शनिवार, 17 अगस्त 2013

भगवद्गीता की राजनीति - नीति सही ना नीयत

फ़ल की इच्छा किए बगैर कर्म करने की सीख देने वाली भगवद्गीता का पाठ बच्चों को पढ़ाने की तैयारी में जुटी प्रदेश सरकार ने अपने इस राजनीतिक कर्म के "फ़ल" का अँदाज़ा लगते ही आनन-फ़ानन में कदम पीछे खींच लिए हैं। मदरसों में गीता पढ़ाने पर मचे बवाल के बाद रक्षात्मक मुद्रा में आई सरकार ने साफ किया कि जिन कक्षाओं की उर्दू पाठ्यपुस्तकों में इन पाठों को शामिल किया गया है, उनमें परीक्षा के आधार पर कक्षा में रोकने का प्रावधान नहीं है। फिर भी यदि किसी विद्यार्थी की रूचि इन पाठों को प़़ढने में नहीं है तो इन्हें वैकल्पिक माना जाएगा। वंदेमातरम और सूर्य नमस्कार के मुद्दे पर मुँह की खाने के बाद सरकार ने इसी तरह फ़ैसले पलटे थे। प्रदेश सरकार ने राज्य के मदरसों में भगवद्गीता पढ़ाने वाला अपना आदेश वापस ले लिया है। गौरतलब है कि सरकार के इस आदेश पर धार्मिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। कुछ संगठनों ने कोर्ट में भी जाने की चेतावनी दी थी।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इसे लेकर जो विवाद पैदा हुआ वह सही नहीं था। उन्होंने कहा कि जिस आदेश के कारण विवाद की स्थिति पैदा हुई उसे वापस लिया जाता है। शिवराज का कहना है कि सरकारी आदेश से कुछ गलतफहमी हो गई थी, जिसके बाद मदरसों में भी नए सत्र की किताबों में गीता के अध्याय जोड़ दिए गए।
राज्य सरकार ने एक जुलाई को जारी अधिसूचना के जरिए प्रदेश के मदरसों में भगवद्गीता पढ़ाने का आदेश जारी किया था। इस मामले के प्रकाश में आने के बाद मुस्लिम संगठनों सहित काँग्रेस ने भी इसका भारी विरोध किया और इसे दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया था। इस सबके बीच सत्ता की हैट्रिक लगाने की चाहत पाले बैठे मुख्यमंत्री इस फैसले के व्यापक विरोध से बुरी तरह परेशान थे। उन्होंने मुख्य सचिव और अन्य आला अफसरों से चर्चा करने के बाद विवादित फैसले को निरस्त करने के आदेश दिए। इसके बाद इसी अगस्त माह की एक तारीख को जारी अधिसूचना पाँच दिन बाद निरस्त कर दी गई। नए आदेश के बाद अब सिर्फ हिन्दी की किताबों में ही गीता का पाठ जारी रहेगा।
 गौरतलब है कि राज्य सरकार ने पाठ्यपुस्तक अधिनियम में संशोधन कर मदरसों के उर्दू पाठ्यक्रम में गीता की शिक्षा को अनिवार्य कर दिया था। इसके तहत कक्षा 1 और 2 की विशिष्ट उर्दू तथा विशिष्ट अँग्रेजी के साथ इसी शिक्षण सत्र से भगवद्गीता के अध्याय पढ़ाए जाना थे। राज्य शिक्षा केंद्र और एमपी मदरसा बोर्ड से संबद्ध सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए यह नियम अनिवार्य किया गया था। कक्षा 3 से 8 तक गीता के अध्याय सामान्य हिन्दी के पाठयक्रम में जोड़े जाने की बात कही गई।
राज्य सरकार के इस फैसले की खिलाफ़त में मध्य प्रदेश कैथोलिक काउंसिल, मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ और मध्य प्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच भी उतर आए थे। अल्पसंख्यक संगठनों ने चेतावनी दी थी कि फैसला वापस नहीं लिया गया तो वे सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाएँगे। उधर ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य आरिफ मसूद ने राज्यपाल रामनरेश यादव को सौंपे ज्ञापन में अधिसूचना निरस्त करने की माँग करते हुए कहा था कि एक धर्म की पुस्तक का पाठ पढ़ाया जाना संविधान के विपरीत है और मुस्लिम समाज इसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के रुप में देखता है।
मध्य प्रदेश ईसाई महासंघ के संयोजक आनंद ने कहा था, 'हम इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार कर सकते हैं। धार्मिक मामलों से सरकार को दूर रहना चाहिए, यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा है। सरकार गलत परंपरा की शुरुआत कर रही है।'
राज्य सरकार का तर्क है कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जनवरी, 2012 में स्कूलों में गीता-सार पढ़ाए जाने के शासन के निर्णय के विरूद्ध कैथोलिक बिशप कौंसिल की याचिका पर व्यवस्था दी कि गीता मूलतः भारतीय दर्शन की पुस्तक है, न कि भारत के धर्म पर।
