<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?>
<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" version="2.0">
<channel>
<title><![CDATA[hastakshep | हस्तक्षेप]]></title>
<description><![CDATA[हस्तक्षेप एक स्वतंत्र हिंदी न्यूज़ पोर्टल है जो समसामयिक, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक मुद्दों पर समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ दलित, वंचित, आदिवासी, महिला व छात्र अधिकारों को विशेष महत्व दिया जाता है।]]></description>
<link>https://hastakshep.com</link>
<image>
<url>https://hastakshep.com/images/logo.png</url>
<title>hastakshep | हस्तक्षेप</title>
<link>https://hastakshep.com</link>
</image>
<atom:link href="https://hastakshep.com/custom_feeds_partners.xml" rel="self" type="application/rss+xml"/>
<pubDate>Tue, 14 Apr 2026 22:37:33 GMT</pubDate>
<lastBuildDate>Tue, 14 Apr 2026 22:37:33 GMT</lastBuildDate>
<copyright><![CDATA[Hastakshep]]></copyright>
<language><![CDATA[hi]]></language>
<managingEditor><![CDATA[anushka@blinkcms.ai (Hastakshep)]]></managingEditor>
<ttl>1</ttl>
<item>
<title><![CDATA[जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम की 107वीं बरसी: साझी शहादतों की विरासत और इतिहास के साथ होता वर्तमान हस्तक्षेप]]></title>
<description><![CDATA[13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम की 107वीं बरसी पर विशेष लेख—अंग्रेजी साम्राज्यवाद की बर्बरता, हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकता की साझा शहादतें, और आज के समय में इस विरासत के साथ हो रहा हस्तक्षेप]]></description>
<tags>साम्राज्यवाद,जालियांवाला बाग,इतिहास,आज का इतिहास,सरदार उधम सिंह,स्वतंत्रता,स्वतंत्रता आंदोलन,स्वतंत्रता संग्राम</tags>
<link>https://hastakshep.com/column/jallianwala-bagh-107th-anniversary-shared-martyrdom-history-analysis-295029</link>
<guid isPermaLink="true">https://hastakshep.com/column/jallianwala-bagh-107th-anniversary-shared-martyrdom-history-analysis-295029</guid>
<category><![CDATA[आपकी नज़र,स्तंभ,हस्तक्षेप]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 13 Apr 2026 08:52:05 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[107th Anniversary of the Jallianwala Bagh Massacre: The Legacy of Shared Martyrdoms and Contemporary Interference with History]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/04/13/113195-107th-anniversary-of-the-jallianwala-bagh-massacre-the-legacy-of-shared-martyrdoms-and-contemporary-interference-with-history.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/04/13/113195-107th-anniversary-of-the-jallianwala-bagh-massacre-the-legacy-of-shared-martyrdoms-and-contemporary-interference-with-history.webp' /><p style="text-align: justify; "><b>जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम/ ख़ूनी बैसाखी की 107वीं बरसी: हिन्दू-मुसलमान-सिख साझी शहादतों की महान विरासत जिसे आरएसएस-भाजपा शासक मलियामेट करने में लगे हैं!</b></p><h2><p><b>राष्ट्रीय अभिलेखागार में बंद जलियांवाला बाग़ का सजीव इतिहास
</b></p></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li><b>13 अप्रैल 1919: बैसाखी के दिन हुआ जनसंहार</b></li><li style="text-align: justify;"><b>अंग्रेजी साम्राज्यवाद: संस्थागत दमन की सुनियोजित संरचना
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>चश्मदीद गवाहियाँ: रतन देवी और अन्य दस्तावेजों की भयावह सच्चाई</b></li><li style="text-align: justify;"><b>हवाई बमबारी और पंजाब में दमन का विस्तार
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>रौलेट एक्ट और राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध की पृष्ठभूमि
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>रवींद्रनाथ टैगोर और जिन्ना का प्रतिरोध: सत्ता के विरुद्ध नैतिक आवाज़
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>प्रतिबंधित साहित्य: शब्दों में दर्ज प्रतिरोध की आग
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>शहीद उधम सिंह: बदले की राजनीति नहीं, प्रतिरोध की विरासत
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>शहीदों की असल संख्या: इतिहास में छुपी सच्चाइयाँ
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>साझी शहादत: हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकता का ऐतिहासिक प्रमाण
