<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:blogger='http://schemas.google.com/blogger/2008' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171</id><updated>2024-11-01T03:45:44.643-07:00</updated><title type='text'>MAHANT TRILOK RAJ GOSWAMI  JI</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default?redirect=false'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false'/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>149</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-5099030427297105710</id><published>2017-09-09T21:55:00.002-07:00</published><updated>2017-09-09T21:55:37.467-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;a class=&quot;uiStreamPrivacy inlineBlock fbStreamPrivacy fbPrivacyAudienceIndicator _5pcq&quot; data-hover=&quot;tooltip&quot; data-tooltip-content=&quot;Public&quot; href=&quot;https://www.facebook.com/mahanttrilokgi/#&quot; role=&quot;button&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; class=&quot;lock img&quot; height=&quot;12&quot; src=&quot;https://static.xx.fbcdn.net/rsrc.php/v3/yf/r/g_kf1vXYV_O.png&quot; width=&quot;12&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
कृष्णा आपकी पुकार सुन रहे है,,,,,,&lt;br /&gt;
 मीरा जी जब भगवान कृष्ण के लिए गाती थी तो भगवान बड़े ध्यान से सुनते थे।&lt;br /&gt;
 सूरदास जी जब पद गाते थे तब भी भगवान सुनते थे। &lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;text_exposed_show&quot;&gt;
 और कहाँ तक कहूँ कबीर जी ने तो यहाँ तक कह दिया:- चींटी के पग नूपुर बाजे वह भी साहब सुनता है।&lt;br /&gt;
 एक चींटी कितनी छोटी होती है अगर उसके पैरों में भी घुंघरू बाँध दे तो उसकी आवाज को भी भगवान सुनते है।&lt;br /&gt;
 यदि आपको लगता है की आपकी पुकार भगवान नहीं सुन रहे तो ये आपका वहम है या फिर आपने भगवान के स्वभाव को नहीं जाना।&lt;br /&gt;
 कभी प्रेम से उनको पुकारो तो सही, कभी उनकी याद में आंसू गिराओ तो सही।&lt;br /&gt;
 मैं तो यहाँ तक कह सकती हूँ की केवल भगवान ही है जो आपकी बात को सुनता है।&lt;br /&gt;
 एक छोटी सी कथा संत बताते है:-&lt;br /&gt;
 एक भगवान जी के भक्त हुए थे, उन्होंने 20 साल तक लगातार भगवत गीता जी का पाठ किया।&lt;br /&gt;
 अंत में भगवान ने उनकी परिक्षा लेते हुऐ कहा:- अरे भक्त! तू सोचता है की मैं तेरे गीता के पाठ से खुश हूँ, तो ये तेरा वहम है।&lt;br /&gt; मैं तेरे पाठ से बिलकुल भी प्रसन्न नही हुआ।&lt;br /&gt;
 जैसे ही भक्त ने सुना तो वो नाचने लगा, और झूमने लगा।&lt;br /&gt;
 भगवान ने बोला:- अरे! मैंने कहा की मैं तेरे पाठ करने से खुश नही हूँ और तू नाच रहा है।&lt;br /&gt;
 वो भक्त बोला:- भगवान जी आप खुश हो या नहीं हो ये बात मैं नही जानता।&lt;br /&gt; लेकिन मैं तो इसलिए खुश हूँ की आपने मेरा पाठ कम से कम सुना तो सही, इसलिए मैं नाच रहा हूँ।&lt;br /&gt;
 ये होता है भाव....&lt;br /&gt;
 थोड़ा सोचिये जब द्रौपती जी ने भगवान कृष्ण को पुकारा तो क्या भगवान ने नहीं सुना?&lt;br /&gt; भगवान ने सुना भी और लाज भी बचाई।&lt;br /&gt;
 जब गजेन्द्र हाथी ने ग्राह से बचने के लिए भगवान को पुकारा तो क्या भगवान ने नहीं सुना?&lt;br /&gt; बिल्कुल सुना और भगवान अपना भोजन छोड़कर आये।&lt;br /&gt;

 कबीरदास जी, तुलसीदास जी, सूरदास जी, हरिदास जी, मीरा बाई जी, सेठजी, भाई 
पोद्दार जी, राधाबाबा जी, श्री रामसुखदास जी और न जाने कितने संत हुए जो 
भगवान से बात करते थे और भगवान भी उनकी सुनते थे।&lt;br /&gt;
 इसलिए जब भी भगवान को याद करो उनका नाम जप करो तो ये मत सोचना की भगवान आपकी पुकार सुनते होंगे या नहीं?&lt;br /&gt;
 कोई संदेह मत करना, बस ह्रदय से उनको पुकारना, तुम्हे खुद लगेगा की हाँ, भगवान आपकी पुकार को सुन रहे है।&lt;br /&gt;  &lt;span class=&quot;_5mfr _47e3&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; class=&quot;img&quot; height=&quot;16&quot; role=&quot;presentation&quot; src=&quot;https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/f71/1/16/1f339.png&quot; width=&quot;16&quot; /&gt;&lt;span class=&quot;_7oe&quot;&gt;🌹&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;   जय श्री राधा माधव  &lt;span class=&quot;_5mfr _47e3&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; class=&quot;img&quot; height=&quot;16&quot; role=&quot;presentation&quot; src=&quot;https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/f71/1/16/1f339.png&quot; width=&quot;16&quot; /&gt;&lt;span class=&quot;_7oe&quot;&gt;🌹&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  &lt;br /&gt;  &lt;span class=&quot;_5mfr _47e3&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; class=&quot;img&quot; height=&quot;16&quot; role=&quot;presentation&quot; src=&quot;https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/f1e/1/16/1f33f.png&quot; width=&quot;16&quot; /&gt;&lt;span class=&quot;_7oe&quot;&gt;🌿&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; हरे कृष्ण हरे कृष्ण  कृष्ण कृष्ण हरे हरे  &lt;span class=&quot;_5mfr _47e3&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; class=&quot;img&quot; height=&quot;16&quot; role=&quot;presentation&quot; src=&quot;https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/f1e/1/16/1f33f.png&quot; width=&quot;16&quot; /&gt;&lt;span class=&quot;_7oe&quot;&gt;🌿&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;  &lt;span class=&quot;_5mfr _47e3&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; class=&quot;img&quot; height=&quot;16&quot; role=&quot;presentation&quot; src=&quot;https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/f1e/1/16/1f33f.png&quot; width=&quot;16&quot; /&gt;&lt;span class=&quot;_7oe&quot;&gt;🌿&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; हरे राम हरे राम   राम राम हरे हरे  &lt;span class=&quot;_5mfr _47e3&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; class=&quot;img&quot; height=&quot;16&quot; role=&quot;presentation&quot; src=&quot;https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/f1e/1/16/1f33f.png&quot; width=&quot;16&quot; /&gt;&lt;span class=&quot;_7oe&quot;&gt;🌿&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;                  श्री राधे राधे जी&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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&lt;div class=&quot;_5pbx userContent&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;K&amp;quot;}&quot; id=&quot;js_7&quot;&gt;
भगवान परशुराम द्वारा 21 बार क्षत्रियो का संहार &lt;br /&gt;
 भगवान परशुराम को भगवन विष्णु का छठवां अवतार माना जाता हैं। भगवान 
परशुराम के बारे में यह प्रसिद्ध है कि उन्होंने तत्कालीन अत्याचारी और 
निरंकुश क्षत्रियों का 21 बार संहार किया। लेकिन क्या आप जानते हैं भगवान 
परशुराम ने आखिर ऐसा क्यों किया?&lt;br /&gt;
 महिष्मती नगर के राजा 
सहस्त्रार्जुन क्षत्रिय समाज के हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य और रानी कौशिक
 के पुत्र थे । सहस्त्रार्जुन का वास्तवीक नाम अर्जुन था। उन्होने 
दत्तत्राई को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। दत्तत्राई उसकी तपस्या से
 प्रसन्न हुए और उसे वरदान मांगने को कहा तो उसने दत्तत्राई से 10000 हाथों
 का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद उसका नाम अर्जुन से सहस्त्रार्जुन पड़ा
 । इसे सहस्त्राबाहू और राजा कार्तवीर्य पुत्र होने के कारण कार्तेयवीर भी 
कहा जाता है ।&lt;br /&gt;
 कहा जाता है महिष्मती सम्राट सहस्त्रार्जुन अपने घमंड
 में चूर होकर धर्म की सभी सीमाओं को लांघ चूका था । उसके अत्याचार व 
अनाचार से जनता त्रस्त हो चुकी थी । वेद - पुराण और धार्मिक ग्रंथों को 
मिथ्या बताकर ब्राह्मण का अपमान करना, ऋषियों के आश्रम को नष्ट करना, उनका 
अकारण वध करना, निरीह प्रजा पर निरंतर अत्याचार करना, यहाँ तक की उसने अपने
 मनोरंजन के लिए मद में चूर होकर अबला स्त्रियों के सतीत्व को भी नष्ट करना
 शुरू कर दिया था ।&lt;br /&gt;
 एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ झाड
 - जंगलों से पार करता हुआ जमदग्नि ऋषि के आश्रम में विश्राम करने के लिए 
पहुंचा । महर्षि जमदग्रि ने सहस्त्रार्जुन को आश्रम का मेहमान समझकर स्वागत
 सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी । कहते हैं ऋषि जमदग्रि के पास देवराज 
इन्द्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक अदभुत गाय थी । महर्षि ने
 उस गाय के मदद से कुछ ही पलों में देखते ही देखते पूरी सेना के भोजन का 
प्रबंध कर दिया । कामधेनु के ऐसे विलक्षण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन को 
ऋषि के आगे अपना राजसी सुख कम लगने लगा। उसके मन में ऐसी अद्भुत गाय को 
पाने की लालसा जागी। उसने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को मांगा। किंतु ऋषि 
जमदग्नि ने कामधेनु को आश्रम के प्रबंधन और जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र 
जरिया बताकर कामधेनु को देने से इंकार कर दिया। इस पर सहस्त्रार्जुन ने 
क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़ दिया और कामधेनु को ले जाने 
लगा। तभी कामधेनु सहस्त्रार्जुन के हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गई।&lt;br /&gt;

 जब परशुराम अपने आश्रम पहुंचे तब उनकी माता रेणुका ने उन्हें सारी बातें 
विस्तारपूर्वक बताई। परशुराम माता-पिता के अपमान और आश्रम को तहस नहस देखकर
 आवेशित हो गए। पराक्रमी परशुराम ने उसी वक्त दुराचारी सहस्त्रार्जुन और 
उसकी सेना का नाश करने का संकल्प लिया। परशुराम अपने परशु अस्त्र को साथ 
लेकर सहस्त्रार्जुन के नगर महिष्मतिपुरी पहुंचे। जहां सहस्त्रार्जुन और 
परशुराम का युद्ध हुआ। किंतु परशुराम के प्रचण्ड बल के आगे सहस्त्रार्जुन 
बौना साबित हुआ। भगवान परशुराम ने दुष्ट सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और
 धड़ परशु से काटकर कर उसका वध कर दिया।&lt;br /&gt;
 सहस्त्रार्जुन के वध के बाद
 पिता के आदेश से इस वध का प्रायश्चित करने के लिए परशुराम तीर्थ यात्रा पर
 चले गए। तब मौका पाकर सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने अपने सहयोगी क्षत्रियों
 की मदद से तपस्यारत महर्षि जमदग्रि का उनके ही आश्रम में सिर काटकर उनका 
वध कर दिया । सहस्त्रार्जुन पुत्रों ने आश्रम के सभी ऋषियों का वध करते 
हुए, आश्रम को जला डाला । माता रेणुका ने सहायतावश पुत्र परशुराम को विलाप 
स्वर में पुकारा । जब परशुराम माता की पुकार सुनकर आश्रम पहुंचे तो माता को
 विलाप करते देखा और माता के समीप ही पिता का कटा सिर और उनके शरीर पर 21 
घाव देखे।&lt;br /&gt;
 यह देखकर परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने शपथ ली कि
 वह हैहय वंश का ही सर्वनाश नहीं कर देंगे बल्कि उसके सहयोगी समस्त 
क्षत्रिय वंशों का 21 बार संहार कर भूमि को क्षत्रिय विहिन कर देंगे। 
पुराणों में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने अपने इस संकल्प को पूरा भी 
किया।&lt;br /&gt;
 पुराणों में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को 
क्षत्रिय विहीन करके उनके रक्त से समन्तपंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर को भर 
कर अपने संकल्प को पूरा किया । कहा जाता है की महर्षि ऋचीक ने स्वयं प्रकट 
होकर भगवान परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोक दिया था तब जाकर किसी तरह
 क्षत्रियों का विनाश भूलोक पर रुका । तत्पश्चात भगवान परशुराम ने अपने 
पितरों के श्राद्ध क्रिया की एवं उनके आज्ञानुसार अश्वमेध और विश्वजीत यज्ञ
 किया ।&lt;br /&gt;      जय जय श्री राधेकृष्णा .....&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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&lt;a class=&quot;uiStreamPrivacy inlineBlock fbStreamPrivacy fbPrivacyAudienceIndicator _5pcq&quot; data-hover=&quot;tooltip&quot; data-tooltip-content=&quot;Public&quot; href=&quot;https://www.facebook.com/mahanttrilokgi/posts/1282193885240627#&quot; role=&quot;button&quot;&gt;&lt;img alt=&quot;&quot; class=&quot;lock img&quot; height=&quot;12&quot; src=&quot;https://static.xx.fbcdn.net/rsrc.php/v3/yf/r/g_kf1vXYV_O.png&quot; width=&quot;12&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;_5pbx userContent&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;K&amp;quot;}&quot; id=&quot;js_8&quot;&gt;
एक बार शुकदेव जी के पिता भगवान&lt;br /&gt; वेदव्यासजी महाराज कहीं जा रहे थे। रास्ते में&lt;br /&gt; उन्होंने देखा कि एक कीड़ा बड़ी तेजी से सड़क&lt;br /&gt; पार कर रहा था।&lt;br /&gt; वेदव्यासजी ने अपनी योगशक्ति देते हुए उससे&lt;br /&gt; पूछाः&lt;br /&gt; &quot;तू इतनी जल्दी सड़क क्यों पार कर रहा है?&lt;br /&gt; क्या तुझे किसी काम से जाना है? तू&lt;br /&gt; तो नाली का कीड़ा है। इस नाली को छोड़कर&lt;br /&gt; दूसरी नाली में ही तो जाना है, फिर इतनी तेजी से&lt;br /&gt; क्यों भाग रहा है?&quot;&lt;br /&gt; कीड़ा बोलाः &quot;बाबा जी बैलगाड़ी आ रही है।&lt;br /&gt; बैलों के गले में बँधे घुँघरु तथा बैलगाड़ी के&lt;br /&gt; पहियों की आवाज मैं सुन रहा हूँ। यदि मैं धीरे-धीर&lt;br /&gt; सड़क पार करूँगा तो वह बैलगाड़ी आकर मुझे&lt;br /&gt; कुचल डालेगी।&quot;&lt;br /&gt; वेदव्यासजीः &quot;कुचलने दे। कीड़े की योनि में जीकर&lt;br /&gt; भी क्या करना?&quot;&lt;br /&gt; कीड़ाः &quot;महर्षि! प्राणी जिस शरीर में होता है&lt;br /&gt; उसको उसमें ही ममता होती है। अनेक&lt;br /&gt; प्राणी नाना प्रकार के कष्टों को सहते हुए&lt;br /&gt; भी मरना नहीं चाहते।&quot;&lt;br /&gt; वेदव्यास जीः &quot;बैलगाड़ी आ जाये और तू मर जाये&lt;br /&gt; तो घबराना मत। मैं तुझे योगशक्ति से महान&lt;br /&gt; बनाऊँगा। जब तक ब्राह्मण शरीर में न पहुँचा दूँ,&lt;br /&gt; अन्य सभी योनियों से शीघ्र&lt;br /&gt; छुटकारा दिलाता रहूँगा।&quot;&lt;br /&gt; उस कीड़े ने बात मान ली और बीच रास्ते पर रुक&lt;br /&gt; गया और मर गया। फिर वेदव्यासजी की कृपा से&lt;br /&gt; वह क्रमशः कौआ, सियार आदि योनियों में जब-&lt;br /&gt; जब भी उत्पन्न हुआ, व्यासजी ने जाकर उसे&lt;br /&gt; पूर्वजन्म का स्मरण दिला दिया। इस तरह वह&lt;br /&gt; क्रमशः मृग, पक्षी, जातियों में जन्म&lt;br /&gt; लेता हुआ क्षत्रिय जाति में उत्पन्न हुआ। उसे&lt;br /&gt; वहाँ भी वेदव्यासजी दर्शन दिये। थोड़े दिनों में&lt;br /&gt; रणभूमि में शरीर त्यागकर उसने ब्राह्मण के घर&lt;br /&gt; जन्म लिया।&lt;br /&gt; भगवान वेदव्यास जी ने उसे पाँच वर्ष की उम्र में&lt;br /&gt; Diksh दि जिसका जप करते-करते&lt;br /&gt; वह ध्यान करने लगा।&lt;br /&gt; उसकी बुद्धि बड़ी विलक्षण होने पर वेद,&lt;br /&gt; शास्त्र, धर्म का रहस्य समझ में आ गया।&lt;br /&gt; सात वर्ष की आयु में वेदव्यास जी ने उसे कहाः&lt;br /&gt; &quot;कार्त्तिक क्षेत्र में कई वर्षों से एक ब्राह्मण&lt;br /&gt; नन्दभद्र तपस्या कर रहा है। तुम जाकर&lt;br /&gt; उसकी शंका का समाधान करो।&quot;&lt;br /&gt; मात्र सात वर्ष का ब्राह्मण कुमार कार्त्तिक&lt;br /&gt; क्षेत्र में तप कर रहे उस ब्राह्मण के पास पहुँच&lt;br /&gt; कर बोलाः&lt;br /&gt; &quot;हे ब्राह्मणदेव! आप तप क्यों कर रहे हैं?