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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" gd:etag="W/&quot;CUYDQnwyeip7ImA9WhRQGE0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810</id><updated>2011-12-13T11:06:13.292-08:00</updated><title>युवा जोश</title><subtitle type="html">चाहत! कुछ करने की</subtitle><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false&amp;v=2" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>53</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/atom+xml" href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mrfeR" /><feedburner:info uri="blogspot/mrfer" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><entry gd:etag="W/&quot;Ak8HSXgyeip7ImA9WxJWFUs.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-6543472398040940911</id><published>2009-06-21T00:07:00.000-07:00</published><updated>2009-06-21T00:20:38.692-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-21T00:20:38.692-07:00</app:edited><title>लालबहादुर शास्त्री</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Sj3ebLrib5I/AAAAAAAAAp4/uPLu59ZF6_M/s1600-h/lal+bahadur+shastri.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5349676490959253394" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 283px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Sj3ebLrib5I/AAAAAAAAAp4/uPLu59ZF6_M/s400/lal+bahadur+shastri.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; लालबहादुर शास्त्री (2 अक्तूबर, 1904 - 11 जनवरी, 1966),भारत के तीसरे और दूसरे स्थायी प्रधानमंत्री थे । वह 1963-1965 के बीच भारत के प्रधान मन्त्री थे। उनका जन्म मुगलसराय, उत्तर प्रदेश मे हुआ था।&lt;br /&gt;लालबहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में लाल बहादुर श्रीवास्तव के रुप में हुआ था। उनके पिता शारदा प्रसाद एक गरीब शिक्षक थे, जो बाद में राजस्व कार्यालय में लिपिक (क्लर्क) बने।&lt;br /&gt;भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रुप में नियुक्त किया गया था। वो गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में प्रहरी एवं यातायात मंत्री बने। यातायात मंत्री के समय में उन्होनें प्रथम बार किसी महिला को संवाहक (कंडक्टर) के पद में नियुक्त किया। प्रहरी विभाग के मंत्री होने के बाद उन्होने भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए लाठी के जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारंभ कराया। 1951 में, जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व मे वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। उन्होने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों मे कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिए बहुत परिश्रम किया।&lt;br /&gt;जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद, शास्त्री जी ने 9 जुन 1964 को प्रधान मंत्री का पद भार ग्रहण किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शिक्षा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उनकी शिक्षा हरिशचंद्र उच्च विद्यालय और काशी विद्यापीठ में हुई थी। यहीं से उन्हें "शास्त्री" की उपाधि भी मिली जो उनके नाम के साथ जुड़ी रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जीवन &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अपने पिता मिर्ज़ापुर के श्री शारदा प्रसाद और अपनी माता श्रीमती रामदुलारी देवी के तीन पुत्रो में से वे दूसरे थे। शास्त्रीजी की दो बहनें भी थीं। शास्त्रीजी के शैशव मे ही उनके पिता का निधन हो गया। 1928 में उनका विवाह श्री गणेशप्रसाद की पुत्री ललितादेवी से हुआ और उनके छ: संतान हुई।&lt;br /&gt;स्नातक की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात वो भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुये यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी विशुद्ध गाँधीवादी थे जो सारा जीवन सादगी से रहे और गरीबों की सेवा में अपनी पूरी जिंदगी को समर्पित किया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी रही, और जेलों मे रहना पड़ा जिसमें 1921 का असहयोग आंदोलन और 1941 का सत्याग्रह आंदोलन सबसे प्रमुख है। उनके राजनैतिक दिग्दर्शकों में से श्री पुरुषोत्तमदास टंडन, पंडित गोविंदबल्लभ पंत, जवाहरलाल नेहरू इत्यादि प्रमुख हैं। 1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने श्री टंडनजी के साथ भारत सेवक संघ के इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम किया। यहीं उनकी नज़दीकी नेहरू से भी बढी। इसके बाद से उनका कद निरंतर बढता गया जिसकी परिणति नेहरू मंत्रिमंडल मे गृहमंत्री के तौर पर उनका शामिल होना था। इस पद पर वे 1951 तक बने रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और इमानदारी के लिये पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हे वर्ष 1966 मे भारत रत्न से सम्मनित किया गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-6543472398040940911?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/vvzvhGpJUfe7eCO2eA1oFa6Rwas/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/vvzvhGpJUfe7eCO2eA1oFa6Rwas/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/vvzvhGpJUfe7eCO2eA1oFa6Rwas/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/vvzvhGpJUfe7eCO2eA1oFa6Rwas/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/VZMmHHCtyqQ" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/6543472398040940911/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=6543472398040940911" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/6543472398040940911?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/6543472398040940911?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/VZMmHHCtyqQ/blog-post_21.html" title="लालबहादुर शास्त्री" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Sj3ebLrib5I/AAAAAAAAAp4/uPLu59ZF6_M/s72-c/lal+bahadur+shastri.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>2</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/06/blog-post_21.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D04DQH0yfSp7ImA9WxJWE00.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-7765963027121654263</id><published>2009-06-17T23:13:00.000-07:00</published><updated>2009-06-17T23:19:31.395-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-17T23:19:31.395-07:00</app:edited><title>ठाकुर मंगल सिंह, खुड़</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjnbkI6IAWI/AAAAAAAAApg/p49ldMjXNwY/s1600-h/Mangal+singh+khood.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5348547446392226146" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 291px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjnbkI6IAWI/AAAAAAAAApg/p49ldMjXNwY/s400/Mangal+singh+khood.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; ठाकुर उदय सिंह जी के स्वर्गवास पर उनके एक मात्र पुत्र मंगल सिंह खुड जागीर के अधिपति बने। ठाकुर मंगल सिंह जी का जन्म सन १९१२ में हुआ था और उनकी शिक्षा अजमेर के मेयो कालेज में हुई थी। ठाकुर मंगल सिंह जी राजस्थान में अपने प्रकार के अपने युग के एक मात्र व्यक्ति थे। स्वतंत्रता प्रेमी, समाज सुधारक, राष्ट्र भक्त, गाँधी जी के खादी ग्रामोद्योग कार्यक्रम के समर्थक, गो-सेवक, शिक्षा प्रेमी और उच्च विचारों के तपस्वी पुरुष थे। रियासत काल में उन्होंने अपने ठिकाने में कई पाठशालायें और रुपगढ़ ग्राम में श्री रामप्रताप ग्राम सुधार आवासीय हाई स्कूल की स्थापना की जिसमे खुड ठिकाने के ग्रामो के अलावा उदयपुरवाटी, सीकर वाटी , नागौर व दांता-रामगढ ठिकाने के गांवों के विद्यार्थी विद्यार्जन करते थे। ठाकुर मंगल सिंह जी महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय जयपुर के सहपाठी ऐ.डी.सी. और सवाई मानगार्ड में केप्टन रहे। राजकीय सेवा से त्याग पत्र देकर उन्होंने ग्राम सुधार और क्षत्रिय-संगठन के लिए अपना जीवन समर्पित किया और जीवन पर्यन्त खादी के वस्त्रों का उपयोग किया। राजस्थान स्वयं सैनिक-समाज,रामराज्य सभा आदि संस्थाओं के वे प्रमुख संस्थापकों में थे। प्रसिद्ध देश भक्त जमनालाल बजाज, प. हीरालाल शास्त्री, रावल नरेन्द्र सिंह जोबनेर, महाराव उम्मेद सिंह कोटा, महाराजा उम्मेद सिंह जोधपुर,योगिराज अरविन्द, स्वामी करपात्री जी, सदाशिव माधव राव गोलवलकर, महाराजा राम सिंह सीतामऊ, महाराजा राणा भवानी सिंह दांताभावानगढ़, भारत के प्रथम &lt;a href="http://hindustaan-ke-yuvajosh.blogspot.com/2008/12/18-1902-1915-1921-1914-1934-1934-1939.html"&gt;राष्ट्रपति बाबू राजेंद्रप्रसाद&lt;/a&gt; आदि से आपका अति-स्नेह सम्बन्ध था। सीकर और जयपुर के मध्य १९३८ के संघर्ष और १९४२ की उदयपुर वाटी पर जयपुर की सेन्य चढाई का उन्होंने सामना कर अपने भाइयों के सम्मान और अधिकारों के लिए नेतृत्त्व ग्रहण कर जयपुर राज्य के कोपभाजन बनने का खतरा मोल लिया था। जागीर उन्मूलन के पश्चात उन्होंने अपने ठिकाने के घोडे़ और गायें भी सदाकत आश्रम पटना, वनस्थली विद्यापीठ जयपुर, चौपासनी विधालय जोधपुर और अपने ठिकाने के ग्रामवासियों और कवियों को प्रदान कर अपनी उदारता और समाज हितैषिता का परिचय दिया था। हिंसकजीवों की आखेट,घोडे़ और गो-पालन की और उनकी आजीवन रूचि बनी रही। वे सादा रहन-सहन और उच्च विचार कथनोक्ति के साक्षात् प्रतिरूप थे। उनकी देश भक्ति ,समाज प्रेम और शीलता आदि गुणों का कई कवियों ने अपनी रचनाओं में उल्लेख किया है। ४ फरवरी १९७६ को आपका निधन हो गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-7765963027121654263?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/xL5UzAsFVi_Tz2WVMuQgRjo42BM/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/xL5UzAsFVi_Tz2WVMuQgRjo42BM/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/xL5UzAsFVi_Tz2WVMuQgRjo42BM/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/xL5UzAsFVi_Tz2WVMuQgRjo42BM/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/ATCSegoi53o" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/7765963027121654263/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=7765963027121654263" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/7765963027121654263?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/7765963027121654263?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/ATCSegoi53o/blog-post_6394.html" title="ठाकुर मंगल सिंह, खुड़" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjnbkI6IAWI/AAAAAAAAApg/p49ldMjXNwY/s72-c/Mangal+singh+khood.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/06/blog-post_6394.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DE4ESXs5fyp7ImA9WxJWEk8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-6591196860951987045</id><published>2009-06-17T01:09:00.000-07:00</published><updated>2009-06-17T01:21:48.527-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-17T01:21:48.527-07:00</app:edited><title>फणीश्वर नाथ ' रेणु '</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjimGjtGQcI/AAAAAAAAApM/go7kaLMd3Fs/s1600-h/phanishwar+nath+renu.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5348207189096284610" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 325px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjimGjtGQcI/AAAAAAAAApM/go7kaLMd3Fs/s400/phanishwar+nath+renu.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span class=""&gt;फणीश्वर&lt;/span&gt; नाथ रेणु (४ मार्च, 1921 - ११ अप्रैल, 1977) एक हिन्दी साहित्यकार थे । इन्होंने प्रेमचंद के बाद के काल में हिन्दी में श्रेष्ठतम गद्य रचनाएं कीं । इनके पहले उपन्यास मैला आंचल को बहुत ख्याति मिली थी जिसके लिए उन्हे पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था ।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जीवनी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म बिहार के अररिया जिले के फॉरबिसगंज के निकट औराही हिंगना ग्राम में हुआ था । प्रारंभिक शिक्षा फॉरबिसगंज तथा अररिया में पूरी करने के बाद इन्होने मैट्रिक नेपाल के विराटनगर के विराटनगर आदर्श विद्यालय से कोईराला परिवार में रहकर की । इन्होने इन्टरमीडिएट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1942 में की जिसके बाद वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पङे । बाद में 1950 में उन्होने नेपाली क्रांतिकारी आन्दोलन में भी हिस्सा लिया जिसके परिणामस्वरुप नेपाल में जनतंत्र की स्थापना हुई । १९५२-५३ के समय वे भीषण रूप से रोगग्रस्त रहे थे जिसके बाद लेखन की ओर उनका झुकाव हुआ । उनके इस काल की झलक उनकी कहानी तबे एकला चलो रे में मिलती है । उन्होने हिन्दी में आंचलिक कथा की नींव रखी । सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय, एक समकालीन कवि, उनके परम मित्र थे । इनकी कई रचनाओं में कटिहार के रेलवे स्टेशन का उल्लेख मिलता है ।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेखन-शैली &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इनकी लेखन-शैली वर्णणात्मक थी जिसमें पात्र के प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था । पात्रों का चरित्र-निर्माण काफी तेजी से होता था क्योंकि पात्र एक सामान्य-सरल मानव मन (प्रायः) के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था । इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी । एक आदिम रात्रि की महक इसका एक सुंदर उदाहरण है ।&lt;br /&gt;इनकी लेखन-शैली प्रेमचंद से काफी मिलती थी और इन्हें आजादी के बाद का प्रेमचंद की संज्ञा भी दी जाती है ।&lt;br /&gt;अपनी कृतियों में उन्होने आंचलिक पदों का बहुत प्रयोग किया है । अगर आप उनके क्षेत्र से हैं (कोशी), तो ऐसे शब्द, जो आप निहायत ही ठेठ या देहाती समझते हैं, भी देखने को मिल सकते हैं आपको इनकी रचनाओं में ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;साहित्यिक कृतियां &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उपन्यास &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैला आंचल&lt;br /&gt;परती परिकथा&lt;br /&gt;जूलूस&lt;br /&gt;दीर्घतपा&lt;br /&gt;कितने चौराहे&lt;br /&gt;पलटू बाबू रोड&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कथा-संग्रह &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;एक आदिम रात्रि की महक&lt;br /&gt;ठुमरी&lt;br /&gt;अग्निखोर&lt;br /&gt;अच्छे आदमी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रिपोर्ताज &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ऋणजल-धनजल&lt;br /&gt;नेपाली क्रांतिकथा&lt;br /&gt;वनतुलसी की गंध&lt;br /&gt;श्रुत अश्रुत पूर्वे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रसिद्ध कहानियां &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मारे गये गुलफाम (तीसरी कसम)&lt;br /&gt;एक आदिम रात्रि की महक&lt;br /&gt;लाल पान की बेगम&lt;br /&gt;पंचलाइट&lt;br /&gt;तबे एकला चलो रे&lt;br /&gt;ठेस&lt;br /&gt;संवदिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सम्मान &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अपने प्रथम उपन्यास मैला आंचल के लिये उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-6591196860951987045?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/SHA_-D_eJ9yMbYT85A2qnnBcJKc/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/SHA_-D_eJ9yMbYT85A2qnnBcJKc/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/37cVlXMxC9c/blog-post_17.html" title="फणीश्वर नाथ ' रेणु '" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjimGjtGQcI/AAAAAAAAApM/go7kaLMd3Fs/s72-c/phanishwar+nath+renu.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/06/blog-post_17.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0EFR3g9fSp7ImA9WxJWEU4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-4380446974990062719</id><published>2009-06-15T23:34:00.000-07:00</published><updated>2009-06-16T00:00:16.665-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-16T00:00:16.665-07:00</app:edited><title>गुरु गोबिन्द सिंह</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjdAULV-cxI/AAAAAAAAAok/U1tHjYzaRzA/s1600-h/GuruGobindSingh.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5347813797912277778" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 255px; CURSOR: hand; HEIGHT: 338px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjdAULV-cxI/AAAAAAAAAok/U1tHjYzaRzA/s400/GuruGobindSingh.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; गुरु गोबिन्द सिंह ( २२ दिसमनर १६६६ से ७ अक्टूबर) सिखों के दसम एवं अन्तिम गुरु थे । उनका जन्म बिहार के पटना में हुआ था । उनके पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त ११ नवम्बर सन १६७५ को वे गुरू बने। वह एक महान योद्धा, कवि एवं आध्यात्मिक नेता थे। उन्होने सन १६९९ में बैसाखी के दिन खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों ( जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा ) के साथ १४ युद्ध लड़े। गुरू गोबिन्द सिंह्जी ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया और इसे ही सिखों को शाश्वत गुरू घोषित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी कासबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों का के संकलन का नाम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गुरु गोबिन्द सिंह का जन्म&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उस समय औरंगजेब जैसा जालिम बादशाह दिल्ली के तख्त पर बैठा हुआ था। उसके आतंक से लोगों को राहत देने के लिए तथा हिंदू धर्म की रक्षा के लिए जिस महान पुरुष ने अपने शीश की कुरबानी दी, ऐसे सिक्खों के नवें गुरु गुरु तेग बाहादुर के घर में सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ था। उन दिनों गुरु तेग बहादुर पटना (बिहार) में रहते थे।&lt;br /&gt;22 दिसंबर, सन् 1666 को गुरु तेग बहादुर की धर्मपरायण पत्नी गूजरी देवी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया, जो बाद में गुरु गोबिंद सिंह के नाम से विख्यात हुआ। बालक के जन्म पर पूरे नगर में उत्सव मनाया गया। उन दिनों गुरु तेग बहादुर असम-बंगाल में गुरु नानक देवजी के संदेश का प्रचार-प्रसार करते हुए घूम रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘वे यहां होते तो कितने प्रसन्न होते।’’ माता गूजरी बोलीं।&lt;br /&gt;‘‘उन्हें समाचार पहुंचा दिया गया है।’’ धाय मां ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नामकरण संस्कार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सिक्ख संगत के बीच बालक का नामकरण किया गया गोबिंदराय। माता गूजरी ने बालक को जहां दया, करुणा और प्रेम के संस्कार दिए, वहीं साहस, वीरता और निर्भीकता की घुट्टी भी पिलाई।&lt;br /&gt;गोबिन्दराय की उम्र उस समय चार वर्ष की थी, जब गुरु तेग बाहादुर वापिस आए। जिस समय उन्होंने हवेली में कदम रखा, तो उन्होंने देखा कि एक नन्हा बालक बच्चों को दो दलों में बांट कर खेल रहा है। एक दल को उसने भयभीत किया हुआ है। गुरु तेग बहादुर ने जब ऐसा करने का कारण पूछा, तो उसने निर्भीकता से कहा, ‘ये यवन हैं, मेरे शत्रु हैं, इसलिए उनके साथ ऐसा कर रहा हूं।’’ उसने कहा, ‘‘मैं इन यवनों को कभी क्षमा नहीं कर सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बालक से परिचय&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;खेल खत्म हो गया। बालक से गुरु तेग बहादुर ने उसका परिचय पूछा। बालक ने कहा, ‘‘मेरा नाम गोबिंदराय है। मैं गुरु तेग बहादुर जी का बेटा हूं।’’ गुरु साहब के चेहरे पर प्रसन्नता और अभिमान की चमक आ गई।’’ और आप ?’’ बालक ने पूछा। ‘‘मैं तुम्हारा पिता...! सुनते ही पुत्र ने पिता के चरणों का स्पर्श किया और पिता ने पुत्र को अपनी गोद में उठा लिया। तब तक माता गूजरी और सिक्ख सेवक वहां पहुंच चुके थे। गुरु साहब ने माता गूजरी को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘जो संतान को जन्मती ही नहीं, उसे संस्कारवान भी बनाती है वह माता धन्य है।’’ अपनी और अपने पुत्र की प्रशंसा सुनकर माता गूजरी की आंखों में आंसू छलकने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अचूक निशाना &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बालक गोबिंदराय धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था। उम्र के साथ-साथ उसकी कारगुजारियां भी बदलने लगी थीं। जिस हवेली में वे रहते थे, उसमें एक कुआं था। आस-पास की स्त्रियां वहां जल भरने आया करती थीं। उन्हें तंग करने में बालक गोबिंदराय को बड़ा मजा आता था। वह अपने दोस्तों के साथ तीर-कमान लेकर छिपकर बैठ जाता और जब स्त्रियाँ अपने सिर पर जल का घड़ा लेकर वहां से गुजरतीं तो वह और उसके मित्र तीरों का निशाना बनाकर उन घड़ों को फोड़ दिया करते। गोबिंदराय का निशाना इतना अचूक था कि वह कभी खाली नहीं जाता था।&lt;br /&gt;वे स्त्रियां उन बालकों की शैतानी से बहुत दुखी थीं। वे जानती थीं कि इन सबका मुखिया गोबिंदराय है। उन्होंने रोज-रोज के नुकसान से तंग आकर गोबिंदराय की शिकायत करने का मन बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;माता गूजरी से शिकायत &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;एक दिन सभी स्त्रियां मिलकर माता गूजरी के पास पहुंचीं और गोबिंदराय की शिकायत करने लगीं। ‘‘बीजी ! संभालो अपने लाड़ले को।’’ एक बोली, ‘‘वह रोज हमारे घड़े फोड़ देता है। रोज-रोज का नुकसान हम कहां तक उठाएं ?’’ दूसरी बोली, ‘‘बीजी ! वो अकेला नहीं है, उसके साथ उसकी पूरी मित्र-मंडली है। हमने कई बार उन्हें समझाया, पर वे मानते ही नहीं।’’&lt;br /&gt;तीसरी बोली, ‘‘बीजी ! आप जरा सोचो, अगर कभी निशाना चूक गया तो हमारी तो जान ही चली जाएगी। ये भी कोई खेल हुआ ? हम तो तंग आ गए हैं, इसकी इन रोज-रोज की शैतानियों से।’’ ‘‘तुम लोगों ने मुझे पहले क्यों नहीं बताया ?’’ माता गूजरी ने कहा, ‘‘अच्छा देखो, मैं तुम्हें पीतल के घड़े दिलवा देती हूँ। यह उन्हें नहीं फोड़ पाएगा और मैं उसे फटकारूंगी भी। तुम चिंता मत करो।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मां का गोबिंद को समझाना &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;माता गूजरी ने उन औरतों को नए चमकदार पीतल के घड़े दिलवा दिए। उन घड़ों को पाकर वे बहुत खुश थीं। बालक गोबिंदराय और उसके साथियों ने तीर-कमान से उन घड़ों को फोड़ने का प्रयास किया, पर वे सफल नहीं हो सके।&lt;br /&gt;जिस समय वे अपने हाथ अजमा रहे थे, उसी समय माता गूजरी ने पीछे से आकर रंगे हाथों गोबिंदराय को पकड़ लिया। गोबिंदराय को पकड़े जाते देखकर उसके सभी साथी जान बचाकर भाग निकले। औरतें हंसने लगीं—‘अब आया बच्चू पकड़ में।’ माता गूजरी ने गोबिंदराय को प्रेम भरी भाषा में फटकारते हुए कहा, ‘‘यह बहुत बुरी बात है बेटा ! अगर तुम्हारा निशाना चूक जाए और छोड़ा हुआ तीर किसी को लगे तो कितना बड़ा अनर्थ हो जाए। तुम्हारा तो खेल होगा, जबकि दूसरे की जान चली जाएगी।’’ ‘‘अब कभी भी ऐसा नहीं करूंगा। वचन देता हूं।’’ गोबिंदराय ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चमत्कारी बालक गोबिंदराय &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पटना में गोबिंदराय जब तक रहे। एक बार की बात है कि पटियाला राज्य के गुड़ाक नामक गांव में, भीखन शाह नाम के एक पहुंचे हुए फकीर ने रात में, एक स्वप्न देखा कि पटना में एक ऐसे पैगम्बर का जन्म हुए, जो अनेक ईश्वरीय शक्तियों से संपन्न है। ऐसा स्वप्न देखने के बाद वह पटना की ओर चल दिया। मार्ग में अनेक कठिनाइयों से जूझता हुआ वह एक दिन पटना जा पहुंचा। पूछते-पूछते वह गोबिंदराय की हवेली पर पहुंचा। वहां उसने माता गूजरी से प्रार्थना की, ‘‘माई ! सुना है तेरी कोख से किसी पैगंबर ने अवतार लिया है। मुझे उसके दर्शन करा दे।’’ माता का हृदय आशंकित हो उठा, ‘‘फकीर बाबा ! मैं नहीं जानती कि वह पैगंबर है या कुछ और। मैं तो उसे अपना बेटा मानती हूं। तुम पहले भोजन करो और फिर विश्राम कर लो। वह अभी आता ही होगा। तब तुम उससे मिल लेना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गोबिंदराय की परीक्षा &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी देर बाद गोबिंद राय बाहर से आया तो माता गूजरी ने उसे फकीर बाबा के सामने खड़ा कर दिया। बालक को देखकर फकीर बाबा ने दो कटोरों में पानी भरकर उसके सामने रखा और बोला, ‘‘पुत्र ! इन दो कटोरों में से किसी भी एक कटोरे को छुओ। मैं तुम्हारी धर्म-आस्था की परीक्षा लेना चाहता हूं। ये दोनों कटोरे विभिन्न धर्मों से संबंधित हैं। मैं देखना चाहता हूं कि तुम्हारी आस्था किस धर्म में है।’’&lt;br /&gt;गोबिंदराय ने दोनों कटोरों का स्पर्श किया और उन्हें लुढ़का दिया। फकीर बाबा आश्चर्य से गोबिंदराय का मुंह देखता रह गया वह माता गूजरी से बोला, ‘‘माई ! तेरा यह बालक कोई साधारण बालक नहीं है। बड़ा होकर यह महान योद्धा होगा और अपनी कौम का सिरमौर बनेगा। दीन-दुखियों का सहायक होगा। यह किसी धर्म के साथ पक्षपात नहीं करेगा। परंतु जिस धर्म में अनाचार या अधर्म का बोलबाला होगा, उसका विध्वंस करने में भी यह पीछे नहीं रहेगा। अत्याचारियों का विनाश करेगा। इस बालक में ईश्वर का अंश है। यह सभी को अपना बनाकर चलेगा।’’ माता गूजरी ने भीखन शाह फकीर को धन-धान्य देकर विदा किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजा फतेहसिंह को पुत्र प्राप्ति &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों पटना में राजा फतेहचंद रहते थे। उनके पास किसी चीज की कमी नहीं थी। बस कमी थी तो औलाद की। एक दिन वे अपने खास हितैषी के कहने पर अपनी पत्नी के साथ गुरु तेग बहादुर से मिलने हवेली पर आए।&lt;br /&gt;वहां पर बालक गोबिंदराय को देखकर राजा फतेहचंद की पत्नी ने प्यार से उसे अपने पास बुलाया। गोबिंदराय जाकर उनकी गोद में बैठ गए। राजा फतेहचंद की पत्नी को ऐसा लगा कि उनकी पुत्र प्राप्ति की कामना पूरी हो गई है। वे बालक गोबिन्द राय को खूब दुलार करके अपने महल में लौट आई।&lt;br /&gt;कुछ दिन बाद ही राजा की पत्नी को लगा कि वह गर्भवती हो गई है। उचित समय आने पर उसने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया। गोबिन्दराय ने गोद में बैठकर मानो उनकी बंधी कोक को खोल दिया था। फिर उन्होंने चार पुत्रों को जन्म दिया। तब से राजा और रानी बालक गोबिंदराय के भक्त हो गए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-4380446974990062719?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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256px; CURSOR: hand; HEIGHT: 304px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjX5-2UV8FI/AAAAAAAAAoI/QacaV_IQefU/s400/vidyapati.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;विद्यापति भारतीय साहित्य की भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभों मे से एक और मैथिली के सर्वोपरि कवि के रूप में जाने जाते हैं। इनके काव्यों में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरुप का दर्शन किया जा सकता है। इन्हें वैष्णव और शैव भक्ति के सेतु के रुप में भी स्वीकार किया गया है। मिथिला के लोगों को 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' का सूत्र दे कर इन्होंने उत्तरी-बिहार में लोकभाषा की जनचेतना को जीवित करने का महती प्रयास किया है।&lt;br /&gt;मिथिलांचल के लोकव्यवहार में प्रयोग किये जानेवाले गीतों में आज भी विद्यापति की श्रृंगार और भक्ति रस में पगी रचनायें जीवित हैं। पदावली और कीर्तिलता इनकी अमर रचनायें हैं।मैथिल&lt;/span&gt; कवि कोकिल, रसासिद्ध कवि विद्यापति, तुलसी, सूर, कबूर, मीरा सभी से पहले के कवि हैं। अमीर खुसरो यद्यपि इनसे पहले हुए थे। इनका संस्कृत, प्राकृत अपभ्रंश एवं मातृ भाषा मैथिली पर समान अधिकार था। विद्यापति की रचनाएँ संस्कृत, अवहट्ट, एवं मैथिली तीनों में मिलती हैं।&lt;br /&gt;देसिल वयना अर्थात् मैथिली में लिखे चंद पदावली कवि को अमरच्व प्रदान करने के लिए काफी है। मैथिली साहित्य में मध्यकाल के तोरणद्वार पर जिसका नाम स्वर्णाक्षर में अंकित है, वे हैं चौदहवीं शताब्दी के संघर्षपूर्ण वातावरण में उत्पन्न अपने युग का प्रतिनिधि मैथिली साहित्य-सागर का वाल्मीकि-कवि कोकिल विद्यापति ठाकुर। बहुमुखी प्रतिमा-सम्पन्न इस महाकवि के व्यक्तित्व में एक साथ चिन्तक, शास्रकार तथा साहित्य रसिक का अद्भुत समन्वय था। संस्कृत में रचित इनकी पुरुष परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली, शैवसर्वश्वसार, शैवसर्वश्वसार प्रमाणभूत पुराण-संग्रह, गंगावाक्यावली, विभागसार, दानवाक्यावली, दुर्गाभक्तितरंगिणी, गयापतालक एवं वर्षकृत्य आदि ग्रन्थ जहाँ एक ओर इनके गहन पाण्डित्य के साथ इनके युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा स्वरुप का साक्षी है तो दूसरी तरफ कीर्तिलता, एवं कीर्तिपताका महाकवि के अवह भाषा पर सम्यक ज्ञान के सूचक होने के साथ-साथ ऐतिहासिक साहित्यिक एवं भाषा सम्बन्धी महत्व रखनेवाला आधुनिक भारतीय आर्य भाषा का अनुपम ग्रन्थ है। परन्तु विद्यापति के अक्षम कीर्ति का आधार, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, है मैथिली पदावली जिसमें राधा एवं कृष्ण का प्रेम प्रसंग सर्वप्रथम उत्तरभारत में गेय पद के रुप में प्रकाशित है। इनकी पदावली मिथिला के कवियों का आदर्श तो है ही, नेपाल का शासक, सामंत, कवि एवं नाटककार भी आदर्श बन उनसे मैथिली में रचना करवाने लगे बाद में बंगाल, असम तथा उड़ीसा के वैष्णभक्तों में भी नवीन प्रेरणा एवं नव भावधारा अपने मन में संचालित कर विद्यापति के अंदाज में ही पदावलियों का रचना करते रहे और विद्यापति के पदावलियों को मौखिक परम्परा से एक से दूसरे लोगों में प्रवाहित करते रहे।&lt;br /&gt;कवि कोकिल की कोमलकान्त पदावली वैयक्तिकता, भावात्मकता, संश्रिप्तता, भावाभिव्यक्तिगत स्वाभाविकता, संगीतात्मकता तथा भाषा की सुकुमारता एवं सरलता का अद्भुत निर्देशन प्रस्तुत करती है। वर्ण्य विषय के दृष्टि से इनकी पदावली अगर एक तरफ से इनको रससिद्ध, शिष्ट एवं मर्यादित श्रृंगारी कवि के रुप में प्रेमोपासक, सौन्दर्य पारसी तथा पाठक के हृदय को आनन्द विभोर कर देने वाला माधुर्य का स्रष्टा, सिद्धहस्त कलाकार सिद्ध करती है तो दूसरी ओर इन्हें भक्त कवि के रुप में शास्रीय मार्ग एवं लोकमार्ग दोनों में सामंजस्य उपस्थित करने वाला धर्म एवं इष्टदेव के प्रति कवि का समन्वयात्मक दृष्टिकोण का परिचय देने वाला एक विशिष्ट भक्त हृदय का चित्र उपस्थित करती है साथ ही साथ लोकाचार से सम्बद्ध व्यावहारिक पद प्रणेता के रुप में इनको मिथिला की सांस्कृतिक जीवन का कुशल अध्येता प्रमाणित करती है। इतना ही नहीं, यह पदावली इनके जीवन्त व्यक्तित्व का भोगा हुआ अनुभूति का साक्षी बन समाज की तात्कालीन कुरीति, आर्थिक वैषम्य, लौकिक अन्धविश्वास, भूत-प्रेत, जादू-टोना, आदि का उद्घाटक भी है। इसके अलावे इस पदावली की भाषा-सौष्ठव, सुललित पदविन्यास, हृदयग्राही रसात्मकता, प्रभावशाली अलंकार, योजना, सुकुमार भाव व्यंजना एवं सुमधुर संगीत आदि विशेषता इसको एक उत्तमोत्तम काव्यकृति के रुप में भी प्रतिष्ठित किया है। हालांकि यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि महाकवि विद्यापत् अपनी अमर पदावली के रचना के लिए अपने पूर्ववर्ती संस्कृत कवियों खासकर भारवि, कालिदास, जयदेव, हर्ष अमरुक, गोवर्द्धनाचार्य आदि से कम ॠणि नहीं हैं। क्योंकि जिस विषयों को महाकवि ने अपनी पदावली में प्रस्तुत किया वे विषय पूर्व से ही संस्कृत के कवियों की रचनाओं में प्रस्तुत हो चुका था । विद्यापति की मौलिकता इसमें निहित है कि इन्होने उन रचनाओं की विषय उपमा अलंकार परिवेश आदि का अन्धानुकरण न कर उसमें अपने दीर्ध जीवन का महत्वपूर्ण एवं मार्मिक नानाविध अनुभव एवं आस्था को अनुस्यूत कर अप्रतिम माधुर्य एवं असीम प्राणवत्ता से युक्त मातृभाषा में यो प्रस्तुत किया कि वह इनके हृदय से न:सृक वल्कु लबजही मानव के हृदय में प्रवेश कर जाता है। यही कारण है कि महाकवि की काव्य प्रतिमा की गुञ्ज मात्र मिथिलांचल तक नहीं अपितु समस्त पूर्वांचल में, पूर्वांचल में भी क्यों समस्त भारतवर्ष में, समस्त भारतवर्ष में ही क्यों अखिल विश्व में व्याप्त है। राजमहल से लेकर पर्णकुटी तक में गुंजायमान विद्यापति का कोमलकान्त पदावली वस्तुत: भारतीय साहित्य की अनुपम वैभव है।&lt;br /&gt;विद्यापति के प्रसंग में स्वर्गीय डॉ. शैलेन्द्र मोहन झा की उक्ति वस्तुत: शतप्रतिशत यथार्थ हैष वे लिखते हैं:&lt;br /&gt;"नेपालक पार्वत्य नीड़ रटओ अथवा कामरुपक वनवीचिका, बंगालक शस्य श्यामला भूमि रहओ अथवा उतकलक नारिकेर निकुंज, विद्यापतिक स्वर सर्वत्र समान रुप सँ गुंजित होइत रहैत छनि। हिनक ई अमर पदावली जहिना ललनाक लज्जावृत कंठ सँ, तहिना संगीतज्ञक साधित स्वरसँ, राजनर्तकीक हाव-भाव विलासमय दृष्टि निक्षेपसँ, भक्त मंडलीक कीर्तन नर्तन सँ, वैष्णव-वैश्णवीक एकताराक झंकारसँ नि:सृत होइत युग-युगसँ श्रोतागणकें रस तृप्त करैत रहल अछि एवं करत। मिथिला मैथिलक जातीय एवं सांस्कृतिक गरिमाक मान-बिन्दु एवं साहित्यिक जागरणक प्रतीक चिन्हक रुप में आराध्य एवं आराधित महाकवि विद्यापतिक रचना जरिना मध्यकालीन मैथिली साहित्यिक अनुपम निधि आछि तहिना मध्यकाल में रचित समस्त मैथिली साहित्य सेहो हिनके प्रभावक एकान्त प्रतिफल अछि।"&lt;br /&gt;महाकवि विद्यापति का जन्म वर्तमान मधुबनी जनपद के बिसपू नामक गाँव में एक सभ्रान्त मैथिल ब्राह्मण गणपति ठाकुर (इनके पिता का नाम) के घर हुआ था। बाद में यसस्वी राजा शिवसिंह ने यह गाँव विद्यापति को दानस्वरुप दे दिया था। इस दानपत्र कि प्रतिलिपि आज भी विद्यापति के वंशजों के पास है जो आजकल सौराठ नामक गाँव में रहते हैं। उपलब्ध दस्तावेजों एवं पंजी-प्रबन्ध की सूचनाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि महाकवि अभिनव जयदेव विद्यापति का जन्म ऐसे यशस्वी मैथिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जिस पर विद्या की देवी सरस्वती के साथ लक्ष्मी की भी असीम कृपा थी। इस विख्यात वंश में (विषयवार विसपी) एक-से-एक विद्धान्, शास्रज्ञ, धर्मशास्री एवं राजनीतिज्ञ हुए। महाकवि के वृहृप्रपितामह देवादिव्य कर्णाटवंशीय राजाओं के सन्धि, विग्रहिक थे तथा देवादिव्य के सात पुत्रों में से धीरेश्वर, गणेश्वर, वीरेश्वर&lt;br /&gt;आदि महराज हरिसिंहदेव की मन्त्रिपरिषद् में थे। इनके पितामह जयदत्त ठाकुर एवं पिता गणपति ठाकुर राजपण्डित थे। इस तरह पाण्डिल्य एवं शास्रज्ञान कवि विद्यापति को सहज उत्तराधिकार में मिला था। अनेक शास्रीय विषयों पर कालजयी रचना का निर्माण करके विद्यापति ने अपने पूर्वजों की परम्परा को ही आगे बढ़ाया।&lt;br /&gt;ऐसे किसी भी लिखित प्रमाण का अभाव है जिससे यह पता लगाया जा सके कि महाकवि कोकिल विद्यापति ठाकुर का जन्म कब हुआ था। यद्यपि महाकवि के एक पद से स्पष्ट होता है कि लक्ष्मण-संवत् २९३, शाके १३२४ अर्थात् मन् १४०२ ई. में देवसिंह की मृत्यु हुई और राजा शिवसिंह मिथिला नरेश बने। मिथिला में प्रचलित किंवदन्तियों के अनुसार उस समय राजा शिवसिंह की आयु ५० वर्ष की थी और कवि विद्यापति उनसे दो वर्ष बड़े, यानी ५२ वर्ष के थे। इस प्रकार १४०२-५२उ१३५० ई. में विद्यापति की जन्मतिथि मानी जा सकती है। लक्ष्मण-संवत् की प्रवर्त्तन तिथि के सम्बन्ध में विवाद है। कुछ लोगों ने सन् ११०९ ई. से, तो कुथ ने १११९ ई. से इसका प्रारंभ माना है। स्व. नगेन्द्रनाथ गुप्त ने लक्ष्मण-संवत् २९३ को १४१२ ई. मानकर विद्यापत् की जन्मतिथि १३६० ई. में मानी है। ग्रिपर्सन और महामहोपाध्याय उमेश मिश्र की भी यही मान्यता है। परन्तु श्रीब्रजनन्दन सहाय "ब्रजवल्लभ", श्रीराम वृक्ष बेनीपुरी, डॉ. सुभद्र झा आदि सन् १३५० ई. को उनका जन्मतिथि का वर्ष मानते हैं। डॉ. शिवप्रसाद के अनुसार "विद्यापति का जन्म सन् १३७४ ई. के आसपास संभव मालूम होता है।" अपने ग्रन्थ विद्यापति की भूमिका में एक ओर डॉ. विमानविहारी मजुमदार लिखते है कि "यह निश्चिततापूर्वक नहीं जाना जाता है कि विद्यापति का जन्म कब हुआ था और वे कितने दिन जीते रहे" (पृ। ४३) और दूसरी ओर अनुमान से सन् १३८० ई. के आस पास उनकी जन्मतिथि मानते हैं।&lt;br /&gt;हालांकि जनश्रुति यह भी है कि विद्यापति राजा शिवसेंह से बहुत छोटे थे। एक किंवदन्ती के अनुसार बालक विद्यापति बचपन से तीव्र और कवि स्वभाव के थे। एक दिन जब ये आठ वर्ष के थे तब अपने पिता गणपति ठाकुर के साथ शिवसेंह के राजदरबार में पहुँचे। राजा शिवसिंह के कहने पर इन्होने निम्नलिखित दे पंक्तियों का निर्माण किया:&lt;br /&gt;पोखरि रजोखरि अरु सब पोखरा।राजा शिवसिंह अरु सब छोकरा।।&lt;br /&gt;यद्यपि महाकवि की बाल्यावस्था के बारे में विशेष जानकारी नहीं है। विद्यापति ने प्रसिद्ध हरिमिश्र से विद्या ग्रहण की थी। विख्यात नैयायिक जयदेव मिश्र उर्फ पक्षधर मिश्र इनके सहपाठी थे। जनश्रुतियों से ऐसा ज्ञात होता है।&lt;br /&gt;लोगों की धारणा यह है कि महाकवि अपने पिता गणपति ठाकुर के साथ बचपन से ही राजदरबार में जाया करते थे। किन्तु चौदहवीं सदी का शेषार्ध मिथिला के लिए अशान्ति और कलह का काल था। राजा गणेश्वर की हत्या असलान नामक यवन-सरदार ने कर दी थी। कवि के समवयस्क एवं राजा गणेश्वर के पुत्र कीर्तिसिंह अपने खोये राज्य की प्राप्ति तथा पिता की हत्या का बदला लेने के लिए प्रयत्नशील थे। संभवत: इसी समय महाकवि ने नसरतशाह और गियासुद्दीन आश्रमशाह जैसे महपुरुषों के लिए कुछ पदों की रचना की। राजा शिवसिंह विद्यापति के बालसखा और मित्र थे, अत: उनके शासन-काल के लगभग चार वर्ष का काल महाकवि के जीवन का सबसे सुखद समय था। राजा शिवसिंह ने उन्हें यथेष्ठ सम्मान दिया। बिसपी गाँव उन्हें दान में पारितोषिक के रुप में दिया तथा 'अभिनवजयदेव' की उपाधि से नवाजा। कृतज्ञ महाकवि ने भी अपने गीतों द्वारा अपने अभिन्न मित्र एवं आश्रयदाता राजा शिवसिंह एवं उनकी सुल पत्नी रानी लखिमा देवी (ललिमादेई) को अमर कर दिया। सबसे अधिक लगभग २५० गीतों में शिवसिंह की भणिता मिलती है।&lt;br /&gt;किन्तु थोड़े ही समय में ही पुन: मिथिला पर दुर्दैव का भयानक कोप हुआ। यवनों के आसन्न आक्रमण का आभाष पाकर राजा शिवसिंह ने विद्यापति के संरक्षण में अपने परिजनों को नेपाल-तराई-स्थित द्रोणवार के अधिपति पुरादित्य के आश्रम में रजाबनौली भेज दिया। युद्ध क्षेत्र में सम्भवत: शिवसिंह मारे गये। विद्यापति लगभग १२ वर्ष तक पुरादित्य के आश्रम में रहे। वहीं इन्होने लिखनावली की रचना की उस समय के एक पद से ज्ञात होता है कि उनके लिए यह समय बड़ा दु:खदायी था। शिवसिंह के छोटे भाई पद्मसिंह को राज्याधिकार मिलने पर औइनवार-वंशीय राजाओं का आश्रय पुन: महाकवि को प्राप्त हुआ और वे मिथिला वापस लौट आए। पद्मसिंह के केवल एक वर्ष के शासन के बाद उनकी धर्मपत्नी विश्वासदेवी मिथिला के राजसिंहासन पर बैठी, जिनके आदेश से उन्होने दो महत्वपूर्ण ग्रन्थः शैवसर्वस्वसार तथा गंगावाक्यावली लिखे। विश्वासदेवी के बाद राजा नरसिंहदेव 'दपंनारायण', महारानी धीरमती, महाराज धीरसिंह 'हृदयनारायण', महाराज भैरवसिंह 'हरिनारायण' तथा चन्द्रसिंह 'रुपनारायण' के शासनकाल में महाकवि को लगातार राज्याश्रय प्राप्त होता रहा था।&lt;br /&gt;जन्मतिथि की तरह महाकवि विद्यापति ठाकुर की मृत्यु के सम्बन्ध में भी विद्वानों में मतभेद है। इतना स्पष्ट है और जनश्रुतियाँ बताती है कि आधुनिक बेगूसराय जिला के मउबाजिदपुर (विद्यापतिनगर) के पास गंगातट पर महाकवि ने प्राण त्याग किया था। उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में यह पद जनसाधारण में आज भी प्रचलित है:&lt;br /&gt;'विद्यापतिक आयु अवसानकातिक धवल त्रयोदसि जान।'&lt;br /&gt;यहाँ एक बात स्पषट करना अनिवार्य है। विद्यापति शिव एवं शक्ति दोनों के प्रबल भक्त थे। शक्ति के रुप में उन्होंने दुर्गा, काली, भैरवि, गंगा, गौरी आदि का वर्णन अपनी रचनाओं में यथेष्ठ किया है। मिथिला के लोगों में यह बात आज भी व्याप्त है कि जब महाकवि विद्यापति काफी उम्र के होकर रुग्न हो गए तो अपने पुत्रों और परिजनों को बुलाकर यह आदेश दिया:&lt;br /&gt;"अब मैं इस शरीर का त्याग करना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि मैं गंगा के किनारे गंगाजल को स्पर्श करता हुआ अपने दीर्ध जीवन का अन्तिम सांस लूं। अत: आप लोग मुझे गंगालाभ कराने की तैयारी में लग जाएं। कहरिया को बुलाकर उस पर बैठाकर आज ही हमें सिमरिया घाट (गंगातट) ले चलें।"&lt;br /&gt;अब परिवार के लोगों ने महाकवि का आज्ञा का पालन करते हुए चार कहरियों को बुलाकर महाकवि के जीर्ण शरीर को पालकी में सुलाकर सिमरिया घाट गंगालाभ कराने के लिए चल पड़े - आगे-आगे कहरिया पालकी लेकर और पीछे-पीछे उनके सगे-सम्बन्धी। रात-भर चलते-चलते जब सूर्योदय हुआ तो विद्यापति ने पूछा: "भाई, मुझे यह तो बताओं कि गंगा और कितनी दूर है?"&lt;br /&gt;"ठाकुरजी, करीब पौने दो कोस।" कहरियों ने जवाब दिया। इस पर आत्मविश्वास से भरे महाकवि यकाएक बोल उठे: "मेरी पालकी को यहीं रोक दो। गंगा यहीं आएंगी।"&lt;br /&gt;"ठाकुरजी, ऐसा संभव नहीं है। गंगा यहाँ से पौने दो कोस की दूरी पर बह रही है। वह भला यहाँ कैसे आऐगी? आप थोड़ी धैर्य रक्खें। एक घंटे के अन्दर हम लोग सिमरिया घाट पहुँच जाएंगे।"&lt;br /&gt;"नहीं-नहीं, पालकी रोके" महाकवि कहने लगे, "हमें और आगे जाने की जरुरत नहीं। गंगा यहीं आएगी। आगर एक बेटा जीवन के अन्तिम क्षण में अपनी माँ के दर्शन के लिए जीर्ण शरीर को लेकर इतने दूर से आ रहा है तो क्या गंगा माँ पौने दो कोस भी अपने बेटे से मिलने नहीं आ सकती? गंगा आएगी और जरुर आएगी।"&lt;br /&gt;इतना कहकर महाकवि ध्यानमुद्रा में बैठ गए। पन्द्रह-बीस मिनट के अन्दर गंगा अपनी उफनती धारा के प्रवाह के साथ वहाँ पहुँच गयी। सभी लोग आश्चर्य में थे। महाकवि ने सर्वप्रथम गंगा को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया, फिर जल में प्रवेश कर निम्नलिखित गीत की रचना की:&lt;br /&gt;बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे।छोड़इत निकट नयन बह नीरे।।करनोरि बिलमओ बिमल तरंगे।पुनि दरसन होए पुनमति गंगे।।एक अपराध घमब मोर जानी।परमल माए पाए तुम पानी।।कि करब जप-तप जोग-धेआने।जनम कृतारथ एकहि सनाने।।भनई विद्यापति समदजों तोही।अन्तकाल जनु बिसरह मोही।।&lt;br /&gt;इस गंगा स्तुति का अर्थ कुछ इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है:&lt;br /&gt;"हे माँ पतित पावनि गंगे, तुम्हारे तट पर बैठकर मैंने संसार का अपूर्व सुख प्राप्त किया। तुम्हारा सामीप्य छोड़ते हुए अब आँखों से आँसू बह रहे हैं। निर्मल तरंगोवानी पूज्यमती गंगे! मैं कर जोड़ कर तुम्हारी विनती करता हूँ कि पुन: तुम्हारे दर्शन हों।"&lt;br /&gt;ठमेरे एक अपराध को जानकर भी समा कर देना कि हे माँ! मैंने तुम्हें अपने पैरों से स्पर्श कर दिया। अब जप-तप, योग-ध्यान की क्या आवश्यकता? एक ही स्नान में मेरा जन्म कृतार्थ हो गया। विद्यापति तुमसे (बार-बार) निवेदन करते है कि मृत्यु के समय मुझे मत भूलना।"&lt;br /&gt;इतना ही नहीं, कवि विद्यापति ने अपनी पुत्री दुल्लहि को सम्बोधित करते हुए गंगा नदी के तट पर एक और महत्वपूर्ण गीत का निर्माण किया। यह गीत कुछ इस प्रकार है:&lt;br /&gt;दुल्लहि तोर कतय छथि माय। कहुँन ओ आबथु एखन नहाय।। वृथा बुझथु संसार-विलास। पल-पल नाना भौतिक त्रास।। माए-बाप जजों सद्गति पाब। सन्नति काँ अनुपम सुख आब।। विद्यापतिक आयु अवसान। कार्तिक धबल त्रयोदसि जान।।&lt;br /&gt;इसका सारांश यह है कि महाकवि वयोवद्ध हो चुके हैं। अपने जीवन का अंत नजदीक देखकर इस नश्वर शरीर का त्याग करने के पवित्र तट पर अपने सखा-सम्बन्धियों के साथ पहुँच गये हैं। पूज्यशलीला माँ गंगा अपने इस महान यशस्वी पुत्र को अंक में समेट लेने के लिए प्रस्तुत हो गई हैं। इसी क्षण महाकवि विद्यापति अपनी एकलौती पुत्री को सम्बोधित करते हुए कहते हैं, अही दुलारि, तुम्हारी माँ कहाँ है.? कहो न कि अब जल्दी से स्नान करके चली आएं। भाई, देरी करने से भला क्या होगा? इस संसार के भोग-विलास आदि को व्यर्थ समझें। यहाँ पल-पल नाना प्रकार का भय, कष्ट आदि का आगमन होता रहता है। अगर माता-पिता को सद्गति मिल जाये तो उसके कुल और परिवार के लोगों को अनुपम सुख मिलना चाहिए। क्या तुम्हारी माँ नहीं जानती हैं जो आज जति पवित्र कार्तिक युक्त त्रयोदशी तिथि है। अब मेरे जीवन का अन्त निश्चित है।" इस तरह से गंगा के प्रति महाकवि ने अपनी अटूट श्रद्धा दिखाया। और इसके बाद ही उन्होंने जीवन का अन्तिम सांस इच्छानुसार गंगा के किनारे लिया।&lt;br /&gt;नगेन्द्रनाथ गुप्त सन् १४४० ई. को महाकवि की मृत्यु तिथि का वर्ष मानते हैं। म.म. उमेश मिश्र के अनुसार सन् १४६६ ई. के बाद तक भी विद्यापति जीवित थे। डॉ. सुभद्र झा का मानना है कि "विश्वस्त अभिलेखों के आधार पर हम यह कहने की स्थिति में है कि हमारे कवि का मसय १३५२ ई. और १४४८ ई. के मध्य का है। सन् १४४८ ई. के बाद के व्यक्तियों के साथ जो विद्यापति की समसामयिकता को जोड़ दिया जाता है वह सर्वथा भ्रामक हैं।" डॉ. विमानबिहारी मजुमदार सन् १४६० ई. के बाद ही महाकवि का विरोधाकाल मानते हैं। डॉ. शिवप्रसाद सिंह विद्यापति का मृत्युकाल १४४७ मानते है।&lt;br /&gt;महाकवि विद्यापति ठाकुर के पारिवारिक जीवन का कोई स्वलिखित प्रमाण नहीं है, किन्तु मिथिला के उतेढ़पोथी से ज्ञात होता है कि इनके दो विवाह हुए थे। प्रथम पत्नी से नरपति और हरपति नामक दो पुत्र हुए थे और दूसरी पत्नी से एक पुत्र वाचस्पति ठाकुर तथा एक पुत्री का जन्म हुआ था। संभवत: महाकवि की यही पुत्री 'दुल्लहि' नाम की थी जिसे मृत्युकाल में रचित एक गीत में महाकवि अमर कर गये हैं।&lt;br /&gt;कालान्तर में विद्यापति के वंशज किसी कारणवश (शायद यादवों एवं मुसलमानों के उपद्रव से तंग आकर) विसपी को त्यागकर सदा के लिए सौराठ गाँव (मधुबनी जिला में स्थित समागाछी के लिए प्रसिद्ध गाँ) आकर बस गए। आज महाकवि के सभी वंशज इसी गाँव में निवास करते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-12T01:30:17.994-07:00</app:edited><title>दादा भाई नौरोजी</title><content type="html">&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjIRen2WZBI/AAAAAAAAAnA/Un2euEmD688/s1600-h/Dadabhai+Naoroji.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5346354925432890386" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 250px; CURSOR: hand; HEIGHT: 247px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjIRen2WZBI/AAAAAAAAAnA/Un2euEmD688/s400/Dadabhai+Naoroji.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;न&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ौ&lt;/span&gt;रोजी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, दादाभाई&lt;/strong&gt; का जन्म सन् 1825 में हुआ। विश्वविद्यालयों की स्थापना के पूर्व के दिनों में एलफिंस्टन इंस्टीटयूट में इन्होंने शिक्षा पाई जहाँ के ये मेधावी छात्र थे। उसी संस्थान में अध्यापक के रूप में जीवन आरंभ कर आगे चलकर वहीं वे गणित के प्रोफेसर हुए, जो उन दिनों भारतीयों के लिए शैक्षणिक संस्थाओं में सर्वोच्च पद था। साथ में उन्होंने समाजसुधार कार्यों में अग्रगामी और कई धार्मिक तथा साहित्य संघटनों के, यथा "स्टूडेंट्स लिटरेरी ऐंड सांइटिफिक सोसाइटी के, प्रतिष्ठाता के रूप में अपना विशेष स्थान बनाया। उसकी दो शाखाएँ थीं, एक मराठी ज्ञानप्रसारक मंडली और दूसरी गुजराती ज्ञानप्रसारक मंडली। रहनुमाई सभी की भी स्थापना इन्होंने की थी।' "रास्त गफ्तार' नामक अपने समय के समाज सुधारकों के प्रमुख पत्र का संपादन तथा संचालन भी इन्होंने किया।&lt;br /&gt;पारसियों के इतिहास में अपनी दानशीलता और प्रबुद्धता के लिए प्रसिद्ध "कैमास' बंधुओं ने दादाभाई को अपने व्यापार में भागीदार बनाने के लिए आमंत्रित किया। तदनुसार दादाभाई लंदन और लिवरपूल में उनका कार्यालय स्थापित करने के लिए इंग्लैंड गए। विद्यालय के वातावरण को छोड़कर एकाएक व्यापारी धन जाना एक प्रकार की अवनति या अपवतन समझा जा सकता है, परंतु दादा भाई ने इस अवसर को इंग्लैंड में उच्च शिक्षा के लिए जानेवाले विद्यार्थियों की भलाई के लिए उपयुक्त समझा। इसके साथ ही साथ उनका दूसरा उद्देश्य सरकारी प्रशासकीय संस्थाओं का अधिक से अधिक भारतीयकरण करने के लिए आंदोलन चलाने का भी था। जो विद्यार्थी उन दिनों उनके संपर्क में आए और उनसे प्रभावित हुए उनमें सुप्रसिद्ध फीरोजशाह मेहता, मोहनदास कर्मचंद गांधी औैर मुहम्मद अली जिना का नाम उल्लेखनीय है।&lt;br /&gt;इसके अतिरिक्त दादाभाई का एक और उद्देश्य ब्रिटिश जनता को ब्रिटिश शासन से उत्पीड़ित भारतीयों के दु:खों की जानकारी कराना और उन्हें दूर करने के उनके उत्तरदायित्व की ओर ध्यान आकर्षित कराना भी था,&lt;br /&gt;उन दिनों भारतीय सिविल सेवाओं में सम्मिलित होने के इच्छुक अभ्यर्थियों के लिए सबसे कठिनाई की बात यह थी कि उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में ब्रिटिश अभ्यर्थियों से स्पर्धा करनी पड़ती थी। इस असुविधा को दूर करने के लिए दादा भाई का सुझाव इंग्लैंड और भारत में एक साथ सिविल सर्विस परीक्षा करने का था। इसके लिए उन्होंने 1893 तक आंदोलन चलाया जब कि उन्होंने वहाँ लोकसभा (हाउस आव कामन्स) में उस सदन के एक सदस्य की हैसियत से अधिक संघर्ष किया और सभा ने भारत तथा इंग्लैंड में एक साथ परीक्षा चलाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।