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>आज़ादी के बाद: शहीदों की विरासत के साथ उपेक्षा और हस्तक्षेप
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>वर्तमान संदर्भ: इतिहास, स्मृति और वैचारिक संघर्ष
</b></li></ul><p style="text-align: justify; ">विश्व इतिहास की पहली साम्राज्यवादी शक्ति अंग्रेज़ नहीं थे। इतिहास साम्राज्यों की मानवता विरोधी दास्तानों से भरा पड़ा है। हम सब पुर्तगाली, रोमन, फ़्रांसीसी, उस्मानियाई, जर्मन इत्यादि साम्राज्यों की रक्त रंजित दास्तानों से बख़ूबी परिचित हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि अंग्रेज़ साम्राज्य एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह साम्राज्य ज़्यादा व्यापक स्थायी और निरंतरता लिए था। अंग्रेज़ी साम्राज्य के ज़्यादा टिकाऊ होने का सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्होंने साम्राज्य चलाने के काम को एक संस्थागत रूप दिया था। उन्होंने इस काम के लिए दफ़्तरों का जाल-सा बिछा दिया था। साम्राज्य द्वारा की जाने वाली हर गतिविधि की सूचना हासिल की जाती थी और उसे संग्रहित किया जाता था। 
</p><p style="text-align: justify; ">अंग्रेज़ साम्राज्य पहला साम्राज्य था, जिसने राज-काज से संबंधित तमाम दस्तावेज़ों और काग़ज़ात को अभिलेखागारों में सुरक्षित रखना शुरू किया। ये सब करने के पीछे उनका पुरानी चीज़ों के प्रति मोह नहीं था, बल्कि वे इतिहास के इन अनुभवों के माध्यम से वर्तमान को समझना और भविष्य को संचालित करना चाहते थे।
</p><p style="text-align: justify; ">भारत में अंग्रेजों ने 1891 में केंद्रीय अभिलेखागार की स्थापना कलकत्ता में की। बाद में इसे दिल्ली लाया गया। इसमें अंग्रेज़ी शासन के तमाम सरकारी दस्तावेज़ों का तो संग्रह था ही, इसके अलावा इसमें ख़ुफ़िया रिपोर्टों, सरकार विरोधी गतिविधियों, दलालों का ब्यौरा और प्रतिबंधित साहित्य का भी विशाल भंडार है। 
</p><p style="text-align: justify; ">अंग्रेज़ जब भारत छोड़कर गए तो इसको भी भारत सरकार के हवाले कर गए (यह स्वाभाविक है कि उन्होंने अति-ख़तरनाक दस्तावेज़ों ख़ासकर अंग्रेज़ों के हिंदुस्तानी दलालों की करतूतों के ब्यौरे वाले दस्तावेज़ों को भारत छोड़ने से पहले नष्ट कर दिया होगा या उन्हें साथ ले गये होंगे)।
</p><p style="text-align: justify; "><b>राष्ट्रीय अभिलेखागार के बस्तों में बंद जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम का इतिहास
</b></p><p style="text-align: justify; ">ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का यह ख़ज़ाना, जो आज़ादी के बाद राष्ट्रीय अभिलेखागार कहलाया, ऊपरी तौर पर तो गुज़रे ज़माने से संबंधित बेज़ुबान दस्तावेज़ों का रिकार्ड ही लगता है। लेकिन जब 1994 में जलियांवाला बाग़ अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को अँगरेज़ शासकों द्वारा अंजाम दिए गए क़त्लेआम की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर इस विभाग ने मूल दस्तावेज़ों, व्यक्तिगत काग़ज़-पत्रों, प्रतिबंधित साहित्य और चौंका देने वाले चित्रों की प्रदर्शनी लगाई (जिस को पहली बार 13 अप्रैल, 1994 को जलियांवाला बाग़ में प्रदर्शित किया गया) तो एक तरफ़ गोरे शासकों के बेमिसाल बर्बर दमन और ख़ूंरेज़ी की दास्तानें जानकर दिल दहल उठा तो दूसरी ओर देश के हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों और अन्य धर्मों के अनुयाइयों ने किस बहादुरी से इस दमन-बर्बरता का सामना किया और मिलकर बेमिसाल क़ुर्बानियां दीं तो इसे जानकर सीना फ़ख़्र से फूल गया। 
</p><p style="text-align: justify; ">इस प्रदर्शनी को देश के विभिन्न बड़े शहरों में घुमाया गया तो बेज़ुबान दस्तावेज़ों में छिपा अँगरेज़ शासकों की बर्बरता और जनता के प्रतिरोध का इतिहास सजीव हो उठा, मानो दफ़न इतिहास ज़िंदा होकर सामने खड़ा हो। 
</p><p style="text-align: justify; ">यह प्रदर्शनी अगर एक तरफ़ अंग्रेज़ी शासन की बर्बरता, वहशीपन और चालाकी की शर्मनाक दास्तान बयान करती थी तो दूसरी ओर भारत की आज़ादी के मतवालों की बहादुरी की गाथाओं का भी जीवंत चित्रण करती थी। 
</p><p style="text-align: justify; ">याद रहे कि जलियाँवाला बाग़ में बैसाखी वाले दिन 13 अप्रैल 1919 को समकालीन दस्तावेज़ों के अनुसार 20 हज़ार से ज़्यादा लोग कांग्रेसी नेताओं डॉ. सतपाल और सैफ़ुददीन किचलू की अंग्रेज़ हकूमत द्वारा गिरफ़्तारी का विरोध करने के लिए जुटे थे। 
</p><p style="text-align: justify; ">इस प्रदर्शनी में प्रस्तुत सामग्री चौंका देने वाली थी और इस बात का शिद्दत से एहसास कराती थी कि जब अंग्रेज़ों का राज शिखर पर था, तब भी इस देश के लोग अंग्रेज़ी लुटेरों से बराबर का लोहा ले रहे थे। यह कितना दुखद है कि इस अभूतपूर्ण प्रदर्शिनी को बस्तों में बंद कर दिया गया और बर्बर दमन और विरोध की शानदार दस्तानों पर ताला डल गया जो जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम की 100वीं बरसी पर भी नहीं खुला है। 