सरकारी बयान के मुताबिक पाठ्य-पुस्तकों में गीता आधारित सामग्री का निर्णय नया नहीं है। वर्ष 2011-12 से गीता के व्यावहारिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित विभिन्न पाठ्य सामग्री, कक्षा 1 से 12 की भाषा की पुस्तकों में समाहित की गई है। ये पुस्तकें पिछले दो वर्षों से शासकीय शालाओं के साथ ही अनुदान प्राप्त मदरसों में प्रचलित हैं, जिसके संबंध में किसी प्रकार की आपत्ति सामने नहीं आई है।
 गीता के व्यवहारिक जीवन में उपयोगी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जो पाठ स्कूली पुस्तकों में जोड़े गए हैं, उन्हें धार्मिक या साम्प्रदायिक नजरिए से देखना गलत है। यह मूलतः नैतिक शिक्षा तथा जिसे भावनात्मक परिपक्वताओं का शिक्षण कहा जाता है, उसके अनुरूप की गई कार्रवाई है। सरकारी विज्ञप्ति कहती है कि उपरोक्त वस्तु-स्थिति के आधार पर यह कहना कि, पाठ्य-पुस्तकों में चुनावी या धार्मिक भावना से कोई पाठ शामिल किया गया है, पूर्णतः भ्रामक एवं गलत होगा।
 ऎसे में लाख टके का सवाल यही है कि निर्णय सही और नीयत साफ़ है, तो फ़िर विरोध की सुगबुगाहट शुरू होते ही कदम क्यों खींचे ? समूचे घटनाक्रम पर नज़र डालें तो पाएँगे कि शिवराज सिंह चौहान नरेन्द्र मोदी से आगे निकलने की होड़ में आए दिन "गोड़" फ़ुड़वाने पर आमादा हैं। देश में कराए तमाम सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक भले ही भाजपा के लिए अभी दिल्ली दूर हो , लेकिन खुद को सर्वमान्य और हर वर्ग में स्वीकार्य बनाने की जुगत भिड़ा रहे शिवराज आए दिन नए-नए शिगूफ़े छोड़ते रहते हैं।
 सेक्युलर छबि बनाने की गरज से रमज़ान के मुकद्दस महीने में मुख्यमंत्री निवास में रोज़ा इफ़्तारी करते हैं, वे मोदी को निपटाने और हिन्दू मतों को साधने के फ़ेर में टोपी तो पहनते हैं- मगर "केसरिया"। इसी तरह ईद की मुबारकबाद के मौके पर पहले तो रज़ा मुराद को आगे कर अपनी मुराद साधने की कोशिश की और जब विवाद बढ़ा तो मोदी की शान में कसीदे पढ़ने लगे। मज़ेदार बात तो यह है कि जो शख्स आठ साल से निर्बाध और एकछत्र राजकाज संभालने के बावजूद अब तक ना तो पद के अनुरूप गंभीरता पैदा कर सका हो और ना ही सूबे के मुखिया के तौर पर काबिलियत साबित कर सका हो, वो सीधे प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए प्रस्तुत है। शायद संत कबीर ने ऎसे ही किसी दौर की आहट को पढ़कर कहा होगा - "करम की गति न्यारी संतो, .................पंडित फ़िरत भिखारी।"
मुख्यमंत्री के हालिया फ़ैसले एक मर्तबा फ़िर साबित कर गए कि विरोध और दबाव का प्रतिरोध करने की सलाहियत उनमें रत्ती भर भी नहीं है। जब भी उनके फ़ैसलों पर सवाल उठे, जवाब देने की बजाय उन्होंने "खोल" में घुस जाना ही बेहतर समझा। वे किसी भी मुद्दे पर ज़्यादा वक्त कायम नहीं रह पाते और दबाव बढ़ने पर फ़ौरन से पेशतर हथियार डाल देते हैं। अँदरखाने पक्ष-विपक्ष के हर छोटे-बड़े नेताओं से डील कर भले ही शिवराज ने अपना कार्यकाल "स्वर्णिम" होने का मुगालता पाल लिया हो, हकीकतन इस स्वेच्छाचारिता ने प्रदेश के हर संवैधानिक पद और संस्थान की गरिमा को ध्वस्त कर दिया है।
अपना उल्लू सीधा करने के लिए कभी संघ से दूरी बनाने की कोशिश और ज़रूरत पड़ने पर  खुद को हिन्दुत्व का ध्वजवाहक बताने की चाहत में उनकी छबि निरंतर "लिजलिजीहोती चली जा रही है। वैसे शिवराज की एक कदम आगे चार कदम पीछे" की कार्यपद्धति ने उनकी नेतृत्व क्षमता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। सूबे के मुखिया के तौर पर वे किंकर्तव्यविमूढ़ ही नज़र आते रहे हैं। गीता पर पैदा हुए विवाद में मीडिया के काँधे पर सवार प्रधानमंत्री पद के स्वयंभू दावेदार ने हथियार डाल दिए।
हिन्दू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी को टक्कर देने की नीयत से किए गए फ़ैसले का विरोध ज़ोर पकड़ते ही हिन्दुत्व पर आगे बढ़ने के इरादे को उन्होंने पल भर में ही तिलाँजलि दे डाली। वैसे सूबे की जनता को भी अब गंभीरता से सोचना होगा। सत्ता में एक दशक का सफ़र तय के बाद भी जो दल अब तक सूबे के लिए एक परिपक्व नेतृत्व तैयार नहीं कर सका हो, क्या उसके हाथ में तीसरी बार काँग्रेस के निकम्मेपन के चलते सत्ता सौंपना उचित रहेगा।  

