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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2enclosuresfull.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487</atom:id><lastBuildDate>Wed, 16 May 2012 11:49:57 +0000</lastBuildDate><category>childhood</category><category>टी-शर्ट</category><category>गांधीनगर</category><category>इंदौर</category><category>पितृ पर्वत</category><category>मेरा गाँव</category><category>स्कूल</category><category>जॉब</category><category>यात्रा</category><category>शौचालय</category><category>होली</category><category>टीआई</category><category>स्लैमबुक</category><category>बच्चा</category><category>मैं</category><category>स्वर्ग</category><category>वेबदुनिया</category><category>तोतली जुबान</category><category>जिन्दगी</category><category>indore</category><category>माँ</category><category>दोस्त</category><category>पिता</category><category>kulwant happy</category><category>स्कूल के दिन</category><category>युवा सोच युवा खयालात</category><category>श्राद्ध</category><category>railway satation</category><category>रिश्वत</category><category>जब प्यार हुआ मुझे</category><category>भतीजी</category><category>प्रेम कहानी</category><category>friend</category><category>मित्र</category><category>नाड़ी निरीक्षण</category><category>रतिया</category><category>मेरी बेटी</category><title>खुली खिड़की</title><description>मेरी जिन्दगी के कुछ लम्हें</description><link>http://window84.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>39</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/rss+xml" href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/window84" /><feedburner:info uri="blogspot/window84" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email></itunes:owner><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>मेरी जिन्दगी के कुछ लम्हें</itunes:subtitle><feedburner:emailServiceId>blogspot/window84</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-4512766033295178662</guid><pubDate>Thu, 02 Jun 2011 07:12:00 +0000</pubDate><atom:updated>2011-06-02T12:42:27.144+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">गांधीनगर</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मैं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">जॉब</category><title>जॉब छोड़ने के एक साल बाद</title><description>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज हर कोई पैसा कमाना चाहता है, वो भी इतना कि वह अपने सपनों को साकार कर सके, लेकिन हिन्‍दुस्‍तान में नौकरी व्‍यवस्‍था ऐसी है कि वह आपको अमीर बनने भी नहीं देती और भूखा मरने भी नहीं देती। ऐसे में लाजमी है कि हर व्‍यक्‍ित ऐसा अवसर ढूंढता है जहां से वह अपने सपनों को साकार करने लायक आमदन कमा सके। मैं भी उन लोगों में ही शामिल हुं, लेकिन पैसा कमाने के लिए उस रास्‍ते पर कभी नहीं चलता, जिसके लिए मेरी आत्‍मा मुझे आज्ञा नहीं देती। आप सभी की तरह मेरी आंखों में भी सपने हैं, और उन सपनों को साकार करने की शक्‍ित, जो मुझे ईश्‍वर की ओर से तोहफे में मिली है, मुझे भगवान ने वार्निग डिजायर का गुण बख्‍शा हुआ है, जो बच्‍चों में होता है। वो अपनी हठ पूरी करने के लिए मां बाप को मजबूर कर देते हैं, और मेरे हिसाब से यह सारी सृष्‍टि मानव के लिए मां बाप से कम नहीं। जिन जिन लोगों ने वर्निंग डिजायर की, सृष्‍टि ने तथास्‍तु कहते हुए उसको पूरा किया, चाहे वो वॉल्‍ट डिजनी हो या फिर बिल गेट्स। मेरी बचपन से इच्‍छा थी, कोई ऐसा बिजनस करूं, जिससे में कुछ लोगों की जिन्‍दगियां बदल सकूं, और जो प्‍यार दुनिया ने मुझे दिया उसका कुछ कर्ज अदा कर सकूं। मुझे याद है, इस बिजनस के मिलने से एक साल पहले मैंने एक बेहतरीन जॉब को छोड़ते हुए जॉब खोने का मलाल करने की बजाय, कंपनी अधिकारियों के सामने कुछ शब्‍द कहे थे, जो आज आपके सामने कहने जा रहा हूं, मुझे लेखक बनना है और मुझे एक बेहतरीन जिन्‍दगी जीनी है, और मुझे आम आदमी की मौत नहीं मरना, मैं खुद का बिजनस खड़ा करूंगा और भारत के तीन शहरों में से किसी एक में रहना पसंद करूंगा, चंडीगढ़, दून और गांधीनगर। मैं जॉब छोड़ने के बाद पंजाब चला गया था, लेकिन उन शब्‍दों को कुदरत ने चुपके से सुन लिया था, और एक साल पूरा होने से पहले कुदरत ने मुझे गांधीनगर में भेज दिया एक नए बिजनस के साथ। उन शब्‍दों के मुताबिक ईश्‍वर ने मुझे बिजनस और शहर दे दिया, असल में कहूं तो एक बेहतरीन जिन्‍दगी जीने का एक सुनहरा अवसर, अब मैं इस अवसर को घोषणा नहीं चाहता, इस लिए एक साल पहले कहे हुए शब्‍दों को याद करते हुए मैंने अपने एक और सपने को साकार करने की ओर कदम बढ़ाने शुरू कर दिए, जी हां, लेखक बनने की ओर। जब कुदरत मेरा साथ दे रही है तो मुझे कोशिश करने में क्‍या गुरेज है। मैंने किताब लिखने के लिए भी प्रयत्‍न करने शुरू कर दिए, एक बेहतरीन बुक लिखने के लिए, मैं घोषणा कर रहा हूं कि मैं किताब लिख रहा हूं, जैसे ही घोषणा की तो एक दोस्‍त ने सुन लिया और कहा, इतना उत्‍साह अच्‍छा नहीं होता, तुम असफल हुए तो लोग हंसेंगे, मैंने कहा, अगर असफन न हुए तो, सफलता के लिए तालियां भी तो यही बजाएंगे। उसने फिर रोका, लेकिन मैंने अब उसकी बात को चुनौती के रूप में ले लिया, और काम को तेज कर दिया। मैं सोचता हूं, हम घोषणाएं करने से क्‍यों डरते हैं, हमको घोषणाएं करनी चाहिए, जैसे कुछ फिल्‍म निर्देशक फिल्‍मों की घोषणाएं करते हैं, और वो फिल्‍में अधर में अटक जाती हैं क्‍या वह निर्देशक फिल्‍में बनाना बंद कर देते हैं, नहीं, वह अगले प्रोजेक्‍ट पर काम करना शुरू कर देते हैं, जब समय अच्‍छा होने लगता है तो पुरानी घोषणाओं को पूरा कर देते हैं। मैं नए बिजनस और अपनी घोषणाओं के साथ गांधीनगर गुजरात शिफट हो चुका हूं, उम्‍मीद है कि एक बेहतरीन जीवन जीकर इस दुनिया से विदा लूंगा। बाकी बातें बाद में दोस्‍तों फिर मिलेंगे। घोषणाएं करो, याद रखो कोई सुन रहा है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-4512766033295178662?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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किश्त का इंतजार नहीं रहता, क्‍योंकि न तो मैं चेतन भगत हूं और न बिग अड्डा का अमिताभ बच्चन, एक साधारण भारतीय हूं, और कुछ लोगों की तरह मुझे भी डायरी लिखने का शौक है, पर सार्वजनिक रूप में, निजी नहीं। आज की किश्त में एक रेल यात्रा के बारे में बताने जा रहा हूं, जोकि मेहसाना से शुरू होती है और बठिंडा सिटी के रेलवे स्टेशन पर खत्म। मुझे पढ़ने का बहुत शौक है, लेकिन कोर्स की किताबें नहीं, बल्कि पत्रिकाएं व जानकारी देने वाले रोचक समाचार पत्रों के पन्ने। मैं शनिवार को जैसे ही मेहसाना के रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो मुझे वहां लगे ब्‍लॉक ने बताया दिया था कि गाड़ी आने में अभी एक घंटा बाकी है। इस एक घंटे को कैसे गुजारा जाए, इस पर मैंने बिल्कुल विचार नहीं किया, क्‍योंकि रेलवे स्टेशन में प्रवेश करते ही मेरी निगाह वहां स्थित बुक स्टॉल पर पड़ी, जहां पर बहुत सारी पत्रिकाएं व एक हिन्दी का न्यूजपेपर पड़ा था, जिसका नाम था राजस्थान पत्रिका, मैंने इस समाचार पत्र व दैनिक भास्कर की पत्रिका लक्ष्य को खरीदा, सच में दोनों पढ़ने के बाद लगा कि मैंने इस बार भी गलत जगह पैसे खर्च नहीं किए। लक्ष्य पत्रिका में भी पॉजिटिव थिंक की बातें लिखी हुई थी, और राजस्थान पत्रिका