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<title><![CDATA[hastakshep | हस्तक्षेप]]></title>
<description><![CDATA[हस्तक्षेप एक स्वतंत्र हिंदी न्यूज़ पोर्टल है जो समसामयिक, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक मुद्दों पर समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ दलित, वंचित, आदिवासी, महिला व छात्र अधिकारों को विशेष महत्व दिया जाता है।]]></description>
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<title>hastakshep | हस्तक्षेप</title>
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<pubDate>Tue, 06 Oct 2026 01:55:43 GMT</pubDate>
<lastBuildDate>Tue, 06 Oct 2026 01:55:43 GMT</lastBuildDate>
<copyright><![CDATA[Hastakshep]]></copyright>
<language><![CDATA[hi]]></language>
<managingEditor><![CDATA[anushka@blinkcms.ai (Hastakshep)]]></managingEditor>
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<title><![CDATA[क्या चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की? नए Form-6 पर SIR विवाद और 27 मई के फैसले का सच]]></title>
<description><![CDATA[SIR विवाद में नए Form-6 पर चुनाव आयोग के दावे की पड़ताल। क्या सुप्रीम कोर्ट ने Declaration Form को मंजूरी दी थी? जानिए 27 मई के फैसले और 26 सितंबर के EC प्रेस नोट का सच।]]></description>
<tags>सुप्रीम कोर्ट,सुप्रीम कोर्ट के फैसले,चुनाव आयोग,चुनाव आयोग विवाद 2025</tags>
<link>https://hastakshep.com/aapki-najar/election-commission-supreme-court-contempt-new-form-6-sir-324383</link>
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<category><![CDATA[आपकी नज़र,कानून,समाचार,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 06 Oct 2026 01:55:41 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[The sham Election Commission committed contempt of the Supreme Court.]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/10/06/221240-the-sham-election-commission-committed-contempt-of-the-supreme-court.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/10/06/221240-the-sham-election-commission-committed-contempt-of-the-supreme-court.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>‘सुप्रीम कोर्ट ने नए Form-6 को मंजूरी दी’—क्या चुनाव आयोग का दावा झूठा है और अवमानना का मामला बनता है?
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list hocalwire-unordered-list"><li style="text-align: justify;"><b>बिहार SIR से नए Form-6 तक: चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के बीच विवाद की पूरी कहानी
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>SIR विवाद: सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के फैसले में Form-6 को लेकर क्या कहा गया था?
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>बिहार SIR, नए Form-6 और चुनाव आयोग के दावे पर बड़ा सवाल: क्या सुप्रीम कोर्ट ने नए मतदाताओं के लिए जोड़े गए Declaration Form को मंजूरी दी थी? 27 मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले, चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों, ECINET पर लागू नए Form-6 और 26 सितंबर के चुनाव आयोग के प्रेस नोट के आधार पर पूरे विवाद का विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार सिंह .....
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>झूठे चुनाव आयोग ने की सुप्रीम कोर्ट की अवमानना
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b><span style="font-size: 24px;">मुकेश कुमार सिंह</span>
</b></p><p style="text-align: justify; ">1. 	चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को बिहार SIR की घोषणा की।
</p><p style="text-align: justify; ">2.	SIR के इस आदेश की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी।
</p><p style="text-align: justify; ">3.	सुप्रीम कोर्ट में इस पर लम्बी सुनवाई चली और आख़िरकार 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी करके अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया।
</p><p style="text-align: justify; ">4.	चार महीने बाद 27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने SIR को ये कहकर सही ठहराया कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची का शुद्धिकरण है और इसके लिए चुनाव आयोग अधिकृत है।
</p><p style="text-align: justify; ">5.	27 मई 2026 के जारी 124 पेज़ के फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहीं भी फॉर्म-6 में बदलाव किये जाने को मंज़ूरी नहीं दी।
</p><p style="text-align: justify; ">6.	27 मई 2026 के इस फ़ैसले के पैरा 45(f) में सिर्फ़ ये कहा गया है कि ‘किसी भी नये मतदाता को Form-6 के साथ एक घोषणा करनी होगी जो उस संलग्नक-D के रूप में होगी, जिसका ज़िक्र 24 जून 2026 के नोटिफिकेशन में किया गया है। कृपया इसके पेज़ 18 और 19 देखें। [45(f): Any new voter was required to submit Form 6 along with a Declaration Form in Annexure D of the Impugned Order.]
