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<title><![CDATA[hastakshep | हस्तक्षेप]]></title>
<description><![CDATA[हस्तक्षेप एक स्वतंत्र हिंदी न्यूज़ पोर्टल है जो समसामयिक, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक मुद्दों पर समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ दलित, वंचित, आदिवासी, महिला व छात्र अधिकारों को विशेष महत्व दिया जाता है।]]></description>
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<title>hastakshep | हस्तक्षेप</title>
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<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 10:08:47 GMT</pubDate>
<lastBuildDate>Thu, 25 Jun 2026 10:08:47 GMT</lastBuildDate>
<copyright><![CDATA[Hastakshep]]></copyright>
<language><![CDATA[hi]]></language>
<managingEditor><![CDATA[anushka@blinkcms.ai (Hastakshep)]]></managingEditor>
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<title><![CDATA[संविधान हत्या दिवस बनाम इतिहास: RSS की आपातकाल विरोधी कथा पर सवाल क्यों उठते हैं?]]></title>
<description><![CDATA[1975 की इमरजेंसी में RSS की भूमिका क्या थी? बालासाहेब देवरस के इंदिरा गांधी को लिखे पत्र, ऐतिहासिक दस्तावेज़, और आज के ‘अघोषित आपातकाल’ पर विश्लेषण]]></description>
<tags>इंदिरा गांधी,आपातकाल,आपातकाल विरोधी आंदोलन,मोदी सरकार,RSS</tags>
<link>https://hastakshep.com/column/rss-emergency-1975-deoras-letters-indira-gandhi-undeclared-emergency-analysis-306583</link>
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<category><![CDATA[आपकी नज़र,स्तंभ,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 10:08:45 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[The Truth About the RSS and the Emergency]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/25/156567-the-truth-about-the-rss-and-the-emergency.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/25/156567-the-truth-about-the-rss-and-the-emergency.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>1975 की इमरजेंसी में RSS ने इंदिरा गांधी का समर्थन किया? देवरस के पत्र, आपातकाल का इतिहास और ‘अघोषित आपातकाल’ पर बहस
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>आपातकाल 1975: जब RSS प्रमुख बालासाहेब देवरस ने इंदिरा गांधी को लिखे समर्थन-पत्र, इतिहास क्या कहता है?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>RSS और इमरजेंसी का सच: देवरस के पत्रों से लेकर मोदी युग के ‘अघोषित आपातकाल’ तक
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>आपातकाल की 51वीं बरसी: क्या RSS ने इंदिरा गांधी से समझौता किया था? दस्तावेज़ों के आधार पर पड़ताल
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>Emergency 1975 और RSS: देवरस के मूल पत्र, प्रभाष जोशी और टी.वी. राजेश्वर के दावों का विश्लेषण
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम का यह लेख 1975-77 की इमरजेंसी के दौरान RSS की भूमिका, बालासाहेब देवरस द्वारा इंदिरा गांधी को लिखे गए पत्रों, प्रभाष जोशी और टी.वी. राजेश्वर जैसे स्रोतों के दावों तथा वर्तमान भारत में लोकतंत्र और ‘अघोषित आपातकाल’ पर चल रही बहस का दस्तावेज़-आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेख इतिहास, राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं के संदर्भ में RSS के आधिकारिक दावों और आलोचनात्मक दृष्टिकोणों की तुलना करता है..
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>इस लेख में जानिए -
</b></p><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>1975 की इमरजेंसी क्या थी और इसे भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय क्यों कहा जाता है?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>RSS का दावा बनाम ऐतिहासिक दस्तावेज़: आपातकाल के दौरान संघ की वास्तविक भूमिका क्या थी?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बालासाहेब देवरस के इंदिरा गांधी को लिखे पत्र: मूल दस्तावेज़ क्या बताते हैं?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>क्या RSS ने जयप्रकाश आंदोलन से दूरी बनाई थी? देवरस के पत्रों का विश्लेषण
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>प्रभाष जोशी ने RSS के आपातकाल विरोधी संघर्ष पर क्या सवाल उठाए थे?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>पूर्व IB प्रमुख टी.वी. राजेश्वर के खुलासे: इमरजेंसी में RSS और सत्ता के रिश्ते
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>20-सूत्रीय कार्यक्रम, माफीनामे और जेल से रिहाई का विवाद
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>आपातकाल विरोधी पेंशन योजना और RSS कार्यकर्ताओं को मिलने वाले लाभ पर बहस
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>गोलवलकर, ‘एक नेता-एक विचार’ और संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>क्या आज भारत में ‘अघोषित आपातकाल’ है? लोकतंत्र सूचकांकों और आलोचकों की दलीलें
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>कूमी कपूर की टिप्पणी: इमरजेंसी की चेतावनियाँ और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>RSS, इमरजेंसी और लोकतंत्र: इतिहास, राजनीति और वर्तमान की बहस
</b></li></ul><h3 style="text-align: justify; "><b>1975 आपातकाल शासन में आरएसएस ने इंदिरा गाँधी की चाकरी की और अब अघोषित आपातकाल राज! 
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b>(आरएसएस के मुखिया, देवरस, द्वारा इंदिरा गाँधी को आपातकाल के समर्थन में लिखे गए पत्रों के मूल पाठ के साथ) 
</b></p><p style="text-align: justify; ">एक हिंदुत्व गुरुकुल (यूनिवर्सिटी) के तौर पर, RSS अपने कार्यकर्ताओं को खुलेआम झूठ बोलने और इतिहास को मनगढ़ंत तरीके से पेश करने की ट्रेनिंग देने में माहिर है। इसका ताज़ा सबूत इमरजेंसी [1975-77] की 51वीं बरसी पर देखने को मिला, जब कई RSS-BJP नेताओं ने हमें बताया कि RSS इमरजेंसी से कितनी नफ़रत करता था, उसके कार्यकर्ताओं ने इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन का कितनी बहादुरी से सामना किया और इमरजेंसी-विरोधी आंदोलन के दौरान कितनी बड़ी कुर्बानियां दीं। अख़बारों में 'संविधान हत्या दिवस' के विज्ञापन भरे पड़े हैं, जिनमें प्रधानमंत्री मोदी को संविधान के सामने सिर झुकाते हुए दिखाया गया है। 
</p><p style="text-align: justify; ">आरएसएस के अनुसार देश में प्रजातंत्र बचा हुआ है कियोंकी "सरकार चला रहे नेता (आरएसएस से जुड़े) उनमें से हैं जिन्हों ने [आपातकाल के ख़िलाफ़] आज़ादी की लड़ाई लड़ी। वे उदारवादी प्रजातान्त्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित हैं, किसी मजबूरी की वजह से नहीं बल्कि एक धर्मसिद्धान्त के तौर पर।"</p><p style="text-align: justify; ">यानि भाजपा-आरएसएस से जुड़े शासक उदारवादी प्रजातान्त्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित हैं और उन्होंने आपातकालीन शासन के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी। ये दोनों दावे शर्मनाक झूठ हैं क्योंकि आरएसएस-भाजपा राज में एक तरह से अघोषित आपातकाल लागू है जिसका शिकार, आम लोग, राजनैतिक/सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, मज़दूर/छात्र/महिला/शिक्षक/किसान संगठन, दलित, अल्प-सांखियक समुदाय, यहाँ तक कि अदालतें भी हो रही हैं। विश्व में प्रजातंत्र को मापने के जो माप-दंड हैं उन के अनुसार मोदी राज में भारत की गिनती तानाशाही वाले देशों के साथ की जा रही है।  
</p><p style="text-align: justify; ">यह बिला वजह नहीं है। आरएसएस से जुड़े मौजूदा भारत के शासकों की रगों में तानाशहों वाला खून दौड़ता है और इस का श्रेय आरएसएस के सब से अहम दार्शनिक गोलवलकर को जाता है। यह वही गुरु गोलवलकर हैं जिन्हें 'नफ़रत का गुरु' भी कहा जाता है। यही वह गुरु भी हैं जिन्हें मोदी जी अपने आप को एक कुशल राजनैतिक नेता में ढलने का श्रेय भी देते हैं। गोलवलकर ने 1940 में ही आरएसएस के 1350 उच्चस्तरीय कार्यकर्ताओं के सामने भाषण करते हुए घोषणा कर दी थी कि -
</p><p style="text-align: justify; "> "<b><i>एक ध्वज के नीचे, एक नेता के मार्गदर्शन में, एक ही विचार से प्रेरित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व की प्रखर ज्योति इस विशाल भूमि के कोने-कोने में प्रज्ज्वलित कर रहा है। </i></b>" 
</p><p style="text-align: justify; ">याद रहे कि <b><i>एक झण्डा, एक नेता और एक विचारधारा का यह नारा </i></b>सीधे यूरोप की नाजी एवं फ़ासिस्ट पार्टियों, जिनके नेता क्रमशः हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाह थे, के कार्यक्रमों से लिया गया था।
</p><p style="text-align: justify; ">भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25-26 जून, 1975 को <b><i>देश में आंतरिक आपातकाल</i></b> घोषित किया था। यह 19 महीने तक लागू रहा। इस दौर को भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में काले दिनों के रूप में याद किया जाता है। 
</p><p style="text-align: justify; ">इंदिरा गांधी का दावा था कि जयप्रकाश नारायण ने सशस्त्र बलों से कहा था कि कांग्रेस शासकों के 'अवैध' आदेशों को नहीं मानें। इसने देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर दी और भारतीय गणतंत्र का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित करने के अतिरिक्त कोर्इ विकल्प नहीं रह गया था। 
</p><p style="text-align: justify; "><b>आरएसएस का दावा</b> है कि उसने इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल  का बहादुरी के साथ मुकाबला किया और भारी दमन का सामना किया। बहरहाल, उस दौर के अनेक कथानक हैं, जो आरएसएस के इन दावों को झुठलाते हैं। यहां हम ऐसे दो दृष्टांतों का उल्लेख कर रहे हैं। इनमें से एक वरिष्ठ भारतीय <b>पत्रकार और विचारक प्रभाश जोशी</b> हैं और दूसरे, पूर्व खुफिया ब्यूरो (आईबी) प्रमुख <b>टीवी राजेश्वर</b> हैं, जिनके द्वारा बताई घटनाओं का जिक्र हम यहां करेंगे। 