के मी डॉट नेक्‍सट में भी पॉजिटिव एटिट्यूड से संबंधित भरपूर जानकारी थी। दोनों को पढ़ते पढ़ते कम समय निकल गया पता ही नहीं चला। इतने में रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर आ गई। मैं बैग उठाकर रेल गाड़ी की तरफ बढ़ा, लेकिन दिमाग इन दोनों चीजों में अभी भी मगन था। मैं एस सिक्‍स में घुसा और अपनी सीट नम्‍बर के पास गया था तो पता चला कि मेरी सीट एस सिक्‍स में नहीं और एस सेवन में है, मैं सॉरी बोलते हुए कोच से बाहर की तरफ दौड़ा और पहुंच गया अपनी सीट पर। मैं पूरी तरह चुपचाप, मानो जैसे में मौन धारण कर लिया हो। यह रिजर्वेशन कोच, मुझे जनरल कोच जैसा लग रहा था, क्‍योंकि मेरे जाने से पूर्व मेरी वाली सीट पर पांच जन बैठे हुए थे, जबकि सामने वाली सीटों पर छोटे छोटे बच्चे लेटे नींद का आनंद ले रहे थे। इस कोच सवार ज्यादा लोगों को माउंट आबू रोड़ उतरना था। एक व्यक्‍ति के मोबाइल पर गीत बज रहे थे, लेकिन मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था। जो समाचार पत्र व पत्रिका रेलवे स्टेशन पर पढ़ी, उसमें एक बात थी कि चुनौतियों को देखकर घबराओ मत, उनका मुकाबला करो। यह परिस्थिति ऐसी थी, जिसको हैंडल करना जरूरी था, बिना किसी अन्य व्यक्‍ति को नुकसान पहुंचाए। मेरी निगाह मेरे सामने बैठी एक लडक़ी पर गई, जिसकी मोटी मोटी आंखों में काजल डाला हुआ था, वो बिल्कुल जब वी मेट की करीना जैसी नजर आ रही थी, लेकिन उसको भी वहीं तक जाना था जहां तक मेरी सीट पर बैठे लोगों को। वो अपने सामने बैठे एक व्यक्‍ति से बातें करने में मस्त थी, और बीच बीच में मुझे भी देख रही थी। वो निरंतर बोल रहा था, वह अलग अलग मुद्राओं में हां का संकेत देते हुए बातें सुन रही थी। मैं उसकी बदलती मुद्राओं को देखता रहा था, ताकि मेरे आस पास फैली अव्यवस्था पर मेरा ध्यान न जाए। कुछ घंटों के बाद माउंट आबू रोड़ आ गया, और रेलगाड़ी खाली हो गई एवं वो युवती भी उसी भीड़ केञ् साथ उतर गई। रेलगाड़ी खाली हुई एवं रोटी खाई और नींद का आनंद लिया। कुछ घंटों पश्चात गाड़ी फालना स्टेशन पर पहुंची और मैं घूमने के लिए थोड़ा नीचे उतरा तो आकर देखा मेरा बैग सीट के नीचे से निकालकर एक महिला ने अपने बैग वहां पर ठूंस दिए, मैंने अपना बैग अन्य जगह पर रख दिया। अब मेरी सीट के आस पास वाली छह सीटों पर पंजाबी गुजराती परिवार बैठा था, दोनों हिन्दी बोलना नहीं जानते थे, दोनों बातें करते एक दूसरे से लेकिन अपनी अपनी भाषा में। ऐसे में कुछ बातें समझाने के लिए मैं उनका ट्रांसलेटर बना, क्‍योंकि मेरा तालुक दोनों राज्यों से है। पंजाबी पूरी तरह जानता हूं तो गुजराती समझता हूं। धीरे धीरे सूर्य डूबता चला गया एवं अंधेरे की चादर फैलती चली गई। जोधपुर गाड़ी नौ बजे के करीब पहुंची। यहां पर एक यंग कपल हमारी सीटों के नजदीक पहुंचा। इस कपल के आने से मेरी उदासी भाग गई, जो मुझे कुछ कुछ पल बाद पकड़ रही थी। ऐसा नहीं कि यंग कपल में यंग लेडी मुझे अच्छी लग रही थी। इस यंग कपल के साथ एक छोटी सी उनकी बेटी थी, बिल्कुञ्ल रिदम जैसी। रिदम मेरी बेटी, जिसको नाना केञ् घर छोडक़र मैं पंजाब लौट रहा था। उसे बहुत ज्यादा मिस कर रहा था, उस बच्ची को देखकर मुझे रिदम याद आ रही थी, वो बच्ची बिल्कुञ्ल रिदम जैसी थी, लेकिन रिदम से पांच माह बड़ी। रिदम ने मेरे सफर पर निकलने से पहले खुद चलकर पांच फूट का सफर तय किया, जबकि राधिका बिंदास चल रही थी। रिदम की तरह राधिका ने भी अपने पापा को देर रात तक नहीं सोने दिया। वो उसको सुलाने की कोशिश करें तो वह रिदम की तरह ही चीखे। राधिका का बाप भी मेरी तरह उसको उठाकर रेलगाड़ी में घुमाने ले गया, ताकि कोई डिस्टर्ब न हो। एक चक्कर काटने के बाद राधिका करीबन सवा बारह बजे के करीब सो गई, तभी वहां टीटी आया, एवं 46 सीट पर सो रहे युवक से टिकट मांगा। वो टिकट दिखा रहा था कि इतने में दो अन्य यात्री टीटी केञ् पास आए एवं सीट देने का अनुरोध करने लगे, टीटी ने सख्‍ती से डांट फटकार लगाते हुए उनको वहां से भगा दिया एवं युवक की टिकट वापिस लौटते हुए सौ रुपए का नोट पकडक़र टीटी वहां से आगे बढ़ गया। कैञ्से खत्म हो सकता है भ्रष्टाचार, जिसकी जन्मदाता ही पब्‍लिक है। सोचते सोचते सो गया एवं सुबह उठा तो बठिंडा के बिल्कुल पास था। उठते ही निगाह सबसे पहले राधिका पर गई, जो धीमी आवाज में पापा वाली सीट पर खड़ी होकर मम्‍मी को उठने के लिए अनुरोध कर रही थी।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-1178737145111089861?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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जिन्दगी ने आखिर हम सबको किस तरह अलग थलग किया है। अभिनय कुलकर्णी, जिसे मैं जल्दबाजी में अभय कुलकर्णी कह जाता था, मेरी अंतिम मुलाकात तब हुई, जब मैं बेवदुनिया छोड़ने का फैसला कर चुका था, एक कांफ्रेंस रूम में। फैसला करने के बाद जैसे ही मैं वेबदुनिया के ऑफिस में पहुंचा तो सब मेरी प्रतिक्रिया जाने के लिए तैयार थे, आखिर क्या हुआ? क्यों कि इस बिरह के मौसम की शुरूआत मुझसे होने वाली थी। मैंने जैसे ही बताया कि मैं वेबदुनिया छोड़ने वाला हूँ, तो बात पूरे ऑफिस में जंगल की आग की तरह फैल गई। मेरे बाद शायद अभिनय कुलकर्णी को भी बुलाया जाना था, वो मेरा फैसला सुनने के बाद काफी बेचैन हो गए, होते भी क्यों न, आखिर पूरा परिवार जो इंदौर में बसा चुके थे, और कंपनी के प्रति खुद को पूरी तरह समर्पित कर चुके थे, कई अच्छे मौके उन्होंने अच्छे वक्त भी ठुकरा दिए थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी थी कि अब उन मौकों को आगे से जाकर मांगना था, जिनको ठुकरा चुके थे वो कई दफा। उसके दिन के बाद, मेरी और उनकी कोई बात नहीं हुई, लेकिन कल जैसे ही मुझे पता चला कि वो इस तरह दुनिया से चले गए, पांव तले से जमीन निकल गई। यह बेहद बुरी खबर थी मेरे लिए अब तक की, क्योंकि वेबदुनिया के क्षेत्रीय भाषा के जितने भी पोर्टल थे, उन पोर्टलों में सबसे बढ़िया वरिष्ठ उप संपादक थे, जिन्होंने लम्बे समय तक बिना किसी विवाद के अपना कार्यकाल खत्म किया, लेकिन वो इस तरह दुनिया से ही रुखस्त हो जाएंगे किसी ने नहीं सोचा था। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।&lt;/div&gt;&lt;a class="google-buzz-button" data-button-style="small-count" data-locale="en_IN" href="http://www.google.com/buzz/post" title="Post on Google Buzz"&gt;&lt;/a&gt; &lt;script src="http://www.google.com/buzz/api/button.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-5951350503000775739?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/window84/~4/C4ChgpWmrWM" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/window84/~3/C4ChgpWmrWM/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><thr:total>5</thr:total><feedburner:origLink>http://window84.blogspot.com/2010/05/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-3456103436326364904</guid><pubDate>Fri, 09 Apr 2010 05:20:00 +0000</pubDate><atom:updated>2012-04-26T18:21:22.517+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">स्कूल</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">दोस्त</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मैं</category><title>उस दिन का पागलपन</title><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दो बजने में कुछ मिनट बाकी थे, और स्कूल की छुट्टी वाली घंटी बजने वाली थी, लेकिन हम दूसरे गाँव से पढ़ने आते थे, इसलिए हमारे लिए स्कूल की घंटी बजने से ज्यादा महत्वपूर्ण था बस का हॉर्न। उस दिन जैसे ही बस ने गाँव के दूसरे बस स्टॉप से हॉर्न दिया, तो हमारे