</p><p style="text-align: justify; ">7.	यहाँ नये मतदाता के लिए Form-6 के साथ जो घोषणापत्र संलग्न है, उसमें कहीं भी उसके माता-पिता या दादा-दादी या नाना-नानी के साथ मैपिंग की बात नहीं की गयी है। सिर्फ़ ये कहा गया है कि घोषणापत्र के समर्थन में उन्हें कौन-कौन से दस्तावेज़ के प्रति पेश करनी होगी। इस सूची ने आधार नम्बर का विकल्प नहीं है। इसे भी सुप्रीम कोर्ट ने अपनी लम्बी सुनवाई के दौरान जोड़ने का आदेश दिया था।
</p><p style="text-align: justify; ">8.	बिहार के बाद बंगाल समेत देश के क़रीब दर्जन भर राज्यों में SIR का विस्तार किया गया। अब चुनाव आयोग ने मनमाने ढंग से Form-6 के घोषणापत्र में बदलाव कर दिया। ये बदलाव सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के फ़ैसले से पहले ही एकतरफ़ा ढंग से लागू कर दिया गया।
</p><p style="text-align: justify; ">9.	27 मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से पहले 16 मई को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखा कि Form-6 के साथ जोड़ी गई नयी घोषणा (Declaration) को सरकार की मंज़ूरी के बग़ैर [Don’t change Form-6 (new voter) without Govt. approval] नहीं लागू करना चाहिए। तीन दिन बाद 19 मई 2026 को चुनाव आयुक्त एस एस सन्धु ने भी इसी चेतावनी को दोहराया। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनकी IT Team, headed by DG(IT) Seema Khanna, ने अपनी मनमानी जारी रखी और अवैध Form-6 को प्रभावी बनाए रखा गया।
</p><p style="text-align: justify; ">10. 	05 जुलाई 2026 की रात से ECINET पोर्टल पर नया वोटर बनने के लिए ऑनलाइन आवेदन करने वालों के लिए वो विवादित और अवैध नया Form-6 अपलोड हो गया जिसमें आवेदक के लिए ये बताना अनिवार्य कर दिया गया कि क्या उसके माँ-बाप या दादा-दादी या नाना-नानी पिछले SIR में भारत के मतदाता थे? यदि हाँ तो उस वक़्त वो जिस बूथ के मतदाता थे उसका नम्बर और उनका मतदाता क्रमांक बताइए।  इस सन्दर्भ में बेहद रोचक और विरोधाभासी तथ्य ये भी कि पोर्टल से Form-6 डाउनलोड करने पर वही पुराना फॉर्म प्राप्त हो रहा था, जिसमें ऐसी घोषणा का प्रावधान नहीं था।
</p><p style="text-align: justify; ">11.	नये Form-6 से जुड़े उपरोक्त तथ्यों का खुलासा इंडियन एक्सप्रेस की 12 जुलाई 2026 की स्टोरी में हुआ। जबकि 23 सितम्बर 2026 को इंडियन एक्सप्रेस के धमाकेदार ख़ुलासे से ये साफ़ हुआ था कि 16 और 19 मई को दोनों चुनाव आयुक्तों यानी सन्धु और जोशी की ओर से अलग-अलग आपत्ति जताने के बावजूद ज्ञानेश कुमार ने सरकार की मंज़ूरी हासिल किये बग़ैर की नया Form-6 लागू कर दिया। जबकि ऐसा करने को दोनों चुनाव आयुक्तों ने बाक़ायदा ‘अनाधिकृत और ग़ैरक़ानूनी’ [unauthorized and illegal] बताया था और इसे ‘फ़ौरन हटाये जाने योग्य’ [must be removed immediately] कहा था।
</p><p style="text-align: justify; ">12. 	26 सितम्बर 2026 को जारी हुए प्रेस नोट में चुनाव आयोग का आख़िरी स्पष्टीकरण ये था कि उसे आयोग की पूर्ण बैठक की मंज़ूरी के बाद जारी किया जा रहा है। [4. This Press Note is issued as per the decisions of the meeting of the Commission held on 26.09.2026 and has the approval of the full Commission.] इसी प्रेस नोट के पैरा 1.(iii) में दावा किया गया है कि ‘The declaration attached to Form 6 for SIR has been upheld by the Hon’ble Supreme Court.’ यानी नये Form-6 में जोड़ी गयी घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है।