&quot;&lt;br /&gt; ब्राह्मणः &quot;हे ऋषिकुमार! मैं यह जानने के लिए&lt;br /&gt; तप कर रहा हूँ कि जो अच्छे लोग है, सज्जन लोग&lt;br /&gt; है, वे सहन करते हैं, दुःखी रहते हैं और&lt;br /&gt; पापी आदमी सुखी रहते हैं। ऐसा क्यों है?&quot;&lt;br /&gt; बालकः &quot;पापी आदमी यदि सुखी है, तो पाप के&lt;br /&gt; कारण नहीं, वरन् पिछले जन्म का कोई पुण्य है,&lt;br /&gt; उसके कारण सुखी है। वह अपने पुण्य खत्म कर&lt;br /&gt; रहा है। पापी मनुष्य भीतर से&lt;br /&gt; तो दुःखी ही होता है, भले ही बाहर से&lt;br /&gt; सुखी दिखाई दे।&lt;br /&gt; धार्मिक आदमी को ठीक समझ नहीं होती,gyan diksha  नहीं मिलता इसलिए वह&lt;br /&gt; दुःखी होता है। वह धर्म के कारण&lt;br /&gt; दुःखी नहीं होता, अपितु समझ की कमी के कारण&lt;br /&gt; दुःखी होता है। समझदार को यदि कोई गुरु मिल&lt;br /&gt; जायें तो वह नर में से नारायण बन जाये, इसमें&lt;br /&gt; क्या आश्चर्य है?&quot;&lt;br /&gt; ब्राह्मणः &quot;मैं इतना बूढ़ा हो गया, इतने वर्षों से&lt;br /&gt; कार्त्तिक क्षेत्र में तप कर रहा हूँ। मेरे तप&lt;br /&gt; का फल यही है कि तुम्हारे जैसे सात वर्ष के&lt;br /&gt; योगी के मुझे दर्शन हो रहे हैं। मैं तुम्हें प्रणाम&lt;br /&gt; करता हूँ।&quot;&lt;br /&gt; बालकः &quot;नहीं... नहीं, महाराज! आप तो भूदेव हैं।&lt;br /&gt; मैं तो बालक हूँ। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।&quot;&lt;br /&gt; उसकी नम्रता देखकर ब्राह्मण और खुश हुआ।&lt;br /&gt; तप छोड़कर वह परमात्मचिन्तन में लग गया। अब&lt;br /&gt; उसे कुछ जानने की इच्छा नहीं रही। जिससे सब&lt;br /&gt; कुछ जाना जाता है उसी परमात्मा में&lt;br /&gt; विश्रांति पाने लग गया।&lt;br /&gt; इस प्रकार नन्दभद्र ब्राह्मण को उत्तर दे,&lt;br /&gt; निःशंक होकर सात दिनों तक निराहार रहकर वह&lt;br /&gt; बालक सूर्यमन्त्र का जप करता रहा और&lt;br /&gt; वहीं बहूदक तीर्थ में उसने शरीर त्याग दिया।&lt;br /&gt; वही बालक दूसरे जन्म में कुषारु पिता एवं&lt;br /&gt; मित्रा माता के यहाँ प्रगट हुआ। उसका नाम&lt;br /&gt; मैत्रेय पड़ा। इन्होंने व्यासजी के&lt;br /&gt; पिता पराशरजी से &#39;विष्णु-पुराण&#39; तथा &#39;बृहत्&lt;br /&gt; पाराशर होरा शास्त्र&#39; का अध्ययन किया था।&lt;br /&gt; &#39;पक्षपात रहित अनुभवप्रकाश&#39; नामक ग्रन्थ में&lt;br /&gt; मैत्रेय तथा पराशर ऋषि का संवाद आता है।&lt;br /&gt; कहाँ तो सड़क से गुजरकर नाली में गिरने&lt;br /&gt; जा रहा कीड़ा और कहाँ संत के सान्निध्य से वह&lt;br /&gt; मैत्रेय ऋषि बन गया। सत्संग की बलिहारी है!&lt;br /&gt; इसीलिए तुलसीदास जी कहते हैं –&lt;br /&gt; तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।&lt;br /&gt; तूल न ताहि सकल मिली जो सुख लव सतसंग।।&lt;br /&gt; यहाँ एक शंका हो सकती है कि वह&lt;br /&gt; कीड़ा ही मैत्रेय ऋषि क्यों नहीं बन गया?&lt;br /&gt; अरे भाई! यदि आप पहली कक्षा के&lt;br /&gt; विद्यार्थी हो और आपको एम. ए. में बिठाया जाये&lt;br /&gt; तो क्या आप पास हो सकते हो....? नहीं...।&lt;br /&gt; दूसरी, तीसरी, चौथी... दसवीं... बारहवीं... बी.ए.&lt;br /&gt; आदि पास करके ही आप एम.ए. में प्रवेश कर&lt;br /&gt; सकते हो।&lt;br /&gt; किसी चौकीदार पर कोई प्रधानमन्त्री अत्यधिक&lt;br /&gt; प्रसन्न हो जाए तब भी वह उसे सीधा कलेक्टर&lt;br /&gt; (जिलाधीश) नहीं बना सकता, ऐसे ही नाली में&lt;br /&gt; रहने वाला कीड़ा सीधा मनुष्य&lt;br /&gt; तो नहीं हो सकता बल्कि विभिन्न&lt;br /&gt; योनियों को पार करके ही मनुष्य बन सकता है।&lt;br /&gt; हाँ इतना अवश्य है कि संतकृपा से उसका मार्ग&lt;br /&gt; छोटा हो जाता है।&lt;br /&gt; संतसमागम की, साधु पुरुषों से संग&lt;br /&gt; की महिमा का कहाँ तक वर्णन करें, कैसे बयान&lt;br /&gt; करें? एक सामान्य कीड़ा उनके सत्संग को पाकर&lt;br /&gt; महान् ऋषि बन सकता है तो फिर यदि मानव&lt;br /&gt; को किसी सदगुरु का सान्निध्य मिल जाये....&lt;br /&gt; उनके वचनानुसार चल पड़े तो मुक्ति का अनुभव&lt;br /&gt; करके जीवन्मुक्त भी बन सकता है।,,,,,,,,&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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*भजन-चिन्तन मोक्ष का मूल*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; एक महात्मा थे। जीवन भर उन्होंने भजन ही किया था। उनकी कुटिया के सामने एक तालाब था। जब उनका शरीर छूटने का समय आया तो देखा कि एक बगुला मछली मार रहा है। उन्होंने बगुले को उड़ा दिया। इधर उनका शरीर छूटा तो नरक गये। उनके चेले को स्वप्न में दिखायी पड़ा; वे कह रहे थे- &quot;बेटा! हमने जीवन भर कोई पाप नहीं किया, केवल बगुला उड़ा देने मात्र से नरक जाना पड़ा। तुम सावधान रहना।&quot;&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; जब शिष्य का भी शरीर छूटने का समय आया तो वही दृश्य पुनः आया। बगुला मछली पकड़ रहा था। गुरु का निर्देश मानकर उसने बगुले को नहीं उड़ाया। मरने पर वह भी नरक जाने लगा तो गुरुभाई को आकाशवाणी मिली कि गुरुजी ने बगुला उड़ाया था इसलिए नरक गये। हमने नहीं उड़ाया इसलिए नरक में जा रहे हैं। तुम बचना!&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; गुरुभाई का शरीर छूटने का समय आया तो संयोग से पुनः बगुला मछली मारता दिखाई पड़ा। गुरुभाई ने भगवान् को प्रणाम किया कि भगवन्! आप ही मछली में हो और आप ही बगुले में भी। हमें नहीं मालूम कि क्या झूठ है? क्या सच है? कौन पाप है, कौन पुण्य? आप अपनी व्यवस्था देखें। मुझे तो आपके चिन्तन की डोरी से प्रयोजन है। वह शरीर छूटने पर प्रभु के धाम गया।&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; नारद जी ने भगवान से पूछा, &quot;भगवन्! अन्ततः वे नरक क्यों गये? महात्मा जी ने बगुला उड़ाकर कोई पाप तो नहीं किया?&quot; उन्होंने बताया, &quot;नारद! उस दिन बगुले का भोजन वही था। उन्होंने उसे उड़ा दिया। भूख से छटपटाकर बगुला मर गया अतः पाप हुआ, इसलिए नरक गये।&quot; नारद ने पूछा, &quot;दूसरे ने तो नहीं उड़ाया, वह क्यों नरक गया?&quot; बोले, &quot;उस दिन बगुले का पेट भरा था। वह विनोदवश मछली पकड़ रहा था, उसे उड़ा देना चाहिए था। शिष्य से भूल हुई, इसी पाप से वह नरक गया।&quot; नारद ने पूछा, &quot;और तीसरा?&quot; भगवान् ने कहा, &quot;तीसरा अपने भजन में लगा रह गया, सारी जिम्मेदारी हमारे ऊपर सौंप दी। जैसी होनी थी, वह हुई; किन्तु मुझसे सम्बन्ध जोड़े रह जाने के कारण, मेरे ही चिन्तन के प्रभाव से वह मेरे धाम को प्राप्त हुआ।।&quot;&lt;br /&gt;
अतः-&lt;br /&gt;
पाप-पुण्य की चिन्ता में समय को न गँवाकर जो निरन्तर चिन्तन में लगा रहता है, वह पा जाता है। भगवान् का भजन ही पुण्य है, बाकी सब पाप है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- &quot;यज्ञार्थात्कर्मणोsन्यत्र लोकोsयं कर्मबन्धन:&#39;&#39;- यज्ञ के अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है वह इसी लोक में बाँधकर रखने वाला है, जिसमें खाना-पीना सभी कुछ आ जाता है। जब बंधनकारी हर कार्य कर ही रहे हैं तो हत्या की ही इतनी चिंता क्यों? वह नियत कर्म कीजिये जो भव-बन्धन से छुड़ा दे........,&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; ।।ॐ शांति।।&lt;/div&gt;
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*★★ पितृ-पक्ष - श्राद्ध 2017*&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
•• इस सृष्टि में हर चीज का अथवा प्राणी का जोड़ा है । जैसे - रात और दिन, अँधेरा और उजाला, सफ़ेद और काला, अमीर और गरीब अथवा नर और नारी इत्यादि बहुत गिनवाये जा सकते हैं । सभी चीजें अपने जोड़े से सार्थक है अथवा एक-दूसरे के पूरक है । दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं । इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है । दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है और अदृश्य जगत वो है जो हमें नहीं दिखता । ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं । पितृ-लोक भी अदृश्य-जगत का हिस्सा है और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है ।&lt;br /&gt;
•• धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है&lt;br /&gt;
•• पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।&lt;br /&gt;
•• श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।&lt;br /&gt;
•• श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;
2- श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।&lt;br /&gt;
3- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।&lt;br /&gt;
4- ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।&lt;br /&gt;
5- जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।&lt;br /&gt;
6- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।&lt;br /&gt;
7- श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटरसरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।&lt;br /&gt;
8- दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
9- चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।&lt;br /&gt;
10- जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।&lt;br /&gt;
11- श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।&lt;br /&gt;
12- शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;
13- श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।&lt;br /&gt;
14- रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।&lt;br /&gt;
15- श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोने, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।&lt;br /&gt;
16- तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।&lt;br /&gt;
17- रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।&lt;br /&gt;
18- चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।&lt;br /&gt;
19- भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-&lt;br /&gt;
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ&lt;br /&gt;
20- श्राद्ध के प्रमुख अंग इस प्रकार :&lt;br /&gt;
तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।&lt;br /&gt;
भोजन व पिण्ड दान-- पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।&lt;br /&gt;
वस्त्रदान-- वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।&lt;br /&gt;
दक्षिणा दान-- यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।&lt;br /&gt;
21 - श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।&lt;br /&gt;
22- पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।&lt;br /&gt;
23- तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।&lt;br /&gt;
24- कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।&lt;br /&gt;
25- ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।&lt;br /&gt;
26- पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राध्दकर्म करें या सबसे छोटा ।&lt;/div&gt;
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(((((( प्रेम के भूखे ))))))
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वृन्दावन में बिहारी जी की अनन्य भक्त थी । नाम था कांता बाई...
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बिहारी जी को अपना लाला कहा करती थी उन्हें लाड दुलार से रखा करती और दिन रात उनकी सेवा में लीन रहती थी। 
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क्या मजाल कि उनके लल्ला को जरा भी तकलीफ हो जाए।
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एक दिन की बात है कांता बाई अपने लल्ला को विश्राम करवा कर खुद भी तनिक देर विश्राम करने लगी तभी उसे जोर से हिचकिया आने लगी ...
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और वो इतनी बेचैन हो गयी कि उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था ...
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तभी कांता बाई कि पुत्री उसके घर पे आई जिसका विवाह पास ही के गाँव में किया हुआ था तब कांता बाई की हिचकिया रुक गयी।
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अच्छा महसूस करने लग गयी तो उसने अपनी पुत्री को सारा वृत्तांत सुनाया कि कैसे वो हिच कियो में बेचैन हो गयी 
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तब पुत्री ने कहा कि माँ मैं तुम्हे सच्चे मन से याद कर रही थी उसी के कारण तुम्हे हिचकिया आ रही थी और अब जब मैं आ गयी हू तो तुम्हारी हिचकिया भी बंद हो चुकी है।
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कांता बाई हैरान रह गयी कि ऐसा भी भला होता है ? तब पुत्री ने कहा हाँ माँ ऐसा ही होता है जब भी हम किसी अपने को मन से याद करते है तो हमारे अपने को हिचकिया आने लगती है।
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तब कांता बाई ने सोचा कि मैं तो अपने ठाकुर को हर पल याद करती रहती हू यानी मेरे लल्ला को भी हिचकिया आती होंगी ??
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हाय मेरा छोटा सा लल्ला हिचकियो में कितना बेचैन हो जाता होगा ! 
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नहीं ऐसा नहीं होगा अब से मैं अपने लल्ला को जरा भी परेशान नहीं होने दूंगी और ...
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उसी दिन से कांता बाई ने ठाकुर को याद करना छोड़ दिया।
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अपने लल्ला को भी अपनी पुत्री को ही दे दिया सेवा करने के लिए। 
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लेकिन कांता बाई ने एक पल के लिए भी अपने लल्ला को याद नहीं किया ...
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और ऐसा करते करते हफ्ते बीत गए और फिर एक दिन ...
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जब कांता बाई सो रही थी तो साक्षात बांके बिहारी कांता बाई के सपने में आते है और कांता बाई के पैर पकड़ कर ख़ुशी के आंसू रोने लगते है....?
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कांता बाई फौरन जाग जाती है और उठ कर प्रणाम करते हुए रोने लगती है और कहती है कि...
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प्रभु आप तो उन को भी नहीं मिल पाते जो समाधि लगाकर निरंतर आपका ध्यान करते रहते है...
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फिर मैं पापिन जिसने आपको याद भी करना छोड़ दिया है आप उसे दर्शन देने कैसे आ गए ??
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तब बिहारी जी ने मुस्कुरा कर कहा- 
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माँ कोई भी मुझे याद करता है तो या तो उसके पीछे किसी वस्तु का स्वार्थ होता है 
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या फिर कोई साधू ही जब मुझे याद करता है तो उसके पीछे भी उसका मुक्ति पाने का स्वार्थ छिपा होता है 
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लेकिन धन्य हो माँ तुम ऐसी पहली भक्त हो जिसने ये सोचकर मुझे याद करना छोड़ दिया कि कहीं मुझे हिचकिया आती होंगी।
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मेरी इतनी परवाह करने वाली माँ मैंने पहली बार देखी है 
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तभी कांता बाई अपने मिटटी के शरीर को छोड़ कर अपने लल्ला में ही लीन हो जाती है।
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इसलिए बंधुओ वो ठाकुर तुम्हारी भक्ति और चढ़ावे के भी भूखे नहीं है वो तो केवल तुम्हारे प्रेम के भूखे है उनसे प्रेम करना सीखो। 
.
