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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" gd:etag="W/&quot;A0EHRH8_fSp7ImA9WhRRFE4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-301554459270010767</id><updated>2011-11-27T16:20:35.145-08:00</updated><title>किताब के बहाने</title><subtitle type="html" /><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://chitrahindi.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://chitrahindi.blogspot.com/" /><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="25" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg" /></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>10</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/atom+xml" href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/tbJp" /><feedburner:info uri="blogspot/tbjp" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><entry gd:etag="W/&quot;DUYGQ3szfip7ImA9WhZSFko.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-301554459270010767.post-29875339369631738</id><published>2011-04-01T09:57:00.000-07:00</published><updated>2011-04-01T09:58:42.586-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-04-01T09:58:42.586-07:00</app:edited><title>घृणा को आधार बनाकर लिखा गया अरविंद अडिका का उपन्‍यास - वाइट टाइगर - कुमार मुकुल</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/S_qcJty_DlI/AAAAAAAADKM/01naVLJsLyE/s1600/132-250x149.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="119" src="http://2.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/S_qcJty_DlI/AAAAAAAADKM/01naVLJsLyE/s200/132-250x149.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/S_qb9M4NmhI/AAAAAAAADKE/UO3OtrGK_vI/s1600/_45109470_-31.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://2.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/S_qb9M4NmhI/AAAAAAAADKE/UO3OtrGK_vI/s200/_45109470_-31.jpg" width="160" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;राजेश जोशी&lt;/b&gt; ने अपनी एक कविता में लिखा है कि घृणा इतनी गैरजरूरी चीज भी नहीं कि जहां उसकी जरूरत हो वहां भी ना की जाए। सीमित तौर पर इसी बात को आधार बनाकर &lt;b&gt;अरविंद अडिगा&lt;/b&gt; ने अपना उपन्याह&lt;b&gt;रा&lt;/b&gt;स &lt;b&gt;द वाइट टाइगर &lt;/b&gt;लिखा है। सीमित इसलिये कि उपन्यारस में घृणा का प्रयोग अधिकतर गैरजरूरी लगने लगता है। इससे पहले मैंने ऐसा उपन्योस नहीं पढा है जो आरंभ से अंत तक एक व्ययक्ति की घृणा को आधार बनाकर रचा गया हो। मुंबईया फिल्मों की तरह घृणा को आरंभ से अंत तक वह बरकरार रखता है। गालियों का जमकर प्रयोग किया गया है उपन्याबस में और&lt;b&gt; ईश्वर अल्ला&lt;/b&gt; तक को बख्शा नहीं गया है। जहां भी जब मन होता है उपन्यालसकार किसी की भी चोंच किसी के भी पिछवाडे डलवा देता है। &lt;br /&gt;
यह एक ड्राइवर की कहानी है जो अपने गांव से लेकर दिल्लीस तक एक जमींदार परिवार की सेवा में लगा रहता है। जमींदार है तो वह आततायी होगा ही सो वह है। और आततायी का अंत होता है तो उसका भी होता है। पर वह सामान्य जमींदारी की कहानियों की तरह किसी जनांदोलन से खत्म नहीं होता बल्कि एक सताए गए ड्राइवर की घृणा उसका अंत करती है। &lt;br /&gt;
वैसे यह एक अपवादी चरित्र है। जमींदार भी अब वैसे रहे नहीं सामान्यतया दलित पीडित जमात ने लडभिडकर अपने अधिकार छीने हैं उससे। पर अपवाद तो हो ही सकते हैं खासकर अगर आपको उपन्यास लिखना हो । वैसे इस ड्राइवर के बहाने उपन्याहसकार ने महानगरीय विकृतियों का अच्छा पर्दाफाश किया है। दिखलाया है कि चमचमाती गाडियों में भागने वाले कितनी कालिख लिये चलते हैं और जरा सी कोशिश से एक अदना सा ड्राइवर उन्हें पार घाट लगा सकता है अगर वह अपने पे आ जाये तो। और किसी के अपने पर आ जाने से कौन रोक सकता है उसे। &lt;b&gt;ब्रेख्त&lt;/b&gt; ने कुछ ऐसा लिखा भी है-. जनरल बहुत मजबूत है तुम्हारा यह टैंक पर इसमें एक नुक्स है इसे आदमी की जरूरत होती है और आदमी में भी एक नुक्शत है कि वह सोचता है। और यह सोचना कब शुरू हो जाए यह पता लगाने की कोई मशीन नहीं इजाद हुई है। तो खोपडिया केवल मुंबईया फिल्मों के खलनायकों की ही नही घूमती वह किसी आम आदमी की भी घूम सकती है तो उस ड्राइवर की भी खोपडिया जब घूम जाती है तो वह अपने मालिक का कत्ल कर देता है और उनके साथ रहकर सीखे गए करतबों से बच भी जाता है , अपनी रामकहानी सुनाने के लिये। फिर अपनी रामकहानी भी वह अलटू.पलटू लोगों को नहीं सुनाता इसके लिये वह &lt;b&gt;चीन के महामहिम वेन जियाबाओ&lt;/b&gt; का चुनाव करता है। क्रांति से किसे परहेज है आजकलए, सो चीन के महामहिम से कम पर कैसे बात हो। वैसे जहां तहां नक्सलवादियों आदि को भी मसाले के तौर पर याद कर लिया गया है। &lt;br /&gt;
लेखक ने भारत को अंधकार और रोशनी के भारत में बांटकर देखा है। अंधकार का भारत वह जहां रोशनी की किरणें पहुंच कर दम तोड देती हैं और रोशनी का भारत वह जहां अंधेरा रोशनी के नियॉन बल्बों से फूटता है और अपने छोटे से घेरे के बाहर के अंधेरे को और गहराता जाता है। किताब जहां तहां अपने मजेदार सनसनीखेज विश्लेषणों से भरी है। कुछ इस तरह से कि आपको उसमें जीवन के दर्शन का भी पुट मिलता चलेगा और आपकी कुछ गंभीर पढने की ग्रंथी तुष्ट होती रहेगी। &lt;b&gt;मार्क्स&lt;/b&gt; वाद जिसकी पहचान &lt;b&gt;लुंपेन सर्वहारा&lt;/b&gt; के रूप में करता है अडिगा का ड्राइवर उसी कोटि का है। अब लुंपेन है तो लुच्च।ई कहां जाने वाली है सो किसी भी स्त्रीर को देख उसकी चोंच खडी हो जाती है और सर्वहारा है तेा जहां तहां अपना रंग बदलने की जरूरत के हिसाब से दर्शन तलाश लेता है वह। जैसे एक जगह ड्राइवर कहता है कि मिस्टार जियाबाओ आपका ड्राइवर अगर मर्डर वीकली के पन्ने पलटने में रमा रहता हैए तो घबराइएगा नहीं। जिस दिन आपका ड्राइवर &lt;b&gt;गांधी और बुद्ध&lt;/b&gt; के बारे में पढना शुरू करे , हां तब जरूर आप अपनी पतलून गीली करियेगा। इसी तरह एक जगह जब उसकी मालकिन उसे दांत और कपडे आदि साफ रखने की हिदायत देती है तो वह दांत साफ करते समय डायलाग मारता है, काश आदमी इतनी ही आसानी से अपने अतीत को भी थूक पाता। &lt;br /&gt;
जहां भी घृणा को अभिव्यक्तक करना होता है उपन्यासकार अपने हाथ दिखलाने से बाज नहीं आता। जैसे एक दृश्य जब तब आता है कि जब ड्राइवर को गुस्सा‍ आता है तो वह कार में सामने नजर आदि से बचने के लिए लगाए गए राक्षसनुमा पुतले को दो घूसे मारता है। और &lt;b&gt;काली माता&lt;/b&gt; की तस्वीर को जीभ दिखाता वह उसे &lt;b&gt;डायन&lt;/b&gt; पुकारता है। दरअसल यह घूंसा मालिक के साथ उसकी सांस्कृहतिक समझ पर भी पडता है। इस तरह यह घूंसा वह अपनी गुलाम मनोवृति को भी मारता है। वैसे यह मजेदार है कि उस ड्राइवर को मेट्रो की खुदाई के लिए लायी गयी पीली क्रेन दैत्य की तरह लगती है पर दूसरी तरफ वह दिल्ली सरकार की इसके लिये खिंचाई भी करता है कि यहां एक ही रिंग रोड है जबकि बीजिंग में दर्जन भर। मतलब कि दर्शन की अच्छी काटमकाट है उपन्यास में। &lt;br /&gt;
मि जियाबाओ को उपन्यासकार ने ऐसा माटी का पुतला बना रखा है जो बस उपन्यास नायक ड्राइवर को सुनता रहता है भारतीय देवी.देवताओं की मूरतों की तरह। अगर उसने उसे एक जीवित पात्र बनाया होता तो शायद उपन्यास का नक्शा् और होता। तब तमाम सवालों पर वह जिरह करता फिर शायद यह ड्राइवर इस तरह शुरू से अंत तक जिंदाबाद जिंदाबाद नहीं करता रहता, उसे कहीं रूक कर विचार करना पडता। जैसे जियाबाओं को ड्राइवर समझाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव नौकरों की विश्वसनीयता पर टिकी है। कि वह एकाध रूपये तो चुरा सकता है पर लाखों डालर आप उस पर छोडकर जा सकते हैं। यहां विश्वसनीयता की जगह अज्ञानता उचित शब्द होता। दो चार रूपये की चोरी वह करता है क्यों कि उतना खपाने भर ही उसकी अक्ल है। उसे इस लायक बनने ही नहीं दिया गया है कि वह लाखों डालर का इंतजाम कर सके। वह उसके लिये सिर का बोझ हो जाता है। क्योंकि ना तो उसका बैंक में खाता है ना उसके पास मकान कोठी है जहां वह इस माल मत्ते को छुपा सके। आखिर यह उपन्यांस नायक ड्राइवर भी उन्हींउ ड्राइवरों में एक था उसने मालिक के साथ रहकर ही सारी कलाएं सीखीं और उसका रूपयों से भरा बैग उडाकर उसकी गरदन रेतकर उपन्यास की फिलासफी तैयार की। हालांकि ड्राइवर बतलाता है कि ये ड्राइवर और अन्य श्रमिक वर्ग भी काबिल,गुणी और होशियार है पर उसे ऐसी घुटटी पिलायी गयी है कि वह गुलाम बना रहता है। यहां वर्गगत अंतर पर ध्यान नहीं दिया गया है। यहां ड्राइवर को चीन के प्रिमियर जियाबाओ से कुछ सीख ले लेनी चाहिए थी पर दुनिया का &lt;b&gt;महान ईमानदार भारतीय&lt;/b&gt; आखिर एक चीनी से कैसे कुछ सीख सकता है उसे बस अपनी हांकते जाना है। यही उपन्यासकार की सीमा है। वह अपने पात्रों का विकास संवाद करने भर नहीं कर पाता। एकतरफा बयानबाजी ही उपन्यापस का आधार है। &lt;br /&gt;
आगे एक जगह ड्राइवर अपना दर्शन बुकता है कि अमेरिका एइंगलैंड के अमीर नौकर नहीं रखते और वे जानते ही नहीं कि ऐशोआराम की जिंदगी क्याब होती है। दरअसल यहां सामंतवाद और पूंजीवाद के अंतर को अनदेखा किया गया है। अमेरिका इंगलैंड में तीसरी दुनिया के देशों का दोहन कर जो अपार पूंजी अर्जित की गयी है उसी से ऐशोआराम की वह व्यवस्थां की गयी है जिसकी कल्पना भी भारतीय अमीर नहीं कर सकते। वहां जब ऐसे दरवाजे हैं जो आने पर खुद सामनेवाले की पहचान कर खुल जाएं तो उन्हें इस तरह दरबान और नौकर रखने की जरूरत क्यों पडेंगी। वे मशीनें ज्यादा विश्ववसनीय और सुरक्षित हैं नौकरों की तुलना में, नहीं तो ये अंग्रेज ही थे जो तमाम भारतीय गरीबों को गुलाम बनाकर दुनिया भर में ले गये थे। &lt;br /&gt;
अधिकांश मामले में उपन्यासकार समय से पीछे चल रहा है। आगे ड्राइवर इस सब के लिये भारतीय परिवार को दोषी मानता है और उसे एक मुरगी दडबा की संज्ञा देता है कि ये नौकर इसलिए विद्रोह नहीं कर पाते कि उन्हें डर रहता है कि उसके जमींदार मालिक उसके परिवार की हत्या करा देंगे। उपर नौकरों की जिस विश्व्सनीयता की घुटटी की बात की गयी है वहां भी एकहद तक यह डर मूल कारण है उनकी तथाकथित ईमानदारी का। यह ड्राइवर भी अपने परिवार को भुलाकर ही अमानवीय बन मालिक की हत्याल कर फरार हो अपनी ऐशो आराम की जिंदगी संभव कर पाता है। पर यह कोई हल नहीं हुआ जो ड्राइवर के माध्य‍म से उपन्यानसकार सामने लाता है यह तो अमानवीयता की नयी पौध तैयार करना हुआ। इसका हल अब लोग ढूंढ चुके हैं और आज इन परिवारों की वैसी ही स्थिति नहीं है अब ये परिवार अपने शोषकों से मुकाबला करने को उठ खडे हुए हैं और तमाम जगह तस्वीर बदली है। उनके हमलों से घबराकर यह व्यवस्था उन्हें नक्सली आदि कह कर किनारा करना चाहती है पर अब उसे बहुत जगह बातचीत करने को मजबूर भी होना पड रहा है। अगर उपन्यासकार को इस बदलाव की जमीनी जानकारी होती तो वह ड्राइवर को उस तिलस्मी आपराधिक जीवन की ओर नहीं ढकेलता बल्कि वह इधर झांकता तो परिवारों की बदली सूरत उसे उपन्यास के नये आयाम तैयार करने को प्रेरित करते। पर ऐसा करने में एक तो काफी मिहनत करनी होती फिर ऐसी मसालेदार अपराध कथा कहां मिलती जिसे पढकर &lt;b&gt;पश्चिम के अंग्रेजीदा पाठकों की श्रेष्ठतता ग्रंथी&lt;/b&gt; तुष्टे होती और वे उसे सराहते और पुरस्कृेत करते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;i&gt;समयांतर के अक्‍टूबर अंक में प्रकाशित&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/301554459270010767-29875339369631738?l=chitrahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;br /&gt;
किसानों ,श्रमिकों,शिल्पियों,सेवाकर्मियों,चिकित्सकों, ब्राह्मणवादी शब्दावली में कहें तो शूद्रों, का दमन वर्णव्यवस्था का मूल रहा है। ऋग्वेद में जहां ओदनम् यानि कि भात एक देवता है, वहीं वेदांत में कृषि कर्म को वेदअध्ययन में बाधक के रूप में देखा गया है। मजेदार बात है कि वेदों के संकलक और रामायण के रचनाकार शूद्र हैं और रामचरितमानस के रचनाकार तुलसी एक दलित के यहां पले दलित ब्रह्मण हैं, पर इन शास्त्रों में अधिकांश की शिक्षाएं शूद्रों के दमन व अनुशासित करने में सहयोग करती हैं। शूद्र के अन्न पर पलने वाले ब्रह्मण को स्वर्ग नहीं मिल सकता,भले ही वह नित्य वेदपाठी हो। तुलसी को भी अयोध्या के ब्राह्मणों ने कभी स्वीकार नहीं किया। यहां तक कि ब्राह्मणों को चुनौती देते तुलसी संस्कृत की जगह लोकभाषा अवधी में रचना करते हैं। पर जिस वर्णाश्रम ने उनकी दुर्दशा की कि उन्हें लिखना पडा कि मांग कर खाएंगे और मस्जिद में सोएंगे पर तुम्हारे सामने नहीं झुकेंगे, किसी की बेटी से बेटा नहीं ब्याहना मुझे , ना किसी की जाति बिगाडनी है, उसी वर्णाश्रम को वे रामकथा में स्थापित करते हैं। दरअसल यह उस अनुकूलन का परिणाम है जिसके तहत शूद्र अपनी पीडा को पूर्वजन्म के कर्मों को परिणाम मानते रहे और वेद,महाभारत,रामायण की रचना करते हुए भी अपनी स्थिति को विश्लेषित कर पाए। हालांकि वाल्मिकी ,तुलसी के वरक्स कबीर ,रैदास,दादू आदि तमाम संतों ने दशरथ पुत्र राम की जगह घट-घट वासी राम को तरजीह दी । इस विचारधारा की जकडन ऐसी रही कि बोद्धों,जैनों,लोकायतों की चुनौती के अलावे जब तब हुए विदेशी हमले ही इसकी पकड कुछ ढीली कर पाए। बांटों और राज करो की नीति भले अंग्रेजों की हो पर उसकी जमीन वर्णविभाजित भारतीय समाज ने ही उपलब्ध करायी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शूद्र की तरह स्त्री को भी इस विचारधारा ने पापयोनी माना और कल्याण के लिये भगवतशरण में आने को कहा। स्त्री के कल्याण को पुरूष के कल्याण से अलग करने की इस अधमता को हम भारत की पतन गाथा की तरह पढ सकते हैं। शास्त्रों में स्त्रियों और शूद्रों की हत्या पर समान दंड की व्यवस्था थी,जबकि ब्राह्मण को अपीडनीय माना गया। शास्त्रों के अनुसार पूर्वजन्म के पापों के फल के रूप में स्त्री योनी में जन्म होता है। आगम-निगम के जानकार तुलसी यूं ही शूद्र के साथ नारी को ताडणा का अधिकारी नहीं बताते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शूद्र अगर बाहर की श्रमशील इकाई थे तो स्त्री घर की। पुरूष मात्र की जन्मदात्री, माता जो कभी कुमाता नहीं होती, को ब्रह्मणवाद ने मात्र योनी यानि वंशोत्पादन के साधन की तरह देखा और अपनी इस गुलामी के विरूद्ध जब स्त्री ने आवाज उठाई तो उसी के द्वारा उसके ही हृदय को भेडिए का हृदय कहलवाया गया। भागवत पुराण-उर्वशी। स्त्री को उसके उच्चासन से दुनिया भर में गिराने के ऐसे प्रयास देखने में आते हैं। शेक्सपीयर का एक पात्र भी क्रूएल्टी के उमन का पर्यायवाची पुकारता है। यूं लोक में इससे अपने तरह से संघर्ष भी चलता रहता है, उस फिल्मी गाने को याद कीजिए- औरत ने जन्म दिया मर्दों को मर्दों ने बाजार दिया।  ..............जारी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
.......स्त्रियां शुरू से इस स्थिति में नहीं थीं। ऋग्वेद में वे भी ऋचा रचनेवाली ऋषियों में शामिल थीं। अलतेकर के अनुसार - वैदिक काल में....खेतीबाडी ,कपडा ,तीरकमान आदि बनाने.....में हिस्सा लेती थीं.....आर्य विजेताओं को शूद्रों का बेगार और सस्ता श्रम मिलने लगा और स्त्रियां समाज की उत्पादक इकाई नहीं रह गयीं तब इनके स्थान में गिरावट आने लगी। नही ंतो पहले मद्रदेश में स्त्री राज्य का उल्लेख है। पर आगे मातृ सत्ता को तोडने के लिये बहुविवाह,बालविवाह,सतीप्रथा अदि के दवारा स्त्रियों के अधिकारों को समाप्त किया जाता रहा। विलियम रीक के अनुसार-पितृसत्तत्मक धर्मों की मूल चिंता रति आवष्यकता का निषेध है। वे धर्म और रति को परस्पर विदृवेशात्मक कोटियों में बांटते हैं। इस तरह रतिजन्य आनंद जो मूलतः रचनात्मक और सुंदर रहा है, उसे नारकीय,दारूण और अपवित्र घोषित कर दिया गया और इस सारी अपवित्रता का ठीकरा पापयोनी स्त्री के माथे फोडा गया। इस तरह यह पितृसत्तात्मक दृश्टिकोण रति की आवश्यकताओं को अपराधबोध से जोड देता है।&lt;br /&gt;
डॉ सेवासिंह के अनुसार कृष्णभक्ति के गोपीभाव में हम माृसत्तात्मक जीवन के सहज....उन्मुक्त यौनाचार को देख सकते हैं।...कृष्णभक्ति के चैतन्य संप्रदाय में परकीया की मान्यता है। गोपियां लोकमर्यादा तोडकर रासलीला में भाग लेने जाती हैं। उनके पतियों को पति होने का मिथ्या आभास मात्र होता है।...सखी सम्प्रदाय की मान्यता है कि राधा श्याम की स्वामिनी है।...राधा यहां परमतत्व है।...इसमें सांख्यों की प्रकृति से जुडी मातृतंत्र की उन्मुक्त अवगुण्ठन रहित रति प्रमाद भावधारा जो लोकचेतना से लुप्त नहीं हो सकी है-सन्निहित है।&lt;br /&gt;
पर पुरूष सत्तात्मक स्वरूप के हावी होने के साथ राधा भी कृश्ण की शक्ति यानि दासी मान ली गयी है। और परकीय भक्ति वाले चैतन्य कहने लगते हैं - मैं किसी ऐसे साधु का चेहरा नहीं देखना चाहता हूं जो किसी औरत को संबोधित करता है। मौसी और पुत्री के निकट भी नहीं बैठना चाहिए क्योंकि विद्वान पुरूष भी खुद सशक्त आवेगों के आकर्षण में आ जाते हैं। जबकि वही चैतन्य भागवतकथा वाचन के समय कृश्ण से बिछडी गोपियों के विरह से विह्वल होकर उन्मत्त होकर नाचने लगते थे।&lt;br /&gt;
मतृसत्तात्मक ,जनजातीय स्त्रियों के स्वछंद आचरण को भी ब्रह्मणवादी विचारधारा के तह आत्मसात कर उसे विकृत रूप दे दिया गया। एक ओर स्त्री को पापयोनि घोषित किया गया दूसरी ओर इस घोषणा के लिये प्रयुक्त मंदिरों-मठों में देवदासी आदि प्रथा की आड में उनकी उन्मुक्त यौन व्यवस्था के अपने प्रोयोजित यौन व्यापार के लिये प्रयुक्त किया गया। देवदासी,वसावी, शालवादल,जोगिन,वेंकटसत्री आदि ऐसी ही कूप्रथाएं हैं। इसके तहत मंदिर के कर्मकांडी वातावरण में तैयार देवदासियों का अंत किसी रेडलाइट एरिया में होता है। डॉ सिंह लिखते हैं - पितृसत्ता,राजसत्ता,ईश्वरीय सत्ता की कृपाकांक्षा के मनोवैज्ञानिक विभ्रमों के द्वारा उन्हें श्रद्धा,भावमूलक भक्ति में बांध दिया गया।....किसानों,शिल्पियों,शूद्रों,स्त्रियों के लिये उन्मुक्त चिंतन के सब रास्ते बंद हो गये ओर ये लोग भाग्यवाद,संतोश,कर्मफल,आवागमन,मोक्ष आदि विभ्रमों के जाल में बंदी बना दिये गये।....भारतीय संस्कृति की शाश्वतता के गर्व की निर्लज्जता को धार्मिक ग्रंथों की प्रामाणिकता कूट एक मजबूत कवच प्रदान करता रहा।&lt;br /&gt;
कौटिल्य का राजनीतिक दर्षन भी ब्राह्मण केंद्रित है। उनके अनुसार ब्राह्मण अपीडनीय है। शांति पर्व के अनुसार ब्राह्मणों अदंड्य है। वह सम्मान और दान का अधिकारी है।&lt;br /&gt;
सामंती समाज व्यवस्था को कायम रखने के लिये एक ओर तो ब्राह्मणों को उनके किसी भी कूकर्म के लिये पीडा और दंड से मुक्त रखा गया और उनके निठल्लेपन के लिये दान की व्यवस्था रखी गयी। इसके उलट हर अपराध के लिये अपराधी के आर्थिक दोहन हेतु प्रायश्चित की व्यवस्था की गयी। मनुस्मृति में  प्रायश्चित पर 268 श्लोक हैं। अपराधों के लिये प्रायश्चित में दान-दक्षिणा की ब्राह्मणों द्वारा शुरू की गयी विष-बेल आज तक कैसे भ्रष्टाचार को पोशित करती रही है इसे देखा जा सकता है। आज भी मंदिरों में करोडों के चढावे के रहस्य को दान-प्रायश्चित के अंतरसंबंधों की रोशनी में परखा जा सकता है।&lt;br /&gt;
कौटिल्य ने शाासन चलाने के लिये नीतिगत तौर पर अंधविश्वासों के लिये जगह बनायी। आगे गुप्तोत्तर काल में अंधविष्वास सत्ता संचालन की बहुत बडी शक्ति थे। इस काल में ब्राह्मण राजमंत्रियों ने धर्मशास्त्र  पर आधारित दो पुस्तकों,लक्ष्मीधर कृत कृत्यकल्पतरू और हेमाद्रि कृत वर्तुवर्गचिंतामणि की रचना की। अनुष्ठानों की भरमार वाले दर्जन भर पोथों के संकलन इन दोनों ग्रंथों में तीर्थयात्राओं,अतिचारों,प्रायश्चितों,मृतक संस्कारों तथा शुद्धियों से संबंधित विधानों की भरमार है। इनके आधार पर शासक वर्ग अंधविश्वासों से भरा शासन लादने में कामयाब रहा। यहां उल्लेखनीय है कि इन पुस्तकों की रचना के पच्चीस साल के भीतर ये दोनों राज्य मुसलमानों की अपेक्षाकृत छोटी सेनाओं द्वारा पूरी तरह नष्ट कर दिये गये। वर्तृवर्ग चिंतामणि के ब्राह्मण लेखक हेमाद्रि पर , जो दौलताबाद के यादव राजा रामचंद्र का मुख्यमंत्री था, राज्य व्यवस्था को कमजोर करने के लिये अलाउद्दीन खिलजी से घूस लेेने का आरोप था। डी डी कोसांबी-प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता।&lt;br /&gt;
ऐसा नहीं था कि खुद को ब्रम्हा के मुख से पैदा कराने वाले ब्राह्मणों में गरीब नहीं थे। पर बहुत चालाकी से जहां उच्च वर्गीय ब्राह्मण देवता के लिये सम्मान की व्यवस्था थी वहीं दलित ब्राह्मण के लये दान की। ताकि उनका क्षोभ मरता रहे। भूखमरी के शिकार ऐसे ब्राह्मणों की चर्चा दसवीं सदी के एक अभिलेख में भी है। पौरोहित्य से जीविका कमाने वाले ये गा्रामयाजक आम जनों व शूद्रों के लिये पूजा-पाठ करते थे।&lt;br /&gt;
ये ब्राह्मण जीविकोपार्जन के लिये दूसरों की सेवा करने व उनका भोजन पकाने को मजबूर थे। आज भी ये दलित ब्राह्मण महाराज के रूप में जहां - तहां छात्रों के मेसों ,घरों में खाना बनाने का काम करत हैं। आदिवासी,जनजातीय क्षेत्रों पर अधिकार करते जाने के साथ उन्हें संस्कारित या भ्रष्ट करने के उद्देष्य से तत्कालीन शासक -सामंत उन क्षेत्रों में ब्राह्मणों को दान में भूमि आदि दिया करते थे। इन जमीनों में मंदिर-मठ आदि बनाकर जनजातियों को संस्कारित करने को धंधा चलता था। यहां हम मिश्नरियों के काम-काज के तरीकों को याद कर सकते हैं। जनजातियों के क्षोभ शमन के लिये ब्राह्मण नये नये रास्ते निकालते थे। घरों में तुलसी चौरे पर शालीग्राम पत्थर पूजने आदि की चली आ रही परंपरा इन जनजातियों के आत्मसातीकरण  की एक झांकी है। पुराणकथाओं में तुलसी को लक्ष्मी करार दे दिया गया और काले पत्थर शालिग्राम को विष्णु पुकारा गया। यह जनजातिय टोटकों का ब्राह्मणीकरण था। जिन जनजातियों को वे लडकर जीत नहीं पाते थे उनके क्षेत्रों में ब्राह्मणों को बसाकर शूद्रों की या सेवकों की नयी जमात खडी करते जाते थे। इस तरह उच्च भू-धारी ब्राह्मण वर्ग पैदा हुआ जो घर-घर घूमकर पुरोहिती करने वाले श्रमिक ब्राह्मणों को तिरस्कार की निगाह से देखता था। खाना बनाने वाले महाराज-महाराजिनों से लेकर मरनोपरांत श्राद्ध कराने वाले महपातर ब्राह्मण तक को हम आज भी उसी दलित ब्राह्मण की श्रेणी में पडा पा सकते हैं।&lt;br /&gt;
इस तरह गुप्त काल और उसके बाद बडे पैमाने पर आम जनों व जनजातियों को शूद्र सेवकों  में परिणत करने में लगे इन ब्राह्मण देवताओं का सहायक श्रीमंत वर्ग सत्ता पर काबिज होता गया। डॉ सेवासिंह लिखते हैं - श्रीमंत-वर्ग उपज का सारा अतिरिक्त हिस्सा हडप लेता था और किसानों के पास उतना ही छोडता था जितना खा पहनकर वे उस वर्ग के लाभ के लिये आगे भी मेहनत-मशक्कत करता रहे सके।...गावों में कृषि उत्पादन ओर दस्तकारी का कार्य ब्राह्मणों के हाथ में आ गया था।....दस्तकारों को ...अस्पृश्य इसलिये घोशित किया गया ताकि ... वे एकजुट ना हो सकें और इस तरह पवित्र भू-स्वामियों के हाथों उनका शोषण ... होता रहे।&lt;br /&gt;
यूं ब्राह्मणों ने इन जनजातिय आदिवासियों को कई चीजें सिखाई भी। हल व खाद का प्रयोग व नक्षत्रों ,ऋतुओं के आवागमन की जानकारी दे उन्होंने खेती के विकास में योगदान दिया।  &lt;br /&gt;
नगरी सभ्यता के विनाष और सामंती ग्रामआधारित अर्थव्यवस्था के विकास को डॉ सिंह इन विकृतियों का पोशक मानते हैं। पुरों को नष्ट करने वाले पुरन्दर पुकारे जाने वाले इंद्र से लेकर बौद्धों के पतन तक नगरी सभ्यता के बिखराव ने इस सामंती व्यवस्था के लिये जमीन तैयार की। वे लिखते हैं - ...व्यापारिक और नागरिक उन्नति के दौर में ब्राह्मणेतर विचारधाराओं का बोलबाला रहा है। गृहसूत्रों में ब्राह्मण और क्षत्रियों के व्यापार-कार्य की ओर प्रवृत होने तथा रूपया उधार लेने-देने का व्यवसाय करने का निशे दर्ज है। बोधायन और वषिष्ठ के सूत्र कुसीदक,सूदखोर को महापातक की संज्ञा देते है। उनके अनुसार किसी विद्वान ब्राह्मण के हत्यारे से कहीं अधिक बडा पापी सूदखोर होता है।&lt;br /&gt;
बोधायन सूदखोर ब्राह्मण को शूद्र मानता है। व्यापार ,सूदखोरी के प्रति इस कडे रूख में अप्रत्यक्षतः उन ब्राह्मणेतर समुदायों की भर्त्सना निहित थी, जो वर्ण-व्यवस्था का विरोध करते थे।&lt;br /&gt;
भारत में शंकराचार्य के बाद दार्शनिक गतिविधियों के लगभग अंत के लिये डॉ सिंह शंकर को ही दोषी मानते हैं। शकराचार्य ने शास्त्र प्रमाण को अंतिम मानते हुए तर्क को भ्रांतिपूर्ण कहा। श्रृतिसम्मत तर्क को ही मान्यता दी गयी। इस तरह श्रृति,वेद और वाचिक की परंपरा में रटंत विद्या के हवाले से जो कुछ ब्राह्मण व्याख्यायित कर देते थे वही श्रुति-वेद होता जाता था। इसी तरह रची गयी तमाम पुराण पच्चीसियों ने भारतीय मानस में कूढमगजी भर दी। इस तरह प्रत्यक्ष अनुभव से संबद्ध दर्शन औ तर्क का विध्वंस भारतीय विज्ञान के लिये घातक साबित हुआ। औषधि विज्ञान को इस तर्क विहीन ब्राह्मणी विचारधारा ने नष्ट ही कर दिया। तर्क के प्रति प्रतिबद्ध आयुर्वेद के ग्रंथ अप्रासंगिक होते गए। चिकित्सकों को भी अछूत की श्रेणी में डाल उसका छुआ अन्न ग्रहण करने की मनाही कर दी गयी। नतीजा आर्युवेद की परंपरा मरती गयी और आज हम अंग्रेजी चिकित्सा पर आश्रित दिखते हैं और विडंबना देखिए कि ब्राह्मण तो क्या देवता होते आज डाक्टर जरूर भगवान कहाते हैं।&lt;br /&gt;