</p><p style="text-align: justify; "><b>क़त्लेआम के चश्मदीद दस्तावेज़ 
</b></p><p style="text-align: justify; ">सबसे दिल दहला देने वाले दस्तावेज़ और चित्र ‘जलियांवाला बाग़’ त्रासदी से संबंधित हैं। जलियांवाला बाग़ के क़त्लेआम से पहले और बाद के मूल चित्र (जो पुलिस रिकार्ड में थे) को दर्शाया गया। रतन देवी जिन्होंने 13 और 14 अप्रैल 1919 की रात जलियांवाला बाग़ में हज़ारों लाशों और ज़ख़्मियों के बीच अपने पति की लाश के सिरहाने बैठकर बिताई थी, उनका रोंगटे खड़े कर देने वाला मूल बयान भी पढ़ने को मिलता है, 
</p><p style="text-align: justify; ">"मैं अपने मृतक पति के पास बैठ गई, मेरे हाथ बांस का एक डंडा भी लग गया था, जिससे मैं कुत्तों को भगाती रही। मेरे बराबर में ही तीन और लोग गंभीर रूप से ज़ख़्मी पड़े थे, एक भैंस गोलियां लगने के कारण बुरी तरह रेंग रही थी, और लगभग 12 साल का एक बच्चा, जो बुरी तरह से ज़ख़्मी था और मौत से लड़ रहा था, मुझसे बार-बार निवेदन करता था कि मैं उसे छोड़ कर न जाऊं। मैंने उसे बताया कि वो फ़िक्र न करे क्योंकि मैं अपने मृतक पति की लाश को छोड़कर जा ही नहीं सकती थी। 
</p><p style="text-align: justify; ">मैंने उससे पूछा कि अगर उसे सर्दी लग रही हो तो मैं उसे अपनी चादर उढ़ा देती हूं, लेकिन वह तो पानी मांगे जा रहा था, लेकिन पानी वहां कहां था।" 
</p><p style="text-align: justify; ">4 अक्टूबर, 1919 के ‘अभ्युदय’ अख़बार में छपी 18 वर्षीय अब्दुल करीम और 17 वर्षीय रामचंद्र नाम के दो दोस्तों की तस्वीरों और जलियांवाला बाग़ में उनकी शहादत के वृत्तांत को पढ़कर दिल-दिमाग़ सन्न हो जाता है। ये दोनों ही अमृतसर से नहीं बल्कि लाहौरियों के बेटे थे। अब्दुल करीम की शहादत के तुरंत बाद जब परीक्षाफल प्रकाशित हुआ तो पंजाब विश्वविद्यालय की दसवीं की परीक्षा में वह सर्वप्रथम आए थे। 
</p><p style="text-align: justify; "><b>निहत्थे देश वासियों पर हवाई बमवारी
</b></p><p style="text-align: justify; ">यह शर्मनाक तथ्य भी पहली बार सामने आया कि जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम के अगले दिन, 14 अप्रैल, 1919 को अंग्रेज़, वायुसेना के एक जहाज़ नंबर 4491, किस्म बी.ई.जेड.ई. जो कि 31वें स्क्वाड्रन का हिस्सा था, को उड़ाते हुए कैप्टन कारबेरी ने 2.20 मिनट से लेकर 4.45 मिनट तक जबर्दस्त बमबारी की थी। अंग्रेज़ी वायुसेना के रिकॉर्ड में दर्ज इस हवाई बमवारी के ब्यौरे के अनुसार:
</p><p style="text-align: justify; ">"समय 15.10, जगह गुजरांवाला रेलवे स्टेशन (अब पाकिस्तानी पंजाब में) के आसपास बमबारी से आग की लपटें उठ रही हैं। समय 15.20 स्थान गुजरांवाला के उत्तर पश्चिम में 2 मील दूर एक गांव-लगभग 150 लोगों की भीड़ पर बमबारी, गांव में मशीन गन से 50 राउंड गोली चलाई। समय 15.30, स्थान- पहली वाली जगह से एक मील दक्षिण की ओर पचास लोगों की भीड़ पर बमबारी, गांव में मशीन गन द्वारा 25 राउंड गोलीबारी, एक खेत में 200 लोगों की भीड़ पर बमबारी, लोग भागकर एक घर में घुसे, जिस पर 30 राउंड मशीन गन से गोलीबारी, समय 15.40, स्थान गुजरांवाला नगर शहर के दक्षिण में लोगों की भीड़ पर बमबारी, सड़कों पर चलते हुए ‘देसी’ लोगों पर मशीन गन से 100 राउंड गोलीबारी। 15.50 पर जब बमवर्षक जहाज लाहौर के लिए चला तो कोई प्रणाली सड़कों पर नहीं था। समय, 16.45, लाहौर हवाई अड्डे पर बमवर्षक जहाज की सही सलामत वापसी।"
</p><p style="text-align: justify; "><b>प्रतिरोध की हैरत-अंगेज़ दास्तानें
</b></p><p style="text-align: justify; ">	इस प्रदर्शनी में सर सिडनी आर्थर टेलर रौलेट की अध्यक्षता में सन् 1917 में गठित राजद्रोह समिति से संबंधित गुप्त दस्तावेज़ों को पहली बार पेश किया गया। इस समिति ने उस समय में 87020 रुपये खर्च करके कलकत्ता और लाहौर में अनेक गुप्त बैठकें कीं और 18 अप्रैल, 1918 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट को सरकार ने स्वीकार करके अराजकता या क्रांतिकारी अपराध अधिनियम (रौलेट एक्ट के नाम से बदनाम) के तौर पर 18 मार्च, 1919 को देश भर में लागू किया। 
</p><p style="text-align: justify; ">देश भर में इसका ज़बर्दस्त विरोध हुआ। प्रदर्शनी में मोहम्मद अली जिन्ना का 28 मार्च, 1919 वाला वह पत्र भी प्रदर्शित किया गया, जिसमें उन्होंने सरकार पर ‘सभ्यता का दामन छोड़ देने’ का इल्ज़ाम लगाते हुए इम्पीरियल विधान परिषद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा की थी। 
</p><p style="text-align: justify; ">जिन्ना जो बाद में एक सांप्रदायिक नेता के तौर पर उभरे, कभी भारत के आम लोगों की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए इम्पीरियल विधान परिषद की सदस्यता को लात भी मार सकते थे, यह जानकर सुखद एहसास होता है।