सोमवार, 8 जुलाई 2013

सीडी की सियासत....!


मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री रहे राघवजी भाई को चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली बीजेपी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अस्सीवीं सालगिरह के मौके पर पचपन साल की सेवा के बदले में पार्टी की तरफ़ से दिया गया यह तोहफ़ा राघवजी भाई के लिए वाकई यादगार रहेगा। यूँ तो प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर, अजय विश्नोई, ध्रुवनारायण सिंह समेत शिवराज मंत्रिमंडल के तमाम सदस्यों पर अनैतिक आचरण के आरोप लगते रहे हैं।लेकिन इससे पहले पार्टी ने कितने मामलों में सख्ती दिखाने की नज़ीर पेश की? फ़िर ऎसा भी नहीं है कि राघवजी पर इस तरह का आरोप पहली मर्तबा लगा हो। दो साल पहले भी अनैतिक यौनाचार के मामले में उन पर अँगुली उठी थी । तब भी सीडी की बात सामने आई थी लेकिन जल्दी ही मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया।

दरअसल यह नैतिक आचरण से ज्यादा सियासी मुद्दा है। भाजपा की अँदरुनी राजनीति के साथ ही पक्ष-प्रतिपक्ष के मिलीजुली "प्रदर्शन मुकाबले" के संकेत भी इस घटनाक्रम में साफ़ मिलते हैं। मध्यप्रदेश में पिछले सात सालों से जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसमें विपक्ष का अस्तित्व ही खत्म हो चुका है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह वही ज़ुबान बोलते हैं, जो सूबे के मुखिया को रास आए। काँग्रेस के नेता और कार्यकर्ता सत्ता में वापसी के लिए कोशिश करते हैं लेकिन अजय सिंह अपने बयानों या फ़िर अपने तौर तरीकों से इन प्रयासों में तुरंत ही पलीता लगा देते हैं ।

राघवजी के मामले में भी विशुध्द रूप से पटवा-सारंग गुट की सियासी शैली साफ़ झलकती है। इसी सियासी वंश परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब चेले ने भी ऎन चुनावों के पहले वही दाँव फ़ेंका है। प्रधानमंत्री पद की रेस में अपना नाम खुद ही आगे बढ़ाने की जुगत में लगे सूबे के मुखिया इन दिनों किसी और ही गुणा-भाग में लगे हैं। वे विदिशा से अपनी पत्नी को चुनाव लड़वा कर विधानसभा में पहुँचाने का इरादा रखते हैं। राघवजी के ५५ साल के राजनीतिक सफ़र को एक झटके में नगण्य कर दिया गया। लोकतंत्र की दुहाई देने वाली पार्टी ने आनन फ़ानन में बगैर जाँच किए जिस तरह से राघवजी को बर्खास्त किया, वह भी कई संकेत छोड़ता है।

इस पूरे घटनाक्रम के सूत्रधार के तौर पर शिवशंकर पटेरिया खुद सामने आए हैं । किसी जमाने में उमा भारती के खास रहे पटेरिया लम्बे वक्त से हाशिये पर हैं। वैसे वो मौके और वक्त की नज़ाकत के मुताबिक पाला बदलने में खासे माहिर हैं। इस सीडी कांड के बाद एकाएक सुर्खियों में आए पटेरिया "मुक्त कंठ" से जिस तरह "राग शिवराज" गा रहे हैं। नज़दीक आते चुनावों के मद्देनज़र उनकी उलट-बाँसी विधानसभा क्षेत्रों पर अपनी दावेदारी को लेकर प्रदेश भाजपा में मचे घमासान का मुज़ाहिरा भी करती है।

एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि हाल के दिनों में नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री और उनके परिवार पर सीधे और तीखे हमले किए थे। प्रदेश में परिवर्तन यात्राओं के दौरान अजय सिंह ने शिवराज सिह चौहान और उनकी पत्नी साधना सिंह पर कई आरोप लगाए और पत्र लिखकर जवाब भी माँगा। पावस सत्र के दौरान इस बार काँग्रेस एक बार फ़िर अविश्वास प्रस्ताव ला रही है। ऎसे में विपक्ष के आरोपों की धार को कुँद करने के लिए चला गया "अस्त्र" लगता है हमेशा की तरह निशाना पर लगा है। विपक्ष के वार की धा को भोथर करने में इसमें "फ़ूल छाप काँग्रेसियों" की भी भूमिका अहम है।

राघवजी के सीडी काँड के जरिए एक साथ कई निशाने साधे गए हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी के नाम पर सहमति जताने वाले संघ को भी इस बहाने अपनी ताकत का एहसास कराने की कोशिश की गई है। यानी इस समय सत्ता का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा है। 

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

बिकाऊ विपक्ष के कँधे पर सवार "विकास पुरुष"


मध्यप्रदेश मे राजनीतिक और पत्रकारीय धर्म से मुँह फ़ेर चुके लोगों का बोलबाला होने से चारों ओर "धूरधानी" मची हुई है। बिकाऊ विपक्ष और बज़रिये जनसंपर्क विभाग सत्ता की चौखट पर कलम गिरवी रख चुके पत्रकारों की बदौलत प्रदेश विकास के ग्राफ़ पर कुलाँचे मारता दिखाई दे रहा है। मगर हकीकत के आइने में सत्ता पक्ष के साथ गलबहियाँ करते विपक्ष और पत्रकारों के बदनुमा चेहरों को साफ़-साफ़ देखा जा सकता है। हाल ही में राजनीतिक चिंतक के.एन. गोविन्दाचार्य ने मध्यप्रदेश सरकार के बारे मे कहा था प्रदेश की भाजपा सरकार पूर्व शासित काँग्रेस की दिग्विजय सरकार से ज्यादा भ्रष्ट है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भ्रष्टाचार को रोकने में असफल साबित हुए हैं। गोविंदाचार्य ने कहा है कि इतना भ्रष्टाचार तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के जमाने में भी नहीं था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा मंत्रियों पर अँकुश नहीं रखने के कारण प्रदेश में भ्रष्टाचार में बेतहाशा वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार चलाने के लिए चौहान ने मंत्रियों को खुली छूट दे रखी है। उन्होंने कहा कि भाजपा के शासन में उद्योगपति और अधिकारी खुश हैं, जबकि किसान दुखी हैं।
गोविंदाचार्य की तस्दीक प्रदेश के हालात भी करते हैं। प्रदेश में काँग्रेस के बड़े नेता सत्ताधारी दल के साथ मिलकर जमकर फ़ायदा ले रहे हैं । नतीजतन विपक्ष का अँकुश पूरी तरह हट चुका है। जनसंपर्क विभाग ने सैकड़ों करोड़ के बजट के बूते कहीं विज्ञापनों के ज़रिए अखबार मालिकों, तो कहीं सीधे पत्रकारों को साध रखा है। जो पत्रकार सच बात कहने का " दुस्साहस " करते हैं, उन्हें सरकारी अधिमान्यता देने से भी इंकार कर दिया जाता है। उधर कई नौकरशाह सरकार के हमजोली बनकर हजारों करोड़ के आसामी बन चुके हैं। ये वो अधिकारी हैं, जो प्रदेश से कमाया धन दूसरे प्रदेशों की प्रॉपर्टी में निवेश कर रहे हैं और जिनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं।
दूसरी तरफ़ अवैध खनन और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले छोटे कर्मचारियों को शातिताना अँदाज़ में हमेशा के लिए खामोश किया जा रहा है। हाल ही में रतलाम में खनिज निेरीक्षक संजय भार्गव की सड़क हादसे में मौत हो गई। इससे पहले भोपाल से लगे बैरसिया के गाँव में पीडब्ल्यूडी के सब इंजीनियर रामेशवर प्रसाद चतुर्वेदी की भी संदिग्ध हालात में मौत हो गई। सरसरी तौर पर ये सामान्य हादसे लगते हैं। लेकिन इन मौतों को बड़े ही शातिराना तरीके से अँजाम तक पहुँचाया गया, जिससे "हत्या" को हादसा साबित किया जा सके। इन दोनों ही मामलों में मु्ख्यमंत्री निवास में सीधे धमक रखने वाले प्रदेश के एक बड़े ठेकेदार का नाम सामने आ रहा है। इसी तरह पिछले साल होली पर मुरैना में खनन माफ़ियाओं ने एक होनहार आईपीएस नरेन्द्र कुमार को मौत के घाट उतार दिया था। मगर हुआ क्या ?
जिस सीबीआई पर काँग्रेस के इशारे पर काम करने का आरोप लगता है, उसी ने एक अदने से आदमी को अपराधी बनाकर पेश कर दिया। आनन-फ़ानन में अदालती फ़ैसला भी हो गया। जिस तरह आरुषि-हेमराज मामले में सीबीआई ने कृष्णा, राजकुमार और प्रदीप मंडल को फ़ाँसी का फ़ँदा पहनाने की पूरी तैयारी कर ली थी । उसी तरह शहला मसूद हत्याकांड में रसूखदार लोगों को बचाने के लिए ज़ाहिदा और सबा जैसे लोगों को बिला वजह फ़ँसाया जा रहा है। फ़र्क है तो सिर्फ़ इतना कि दिल्ली की मीडिया कृष्णा और राजकुमार की बेगुनाही साबित करने के किए उठ खड़ी हुई थी। मगर प्रदेश में सम्मानों, प्रोजेक्टों, विज्ञापनों, सस्ते प्लाटों और इसी तरह के कई अन्य फ़ायदों के बोझ तले दबे कलमवीरों का ज़मीर क्या कभी जाग पाएगा।