उनसे केवल और केवल किशोरी जी ही प्रेम करना सिखा सकती है।
~~~~~~~~~~~~~~~~~
  ((((((( जय जय श्री राधे ))))))))&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/4181512016093961339/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2017/09/blog-post_7.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/4181512016093961339'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/4181512016093961339'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2017/09/blog-post_7.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-6228237828545185297</id><published>2017-09-07T20:34:00.000-07:00</published><updated>2017-09-07T20:34:53.152-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
धर्म के चार पांव कहे गए हैं- सत, तप, दया और दान.&lt;br /&gt;
इनमें से सतयुग 
में सत चला गया. त्रेता में तप चला गया. फिर द्वापर युग में महाभारत में 
भाइयों द्वारा भाइयों के वध से दया भी चली गई. कलियुग चल रहा है जिसमें 
धर्म का एकमात्र पांव दान बचा है इसलिए मनुष्य को भवसागर पार करने के लिए 
अपने सामर्थ्य अनुसार दान अवश्य करना चाहिए.&lt;br /&gt;
सनातन नियम रहा है- 
प्रत्येक धर्मनिष्ठ को अपनी आय का दशांश एवं भोजन का चतुर्थांश प्रत्येक 
दान कर देना चाहिए. दानशीलता उनके लिए कई प्रकार से रक्षा कवच तैयार करती 
है।&lt;span class=&quot;text_exposed_show&quot;&gt; &lt;br /&gt; चिडिया चोंच भर ले गयी नदी न घटयो नीर &lt;br /&gt; दान दिए धन और बढे कह गये संत कबीर .......&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/6228237828545185297/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2017/09/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/6228237828545185297'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/6228237828545185297'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2017/09/blog-post.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-2920012224901618742</id><published>2016-09-07T07:12:00.001-07:00</published><updated>2016-09-07T07:12:22.923-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
श्रद्धेय श्री मोरारी बापू द्वारा .......&lt;br /&gt;
एक कबूतर कबूतरनी का जोड़ा आकाश में विचरण कर रहा था, तभी उनके ऊपर एक बाज उनको खाने के लिए उनके ऊपर उड़ने लगा।&lt;br /&gt;
तब वह दोनों जेसे-तेसे भागने लगे तब जमीन पर एक शिकारी भी उनको मारने के लिए आ गया ।&lt;br /&gt;
उस समय कबूतर भगवत नाम का स्मरण कर रहा था। और उसे कोई भय नही था,&lt;span class=&quot;text_exposed_show&quot;&gt;&lt;br /&gt;
 पर उसकी पत्नी को डर लग रहा था। वह सोच रही थी की की मेरा पति तो गुरु का 
जप कर रहा है इसे कोई डर नही है। और हमारी दोनों और से मृत्यु निश्चित है।&lt;br /&gt; या तो हमें बाज मार डालेगा या वो नीचे शिकारी है वो मार देगा, अब हमारा क्या होगा हम तो मरने वाले हैं।&lt;br /&gt;
 तभी सदगुरू की कृपा से वहाँ जमीन पर एक सांप आ जाता है और वह सांप वहां 
खड़े शिकारी को ढस लेता है। और उसने जो तीर अपने धनुष पर लगा रखा था वो हाथ 
से छूट कर उस बाज के लग जाता है। और उनके पास दोनों तरफ से आई हुई मृत्यु 
टल जाती है।&lt;br /&gt; इस पद से मुझे ये शिक्षा मिली कि चाहे कितनी भी विपत्ति क्यों ना आ जाए सदगुरू का स्मरण नही छोड़ना चाहिए,&lt;br /&gt; श्री सदगुरू हमें सारी विपत्तियों ये निकाल लेते हैं। बस उनका ही आसरा होना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/2920012224901618742/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2016/09/blog-post_35.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/2920012224901618742'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/2920012224901618742'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2016/09/blog-post_35.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-8235446539940355428</id><published>2016-09-07T07:05:00.001-07:00</published><updated>2016-09-07T07:05:36.892-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
भूत-प्रेतो को निमंत्रण देता है घर के&lt;br /&gt;
फ्रिज में रखा हुआ आटा ।&lt;br /&gt;
वर्तमान में बहुत सी गृहिणियां खाना&lt;br /&gt;
बनाते समय रात को बचा हुआ अतिरिक्त&lt;br /&gt;
आटा गोल लोई बनाकर उसे फ्रिज में रख&lt;span class=&quot;text_exposed_show&quot;&gt;&lt;br /&gt; देती है और उसका प्रयोग अगले दिन करती&lt;br /&gt; है। कई बार सुबह के समय भी आटा बचने पर&lt;br /&gt; ऎसा ही किया जाता है। धर्मशास्त्रों&lt;br /&gt; के अनुसार गूंथा हुआ आटा पिण्ड माना&lt;br /&gt; जाता है जिसे मृतात्मा के भक्षण के&lt;br /&gt; लिए अर्पित किया जाता है।&lt;br /&gt; जिन भी घरों में लगातार या अक्सर&lt;br /&gt; गूंथा हुआ आटा फ्रिज में रखने की&lt;br /&gt; परंपरा बन जाती है वहां पर भूत, प्रेत&lt;br /&gt; तथा अन्य ऊपरी हवाएं भोजन करने के लिए&lt;br /&gt; आने लग जाती है। इनमें अधिकतर वे&lt;br /&gt; आत्माएं होती है जिन्हें उनके&lt;br /&gt; घरवालों ने भुला दिया या जिनकी अब&lt;br /&gt; तक मुक्ति नहीं हो सकी है। ऎसी&lt;br /&gt; आत्माओं के घर में आने के साथ ही घर&lt;br /&gt; में अनेकों समस्याएं भी आनी शुरू हो&lt;br /&gt; जाती हैं।&lt;br /&gt; बचे हुए आटे को इस तरह रखने वाले सभी&lt;br /&gt; घरों में किसी न किसी प्रकार के&lt;br /&gt; अनिष्ट देखने को मिलते हैं। वहां&lt;br /&gt; अक्सर बीमारियां, क्रोध, आलस आदि बने&lt;br /&gt; रहते हैं और घर में रहने वालों की भी&lt;br /&gt; तरक्की नहीं हो पाती है।&lt;br /&gt; शास्त्रों के अनुसार ऎसे किसी भी&lt;br /&gt; चीज को घर में स्थान नहीं देना चाहिए&lt;br /&gt; जो मृतात्माओं का भोजन हो अथवा&lt;br /&gt; उन्हें किसी भी प्रकार से आमंत्रित&lt;br /&gt; करने की क्षमता रखती हो। इसके ही रात&lt;br /&gt; के बासी बचे आटे से रोटी बनाना शरीर&lt;br /&gt; के लिए भी नुकसानदेह होता है। ऎसा&lt;br /&gt; भोजन तामसिकता को तो बढ़ावा देता&lt;br /&gt; ही है साथ में शरीर को भी रोगों का घर&lt;br /&gt; बना देता है जबकि ताजा बना भोजन शरीर&lt;br /&gt; को स्फूर्ति, शक्ति और स्वास्थ्य&lt;br /&gt; देता है। इन सभी चीजों को देखते हुए&lt;br /&gt; हमें घर में बासी आटा नही रखना चहिये ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/8235446539940355428/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2016/09/blog-post_7.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/8235446539940355428'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/8235446539940355428'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2016/09/blog-post_7.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-3563369893338996125</id><published>2016-09-04T05:10:00.001-07:00</published><updated>2016-09-04T05:10:53.209-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
पंचमुखी क्यो हुए हनुमान&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
लंका में महा बलशाली मेघनाद के साथ बड़ा ही भीषण युद्ध चला. अंतत: मेघनाद मारा गया. रावण जो अब तक मद में चूर था राम सेना, खास तौर पर लक्ष्मण का पराक्रम सुनकर थोड़ा तनाव में आया.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
रावण को कुछ दुःखी देखकर रावण की मां कैकसी ने उसके पाताल में बसे दो भाइयों अहिरावण और महिरावण की याद दिलाई. रावण को याद आया कि यह दोनों तो उसके बचपन के मित्र रहे हैं.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
लंका का राजा बनने के बाद उनकी सुध ही नहीं रही थी. रावण यह भली प्रकार जानता था कि अहिरावण व महिरावण तंत्र-मंत्र के महा पंडित, जादू टोने के धनी और मां कामाक्षी के परम भक्त हैं.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
रावण ने उन्हें बुला भेजा और कहा कि वह अपने छल बल, कौशल से श्री राम व लक्ष्मण का सफाया कर दे. यह बात दूतों के जरिए विभीषण को पता लग गयी. युद्ध में अहिरावण व महिरावण जैसे परम मायावी के शामिल होने से विभीषण चिंता में पड़ गए.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
विभीषण को लगा कि भगवान श्री राम और लक्ष्मण की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी करनी पड़ेगी. इसके लिए उन्हें सबसे बेहतर लगा कि इसका जिम्मा परम वीर हनुमान जी को राम-लक्ष्मण को सौंप दिया जाए. साथ ही वे अपने भी निगरानी में लगे थे.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
राम-लक्ष्मण की कुटिया लंका में सुवेल पर्वत पर बनी थी. हनुमान जी ने भगवान श्री राम की कुटिया के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा खींच दिया. कोई जादू टोना तंत्र-मंत्र का असर या मायावी राक्षस इसके भीतर नहीं घुस सकता था.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
अहिरावण और महिरावण श्री राम और लक्ष्मण को मारने उनकी कुटिया तक पहुंचे पर इस सुरक्षा घेरे के आगे उनकी एक न चली, असफल रहे. ऐसे में उन्होंने एक चाल चली. महिरावण विभीषण का रूप धर के कुटिया में घुस गया.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
राम व लक्ष्मण पत्थर की सपाट शिलाओं पर गहरी नींद सो रहे थे. दोनों राक्षसों ने बिना आहट के शिला समेत दोनो भाइयों को उठा लिया और अपने निवास पाताल की और लेकर चल दिए.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
विभीषण लगातार सतर्क थे. उन्हें कुछ देर में ही पता चल गया कि कोई अनहोनी घट चुकी है. विभीषण को महिरावण पर शक था, उन्हें राम-लक्ष्मण की जान की चिंता सताने लगी.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
विभीषण ने हनुमान जी को महिरावण के बारे में बताते हुए कहा कि वे उसका पीछा करें. लंका में अपने रूप में घूमना राम भक्त हनुमान के लिए ठीक न था सो उन्होंने पक्षी का रूप धारण कर लिया और पक्षी का रूप में ही निकुंभला नगर पहुंच गये.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
निकुंभला नगरी में पक्षी रूप धरे हनुमान जी ने कबूतर और कबूतरी को आपस में बतियाते सुना. कबूतर, कबूतरी से कह रहा था कि अब रावण की जीत पक्की है. अहिरावण व महिरावण राम-लक्ष्मण को बलि चढा देंगे. बस सारा युद्ध समाप्त.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
कबूतर की बातों से ही बजरंग बली को पता चला कि दोनों राक्षस राम लक्ष्मण को सोते में ही उठाकर कामाक्षी देवी को बलि चढाने पाताल लोक ले गये हैं. हनुमान जी वायु वेग से रसातल की और बढे और तुरंत वहां पहुंचे.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी को रसातल के प्रवेश द्वार पर एक अद्भुत पहरेदार मिला. इसका आधा शरीर वानर का और आधा मछली का था. उसने हनुमान जी को पाताल में प्रवेश से रोक दिया.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
द्वारपाल हनुमान जी से बोला कि मुझ को परास्त किए बिना तुम्हारा भीतर जाना असंभव है. दोनों में लड़ाई ठन गयी. हनुमान जी की आशा के विपरीत यह बड़ा ही बलशाली और कुशल योद्धा निकला.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
दोनों ही बड़े बलशाली थे. दोनों में बहुत भयंकर युद्ध हुआ परंतु वह बजरंग बली के आगे न टिक सका. आखिर कार हनुमान जी ने उसे हरा तो दिया पर उस द्वारपाल की प्रशंसा करने से नहीं रह सके.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी ने उस वीर से पूछा कि हे वीर तुम अपना परिचय दो. तुम्हारा स्वरूप भी कुछ ऐसा है कि उससे कौतुहल हो रहा है. उस वीर ने उत्तर दिया- मैं हनुमान का पुत्र हूं और एक मछली से पैदा हुआ हूं. मेरा नाम है मकरध्वज.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी ने यह सुना तो आश्चर्य में पड़ गए. वह वीर की बात सुनने लगे. मकरध्वज ने कहा- लंका दहन के बाद हनुमान जी समुद्र में अपनी अग्नि शांत करने पहुंचे. उनके शरीर से पसीने के रूप में तेज गिरा.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
उस समय मेरी मां ने आहार के लिए मुख खोला था. वह तेज मेरी माता ने अपने मुख में ले लिया और गर्भवती हो गई. उसी से मेरा जन्म हुआ है. हनुमान जी ने जब यह सुना तो मकरध्वज को बताया कि वह ही हनुमान हैं.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
मकरध्वज ने हनुमान जी के चरण स्पर्श किए और हनुमान जी ने भी अपने बेटे को गले लगा लिया और वहां आने का पूरा कारण बताया. उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि अपने पिता के स्वामी की रक्षा में सहायता करो.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
मकरध्वज ने हनुमान जी को बताया कि कुछ ही देर में राक्षस बलि के लिए आने वाले हैं. बेहतर होगा कि आप रूप बदल कर कामाक्षी कें मंदिर में जा कर बैठ जाएं. उनको सारी पूजा झरोखे से करने को कहें.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी ने पहले तो मधु मक्खी का वेश धरा और मां कामाक्षी के मंदिर में घुस गये. हनुमान जी ने मां कामाक्षी को नमस्कार कर सफलता की कामना की और फिर पूछा- हे मां क्या आप वास्तव में श्री राम जी और लक्ष्मण जी की बलि चाहती हैं ?&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी के इस प्रश्न पर मां कामाक्षी ने उत्तर दिया कि नहीं. मैं तो दुष्ट अहिरावण व महिरावण की बलि चाहती हूं.यह दोनों मेरे भक्त तो हैं पर अधर्मी और अत्याचारी भी हैं. आप अपने प्रयत्न करो. सफल रहोगे.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
मंदिर में पांच दीप जल रहे थे. अलग-अलग दिशाओं और स्थान पर मां ने कहा यह दीप अहिरावण ने मेरी प्रसन्नता के लिए जलाये हैं जिस दिन ये एक साथ बुझा दिए जा सकेंगे, उसका अंत सुनिश्चित हो सकेगा.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
इस बीच गाजे-बाजे का शोर सुनाई पड़ने लगा. अहिरावण, महिरावण बलि चढाने के लिए आ रहे थे. हनुमान जी ने अब मां कामाक्षी का रूप धरा. जब अहिरावण और महिरावण मंदिर में प्रवेश करने ही वाले थे कि हनुमान जी का महिला स्वर गूंजा.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी बोले- मैं कामाक्षी देवी हूं और आज मेरी पूजा झरोखे से करो. झरोखे से पूजा आरंभ हुई ढेर सारा चढावा मां कामाक्षी को झरोखे से चढाया जाने लगा. अंत में बंधक बलि के रूप में राम लक्ष्मण को भी उसी से डाला गया. दोनों बंधन में बेहोश थे.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी ने तुरंत उन्हें बंधन मुक्त किया. अब पाताल लोक से निकलने की बारी थी पर उससे पहले मां कामाक्षी के सामने अहिरावण महिरावण की बलि देकर उनकी इच्छा पूरी करना और दोनों राक्षसों को उनके किए की सज़ा देना शेष था.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
अब हनुमान जी ने मकरध्वज को कहा कि वह अचेत अवस्था में लेटे हुए भगवान राम और लक्ष्मण का खास ख्याल रखे और उसके साथ मिलकर दोनों राक्षसों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
पर यह युद्ध आसान न था. अहिरावण और महिरावण बडी मुश्किल से मरते तो फिर पाँच पाँच के रूप में जिदां हो जाते. इस विकट स्थिति में मकरध्वज ने बताया कि अहिरावण की एक पत्नी नागकन्या है.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
अहिरावण उसे बलात हर लाया है. वह उसे पसंद नहीं करती पर मन मार के उसके साथ है, वह अहिरावण के राज जानती होगी. उससे उसकी मौत का उपाय पूछा जाये. आप उसके पास जाएं और सहायता मांगे.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
मकरध्वज ने राक्षसों को युद्ध में उलझाये रखा और उधर हनुमान अहिरावण की पत्नी के पास पहुंचे. नागकन्या से उन्होंने कहा कि यदि तुम अहिरावण के मृत्यु का भेद बता दो तो हम उसे मारकर तुम्हें उसके चंगुल से मुक्ति दिला देंगे.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
अहिरावण की पत्नी ने कहा- मेरा नाम चित्रसेना है. मैं भगवान विष्णु की भक्त हूं. मेरे रूप पर अहिरावण मर मिटा और मेरा अपहरण कर यहां कैद किये हुए है, पर मैं उसे नहीं चाहती. लेकिन मैं अहिरावण का भेद तभी बताउंगी जब मेरी इच्छा पूरी की जायेगी.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी ने अहिरावण की पत्नी नागकन्या चित्रसेना से पूछा कि आप अहिरावण की मृत्यु का रहस्य बताने के बदले में क्या चाहती हैं ? आप मुझसे अपनी शर्त बताएं, मैं उसे जरूर मानूंगा.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
चित्रसेना ने कहा- दुर्भाग्य से अहिरावण जैसा असुर मुझे हर लाया. इससे मेरा जीवन खराब हो गया. मैं अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलना चाहती हूं. आप अगर मेरा विवाह श्री राम से कराने का वचन दें तो मैं अहिरावण के वध का रहस्य बताऊंगी.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी सोच में पड़ गए. भगवान श्री राम तो एक पत्नी निष्ठ हैं. अपनी धर्म पत्नी देवी सीता को मुक्त कराने के लिए असुरों से युद्ध कर रहे हैं. वह किसी और से विवाह की बात तो कभी न स्वीकारेंगे. मैं कैसे वचन दे सकता हूं ?&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
फिर सोचने लगे कि यदि समय पर उचित निर्णय न लिया तो स्वामी के प्राण ही संकट में हैं. असमंजस की स्थिति में बेचैन हनुमानजी ने ऐसी राह निकाली कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी बोले- तुम्हारी शर्त स्वीकार है पर हमारी भी एक शर्त है. यह विवाह तभी होगा जब तुम्हारे साथ भगवान राम जिस पलंग पर आसीन होंगे वह सही सलामत रहना चाहिए. यदि वह टूटा तो इसे अपशकुन मांगकर वचन से पीछे हट जाऊंगा.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
जब महाकाय अहिरावण के बैठने से पलंग नहीं टूटता तो भला श्रीराम के बैठने से कैसे टूटेगा ! यह सोच कर चित्रसेना तैयार हो गयी. उसने अहिरावण समेत सभी राक्षसों के अंत का सारा भेद बता दिया.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
चित्रसेना ने कहा- दोनों राक्षसों के बचपन की बात है. इन दोनों के कुछ शरारती राक्षस मित्रों ने कहीं से एक भ्रामरी को पकड़ लिया. मनोरंजन के लिए वे उसे भ्रामरी को बार-बार काटों से छेड रहे थे.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
भ्रामरी साधारण भ्रामरी न थी. वह भी बहुत मायावी थी किंतु किसी कारण वश वह पकड़ में आ गई थी. भ्रामरी की पीड़ा सुनकर अहिरावण और महिरावण को दया आ गई और अपने मित्रों से लड़ कर उसे छुड़ा दिया.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
मायावी भ्रामरी का पति भी अपनी पत्नी की पीड़ा सुनकर आया था. अपनी पत्नी की मुक्ति से प्रसन्न होकर उस भौंरे ने वचन दिया थ कि तुम्हारे उपकार का बदला हम सभी भ्रमर जाति मिलकर चुकाएंगे.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
ये भौंरे अधिकतर उसके शयन कक्ष के पास रहते हैं. ये सब बड़ी भारी संख्या में हैं. दोनों राक्षसों को जब भी मारने का प्रयास हुआ है और ये मरने को हो जाते हैं तब भ्रमर उनके मुख में एक बूंद अमृत का डाल देते हैं.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
