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<title><![CDATA[hastakshep | हस्तक्षेप]]></title>
<description><![CDATA[हस्तक्षेप एक स्वतंत्र हिंदी न्यूज़ पोर्टल है जो समसामयिक, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक मुद्दों पर समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ दलित, वंचित, आदिवासी, महिला व छात्र अधिकारों को विशेष महत्व दिया जाता है।]]></description>
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<title>hastakshep | हस्तक्षेप</title>
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<pubDate>Tue, 15 Sep 2026 06:41:52 GMT</pubDate>
<lastBuildDate>Tue, 15 Sep 2026 06:41:52 GMT</lastBuildDate>
<copyright><![CDATA[Hastakshep]]></copyright>
<language><![CDATA[hi]]></language>
<managingEditor><![CDATA[anushka@blinkcms.ai (Hastakshep)]]></managingEditor>
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<title><![CDATA[समुद्र 100 दिन तक रिकॉर्ड गर्म रहा तो कीमत कौन चुकाएगा? जलवायु संकट, भारत और तटीय अर्थव्यवस्था]]></title>
<description><![CDATA[2026 में समुद्र का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर क्यों है. समुद्र 100 दिन तक रिकॉर्ड गर्म रहने का क्या मतलब है. समुद्री गर्मी का भारत पर क्या असर होगा. समुद्री हीटवेव मछुआरों को कैसे प्रभावित करती है]]></description>
<tags>प्रशांत महासागर,जलवायु संकट,जलवायु परिवर्तन</tags>
<link>https://hastakshep.com/samachar/climate-change/record-ocean-heat-100-days-2026-climate-change-india-coastal-economy-320806</link>
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<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन,दुनिया,देश,समाचार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 15 Sep 2026 06:41:49 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[The sea level is rising silently; the danger has reached us.]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/04/09/111650-the-sea-level-is-rising-silently-the-danger-has-reached-us.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/04/09/111650-the-sea-level-is-rising-silently-the-danger-has-reached-us.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>2026 की रिकॉर्ड समुद्री गर्मी: मछुआरों, कोरल रीफ, खाद्य कीमतों और तटीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?
</b></h2><p style="text-align: justify; "><b>2026 में करीब 100 दिनों तक रिकॉर्ड समुद्री गर्मी का संभावित दौर जलवायु संकट के बढ़ते आर्थिक और सामाजिक असर का संकेत है। समुद्र का बढ़ता तापमान मछली पालन, कोरल रीफ, समुद्री पर्यटन, जलीय कृषि, ऊर्जा ढांचे और भारत के तटीय समुदायों को कैसे प्रभावित कर सकता है? डॉ. सीमा जावेद का यह लेख समुद्री हीटवेव, अल नीनो और मानवजनित जलवायु परिवर्तन के संबंध तथा समुद्र की गर्मी की आर्थिक कीमत की पड़ताल करता है...
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>समुद्र 100 दिन तक रिकॉर्ड गर्म रहा तो कौन चुकाएगा कीमत ?
</b></h3><p style="text-align: justify; ">अगर किसी शहर में लगातार 100 दिनों तक तापमान रिकॉर्ड स्तर पर बना रहे, तो हम इसे बड़ी खबर मानेंगे। लेकिन यही बात जब महासागर के साथ होती है, तो उसका असर हमारी नजर से काफी हद तक बाहर रहता है।
</p><p style="text-align: justify; ">2026 में दुनिया के महासागर कुछ ऐसी ही असाधारण गर्मी से गुजर रहे हैं। उपलब्ध दैनिक समुद्री सतह तापमान आंकड़ों के मुताबिक, 2 जून से वैश्विक समुद्री सतह का तापमान, ध्रुवीय इलाकों को छोड़कर, साल के इस समय के लिए रिकॉर्ड स्तरों पर बना हुआ है। यह स्थिति 10 सितंबर तक जारी रहती है तो करीब 100 दिनों तक रिकॉर्ड समुद्री गर्मी का दौर बन सकता है।
</p><p style="text-align: justify; ">23 अगस्त को वैश्विक दैनिक समुद्री सतह तापमान 21.24 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का प्रारंभिक आंकड़ा सामने आया। यह मार्च 2024 के 21.17 डिग्री सेल्सियस के पिछले दैनिक रिकॉर्ड से ऊपर है। हालांकि 23 अगस्त के आंकड़े की अंतिम पुष्टि अभी बाकी है।
</p><p style="text-align: justify; ">क्लाइमेट सेंट्रल के जलवायु वैज्ञानिक डॉ. जैकरी लेब के मुताबिक, 2026 में समुद्री गर्मी के रिकॉर्ड जिस तरह टूट रहे हैं, उनके पीछे मानवजनित जलवायु परिवर्तन की बड़ी भूमिका है। उनका कहना है कि इसका असर चरम मौसम से लेकर समुद्री पारिस्थितिकी और तटीय समुदायों की अर्थव्यवस्था तक दिखाई देता है।
</p><p style="text-align: justify; ">यहीं से इस कहानी का असली सवाल शुरू होता है।
</p><ul class="hocalwire-editor-list hocalwire-unordered-list"><li style="text-align: justify;">अगर समुद्र गर्म हो रहा है, तो इसकी कीमत कौन चुका रहा है?