बृहस्पतिवार, 30 अगस्त 2012

लोकतंत्र की दीमक


मध्यप्रदेश की राजनीति में इस वक्त वो सब हो रहा है , जो कभी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा । कल तक खुद को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार मानकर शिवराजसिंह चौहान के खिलाफ़ खेमेबंदी का झंडा उठाकर चलने वाले कैलाश विजयवर्गीय आज सरकार की झूठन समेट रहे हैं । चाहे वो मुरैना में हुई आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार की हत्या का मामला हो , महज़ सात सालों में अरबपति बने दिलीप सूर्यवंशी से मुख्यमंत्री के सीधे ताल्लुकात का मुद्दा हो या कोल ब्लॉक आवंटन मामले में शिवराज सिंह चौहान की भूमिका पर उठ रहे सवाल हों । मुख्यमंत्री मुँह में दही जमा कर बैठे हैं और कैलाश विजयवर्गीय उनकी पैरवी करते घूम रहे हैं । गोया कि सूबे के मुखिया बनने का ख्वाब हुआ हवा , अब तो आलम ये है कि कुर्सी बचाए रखने के लिए चौहान की चरणोदक पीने में भी गुरेज़ नहीं रहा ।

 रही सही कसर एमपीसीए के चुनाव में मिली करारी मात ने निकाल दी । धुआँधार बल्लेबाज़ी करते हुए माधवराव सिंधिया ने क्लीन स्वीप कर दिया । कैलाश विजयवर्गीय ने चुनाव जीतने के लिए लोकतंत्र के सभी हथकंडे अपनाए ,मगर वो भूल गए कि गली-कूचों में “भिया और भिडु “ तैयार करके विधायकी हासिल करना अलग बात है , भद्र और कुलीन समाज का खेल माने जाने वाले क्रिकेट की सत्ता पर कब्ज़ा जमाना और बात । 

इसी तरह देश के इतिहास में शायद ये पहला ही मौका होगा , जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दो सौ से ज़्यादा कार्यकर्ताओं के हुजूम ने इंदौर में भाजपा कार्यालय पर धावा बोल दिया । संघी मनोज परमार मामले के जाँच अधिकारी के एकाएक तबादले से नाराज़ थे । सूबे के मुखिया के खिलाफ़ जमकर नारेबाज़ी कर रहे इन कार्यकर्ताओं का आरोप था कि सरकार ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को प्रताड़ित कर रही है । इंदौर इन दिनों गैंगवार और माफ़िया की गिरफ़्त में फ़ँस कर कराह रहा है । मगर इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं । भाजपा समर्थक व्यापारी प्रशासन से गुँडाराज से छुटकारा दिलाने की गुहार लगा रहे हैं ।

प्रदेश के मुखिया हवाई सफ़र, विदेश भ्रमण, तीर्थाटन, देवदर्शन या फ़िर प्रदेश के रमणिक स्थलों पर परिवार के साथ सुस्ताने में व्यस्त रहते हैं । इन गतिविधियों से कभी कुछ वक्त मिल जाता है , तो मीडिया का चोंगा थाम कर देश-विदेश की हर छोटी-बड़ी घटना पर अपने “अनमोल वचन” प्रसारित करके उपस्थित दर्ज कराते रहते हैं । "मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थूकने" की प्रवृत्ति के पोषक मुख्यमंत्री प्रदेश की हर बड़ी घटना पर मुँह सिलकर बैठ जाते हैं । ऎसे मौके पर नरोत्तम मिश्र या कैलाश विजयवर्गीय को आगे कर दिया जाता है । लोग मायावती के प्रचार अभियान पर सरकारी खज़ाने के १२० करोड़ रुपए फ़ूँक दिए जाने पर गाल बजाते हैं । यदि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह की ब्रांडिंग पर जनसंपर्क, वन्या , खेल और तमाम अन्य महकमों के मद से लुटाए गए खज़ाने का अनुमान लाया जाए , तो ये किसी भी सूरत में ३५० करोड़ रुपए से कम नहीं बैठेगा ।

