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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" gd:etag="W/&quot;D0QARn44eSp7ImA9WhRVF08.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170</id><updated>2012-01-16T06:49:07.031-08:00</updated><category term="गंवईं-गंध" /><category term="ब्रांड" /><title>balliabole</title><subtitle type="html">बलिया समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की आवाज</subtitle><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://balliabole.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://balliabole.blogspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false&amp;v=2" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>104</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/atom+xml" href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/xcIxS" /><feedburner:info uri="blogspot/xcixs" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><feedburner:emailServiceId>blogspot/xcIxS</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><entry gd:etag="W/&quot;D0QHRHk5cSp7ImA9WhRVF08.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-4622100731594687453</id><published>2012-01-16T06:48:00.001-08:00</published><updated>2012-01-16T06:48:55.729-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-01-16T06:48:55.729-08:00</app:edited><title /><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div class="MsoTitle" style="text-align: center;"&gt;
&lt;u&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; font-size: 14.5pt; mso-ansi-font-size: 16.0pt;"&gt;लोकपाल विधेयक का जानबूझकर ये हश्र हुआ&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/u&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div align="right" class="MsoNormal" style="text-align: right;"&gt;
&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal"&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;लोकपाल बिल को लेकर
जो अंदेशा जताई जा रही थी...आखिर वही हुआ। विवादास्पद विधेयकों को फाड़ने और इस
बहाने लोकतंत्र को लटकाने का जरिया बनते रहे राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी
के सांसदों पर इस बार भी महिला आरक्षण दोहराने की उम्मीद जताई जा रही थी। लेकिन ऐसा
कम से कम लोकसभा में नहीं हुआ। हालांकि दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में ये उम्मीद
जताई जा रही थी कि लोकपाल को लटकाने के लिए राजनीतिक पार्टियां ऐसे कदम उठा सकती
हैं। लेकिन इस बार मुलायम सिंह ने अपने सिर महिला आरक्षण की तरह की बदनामी नहीं
ली। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;लोकसभा में आरजेडी के सांसद भी बैठे रहे। लेकिन राज्यसभा में आरजेडी के
राजनीति प्रसाद ने बिल को जितनी आसानी से फाड़ा और उन्हें रोकने की आसान कोशिश
सिर्फ कांग्रेस के नेता और मंत्री अश्विनी कुमार ने की, उससे इस आशंका को बल मिल
रहा है कि कहीं राजनीति प्रसाद किसी उकसावे में तो नहीं आ गए। इस सोच की वजह भी
है। दो महीने बाद राज्यसभा का उनका कार्यकाल खत्म हो रहा है। बिहार विधानसभा में
राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों की जो संख्या है...उसमें उनका दोबारा चुनकर आना
संभव भी नहीं है। लिहाजा शक की गुंजाइश तो बनती ही है। &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;br /&gt;


&lt;div class="MsoNormal"&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;वैसे राज्यसभा से
लोकपाल बिल को लटकाने का प्रमुख बहाना ये घटना नहीं बनी है। सरकार की तरफ से तर्क
दिया जा रहा है कि चूंकि 187 संशोधन सुझाए गए थे और राष्ट्रपति के आदेश के मुताबिक
गुरूवार को रात बारह बजे तक ही राज्य सभा चल सकती थी। और इतने कम वक्त में 187
संशोधनों पर चर्चा नहीं कराई जा सकती थी। लिहाजा राज्यसभा की बैठक बढ़ाई नहीं जा
सकती थी। लेकिन हकीकत तो यह है कि सरकार की सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ही विधेयक में
लोकायुक्त की नियुक्ति को शामिल करने पर एतराज जता रही थी। समाजवादी पार्टी और
बहुजनसमाज पार्टी को सीबीआई को लोकपाल के दायरे में नहीं लाने पर एतराज है। फिर
लोकसभा में अपने संशोधनों को नकार दिए जाने से बीजेपी भी नाराज थी। जाहिर है कि
उसने भी सरकार की मजबूत घेरेबंदी की थी। जिसके चलते सरकार को अपनी भद्द पिटती नजर
आ रही थी। उसका असर ये हुआ कि सरकार ने विधेयक को टाल दिया। लेकिन सरकार की मंशा
इसी तथ्य से जाहिर हो जाती है कि कानून मंत्री सलमान खुर्शीद को यह कहने से अब
गुरेज नहीं रहा कि दोनों तरफ से खेल हुआ। विपक्ष का खेल तो समझा में आता है। लेकिन
सवाल यह है कि जिस सरकार पर इस खेल को खराब करने की जिम्मेदारी थी, वह खुद इस खेल
में शामिल हो गई। यानी साफ है कि रालेगण के बुजुर्ग और उसके साथ खड़े जनमानस के
दबाव में विधेयक तो ला दो, लेकिन इससे भविष्य में अपना ही गिरबेना फंसना है,
लिहाजा इसे अनंत काल तक के लिए टाल दो। और राजनीति ने यही किया है। &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal"&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;उत्तर प्रदेश के
चुनावी महाभारत में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पर लगातार हमला कर रही
कांग्रेस को उम्मीद थी कि दोनों पार्टियां लोकसभा में लोकपाल बिल पर सहयोग
करेंगीं। लेकिन कांग्रेस की यह उम्मीद धाराशायी हो गई। कांग्रेस को उस राष्ट्रीय
जनता दल से भी सहयोग की उम्मीद थी&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;जिसके भले ही फकत चार लोकसभा स&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;ांसद हैं&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;लेकिन बिन मांगे सरकार का वह समर्थन भी कर रही है। उसके
नेता लालू प्रसाद यादव गाहे&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;बगाहे सरकार और सोनिया
गांधी का गुणगान करते रहे हैं। सरकार के रणनीतिकार मान कर चल रहे थे कि तीनों
पार्टियों को झक मारकर सरकार के बनाए बिल का साथ देना ही होगा। लेकिन इ&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;न तीनों पार्टियों ने कांग्रेस का साथ नहीं
दिया। दिलचस्प बात यह है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट
पार्टी के सांसद भी वोटिंग से पहले लोकसभा से बाहर निकल गए। और सरकार देखती रह गई।
सरकार को उम्मीद भारतीय जनता पार्टी से भी रही थी। क्योंकि मजबूत लोकपाल बिल बनाने
की मांग वह लगातार करती रही है। संसद की स्थायी समिति में बिल पर विचार करते वक्त
भी अपने असहमति नोट में बीजेपी के सांसदों ने भी जिस तरह से मजबूत लोकपाल बिल के
साथ ही राज्यों के लिए लोकायुक्त बनाने की सिफारिश की थी।&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस लोकपाल विधेयक के इस हश्र के
लिए भारतीय जनता पार्टी समेत पूरे विपक्ष पर निशाना साध रही है। जाहिर है कि
राष्ट्रीय राजनीति में अपनी धुर विरोधी पार्टी को ही कटघरे में खड़ा करके कांग्रेस
जहां अपनी असलियत छिपाने की कोशिश कर रही है, वहीं बीजेपी की कथित पोल खोलने की
कोशिश कर रही है। लेकिन क्या बात सिर्फ इतनी सी ही है और क्या भारतीय जनता पार्टी
को दोष देकर सरकार आम लोगों को यह समझाने में कामयाब हो जाएगी कि उसकी कमजोरी की
वजह से लोकपाल को संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं हो पाया। लोकतंत्र में यह सरकार
चलाने वाले दल की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने विधेयक को उस तरह पारित करवाए&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;जैसा वह चाहती है। अगर आज
सरकार और उसकी रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं तो सिर्फ इसलिए &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;...&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;क्योंकि सरकार चलाना उनकी जिम्मेदारी है और अगर संसद ने अन्ना को मजबूत लोकपाल
के लिए आश्वस्त करती है तो उस आश्व&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;ासन को उसी संसद से पूरा कराने की जिम्मेदारी सरकार की ही होती है। अगर भारतीय
जनता पार्टी सरकार में होती तो वह बिना शक उसकी ही जिम्मेदारी होती। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal"&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;चूंकि लोकपाल बिल
पास हो गया है&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;लिहाजा सरकार इसे अपनी जीत भी बता रही है &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;हितो और अहं के टकराव में बेशक सरकार इसे अपनी जीत माने&lt;/span&gt;,
&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;लेकिन ये जनभावना और जनता की जरुरतों की हार है&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;। क्योंकि इस बिल से
जो लोकपाल बनेगा&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;वह सरकार के लिए जवाबदेह होगा&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;,
&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;उसे सरकार के इशारों
पर नाचना होगा। अगर उसे संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं होगा तो सत्ता तंत्र के मजबूत
स्तंभों पर लगे आरोपों और उनके &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;खिलाफ हुई शिकायतों की जांत भी नहीं कर पाएगा। मुलायम सिंह यादव और लालू
प्रसाद यादव ने जिस तरह लोकपाल बिल के मौजूदा स्वरूप का विरोध किया था&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;उससे साफ था कि वे मतदान
में इस बिल का साथ नहीं देने जा रहे। लालू तो इसे डेथ वारंट तक बता चुके थे। ऐसे
में अगर सरकार औ&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;र उसके रणनीतिकार
उनसे उम्मीद लगा रखे थे&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;तो उनकी राजनीतिक नासमझी ही कही जाएगी। शायद राजनीति की यह फितरत ही है कि
वहां उम्मीदें ऐसी जगहों से परवान चढ़ती हैं&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;,
&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;जिन पर भरोसा नहीं
होता और पूरी भी हो जाती हैं या फिर जिन पर भरोसा होता है&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;वहां से उम्मीदें धाराशाय&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;ी हो जाती हैं। कांग्रेस के साथ यही हुआ है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal"&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;हालांकि इस बार
कांग्रेस का जितना दांव लगा था&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;उससे कहीं ज्यादा दांव भारतीय जनता पार्टी का भी लगा था।
भ्रष्टाचार के खिलाफ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;2009 &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;के लोकसभा चुनावों से ही अभियान चला रहे हैं। लेकिन जब बिल प&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;र समर्थन की बात आई तो भारतीय जनता पार्टी ने
कांग्रेस को टका सा जवाब दे दिया। इसका नतीजा सामने है&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;...&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;लोकपाल को संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं हो पाया
है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस को लोकपाल को संवैधानिक दर्जा ना दिला पाने का
ठीकरा बीजेपी के सिर फोड़ने का बहाना&lt;/span&gt;&lt;span dir="LTR"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="LTR"&gt;&lt;/span&gt; मिल गया है। यही वजह है कि बीजेपी
उसे करारा जवाब देने में खुद को असहज महसूस कर रही है। यही वजह है कि बीजेपी बार&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;बार यह कहकर सफाई दे रही है
कि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का विचार कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का था
और बीजेपी ने इस विचार को मूर्त रूप दे&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;ने का कांट्रैक्ट नहीं लिया था। लेकिन क्या बात सिर्फ इतनी सी ही है। अगर
लोकपाल को संवैधानिक दर्जा हासिल होता तो क्या उसका श्रेय भले ही राहुल गांधी को
मिलता&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;लेकिन क्या उसका फायदा सिर्फ कांग्रेस समर्थकों को ही मिलता&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;बीजेपी समर्थकों और दूसरी पार्टियों के समर&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;्थकों और देश की आम जनता को नहीं मिलता। यही वजह
है कि जब बीजेपी से लोकपाल बिल पर सवाल पूछे जाएंगे तो उसे असहज स्थितियों का
सामना करना पड़ेगा। निश्चित तौर पर इसका असर आने वाले विधानसभा चुनावों में ही नजर
आ सकता है। चुनावी मैदान में इसके लिए कांग्रेस जहां बीजेपी को जिम्मेदार ठहराने
की कोशिश करेगी&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;वहीं बीजेपी कांग्रेस को इसके लिए जिम्मेदार ठहराएगी। लेकिन इस पूरी बहस में
कांग्रेस की परेशानी की तरफ किसी का ध्यान नहीं है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि
उसके अपने और साथी दलों के करीब पंद्रह सांसद भी वोटिंग के दौरान गाय&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;ब रहे। अगर इस पर सवाल उठने शुरू हुए तो
कांग्रेस को जवाब देना मुश्किल हो सकता है। लेकिन इस पूरे खेल में कौन जीता और कौन
हारा&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="AR-SA" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;...&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-theme-font: minor-bidi;"&gt;तेजी से बदलते घटनाक्रम में इसका जवाब बाद में ही मिल पाएगा। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal"&gt;
&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-4622100731594687453?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/n_LboNRtpWK8b_QgGQsQsTZJuMQ/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/n_LboNRtpWK8b_QgGQsQsTZJuMQ/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/n_LboNRtpWK8b_QgGQsQsTZJuMQ/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/n_LboNRtpWK8b_QgGQsQsTZJuMQ/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/xcIxS/~4/JmFlG_Z_Wa0" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://balliabole.blogspot.com/feeds/4622100731594687453/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://balliabole.blogspot.com/2012/01/blog-post.html#comment-form" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/4622100731594687453?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/4622100731594687453?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/JmFlG_Z_Wa0/blog-post.html" title="" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2012/01/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEQGSH48cCp7ImA9WhRRF0g.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-8497759657578477411</id><published>2011-12-01T07:10:00.001-08:00</published><updated>2011-12-01T07:12:09.078-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-12-01T07:12:09.078-08:00</app:edited><title>विदेशी कंपनियों को मनमोहन का क्रिसमस तोहफा</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;div class="gmail_quote"&gt;
&lt;div align="right" class="MsoNormal" style="margin: 0cm 0cm 0pt; text-align: right;"&gt;
&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="margin: 0cm 0cm 0pt;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;विकास के जिस मॉडल के खिलाफ पूंजीवाद के ही उत्स देश अमेरिका में जब आक्युपाई वाल स्ट्रीट यानी वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो आंदोलन चल रहा है, ठीक उन्हीं दिनों भारत सरकार ने खुदरा में विदेशी निवेश को मंजूरी देकर देश में नई बहस को जन्म दे दिया है। यह संयोग ही है या सोची समझी तैयारी कि कुछ ही दिनों बाद पश्चिमी दुनिया का सबसे बड़ा त्यौहार क्रिसमस आने वाला है। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;फ्रांस की काफरू&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;जर्मनी की मेट्रो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;ब्रिटेन की टेस्को तथा फ्रांस की स्वार्ज जैसी विशाल कंपनियों के लिए मनमोहन सरकार का यह क्रिसमस तोहफा है। अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को यह तोहफा देने में 14 साल का लंबा वक्त लग गया। यह सच है कि 1997 में पहली बार खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मौका देने के विचार की शुरूआत हुई। कहने के लिए कहा जा सकता है कि तब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री नहीं थे। लेकिन उस वक्त जो वित्त मंत्री थे, वे पी चिदंबरम यूपीए एक की सरकार के वित्त मंत्री थे और मौजूदा मंत्रिमंडल में वे गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग संभाल रहे हैं। बहरहाल संयुक्त मोर्चा सरकार के वाणिज्य मंत्री ने छह देशों के वाणिज्य मंत्रियों के साथ कैश एंड कैरी की थोक व्यापार में जो बीजारोपण किया था, वह बीज आखिरकार चौदह साल बाद फलीभूत हो ही गया है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="margin: 0cm 0cm 0pt;"&gt;
क्रिसमस पर तोहफे देने-दिलाने की परंपरा रही है। तो क्या यह मान लिया जाय कि भारत सरकार ने अमेरिका की बड़ी कंपनी वॉलमार्ट&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="margin: 0cm 0cm 0pt;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;लेकिन इसे फलीभूत करने में रिटेल सेक्टर की बड़ी कंपनियों की तैयारी और भारत के लगातार बढ़ते विशाल मध्यवर्ग पर उनकी नजर के चलते ही संभव हुआ है। खुद वाणिज्य मंत्रालय मानता है कि देश का खुदरा बाजार 590 अरब डालर यानी 29.5 लाख करोड़ का है। यानी इस बड़े बाजार पर दुनिया की जानी-मानी कंपनियों की नजर है। लेकिन इसकी तैयारी बहुत पहले से ही थी। पिछले साल दुनिया की जानी-मानी सर्वेक्षण कंपनी प्राइसवाटर हाउस कूपर ने &lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;मजबूत व स्थिर-&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;2011'&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;शीर्षक से खुदरा क्षेत्र को लेकर एक अध्ययन रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट में प्राइसवाटर हाउसकूपर ने भारत के खुदरा क्षेत्र के बारे में अनुमान लगाया था कि यह &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;2014 &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;तक बढ़कर नौ सौ अरब डालर तक पहुंच जाएगा। इस रिपोर्ट के मुताबिक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;भारत में अभी खुदरा कारोबार पांच सौ अरब डालर का है। प्राइसवाटर हाउसकूपर ने भारत के खुदरा बाजार में 2014 तक करीब चार फीसदी की सालाना वृद्धि का अनुमान भी लगाया था। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत का खुदरा बाजार एशिया का तीसरे नंबर का बाजार है। पहले नंबर पर 4500 अरब डालर के मूल्य का चीन का खुदरा बाजार है। इसके बाद दूसरे नंबर पर जापान की अर्थव्यवस्था है। भारत सरकार माने चाहे ना माने, लेकिन यह तय है कि आर्थिक मंदी की आहट के बीच रिटेल क्षेत्र की बड़ी कंपनियां भी परेशानी झेल रही हैं। जिन 82 देशों में वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो नाम का पूंजीवाद विरोधी आंदोलन चल रहा है, उन देशों में रिटेल कंपनियां भी परेशानी में हैं। ब्रिटेन के हाल के दंगों में लोगों ने सबसे ज्यादा गुस्सा रिटेल स्टोरों पर ही उतारा। ऐसे में रिटेल क्षेत्र की कंपनियां नए बाजारों की भी तलाश में हैं। ऐसे में भारत के बाजार का खुलना उनके लिए राहत दे सकता है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="margin: 0cm 0cm 0pt;"&gt;
&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;भारतीय खुदरा क्षेत्र को खोलते वक्त भारत सरकार ने दावा किया है कि इससे एक करोड़ रोजगार का सृजन होगा। इस दावे की मीमांसा के पहले सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि भारत के खुदरा कारोबार में कितने लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार मिला हुआ है। भारत सरकार ने &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;2004 &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;में रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े खुदरा व्यापारियों को लेकर जो सर्वे कराया था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;उसके मुताबिक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;देश के शहरी इलाकों में एक करोड़ बीस लाख खुदरा कारोबारी हैं। छोटे शहरों और कस्बों में करीब साढ़े तीन करोड़ खुदरा कारोबारी हैं। वैसे कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बीसी भरतिया के मुताबिक देशभर में करीब &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;10 &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;करोड़ खुदरा व्यापारी हैं। यदि यह भी मान लिया जाए कि हर खुदरा कारोबारी के पीछे चार लोगों का परिवार चलता है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;तो करीब &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;40 &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;करोड़ लोगों की जनसंख्या का गुजारा इससे होता है। हालांकि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण ने साल &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;2007-08 &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;में जो आंकड़े जारी किए थे, उसके लिहाज से देश में काम करने वाले लोगों का &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;7.2 &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;फीसद यानी &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;16 &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;करोड़ लोगों की जीविका खुदरा क्षेत्र के जरिए ही चल रही है। अब खुद सर्वेक्षण ही मानता है कि करीब &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Times New Roman;"&gt;25 &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;करोड़ लोगों का रोजगार मिला हुआ है। अगर कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी सी भरतिया के मुताबिक अगर देश में दस करोड़ खुदरा कारोबारी हैं और उनके पीछे सिर्फ चार लोगों की रोजी-रोटी चलती है तो इसका मतलब है कि चालीस करोड़ लोगों की रोटी-रोजी खुदरा कारोबार ही चला रहा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की जनसंख्या 120 करोड़ है। इस हिसाब से देखें तो तिहाई लोगों का रोजगार खुदरा कारोबार के जरिए चल रहा है। जाहिर है कि उनके रोजगार पर संकट आना लाजिमी है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="margin: 0cm 0cm 0pt;"&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;सरकार का दावा है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के बाद देश में एक करोड़ रोजगार का सृजन होगा। लेकिन एक करोड़ के रोजगार की ये गारंटी शहरी क्षेत्र में काम कर रहे &amp;nbsp;खुदरा कारोबारियों से भी कम होगा। क्योंकि भारत सरकार का 2004 का आंकड़ा कहता है कि देश के शहरी क्षेत्र में करीब एक करोड़ बीस लाख लोगों को रोजगार खुदरा क्षेत्र में मिला हुआ है। खुदरा क्षेत्र के लिए इन दिनों काम कर रहे सीपीआईएमएल के पूर्व प्रवक्ता रंजीत अभिज्ञान कहते हैं कि इन दिनों शहरी क्षेत्र में खुदरा कारोबारियों की संख्या डेढ़ करोड़ की संख्या पार कर गई है। यानी दस लाख की जनसंख्या वाले जिन शहरों में रिटेल की कंपनियां आएंगी, वहां अगर सरकारी आंकड़ों पर ही भरोसा करें तो एक करोड़ रोजगार पैदा होगा। यानी वह भारत सरकार के अपने आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा रोजगार से ही कम होगा। लेकिन यह एक करोड़ रोजगार का दावा भी महज भुलावा है। क्योंकि बड़ी कंपनियों का अब तक का जो बिजनेस मॉडल नजर आया है, उसमें भारतीय कम मानव श्रम में ज्यादा काम और ज्यादा उत्पादकता हासिल करना है। ताकि मुनाफा ज्यादा से ज्यादा कमाया जा सके। मुनाफे के आधार वाली अर्थव्यवस्था में सरकारी दावे पर भरोसा नहीं किया जा सकता। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="margin: 0cm 0cm 0pt;"&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;सरकार का दावा है कि रिटेल क्षेत्र में खुदरा निवेश के बाद जो फुड चेन और कोल्ड स्टोरेज चेन खुलेंगी, उससे देश के तीस फीसदी खाद्यान्न और फल-सब्जियों की बरबादी पर रोक लगेगी। लेकिन किस कीमत पर यह बरबादी रूकेगी, इस पर सरकारी दावा चुप है। सरकार का यह भी दावा है कि रिटेल में बड़ी कंपनियों के आने बाद छोटे कारोबारियों को भी फायदा होगा, क्योंकि प्रतियोगिता में कीमतें कम होंगी। लेकिन वालमार्ट को लेकर खुद अमेरिकी अध्ययन कहते हैं कि जिन इलाकों में वालमार्ट के स्टोर खुले, वहां के पूरे बाजार पर दस साल में वालमार्ट में कब्जा कर लेती है। रिटेल की बड़ी कंपनियों के पास भारी रकम है। लिहाजा भारत में तो उनके लिए पूरे बाजार पर कब्जा करना आसान होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो अमेरिका में ओरेगान में उस पर रोक लगाने का फैसला वहां की नगर परिषद क्यों लेती। भगवान रजनीश के लिए मशहूर ओरेगान की नगर परिषद ने इस मसले पर बाकायदा मतदान से फैसला लिया। जाहिर है कि अमेरिका में भी रिटेल की बड़ी कंपनियों का विरोध हो रहा है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal" style="margin: 0cm 0cm 0pt;"&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: &amp;quot;Mangal&amp;quot;, &amp;quot;serif&amp;quot;;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;रिटेल में विदेशी निवेश के फैसले पर लगातार जारी विरोध से साफ है कि सरकार के लिए यह फैसला परेशानी का सबब बन गया है। विपक्षी मोर्चे पर उसे जहां विरोध झेलना पड़ रहा है, वहीं चुनावी मैदान में उतरने जा रहे कांग्रेस के प्रत्याशी भी इस फैसले से बेहद परेशान हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का टिकट पा चुके नेताओं को जनता के सामने इसका जवाब देते नहीं बन पा रहा है। दो-तीन प्रत्याशियों ने खुद इन पंक्तियों के लेखक से कहा कि क्या कांग्रेस नेतृत्व जनता में उठ रहे इस उबाल को नहीं भांप पा रहा है। जाहिर है कि सरकार का यह फैसला कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन पर भी असर डाल सकता है। ऐसे में देखना ये है कि सरकार विदेशी कंपनियों को दिए क्रिसमस के तोहफे पर काबिज रहती है या फिर अपनी जनता और अपने कारोबारियों के हित में कोई कदम उठाती है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-8497759657578477411?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/DSHIvWBKEzJA7OSI1jv2gvWbsJU/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/DSHIvWBKEzJA7OSI1jv2gvWbsJU/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/DSHIvWBKEzJA7OSI1jv2gvWbsJU/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/DSHIvWBKEzJA7OSI1jv2gvWbsJU/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/xcIxS/~4/Vtn6gwv7vsk" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://balliabole.blogspot.com/feeds/8497759657578477411/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://balliabole.blogspot.com/2011/12/blog-post.html#comment-form" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/8497759657578477411?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/8497759657578477411?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/Vtn6gwv7vsk/blog-post.html" title="विदेशी कंपनियों को मनमोहन का क्रिसमस तोहफा" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/12/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEUHSXo8fSp7ImA9WhRSEkU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-2439740109493119805</id><published>2011-11-12T21:47:00.000-08:00</published><updated>2011-11-14T06:50:38.475-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-11-14T06:50:38.475-08:00</app:edited><title>मनियर की टिकुली की खोने लगी चमक</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;div class="MsoNormal"&gt;