</p><p style="text-align: justify; ">इस प्रदर्शनी में केंद्रीय ख़ुफ़िया विभाग की अति-गुप्त रिपोर्टों को भी पहली बार देश के सामने रखा गया। 
</p><p style="text-align: justify; ">आमतौर पर शांत और अहिंसात्मक माने जाने वाले गुजरातियों ने रौलेट समिति के ख़िलाफ़ अहमदाबाद में अंग्रेज़ी सत्ता के प्रतीकों की जिस तरह होली जलाई थी, वह जानने योग्य है। प्रदर्शित गुप्त रिपोर्टों के अनुसार 11, 12 अप्रैल 1919 को अहमदाबाद में प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टर के दफ़्तर, नगर मजिस्ट्रेट, फ्लैग स्टाफ़, अहमदाबाद जेल, मुख्य टेलीग्राफ़ केंद्र और 26 पुलिस चौकियों को आग लगाई थी। स्वयं अंग्रेजों की इस रिपोर्ट से यह बात साफ़ होती है कि अंग्रेज़ सत्ता के विरोध के केंद्र केवल बंगाल और पंजाब ही नहीं थे। 
</p><p style="text-align: justify; "><b>गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का प्रतिरोध
</b></p><p style="text-align: justify; ">इस प्रदर्शनी में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के अपने हाथ से लिखे उस मूल पत्र की प्रति भी दर्शकों के लिए उपलब्ध कराई गई, जो उन्होंने पंजाब में दमन के विरोध में ‘नाइट’ की उपाधि त्यागने की घोषणा करते हुए वायसराय को लिखा था। इस पत्र में उन्होंने लिखा : 
</p><p style="text-align: justify; ">"समय आ गया है जबकि सम्मान के पदक वर्तमान अपमान के संबंध में हमारी लज्जा के प्रतीक बन गए हैं... और मैं अपनी ओर से खड़ा रहना चाहता हूं, हर प्रकार की विशिष्टता के बिना अपने देश के लोगों के साथ, जिनको साधारण आदमी होने के कारण एक ऐसा अपमान और जीवन सहना पड़ रहा है, जो इंसान के लिए किसी भी तरह स्वीकार योग्य नहीं है।" 
</p><p style="text-align: justify; "><b>सरकारी कर्मचरियों का प्रतिरोध 
</b></p><p style="text-align: justify; ">भारत सरकार के गृह सचिव का इसी दौर का एक और रोचक पत्र भी यहां उपलब्ध कराया गया, जिससे पता लगता है कि सरकारी दमन के ख़िलाफ़ केंद्रीय सचिवालय के सरकारी कर्मचारियों ने भागीदारी की थी। इस गुप्त पत्र में गृह सचिव ने सख़्त कार्रवाई की मांग करते हुए यह भी लिखा कि सरकार की भद्द पिटने के डर से अनुशासनात्मक कार्रवाई न की जाए।
</p><p style="text-align: justify; "><b> क़त्लेआम विरोधी साहित्य पर प्रतिबन्ध	
</b></p><p style="text-align: justify; ">विदेशी शासकों के अत्याचारों और भारतीय जनता के प्रतिरोध के एक पूरे चरण पर प्रकाश डालती इस प्रदर्शनी का सबसे सशक्त हिस्सा था उस प्रतिबंधित साहित्य की उपस्थिति, जो अंग्रेजों ने ज़ब्त करके ख़ुफ़िया विभाग की फ़ाइलों में नत्थी कर दिया था। ये देश की हर भाषा में लिखा गया था। 
</p><p style="text-align: justify; ">‘बाग़े-जलियां’(रामस्वरूप गुप्ता द्वारा हिंदी में लिखित संगीतात्मक नाटक), ‘जलियांवाला बाग़’ (फ़िरोज़द्दीन शरफ़ द्वारा गुरमुखी में एक लंबी कविता), ‘पंजाब का हत्याकांड’ (उर्दू में लम्बा नाटक) और ‘जलियांवाला बाग़’ (एक लम्बा गुजराती नाटक) तो किताबों के रूप में ही प्रदर्शनी में पेश किया गया। 
</p><p style="text-align: justify; ">यह कितना दुखद है कि आज़ादी के 70 साल बाद भी हमारी यह गौरवशाली परंपरा धूल से अटे बस्तों में बंद है। यह वे साहित्यिक रचनाएँ थीं जिनसे दुनिया का सबसे शक्तिशाली अंग्रेज़ साम्राज्य भी थर्राता था। इस साहित्यिक प्रतिरोध के कुछ नमूने यहाँ पेश हैं:
</p><p style="text-align: justify; "><i><b>	"बेगुनाहों पर बमों की बेख़तर बौछारों की/ दे रहे हैं धमकियां बंदूक-तलवार की। 
</b></i></p><p style="text-align: justify; "><i><b>बाग़ की जलियां में निहत्थों पर चलाई गोलियां/ पेट के बल भी रेंगाया, ज़ुल्म की हद पार की।"
</b></i></p><p style="text-align: justify; "><i><b> "जुल्म डायर ने किया था रंग जमाने के लिए/ हिंद वालों को मुसीबत में फंसाने के लिए।
</b></i></p><p style="text-align: justify; "><i><b>ख़ून से पंजाब के डायर की लिखी डायरी/ रुबरु रख दी मेरी तबियत जलाने के लिए। 
</b></i></p><p style="text-align: justify; "><i><b>बाग़े-जलियां में शहीदों की बने गर यादगार/ जायेंगे अशिक़े-वतन आंसू बहाने के लिए।" 
</b></i></p><p style="text-align: justify; "><i><b>"हम उजड़ते हैं तो उजड़ें, वतन आबाद रहे। मर मिटे हैं हम के अब वतन आज़ाद रहे। 
</b></i></p><p style="text-align: justify; "><i><b>वतन की ख़ातिर जो अपनी जान दिया करते हैं/ मरते नहीं हैं वो हमेशा के लिए जिया करते हैं।"
</b></i></p><h3 style="text-align: justify; "><b> शहीद उधम सिंह जिन्होंने जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम का बदला लिया 