इसके अलावा यह भी एक दिलचस्प खबर है कि सूबे के मुखिया औसत हर रोज़ दो घंटे हवाई यात्रा में बिताते हैं । सब कुछ हवा में ही है, ज़मीन पर कुछ नहीं अगर है भी तो बस पोलपट्टी । यही नतीजा है कि भाजपा के ज़िला पदाधिकारी भी अपना सिर पीट रहे हैं । वे कहते हैं कि ज़िलों में ना सड़क है ना बिजली और ना ही पानी , बरसात में तो हालात बदतर हो चुके हैं , ऎसे में जनता को क्या जवाब दें ? उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे चुनाव में जनता के सामने क्या मुँह लेकर जाएँगे ? अधिकांश पदाधिकारी मानते हैं कि इन्हीं मुद्दों को लेकर दिग्विजय सिंह को सत्ता से उखाड़ फ़ेंकने वाली जनता अब भाजपा को सबक सिखाने का मूड बना रही है । मगर दिल्ली की चाँडाल – चौकड़ी को हफ़्ता पहुँचाकर अपनी कुर्सी बचाए रखने वालों का जनता के सुख-दुख से क्या सरोकार ?

आरएसएस के अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ  के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा भी प्रदेश सरकार की कारगुज़ारियों पर अँगुली उठाते रहे हैं । ये अलग बात है कि  भाजपा सरकार की मुखालफ़त की उन्हें भारी कीमत चुकाना पड़ी । सच बोलने की सज़ा के तौर पर उन्हें असंवैधानिक तरीके से पद से हटा दिया गया , करीब पंद्रह दिन जेल की सलाखों के पीछे फ़ेंका गया सो अलग । हाल ही में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले भोपाल में आयोजित अरविंद केजरीवाल के कार्यक्रम में पहुँचे श्री शर्मा ने प्रदेश सरकार को यूपीए सरकार से भी चार गुना ज़्यादा भ्रष्ट करार देकर सबको सकते में डाल दिया ।

 अपनी साफ़गोई के लिए पहचाने जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा जैसे लोगों को सत्ता का रोग मानते हैं । खून- पसीने से पार्टी को सींच कर यहाँ तक पहुँचाने वालों की कतार में शामिल रहे श्री शर्मा का कहना है कि संकट के समय ये लोग नहीं दिखेंगे, उस समय काम आयेंगे त्यागी और सिद्धांतनिष्ठ कार्यकर्ता । मगर उनकी इस नसीहत की आखिर ज़रुरत किसे है? अपना तो क्या चाचा के मामा के ताऊ के फ़ूफ़ा  तक की पुश्तों का इंतज़ाम कर चुके इन सत्ताधीशों को क्या लेना देश से ,यहाँ की जनता से , भारत के लोकतंत्र से ।

दरअसल इस देश में इस तरह के लोकतंत्र की कोई ज़रुरत ही नहीं है । देश में भ्रष्टाचार के मूल में लोकतंत्र के नाम पर खड़े किये गये चूषक तंत्र ही हैं । मुझे आज तक समझ ही नहीं आया कि आखिर इस देश में दिल्ली से लेकर गाँवों की गली-कूचों तक जनप्रतिनिधियों के नाम पर खड़े किए गए इन सत्ता के दलालों की ज़रुरत क्यों है ? अगर देश के नेता सिर्फ़ दलाली खाने के लिए ही हैं तो इनका खर्च जनता क्यों उठाए ? राष्ट्र्पति शासन में भी तो सरकारी मशीनरी बिना मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बेहतर और सुचारु ढंग से काम करती है । गौर करने वाली बात यह भी है कि जब से नगर निगम और नगर पालिकाएँ बनीं तबसे अव्यवस्थाएँ और गंदगी फ़ैली । महापौर और पार्षद रातोंरात करोड़पति बन गए ,मगर शहरों की हालत बद से बदतर होती गई । यही हाल ग्राम स्वराज के नाम पर खड़ी की गई पंचायती राज व्यवस्था का है । पंच-सरपंच पजेरो में सैर कर रहे हैं लेकिन गरीब आदमी सूखे निवालों से भी महरुम है । यानी अब लोकतंत्र  की दीमकों से छुटकारा पाने के लिए सत्ता बदलने की नहीं , देश चलाने के लिए नय रास्ता तलाशने का वक्त है ।

