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<title><![CDATA[hastakshep | हस्तक्षेप]]></title>
<description><![CDATA[हस्तक्षेप एक स्वतंत्र हिंदी न्यूज़ पोर्टल है जो समसामयिक, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक मुद्दों पर समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ दलित, वंचित, आदिवासी, महिला व छात्र अधिकारों को विशेष महत्व दिया जाता है।]]></description>
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<title>hastakshep | हस्तक्षेप</title>
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<pubDate>Fri, 05 Jun 2026 03:46:27 GMT</pubDate>
<lastBuildDate>Fri, 05 Jun 2026 03:46:27 GMT</lastBuildDate>
<copyright><![CDATA[Hastakshep]]></copyright>
<language><![CDATA[hi]]></language>
<managingEditor><![CDATA[anushka@blinkcms.ai (Hastakshep)]]></managingEditor>
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<title><![CDATA[मोदी और कॅाकरोच का लक्ष्य है कांग्रेस का स्पेस खाओ]]></title>
<description><![CDATA[प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी भारतीय राजनीति, नरेंद्र मोदी सरकार, कांग्रेस, लोकतंत्र और विपक्ष की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हैं। पढ़िए और सुनिए उनका विस्तृत विश्लेषण...]]></description>
<tags>राहुल गांधी,मोदी सरकार,नरेंद्र मोदी,नरेन्द्र मोदी,बीजेपी</tags>
<link>https://hastakshep.com/videos/modi-target-congress-space-prof-jagdishwar-chaturvedi-analysis-303242</link>
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<category><![CDATA[Videos,आपकी नज़र,स्तंभ,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Fri, 05 Jun 2026 03:46:26 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Modi and the cockroach aim to usurp the Congress's space.]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/05/144216-modi-and-the-cockroach-aim-to-usurp-the-congresss-space.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/05/144216-modi-and-the-cockroach-aim-to-usurp-the-congresss-space.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>क्या विपक्ष को खत्म करने की राजनीति चल रही है?</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>"लोकतंत्र का स्पेस खाया जा रहा है" : मोदी सरकार और कॅाकरोच जनता पार्टी पर प्रोफेसर चतुर्वेदी का तीखा हमला
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>कांग्रेस क्यों निशाने पर है? मोदी मॉडल पर बड़ा सवाल
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>क्या भारत में विपक्ष के लिए जगह खत्म की जा रही है?
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>प्रस्तुत पाठ में कांग्रेस के स्पेस को खत्म करने की मुहिम, नरेंद्र मोदी की राजनीति, कांग्रेस की वर्तमान भूमिका और लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई है। आज हम आपके लिए लेकर आए हैं वरिष्ठ चिंतक और मीडिया विश्लेषक प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी का एक महत्वपूर्ण वक्तव्य।
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>प्रोफेसर चतुर्वेदी का तर्क है कि भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसी प्रवृत्ति उभरी है जिसका उद्देश्य केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति के स्पेस को सीमित करना है। (संपादक)
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>मामला मोदी बनाम कांग्रेस नहीं, लोकतंत्र का सवाल है!
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b><span style="font-size: 30px;">प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी</span>
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>कांग्रेस का स्पेस खाओ मुहिम:
</b></p><p style="text-align: justify; ">पिछले 15-16 सालों से "कांग्रेस का स्पेस खाओ" की मुहिम चल रही है। इसका उद्देश्य कांग्रेस द्वारा बनाए गए स्पेस और उसके कार्यों को कलंकित करना और नष्ट करना है। इस मुहिम के तहत विपक्ष को बदनाम किया जाता है, ध्वस्त किया जाता है, विपक्षी दलों में दल-बदल कराया जाता है, कांग्रेस के विधायकों और सांसदों का अपहरण किया जाता है, नेताओं के यहां छापे मारे जाते हैं, और खरीद-फरोख्त की जाती है। जब भी आम लोगों में असंतोष पैदा होता है, तो उसे वास्तविक मुद्दों से भटकाने के लिए कोई न कोई मसला खड़ा किया जाता है, ताकि असंतोष को विभाजन या कांग्रेस के स्पेस के अपहरण में लगाया जा सके।
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी की राजनीति:
