी लाफ़ार्ज नामक महिला को सौंप दिया गया. स्टेफ़नी ओकलाहोमा से चिम्पस्की को अपने घर न्यूयॉर्क ले आई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टेफ़नी, उसके पति और उसकी 12 वर्षीय बेटी के साथ चिम्पस्की पलने लगा. कुछ महीनों के भीतर वह एक शरारती बच्चा साबित होने लगा. डाँटने और पिटाई करने से भी जब चिम्पस्की की शरारत नहीं रुकती, तो सिर्फ़ एक उपाय हमेशा काम करता. चिम्पस्की को किसी कमरे में अकेला छोड़ कर सारे लोग बाहर निकल जाते. इस तरह बहिष्कार किए जाने पर उसे होश आ जाता कि शायद वह कुछ ग़लत कर रहा होगा, और वह शरारत करना बंद कर देता. जल्दी ही उसने साइन लैंग्वेज में 'सॉरी' कहना सीख लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे स्टेफ़नी ने जब चिम्पस्की को विधिवत प्रशिक्षण देना शुरू किया तो उसे साइन लैंग्वेज में पहला शब्द सिखाया- पीना. इस शब्द को सिखाने में मात्र दो सप्ताह लगे. दो महीने के भीतर चिम्पस्की के शब्दकोश में 'लाओ', 'ऊपर', 'मिठाई' और 'ज़्यादा' जैसे कई शब्द जुड़ गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह 'प्रोजेक्ट निम' चल निकला. मीडिया में चिम्पस्की की चर्चा होने लगी. न्यूयॉर्क पत्रिका के कवर पर तस्वीर छपने के बाद तो उसे सब जानने लगे. 'टॉकिंग चिम्प' चिम्पस्की को टीवी शो में आमंत्रित किया जाने लगा, जहाँ वह सेट पर उछलकूद करने के साथ-साथ साइन लैंग्वेज के ज़रिए प्रस्तुतकर्ता से पानी की माँग कर सबको हतप्रभ कर देता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SFEyttbaDtI/AAAAAAAAAI4/Gy5wt9tinUA/s1600-h/Nim_Chimpsky1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SFEyttbaDtI/AAAAAAAAAI4/Gy5wt9tinUA/s320/Nim_Chimpsky1.jpg" border="0" alt="साइन लैंग्वेज प्रशिक्षण"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5211002004714426066" /&gt;&lt;/a&gt;अपने प्रयोग में हो रही प्रगति से प्रोफ़ेसर टेरेस इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने प्रशिक्षण का स्तर और सघन करने का फ़ैसला किया. इसके लिए चिम्पस्की को स्टेफ़नी के घर से निकाल कर कोलंबिया विश्वविद्यालय के विज्ञान विभाग के एक विशेष कक्ष में रखा गया. उसके लिए एक कठोर शिक्षक कैरोल स्टीवार्ट को नियुक्त किया गया. पहले ही अवसर में स्टीवार्ट ने चिम्पस्की के मस्ती के दिन ख़त्म कर दिए. उसे छोटी सी बेंच पर बिठा कर रखा जाता. चिम्पस्की से उम्मीद की जाने लगी कि वो अपना कोट हैंगर पर टांगे. खों-खों करने, काटने या मस्ती के मूड में आने पर सज़ा के तौर पर उसे चार फ़ुट के खिड़कीरहित बक्से में डाल दिया जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सब बातें जब चिम्पस्की की पहली शिक्षिका स्टेफ़नी को पता चलीं तो उसने अपना विरोध जताया. उसने कहा कि चिम्पस्की अपने को मनुष्यों के साथ जोड़ कर देखता है, इसलिए उसके साथ जानवर जैसा व्यवहार करना कतई ठीक नहीं है. दरअसल एक बार चिम्पस्की को मनुष्यों और चिंपाज़िंयों की कुछ तस्वीरें देख कर उसे दो समूहों में बाँटने को कहा गया था. उनमें से एक तस्वीर ख़ुद उसकी भी थी. चिम्पस्की ने इस काम को कर दिखाया, लेकिन अपनी तस्वीर मनुष्यों के बीच रखी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब स्टीवार्ट के कड़क प्रशिक्षण का ज़्यादा उत्साहजनक परिणाम नहीं निकला, तो उसे परियोजना से बाहर कर दिया गया. अब चिम्पस्की को एक 21 कमरों वाली बड़ी हवेली में स्थानांतरित कर दिया गया. हडसन नदी के किनारे बनी इस हवेली में चिम्पस्की की ज़िंदगी थोड़ी आसान हो गई. नए प्रशिक्षक भी उसके साथ बढ़िया से पेश आते थे. लेकिन माँ(पहली प्रशिक्षक स्टेफ़नी) की कमी उसे यहाँ भी महसूस होती. इस कारण वह चिड़चिड़ा भी हो गया. इसके बाद भी उसने 100 शब्द सीख लिए, जिनके ज़रिए वह हज़ारों तरह के विचार व्यक्त कर लेता था. लेकिन साथ ही वह आसपास मौजूद लोगों को कभी-कभी काट भी खाता. चिम्पस्की ने हद तब पार कर ली जब उसने अपने एक प्रशिक्षक के चेहरे को बुरी तरह नोंच डाला. यही वो वक़्त था जब प्रोफ़ेसर टेरेस ने चिम्पस्की को वापस चिंपांज़ियों के बीच ओकलाहोमा भेजने का फ़ैसला किया. उनका कहना था कि अध्ययन के लिए ज़रूरी आंकड़े वैसे भी जुटाए जा चुके हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्षों तक चिम्पस्की लोगों के बीच रहा था. उसकी किसी अन्य चिंपांज़ी से मुलाक़ात तक नहीं हो पाई थी. इसलिए जब उसे चिंपाज़ियों के बाड़े में भेज दिया गया, तो वहाँ वह लोगों से संवाद करने के लिए तरसता. न सिर्फ़ उसकी ज़रूरत को नज़रअंदाज़ किया गया, बल्कि उल्टे उसे चिंपांज़ियों के साथ संवाद करने की ट्रेनिंग दी जाने लगी. इसी दौरान इस ओकलाहामा स्थित इंस्टीट्यूट पर वित्तीय संकट आ गया. इसके निदेशक का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था. ऐसे में उन्होंने चोरी-चुपके चिम्पस्की समेत 20 चिंपांज़ियों को चिकित्सा अनुसंधान प्रयोगशाला Laboratory of Experimental Medicine and Surgery in Primates को बेच दिया. न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की इस प्रयोगशाला में चिम्पस्की पर हेपटाइटिस से जुड़ा एक अध्ययन किया जाना था. यहाँ चिम्पस्की को बुरी परिस्थितियों में रखा जा रहा था. बाक़ी चिम्पांज़ियों के साथ ही उसे पिंजड़े में बंद रखा जाता. प्रयोगशाला के एक सहायक ने ग़ौर किया कि वहाँ न सिर्फ़ चिम्पस्की बल्कि उसके प्रभाव में अन्य चिंपांज़ी में साइन लैंग्वेज में पानी, सिगरेट आदि की माँग कर रहे होते थे. शायद ज़रूरत के तौर पर नहीं, बल्कि हताशा में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये ख़बर बाहर आते ही राष्ट्रीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया. अख़बारों और टीवी चैनलों ने एक चिंपांज़ी के मानवीकरण की कोशिश करने और बाद में उसे चिकित्सीय प्रयोग के लिए त्याग देने की नैतिकता पर बहस शुरू कर दी. इस बीच प्रोफ़ेसर टेरेस अपने अध्ययन की रिपोर्ट जारी कर चुके थे, जिसमें उन्होंने अपने शुरुआती विचार से बिल्कुल उल्टा जाते हुए कहा कि चिंपांज़ी मनुष्यों की भाषा नहीं समझ सकते. अपने 'प्रोजेक्ट निम' को नाकाम बताते हुए उन्होंने कहा कि चिम्पस्की जैसे चिंपांज़ी सिर्फ़ नकल भर कर पाते हैं, संवाद करने का नाटक कर वैज्ञानिकों को मूर्ख बनाते हैं. प्रोफ़ेसर टेरेस के इस तरह पलटी मारने से पूरा अमरीका हतप्रभ रह गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन प्रोफ़ेसर टेरेस ने भी न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में चिम्पस्की को जानवरों के जैसा रखे जाने पर हो रहे विरोध में बढ़-चढ़ कर भाग लिया. इस दौरान एक वकील ने चिम्पस्की के समर्थन में अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की घोषणा की. चौतरफ़ा दबाव की रणनीति काम आई और महीने भर के भीतर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय ने चिम्पस्की को छोड़ने का फ़ैसला किया. संयोग से उस पर किसी तरह के प्रयोग अभी शुरू नहीं किए गए थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतत: पशु अधिकारवादी लेखक क्लीवलैंड एमोरि ने चिम्पस्की को ख़रीद कर टेक्सस स्थित अपने &lt;a href="http://fundforanimals.org/ranch/about/"&gt;पशु अभ्यारण्य&lt;/a&gt; में डाल दिया. लेकिन वहाँ भी उसे ज़्यादातर पिंजरे में ही रखा जाता. एमोरि ने अपने अभ्यारण्य में साइन लैंग्वेज जानने वाले किसी कर्मचारी की व्यवस्था नहीं की थी. इसलिए चिम्पस्की वहाँ भी लोगों से संवाद करने के लिए तरसता ही रहा. उसके अकेलेपन पर तरस खाकर एमोरि ने एक मादा चिंपाज़ी सैली को उसके पिंजरे में डाल दिया. इसका ज़्यादा असर नहीं हुआ, लेकिन एमोरि के लिए चिम्पस्की को सैली के साथ खेलते देखना सुखद था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SFD6hcSG4zI/AAAAAAAAAIw/BCnpwRVBbHM/s1600-h/nim_chimpsky.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SFD6hcSG4zI/AAAAAAAAAIw/BCnpwRVBbHM/s200/nim_chimpsky.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5210940221302432562" /&gt;&lt;/a&gt;जब कभी चिम्पस्की को पिंजरे से निकलने का मौक़ा हाथ लगता, वह अभ्यारण्य के मैनेजर के आवास में जा धमकता. वहाँ फ़्रिज से खाने-पीने का सामान निकालता. टकटकी लगा कर टीवी देखता. ज़ाहिर है उसे मनुष्यों का साथ अभी भी पसंद था. चिम्पस्की को रोज़ मन बहलाने के लिए सचित्र किताबें-पत्रिकाएँ दी जाती थीं. अधिकतर किताबों-पत्रिकाओं को वह खेल-खेल में फाड़ डालता था. अपवाद थी सिर्फ़ दो किताबें- एक थी साइन लैंग्वेज सिखाने वाली किताब, और दूसरी 1980 में प्रकाशित उसके फ़ोटो-एलबम जैसी किताब The Story of Nim:The Chimp Who Learned Language.