</p><p style="text-align: justify; ">13.	05 अक्टूबर 2026 की सुनवाई के दौरान CJI ने कहा कि हमने कभी नये फ़ॉर्म-6 को सही नहीं ठहराया है। लिहाज़ा, चुनाव आयोग का दावा सरासर ग़लत है। सच्चाई भी यही है कि सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के फ़ैसले में कहीं भी नये फ़ॉर्म-6 में जोड़ी गयी ‘घोषणा’ को चुनाव आयोग ने सही नहीं ठहराया है। सच्चाई ये भी है कि सुप्रीम कोर्ट के पास ऐसा कोई क्षेत्राधिकार भी नहीं है कि जिस काम को करने का दायित्व सरकार (क़ानून मंत्रालय) का है, उसे किये जाने से पहले ही वो उसे सही ठहरा दे।
</p><p style="text-align: justify; ">14.	फ़ॉर्म-6 में बदलाव करने का अधिकार सिर्फ़ सरकार या संसद को है। इसी बात को लेकर मई में ही दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जतायी थी, तो फिर 26 सितम्बर 2026 में हुई बैठक में उन्होंने ये कैसे स्वीकार कर लिया कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘नये फ़ॉर्म-6 में जोड़ी गयी घोषणा को’ सही ठहराया है।  जिस काम को सुप्रीम कोर्ट कर ही नहीं सकती, वो सुप्रीम कोर्ट ने किया ही नहीं, उसे पूर्ण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला कैसे बता दिया?
</p><p style="text-align: justify; ">15.	तीनों चुनाव आयुक्तों की ओर से आमसहमति से झूठा और ग़ैरक़ानूनी दावा करना न सिर्फ़ आपराधिक काम है, बल्कि ऐसा करके उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की अवमानना भी की है। ये अक्षम्य अपराध है और संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को भी इसकी सज़ा अवश्य मिलनी चाहिए क्योंकि उसके अवैध, अनाधिकृत, असंवैधानिक तथा दुर्भावनापूर्ण फ़ैसले से देश के 13 करोड़ से ज़्यादा मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से काट दिये गये। जबकि क़ानून में साफ़ कहा गया है कि उचित नोटिस और सुनवाई की प्रक्रिया को पूरा किये बग़ैर किसी भी मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाया नहीं जा सकता। ऐसा करना पूरी तरह से आपराधिक काम है और इसके लिए बाक़ायदा सज़ा का भी विधान है।
</p><p style="text-align: justify; ">16.	लिहाज़ा, 26 सितम्बर 2026 का प्रेस नोट इस बात की स्वीकारोक्ति है कि नये फ़ॉर्म-6 को तीनों चुनाव आयुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट के सहमति का हवाला देकर सही बताया है। ये आपराधिक मिलीभगत का सबूत है। मई में जो आपत्ति सन्धु और जोशी ने जताई थी, उसे 26 सितम्बर 2026 को उन्होंने भी कैसे सही मान लिया? जबकि इस दौरान न तो सरकार ने फ़ॉर्म-6 में बदलाव किया और ना ही सुप्रीम कोर्ट ने सहमति दी। साफ़ है कि ज्ञानेश कुमार के पाप और अपराध में भले ही मई में सन्धु और जोशी शामिल नहीं रहे हों, लेकिन अब तो वो तीन अपराध के गुनाहगार हैं। पहला, जब ज्ञानेश कुमार मनमानी कर रहे थे तब वो चुनाव आयोग में ख़ामोश क्यों रहे? दूसरा, 12 जुलाई के ख़ुलासे के बाद दोनों आयुक्तों ने ही अपनी ओर से ये सफ़ाई नहीं क्यों नहीं दी वो ज्ञानेश कुमार के गुनाहों के साझीदार नहीं हैं। और तीसरा, 26 सितम्बर को ज्ञानेश के साथ मिलकर इन दोनों आयुक्तों ने भी ये झूठा दावा किया कि नये फ़ॉर्म-6 की घोषणा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सहमति दी है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>अब आगे क्या?