</li><li style="text-align: justify;">समुद्र का तापमान, जमीन की अर्थव्यवस्था
</li></ul><p style="text-align: justify; ">महासागर पृथ्वी की अतिरिक्त गर्मी का सबसे बड़ा भंडार है। अनुमान है कि मानव गतिविधियों से पैदा हुई अतिरिक्त गर्मी का करीब 93 फीसदी हिस्सा समुद्र ने सोखा है।
</p><p style="text-align: justify; ">लेकिन समुद्र की यह भूमिका जितनी महत्वपूर्ण है, उसकी कीमत भी है। गर्म होता समुद्र समुद्री जीवों के आवास और उनके व्यवहार को बदल सकता है। मछलियां अपने अनुकूल तापमान वाले पानी की तरफ जाने लगती हैं। कुछ प्रजातियों के प्रजनन और भोजन चक्र प्रभावित होते हैं। समुद्री हीटवेव लंबे समय तक बनी रहे तो मछली पकड़ने, जलीय कृषि और पर्यटन पर भी असर पड़ सकता है।
</p><p style="text-align: justify; ">डॉ. कैथरीन स्मिथ, मरीन बायोलॉजिकल एसोसिएशन, यूके, के मुताबिक समुद्री गर्मी के दौरान मछलियां ठंडे पानी की तरफ चली जाती हैं या बीमारी और मृत्यु के कारण मत्स्य क्षेत्र बंद करने पड़ सकते हैं। इसका असर तटीय समुदायों पर लाखों से अरबों डॉलर तक पड़ सकता है और अंततः खाद्य कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>भारत जैसे देश के लिए यह कोई दूर की कहानी नहीं है।
</b></p><p style="text-align: justify; ">देश की लंबी तटरेखा और लाखों लोगों की समुद्र से जुड़ी आजीविका को देखते हुए, समुद्री तापमान में बदलाव का मतलब मछली पकड़ने के इलाके बदलना, पकड़ कम होना, ईंधन खर्च बढ़ना और आय में अनिश्चितता भी हो सकता है।
</p><p style="text-align: justify; ">और जब मछली की उपलब्धता बदलती है, तो असर सिर्फ मछुआरे तक नहीं रहता। वह बाजार और उपभोक्ता की थाली तक पहुंचता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>पेरू से मिलने वाला संकेत
</b></p><p style="text-align: justify; ">इस बदलाव की एक झलक 2026 में पेरू में दिखाई दी है।
</p><p style="text-align: justify; ">अल नीनो कोस्टेरो और समुद्री परिस्थितियों के बीच एंकोवी मछली पकड़ने पर गंभीर असर पड़ा। पहली मछली पकड़ने की अवधि में उत्पादन करीब 0.5 मिलियन टन रहा, जबकि पिछले साल यह लगभग 1.9 मिलियन टन था। मछली पकड़ने से जुड़े विनिर्माण क्षेत्र पर भी इसका असर पड़ा।
</p><p style="text-align: justify; ">यहां सावधानी जरूरी है। किसी खास साल में मछली उत्पादन में गिरावट को केवल समुद्री गर्मी के खाते में डालना सही नहीं होगा। ओवरफिशिंग, प्रदूषण, ईंधन की लागत और प्रबंधन संबंधी फैसले भी भूमिका निभाते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">लेकिन जब समुद्र का तापमान बदलता है, तो इन सभी दबावों के ऊपर एक नया जलवायु जोखिम जुड़ जाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">यही बात ग्लोबल साउथ के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, जहां समुद्री संसाधनों पर निर्भर समुदायों के पास बदलती परिस्थितियों से बचने के विकल्प अक्सर सीमित होते हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>कोरल की सफेदी के पीछे छिपी अर्थव्यवस्था
</b></p><p style="text-align: justify; ">समुद्री गर्मी का सबसे स्पष्ट असर कोरल रीफ पर दिखाई देता है।
</p><p style="text-align: justify; ">कोरल लंबे समय तक सामान्य से ज्यादा गर्म पानी में रहने पर अपने साथ रहने वाले सूक्ष्म शैवालों को बाहर निकाल सकते हैं। यही प्रक्रिया कोरल ब्लीचिंग कहलाती है। गर्मी लंबे समय तक बनी रहे तो कोरल की मृत्यु भी हो सकती है।
</p><p style="text-align: justify; ">फ्रेंच पोलिनेशिया में कोरल रीफ पर काम कर रहे सीएनआरएस के रिसर्च डायरेक्टर प्रोफेसर सर्ज प्लानेस कहते हैं कि समुद्री हीटवेव अब अलग-अलग जगहों पर होने वाली छिटपुट घटनाएं नहीं रह गई हैं। उनके मुताबिक ये घटनाएं अधिक बार हो रही हैं, ज्यादा तीव्र हो रही हैं और लंबे समय तक चल रही हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">स्थानीय स्तर पर प्रदूषण और ओवरफिशिंग कम करके रीफ को मजबूत बनाया जा सकता है। लेकिन प्लानेस के मुताबिक, इससे लगातार बढ़ते वैश्विक तापमान की भरपाई नहीं की जा सकती।
</p><p style="text-align: justify; ">यह बात भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है।
</p><p style="text-align: justify; ">अंडमान-निकोबार से लेकर लक्षद्वीप और गुजरात के तट तक कोरल रीफ केवल जैव विविधता का हिस्सा नहीं हैं। वे मछलियों के आवास, पर्यटन और तटीय समुदायों की अर्थव्यवस्था से भी जुड़े हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">इसलिए कोरल का नुकसान समुद्र के भीतर होने वाली क्षति भर नहीं है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसान है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>जब समुद्र का तापमान बिजलीघर तक पहुंच जाए
</b></p><p style="text-align: justify; ">समुद्री गर्मी का एक कम चर्चित असर ऊर्जा ढांचे पर भी पड़ सकता है।
</p><p style="text-align: justify; ">तटीय बिजली संयंत्रों और दूसरे औद्योगिक प्रतिष्ठानों को ठंडा करने के लिए पानी की जरूरत होती है। जब समुद्र का पानी असामान्य रूप से गर्म हो, तो कूलिंग सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
</p><p style="text-align: justify; ">2026 में उत्तरी फ्रांस में जेलीफिश के बड़े झुंड के कारण तीन परमाणु रिएक्टरों को बंद करना पड़ा। जेलीफिश ने उन पंपों को प्रभावित किया जिनसे संयंत्र की इकाइयों को ठंडा करने के लिए पानी लिया जाता था।
</p><p style="text-align: justify; ">यह घटना सीधे जलवायु परिवर्तन का प्रमाण नहीं है। लेकिन यह बताती है कि समुद्र में बदलाव का असर उन प्रणालियों तक पहुंच सकता है जिन्हें आमतौर पर जलवायु नीति की चर्चा में समुद्र से अलग माना जाता है।
</p><p style="text-align: justify; ">ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री पारिस्थितिकी, दोनों एक ही व्यवस्था के हिस्से हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>अल नीनो है, लेकिन कहानी सिर्फ अल नीनो की नहीं
</b></p><p style="text-align: justify; ">2026 की रिकॉर्ड समुद्री गर्मी में अल नीनो की भूमिका महत्वपूर्ण है।
</p><p style="text-align: justify; ">प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में इस साल समुद्री तापमान रिकॉर्ड स्तरों पर पहुंचा है। अल नीनो समुद्र और वायुमंडल के बीच ऊर्जा के वितरण को बदलता है और दुनिया के कई हिस्सों के मौसम को प्रभावित करता है।
</p><p style="text-align: justify; ">लेकिन अल नीनो को पूरी कहानी मानना भी गलत होगा। मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण महासागर लंबे समय से गर्म हो रहे हैं। ऐसे में प्राकृतिक जलवायु घटनाएं जिस समुद्र में घटित हो रही हैं, वह पहले ही ऐतिहासिक औसत से ज्यादा गर्म है।
</p><p style="text-align: justify; ">यही वजह है कि 2023-24 के अल नीनो के बाद भी समुद्र का तापमान पुराने स्तरों पर तुरंत वापस नहीं लौटा। बाद की ला नीना परिस्थितियों के दौरान भी समुद्र का तापमान ऐतिहासिक संदर्भ की तुलना में असामान्य रूप से ऊंचा बना रहा।
</p><p style="text-align: justify; ">डॉ. लेब के शब्दों में, मौजूदा गर्मी को समझने के लिए अल नीनो और दीर्घकालिक मानवजनित गर्मी, दोनों को साथ देखना होगा।
</p><p style="text-align: justify; ">अब बात पर्यावरण मंत्री की नहीं, वित्त मंत्री की भी है
</p><p style="text-align: justify; ">वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के ओशन प्रोग्राम के ग्लोबल डायरेक्टर डॉ. टॉम पिकरेल का सवाल इसी जगह महत्वपूर्ण हो जाता है। उनके मुताबिक, रिकॉर्ड समुद्री गर्मी को लेकर चिंता केवल पर्यावरण मंत्रियों की नहीं, वित्त मंत्रियों की भी होनी चाहिए।
</p><p style="text-align: justify; "><b>क्यों?