</p><p style="text-align: justify; ">आपातकाल जिस समय घोषित किया गया था राजेश्वर आईबी के उप प्रमुख थे। राजेश्वर ने आपातकाल काल के उस दौर के बारे में बताया है किस तरह से आरएसएस ने इंदिरा गांधी के दमनकारी शासन के सम्मुख घुटने टेक दिए थे और इंदिरा गांधी एवं उनके पुत्र संजय गांधी को 20-सूत्रीय कार्यक्रम पूरी वफ़ादारी के साथ लागू करने का आश्वासन था। आएसएस के अनेक 'स्वयंसेवक' 20-सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने के रूप में माफीनामें पर दस्तख़त कर जेल से छूटे थे। 
</p><p style="text-align: justify; ">इन तमाम ग़द्दारियों के बावजूद, ये आरएसएस वाले आपातकाल के दौरान उत्पीड़न के एवज में आज मासिक पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। भाजपा शासित राज्यों, जैसे कि- गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में उन लोगों को 10,000 रुपये मासिक पेंशन देने का फैसला लिया गया है, जिन्हें आपातकालीन अवधि के दौरान एक महीने से कम समय तक जेल में रखा गया था। और आरएसएस से जुड़े जो लोग इस दौरान 2 माह से कम अवधि के जेल गए थे उन्हें बतौर 20000 रुपये पेंशन देना तय किया गया है। इस नियम में उन 'स्वयंसेवकों' का ख्याल रखा गया है, जिन्होंने केवल एक या दो महीने जेल में रहने के बाद घबरा कर दया याचिका पेश करते हुए माफीनामे पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इस पेंशन के लिए ऐसी कोर्इ शर्त नहीं है कि लाभार्थी आपातकाल के पूरे दौर में जेल में रहा हो। 
</p><p style="text-align: justify; ">	खास बात यह है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ़ देश की आज़ादी के आंदोलन में जेल में रहने वालों को मिलने वाली स्वतंत्रता सेनानी पेंशन पाने वालों में से एक भी आरएसएस का 'स्वयंसेवक' नहीं है। 
</p><p style="text-align: justify; ">यहां एक तथ्य गौरतलब है कि उन सैकड़ों कम्युनिस्ट युवकों का किसी को ख्याल तक नहीं है जिन्हें आपातकाल के इस दौर में नक्सलपंथी कह कर फर्जी मुठभेड़ों मे मार दिया गया था। 
</p><p style="text-align: justify; ">यहां एक और रोचक तथ्य है कि आरएसएस के हिंदुत्व सह-यात्री शिवसेना ने खुले आम आपातकाल का समर्थन किया था।
</p><p style="text-align: justify; "><b>प्रभाश जोशी का लेख</b> अंग्रेजी साप्ताहिक 'तहलका' में आपातकाल की 25 वीं वर्षगांठ पर छपा थाi। उनके अनुसार आरएसएस के आपातकाल विरोधी संघर्ष में सहभागिता को लेकर उस दौर में भी "मन ही मन हमेशा एक किस्म का संदेह, उसे के साथ कुछ दूरी, विश्वास के कमी" का भाव था। उन्होंने आगे बताया, 
</p><p style="text-align: justify; ">"<b><i>उस समय के आरएसएस प्रमुख बालासाहेब देवरस ने संजय गांधी के कुख्यात 20-सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने में सहयोग  करने हेतु इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा था। यह है आरएसएस का असली चरित्र...आप उनके काम करने के अंदाज़ और तौर-तरीकों को देख सकते हैं। यहां तक कि आपातकाल के दौरान, आरएसएस और जनसंघ के अनेक लोग माफीनामा देकर जेलों से छूटे थे। माफी मांगने में वे सबसे आगे थे। उनके नेता ही जेलों में रह गए थे: अटल बिहारी वाजपेयी, एल के आडवाणी, यहां तक कि अरुण जेटली। आरएसएस ने आपातकाल लागू होने के बाद उसके खिलाफ किसी प्रकार का कोई संघर्ष नहीं किया। तब, भाजपा आपातकाल के खिलाफ संघर्ष की याद को अपनाने की कोशिश क्यों कर रही है?</i></b>"
</p><p style="text-align: justify; ">प्रभाश जोशी के निष्कर्ष के अनुसार, "<b><i>वे कभी संघर्षशील शक्ति न तो रहे हैं न ही वे कभी संघर्ष के प्रति उत्सुक रहनों वालों में से हैं। वे बुनियादी तौर पर समझौतापरस्त रहे हैं। वे कभी भी सही मायने में सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वालों में नहीं रहे है।</i></b>"
</p><p style="text-align: justify; ">टी.वी. राजेश्वर सेवानिवृत्ति के बाद उत्तर प्रदेश और सिक्किम के राज्यपाल रहे। उन्होंने अपनी पुस्तक '<b><i>इंडिया: द क्रूशियल यिर्ज़' (हार्पर कॉलिन्स)</i></b> में, इस तथ्य की पुष्टि की है कि "वह (आरएसएस) न केवल इसका (आपातकाल) का समर्थन कर रहा था, वह श्रीमती गांधी के अलावा संजय गांधी के साथ संपर्क स्थापित करना चाहता था।" </p><p style="text-align: justify; ">राजेश्वर ने मशहूर पत्रकार, करन थापर के साथ एक मुलाकात में खुलासा किया कि देवरस ने "गोपनीय तरीके से प्रधानमंत्री आवास के साथ संपर्क बनाया और देश में अनुशासन लागू करने के लिए सरकार ने जो सख़्त कदम उठाए थे उनमें से कई का मजबूती के साथ समर्थन किया था। देवरस श्रीमती गांधी और संजय से मिलने के इच्छुक थे। लेकिन श्रीमती गांधी ने इनकार कर दिया।" 
</p><p style="text-align: justify; ">	राजेश्वर की पुस्तक के अनुसार, "<b><i>आरएसएस, एक दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, आपातकाल के समय इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। लेकिन इसके प्रमुख बाला साहेब देवरस ने लागू आदेशों और देश में अनुशासन को लागू करने के लिए सरकार के अनेक आदेशों का मजबूती के साथ समर्थन किया था। संजय गांधी के परिवार नियोजन अभियान और इसे विशेष रूप से मुसलमानों के बीच लागू करने के प्रयासों का देवरस का भरपूर समर्थन हासिल था।</i></b>" 
</p><p style="text-align: justify; ">राजेश्वर ने यह तथ्य भी साझा किया है कि आपातकाल के बाद भी "संघ (आरएसएस) ने आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को अपना समर्थन विशेष रूप से व्यक्त किया था।" 
</p><p style="text-align: justify; ">यह खास तौर पर गौरतलब है कि सुब्रमण्यम स्वामी जो अब आरएसएस के प्यादे हैं, के अनुसार भी आपातकाल की अवधि में, आरएसएस के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं ने आपातकाल के खिलाफ संघर्ष के साथ गद्दारी की थी। 
</p><p style="text-align: justify; ">आरएसएस अभिलेखागार में समकालीन दस्तावेज प्रभाष जोशी और राजेश्वर के कथन की सत्यता प्रमाणित करते हैं। आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक, मधुकर दत्तात्रय देवरस ने आपातकाल लगने के दो महीने के भीतर इंदिरा गांधी को पहला पत्र लिखा था। यह वह समय था जब राजकीय आतंक चरम पर था। <b>देवरस ने अपने पत्र दिनांक 22 अगस्त, 1975 की शुरुआत ही इंदिरा की प्रशंसा के साथ इस तरह की</b>:
</p><p style="text-align: justify; ">"<b><i>मैंने 15 अगस्त, 1975 को रेडियो पर लाल किले से देश के नाम आपके संबोधन को जेल (यारवदा जेल) में सुना था। आपका यह संबोधन संतुलित और समय के अनुकूल था। इसलिए मैंने आपको यह पत्र लिखने का फैसला किया।</i></b>" 
</p><p style="text-align: justify; ">इंदिरा गांधी ने देवरस के इस पत्र को जवाब नहीं दिया। देवरस ने 10 नवंबर, 1975 को इंदिरा को एक और पत्र लिखा। इस पत्र की शुरुआत उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दिए गए निर्णय के लिए बधार्इ के साथ की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनको चुनाव में भ्रष्ट साधनों के उपयोग का दोषी मानते हुए पद के अयोग्य करार दिया था। देवरस ने इस पत्र में लिखा,
</p><p style="text-align: justify; ">"<b><i>सुप्रीम कोर्ट के सभी पांच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव को संवैधानिक घोषित कर दिया है, इसके लिए हार्दिक बधाई।" गौरतलब है कि विपक्ष का दृढ़ मत था कि यह निर्णय कांग्रेस के द्वारा 'मैनेज्ड' था। देवरस ने अपने इस पत्र में यहां तक कह दिया कि "आरएसएस का नाम जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के साथ अन्यथा जोड़ दिया गया है। सरकार ने अकारण ही गुजरात आंदोलन और बिहार आंदोलन के साथ भी आरएसएस को जोड़ दिया है...संघ का इन आंदोलनों से कोई संबंध नहीं है .</i></b>.." 
</p><p style="text-align: justify; ">इंदिरा गांधी ने क्योंकि देवरस के इस पत्र का भी जवाब नहीं दिया, आरएसएस प्रमुख ने विनोबा भावे के साथ संपर्क साधा, जिन्होंने आपातकाल का आध्यात्मिक समर्थन और इंदिरा गांधी का पक्ष लिया था। देवरस ने अपने पत्र दिनांक 12 जनवरी, 1976 में, आचार्य विनोबा भावे से गिड़गिड़ाते हुए आग्रह किया कि आरएसएस पर प्रतिबंध हटाए जाने के लिए वे इंदिरा गांधी को सुझाव दें।ix  आचार्य विनोबा भावे ने भी पत्र का जवाब नहीं दिया, हताश देवरस ने तो उन्होंने एक और पत्र लिखा जिस पर तिथि भी अंकित नहीं है। उन्होंने लिखा: 
</p><p style="text-align: justify; ">"<b><i>अखबारों में छपी सूचनाओं के अनुसार प्रधान मंत्री (इंदिरा गांधी) 24 जनवरी को वर्धा पवनार आश्रम में आपसे मिलने आ रही हैं। उस समय देश की वर्तमान परिस्थिति के बारे में उनकी आपके साथ चर्चा होगी। मेरी आपसे याचना है कि प्रधानमंत्री के मन में आरएसएस के बारे में जो गलत धारणा घर कर गर्इ है आप कृपया उसे हटाने की कोशिश करें ताकि आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाया जा सके और जेलों में बंद आरएसएस के लोग रिहा होकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में प्रगति और विकास में सभी क्षेत्रों में अपना योगदान कर सकें।</i></b>" 
</p><p style="text-align: justify; ">इस काल में आरएसएस न किस तरह इंदिरा गांधी और  संजय गांधी की चाकरी की उस की गवाही आरएसएस के एक वरिष्ठ विचारक बलराज माधोक ने भी इन शब्दों में की:	
</p><p style="text-align: justify; ">“<b><i>देश में आपातकालीन वाले काल में संघ के सरसंघचालक श्री बाल साहेब देवरस पूना के यरवादा जेल में MISA बंदी थे...उनका जीवन सुविधा-भोगी था। इसलिये उन्होंने जेल इंदिरा गांधी को संघ के प्रति रुख़ बदलने और इस पर से प्रतिबंध हटाने के लिए 22-08-1975 और 10-11-1975 को दो पत्र लिखे। उन्होंने श्री विनोबा भावे को भी पत्र लिखकर प्रार्थना की कि वे इंदिरा गांधी के मन से संघ के प्रति विरोध का भाव दूर करने का प्रयत्न करें। सरकार की ओर से इन पत्रों को लीक कर दिया गया और वे केई समाचार पत्रों में छप गए। इसका स्वाभाविक रूप से संघ के स्वयंसेवकों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ा और सत्याग्रह आंदोलन मृतप्राया हो गया।</i></b>”      
</p><p style="text-align: justify; ">[Madhok, Balraj, Zindagi Ka Safar –3: Deendayal Upadhyay Ki Hatya Se Indira Gandhi Ki Hatya Tak (Journey of Life-3: From the Murder of Deendayal Upadhyay to the Murder of Indira Gandhi), Dinman Prakashan, 2003, pp. 188-189.]