&lt;br /&gt;उन दिनों दूसरी उससे भी बड़ी परिवेदना भारतीयों की भयानक दरिद्रता थी। हालाँकि दादाभाई ही पहले व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने इसके लिए दु:ख की अभिव्यक्ति की हो किंतु वे पहले व्यक्ति अवश्य थे जिन्होंने उसके उन्मूलन के लिए आंदोलन चलाया। उन्होंने तथ्यों और आँकड़ों से यह सिद्ध कर दिया कि जहाँ भारतीय दरिद्रता में आकंठ डूबे थे, वहीं भारत की प्रशासकीय सेवा दुनियाँ में सबसे महँगी थी। सरकारी आँकड़े उन दिनों नहीं के समान थे और जानकारी प्राप्त करने के लिए कोई गैर सरकारी साधन भी नहीं था। भारतीयों की आर्थिक स्थिति के संबंध में प्रारंभिक सर्वेक्षण के बाद यही निष्कर्ष निकला कि देश में एक व्यक्ति की औसत वार्षिक आय कुल बीस रुपए थी। इन्हीं सब आँकड़ों के आधार पर ईस्ट इंडिया एसोसिएशन के सामने उन्होंने "वांट्स एेंड मीन्स आव इंडिया' नामक निबंध 27 जुलाई, 1870 को पढ़ा।&lt;br /&gt;19वीं शताब्दी के अंत तक दादाभाई ने अनेक समितियों और आयोगों के समक्ष ही नहीं वरन् ब्रिटिश पार्लमेंट के सामने भी भारत के प्रति की गई बुराइयों को दूर करने के लिए वकालत की और उच्चाधिकारियों को बराबर चेतावनी देते रहे कि यदि इसी प्रकार भारत की नैतिक और भौतिक रूप से अवनति होती रही तो भारतीयों को ब्रिटिश वस्तुओं का ही नहीं वरन् ब्रिटिश शासन का भी बहिष्कार करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा, किंतु इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अंत में उन्होंने भारतीयों की राजनीतिक दासता और दयनीय स्थिति की ओर विश्व लोकमत का ध्यान आकृष्ट करने के लिए महान् प्रयास करने का निश्चय किया जिसका परिणाम हुआ उनकी वृहदाकार पुस्तक लिबर्टी ऐंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया । इसमें बहुत से लेख, भाषण, निबंध और उच्चाधिकारियों से पत्रव्यवहार तथा समितियों और आयोगों के समक्ष दी गई उनकी गवाहियाँ तथा कितने ही महत्वपूर्ण अधिनियमों और घोषणाओं के उद्धरण थे। हाउस आव कामन्स की सदस्यता प्राप्त करने में उनकी अद्भुत सफलता लक्ष्यपूर्ति के लिए एक साधन मात्र थी। उनका यह लक्ष्य या ध्येय था भारत का कल्याण और उन्नति जो संसद की सदस्यता के लिए संघर्ष करते समय भी उनके मस्तिष्क पर छाया रहता था। वे बराबर नैशनल कांग्रेस के लिए प्रचार करते रहे और भारत में अपने मित्रों को लिखे विविध पत्रों में पारसियों की राष्ट्रीय संग्राम से दूर रहने की प्रवृत्ति की निंदा करते रहे। कोई भी सप्ताह ऐसा नहीं बीतता था जिसमें उनके पास भारत से पत्र और कांग्रेस के संबंध में पत्रपत्रिकाओं की कतरनें न आती रही हों तथा उनके पत्र भारतीय मित्रों के पास न पहुँचते रहे होंं। किसी ने कभी यह अपेक्षा नहीं की थी कि दादाभाई हाउस आव कामन्स में इतनी बड़ी हलचल पैदा कर देंगे किंतु उस सदन में उनकी गतिविधि और सक्रियता से ऐसा प्रतीत होता था मानो वे वहाँ की कार्यप्रणाली आदि से बहुत पहले से ही परिचित रहे हों। भारत की दरिद्रता, मुद्रा और विनिमय, अफीम या शराब के सेवन के प्रोत्साहन से उत्पन्न होनेवाले कुपरिणामों के विषय में उनके भाषण बड़े आदर और ध्यान से सुने जाते थे।&lt;br /&gt;अपने लंबे जीवन में दादाभाई ने देश की सेवा के लिए जो बहुत से कार्य किए उन सबका वर्णन करना स्थानाभाव के कारण यहाँ संभव नहीं है किंतु स्वशासन के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (1906) में उनके द्वारा की गई माँग की चर्चा करना आवश्यक है। उन्होंने अपने भाषण में स्वराज्य को मुख्य स्थान दिया। अपने भाषण के दौरान में उन्होंने कहा, हम कोई कृपा की याचना नहीं कर रहे हैं, हमें तो केवल न्याय चाहिए। आरंभ से ही अपने प्रयत्नों के दौरान में मुझे इतनी असफलताएँ मिली हैं जो एक व्यक्ति को निराश ही नहीं बल्कि विद्रोही भी बना देने के लिए पर्याप्त थीं, पर मैं हताश नहीं हुआ हूँ और मुझे विश्वास है कि उस थोड़े से समय के भीतर ही, जब तक मै जीवित हूँ, सद्भावना, सचाई तथा संमान से परिपूर्ण स्वयात्त शासन की माँग को परिपूर्ण, करनेवाला संविधान भारत के लिए स्वीकार कर लिया जाएगा। उनकी यह आशा उस समय पूरी हुई जब वे सार्वजनिक जीवन से अवकाश ग्रहण कर चुके थे।&lt;br /&gt;पूर्व और पश्चिम में कांग्रेसी कार्यकर्ता तथा उनके मित्र भारत की नई पीढ़ी की आशाओं के अनुसार सांवैधानिक सुधारों को मूर्त रूप देने के लिए प्रस्ताव तैयार करने में व्यस्त थे। परंतु 20 अगस्त, 1917 की घोषणा के दो महीने पूर्व दादाभाई की मृत्यु हो चुकी थी। इस घोषणा के द्वारा प्रशासनिक सेवाओं में अधिकाधिक भारतीय सहयोग तथा ब्रिाटिश साम्राज्य के अंतर्गत क्रमश: भारत में उत्तरदायी शासन के विकास के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ। इस प्रकार भारत के इस वयोवृद्ध नेता ने जो माँग की थी, उसकी बहुत कुछ पूर्ति का आश्वासन मिल गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/5Ty_xqoLzME5K05em3VzpuOaMIk/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/5Ty_xqoLzME5K05em3VzpuOaMIk/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/5Ty_xqoLzME5K05em3VzpuOaMIk/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/5Ty_xqoLzME5K05em3VzpuOaMIk/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/kAGRgL2ilpo" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/69620469831162895/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=69620469831162895" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/69620469831162895?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/69620469831162895?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/kAGRgL2ilpo/blog-post_12.html" title="दादा भाई नौरोजी" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SjIRen2WZBI/AAAAAAAAAnA/Un2euEmD688/s72-c/Dadabhai+Naoroji.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/06/blog-post_12.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;Dk8FQH88fSp7ImA9WxJXFkw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-3677559452892040358</id><published>2009-06-09T22:20:00.000-07:00</published><updated>2009-06-09T23:20:11.175-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-09T23:20:11.175-07:00</app:edited><title>केसरी सिंह बारहट</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Si9Mwcx0WiI/AAAAAAAAAmY/k-2VKS6Ec18/s1600-h/Kesri+singh+barhat.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5345575677954644514" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 262px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Si9Mwcx0WiI/AAAAAAAAAmY/k-2VKS6Ec18/s400/Kesri+singh+barhat.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;जीवन परिचय&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;मानव जीवन में जिन लोगों ने समाज और राष्ट्र की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित किया ऐसे बिरले पुरुषों का नाम ही इतिहास या लोगो के मन में अमर रहता है  सूरमाओं,सतियों,और संतो की भूमि राजस्थान में एक ऐसे ही क्रांतिकारी,त्यागी और विलक्षण पुरुष हुए कवि केसरी सिंह बारहट  जिनका जन्म २१ नवम्बर १८७२ में श्री कृष्ण सिंह बारहट के घर उनकी जागीर के गांव देवपुरा रियासत शाहपुरा में हुआ  केसरी सिंह की एक माह की आयु में ही उनकी माता का निधन हो गया अतः उनका लालन-पालन उनकी दादी माँ ने किया  उनकी शिक्षा उदयपुर में हुई  उन्होंने बंगला,मराठी,गुजराती आदि भाषाओँ के साथ इतिहास,दर्शन (भारतीय और यूरोपीय) मनोविज्ञान,खगोल शास्त्र,ज्योतिष का अध्ययन कर प्रमाणिक विद्वता हासिल की  डिंगल- पिंगल भाषा की काव्य सृजना तो उनके जन्म जात संस्कारों में शामिल थी ही साथ ही बनारस से श्री गोपीनाथ जी नाम के पंडित को बुलाकर इन्हें संस्कृत भाषा की शिक्षा दिलवाई गई  केसरी सिंह के स्वध्याय के लिए उनके पिता कृष्ण सिंह का प्रसिद्ध पुस्तकालय " कृष्ण वाणी विलास " तो उपलब्ध था ही  राजनीती में वे इटली के राष्ट्रपिता मैजिनी को अपना गुरु मानते थे  मैजिनी की जीवनी वीर सावरकर ने लन्दन में पढ़ते समय मराठी में लिखकर गुप्त रूप से लोकमान्य तिलक को भेजी थी क्योंकि उस समय मैजिनी की जीवनी पुस्तक पर ब्रिटिश साम्राज्य ने पाबन्दी लगा रखी थी  केसरी सिंह जी ने इस मराठी पुस्तक का हिंदी अनुवाद किया था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शिक्षा प्रसार हेतु योजनाएं :-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;केसरी सिंह जी ने समाज खास कर क्षत्रिय जाति को अशिक्षा के अंधकार से निकालने हेतु कई नई-नई योजनाएं बनाई ताकि राजस्थान भी शिक्षा के क्षेत्र में दुसरे प्रान्तों की बराबरी कर सके  उस समय राजस्थान के अजमेर में मेयो कालेज में राजाओं और राजकुमारों के लिए अंग्रेजों ने ऐसी शिक्षा प्रणाली लागु कर रखी थी जिसमे ढल कर वे अपनी प्रजा और देश से कट कर अलग-थलग पड़ जाए  इसीलिय सन १९०४ में नेशनल कालेज कलकत्ता की तरह जिसके प्रिंसिपल अरविन्द घोष थे अजमेर में क्षत्रिय कालेज स्थापित करने की योजना बनाई जिसमे जिसमे राष्ट्रिय भावना की शिक्षा दी जा सके  इस योजना में उनके साथ राजस्थान के कई प्रमुख बुद्धिजीवी साथ थे  इससे भी महत्वपूर्ण योजना राजस्थान के होनहार विद्यार्थियों को सस्ती तकनीकी शिक्षा के लिए सन १९०७-०८ में जापान भेजने की बनाई क्योकि उस सदी में जापान ही एक मात्र एसा देश था जो रूस और यूरोपीय शक्ति को टक्कर दे सकता था अपनी योजना के प्रारूप के अंत में उन्होंने बड़े ही मार्मिक शब्दों में जापान का सहयोग करने के लिए आव्हान किया - "जापान ही वर्तमान संसार के सुधरे हुए उन्नत देशों में हमारे लिए शिक्षार्थ आश्रणीय है ; हमारे साथ वह देश में देश मिलाकर (एशियाटिक बनकर) ,रंग में रंग मिलाकर, (यहाँ रंग से मतलब Racial Colours से है जैसे व्हाइट,रेड ब्लैक) दिल में दिल मिलाकर , अभेद रूप से , उदार भाव से, हमारे बुद्ध भगवान के धर्मदान की प्रत्युपकार बुद्धि से- मानव मात्र की हित-कामना-जन्य निस्वार्थ प्रेमवृति से सब प्रकार की उच्चतर महत्वपूर्ण शिक्षा सस्ती से सस्ती देने के लिए सम्मान पूर्वक आव्हान करता है " इस स्कीम में उन्होंने ऐसे नवीन विचार पेश किये जो उस समय सोच से बहुत आगे थे कि अब जमाना " यथा राजा तथा प्रजा " का न होकर "यथा प्रजा तथा राजा" का है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिक्षा के माध्यम से केसरी सिंह जी ने सुप्त क्षात्रधर्म को जागृत करने हेतु क्षत्रिय और चारण जाति को सुशिक्षित और सुसंगठित कर उनके वंशानुगत गुणों को सुसंस्कृत कर देश को स्वत्तन्त्रता दिलाने का एक भगीरथ प्रयत्न प्रारंभ किया था  इनकी इस योजना में सामाजिक और राजनैतिक क्रांति के बीज थे  केसरी सिंह ने इस विस्तृत योजना में क्षात्र शिक्षा परिषद् और छात्रावास आदि कायम कर मौलिक शिक्षा देने की योजना बनाई और सन १९११-१२ में "क्षत्रिय जाति की सेवा में अपील " निकाली  यह अपील इतनी मार्मिक थी कि बंगाल के देशभक्त विद्वानों ने कहा कि यह अपील सिर्फ क्षत्रिय जाति के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतीय जाति के नाम निकालनी चाहिए थी  अक्षर के स्वरूप पर शोध कार्य शिक्षा के प्रसार के साथ ही वैज्ञानिक खोज का एक बिलकुल नया विषय केसरी सिंह जी ने सन १९०३ में ही " अक्षर स्वरुप री शोध " का कार्य आरम्भ किया  कुछ वर्ष पहले इस प्रारम्भिक शोध के विषय पर केसरी सिंह जी के एक निकट सम्बन्धी फतह सिंह मानव ने राजस्थान विश्वविद्यालय के फिजिक्स के विभागाध्यक्ष से बात करी तो उन्होंने बताया कि अमेरिका की एक कंपनी Bell Company ने लाखों डालर अक्षर के स्वरूप की शोध में खर्च कर दिए लेकिन सफलता नहीं मिली  उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि राजस्थान जैसे पिछडे प्रदेश में और उसमे भी शाहपुरा जैसी छोटी रियासत में रहने वाले व्यक्ति के दिमाग में अक्षर के स्वरूप की शोध की बात कैसे आई &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शस्त्र क्रांति के माध्यम से देश की स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रयास :&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उन्नीसवी शताब्दी के प्रथम दशक में ही युवा केसरी सिंह का पक्का विश्वास इसी सिद्धांत पर था कि आजादी सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ही संभव है  अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के ज्ञापनों से आजादी नहीं मिल सकती  सन १९०३ में वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा आहूत दिल्ली दरबार में शामिल होने से रोकने के लिए उन्होंने उदयपुर के महाराणा फतह सिंह को संबोधित करते हुए " चेतावनी रा चुंगटिया " नामक सौरठे लिखे जो उनकी अंग्रेजो के विरूद्व भावना की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी  सशस्त्र क्रांति की तैयारी के लिए प्रथम विश्व युद्ध (१९१४) के प्रारम्भ में ही वे इस कार्य में जुट गए और अपने दो रिवाल्वर क्रांतिकारियों को दिए और कारतूसों का एक पार्सल बनारस के क्रांतिकारियों को भेजा व रियासती और ब्रिटिश सेना के सैनिको से संपर्क किया  एक गुप्त रिपोर्ट में अंग्रेज सरकार ने कहा कि केसरी सिंह राजपूत रेजिमेंट से संपर्क करना चाह रहा था  उनका संपर्क बंगाल के विप्लव दल से भी था और वे श्री अरविन्द से बहुत पहले १९०३ में ही मिल चुके थे तथा महान क्रान्तिकारी रास बिहारी बोस व शचीन्द्र नाथ शान्याल,ग़दर पार्टी के लाला हरदयाल और दिल्ली के क्रान्तिकारी मास्टर अमीरचंद व अवध बिहारी से घनिष्ठ सम्बन्ध थे  ब्रिटिश सरकार की गुप्त रिपोर्टों में राजपुताना में विप्लव फैलाने के लिए केसरी सिंह बारहट व अर्जुन लाल सेठी को खास जिम्मेदार माना गया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राजद्रोह का मुकदमा :&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;केसरी सिंह पर ब्रिटिश सरकार ने प्यारे लाल नाम के एक साधू की हत्या और अंग्रेज हकुमत के खिलाफ बगावत व केन्द्रीय सरकार का तख्ता पलट व ब्रिटिश सैनिकों की स्वामिभक्ति खंडित करने के षड़यंत्र रचने का संगीन आरोप लगाकर मुकदमा चलाया गया  इसकी जाँच के लिए मि. आर्मस्ट्रांग आई.पी.आई. जी. इंदौर को सौंपी गई जिसने २ मार्च १९१४ को शाहपुरा पहुँच शाहपुरा के राजा नाहर सिंह के सहयोग से केसरी सिंह को गिरफ्तार कर लिया  इस मुकदमे में स्पेशल जज ने केसरी सिंह को २० वर्ष की सख्त आजन्म सजा सुनाई और राजस्थान से दूर हजारी बाग़ केन्द्रीय जेल बिहार भेज दिया गया  जेल में उन्हें पहले चक्की पिसने का कार्य सौपा गया जहाँ वे दाल व अनाज के दानो से क ख ग आदि अक्षर बना कर अनपढ़ कैदियों को अक्षर ज्ञान देते और अनाज के दानो से ही जमीन पर भारत का नक्शा बना कर कैदियों को देश के प्रान्तों का ज्ञान कराते थे  केसरी सिंह का नाम उस समय कितना प्रसिद्ध था उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस समय श्रेष्ठ नेता लोकमान्य तिलक ने अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में केसरी सिंह को जेल से छुडाने का प्रस्ताव पेश किया था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जेल से छूटने के बाद :&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;हजारी बाग़ जेल से छूटने के बाद अप्रेल १९२० में केसरी सिंह ने राजपुताना के एजेंट गवर्नर जनरल (आबू ) को एक बहुत सारगर्भित पत्र लिखा जिसमे राजस्थान और भारत की रियासतों में उतरदायी शासन पद्धति कायम करने के लिए सूत्र रूप से योजना पेश की  इसमें "राजस्थान महासभा" के गठन का सुझाव था जिसमे दो सदन (प्रथम) भूस्वामी प्रतिनिधि मंडल (जिसमे छोटे बड़े उमराव,जागीरदार) और "द्वितीय सदन" सार्वजनिक प्रतिनिधि परिषद् (जिसमे श्रमजीवी,कृषक,व्यापारी ) का प्रस्ताव था  महासभा के अन्य उद्देश्यों के साथ एक उद्देश्य यह भी था :- "राज्य में धार्मिक,सामाजिक,नैतिक,आर्थिक,मानसिक,शारीरिक और लोक हितकारी शक्तियों के विकास के लिए सर्वांगीण चेष्ठा करना " इस पत्र में उनके विचार कितने मौलिक थे उसका अंदाज उनके कुछ वाक्यांशों को पढने से लगता है , " प्रजा केवल पैसा ढालने की प्यारी मशीन है और शासन उन पैसों को उठा लेने का यंत्र " ....... शासन शैली ना पुरानी ही रही ना नवीन बनी , न वैसी एकाधिपथ्य सत्ता ही रही न पूरी ब्यूरोक्रेसी ही बनी  ........ अग्नि को चादर से ढकना भ्रम है -खेल है- या छल है मेरी यही शाक्षी देती है  जिस ज़माने में ब्रिटिश सत्ता को कोई खास चुनौती नहीं थी और रियासतों में नरेशों का एक छत्र शासन था उस समय सन १९२०-२१ में उनके विचारों में प्रजा की शक्ति का कितना महत्व था कि उन्होंने रियासतों के राजाओं के लिए लिखा - " भारतीय जन शक्ति के अतिरिक्त भारत में और कोई समर्थ नहीं,अतः उससे सम्बन्ध तोड़ना आवश्यक नहीं" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उत्तर जीवन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सन १९२०-२१ में सेठ जमनालाल बजाज द्वारा आमंत्रित करने पर केसरी सिंह जी सपरिवार वर्धा चले गए  जहाँ विजय सिंह पथिक जैसे जन सेवक पहले से ही मौजूद थे  वर्धा में उनके नाम से " राजस्थान केसरी " साप्ताहिक शुरू किया गया जिसके संपादक विजय सिंह पथिक थे  वर्धा में ही केसरी सिंह का महात्मा गाँधी से घनिष्ठ संपर्क हुआ  उनके मित्रो में डा.भगवानदास (पहले भारत रत्न) ,राजर्षि बाबू पुरुषोतम दास टंडन,गणेश शंकर विद्यार्थी , चंद्रधर शर्मा , माखनलाल चतुर्वेदी राव गोपाल सिंह खरवा ,अर्जुनलाल सेठी जैसे स्वतंत्रता के पुजारी शामिल थे  देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ होम कर देने वाले क्रान्तिकारी कवि केसरी सिंह ने १४ अगस्त १९४१ को " हरी ॐ तत् सत् " के उच्चारण के साथ अंतिम साँस ली &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चेतावनी रा चुंग्ट्या&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1903 मे लार्ड कर्जन द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार मे सभी राजाओ के साथ हिन्दू कुल सूर्य मेवाड़ के महाराणा का जाना भी शेखावाटी के क्रान्तिकारियो को अच्छा नही लग रहा था इसलिय उन्हे रोकने के लिये शेखावाटी के मलसीसर के ठाकुर भूर सिह ने ठाकुर करण सिह जोबनेर व राव गोपाल सिह खरवा के साथ मिल कर महाराणा फ़तह सिह को दिल्ली जाने से रोकने की जिम्मेदारी केशरी सिह बारहट को दी  केसरी सिह बारहट ने "चेतावनी रा चुंग्ट्या " नामक सौरठे रचे जिन्हे पढकर महाराणा अत्यधिक प्रभावित हुये और दिल्ली दरबार मे न जाने का निश्चय किया &lt;br /&gt;पग पग भम्या पहाड,धरा छांड राख्यो धरम &lt;br /&gt;(ईंसू) महाराणा'र मेवाङ, हिरदे बसिया हिन्द रै 1&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घणा घलिया घमसांण, (तोई) राणा सदा रहिया निडर &lt;br /&gt;(अब) पेखँतां, फ़रमाण हलचल किम फ़तमल ! हुवै 2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिरद गजां घमसांणष नहचै धर माई नहीं &lt;br /&gt;(ऊ) मावै किम महाराणा, गज दोसै रा गिरद मे 3&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओरां ने आसान , हांका हरवळ हालणों &lt;br /&gt;(पणा) किम हालै कुल राणा, (जिण) हरवळ साहाँ हंकिया 4&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नरियंद सह नजरांण, झुक करसी सरसी जिकाँ &lt;br /&gt;(पण) पसरैलो किम पाण , पाणा छतां थारो फ़ता ! 5&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिर झुकिया सह शाह, सींहासण जिण सम्हने &lt;br /&gt;(अब) रळनो पंगत राह, फ़ाबै किम तोने फ़ता ! 6&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सकल चढावे सीस , दान धरम जिण रौ दियौ &lt;br /&gt;सो खिताब बखसीस , लेवण किम ललचावसी 7&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखेला हिंदवाण, निज सूरज दिस नह सूं &lt;br /&gt;पण "तारा" परमाण , निरख निसासा न्हांकसी 8&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखे अंजस दीह, मुळकेलो मनही मनां &lt;br /&gt;दंभी गढ़ दिल्लीह , सीस नमंताँ सीसवद 9&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत बेर आखीह, पताल जे बाताँ पहल &lt;br /&gt;(वे) राणा सह राखीह, जिण री साखी सिर जटा 10&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कठिण जमानो" कौल, बाँधे नर हीमत बिना &lt;br /&gt;(यो) बीराँ हंदो बोल, पातल साँगे पेखियो 11&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब लग सारां आस , राण रीत कुळ राखसी &lt;br /&gt;रहो सहाय सुखरास , एकलिंग प्रभु आप रै 12&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान मोद सीसोद, राजनित बळ राखणो &lt;br /&gt;(ईं) गवरमेन्ट री गोद, फ़ळ मिठा दिठा फ़ता 13&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-3677559452892040358?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/RkjRKdBfGm_GDQowu44ulxtjFQM/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/RkjRKdBfGm_GDQowu44ulxtjFQM/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/RkjRKdBfGm_GDQowu44ulxtjFQM/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/RkjRKdBfGm_GDQowu44ulxtjFQM/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/psqp-1X6y1s" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/3677559452892040358/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=3677559452892040358" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/3677559452892040358?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/3677559452892040358?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/psqp-1X6y1s/blog-post_09.html" title="केसरी सिंह बारहट" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Si9Mwcx0WiI/AAAAAAAAAmY/k-2VKS6Ec18/s72-c/Kesri+singh+barhat.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/06/blog-post_09.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D04ASH4zfSp7ImA9WxJXEUw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-3541830959059460157</id><published>2009-06-04T04:28:00.000-07:00</published><updated>2009-06-04T04:45:49.085-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-04T04:45:49.085-07:00</app:edited><title>सरोजिनी नायडू</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SieyHXbgkpI/AAAAAAAAAmA/_RHG1cBSXnI/s1600-h/sarojini+naidu.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5343435322516607634" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 172px; CURSOR: hand; HEIGHT: 213px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SieyHXbgkpI/AAAAAAAAAmA/_RHG1cBSXnI/s400/sarojini+naidu.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;सरोजिनी नायडू (१३ फरवरी १८७९ - २ मार्च १९४९)का जन्म भारत के हैदराबाद नगर में हुआ था ।&lt;/strong&gt; इनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक नामी विद्वान थे । इनकी माँ एक कवयित्री थीं और बंगला में लिखती थीं । ये बचपन से ही कुशाग्र-बुद्धि थीं । इन्होंने १२ वर्ष की अल्पायु में ही १२हवीं की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण कर ली थीं। कविताएँ लिखना इन्हें प्रकृति से प्राप्त था और १३ वर्ष की आयु में ही इन्होंने लेडी आफ दी लेक नामक कविता रच डाली । सरोजिनी नायडू १८९५ में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड गईं और पढ़ाई के साथ-साथ कविताएँ भी लिखती रहीं । गोल्डन थ्रैशोल्ड उनकी पहली काव्य पुस्तक थी और उसके बाद उनकी आई काव्य पुस्तकें बर्ड आफ टाइम, ब्रोकन विंग ने उन्हें एक सुप्रसिद्ध कवयित्री बना दिया ।&lt;br /&gt;१८९८ में सरोजिनी नायडू, डा. गोविंदराजुलू नायडू की जीवन-संगिनी बनीं। सरोजिनी नायडू से माँ भारती की वेदना देखी नहीं गई और माँ भारती को स्वतंत्र कराने हेतु वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद गईं। १९१४ में इंग्लैंड में ही इनकी पहली भेंट गाँधीजी से हुई और गाँधीजी के विचारों से प्रभावित होकर ये उनकी परम शिष्या बन गईं। गाँधीजी का आशिर्वाद मिलते ही ये पूरी तरह से अपने आप को देश के लिए समर्पित कर दिया और एक कुशल सेनापति की भाँति अपनी प्रतिभा का परिचय हर क्षेत्र (सत्याग्रह हो या संगठन की बात) में दिया।&lt;br /&gt;इन्होंने कई राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व भी किया जिसके लिए इन्हें जेल की यात्रा भी करनी पड़ी । संकटों से न घबराते हुए एक धीर वीरांगना की भाँति गाँव-गाँव घूमकर ये देश-प्रेम का अलख जगाती रहीं और देशवासियों को उनके कर्तव्य की याद दिलाती रहीं । इनके वक्तव्य भारतीयों के हृदय को झकझोर देते थे और देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए प्रेरित कर देते थे । भारत माँ की यह अमर पुत्री क्षेत्रानुसार अपना भाषण अंग्रेजी, हिंदी, बंगला या गुजराती में देती थी । लंदन की &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SiewmEC7ssI/AAAAAAAAAl4/-gjwZhEVmWc/s1600-h/Stamp+of+sarojini.