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी को भारतीय राजनीतिक इतिहास में पहले ऐसे नेता के रूप में वर्णित किया गया है, जिन्होंने सुनियोजित ढंग से "कांग्रेस का स्पेस खाओ" मुहिम चलाई है। यह कहा गया है कि नरेंद्र मोदी नेहरू से अधिक ताकतवर नहीं हैं, क्योंकि नेहरू ने कभी सीबीआई या ईडी जैसे संगठनों का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं के खिलाफ नहीं किया। इंदिरा गांधी ने आपातकाल में गलती की थी, जिसे उन्होंने स्वीकार किया और कांग्रेस ने दोबारा आपातकाल न लगाने की प्रतिज्ञा की।
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी की राजनीति को "फासिस्ट पद्धति" बताया गया है, क्योंकि वे अपने लिए वोट मांगने के साथ-साथ विपक्ष को कमजोर करने के लिए भी काम करते हैं। वे चुनाव लड़ने से पहले विपक्ष के महत्वपूर्ण नेताओं को दल-बदल कराकर बीजेपी में शामिल करते हैं, या ताकतवर उम्मीदवारों को पैसे देकर खरीद लेते हैं या डरा-धमकाकर चुनाव लड़ने से रोकते हैं। यह पद्धति दिखाती है कि नरेंद्र मोदी को अपनी राजनीति पर भरोसा नहीं है, बल्कि उन्हें "डंडे" पर भरोसा है। उन्हें खुलकर कहना चाहिए कि वे डंडे, पैसे और दल-बदल की राजनीति करना चाहते हैं, न कि डेवलपमेंट या डेमोक्रेसी का ढोल बजाना चाहिए।
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी ने एक "अलिखित घोषणा पत्र" बनाया है, जिसकी पहली प्रतिज्ञा है "कांग्रेस का स्पेस खाओ" और जहां भी चुनाव हों, वहां विपक्ष को नेस्तनाबूत करो। इसके लिए दल-बदल, दल तोड़ना या बुलडोज करना जैसे तरीके अपनाए जाते हैं। यह प्रक्रिया बिहार, उत्तराखंड, यूपी और बंगाल सहित कई राज्यों में देखी गई है।
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी की बुनियादी राजनीतिक विशेषता:
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी की बुनियादी राजनीतिक विशेषता "कांग्रेस का स्पेस खाओ" है, जिसका अर्थ केवल कांग्रेस पार्टी का स्पेस खाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र के स्पेस को खाना है। जो नेता या पार्टी लोकतंत्र के स्पेस को निगल जाए, वह जनतांत्रिक नहीं हो सकती। बीजेपी और नरेंद्र मोदी अपनी खुराक पर नहीं, बल्कि "डेमोक्रेसी की खुराक" पर जिंदा हैं। वे डेमोक्रेसी को खाकर ही अपना पेट भरते हैं और जब तक वे विपक्षी दलों के लोकतांत्रिक स्पेस को नष्ट नहीं कर देते, तब तक उनका विकास नहीं होगा। इस मॉडल को "फासिस्ट मॉडल" बताया गया है।
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी को विपक्ष के बिना डेमोक्रेसी और चुनाव चाहिए, और उन्हें चंदा चाहिए, लेकिन विपक्ष को चंदा नहीं मिलना चाहिए। जब जनता में असंतोष पैदा होता है और सरकार जनता की समस्या हल नहीं कर पाती, तो उस असंतोष को भटकाने के लिए गैर-जरूरी मसले और संगठन खड़े किए जाते हैं, ताकि असंतुष्ट जनता कांग्रेस के साथ न जाए।
</p><p style="text-align: justify; ">लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियां:
</p><p style="text-align: justify; ">भारत की सबसे बुनियादी समस्या 2010 के आसपास से "डेमोक्रेसी के स्पेस को खाओ" है। कांग्रेस से विद्वेष इसलिए नहीं है कि वह विपक्ष में है, बल्कि इसलिए है कि कांग्रेस लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध है। बीजेपी को उन सभी से परेशानी है जो लोकतांत्रिक मूल्यों और अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी का तीसरा बड़ा फिनोमिना है "डेमोक्रेसी का डेवलपमेंट हजम करो", "डेमोक्रेसी का स्पेस हजम करो" और "डेमोक्रेसी के लिए लड़ने वाले संगठनों को हजम करो या अपाहिज करो"। ये तीनों चीजें एक साथ व्यवस्थित रूप से चल रही हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">राष्ट्रीय संपदा का निजीकरण:
</p><p style="text-align: justify; ">भारत जब आजाद हुआ था, तब यहां कुछ नहीं बनता था, लेकिन जब नरेंद्र मोदी के हाथ में आया, तब यहां हर चीज बनती थी। नरेंद्र मोदी ने सारे डेवलपमेंट को विध्वंस के कगार पर खड़ा कर दिया है। सरकारी संरक्षण में सार्वजनिक क्षेत्र में हुए विकास को नरेंद्र मोदी ने निर्ममता से निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया है। अदानी, अंबानी या टाटा जैसे पूंजीपतियों को बंदरगाह, एयरपोर्ट और रेलवे का पूरा सिस्टम गिफ्ट में दे दिया गया है, जबकि उन्होंने कभी इन पर एक ईंट भी नहीं लगाई थी। नरेंद्र मोदी ने हिंदुस्तान की सारी संपदा उन पूंजीपतियों को सौंप दी है, जो पब्लिक सेक्टर में बनी थी और जनता की संपत्ति थी। इस प्रकार, "कांग्रेस का स्पेस खाओ" मुहिम केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के शासन में अर्जित राष्ट्रीय संपदा को भी खाने का काम कर रही है।
</p><p style="text-align: justify; ">अमेरिकी लॉबी और कठपुतली सरकार:
</p><p style="text-align: justify; ">कांग्रेस के खिलाफ अमेरिकी लॉबी नेहरू के जमाने से सक्रिय रही है, जो ऐसी राजनीतिक शक्तियों को खड़ा करने की कोशिश करती रही है जो कांग्रेस को ध्वस्त करें और उनके कठपुतली की तरह काम करें। नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी ने कठपुतली बनने से इनकार कर दिया था, लेकिन नरेंद्र मोदी ने इनकार नहीं किया। आज नरेंद्र मोदी अमेरिका की कठपुतली सरकार की तरह काम कर रहे हैं, जो विदेश नीति और गृह नीति दोनों में एक बड़ा बदलाव है।
</p><p style="text-align: justify; ">कॉर्पोरेट हाउस भी सरकारी संपदा को अपनी संपदा बनाने के लिए कटिबद्ध थे, लेकिन कांग्रेस के शासन में वे ऐसा नहीं कर पाए। नरेंद्र मोदी के शासन में यह काम चुटकी में होने लगा। प्रधानमंत्री कॉर्पोरेट हाउसेस के एजेंट की तरह विदेश यात्राएं करते हैं और समझौते कराते हैं, जो भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। कांग्रेस के पूंजीपतियों से संबंध थे, लेकिन कांग्रेस की सरकार कभी पूंजीपतियों की कठपुतली नहीं थी।
</p><p style="text-align: justify; ">लोकतांत्रिक संस्थानों का क्षरण:
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की स्वायत्तता को खत्म कर दिया है। सिर्फ कांग्रेस का स्पेस ही खत्म नहीं हुआ, बल्कि डेमोक्रेसी में जनता का लोकतांत्रिक स्पेस और लोकतांत्रिक संस्थानों, पदों का स्पेस और उनका अर्थ भी खत्म हो गया है।
</p><p style="text-align: justify; ">कांग्रेस की वर्तमान भूमिका:
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी को कांग्रेस और विपक्ष से इतनी नफरत है क्योंकि वे डेमोक्रेसी के स्पेस के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। फासीवाद के जितने भी चरण हो सकते हैं, भारत अब उन्हें देखेगा, क्योंकि विपक्ष को निस्तनाबूत करने की मुहिम चल रही है। जब जनता में असंतोष होता है, तो उसे भटकाने के लिए विश्व हिंदू प्रसाद, गुर्जर आंदोलन या कॅाकरोच जनता पार्टी जैसे फ्रंट संगठन लॉन्च किए जाते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">कांग्रेस अब जनता की समस्याओं पर आंदोलन कर रही है, जो पहले नहीं करती थी। कांग्रेस ने अपने सांगठनिक ढांचे का कायाकल्प किया है और डेमोक्रेसी, लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थानों के लिए प्रतिबद्ध है। वह जनता के साथ हर स्तर पर जुड़ने की कोशिश कर रही है, चाहे जुलूस निकालकर, बयान देकर, रील बनाकर या सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर। यह कांग्रेस की भावना लोकतंत्र की लाइफलाइन है।
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी के लिए असल चिंता की जगह यही है कि कांग्रेस आंदोलन क्यों कर रही है। कांग्रेस के आंदोलन से नरेंद्र मोदी की नींद हराम हो गई है। वे दिल्ली में जुलूस नहीं करने देते, और जहां उनकी राज्य सरकारें हैं, वहां भी जुलूसों को लाठीचार्ज, गिरफ्तारी और झूठे मुकदमों से दबाया जाता है। कांग्रेस के वकील उन लोगों की मुफ्त में कानूनी मदद कर रहे हैं, जिन पर पुलिस का दमन है। यह दमन के दौर में जनता की अदालत में मदद करने, मीडिया में कवरेज क्रिएट करने और दमन के दौर में साथ खड़े होने की कांग्रेस की कोशिश है।
</p><p style="text-align: justify; ">कांग्रेस ने अपने राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर जनतंत्र के स्पेस और जनतांत्रिक आवाज की सुरक्षा के लिए खड़ा होना शुरू कर दिया है, जैसा कि बंगाल चुनाव के बाद टीएमसी के आरोपों और आंदोलन को राहुल गांधी के बिना शर्त समर्थन से देखा गया। कांग्रेस ने तय कर रखा है कि वह डेमोक्रेसी के साथ जाएगी।
</p><p style="text-align: justify; ">निष्कर्ष:
</p><p style="text-align: justify; ">नरेंद्र मोदी और उनके अनुयायियों को यह गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए कि वे लोकतंत्र और कांग्रेस के स्पेस को व्यापक दमन के बाद भी खत्म कर सकते हैं। जाति, धर्म और हेट संगठनों का इस्तेमाल करने की उनकी टैक्टिक्स अब थक चुकी हैं और उन्हें ज्यादा मदद नहीं कर पाएंगी। डेमोक्रेसी में एक रेखा खींच चुकी है, और कांग्रेस ने डेमोक्रेसी के साथ जाने का फैसला किया है। लोकतंत्र और कांग्रेस के स्पेस को बचाना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।</p><div draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="https://www.youtube.com/embed/J5EA5lEFP-Q?autoplay=0" max-width="100%" height="360" class="video-element note-video-clip"></iframe></div>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
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<title><![CDATA[FCI साइलो परियोजना पर अडानी का बढ़ता दबदबा: CPI(M) ने खाद्य सुरक्षा ढांचे के निगमीकरण पर जताई गंभीर चिंता]]></title>
<description><![CDATA[FCI साइलो परियोजना में अडानी-लीप इंडिया की बढ़ती हिस्सेदारी पर CPI(M) ने चिंता जताई है। पार्टी ने खाद्य सुरक्षा ढांचे के निगमीकरण और एकाधिकार पर सवाल उठाए हैं।]]></description>