गाँव के सब लड़के स्कूल के मुख्य दरवाजे की तरफ दौड़ने लगे। मेरे गाँव के सब लड़के स्कूल की दीवार के उस पार खड़े मुझे आवाज दे रहे थे, ओए पंडता (पंडित) जल्दी आ, बस आने वाली है, लेकिन मैं और मेजर फँसे खड़े सौ के करीब लड़कों की भीड़ में। पंगा पड़ा हुआ था, एक लड़की को लेकर, जो इस स्कूल में पढ़ने के लिए आई थी, दूसरे किसी शहर से, लेकिन उसके शहरीपन ने स्कूल का माहौल बिगाड़ दिया, अब हर कोई प्यार इश्क की बातें करने लगा, लड़कियाँ लड़कों से फ्रेंडशिप करने के बारे में सोचने लगी। बस गलती इतनी सी थी मेजर की, वो दोस्त के कहने में आ गया और सोचने लगा वो लड़की उस पर मरती है, जबकि ऐसा कुछ नहीं था, क्योंकि मैं उससे स्पष्ट शब्दों में पूछ चुका था। सुंदर लड़की पर कौन नहीं मरना चाहेगा, पूरा स्कूल उसकी तरफ देखता था, मैं नहीं मेरी निगाहें कहीं और थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जैसे स्कूल में पता चला कि मेजर उस लड़की पर लाईन लगाता है, तो उस गाँव के सब लड़के सख्ते में आ गए। और उन्होंने मेजर को स्कूल में पीटने का प्लान बना लिया। मेरे सब दोस्तों को पहले पता चल गया था, वो सब के सब तो स्कूल के पिछले रास्ते से निकल बस स्टॉप पर पहुंचकर मुझे आवाज दे रहे थे, लेकिन मैं मेजर को स्कूल के बरामदों से बस स्टॉप की तरफ खींचकर ले जा रहा था, वो लड़कों की भीड़ देखकर घबरा रहा था, पैर पीछे खींच रहा था, लेकिन मेरा मन उसको अकेले छोड़ भाग जाने को नहीं करा, मैंने कहा मैं भी तो तेरे साथ चल रहा हूँ, तू क्यों डर रहा है, तुझे रोज इस स्कूल में आना है, अगर तू डरेगा तो ये लोग तुम्हें घर में घूसकर मारेंगे, तू डर मत मेरी बाजू पकड़, मैं देखता हूँ कौन रोकता है रास्ता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौ के करीब लड़कों की भीड़ मुख्य द्वार और बरामदे के बीच वाले रास्ते पर खड़ी थी, जैसे ही हमने कदम बरामदे से बाहर निकाले, वो सबके सब मारने के लिए अपने हाथ को तनने लगे, वो किसी भी समय हम पर हमला कर सकते थे, लेकिन मैं निरंतर उसको लेकर आगे बढ़ा, अब हम दोनों को लड़कों ने चारों ओर से घेर लिया था। एक लड़के ने मुट्ठी बंद कर जैसे ही मेरे गुप्तअंग की तरह प्रहार करने की कोशिश की, तो एक पीछे से आई आवाज ने उसकी मुट्ठी को वहाँ ही रोक दिया। "पंडतां दा मुंडा ए, देखके मारी" (पंडितों का लड़का है, देखकर मारना)। इस पंक्ति ने सबको पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया, और मैं निरंतर उसको लेकर आगे बढ़ता गया, और हम स्कूल के द्वार के बाहर निकल गए, कुछ देर में उधर से बस भी आ गई, हम दौड़कर बस की छत्त पर चढ़ गए। मेरे दोस्तों ने कहा, ओए पंडता तू बच गया, आज तेरे साथ बहुत बुरा होता, तुम्हें सन्नी देओल बनने की क्या जरूरत थी। इतना सुनते ही जब मैं उस दृश्य को ख्याल में देखा तो सच मानो, मेरे पैरों तले जमीं निकल गई, अगर कुछ हो जाता तो?&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-3456103436326364904?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/window84/~4/i7sVSWil3Mo" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/window84/~3/i7sVSWil3Mo/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><thr:total>4</thr:total><feedburner:origLink>http://window84.blogspot.com/2010/03/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-7174560828063251973</guid><pubDate>Fri, 19 Feb 2010 09:31:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-04-15T19:59:40.348+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मैं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">नाड़ी निरीक्षण</category><title>जब हुआ नाड़ी निरीक्षण</title><description>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ग&lt;/span&gt;त 17 फरवरी से योग शिविर जा रहा हूँ, एक दोस्त के निवेदन पर, ताकि दोस्ती भी रह जाए और सेहत में भी सुधार हो जाए। योग शिविर में जाकर बहुत मजा आ रहा है, क्योंकि वहाँ पर बच्चा बनने की आजादी है, जोर जोर से हँसने की आजादी है, वहाँ पर बंदर उछल कूद करने की आजादी है। सुना तो बहुत बार है कि मानव रूपी पुतला पाँच तत्व से बना है, &lt;/div&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;लेकिन उसको भी तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है, पहली बार जानने को मिला। वहाँ जाकर पता लगा कि मनुष्य में तीन प्रकार की प्रकृति पाई जाती हैं कफ, पित्त और वात। एक महिला प्रवक्ता ने इस पर थोड़ी जानकारी दी, उसको सुनने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं पित्त प्रकृति का व्यक्ति हूँ, जो जो लक्षण उन्होंने बताए वो मैंने खुद में महसूस किए, लेकिन मेरी स्वीकारने की भावना मेरे दोस्त को खनक गई। उसने कहा कि नाड़ी निरीक्षण करवा, मुझे लगता है तुम्हारी प्रकृति कफ है। तो मैंने कहा, नहीं यार जो लक्षण बताएं हैं वो तो मेरे भीतर हैं। वो माना नहीं, और मैं भी ठहरा जिद्द का पक्का। शुक्रवार को जैसे ही योग शिविर की समाप्ति हुई, तो पहुंच गया वहाँ मौजूद डॉक्टरनी साहिब से नाड़ी निरीक्षण करवाने। &lt;b style="color: red;"&gt;&lt;i&gt;कुर्सी पर बैठते हुए आँखें बंद करने से पहले मैंने बाईं बाजू आगे कर दी, क्योंकि मुझसे पहले नाड़ी निरीक्षण करवा रही महिला ने भी उसी बाजू को आगे किया था। मेरी बाईं बाजू को देखकर डॉक्टरनी साहिबा बोली, दूसरी बाजू आगे करो। मैं मन ही मन में हँस रहा था, बहुत पुरानी बात को याद कर, एक बार पहले भी किसी हस्तरेखा माहिर ने मुझे ऐसा ही कहा था कि दूसरी बाजू आगे करो। मैंने दाईं बाजू आगे कर दी। डॉक्टरनी साहिबा ने मेरी कलाई के आसपास की नसों को दबा दबा कर कुछ महसूस करने की कोशिश की, तब मैं बंद आँखों के सामने हिरन, खिलते हुए फूल और पहाड़ों से गिरता पानी महसूस कर रहा था। उस सुंदर नजारे के साथ साथ &lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;&lt;i&gt;मुझे समझ भी आ रहा था कि&amp;nbsp;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;&lt;i&gt; डॉक्टरनी साहिबा के कुछ पल्ले नहीं पड़ा रहा,&amp;nbsp; मेरा सोचना शुरू ही था कि उन्होंने थोड़ी&amp;nbsp; देर बाद मेरी दाईं बाजू को छोड़ दिया और बोली कि&amp;nbsp; दूसरी बाजू को आगे करो।&amp;nbsp; मैंने फिर बाईं बाजू आगे बढ़ा दी, जिसको उन्होंने नकार दिया था। फिर थोड़ी देर तक निरीक्षण चला और अंतिम में डॉक्टरनी साहिबा बोली।&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; जहाँ तक मुझे लगता है तुम पित्त प्रकृति के हो, मतलब दोनों बाजू देखने के बाद भी केवल उसको लगा। पक्की गारंटी नहीं दे सकी कि मैं पित्त प्रकृति का हूँ, मुझे क्या करना था वो सब जानकर, &lt;b&gt;&lt;a href="http://window84.blogspot.com/2010/02/blog-post_15.html" style="color: lime;"&gt;मैं जो हूँ, वो मैं अच्छी तरह जानता हूँ&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;, लेकिन दोस्त के व्याकुल मन को संतुष्ट करना था मुझे तो। दोस्त भी बड़ा अजीब है, वो फिर भी मानने को तैयार नहीं हुआ, वो बोला तुम कफ प्रकृति के हो। दोस्त को ही शांति देनी थी, तो मैंने कह दिया दोनों प्राकृतियों का हूँ। जब घर पहुंचा तो सोचा। दोस्त कहता है कफ प्रकृति हूँ, डॉक्टरनी साहिबा कहती हैं कि पित्त प्रकृति का हूँ। मतलब अब एक प्रकृति बची है वात, लगते हाथ उसको भी ग्रहन करन लेता हूँ। डॉक्टरनी साहिबा की जाँच देखकर दोस्त भी घबरा गया था, जो घबराहट मैंने महसूस की उसके दिल में, क्योंकि डॉक्टरनी साहिबा सबको एक ही बाजू चैक करके बता देती थी, लेकिन पहला व्यक्ति था, जिसकी दोनों बाजूओं को चैक करना पड़ा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-7174560828063251973?