</b></h3><p style="text-align: justify; ">इस क़त्लेआम पर देश के लोगों को प्यार करने वाले जांबाज़ खामोश नहीं रहे, उन्होंने उन शैतानों से बदला लिया जिन्होंने इसे अंजाम दिया था। इस सिलसिले में शहीद उधम सिंह का ज़िक्र न हो, यह कैसे हो सकता है। सुविख्यात क्रांतिकारी ऊधम सिंह का जन्म एक ग़रीब सिख परिवार में हुआ और एक अनाथालय में उनकी परवरिश हुई। वे भगत सिंह से गहरा लगाव रखते थे। 20 वर्षीय उधम सिंह ख़ूनी बैसाखी वाले दिन अमृतसर में ही थे। तभी से उनके दिल में इसका बदला लेने की ज्वाला धधक रही थी। इस बीच वे कम्युनिस्ट विचारों को ग्रहण कर चुके थे। उनके जीवन का एक ही मक़सद था कि किसी भी क़ीमत पर क़त्लेआम को अंजाम देने वाले दो सब से बड़े अफ़सरों (सर माइकल फ्रांसिस ओ ड्वायर जो उस समय पंजाब का अँगरेज़ शासक था और कर्नल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर जिस ने जलियाँवाला बाग़ में क़त्लेआम का हुक्म दिया था) से बदला लिया जाये। 
</p><p style="text-align: justify; ">डायर की 1927 में मौत हो गई थी और अब सिर्फ़ ओ ड्वायर बचा था जिस की रिहाइश लंदन (इंग्लैंड) में थी। उधम सिंह की ज़िंदगी का एक ही मक़सद था कि किसी तरह वहाँ पहुंचा जाये। 
</p><p style="text-align: justify; ">इस काम को अंजाम देने के लिए और इंग्लैंड में प्रवेश पाने की जुगत में वे मिस्र, कीनिया, उगांडा, अमरीका और समाजवादी रूस में वहां की कम्युनिस्ट तहरीकों में काम करते रहे। आख़िरकार 21 साल बाद उन्हें सफलता मिली, जब उन्होंने 13 मार्च 1940 को लंदन में माइकल ओ डायर की गोली मारकर हत्या कर दी। 
</p><p style="text-align: justify; ">मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने पर जब ऊधम सिंह से नाम पूछा गया, तो उन्होंने अपना नाम ऊधम सिंह नहीं बताया बल्कि ‘मोहम्मद सिंह आज़ाद’ बताया। ऐसा नाम जिसमें मुसलमान, सिख और हिंदू तीनों के नाम शामिल हैं। इस तरह उपनिवेशवादी शासकों के विरुद्ध जारी संघर्ष में एक बार फिर भारत में सभी धर्मों के बीच एकता की बुनियादी ज़रूरत का संदेश ज़बर्दस्त तरीक़े से प्रस्तुत किया। 
</p><p style="text-align: justify; ">याद रहे यह वो ख़तरनाक समय था जब गोरे-शासकों के हिन्दू-मुसलमान-सिख प्यादे साझे स्वतंत्रता आंदोलन को तोड़ने के लिए धार्मिक राष्ट्रवाद के जंगी नारे बुलंद कर रहे थे। 
</p><h4 style="text-align: justify; "><b>शहीद उधम सिंह की अपने नाम के बारे में अंतिम इच्छा की अवहेलना 
</b></h4><p style="text-align: justify; ">महान शहीद उधम सिंह ने अपना नया नाम ‘<b>मोहम्मद सिंह आज़ाद</b>’ चुना था और ताकीद की थी कि उनको किसी और नाम से ना पुकारा जाये। यह बात शर्मसार करने वाली है कि उन की इस अंतिम ख्वाहिश का कई बार मान नहीं रखा गया है। कुछ लोग इस नाम से पहले ‘राम’ जोड़ देते हैं। ऐसा उनके बारे में बनाई गई फ़िल्म ‘सरदार उधम’ में भी किया गया है। यह उर्दू भाषा से बैर के कारण किया जाता है। ‘आज़ाद’ किसी हिन्दू का नाम नहीं हो सकता इस लिए ‘राम’ जोड़ दिया जाता है। इस का विरोध किया जाना चाहिये। 
</p><p style="text-align: justify; "> उधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को पेंटोनविल्ल (Pentonville) जेल में फांसी दे दी गयी। मौत की सज़ा सुनाये जाने के बाद अदालत में उन्होंने जो जवाब दिया, वह उनके गोरे शासकों के ज़ुल्म और लूट के ख़िलाफ़ उनकी प्रतिबद्धता को ही रेखांकित करता है:
</p><p style="text-align: justify; ">"मुझे मौत की सज़ा की क़तई चिंता नहीं है। इस से मैं ख़ौफ़ज़दा नहीं हूँ और न ही मुझे इस की परवाह है। मैं एक उद्देश्य के लिए जान दे रहा हूँ। अँगरेज़ साम्राज्य ने हमें बर्बाद कर दिया है। मुझे अपने वतन की आज़ादी के लिए जान देते वक़्त गर्व हो रहा है और मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे बाद मेरे वतन के हज़ारों लोग मेरी जगह लेंगे और वहशी दरिंदों [अंग्रेज़ शासकों] के देश से खदेड़ कर देश आज़ाद और अंग्रेज़ी साम्राजयवाद का विनाश होगा। मेरा निशाना अँगरेज़ सरकार है, मेरा अँगरेज़ जनता से कोई बैर नहीं है। मुझे इंग्लैंड की मेहनतकश जनता से गहरी हमदर्दी है, मैं इंग्लैंड की साम्राजयवादी सरकार के विरोध में हूँ।"   
</p><p style="text-align: justify; ">राष्ट्रीय अभिलेखागार के संग्रह से पुलिस और ख़ुफ़िया विभागों एवं अख़बारों के उन चित्रों को देखकर कलेजा मुंह को आ जाता है, जिनमें पंजाब में सन् 1919 में फ़ौजी क़ानून के लागू होने पर आम नागरिकों को सज़ा के तौर पर सार्वजनिक रूप से कोड़े खाते हुए और सड़कों पर रेंगते हुए दिखाया गया है। आत्मसम्मान को भयानक चोट पहुंचाने वाली ये तस्वीरें देखकर इस बात को समझना जरा भी मुश्किल नहीं रहता कि पंजाब ने भगत सिंह जैसे शहीदों को क्यों पैदा किया!