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5343433650865943234" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 143px; CURSOR: hand; HEIGHT: 168px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SiewmEC7ssI/AAAAAAAAAl4/-gjwZhEVmWc/s400/Stamp+of+sarojini.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;सभा में अंग्रेजी में बोलकर इन्होंने वहाँ उपस्थित सभी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था।&lt;br /&gt;अपनी लोकप्रियता और प्रतिभा के कारण १९२५ में कानपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन की ये अध्यक्षा बनीं और १९३२ में भारत की प्रतिनिधि बनकर दक्षिण अफ्रीका भी गईं । भारत की स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद ये उत्तरप्रदेश की पहली राज्यपाल बनीं। श्रीमती एनी बेसेन्ट की प्रिय मित्रा और गाँधीजी की यह प्रिय शिष्या ने अपना सारा जीवन देश के लिए अर्पण कर दिया था । २ मार्च १९४९ को उनका देहांत हुआ।&lt;br /&gt;१३ फरवरी १९६४ को भारत सरकार ने उनकी जयंती के अवसर पर उनके सम्मान में १५ नए पैसे का एक डाकटिकट भी जारी किया।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-3541830959059460157?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/9EDChhTofkbbxZH1wyMwQe2CX_E/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/9EDChhTofkbbxZH1wyMwQe2CX_E/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/9EDChhTofkbbxZH1wyMwQe2CX_E/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/9EDChhTofkbbxZH1wyMwQe2CX_E/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/qpXtKIaPyug" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/3541830959059460157/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=3541830959059460157" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/3541830959059460157?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/3541830959059460157?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/qpXtKIaPyug/blog-post.html" title="सरोजिनी नायडू" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SieyHXbgkpI/AAAAAAAAAmA/_RHG1cBSXnI/s72-c/sarojini+naidu.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>3</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/06/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkcDSXg-cSp7ImA9WxJQFUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-7641038030672478855</id><published>2009-05-29T02:14:00.000-07:00</published><updated>2009-05-29T02:41:18.659-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-29T02:41:18.659-07:00</app:edited><title>चंद्रशेखर आजाद</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Sh-qVfJ0iTI/AAAAAAAAAlg/V7rc5uQRsIM/s1600-h/chandrashekhar+aazad.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5341174969201363250" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 242px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Sh-qVfJ0iTI/AAAAAAAAAlg/V7rc5uQRsIM/s400/chandrashekhar+aazad.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;चंद्रशेखर आजाद (23 जुलाई 1906 - 27 फरवरी 1931) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अत्यंत सम्मानित और लोकप्रिय क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे भगत सिंह के अन्यतम साथियों में से थे। असहयोग आंदोलन समाप्‍त होने के बाद चंद्रशेखर आजाद की विचारधारा में बदलाव आ गया और वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिंदुस्‍तान सोशल रिपब्लिकन आर्मी में शामिल हो गए। उन्‍होंने कई क्रांतिकारी गतिविधियों जैसे काकोरी काण्ड तथा सांडर्स-वध को अंजाम दिया।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जन्म तथा प्रारंभिक जीवन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;चंद्रशेखर आजाद का जन्‍म मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले भावरा गाँव में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ।[तथ्य वांछित] उस समय भावरा अलीराजपुर रियासत की एक तहसील थी। आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी संवत १९५६ के अकाल के समय अपने निवास उत्तर-प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गाँव को छोडकर पहले अलीराजपुर राज्य में रहे और फिर भावरा में बस गए। यहीं चंद्रशेखर का जन्म हुआ। वे अपने माता पिता की पाँचवीं और अंतिम संतान थे। उनके भाई बहन दीर्घायु नहीं हुए। वे ही अपने माता पिता की एकमात्र संतान बच रहे। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। पितामह मूलतः कानपुर जिले के राउत मसबानपुर के निकट भॉती ग्राम के निवासी कान्यकुब्ज ब्राह्मण तिवारी वंश के थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संस्कारों की धरोहर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;चन्द्रशेखर आजाद ने अपने स्वभाव के बहुत से गुण अपने पिता पं0 सीताराम तिवारी से प्राप्त किए। तिवारी जी साहसी, स्वाभिमानी, हठी और वचन के पक्के थे। वे न दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुलम सहन कर सकते थे। भावरा में उन्हें एक सरकारी बगीचे में चौकीदारी का काम मिला। भूखे भले ही बैठे रहें पर बगीचे से एक भी फल तोड़कर न तो स्वयं खाते थे और न ही किसी को खाने देते थे। एक बार तहसीलदार ने बगीचे से फल तुड़वा लिए तो तिवारी जी बिना पैसे दिए फल तुड़वाने पर तहसीलदार से झगड़ा करने को तैयार हो गए। इसी जिद में उन्होंने वह नौकरी भी छोड़ दी। एक बार तिवारी जी की पत्नी पडोसी के यहाँ से नमक माँग लाईं इस पर तिवारी जी ने उन्हें खूब डाँटा ऑर चार दिन तक सबने बिना नमक के भोजन किया। ईमानदारी और स्वाभिमान के ये गुण आजाद ने अपने पिता से विरासत में सीखे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आजाद का बाल्य-काल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बचपन में आजाद भावरा गाँव के छँटे हुए शॅतानो के कमाण्डर इन चीफ थे। आदिवासी भीलों /भील के बालकों के साथ वे दिन-दिन भर घर से गायब रहते ऑर वनो उपवनो में उपद्रव लीलाएँ किया करते थे। गाँव में या गाँव के आस-पास कहीं कुछ उजाड-बिगाड हो तो बिना पूछे ही आजाद का नाम लिख लिया जाता था। बाल्य-काल में आजाद को पेडों पर चढकर गुलाम-डण्डा खेलने का बहुत शॉक था। भील बालकों के साथ तीर-कमठे लेकर निशानेबाजी का अच्छा अभ्यास आजाद ने कर लिया था। आजाद को शिकार खेलने का बचपन में ही शॉक लग गया था। क्रान्तिकारी जीवन में अपने बचपन के साथियों से वे कहा करते थे कि बचपन में उन्हें शेर का मांस खिलाया गया था। आजाद झूठ बोलना या गप लडाना जानते ही नहीं थे। भीतर ऑर बाहर जो था एक सा था। ओरछा के जंगल में एक बार अज्ञातवास के समय साधुवेश में उन्हें पुलिस वालों ने पकडकर पूछा था कि- "तुम्हीं आजाद हो ?" तो आजाद ने बिना झूठ बोले कह दिया था- "हाँ भॅया, हम आजाद नहीं तो क्या हॅ, सभी साधु आजाद होते हॅ। हम किसी के बाप के गुलाम थोडे ही हॅ। हनुमान जी की चाकरी करते हॅ ऑर आजाद रहते हॅ।" पुलिस वाले साधु महाराज को छोडकर चले गए थे। उनका कथन बचपन में उन्हें शेर का मांस खिलाया गया था, सत्य ही हॅ। भीलों के साथ कई बार वे शेर के शिकार में शामिल होते थे। ऑर एक-दो बार अपनी धाक जमाने के लिए कि "शेर का मांस मुझे हानि नहीं पहुँचा सकता, उन्होंने तीख मं आकर शेर का मांस खाया भी था। वॅसे बहुत गर्म होने के कारण शेर का मांस खाया नहीं जाता हॅ।- ( श्रीकृष्ण सरल, महाकाव्य ग्रंथावली, प्रथम संस्करण- २७ फरवरी १९९२ ई०, प्रकाशक बलिदान भारती, २७ दशहरा मैदान, उज्जैन (म०प्र०)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1919 मे हुए जलियां वाला बाग नरसंहार ने उन्हें काफी व्यथित किया 1921 मे जब महात्‍मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन प्रारंभ किया तो उन्होने उसमे सक्रिय योगदान किया। यहीं पर उनका नाम आज़ाद प्रसिद्ध हुआ । इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे गिरफ़्तार हुए और उन्हें १५ बेतों की सज़ा मिली। सजा देने वाले मजिस्ट्रेट से उनका संवाद कुछ इस तरह रहा -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा नाम ? आज़ाद&lt;br /&gt;पिता का नाम? स्वाधीन&lt;br /&gt;तुम्हारा घर? जेलखाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजिस्ट्रेट ने जब १५ बेंत की सजा दी तो अपने नंगे बदन पर लगे हर बेंत के साथ वे चिल्लाते - महात्मा गांधी की जय। बेंत खाने के बाद तीन आने की जो राशि पट्टी आदि के लिए उन्हें दी गई थी, को उन्होंने जेलर के ऊपर वापस फेंका और लहूलुहान होने के बावजूद अपने एक दोस्त डॉक्टर के यहाँ जाकर मरहमपट्टी करवायी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान जब फरवरी १९२२ में चौराचौरी की घटना को आधार बनाकर गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो भगतसिंह की तरह आज़ाद का भी काँग्रेस से मोह भंग हो गया और वे १९२३ में शचिन्द्र नाथ सान्याल द्वारा बनाए गए उत्तर भारत के क्रांतिकारियों को लेकर बनाए गए दल हिन्दुस्तानी प्रजातात्रिक संघ (एच आर ए) में शामिल हो गए। इस संगठन ने जब गाँवों में अमीर घरों पर डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाया जा सके तो तय किया कि किसी भी औरत के उपर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का तमंचा छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उसपर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल शामिल थे, की बड़ी दुर्दशा हुई क्योंकि पूरे गाँव ने उनपर हमला कर दिया था। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। १ जनवरी १९२५ को दल ने देशभर में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी (क्रांतिकारी) बांटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा था। इस पैम्फलेट में रूसी क्रांति की चर्चा मिलती है और इसके लेखक सम्भवतः शचीन्द्रनाथ सान्याल थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजों की नजर में&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इस संघ की नीतियों के अनुसार ९ अगस्त १९२५ को काकोरी कांड को अंजाम दिया गया । लेकिन इससे पहले ही अशफ़ाक उल्ला खान ने ऐसी घटनाओं का विरोध किया था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जाएगा। और ऐसा ही हुआ। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओं - रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को क्रमशः १९ और १७ दिसम्बर १९२७ को फाँसी पर चढ़ाकर शहीद कर दिया। इस मुकदमे के दौरान दल निष्क्रिय रहा और एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रांतिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन यह योजना पूरी न हो सकी। ८-९ सितम्बर को दल का पुनर्गठन किया गया जिसका नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एशोसिएसन रखा गया। इसके गठन का ढाँचा भगत सिंह ने तैयार किया था पर इसे आज़ाद की पूर्ण समर्थन प्राप्त था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चरम सक्रियता&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आज़ाद के प्रशंसकों में पंडित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट जो स्वराज भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने 'फासीवदी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। इसकी कठोर आलोचना मन्मनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है। यद्यपि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को रूस में समाजवाद के प्रशिक्षण के लिए भेजने के लिए एक हजार रूपये दिये थे जिनमें से ४४८ रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर १९२८-३१ के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगतसिंह एसेम्बली में बम फेंकने गए तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गई। सांडर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और फिर बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी उन्होंने की । आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने २३ दिसम्बर १९२९ को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को २८ मई १९३० को भगवतीचरण वोहरा की बमपरीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था । इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना खटाई में पड़ गई थी। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुर की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गाँधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे । झाँसी में रुद्रनारायण, सदाशिव मुल्कापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर मे शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को १ दिसम्बर १९३० को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में जाते वक्त शहीद कर दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शहादत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;२५ फरवरी १९३१ से आज़ाद इलाहाबाद में थे और यशपाल रूस भेजे जाने सम्बन्धी योजनाओं को अन्तिम रूप दे रहे थे। २७ फरवरी को जब वे अल्फ्रेड पार्क (जिसका नाम अब आज़ाद पार्क कर दिया गया है) में सुखदेव के साथ किसी चर्चा में व्यस्त थे तो किसी मुखाविर की सूचना पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया। इसी मुठभेड़ में आज़ाद शहीद हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज़ाद के शहादत की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिए उनका अन्तिम संस्कार कर दिया । बाद में शाम के वक्त उनकी अस्थियाँ लेकर युवकों का एक जुलूस निकला और सभा हुई। सभा को शचिन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीरामबोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को जवाहरलाल नेहरू ने भी सम्बोधित किया। इससे पूर्व ६ फरवरी १९२७ को मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे क्योंकि उनके देहान्त से क्रांतिकारियों ने अपना एक सच्चा हमदर्द खो दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;व्यक्तिगत जीवन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आजाद एक देशभक्त थे। अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से सामना करते वक्त जब उनकी पिस्तौल में आखिरी गोली बची तो उसको उन्होंने खुद पर चला कर शहादत दी थी। उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख था और इसका उपयोग उन्होंने कई दफ़े किया। एक बार वे दल के लिए धन जुटाने हेतु गाज़ीपुर के एक मरणासन्न साधु के पास चेला बनकर भी रहे ताकि उसके मरने के बाद डेरे के पाँच लाख की सम्पत्ति उनके हाथ लग जाए पर वहाँ जाकर उन्हें पता चला कि साधु मरणासन्न नहीं था और वे वापस आ गए। रूसी क्रान्तिकारी वेरा किग्नर की कहानियों से वे बहुत प्रभावित थे और उनके पास हिन्दी में लेनिन की लिखी एक किताब भी थी। हंलांकि वे कुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने मे ज्यादा आनन्दित होते थे। जब वे आजीविका के लिए बम्बई गए थे तो उन्होंने कई फिल्में देखीं। उस समय मूक फिल्मों का ही प्रचलन था पर बाद में वे फिल्मो के प्रति आकर्षित नहीं हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रशेखर आजाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारंभ किया गया आंदोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्‍वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों के बाद 15 अगस्‍त सन् 1947 को भारत की आजादी का उनका सपना पूरा हुआ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-7641038030672478855?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zsHkEmw_36D85anC5RD-7156K34/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zsHkEmw_36D85anC5RD-7156K34/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zsHkEmw_36D85anC5RD-7156K34/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zsHkEmw_36D85anC5RD-7156K34/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/RpS1iNz8o5I" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/7641038030672478855/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=7641038030672478855" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/7641038030672478855?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/7641038030672478855?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/RpS1iNz8o5I/blog-post.html" title="चंद्रशेखर आजाद" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Sh-qVfJ0iTI/AAAAAAAAAlg/V7rc5uQRsIM/s72-c/chandrashekhar+aazad.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>3</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/05/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0EFQ3wyeCp7ImA9WxVaGEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-7274709182659033419</id><published>2009-04-16T00:49:00.000-07:00</published><updated>2009-04-16T04:33:32.290-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-16T04:33:32.290-07:00</app:edited><title>मदर टेरेसा</title><content type="html">&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Seb81jcetGI/AAAAAAAAAkg/4mp38UQ6CiI/s1600-h/mother-theresa.jpg"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325221606390150242" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 298px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Seb81jcetGI/AAAAAAAAAkg/4mp38UQ6CiI/s400/mother-theresa.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; मदर टेरेसा ( २६ अगस्त, १९१० -- ५ सितम्बर) , १९९७ ) एक अल्बानियाई (Albanian-born) थी रोमन कैथोलिक नन (nun) के रूप में जन्म ली, जो भारतीय नागरिकता के साथ कोलकाता ( कलकत्ता ) , भारत में १९५० में मिशनरीज ऑफ चेरिटी (Missionaries of Charity) की स्थापना की. पैंतालिस साल सेअधिक उन्होंने गरीब, अनाथ , और मरते लोगो की सेवा की और मिशनरीज ऑफ चेरिटी को पहले भारत और तब अन्य देशों में मार्गदर्शन किया&lt;br /&gt;१९७० तक वह एक मानवतावादी के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हुई और गरीबों और असहायों की सहायता की , और माल्कम Muggeridge के द्वारा वृत्तचित्र, और पुस्तक , परमेश्वर के लिए कुछ सुंदर एक भाग मेंउन्होंने १९७९ में नोबेल शांति पुरस्कार १९८० में उनके लिए मानवीय कार्य के लिए भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न जीता मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चेरिटी का विस्तार जारी रहा , और उनके मौत के समय यह १२३ देशों में ६१० मिशन के साथ कार्यशील थी , HIV/AIDS के साथ कुष्ठ और तपेदिक , सूप रसोईघर , परामर्श और परिवार के बच्चों के कार्यक्रम , अनाथालयों , और स्कूलों के लिए घर के साथ&lt;br /&gt;उनकी मृत्यु के बाद वे beatified पोप जॉन पॉल द्वितीय के द्वारा धन्य घोषित हुई और कलकत्ता का धन्य टेरेसा की उपाधि मिली&lt;br /&gt;मदर टेरेसा को दुनिया भर में सकारात्मक ख्याति मिली है, और वह कई व्यक्तियों सरकारों और संगठनों द्वारा सराही गई हैं ,लेकिन इस सकारात्मक प्रतिक्रिया के अलावा , उन्हें आलोचना की विभिन्न श्रेणी के का सामना करना पड़ा हैइसमे शामिल है विभिन्न गैर ईसाई समेत क्रिस्टोफर हित्चेंस और अरूप चटर्जी जैसे नास्तिक और विश्व हिन्दू परिषद उनके कार्य के खिलाफ विरोध इसमे शामिल है , एक मरणशील का बप्तिस्मा, गर्भपात पर एक मजबूत जीवन समर्थक दृष्टान्त और आध्यात्मिक गरीबी की अच्छाईपर विश्वास विभिन्न चिकित्सा पत्रिकाओं ने भी उनके आश्रम में उनके चिकित्सा सेवा की आलोचना की और दान के पैसो को अपारदर्शी प्रकृति से खर्च किए जाने पर भी चिंता की गई है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;प्रारंभिक जीवन&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;अगनेस गोंक्स्हा (अल्बानियाई के लिए " rosebud " ) Bojaxhiu का जन्म २६ अगस्त, १९१०, Skopje , अब मैसिडोनिया। की राजधानी में हुआ वह Shkodër अल्बानिया के एक परिवार के बच्चो में सबसे छोटी थी , अल्बानियाईनिकोला और द्रनाफिले से जन्मी " गुलाब " घरेलु नाम Bojaxhiu Nikollë&lt;br /&gt;अल्बानियाई राजनीति में शामिल किया गया था ।१९१९ में एक राजनीतिक बैठक के बाद वह बीमार होकर मर गए तब वह करीब आठ साल के थे&lt;br /&gt;अपने पिता की मृत्यु के बाद , उसे अपनी माँ ने रोमन कैथोलिक के रूप में पालाग्राफ क्लुकास की आत्मकथा के अनुसार उसके प्रारंभिक जीवन में अगनेस मिशनरियों के जीवन और उनकी सेवा की कहानियो से बहुत प्रभावित था और १२ साल की उम्र तक वह निर्णय कर चुकी थी की वह स्वयं को एक धार्मिक जीवन के प्रति समर्पित कर देगी।&lt;br /&gt;उन्होंने १८ साल की उम्र में मिशनरी के रूप में सिस्टर ऑफ़ लोरेटो में शामिल होने के लिए घर छोड़ दिया उन्होंने बाद में कभी माँ या बहन को नही देखा.&lt;br /&gt;अगनेस प्रारम्भ में रथफर्नहम आयरलैंड में अंग्रेजी जानने के लिए लोरेटो अब्बे गया , जिस भाषा को सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो भारत में बच्चो को पद्धति थी।&lt;br /&gt;वह १९२९ में भारत आई और हिमालय पर्वतों के पास दार्जिलिंग, में अपना शिक्षार्थी जीवन प्रारम्भ किया उसने अपनी धार्मिक मन्नतें एक नून के रूप में २४ मई १९३१ पहली बार लिया जिस समय उन्होंने अपना नाम Thérèse डे Lisieux से मिशनरियों के संरक्षक संत, मदर टेरेसा रखा उसने १४ मई १९३७ को अपनी पवित्र दीक्षा लोरेटो कोंवेंट में एक शिक्षक के रूपमे सेवा किया&lt;br /&gt;यद्यपि टेरेसा ने स्कूल में पढाने का आनंद लिया , वह कोलकोता के आस पास की गरीबी से परेशान थी १९४३ में अकाल से नगर में दुःख और मौत आई , और अगस्त १९४६ में हिन्दू / मुस्लिम हिंसा से नगर में निराशा और दहशत फ़ैल गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;मिशनरीज ऑफ चेरिटी&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;१० सितम्बर १९४६ को टेरेसा ने जो अनुभव किया उसे बाद में " कॉल के भीतर कॉल "के रूप में तब वर्णन किया जब वह दार्जिलिंग के लोरेटो कान्वेंट में वार्षिक समारोह की यात्रा पर थी "मै कॉन्वेंट को गरीबो के बीच रहकर सहायता करने के लिए छोड़ने वाली थी। यह एक आदेश था "विफलता इस विश्वास को तोड़ने के लिए रहता "&lt;br /&gt;उसने १९४८ में गरीबो के साथ अपना मिशनरी कार्य जरी रखा , अपनी पारंपरिक लोरेटोकी आदतों को बदलते हुए एक सरल सफेद सूती chira नीले रंग के बॉर्डर के साथ , भारतीय नागरिकता अपनाया और झुग्गी बस्तियों में डेरा जमाया&lt;br /&gt;प्रारंभ में उन्होंने मोतीझील में एक स्कूल प्रारम्भ किया , जल्द ही उन्होंने बेसहारा और भूख से मर रहे लोगो की आवश्यकताओं की ओर प्रवृत हुई उनके प्रयासों ने भारत्या अधिकारीयों का ध्यान आकृष्ट किया जिनमें प्रधानमंत्री शामिल थे ,जिन्होंने उनकी सराहना की .&lt;br /&gt;टेरेसा ने अपनी डायरी में लिखा की उनका पहला साल कठिनाइयों से भरपूर था उनके पास कोई आमदनी नही थी और भोजन और आपूर्ति के लिए भिक्षावृत्ति भी किया इन शुरूआती महीनो में टेरेसा ने संदेह , अकेलापन , और आरामदेह जीवन में वापस जाने की लालसा को महसूस किया , उन्होंने अपनी डायरी में लिखा&lt;br /&gt;टेरेसा ने ७ अक्तूबर १९५० को बिशप के प्रदेश मण्डली जो मिशनरीज ऑफ चेरिटी बना.वेटिकेन की आज्ञा प्राप्त कर प्रारम्भ किया इसका उद्देश्य उनके अपने शब्दों में " भूखे , नंगा , बेघर , लंगड़ा , अंधा , पुरे समाज से उपेक्षित, प्रेमहीन , जो लोग समाज के लिए बोझ बन गए हैं और सभी के द्वारा दुत्कारेगए हैं की देखभाल करना है यह कोलकाता में १३ सदस्यों के साथ प्रारम्भ हुआ : आज यहाँ ४००० से अधिक नन अनाथालयों , एड्स आश्रम और दुनिया भर में दान केन्द्रों , और शरणार्थियों की , अन्धे , विकलांग , वृद्ध , शराबियों , गरीबों और बेघर , और बाढ़ , महामारी , और अकाल पीड़ितों के देखभाल के लिए कार्य कर रही हैं.&lt;br /&gt;१९५२ में मदर टेरेसा ने कोलकाता शहर उपलब्ध कराये गए जगह में अपना पहला घर खोला भारतीय अधिकारियों की सहायता से उन्होंने एक उपेक्षित हिंदू मन्दिर को मरणशील के लिए घर कालीघाट में परिवर्तित किया ,गरीबों के लिए एक मुफ्त आश्रम इसने इसका नाम कालीघाट रखा , शुद्ध हृदय का घर ( निर्मल हृदय )जो घर लाये गए उन्हें चिकित्सा सुविधा दिया गया और उन्हें सम्मान के साथ मरने का अवसर दिया गया , उनके रीती रिवाज़ के साथ , मुसलमानों ने कुरान पढ़ा , हिंदू गंगा से पानी प्राप्त किए और कैथोलिक ने अन्तिम संस्कार किए.उन्होंने कहा " एक सुंदर मृत्यु , जो लोग जानवरों की तरह रहते थे और स्वर्गदूतों जैसे मरना चाहते थे - प्रेम चाहते थे&lt;br /&gt;मदर टेरेसा जल्दी ही एक घर कुष्ठ से पीड़ित लोगों के लिए खोला , कुष्ठ रोग के नाम से &lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Seb81pdJEDI/AAAAAAAAAko/TzFGedQbEh0/s1600-h/mother+teresa.