</b></p><p style="text-align: justify; ">सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से उसके झूठे दावों को लेकर सफ़ाई माँगी है। ये प्राकृतिक न्याय के उस सिद्धान्त के तहत है जिसमें दोषी को अपना बचाव करने का मौक़ा दिया जाता है। हालाँकि, उपरोक्त ब्यौरे से साफ़ है कि चुनाव आयोग गुनाहगार है। सज़ा का हक़दार है। सज़ा के दो आयाम होने चाहिए। जो कुछ ग़लत हुआ है उसे दुरुस्त किया जाए और ग़लती करने वाले को सज़ा दी जाए।
</p><p style="text-align: justify; ">बिहार SIR के बाद जिस ढंग से बाक़ी राज्यों में SIR हुआ है, उसे सुप्रीम कोर्ट अवैध घोषित करे। अवैध SIR के आधार पर हुए चुनाव भी अवैध हैं, लिहाज़ा चुनाव रद्द किए जाएँ। सरकारें भंग की जाएँ। नये सिरे से SIR पूर्व की मतदाता सूची को वैसे शुद्ध किया जाए जैसे पहले किया जाता था। यानी मृत लोग का नाम हटाया जाए, नये वयस्कों का नाम पुराने फ़ॉर्म-6 के ज़रिये ही जोड़ा जाए और डुप्टीकेट तथा निवास बदलने वाले लोगों का नाम भी वैसे ही दुरुस्त किया जाए, जैसी प्रक्रिया SIR से पहले लागू थी।
</p><p style="text-align: justify; ">SIR के रूप में लोकतंत्र का हत्या करने वाले चुनाव आयोग को तुरन्त बर्ख़ास्त किया जाए। सुप्रीम कोर्ट को इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 142 में पूरी तरह से अधिकार-सम्पन्न बनाया गया है। जैसे सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवन्त वर्मा को इस्तीफ़ा देने का निर्देश दिया था वैसे ही तीन चुनाव आयुक्तों को इस्तीफ़ा देने का निर्देश दिया जाए। तीनों चुनाव आयुक्तों को जेल भेजा जाए और इनके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा चलाया जाए। क्योंकि इन्हें अपने संवैधानिक दायित्वों को निभाने के लिए जो विशेषाधिकार दिये गये हैं, वो आपराधिक कुकर्मों की सज़ा से बचने के लिए ढाल का काम नहीं कर सकते।
</p><p style="text-align: justify; ">चुनाव आयुक्तों को पद से हटाने का काम भले ही संसद में महाभियोग पारित करके ही सम्भव है, लेकिन उनके अपराधों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को उन्हें इस्तीफ़ा देने के लिए तो कहना ही चाहिए।
</p><p style="text-align: justify; "><b>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, कई टीवी चैनलों में संपादक रहे हैं)
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>FAQs
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>क्या सुप्रीम कोर्ट ने नए Form-6 को मंजूरी दी थी?
</b></p><p style="text-align: justify; ">27 मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में नए मतदाताओं के लिए Form-6 के साथ Declaration Form का उल्लेख है। लेख में तर्क दिया गया है कि फैसले में Form-6 में बाद में जोड़े गए माता-पिता अथवा दादा-दादी/नाना-नानी की मतदाता सूची से मैपिंग संबंधी प्रावधान को मंजूरी नहीं दी गई थी।
</p><p style="text-align: justify; "><b>SIR क्या है और बिहार में इसकी शुरुआत कब हुई?
</b></p><p style="text-align: justify; ">SIR यानी Special Intensive Revision (विशेष गहन पुनरीक्षण) मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। लेख के अनुसार, चुनाव आयोग ने बिहार में SIR की घोषणा 24 जून 2025 को की थी, जिसकी संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
</p><p style="text-align: justify; "><b>27 मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में Form-6 को लेकर क्या कहा गया?