</b></p><p style="text-align: justify; ">क्योंकि समुद्र की गर्मी का असर सरकारी बजट और स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
</p><p style="text-align: justify; ">मत्स्य पालन से आय घट सकती है। खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं। तटीय पर्यटन को नुकसान हो सकता है। जलीय कृषि को बीमारी और तापमान के झटके झेलने पड़ सकते हैं। बंदरगाह और तटीय बुनियादी ढांचे पर जोखिम बढ़ सकता है।
</p><p style="text-align: justify; ">भारत और ग्लोबल साउथ के लिए यह सवाल और गंभीर है। जिन समुदायों की आय समुद्र पर सबसे ज्यादा निर्भर है, उनके पास जलवायु जोखिम से बचने के संसाधन अक्सर सबसे कम हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">इसलिए समुद्री गर्मी का संकट असमानता का संकट भी बन सकता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>महासागर की गर्मी का मतलब भारत के लिए क्या है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">भारत में समुद्र की निगरानी को सिर्फ समुद्री विज्ञान की जरूरत मानना अब पर्याप्त नहीं होगा।
</p><p style="text-align: justify; ">समुद्री तापमान और हीटवेव के आंकड़ों को मत्स्य प्रबंधन, तटीय आपदा तैयारी, बंदरगाह योजना, समुद्री पर्यटन और जलीय कृषि की नीतियों से जोड़ना होगा। मछुआरों के लिए शुरुआती चेतावनी सिर्फ तूफान की नहीं, उन समुद्री परिस्थितियों की भी होनी चाहिए जो उनकी पकड़ और आजीविका को प्रभावित कर सकती हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">कोरल रीफ और मैंग्रोव को संरक्षण परियोजना भर मानने के बजाय उन्हें तटीय सुरक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी संपत्ति की तरह देखना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण, जलवायु अनुकूलन की चर्चा में समुद्र को वह जगह देनी होगी जो जमीन और हवा को मिलती रही है।
</p><p style="text-align: justify; ">क्योंकि भारत में समुद्र की गर्मी का असर किसी दूर बैठे वैज्ञानिक के ग्राफ में ही नहीं रहेगा।
</p><p style="text-align: justify; ">वह मछुआरे की नाव में दिख सकता है। मछली बाजार की कीमत में दिख सकता है। तटीय पर्यटन की कमाई में दिख सकता है।
</p><p style="text-align: justify; ">और किसी बंदरगाह या बिजली संयंत्र की परिचालन लागत में भी।
</p><p style="text-align: justify; ">2026 में करीब 100 दिनों तक रिकॉर्ड समुद्री गर्मी का संभावित आंकड़ा इसलिए सिर्फ एक नया जलवायु रिकॉर्ड नहीं है। यह एक आर्थिक संकेत भी है।
</p><p style="text-align: justify; ">समुद्र हमें बता रहा है कि जलवायु संकट की कीमत अब सिर्फ तापमान में नहीं मापी जाएगी। उसकी कीमत भोजन, रोजगार, ऊर्जा, पर्यटन और तटीय अर्थव्यवस्था में भी दिखाई देगी।
</p><p style="text-align: justify; "><b><span style="font-size: 24px;">डॉ. सीमा जावेद</span>
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>पर्यावरणविद  &amp;  कम्युनिकेशन विशेषज्ञ
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>FAQs
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>1. 2026 में समुद्र करीब 100 दिनों तक रिकॉर्ड गर्म क्यों रहा?
</b></p><p style="text-align: justify; ">2026 में वैश्विक समुद्री सतह तापमान असाधारण रूप से ऊंचा रहा। अल नीनो जैसी प्राकृतिक जलवायु घटना ने इसमें भूमिका निभाई, लेकिन दीर्घकालिक मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण पहले से गर्म हो चुके महासागर ने इस गर्मी की तीव्रता बढ़ाई।
</p><p style="text-align: justify; "><b>2. समुद्री हीटवेव (Marine Heatwave) क्या होती है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">जब किसी समुद्री क्षेत्र का तापमान स्थानीय ऐतिहासिक औसत की तुलना में असामान्य रूप से अधिक गर्म रहता है और यह गर्मी कई दिनों या उससे अधिक समय तक बनी रहती है, तो इसे समुद्री हीटवेव कहा जाता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>3. समुद्र के गर्म होने से मछलियों पर क्या असर पड़ता है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">मछलियां अपने अनुकूल तापमान वाले ठंडे पानी की ओर जा सकती हैं। इससे मछली पकड़ने के क्षेत्र बदल सकते हैं, पकड़ घट सकती है और मछुआरों के ईंधन तथा परिचालन खर्च बढ़ सकते हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>4. समुद्र का तापमान बढ़ने से भारत पर क्या असर होगा?
</b></p><p style="text-align: justify; ">भारत में इसका असर मछली पालन, जलीय कृषि, तटीय पर्यटन, कोरल रीफ, मैंग्रोव और समुद्र पर निर्भर समुदायों की आजीविका पर पड़ सकता है। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव खाद्य कीमतों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी हो सकता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>5. समुद्र के गर्म होने और खाद्य कीमतों के बीच क्या संबंध है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">समुद्री गर्मी मछलियों के वितरण और उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है। यदि पकड़ घटती है या मछली पकड़ने की लागत बढ़ती है, तो इसका असर आपूर्ति और बाजार कीमतों पर पड़ सकता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>6. समुद्र के गर्म होने से कोरल रीफ को क्या नुकसान होता है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">असामान्य रूप से गर्म पानी में कोरल अपने सहजीवी सूक्ष्म शैवालों को बाहर निकाल सकते हैं। इसे कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है। लंबे समय तक गर्मी रहने पर कोरल की मृत्यु भी हो सकती है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>7. भारत में कौन से क्षेत्र समुद्री गर्मी के प्रति संवेदनशील हैं?