</p><p style="text-align: justify; ">आरएसएस को आपातकाल के मुजरिमों को गले लगाने में भी कोई एतराज़ नहीं रहा है।  भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 2018 में स्वयंसेवकों के दीक्षा समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। प्रणब मुखर्जी की गिनती आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों के लिए जिम्मदार सर्वोच्च कांग्रेसी नेताओं में होती है और शाह आयोग ने भी आपातकाल की  ज़्यादतियों के लिए उन्हें प्रमुख रूप से ज़िम्मेदार  माना था। आरएसएस के प्रधान कार्यालय पर प्रणब का सत्कार करते हुवे ज़ाहिर है आरएसएस को किसी भी तरह की लज्जा नहीं आयी।
</p><p style="text-align: justify; ">भारत की जानी-मानी वरिष्ठ पत्रकार और बेहतरीन <b><i>पॉलिटिकल कमेंटेटर कूमी कपूर</i></b> ने पिछले 12 सालों में RSS-BJP के कामकाज का आकलन करते हुए साफ़ तौर पर लिखा:
</p><p style="text-align: justify; ">“<b><i>सत्ता में बैठे लोग अब यह मानने लगे हैं कि वे सीधे तौर पर जनता के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। NEET और CBSE परीक्षाओं में हुई बड़ी गड़बड़ियों, जिनसे लाखों छात्र प्रभावित हुए, उन पर सरकार की चुप्पी इसका एक बड़ा उदाहरण है। आज की सरकार जनता की शिकायतों का जवाब देने को कमजोरी मानती है। सत्ताधारी पार्टी के भीतर आंतरिक बहस की कमी भी चिंताजनक है। BJP संसदीय बोर्ड की बैठकें बहुत कम होती हैं और जब होती भी हैं, तो वे सिर्फ़ दूसरी जगहों पर लिए गए फैसलों पर अपनी मुहर लगाती हैं। बिना किसी पहले सलाह-मशविरे के अनुभवहीन जूनियर पार्टी नेताओं को मुख्यमंत्री बनाना, पार्टी के भीतर लोकतंत्र की कमी का एक और उदाहरण है। लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए बनी संवैधानिक संस्थाओं की आज़ादी और ईमानदारी का गिरता स्तर भी कम चिंताजनक नहीं है।
</i></b></p><p style="text-align: justify; "><b><i>“चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से 90 लाख से ज़्यादा नाम बिना वजह हटा दिए, जिससे उस चुनाव पर सवालिया निशान लग गया जिसमें जनता का मूड साफ़ तौर पर ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ था... सच्चे लोकतंत्र का मूल आधार है वोट के ज़रिए संसद में बहुमत हासिल करना, न कि चुनाव के बाद किसी भी तरह से—चाहे तरीका सही हो या गलत—विपक्षी विधायकों को अपने पाले में करना। दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के इस बेरहम अभियान के बीच, इंदिरा गांधी का वह दौर याद आता है जब उन्होंने अपने भारी-भरकम दो-तिहाई बहुमत का इस्तेमाल करके हमारे संविधान को कमज़ोर किया था और इमरजेंसी लागू की थी।
</i></b></p><p style="text-align: justify; "><b><i>“जब देश इमरजेंसी की 50वीं बरसी मना रहा है, तो सत्ताधारी पार्टी के कई समर्थक इंदिरा गांधी के दौर में इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों का ज़िक्र करते हुए भविष्य की पीढ़ियों को चेतावनी देते हैं कि वे उस बदनाम रास्ते पर न चलें और लोकतंत्र को पटरी से न उतारें। विडंबना यह है कि इमरजेंसी के दौरान अपनाए गए कई तौर-तरीके आज भी अपनाए जा रहे हैं। विज्ञापनों, होर्डिंग्स और सार्वजनिक कार्यक्रमों में शासकों की ज़रूरत से ज़्यादा चापलूसी भी उस काले दौर की बुरी याद दिलाती है और कांग्रेस अध्यक्ष डी. के. बरुआ के उस चापलूसी भरे नारे की याद ताज़ा करती है: ‘इंदिरा ही भारत हैं और भारत ही इंदिरा है’</i></b>।”
</p><p style="text-align: justify; ">[Coomi Kapoor, ‘Five decades after the Emergency, difficult questions, unheeded warnings’, <a href="https://indianexpress.com/article/opinion/columns/when-a-home-of-her-own-is-a-womans-lifeline-10750871/?ref=infinite" target="_blank">The Indian Express</a>, Delhi, June 25, 2026. ]
</p><p style="text-align: justify; ">विश्व के सब से बड़े जनतंत्र का विनाश हम सब के सामने है। भारत में संविधान के कुछ अनुच्छेदों (352-360) का इस्तेमाल करके इमरजेंसी लगाई गई थी और बाद में उसे हटा भी लिया गया था। आज, इंदिरा गांधी और कांग्रेस सरकार के बिना, आरएसएस के सब से शक्तिशाली हस्ती मोदी के राज में एक तरह की 'अघोषित' इमरजेंसी लगातार चल रही है। इसे हटाने की ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि इसे कभी घोषित ही नहीं किया गया था!
</p><p style="text-align: justify; "><b><span style="font-size: 30px;">शम्सुल इस्लाम</span>
</b></p><p style="text-align: justify; "><b>25 जून, 2026  
</b></p><div class="twitter-tweet twitter-tweet-rendered" style="display: flex; max-width: 550px; width: 100%; margin-top: 10px; margin-bottom: 10px;"><iframe id="twitter-widget-0" scrolling="no" frameborder="0" allowtransparency="true" allowfullscreen="true" class="" style="position: static; visibility: visible; width: 550px; height: 791px; display: block; flex-grow: 1;" title="X Post" src="https://platform.twitter.com/embed/Tweet.html?dnt=false&amp;embedId=twitter-widget-0&amp;features=eyJ0ZndfdGltZWxpbmVfbGlzdCI6eyJidWNrZXQiOltdLCJ2ZXJzaW9uIjpudWxsfSwidGZ3X2ZvbGxvd2VyX2NvdW50X3N1bnNldCI6eyJidWNrZXQiOnRydWUsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdHdlZXRfZWRpdF9iYWNrZW5kIjp7ImJ1Y2tldCI6Im9uIiwidmVyc2lvbiI6bnVsbH0sInRmd19yZWZzcmNfc2Vzc2lvbiI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfZm9zbnJfc29mdF9pbnRlcnZlbnRpb25zX2VuYWJsZWQiOnsiYnVja2V0Ijoib24iLCJ2ZXJzaW9uIjpudWxsfSwidGZ3X21peGVkX21lZGlhXzE1ODk3Ijp7ImJ1Y2tldCI6InRyZWF0bWVudCIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfZXhwZXJpbWVudHNfY29va2llX2V4cGlyYXRpb24iOnsiYnVja2V0IjoxMjA5NjAwLCJ2ZXJzaW9uIjpudWxsfSwidGZ3X3Nob3dfYmlyZHdhdGNoX3Bpdm90c19lbmFibGVkIjp7ImJ1Y2tldCI6Im9uIiwidmVyc2lvbiI6bnVsbH0sInRmd19kdXBsaWNhdGVfc2NyaWJlc190b19zZXR0aW5ncyI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdXNlX3Byb2ZpbGVfaW1hZ2Vfc2hhcGVfZW5hYmxlZCI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdmlkZW9faGxzX2R5bmFtaWNfbWFuaWZlc3RzXzE1MDgyIjp7ImJ1Y2tldCI6InRydWVfYml0cmF0ZSIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfbGVnYWN5X3RpbWVsaW5lX3N1bnNldCI6eyJidWNrZXQiOnRydWUsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdHdlZXRfZWRpdF9mcm9udGVuZCI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9fQ%3D%3D&amp;frame=false&amp;hideCard=false&amp;hideThread=false&amp;id=2070056393533764012&amp;lang=en&amp;origin=https%3A%2F%2Fadmin.hastakshep.com%2Fstory%2Fadd%3FstoryId%3D30356&amp;sessionId=da8cf4bb2db7fd463fc897d9165475b99e323d25&amp;theme=light&amp;widgetsVersion=6a3ad42b224df%3A1778106238597&amp;width=550px" data-tweet-id="2070056393533764012"></iframe></div><p style="text-align: justify; "><b>नोट - देवरस के सभी पत्र आरएसएस के एक प्रकाशन से लिए गए हैं</b></p><p><b>FAQ
</b></p><p><b><i>क्या RSS ने 1975 की इमरजेंसी का समर्थन किया था?
</i></b></p><p>ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और देवरस के पत्रों के आधार पर यह दावा किया जाता है कि RSS नेतृत्व ने इंदिरा गांधी सरकार से संवाद और प्रतिबंध हटाने का प्रयास किया था।
</p><p><b><i>बालासाहेब देवरस कौन थे?
</i></b></p><p>बालासाहेब देवरस RSS के तीसरे सरसंघचालक थे, जिन्होंने आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी और विनोबा भावे को कई पत्र लिखे थे।
</p><p><b><i>RSS और जयप्रकाश नारायण आंदोलन का क्या संबंध था?
</i></b></p><p>RSS स्वयं को जेपी आंदोलन का सहभागी बताती है, जबकि कुछ दस्तावेज़ों और आलोचकों के अनुसार संघ नेतृत्व ने औपचारिक रूप से उससे दूरी जताई थी।
</p><p><b><i>क्या आज भारत में अघोषित आपातकाल की बहस चल रही है?
</i></b></p><p>कई पत्रकार, मानवाधिकार संगठन और राजनीतिक विश्लेषक लोकतांत्रिक संस्थाओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के संदर्भ में यह प्रश्न उठाते रहे हैं।
</p><p><b><i>इमरजेंसी के दौरान देवरस ने इंदिरा गांधी को क्या लिखा था?
</i></b></p><p style="text-align: justify; "><b><i>
</i></b></p><p>पत्रों में इंदिरा गांधी के भाषण की सराहना, RSS पर प्रतिबंध हटाने का अनुरोध और संगठन की भूमिका को स्पष्ट करने की कोशिश दिखाई देती है।</p><section draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/VshuvFx42OY" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></section><p style="text-align: justify; "> <script async="" src="https://platform.x.com/widgets.js" charset="utf-8"></script>
</p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बिना चालक चलने वाली कारों के लिए संयुक्त राष्ट्र का बड़ा फैसला, वैश्विक सुरक्षा नियमों को मिली मंजूरी]]></title>
<description><![CDATA[चालक रहित वाहन नियम : संयुक्त राष्ट्र ने चालक रहित वाहनों के लिए पहला वैश्विक नियामक ढाँचा अपनाया। नए नियम स्वचालित ड्राइविंग सिस्टम की सुरक्षा, परीक्षण और निगरानी सुनिश्चित करेंगे]]></description>
<tags>संयुक्त राष्ट्र,संयुक्त राष्ट्र समाचार</tags>
<link>https://hastakshep.com/law-and-justice/un-approves-global-rules-for-driverless-vehicles-autonomous-driving-systems-306553</link>
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<category><![CDATA[कानून,दुनिया,देश,समाचार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 05:31:20 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Will cars now run without drivers? UN formulates first global law for driverless vehicles.]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/25/156471-will-cars-now-run-without-drivers-un-formulates-first-global-law-for-driverless-vehicles.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/25/156471-will-cars-now-run-without-drivers-un-formulates-first-global-law-for-driverless-vehicles.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>चालक रहित वाहनों का युग करीब: संयुक्त राष्ट्र ने स्वचालित ड्राइविंग सिस्टम के लिए वैश्विक नियमों को दी मंज़ूरी</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify; "><b>Driverless Cars के लिए खुला रास्ता, संयुक्त राष्ट्र ने अपनाया पहला वैश्विक नियामक ढाँचा
</b></li><li style="text-align: justify; "><b>अब बिना चालक दौड़ेंगे वाहन? UNECE ने स्वचालित ड्राइविंग के लिए बनाए अंतरराष्ट्रीय मानक
</b></li><li style="text-align: justify; "><b>स्वचालित वाहनों पर वैश्विक सहमति, सुरक्षा मानकों को मिली संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी
</b></li><li style="text-align: justify; "><b>Autonomous Vehicles के लिए नई वैश्विक व्यवस्था, सुरक्षा और नवाचार दोनों पर ज़ोर
</b></li><li style="text-align: justify; "><b>चालक रहित कारों के लिए ऐतिहासिक कदम, UN ने लागू किया दुनिया का पहला ADS नियमन
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>चालक रहित वाहनों को लेकर दुनिया एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। संयुक्त राष्ट्र के यूरोपीय आर्थिक आयोग ने स्वचालित ड्राइविंग सिस्टम (ADS) के लिए पहला वैश्विक नियामक ढाँचा अपनाया है। यह व्यवस्था सुरक्षा मानकों, परीक्षण प्रक्रियाओं और जवाबदेही को सुनिश्चित करते हुए परिवहन क्षेत्र में नवाचार का मार्ग प्रशस्त करेगी... पढ़िए <a href="https://news.un.org/hi/story/2026/06/1088335" target="_blank">संयुक्त राष्ट्र समाचार</a> की यह खबर</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>चालक रहित वाहनों के लिए, अन्तरराष्ट्रीय नियमों के ज़रिए रास्ता साफ़
</b></h3><p style="text-align: justify; ">वाहनों में स्वचालित ड्राइविंग तकनीक के लिए अन्तरराष्ट्रीय मानकों को मंज़ूरी दे दी गई है जिससे चालक रहित वाहनों के लिए रास्ता साफ़ हो जाएगा. स्वचालित वाहनों के लिए, शुरुआती उम्मीदों के एक दशक बाद, वैश्विक नियामक ढाँचे को मिली इस स्वीकृति को, परिवहन के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है.