&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b&gt;बिरहा गायक बालेसर का एक गीत है नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के...लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि बलिया का मनियर कस्बा भी टिकुली यानी बिंदी उद्योग में जाना-माना नाम था। लेकिन यूपी सरकार की उपेक्षा और आधुनिकता के दबाव में यह उद्योग अपनी चमक खो रहा है। इस पर अमर उजाला ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसी रिपोर्ट का संपादित अंश यहां पेश किया जा रहा है।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
&lt;div class="MsoNormal"&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;सुहागिनों के माथे की बिंदी कभी देश के विभिन्न महानगरों में अपनी चमक से बलिया जिले का नाम रोशन करती थी लेकिन अब यह चमक धुंधली पड़ती जा रही है। मनियर नगर पंचायत में तैयार की गई बिंदी-टिकुली यूपी&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बिहार ही नहीं विभिन्न प्रांतों के साथ महानगरों तक भेजी जाती थी। लेकिन यह कारोबार इन दिनों अपनी पहचान खोता जा रहा है। अब इस के अस्तित्व को बचाने के लिए किसी रहनुमा की दरकार है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;महंगाई&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;पूंजीवाद और सरकार की उपेक्षा के चलते उपेक्षित इस व्यवसाय के भविष्य को लेकर इससे रोजी-रोटी कमा रहे लोग बेहद चिंतित हैं। जिले के जनप्रतिनिधियों और अफसरों ने भी इस पुश्तैनी धंधे के प्रति संवेदना नहीं दिखाई। मनियर कस्बा सहित आसपास के तमाम गांवों में पिछले कई दशक से महिलाओं के शृंगार में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली बिंदी देश के विभिन्न हिस्सों तक निर्यात होती थी। यहां की बिंदी को लोग मनिहारी बिंदी के नाम से जानते थे। बिंदियों की पहचान आकर्षक कलाकारी एवं रैपर पर ट्रेडमार्क से हुआ करता थी। कारीगर अपनी सोच एवं शिल्पकारी का कौशल बिंदिया में डालने का प्रयास करते थे। इसके निर्माण में जहां अब धन आड़े आने लगा है, वहीं आधुनिक पैठ ने पारंपरिक व्यवसायियों के धंधा पर डाका डालने का काम किया है। उपेक्षा के कारण यह कारोबार अब हाशिए पर पहुंच गया है। इसके अलावा बिजली की कमी और सुविधाओं के अभाव ने भी इस पर असर डाला है। आधुनिकता की होड़ में चौपट हो रहे इस पारंपरिक व्यवसाय को लेकर जहां बिंदी व्यवसायियों में मलाल है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;वहीं क्षेत्रवासी भी कम मर्माहत नहीं। कुछ वर्ष पहले विधायक मारकंडेय सिंह के अथक प्रयास से तत्कालीन कमिश्नर ने यहां पहुंचकर कारोबारियों और कारीगरों को टैक्स छूट दिलाया था। लेकिन उसके बाद आज तक न तो प्रशासन के रहनुमा धंधे की सुध लेने आए और न ही किसी जनप्रतिनिधि ने इसके प्रति दिलचस्पी दिखाई।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;चांदूपाकड़ निवासी बिंदी व्यवसायी रामाशंकर गुप्त का कहना है कि पूंजी व आधुनिकता के चलते दिन प्रतिदिन व्यवसाय खत्म होता जा रहा है। बड़े शहरों के व्यवसायी खुद ही कारोबार शुरू कर दिए हैं। मनियर के हाजी गुल मोहम्मद ने बताया कि बिंदी बनाने वाला कच्चा माल चीन से सस्ती कीमत पर आ रहा है। सरकार द्वारा मैटेरियल्स पर सेल्स टैक्स&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इनकम टैक्स आदि लगा दिया गया है। लेकिन देहात में बिजली रहती नहीं.., , , लिहाजा वहां काम करना मुश्किल है। ऐसे में यह धंधा दिनों-दिन चौपट होता जा रहा है। कस्बे के बिंदी व्यवसायी शम्सुल होदा का कहना है कि यहां की बिंदी का मुकाबला दिल्ली&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मुंबई&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style="mso-spacerun: yes;"&gt;&lt;/span&gt;कोलकाता आदि महानगरों में बनने वाली बिंदियों से नहीं हो सकता। बड़े-बड़े पूंजीपति वहां अपनी कंप्यूटराइज्ड फर्में लगा ली है&lt;/span&gt;, &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;एवं माल सस्ते दामों पर उपलब्ध करा रहे हैं। व्यवसायी इरफान का कहना है कि सरकार द्वारा कोई भी सुविधा नहीं दी गई। बैंक व्यवसायियों को ऋण देने में कतराते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-2439740109493119805?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;strong&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;
उलटबांसियों में जीने की आदत जितनी भारतीय समाज को है...उतनी दुनिया के शायद ही किसी समाज में होगी..यूरोप और अमेरिका में भयानक मंदी के दौर में भी भारतीय अर्थव्यस्था ना सिर्फ बची हुई है...बल्कि आगे बढ़ रही है। दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर चल रहे भारत में आज भी एक वर्ग ऐसा है, जिसे अंधविश्वास के हद तक धार्मिक कर्मकांड आकर्षित करते हैं। इसके लिए उन्हें जान भी चुकानी पड़े तो वह कीमत छोटी होती है। उदारीकरण के दौर में आज की शिक्षा और मौजूदा अर्थव्यवस्था आधुनिकता का नया पैमाना माने जा रहे हैं। लेकिन इसी दौर में ऐसे भी लोग रहते हैं, जिन्हें अपनी जान कौड़ियों के मोल किसी धार्मिक कर्मकांड में गंवानी पड़ती है। हरिद्वार के गायत्री परिवार का दावा नए युग निर्माण और नई समाज व्यवस्था बनाने का है। &lt;br /&gt;
&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;लेकिन शांति और सौहार्द्र के जरिए बनने वाली इस समाज व्यवस्था के एक धार्मिक कर्मकांड में अगर 22 लोगों को जान गंवानी पड़ती है, पचास से ज्यादा लोगों को घायल होना पड़ता है तो इस व्यवस्था और इसके आयोजकों पर सवाल उठेंगे ही। हालांकि अभी तक तस्वीर साफ नहीं हो पाई है कि किस वजह से भगदड़ मची। युग निर्माण योजना के प्रवक्ता का दावा है कि भगदड़ की वजह कुछ बुजुर्ग लोगों का गिर जाना रही। आयोजकों के इस प्रचार से आगे बढ़कर हां में हां मिलाने का काम हरिद्वार प्रशासन करता रहा। उसके एक उप जिलाधिकारी हरवीर सिंह भगदड़ के लिए भीड़ की वजह से कुछ लोगों के दम घुटने को बताते रहे। एक पल के लिए मान लिया जाए कि हरवीर सिंह की बात सही तो सवाल यह है कि इतनी भारी भीड़ को संभालने के लिए उन्होंने या जिस प्रशासन के वे अंग हैं, उन्होंने एहतियाती कदम क्यों नहीं उठाए। हो सकता है कि हरिद्वार प्रशासन का जवाब हो कि उसने एहतियाती कदम उठाए थे। लेकिन हद से ज्यादा हो गई। अगर वे ऐसा जवाब देते भी हैं तो निश्चित तौर पर यह हरिद्वार प्रशासन की कमी ही मानी जाएगी। क्योंकि अगर वह भीड़ का अंदाजा नहीं लगा पाना भी उसकी ही गलती है। ऐसा भी नहीं कि हरिद्वार में पहली बार ऐसी कोई भगदड़ मची है। अभी एक साल पहले ही इसी हरिद्वार में 14 अप्रैल 2010 को कुंभ मेले के दौरान भी तब भगदड़ मची थी, जब शाही स्नान के लिए साधुओं का जुलूस निकल रहा था। उस भगदड़ में प्रशासन के मुताबिक सात लोगों की मौत हुई थी। जबकि 15 लोग घायल हुए थे। तब भी प्रशासन ने सफाई में यही कहा था कि लोगों की मौत की वजह ज्यादा भीड़ थी। जिसे संभाल पाना आसान नहीं था। वैसे यह सच है कि श्रीराम शर्मा के शुरू किए युग निर्माण योजना पर अभी तक कोई कालिख नहीं लगी है...उसके राजनीतिक मकसद भी जाहिर नहीं हुए हैं। लिहाजा उसके मकसदों पर सवाल नहीं उठ सकते। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि युग निर्माण योजना और गायत्री परिवार अपनी जिम्मेदारी से बच जाएगा। क्योंकि जब भीड़ जुट रही है तो उसे काबू करने और उसे संभालने के इंतजाम की जिम्मेदारी आयोजक होने के नाते युग निर्माण योजना की भी बनती है। पिछले ही साल चार मार्च 2010 को जब इलाहाबाद के नजदीक कृपालु जी महाराज के आश्रम में भी भगदड़ मची थी तो उन पर भी बदइंतजामी के आरोप लगे थे। तब उन्होंने अपनी पत्नी की मौत की बरसी पर लोगों के लिए बड़े भंडारे और खाना खाने आने वाले लोगों को साड़ी और बर्तन देने का ऐलान किया था। फकत एक थाली-गिलास पाने के चक्कर में 63 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस घटना का दुखद पहलू यह है कि मरने वालों में ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे। साफ है कि तब मरने वाले ज्यादातर लोग गरीब थे। कुंभ के दौरान मरने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति पर रोना रोया जा सकता है। लेकिन हरिद्वार की युग निर्माण योजना के जुलूस में मरे लोगों के बारे में नहीं कहा जा सकता कि सभी लोग गरीब ही होंगे। क्योंकि श्रीराम शर्मा की युग निर्माण योजना में अच्छे-भले खाते-पीते परिवारों के लोग भी शामिल हैं। ऐसे में यह भी नहीं कहा जा सकता है कि हरिद्वार में मरने वाले गरीब थे। अपने देश में जब भी ऐसे हादसे होते हैं, वहां जान गंवाते हैं तो उनके गंवारपन और गरीबी को इसकी वजह बताकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश की जाती है। क्योंकि गरीब पर सवाल उठाना और उसे जिम्मेदार ठहराना आसान होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि भीड़ बढ़ाना अपने देश में ताकत और सम्मान हासिल करने का सबसे बड़ा जरिया तो है, लेकिन भीड़ को भेड़ से ज्यादा की अहमियत नहीं दी जाती। जब भी कोई वीआईपी भीड़ वाले कार्यक्रमों में ही शामिल होता है तो भीड़ की अहमियत सामान से ज्याद नहीं रह पाती। भीड़ को धकियाने में ही भीड़ के बीच के किसी परिवार से निकले पुलिस के सिपाही और दरोगा को अपनी अहमियत नजर आने लगती है। कई बार भगदड़ की वजह यह मानसिकता भी बनती है। इस लिहाज से भी हरिद्वार की भगदड़ की जांच होनी चाहिए। अगर भगदड़ की वजह किसी वीआईपी का आवागमन है तो उस वीआईपी को भी नैतिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना होगा। प्रशासन और आयोजकों को तो जिम्मेदार ठहराया ही जाना चाहिए। जिम्मेदार लोगों को दंडित भी किया जाना चाहिए। लेकिन सबसे बड़ी बात यह कि लोगों को इंसान की तरह मानना होगा। तभी जाकर ऐसे हादसों पर रोक लग सकेगी।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-7013145407267685710?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
अपने उपवास के आखिरी दिन नरेंद्र मोदी ने यूं तो बहुत कुछ कहा...इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उन्हें सूक्त वाक्यों की तरह लिया...उन्हीं में से एक बात थी कि उपवास खत्म हो गया लेकिन उनका सद्भावना मिशन जारी रहेगा....नरेंद्र मोदी जैसा नेता ऐसा कह रहा हो तो निश्चित तौर पर उनके मन में इस मिशन के लिए एक खाका होगा..उसकी रणनीति होगी और इसी रणनीति के सहारे वे अपने मिशन और खुद को आगे भी बढ़ाएंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति के सर्वोच्च पद यानी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर वे इसी मिशन के सहारे पहुंच पाएंगे...क्या उनके लिए सद्भावना मिशन की राह इतनी ही आसान होगी...जैसा कम से कम मीडिया के आधुनिक माध्यम दिखा रहे हैं...&lt;br /&gt;
&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;कांग्रेस का काम है, मोदी का विरोध करना...एक हद तक नीतीश कुमार जैसे जनता दल नेताओं की राजनीतिक और रणनीतिक मजबूरी नरेंद्र मोदी के विरोध के लिए उन्हें तैयार करती है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है...मोदी के उपवास ने ऐसे कई सवालों को जन्म दिया है...जिन पर विचार किया जाना जरूरी है। &lt;br /&gt;
गांधी जी उपवास को आत्मशुद्धि का माध्यम मानते थे। संयोगवश गांधी की जन्मभूमि के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने तीन दिनी उपवास में हर दिन आत्मबल बढ़ाने और सद्भाव बढ़ाने का संदेश देने की कोशिश की। उन्होंने अपने उपवास के शुरू के दिन तो गुजरात दंगों का उल्लेख किया ...दंगा पीड़ितों से अफ़सोस भी जताया....लेकिन उम्मीद जताई जा रही थी कि वे अपने समापन संबोधन में भी दंगा पीड़ितों के लिए कुछ मरहम जरूर लगाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए उनकी विकास यात्रा के साथ खड़े हुए दंगा पीड़ितों के बड़े वर्ग को भी निराशा जरूर हुई होगी। हालांकि अभी तक मीडिया के बड़े हिस्से में इसे लेकर कोई सवाल नहीं उठा है। दंगा पीड़ितों की मन:स्थिति को लेकर ज्यादा जानकारी भी नहीं आई है। इसलिए सवाल यह उठता है कि क्या सद्भावना मिशन ऐसे ही आगे बढ़ेगा। मोदी ने अपने उपवास के दूसरे दिन एक और गलती की। उससे उनके पारंपरिक मतदाताओं में भले ही बड़ा संदेश गया हो...लेकिन उनके सद्भावना मिशन पर सवाल उठाने के लिए इस घटना को बार-बार उठाया जाएगा। कांग्रेस के हाथ ये एक तुरूप का पत्ता भले ही साबित न हो, लेकिन ये जरिया जरूर बनेगा। दूसरे दिन उन्हें एक शिया धर्मगुरू चादर ओढ़ाने गए। मोदी ने उनकी चादर तो कबूल कर ली, लेकिन उनके हाथ से मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया। सवाल यह है कि क्या मोदी टोपी पहन लेते तो मुसलमान हो जाते...निश्चित तौर पर नहीं...गुरूद्वारों में जाते वक्त गुरूद्वारे की रूमाल सिर पर बांध लेने या मस्जिद में जाते वक्त सिर पर टोपी धारण कर लेने से कोई सिख या मुसलमान नहीं हो जाता। ऐसा नहीं कि नरेंद्र मोदी को ये पता नहीं होगा। लेकिन उन्होंने टोपी न धारण करके भले ही अपने पारंपरिक मतदाताओं को खुश कर दिया। लेकिन सद्भावना मिशन के एक कदम को कमजोर जरूर किया है। मोदी या भारतीय जनता पार्टी की किसी जिम्मेदार शख्सियत ने खुलेतौर पर अब तक भले ही स्वीकार नहीं किया हो कि मोदी के उपवास का लक्ष्य उनकी स्वीकार्यता समाज के उन कोनों तक पहुंचाना रहा है, जहां अब भी उन्हें सशंकित निगाहों से देखा जाता है। मोदी की इस एक रणनीतिक गलती ने कम से कम उन पर ये निगाहें बनाए रखने का बहाना और मौका तो जरूर दे दिया है। &lt;br /&gt;
मोदी के उपवास को लेकर बिहार में भी गठबंधन चला रहे दोनों दलों यानी जनता दल यू और भारतीय जनता पार्टी के बीच रिश्तों की बर्फ जमनी शुरू हो गई है। जैसे ही ये बर्फ बढ़ने लगती है, मीडिया और सियासत के एक वर्ग को गठबंधन पर दरार दिखने लगती है। लेकिन लोग ये भूल जाते हैं कि जनता दल यू का जो इतिहास रहा है, उसमें तो बीजेपी को उसके साथ एक-दम नहीं होना चाहिए या फिर बीजेपी के साथ उसे नहीं होना चाहिए। 1990 की रामरथ यात्रा को बिहार के समस्तीपुर में रोकने का प्रशासनिक श्रेय लालू यादव को ही मिलना था, क्योंकि वे उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री थे। आज वे हर मंच से इसका श्रेय लेते घूमते हैं। लेकिन जानने वाले जानते हैं कि इसकी हकीकत कुछ और ही है। तब लालू यादव के आका दिल्ली में कपड़ा राज्य मंत्री शरद यादव थे। धर्मनिरपेक्षता के उन दिनों दूसरे अलंबरदार के तौर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह हुआ करते थे और उन्होंने ऐलान ही कर रखा था कि बिहार की सीमा से आडवाणी का रामरथ जैसे ही उत्तर प्रदेश की सीमा में देवरिया में घुसेगा, वहीं उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। दूरदर्शन पर राष्ट्र के नाम संबोधन में भी वे इसे जाहिर कर चुके थे। लेकिन तब की जनता दल की अंदरूनी राजनीति में उनसे अदावत रखने वाले शरद यादव, मोहन प्रकाश, रंजन यादव नहीं चाहते थे कि मुलायम सिंह को गिरफ्तारी का श्रेय मिला और एक तरह से लालू यादव पर दबाव बनाकर समस्तीपुर में आडवाणी को गिरफ्तार कराया गया। शरद यादव और उनके ग्रुप को लालू पर भरोसा नहीं था तो तब के लालू के मंत्री जगदानंद सिंह को यह जिम्मेदारी दी गई थी और उन्होंने उसे बखूबी निभाया भी। एक बात और...1991 की लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी प्रमुख विपक्षी दल था। तब जनता दल कमजोर होकर तीसरे पायदान पर जा पहुंचा था। तब की लोकसभा की कार्यवाही उठाकर देख लीजिए तो पता चलेगा कि शरद यादव भारतीय जनता पार्टी के लिए कैसे जुमलों का इस्तेमाल करते थे। उनके मुताबिक तब भारतीय जनता पार्टी लोटा बाबा, बाल्टी बाबा की पार्टी थी। लेकिन 1999 आते-आते लोटा बाबा और बाल्टी बाबाओं को कोसने वाली शख्सियत लोटा और बाल्टी बाबा के मंत्रिमंडल में बतौर नागरिक उड्डयनमंत्री शामिल हो जाती है। इस राजनीति पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है। दो घटनाओं से साफ है कि आडवाणी के खिलाफ एक हद तक सोच रखने वाले शरद यादव को 2009 के चुनावों में प्रधानमंत्री पद के तौर पर उन्हें मंजूर करना पड़ा और उनकी अगुआई में चुनाव मैदान में उतरना पड़ा। क्या 2009 में भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाला एनडीए जीत जाता तो शरद यादव उस मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होते। आडवाणी की छवि निश्चित तौर पर वाजपेयी जैसी उदार नहीं है। मोदी उन्हीं के उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ते हुए माने जाते हैं। मोदी पर वाजपेयी से ज्यादा आडवाणी का ही प्रभाव माना जाता है। ऐसे में कल को मोदी की ही अगुआई में भारतीय जनता पार्टी चुनावी मैदान मे उतरती है तो क्या एनडीए के सहयोगी दल भाग खड़े होंगे। अगर यह तर्क चलता है तो उन्हें 2009 में ही भाग जाना चाहिए था। लेकिन वे जमे रहे। तर्क ये दिए जाते हैं कि बीजू जनता दल और तृणमूल कांग्रेस ने मुस्लिम वोटरों की वजह से अलग रास्ता अख्तियार कर लिया। लेकिन सिर्फ यही कारण नहीं रहे। बीजू जनता दल को पता चल गया था कि बिना बीजेपी के ही उसकी नैया पार लग जाएगी। उड़ीसा बीजेपी ने भी तब कम गलतियां नहीं की। फिर बीजेपी ने उड़ीसा में बीजू जनता दल से बात करने के लिए जिन लोगों को भेजा था, उन लोगों ने बातचीत को ठीक से संभाला ही नहीं...अलबत्ता बीजू जनता दल नहीं टूटता। रही बात तृणमूल कांग्रेस की तो उसका स्वभाव ही अतिवादी है…जिस कांग्रेस के साथ उसने चुनाव लड़ा है, उसकी कांग्रेस से ही कहां निभती दिख रही है। आज जयललिता मोदी के साथ खड़ी दिख रही हैं...लेकिन हकीकत यह है कि पिछले आम चुनाव में भी कोशिश की गई होती तो जयललिता के साथ समझौता हो सकता था या कम से कम समझदारी विकसित हो सकती थी। लेकिन तब बीजेपी के दक्षिण राज्यों के प्रभारी वेंकैया नायडू ही नहीं चाहते थे कि जयललिता के साथ समझौता हो। तमिलनाडु के नेता सीपी राधाकृष्णन ने जब ये सुझाव वेंकैया के सामने रखा था तो उनका जवाब था कि बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी किसी क्षेत्रीय पार्टी से समझौता क्यों करे। मानों बीजेपी के समझौते सिर्फ राष्ट्रीय पार्टियों से ही हैं। लब्बोलुआब यह है कि राजनीतिक गठबंधन सिर्फ नेतृत्व की शख्सियत पर ही निर्भर नहीं करते, बल्कि राजनीतिक मजबूरियां भी साथ आने के लिए दबाव बनाती हैं। जनता दल की मजबूरी कांग्रेस के साथ जाने से रोकती है। यही हालत बीजू जनता दल की भी है। इस लिहाज से उसे दूसरे का ही हाथ थामना पड़ता है। तेलगू देशम भी तभी छिटक सकती है, जब तीसरे मोर्चे में दम दिखे। अन्यथा कांग्रेस के साथ उसके लिए भी खड़ा होना उसकी स्थानीय राजनीति पर भारी पड़ सकता है। इसलिए यह कहना कि मोदी के नाम पर कोई आएगा या नहीं आएगा...सिर्फ राजनीतिक अटकलबाजी ही होगी। अभी आम चुनावों में तीन साल की देर है। तब तक गंगा से लेकर कृष्णा-कावेरी और ब्रह्मपुत्र तक में काफी पानी बह चुकेगा। तब राजनीति की धारा क्या करवट लेगी...उस पर मोदी का नेतृत्व निर्भर करेगा। जो लोग अभी से ही मोदी को बतौर प्रधानमंत्री देखने लगे हैं, उन्हें भी नहीं भूलना चाहिए कि वाजपेयी से ज्यादा लोकप्रिय वे नहीं हैं। जब राजनीति ने करवट ली तो उनकी सारी लोकप्रियता धरी की धरी रह गई और 2004 का चुनाव बीजेपी के हाथ से निकल गया। दरअसल राजनीति जितनी संभावनाओं का खेल है, उतनी ही आशंकाओं का...मीडिया इन संभावनाओं और आशंकाओं के बीच झूलती राजनीति पर अपना नजरिया पेश करता रहता है। जबकि राजनेता आशंकाओं के बीच संभावनाओं की टोह लेता रहता है। मोदी भी टोह ले रहे हैं। लेकिन उन्हें सफलता मिल ही जाएगी...या वे असफल ही होंगे...फिलहाल कहना मुश्किल है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भोजपुरी और मैथिली इलाके में शादी के वक्त सिंदूर रखने के लिए जो सिंदूरदान आता है...वह जब तक पति जिंदा रहता है...तब तक रहता है। उसे अहिवात यानी सुहाग का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए इस सिंदूरदान यानी सिन्होरा को महिलाएं अपनी जिंदगी की तरह प्यार करती है। यह सिन्होरा हर जगह नहीं बनता...कभी बलिया का हनुमानगंज इलाका पूरे देश में अपने सिन्होरा निर्माण के लिए प्रसिद्ध था। लेकिन सरकारी उपेक्षा और उदारीकरण ने इस उद्योग की कमर तोड़ दी है। पेश है बलिया से &lt;span style="font-style: italic;"&gt;सुधीर तिवारी &lt;/span&gt;की रिपोर्ट&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;
'कहवां से आवेला सिन्होरवा-सिन्होरवा भरल सेनुर हो, ए ललना कहंवा से आवेला पियरिया-पियरिया लागल झालर हो'। यह मंगल गीत जब सुहागिन औरतें गाती हैं तो उन्हे शायद यह नहीं पता होता कि सुहाग का प्रतीक 'सिन्होरा' सेन्दुरौटा कहां और कैसे बनता है। जिला मुख्यालय से करीब पांच किमी दूर सिकंदरपुर मार्ग पर स्थित हनुमानगंज में 'सिन्होरा' बनाने का लघु उद्योग है। यहां किसी जमाने में मुम्बई तक के व्यापारी आते थे लेकिन अब बदलते जमाने की मार इस धंधे पर भी पड़ गयी है। &lt;br /&gt;
शासन स्तर से इस धंधे में जुड़े लोगों को कोई सहायता नहीं मिलती है। इस व्यवसाय में जुड़े लोगों को सबसे अधिक दिक्कत कच्चे माल की होती है। यहां पर सिन्होरा, मौर एवं दूल्हे के सिर पर सजने वाली पगड़ी का निर्माण किया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;निर्माण में आम की लकड़ी का होता प्रयोग&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;
सिन्होरा निर्माण में प्रमुख कच्चा माल आम की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है जिसे वेदों में देव वृक्ष की संज्ञा दी गई है। 9 से 10 फीट व्यास के डेढ़ फीट लम्बे आम की लकड़ी के बोटा-गुटके को पहले धूप में सुखाया जाता है। उसके बाद कुल्हाड़ी से उसके छिलके उतार कर खराद मशीन से सिन्होरा का स्वरूप दिया जाता है। पुन: छाया में सुखाने के बाद सफाई कर के चापड़ से तैयार रंग से रंग कर बिक्री हेतु तैयार किया जाता है। मुख्य रूप से औजार रूखानी, कुल्हाड़ी तथा बिजली की मोटर या डीजल इंजन का सहारा लिया जाता है। इसके लिए तकनीकी रूप से ट्रेन्ड कारीगर बिहार के जनपद कटिहार, मोतीहारी व बेगूसराय आदि से आते हैं जो पूरे वर्ष रहकर काम करते हैं। एक कारीगर एक दिन में 40 से 50 सिन्होरा का निर्माण कर देता है जिसे मजदूरी के रूप में 3 से 4 रुपये प्रति पीस के हिसाब से भुगतान किया जाता है। सिन्होरा पूर्ण रूप से तैयार होने के बाद उसकी कुल लागत 75 से 80 रु. पड़ती है जिसे बाहर से आये व्यापारी लगभग 100-150 रु. प्रति पीस की दर से खरीदते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प्रमुख समस्या लकड़ी की&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;