दरअसल ब्राह्मणवादी आस्था ने जनमानस को ऐसा अंधा कर दिया है कि किसी भी उपलब्धि या ज्ञान को तर्क के आधार पर समझने की जगह हम उसे आंख मूंद भगवान मानने लगते हैं। वैदिक काल में तो ओदनम यानि कि भात और ओखल जिसमें धान कूटा जाता था वह भी देवता था पर आज भी हम रजनीश,संतोशी माता से लेकर सांई बाबा तक देवता पैदा करने से कहां बाज आ रहे, भले ही कुछ समय बाद ये देवता मर बिला जाएं। इसी अंधआस्था को जान समझकर चिकित्सकों की बडी जमात आम जन से धन दोहन में लगी रहती है। जबकि वे भी अनुभवजन्य ज्ञान का प्रयोग कर रोजी कमाने वाले आम जन हैं। पर जो विशिष्टता बोध का औरा उनके चारों ओर घिरा रहता है वह प्रकरांतर से इसी विचारधारा का उपउत्पादन है।&lt;br /&gt;
गौतम ,वशिष्ठ,मनु चिकित्सकों को अपराधी,व्यभिचारिणी,चोर,वेश्या आदि की कोटि में रखते हैं। मनु तो चिकित्सकों से प्राप्त अन्न को मवाद की तरह गंदा बताते हैं। धर्मशास्त्र ओर स्मृतिकार मात्र अंत्यजों को ही चिकित्सा कर्म की अनुमति देते हैं। संपूर्ण उपनिशद में किसी ऐसे ऋषि की चर्चा नहीं जो चिकित्सक हो,कहीं चिकित्साशास्त्र की ही चर्चा नहीं है। इसतरह हम भारतीय चिकित्साशास्त्र ,आयुर्वेद की दुर्गति में वैदिक विचारधारा की साफ भूमिका देखत सकते हैं। अनुभवजन्य,तर्काधारित प्रमाणों को शंकर अविद्या यानि की अज्ञान की श्रेणी में रखते हैं। जबकि चरक संहिता तर्क-वितर्क द्वारा दवाओं के चुनाव पर बल देती है। मनु तर्कशास्त्री का बोलकर अभिवादन करने की भी मनाही करते हैं। दंडवत तो खैर मात्र ब्राह्मण देवता के लिये ही आरक्षित रहा है। कर्म और अदृष्ट के प्रभाव को नकारने वाले आयुर्वेदाचार्यों और ब्रह्मगुप्त जैसे वैज्ञानिकों को इन ब्रह्मज्ञानियों के सामने घुटने टेकने पडे।&lt;br /&gt;
ब्राह्मणवाद के वर्णमूलक समाज वैचारिक स्तर पर आत्मवाद को आधार बनाता है। यहां अजर,अमर आत्मा है,देह का अस्तित्व नहीं। जब जगत ही मिथ्या है तो फिर देह कहां रहे। इसलिये स्वधर्म के लिये बंधुओं को मारने में कोई दोश नहीं। यहां स्वधर्म का माने वर्णगत धर्म से है , जो आपके लिये ब्राह्मणों ने तय कर रखा है, न कि निजी धर्म से । यहां क्षत्रिय का धर्म है युद्ध करना। गीता के अनुसार युद्ध क्षत्रिय के लिये स्वर्ग का खुला द्वार है। क्योंकि मरने के बाद आत्मा परमब्रह्म में जा मिलती है, फिर देर कया। मरो-मारो और स्वर्ग जाओ।&lt;br /&gt;
इस तरह जनजातीय सहज आदिम भौतिकवाद का आत्मवाद में रूपांतरण होता गया। डॉ.सेवा सिंह लिखते हैं - ‘‘...हम ऋग्वैद से उपनिशदों में यही विकास पाते हैं। प्रकृति की शक्तियों की मूर्त भावना कुंठित हो जाती है और निश्चित चिंतन का युग शुरू हो जाता है।‘‘इसके तहत प्रकृति की शक्तियों के लिये देवताओं की प्रतीकात्मकता का त्याग कर दिय गया था। जिनके सामने ऋग्वैदिक ऋशि अज्ञात भय से नतमस्तक था। तत्कालीन अनेक विचारधाराओं की जुटान के बावजूद उपनिषद मूलतः आत्मज्ञान के प्रवक्ता हैं। यह आत्म या ब्रह्म ऐसा था जिसकी जानकारी कोई प्रयोगाश्रित ज्ञान नहीं दे सकता था। डॉ.सिंह लिखते हैं -‘‘भौतिक अनुभवों से विच्छिन्न शुद्ध ज्ञान का प्रार्दुभाव उन परिस्थितियों को प्रतिबिम्बित करता है, जिनमें उत्पादनशील श्रेणियों के अतिरिक्त उत्पादन पर काबिज होकर एक परजीवी वर्ग का उद्भव होने लगता है।‘‘&lt;br /&gt;
इस तरह श्रम की महत्ता घटती जाती है और प्रगति का श्रेय मस्तिष्क की कुशाग्रता को मिलने लगता है। ऐसे श्रमजीवी और परजीवी वर्गभेद वाले समाज में ही ऐसे आत्मवादी या प्रत्ययवादी दृष्टिकोण का उद्भवन होता है। बोधायन ने वेद और कृषि को परस्पर विरोधी कार्य बताया है। मनु भी आपातकाल में ब्राह्मण को वैष्य का व्यवसाय अपनाने की सलाह देते हैं पर कृषि कर्म को निकृष्ट धंधा कहते हैं। इस तरह ऋग्वेद में जो अन्न ब्रम्ह है उसे पैदाकरने वाले को मनुस्मृति निकृष्ट बना देती है।&lt;br /&gt;
आत्मवाद के वर्णमूलक सरोकार के वरक्स उसी दौर में बौद्धों का अनात्मवाद जनजातियों के दमन के खिलाफ समतामूलक सरोकारों के साथ सामने आ रहा था। बुद्ध का कथन है कि वह जो क्षणिक है, अश्रेय है और परिवर्तन के अधीन है, नित्य आत्मा नहीं हो सकता। सत्ताहीन पदार्थ , आत्मा , की प्राप्ति का उद्योग परम मूर्खता का सूचक है। आत्मा की जगह बुद्ध व्यक्तित्व को महत्व देते हैं। उनके अनुसार - रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान इन पांच स्कंधों को मिलाकर व्यक्तित्व का निर्माण होता है। बुद्ध के समकालीन चार्वाक और लोकायत भी शाश्वत आत्मा को नहीं मानते थे। चार्वाक के अनुसार देह का निर्माण अणु से हुआ , यहां कोई आत्मा नहीं, न पाप है न पुण्य।&lt;br /&gt;
आत्मा के साथ प्रतीत्यसमुत्पाद बुद्ध का मुख्य सिद्धांत है। इसके अनुसार उत्पत्ति न स्वतः होती है न बिना हेतुओं के ही, बल्कि वह प्रत्ययों के आश्रय से ही या उनके साथ ही होती है। यह एक द्वंद्वात्मक सिद्धांत है जो कहता है कि - इसकी उत्पत्ति से उसकी उत्पत्ति है। जन्म का कारण यह है कि अस्तित्व का लोप होता रहता है। बुद्ध कहते हैं कि हमें आदि और अंत के प्रश्नों को छोड देना चाहिए। निजी संपत्ति का भी बुद्ध के यहां निषेध है। एक सुत्त में बुद्ध कहते हैं - ‘‘ इस संसार में मैं देखता हूं कि धनवान लोगों ने जितनी वस्तुएं जमा की हैं....उसमें से वह कुछ भी दूसरों को नहीं देते .... राजा ने यद्यपि इस पृथ्वी के सभी राज्यों को जीत लिया हो .... तो भी उसी तृष्णा नहीं मिटेगी .... राजा और कई अन्य लोग अपूर्ण ईच्छाओं को लिये हुए काल के ग्रास बन जाते हैं....।‘‘&lt;br /&gt;
ब्राह्मणों के जन्मतः श्रेष्ठता के दावे को बुद्ध नकारते थे, वे देख रहे थे कि धन के बल पर किसी की भी सेवा प्राप्त की जा सकती थी। डॉ.सिंह लिखते हैं-‘‘वर्ण अवधारणागत सैद्धांति परिकल्पना रही है, जबकि जाति और कुल ठोस वास्तविक वर्गीकरण हैं।...बौद्धों का सामाजिक वर्गीकरण कुल आधृत .... व्यवसायगत है। जेसे नाई, लोहार,श्रमिक,कुम्हार...क्षत्रिय,ब्राह्मण,गहपति।‘‘ यह वर्गीकरण पेशागत है न कि मुंह और पैर से जन्म की कपोल कल्पना पर आधारित। लोगों की पहचान अर्थगत थी। अषोक के अभिलेख भी वैश्य और शूद्र का इस्तेमाल नहीं करते। इसकी बजाय वहां ‘इम्यां‘ शब्द का प्रयोग है। इसी तरह दास-भटक हैं। ये उत्पादन से जुडी कोटियां हैं न कि ब्राह्मणिक जातिगत कोटियां। बौद्ध धर्म ने चांडालों और पुक्कसों को भी निर्वाण के योग्य बताया है।&lt;br /&gt;
ब्राह्मण ग्रंथों में पुक्कसों या निषादों को वर्णसंकर कहा गया है जबकि बौद्ध साहित्य के अनुसार मिश्रित विवाह से उत्पन्न बच्चों पर किसी नयी अछूत जाति को थोपने की जगह उन्हें माता-पिता में से किसी एक के समुदाय में  शामिल कर लिया जाता था।&lt;br /&gt;
ब्राह्मणवादी व्यवस्था में शूद्र और चांडाल को शिक्षा के अधिकार से ही वंचित रखा गया इसी कारण राम वेदपाठी शाम्बूक की हत्या करते हैं। वहीं जातक की एक कथा में चांडाल से जादू सीखने वाला ब्राह्मण जब उसे गुरू नहीं मानता तो जादू भूल जाता है। इसी तरह बोधिसत्व चांडाल अपने ब्राह्मण सहपाठी को शास्त्रार्थ में पराजित कर लात मारता है तो उसके अध्यापक उसकी निंदा करते हैं इसी तरह जैन धर्म में भी हरिसेन नामक चांडाल की कथा है जो एक ब्राह्मण को उपदेश देता है।&lt;br /&gt;
पर बौद्ध दर्शन की यह क्रंातिकारी भूमिका लंबे समय तक अपना यह तेवर बरकरार नहीं रख सकी। कारर्ण-कार्य के स्पश्ट सिद्धंात को परवर्ती बौद्ध शून्यवाद में ढाल देते हैं। उपनिषदों का रहस्यवादी आत्मवाद जैसे नये रूप में सामने आने लगता है। बौद्धों के इसी&lt;br /&gt;
शून्यवाद के तत्वों को लेकर ही आगे शंकर अपने जगत-मिथ्या व अद्वैत वेदांत का सिद्धांत गठित करते हैं। ‘‘शंकर के दर्षन का पूरा ढांचा पारिभाशिकों के हेर फेर के साथ बौद्धों के शून्यवाद पर ही आधृत है।‘‘ परवर्ती वेदांती रामानुजाचार्य शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध कहते भी रहे हैं। ‘‘ बौद्धों की शून्यवादी और विज्ञानवादी विचारधाराओं के श्रोत ग्रंथ आखिर वेदांतिक उपनिषद ही थे।... ष्षून्यवाद में समस्त जागतिक सत्ता को अस्वीकृत करते हुए केवल एक मात्र शून्य को ही परमार्थ कहा गया है।‘‘ चंद्रकीर्ति का कथन है कि वस्तुओं के दो ही रूप हो सकते हैं - भाव और अभाव। जो वस्तु सदा वर्तमान रहती है वह भावरूप है, जो वस्तु विद्यमान नहीं रहती ,वह अभावरूप है। वस्तु का न भाव है न अभाव , इसलिये वह शून्य‘ कहलाती है....।‘‘&lt;br /&gt;
शून्य के रूप में जगत की निस्सारता प्रतिपादित करनेवाली तमाम महायानी युक्तियों को दार्षनिक आधार देने वाले नागार्जुन का निश्कर्श्श था -‘‘तत्तत् प्राप्य यदुत्पन्नं नोत्पन्नं तत् स्वभावतः‘‘- अर्थात जो वस्तु किसी अन्य वस्तु पर निर्भर रहकर उत्पन्न हुई वह स्वयं उत्पन्न नहीं हुई अर्थात् उसकी कोई सत्ता नहीं। इसी तरह ‘प्रतीत्यसमुत्पाद‘ जिसका अर्थ था -‘प्रत्येक सत्ताशाली वस्तु कारण वाली है‘ को तोड-मरोड कर यह अर्थ दिया गया कि - ‘प्रत्येक वह वस्तु जो कारणवाली है, सत्ताहीन है।‘&lt;br /&gt;
प्रतीत्यसमुत्पाद की इस शून्यवादी व्याख्या के बाद ईश्वर का निषेध करने वाले बुद्ध को ही ईष्वर बना दिया गया, वे भी अवतारी हो गये। महायानी ग्रंथों में बुद्ध के 24 अवतार हैं, जैनों में भी 24 तीर्थंकर हैं। आगे भागवत पुराण में भी वैष्ण्व अवतारों की संख्यां 24 मानी गयी।&lt;br /&gt;
ललित विस्तर के अनुसर बुद्ध मात्र जम्बूद्वीप में अवतरित होते हैं और वहां भी केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय कुल में। इस ब्राह्मणवादी बुद्ध का काफी प्रचार-प्रसार हुआ। मजेदार बात है कि बौद्ध मत के अधिकांश विद्वान  अश्वघोष,नागार्जुन, आर्यदेव,असंग,बसुबंधु आदि ब्राह्मण थे। पुराणों में भी बुद्ध को विष्णु का नवम अवतार माना गया है।&lt;br /&gt;
इसी तरह बौद्ध ,जैन की तरह वेदांतियों ने तमाम भारतीय दर्शन का ब्राह्मणीकरण कर दिया। डॉ.सेवा सिंह सवाल उठाते हैं कि प्रत्यक्ष,अनुमान आदि प्रमाणों और तर्कों का निषेध कर मात्र वेदों के प्रति आस्था और अनास्था के आधार पर दर्शनों का वर्गीकरण करने वाला वेदांत क्या कोई दर्शन है...। कौटिल्य के अनुासार भी वेदांत दर्शन नहीं मात्र ब्रह्मज्ञान का विषय है। ब्राह्मणिक दर्शन के अनुसार सांख्य,न्याय,योग,वेदांत,मीमांसा और वैशेषिक आस्तिक दर्शन हैं और लोकायत,बौद्ध,जैन नास्तिक।&lt;br /&gt;
कौटिल्य राज चलाने के लिये अंधविश्वासों का प्रयोग करना नीतिगत तौर पर सही मानते हैं। पर साथ ही वे चाहते हैं कि शासक तर्कशास्त्र और बुद्धिसंगत दर्शन में पारंगत हों न कि अंधविश्वासी। वे दर्शन के लिये आन्वीक्षिकी शब्द का प्रयोग करते हैं और तर्कबुद्धिबाद और धर्मनिरपेक्षता को दर्शन का अनिवार्य लक्षण मानते हैं। इसी अर्थ में वे मात्र न्यायवैशेषिक,सांख्य और लोकायत को ही दर्शन की कोटि में रखते हैं।&lt;br /&gt;
न्यायवैशेषिक एक भौतिकवादी दर्शन है जो आत्मा को जड तत्व मानतो है और चेतना को कतिपय पदार्थों के संयोजन का परिणाम मानता है पर लोकायत के देहात्मवाद से यह खुद को अलग रखता है। लोकायतों के विरूद्ध न्यायवैशेषिक जयंत भट्ट,उदयन आदि शरीर से बाहर किसी आत्मा या चेतना की सत्ता सिद्ध करना चाहते हैं।&lt;br /&gt;
संख्य दर्शन मूलतः अनीश्वरवादी और वेदों को ना मानने वाला था पर बाद में इसमें भी स्मृतियों की दुहाई जोड दी गयी। कपिल सांख्य के प्रर्वतक माने जाते हैं। सांख्य सूत्र व षष्टितंत्र  आदि उनके ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं हैं। सांख्य के अनुसार आनुभविक जगत वास्तविक है। यह स्वभाववाद के निकट का दर्शन है। शंकर लोकायत और सांख्य को समान मानते थे।&lt;br /&gt;
लेकायत लोक में प्रचलित विज्ञान,तर्कसम्मत व धर्मनिरपेक्ष विचारधारा थी जिसने कभी ब्राह्मणवाद के सामने घुटने नहीं टेके और नष्ट कर दी गयी। लोकायती चार्वाक स्वजनों और गुरूजनों की हत्या को आरोप लगा जब ब्राह्मणसमूह की ओर से युधिष्ठिर को मृत्यु का शाप दे रहा था तो ब्राह्मणों ने उसे पाखंडी कहकर जलाकर भस्म कर दिया था। लोकायत की कोई मूल रचना नहीं मिलती। इसके बारे में हम विरोधियों के यहां आए प्रसंगों से ही जान पाते हैं। बौद्ध ग्रंथ दीघ निकाय में लोकायत को शाश्त्र कहा गया है। दासगुप्त के अनुसार, यह लोकायती मत कि जन्म के बाद कोई जीवन नहीं और मृत्यु के  साथ चेतना नष्ट हो जाती है,उपनिषद काल में स्थापित हो चुका था। उपनिषद् इसी मत का खंडन करते थे। लोकायत को ही आगे चार्वाक और फिर ब्राहस्पत्य दर्शन के रूप में ब्राह्मणवादियों द्वारा एक दानवी विचारधारा पुकारा गया। प्रबोधचंद्रोदया और श्रीहर्षनैषध में लोकायत वा चार्वाकों के मतों का वर्णन है। माधवाचार्य के सर्वदर्शन संग्रह में भी लोकायतों के छंदों का संग्रह है।&lt;br /&gt;
इस तरह हम देखते हैं कि ब्राह्मणवाद ने वेद विरोधी दर्शनों को या तो नष्ट किया या खंडन-मंडन कर आत्मसात कर लिया व दर्शन के नाम पर भाष्यों का अंबार लगा दिया।&lt;br /&gt;
आयुर्वेद और चरक संहिता जैसे चिकित्साशास्त्र की तरह ब्राह्मणवाद के राहु-केतु ने भारतीय विज्ञान को भी ग्रस लिया था। नतीजा आजतक हम पश्चिम पर आश्रित हैं। सत्य को जानकर भी हमारे वैज्ञानिकों को ब्राह्मणिक मिथकों को आत्मरक्षा में ओढ लेना पडता था। इस पाखंड की चर्चा अलबेरूनी ने भी की है कि छठी शताब्दी में वराहमिहिर और सातवीं में ब्रह्मगुप्त जैसे खगोलशस्त्रियों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक विश्लेषण कर डाला था पर धार्मिक दबाव में उन्होंने राहु और केतु  जैसे दैत्यों की अवधारणा को भी आत्मरक्षा में स्वीकार कर लिया था। इसी तरह आर्यभट्ट का भूभ्रमणवाद एक क्रातिकारी सिद्धांत था जिसे नष्ट करने का पूरा प्रयास ब्राह्मणिक परंपरा ने किया था। गुणाकर मूले के अनुसार आर्यभट्ट पहले भारतीय थे जिन्होंने नक्षत्रलोक को स्थिर और पृथ्वी को अक्ष पर पष्चिम से पूर्व घूमता बताया था। इस तरह पांच महाभूतों की जगह आर्यभट्ट ने चार महाभूतों को ही माना था। पांचवें तत्व आकाश को उन्होंने नहीं माना था। ध्यान देने की बात है कि लोकायत आदि नास्तिक मत के प्रणेता भी चार ही भूत मानते थे – मिट्टी,जल,अग्नि व वायु।&lt;br /&gt;
विचारधारा के इस दबाव को हम चरक व सुश्रुत संहिता पर भी स्पष्ट देख सकते हैं। एक ओर तो चरक संहिता में गया और ब्राह्मण को पूज्य माना गया है वहीं चरक में गोमांस को वातरोग,पीनस,ज्वर,खांसी आदि में हितकारी भी बताया गया है। धर्मशस्त्रों के अनुसार चिकित्सक ब्राह्मण और वैष्य स्त्री से उत्पन्न जारज संतानें थे जिन्हें अंबुष्ट पुकारा जाता था। अंबुष्टों को दान देने की मनाही थी। भीष्म-अनुषासन पर्व।&lt;br /&gt;
चिकित्सकों की यह दयनीय स्थिति ऋग्वेद में नहीं थी। उसका एक पूरा सूक्त औषधि की प्रशंसा में है जिसमें औषधि को मातृरूप कहा गया है और चिकित्सक को गौ,अश्व,वस्त्र आदि देने की बात कही गयी है। पर यजुर्वेदें चिकित्साकर्म की निंदा आरंभ कर दी गयी थी।&lt;br /&gt;
ऋग्‍वेद के सम्माधनित चिकित्सखक देवता अश्वसनी कुमार का सम्मांन अब कम हो गया था। दरअसल चिकित्स क आम जन से जुड जाते थे। उनका पेशा ही ऐसा था कि लोगों को छूना पडता था। इस तरह आम लोगों को छूकर जीविकोपार्जन करने वालों को मनुस्म्रिति और धर्मसूत्र अपने यहां कैसे जगह दे सकते थे। मनुस्म्रिति ,गौतम व विष्णुा धर्मसूत्र  में आम जनों-स्त्रिों के लिये यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों से बाकी श्रेष्ठय ब्राह्मणों को दूर रखने को कहा गया है। वसिष्ठत का कहना था कि वेदों का ज्ञन न रखने वाले द्विज को ब्राह्मण नहीं माना जा सकता। मनु के निषिद्ध कर्म में शिल्परकारी, मजदूरी, पशुपालन, दुकानदारी, खेती के अलावा विद्यार्जन भी शामिल है। यहां विद्यार्जन का मतलब वेद के अलावे किसी भी तरह की विद्या के अर्जन से है। शंकर के अनुसार अनुभवजन्यप-तर्काधारित प्रमाण अविद्या या अज्ञान है। जबबकि चरक संहिता में बुद्धि व तर्क के आधार पर औषधि चयन की बात कही गयी है। इसके उलट कठोपनिषद में तर्क से प्राप्त् बु‍द्धि का निषेध है।       एक जमाने में भारत की कीर्तिपताखा दुनिया भर में फहराने वाले बौद्धों, जैनों पर अंतिम चोट, छठी शताब्दी् के बाद के, आलवार संतों के भक्ति आंदोलन ने किया था। तिरूनुमुर गांव का निवासी अप्पायर अपनी बहन के प्रभाव में शैव बना फिर उसके प्रभाव में जैन सम्राट महेंद्रवर्मन शैव बना और उसने तमाम जैन मंदिरों को तबाह कर उन्हेंप शैव मंदिरों में बदल डाला। सुंदर भक्ति पदों की रचना करने वाले तिरूमंकई ने भी बौद्ध,जैनों के खिलाफ लगातार जहर उगला। कहा जाता है कि शैव संत तिरूज्ञानसंपंतर के प्रभाव में पांड्या सम्राट ने अस्सी  हजार भिक्षुओं का वध करवा दिया था।     यही वह दौर था जब शैव मठ की स्था्पना भारत भर में की गयी। शंकर ने अपने जीवन में ही चारों मठों की स्थांपना कर दी थी। ये मठ शक्ति और सत्ता  के नये सामंती केंद्र थे। कुछ मठों के अधिकार में सैकडों गांव थे जो मठों के लिये अन्न ,कपडे़ व मजदूर की व्य वस्था  करते थे।      दसवीं सदी में नाथ मुनि ने अलवारों के पदों का संकलन ‘प्रबंधम्’ नाम से किया। नाथ के पोते यमुनाचार्य ने इन्हें ‘दिव्यभ प्रबंधम्’ की संज्ञा दी। आगे यही ‘प्रबंधम्’ चार तमिल वेद कहलाए। यमुनाचार्य की मौत के बाद वैष्ण वों के दो खेमे हो गये‍ जिनमें तमिल और Sanskrit की जगह तमिल वेद को ही सर्वोपरि मानते थे।      तमिल के पक्षधर टेंकलई कहलाए जबदकि Sanskrit वाले वडकलै थे। वडकलै Sanskrit और तमिल दोनों वेदों को प्रमाण मानते थे। इनमें दार्शनिक मतभेद भी थे। टेंकलई बस भगवतशरण में चले जाने को ही मोक्ष का उपाय मानते थे जबnकि वडकलै के अनुसार शरणागत होना काफी नहीं, मोक्ष के लिए कर्म भी करना होता है। &lt;br /&gt;
वर्ण की द्रिष्टि से देखें तो बारह आलवार संतों में मात्र दो ही शूद्र थे। शूद्रों का मंदिर में प्रवेश वर्जित था सो ये शूद्र संत भी कभी अपने आराध्यण के दर्शन नहीं कर पाते थे। शूद्र संत नाम्मांलवार ने इसकी चर्चा भी की है कि ब्राह्मणों के माथे का तिलक देखकर ही उन्हेंर संतोष करना पडता था। &lt;br /&gt;
आलवारों ने गीता और पुराण की ब्राह्मणी विचारधारा को गीतों के माध्याम से जन-गण में स्थादपित कर दिया। आलवार कवि मधु के अनुसार गुरू नाम्मातलवार ने वेदों के रहस्या को अपने ग्रंथ में भर दिया है। विडंबना देखिए कि वेदों के रहस्यय को तमिल में लाने का श्रेय पाने वाले नाम्मा वलार को भी मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता था और गुलामी ऐसी कि पंडितों के सिर का टीका ही दूर से ही देखकर उन्हें  संतोष करना होता था। धीरे – धीरे प्रबंधम के गायन ने वेदपाठ को विस्थाीपित कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डॉ सिंह के अनुसार आलवारों के भक्तिगीत ही संस्‍थाबद्ध रूप से भागवतपुराण का विषय बने। भागवत के अनुसार कृष्‍ण ही वेदों के मूल कारण हैं। भागवत ने कृष्‍ण के सगुन रूप्‍ में प्रति भक्ति का प्रसार किया। उनकी देह और अंग-प्रत्‍यंग पूजनीय हो उठे। रासलीला के इस आत्‍मसातीकरण में स्‍त्री को एक बार फिर महत्‍व मिला। यह सब ब्राहमणवाद के नीतिगत कार्यकलाप थे। भागवत के अनुसार भक्ति उनलोगों के लिये है जो वेदअध्‍ययन के अधिकारी नहीं। इस तरह शुद्रों ,स्त्रियों,श्रमिकों की मनु व वर्णधर्म आदि में आस्‍था पैदा करने की सफल कोशिशें की गयीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस तरह आठवीं शताब्‍दी में जब भागवत आम जन को अपनी जद में ले रहा था , शंकराचार्य भक्ति को दार्शनिक आधार दे रहे थे। मनु को शंकर ने अपनी स्‍थापनाओं के लिए आधार की तरह प्रयोग कर द्विज और शूद्र की कोटियां प्रस्‍तावित कीं। यूं इस वेदांती परंपरा के भीतर शैवों और वैष्‍णवों के सांप्रदायिक झगडे कम तीखे नहीं थे। स्‍मृति चंद्रिका में शैवों को बौदधों के साथ अछूत की श्रेणी में रखा गया है। ज्ञान पर अधिक जोर देने वाले शंकर के अद्वैत वेदांत को वैष्‍णव आचार्य रामानुज भक्ति में बाधक मानते थे। शंकर के अनुसार ब्रम्‍ह सत्‍य है ओर जीव उसका आभास है, वह ब्रम्‍ह के ही सामान है। पर रामानुज के अनुसार जीव अणु और क्षुद्र है पर ब्रम्‍ह महान है। शंकर के लिये जगत मिथ्‍या है पर रामानुज के लिये वह सत्‍य है । आगे मध्‍वाचार्य ने ब्रम्‍ह की सत्‍ता को जगत से अलगाते हुए दोनों को स्‍वीकार किया था। शंकर अद्वैत थे माध्‍व द्वैत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
11वीं सदी में तैलंग ब्रम्‍हण निम्‍बार्क ने इन दोनों से आगे का सिदधांत दिया। वे ईश्‍वर तथा जीव और जगत में भेद भी मानते थे और अभेद भी। वे द्वैत-अद्वैत दोनों को मानते थे। पर ये मतभेद मूलगामी नहीं थे। वैष्‍णवों का विरोध नगरों के उन व्‍यापारिक केंद्रों पर कब्‍जे को लेकर था जिस पर शैव काबिज थे। जबकि वैष्‍ण्‍वों का प्रभाव ग्रामीण इलाकों में था, जहां ब्राम्‍हण सामंत आदिवासी क्षेत्रों में कृषि-भूमि का विकास कर रहे थे। आगे शंकर के मठ बौदध विहारों का स्‍थानापन्‍न करते गए। विहारों से निष्‍कासित भिक्षु जीविकोपार्जन के लिए जनजातीय गुहयाचारी ,तांत्रिक कर्मकांडों की ओर प्रवृत हो रहे थे, जिसे आलवार भक्‍त-संत बौदधों के पतन के रूप में देख अपने गीतों में उसे दर्ज कर रहे थे। यह पतन व्‍यपार अर्थव्‍यवस्‍था पर कृषिव्‍यवस्‍था की विजय थी। निरीश्‍वरवाद पर ईश्‍वारवाद तरजीह पा रहा था। आत्‍मनिवेदक और अनुकंपा आधारित दयनीयता भक्ति का अधार बन रही थी। इसमें सामंती दमन का प्रतिबिम्‍ब देख जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गौडपाद की मांडूक्‍यकारिका शंकर के मायावाद का बीज ग्रंथ है। इसमें उपनिषदों ,मांडूक्‍य, वृहदारण्यकों की अद्वैतवादी व्‍याख्‍या है। गौडपाद ने जगत को माया और स्‍वप्‍न की तरह काल्‍पनिक माना है। उनके अनुसार जैसे स्‍वप्‍न में हम पदार्थों को अस्तित्‍वमान पाते हैं, पर वे होते नहीं हैं, वैसे ही जागने पर भी जो पदार्थ सत्‍य प्रतीत होते हैं वह होते नहीं हैं। वह माया के कारण सत्‍य प्रतीत होती है,ऐसे ही जगत भी स्‍व्‍प्‍न्‍ मात्र है। शंकर से पहले बौदध शून्‍यवादी ऐसी ही व्‍याख्‍या कर चुके थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस तरह भक्ति , परमगति,मोक्ष आदि की वेदांती धारा ने उत्‍पीडितों के प्रतिरोध को तबतक उभरने नहीं दिया जब-तक कि तुर्क हमलों और उनके सामा‍जार्थिक परिवर्तनों ने सामंतीय व्‍यवस्‍था को शिथिल नहीं कर दिया। आगे कबीरादि संत कवियों ने अस्‍पृश्‍यता के जाल को तार-तार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन संत भक्‍त कवियों के उदभव व भूमिका पर हिन्‍दी साहित्‍य के आलोचकों में मतभेद रहा है। जहां रामचंद्र शुक्‍ल ने भक्ति आंदोलन का कारण हिन्‍दुओं पर मुसलमानों के अत्‍याचार को माना है वहीं हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसका खंडन करते हुए कहा कि – मुसलमानों के अत्‍याचार के कारण यदि भक्ति की भावधारा को उमडना था तो पहले उसे सिन्‍ध में और फिर उत्‍तर भारत में प्रकट होना चाहिए था, पर वह हुई दक्षिण्‍ में। उधर जार्ज ग्रियर्सन इस आंदोलन को ईसाईयत की देन कहते हैं। उनका तर्क है कि दूसरी-तीसरी शताब्‍दी में मद्रास में जो नेस्‍टोरियन ईसाई आ बसे थे, जिनकी संगत से रामानुजाचार्य को भावावेश व प्रेमोल्‍लास की धार्मिक भावना का पता चला था उन्‍हीं के प्रचार-प्रसार ने भक्ति को बढावा दिया। आचार्य द्विवेदी ने ग्रियर्सन के मत का भी खंडन किया था , उनके अनुसार -  इसका कारण उस काल की लोक-प्रवृति का ठोस शास्‍त्रसिदध्‍ आचार्यों और पौराणिक ठोस कल्‍पनाओं से युक्‍त हो जाना था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपरोक्‍त मतभेदों की चर्चा करते  हुए पहल के इतिहास अंक 43-44 में प्रकाशित भक्ति-आंदोलन.. पर अपने आलेख में – लल्‍लन राय लिखते हैं – वास्‍तविकता यह है कि कबीर आदि निर्गुण संतों और प्रेमोल्‍लास में लीन सूफी संतों दवारा उत्‍तर भारत में जिस भक्ति-आंदोलन का सूत्रपात हुआ ,उसमें हिन्‍दु-मुस्लिम सामंतवादी तत्‍वों के विरूदध निम्‍नवर्गीय साधारण हिन्‍दू-मुस्लिम आम जनता का विक्षोभ व्‍यक्‍त हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबीर लिखते हैं – हमरा झगडा रहा न कोउ,पंडित मुलां छाडे दोउ। रज्‍जब भी हिन्‍दू ओर तुर्क दोनों के त्‍याग की बात करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संत कवियों में अधिकांश दलित जातियों से थे। संत कबीर जुलाहा थे तो दादू धुनियां, धर्मदास बनियां,बषण मिरासी,भीषण महापात्र,बूला साहब कुर्मी,दीन दरवेश लोहार,दरिया मुसलमान,चरणदास,साहजोबाई ओर दयाबाई वैश्‍य,सधना कसाई थे तो ललदेदू मेहतर और संत नामदेव छींपी थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्राहमणिक विचारधारा में जहां तमाम श्रमिक को शूद्र की कोटि बनाकर उसमें डाल, शोषण की अनंत चक्‍की में पिसने को डाल दिया गया था, वहीं संत कवियों ने शूद्रों के मानवाधिकार को ही ईश्‍वर आस्‍था की कसौटी प्रमाणित कर दिया था। नानक ने कहा – जिथे नीच समालीअनि तिथे न‍दरि तेरी बखसीस। मतलब जहां निम्‍न वर्ग के लोगों की देख-भाल होती हो वहीं ईश्‍वर की कृपा हो सकती है। इन संतों का सारा जोर कर्म पर है। नानक अंति निर्णायक करणी को बताते हैं। जबकि तुलसी हैं कि कोई कर्म कर राम नाम रट कर उससे मुक्ति की आशा करते हैं – उलटा नाम जपत जग जाना। वाल्‍मीकि भए ब्रहम समाना। तुलसी के इस आचरण पर सेवा सिंह को गहरी आपत्‍ती है, क्‍योंकि इस तरह तुलसी वाल्‍मीकि के कर्मशील , साधक व्‍यक्त्त्वि को ओछा कर देते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डॉ सेवा सिंह सिंधु घाटी सभ्‍यता को असुरों की सभ्‍यता मानते हैं, वैदिक आर्यों ने इसी सभ्‍यता वाले नगरों का विनाश किया था। ऋग्‍वेद में असुरों के नगर को हरियूपिया लिखा गया है, विदवानों के अनुसार यही हडप्‍पा संस्‍कृति थी। उनका निष्‍कर्ष है कि छठी शताब्‍दी के बाद के किसान ,श्रमिक , शूद्र वास्‍तव में असुर और जनजातियों के लोग थे ओर तमाम वर्णवादी दबावों के बादभी मौर्यकाल तक उनकी विचारधारा बरकरार थी। कलिंग युदध को वे जनजातीय लोगों को दास बनाने के लिए अशोक दवारा थोपा गया युदध मानते हैं। कलिंग में हुए जनजातीय प्रतिरोध के फलस्‍वरूप ही अशोक को धर्मनिरपेक्ष व नैतिक सिदधांत धम्‍म का प्रावधान करना पडा। यह जनजातियों को उदारतापूर्वक मुख्‍यधारा में लाने का एक प्रयास था। आगे धम्‍म के विघटन के बाद बौदधों के समता मूलक दृष्टिकोण पर ब्राहमणवादी वर्णवादी विचारधारा का वर्चस्‍व्‍ स्‍थापित हुआ। इस विचारधारा ने जनजातियों को बडे पैमाने पर दास बनाया और उनके श्रम के शोषण के लिए निष्‍काम कर्म और कर्मफल के रूप में शूद्र जाति में जन्‍म को इस तरह दलित-विजित जातियों के दिमाग में पैबस्‍त किया गया कि वे कभी खुलकर बडा विद्रोह ना कर सकें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