</p><h5 style="text-align: justify; "><b>जलियांवाला बाग़ के शहीदों का ब्यौरा उपलब्ध नहीं
</b></h5><p style="text-align: justify; ">	भारत सरकार के गृह विभाग के जून 1919 की एक रिपोर्ट, जिसमें पंजाब में मारे गए लोगों के आंकड़े दिये गये हैं, को देखकर यह साफ़ पता लगता है कि किस तरह अंग्रेज़ शासकों ने पंजाब में किए गए क़त्लेआम पर परदा डालने की कोशिश की। मृतक अंग्रेजों का ब्यौरा तो उपलब्ध है, लेकिन मारे गए भारतीयों के बारे में साफ़ लिखा गया है कि उनकी संख्या कभी भी पता नहीं की जा सकेगी। इस रिपोर्ट में गृह सचिव की यह टिप्पणी कि अगर मृतक भारतीयों के बारे में हम कोई भी संख्या दें तो वो मानी नहीं जाएगी, अंग्रेज़ शासकों के नैतिक पतन की छवि को ही रेखांकित करती है। 	
</p><p style="text-align: justify; ">इस सिलसिले में एक शर्मनाक पहलू यह है कि शहीद हुए देशवासियों की असली तादाद कभी नहीं जानी जा सकी। 
</p><p style="text-align: justify; ">हंटर आयोग जिसे हत्यारी अँगरेज़ सरकार ने अक्टूबर 14, 1919 में पंजाब में हुई ज़्यादतियों की जाँच के लिए नियुक्त किया था (जिस में बंबई यूनिवर्सिटी के उपकुलपति और प्रसिद्ध वकील, चिमनलाल हरिलाल सेतलवाड़ भी थे) के अनुसार 381 अंग्रेज़ी सेना की गोलियों का शिकार हुए थे जिन में एक 6 महीने का बच्चा भी था। शहीदों की हंटर आयोग द्वारा निर्धारित यह संख्या सही नहीं मानी सकती। अमृतसर एक बड़ा व्यापारिक केंद्र था, जहाँ दूर-दराज़ से सौदागर, ग्राहक और काम की तलाश में लोग आते रहते थे, इन में बहुत से गुमनाम शहीदों की लाशों को ग़ायब कर दिया गया, जैसा कि इस तरह के बर्बर दमन की घटनाओं में पुलिस द्वारा किया जाता है और आज़ादी के बाद भी किया जाता रहा है। 
</p><p style="text-align: justify; "><b>आज़ादी के बाद जलियांवाला बाग़ के शहीदों की विरासत के साथ खिलवाड़
</b></p><p style="text-align: justify; ">अंग्रेज़ी राज में तो इन शहीदों की अनदेखी की ही गयी जो स्वाभाविक भी था। लेकिन आज़ाद भारत में भी इन शहीदों के परिवारों का तिरस्कार जारी रहा और है। जिस देश में आपातकाल में सिर्फ़ एक महीने से भी कम जेल में रहने के लिए आरएसएस से जुड़े लोगों को दस हज़ार रुपए प्रति माह और दो माह से कम जेल में रहने के बदले में 20 हज़ार रुपए महीना पारिवारिक पेंशन दी जा रही हो, वहां इन शहीदों की किसी ने सुध नहीं ली।   
</p><p style="text-align: justify; "><b>जलियांवाला बाग़ क़त्लेआम ने स्वतंत्रता आंदोलन के सहधर्मिक और सहजातीय चरित्र को ही रेखांकित किया
</b></p><p style="text-align: justify; ">शहीदों की सूची से यह सच बहुत साफ़ होकर सामने आता है कि बाग़ में उस दिन हिन्दू, सिख, मुसलमान और दूसरे मज़हबों के अनुयायी बड़ी तादाद में मौजूद थे। 381 शहीदों में से 220 हिन्दू, 94 सिख और 61 मुसलमान थे और 6 की शिनाख़्त ना हो सकी। ऐसा माना जाता है कि जिन शहीदों की पहचान नहीं की गई वे कम उम्र के बच्चे-बच्चियाँ थे। 
</p><p style="text-align: justify; ">इस सूची की एक ख़ास बात यह थी कि वहां मौजूद जनसमूह हर तरह की जातियों और पेशों से जुड़ा था, इन में दुकानदार, वकील, सरकारी मुलाज़िम, लेखक और बुद्धिजीवी थे तो लोहार, जुलाहे, तेली, नाई, खलासी, सफ़ाई कर्मचारी, क़साई, बढ़ई, कुम्हार, क़ालीन बुनने वाले, राजमिस्त्री, मोची भी बड़ी तादाद में मौजूद थे। यह सूरत इस गौरवशाली सच को रेखांकित करती थी कि साम्राजयवाद विरोधी आंदोलन एक साझा आंदोलन था और अभी मुस्लिम राष्ट्र और हिन्दू राष्ट्र के झंडाबरदार हाशियों पर पड़े थे।   
</p><p style="text-align: justify; ">भारत के लोगों की यह महान जुझारू विरासत, अलमारियों में बंद पड़ी है। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, गुजराती, पंजाबी, बंगाली, मद्रासी, और विभिन्न पेशों से जुड़े सब मिलकर दुख, पीड़ा, संघर्ष और बलिदान में सहभागी थे। 
</p><p style="text-align: justify; ">यह भारत के इतिहास का एक गौरवशाली सच था, लेकिन यह सब फ़ाइलों में बंद पड़ा है। इस का नतीजा यह है कि साझी शहादत और साझी विरासत को भूलकर देश आज धार्मिक और जातीय नफ़रत फैलाने वाले गिरोहों की चरागाह में तब्दील हो गया है। 
</p><p style="text-align: justify; "><b><span style="font-size: 30px;">शम्सुल इस्लाम</span> 
</b></p><p style="text-align: justify; ">13 अप्रैल २०२६</p><div draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/3xWUG-yWFwg" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></div>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महिला आरक्षण बनाम परिसीमन: Sonia Gandhi ने मोदी सरकार पर उठाए गंभीर सवाल]]></title>
<description><![CDATA[सोनिया गांधी के लेख के जरिए महिला आरक्षण, परिसीमन और जनगणना को लेकर केंद्र सरकार पर उठे सवालों का विश्लेषण। जानिए 2024 बनाम 2029 विवाद, संघीय ढांचे की चुनौती और भारतीय लोकतंत्र पर इसके प्रभाव]]></description>
<tags>देश दुनिया की लाइव खबरें,नवीनतम समाचार,soniyaa-gaandhii,सोनिया गांधी,महिला सशक्तिकरण,सामाजिक न्याय</tags>
<link>https://hastakshep.com/gender-justice/sonia-gandhi-women-reservation-delimitation-debate-india-2026-295011</link>
<guid isPermaLink="true">https://hastakshep.com/gender-justice/sonia-gandhi-women-reservation-delimitation-debate-india-2026-295011</guid>
<category><![CDATA[Breaking News,दुनिया,राजनीति,समाचार,जेंडर जस्टिस]]></category>
<dc:creator><![CDATA[Hastakshep]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 13 Apr 2026 05:44:07 GMT</pubDate>
<imagecaption><![CDATA[Women's Reservation vs. Delimitation: Sonia Gandhi Raises Serious Questions Over Modi Government]]></imagecaption>
<image><![CDATA[https://hastakshep.com/h-upload/2026/04/13/113177-womens-reservation-vs-delimitation-sonia-gandhi-raises-serious-questions-over-modi-government.webp]]></image>
<content:encoded><![CDATA[<img src='https://hastakshep.com/h-upload/2026/04/13/113177-womens-reservation-vs-delimitation-sonia-gandhi-raises-serious-questions-over-modi-government.webp' /><h2 style="text-align: justify; "><b>संसद का विशेष सत्र और राजनीतिक टाइमिंग पर सवाल</b></h2><ul class="hocalwire-editor-list"><li style="text-align: justify;"><b>महिला आरक्षण बनाम परिसीमन: असली मुद्दा क्या है?