सिन्होरा निर्माण से जुडे़ व्यापारियों का कहना है कि इसके निर्माण हेतु कच्चा माल आम की लकड़ी की सबसे बड़ी समस्या है। वन विभाग एवं पुलिस की सख्ती से आम की लकड़ी प्राप्त कर पाना आसान नहीं है। इसके लिए जगह-जगह पर भेंट देनी पड़ती है तब जाकर बड़ी मुश्किल से काम योग्य आम की लकड़ी प्राप्त हो पाती है। फुटकर विक्रेता सिन्होरा को सुहाग का प्रतीक बताकर एक सिन्होरा का मूल्य 251 रु. से लेकर 1000 रु. तक में बेंच देते हैं। जनपद के सिन्होरा उद्योग से गाजीपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, चंदौली, गोरखपुर, बस्ती, आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, आरा, छपरा, बक्सर, सिवान आदि जनपदों में बलिया का नाम रोशन है लेकिन विडम्बना है कि इसके विकास के प्रति उद्योग विभाग कोई आर्थिक मदद एवं सहयोग नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सिन्होरी इंगुरवटी का बढ़ा क्रेज&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;
सौभाग्यवती महिलाओं के सुहाग के प्रतीक सिन्होरा के महत्व को निकट भविष्य में भी कमतर तो नहीं आंका जा सकता लेकिन हाईटेक जमाने के साथ इसके प्रयोग में भी अन्तर आया है। पहले बड़ा और भारी सिन्होरा सौभाग्यशाली समझा जाता था। वहीं अब सिन्होरी व इंगुरवटी का प्रचलन बढ़ रहा है। छोटा होने के कारण इसे अटैची आदि में रखकर कहीं भी ले जाया जा सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कोई योजना नहीं: महाप्रबंधक&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;
जिला उद्योग महाप्रबंधक शिवलाल ने कहा कि शासन से सिन्होरा उद्योग के लिए किसी तरह की योजना आने पर इससे जुड़े लोगों की मदद की जायेगी। अभी तक कोई योजना नहीं है। उन्होंने बताया कि पूरी स्थिति से शासन को अवगत करा दिया गया है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-6131110382425808093?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;
अन्ना के आंदोलन के विविध आयाम हैं...देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमानस को खड़ा करने के अलावा अन्ना के आंदोलन ने एक और सीख दी है। उसने बताया है कि अगर साख वाला व्यक्ति किसी को अगुआई करे तो उसके साथ आमतौर पर उच्छृंखल समझी जाने वाली पीढ़ी भी अनुशासन का पाठ पढ़ने लगती है। जिन लोगों ने 1990 में पूरे उत्तर भारत में फैले आरक्षण विरोधी आंदोलन को देखा है, उन्हें पता है कि तब क्रोध और क्षोभ से भरे नौजवानों ने राष्ट्रीय और निजी संपत्ति को कितना नुकसान पहुंचाया था। तब आंदोलनकारी युवाओं की एक ही कोशिश होती थी कि कब मौका मिले और अपना गुस्सा सरकारी संपत्ति पर निकालें। &lt;br /&gt;
&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;यह सच है कि तब ये आंदोलन स्वत: स्फूर्त था.....उसका कोई नेतृत्व नहीं था....लेकिन उस वक्त युवाओं में गुस्सा था। उस समय आंदोलन में सक्रिय रहे लोग आज जिंदगी के तमाम मोर्चों पर काफी आगे निकल गए हैं। राजनीति में भी कई लोगों ने अपनी पहचान बना ली है या फिर वे भारतीय राजनीति को दिशा देने की स्थिति में हैं। वकील हैं, पत्रकार हैं...अधिकारी हैं ...वे भी मानते हैं कि अन्ना के आंदोलन ने देश को अनुशासन का नया पाठ पढ़ाया है और निश्चित तौर पर नई पीढ़ी में यह अनुशासन खास तौर पर दिख रहा है। यहां ध्यान देने की बात यह है कि नब्बे में आंदोलनरत पीढ़ी उदारवाद के दौर की पीढ़ी नहीं थी। उनमें से ज्यादातर का जन्म 1967 में शुरू हुए संविद सरकारों के दौर से लेकर जयप्रकाश आंदोलन के बीच हुआ था। उस दौर में कांग्रेस के रोमानी आदर्शवादी सपने से देश का मोहभंग हो रहा था। स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्य ध्वस्त हो रहे थे। लोहिया की अगुआई में देश का नौजवान नया पाठ पढ़ रहा था। स्वतंत्रता आंदोलन के क्षरित हो रहे मूल्यों के बावजूद लोहिया ने भी नए तरह के आदर्शवाद का पाठ पढ़ाया था। कहना न होगा कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू किए जाने के बाद जिस वर्ग में गुस्सा था, उस पर भी लोहियावादी आदर्शवाद का असर था। इसके बावजूद 1990 में खासतौर पर उत्तर भारत में सार्वजनिक संपत्ति का जबर्दस्त नुकसान हुआ। &lt;br /&gt;
ध्यान देने की बात यह है कि अपने आंदोलन की अगुआई कर रहे अन्ना ही सिर्फ पुरानी और स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की पीढ़ी के हैं। उनकी टीम के ज्यादातर लोग या तो कांग्रेस के रोमानी आदर्शवाद के क्षरण के दौर में पैदा हुए हैं या जयप्रकाश आंदोलन के दौर में। लेकिन उनका सबसे ज्यादा साथ निभा रहा वह युवा है, जो उदारीकरण के दौर में पैदा हुआ है। उदारीकरण के दौर में पैदा युवाओं से पिछली पीढ़ी को शिकायत रही है कि वह अनुशासनहीन है, उसके लिए जिंदगी के मूल्यों का कोई मतलब नहीं है...उसे यह भी लगता है कि आज की पीढ़ी में भोग की ही भावना है। गांवों से लेकर महानगरों की सड़कों, पार्कों और खेत-खलिहानों में आए दिन होने वाली घटनाएं नई पीढ़ी को लेकर इस नई अवधारणा को बनाने में ही मदद दी है। लेकिन अन्ना के आंदोलन ने इसे बदलकर रख दिया है। उसी उदारवाद के दौर की खाओ-पियो-मौज करो के जीवन दर्शन के साथ पली-बढ़ी पीढ़ी का अन्ना के आंदोलन में अनुशासन और सेवाभाव देखकर हैरत होती है। आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान मंडल कमीशन के पक्ष में माहौल बनाने के आंदोलन में शामिल रहे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रनेता विनोद सिंह भी मानते हैं कि उदारवाद के दौर में पैदा पीढ़ी ने खुद को लेकर बनी सामाजिक अवधारणा को झुठला दिया है। विनोद सिंह ने अन्ना के आंदोलन की ही तर्ज पर एक दौर में स्वच्छ भारत और स्वच्छ राजनीति को लेकर राजघाट से लेकर जयप्रकाश नारायण के गांव तक नौजवानों की साइकिल यात्रा करने की एक साल पहले योजना बनाई थी। लेकिन जिस कांग्रेस में वे सक्रिय हैं, वहां उसे मंजूरी नहीं मिली। शायद तब कांग्रेस को लगा होगा कि भ्रष्टाचार को कौन पूछता है। लेकिन अन्ना के आंदोलन ने साबित कर दिया है कि नई पीढ़ी भी भ्रष्टाचार को लेकर बेहद चिंतित है। &lt;br /&gt;
दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में रैलियों के दौरान लूटपाट की घटनाएं होती रही हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपने छात्र जीवन के दौरान इन पंक्तियों के लेखक ने कई ऐसी घटनाएं रही हैं, जब लोग रैलियों का सहारा अपना निजी बदला चुकाने के लिए लेते थे। रैलियों के बाद गंदगी की भरमार रहती थी। लेकिन अन्ना के आंदोलन ने इस मिथक को भी तोड़ दिया है। वैसे महाराष्ट्र में एक परंपरा रही है। वहां रैलियों के बाद गंदगी कम से कम दिखती रही है। 2002 में रत्नागिरी जिले के एक दौरे में इन पंक्तियों के लेखक ने देखा था कि करीब एक लाख लोगों की रैली खत्म होने के बाद भी रैली वाले मैदान में कोई गंदगी नहीं थी। अन्ना अपने आंदोलन के साथ दिल्ली में महाराष्ट्र की वही परंपरा लेकर आए हैं। हैरत इस बात की है कि गंदगी को देखकर नाक-भौं सिकोड़ने वाली नई पीढ़ी खुद आज गंदगी साफ करते हुए दिख रही है। दिल्ली में अब तक अन्ना की अगुआई में जितनी भी रैलियां हुई हैं, उनमें सागर जैसी गहराई और नदी जैसा प्रवाह दिखा है। बरसाती नदियों की तरह अनुशासनहीनता नजर नहीं आई है। &lt;br /&gt;
आखिर ऐसा क्यों हुआ। दिल्ली हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे संजीव उपाध्याय की मानें तो यह सब अन्ना का प्रताप है। हालांकि अन्ना खुद इसका श्रेय नहीं लेते, बल्कि किसी भाग्यवादी की भांति ईश्वर को इसका श्रेय देते हैं। दिलचस्प बात यह है कि भाग्यवाद से ज्यादा कर्म पर भरोसा करने वाली नई पीढ़ी इसी अन्ना पर भरोसा कर रही है। दरअसल अन्ना की ताकत उनकी सादगी और निजी जीवन का निष्कलंक होना है। सिर्फ भारत ही नहीं, उन उदारवादी और उपभोक्तावादी समाजों में भी लोग अपने नेताओं को पाक-साफ और चरित्रवान देखना चाहते हैं, जहां के समाज में भोग कोई मुद्दा भी नहीं रहा। हैरत भी इसी को लेकर हो रही है कि भारतीय समाज की भोगवादी नई पीढ़ी भी अन्ना के अनुशासन में खुद को खुद-ब-खुद बंधा पा रही है। अन्ना कहते हैं कि त्याग करो तो नई पीढ़ी त्याग करने के लिए तैयार है। &lt;br /&gt;
गांधी ने अपने आंदोलन के जरिए सिर्फ राजनीति को ही बदलने की कोशिश नहीं की थी। बल्कि उन्होंने समाज में आमूल बदलाव की कई मोर्चों पर कामयाब कोशिश की थी। 74 साल के बूढ़े अन्ना हजारे आज वही काम कर रहे है। अन्ना ने यह मिथक भी तोड़ा है कि सामाजिक कर्म में सफल होने के लिए महानगरीय होना जरूरी है। उदारवाद ने अपने देश को भाषाई गुलामी का नया संदेश दिया, जिसे अख्तियार करना नई पीढ़ी के लिए ना सिर्फ कैरियर, बल्कि सामाजिक रसूख की बात हो गई थी। लेकिन अन्ना तो कायदे से हिंदी भी नहीं बोल पाते...लेकिन उनकी आवाज अंग्रेजीभाषी नई पीढ़ी ना सिर्फ सुन रही है, बल्कि उस पर अमल भी कर रही है। इससे साफ है कि नई पीढ़ी को ऐसा हर व्यक्ति पसंद है, जो अपने अंतर्मन से सही बात बोलता है...भले ही उसकी भाषा उदारवाद की प्रतीक अंग्रेजी ना हो...जो काम लोहिया का उग्र अंग्रेजी हटाओ आंदोलन नहीं कर पाया, उसे अन्ना की सादगी से भरी ओजस्वी अपील ने कर दिखाया है। तो क्या यह मान लिया जाय कि देश में नए इतिहास की शुरूआत है और देश अन्ना के दिखाए राह पर ही आगे चलेगा..क्योंकि उसके साथ भविष्य की सबसे ज्यादा नई पीढ़ी है। लोहिया और जयप्रकाश के आंदोलनों से ऐसी ही उम्मीद पाली गई थी। लेकिन मौका मिलते ही उस पीढ़ी ने अपने मूल्य भुला दिए...इसलिए अन्ना समर्थक नई पीढ़ी को लेकर भी फिलहाल मुकम्मल आकलन किया जाना ठीक नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-8650730123492458129?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;
अन्ना के आंदोलन के साथ जिस तरह का सलूक सरकार कर रही है, उससे साफ है कि कांग्रेस एक बार फिर 37 साल पुरानी रवाययत को ही दोहरा रही है। तब जयप्रकाश के आंदोलन को भी कुछ इसी अंदाज में दबाने की कोशिश हुई थी। जैसा अन्ना के आंदोलन के साथ किया जा रहा है। लेकिन तब कांग्रेस में मोहन धारिया, चंद्रशेखर, रामधन, कृष्णकांत जैसे युवा तुर्क के तौर पर विख्यात समाजवादी भी थे। इनमें से एक चंद्रशेखर ने साहस दिखाकर इंदिरा गांधी को समझाने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा था - ' जेपी संत हैं. संत से मत टकराइए। &lt;br /&gt;
&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;संत से जो सत्ता टकराती है, वह चूर-चूर हो जाती है। ' इतिहास गवाह है, जयप्रकाश से टकराना कांग्रेस और इंदिरा गांधी के लिए महंगा साबित हुआ और 1977 के चुनावों में कांग्रेस चारों खाने चित्त हो गई थी। हालांकि तब भी चंद्रशेखर को इस सलाह की कीमत चुकानी पड़ी थी। कांग्रेस में होते हुए भी ऐसी सलाह देना और बाद में आपातकाल का विरोध करना उनके लिए महंगा साबित हुआ। इंदिरा सरकार ने उन्हें भी जेल में डालने में संकोच नहीं किया। बहरहाल आज कांग्रेस में आलाकमान की जो हैसियत है, वह इंदिरा दौर से कम नहीं है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि तब इंदिरा गांधी से खुले तौर पर ऐसी बात कहने वाले युवा तुर्क थे। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में समाजवादी पृष्ठभूमि वाले दमदार समाजवादी नेता नहीं है। लेकिन मौजूदा माहौल देखकर ऐसा नहीं लगता कि उनमें से कोई चंद्रशेखर कौन कहे, इंद्रकुमार गुजराल बनने का भी साहस रखता हो। यहां यह बताना जरूरी है कि आपातकाल लागू होने से ठीक पहले इंद्रकुमार गुजराल ही देश के सूचना और प्रसारण मंत्री थे। लेकिन उन्होंने आपातकाल का विरोध किया और नतीजतन उन्हें भी चंद्रशेखर और मोहन धारिया की तरह कांग्रेस से बाहर की राह तलाशनी पड़ी। &lt;br /&gt;
जिस जयप्रकाश आंदोलन ने कई युवा नेताओं को नई पहचान दिलाई, उसमें से कई आज कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता हैं। बालचंद्र मुंगेकर, भक्तचरण दास सिद्धारमैया, डॉक्टर चंद्रभान, हुसैन दलवई, जैसे नेता तो सीधे-सीधे जयप्रकाश के छात्र आंदोलन की पहली पंक्ति के सिपाही थे। जयपाल रेड्डी की भी पृष्ठभूमि समाजवादी है। खुद जनार्दन द्विवेदी भी समाजवाद के पुरोधा रहे हैं। वाराणसी में देवदत्त मजूमदार के साथ मोहन प्रकाश ने तो आपातकाल के खिलाफ जबर्दस्त छात्र आंदोलन किया था। कांग्रेस के सहयोगी के तौर पर लालू यादव भी है। वे खुद जयप्रकाश आंदोलन की ही उपज हैं। यानी मौजूदा कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों में भी सक्षम और प्रतिभावान नेताओं की एक पूरी फौज है, जिसे जनतांत्रिक मूल्यों में गहरे तक भरोसा रहा है। इसके बावजूद अगर अन्ना हजारे के आंदोलन के साथ गैरलोकतांत्रिक राह अख्तियार की जा रही है तो इस तथ्य को समझना आसान है कि इन नेताओं की या तो सलाह नहीं सुनी जा रही या फिर वे चंद्रशेखर या मोहन धारिया की तरह खरा बोलने की हिम्मत नहीं दिखा रहे। सुदूर तमिलनाडु के एक पूर्व छात्र नेता और राज्य में कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता ने तो निजी बातचीत में अन्ना के खिलाफ ही सवाल उछाल रहे हैं। उनका तर्क है कि अन्ना संसद की सर्वोच्चता को चुनौती दे रहे है। लेकिन वे यह तर्क देते वक्त भूल जा रहे हैं कि जिस समय वे जयप्रकाश के आंदोलन में लाठियां खा रहे थे, उस वक्त जयप्रकाश पर भी उनकी आज की पार्टी ने अराजकता फैलाने का आरोप लगाया था। तब वे इस आरोप की मुखालफत में गला फाड़ नारा लगाते फिरते थे। लेकिन दिल्ली के गलियारों में दक्षिण भारत के ही एक पूर्व समाजवादी छात्रनेता और मौजूदा कांग्रेस पदाधिकारी को टीम अन्ना के महत्वपूर्ण सदस्य प्रशांत भूषण से मिलने से परहेज नहीं हुआ। प्रशांत भूषण का खुलकर समर्थन करने और अन्ना की गिरफ्तारी का विरोध करने की हिम्मत उन्होंने दिखाई है। यह बात दीगर है कि राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया में दक्षिण के नेताओं को तवज्जो देने की कोई परंपरा ही नहीं रही है, लिहाजा उनकी बात को अब तक किसी ने नहीं सुना है। &lt;br /&gt;
भले ही आज के दौर में भारतीय जनता पार्टी प्रमुख विपक्षी दल हो, लेकिन संसद और संसद से बाहर जैसी वह भूमिका निभा रही है, उससे साफ है कि वह पस्त नजर आ रही है। फिर राजनीति की दुनिया की विश्वसनीयता इतनी गिर गई है कि टीम अन्ना पर लोगों को जितना भरोसा है, उतना विपक्षी दलों पर भी नहीं है। इसके बावजूद अन्ना के आंदोलन के खिलाफ सरकार द्वारा गैर लोकतांत्रिक तरीका इस्तेमाल करने की हालत में विपक्ष से दमदार भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है। लेकिन दुर्भाग्यवश भारतीय जनता पार्टी इस मोर्चे पर कुछ खास नहीं कर पाई है। इसीलिए एक मजबूत विपक्ष के होते हुए भी किसी गैरराजनीतिक हस्ती के लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचल दिया जाता है, और विपक्ष अपना तेवर तक नहीं दिखा पाता है। बाबा रामदेव के जून के अनशन और अन्ना हजारे के ही अप्रैल की भूख हड़ताल के दौरान भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने बयान दिया था कि गनीमत है कि कांग्रेस के पास इस समय कोई वीपी सिंह नहीं है। ऐसा बयान देकर एक तरह से वे कांग्रेस में जयप्रकाश आंदोलन के युवा तुर्कों और 1987 के बोफोर्स दलाली के खिलाफ उभरे जनमोर्चा नेताओं की ही तलाश कर रहे थे। उनके इस बयान से साफ है कि विपक्ष को खुद पर भरोसा नहीं है और उसे किसी चंद्रशेखर, किसी मोहन धारिया, किसी वी पी सिंह, आरिफ मोहम्मद खान, रामधन या सतपाल मलिक की ही तलाश है। लेकिन सवाल यह है कि मौजूदा उपभोक्तावाद ने राजनीति के उन चेहरों को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जो उपभोक्तावाद की जननी उदारवाद को पानी पी-पीकर कोसते रहे हैं। पैसा और पद पाने की लालसा ने राजनीति के तमाम वादों को भी जकड़ लिया है। यही वजह है कि कभी जिस राजनीति के हर दरवाजे में क्रांति की मशाल दिखती थी या दिखाना शान की बात मानी जाती थी, उसी राजनीति में आमलोगों की तरह क्रांतिकारी अक्स अपने से अलग की शख्सियतों में ढूंढ़ा जाने लगा है। यही वजह है कि अब युवा तुर्कों के उभरने और कांग्रेस को सही राह दिखाने वाली आवाज की उम्मीद कम से कम इन दिनों कम पड़ती जा रही है। लेकिन तमाम बुराइयों के बावजूद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति भी संभावनाओं का खेल है। संभावनाएं यहां भी पनपती हैं और हकीकत भी बन जाती हैं। इतिहास बदलने में हकीकत बनती संभावनाओं की अहम भूमिका होती है। हो सकता है कि 37 साल पहले युवा तुर्क की बात इंदिरा गांधी को समझ में नहीं आई हो, लेकिन इस बार स्थितियां बदली भी नजर आ सकती हैं। हो सकता है कि किसी युवा तुर्क की सलाह मानकर कांग्रेस लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन चला रहे अन्ना हजारे के साथ पारदर्शी रवैया अख्तियार कर ले। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि मौजूदा कांग्रेस में चंद्रशेखर जैसा साहस दिखाने वाला कोई युवा तुर्क है भी या नहीं.... &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-5324495611447235957?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/PMCMDeaXgd3hhoKOxGuW8oQJ9qs/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/PMCMDeaXgd3hhoKOxGuW8oQJ9qs/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/xcIxS/~4/qho7i5VmZHc" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://balliabole.blogspot.com/feeds/5324495611447235957/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://balliabole.blogspot.com/2011/08/blog-post_17.html#comment-form" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/5324495611447235957?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/5324495611447235957?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/qho7i5VmZHc/blog-post_17.html" title="क्या अब भी  सुनाई देगी किसी ‘युवा तुर्क’ की आवाज" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/08/blog-post_17.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEYMRXo4cSp7ImA9WhRSEkU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-1335702025056363560</id><published>2011-08-06T22:11:00.000-07:00</published><updated>2011-11-14T06:49:44.439-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-11-14T06:49:44.439-08:00</app:edited><title>बदलते दौर में बेहद याद आएंगे जनेश्वर मिश्र</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-M3Zewe1LQO0/Tj4fKcASWzI/AAAAAAAAASw/QCHMRQHJpWU/s1600/janeshwar.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5637978047690988338" src="http://4.bp.blogspot.com/-M3Zewe1LQO0/Tj4fKcASWzI/AAAAAAAAASw/QCHMRQHJpWU/s200/janeshwar.jpg" style="cursor: hand; float: right; height: 200px; margin: 0px 0px 10px 10px; width: 181px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;
&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
1989 के आम चुनावों के नतीजे आने शुरू हो गए थे। कांग्रेस विरोधी लहर की अगुआई कर रहे वीपी सिंह के अपने इलाके इलाहाबाद से जिस सज्जन को जनता दल ने मैदान में उतारा था, शुरूआती दौर में तब की कांग्रेसी उम्मीदवार से वह पिछड़ रहा था। इलाहाबाद संसदीय सीट के विपक्षी जनता दल का उम्मीदवार न जीत पाए, यह जितनी हैरत की बात जनता दल के लिए थी, उतना ही आश्चर्य मीडिया को भी था। तब बीबीसी के विजय राणा ने लंदन से फोन करके उस विपक्षी नेता से पिछड़ने को लेकर प्रतिक्रिया मांगी को उत्तर भारत में जीत की पूरी उम्मीद थी। &lt;br /&gt;
&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;लेकिन अगुआ के गृह क्षेत्र इलाहाबाद से कांग्रेस विरोधी अभियान का जिम्मा संभाल रहे उस नेता ने पूरे आत्मविश्वास से कहा था – कांग्रेस की उम्मीदवार हमारी अपनी भाभी हैं...आप इलाहाबाद शहर की मतपेटियों को खुलने दीजिए। तब मुझे अफसोस होगा, क्योंकि हमारी भाभी चुनाव हार जाएंगी। और ऐसा ही हुआ। जनेश्वर मिश्र भारी मतों से विजयी हुए। यहां यह बता देना जरूरी है कि उनके खिलाफ तब कांग्रेस के आज की उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी की मां कमला बहुगुणा को अपना उम्मीदवार बनाया था। &lt;br /&gt;
जनेश्वर मिश्र के व्यक्तित्व को समझने के लिए यही एक उदाहरण काफी है। उनमें आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा था। यही वजह है कि छात्र जीवन में एक बार समाजवाद में उनका भरोसा क्या जमा, ता जिंदगी उस भरोसे को बरकरार रखा। समाजवाद में बढ़ते सिनेमाई तड़क-भड़क के दौर में भी उनका असल समाजवादी मन नहीं बदल पाया। बाद में जब यह लगा कि आंदोलन के बिना काम नहीं चलेगा तो खराब स्वास्थ्य के बावजूद 21 जनवरी 2010 को इलाहाबाद की सड़कों पर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं की अगुआई करने उतर पड़े। 76 साल की उम्र में उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। चलने-फिरने में भी उन्हें तकलीफ होती थी, तब भी उन्हें लगा कि अब ठहरने और रूकने का वक्त नहीं रहा। आखिरी वक्त तक उनके सहयोगी की भूमिका में रहे शिव शरण तिवारी को याद है कि शारीरिक कष्टों के बावजूद उस दिन वे पूरे उत्साह में थे। उन्हें लगता था कि अब मैदान में नहीं उतरे तो लोहिया के आम आदमी की तकलीफों पर कोई ध्यान नहीं देगा। लेकिन अफसोस अपने इस आंदोलन को वे आगे बढ़ा पाते, मौत महबूबा अगले ही दिन हमेशा के लिए उन्हें अपने साथ लेकर चली गई। छोटे लोहिया का जन्म भले ही पांच अगस्त 1933 को बलिया के शुभनथहीं के गांव में हुआ था। लेकिन उनका कार्यक्षेत्र इलाहाबाद रहा। बलिया में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद इलाहाबाद पहुंचे जनेश्वर को आजाद भारत के विकास की राह समाजवादी सपनों के साथ आगे बढ़ने में दिखी और समाजवादी आंदोलन में इतना पगे कि उन्हें लोग छोटे लोहिया के तौर पर ही जानने लगे। समाजवादी आंदोलन में उनके योगदान और इलाहाबाद के साथ उनके रिश्ते को यूं समझा जा सकता है कि वे पहली बार 1969 में इलाहाबाद की ही उस सीट फूलपुर से लोकसभा पहुंचे, जहां की नुमांइदगी पंडित जवाहर लाल नेहरू करते थे। हराया भी उन्होंने खुद पंडित नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित को। तब 36 साल का यह नौजवान इलाहाबाद में बदलाव का प्रतीक बन गया था। 1980 के चुनाव में लोकदल के टिकट पर वे बलिया से मैदान में थे। तब उनका प्रचार करने पहुंचे वयोवृद्ध समाजवादी नेता और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन वित्तमंत्री मधुकर दिघे ने कहा था – ‘जनेश्वर मुझसे उम्र में मुझसे छोटा है, लेकिन समझ और राजनीतिक कद में वह मुझसे बड़ा है।’ लेकिन दिघे की यह अपील भी बलिया के लोगों पर असर नहीं डाल पाई। चंद्रशेखर के सामने जनेश्वर मिश्र की हार हुई। इस चुनाव के बाद बलिया के सहतवार में हुई एक सभा में उन्होंने जो भाषण दिया, उसकी एक लाइन आज भी इन पंक्तियों के लेखक को समाजवादी आंदोलन को समझने के सूत्र की तरह याद है। छोटे लोहिया ने तब कहा था- ‘हमारी कुर्सी कभी संसद में होती है तो कभी सड़क पर, लेकिन जनता की आवाज के साथ हम कभी समझौता नहीं करते। ’ लेकिन जब सड़क से उठे मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी में समाजवाद से विचलन साफ नजर आने लगा और उस दौरान यह सूत्र वाक्य बोलने वाले की चुप्पी खलती रही। इस चुप्पी के निहितार्थों को वे भी शायद समझते थे, तभी उन्होंने शायद आखिर में एक बार फिर समाजवादी आंदोलन की मूल राह पर वापस लौटने की कोशिश की थी। मशहूर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की मशहूर कविता – लोहिया के न रहने पर – कविता बेहद उद्वेलित करती थी। साहित्य की चर्चा हो तो वे इस कविता का उल्लेख जरू करते थे। शायद यही वजह है कि आपसी बातचीत में समाजवादी विचलन से परेशान रहा करते थे। &lt;br /&gt;
कभी समाजवादी राजनीति में अपने इलाके का काम न करना अच्छाई की बात मानी जाती थी। लेकिन उनके अपने इलाके के लोग इसे अच्छाई मानने से इनकार करते रहे हैं। समाजवादी राजनीति से एक शिकायत कमसे कम उनके अपने इलाके के लोगों को रही है, उन्होंने दूसरे इलाकों को तरजीह देकर अपने इलाके का विकास नहीं किया। यह शिकायत बलिया वालों को भी रही है। &lt;br /&gt;
