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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" gd:etag="W/&quot;Ak8DQX04cCp7ImA9WxBTFEg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987</id><updated>2009-12-10T20:57:50.338+05:30</updated><title>एक हिंदुस्तानी की डायरी</title><subtitle type="html" /><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/" /><link rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false&amp;v=2" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>546</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><link rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/hindustani" type="application/atom+xml" /><feedburner:emailServiceId>hindustani</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com" /><entry gd:etag="W/&quot;DkAGRn08cSp7ImA9WxNTF0k.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-5115313953714833265</id><published>2009-08-20T10:15:00.006+05:30</published><updated>2009-08-20T10:35:27.379+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-08-20T10:35:27.379+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अंदर की दुनिया" /><title>बदलाव तो शतरंज का खेल है, शह और मात</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SozZQrdQARI/AAAAAAAACx0/t0LwN6MdSNI/s1600-h/chnange.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 240px; height: 180px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SozZQrdQARI/AAAAAAAACx0/t0LwN6MdSNI/s320/chnange.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5371907336112701714" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;सामाजिक बदलाव, व्यवस्था परिवर्तन। सिस्टम बदलना होगा। बीस-पच्चीस साल पहले नौजवानों में यह बातें खूब होती थीं। अब भी होती हैं, लेकिन कम होती हैं। कितनी कम, नहीं पता क्योंकि बड़े शर्म की बात है कि हम अब बुजुर्ग होने लगे हैं। हालांकि मानने को जी नहीं करता, लेकिन चेहरा और शरीर सब बता देता है। काफी समय से, समझिए कि अरसे से सोच रहा था कि बदलाव में आखिर ठीक-ठीक बदलना क्या है? हम बदलेंगे, युग बदलेगा - जैसी गुरु सूक्तियां भी सिर चढ़कर बोलती रहीं। लेकिन जरा-सा सोचा तो पाया कि हम तो अनवरत बदलते ही रहते हैं। शरीर से, मन से और विचार से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो कल थे, आज नहीं हैं। जो आज हैं, कल नहीं होंगे। हमें अपने इस बदलाव का अहसास नहीं होता। लेकिन कोई पुराना दोस्त, यार, रिश्तेदार सालों बाद मिलता है तो यही प्रभाव लेकर जाता है कि जनाब, पहले जैसे नहीं रहे। हालांकि शुरुआत में यही कहता है कि आप तो एकदम नहीं बदले, बस थोड़ा-सा मोटे हो गए हो, आवाज भारी हो गई है, बाकी सब वैसे का वैसा ही है। लेकिन यह अतीत-प्रेम या नास्टैल्जिया का आवेग होता है, सच नहीं है। समय की चकरी और रिश्तों की चक्की हमें पीसती-बदलती रहती है। इस हकीकत को कोई हठी, आत्ममुग्ध और जिद्दी विक्रमादित्य ही ठुकरा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बचा समाज, जो हम सभी का सुपरिभाषित, नियत लेकिन परिवर्तनशील समुच्चय है। संस्थाएं हैं, रिवाज हैं। जकड़बंदियां हैं, घुटन है। बगावत है, दमन है। कुछ लोग पुराने का महिमामंडन करते हैं, यथास्थिति को यथावत रखने का चिंतन चलाते हैं। कुछ लोग हर चीज को बस गरियाते रहते हैं, चिड़चिड़ापन उनका शाश्वत स्वभाव बन जाता है। बहुत से लोग तो जिन्हैं न व्यापै जगत गति वाले होते हैं। बस बहे चले जाते हैं, जिए चले जाते हैं। लेकिन हर समय, दी गई काल-परिस्थिति में तमाम लोग ऐसे होते हैं जो विकल्प बुनते रहते हैं। उनके पास वैकल्पिक सोच होती है जो सही सिंहासन मिलते ही सब कुछ बदल देती है। बराक ओबामा पड़ा था, कहीं समाज में। राष्ट्रपति चुन लिया गया तो लगा जैसे अमेरिका में कोई मिनी-क्रांति हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही सच है। हर वक्त, हर दौर में बदलाव की इंसानी शक्तियां समाज में मौजूद रहती हैं। पलती रहती हैं, बढ़ती रहती हैं। शतरंग की गोटों की तरह जहां-तहां पड़ी रहती हैं। बस उनकी सही प्लेसिंग कर दी जाए तो पूरा सीन बदल जाता है। क्या आप ऐसे लोगों को नहीं जानते जो वैकल्पिक सोच रखते हैं? जो पुराने और नए के बीच की अटूट कड़ी को सही से पहचानते हैं? जो लोकतांत्रिक मूल्यों से लवरेज हैं? जो अपने देश को अपनी मां से भी ज्यादा प्यार करते हैं? जो ज़िंदगी में जनक से बड़े योगी हैं? जैसे कृष्ण के विराट स्वरूप में सारी दुनिया समाई थी, सारी सृष्टि समाहित थी, वैसे ही वे भी पर्यावरण से लेकर दुनिया के रग-रग से वाकिफ हैं? चलिए एक-दो नहीं, पचास-सौ लोगों को मिलाकर तो एक सेट बनाया ही जा सकता है जिनको सही जगह पहुंचा दिया जाए तो सारा परिदृश्य बदल सकता है, सारी सत्ता बदल सकती है, सिस्टम बदल सकता है, व्यवस्था बदल सकती है, समाज बदल सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस, सही गोट को सही जगह रखिए। चाल सही चलिए। शह और मात का खेल खेलिए, आनंद आएगा। लेकिन इस खेल में निर्जीव गोटें नहीं, जीवित इंसान शामिल हैं, इंसानी जिद शामिल है। इसलिए फर्क यह पड़ता है कि यहां शह और मात का खेल शोर और मौत का खेल बन सकता है। विनय न मानय जलधि जड़, गए कई दिन बीति, बोले राम सकोपि तब, भय बिनु होय न प्रीति।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-5115313953714833265?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/5115313953714833265/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=5115313953714833265&amp;isPopup=true" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/5115313953714833265?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/5115313953714833265?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/YG6gqs1He10/blog-post.html" title="बदलाव तो शतरंज का खेल है, शह और मात" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SozZQrdQARI/AAAAAAAACx0/t0LwN6MdSNI/s72-c/chnange.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/08/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkcMRnk5eCp7ImA9WxJREEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-510515238982496260</id><published>2009-05-11T06:15:00.002+05:30</published><updated>2009-05-11T09:24:47.720+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-11T09:24:47.720+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अंदर की दुनिया" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अतर्मन" /><title>मरूं तो समय के सबसे उन्नत विचारों के साथ</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/Sgc0TXajj-I/AAAAAAAACxU/80FI-KLUGxY/s1600-h/kundalini.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5334289790951198690" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left; width: 229px; height: 320px;" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/Sgc0TXajj-I/AAAAAAAACxU/80FI-KLUGxY/s320/kundalini.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;एक अभिन्न मित्र से बात हो रही थी। कहने लगे कि इधर दुनिया भर के पचड़े, कामकाज का झंझट, असुरक्षा और रिश्तों के तनाव ने इतनी खींचोंखींच मचा रखी है कि मन करता है सो जाओ तो सोते ही रहो। अतल नींद की गहराइयों में इतना डूब जाओ कि कुछ होश न रहे। एक सुदीर्घ नींद। जब उठो तो छलकती हुई ताज़गी के मानिंद। आखिर मौत भी तो एक सुदीर्घ नींद की तरह है जिससे आप जगते हो तो ओस की तरह ताज़ा, कोंपल की तरह मुलायम, कुंदन की तरह पवित्र, छह महीने-साल भर के बच्चे की आंखों की तरह निर्दोष होते हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे समझ में आ गया कि यह संघर्षशील व्यक्ति भागकर आत्महत्या जैसी बात नहीं कर रहा, बल्कि उस ऊर्जा स्रोत की तलाश में है जो उसे हर प्रतिकूलता से जूझने में समर्थ बना दे, उस ज्ञानवान विवेक की तलाश में है जो उसे जटिल से जटिल निजी व सामाजिक उलझन को सुलझाने में सक्षम बना दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मैं अपनी तरफ मुड़ा तो अचंभे से भर गया। दस साल पहले मेरी भी तो यही अवस्था थी। फुरसत मिलते ही सोता था तो सोता ही रहता था। हद से ज्यादा सोने के बावजूद उठता था तो एकाध घंटे बाद ही फिर नींद की ढलवा स्लाइड पर सरक जाता था। फिर भी कभी वह ताजगी नहीं मिली थी जिसकी शिद्दत से तलाश थी। हां, इतना ज़रूर हुआ कि शरीर का पित्त निकलकर चेहरे पर आ गया। कोई देखता तो बोलता – जनाब, चुपके-छिपके गोवा गए थे, सन-बर्न सारा भेद खोले दे रहा है। उनको क्या बताता कि कौन-सा सन-बर्न झेल रहा हूं। मुस्कराकर उनकी बात मान लेता। कई बार मरने की इच्छा हुई तो उसे भी आजमा के देख लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आज स्थिति भिन्न है। आज तो ज़िंदगी को गन्ने की तरह चीरने और चूसने की इच्छा होती है। अनसुलझे को सुलझाने के कुछ सूत्रों की पूंछ भर पकड़ में आई तो बाहर की प्रकृति ने अंदर की प्रकृति को अदम्य जिजीविषा से भर दिया। लगता है पूरे सूत्र तक पहुंचने के लिए तो सौ साल की उम्र भी कम है। भौतिक रूप से कुछ खास पाने की इच्छा नहीं है। बस, यही चिंता सताती है कि कहीं मैं अपने समय के सबसे उन्नत विचारों से दूर न रह जाऊं। जिस तरह गौतम बुद्ध ने अपने समय को नांथा था, जिस तरह कबीर ने अपने समय पर सवारी गांठी थी, उसी परंपरा से जुड़ने की ख्वाहिश है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है कि हर युग की समस्याओं का स्तर पहले युग से ज्यादा उन्नत, ज्यादा जटिल होता है। हम बुद्ध, कबीर या गांधी से प्रेरणा ले सकते हैं। लेकिन उनकी कही बातों को सूक्तियों की तरह नहीं इस्तेमाल कर सकते। हां, सुलझाने की जो खुशी कबीर को मिलती थी, वह खुशी उतनी ही सघनता से हमें भी मिल सकती है। हम भी अनुभूति के उस स्तर पर पहुंच कर कह सकते हैं – संतो आई ज्ञान की आंधी, भ्रम की टाटी सबै उड़ानी माया रहै न बांधी रे। या, साधो देखो जग बौराना। मजे की बात यह है कि इधर मुझे कबीर की उलटबांसियों के अर्थ का भी थोड़ा-थोड़ा आभास होने लगा है। बस, चाहत यही है कि सभी आभास और अनुभूतियां किसी तर्कसंगत नतीजे तक पहुंच जाएं और मैं अनंत आह्लाद की उस अवस्था में जा पहुंचूं जिसकी कल्पना हमारे मनीषियों ने कुंडलिनी जागरण के रूप में की है। इसके अलावा न तो मुझे धन चाहिए, न सत्ता चाहिए, न स्वर्ग चाहिए और न ही पुनर्जन्म। खैर, इसमें नया कुछ नहीं है। पहले भी तो यह बात कही जा चुकी है कि ...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;न त्वहं कामये राज्यम्, न स्वर्ग, नापुनर्भवम्।&lt;br /&gt;कामये दु:ख-ताप्तानाम् प्राणिनाम् आर्ति-नाशनम्।।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-510515238982496260?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/510515238982496260/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=510515238982496260&amp;isPopup=true" title="7 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/510515238982496260?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/510515238982496260?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/KXkkY9r1WSs/blog-post.html" title="मरूं तो समय के सबसे उन्नत विचारों के साथ" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/Sgc0TXajj-I/AAAAAAAACxU/80FI-KLUGxY/s72-c/kundalini.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/05/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEQEQXw6fSp7ImA9WxJSEEg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-2031283642065885828</id><published>2009-04-30T06:15:00.000+05:30</published><updated>2009-04-30T06:15:00.215+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-30T06:15:00.215+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><title>नेता को नुमाइंदा नहीं, आका मानते हैं हम</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/Sfijyp1TP7I/AAAAAAAACxE/7lv0kzWvPGw/s1600-h/804854-A-Hindu-Bali-God-0.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5330190249611182002" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 226px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/Sfijyp1TP7I/AAAAAAAACxE/7lv0kzWvPGw/s320/804854-A-Hindu-Bali-God-0.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;एक तरफ हम राजनीति में पढ़े-लिखे काबिल लोगों के अभाव का रोना रोते हैं, दूसरी तरफ पढ़े-लिखे काबिल लोग चुनावों में खड़े हो जाते हैं तो उनकी जमानत जब्त हो जाती है। साफ-सी बात है कि ‘हम’ चुनावों में किसी की जीत-हार का फैसला करने की स्थिति में नहीं हैं। गांवों ही नहीं, शहरों में भी। एक तो किसी भी संसदीय या विधानसभा क्षेत्र में मध्य वर्ग के हम जैसे लोगों की संख्या मुठ्ठी भर होती है। ज्यादा से ज्यादा दस हजार, बीस हजार। दूसरे, हम शक्तिसंपन्नता हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि नैतिक आग्रह के चलते राजनीति के बारे में सोचते हैं। राजनीति को गर्त से निकालने के लिए सोचते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले तो हम वोट तक देने नहीं जाते थे। इस बार स्थिति थोड़ी बदली है। टाटा टी जैसी कंपनियों से लेकर तमाम एनजीओ और आमिर खान जैसे अभिनेता तक हमें इस बार वोट डालने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मैं भी इस बार पहली बार वोट डालने जा रहा हूं। अब से चंद घंटे बाद मेरी भी उंगली पर पहली बार काली स्याही का निशान लगा होगा। होता यह रहा कि गांव की वोटर लिस्ट में मेरा नाम तो है। लेकिन गांव से शहर, फिर इस शहर से उस शहर, किराए के मकान में जब भी जहां रहा, वहां का मतदाता नहीं बन पाया। इस बार भी मतदाता पहचान पत्र नहीं बना है। लेकिन स्थाई निवास हो जाने के कारण एक प्रक्रिया चल निकली और मैं मतदाता बन गया। तो, यकीनन वोट भी डालूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुश्किल यह है कि वोट डालूं तो किसको? मुंबई उत्तर-पूर्व से शिवसेना-बीजेपी के प्रत्याशी हैं किरीट सोमैया। साफ-सुथरी छवि। इतने आम कि बोलते समय हकलाते हैं। अवाम से जुड़े मुद्दे उठाते रहते हैं। सांप्रदायिकता या क्षेत्रीयता को हवा नहीं देते। इनके मुकाबले में खड़े हैं कांग्रेस-एनसीपी के संजय पाटिल। विभाजन की राजनीति करनेवाला एक प्रत्याशी है महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का शिशिर शिंदे। लेकिन पाटिल और शिंदे दोनों के नाम काफी खोजने पर मिले हैं तो आप उनके प्रचार-प्रसार और साख का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं। सोमैया ने दस बड़े स्थानीय किस्म के वादे किए हैं। छह लेन का ट्रेन कोरिडोर, हर तीन मिनट पर लोकल ट्रेन, लोड शेडिंग की समाप्ति, जगह-जगह फ्लाईओवर, साल्ट कमिश्नर की 1200 एकड़ जमीन पर एक लाख घरों का निमार्ण आदि-इत्यादि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर स्थानीय निकाय का चुनाव होता तो मैं आंख मूंदकर सोमैया को ही वोट देता। लेकिन क्या राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को गलत मानने के बावजूद उसके लोकसभा प्रत्याशी को वोट देना इसलिए सही होगा क्योंकि स्थानीय स्तर पर उसने अच्छे काम किए हैं? ये माया किसलिए, यह छलावा किसलिए? कोई दादी की साड़ी पहनकर छल कर रहा है, कोई दलालों की बूढ़ी पार्टी का युवा चेहरा बनकर। कोई अंग्रेजी को गाली देकर तो कोई अभिनेताओं, अभिनेत्रियों का मजमा जमाकर। अरे भाई, खुलकर क्यों नहीं सामने आते? नकाब क्यों लगाकर आते हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परसों ही टाइम्स ऑफ इंडिया में जाने-माने अर्थशास्त्री &lt;a href="http://timesofindia.indiatimes.com/Opinion/Editorial/TOP-ARTICLE--Interpretation-Of-Dreams/articleshow/4455896.cms"&gt;ज्यां द्रेज का एक लेख&lt;/a&gt; पढ़ा जिसमें उन्होंने बीजेपी के घोषणापत्र में छिपे ‘धोखा दो-राज करो की नीति’ के रहस्य की परतें खोली हैं। सोचता हूं तो पाता हूं कि कांग्रेस से लेकर बीजेपी और समाजवादियों का छल इसीलिए चल रहा है क्योंकि हम नेता को अपना नुमाइंदा नहीं, बल्कि आका मानते हैं, माई-बाप समझते हैं। हम में से हर कोई मौका पाते ही जताने लगता है कि किस एमपी या मंत्री या बड़े नेता की उसकी खास पहचान या रिश्तेदारी है। काम निकलवाने के लिए हम भी ‘आका’ के आगे खीस निपोर देते हैं। मुश्किल यही है कि नेता को आका मानने की यह मानसिकता खत्म कैसे की जाए? नहीं तो हम दलित की बेटी, प्राइमरी स्कूल की बहनजी को मुख्तार अंसारी जैसे खूंखार अपराधी को गरीबों का मसीहा बताने से कभी नहीं रोक पाएंगे। तब तक हमारे नेतागण ऐसा ही मायाजाल फैलाकर हमें फांसते रहेंगे और हित साधते रहेंगे अपराधियों, दलालों और देश व अवाम के दुश्मनों का।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-2031283642065885828?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/2031283642065885828/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=2031283642065885828&amp;isPopup=true" title="7 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/2031283642065885828?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/2031283642065885828?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/26QBZfIzCOY/blog-post_30.html" title="नेता को नुमाइंदा नहीं, आका मानते हैं हम" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/Sfijyp1TP7I/AAAAAAAACxE/7lv0kzWvPGw/s72-c/804854-A-Hindu-Bali-God-0.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/04/blog-post_30.