</b></p><p style="text-align: justify; ">अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप और गुजरात सहित भारत के कई तटीय क्षेत्र समुद्री तापमान में बदलाव से प्रभावित हो सकते हैं। संवेदनशीलता स्थानीय पारिस्थितिकी, मत्स्य संसाधनों और तटीय आजीविका पर निर्भर करती है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>8. क्या 2026 की रिकॉर्ड समुद्री गर्मी सिर्फ अल नीनो के कारण है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">नहीं। अल नीनो महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, लेकिन महासागरों के दीर्घकालिक गर्म होने की पृष्ठभूमि मानवजनित जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है। इसलिए मौजूदा समुद्री गर्मी को प्राकृतिक और मानवजनित दोनों कारकों के संदर्भ में देखना जरूरी है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>9. समुद्री गर्मी से तटीय समुदायों की अर्थव्यवस्था कैसे प्रभावित होती है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">मछली पकड़ने की आय घट सकती है, ईंधन खर्च बढ़ सकता है, जलीय कृषि में बीमारी और उत्पादन संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं तथा समुद्री पर्यटन प्रभावित हो सकता है। इसलिए समुद्री गर्मी पर्यावरणीय संकट के साथ आर्थिक संकट भी बन सकती है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>10. क्या समुद्र का गर्म होना ऊर्जा क्षेत्र को भी प्रभावित कर सकता है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">हां। तटीय बिजली संयंत्र और औद्योगिक प्रतिष्ठान कूलिंग के लिए समुद्री पानी पर निर्भर हो सकते हैं। असामान्य तापमान या समुद्री पारिस्थितिकी में बदलाव उनके संचालन और कूलिंग सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b>11. समुद्री गर्मी और जलवायु परिवर्तन में क्या संबंध है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">महासागर मानव गतिविधियों से पैदा हुई अतिरिक्त गर्मी का बहुत बड़ा हिस्सा सोखते हैं। इसलिए समुद्र का दीर्घकालिक गर्म होना पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में मानवजनित तापवृद्धि का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>12. समुद्र के गर्म होने का सबसे ज्यादा नुकसान किसे हो सकता है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">समुद्र पर आर्थिक रूप से निर्भर और जलवायु जोखिम से निपटने के सीमित संसाधन रखने वाले तटीय समुदाय अधिक असुरक्षित हो सकते हैं। इसलिए समुद्री गर्मी का संकट सामाजिक और आर्थिक असमानता को भी बढ़ा सकता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>13. समुद्री गर्मी को रोकने के लिए क्या उपाय किया जा सकता है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">दीर्घकालिक समाधान के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आवश्यक है। साथ ही स्थानीय स्तर पर ओवरफिशिंग और प्रदूषण कम करना, कोरल रीफ और मैंग्रोव की रक्षा करना तथा तटीय समुदायों के लिए बेहतर जलवायु अनुकूलन और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था विकसित करना जरूरी है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>14. भारत को समुद्री गर्मी से निपटने के लिए क्या करना चाहिए?
</b></p><p style="text-align: justify; ">भारत को समुद्री तापमान और हीटवेव के आंकड़ों को मत्स्य प्रबंधन, तटीय आपदा तैयारी, बंदरगाह नियोजन, समुद्री पर्यटन और जलीय कृषि की नीतियों से जोड़ना चाहिए। मछुआरों के लिए समुद्री परिस्थितियों की शुरुआती चेतावनी व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी।
</p><p style="text-align: justify; "><b>15. क्या समुद्री गर्मी सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">नहीं। इसके प्रभाव भोजन, रोजगार, ऊर्जा, मत्स्य पालन, पर्यटन, तटीय बुनियादी ढांचे और सरकारी वित्त तक पहुंच सकते हैं। इसलिए समुद्री गर्मी को पर्यावरणीय संकट के साथ आर्थिक और सामाजिक नीति के मुद्दे के रूप में भी देखना चाहिए।
</p><p style="text-align: justify; "><b>16. 100 दिनों की रिकॉर्ड समुद्री गर्मी का आर्थिक महत्व क्या है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">इतने लंबे समय तक असामान्य समुद्री गर्मी इस बात का संकेत हो सकती है कि समुद्री पारिस्थितिक तंत्र और उनसे जुड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ रहा है। इसका असर मत्स्य उत्पादन, खाद्य आपूर्ति, पर्यटन, जलीय कृषि और ऊर्जा अवसंरचना तक फैल सकता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>17. समुद्र के गर्म होने से मछुआरों की आजीविका पर क्या असर पड़ सकता है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">मछलियों के स्थान बदलने से मछुआरों को अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है। इससे ईंधन लागत बढ़ सकती है और पकड़ तथा आय में अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>18. समुद्री गर्मी को वित्तीय नीति का मुद्दा क्यों माना जाना चाहिए?
</b></p><p style="text-align: justify; ">क्योंकि समुद्री गर्मी से प्रभावित क्षेत्रों में आय, रोजगार, खाद्य कीमतों, पर्यटन, मत्स्य पालन और बुनियादी ढांचे पर आर्थिक असर पड़ सकता है। इसलिए इसके जोखिमों को सरकारी बजट, बीमा, आपदा प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन नीति में शामिल करना आवश्यक है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>19. क्या स्थानीय संरक्षण उपाय वैश्विक समुद्री गर्मी की समस्या हल कर सकते हैं?
</b></p><p style="text-align: justify; ">स्थानीय संरक्षण उपाय कोरल रीफ और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकते हैं, लेकिन वे वैश्विक समुद्री तापमान में लगातार वृद्धि की भरपाई अकेले नहीं कर सकते। इसके लिए वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कमी जरूरी है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>20. इस लेख का केंद्रीय सवाल क्या है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">लेख का केंद्रीय सवाल है: अगर समुद्र लगातार गर्म हो रहा है, तो उसकी आर्थिक और सामाजिक कीमत कौन चुका रहा है? इसका उत्तर केवल पर्यावरण में नहीं, बल्कि मछुआरों की आय, भोजन की कीमत, रोजगार, पर्यटन, ऊर्जा और तटीय समुदायों की असुरक्षा में भी दिखाई देता है।
</p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
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<title><![CDATA[ताकतवर की सेवा और कमजोर को धोखा: क्या यही न्याय है? भारतीय न्यायपालिका के संकट पर एम. ए. बेबी]]></title>
<description><![CDATA[क्या भारतीय न्याय व्यवस्था ताकतवर के पक्ष में और कमजोर नागरिकों के खिलाफ काम कर रही है]]></description>
<tags>Law and Justice,न्यायपालिका</tags>
<link>https://hastakshep.com/column/indian-judiciary-crisis-delay-justice-judicial-independence-ma-baby-320546</link>
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<category><![CDATA[आपकी नज़र,स्तंभ,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Sun, 13 Sep 2026 10:38:01 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Law and Justice news in Hindi]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/wp-content/uploads/2025/02/xRm5qKXBrqNulTUY3RYw.jpg]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/wp-content/uploads/2025/02/xRm5qKXBrqNulTUY3RYw.jpg' /><h2><b>ताकतवर की सेवा करना और कमजोर को धोखा देना: क्या यही न्याय है?