शनिवार, 18 अगस्त 2012

अकेला कांडा ही तो दोषी नहीं


गीतिका खुदकुशी मामले में गोपाल कांडा को लेकर बवाल मचा हुआ है । लेकिन इस मामले का एक पहलू और भी है , जिसे नज़र अँदाज़ किया जा रहा है । हालाँकि इस ओर इंगित करने से अक्सर लोग घबराते हैं, बचते हैं । और इसकी वजह है लोकेषणा । लोगों को लगता है कि कहीं उन पर रुढ़िवादी या दकियानूसी होने का ठप्पा न लग जाए । खुद को प्रोग्रेसिव जताने की खोखली चाहत में समाज लगातार गर्त में जा रहा है । हम सब इस अधोपतन को मुँह बाये देख रहे हैं ।

 चारों तरफ़ से कांडा पर आरोपों की बारिश हो रही है । गीतिका का भाई चीख-चीख कर गोपाल कांडा की गिरफ़्तारी की माँग करता टीवी पर गाहे-बगाहे नज़र आ रहा है । लेकिन क्या गीतिका की मौत के लिए उसका परिवार भी बराबर का ज़िम्मेदार नहीं है ? विभिन्न शहरों में खिंचवाई गई तस्वीरें गीतिका के परिवार और कांडा के करीबी ताल्लुकात की तस्दीक करती हैं । एक सवाल ये भी कि महज़ सत्रह साल की उम्र में ज़रुरी योग्यता हासिल किए बगैर नौकरी की शुरुआत के लिए बाहर भेजने और एकाएक कामयाबी की सीढ़ी पर फ़र्राटा भरने के दौर में गीतिका का परिवार खामोश क्यों रहा ?

 बेटी के पैसों पर मौज उड़ाते वक्त क्या उस युवती के माता-पिता के ज़ेहन में एकबारगी ये ख्याल आया कि उनकी सुपुत्री पर एकाएक कामयाबी की बौछारें क्यों हो रही है । महँगी गाड़ी, मोबाइल तोहफ़े लेते समय क्या कभी उनके मन में सवाल नहीं उठे ? अगर शुरुआती दौर में ही इस सिलसिले को सख्ती से रोकने की कोशिश की जाती, तो शायद हालात कुछ और होते । इस मामले में कांडा के समर्थन में थाने पर प्रदर्शन का मामला भी समाज के विद्रूप चेहरे को सामने लाता है । समाज में नैतिकता का संकट इतना गहरा गया है कि लोग पैसे की खातिर रसूखदारों के हज़ारों गुनाहों पर पर्दा डालकर उन्हें "रॉबिनहुड" का जामा पहनाने में ना देरी करते हैं और ना ही कोई गुरेज़ ।

वक्त अभी भी पूरी तरह से हाथ से निकला नहीं है । समाज की उलझी डोर को सुलझाने का सिरा भले ही नहीं मिल पा रहा हो , मगर जहाँ से भी मुमकिन हो डोर को थाम लेने में ही सबकी भलाई है । निष्पक्ष रुप से देखें तो कांडा के साथ ही गीतिका के माता-पिता भी गीतिका की मौत के लिए बराबर के दोषी हैं । कानूनी तौर पर ना सही , सामाजिक रुप से वे इस खुदकुशी का ठीकरा कांडा पर अकेले कतई नहीं फ़ोड़ सकते । इसी तरह कांडा के साथ खड़े होने वाले लोगों का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए ।

मीडिया को भी अपने तात्कालिक फ़ायदे के लिए समाज की बुनियाद को खोखला करने की प्रवृत्ति पर स्वप्रेरणा से आत्मनियंत्रण की प्रक्रिया आज नहीं तो कल अपनाना ही होगी । वरना अनुराधा बाली, गीतिका , मधुमिता , भँवरी देवी जैसी महिलाएँ महत्वाकांक्षा की बलिवेदी पर यूँ ही आहुतियाँ देती रहेंगीं । नारी स्वातंत्र्य के नाम पर  उपभोग की वस्तु बन चुकी स्त्री को अपने अस्तित्व को पहचान कर समाज में योगदान देना चाहिए । बराबरी के हक की आड़ में पुरुषों के हाथ की कठपुतली बनने से कहीं बेहतर है अपने नैसर्गिक गुणों को पहचान कर परिवार में समग्र और रचनात्मक योगदान देना ।