</b></p><p style="text-align: justify; ">लेख में उद्धृत फैसले के पैरा 45(f) में नए मतदाता द्वारा Form-6 के साथ Annexure-D में दिए गए Declaration Form को प्रस्तुत करने का उल्लेख है। लेख का दावा है कि फैसले में बाद में लागू किए गए नए Form-6 की विवादित घोषणा को मंजूरी नहीं दी गई।
</p><p style="text-align: justify; "><b>नए Form-6 में क्या बदलाव किया गया था?
</b></p><p style="text-align: justify; ">लेख के अनुसार, नए ऑनलाइन Form-6 में आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसके माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी पिछले SIR में भारत के मतदाता थे या नहीं और यदि थे तो संबंधित बूथ तथा मतदाता क्रमांक क्या था।
</p><p style="text-align: justify; "><b>चुनाव आयुक्तों ने नए Form-6 पर आपत्ति क्यों जताई?
</b></p><p style="text-align: justify; ">लेख में 16 मई 2026 को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और 19 मई 2026 को चुनाव आयुक्त एस. एस. संधु की आपत्तियों का उल्लेख है। उनके अनुसार, सरकार की मंजूरी के बिना Form-6 में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए था।
</p><p style="text-align: justify; "><b>चुनाव आयोग ने 26 सितंबर 2026 के प्रेस नोट में क्या दावा किया?
</b></p><p style="text-align: justify; ">26 सितंबर 2026 के प्रेस नोट में चुनाव आयोग ने कहा कि SIR से संबंधित Form-6 के साथ लगाया गया Declaration सुप्रीम कोर्ट द्वारा upheld किया गया है। यही दावा वर्तमान विवाद का प्रमुख केंद्र है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर 2026 की सुनवाई में क्या कहा?
</b></p><p style="text-align: justify; ">लेख के अनुसार, 5 अक्टूबर 2026 की सुनवाई के दौरान CJI ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने नए Form-6 को कभी मंजूरी नहीं दी थी। इसलिए चुनाव आयोग के 26 सितंबर के दावे की सत्यता और उसके कानूनी आधार पर सवाल उठे हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>क्या चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मामला बन सकता है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">यह एक कानूनी प्रश्न है जिसका अंतिम निर्धारण सुप्रीम कोर्ट ही कर सकता है। यदि किसी न्यायालय के आदेश या निर्णय को जानबूझकर गलत तरीके से प्रस्तुत करने अथवा उसकी अवहेलना करने का आरोप हो, तो अदालत संबंधित पक्ष से स्पष्टीकरण मांग सकती है और परिस्थितियों के आधार पर अवमानना की कार्यवाही पर विचार कर सकती है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>SIR के कारण कितने मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए?
</b></p><p style="text-align: justify; ">लेख में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम प्रभावित होने का दावा किया गया है। इस संख्या को प्रकाशित करते समय चुनाव आयोग अथवा संबंधित आधिकारिक दस्तावेज से स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना उचित होगा।
</p><p style="text-align: justify; "><b>क्या सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयुक्तों को पद से हटा सकता है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">चुनाव आयुक्तों को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया अलग है और उसमें संसद की भूमिका है। हालांकि, अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों और उसके दायरे का प्रश्न अलग संवैधानिक एवं न्यायिक मुद्दा है। इसलिए लेख में इसे स्थापित तथ्य के बजाय संवैधानिक बहस/लेखक की मांग के रूप में रखना अधिक सुरक्षित होगा।
</p><p style="text-align: justify; "><b>क्या SIR के आधार पर हुए चुनाव रद्द किए जा सकते हैं?