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0UNQnw9eSp7ImA9WxJTGE4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-9108489578878850740</id><published>2009-04-27T15:40:00.004+05:30</published><updated>2009-04-27T17:58:13.261+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-27T17:58:13.261+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खबर जो नहीं छपी" /><title>चार साल पहले खारिज दवाएं बिक रही हैं धड़ल्ले से</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SfWGCNCI87I/AAAAAAAACw8/p4D7GzJsG3U/s1600-h/medicine.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5329313106479346610" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 130px; CURSOR: hand; HEIGHT: 98px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SfWGCNCI87I/AAAAAAAACw8/p4D7GzJsG3U/s320/medicine.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;चिदंबरम व रामदौस की अध्यक्षता में बने आयोग ने बीकासूल और डाइजीन समेत दस दवा दवाओं को अगस्त 2005 में ही फालूत करार दिया था। &lt;/strong&gt;डाइजीन, कॉम्बीफ्लेम, डेक्सोरेंज, बीकासूल, लिव-52, कोरेक्स जैसी दस दवाओं को अगस्त 2005 में केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम व स्वास्थ्य मंत्री डॉ. ए. रामदौस की अगुवाई में बने एक आयोग ने बेतुकी और गैर जरूरी, यहां तक कि खतरनाक बताया था। इस आयोग की रिपोर्ट सरकार स्वीकार भी कर चुकी है। लेकिन करीब चार साल बाद भी वे दवाएं धड़ल्ले से देश भर के बाजारों में बेची जा रही हैं और हम आप सभी इनका जमकर इस्तेमाल करते हैं। उपभोक्ता संरक्षण संस्थाओं द्वारा सरकार का ध्यान बार-बार इस मुद्दे पर आकर्षित कराए जाने के बावजूद इन दवाओं पर कोई रोक नहीं लग पाई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.who.int/macrohealth/action/Report%20of%20the%20National%20Commission.pdf"&gt;नेशनल कमीशन ऑन माइक्रो इकनॉमिक्स एंड हेल्थ &lt;/a&gt;ने सरकार को सौंपी एक रिपोर्ट में दर्द निवारक, खांसी, लीवर, विटामिन, खून बढ़ाने, अपच वगैरह के इलाज के लिए बिकने वाली 25 प्रमुख दवाओं में से दस दवाओं को बेकार, अनुपयोगी व घातक बताया था। इनके उपयोग से वह बीमारी या तकलीफ तो दूर होती नहीं, उल्टे ग्राहक की जेब पर हल्की हो जाती है और किसी-किसी दवा का तो खतरनाक दुष्प्रभाव भी पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिपोर्ट में फाइजर कंपनी की बीकासूल व कोरेक्स, हिमालया ड्रग्स की लिव-52, रैनबैक्सी की रिवाइटल, फ्रेंक्रो-इंडियन की डेक्सोरेंज, एबोट की डाइजीन, अवेंटिस की कॉम्बीफ्लेम, ईमर्क की पॉलीबियन व एवियन और हाइंज की ग्लूकोन-डी को फालतू पाया गया है। इसके बावजूद ये दवाएं देश भर में काफी लोकप्रिय है और डॉक्टर धड़ल्ले से इनका नुस्खा लिखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपभोक्ता संरक्षण संस्था कंज्यूमर वॉयस के सीईओ असीम सान्याल ने बताया कि इस विषय पर सरकार ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है और वे आम चुनावों के बाद बनने वाली नई सरकार का ध्यान इन मुद्दे पर खींचेंगे। इस विषय पर ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) से जुड़े अधिकारियों ने टिप्पणी करने से मना कर दिया। लेकिन महाराष्ट्र स्टेट ड्रग्स कंट्रोल आर्गेनाइजेशन के सहायक आयुक्त एम.जी. केकतपुरे के मुताबिक रिपोर्ट में जिन-जिन दवाओं का नाम शामिल है उन पर मरीजों का पैसा खर्च तो हो जाता है लेकिन इनसे उन्हें कोई लाभ नहीं पहुंचता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-9108489578878850740?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/9108489578878850740/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=9108489578878850740&amp;isPopup=true" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/9108489578878850740?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/9108489578878850740?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/_WFYdqBU_iQ/blog-post.html" title="चार साल पहले खारिज दवाएं बिक रही हैं धड़ल्ले से" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SfWGCNCI87I/AAAAAAAACw8/p4D7GzJsG3U/s72-c/medicine.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/04/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkMCQX07cCp7ImA9WxVUGUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-1277480999061695835</id><published>2009-03-25T19:06:00.002+05:30</published><updated>2009-03-25T19:11:00.308+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-03-25T19:11:00.308+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ताकि सनद रहे" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><title>बड़े किसानों को राहत, केंद्र सरकार ने तोड़ी आचार संहिता</title><content type="html">न कोई विज्ञप्ति, न कोई सार्वजनिक घोषणा। रिजर्व बैंक ने चुपचाप एक अधिसूचना जारी कर यूपीए सरकार की सर्वाधिक लोकलुभावन किसानों की कर्जमाफी योजना में नई राहत दे दी। वह भी उन किसानों को जिनके पास दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से ज्यादा जमीन है। कर्जमाफी योजना के तहत इन किसानों को बकाया कर्ज में एकल समायोजन (वन टाइम सेटलमेंट) के तहत 25 फीसदी छूट देने का प्रावधान है, बशर्ते ये लोग बाकी 75 फीसदी कर्ज तीन किश्तों में अदा कर देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पांच एकड़ से ज्यादा जोत वाले इन किसानों को बकाया कर्ज की पहली किश्त 30 सितंबर 2008 तक, दूसरी किश्त 31 मार्च 2009 तक और तीसरी किश्त 30 जून 2009 तक चुकानी है। लेकिन रिजर्व बैंक ने दूसरी किश्त की अंतिम तिथि से आठ दिन पहले सोमवार को अधिसूचना जारी कर पहली किश्त को भी अदा करने की तिथि बढ़ाकर 31 मार्च 2009 कर दी है। दिलचस्प बात यह है कि रिजर्व बैंक के मुताबिक तिथि को आगे बढ़ाने का फैसला भारत सरकार का है। जाहिर है, इससे सीधे-सीधे देश के उन सारे बड़े किसानों को फायदा मिलेगा, जिन्होंने अभी तक पहली किश्त नहीं जमा की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2 मार्च को आम चुनावों की तिथि की घोषणा हो जाने के बाद देश में आचार संहिता लागू हो चुकी है। ऐसे में रिजर्व बैंक या किसी भी सरकारी संस्था की ऐसी घोषणा को आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा जो आबादी के बड़े हिस्से को नया लाभ पहुंचाती हो। शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत कहते हैं कि साढ़े पांच महीने से केंद्र सरकार सोई हुई थी क्या? चुनावों की तिथि घोषित हो जाने के बाद वित्त मंत्रालय की पहले पर की गई यह घोषणा सरासर आचार संहिता का उल्लंघन है। आदित्य बिड़ला समूह के प्रमुख अर्थशास्त्री अजित रानाडे कहते है कि वैसे तो रिजर्व बैंक एक स्वायत्त संस्था है। लेकिन चूंकि अधिसूचना में भारत सरकार के फैसले का जिक्र किया गया है, इसलिए यकीनन यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में केंद्र सरकार की कर्जमाफी योजना के तहत पांच एकड़ से कम जमीन वाले लघु व सीमांत किसानों को 31 मार्च 1997 के बाद 31 मार्च 2007 तक वितरित और 31 दिसंबर 2007 को बकाया व 29 फरवरी 2008 तक न चुकाए गए सारे बैंक कर्ज माफ कर दिए थे। लेकिन पांच एकड़ से ज्यादा जोतवाले किसानों को कर्ज में 25 फीसदी की राहत दी गई थी। इस कर्ज की रकम की व्याख्या ऐसी है कि इसकी सीमा में ऐसे किसानों के सारे कर्ज आ सकते हैं। वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक इन किसानों के लिए कर्ज छूट की रकम या 20,000 रुपए में से जो भी ज्यादा होगा, उसका 25 फीसदी हिस्सा माफ कर दिया जाएगा। लेकिन यह माफी तब मिलेगी, जब ये किसान अपने हिस्से का 75 फीसदी कर्ज चुका देंगे। इसकी भरपाई बैंकों को केंद्र सरकार की तरफ से की जाएगी। दूसरे शब्दों में 30 जून 2009 तक बड़े किसानों द्वारा कर्ज की 75 फीसदी रकम दे दिए जाने के बाद उस कर्ज का बाकी 25 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार बैंकों को दे देगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिजर्व बैंक ने सोमवार, 23 मार्च को जारी अधिसूचना में कहा है कि समयसीमा केवल 31 मार्च तक बकाया किश्तों के लिए बढ़ाई गई है और तीसरी व अतिम किश्त के लिए निर्धारित 30 जून 2009 की समयसीमा में कोई तब्दीली नहीं की गई है। तब तक अदायगी न होने पर बैंकों को ऐसे कर्ज को एनपीए में डाल देना होगा और उसके मुताबिक अपने खातों में प्रावधान करना होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-1277480999061695835?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/1277480999061695835/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=1277480999061695835&amp;isPopup=true" title="8 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1277480999061695835?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1277480999061695835?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/7JRU7GDAMMs/blog-post_25.html" title="बड़े किसानों को राहत, केंद्र सरकार ने तोड़ी आचार संहिता" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/03/blog-post_25.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;Ak8GQXs-eSp7ImA9WxVVGU4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-4965839379111964464</id><published>2009-03-12T22:00:00.002+05:30</published><updated>2009-03-13T15:37:00.551+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-03-13T15:37:00.551+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ताकि सनद रहे" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खबर जो नहीं छपी" /><title>लेफ्ट यूनियन सीटू की डाकिया बनी रिलायंस इंडस्ट्रीज</title><content type="html">&lt;a href="http://www.breakingnewsonline.net/uploaded_images/CITU-747398.png"&gt;&lt;img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 127px; CURSOR: hand; HEIGHT: 121px" alt="" src="http://www.breakingnewsonline.net/uploaded_images/CITU-747398.png" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;देश की सबसे बड़ी वामपंथी ट्रेड यूनियन और देश के सबसे बड़े पूंजीपति में जाहिरा तौर पर रिश्ता तो टकराव का ही होना चाहिए। लेकिन इन दिनों मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज सीपीएम से जुड़ी ट्रेड यूनियन सीटू की डाकिया बनी हुई है। वह सीटू की तरफ से प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को लिखी गई एक ऐसी चिट्ठी मीडिया में बंटवा रही है जिसमें छोटे भाई अनिल अंबानी की कंपनियों को निशाना बनाया गया है और मांग की गई है कि अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस कैपिटल को दिया गया कर्मचारी भविष्यनिधि कोष के शेयर बाजार में निवेश का काम उससे छीन लिया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीटू के पत्र को मीडिया तक पहुंचाने का काम रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रचार विभाग द्वारा बड़े गोपनीय अंदाज में किया जा रहा है। उनके लोग यह पत्र फैक्स या ई-मेल के जरिए नहीं भेज रहे हैं, बल्कि बंद लिफाफा सीधे मीडियाकर्मियों तक पहुंचा रहे हैं। पूछने पर कहते हैं कि यह पत्र इतना संवेदनशील है कि हम फैक्स या ई-मेल से नहीं भेज सकते। लेकिन लिफाफे में बंद पत्र को पढऩे पर पता चलता है कि वह एक सामान्य पत्र है और उसमें ऐसी कोई सनसनी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीटू के लेटरहेड पर उसके अध्यक्ष एम के पंधे द्वारा लिखा गया यह पत्र 2 मार्च 2009 का है। पत्र में प्रेस में छपी खबरों के आधार पर कहा गया है कि सत्यम और मेटास जैसा ही घोटाला अनिल अंबानी की कंपनियों - रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर, रिलायंस कम्युनिकेशंस और रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज में चल रहा है। इन कंपनियों ने विदेशी कॉरपोरेट उधार (ईसीबी) से जुटाई गई भारी-भरकम राशि का निवेश भारतीय म्यूचुअल फंडों और शेयर बाजार में किया है। ये कंपनियां अब घरेलू वित्तीय संस्थाओं और सरकारी बैंकों से कर्ज जुटाने में लगी हुई हैं। सीटू का आरोप है कि बैंकों व वित्तीय संस्थाओं से जुटाई गई रकम अनिल अंबानी की कंपनियां वाजिब मकसद के बजाय शेयर बाजार मे लगाएंगी और यह सारा ऋण एक दिन बैंकों के लिए एनपीए (गैर-निष्पादित आस्तियां) बन जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिलांयस इंडस्ट्रीज की तरफ से बंटवाए जा रहे इस पत्र के बाबत जब अनिल अंबानी समूह के लोगों से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हमारे पास भी मुकेश अंबानी के खिलाफ 18,000 करोड़ रुपए के घोटाले की खबर है और हम भी इसे प्रचारित करवा सकते हैं। सीटू का यह पत्र काफी महत्वपूर्ण बन गया है क्योंकि इसी तरह का एक पत्र रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के अध्यक्ष व सांसद रामदास अठावले ने 18 अगस्त 2003 को सेबी के तत्कालीन चेयरमैन जी एन बाजपेयी को लिखा था, जिसमें सत्यम के प्रवर्तकों के बेनामी खातों और घोटालों की शिकायत की गई थी। सीबीआई इस समय सेबी से अठावले का यह पत्र हासिल करने में जुटी हुई है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-4965839379111964464?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/4965839379111964464/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=4965839379111964464&amp;isPopup=true" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/4965839379111964464?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/4965839379111964464?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/-Bix_h-0OO0/blog-post.html" title="लेफ्ट यूनियन सीटू की डाकिया बनी रिलायंस इंडस्ट्रीज" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/03/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkcFRH0-eCp7ImA9WxVXGEo.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-1909596747163744906</id><published>2009-02-17T16:55:00.000+05:30</published><updated>2009-02-17T16:56:55.350+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-02-17T16:56:55.350+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हिंदी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लॉगिंग" /><title>गूगल ‘हिंदी’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘इंग्लिश’ करता है!!</title><content type="html">मेरे एक मित्र है, सहयोगी हैं। नया-नया ब्लॉग &lt;a href="http://jaigaathaa.blogspot.com/"&gt;वंदे मातरम &lt;/a&gt;बनाया है। कुछ दिनों पहले उन्होंने एक पोष्ट लिखी जिसका शीर्षक है – &lt;a href="http://jaigaathaa.blogspot.com/2009/02/blog-post_13.html"&gt;क्यों न हिंदी के लिए बने सत्याग्रह का प्रारूप। &lt;/a&gt;अचंभा तब हुआ जब गूगल ने इसका अनुवाद किया – &lt;a href="http://72.14.203.100/translate_c?hl=en&amp;amp;sl=hi&amp;amp;u=http://jaigaathaa.blogspot.com/2009/02/blog-post_13.html&amp;amp;prev=/search%3Fq%3Djaigaathaa%2Bblog%26hl%3Den%26sa%3DG&amp;amp;usg=ALkJrhjoSg0uRJnj5UUwUFn0EPpgRIeTeQ"&gt;Why not English made for the format of Satyagraha?&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि यह यंत्रवत अनुवाद है। लेकिन यह बात समझ से परे है कि हिंदी का यंत्रवत अनुवाद इंग्लिश कैसे हो सकता है। ऐसी बात तो है नहीं कि हिंदी में सर्च से लेकर ब्लॉगिंग को प्रोत्साहित करनेवाले गूगल का अनुवादक सॉफ्टवेयर बनानेवाले को इतना भी नहीं पता हो कि हिंदी एक स्वतंत्र देश के कम से कम 42 करोड़ लोगों की मातृभाषा है? हकीकत जो भी हो। लेकिन अंग्रेजी के जिस साम्राज्य के खिलाफ मेरे सहयोगी अजीत सिंह मुहिम चलाकर हिंदी के लिए सत्याग्रह का प्रारूप बनाना चाहते हैं, गूगल उन्हीं के लेख को अंग्रेजी का पक्षधर बना दे रहा है? इसके पीछे गूगल का कोई गुप्त एजेंडा तो नहीं है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;बात जो भी हो। इस पोस्ट के जरिए मैं हिंदी, हिदुस्तान के अनुरागी अजीत का ब्लॉगिंग की दुनिया में स्वागत करता हूं। यकीन है कि आप भी उनका उत्साहवर्धन करेंगे।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-1909596747163744906?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/1909596747163744906/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=1909596747163744906&amp;isPopup=true" title="10 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1909596747163744906?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1909596747163744906?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/oaMqLjaCu9w/blog-post_17.html" title="गूगल ‘हिंदी’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘इंग्लिश’ करता है!!" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/02/blog-post_17.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;Dk4EQXwzfSp7ImA9WxVXE0w.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-4933170615984763414</id><published>2009-02-11T06:45:00.001+05:30</published><updated>2009-02-11T06:45:00.285+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-02-11T06:45:00.285+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ताकि सनद रहे" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><title>साथ में अपना भी भला हो जाता है, क्या बुरा है?</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SZHER0jp59I/AAAAAAAACws/HKVXgj05Is4/s1600-h/phul.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5301234046836795346" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SZHER0jp59I/AAAAAAAACws/HKVXgj05Is4/s320/phul.