</b></h2><p><b>भारतीय न्यायपालिका का संकट: न्याय में देरी, जेल में विचाराधीन कैदी और कमजोर नागरिकों के अधिकार
</b></p><p><b>माकपा महासचिव कॉमरेड एम. ए. बेबी का यह लेख भारतीय न्यायपालिका के संकट, न्याय में लगातार देरी, विचाराधीन कैदियों, नागरिकों के वोट के अधिकार, न्यायिक स्वतंत्रता और कॉलेजियम व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाता है। लेख जस्टिस दीपक गुप्ता की चिंताओं के संदर्भ में पूछता है कि क्या भारतीय न्याय व्यवस्था ताकतवर के पक्ष में और कमजोर नागरिकों के खिलाफ काम कर रही है। अनुवाद: संजय पराते
</b></p><p><b>(आलेख : एम ए बेबी, अनुवाद : संजय पराते)
</b></p><p>सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता ने आज़ादी की 80वीं वर्षगांठ पर प्रिंट मीडिया में वह सवाल पूछा है, जो उनके पद पर बैठे बहुत कम लोगों ने पूछने की हिम्मत की है : हम, भारत के नागरिक, कितने आज़ाद हैं? 'द ट्रिब्यून' में उनका जवाब बहुत ही नरम था : संवैधानिक अदालतों ने ज़रूरी संवेदनशीलता या ताकत नहीं दिखाई है; आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन किया जाता है और कोई सजा नहीं मिलती, और कई मामलों में अदालतें मूक दर्शक बनी हुई हैं; और कॉलेजियम प्रणाली नाकाम हो गई है; यह पूरी तरह से धुंधला हो गया है। एक आदमी, जिसने विधि के क्षेत्र में आधी सदी बिताई हो और सबसे ऊंची पीठ पर बैठा हुआ था, जब यह कहता है, तो देश को सुनना चाहिए।
</p><h3><b>टूट रहा है न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा
</b></h3><p>असल में, सीपीआई(एम) भी सालों से कमोबेश यही कहती आ रही है। जो टूट रहा है, वह है न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा। मुद्दा किसी एक या दूसरे न्यायाधीश का नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रणाली का है। अपनी देरी, अपने चयन और अपनी सामाजिक बनावट के कारण, यह ताकतवर लोगों की सेवा करने और बाकी लोगों को विफल करने पर उतारू है।
</p><p><b>देरी का अंकगणित 
</b></p><p>शुरू करते हैं उन आंकड़ों से, जो कानून मंत्री ने 23 जुलाई, 2026 को राज्यसभा में रखा था। 16 जुलाई, 2026 तक, 5.64 करोड़ मामले लंबित थे; सुप्रीम कोर्ट में 96,024, हाई कोर्ट में 64.72 लाख और जिला अदालतों में 4.98 करोड़। केवल सुप्रीम कोर्ट में ही, 10,094 मामले दस साल से ज़्यादा और 26 तीस साल से ज़्यादा से निपटारे इंतज़ार कर रहे हैं। हाई कोर्ट में स्वीकृत 1,122 न्यायाधीशों के मुकाबले 781 न्यायाधीश हैं; यानी 30 प्रतिशत खाली हैं। जिलों की अदालतों में 7,310 पद खाली हैं। विधि आयोग ने 1987 में हर दस लाख लोगों पर पचास न्यायाधीशों की सिफारिश की थी; जबकि इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 के अनुसार, हर दस लाख लोगों पर कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या केवल 15 हैं।
</p><p>इन आंकड़ों में वे लोग छुपे हुए हैं, जिन्हें इसके लिए भुगतना पड़ता हैं। एनसीआरबी के 2024 की जेल सांख्यिकी बताती है कि भारत की जेलों में बंद 5.11 लाख लोगों में से 73 प्रतिशत विचाराधीन हैं, जिन्हें बेगुनाह माना जाता है, और वे न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं; इनमें से ज़्यादातर दलित, आदिवासी, अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम हैं। न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है, और भारत में बड़े पैमाने पर एक वर्ग को न्याय देने से इंकार किया जाता है। 
</p><h4><b>एक राजनैतिक हथियार बन गई है देरी
</b></h4><p>देरी भी एक राजनैतिक हथियार बन गई है और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी खुद को एक राजनीतिक हथियार के रूप में अपना इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के खिलाफ याचिकाएं अगस्त 2019 में दायर की गईं थीं। मार्च 2020 से जुलाई 2023 तक उन्हें एक बार भी सूचीबद्ध नहीं किया गया। फैसला 11 दिसंबर, 2023 को आया, जम्मू-कश्मीर के विभाजन के चार साल और चार महीने बाद, जब सरकार की मंशा पूरी हो गई। फिर भी न्यायालय ने सॉलिसिटर जनरल की इस बात को स्वीकार करते हुए कि राज्य का दर्जा यथाशीघ्र बहाल किया जाएगा, पुनर्गठन अधिनियम पर फ़ैसला देने से इंकार कर दिया। अक्टूबर 2025 में केंद्र ने राज्य के दर्जे पर जवाब देने के लिए चार सप्ताह का और समय मांगा; तब से मामले की सुनवाई नहीं हुई है। सोनम वांगचुक 24 सुनवाइयों के दौरान हिरासत में रहे; जब सरकार ने फैसले का सामना करने के बजाय आदेश वापस ले लिया, तो न्यायालय के लिए निर्णय करने के लिए कुछ भी नहीं बचा था।
</p><p>सीपीआई(एम) इस तरीके को अंदर से समझती है। अगस्त 2019 में, कॉमरेड सीताराम येचुरी को श्रीनगर एयरपोर्ट से दो बार वापस भेजा गया। कॉमरेड मोहम्मद यूसुफ तारिगामी, जो तब 72 साल के थे और बीमार थे और बिना किसी नजरबंदी आदेश के हिरासत में रखे गए थे, के लिए उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। विधि में बंदी प्रत्यक्षीकरण सबसे पुरानी याचिका है; यह राज्य को किसी व्यक्ति को अदालत में पेश करने और उसकी हिरासत को सही ठहराने के लिए मजबूर करता है। इस याचिका पर सुनवाई के बजाय अदालत ने एक अनुमति जारी की। एक राष्ट्रीय पार्टी के महासचिव को अपने साथी से मिलने के अलावा किसी और मकसद से श्रीनगर जाने की इजाज़त नहीं दी गई, चेतावनी दी गई कि इसके अलावा कुछ भी करना आदेश का उल्लंघन करना होगा, और लौटने पर शपथ पत्र पर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया। उसके बाद ही, 5 सितंबर को, तारिगामी को एम्स जाने का आदेश दिया गया। याचिका का अंतिम रूप से मई 2023 में यह कहते हुए निपटारा कर दिया गया कि कॉमरेड तारिगामी अब आज़ाद हैं। उस पतझड़ से आज तक सैकड़ों कश्मीरियों के बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं का कभी भी गुणदोष के आधार पर फैसला नहीं किया गया है।