19वीं शताब्‍दी के औपनिवेशिक शासन में भी किसानों और शिल्पियों का दमन हुआ था। मैकाले ने ऐसा वर्ग तैयार करने की बात की थी जिसका रंग हिन्‍दुस्‍तानी हो पर सोचने का ढंग अंग्रेजी हो। डॉ.सिंह लिखते हैं – बांटो और राज करो की औपनिवेशिक कूटनीति के अनुरूप इस नये उदीयमान वर्ग बिचौलिए,नवधनाढय का पुनर्जागरण – हिन्‍दू पुनर्जागरण,मुस्लिम पुनर्जागरण अथवा सिख पुनर्जागरण आदि की विभाजकताओं को जन्‍म देते हुए हिन्‍दू ,मुस्लिम आदि की विशेषीकृत लाक्षणिकताओं को पृथकतावादी विशिष्‍ठताओं में परिभाषित करने की विचारधारात्‍मक सामग्री प्रदान करता थ। ... राष्‍ट्रीय आंदोलन का इतिहास हमारे समय के धीरे-धीरे किन्‍तु दृढ रूप से सामप्रदायिक होने का इतिहास भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1803 में पैगंबर और इलहाम जैसी अतार्किक बातों का तीखा निषेध करने वाले राज राममोहन राय 1815 में हिन्‍दू धर्म की सर्वोत्‍कृष्‍ठता सिदध करने में लग जाते हैं। और वेद उनके लिए आपौरूषेय हो जाते हैं। ईश्‍वरचंद विदयासागर भी विधवा विवाह के पक्ष में लेखनी तब उठाते हैं जब उन्‍हें इसके लिए शास्‍त्रों में प्रमाण मिल जाते हैं। विवेकानंद भी रामकृष्‍ण के सार्वभौम को उलटकर हिन्‍दू सार्वभौम कर डालते हैं। मुसलमानों का काल विवेकानंद,राममोहन राय और बंकिमचंद्र के लिए समान रूप से अंधकार का युग हो जाता है। वे भूल जाते हैं कि जब तुलसीदास रामराज्‍य का संकल्‍प पेश कर रहे थे अकबर संत कवियों की वाणियों की पृष्‍ठभूमि में दीन-ए-इलाही का विचार पेश कर रहा था। संतों की तरह दीन ने धर्म के संस्‍थाबदध स्‍व्‍रूप को एक सिरे से नकार दिया था। अपने ग्रंथ तबकाते शाहजहांनी में मुहम्‍मद सादिक अकबर पर आरोप लगाते लिखता है -... अंतिम दौर में अकबर बादशाह मत इस्‍लाम के मार्ग से हट गया और उसने सब हिस्‍सों से रहस्‍यवादियों और धर्मवेत्‍ताओं को बुलवाया और दंड दिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कार्ल मार्क्‍स से लेकर इतिहासकार एच.एच.विल्‍सन तक सभी अंग्रेजों दवारा देशी उदयोग को तबाह कर करोडों भारतीय बुनकरों की रोजी छीनने को बडे अन्‍याय के रूप में माना है। डॉ.सिंह लिखते हैं- औपनिवेशिक दखल से पहले जातिगत भेदभाव के बावजूद भारत का जन सामान्‍य किन्‍हीं विशेषीकृत धार्मिक पृथकताओं से एकदम अनभिज्ञ रहा है।... ...1857 का स्‍वतंत्रता संग्राम, कूका आंदोलन, गदरी बाबों का विद्रोह,जालियांवाला बाग कांड... में जन सामान्‍य की शमूलियत के तहत धर्मनिरपेक्षता का तत्‍व विदयमान रहा है। मुगल सत्‍ता की टूटन को वे सत्‍ता का विखंडन मानते हैं, न कि बिखराव। आगे विल्‍फ्रेड स्मिथ, राइजनर व के.एम.अशरफ दवारा जाटों ,सतनामियों सिखों व मराठों के विद्रोह में सामंत विरोधी किसान तत्‍व की उपस्थिति दर्शाने की ओर भी वे ध्‍यान दिलाते हैं। इस संदर्भ में आज के दौर के भूमंडलीकरण की नई उपनिवेशवादी जकडबंदी ,नवब्राहमणवाद के पुनर्गठन के तहत, पहले से भी अधिक क्रूर अमानवी और असंवेदनशील सिदध हो रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डॉ.सिंह का निष्‍कर्ष है कि – भारत की सामंतीय, औपनिवेशिक ,नवउपनिवेशिक  सत्‍ताओं के लिए एक सांस्‍कृतिक उपस्‍कर के रूप में ब्रहमणवादी विचारधारा सबसे कारगर और निर्णायक सिदध हुयी है। बौदधों ,लोकायतों के लंबे अंतराल के बाद केवल तुर्क काल ऐसा कालखंड है जब कबीरआदि संतों ने सचेत रूपा से इस विचारधारा के विरूदध प्रतिरोध की परंपरा को नये सिरे से एक सैदधांतिक आधार प्रदान किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस नवउपनिवेशवादी सत्‍ता और वेदांत के गठजोड का हालिया नमूना देखना हो तो हम गुजरात के बाद सत्‍ता के दूसरे रोल मॉडल बनते बिहार में चल रहे विमर्शों को देख सकते हैं। इस सत्‍ता के पैरोकार अंग्रेजी के लोकप्रिय लेखक चेतनभगत बिहार आकर सुशासन पुरूषों की पीठ थपथपाते कहते हैं कि कहीं का विकास देखना हो तो आप वहां आधी रात को हवाई जहाज से पहुंचें और हवाई अडडे पर झिलमिलाती रोशनियों के आधार पर आकलन करें कि चमक कितनी बढी है। दूसरी ओर इस सुशासन में सड और सूख रही गंगा के तट पर वेदांतियों दवारा आरंभ की गयी गंगा आरती के तुमुल नाद का आकलन कर सकते हैं। इस तरह यह दूसरा उलूक विकास भी रात्रि में ही दृष्टिगोचर होने वाला है। पटना स्‍टेशन पर नवनिर्मित बौदध स्‍तूप की चमक-दमक भी रात में ही ज्‍यादा दीखती है पर इसकी दीवार के दूसरी ओर स्थित टैंपो स्‍टैंड  पर अगर आप रात में उतरें आपका हर कदम कीचड और मूत्रगंगा में ही पडेगा। पर उधर वाले इधर कदम डालेंगे ही क्‍यों , स्‍तूप के गर्भगृह में निश्चिंत हो विकास की शवसाधना कर सकते हैं वे।___समाप्‍त&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/301554459270010767-1996177444213334916?l=chitrahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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तो दूसरी गलती के रूप में युवा प्रेमियों में सेक्स के लिए बेताबी के रूप में युवा प्रेमियों में सेक्स के लिए बेताबी से पैदा मुश्किलातों को देखा गया है तीसरी गलती में समय पर एक जरूरी फैसला ना ले पाने से हुई जीवन की हानि को दिखाया जाता है।&lt;br /&gt;युवा मनोविज्ञान की अच्छी समझ है चेतन को, जो संवादों में अपनी बारीकी के साथ अभिव्यक्त होता है। 21वीं सदी का निम्न मध्यवर्गीय युवा किन कठिनाइयों से रोज दो-चार होता है और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कैसी-कैसी हिकमतें आजमाता है और जब उसकी गाडी जरा-सी लाइन पर आती दिखती है कि व्यवस्थाजन्य उत्पात कैसे उसे मरनांतक पीड़ा पहुँचाते हुए नष्ट कर देते हैं। इसका उदाहरण है ओमी-ईशान-गोविन्द की तिकड़ी और विद्या एक चौथा कोण है,जीवन की जिदों के प्रतीक-सी वह जिन्दा रंग भरती है उपन्यास के वीरान सफों में और सबसे ऊपर है क्रिकेटर अली। &lt;br /&gt;भारतीय मानस के हिसाब से चेतन ने सही नाम दिया है उपन्यास को, थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ। पर इसका नाम क्रिकेटर अली भी रखा जा सकता था। बारह साल के इस बच्चे की नीली आँखें जहाँ से इस उपन्यास में चमकनी शुरू होती हैं वहाँ से सारी कथा पीछे छूट जाती है ओर कहानी का एकमात्रा लक्ष्य रह जाता है,इस नन्हे अली को महान् क्रिकेटर बनाने की कथा नायकों की समवेत इच्छा और उनकी अविराम कोशिशें जिसे दंगे की घृणित आग भी जला नहीं पाती। हो क्यों नहीं, अली तो अली है,एक निर्णयक मकाम पर जब अली से अस्ट्रेलिया की नागरिकता स्वीकारने की बाबत पूछा जाता है तो वह साफ इनकार करता हुआ कहता है कि सौ जन्म बाद भी वह एक भारतीय क्रिकेटर के रूप में ही जीवित रहना पसन्द करेगा।&lt;br /&gt;अली चेतन का आदर्श चरित्रा है? इस चरित्रा के अंकन में चेतन उस अंधता तक जाते हैं जिस तक कोई भी आदर्शवादी लेखक अपनी सच्ची जिद में जा पहुँचता है,इसीलिए यह सम्भव हो पाता है कि अली सा मात्र बारह-तेरह साल का लड़का देशभक्ति का जज्बा जिस तरह दर्शाता है वह सामान्य नहीं लगता। इस तरह का जज्बा उपन्यास के अन्य चरित्रों पर फबता। पर देशभक्ति के आदर्श की यही सीमा भी होती है कि अक्सर वह कच्चे दिमागों में अपनी जडें जमाता है और देश को जनसमूह के रूप में देखने की बजाय एक ईकाई के रूप में देखने लगता है,जैसे एक व्यक्ति के महान् क्रिकेटर बनने में ही जैसे मुल्क का भविष्य छिपा हो। इस तरह देखें तो इस उपन्यास का सबसे प्रभावी हिस्सा छोटी उम्र की कोरी भावुकता को ही तरजीह देता है,जैसे कि बाकी तीन समस्याग्रस्त युवकों का भविष्य यह कोरी भावुक जिद ही तय कर देगी? क्योंकि असली भारत चेतन के ये तीन युवा ही बनाते हैं,और अली चाहे जितने छक्के लगा ले वह इस युवा वर्ग को उनके  संकटों के पार नहीं ले जा सकता। इस तरह यह उपन्यास उसी मानसिकता को विज्ञाप्ति करता है जिसे रोज ब रोज के हमारे समाचार पत्रा व चैनल करते हैं जो क्रिकेट को दो देशों की बीच एक जंग के रूप में प्रचारित करते हैंµऔर इस तरह एक नकली जंग में पूरे मुल्क को  मुिब्तला रखकर युवा वर्ग को उसके अपने संकटों को दूर करने के सही प्रयासों से भटकाता है।&lt;br /&gt;इन तथ्यों के आलोक में देखें तो लगता है जैसे चेतन एक उपन्यास को बेस्टसेलर बनाने के तमाम गुरों का इस्तेमाल एक ही उपन्यास में कर जाते हैं, व्यवसायी वर्ग,दंगा-क्रिकेट-राष्ट्रवादी और सेकुलर पार्टियों के झगडे,प्रेम व  सेक्स के अंतरंग दृश्य, कुल मिलाकर चेतन भारतीय बेस्ट सेलर्स गुलशन नंदा से लेकर  धर्मवीर भारती तक ऐसे लेखकों को काफी पीछे छोड़ देते हैं? हिन्दी के उपन्यासों के बरक्स देखा जाए तो वे गुनाहों का देवता और मुझे चांद चाहिए के मध्य जगह बनाते दिखते हैं। हालाँकि विवरण की बारीकियां चेतन को इन दोनों से अलग पहचान देती हैं पर जहां तक जीवन दृष्टि का सवाल है वह मुझे चांद चाहिए में ज्यादा समर्थ ढंग से अभिव्यक्त होती है। &lt;br /&gt;चेतन के इस उपन्यास पर फिल्म बनने जा रही है। उपन्यास का अन्तिम हिस्सा एक फिल्म की तरह तेजी से घटता है। उसमें कल्पना का प्रयोग अविश्वसनीयता की हद तक किया जाता है। दंगाई भीड़ से जिस तरह तीनों युवा निपटते हैं वह विश्वसनीय नहीं बन पाया है। पर फिल्मों में कुछ भी संभव होता है। इस तरह चेतन उपन्यास के अंत में पटकथा लिखने लगते है। शायद व्यवसायी दिमाग की उपज है यह। अन्त में अली के शाट्स से जिस तरह मुख्य दंगाई मारा जाता है वह उपन्यासकार की व्यवसाय की प्रतिभा का प्रमाण है। चेतन के उपन्यास इस तरह हिन्दी को एक नया पाठक वर्ग भी देंगे। जैसा कि सभी लोकप्रिय रचनाकार देते हैं। उनकी तीनों  पुस्तकों के हिन्दी में अनुवाद हो भी चुके हैं? यूँ हिन्दी के युवा रचनाकार चेतन से बहुत-सी बातें सीख सकते हैं,खासकर अपने परिवेश को व अन्तर्मन की बुनावट को अभिव्यक्त करने की उनकी कला?&lt;br /&gt;उपन्यास का केन्द्रीय पात्रा अली हाईपर-रिपलैक्स नामक एक मनोरोग से ग्रस्त है और चिकित्सकों का मानना है कि इस बीमारी की वजह से ही अली एक ओवर की शुरू की चार गेंदों पर लगातार छक्के मारने का करतब दिखा पाता है। मनोरोग के साथ जीवन में आगे बढ़ाने की कला भी अली से सीखी जा सकती है। रिपलैक्स एक्शन में दिमाग सोचने की शक्ति और क्रिया को खत्म कर देता है। वह केवल बचाव कर सकता है...इसलिए प्रतिउत्तर का समय बहुत तेज होता है। इस क्षमता का प्रयोग कर अली बॉल की तेजी की पहचान कर उतनी ही तेजी से जवाब दे पाता है?&lt;br /&gt;अपनी कमजोरियों को सकारात्मक तरीके से जानकर उनका सही उपयोग करने की कला ही जीवन की कला है। अली के चरित्रा के द्वारा चेतन इसी बात को सामने रखते हैं। उपन्यास के अन्त में अली की इसी क्षमता का चमत्कारिक ढंग से प्रयोग कराकर उपन्यासकार अपनी कहानी को एक सुखद अन्त की ओर ले जा पाता है।&lt;br /&gt;प्यार के निहिताथों को भी चेतन सही ढंग से पहचानते हैं। कि प्यार साधारण जीवन स्थितियों को भी अपने सहज स्पर्श से असाधारण बना देता है। विद्या और गोविन्द के प्रेम प्रसंग इसे उचित ढंग से अभिव्यक्त कर पाते हैं। गोविन्द जब आस्ट्रेलिया जाता है तो वहाँ फोन कर पूछता है कि उसे गिफ्ट के रूप में क्या चाहिए,गोविन्द की गरीबी का ध्यान है विद्या को, सो वह कहती है कि वह समुन्दर किनारे की रेत लेता आए थोड़ी-सी। गोविन्द माचिस में रेत डालकर भारत लाता है तो उसे प्रेम से उटकेरती विद्या देखती है कि रेत में सीपी है एक। फिर वह कहती है,यह ठीक है क्योंकि जीवन के सबसे बेहतरीन तोहफे मुफ्त हैं।&lt;br /&gt;यहाँ महत्त्वपूर्ण बस यह है कि एक ओर जहाँ चेतन प्रेम जैसे बहुआयामी ध्वनि वाले शब्द को उसकी ताकत के साथ अभिव्यक्त कर बाजारवाद से जूझते दिखते हैं वहीं विद्या,गोविन्द के प्रणय के अतिरिक्त दृश्य यह साबित करते हैं कि वे सतर्कता से बाजार के नुस्खों का ध्यान रखते हैं? क्योंकि पढ़ाई के वक्त प्रेमी शिक्षक और छात्रा जिस कदर यौन क्रिया में मशगूल दिखाए जाते हैं वह सहज नहीं है। और इसके परिणाम भी सही नहीं आते इसे चेतन दूसरी गलती के रूप देखते भी हैं। पर मुझे लगता है यह उपन्यासकार की एकमात्रा गलती है कि वह उपन्यास को फामूर्लाबाजी की हदों में जाने से नहीं बचा पाते। उपन्यास के अन्त में दंगे के दृश्यों को फिल्मी बनाते से चेतन यह गलती दुहराते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/301554459270010767-7132628679222859970?l=chitrahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4H5yxbsBFHukKLwaN7SOXSpmYaY/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4H5yxbsBFHukKLwaN7SOXSpmYaY/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/tbJp/~3/bbLTp1hoSjk/blog-post.html" title="चेतन भगत - बेस्‍टसेलर बनाने के नुस्‍खे" /><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="25" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SXcUJCmdwQI/AAAAAAAAA3U/nNNtpzxT95E/s72-c/JZSCASQCONCCAWBMKNACA0FAACJCARU33DECAMOWERECAV886U7CA95OF0ACAU6D8BMCAKBFSB3CAPV1BUVCARVRI03CAOLT2W2CAV8GVCXCARAO6CPCAH0T8KECA6V8YDLCAMD75QJCAXONOJA.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://chitrahindi.blogspot.com/2009/01/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkAHQ34_cSp7ImA9WxRUF0s.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-301554459270010767.post-8710016029717043804</id><published>2008-11-26T22:48:00.000-08:00</published><updated>2008-11-26T22:52:12.049-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-26T22:52:12.049-08:00</app:edited><title>संयोगों की सत्‍ता ईश्‍वरीय सत्‍ता का निषेध करती है - कुमार मुकुल</title><content type="html">'पूरा सच कभी किसी एक के हिस्‍से नहीं पड़ता'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SJ5wxVbXC_I/AAAAAAAAAhw/aT1PQoXYR4w/s1600-h/200px-Stephen_Hawking_StarChild.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SJ5wxVbXC_I/AAAAAAAAAhw/aT1PQoXYR4w/s200/200px-Stephen_Hawking_StarChild.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5232743809918897138" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SJ5wpg9JpaI/AAAAAAAAAho/r4pcQDtVgtY/s1600-h/2472samaya_kaa_sanshiptya_etihas.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SJ5wpg9JpaI/AAAAAAAAAho/r4pcQDtVgtY/s200/2472samaya_kaa_sanshiptya_etihas.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5232743675574461858" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्‍टीफेन हाकिंग को पढते हुए लगता है कि पूरा सच कभी किसी एक के हिस्‍से नहीं पड़ता। अरस्‍तू से हाकिंग तक सब थोड़ा-थोड़ा बता पाते हैं। हां हाकिंग के पास पिछले अनुभवों को जोड़ने की सुविधा थी जो अरस्‍तू के पास सबसे कम थी। पर किसी आधुनिक वैज्ञानिक ने नहीं दार्शनिक अरस्‍तू ने पहली बार बतलाया था कि धरती चपटी नहीं गोल है पर उन्‍होंने यह गलत अनुमान भी लगाया था कि पृथ्‍वी स्थिर है और सूरज-चांद-तारे उसका चक्‍कर लगाते हैं। &lt;br /&gt;धर्मसत्‍ता के विरूद्ध सबसे बड़ी और समझदारी भरी क्रांतिकारी स्‍थापनाएं वैज्ञानिकों ने की। धर्म हमेशा विज्ञान को ब्रह्मांड संबंधी उतनी ही जानकारी देने की छूट देता था जिससे उसके आकाशी स्‍वर्ग-नरक की परिभाषा अक्षुण्‍ण रहे। चर्च की कड़ी निगाह हमेशा विज्ञान को अनुशासित रखने की फिराक मे रहती थी। &lt;br /&gt;सूर्य के चारों ओर बाकी ग्रहों के घूमने की बात भी किसी वैज्ञानिक ने नहीं पहली बार एक पुरोहित निकोलस कॉपरनिकस ने 1514 में की थी। पर अपने ही चर्च के भय से उसने यह बात गुमनाम प्रसारित की और इस सच्‍चाई तक पहुंचने में दुनिया को और सौ साल लग गए। 1609 में गैलीलियो ने कॉपरनिकस की बातों पर सहमति जाहिर की। गैलीलियो की बातों को योरप में समर्थन भी मिला पर पर चर्च के भय से आस्‍थावान गैलीलियों ने कॉपरनिकस के विचारों से खुद को दूर कर लिया। हाकिंग की यह पुस्‍तक समय का संक्षिप्‍त इतिहास इन संघर्षों का इतिहास सा है। और करीब-करीब गैलीलियों की तरह वे ईश्‍वर की अवधारणा को नकारते हुए हुए भी कहीं-कहीं उसे गोल-मोल ढंग से स्‍वीकारते भी दिखते हैं। अब यह समय पर है कि वह उनके छुपाने को किस तरह दिखाता है।&lt;br /&gt;न्‍यूटन और सेव की कहानी पर संदेह करते हुए हाकिंग लिखते हैं कि जब न्‍यूटन चिंतनशील थे तो सेव के गिरने ने उनकी समस्‍या का हल निकाला। हाकिंग ने उनके गुरूत्‍वबल सिद्धांत के अंतरविरोधों पर भी उंगली रखी है कि यह विचार न्‍यूटन के भीतर भी उठा था कि अगर ब्रह्मांड में गुरूत्‍वबल समान है तो तारों को भी एक दूसरे को आकर्षित करना चाहिए था पर ऐसे में तारे स्थिर क्‍योंकर हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कोई भी भौतिक सिद्धांत एक अस्‍थायी परिकल्‍पना होता है'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्‍टीफेन हाकिंग का कहना है कि हमने कभी इस बाबत नहीं सोचा कि ब्रह्मांड फैल रहा है या सिकुड़ रहा है...। ऐसा ब्रह्मांड के बारे में शाश्‍वत आध्‍यात्मिक धारणा के कारण हुआ। हाकिंग ब्रह्मांड के फैलने संबंधी बीसवीं सदी की धारणा को एक क्रांतिकारी स्‍थापना मानते हैं और उस पर एक अध्‍याय ही लिख डालते हैं। &lt;br /&gt;हाकिंग को पढ़ते हुए एक मजेदार बात पहली बार सामने आती है कि विज्ञान के विकास में अगर धर्म हमेशा अवरोध की तरह आया तो दैवीर हस्‍तक्षेप की गंध को पसंद नहीं करने जैसे कारकों ने भी विवेचकों केा गलत निष्‍कर्ष पर पहुंचाया।&lt;br /&gt;जैसे अरस्‍तू ने दैवी हस्‍तक्षेप को पसंद ना करने के कारण बह्मांड की उत्‍पत्ति के विचार को ही खारिज कर दिया। उन्‍होंने माना कि संसार सदा से है और सदा रहेगा। यह प्रलय की दैवी अवधारणा के विरूद्ध था और अवैज्ञानिक भी। जबकि प्रलय-पुनर्जन्‍म की अवधारणा खुद काल्‍पनिक और अवैज्ञानिक है।&lt;br /&gt;1929 की एडविन हब्‍बल की इस खोज ने कि आकाशगंगा हमेशा हमसे दूर जा रही है ने साबित किया कि ब्रह्मांड का विस्‍तार हो रहा है। मतलब कभी यह ब्रह्मांड केंद्रित और सिमटा था। यह शुरूआत लगभग दस या बीस हजार साल पहले हुई थी। इससे यह बात सामने आई कि जब ब्रह्मांड केंद्रित था उसी समय महाविस्‍फोट नाम से एक समय था। वहीं से समय का आरंभ माना जा सकता है क्‍योंकि वहीं से ब्रह्मांड का विस्‍तार आरंभ होता है।&lt;br /&gt;ब्रह्मांड के विस्‍तार पर ही हाकिंग स्रष्‍टा या ईश्‍वर के अस्तित्‍व पर सवाल उठाते हैं कि माना कि ब्रह्मांड का कोई स्रष्‍टा हो पर चूंकि ब्रह्मांड लगातार फैल रहाहै तो कहां किस बिंदू पर उसके काम को पूरा हुआ माना जाए...। स्रष्‍टा के साथ विज्ञान की भी सीमा बताते हाकिंग कहते हैं कि - इसका अस्तित्‍व केवल हमारे मस्तिष्‍क में होता है। उनके अनुसार कोई भी वैज्ञानिक सिद्धांत श्रेणियों के प्रेक्षणों के सही आकलन पर निर्भर करता है और उसमें स्‍वेच्‍छाचारिता जितनी ही कम होगी वह उतना ही वैज्ञानिक होगा। दूसरे कि वह सिद्धांत भविष्‍य की कहां तक निश्चित भविष्‍यवाणी करता है इस पर उसकी आयु निर्भर करती है। वे बतलाते हैं कि कोई भी भौतिक सिद्धांत एक अस्‍थायी परिकल्‍पना होता है जिसे कभी सिद्ध नहीं किया जा सकता। किसी भी मान्‍य सिद्धांत के आधार पर की गई भविष्‍यवाणियां जब-तक सही साबित होती हैं उसकी वैज्ञानिकता बरकरार रहती है पर अगर कभी एक भी नया प्रेक्षण उसके प्रतिकूल पड़ता है तो हमें वह सिद्धांत त्‍यागना पड़ता है। हां प्रेक्षक की क्षमता पर भी हम सदा सवाल उठा सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्मांड के बारे में कोई एक तय सिद्धांत नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाकिंग स्‍वीकारते हैं कि ब्रह्मांड के बारे में कोई एक तय सिद्धांत बनाना कठिन है। इसलिए हम उसका खंड-खंड ही अध्‍ययन कर पाते हैं। हालांकि विज्ञान का यह तरीका एकदम गलत है पर अब-तक की सारी वैज्ञानिक प्रगति इसी तरीके से संभव हुई है। वे कहते हैं कि व्‍यवहार में अधिकांश नया अभिकल्पित सिद्धांत किसी पूर्व सिद्धांत का विस्‍तार होता है। दरअसल समय का संक्षिप्‍त‍ि इतिहास लिखते समय उन्‍होंने विज्ञान का इतिहास भी लिख डाला है और इस रूढि को तोड़ा है कि वैज्ञानिक खोज व्‍यक्ति के निजी प्रयासों और सनकभरी खोजों का परिणाम मात्र होते हैं। वे स्‍थापित करते हैं कि विज्ञान निजी प्रयासों और सनकभरी खोजों का नहीं , खंड-खंड में ही पर एक दूसरे से जुड़े और पूरक प्रयासों का नतीजा होता है। &lt;br /&gt;इतिहास और दर्शन की तरह विज्ञान की भी रूढियां होती हैं। जो नयी खोजों से टूटती रहती हैं। हाकिंग ने पहली बार विज्ञान को मनुष्‍य की जिज्ञासा और उसके दर्शन , इतिहास संबंधी अभिरूचियों से जोड़ा है। इससे पहले आइंस्‍टाइन ने भी ऐसा किया था। आइंस्‍टाइन ने समाजवाद और गांधीवाद पर भी अपना दृष्टिकोण जाहिर किया था। इस तरह हाकिंग विज्ञान के इतिहास में आइंस्‍टीन की अगली कड़ी हैं। इस तरह हाकिंग विज्ञान की उस धारा को आगे बढाते हैं जो विज्ञान को सनक से जोड़कर धर्म को उसकी राह में अवरोध खड़ा करने की छूट नहीं देता है। आइंस्‍टीन के विरूद्ध उनके समय में सौ लेखकों ने मिलकर एक किताब लिखी थी , जिसके बारे में आइंस्‍टीन का जवाब था कि - यदि मैं गलत होता तो मेरे लिए एक ही काफी होता।&lt;br /&gt;हाकिंग ने अपनी पुस्‍तक में उपसंहार के बाद आइंस्‍टाइन, गैलीलियों, न्‍यूटन आदि की अति संक्षिप्‍त और रोचक चर्चा भी की है। ये तीनों अलग-अलग विज्ञान की तीन धाराओं का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। तीनों में गैलीलियो जहां धर्मभीरू हैं न्‍यूटन तानाशाह हैं तो वहीं आइंस्‍टाइन खरी बोलने वाले हैं। हाकिंग न्‍यूटन के प्रति एक हद तक अपनी नापसंदगी भी दिखलाते हैं। न्‍यूटन की तानाशाही को बाद में एक सनक के रूप में प्रचारित किया गया। &lt;br /&gt;मीडिया में हाकिंग की चर्चा उनकी विकलांगता और कंम्‍पयूटर के चमत्‍कारों को लेकर है जो उनसे चिपका है। उनकी चेतना की चर्चा कम हाती है जो हाकिंग को हाकिंग बनाती है। यह हमारी मानसिक विकलांगता भी है कि हम कोई भी चर्चा चमत्‍कारों और उनकी दयनीयता से अलग हटकर नहीं कर पाते। क्‍येांकि चमत्‍कारेां को कभी भी दैवीय एंगल दिया जा सकता है और चूं-चूं करती दया भी इसमें सहायक होती है। जबकि हाकिंग पहली बार विज्ञान को ऐतिहासिक और सुसंब्‍द्धता प्रदान कर धर्म के विरूद्ध विज्ञान की पिछली चुनौतियों को तीखा करते हुए उसे एक सुचिंतित आधार प्रदान करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;योग्‍यता वस्‍तुत: वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन जगत के सवालों को हम कहां तक हल कर सकते हैं का जवाब देते हुए हाकिंग अपना जवाब डार्विन के प्राकृतिक चयन पर आधारित करते हुए उस आगे बढाते हैं। डार्विन का कहना है कि - जीवन की विभिन्‍नताएं जाहिर करती हैं कि कुछ लोग:प्रजाति अन्‍य से ज्‍यादा योग्‍य है। इस योग्‍यता को पहले ताकत के रूप में देखा जाता था इसलिए इसे - वीर भोग्‍या वसुंधरा - कहा जाता था और इसे आलोचित भी किया जाता था। पर हाकिंग ने यह कहकर इसे आगे बढाया कि - योग्‍यता वस्‍तुत: वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना है। इस तरह जो मानव समूह वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाता गया वह उत्‍तरजीवितता के इस संघर्ष में आगे बढा। यहां पर वे विज्ञान की ध्‍वंसात्‍मक शक्ति की ओर भी ईशारा करते हैं। और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को गलत तरीके से लागू करने से ब्रह्मांड के मनुष्‍यों-जीवों सहित विनाश की संभावना से भी इनकार नहीं करते। दरअसल ऐसा कहते हुए वे विज्ञान के रूढि बनने की ईशारा करते हुए उससे बचने की बात करते हैं।&lt;br /&gt;डार्विन को खारिज करते हुए हिन्‍दी के कवि निराला लिखते हैं- योग्‍य जन जीता है , पश्चिम की उक्ति नहीं गीता है गीता है। हाकिंग के हिसाब से ऐसी रूढियां खतरनाक हो सकती हैं। गीता में विज्ञान रहा होगा पर आज अगर विज्ञान विकास के नये सोपान पर जा चुका है तो चाहे वह पश्चिम में हो या पूरब में हमें गीता काल के विज्ञान पर नहीं अटके रहना चाहिए। वर्ना हम नष्‍ट हो जाएंगे।&lt;br /&gt;हाकिंग की किताब अंतरद्वंद्वों को जबरदस्‍त ढंग से उभारती है पर पाठक पर अपना कोई मत थोपने से भी बचती है। उसे वह अपना पक्ष चुनने की स्‍वतंत्रता देती है। वह पक्षों के खतरे से भी उन्‍हें अवगत कराती चलती है। वे इस जिज्ञासा को बल प्रदान करती चलती हैं कि हम कभी ना कभी जीवन-जगत के प्रश्‍नों का हल तलाश कर लेंगे। पर वह काल कल आएगा या कई प्रकाश वर्ष दूर होगा इसकी घोषणा से भी बचते हैं। जैसे जीनोम की खोज पर कुछ लोग बवेला मचा रहे हैं कि अब दुनिया से जैसे गैरबराबरी मिट जाएगी। चूंकि सबकी जैविक बनावट निकट की है , पर हमें गैरबराबरी जमीन पर मिटानी होगी , खोजों से बराबरी साबित कर देने से बराबरी नहीं आने वाली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संयोगों की सत्‍ता ईश्‍वरीय सत्‍ता का निषेध करती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाकिंग संयोगों की सत्‍ता पर विशेष जोर देते हैं। इस सत्‍ता को पुष्‍ट करने वाले‍ विज्ञान के क्‍वांटम सिद्धांत और अनिश्चितता के सिद्धांत को वह विश्‍व की आधारभूत संपत्ति मानते हैं। अनिश्चितता का सिद्धांत बीसवीं सदी के जर्मन वैज्ञानिक वर्नर हाइजेनवर्ग की खोजों पर टिका है। उनकी खोजों का आधार यह है कि - किसी भी कण के वेग और उसकी स्थिति को आप एक साथ शुद्ध-शुद्ध नहीं नाप सकते। और अगर एक कण की स्थिति को आप नहीं नाप सकते तो ब्रह्मांड का आकलन ठीक-ठीक कैसे किया जा सकता है। आइंस्‍टाइन ने भी क्‍वांटम के सिद्धांत में सापेक्षता का सिद्धांत जोड़ और इसके लिए ही उन्‍हें नोबेल से नवाजा गया था। यूं आइंस्‍टाइन नहीं स्‍वीकार सके कि ब्रह्मांड संयोगों से नियंत्रित होता है,इसीलिए आइंस्‍टाइन का सिद्धंत परंपरिक कहलाया। &lt;br /&gt;दरअसल संयोगों की सत्‍ता ईश्‍वरीय सत्‍ता का निषेध करती है। जहां सब-कुछ ईश्‍वर की मर्जी से पहले से तय होता है। आइंस्‍टाइन का प्रसिद्ध कथन है- ईश्‍वर पासा नहीं फेंकता।