</p><p style="text-align: justify; ">संयुक्त राष्ट्र के योरोपीय आर्थिक आयोग (UNECE) के वाहन विनियमों के सामंजस्य के लिए विश्व मंच ने पूरी तरह चालक-रहित स्वचालित ड्राइविंग प्रणालियों (ADS) के लिए दुनिया का प्रथम नियामक ढाँचा अपनाया है.
</p><p style="text-align: justify; ">यह नया ढाँचा स्वचालित ड्राइविंग प्रणाली (<b><i>Autonomous Driving Systems - ADS</i></b>) से वाले वाहनों की सुरक्षा जाँच और सत्यापन के लिए एक समान अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा मानक और साझा कार्यप्रणाली निर्धारित करता है.
</p><p style="text-align: justify; ">इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्वचालित वाहन कड़े सुरक्षा मानकों पर खरे उतरें, जिससे देशों की सरकारों, उद्योग जगत और आम लोगों का भरोसा मज़बूत हो सके.
</p><p style="text-align: justify; ">आयोग का यह फ़ैसला वाहनों के लिए वैश्विक स्तर पर समान नियमों की बढ़ती आवश्यकता को रेखांकित करता है. यह नियामक ढाँचा वाहन निर्माताओं को, अलग-अलग देशों में बिखरे हुए नियमों की स्थिति से बचाते हुए, स्पष्ट दिशा, उपभोक्ताओं को अधिक भरोसा और विभिन्न बाज़ारों में सुरक्षित ढंग से नवाचार को विस्तार देने का मार्ग प्रदान करता है.
</p><p style="text-align: justify; ">यह नया विनियमन लगभग एक महीने के भीतर लागू हो जाएगा.
</p><p style="text-align: justify; "><b>प्रमुख विशेषताएँ
</b></p><p style="text-align: justify; ">इस नए नियम ढाँचे की प्रमुख विशेषताओं में वाहन निर्माताओं के लिए पूरे परिचालन चक्र में सुरक्षा प्रबन्धन प्रणाली लागू करना और उसकी स्वतंत्र जाँच सुनिश्चित करना शामिल है.
</p><p style="text-align: justify; ">इसके तहत परीक्षण प्रक्रियाओं के लिए कड़े विश्वसनीयता मानक निर्धारित किए गए हैं,  जिनमें आभासी (virtual) परीक्षण प्रणालियाँ भी शामिल हैं. 
</p><p style="text-align: justify; ">कम्पनियों को यह प्रमाण भी प्रस्तुत करना होगा कि उनकी स्वचालित ड्राइविंग प्रणाली (ADS) किसी भी प्रकार का अनुचित सुरक्षा जोखिम उत्पन्न नहीं करती.
</p><p style="text-align: justify; ">साथ ही, वाहनों के प्रदर्शन की निरन्तर निगरानी और रिपोर्टिंग की व्यवस्था की गई है ताकि वास्तविक परिस्थितियों में सुरक्षा पर नज़र रखी जा सके.
</p><p style="text-align: justify; ">इसके अलावा, ADS से जुड़े सुरक्षा-सम्बन्धी आँकड़ों को दर्ज करने के लिए वाहनों में विशेष डेटा भंडारण प्रणाली भी अनिवार्य होगी.
</p><p style="text-align: justify; "><b>सुरक्षा पर विशेष ज़ोर
</b></p><p style="text-align: justify; ">नए नियमों के अनुसार, स्वचालित ड्राइविंग प्रणाली (ADS) की क्षमता व प्रदर्शन एक सक्षम मानव चालक के बराबर या उससे बेहतर होना चाहिए.
</p><p style="text-align: justify; ">ADS वाहन, चूँकि संचालन से जुड़े सभी प्रमुख कार्य, जैसेकि स्टीयरिंग, गति बढ़ाना या घटाना, रौशनी और संकेतों का संचालन स्वयं करेगा, इसलिए निर्माताओं को सुरक्षा अधिकारियों के समक्ष यह साबित करना होगा कि उनकी प्रणाली सुरक्षित, विश्वसनीय और यातायात नियमों के अनुरूप है.
</p><p style="text-align: justify; ">इसके लिए सिमुलेशन, परीक्षण ट्रैक और वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण किए जाएंगे.
</p><p style="text-align: justify; "><b>वैश्विक स्तर पर लागू करने की दिशा में क़दम
</b></p><p style="text-align: justify; ">यह ढाँचा राजमार्गों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक, स्वचालित ड्राइविंग के विभिन्न उपयोगों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.
</p><p style="text-align: justify; "> इसका उद्देश्य सुरक्षा के एक समान स्तर को बनाए रखते हुए नवाचार को बढ़ावा देना है.
</p><p style="text-align: justify; ">कैनेडा, चीन, योरोपीय संघ, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका सहित प्रमुख वाहन बाज़ारों ने, इन नियमों का समर्थन किया है, जिससे इसके वैश्विक स्तर पर अपनाए जाने की दिशा में मज़बूत संकेत मिले हैं.
</p><p style="text-align: justify; "><b>मौजूदा नियमों में संशोधन
</b></p><p style="text-align: justify; ">आयोग ने, नए ADS विनियमन के साथ-साथ, संयुक्त राष्ट्र के लगभग 90 मौजूदा वाहन विनियमों में भी संशोधन अपनाए हैं.
</p><p style="text-align: justify; ">इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्वचालित ड्राइविंग प्रणालियों से युक्त वाहनों, यहाँ तक कि पारम्परिक चालक नियंत्रणों के बिना संचालित होने वाले वाहनों पर भी मौजूदा नियम प्रभावी रूप से लागू रह सकें.
</p><p style="text-align: justify; ">यह व्यवस्था नियामक ढाँचे में निरन्तरता बनाए रखते हुए पूरी तरह चालक-रहित वाहनों सहित नए और अभिनव वाहन डिज़ाइनों के विकास का मार्ग साफ़ करेगी.</p><p style="text-align: justify; "><b>(संयुक्त राष्ट्र समाचार)</b></p><p><b>FAQs
</b></p><p><b><i>चालक रहित वाहन (Driverless Vehicle) क्या होता है?
</i></b></p><p>चालक रहित वाहन वह वाहन है जो स्वचालित ड्राइविंग सिस्टम (ADS) की मदद से बिना मानव चालक के सड़क पर चल सकता है और स्टीयरिंग, ब्रेक तथा गति नियंत्रण जैसे कार्य स्वयं करता है।
</p><p><b><i>संयुक्त राष्ट्र ने चालक रहित वाहनों के लिए कौन सा नया नियम बनाया है?
</i></b></p><p>UNECE ने दुनिया का पहला वैश्विक नियामक ढाँचा अपनाया है, जो स्वचालित ड्राइविंग सिस्टम की सुरक्षा, परीक्षण, निगरानी और प्रमाणन के लिए मानक तय करता है।
</p><p><b><i>ADS (Autonomous Driving System) क्या है?
</i></b></p><p>ADS एक उन्नत तकनीकी प्रणाली है जो वाहन को मानव हस्तक्षेप के बिना चलाने, दिशा नियंत्रित करने और यातायात नियमों का पालन करने में सक्षम बनाती है।
</p><p><b><i>नए नियमों के तहत वाहन निर्माताओं को क्या साबित करना होगा?
</i></b></p><p>उन्हें यह प्रमाणित करना होगा कि उनकी स्वचालित प्रणाली सुरक्षित, विश्वसनीय और एक सक्षम मानव चालक के बराबर या उससे बेहतर प्रदर्शन कर सकती है।
</p><p><b><i>किन देशों ने इन नियमों का समर्थन किया है?
</i></b></p><p>कनाडा, चीन, यूरोपीय संघ, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका सहित प्रमुख वैश्विक वाहन बाज़ारों ने इस नियामक ढाँचे का समर्थन किया है।
</p><p><b><i>चालक रहित वाहनों में डेटा रिकॉर्डिंग क्यों जरूरी होगी?
</i></b></p><p>सुरक्षा घटनाओं, तकनीकी त्रुटियों और वास्तविक परिस्थितियों में वाहन के प्रदर्शन की निगरानी के लिए डेटा रिकॉर्डिंग सिस्टम अनिवार्य किया गया है।</p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[युद्ध का दंश: अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता से 24 हज़ार से अधिक बच्चे हुए प्रभावित, यूएन ने जताई गहरी चिंता]]></title>
<description><![CDATA[यूएन रिपोर्ट के अनुसार 2025 में युद्धग्रस्त क्षेत्रों में 24 हजार से अधिक बच्चे प्रभावित हुए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता पर संयुक्त राष्ट्र ने गंभीर चिंता जताई]]></description>
<tags>संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद,UNICEF</tags>
<link>https://hastakshep.com/human-rights/un-war-on-children-international-community-failure-child-rights-violations-2025-306538</link>
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<category><![CDATA[दुनिया,समाचार,मानवाधिकार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 03:28:39 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Violation of children's rights in war!]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/25/156444-violation-of-childrens-rights-in-war.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/06/25/156444-violation-of-childrens-rights-in-war.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>सशस्त्र संघर्षों में बच्चों पर बढ़ते अत्याचार: यूएन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता पर उठाए सवाल
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>युद्ध की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे बच्चे, 2025 में अधिकार उल्लंघन के 38,558 मामले दर्ज
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>स्कूल और अस्पताल बने रणभूमि: युद्धग्रस्त क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा पर यूएन की चेतावनी
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>UN Report: युद्ध और हिंसा के बीच फंसे बच्चे, रिकॉर्ड स्तर पर बढ़े मानवाधिकार उल्लंघन
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बच्चों के खिलाफ युद्ध अपराधों पर यूएन का आरोप-पत्र, वैश्विक नेतृत्व की निष्क्रियता कटघरे में
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>युद्ध और हिंसक संघर्षों का सबसे बड़ा दंश बच्चे झेल रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 2025 में बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन के 38,558 मामले दर्ज हुए। यूएन अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता को बच्चों की बढ़ती पीड़ा का प्रमुख कारण बताया है।
</b></p><article style="text-align: justify; "><b>संयुक्त राष्ट्र समाचार की इस खबर में जानिए -
</b></article><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>सशस्त्र संघर्षों में बच्चों पर बढ़ते हमलों को लेकर यूएन की चेतावनी
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>वैनेसा फ़्रेज़ियर ने क्यों कहा— निष्क्रियता एक राजनीतिक विकल्प है?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>2025 में बच्चों के अधिकार उल्लंघन के रिकॉर्ड 38,558 मामले दर्ज
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बच्चों पर युद्ध का असर: हत्या, अपहरण, यौन हिंसा और जबरन भर्ती
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>स्कूल, अस्पताल और जल केन्द्र क्यों बन रहे हैं युद्ध के निशाने?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>यूनीसेफ़ प्रमुख कैथरीन रसैल ने अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन पर जताई चिंता
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>सरकारी सुरक्षा बलों की भूमिका पर रिपोर्ट का चौंकाने वाला खुलासा
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बच्चों की सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र ने क्या तत्काल कदम सुझाए?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>युद्धग्रस्त क्षेत्रों में बच्चों के अधिकारों की रक्षा क्यों जरूरी है?
</b></li></ul><h3 style="text-align: justify; "><b>युद्ध का दंश: 'अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता का ख़ामियाज़ा भुगत रहे हैं बच्चे'
</b></h3><p style="text-align: justify; ">पिछले कई दशकों से उपलब्ध प्रमाणों, चेतावनियों और अपीलों के बाद, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय यह दावा नहीं कर सकता है कि उसके पास यह जानकारी ही नहीं है कि सशस्त्र टकरावों में बच्चों के साथ क्या हो रहा है. बच्चों और हथियारबन्द संघर्षों के विषय पर यूएन महासचिव की विशेष प्रतिनिधि वैनेसा फ़्रेज़ियर ने सुरक्षा परिषद की वार्षिक बैठक को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है.
</p><p style="text-align: justify; ">जून महीने के लिए सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष देश, कोलम्बिया ने बुधवार को यह बैठक बुलाई, जिसमें बाल कल्याण की रक्षा करने, उल्लंघन मामलों की रोकथाम करने और अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनी दायित्वों पर बल देने पर चर्चा हुई.