उस अमृत के कारण ये दोनों राक्षस मरकर भी जिंदा हो जाते हैं. इनके कई-कई रूप उसी अमृत के कारण हैं. इन्हें जितनी बार फिर से जीवन दिया गया उनके उतने नए रूप बन गए हैं. इस लिए आपको पहले इन भंवरों को मारना होगा.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी रहस्य जानकर लौटे. मकरध्वज ने अहिरावण को युद्ध में उलझा रखा था. तो हनुमान जी ने भंवरों का खात्मा शुरू किया. वे आखिर हनुमान जी के सामने कहां तक टिकते.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
जब सारे भ्रमर खत्म हो गए और केवल एक बचा तो वह हनुमान जी के चरणों में लोट गया. उसने हनुमान जी से प्राण रक्षा की याचना की. हनुमान जी पसीज गए. उन्होंने उसे क्षमा करते हुए एक काम सौंपा.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी बोले- मैं तुम्हें प्राण दान देता हूं पर इस शर्त पर कि तुम यहां से तुरंत चले जाओगे और अहिरावण की पत्नी के पलंग की पाटी में घुसकर जल्दी से जल्दी उसे पूरी तरह खोखला बना दोगे.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
भंवरा तत्काल चित्रसेना के पलंग की पाटी में घुसने के लिए प्रस्थान कर गया. इधर अहिरावण और महिरावण को अपने चमत्कार के लुप्त होने से बहुत अचरज हुआ पर उन्होंने मायावी युद्ध जारी रखा.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
भ्रमरों को हनुमान जी ने समाप्त कर दिया फिर भी हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों अहिरावण और महिरावण का अंत नहीं हो पा रहा था. यह देखकर हनुमान जी कुछ चिंतित हुए.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
फिर उन्हें कामाक्षी देवी का वचन याद आया. देवी ने बताया था कि अहिरावण की सिद्धि है कि जब पांचो दीपकों एक साथ बुझेंगे तभी वे नए-नए रूप धारण करने में असमर्थ होंगे और उनका वध हो सकेगा.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी ने तत्काल पंचमुखी रूप धारण कर लिया. उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
उसके बाद हनुमान जी ने अपने पांचों मुख द्वारा एक साथ पांचों दीपक बुझा दिए. अब उनके बार बार पैदा होने और लंबे समय तक जिंदा रहने की सारी आशंकायें समाप्त हो गयीं थी. हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों शीघ्र ही दोनों राक्षस मारे गये.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
इसके बाद उन्होंने श्री राम और लक्ष्मण जी की मूर्च्छा दूर करने के उपाय किए. दोनो भाई होश में आ गए. चित्रसेना भी वहां आ गई थी. हनुमान जी ने कहा- प्रभो ! अब आप अहिरावण और महिरावण के छल और बंधन से मुक्त हुए.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
पर इसके लिए हमें इस नागकन्या की सहायता लेनी पड़ी थी. अहिरावण इसे बल पूर्वक उठा लाया था. वह आपसे विवाह करना चाहती है. कृपया उससे विवाह कर अपने साथ ले चलें. इससे उसे भी मुक्ति मिलेगी.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
श्री राम हनुमान जी की बात सुनकर चकराए. इससे पहले कि वह कुछ कह पाते हनुमान जी ने ही कह दिया- भगवन आप तो मुक्तिदाता हैं. अहिरावण को मारने का भेद इसी ने बताया है. इसके बिना हम उसे मारकर आपको बचाने में सफल न हो पाते.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
कृपा निधान इसे भी मुक्ति मिलनी चाहिए. परंतु आप चिंता न करें. हम सबका जीवन बचाने वाले के प्रति बस इतना कीजिए कि आप बस इस पलंग पर बैठिए बाकी का काम मैं संपन्न करवाता हूं.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी इतनी तेजी से सारे कार्य करते जा रहे थे कि इससे श्री राम जी और लक्ष्मण जी दोनों चिंता में पड़ गये. वह कोई कदम उठाते कि तब तक हनुमान जी ने भगवान राम की बांह पकड़ ली.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी ने भावा वेश में प्रभु श्री राम की बांह पकड़कर चित्रसेना के उस सजे-धजे विशाल पलंग पर बिठा दिया. श्री राम कुछ समझ पाते कि तभी पलंग की खोखली पाटी चरमरा कर टूट गयी.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
पलंग धराशायी हो गया. चित्रसेना भी जमीन पर आ गिरी. हनुमान जी हंस पड़े और फिर चित्रसेना से बोले- अब तुम्हारी शर्त तो पूरी हुई नहीं, इसलिए यह विवाह नहीं हो सकता. तुम मुक्त हो और हम तुम्हें तुम्हारे लोक भेजने का प्रबंध करते हैं.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
चित्रसेना समझ गयी कि उसके साथ छल हुआ है. उसने कहा कि उसके साथ छल हुआ है. मर्यादा पुरुषोत्तम के सेवक उनके सामने किसी के साथ छल करें यह तो बहुत अनुचित है. मैं हनुमान को श्राप दूंगी.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
चित्रसेना हनुमान जी को श्राप देने ही जा हे रही थी कि श्री राम का सम्मोहन भंग हुआ. वह इस पूरे नाटक को समझ गये. उन्होंने चित्रसेना को समझाया- मैंने एक पत्नी धर्म से बंधे होने का संकल्प लिया है. इस लिए हनुमान जी को यह करना पड़ा. उन्हें क्षमा कर दो.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
क्रुद्ध चित्रसेना तो उनसे विवाह की जिद पकड़े बैठी थी. श्री राम ने कहा- मैं जब द्वापर में श्री कृष्ण अवतार लूंगा तब तुम्हें सत्यभामा के रूप में अपनी पटरानी बनाउंगा. इससे वह मान गयी.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
हनुमान जी ने चित्रसेना को उसके पिता के पास पहुंचा दिया. चित्रसेना को प्रभु ने अगले जन्म में पत्नी बनाने का वरदान दिया था. भगवान विष्णु की पत्नी बनने की चाह में उसने स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया.&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
श्री राम और लक्ष्मण, मकरध्वज और हनुमान जी सहित वापस लंका में सुवेल पर्वत पर लौट आये. (स्कंद पुराण और आनंद रामायण के सारकांड की कथा)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जय जय श्री राधे&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
.जय श्री राम﻿&lt;/div&gt;
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&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
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&lt;br /&gt;
-----गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस लिखकर मानव जीवन मे उजाला कर दिया है--- अगर कोई व्यक्ति सदगुरु की शरण मे जाकर रामचरितमानस को जीवन मे उतार लेता है तो उसके जीवन मे साक्षात् प्रभु प्रकट हो जाते है---&lt;br /&gt;
मनुष्य का मन अगर हरि कथाएं सुनते सुनते थक जाए या बोर हो जाए तो ये समझ लेना की वो सच्चा प्रेमी नही है--&lt;br /&gt;
तुलसीदास जी कहते है-- राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं&lt;br /&gt;
जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ----&lt;br /&gt;
तुलसीदास जी कहते है की जो हरि कथा सुनकर बोर हो जाते है उन्होने कथा रस को अच्छी तरह नही पीया लेकिन जो जीवन्मुक्त यानि जो प्रभु से सच्चा प्रेम करते है वो निरंतर कथा श्रवण करते रहते है--&lt;br /&gt;
बिलकुल ठीक कहा है की जब मनुष्य भोजन करना नही छोड सका तो भजन क्यो छोड देता है---&lt;br /&gt;
जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी--&lt;br /&gt;
जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना--&lt;br /&gt;
तुलसीदास जी कहते है की जिसके हर्दय मे भक्ति नही है वो ईंसान मुर्दे के समान है ओर जिसकी जीभ हरिनाम नही गाती वो जीभ मेढंक की तरह टर टर करती रहती है----&lt;br /&gt;
बिलकुल सत्य कहा है क्योकि भक्ति जब जीवन मे आती है तो मनुष्य के जीवन मे आनंद के साथ साथ उत्साह,,धैर्य,,&lt;br /&gt;
संतोष,शांति,,सरलता,,शीतलता आदि गुण आ जाते है --&lt;br /&gt;
भक्ति का जीवन मे आना बहुत ही भाग्य की बात है ओर जिसके जीवन मे भक्ति आ जाये उसपर विशेष कृपा होती है क्योकि प्रभु ने कहा है की मै मुक्ति बहुत जल्दी दे देता हूं पर भक्ति नही ओर जिसको भक्ति मिल गयी वो धन्य है--&lt;br /&gt;
निर्धना अपि ते धन्या-- वो भाग्यशाली है जिसके जीवन मे भक्ति है क्योकि रुपया पैसा घर गाडी ये सब चाहे कितना भी आ जाये लेकिन प्रभु को बांधने मे समर्थ नही है-- प्रभु सोने या चांदी की जंजीरो से नही बंधेगे ,,प्रभु अगर बंधते है तो आंसुओ की लडियो मे बंध जाते है--&lt;br /&gt;
जब हरि लगन लगेगी ओर लगन मे जब अगन आ जायेगी तो आंसु खुद गिरने लगेंगे--&lt;br /&gt;
ओर भक्ति मे शर्म भी नही करनी चाहिये क्योकि अगर मीरा शर्म करती तो फिर कैसे वो महलो को छोड पाती- ,,,भक्ति संसार को दिखाने के लिए नही होती,,भक्ति तो प्रभु के लिए होती है-- अगर प्रभु के लिए चलें है तो ये चलना भी भक्ति हो जाती है-- जो क्रिया भगवान से जुड गयी वो भक्ति हो गयी,--&lt;br /&gt;
संसार के लिए तो ये जीभ कितना कुछ बोलती रहती है लेकिन प्रभु का नाम गाने मे संकोच करती है ईसलिए विवेकपुर्वक जितना ज्यादा हो सके तो हरिनाम मे ईसका प्रयोग करना चाहिये------ सुत दारा अरु लक्ष्मी पापी घर भी होय&lt;br /&gt;
संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोय |----&lt;br /&gt;
तुलसीदास जी कहते है की पुत्र,,पत्नी,,ल&lt;br /&gt;
क्ष्मी ये सब तो पापी के घर भी होते है लेकिन हरि कथा ओर संत दर्शन ये दुर्लभ है---&lt;br /&gt;
जब भी हरि कथा श्रवण करने का मौका मिले तो समझ लेना की प्रभु की बहुत कृपा है---&lt;br /&gt;
हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता---&lt;br /&gt;
भगवान अनंत है ओर उनकी कथा भी अनंत है---&lt;br /&gt;
वैसे तो भगवान के 24 अवतारो का वर्णन है शास्त्रो मे लेकिन भगवान के अवतार अनंत ओर अनगिनत है ओर वो कहीं भी ओर किसी भी समय प्रकट हो सकते है---&lt;br /&gt;
कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरहि पारा!-- कलियुग मे हरिनाम की बहुत महिमा है---&lt;br /&gt;
जिस तरह अमृत को जानबुझकर पीयो या अनजाने मे अमृत अमर करता है उसी प्रकार भगवान का नाम चाहे जैसे भी लो भगवान का नाम कभी खाली नही जाता---&lt;br /&gt;
सांकेतं परिहास्यं वा---&lt;br /&gt;
रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी॥&lt;br /&gt;
रामकथा कलि बिटप कुठारी।-- भगवान की कथा हाथ की एक ताली है जो संदेह रुपि पक्षियो को उडा देती है---&lt;br /&gt;
सत्य है क्योकि हरि कथा का अगर श्रवण मनन चिंतन ओर धारण किया जाए तो मन से सारे संशय निकलकर प्रभु प्रेम जागृत होता है ओर जिस तरह कुल्हाडी से वृक्ष काटा जाता है उसी प्रकार हरिकथा से मनुष्य के जीवन से संसार रुपि विष का मोह दुर होता है---&lt;br /&gt;
शेष सब भगवद् कृपा ओर गुरुजी का आशीर्वाद---&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/6020798440398886788/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2015/08/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/6020798440398886788'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/6020798440398886788'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2015/08/blog-post.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiFZbV0ceddqyLTHF-6KmBGtoMj0ZJLpI7WHR7W0LcsN73kGHKtqRPoaTiRv91MLKFKlhYimNM-kzl-Qe2-HhC5s3z-GMLf3XF47W6aANo5DcIvg-jO8IWb4WhQaX2IvuA7qWYjv5B4m0Xz/s72-c/FB_IMG_1440083767766.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-3828633244735672979</id><published>2015-07-30T07:39:00.000-07:00</published><updated>2015-07-30T07:39:25.342-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh4-tSN2DEytfVPg9gEDowHSCVLaypjm41cmVMdHn1Ajy4yCCfjKnqWtvoNKT3NkvSfENyYpS3r1zQ3_-HP25VEp4zqg_9kEF-NLNgMeoVInoxC3ZMKiPYB3vk6dK6rSZntVPU0P6FIqvS5/s1600/DSC01979.JPG&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;360&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh4-tSN2DEytfVPg9gEDowHSCVLaypjm41cmVMdHn1Ajy4yCCfjKnqWtvoNKT3NkvSfENyYpS3r1zQ3_-HP25VEp4zqg_9kEF-NLNgMeoVInoxC3ZMKiPYB3vk6dK6rSZntVPU0P6FIqvS5/s640/DSC01979.JPG&quot; width=&quot;640&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style=&quot;text-align: left;&quot;&gt;गुरु पूर्णिमा ??&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
गुरु के प्रति आभार का दिन ......&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु : गुरु देवों महेश्वरः !&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
गुरु साक्षात् परब्रम्हा तस्मे श्री गुरुये नमः !!&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
भारतीय संस्कृति में अनादि काल से ही गुरु को विशेष दर्जा प्राप्त है ! गुरु की महानता का परिचय सन्त कबीर ने बहुत अच्छे से इस दोहे में दिया है !&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
गुरु गोबिन्द दोउ खड़े काके लागु पाए !&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
बलिहारी गुरु आपके जो गोबिन्द दियो मिलाय !!&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
गुरु शब्द का महत्व तो गुरु शब्द से ही निमित है संस्कृत में &quot; गू &quot; का अर्थ है अन्धकार ( अज्ञान ) और&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
&quot; रु &quot; का अर्थ है हटाने वाला यानि प्रकाश ....गुरु का अर्थ है अन्धकार को हटाने वाला , माता पिता हमारे जीवन के प्रथम गुरु है ! जो हमारा पालन पोषण करते है हमे बोलना सिखाते है ! तथा वो सभी संस्कार देते है ! जिनके द्वारा हम समाज में रहने योग्य बनते है उसके आगे जीवन में सार्थकता प्रदान करने के लिए जिस ज्ञान एवं शिक्षा की आवश्यकता होती है वह गुरु से प्राप्त होती है !!&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
आषाढ़ मॉस की पूर्णिमा का दिन गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है ! हिन्दू धर्म में इस का विशेष महत्व है हिन्दू धर्म गर्न्थो के अनुसार इस दिन महाऋषि वेद व्यासः जी का जन्म हुआ था उन्होंने 18 पुराणों एवम् 18 उपमहापुराणो की रचना की थी ! गुरु जो स्वम् पूर्ण होते है ! जो पूर्ण है वही पूर्णत्व की प्राप्ति दुसरो को करा सकते है ! पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति जिसके जीवन में प्रकाश है ! वही तो अपने शिष्यो के अन्तःकरण में ज्ञान रूपी चन्दर की किरणे बिखेर सकता है ! गुरु वहीँ जो हमारे जीवन को सही राह पर ले आये ! गुरु हमारे भीतर संस्कारो का सर्जन करता है और दुर्भवनाओ का विनाश करता है अतः गुरु पूर्णिमा सदगुरु के पूजन का पर्व है ! यह किसी व्यक्ति की पूजा नही अपितु ज्ञान का आदर है ज्ञान का पूजन है !!!&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
वर्तमान युग में गुरु और शिष्य की परम्परा में कुछ विसंगतियां आ गयी है यह जरुरी नही देह धारी गुरु को माना जाये ! मन में सच्ची लगन और श्रद्धा हो तो गुरु को कही भी पाया जा सकता है ! एकलव्य ने मिटटी की प्रतिमा बना कर गुरु को अपने भीतर जागृत किया और एक महान धनुर्धर बना , दातेत्र ने 24 गुरु बनाये यानि 24 जगह से ज्ञान प्राप्त किया ! उन्होंने संसार में मौजूद हर उस वनस्पति प्राणी ग्रह नक्षत्र को अपना गुरु बनाया जिससे कुछ सिख जा सके !!!!!&lt;/div&gt;
&lt;div&gt;
गुरु पूर्णिमा की आप सभी को हार्दिक बधाई ......&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/3828633244735672979/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2015/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/3828633244735672979'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/3828633244735672979'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2015/07/blog-post.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh4-tSN2DEytfVPg9gEDowHSCVLaypjm41cmVMdHn1Ajy4yCCfjKnqWtvoNKT3NkvSfENyYpS3r1zQ3_-HP25VEp4zqg_9kEF-NLNgMeoVInoxC3ZMKiPYB3vk6dK6rSZntVPU0P6FIqvS5/s72-c/DSC01979.JPG" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-607611060377171453</id><published>2015-03-07T23:50:00.002-08:00</published><updated>2015-06-30T22:00:21.111-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjF699RPIzdPCguZkLStodfhMoMmVP0W6LPn8Bpv3NFpNRaSkOomXhlSf2OuNcFIe682g7UuABH42auuGQbnkTzgf0ruq4OaRjGafaFYkdbRDehs5FVqq6GcyxbYjEFR00Ur-JzesqVIYlA/s1600/_20141224_112055.JPG&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjF699RPIzdPCguZkLStodfhMoMmVP0W6LPn8Bpv3NFpNRaSkOomXhlSf2OuNcFIe682g7UuABH42auuGQbnkTzgf0ruq4OaRjGafaFYkdbRDehs5FVqq6GcyxbYjEFR00Ur-JzesqVIYlA/s1600/_20141224_112055.JPG&quot; width=&quot;288&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
कथा&lt;br /&gt;
भगवान शिव ने कहा “हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर गंगा के तट पर तुमने अपनी 
बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इस अवधि में तुमने अन्न ना 
खाकर केवल हवा का ही सेवन के साथ तुमने सूखे पत्ते चबाकर काटी थी।&lt;br /&gt;
माघ की शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश कर तप किया था। वैशाख की 
जला देने वाली गर्मी में पंचाग्नी से शरीर को तपाया। श्रावण की मुसलाधार 
वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न जल ग्रहन किये व्यतीत किया। 
तुम्हारी इस कष्टदायक तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुःखी और नाराज़ 
होते थे। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता की नाराज़गी को देखकर नारदजी 
तुम्हारे घर पधारे।&lt;br /&gt;
तुम्हारे पिता द्वारा आने का कारण 
पूछने पर नारदजी बोले – ‘हे गिरिराज! मैं भगवान् विष्णु के भेजने पर यहाँ 
आया हूँ। आपकी कन्या की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वह उससे विवाह करना 
चाहते हैं। इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूँ।’ नारदजी की बात 
सुनकर पर्वतराज अति प्रसन्नता के साथ बोले- ‘श्रीमान! यदि स्वंय विष्णुजी 
मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो 
साक्षात ब्रह्म हैं। यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री 
सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर कि लक्ष्मी बने।’&lt;br /&gt;
नारदजी तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर विष्णुजी के पास गए और उन्हें विवाह
 तय होने का समाचार सुनाया। परंतु जब तुम्हे इस विवाह के बारे में पता चला 
तो तुम्हारे दुःख का ठिकाना ना रहा। तुम्हे इस प्रकार से दुःखी देखकर, 
तुम्हारी एक सहेली ने तुम्हारे दुःख का कारण पूछने पर तुमने बताया कि – 
‘मैंने सच्चे मन से भगवान् शिव का वरण किया है, किन्तु मेरे पिता ने मेरा 
विवाह विष्णुजी के साथ तय कर दिया है। मैं विचित्र धर्मसंकट में हूँ। अब 
मेरे पास प्राण त्याग देने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचा।’ तुम्हारी सखी 
बहुत ही समझदार थी। उसने कहा – ‘प्राण छोड़ने का यहाँ कारण ही क्या है? 
संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिये। भारतीय नारी के जीवन की सार्थकता 
इसी में है कि जिसे मन से पति रूप में एक बार वरण कर लिया, जीवनपर्यन्त उसी
 से निर्वाह करे। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो भगवान् भी असहाय 
हैं। मैं तुम्हे घनघोर वन में ले चलती हूँ जो साधना थल भी है और जहाँ 
तुम्हारे पिता तुम्हे खोज भी नहीं पायेंगे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर
 अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।’&lt;br /&gt;
तुमने ऐसा ही 
किया। तुम्हारे पिता तुम्हे घर में न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए। वह 
सोचने लगे कि मैंने तो विष्णुजी से अपनी पुत्री का विवाह तय कर दिया है। 
यदि भगवान् विष्णु बारात लेकर आ गये और कन्या घर पर नहीं मिली तो बहुत 
अपमान होगा, ऐसा विचार कर पर्वतराज ने चारों ओर तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।
 इधर तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक 
गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगीं। भाद्रपद तृतीय शुक्ल को हस्त 
नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण किया। रात भर मेरी 
स्तुति में गीत गाकर जागरण किया। तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से 
मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुँचा और तुमसे वर मांगने 
को कहा तब अपनी तपस्या के फलीभूत मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा – ‘मैं 
आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूँ। यदि आप सचमुच मेरी 
तपस्या से प्रसन्न होकर यहाँ पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के &lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;/div&gt;
रूप में
 स्वीकार कर लीजिये। ‘तब ‘तथास्तु’ कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया।&lt;br /&gt;
प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित करके अपनी 
सखी सहित व्रत का वरण किया। उसी समय गिरिराज अपने बंधु – बांधवों के साथ 
तुम्हे खोजते हुए वहाँ पहुंचे। तुम्हारी दशा देखकर अत्यंत दुःखी हुए और 
तुम्हारी इस कठोर तपस्या का कारण पुछा। तब तुमने कहा – ‘पिताजी, मैंने अपने
 जीवन का अधिकांश वक़्त कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या के केवल
 उद्देश्य महादेवजी को पति के रूप में प्राप्त करना था। आज मैं अपनी तपस्या
 की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूँ। चुंकि आप मेरा विवाह विष्णुजी से करने का 
निश्चय कर चुके थे, इसलिये मैं अपने आराध्य की तलाश में घर से चली गयी। अब 
मैं आपके साथ घर इसी शर्त पर चलूंगी कि आप मेरा विवाह महादेवजी के साथ ही 
करेंगे। पर्वतराज ने तुम्हारी इच्छा स्वीकार करली और तुम्हे घर वापस ले 
गये। कुछ समय बाद उन्होने पूरे विधि – विधान के साथ हमारा विवाह किया।”&lt;span class=&quot;messageBody&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;type&amp;quot;:3,&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;K&amp;quot;}&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div&gt;
&lt;span class=&quot;userContent&quot;&gt;भगवान् शिव ने आगे कहा – “हे पार्वती! भाद्र पद कि शुक्ल तृतीया को तुमने 
मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के परिणाम स्वरूप हम दोनों का विवाह
 संभव हो सका। इस व्रत का महत्त्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से
 करने वाली प्रत्येक स्त्री को मन वांछित फल देता हूँ।” भगवान् शिव ने 
पार्वतीजी से कहा कि इस व्रत को जो भी स्त्री पूर्ण श्रद्धा से करेगी उसे 
तुम्हारी तरह अचल सुहाग प्राप्त होगा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;mvm uiStreamAttachments fbMainStreamAttachment&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;type&amp;quot;:10,&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;H&amp;quot;}&quot;&gt;
&lt;div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/607611060377171453/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2015/03/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/607611060377171453'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/607611060377171453'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2015/03/blog-post.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjF699RPIzdPCguZkLStodfhMoMmVP0W6LPn8Bpv3NFpNRaSkOomXhlSf2OuNcFIe682g7UuABH42auuGQbnkTzgf0ruq4OaRjGafaFYkdbRDehs5FVqq6GcyxbYjEFR00Ur-JzesqVIYlA/s72-c/_20141224_112055.JPG" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-5867843133567655102</id><published>2015-03-07T23:26:00.000-08:00</published><updated>2015-03-07T23:26:08.096-08:00</updated><title type='text'>&#39;&#39; भारतीय संस्कृति में शंख कi स्थान &#39;&#39;</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgQJ5ILl1DM80HfMqzj4ucCJl_yrtYM1aQg3oQVjG4eJe-WnoG-_jvkIV4Dfss6zUyAE_GRxpPf3XDZDvK6FQAwcMNuWM_vpGviiKrEhsPNJlMciUQm0uZ2rCeZLXk_RXUwRD8g2eZOkpeT/s1600/DSC01460.JPG&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgQJ5ILl1DM80HfMqzj4ucCJl_yrtYM1aQg3oQVjG4eJe-WnoG-_jvkIV4Dfss6zUyAE_GRxpPf3XDZDvK6FQAwcMNuWM_vpGviiKrEhsPNJlMciUQm0uZ2rCeZLXk_RXUwRD8g2eZOkpeT/s1600/DSC01460.JPG&quot; height=&quot;180&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
भारतीय
 संस्कृति में शंख को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ब्रह्मवैवर्त पुराण 
के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में 
वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है।
 शंख से कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता 
प्रसन्न होते हैं। कल्याणकारी शंख दैनिक जीवन में दिनचर्या को कुछ समय के 
लिए विराम देकर मौन रूप से देव अर्चना के लिए प्रेरित करता है। यह भारतीय 
संस्कृति की धरोहर है। विज्ञान के अनुसार शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक 
प्रकार के घोंघे का खोल है जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है।हिन्दू धर्म में पूजा स्थल पर शंख रखने की परंपरा है क्योंकि शंख को सनातन
 धर्म का प्रतीक माना जाता है। शंख निधि का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि
 इस मंगलचिह्न को घर के पूजास्थल में रखने से अरिष्टों एवं अनिष्टों का नाश
 होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं 
नवनिधियों में शंख का महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिन्दू धर्म में शंख का 
महत्त्व अनादि काल से चला आ रहा है। शंख का हमारी पूजा से निकट का सम्बन्ध 
है। कहा जाता है कि शंख का स्पर्श पाकर जल गंगाजल के सदृश पवित्र हो जाता 
है। मन्दिर में शंख में जल भरकर भगवान की आरती की जाती है। आरती के बाद शंख
 का जल भक्तों पर छिड़का जाता है जिससे वे प्रसन्न होते हैं। जो भगवान 
कृष्ण को शंख में फूल, जल और अक्षत रखकर उन्हें अर्ध्य देता है, उसको अनन्त
 पुण्य की प्राप्ति होती है। शंख में जल भरकर ऊँ नमोनारायण का उच्चारण करते
 हुए भगवान को स्नान कराने से पापों का नाश होता है।&lt;br /&gt;
धार्मिक 
कृत्यों में शंख का उपयोग किया जाता है। पूजा-आराधना, अनुष्ठान-साधना, 
आरती, महायज्ञ एवं तांत्रिक क्रियाओं के साथ शंख का वैज्ञानिक एवं 
आयुर्वेदिक महत्त्व भी है। हिन्दू मान्यता के अनुसार कोई भी पूजा, हवन, 
यज्ञ आदि शंख के उपयोग के बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। कुछ गुह्य साधनाओं
 में इसकी अनिवार्यता होती है। शंख साधक को उसकी इच्छित मनोकामना पूर्ण 
करने में सहायक होते हैं तथा जीवन को सुखमय बनाते हैं। शंख को विजय, 
समृद्धि, सुख, यश, कीर्ति तथा लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। वैदिक 
अनुष्ठानों एवं तांत्रिक क्रियाओं में भी विभिन्न प्रकार के शंखों का 
प्रयोग किया जाता है।&lt;br /&gt;
साधारणत: मंदिर में रखे जाने वाले शंख उल्टे
 हाथ के तरफ खुलते हैं और बाज़ार में आसानी से ये कहीं भी मिल जाते हैं. 
लक्ष्मी के हाथ में जो शंख होता है वो दक्षिणावर्ती अर्थात सीधे हाथ की तरफ
 खुलने वाले होते हैं। वामावर्ती शंख को जहां विष्णु का स्वरुप माना जाता 
है और दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का स्वरुप माना जाता है। दक्षिणावृत्त 
शंख घर में होने पर लक्ष्मी का घर में वास रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;h5 class=&quot;uiStreamMessage userContentWrapper&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;type&amp;quot;:1,&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;K&amp;quot;}&quot;&gt;
&lt;span class=&quot;messageBody&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;type&amp;quot;:3}&quot;&gt;&lt;span class=&quot;userContent&quot;&gt; &lt;br /&gt; शंख पूजा का महत्त्व -&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;
 सभी वैदिक कार्यों में शंख का विशेष स्थान है। शंख का जल सभी को पवित्र 
करने वाला माना गया है, इसी वजह से आरती के बाद श्रद्धालुओं पर शंख से जल 
छिड़का जाता है। साथ ही शंख को लक्ष्मी का भी प्रतीक माना जाता है, इसकी 
पूजा महालक्ष्मी को प्रसन्न करने वाली होती है। इसी वजह से जो व्यक्ति 
नियमित रूप से शंख की पूजा करता है उसके घर में कभी धन अभाव नहीं रहता। 
शास्त्रों के अनुसार श्रीकृष्ण का स्वरूप कहे जाने वाले माह मार्गशीर्ष में
 उन्हीं के पंचजन्य शंख की पूजा का विशेष महत्त्व है। जिस प्रकार सभी 
देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, वैसे ही शंख का भी पूजन करें। अर्चना 
करते समय इस मंत्र का जप करें -&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; त्वं पुरा सागरोत्पन्न विष्णुना विधृत: करे। निर्मित: सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते।&lt;br /&gt; तव नादेन जीमूता वित्रसन्ति सुरासुरा:। शशांकायुतदीप्ताभ पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते॥&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; शंख-ध्वनि / शंख बजाना -&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;
 शंख नाद का प्रतीक है। नाद जगत में आदि से अंत तक व्याप्त है। सृष्टि का 
आरंभ भी नाद से ही होता है और विलय भी उसी में होता है। दूसरे शब्दों में 
शंख को ॐ का प्रतीक माना जाता है, इसलिए पूजा-अर्चना आदि समस्त मांगलिक 
अवसरों पर शंख ध्वनि की विशेष महत्ता है। हिन्दू संस्कृति में पूजा और 
अनुष्ठान के समय शंख बजाने की परंपरा है जो बहुत पुरानी है। जैन, बौद्ध, 
शाक्त, शैव, वैष्णव आदि सभी संप्रदायों में शंख ध्वनि शुभ मानी गई है। 
महाभारत युद्ध में शंख ध्वनि की विशद चर्चा है। कई योद्धाओं के शंखों के 
नाम भी गिनाए गए हैं जिसमें कृष्ण के पांचजन्य शंख की विशेष महत्ता बताई गई
 है। जहां तक तीन बार शंख बजाने की परंपरा है वह आदि, मध्य और अंत से जुड़ी
 है। वैदिक मान्यता के अनुसार शंख को विजय घोष का प्रतीक माना जाता है। 
कार्य के आरम्भ करने के समय शंख बजाना शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसके 
नाद से सुनने वाले को सहज ही ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव हो जाता है और 
मस्तिष्क के विचारों में भी सकारात्मक बदलाव आ जाता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; हमारे 
यहां शंख बजाना एक धार्मिक अनुष्ठान है। पूजा आरती, कथा, धार्मिक 
अनुष्टानों, हवन, यज्ञ आदि के आरंभ व अंत में भी शंख-ध्वनि करने का विधान 
है। इसके पीछे धार्मिक आधार तो है ही, वैज्ञानिक रूप से भी इसकी 
प्रामाणिकता सिद्ध हो चुकी है। और शंख बजाने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ
 भी मिलता है। शंख की पवित्रता और महत्त्व को देखते हुए हमारे यहां सुबह और
 शाम शंख बजाने की प्रथा शुरू की गई है। मंदिरों में नियमित रूप से और बहुत
 से घरों में पूजापाठ, धार्मिक अनुष्ठान, व्रत, कथा, जन्मोत्सव आदि अवसरों 
पर शंख बजाना एक शुभ परम्परा मानी जाती है। कहा जाता है कि शंख बजाने से घर
 के बाहर की आसुरी शक्तियां घर के भीतर प्रवेश नहीं कर पाती हैं। पारद 
शिवलिंग, पार्थिव शिवलिंग एवं मंदिरों में शिवलिंगों पर रुद्राभिषेक करते 
समय शंख-ध्वनि की जाती है। आरती, धार्मिक उत्सव, हवन-क्रिया, राज्याभिषेक, 
गृह-प्रवेश, वास्तु-शांति आदि शुभ अवसरों पर शंख-ध्वनि से लाभ मिलता है। 
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार शंख बजाने से भूत-प्रेत, अज्ञान, रोग, 
दुराचार, पाप, दुषित विचार और गरीबी का नाश होता है। शंख बजाने की परंपरा 
प्राचीन काल से चली आ रही है। महाभारत काल में श्रीकृष्ण द्वारा कई बार 
अपना पंचजन्य शंख बजाया गया था। पुराणों और शास्त्रों में शंख ध्वनि को 
कल्याणकारी कहा गया है। इसकी ध्वनि विजय का मार्ग प्रशस्त करती है। शंख की 
ध्वनि से भक्तों को पूजा-अर्चना के समय की सूचना मिलती है। आरती के समापन 
के बाद इसकी ध्वनि से मन को शांति मिलती है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; समुद्र मंथन के समय 
देव- दानव संघर्ष के दौरान समुद्र से 14 अनमोल रत्नों की प्राप्ति हुई। 
जिनमें आठवें रत्न के रूप में शंखों का जन्म हुआ। जिनमें सर्वप्रथम पूजित 
देव गणेश के आकार के गणेश शंख का प्रादुर्भाव हुआ जिसे गणेश शंख कहा जाता 
है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; शंख का महत्त्व धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, वैज्ञानिक रूप से 
भी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख-ध्वनि के प्रभाव में सूर्य की 
किरणें बाधक होती हैं। अतः प्रातः व सायंकाल में जब सूर्य की किरणें 
निस्तेज होती हैं, तभी शंख-ध्वनि करने का विधान है। इससे आसपास का वातावरण 
तथा पर्यावरण शुद्ध रहता है। आयुर्वेद के अनुसार शंखोदक भस्म से पेट की 
बीमारियाँ, पीलिया, कास प्लीहा यकृत, पथरी आदि रोग ठीक होते हैं।&lt;br /&gt; ऋषि 
श्रृंग की मान्यता है कि छोटे-छोटे बच्चों के शरीर पर छोटे-छोटे शंख बाँधने
 तथा शंख में जल भरकर अभिमंत्रित करके पिलाने से वाणी-दोष नहीं रहता है। 
बच्चा स्वस्थ रहता है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि मूक एवं श्वास रोगी 
हमेशा शंख बजायें तो बोलने की शक्ति पा सकते हैं।&lt;br /&gt; रूक-रूक कर बोलने व 
हकलाने वाले यदि नित्य शंख-जल का पान करें, तो उन्हें आश्चर्यजनक लाभ 
मिलेगा। दरअसल मूकता व हकलापन दूर करने के लिए शंख-जल एक महौषधि है।&lt;br /&gt; हृदय रोगी के लिए यह रामबाण औषधि है।&lt;br /&gt;
 ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, पूजा के समय शंख में जल भरकर देवस्थान में 
रखने और उस जल से पूजन सामग्री धोने और घर के आस-पास छिड़कने से वातावरण 
शुद्ध रहता है। क्योकि शंख के जल में कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भूत 
शक्ति होती है। साथ ही शंख में रखा पानी पीना स्वास्थ्य और हमारी हड्डियों,
 दांतों के लिए बहुत लाभदायक है। शंख में गंधक, फास्फोरस और कैल्शियम जैसे 
उपयोगी पदार्थ मौजूद होते हैं। इससे इसमें मौजूद जल सुवासित और रोगाणु रहित
 हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में इसे महाऔषधि माना जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h5&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/5867843133567655102/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2015/03/i.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/5867843133567655102'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/5867843133567655102'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2015/03/i.html' title='&#39;&#39; भारतीय संस्कृति में शंख कi स्थान &#39;&#39;'/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgQJ5ILl1DM80HfMqzj4ucCJl_yrtYM1aQg3oQVjG4eJe-WnoG-_jvkIV4Dfss6zUyAE_GRxpPf3XDZDvK6FQAwcMNuWM_vpGviiKrEhsPNJlMciUQm0uZ2rCeZLXk_RXUwRD8g2eZOkpeT/s72-c/DSC01460.JPG" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-6537742121768687610</id><published>2014-07-21T21:32:00.001-07:00</published><updated>2014-07-21T21:32:36.993-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEidM8-t8quxuZ_mCJs39fjwXUUhcnC_lUhqpE_-ZQajjU_4GnYGCsJuZPLXLgd2MXKyW1uvnc9dpqAe-YfV3M0fJ8SBJG_J9z1bQy2zaOMOxlI91Je9GNvg21NJaD2aUYfT4RCp45vHYZlY/s1600/IMG_1429a.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEidM8-t8quxuZ_mCJs39fjwXUUhcnC_lUhqpE_-ZQajjU_4GnYGCsJuZPLXLgd2MXKyW1uvnc9dpqAe-YfV3M0fJ8SBJG_J9z1bQy2zaOMOxlI91Je9GNvg21NJaD2aUYfT4RCp45vHYZlY/s1600/IMG_1429a.jpg&quot; height=&quot;150&quot; width=&quot;200&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;span class=&quot;messageBody&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;type&amp;quot;:3}&quot;&gt;&lt;span class=&quot;userContent&quot;&gt;भगवान
 शंकर का नंदी अवतार : भगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। 
भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात का अनुसरण करते हुए सभी जीवों से 
प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है जिसका अर्थ है कर्म 
ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि 
ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न
 करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव 
की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म 
लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न 
एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना 
गणाध्यक्ष बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;span class=&quot;messageBody&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;type&amp;quot;:3}&quot;&gt;&lt;span class=&quot;userContent&quot;&gt;&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgCwwC5zPDd43cuOw_aK6Mm6ZLh97xtpXaXHo0c5txIF7CEWh7pwapSarv_DDmGJvE_lUkssrm6ThVd39HCjaTyUxWnAUR1m9EvNoZ7Vz9WaJv75dzxNhvZrwIaRvzZIp-R6dDvuXzqGIRN/s1600/9391_341919535945690_1819494710_n.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgCwwC5zPDd43cuOw_aK6Mm6ZLh97xtpXaXHo0c5txIF7CEWh7pwapSarv_DDmGJvE_lUkssrm6ThVd39HCjaTyUxWnAUR1m9EvNoZ7Vz9WaJv75dzxNhvZrwIaRvzZIp-R6dDvuXzqGIRN/s1600/9391_341919535945690_1819494710_n.jpg&quot; height=&quot;240&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/6537742121768687610/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2014/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/6537742121768687610'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/6537742121768687610'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2014/07/blog-post.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEidM8-t8quxuZ_mCJs39fjwXUUhcnC_lUhqpE_-ZQajjU_4GnYGCsJuZPLXLgd2MXKyW1uvnc9dpqAe-YfV3M0fJ8SBJG_J9z1bQy2zaOMOxlI91Je9GNvg21NJaD2aUYfT4RCp45vHYZlY/s72-c/IMG_1429a.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-617962277688170460</id><published>2013-12-06T04:02:00.001-08:00</published><updated>2013-12-06T04:02:34.574-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiI2TLjWqVjfvItZRUBaGH6KrYiumwXjP_1t0SwPiFG3_xqW4PkRnU5t33_zGAYCPnE4ylXI4BVX85hJJh5-gyWhyYoEbNMeMeT20o4FLxQ8DLW9Xu7qlmRN49EGPolFeBB3mCJP6K1YhDl/s1600/IMG_0943.JPG&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;320&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiI2TLjWqVjfvItZRUBaGH6KrYiumwXjP_1t0SwPiFG3_xqW4PkRnU5t33_zGAYCPnE4ylXI4BVX85hJJh5-gyWhyYoEbNMeMeT20o4FLxQ8DLW9Xu7qlmRN49EGPolFeBB3mCJP6K1YhDl/s320/IMG_0943.JPG&quot; width=&quot;228&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
घट-घट वासी राम की व्यापकता को स्वीकारते हुए संत कवि तुलसीदास जी
 कहते  है &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; सियाराम मय सब जग जानी। करहुं प्रणाम जोर जुग पानी।।&lt;br /&gt;
तुलसीदास
 जी के  लिए सगुण और निर्गुण के भेद व्यर्थ हैं। कहते हैं -&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; जो गुन रहित 
सगुन सोइ  कैसे। जलु हिम उपल विलग नहिं जैसे।।&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;अर्थात् जिस प्रकार बर्फ और 
पानी एक ही  है, उसी प्रकार सगुण और निर्गुण एक ही है। व्यक्ति चाहे सगुण 
राम का नाम  ले चाहे निर्गुण राम का दोनों में ही त्याग, समर्पण, प्रेम, 
भक्ति आवश्यक  है।&amp;nbsp; राम के प्रति उनका समर्पण देखिए-&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; तुलसी जाके मुखन ते, 
धोखेहु निकसे  राम।&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; ताके पग की पानहीं, मेरे तन की चाम।।&lt;br /&gt;
संत कवि तुलसीदास 
ने राम के  अनन्य भक्त श्री हनुमान जी महाराज एवं शिव कृपा से राम गुणगान 
करते हुए  लोकहित के लिए अमर ग्रंथ रामचरितमानस की रचना की। वह जीवन भर 
प्रभु राम का  गुणगान करते रहे और राम की कृपा से लगभग 126 वर्ष की उम्र 
में महाप्रयाण  किया। लोकहित के लिए लोक भाषा में रामायण रचने का आदेश 
तुलसीदास जी को  भगवान शिव ने ही तो दिया था।&amp;nbsp; वर्णन मिलता है कि महाप्रयाण
 के समय उन्होंने  अपने भक्तों को यह संकेत दे दिया था कि अब वह इस देह को 
त्यागना चाहते  हैं-&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; राम नाम यश बरनि कैं, भयो चहत अब मौन। तुलसी के मुख 
डारिबो, अब ही  तुलसी सौन।।&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;अपने भक्तों के आग्रह पर उन्होंने अंतिम समय 
में सभी को राम  नाम लेने की सलाह दी-&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; अलप तो अवधि जीव, तामें बहुसोच पोच। करिबे को बहुत है, काह काह  
कीजिए।।&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; पार न पुरानहू को, वेदहू को अंत नाहि। वानी तो अनेक, चित कहां-कहां
  दीजिये।।&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; काव्य की कला अनंत, छंद को प्रबंध बहु। राग तो रसीले, रस कहां-कहां  
पीजिए।।&lt;br /&gt;
&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; लाखन में एक बात, तुलसी बताये जात। जनम जो सुधार चहौ, राम नाम  
लीजिये।।&lt;br /&gt;
जप, तप, पूजा, पाठ, दान, यज्ञ, ध्यान, साधना समाधि सभी को राम को अर्पित
  कर दीजिए, सफल होगा मानव जन्म। सभी धर्मों का अंतिम लक्ष्य उस परम प्रभु 
 की कृपा पाना ही है। उस प्रभु&amp;nbsp; को हम अल्लाह, ईसा, रहीम, अकाल पुरुष किसी 
 भी नाम से पुकारें वह तो सभी में रमने वाला राम है। हम सब का नियंता है। 
हम  सब उसी के अंश हैं और अंत में उसी में मिल जाना चाहते हैं। हमें उसे 
कभी  नहीं भूलना चाहिए। संसार में कर्म करते हुए उसी को ध्यान में रखना 
चाहिए।  यदि हम भौतिक सुख संपदा चाहते हैं, तो वह भी वही दे सकता है । यदि 
शरीर को  किसी तरह का कष्ट हो, तो उसी को याद करें,, उसी से क्षमा मांगें 
कहें-  प्रभु ! हमसे कोई अपराध हुआ है। किंतु इतना कठोर दंड न दें। वह तो 
दीन बंधु  है, आपकी पुकार अवश्य सुनेगा। बस संकल्प लें, उसे कभी नहीं 
भूलेंगे, वह  करुणा निधान आपकी सहायता के लिए दौड़ा आएगा। कारण ‘राम’ शब्द 
तो एक मन्त्र  है&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;

- मंत्र महामणि विषम ब्याल के। मैटत कठिन कुअंक भाल के।।&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/617962277688170460/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/12/blog-post_6.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/617962277688170460'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/617962277688170460'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/12/blog-post_6.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiI2TLjWqVjfvItZRUBaGH6KrYiumwXjP_1t0SwPiFG3_xqW4PkRnU5t33_zGAYCPnE4ylXI4BVX85hJJh5-gyWhyYoEbNMeMeT20o4FLxQ8DLW9Xu7qlmRN49EGPolFeBB3mCJP6K1YhDl/s72-c/IMG_0943.JPG" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-1268565431542781111</id><published>2013-12-06T03:28:00.000-08:00</published><updated>2013-12-06T03:28:19.406-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgNBS5_H7ept-YClYaM5kk7-X626uCISRDYogekuDpA_phEjla1aq9a9KUBNSAjzvyz52aVd-ORJ4BlQZ0RDmjyYb-CvDC9-oXElovwWahFD6ez-0IbXsHC1bqIA8EeRl6eJnGlMOwuuH_R/s1600/488239_348830845200783_878412087_n.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;400&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgNBS5_H7ept-YClYaM5kk7-X626uCISRDYogekuDpA_phEjla1aq9a9KUBNSAjzvyz52aVd-ORJ4BlQZ0RDmjyYb-CvDC9-oXElovwWahFD6ez-0IbXsHC1bqIA8EeRl6eJnGlMOwuuH_R/s400/488239_348830845200783_878412087_n.jpg&quot; width=&quot;336&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
गोस्वामी
 जी हनुमान के सबसे बडे भक्त थे।  हनुमान की विशेषताओं को देखकर वह पूरी 
तरह उनके हो गए। हनुमान के माध्यम से उन्होंने राम की भक्ति ही नहीं 
प्राप्त की, राम के दर्शन भी कर लिए। हनुमान ने गोस्वामी की निष्ठा से 
प्रसन्न होकर उन्हें वाराणसी में दर्शन दिए और वर मांगने को कहा। तुलसी को 
अपने राम के दर्शन के अतिरिक्त और क्या मांगना था? हनुमान ने वचन दे दिया। 
राम और हनुमान घोडे पर सवार, तुलसी के सामने से निकल गए। हनुमान ने देखा 
उनका यह प्रयास व्यर्थ गया। तुलसी उन्हें पहचान ही नहीं पाए। हनुमान ने 
दूसरा प्रयास किया। चित्रकूट के घाट पर वह चंदन घिस रहे थे कि राम ने एक 
सुंदर बालक के रूप में उनके पास पहुंच कर तिलक लगाने को कहा। तुलसीदास फिर न
 चूक जाएं अत:हनुमान को तोते का रूप धारण कर ये प्रसिद्ध पंक्तियां कहनी 
पडी-&lt;br /&gt;
चित्रकूट के घाट पर भई संतनकी भीर।तुलसीदास चन्दन घिसें तिलक देत रघुबीर॥&lt;br /&gt;
हनुमान ने मात्र तुलसी
 को ही राम के समीप नहीं पहुंचाया। जिस किसी को भी राम की भक्ति करनी है, 
उसे प्रथम हनुमान की भक्ति करनी होगी। राम हनुमान से इतने उपकृत हैं कि जो 
उनको प्रसन्न किए बिना ही राम को पाना चाहते हैं उन्हें राम कभी नहीं 
अपनाते। गोस्वामी जी ने ठीक ही लिखा-&lt;br /&gt;
राम दुआरेतुम रखवारे।होत न आज्ञा बिनुपैसारे॥&lt;br /&gt;
अत:हनुमान भक्ति के महाद्वारहैं। राम की ही नहीं कृष्ण की भी भक्ति करनी 
हो तो पहले हनुमान को अपनाना होगा। यह इसलिए कि भक्ति का मार्ग कठिन है। 
हनुमान इस कठिन मार्ग को आसान कर देते हैं, अत:सर्वप्रथम उनका शरणागत होना 
पडता है। भारत में कई ऐसे संत व साधक हुए हैं जिन्होंने हनुमान की कृपा से 
अमरत्व को प्राप्त कर लिया। रामायण में राम और सीता के पश्चात सर्वाधिक 
लोकप्रिय चरित्र हैं हनुमान जिनके मंदिर भारत ही नहीं भारत के बाहर भी 
अनगिनत संख्या में निर्मित हैं। धरती तो धरती तीनों लोकों में इनकी ख्याति 
है-&lt;br /&gt;
&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।&lt;span class=&quot;text_exposed_show&quot;&gt;जय कपीसतिहूंलोक उजागर॥&lt;/span&gt;&lt;span class=&quot;userContent&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=&quot;messageBody&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;type&amp;quot;:3,&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;K&amp;quot;}&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/1268565431542781111/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/12/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/1268565431542781111'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/1268565431542781111'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/12/blog-post.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgNBS5_H7ept-YClYaM5kk7-X626uCISRDYogekuDpA_phEjla1aq9a9KUBNSAjzvyz52aVd-ORJ4BlQZ0RDmjyYb-CvDC9-oXElovwWahFD6ez-0IbXsHC1bqIA8EeRl6eJnGlMOwuuH_R/s72-c/488239_348830845200783_878412087_n.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-6696772245029614080</id><published>2013-10-05T05:26:00.000-07:00</published><updated>2013-10-05T05:26:05.724-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;h3 class=&quot;post-title entry-title&quot; itemprop=&quot;name&quot;&gt;
शरद नवरात्रों के शुभ अवसर पर
&lt;/h3&gt;
&lt;div class=&quot;post-header&quot;&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;/div&gt;
शरद नवरात्रों के शुभ अवसर पर &#39;&#39; जागरण एवं भागवत परिवार &#39;&#39; की तरफ से आप सभी को बहुत बहुत बधाई ,,&lt;br /&gt;
हमारी तरफ से आप सभी मित्रो को नवरात्री की हार्दिक शुभ कामनाये...........&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjPPpUFX35U4JfTaTgWQMr6SChwOVugdXIxjpbIP2pvATMhAO7EapPVV1O1Fnh2FTF9pzIqemJWJAkDSgK8mOpGp9gEywJULO63LbYEBb88DZ59smSh25J0QChJdJM6dWPmdC9nDxBoRTR1/s1600/12884_508525149157966_2108556631_n.jpg&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;266&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjPPpUFX35U4JfTaTgWQMr6SChwOVugdXIxjpbIP2pvATMhAO7EapPVV1O1Fnh2FTF9pzIqemJWJAkDSgK8mOpGp9gEywJULO63LbYEBb88DZ59smSh25J0QChJdJM6dWPmdC9nDxBoRTR1/s400/12884_508525149157966_2108556631_n.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjRRxwIqSLolV4LSgKuKLnqtNcd-ifX9xhiEQEzUh10g36jtemXk-arMefFwAo1UdtarZDKzFnGLLy46FB2dhRgF3QXT-z7K-UXHNAXIKvEoZLU98_URB6QnzztTE3ZZnpflXRe7eiQcGbC/s1600/IMG_2178a.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;240&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjRRxwIqSLolV4LSgKuKLnqtNcd-ifX9xhiEQEzUh10g36jtemXk-arMefFwAo1UdtarZDKzFnGLLy46FB2dhRgF3QXT-z7K-UXHNAXIKvEoZLU98_URB6QnzztTE3ZZnpflXRe7eiQcGbC/s320/IMG_2178a.jpg&quot; width=&quot;320&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;
पिप्पलाद ऋषि वैदिक सनातन काल के परम तपस्वी एवं 
ज्ञानी ऋषि थे. पिप्पलाद का जन्म पीपल के वृक्ष के नीचे हुआ पीपल के पत्तों
 का सेवन भोजन रूप में किया और पीपल के नीचे ही कठोर तपस्या की  जिस कारण 
इन्हें पिप्पलाद नाम प्राप्त हुआ. ऋषि पिप्पलाद जी को भगवान शिव का अवतार 
भी माना गया है जिस कारण इन्हें पूजनीय स्थान &lt;span class=&quot;text_exposed_show&quot;&gt;प्राप्त हुआ.&lt;br /&gt; पिप्पलाद जन्म कथा |&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;
 पिप्पलाद जी के संबंध में कुछ कथाएं प्रचलित हैं जिसमें से एक के अनुसार 
जब एक समय त्रेतायुग में अकाल पड़ा तब कौशिक मुनि अपने परिवार समेत 
गृहस्थान को छोड़कर अन्यत्र परिवार का भरण-पोषण करने के लिए निकल पड़ते हैं
 परंतु लालन पालन में असमर्थ होने पर वह दुखी मन से अपने एक पुत्र को बीच 
राह में ही पीपल के वृक्ष के नीचे छोड़ कर चले जाते हैं.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; वह बालक 
जब निंद्रा से जागा तो अपने माता पिता को वहां न पाकर रोने लगता है. थोडी़ 
देर में उसे भूख-प्यास सताने लगती है तब उसे अपने पास पडे़ पीपल के पत्ते 
दिखाई पड़ते हैं भूख से व्याकुल वह बालक उन पत्तों से अपनी भूख शांत करता 
और समीप ही स्थित एक जल कुण्ड का जल पीकर अपनी प्यास बुझाता है.  वह बालक 
प्रतिदिन इसी तरह पत्ते और पानी पीकर भगवान की साधना में लगा रहता है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;
 एक बार वहां देवर्षि नारद जी उस बालक के पास पहुंचते हैं तथा विपरीत दशा 