<tags>देश दुनिया की लाइव खबरें,भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी,CPI(M),खाद्य सुरक्षा</tags>
<link>https://hastakshep.com/politics/cpim-opposes-adani-leap-india-monopoly-fci-silo-food-security-303113</link>
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<category><![CDATA[Breaking News,देश,राजनीति,समाचार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 04 Jun 2026 03:41:08 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[CPI(M) Polit Bureau Demands a Halt to Adani-Leap India's Takeover of India’s Public Food Security Infrastructure]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/04/143625-cpim-polit-bureau-demands-a-halt-to-adani-leap-indias-takeover-of-indias-public-food-security-infrastructure.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/04/143625-cpim-polit-bureau-demands-a-halt-to-adani-leap-indias-takeover-of-indias-public-food-security-infrastructure.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>भारत की खाद्य सुरक्षा पर कॉर्पोरेट कब्ज़ा? CPI(M) ने अडानी-लीप इंडिया के एकाधिकार पर उठाए सवाल
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>FCI साइलो योजना में अडानी को बढ़त: माकपा ने एकाधिकार-विरोधी प्रावधान बहाल करने की मांग की
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>खाद्य सुरक्षा बनाम कॉर्पोरेट नियंत्रण: FCI साइलो अनुबंधों पर CPI(M) का सरकार पर हमला
</b></li></ul><h3 style="text-align: justify; "><b>अडानी-लीप इंडिया को मिले अधिकांश साइलो अनुबंध, CPI(M) ने बताया खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b>माकपा ने आरोप लगाया है कि FCI की साइलो आधुनिकीकरण योजना के जरिए भारत के खाद्य सुरक्षा ढांचे पर कॉर्पोरेट नियंत्रण बढ़ाया जा रहा है। पार्टी ने अडानी-लीप इंडिया के बढ़ते वर्चस्व को रोकने और एकाधिकार-विरोधी प्रावधान बहाल करने की मांग की है।
</b></p><h4 style="text-align: justify; "><b>CPI(M) पोलित ब्यूरो ने भारत के सार्वजनिक खाद्य सुरक्षा बुनियादी ढांचे पर अडानी-लीप इंडिया के कब्ज़े को रोकने की मांग की।
</b></h4><p style="text-align: justify; ">भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पोलित ब्यूरो ने 3 जून, 2026 को एक बयान जारी किया है, जिसमें अडानी-लीप इंडिया द्वारा भारत के सार्वजनिक खाद्य सुरक्षा बुनियादी ढांचे पर कब्ज़ा करने को रोकने की मांग की गई है।
</p><p style="text-align: justify; ">माकपा पोलित ब्यूरो ने कहा है कि न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय खाद्य निगम (FCI) की साइलो आधुनिकीकरण योजना में अडानी-लीप इंडिया का एकाधिकार भारत के सार्वजनिक खाद्य सुरक्षा बुनियादी ढांचे के निगमीकरण का एक खतरनाक प्रयास है। अडानी ने कथित तौर पर 134 साइलो अनुबंधों में से 110 हासिल किए हैं, जिनकी कीमत 16,500 करोड़ रुपये से अधिक है, जिससे उन्हें भारत के अनाज भंडारण नेटवर्क के एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण मिल गया है।
</p><p style="text-align: justify; ">माकपा पोलित ब्यूरो ने कहा है कि FCI ने शुरू में ऐसे परिणाम को रोकने के लिए एक "एकाधिकार-विरोधी" खंड का प्रस्ताव किया था, लेकिन इसके बावजूद, दोनों कंपनियां मिलकर कुल 60 लाख मीट्रिक टन अनाज में से अनुमानित 46.5 लाख मीट्रिक टन अनाज इन साइलो में संग्रहीत करेंगी।
</p><p style="text-align: justify; ">अडानी एग्री लॉजिस्टिक्स लिमिटेड, जो अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड का हिस्सा है, इस परियोजना के तहत साइलो को वितरण केंद्रों से जोड़ने के लिए एक बड़ा निजी रेलवे नेटवर्क बना रहा है। इस प्रकार, FCI योजना अडानी समूह को खरीद से लेकर भंडारण, परिवहन और निर्यात तक आपूर्ति श्रृंखला के सभी स्तरों पर अपना नियंत्रण मजबूत करने में सक्षम बनाएगी।
</p><p style="text-align: justify; ">माकपा पोलित ब्यूरो ने कहा है कि खुलासे के अनुसार, NITI आयोग और आर्थिक मामलों के विभाग के हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप FCI द्वारा प्रस्तावित "एकाधिकार-विरोधी" खंड को हटा दिया गया, ताकि "गहरी बैलेंस शीट" वाली कंपनियों का पक्ष लिया जा सके। इसे तीन कृषि कानूनों की हार के बाद भारतीय कृषि के निगमीकरण को पिछले दरवाजे से धकेलने का प्रयास बताया गया है। सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी के संबंध में किसानों से किए गए वादे का सम्मान करने से इनकार कर दिया है, और इसके बजाय रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सार्वजनिक वितरण प्रणाली और परिणामस्वरूप भारत की खाद्य सुरक्षा को कमजोर कर रही है।