</p><p><b>जमानत नहीं, जेल
</b></p><p>13 सितंबर को उमर खालिद हिरासत में छह साल पूरे कर लेंगे। अभी आरोप तय नहीं हुए हैं; मुकदमा शुरू नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में उन्हें एक ऐसी साज़िश में उनकी मुख्य और अहम भूमिका के लिए जमानत देने से मना कर दिया था, जिसकी किसी अदालत ने जांच नहीं की है। मई में एक अलग पीठ ने उस फैसले पर गंभीर सवाल उठाए और फिर से कहा कि यूएपीए के तहत भी, जमानत नियम है और जेल अपवाद; कुछ दिनों बाद एक तीसरी पीठ ने इस मामले को एक बड़ी पीठ को भेज दिया। इस बीच, उमर खालिद अभी भी तिहाड़ जेल में बंद हैं, जबकि अदालत अपने पर ही बहस कर रही है।
</p><p>भीमा कोरेगांव मामले का नौवां साल चल रहा है। फादर स्टेन स्वामी की जुलाई 2021 में हिरासत में मौत हो गई। सुरेंद्र गाडलिंग को लगभग आठ साल बाद मई 2026 में जमानत मिली, लेकिन वे दूसरे मामले में जेल में ही हैं। अब तक बचे हुए सभी आरोपियों को जमानत मिल चुकी है; किसी पर भी मुकदमा शुरू नहीं हुआ है, क्योंकि अभी भी आरोप तय नहीं हुए हैं, और फोरेंसिक जांच से पता चला है कि गलत फाइलें मैलवेयर से कंप्यूटर में प्लांट की गई थीं, लेकिन कभी भी इसकी कानूनी जांच नहीं हुई। कानूनी प्रक्रिया ही सज़ा है, और अदालत का दखल न देना ही इस प्रक्रिया को ज़िंदा रखता है।
</p><h5><b><span style="font-size: 22px;">वोट का अधिकार और अदालत, जिसने नज़रें फेर लीं</span>
</b></h5><p>वोट देने के अधिकार के मामले को अदालत ने जिस तरह छोड़ दिया है, उससे इस अधिकार का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। भारत के चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल की मतदाता सूचियों से 91 लाख नाम हटा दिए हैं, जो मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत हैं। फैसले के लिए रखे गए लगभग 60 लाख नामों में से 27.16 लाख को वोट देने के अयोग्य घोषित कर दिया गया। लगभग 38 लाख अपील दाखिल की गईं हैं। एक आरटीआई जवाब से पता चलता है कि अगस्त तक, मुश्किल से दो प्रतिशत अपीलों का फैसला हुआ था। 13 अप्रैल को, मतदान से दस दिन पहले, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सिर्फ अपीलों के लंबित रहते, कोई नागरिक वोट देने का हकदार नहीं है। 24 अप्रैल को, चुनाव के पहले चरण के अगले दिन, उसने परेशान लोगों को कलकत्ता हाई कोर्ट भेजा और मतदान प्रतिशत पर अपनी खुशी जताई। 27 मई को उसने एसआईआर को सही ठहराया। 
</p><p><b>अगस्त के आखिर में, जब 31 चुनाव क्षेत्रों के नतीजों को दिखाया गया, जहां नाम हटाने की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा थी, तो मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, क्या अदालत इस पर नए चुनाव का आदेश दे सकती है?
</b></p><p>अदालत को पता ही नहीं था। जस्टिस बागची ने खुद कहा कि चुनाव आयोग ने बिहार की सुनवाई में वादा किया था कि 2002 की मतदाता सूची में नाम होने पर मतदाताओं को दस्तावेज दिखाने की ज़रूरत नहीं है और अब वह सुधार कर रहा है, और फिर उन्होंने पूछा कि क्या होगा, अगर जीत का अंतर दो प्रतिशत हो और चिन्हित किए गए 15 प्रतिशत मतदाता वोट न दे सकें। 
</p><p>सवाल पूछने के बाद, पीठ ने चुनाव होने दिया। हमारे पोलिट ब्यूरो ने मई के निर्णय को लोकतंत्र के लिए एक बड़ा झटका बताया, क्योंकि यह मतदान को स्वीकृत दस्तावेजों पर निर्भर बनाता है, एनआरसी दूसरे रास्ते से यही काम करता है। 2026 में 27 लाख बंगालियों को मतदाता सूची से बाहर किया गया। इसके बाद तीसरे चरण में, 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में 6.15 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं।
</p><p><b>विचारधारात्मक बहाव 
</b></p><p>यह सब अचानक नहीं हुआ है। पीठ सरकार के साथ बह रही है, और कभी-कभी उससे आगे भी। जुलाई 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने सीपीआई(एम) को गजा में नरसंहार के खिलाफ विरोध आयोजित करने की इजाज़त देने से मना कर दिया था, और कहा कि हम देशभक्त हैं, अपने देश को देखो और गजा के बजाय कचरा डंपिंग, प्रदूषण, सीवरेज और बाढ़ जैसे मामलों पर ध्यान दो। उसने यहां तक कहा कि जिस पार्टी का तुम प्रतिनिधित्व करते हो, उसके अनुसार हम विदेशी मामलों को नहीं समझ सकते। एक संवैधानिक अदालत ने फ़िलिस्तीन के साथ एकजुटता को देशद्रोह माना, और अपनी परिभाषा में वामपंथ को संदेहास्पद माना। अदालत को इस बात का पता ही नहीं था कि यह वही स्टैंड था, जिसका महात्मा गांधी ने हमारे उपनिवेशवाद विरोधी स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान समार्थन किया था, और नेहरू के बाद से हर भारतीय सरकार ने इस स्टैंड का समर्थन किया था।