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;अंग्रेजों ने गुलाम देश में रेल बिछा दी। इसलिए कि माल के आने-जाने में आसानी हो जाए। दूरदराज तक पहुंचना सुगम हो जाए। ज्यादा भला उनका हुआ, ब्रिटेन में बैठी उनकी कंपनियों का हुआ। लेकिन हम भारतवासियों का भी कुछ भला हो गया है। अच्छा है, क्या बुरा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर मुंबई की बेस्ट बसों में सीसीटीवी कैमरे के साथ फ्लैट स्कीन टीवी भी लग गए हैं। किस कंपनी के हैं, ध्यान से देखा नहीं है। शायद सैमसंग के हैं। लेकिन बस में टीवी के दो स्क्रीन देखने पर अच्छा लगा। दस मिनट का सफर पांच मिनट में कट गया। मंदी के दौर में कंपनी के फ्लैट टीवी स्क्रीन बिक गए। कई करोड़ की कमाई हो गई होगी। अपना क्या जाता है, जो गया बेस्ट और महाराष्ट्र सरकार के बजट से। सुरक्षा के साथ-साथ मनोरंजन का इंतजाम भी! खांसी को फांसी, सर्दी को तड़ीपार। एक रुपए में दो, दो रुपए में पांच। क्या बुरा है? कंपनी को फायदा हुआ तो अपन को भी तो कुछ मिल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में फ्लाईओवर बन गए, सड़कें चौड़ी और चकाचक हो गईं। रेल सेवाएं बढ़ रही हैं। बिजली की उपलब्धता बढ़ाई जा रही है। ये सच है कि सारा कुछ प्रति किलोमीटर लागत घटाने के लिए हो रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर दुरुस्त हो रहा है। मुंबई किसी दिन शांघाई बन जाएगा। विदेशी निवेशकों को भारत आने पर होम-सिकनेस नहीं महसूस होगी। ज्यादा फायदा उनका होगा। लेकिन अपुन को भी बहुत कुछ मिल जाएगा। अच्छा है। क्या बुरा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने गांव में चंद घंटों को बिजली आती है। काश, उद्योग-धंधे लग जाते। जमीन जाए तो चली जाए। सबको नहीं तो कुछ को तो रोज़गार मिलेगा। बाकी बहुत सारे उनको रोज़गार मिलने से बारोज़गार हो जाएंगे। हो सकता है कि उद्योग के लिए आ रही बिजली सबको मिलने लगे। क्या बुरा है। अच्छा है। रही-सही ज़मीन को रखकर क्या करेंगे? उसके न रहने से क्या फर्क पड़ेगा? कुछ होता-हवाता तो है नहीं। बहिला गाय या भैंस की तरह उसे पालते जाने का क्या फायदा। अब छोटी खेती-किसानी का ज़माना लद चुका है। हरिऔध ने कहा था कि उत्तम खेती, मध्यम बान, निपट चाकरी भीख निदान। लेकिन आज तो नौकरी-चाकरी में ही भलाई है। आखिर, औद्योगिकीकरण के अलावा कोई चारा भी तो नहीं है। मालिक बनने का हुनर है नहीं तो नौकरी ही सही। इसी में अपना भला है। क्या बुरा है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-4933170615984763414?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/4933170615984763414/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=4933170615984763414&amp;isPopup=true" title="7 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/4933170615984763414?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/4933170615984763414?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/gCvej6CqCsg/blog-post_11.html" title="साथ में अपना भी भला हो जाता है, क्या बुरा है?" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SZHER0jp59I/AAAAAAAACws/HKVXgj05Is4/s72-c/phul.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/02/blog-post_11.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0YEQHsyfCp7ImA9WxVXEk8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-9131701073608827323</id><published>2009-02-10T06:55:00.002+05:30</published><updated>2009-02-10T06:55:01.594+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-02-10T06:55:01.594+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हिंदी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लॉगिंग" /><title>हिंदी में साहित्यकार बनते नहीं, बनाए जाते हैं</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SZB163jAxiI/AAAAAAAACwk/IOFp9kJszYA/s1600-h/tasweer.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5300866415618737698" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 118px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SZB163jAxiI/AAAAAAAACwk/IOFp9kJszYA/s200/tasweer.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;शुरू में ही साफ कर दूं कि यह &lt;a href="http://halchal.gyandutt.com/2009/01/blog-post_26.html"&gt;तीव्र प्रतिक्रियात्मक पोस्ट &lt;/a&gt;नहीं है। कई महीने हो गए। बनारस के एक काफी पुराने मित्र से फोन पर बात हो रही थी। वे बीएचयू में हिंदी के प्राध्यापक हैं। नामवर सिंह के अंडर में जेएनयू से पीएचडी किया है। कई कॉलेजों में पढ़ाने के बाद आखिरकार बीएचयू में जम गए हैं। हिंदी साहित्य की पत्र-पत्रिकाओं में बतौर आलोचक लिखते रहते हैं। खुद भी एक पत्रिका निकालते हैं। मैंने उन्हें बताया कि इधर गुमनाम से हिंदी ब्लॉगर ऐसी-ऐसी कविताएं-कहानियां लिख रहे हैं कि दिल खुश हो जाता है। बातों ही बातों में मैंने यह भी कहा कि मुझे अगर इजाजत दी जाए और मौका मिले तो मैं कई ब्लॉगरों की कहानियों और बातों मिलाकर ऐसा उपन्यास लिख सकता हूं जो बहुत लोकप्रिय हो सकता है, संक्रमण से गुजरते हमारे आज के समाज का अद्यतन आईना होने के साथ ही उलझनों को सुलझाने का माध्यम बन सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मित्रवर बोले – तो यहां से, वहां से उठाकर लिख डालो। यही तो उत्तर-आधुनिकता का तरीका है। मैं आधुनिकता का बिंब तो बना ले जाता है, लेकिन उत्तर-आधुनिकता को अभी तक रत्ती भर भी नहीं समझ पाया हूं। खैर, मैंने पूछा कि न तो ब्लॉगर साहित्यकार हैं और उनकी रचनाओं का कोलॉज बनानेवाला मैं कोई साहित्यकार हूं। बोले – बंधु, घबराते क्यों हो? हिंदी में साहित्यकार होते नहीं, बनाए जाते हैं। उनकी यह बात सुनकर मैं चौंक गया। वे फोन पर तफ्सील से समझा नहीं सकते थे। मैंने भी अपने अज्ञान को छिपाते हुए अंदाजा लगा लिया कि हिंदी में कविता-कहानियां लिखनेवालों को साहित्यकार की मान्यता दिलाना कुछ आलोचको के पेट से निकली डकार जैसा आसान काम बना हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़रा-सा और सोचा तो पाया कि हर साल अंग्रेजी में नए-नए नाम बुकर पुरस्कार पा जाते हैं। अंग्रेजी में पहला ही उपन्यास लिखने वाला/वाली चर्चा में आ जाता/जाती है। लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं होता। यहां तो किसी आलोचक का ठप्पा ज़रूरी होता है। आलोचकों-प्रकाशकों का ऐसा उलझा हुआ वणिक तंत्र फैला हुआ है कि कोई रचना अपनी मेरिट के आधार पर नहीं, नेटवर्किंग के दम पर चर्चा में आती है। यह अलग बात है कि इस चर्चा का दायरा इतना सीमित होता है कि हिंदी समाज के आम पाठकों को इसका पता ही नहीं चलता। ऐसे साहित्यकारों की रचनाएं हिंदी के सक्रिय समाज की नब्ज़ को कितना पकड़ पाती हैं, इसका पता तब चलता है जब ऐसे मूर्धन्य साहित्यकार अपना ब्लॉग बनाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितना दुखद है कि आज हिंदी के पाठकों को अपने समाज के सच को समझने किसी अडीगा का अंग्रेजी उपन्यास पढ़ना पड़ता है। यहीं पर लगता है कि हिंदी समाज के मानस में छाया सामंतवाद हिंदी साहित्य की दुनिया पर भी हावी है। मजे की बात यह है कि इस सामंतवाद ने वामपंथ का चोंगा पहन रखा है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#333399;"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;कलाकृति: &lt;a href="http://kalalaxmi.com/jagdish_swaminathan.htm"&gt;जगदीश स्वामीनाथन&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-9131701073608827323?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/9131701073608827323/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=9131701073608827323&amp;isPopup=true" title="16 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/9131701073608827323?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/9131701073608827323?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/tt5ft--_0P0/blog-post_10.html" title="हिंदी में साहित्यकार बनते नहीं, बनाए जाते हैं" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SZB163jAxiI/AAAAAAAACwk/IOFp9kJszYA/s72-c/tasweer.gif" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">16</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/02/blog-post_10.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkQEQXo-fSp7ImA9WxVQF0Q.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-156027864226977560</id><published>2009-02-05T07:15:00.000+05:30</published><updated>2009-02-05T07:15:00.455+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-02-05T07:15:00.455+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हानि-लाभ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खबर जो नहीं छपी" /><title>उत्तर भारत के छह राज्यों की जमा औरों के हवाले</title><content type="html">&lt;strong&gt;बिहार, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और हिमाचल की आधी से लेकर दो-तिहाई तक जमाराशि बैंक दे रहे हैं पहले से आगे बढ़े राज्यों को&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SYnI4wj9dgI/AAAAAAAACwU/zSX3y1hhYfQ/s1600-h/mypainting.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5298987314012059138" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SYnI4wj9dgI/AAAAAAAACwU/zSX3y1hhYfQ/s200/mypainting.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आर्थिक पिछड़ेपन की और जो भी वजहें हों, लेकिन उनमें से एक प्रमुख वजह यह है कि इन राज्यों में आनेवाली जमाराशि का आधे से लेकर दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा यहां निवेश नहीं हो रहा है। बैंक इन राज्यों से मिलनेवाली राशि के अनुपात में यहां ऋण नहीं दे रहे हैं। रिजर्व बैंक द्वारा जारी चालू वित्त वर्ष 2008-09 की सितंबर में समाप्त तिमाही के आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश का औसत ऋण-जमा अनुपात 74.93 फीसदी है। लेकिन उत्तर भारत के इस छह राज्यों का ऋण-जमा अनुपात 50 फीसदी से नीचे है। यह अनुपात देश के सभी बैंकों द्वारा हासिल जमा और बांटे गए ऋण के आधार पर निकाला जाता है। इससे पता चलता है कि बैंक किसी राज्य या जिले के लोगों से हासिल की गई जमाराशि का कितना हिस्सा उस राज्य या जिले में औद्योगिक गतिविधियों के लिए कर्ज के रूप में दे रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में तमिलनाडु और चंडीगढ़ ही ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर बैंक कुल मिली जमाराशि से ज्यादा कर्ज दे रहे हैं। तमिलनाडु में ऋण-जमा अनुपात 113.6 फीसदी और चंडीगढ़ में 107.4 फीसदी है। यह अनुपात आंध्र प्रदेश में 95.02 फीसदी और महाराष्ट्र में 97.88 फीसदी है। यानी, इन राज्यों में आनेवाली जमा कमोवेश उनके उद्योग या व्यापार क्षेत्र को मिल जाती है। राजस्थान में यह अनुपात 80.51 फीसदी और कर्णाटक में 78.10 फीसदी है। बाकी सभी प्रमुख राज्यों में यह अनुपात 70 फीसदी से कम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर पूर्वी क्षेत्र में पडऩेवाले सात राज्यों की हालत अच्छी नहीं है। फिर भी इस क्षेत्र का औसत ऋण-जमा अनुपात 49.71 फीसदी है। लेकिन उत्तराखंड में कैसे औद्योगिक विकास हो सकता है, जब वहां का ऋण-जमा अनुपात महज 25.78 फीसदी है। इस मामले में उत्तराखंड के ठीक ऊपर आता है बिहार, जहां का ऋण-जमा अनुपात 27.57 फीसदी है। प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध झारखंड की स्थिति भी खास अच्छी नहीं है। वहां से आनेवाली जमाराशि का 34.65 फीसदी हिस्सा बैंक राज्य की औद्योगिक या व्यापारिक गतिविधियों को ऋण के रूप में दे रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश से सितंबर 2008 में खत्म तिमाही में बैंकों को 2.33 लाख करोड़ रुपए जमाराशि के रूप में हासिल हुए, लेकिन 96,596 करोड़ रुपए के ऋण वितरण के साथ वहां का ऋण-जमा अनुपात 41.40 फीसदी है। हिमाचल प्रदेश का ऋण-जमा अनुपात 40.73 फीसदी और छत्तीसगढ़ का ऋण-जमा अनुुपात 47.66 फीसदी है। देश के गरीब माने जानेवाले राज्य उड़ीसा तक की स्थिति इन सभी राज्यों से बेहतर है क्योंकि वहां का ऋण-जमा अनुपात 51.29 फीसदी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर भारत के उक्त छह राज्यों में से अगर छत्तीसगढ़ को छोड़ दें तो बाकी पांच राज्यों में ऋण-जमा अनुपात की हालत पिछले दो वित्त वर्षों में कमोबेश ऐसी ही रही है। उत्तराखंड का ऋण-जमा अनुपात वित्त वर्ष 2006-07 में 26.98 और वित्त वर्ष 2007-08 में 26.64 फीसदी रहा है। इन्हीं दो सालों के दौरान बिहार में यह अनुपात 30.14 व 29.69, झारखंड में 33.95 व 35.15, हिमाचल प्रदेश में 41.52 व 43.63 और उत्तर प्रदेश में 45.14 व 44.92 फीसदी रहा है। छत्तीसगढ़ में जरूर यह अनुपात वित्त वर्ष 2006-07 में 53.01 फीसदी और वित्त वर्ष 2007-08 में 52.28 फीसदी रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चालू साल 2008-09 की सितंबर में समाप्त तिमाही के आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब से लेकर गुजरात और पश्चिम बंगाल बेहतर स्थिति में हैं। राजनीतिक रूप से दो ध्रुवों पर खड़े गुजरात और पश्चिम बंगाल में ऋण-जमा अनुपात लगभग बराबर है। गुजरात में यह 62.30 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 60.52 फीसदी है। केरल का ऋण-जमा अनुपात 65.28 और पंजाब का ऋण-जमा अनुपात 67.15 फीसदी है। मध्य प्रदेश में ऋण-जमा अनुपात 56.05 फीसदी और हरियाणा में 58.05 फीसदी रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर हम बैंकों द्वारा हासिल जमाराशि और ऋण-वितरण की क्षेत्रवार स्थिति पर नजर डालें तो एक क्षेत्रीय असंतुलन साफ नजर आता है। पिछले दो वित्त वर्षों में उत्तरी क्षेत्र का बैंकों की कुल जमा में हिस्सा 23 फीसदी के आसपास है, जबकि वितरित ऋण में इसका हिस्सा 21 फीसदी है। मध्य भारत का कुल जमा में योगदान लगभग 11.5 फीसदी है, जबकि उन्हें बैंकों के ऋण का सात फीसदी हिस्सा ही मिल पा रहा है। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की हालत इससे जुदा नहीं है। लेकिन देश के पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्र अपनी जमा से अधिक हिस्सा ऋण के बतौर हासिल कर रहे हैं। पश्चिमी क्षेत्र का बैंकों की कुल जमा में योगदान 31 फीसदी के आसपास है, जबकि वे बैंकों के ऋण का तकरीबन 37 फीसदी हिस्सा हासिल कर रहे हैं। दक्षिणी राज्यों का जमा में योगदान लगभग 22 फीसदी है, जबकि बैंकों से मिले ऋण में उनका हिस्सा करीब 26 फीसदी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखनेवाली प्रमुख संस्था सीएमआईई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी) के प्रबंध निदेशक व सीईओ महेश व्यास का कहना है कि इसमें क्षेत्रीय असंतुलन जैसी कोई बात नहीं है। बचत का आना एक बात है, लेकिन बैंकों तो उन्हीं राज्यों या इलाकों में ऋण देंगे, जहां निवेश के बेहतर अवसर हैं। बैंकों का यह रुख एकदम स्वाभाविक है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के प्रमुख अर्थशास्त्री डी के जोशी का भी मानना है कि हमेशा से ऐसा ही होता आया है और जमाराशि के रूप में आया पैसा वहीं निवेश होगा जहां बेहतर सुविधाएं हैं। तमिलनाडु में ज्यादा ऋण वितरण के बारे में उनका कहना था कि यह तेजी से प्रगति कर रहा राज्य है। इसलिए वहां जमा से अधिक निवेश हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#333399;"&gt;फोटोशॉप छवि सौजन्य: &lt;a href="http://designflute.worlpress.com/"&gt;DesignFlute&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-156027864226977560?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/156027864226977560/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=156027864226977560&amp;isPopup=true" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/156027864226977560?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/156027864226977560?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/KbTtyR4n4XM/blog-post_05.html" title="उत्तर भारत के छह राज्यों की जमा औरों के हवाले" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SYnI4wj9dgI/AAAAAAAACwU/zSX3y1hhYfQ/s72-c/mypainting.gif" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/02/blog-post_05.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkMMRHwyeyp7ImA9WxVQF0s.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-114619313572753696</id><published>2009-02-04T14:05:00.006+05:30</published><updated>2009-02-04T22:58:05.293+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-02-04T22:58:05.293+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हानि-लाभ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खबर जो नहीं छपी" /><title>फंड की लागत का रोना, बैंकों का डर छिपाने का बहाना</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SYlS4JsMatI/AAAAAAAACwE/zUy7J_UHBoY/s1600-h/rgB1906_banks3_wideweb__470x352,0.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5298857561205533394" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SYlS4JsMatI/AAAAAAAACwE/zUy7J_UHBoY/s200/rgB1906_banks3_wideweb__470x352,0.