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325221608003538994" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 293px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Seb81pdJEDI/AAAAAAAAAko/TzFGedQbEh0/s400/mother+teresa.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;जाना&lt;/span&gt; और आश्रम का नाम शांति नगर ( शांति की शहर ) मिशनरीज ऑफ चेरिटी ने कई कुष्ठ रोग क्लीनिक की स्थापना पूरे कलकत्ता में दवा उपलब्ध कराने , पट्टियाँ और खाद्य पदार्थ प्रदान करने के लिए की&lt;br /&gt;मिशनरीज ऑफ चेरिटी ने ढेरो संख्या में बच्चों को को अपनाया , मदर टेरेसा ने उनके लिए घर बनाने के लिए जरूरत महसूस कियाउन्होंने १९५५ में निर्मला शिशु भवन खोला, शुद्ध हृदय के बच्चे का घर ,बेघर अनाथों के लिए युवाओं के लिए स्वर्ग.&lt;br /&gt;व्यवस्था ने शीघ्र ही रंगरूटों धर्मार्थ दान दोनों को आकर्षितकरना शुरू किया और १९६० तक पूरे घर भारत में अनाथालयों, और कोढ़ी घरो के आश्रम की स्थापना की मदर टेरेसा के व्यवस्था का विस्तार पूरे विश्व में हैंभारत से बाहर इसका पहला घर १९५५ में पाँच बहनों के साथ वेनेजुएला में खोला उसके बाद रोम, तंजानिया, और ऑस्ट्रिया ने १९६८ में खोला , १९७० के दौरान एशिया, अफ्रीका, यूरोप, और संयुक्त राज्य अमेरिका के दर्जनों देशों में घर खोले और नीव डाली उनका दर्शन और कार्यान्वयन ने कुछ आलोचना का सामना किया मदर टेरेसा के आलोचकों को उनके ख़िलाफ़ कम सबूत पाने पर दाऊद स्कॉट ने लिखा की मदर टेरेसा ने खुद को सीमित रखने के बजाए लोगों को जीवित गरीबी से निपटनेमें रखा है ।&lt;br /&gt;पीड़ितपर उनके विचार पर भी आलोचना की गई :&lt;br /&gt;अल्बेर्ता रिपोर्ट (Alberta Report) के एक आलेख के अनुसार उन्होंने यह महसूस किया की पीडा लोगो को यीशु के करीबलाएगी.लम्बी बीमारी से ग्रस्त रोगियों की मरणशील गृह में की जा रही सेवा की भी मेडिकल प्रेस में आलोचना की गई , खासकर लांसेट (The Lancet) और ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (British Medical Journal) में , जिसने इसका दुबारा प्रयोग hypodermic नीडल्स (hypodermic needles), गरीबों के जीवन स्तर सहित सभी रोगियों के लिए ठंडे स्नान और और विरोधी भौतिकवादी दृष्टिकोण के लिए किया जो व्यवस्थित निदान के निवारण के लिए है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;अंतर्राष्ट्रीय दान&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;१९८२ में, बेरूत के घेर (Siege of Beirut) घेराबंदी चरम पर थी तो मदर टेरेसा ने फ्रंट लाइन अस्पताल में फंसे ३७ बच्चों को इजरायली सेना (Israeli army) और फिलिस्तीनी छापामारों के बीच आस्थाई समझौता कर बचाया. रेड क्रॉस कामगारों के साथ उन्होंने युद्ध क्षेत्र से तबाह अस्पताल की यात्रा की ताकि युवा रोगियोंसे खाली कराया जा सके&lt;br /&gt;जब पूर्वी यूरोप ने बढे हुए खुलेपन का १९८० के अंत में अनुभव किया , तो उन्होंने अपना प्रयास का विस्तार कम्युनिस्ट देशों में किया जिन्होंने पहले मिशनरीज ऑफ चेरिटी की दर्जनों .परियोजनाओं को अस्वीकार कर दिया था , आलोचनाओं से अलग वह गर्भपात (abortion) और तलाक (divorce) के ख़िलाफ़ सख्ती से खड़ी रही , "कोई बात नही की कोई क्या कहता है , आपको इसे एक मुस्कराहट के साथ स्वीकार करना चाहिए और अपना काम करना चाहिए "&lt;br /&gt;मदर टेरेसा इथियोपिया (Ethiopia) में भूखे चेरनोबिल (Chernobyl) में विकिरण का शिकार आर्मेनिया में भूकंप पीड़ितों की मदद के लिए यात्रा की १९९१ में मदर टेरेसा पहली बार अपने गृह देश में लौटी और अल्बानिया के तिरने (Tirana)में मिशनरीज ऑफ चेरिटी ब्रदर्स होम की स्थापना की&lt;br /&gt;१९९६ तक वह १०० से अधिक देशो में ५१७ से अधिक मिसनो का सञ्चालन कर रही थी कई सालो में मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चेरिटी १२ से बढ़कर हजारों में " दुनिया भर में ४५० केन्द्रों .में "निर्धनतम " की सेवा के लिए हो गए&lt;br /&gt;मिशनरीज ऑफ चेरिटी का पहला घर संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यू यार्क; के दक्षिण Bronx (South Bronx) में स्थापित किया गया , १९८४ तक व्यवस्था ने पूरे देश में १९ प्रतिष्ठानों को संचालित किया.&lt;br /&gt;प्राप्त किया गया दान के पैसा का खर्च की कुछ ने आलोचना की क्रिस्टोफर Hitchens (Christopher Hitchens) और स्टर्न (Stern) ने कहा है कि दान में गरीबों के ऊपर खर्च करने के इरादे से दिया गया पैसा अन्य परियोजनाओं पर खर्च किया गया था .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;घटता स्वास्थ्य और मौत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पोप जॉन पॉल द्वितीय (Pope John Paul II) के पास १९८३ में जाने के दौरान मदर टेरेसा को रोम में दिल का दौरा पड़ा १९८९ में दुसरे हमले के बाद उन्हें कृत्रिम पेसमेकर (artificial pacemaker) लगाया गया १९९१ में ,मेक्सिको में निमोनिया (pneumonia) के साथ युद्ध के बाद उन्होंने आगे और हृदय की समस्याओं का सामना करना पड़ा उन्होंनेमिशनरीज ऑफ चेरिटी .के प्रमुख के रूप में अपने इस्तीफे की पेशकश की स्थिति लेकिन वयास्था की नन ने एक्गुप्त मतदान में रहने का मत दिया मदर टेरेसा व्यवस्था में प्रमुख के रूप में काम को जारी रखने पर सहमत हो गई&lt;br /&gt;अप्रैल १९९६ में मदर टेरेसा गिर गई और अपना हँसिया (collar bone) तोड़ दिया अगस्त में वह मलेरिया और बाईं ओर हृदय वेंट्रिकल (ventricle) की विफलता पीड़ित थी उनका हृदय शल्य चिकित्सा (heart surgery) हुआ , पर यह स्पस्ट था की उनका स्वास्थ्य गिर रहा था १३ मार्च १९९७ को वह मिशनरीज ऑफ चेरिटी के प्रमुख के पड़ से हट गई और ५ सितम्बर (September 5)१९३७ को मर गई&lt;br /&gt;कलकत्ता के आर्कबिशप हेनरी सेबेस्टियन डिसूजा ने कहा , वह एक पुजारी को मदर टेरेसा की अनुमति पर झाड़ फूंक (exorcism) के अनुमति दी जब वह हृदय की समस्याओं के कारण पहली अस्पताल में भरती हुई क्योंकि उसने सोंचा की वह शैतान के हमले के तहत है&lt;br /&gt;उनकी मृत्यु के समय , मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चेरिटी में ४००० से अधिक बहने थी, एक संबद्ध भाईचारे के ३०० सदस्य और १२३ देशों के संचालित ६१० मिशन में १००,००० से अधिक स्वयमसेवक रखे (lay) थे इनमे एचआईवी / एड्स, कुष्ठ रोग और तपेदिक, सूप रसोई (soup kitchen)s , परामर्श और परिवार के बच्चों के कार्यक्रम , अनाथालयों और स्कूलों के लिए आश्रम और घर शामिल हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वैश्विक मान्यता और पुरस्कार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारत में स्वागत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदर टेरेसा को सितम्बर १९९७ में उनके अन्तिम संस्कार के पहले एक सप्ताह के लिए सेंट थॉमस , कोलकाता (St Thomas, Kolkata) में रखा गया भारत सरकार द्वारा भारत में सभी धर्मों के गरीबों के लिए की गई उनकी सेवाओ के प्रति आभार प्रकट करने के लिए राज्य द्वारा अंतिम संस्कार (state funeral) मंजूर किया गया.&lt;br /&gt;मदर टेरेसा को भारत सरकार द्वारा पहली बार एक शताब्दी के तिहाई समय से अधिक मान्यता दी गई जब उन्हें १९६२ में पद्मश्री से सम्मानित किया गया बाद के दशकों में उन्होंने १९७२ में , जवाहरलाल नेहरू अंतर्राष्ट्रीय समझ के लिए पुरस्कार और १९८० में भारतीय पुरस्कार भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार , भारत रत्न समेत पुरस्कारों को प्राप्त करना जारी रखा&lt;br /&gt;मदर टेरेसा पर भारतीय विचार समान रूप से अनुकूल नहीं थे उनके आलोचक [[अरूप चटर्जी&lt;br /&gt;अरूप चटर्जी]] (Aroup Chatterjee) जो कोलकाता में जन्मे और पले लेकिन लंदन में रहते हैं , बताते हैं की " वह अपने जीवनकाल में कोलकाता में एक महत्वपूर्ण पहचान नहीं थी "चटर्जी मदर टेरेसा को अपने गृह शहर की एक नकारात्मक छवि को बढ़ावा देने के लिए दोषी ठहराया है उनकी उपस्थिति और व्यक्तित्व भारतीय राजनीतिक दुनिया में अंश में है , क्योंकि वह प्रायः हिंदू अधिकार (Hindu Right). का विरोध करती थी भारतीय जनता पार्टी उनसे ईसाई दलित पर टकराती थी पर उनकी मौत पर प्रशंशा की और उनके संस्कार में अपना एक प्रतिनिधि भेजा विश्व हिंदू परिषद (Vishwa Hindu Parishad) दूसरी ओर राजकीय अन्तिम संस्कार को मंजूरी देने के लिए सरकार की निर्णय का विरोध किया इसके सचिव गिरिराज किशोर (Giriraj Kishore) ने कहा की " उनका पहला कर्तव्य चर्च था और समाज सेवा आकस्मिक " और उन्हें ईसाइयों के तरजीह और मरने वालो का " गुप्त बप्तिस्मा " करने का आरोप लगाया पर पृथ्वी मेनन ने भारतीय पाक्षिक फ्रंट लाइन (Frontline) के मुख पृष्ठ पर श्रद्धांजलि लेख में इन आरोपों को " घटिया झूठ " बता कर खारिज कर दिया और कहा की " लोगो की समझ पर कोई प्रभाव नही डालते हैं खासकर कोलकाता में "यद्यपि " निस्वार्थ की देखभाल " , ऊर्जा और बहादुरी , की सराहना करते हुए , भी मेनन मदर टेरेसा की गर्भपात के खिलाफ सार्वजनिक चुनाव प्रचार के आलोचक थी जो गैर राजनीतिक होने का दावा करती थी अभी हाल ही में भारतीय दैनिक द टेलीग्राफ (The Telegraph) ने उन्हें " बर्बादी का संत " कहा और उल्लेख किया किया की " रोम को यह जांच करनी चाहिए की क्या वह गरीबो की स्थिति को ऊपर उठाने के लिए कुछ करती थी या मात्र बीमार और जरूरतमंद और मरणशील की देखभाल कि.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रिसेप्शन में शेष विश्व&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;व्हाइट हाउस (White House) समारोह में मदर टेरेसा को स्वतंत्रता के राष्ट्रपति पदक (Presidential Medal of Freedom) प्रस्तुत किया&lt;br /&gt;१९६२ में मदर टेरेसा ने अंतर्राष्ट्रीय समझ के लिए फिलीपींसआधारित रेमन मैगसेसे पुरस्कार (Ramon Magsaysay Award) प्राप्त किया ,दक्षिण पूर्व एशिया में काम करने के लिए दिया गया प्रशश्ति पत्र में कहा गया " न्यासी बोर्ड ने एक विदेशी भूमि के उनके दयालु नितान्त गरीबों के संज्ञान को जाना , जिसकी सेवा में उसने एक नए मंडली का नेतृत्व किया १९७० के प्रारम्भ में मदर टेरेसा एक अंतरराष्ट्रीय हस्ती बन गई उनकी शोहरत ने १९६९ में वृत्तचित्रपरमेश्वर के लिए कुछ सुंदर को आकर्षित किया जो माल्कम Muggeridge{/३ } द्वारा फिल्माया गया और उनके १९७१ की उसी शीर्षक की किताब भी थी (Malcolm Muggeridge)चल गया था Muggeridge उस समय एक आध्यात्मिक यात्रा पर थे इस वृत्तचित्र के फिल्मांकन के दौरान खराबप्रकाश व्यवस्था की स्थिति में फुटेज में लिया गया , खासकर मरणशील के लिए घर , को दल द्वारा उपयोग नहीं होने की संभावना मन गया भारत से लौटने के बाद लेकिन यह पाया गया की फुटेज भी अत्यंत रोशनी वाले हैंMuggeridge दावा किया कि यह मदर टेरेसा का " ईश्वरीय प्रकाश " का एक चमत्कार था दल के अन्य ने सोचा की यह एक नई प्रकार की अति संवेदनशील कोडक (Kodak) फिल्म के कारण था .[४६]Muggeridge बाद में कैथोलिक संप्रदाय में परिवर्तित हो गए .&lt;br /&gt;लगभग इस समय ,कैथोलिक विश्व मदर टेरेसा का सार्वजनिक आदर करने लगेसन् १९७१ में पॉल छठी (Paul VI) ने उन्हें पहला पोप जॉन XXIII (Pope John XXIII) शांति पुरस्कार दिया , गरीबों के लिए कार्य के लिए सराहना की , शांति के लिए प्रयास और ईसाई दान का प्रदर्शन बाद में उन्होंनेपासम में तेर्रिस पुरस्कार (Pacem in Terris Award) ( १९७६ ) प्राप्त किया उनकी मृत्यु के बाद से , मदर टेरेसा ने तेजी से संतवाद (sainthood) की दिशा में कदम उठाने के साथ प्रगति की , वर्तमान में beatified (beatified) होने के स्तर तक पहुँच गई&lt;br /&gt;मदर टेरेसा सरकारों और नागरिक संगठनों दोनों के द्वारा सम्मानित किया गया यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका प्रत्येक ने बार बार पुरस्कारों को प्रदान किया १९८३ में ऑर्डर ऑफ मेरिट (Order of Merit) और १६ नवंबर, १९९६ को संयुक्त राज्य अमेरिका की मानद नागरिकता प्राप्त की मदर टेरेसा की अल्बानियाई मातृभूमि ने उन्हें १९९४ में राष्ट्र का स्वर्ण आदर प्रदान किया उनकी यह स्वीकृति और हैती सरकार द्वारा प्रदानित अन्य सम्मान ने विवादास्पद साबित किया मदर टेरेसा की आलोचना खासकर वाम (left) से की गई , यह Duvalier (Duvalier) , भ्रष्ट व्यापारी जैसे चार्ल्स Keating (Charles Keating) और राबर्ट मैक्सवेल (Robert Maxwell) को तथाकथित रूप से समर्थन देने के लिए थी कीटिंग मामले में उन्होंने सुनवाई करने वाले जज को दया दिखाने को लिखा&lt;br /&gt;पश्चिम और भारतीय विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधि (honorary degree) प्रदान की अन्य नागरिक सम्मान में मानवता शांति और भाईचारे को लोगों के बीच में बढ़ावा देने के लिए , ( १९७८ ) ,में बैल्ज़ान प्राइज़ (Balzan Prize) और अल्बर्ट श्वित्ज़र (Albert Schweitzer) अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार ( १९७५ ) शामिल है&lt;br /&gt;१९७९ में मदर टेरेसा को नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) से सम्मानित किया गया , गरीबी पर जीत हासिल करने के संघर्ष करने के लिए, जो शांति के लिए खतरा भी गठित करता है "उन्होंने परंपरागत औपचारिक नोबेल भोज से इनकार कर दिया दिया, और कहा की दी जा रही १९२००० डॉलर की धनराशि भारत में गरीबों के लिए दिया जाय उन्होंने कहा की पृथ्वी के पुरस्कार तभी महत्वपूर्ण है उनकी मदद से दुनिया के जरूरतमंद की मदद हो जब मदर टेरेसा ने पुरस्कार प्राप्त किया , उन्होंने कहा" हम विश्व शांति को बढ़ावा देने के लिए है क्या कर सकते हैं ? "उन्होंने उत्तर दिया " घर पर जाएँ और अपने परिवार से प्रेम करे . "इस विषय पर नोबेल भाषण देते हुए ,उन्होंने कहा की " दुनिया भर में , न केवल गरीब देशों में बल्कि मैंने पाया कि पश्चिम की गरीबी को दूर करना अधिक कठिन है जब मैं सड़क पर से एक भूखे व्यक्ति को उठाती हूँ , मैं उसे एक प्लेट चावल , रोटी का एक टुकड़ा दे संतुष्ट हो जाती हूँ मैं ने उस भूख को निकाल दिया है लेकिन एक व्यक्ति है जो बंद हैं , जो अवांछित , बिना प्रेम , भय को अनुभव करता है , जिस व्यक्ति को समाज से बहार कर दिया गया है - वह गरीबी इतनी पीडादायक है की की मै बहुत कठिन मानती हूँ अधिक विशेष रूप में वे गर्भपात के रूप में दुनिया में शांति का सबसे बड़ा विध्वंसक बताती है.&lt;br /&gt;उनकी मृत्यु धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक समुदायों .दोनों में दुःख था श्रद्धांजलि में , पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ, ने कहा था कि वे " दुर्लभ और एक अद्वितीय व्यक्ति थी जो लंबे समय तक उच्च प्रयोजनों के लिए जिया गरीबों , बीमार , और वंचित के लिए उनका जीवन भर का याग हमारे मानवता की सेवा के लिए सबसे बड़ा उदहारण है "[५३]पूर्व संयुक्त राष्ट्र के महासचिव (U.N. Secretary-General)जविएर Péरेज़ डे Cuéलार (Javier Pérez de Cuéllar) ने कहा : " वह संयुक्त राष्ट्र है वह विश्व में शांति है . "अपने जीवनकाल के दौरान और उसकी मौत बाद में मदर टेरेसा सतत (Gallup)सबसे व्यापक रूप से अमेरिका में , पसंदीदा व्यक्ति (admired person)के रूप में पी गई और १९९९ में उन्हें एक अमेरिकी जनमत सर्वेक्षण में सबसे प्रशांशित व्यक्ति के रूप में २० वे स्थान पर रही उन्होंने स्वेच्छा से अन्य दिए गए उत्तर को बाहर कर दिया और बहुत युवा के अतिरिक्त सभी प्रमुख जनांकिकीय श्रेणियों में प्रथम स्थान पर थी&lt;br /&gt;अपने जीवन के अंत में , मदर टेरेसा ने पश्चिमी मीडिया में कुछ नकारात्मक ध्यान आकर्षितकिया पत्रकार क्रिस्टोफर हित्चेंस (Christopher Hitchens) एक दिया गया है उनके का सर्वाधिक सक्रिय आलोचकों में एक है .वह उनके बारे में हेल्स एंगल वृतचित्र के सह लेखन और कथन को ब्रिटिश चैनल ४ (Channel 4) के लिए लिखने के लिए प्रेरित हुए अरूप चटर्जी (Aroup Chatterjee) के ऐसे एक कार्यक्रम के बनने के बाद , यद्यपि चटर्जी अंतिम उत्पाद के संवेदनशील दृष्टिकोण से अप्रसन्न हैं हित्चेंस ने अपनी आलोचना का विस्तार १९९५ में एक पुस्तक मिशनरी की स्थिति (The Missionary Position).में किया&lt;br /&gt;चटर्जी लिखते हैं कि जब वह जीवित थी तो मदर टेरेसा और उनके आधिकारिक जीवनी लेखको ने अपनी जांचमें उनके साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया पश्चिमी प्रेस कवरेज में अपनी रक्षा करने में असफल रहे वह ब्रिटेन मेंगार्जियन (The Guardian) के एक रिपोर्ट का उदहारण देते हैं जिसका उनके अनाथालयों . पर "कठोर " ( और काफी विस्तृत ) हमला , घोर उपेक्षा और शारीरिक और भावनात्मक शोषण " ,का आरोप " और अन्य वृतचित्र मदर टेरेसा : समय के लिए बदलें ? कई यूरोपीय देशों में प्रसारण चटर्जी और हित्चेंस दोनों के अपने की गई आलोचना के अपने रूख हैं&lt;br /&gt;जर्मन पत्रिका स्टर्न (Stern) ने मदर टेरेसा की मृत्यु की पहली वर्षगांठ पर एक लेख प्रकाशित किया यह सम्बंधित वित्तीय मामलों और दान का खर्च से जुडा है चिकित्सा प्रेस ने भी उनकी आलोचना प्रकाशितकी है, बहुत से उत्पन्न होने वाली विभिन्न दृष्टिकोण और रोगियों पर ' की जरूरतप्राथमिकतायें है अन्य आलोचकों में शामिल हैं तारिक अली (Tariq Ali), संपादकीय समिति के एक सदस्य के नई वामपंथियों की समीक्षा (New Left Review) और आयरलैंड में जन्मे खोजी पत्रकार डोनल MacIntyre (Donal MacIntyre).&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आध्यात्मिक जीवन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके कामों और उपलब्धियों का विश्लेषण करते हुए जॉन पॉल द्वितीय (John Paul II) कहा : " मदर टेरेसा दूसरों की सेवा के लिए स्वयं पूरी तरह से शक्ति और दृढ़ता कहा से पति है ?उन्होंने यह प्रार्थना में और यीशु मसीह के मूक ध्यान , उनके पवित्र चेहरे , उनके पवित्र हृदय (Sacred Heart)में पाया दरअसल ,निजी तौर पे मदर टेरेसा ने सन्यासी जीवन के क्लासिक खुश्की और अकेलेपन को सहा , जिसेसे विश्वास का विरेचन और परीक्षण होता है और जिसे आत्मा की काली रात (dark night of the soul),[५६] के नाम से भी जानते हैं मदर टेरेसा के लिए यह अवस्था करीब ५० साल , उनके जीवन के अंत तक , चली जिसमे "उन्होंने इश्वर की उपस्तिथि का कोई अनुभव नही किया" - "न ही उनके हृदय में और न ही परम प्रसाद में" जैसा की उनके पोस्तुलेटर (postulator) रख कर उनके Rev.&lt;br /&gt;ब्रायन Kolodiejchuk .मदर टेरेसा ने ईश्वर के अस्तित्व पर गंभीर संदेह और ईश्वर के अस्तित्व पर उनके विश्वास के कमी पर पीडा का अनुभव किया:&lt;br /&gt;उनके पहले encyclical Deus Caritas ईएसटी (Deus Caritas Est)में , बेनेडिक्ट XVI ने कोल्कता की टेरेसा का तीन बार उल्लेख किया है और उनके जीवन का प्रयोग encyclical के मुख्य बिंदुओं को स्पस्ट करने के लिए भी किया है "कलकत्ता की धन्य टेरेसा का यह उदाहरण में हमें एक स्पस्ट द्रिशंत मिलता है की इश्वर की प्रार्थना में समर्पित समय हमें प्रभावी और प्रेमपूर्ण सेवा से विलग नही करता बल्कि उस सेवा का वह अंतहीन स्रोत है." मदर टेरेसा ने स्पष्ट किया की " यह केवल मानसिक प्रार्थना (mental prayer) और आध्यात्मिक अद्ध्ययन (spiritual reading)के द्वारा ही प्रार्थना के उपहार को प्राप्त कर सकते हैं.&lt;br /&gt;मदर टेरेसा की व्यवस्था और सेंट फ्रांसिस के संप्रदाय के बीच कोई सीधा संबंध नहीं था , वह सेंट फ्रांसिस के Assisi (St. Francis of Assisi) के महान प्रशंसक के रूप में जनि जाती थी इसके अनुसार , उनका जीवन और प्रभाव ने फ़्रन्सिस्कन आध्यात्मिकता को दिखाया धर्मादा बहने सेंट फ्रांसिस के शांति की प्रार्थना की कविताओं को हर सुबह कोमुनिओं के बाद धन्यवाद (thanksgiving after Communion) गाती हैं और उनके मंत्रालय की बहुत से मन्नतें और प्रभाव सामान हैं.सेंट फ्रांसिस ने गरीबी , शुद्धता , आज्ञाकारिता और मसीह को प्रस्तुत करने के लिए पर बल दिया उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय गरीबों की सेवा में समर्पित किया ,विशेष रूप से जहां वे रहते हैं की कोढ़ी की सेवा में&lt;br /&gt;मदर टेरेसा ने अपने गुरु और वरिष्ठ अधिकारियों को ६६ साल की अवधि में कई पत्र लिखा उन्होंने कहा की उनके पत्र नष्ट किए जाए , चिंता थी की " लोग मुझे अधिक और - यीशु को अधिक सोंचेगे लेकिन , इस अनुरोध के बावजूद पत्राचार मदर टेरेसा : मेरा प्रकाश बनो ( डबलडे ) में संकलित है एक आध्यात्मिक विश्वासी को एक सार्वजनिक जारी पत्र माइकल वॉन देर पीत, उन्होंने लिखा की यीशु के पास आपके लिए एक बहुत ही विशेष प्रेम है[पर] मेरे लिए मौन और रिक्तता इतने बड़े हैं की मैं देखता हूँ पर देख नही पाता - सुनता हो पर सुन नही पाता - जीभ चलती है पर बोल नही पाता .... मै तुम्हे स्वयं के लिए प्रार्थना करना चाहता हूँ -कि मैं [ एक ] मुक्त हाथ हूँ&lt;br /&gt;कई समाचार के संस्थानों ने मदर टेरेसा के लेखन को विश्वास का संकट के संकेत के रूप में पेश किया लेकिन , इस तरह के अन्य लोगों के रूप में ब्रायन Kolodiejchuk , आओ मेरे प्रकाश बनो संपादक , ने १६ वी शताब्दी के रहस्य की तुलना को आकैषित किया , क्रोस का सेंट जॉन (St. John of the Cross) जिसने काली रात (dark night)के शब्द को एक विशिष्ट चरण के विकास में आत्मा का वर्णन करने के लिए गढा वेटिकन ने संकेत दिया है कि यह पत्र संत वाद के उनके रास्ते को प्रभावित नही करेगा वास्तव में , इस पुस्तक का संपादन किया है Rev.ब्रायन Kolodiejchuk , उसके अनुबंधक .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विश्व में प्रभाव&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिशनरीज ऑफ चेरिटी ब्रदर्स की स्थापना १९६३ में हुई और मननशील बहनों की एक शाखा बाद में १९७६ में स्थापित हुआ कैथोलिक और गैर कैथोलिक को मदर टेरेसा के सह कार्यकर्ता में बीमारों और पीड़ा के सह कार्यकर्ता , और मिशनरीज ऑफ चेरिटी में पंजीकृत किए गएकई पादरियों अनुरोध के जवाब में , १९८१ में मदर टेरेसा ने पादरियों के लिए कॉपर्स क्राइस्टि आंदोलन की शुरुआत की, और १९८४ में फादर के साथ जोसेफ लंग्फोर्ड के साथ मिशनरीज ऑफ चेरिटी फादर की स्थापना की ताकि मिशनरीज ऑफ चेरिटी के काम की आनंद को ministerial priesthood।संसाधनों के साथ जोड़ा जा सके&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चमत्कार और मोक्ष प्राप्ति&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१९९७ में मदर टेरेसा की मृत्यु के बाद पवित्र दृष्टि (Holy See) ने पवित्रीकरण (beatification) की प्रक्रिया को शुरू किया जो की संत (canonization) बनने की ओर दूसरा कदम था इस प्रक्रिया में यह जरुरी है की मदर टेरेसा की मध्यस्थता (intercession) के समय से किए गए सारे चमत्कारों (miracle) का दस्तावेज बनाया जाए २००२ में वेटिकन ने मोनिका बेसरा नमक एक भारतीय महिला के पेट में ट्यूमर (tumor)का मदर टेरेसा के चित्र वाले लोकेट के स्पर्श से ठीक हो जाने को एक चमत्कार का दर्जा दिया मोनिका बेसरा ने कहा कि चित्र में से एक प्रकाश की किरण निकली जिसने कैंसर के ट्यूमरको ठीक कर दिया बेसरा के कुछ चिकित्सा कर्मचारी और शुरू में उनके पति ने भी जोर दिया की पारंपरिक मेडिकल चिकित्सा ने ही ट्यूमर के नाश किया.&lt;br /&gt;क्रिस्टोफर Hitchens (Christopher Hitchens) , एक लेखक और पत्रकार ,ही वह एकमात्र गवाह थे जिन्हें वेटिकन (Vatican) ने मदर टेरेसा के संत रूप में पवित्रीकरण (beatification) और मोक्ष (canonization) प्राप्ति प्रक्रिया के विरुद्ध गवाही देने को बुलाया था , क्योंकि वेटिकन ने "शैतान के वकील (devil's advocate)" के पारंपरिक प्रथा को हटा दिया था जो वही उद्देश्य पूरा करती थी. Hitchens ने लिखा है कि मदर टेरेसा ने गरीबी पर अपने उद्गार में साबित कर दिया कि " उनकी लोगों की मदद करने के लिए इरादा नहीं था " , और उन्होंने आरोप लगाया कि वह दाताओं के दान के प्रयोग के बारे में झूठ बोलती थी हित्चेंस कहते हैं की उन्होंने उनसे बात की थी और यह पाया था की वह गरीबी दूर करने के लिए काम नही कर रही थी " वे कैथोलिक की संख्या में काम का विस्तार करने के लिए करता हूँ उन्होंने कहा , ' मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (social worker) नहीं हूँ .मैं ऐसा इस कारण से नही कर रही हूँ मैं ऐसा मसीह के लिए करती हूँ .मैं ऐसा चर्च के लिए करती हूँ ' .&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-7274709182659033419?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/tzIBnWrvw51egPj77sWiVr-Goe4/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/tzIBnWrvw51egPj77sWiVr-Goe4/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/tzIBnWrvw51egPj77sWiVr-Goe4/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/tzIBnWrvw51egPj77sWiVr-Goe4/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/uHE2q7RnYAg" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/7274709182659033419/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=7274709182659033419" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/7274709182659033419?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/7274709182659033419?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/uHE2q7RnYAg/blog-post_16.html" title="मदर टेरेसा" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Seb81jcetGI/AAAAAAAAAkg/4mp38UQ6CiI/s72-c/mother-theresa.