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन चिम्पस्की की पहली प्रशिक्षक स्टेफ़नी वहाँ उससे मिलने पहुँची. वह एमोरि की हिदायतों के बावजूद पिंजरे के भीतर जा पहुँची. चिम्पस्की ने कुछ देर अपनी माँ समान स्टेफ़नी को घूर कर देखा, फिर उसे ज़मीन पर गिरा दिया और घसीट कर पिंजरे के एक कोने में लगा दिया. वह ख़ुद दरवाज़ा छेंक कर खड़ा हो गया मानो वह स्टेफ़नी को भागने नहीं देगा. स्टेफ़नी को चोट ज़रूर लगी लेकिन उसका कहना था कि चूंकि उसने आरंभ में अपनाने के बाद चिम्पस्की का परित्याग किया है, इसलिए वह उसके ग़ुस्से को समझ सकती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैली का 1997 में बीमार होने के बाद निधन हो जाने के बाद चिम्पस्की एक बार फिर अकेला पड़ गया. अंतत: उसकी भी 10 मार्च 2000 को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई. वह अभी 20 साल और जी सकता था. लेकिन शायद मानव की तरह पलने और जानवर जैसा बर्ताव सहने ने उसकी ज़िंदगी छोटी कर दी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(निम चिम्पस्की की करुण कथा पिछले दिनों &lt;a href="http://www.amazon.com/Nim-Chimpsky-Chimp-Would-Human/dp/0553803832"&gt;Nim Chimpsky: The Chimp Who Would Be Human&lt;/a&gt; के रूप में प्रकाशित हुई है.)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;&lt;img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://desh-duniya.blogspot.com/2008/06/blog-post_12.html</link><author>noreply@blogger.com (Hindi Blogger)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-3640350715772468630</guid><pubDate>Mon, 09 Jun 2008 22:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-06-10T01:06:55.408Z</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">लीक</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">इंटरनेट</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">विकिलीक्स</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">न्यू साइंटिस्ट</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">वेबसाइट</category><title>राज़ खोलो, पहचान गुप्त रहेगी</title><description>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SE3PGZXOOPI/AAAAAAAAAIg/QAVuOJV6ZNI/s1600-h/smart-bomb.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SE3PGZXOOPI/AAAAAAAAAIg/QAVuOJV6ZNI/s320/smart-bomb.jpg" border="0" alt="स्मार्ट बम"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5210048052731984114" /&gt;&lt;/a&gt;अमरीका का GPS-निर्देशित स्मार्ट बम किस हद तक सटीक निशाना साधता है? इसके निशाने से कितना दूर तक छिटकने के आसार होते हैं? ये सारी सूचनाएँ इंटरनेट पर उपलब्ध हैं. पेंटागन के खुलेपन के कारण नहीं, बल्कि &lt;strong&gt;विकिलीक्स&lt;/strong&gt; के सौजन्य से. वर्ष 2002 के इस दस्तावेज़ को सार्वजनिक किए जाने के बाद से यों तो अमरीका ने स्मार्ट बम या Joint Direct Attack Munition के डिज़ायन में कुछ बदलाव किए हैं, लेकिन विकिलीक्स के सौजन्य से ही हमें पता चल पाया कि दो दशकों में अमरीकी आयुध भंडार में आए इस सबसे महत्वपूर्ण बम के 2.8 मीटर तक निशाना चूकने की बात ग़लत थी, क्योंकि ये परीक्षण स्थिति का आँकड़ा था. वास्तविक युद्ध में ये 7.8 मीटर तक छिटक सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे &lt;a href="http://www.wikileaks.org/"&gt;विकिलीक्स&lt;/a&gt; के बारे में पहली बार साल भर पहले ख़बरों की दुनिया में विचरण करते वक़्त पता चला था, लेकिन इसके काम करने के तरीके के बारे में आसान शब्दों में ढंग की जानकारी अब जा कर मिली है, विज्ञान पत्रिका &lt;a href="http://www.newscientist.com/contents/issue/2655.html"&gt;न्यू साइन्टिस्ट&lt;/a&gt; के ज़रिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ुशी की बात है कि साल भर से कुछ ज़्यादा समय मात्र काम करके विकिलीक्स ने 2008 Economist Index on Censorship Freedom of Expression award हासिल कर दिखाया है. हाल के दिनों में इसने हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम का डिज़ायन सार्वजनिक किया है, साथ ही ये भी बताया कि ब्रिटेन ने कैसे परमाणु हथियार क्षमता का जुगाड़ किया. इसने तिब्बत में पिछले दिनों हुए प्रदर्शन को दबाने के लिए किए चीन के शक्ति-प्रदर्शन के सैंकड़ो दिल दहला देने वाले चित्र और वीडियो क्लिप्स भी उपलब्ध कराए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बमुश्किल डेढ़ साल पुरानी इस वेबसाइट को चलाने वालों ने अमरीका सरकार, चीन सरकार, पूर्व कीनियाई राष्ट्रपति, सबसे बड़े निजी स्विस बैंक, रूसी कंपनियों, सिंटोलोजी-कैथोलिक-मॉरमन चर्चों आदि के क़ानूनी-ग़ैरक़ानूनी हमलों का सफलतापूर्वक सामना किया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विकिलीक्स से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-विकिलीक्स के के पहले ही पन्ने पर आमंत्रण और आश्वासन इन शब्दों में दिया गया है- Have documents the world needs to see? We protect you and get your disclosure out to the world.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-विकिलीक्स को किस तरह के गोपनीय दस्तावेज़ों की ज़रूरत है ये एक पंक्ति में स्पष्ट किया गया है- Wikileaks accepts classified, censored or otherwise restricted material of political, diplomatic or ethical significance. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-इसके ठीक बाद एक और पंक्ति में स्पष्ट किया गया है कि विकिलीक्स को किस तरह की जानकारी नहीं चाहिए- Wikileaks does not accept rumour, opinion or other kinds of first hand reporting or material that is already publicly available.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-विकिलीक्स को सार्वजनिक किए जाने योग्य गुप्त दस्तावेज़/रिकॉर्डिंग भोजपुरी और हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं में भी भेजे जा सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गोपनीयता प्याज़ की परतों के सहारे&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकिलीक्स को मिलने वाले दस्तावेज़ों की परख दुनिया भर में फैले इसके स्वयंसेवक करते हैं. ये लोग या तो जानेमाने वक़ील हैं, या फिर मान्यता प्राप्त पत्रकार. गोपनीयता मुहैया कराने के सच्चे भरोसे के कारण विकिलीक्स को हाल के महीनों में इतनी बड़ी संख्या में दस्तावेज़ प्राप्त हुए हैं, कि उनको शीघ्रता से परखने के लिए स्वयंसेवक कम पड़ गए हैं.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SE3O87QBaYI/AAAAAAAAAIY/sAZNxtuafzo/s1600-h/wikileaks.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SE3O87QBaYI/AAAAAAAAAIY/sAZNxtuafzo/s320/wikileaks.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5210047890029898114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दस्तावेज़ लीक करने वालों को गोपनीयता मुहैया कराने का बड़ा ही सरल आधार है, उनके वेब कनेक्शन के IP address को ज़ाहिर नहीं होने देना. ये काम करता है &lt;strong&gt;T&lt;/strong&gt;he &lt;strong&gt;O&lt;/strong&gt;nion &lt;strong&gt;R&lt;/strong&gt;outer या टोर नामक एक नेटवर्क. टोर विकिलीक्स को भेजे गए दस्तावेज़ को हज़ारों सर्वरों के एक नेटवर्क के ज़रिए रूट करता है. दस्तावेज़ इन सर्वरों में एक से दूसरे में अनियोजित तरीके से कई बार स्थानांतरित होने के बाद अंतत: विकिलीक्स के इनबॉक्स में पहुँचता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल विकिलीक्स के स्वयंसेवक टोर का क्लाइंट सॉफ़्टवेयर अपने कंप्यूटर पर डाउनलोड कर उसे एक ओनियन प्रॉक्सि में बदल देते हैं. जब कोई गुप्त दस्तावेज़ी संदेश भेजता है तो टोर इसे तीन बार प्याज़ की परतों जैसा इनक्रिप्ट करता है. तीनों परतों के लिए अलग-अलग कुंज़ी देकर उन्हें अनियोजित तरीके से अचानक चुने गए टोर नेटवर्क के तीन प्रॉक्सि सर्वरों को भेज दिया जाता है. इनमें से एक सर्वर पहली परत को डिक्रिप्ट करके चुने गए दूसरे सर्वर को बढ़ा देता है. दूसरा सर्वर एक और परत को डिक्रिप्ट करता है. और अंतत: तीसरे सर्वर से पूरी तरह डिक्रिप्टेड संदेश बाहर आता है. और, आमतौर पर यही लगता है कि संदेश का स्रोत ये तीसरा सर्वर ही है, जबकि असलियत कुछ और है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह उछलकूद मचाते हुए गंतव्य तक पहुँचे संदेश का स्रोत का पता हर देश की सुरक्षा एजेंसियों के बूते से बाहर की बात है. अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के पास इसकी क्षमता ज़रूर है, लेकिन इसके लिए उसे सही समय पर सही सर्वर को लक्ष्य करना पड़ेगा. यानि सिद्धांत: संभव, लेकिन व्यावहारिक तौर पर लगभग असंभव काम! कंप्यूटर सुरक्षा विशेषज्ञ Bruce Schnier इसे एक सरल उदाहरण से समझाते हैं, "कल्पना करें लोगों से भरे एक बड़े कमरे की. कमरे में मौजूद लोगों में से अनेक एक-दूसरे को लिफ़ाफ़े सौंप रहे हैं. भला कैसे पता लगाएँगे कि कौन-सा लिफ़ाफ़ा शुरूआत में किसके हाथ में था?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक शोध दल ने कुछ टोर प्रॉक्सि सर्वरों की पहचान कर दिखाने का दावा किया है. लेकिन उनके शोध में भी गुप्त संदेश का पता नहीं चल पाया, सिर्फ़ टोर क्लाइंट सॉफ़्टवेयर का उपयोग करने वाले की पहचान भर हो पाई है. यानि विकिलीक्स पर दस्तावेज़ लीक करने के लिए किसी को दोषी साबित करना अभी तक लगभग असंभव ही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विचित्र किंतु सत्य&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमरीकी ख़ुफ़िया सैनिक सूचनाओं को बड़ी मात्रा में परोसने वाला विकिलीक्स जिस टोर तकनीक पर आश्रित है, उसका विकास वाशिंग्टन डीसी स्थित अमरीकी नौसैनिक अनुसंधान प्रयोगशाला(NRL) में किया गया था. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि अमरीकी रक्षा मंत्रालय इस नेटवर्क में किसी भी तरह घुसपैठ कर सकता है. विकिलीक्स के प्रवक्ता Julian Assange ने इस तथ्य को इन शब्दों में कहा है, "इंटरनेट की तरह ही, टोर उन लोगों के हाथ से बाहर निकल चुका है, जो कभी इसके निर्माण में शामिल रहे होंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी एक देश में क़ानूनी पेंच में फंसाए जाने का तोड़ भी विकिलीक्स ने पहले से ही निकाल रखा है. &lt;a href="http://www.wikileaks.org/wiki/Wikileaks"&gt;विकिलीक्स.ऑर्ग&lt;/a&gt; के अनेक मिरर साइट्स हैं जिन्हें बेल्जियम, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, क्रिसमस आइलैंड और कैलीफ़ोर्निया समेत कई देशों में रखा गया है. यानि किसी एक देश में विकिलीक्स वेबसाइट को बंद करने के लिए क़ानूनी कार्रवाई करेंगे, फिर भी वेबसाइट पूरी तरह बंद नहीं होगी. ये बात हाल ही में एक स्विस बैंक को समझ में आ गई जब उसने विकिलीक्स के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने की पहल की. ख़ास कर स्वीडन और बेल्जियम के कड़े सेंसरशिप-विरोधी क़ानूनों का बख़ूबी लाभ उठाया है विकिलीक्स ने.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोचना और उसका जवाब&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकिलीक्स किसी सरकार या संस्था के प्रति जवाबदेह नहीं है, इसलिए सामरिक महत्व की गोपनीय सूचनाएँ लीक करने के इस प्लेटफ़ॉर्म को लेकर कुछ हलकों में असहजता देखी जा सकती है. इनमें से अमरीकी संस्था Federation of American Scientists(एफ़एसए) भी है जो ख़ुद अपनी Project on Government Secrecy के तहत गोपनीय दस्तावेज़ लीक करती है. एफ़एसए के एक प्रवक्ता Steven Aftergood विकिलीक्स को गोपनीय सूचनाएँ लीक करने की प्राचीन कला को एक पेशेवर रूप देने का श्रेय देते हैं, साथ ही शिकायत भी करते हैं कि विकिलीक्स क़ानून के दायरे बाहर रह कर काम करता है और इसलिए आगे चल कर यह सुरक्षा के लिए ख़तरा बन सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर विकिलीक्स के प्रवक्ता का जवाब है, "&lt;strong&gt;जब सरकार लोगों को प्रताड़ित करना और लोगों को मौत के घाट उतारना बंद कर देगी, जब बड़ी-बड़ी कंपनियाँ क़ानूनी प्रावधानों का दुरुपयोग करना छोड़ देंगी, तब शायद ये पूछने का समय का होगा कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक जवाबदेह हैं&lt;/strong&gt;."&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;&lt;img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://desh-duniya.blogspot.com/2008/06/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Hindi Blogger)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-7858973748637988105</guid><pubDate>Thu, 29 May 2008 21:25:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-05-30T00:26:40.088Z</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नोकिया</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">कंपनी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ब्रांड</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नाम</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">माइक्रोसॉफ़्ट</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">वोल्वो</category><title>नाम के पीछे क्या है? (3)</title><description>&lt;a href="http://desh-duniya.blogspot.com/2008/05/2.html"&gt;गतांक&lt;/a&gt; से आगे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Lego&lt;/strong&gt;- खिलौनों के रूप में प्लास्टिक की ईंटें और अन्य तरह के ब्लॉक बनाने वाली इस कंपनी का नाम डेनिश भाषा के मुहावरे leg godt से आया है, जिसका मतलब होता है Play Well. वैसे लैटिन में Lego का मतलब होता है I Construct जो कि इसके उत्पादों के चरित्र को ज़ाहिर करता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SD9Arjn9xCI/AAAAAAAAAH4/GYYeEthegdk/s1600-h/mercedes.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SD9Arjn9xCI/AAAAAAAAAH4/GYYeEthegdk/s200/mercedes.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5205950811305002018" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;Mercedes Benz&lt;/strong&gt;- इस जर्मन कंपनी की स्थापना Gottlieb Daimler और Karl Benz ने की थी. कंपनी के नाम का पहला हिस्सा ऑस्ट्रिया के व्यवसायी Emill Jellinek की कृपा से आया है. Jellinek ने 1898 में Daimler और Benz की कंपनी में बनी कारों को बेचना शुरू किया. उसने 1900 में कंपनी में एक नए ईंजन के विकास के लिए निवेश किया. ईंजन को Mercedes-Benz नाम दिया गया. दरअसल Jellinek की बेटी का नाम Mercedes था. कार रेसों में छद्म नाम से भाग लेते समय वह अपने लिए भी Mercedes नाम ही चुनता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Microsoft&lt;/strong&gt;- दरअसल Bill Gates अपनी कंपनी के लिए एक ऐसा नाम चाहते थे जो कि microcomputer sofware के उनके उत्पाद का द्योतक हो. इस तरह Micro-soft नाम अस्तित्व में आया. बात में इस नाम से हाइफ़न गिरा दिया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SD9BMjn9xDI/AAAAAAAAAIA/MsE0vdQG1TM/s1600-h/Mitsubishi.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SD9BMjn9xDI/AAAAAAAAAIA/MsE0vdQG1TM/s200/Mitsubishi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5205951378240685106" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;Mitsubishi&lt;/strong&gt;- इस जापानी उद्योग समूह का नाम इसके थ्री-डायमंड लोगो को परिभाषित करता है. यह नाम Mitsu और Hishi का संयुक्ताक्षर है. किसी अन्य शब्द के साथ जुड़ने पर Hishi बदल कर bishi हो जाता है. Mitsu का मतलब है तीन, जबकि Hishi का मतलब है पानीफल सिंघाड़ा, यह शब्द जापानी भाषा में ताश के पत्ते पर बने डायमंड आकार को भी व्यक्त करता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Motorola&lt;/strong&gt;- इस कंपनी का शुरुआती नाम Galvin Manufacturing Company था. इसके संस्थापकों ने कार रेडियो बनाना शुरू करने के बाद 1930 के दशक में कंपनी का नाम बदल कर Motorola कर दिया. उन दिनों अमरीका में उच्च गुणवत्ता वाले ऑडियो उत्पादों में -ola लगाने का चलन था, जैसे Rockola, Victrola आदि. इसलिए Motorola नाम sound in motion के आभास के लिए दिया गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Nike&lt;/strong&gt;- इस अमरीकी खेल उत्पाद कंपनी का नाम विजय की ग्रीक देवी के नाम पर है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SD9Cjzn9xFI/AAAAAAAAAIQ/oviICmpg2fU/s1600-h/Nikon.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SD9Cjzn9xFI/AAAAAAAAAIQ/oviICmpg2fU/s200/Nikon.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5205952877184271442" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;Nikon&lt;/strong&gt;- इस जापानी कंपनी का पुराना नाम Nippon Kogaku था, जिसका मतलब हुआ Japanese Optical. ज़ाहिर है एक शब्द वाला नया नाम पुराने नाम के दो शब्दों से लिया गया .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Nissan&lt;/strong&gt;- इसकी भी कहानी Nikon जैसी ही है. दरअसल Nissan को पहले Nippon Sangyo के नाम से जाना जाता था, यानि Japanese Industry.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Nokia&lt;/strong&gt;- फ़िनलैंड के एक छोटे से शहर के नाम पर मोबाइल कंपनी का नाम रखा गया है. मोबाइल फ़ोन निर्माण के क्षेत्र में आने से पहले कंपनी काग़ज़ और रबर उत्पादों के क्षेत्र में थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Oracle&lt;/strong&gt;- अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के Oracle कूटनाम वाले एक प्रोजेक्ट पर काम करते थे Larry Ellison, Ed Oates और Bob Miner. धन के अभाव में जब सीआईए ने प्रोजेक्ट पर काम रोक दिया, तो इन तीनों ने अपने बूते प्रोजेक्ट को पूरा करने का निश्चय किया और अपनी सॉफ़्टवेयर कंपनी को Oracle नाम दिया. कंपनी के पहले ग्राहकों में थी अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Pepsi&lt;/strong&gt;- इस पेय पदार्थ के आविष्कारक Caleb Bradham ने 1898 में इसे Pepsi-Cola नाम दिया था इसमें प्रयुक्त कोला फली, और संभवत: पेप्सिन नामक एंजाइम के नाम पर जो कि पाचन-क्रिया में सहायक होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Royal Dutch Shell&lt;/strong&gt;- इसकी शुरुआत होती है Shell Transport and Trading Company से जो कि विक्टोरिया काल में प्राकृतिक इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों को सीपियाँ और अन्य समुद्री जीवों के कवच-अवशेष बेचती थी. बाद में कंपनी को लगा कि तेल का भी बाज़ार है, और यह तेल के धंधे में उतर गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Saab&lt;/strong&gt;- ये नाम स्वीडन की विमान निर्माता कंपनी Svenka Aeroplane Aktiebolaget से आया है. कंपनी ने 1949 में कार निर्माण के क्षेत्र में क़दम रखा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Samsung&lt;/strong&gt;- कोरिया के इस सबसे बड़े कंपनी समूह के नाम का कोरियाई भाषा में मतलब होता है Three Stars.