&lt;br /&gt;ज‍बकि हाइजेनवर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत इस पर निर्भर है कि कण कुछ हद तक तरंगों की तरह व्‍यवहार करते हैं,उनकी कोई निश्चित स्थिति नहीं होती।&lt;br /&gt;अधिकांश वैज्ञानिक अक्‍सर अपने पिछले आकलनों को ही आगे नकारने लगते हैं। हाकिंग से आइंस्‍टाइन तक सबका यही हाल है और यह भैतिक विज्ञान की प्रामाणिकता पर एक प्रश्‍न चिन्‍ह है। एक तरफ न्‍यूटन जैसे वैज्ञानिक हैं जो अपने विपरीत पड़ने वाले किसी भी शोध और शोधक को आगे आने से रोकने में सारी ताकत लगा देते हैं। उनके लिए अपना सच अंतिम होता है दूसरी ओर हाकिंग और आइंस्‍टाइन जैसे ढुल-मुल लोग हैं। &lt;br /&gt;कृष्‍णविवर काले नहीं श्‍वेत तप्‍त होते हैं। जो कृष्‍णविवर जितना छोटा होता है वह उतना ही ज्‍यादा चमकता है और उनका पता लगाना आसान होता है। हाकिंग का कहना है कि एक छोटा कृष्‍णविवर पृथ्‍वी के पास होतो उसके सामने एक विशाल द्रव्‍यराशि को रखकर कृष्‍णविवर को धरती पर उसी तरह खींचा जा सकता है जैसे एक गदहे को गाजर दिखाकर। और उसे पृथ्‍वी के चारेां ओर की कक्षा में स्‍थापित किया जा सकता है। पर आगे हाकिंग अपनी इस कल्‍पना या परिकल्‍पना को खुद अव्‍यावहारिक बताते हैं और कहते हैं कि अपनी आयु पूरी करने पर कृष्‍ण विवरों का विस्‍फोट होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टिप्‍पणियां-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिनेशराय द्विवेदी ने कहा… &lt;br /&gt;तारे क्या चीज हैं। कुछ भी स्थिर नहीं है। स्थिर हो तो काल जई नहीं हो जाएगा। जो आज तक कोई नहीं हुआ।&lt;br /&gt;June 23, 2008 2:41 AM&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;pallavi trivedi ने कहा… &lt;br /&gt;ham to aaj tak kauparnikas ko scientist hi samajhte aaye the..pahli baar pata chala ki wah ek purohit tha!&lt;br /&gt;June 23, 2008 5:09 AM&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Udan Tashtari ने कहा… &lt;br /&gt;पूरा सच समझने के लिए अगले भाग का इन्तजार कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिनेशराय द्विवेदी ने कहा… &lt;br /&gt;बहुत दिलचस्प पुस्तक है। कोई दस वर्ष पहले पढ़ी। फिर मेरी प्रति कोई पढ़ने को ले गया लौट कर आज तक नहीं आई। विश्वोत्पत्ति के सिद्धान्त ही हो सकते हैं। नियम नहीं, और सिद्धान्त होंगे तो अनेक होंगे। &lt;br /&gt;हॉकिन्स ने यह भी कहा है कि पहले वैज्ञानिकों को आगे बढ़ने के लिए दार्शनिक रास्ता सुझाते थे। वैज्ञानिक उन की अवधारणाओं को पुष्ट या खारिज करते थे। लेकिन अब लगता है दार्शनिक चुक गए हैं और विज्ञान को आगे का मार्ग स्वयं तलाशना पड़ रहा है। &lt;br /&gt;आप लिखिए। इस पुस्तक के बारे में लिखा जाना और पढ़ा जाना जरूरी है। वैसे अंग्रेजी में यह ई-पुस्तक के रूप में उपलब्ध है। मेरे पास उस की एक प्रति सुरक्षित है।&lt;br /&gt;August 9, 2008 10:10 PM&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्मुक्त ने कहा… &lt;br /&gt;मैंने यह पुस्तक अंग्रेजी में पढ़ी है। हिन्दी में भी प्रकाशित हो गयी जानकर अच्छा लगा।&lt;br /&gt;पर यह उतनी पसन्द नहीं आयी जितना इसका नाम है।&lt;br /&gt;August 10, 2008 1:17 AM&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संगीता पुरी ने कहा… &lt;br /&gt;जब से पंडितों, पुरोहितों ने परंपरागत व्यवसाय के रूप में धर्म और ज्ञान को स्थान दे दिया ,स्थिति विकट होती चली गयी। वैज्ञानिकों का काम बढ़ता चला गया।&lt;br /&gt;August 10, 2008 1:33 AM&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Umesh ने कहा… &lt;br /&gt;जितना हम जानते है, उससे अनंत गुणा ऐसा है जो हम नही जानते । स्टीफन हाकिंगस की पुस्तक मे बहुत सी बातें दिमाग के उपर से निकल जाती है । हम खुद को बुद्धीजीवी दिखाने के लिए भी ईस प्रकार की पुस्तकों की प्रशंसा करते है । नेपाली मे एक पुस्तक पढी थी, " माया तथा लिला ", यह पुस्तक बेजोड है । वेदांत तथा क्वांटम थ्योरी के साम्य तथा ब्रहमाण्ड उत्पती के सिद्ध्न्तो पर से बखुबी से पर्दा उठाने का प्रयास करती है यह पुस्तक । लेखक का नाम शायद अरुण कु सुबेदी है ।&lt;br /&gt;August 10, 2008 6:49 AM&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हकीम जी ने कहा… &lt;br /&gt;हॉकिन्स के विचारों की मैं बहुत कद्र करता हूँ ..पुस्तक में लेखक भी अपनी ही बात पर अडा होना चाह रहा है ..&lt;br /&gt;ब्रह्माण्ड की उत्पत्ती कैसे हुई .. इस विषय पर दुनीया में कई सिद्धांत विभिन्न कालो में प्रतिपादित होते रहे . कई प्राचीन सिद्धांतो कों नवीन रूप दिया गया तो कई प्राचीन सिन्द्धान्तो का निरूपण किया गया ..बफ़्फन कांट , चैम्बरलैंड, मोलटन, जींस ,जेफ्रीज, नॉर्मन, हेनरी,रोजगन, शिमन्ड,वेज्सेकर और भी ना जाने कीतने ही विद्वानों ने समय समय पर ब्रामांड के बारे में जानने की कोशीश की ,, .. मुआफ करना दोस्त अब जो मैं बात कहने जा रहा हूँ शायद वो आपके दील के संवेदनशील भाग से गुजरे...हिन्दुस्तान में कभी भी हमने धर्म से अलग होकर नहीं सोचा तर्क की कसौटी भारत में बेअसर है ..और ना ही हम लोगो ने दर्शन और इतिहास से बहार नीकल कर सोचा ..एक इतिहास कार या दार्शनिक ब्रामांड के बारे में क्या बता सकता है सिवाय दार्शनिकता के..जरुरत है उन नई तकनीको और ज्ञान की जो इस बारे में हमें सच्चाई कों बताये अपने सिद्धांतो से तर्क का निरूपण करे...मुर्ख व्यक्ती तो हमेशा येही कहता रहेगा की तो फिर तारे कहा से बने , इस संसार कों कौन चला रहा है ,सूरज किसने बनाया , वे कारण नहीं खोजते ..खासतौर से हिन्दुस्तान में अगर आप इन चीजो के सही कारण खोजोगे तो वे आपको धर्म का विरोधी करार कर देंगे...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/301554459270010767-8710016029717043804?l=chitrahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/tbJp/~3/xXRyjbQKcXM/blog-post_225.html" title="संयोगों की सत्‍ता ईश्‍वरीय सत्‍ता का निषेध करती है - कुमार मुकुल" /><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="25" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SJ5wxVbXC_I/AAAAAAAAAhw/aT1PQoXYR4w/s72-c/200px-Stephen_Hawking_StarChild.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://chitrahindi.blogspot.com/2008/11/blog-post_225.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEEBRH4_fSp7ImA9WxRUF0s.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-301554459270010767.post-538681092898380968</id><published>2008-11-26T22:01:00.001-08:00</published><updated>2008-11-26T22:17:35.045-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-26T22:17:35.045-08:00</app:edited><title>क्रोध,चिंता आदि भावावेग सोद्देश्‍य होते हैं - कुमार मुकुल</title><content type="html">सहज बुद्धि के आधार पर मन पर नियंत्राण रखना ही जीवन का सबसे बड़ा अर्थ है। एडलर लिखते हैं कि ``जीवन का अर्थ है, मैं अपने साथी मनुष्यों में दिलचस्पी लूं, सम्पूर्ण का एक अंश बनूं, मानव-मात्र की भलाई के लिए अपना कर्तव्य-भाग निबाहूं।´´ वे मानते हैं कि दुनिया के सभी विफल मनुष्य ``दूसरों में दिलचस्पी नहीं लेते और सामाजिक भावना नहीं पैदा करते।´´ वे जीवन का अपना निजी अर्थ लगाते हैं।&lt;br /&gt;सच्चाई और वास्तविकता का अर्थ वे मानव के लिए सच्चे और वास्तविक होने से लगाते हैं। अन्य सारी सच्चाइयों को वे व्यर्थ बताते हैं। मन को समाजोन्मुखी बनाने की बात करते एडलर उसकी वैयक्तिकता को नहीं भूलते। वे मानते हैं कि जीवन के उतने ही अर्थ हैं जितने कि मनुष्य। और इसीलिए इन निजी अथों में भूल की गुंजाइश हमेशा रहती है। निजी अर्थ भी सच होते हैं पर वे निजता से सीमित और अधूरे होते हैं और इसलिए भूलों का कारण बनते हैं। इसलिए अथों की कसौटी सामूहिकता है मनमानी नहीं। वे कहते हैं कि जीवन से जुड़ी हर चीज का अर्थ मनुष्य के लिए उसकी आवश्यकता और उससे उसके संबंधों पर निर्भर करता है। चीजों का कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं होता।&lt;br /&gt;वे पाते हैं कि वैयक्तिक मनोविज्ञान की सारी समस्याए¡ व्यक्ति के व्यवसाय, समाज और यौन जीवन संबंधी उसके विचारों से जुड़ी होती है। इन सब का हल सहयोग, सन्तुलन और प्रेम-जीवन पर निर्भर करता है। वे कहते हैं कि आपका जीवन तभी सार्थक होगा जब दूसरों के लिए उसका कुछ अर्थ होगा। क्योंकि वैयक्तिक अथों की कभी परीक्षा नहीं ली जा सकती उसकी कसौटी वह व्यक्ति ही होता है और वह खुद अपना महत्‍व कैसे प्रतिपादित कर सकता है। व्यक्ति का महÙव सामाजिकता- सामूहिकता की कसौटी पर ही कस कर जाना जा सकता है। जीवन के सच्चे अथों की कसौटी साधारण है जिसमें दूसरा हिस्सा बंट सके, ``संपूर्णता में अपना अंश प्रदान´´ कर सकें। `प्रदान को ही वे जीवन का सच्चा अर्थ मानते हैं कि जिस दुनिया में हम काम शुरू करते हैं वह हमें पूर्वजों ने हमें ऐसी प्रदान की है जिसमें हम काम कर सकें और इस दुनिया को आगे वालों के लिए और अनुकूल बनाना ही जीवन का अर्थ हो सकता है। एडलर लिखते हैं कि वैसे असहयोगी लोग जो केवल यही पूछते हैं कि ``मैं जिन्दगी से क्या पा सकता हूं।´´ वह केवल मर ही नहीं चुके हैं, उनका सारा जीवन ही व्यर्थ है।&lt;br /&gt;वे कहते हैं कि वैयक्तिक मनोविज्ञान नियतिवाद के सिद्धान्त को नष्ट कर देता है, कि अपने अनुभवों को जो अर्थ हम देते हैं वही हमारी नियत की रेखा को निधाZरित करता है कि परिस्थितियों को हमेशा परिभाषित करने की जरूरत होती है और यही हमारा भविष्य निधाZरित करता है।&lt;br /&gt;एडलर ने पहली बार शोध कर यह पाया कि विकृत अंगों वाले और बीमार बच्चों में विफलता की संभावना ज्यादा रहती है। जो शरीर वातावरण की मांग को पूरा नहीं कर पाता उसे मन बोझ के रूप में लेता है और यहीं से गड़बड़ी शुरू होती है। उनकी अपंगता के प्रति अगर समाज में या परिवार में सही व्यवहार नहीं मिला तो वे समाजोन्मुख होने की जगह आत्मकेंद्रित होते चले जाकर बर्बाद हो सकते हैं। पर इसे वे कोई नियम नहीं मानते क्योंकि बहुत बार उल्टा भी होता है और जो विकलांग बच्चे सहयोग की ताकत को पहचान लेते हैं और संघर्ष करते रहते हैं वे बहुत बार ठीक-ठाक अंगों वाले बच्चों को भी पीछे छोड़ देते हैं।&lt;br /&gt;विकलांग बच्चों की तरह लाड-प्यार से पले बच्चों में भी बर्बादी के अवसर ज्यादा देखते हैं। ऐसे बच्चे केवल पाना जानते हैं और देना नहीं जान पाते और बोझ बन जाते हैं। इसी तरह उपेक्षा का दंश भी बच्चे को विकसित नहीं होने देता। एडलर बताते हैं कि ``कोई भी दूसरा अनुभव नहीं है जो नि:स्वार्थ प्यार की जगह ले सके।´´ और इस संदर्भ में वे मां की भूमिका को बहुत जरूरी मानते हैं क्योंकि वही बच्चे को बाकी विश्व से जोड़ने वाला जरूरी पुल है। अगर बच्चे ने माता से खुद को उपेक्षित महसूस किए तो इस कमी को शायद ही भरा जा सके। क्योंकि आरम्भ के पांच सालों में ही बच्चे की समझदारी की नींव पड़ती है। किसी व्यक्ति के मानस की विकृतियों को जानने के लिए उसके बचपन के संस्मरणों को एडलर सबसे जरूरी साèान मानते हैं। क्योंकि वहीं उसकी ग्रंथियों की गुत्थी छुपी होती है।&lt;br /&gt;एडलर लिखते हैं कि ``गति की दिशा को पहले ही भांप लेना मन की केंद्रीय शक्ति है।´´ पर चूंकि मन को शरीर में ही रहना है इसलिए वह भी एक जरूरी फैक्टर है क्योंकि गति तो शरीर ही करेगा। पर एडलर गलतियों के लिए मन को ही दोषी ठहराते हैं क्योंकि निर्देशन वही करता है। इसलिए एडलर मन को ही नियंत्रिात करने और उसे समाजोन्मुखी बनाने की बात करते हैं। क्योंकि मन अगर खुद सारे फैसले लेने लगे तो मनमानी होगी उसी सहज बुद्धि के आèाार पर काम करने को तैयार करना ही मनुष्य का अभिष्ट है।&lt;br /&gt;व्यक्ति के मनोविज्ञान की तह में जाते एडलर बताते हैं मनुष्य की हर भावना चाहे वह क्रोध और चिन्ता ही क्यों न हो एक उद्देश्य को लेकर प्रकट होती है। भावना के नाम पर दरअसल आदमी छूट चाहता है अपनी मनमानी की। वे लिखते हैं कि ``हमारा अनुभव बताता है कि क्रोध एक ऐसा ढंग है जिसे किसी व्यक्ति अथवा स्थिति पर काबू करने के लिए बरता जाता है।´´ वे शारीरिक व मानसिक अभिव्यक्तियों को जन्मजात कहकर उसके नाम पर छूट देना नहीं चाहते बल्कि उसकी तह में छुपे उद्देश्यों तक जाना चाहते हैं।&lt;br /&gt;एडलर पाते हैं कि मन का शरीर पर प्रभुत्व रहता है और इसीलिए उसके मन के भावों को हम उसके शारीरिक क्रिया कलापों में अभिव्यक्त होते पाते हैं। एक कमजोर आदमी की कमजोरी उसके आचरण में भी प्रकट होती रहती है और विशाल शरीर का आदमी भी मन से कमजोर होने पर लुंज-पुंज दिखता है। इसलिए वे मन और शरीर को अलग-अलग नहीं उनकी पारस्परिकता में देखने का आग्रह करते हैं। वे कहते हैं कि मन का मस्तिष्क पर भी गहरा प्रभाव रहता है इसलिए सिर पर चोट से अगर कभी मस्तिष्क का एक हिस्सा बेकार हो जाता है तो कभी-कभी मन की ताकत से मस्तिष्क का दूसरा हिस्सा उस कमी को पूरा करने का चमत्कार भी कर दिखाता है।&lt;br /&gt;एडलर कहते हैं कि ``सहयोग की कमियों का ज्ञान ही मनो- विज्ञान है।´´ और मनोविकृतियों को दूर करने के लिए वे सहयोग आधारित जीवन प्रणाली की वकालत करते हैं। क्योंकि व्यक्ति की जीवन प्रणाली में ही उसके मन की गड़बड़ी के सूत्रा होते हैं और उस प्रणाली को बदल कर ही उनसे निजात पाई जा सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हीनताबोध-श्रेष्‍ठताबोध और एडलर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हीनभाव यानि इन्फीरिआरिटी काम्प्लैक्स के बारे में एडलर का मानना है कि इसका जिस व्यापक स्तर पर प्रयोग होता है उसके अनुपात में कम ही लोग इसे ठीक से समझ पाते हैं। हीन भाव थोड़ा-बहुत सबमें होता है क्योंकि हर आदमी के आसपास कुछ ऐसी स्थितियां होती हैं जिनको वह सुधारना चाहता है। किसी को हीन भाव से पीिड़त बतलाना उचित नहीं। क्योंकि ऐसा करने से रोगी अपनी उस ग्रंथी से निपटने की जगह उसे और महत्व देते हुए अपनी श्रेश्ठता का प्रदर्शन करेगा। एडलर के अनुसार हर स्नायु-रोगी यानि न्यूरोटिक हीनभाव का शिकार होता है, हां उसका विकार अलग अलग तरीके का हो सकता है। कुछ लोग बोलते समय अपने हाथ पांव को जरूरत से ज्यादा हिलाते हैं ऐसे लोगों का अपनी बोली पर विश्‍वास कम होता है इसलिए उस पर जोर देने के लिए वह अपने अन्य अंगों को हिलाता है। हीन भाव से ग्रस्त व्यक्ति जरूरी नहीं कि हीन या दबा हुआ दिखे वह इसके विपरीत आचरण भी कर सकता है। जैसे जिस बच्चे में अपने छोटे होने का भय हो वह कुछ तनकर चलने का प्रयास करता दिख सकता है। कोई व्यक्ति अपने हीनभाव को ऐसे ही लगातार लादे नहीं चल सकता वह उससे उबरने का प्रयास अपने तरीके से करता है। संभव है कि वह प्रयास करके भी उससे उबर ना सके और तनाव मेें आ जाए पर वह प्रयास करता जरूर है। अत्याचार और कठोर व्यवहार के कारक के रूप में भी इस हीन भाव की भूमिका तलाशी जा सकती है। अपने कार्य क्षेत्रा में अच्छा प्रदर्शन ना कर पाने वाला व्यक्ति अपने घर या अपने मातहतों के बीच कठोर व्यवहार कर अपने हीन भाव का प्रदर्शन करता है। हीन भाव का विश्‍लेषण करते एडलर कहते हैं कि हीन भाव से निपट ना पाने वाला व्यक्ति अक्सर श्रेष्‍ठता की अनुभूति की ओर जाना चाहता है पर यह कोई सकारात्मक प्रयास नहीं है। ऐसा व्यक्ति सफलता की ओर बढ़ने की जगह पराजय से बचने में अधिक समय गंवाता है और ऐसा करते हुए अपना कार्यक्षेत्र सीमित करता आत्महत्या की परिस्थितियां तक पैदा कर लेता है। एडलर के अनुसार आत्महत्या भी श्रेष्‍ठता भाव की ही एक परिणति है कि उसने आत्महत्या इसलिए की कि अपने जीवन की परिस्थितियों में आत्महंता के पास इससे बेहतर विकल्प नहीं थे। उनके अनुसार आत्महत्या हमेशा एक शिकायत या बदला हुआ करती है कि ऐसा करने वाला अपनी परिस्थितियों का दोश दूसरों के सिर मढ़ता है कि वह उसे समझ नहीं सका। हीन भाव से ग्रस्त व्यक्ति दूसरों पर हावी होना चाहता है चाहे यह काम रोब गांठकर हो या गिड़गिड़ाकर। रोकर या चीखकर जब एक बच्चे को कुछ हासिल होता है तो आगे यही आदत उसे एक उदास प्रकृति का व्यक्ति यानि मेलोन्कोलियॉक बना डालता है। ऐसे लोग सहयोग करने की जगह आंसू बहाकर अपनी बात मनवा लेना चाहते हैं। ऐसे लोग अपनी कमजोरी को अक्सर स्वीकार लेते हैं पर जिस चीज को वे छिपाते हैं वह श्रेष्‍ठता का भाव होता है। इसी तरह शेखी बधारने वालो बच्चा देखने में श्रेष्‍ठता का प्रदर्शन कर रहा होता है पर इसके भीतर वही हीन भाव होता है। हस्तमैथुन, स्वप्नदोश, नपुंसकात और विपरीत रति दूसरे लिंग के प्रति अपर्याप्तता के हीनभाव का ही परिणाम होते हैं। इस सबके बावजूद एडलर हीनभाव को मानव जाति की उन्नति के कारक के रूप में देखते हैं। विकास का सार प्रकम ही हीनभाव की उपज है कि आखिर सुख,सुविधा और सुरक्षा के इतने इंतजाम मानव के लिए ही क्यों हैं , क्योंकि नििष्चत ही मानव खुद को स़ष्टि का दुर्बलतम प्राणी समझता है। पशुओं के मुकाबले मनुष्‍य को बचपन से ही जिस असुरक्षा के बीच अपना जीवन बिताना पड़ता है वह एक ओर इस हीनभाव और दूसरी ओर उसके विकास का कारक है। आदमी के बच्चे केा खड़ा होने और चलने में सालभर लग जाते हैं जबकि पशु शावक जन्म के कुछ देर बाद ही चलने लगता है। इन कठिनाईयेां केा एडलर मानव जाति का सौभग्य मानते हैं। जिसके हल ढूंढने के क्रम में वह न जाने क्या-क्या ढूंढ लेता है। एडलर का मानना है कि साधाण मनुष्‍य अपनी समस्याओं का हमेशा अच्छे से अच्छा हल ढूंढ लेता है। वह हमेशा दूसरों को कुछ देता है वह किसी पर बोझ नहीं बनता ना उसे अनुकम्पा सामाजिक भावना और सहयोगी रवैये के साथ वह कठिनाईयेां को हल करता आगे बढ़ता चला जाता है। एडलर बताते हैं कि -किसी की जीवन प्रणाली को समझना किसी कवि की कृति को समझने के समान है। कवि को तो शब्दों का प्रयोग करना ही पड़ता है, परन्तु उसका आभिप्राय तो उन शब्दों से कहीं अधिक होता है जिनका वह प्रयोग करता है। उसके अभिप्राय का अधिकांश तो अनुमानगम्य ही होता है, पंक्तियेां के बीच उसकी खोज करनी पड़ती है। यही वैयक्तिक जीवन प्रणाली की दशा है जो अगाध और बहुत उलझी हुई संश्लिष्‍ठ हुआ करती है। मनोवैज्ञानिक को पंक्तियेां के बीच में पढ़ना होगा, यह आवश्‍यक होगा कि जीवन का अभिप्राय परखने की कला वह सीखे। ईश्‍वर तुल्य होने ओर महामानव के विचार को भी एडलर श्रेष्‍ठताग्रंथि की उपज मानते हुए कहते हैं कि जब जर्मन दार्शनिक नीत्से पागल हो गया था तो वह पत्रों में अपने हस्ताक्षर शहीद लिखकर करता था। उनके अनुसारी प्राय: पागल व्यक्ति अपनी श्रेष्‍ठता के ध्येय स्पष्‍ठ रूप में व्यक्त करते हैं। श्रेष्ठताबोध से पीडित व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता। क्योंकि उनके अनुसार प्रेम दुर्बलता की निशानी होता है। ऐसे लोग प्रेम से भागने का बचने का अभ्यास करते हैं। इससे बचने के लिए वह ऐसी स्थिति को उपहास में उड़ा देने की कोशिश करता है। एडलर कहते हैं कि - कई लोग प्रेम में होने पर दुर्बल अनुभव किया करते हैं, और कुछ हद तक वह ठीक होते हैं। उनके अनुसार केवल वही व्यक्ति प्रेम की पारस्परिक निर्भरता से बचे रहने का प्रयत्न करेगा जिसका श्रेष्ठता संबंधी ध्येय यह कहता है - मुझे कभी दुर्बल नहीं होना है, मुझे कभी भी अरक्षित नहीं रहना है। जिस व्यक्ति से ऐसे लोगों को प्रेम होने का भय होता है उनका वे उपहास उड़ाते हैं। बच्चों द्वारा चोरियां किए जाने और दूसरे की बुराई करने को भी वे श्रेष्ठताबोध से जोड़ते हैं। उनका यह भी मानना है कि जहां भी झूठ बोलने का मामला दिखे, हमें उसका कारण कठोर माता अथवा पिता में तलाश करना पड़ेगा। श्रेष्ठता की इस कुंठा को समझने के लिए वे सलाह देते हैं कि हमें खुद को उनकी स्थितियों में रख कर देखना चाहिए तभी हम इसकी तह में जा सकते हैं। कि श्रेष्ठता की ओर जाने का प्रयास ही प्रगति के मूल में है पर कहां से यह बंधन के रूप में बदलने लगता है इस पर विचार करना चाहिए। उनका स्पष्ट मत है कि -जो व्यक्ति जीवन की समस्याओं का वास्तव में सामना कर सकते हैं और उनपर विजय पा सकते हैं वह वही होते हैं जो अपने प्रयत्नों से सभी को लाभ पहुंचाने की प्रवृत्ति दिखाते हैं, जो इस तरह आगे बढ़ते हैं कि दूसरे भी फायदा उठाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सपने हमारी जीवन प्रणाली के हिस्‍से हैं&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सपने को लेकर हमेशा हम एक संशय में रहे हैं कि जैसे वे कोई रहस्‍य हों। दूसरी ओर सपनों को लेकर एक अतिरेकी विचार यह भी है कि जो सपने नहीं देखता वह बड़ा नहीं हो सकता। पर वैज्ञानिक और मनोचिकित्‍सक डॉक्‍टर एल्‍फ्रेड एडलर को पढ़ने के बाद मुझे अपने विचारों को बदलना पड़ा और लंबे समय से चला आ रहा कुहासा छंटा। एडलर यह साफ करते हैं कि स्‍वप्‍न हमारी जीवन प्रणाली के हिस्‍से होते हैं और उनका व्‍यक्ति के मूल स्‍वभाव से अलग कोई अर्थ नहीं होता। &lt;br /&gt;वे बताते हैं कि सपने अक्‍सर हमें धोखा देते हैं क्‍यों कि हम उन्‍हें समझने की जहमत कम उठाते हैं और उनका भ्रमप्रर्ण अथै लगाना आसान होता है। पर अगर हम हम उन पर ध्‍यान देने लगें तो वे हमें धोखा नहीं दे पाएंगे। उनके अनुसार आदमी को अपनी सहज बुद्धि के अनुसार चलना चाहिए और सपनों के धोखे से बचना चाहिए क्‍योंकि वे अक्‍सर एक आसान हल की ओर ईशारा करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकांश लोग उड़ने के सपने देखते हैं, एडलर बताते हैं कि हम अपनी समस्‍याओं का हल बिना मिहनत किए पा लेना चाहते हैं। सपने एक तरह से तोष देते हैं कि यथार्थ में ना सही आपने सपने में तो अपनी समस्‍या का हल पा ही लिया। इसी तरह लोग गाड़ी छूटने का सपना देखते हैं यह इंगित करता है कि हम बिना प्रयास किए अपनी समस्‍या का हल पा लेना चाहते हैं। मुझे कुछ देर से इस तरह चलना चाहिए कि गाड़ी छूट जाए और उसका सामना ना करना पड़े। &lt;br /&gt;इसी तरह किसी समस्‍या को सामने पा आ असहज हो उठते हैं तो आपको परीक्षा के सपने आ सकते हैं। इसका मतलब कुछ लोगों के लिए यह हो सकता है कि उस समस्‍या को सामने पा व्‍यक्ति परेशानी में पड़ गया और उसे परीक्षा की तरह ले रहा है। कुछ लोगों के लिए जो ऐसी समस्‍याओं से आसानी से पार पा चुके हैं इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि यह भी एक परीक्षा है और वो इससे पार पा लेंगे। इस तरह सपनों के अर्थ उस व्‍यक्ति के जीवन संदर्भों में ही निकलेंगे उसका कोई आकाशी रहस्‍यमय अर्थ नहीं होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एडलर के अनुसार हर सपने का अर्थ खुद को मदहोश करना और आत्‍मसम्‍मोहित करते हुए मूल समस्‍या से बच कर निकलने का प्रयास करना है कि सपने आत्‍मवंचना को बल देते हैं। कि स्‍वप्‍न भी सोद्देश्‍य होते हैं। सपने में व्‍यक्ति अपनी स्‍मृति से ही चुनाव करते हैं जो श्रेष्‍ठता के उसके निजी ध्‍येय का पक्ष लेते हैं। इस तरह सपने में हम उन्‍हीं घटनाओं में से चुनाव करते हैं जो हमारी जीवन प्रणाली से मेल खाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महान मनोविश्‍लेषक फ्रायड का मत है कि सपनों का निर्माण अलंकारों और प्रतीकों से होता है। एडलर सवाल करते हैं कि आखिर सपने अलंकारों और प्रतीकों की जगह सरल सीधी भाषा में क्‍यों नहीं व्‍यक्‍त्‍ होते। वे कहते हैं कि अलंकार वाणी के भू‍षण माने जाते हैं पर उनका प्रयोग कर हम हमेशा अपने को धोखा देते हैं। जारी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/301554459270010767-538681092898380968?l=chitrahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Y3jNy41Qrio8MNCdJrxGdyLhPcg/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Y3jNy41Qrio8MNCdJrxGdyLhPcg/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Y3jNy41Qrio8MNCdJrxGdyLhPcg/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Y3jNy41Qrio8MNCdJrxGdyLhPcg/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/tbJp/~4/5I8A9Q4cA2M" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://chitrahindi.blogspot.com/feeds/538681092898380968/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=301554459270010767&amp;postID=538681092898380968" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/301554459270010767/posts/default/538681092898380968?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/301554459270010767/posts/default/538681092898380968?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/tbJp/~3/5I8A9Q4cA2M/blog-post_26.html" title="क्रोध,चिंता आदि भावावेग सोद्देश्‍य होते हैं - कुमार मुकुल" /><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="25" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://chitrahindi.blogspot.com/2008/11/blog-post_26.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0UBRHkyeip7ImA9WhdSGUw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-301554459270010767.post-250526974525079034</id><published>2008-11-07T20:52:00.000-08:00</published><updated>2011-07-28T21:54:15.792-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-07-28T21:54:15.792-07:00</app:edited><title>चेखव और लीडिया - एक प्रेम कथा</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;b&gt;उम्र भर एक मुलाकात चली आती है ... &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKzwQx8bQII/AAAAAAAAAo8/au7ME5jbP-Y/s1600-h/bghf.psd+-+Copy.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5236824637800398978" src="http://1.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKzwQx8bQII/AAAAAAAAAo8/au7ME5jbP-Y/s200/bghf.psd+-+Copy.jpg" style="cursor: hand; cursor: pointer; float: left; margin: 0 10px 10px 0;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKzwFBk12RI/AAAAAAAAAo0/fvkI_g3i1To/s1600-h/es.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5236824435838015762" src="http://4.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKzwFBk12RI/AAAAAAAAAo0/fvkI_g3i1To/s200/es.jpg" style="cursor: hand; cursor: pointer; float: right; margin: 0 0 10px 10px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;&lt;i&gt;अपनी &lt;i&gt;भयाक्रांत&lt;/i&gt; शीर्षक कविता में &lt;i&gt;होर्खे लुइस बोर्खेस&lt;/i&gt; लिखते हैं - यह प्रेम है।मुझे गोपन रहना होगा अथवा पलायन करना होगा। इस कैदखाने की दीवारें बढ़ती जाती हैं, जैसे किसी डरावने स्‍वप्‍न में।  &lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;लीडिया एविलोव&lt;/b&gt; की पुस्‍तक &lt;i&gt;मेरी जिन्‍दगी में चेखव &lt;/i&gt;को पढते हुए जैसे प्‍यार के निहितार्थ नये सिरों से खुलते हैं। अपने सहज, सरल ढंग से। कैदखाने की दीवारें और डरावने स्‍वप्‍न वहां भी हैं पर वे बोर्खेस की कविता की तरह भयाक्रांत नहीं करते बल्कि खीचते हैं जैसे समुद्र खींचता है चाहे आप तैरना जानते हों या ना जानते हों ...। इसे पढते हुए लगता है कि प्‍यार अपने अनुभवों के प्रति एक निजी आ्ग्रह है जो रूढिगत आचरणों को दरकिनार करता अपनी रौ में बढता जाता है। यह कबीर की आंखिन देखी है जिसे आंख वाला दुनियावी दबाव में अपनी नजरों से दूर नहीं कर पाता, चाहे इसकी जो कीमत उठानी पडे।&lt;br /&gt;