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/04/blog-post_16.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DE8NSXk-fCp7ImA9WxVaGEs.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-3504382229819820045</id><published>2009-04-16T00:20:00.000-07:00</published><updated>2009-04-16T00:28:18.754-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-16T00:28:18.754-07:00</app:edited><title>चक्रवर्ती राजगोपालाचारी</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Sebd0UWW6CI/AAAAAAAAAkI/rQuXo-AfUU0/s1600-h/CRajagopalchari.jpg"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325187500297611298" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 242px; CURSOR: hand; HEIGHT: 360px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Sebd0UWW6CI/AAAAAAAAAkI/rQuXo-AfUU0/s400/CRajagopalchari.jpg" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; &lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;च&lt;/span&gt;क्रवर्ती&lt;/span&gt; राजगोपालाचारी (दिसम्बर १०, १८७८ - दिसम्बर २५, १९७२), राजाजी नाम से भी जाने जाते हैं। वे वकील, लेखक, राजनीतिज्ञ और दार्शनिक थे। वे स्वतन्त्र भारत के द्वितीय गवर्नर जनरल और प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल थे। १० अप्रेल १९५२ से १३ अप्रेल १९५४ तक वे मद्रास प्रांत के मुख्यमंत्री रहे। वे दक्षिण भारत के कांग्रेस के प्रमुख नेता थे किन्तु बाद में वे कांग्रेस के प्रखर विरोधी बन गये तथा स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की। वे गांधीजी के समधी थे (राजाजी की पुत्री लक्ष्मी का विवाह गांधीजी के पुत्र देवदास गांधी से हा था।) उन्होने दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये बहुत कार्य किया।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;उनका जन्म दक्षिण भारत के सलेम जिले मे थोरापल्ली नामक गांव मे हुआ था। राजाजी तत्कालीन सलेम जनपद के थोरापल्ली नामक एक छोटे से गाँव में एक तमिल ब्राह्मण परिवार ( श्री वैष्णव ) में जन्मे थे। आजकल थोरापली कृष्णागिरि जनपद में है। उनकी आरम्भिक शिक्षा होसूर में हुई। कालेज की शिक्षा मद्रास (चेन्नै) एवं बंगलुरू में हुई।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;उन्हे वर्ष १९५४ मे भारत रत्न से सम्मनित किया गया। भारत रत्न पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-3504382229819820045?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/dO0_wL078roEUxUeRSJysxQFsO4/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/dO0_wL078roEUxUeRSJysxQFsO4/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/dO0_wL078roEUxUeRSJysxQFsO4/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/dO0_wL078roEUxUeRSJysxQFsO4/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/pu1S3k1zbWc" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/3504382229819820045/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=3504382229819820045" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/3504382229819820045?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/3504382229819820045?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/pu1S3k1zbWc/blog-post.html" title="चक्रवर्ती राजगोपालाचारी" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/Sebd0UWW6CI/AAAAAAAAAkI/rQuXo-AfUU0/s72-c/CRajagopalchari.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/04/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUcCQn84eCp7ImA9WxVRFEk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-3794740384825937970</id><published>2009-01-19T23:24:00.000-08:00</published><updated>2009-01-20T02:24:23.130-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-20T02:24:23.130-08:00</app:edited><title>१८५७ विद्रोह : मिटते हुए कुछ निशान भाग-2</title><content type="html">&lt;a href="http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_19.html"&gt;१८५७ विद्रोह : मिटते हुए कुछ निशान भाग -१&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;.........लखनऊ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लखनऊ में पुराने नवाबी ठाठ के संकेत दे रहे अपने बैठकख़ाने में नवाब जाफ़र मीर अब्दुल्ला ये क़िस्सा बयान करते हैं: “बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने ख़ुद हमारे बुज़ुर्गों को ख़ान बहादुर का ख़िताब अता फ़रमाया था.”&lt;br /&gt;"गो हमारे बुज़ुर्ग बादशाह के बहुत क़रीब थे, मगर उन्हें ख़ान बहादुर का ख़िताब नहीं दिया गया था. किसी के तंज़ करने पर उन्होंने बहादुर शाह ज़फ़र को लिखा – मन ख़िताब-ए-ख़ान बहादुर ख़्वाहम. यानी मैं ख़ान बहादुर का ख़िताब चाहता हूँ."&lt;br /&gt;नवाब अब्दुल्ला क़िस्सा आगे बढ़ाते हैं – "ख़िताब मिल गया और अब यूँ ही रखा था हमारे पास. कुछ साल पहले लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम से एक साहब तशरीफ़ लाए और उन्होंने वो ख़िताब असल हमसे माँगा."&lt;br /&gt;"हमारे अब्बू ने हमसे पूछा कि क्यों मियाँ क्या कहते हो? यहाँ पड़ा पड़ा बरबाद हो रहा है. दे दें? हमने कहा- दे दीजिए."&lt;br /&gt;इस तरह बहादुर शाह ज़फर की ओर से मिला ख़िताब लंदन पहुँच गया. &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXV86FFHSII/AAAAAAAAAgQ/2zcNWDpGMg4/s1600-h/1857.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5293274274281769090" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 270px; CURSOR: hand; HEIGHT: 179px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXV86FFHSII/AAAAAAAAAgQ/2zcNWDpGMg4/s400/1857.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नवाब साहब के पास और भी कई बेशक़ीमती चीज़ें और पुराने दस्तावेज़ थे। लेकिन सब बरबाद हो गए क्योंकि “एक बार गोमती की बाढ़ का पानी अंदर घुस आया था. सब काग़ज़ात उसी में भीग गए.”अब उनके बैठक ख़ाने में लखनऊ के नवाबी दिनों की कहानी कहने के लिए कुछ पुराने सरोते, कुछ नक़्काशीदार पानदान, कुछ हुक़्क़े और चंद तस्वीरें बची हैं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;कानपुर&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;कानपुर में ऊची छतों वाले ब्रिटिश काल के अपने घर के बरामदे में बैठे वयोवृद्ध वेंकटेश राव सूबेदार हरे मोमजामे में लपेटे गए कुछ पुराने काग़ज़ों को आहिस्ता से निकालते हैं और मेज़ पर फैला देते हैं.&lt;br /&gt;ऊँचे कमरों, भारी गोल स्तंभों और बड़े-बड़े बरामदों वाली इस बड़ी सी इमारत में किसी ज़माने में ईस्ट इंडिया कंपनी का बिज़नेस दफ़्तर हुआ करता था.&lt;br /&gt;बाद में ये इमारत सूबेदार परिवार को मिल गई.&lt;br /&gt;वेंकटेश सूबेदार के सामने मेज़ पर फैले ये दस्तावेज़ 1857 के संग्राम में नानाराव पेशवा और तात्या टोपे की हार के बाद जारी किए गए हैं.&lt;br /&gt;सूबेदार परिवार हालाँकि पूना से बाजीराव पेशवा के निर्वासन पर उनके साथ ही बिठूर आया था लेकिन इतिहास में दर्ज है कि उनके परिवार ने 1857 में अँग्रेज़ों का साथ दिया.&lt;br /&gt;वेंकटेश सूबेदार कहते हैं, "बस अब यही कुछ बचा है। बरसों पुराने कई बोरे काग़ज़ात हमारे पास थे जो हमने ख़ुद अपने हाथों से जला दिए. कहाँ रखते उन्हें? अब हमें इतना मालूम भी नहीं था कि उनका कोई महत्व भी हो सकता है."&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-3794740384825937970?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zVUOLItqRgtGNiNuK6al600hGAU/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zVUOLItqRgtGNiNuK6al600hGAU/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
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के ख़िलाफ़ भारतीयों की 1857 की लड़ाई से जुड़े अमूल्य दस्तावेज़ रोज़ाना ख़ाक में बदल रहे हैं. उस दौर की ऐतिहासिक इमारतें ईंट-ईंट करके दरक रही हैं और भारतीयों की आने वाली पीढ़ियों को शायद याद भी नहीं रहेगा कि कभी उनके पुरखे यहाँ लड़े थे.&lt;br /&gt;1857 के निशान खोजने के लिए बैरकपुर से दिल्ली तक की यात्रा करते समय राजेश जोशी तेज़ी से धूमिल होते इस इतिहास के कुछ पुराने पन्नों को देखा है।&lt;/span&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;जगदीशपुर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दरकती दीवारों और ऊँची मेहराबों वाले उस पुराने महल के एक भीतरी हिस्से से होकर गुज़रता हूँ.&lt;br /&gt;ये इतिहास के एक टुकड़े से होकर गुज़रने जैसा है क्योंकि ये महल है पटना के पास जगदीशपुर के वीर कुँअर सिंह का जिन्होंने 1857 में अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लंबा युद्ध चलाया था और अंत में मारे गए.&lt;br /&gt;कुँअर सिंह की बहादुरी की कहानियाँ भोजपुर इलाक़े के लोकगीतों में अब भी गाई जाती हैं.&lt;br /&gt;अँग्रेज़ों ने उनके महल के सामने तोपें खड़ी करके उसे गोलों से उड़ा दिया। लेकिन महल का पिछला हिस्सा अभी बचा हुआ है जिसके अँधेरे, धूल भरे ऊँचे-ऊँचे कमरों में कुँवर सिंह के वंशज या परिवार से जुड़े लोग रहते हैं.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;दीवारों पर शिकार में मारे गए बारहसिंगों और अरना भैंसों के सिर टँगे हुए हैं, जो बताते हैं कि अच्छे दिनों में यहाँ रहने वाले लोग शिकार के शौकीन रहे होंगे.&lt;br /&gt;लेकिन अब मकड़ियों ने उन पर जाले बुन लिए हैं और बरसों से उन पुराने जालों पर धूल बैठी हुई है.&lt;br /&gt;लोहे के ज़ंग खाए दो एक संदूक़ एक कोने में यूँ ही लावारिस पड़े हैं. बचपन का कौतूहल बरबस उन्हें खोलने पर मजबूर कर देता है.&lt;br /&gt;धूल का एक बग़ूला बाहर निकल आता है, कुछ चिलचट्टे और मकड़ियाँ घबराकर इधर-उधर छिपने के लिए भागती हैं.&lt;br /&gt;बक्से में ऊपर तक पुराने काग़ज़ात भरे हुए हैं जिन्हें शायद कई दशकों से किसी ने देखा नहीं होगा.&lt;br /&gt;सबसे ऊपर एक चिट्ठी नज़र आती है, जिसे उठाकर पढ़ता हूँ—भोजपुरी में किन्हीं रानी साहिबा के हवाले से किन्हीं ठाकुर साहब को कुछ रक़म देने की बात कही गई है. ये चिट्ठी 1939 में कभी लिखी गई थी.&lt;br /&gt;"छोड़िए ये सब पुराना है, काफ़ी काग़ज़ तो दीमक खा गई है. कुछ हमने जला दिए. सब सौ &lt;span class=""&gt;दो&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXV4bJatwCI/AAAAAAAAAgI/cHU3cH8Niyw/s1600-h/kunwar+family.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5293269344823656482" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 235px; CURSOR: hand; HEIGHT: 191px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXV4bJatwCI/AAAAAAAAAgI/cHU3cH8Niyw/s400/kunwar+family.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; सौ साल पुराने काग़ज़ थे. उनका क्या उपयोग था," कुँअर सिंह के प्रपौत्र अजित सिंह कहते हैं.&lt;br /&gt;अस्सी पार कर चुके उनके भाई दिग्विजय सिंह से मिलने के लिए मुझे एक बड़े बैठकख़ाने में ले जाया जाता है.&lt;br /&gt;अंदर बेशक़ीमती लकड़ी का नक़्काशीदार फ़र्नीचर रखा हुआ है, बल्कि यूँ ही पड़ा हुआ है. दीवारों पर ब्रिटिश राज के ज़माने की फ़्रेम में जड़ी तस्वीरें हैं लेकिन सब सीलन से गल चुकी हैं.&lt;br /&gt;इन फ़्रेम जड़ी तस्वीरों में ब्रिटेन के बादशाह के राज के 25 साल पूरे होने पर 22 मई 1933 को लंदन में हुए समारोह का दावतनामा भी है.&lt;br /&gt;एक दीवार पर “सौ डेढ़ सौ साल पुरानी” चीन की पेंटिंग्स लगी हुई हैं.&lt;br /&gt;दिग्विजय सिंह कहते हैं, "अब ये सब हमारे लिए बोझ बन चुका है। कैसे संभालें इसे, कहाँ तक संभालें. कई पुराने दस्तावेज़ दीमकें खा गईं हैं. कुछ यूँ ही इधर उधर हो गए."....... &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;क्रमशः&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;राजेश जोशी&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-5349364793709654697?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zD_6s-qrCMCLPblFXUGH-nNjLtU/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zD_6s-qrCMCLPblFXUGH-nNjLtU/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zD_6s-qrCMCLPblFXUGH-nNjLtU/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zD_6s-qrCMCLPblFXUGH-nNjLtU/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/52L-r-NKSN0" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/5349364793709654697/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=5349364793709654697" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/5349364793709654697?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/5349364793709654697?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/52L-r-NKSN0/blog-post_19.html" title="१८५७ विद्रोह : मिटते हुए कुछ निशान भाग -१" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXV4bJatwCI/AAAAAAAAAgI/cHU3cH8Niyw/s72-c/kunwar+family.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_19.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;Ak4FSHgzcSp7ImA9WxVREko.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-633038053148769854</id><published>2009-01-18T03:14:00.000-08:00</published><updated>2009-01-18T03:41:59.689-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-18T03:41:59.689-08:00</app:edited><title>1857: 19वीं सदी का सबसे बड़ा विद्रोह</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXMTaS90E3I/AAAAAAAAAf4/6Zuf35dZ30A/s1600-h/bahadurshah_zafar.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5292595329579094898" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 238px; CURSOR: hand; HEIGHT: 241px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXMTaS90E3I/AAAAAAAAAf4/6Zuf35dZ30A/s400/bahadurshah_zafar.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;भा&lt;/span&gt;रत&lt;/span&gt; में वर्ष 1857 का विद्रोह दुनियाभर में अंग्रेज़ी हुकूमत और उपनिवेशवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ 19वीं सदी में हुआ सबसे बड़ा विद्रोह था. शायद यह एक वजह है कि किसी भी इतिहासकार के लिए यह एक बहुत बड़ा और बहुत ज़्यादा महत्व का विषय है.&lt;br /&gt;दरअसल, 1857 के विद्रोह ने दो बहुत बड़े बदलाव भारतीय इतिहास में किए. यूँ कहें कि इससे दो महत्वपूर्ण चीज़ों का अंत हुआ. एक मुग़ल बादशाहत का और दूसरा ईस्ट इंडिया कंपनी का. विद्रोह के बाद ब्रिटेन की महारानी भारत की हुकूमत को ख़ुद अपने प्रभाव में ले लेती हैं.&lt;br /&gt;1857 के संदर्भ में जिस बात को लेकर सबसे ज़्यादा बहस आज भी होती है वो यह है कि इसे पहला स्वाधीनता संग्राम कहें, गदर या विद्रोह कहें, सिपाहियों की बगावत कहें या फिर एक क्रांति कहें.&lt;br /&gt;यह सवाल उठना इसलिए लाज़मी है क्योंकि अलग-अलग जगहों पर इस विद्रोह की अलग-अलग तस्वीर देखने को मिलती है.&lt;br /&gt;यह सही है कि इसकी शुरुआत भी सैनिक विद्रोह के रूप में हुई और सिपाही ही इस विद्रोह की आखिर तक रीढ़ की हड्डी बने रहे पर इस बात को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि जब 10 मई को मेरठ में पहला सैनिक विद्रोह होता है, तभी से लोग भी इसमें शामिल हो गए थे.&lt;br /&gt;मेरठ में बाज़ार के लोगों का समर्थन विद्रोहियों को मिलता है तो दिल्ली में बुनकर, आम व्यापारी, आम लोग विद्रोह को समर्थन देते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;लखनऊ में यह क्रांति की तरह उभरता है तो मध्य प्रदेश में आदिवासियों के विद्रोह के रूप में. झाँसी जैसी रियासतें भी इस विद्रोह में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ खड़ी होती हैं.&lt;br /&gt;उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ यह संघर्ष इस तरह खड़ा होता है कि जाति और कई जातियाँ संघर्ष में उतरती हैं. केवल अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ही नहीं बल्कि और रूपों में भी. आदिवासियों का विद्रोह और मेरठ के आसपास जाटों-गूजरों के बीच शुरू हुआ संघर्ष इसका उदाहरण है.&lt;br /&gt;हिंदू-मुस्लिम समीकरण&lt;br /&gt;कई बार हम कहते हैं कि इस विद्रोह में हिंदू और मुसलमान एक साथ खड़े हुए और अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़े और ऐसा देखने को भी मिलता है. बहादुरशाह जफ़र के साथ बड़ी तादाद में हिंदु सिपाही खड़े हुए.&lt;br /&gt;यहाँ मुझे लगता है कि इस तर्क के साथ सावधानी से पेश आना चाहिए क्योंकि मगल शासक इससे कहीं पहले से हिंदुओं को साथ लेकर लड़ते आ रहे थे। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;उदाहरण के लिए शाहजहाँ में दक्षिण भारतीय मुस्लिम शासकों को जीतने के लिए राजपूतों का इस्तेमाल किया. मुस्लिम तो अल्पसंख्यक थे और अगर मुगल शासक हिंदू विरोधी रवैये के साथ चलते तो लंबे समय तक टिके न रह पाते.&lt;br /&gt;हालांकि 1857 के दौरान दिल्ली में कुछ जेहादी समूह भी सामने आए थे और उन्होंने चरमपंथी गतिविधियों की धमकियाँ भी दी थीं पर उन्हें काबू में रखा गया और जब उन्होंने ऐसा दोबारा करने की कोशिश की तो सख़्त क़दम भी उठाए गए.&lt;br /&gt;मसलन, दिल्ली में गौ-हत्या जैसे मुद्दे को उस वक्त मुगल बादशाह के शासन ने गंभीरता से लिया और इसे न होने देने के लिए कार्रवाई की गई.&lt;br /&gt;पर दिल्ली के पतन के साथ ही गंगा-जमुनी संस्कृति भी कमज़ोर हो गई. जैसे-जैसे भुखमरी, ग़रीबी और आर्थिक अस्थिरता बढ़ी, हिंदुओं ने विद्रोह के लिए मुस्लिमों को दोष देना शुरू कर दिया था.&lt;br /&gt;महान शायर, कमज़ोर शासक&lt;br /&gt;हिंदुओं और मुसलमानों के संदर्भ में ज़्यादा ध्यान देने लायक जो तथ्य है वो यह है कि विद्रोह के उस दौर में लाखों हिंदू सिपाहियों ने मुगल बादशाह को अपना नेता माना था. इन हिंदू सिपाहियों में से क़रीब 85 प्रतिशत पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के ब्राह्मण, राजपूत या सवर्ण थे.&lt;br /&gt;ये सब अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक ऐसे व्यक्ति को अपना राजा मानते हैं जो बेशक एक अच्छा शायर है पर एक कमज़ोर शासक है.&lt;br /&gt;इसलिए भी क्योंकि उसकी अवस्था उस वक्त 82 वर्ष की है. एक इतनी बड़ी सेना के नेतृत्व के लिए यह बादशाह एक अनुपयुक्त नेता था.&lt;br /&gt;हालांकि सावरकर जैसे कई राष्ट्रवादी प्रभाव वाले इतिहासकार झांसी और मंगल पांडे जैसे नामों को ज़्यादा महत्व देते हैं पर इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि एक लाख, 39 हज़ार की सेना में से एक लाख सिपाही मुगल बादशाह को ही अपना नेता स्वीकारते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;विलियम डेलरिंपल&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-633038053148769854?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/kgSxor9F5OK-rOmEGhb8Q2EJIc4/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/kgSxor9F5OK-rOmEGhb8Q2EJIc4/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/kgSxor9F5OK-rOmEGhb8Q2EJIc4/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/kgSxor9F5OK-rOmEGhb8Q2EJIc4/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/eXlSxW_BLGQ" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/633038053148769854/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=633038053148769854" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/633038053148769854?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/633038053148769854?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/eXlSxW_BLGQ/1857-19.html" title="1857: 19वीं सदी का सबसे बड़ा विद्रोह" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXMTaS90E3I/AAAAAAAAAf4/6Zuf35dZ30A/s72-c/bahadurshah_zafar.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/1857-19.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUUNQXg7cCp7ImA9WxVREkg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-4273155938416250096</id><published>2009-01-17T21:39:00.000-08:00</published><updated>2009-01-17T21:41:30.608-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-17T21:41:30.608-08:00</app:edited><title>आत्महत्या को क़ानूनी मान्यता देने वाला पहला देश कौन सा है?</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXLA4yrk7WI/AAAAAAAAAfA/-87nHGf7l8k/s1600-h/sucide.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5292504594023509346" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 287px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXLA4yrk7WI/AAAAAAAAAfA/-87nHGf7l8k/s400/sucide.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;न&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;ी&lt;/span&gt;दरलैंड&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;. इसे हॉलैंड भी कहा जाता है. हालाँकि हॉलैंड नीदरलैंड का एक भाग है. दस अप्रैल 2001 को नीदरलैंड की संसद में 28 के मुक़ाबले 46 वोटों से इच्छा-मृत्यु या युथेनेज़िया का क़ानून पास हो गया. इस क़ानून का मतलब ये नहीं कि जो जब चाहे आत्महत्या कर सकता है. ये केवल उन रोगियों के लिए है जिसकी बीमारी लाइलाज हो या जो बहुत पीड़ा झेल रहा हो और जिसके कम होने की कोई संभावना न हो.&lt;br /&gt;यूथेनेज़िया के लिए रोगी और डॉक्टर के बीच एक लंबा संबंध होना ज़रूरी है और उसके बाद भी डॉक्टर, इच्छा-मृत्यु में रोगी की तभी मदद कर सकता है जब उसने रोगी को उसकी हालत की पूरी जानकारी दे दी हो, कम से कम एक और डॉक्टर से सलाह की हो, उसे विश्वास हो गया हो कि रोगी ने अपनी मर्ज़ी से, सोच समझकर पूरे होशोहवास में अपने जीवन का अंत करने का फ़ैसला किया है.&lt;br /&gt;नीदरलैंड के बाद यूथेनेज़िया को बैल्जियम की संसद ने 17 मई 2002 को मान्यता दे दी. अन्य कई देशों में इस विषय पर बहस चल रही है लेकिन अभी क़ानून नहीं बना है.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-4273155938416250096?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/b2jR2UkkWS6BUt3cMxn9eA4eXSc/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/b2jR2UkkWS6BUt3cMxn9eA4eXSc/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/b2jR2UkkWS6BUt3cMxn9eA4eXSc/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/b2jR2UkkWS6BUt3cMxn9eA4eXSc/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/IuvdNLVYd4k" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/4273155938416250096/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=4273155938416250096" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/4273155938416250096?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/4273155938416250096?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/IuvdNLVYd4k/blog-post_2016.html" title="आत्महत्या को क़ानूनी मान्यता देने वाला पहला देश कौन सा है?" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXLA4yrk7WI/AAAAAAAAAfA/-87nHGf7l8k/s72-c/sucide.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_2016.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D08DQXo_fip7ImA9WxVREkw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-4415210705791596630</id><published>2009-01-17T10:09:00.000-08:00</published><updated>2009-01-17T10:11:10.446-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-17T10:11:10.446-08:00</app:edited><title>87 साल के नौजवान</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SRRHxKIwaeI/AAAAAAAAAOI/AXc7Zxyj31Q/s1600-h/Bahadur_Shah_II_-_aka_Zafar_-_Project_Gutenberg_eText_17711.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5265912774163196386" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 187px; CURSOR: hand; HEIGHT: 262px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SRRHxKIwaeI/AAAAAAAAAOI/AXc7Zxyj31Q/s320/Bahadur_Shah_II_-_aka_Zafar_-_Project_Gutenberg_eText_17711.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;हिंदिओं में बू रहेगी जब तलक ईमान की।&lt;br /&gt;तख्त ए लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।।........ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;कोई क्यो किसी से लगाए दिल, कोई क्यो किसी का लुभाए दिल।&lt;br /&gt;वो जो बेचते थे दवाए दिल वो अपनी दूकान बढ़ा गए ॥ ..........