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/window84/~4/yd576ZyZt3I" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/window84/~3/yd576ZyZt3I/blog-post_19.html</link><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><thr:total>9</thr:total><feedburner:origLink>http://window84.blogspot.com/2010/02/blog-post_19.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-5666871455153658411</guid><pubDate>Mon, 15 Feb 2010 16:14:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-04-15T20:00:01.201+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मैं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">पिता</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">जिन्दगी</category><title>जो हूँ वैसा रहना</title><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S3lyvESxJfI/AAAAAAAAAl8/gE5GhWxhMRY/s1600-h/blog-ke-liye.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="179" src="http://1.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S3lyvESxJfI/AAAAAAAAAl8/gE5GhWxhMRY/s320/blog-ke-liye.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;मैं कल से क्यों नहीं डरता? मैं कल के बारे में क्यों नहीं सोचता? मेरी पत्नि अक्सर मुझ पर चिल्लाती है| चिल्लाए भी क्यों न वो, कल से जो डरती है, जिसके चक्कर में वो आज भी खो बैठती है। मुझे नहीं पता चला कब और कैसे मुझे आज से नहीं अब से प्यार हो गया। जो हूँ वैसा रहना मुझे पसंद है, चाहे सामने वाले को कितना ही बुरा क्यों न लगे। मुझे पल पल रूप बदलना नहीं आता। मैंने कहीं सुनना था या पढ़ा था सच और तलवार का घाव जल्द ठीक हो जाता है। उसके बाद झूठ का पल्लू पकड़ना बंद कर दिया, जबकि दुनियादारी झूठ के बगैर चलती नहीं।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt; पता नहीं कौन सी शक्ति है मेरे पीछे, जो मेरी दुनियादारी को सच के बलबबूते पर भी चलाए जा रही है। मैं कभी किसी चीज के पीछे दौड़ा नहीं, जो चाहिए वो सामने अचानक आ खड़ा हुआ और मुझे शक्ति देकर गायब हो गया या कह लो मुझमें समा गया। पिछले साल रिलीज हुई आमिर खान की फिल्म थ्री इड्टियस तो सबने देखी हो गई। सच में मैं मेरा सीना तब गर्व से फूल गया था, शरीर के भीतर एक अनोखी शक्ति महसूस की। जब इंटरव्यू देना आया रोस्तगी कहता है कि दो टाँग तुड़वाकर फिर से चलना सीखा हूँ, ये एटीट्यूट तो आते आते ही आएगा। मुझे पता है वो फिल्म थी, पर्दे पर ऐसा तो दिखाया जा सकता है, लेकिन मैंने तो इस असल जिन्दगी में अपना हुआ है अब से नहीं, तब से जब एक खेत छीनने पर पिता ने कहा था " कोई बात नहीं, बेटा खेत छीना है, कर्म तो नहीं"। उस दिन के बाद शायद कोई पल होगा जब मैंने कभी कहीं काम छूटने को लेकर अफसोस किया हो। मुझे याद है जब मैंने दैनिक जागरण छोड़ा था। मैंने एकाएक ही दैनिक जागरण को त्याग पत्र दे दिया, और बाहर निकल गया उस संस्थान से। सच में ऑफिस से पहले सीधा घर ही जाना था, घरवालों को बताना जो था कि बेटे ने नौकरी को ठोकर मार दी। सीढ़ियाँ उतर रहा था कि मोबाइल पर रिंग आई। बोले हैप्पी कहाँ हो? पंजाबी केसरी के लिए काम करोगे? उन्होंने कहा पैसे कितने लोगे? मैंने कहा, पैसे के लिए जॉब करनी होती तो दैनिक जागरण को ठोकर क्यों मारता, जो एक ही झटके में दो हजार रुपए बढ़ने के तैयार हो गया था। पंजाब केसरी में जॉब मिल गई और मैं खुश। डेढ़ साल बाद कुछ रिश्तों में खटास आने लगी। रिश्तों में खटास मुझे पसंद नहीं। जॉब छोड़ना बेहतर समझा, अच्छे रिश्ते रह जाएं इसलिए। जॉब छोड़ते ही फिर नई जॉब का ऑफर आ गया। फिर घर रहने की फुर्सत न मिली, स्वाभाव कभी नहीं बदला। चापलूसी हम से होती नहीं। कई जगहों से गुजरने के बाद वेबदुनिया ग्रुप में पहुंचा हूँ, यहाँ भी अपना स्वाभाव बरकरार है। जैसा हूँ वैसा रहना पसंद है। पिता की उस बात ने जिन्दगी को जीने का तरीका दे दिया। वरना मैं भी कल के चक्कर में अपना आज खो रहा होता। बहुत कुछ मिला है बिन माँगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;शायद चाहने वालों ने &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;एक जमाने बाद &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;खुशियाँ को मेरे घर का पता दे दिया।&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-5666871455153658411?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/window84/~4/4vessajHBCM" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/window84/~3/4vessajHBCM/blog-post_15.html</link><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><media:thumbnail url="http://1.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S3lyvESxJfI/AAAAAAAAAl8/gE5GhWxhMRY/s72-c/blog-ke-liye.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>11</thr:total><feedburner:origLink>http://window84.blogspot.com/2010/02/blog-post_15.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-4948403734346783058</guid><pubDate>Sat, 06 Feb 2010 10:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-04-15T20:00:24.954+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मेरी बेटी</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">जिन्दगी</category><title>मेरे घर आई नन्ही परी</title><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S20-z_kkWUI/AAAAAAAAAkE/PmdYZg_Jt4Q/s1600-h/Image0059.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S20-z_kkWUI/AAAAAAAAAkE/PmdYZg_Jt4Q/s320/Image0059.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;छ: फरवरी 2010 को सुबह सात बजकर 58 मिनट पर हिम्मतनगर (गुजरात) स्थित अस्पताल वरदान में इस नन्ही परी का जन्म हुआ। एक झलक खुली खिड़की के पाठकों और मेरे दोस्त जनों के लिए। &lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S20--6TcjRI/AAAAAAAAAkM/OJrYcy7LErA/s1600-h/Image122.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S20--6TcjRI/AAAAAAAAAkM/OJrYcy7LErA/s320/Image122.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;फिलहाल नाम नहीं रखा गया, लेकिन मैंने उसको रिधम कहना शुरू कर दिया है। मेरे पास समय कम था, इसलिए दोस्त बस इतना सा लिख पा रहा हूँ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-4948403734346783058?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/window84/~4/CqNtmsJ23nk" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/window84/~3/CqNtmsJ23nk/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><thr:total>8</thr:total><feedburner:origLink>http://window84.blogspot.com/2010/01/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-8458466924996728051</guid><pubDate>Mon, 21 Dec 2009 02:50:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-01-16T09:43:23.580+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मैं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">शौचालय</category><title>शौचालय और बेसुध मैं</title><description>मुझे वो दिन कभी नहीं भूलता। उस दिन मैं काम कर कर बेसुध हो चुका था। मेरा शरीर गतीविधि कर रहा था, जबकि मेरा दिमाग बिल्कुल सुन्न हो चुका था, क्योंकि काम कर कर दिमाग इतना थक चूका था कि उसमें और काम करने की हिम्मत न थी। मैंने अपनी कुर्सी छोड़ी, और टहलने के लिए नीचे के फ्लोर पर चला गया, जहां चाय और कॉफी बनाने वाली मशीन लगी हुई थी। मैंने एक कप चाय ली, और घुस गया साथ वाले रूम में, जो बिल्कुल खाली था। सोचा कि एकांत है, कुछ समय यहां पर रहूंगा तो तारोताजा हो जाऊंगा। मैंने चाय का कप एक टेबल पर रखा, और पेसाब करने के लिए बाथरूम में चला गया।