</b></p><p style="text-align: justify; ">केवल SIR को विवादित या अवैध बताए जाने से चुनाव स्वतः अवैध नहीं हो जाते। किसी चुनाव को रद्द करने के लिए संबंधित संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों तथा न्यायिक निष्कर्षों का परीक्षण आवश्यक होगा। इसलिए यह लेख में सुप्रीम कोर्ट से की गई मांग के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, स्थापित कानूनी परिणाम के रूप में नहीं।</p><section draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/oaTiN90h7v0" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></section>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
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<title><![CDATA[हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर ख़ुसरो: सूफ़ी संत और सांप्रदायिक सद्भाव]]></title>
<description><![CDATA[जस्टिस मार्कंडेय काटजू और सीनियर वकील व सांसद कपिल सिब्बल ने हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह का दौरा किया, जब संत का 723वां उर्स मनाया जा रहा था।]]></description>
<tags>काटजू,जस्टिस काटजू,जस्टिस काटजू का लेख,जस्टिस मार्कंडेय काटजू</tags>
<link>https://hastakshep.com/column/justice-markandey-katju-kapil-sibal-nizamuddin-auliya-dargah-723rd-urs-2026-324108</link>
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<category><![CDATA[आपकी नज़र,धर्म-समाज-त्योहार,समाचार,स्तंभ,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Sun, 04 Oct 2026 09:32:45 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Hazrat Nizamuddin Auliya and Amir Khusro: Sufi saints and communal harmony]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/10/04/220045-hazrat-nizamuddin-auliya-and-amir-khusro-sufi-saints-and-communal-harmony.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/10/04/220045-hazrat-nizamuddin-auliya-and-amir-khusro-sufi-saints-and-communal-harmony.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का 723वां उर्स : जस्टिस काटजू और कपिल सिब्बल ने दिल्ली दरगाह का दौरा किया, प्रेम और सांप्रदायिक सद्भाव के सूफी मूल्यों पर प्रकाश डाला
</b></h2><p style="text-align: justify; "><b>सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू और वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल ने <i>प्रसिद्ध सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के 723वें उर्स </i>के दौरान 3 अक्टूबर, 2026 को <i>दिल्ली में हजरत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह </i>का दौरा किया। दरगाह के सज्जादा नशीन, <i>सैयद फरीद अहमद निज़ामी</i> द्वारा स्वागत किया गया, उन्होंने हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और उनके प्रसिद्ध शिष्य अमीर खुसरो की मज़ारों पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। अपने विवरण में, जस्टिस काटजू प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और भाईचारे की सूफी परंपराओं को दर्शाते हैं, और उन्हें अकबर के सुलह-ए-कुल के सिद्धांत - सभी धर्मों और समुदायों के लिए समान सम्मान - से जोड़ते हैं। यह यात्रा भारत में आस्था और सामाजिक सद्भाव के साझा स्थानों के रूप में दरगाहों की भूमिका पर भी प्रकाश डालती है।
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>3 अक्टूबर 2026 को उनके 723वें उर्स पर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह की यात्रा
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b>द्वारा <span style="font-size: 26px;">जस्टिस मार्कंडेय काटजू</span> 
</b></p><p style="text-align: justify; ">भारत जबरदस्त विविधता का देश है, इसलिए इसे एकजुट रखने और प्रगति के पथ पर रखने का एकमात्र तरीका सुलह-ए-कुल या सभी धर्मों और समुदायों को समान सम्मान देना है, जो महान मुगल सम्राट अकबर (1542-1605) द्वारा घोषित किया गया था।
</p><p style="text-align: justify; "><a href="https://www.hastakshepnews.com/2023/11/why-does-justice-katju-consider-mughal.html" target="_blank"><b>जस्टिस काटजू मुगल सम्राट अकबर को भारतीय राष्ट्रपिता क्यों मानते हैं?</b></a><b></b></p><p style="text-align: justify; ">भारत के सूफ़ी संत, जो मुसलमान थे, सभी मनुष्यों के बीच प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और भाईचारे का उपदेश देते थे, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, जो सुलह-ए-कुल की नीति के अनुरूप है।</p><p style="text-align: justify; "><b><a href="https://www.hastakshepnews.com/2025/10/the-urs-of-sufi-saint-hazrat-nizamuddin.html" target="_blank">दरगाहें</a></b> इन सूफी संतों की कब्रों पर बने पूजास्थल हैं। आमतौर पर हिंदू, मुस्लिम मस्जिदों में नहीं जाते हैं, और मुस्लिम, हिंदू मंदिरों में नहीं जाते हैं। लेकिन सभी दरगाहों पर जाते हैं (अक्सर दरगाहों पर मुसलमानों की तुलना में हिंदू अधिक होते हैं)। इसलिए दरगाहें हमें एकजुट करती हैं, और जो कुछ भी हमें एकजुट करता है वह मुझे पसंद है, और मैं अक्सर दरगाहों पर जाता हूं।