में भी बालक के विनय भाव से प्रभावित हो उस बालक के सभी यथोचित संस्कार 
पूर्ण करते हैं और उन्हें वेद एवं पुराण का ज्ञान देते हैं. वह बालक को 
भगवान विष्णु की भक्ति करने को कहते हैं अत: वह बालक नियमित रूप से भगवान 
विष्णु की भक्ति किया करता और तप में लीन रहता उस बालक की भक्ति से प्रसन्न
 होकर भगवान विष्णु उसके समक्ष प्रकट होते हैं तथा उस बालक को योग और ज्ञान
 की शिक्षा देते हैं जिससे वह बालक ज्ञानी महर्षि बनता है.&lt;br /&gt; पिप्पलाद एवं शनिदेव &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;
 समय व्यतीत होने के उपरांत वह बालक जिज्ञासा विवश अपने इस कष्टों का करण 
पूछता है. वह नारद मुनि जी से प्रश्न करता है कि क्यों उसे इतनी कम उम्र 
में अनेक कष्टों एवं माता-पिता से अलगाव को सहना पडा़, क्यों मुझे इतनी 
पीड़ा भोगनी पड़ रही हैं. उस बालक के प्रश्न सुन नारद उनसे कहते हैं कि 
तुम्हारे कष्टों का कारण शनि देव हैं जिसके कारण तुम्हें अनेक कष्ट सहने 
पडे़ हैं, नारद मुनि के कथन को सुन कर पिप्पलाद क्रोधित हो जाते हैं और शनि
 देव को श्राप देतें हैं जिस कारण शनि ग्रह पिप्पलाद के तेजोबल से पृथ्वी 
पर एक पर्वत पर गिरते हैं जिससे उनका एक पांव चोटिल हो जाता है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; 
शनि की ऐसी दुर्दशा देखकर ब्रह्मदेव अन्य देवों समेत पिप्पलाद के पास आकर 
उसका क्रोध शांत करते हैं. वह उनसे कहते हैं कि इसमें शनि का कोई  दोष नहीं
 हैं वह तो केवल व्यक्ति को उसके कर्म अनुसार ही फल प्रदान करते हैं अत: 
तुम धराशायी हुए शनि को उनके स्थान पर प्रतिष्ठित कर दो पिप्पलाद मुनि 
ब्रह्मदेव के आदेश का पालन करते हैं. इसलिए जो भी व्यक्ति शनिवार के दिन 
पिप्पलाद नाम का ध्यान करते हैं उन्हें शनि ग्रह के कष्टों से छुटकारा 
प्राप्त होता है शनि ग्रह की शांति के लिए शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष के 
साथ ही शनिदेव के पूजन की परंपरा का विधान है.&lt;br /&gt; पिप्पलाद संबंधि अन्य कथा &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;
 पिप्पलाद मुनि के साथ एक अन्य कथा भी जुडी़ हुई है जिसमें पिप्पलाद को 
महर्षि दधीचि का पुत्र कहा गया है. महर्षि दधीचि ने वृत्रासुर आदि दैत्यों 
के वध के लिए अपनी हड्डियां देवताओं को दान कर दी थी और जब उनकी पत्नी 
सुवर्चा पति के साथ सती होने के लिए चिता की ओर जाने लगीं तभी आकाशवाणी 
होती है कि तुम्हारे गर्भ में महर्षि दधीचि का तेज है जो भगवान शिव का 
अवतार है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; आकाशवाणी को सुन सुवर्चा अपने मनोरथ को कुछ समय के लिए 
टाल देती है और पुत्र के जन्म पश्चात उसे पीपल के वृक्ष के नीचे छोड़ कर 
सती हो जाती हैं. वह बालक पीपल के वृक्ष के नीचे निवास करने लगा और पीपल के
 पत्तों का सेवन करता है जिस कारण उस बालक को पिप्पलाद नाम प्राप्त होता 
है. पिप्पलाद अपने पिता की मृत्यु के कारण अत्यंत क्षुब्ध थे अत: वह 
देवताओं से अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए भगवान शंकर की तपस्या 
करते हैं.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न हो भगवान शिव उनसे वरदान 
मांगने को कहते हैं इस पर पिप्पलाद पिता के हत्यारे देवताओं को भस्म करने 
की इच्छा व्यक्त करता है. शिवजी उसकी इच्छा पूर्ति हेतु अपने तीसरे नेत्र 
को खोल देते हैं इस भीषण अग्नि से संपूर्ण सृष्टि नष्ट होने लगती है और 
पिप्पलाद का शरीर भी आग से जलने लगता है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; इस संकट से मुक्ति के 
लिए पिप्पलाद भगवान शिव को पुकरते हैं भगवान शिव प्रकट हो कर उससे कहते हैं
 कि तुमने जैसा चाहा मैने तो वैसा ही किया है और तुम्हें इस लिए कष्ट मिल 
रहा है क्योंकि तुमने दूसरों का विनाश चाहा और इस कष्ट को तुम्हें भी 
भुगतना होगा. भगवान शिव के वचन सुनकर पिप्पलाद उनसे अपने कृत की क्षमा 
मांगते हैं और अपनी भूल का पश्चाताप करते हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/6757549030070106423/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/09/blog-post_2113.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/6757549030070106423'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/6757549030070106423'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/09/blog-post_2113.html' title='पिप्पलाद ऋषि '/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjRRxwIqSLolV4LSgKuKLnqtNcd-ifX9xhiEQEzUh10g36jtemXk-arMefFwAo1UdtarZDKzFnGLLy46FB2dhRgF3QXT-z7K-UXHNAXIKvEoZLU98_URB6QnzztTE3ZZnpflXRe7eiQcGbC/s72-c/IMG_2178a.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-7682099676719881625</id><published>2013-09-03T04:49:00.000-07:00</published><updated>2013-09-03T04:49:10.994-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
सृष्टि
 के पालनकर्ता भगवान विष्णु ने एक बार सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के साथ 
निर्गुण, निराकार शिव से प्रार्थना की, प्रभु आप कैसे प्रसन्न होते हैं। 
भगवान शिव बोले मुझे प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का पूजन करो। जब किसी 
प्रकार का संकट या दु:ख हो तो शिवलिंग का पूजन करने से समस्त दु:खों का नाश
 हो जाता है।(शिवमहापुराण सृष्टिखंड )जब देवर्षि नारद ने भगवान श्री 
विष्णु को शाप दिया और बाद में पश्चाताप किया तब विष्णु ने नारदजी को 
पश्चाताप के लिए शिवलिंग का पूजन, शिवभक्तों का सत्कार, नित्य शिवशत नाम का
 जाप आदि उपाय सुझाये। (शिवमहापुराण सृष्टिखंड )एक बार सृष्टि रचयिता 
ब्रह्माजी सभी देवताओं को लेकर क्षीर सागर में श्री विष्णु के पास परम तत्व
 जानने के लिए पहोच गये। श्री विष्णु ने सभी को शिवलिंग की पूजा करने का 
सुझाव दिया और विश्वकर्मा को बुलाकर देवताओं के अनुसार अलग-अलग द्रव्य 
पदार्थ के शिवलिंग बनाकर देने का आदेश देकर सभी को विधिवत पूजा से अवगत 
करवाया। (शिवमहापुराण सृष्टिखंड )&lt;span class=&quot;messageBody&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;type&amp;quot;:3}&quot;&gt;&lt;span class=&quot;userContent&quot;&gt;ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को 
शिवलिंग की पूजा की महिमा का उपदेश देते हुवे कहा। इसी उपदेश से जो ग्रंथ 
कि रचना हुई वो शिव महापुराण हैं। माता पार्वती के अत्यन्त आग्रह से, 
जनकल्याण के लिए निर्गुण, निराकार शिव ने सौ करोड़ श्लोकों में शिवमहापुराण
 की रचना कि। जो चारों वेद और अन्य सभी पुराण शिवमहापुराण की तुलना में 
नहीं आ सकते। भगवान शिव की आज्ञा पाकर विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने 
शिवमहापुराण को २४६७२ श्लोकों में संक्षिप्त किया हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/7682099676719881625/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/09/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/7682099676719881625'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/7682099676719881625'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/09/blog-post.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-1796433805605704384</id><published>2013-08-19T23:57:00.000-07:00</published><updated>2013-08-19T23:57:43.635-07:00</updated><title type='text'>&#39;&#39;श्रावणी पूर्णिमा और रक्षा बंधन &#39;&#39;</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt; &lt;span class=&quot;caption&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;L&amp;quot;}&quot;&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class=&quot;mts uiAttachmentDesc translationEligibleUserAttachmentMessage&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;M&amp;quot;}&quot;&gt;
&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj0-QzZojcwQb-1ZnDoFIA4CEJBDP6BYDOY_2d5U-4p0-pxkTYFbM4odhfAFWXQC_1o8gqT3-td2B7R2aHbH6lHsWgfL85fPVUwIdAzJ0LDa4lZDjrQFQ3Ruh5rUGfg4hc0yoO4r0NZdly3/s1600/971794_623691890995603_2089014574_n.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;margin-left: 1em; margin-right: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;383&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj0-QzZojcwQb-1ZnDoFIA4CEJBDP6BYDOY_2d5U-4p0-pxkTYFbM4odhfAFWXQC_1o8gqT3-td2B7R2aHbH6lHsWgfL85fPVUwIdAzJ0LDa4lZDjrQFQ3Ruh5rUGfg4hc0yoO4r0NZdly3/s400/971794_623691890995603_2089014574_n.jpg&quot; width=&quot;400&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
&lt;span class=&quot;userContent&quot;&gt;राधे राधे....!&lt;br /&gt; आप सभी प्यारे भाईयोँ तथा प्यारी बहनोँ को&lt;br /&gt;  रक्षाबंधन के पावन पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएँ...&lt;/span&gt;&lt;span class=&quot;userContentSecondary fcg&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;mts uiAttachmentDesc translationEligibleUserAttachmentMessage&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;M&amp;quot;}&quot;&gt;
&lt;span class=&quot;userContentSecondary fcg&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;div class=&quot;text_exposed_root text_exposed&quot; id=&quot;id_521302bdae1b97618256681&quot;&gt;
श्रावण मास की पूर्णिमा को श्रावणी पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. इस दिन रक्षा बंधन का पवित्र त्यौहार मनाया जाता है.&lt;br /&gt;
  इस दिनयज्ञोपवीत के पूजन तथा उपनयन संस्कार का भी विधान है. ब्राह्मण 
वर्ग अपनी कर्म शुद्धि के लिए उपक्रम करते हैं. हिन्दू धर्म में सावन माह 
की पूर्णिमा बहुत ही पवित्र व शुभ दिन माना जाता है सावन पूर्णि&lt;span class=&quot;text_exposed_show&quot;&gt;मा
 की तिथि धार्मिक दृष्टि के साथ ही साथ व्यावहारिक रूप से भी बहुत ही महत्व
 रखती है सावन माह भगवान शिव की पूजा उपासना का महीना माना जाता है. सावन 
में हर दिन भगवान शिव की विशेष पूजा करने का विधान है.&lt;br /&gt;  श्रावण 
पूर्णिमा को दक्षिण भारत में नारियली पूर्णिमा और अवनी अवित्तम, मध्य भारत 
में कजरी पूर्णिमा , उत्तर भारत में रक्षा बंधन तथा गुजरात में पवित्रोपना 
के रूप में मनाया जाता है.&lt;br /&gt; श्रावण पूर्णिमा महत्व |&lt;br /&gt; श्रावण 
पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ होता है अत: इस दिन पूजा 
उपासना करने से चंद्रदोष से मुक्ति मिलती है, श्रावणी पूर्णिमा का दिन दान,
 पुण्य के लिए महत्वपूर्ण होता है अत: इस दिन स्नान के बाद गाय आदि को चारा
 खिलाना, चींटियों , मछलियों आदि को दाना खिलाना चाहिए इस दिन गोदान का 
बहुत महत्व होता है.&lt;br /&gt; श्रावणी पर्व के दिन जनेऊ पहनने वाला हर 
धर्मावलंबी मन, वचन और कर्म की पवित्रता का संकल्प लेकर जनेऊ बदलते हैं. इस
 दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी की पूजा का विधान होता है. विष्णु-लक्ष्मी के
 दर्शन से सुख, धन और समृद्धि की  प्राप्ति होती है. इस पावन दिन पर भगवान 
शिव, विष्णु, महालक्ष्मी व हनुमान को रक्षासूत्र अर्पित करना चाहिए.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;
 पुराणों के मुताबिक गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्री अमरनाथ की पवित्र 
छडी यात्रा का शुभारंभ होता है और यह यात्रा श्रावण पूर्णिमा को संपन्न 
होती है. कांवडियों द्वारा श्रावण पूर्णिमा के दिन ही शिवलिंग पर जल चढ़ाया 
जाता है और उनकी कांवड़ यात्रा संपन्न होती है. इस दिन शिव जी का पूजन होता
 है पवित्रोपना के तहत रूई की बत्तियाँ पंचग्वया में डुबाकर भगवान शिव को 
अर्पित की जाती हैं.&lt;br /&gt; सावन कजरी पूर्णिमा |  &lt;br /&gt; कजरी पूर्णिमा का पर्व
 भी श्रावण पूर्णिमा के दिन ही पड़ता है यह पर्व विशेषत: मध्यप्रदेश, 
छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के कुछ जगहों में मनाया जाता है. श्रावण 
अमावस्या के नौंवे दिन से इस उत्सव की तैयारियां आरंभ हो जाती हैं. कजरी 
नवमी के दिन महिलाएँ पेड़ के पत्तों के पात्रों में मिट्टी भरकर लाती हैं 
जिसमें जौ बोया जाता है. कजरी पूर्णिमा के दिन महिलाएँ इन जौ पात्रों को 
सिर पर रखकर पास के किसी तालाब या नदी में विसर्जित करने के लिए ले जाती 
हैं .&lt;br /&gt; रक्षाबंधन | &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; रक्षाबंधन का त्यौहार भी श्रावण मास की 
पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है इसे सावनी या सलूनो भी कहते हैं. रक्षाबंधन,
 राखी या रक्षासूत्र का रूप है राखी सामान्यतः बहनें भाई को बांधती हैं इस 
दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं उनकी आरती उतारती हैं 
तथा इसके बदले में भाई अपनी बहन को रक्षा का वचन देता है और उपहार स्वरूप 
उन्हें  भेंट भी देता है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; इसके अतिरिक्त ब्राहमणों, गुरुओं और 
परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा संबंधियों को जैसे पुत्री द्वारा पिता को 
भी रक्षासूत्र या राखी बांधी जाती है. इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपकर्म 
होता है, उत्सर्जन, स्नान-विधि, ॠषि-तर्पणादि करक नवीनयज्ञोपवीत धारण किया 
जाता है. वृत्तिवान ब्राह्मण अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर 
दक्षिणा लेते हैं.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/1796433805605704384/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/08/blog-post_19.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/1796433805605704384'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/1796433805605704384'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/08/blog-post_19.html' title='&#39;&#39;श्रावणी पूर्णिमा और रक्षा बंधन &#39;&#39;'/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj0-QzZojcwQb-1ZnDoFIA4CEJBDP6BYDOY_2d5U-4p0-pxkTYFbM4odhfAFWXQC_1o8gqT3-td2B7R2aHbH6lHsWgfL85fPVUwIdAzJ0LDa4lZDjrQFQ3Ruh5rUGfg4hc0yoO4r0NZdly3/s72-c/971794_623691890995603_2089014574_n.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-4561172016157702027</id><published>2013-08-17T00:40:00.002-07:00</published><updated>2013-08-17T00:40:52.055-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&lt;span class=&quot;userContent&quot;&gt;एक
 बार धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया तथा अपने चारों भाइयों को 
दिग्विजय करने की आज्ञा दी। चारों भाइयों ने चारों दिशा में जाकर समस्त 
नरपतियों पर विजय प्राप्त की किन्तु जरासंघ को न जीत सके। इस पर श्री 
कृष्ण, अर्जुन तथा भीमसेन ब्राह्मण का रूप धर कर मगध देश की राजधानी में 
जरासंघ के पास पहुँचे। जरासंघ ने इन ब्राह्मणों का यथोचित आदर सत्कार करके 
पूछा, “हे ब्राह्मणों! मैं आप लोगों की क्या सेवा कर सकता हूँ?”जरासंघ
 के इस प्रकार कहने पर श्री कृष्ण बोले, “हे मगजधराज! हम आपसे याचना करने 
आये हैं। हम यह भली भाँति जानते हैं कि आप याचकों को कभी विमुख नहीं होने 
देते हैं। राजा हरिश्चन्द्र ने विश्वामित्र जी की याचना करने पर उन्हें 
सर्वस्व दे डाला था। राजा बलि से याचना करने पर उन्होंने त्रिलोक का राज्य 
दे दिया था। फिर आपसे यह कभी आशा नहीं की जा सकती कि आप हमें निराश कर 
देंगे। हम आपसे गौ, धन, रत्नादि की&lt;span class=&quot;text_exposed_show&quot;&gt; याचना नहीं करते। हम केवल आपसे युद्ध की याचना करते हैं, आप हमे द्वन्द्व युद्ध की भिक्षा दीजिये।”&lt;br /&gt;
 श्री कृष्ण के इस प्रकार याचना करने पर जरासंघ समझ गया कि छद्मवेष में ये 
कृष्ण, अर्जुन तथा भीमसेन हैं। उसने क्रोधित होकर कहा, “अरे मूर्खों! यदि 
तुम युद्ध ही चाहते हो तो मुझे तुम्हारी याचना स्वीकार है। किन्तु कृष्ण! 