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बाथरूम के भीतर गया और पेसाब करने लगा। जब मैं पेसाब कर रहा था, मुझे कुछ ऐसा लगा जो 'गलत' था। जो इससे पहले कभी मेरे साथ नहीं हुआ था। आज मुझे पेसाब करने के लिए पैरों की उंगलियों के बल होना पड़ रहा था। लेकिन आज तक तो ऐसा न हुआ था। मैंने सोचा कि पागल कारीगर ने पेशाब करने वाला बेसिन कितना ऊंचा लगा दिया। मुझे से छोटे कद वाले इस ऑफिस में बहुत लोग हैं, उनको कितनी मुश्किल आती होगी पेसाब करने में। इसकी शिकायत किसी ने शिकायत क्यों नहीं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या प्रोजेक्ट लीडर ने भी इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया? जिसका कद तो बहुत छोटा है। इतना सोच सोचते मैंने कैसे न कैसे पेशाब कर लिया। पेशाब करने बाद जैसे ही मैंने अपनी कम्प्यूटर की स्क्रीन पर काम कर कर थकी हुई आंखों को खोला, तो मेरी निगाह सामने लगे आईने पर गई। फिर क्या था आंखें खुली की खुली रह गई, दिमाग चित हो गया। गुम हुए होश लौट आए। मैंने देखा कि जिसमें मैंने पेशाब किया, वो पेशाब करने का नहीं हाथ धोने वाला वाश बेसिन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां पर मुझे ऐसी हकरत करते हुए देखने वाला कोई नहीं था, सोचो अगर वो सार्वजनिक होता तो...। इसके बाद मेरी हैरानी की कोई हद न रही, मुझे उस दिन अहसास हुआ कि काम का बोझ आदमी को किस तरह बेसुध कर देता है। इस घटना का केवल मुझे पता था, लेकिन मैं सोच रहा था कि अगर इतनी बड़ी गलती यहां हो गई तो काम में भी कुछ न कुछ तो हुई हो गई। और कोई गलती न हो। इसलिए मैं ऑफिस से घर के लिए निकल दिया। ये बात करीब दो साल पहले की है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-8458466924996728051?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/window84/~4/E8VA6PNb7mk" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/window84/~3/E8VA6PNb7mk/blog-post_21.html</link><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><thr:total>10</thr:total><feedburner:origLink>http://window84.blogspot.com/2009/12/blog-post_21.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-2562904374182459227</guid><pubDate>Fri, 11 Dec 2009 05:32:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-01-19T00:24:24.197+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">माँ</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">railway satation</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">kulwant happy</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मैं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">पिता</category><title>मेरे पिता और पक्षी फीनिक्स</title><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://dailyhoopla.com/wp-content/uploads/phoenix.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://dailyhoopla.com/wp-content/uploads/phoenix.jpg" width="173" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;कुछ दिन पहले मैं अहमदाबाद के रेलवे स्टेशन पर खड़ा बठिंडा को जाने वाली रेलगाड़ी का इंतजार कर रहा था, मैं खड़ा था, लेकिन मेरी नजर इधर उधर जा रही थी, लड़कियों को निहारने के लिए नहीं बल्कि कुछ ढूंढने के लिए, जो खोया भी नहीं था। इतने में मेरी निगाह वहां पर स्थित एक किताब स्टॉल पर गई, मैं तुरंत उसकी तरफ हो लिया, जब पत्नी साथ होती है तब मैं खाने पीने के अलावा शायद किसी और वस्तु पर पैसे खर्च कर सकता हूं, इसलिए हर यात्रा के दौरान मुझे किताबें या मैगजीन खरीदने का शौक है। इस बार मैंने अपने इस सफर के लिए 'आह!जिन्दगी' को चुना, मैंने जब उसको खोला तो मैं सबसे पहले उस लेख पर गया, जो महान फुटबाल खिलाड़ी माराडोना पर लिखा गया था, इसको लेख को पढ़ते हुए मुझे मेरे पिता का अतीत याद आ गया, उनका संघर्ष याद आ गया।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;वो माराडोना की तरह फुटबालर नहीं हैं, वे तो आम इंसान हैं। इस लेख में माराडोना की तुलना एक ऐसे पक्षी (फीनिक्स) के साथ की गई थी, जो अपनी ही राख से पुन:जीवित हो उठा है, इस तुलना ने मुझे मेरे पिता के संघर्ष के उन दिनों की याद दिला दी, जब वक्त ने कहा, "अब तो हेमराज खत्म हो गया", लेकिन वे फिर से इस कल्पित पक्षी की तरह खड़े हुए और जुट गए। इस लेख में माराडोना के बारे में लिखा था, लेकिन मुझे मेरे पिता का संघर्ष ही याद आ रहा था, मुझे लगा कि शायद इस लेख को मेरे लिए लिखा गया। मेरे पिता का जन्म एक बड़े पंडित परिवार में हुआ, लेकिन उनके पिता की बे-वक्ती मौत ने उनको दर दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर दिया, लालची लोगों ने उनका सोना(जायादाद) कौड़ियों का भाव खरीद लिया। खुद के गांव में रहकर काम करने की बजाय मामा के गांव चले गए, कई साल वहां रहे, लेकिन खुद के लिए कुछ नहीं, मामा के बच्चों के लिए कई एकड़ जमीन तैयार कर दी, जब जवान हुए तो हाथ में कुछ ही जमीन बची।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उस जमीं पर खेती शुरू की तो कुछ साल बाद मां को बेटे का मोह आने लगा, उन्होंने मेरे पिता को शहर बुला लिया, चलो तीनों भाईयों की तरह इसको भी सरकारी नौकरी पर अटक दें, लेकिन किस्मत देखो, तीन बार सरकारी नौकरी मिली और चली गई। सबको चिंता हो रही थी, अब क्या होगा, बच्चे बढ़े हो रहें और शहर में तो महंगाई बहुत ज्यादा है। लेकिन सरकारी नौकरी से ऊब चुके मेरे पिता ने अब पशु व्यापार शुरू कर दिया, घर में अच्छे पैसे आने लगे, लग रहा था कि अब दिन सुनहरे आ गए, बुरा वक्त टल गया, मगर बुरा वक्त कहां टलने वाला था, वो तो बड़ा हाथ मारने का इंतजार कर रहा था। मुझे आज भी याद है वो दर्दनाक हादसा, जिसमें एक ट्रक्टर, तीन दोस्त और कई भैंसे खोई मेरे पिता ने, उनकी भी टांग टूट गई थी। सारी कमाई इस हादसे ने छीन ली, और तो और कई महीनों के लिए बिस्तर पर लिटा दिया गया मेरे पिता को, टेंशन फिर से बढ़ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ महीनों बाद फिर से बिस्तर छोड़ा और निकल गए कुछ नए जुगाड़ की तरफ, उनको फिर से एक सरकारी नौकरी पर लगा दिया गया, लेकिन काम जमा नहीं, उन्होंने उसको ठोकर मार थी, बस फिर क्या? पूरे परिवार की बातों को अनसुना करते हुए चल दिए उस गांव की तरफ, जहां कभी उनकी जमीनें हुआ करती थी, और आस पास के गांवों में उनके पिता और दादा के नाम का डंका बजा करता था, लोग आज भी याद करते हैं मेरे दादा की घोड़सवारी को। इस गांव में सिर्फ सौ रुपए और एक दो महीनों का राशन लेकर पहुंचे मेरे पिता, शहर में चिंता थी कि अब इसका होगा क्या? इसको खेती के लिए वहां जमीं कौन देगा। लेकिन एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खुलता भी है। इस गांव में मेरे पिता को उनके चचेरे भाई की जमीं 50-50 पर करने के लिए मिल गई और कुछ जमीं हमने ठेके पर ले ली। जो जमीं हिस्से (50-50) पर मिली थी, वो जमीं ठीक ठीक थी, लेकिन मेरे पिता की मेहनत ने उसको सोना बना दिया। जब वो सोने में तब्दील हो गई तो चचेरे भाई का दिमाग खराब हो गया, मन में लालच आ गया, वो हिस्से पर देने के बजाय ठेके पर देने की बात करने लगा, लेकिन उसने ठेका इतना बोला कि पूरे गांव में उतना ठेका किसी जमीं का न था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने वो जमीं छोड़ दी, गुस्सा आ रहा था, लेकिन मेरे पिता की जिन्दगी में धोखे ही धोखे लिखें हैं, ये तो मैं अच्छी तरह जानता हूं। अगर वो जीवनी लिखें बैठे तो शायद ही कोई अपना होगा, जिसने उसके साथ धोखा न किया हो, शायद उन लोगों में मेरी मां सबसे पहले आएगी, जिसने अंतिम सांसों तक मेरे पिता को धोखा नहीं दिया। इसके बाद एक और जमीं हिस्से पर मिली, जो सोना होते हुए भी पित्तल के भाव बिक रही थी, इस जमीं का मालक एक सीधा सादा साधारण व्यक्ति था, जिसको दुनियादारी नहीं आती थी, बस नशा खिलाओ, जो मर्जी पाओ। उसकी पत्नी थोड़ी समझादार थी, उसने कहा कि अगर बाबा आप मेरे खेतों में काम करना चाहते हैं तो मुझे खुशी हो गई। शायद गांव छोड़ने से पहले हमको उस घर का भला करना ही था, ये मेरे गांव में अंतिम साल थे। मेरे पिता ने हां कह दिया, लेकिन लोग मुझे पकड़ पकड़ कह रहे थे, तेरे पिता को बोल, वो जमीं कचरा है, और कचरे में हीरे मोती नहीं मिलते। मेरे पिता मेरी कहां मानने वाले थे, वो मुझे और मजदूरों को लेकर जुट गए काम में, उनको विश्वास था कि वो इसको सोना बना देंगे, अगले साल वो ही हुआ, जो जमीं गांव के लोगों के लिए कचरा थी, वो आज सोना हो चली थी, सब को इंतजार था कि ये लोग जमीं कब छोड़ेंगे और हमको कब मिलेगी। सबको इंतजार था, मेरे द्वारा गांव छोड़ने का, क्योंकि मुझे अगर शहर में नौकरी मिल गई तो स्वाभिक है कि मेरे पिता मेरे साथ आएंगे। ऐसे में इस जमीं को वो लोग ठेके पर ले लेंगे, लेकिन खेत की मालिकन नहीं चाहती थी कि हम गांव छोड़कर जाएं, क्योंकि उसके घर में खुशियां फिर से लौट आई थी, उसके उतरे हुए चेहरे की रंगत फिर लौट आई थी, मगर मैं उस गांव में कैसे रुकता, मेरे पिता की जमीनें तो लोग खा चुके थे। ऐसे दूसरों के खेतों में मर मर कमाई करने से क्या होने वाला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी मां की मौत के बाद मेरे पिता भी शहर आ गए, तीन साल पहले। वो यहां भी अपना ही काम शुरू करने वाले थे, लेकिन घर परिवार वालों ने कहा कि जो तुम्हारे पैसे हैं, वो तुम को खर्च ने के लिए नहीं मिलेंगे, क्योंकि तुम्हारी बेटी की शादी करनी बाकी है। अब वो फिर मुश्किल में आ गए, मामा ने उनको एक नौकरी पर लगवा दिया, जिसको लेकर मैंने एतराज जताया, वो नौकरी करने लायक नहीं थी, और तो और मामा ने यहां तक कह दिया कि मालक को मत बताना तुम मेरे जीजा हो। इस बात ने मेरे पिता के मन और दुखी कर दिया। फिर क्या, उनके भीतर का फीनिक्स फिर जिन्दा हो गया और अगले छ: महीनों में मेरे पिता ने अपना नया ट्रैक्टर ट्राली लाकर खड़ा कर दिया, जो अब चल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'}); BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''}); BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84}); &lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-2562904374182459227?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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तो बहुत पहले ही बंद हो गया था, लेकिन वो पहला बैंक खाता मुझे आज भी याद है। उस बैंक में चैक लगाने और पैसे निकलवाने के लिए जाना। कतार में लगना, उस मैडम को देखना, जो मुझे कतार में लगे हुए देखती। कभी कभी कैश काउंटर पर वो भी आ जाती, बस उस दिन काम थोड़ा जल्दी हो जाता..आम दिनों के मुकाबले।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;जब उस मैडम तक मुझे कोई काम आ जाता तब बहुत मुश्किल होती। वो मुझे घंटों तक अपने सामने बिठाकर रखती दस मिनट दस मिनट कहते कहते वो घंटों निकाल देती। और कुछ भी न बोलती, बस सामने बैठे इस ग्राहक को देखती दस मिनट कहने के बहाने। वो असीम खूबसूरत थी, चेहरे पर नूर तो गजब का था। कोई भी देखे पहली नजर में मर मिटे। शायद उसका बस चलता तो वो मुझे महीने-दर-महीने अपने सामने रखे रखती उसके सामने पड़े कम्प्यूटर की तरह। वो कोई मुझसे बदला ले रही थी या जानबूझकर वो मुझको बस देखना चाहती थी। ये बात न तो उसने कभी बताई और न मैंने पूछी। पूछकर मैं मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता, एक बार भूल से ले बैठा था,  तो उसने ऑफिस में पकड़कर चुम्मा ले लिया था मेरा। जी हां, ये बैंक वाली मैडम के बाद की घटना है, जिस ऑफिस में मैं काम करता था, उस ऑफिस का इंचार्ज या खर्चवाहक आशिक मिजाज था, वो नई नई लड़कियों को रोजगार के बहाने अपने ऑफिस में रखता। एक दिन मैं ऑफिस में अकेला था, खबरें बना रहा था। मैंने वहां डेस्क पर बैठी एक 32 साला महिला से पूछा तुम मुझे इस तरह क्यों देखती हो। मैं तुम्हें बुरा लगता हूं या अच्छा। इतना कहते हुए मैं पानी पीने के लिए सीट से उठा, उसने आएं देखा न बाएं। बस वहां से खड़ी हुई और मुझे पकड़कर किस कर डाला। वो तो भगवान का शुक्र के ऑफिस के शीशे काले थे, वरना बाहर बस स्टॉप पर खड़े लोग देख लेते तो मुसीबत हो जाती। इस लिए मैंने किसी भी महिला को कभी नहीं पूछा कि वो मेरे बारे में क्या सोचती है। वो मुझे क्यों निहारती है। मैंने कभी नहीं कहा 'क्यों'। क्योंकि उत्तर तो मिल ही चुका था उक्त घटना से। उसके बाद कई अंटियां निहारती रहती, लेकिन मैंने मुड़कर क्यों नहीं कहा और कहना भी नहीं चाहूंगा। ऑफिस के साथ एसटीडी थी, वहां पर बहुत सारी महिलाएं फोन करने आती, वो मेरे ऑफिस में तांकती रहती, उस दरवाजे से जो एसटीडी और ऑफिस को एक करता था। वहां पर एक कॉल गर्ल भी आती थी, आती तो बहुत सारी थी, लेकिन वो मुझे याद है। एक दिन उसने मुझे ही छेड़ दिया। मैंने एसटीडी वाले से कहा यार तुम दरवाजा बंद रखा करो। नहीं तो मुश्किल हो जाएगी। वो कहने लगा कि समुद्र में रहकर मछलियों से परहेज अच्छा नहीं। तुम हैंडसम हो..तुम्हारे पास मौके आते हैं। मैं कहता था, मुझे मौके नहीं चाहिए। मैं हमेशा भागता हूं ऐसे मौकों से। इस ऑफिस में नौकरियां दिलवाने का काम भी चलता था। उस दिन नौकरी दिलाने वाली लड़की नहीं आई, जिसका काम मुझे करना पड़ा । एक महिला आई नर्स की ज़ॉब के लिए, जो कभी नाचने गाने का काम करती थी। मुझे नहीं पता था कि वो ऑफिस इंचार्ज की ही भेजी है। अगर पता होता तो सतर्क रहता। वो ऑफिस में आई। उसके कपड़े मल्लिका शेरावत जैसे। मुझे बोली चलें। मैंने कहा चलो। डाक्टर इंतजार कर रहा है। बोली मोटरसाइकल पर चलते हैं। मैंने कहा नहीं, पास में ही है पैदल चलते हैं। मैं उसके आगे आगे ऐसे चल रहा था, जैसे वो मेरे पास आकर मुझे मार डालेगी। उसने फिर कहा साथ साथ चलते हैं। मैंने कहा कि कोई बात नहीं। तुम आओ। वहां डाक्टर के पास पहुंचे तो वो ऐसे बैठी वहां। जैसे वो जॉब के लिए नहीं जिस्म का नुमाइश लगाने आई हो। उसकी माऊंट एवरेस्ट की तरह उभरी हुई छाती देखकर डॉक्टर हैंग हो गया, मेरे ऑफिस वाले कम्प्यूटर की तरह। बातचीत खत्म हुई तो हम बाहर आए। मुझे बोली जॉब पक्की समझूं। मैंने मन में कहा कि आंखों का डाक्टर है, अगर इसको रख लिया तो हॉस्पिटल को ताला जल्द ही बजेगा। मैंने कहा कि कल से काम पर आ जाना, उसके बाद अंतिम फैसला होगा। फिर बोली मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे ऑफिस में काम करने लग जाती हूं, तुम कितने खूबसूरत दिखते हो। मैंने कहा बेटा फिर फँस गया। उसके बाद मैंने अपने खर्चवाहक को फोन लगाया, ये क्या माल भेज दिया। कोई शो नहीं करवाना, वहां नर्स की जरूरत है। मल्लिका शेरावत की नहीं। डाक्टर ने उसको दूसरे दिन ही निकाल दिया, डाक्टर ने नहीं उसकी पत्नी ने। इसको रखकर क्या उसने अपना घर बर्बाद करना था। वो फिर मेरे ऑफिस आई उसने कहा मेरी जॉब चली गई, मैंने कहा ये तो होना ही था।&lt;a href="http://window84.blogspot.com/2009/10/blog-post.html"&gt;...