इस पुस्‍तक को पढते लगा जैसे सारा लेखन आदमी के प्‍यार की ही अभिव्‍यक्ति होता है। अपने देखे-गुने हुए के प्रति एक सच्‍ची जिच से ही लेखन पैदा होता है। चेखव कहते हैं - &lt;i&gt;लेखक को वही लिखना चाहिए जो उसने देखा और भोगा है-पूरी सच्‍चाई और ईमानदारी के साथ। ... जीवन का अनुभव विचार को जन्‍म दे सकता है लेकिन विचार अनुभव को जन्‍म नहीं दे सकता। &lt;/i&gt;   यहां विचार एक रूढि की तरह आता है और अनुभव विचार का पर्यायवाची हो जाता है। मतलब हर बार नये समय संदर्भों में अनुभवों के आधार पर विचारों का पुनरमूल्‍यांकन करने की जो हिम्‍मत करता है वही लेखक होता है वही प्रेमी होता है। और यह मूल्‍यांकन पूरी जटिलात और समय के विडंबना बोध को साथ लेकर चलता है वह विचारों का सरलीकरण नहीं करता। &lt;br /&gt;
जब लीडिया की पहली मुलाकात हुई थी तब वह पच्‍चीस की और एक बच्‍चे की मां थी , चेखव तब अटठाईस के थे और अविवाहित। लीडिया लिखती है- ... पर उस एक नजर में क्‍या कुछ नहीं था। ... उमंग,उल्‍लास और आनंद की जैसे हजार आतिशें जल उठीं। &lt;br /&gt;
जब चेखव को पता चला कि उनका एक बच्‍चा भी है तो उसकी आंखों में देखते उन्‍होंने पूछा- आपका बेटा भी है... अरे वाह ...।&lt;br /&gt;
लीडिया में लेखिका बनने की गहरी ईच्‍छा थी, जब उसकी शादी तय हुई तो मासिक &lt;i&gt;रूसी विचार&lt;/i&gt; के संपादक &lt;b&gt;गाल्‍तसेव&lt;/b&gt; ने कहा कि - &lt;i&gt;बस फिर तो हो गया। अब भूल जाओ कि लेखिका-वेखिका बनोगी...&lt;/i&gt;। तब लीडिया ने संकल्‍प लिया कि वह शादी को लेखन में बाधा नहीं बनने देगी। पर बाद उसे लगा कि वह उसकी भूल थी कि विवाहित जीवन में लेखन के लिए समय ही नहीं था। पर यह चीज कहीं न कहीं उसके भीतर बैठी रही। शादी के बाद भी वह कहानियां लिखती रही छपवाती रही और अपने प्रिय लेखक चेखव या &lt;b&gt;चेखान्‍ते &lt;/b&gt; को लेकर उसका प्रेम दस सालों तक बना रहा। अंतिम सालों में उसने चेखव की कहानियों के संकलन में उनकी काफी मदद भी की और उसकी लेखकीय जिद के रूप में हम इस खूबसूरत किताब को देख सकते हैं जिसमें चेखव से कुल आठ-दस मुलाकातों को जैसे पुनरजीवित कर दिया गया हो।&lt;br /&gt;
अपने भीतर के लेखक को बचाने की जिद में लीडिया ने अपने पति से तलाक की भी मांग की। तब वह पहले बच्‍चे की मां बनने वाली थी और चेखव से उसका परिचय भी नहीं हुआ था। पति ने समझाया कि यह गलतफहमी पर टिकी जिद है और लीडिया ने भी सोचा और पाया कि उसका पति उसके लिए कुछ भी उठा नहीं रखता, पर प्रेम के यह क्‍या मायने हुए कि एक दूसरे की तारीफ में गर्क होते रहें , प्रेम तो मिलकर बाकी दुनिया के लिए एक नयी राह तलाशना है , और लिखना उसी की ओर जाती एक राह है।&lt;br /&gt;
संतान हो जाने पर लीडिया के लिए तलाक की बात सोचना भी संभव ना रहा और उसने महसूस किया कि मेरे पंख कतर दिए गए हैं ...। यूं अब दोनों के बीच का तनाव घटने लगा था, लिखने को लेकर उसका पति उसे तंग करना बंद कर चुका था फिर भी लीदिया को समझ नहीं आ रहा कि इस उदासी और उब की वजह क्‍या है, जबकि उसकी कहानियां छपने लगी थीं।&lt;br /&gt;
पहली मुलाकात के तीन साल बाद चेखव से लीदिया की दूसरी मुलाकात हुई तब वह तीन बच्‍चों की मां बन चुकी थी। एक गोष्‍ठी में वह चेखव का इंतजार करती सोच रही थी कि - क्‍या उन्‍हें मेरी याद होगी, कि उस अनुभूति को जिसने तीन बरस पहले मेरे भीतर उजाला भर दिया था हम फिर जी सकेंगे...। यहां &lt;b&gt;मीर&lt;/b&gt; याद आते हैं, &lt;i&gt;उम्र भर एक मुलाकात चली आती है..&lt;/i&gt;.। चेखव भी उस मुलाकात को उसी तरह याद रखे थे - वे बोले - तीन साल पहले  जब हम मिले थे तो क्‍या तुम्‍हें ऐसा नहीं लगा था कि हमारा परिचय पहली बार हुआ हो, मगर हमारी जान पहचान पुरानी है और हमने एक लम्‍बे बिछोह के बाद एक दूसरे को पाया है ... कि यह अनुभूति इकतरफा हो ही नहीं सकती...।&lt;br /&gt;
उस मुलाकात के समय के संवादों को देखा जाए तो वे आम प्रेमियों के संवादों की तरह थे , रोमान और उत्‍तेजना और एक निष्‍कपट बाल सुलभ जिज्ञासा से भरे हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;मेरे 'सुखी पारिवारिक जीवन' में अब कोई रोशन दिन नहीं होगा&lt;/b&gt;  &lt;br /&gt;
चेखव और लीडिया पहली मुलाकात के तीन साल बाद जब मिलते हैं वे तो बडे मजाकिया लहजे में बातें करते हैं। वे सोचते हैं कि उनका संबंध जरूर पूर्वजन्‍म का है और शायद वे पिछले जन्‍म में प्रेमी हों और एक साथ डूबकर मरे हों। हंसी की इन बातों के बाद चेखव उलाहना देते हैं कि कितनी बुरी हो तुम , जाकर कुछ भेजा नहीं , मैंने तुमसे कहानियां मांगी थी ...। अभी उनकी बातचीत आरंभ ही हुयी थी कि चेखव को उनके प्रशंसक ले गये। यहां मजेदार यह है कि आज कल की तरह उस काल में रूस में भी लेखकों के साथ अफवाह उडाने वालों का एक तबका भिडा रहता था, सो उनमें किसी ने उडा दिया कि पार्टी में चेखव ने नशे में धुत्‍त होकर कहा कि वे लीडिया के पति से उसे तलाक दिला कर शादी करने वाले हैं। यह सब सुनकर लीडिया की समझ में कुछ आ नहीं रहा था कि वह क्‍या करे ...। अंत में चेखव से लीडिया की भेंट हुयी तो चेखव ने कहा कि मुझे लेकर दुनिया भर के ऐसे ही अफवाह हैं - कि , मेरी शादी एक अमीरजादी से हुयी है, कि अपने मित्रों की पत्नियों से मेरे संबंध हैं वगैरह वगैरह...। &lt;br /&gt;
फिर चेखव ने लीडिया से विदा ली तो उदासमना लीडिया ने सोचा - मेरे सुखी पारिवारिक जीवन में अब कोई रौशन दिन नहीं होगा ...। &lt;br /&gt;
इस मुलाकात के बाद चेखव के साथ उनका पत्राचार चलने लगा। लीडिया चोरी छुपे डाकघर जाकर चेखव के पत्र लाती । कभी कभार एकाध पत्र वह अपने पति मिखाइल को दिखा देती थी। इस पर उसके पति ने कहा कि मेरी दिलचस्‍पी इसमें नहीं कि चेखव तुम्‍हें क्‍या लिखते हैं अगर दिखा सको तो तुम यह दिखाओं कि अपने पत्र में तुम उन्‍हें क्‍या लिखती हो। पर लीडिया ने कभी अपने पत्र चेखव को नहीं दिखाए। &lt;br /&gt;
कुछ दिनों बाद चेखव फिर पीटर्सबर्ग आए तो लीडिया उनसे मिली। तब चेखव ने उससे उसके बच्‍चों के बारे में पूछ - तो लीडिया ने बहुत उत्‍साह से उन्‍हें इस बारे में बताया।&lt;br /&gt;
बातचीत में लीडिया ने चेखव को सलाह दे डाली कि अब आपको शादी कर लेनी चाहिए। तो चेखव ने कहा कि मुझे इसकी फुर्सत कहां है, फिर उन्‍होंने लीडिया से सवाल किया कि .... क्‍या तुम सुखी हो ...&lt;br /&gt;
लीडिया को अब जवाब नहीं सूझ रहा था - वह बोली - मेरे पति बहुत भले हैं और बच्‍चे भी। पर किसी का भला लगना और सुखी होना दोनों में अंतर है ना ...मुझे लगता है जैसे मैं घिर गयी हूं ... मेरा कोई अस्तित्‍व नहीं रहेगा। क्‍या इसी का नाम सुख है ..।&lt;br /&gt;
इस पर चेखव ने उत्‍तेजना में परिवार और स्‍त्री की पराधीनता की आलोचना करते कहा कि अपनी प्रतिभा को पहचानो।&lt;br /&gt;
फिर बात बदल कर चेखव ने कहा - अगर मैंने शादी की होती तो मैं अपनी पत्‍नी से अलग रहने के लिए कहता ... ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा समय साथ बिताने से आपसी व्‍यवहार में जो असावधानी या अशिष्‍टता का पुट आ जाता है, वह हमारे बीच न आ पाए।&lt;br /&gt;
घर पहुंचने पर उनके पति ने दरवाजा खोलते हुए कहा कि तुम्‍हारे बिना हम सब अनाथ हो जाते हैं ...। &lt;br /&gt;
अपने घर में पति के पास लेटी लीडिया सोच रही थी कि उसे चेखव से प्‍यार है ... ।&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;चेखव अक्‍सर उसे प्‍यारी बच्‍ची पुकारते&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;-&lt;span lang="HI"&gt;लीडिया चेखव&lt;/span&gt;- &lt;span lang="HI"&gt;एक प्रेम कथा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;  &lt;br /&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;br /&gt;
&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अगली मुलाकात में चेखव ने लीडिया को उपन्‍यास लिखने की सलाह देते कहा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt; - ... &lt;span lang="HI"&gt;एक स्‍त्री को ठीक उसी प्रकार लिखना चाहिए जैसे कि वह कुछ काढती है। खूब लिखो और पूरे विस्‍तार में लिखो। लिखो और काटो। फिर लिखो&lt;/span&gt; - &lt;span lang="HI"&gt;फिर काटो।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इस पर लीडिया ने कहा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt; - &lt;span lang="HI"&gt;यहां तक कि कुछ बाकी ही न बचे&lt;/span&gt;...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इस पर नाराज होते चेखव ने कहा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt; - &lt;span lang="HI"&gt;तुम बहुत खराब औरत हो&lt;/span&gt; ... &lt;span lang="HI"&gt;जीवन जैसा है बस वैसा ही। लिखोगी न&lt;/span&gt; ...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;तब लीडिया ने कहा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt; - &lt;span lang="HI"&gt;हां&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI"&gt;लिखूंगी।&lt;/span&gt; ... &lt;span lang="HI"&gt;मैं एक आजाने व्‍यक्ति की प्रेम कहानी लिखूंगी।&lt;/span&gt;...&lt;span lang="HI"&gt;वह व्‍यक्ति जिसे आप जानते तक नहीं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI"&gt;आपको बहुत प्‍यारा हो गया है&lt;/span&gt;...&lt;span lang="HI"&gt;क्‍या यह बेहद दिलचस्‍प नहीं है&lt;/span&gt;...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इस पर मजाक करते हुए चेखव बोलते हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt; - &lt;span lang="HI"&gt;जी नहीं। कतई दिलचस्‍प नहीं&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI"&gt;प्‍यारी बच्‍ची।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;यह संबोधन सुन लीडिया देर तक हंसती रही। चेखव अक्‍सर उसे प्‍यारी बच्‍ची पुकारते।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अंत में अगले दिन तक के लिए विदा होते चेखव ने उसे फिर उपन्‍यास लिखने की याद दिलाते कहा कि तुम लिखो कि कैसे तुम एक सैनिक अफसर के इश्‍क में कैद थीं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;फिर चेखव ने कहा कि तुम मुझ पर गुस्‍सा नहीं करोगी।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;...&lt;span lang="HI"&gt;स्‍त्री को सदा स्‍नेहमयी और कोमल हृदय होना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="line-height: normal; margin-bottom: 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अगली शाम चेखव लीडिया के घर खाने पर आमंत्रित थे। उसके पति कहीं बाहर गये थे। बच्‍चे चेखव से मिलकर सोने चले गए। हल्‍का खाते&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;-&lt;span lang="HI"&gt;पीते चेखव ने पहली बार अपने प्‍यार का इजहार करते कहा&lt;/span&gt; - &lt;span lang="HI"&gt;क्‍या तुम्‍हें मालूम है&lt;/span&gt; ... &lt;span lang="HI"&gt;इतना प्‍यार तो मैं दुनिया की किसी भी अन्‍य स्‍त्री से नहीं कर सकता ।&lt;/span&gt;... &lt;span lang="HI"&gt;तुमसे बिछडना कितना दुश्‍वार होगा मेरे लिए।&lt;/span&gt; ... &lt;span lang="HI"&gt;तुम्‍हें केवल पवित्र और निष्‍कलुष प्‍यार ही किया जा सकता है।&lt;/span&gt;...&lt;span lang="HI"&gt;तुम्‍हें स्‍पर्श करते मैं डरता था&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;,&amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;कहीं रूठ न जाओ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt; ... &lt;span lang="HI"&gt;यह कहते उन्‍होंने लीडिया का हाथ पकडा और तुरत छोड दिया&lt;/span&gt; ... &lt;span lang="HI"&gt;उफ कितना ठंडा हाथ है&lt;/span&gt; ...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;b&gt;Udan Tashtari&lt;/b&gt; ने कहा… &lt;br /&gt;
आभार इस आलेख के लिए. बहुत रोचक!!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
August 28, 2008 5:38 AM  &lt;br /&gt;
&lt;b&gt;Nitish Raj&lt;/b&gt; ने कहा… &lt;br /&gt;
...पर इन्हें समझना इतना आसान भी नहीं...पर पढ़कर अच्छा लगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/301554459270010767-250526974525079034?l=chitrahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/FuvURFHGsYrruQj6_r8EVZxdsvc/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/FuvURFHGsYrruQj6_r8EVZxdsvc/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/FuvURFHGsYrruQj6_r8EVZxdsvc/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/FuvURFHGsYrruQj6_r8EVZxdsvc/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/tbJp/~4/QsyQrxwdI2U" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://chitrahindi.blogspot.com/feeds/250526974525079034/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=301554459270010767&amp;postID=250526974525079034" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/301554459270010767/posts/default/250526974525079034?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/301554459270010767/posts/default/250526974525079034?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/tbJp/~3/QsyQrxwdI2U/blog-post_07.html" title="चेखव और लीडिया - एक प्रेम कथा" /><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="25" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKzwQx8bQII/AAAAAAAAAo8/au7ME5jbP-Y/s72-c/bghf.psd+-+Copy.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://chitrahindi.blogspot.com/2008/11/blog-post_07.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DU4CQ3Y7fyp7ImA9WxRWGUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-301554459270010767.post-4737648118489174404</id><published>2008-11-06T08:11:00.000-08:00</published><updated>2008-11-06T08:12:42.807-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-06T08:12:42.807-08:00</app:edited><title>दास्‍तोएवस्‍की के प्रेम - कुमार मुकुल</title><content type="html">उपन्‍यास जगत की महान हस्‍ती और &lt;strong&gt;अपराध और दंड&lt;/strong&gt; जैसी सार्वकालिक कृति के सर्जक &lt;strong&gt;दास्‍वोएवस्‍की&lt;/strong&gt; के जीवन को हम देखें तो वह भी अपराध और दंड के जटिल संजाल में गुत्‍थम-गुत्‍था दिखेगा। &lt;strong&gt;रूप सिंह चंदे&lt;/strong&gt;ल की पुस्‍तक &lt;strong&gt;दास्‍तोएवस्‍की के प्रेम &lt;/strong&gt;को पढते हुए यह साफ हो जाता है कि जीवनानुभव की जमीन पर ही महान रचनाओं का सृजन होता है। कि दास्‍तोएवस्‍की की मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि और दार्शनिक गहनता के श्रोत उनकी जीवन सलिला में ही हैं। पुस्‍तक के प्राक्‍कथन में ही रूपसिंह क‍हते हैं - ... उनका कोई भी कार्य शायद ही इतना चौंकानेवाला हो,जितना उनका स्‍वयं की जीवन... विशेष रूप से वेश्‍याओं,आदर्शवादी विवाहिता  महिलाओं,आकर्षक और स्‍वतंत्र उन्‍मुक्‍त औरतों और कामुक युवतियों के साथ बिताया गया उनका जीवन था, यही नहीं जुआ उनकी विशेष कमजोरी थी।&lt;br /&gt;      पुस्‍तक में रूपसिंह ने उन परिस्थितियों को विश्‍लेषित करने का प्रयास किया है जिसकी उपज थे दास्‍तोएवस्‍की। उनकी तीन प्रेमकथाओं की चर्चा रही है, अपने प्रेम में वे बहुत क्रूर हो जाते थे,पाशविकता की हद तक। एक तरह का सनकीपन हमेशा उनके साथ रहा। और क्‍यों ना हो किशोर वय में वे अपने अपने भाई  के साथ &lt;em&gt;पागल हो जाने की योजना&lt;/em&gt; पर विचार करते थे।&lt;br /&gt;       उनके जीवन में जो अस्‍तव्‍यस्‍तता रही उसकी जड़ें उनके पालन पोषण के तरीकों से जुड़ी दिखती हैं। दास्‍तोएवस्‍की कभी भी अपने पिता के बारे में बातें करना पसंद नहीं करते थे। उनके चिकित्‍सक पिता कठोर अनुशासन पसंद और शंकालु स्‍वभाव के थे और अपनी पत्‍नी को बराबर प्र‍ताडि़त किया करते थे। पत्‍नी की मृत्‍यु के बाद उनके पिता ने नौकरी छोड़ दी और नौकरानी के साथ गांव जाकर रहने लगे,जहां ग्रामीणों व रिश्‍तेदारों ने उनकी हत्‍या कर दी।&lt;br /&gt;    प्रेम व्‍यवहार में पाशविकता की जड़ें हम उपरोक्‍त घटनाओं में तलाश सकते हैं। उनकी तीसरी पत्‍नी, जो उनके यहां टंकन के कार्य के लिए आई थीं और  जिनके सामने उन्‍होंने प्रेम निवेदन किया तो वह भौंचक रह गयी थी पर आगे जिसे दास्‍तोएवस्‍की से प्रेम हो गया था, ने उन्‍हें संभाला। उनका नाम अन्‍ना था। दास्‍तोएवस्‍की ने जुआ में उसकी भी सारी चीजें गंवा दी थीं पर अन्‍न ने हिम्‍मत नहीं हारी। वह शायद भविष्‍य के इस लेखक को पहचान चुकी थीं और  उसने जीवन भर और उसके बाद भी उनके मान-सम्‍मान की रक्षा में खुद को झोंक दिया। दास्‍तोएवस्‍की को उनकी लंपटता से मुक्‍त करने का श्रेय अन्‍ना को ही जाता है।&lt;br /&gt;    अन्‍ना ज‍ब दास्‍तोएवस्‍की के प्रेम में पड़ीं तो वे उसके पिता से भी ज्‍यादा उम्र के थे, पर अन्‍न का कहना था - लेकिन वे जवान थे,वह मेरे समय के युवकों से अधिक दिलचस्‍प और जीवंत थे ...। शादी के वक्‍त अन्‍न बीस की और दास्‍वोएवस्‍की पैंतालीस साल के थे। और मिरगी के वे पुराने मरीज थे। पर शायद अन्‍ना की पहचान सही थी, जिसने विश्‍व के इस महान रचनाकार को अपने स्‍नेह से संवारा। वह मानती थी कि - प्रेम करने में रूप-रंग,स्‍वास्‍थ्‍य और गरीबी बाधक नहीं होते।&lt;br /&gt;      दास्‍तोएवस्‍की की पहली पत्‍नी मारिया को उनसे प्रेम था या नहीं इस पर भी कई लोग शंका करते हैं, उनका मानना है कि वह उनपर दया करती थी व सहानुभूति दिखाती थी पर दास्‍तोएवस्‍की उसके दीवाने थे।&lt;br /&gt;     पहले परिचय में उनतीस वर्षीय मारिया इसाएव की पत्‍नी थी। इसाएव बीमार और शराबी था। दास्‍तोएवस्‍की उसके घर बराबर जाते थे। इसाएव उन्‍हें सम्‍मान से देखता था और दास्‍तोएवस्‍की उसके बेटे को पढाते थे। इसी दौरान उनकी मारिया से घंटों बातें होती थीं। आगे बीमारी और शराब की आदतों से इसाएव का असामयिक निधन हो गया। तब मारिया को पाने की व्‍याकुलता दास्‍तोएवस्‍की में चरम पर थी। पर मारिया उस समय एक अन्‍य स्‍वस्‍थ ग्रामीण युवक को चाहती थी। जिससे उसे एक पुत्र भी हुआ। बाद में दास्‍तोएवस्‍की की आर्थिक स्थिति सुधरी तो मारिया ने उनसे विवाह कर लिया। आगे मारिया भी बीमार रहने लगी और मर गयी।&lt;br /&gt;      मारिया के रहते ही दास्‍तोएवस्‍की को अपोलिनेरिया से प्रेम हो गया थ। पर यह भी असफल रहा। इसका श्रेय दास्‍तोएवस्‍की की यौन कुंठा को ही जाता है। प्रेम संबंधेां में वे यौन उन्‍मादी व परपीड़क सा व्‍यवहार करते थे व अपोलिनेरिया की अपनी महत्‍वाकांक्षाएं थीं।&lt;br /&gt;     पुस्‍तक को पढकर दास्‍तोएवस्‍की के जीवन के कई सकारात्‍मक पहलू भी समने आते हैं, जैसे कि वह रूस के पहले ऐसे लेखक थे जिन्‍होंने लेखन को जीवन का आधार बनाया था। वे लेखक के रूप में एक मजदूर की तरह निरंतर श्रम करते थे। यही कारण था कि उन्‍हें तुर्गनेव व तोस्‍तोय जैसे अभिजात वर्ग के लेखकों  और नौकरशाह लेखकों से ईर्ष्‍या थी। तो अगर जुआ में धन उडाने की बीमारी उनमें थी तो लेखक के रूप में जी तोड़ मिहनत की सामर्थ्‍य भी।&lt;br /&gt;      यह आश्‍चर्यजनका था कि युवावस्‍था में क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण सश्रम कारावास भुगतने वाले दास्‍तोएवस्‍की की झुकाव धीरे-धीरे वामपंथ से दक्षिणपंथ की ओर होने लगा था और अंत में वे दक्षिणपंथी रह गए थे। जब रूस के राज्‍यतंत्रवादी लोग उग्र सुधारवादी व निरिश्‍वरवादी हो रहे थे दास्‍तोएवस्‍की राज्‍यतंत्रवादी व ईश्‍वर में आस्‍था रखने वाले होते जा रहे थे।&lt;br /&gt;   यह पुस्‍तक दास्‍तोएवस्‍की के जीवन को एक फिल्‍म की पटकथा की तरह सामने रख पाती है यह इसकी खूबी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/301554459270010767-4737648118489174404?l=chitrahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/E7Z9icHKXs6tPF5xR08puILvqxY/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/E7Z9icHKXs6tPF5xR08puILvqxY/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/E7Z9icHKXs6tPF5xR08puILvqxY/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/E7Z9icHKXs6tPF5xR08puILvqxY/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/tbJp/~4/d6MAhbq1fZE" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://chitrahindi.blogspot.com/feeds/4737648118489174404/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=301554459270010767&amp;postID=4737648118489174404" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/301554459270010767/posts/default/4737648118489174404?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/301554459270010767/posts/default/4737648118489174404?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/tbJp/~3/d6MAhbq1fZE/blog-post.html" title="दास्‍तोएवस्‍की के प्रेम - कुमार मुकुल" /><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="25" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://chitrahindi.blogspot.com/2008/11/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D08CQnw7eip7ImA9WxdaFk4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-301554459270010767.post-3357089802520366550</id><published>2008-08-24T20:38:00.000-07:00</published><updated>2008-08-24T20:44:23.202-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-08-24T20:44:23.202-07:00</app:edited><title>वेदों में क्‍या है - कुमार मुकुल</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKJRr0peKZI/AAAAAAAAAiA/GPIbKM7gl6k/s1600-h/dasve.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKJRr0peKZI/AAAAAAAAAiA/GPIbKM7gl6k/s320/dasve.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5233835530266749330" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKJRf5VHevI/AAAAAAAAAh4/mCj0sFVtESk/s1600-h/veda-1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKJRf5VHevI/AAAAAAAAAh4/mCj0sFVtESk/s200/veda-1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5233835325365123826" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वेदों की आधारभूमि&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्पष्ट है कि खेतिहर समाज के लिए वर्षा प्राथमिक जरूरत है, इसी तरह बादलों से वर्षा कराने वाले इंद्र की पूजा भी स्वाभाविक है।&lt;br /&gt;वेद आदिग्रंथ है। इसमें मांसाहारी समाज से विकसित हो, नए-नए बन रहे खेतिहर समाज के अनुभवों को ऋषियों ने अपनी ऋचाओं में अभिव्यक्त किया है। इन दोनों समाजों के बीच का टकराव वेद की आधारभूमि है। मांसाहार पर टिके पुराने मानुष समाज को नए खेतिहर समाज ने राक्षस की संज्ञा दी। खेतिहर समाज के ऋषि अहिंसा को अपनी ऋचाओं में प्राथमिकता देते दिखते हैं। इस विकास यात्रा में जो व्यक्ति या वस्तु उन्हें सहायक दिखते हैं। वे उसे देवता मान पूजा करते हैं। इन देवताओं में अग्नि-इंद्र से लेकर सोम, ओदन (भात) और मधु आदि सैकड़ों चीजें शामिल हैं। इन वेदों में आपको पूजा-प्रेम-घृणा-क्रूरता सभी भावों की अभिव्यक्तियां दिखती है।