&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;इस&lt;/span&gt; ग़ज़ल को कौन भूल सकता है, हम बात कर रहे है आखरी शहंशाह, शायर, देशभक्त बहादुर शाह जफ़र की । आज के दिन ही उनकी सहादत हुई थी , मगर वक्त के थपेडो ने यादो को इतना धुंधला कर दिया कि अब गाहे-बगाहे ही उनकी याद आती है। मगर जब भी आती है गुनेहगार कि तरह ही आती है। आइये आज का दिन इस ८७ साल के नौजवान को समर्पित करते हुए उनकी यादो को दिल में बसाते है। मगर सवाल ये है कि क्या बहादुर शाह का नाम किताबो में, सड़क के नामो में,संग्रहालय में और गज़लों के पन्नो में ही रह गई है या हमारे दिलो में आज भी वो अमर है ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अपनी प्रतिक्रिया हमें जरुर बताए। बहादुर शाह जफ़र के जीवन के बारे में &lt;/span&gt;&lt;a href="http://bahadurshahjafar.blogspot.com/"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;यहाँ क्लिक कर &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पढ़े।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-4415210705791596630?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/9DeJpNbS4G4Icih0HqLZjegB4yE/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/9DeJpNbS4G4Icih0HqLZjegB4yE/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/9DeJpNbS4G4Icih0HqLZjegB4yE/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/9DeJpNbS4G4Icih0HqLZjegB4yE/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/sAVe55ZJIu4" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/4415210705791596630/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=4415210705791596630" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/4415210705791596630?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/4415210705791596630?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/sAVe55ZJIu4/87.html" title="87 साल के नौजवान" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SRRHxKIwaeI/AAAAAAAAAOI/AXc7Zxyj31Q/s72-c/Bahadur_Shah_II_-_aka_Zafar_-_Project_Gutenberg_eText_17711.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/87.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0UMRnw7cSp7ImA9WxVREUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-6939391285282560413</id><published>2009-01-17T01:40:00.000-08:00</published><updated>2009-01-17T01:41:27.209-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-17T01:41:27.209-08:00</app:edited><title>चोली के आकार से उलझनें...</title><content type="html">&lt;table cellspacing="0" cellpadding="5" width="100%" align="left" border="1" color="#ffffff"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: #800000 3px double; BORDER-TOP: #800000 3px double; FONT-WEIGHT: bold; BORDER-LEFT-WIDTH: 3px; BORDER-LEFT-: 3px" align="middle" height="5" color="#800000"&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td align="middle"&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;जानकारों का कहना है कि अगर महिलाएँ सही आकार की ब्रा का चयन करें &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SVn4ueq1JeI/AAAAAAAAAZA/9oSyP1hgzFg/s1600-h/bra.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5285529115086366178" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 272px; CURSOR: hand; HEIGHT: 222px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SVn4ueq1JeI/AAAAAAAAAZA/9oSyP1hgzFg/s400/bra.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;तो उन्हें कई तरह की परेशानियों से निजात मिल सकती है.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लंदन के एक अस्पताल का कहना है कि अस्पतालों में 'ब्रा फिटिंग क्लीनिक' खोल दिए जाएँ तो उन हज़ारों महिलाओं को फ़ायदा होगा जिन्हें अपने स्तन का आकार कम करने के लिए सर्जरी करानी पड़ती है.&lt;br /&gt;ये अस्पताल ब्रा चयन का सही तरीक़ा भी बताता है. इसका कहना है कि अब तक जितनी महिलाएँ अस्पताल के इस विभाग में आई हैं, उनमें से कोई भी सही आकार का ब्रा नहीं पहन रही थी.&lt;br /&gt;डॉक्टरों के मुताबिक अगर ब्रा सही आकार की ना हों तो गले, पीठ और कंधों में दर्द हो सकता है और ये इतना बढ़ सकता है कि सर्जरी करानी पड़ जाए.&lt;br /&gt;एक वरिष्ठ स्तन सर्जन का कहना है कि आम तौर पर महिलाएँ ज़रूरत से बड़े आकार की ब्रा पहनती हैं.&lt;br /&gt;ब्रिटेन में अक़्सर बड़े आकार के स्तनों से परेशान महिलाएँ सर्जरी कराना चाहती हैं और कुछ इलाक़ों में तो यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना का हिस्सा है जिसके तहत पैसे न के बराबर लगते हैं.&lt;br /&gt;इसके बावजूद महिलाएँ ख़ुद हज़ारों पाउंड ख़र्च करके भी स्तन ऑपरेशन करवाती हैं.&lt;br /&gt;एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में हर साल लगभग दस हज़ार महिलाएँ स्तन का आकार छोटा करने के लिए सर्जरी कराती हैं.&lt;br /&gt;हालाँकि लंदन के रॉयल फ़्री अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉक्टर एलेक्स क्लार्क का कहना है कि ये पैसे की बर्बादी है और ज़रूरत है तो सिर्फ़ सही आकार की चोली पहनने की। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सौ : बी बी सी &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-6939391285282560413?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/6UI6aDGAQZVBJ2iYkeKaGUydIJo/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/6UI6aDGAQZVBJ2iYkeKaGUydIJo/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/6UI6aDGAQZVBJ2iYkeKaGUydIJo/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/6UI6aDGAQZVBJ2iYkeKaGUydIJo/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/xzIFCI1ra3U" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/6939391285282560413/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=6939391285282560413" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/6939391285282560413?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/6939391285282560413?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/xzIFCI1ra3U/blog-post_17.html" title="चोली के आकार से उलझनें..." /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SVn4ueq1JeI/AAAAAAAAAZA/9oSyP1hgzFg/s72-c/bra.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_17.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUcNSHsyeSp7ImA9WxVREUo.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-8966797485613015152</id><published>2009-01-16T23:24:00.001-08:00</published><updated>2009-01-16T23:24:59.591-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-16T23:24:59.591-08:00</app:edited><title>तीसरी कसम: साहित्यिक कृति पर बनी कालजयी फिल्म</title><content type="html">&lt;table cellspacing="0" cellpadding="5" width="100%" align="left" border="1" color="#ffffff"&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td style="BORDER-RIGHT: #800000 3px double; BORDER-TOP: #800000 3px double; FONT-WEIGHT: bold; BORDER-LEFT-WIDTH: 3px; BORDER-LEFT-: 3pxcolor:#800000;" align="middle" height="5" &gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td align="middle"&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;भले ही गीतकार शैलेन्द्र (फिल्म निर्माता) को इस फिल्म की वजह से अपनी जान &lt;span class=""&gt;गं&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SV0PscJuVjI/AAAAAAAAAbQ/JwJNjvKXWFg/s1600-h/teesari+kasam.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5286398793748469298" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 211px; CURSOR: hand; HEIGHT: 157px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SV0PscJuVjI/AAAAAAAAAbQ/JwJNjvKXWFg/s400/teesari+kasam.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;वानी&lt;/span&gt; पडी हो, पर सच है कि तीसरी कसम ने शैलेन्द्र को अमर कर दिया। शैलेन्द्र ही क्यों, राजकपूर को अभिनय की अप्रतिम ऊंचाई तक पहुंचाने और कथाकार रेणु के नाम को आमजन तक पहुंचाने का काम भी इस फिल्म ने किया।&lt;br /&gt;सेल्यूलाइड पर लिखी एक हृदयस्पर्शी कविता तीसरी कसम सिर्फ इसलिए एक यादगार फिल्म नहीं है कि इसे सर्वोत्तम फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रपति का स्वर्ण कमल पुरस्कार प्राप्त हुआ, बल्कि इसलिए भी कि मित्रों और खासतौर पर राजकपूर के इस आग्रह और सुझाव को भी गीतकार से पहली बार निर्माता बने शैलेन्द्र ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया कि फिल्म की व्यावसायिक सफलता के लिये मूलकथा में मामूली हेरफेर कर दिया जाये। वस्तुत: शैलेन्द्र को इस कहानी से प्यार था, और वे इस कथा को जस का तस फिल्माना चाहते थे। उन्हीं के आग्रह पर रेणु जी ने स्वयं फिल्म के संवाद लिखे।&lt;br /&gt;रेणु की मूल कथा मारे गये गुल्फाम पर आधारित यह फिल्म बासु भट्टाचार्य का भी बेहतरीन मास्टरपीस माना जाता है। हालांकि उन्होंने इन्हीं वर्षो में कई और समानान्तर फिल्में निर्देशित कीं, जैसे- अनुभव (1971) आविष्कार (1973) और गृह प्रवेश (1980) लेकिन तीसरी कसम जैसा जादू और कोई फिल्म कर न सकी। फिल्म की पृष्ठभूमि को देखते हुए प्रारंभ में फिल्म की शूटिंग की योजना बिहार और नेपाल के ग्रामीण इलाकों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी, लेकिन कई कारणों से वास्तविक फिल्म इगतपुरी (महाराष्ट्र) में शूट की गई। (पूर्व में मधुमती फिल्म की शूटिंग भी यहीं की गई थी।) कथा में उपस्थित और फिल्म में जतन से संवार कर रखे गये चार तत्व इस फिल्म को चिर-स्मरणीय बनाते हैं। एक हीरामन और हीराबाई के बीच के सहज मानवीय संबंधों की ऊर्जा और धीरे-धीरे पनपी स्वाभाविक अंतरंगता (भौतिक नहीं) दर्शक जिसके साथ अपने को आत्मसात करता है। हीराबाई को हीरामन का जमीनी चरित्र और संगीतमय जीवन-दर्शन प्रभावित करता है, जिसे वह अपने गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है, वहीं हीरामन को नौटंकी वाली बाई की बेबसी बांधती है। इस संबंध को कोई नाम नहीं दिया जा सकता। यह संबंध समाप्त होने के लिए बना है, इस दर्द का एहसास दर्शक को शुरू से हो जाता है। इन बेहद मुश्किल और संश्लिष्ट चरित्रों को राज और वहीदा रहमान ने जिस खूबसूरती और सहजता से निभाया है वह देखने की चीज है।&lt;br /&gt;भाव-भंगिमा और आंखों से भावनाओं को, उल्लास और दर्द को व्यक्त करवा लेने की सफलता ही निर्देशक की सफलता है। राज की शो मैन वाली छवि इस फिल्म में टूट-टूट कर बिखर गई है और यहां है बात-बात में लजाने, शरमाने वाला एक गंवई, ठेठ गाडीवान! दूसरी तरफ नृत्य-कौशल के चलते हीराबाई ने नौटंकी वाली बाई के चरित्र को जीवन्त बना दिया है। फिल्म का दूसरा सशक्त पक्ष है इसका स्वाभाविक चित्रण, छायांकन और दृश्य संयोजन, जो कथा की मांग थी। सत्यजीत रे की कई फिल्में करने वाले सुब्रत मित्रा का छायांकन बेमिसाल तो है ही, दृश्य की मांग और प्रकृति के अनुसार भी है। गांव के नैसर्गिक सौंदर्य को लगभग अकृत्रिम प्रकाश व्यवस्था के साथ श्वेत-श्याम फिल्मांकित किये जाने से एक-एक शॉट का सौंदर्य कथा की काव्यात्मकता के साथ मेल खाता हुआ है। प्रतीकात्मक बिम्बों का इस्तेमाल छायाकार और निर्देशक की पटकथा पर पकड को रेखांकित करता है। फिल्म का तीसरा सशक्त पक्ष है इसके संवाद, जो स्वयं रेणु के लिखे हुये हैं। संवादों की रवानगी, सहजता और ठेठपन कथा को कहीं से बिखरने नहीं देते। मूल कथा लेखक ही फिल्म का संवाद लिखे, ऐसे कम उदाहरण मिलेंगे, परन्तु तीसरी कसम के संवाद दर्शक की जुबान पर अनायास चढ जाते हैं, तो इसलिए कि इसमें मीठा सा सोंधापन है।&lt;br /&gt;फिल्म का चौथा सशक्त पहलू है इसके गीत और मधुर संगीत। हसरत जयपुरी और शैलेन्द्र ने इस फिल्म के गीत लिखते वक्त न केवल फिल्म के समूचे परिवेश और चरित्रों को ध्यान में रखा, बल्कि लोकधुन और नौटंकी विधा को भी साथ लिया। (पान खाये सैंय्या हमारो..)। हीरामन के समूचे चरित्र को उभारता सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है.. या फिर दुनियां बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई... के बहाने हीरामन का गांव की लडकी महुआ को याद करना, या फिर नौटंकी शैली में लिखा गया गीत आ, अब तो आजा, रात ढलने लगी.. ऐसे गीत हैं जो आज भी कान में पडते ही जुबान पर आ जाते हैं। ग्रामीण परिवेश का एक और गीत चलत मुसाफिर मोह लियो रे.. भी एक सदाबहार गीत है। शंकर जयकिशन का संगीत शोर रहित और कर्णप्रिय तो है ही, कथ्य के साथ न्याय भी करता है।&lt;br /&gt;आज जबकि भारतीय फिल्म जगत से अच्छी साहित्यिक कृतियों का नाता लगभग टूट चुका है। फिल्म उद्योग की जटिलतायें इतनी बढ चुकी हैं कि कोई निर्माता पचासों करोड खर्च करके किसी साहित्यिक रचना पर फिल्म बनाने का खतरा चाहकर भी मोल नहीं ले सकता, तीसरी कसम जैसी 70 से 90 के दशक में बनी ऐसी तमाम फिल्मों का याद आना स्वाभाविक है। आज भी बंगला फिल्म जगत में साहित्यिक फिल्मों के अच्छे दर्शक हैं। दूसरी तरफ हिंदी कृतियों की कमी नहीं, पर फिल्में नहीं बनतीं। कारण कई हैं, पर एक बडा कारण है हिन्दी लेखकों का अलग-थलग कटे रहना और हिन्दी कृतियों का सीमित पाठक वर्ग। एक दूसरी वजह है अच्छे पटकथा लेखकों का अभाव, जो एक अच्छी कृति को एक सफल पटकथा में बदल सकें।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;[प्रभु झिंगरन] &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-8966797485613015152?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Hk6Z3Uif6OdYqVFRY9ztzgmPzw8/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Hk6Z3Uif6OdYqVFRY9ztzgmPzw8/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
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MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 166px; CURSOR: hand; HEIGHT: 207px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXFsj4wpIgI/AAAAAAAAAdg/BQ3fS1pRmQY/s400/ashfaqullah.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;भा&lt;/span&gt;रतीय&lt;/span&gt; स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड एक ऐसी घटना है जिसने अंग्रेजों की नींव झकझोर कर रख दी थी। अंग्रेजों ने आजादी के दीवानों द्वारा अंजाम दी गई इस घटना को काकोरी डकैती का नाम दिया और इसके लिए कई स्वतंत्रता सेनानियों को 19 दिसंबर 1927 को फांसी के फंदे पर लटका दिया।&lt;br /&gt;फांसी की सजा से आजादी के दीवाने जरा भी विचलित नहीं हुए और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए। बात नौ अगस्त 1925 की है जब चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह सहित 10 क्रांतिकारियों ने मिलकर लखनऊ से 14 मील दूर काकोरी और आलमनगर के बीच ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया।&lt;br /&gt;दरअसल क्रांतिकारियों ने जो खजाना लूटा उसे जालिम अंग्रेजों ने हिंदुस्तान के लोगों से ही छीना था। लूटे गए धन का इस्तेमाल क्रांतिकारी हथियार खरीदने और आजादी के आंदोलन को जारी रखने में करना चाहते थे।&lt;br /&gt;इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी गई, जिससे गोरी हुकूमत बुरी तरह तिलमिला उठी। उसने अपना दमन चक्र और भी तेज कर दिया।&lt;br /&gt;अपनों की ही गद्दारी के चलते काकोरी की घटना में शामिल सभी क्रांतिकारी पकडे़ गए, सिर्फ चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के 45 सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया जिनमें से राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।&lt;br /&gt;ब्रिटिश हुकूमत ने पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा चलाया जिसकी बड़े पैमाने पर निंदा हुई क्योंकि डकैती जैसे मामले में फांसी की सजा सुनाना अपने आप में एक अनोखी घटना थी। फांसी की सजा के लिए 19 दिसंबर 1927 की तारीख मुकर्रर की गई लेकिन राजेंद्र लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी पर लटका दिया गया। राम प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल और अशफाक उल्ला खान को इसी दिन फैजाबाद जेल में फांसी की सजा दी गई।&lt;br /&gt;फांसी पर चढ़ते समय इन क्रांतिकारियों के चेहरे पर डर की कोई लकीर तक मौजूद नहीं थी और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए।&lt;br /&gt;काकोरी की घटना को अंजाम देने वाले आजादी के सभी दीवाने उच्च शिक्षित थे। राम प्रसाद बिस्मिल प्रसिद्ध कवि होने के साथ ही भाषायी ज्ञान में भी निपुण थे। उन्हें अंग्रेजी, हिंदुस्तानी, उर्दू और बांग्ला भाषा का अच्छा ज्ञान था।&lt;br /&gt;अशफाक उल्ला खान इंजीनियर थे। काकोरी की घटना को क्रांतिकारियों ने काफी चतुराई से अंजाम दिया था। इसके लिए उन्होंने अपने नाम तक बदल लिए। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने चार अलग-अलग नाम रखे और अशफाक उल्ला ने अपना नाम कुमार जी रख लिया।&lt;br /&gt;खजाने को लूटते समय क्रांतिकारियों को ट्रेन में एक जान पहचान वाला रेलवे का भारतीय कर्मचारी मिल गया। क्रांतिकारी यदि चाहते तो सबूत मिटाने के लिए उसे मार सकते थे लेकिन उन्होंने किसी की हत्या करना उचित नहीं समझा।&lt;br /&gt;उस रेलवे कर्मचारी ने भी वायदा किया था कि वह किसी को कुछ नहीं बताएगा लेकिन बाद में इनाम के लालच में उसने ही पुलिस को सब कुछ बता दिया। इस तरह अपने ही देश के एक गद्दार की वजह से काकोरी की घटना में शामिल सभी जांबाज स्वतंत्रता सेनानी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद जीते जी कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सौ:जागरण &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-3056930843957164950?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/AgcWl8vbMOcd4UC27PELDs5Q0Us/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/AgcWl8vbMOcd4UC27PELDs5Q0Us/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/AgcWl8vbMOcd4UC27PELDs5Q0Us/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/AgcWl8vbMOcd4UC27PELDs5Q0Us/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/_BVK0A-jDOA" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/3056930843957164950/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=3056930843957164950" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/3056930843957164950?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/3056930843957164950?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/_BVK0A-jDOA/blog-post_16.html" title="हंसते-हंसते झूल गए फांसी के फंदे पर......पर क्यो?" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXFsj4wpIgI/AAAAAAAAAdg/BQ3fS1pRmQY/s72-c/ashfaqullah.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_16.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DU8DRHgzeyp7ImA9WxVREEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-6464914473237436124</id><published>2009-01-15T22:21:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T22:37:55.683-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-15T22:37:55.683-08:00</app:edited><title>भुलक्कड़ ज़रा संभले क्योकि ये एक बीमारी है</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXAnuj3NJ2I/AAAAAAAAAdI/eKGiUQYaB14/s1600-h/head_and_brain.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291773243014588258" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXAnuj3NJ2I/AAAAAAAAAdI/eKGiUQYaB14/s400/head_and_brain.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:180%;"&gt;क्या&lt;/span&gt; आप चश्मा लगाकर भूल जाते है और फिर उसे ढूंढने के लिए पूरा घर ही सिर पर उठा लेते हैं या फिर चाबी, मोबाइल या कलम जैसी चीजें रखकर अक्सर भूल जाते हैं और फिर भुलक्कड़ कहलाकर हंसी का पात्र बनते हैं। अगर ऐसा है तो तुरंत अपनी थाइरायड जांच करा लें।&lt;br /&gt;ऐसी परिस्थितियों को अक्सर यह कहकर मजाक में उड़ा दिया जाता है कि भूलने की बीमारी हो गई है या फिर उम्र का तकाजा है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह हाइपो थाइरायडिज्म या हाइपर थाइरायडिज्म का लक्षण है।&lt;br /&gt;हाइपो थाइरायडिज्म में थाइरायड ग्रंथी कम सक्रिय हो जाती है जबकि हाइपर थाइरायडिज्म में थाइरायड ग्रंथी अत्यधिक थाइरायड हार्मोन बनाना शुरू कर देती है। डाक्टरों के अनुसार दोनों ही स्थितियां घातक सिद्ध हो सकती है।&lt;br /&gt;विशेषज्ञों का कहना है कि हाइपो थाइरायडिज्म के कारण वजन बढ़ना, मांसपेशियों में कमजोरी या ऐंठन और दर्द और ज्यादा मासिक स्राव, जैसे लक्षणों के साथ ही याददाश्त भी कमजोर पड़ने लगती है। इसके अलावा निराशा व एकाग्रता में कमी और ठंडे मौसम से बचने की प्रवृत्ति भी बन जाती है। दूसरी ओर हाइपर थाइरायडिज्म में जब अत्यधिक हार्मोन बनने लगते हैं तो रोगी को थोड़ा सा काम करने पर थकावट का एहसास, चिड़चिड़ापन, गर्मी से बचना, पसीना आना तथा कंपकंपी, अधिक भूख लगना, वजन घटना लेकिन कभी-कभी बहुत अधिक खाने से वजन में काफी वृद्धि हो जाना, दिल की धड़कनों में तेजी आना मांसपेशियों का कमजोर पड़ना, गले में सूजन आना तथा कुछ भी निगलने में तकलीफ होना, आंखों का पानी सूखने लगना तथा कभी-कभी कोई चीज दोहरा दिखने जैसे लक्षण होते हैं।&lt;br /&gt;विशेषज्ञों के अनुसार हाइपो थायराडिज्म वह स्थिति होती है जब थाइरायड हार्मोन [टीएच] का स्राव बहुत ही कम मात्रा में होने लगता है और शरीर की उपापचयी क्षमता यानी भोजन को ऊर्जा में परिवर्तित करने की रासायनिक प्रक्रिया धीमी हो जाती है जिससे शरीर में सुस्ती आती है। आमतौर पर इसे हाइपो थायराडिज्म नहीं बल्कि अन्य रोगों के लक्षण मान लिया जाता है। यही नहीं याददाश्त कमजोर पड़ने, निराशा की स्थिति बढ़ने, बाल झड़ने और रूखे पड़ जाने तथा थकावट महसूस करने जैसे लक्षणों को उम्र का तकाजा बताकर हंसी मजाक का मुद्दा बना दिया जाता है। समय गंवाने या इसी नजरअंदाज की वजह से एक गंभीर समस्या का रूप ले लेती है।&lt;br /&gt;विशेषज्ञों की सलाह है कि याददाश्त कमजोर होने की स्थिति में बिना समय गंवाए थाइरायड हार्मोन जांच कराई जानी चाहिए क्योंकि समय रहते कारण पता चल जाने और उचित इलाज से थाइरायड स्तर को नियंत्रित करके पहले जैसी याददाश्त वापस पाई जा सकती है।&lt;br /&gt;डाक्टरों का कहना है कि तीन हार्मोन थाइराक्सीन [टी 4], ट्राई आयोडोथाइरोनिन [टी 3] और थाइरायड स्टिमुलेटिंग हार्मोन [टीएसएच] और हाइपो थाइराडिज्म को निर्देशित करने वाले थाइरायड एंटीबाडीज की नियमित जांच करानी चाहिए।&lt;br /&gt;उम्र के मामले में विशेषज्ञों का कहना है कि हाइपो थायराडिज्म की समस्या वयस्कों, बुजुर्गो और यहां तक कि नवजात शिशुओं में भी पाई जाती है। इसीलिए नवजात शिशुओं की भी यह जांच की जाने लगी है। डाक्टरों का कहना है कि हाइपो थाइराडिज्म वह स्थिति होती है जब थाइरायड ग्लैंड कम सक्रिय हो जाती है और कम हार्मोन बनाती है। ऐसी स्थिति हर एक सौ महिलाओं में दो और हर एक हजार पुरुषों में से दो में होती है।&lt;br /&gt;हाइपोथाइराडिज्म के कारण शारीरिक एवं मानसिक क्रियाएं और विकास की प्रक्रिया दोनों ही धीमी पड़ जाती है।&lt;br /&gt;मानव शरीर में मुख्य रूप से दो प्रमुख थाइरायड हार्मोन टी 4 तथा टी 3 होते हैं। टी 4 मुख्य हार्मोन होता है जिसे थाइरायड ग्रंथि बनाती है। ये तंतुएं टी 3 में परिवर्तित होते हैं और स्वयं टी 3 के लिए अधिक संवेदनशील भी होते हैं। थाइरायड ग्रंथी थाइरायड स्टिमुलेटिंग हार्मोन की प्रेरणा से थाइरायड हार्मोन बनाती है जो मस्तिष्क के निचले भाग में स्थित पिटयूटरी ग्रंथी से निकलते हैं।&lt;br /&gt;हाइपो थाइरायडिज्म की स्थिति दरअसल आटोइम्यून के कारण पैदा होती है जिसमें किन्ही कारणों से शरीर थाइरायड ग्रंथी को बाहरी वस्तु मानने लगता है और उस पर हमले जैसा विपरीत असर डालना शुरू कर देता है। डाक्टरों का कहना है कि इस स्थिति का कोई स्पष्ट कारण नहीं होता। थाइरायड की कम सक्रियता का कारण रेडियोएक्टिव आयोडीन या थाइरायड की अत्यधिक सक्रियता के उपचार के लिए की गई सर्जरी भी हो सकता है। इस रोग की पहचान साधारण सी रक्त जांच से की जा सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-6464914473237436124?