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;बैंकों ने कर्ज पर ब्याज दरें घटाने का सिलसिला शुरू कर दिया है। देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने हर तरह के होमलोन पर एक साल के लिए 8 फीसदी ब्याज दर घोषित करके सबको चौंका दिया है। बैंकों ने सरकार से वादा भी कर दिया है कि वे ब्याज दरों में दो फीसदी कमी कर सकते हैं, बशर्ते उनके फंड की लागत घट जाए। दूसरे शब्दों में बैंकों का कहना है कि वे इस समय जमा पर ज्यादा ब्याज दे रहे हैं। इसलिए जब तक वे जमा पर ब्याज घटाने की स्थिति में नहीं आते, तब तक कर्ज पर ब्याज घटाना उनके लिए घाटे का सौदा रहेगा। देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक पंजाब नेशनल बैंक के चेयरमैन के सी चक्रवर्ती का कहना है कि बैंक उधार पर ब्याज दर घटाने को तैयार है, बशर्ते फंड की लागत और घट जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या सचमुच ऐसी ही स्थिति है या बैंक झूठ-मूठ का रोना रो रहे हैं और वे असल में देश की सुस्त पड़ी आर्थिक गतिविधियों में जान डालने के लिए कर्ज देने के जोखिम से यथासंभव बचना चाहते हैं। शायद यही वजह है कि स्टेट बैंक के चेयरमैन ओ पी भट्ट को कहना पड़ता है कि बड़े और मझोले उद्योगों को कर्ज देने पर बैंक की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) बढ़ सकती हैं। लेकिन बैंकों के फंड की वास्तविक लागत पर नजर डालने पर दूसरी ही बात सामने आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी ज्यादातर बैंकों में कुल जमा धन का लगभग 35 फीसदी हिस्सा चालू और बचत खातों से आता है। बैंकों के लिए रकम जुटाने का यह सबसे सस्ता जरिया है क्योंकि बचत खातों पर उसे महज 3.5 फीसदी सालाना ब्याज देनी पड़ती है जो सात-आठ सालों से जस की तस है। इसके अलावा फर्में और कंपनियां अपना धन चालू खाते में रखती हैं जिस पर बैंकों को एक धेला भी ब्याज नहीं देना पड़ता। अगर फिक्स्ड डिपॉजिट की बात करें तो इस समय बैंक इस पर अवधि के हिसाब से 4 फीसदी से शुरू करके ज्यादा से ज्यादा 9 फीसदी सालाना ब्याज दे रहे हैं। जैसे एचडीएफसी बैंक 3.75 फीसदी से लेकर 8.5 फीसदी सालाना ब्याज दे रहा है। स्टेट बैंक ने 12 जनवरी से जमा पर ब्याज दरें एक बार फिर घटा दी हैं और वह पांच साल से दस साल तक की जमा पर अधिकतम 8.5 फीसदी सालाना ब्याज दे रहा है। बल्क डिपॉजिट यानी एक करोड़ रुपए से ज्यादा की जमा पर बैंक अब केवल 7.5 फीसदी ब्याज दे रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर-सी बात है कि बैंकों के लिए जमा का औसत खर्च इस समय 6 फीसदी से ज्यादा नहीं है। यह अलग बात है कि बैंक दिसंबर तक सावधि जमा पर लगभग 10 फीसदी ब्याज दे रहे थे। लेकिन पुरानी जमा पर अगर ब्याज दर ज्यादा है तो बैंकों ने पुराने कर्ज पर ब्याज दर भी नहीं घटाई है। जैसे, आईसीआईसीआई बैंक अब भी पुराने होम लोन पर 12.75 फीसदी सालाना ब्याज ले रहा है। सरकारी बैंकों की प्राइम लेंडिंग रेट (पीएलआर) घटकर 12-13 फीसदी हो गई है, जबकि निजी बैंकों की पीएलआर अब भी 14 से 16 फीसदी बनी हुई है। ऐसे में फंड की लागत और कर्ज पर ब्याज का अंतर अब भी बैंकों के लिए 3 फीसदी से ज्यादा ही बैठता है जिसे एक अच्छा लाभ मार्जिन कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा बैंकों ने अपनी जमा का तकरीबन 29 फीसदी हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में लगा रखा है, जबकि एसएलआर (वैधानिक तरलता अनुपात) की अनिवार्यता के तहत उन्हें केवल 24 फीसदी निवेश करना है। इस तरह उन्होंने 1.80 लाख करोड़ रुपए सरकारी प्रतिभूतियों में ज्यादा लगा रखे हैं, जिसे जमानत (कोलैटरल) के बतौर रखकर वे रिजर्व बैंक से महज 5.5 फीसदी की रेपो दर पर तात्कालिक जरूरत के लिए उधार ले सकते हैं। अगर उन्हें और भी रकम की जरूरत पड़ती है तो अंतरबैंक बाजार से कॉलमनी के जरिए ले सकते हैं जहां इस समय दरें 2.5 से 4.30 फीसदी चल रही है। साथ ही रिजर्व बैंक ने बैंकों को अपने एसएलआर निवेश के 1.5 फीसदी हिस्से के एवज में 5.5 फीसदी ब्याज पर 60,000 करोड़ देने की सहूलियत दे रखी है। बात एकदम साफ है फंड की लागत बस रोना है। असली बात यही है कि बैंक अब भी जोखिम लेने से घबरा रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-114619313572753696?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/114619313572753696/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=114619313572753696&amp;isPopup=true" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/114619313572753696?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/114619313572753696?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/hSDpnCEdcE4/blog-post.html" title="फंड की लागत का रोना, बैंकों का डर छिपाने का बहाना" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SYlS4JsMatI/AAAAAAAACwE/zUy7J_UHBoY/s72-c/rgB1906_banks3_wideweb__470x352,0.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/02/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUYEQXgyeSp7ImA9WxVQEEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-5270544775369743187</id><published>2009-01-27T06:15:00.000+05:30</published><updated>2009-01-27T06:15:00.691+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-27T06:15:00.691+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अंतर्मन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अंदर की दुनिया" /><title>निरर्थक है निरर्थकता का बोध</title><content type="html">&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5295659552880428674" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 203px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SX32TkTXhoI/AAAAAAAACvw/ACpDYX00rBw/s320/412075475_854ee09462_m.jpg" border="0" /&gt;अपने बहुत सारे पुराने साथियों में देखता हूं कि वे अब भी अजीब किस्म के अपराध-बोध और ग्लानि के भाव के साथ जिए जा रहे हैं कि देश-समाज के लिए जो कभी करने की सोची थी, अब कुछ नहीं कर पा रहे हैं। एकाध धरना-प्रदर्शन में हिस्सेदारी, और कुछ नहीं। बस, नौकरी-चाकरी और बीवी-बच्चे। घर से दफ्तर और दफ्तर से घर। कभी-कभी लगता है कि हमारे सपने भी मर रहे हैं, तब हम पाश की लाइनें याद करके दुखी हो जाते हैं कि सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। अक्सर सोचने लगते हैं कि &lt;a href="http://thumri.blogspot.com/2009/01/blog-post_19.html"&gt;अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया।&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल की बात सोचता हूं तो मैं भी एक चमकीली उदासी से भर जाता हूं। लेकिन उन अनुभवों को अतीतजीविता के आभासी सुख से मुक्त कर सोचता हूं तो लगता है कि बाहरी और आंतरिक संघर्ष वहां भी था, यहां भी है। तब भी था और आज भी है। यह भी लगता है कि हमारी-आपकी ज़िंदगी ही असली और मूर्त है। देश तो महज एक अमूर्तन है। कहीं वह माता बन जाता है तो कहीं पिता। मुश्किल यह है कि यह अमूर्तन हर किसी को हमारी भावनाओं के दोहन का भरपूर मौका दे देता है। कोई हमें तकरीर के तीरों से बेधता है तो कोई भावनात्मक ब्लैकमेल करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है कि पहले हमें साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि हमें बदलना क्या है। आप कहेंगे कि सरकार को बदलना है। तो, हर पांच साल पर सत्ता के खिलाफ वोट दे दीजिए। आप कहेंगे कि केवल सरकार बदलना पर्याप्त नहीं है। 1977 के बाद तो लगातार यही हो रहा है। नई सरकार भी या तो पुरानी जैसी निकलती है या उससे भी बदतर। इसलिए तंत्र को भी बदलना है। तो, असली सवाल यह है कि तंत्र को कैसे बदला जाएगा? लेकिन इससे भी अहम सवाल है कि इस तंत्र की जगह कौन-सा तंत्र लाना चाहते हैं हम? क्या इसकी तस्वीर हमारे जेहन में साफ है? नहीं है तो पहले इसे साफ करने की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है कि इस तस्वीर को साफ करने के लिए हमें किसी किताब या विचारधारा के शरणागत होने की ज़रूरत नहीं है। बस एक सूत्र होना चाहिए कि सामूहिकता के जो भी साधन हैं उन्हें व्यक्ति के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा। गांव के प्रधान, ब्लॉक के प्रमुख और जिलाधिकारी तक की जवाबदेही तय होनी चाहिए। हम जिस सोसायटी में रहते हैं उसके सचिव व अध्यक्ष की कमान हमारे साथ में रहनी चाहिए। सोचता हूं कि जिस सोसायटी में रहता हूं उसमें दखल तो छोड़िए, उसके कामों से मुंह चुराता हूं तो देश-समाज के लिए कुर्बान हो जाने का जज्बा क्या सचमुच सच्चा था? क्या वह व्यावहारिकता से दूर एक खोखला आदर्शवाद नहीं था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समय निरर्थकता का बोध मुझ पर भी इतना हावी हुआ था कि लगा कि इस तरह जीने से तो अच्छा है मर जाना। लेकिन अब लगता है कि असली वीरता यह है कि हम संघर्षों को दरी के नीचे खैनी की तरह दबा देने के बजाय उन्हें शांत मन से सुलझाएं, चाहे वे संघर्ष घर के हों, दफ्तर के हों या सभा-सोसायटी के हों। खुद ही पैमाने बनाकर, नैतिकता के मानदंड बनाकर उनके सामने खुद को बौना या निरथर्क समझने की कोई ज़रूरत नहीं है। असल में हर नैतिकता के पीछे एक अंधापन होता है, आंख मूंदकर उसे सही मानने की बात होती है। यह सच है कि नैतिकता को एक सिरे से नकार कर हम पूरी मानव सभ्यता को नकार देंगे, इंसान के सामूहिक वजूद को नकार देंगे, बर्बरता ओर जंगलीपन के पैरोकार बन जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन नैतिकता भी काल-सापेक्ष होती है। स्थिर हो गई नैतिकता यथास्थिति की चेरी बन जाती है, सत्ताधिकारियों का वाजिब तर्क बन जाती है। जड़ हो गई नैतिकता मोहग्रस्तता बन जाती है जिसे तोड़ने के लिए कृष्ण को गांडीवधारी अर्जुन को गीता का संदेश देना पड़ता है। मेरा मानना है कि हर किस्म की ग्लानि, अपराधबोध, मोहग्रस्तता हमें कमजोर करती है। द्रोणाचार्य एक झूठ में फंसकर, पुत्र-मोह के पाश में बंधकर अश्वथामा का शोक करने न बैठ होते तो पांडव उनका सिर धड़ से अलग नहीं कर पाते। हम जैसे हैं, जहां हैं, अगर सच्चे हैं तो अच्छे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें न तो अपने से छल करना चाहिए और न अपनों से। इसके बाद हम रोजमर्रा के संघर्षों से लोहा लेते रहें तो समझिए हम अपना काम कर रहे हैं। कभी भी किसी अफसोस या निरथर्कता बोध की ज़रूरत नहीं है। कभी भी हमें ऐसे लकीर नहीं बना लेनी चाहिए जिसके सामने हम खुद को बहुत-बहुत छोटा महसूस करने लगें क्योंकि यह भाव हमारे अंग-प्रत्यंग को शिथिल कर देता है। यह निष्क्रियता की सोच है और साथियों, हम न तो कल निष्क्रिय थे और न आज रहेंगे। हम सक्रिय थे और मरते दम तक सक्रिय ही रहेंगे। आमीन!!!&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#cc0000;"&gt;फोटो साभार: &lt;a href="http://flickr.com/photos/cobalt/412075475/"&gt;cobalt123&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-5270544775369743187?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/5270544775369743187/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=5270544775369743187&amp;isPopup=true" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/5270544775369743187?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/5270544775369743187?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/1sMC6TgA5JE/blog-post_27.html" title="निरर्थक है निरर्थकता का बोध" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SX32TkTXhoI/AAAAAAAACvw/ACpDYX00rBw/s72-c/412075475_854ee09462_m.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/01/blog-post_27.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0QCRnw6eSp7ImA9WxVRGE0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-7746773759749506347</id><published>2009-01-24T09:50:00.002+05:30</published><updated>2009-01-24T19:26:07.211+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-24T19:26:07.211+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लॉगिंग" /><title>दशानन के चेहरे चिढ़ते बहुत हैं</title><content type="html">&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SXqXBtRGOWI/AAAAAAAACvo/DevRg_FuFk4/s1600-h/Modi_mask_275.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5294710367514409314" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 160px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SXqXBtRGOWI/AAAAAAAACvo/DevRg_FuFk4/s200/Modi_mask_275.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;रावण की लंका सोने की थी। बहुत सारा निवेश आया होगा तभी तो बनी होगी सोने की लंका। उसके हित-मित्र, चाटुकार बड़े मायावी थे। स्वर्ण-मृग बनकर अपने यार के लिए वनवासियों की बीवियों को रिझाकर छल से उठा लिया करते थे। दशानन चिढ़ता बहुत था। निंदा तो छोड़िए, अपनी जरा-सा आलोचना भी बरदाश्त नहीं कर पाता था। इसी बात पर अपने भाई विभीषण को निकाल फेंका। पौराणिक आख्यान गवाह हैं कि रावण का सर्वनाश हो गया। विभीषण को लंका का राजपाट मिला। लंका सोने की ही रही। लेकिन उस सोने पर राजा का ही नहीं, प्रजा का भी हक हो गया। लंका में रामराज्य आ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एडोल्फ हिटलर, रहनेवाला ऑस्ट्रिया का। आगे नाथ, न पीछे पगहा। अंदर से बड़ा ही भीरु किस्म का शख्स। अपने अलावा और किसी को कुछ नहीं समझता था। मंच पर ऐसा बमकता था कि लगता था कि धरती और आकाश के बीच उसके अलावा कुछ है ही नहीं। सत्ता लोलुप और शातिर इतना कि पराए मुल्क में जाकर राष्ट्रवाद का नारा दे दिया। यहूदियों को निशाना बनाया। उनके खिलाफ नफरत भड़का कर बाकियों को अपने पीछे लगा लिया। जर्मन लोग उसके दीवाने हो गए। लेकिन जर्मनी के वही लोग आज उससे बेइंतिहा नफरत करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां किसी को हिटलर कह दो तो वह आपके खिलाफ मानहानि का मुकदमा ठोंक देगा। मुट्ठी भर सिरफिरों को छोड़ दें तो जर्मनी का बच्चा-बच्चा हिटलर से नफरत करता है। अपने इतिहास से हिटलर को मिटाने के लिए अभी साल भर पहले उस नगरपालिका ने पुराने रजिस्टर से हिटलर का नाम काट दिया जिसने इस ऑस्ट्रिया-वासी को जर्मन नागरिकता दी थी। हिटलर का भी सबसे बड़ा दोष यही था कि वह चिढ़ता बहुत था। अपनी किसी भी तरह की आलोचना को बरदाश्त नहीं कर पाता था। इतिहास गवाह है कि एक सुनसान बंकर में उसका मृत शरीर पाया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने का मंतव्य यह है कि आलोचना न सह पाना, मामूली बात पर चिढ़ जाना बहुत बड़ा दुर्गुण है। इतना बड़ा कि आपका सत्यानाश तक कर सकता है। अपने यहां राजा जनक को सबसे बड़ा योगी इसीलिए माना गया है कि वे सब कुछ के बीच रहते हुए भी असंपृक्त रहते थे। राग-द्वेष, वैर-प्रीति, यश-अपयश से ऊपर थे। गीता में योगिराज कृष्ण ने स्थितिप्रज्ञता का बखान किया है। तो, अपने पंगेबाज टाइप बंधुओं से मैं विनती करना चाहता हूं कि दशानन के चेहरे मत बनो। यह मत साबित करो कि उसमें और तुम में नाभिनाल संबंध है क्योंकि उसकी नाभि को भेदकर कोई भी राम उसका विनाश कर सकता है। तुम और हम आम नागरिक हैं भाई जो अपने देश, अपनी माटी और अपनी परंपरा से बेपनाह मोहब्बत करते हैं। हम उस मायावी का पाप अपने ऊपर क्यों लें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर में एक बात और। नाम पंगेबाज रखा है तो उसकी मर्यादा का पालन करो। पंगेबाज नाम का मतलब है कि वह बड़े संयत भाव से, शांत मन से पंगा लेगा। चिढ़ेगा नहीं। अरे, मेरी बात का जवाब देना ही था तो &lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/01/blog-post_22.html?showComment=1232623740000#c2618096721212707628"&gt;आलोक नंदन की तरह &lt;/a&gt;देते। चिढ़ जाने से बुद्धि और विवेक का नाश हो जाता है। बंधुवर, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की परंपरा को अपनाओ। दशानन का दसवां चेहरा मत बनो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-7746773759749506347?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/7746773759749506347/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=7746773759749506347&amp;isPopup=true" title="14 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/7746773759749506347?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/7746773759749506347?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/h7dvKOES3Hw/blog-post_24.html" title="दशानन के चेहरे चिढ़ते बहुत हैं" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SXqXBtRGOWI/AAAAAAAACvo/DevRg_FuFk4/s72-c/Modi_mask_275.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/01/blog-post_24.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkIAQn04fSp7ImA9WxVRFkw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-8002282842442962548</id><published>2009-01-22T14:00:00.002+05:30</published><updated>2009-01-22T15:32:23.335+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-22T15:32:23.335+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ताकि सनद रहे" /><title>नरेन्द्र भाई का एक सद्गुण</title><content type="html">&lt;a href="http://conclave.digitaltoday.in/conclave2008/images/stories/kicker_image_220208_105247_narendra-modi-big.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 290px; CURSOR: hand; HEIGHT: 238px" alt="" src="http://conclave.digitaltoday.in/conclave2008/images/stories/kicker_image_220208_105247_narendra-modi-big.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;संजय भाई ने नरेन्द्र मोदी के दस &lt;a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=792"&gt; अवगुण &lt;/a&gt;गिनाये तो मुझे लगा कि क्यों न उनका एक सद्गुण गिना दिया जाए। आज ही इंडियन एक्सप्रेस में &lt;a href="http://www.indianexpress.com/news/report-by-own-govt-punctures-modis-gujarat-hype/413765/"&gt;एक रिपोर्ट &lt;/a&gt;छपी है जो बताती है कि वे झूठ बोलने में ज़बरदस्त महारत रखते हैं। उनके सत्य की कलई ख़ुद उन्हीं के सरकारी विभाग ने खोली है। आप भी &lt;a href="http://www.indianexpress.com/news/report-by-own-govt-punctures-modis-gujarat-hype/413765/"&gt;यह रिपोर्ट &lt;/a&gt;पढ़ें और उनके इस सद्गुण की दाद दें। शुक्रिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-8002282842442962548?