</p><p>इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर यादव ने विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की एक सभा में कहा कि देश बहुमत की इच्छा के अनुसार चलेगा; उनके खिलाफ महाभियोग की नोटिस पर कभी कार्रवाई नहीं हुई और वे अप्रैल 2026 में सेवा निवृत्त हो गए। एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश राज्यसभा में पहुंच गए; सुप्रीम कोर्ट के एक और न्यायाधीश राजभवन में पहुंच गए। नवंबर 2025 में, राष्ट्रपति संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट की राय ने राज्यपालों के लिए समय सीमा तय करने वाले अपने ही अप्रैल के फैसले को रद्द कर दिया।
</p><p>सबक यह नहीं है कि अदालत हिल नहीं सकती। जब नीट लीक के बाद लाखों छात्र-छात्राएं सड़कों पर उतर आए, तो अदालत ने 1 सितंबर को देश भर में हुए विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दीं और कहा कि सिर्फ़ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेना दंड कानून के तहत जुर्म नहीं है। यह वही अदालत है, जिसके मुख्य न्यायाधीश ने मई में बेरोज़गार युवाओं की तुलना कॉकरोच से की थी। मई और सितंबर के बीच जो बदला, वह कानून नहीं था, बल्कि यह आंदोलन था।
</p><p><b>कॉलेजियम, कार्यकारी और रास्ता
</b></p><p>न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रणाली इसके मूल में है। कॉलेजियम किसी को कोई कारण और उत्तर नहीं देता। 'द वायर' के एक विश्लेषण में पाया गया है कि 2021 से 2026 के बीच उच्च न्यायालयों में नियुक्त 593 न्यायाधीशों में से लगभग 80 प्रतिशत उच्च जाति, चार प्रतिशत दलित, दो प्रतिशत आदिवासी और 14 प्रतिशत से कम ओबीसी हैं; सर्वोच्च न्यायालय के लगभग एक तिहाई वर्तमान न्यायाधीश ब्राह्मण हैं, और पाँच वर्षों में एक महिला को नियुक्त किया गया है। फिर भी, सरकार के विकल्प निकृष्ट है। कार्यपालिका पहले से ही कॉलेजियम की सिफ़ारिशों पर कुंडली मारकर बैठी रहती है और राजनीतिक आधार पर आपत्ति जताती है, जैसा कि उसने 2024 में सीपीआई (एम) समर्थक कहे जाने वाले केरल के एक वकील के साथ किया था। इसका उद्देश्य, जैसा कि हमारे पोलिट ब्यूरो ने दिसंबर 2022 में कहा था, नियुक्तियों पर कार्यकारी नियंत्रण है, जिसका हमारी पार्टी बिना किसी समझौते के विरोध करती है। जवाबदेही का मामला भी कुछ बेहतर नहीं है; मार्च 2025 में जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर नकदी पाई गई, जांच में पाया गया कि मई 2026 में हर आरोप साबित हो गया, और उनको हटाने का प्रस्ताव अभी भी मतदान का इंतजार कर रहा है।
</p><p>सीपीआई(एम) लंबे समय से यह मानती है कि न तो बंद कॉलेजियम और न ही कार्यकारी के दबदबे वाला आयोग उसे मंज़ूर है। ज़रूरत है एक व्यापक आधार वाले राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की, जिसकी स्थापना कानून से हो, जिसमें न्यायपालिका, विधान मंडल, बार और नागरिक समाज का प्रतिनिधत्व हो, जो सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो, जिसकी कार्यप्रणाली उजागर मानदंडों और कारणों के आधार पर संचालित हो, जिसे यह सुनिश्चित करने का अधिकार हो कि बेंच में देश की सामाजिक बनावट की झलक मिले, और जिसे न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की जांच करने का अधिकार हो। कॉमरेड बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने दिसंबर 2022 में राज्यसभा में ऐसा ही विधेयक रखा था। हमारी पार्टी का स्टैंड भी यही है।
</p><p>लेकिन कोई भी संस्थागत डिज़ाइन अपने आप ऐसे जज पैदा नहीं कर सकता, जिनमें जस्टिस गुप्ता जैसी रीढ़ हो। न्यायपालिका राज्य का हिस्सा है, और आज राज्य एक कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक गठबंधन के हाथों में है, जो चाहता है कि अदालत भी चुनाव आयोग की तरह उसकी आज्ञा का पालन करें। न्यायिक स्वतंत्रता कभी भी ऊपर से मिला तोहफ़ा नहीं होती। इसकी रक्षा हमेशा उन लोगों ने की है, जो अदालती कक्ष के बाहर लामबंद हुए हैं। छात्रों ने इस गर्मी में यह साबित कर दिया; बंगाल के मतदाता भी, जो अपने नाम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए लड़ रहे हैं, अब यह साबित कर रहे हैं। एक ऐसी न्यापालिका के लिए संघर्ष, जो सत्ता के बजाय संविधान के प्रति जवाबदेह हो, एक ऐसा संघर्ष है, जिसे मेहनतकशों को खुद ही लड़ना होगा। सीपीआई(एम) इस संघर्ष का अभिन्न हिस्सा होगी।
</p><p><b>(लेखक सीपीआई(एम) के महासचिव और पूर्व सांसद हैं। वे केरल के शिक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।)
</b></p><p><b>FAQs
</b></p><p><b>1. भारतीय न्यायपालिका का वर्तमान संकट क्या है?
</b></p><p>लेख के अनुसार भारतीय न्यायपालिका के संकट में मामलों का भारी लंबित बोझ, न्याय मिलने में देरी, न्यायाधीशों की नियुक्ति और जवाबदेही से जुड़े सवाल तथा नागरिक अधिकारों की न्यायिक सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं शामिल हैं।
</p><p><b>2. “Justice delayed is justice denied” का भारत के संदर्भ में क्या अर्थ है?
</b></p><p>जब किसी नागरिक को वर्षों तक मुकदमे के परिणाम की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, तो न्याय में हुई देरी स्वयं उसके अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। लेख विशेष रूप से विचाराधीन कैदियों और लंबे समय से लंबित मामलों को इसका उदाहरण मानता है।
</p><p><b>3. भारत में न्यायिक मामलों के लंबित रहने की समस्या कितनी गंभीर है?
</b></p><p>लेख में 16 जुलाई 2026 तक देश की अदालतों में 5.64 करोड़ से अधिक लंबित मामलों के आंकड़े का उल्लेख किया गया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला अदालतों के मामले शामिल हैं।
</p><p><b>4. न्याय में देरी का सबसे अधिक प्रभाव किन लोगों पर पड़ता है?