आज उदारवाद के दौर में जब आम आदमी की आवाज लगातार अनसुनी की जा रही है। उसकी परेशानियों पर किसी का ध्यान नहीं है। उदारीकरण की बयार में लोगों के साथ लगातार अन्याय हो रहा है। ऐसे माहौल में समाजवादी पार्टी एक बार फिर अपने रौ में लौटती दिख रही है। जनसंघर्षों और सरोकारों से जुड़ने की कोशिश कर रही है, ऐसे मौके पर छोटे लोहिया याद आते रहेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-1335702025056363560?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/UWCKgm01FzuyPbiNkhhFEvpcehI/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/UWCKgm01FzuyPbiNkhhFEvpcehI/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/xcIxS/~4/PU99mlU5uTU" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://balliabole.blogspot.com/feeds/1335702025056363560/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://balliabole.blogspot.com/2011/08/blog-post_06.html#comment-form" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/1335702025056363560?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/1335702025056363560?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/PU99mlU5uTU/blog-post_06.html" title="बदलते दौर में बेहद याद आएंगे जनेश्वर मिश्र" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/-M3Zewe1LQO0/Tj4fKcASWzI/AAAAAAAAASw/QCHMRQHJpWU/s72-c/janeshwar.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/08/blog-post_06.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkEGRXc-fip7ImA9WhdRE04.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-135827139172315276</id><published>2011-08-02T19:29:00.000-07:00</published><updated>2011-08-02T19:30:24.956-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-08-02T19:30:24.956-07:00</app:edited><title>सब्सिडी घटाने के तर्क</title><content type="html">&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आम आदमी भी समझता है कि महंगाई रोकने के दावे और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को बाजार से नियंत्रणमुक्त  करने की कोशिशें साथ- साथ नहीं चल सकतीं। लेकिन केंद्र सरकार दोनों ही स्थितियों में आगे बढ़ने की बात करती रहती  है। जिस समय वह महंगाई रोकने का दावा करती है, उसी वक्त वह डीजल एवं एलपीजी की कीमतों को बाजार के हवाले करने की बातें भी करती है। इसी सिलसिले में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने डीजल और एलपीजी की सब्सिडी खत्म करने की बात कह कर खासकर आम लोगों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। बहरहाल यह पहला मौका नहीं है, जब केंद्र सरकार के किसी जिम्मेदार मंत्री ने ऐसा बयान दिया है। दिसंबर 2010 में ही डीजल पर दी जाने वाली सब्सिडी पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया नाखुशी जाहिर कर चुके हैं। इसी साल मई में तब के वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को भी देश के वास्तविक विकास में डीजल की सब्सिडी बाधा लग रही थी। इसके फौरन बाद एक बार फिर मोंटेक सिंह अहलूवालिया को डीजल सब्सिडी चुभने लगी थी। रही-सही कसर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसी साल मई में ही पूरी कर दी, जब उन्होंने डीजल की कीमतों को बाजार के हवाले करने का ऐलान कर दिया था।&lt;br /&gt;सरकार के जिम्मेदार लोगों के बयान से साफ है कि भले ही अपना देश अब भी संवैधानिक रूप से लोक कल्याणकारी होने का संवैधानिक तमगा धारण किए हुए है, लेकिन हकीकत कुछ और है। सरकारी फैसलों से साफ है कि देश की पूरी की पूरी व्यवस्था को बाजार के हवाले करने का फैसला कर लिया गया है। पेट्रोल की कीमतें बाजार के हवाले करके इसे पहले ही साबित किया जा चुका है। इसी तरह डीजल और एलपीजी की कीमतों को बाजार के हवाले करने की तैयारी काफी पहले से कर ली गई है। डीजल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने का वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इस बार भी ऐलान करते वक्त वही पुराना रोना रोया है। उन्होंने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत जुलाई में बढ़कर 116-118 डॉलर बैरल हो गई, जबकि जून में यह 110 डॉलर बैरल थी। इसका असर भारत पर पड़ेगा। इसी तर्क के आधार पर पेट्रोल की कीमतें बढ़ाई गईं। लेकिन वित्त मंत्री यह बताना भूल गए कि इसी साल जब कुछ वक्त तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 90-95 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई थीं तो बाजार के नियमों के मुताबिक घरेलू बाजार में पेट्रोल की कीमतें घट जानी चाहिए थीं। लेकिन हकीकत तो यह है कि ऐसा नहीं हुआ। यह मांग भी कोई अलग नहीं है। क्योंकि जिन देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बाजार के हवाले हैं, वहां तो ऐसा ही होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बार-बार बढ़ाने या बाजार के हवाले करने का तर्क देते वक्त सरकार यह बताना नहीं भूलती कि ईंधन और उर्वरक की सब्सिडी के मद में उसे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार यह रकम हर साल करीब 73 हजार 637 करोड़ बैठती है। निश्चित तौर पर इतनी बड़ी रकम भारत सरकार के लिए बोझ ही है। लेकिन सरकार को इसका भी खुलासा करना चाहिए कि इतनी बड़ी सब्सिडी के बावजूद देश के आम आदमी के हिस्से क्या आता है। हकीकत तो यह है कि खाद की सब्सिडी किसानों के नाम पर हर बार दी जाती है, लेकिन उसका फायदा खाद बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियां उठाती हैं। इसी तरह डीजल पर सब्सिडी देते वक्त सरकार किसानों का ही बहाना बनाती है। लेकिन खुद सरकार भी मानती है कि 75 फीसदी डीजल और चालीस फीसदी रसोई गैस और केरोसिन का इस्तेमाल उद्योगों में होता है। यही वजह है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक शरद यादव ने पिछले दिनों पेट्रोलियम मंत्रालय को लिखकर डीजल की सब्सिडी खत्म करने का सुझाव दिया था। उन्होंने अपनी चिट्ठी में लिखा था कि डीजल की सब्सिडी का सबसे ज्यादा फायदा मोबाइल टावरों, मॉल, होटल और बड़ी कंपनियों को हो रहा है, क्योंकि उनके यहां बिजली डीजल से चलने वाले जेनरेटरों से ही तैयार की जाती है। शरद यादव ने इसे ध्यान दिलाते हुए कहा था कि डीजल से सब्सिडी खत्म करके किसानों को सीधे सहायता मुहैया कराई जाय। लेकिन शरद यादव की मांग को पूरा करने में व्यवहारिक दिक्कत यह है कि अगर किसानों को सीधे सहयोग दिया जाएगा तो भ्रष्टाचार की नई गंगा शुरू हो जाएगी। हां, एक उपाय यह जरूर हो सकता है कि डीजल के किसानों को राशन कार्ड दिए जाएं। लेकिन सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए राशन की जैसी बंदरबाट हो रही है और जिस तरह रसूखदार लोगों तक ने बीपीएल कार्ड बनवा लिए हैं, उससे साफ है कि किसानों के नाम पर राशन से डीजल हासिल करने के नए भ्रष्टाचारी खेल की शुरूआत हो जाएगी। वैसे भी जब सब्सिडी घटाने की बात आती है या फिर इनकी कीमतों को बाजार के हवाले करने का तर्क दिया जाता है, तब इस तथ्य को धीरे से बताया जाता है। लेकिन ऐसा करते वक्त सरकारें भूल जाती हैं कि सब्सिडी घटाने की असल मार किसानों और आम आदमी को भुगतनी पड़ती है। देश में बिजली की जो हालत है, उसमें खेती में ऊर्जा का सबसे बड़ा माध्यम डीजल ही है। जाहिर है कि अगर डीजल की कीमतें बढ़ती हैं तो खेती की लागत भी बढ़ेगी। जिसे बड़े किसान तो भुगत सकते हैं, लेकिन छोटे किसानों के लिए इसे झेल पाना आसान नहीं होगा। इस लिहाज से खेती की लागत बढ़ जाएगी और खेती का संकट बढ़ जाएगा। इसी तरह जब डीजल की कीमत में एक रूपए की बढ़ोत्तरी होती है तो महंगाई में डेढ़ गुना तक बढ जाती है। फिर जिस सब्सिडी को रोकने की बात की जा रही है, खुद पेट्रोलियम मंत्रालय ही मानता है कि डीजल पर सब्सिडी सिर्फ 3.80 रूपए प्रति लीटर दी जा रही है। इसी तरह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए दिए जा रहे केरोसिन पर 18.82 रूपए प्रति लीटर सब्सिडी दी जा रही है। जाहिर है कि कम से कम डीजल पर सब्सिडी भी ज्यादा नहीं है। &lt;br /&gt;यह सच है कि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों का तीन चौथाई हिस्सा आयात करते हैं। इससे सरकारी खजाने पर बोझ तो है ही। इसी लिए हम अमेरिका और ब्रिटेन की नकल पर अपने यहां पहले पेट्रोल को बाजार के हवाले कर चुके हैं और अब डीजल और एलपीजी को भी करने जा रहे हैं। ऐसे में हमें सरकार से पूछना पडेगा कि जब पेट्रोलियम को बाजार के हवाले करने के मामले में अमेरिका की नकल की जा सकती है, तब अमेरिका में जनता को राहत देने जैसी नकल क्यों नहीं की जा सकती। मसलन-जब 2004 में पेट्रोल की कीमतों में भारी तेजी आई थी, तब अमेरिकी संसद ने सेना के तेल भंडार में कटौती करके तेल को बाजार में भेजने के लिए तब के अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को मजबूर कर दिया था। बुश ने इसके खिलाफ लाखों तर्क दिए थे, पर संसद ने कह दिया था कि सरकार की प्राथमिकता फिलहाल तो तेल की कीमतों पर नियंत्रण रखना ही होना चाहिए। जिस राह पर भारत सरकार चल रही है, क्या इस दौर में उससे अमेरिका जैसे कदम उठाने की उम्मीद भी की जा सकती है ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-135827139172315276?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/5sVHDeCUcghYADnhbeutbbjqXkU/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/5sVHDeCUcghYADnhbeutbbjqXkU/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/xcIxS/~4/m6vKBEoPXv4" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://balliabole.blogspot.com/feeds/135827139172315276/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://balliabole.blogspot.com/2011/08/blog-post.html#comment-form" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/135827139172315276?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/135827139172315276?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/m6vKBEoPXv4/blog-post.html" title="सब्सिडी घटाने के तर्क" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/08/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEYNSXg7fCp7ImA9WhRSEkU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-1655746931637920844</id><published>2011-07-28T06:38:00.000-07:00</published><updated>2011-11-14T06:49:58.604-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-11-14T06:49:58.604-08:00</app:edited><title>खुदरा में विदेशी निवेश : किसको नफा, किसे नुकसान</title><content type="html">&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;
&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;
खुदरा व्यापार में भी विदेशी निवेश की मंजूरी देकर भारत सरकार ने एक बार फिर बहस को जन्म दे दिया है। उदारीकरण की शुरूआत के ठीक बीस साल बाद रिटेल सेक्टर को विदेशी निवेश के लिए खोलने के बाद बहस एक बार फिर वही है कि देशभर में फैले करीब डेढ़ करोड़ खुदरा दुकानदारों का क्या होगा। इतनी संख्या तो खुद भारत सरकार ही मानती है। लेकिन यह संख्या इससे और ज्यादा ही है। क्योंकि देशभर में रेहड़ी-पटरी वाले व्यापारियों का अभी तक कोई मुकम्मल आंकड़ा तैयार नहीं किया जा सका है। लेकिन अगर भारत सरकार के बिजनेस पोर्टल की ही मान लें तो भारत भर में फैले करीब डेढ़ करोड़ खुदरा दुकानदार तो हैं हीं और उनके साथ करीब नौ करोड़ लोगों की जिंदगी भी जुड़ी है।&lt;br /&gt;
&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;इसके साथ ही अगर रेहड़ी-पटरी वालों को भी जोड़ दें तो यह संख्या अनुमान से भी कहीं ज्यादा हो सकती है। जाहिर है उनकी रोजी-रोटी का जरिया खुदरा व्यापार ही है। उदारीकरण की शुरूआत के ठीक बीस साल बाद अगर रिटेल सेक्टर को विदेशी निवेश के लिए खोला जाएगा और इतनी बड़ी आबादी की रोजी-रोटी के सरोकारों को लेकर विचार नहीं किया जाएगा तो सवाल उठेंगे ही।&lt;br /&gt;
बहरहाल खुदरा क्षेत्र को विदेशी निवेश के बाद भारत में आने वाले बदलावों की चर्चा से पहले इससे जुड़े आंकड़ों पर विचार करना जरूरी है। रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेशी को खोलने की मांग तो बरसों से हो रही है। इसकी वजह है भारत का विशाल मध्यवर्ग और तेजी से बढ़ती उसकी खरीद क्षमता। पिछले साल दुनिया की जानी-मानी रिसर्च कंपनी प्राइसवाटर हाउसकूपर ने भारत के रिटेल सेक्टर को लेकर एक अध्ययन किया था। मजबूत और स्थिर 2011 शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में उसने अनुमान लगाया था कि भारत का खुदरा क्षेत्र 2014 तक बढ़कर 900 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अभी खुदरा कारोबार महज 500 अरब डॉलर का है। प्राइसवाटर हाउसकूपर ने अनुमान लगाया है कि 2010 से 2014 तक भारतीय रिटेल सेक्टर में औसतन चार फीसदी की सालाना वृद्धि होगी। प्राइसवाटर हाउस कूपर की यह रिपोर्ट मुख्यत: एशिया के खुदरा क्षेत्र पर केंद्रित है। इसके मुताबिक भारत का खुदरा क्षेत्र चीन और जापान के बाद तीसरे नंबर पर आता है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक चीन में खुदरा क्षेत्र 2014 तक 4,500 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर जाएगा यानी चीन का खुदरा क्षेत्र भारतीय खुदरा क्षेत्र से पांच गुना ज्यादा होगा।&lt;br /&gt;
तीन साल पहले भारत सरकार ने भी देश के खुदरा बाजार पर अध्ययन कराया था। भारत सरकार के व्यापार पोर्टल के मुताबिक तब तक उपलब्‍ध अनुमानों के मुताबिक भारत का खुदरा बाजार 1,330,000 करोड़ रु. का था। जिसमें खाद्य और किराना बाजार की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा यानी 7,92,000 करोड़ रु.की आंकी गई थी। यानी यह हिस्सेदारी भारत के कुल खुदरा बाजार में करीब 59.5 प्रतिशत बैठती है। इसके साथ ही कपड़े, वस्‍त्र उद्योग और फैशन संबंधी चीजों की खुदरा बाजार में हिस्सेदारी 9.9 प्रतिशत के साथ करीब 1,31,300 करोड़ रु. बैठती है। जो भारत के खुदरा बाजार में दूसरे स्थान पर है। हालांकि यह पूरा का पूरा ब्लॉक असंगठित है। आज संगठित किए जाने के नाम पर खुदरा बाजार को खोलने की जो हिमायत खुद सरकार कर रही है, उसका ही आंकड़ा बताता है कि भारत के खुदरा क्षेत्र का एक ब्लॉक ऐसा भी है, जो पहले से ही कहीं संगठित रहा है। इसमें टाइम वीयर की 48.9 प्रतिशत हिस्‍सेदारी और फुटवीयर (48.4 प्रशितत हिस्‍सेदारी है।&lt;br /&gt;
देश को उदारीकरण की तरफ ले जाने वाले प्रधानमंत्री और कांग्रेस के साथ ही भारतीय बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि खुदरा क्षेत्र को खोलने के बाद भारत के किसानों की हालत सुधरने वाली है। गुरूचरण दास जैसे लोगों का कहना है कि जिन देशों का खुदरा क्षेत्र संगठित क्षेत्र के हवाले कर दिया गया है, वहां के सुपर मार्केट आमतौर पर किसानों से सीधे अनाज और सब्जियां खऱीदते हैं। फिर फ्रिज्ड करके उसे अपने सुपर मार्केटों तक पहुंचाते हैं। और अपने रिटेल स्टोर के जरिए उपभोक्ताओं को बेचते हैं। यानी बिचौलिए की वहां भूमिका खत्म हो जाती है। चूंकि किसानों से खुदरा चेन वाली कंपनियां सीधे जिंस खऱीदेंगी और उन्हें बेचेंगी तो किसानों को उनकी फसल की कहीं ज्यादा कीमत मिलेगी और उनके जरिए भारतीय उपभोक्ताओं को दस-बीस फीसदी कम कीमत पर बेचा जाएगा। यानी खुदरा क्षेत्र के संगठित होने से फायदा किसानों और उपभोक्ताओं-दोनों को होने की उम्मीद है। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को खोलने का एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि भारत में अनाज और सब्जियों के रख-रखावा का उचित इंतजाम नहीं होने के चलते करीब 20 से 30 फीसदी तक अनाज और सब्जियां बरबाद हो जाती हैं। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के बाद आने वाली कंपनियां भंडारण का उचित इंतजाम करेंगी और यह बरबादी रूकेगी। वैसे एक फायदा तो यह भी गिनाया जा रहा है कि खाद्यान्न की महंगाई दर में बढ़ोत्तरी के लिए वायदा कारोबार और उससे जुड़ी जमा खोरी सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के बाद वायदा कारोबारियों पर लगाम लगेगी। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वायदा कारोबारियों को मौका अधिकारियों की ढिलाई के बाद ही मिलती है। इसकी तरफ सरकारों ने अब तक मुकम्मल ध्यान नहीं दिया है।&lt;br /&gt;
विदेश में बड़े सुपरमार्केट आम तौर पर किसानों से सीधे खाद्यान्न खरीदते हैं, कोल्ड स्टोर में उनका भंडारण करते हैं, एयरकंडीशंड गाडि़यों में उनका परिचालन करते हैं और एयरकंडीशंड स्टोरों में उन्हें सीधे उपभोक्ताओं को बेचते हैं। यह कोल्ड चेन खुले स्थान में पड़े खाद्यान्न की बर्बादी को रोकती है। भारत में कुल खाद्यान्न उत्पादन का 20 से 30 प्रतिशत बर्बाद हो जाता है। आधुनिक रिटेल स्टोर के आने के बाद खाद्यान्न के दामों में 15-20 फीसदी कमी आने और किसानों की आय में 10 से 20 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है। लेकिन हमें करीब डेढ़ दशक पहले की पंजाब की उस घटना को नहीं भूलना चाहिए। पंजाब सरकार ने एक विदेशी कंपनी से समझौते के बाद राज्य के किसानों को टमाटर बोने के लिए प्रोत्साहित किया था। तब कंपनी ने वादा किया था कि वह किसानों से उचित मूल्य पर टमाटर खऱीदेगी और अपनी प्रोसेसिंग यूनिट में उससे केचप और दूसरी चीजें तैयार करेंगी। लेकिन जब टमाटर का बंपर उत्पादन होने लगा तो कंपनी तीस पैसे प्रति किलो की दर से टमाटर मांगने लगी। तब किसानों ने कंपनी को टमाटर बेचने की बजाय सड़कों पर ही फैला दिए थे। यानी किसानों को वाजिब हक कहां मिल पाया था। &lt;br /&gt;
किसानों और उपभोक्ताओं को फायदा होने का तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि देश में जिन करोड़ों लोगों की जीविका गली-मुहल्ले में रेहड़ी-पटरी लगाकर सब्जी-भाजी बेचकर चलती है, या गली के मुहाने की दुकान के सहारे रोजी-रोटी चल रही है, रिटेल चेन बढ़ने के बाद उनका क्या होगा। वैसे ही इस देश की आबादी का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जिसके लिए नौकरियां पाना आसान नहीं है। रोजगार की हालत वैसे ही अभी तक खराब है। इस देश में बेरोजगारी जमकर है। भारत सरकार के ही आंकड़ों का हवाला दें तो भारत में इस समय बेरोजगारी दर 10.70 फीसदी है। जाहिर है कि जब खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश होगा तो इसमें बढ़ोत्तरी हो सकती है। क्योंकि जब घर के पास एयरकंडिशंड दुकानों में सस्ते सामान मिलेंगे तो रेहड़ी वालों को कौन पूछेगा, बगल के किराना स्टोर पर कौन जाएगा। यह सच है कि बिना विदेशी निवेश के ही रहेजा, टाटा, फ्यूचर, पीरामल, रिलायंस और भारती जैसे ग्रुपों ने रिटेल स्टोरों की श्रृंखला शुरू कर दी है। जाहिर है कि विदेशी निवेश के बाद इन पर भी दबाव बढ़ेगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-1655746931637920844?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Ga3Snvwx-h1XlchWhoebGR5CHS4/1/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/Ga3Snvwx-h1XlchWhoebGR5CHS4/1/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/blogspot/xcIxS/~4/JmcnRQKhyKE" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://balliabole.blogspot.com/feeds/1655746931637920844/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://balliabole.blogspot.com/2011/07/blog-post_28.html#comment-form" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/1655746931637920844?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/1988508270396874170/posts/default/1655746931637920844?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/JmcnRQKhyKE/blog-post_28.html" title="खुदरा में विदेशी निवेश : किसको नफा, किसे नुकसान" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/07/blog-post_28.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0UASXw_eSp7ImA9WhdSFEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-6448232827463798504</id><published>2011-07-23T01:53:00.000-07:00</published><updated>2011-07-23T01:54:08.241-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-07-23T01:54:08.241-07:00</app:edited><title>विरोध के सुरों के बीच दार्जिलिंग क्षेत्रीय प्रशासन</title><content type="html">&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की अजीब-सी फितरत है। पहले वे समस्याएं पैदा करते हैं, फिर उसे अपने राजनीतिक हितों के लिए बढ़ावा देते हैं, समाधान भी वही करते हैं और चलते-चलते ऐसा समाधान करते हैं कि उस समाधान में भी भविष्य के लिए कुछ नई समस्याएं रह जाती हैं। दार्जिलिंग टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन यानी दार्जिलिंग क्षेत्रीय प्रशासन बनाने को लेकर हुआ त्रिपक्षीय समझौता भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की इसी खासियत का ताजा उदाहरण है। समझौता हुआ नहीं कि इसके विरोध की लहरें तेजी से उठने लगीं हैं। दार्जिलिंग से सटे जलपाईगुड़ी जिले के जिन तराई और दोआर्स वाले इलाकों को इस प्रशासनिक व्यवस्था के अधीन लाया गया है, वहां इसका विरोध शुरू हो गया है। यहां सक्रिय संस्थाएं आमरा बंगाली, जन जागरण, जन चेतना के साथ ही स्थानीय अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद भी विरोध के इस सुर में अपना सुर मिलाने लगी है। समझौते के ठीक अगले दिन यानी 19 जुलाई से 48 घंटे के व्यापक बंद का जिस तेजी से इन संस्थाओं ने ऐलान किया और लोगों का उसे जितना समर्थन मिला है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में दार्जिलिंग टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन यानी डीटीए की राह आसान नहीं होगी। दरअसल जिस डीटीए के गठन को लेकर पश्चिम बंगाल की ममता सरकार और पी चिदंबरम का गृहमंत्रालय अपनी उपलब्धि बताते नहीं थक रहा है, उसके गठन की सबसे बड़ी वजह पिछली सदी के अस्सी के दशक के आखिरी दिनों में अलग गोरखालैंड राज्य के गठन का हिंसक आंदोलन रहा है। इस हिंसक आंदोलन की कीमत इन इलाकों में रह रहे गैर नेपाली मूल के लोगों ने चुकाई है। दरअसल तराई और दोआर्स के इलाकों में नेपाली मूल से कहीं ज्यादा बांग्ला और हिंदी भाषी लोग हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान से गए लोगों का यहां के मोहल्ला व्यापार पर तो कब्जा है ही, राजनीतिक और सामाजिक जीवन में अपनी आर्थिक समृद्धि के जरिए उनका हस्तक्षेप बना हुआ है। स्थानीय बांग्लाभाषियों का तो खैर यह इलाका है ही। फिर आदिवासी, बोडो और राजवंशी समुदाय भी अच्छी खासी संख्या में है। इनकी भी अलग गोरखालैंड राज्य के प्रति सहानुभूति नहीं रही है। नेपाली मूल के अलग गोरखालैंड राज्य के गठन के हिंसक आंदोलन के शिकार यही लोग हुए थे। हालांकि स्थानीय नेपाली समुदाय के साथ उनके रिश्तों में उस दौर की तल्खी नहीं है। लेकिन इतिहास तो इतिहास होता है और उसे झुठलाया जाना आसान नहीं होता। इतिहास में मिली टीस भविष्य को आशंकित करने के लिए काफी होती है। पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्रीय गृहमंत्रालय ने इतिहास की इस टीस को ठीक से नहीं समझा। दिलचस्प बात यह है कि इस समझौते की इस कमी को पश्चिम बंगाल की मार्क्सवादी सरकार के एक स्तंभ रहे अशोक भट्टाचार्य ने खुलकर इस समझौते का विरोध किया है। अखबारों में उनके बयान भी आए हैं। इन बयानों के मुताबिक तराई और दोआर्स के इलाक़ो को गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन में लाए जाने से इन इलाक़ो में मौजूद आदिवासियों, बंगालियों, बोडो और राजवंशी समाज के लोगों के मन में निराशा पैदा होगी, जिससे समस्या के समाधान की बजाए नई दिक़्कते ही बढ़ेंगीं। हालांकि ममता सरकार ने एक समिति के गठन का भी ऐलान किया है, जो तराई और दोआर्स के इलाकों को इस नए प्रशासन में शामिल करने के लिए सुझाव देगी। लेकिन तराई और दोआर्स में रह रहे गैर नेपाली समुदाय के लोगों को आशंका है कि समिति की रिपोर्ट डीटीए और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के ही पक्ष में रिपोर्ट देगी। &lt;br /&gt;नाराज तो अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर लंबे समय तक संघर्षरत रहे गोरखा लिबरेशन फ्रंट के सुभाष घीसिंग भी हैं। इसके साथ ही अखिल भारतीय गोरखा लीग भी इसके विरोध में है। यह सच है कि इस समय गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का दार्जिलिंग के इलाकों में बोलबाला है। हालांकि इसका गठन सिर्फ तीन साल पहले यानी 2008 में हुआ था। इस सच को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि अलग गोरखालैंड की अपनी पैरवी के दम पर पूरी दुनिया में तहलका मचाने वाले सुभाष घीसिंग और उनका संगठन हाशिए पर पड़ा है। उन्हें डीटीए के गठन के विमर्श में भी शामिल नहीं किया गया। समझौता तो खैर गृहमंत्रालय, पश्चिम बंगाल सरकार और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के रोशन गिरी के ही बीच हुआ है। यह ठीक है कि गोरखा लीग और सुभाष घीसिंग को इस समझौते में शामिल नहीं किया जा सकता था। लेकिन विचार-विमर्श की प्रक्रिया में उन्हें शामिल किया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे घीसिंग और गोरखा लीग का नाराज होना अस्वाभाविक नहीं है। जिस तरह से इसके गठन के बाद ही विरोध शुरू हो गया है, उसमें राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश में घीसिंग और अखिल गोरखा लीग भी जुट सकता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पश्चिम बंगाल और देश की सरकार और उसके अधिकारी इस आशंका को क्यों नहीं समझ पाए। अब दार्जिलिंग इलाके में यह सवाल भी पूछा जाना शुरू हो गया है कि 2008 में नेपाली भाषियों के अलग राज्य के मुद्दे पर गठित गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के सामने आखिर क्या मजबूरी रही कि उसने इस नए प्रशासन के मसविदे को मंजूरी दे दी। अगर इस मांग ने जोर पकड़ा तो गोरखा जनमु्क्ति मोर्चा के भी पाला बदलते देर नहीं लगेगी। &lt;br /&gt;डीटीए 1988 में बनी गोरखालैंड हिल काउंसिल की जगह लेने जा रही है। जिसे हिल काउंसिल से कहीं ज्यादा अधिकार हासिल हैं। गृह मंत्री पी चिदंबरम ने खुद इसका ऐलान करते हुए कहा कि क्षेत्रीय प्रशासन को व्यापक अधिकार दिए गए हैं और उनके पास रोज़मर्रा के काम काज से संबंधित लगभग सभी विभाग मौजूद हैं। हालांकि उसे कानून बनाने के अधिकार हासिल नहीं है। समझौते के मुताबिक इस प्रशासन के लिए 45 सदस्य चुने जाएंगे, जबकि पांच को राज्य सरकार मनोनीत करेगी। उपर से देखने में यह व्यवस्था बेहद साफ-सुथरी नजर आ रही है। लेकिन हकीकत तो यह है कि इसका राजनीतिक विरोध शुरू हो गया है। राज्य की विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि इस प्रशासन के गठन में उनसे सलाह-मशविरा भी नहीं किया गया। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी तो यहां तक कह रही है कि ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए यह नया प्रशासन बनवाया है। विपक्षी दलों के इस आरोप में दम इसलिए नजर आता है, क्योंकि अपने चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी ने इस इलाके में और अधिकार प्राप्त नई व्यवस्था बनाने का वादा किया था। ममता बनर्जी को अभी विधानसभा से इस प्रशासन को कानूनी जामा पहनाने के लिए विधेयक पारित कराना होगा। चूंकि नए समझौते के तहत गोरखालैंड प्रशासन के पास 54 विभाग होंगे जिसके तहत भूमि के मामले की देख-रेख का अधिकार भी शामिल है। इसलिए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का विरोध उसे विधानसभा में झेलना होगा। क्योंकि भूमि सुधार कम्युनिस्ट पार्टियों की जान रहे हैं और राज्य में उनके 34 साल के शासन की प्रमुख वजह भी रहे हैं। जाहिर है कि नए समझौते के तहत बन रहे इस प्रशासन को चौतरफा विरोध शुरू हो गया है और गोरखालैंड में आंदोलनों का जो इतिहास रहा है, उससे आशंकाएं ही बढ़ती हैं। क्योंकि विरोध के इन सुरों के बीच फिर किसी गोरखा या राजनीतिक समूह ने अलग राज्य की वीणा बजानी शुरू की तो गोरखालैंड में शांति बनाए रखना आसान नहीं होगा। व्यापक राजनीतिक विमर्श की कमी लोकतांत्रिक समाज में अविश्वसनीयता को ही बढ़ाती है और यह अविश्वसनीयता कई बार महत्वाकांक्षी राजनीतिक दलों को अपनी ताकत बढ़ाने का माहौल मुहैया कराती हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-6448232827463798504?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/S3j-NwPidLc/blog-post_21.html" title="प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का पहला बलिया फिल्म फेस्टिवल" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/07/blog-post_21.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0UESX89eip7ImA9WhdTEUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-4886251828687956878</id><published>2011-07-08T21:19:00.000-07:00</published><updated>2011-07-08T21:20:08.162-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-07-08T21:20:08.162-07:00</app:edited><title>आधुनिकताबोध और ग्रामीण सभ्यता</title><content type="html">&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;साध्य और साधन एक ही हों, लेकिन साधक की पृष्ठभूमि अलग हो तो आधुनिक सभ्यता और समाज का नजरिया दोनों को लेकर बदल जाता है। आज के दौर में आधुनिकता को व्यापक बनाने का ठेका सरकारों के पास ही है, लिहाजा उनका भी रवैया कुछ ऐसा ही नजर आता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन में कम से कम साध्य और साधन के स्तर पर बराबरी तो थी ही। दोनों का लक्ष्य भ्रष्टाचार के भस्मासुर का विरोध करना था और दोनों ने अनशन और सत्याग्रह को ही अपना साधन बनाया। लेकिन समाज और व्यक्ति को आधुनिक बनाने की कथित जिम्मेदारी संभाल रही सरकारों का रवैया दोनों ही आंदोलनों को लेकर एक जैसा नहीं रहा। इन आंदोलनों को तोड़ने और उन्हें नुकसान पहुंचाने को लेकर हुई सत्ता और विपक्ष की राजनीति पर काफी चर्चा हो चुकी है। लेकिन अभी तक आंदोलन की मीमांसा उनके नेताओं और उनमें शामिल हुए लोगों की पृष्ठभूमि को लेकर नहीं हुआ है। &lt;br /&gt;चार अप्रैल को दिल्ली के जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठे अन्ना हजारे को चार दिनों में जो समर्थन मिला, उसमें ज्यादातर शहरी मध्यवर्ग था। इस तथ्य पर शायद ही किसी को एतराज हो। एनजीओ और सिविल सोसायटी के नाम पर जो लोग इस आंदोलन में कूदे वे महज 30 फीसदी भारत का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। क्योंकि 2011 की जनगणना के शुरूआती आंकड़े तो यही बताते हैं कि देश की करीब तीस फीसदी आबादी ही शहरों-छोटे नगरों या कस्बों में निवास करती है। देश की बाकी 70 फीसदी आबादी अब भी गांवों-ढाणियों में रह रही है। अन्ना के चार दिनों के अनशन को जिस तरह शहरी मध्यवर्ग का समर्थन मिला, दूर – दूर से शहरी मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले नौजवानों का हुजूम दिल्ली की ओर बढ़ने लगा तो सरकार की सांसत बढ़ गई। उसने अपने तेजतर्रार, दूसरे शब्दों में कहें तो शातिर मंत्री कपिल सिब्बल को अन्ना हजारे को मनाने में लगाया। आठ अप्रैल को जिस तरह सरकार अन्ना के सामने दंडवत करते नजर आई, उसे देश की आम जनता की जीत बताया गया। जनता की जीत तो यह थी, लेकिन जिस जनता की जीत हुई या अभी होनी बाकी है, उस जनता की पहचान होनी बाकी है। आज जो सिविल सोसायटी या एनजीओ अन्ना के साथ खड़े हैं, उनके कर्ता-धर्ता ज्यादातर शहरी मध्यवर्ग का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। &lt;br /&gt;लेकिन चार जून को रामलीला मैदान में आने वाले लोगों में से ज्यादातर की पृष्ठभूमि ग्रामीण थी। रामदेव के साथ योग भले ही शहरी मध्यवर्ग के लोग करते हैं, लेकिन उनके भगवा चोले और साधुवेश को ग्रामीण लोगों का समर्थन ज्यादा है। रामलीला मैदान में जुटी भीड़ भी ज्यादातर ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली ही थी। हम गांधी और गांव की बात तो करते हैं, हमारी सरकारें उनका पारायण तो करती हैं, लेकिन जैसे ही अपनी सत्ता की हनक दिखाने का मौका आता है, ग्रामीण लोगों पर सरकारी कहर तोड़ने में कोई भी सरकार पीछे नहीं रहती। उत्तर प्रदेश के भट्टा पारसौल में जिस तरह घरों में घुसकर पुलिस ने पुरूषों-महिलाओं और बच्चों को पीटा, क्या दिल्ली-मुंबई या फिर ऐसे ही किसी शहरी समाज में पुलिस या सरकार ऐसी हिम्मत दिखा सकती है। शहरी मध्यवर्ग की मोमबत्तियों का डर उसे ऐसा करने से रोक देता है। भारत भले ही गांवों का देश हो, ग्रामीण सभ्यता वाला देश हो, लेकिन हकीकत तो यह है कि गांव और ग्रामीण अब हाशिए पर हैं। ग्रामीण होना मौजूदा मानकों के मुताबिक सभ्यता और संस्कृति से दूर पिछड़ा होने की निशानी है। शायद यही वजह है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के सुदूर गाजीपुर में रह रहे हिंदी साहित्यकार विवेकी राय कहते हैं कि दरअसल आज की सारी लड़ाइयां शहरी हैं। गांव तो सिर्फ मुखौटा है। गांवों को मुखौटा बनाने और उन्हें असभ्यता से सभ्यता की ओर लाने वाली नीतियों की शुरूआत नेहरू सरकार के दौरान ही हो गई थी। जयप्रकाश नारायण का नेहरू से मतभेद की बड़ी वजह यह सोच भी थी। यही वजह है कि 1955-56 में नेहरू के बुलावे के बाद भी जयप्रकाश नारायण उनकी कैबिनेट में शामिल नहीं हुए। गांवों और उनकी आवाज को तब से लेकर अब तक दबाया ही जा रहा है। इस देश की नीतियां, विकास के पैमाने और सभ्यता के मानदंड शहरों को केंद्र में रखकर बनाए जाते हैं। इसका ही असर है कि गांव को अगर आठ घंटे बिजली और चलताऊ सड़क मिल गई तो मान लिया जाता है कि बहुत कुछ हो गया, लेकिन शहर में चार घंटे बिजली कटती है तो हाहाकार मच जाता है। शहरों के आंसू पोंछने के लिए राजनीति और नौकरशाही आगे रहती है, लेकिन फटेहाली में जीते गांव के लिए सिर्फ घड़ियाली आंसू बहाए जाते हैं और अगर ग्रामीण सभ्यता ने इन आंसुओं की पहचान कर ली तो उसे पुलिस और डंडे के जोर पर दबा दिया जाता है। यही वजह है कि आज देश के करीब एक चौथाई जिलों में सरकारों का कोई असर नहीं है। पुलिस, नेता और अधिकारी की तुलना में इन गांव वालों को नक्सली कहीं ज्यादा अपने और भरोसेमंद लगते हैं। &lt;br /&gt;बाबा रामदेव को अगर नक्सलियों ने भी समर्थन देने का ऐलान किया तो उसके भी संकेत साफ हैं। उन्हें पता है कि रामदेव के अनशन में शहरी मध्यवर्ग की तुलना में गांव-गिरांव के लोग कुछ ज्यादा ही शामिल थे। बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के खिलाफ जैसी कार्रवाई पुलिस और सरकार ने की, उससे इसी धारणा को बल मिलता है कि ग्रामीण सभ्यता के खिलाफ आज की पूरी व्यवस्था है। वह तो भला हो लोकतंत्र का कि पांच साल में एक बार गांव वालों की पूछ बढ़ जाती है। लेकिन वह भी कितने दिनों के लिए, सिर्फ चुनावी प्रक्रिया के पूरी होने तक ही गांव वालों की पूछ-परख रहती है। दिलचस्प बात यह है कि ग्रामीण सभ्यता को शहरी मानदंडों के मुताबिक हांकने वाली सरकारों को बनाने में सबसे ज्यादा योगदान इस ग्रामीण आबादी का ही होता है। चुनाव के दिन गांव वाले ही ज्यादा वोट डालने निकलते हैं। शहरी मध्यवर्ग तो उस दिन अपने शहरों के इंडिया गेट, गेट वे ऑफ इंडिया या गोमतीनगर में पिकनिक पर होता है। उसकी नजर में मतदान बेकार की कवायद होती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-4886251828687956878?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/CMUQMBNaon8/blog-post_08.html" title="आधुनिकताबोध और ग्रामीण सभ्यता" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/07/blog-post_08.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkcBSXg9fCp7ImA9WhdTEUw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-1266628135538335647</id><published>2011-07-08T00:26:00.000-07:00</published><updated>2011-07-08T00:27:38.664-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-07-08T00:27:38.664-07:00</app:edited><title>ग्लैमर की चाशनी के बीच गुम होते सामाजिक सवाल</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-kM52VG_uc0U/ThaxZaERObI/AAAAAAAAASU/TZJ1OmOy_EU/s1600/6SUSAIRAJ.jpg.crop_display.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 148px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-kM52VG_uc0U/ThaxZaERObI/AAAAAAAAASU/TZJ1OmOy_EU/s200/6SUSAIRAJ.jpg.crop_display.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5626879834498087346" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्रबंधन के पारंपरिक पाठ्यक्रमों में सिखाया जाता रहा है कि हर धंधे की नैतिकता होती है। प्रबंधन का पारंपरिक तरीका नहीं अब नहीं रहा, 1991 में शुरू हुए उदारीकरण ने धंधा शब्द को भी प्रोफेशन के बतौर स्थापित कर दिया है। लिहाजा प्रोफेशन की मान्यताएं भी बदल गई हैं। उदारीकरण और वैश्वीकरण की शुरूआत के दौर में इसके नफे-नुकसान को लेकर बहसों का जो दौर चल रहा था, उसमें एक सवाल प्रमुखता से उठा था। वह था प्रोफेशन की नैतिकता और सांस्कृतिक गिरावट का। जानकारों को आशंका थी कि उदारीकरण के दौर में पैसा बनाने के लिए नैतिकता और वर्जनाओं की सीमाएं टूटेंगी। जो निश्चित रूप से सामाजिक जीवन के लिए अच्छा नहीं होगा। नीरज ग्रोवर की हत्या के आरोप से छूट गई कन्नड़ अभिनेत्री मारिया सुसईराज को कलर्स चैनल के बहुप्रचारित शो बिग बॉस से ऑफर मिलने और उसके बदले में पांच करोड़ रूपए की भारी-भरकम रकम देने की खबर उदारीकरण के शुरूआती दौर की उन्हीं आशंकाओं को ही सही साबित कर रही है। चेहरे से शालीन दिखने वाले हॉरर फिल्में बनाने के लिए मशहूर राम गोपाल वर्मा भी मारिया के नाम से पैसे कमाने के लिए पीछे रहने वालों में से नहीं रहे। उन्होंने भी मारिया को लेकर फिल्म बनाने की घोषणा कर दी। यह बात और है कि मारिया के छूटने और उसे लेकर फिल्में और टीवी शो बनाने के खिलाफ लोगों के उतरने और इस दौड़ में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कूद जाने से कलर्स और रामगोपाल वर्मा की फिलहाल घिग्घी बंद है। कलर्स सफाई देते फिर रहा है कि उसने मारिया को कोई प्रस्ताव नहीं दिया। &lt;br /&gt;लेकिन कलर्स का जो अतीत रहा है और खासतौर पर बिग बॉस बनाते वक्त उसने जो लटके-झटके इस्तेमाल किए, उससे शक की गुंजाइश अब भी बनी हुई है। बिग बॉस में पहले भी उसने राहुल महाजन, मोनिका बेदी, डॉली बिंद्रा, राजा चौधरी, कमाल राशिद खान, वीना मलिक जैसी नकारात्मक छवि वाले लोगों को ही शामिल करके टीआरपी और दाम दोनों कमाए हैं। राहुल महाजन बिग बॉस में इसलिए शामिल नहीं किए गए थे कि वे भारतीय जनता पार्टी के सर्वसुलभ और सर्वस्वीकार्य नेता प्रमोद महाजन के बेटे हैं, नशाखोरी और बीवी के साथ मारपीट के चलते उनकी जो नकारात्मक शोहरत बनी, कलर्स और बिग बॉस की निर्माता कंपनी एंडमोल को उसने आकर्षित किया। मोनिका बेदी फिल्मों में तो कोई कमाल नहीं दिखा पाईं, लेकिन डॉन अब्दुल सलेम की माशूका के तौर पर उन्होंने भारत सरकार के नाक में जरूर दम कर दिया। उनकी यही कुख्याति ही कलर्स को अपने साथ जोड़ने के लिए उत्साहित किया। राजा चौधरी की भी ख्याति आए दिन पत्नी श्वेता तिवारी के साथ मारपीट करना और गली-मुहल्लों के गुंडों की तरह लड़ने-पिटने की रही है। कमाल राशिद खान की गालियां भला कौन भूल सकता है। सी ग्रेड की फिल्में बनाने वाले कमाल राशिद खान की भी नकारात्मक छवि ही रही है। पाकिस्तानी फिल्मों की बी ग्रेड की हीरोइन वीना मलिक न तो पाकिस्तानी सिनेमा की दुनिया में कुछ कर पाईं और न ही हिंदुस्तानी सिनेमा में दस्तक दे पाईं। लेकिन क्रिकेट मैचों की फिक्सिंग में अपने पूर्व प्रेमी पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी मोहम्मद आसिफ के चलते चर्चा में जरूर आ गईं। खबर तो यह भी है कि मैच फिक्सिंग में सटोरियों और आसिफ के साथ रहकर उन्होंने पैसे कमाए और जब खुलासा हुआ तो आसिफ के खिलाफ खड़ी हो गईं। डाली बिंद्रा की गालियों को भला कौन भूल सकता है। अस्मित पटेल के बारे में कम ही लोग जानते हैं कि उनके दादा रजनी पटेल समाजवादी आंदोलन की मशहूर हस्ती थे। लेकिन बिग बॉस के पिछले सीजन में उन्होंने कैमरे के सामने वीना मलिक से साथ जो किया, उससे स्वर्ग में बैठी उनके दादा की आत्मा जरूर सोच में पड़ गई होगी। बिग बॉस में इतनी नकारात्मक छवियों वाले लोगों को शामिल किया जा चुका है कि मारिया सुसईराज को भी कलर्स से ऑफर मिलने पर लोगों को हैरत नहीं हुई। लेकिन यह पहला मौका है, जब फिल्म और टीवी शो के धंधे की नैतिकता पर सवाल उठाया गया। निश्चित तौर पर इसकी शुरूआत फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने की। उनके साथ उस नीरज ग्रोवर के दोस्त भी शामिल हुए, जिसकी हत्या करके उसकी लाश को तीन सौ टुकड़ों में करके जलाने और फेंकने और इस दौरान मस्ती से शॉपिंग करने का मारिया सुसईराज पर आरोप हैं। अब मारिया सफाई दे रही है कि लाश को तीन सौ टुकड़ों में नहीं काटा गया था। ऐसी सफाई के जरिए वह जाहिर करे कि वह निर्दोष है, लेकिन यह कहते वक्त भी उसकी नैतिकता आड़े नहीं आती। मानो नीरज ग्रोवर कोई बकरा या मुर्गा था, जिसे तीन सौ या तीन टुकड़े में काटकर खाने वाले शौकीनों को बेचना था। &lt;br /&gt;लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मारिया जैसे लोगों को ऐसी शोहरत और पैसे देकर ग्लैमराइज किया जाना चाहिए। क्या इंसानी जान की कीमत कुछ नहीं होती। क्या समाज में अच्छे लोगों की कमी हो गई है कि मारिया या मोनिका बेदी जैसों पर ही भरोसा किया जा सकता है। सवाल तो यह भी है कि क्या टीवी शो और फिल्में बनाने वाले लोगों के घरों में मारिया जैसे चरित्र पैदा होंगे तो वे उन्हें समाज के सामने इसी तरह पेश करेंगे। क्या समाज में नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं है। क्या ऐसे ही लोगों के जरिए पैसे कमाए जाएंगे। मारिया, मोनिका या ऐसी ही हस्तियों को अगर महिमामंडित किया जाएगा तो क्या गारंटी है कि कई दूसरे लोगों को ऐसे कदम उठाकर शोहरत हासिल करने की प्रेरणा नहीं मिलेगी। &lt;br /&gt;मारिया को हीरोइन बनाने में हमारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भी कम हाथ नहीं है। मारिया की रिहाई की खबर को ग्लैमराइज तरीके से पेश किया गया। खबरों के बारे में आम धारणा है कि उन्हें निरपेक्ष तरीके से पेश किया जाना चाहिए। लेकिन जब कोई लिज हर्ले किसी शेन वार्न के साथ खुलेआम चुंबन लेती है या कोई मोनिका वेदी और मारिया सुसईराज जैसे गंभीर आरोपी जेल से छूटते हैं, कैमरे उनके पीछे भागते कैमरे निरपेक्ष रवैया अख्तियार नहीं कर पाते। ऐसी घटनाओं को वे ग्लैमर की चाशनी में पेश करते हैं। सवाल यह है कि यही कैमरे किसी पप्पू यादव, किसी शहाबुद्दीन या किसी मुख्तार अंसारी को कवर करते वक्त ग्लैमराइज तो नहीं होते। उन्हें राजनीति में तो तमाम बुराइयां नजर आती हैं, उसे लेकर घंटों हायतौबा भी मचाने में पीछे नहीं रहते। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब कोई मारिया या मोनिका रिहा होती है तो कैमरों की भाषा क्यों बदल जाती है। इस सवाल का जवाब ढूंढे़ बिना समाज में लगातार आ रही इस गिरावट और नकारात्मक शोहरत वाले लोगों को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लग सकेगी। &lt;br /&gt;मारिया को लेकर नीरज ग्रोवर के मुट्ठीभर दोस्तों ने जैसे ही सवाल उठाए, उनके पीछे समाज का एक तबका तो खड़ा नजर आ ही रहा है। अशोक पंडित और नीरज ग्रोवर के दोस्तों के साथ रजा मुराद और टीवी-फिल्म की दूसरी हस्तियों का उठ खड़ा होना दरअसल समाज के उस गुस्से की ही अभिव्यक्ति है, जो नकारात्मक छवियों वाले लोगों को ग्लैमर की चाशनी में पेश करने को लेकर जमा हो रही थी। संभवत: यह पहला मौका है, जब किसी नकारात्मक छवि के खिलाफ समाज का एक तबका उठ खडा़ हुआ है। अब देखना यह है कि ऐसी हस्तियों से निबटने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कब कदम उठाता है। लेकिन मारिया पर उठते सवालों से एक चीज तो तय है कि ऐसी नकारात्मक छवियों को ग्लैमर की चाशनी में पकाने की कोशिशों पर लगाम लगाने से पहले लोगों को सोचना पड़ेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-1266628135538335647?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/tdkPxY4d02E/blog-post.html" title="ग्लैमर की चाशनी के बीच गुम होते सामाजिक सवाल" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/-kM52VG_uc0U/ThaxZaERObI/AAAAAAAAASU/TZJ1OmOy_EU/s72-c/6SUSAIRAJ.jpg.crop_display.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/07/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0UMRX88eSp7ImA9WhZaFUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-4875986918657313719</id><published>2011-07-02T00:13:00.000-07:00</published><updated>2011-07-02T00:21:24.171-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-07-02T00:21:24.171-07:00</app:edited><title>गेहूं की राजनीति पर सवार शिवराज सरकार</title><content type="html">&lt;strong&gt;विदुर सरकार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने दक्षिणी राज्यों और छत्तीसगढ़ की तर्ज पर 2013 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए चुनावी बिसात बिछाना शुरू कर दिया है और लोक लुभावने निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जिससे की उनकी सरकार पार्टी के जनाधार को व्यापक तरिके से भी बढ़ा सके। इसी क्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अभी पिछले ही सप्ताह प्रधानमंत्री से मुलाकात कर प्रदेश में रिकार्ड गेहूं की पैदावार से उत्पन्न भण्डारण की समस्या से अवगत कराया और साथ ही पर्याप्त गोदाम न होने के कारण ज्यादातर गेहूं खुले में पड़ा है, जिससे उसके खराब होने की सम्भावना को देखते हुये आग्रह किया कि केन्द्र सरकार गेहूं का प्रदेश को एक साल का अग्रिम आवंटन कर दे जिससे कि भण्डारण की समस्या हल भी हो जाएगी और राज्य सरकार गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को तीन रूपये किलो की दर से अनाज बांटेगी। इससे अनाज का भी सही उपयोग हो जायेगा और साथ ही जरूरतमंदों को भी सस्ते दाम पर अनाज मिल जाएगा। इस समय लगभग 18 लाख मीट्रिक टन गेहूं खुले में रखा है जिससे सुरक्षित भण्डारण की आवश्यकता है।&lt;br /&gt;अव्वल तो यह सम्भव नहीं है कि केन्द्र सरकार एक साल का अग्रिम आवंटन राज्य सरकार को कर दे और अगर कर भी देती है तो शिवराज सिंह चौहान 18 लाख मीट्रिक टन गेहूं को गरीबों में 3 रूपये किलो की दर से बांट देते हैं तो जाहिर है कि उसका राजनीतिक फायदा उन्हें जरूर मिलेगा। क्योंकि कमर तोड़ महंगाई से जूझ रहे लोग राज्य सरकार के इस कदम से जरूर कृतार्थ होंगे। जो बाद में वोटो में भी तब्दील हो सकते है। कुछ इसी तरह का फायदा छत्तीसगढ़ और दक्षिणी राज्यों ने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को एक रू किलो की दर से चावल बांटकर उठा चुके हैं।  &lt;br /&gt;उपर से देखने पर 3 रू प्रति किलो का गेहूं गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों को बांटने से राजनैतिक लाभ तो दिख रहा है। लेकिन इसके आर्थिक पक्ष को बारीकी से अध्ययन करे तो पायेंगे कि पूरा का पूरा मुददा हवा-हवाई है। क्योंकि इस योजना को हकीकत में लाते ही राज्य सरकार की अर्थव्यवस्था ढगमगाना तय है और मध्यप्रदेश सरकार की आज की आर्थिक स्थिति को देखते हुए ऐसा हो पाना असंभव है। &lt;br /&gt;वैसे मुख्यमंत्री के अनुसार लगभग 18 लाख मीट्रिक टन गेहूं खुले में पड़ा है। जिससे सुरक्षित भण्डारण की आवश्यकता है। अगर हम मान लें कि केन्द्र सरकार 18 लाख मीट्रिक टन गेहूं को प्रदेश को साल भर कर अग्रिम आबंटन कर देती है तो और गेहूं के समर्थन मूल्य 11 रू की दर भी तय की जाए तो राज्य सरकार प्रति किलो 8 रू की सब्सिडी देगी। 8 रू प्रति किलो के हिसाव से राज्य सरकार पर केवल गेहूं की सब्सिडी का लगभग 14500 करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ेगा। जिसे सरकार को अपनी ही वार्षिक योजना से लेना होगा। यह भार गैर योजना मद में होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि राज्य सरकार अपनी 2011-12 की कुल वार्षिक योजना जो 23000 करोड़ रूपए की है, उसमें गैर योजना गत राशि के तौर पर 14500 करोड़ रूपए लेकर खर्च कर पाना कितना सम्भव हो पाएगा। और अगर राज्य सरकार ऐसा कर भी पाती है तो तो क्या अन्य कल्याणकारी क्षेत्रों जैसे शिक्षा , स्वास्थ्य, ऊर्जा, कृषि, उद्य़ोग  आदि पर उलटा असर नही पड़ेगा। अव्वल तो ऐसा करना प्रदेश के वित्तीय प्रबंधन के लिहाज से ठीक नहीं होगा और व्यवहारिक रूप से भी यह सम्मभव नहीं है। तो क्या मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गेहूं के मुददे पर राजनीति कर रहे हैं और केन्द्र सरकार से ऐसी मांग कर रहे है। जिसे अगर केन्द्र सरकार नहीं मानती तो गेहूं का सड़ना और गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों को पर्याप्त मात्रा में गेहूं सस्ते दामों में न उपलबध कराने का ठीकरा भी केन्द्र सरकार पर मढ़ दिया जाएगा। अगर केन्द्र सरकार खुदा न खास्ता खुले में पड़े गेहूं को राज्य सरकार को एक साल का अग्रिम आवंटन करने को राजी हो जाती है तो मुख्यमंत्री को गेहूं को समर्थन मूल्य पर लेकर गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों में 3 रूपये प्रति किलो के हिसाब से बांटना राज्य सरकार के लिए गले की हड्डी बन सकता है। विकास के मूलमंत्र पर दोबारा सत्ता पर आसीन शिवराज अब तीसरी पारी के लिए अभी से राजनीतिक बिसात बिछा रहे हैं पर उनको शायद यह नहीं पता कि कभी-कभी ऐसे कदम उल्टे भी हो जाते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-4875986918657313719?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/GABnj7_fWgQ/3.html" title="गेहूं की राजनीति पर सवार शिवराज सरकार" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/07/3.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEUCQn8zfSp7ImA9WhZbEU8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-4877675687653433578</id><published>2011-06-15T00:16:00.000-07:00</published><updated>2011-06-15T00:17:43.185-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-06-15T00:17:43.185-07:00</app:edited><title>नया नहीं है राजनीति से संन्यासियों का रिश्ता</title><content type="html">&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हिंदी साहित्य के मध्यकाल में कृष्णभक्त कवियों की एक धारा रही, जिन्हें&lt;br /&gt;अष्टछाप के नाम से जाना जाता है। इसी अष्टछाप के आठ कवियों में एक कवि&lt;br /&gt;कुंभनदास भी थे। एक बार बादशाह अकबर के बुलावे पर उन्हें मुगल सल्तनत की&lt;br /&gt;तब की राजधानी फतेहपुर सीकरी जाना पड़ा था। मजबूरी में राजधानी की यात्रा&lt;br /&gt;के बाद उनकी व्यथा कुछ यूं फूटी थी  –&lt;br /&gt;संतन को कहा सीकरी सों काम ?&lt;br /&gt;आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरि नाम ।।&lt;br /&gt;संभवत: तभी से हिंदीभाषी इलाकों में एक मुहावरा ही चल पड़ा – संतन को कहा&lt;br /&gt;सीकरी सों काम। जब भी संत-सन्यासी और साधु राजनीति और देशनीति के सवालों&lt;br /&gt;से जूझने की कोशिश करने लगते हैं, कुंभनदास की ये पंक्तियां प्रबुद्ध&lt;br /&gt;हिंदी समाज के साथ ही भारतीय राजनीति के पुरोधा उछालने लगते हैं। काले धन&lt;br /&gt;की देशवापसी और उसके लिए योगगुरू रामदेव के अनशन को लेकर एक बार फिर यही&lt;br /&gt;सवाल उछाला जा रहा है। बिहार की राजनीति से अप्रासंगिकता की हद तक किनारे&lt;br /&gt;हो चुके लालू यादव हों या कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय&lt;br /&gt;सिंह या फिर कपिल सिब्बल, योगगुरू रामदेव पर हमला करते वक्त सबका यही&lt;br /&gt;कहना है कि उनका काम योग सिखाना है, राजनीति करना नहीं। भारतीय जनता&lt;br /&gt;पार्टी की राजनीति में जब साधु-संतों का प्रवेश बढ़ा था, तब भी यही सवाल&lt;br /&gt;उठाया गया था। एक वामपंथी सांस्कृतिक संगठन की कर्ता-धर्ता को बाबाओं में&lt;br /&gt;सिर्फ गुंडे और मवाली ही नजर आ रहे हैं।&lt;br /&gt;लेकिन यह हकीकत नहीं है। कुंभनदास को सीकरी जाना भले ही पसंद नहीं था।&lt;br /&gt;लेकिन यह भी सच है कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ पहला विद्रोह संन्यासियों&lt;br /&gt;ने ही किया था। 1773 से तीस बरसों तक यह संघर्ष इतना तेज बढ़ा कि उसकी&lt;br /&gt;अनुगूंज आज भी बंगाल के समाज में देखी-समझी जा सकती है। दरअसल 1757 में&lt;br /&gt;प्लासी युद्ध में सिराजुद्दौला को हराने के बाद बंगाल के शासन पर काबिज&lt;br /&gt;हुए अंग्रेजों के जुल्मों ने किसानों और कारीगरों की कमर तोड़ दी।