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Seat&lt;/strong&gt;- ये नाम स्पेनिश भाषा में Sociedad Española de Automóviles de Turismo या Spanish Saloon Car Company का संक्षिप्त रूप है. इसकी स्थापना 1950 में बार्सिलोना में हुई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Sony&lt;/strong&gt;- जब 1945 में इस कंपनी की स्थापना हुई थी तो इसका नाम Tokyo Tsushin Kogyo K.K. या अंग्रेज़ी में Tokyo Telecommunication Engineering Corporation था. &lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SD9BUDn9xEI/AAAAAAAAAII/11N9hR1uN1E/s1600-h/Sony.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SD9BUDn9xEI/AAAAAAAAAII/11N9hR1uN1E/s200/Sony.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5205951507089704002" /&gt;&lt;/a&gt;माना जाता है कि इस नाम का लैटिन मूल Sonus है, और इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के जापान में लोकप्रिय अभिव्यक्ति Sonny Boy से भी जोड़ कर देखा जाता है. कंपनी के संस्थापकों ने नाम चुनते वक़्त ये भी देखा कि Sony शब्द किसी भी भाषा का हूबहू हिस्सा नहीं है, यानि नाम पर उनका शतप्रतिशत स्वामित्व है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Toyota&lt;/strong&gt;- पहले Sakichi Toyoda ने अपनी कंपनी का नाम Toyeda रखा था. बाद में उन्होंने बेहतर उच्चारण वाला नाम ढूंढने के लिए एक प्रतियोगिता कराई, जिसके ज़रिए नया नाम सामने आया. जापानी भाषा में Toyota लिखने में कलम के आठ स्ट्रोक लगते हैं, और 8 जापान में लकी नंबर माना जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Vauxhall&lt;/strong&gt;- कार बनाने वाली इस कंपनी का पुराना नाम Vauxhall Iron Works है. लंदन में टेम्स नदी के किनारे 1894 में इसे उस जगह स्थापित गया था जहाँ कि, कहते हैं, मध्यकालीन योद्धा Fulk le Breant का घर था, यानि Fulk's Hall. (रूस में बड़े रेल स्टेशनों को Vokzal कहा जाता है. कहते हैं कि ज़ार निकोलस प्रथम जब ब्रिटेन की यात्रा पर आए थे उनके साथ ये शब्द रूस गया. लंदन में एक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र, एक पार्क और एक रेलवे स्टेशन को भी Vauxhall नाम दिया गया है.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Volvo&lt;/strong&gt;- लैटिन में इस शब्द का मतलब है I Roll. दरअसल स्वीडन की कंपनी SKF ने अपने एक बॉलबेयरिंग उत्पाद को ये नाम दिया था. बाद में SKF की मोटर निर्माण इकाई को Volvo नाम दिया गया. अब Volvo समूह कारों, बसों और ट्रकों के निर्माण के अलावा भारी मशीनरी के क्षेत्र में भी सक्रिय है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Xerox&lt;/strong&gt;- ग्रीक भाषा में xerox का मतलब होता है dry. जब Chestor Carlson ने फ़ोटो कॉपी करने की एक नई dry-copying प्रणाली की खोज की तो उसे Xerox नाम दिया. कंपनी xerox शब्द के क्रिया के रूप में प्रयोग पर रोक लगाने की हरसंभव कोशिश करती रही है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;&lt;img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://desh-duniya.blogspot.com/2008/05/3.html</link><author>noreply@blogger.com (Hindi Blogger)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-5575876197523494631</guid><pubDate>Sat, 24 May 2008 16:11:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-05-24T17:48:23.068Z</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">कोडक</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">कंपनी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ब्रांड</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नाम</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">गूगल</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">बीएमडब्ल्यू</category><title>नाम के पीछे क्या है? (2)</title><description>&lt;a href="http://desh-duniya.blogspot.com/2008/05/blog-post.html"&gt;गतांक&lt;/a&gt; से आगे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SDhPqstlrtI/AAAAAAAAAHY/1Zhm357M4ms/s1600-h/bmw_logo.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SDhPqstlrtI/AAAAAAAAAHY/1Zhm357M4ms/s200/bmw_logo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203996964402081490" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;BASF&lt;/strong&gt;- इस जर्मन रसायन कंपनी का नाम Badische Anilin und Soda Fabrik से लिया गया है. इसमें BASF के शुरूआती उत्पादों और उत्पादन स्थल का समावेश है. यानि जर्मनी के बाडेन प्रांत स्थिति एनलिन और सोडा बनाने वाली कंपनी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;BMW&lt;/strong&gt;- Bayerische Motoren Werke यानि बावेरियन मोटर वर्क्स की स्थापना 1917 में जर्मनी के बावेरिया क्षेत्र के मुख्य नगर म्यूनिख में हुई थी. कंपनी की स्थापना मूल रूप से विमानों के इंजन के निर्माण के लिए हुई थी. शायद इसीलिए कंपनी का लोगो एक घूमता प्रोपेलर है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Bridgestone&lt;/strong&gt;- इस जापानी टायर निर्माता कंपनी को इसके संस्थापक Shorijo Ishibashi का नाम मिला है. दरअसल Ishibashi का जापानी भाषा में अर्थ होता है- Stone Bridge.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Canon&lt;/strong&gt;- The Precision Optical Instruments Laboratory का नया नाम इसके द्वारा निर्मित पहले कैमरे Kwannon पर आधारित है. इसे Kannon से भी जोड़ कर देखा जाता है जो कि करुणा के बोधिसत्व का जापानी नाम है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Casio&lt;/strong&gt;- कंपनी के संस्थापक Kashio Tadao के नाम से बना है ये ब्रांड. टोक्यो में 1946 में स्थापित ये कंपनी कैलकुलेटरों के अलावा भी अनेक तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Coca-Cola&lt;/strong&gt;- ये नाम कोका की पत्तियों और कोला की फली से लिया गया है, जो कि 1885 में बाज़ार में स्वास्थ्यवर्द्धक दवाई के रूप में उतारे गए पेय पदार्थ के मूल फ़्लेवर में शामिल था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Daewoo&lt;/strong&gt;- कोरियाई भाषा में इसका मतलब है- Great Universe. इस उद्योग समूह को 1990 के दशक में संकट से गुजरना पड़ा. हालाँकि 1999 में दिवालिया घोषित होने के बाद भी इस उद्योग समूह की कई कंपनियाँ अभी सक्रिय हैं. वैसे अब इसकी मोटर निर्माण इकाइयाँ अमरीका के जेनरल मोटर्स और भारत के टाटा समूह के नियंत्रण में हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;eBay&lt;/strong&gt;- इस ऑनलाइन बाज़ार को इसके संस्थापक Pierre Omidyar ने अपनी इंटरनेट कंसल्टेंसी Echo Bay Technology Group का नाम देने का मंसूबा बनाया था. लेकिन Echo Bay नाम एक स्वर्ण खनन कंपनी पहले ही रजिस्टर्ड करा चुकी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Fiat&lt;/strong&gt;- यह नाम Fabbrica Italiana Automobili Torino यानि Italian Automobile Factory of Turin का संक्षिप्त रूप है. सोनिया गांधी भी उत्तरी इटली के Turin शहर की हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Google&lt;/strong&gt;- ये नाम googol शब्द से बना है जो एक बहुत बड़ी संख्या होती है. 1 के आगे 100 बार शून्य लगाने से बनी संख्या. &lt;a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SDhPy8tlruI/AAAAAAAAAHg/qjYU9LVhkH8/s1600-h/google_logo.gif"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SDhPy8tlruI/AAAAAAAAAHg/qjYU9LVhkH8/s200/google_logo.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203997106136002274" /&gt;&lt;/a&gt;संस्थापकों का दावा था कि उनका सर्च इंजन इतनी बड़ी संख्या में सूचनाओं को खंगाल सकता है. अब तो google को प्रमुख शब्दकोशों में भी एक क्रिया के रूप में शामिल किया जा चुका है जिसका मतलब होता है गूगल सर्च इंजन की सहायता से इंटरनेट पर जानकारी जुटाना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Hewlett-Packard&lt;/strong&gt;- कहा जाता है कि कंपनी के संस्थापकों Bill Hewlett और David Packard ने एक सिक्का उछाल कर इस बात का फ़ैसला किया कि दोनों में से किसका नाम शुरू में आएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Ikea&lt;/strong&gt;- इस प्रमुख स्वीडिश फ़र्नीचर कंपनी का नाम इसके संस्थापक &lt;strong&gt;I&lt;/strong&gt;ngvar &lt;strong&gt;K&lt;/strong&gt;amprad ने अपने नाम में अपने पैतृक घर यानि &lt;strong&gt;E&lt;/strong&gt;lmtaryd नामक फ़ार्म और पास के गाँव &lt;strong&gt;A&lt;/strong&gt;gunnaryd के पहले अक्षरों को मिला कर बनाया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Intel&lt;/strong&gt;- संस्थापक Bob Noyce और Gordon Moore अपनी माइक्रोचिप कंपनी को Moore Noyce नाम देना चाहते थे, लेकिन एक होटल कंपनी ने पहले ही ये नाम ले रखा था. मजबूरी में Integrated Electronics के हिस्सों को जोड़ कर Intel बनाया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SDhP4stlrvI/AAAAAAAAAHo/8QaSPFGdvXE/s1600-h/kodak_logo.