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>अनुच्छेद 334-A और लागू करने की समयसीमा पर विवाद
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>जनगणना में देरी और उसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>परिसीमन और संघीय ढांचे (Federal Structure) की चुनौती
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>सर्वदलीय संवाद की कमी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>ऐतिहासिक संदर्भ: 73वां–74वां संविधान संशोधन
</b></li><li style="text-align: justify;"><b>जाति जनगणना और सामाजिक न्याय का प्रश्न
</b></li></ul><h3 style="text-align: justify; "><b>क्या यह राजनीतिक रणनीति या नीतिगत सुधार?
</b></h3><p style="text-align: justify; "><b>संसद के विशेष सत्र से पहले देश की सियासत गरमा गई है। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष Sonia Gandhi ने अपने एक लेख में सरकार की मंशा और समय-निर्धारण पर गंभीर सवाल उठाए हैं। क्या महिला आरक्षण (Women’s Reservation) वास्तव में प्राथमिकता है, या फिर इसके पीछे परिसीमन (Delimitation) का एक बड़ा राजनीतिक एजेंडा छिपा है? और सबसे अहम—क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार कर जल्दबाजी में फैसले लिए जा रहे हैं?
</b></p><p style="text-align: justify; ">नई दिल्ली, 13 अप्रैल 2026. कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी का एक लेख 13 अप्रैल, 2026 को 'द हिंदू' में प्रकाशित हुआ है। इस लेख का उद्देश्य संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण के बजाय परिसीमन के मुद्दे पर सरकार की जल्दबाजी की आलोचना करना है। सोनिया गांधी का कहना है कि सरकार 2029 से महिला आरक्षण लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 334-A में संशोधन कर रही है, जबकि विपक्ष 2024 से ही इसे लागू करने की मांग कर रहा था। लेख में कहा गया है कि परिसीमन का मुद्दा अधिक महत्वपूर्ण है और इसे जनगणना के बाद ही किया जाना चाहिए, न कि जल्दबाजी में। सोनिया गांधी सरकार की "मेरा तरीका या कोई तरीका नहीं" वाली निर्णय लेने की प्रक्रिया और राजनीतिक लाभ के लिए विशेष सत्र बुलाने की मंशा पर सवाल उठाती हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">सोनिया गांधी कहती हैं कि प्रधान मंत्री विपक्ष से उन विधेयकों का समर्थन करने की अपील कर रहे हैं, जिन्हें सरकार संसद के एक विशेष सत्र में पारित करना चाहती है, जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव अभियान अपने चरम पर होगा। इस असाधारण जल्दबाजी का केवल एक ही कारण हो सकता है, जो राजनीतिक लाभ प्राप्त करना और विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में लाना है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>प्रधान मंत्री, हमेशा की तरह, सच्चाई के साथ मितव्ययी हैं।
</b></p><p style="text-align: justify; ">सोनिया गांधी कहती हैं कि संसद ने सितंबर 2023 में एक विशेष सत्र के दौरान सर्वसम्मति से नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 पारित किया। अधिनियम ने संविधान में अनुच्छेद 334-ए पेश किया, जिसमें लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य किया गया था, जो अगली जनगणना और जनगणना-आधारित परिसीमन प्रक्रिया के पूरा होने के बाद लागू होने वाला था। विपक्ष ने इस शर्त की मांग नहीं की थी। वास्तव में, राज्यसभा में विपक्ष के नेता, श्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने जोरदार मांग की थी कि आरक्षण प्रावधान को 2024 के लोकसभा चुनावों से ही लागू किया जाए। सरकार ने जिन कारणों से इसे सबसे अच्छा माना, वह सहमत नहीं हुई।
</p><p style="text-align: justify; ">अब, हमें यह बताया गया है कि अनुच्छेद 334-ए को संशोधित किया जाएगा ताकि महिलाओं का आरक्षण 2029 से ही लागू हो सके। 
</p><p style="text-align: justify; ">सोनिया गांधी सवाल करती हैं कि प्रधान मंत्री को अपना यू-टर्न लेने में 30 महीने क्यों लगे? और वह विशेष सत्र बुलाने के लिए कुछ हफ्तों का इंतजार क्यों नहीं कर सकते? विपक्षी नेताओं ने सरकार को एक बार नहीं बल्कि तीन बार लिखा है, जिसमें अनुरोध किया गया है कि 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में चुनाव का अंतिम चरण समाप्त होने के बाद एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए, ताकि सरकार के नए प्रस्तावों पर चर्चा की जा सके। लेकिन उस पूरी तरह से उचित अनुरोध को ठुकरा दिया गया है। इसके बजाय, प्रधान मंत्री ने ओप-एड लिखने, राजनीतिक दलों से अपील करने और सम्मेलनों का आयोजन करने का सहारा लिया है। यह एक गुप्त रणनीति है जो प्रधान मंत्री की एक-अपमैनशिप और निर्णय लेने के लिए उनके "मेरा तरीका या राजमार्ग" दृष्टिकोण को दर्शाती है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>अतीत से सबक
</b></p><p style="text-align: justify; ">सोनिया गांधी कहती हैं कि इसकी तुलना उस तरीके से करें जिससे 73वें और 74वें संविधान संशोधन विधेयक अंततः अप्रैल 1993 और जून 1993 में संसद द्वारा पारित किए गए थे। विधेयकों पर लगभग पांच साल तक चर्चा और बहस हुई, जिसके बाद पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण कानून बन गया। यह दिवंगत प्रधान मंत्री राजीव गांधी की एक अद्वितीय उपलब्धि थी। आज, ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में लगभग 15 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं, जो कुल का 40% से अधिक हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 इस उपलब्धि के कंधों पर खड़ा है।