</p><p style="text-align: justify; "><b><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/Urs" target="_blank">उर्स </a></b>एक दरगाह में दफ़नाए गए सूफ़ी संत की बरसी है। इसे शोक मनाने के बजाय उत्सव मनाया जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि संत अपनी मृत्यु पर भगवान के साथ एकजुट हो गए थे। इस अवसर पर दरगाह में कव्वाली संगीत गाया जाता है और अन्य प्रकार से जश्न मनाया जाता है
</p><p style="text-align: justify; "><b><a href="https://en.wikipedia.org/wiki/निजामुद्दीन_औलिया" target="_blank">हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया</a></b> (1238-1325) एक प्रसिद्ध सूफ़ी संत थे, जिनकी दरगाह दिल्ली में है
</p><p style="text-align: justify; ">उन्होंने सभी मनुष्यों के बीच प्रेम और भाईचारे का उपदेश दिया, चाहे वे किसी भी धर्म के हों। यहां उनके और उनके प्रमुख शिष्य <b><a href="https://www.hastakshepnews.com/2023/09/justice-katju-on-nizamuddin-aulia-and.html" target="_blank">अमीर खुसरो के बारे में एक कहानी </a></b>है:
</p><p style="text-align: justify; ">पिछले साल 12 अक्टूबर 2025 को हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के 722वें उर्स पर मैं अपने दोस्त पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री सलमान ख़ुर्शीद के साथ उनकी दरगाह पर गया था, जिसके बारे में मैंने नीचे लेख लिखा है:</p><p style="text-align: justify; "><a href="https://www.hastakshepnews.com/2025/10/justice-katju-and-salman-khurshids.html" target="_blank"><b>जस्टिस काटजू और सलमान खुर्शीद का निज़ामुद्दीन औलिया के उर्स का दौरा: सद्भाव का प्रतीक </b></a><b></b></p><p style="text-align: justify; ">इस वर्ष, 3 अक्टूबर 2026 को, मेरे मित्र कपिल सिब्बल, सांसद, पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट, और मैंने संत के 723वें उर्स के दौरान दिल्ली के हजरत निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह का दौरा किया।</p><p style="text-align: justify; ">सज्जादा नशीन और दरगाह की प्रबंध समिति के अध्यक्ष सैयद फरीद अहमद निज़ामी ने हमारा स्वागत किया। वह पहले हमें एक कमरे में ले गए और हमें चाय और कुछ नाश्ता दिया और हमें संत के बारे में कुछ कहानियाँ सुनाईं। इनमें से एक कहानी यह थी कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने अपने सहयोगियों को सख्त निर्देश दिए थे कि वे किसी भी आगंतुक का धर्म न पूछें, बल्कि पहले उसे भोजन और पानी दें, और फिर पूछें कि क्या उसे कोई समस्या है, और उसकी मदद करने का प्रयास करें।
</p><p style="text-align: justify; ">फ़रीद साहब हमें पहले <b><a href="https://justicekatju.blogspot.com/2014/08/dargah-of-hazrat-amir-khusro.html" target="_blank">हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया</a></b> के प्रमुख शिष्य <b><a href="https://www.hastakshepnews.com/2023/07/amir-khusro.html" target="_blank">अमीर ख़ुसरो</a></b> की दरगाह पर ले गए, और फिर उनकी दरगाह (जो एक दूसरे के बगल में हैं) में ले गए। वहां हमने प्रत्येक के मकबरे (कब्र) पर फूल बरसाए और उन पर चादर चढ़ाई (जैसा कि रिवाज है)।
</p><p style="text-align: justify; "><b><a href="https://www.hastakshepnews.com/2024/08/the-legacy-of-nizamuddin-aulia-and-amir.html" target="_blank">हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया </a></b>के प्रमुख शिष्य अमीर ख़ुसरो, जिनकी दरगाह निज़ामुद्दीन औलिया के बगल में है, को अक्सर भारतीय कला और संस्कृति में उनके विविध योगदान को देखते हुए, भारत के माइकल एंजेलो के रूप में वर्णित किया जाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">(जस्टिस मार्कंडेय काटजू भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष और भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं।)
</p><p style="text-align: justify; "><b>अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>1. 2026 में 723वें उर्स के दौरान हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर कौन गया था?