&lt;br /&gt;रही-सही कसर 1769 के अकाल ने पूरी कर दी। कहा जाता है कि उस अकाल में&lt;br /&gt;करीब तीन करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हुए। अकाल की विभीषिका इतनी त्रासद&lt;br /&gt;थी कि उसका जिक्र और अंग्रेजी दमन और शोषण की कहानी बताते हुए एडमंड बर्क&lt;br /&gt;हाउस ऑफ लॉर्ड्स में बेहोश हो गए। उस वक्त भी लोगों में इस शोषण के खिलाफ&lt;br /&gt;गुस्सा तो था, लेकिन हथियार उठाने से लोग हिचक रहे थे। ऐसे में दशनामी&lt;br /&gt;संप्रदाय के साधुओं ने अंग्रेजों और उनके पिट्ठू जमींदारों के खिलाफ&lt;br /&gt;हथियार उठा लिया। तकरीबन तीन दशकों तक चले इस युद्ध में साधनहीन&lt;br /&gt;सन्यासियों की ही पराजय हुई। लेकिन उत्तरी बंगाल से लेकर बिहार तक में इन&lt;br /&gt;देशभक्त संन्यासियों की दिलेरी और देशभक्ति ने लोगों का दिल जीत लिया। आज&lt;br /&gt;जिस वंदेमातरम को हम गाते हैं, वह इसी सन्यासी विद्रोह पर आधारित&lt;br /&gt;बंकिमचंद्र चटर्जी की अमरकृति आनंदमठ का एक अंश है। दिलचस्प बात यह है कि&lt;br /&gt;सन्यासी विद्रोह की ज्यादा जानकारी इतिहास में नहीं मिलती है। लेकिन&lt;br /&gt;बंगाल के लोकजीवन में यह विद्रोह किंवदंतियों के तौर पर आज भी जिंदा है।&lt;br /&gt;यह सच है कि इतिहास की पुस्तकों में इस विद्रोह की ज्यादा जानकारी नहीं&lt;br /&gt;मिलती। प्रसन्न कुमार चौधरी और श्रीकांत की पुस्तक 1857 - बिहार-झारखंड&lt;br /&gt;में महायुद्ध में इस विद्रोह का जिक्र है। चौधरी के मुताबिक इन&lt;br /&gt;विद्रोहियों की संख्या एक दौर में 50 हजार तक जा पहुंची थी।&lt;br /&gt;आजादी के आंदोलन में स्वामी श्रद्धानंद और राहुल सांकृत्यायन की भूमिका&lt;br /&gt;को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है। आजादी के आंदोलन में किसानों को&lt;br /&gt;संगठित करने और अंग्रेजी शासन के खिलाफ उनके विद्रोह की अगुआई करने वाले&lt;br /&gt;स्वामी श्रद्धानंद भी संन्यासी ही थे। आजमगढ़ के केदार पांडे संन्यासी&lt;br /&gt;होकर बिहार के सीवान जिले के मैरवा मठ पर राहुल सांकृत्यायन के नाम से&lt;br /&gt;बतौर संन्यासी विराजमान थे। अगर वे चाहते तो संन्यासी के तौर पर मलाई&lt;br /&gt;खाते हुए वहां जिंदगी गुजार देते, लेकिन छपरा में जमींदारों और अंग्रेज&lt;br /&gt;हुकूमत का किसानों के खिलाफ जोर-जुल्म उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ और किसानों&lt;br /&gt;के आंदोलन की अगुआई करने की उन्होंने ठान ली। इस आंदोलन में जमींदारों के&lt;br /&gt;गुर्गों ने उनकी जमकर पिटाई की। इस दौरान उनका सिर तक फट गया। भारतीय&lt;br /&gt;स्वतंत्रता आंदोलन के इस हालिया इतिहास में संन्यासियों के इस आंदोलन को&lt;br /&gt;नकार पाना मुश्किल है।&lt;br /&gt;भारत में राजनीति में संन्यासियों की सक्रियता नई बात नहीं है।&lt;br /&gt;पाटलिपुत्र के महान मौर्यवंश की स्थापना भी चाणक्य ने की थी और वे भी एक&lt;br /&gt;तरह से सन्यासी ही थे। यह सच है कि मौर्य वंश के शासक चंद्रगुप्त मौर्य&lt;br /&gt;थे। लेकिन इतिहास भी मानता है कि चाणक्य का बौद्धिक कौशल नहीं होता तो&lt;br /&gt;चंद्रगुप्त मौर्य न तो नंद वंश का नाश कर पाते और न ही पाटलिपुत्र में&lt;br /&gt;मौर्यवंश की स्थापना कर पाते। अर्थनीति और राजनीति के धुरंधर विद्वान के&lt;br /&gt;तौर पर स्थापित चाणक्य को भारतीय इतिहास का चमकता सितारा मानने से उन&lt;br /&gt;लोगों को भी शायद ही एतराज होगा, जिन्हें संन्यासी होते हुए रामदेव के&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से परेशानी हो रही है। मुगलों से विद्रोह करके&lt;br /&gt;शिवाजी महाराज ने जिस मराठा साम्राज्य की नींव डाली थी, उसकी कल्पना&lt;br /&gt;समर्थ गुरू रामदास के बिना की ही नहीं जा सकती। समर्थ गुरू रामदास ही वह&lt;br /&gt;शख्सियत थे, जिनसे प्रेरणा लेकर शिवाजी ने औरंगजेब की सेनाओं के खिलाफ&lt;br /&gt;गोलकुंडा की पहाड़ियों से छापामार युद्ध जारी रखा और मराठा राज्य की&lt;br /&gt;मजबूत नींव रखने में सफल हुए। ये तो चंद बानगी है। भारतीय इतिहास में ऐसे&lt;br /&gt;ढेरों पन्ने मिल जाएंगे, जिनमें संन्यासियों ने सामाजिक हित के लिए खुद&lt;br /&gt;को कुर्बान कर दिया।&lt;br /&gt;सच तो यह है कि राजनीति की दुनिया सदा से कालिख से भरी रही है। डॉक्टर&lt;br /&gt;राममनोहर लोहिया राजनीति की इस कालिख को माला पहनाने वाली कौम के तौर पर&lt;br /&gt;देखते थे। शायद यही वजह है कि कुंभनदास जैसे कवि राजधानी आने से बचना&lt;br /&gt;चाहते थे। कुंभन की पीड़ा ही है कि अपनी कविता में वे कहते हैं - जिनको&lt;br /&gt;मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परी सलाम। कुंभनदास तो जिनका मुंह नहीं&lt;br /&gt;देखना चाहिए, उन्हें सलाम करने को बाध्य हुए। लेकिन क्रांतिकारी संन्यासी&lt;br /&gt;उन लोगों को सलाम नहीं करना चाहता। शायद यही प्रवृत्ति आज के राजनेताओं&lt;br /&gt;को खलती है। शायद यही वजह है कि राजनीति में संन्यासियों का कूदना उन्हें&lt;br /&gt;पसंद नहीं आता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-4877675687653433578?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
&lt;p&gt;&lt;a href="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/K3C_nMOnv_994ayesdh7vovkb8A/0/da"&gt;&lt;img src="http://feedads.g.doubleclick.net/~a/K3C_nMOnv_994ayesdh7vovkb8A/0/di" border="0" ismap="true"&gt;&lt;/img&gt;&lt;/a&gt;&lt;br/&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/JqC9WixcMVg/blog-post_15.html" title="नया नहीं है राजनीति से संन्यासियों का रिश्ता" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/06/blog-post_15.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEANSHw4fip7ImA9WhZUF0o.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-7678124321849830223</id><published>2011-06-11T00:18:00.000-07:00</published><updated>2011-06-11T00:19:59.236-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-06-11T00:19:59.236-07:00</app:edited><title>उमा की वापसी के मायने</title><content type="html">&lt;strong&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उ&lt;/strong&gt;मा भारती की भारतीय जनता पार्टी में वापसी के वक्त जिस उत्साह की उम्मीद की जा रही थी, दिल्ली के पार्टी मुख्यालय में वैसा तो कुछ नजर नहीं आया। लेकिन जिस उत्तर प्रदेश की कमान उन्हें सौंपी गई है, वहां से उनके खिलाफ पहला बयान जरूर आ गया। पार्टी उपाध्यक्ष और कभी भारतीय जनता पार्टी के बजरंगी चेहरा रहे विनय कटियार ने उनका वैसा स्वागत नहीं किया, जैसी सदाशयता और उत्साही प्रतिक्रिया शिवराज सिंह चौहान ने दी। बारहवीं और तेरहवीं विनय कटियार की तरफ से ठंडी प्रतिक्रिया के अपने खास अर्थ हैं। जिन्होंने तेरहवीं और बारहवीं लोकसभा का नजारा देखा है, उन्हें पता है कि भारतीय जनता पार्टी की तब की हल्ला ब्रिगेड को संसदीय कार्य मंत्री मदन लाल खुराना या बाद में प्रमोद महाजन तक चुप कराने का अपना संवैधानिक और पार्टीगत दायित्व नहीं निभा पाते थे, उस हल्ला ब्रिगेड को उमा भारती अपने एक इशारे से चुप करा देती थीं। मध्य प्रदेश से सांसद प्रह्लाद पटेल, राजस्थान से सांसद श्रीचंद कृपलानी और उत्तर प्रदेश से विनय कटियार भारतीय जनता पार्टी की हल्ला ब्रिगेड के प्रमुख सदस्य थे और कांग्रेसी आरोपों का तुर्शी-बतुर्शी जवाब देने में माहिर थे। उसी ब्रिगेड के सदस्य विनय कटियार को अगर उमा भारती की पार्टी में वापसी सहजता से स्वीकार्य नहीं है तो सवाल उठेंगे ही। हालांकि विनय कटियार ने अगले ही दिन अपना बयान बदलने में देर नहीं लगाई।  उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीसरे स्थान पर खिसक चुकी भारतीय जनता पार्टी को पहले स्थान पर लाने की नितिन गडकरी की कोशिशों के बीच विनय कटियार की ठंडी और व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया से साफ है उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की राह आसान नहीं है। &lt;br /&gt;उमा भारती की वापसी के दौरान यूं तो गडकरी के अलावा दूसरे कोई बड़े नेता मौजूद नहीं थे, सिवा शाहनवाज हुसैन के। 10 नवंबर 2004 को भारतीय जनता पार्टी की उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक में आडवाणी को खरीखोटी सुनाने के बाद जब उमा भारती बाहर निकलीं थीं तो उस वक्त मौजूद भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता हक्के-बक्के रह गए थे। लेकिन किसी ने उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं दिखाई थी। उस वक्त उन्हें शांत करते हुए उन्हें रोकने की कोशिश सिर्फ और सिर्फ राजनाथ सिंह ने की थी। उमा की वापसी के दौरान पार्टी मुख्यालय मंक राजनाथ सिंह की गैरमौजूदगी इसीलिए खलती रही। शाहनवाज हुसैन की मौजूदगी की वजह यह है कि भारतीय जनता युवा मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते उमा भारती ने शाहनवाज को अपनी कार्यसमिति में शामिल किया था। हालांकि शाहनवाज इससे बहुत आगे निकल चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी में उनकी हैसियत बदल चुकी है। लेकिन उमा की वापसी के वक्त पार्टी मुख्यालय में मौजूद रहकर उन्होंने सदाशयता का ही परिचय दिया है। &lt;br /&gt;2008 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले भारतीय जनता पार्टी और उमा भारती के कुछ शुभचिंतकों ने उमा भारती को पार्टी में लौट जाने का सुझाव दिया था। उन शुभचिंतकों की सलाह थी कि उमा जैसी नेता भारतीय जनता पार्टी के पास नहीं है और उमा के पास भारतीय जनता पार्टी जैसा संगठन नहीं है। उमा के लिए मजबूत संगठन बनाना आसान नहीं था तो पार्टी के लिए उमा जैसा नेता मिलना कठिन था। ऐसे में दोनों एक-दूसरे के पूरक बन सकते थे। लेकिन उमा को लगता था कि 2003 के जिस प्रचंड जनादेश के सहारे उन्होंने मध्यप्रदेश में दस साल के दिग्विजयी शासन को उखाड़ फेंका था, उसमें सिर्फ और सिर्फ उनका ही योगदान था। उमा जैसी नेता यह भूल गईं कि कैडर आधारित पार्टियों में कार्यकर्ता अपने नेता के साथ सहानुभूति तो रख सकते हैं, उसका आदर भी कर सकते हैं। लेकिन वोट डालने का मौका आते ही वे पार्टी की डोर छोड़ने में हिचकते हैं। जाहिर है कि उमा का अपने संगठन और अपनी जनप्रियता से मोहभंग हुआ। कैडर आधारित पार्टियों के साथ एक और मजबूरी होती है कि वहां के नेता के लिए अपनी पार्टी से अलग ताकत हासिल कर पाना आसान नहीं होता। यह सिद्धांत सिर्फ भारतीय जनता पार्टी पर ही लागू नहीं होता, उसकी धुर विरोधी वामपंथी पार्टियों के लिए भी यही सच है। एक दौर में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में सैफुद्दीन चौधरी की तूती बोलती थी, लेकिन सीपीएम से अलग होने के बाद उनकी कोई पहचान नहीं है। जबकि उन्होंने भी अपनी अलग पार्टी बनाई और पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टियों का विकल्प बनने की कोशिश भी की। और तो और उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सियासत भी इसका उदाहरण है। अगर इस सियासत का थोड़ा-बहुत कोई अपवाद है तो वे हैं झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी। भारतीय जनता पार्टी से अलग होने के बाद भी वे कम से कम अपना राजनीतिक वजूद बचाए रखने में कामयाब हैं। &lt;br /&gt;रही बात उत्तर प्रदेश में उमा भारती के आने के बाद बदलते चुनावी समीकरणों की तो उसे लेकर अंकगणितीय फार्मूला देना आसान नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में सरकार चला चुकी भारतीय जनता पार्टी की हालत यह है कि वह तीसरे नंबर पर खिसक गई है। पिछले दो-तीन चुनावों से माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के मतदाता मजबूत नेतृत्व के अभाव में उससे दूर भागते जा रहे हैं। 1991 में जब पहली बार कल्याण सिंह की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत मिला था तो उसमें पिछड़े वर्ग के वोटरों का बड़ा योगदान था। ब्राह्मण और बनिया की पार्टी मानी जाती रही भारतीय जनता पार्टी को पूर्वी उत्तर प्रदेश में जहां चौहान यानी नोनिया, कोइरी, कुर्मी और राजभर जातियों का भरपूर सहयोग मिला था। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसे लोध राजपूतों का एकमुश्त समर्थन मिला था। पूर्वी उत्तर प्रदेश से पार्टी के पास ओमप्रकाश सिंह जैसा पिछड़ा नेतृत्व था। लेकिन पार्टी की गुटबाजी में ओमप्रकाश सिंह किनारे लगा दिए गए। 1999 के लोकसभा चुनावों में कल्याण सिंह की बेरूखी ने लोध राजपूतों को भारतीय जनता पार्टी से अलग कर दिया, जिसकी वजह से पार्टी 23 लोकसभा सीटें हार गईं। उमा भारती भी उसी लोध राजपूत समुदाय से आती हैं और माना जा रहा है कि कल्याण सिंह की नाराजगी की वजह से जो लोध वोट बैंक भारतीय जनता पार्टी से दूर चला गया था, उसे वापस खींचने में मदद मिलेगी। लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में जिस तरह भारतीय समाज पार्टी ने अपना दबदबा बनाया है, उसमें नोनिया और राजभर जातियों के वोट वापस भारतीय जनता पार्टी की तरफ मोड़ना आसान नहीं होगा। इसके लिए उमा भारती को कोशिश करनी होगी। हालांकि उनकी कोशिशों का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक उत्साही और मजबूत की नेतृत्व की कमी से जूझ रही उत्तर प्रदेश इकाई के भारतीय जनता पार्टी के सभी प्रमुख नेता उमा भारती का सहयोग करें। वैसे दो-तीन चुनावों से उत्तर प्रदेश से भारतीय जनता पार्टी के मतदाताओं के मोहभंग की वजह राज्य में दमदार नेतृत्व की कमी भी रही। भारतीय जनता पार्टी का आलाकमान कलराज मिश्र और लालजी टंडन पर चाहे जितना भरोसा करे, लेकिन उनकी राजनीतिक हनक वैसी नहीं है, जैसी जनता नेतृत्व से उम्मीद करती है। चूंकि उमा राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र और लालजी टंडन की तुलना में जवान हैं, घोटाले और भ्रष्टाचार के खुलासों के दौर में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप नहीं हैं, फिर उनका अतीत फायर ब्रांड नेता का रहा है। ऐसे में पार्टी के लिए उनसे उम्मीदें बांधना गैरमौजूं भी नहीं है। &lt;br /&gt;उमा के उत्तर प्रदेश की चुनावी कमान संभालने के बाद अगर किसी पार्टी की परेशानी बढ़ सकती है तो वह कांग्रेस हो सकती है। क्योंकि ऐसा माना जा रहा था कि ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस की तरफ झुक रहा है। लेकिन हकीकत तो यही है कि भ्रष्टाचार, महंगाई और बाबा रामदेव से निबटने के तरीकों को लेकर ब्राह्णण मतदाता कांग्रेस से नाराज नजर आ रहा है। पिछले दो चुनावों से अगर वह कभी कांग्रेस और कभी बहुजन समाज पार्टी की तरफ तैरता रहा है तो इसकी बड़ी वजह भारतीय जनता पार्टी के पास राज्य में मजबूत नेतृत्व का अभाव रहा है। चूंकि उमा दमदार रहीं हैं, लिहाजा भारतीय जनता पार्टी का पारंपरिक मतदाता उन पर भरोसा कर सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/fph4GbnSaBE/blog-post_11.html" title="उमा की वापसी के मायने" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/06/blog-post_11.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CUICQnczfSp7ImA9WhZVGUw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-3863201836036353949</id><published>2011-06-01T00:31:00.000-07:00</published><updated>2011-06-01T00:32:43.985-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-06-01T00:32:43.985-07:00</app:edited><title>कैसे विश्वस्तरीय बनें देसी विश्वविश्वविद्यालय</title><content type="html">&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेसी हलके में जयराम रमेश की ख्याति एक ऐसे राजनता के तौर पर है, जो अपनी बात खुलकर रखता है। जैतापुर में परमाणु परियोजना लगाए जाने को लेकर लोगों के विरोध का समर्थन हो या फिर मुंबई की आदर्श सोसायटी को गिराने की मंशा जाहिर करना हो या फिर लवासा के प्रोजेक्ट को लेकर खुला बयान हो, जयराम अपनी बात खुलकर रखते रहे हैं। इसके लिए कई बार कांग्रेसी राजनीति में उनकी तरफ भौंहें तनती रही हैं, कई बार केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य भी उनसे परेशान नजर आते रहे हैं। जयराम रमेश की मुखरता ने एक बार अपना कमाल दिखाया है। उन्होंने यह कहकर नई बहस को ही जन्म दे दिया है कि देश में विश्व स्तरीय छात्र तो हैं, लेकिन विश्वस्तरीय फैकल्टी नहीं है। मजे की बात है कि हमेशा की तरह उनके बयानों से अलग रहने वाली कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर इस बयान से खुद को अलग कर दिया है। विरोध के सुर विपक्षी भारतीय जनता पार्टी से लेकर उदारीकरण के दौर में करोड़ों-लाखों का पैकेज दिलवाते रहे आईआईएम और आईआईटी के प्रोफेसरों की तरफ से भी उठे हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि देश में शिक्षा के बदलाव के लिए कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे संस्थानों के हिमायती मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल जयराम रमेश के समर्थन में पहले उतर आए और जब ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का दबाव पड़ा तो जयराम रमेश के विरोध में उतर आए। बहरहाल समर्थन में उतरे कपिल सिब्बल का कहना था  कि रमेश की बात इसलिए ठीक है कि अगर सचमुच विश्वस्तरीय फैकल्टी होती तो दुनिया के टॉप 100-150 विश्वविद्यालयों में भारत के भी किसी विश्वविद्यालय और संस्थान का नाम होता। &lt;br /&gt;जयराम रमेश के बयान और कपिल सिब्बल के बयानों की तासीर और अहमियत में फर्क है। जयराम रमेश की ख्याति बयानबाज राजनेता की है। हालांकि उनकी संजीदगी पर भी सवाल नहीं उठाए जा सकते। लेकिन कपिल सिब्बल का उनके समर्थन में उतरने का अपना महत्व भी है और उस पर सवाल भी है। अगर कपिल सिब्बल को लगता है कि देश में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय नहीं हैं तो सबसे बड़ा सवाल तो यही उठता है कि आखिर इसके लिए वे क्या कर रहे हैं। यह जानते हुए भी कि निजी शैक्षिक संस्थान सिर्फ शिक्षा की दुकानें बनते जा रहे हैं, वे इनके समर्थन में क्यों खड़े हैं। यह सच है कि डीम्ड विश्वविद्यालयों की खेप अर्जुन सिंह ने बढ़ाई। आनन-फानन में उन्हें मान्यता दे दी गई। कुकुरमुत्तों की तरफ खुलते इन विश्वविद्यालयों में शिक्षा का क्या हाल है, दिल्ली की सीमा से सटे फरीदाबाद में स्थित दो डीम्ड विश्वविद्यालयों के छात्रों और अध्यापकों से निष्पक्ष और औचक बातचीत से ही जाना जा सकता है। मानव संसाधन विकास मंत्री बनते ही कपिल सिब्बल ने जिस तरह इन विश्वविद्यालयों पर लगाम लगाने की कोशिशें शुरू की, उससे लगा कि वे देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को सुधारना चाहते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि यह कवायद उनकी सिर्फ हनक बढ़ाने की कवायद ही साबित हुई। डीम्ड विश्वविद्यालयों में छात्रों से वसूली का खेल जारी है। जब राजधानी दिल्ली के नजदीक मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नाक के नीचे स्थित विश्वविद्यालयों का यह हाल है और मंत्रालय कुछ करने में खुद को नाकाम पा रहा है तो देश के दूर-दराज के इलाकों के डीम्ड विश्वविद्यालयों की हालत क्या होगी, इसका अंदाजा लगाना आसान है।&lt;br /&gt;रही बात विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत आज अपनी जीडीपी का करीब चार प्रतिशत शिक्षा पर खर्च कर रहा है। उसका भी सिर्फ दसवां हिस्सा यानी दशमलव 4 प्रतिशत ही उच्च शिक्षा पर खर्च किया जाता है। जबकि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में उच्च शिक्षा पर खर्च जीडीपी के एक से लेकर सवा फीसदी तक है। दूसरी बात यह है कि विकसित देशों में, जहां के विश्वविद्यालय आज के मानकों के मुताबिक विश्वस्तरीयता के उपरी पायदान पर हैं, वहां कम से कम शैक्षिक संस्थान संकीर्ण राजनीति के दायरे से बाहर हैं। वहां के विश्वविद्यालयों में नियुक्ति की योग्यता राजनीतिक प्रतिबद्धता और संपर्क नहीं है, बल्कि ज्ञान है। लेकिन क्या ऐसी स्थिति भारतीय विश्वविद्यालयों में है। बेहतर माने जाने वाले दिल्ली के ही जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में नियुक्ति के लिए एक खास तरह की विचारधारा वाला होना जरूरी है। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय में तो ऐरू-गैरू नत्थू-खैरू तक राजनीति और तिकड़म के बल पर नियुक्ति पा जाते हैं। विकसित देशों में विश्वविद्यालयों को अकादमिक स्वायत्तता के साथ ही प्रशासनिक स्वायत्तता भी हासिल है। ज्ञान और शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध लोगों की टीम वहां की शिक्षा व्यवस्था को ऊंचाईयों पर ले जाने के लिए तत्पर रहती है। लेकिन ऐसी सोच रखने वाले यहां अध्यापक कितने हैं। &lt;br /&gt;अब एक नजर जयराम के खिलाफ कपिल सिब्बल के तर्कों पर भी देना चाहिए। रमेश के बयान के बाद सरकार की होती किरकिरी के बाद ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स के दबाव में कपिल सिब्बल ने बयान दिया कि देश में विश्वस्तरीय शोध का माहौल ही नहीं है। ऐसे में सवाल कपिल सिब्बल से ही पूछा जाएगा कि आखिर मंत्री रहते या देश में ज्यादातर वक्त तक उनकी पार्टी की सरकार रहते ऐसे उपाय क्यों नहीं हो पाए कि आजादी के 63 सालों में देश में विश्वस्तरीय शोध और पढ़ाई का माहौल बन पाया। &lt;br /&gt;भारतीय शिक्षा व्यवस्था की कमी के लिए माना गया कि यहां अध्यापकों का वेतन विकसित देशों के अध्यापकों की तुलना में कम है। छठवें वेतन आयोग ने अध्यापकों की इस कमी को पूरा तो किया है। लेकिन इसके बावजूद अध्यापकों और प्रोफेसरों में अपने काम के प्रति प्रतिबद्धता कम ही नजर आ रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में तो अध्यापकों को खुलेआम राजनीति करते देखा जा सकता है। जब दिल्ली विश्वविद्यालय की यह हालत है तो देश के दूसरे इलाके के विश्वविद्यालयों का अंदाजा लगाया जाना आसान होगा। फिर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश की अब भी करीब 25 फीसदी जनता निरक्षर है। कॉलेज और विश्वविद्यालय जाने वाले युवाओं में से सिर्फ बमुश्किल 14 फीसदी को ही दाखिला मिल पाता है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देश के ज्यादातर विश्वविद्यालय सिर्फ और सिर्फ डिग्रियां बांटने की मशीन बन गए हैं। गुणवत्ता आधारित शिक्षा पर उनका ध्यान नहीं है। उनके लिए अकादमिक कैलेंडर को पूरा करना और परीक्षाएं दिलवाकर डिग्रियां बांट देना ही महत्वपूर्ण काम रह गया है। ऐसे में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की उम्मीद भी बेमानी ही है। &lt;br /&gt;बहरहाल जिन यूरोपीय या अमेरिकी विश्वविद्यालयों की तुलना में जयराम रमेश ने भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, वे भी दूध के धुले नहीं हैं। दुनिया में अपनी गुणवत्ता आधारित शिक्षा के लिए मशहूर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की कारस्तानी हाल ही में उजागर हुई है। लीबिया पर नाटो और अमेरिकी कार्रवाई शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद यानी 4 मार्च, 2011 को लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक सर हावर्ड डेवीज को इस्तीफा देना पड़ा। इसकी वजह रही लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के लीबिया के तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के साथ आर्थिक रिश्तों का खुलासा। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में गद्दाफी के बेटे सैफ-अल-कदाफी ने 2003 से 2008 तक पढ़ाई की थी। जहां से उसे पी.एच.डी.की डिग्री मिली । आरोप है कि उसकी थिसिस इंटरनेट से कटपेस्ट करके तैयार की गई और इसमें उसकी मदद स्कूल के एक डीन ने ही की थी। खुलासा तो यह भी हुआ है कि गद्दाफी से लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स को लाखों पौण्ड की धनराशि मिलती रही है। सिर्फ 2003 से 2008 के बीच ही 22 लाख पौंड के बदले लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने लीबिया के 400 भावी नेताओं और ब़ड़े अधिकारियों को ट्रेनिंग दी थी। और तो और लीबिया के सॉवरिन वेल्थ फण्ड के प्रचार के लिए लन्दन स्कूल ने 50,000 पौण्ड की फीस ली थी। लीबियाई सरकार द्वारा खड़े किये गये ‘गद्दाफी इण्टरनेशनल चैरिटी एण्ड डेवलपमेण्ट फाउण्डेशन’ से 15 लाख पौण्ड का अनुदान भी मिला था।&lt;br /&gt;कुछ ऐसे ही आरोप येल विश्वविद्यालय पर लगते रहे हैं। येल विश्वविद्यालय पर कई विवादास्पद कंपनियों से वित्तीय रिश्ते रखने के आरोप भी लगते रहे हैं। 2009 में  केमिस्ट्री के लिए नोबेल पुरस्कार हासिल कर चुके वेंकटरमण रामाकृष्णन ने पिछले ही साल बयान दिया था कि दुनिया के विश्वस्तरीय माने जाने वाले विश्वविद्यालयों ने अपने मूल कैंपस से बाहर जाकर जो कैंपस खोले, उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसा ही बनाना रहा है। वहां से कोई खास शोध और उपलब्धि हासिल नहीं हुई है। &lt;br /&gt;भारत की जो बदहाल शैक्षिक व्यवस्था है, उसमें कुकुरमुत्तों की तरह उगते संस्थानों का मकसद सिर्फ पैसा बनाना रह गया है, उसमें जयराम के बयान के सिर्फ नकारात्मक पक्ष की चर्चा करने से बेहतर यह होगा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की तरफ सकारात्मक पहल की जाय। हालांकि जानकारों के एक तबके को लगता है कि जयराम का यह बयान दरअसल भारतीय शिक्षा व्यवस्था में कथित विश्वस्तरीय माने जाने वाले संस्थानों के प्रवेश की राह खोलने की पहल है। अगर रमेश का यह बयान इस सोच से भी प्रभावित है तो उसे स्वीकार करना कठिन होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-3863201836036353949?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/hJStvPgnPgs/blog-post_28.html" title="पानी बिच सड़क है कि सड़क बिच पानी" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-LIQW0d_7cPY/TeDmdadWuoI/AAAAAAAAARI/_S0PKuVq6jA/s72-c/CityGallery.aspx.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/05/blog-post_28.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0EDRnk-cSp7ImA9WhZWE0s.