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/8002282842442962548/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=8002282842442962548&amp;isPopup=true" title="16 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/8002282842442962548?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/8002282842442962548?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/_ivnaYrGuOw/blog-post_22.html" title="नरेन्द्र भाई का एक सद्गुण" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">16</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/01/blog-post_22.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkICQ3k7eyp7ImA9WxVRFUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-5634238796335659759</id><published>2009-01-22T06:06:00.000+05:30</published><updated>2009-01-22T06:06:02.703+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-22T06:06:02.703+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ताकि सनद रहे" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><title>देखो, टूट रही हैं राष्ट्रवाद की सरहदें</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SXdwjeCNJtI/AAAAAAAACvg/z3SQ43u-Nxk/s1600-h/2340664539_5fe4148210_m.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5293823641657353938" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 180px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SXdwjeCNJtI/AAAAAAAACvg/z3SQ43u-Nxk/s320/2340664539_5fe4148210_m.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;बराक ओबामा को अमेरिका का 44वां राष्ट्रपति बनते दुनिया के करोड़ों लोगों ने टीवी पर लाइव देखा। मैंने भी सपरिवार देखा। शायद आपने भी देखा होगा। मेरी पत्नी ने इस समारोह को देखने के बाद सहज भाव से पूछा – क्या मार्केटिंग और नेटवर्किंग के इस युग में ओबामा जैसे साधारण आदमी के रूप में पूरी दुनिया में नई आशा और उम्मीद का पैदा होना चमत्कार नहीं है? यह एक भावना है जो युद्ध और आर्थिक मंदी के संत्रास से घिरे अमेरिका के लोगों में नहीं, सारी दुनिया के लोगों में लहर मार रही है। बराक जब चुने गए थे, तभी हमारे देश में भी पूछा जाने लगा था कि अपने यहां कोई बराक ओबामा नहीं हो सकता। बहुतों के भीतर अपने देश में किसी बराक ओबामा के न होने की कचोट सालने लगी। ओबामा का कहा हुआ वाक्य – yes we can, सबकी जुबान और मानस पर चढ़ गया। इसी माहौल में कुछ मीडिया पंडितों और कॉरपोरेट हस्तियों ने राहुल गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी में भारतीय ओबामा की शिनाख्त शुरू कर दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच यही है कि सारी दुनिया के लोग अंदर ही अंदर बराक को अपना नेता मानने लगे हैं। कहने का मौका मिले तो वे कह भी सकते हैं कि अमेरिका का राष्ट्रपति हमारा राष्ट्रपति है। इसी बात पर मुझे साठ के दशक के आखिरी सालों की सुनी-सुनाई बात याद आ गई, जब देश के लाखों तो नहीं, लेकिन हज़ारों नौजवानों ने नारा दिया था – चीन के चेयरमैन हमारे चेयरमैन। लेकिन सत्तर और अस्सी का दशक आते-आते यह नारा उलाहना और हिकारत का साधन बन गया। हिंदू राष्ट्रवाद के चोंगे में सतरंगी राष्ट्र की कंबल परेड करनेवाले स्वयं-सेवक जवाब मांगने लगे – चाओ माओ कहते तो भारत में क्यों रहते हो। लेकिन वही लोग आज ओबामा को अपना नेता माननेवालों से हिकारत की इस जुबान में बात नहीं कर सकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय के दौर के बारे में मैं अपने अनुभव से यही कहना चाहता हूं कि चीन के चेयरमैन को अपना चेयरमैन कहनेवाले अपनी मातृभूमि से बेइंतिहा प्यार करते थे। वे अपनी मातृभूमि की मुक्ति का स्वप्न देखनेवाले समर्पित नौजवान थे। इंजीनियरिंग संस्थानों से लेकर विश्वविद्यालयों के मेधावी छात्र थे। वे गीत गाते थे – हे मातृभूमि, तुम्हारी मुक्ति का दिन अब दूर नहीं है। देखो, पूर्व के समुद्र के पार लाल सूरज उग रहा है। उसकी लाल आभा में, लाल आलोक में सारा जग जगमग हो रहा है। वे गीत गाते थे – तोहार बाड़ी सोने के बाड़ी, तोहार बाड़ी रुपे के बाड़ी, हमार बाड़ी हे हो नक्सलबाड़ी। जी हां, मैं नक्सलबाड़ी के संघर्ष से उठे मुक्तिकामी योद्धाओं की बात कर रहा हूं, बलिदानी नौजवानों की बात कर रहा हूं। ये सच है कि उन्होंने भारतीय परिस्थितियों की विशिष्टता को नहीं समझा। लेकिन उनकी भावना पर शक करना, उन्हें चीन का दलाल बताना, उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाना गौ-हत्या या ब्रह्म-हत्या से भी बड़ा पाप है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे तो ऐसा ही लगता है। आप कुछ भी मानने-सोचने के लिए आज़ाद हैं। इतिहास के पहिए को वापस नहीं मोड़ा जा सकता। लेकिन आज वे हज़ारों नौजवान होते तो हज़ारों के हज़ारों भारत का ओबामा बनने की संभावना लिए होते। वैसे, दिक्कत यह है कि परछाइयों के पीछे भागने के आदी हो गए हैं। किसी बाहरी उद्धारक या अवतार की बाट जोहने में लगे रहते हैं। यह नहीं देखते कि एक साधारण-सा शिक्षक ओबामा कैसे बन जाता है। ओबामा को राष्ट्रपति बनने पर हम मुदित हैं। लेकिन यह नहीं समझते कि डेमोक्रेटिक पार्टी का तंत्र नहीं होता तो ओबामा को इतना उभार नहीं मिलता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या अपने यहां कोई भी ऐसी पार्टी है जिसमें ओबामा जैसे आम आदमी को उभारनेवाला आंतरिक लोकतंत्र है? कांग्रेस की तो बात ही छोड़ दीजिए, बीजेपी में किसी नए नेता की तारीफ होते ही प्रधानमंत्री की कुर्सी के दावेदार बुजुर्ग घबरा जाते हैं। सीपीएम तक गुजरात के विकास कार्यक्रमों को समझने की कोशिश में लगे नेता को निकाल बाहर करती है। नैतिकता की अलंबरदार पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके नेता अपनी प्रिया और प्रिय पुत्र के लिए धृतराष्ट्र बन जाते हैं, मातृघात कर डालते हैं। हमारी पार्टियों में आतरिक लोकतंत्र का अभाव है तो ओबामा की तलाश में लगे हमारे कॉरपोरेट जगत में कॉरपोरेट गवर्नेंस का। कंपनियों के प्रबंधन में न तो कर्मचारियों और न ही बाहरी स्वतंत्र निदेशकों की आवाज़ सुनने की व्यवस्था है। अभी तो एक सत्यम का खुलासा हुआ है, न जाने कितनों का सत्य अभी सामने आना बाकी है। राजनीतिक पार्टियों के खातों का स्वतंत्र ऑडिट हो जाए तो लेफ्ट के अलावा सारी की सारी पार्टियां सत्यम की अम्मा निकलेंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में मेरा बस इतना कहना है कि राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की स्थापना के बगैर भारत में कोई ओबामा नहीं उभर सकता। हमारे यहां आज भी ओबामा की कमी नहीं है। लेकिन एक सच्ची लोकतांत्रिक पार्टी के विकास के बिना ऐसे ओबामा अपनी-अपनी चौहद्दियों में चीखते-चिल्लाते, बाल नोंचते, पैर पटकते मिट जाने को अभिशप्त हैं। अच्छी बात यह है कि यह बात अब महज बात नहीं रही है। कहीं-कहीं, धीरे-धीरे एक सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। देखो, रंग बदल रहा है आसमान का..&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;फोटो साभार: &lt;/span&gt;&lt;a href="http://flickr.com/photos/tsevis/2340664539/"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;tsevis&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;a href="http://flickr.com/photos/tsevis/2340664539/"&gt; &lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-5634238796335659759?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/5634238796335659759/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=5634238796335659759&amp;isPopup=true" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/5634238796335659759?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/5634238796335659759?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/fAAVGMFezwk/blog-post.html" title="देखो, टूट रही हैं राष्ट्रवाद की सरहदें" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SXdwjeCNJtI/AAAAAAAACvg/z3SQ43u-Nxk/s72-c/2340664539_5fe4148210_m.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2009/01/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkcNRHk5eSp7ImA9WxRaFk8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-3699699691032761621</id><published>2008-12-18T23:40:00.000+05:30</published><updated>2008-12-18T23:44:55.721+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-12-18T23:44:55.721+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नीर-क्षीर" /><title>कसाब का मुकदमा लाइव ब्रॉडकास्ट हो</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SUqSy5s_LII/AAAAAAAACuM/lsmyPE_tc8A/s1600-h/14818632_Mohammed_Ajmal_Kasab.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5281194916225952898" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 206px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SUqSy5s_LII/AAAAAAAACuM/lsmyPE_tc8A/s320/14818632_Mohammed_Ajmal_Kasab.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;मुंबई पुलिस की पकड़ में आए पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब के खिलाफ खुली अदालत में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इसमें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बुलाया जाए। साथ ही टीवी चैनलों को इसके लाइव ब्रॉडकास्ट की अनुमति दी जानी चाहिए ताकि पूरा देश, पूरी दुनिया जान सके कि हकीकत क्या है। इससे हम लश्करे तैयबा और दूसरे आतंकवादी संगठनों और उनके आकाओं को बेनकाब कर सकते हैं। मुकदमा बिना किसी विलंब के हर दिन चलाकर कसाब को भारतीय कानून के मुताबिक सख्त से सख्त सज़ा दी जानी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर हम सैकड़ों साल पुराने किसी कबीलाई समाज में रह रहे होते तो शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे का कहना सही था कि कसाब को बिना कोई मुकदमा चलाए वीटी स्टेशन पर ले जाकर फांसी चढ़ा देना चाहिए या गोली मार देनी चाहिए, जहां 26 नवंबर की रात आतंकवादियों की गोलियों से 63 मासूम भारतीय मारे गए थे। लेकिन हम एक लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं जहां घनघोर अपराधी को भी कानूनी बचाव का हक है। और, अपराधी का कोई देश नहीं होता। जो लोग कह रहे हैं कि कसाब अगर पाकिस्तानी नागरिक न होकर भारतीय होता तो उसे वकील दिया जा सकता था, वे लोग असल में मूर्ख और लोकतंत्र-विरोधी ही नहीं, कायर भी हैं। उनमें लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ने की हिम्मत नहीं है। ये लोग देशभक्त भी नहीं हैं क्योंकि लोकतंत्र के बिना देश को ज्यादा देर तक बचाया नहीं जा सकता। लोकतंत्र चला गया तो भारत को पाकिस्तान बनते देर नहीं लगेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए दोस्तों, मैं तो यही मानता हूं कि कसाब को वकील जरूर मिलना चाहिए। लेकिन उस पर खुली अदालत में मुकदमा चलाया जाए और मुकदमे की सारी कायर्वाही टीवी चैनलों पर लाइव दिखाई जाए। हमें किसी बाल ठाकरे या उनके गणों के बहकावे में नहीं आना चाहिए क्योंकि वे लोकतंत्र के, हमारी-आपकी की आजादी के, स्वतंत्र वजूद और सोच के कट्टर दुश्मन हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-3699699691032761621?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/3699699691032761621/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=3699699691032761621&amp;isPopup=true" title="14 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/3699699691032761621?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/3699699691032761621?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/NUuEuW6hZB4/blog-post_18.html" title="कसाब का मुकदमा लाइव ब्रॉडकास्ट हो" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SUqSy5s_LII/AAAAAAAACuM/lsmyPE_tc8A/s72-c/14818632_Mohammed_Ajmal_Kasab.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/12/blog-post_18.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUYNR3g6fCp7ImA9WxVQF04.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-1481791282596197491</id><published>2008-12-13T06:06:00.003+05:30</published><updated>2009-02-04T14:16:36.614+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-02-04T14:16:36.614+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ताकि सनद रहे" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><title>ऐसे ज्ञानी भी न बनो!</title><content type="html">&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SULLNpb-TrI/AAAAAAAACuE/L65FSxGw4jA/s1600-h/2070289118_962716f69b_m.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5279005148553563826" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 160px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SULLNpb-TrI/AAAAAAAACuE/L65FSxGw4jA/s320/2070289118_962716f69b_m.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;एक जंगल में बहुत ऊंचे स्तर की आईक्यू वाला चीता रहा करता था। बड़ा विद्वान, बुद्धिजीवी, आत्मज्ञानी। दिक्कत बस इतनी थी कि वह दूसरे चीतों की तरह 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से नहीं दौड़ पाता था। इसके चलते हिरन कुलांचे भरते निकल जाते और वह उन्हें पकड़ नहीं पाता। तेजी से दौड़ते-भागते जानवरों का शिकार उसके लिए नामुमकिन हो गया तो क्या करता वह बुद्धिजीवी बेचारा। चूहों, खरगोश, सांप और मेढक जैसे जानवरों को खाकर किसी तरह गुजारा करने लगा। लेकिन उसे यह सब छिपकर करना पड़ता क्योंकि अगर कोई और चीता देख लेता तो यह शर्म के मारे डूब मरनेवाली बात हो जाती। है कि नहीं। आप ही बताएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह अक्सर सोचता रहता कि दुनिया का सबसे तेज दौड़नेवाला जानवर होने से आखिर क्या फायदा? मैं तो कुलांचे मारते हिरन तक का शिकार नहीं कर पाता। इसी सोच और उधेड़बुन में डूबा वह एक दिन जंगल के दूसरे चीते के पास जा पहुंचा जो अपनी शानदार रफ्तार के लिए आसपास के सभी जंगलों में विख्यात था। दुआ-सलाम के बाद फटाक से बोला – मेरे पास विकासवादी अनुकूलन की वे सारी खूबियां हैं जिसने हमारी प्रजाति को सबसे तेज दौड़नेवाला जानवर बनाया है। मेरी नाक की नली काफी गहरी है जो मुझे ज्यादा ऑक्सीजन सोखने की क्षमता देती है। मेरे पास काफी बड़ा हृदय और फेफड़े हैं जो ऑक्सीजन को पूरे शरीर में बेहद दक्षता से पहुंचा देते हैं। इसके साथ ही जब दौड़ने के दौरान मैं मात्र तीन सेकंड में इतना त्वरण हासिल कर लेता हूं कि मेरी रफ्तार शून्य से 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुचाती है, तब मेरी सांस लेने की गति 60 से बढ़कर 150 प्रति सेकंड हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दौड़ने में मेरे अर्ध-आयताकार पंजे बड़े उपयोगी हैं। ऊपर से अपनी लंबी पूंछ का इस्तेमाल मैं रडर की तरह कर सकता हूं और दौड़ते-दौड़ते बड़ी तेजी से मुड़ सकता हूं। यानी शिकार को हर दिशा से दबोच सकता हूं। फिर भी...उसने लंबी सांस भरकर कहा – मैं चाहे जितनी कोशिश कर लूं, 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार नहीं हासिल कर पाता। सामनेवाला चीता आंख फाड़कर उसकी बात सुनता रहा और जब उसकी बात खत्म हो गई तो बोला – वावो, बड़ी दिलचस्प जानकारियां आपने दीं। मैं तो अभी तक यही समझता था कि मेरी नाक केवल सूंधने के लिए है। मेरे हृदय और फेफड़े मुझे जिंदा रखने के लिए हैं। और शिकार का पीछा करने के दौरान तो मुझे कुछ और दिखता ही नहीं कि पूंछ कहां जा रही है, पंजे कहां उठ रहे हैं। पता ही नहीं चलता। हां, सांस फूल जाती है, इसका अहसास रहता है। लेकिन तब तक तो शिकार मेरे जबड़े में आ चुका होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा चीता बोलता रहा – बड़ा मजा आया आपकी दिलचस्प और चौंकानेवाली बातें सुनकर। वाकई आप तो बड़े आत्मज्ञानी हैं। तो ऐसा करते हैं कि हम अब एक साथ रहते हैं। मैं आपके हिस्से का भी शिकार करता रहूंगा और आप मुझे मेरे स्व और जगत का ज्ञान कराते रहना ताकि मैं भी आपकी तरह ज्ञानवान और विद्वान बन जाऊं। बुद्धिजीवी बन जाऊं। आत्मज्ञानी बन जाऊं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले चीते ने उसकी बात मान ली। दोनों चीते एक साथ रहने लगे। धीरे-धीरे इस तरह उस जंगल में दो चीते हो गए जो 120 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम रफ्तार नहीं हासिल कर पाते थे और दूसरों की नजरों से छुपते-छिपाते खरगोश, चूहे, सांप, नेवले, मेढक, गोजर, केकड़े, कॉकरोच, बिच्छू आदि-इत्यादि खाकर जिंदा रहते थे। &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;यह कहानी एक बनारसी ने सुनी तो फटाक से बोल पड़ा – अरे धत! बड़े-बड़े विद्वान, तुम्हारी...&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;आधार : &lt;a href="http://economictimes.indiatimes.com/Opinion/A_little_knowledge_goes_a_long_way/rssarticleshow/3825609.cms"&gt;इकनॉमिक टाइम्स&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-1481791282596197491?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/1481791282596197491/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=1481791282596197491&amp;isPopup=true" title="22 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1481791282596197491?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1481791282596197491?