&lt;br /&gt;चारों वेदों में ऋग्वेद को पहला और महत्‍वपूर्ण माना गया है। ऋग्वेद का आरम्भ मधुच्छन्दा ऋषि के अग्निदेव की अभ्यर्थना में लिखे गए श्लोकों से होती है। अग्नि को ही आरम्भ के लिए क्यों चुना गया इसका कारण इस श्लोक से हम समझ सकते हैं। इस ऋचा के अन्तिम श्लोक में लिखा गया है-हे अग्नि! पिता जैसे पुत्र के पास स्वयं ही पहुंच जाता है। वैसे ही तू हमको सुगमता से प्राप्त हो जाती है।&lt;br /&gt;मतलब, विकास के क्रम में खेतिहर समाज को जो चीजें सहज उपलब्ध होती गईं और लाभकारी बनीं उन्हें देव पुकारा गयाअग्नि की विकास क्रम में महत्‍वपूर्ण जगह है। अग्नि की खोज ने खेतिहर समाज को मांसाहारी समाजों से आगे कर दिया। फिर यह अग्नि धीरे-धीरे सहज उपलब्ध होने लगी इसलिए इसकी अभ्यर्थना से ही ऋग्वेद का आरम्भ किया गया। वेदों में राक्षसों को अग्नि से डरने वाला बताया गया है। इससे भी जाहिर है कि अग्नि से राक्षसों का परिचय ठीक से नहीं था। विकास की कड़ी में वे पिछड़े रहे थे और खेतिहर समाज के कामों में भयवश अवरोध उत्पन्न करते थे। &lt;br /&gt;अग्नि से भी ज्यादा वेदों में इन्द्र देवता की पूजा की गई है। इन्द्र को वर्षा का देवता कहा गया है। यहां भी स्पष्ट है कि खेतिहर समाज के लिए वर्षा प्राथमिक जरूरत है। इस तरह बादलों से वर्षा कराने वाले इन्द्र की समर्थक पूजा भी स्वाभाविक है। अधिकांश श्लोकों में इन्द्र से धन-धान्य-गौ की मांग की गई है। उस काल में गौ खेतिहरों के लिए मुख्य धन या गौ की ज्यादा संख्या से धनी होने का सम्बन्ध था। वर्षा से जहां फसलें होती थी, वहीं गाय को पर्याप्त चारा भी मिलता था। इसलिए इन्द्र से गौ की रक्षा की मांग की जाती थी। गौ से ही खेती के लिए बैल भी प्राप्त होते थे। इसलिए मांसाहारी समाजों से संघर्ष में गौरक्षा मुख्य विषय था। इसी सन्दर्भ में इन्द्र द्वारा वृत्रासुर-वध का प्रसंग आता है। वृत्र को राक्षस पुकारा गया है। जो जल को रोके हुए था। दरअसल वृत्र के मानी वहां बादल से भी है। जिसे तडित कराकर (बिजली गिराकर या वज्र गिराकर) इन्द्र बारिश कराते हैं। यूं आगे वृत्र ब्राह्मण भी कहा गया है, क्योंकि उसकी हत्या के बाद ब्रह्महत्या के भय से इन्द्र तालाब में छिप जाते हैं।&lt;br /&gt;वैदिक काल में यज्ञ एक महत्‍वपूर्ण क्रिया-कलाप था। अधिकांश ऋचाओं में ऋषि देवों को अपना यज्ञ सफल बनाने के लिए आहवान करते दिखते हैं। यज्ञ भी खेतिहर समाज के लिए उस समय एक जरूरी क्रिया थी। खेतिहर समाज को खेती के लिए लगातार जमीन की जरूरत पड़ती थी, चूंकि उस समय चारों ओर जंगल थे, तो उसके लिए वनों काटना और जलाना पड़ता था। इससे नई जमीन हासिल होती थी। यही काम आगे यज्ञ के रूप में मान्य हो गई। यज्ञ में हवन के रूप में जंगल में लाई लकिड़यां जलती थी। उससे उठे धुएं से बारिश होती थी, जो खेतिहर समाज के लिए जरूरी था। यज्ञों को लेकर भी मांसाहारी पूर्वजों से खेतिहर समाज के लोगों का युद्ध होता था। चूंकि यज्ञ के नाम पर वनों के विनाश से उनकी आखेट भूमि नष्ट होती थी। इसीलिए वे यज्ञों को नष्ट करते थे। और राक्षस की संज्ञा पाते थे। वेदों में इस दृष्टिकोण से भी कुछ नया खोजने की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्म (अन्न) सत्यं, जगत मिथ्या ...&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परस्पर सद्भावना, जीव मात्रा के प्रति प्रेम, सहिष्णुता आदि भारतीय लोकमानस के जो सकारात्मक पहलू हैं। उनकी जड़ें, वेदों में ही हैं। वेदों में धर्म और भाषा के विभेद नहीं है। अथर्ववेद के बारहवें कांड के पहले सूक्त में एक पंक्ति है : जनं बिभ्रती बहुध विवाचसं नानाधर्माणां पृथिवी यथौकसम। इसका अर्थ यह है कि अनेक धर्म और भाषा वाले मनुष्यों को पृथ्वी समान रूप से धारण करती है। यह जो वेदों की सहज समतामूलक दृष्टि है, उसे हम उदारता के रूप में व्याख्यायित करते हैं। पर सच्चाई यह है कि उदारता का दयाभाव इन पंक्तियों का आशय नहीं है, बल्कि यह एक सहजबोध है। एक सामाजिक अनुभव। क्योंकि उस समय धर्म का मतलब धर्मराज्य कायम करने से नहीं जुड़ा था, बल्कि धर्म तब आचरण और व्यवहार से जुड़ा था।&lt;br /&gt;वेद ही नहीं ब्राह्मणग्रंथ, अरण्यक, उपनिषद् आदि में भी हमें तत्कालीन लोगों के सहज अनुभव ही प्राप्त होते हैं। गड़बड़ी तब होती है, जब हम उनकी पंक्तियों के अर्थ सन्दर्भ से काटकर प्रस्तुत करते हैं या उन्हें क्रमश: रूढ़ियों की तरह आज भी लागू करना चाहते हैं।&lt;br /&gt;एक चितरंजन सवाल है कि सत्य क्या है। क्या वह चितरंजन भी होता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में सत्य के बारे में लिखा है। चक्षुर्वे सत्यम्, मतलब जो दिख रहा है, वही सत्य है। शतपथ ब्राह्मण में सत्य को देव और ब्रह्म कहा गया है। इसी में आगे कहा गया है कि अभय ही स्वर्ग है। अब यहा¡ सवाल उठता है कि अभय क्या हुआ? दरअसल अभय का सम्बन्ध दृष्टि से है। सत्य को देखनेवाली दृष्टि। यह दृष्टि विकसित हो जाने पर जब आप सत्य को उसके बहुआयामी स्वरूप में समझने लगते हैं तो जीवन को लेकर आपकी आशंकाए¡ कम होती हैं और आप निर्भय होते जाते हैं।&lt;br /&gt;उपरोक्त सन्दर्भ में देखें तो किसी रहस्य के लिए कहा¡ जगह बचती है। बातें इतनी साफ हैं वहा¡ कि हमें किसी स्वामी या बापू की जरूरत नहीं है। इन्हें समझने के लिए अथर्ववेद में लिखा है : गातु वित्वा गातुमित। यानी मार्ग को जानो फिर चलो। यह नहीं है कहीं कि सत्य का दृष्टा मैं हू¡, पैगम्बर या मसीहा और आप सब मेरी राह पर चलें। अथर्ववेद में ही आठवें कांड के पहले सूक्त में कहा गया है कि पितरों की राह पर न चल (मानुगा: पितृन)। तो, लीक लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत, जैसे लोक में प्रचलित मुहावरों की जड़ें भी हम वेदों में पाते हैं। वेदों में हर जगह मन की, बुद्धि की ही महत्ता है। अपनी बुिद्ध को जो सही लगे उसी राह चलने की बात वहा¡ है। यजुर्वेद में है कि यह बुिद्ध ही सर्वोपरि है (इयमुपरि भति:) यही विश्वकर्ता है। एक जगह लिखा है कि मन रूपी गंधर्व ही प्रजापति और विश्वकर्मा है। आगे है कि प्रजापति (मन) ने असत्य में अश्रद्धा और सत्य में श्रद्धा को स्थापित किया। &lt;br /&gt;अगर उपनिषदों को देखें तो वहा¡ और भी आगे की बातें हैं। इशावास्योपनिषद् में एक जगह कहा गया है, निरे भौतिकवादी अंधकार में जा पहुंचते हैं। अब हमारे बापू नाम केवलम् वाले यह पंक्ति पढ़कर लेगेंगे भौतिकवादियों को समझाने की देखो कैसी गर्हित बातें हैं परम्परा में, भौतिकवादियों के लिए। पर इसी श्लोक की अगली पंक्ति में लिखा है, निरे अधयात्मवादी उससे भी गहरे अंधकार में जा पहु¡चते हैं।&lt;br /&gt;यहा¡ सवाल उठता है कि तब क्या किया जाए? भौतिकवाद, न अधयात्मवाद। तो फिर! यहा¡ निषेध नहीं है, बल्कि कहा गया है किोई भी वाद हो उसे आंख मूंदकर ना स्वीकारें जीवन के द्वंद्व को समझें। और अपने समय सन्दर्भ में उसकी व्याख्या करें।&lt;br /&gt;अगर धयान से देखा जाए तो हमारे पुराग्रंथों में भौतिकवाद को कहीं भी अध्‍यात्म से कम नहीं आंका गया है। सामवेद में एक ऋचा में अन्न को ब्रह्म से भी पहले जन्मा बताया गया है। अरण्यक में लिखा गया है कि अन्न ही ब्रह्म है। अरण्यक के इसी अèयाय में आगे कहा गया है कि तप (कर्म) से ही ब्रह्म (अन्न) को पाया जा सकता है। अरण्यक के आठवें अध्‍याय की दूसरी कंडिका में कुछ पंक्तियां यूं हैं : &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्नं ही भूतानां ज्येष्ठ्म तस्मात् सर्वेषध मुच्यते।&lt;br /&gt;अन्नाद् भूतानि जायन्ते, जातान्येन्नेन वधनते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब जीवन-जगत् में अन्न ही श्रेष्ठ है। वह सभी रोगों की औषध है। अन्न से ही प्राणी पैदा होते हैं और अन्न से ही बढ़ते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में तो अन्न को विराट भी बताया गया है। (अन्नं वै विराट) उपरोक्त तथ्यों के प्रकाश में अगर अब हम कहें कि ब्रह्म (अन्न) सत्यं, जगत मिथ्या तो क्या अनर्थ होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;साधो, मन माने की बात &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;मन एवं मनुष्याणां &lt;/em&gt;मन यानी कि मानस ही मनुष्य है, एक प्रचलित उक्ति है। वेद भी मन की महत्ता से भरे हैं। आज भी मन की शक्ति से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहा है कोई। सारे संयम मन से ही संचालित होते हैं। कबीर ने भी लिखा था : मन ना रंगाये रंगाये जोगी कपड़ा। पिछले वर्षों में भारत में ऐसे जोगियों की धूम मची रही। वेद-परम्परा आदि के नाम पर एड़ी-चोटी का पसीना एक करते रहे।&lt;br /&gt;काश! उन्होंने वेदों को पढ़ने की जहमत उठाई होती तो उनहें एक-दूसरे के खून से अपने हाथ न रंगने पड़ते। मानो तो देव नहीं तो पत्थर यह लोकोक्ति वैदिक ही है। क्योंकि वहा¡ भी यही लचीलापन है। जिसके मन को जो भा रहा है, वही बात कर रहा है, कह रहा है। वहां कोई नियम नहीं है, मन को बांधने वाला।&lt;br /&gt;यजुर्वेद में मन के बारे में ऋचा है : इयमुपरि मति:, मतलब यह जो मानस से उपजी बुिद्ध है। वही सर्वोपरि है। आगे की ऋचाओं में उसे विश्वकर्मा भी बताया गया है। प्रजापति विश्वकर्मा मनो गंèार्व: यानी मन रूपी गंधर्व ही प्रजापति ब्रह्म और विश्वकर्मा है।&lt;br /&gt;दरअसल वेद के सारे कथन `मनमाने´ की बात हैं। वे प्रमाण हैं कि कैसे मानव मन का निरन्तर परिष्कार होता गया। उन्होंने वही लिखा, जो उनके मन को भाया। ऋग्वेद के पांचवें मंडल के सत्तरवें सूक्त में एक पंक्ति है-वय ते रुद्रा स्यामा। यानी हम भी दु:खहारी रुद्र हों। वहीं पहले मंडल के 164वें सूक्त में एक पंक्ति में इसी तरह कहा गया है कि हम सब भगवान हों।&lt;br /&gt;माने आदमी-देवता और भगवान में कोई विशेष अन्तर नहीं था। वैदिक माल में वैदिक ऋषि देवता होने की कामना करते थे, देवता होते थे और जो उनके मन को भाता था उसे देवता पुकारते थे। यह सब मनोभाव के स्तर पर था, उसकी कोई मूर्ति नहीं थी। यजुर्वेद के बत्तीसवें सूक्त में एक पंक्ति है : न तस्य प्रतिमा ·अस्ति। यानी उस परमचैतन्य की मूर्ति नहीं बनाई जा सकती। ऐसा इसलिए था कि ईश्वर या देव एक मनोभाव था। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग काल में उसके जुदा निहितार्थ थे। &lt;br /&gt;देखा जाए तो वैदिक काल में मनुष्यों का मन भी तरह-तरह की कल्पनाएं करता है। जब वह सुबह को देखता है तो उल्ल्सित हो उठता है। और उषा की अर्चणा में ऋचाएं रचता है। रात से वह भी भय खाता है और उसे सर्वग्रासी बताता है। सोमपान के बाद उसका मन भी प्रमत्त हो जाता है और वह असंभव कल्पनाएं करने लगता है। जरा ऋग्वेद के दसवें मंडल के 119वें सूक्त की पंक्तियों के अर्थ देखें। उसमें कहा गया है : ``मैं पृथ्वी को जहां चाहूं उठाकर रख सकता हूं, क्योंकि मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं।´´ या ``मेरा एक पक्ष स्वर्ग में स्थापित है तो दूसरा पृथ्वी पर। क्योंकि मैं अनेक बाद सोमपान कर चुका हूं।´´&lt;br /&gt;मनोभावों को स्वच्छन्द ढंग से अभिव्यक्त करने की यह प्रवृत्ति मात्रा पुरुषों में ही नहीं है। स्त्रियां इसमें और भी आगे है। ऋग्वेद के अन्तिम मंडल के 159वें सूक्त में पंक्ति है-अहं के तुरहं मूर्धा इहा मुग्रा विवाचुनी। यानी मैं (गृहपत्नी) घर की, परिवार की ध्‍वजा हूं। मस्तक हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वेद चर्चा - असुर नहीं, पूर्व देव &lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परम्परा में असुर देवता और असुर दोनों के पूर्वज हैं। उन्हें इसलिए पूर्वदेवा: भी पुकारा जाता है, संस्कृत में, असुर शब्द तो आधुनिक देवों के पूर्वदेवों (असुरों) से संघर्ष के बाद उनके लिए घृणा को प्रकट करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। सभ्यताओं के संघर्ष में हमेशा आधुनिक ही जीतते हैं और वे अपने हारे हुए शत्रुओं को सभ्य ढंग से क्यों पुकारेंगे। अर्थववेद के पृथ्वीसूक्त में एक पंक्ति है : असुरानभ्यवर्तयन्। इसका अर्थ है-जिस पृथ्वी पर पुराने लोगों ने कई प्रकार के कार्य किए और जिस पर देवताओं ने `असुरों´ पर आक्रमण किए । ये पुराने लोग वे पूर्वदेव ही थे। &lt;br /&gt;कुछ लोग परम्परा के नाम पर खुद को वेदों तक सीमित रखते हैं वे पूर्वदवों की कृतियों को भूल जाते हैं। जबकि जानकर वेदों के पूर्व के साहित्य को भी उतना ही महत्‍व देते हैं। पौराणिक हिन्दू धर्म के पहले से निगमागम नाम प्रसिद्ध है। निगम का माने वेद हुआ और आगम का मतलब प्राग्वैदिक वैदिकेतर परम्परा है। तुलसी दास ने भी निगमागम धर्म सम्मतं कहा है।&lt;br /&gt;पूर्वदेवों को `अयज्ञा:´ `अनिंद्रा´ आदि भी पुकारा जाता था। अयज्ञा यानी यज्ञ प्रथा को न मानने वाले और अनिंद्रा मतलब इन्द्र को न माननेवाले। यज्ञ को मानने वाले उन्हें दास और दस्यु भी पुकारते थे। प्राग्वैदिकों के और भी कई नाम थे, जैसे-विद्याधर, नाग, यक्ष, राक्षस आदि।&lt;br /&gt;यह कितनी मजेदार बात है कि असुर देवों के पूर्वज ही नहीं थे, वाकई उन्होंने देवों से पहले बहुत-सी अच्छी चीजें रची थीं। वहां सबकुछ बुरा नहीं था जैसा कि देवों ने उन्हें आगे साबित करने की कोशिश की। संभवत: वे सभ्य भी थे। भवन निर्माण की कला भी वे जानते थे। इन्द्र का एक नाम पुरंदर यानी पुरों (नगरों) को नष्ट करने वाला भी है। महाभारत में भी एक जगह मय असुर का जिक्र है जिसने पांडवों के लिए भवन निर्माण किया था।&lt;br /&gt;दरअसल इस बारे में कुछ भी साफ-साफ नहीं कहा जा सकता। यह भी हो सकता है कि देवों ने दस्युओं को पराजित कर दास बना लिया उनसे तरह-तरह के काम कराया गया और स्वभावत: वे निपुण हो गए। यूं भी सारे कर्मकार और शिल्पकार तथाकथित सवर्ण जातियों के घेरे के बाहर पड़ते हैं। देखा जाए तो तथाकथित सारी सभ्यताओं का निर्माण दासों के शोषण से हुआ है। &lt;br /&gt;अध्‍यात्म, दर्शन, ब्रह्मचर्य, आश्रम आदि की स्थापना भी देवों ने नहीं असुरों ने की थी। प्रह्लाद भी असुर थे उनके पुत्र कपिल ऋषि ने ही ये स्थापनाएं की थीं। यूं देव और असुर का बहुत साफ बंटवारा भी नहीं है। वैदिक देवों में एक देवता असुर भी है। फिर ऋषियों में एक कुत्स ऋषि हैं, यह शब्द कुत्सा से जुड़ा है।&lt;br /&gt;ऋषि में सारी अच्छाइया¡ ही नहीं होती थीं। इस माने में ऋषि शब्द मुनि से बहुत दूर पड़ता है। जबकि हम दोनों का एक साथ उच्चारण करते हैं। ऋषि-मुनि। ऋषि वैदिक शब्द है। जबकि मुनि बौद्ध और जैन धर्म से जुड़ता है। ऋषि जहां मूलत: मांसाहारी हैं, वहीं मुनि अहिंसक। ऋषि वेद सुननेवाले शूद्र को कान में गर्म रांगा भरने की बात करते हैं। जबकि मुनि दलितों के हितैषी और बौद्ध-जैसे सन्त सम्प्रदायों के जन्मदाता। मुनि मूलत: प्राग्वैदिक (वेदों के पूर्व से) हैं।&lt;br /&gt;परम्परा में शिवत्व की जो भावना है उसका भी श्रोत वैदिकेत्तर (वेद से पूर्व) है। वेदों में शिव की नहीं रुद्र की चर्चा है। वहां रुद्र अन्तरिक्ष के विनाशकारी देवता हैं। जबकि शिव का सम्बन्ध पूर्वदेवों से है। असुर गण (भूत-प्रेत-पिशाच) उनके सहज मित्र हैं। यक्ष और राक्षस भी उन्हें प्रिय हैं। अपने असुर गणों की सहायता से ही उन्होंने यक्ष प्रजापति का वैदिक यज्ञ विध्‍वंस किया था।&lt;br /&gt;इसी तरह हनुमान, भैरव, शक्ति, गणेश आदि का सम्बन्ध भी शिव से है। वेदों में इनका स्थान नहीं है। कहीं जिक्र है भी तो गौण रूप में। वेदों में ग्राम है, पर नगर नहीं। वहीं पुराणों में नगर निर्माता असुर मय दानव की चर्चा है।&lt;br /&gt;वेद शब्द का सम्बंध विद्या से है। विद्या जानने वालों से है। वेद चार ही हैं आज। यूं वेदत्रयी भी पुकारा जाता है। इसमें अथर्ववेद को छांट दिया जाता है। इसी तरह पहले धनुर्वेद, आयुर्वेद, गंधर्ववेद, सर्पवेद, पिशाचवेद, असुरवेद, आदि भी थे। जिन्हें बाद में भुला दिया गया है। देखा जाए तो असल में कर्मवेद वही थे, जबकि वेदत्रयी तो एक तरह से मनोवेद हैं। इसकी बातें भावनापरक और आकाशी ज्यादा हैं। जबकि बाकी वेद (विद्याएं) जीवन-जगत के ज्यादा काम की थीं। बाकी विद्याएं प्राग्वैदिक काल से ही चली आ रही थीं। प्राग्वैदिक देवों के अलग-अलग कामों से जुड़े उनके नाम थे, उनमें विविधता थी। जबकि वैदिक काल में एक मात्र मन की महत्ता को ही विविध रूप दे दिया गया। यजुर्वेद में एक श्लोक है, सूक्त 32 में-उसका अर्थ है कि अग्नि, वायु, आदित्य, प्रजापति, आदि एक ही देवता हैं। वे एक ही मूलतत्‍व की विभूतियां हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;स्त्रियों ने भी रची हैं वैदिक ऋचाएं&lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेदों के पुनरपाठ की इस कड़ी में आप देखेंगे कि जिस स्त्री के वेद पढ़ने पर ही प्रतिबंध था, उसके कई हिस्सों की रचयिता वे खुद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेदों को लेकर सबसे बड़ा वितंडा यह है कि यह अपौरुषेय है, ब्रह्मा की लकीर है, वेदों का अध्‍ययन करने पर यह भ्रम सबसे पहले दूर होता है। वेद की हर ऋचा को रचनेवाले ऋषि का नाम उसमें दर्ज है और ऋषि एक-दो नहीं पच्चीसों हैं, जिनमें दर्जनों नारियां है। अब कोई एक लेखक हो तो उसका नाम लिखा जाए वेद के लेखक के रूप में, बहुत सारे लेखक होने के कारण ही सबका नाम उनकी रचना के साथ दे दिया गया है।&lt;br /&gt;वेद ब्रह्मा की लकीर भी नहीं हैं, इस बारे में तो हमारे पुराने शास्त्रों में ही कई कथन मिल जाएंगे। परशर-माध्‍वीय में कहा गया है-&lt;br /&gt;श्रुतिश्च शौचमाचार: प्रतिकालं विमिध्‍यते।&lt;br /&gt;नानाधर्मा: प्रावर्तन्ते मानवानां युगे युगे।।&lt;br /&gt;मतलब, हर युग में मनुष्यों की श्रुति (वेद), आचार, धर्म आदि बदलते रहते हैं। अब सवाल उठेगा कि वेदों की तब क्या प्रासंगिकता है। जवाब में हम सिर ऊंचा कर कह सकते हैं कि वेद हमारे आदि पुरुषों-स्त्रियों के प्रथमानुभूत सुन्दर विचार हैं, पर वे अन्तिम विचार नहीं हैं। दरअसल, वेद उस समय की उपज हैं, जब विकास क्रम में लगातार नई-नई चीजों की खोज हो रही थी।&lt;br /&gt;उनमें जो भी चीजें थीं, जो हमें कुछ देती थीं, वे आगे देवता कहलाने लगीं। ऐसा नहीं था कि केवल लाभदायक चीजें ही देवता कहलाईं। जो भय त्रास देती थीं, वे भी देवता कहलाई, जरा अपने कुछ प्रचलित वैदिक देवताओं के नाम देखें-जंगल, असुर, पशु, अप्सरा, बाघ, बैल, गर्भ, खांसी, योनि, पत्थर, दु:स्वप्न, यक्ष्मा (टीवी), हिरण, भात, पीपल आदि।&lt;br /&gt;अब कुछ अप्रचलित ऋषियों के नाम देखें जिन्होंने वैदिक ऋचाए रचीं-मानव, राम, नर, कुत्स, सुतम्भरा, अपाला, सूर्या सावित्री, श्रद्धा कामायनी, यमी, शची पौलमी, ऊर्वशी आदि। वेदों की रचना में स्त्रियों की महत्‍वपूर्ण भूमिका है, यह उपरोक्त स्त्री ऋषियों की ऋचाओं को पढ़कर जाना जा सकता है।&lt;br /&gt;मजेदार बात यह है कि स्त्री ऋषियों ने कई ऐसी ऋचाएं रची हैं जिनमें उन्होंने खुद को ही सर्वशक्तिमान कहा है। &lt;br /&gt;कहीं यह स्त्रियों की मजबूत स्थिति ही तो नहीं है कि आगे षड्यंत्रकारी पुरुष वैदिक भाष्यकारों ने उनको वेद पढ़ने की ही मनाही कर दी, जिसकी आज तक वकालत की जाती है। जो स्त्रियां¡ खुद वेद रच सकती हैं, उन्हें उनका पाठ करने से कोई कैसे रोक सकता है? वेद को पढ़ें, तो वे अपने समय की सहज रचना मालूम पड़ती हैं। बातें वहां बड़ी सीधी हैं। उनको समझने के लिए किसी प्रकाण्डता की जरूरत नहीं है, जरूरत उनकी अनुवाद के साथ उपलब्धता की है।&lt;br /&gt;वेदों में प्रकृति को लेकर सहज उल्लास है, प्रकृति आज भी हमें उसी तरह उल्ल्सित करती है। वहां छोटी-छोटी कामनाओं के लिए आदमी इन्द्र से याचना करता है। आज तक वह याचक कृति हमारे लिए अभिशाप बनी चली आ रही है। छोटे-छोटे डरों से भयाक्रान्त वैदिक मनुष्य ऋचाओं में उन्हें देवता पुकारता, उनसे मुक्ति की मांग करता है।&lt;br /&gt;वह विकास का आरिम्भक दौर था और जानने की प्रक्रिया में यह एक सहज क्रिया थी, विशिष्ट नहीं। जैसे ऋग्वेद के दसवें खंड के 184 वें सूक्त में ऋषि त्वष्टा लिंगोक्ता : देव से प्रार्थना करते हैं-विष्णुयोनि कल्पयतु, त्वष्टा रुपाणि पिंशतु। मतलब, देवता इस स्त्री को प्रजनन योग्य बनावें। आज इस काम के लिए लोग डॉक्टर के पास जाते हैं।&lt;br /&gt;क्या उन्हें आज भी किसी ऋषि की खोज करनी चाहिए? इसी तरह सूक्त 165 में कहा गया है, `इस अमंगलकारी कबूतर को हम पूजते हैं। हे विश्वदेव, इसे यहां से दूर करें।´ क्या आज भी हमें कबूतर को अशुभ मान उनसे डरना चाहिए। आज कबूतर हमारे मिन्दरों में छाए रहते हैं और कोई उन्हें अशुभ नहीं मानता है। मतलब वेदों में सारा अटल ब्रह्मवाक्य ही नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सबसे बड़े वैदिक देवता भात ( ओदनम् ) &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृहस्‍पति मस्‍तक है भात का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अश्‍व इसके कण हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गायें हैं चावल के दाने&lt;br /&gt;और मच्‍छर हैं फोंतरे&lt;br /&gt;घोंघे हैं इसके उूपर के छिलके&lt;br /&gt;बादल इसका चारा है&lt;br /&gt;काला लोहा है इसका मांस&lt;br /&gt;और रूधिक है तांबा&lt;br /&gt;जस्‍ता इसकी राख&lt;br /&gt;हरित है इसका रंग&lt;br /&gt;और नीलकमल है&lt;br /&gt;इसकी गंध&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह धरती मिटटी का वर्तन है&lt;br /&gt;इसमें पकता है भात&lt;br /&gt;आकाश ढक्‍कन होता है&lt;br /&gt;हल की फाल पसलियां हैं इसकी&lt;br /&gt;मिटटी है इसका मल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऋतुएं रसोइनें हैं इसकी&lt;br /&gt;दिन और रात समिधाएं हैं&lt;br /&gt;पांच मुख वाले चरू को&lt;br /&gt;पका रहा घाम&lt;br /&gt;इस भात को अर्पित कर&lt;br /&gt;जो कर रहा है यज्ञ&lt;br /&gt;सारे लोक&lt;br /&gt;उसे प्राप्‍त होते हैं।&lt;br /&gt;( वरिष्‍ठ कवि विजेन्‍द्र के संपादन में निकल रही लघु पत्रिका &lt;em&gt;कृति ओर&lt;/em&gt; के जुलाई-सितंबर 2007 अंक में राधावल्‍लभ त्रिपाठी द्वारा अनुदित &lt;em&gt;अर्थववेद&lt;/em&gt; से लिया गया अंश )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेदों में क्‍या है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेद देव स्‍तुति से भरे हैं। देवता माने जो देता है। सुर जो सुरा का सेवन करते हैं असुर जो नहीं करते। वेदों में सर्वाधिक प्रार्थना इंद्र की हुई है। पर इसका मतलब यह नहीं कि इंद्र सबसे महत्‍वपूर्ण देवता हैं। इंद्र के बाद सबसे ज्‍यादा मंत्र अग्नि पर है। ऋग्‍वेद का आरंभ अग्नि पर लिखी ऋचा से होता है। यह सम्‍मान इंद्र को नहीं मिला है। दरअसल किस पर कितनी ऋचा है इससे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण यह है कि उसमें क्‍या लिखा है। इंद्र पर लिखी गईं अधिकांश ऋचाएं धन-धान्‍य के लोभ में लिखी गई हैं। यजुर्वेद के तीसरे अध्‍याय में लिखा गया है कि हे सैकडों कर्मो वाले इंद्र , हमारे और तुम्‍हारे मध्‍य परस्‍पर क्रय-विक्रय जैसा व्‍यवहार संपन्‍न हो। अर्थात मुझे हर्विअन्‍न का फल मिलता रहे। हे इंद्र मूल्‍य लेकर क्रय योग्‍य फल मुझे दो। फिर उन ऋचाओं में इंद्र को सर्वश्रेष्‍ठ भी नहीं बताया गया है। अथर्ववेद में भात यानि चावल को देव मानकर कई ऋचाएं हैं। उनमें भात को जो सम्‍मान मिला है वह इंद्र के लिए लिखी गई सैकडों ऋचाओं में नहीं है। &lt;br /&gt;भात को न केवल त्रिदेवों का कारक बताया गया है बल्कि उसे काल का भी जन्‍मदाता माना गया है। इसी तरह उच्छिष्‍ट यानि जूठन-मधु की प्रशंसा में जो लिखा गया है उनमें भी मधु की इंद्र से अच्‍छी स्‍तुति है। इसी तरह रूद्र को भी जो महत्‍व दिया गया है यजुर्वेद में वह इंद्र से कम नहीं है। एक श्‍लोक में लिखा गया है- हे रूद्र आपके नेत्रों में तीनों लोक प्रकाशित हैं। आपको अन्‍य देवताओं से अलग और उत्‍कृष्‍ट जानकर हम आपको यज्ञ का भाग देते हैं। रूद्र को चिकित्‍सक के रूप में महत्‍व देते हुए कहा गया है कि - तुम सर्वरोगनाशक औषधि प्रदान करो और हमें जन्‍म-मरण के चक्र से मुक्‍त करो।&lt;br /&gt;ऐसा नहीं था कि वैदिक ऋषि केवल देवों और त्रिदेवों को ही पूजते थे। वे भात, मधु, पत्‍थर, आदि के साथ यजमान को भी पूजते थे। अपनी प्रशस्ति गाने में भी वे पीछे नहीं रहते थे। बहुत से ऋषियों ने खुद पर ही ऋचाएं लिखी हैं। जैसे अथर्व वेद में अथर्वा खुद की अभ्‍यर्थना करते हुए अपने को देवताओं से भी बडा दिखाते हैं।&lt;br /&gt;यजुर्वेद के तीसरे श्‍लोक में यजमान के लिए ऋषि लिखते हैं- हे यजमान, यश के निमित्‍त अन्‍न और अपरिमित धन व बल पाने के लिए मैं तुझे पूजता हूं। इस तरह वेद देवों-मनुष्‍यों-ऋषियों के भौतिकवादी व्‍यवहार को ज्‍यादा उजागर करते हैं आध्‍यात्कि व्‍यवहार को कम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;टिप्‍पणियां-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;deepanjali ने कहा… &lt;br /&gt;आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.&lt;br /&gt;ऎसेही लिखेते रहिये.&lt;br /&gt;क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.&lt;br /&gt;जो हमे अच्छा लगे.&lt;br /&gt;वो सबको पता चले.&lt;br /&gt;ऎसा छोटासा प्रयास है.&lt;br /&gt;हमारे इस प्रयास में.&lt;br /&gt;आप भी शामिल हो जाइयॆ.&lt;br /&gt;एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.&lt;br /&gt;September 25, 2007 1:48 AM  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतुल ने कहा…&lt;br /&gt;वेदों और उपनिषदों में स्त्रियों की बडी भूमिका रही है, जिसपर ब्राह्मण और पुराण काल से रोक लगने लगी, जब देश में बड़े-बडे सामंती चरित्र के साम्राज्य स्थापित होने लगे.