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-7983429349588982398</id><published>2011-05-14T03:40:00.000-07:00</published><updated>2011-05-14T03:41:17.759-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-05-14T03:41:17.759-07:00</app:edited><title>यूपीए बिना चैन कहां रे</title><content type="html">&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राजनीति में किसी की कमजोरी कई बार किसी की मजबूती का सबब बन जाती है। 2 जी घोटाले से जूझ रही द्रविड़ मुनेत्र कषगम की विदाई ने केंद्र की यूपीए सरकार की मजबूती की नींव रख दी है। सीबीआई अदालत और आयकर अधिकारियों के दफ्तरों की चक्कर काट रही कनिमोझी को कानूनी पचड़े से बचाने के लिए द्रविड़ मुनेत्र कषगम का यूपीए के साथ रहना मजबूरी है। सत्ता का साथ ही उन्हें अधिकारियों से राहत दिलवा सकता है। इस लिहाज से देखें तो दो हफ्ते कनिमोझी के खिलाफ सीबीआई के आरोप पत्र दाखिल करने के पहले जब डीएमके की कार्यसमिति ने केंद्र सरकार से समर्थन वापसी की अटकलों को टाल कर भावी राजनीतिक आशंकाओं के बीच अपने बचाव की राह तलाश ली थी। अन्यथा मीडिया का एक बड़ा वर्ग मानकर चल रहा था कि कनिमोझी का आरोप पत्र में नाम यूपीए सरकार से डीएमके के अलगाव का संदेश लेकर आएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौजूदा दौर में चूंकि राजनीति सिर्फ सत्ता को साधने और उसके जरिए राजनीतिक से ज्यादा आर्थिक फायदे उठाने का खेल हो गई है, लिहाजा जैसे ही किसी घोटाले और उससे जुड़े राजनीतिक विवाद शुरू होते हैं, सत्ता की सेहत और उसके भविष्य पर सवाल उठाए जाने लगते हैं। यही वजह है कि 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में डीएमके सांसद कनिमोझी के खिलाफ सीबीआई के आरोप पत्र दाखिल करने के बाद केंद्र सरकार की सेहत पर सवाल उठने लगे थे। लेकिन द्रविड़ मुनेत्र कजगम के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन से समर्थन की वापसी इतनी आसान नहीं थी। तमिलनाडु भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य सी पी राधाकृष्णन पहले ही जाहिर कर चुके थे कि डीएमके की वह बैठक महज दिखावा थी।  ज्यादा से ज्यादा इस बैठक की राजनीतिक व्याख्या की जाती तो वह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा भर थी। लेकिन तमिलनाडु की सत्ता से विदाई के बाद डीएमके के लिए अब विकल्प सीमित हो गए हैं। 2 जी स्पेक्ट्रम में जिस तरह डीएमके आकंठ डूबी नजर आ रही है, उसमें उसके लिए बचाव की राह यूपीए के साथ में ही नजर आती है।  अगर उसे कड़ा कदम उठाना ही होता तो वह तभी उठा लेती, जब उसके एक अहम सहयोगी और पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री ए राजा को सीबीआई ने सलाखों के पीछे डाल दिया। हालांकि क्या सचमुच सीबीआई उन्हें सलाखों के पीछे डालने की हिम्मत जुटा पाती। क्या सीबीआई को इसके लिए उसके राजनीतिक हुक्मरानों का समर्थन हासिल हो पाता...जाहिर है नहीं...सीबीआई या किसी जांच एजेंसी को ए राजा जैसे ताकतवर दल के नेता और उदारीकरण के दौर में सत्ता का समानांतर केंद्र बने कारपोरेट के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत कम से कम आज के दौर में नहीं है। गठबंधन राजनीति की मजबूरियों और उसमें शामिल दलों के आर्थिक हितों के साथ जुड़े कारपोरेट की ताकत को समझने के लिए 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला बेहतर उदाहरण है। 2007 से 2 जी स्पेक्ट्रम को लेकर खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती रहीं, लेकिन सत्ता का जिम्मेदार तंत्र राजा, उनके अफसरों और कारपोरेट जगत की हस्तियों के खिलाफ कदम उठाने की हिम्मत नहीं कर पाया। आज अगर सत्ता और कारपोरेट की हस्तियां जेल में हैं तो उसके लिए कोई राजनीतिक ताकत या इच्छाशक्ति जिम्मेदार नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की नकेल ने सीबीआई को ऐसा करने के लिए मजबूर किया है। अगर राजनीतिक नेतृत्व ने जिम्मेदारी और इच्छाशक्ति दिखाई होती तो शायद घोटाले के तार इतनी दूर तक नहीं पहुंचते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले राजा और बाद में कनिमोझी के खिलाफ अगर सीबीआई को आरोप पत्र दाखिल करना पड़ा तो इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की कड़ी निगरानी जिम्मेदार है। यह तथ्य डीएमके सुप्रीमो भी जानते हैं। इसलिए उनकी कोशिश यही रही है कि यूपीए को समर्थन के एवज में इस मामले को ज्यादा से ज्यादा हलका बना सकें, ताकि इस केस की आंच में अधिक से अधिक उनकी राजनीति में हलकी सी झुलसन आ सके, उनकी राजनीति खाक न हो सके। सीबीआई की चार्जशीट से करूणानिधि की दूसरी पत्नी और कनिमोझी की मां दयालु अम्माल का नाम गायब होना एक तरह से करूणानिधि की कामयाबी भी है। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी निगरानी के बावजूद कार्यपालिका अपनी राजनीतिक मजबूरियों के चलते मनमाना कदम उठाने में कामयाब रही है। लेकिन अदालत के सामने सीबीआई के वे तर्क कितने दिनों तक टिकेंगे, देखना दिलचस्प रहेगा। क्योंकि जिस कलईंजर टीवी में स्वान टेलीकॉम ने एक तरह से रिश्वतखोरी के तहत निवेश किया है, उसके साठ फीसदी हिस्से की मालकिन दयालु अम्माल ही हैं। बाकी चालीस फीसदी में से आधे-आधे की मालिक कनिमोझी और कलईंजर टीवी के प्रबंध निदेशक शरत कुमार हैं। सीबीआई ने दयालु अम्माल को क्लीन चिट देने के लिए तर्क दिया है कि वे तमिल के अलावा दूसरी कोई भाषा न तो बोल सकती हैं और न ही समझ सकती हैं। सिर्फ तमिल जानना ही किसी के निर्दोष होने की गारंटी कैसे हो सकता है। सीबीआई का यह तर्क आसानी से गले नहीं उतरता कि चालीस फीसदी के मालिक रिश्वतखोरी के लिए जिम्मेदार तो हैं, लेकिन साठ फीसदी की मालकिन इसके लिए जिम्मेदार न हो। दयालु अम्माल का नाम चार्जशीट से अलग कराना एक तरह से करूणानिधि कामयाबी ही कही जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के नतीजों ने साफ कर दिया है कि अगर तमिलनाडु में करूणानिधि और उनके कुनबे को थोड़े सुकून के साथ जीना है तो उन्हें यूपीए के साथ रहना ही होगा। बदले माहौल में केंद्र सरकार से अलग होने का जोखिम उठाना करूणानिधि के लिए आसान नहीं है। क्योंकि राज्य की राजनीति में जयललिता के साथ उनका जो छत्तीस का आंकड़ा है, उसमें ज्यादा उम्मीद भी बेमानी है। इस बात की गारंटी नहीं है कि पिछली दफा की तरह जयललिता इस बार भी करूणानिधि को निशाना नहीं बनाएंगी। पिछली बार जब जयललिता ने देर रात करूणानिधि को गिरफ्तार किया था, तब भी डीएमके केंद्र की एनडीए सरकार का प्रमुख घटक था और उसके दिग्गज मुरासोली मारन और टीआर बालू केंद्रीय कैबिनेट में शामिल थे। इसके बाद भी जयललिता ने करूणानिधि को उन मंत्रियों समेत गिरफ्तार करने से नहीं हिचकी थीं। जहां राजनीतिक बदले की भावना इस हद तक हो, वहां विधानसभा चुनावों में हार की आशंका के बीच करूणानिधि केंद्र से अलग होने की हिम्मत कैसे जुटा सकते हैं। वैसे कनिमोझी का नाम सीबीआई की चार्जशीट में आने के बाद कांग्रेस के रणनीतिकारों के माथे पर बल पड़ने लगे थे। इसीलिए कांग्रेस ने वैकल्पिक इंतजाम कर रखे थे। डीएमके के बाहर जाने की हालत में समाजवादी पार्टी का विकल्प उन्होंने तैयार कर रखा था। लेकिन बदले माहौल में कांग्रेस को शायद उस विकल्प को आजमाने की जरूरत ही नहीं पड़े। सबसे बड़ी बात यह कि तमिलनाडु चुनावों में हार के बाद डीएमके अब दबाव की बजाय याचना की भूमिका में होगा और इससे केंद्र सरकार को कम से कम डीएमके की तरफ से किसी खतरे की आशंका नहीं रहेगी। अगर कनिमोझी को राहत पानी है या करूणानिधि के दुलारे ए राजा को जेल के बाहर की दुनिया जल्द देखनी है तो यूपीए का साथ ही इन उम्मीदों का सहारा बन सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-7983429349588982398?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/mB-YzhFmOUQ/blog-post.html" title="यूपीए बिना चैन कहां रे" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/05/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkcGQns-fSp7ImA9WhZQE0Q.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-6096319805473771693</id><published>2011-04-21T06:51:00.000-07:00</published><updated>2011-04-21T06:53:43.555-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-04-21T06:53:43.555-07:00</app:edited><title>अन्ना के आंदोलन को पटरी से उतारने की कोशिश</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-DLnml7Oy1LA/TbA23QdmwZI/AAAAAAAAARA/I56T_OGImtk/s1600/images.jpeg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 137px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-DLnml7Oy1LA/TbA23QdmwZI/AAAAAAAAARA/I56T_OGImtk/s200/images.jpeg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5598034659761373586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;“पिछले कुछ दिनों का घटनाक्रम चिंता का विषय है. ऐसा लगता है कि देश की भ्रष्ट ताकतें भ्रष्टाचार निरोधी प्रभावी कानून तैयार करने की प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए एकजुट हो गई हैं. मेरा आपसे आग्रह है कि हम एकसाथ मिलकर उन ताकतों को पराजित कर सकते हैं. उन ताकतों की एक रणनीति यह है कि समिति में शामिल सामाजिक कार्यकर्ताओं की छवि खराब की जाए.”&lt;br /&gt;अन्ना हजारे की चिट्ठी के ये अंश दरअसल उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है, जो एक अच्छे काम को पटरी से उतारने की कोशिशें से उपजी है। इस पीड़ा में अन्ना का क्षोभ भी कहीं गहरे तक साया है। ऐसी तकलीफ गांधी जी को भी आजादी मिलने के कुछ पहले हुई थी, जब उनकी सोच के मुताबिक काम करने से तब के प्रमुख कांग्रेसी हिचकने लगे थे और लगता था कि आजाद भारत के कांग्रेसियों को गांधी जी की जरूरत ही नहीं रह गई है। तब गांधी ने कहा था कि इसी देश की मिट्टी से वे दोबारा कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे। गांधी जी की उस पीड़ा और अन्ना हजारे के क्षोभ भरे दर्द में एक अंतर है। दरअसल गांधीजी को पीड़ा उनके अपने ही अनुयायियों से पहुंची थी, जबकि अन्ना को उनके आंदोलन के साथियों से ज्यादा दूसरे लोगों के हमलों का सामना करना पड़ रहा है। इसीलिए उनका क्षोभ गांधी से कहीं कम है, लेकिन उनका भी कर्म चूंकि बृहत्तर सामाजिक संदर्भों को पटरी पर लाने से जुड़ा है, इसीलिए दर्द भी है। &lt;br /&gt;जन लोकपाल की मांग को लेकर अनिश्चित कालीन अनशन पर बैठे अन्ना की मांगों को मानना भारत सरकार की मजबूरी बन गई थी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के दावा करते न थकने वाली भारत सरकार को नव उदारीकरण के दौर में लोकतंत्र भी एक नाटक सा होता जा रहा है। फिर पश्चिमी ताकतों के सामने लोकतांत्रिक होते दिखना भी उदारवाद का ही सहज विस्तार माना जा रहा है। ऐसे में भारत सरकार को लोकतांत्रिक दिखना जरूरी था। उसके सामने इसी साल जनवरी में शुरू हुए मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर लोकतांत्रिक शक्तियों ने जिस तरह वहां के राष्ट्रपति हुस्ने मुबारक को झुकने के लिए मजबूर कर दिया था, उसका उदाहरण अभी पुराना नहीं पड़ा है। ट्यूनिशिया की घटनाएं भी ताजा ही हैं, यमन में जारी लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शन अभी जारी ही है। नये मीडिया माध्यमों, सोशल मीडिया आदि के जरिए दुनिया जितनी छोटी हुई है, उतनी शायद इससे पहले कभी छोटी नहीं थी। इसका सहज असर पूरी दुनिया में दिख रहा है। चूंकि हम बाकी दुनिया की तुलना में खुद को कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक साबित करने का मौका नहीं छोड़ते, लिहाजा अन्ना हजारे के सामने हमारी सरकार को झुकना ही था। वह झुकी भी। खुद अन्ना को भी इतनी उम्मीद नहीं थी कि उनके अनशन के महज चार दिनों में देशव्यापी इतना ज्यादा समर्थन मिल जाएगा। लेकिन भारी समर्थन ने उनके आत्मविश्वास को किस कदर बढ़ा दिया है कि जन लोकपाल के लिए गठित समिति की पहली बैठक में शामिल होने के लिए जाते वक्त यह कहने से नहीं चूके कि अगर उनका अनशन चार दिन और चल जाता तो केंद्र सरकार गिर जाती। उसी अन्ना का आत्मविश्वास महज दो दिनों बाद डोलने लगता है और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने के लिए मजबूर होना पडता है तो जाहिर है कि उनके अंदर कहीं न कहीं कुछ अपने राजनीतिकों के दांव-पेंचों से कुछ न कुछ खदबदा रहा है। &lt;br /&gt;इटली के विद्वान मेकियावेली ने अपनी मशहूर पुस्तक द प्रिंस में सत्ता के चरित्र की व्याख्या की है। इस व्याख्या के मुताबिक सत्ताएं चाहें अधिनायकवादी हों या फिर लोकतांत्रिक, उनके मूल में एक समानता होती है, विरोधी सुरों को आसानी से स्वीकार नहीं करना। सत्ता का यह लौहआवरण ही है कि वह जल्द झुकती भी नहीं। इसका उदाहरण अपने ही देश के छोटे-छोटे आंदोलनों में दिख जाएगा। जहां लोगों की मांगें जायज हैं, लेकिन सत्ता ने ठान लिया है कि वहां उसकी मर्जी से विकास हो तो इसके लिए वह जायज मांगों को लेकर खड़े लोगों तक पर गोलियां चलाने से नहीं हिचक रही हैं। सत्ता विरोधी सुरों को कुचलने के उदाहरण राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से ठीक नजदीक नोएडा या फरीदाबाद तक में दिख सकता है। ऐसे में यह सोचना की सत्ता अन्ना के सामने झुक गई और जन लोकपाल की राह आसान हो गई, दरअसल दिवास्वप्न जैसा ही था। &lt;br /&gt;आंदोलन को तोड़ने की कोशिशें उसी दिन शुरू हो गईं, जब आंदोलन की कामयाबी के लिए अन्ना से ज्यादा सोनिया गांधी को ज्यादा जिम्मेदार बनाने की कांग्रेसी कोशिशें शुरू हो गईं। इतना ही नहीं, जन लोकपाल के लिए गठित ड्राफ्ट कमेटी में शांतिभूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण के शामिल किए जाने को वंशवाद से जोड़कर देखा-दिखाया जाने लगा। इन चर्चाओं और खबरों के पीछे जहां सत्ताधारी खेमें के कुछ लोग जुटे हैं तो कई लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें भगवा रंग से हर कीमत पर नाराजगी है। अन्ना हजारे ने नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के ग्रामीण विकास की सफल योजनाओं के लिए प्रशंसा क्या कर दी, अन्ना की लानत-मलामत का जैसे मौका ही मिल गया। अन्ना जब नीतीश या नरेंद्र मोदी की प्रशंसा कर रहे थे तो उसके पीछे उनका सहज हृदय काम कर रहा था। लेकिन अन्ना के आंदोलन के आगे मजबूर हुए ताकतवर लोगों को अन्ना के इस बयान में भी खोट और सांप्रदायिकता नजर आने लगी। नरेंद्र मोदी ने लाख गुनाह किए हों, लेकिन हकीकत तो यही है कि गुजरात की जनता ने उन्हें दोबारा चुना है। ऐसे में उन्हें गाली देना और उनके हाथों हुए विकास कार्यों की बिना वजह आलोचना करने के लिए गोधरा का भूत जगाना दरअसल नरेंद्र मोदी पर हमला नहीं था, बल्कि अन्ना के आंदोलन को पटरी से उतारने की कोशिश ही थी। इसमें एक खास विचारधारा के लोग कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं। &lt;br /&gt;गांधीजी की अगुआई में जब कांग्रेस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र में थी, तब उसके साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी काम कर रहा था, सांप्रदायिकता विरोधी गांधी को भी आरएसस के साथ से परहेज नहीं था। गांधी की हत्या का आरोप आरएसस पर था, इसके बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल में भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी शामिल थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने खुद आरएसएस को गणतंत्र दिवस की परेड में मार्च पास्ट के लिए बुलाया था। इसका यह मतलब था कि देश के समग्र विकास में वे सबको साथ लेकर चलने की विचारधारा पर चलते थे। अन्ना के मोदी समर्थक बयान को उस नजरिए से क्यों नहीं देखा गया और उसकी आलोचना करने की कोशिशें तेज हो गईं। साफ है कि अन्ना और उनकी टीम पर आरोप लगा-लगाकर दरअसल उनकी साख को धक्का पहुंचाने की कोशिशें शुरू हो गईं है। &lt;br /&gt;आखिर क्या वजह है कि अन्ना की साख को चोट पहुंचाने की कोशिशें तेज हो रही हैं। इसके दो कारण हैं। पहला कारण तो विशुद्ध राजनीतिक है। अन्ना ने जन लोकपाल के लिए जो आंदोलन चलाया है, निश्चित तौर पर उसका फायदा पूरे देश को होना है। लेकिन चूंकि अन्ना और उनके साथियों ने इसका राजनीतिक फायदा उठाने की कोई मंशा जाहिर नहीं की है और न ही उनकी कोई मंशा है भी। उनके पास राजनीतिक संगठन भी नहीं है। इसके चलते देर-सवेर जब चुनाव होंगे तो विपक्षी राजनीतिक धारा के एक वर्ग को डर है कि इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी को हो सकता है। भारतीय जनता पार्टी कालेधन, स्विस बैंक में जमा धन और भ्रष्टाचार के मसले को लेकर 2009 के आम चुनावों से ही आंदोलन कर रही है। हालांकि उसे इसका फायदा नहीं मिल पाया। लेकिन अन्ना की साख भरी आवाज ने जब लोगों को जगा दिया तो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तो ख़ड़ा हो गया, लेकिन चुनावी समर में जाहिर है कि यह सवाल उठाने का फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। हालांकि शांति भूषण या प्रशांत भूषण जैसे जिन लोगों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, सच तो यह है कि वे खुद भी नहीं चाहेंगे कि अन्ना के साथ खड़े आंदोलन का फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिले। इसके बावजूद अन्ना की साख को गिराने की कोशिशें जारी हो रही हैं। &lt;br /&gt;इसकी दूसरी वजह सत्ता के अहं को पहुंची चोट है, जिसका बदला वह चुकाना चाहेगी ही। वैसे सत्ता के इर्द-गिर्द भ्रष्टाचारियों का बोलबाला कुछ ज्यादा ही है। उन्हें एक और डर सता रहा है कि अगर जन लोकपाल बिल पास हुआ तो उनके तो हाथ-पांव ही बंध जाएंगे। इसके लिए वे अन्ना को ही जिम्मेदार मानते हैं और अन्ना को जनसमर्थन के मुद्दे पर पटखनी तो देने से फिलहाल वे रहे तो इसके लिए बेहतर उपाय यह है कि अन्ना की साख को ही चोट पहुंचाई जाय। लेकिन अन्ना की साख पर चोट पहुंचाने की कोशिशें में जुटे लोगों को यह पता होगा ही कि अन्ना के लिए दौड़ने-रोने और चलने वाला पूरा समाज है। अन्ना के पास कोई आर्थिक ताकत भी नहीं है। ऐसे लोगों के लिए समाज तभी उठ खड़ा होता है, जब उसकी साख होती है और अन्ना जैसे लोगों की साख एक दिन में नहीं आती। इसलिए उस पर चोट पहुंचाना भी आसान नहीं होता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/TsoFb3YfTv8/blog-post_21.html" title="अन्ना के आंदोलन को पटरी से उतारने की कोशिश" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/-DLnml7Oy1LA/TbA23QdmwZI/AAAAAAAAARA/I56T_OGImtk/s72-c/images.jpeg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/04/blog-post_21.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkUNSXo5cSp7ImA9WhZRFko.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-3925915431231071526</id><published>2011-04-12T22:57:00.000-07:00</published><updated>2011-04-12T22:58:18.429-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-04-12T22:58:18.429-07:00</app:edited><title>विधानसभा चुनावों के नतीजे और भावी राजनीति</title><content type="html">&lt;strong&gt;उमेश चतुर्वेदी &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट के विश्व कप में भारत की जीत ने उन करोड़ों भारतीयों की जिंदगी में भी बेशक कुछ पल के लिए रोशनी की लकीर खींच दी है, जिनकी जिंदगी की दहलीज को अब भी असल रोशनी का इंतजार है। उदारीकरण के दौर में लाख झुठलाया जाय, लेकिन कड़वी हकीकत तो यही है कि जिंदगी में असल रोशनी लाने की जिम्मेदारी राजनीति पर है और राजनीति की दिशाएं चुनाव तय करते हैं। इन दिनों देश के चार राज्यों में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया जारी है। असम में चुनाव हो चुके है, नतीजों का इंतजार है। लेकिन शायद उन राज्यों के लोगों को छोड़ दें तो दूसरे इलाके के लोगों और मीडिया का ध्यान इस ओर नहीं इसका यह भी मतलब नहीं है कि इन चुनावों का कोई महत्व नहीं है और वे बेमानी हो गए है। इन चुनावों के नतीजे सिर्फ संबंधित राज्यों के लोगों के भाग्य को ही तय नहीं करेंगे, बल्कि देश की राजनीति पर भी असर डालेंगे। भारतीय जनता पार्टी के महासचिव अरूण जेटली इस चुनाव अभियान में इस तथ्य पर जोर दे रहे हैं। लेकिन उनकी भी बात का वजन इसलिए नहीं बढ़ रहा है, जिस केरल में प्रचार के दौरान उन्होंने यह कहा, उस केरल में भारतीय जनता पार्टी का खास दांव पर नहीं है।  &lt;br /&gt;पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की लोककथाओं में पूरब यानी असम और बंगाल का ऐसे देस के तौर पर चित्रण है, जहां जादूगरनियां रहती हैं, जो वहां गए पुरूषों को तोता बनाकर पिंजरे में कैद कर लेती हैं। अपने खूबसूरत नागरिकों और शाक्त संप्रदाय के साथ ही उसकी तांत्रिक क्रियाओं के लिए इन राज्यों की शोहरत ने ही शायद इन लोककथाओं का जन्म दिया। लेकिन इन राज्यों की खूबसूरती को ग्रहण लग गया है। असम तीन दशकों से आतंकवाद की चपेट में है। यही वजह है कि इस राज्य में तीन दशकों में सिर्फ और सिर्फ आतंकवाद ही सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है। चाहे असम गण परिषद की अगुआई वाला मोर्चा रहा हो या फिर कांग्रेस, दोनों ने तीन दशकों में जितने भी चुनाव लड़े हैं, उनका सिर्फ एक ही मुद्दा रहा है- खून-खराबे पर काबू और आतंकवाद का सफाया। इसके बीच एक और मुद्दा काम करता है। यहां भाषा और उन्हें बोलने वाले भी चुनावी मुद्दा बनते रहे हैं। असम की राजभाषा असमी है। लेकिन यहां बांग्लाभाषी लोग भी हैं और बांग्लादेश से विस्थापित लोग भी है। असम गणपरिषद का गठन भी बांग्लादेश से आए लोगों को असम से बाहर निकालने के आंदोलन के तूल पकड़ने के बाद ही हुआ था। लेकिन अब इसमें बोडो को भी शामिल करने का आंदोलन शुरू हो गया है। इसके साथ ही बोडो को अलग राज्य बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। दिलचस्प बात यह है कि उल्फा और बोडो- दोनों उग्रवादियों के निशाने पर अब हिंदीभाषी मजदूर भी बनने लगे हैं। क्योंकि दोनों ही समुदायों को प्रवासी हिंदीभाषी दुश्मन और उनके रोजगार पर हक जताने वाले लगते हैं। इस बार जहां बीजेपी अकेले चुनावी मैदान में है। सबसे हैरतअंगेज बात यह है कि राज्य के बांग्लाभाषी इलाकों में बीजेपी का प्रभाव रहा है। 1999 के लोकसभा चुनाव में यहां से बीजेपी के चार सांसद चुने गए थे। लेकिन 2001 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की स्थानीय इकाई असम गणपरिषद के साथ चुनाव नहीं लड़ना चाहती थी। लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में सहभागी होने के चलते बीजेपी को असम गणपरिषद के साथ चुनावी वैतरणी में उतरना पड़ा और बीजेपी के साथ ही असम गणपरिषद को भी मुंह की खानी पड़ी। तब से लेकर तरूण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार चल रही है। हालांकि 2006 के विधानसभा चुनावों में तरूण गोगोई की अगुआई में कांग्रेस को साफ बहुमत नहीं मिल पाया। इत्र व्यापारी बदरुद्दीन अजमल की असम यूनाइडेट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एयूडीएफ) ने पिछले चुनाव में कांग्रेस को जोरदार झटका दिया था। हालांकि बाद में वह भी सरकार में शामिल हो गई। तरूण गोगोई की अकेली उपलब्धि उल्फा से बातचीत शुरू कराना है। हालांकि कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। विपक्षी असम गणपरिषद पिछले चुनावों में बिखरी हुई थी। उसमें दो-फाड़ हो गया था। लेकिन इस बार प्रफुल्ल मोहंत की अगुआई में पार्टी के साथ सीपीएम और सीपीआई का मोर्चा कांग्रेस को टक्कर दे रहा है। वैसे दिल्ली के राजनीतिक हलके में कहा जा रहा है कि असम गण परिषद और बीजेपी भले ही चुनावी मैदान में अलग-अलग हों, लेकिन उनके बीच सियासी समझ विकसित हो गई है। यानी जरूरत पड़ी तो दोनों दल चुनाव बाद एक साथ सरकार बना सकते हैं। हालांकि चुनाव पूर्व हुए कुछ सर्वेक्षणों में कांग्रेस की वापसी की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन सी वोटर के यशवंत देशमुख का मानना है कि वहां कांग्रेस की वापसी मुश्किल है। &lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल और केरल दो ऐसे राज्य हैं, जहां वामपंथ अपनी पकड़ और पहुंच बनाए हुए है। दुनिया के तमाम अहम देशों से मार्क्सवादी राजनीति की विदाई के दौर में भी पश्चिम बंगाल अलग उदाहरण बना हुआ है। संसदीय राजनीतिक परंपरा में शामिल वामपंथी सरकार की लगातार 34 साल से मौजूदगी को दुनिया हैरत की निगाह से देखत रही है। लेकिन इस बार माना जा रहा है कि ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का गठबंधन वामपंथ के इस गढ़ को ध्वस्त कर देगा। सिंगूर और नंदीग्राम के बाद तृणमूल कांग्रेस की राज्य के मतदाताओं में बढ़ती पकड़ और पहुंच को पिछले लोकसभा चुनावों में देखा जा चुका है। इसलिए माना जा रहा है कि इस बार पश्चिम बंगाल का लाल दुर्ग ध्वस्त हो सकता है। चूंकि वामपंथी खेमे के पास इन दिनों ज्योति बसु जैसा कोई चमत्कारिक नेता नहीं है, लिहाजा इस मान्यता में दम भी देखा जा रहा है। वाममोर्चे के शासन ने राज्य में भूमि सुधार का जो इतिहास रचा, वह पूरे देश में कहीं नहीं दिखा। आम लोगों की असल रहनुमाई करने का दावा करने वाली इस राजनीतिक विचारधारा से उम्मीद कहीं ज्यादा थी। लेकिन यह उम्मीद तकरीबन हर मोर्चे पर विफल हुई है। &lt;br /&gt;अंग्रेजों के साथ के चलते देश में सबसे पहले कहीं नवजागरण आया तो वह बंगाल ही था। इसके चलते आजादी मिलते तक पश्चिम बंगाल में उद्योगों का जाल बिछा हुआ था। 