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SDhP4stlrvI/AAAAAAAAAHo/8QaSPFGdvXE/s200/kodak_logo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203997204920250098" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;Kodak&lt;/strong&gt;- ये एक अनूठा ब्रांड नाम है. कैमरा कंपनी के संस्थापक जॉर्ज ईस्टमैन ने सिर्फ़ इसलिए ये नाम चुना कि ये सुनने में अच्छा लगता है. हालाँकि, अपनी माँ के साथ सलाह-मशविरा कर ये नाम चुनते वक़्त उन्होंने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि नाम को बिगाड़ा नहीं जा सके, उसका ग़लत उच्चारण नहीं किया जा सके. ईस्टमैन ने इस बात का भी ध्यान रखा कि इसे किसी और उत्पाद, कंपनी या स्थान से नहीं जोड़ा जा सके. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&gt;......जारी........&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;&lt;img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://desh-duniya.blogspot.com/2008/05/2.html</link><author>noreply@blogger.com (Hindi Blogger)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-7157250958382493745</guid><pubDate>Tue, 13 May 2008 23:29:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-05-24T17:55:20.020Z</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">कंपनी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ब्रांड</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नाम</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">एप्पल</category><title>नाम के पीछे क्या है?</title><description>&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SCpKgdn_u6I/AAAAAAAAAHQ/wZv4rseoYzE/s1600-h/Alfa_Romeo.gif"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SCpKgdn_u6I/AAAAAAAAAHQ/wZv4rseoYzE/s200/Alfa_Romeo.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5200050641321311138" /&gt;&lt;/a&gt;हर नाम का आमतौर पर कुछ-न-कुछ मतलब होता है. और, जब बात किसी बड़ी कंपनी का या किसी प्रसिद्ध ब्रांड का हो, तब तो नाम के पीछे का मतलब कुछ ज़्यादा ही महत्वपूर्ण हो जाता है. आइए ऐसे ही कुछ प्रसिद्ध ब्रांडों के नामाकरण पर ग़ौर करते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Adidas&lt;/strong&gt;- खेल सामग्रियों का व्यापार करने वाली इस जर्मन कंपनी का नाम इसके निर्माता Adoldf(Adi) Dassler के नाम पर पड़ा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ इस बात का उल्लेख किया जाना ज़रूरी है कि Adidas का खेल की दुनिया के एक और बड़े नाम &lt;strong&gt;Puma&lt;/strong&gt; से भाई-भाई का संबंध है. दरअसल Adi Dassler ने 1920 के दशक में जर्मनी के Herzogenaurach नामक कस्बे में खिलाड़ियों के लिए विशेष जूते के धंधे की शुरुआत अपने भाई Rudolf Dassler के साथ मिल कर की थी. बाद में दोनों भाइयों में खटपट हुई, और 1940 के दशक के मध्य तक आते-आते Adolf ने Adidas और Rudolf ने Puma के नाम से अपने धंधे अलग कर लिए. हाल ही में Dassler भाइयों की बेमिसाल प्रतिद्वंद्विता पर Sneaker Wars नामक एक किताब प्रकाशित हुई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Adobe&lt;/strong&gt;- इस अमरीकी सॉफ़्टवेयर कंपनी का नाम उस जलधारा या क्रीक के नाम पर पड़ा है जो इसके संस्थापकों के घर के पास से गुजरती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Aldi&lt;/strong&gt;- यूरोप में मध्यवर्ग के उपभोक्ताओं में लोकप्रिय इस सुपरस्टोर के नाम का Al इसके जर्मन संस्थापक Albrecht परिवार के नाम से आया है, जबकि di वाला दूसरा हिस्सा इन स्टोरों की प्रकृति को दर्शाता है- मतलब Discount Store.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Alfa Romeo&lt;/strong&gt;- इतालवी मोटर निर्माता कंपनी Anonima Lombarda Fabbrica Automobili का संक्षेप हुआ Alfa. वर्ष 1915 में Nicola Romeo ने इसका अधिग्रहण किया और आगे चल कर कंपनी का नाम बदल कर Alfa Romeo कर दिया गया. ख़ास कर रेसिंग कारों के क्षेत्र में नाम कमाने वाली ये कंपनी अब इटली के ही Fiat समूह का हिस्सा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Amazon.com&lt;/strong&gt;- ये नाम दुनिया की दूसरी सबसे लंबी नदी अमेज़न पर है. हालाँकि संस्थापक Jeff Bezos पहले कंपनी को abracadabra शब्द से प्रभावित होकर Cadabra.com कहना चाहते थे. उन्होंने अपनी राय वकीलों की सलाह पर बदली जिनका मानना था कि Cadabra का उच्चारण cadaver से बिल्कुल क़रीब है, जिसका अर्थ होता है- शव.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Amstrad&lt;/strong&gt;- इस ब्रितानी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी का नाम Alan Michael Sugar Trading का संक्षेप है, जो कि संस्थापक एलेन माइकल सुगर के नाम के आगे ट्रेडिंग लगाने से बना है. सुगर इन दिनों अत्यंत लोकप्रिय ब्रितानी टेलीविज़न शो 'The Apprentice' के कड़कमिज़ाज बॉस की भूमिका के लिए ज़्यादा जाने जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Apple&lt;/strong&gt;- ये नाम निश्चय ही सेब से जुड़ा है, क्योंकि कंपनी के क्लासिक कंप्यूटर Apple Macintosh के नाम का दूसरा हिस्सा सेब की एक लोकप्रिय अमरीकी प्रजाति McIntosh से लिया गया है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SCpKYNn_u5I/AAAAAAAAAHI/SViLC8jdLn8/s1600-h/apple+logo.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/SCpKYNn_u5I/AAAAAAAAAHI/SViLC8jdLn8/s200/apple+logo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5200050499587390354" /&gt;&lt;/a&gt;लेकिन सेब ही क्यों? ये तो संस्थापक Steve Jobs ही बेहतर जानते होंगे. संभव है कि वे या तो सेब के स्वास्थवर्द्धक गुणों से बहुत ज़्यादा प्रभावित रहे हैं, या फिर संगीत मंडली बीटल्स से क्योंकि बीटल्स की व्यापारिक कंपनी Apple Corp के नाम से जानी जाती है. दोनों कंपनियों के बीच नाम को लेकर भारी क़ानूनी लफड़ा भी चला. एप्पल नाम नहीं छोड़ने के एवज़ में स्टीव जॉब्स की कंपनी ने बीटल्स की कंपनी के साथ अदालत से बाहर सुलहनामा किया और उसे लाखों डॉलर दिए. हालाँकि विवाद अब भी पूरी तरह सुलझा नहीं है. इससे पहले Apple ने एक ऑडियो उपकरण कंपनी McIntosh Laboratory को भी उसके नाम के इस्तेमाल के एवज़ में भारी रकम दिए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Aston Martin&lt;/strong&gt;- जेम्स बाँड की फ़िल्मों में दिखने वाली कार की निर्माता कंपनी के नाम का पहला हिस्सा ब्रिटेन में बर्मिंघम के पास होने वाली The Aston Hill मोटर रेस से आया है. कंपनी की स्थापना रेस वाले इलाके में भी ही की गई थी. कंपनी के नाम का दूसरा हिस्सा संस्थापक Lionel Martin के नाम से आया है. अमीरों के लिए कार बनाने वाली इस कंपनी का स्वामित्व आजकल एक निजी निवेश समूह के हाथों में है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Audi&lt;/strong&gt;- इस जर्मन कार कंपनी की स्थापना 1909 में August Horch ने की थी. Horch यानि अंग्रेज़ी में hark या listen! जब विवादों के बाद अपनी पहली कंपनी से निकलने के बाद उन्होंने एक नई कंपनी बनाई, तो Horch नाम से कार बनाने का अधिकार पहली कंपनी के पास ही रह गया. चूँकि August Horch नई कंपनी की कारों को भी अपना नाम देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने नाम के लैटिन अनुवाद Audi से काम चलाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://desh-duniya.blogspot.com/2008/05/2.html"&gt;&gt;......जारी........&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;&lt;img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://desh-duniya.blogspot.com/2008/05/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Hindi Blogger)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-7680336748838599637</guid><pubDate>Fri, 11 Apr 2008 15:55:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-11T17:28:35.689Z</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मशाल</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">खेल</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">चीन</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ओलम्पिक</category><title>सवाल-जवाब: ओलम्पिक मशाल</title><description>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-b50wxQ6I/AAAAAAAAAGo/pYajwpvxNzE/s1600-h/beijingtorchlogo.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-b50wxQ6I/AAAAAAAAAGo/pYajwpvxNzE/s320/beijingtorchlogo.jpg" border="0" alt="लोगो"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5188036713472148386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;1. क्या ये सच है कि नाज़ियों ने ओलम्पिक मशाल दौड़ की शुरुआत की थी?