</p><p style="text-align: justify; ">CPI(M) ने साइलो योजना में एकाधिकार-विरोधी खंड को तत्काल बहाल करने की मांग की है। सार्वजनिक निवेश को FCI के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना चाहिए, न कि इसे निजी एकाधिकारों को सौंपना चाहिए। एक संयुक्त सार्वजनिक निजी भागीदारी मूल्यांकन समिति और सरकारी मंत्रालय बड़े व्यापारिक घरानों द्वारा नियंत्रण के केंद्रीकरण को सुविधाजनक बना रहे हैं। सभी लोकतांत्रिक ताकतों को भारत के खाद्य सुरक्षा बुनियादी ढांचे पर कॉर्पोरेट अधिग्रहण का विरोध करने के लिए एकजुट होना चाहिए।</p><div draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/l348G8Hkz1c" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></div>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[युद्ध खत्म, हथियार नहीं: घोस्ट गन, 3डी-प्रिंटेड हथियार और तस्करी नेटवर्क कैसे बन रहे हैं वैश्विक शांति के लिए नया खतरा]]></title>
<description><![CDATA[युद्ध समाप्त होने के बाद भी अवैध हथियार हिंसा को बढ़ाते रहते हैं। घोस्ट गन, 3डी-प्रिंटेड हथियार और तस्करी नेटवर्क वैश्विक सुरक्षा के लिए नई चुनौती बन रहे हैं]]></description>
<tags>देश दुनिया की लाइव खबरें,मानवाधिकार</tags>
<link>https://hastakshep.com/human-rights/ghost-gun-3d-printed-weapons-illegal-arms-trafficking-global-peace-threat-303108</link>
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<category><![CDATA[Breaking News,दुनिया,देश,समाचार,मानवाधिकार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 04 Jun 2026 02:56:00 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[The War Is Over, But Not the Weapons: How Ghost Guns, 3D-Printed Arms, and Smuggling Networks Are Becoming a New Threat to Global Peace]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/04/143622-the-war-is-over-but-not-the-weapons-how-ghost-guns-3d-printed-arms-and-smuggling-networks-are-becoming-a-new-threat-to-global-peace.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/04/143622-the-war-is-over-but-not-the-weapons-how-ghost-guns-3d-printed-arms-and-smuggling-networks-are-becoming-a-new-threat-to-global-peace.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>युद्ध समाप्त होने के बाद भी क्यों बने रहते हैं हथियारों के खतरे?
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>घोस्ट गन क्या हैं और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए ये क्यों हैं चुनौती?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>3डी-प्रिंटेड हथियार: तकनीक का नया और खतरनाक इस्तेमाल
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>छोटे और हल्के हथियार कैसे बनते हैं लंबे समय तक हिंसा का स्रोत?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>लीबिया से सहेल तक: संघर्ष क्षेत्रों से फैलते हथियारों का नेटवर्क
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>अवैध हथियारों का संबंध अपराध, आतंकवाद और मानवाधिकार उल्लंघनों से कैसे जुड़ता है?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में अवैध हथियारों का बढ़ता प्रभाव
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>अवैध हथियारों की रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक पहल
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>कोफ़ी अन्नान ने छोटे हथियारों को ‘वास्तविक विनाश के हथियार’ क्यों कहा था?
</b></li></ul><h3 style="text-align: justify; "><b>वैश्विक शांति और विकास के लिए हथियारों पर नियंत्रण क्यों जरूरी है?
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b>युद्ध और संघर्ष खत्म होने के बाद भी हथियार समाजों का पीछा नहीं छोड़ते। घोस्ट गन, 3डी-प्रिंटेड हथियार और अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क कैसे अपराध, आतंकवाद और अस्थिरता को बढ़ा रहे हैं,<a href="https://news.un.org/hi/story/2026/06/1088219" target="_blank">संयुक्त राष्ट्र समाचार </a>की इस खबर से जानिए संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी...</b></p><h4><b>हथियार नहीं छोड़ते पीछा इनसान का, जगह बदलकर करते रहते हैं विनाश
</b></h4><p>3 जून 2026 शान्ति और सुरक्षा
</p><p>युद्ध या हिंसक संघर्ष, कुछ समय बाद भले ही सुर्ख़ियों से ओझल हो जाएँ, लेकिन उनमें इस्तेमाल किए गए हथियार अक्सर लम्बे समय तक प्रचलन में बने रहते हैं. ये हथियार सीमाएँ पार करके अपराध को बढ़ावा देते हैं और नाज़ुक शान्ति प्रयासों को कमज़ोर करते हैं. अब ‘घोस्ट गन’, 3डी-प्रिंटेड हथियार और हथियारों की तस्करी के लगातार अधिक बेहतर होते नैटवर्क, दुनिया भर की सरकारों के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहे हैं.