</p><p style="text-align: justify; ">विशेष प्रतिनिधि वैनेसा फ़्रेज़ियर के अनुसार, निष्क्रियता कोई अज्ञानता का नतीजा नहीं है बल्कि यह सचेत होकर चुना गया एक राजनैतिक विकल्प है, जिसके प्रभाव को बच्चों के दैनिक जीवन में देखा जा सकता है.
</p><p style="text-align: justify; ">उन्होंने कहा कि सशस्त्र टकराव और बच्चों के मुद्दे पर, यूएन महासचिव की रिपोर्ट को सुरक्षा परिषद, सदस्य देशों और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की अन्तरात्मा को झकझोर देना चाहिए.   
</p><p style="text-align: justify; ">“इसे आत्मसंतुष्टि की भावना को विचलित करना चाहिए, सौम्य शब्दों व घुमा-फिराकर कही जाने वाली बातों का भ्रम तोड़ देना चाहिए और सशस्त्र संघर्षों में बच्चों को जिन कठोर वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है, उनके बारे में हर बची-खुची भ्रान्ति को दूर किया जाना चाहिए.”
</p><p style="text-align: justify; ">विशेष प्रतिनिधि ने इस रिपोर्ट को निष्क्रियता के विरुद्ध एक आरोप-पत्र बताते हुए कहा कि यह बच्चों की रक्षा के लिए पहले से उपलब्ध साधानों के कारगर उपयोग का आहवान है.
</p><p style="text-align: justify; ">यूएन निगरानी तंत्र द्वारा जुटाए गए प्रमाणों के अनुसार, वर्ष 2025 में बच्चों के अधिकार उल्लंघन के 38,558 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनसे 24 हज़ार से अधिक बच्चे प्रभावित हैं. उन्होंने कहा कि बच्चों और सशस्त्र टकराव के विषय में अधिदेश स्थापित होने के बाद से यह किसी एक वर्ष में प्रभावित बच्चों की सर्वाधिक संख्या है.
</p><p style="text-align: justify; ">इन उल्लंघन मामलों में बच्चों को जान से मारना, उन्हें अपंग बनाना, हथियारबन्द गुटों द्वारा लड़ाकों के रूप में भर्ती करना, अगवा करना, यौन हिंसा का शिकार बनाना, मानवीय सहायता से दूर रखना, शिक्षा, स्वास्थ्य व संरक्षण सेवाओं से वंचित रखना समेत अन्य उल्लंघन मामले हैं.
</p><p style="text-align: justify; "><b>स्कूल, रणभूमि नहीं हैं
</b></p><p style="text-align: justify; ">संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसैल ने क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि स्कूलों, अस्पतालों और जल वितरण केन्द्रों को कभी भी रणभूमि में नहीं बदला जाना चाहिए.
</p><p style="text-align: justify; ">इसके बावजूद, लाखों बच्चे हिंसक टकराव की छाया में जीवन गुज़ार रहे हैं और वे इस वास्तविकता का रोज़ सामना करते हैं.
</p><p style="text-align: justify; ">यूनीसेफ़ प्रमुख के अनुसार, असुरक्षा, पहुँच न होने और बदले की भावना से कार्रवाई के भय की वजह से बहुत से मामलों में उल्लंघन मामलों की जानकारी एकत्र कर पाना सम्भव नहीं होता है और सक्रिय युद्ध क्षेत्रों में दुर्व्यवहार मामलों में प्रमाण जुटा पाना बहुत कठिन है.
</p><p style="text-align: justify; ">“ये आँकड़े दर्शाते हैं कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत बच्चों के लिए संरक्षण व्यवस्था का अब कहीं अधिक संख्या में और बड़ी क़ीमत पर उल्लंघन किया जा रहा है.”
</p><p style="text-align: justify; ">रिपोर्ट में पहली बार एक चिन्ताजनक निष्कर्ष भी साझा किया गया है: सरकारी सुरक्षा बल और सम्बद्ध गुट, ग़ैर-सरकारी तत्वों की तुलना में कहीं ज़्यादा, अधिकार उल्लंघन मामलों के लिए ज़िम्मेदार हैं. 
</p><p style="text-align: justify; "><b>तुरन्त कार्रवाई पर बल 
</b></p><p style="text-align: justify; ">कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसैल ने कहा कि इस निष्कर्ष से इस कक्ष में उपस्थित हर एक देश को चेत जाना चाहिए और उनकी रक्षा के लिए क़ानूनी व नीतिगत फ़्रेमवर्क को सर्वोपरि रखना होगा और ज़िम्मेदार लोगों की जवाबदेही को सुनिश्चित किया जाना होगा.
</p><p style="text-align: justify; ">यूनीसेफ़ की शीर्ष अधिकारी ने कहा कि वास्तविकता के अनुरूप जल्द से जल्द क़दम उठाने होंगे. साथ ही, उन्होंने सदस्य देशों से अनुरोध किया गया है युद्धरत पक्षों को मानवतावादी व मानवाधिकार क़ानून का पालन करने के लिए उन्हें प्रभाव का इस्तेमाल करना होगा.
</p><p style="text-align: justify; ">“कोई भी, बच्चों पर युद्ध की वजह से हो रहे प्रभावों पर जानकारी न होने के तर्क का सहारा नहीं ले सकता है.”
</p><p style="text-align: justify; ">उन्होंने कहा कि हिंसक टकराव में सभी पक्षों को बच्चों को बचाने के लिए क़दम उठाने होंगे, शिक्षा के विरुद्ध हमले रोकने होंगे और उल्लंघन मामलों की जवाबदेही तय की जानी ज़रूरी है.</p><p style="text-align: justify; ">(<b><a href="https://news.un.org/hi/story/2026/06/1088336" target="_blank">संयुक्त राष्ट्र समाचार</a></b>)</p><p><b>FAQs
</b></p><p><b><i>युद्ध में बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन कितने स्तर तक बढ़ गया है?
</i></b></p><p>यूएन रिपोर्ट के अनुसार 2025 में बच्चों के अधिकार उल्लंघन के 38,558 मामले दर्ज किए गए, जिनसे 24 हजार से अधिक बच्चे प्रभावित हुए।
</p><p><b><i>संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर क्या आरोप लगाया है?
</i></b></p><p>यूएन अधिकारियों ने कहा कि बच्चों की पीड़ा के प्रति निष्क्रियता अज्ञानता नहीं बल्कि एक राजनीतिक विकल्प है।
</p><p><b><i>युद्धग्रस्त क्षेत्रों में बच्चों के खिलाफ सबसे आम अपराध कौन से हैं?
</i></b></p><p>हत्या, अपंग बनाना, अपहरण, यौन हिंसा, जबरन भर्ती, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित करना प्रमुख उल्लंघन हैं।
</p><p><b><i>यूनीसेफ़ ने स्कूलों और अस्पतालों को लेकर क्या कहा?
</i></b></p><p>यूनीसेफ़ ने कहा कि स्कूल, अस्पताल और जल वितरण केन्द्र कभी भी युद्ध का मैदान नहीं बनने चाहिए।
</p><p><b><i>रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक खुलासा क्या है?
</i></b></p><p>रिपोर्ट के अनुसार पहली बार सरकारी सुरक्षा बल और उनसे जुड़े समूह गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों की तुलना में अधिक उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार पाए गए।</p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्या अमेरिका-ईरान के बीच हुआ समझौता संकट में है? अलग-अलग दावों से जून 2026 की शांति डील पर शक पैदा हो रहा है।]]></title>
<description><![CDATA[जस्टिस काटजू जून 2026 के US-ईरान MOU, परमाणु निरीक्षणों को लेकर विरोधाभासी दावों और इस बात की पड़ताल करते हैं कि शांति की नाज़ुक प्रक्रिया क्यों विफल हो सकती है।]]></description>
<tags>ईरान,अमेरिका,डोनाल्ड ट्रंप,काटजू,जस्टिस काटजू,जस्टिस काटजू का लेख,जस्टिस मार्कंडेय काटजू</tags>
<link>https://hastakshep.com/column/us-iran-mou-in-crisis-conflicting-306535</link>
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<category><![CDATA[आपकी नज़र,स्तंभ,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 02:59:27 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Justice Markandey Katju's open letter to the Supreme Court judges: Serious questions on the working style of judges]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/wp-content/uploads/2025/02/Justice-Markandey-Katju-638659692419676442.jpg]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/wp-content/uploads/2025/02/Justice-Markandey-Katju-638659692419676442.jpg' /><h2 style="text-align: justify; "><b>हालात और उलझते जा रहे हैं: ट्रंप, ईरान और शांति समझौते को लेकर चल रही खींचतान
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>जस्टिस काटजू : क्यों US-ईरान के बीच हुआ समझौता (MOU) शायद पहले ही खत्म हो चुका है
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>US और ईरान की अलग-अलग बातें: क्या जून 2026 का MOU टूट रहा है?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>तेहरान ने वॉशिंगटन के दावों को नकारा, US-ईरान के बीच सीज़फायर समझौते पर सवाल
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>जस्टिस काटजू का विश्लेषण: US और ईरान के विरोधाभासी बयानों से फिर से टकराव की आशंका
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>क्या ईरान अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षण के लिए सहमत हुआ? क्या जून 2026 के US-ईरान समझौते (MOU) ने शांति का कोई ठोस रास्ता बनाया? इस विश्लेषण में, जस्टिस मार्कंडेय काटजू वॉशिंगटन और तेहरान के विरोधाभासी दावों, सीज़फायर फ्रेमवर्क की अनिश्चित स्थिति, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के भविष्य और मध्य पूर्व में फिर से सैन्य टकराव की बढ़ती संभावनाओं पर चर्चा करते हैं...