पार्ट-1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'}); BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''}); BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84}); &lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-3749356521542785543?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/window84/~4/4eVQWLOfxYE" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/window84/~3/4eVQWLOfxYE/2.html</link><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><thr:total>6</thr:total><feedburner:origLink>http://window84.blogspot.com/2009/10/2.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-1279950597949706911</guid><pubDate>Fri, 09 Oct 2009 05:24:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-01-19T00:24:41.838+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मैं</category><title>महिलाओं का मेरे प्रति आकर्षण</title><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/Ss7JEpQ4qnI/AAAAAAAAAR0/48C4E53kXc0/s1600-h/c-pic1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/Ss7JEpQ4qnI/AAAAAAAAAR0/48C4E53kXc0/s320/c-pic1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;मैंने अपनी जिन्दगी में बहुत बार इस बात का अहसास किया है कि मर्दों के मुकाबले महिलाओं का मेरे प्रति आकर्षण ज्यादा रहा है। अगर आज मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे बहुत सी महिलाएं याद आती हैं, जिनका मेरे प्रति आकर्षण था, हर आकर्षण का मतलब शारीरिक संबंधों से नहीं होता। मुझे याद आ रहे हैं वो बचपन के दिन, जब मैं दारेवाला गाँव में स्थित अपने घर के बाहर मिट्टी में खेल रहा होता था और घर के भीतर मां काम में जुटी होती थी। जब मैं मिट्टी के साथ मिट्टी हो रहा होता, तो वहां से सिर पर घास की गठड़ी उठाएं जो भी महिलाएं गुजरती, वो मुझे बुलाकर एवं छेड़कर गुजरती, इतना ही नहीं कुछ तो मुझे अपनी उंगली पकड़ाकर अपने घर तक ले जाती, और मैं भी निश्चिंत उनके साथ चल देता।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार तो मेरे गुम होने की अफवाह भी उड़ गई थी, अफवाह इस लिए कह रहा हूं क्योंकि मैं गुम हुआ ही नहीं था, मैं तो किसी के घर में ऊंट के साथ खेल रहा था। उधर, मेरे घरवालों ने आसपास के तीन गांवों की तलाशी ले ली, लेकिन अपने गांव को भूल गए। तब सब थक हारकर घर में आ गए तो किसी ने कहा कि तुम्हारा छोरा तो उस महिला के साथ मैंने जाते देखा था। जब उनके घर पहुंचे तो पता चला कि शैतान तो यहां ऊंट के साथ खेल रहा है। थोड़ा सा आगे बढ़ता हूं तो मुझे चौथी कक्षा वाली वो टीचर याद आती है, जो मुझको गोद में लेना चाहती थी, जो मुझे पढ़ाकर लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहती थी, अगर अन्य महिलाओं को मुझसे लगाव था तो मेरी माँ का लगाव कैसे कम हो सकता है। आखिर वो भी एक महिला थी। मेरी मां ने मुझे चौदह साल तक अपने साथ सुलाया, कभी न नुक्कर नहीं की। मैं सबसे ज्यादा मां के करीब रहा हूं, मैंने ही अपने बहन भाईयों में से सबसे ज्यादा मां का दूध पिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल के समय लड़कियों के आकर्षण का केंद्र तो मैं हमेशा से ही बना रहा है, उससे भी दिलचस्प बात मुझे याद आती है कि कोई सुंदर जवान टीचर भी मुझे ज्यादा समय तक अपने सामने बैठने नहीं देती थी, जब मैं नौवीं कक्षा में था, तो एक टीचर ने यहां तक कह दिया था कि तुम सबसे पीछे बैठा करो, मैंने पूछा कौन मैडम जी, उन्होंने कहा कि मेरे ध्यान किताब पर केंद्रित नहीं हो पाता, इसका मतलब मैं कुछ भी नहीं समझा, आखिर क्यों उसका ध्यान डोल जाता है। आपको हैरानी होगी कि इस टीचर ने जब कई साल बीतने के बाद मेरी अखबार में छप्पी फोटो देखी तो फटाक से बोली शायद इस लड़के को मैं जानती हूं, जाने भी कैसे ना..ध्यान जो भटका देता था, ये फोटो इसलिए नहीं छप्पी थी कि मैं कोई चोर लुटेरा गैंग में शामिल हो गया था, बल्कि तब मैं दैनिक जागरण में काम करता था, और पाठकों को गिफ्ट प्रदान करते हुए फोटो खिंचवाने पड़ते थे। मैंने उपर 'हैरानी होगी' शब्द इसलिए इस्तेमाल किया क्योंकि शिक्षकों को स्टूडेंट याद नहीं रहते। इसका भी कारण है क्योंकि उनका कोई एक स्टूडेंट नहीं होता, हजारों स्टूडेंट होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़कियों की लिस्ट लम्बी है, इसलिए उनको की बात न करते हुए, एक और महिला की बात करता हूं, जब मैंने छोटे से शहर से बड़े शहर की तरफ कूच किया तो एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। मुझे सबसे ज्यादा नफरत बार बार बैठकें बुलाने से होती है, तब तो खासकर जब आप एक ही मुद्दे को बार बार दोहरा रहे हों। इस कंपनी में मुझे निरंतर कई बैठकों में भाग लेना पड़ा, मैं तो एक ही मुद्दे से तंग आ जाता हूं, इसलिए मैं सामने वाले को देखकर बैठक में टाईम पास करने लगता हूं, या फिर उसकी मूर्खता पर मन ही मन में मुस्कराता हूं, जिसके कारण मेरी आंखों में एक अजब सी चमक आ जाती है, शायद किसी लड़की को आकर्षित करने के लिए वो चमक होनी बहुत जरूरी होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैठक चल रही थी शायद 12वीं बैठक थी जो एक ही मुद्दे पर थी, और एक ही उसको संबोधन करने वाला, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मूर्ख कौन है वो कि हम? इतने में बैठक को संबोधन कर रही महिला ने बीच में रुकते हुए कहा कि तुम मुझे इस तरह मत देखो, मैं हाजिर जवाबी हूं, मैंने तुरंत कहा कि ठीक है अगली बार काला चश्मा पहनकर आऊंगा, अब उसके पास कोई जवाब नहीं था, वो भी कोई कम आकर्षित करने वाली चीज तो न थी, अगर आप किसी सुंदर चीज देख नहीं सकते, तो दुनिया में आने का कोई फायदा नहीं और उस वक्त जब आपको कोई मुफ्त में समय दे रहा है। लेकिन उस कंपनी में वो ही एक ऐसी महिला थी, जिसने मुझे फोन करके अच्छे डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा। ये तब की बात है, जब मैं एक दिन बिमार होने के कारण ऑफिस से घर की तरफ जा रहा था, और किसी का फोन नहीं आया, जबकि अगले दिन सबने पूछा अब कैसे अब कैसे हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और किस्सा याद आ रहा, छोटा करके सुनाता हूं। मैं अब भी उसी बड़ी कंपनी में काम कर रहा था कि अचानक एक दिन रास्ते में मुझे एक लड़की ने रोका और शुरू हो गई। सब उगल दिया जितना जहर उसके मन में कंपनी के प्रति भरा हुआ था, मैं हैरान था कि इस लड़की ने ऑफिस में कभी चाय का कप तक शेयर नहीं किया और आज एकदम से मुझे बीच रास्ते शुरू पड़ गई क्या इसको डर नहीं लगता कि मैं ऑफिस वालों को उसकी सारी बात बता दूंगा। शायद वो मुझे पहचान चुकी थी कि मैं तो एक बागी किस्म का लड़का हूं। जब आपको कोई हर रोज नोटिस करता है तो वो आपको आपसे ज्यादा जानने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी मकान मालिकन कहती है कि तुम को रिश्तों की कदर नहीं, लेकिन फिर भी मैं तुम्हारी ज्यादा इज्जत करती हूं। मुझे इस बात की समझ भी नहीं आई, जब मुझे रिश्तों की कदर नहीं, अगर मुझे समाज की समझ नहीं, अगर मुझे कोई समझ नहीं तो वो मेरी इज्जत क्यों करे। शायद उसका मेरे प्रति आकर्षक ही उसको मेरी इज्जत करने के लिए मजबूर करता है, लेकिन मैं फिर दोहरा रहा हूं कि आकर्षण का मतलब सदैव शारीरिक संबंधों से नहीं होता। और होना भी नहीं चाहिए, फूल हमको आकर्षित करते हैं क्या हम उनके साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश कर सकते है? सुंदर चीजें हमेशा आकर्षित करती हैं, लेकिन मैं खुद को सुंदर नहीं कह रहा, हो सकता है कि सामने वाली निगाहें ही सुंदर हो, जिनको मैं हमेशा ही सुंदर दिखाई देता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: blue;"&gt;&lt;b&gt;मुझे कुछ और महिलाएं याद आ रही हैं...