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/kVsLkBJ3dJo/blog-post_13.html" title="ऐसे ज्ञानी भी न बनो!" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SULLNpb-TrI/AAAAAAAACuE/L65FSxGw4jA/s72-c/2070289118_962716f69b_m.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">22</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/12/blog-post_13.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D04AQ38zfyp7ImA9WxRaEEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-1864923739851190942</id><published>2008-12-11T06:35:00.004+05:30</published><updated>2008-12-11T22:49:02.187+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-12-11T22:49:02.187+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अंदर की दुनिया" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कच्ची कहानियां" /><title>नगई महरा पानी भरो, रोती है नयका नाउनि</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SUAi8rxpQWI/AAAAAAAACt8/7HEWq_12Sog/s1600-h/2791307045_1d34787007_m.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5278257189216665954" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 180px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SUAi8rxpQWI/AAAAAAAACt8/7HEWq_12Sog/s320/2791307045_1d34787007_m.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;कमर से झुकी, दाएं हाथ में दंड पकड़े उस सांवली औरत ने अपने बाएं हाथ से मेरे बंधे हुए हाथों को बस छुआ भर था कि जादू हो गया। अंबेडकरनगर ज़िले के देवलीपुर गांव में बाबू राम उदय सिंह के जिस नए-नवेले घर के बरामदे के बाहर यह वाकया हुआ, वह घर गायब हो गया। पूरे गांव-जवार के घर-बार, पेड़-पौधे, खेत-खलिहान, गाय-बछरू सब गायब हो गए। बस बचा तो मैं और वह सांवली औरत जिसका नाम है नयका नाउनि। सत्तर के पार की नयका नाउनि। नयका मेरे हाथों पर अपना हाथ बड़ी नरमी से रखे रहीं और बोलीं – भइया सब भुलाइ दिह्या। फिर बह निकली आंसुओं की अजस्र धारा। नयका नाउनि रोने लगीं। मेरी भी आंखें पहले नम हुईं, फिर बहने लगीं। सारी धरती, सारा इलाका मां और बेटे के आंसुओं में डूब गया। ताल-तलैया, गढ्ढे-गढ़ही, कच्चे-पक्के तालाब सभी गले तक भरकर बहने लगे। लगा जैसे घाघरा से निकली मडहा नदी में भयंकर बाढ़ आ गई हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्षितिज तक जिधर भी नजर फेरो, पानी ही पानी। दिग-दिगंत तक पानी ही पानी। उसी के बीच चार गज जमीन के द्वीप पर खड़े थे हम दोनों। असली मां और बेटे तो नहीं। लेकिन वह मुझमें एक-एक कर मरते गए अपने चौदह पुत्रों को देख रही थी और मैं उसमें अथाह ममता की आदर्श प्रतिमूर्ति, जो मुझे सांसारिक समीकरणों में उलझे अपनों से नहीं मिली। नयका के आंसुओं की वजह जो भी रही हो, लेकिन मुझे पता है कि मैं अपनों की उलाहना के दंश से रो रहा था। पहले तो मामी ने उलाहना दी कि तुम न पप्पू के मरने पर आए, न ही मामा के गुजरने पर, जबकि मामा तुमको सबसे ज्यादा मानते थे और पप्पू तो तुम पर जान छिड़कता था। उनको कैसे समझाता कि इन दोनों के जाने से मैं कितना तड़पा था। अभी तक पप्पू और मामा सपने में आते रहते हैं। जब उन्हें कोई शिकायत नहीं है तो यह 56 साल की फैशनेबल औरत कौन होती है यह कहनेवाली कि मैं तो सोचकर आई थी कि तुमसे बात ही नहीं करूंगी। अब बगल में बैठे हो तो बोल ले रही हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामी की इस उलाहना पर बुआ ने तेजाब उड़ेल दिया। उस बुआ ने, जिसने मुझे रातों में अपने बगल में सुलाकर सीत-बसंत जैसे सैकड़ों किस्से सुनाए थे, उसी ने मेरे दुनियादार न हो पाने को झूठ मानकर ताना मारा। जिस मां के लिए मैं सब कुछ कुर्बान करने की अंधश्रद्धा रखता हूं, उस मां ने मुझसे पूछा कि छोटे भाई की बहू को क्या मुंह-दिखाई दे रहे हो। मैंने कहा – तुम बताओ क्या देना है, मैं दे दूंगा। मुझे नहीं पता कि क्या दिया जाता है। मां ने मुंह बिचकाया तो बुआ ने ताना मार दिया। नहीं पता कि किस चाची-ताई ने बचाव किया कि बच्चा दस साल का था तभी से तो बाहर है क्या जाने रीति-रिवाज। लेकिन मां के मुंह घुमाने और बुआ के ताने की चोट इतनी गहरी थी कि नाश्ता बीच में छोड़कर थाली झनाक से फेंकी और बाहर निकल गया। वहीं बरामदे में दिख गईं नयका नाउनि। और, फिर घट गया वह वाकया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचिए, जब हर तरफ पानी ही पानी हो, आंसुओं का हाहाकार हो, तब जानवरों और इंसानों के रुदन की आवाजें गूंजने लगें तो आपकी मनस्थिति क्या हो जाएगी। मैं भी संज्ञाशून्य होते-होते कहीं गुम गया। पहुंच गया उस अतीत में जब नयका मुझे बुकुआ (सरसों का उबटन) लगाकर नहलाती भी थीं। तब तो मैं बकइया-बकइयां भी नहीं चल पाता था। दसई नाऊ की नई बहू आई तो सब उसे नयका-नयका कहने लगे और अधेड़ से बूढ़ी होने तक वह नयका (नई) ही बनी रही। हमारे गांवों में ऐसा ही चलन है। मेरी बुआ का नाम सुरजा है, लेकिन उनकी ससुराल में उन्हें भी नयका ही कहते हैं। यहां तक कि जेठ और देवर के लड़के आज भी उन्हें नयका माई कहते हैं। उनकी कोई आद-औलाद नहीं है। &lt;div style="BORDER-TOP: rgb(92,138,100) 6px solid; FONT-WEIGHT: bold; FONT-SIZE: 12pt; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 6px; MARGIN: 10px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 6px; BORDER-BOTTOM: rgb(92,138,100) 4px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;गंगा ने बिना शिकन अपने सात नवजात पुत्रों को नदी में बहा दिया था। आठवां पुत्र शांतनु के टोकने से बच गया तो भीष्म बन गया। लेकिन दसई नाऊ का दुख तो शांतनु से भी बड़ा था, जिसने अपनी आंखों के सामने अपने चौदह पुत्रों को बिना किसी बीमारी के बिछुड़ते देखा था।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;नयका नाउनि की भी कोई आल-औलाद नहीं है। लेकिन उनकी कोख से चौदह बच्चों ने जन्म लिया था। कोई जन्मते ही मर गया, कोई दो-चार महीने में और कोई पांच-सात साल का होकर। नयका का चौदहवां बेटा तेरह साल का होकर मरा। दसई और नयका उसे बड़ा होता देखकर हमेशा चहकते रहते। टोना-टोटका जाननेवाले बड़े-बूढ़ों के कहने पर पैदा होने के कुछ महीने बाद ही नाक और कान दोनों छेदा दिया और तभी से उसका नाम पड़ गया छेदी। मुझसे छह साल चार महीने ही छोटा था छेदी। वह बात तो मैंने खुद अपनी आंखों से देखी थी और मुझे वो दृश्य यादकर आज भी हंसी छूट जाती है। दसई नाऊ उसे हाथ में लेकर उछाल रहे थे। दोनों हाथों में अपने सिर के ऊपर तक उठाकर लू-लू कर रहे थे कि छेदी ने ऊपर से सू-सू कर दिया और उसकी धार सीधे दसई की आंखों और खुले मुंह में जा पड़ी। दसई बोले – का सारे, मूति दिहे। नयका फौरन आकर छेदी को गोद में भरकर दुलारने लगीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नयका नाउनि की आंखों से अब कम दिखता है। लेकिन उन्हें इन्ही आंखों से मुझमें अपने एक-एक बिछुड़े चौदह पुत्रों को देखने में कोई दिक्कत नहीं आई। मुझे लगा कि नयका के आगे गंगा को भी पानी भरना पड़ेगा। गंगा ने बिना शिकन अपने सात नवजात पुत्रों को नदी में बहा दिया था। आठवां पुत्र शांतनु के टोकने से बच गया तो भीष्म बन गया। लेकिन दसई नाऊ का दुख तो शांतनु से भी बड़ा था, जिसने अपनी आंखों के सामने अपने चौदह पुत्रों को बिना किसी बीमारी के बिछुड़ते देखा था। वैसे, दसई नाऊ थे बड़े विचित्र। पता नहीं आंखें कमजोर थीं या अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर के शिकार थे, सभी के बाल चाईं-चूआं ही काटते थे। कटे हुए बालों में कैची की हर हरकत अपना अलग निशान छोड़ जाती थी। मां-बाप को जिस बच्चे को भी सजा देनी होती, उसे बाल कटाने दसई नाऊ के पास भेज देते थे। मुझे भी दो-चार बार दसई से बाल कटाने पड़े थे। दसई नाऊ को मरे हुए सत्ररह साल हो चुके हैं यानी मेरे पिछली बार गांव जाने से दो साल पहले वे नयका नाउनि और डीह पर बने अपने घर को अकेले छोड़कर चले गए। आज होते तो आमिर खान की गजिनी स्टाइल को मात कर देते। सभी उन्हीं से हेयर-स्टाइलिंग कराने पहुंच जाते अंबेडकरनगर जिले के देवलीपुर गांव में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेजतर्रार नयका नाउनि को जीते जी दसई की खास परवाह नहीं थी तो मरने के बाद क्या होगी। लेकिन बच्चों की कसक इन्हें आज भी सालती है। तभी तो मुझ जैसे निर्मोही शख्स में अपने पुत्रों को खोज रही हैं। तो, नयका मेरे बंधे हांथों पर अपना बायां रखकर रो रही थीं, तभी उनके चचेरे देवर अलगू नाऊ की आवाज आई – भइया, कैसे अह्या। यह आवाज आते ही सारा जादू गायब हो गया, सारा तिलिस्म टूट गया। सब कुछ वापस आ गया। घर-बार, खेत-खलिहान, लोग-बाग, गाय-बछरू सब कुछ। बाढ़ का सारा पानी अपने-अपने सोतों में लौट गया। सब कुछ पूर्ववत हो गया। लेकिन मैं अभी तक पूर्ववत नहीं हो पाया हूं। एक अमिट छाप बनकर दर्ज हो गया है यह वाकया मेरे जेहन में।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुनश्च :&lt;/strong&gt; &lt;span style="color:#990000;"&gt;मुझे लगता है कि मैं कभी इतमिनान से लिख पाऊंगा तो नयका नाउनि का चरित्र त्रिलोचन शास्त्री के &lt;a href="http://kakesh.com/2007/nagaee-mahara1/"&gt;&lt;strong&gt;नगई महरा&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;को भी मात कर सकता है। शायद इसी तरीके से मैं अपनी मां तो नहीं, लेकिन उससे भी बहुत-बहुत बड़ी, विराट नयका नाउनि को वाजिब सम्मान दे पाऊंगा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;फोटो सौजन्य: &lt;a href="http://flickr.com/photos/8085722@N08/2791307045/"&gt;danny george&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-1864923739851190942?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/1864923739851190942/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=1864923739851190942&amp;isPopup=true" title="9 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1864923739851190942?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1864923739851190942?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/9Lr82MlKHTI/blog-post_11.html" title="नगई महरा पानी भरो, रोती है नयका नाउनि" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SUAi8rxpQWI/AAAAAAAACt8/7HEWq_12Sog/s72-c/2791307045_1d34787007_m.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">9</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/12/blog-post_11.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D08ARn84cCp7ImA9WxRaEEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-4314421224085096415</id><published>2008-12-10T06:15:00.003+05:30</published><updated>2008-12-11T22:47:27.138+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-12-11T22:47:27.138+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अंदर की दुनिया" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लॉगिंग" /><title>अजी हां, मारे गए गुलफाम</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/ST69L2m_i2I/AAAAAAAACts/P49D5_RW2AE/s1600-h/3038066893_1bd18d7e85_m.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5277863824660073314" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 180px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/ST69L2m_i2I/AAAAAAAACts/P49D5_RW2AE/s320/3038066893_1bd18d7e85_m.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;ब्लॉग की दुनिया से वनवास के इस दौर में रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम और उस पर बनी फिल्म तीसरी कसम का वह अंश बराबर याद आ रहा है जहां कहानी का नायक हीरामन महुआ घटवारिन की कहानी सुनाता है। जिस तरह महुआ घटवारिन को सौदागर उठा ले गया था, वही हालत मुझे अपनी हो गई लगती है। एक मीडिया ग्रुप ने चंद हजार रुपए ज्यादा देकर मुझे उस दुनिया से छीन लिया है जहां मैं चहकता था, लहकता था, बहकता था। लिखना तो छोड़िए, देख भी नहीं पाता कि हिंदी ब्लॉग की दुनिया में चल क्या रहा है। नहीं पता कि समीर भाई कितने सक्रिय है, ज्ञानदत्त जी के मन की हलचल क्या है, कोलकाता वाले बालकिशन क्या कर रहे हैं, कोई टिप्पणियों में समीरलाल को फतेह करने की मुहिम पर निकला कि नहीं? मुंबई में रहते हुए भी न अजदक, न निर्मल आनंद, न ठुमरी और न ही विनय-पत्रिका का हाल मिल पाता है। हां, गाहे-बगाहे विस्फोट की झलक जरूर देख लेता हूं क्योंकि यकीन है कि वहां कोई विचारोत्तेजक बहस चल रही होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या करूं? लिखना भी चाहता हूं और पढ़ना भी। लेकिन नौकरी के चक्कर में फुरसत ही नहीं मिल रही। पहले अपना हफ्ता दो दिन का और काम का हफ्ता पांच दिन का था। अब अपना हफ्ता एक दिन का और काम का हफ्ता छह दिन का हो गया है। अपने हिस्से के एक दिन में हाईस्कूल की बोर्ड परीक्षा की तैयारी में लगी बेटी को पढ़ाना पड़ता है। फिर, क्योंकि काम सीखने और सिखाने का है, टीम को बनाने और निखारने का है तो दिन में कम से कम 10 घंटे देने पड़ते हैं। कभी-कभी तो 12 घंटे चाकरी में निकल जाते हैं। आने-जाने के दो घंटे ऊपर से। सुबह उठते ही आर्थिक घटनाक्रमों की थाह लेने का सिलसिला शुरू हो जाता है जो सोते वक्त तक जारी रहता है। सपने में भी रिजर्व बैंक के किसी सर्कुलर का जोड़-घटाना, सेबी की किसी पहल की पड़ताल या बैंकों के किसी कदम की ताल गूंजती रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन को यह समझाकर तसल्ली देता हूं कि आर्थिक और वित्तीय जगत में गहरे पैठकर थाह ले रहा हूं। बीमारी चरम पर है तो सारे रहस्य को तार-तार करने का यही मौका है। इसी से वह समझ हासिल होगी कि इसे बदला कैसा जाए। अब मैं कोई वामपंथी विचारक या लिख्खाड़ तो हूं नहीं जिसके पास सारे जवाब तैयार रहते हैं और जो सवालों को आमंत्रित करता फिरता है। न ही मैं अपने रुपेश श्रीवास्तव की तरह हूं कि नब्ज पर हाथ रखते ही जिद्दी से जिद्दी बीमारी का निदान कर दूं। तो, कोशिश में लगा हूं कि कॉरपोरेट जगत से लेकर बैंकिंग की दुनिया की अद्यतन समझ हासिल कर सकूं। उसी हिसाब से अपने अखबार बिजनेस भास्कर में लिखता भी हूं। इन रिपोर्टों को ब्लॉग पर डाल नहीं सकता क्योंकि ऑफिस में विंडोज एक्सपी होते हुए भी उस पर यूनिकोड नहीं चढ़ा पा रहा हूं। कई बार आईटी विभाग की मदद ली, लेकिन कामयाबी नहीं मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काम के दौरान द्वंद्व, संघर्ष और टकराव की स्थितियां भी आती हैं। लेकिन अपने ही लेख कण-कण में संघर्ष की याद कर तनावमुक्त हो जाता हूं। दोस्तों! नई-नई अनुभूतियों और संवेदनाओं का आना पहले की तरह अनवरत जारी है। बस, ब्लॉग पर दर्ज कर आप लोगों का सानिध्य नहीं ले पा रहा हूं। लेकिन यह स्थिति स्थाई नहीं है। यही बात आपसे ज्यादा खुद को जताने के लिए आज जिद करके लिखने बैठ गया। न लिख पाने की सफाई पूरी हुई। आगे से कोई गिला-शिकवा नहीं। ठोस बातें लिखूंगा, जिससे मेरी और आपकी दुनिया थोड़ी ज्यादा धवल और विस्तृत हो सके।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#990000;"&gt;&lt;strong&gt;फोटो सौजन्य: &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://flickr.com/photos/mpaoletti/3038066893/"&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#990000;"&gt;&lt;strong&gt;m.paoletti&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-4314421224085096415?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/4314421224085096415/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=4314421224085096415&amp;isPopup=true" title="14 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/4314421224085096415?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/4314421224085096415?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/0bfyQqe2-ek/blog-post.html" title="अजी हां, मारे गए गुलफाम" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/ST69L2m_i2I/AAAAAAAACts/P49D5_RW2AE/s72-c/3038066893_1bd18d7e85_m.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/12/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEEARXw9eSp7ImA9WxRWEkw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-873058305028915855</id><published>2008-10-28T23:22:00.002+05:30</published><updated>2008-10-28T23:27:24.261+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-10-28T23:27:24.261+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अंतर्मन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अंदर की दुनिया" /><title>कुछ जानते हैं तो कितना कुछ नहीं जानते हम</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SQdSFYwF7DI/AAAAAAAACtk/CkpDXH90g_U/s1600-h/COSMIC%20DIYA.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5262264942102703154" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 177px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SQdSFYwF7DI/AAAAAAAACtk/CkpDXH90g_U/s200/COSMIC%2520DIYA.