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>हालात और भी उलझते जा रहे हैं
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b>जस्टिस मार्कंडेय काटजू 
</b></p><p style="text-align: justify; ">हाल ही में, 17 जून 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच एक <a href="https://www.cnn.com/2026/06/17/middleeast/us-iran-war-mou-text-intl" target="_blank">14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन</a> <a href="https://www.bbc.com/news/articles/c4gy700j0eko" target="_blank">(MOU</a>) पर हस्ताक्षर किए गए, जिससे दोनों देशों के बीच 60 दिनों के लिए दुश्मनी रुक गई। इसकी शर्तों में अमेरिका द्वारा ईरान की फ्रीज़ की गई संपत्ति को बहाल करना, ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाना, ईरान को तेल निर्यात की अनुमति देना और पुनर्निर्माण के लिए पैसे देना शामिल था। वहीं, ईरान परमाणु हथियार नहीं खरीदेगा या विकसित नहीं करेगा, अपने संवर्धित यूरेनियम के मुद्दे पर बातचीत करेगा और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को सभी जहाजों के लिए खुला रहने देगा।
</p><p style="text-align: justify; ">अब, MOU कोई बाध्यकारी अनुबंध या संधि नहीं होती है। जब तक यह किसी बाध्यकारी समझौते में नहीं बदलता, तब तक यह किसी भी पक्ष पर कोई दायित्व नहीं डालता; यह केवल इरादे को दर्शाता है, लेकिन इसमें किसी भी पक्ष की ओर से कोई पक्का वादा नहीं होता है।</p><p style="text-align: justify; ">MOU पर हस्ताक्षर के बाद, दोनों सरकारों के प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए स्विट्जरलैंड गए। अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधिमंडल ने 21 और 22 जून को स्विट्जरलैंड में मुलाकात की। उच्च-स्तरीय बातचीत बर्गेनस्टॉक रिज़ॉर्ट में हुई और कतर तथा पाकिस्तान ने इसमें मध्यस्थता की, ताकि युद्धविराम और शांति के लिए एक रोडमैप तैयार किया जा सके।
</p><p style="text-align: justify; ">बातचीत में असल में क्या हुआ, यह पक्का नहीं है, लेकिन अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने वाले <b><a href="https://www.nbcnews.com/world/iran/us-iran-talks-war-vance-trump-hormuz-lebanon-switzerland-foundation-rcna351112" target="_blank">अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस</a></b> ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि MOU अमेरिकी लोगों के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी और ईरान के स्थायी परमाणु-निरस्त्रीकरण की दिशा में पहला कदम था। उन्होंने कहा कि ईरान, IAEA के निरीक्षकों को अपने परमाणु स्थलों का निरीक्षण करने देने पर सहमत हो गया है। उन्होंने यह भी कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने के लिए जल्द ही एक व्यवस्था बनाई जाएगी। 
</p><p style="text-align: justify; "><b>राष्ट्रपति ट्रंप ने आगे कहा कि ईरान न्यूक्लियर इंस्पेक्शन की इजाज़त देने के लिए पूरी तरह से सहमत हो गया था।</b></p><p style="text-align: justify; ">लेकिन ईरान ने इस बात से इनकार किया है कि वह कभी न्यूक्लियर इंस्पेक्शन या ट्रंप या वेंस द्वारा बताई गई दूसरी बातों के लिए सहमत हुआ था। 
</p><p style="text-align: justify; ">ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा है कि अमेरिका का कोई भी बयान सच नहीं था।
</p><p style="text-align: justify; ">ईरान ने अमेरिकी दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है और कहा है कि (1) ईरान कभी भी परमाणु निरीक्षण के लिए सहमत नहीं हुआ (2) होर्मुज जलडमरूमध्य कभी भी युद्ध-पूर्व स्थिति में वापस नहीं आएगा, बल्कि ईरानी नियंत्रण में रहेगा (3) ईरान कभी भी अपनी मिसाइलों को नहीं छोड़ेगा, क्योंकि इनके बिना... ...तो ईरान को लूटकर बर्बाद कर दिया जाता और वह भी गाज़ा जैसा बन जाता।
</p><p style="text-align: justify; "><b>इनमें से कौन सी बात सच है? </b>ट्रंप, जिनकी लोकप्रियता रेटिंग सबसे निचले स्तर पर है, उन्हें नवंबर में होने वाले अमेरिकी कांग्रेस चुनावों के मद्देनजर इस समझौते को एक ऐतिहासिक जीत के तौर पर पेश करने और यह कहने की ज़रूरत है कि ईरान के साथ युद्ध सही था।
</p><p style="text-align: justify; ">दूसरी ओर, ईरान अभी भी अपने रुख पर अड़ा हुआ है कि वह परमाणु साइटों के निरीक्षण की इजाज़त नहीं देगा, और वह यूरेनियम संवर्धन, मिसाइल रखने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर नियंत्रण रखने के अपने अधिकार पर कायम है।
</p><p style="text-align: justify; ">MOU की शर्तों की दो बिल्कुल विपरीत व्याख्याएं हैरान कर देने वाली हैं और यह साफ करती हैं कि MOU (जो शुरू से ही बाध्यकारी नहीं था) सिर्फ़ कागज़ का एक टुकड़ा था और अब पूरी तरह खत्म हो चुका है।
</p><p style="text-align: justify; ">भविष्य में क्या होगा, यह कोई नहीं जानता, लेकिन मेरी समझ यह है कि ईरान पर अमेरिका-इज़राइल का बड़ा हमला अब होने ही वाला है, जैसा कि नीचे बताया गया है:</p><p><b><a href="https://www.hastakshepnews.com/2026/06/justice-markandey-katju-why-i-believe.html" target="_blank">Justice Markandey Katju: Why I Believe a Massive US-Israel Attack on Iran Is Still Likely</a></b></p><p style="text-align: justify; "><b>(जस्टिस काटजू भारत के सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)</b></p><section draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/qE6kHaoB0iQ" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></section><b>
</b><p style="text-align: justify; "><b>मुख्य मुद्दा क्या है?
</b></p><p style="text-align: justify; ">मुख्य मुद्दा यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान इस बात पर बहुत अलग-अलग राय रखते हैं कि क्या तय हुआ था। जहाँ अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ईरान ने परमाणु निरीक्षण और होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खुला रखने के उपायों को स्वीकार किया था, वहीं ईरानी नेता ऐसे किसी भी वादे से इनकार करते हैं। चूँकि MOU कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, इसलिए इन विरोधाभासों ने इसके व्यावहारिक होने और भविष्य में लागू किए जाने को लेकर संदेह पैदा कर दिया है।
</p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सूडान युद्ध में यौन हिंसा बनी ‘युद्ध का हथियार’: संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में 546 मामलों का खुलासा]]></title>
<description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि सूडान युद्ध में यौन हिंसा का व्यापक इस्तेमाल किया गया। 546 मामलों की पुष्टि, महिलाएं और बच्चियां सबसे अधिक प्रभावित]]></description>
<tags>मानवाधिकार,मानसिक स्वास्थ्य,मानवीय त्रासदी,सूडान,यौन हिंसा,यौन दुर्व्यवहार</tags>
<link>https://hastakshep.com/gender-justice/sudan-war-sexual-violence-un-report-war-crime-2026-306335</link>
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<category><![CDATA[दुनिया,समाचार,जेंडर जस्टिस,मानवाधिकार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 24 Jun 2026 03:29:26 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[सूडान क्राइसिस (Sudan crisis)]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2025/12/09/59987-sudan-crisis.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2025/12/09/59987-sudan-crisis.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>UN रिपोर्ट: सूडान युद्ध में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ यौन हिंसा का भयावह विस्तार
</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>सूडान संकट: सामूहिक बलात्कार और यौन दासता के मामलों पर संयुक्त राष्ट्र की गंभीर चेतावनी
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>दारफ़ूर से खौफनाक गवाही: सूडान युद्ध में यौन हिंसा को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>सूडान में युद्ध अपराधों का नया चेहरा, UN ने यौन हिंसा पर जारी की चिंताजनक रिपोर्ट
</b></li></ul><p style="text-align: justify; "><b>सूडान में जारी गृहयुद्ध के बीच संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने भयावह तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ यौन हिंसा का इस्तेमाल युद्ध के हथियार के रूप में किया गया। <a href="https://news.un.org/hi/story/2026/06/1088330" target="_blank">संयुक्त राष्ट्र समाचार</a> की इस ख़बर से जानिए दारफ़ूर से लेकर अन्य प्रांतों तक फैले इस मानवाधिकार संकट की पूरी कहानी...
</b></p><h3 style="text-align: justify; "><b>खबर से जानिए-
</b></h3><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में क्या सामने आया?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>सूडान युद्ध में यौन हिंसा का हथियार के रूप में इस्तेमाल
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>546 पुष्ट मामलों से कहीं अधिक गंभीर हो सकती है वास्तविक स्थिति
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>सामूहिक बलात्कार, यौन दासता और जबरन विवाह के भयावह मामले
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>बच्चियां भी बनीं शिकार, सबसे कम उम्र की पीड़िता सिर्फ 9 वर्ष
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>दारफ़ूर में जातीय पहचान के आधार पर हिंसा के आरोप
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>RSF और अन्य सशस्त्र समूहों पर लगे गंभीर आरोप
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>UN मानवाधिकार प्रमुख ने जवाबदेही और स्वतंत्र जांच की मांग की
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>दंडमुक्ति का माहौल क्यों बढ़ा रहा है मानवाधिकार संकट?
</b></li></ul><h4 style="text-align: justify;"><b>सूडान युद्ध में यौन हिंसा के क्रूर और बड़े पैमाने पर प्रयोग को लेकर चेतावनी
</b></h4><p style="text-align: justify; "><b>23 जून 2026 शान्ति और सुरक्षा
</b></p><p style="text-align: justify; ">संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) ने कहा है कि सूडान में अप्रैल 2023 में युद्ध शुरू होने के बाद से, युद्ध से जुड़ी यौन हिंसा व्यापक और बेहद क्रूर रूप धारण कर चुकी है, जिसके पीड़ितों, उनके परिवारों और समुदायों पर गहरे व दीर्घकालिक प्रभाव पड़ रहे हैं.
</p><p style="text-align: justify; ">रिपोर्ट के अनुसार, सूडान में युद्ध की शुरुआत से इस वर्ष अप्रैल मध्य तक 18 में से 16 प्रान्तों में यौन हिंसा की 546 घटनाओं की पुष्टि की गई है. इनमें कम से कम 838 लोग प्रभावित हुए, जिनमें 15 को छोड़कर सभी महिलाएँ और लड़कियाँ थीं.
</p><p style="text-align: justify; ">हालाँकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि ये आँकड़े वास्तविक स्थिति का केवल एक छोटा हिस्सा हैं.
</p><p style="text-align: justify; ">रिपोर्ट में पाया गया कि यौन हिंसा, युद्ध और विस्थापन के साथ-साथ फैली है और नागरिकों को भयभीत व मानसिक रूप से आहत करने के लिए लगातार इसका इस्तेमाल किया गया है.
</p><p style="text-align: justify; "><b>यौन हिंसा का हथियार के रूप में इस्तेमाल
</b></p><p style="text-align: justify; ">यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने मंगलवार को जारी एक रिपोर्ट में कहा है कि निष्कर्ष उनकी उस चेतावनी की पुष्टि करते हैं कि सूडान में यौन हिंसा का उपयोग युद्ध के हथियार के रूप में किया जा रहा है.
</p><p style="text-align: justify; ">उन्होंने कहा कि यह एक युद्ध अपराध है और यदि इसे व्यापक या व्यवस्थित हमलों के हिस्से के रूप में अंजाम दिया गया हो, तो यह मानवता के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में भी आ सकता है.
</p><p style="text-align: justify; ">रिपोर्ट में विशेष रूप से दारफ़ूर क्षेत्र का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वहाँ नागरिक आबादी के विरुद्ध व्यापक और व्यवस्थित हमलों के दौरान किए गए कुछ यौन हिंसा के कृत्य मानवता के विरुद्ध अपराध माने जा सकते हैं.
</p><p style="text-align: justify; ">यौन हिंसा की अधिकांश पुष्टि की गई घटनाओं के लिए त्वरित सहयोग बल (RSF), उससे जुड़े लड़ाके और अरब मिलिशिया ज़िम्मेदार पाए गए. 
</p><p style="text-align: justify; ">कुछ मामलों में सूडानी सशस्त्र बलों और अन्य सशस्त्र समूहों का भी नाम सामने आया है.
</p><p style="text-align: justify; "><b>सामूहिक बलात्कार के मामले
</b></p><p style="text-align: justify; ">रिपोर्ट में बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, यौन दासता, जबरन विवाह, जबरन वेश्यावृत्ति, यौन यातना और यौन शोषण के लिए मानव तस्करी जैसी गम्भीर घटनाओं को दर्ज की गई है. लगभग एक-चौथाई मामलों में सामूहिक बलात्कार शामिल था.
</p><p style="text-align: justify; ">इसके अलावा, नागरिकों की आवाजाही नियंत्रित करने, अपहरण, हिरासत और यौन दासता के लिए यौन हिंसा के इस्तेमाल का लगातार चलन भी दर्ज किया गया है.
</p><p style="text-align: justify; ">यूएन मानवाधिकार कार्यालय ने कम से कम 85 महिलाओं और लड़कियों के ऐसे मामले दर्ज किए हैं, जिन्हें यौन दासता में रखकर घरेलू काम करने या आय अर्जित करने के लिए मजबूर किया गया.
</p><p style="text-align: justify; "><b>बच्चों के साथ यौन हिंसा का मामला
</b></p><p style="text-align: justify; ">रिपोर्ट के अनुसार, यौन हिंसा के पीड़ितों में बच्चे भी शामिल हैं और सबसे कम उम्र की पीड़िता केवल 9 वर्ष की थी. 
</p><p style="text-align: justify; ">साथ ही, कम से कम 13 पीड़ितों की मृत्यु हुई, जिनमें अधिकांश सामूहिक बलात्कार की घटनाओं के बाद जान से हाथ धो बैठे.
</p><p style="text-align: justify; ">अनेक पीड़ितों को, स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव के कारण, गम्भीर चिकित्सीय जटिलताओं का सामना करना पड़ा, जबकि कम से कम 59 महिलाएँ और लड़कियाँ बलात्कार के बाद गर्भवती हुईं या उन्होंने बच्चों को जन्म दिया.