1977 में जब पहली बार वाम मोर्चा की सरकार बनी तो उम्मीद जगी कि इस राज्य में आम लोगों की भलाई की राह में ढेर सारे बदलाव होंगे। सबसे बड़ा बदलाव तो भूमि सुधारों का हुआ। तब से लेकर अब तक चुनावी राह से इस राज्य में वामपंथी सरकार बनी हुई है। चीन और वेनेजुएला को छोड़ दें तो तकरीबन पूरी दुनिया से कम्युनिस्ट विचारधारा वाली सरकारों की विदाई हो चुकी है। ऐसे में संसदीय परंपरा को आत्मसात करते हुए 34 सालों से सरकार चलाना सचमुच वामपंथी विचारधारा की कामयाबी का ही इतिहास है। लेकिन इस दौर में जिस तरह सत्ता के विकेंद्रीकरण के नाम पर स्थानीय स्तर तक वामपंथी कैडरों की ताकत में इजाफा हुआ, उसका नतीजा राज्य में एक नए तरह के शोषण के तौर पर दिखा। आम आदमी की सैद्धांतिक तौर पर बात करने वाली विचारधारा के लोगों ने आम लोगों पर कहर बरपाने शुरू कर दिए। औद्योगिक केंद्र रहे पश्चिम बंगाल से उद्योगों की विदाई हो गई। पूरबिया लोकगीतों में सजने वाला बंगाल और कोलकाता अपना रौनक खोने लगा। वाम मोर्चे की सांगठनिक गुंडई का नजारा सिंगूर और नंदीग्राम में दिखा। इसके खिलाफ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने मोर्चा संभाला। कहा जा रहा है कि उसे नक्सलियों का भी समर्थन हासिल है। बंगला समाज अपने संस्कृति कर्मियों पर खासा गर्व करता है। लेकिन वाममोर्चे की सांगठनिक जबर्दस्ती और राज्य की बदहाली ने महाश्वेता देवी, शंखो घोष, अपर्णा सेन जैसे तमाम संस्कृति कर्मी भी राज्य की वाममोर्चा सरकार के खिलाफ हो गए। इसका नतीजा पिछले लोकसभा चुनाव में भी दिखा। इस बार वाम मोर्चा अपने पुराने सभी साथियों मसलन सीपीएम, सीपीआई, आरएसपी, फारवर्ड ब्लॉक के साथ अपना गढ़ बचाने की जुगत में जुटा है, वहीं ममता बनर्जी और कांग्रेस उसका मुकाबला कर रहे हैं। इसी राज्य की राजधानी कोलकाता में 1951 में भारतीय जनता पार्टी के पूर्व संगठन भारतीय जनसंघ की स्थापना श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने की थी। लेकिन यहां भारतीय जनता पार्टी एक कोने में पड़ी अपने अस्तित्व को साबित करने की जद्दोजहद में जुटी हुई है। चुनाव सर्वेक्षण मान रहे हैं कि इस बार तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का राज्य सचिवालय रायटर्स बिल्डिंग पर कब्जा होने जा रहा है। लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर जिस तरह दोनों पार्टियों में खींचतान जारी रही, उससे दोनों पार्टियों का आपसी विश्वास बरकरार नहीं हो पाया है। कांग्रेस पार्टी के एक महत्वपूर्ण नेता का इन पंक्तियों के लेखक ने पूछा कि ममता बनर्जी से कांग्रेस का भरोसा बन गया है। तो उनका जवाब था कि पहले ममता खुद पर तो भरोसा करें। इस जवाब में ही छुपा है कि दोनों पार्टियों का भविष्य कैसा रहने वाला है। वैसे सच तो यह है कि वाममोर्चे की सांगठनिक जबर्दस्ती से पश्चिम बंगाल को मुक्ति दिलाने का दावा कर रही ममता बनर्जी के पास विकास का पहिया पटरी पर लाने के लिए कोई विशेष कार्यक्रम या रोडमैप नहीं है। अगर है भी तो अब तक नजर नहीं आया है। फिर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता भी वाममोर्चे के कार्यकर्ताओं के तर्ज पर निचले स्तर तक तुर्की-बतुर्की काम करने की तैयारियों में जुट गए हैं। यानी अगर राज्य में सत्ता का परिवर्तन हुआ तो वहां सिर्फ राजनीति का ही नहीं, अराजकता का नया इतिहास भी रचा जाएगा। जिसे एक किनारे बैठकर देखने के लिए कांग्रेस भी मजबूर रहेगी। &lt;br /&gt;दुनिया में वाम विचार धारा की पहली सरकार बतौर चुनाव देने वाले राज्य केरल में भी फिलहाल वाममोर्चा की सरकार है। राज्य के मुख्यमंत्री वी एस अच्युतानंदन की ईमानदारी और सादगी की वाममोर्चे कार्यकर्ताओं पर पूरी पकड़ है। इसके बावजूद उन्हें पिछली बार की ही तरह इस बार भी सीपीएम ने टिकट नहीं दिया। पिछली बार कार्यकर्ताओं के दबाव पर उन्हें ना सिर्फ टिकट दिया गया, बल्कि सीपीएम नेतृत्व को उन्हें मुख्यमंत्री भी बनाना पड़ा। इस बार उनको टिकट तो आखिरकार दबाव में दे दिया गया, लेकिन राज्य सचिव पनिराई विजयन के दबाव में अगर सत्ता मिलती भी है तो अच्युतानंदन को आसानी से मुख्यमंत्री की कुर्सी शायद ही मिले। वैसे देश का सबसे पहला संपूर्ण शिक्षित इस राज्य के ग़रीब परिवारों से आने वाले 54 प्रतिशत लोग बेरोज़गार हैं, जबकि प्रभावशाली परिवारों के मामले में यह आंकड़ा 24.8 प्रतिशत है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद के 41 फीसद हिस्से का उपभोग सिर्फ दस फीसद जनता करती है। अगर खाड़ी देशों में यहां के कामगारों को काम न मिला होता तो शायद कई घरों में चूल्हे भी नहीं जलते। भगवान का अपना देश के तौर पर विख्यात इस राज्य में पर्यटन की अकूत संभावनाओं के बावजूद राज्य सरकारें कुछ कर नहीं पाईं। इसके बावजूद राज्य के ज्यादातर लोगों की पहली पसंद वीएस अच्युतानंदन हैं। लेकिन बेरोजगारी और महंगाई के चलते इस बार माना जा रहा है कि कांग्रेस की वापसी होगी। इस बार कांग्रेस के साथ यहां केरल कांग्रेस और मुस्लिम लीग भी शामिल है। मजे की बात यह है कि उत्तर भारत में बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति का विरोध करने वाली कांग्रेस को केरल में मुस्लिम लीग सांप्रदायिक नजर नहीं आती। लेकिन कांग्रेस के सामने भी मुख्यमंत्री पद की चुनौती भी है। राज्य में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार है- राज्य कांग्रेस अध्यक्ष रमेश चेनिथला और पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी। पिछली बार ए के एंटनी को हटाने के बाद कुछ महीनों तक चांडी को ही कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन रमेश चेनिथला को उम्मीद है कि चुनाव बाद उनके पक्ष में भाग्य का दांव पलट सकता है। &lt;br /&gt;सबसे दिलचस्प मुकाबला तमिलनाडु में हो रहा है। जहां एक तरफ करूणानिधि की अगुआई वाला डीएमके और कांग्रेस का गठबंधन है तो दूसरी तरफ जयललिता की अगुआई वाला एआईडीएमके है। जयललिता के साथ सीपीआई और सीपीएम भी है। तीसरा मोर्चा तमिल अभिनेता विजयकांतन की पार्टी डीएमडीके का है। पिछली बार उनकी पार्टी ने दस फीसदी वोट पाकर तहलका मचा दिया था। 1999 के लोकसभा चुनावों में राज्य से चार सीटें हासिल करने वाली बीजेपी एक बार फिर यहां अपना अस्तित्व तलाश रही है। हालांकि राज्य बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष सी पी राधाकृष्णन चाहते थे कि पार्टी जयललिता के साथ विधानसभा चुनावों में उतरे, लेकिन राज्य प्रभारी वेंकैयानायडू का तर्क था कि राज्य स्तरीय पार्टी से गठबंधन कैसे हो सकता है। हालांकि इस तर्क का आधार समझ में नहीं आया। इस बार राज्य का प्रभावी नाडर समुदाय का एक नेता टूटकर बीजेपी के साथ आने को तैयार था। लेकिन उसे पार्टी ने भाव ही नहीं दिया। बहरहाल यह राज्य ऐसा है, जहां भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा है। भ्रष्टाचार को लेकर राज्य की जनता भी बंटी हुई नजर आ रही है। हालांकि वोटरों को खरीदने और मंगल सूत्र से लेकर लैपटाप देकर खरीदने की कोशिश हो रही है। चुनाव सर्वेक्षणों की मानें तो इस बार अम्मा की वापसी की संभावना ज्यादा है। पांचवा राज्य पुद्दुचेरी है, यहां की तीस सदस्यीय विधानसभा का चुनाव भी साथ ही हो रहा है। हालांकि उसकी राजनीतिक गूंज खास सुनाई नहीं दे रही है। &lt;br /&gt;यह सच है कि अगर ममता को पश्चिम बंगाल में बहुमत के करीब सीटें मिलीं तो वह कांग्रेस का साथ छोड़ने से देर नहीं लगाएंगी। लेकिन तमिलनाडु में अगर जयललिता का संगठन जीतता है तो केंद्र के साथ डीएमके का साथ बना रहेगा। लेकिन क्योंकि भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे करूणानिधि परिवार के लिए सरकार का साथ ही संजीवनी बन सकता है। केरल और पश्चिम बंगाल की हार वाम मोर्चे के लिए सदमा तो होगा, लेकिन उम्मीद की जा सकती है कि संघर्षों के लिए मशहूर इस मोर्चे के नेता महंगाई और भ्रष्टाचार के मसले पर केंद्र की नाक में दम करने से नहीं हिचकेंगे। जिसकी अनूगूंज देर तक सुनाई देगी। केरल में प्रचार करते वक्त भारतीय जनता पार्टी महासचिव अरूण जेटली ने उम्मीद जताई है कि इन विधानसभा चुनावों के नतीजे राजनीतिक स्तर पर कई बदलाव लाएंगे। हो सकता है, बदलाव आएं, लेकिन इसमें बीजेपी का भी योगदान होगा, इसे लेकर संदेह की गुंजाइश बनी हुई है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-3925915431231071526?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/4KpPhI_nxjM/blog-post_12.html" title="विधानसभा चुनावों के नतीजे और भावी राजनीति" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/04/blog-post_12.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0YFRnw5eip7ImA9WhZRFUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-6529156523102427493</id><published>2011-04-11T22:10:00.000-07:00</published><updated>2011-04-11T22:11:57.222-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-04-11T22:11:57.222-07:00</app:edited><title>समाजवाद की प्रासंगिकता और तीसरी धारा की करवट लेती राजनीति</title><content type="html">&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उमेश चतुर्वेदी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर राममनोहर लोहिया की जन्मशताब्दी बीत गई, स्वतंत्रता के बाद भारतीय मनीषा और राजनीति को झकझोर कर रख देने वाली इस शख्सियत की याद को जनमानस के बीच ताजा करने की कोशिश क्यों करती...लोकसभा की फकत चार साल की सदस्यता में ही इस शख्सियत ने शाश्वत सवालों को उठाकर तत्कालीन सरकारों को सोचने और बचाव की मुद्रा में आने के लिए बाध्य किया, भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसी दूसरी नजीर नहीं मिलती। ऐसे में स्वाभाविक ही था कि लोहिया को सरकारी स्तर पर याद किया जाता और उनकी जन्मशताब्दी मनाई जाती। लेकिन ऐसा नहीं हो सका..जबकि इस सरकार और कांग्रेस पार्टी में अब भी लोहियावदी समाजवाद के अब भी कई समर्थक शामिल हैं। उम्मीद तो यह भी थी कि जयप्रकाश और लोहिया के नाम पर तीसरी कतार में खड़े होकर समाजवादी राजनीति करने वाले लोगों के बीच भी कोई हलचल होगी, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा भी नहीं हुआ। ना सिर्फ समाजवादी, बल्कि मार्क्सवादी धारा के लोग भी मानते हैं कि देश में इन दिनों जैसी परिस्थितियां हैं, उनमें लोहिया की राह पर चलते हुए आंदोलन खड़े किए जा सकते हैं और उनके ही जरिए मौजूदा हालात से निबटा जा सकता है। लोहिया जन्मशताब्दी की पूर्व संध्या पर उनकी रचनाओं के लोकार्पण के मौके पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी वर्धन का कहना कि देश में लोहियावादी तरीके से आंदोलन खड़ा करने की परिस्थितियां मौजूद हैं, लेकिन मौजूदा राजनीतिक तंत्र की साख ही संकट में है, लिहाजा जनता भरोसा करने को तैयार नहीं है। &lt;br /&gt;यह सच है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय- दोनों ही मोर्चों पर हालात बेहद तकलीफदेह और कशमकश भरे हैं। महंगाई बेलगाम हो गई है, गरीब की जिंदगी को कौन कहे, निम्न मध्यवर्ग की जिंदगी भी बेकाबू महंगाई से बदहाल होती जा रही है। राजनीतिक तंत्र में भ्रष्टाचार संस्थानिक तौर पर जड़ जमा चुका है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लेकर केंद्रीय मंत्रियों तक पर खुलेआम भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, हसन अली जैसे टैक्स चोर के साथ महाराष्ट्र के तीन-तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के पैसे के लेन-देन की बात सामने आती है, आजाद भारत के इतिहास में दूसरी बार प्रधानमंत्री पर अपनी सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगा है। इन सब मसलों से ऐसा नहीं कि जनता परेशान नहीं है..आम लोगों में रोष नहीं है...लेकिन शहरी इलाकों में आर्थिक उदारीकरण ने जिस तरह जिंदगी के संघर्ष को सामाजिक संघर्षों से भी कहीं ज्यादा बड़ा बना दिया है, इसलिए लोग सब चलता है- कहकर राजनीति और व्यवस्था के साख पर आए संकट को देखने के लिए मजबूर हैं। ऐसे में क्या लोहिया चुप रहते..निश्चित तौर पर वे नए सिरे से आंदोलन खड़ा कर देते, कमजोर लोगों और जनता के हक-हकूक की आवाज उठाना उनका उसूल था, लिहाजा वे अपने इस उसूल से किसी भी कीमत पर समझौते नहीं करते। &lt;br /&gt;भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान, शरद यादव और नीतीश कुमार जैसी शख्सियतें लोहिया और जयप्रकाश की समाजवादी धारा पर ही राजनीति करने का दावा करती रही हैं। कांग्रेस के मुखर प्रवक्ता मोहन प्रकाश भी लोहियावादी राजनीति के पुरोधा रहे हैं। ऐसे में अगर आम लोगों और मजलूमों की सहूलियत की बात करने वाली मनीषा इन राजनेताओं पर टकटकी लगाकर देखती हैं तो यह वाजिब ही है। लेकिन दुर्भाग्यवश समाजवादी धारा के सहारे राजनीति और सत्ता की सीढ़ियां नापती रही राजनेताओं की इस पहली पंक्ति को लोहिया याद तो हैं, लेकिन उनके उसूल लगातार पीछे छूटते गए हैं। हालांकि लोहिया की जन्मशताब्दी की पूर्व संध्या पर राजधानी दिल्ली में एक मंच पर जब लोहियावाद के समर्थक एक मंच पर जुटे तो एक बार फिर यही सवाल उठा कि क्या लोहिया की याद में लोगों की समस्याओं के लिए मैदान में उतरना और समाजवादियों को एक मंच पर लाना जरूरी नहीं हो गया है। शरद यादव हों या रामविलास पासवान या फिर मुलायम सिंह यादव, तीनों कम से कम एक मुद्दे पर सहमत रहे कि अगर मौजूदा हालात के खिलाफ मजबूत आवाज नहीं उठाई गई तो आने वाले वक्त में देश को और भी कठिन हालात और चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। जाहिर है कि इस मौके पर एक बार फिर से तीसरे मोर्चे को जिंदा करने और आम लोगों की राजनीति करने की मांग उठाई गई। इसकी राम विलास पासवान और मुलायम सिंह यादव ने जोरदार शब्दों में वकालत की। लेकिन शरद यादव इस सवाल से कन्नी काट गए। दरअसल राजनीति की दुनिया में रामविलास पासवान की हालत किसी से छुपी नहीं है। पहले लोकसभा और बाद में बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की जो हालत हुई है, उसमें उन्हें समाजवाद और उनकी एकता की याद आनी स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश में दूसरी बड़ी ताकत रहे मुलायम सिंह को भी अपना जनाधार डोलता नजर आ रहा है, लिहाजा उन्हें भी समाजवादी एकता का शिगूफा पसंद आ रहा है। लेकिन क्या यह इतना आसान है। &lt;br /&gt;डॉक्टर राममनोहर लोहिया पर आरोप लगता रहा है कि उन्होंने समाजवादी आंदोलन को बार-बार तोड़ा। 1963 में जब वे फर्रूखाबाद लोकसभा सीट से उपचुनाव में जीतकर संसद पहुंचे, तब एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार ने उनके बारे में लिखा था कि चीनी मिट्टी के बर्तनों में सांड़ घुस आया है। इससे साफ है कि लोहिया को लेकर एक वर्ग की धारणा क्या थी। कुछ इसी अंदाज में 1977 के बाद कई बार समाजवादी पार्टियां टूटीं और बिखरी हैं। उन्होंने अपने नेता लोहिया की इस विरासत को बखूबी संभाले रखा। तीन-तीन बार केंद्र की सत्ता में पहुंचने के बाद समाजवादी धारा के आंदोलन में इतना बिखराव हुआ कि राजनीतिक हलकों में इसे लेकर एक जुमला ही कहा जाने लगा – इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा। लेकिन ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि लोहिया ने समाजवादी आंदोलन को तोड़ा तो उसके पीछे उनके सिद्धांत और उसूल थे। जबकि बाद के दौर में समाजवादी आंदोलन के बिखरने की वजह समाजवादी नेताओं के अहं का आपसी टकराव और वंश-परिवारवाद का बढ़ावा रही है। लोहिया परिवार और वंशवादी राजनीति के खिलाफ थे, लेकिन उनके मौजूदा अनुआयियों के अंदर यह रोग कूट-कूट भर गया है। यही वजह है कि समाजवादी आंदोलन पर जनता का भरोसा कम होता गया है। &lt;br /&gt;कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के खेमे में बंटी भारतीय राजनीति में लोहिया के बहाने समाजवादी धारा के नेता भले ही आपसी एकता की चर्चा चला रहे हों, या फिर एक होना उनकी मौजूदा राजनीतिक मजबूरी हो, लेकिन सच तो यह है कि परिवारवाद और पैसावाद की परिधि से वे बाहर निकलने को तैयार नहीं है। समाजवादी धारा के नेता जब तक इन बुराइयों से दूर थे, अपने प्रभाव क्षेत्र की अधिसंख्य जनता के हीरो थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने उसूलों को तिलांजलि देकर उसी राजनीतिक संस्कृति को अख्तियार करना शुरू किया, जिसके विरोध में उनका पूरा विकास हुआ था, जनता की नजरों से वे उतरते गए। इसके साथ ही समाजवादी धारा की राजनीति की साख पर संकट बढ़ता गया। ऐसे में सवाल उठ सकता है कि उड़ीसा में बीजू जनता दल और हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल की साख अभी – भी क्यों बची हुई है। सच तो यह है कि उनकी साख अपनी समाजवादी सोच से ज्यादा बीजेपी की अपनी कमियों और खामियों के चलते बची हुई है। &lt;br /&gt;तो क्या यह मान लिया जाय कि लोहिया के विचार और समाजवादी सोच पर आधारित उनकी राजनीति के दिन लद गए...इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं है। लेकिन इतना तय है कि जब तक आम आदमी का सही मायने में सशक्तिकरण हो सकेगा, देसी भाषाओं के जरिए लोकतांत्रिक ताकत हासिल नहीं की जा सकेंगी, राजनीति जनता से सीधे ताकत नहीं हासिल करेगी, लोहिया की प्रासंगिकता बनी रहेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-6529156523102427493?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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href="http://feedproxy.google.com/~r/blogspot/xcIxS/~3/giGPpT1sph8/blog-post_11.html" title="समाजवाद की प्रासंगिकता और तीसरी धारा की करवट लेती राजनीति" /><author><name>उमेश चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11750711292912505261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="30" height="32" src="http://bp2.blogger.com/_4JBmBk9bdH8/SGI471UPnHI/AAAAAAAAACk/UfyW4zWNTNo/S220/umesh_chaturvedi_393173724.jpg" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://balliabole.blogspot.com/2011/04/blog-post_11.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CUAEQHo6fCp7ImA9WhZRFU8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-1988508270396874170.post-8475148126763961406</id><published>2011-04-07T02:35:00.000-07:00</published><updated>2011-04-11T05:08:21.414-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-04-11T05:08:21.414-07:00</app:edited><title>रालेगण सिद्धि के गांधी की आवाज</title><content type="html">&lt;strong&gt;उमेश चतुर्वेदी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;संसद और राष्ट्रपति भवन से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित सरदार पटेल भवन की चारदीवारी से सटा मंच पांच अप्रैल की सुबह से ही गुलजार है। उदारीकरण के बाद की चमक-दमक भरी दुनिया में स्मार्ट पर्सनैलिटी और खूबसूरत चेहरे ही आकर्षण का केंद्र माने जा रहे हैं। इसके बावजूद राजधानी के जंतरमंतर रोड पर ठिगने कद का एक बूढ़ा आदमी हजारों लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पांच अप्रैल की सांझ को यहां अपार जनसमुदाय गांधीजी का प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने कहिए गाने में मगन था, उस भीड़ में दो-तीन युवतियां ऐसी भी थीं, जिनके भर हाथ सजे चूड़े बता रहे थे कि उनकी हाल ही में शादी हुई है। लेकिन ठिगने कद के गांधी टोपीधारी अन्ना हजारे के सादे व्यक्तित्व का चुंबक इन युवतियों को भी जंतरमंतर पर खींच लाया है। देश के तमाम कोनों से जुटे बूढ़े-जवान, औरत-मर्द, पढ़े-लिखे, अनपढ़ हर तरह के लोग इस भीड़ में शामिल हैं। वे अन्ना के साथ हैं। अन्ना की जबान जब खुलती है तो वे धाराप्रवाह मराठी बोलते हैं। हिंदी की कुछ लाइनें मराठी में छौंक का काम करती हैं। लेकिन लोग उन्हें सुनने को ब्याकुल हैं। यह नजारा कम से कम उन भारतीयों के लिए राहत का संदेश लेकर आया है, जिन्हें लगता है कि देश में लूट-खसोट चलती रहेगी, अफसर-नेता और कारपोरेट का गठजोड़ जनता की गाढ़ी कमाई से मलाई काटता रहेगा। लेकिन जन लोकपाल बिल की अन्ना हजारे की मांग ने नजारा बदल कर रख दिया है। सूचना के अधिकार के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी, समाजवादी आर्यसमाजी स्वामी अग्निवेश, गोविंदाचार्य सभी इस महायज्ञ में आहुति देने और भ्रष्टाचार का खात्मा करने की लड़ाई में शामिल हो गए हैं। &lt;br /&gt;भ्रष्टाचार पूरे देश में संस्थानिक हालात को प्राप्त कर चुका है। भ्रष्टाचार की आंच में झुलसता आम नागरिक इसे अपनी नियति मानने को मजबूर हो चुका था। लेकिन अन्ना की एक आवाज ने निराशा के इन स्वरों को बदलकर रख दिया है। दुष्यंत कुमार की गजल की वे पंक्तियां एक बार साकार होती नजर आ रही हैं – कौन कहता है आसमां में सूराख नहीं हो सकता/ एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो। अन्ना हजारे ने पत्थर उछाल दिया है, आसमां में सूराख कितना बड़ा होगा, यह तो तय होना बाकी है। लेकिन इस पत्थर की धमक कितनी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अन्ना हजारे से अपना अनशन वापस लेने की मांग की है। लेकिन अन्ना अपनी जिद्द पर अड़े हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, मुख्य सतर्कता आयुक्त पी जे थॉमस की नियुक्ति और कॉमनवेल्थ खेल घोटाले में चौतरफा घिरी सरकार पर अन्ना की मांग का दबाव कितना है, यह प्रधानमंत्री की अपील से साफ है। &lt;br /&gt;यथास्थितिवाद की ओर लगातार कदम बढ़ाते जा रहे देश को लगता था कि जयप्रकाश आंदोलन सामाजिक बदलाव का आखिरी आंदोलन था। हालांकि हमें यह ध्यान रखना होगा कि जयप्रकाश नारायण के शामिल होने के पहले गुजरात विद्यापीठ के छात्रों ने गुजरात सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था। हॉस्टल में बदहाल व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन पूरे राज्य की बदहाली से जुड़ गया। देखते ही देखते इस आंदोलन में पूरे गुजरात का छात्र समुदाय जुट गया। गुजरात की हवा बिहार तक पहुंची और वहां महंगाई, भ्रष्टाचार और बदहाली से जूझ रहे छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा। लेकिन यह आंदोलन पूरी तरह नेतृत्व विहीन था। जयप्रकाश तो छात्र नेताओं की मांग पर आंदोलन की कमान थामने को तैयार हुए। हालांकि अपनी अस्वस्थता के कारण उनका मन तैयार नहीं हो पा रहा था। लेकिन एक बार उन्होंने आंदोलन की कमान क्या थामी, देश में परिवर्तन की नई बयार ही बह चली। इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर उस बदलाव को रोकने और बदहाली-भ्रष्टाचार के खिलाफ उठती आवाजों को दबाने की कोशिश तो की, लेकिन जयप्रकाश लहर के सामने वे कारगर नहीं हो पाईं। 1977 में हुए चुनावों में उन्हें बुरी तरह पराजय का दंश झेलना पड़ा। लेकिन इस आंदोलन की नाकामयाबी ही कही जाएगी कि इससे निकले लालू प्रसाद यादव जैसे नेता बदलाव की बयार के प्रतीक की बजाय पुरानी भ्रष्ट व्यवस्था का ही अंग बन गए। बाद के दौर में लालू-मुलायम अपनी जातियों के नेता के तौर पर ज्यादा जाने जाने लगे। 1974 में चंद्रशेखर ने जयप्रकाश को लिखी एक चिट्ठी में अपनी चिंता जाहिर करते हुए लिखा था कि जो लोग आपके आंदोलन में शामिल हो रहे हैं, वे व्यवस्था बदलने नहीं, बल्कि सत्ता बदलने आ रहे हैं और भविष्य में अपनी जातियों के नेता साबित होंगे। जयप्रकाश आंदोलन के बाद अस्तित्व में आई जनता पार्टी की सरकार को देश ने एक सकारात्मक प्रयोग की तरह देखा, लेकिन यह प्रयोग अपने अंतर्विरोधों के ही चलते असमय ही ध्वस्त हो गया और सार्वजनिक हित के लिए शुरू हुआ आंदोलन खत्म हो गया। इस आंदोलन के पैंतीस साल बाद यह कहने में हर्ज नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस की सत्ता की राजनीति में नाकामयाब रहे नेताओं ने सत्ता हासिल करने के लिए जयप्रकाश का इस्तेमाल किया था। &lt;br /&gt;आंदोलन तो 1987 में भी विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुआई में हुआ। वीपी भी जेपी बनना चाहते थे। लेकिन उनमें और जेपी में अंतर यह था कि जेपी जहां खुद सत्ता से दूर रहने के लिए मानसिक तौर पर तैयार थे, वहीं वी पी सिंह खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे और चंद्रशेखर को सत्ता से दूर रखने के लिए उन्होंने देवीलाल के साथ जो राजनीतिक चौपड़ बिछाई, उससे देश एक बार फिर बदलाव हासिल करने से वंचित रह गया। इन अर्थों में अन्ना हजारे का आंदोलन कुछ अलग है। यह जनांदोलन तो बन चुका है। सामाजिक कार्यकर्ता क्रांति प्रकाश 13 साल की उम्र में ही जयप्रकाश आंदोलन में कूद गए थे। उनके मुताबिक जनआंदोलन में पूरी दुनिया में जनता से चंदा मांगने की रवायत है। लेकिन अन्ना के इस आंदोलन में पैसे की मांग नहीं हो रही है। इस आंदोलन के जरूरी खर्च सामाजिक स्वयंसेवी संगठन उठा रहे हैं। ऐसा नहीं कि जेपी की तरह राजनेता अन्ना के साथ नहीं आ रहे हैं। अन्ना के साथ उमड़ती भीड़ का फायदा उठाने में राजनीतिक दल भी शामिल हो रहे हैं। पांच अप्रैल को धरना स्थल पर जनता दल यूनाइटेड के नेता शरद यादव की मौजूदगी कुछ ऐसे ही संकेत देती है। यही कुछ बिदु हैं, जो इस आंदोलन की सफलता के लिए संशय खड़ा करते हैं। क्योंकि इस देश में नेताओं की तरह एनजीओ की भी साख अच्छी नहीं है। लेकिन अन्ना की अपनी साख और अपना इतिहास पाकसाफ है। नि:स्वार्थ भाव और गांधीवादी तरीके से अपने गांव रालेगांव सिद्धि में जिस तरह वे बदलाव लाने में कामयाब रहे हैं, उससे उनके व्यक्तित्व में चार चांद लग गए हैं। महाराष्ट्र की विलासराव देशमुख सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ अहिंसक तरीके से उन्होंने जो आंदोलन चलाया, उसकी याद आज भी देश के जेहन में ताजा है। उसके चलते विलासराव देशमुख सरकार गिरते-गिरते बची थी। तीन मंत्रियों को उन्हें अपने मंत्रिमंडल से हटाना पड़ा था। यही वजह है कि अन्ना के साथ चलने में बदहाल और लालफीताशाही से जूझते आम नागरिक को सुकून मिल रहा है। यह सुकून ही जनता को उम्मीदों की डोर से बांधे हुए है। ऐसे में यह न मानने की कोई वजह नहीं दिखती कि अन्ना का आंदोलन नाकामयाब होगा। देशभर से जुटे लोगों के समर्थन और उत्साह के सहारे भ्रष्टाचार के खात्मे की दिशा में नया इतिहास जरूर बनेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1988508270396874170-8475148126763961406?l=balliabole.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;
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