</b></p><p>लेख के अनुसार, न्याय में देरी का प्रभाव विशेष रूप से गरीब, सामाजिक रूप से वंचित और विचाराधीन कैदियों पर पड़ता है, जिनके लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया स्वयं सजा जैसी स्थिति पैदा कर सकती है।
</p><p><b>5. भारत में विचाराधीन कैदियों की समस्या क्या है?
</b></p><p>विचाराधीन कैदी वे लोग हैं जिनका मुकदमा पूरा नहीं हुआ है और जिनके दोषी होने का न्यायिक निर्णय नहीं हुआ है। लेख के अनुसार जेलों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने की प्रतीक्षा करते हैं।
</p><p><b>6. लेख में न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर क्या सवाल उठाया गया है?
</b></p><p>लेख का सवाल है कि न्यायपालिका सत्ता और कार्यपालिका के दबाव से कितनी स्वतंत्र है तथा क्या अदालतें नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करते हुए सरकार से स्वतंत्र निर्णय लेने में पर्याप्त मजबूती दिखा रही हैं।
</p><p><b>7. कॉलेजियम व्यवस्था पर क्या सवाल उठाए गए हैं?
</b></p><p>लेख न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल उठाता है। साथ ही यह भी तर्क देता है कि केवल कार्यपालिका के नियंत्रण वाली नियुक्ति व्यवस्था बेहतर विकल्प नहीं होगी।
</p><p><b>8. राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की मांग क्यों उठाई गई है?
</b></p><p>लेख में व्यापक आधार वाले राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की आवश्यकता बताई गई है, जिसमें न्यायपालिका, विधानमंडल, बार और नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व हो तथा नियुक्तियों और शिकायतों की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह हो।
</p><p><b>9. न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व क्यों महत्वपूर्ण है?
</b></p><p>न्यायपालिका समाज के सभी वर्गों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करती है। इसलिए लेख के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति में देश की सामाजिक विविधता और वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न महत्वपूर्ण है।
</p><p><b>10. लेख में न्यायपालिका और नागरिकों के वोट के अधिकार का क्या संबंध बताया गया है?
</b></p><p>लेख पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के संदर्भ में सवाल उठाता है कि चुनावी प्रक्रिया और मताधिकार से जुड़े विवादों में न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक लोकतांत्रिक अधिकारों की कितनी प्रभावी रक्षा कर रही है।
</p><p><b>11. अनुच्छेद 370 से जुड़े मामलों को लेख में क्यों उठाया गया है?
</b></p><p>लेख इसका इस्तेमाल इस तर्क के उदाहरण के रूप में करता है कि संवैधानिक महत्व के मामलों में न्यायिक सुनवाई और निर्णय में लंबी देरी राजनीतिक और नागरिक अधिकारों के सवालों को प्रभावित कर सकती है।
</p><p><b>12. उमर खालिद के मामले को लेख किस संदर्भ में देखता है?
</b></p><p>लेख उनके लंबे समय से जारी कारावास और मुकदमे की प्रक्रिया में देरी को इस व्यापक सवाल से जोड़ता है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में जमानत, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित न्याय के सिद्धांत व्यवहार में कितने प्रभावी हैं।
</p><p><b>13. भीमा कोरेगांव मामले का उल्लेख क्यों किया गया है?
</b></p><p>लेख भीमा कोरेगांव मामले को लंबी कानूनी प्रक्रिया, आरोप तय होने में देरी और लंबे समय तक कारावास की समस्या के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है।
</p><p><b>14. क्या न्यायपालिका की समस्या केवल न्यायाधीशों की समस्या है?
</b></p><p>लेख का तर्क है कि समस्या केवल व्यक्तिगत न्यायाधीशों तक सीमित नहीं है। न्यायिक संस्थाओं की संरचना, नियुक्ति व्यवस्था, जवाबदेही, लंबित मामलों और व्यापक राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों को भी इसके संदर्भ में देखना होगा।
</p><p><b>15. न्यायपालिका और कार्यपालिका के संबंध को लेकर लेख की चिंता क्या है?
</b></p><p>लेख न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यपालिका के प्रभाव के बीच संतुलन को केंद्रीय प्रश्न मानता है। उसका तर्क है कि न्यायपालिका को सरकार के प्रति नहीं, बल्कि संविधान के प्रति जवाबदेह और स्वतंत्र होना चाहिए।
</p><p><b>16. लेख में जस्टिस दीपक गुप्ता की टिप्पणी का महत्व क्या है?
</b></p><p>लेख जस्टिस दीपक गुप्ता द्वारा नागरिकों की वास्तविक स्वतंत्रता और न्यायपालिका की भूमिका पर उठाए गए सवालों को महत्वपूर्ण मानता है, क्योंकि वे लंबे न्यायिक अनुभव के बाद न्याय व्यवस्था की संस्थागत कमजोरियों की ओर संकेत करते हैं।
</p><p><b>17. भारतीय न्यायपालिका में सुधार के लिए क्या उपाय सुझाए गए हैं?
</b></p><p>लेख में न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता और सामाजिक प्रतिनिधित्व, न्यायिक जवाबदेही, लंबित मामलों को कम करने, न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा तथा व्यापक आधार वाले राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
</p><p><b>18. लेख का केंद्रीय सवाल क्या है?
</b></p><p>लेख का केंद्रीय सवाल है कि यदि न्यायिक व्यवस्था गरीब, कमजोर और वंचित नागरिकों को समय पर न्याय नहीं दे पाती, जबकि शक्तिशाली लोगों के पास बेहतर कानूनी संसाधन और प्रभाव उपलब्ध रहते हैं, तो ऐसी व्यवस्था को वास्तविक न्याय कैसे कहा जाए?
</p><p><b>19. लेख में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को जनसंघर्ष से क्यों जोड़ा गया है?
</b></p><p>लेख के अनुसार न्यायिक स्वतंत्रता केवल संस्थागत प्रावधानों से सुरक्षित नहीं होती। संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए जनता, छात्रों, श्रमिकों और लोकतांत्रिक शक्तियों की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है।
</p><p><b>20. इस लेख का व्यापक लोकतांत्रिक संदेश क्या है?
</b></p><p>लेख का व्यापक संदेश है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, नागरिक स्वतंत्रता, मताधिकार, सामाजिक न्याय और संवैधानिक लोकतंत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए प्रश्न हैं। सत्ता के बजाय संविधान के प्रति जवाबदेह न्यायपालिका के लिए सामाजिक और लोकतांत्रिक संघर्ष आवश्यक है।</p><p><section draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/j-cgdRyRcrs" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></section><br></p>]]></content:encoded>
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