</p><p style="text-align: justify; ">रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि यौन हिंसा का इस्तेमाल कथित राजनैतिक या जातीय पहचान के आधार पर प्रतिशोध लेने के लिए किया गया. 
</p><p style="text-align: justify; ">पश्चिमी दारफ़ूर के मसालित समुदाय के अनेक पीड़ितों ने बताया कि हमलावर, बलात्कार करने से पहले उनकी जातीय पहचान पूछते थे.
</p><p style="text-align: justify; ">मानवाधिकार प्रमुख ने इन घटनाओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच कराने तथा सभी दोषियों को जवाबदेह ठहराने की अपील की है.
</p><p style="text-align: justify; ">उन्होंने कहा कि दंडमुक्ति का माहौल हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों के चक्र को और गहरा कर रहा है.
</p><div class="twitter-tweet twitter-tweet-rendered" style="display: flex; max-width: 550px; width: 100%; margin-top: 10px; margin-bottom: 10px;"><iframe id="twitter-widget-0" scrolling="no" frameborder="0" allowtransparency="true" allowfullscreen="true" class="" style="position: static; visibility: visible; width: 550px; height: 897px; display: block; flex-grow: 1;" title="X Post" src="https://platform.twitter.com/embed/Tweet.html?dnt=false&amp;embedId=twitter-widget-0&amp;features=eyJ0ZndfdGltZWxpbmVfbGlzdCI6eyJidWNrZXQiOltdLCJ2ZXJzaW9uIjpudWxsfSwidGZ3X2ZvbGxvd2VyX2NvdW50X3N1bnNldCI6eyJidWNrZXQiOnRydWUsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdHdlZXRfZWRpdF9iYWNrZW5kIjp7ImJ1Y2tldCI6Im9uIiwidmVyc2lvbiI6bnVsbH0sInRmd19yZWZzcmNfc2Vzc2lvbiI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfZm9zbnJfc29mdF9pbnRlcnZlbnRpb25zX2VuYWJsZWQiOnsiYnVja2V0Ijoib24iLCJ2ZXJzaW9uIjpudWxsfSwidGZ3X21peGVkX21lZGlhXzE1ODk3Ijp7ImJ1Y2tldCI6InRyZWF0bWVudCIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfZXhwZXJpbWVudHNfY29va2llX2V4cGlyYXRpb24iOnsiYnVja2V0IjoxMjA5NjAwLCJ2ZXJzaW9uIjpudWxsfSwidGZ3X3Nob3dfYmlyZHdhdGNoX3Bpdm90c19lbmFibGVkIjp7ImJ1Y2tldCI6Im9uIiwidmVyc2lvbiI6bnVsbH0sInRmd19kdXBsaWNhdGVfc2NyaWJlc190b19zZXR0aW5ncyI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdXNlX3Byb2ZpbGVfaW1hZ2Vfc2hhcGVfZW5hYmxlZCI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdmlkZW9faGxzX2R5bmFtaWNfbWFuaWZlc3RzXzE1MDgyIjp7ImJ1Y2tldCI6InRydWVfYml0cmF0ZSIsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfbGVnYWN5X3RpbWVsaW5lX3N1bnNldCI6eyJidWNrZXQiOnRydWUsInZlcnNpb24iOm51bGx9LCJ0ZndfdHdlZXRfZWRpdF9mcm9udGVuZCI6eyJidWNrZXQiOiJvbiIsInZlcnNpb24iOm51bGx9fQ%3D%3D&amp;frame=false&amp;hideCard=false&amp;hideThread=false&amp;id=2069434016411812075&amp;lang=en&amp;origin=https%3A%2F%2Fadmin.hastakshep.com%2Fstory%2Fadd%3FstoryId%3D30153&amp;sessionId=030695aaff4b66a3b8c49147fb7fa9257f327447&amp;theme=light&amp;widgetsVersion=6a3ad42b224df%3A1778106238597&amp;width=550px" data-tweet-id="2069434016411812075"></iframe></div><p style="text-align: justify; "><b>FAQs
</b></p><p style="text-align: justify; "><b><i>सूडान में यौन हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट क्या कहती है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के अनुसार अप्रैल 2023 से अप्रैल 2026 तक सूडान के 16 प्रांतों में यौन हिंसा की 546 घटनाओं की पुष्टि हुई है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>सूडान युद्ध में यौन हिंसा के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया गया है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश मामलों के लिए त्वरित सहयोग बल (RSF), उससे जुड़े लड़ाके और अरब मिलिशिया जिम्मेदार पाए गए हैं।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>क्या संयुक्त राष्ट्र ने इसे युद्ध अपराध माना है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">हाँ। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने कहा है कि यौन हिंसा का हथियार के रूप में इस्तेमाल युद्ध अपराध है और कुछ मामलों में यह मानवता के विरुद्ध अपराध भी हो सकता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>क्या बच्चों को भी निशाना बनाया गया?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">हाँ। रिपोर्ट में सबसे कम उम्र की पीड़िता 9 वर्ष की बच्ची बताई गई है।
</p><p style="text-align: justify; "><b><i>दारफ़ूर क्षेत्र का उल्लेख क्यों महत्वपूर्ण है?
</i></b></p><p style="text-align: justify; ">रिपोर्ट के अनुसार दारफ़ूर में नागरिक आबादी पर व्यापक और व्यवस्थित हमलों के दौरान यौन हिंसा के कई मामले सामने आए हैं, जिन्हें मानवता के विरुद्ध अपराध माना जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रॉपीज का बड़ा ऐलान: स्वच्छ ऊर्जा विस्तार के लिए 285 मिलियन डॉलर का निवेश, 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा को मिलेगी रफ्तार]]></title>
<description><![CDATA[Major announcement by Bloomberg Philanthropies: $285 million investment for clean energy expansion; renewable energy to gain momentum by 2030.]]></description>
<tags>स्वच्छ ऊर्जा,बिजली,संयुक्त राष्ट्र</tags>
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<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन,जलवायु विज्ञान,दुनिया,देश,पर्यावरण,समाचार]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 23 Jun 2026 17:14:09 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Environment Renewable Energy]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2025/11/05/45899-environment-renewable-energy.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2025/11/05/45899-environment-renewable-energy.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>बढ़ती वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा के तेजी से विस्तार में मदद हेतु $285 मिलियन देने का वादा : ब्लूमबर्ग फ़िलन्थ्रॉपी 
</b></h2><p style="text-align: justify; "><b>जैसे-जैसे बिजली की बढ़ती खपत वैश्विक ऊर्जा बाजारों को नया रूप दे रही है, नया सहयोग वैश्विक विकास के अगले युग को संचालित करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा उद्योगों को मजबूत करने में मदद करेगा…</b></p><p style="text-align: justify; "><b>Bloomberg Philanthropies ने दुनिया भर में स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार और बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए 285 मिलियन डॉलर की नई प्रतिबद्धता की घोषणा की है। यह निवेश उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सौर, पवन और स्वच्छ ऊर्जा उद्योगों को मजबूत करने, ऊर्जा संक्रमण को तेज करने तथा 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने पर केंद्रित है</b></p><p style="text-align: justify; ">नई दिल्ली, 21 जून, 2026 — जलवायु महत्वाकांक्षा और समाधान पर <b>संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष दूत माइकल आर. ब्लूमबर्ग</b> ने दुनिया की ऊर्जा प्रणालियों को संचालित करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा का तेजी से विस्तार करने में मदद हेतु $285 मिलियन देने का वादा किया है। यह नया प्रयास Bloomberg Philanthropies के वैश्विक ऊर्जा कार्य के अगले चरण को दर्शाता है, जिसका ध्यान दुनिया भर में भरोसेमंद, सस्ती और सुरक्षित बिजली प्रदान करने की स्वच्छ ऊर्जा की क्षमता में तेजी लाने पर केंद्रित है।
</p><p style="text-align: justify; ">जैसे-जैसे औद्योगिक विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, विद्युतीकरण और भू-राजनीतिक अस्थिरता वैश्विक ऊर्जा बाजारों को नया रूप दे रहे हैं, Bloomberg Philanthropies उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा उद्योगों को मजबूत करने के लिए अपने प्रयासों को और गहरा कर रहा है। इसके तहत उनकी संस्थागत ताकत, तकनीकी क्षमता, बाजार विशेषज्ञता और विश्लेषणात्मक क्षमताओं को बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है। यह उन्हें उन ऊर्जा नियोजन, वित्तपोषण और बाजार के निर्णयों में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाने में सक्षम बनाएगा, जिन पर पारंपरिक रूप से स्थापित ऊर्जा हितों (संबद्ध पक्षों) का वर्चस्व रहा है।
</p><p style="text-align: justify; ">Bloomberg Philanthropies पांच प्रमुख क्षेत्रों में स्थायी बदलाव लाने पर ध्यान केंद्रित करता है: कला, शिक्षा, पर्यावरण, सरकारी नवाचार और जन स्वास्थ्य। 
</p><p style="text-align: justify; ">जलवायु महत्वाकांक्षा और समाधान पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत और Bloomberg L.P. एवं Bloomberg Philanthropies के संस्थापक माइकल आर. ब्लूमबर्ग ने बताया "दुनिया के लगभग हर हिस्से में अब स्वच्छ ऊर्जा जीवाश्म ईंधन की तुलना में सस्ती है, और परिणामस्वरूप, वैश्विक बिजली उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी बढ़ रही है"। "लेकिन अभी भी कुछ ऐसी बाधाएं हैं जिन्हें सुधारा जा सकता है और जो इसके विस्तार की गति को धीमा कर रही हैं। ऊर्जा की मांग जिस अभूतपूर्व गति से बढ़ रही है, उसे देखते हुए हम इन बाधाओं को परिवारों और व्यवसायों के लिए ऊर्जा की लागत कम करने, और समुदायों के लिए स्वच्छ हवा व पानी की राह में अधिक समय तक रोड़ा नहीं बनने दे सकते। यह नया निवेश यह सुनिश्चित करने में मदद करेगा कि ऐसा न हो।"
</p><p style="text-align: justify; ">संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा, "स्वच्छ ऊर्जा का युग आ गया है, जैसे-जैसे बिजली की मांग बढ़ रही है, अब इसे उन अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से बढ़ाया जाना चाहिए जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। माइकल ब्लूमबर्ग की प्रतिबद्धता ठीक यही करती है – उन उद्योगों का समर्थन करना जो घरों को बिजली देंगे, बिलों को कम करेंगे, अर्थव्यवस्थाओं को ऊँचा उठाएंगे, और अरबों लोगों के लिए हवा को स्वच्छ करेंगे। आइए, मिलकर नवीकरणीय ऊर्जा क्रांति को दुनिया के हर कोने तक पहुंचाएं।"
</p><p style="text-align: justify; ">दुनिया के अधिकांश हिस्सों में स्वच्छ ऊर्जा अब बिजली का सबसे सस्ता नया स्रोत बन गई है, जिसमें 2025 में वैश्विक बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल्स) की हिस्सेदारी 34% तक पहुँच गई है। इसने लगभग एक सदी में पहली बार कोयले की 33% हिस्सेदारी को पीछे छोड़ दिया है। 2030 तक, नवीकरणीय और परमाणु ऊर्जा से दुनिया की आधी बिजली उत्पन्न होने का अनुमान है।