</p><p style="text-align: justify; ">पिछली दशकीय जनगणना 2021 में होनी थी। मोदी सरकार इसे टालती रही। इसका एक परिणाम यह हुआ है कि 10 करोड़ से अधिक लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत अपने कानूनी अधिकारों से वंचित हो गए हैं, जो प्रधान मंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना का आधार प्रदान करता है। जनगणना संचालन पांच साल की एक अस्पष्टीकृत देरी के बाद ही शुरू हुआ है। 
</p><p style="text-align: justify; ">सोनिया गांधी कहती हैं कि यह गर्व से दावा किया जा रहा है कि यह एक डिजिटल जनगणना है। वरिष्ठ अधिकारियों ने खुद सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि इसके डिजिटल स्वरूप के कारण, अधिकांश जनसंख्या गणना संख्या 2027 में ही उपलब्ध हो जाएगी। इस सत्र को बुलाने और परिसीमन करने की सरकार की जल्दबाजी के बहाने स्पष्ट रूप से खोखले हैं।
</p><p style="text-align: justify; ">सोनिया गांधी बताती हैं कि लगभग ठीक एक साल पहले, प्रधान मंत्री ने घोषणा की थी कि 2027 की जनगणना भी एक जाति जनगणना होगी। यह सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे दाखिल करने और संसद में जाति जनगणना आयोजित करने के विचार को खारिज करने वाले सवालों के जवाब देने के बाद हुआ था। यह प्रधान मंत्री द्वारा जाति जनगणना की मांग करने वाले कांग्रेस नेताओं पर "शहरी नक्सल मानसिकता" से पीड़ित होने का आरोप लगाने के बाद भी हुआ था। जैसा भी हो, जनगणना 2027 को सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण को अधिक अर्थ देने के लिए जाति के अनुसार जनसंख्या की गणना करनी है। बिहार और तेलंगाना ने अपने-अपने राज्यों में व्यापक जाति सर्वेक्षण किए हैं, जिसमें पूरी प्रक्रिया में छह महीने से अधिक का समय नहीं लगा है।
</p><p style="text-align: justify; ">इसलिए, यह स्पष्ट है कि यह प्रचार कि जाति जनगणना 2027 की जनगणना के प्रकाशन में देरी करेगी, सच नहीं है। वास्तव में, प्रधान मंत्री का वास्तविक इरादा अब जाति जनगणना में और देरी करना और उसे पटरी से उतारना है।
</p><p style="text-align: justify; ">सोनिया गांधी कहती हैं कि संसद का विशेष सत्र 16 अप्रैल को शुरू होने वाला है। फिर भी अब तक, सांसदों के साथ कोई आधिकारिक प्रस्ताव साझा नहीं किया गया है, कि सरकार वास्तव में सत्र में क्या विचार करना चाहती है। ऐसा लगता है कि परिसीमन के लिए कुछ सूत्र सुझाया जा रहा है। किसी भी परिसीमन से पहले अतीत की तरह जनगणना अभ्यास होना चाहिए। और यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि लोकसभा की शक्ति में वृद्धि से जुड़े किसी भी परिसीमन को राजनीतिक रूप से - और न केवल अंकगणितीय रूप से - न्यायसंगत होना चाहिए। परिवार नियोजन में अग्रणी रहे राज्यों और छोटे राज्यों को पूर्ण या सापेक्ष नुकसान में नहीं रखा जाना चाहिए।
</p><p style="text-align: justify; ">आनुपातिक वृद्धि, वास्तव में, सापेक्ष प्रभाव के नुकसान का परिणाम हो सकती है क्योंकि पूर्ण संख्याओं में अंतर बढ़ जाता है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता
</b></p><p style="text-align: justify; ">सोनिया गांधी कहती हैं कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान करता है। इसका मतलब है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए क्रमशः आरक्षित एक-तिहाई सीटें भी महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
</p><p style="text-align: justify; ">सितंबर 2023 में बहस के दौरान, राज्यसभा में विपक्ष के नेता ने मांग की थी कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से संबंधित महिलाओं के लिए भी इसी तरह का आरक्षण प्रदान किया जाए। ओबीसी के लिए आरक्षण पहले से ही उच्च शिक्षा और सरकारी रोजगार में प्रदान किया गया है।
</p><p style="text-align: justify; ">संसद का मानसून सत्र जुलाई के मध्य में शुरू होगा। यदि सरकार 29 अप्रैल के बाद एक सर्वदलीय बैठक बुलाती है, तो विपक्ष के साथ अपने प्रस्तावों पर चर्चा करने के लिए, सार्वजनिक बहस के लिए समय देती है, और फिर मानसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयकों पर विचार करती है, तो आसमान नहीं गिरेगा। हमारे राजनीतिक व्यवस्था में अत्यंत दूरगामी परिवर्तनों को पारित करने की इस जल्दबाजी के लिए, संकटग्रस्त समय के दौरान कथा प्रबंधन को छोड़कर, कोई औचित्य नहीं है। यह प्रक्रिया गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण और अलोकतांत्रिक है। महिलाओं के लिए आरक्षण यहां मुद्दा नहीं है। वह पहले ही तय हो चुका है। वास्तविक मुद्दा परिसीमन है, जो अनौपचारिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर, अत्यंत खतरनाक और संविधान पर ही हमला है।
</p><p style="text-align: justify; "><b>हमारी राय
</b></p><p style="text-align: justify; ">महिला आरक्षण अब विवाद का विषय नहीं रहा—वह एक सहमति का बिंदु बन चुका है।
</p><p style="text-align: justify; ">लेकिन परिसीमन का सवाल, जैसा कि Sonia Gandhi ने उठाया है, केवल आंकड़ों का नहीं बल्कि संविधान और संघीय संतुलन का मुद्दा है।
</p><p style="text-align: justify; ">क्या यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक संवाद से तय होगी, या फिर राजनीतिक जल्दबाजी से?
</p><p style="text-align: justify; ">आप इस पूरे घटनाक्रम को कैसे देखते हैं—सुधार या रणनीति?
</p><p style="text-align: justify; ">अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताइए।
</p><p style="text-align: justify; ">नमस्कार।</p><div draggable="true" class="hocal-draggable"><iframe frameborder="0" src="//www.youtube.com/embed/BSYVsIiBNAs" max-width="100%" class="video-element note-video-clip" height="360"></iframe></div>]]></content:encoded>
<source url="https://hastakshep.com/hastakshep"><![CDATA[Hastakshep]]></source>
</item>
</channel>
</rss>