</p><p>इस सप्ताह संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सदस्य देशों के प्रतिनिधि, अवैध हथियारों के वैश्विक प्रसार पर विचार-विमर्श कर रहे हैं. ये ऐसे हथियार हैं जो युद्ध समाप्त होने के बाद भी समुदायों में हिंसा को बढ़ावा देते रहते हैं.
</p><p>इस चर्चा का मुख्य केंद्र उभरती टेक्नोलॉजी हैं. इस विषय पर विशेषज्ञों का कहना है कि टैक्नोलॉजी के कारण अवैध हथियारों का निर्माण पहले की तुलना में आसान और उनका पता लगाना अधिक कठिन हो सकता है.
</p><p>संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष निरस्त्रीकरण अधिकारी इज़ुमी नाकामित्सु ने यूएन न्यूज़ से कहा, “युद्ध समाप्त हो जाते हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश उन हिंसक टकरावों में इस्तेमाल किए गए हथियार पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ पाते. वे प्रचलन में बने रहते हैं, कभी उन्हें छिपा दिया जाता है और कई बार उन्हें सीमाओं के पार ले जाया जाता है.”
</p><p><b>'घोस्ट गन' और 3डी-प्रिंटेड हथियार
</b></p><p>विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे तेज़ी से उभरती चिन्ताओं में तथाकथित ‘घोस्ट गन’ शामिल हैं. ये ऐसे हथियार होते हैं जिन्हें अलग-अलग पुर्ज़ों या किटों को जोड़कर तैयार किया जाता है और जिन पर कोई क्रम संख्या (serial numbers) नहीं होती, जिससे उनका पता लगाना, क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है.
</p><p>वहीं, 3डी-प्रिंटिंग तकनीक में प्रगति ने नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर दी हैं. इसके ज़रिए हथियारों के पुर्ज़े और कुछ मामलों में पूरे कार्यशील हथियार भी पारम्परिक विनिर्माण और नियामक व्यवस्था से बाहर तैयार किए जा सकते हैं.
</p><p>देशों की सरकारों के बीच यह चिन्ता बढ़ रही है कि ऐसी तकनीक के अधिक सुलभ और सस्ती होने से अवैध हथियारों का निर्माण आसान और उनका नियमन अधिक कठिन हो सकता है.
</p><p>इज़ुमी नाकामित्सु ने कहा, “यदि इन हथियारों या उनके पुर्ज़ों को अलग-अलग करके उनकी तस्करी की जाती है, तो उनका पता लगाना और भी मुश्किल हो जाता है.”
</p><p><b>छोटे और हल्के हथियार
</b></p><p>इसके साथ ही, छोटे हथियारों में पिस्तौल, रिवॉल्वर और असॉल्ट राइफ़ल जैसे हथियार शामिल हैं, जिन्हें एक व्यक्ति चला सकते हैं.
</p><p>वहीं, हल्के हथियारों (Light weapons) की श्रेणी में ग्रेनेड लांचर, मशीन गन तथा ढोकर ले जाई जा सकने वाली वायु-रोधी और टैंक-रोधी प्रणालियाँ आती हैं, जिन्हें संचालित करने के लिए एक छोटे दल की आवश्यकता होती है.
</p><p>ये हथियार, तुलनात्मक रूप से सस्ते, टिकाऊ और उपयोग में आसान होने के कारण, दशकों तक प्रचलन में बने रह सकते हैं.
</p><p>साथ ही, गोला-बारूद भी एक बड़ी चुनौती है. विशेषज्ञों के अनुसार, अवैध रूप से प्रचलित हथियारों तक गोला-बारूद की निरन्तर पहुँच हिंसक संघर्ष, अपराध और आतंकवाद को लम्बे समय तक जारी रख सकती है.
</p><p><b>युद्ध के बाद भी चलन में
</b></p><p>इसका एक प्रमुख उदाहरण लीबिया है, जहाँ 2011 में मुअम्मार गद्दाफ़ी के शासन के अन्त के दौरान और उसके बाद लूटे गए या अवैध रूप से फैलाए गए हथियार, बाद में पूरे सहेल क्षेत्र में दिखाई दिए. इनमें निजेर, बुर्कीना फ़ासो और नाइजीरिया जैसे देश शामिल हैं.
</p><p>इनमें से कुछ हथियार बाद में चरमपंथी समूहों के हाथों में पहुँच गए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि एक संघर्ष में इस्तेमाल हुए हथियार वर्षों बाद पड़ोसी देशों की स्थिरता के लिए भी ख़तरा बन सकते हैं.
</p><p>इज़ुमी नाकामित्सु ने कहा, “किसी (हिंसक) संघर्ष का अन्त होने का अर्थ यह नहीं है कि उन हथियारों का प्रसार भी समाप्त हो जाता है. वे बने रहते हैं और लोगों को नुक़सान पहुँचाते रहते हैं.”
</p><p><b>व्यापक पहुँच से चिन्ता
</b></p><p>अवैध हथियारों का असर अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न है, लेकिन इसकी पहुँच व्यापक है.