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हाँ, मौजूदा रूप में मशाल दौड़ की शुरुआत 1936 के बर्लिन ओलम्पिक के दौरान हुई थी. माना जाता है कि हिटलर के प्रचार मंत्री जोज़ेफ़ गोयबल्स को मशाल दौड़ की योजना डॉ. कार्ल डीम ने बताई थी. डीम ने ओलम्पिक के प्रचार का काम भी देख रहे गोयबल्स को बताया कि एथेंस में माउंट ओलिम्पस के हेरा मंदिर से बर्लिन तक की 3422 किलोमीटर की दूरी 3422 आर्य युवा मशाल के साथ पूरा करें तो दुनिया को एक ख़ास तरह का संदेश मिलेगा. मशाल के रूट में बुल्गारिया, युगोस्लाविया, हंगरी, ऑस्ट्रिया और चेकोस्लोवाकिया आया. इन सभी देशों पर आगे चल कर नाज़ियों का क़ब्ज़ा हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, सही मामलों में पहली विश्वव्यापी ओलम्पिक मशाल दौड़ 2004 के एथेंस ओलम्पिक के लिए आयोजित की गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;2. मशाल की बनावट के बारे में कुछ बताएँ, और ये भी कि इसमें ईंधन के रूप में क्या होता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मशाल का डिज़ायन मेज़बान देश तय करता है. बीजिंग ओलम्पिक की मशाल 72 सेंटीमीटर ऊँची है. &lt;a href="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-cTUwxQ8I/AAAAAAAAAG0/uz6bc2Kt6Hs/s1600-h/beijingtorch.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-cTUwxQ8I/AAAAAAAAAG0/uz6bc2Kt6Hs/s320/beijingtorch.jpg" border="0" alt="मशाल"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5188037151558812610" /&gt;&lt;/a&gt;अल्युमिनियम निर्मित मशाल का वज़न 985 ग्राम है. मशाल में ईंधन के रूप में प्रोपेन नामक हाइड्रोकार्बन का उपयोग किया जाता है. मौजूदा मशाल 65 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार वाली हवा को झेल सकती है. इतना ही नहीं प्रति घंटे 50 मिलिमीटर की दर से बारिश हो तो उसे भी ये मशाल भलीभाँति झेल सकती है. एक मशाल सामान्य परिस्थितियों में क़रीब 15 मिनट तक जल सकती है. यानि अधिकारियों का लक्ष्य होता है कि दौड़ के समय हर 10-12 मिनट में किसी जल रही मशाल से दूसरी मशाल जलाई जाती रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;3. किसी कारणवश कभी मशाल बुझी भी है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पेरिस में यात्रा के दौरान 7 अप्रैल 2008 को मशाल को तीन बार बुझाना पड़ा. ऐसा चीन विरोधी प्रदर्शनों के कारण ऐहतियात के तौर पर करना पड़ा. इससे पहले मात्र दो अवसर और आए जब ओलम्पिक मशाल बुझी. 1976 में मॉन्ट्रियल में अचानक हुई तेज़ बारिश के कारण मशाल बुझ गई. किसी ने आनन-फ़ानन में सिगरेट लाइटर से उसे जला दिया जो कि ठीक बात नहीं मानी गई. इसलिए फिर बैकअप लैम्प से दौड़ में प्रयुक्त मशाल को नए सिरे से जलाया गया. 2004 में भी एक बार मशाल तेज़ हवा के कारण बुझी थी.&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-cbUwxQ9I/AAAAAAAAAHA/2f1Dk7_pkts/s1600-h/beijingtorch_lantern.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-cbUwxQ9I/AAAAAAAAAHA/2f1Dk7_pkts/s320/beijingtorch_lantern.jpg" border="0" alt="मातृज्योति लैम्प"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5188037288997766098" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ तक एक देश से दूसरे देश की यात्रा की बात है, तो हवाई जहाज़ पर ले जाने से पहले मशाल को बुझा दिया जाता है. लेकिन दौड़ के लिए एथेंस में तापक शीशे के सहारे जो अग्नि जलाई जाती है, उस मातृज्योति को सुरक्षित लैम्पों में जलते रहने दिया जाता है. इन लैम्पों को आयोजक देश के अधिकारी विमान में संभाले रखते हैं. मशाल दौड़ के विभिन्न चरणों के बीच रातों में विश्राम के वक़्त भी मशाल बुझा दी जाती है, सिर्फ़ लैम्प ही हमेशा जलते रहते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;4. मशाल दौड़ में शामिल होने के लिए लोगों का चुनाव कौन करता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ओलम्पिक मशाल थामने के लिए लोगों का चुनाव कई तरह से किया जाता है. ज़्यादातर तो उस देश के अधिकारियों की सलाह पर चुने जाते हैं, जहाँ कि मशाल दौड़ हो रही होती है. इस कोटि में खेल की दुनिया के लोगों की तादात ज़्यादा होती है, हालाँकि समाज के दूसरे तबकों के प्रतिष्ठित लोगों को भी मौक़ा दिया जाता है. मशाल लेकर दौड़ने के लिए कुछ लोगों का चुनाव आयोजक देश की सरकार की तरफ़ से होता है. जैसे लंदन में मशाल थामने वालों में ब्रिटेन में चीन की राजदूत भी शामिल थीं. तीसरी कोटि के लोग मशाल दौड़ के प्रायोजकों की तरफ़ से लगाए जाते हैं. इस बार की प्रायोजक कंपनियाँ हैं- सैमसंग, कोका-कोला और लेनोवो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;5. इस बार मशाल के इर्दगिर्द प्रथम सुरक्षा घेरा बना कर चल रहे नीली-सफ़ेद ट्रैकसूट वाले रक्षकों का क्या मामला है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ब्लू-एंड-व्हाइट ब्रिगेड के ये लोग दरअसल चीनी सुरक्षा बल के अतिविशिष्ट दस्ते के सदस्य हैं. इस बार लंदन में मशाल दौड़ में शामिल कुछ धावकों की मानें तो चीनी मशाल-रक्षकों का शालीनता से कोई वास्ता नहीं है. टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में ये धावकों को 'हाथ ऊपर उठा कर रखो, सीधा चलो...' जैसे आदेश देते रहते हैं. लंदन में 2012 के ओलम्पिक आयोजन से जुड़े एक बड़े खेल अधिकारी ने चीनी मशाल रक्षकों को 'Thugs' की उपमा दी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीले-सफ़ेद पहनावे वाले चीनी मशाल रक्षकों का सबसे ज़्यादा विरोध इस बात को लेकर हो रहा है कि ये चीनी सुरक्षा बलों की उन्हीं टुकड़ियों से हैं जिन पर कि तिब्बत में दमनात्मक कार्यों में शामिल होने का आरोप रहा है. और अंतत:, मशाल दौड़ में शामिल ब्रिटेन, फ़्रांस, अमरीका और अर्जेंटीनी जैसे देशों की चुप्पी के बाद जापान ने चीनियों से ये कहने का साहस किया है कि उसके यहाँ चीनी रक्षकों को मशाल के साथ दौड़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी, क्योंकि जापान अपने दम पर मशाल की सुरक्षा-व्यवस्था सुनिश्चित कर सकता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;&lt;img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://desh-duniya.blogspot.com/2008/04/blog-post_11.html</link><author>noreply@blogger.com (Hindi Blogger)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-3983308397678054795</guid><pubDate>Wed, 09 Apr 2008 11:17:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-04-29T14:17:08.038Z</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मशाल</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">चीन</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">ओलम्पिक</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">रेडियो</category><title>चाइना रेडियो की एक रिपोर्ट</title><description>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_yyWIwAeNI/AAAAAAAAAGc/ybdazPcvEXs/s1600-h/extinguisher_london.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_yyWIwAeNI/AAAAAAAAAGc/ybdazPcvEXs/s320/extinguisher_london.jpg" border="0" alt="लंदन में बीजिंग ओलंपिक मशाल बुझाने की कोशिश"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187216964199676114" /&gt;&lt;/a&gt;मीडिया के लिए पूरी तरह नहीं खुले किसी देश का सूचना-प्रवाह सत्य से कितना दूर हो सकता है, उसकी मिसाल चाइना रेडियो इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट में देखा जा सकता है, जिसे हिंदी श्रोताओं/पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने सुना था कि चीनी मीडिया या तो अपनी मर्ज़ी से या सरकारी दबाव में अपने लोगों को आधी-अधूरी या बनी-बनाई ख़बरें देता है. लेकिन भारतवासियों और हिंदीभाषियों के लिए सफेद झूठ प्रसारित करने का कोई मतलब समझ में नहीं आता. क्योंकि भारत में मीडिया के क्षेत्र में खुलापन कई मामलों में तो पश्चिमी देशों से भी ज़्यादा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाइना रेडियो इंटरनेशनल की ख़बर लंदन में ओलंपिक मशाल दौड़ के बारे में है. सब को पता है कि लंदन में 50 किलोमीटर के पूरे रास्ते में मशाल दौड़ को तिब्बत समर्थक और चीन विरोधी प्रदर्शनकारियों का सामना करना पड़ा. क़रीब 35 प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया गया. मशाल छीनने और उसे अग्निशामक से बुझाने की कोशिशों की तस्वीरें दुनिया भर ने देखीं. मशाल थामने के लिए चीनी राजदूत को तयशुदा स्थान से दूर चाइना-टाउन जाना पड़ा. लेकिन ये देखिए ओलंपिक मशाल दौड़ के लंदन चरण के बारे में चाइना रेडियो की रिपोर्ट, सब कुछ कितना व्यवधानरहित और आनंदमय रहा! (कृपया मज़े के लिए पढ़ें.)-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;2008-04-07 16:16:49&lt;br /&gt;पेइचिंग ओलिंपिक मशाल रिले लंदन में संपन्न हुई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6 मार्च को 2008 पेइचिंग ओलिंपिक की मशाल रिले ब्रिटेन की राजधानी लंदन में चली , उसी दिन लंदन में बड़ी बर्फबारी पड़ी , विशाल जमीन पर सफेद चादर सा बिछा हुआ , जान पड़ता था कि पूरा शहर एक सफेद दुनिया में आच्छादित था , मौसम ठंडा था , लेकिन ओलिंपिक मशाल के स्वागत में लंदन निवासियों और ब्रिटेन में रह रहे चीनी मूल के लोगों और प्रवासी चीनियों का उत्साह बहुत ऊंचा था । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओलिंपिक मशाल रिले 6 मार्च के सुबह सफेद बर्फों से ढके लंदन में हुई । लंदन के उत्तरी भाग में स्थित वेम्बली स्टेडियम के पास आरेना चौक पर रंगबिरंगे झंडे हवा में लहरा रहे थे , बैंड की ध्वनि आकाश में गूंज उठी और चौक पर हजार से अधिक लोग एकत्र हुए , उन में से सपरिवार आए लोग बहुत अधिक थे । सुबह दस बज कर तीस मिनट पर मशाल वेम्बली स्टेडियम में प्रज्ज्वलित किया गया और उस के स्वागत में इकट्ठी भीड़ में हर्षोल्लास गूंज उठा , जो आरेना चौक तक सुनाई पड़ा था। अपने तीन बच्चों को ले कर मशाल रिले देखने आए लंदन निवाली श्री अर्वांद बाटेल और उन के बच्चे हाथों में चीनी राष्ट झंडे , ब्रिटिश राष्ट्र झंडे और ओलिंपिक पताकाएं थामे हर्षोल्लास कर रहे थे । उन्हों ने कहाः  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम स्टेडियम के निकटस्थ स्थान पर है । आज की गतिविधि उत्साहजनक है , मुझे इस प्रकार के संगीत बहुत पसंद है । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुश्री काटिए.पोल मशाल रिले के अपने पास से गुजरते देख कर बहुत प्रफुल्लित हुई , वह स्थानीय चीनियों द्वारा प्रस्तुत रंगीन फीता नृत्य से बरबस आकर्षित हुई । उन्हों ने कहाः &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह नृत्य बेहद सुन्दर है । मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि रंगीन फीतों से इस किस्म का मनोहर नृत्य पेश किया जा सकता है । यह नृत्य बहुत मोहक है । मुझे बड़ी खुशी हुई कि मशाल रिले यहां से गुजर कर लंदन और अन्य स्थानों को चली जाएगी । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी दिन की मशाल रिले गतिविधि के लिए लंदन के उन सभी स्थलों , जहां मशाल रिले पहुंचेगी , ने अनेक प्रकार के रंगबिरंगे जश्न आयोजित किए । आरेना चौक पर जाकोब .माट्वीजसन ने लाल सफेद रंगों की धारीदार नृत्य पोशाक पहना था और उन के हाथों में अग्नि का प्रतीक वाला पकाता था । वे अपने सहपाठियों के साथ रंगमंच पर कार्यक्रम पेश करने की प्रतीक्षा में थे । उन्हों ने संवाददाता से कहा कि वह लंदन के एक मिडिल स्कूल का छात्र है । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम रंगमंच पर प्रोग्राम पेश करेंगे । जब मशाल पहुंचा , तो हमारा एक भाग चक्कर लगाए गोलाकार दिखाएंगे और दूसरा भाग रंगीन झंडे फहराएंगे । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रोग्राम पेश करने वाले स्कूली छात्र दल के नेता ब्रेंट सामुदायिक बस्ती से आई सुश्री क्लारी. सालंडी है । उन्हों ने कहाः &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज बहुत से नौजवान यहां आए हैं । उन्हों ने खुद प्रोग्राम के लिए पोशाक बनाये है । वे पेइचिंग ओलिंपिक मशाल के ब्रिटेन में आने का जोशीला स्वागत करते हैं । उन का यह प्रोग्राम शांति वाहक कबूतरे की आकृति में है , जिस का अर्थ ओलिंपिक भावना शांति है । प्रोग्राम का यह हिस्सा लहराती पवित्र अग्नि का द्योतक है । मैं बहुत भावविभोर हूं, यह एक महान घड़ी है । मैं समझती हूं कि ओलिंपिक मशाल की अग्नि विश्व के सभी देशों के एकता के सूत्र में बांध देगी और खेल समारोह के जरिए लोगों को और बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित करेगी , यह ओलिंपिक द्वारा प्रवर्तित मुख्य विषय है । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मशाल रिले के लंदन में चलने के समय ब्रिटेन में रह रहे चीनी मूल के लोग और प्रवासी चीनी सब से अधिक प्रभावित हुए । जब मशाल रिले लंदन की चाइना टाउन में खड़े चीनी तौरण तक पहुंची , तो वहां इंजतार में खड़े चीनियों में जोरदार उमंग और उत्साह की लहर दौड़ने लगी । लाल रंग की लाइट , सड़क के दोनों किनारों पर फहराती रंगीन झंडियां , घूम रहे स्वर्णिम ड्रैगन व सिंह नाच और प्यारे प्यारे पेइचिंग ओलिंपिक के पांच शुभंकर यहां के खुशगवार वातावरण को चार गुना बढ़ा गए। लंदन के चीनी व्यापारी संघ के अध्यक्ष श्री तङ चुथिंग ने कहाः  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम पिछले अनेक महीनों से तैयारी कर रहे हैं । देखो , वहां के कंडीलों और रंगीन ध्वजों को देखो , ओलिंपिक के पांच शुभंकर भी आ पहुंचेंगे , हम ड्रैगन व सिंह नाच भी नाचेंगे । और वे चीनी राष्ट्र झंडे , ओलिंपिक ध्वज और ब्रिटिश राष्ट्र झंडे सभी हम ने तैयार कर रखे हुए हैं । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीनी मूल की युवती सुश्री कामेन वु सिंह नाच दल की सदस्या है । उस ने अपने सहपाठियों के साथ सिंह नाच नाचते हुए ब्रिटेन स्थित चीनी राजदूत सुश्री फु श्यन और उन के हाथ में थामे मशाल को चाइना टाउन के अंतिम छोर तक पहुंचाया । कामेन .वु ने कहा कि यद्यपि उन की चीनी भाषा अच्छी नहीं है, तथापि वह पेइचिंग ओलिंपक मशाल के साथ निकट संपर्क के इस मौके को बहुत मूल्यवान समझती है । उस ने कहाः &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम ने इस बार की गतिविधि के लिए दो महीनों तक तैयारी की है , हम हर हफ्ते तीन दिन अभ्यास करते थे । मैं बहुत प्रभावित हुई हूं , मैं समझती हूं कि मेरी यह कोशिश मूल्यवान है । आम स्थिति में हमें ओलिंपिक मशाल के इतने नजदीक पहुंचने का मौका नहीं मिलता है । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंदन की सड़कों पर बहुत से लोग मशाल रिले के साथ एक स्थल से दूसरे स्थल तक दौड़ने चले जाते थे । उन में से लंदन युनिवर्सिटी के छात्र , अखिल ब्रिटिश चीनी छात्र मित्रता संघ के अध्यक्ष श्री ये हाईथाओ भी हैं । उन की नजर में 6 मार्च की यह हिमपात शुभसूचक है । उन का कहना हैः &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह बड़ी बर्फबारी हुई , यह बड़ी खुशी की बात है । क्योंकि यह बर्फबारी इस साल के ओलिंपिक की सफलता का शुभसूचक है । यों मौसम ठंडा है , किन्तु लोगों के दिल में गर्मी भरी हुई है । ओलिंपिक एक शानदार खेल समारोह है , वह मातृभूमि का शानदार जश्न है , जिस से मातृभूमि की प्रतिष्ठा और उपलब्धि अभिव्यक्त हुई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मशाल रिले के जोशीले वातावरण से ब्रिटिश पक्ष के कर्मचारी भी प्रभावित हुए । मशाल रिले के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के काम में तैनात सुश्री मारिया. आर्मस्ट्रांग ने कहा कि मौसम ठंडा है , पर वह सभी लोगों की भांति बहुत उत्साहित हुई है । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज इतने ज्यादा लोग एकत्र हुए हैं , बड़ी खुशी है कि इतने ज्यादा मुस्कराते चेहरे देखे । मौसम सर्द है , लेकिन ओलिंपिक मशाल रिले की कार्यवाही बहुत उम्दा है । मैं पेइचिंग ओलिंपिक देखने के आतुर हूं । मैं और मेरे सहकर्मी सभी आज यहां काम मिलने पर प्रसन्न हुए हैं । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंदन में मशाल रिले 50 किलोमीटर लम्बे रास्ते से गुजरी , जो मौजूदा रिले में सब से लम्बी है। रिले ग्रेट ब्रिटेन संग्रहालय , लंदन टावर पुल , चाइना टाउन और बिग बेन क्लॉक आदि दर्शनीय स्थलों से गुजरी । लंदन की मशाल रिले विशिष्ट ऊंचे दर्जे की है । जब मशाल रिले डाउनिंग स्ट्रेट नम्बर 10 पहुंची , उस के स्वागत में ब्रिटिश प्रधान मंत्री गोर्डुन ब्रोन खुद द्वार पर आए और रिले के अंतिम स्थल पर आयोजित समारोह में राजकुमारी आन्ने भी उपस्थित हुई । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मशाल रिले जब लंदन के पूर्वी भाग में स्थित ग्रीनविच के प्रायद्वीप चौक पर पहुंची , तो वहां अग्नि कुंड को प्रज्ज्वलित करने की रस्म आयोजित हुई । इस के उपरांत मशाल रिले लंदन की गतिविधि समाप्त कर आगे के पड़ाव यानी फ्रांस के पैरिस शांति का संदेश पहुंचाने चली जाएगी । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेइचिंग ओलिंपिक मशाल रिले लंदन में अपनी कार्यवाही संपन्न करके 7 मार्च को फ्रांस के शहर पेरिस पहुंची । 7 तारीख को पेरिस के प्रतीकात्मक वास्तु निर्माण यानी एफेर टावर के नीचे से रिले की शुरूआत होगी । इस भव्य रस्म के स्वागत में फ्रांस के पूर्व प्रधान मंत्री , सीनेटर श्री जेन.पिएर . राफिरिन ने 6 तारीख को विशेष कर एफेर टावर के नीचे चीनी संवाददाताओं को इंटरव्यू दिया और कहा कि उन्हें बड़ी खुशी हुई है कि ओलिंपिक पेइचिंग में आयोजित होगा । उन्हों ने कहाः &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि पेरिस को 2012 ओलिंपिक के आयोजन का अवसर नहीं मिला , लेकिन मुझे बड़ी खुशी हुई है कि ओलिंपिक चीन में भी होगा । विश्व के सभी देशों को औलिंपिक आयोजित करने का अधिकार है । चीनी जनता को भी ओलिंपिक का आयोजन करने का अधिकार है । 