</p><p style="text-align: justify; ">लेकिन यह प्रगति एक नई चुनौती को भी सामने ला रही है: यह सुनिश्चित करना कि स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार बिजली की तेजी से बढ़ती मांग के साथ तालमेल बनाए रख सके।  हालांकि स्वच्छ ऊर्जा तकनीकें तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन उनका समर्थन करने वाले उद्योग जगत के खिलाड़ी अभी भी परिपक्व हो रहे हैं।  कई बाजारों में, स्वच्छ ऊर्जा उद्योग और बुनियादी ढांचा उन स्थापित ऊर्जा क्षेत्रों की तुलना में अभी भी कम संसाधन वाले हैं, जिन्होंने राजनीतिक प्रभाव, तकनीकी विशेषज्ञता, वित्तपोषण नेटवर्क और संस्थागत शक्ति बनाने में दशकों बिताए हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">अब सवाल यह नहीं है कि स्वच्छ ऊर्जा आर्थिक रूप से व्यावहारिक है या नहीं। सवाल अब यह है कि क्या इसके पीछे काम कर रहे उद्योग जगत के खिलाड़ी भविष्य की ऊर्जा प्रणाली को आकार देने के लिए पर्याप्त तेजी से परिपक्व हो सकते हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रोपीज का यह नया संकल्प उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (जहां बिजली की मांग सबसे तेजी से बढ़ रही है) में चल रहे मौजूदा प्रयासों को आगे बढ़ाकर, इसी अंतर को पाटने के लिए तैयार किया गया है। 
</p><p style="text-align: justify; ">वैश्विक बिजली क्षेत्र के लगभग 70% उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार देशों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, इस सहायता का उद्देश्य निम्नलिखित माध्यमों से 2030 तक सौर और पवन ऊर्जा को उनकी आधी से अधिक बिजली उत्पन्न करने में मदद करना है:
</p><p style="text-align: justify; ">● स्वच्छ ऊर्जा उद्योग संघों और क्षेत्रीय नेटवर्कों को मजबूत करना, ताकि वे ऊर्जा नियोजन, वित्तपोषण और मार्केट डिज़ाइन में बेहतर तरीके से भाग ले सकें;
</p><p style="text-align: justify; ">● सहायक डेटा, आर्थिक विश्लेषण और तकनीकी शोध प्रदान करना जो यह प्रदर्शित कर सकें कि कैसे स्वच्छ ऊर्जा बड़े पैमाने पर विश्वसनीय और सस्ती बिजली प्रदान कर सकती है;
</p><p style="text-align: justify; ">● सरकारों और नियामकों को तकनीकी सहायता प्रदान करना ताकि वे ऐसी बाजार स्थितियां बना सकें जो स्वच्छ ऊर्जा निवेश और उसके विस्तार में तेजी लाएं;
</p><p style="text-align: justify; ">● वित्तीय संस्थानों और निवेशकों के साथ साझेदारी करना ताकि स्वच्छ ऊर्जा बुनियादी ढांचे लिए निजी पूंजी के रास्ते खोले जा सकें।
</p><p style="text-align: justify; ">Global Solar Council की सीईओ, सोनिया डनलप ने कहा: "केवल प्रतिस्पर्धी तकनीक ही एक नई ऊर्जा प्रणाली का निर्माण नहीं करती है। हर बाजार में हम एक ही कहानी देखते हैं: आर्थिक रूप से यह व्यावहारिक है, परियोजनाएं भी तैयार हैं, लेकिन जो बात हमारी रफ्तार को धीमा कर देती है, वह है संस्थागत और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी। रिन्यूएबल एनर्जी एसोसिएशंस जो ग्रिड नियोजन, बाजार के स्वरूप और वित्तपोषण में प्रभावी ढंग से शामिल हो सकें, वे कोई हाशिए का मुद्दा नहीं हैं। वे ही वह माध्यम हैं जो किसी देश की ऊर्जा क्षमता को ग्रिड पर वास्तविक बिजली में बदलते हैं।  यही वह बात है जिसे यह निवेश स्वीकार करता है, और इसकी बहुत लंबे समय से दरकार थी।" 
</p><p style="text-align: justify; ">पैट्रीशिया एस्पिनोसा, onepoint5 की सीईओ और फ़ाउंडिंग पार्टनर, तथा UNFCCC की पूर्व एग्जीक्यूटिव सेक्रेटरी ने कहा:"वैश्विक ऊर्जा मांग को बढ़ाने वाली उभरती अर्थव्यवस्थाएं वही हैं जिनमें नवीकरणीय ऊर्जा से खुद को ऊर्जावान बनाने की सबसे बड़ी क्षमता है। उनमें से कई देशों ने महत्वाकांक्षी स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य तय किए हैं, और यह बदलाव कैसे होगा, इसके लिए कोई एक तय ब्लूप्रिंट नहीं है। इसे हर देश, उसकी कंपनियों और वहां के लोगों की वास्तविकताओं के अनुरूप ढाला जाना चाहिए।" उन सब में जो एक समान बात है, वह है एक प्रभावी और अनुकूल माहौल  तथा बुनियादी ढांचे की आवश्यकता, ताकि उन लक्ष्यों को बड़े पैमाने पर धरातल पर उतारा जा सके।" "यही वह अंतर है जिसे यह संकल्प पूरा करता है, और इसीलिए यह महत्वपूर्ण है।" 
</p><p style="text-align: justify; ">African Climate Foundation के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सलीम फकीर ने कहा: "अफ्रीका के पास प्रचुर मात्रा में नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन हैं और वहाँ बिजली की मांग भी तेजी से बढ़ रही है।  जिस चीज़ की कमी रही है वह क्षमता नहीं, बल्कि उसे उजागर करने के लिए संस्थागत बुनियादी ढांचा और योग्यताएं हैं: यानी ऐसे प्लेयर्स का एक पूरा इकोसिस्टम जिसके पास एनर्जी प्लानिंग में शामिल होने की विश्लेषणात्मक क्षमता हो, नियामकों के साथ काम करने की तकनीकी विशेषज्ञता हो, और बड़े पैमाने पर निजी वित्त जुटाने की विश्वसनीयता हो। परोपकार जो सीधे इन कमियों को लक्षित करता है, एक ऐसा हस्तक्षेप है जो पूरे महाद्वीप की ऊर्जा प्रणाली की दिशा और गति को बदल सकता है।  इस काम को बिल्कुल सटीक तरीके से करने की Bloomberg Philanthropies की प्रतिबद्धता हमें अफ्रीका के ऊर्जा भविष्य के स्वरूप को स्थायी रूप से बदलने का एक वास्तविक अवसर देती है।"
</p><p style="text-align: justify; ">Ember के सह-संस्थापक डेव जोन्स के अनुसार:"दुनिया में ऊर्जा की अधिकांश वृद्धि विकसित हो रहे देशों में हो रही है, और यह विशेष रूप से बिजली के क्षेत्र में हो रही है। ज़्यादातर देशों में सौर ऊर्जा, बैटरी और पवन ऊर्जा का संयोजन कॉम्बिनेशन अब चौबीसों घंटे भरोसेमंद और आपूर्ति-योग्य डिस्पैचेबल बिजली पाने का सबसे सस्ता तरीका बन गया है। जो बात इसके विस्तार को धीमा कर रही है, वे हैं संरचनात्मक बाधाएं, जिनमें नीतिगत फैसले लेने के लिए गुणवत्तापूर्ण डेटा और विश्लेषण की कमी भी शामिल है। यह निवेश उद्योगों, सरकारों और निवेशकों को वह जानकारी, मैट्रिक्स और पूर्वानुमान प्रदान करेगा जिसकी उन्हें स्वच्छ ऊर्जा की क्षमता को पूरी तरह से अनलॉक करने के लिए आवश्यकता है।"
</p><p style="text-align: justify; ">कीनिया सरकार के जलवायु परिवर्तन के विशेष दूत (स्पेशल एन्वॉय), अली मोहम्मद ने कहा:"अफ्रीका भर के देशों के लिए, नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता असीम है।  इसके विस्तार को रोकने की वजह धरातल पर महत्वाकांक्षा या संसाधनों की कमी नहीं रही है। यह उस क्षमता और उसे निवेश, परियोजनाओं तथा ग्रिड पर वास्तविक बिजली में बदलने की योग्यता के बीच का अंतर है। निवेश के जोखिम को कम करने के लिए लॉन्ग-टर्म ऑफटेक और भविष्य की जरूरतों के अनुकूल निवेश फ्यूचर-प्रूफ इन्वेस्टमेंट्स हासिल करने के लिए इनोवेटिव फाइनेंसिंग सॉल्यूशंस, जो इस अंतर को पाट सकें—यही वह चीज़ है जिसकी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को इस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। और यही यह तय करेगा कि एनर्जी ट्रांजिशन का लाभ उन लोगों तक पहुँचे, जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा आवश्यकता है।"
</p><p style="text-align: justify; ">नेशनल सोलर एनर्जी फेडरेशन ऑफ इंडिया (NSEFI) के सीईओ, सुब्रह्मण्यम पुलीपाका ने कहा: "भारत की सौर ऊर्जा विस्तार की गति लगभग बेजोड़ है।  जैसे-जैसे भारत अपने एनर्जी ट्रांजिशन के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है, ग्रिड के सीमलेस ग्रिड इंटीग्रेशन में तेजी लाने, ऊर्जा भंडारण को बड़े पैमाने पर बढ़ाने और नेक्स्ट-जेनरेशन मार्केट मैकेनिज्म के द्वार खोलने के लिए इस मजबूत नींव को और आगे बढ़ाना बेहद जरूरी है। यह निवेश बिल्कुल उन्हीं जगहों पर सीधे सहायता पहुंचाता है जहां प्रगति के वास्तविक अवसर मौजूद हैं।"
</p><p style="text-align: justify; ">ViriyaENB की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सुजांती सितोरुस ने कहा: "इंडोनेशिया के आज के ऊर्जा संबंधी विकल्प न केवल उसके अपने भविष्य को आकार देंगे, बल्कि पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया के एनर्जी ट्रांज़िशन की दिशा और गति को भी तय करेंगे।  100 गीगावाट सौर ऊर्जा स्थापित करने की राष्ट्रपति की महत्वाकांक्षा इस अवसर के विशाल पैमाने को दर्शाती है। इसे साकार करने के लिए मजबूत संस्थानों, प्रभावी योजना और उन परियोजनाओं को धरातल पर उतारने की क्षमता की आवश्यकता है जो देश भर के समुदायों के लिए किफायती, विश्वसनीय और समावेशी लाभ प्रदान कर सकें।  ऐसी अनुकूल परिस्थितियों के लिए मिलने वाला समर्थन अक्सर बिजली संयंत्रों की तुलना में कम दिखाई देता है, लेकिन यही वह चीज़ है जो महत्वाकांक्षा को असल मेगावाट में बदलती है।"
</p><p style="text-align: justify; ">आज की यह घोषणा वैश्विक स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों की ओर ट्रांज़िशन को तेज करने के लिए माइक ब्लूमबर्ग द्वारा एक दशक से अधिक समय से किए जा रहे कार्यों को और आगे बढ़ाती है।  Bloomberg Philanthropies ने सबसे पहले 2011 में संयुक्त राज्य अमेरिका में 'बियॉन्ड कोल' (Beyond Coal) अभियान का समर्थन किया था, और फिर 2017 में इसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार किया।  तब से, Bloomberg Philanthropies द्वारा समर्थित प्रयासों ने कोयले से स्वच्छ ऊर्जा की ओर वैश्विक बदलाव को गति देने में मदद की है, जिससे चार महाद्वीपों में लगभग 450 कोयला संयंत्रों को बंद करने में योगदान मिला है, जिसमें यूरोप के 60 प्रतिशत से अधिक कोयला संयंत्र शामिल हैं। दुनिया भर के भागीदारों के साथ मिलकर, Bloomberg Philanthropies ने 1,100 गीगावाट से अधिक स्वच्छ ऊर्जा क्षमता स्थापित करने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाने में भी मदद की है – जो लगभग 30 करोड़ घरों को बिजली देने के लिए पर्याप्त है।
</p><p style="text-align: justify; ">जलवायु और ऊर्जा के क्षेत्र में एक दशक से भी अधिक समय के काम को आगे बढ़ाते हुए, इस प्रतिबद्धता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करने में मदद करना है कि भविष्य में बिजली की मांग को बढ़ाने वाले देशों के पास अधिक स्वच्छ, अधिक किफायती और अधिक सुरक्षित ऊर्जा प्रणालियों के निर्माण के लिए आवश्यक क्षमता, विशेषज्ञता और निवेश मौजूद हो।
</p><p style="text-align: justify; ">
</p><p style="text-align: justify; ">डॉ. सीमा जावेद
</p><p style="text-align: justify; ">पर्यावरणविद  &amp;  कम्युनिकेशन विशेषज्ञ
</p><p style="text-align: justify; "></p>]]></content:encoded>
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