</p><p>लातीनी अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्र में अवैध हथियार, संगठित अपराध और दुनिया की सबसे ऊँची हत्या दरों से जुड़े हुए हैं.
</p><p>संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, इस क्षेत्र के कुछ हिस्सों में हिंसक मौतों के 70 से 80 प्रतिशत मामलों में आग्नेयास्त्रों (firearms) का इस्तेमाल होता है.
</p><p>वहीं, उप-सहारा अफ़्रीका के कई क्षेत्रों में छोटे हथियारों का प्रसार शान्ति निर्माण प्रयासों को कमज़ोर कर सकता है.
</p><p>सशस्त्र समूहों, मिलिशिया या आत्मरक्षा के लिए समुदायों के पास बने रहने वाले हथियार, हिंसा और अस्थिरता को फिर से बढ़ावा दे सकते हैं.
</p><p>अवैध हथियारों के दुष्परिणाम केवल हिंसक संघर्षों तक सीमित नहीं हैं. इनका सम्बन्ध मानवाधिकार उल्लंघनों, आतंकवाद तथा यौन और लैंगिक हिंसा से भी है.
</p><p>इज़ुमी नाकामित्सु ने कहा, “यह केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं है. यह शान्ति निर्माण, मानवाधिकारों और विकास से भी जुड़ा हुआ विषय है.”
</p><p><b>यूएन के क़दम…
</b></p><p>संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों ने छोटे और हल्के हथियारों से उत्पन्न होने वाले ख़तरों के मद्देनज़र, वर्ष 2001 में एक कार्य योजना अपनाई थी.
</p><p>इस कार्य योजना के तहत देशों ने राष्ट्रीय क़ानूनों को मज़बूत करने, हथियार भंडारों की सुरक्षा बढ़ाने, अवैध तस्करी से निपटने और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करने की प्रतिबद्धता जताई.
</p><p>इसके बाद. साल 2005 में ‘अन्तरराष्ट्रीय अनुरेखण साधन’ (International Tracing Instrument) को अपनाया गया, जिसने अवैध हथियारों की पहचान, रिकॉर्ड रखने और उनका पता लगाने के लिए वैश्विक मानक स्थापित किए.
</p><p>यह व्यवस्था जाँचकर्ताओं को यह पता लगाने में मदद करती है कि <b><i>अवैध हथियार कहाँ से आए </i></b>और वे गैर-क़ानूनी बाज़ारों तक कैसे पहुँचे.
</p><p>साथ ही, इससे वैध भंडारों से हथियारों के अवैध हाथों में पहुँचने का जोखिम भी कम होता है.
</p><p>संयुक्त राष्ट्र, तकनीकी सहायता, नीतिगत मार्गदर्शन और क्षमता-विकास कार्यक्रमों के माध्यम से देशों को हथियार भंडारों की सुरक्षा, उनके बारे में जानकारी रखने की प्रणालियों में सुधार और सीमा नियंत्रण को मज़बूत बनाने में सहायता प्रदान करता है.
</p><p><b>विनाश की वजह हैं हथियार
</b></p><p><b><a href="https://www.un.org/sg/en/content/kofi-annan" target="_blank">पूर्व यूएन महासचिव कोफ़ी अन्नान</a></b> ने इस बात पर बल दिया था कि छोटे हथियार वास्तव में दुनिया के “<b><i>वास्तविक विनाश के हथियार</i></b>” हो सकते हैं, क्योंकि ये बड़े पैमाने पर मौत और चोट का कारण बनते हैं.
</p><p>यह चुनौती केवल घातक हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंसा को कम करने, समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और हिंसक संघर्षों के फिर से भड़कने से रोकने से भी जुड़ी है.
</p><p>इज़ुमी नाकामित्सु ने कहा कि अवैध हथियारों के प्रसार को कम करने से दुनिया भर के समुदायों को लाभ होगा.
</p><p>उन्होंने कहा, “यह बहुत से लोगों के लिए एक वास्तविक मुद्दा है. हम सभी समाजों में छोटे हथियारों के उचित नियंत्रण और विनियमन चाहते हैं. इससे निश्चित रूप से सभी का जीवन अधिक सुरक्षित और संरक्षित होगा.”