2008 पेइचिंग ओलिंपिक निश्चय ही चीनी व विश्व युवा का शानदार खेल समारोह होगा । ओलिंपिक का आयोजन चीन द्वारा खुलेपन की नीति लागू करने की अभिव्यक्ति है , साथ ही ओलिंपिक भावना की व्यापकता का महत्व व्यक्त होगा । &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये रहा रिपोर्ट का- &lt;a href="http://hindi.cri.cn/121/2008/04/07/1@79024.htm"&gt;असल लिंक&lt;/a&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाइना रेडियो इंटरनेशनल ने ल्हासा में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एकतरफ़ा रिपोर्टों का एक &lt;a href="http://hindi.cri.cn/121/2008/03/23/Zt1@78390.htm"&gt;विशेष पन्ना&lt;/a&gt; भी तैयार किया है. नज़र डालने पर पता चलेगा कि राज्यनियंत्रित मीडिया सच्चाई से कितने कोस दूर होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंदन के बाद पेरिस में भी हंगामा होने के बाद चाइना रेडियो का स्वर थोड़ा बदला, लेकिन फिर भी सच्चाई से कोसों दूर. बाद की रिपोर्टों में 'पवित्र अग्नि' के पथ में बाधा डालने के लिए प्रदर्शनकारियों को लानत दी गई है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;&lt;img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://desh-duniya.blogspot.com/2008/04/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Hindi Blogger)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-1667912682088973849</guid><pubDate>Sun, 30 Mar 2008 10:29:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-03-30T15:01:12.279Z</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">व्यापार</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">कंटेनर</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">इकाई</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">यूटीसी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">बुशल</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">यूनिट</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">सेल्सियस</category><title>एक बुशल गेहूँ, एक बुशल टमाटर</title><description>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R--VqIwAeLI/AAAAAAAAAGM/UO7Gu6Awynw/s1600-h/bushell.gif"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R--VqIwAeLI/AAAAAAAAAGM/UO7Gu6Awynw/s400/bushell.gif" border="0" alt="बुशल टोकरी"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5183526247262615730" /&gt;&lt;/a&gt;ख़बरों की दुनिया में घूमते हुए कई ऐसी चीज़ें सामने आती हैं, जिन्हें विस्तार से जानने की या तो ज़रूरत नहीं होती या फिर ज़रूरत होने पर भी उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है. इकाइयों या यूनिट्स के मामले में भी ऐसा ही होता है. लेकिन आम प्रचलन में ऐसी कई इकाइयाँ हैं जिनके बारे में जिज्ञासा रखने पर बड़ी ही रोचक जानकारियाँ मिलती हैं. कुछ महीनों पहले मेरी नज़र से ऐसी एक इकाई गुजरी थी- &lt;a href="http://desh-duniya.blogspot.com/2005/10/blog-post_22.html"&gt;तोरिनो&lt;/a&gt;. इसके बारे में विस्तार से जानने का अनुभव रोमाँचक रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों गेहूँ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती क़ीमत के बारे में एक ख़बर पढ़-सुन रहा था. पता चला कि पश्चिमी देशों में उत्पादक के स्तर पर गेहूँ के व्यापार में किलोग्राम या क्विंटल या टन नहीं बल्कि बुशल(Bushel) नामक इकाई प्रयुक्त की जाती है. (ठीक उसी तरह जैसे तेल के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लीटर-किलोलीटर नहीं बल्कि गैलन-बैरल का इस्तेमाल होता है.) सच कहें तो न सिर्फ़ गेहूँ बल्कि बाक़ी खाद्यान्नों, फलों आदि के लिए भी बुशल का ही उपयोग किया जाता है. बुशल दरअसल एक निश्चित आकार की टोकरी होती है(अमरीका में 64 पाइंट, जबकि ब्रिटेन में 8 गैलन आयतन के बराबर) जिसे किसी सूखे कृषि उत्पाद से भर कर उस उत्पाद की एक व्यापारिक इकाई तय की जाती है. मतलब हर उत्पाद के लिए एक बुशल का मतलब अलग-अलग होगा. उदाहरण के लिए अमरीका में एक बुशल गेहूँ या सोयाबीन का वज़न 60 पाउंड निश्चित किया गया है, जबकि एक बुशल में 48 पाउंड सेब और 53 पाउंड टमाटर आते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;टीईयू&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह साइंटिफ़िक अमेरिकन के अप्रैल 2008 अंक में परमाणु तस्करी के ख़तरों के बारे में एक लेख पढ़ते हुए बार-बार TEU नामक इकाई सामने आई. ये दरअसल ग्लोबलाइज़ेशन को आसान बनाने वाली एक प्रमुख चीज़ कंटेनर से जुड़ी हुई है. जैसा कि सर्वविदित है, आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ैरपेट्रोलियम पदार्थों का ज़्यादातर व्यापार कंटेनरों में होता है. लेकिन व्यापार बढ़ने के साथ-साथ कंटेनर भी अलग-अलग आकार में आने लगे हैं. लेकिन हिसाब-क़िताब की सहूलियत के चलते इस मामले में भी एक मानक तय किया गया है- TEU या Twenty-foot Equivalent Unit. यानि सबसे ज़्यादा प्रचलित 20 फ़ुट लंबे कंटेनर को मानक माना गया है. साइंटिफ़िक अमेरिकन के लेख से ही उदाहरण लें तो वर्ष 2007 में दुनिया भर में जहाज़ों के ज़रिए लगभग 30 करोड़ TEUs ढोए गए. और यदि एक व्यस्त बंदरगाह की बात करें तो न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी बंदरगाह पर प्रतिदिन औसत 10 हज़ार TEUs की आमद होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यूटीसी/जीएमटी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूनिटों की बात को आगे बढ़ाएँ तो अंतरराष्ट्रीय मानक समय को UTC(Universal Time Coordinated या Coordinated Universal Time) कहा जाने लगा है. हालाँकि गणना के तरीके की महीनियों पर नहीं जाएँ तो UTC और GMT(Greenwich Mean Time) के बीच व्यावहारिक स्तर पर कोई अंतर नहीं है. दिलचस्प बात ये है कि यूटीसी की देखरेख पेरिस से होती है, जबकि जीएमटी को लंदन स्थित ग्रीनिच से सँभाला जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सेंटीग्रेड/सेल्सियस&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह तापमान की सर्वमान्य इकाई को 'डिग्री सेंटीग्रेड' की जगह 'सेल्सियस' कहा जाने लगा है. बारीकियों पर ध्यान नहीं दें तो व्यावहारिक तौर पर दोनों हैं लगभग एक समान ही. इकाई के रूप में 'सेंटीग्रेड' के 'ग्रेड' का सौवाँ हिस्सा होने का भ्रम बनता है, जबकि 'ग्रेड' तो कोण की इकाई होती है. सेल्सियस इकाई की व्यवस्था के ज़रिए तापमानों को लेकर व्यापक शोध करने वाले Anders Celsius नामक स्वीडिश वैज्ञानिक को सम्मानित भी किया गया है. ध्यान रहे कि अधिकतर बड़े मीडिया संस्थानों ने सेल्सियस से पहले 'डिग्री' शब्द लगाने की बाध्यता ख़त्म कर दी है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;&lt;img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"&gt;देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://desh-duniya.blogspot.com/2008/03/blog-post_30.html</link><author>noreply@blogger.com (Hindi Blogger)</author></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-3661245701750358510</guid><pubDate>Tue, 11 Mar 2008 21:19:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-03-12T00:27:28.782Z</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धातु</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">तत्व</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मोबाइल फ़ोन</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">धरती</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">भूगर्भ</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">विज्ञान</category><title>एक भूगर्भशास्त्री का मोबाइल फ़ोन</title><description>&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R9cRPd0WmDI/AAAAAAAAAF0/4Lja4B-O-Zg/s1600-h/N95.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R9cRPd0WmDI/AAAAAAAAAF0/4Lja4B-O-Zg/s320/N95.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5176625254085597234" /&gt;&lt;/a&gt;मोबाइल फ़ोनों का चलन इतना व्यापक हो गया है कि आधुनिकता से दूर माने जाने वाले किसी इलाक़े में भी कुछ लोग ऐसे ज़रूर मिल जाते हैं जो संचार के इस क्रांतिकारी साधन को भलीभाँति जानते हैं. लेकिन स्टेटस-सिंबल के रूप में महँगे और दसियों अतिरिक्त सुविधाओं से लैस मोबाइल फ़ोन लेकर चलने वालों में से भी कुछ ही को पता होता है कि आख़िर यह बेतार-यंत्र काम कैसे करता है. जानने की कोई ज़रूरत भी नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यदि किसी भूगर्भशास्त्री को उसके मोबाइल फ़ोन सेट के बारे में पूछें तो वो गर्व से बताएगा कि धरती की कोख से निकले कितने तत्वों की सहायता से काम करता है यह स्मार्ट यंत्र. आप भी जानिए एक भूगर्भशास्त्री के मोबाइल फ़ोन को-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;1.एबीएस और पॉलिकार्बोनेट-Acrylonitrile Butadiene Styrene/Polycarbonate alloy&lt;/strong&gt;- इस पदार्थ का उपयोग मोबाइल फ़ोन का बाहरी प्लास्टिक आवरण बनाने में होता है. एक मोबाइल फ़ोन के ABS/PC आवरण के निर्माण में लगभग दो किलोग्राम पेट्रोलियम का इस्तेमाल होता है. एबीएस की तरह ही पॉलिकार्बोनेट भी एक हल्का प्लास्टिक उत्पाद है, लेकिन कहीं ज़्यादा मज़बूत, इसलिए अपेक्षाकृत महँगा भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;2. ताँबा-&lt;/strong&gt; मोबाइल फ़ोन के इलेक्ट्रॉनिक सर्किट का महत्वपूर्ण अंग ताँबे का बना होता है. ताँबे की ख़ासियत है कि इसे किसी भी रूप में ढाल 