इस लिए एक और किश्त जल्द जारी करूंगा।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'}); BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''}); BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84}); &lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-1279950597949706911?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/window84/~4/GdQTXoP2X30" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/window84/~3/GdQTXoP2X30/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><media:thumbnail url="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/Ss7JEpQ4qnI/AAAAAAAAAR0/48C4E53kXc0/s72-c/c-pic1.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>9</thr:total><feedburner:origLink>http://window84.blogspot.com/2009/10/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-7497935766285492839</guid><pubDate>Sun, 20 Sep 2009 02:10:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-09-20T07:40:20.955+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">टी-शर्ट</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मैं</category><title>मेरी दस नंबरी टी-शर्ट</title><description>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SrWO85NbnCI/AAAAAAAAARc/LIGlBd4Phrs/s1600-h/untitled_1_copy2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SrWO85NbnCI/AAAAAAAAARc/LIGlBd4Phrs/s320/untitled_1_copy2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;मुझे टी-शर्टों से बेहद प्यार था, मुझे टी-शर्ट और जींस पहना शुरू से ही अच्छा लगता है, लेकिन आजकल टी-शर्ट पहना कम हो गया, क्योंकि मेरा पेट बाहर आ गया है। जब मैंने वेबदुनिया को ज्वॉइन किया, तो मुझे पता चला कि वेबदुनिया में ऑफिस ड्रेस रूल हैं, लेकिन मैं बंदा बिंदास। कुछ दिन तो सोचा कि कंपनी बड़ी है, शायद रिर्सोसेज से बढ़कर रूल बड़े हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर कुछ दिनों बाद मेरी निगाहें कंपनी के एक सीनियर एवं पुराने अधिकारी पर पड़ी, जो नियम के उलट उस दिन टी शर्ट पहनकर आया हुआ था। मैं अपनी सीट से उठा और उससे पूछा क्या। सर रूल केवल नए रिर्सोसेज के लिए हैं, सबके लिए। उन्होंने कहा, नहीं सब के लिए एक ही रूल हैं। मैंने कहा आज शनिवार नहीं, और आप फॉर्मल कपड़े पहनकर नहीं आए। उन्होंने कहा, मैंने तुमको कब कहा, तुम फॉर्मल पहनकर आओ। बस फिर क्या था, मेरा वो ही पुराना राग शुरू हो गया। टी-शर्ट और पेंट। मेरे इस लुक को लेकर कुछ लोग तो मुझे टी शर्ट बॉय कहते भी थे, खासकर निहारिका पांडे, जो आजकल श्रीमति अनिल पांडे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मुझे वेबदुनिया की ओर से शुरूआती तीन दिन का वेतन मिला, तो उसके कैश होती ही। मैंने एक टी शर्त खरीदने की सोची। मैं टी-शर्ट खरीदने के लिए एक बड़े शोरूम के भीतर गया, मैंने एक टी-शर्ट देखी। मुझे वो पसंद आ गई, मेरी सब से बड़ी कमजोरी कोई पसंदीदा चीज लेने के लिए मोल तोल नहीं करता, जब मैंने वो टीशर्ट देखी तो मुझे बहुत पसंद आ गई। बस मैंने बोला इसको पैक कर दो। मुझे लगा कि इसकी कीमत दो ढाई सौ रुपए होगी। मगर जब बिल बनकर तैयार हुआ तो मेरी आंखें खुली की खुली रह गई। बिल पर लिखे थे साढ़े चार सौ रुपए। मैंने चुपचाप टी शर्ट लेकर वहां से निकलने की सोची।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SrWOo8nzvFI/AAAAAAAAARU/UKwupsnyPNM/s1600-h/Image0431.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SrWOo8nzvFI/AAAAAAAAARU/UKwupsnyPNM/s320/Image0431.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;उसके बाद मैंने उसको कम से कम दो साल तक पहना, लेकिन मेरी पत्नी को अब वो अच्छी नहीं लग रही थी, मेरे शरीर के बिगड़े स्टक्चर के कारण। उसने फाड़ दी, और वो पोचा बनकर मेरे घर का फर्श साफ करती है। बेचारी दस नंबरी मेरी टी-शर्ट।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'}); BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''}); BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84}); &lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-7497935766285492839?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/window84/~4/op_Wpa_v2XE" height="1" width="1"/&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/window84/~3/op_Wpa_v2XE/blog-post_20.html</link><author>noreply@blogger.com (Kulwant Happy "Unique Man")</author><media:thumbnail url="http://2.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SrWO85NbnCI/AAAAAAAAARc/LIGlBd4Phrs/s72-c/untitled_1_copy2.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>8</thr:total><feedburner:origLink>http://window84.blogspot.com/2009/09/blog-post_20.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-4720978767745903223</guid><pubDate>Fri, 18 Sep 2009 09:11:00 +0000</pubDate><atom:updated>2010-01-19T00:29:57.672+05:30</atom:updated><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">श्राद्ध</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">माँ</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">मैं</category><category domain="http://www.blogger.com/atom/ns#">रिश्वत</category><title>श्राद्ध खिलाने के लिए खिलाओ रिश्वत</title><description>आज मैंने भी अपनी मां का श्राद्ध पाया, लेकिन खुद ही घर में खाया। सचमुच! यकीन नहीं आता होगा न। मुझे भी यकीन नहीं आ रहा था क्योंकि मां को पूर्वजों की रोटी खिलाते हुए देखा, किसी गरीब घर के बच्चों या परिवारजनों को। आज मेरी पत्नी बोली हम किसी पंडित पंडितायन आदि को खिलाने की बजाय मंदिर बाहर बैठे हुए भूखे नंगे लोगों को श्राद्ध की रोटी खिलाएंगे ताकि मां खुश हो सके। आखिर होममिनिस्टर के आगे हमारी कहां चलती है, वो हड़ताल पर चली या अस्तीफा देकर चली गई तो अपनी तो नैया डुब जाएगी। मैंने कहा ठीक है, उसने पूरी और खीर बनाई। मुझे भरकर एक बर्तन में खीर दे दी। मैं और मेरा तेतेरा भाई खीर पूरी लेकर मंदिर पहुंचे। हम बांटने ही लगे कि वहां बच्चों की फौज लिए बैठी एक महिला बोली, ये नहीं खाएंगे, तुम पैसे दे सकते हो। मैंने बोला, चल किसी और को खिला देते हैं। वहां गया, उस महिला ने खीर पत्तल में डलवा तो ली, लेकिन खीर बाद में वहां पर ऐसे गिर रही थी जैसे गिलास से पानी। फिर मेरी नजर एक बुजुर्ग व्हील चेयर पर बैठे साधुनुमा व्यक्ति पर पड़ी, जब उसको मैंने पूछा बाबाजी पूरी खीर खाओगे। कोई जवाब नहीं आया। इतने में वहां एक और युवक आया और मेरी तरह ही बोला। बाबा ने उत्तर दिया, दक्षण दोगे, वो पहले तो चुप हो गया। फिर दुबकी आवाज में हां बोला। इधर, बाबा ने फटाक से उच्ची आवाज में कहा क्यों नहीं खाएंगे? पहले दक्षण हो जाए। मैं चकित रह गया। फिर मैंने सोचा शायद बाबा पहले किसी सरकारी दफ्तर में था, शायद इस लिए काम के लिए पहले रिश्वत मांग रहा है। अब तो श्राद्ध खिलाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'}); BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''}); BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84}); &lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-4720978767745903223?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="feedflare"&gt;
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