&lt;br /&gt;April 14, 2008 8:07 AM  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देव प्रकाश चौधरी ने कहा… &lt;br /&gt;रोचक लेख....जानकारी काम की है। शुक्रिया&lt;br /&gt;April 14, 2008 8:09 AM  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजयशंकर चतुर्वेदी ने कहा… &lt;br /&gt;आप अच्छा लिख रहे हैं. कृपया जारी रखें!&lt;br /&gt;May 19, 2008 5:42 AM  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतुल ने कहा… &lt;br /&gt;फ़ारसी में अहुर देव ही हैं. वेद में भी थे पर बाद में सुर के विरोधी माने जाने लगे. अवेस्ता में भी चर्चा है.&lt;br /&gt;April 15, 2008 9:05 AM  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Udan Tashtari ने कहा… &lt;br /&gt;आभार इस आलेख के लिए.&lt;br /&gt;August 13, 2008 7:36 AM  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभय तिवारी ने कहा… &lt;br /&gt;पूरा लेख बेहतरीन बन पड़ा है..सिवाय एक बात के.. आप ने देवता माने देने वाला बताया है.. जबकि देवता की उत्पत्ति द्युत धातु से है.. द्युत माने चमकना.. इस द्युत से ही द्युति, द्यूत, दिवस, दिव्य, देव , देवता, द्योतक आदि शब्द बने हैं.. तो देवता का अर्थ चमकने वाली शक्ति के अर्थ में बनेगा..&lt;br /&gt;आशा है आप अन्यथा न लेंगे और अपना अमूल्य काम निर्बाध जारी रखेंगे..&lt;br /&gt;August 16, 2008 6:40 AM  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हकीम जी ने कहा… &lt;br /&gt;Veda is a body of religious and philosophical beliefs and cultural practices native to India and based on a caste system; casteism is not poisonous, its the most wonderful social ordering of people based on their individual skills (work)&lt;br /&gt;Discrimination based on the work u do, is the inhuman and poisonous thing..&lt;br /&gt;Even today people all over the world discriminate others based on the work they do, their earnings, their type of life, money, their knowledge, their religion, their race, their skin color etc., and what no...&lt;br /&gt;more progressed humans(in some way) have always been discriminating less progressed humans, this should stop through out the world, you cannot blame india, hindus and casteism for this.&lt;br /&gt;It is false to say caste and skin color are related, they are darker brahmins and there are whiter lower caste people..&lt;br /&gt;In ancient India...In every village there used to be atleast one family belonging to each of the caste(means people belonging to working groups like merchants, teachers, labourers, leader), and only if each mingle with each other.. and work for each other...every one in the village will be happy..&lt;br /&gt;So in every function(ie either temple, marriage or any social function)every caste(family) in the village used to take part...&lt;br /&gt;and every caste used to contribute to the function....&lt;br /&gt;it was a custom that every caste profit from that function and grow.(for eg in marriage-the brahmins do the mantra part, the vaisyas take care of all the business &amp; agri part of the function, the sudras, does the shaving, haricut and other help for smooth functioning of the marriage,kshtriya takes care and looks to that no untoward incident happens in the function )&lt;br /&gt;it is because people started discriminating people based on the work they do and failed to do their duty that india such a rich country once, is now in this condition.&lt;br /&gt;Brahmins failed to do their teaching and spiritual duty, thats why the lack of sprituality in people, no one knows what vedas and gita is..and some western religion is converting people and explaining spirituality to a highly spiritual india.&lt;br /&gt;Vaisyas failed to do their duty that why the economy went down..&lt;br /&gt;the kshatriyas did not do their duty thats why islamic, protugese and british people from west invaded us and looted all treasures (both intellectual and material) what we had.&lt;br /&gt;All now in india are sudras, working in front of computers for some alien country or doing jobs for others..i'm happy to be a sudra and work for others, but all other caste have not done their duty and thats why india is alien for indians them selves...&lt;br /&gt;you can see intercaste marriages in mahabharatha ramayana etc.,&lt;br /&gt;its false to say that no one was allowed to inter marry&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/301554459270010767-3357089802520366550?l=chitrahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4ip8yHx8bjhmVOdHOgpmRTV-JRM/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4ip8yHx8bjhmVOdHOgpmRTV-JRM/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4ip8yHx8bjhmVOdHOgpmRTV-JRM/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/4ip8yHx8bjhmVOdHOgpmRTV-JRM/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/tbJp/~4/tq-9QsP7SS8" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://chitrahindi.blogspot.com/feeds/3357089802520366550/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=301554459270010767&amp;postID=3357089802520366550" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/301554459270010767/posts/default/3357089802520366550?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/301554459270010767/posts/default/3357089802520366550?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/tbJp/~3/tq-9QsP7SS8/blog-post_24.html" title="वेदों में क्‍या है - कुमार मुकुल" /><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="25" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKJRr0peKZI/AAAAAAAAAiA/GPIbKM7gl6k/s72-c/dasve.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://chitrahindi.blogspot.com/2008/08/blog-post_24.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0cCRns-cCp7ImA9WxdaEU8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-301554459270010767.post-9126945080751801832</id><published>2008-08-18T22:48:00.000-07:00</published><updated>2008-08-18T22:51:07.558-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-08-18T22:51:07.558-07:00</app:edited><title>स्त्रियां पिकासो की - कुमार मुकुल</title><content type="html">&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_Zgr_j04leW8/SB_YWCLxM1I/AAAAAAAAAWw/pbQvstELPKQ/s1600-h/vikend7_1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_Zgr_j04leW8/SB_YWCLxM1I/AAAAAAAAAWw/pbQvstELPKQ/s400/vikend7_1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5197110368063796050" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सिद्ध&lt;/strong&gt; मनोविज्ञानी कार्ल युंग ने अपने एक लेख में पिकासो और उसकी कला को ि‍स्कजोफ्रेनिक कहा था। पिकासो के जीवन में और उसके चित्रों में आई दर्जन भर से ज्यादा स्त्रियों के साथ उसके व्यवहार को अगर देखा जाए तो युंग की बात सही लगती है। पर कलाकार यही तो करता है कि अपनी कमियों को एक चेहरा दे देता है जिससे वह खुद उसे पहचान पाता है उससे लड़ता है और इस तरह खुद को बचा लेता है। शायद पिकासो ने भी ऐसा ही किया। उसके जीवन में छह घोषित प्रेमिकाएं थीं जिनमें से दो से उसने विवाह किया था। उसके लंबे जीवन में अक्सर एक साथ दो या तीन प्रेमिकाएं रहती थीं। यहां तक कि वह उनके आने जाने के लिए कई दरवाजे रखता था और किसे किस दरवाजे से आना है यह भी तय करता था। इसके लिए एक मित्रा को वह हमेशा मुस्तैद रखता था।&lt;br /&gt;उसके जीवन में आने वाली स्त्रियों में फ्रांसुआज, ओलिविए, ओल्गा, मारी तेरेज, डोरा मार, जैकलिन प्रमुख थीं। बेल फर्नांद, मादलेन, स्टाइन, नुश, इव्वा, युजेनिया आदि उसकी अन्य सहचरियां थीं। यह सब असामान्य नहीं था। नब्बे साल का लंबा जीवन जिया था पिकासो ने। और वह चित्रों के लिए मॉडलों का प्रयोग नहीं करता था। जीवन में आई स्त्रियों को ही वह मॉडल के रूप में प्रयोग करता था, या यूं कहें कि मॉडल के रूप में आई स्त्रियों के साथ वह टिककर रहने लगता था। चाहे वह वेश्या हो या किसी की पत्नी या उसके नाम से प्रभावित हो उसे देखने को उसके आस-पास मंडरती लड़कियां।&lt;br /&gt;कुल मिलाकर अपनी प्रेमिकाओं के साथ उसका व्यवहार न्यायसंगत नहीं था। वह उनसे प्रेम नहीं करता था। और किसी स्त्री द्वारा छोड़ जाना उसे बर्दाशत नहीं होता था उसे वह किसी भी तरह अपने से बांèो रखना चाहता था। चित्रों में भी वह अधिकांश तौर पर उन्हें विकृत तौर पर चित्रित करता था। यूं कई सहज, सुंदर चित्र भी बनाए उसने। फर्ंनाद पिकासो की पहली जीवन सहचरी थी। वह पिकासो के जीवन का दरिद्रता का दौर था। सबमें उसने उसका साथ दिया। माधुरी पुरंदरे लिखती हैं - पाब्लो बड़ा शक्की था। कला और स्त्री दोनों के बारे में उसकी जिद विजेता होने की थी। मेरी स्त्री मुझे छोड़कर चली न जाए यह डर उसे हमेशा छेदता रहता था। फर्नांद को तो वह अकेले घर से बाहर नहीं ही जाने देता था, बाहर जाते &lt;br /&gt;समय उसको कमरे में तालाबंद कर जाता था। &lt;br /&gt;ये और ऐसी तमाम हरकतों के मूल में पिकासो के युवा काल की एक घटना के उसके मन पर पडे़ प्रभाव को देखा जा सकता है। वह थी उसके एक मित्रा काजागमास द्वारा प्यार में की गयी आत्महत्या। काजागमास ने नोंकझोंक में अपनी प्रेमिका जर्मेन पर गोली चला दी थी और उसे मरा समझ कर खुद को गोली मार लिया था। इसका उस पर गहरा असर पड़ा। उसने इसे कला में ढाल दिया। उससे संबंधित कई चित्र बनाये उसने। और जैसे खुद को चेतावनी दी कि इस तरह की मौत नहीं मरनी। फिर पिकासो की पहली प्रेमिका फनाद उसे छोड़कर किसी दूसरे चित्रकार के साथ घर छोड़कर चली गयी थी। इस तरह उसका शक्की व्यवहार और फिर उससे पैदा हुई इस तरह की परिणतियों ने उसे स्त्री के मामले में कठोर बना दिया। पिकासो नियमित वेश्याघरों को जाता था और वहां के जीवन का भी उस पर असर पड़ा। वहां उसने मात्र शारीरिक प्रेम को पाया और पैसे के व्यापार को। वह सोचता कि निष्कलुष प्रेम कैसे टिक सकता है। फिर चौदह साल की उम्र में ही जिस तरह उसने काम भावना प्रधान जीवन आरंभ किया था वह अंत तक चलता रहा। इस तरह प्रेम हमेशा उसे एक विभ्रम में डालता था। वह उसका उपयोग कला में खुद को निखारने में करता था। उसकी सृजन शक्ति का आधार वही था पर अपने इस आधार पर ही वह बराबर चोट करता था। उसके जीवन में आई हर स्त्राी ने उसकी कला को एक नया मुकाम दिया और सबातेज के हिसाब से उसके कला के हर कालखंड से जुड़ी स्त्रियों का नाम उसके काम के साथ जोड़ा जाना चाहिए। विध्‍वंस और सृजन जैसे एक साथ उसकी कला में चलते रहते थे। जिनसे वह प्रेम करता उन्हें ही रूलाता और फिर उस रुदन को भी चित्रिात करता। पिकासो के अनुसार चित्रकला विध्‍वंस का कुलजमा योग होती है।  &lt;br /&gt;एक मनमौजीपन पिकासो में हमेशा रहा। मनोवैज्ञानिक मेडेल के अनुसार उसमें अमानवीय सा कुछ नहीं है उसने स्वध्‍याय तो काफी किया पर दिशाहीन। यह दिशाहीनता हमेशा उसके बात-व्यवहार में देखी जा सकती है। वह हमेशा अपने साथ एक रिवाल्वर रखता था। और आरंभ के दिनों में रात में जब तब फायर कर लोगों को चौंकाता था।&lt;br /&gt;उसके जीवन में आयी स्त्रियों का पता लोगों को उसके चित्रों से लगता था। फिर उसकी नायिका उसके जीवन में अवतरित होती थी। जैसे ही किसी नयी नायिका का प्रवेश होता पुरानी उसके कैनवस से गायब होने लगती और जीवन से भी वह किनारे कर दी जाती। पिकासो की बनायी अिधकांश नंगी स्त्रियां कुरूप और राक्षसी-सी हैं। कभी उसने स्टाइन को कहा भी था कि प्रत्येक कला कुरूपता की घुट्टी पीकर ही जन्मती है। &lt;br /&gt;पिकासो की मित्र स्टाइन पता लगा पाती कि उसके कैनवस की नयी नायिका कौन है तब तक इव्वा का उसके जीवन में पदार्पण हो चुका था। इव्वा के साथ उसका जीवन सुंदर और सामान्य रहा। उसके आने से पिकासो बहुत खुश हुआ उसने रहने की जगह बदली और प्रेम से इव्वा के साथ रहने लगा। हर महत्‍वपूर्ण घटना के बाद पिकासो रहने की जगह बदल लेता था। बाद में इव्वा बीमारी से मर गई और पिकासो बहुत दुखी हुआ।&lt;br /&gt;विकृत व्यवहार के बाद भी स्त्रियां और सफलताएं हमेशा उसके साथ रहीं। हालांकि सफलता को वह खतरनाक मानता था पर अपनी अनदेखी उससे कभी बर्दास्त नहीं हुई। इव्वा के बाद उसके कैनवास पर आने वाली स्त्री थी युजेनिया। युजेनिया पिकासो की पुरानी मित्र स्टाइन को पिकासो से दूर करने में सफल हुई। इस दौरान पाकरेत और इरेन भी पिकासो की छाया के पीछे मडराती रहीं। पर अब पिकासो के जीवन में पहली ऐसी नायिका का प्रवेश होने वाला था जिसे उसकी पहली पत्नी का दर्जा मिलना था। वह थी ओल्गा। वह एक रूसी वैले में नर्तकी थी। वैले के लिए काम करते उससे प्रगाढ़ता हुई थी पिकासो की। पर इस बार उसके मित्र दियाघिलेव ने उसे चेतावनी दे दी थी कि रूसी लड़की के साथ विवाह करना पड़ता है। ओल्गा से उसने विवाह किया और फरवरी 1921 में उसे एक पुत्रा हुआ पावलो। अब मातृत्व उसके चित्र का विषय हो चुका था। पिकासो का कहना था कि जैसे लोग आत्मकथा लिखते हैं वैसे ही मैं चित्र बनाता हूं।&lt;br /&gt;बाद में ओल्गा के साथ पाब्लो का जीवन कष्टकर होता गया। अब उसके चित्रों में पहले सुंदरता का पर्याय बनी ओल्गा अब विकृत चेहरों के साथ आने लगी। एक कवि ब्रतों ने उसके बारे में कहा भी था - कि किसी चित्रकार ने स्त्री से इतना प्रेम नहीं किया होगा और उसकी इतनी अवहेलना भी नहीं की होगी। पाल एलुआर के अनुसार - वह असामान्य उत्कट प्रेम करता है और जिस बात से प्रेम करता है, उसी की हत्या भी कर देता है। पिकासो का खुद के बारे में कथन भी था - मेरे कहने पर यकीन मत करते जाना।&lt;br /&gt;मजेदार बात यह है कि पिकासो की मां की राय भी पिकासो के बारे में कुछ अच्छी नहीं थी। जब ओल्गा से उसका विवाह होने &lt;br /&gt;वाला था तो पिकासो की मां ने ओल्गा से कहा था कि - मेरे बेटे के साथ कोई भी स्त्री सुखी हो सकती है इस पर मुझे यकीन नहीं। वह सिर्फ अपने लिए है दूसरे के लिए नहीं।Þ पिकासो से प्रेम करने वाली अिधकांश स्त्रियां धनी, अभिजात घराने से थीं वे उसे बहुत कुछ देने को तत्पर रहती थीं पर पिकासो केवल उस स्त्री को चुनता था। जब ओल्गा के साथ पिकासो की कलह होने लगी तो उसने मारी तेरेज को ढूंढ़ निकाला। मारी उसे बाजार में मिली थी और पिकासो को जंच गई थी उसने सीधे उसके कंधे पर हाथ रख कहा - तुम्हारा चेहरा खूबसूरत है, मुझे तुम्हारा चित्र बनाना अच्छा लगेगा। फिर छह महीने तक पिकासो उसके पीछे पड़ा रहा और अंत में मारी उसकी हो गई। पिकासो ने ओल्गा को तलाक देना चाहा पर वह तैयार नहीं हुई। उससे छिपाकर पिकासो मारी के साथ रहता रहा। मारी के साथ वह सबसे ज्यादा रहा पर ज्यादातर छिपा कर। जब पिकासो ने मारी के सामने उसका चित्र बनाने का प्रस्ताव सड़क पर पहली बार रखा था तब भी वह पिकासो के बारे में कुछ नहीं जानती थी, बाद में भी मारी ने उसके चित्रों के बारे में कहा - मुझे पिकासो के चित्रों में कुछ खास मालूम नहीं पड़ता। 1935 में मारी से पिकासो को एक पुत्र हुआ जिसका नाम पिकासो ने माया रखा। मारी ओल्गा से तलाक का इंतजार करती रही पर अंत तक वह नहीं हुआ।&lt;br /&gt;मारी के बाद पिकासो के जीवन में फ्रांसुआज जिले का प्रवेश हुआ । उसकी प्रेमिकाओं में मात्र उसी ने पिकासो के खिलाफ आगे मोर्चा खोला और अंत तक लड़ती रही। जिले ने आहत हो उसके बारे में लिखा था - जिस प्रकार शिकारी अपने शिकार का सिर दीवानखाने में टांग देता है, वैसे ही पिकासो अपनी स्त्रिायों के सिर रख देता है। हां वे धड़ से पूरी तरह अलग नहीं हो पाते। उनमें थोड़ी जान देने का इंतजाम वह कर देता है।&lt;br /&gt;यूं अपने चित्रों में वह स्त्राी के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर भी जमकर कूची चलाता। 1933 के बाद उसके चित्राों में स्त्रियों पर जुल्म ढाते राक्षसी चाल चलने वाले सैनिक दिखाई पड़ने लगे। इस संदर्भ में पिकासो के कथन को ही देखा जाना चाहिए, वह कहता था - ßचित्राकला मुझसे शक्तिशाली है, वह जो चाहती है मुझसे करा लेती है। मैं कुछ बोलता नहीं पूरा, रंग देता हूं।  मैं उस स्थिति तक पहुंचना चाहता हूं जहां कोई यह जानने का प्रयास नहीं करेगा कि मैंने अपना चित्र कैसे बनाया। इसकी क्या जरूरत है। मैं चाहता हूं कि अपने चित्रों को भावनाओं से मुक्त कर सकूं।Þ साफ है कि वह अपनी रचना प्रक्रिया को बाहर लाने से सप्रयास बचता था। इसके लिए ही वह परस्पर विरोधाभासी बयानेां का सहारा लेता था।&lt;br /&gt;पिकासो बहुआयामी प्रतिभा का था । चित्र बनाने के अलावे कविता, नाटक आदि भी लिखता। इससे उसकी मित्र स्टाइन नाराज होती कि वह उसके क्षेत्र में दखल दे रहा है। इस पर चिढ़ कर पिकासो कहता - ßतुम हमेशा मेरे बारे में कहती हो कि मैं एक असामान्य व्यक्ति हूं। फिर असामान्य मनुष्य जो चाहता है, वह कर सकता है।Þ इस पर स्टाइन चीखती - ßतुम असामान्य हो यही तुम्हारी सीमा है मुझसे यह मत कहलवाना कि वह काव्य हैÞ यूं पिकासो का विश्वास कलाओं के परस्पर सामंजस्य में था। वह सोचता कि चित्र लिखा जाए और कविता उकेरी जाए। पिकासो की कविता के बारे में ब्रेतों ने कहा था - ßयह उतनी ही दृश्यात्मक है, जितना काव्यात्मक उसका चित्र।Þ आगे उन कविताओं ने उसे महान कवि पाल एलुआर का चित्र बनाया।&lt;br /&gt;मारी तेरेज के बाद पिकासो के जीवन में आने वाली स्त्राी थी डोरा मार। वह मारी के विपरीत पिकासो की आंखों में आंखें डाल बाते कर पाती थी। डोरा पिकासो को एक कैफे में मिली थी और पहली ही मुलाकात में टेबल पर पडे़ चाकुओं को फेंकने का खेल करते अपने हाथों से खून निकाल लिया था उसने। और यह लाल रंग पिकासो की आंखों में बैठा तो फिर वह डोरा का हो गया। डोरा वामपंथी विचारों की थी और वामपंथी विचारों के कवि एलुवार की मित्र भी थी। डोरा और एलुआर के प्रभाव में ही पिकासो का खिंचाव वाम धारा की ओर हुआ था और बाद में लंबे समय तक पिकासो वामपंथी दल का सदस्य रहा था।&lt;br /&gt;अपनी प्रेमिकाओं को उल्लू बनाने के उसके अपने नुस्खे थे। जैसे अपने प्रसिद्ध चित्र गुएिर्नका को दिखाते उसने मारी तेरेज को कहा कि चलो यह चित्र तेरा है। अगले ही क्षण ऐसे तात्कालिक बयानों से वह पलट जाता। यहां तक कि ओल्गा से वह तलाक इसलिए नहीं चाहता था कि इसके चलते उसे अपने चित्रों का भी बंटवारा करना पड़ेगा। पेरिस में लंबा समय बिताने वाला पिकासो स्पेन का था और स्त्रियों के प्रति उसके व्यवहार को लोग स्पेन के पारंपरिक स्त्री विरोधी आचरण से जोड़ कर देखते थे। उसकी ख्याति से खिंची औरतें उसकी ओर भागती चली आतीं और वह उन्हें अपने चारों ओर घुमाता रहता। इस तरह साठ साल की उम्र में पिकासो बीस साल के जोश से काम करता ओर वैसी ही बुभुक्षा को कायम किए रहता। उसकी प्रसिद्धी ऐसी थी कि लोग पेरिस में एफिल टावर के साथ पिकासो को देखने आते। पिकासो के चित्रों में स्त्रिायां अिधकतर बंद कमरों में दिखती हैं, भयानक पागलों जैसी कैदी स्त्रियां। यहां याद कीजिए पिकासो की पहली प्रेमिका से उसका व्यवहार, जिसे वह घर में ताला बंद कर बाहर जाता था। अथाह पैसा होने के बाद भी पिकासो कंजूस था। आने वाली लड़कियों के चित्र बना कर वह उन्हें दे देता। एक बार एक लड़की की नग्न तस्वीर बना उसने उसे भेंट किया। अब लड़की उस चित्र का क्या करती। उसे उसकी कीमत पता थी सो उसने उसे छुपा कर रख दिया। उसकी शादी हुई फिर तलाक हुआ तब उसने उस चित्र को बेचना चाहा तो उस पर पिकासो के हस्ताक्षर नहीं थे उसने पिकासो से उस पर हस्ताक्षर कराने चाहे तो उसने उसे अपना चित्र मानने से इनकार कर दिया।&lt;br /&gt;इधर उसकी उपेक्षा से डोरामार भी मानसिक तौर पर अवसाद ग्रस्त रहने लगी। उम्र के छियासठवें साल में पिकासो को फ्रांसुआज से एक पुत्र की प्राप्ति हुई। उसकी कनूनी पत्नी ओल्गा अब भी हर जगह उसका पीछा कर रही थी। फ्रंसुआज उससे चालीस साल छोटी थी। पिकासो की अगली स्त्री जैकलीन थी जो तलाकशुदा थी। वह फ्रांसुआज से कुछ छोटी ही थी। ओल्गा के अलावे जिस स्त्री की शांत, सौम्य तस्वीरें पिकासो ने बनाई है उनमें जैकलीन भी है। आगे उपेक्षा से त्रास्त फ्रांसुआज ने एक किताब लिखी - लाइफ विद पिकासो। यह वेस्टसेलर रही। इसमें पिकासो की पोलपट्टी खोलकर रख दी गयी थी। पिकासो ने इस पर केस भी किया पर पर मुकदमा हार गया। इसके बाद पिकासो ने फ्रांसुआज की संतानों के लिए अपने घर के दरवाजे बंद कर दिए।&lt;br /&gt;उम्र के नब्बेवें साल में पिकासो ने फिर बहुत से चित्र बनाए स्त्रियों के जिसमें उसकी काम कुंठा उभर कर सामने आई। जैकलीन ने इन चित्रों को बाहर दिखाने से मना कर दिया था सो वे बंद रहे। अब जाकर वह मौत के बारे में सोचने लगा था हर दिन वह सोचता कि चलो एक दिन और मिल गया। आखिर आठ अप्रैल 1973 को पिकासो की मौत हो गयी। उसकी कब्र पर उसी का बनाया एक शिल्प लगाया गया। उसकी मृत्यु पर बहुत से अखबारों ने उसे एक क्रूर ,भावनाशून्य, कामांध व्यक्ति के रूप में याद किया। दिसंबर 1973 में उसकी 1909 की एक कृति द सीटिंग वूमन ने मूल्य के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। मूल्य के सारे रिकार्ड पिकासो के प्रिय चित्रकार वॉन गॉग ने भी तोडे़ थे पर जीते जी नहीं, और उसके प्रतिमान पिकासो के उलट थे। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुस्तक : पिकासो, लेखिका : माधुरी पुरंदरे&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सिद्धार्थ जोशी&lt;/strong&gt; ने कहा… &lt;br /&gt;धन्‍यवाद, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद इतना कहना पर्याप्‍त होता... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पहली बार आपका ब्‍लॉग देखा है। इसमें मुझे प्रभावित किया। इसे मैं अपने फेवरेट में डाल रहा हूं। यकीन मानिए आपका हर लेख में नियमित रूप से पढूंगा। यह ब्‍लॉगिंग का एक अलग आयाम है। आपकी मेहनत और प्रस्‍तुतिकरण श्रेष्‍ठ है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/301554459270010767-9126945080751801832?l=chitrahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/tbJp/~3/aGy7r0FEBhY/blog-post_18.html" title="स्त्रियां पिकासो की - कुमार मुकुल" /><author><name>कुमार मुकुल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04890735360499335970</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="25" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/TCmWko2lqfI/AAAAAAAADPU/CrxeYR17RSo/S220/mukul.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://bp2.blogger.com/_Zgr_j04leW8/SB_YWCLxM1I/AAAAAAAAAWw/pbQvstELPKQ/s72-c/vikend7_1.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://chitrahindi.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0EBSHk7fyp7ImA9WxdaEUw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-301554459270010767.post-3038474380172771098</id><published>2008-08-18T19:03:00.000-07:00</published><updated>2008-08-18T19:07:39.707-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-08-18T19:07:39.707-07:00</app:edited><title>अपने दुख से सौंदर्य की रचना करो - कुमार मुकुल</title><content type="html">&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKoqYO5EPAI/AAAAAAAAAn8/BCqWQ8kb4hc/s1600-h/van%2Bgog.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_Zgr_j04leW8/SKoqYO5EPAI/AAAAAAAAAn8/BCqWQ8kb4hc/s320/van%2Bgog.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5236044112574299138" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; चित्रकार बनने की आकांक्षा वॉन गॉग में शुरू से थी। गरीबी और अपमान में मृत्यु को प्राप्त होनेवाले महान चित्राकार रैम्ब्रां बहुत पसंद थे विन्सेन्ट को और उसका अंत भी रैम्ब्रां की तरह हुआ और दुनिया के कुछ महान लोगों की तरह उसकी पहचान भी मृत्यु के बाद हुई। जीते जी तो कला के प्रति उसकी दीवानगी अभाव और उपेक्षा की आंच में झुलसती रही पर मरने के बाद प्रसिद्धि ने कभी उसका दामन नहीं छोड़ा। उसके चित्रा दुनिया के सबसे महंगे चित्राों की सूची में हमेशा जगह बनाये रहे। आज वॉन गॉग के सेल्फ पोर्टे्रट की कीमत तीन अरब है। और दुनिया के सबसे महंगे दस चित्राों में उसके चार चित्रा शामिल हैं। उनके शिक्षक मेन्डेस ने उससे कहा था-÷...तुम्हें कई बार लगेगा कि तुम हार रहे हो लेकिन आखिरकार तुम खुद को अभिव्यक्त करोगे और वह अभिव्यक्ति तुम्हारे जीवन को मायने देगी।'और विन्सेन्ट की रचनाओं ने, चित्राों ने उसके जीवन को जो मायने दिये उनके अर्थ उसकी मौत के बाद खुले तो खुलते चले गए और आज उसके रंग दशों दिशाओं में फैलते चले जा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इक्कीस साल की उम्र में विन्सेन्ट को उन्नीस साल की एक गरीब, पतली-दुबली लड़की उर्सुला से प्यार हो गया था। त्राासदी यह कि उर्सुला की मंगनी हो चुकी थी और जब विन्सेन्ट ने प्यार का वास्ता दे उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो रोते हुए उर्सुला ने कहा-÷क्या मुझे हर उस आदमी से शादी करनी होगी जिसे मुझसे प्यार हो जाए?' आखिर वह नहीं मिली उसे और इस विडंबना ने अंत तक उसका पीछा नहीं छोड़ा। उसके जीवने में जो भी स्त्राी उसके निकट आई और जिसे भी उसने अपने अंतर्तम से प्यार किया उसे खो दिया विन्सेन्ट ने। इस दौरान राग-विराग के दौर में कभी तो उसने पादरी बनने की कोशिश की, कभी शिक्षक और कभी खदान मजदूर का जीवन जीते उसने खुद को भूखा रखकर मौत की कगार तक पहुंचा दिया। पादरी बनने की कोशिश के दौरान वे उपदेश देते-÷...