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/pTvkym3ew35Bs-WBvb7dUeg3Srs/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/pTvkym3ew35Bs-WBvb7dUeg3Srs/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/pTvkym3ew35Bs-WBvb7dUeg3Srs/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/pTvkym3ew35Bs-WBvb7dUeg3Srs/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/zaNBE5evCW8" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/6464914473237436124/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=6464914473237436124" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/6464914473237436124?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/6464914473237436124?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/zaNBE5evCW8/blog-post_8026.html" title="भुलक्कड़ ज़रा संभले क्योकि ये एक बीमारी है" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SXAnuj3NJ2I/AAAAAAAAAdI/eKGiUQYaB14/s72-c/head_and_brain.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_8026.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUYFRX8zeCp7ImA9WxVREEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-8775208443172149463</id><published>2009-01-15T02:50:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T02:58:34.180-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-15T02:58:34.180-08:00</app:edited><title>दिल देकर देखो....</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW8WyDl2eDI/AAAAAAAAAco/B2L5Assz8E0/s1600-h/HEART.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291473136396957746" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 203px; CURSOR: hand; HEIGHT: 152px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW8WyDl2eDI/AAAAAAAAAco/B2L5Assz8E0/s400/HEART.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;दि&lt;/span&gt;ल देकर देखो ..ऐसे जुमले यूँ तो कई बार सुनने को मिलते हैं लेकिन वाकई अगर दिल देखने को मिले तो कैसा लगेगा और वो भी अपना ही दिल.&lt;br /&gt;ब्रिटेन की 23 वर्षीय युवती जेनिफ़र सटन को अपना ही दिल देखने का मौका मिल रहा है. दरअसल इस साल ऑपरेशन के ज़रिए उनका हृदय प्रतिरोपण किया गया.&lt;br /&gt;उन्हें बचपन में रिस्ट्रिक्टिव कार्डियोमाओपेथी नाम की जानलेवा बीमारी थी और इस कारण उनका दिल बदलना पडा.&lt;br /&gt;अब उनके दिल को अस्थाई तौर पर केंद्रीय लंदन में रखा गया है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;भावनात्मक अनुभव&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;जेनिफ़र ने जून में सर्जरी के बाद अपना 'दिल देने का फ़ैसला किया'- प्रदर्शनी के लिए.&lt;br /&gt;उन्हें उम्मीद है कि उससे अंगो के दान के प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ेगी और साथ ही उस बीमारी के प्रति भी जिससे जेनिफ़र की जान जा सकती थी.&lt;br /&gt;अपना ही दिल देखने के बाद जेनिफ़र का कहना था, पहली बार अपना दिल देखना मेरे लिए बहुत भावनात्मक अनुभव है. जब ये मेरे अंदर था तो इसके चलते मुझे बहुत दर्द और परेशानी हुई. अब इसे बाहर देखकर बहुत अजीब सा लग रहा है. आख़िरकर मैं इस ठेलेनुमा चीज़ को देख सकती हूँ जिसने मुझे इतना परेशान किया.&lt;br /&gt;रिस्ट्रिक्टिव कार्डियोमाओपेथी के कारण मरीज़ की मौत भी हो सकती और हृदय प्रतिरोपण ही एक मात्र उपचार है.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-8775208443172149463?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4bJjgySXYUyVmtHa1RotmjQpbCQ/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4bJjgySXYUyVmtHa1RotmjQpbCQ/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4bJjgySXYUyVmtHa1RotmjQpbCQ/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4bJjgySXYUyVmtHa1RotmjQpbCQ/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/gLqXkeLmK58" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/8775208443172149463/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=8775208443172149463" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/8775208443172149463?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/8775208443172149463?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/gLqXkeLmK58/blog-post_2127.html" title="दिल देकर देखो...." /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW8WyDl2eDI/AAAAAAAAAco/B2L5Assz8E0/s72-c/HEART.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>4</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_2127.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkAFRX85fip7ImA9WxVREE0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-6056658443704898045</id><published>2009-01-15T00:35:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T00:38:34.126-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-15T00:38:34.126-08:00</app:edited><title>याहू को हम सब जानते है पर क्या याहू का पुरा जानते  है?</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW71lwguzNI/AAAAAAAAAcY/ojHZWtwEc88/s1600-h/yaaho.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291436641233063122" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 203px; CURSOR: hand; HEIGHT: 152px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW71lwguzNI/AAAAAAAAAcY/ojHZWtwEc88/s400/yaaho.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;या&lt;/span&gt;हू&lt;/span&gt; डॉटकॉम की स्थापना अमरीका के स्टैनफ़र्ड विश्वविद्यालय में इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी कर रहे दो छात्रों, डेविड फ़िलो और जैरी यांग ने 1994 में की थी. यह वेबसाइट जैरी ऐन्ड डेविड्स गाइड टू द वर्ल्ड-वाइड-वैब के नाम से शुरु हुई थी लेकिन फिर उसे एक नया नाम मिला, यट अनदर हाइरार्किकल ऑफ़िशियस ओरैकिल. जिसका संक्षिप्त रूप बनता है याहू. जैरी और डेविड ने इसकी शुरुआत इंटरनेट पर अपनी व्यक्तिगत रुचियों के लिंकों की एक गाइड के रूप में की थी लेकिन फिर वह बढ़ती चली गई. फिर उन्होंने उसे श्रेणीबद्ध करना शुरु किया. जब वह भी बहुत लम्बी हो गई तो उसकी उप-श्रेणियां बनाईं. कुछ ही समय में उनके विश्वविद्यालय के बाहर भी लोग इस वेबसाइट का प्रयोग करने लगे. अप्रैल 1995 में सैकोया कैपिटल कम्पनी की माली मदद से याहू को एक कम्पनी के रूप में शुरू किया गया. इसका मुख्यालय कैलिफ़ोर्निया में है और यूरोप, एशिया, लातीनी अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमरीका में इसके कार्यालय हैं।  &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-6056658443704898045?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/k2cS8DvcFjIOM0NiPRYxHnc_p9w/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/k2cS8DvcFjIOM0NiPRYxHnc_p9w/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/k2cS8DvcFjIOM0NiPRYxHnc_p9w/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/k2cS8DvcFjIOM0NiPRYxHnc_p9w/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/iW90L8e-kGg" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/6056658443704898045/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=6056658443704898045" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/6056658443704898045?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/6056658443704898045?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/iW90L8e-kGg/blog-post_15.html" title="याहू को हम सब जानते है पर क्या याहू का पुरा जानते  है?" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW71lwguzNI/AAAAAAAAAcY/ojHZWtwEc88/s72-c/yaaho.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_15.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;C08ERX8_eyp7ImA9WxVREE0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-1041126898971722210</id><published>2009-01-14T22:38:00.000-08:00</published><updated>2009-01-14T22:43:24.143-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-14T22:43:24.143-08:00</app:edited><title>१८५७ के विद्रोह को टला जा सकता था....पर कैसे ?</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2i5vIBFBI/AAAAAAAAAcA/DJk-fjO15XU/s1600-h/1857.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291064250016535570" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 203px; CURSOR: hand; HEIGHT: 152px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2i5vIBFBI/AAAAAAAAAcA/DJk-fjO15XU/s400/1857.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;व&lt;/span&gt;र्ष&lt;/span&gt; 1857 में दोनों ही तरफ सही नेतृत्व नहीं था अगर ऐसा होता तो विद्रोह को टाला जा सकता था.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;विद्रोह के समय मिर्ज़ा ग़ालिब दिल्ली में रहते थे और उन्होंने अपनी डायरी 'दस्तंबो' में लिखा है इसकी ज़रूरत नहीं थी.&lt;br /&gt;हो सकता है कि आप उनके विचार से सहमत न हों लेकिन उस समय ये दिल्ली और बंगाल के बहुत सारे सभ्रांत लोगों के विचार थे.&lt;br /&gt;सारे इतिहासकार इस मत पर एकमत थे कि भारतीय विद्रोहियों में समन्वय, एकता और संसाधनों की कमी थी. जबकि उनके सामने एक साधन संपन्न और आधुनिक हथियारों से सुसज्जित सेना थी.&lt;br /&gt;देखने वाली बात ये है कि जहाँ-जहाँ से सैनिकों का विरोध सबसे अधिक हुआ (बंगाल, अवध, दिल्ली और बिहार) वहाँ ब्रिटिश रेज़िमेंट थी ही नहीं, भारतीय सैनिक ही थे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;बंगाल, जहाँ से बग़वत शुरू हुई वहाँ ज़्यादातर अवध के ब्राह्मण सैनिक थे. इसलिए जानवरों की चर्बी वाले कारतूस को लेकर तीखी प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी.&lt;br /&gt;बाद में कमांडर इन चीफ बने रॉबर्ट्स ने भी माना था कि कारतूस में जानवरों की चर्बी का प्रयोग होता है लेकिन उसने कहा कि आप मुँह के बजाय हाथ लगाएं.&lt;br /&gt;वर्ष 1857 के विद्रोह के समय 73-74 साल का एन्सन कमांडर इन चीफ था और वो उस समय शिमला में पड़ा था. तेरह दिन बाद तो वो अंबाला पहुँचा. शतंरज, ताश और घुड़दौड़ में उसकी रूचि थी. कोई दूसरा कमांडर इन चीफ होता तो ऐसी स्थिति नहीं आती.&lt;br /&gt;इसके अलावा कमिश्नर हेली लॉरेंस ने सलाह दी थी कि अवध को अपने साम्राज्य में न मिलाया जाए लेकिन डलहौजी नहीं माने.&lt;br /&gt;तो जिस प्रकार भारतीय विद्रोहियों में नेतृत्व का अभाव था उसी प्रकार अंग्रेज़ों के पास भी कोई कुशल नेतृत्व नहीं था. उस समय वायसरय लॉर्ड कैनिंग ने भी कोई रूचि नहीं ली.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;इतिहास लेखन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ये ठीक है कि विद्रोह विफल हो गया लेकिन इसका प्रभाव काफ़ी दूरगामी रहा। थोड़े ही समय कांग्रेस का जन्म हुआ और अंग्रेज़ों को समझ में आ गया कि बहुत लंबे समय तक भारतीयों पर राज नहीं किया जा सकता है.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;जहाँ तक 1857 के इतिहास लेखन की बात है तो हर इतिहासकार से समझता है कि वो ईमानदारी से काम कर रहा है और अपना नज़रिया देता है.&lt;br /&gt;वर्ष 1957 में विद्रोह की 100 वीं वर्षगांठ पर भारत सरकार ने उस समय सुंदर कुमार सेन को इस पर किताब लिखने को कहा था. इसी तरह इस पर आर सी मजूमदार, पीसी जोशी और एस पी चौधरी ने भी लिखी.&lt;br /&gt;लेकिन एक चीज़ हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि इतिहास में एकरूपता नहीं होती हर इतिहासकार अपने हिसाब से चीज़ों को सामने रखता है.&lt;br /&gt;इसके बाद देखा जाता है कि कोई नया नज़रिया आ रहा हा कि नहीं. इसके अलावा इतिहास में जो काम हो चुका है उसका भी मूल्यांकन होना चाहिए. इससे पता चलेगा कि नया मुद्दा क्या है.&lt;br /&gt;मैं ये कतई मानने को तैयार नहीं हूँ कि ये राष्ट्रीयता स्वाधीनता का पहला संग्राम था. जवाहर लाल नेहरू तकनीकी रूप से इतिहासकरा नहीं थे लेकिन वे भी मानते हैं कि स्वाधीनता के लिए भारतीयों का संग्राम था.&lt;br /&gt;सेन कहते हैं कि इसकी शुरुआत सिपाहियों के ग़दर से हुई और बाद में अवध में ही थोड़ी बहुत राष्ट्रीयता की भावना दिखाई देती है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्रोफ़ेसर वीएन दत्ता (वरिष्ठ इतिहासकार) &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-1041126898971722210?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/fl65Mrb6KnyfyWCko9jRRz-i3nE/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/fl65Mrb6KnyfyWCko9jRRz-i3nE/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/fl65Mrb6KnyfyWCko9jRRz-i3nE/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/fl65Mrb6KnyfyWCko9jRRz-i3nE/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/AHRedTN-dqo" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/1041126898971722210/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=1041126898971722210" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/1041126898971722210?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/1041126898971722210?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/AHRedTN-dqo/blog-post_386.html" title="१८५७ के विद्रोह को टला जा सकता था....पर कैसे ?" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2i5vIBFBI/AAAAAAAAAcA/DJk-fjO15XU/s72-c/1857.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_386.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;Dk8DR3s-fip7ImA9WxVSGU8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-4581558611328497003</id><published>2009-01-14T01:20:00.000-08:00</published><updated>2009-01-14T01:21:16.556-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-14T01:21:16.556-08:00</app:edited><title>नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या की साजिश</title><content type="html">&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2JDSwrF_I/AAAAAAAAAbo/LaG3p7A-HrY/s1600-h/subhash.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291035826898802674" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 208px; CURSOR: hand; HEIGHT: 152px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2JDSwrF_I/AAAAAAAAAbo/LaG3p7A-HrY/s400/subhash.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ब्रितानी ख़ुफ़िया एजेंटों को 1941 में आदेश दिया गया था कि वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या कर दें.एक आयरिश इतिहासकार यूनन ओ हैल्पिन का कहना है कि जब नेताजी ने जापान और जर्मनी से मदद लेने की कोशिश की तो ब्रितानी सरकार ने उन्हें ख़त्म करने का आदेश दिया.&lt;br /&gt;ओ हैल्पिन ब्रितानी ख़ुफ़िया सेवाओं पर पहले भी कई किताबें लिख चुके हैं.&lt;br /&gt;उनका कहना है कि ब्रितानी ख़ुफ़िया सेवा के अधिकारियों को आदेश दिया गया था कि मध्य पूर्व से होकर जर्मनी जाने की कोशिश कर रहे नेताजी को बीच रास्ते में ही ख़त्म कर दिया जाए.&lt;br /&gt;लेकिन वे अपने इस मंसूबे में सफल नहीं हो पाए, माना जाता है कि नेताजी की मौत 1945 में ताईवान में एक विमान दुर्घटना में हो गई, हालाँकि इस पर भी लंबे समय से विवाद चलता रहा है.&lt;br /&gt;ओ हैल्पिन का कहना है कि जब ब्रितानी सरकार को पता चल गया कि नेताजी दुश्मन देशों की मदद लेकर ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंकना चाहते हैं तो ख़ुफ़िया अधिकारियों को &lt;span class=""&gt;स्पष्ट&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2JDnsRFaI/AAAAAAAAAbw/gN7NCqyjaVw/s1600-h/subhash+chandra.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291035832517465506" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 203px; CURSOR: hand; HEIGHT: 152px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2JDnsRFaI/AAAAAAAAAbw/gN7NCqyjaVw/s400/subhash+chandra.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; आदेश दिए गए कि उन्हें मार डाला जाए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;span class=""&gt;राज़&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कोलकाता में एक भाषण में ओ हैल्पिन ने गुप्त दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए अपनी बात कही, उन्होंने बताया कि ब्रितानी एजेंट इस बात को लेकर परेशान थे कि नेताजी आख़िर कहाँ हैं, वे जनवरी 1941 में अचानक लापता हो गए थे.हैल्पिन ने बताया, "ख़ुफ़िया एजेंटों ने सोचा कि नेताजी सुदूर पूर्व की तरफ़ गए हैं लेकिन एक इतालवी संदेश से उन्हें पता चला कि वे काबुल हैं और मध्य पूर्व के रास्ते जर्मनी जाने की तैयारी कर रहे हैं."&lt;br /&gt;"इसके बाद तुर्की में तैनात दो जासूसों को लंदन स्थित मुख्यालय से निर्देश दिया गया कि वे सुभाष चंद्र बोस को जर्मनी पहुँचने से पहले खत्म कर दें."&lt;br /&gt;हैल्पिन का कहना है कि जासूस नेताजी तक नहीं पहुँच पाए क्योंकि वे मध्य एशिया होते हुए रूस के रास्ते जर्मनी पहुँच गए.&lt;br /&gt;हैल्पिन का कहना है कि ब्रितानी सरकार बोस को लेकर बहुत चिंतित थी और उन्हें एक गंभीर ख़तरे के रूप में देख रही थी.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;इतिहासकार&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नेताजी के जीवन पर शोध करने वाले इतिहासकारों का कहना है कि इस नई जानकारी के सामने आने से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे करिश्माई नेताओं में से एक, सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय जीवन में एक अध्याय जुड़ गया है.&lt;br /&gt;कोलकाता की प्रमुख इतिहासकार लिपि घोष का कहना है कि अँगरेज़ों ने बोस से मिलने वाली चुनौती का सही आकलन किया था और इससे यह भी पता चलता है कि ब्रितानी हुकूमत उनसे कितना घबरा रही थी.&lt;br /&gt;नेताजी के पड़पोते और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर सुगत बोस कहते हैं, "उन्होंने जिस तरह से भारतीय सैनिकों की वफ़ादारी को देश हित में और ब्रितानी हुकूमत के ख़िलाफ़ प्रेरित किया था, उनके पास ऐसा आख़िरी क़दम उठाने का कारण मौजूद था."&lt;br /&gt;नेताजी ने हत्या की इस कोशिश को नाकाम करते हुए आज़ाद हिंद फौज का गठन किया और पूर्वोत्तर भारत में ब्रितानी सेना को चुनौती दी। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;सुबीर भौमिक&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-4581558611328497003?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/D8o6yryFilsefJ9Rwo9yAaI6jyg/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/D8o6yryFilsefJ9Rwo9yAaI6jyg/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/D8o6yryFilsefJ9Rwo9yAaI6jyg/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/D8o6yryFilsefJ9Rwo9yAaI6jyg/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/VQ7q2MclXEg" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/4581558611328497003/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=4581558611328497003" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/4581558611328497003?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/4581558611328497003?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/VQ7q2MclXEg/blog-post_14.html" title="नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या की साजिश" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2JDSwrF_I/AAAAAAAAAbo/LaG3p7A-HrY/s72-c/subhash.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_14.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkADQHw-eSp7ImA9WxVSGUw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3743235578492677810.post-71697910492691671</id><published>2009-01-13T23:24:00.000-08:00</published><updated>2009-01-13T23:39:31.251-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-13T23:39:31.251-08:00</app:edited><title>सुभाष चंद्र बोस की मौत दुर्घटना में नहीं हुई तो....?</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2WFhKsygI/AAAAAAAAAb4/R2maozcjvlY/s1600-h/subhash+chandra+bose.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291050158776961538" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 203px; CURSOR: hand; HEIGHT: 152px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2WFhKsygI/AAAAAAAAAb4/R2maozcjvlY/s400/subhash+chandra+bose.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;ताईवान के अधिकारियों ने कहा है कि भारत के स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की मौत ताईवान में किसी विमान दुर्घटना में नहीं हुई.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आज़ाद हिंद फौज के कुछ सदस्यों का मानना रहा है कि सुभाष चंद्र बोस की मौत 18 अगस्त, 1945 को ताईवान की राजधानी ताईपे में एक विमान दुर्घटना में हो गई थी.&lt;br /&gt;आज़ाद हिंद फौज का गठन बोस ने ब्रितानी साम्राज्य के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए किया था.&lt;br /&gt;ताईवान में अब भारतीय जाँचकर्ताओं को बताया है कि ताईपे में 14 अगस्त से 20 सितंबर 1945 के बीच कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं थी.&lt;br /&gt;उनके एक साथी ने तो यहाँ तक दावा किया कि उस विमान दुर्घटना में वह ख़ुद बच गए और उन्होंने बोस को विमान के मलबे में मृत देखा था.&lt;br /&gt;हालाँकि बोस का शव कभी बरामद नहीं हो सका और ऐसी अटकलें जारी रहीं कि बोस उस विमान दुर्घटना में जीवित बच गए थे.&lt;br /&gt;कुछ ऐसी भी अफ़वाहें थीं कि सुभाष चंद्र बोस सोवियत रूस चले गए थे और वहाँ उन्हें जेल में रखा गया.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;सच्चाई क्या है?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नेताजी के नाम से मशहूर सुभाष चंद्र बोस ने भारत में ब्रितानी साम्राज्य के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी. उनका मानना था कि भारत से ब्रितानी साम्राज्य को ख़त्म करने के लिए सशस्त्र विद्रोह ही एक मात्र रास्ता हो सकता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;बोस ने निर्वासन में रहकर आज़ाद हिंद फौज का गठन किया था जिसका लक्ष्य दूसरे विश्व युद्ध में ब्रितानी साम्राज्य के ख़िलाफ़ युद्ध करना था.&lt;br /&gt;अब ताईवान सरकार ने भारतीय जाँच दल को बताया है कि अगस्त में राजधानी ताईपे में कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं थी.&lt;br /&gt;बोस पर एक क़िताब लिखने वाले कल्याण कुमार घोष ने इस ख़बर पर कहा, "जो लोग यह मानते हैं कि बोस की मौत विमान दुर्घटना में नहीं हुई, यह ताज़ा ख़बर उनकी दलील को मज़बूत बनाती है."&lt;br /&gt;बोस के बारे में हमेशा से ही रहस्य बना रहा है और यह साबित नहीं हो सका है कि उनकी मौत किस तरह हुई.&lt;br /&gt;जापान सरकार का कहना है कि उनकी अस्थियाँ वहाँ एक मंदिर में सुरक्षित रखी गई हैं.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3743235578492677810-71697910492691671?l=shan-e-hind.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zgjYQ9VQpl_k-AtynMyKiT8ePM0/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zgjYQ9VQpl_k-AtynMyKiT8ePM0/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zgjYQ9VQpl_k-AtynMyKiT8ePM0/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/zgjYQ9VQpl_k-AtynMyKiT8ePM0/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/mrfeR/~4/DT7TZ0GiBkc" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://shan-e-hind.blogspot.com/feeds/71697910492691671/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3743235578492677810&amp;postID=71697910492691671" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/71697910492691671?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3743235578492677810/posts/default/71697910492691671?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/mrfeR/~3/DT7TZ0GiBkc/blog-post_13.html" title="सुभाष चंद्र बोस की मौत दुर्घटना में नहीं हुई तो....?" /><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="24" src="http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_S-gIasDIFWo/SW2WFhKsygI/AAAAAAAAAb4/R2maozcjvlY/s72-c/subhash+chandra+bose.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://shan-e-hind.blogspot.com/2009/01/blog-post_13.html</feedburner:origLink></entry></feed>