तुम मुझसे पहले ही पराजित होकर रण छोड़ कर भाग चुके हो। नीति कहती है कि 
भगोड़े तथा पीठ दिखाने वाले के साथ युद्ध नहीं करना चाहिये। अतः मैं तुमसे 
युद्ध नहीं करूँगा। यह अर्जुन भी दुबला-पतला और कमजोर है तथा यह वृहन्नला 
के रूप में नपुंसक भी रह चुका है। इसलिये मैं इससे भी युद्ध नहीं करूँगा। 
हाँ यह भीम मुझ जैसा ही बलवान है, मैं इसके साथ अवश्य युद्ध करूँगा।”&lt;br /&gt; 
इसके पश्चात् दोनों ही अपना-अपना गदा सँभाल कर युद्ध के मैदान में डट पड़े।
 दोनों ही महाबली तथा गदायुद्ध के विशेषज्ञ थे। पैंतरे बदल-बदल कर युद्ध 
करने लगे। कभी भीमसेन का प्रहार जरासंघ को व्याकुल कर देती तो कभी जरासंघ 
चोट कर जाता। सूर्योदय से सूर्यास्त तक दोनों युद्ध करते और सूर्यास्त के 
पश्चात् युद्ध विराम होने पर मित्रभाव हो जाते। इस प्रकार सत्ताइस दिन 
व्यतीत हो गये और दोनों में से कोई भी पराजित न हो सका। अट्ठाइसवें दिन 
प्रातः भीमसेन कृष्ण से बोले, “हे जनार्दन! यह जरासंघ तो पराजित ही नहीं हो
 रहा है। अब आप ही इसे पराजित करने का कोई उपाय बताइये।” भीम की बात सुनकर 
श्री कृष्ण ने कहा, “भीम! यह जरासंघ अपने जन्म के समय दो टुकड़ों में 
उत्पन्न हुआ था, तब जरा नाम की राक्षसी ने दोनों टुकड़ों को जोड़ दिया था। 
इसलिये युद्ध करते समय जब मै तुम्हें संकेत करूँगा तो तुम इसके शरीर को दो 
टुकड़ों में विभक्त कर देना। बिना इसके शरीर के दो टुकड़े हुये इसका वध 
नहीं हो सकता।”&lt;br /&gt; जनार्दन की बातों को ध्यान में रख कर भीमसेन जरासंघ से 
युद्ध करने लगे। युद्ध करते-करते दोनों की गदाओं के टुकड़े-टुकड़े हो गये 
तब वे मल्ल युद्ध करने लगे। मल्ल युद्ध में ज्योंही भी ने जरासंघ को भूमि 
पर पटका, श्री कृष्ण ने एक वृक्ष की डाली को बीच से चीरकर भीमसेन को संकेत 
किया। उनका संकेत समझ कर भीम ने अपने एक पैर से जरासंघ के एक टांग को दबा 
दिया और उसकी दूसरी टांग को दोनों हाथों से पकड़ कर कंधे से ऊपर तक उठा 
दिया जिससे जरासंघ के दो टुकड़े हो गये। भीम ने उसके दोनों टुकड़ों को अपने
 दोनों हाथों में लेकर पूरी शक्ति के साथ विपरीत दिशाओं में फेंक दिया और 
इस प्रकार महाबली जरासंघ का वध हो गया।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;h5 class=&quot;uiStreamMessage userContentWrapper&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;type&amp;quot;:1,&amp;quot;tn&amp;quot;:&amp;quot;K&amp;quot;}&quot;&gt;
 &lt;span class=&quot;messageBody&quot; data-ft=&quot;{&amp;quot;type&amp;quot;:3}&quot;&gt;&lt;div&gt;
&lt;span class=&quot;userContent&quot;&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/span&gt;&lt;/h5&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/4561172016157702027/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/08/blog-post_17.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/4561172016157702027'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/4561172016157702027'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/08/blog-post_17.html' title=''/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-5578572392795896528</id><published>2013-08-08T04:04:00.000-07:00</published><updated>2013-08-08T04:04:02.769-07:00</updated><title type='text'>यहां है आधा शिव आधा पार्वती रूप शिवलिंग</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
&amp;nbsp;धार्मिक दृष्टि से पूरा संसार ही शिव का रुप है। इसलिए शिव के अलग-अलग 
अद्भुत स्वरुपों के मंदिर और देवालय हर जगह पाए जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर 
स्थित है - हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित काठगढ़ महादेव। इस 
मंदिर का शिवलिंग ऐसे स्वरुप के लिए प्रसिद्ध है, जो संभवत: किसी ओर शिव 
मंदिर में नहीं दिखाई देता। इसलिए काठगढ़ महादेव संसार में एकमात्र शिवलिंग
 माने जाते हैं, जो आधा शंकर और आधा पार्वती का रुप लिए हुए है। यानि एक 
शिवलिंग में दो भाग हैं। इसमें भगवान शंकर के अर्द्धनारीश्वर स्वरुप के 
साक्षात दर्शन होते हैं। शिव रुप का भाग लगभग ७ फुट और पार्वती रुप का 
शिवलिंग का हिस्सा थोड़ा छोटा होकर करीब ६ फुट का है। इस शिवलिंग की गोलाई 
लगभग ५ फिट है। 

शिव और शक्ति का दोनों के सामूहिक रुप के शिवलिंग दर्शन से जीवन से 
पारिवारिक और मानसिक दु:खों का अंत हो जाता है। 

शिवपुराण की कथा अनुसार जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच बड़े और श्रेष्ठ होने 
की बात पर विवाद हुआ, तब बहुत तेज प्रकाश के साथ एक ज्योर्तिलिंग प्रगट 
हुआ। अचंभित विष्णु और ब्रह्मदेव उस ज्योर्तिलिंग का आरंभ और अंत नहीं खोज 
पाए। किंतु ब्रह्मदेव ने अहं के कारण यह झूठा दावा किया कि उनको अंत और 
आरंभ पता है। तब शिव ने प्रगट होकर ब्रह्म देव की निंदा की और दोनों देवों 
को समान बताया। माना जाता है कि वही ज्योर्तिमय शिवलिंग ही काठगढ़ का 
शिवलिंग है। 

चूंकि शिव का वह दिव्य लिंग शिवरात्रि को प्रगट हुआ था, इसलिए लोक मान्यता 
है कि काठगढ महादेव शिवलिंग के दो भाग भी चन्द्रमा की कलाओं के साथ करीब 
आते और दूर होते हैं। शिवरात्रि का दिन इनका मिलन माना जाता है।

काठगढ़ में सावन माह और महाशिवरात्रि के दिन विशेष शिव पूजा और धार्मिक 
आयोजन होते हैं। इसलिए इस समय काठगढ़ की यात्रा सबसे अच्छा मानी जाती है। 

काठगढ़ शिवलिंग दर्शन के लिए पहुंचने का मुख्य मार्ग पंजाब का पठानकोट और 
हिमाचल प्रदेश के इंदौरा तहसील से है। जहां से काठगढ़ की दूरी लगभग ६ से ७ 
किलोमीटर है।&lt;/div&gt;
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&lt;div class=&quot;separator&quot; style=&quot;clear: both; text-align: center;&quot;&gt;
&lt;a href=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjOBz4LxEZMFMX4hlTq_ZTqUUXeai-gkoYvfYo-iFWD75-WpMovCQwJZ44iat5s_soNtThG_jXlL2CXuj1AOkukK_GmDL8CuygJrh8occ0vIyEV-hp5sleQYElfoQ-Z25AYZgi_S76D99zT/s1600/IMG_1283a.jpg&quot; imageanchor=&quot;1&quot; style=&quot;clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;&quot;&gt;&lt;img border=&quot;0&quot; height=&quot;200&quot; src=&quot;https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjOBz4LxEZMFMX4hlTq_ZTqUUXeai-gkoYvfYo-iFWD75-WpMovCQwJZ44iat5s_soNtThG_jXlL2CXuj1AOkukK_GmDL8CuygJrh8occ0vIyEV-hp5sleQYElfoQ-Z25AYZgi_S76D99zT/s200/IMG_1283a.jpg&quot; width=&quot;133&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;
एक सदना नाम का कसाई था,मांस बेचता था, पर भगवत भजन में बड़ी निष्ठा थी, 
एक दिन एक नदी के किनारे से जा रहा था, रास्ते में एक पत्थर पड़ा मिल 
गया....उसे अच्छा लगा &lt;span class=&quot;text_exposed_show&quot;&gt;उसने सोचा बड़ा 
अच्छा पत्थर है क्यों ना मैँ इसे मांस तौलने के लिए उपयोग करू. उसे उठाकर 
ले आया....और मांस तौलने में प्रयोग करने लगा.&lt;br /&gt; जब एक किलो तौलता तो भी 
सही तुल जाता, जब दो किलो तौलता तब भी सही तुल जाता, इस प्रकार चाहे जितना 
भी तौलता हर भार एक दम सही तुल जाता, अब तो एक ही पत्थर से सभी माप करता और
 अपने काम को करता जाता और भगवन नाम लेता जाता.&lt;br /&gt; एक दिन की बात है उसी 
दुकान के सामने से एक ब्राह्मण निकले ब्राह्मण बड़े ज्ञानी विद्वान थे, 
उनकी नजर जब उस पत्थर पर पड़ी तो वे तुरंत उस सदना के पास आये और गुस्से 
में बोले ये तुम क्या कर रहे हो क्या तुम जानते नहीं जिसे पत्थर समझकर तुम 
तौलने में प्रयोग कर रहे हो वे शालिग्राम भगवान है, इसे मुझे दो जब सदना ने
 यह सुना तो उसे बड़ा दुःख हुआ और वह बोला हे ब्राह्मण देव मुझे पता नहीं 
था कि ये भगवान है मुझे क्षमा कर दीजिये.और शालिग्राम भगवान को उसने 
ब्राह्मण को दे दिया....&lt;br /&gt; ब्राह्मण शालिग्राम शिला को लेकर अपने घर आ गए
 और गंगा जल से उन्हें नहलाकर, मखमलके बिस्तर पर, सिंहासन पर बैठा दिया, और
 धूप, दीप,चन्दन से पूजा की. जब रात हुई और वह ब्राह्मण सोया तो सपने में 
भगवान आये और बोले ब्राह्मण मुझे तुम जहाँ से लाए हो वहीँ छोड आओं मुझे 
यहाँ अच्छा नहीं लग रहा. इस पर ब्राह्मण बोला भगवान ! वो कसाई तो आपको तुला
 में रखता था जहाँ दूसरी ओर मास तौलता था उस अपवित्र जगह में आप थे.&lt;br /&gt; 
भगवान बोले - ब्राहमण आप नहीं जानते जब सदना मुझे तराजू में तौलता था तो 
मानो हर पल मुझे अपने हाथो से झूला झूला रहा हो जब वह अपना काम करता था तो 
हर पल मेरे नाम का उच्चारण करता था.हर पल मेरा भजन करता था जो आनन्द मुझे 
वहाँ मिलता था वो आनंद यहाँ नहीं.इसलिए आप मुझे वही छोड आये.तब ब्राह्मण 
तुरंत उस सदना कसाई के पास गया ओर बोला मुझे माफ कर दीजिए.वास्तव में तो आप
 ही सच्ची भक्ति करते है.ये अपने भगवान को संभालिए......।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; ~जय श्री राधे कृष्ण.....।।।~&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/8675122553917628114/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/05/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/8675122553917628114'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/8675122553917628114'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/05/blog-post.html' title='&#39;&#39; सदना  कसाई &#39;&#39;'/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjOBz4LxEZMFMX4hlTq_ZTqUUXeai-gkoYvfYo-iFWD75-WpMovCQwJZ44iat5s_soNtThG_jXlL2CXuj1AOkukK_GmDL8CuygJrh8occ0vIyEV-hp5sleQYElfoQ-Z25AYZgi_S76D99zT/s72-c/IMG_1283a.jpg" height="72" width="72"/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2673106605802531171.post-4986436881331624580</id><published>2013-04-29T23:17:00.002-07:00</published><updated>2013-04-29T23:17:22.441-07:00</updated><title type='text'>&#39;&#39; भारतीय संस्कृति में शंख को स्थान &#39;&#39;</title><content type='html'>&lt;div dir=&quot;ltr&quot; style=&quot;text-align: left;&quot; trbidi=&quot;on&quot;&gt;
भारतीय
 संस्कृति में शंख को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ब्रह्मवैवर्त पुराण 
के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में 
वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है।
 शंख से कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता 
प्रसन्न होते हैं। कल्याणकारी शंख दैनिक जीवन में दिनचर्या को कुछ समय के 
लिए विराम देकर मौन रूप से देव अर्चना के लिए प्रेरित करता है। यह भारतीय 
संस्कृति की धरोहर है। विज्ञान के अनुसार शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक 
प्रकार के घोंघे का खोल है जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है।हिन्दू 
धर्म में पूजा स्थल पर शंख रखने की परंपरा है क्योंकि शंख को सनातन
 धर्म का प्रतीक माना जाता है। शंख निधि का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि
 इस मंगलचिह्न को घर के पूजास्थल में रखने से अरिष्टों एवं अनिष्टों का नाश
 होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं 
नवनिधियों में शंख का महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिन्दू धर्म में शंख का 
महत्त्व अनादि काल से चला आ रहा है। शंख का हमारी पूजा से निकट का सम्बन्ध 
है। कहा जाता है कि शंख का स्पर्श पाकर जल गंगाजल के सदृश पवित्र हो जाता 
है। मन्दिर में शंख में जल भरकर भगवान की आरती की जाती है। आरती के बाद शंख
 का जल भक्तों पर छिड़का जाता है जिससे वे प्रसन्न होते हैं। जो भगवान 
कृष्ण को शंख में फूल, जल और अक्षत रखकर उन्हें अर्ध्य देता है, उसको अनन्त
 पुण्य की प्राप्ति होती है। शंख में जल भरकर ऊँ नमोनारायण का उच्चारण करते
 हुए भगवान को स्नान कराने से पापों का नाश होता है।&lt;br /&gt;
धार्मिक 
कृत्यों में शंख का उपयोग किया जाता है। पूजा-आराधना, अनुष्ठान-साधना, 
आरती, महायज्ञ एवं तांत्रिक क्रियाओं के साथ शंख का वैज्ञानिक एवं 
आयुर्वेदिक महत्त्व भी है। हिन्दू मान्यता के अनुसार कोई भी पूजा, हवन, 
यज्ञ आदि शंख के उपयोग के बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। कुछ गुह्य साधनाओं
 में इसकी अनिवार्यता होती है। शंख साधक को उसकी इच्छित मनोकामना पूर्ण 
करने में सहायक होते हैं तथा जीवन को सुखमय बनाते हैं। शंख को विजय, 
समृद्धि, सुख, यश, कीर्ति तथा लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। वैदिक 
अनुष्ठानों एवं तांत्रिक क्रियाओं में भी विभिन्न प्रकार के शंखों का 
प्रयोग किया जाता है।&lt;br /&gt;
साधारणत: मंदिर में रखे जाने वाले शंख उल्टे
 हाथ के तरफ खुलते हैं और बाज़ार में आसानी से ये कहीं भी मिल जाते हैं. 
लक्ष्मी के हाथ में जो शंख होता है वो दक्षिणावर्ती अर्थात सीधे हाथ की तरफ
 खुलने वाले होते हैं। वामावर्ती शंख को जहां विष्णु का स्वरुप माना जाता 
है और दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का स्वरुप माना जाता है। दक्षिणावृत्त 
शंख घर में होने पर लक्ष्मी का घर में वास रहता है।&lt;/div&gt;
&lt;div class=&quot;blogger-post-footer&quot;&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;&lt;img src=&quot;http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon32x32.png&quot; alt=&quot;&quot; style=&quot;border:0&quot;/&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href=&quot;http://feeds.feedburner.com/blogspot/tSSHx&quot; title=&quot;Subscribe to my feed&quot; rel=&quot;alternate&quot; type=&quot;application/rss+xml&quot;&gt;Subscribe in a reader&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/feeds/4986436881331624580/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/04/blog-post_644.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/4986436881331624580'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2673106605802531171/posts/default/4986436881331624580'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mahanttrilokgi.blogspot.com/2013/04/blog-post_644.html' title='&#39;&#39; भारतीय संस्कृति में शंख को स्थान &#39;&#39;'/><author><name>जागरण एवँ भागवत परिवार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15623664498447262714</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='https://img1.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>