कोई भी दुख बिना उम्मीद के नहीं आता...'। वह प्रार्थना करता-÷...कि हमें न निर्धनता दे न धन, हमें उतनी रोटी दे जितना हमारा अधिकार बनता है।' अंत तक यह उपदेश जैसे उसके साथ खुद को प्रमाणित करता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोरीनाज के खदान मजदूरों को उपदेश के दौरान जब उसे लगा कि उसके गोरे चिट्ठे रंग के चलते मजदूर दूरी महसूस करते हैं तो उसने अपने चेहरे पर कोयले की धूल मलनी आरंभ कर दी ताकि उन जैसा दिख सके। अंत में यह नाटक भी खत्म किया उसने और मजदूरों सा जीवन जीना आरंभ किया और भूखे रहने की आदत डाल ली और खुद को बीमार करता मौत की कगार पर पहुंचा दिया। मार्क्स ने जिस डिक्लास थ्योरी की बात की है उसे उसने आजीवन खुद पर लागू किया। इसी जिद में उसने खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार कर लिया।पहले प्रेम में असफलता से पैदा विराग ने उसे कैथोलिक पादरी या धर्मोपदेशक बनने की राह पर डाल दिया था। पर मजदूरों को उपदेश देते और उनके जैसी जिन्दगी जीते उसे भान हुआ कि उनका कष्ट अपार है। उसने खान के मैनेजर से प्रार्थना की कि आप कम से कम कुछ ऐसा तो कर ही सकते हैं जिससे खान में दुर्घटनाएं कम हों और मजदूरों की मौतों में कमी आए। पर मैनेजर के जवाब, कि हमारे पास निवेश के लिए एकदम पूंजी नहीं है, ने विन्सेन्ट को भीतर से निराश कर दिया और उसने सोचा कि एक दृढ़निश्चयी कैथोलिक से वह नास्तिक बनता जा रहा है। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि ÷इतनी दयनीय निर्धनता में शताब्दी दर शताब्दी रह रहे लोगों के लिए ईश्वर ऐसी दुनिया की रचना कैसे कर सकता है, जिसमें जरा भी दया न हो।'आखिर जब चर्च के लोग उस प्रदेश में धर्म की प्रगति जानने पहुंचे तो पाया कि वॉन गॉग उनके पवित्रा, उज्ज्वल धर्म को गरीबी और निर्धनता में लथेड़ चुका है। दो सौ मजदूरों के बीच बैठा वह खान में दबकर मर गए सत्तावन मजदूरों के लिए प्रार्थना करने को था कि जांच के लिए पहुंचे चर्च के लोगों के लिए वहां की गंदगी को बर्दाश्त करना कठिन हो गया। वॉन गॉग को झिड़कते हुए उन्होंने कहा-लगता है हम अफ्रीका के जंगल में हैं...किसने सोचा था कि यह आदमी इतना पागल निकलेगा...मैं तो इसे शुरू से ही पागल समझता था...।' अंत में उन्होंने उसे कहा कि तुम हमारे चर्च का अपमान करना चाहते हो, कि अब तुम अपनी नियुक्ति निरस्त समझ सकते हो।दब कर मर गए मजदूरों के लिए हड़ताल करते मजदूरों को आखिर समझाकर काम पर भेजने के बाद वॉन गॉग ने पाया कि बाइबिल अब उनके किसी काम की नहीं थी, कि ईश्वर ने उनकी तरफ पत्थर के कान कर रखे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब चीजों ने उसे फिर एक बार गहरी हताशा की ओर ढकेल दिया। उसने पाया कि ईश्वर कहीं नहीं था...एक हताश, क्रूर, अंधी अस्त-व्यस्तता थी...इस पागलपन से निकलने के लिए वह फिर अपने पुराने पागलपन की ओर मुड़ा और चित्राकारी शुरू कर दी और बोरीनाज के खदान मजदूरों के चित्रा बनाने लगा। कुछ चित्रा बना लेने के बाद विन्सेन्ट को लगा कि उसे अपने चित्राों के बारे में किसी की राय लेनी चाहिए, और उसे वहां से अस्सी किलोमीटर दूर ब्रुसेल्स में रह रहे चित्राकार रैवरैण्ड पीटरसन की याद आई और उसने उनसे मिलने का इरादा किया। उसके पास टिकट के पैसे नहीं थे और वह पैदल ही निकल पड़ा। उसके पास मात्रा तीन फ्रैंक थे। करीब छत्तीस घंटे की यात्राा के बाद उसके जूते के तल्लों ने जवाब दे दिया और उसके जूते को फाड़ अंगूठे बाहर झांकने लगे। पांवों में छाले पड़ चुके थे। इस हालत में एक रात का विश्राम लेकर भूखा-प्यासा वह फिर निकल पड़ा और बु्रसेल्स पहुंचा। मानव इतिहास में किसी रचनाकार की जिजीविषा का ऐसा उदाहरण और कहां मिलेगा? खाक और धूल में लिथड़ी विन्सेन्ट की सूरत देख रैवरैण्ड की बेटी चीखती भाग खड़ी हुई। आखिर जब रैवरैण्ड ने उसे पहचाना तो बोले-तुम्हें देखना कितना सुखद है, सीधे भीतर चले आओ। विन्सेन्ट कितना खुश हुआ होगा, यह हम सोच सकते हैं। आखिर ईसा के उस कथन के, जो विन्सेन्ट को प्रिय था, कि कोई भी दुख बिना उम्मीद के नहीं आता, निहितार्थों को यहां समझा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रैवरैण्ड के साथ कुछ दिन बिताने के बाद जब विन्सेन्ट वास्मेस गांव लौटने लगा तो रैवरैण्ड ने उसे अपना पुराना जूता और लौटने के टिकट के पैसे दिये।रैवरैण्ड से मिली सलाह और उत्साहवर्धन के बाद उसने कुछ और चित्रा बनाये। फिर सोचा कि इसे उस समय के चर्चित चित्राकार जूल्स ब्रेतों को दिखाए। पर ब्रेतों वहां से एक सौ सत्तर किलोमीटर दूर रहता था और हमेशा की तरह उसके पास पैसे नहीं थे। थोड़ी दूर वह ट्रेन से गया और फिर पांच दिन-रात पैदल चलकर जब कूरियेरेस में ब्रेतों के स्टूडियो तक पहुंचा तो उसकी भव्यता देख उसकी हिम्मत नहीं पड़ी भीतर जाने की और वह वापिस चल पड़ा-भूखा, प्यासा, पैदल। भूख लगने पर वह अपने चित्राों को देकर बदले में पावरोटी मांग कर खाता, सप्ताहों की पैदल दिन-रात की यात्राा के बाद घर पहुंचा। इस यात्राा में वह अपना कई पौंड वजन कम कर चुका था और बुखार की चपेट में आ चुका था। इसी अर्धमृतावस्था में उसका भाई थियो वहां आ पहुंचा और उसने अपने प्यारे भाई को संभाला। थियो ने हमेशा विन्सेन्ट को उसके पागलपन के साथ प्यार किया और न्यूनतम जीवनयापन की उसकी व्यवस्था में उसका अहम योगदान रहा। पहले प्यार की त्राासदी, बाईबिल के अध्ययन और कठोर जीवन शैली के चुनाव ने हमेशा विन्सेन्ट के भीतर एक चिंतक को जाग्रत और विकसित किया। पर भाई की संगत और प्यार में वह भावुक हो जाता था। एक जगह वह थियो से कहता है-÷क्या हमारे अंदर के ख्याल बाहर से दिखाई पड़ सकते हैं? हमारी आत्मा में एक आग जल रही हो सकती है जिसे बगल में बैठकर तापने कोई नहीं आता। आने-जानेवालों को सिर्फ चिमनी से निकलता धुंआ दिखाई पड़ता है...।'विन्सेन्ट को ÷लैंडस्केप से प्रेम था पर उससे भी ज्यादा उसे जीवन से भरपूर उन चीजों से प्रेम था, जिनमें उत्कट यथार्थवाद होता था...।' वह जानता था कि अभ्यास को किताबों के साथ नहीं खरीदा जा सकता और उसका कोई विकल्प नहीं होता इसलिए जीवन भर वह श्रम करता अपनी कला को लगातार धार देता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके चचेरे भाई मॉव का कथन था कि आदमी चित्राों पर या तो बातें कर सकता है या चित्रा ही बना सकता है। ...कि ÷कलाकार को स्वार्थी होना चाहिए। उसे काम करने के हर क्षण की रक्षा करनी चाहिए।' विन्सेन्ट श्रम तो करता रहा पर स्वार्थी नहीं हो सका। उसकी माली हालत को देखकर मां सलाह देतीं कि वह धनी महिलाओं के चित्रा क्यों नहीं बनाता तो उसका जवाब होता-÷प्यारी मां, उन सबका जीवन इतना सुविधापूर्ण होता है कि उनके चेहरों पर समय ने कोई भी रोचक चीज नहीं बनाई होती।' मां पूछती कि गरीबों के चित्रा बनाकर क्या फायदा, वे तो उसे खरीदेंगे नहीं। मां की नीली, गहरी साफ आंखों में शांतिपूर्वक देखता विन्सेन्ट बोलता-÷अंततः मैं अपने चित्रा बेच सकूंगा...'। एक पुरानी कहावत हमेशा विन्सेन्ट को याद रही-÷अपने दुख से सौंदर्य की रचना करो।' और दुख से रचे उसके चित्राों की कीमत अंततः मरने के बाद ही जानी जा सकी।अठ्ठाइस साल की उम्र में विन्सेन्ट को फिर प्रेम हुआ के से जो जॉन की मां थी। पर उसके मृत पति वॉस से उसे नफरत थी जिसे के भुला नहीं पा रही थी। उस दौरान मिशेले को पढ़ते हुए एक पंक्ति उसे जंच गई-÷यह जरूरी है कि एक स्त्राी आप के ऊपर बयार की तरह बह सके ताकि आप पुरुष बन सकें।' उसे लगा कि उर्सुला से मिली यातना को के ही दूर कर सकेगी पर के वॉस को भुला न सकी और दूसरा प्रेम भी विन्सेन्ट के लिए एक त्राासदी ही साबित हुआ। इससे पार पाने के लिए वह फिर द हेग में अपने कजिन मॉव के पास चला गया। फिर वही भूख और चित्राकारी की दीवानगी का दौर। ऐसे में उसे मिली क्रिस्टीन जो लॉन्ड्री में कपडे+ धोती थी और उससे पेट नहीं भरता तो पेशा करती थी। विन्सेन्ट को उसका साथ भा गया और उसके साथ वह रहने लगा। क्रिस्टीन ने विन्सेन्ट के जीवन में प्रेम की कमी को अंशतः पूरा किया। वह उससे मॉडल के रूप में भी काम लेता था। इसके अलावा मजदूरों और बूढ़ी स्त्रिायों को वह थोड़े पैसे के लिए मॉडल बनने का आग्रह कर अपने झोपड़ीनुमा स्टूडियो में ले आता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह सोचता, काश, वह अपने काम से अपनी रोटी भर कमा सके। उसे और कुछ नहीं चाहिए था। और वह कभी ठीक से अपनी रोटी भी नहीं कमा सका और आज उसकी कृतियां अरबों-खरबों कीमत की हैं-क्या यह उसी भूख की कीमत है ! भूख से कीमती कुछ भी नहीं शायद। विन्सेन्ट जानता था भूख अर्जित करने की कला। और, आज पूरी दुनिया का पेट भर दिया उसने। और यह दुनिया कभी उसका पेट नहीं भर पाएगी। उसका कर्जदार रहेगी यह दुनिया, जब तक रहेगी।ऐसा नहीं था कि विन्सेन्ट यूं ही ऐसा था। उसके आस-पास की दुनिया और उसके सलाहकार भी ऐसे ही थे। उस समय के राष्ट्रीय ख्याति के चित्राकार वाइसेंनब्रूख विन्सेन्ट को समझाते हुए कहते-÷...साठ साल के हर कलाकार को भूख से मरना चाहिए। तब शायद वह कैनवस पर कुछ अच्छे चित्रा बना सकेगा।...हुंह! तुम चालीस से ऊपर नहीं हो और बढ़िया काम कर रहे हो।' ॥अगर भूख और दर्द किसी आदमी को मार सकते हैं तो वह जीने के काबिल नहीं। इस धरती के कलाकार वही लोग होते हैं, जिन्हें ईश्वर या शैतान तब तक नहीं मार सकता जब तक वे उन सारी बातों को नहीं कह देते, जिन्हें वे कहना चाहते हैं।' पर अभाव ने घर में कलह को जन्म देना शुरू कर दिया था। क्रिस्टीन और विन्सेन्ट झगड़ने लगे थे। एक दूसरे को समझते हुए वे एक साथ नहीं बारी-बारी गुस्सा होते। और अपनी भड़ास निकालते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी विन्सेन्ट को निराशा होती कि उसके समकालीन डी बॉक के चित्राों पर लोग पैसा लुटाते हैं और उसे काली डबलरोटी और कॉफी तक नसीब नहीं होती पर फिर वह अपने को संतोष देता-मैें सच्चाई और मेहनत की जिंदगी जीता हूं और यह ऐसी सड़क नहीं जहां किसी की मौत हो जाए। साफ है कि वह भविष्य की बाबत कह रहा था और वह सच्चाई थी, और विन्सेन्ट के बाद विन्सेन्ट की तरह भला कौन जिन्दा रहेगा ! उसके बनाये सूर्यमुखी सूर्य की तरह आज पूरी दुनिया में खिल रहे हैं उद्भासित होते अपने अनंत रंगदृश्यों के साथ।क्रिस्टीन के साथ रहने के चलते विन्सेन्ट को द हेग के सारे कलाकारों ने नीचा दिखाना शुरू किया। उसके चित्राकार भाई मॉव ने एक दिन कहा कि तुम दुष्ट चरित्रा के आदमी हो, तो विन्सेन्ट ने खुद को कलाकार बताया। मॉव ने मजाक उड़ाते हुए कहा-आज तक तुम्हारा एक चित्रा नहीं बिका और तुम कलाकार हो। विन्सेन्ट ने भोलेपन से पूछा-क्या कलाकार का मतलब बेचना होता है? मैं समझता था कि बिना कुछ पाए खोज में लगे रहना कलाकार का काम है। इसी तरह एक दिन डी वॉक ने कहा-हर कोई जान गया है कि तुमने एक रखैल रख छोड़ी है। क्या तुम्हें कोई और मॉडल नहीं मिली। विन्सेन्ट ने आपत्ति की कि यह मेरी पत्नी है। यह विवाद बढ़ता गया और उसकी रोटी पर भी आफत आने लगी। जिस माहौल से वह आई थी उसमें शराब और सिगरेट की आदतें बुरी तरह उसे जकड़े थीं। वह बीमार रहने लगी थी। उसके इलाज की व्यवस्था करता विन्सेन्ट सोचता-÷बेचारी ने अच्छाई कभी देखी ही नहीं...वह खुद अच्छी कैसे हो सकती है?' आखिर इस हद तक मानवीय होने पर दुनियावी समाज किसी को पागल ही तो समझता है, और एक दिन थक-हारकर व्यक्ति समाज के पागलपन को स्वीकृति देता हुआ अपने तथाकथित पागलपन को बचाए रखता है। आखिर वही तो उसकी पूंजी होती है। भविष्य में उसे पागल कहता समाज ही तो उसकी अरबों कीमत लगाता है, इस बात को विन्सेन्ट जैसा हर कलाकार जानता होता है।क्रिस्टीन से शादी को लेकर एक दिन तेरेस्टीग ने भी उसकी फजीहत करते हुए कहा-÷दिमागी तौर पर बीमार आदमी ही ऐसी बातें कर सकता है।' पर विन्सेन्ट सोचता है-÷आदमी का व्यवहार, मौश्ये, काफी कुछ ड्राइंग की तरह होता है। आंख का कोण बदलते ही सारा दृश्य बदल जाता है...यह बदलाव विषय पर नहीं बल्कि देखनेवाले पर निर्भर करता है।' त्राासदी यह थी कि ये सारी बातें क्रिस्टीन के सामने संभ्रांत भाषा में होती थीं, थोड़ा बहुत क्रिस्टीन इसे समझती भी थी और दर्द से भर उठती थी। उसके मित्रा वाइसेनव्रूख ने एक दिन मजाक में कहा-÷...मैं चाहूंगा तुम्हारा चित्रा बनाना। मैं उसे ÷होली-फैमिली' कहूंगा!' इतना सुनकर विन्सेन्ट गाली बकता उसे मारने दौड़ा...।महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि उसका भाई थियो, जो चित्राों का व्यापार करता था और हमेशा विन्सेन्ट की चिन्ता करता था, भी कम पागल नहीं था। उस दौर में विन्सेन्ट को उसके मित्रा चित्राकार यह कहकर डराते थे कि उसके भाई से शिकायत करेंगे वे उसके आचरण की और उसे थियो पैसे भेजना बंद कर देगा। उधर थियो था कि उसे भी भाई का दर्शन भाने लगा था। एक दिन उसने विन्सेन्ट को पत्रा लिखा कि उसने एक बीमार और आत्महत्या पर उतारू स्त्राी को अपने साथ जगह दी है और उससे शादी करना चाहता है। अभाव में क्रिस्टीन के साथ कठिन होते जीवन को देखते हुए उसने सलाह दी कि-वह इंतजार करे...उसके लिए जो संभव हो करे और प्रेम को पनपने दे, हड़बड़ी में शादी ना करे। उसकी आर्थिक स्थिति को देखते क्रिस्टीन ही शादी पर आपत्ति करने लगी थी। आखिर वह अपने गांव अपनी मां के पास लौट गया, शांति की खोज में। उसे स्टेशन छोड़ने क्रिस्टीन भी आई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव में वह पीठ पर ईजल टांगे खेतों में चित्रा बनाता घूमता रहता। इसी बीच उसके पड़ोस की एक स्त्राी मारगॉट उसके निकट आई। वह हिस्टीरिया की मरीज थी और बचपन से ही मन ही मन विन्सेन्ट को चाहती थी। एक दिन उसने मारगॉट को बताया कि प्यार करना तो आसान होता है मारगॉट ने कहा-हां, मुश्किल होता है बदले में प्यार पाना। मारगॉट ने उसे बताया कि वह सोचती थी कि बिना प्यार किए वह चालीस की नहीं होगी और उनचालीसवें साल में आखिर उसे विन्सेन्ट मिल गया। इस प्रेम ने उसके जीवन में सूखते सोते को जीवित कर दिया। मारगॉट की निगाहों में डूबा वह खेतों में घूमता चित्रा बनाता और समझाता-÷जिंदगी भी मारगॉट, एक अनंत खाली और हतोत्साहित कर देनेवाली निगाह से हमें घूरती है, जैसे यह कैनवस करता है।...लेकिन ऊर्जा और विश्वास से भरा आदमी उस खालीपन से भयभीत नहीं होता, बल्कि वह...रचना करता है और अंत में कैनवस खाली नहीं रहता बल्कि जीवन के पैटर्न से भरपूर हो जाता है।'क्रिस्टीन को बचा ना पाने के दर्द को समझते हुए मारगॉट उसे समझाती कि इसमें उसका क्या कसूर, क्या वह बोरीनाज के खदान मजदूरों को बचा पाया था। पूरी सभ्यता के खिलाफ एक आदमी क्या कर सकता है। मारगॉट की बात सही थी पर विन्सेन्ट तो वही आदमी था, पूरी सभ्यता के खिलाफ संघर्षरत, उसका रुख मोड़ देने को आतुर, वह भी प्रेम से, विश्वास की ताकत से। आखिर यह पागलपन ही तो था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मारगॉट से प्यार के वक्त वह इकतीस का था। फिर उसकी पांच बहनें अविवाहित थीं। दोनों के घरवाले विवाह को तैयार नहीं थे। सबसे ज्यादा आपत्ति मारगॉट की बहनें कर रही थीं। विन्सेन्ट के इस तीसरे प्यार की त्राासदी ने उसके कैनवस के रंगों को और प्रभावी बनाया। उसे वाइसेनब्रूख का जीवन-दर्शन सही लगता-÷मैं कभी भी यातना को छिपाने का प्रयास नहीं करता, क्योंकि अक्सर यातना ही कलाकार की रचना को सबसे मुखर बनाती है।' इस यातना से कब पीछा छूटना था विन्सेन्ट का और अब वह नये रूप में आनेवाली थी। मारगॉट प्रसंग के चलते विन्सेन्ट ने अपना गांव ब्रेबेन्ट छोड़ा और नुएनेन में एक किसान परिवार के साथ मित्राता की। वहां उसे एक किसान की लड़की सत्राह साल की स्टीन मिली, जिसमें ÷हंसने की नैसर्गिक प्रतिभा थी।' वह उसके पास मॉडल के रूप में काम करने आती थी। गुस्साने पर वह विन्सेन्ट के चित्राों पर काफी फेंक देती या आग में झोंक देती। इसी किसान परिवार का आलू खाते चित्रा बनाया था विन्सेन्ट ने जो ÷द पोटैटो इटर्स' नाम से ख्यात हुआ। फिर स्टीन को लेकर भी स्थानीय पादरी ने आपत्तियां शुरू कीं। आजिज आकर वह अपने चित्राों के साथ पेरिस आ गया। अपने प्यारे भाई थियो के निकट।विन्सेन्ट को वही चित्रा पसंद थे जो कि वैसे बनाई गए हों जैसे कि वो नजर आ रहे थे। चाहे वो बदसूरत ही हों। वैसे चित्रा उसे जीवन पर धारदार वक्तव्य जैसे नजर आते रहे। उसकी नजर में वही सौेंदर्य था। विन्सेन्ट सोचता-चित्राों में नैतिकता थोपना या कोरी भावुकता में उन्हें चित्रिात करना उन्हे बदसूरत बना देना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेरिस में चित्राकार लात्रोक को यही समझा रहा था विन्सेन्ट। चित्राों के व्यापारी उसके भाई को पेरिस के सभी चित्राकार जानते थे और विन्सेन्ट को वहां अच्छी मंडली मिल गई। पाल गोगां, जॉर्जेस, स्योरो, लॉत्रोक आदि। प्रेम में लगातार मिली विफलता, भूख और अथक श्रम ने विन्सेन्ट को त्रास्त कर दिया था। अब एक उन्माद में वह खुद को झोंकता रहता था काम में। जीवन में मिली यातनाओं को रूपाकार देता वह पागल की तरह भिड़ा रहता था। अतीत से जूझता वह हिस्टीरिया के मरीज सा हो गया था। उसे दौरे भी पड़ने लगे थे। एक बार उसके चित्राों को देखते हुए पाल गोगां ने कहा-÷क्या तुम्हें दौरे पड़ते हैं, विन्सेन्ट।...तुम्हारे चित्राों को देखकर लगता है कि जैसे... वे कैनवस से फटकर बाहर आ जाएंगे...ऐसी उत्तेजना छा जाती है कि मैं उस पर काबू नहीं कर पाता।...वे हफ्‌ते भर में मुझे पागल कर देंगे।' गोगां ने कितना सच कहा था, विन्सेन्ट के बाद पूरी दुनिया उसके चित्राों के पीछे पागल है।हड्डियों में घुसती पेरिस की ठंड से आजिज वहां के चित्राकार अक्सर सूरज की चर्चा करते। विन्सेन्ट ने भी एक दिन अपने भाई थियो से सूरज की रोशनी में दिन बिताने के लिए अफ्रीका जाने की जिद की। थियो ने कहा कि वह तो दूर है। अंततः उसने एक पुरानी रोमन बस्ती आर्लेस जाना तय किया। आर्लेस की धूप कुछ ज्यादा ही तेज थी। तिस पर विन्सेन्ट बिना हैट के सारा दिन पीठ पर ईजल टांगे यहां-वहां चित्रा बनाता दिन बिताता। वहां के लोग उसे सनकी पागल कहते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विन्सेन्ट सोचता-शायद मैं पागल हूं, पर मैं क्या कर सकता हूं। घर, पत्नी, बच्चों और परिवार के बिना यातना से भरा जो उसका जीवन था उसका हल उसे इस पागलपन में सूझता था। एक रचनात्मक ऊर्जा में बदल रहा था वह इस यातना को। यह सूरज की रोशनी और उसकी आग में खुद को डुबो देने का पागलपन था। भूखों मरने का पागलपन था। वह सोचता-बना हुआ कैनवस खाली कैनवस से अच्छा होता है और वह लगातार कैनवसों पर काम करता रहता। गरीब कामगार लोगों के बीच काम करते उसे लगता कि ये कितने पवित्रा लोग हैं, अनंत काल तक ÷निर्धन बने रहने की प्रतिभा' से पूर्ण। अर्लेस में ही एक पेशेवर लड़की रैचेल से विन्सेन्ट की भेंट होने लगी थी। पांच फ्रैंक में वह विन्सेन्ट का साथ देने को तैयार हो जाती थी। पर विन्सेन्ट के पास जब पांच फ्रैंक भी नहीं रहते तो वह मजाक में कहती तब तुम बदले में अपने कान दे देना। और एक दिन जब विन्सेन्ट के पास पांच फ्रैंक भी नहीं थे तो यातना से भन्नाया विन्सेन्ट शीशे के सामने गया और चाकू से अपना दायां कान काट उसे रूमाल में लपेट रैचेल को देने चल दिया। रूमाल में कटे कान देख वह बेहोश हो गिर पड़ी। उधर घर पहुंच कर वह खुद बेहोश हो गया। सुबह उसे अस्पताल में भर्ती किया गया और किसी तरह बचाया गया। डॉक्टर ने बताया कि ऐसा सनस्ट्रोक के कारण हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामान्य होते ही वह फिर वैसे ही बिना हैट लगाये तेज धूप में पागलों सा ईजल लिए मारा-मारा फिरने लगा। डाक्टर रे ने एक दिन उसे समझने और समझाने की कोशिश करते हुए कहा-÷...कोई भी कलाकार सामान्य नहीं होता। सामान्य लोग कला की रचना नहीं कर सकते। वे सोते हैं, खाते हैं, सामान्य धंधे करते हैं और मर जाते हैं। तुम जीवन और प्रकृति को लेकर ज्यादा संवेदनशील हो ...पर यदि तुमने ख्याल नहीं किया तो तुम्हारी यह अतिसंवेदनशीलता तुम्हें तबाह कर देगी...।' अब उस इलाके के बच्चे उसके पीछे सारा दिन पड़े रहते, उसे पागल कह चिढ़ाते, उससे उसका दूसरा कान मांगते हुए। एक दिन तंग आकर उसने खिड़की से सारा सामान बच्चों पर फेंक मारा और खुद बेहोश हो गिर पड़ा। फिर तो उसे खतरनाक पागल घोषित कर गिरफ्‌तार कर लिया गया। अब डाक्टर की सलाह से उसे विस्तृत मैदानोंवाले एक पागलखाने में भर्ती किया गया। वहां डाक्टर पेरॉन उसकी देख-रेख के लिए थे। डाक्टर ने उसे धार्मिक गतिविधियों में भाग न लेने की छूट दिला दी और उसे कई बार नहाने की सलाह दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस-पास के पागलों को देख विन्सेन्ट परेशान हो जाता तो डाक्टर उसे समझाते-÷...इन्हें अपने बंद संसारों में जीने दो...तुम्हें याद नहीं ड्राइडन ने क्या कहा था? अवश्य ही पागल होने में भी आनंद है, जिसे केवल पागल ही जान सकता है...'। मजदूर और किसान हमेशा से विन्सेन्ट को पसंद थे। वह खुद को किसानों से नीचा समझता था। वह उनसे बोला करता-आप खेतों में हल चलाते हैं, मैं कैनवस पर। दुनिया कभी उसे ठीक से समझ नहीं पाई। जब वह पागलखाने में था तब फ्रांस की एक पत्रिाका में जी अल्बर्ट ऑरेयर ने उसके चित्राों के बारे में लिखा-÷विन्सेन्ट वॉन गॉग हॉल्स की परंपरा का कलाकार है, उसका यथार्थवाद अपने स्वस्थ डच पूर्वजों के कार्य से कहीं आगे के सत्य को उद्घाटित करता है। उसके चित्राों की विशेषता है आकृति का सचेत अध्ययन, प्रत्येक वस्तु के मूल तत्त्व की खोज और प्रकृति और सत्य के प्रति उसका बाल सुलभ प्रेम। क्या यह सच्चा कलाकार और महान आत्मा दोबारा से जनता द्वारा स्वीकार किए जाने के अनुभव को पा सकेगा? मैं नहीं समझता। वह काफी साधारण है और साथ ही हमारे समकालीन बुर्जुआ समाज के समझने के लिए काफी जटिल भी, उसे उसके साथी कलाकारों के अलावा कभी भी कोई नहीं समझ पाएगा।अंत में विन्सेन्ट को एक होमियोपैथिक डाक्टर गैशे मिले जो दिमागी बीमारियों के ही नहीं, चित्राकारों के भी विशेषज्ञ थे। विन्सेन्ट ने उनके अनगिनत चित्रा बनाये जो दुनिया की सबसे महंगी तस्वीरों में शुमार हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विन्सेन्ट के अंतिम दिनों के हालात देख मुक्तिबोध, निराला के अंतिम दिन याद आते हैं। दरअसल ये वो कलाकार हैं जो गालिब की तरह दुनिया की हकीकत समझते हैं पर उससे दिल बहलाने की जगह उस हकीकत का पर्दाफाश करना चाहते हैं। और पागल घोषित कर दिये जाते हैं क्यों कि दुनिया के बाकी तमाशाईयों की तरह ये अपने पीछे कोई कुनबा, गिरोह या अनुयायियों की फौज खड़ी कर अपने इलहाम को निर्वाण घोषित करने की बेहयाई नहीं कर पाते। उससे बेहतर वे अपने दर्द और अकेलेपन में डूब मरना मानते हैं। आखिर उनके मत को भी दुनिया समझती है और किसी भी मत के माननेवालों से ज्यादा बड़ी तादात होती है उनकी, पर वह एक घेरा नहीं बनाती, उसका लाभ उठाने को, क्योंकि स्वतंत्राता के विचार का सम्मान करना वे उससे सीख चुके होते हैं।दोनों भाईयों को लेने डाक्टर गैशे खुद स्टेशन पहुंचे थे। भाई थियो ने अकेले में जब आशंका जाहिर की। विन्सेन्ट की दिमागी हालत की बाबत तो गैशे ने समझाया-÷हां, वो सनकी है...सारे कलाकार सनकी होते हैं...किसने कहा था, ÷कि हर आत्मा के भीतर थोड़ा-बहुत पागलपन मिला होता है। शायद एरिस्टोटल ने।' एक दिन गैशे उसके बनाए सूरजमुखी को देखते हुए बोला-÷अगर मैं ऐसा एक भी चित्रा बना पाता तो मैं समझता कि मैंने अपने जीवन के साथ न्याय किया है, विन्सेन्ट! मैंने पूरी जिन्दगी लोगों के दर्द का इलाज करने में काटी...वे सब अंत में मर गए...क्या फर्क पड़ा इस सबसे? ये सूरजमुखी तुम्हारे, ये लोगों के दिलों का इलाज करेंगे...ये लोगों के पास खुशियां लाएंगे...सदियों तक...।' एक दिन विन्सेन्ट ने डाक्टर गैशे से बातचीत के दौरान पूछा कि आखिर मिर्गी के उन मरीजों का क्या होता है डाक्टर, जिनका दौरा आना नहीं रुकता। गैशे ने कहा कि वे पूरी तरह पागल हो जाते हैं। यह बात विन्सेन्ट के दिमाग में घर कर गई और उसने सोचा कि वह एक पागल की मौत नहीं मरेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन उसने मकई के खेत में काम करते हुए कौओं का चित्रा बनाया और शीर्षक दिया ÷क्रोज अबव ए कार्नफिल्ड'। फिर इसी तरह एक दिन खेतों में खडे+ सूर्य को निहारते हुए उसने अपनी कनपटी पर गोली मार ली। घायल अवस्था में वह एक दिन जिन्दा रहा। गोली उसके मस्तिष्क में फंसी रही। उस दौरान थियो उसे बता रहा था कि वह अपनी पहली प्रर्दशनी विन्सेन्ट के चित्राों की लगाएगा। पर उसे देखने के लिए विन्सेन्ट जिन्दा नहीं रहा। उसकी मृत्यु के छह माह बाद थियो भी मर गया। गालिब की तरह ख्यालों से मन बहलाने का शौक नहीं था विन्सेन्ट को, उसके पास मन बहलाने का एक ही तरीका था काम करना और करते जाना। श्रम की इस निरंतरता ने उसकी कला को अनंत बना दिया, उसकी मृत्यु अनंत हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(इरविंग स्टोन लिखित उपन्यास लस्ट फॉर लाइफ महान चित्राकार विन्सेन्ट वॉन गॉग के जीवन पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण कृति है जिसका अनुवाद अशोक पांडे ने किया है। संवाद प्रकाशन, मेरठ से आई इस किताब को पढ़ना वॉन गॉग के जीवन से गुजरने के समान है।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/301554459270010767-3038474380172771098?l=chitrahindi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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