</b></p><p style="text-align: justify; ">न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल ने सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के 723वें उर्स के दौरान 3 अक्टूबर, 2026 को दिल्ली में हजरत निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह का दौरा किया।
</p><p style="text-align: justify; "><b>2. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का उर्स क्या है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">उर्स एक सूफी संत की पुण्यतिथि का स्मरणोत्सव है। सूफ़ी परंपरा में, इसे संत का ईश्वर से मिलन माना जाता है और इसलिए इसे उत्सव के रूप में मनाया जाता है.
</p><p style="text-align: justify; "><b>3. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया कौन थे?
</b></p><p style="text-align: justify; ">हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (1238–1325) भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे मशहूर सूफी संतों में से एक थे। उनकी शिक्षाओं में इंसानों के बीच प्यार, दया, आध्यात्मिक भक्ति और भाईचारे पर ज़ोर दिया गया था।
</p><p style="text-align: justify; "><b>4. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह कहाँ है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाके में है। उनके मशहूर शिष्य और कवि अमीर खुसरो का मज़ार भी पास ही में है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>5. अमीर खुसरो कौन हैं?
</b></p><p style="text-align: justify; ">अमीर खुसरो मध्यकालीन भारत के एक मशहूर कवि, संगीतकार और सांस्कृतिक हस्ती थे और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के मुख्य शिष्य थे। भारतीय साहित्य और संगीत संस्कृति के विकास में उनके योगदान ने अहम भूमिका निभाई।
</p><p style="text-align: justify; "><b>6. सुलह-ए-कुल क्या है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">सुलह-ए-कुल, जिसका मतलब है "सबके साथ शांति" या सार्वभौमिक शांति, मुगल बादशाह अकबर की धार्मिक सहिष्णुता और अलग-अलग धार्मिक समुदायों के प्रति समान सम्मान की नीति से जुड़ी है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>7. जस्टिस मार्कंडेय काटजू दरगाहों को सामाजिक सद्भाव का प्रतीक क्यों मानते हैं?
</b></p><p style="text-align: justify; ">जस्टिस काटजू का तर्क है कि दरगाहों ने ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया है। वे इन साझा जगहों को ऐसी जगहों के तौर पर देखते हैं जहाँ अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ आ सकते हैं, जो सहिष्णुता, भाईचारे और सांप्रदायिक सद्भाव की मूल्यों को दर्शाते हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>8. दरगाह की यात्रा के दौरान जस्टिस काटजू और कपिल सिब्बल के साथ क्या हुआ?
</b></p><p style="text-align: justify; ">दरगाह की प्रबंध समिति के अध्यक्ष और सज्जादा नशीन, सैयद फरीद अहमद निज़ामी ने उनका स्वागत किया। उन्होंने हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से जुड़ी कहानियाँ सुनीं, अमीर खुसरो और निज़ामुद्दीन औलिया के मज़ारों पर गए, और परंपरा के अनुसार मज़ारों पर फूल चढ़ाए और चादरें पेश कीं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>9. जस्टिस काटजू ने हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की किस शिक्षा पर ज़ोर दिया है? </b></p><p style="text-align: justify; ">इस लेख में एक परंपरा का ज़िक्र है जिसके तहत निज़ामुद्दीन औलिया ने अपने सहयोगियों को निर्देश दिया था कि वे किसी आने वाले व्यक्ति से सबसे पहले उसका धर्म न पूछें, बल्कि उसे खाना-पानी दें और पूछें कि क्या उसे कोई ऐसी परेशानी है जिसमें मदद की जा सकती है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>10. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का 723वां उर्स क्यों महत्वपूर्ण है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">723वां उर्स हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की आध्यात्मिक विरासत और दया, सहनशीलता व भाईचारे की व्यापक सूफी परंपराओं को याद करने का अवसर देता है, साथ ही भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के लंबे इतिहास पर भी विचार करने का मौका देता है।</p><section draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/bMMJNc6KJxs" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></section>]]></content:encoded>
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