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;चोर से लेकर जुआरी तक दीवाली जगाते हैं तो लिखने का ‘धंधा’ करनेवाले हम कैसे पीछे रह सकते हैं!! पूरे दो हफ्ते हो गए, कुछ नहीं लिखा। लेकिन आज एक नई शुरुआत का दिन है, विक्रम संवत् 2065 की शुरुआत की बेला है तो लिखना ज़रूरी है। लेकिन लिखने के लिए जानना ज़रूरी है और मैं शायद अब भी जानने के मामले में सिफर के काफी करीब हूं। लोग कहते हैं कि मैं आर्थिक मामलों की कायदे की समझ रखता हूं। लेकिन हिंदी के एक नए बिजनेस अखबार में मुंबई ब्यूरो प्रमुख का काम संभाला तब पता चला कि अर्थ के बारे में अभी तक कितना कम जानता हूं मैं। फिर यह सोचकर तसल्ली हुई कि लेहमान ब्रदर्स से लेकर एआईजी के लिए फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट तैयार करनेवाले लोग भी इतना नहीं जानते थे कि वित्तीय संकट को पास फटकने से कैसे रोका जा सकता है। खैर, उन लोगों जैसी जटिल समझ हासिल करने के लिए मुझे एवरेस्ट की फतेह जैसा उपक्रम करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात और बता दूं कि साढ़े पांच साल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद प्रिंट में वापस लौटने पर मुझे लगा, जैसे कोई मछली सूखे किनारे से उछलकर दोबारा पानी में पहुंच गई हो। आपको अगर गांव का अनुभव होगा तो ज़रूर जानते होंगे कि तालाब के पानी में छिछली खिलाना क्या होता है। हाथ तिरछा करके फेंका गया खपड़ा या पतले पत्थर का टुकड़ा सतह को छूता-छूता उड़ा चला जाता है, कहीं गहरे नहीं उतरता। मुझे लगता है कि आज हमारी टेलिविजन न्यूज़ में छिछली खिलाने जैसा ही काम हो रहा है। पूरी शिफ्ट में आप छिछली खिलाते रहते हैं। पारी खत्म कर जब घर लौटते हैं तो लगता है न कुछ किया, न कुछ पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे कोई भिखारी किसी स्टेशन की सीढियों पर दस घंटे बैठकर सौ-दो सौ कमा लेता है, वैसे ही हम हफ्ते में पांच दिन दस-दस घंटे की चाकरी कर महीने में 70-80 हज़ार कमा लेते हैं। लेकिन इस काम से पैसे के अलावा हमें कुछ नहीं मिलता। न बदलते जमाने की समझ, न राजनीति या अर्थनीति की समझ। न अपनी समझ, न परायों की समझ। सत्ता की लिप्सा में डूबे चंद लोग अपना हिसाब-किताब लगाकर आपको सेट करते रहते हैं और आप उनकी फौज के घुघ्घू या सियार बन गए तो ठीक है, नहीं तो बस समय काटते रहिए, ऊर्जा-विहीन होते रहिए, दिन-ब-दिन चुकते चले जाइए। लेकिन मुझे लगता है कि न तो हम इतने फालतू हैं और न ही हमारे पास इतना फालतू समय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, इतना ज़रूर है कि आज मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सत्ता समीकरण का अनिवार्य हिस्सा बन गया है तो जिन्हें इन समीकरणों से खेलने का मौका मिला है और जिन्हें इस खेल का हुनर आता है उनके लिए यहां मौजा ही मौजा है। बाकी सब तो फुरसत मिलने ही इमारत के स्मोकिंग एरिया में छल्ले उड़ाने चले जाते हैं। कल के चंद विद्रोहियों को मैंने इस हालत में देखा है। और, उनकी यह हालत देखकर मुझे लगा कि मैं इस हश्र को कतई प्राप्त नहीं हो सकता। अंत में मैं वे पंक्तियां पेश करना चाहता हूं जो अपने ताज़ा इस्तीफे में मैंने लिखी थीं...&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;The moment you feel stagnant, the moment you feel that you are becoming redundant, immediately you should say, quit. That’s why I support euthanasia. Always new challenges are waiting for you somewhere outside.&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/blockquote&gt;क्या करूं, अपने यहां इस्तीफे अब भी अंग्रेज़ी में लिखने का चलन है। वैसे, आज का लिखा यह सारा कुछ एकालाप ही है। लेकिन अक्सर लगता है कि अपने से संवाद बनाने की कोशिश में बहुतों से संवाद बन जाता है क्योंकि एक की हद टूटकर कब अनेक से मिल जाती है, पता ही नहीं चलता। इसीलिए कभी-कभी लगता है कि मैं अनाम ही रहता तो अच्छा रहता।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-873058305028915855?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/873058305028915855/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=873058305028915855&amp;isPopup=true" title="21 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/873058305028915855?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/873058305028915855?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/oUki2e11Xnk/blog-post_28.html" title="कुछ जानते हैं तो कितना कुछ नहीं जानते हम" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SQdSFYwF7DI/AAAAAAAACtk/CkpDXH90g_U/s72-c/COSMIC%2520DIYA.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">21</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/10/blog-post_28.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0EASXc9eyp7ImA9WxRQGUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-3192795821202954540</id><published>2008-10-14T21:22:00.000+05:30</published><updated>2008-10-14T21:24:08.963+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-10-14T21:24:08.963+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ताकि सनद रहे" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गीली मिट्टी की छाप" /><title>अपराध की राह पर हैं लोग मेरे गांव के</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SPTAgh73QHI/AAAAAAAAB6Y/xQMclBUJGSo/s1600-h/1403549156_da27e083e3_m.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5257038330146013298" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SPTAgh73QHI/AAAAAAAAB6Y/xQMclBUJGSo/s320/1403549156_da27e083e3_m.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;इधर कुछ दिनों से अपने गांव आया हुआ हूं। करीब छह साल बाद आया हूं तो सब कुछ बदला-बदला सा लग रहा है। लेकिन सबसे चौंकानेवाली बात यह पता लगी कि लखनऊ से लेकर बलिया तक पूर्वी उत्तर प्रदेश का शायद ही कोई ऐसा गांव होगा जिसके कम से कम दो-तीन नौजवान जेल में न बंद हों। इनमें से किसी पर अपहरण का इल्जाम है, किसी पर हत्या का तो किसी पर राहजनी का। बलात्कार जैसे जघन्य आरोप इन पर नहीं हैं। ये भी चौंकानेवाली बात है कि जेल गए ज्यादातर नौजवान सवर्ण जातियों के हैं। आसानी से पैसा कमाने की चाह ने उन्हें अपराध की राह पर धकेल दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे गांव के पास के एक रिटायर्ड प्रिसिंपल साहब हैं जो कभी कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं। पहले उनका बेटा अपहरण और हत्या के मामले में रंगेहाथों पकड़ा गया। वह अभी जेल में ही था कि घरवालों ने उसके छोटे भाई को मेरठ में पढ़ाई करने के लिए भेज दिया। कुछ ही दिन बाद उसने एक क्वालिस गाड़ी को ड्राइवर समेत अगवा किया और फिर ड्राइवर को मार कर फेंक दिया। लेकिन बदकिस्मती से घर आते वक्त शक के आधार पर पुलिस ने पकड़ लिया तो वह भी सलाखों के पीछे पहुंच गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो दिन में ही अपने इलाके के ऐसे तमाम किस्से सुनकर मेरा माथा भन्ना गया। समाजशास्त्री होता तो इसकी वजह बता देता। लेकिन नहीं पता, असली वजह या वजहें क्या हैं। सवर्ण लोग इसके लिए जाति-आरक्षण की व्यवस्था को दोषी मानते हैं। उनका कहना है कि पिछड़ी जाति या अनसूचित जाति के नौजवानों को किसी न किसी तरह, कोई न कोई नौकरी मिल जाती है। लेकिन सवर्ण किसान परिवार का युवक बीए, एमए या पीएचडी करने के बाद नौकरी की आस अगोरता रह जाता है। ऊपर से पुरानी ठसक उसे छोटा-मोटा काम करने नहीं देती। ऐसे में उसके पैर आसानी से अपराध की तरफ मुड़ जा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर मैं गहराई से सोचकर कभी विस्तार से लिखूंगा। अभी तो मेरे दिमाग में बल्ली सिंह चीमा की कविता की लाइनें गूंज रही हैं कि ... अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के। इस कविता में चीमा ने क्या-क्या बातें कही थी कि कफन बांधे हैं सिरों पर हाथ में तलवार है, ढूंढने निकले हैं दुश्मन लोग मेरे गांव के। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि वो दुश्मन कहां है और कौन है, जिन्होंने मेरे गांवों की हालत ऐसी बना दी है कि हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा और वीरानगी ही नज़र आ रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-3192795821202954540?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/3192795821202954540/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=3192795821202954540&amp;isPopup=true" title="14 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/3192795821202954540?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/3192795821202954540?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/o1we9Dt7dcE/blog-post_14.html" title="अपराध की राह पर हैं लोग मेरे गांव के" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SPTAgh73QHI/AAAAAAAAB6Y/xQMclBUJGSo/s72-c/1403549156_da27e083e3_m.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/10/blog-post_14.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkUMRXgycSp7ImA9WxRQEE8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-1594285606109478492</id><published>2008-10-03T15:32:00.002+05:30</published><updated>2008-10-03T15:34:44.699+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-10-03T15:34:44.699+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ताकि सनद रहे" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हानि-लाभ" /><title>पाखंड का प्रतिफल है अमेरिका पर घहराती ये मंदी</title><content type="html">&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;जोसेफ &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://josephstiglitz.com/"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;स्टिग्लिट्ज़ &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;साल 2001 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीत चुके हैं। इस समय कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। कुछ दिनों पहले &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.guardian.co.uk/commentisfree/2008/sep/16/economics.wallstreet"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;गार्डियन अखबार में छपे लेख &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;में उन्होंने अमेरिका में छाए मौजूदा आर्थिक संकट को पाखंड के टूटने का नतीजा बताया है। इसमें उन्होंने और भी कई बड़ी दिलचस्प बातें कही हैं। इन दिनों कुछ फालतू कामों में फंसा हूं तो अपना कुछ लिखने के बजाय जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ का यह लेख प्रस्तुत कर रहा हूं। &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;मुलाहिज़ा फरमाइए...&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SOXtaa8fGvI/AAAAAAAAB6Q/2N30vrwFwco/s1600-h/2208624047_3c025a5e57_m.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5252865578562951922" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SOXtaa8fGvI/AAAAAAAAB6Q/2N30vrwFwco/s320/2208624047_3c025a5e57_m.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;ताश के महल ढह रहे हैं। आर्थिक संकट ऐसा कि इसकी तुलना 1929 की महामंदी से की जा रही है। लेकिन असल में यह संकट वित्तीय संस्थाओं की परले दर्जे की बेईमानी और नीतियां बनानेवालों की अक्षमता का नतीजा है। हुआ यह है कि हम अजीब तरह के पाखंड के आदी हो गए हैं। किसी तरह के सरकारी नियंत्रण की बात होती है तो बैंक हल्ला मचाने लगते हैं, एकाधिकार बढ़ाने के खिलाफ उठाए गए कदमों का विरोध करते हैं, लेकिन हड़ताल होने पर फौरन सरकारी दखल की मांग करने लगते हैं। आज भी वो पुकार लगा रहे हैं कि उन्हें संकट से उबारा जाए क्योंकि वे इतने बड़े और महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें डूबने नहीं दिया जा सकता!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ा सवाल हमेशा इसी व्यवस्थागत जोखिम के इर्दगिर्द मंडराता रहा है कि किसी संस्था का धसकना पूरी वित्तीय प्रणाली को किस हद तक बरबाद कर सकता है? दिक्कत यह है कि अमेरिका का वित्तीय तंत्र व्यवस्थागत जोखिम को फटाक से पलीता बना देता है। इसका उदाहरण है मेक्सिको का 1994 का वित्तीय संकट। लेकिन वह अपने कर्मों की तरफ नहीं देखता। अमेरिकी वित्त मंत्री हेनरी पॉलसन ने Fannie Mae and Freddie Mac के सरकारी उद्धार को तो जायज बता डाला, लेकिन लेहमान ब्रदर्स के डूबने में उन्हें पर्याप्त व्यवस्थागत जोखिम नहीं नज़र आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौजूदा (अमेरिकी) आर्थिक संकट भरोसे के भयानक रूप से भसकने का प्रतिफल है। बैंक अपने कर्जों और धंधे को लेकर एक-दूसरे से भारी दांव लगा रहे थे। परिसंपत्तियों के गिरते मूल्य को छिपाने और जोखिम को टालने के लिए बेहद जटिल सौदों का सहारा ले रहे थे। ये ऐसा खेल है जिसमें कुछ लोग जीतते हैं तो कुछ हारते हैं। लेकिन इसमें कर्ज देनेवाले बैंक और उनके कर्ज़ों का जोखिम उठाने के धंधे में लगी मॉर्टगेज कंपनियां ही नहीं, आम लोग भी शामिल हैं। इसलिए यह हिसाब-किताब बराबर करनेवाला खेल नहीं है। इसमें आम लोगों का भरोसा टूटता है। वे जब देखते हैं कि वित्तीय प्रणाली से धुआं उठ रहा है तो हिसाब-किताब ऋणात्मक हो जाता है, पूरा बाज़ार धराशाई हो जाता है और नुकसान हर किसी को उठाना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, वित्तीय बाज़ार भरोसे पर टिके होते हैं और वही भरोसा अब टूट चुका है। लेहमान ब्रदर्स का ढहना इस भरोसे के तलहटी पर पहुंच जाने का द्योतक है और ये सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। इस भरोसे का ताल्लुक बैंकों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक संदर्भ में देखें तो आज अमेरिकी नीति-नियामकों के ऊपर लोगों का भरोसा डगमगा गया है। जुलाई में जी-8 की बैठक में अमेरिका ने ढांढस बंधाया था कि सब कुछ अब ठीक हो रहा है। लेकिन हाल की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि ऐसा कहना महज छलावा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर हम किस हद तक इस संकट की तुलना 1929 की महामंदी से कर सकते हैं? ज्यादातर अर्थशास्त्री मानते हैं कि हमारे पास वो मौद्रिक व राजकोषीय उपाय और समझ है जिनसे हम संकट को उस हद तक पहुंचने से रोक सकते हैं। लेकिन आईएमएफ और अमेरिकी वित्त मंत्रालय समेत दुनिया के तमाम देशों के केंद्रीय बैंकों और वित्त मंत्रियों के ऐसे ही बचाव ‘उपायों’ ने इंडोनेशिया में 1998 का आर्थिक भूचाल पैदा कर दिया था। फिलहाल बुश प्रशासन ने इराक युद्ध से लेकर कैट्रीना चक्रवात का जैसा सामना किया है, उससे तो यही लगता है कि वो मौजूदा आर्थिक संकट को यकीनन मंदी के हश्र तक पहुंचाने का पूरी ‘काबिलियत’ रखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिका की वित्तीय व्यवस्था न तो जोखिम को साध सकी और न ही पूंजी का सही नियोजन कर सकी। ऐसे तरीके निकाले जा सकते था कि लोगबाग ब्याज दरों के बढ़ने और कीमतों के गिरने के बावजूद कर्ज पर लिए गए अपने घरों में बने रहते। लेकिन अपने जोखिम को बांटने के चक्कर में पूरा उद्योग एक दुष्चक्र पैदा करता गया। यहां तक कि अमेरिका की मॉर्टगेज कंपनियों ने अपना जहरीला जोखिम बाकी दुनिया को एक्सपोर्ट कर दिया। यह सब कुछ नई-नई तजबीज़ों को आजमाने के नाम पर किया गया। लेकिन इन तजबीज़ों ने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाय उसका भठ्ठा बिठा दिया। और, अब उनके किए की कीमत चुका रहे हैं हम जैसे लोग जिन्होंने घर खरीदे थे, जो मजदूर है, निवेशक है और करदाता हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-1594285606109478492?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/1594285606109478492/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=1594285606109478492&amp;isPopup=true" title="14 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1594285606109478492?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1594285606109478492?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/QadIPDhHixE/blog-post.html" title="पाखंड का प्रतिफल है अमेरिका पर घहराती ये मंदी" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SOXtaa8fGvI/AAAAAAAAB6Q/2N30vrwFwco/s72-c/2208624047_3c025a5e57_m.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/10/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEAAQngzeip7ImA9WxRRFUo.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-1449352929719143759</id><published>2008-09-28T08:15:00.001+05:30</published><updated>2008-09-28T09:02:23.682+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-09-28T09:02:23.682+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शहीद-ए-आज़म" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अंदर की दुनिया" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राष्ट्रभक्त की डायरी" /><title>जन्मदिन एक है तो क्या भगत सिंह बन जाओगे?