</p>]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[राहुल से BJP क्यों डरती है? सुप्रिया श्रीनेत ने गिनाईं 20 बड़ी वजहें]]></title>
<description><![CDATA[कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने राहुल गांधी के समर्थन में भाजपा और आलोचकों पर तीखा हमला बोला। जानिए राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस के बड़े दावे]]></description>
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<category><![CDATA[देश,राजनीति,समाचार]]></category>
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<pubDate>Wed, 03 Jun 2026 08:32:37 GMT</pubDate>
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<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/videothumb/yt_full_321Ka2sFFsI.jpg' /><p style="text-align: justify; "><b>राहुल गांधी को सर्टिफिकेट नहीं चाहिए!" कांग्रेस का पलटवार: BJP से ज्यादा 'लिबरल्स' निशाने पर? राहुल गांधी के बचाव में कांग्रेस का बड़ा हमला</b></p><h2 style="text-align: justify; "><b>"राहुल गांधी को किसी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं"—सुप्रिया श्रीनेत ने गिनाईं वजहें, भाजपा और आलोचकों पर साधा निशाना
</b></h2><p style="text-align: justify; "><b>Rahul Gandhi does not need anyone's certificate: Supriya Shrinate
</b></p><p style="text-align: justify; ">नई दिल्ली। कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का जोरदार बचाव करते हुए कहा है कि उन्हें अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता साबित करने के लिए किसी के "सर्टिफिकेट" की आवश्यकता नहीं है। सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किए गए एक विस्तृत पोस्ट में उन्होंने न केवल भाजपा बल्कि उन उदारवादी आलोचकों (Liberals) पर भी निशाना साधा, जो उनके अनुसार भाजपा से पहले राहुल गांधी को कठघरे में खड़ा करते हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>"प्रत्यक्षम किम प्रमाणम"
</b></p><p style="text-align: justify; ">सुप्रिया श्रीनेत ने लिखा कि <b>राहुल गांधी</b> इस देश के नेता प्रतिपक्ष के रूप में लगातार सरकार को चुनौती दे रहे हैं, जनता के मुद्दे उठा रहे हैं और लोकतांत्रिक जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने संस्कृत उक्ति "प्रत्यक्षम किम प्रमाणम" का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके कामकाज को देखने के बाद किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती।
</p><p style="text-align: justify; "><b>आलोचकों से सीधे सवाल
</b></p><p style="text-align: justify; ">अपने पोस्ट में श्रीनेत ने कई सवालों की श्रृंखला रखी। उन्होंने पूछा कि राहुल गांधी के अलावा ऐसा कौन-सा विपक्षी नेता है जिसके बारे में कहा जा सके कि वह किसी भी परिस्थिति में भाजपा से समझौता नहीं करेगा। उन्होंने यह भी पूछा कि कौन-सा नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों और उद्योगपति गौतम अडानी से जुड़े मुद्दों पर लगातार सवाल उठाता रहा है।
</p><p style="text-align: justify; ">कांग्रेस प्रवक्ता ने दावा किया कि राहुल गांधी उन चुनिंदा नेताओं में हैं जिन्हें केंद्रीय एजेंसियों के दबाव से झुकाया नहीं जा सका और जिनकी एक सोशल मीडिया पोस्ट भी राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन जाती है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>भारत जोड़ो यात्रा का उल्लेख
</b></p><p style="text-align: justify; ">श्रीनेत ने <b>राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा</b> का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि <b>कन्याकुमारी से कश्मीर तक की पदयात्रा </b>केवल राजनीतिक अभियान नहीं थी, बल्कि सामाजिक संवाद और राष्ट्रीय एकता का प्रयास थी। उनके अनुसार इस यात्रा ने राहुल गांधी को सीधे जनता के बीच पहुंचाया और विभिन्न वर्गों की समस्याओं को समझने का अवसर दिया।
</p><p style="text-align: justify; "><b>किसानों, दलितों और आदिवासियों का मुद्दा
</b></p><p style="text-align: justify; ">पोस्ट में राहुल गांधी के राजनीतिक जीवन के कई प्रसंगों का उल्लेख किया गया। इनमें किसानों के भूमि अधिकारों, भूमि अधिग्रहण कानून, आदिवासी अधिकारों, दलित परिवारों के बीच जाकर संवाद स्थापित करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को उठाने का दावा किया गया।
</p><p style="text-align: justify; ">सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि राहुल गांधी ने किसानों, मजदूरों, युवाओं, छात्रों, सफाई कर्मचारियों, ऑटो चालकों और समाज के वंचित तबकों के मुद्दों को लगातार उठाया है। उन्होंने संविधान की रक्षा और सामाजिक न्याय को राहुल गांधी की राजनीति का केंद्रीय तत्व बताया।
</p><p style="text-align: justify; "><b>राजनीतिक संदेश
</b></p><p style="text-align: justify; ">इस पोस्ट के जरिए कांग्रेस ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह राहुल गांधी को विपक्ष की राजनीति का सबसे प्रमुख चेहरा मानती है। पार्टी का तर्क है कि लगातार राजनीतिक हमलों, आलोचनाओं और दुष्प्रचार अभियानों के बावजूद राहुल गांधी केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्षी राजनीति की मुख्य आवाज बने हुए हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>हस्तक्षेप
</b></p><p style="text-align: justify; ">सुप्रिया श्रीनेत का यह बयान केवल राहुल गांधी के बचाव तक सीमित नहीं है। यह विपक्षी राजनीति के भीतर चल रही उस बहस का भी हिस्सा है, जिसमें नेतृत्व, वैचारिक प्रतिबद्धता और <b>भाजपा के खिलाफ संघर्ष की रणनीति </b>पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कांग्रेस का संदेश साफ है—वह राहुल गांधी को केवल पार्टी नेता नहीं, बल्कि भाजपा के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। दूसरी ओर, आलोचक इस दावे को राजनीतिक प्रचार का हिस्सा मानते हैं। ऐसे में यह बहस आने वाले समय में और तेज होने की संभावना है।
</p>]]></content:encoded>
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