</title><content type="html">&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5250763448194111954" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SN51iVE3GdI/AAAAAAAAB6I/n0dPAc5qjUw/s320/blogmeetanil.gif" border="0" /&gt;सरकार को &lt;a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4856885/"&gt;भले ही न पता हो&lt;/a&gt; कि शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का जन्मदिन 27 सितंबर है या 28 सितंबर, लेकिन मेरे बाबूजी को यकीन है 28 सितंबर ही भगत सिंह का असली जन्मदिन है। मुझे इसका पता तब चला जब वे सालों तक बार-बार मुझे यही उलाहना देते रहे कि जन्मदिन एक है तो क्या भगत सिंह बन जाओगे। जी हां, संयोग से मेरा भी जन्म आज के दिन यानी 28 सितंबर को हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीएससी करने के दौरान देश-दुनिया की हवा लगी तो मन में धुन सवार हो गई कि कुछ ऐसा करना है जिससे पर्वत-सी बढ़ गई पीर पिघल सके। संगी-साथियों ने ज्ञान कराया कि गोरे अंग्रेज़ चले गए, मगर उनकी जगह आ गए हैं काले अंग्रेज़। भगत सिंह का सपना अब भी अधूरा है। फिर तो इरादा कर लिया कि सिस्टम का पुरजा नहीं बनना है, कुछ अलग करना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अम्मा को बताया, समझाया। अम्मा मान गईं। लेकिन जो बाबूजी हमेशा कहावत सुनाते थे कि लीक-लीक कायर चलैं, लीकहि चलैं कपूत, अव, लीक छोड़ि तीनों चलैं शायर सिंह सपूत... जो बाबूजी मुझे ऐसा ही सपूत बनाना चाहते थे, वही बाबूजी मेरे इरादों का पता चलते ही भड़क गए। बोले तो करना क्या है? मैंने कहा – फकीरी कर लूंगा। बोले तो घर-परिवार कैसे चलाओगे? मैंने कहा, जब मैं सबके लिए काम करूंगा तो सभी मुझे अपना लेंगे, मैं सबके परिवार का हिस्सा बन जाऊंगा। मैंने भगत सिंह का किस्सा सुनाया, उनकी बातें बताईं तो बाबूजी ने कहा कि वो तब की बात थी। आज देश आज़ाद हो चुका है और भगत सिंह बनने की कोई ज़रूरत नहीं है। बाबूजी तब ऐसा बोल रहे थे जब आम घरों की तरह मेरे भी घर की दीवार पर भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाषचंद्र बोस जैसे राष्ट्रभक्तों की तस्वीरों वाला कैलेंडर लटका रहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे समझ में आ गया कि बाबूजी भी उसी आम भारतीय सोच के वाहक हैं जिसमें हर कोई चाहता है कि भगत सिंह अगर हों तो उसके घर में नहीं, पड़ोसी के घर में हों। खैर, अरसा बीत चुका है। मुझे नहीं पता कि बाबूजी सही थे या मेरा युवा जुनून। मुझे अफसोस है तो बस इस बात का कि मैं भरसक कोशिश करने के बावजूद भगत सिंह की बताई राह पर जीवन-पर्यंत नहीं चल सका। आठ-दस साल चलने के बाद भ्रमों के जाल से टकरा कर मोहभंग का शिकार हो गया। फकीरी छोड़कर गृहस्थ बन गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आज भी मन में कसक उठती है और लगता है कि काश! कहीं से ऐसी ज्योति दिख जाती कि डंके की चोट पर कहा जा सकता – यूरेका, यूरेका... यही है हम सबकी मुक्ति का रास्ता, जन-जन की मुक्ति का मार्ग, इसी राह पर चलकर हम शहीदों के सपनों को साकार कर सकते हैं, अपने प्यारे भारतवर्ष को स्वावलंबी और दुनिया का महानतम देश बना सकते हैं। अपने हर जन्मदिन पर मुझे ये बातें परेशान कर देती हैं क्योंकि बरबस मुझे याद आ जाता है कि आज महान शहीद भगत सिंह का भी जन्मदिन है और वे स्वर्ग में कहीं बैठे अधूरे कामों को याद कर रहे होंगे। बाबूजी ने तो अब कुछ कहना बंद कर दिया है। जब से नौकरी पकड़ी है, बीवी-बच्चों को संभाला है, उन्हें लगता है कि ‘बालक’ का दिमाग अब ठिकाने आ गया है। लेकिन उन्हें नहीं पता कि मेरे दिमाग का केमिकल लोचा अभी तक गया नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-1449352929719143759?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/1449352929719143759/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=1449352929719143759&amp;isPopup=true" title="28 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1449352929719143759?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1449352929719143759?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/l0w8RLCP8w0/blog-post_28.html" title="जन्मदिन एक है तो क्या भगत सिंह बन जाओगे?" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SN51iVE3GdI/AAAAAAAAB6I/n0dPAc5qjUw/s72-c/blogmeetanil.gif" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">28</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/09/blog-post_28.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkcNR38_eip7ImA9WxRRFEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-6618188758455916521</id><published>2008-09-27T09:05:00.004+05:30</published><updated>2008-09-27T09:31:36.142+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-09-27T09:31:36.142+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अंदर की दुनिया" /><title>मियां, तुम होते कौन हो!!!</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SN2puJHqENI/AAAAAAAAB6A/4rCD_i_DvHY/s1600-h/1358852723_a76557bd88_m.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5250539350770979026" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SN2puJHqENI/AAAAAAAAB6A/4rCD_i_DvHY/s320/1358852723_a76557bd88_m.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;यह कहानी हमारे जैसे एक आम हिंदुस्तानी की है जो अपनी पहचान को लेकर परेशान है। इतना कि धर्म तक बदल लेता है। कहानी लिखी तो गई थी करीब सवा साल पहले। लेकिन आज हमारे मुखर समाज में जिस तरह का धुव्रीकरण हो रहा है, उसमें धूमिल के शब्दों में कहूं तो जिसकी पूंछ उठाओ, मादा निकलता है, प्यारे-से तेवरों वाला अच्छा-खासा आदमी चौदह सौ सालों की गुलामी की बात करने लगता है, उसका आत्मसम्मान, उसकी ऊर्जा, उसकी राष्ट्रभक्ति उसे उठाकर किसी खेमे में बैठा देती है, तब मुझे बड़ी सांघातिक पीड़ा होती है। इसीलिए आज यह कहानी फिर से पेश कर रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे मैने हंस में राजेंद्र यादव नाम के कथाकार-साहित्यकार संपादक के पास भी भेजा था। लेकिन पारखी-जौहरी बड़े लोग हैं, ठेका चलाते हैं तो परवाह ही नहीं की। हां, मैं शारजाह में रहनेवाली &lt;a href="http://hi.literature.wikia.com/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A8"&gt;पूर्णिमा वर्मन जी&lt;/a&gt; का ज़रूर शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जिन्होंने बिना किसी जान-पहचान या सिफारिश के मेरी यह कहानी &lt;a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/"&gt;अभिव्यक्ति &lt;/a&gt;में छाप दी। आप इसे अभिव्यक्ति की &lt;a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2007/mthkh/mthkh1.htm"&gt;साइट पर पूरा पढ़&lt;/a&gt; सकते हैं। साथ ही अपने ब्लॉग में इसे मैंने सात पोस्टों में लिखा था। उनके लिंक क्रमबद्ध रूप से दे रहा हूं। हर लिंक क्लिक करने पर आपको कहानी के उस अंश में ले जाएगा। हो सकता है, आप में से पुराने बंधुओं ने यह कहानी पढ़ी हो। लेकिन शायद बहुत से नए साथियों ने नहीं। उम्मीद है, यह कहानी आपको सोचने का कुछ मसाला ज़रूर दे जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;1. &lt;/strong&gt;&lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/07/blog-post_07.html"&gt;&lt;strong&gt;मतीन बन गया जतिन&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जतिन गांधी का न तो गांधी से कोई ताल्लुक है और न ही गुजरात से। वह तो कोलकाता के मशहूर सितारवादक उस्ताद अली मोहम्मद शेख का सबसे छोटा बेटा मतीन मोहम्मद शेख है। अभी कुछ ही दिनों पहले उसने अपना धर्म बदला है। फिर नाम तो बदलना ही था। ये सारा कुछ उसने किसी के कहने पर नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी से किया है। नाम जतिन रख लिया। उपनाम की समस्या थी तो उसे इंदिरा नेहरू और फिरोज खान की शादी का किस्सा याद आया तो गांधी उपनाम रखना काफ़ी मुनासिब लगा। वैसे, इसी दौरान उसे ये चौंकानेवाली बात भी पता लगी कि इंदिरा गांधी के बाबा मोतीलाल नेहरू के पिता मुसलमान थे, जिनका असली नाम ग़ियासुद्दीन गाज़ी था और उन्होंने ब्रिटिश सेना से बचने के लिए अपना नाम गंगाधर रख लिया था।...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;2. &lt;/strong&gt;&lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/07/blog-post_386.html"&gt;&lt;strong&gt;एक-दूजे में समाए थे पीपल और जामुन&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;3.&lt;/strong&gt;&lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/07/blog-post_5712.html"&gt;&lt;strong&gt; रात के तीसरे पहर रो उठा सितार&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;4. &lt;/strong&gt;&lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/07/blog-post_7003.html"&gt;&lt;strong&gt;सात-सात-सात, कहां कोई साथ&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;5.&lt;/strong&gt;&lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/07/blog-post_08.html"&gt;&lt;strong&gt; मियां तुम होते कौन हो&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;6. &lt;/strong&gt;&lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/07/blog-post_3096.html"&gt;&lt;strong&gt;कितने कच्चे हैं खून के रिश्ते&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;7. &lt;/strong&gt;&lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/07/blog-post_09.html"&gt;&lt;strong&gt;न कौओं की जमात, न हंसों का झुंड&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-6618188758455916521?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/6618188758455916521/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=6618188758455916521&amp;isPopup=true" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/6618188758455916521?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/6618188758455916521?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/vKczQMxYMHA/blog-post_27.html" title="मियां, तुम होते कौन हो!!!" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SN2puJHqENI/AAAAAAAAB6A/4rCD_i_DvHY/s72-c/1358852723_a76557bd88_m.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/09/blog-post_27.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkMFRHw5cSp7ImA9WxRRFE4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-968593042449838987.post-1200199321475231889</id><published>2008-09-26T17:15:00.003+05:30</published><updated>2008-09-26T18:36:55.229+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-09-26T18:36:55.229+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ताकि सनद रहे" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाहर का संसार" /><title>हिंदू कट्टरपंथ देश को जोड़ता नहीं, तोड़ता है: लोहिया</title><content type="html">&lt;span style="color:#000099;"&gt;बीजेपी अध्यक्ष &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.indianexpress.com/news/Shoot-anyone-who-waves-Pak-flag-in-Valley--Rajnath/365966"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;राजनाथ सिंह का कहना है&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; कि कश्मीर घाटी में जो भी पाकिस्तान का झंडा फहराए, उसे गोली मार दो। सुनने में यह ठकुरई अंदाज़ बड़ा अच्छा लगता है। लेकिन राजनाथ की इस ललकार में अलगाव का ऐसा बीज छिपा है जो अलगाववादियों से कहीं ज्यादा खतरनाक है। प्रसिद्ध विचारक और राजनेता राम मनोहर लोहिया ने जुलाई 1950 में हिंदू धर्म में कट्टरपंथ और उदारपंथ के संघर्ष पर एक लेख लिखा था, जिसे अफलातून भाई ने करीब डेढ़ साल पहले &lt;/span&gt;&lt;a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/03/12/lohiahindu-banam-hindu-2/"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;अपने ब्लॉग पर &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;हिंदू बनाम हिंदू &lt;/strong&gt;शीर्षक से छापा था। हाल ही में उन्होंने इसे अपनी &lt;/span&gt;&lt;a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2008/09/22/hindu_banam_hindu_lohia/"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;आवाज़ में भी&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; पेश किया है। उसी लेख के संपादित अंश पेश कर रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SNzLek2iXzI/AAAAAAAAB54/k56IvLxM5Os/s1600-h/ram-manohar2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5250294991756091186" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SNzLek2iXzI/AAAAAAAAB54/k56IvLxM5Os/s320/ram-manohar2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;आमतौर पर माना जाता है&lt;/strong&gt; कि सहिष्णुता हिन्दुओं का विशेष गुण है। यह गलत है सिवाय इसके कि खुला उत्पात अभी तक उसे पसन्द नहीं रहा। हिन्दू धर्म में कट्टरपंथी हमेशा प्रभुताशाली मत के अलावा अन्य मतों और विश्वासों का दमन करके एकरूपता कायम करने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन उन्हें कभी सफलता नहीं मिली। हिन्दू धर्म में सहिष्णुता की बुनियाद यह है कि अलग-अलग बातें भी अपनी जगह पर सही हो सकती हैं। वह मानता है कि अलग-अलग क्षेत्रों और वर्गों में अलग सिद्धान्त और चलन हो सकते हैं और उनकी बीच वह कोई फैसला करने को तैयार नहीं। उसमें सहिष्णुता का गुण इस विश्वास के कारण है कि किसी भी जिंदगी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, इस विश्वास के कारण कि अलग-अलग बातें गलत ही हों, यह जरूरी नहीं है, बल्कि वे सच्चाई को अलग-अलग ढंग से व्यक्त कर सकती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कट्टरपंथियों की कोशिशों के पीछे अक्सर शायद स्थायित्व और शक्ति की इच्छा थी। लेकिन उनके कामों के नतीजे हमेशा बहुत बुरे हुए। मैं भारतीय इतिहास का एक भी ऐसा काल नहीं जानता जिसमें कट्टरपंथी हिन्दू धर्म भारत में एकता या खुशहाली ला सका हो। जब भी भारत में एकता या खुशहाली आई, तो हमेशा वर्ण, स्त्री, सम्पत्ति, सहिष्णुता आदि के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म में उदारवादियों का प्रभाव अधिक था। हिन्दू धर्म में कट्टरपंथी जोश बढ़ने पर हमेशा देश सामाजिक और राजनीतिक दृष्टियों से टूटा है और भारतीय राष्ट्र में, राज्य और समुदाय के रूप में बिखराव आया है। मैं नहीं कह सकता कि ऐसे सभी काल, जिनमें देश टूट कर छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया, कट्टरपंथी प्रभुता के काल थे। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि देश में एकता तभी आई जब हिन्दू दिमाग पर उदार विचारों का प्रभाव था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक इतिहास में देश में एकता लाने की कई बड़ी कोशिशें असफल हुईं। ज्ञानेश्वर का उदार मत शिवाजी और प्रथम बाजीराव के काल में अपनी चोटी पर पहुंचा। लेकिन सफल होने के पहले ही पेशवाओं की कट्टरता में गिर गया। फिर गुरु नानक के उदार मत से शुरू होनेवाला आन्दोलन रणजीत सिंह के समय अपनी चोटी पर पहुंचा, लेकिन जल्द ही सिक्ख सरदारों के कट्टरपंथी झगड़ों में पतित हो गया। इन सब में भारतीय इतिहास के विद्यार्थी के लिए पढ़ने और समझने की बड़ी सामग्री है जैसे धार्मिक सन्तों और देश में एकता लाने की राजनीतिक कोशिशों के बीच कैसा निकट सम्बन्ध है या कि पतन के बीज कहां हैं, बिलकुल शुरू में या बाद की किसी गड़बड़ी में या कि इन समूहों द्वारा अपनी कट्टरपंथी सफलताओं को दुहराने की कोशिशों के पीछे क्या कारण हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केवल उदारता ही देश में एकता ला सकती है। हिन्दुस्तान बहुत बड़ा और पुराना देश है। मनुष्य की इच्छा के अलावा कोई शक्ति इसमें एकता नहीं ला सकती। कट्टरपंथी हिन्दुत्व अपने स्वभाव के कारण ही ऐसी इच्छा नहीं पैदा कर सकता। लेकिन उदार हिन्दुत्व कर सकता है, जैसा पहले कई बार कर चुका है। हिन्दू धर्म संकुचित दृष्टि से, राजनीतिक धर्म, सिद्धान्तों और संगठन का धर्म नहीं है। लेकिन राजनीतिक देश के इतिहास में एकता लाने की बड़ी कोशिशों को इससे प्रेरणा मिली है और उनका यह प्रमुख माध्यम रहा है। हिन्दू धर्म में उदारता और कट्टरता के महान युद्ध को देश की एकता और बिखराव की शक्तियों का संघर्ष भी कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदार और कट्टरपंथी हिन्दुत्व के महायुद्ध का बाहरी रूप आजकल यह हो गया है कि मुसलमानों के प्रति क्या रुख हो। लेकिन हम एक क्षण के लिए भी यह न भूलें कि यह बाहरी रूप है और बुनियादी झगड़े जो अभी तक हल नहीं हुए, कहीं अधिक निर्णायक हैं। अब तक हिन्दू धर्म के अन्दर कट्टर और उदार एक-दूसरे से जुड़े क्यों रहे और अभी तक उनके बीच कोई साफ और निर्णायक लड़ाई क्यों नहीं हुई, यह एक ऐसा विषय है जिस पर भारतीय इतिहास के विद्यार्थी खोज करें तो बड़ा लाभ हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक हिन्दुओं के दिमाग में वर्णभेद बिल्कुल ही खतम नहीं होते, या स्त्री को बिल्कुल पुरुष के बराबर ही नहीं माना जाता या सम्पत्ति और व्यवस्था के सम्बन्ध को पूरी तरह तोड़ा नहीं जाता, तब तक कट्टरता भारतीय इतिहास में अपना विनाशकारी काम करती रहेगी। अन्य धर्मों की तरह हिन्दू धर्म सिद्धान्तों और बंधे हुए नियमों का धर्म नहीं है बल्कि सामाजिक संगठन का एक ढंग है और यही कारण है कि उदारता और कट्टरता का युद्ध कभी समाप्ति तक नहीं लड़ा गया और ब्राह्मण-बनिया मिलकर सदियों से देश पर अच्छा या बुरा शासन करते आए हैं जिसमें कभी उदारवादी ऊपर रहते हैं कभी कट्टरपंथी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/968593042449838987-1200199321475231889?l=diaryofanindian.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://diaryofanindian.blogspot.com/feeds/1200199321475231889/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=968593042449838987&amp;postID=1200199321475231889&amp;isPopup=true" title="10 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1200199321475231889?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/968593042449838987/posts/default/1200199321475231889?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/hindustani/~3/zBmAKaTVShc/blog-post_26.html" title="हिंदू कट्टरपंथ देश को जोड़ता नहीं, तोड़ता है: लोहिया" /><author><name>अनिल रघुराज</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07237219200717715047</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="06424451542965949771" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_k1EAeWajj3k/SNzLek2iXzI/AAAAAAAAB54/k56IvLxM5Os/s72-c/ram-manohar2.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total><feedburner:origLink>http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/09/blog-post_26.html</feedburner:origLink></entry></feed>