बृहस्पतिवार, 16 अगस्त 2012

ईमानदारी की दुहाई , पर ये है सच्चाई


 मध्य प्रदेश  को ’’शांति का टाप” कहा जाता है । बेशक कागज़ों पर यह बात लगातार सही साबित हो रही हो , मगर इस शांति के असली कारक सत्ता और विपक्ष की साँठ-गाँठ और मीडिया की मिलीभगत है । जून में बीजेपी से जुड़े दो कारोबारियों-दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा के ठिकानों पर आयकर छापे में मिली अकूत दौलत की खबरें सामने आने के बाद एक बारगी जनता को भ्रष्टाचार से निजात मिलने के सपने पर ये यकीन हो चला था । लेकिन जल्दी ही काँग्रेस-भाजपा के गठबँधन ने इसे दिवास्वप्न में तब्दील कर दिया । सदन में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने के नाम पर नेता प्रतिपक्ष की लचर कार्रवाई और दो काँग्रेस विधायकों की विधानसभा से बर्खास्तगी के सुनियोजित ड्रामेबाज़ी ने एक गंभीर मामले को प्रहसन बना दिया । इस पूरे घटनाक्रम ने एक फ़िर साबित कर दिया है कि किस तरह सत्ता और विपक्ष पर्दे के पीछे एकजुट होकर जनता के हितों पर डाका डाल रहे हैं ।

इस मसले में काला धन वापस लाने की मुहिम में ज़ोरशोर से जुटे बाबा रामदेव  की नीयत पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है । विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बाबा रामदेव के साथ दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा के फोटो जारी कर बाबा की सच्चाई को जगज़ाहिर कर दिया है । तस्वीरों में से एक में दिलीप सूर्यवंशी एक कार्यक्रम के दौरान बाबा के चरण छू रहे हैं। वहीं, दूसरी तस्वीर में बाबा के दायें-बायें छप्परफ़ाड़ तरीके से धनकुबेर बने सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा खड़े हैं  । सवाल है कि बाबा रामदेव भाजपाइयों के काले धन और भ्रष्टाचार के मामले में मौन क्यों हैं?
  
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जब जापान, सिंगापुर और कोरिया की दस दिन के दौरे पर थे, तब आरएसएस नेता सुरेश सोनी के करीबी बीजेपी नेता सुधीर शर्मा और शिवराज के करीबी बिल्डर दिलीप सूर्यवंशी के 60 ठिकानों पर इनकम टैक्स ने छापे मारे और साढ़े छह करोड़ रुपये नकद, दस किलो सोना और सैकड़ों एकड़ जमीन के कागजात जब्त किए थे । सूर्यवंशी के घर से बड़ी तादाद में मंत्रियों की तबादले संबंधी नोटशीटस भीमिली थीं । इन सरकारी कागज़ात का मिलना साफ़ गवाही देता है कि सूर्यवंशी का सत्ता–साकेत में कितना और किस हद तक सीधा दखल था । सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि राखी सावंत से लेकर ओबामा और भोपाल की गली-कूँचों से लेकर वाशिंगटन तक के हर छोटे-बड़े मसले पर तत्काल बयान जारी करने वाले मुख्यमंत्री अपने रात-दिन के करीबी पर खामोशी अख्तियार किए बैठे हैं ।

उधर पूर्व प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता के.के. मिश्रा ने सीडी जारी कर दिलीप सूर्यवंशी से मुख्यमंत्री के करीबी रिश्तों का खुलासा किया है  । सीडी में साल 2008 की एक वीडियो क्लिपिंग जिसमें सीएम का उदबोधन है और श्री सूर्यवंशी के संबंध में बात कही गई है  । इसमें मुख्यमंत्री चार साल पहले खुले मंच से दिलीप सूर्यवंशी और खनन माफिया सुधीर शर्मा से सीधे संबंध स्वीकारते दिखाई पड़ रहे हैं। उन्होंने यहाँ तक कहा है कि मेरे बचपन के दौर के पालन पोषण में सूर्यवंशी परिवार का बड़ा योगदान रहा है।
सत्ताधीशों की करीबी पाकर लक्ष्मी की कृपादृष्टि पाने का खेल समझने के लिए इतना जानजा कीफ़ी है कि आठ साल पहले दिलीप सूर्यवंशी के पास  तेरह डंपर थे जिनकी संख्या बढ़कर १८२० हो गई है । इसी तरह सरस्वती शिशु मंदिर के शिक्षक  रहे सुधीर शर्मा पर कुबेर  की असीम अनुकंपा का नज़ारा कुछ  ऎसा  रहा कि “आचार्यजी” प्रदेश में सबसे ज़्यादा आयकर देने के बावजूद भी आयकर छापों के फ़ेर में उलझ गये । ज़ाहिर है इतनी अकूत संपदा इतनी छोटी सी अवधि में ईमानदारी और मेहनत से अर्जित कर पाना नामुमकिन है । साफ़ है कि लक्ष्मी और कुबेर से ज़्यादा इन पर सरकार के मुखिया और पार्टी के कुछ चुनिंदा नेताओं  की खास नज़रे इनायत रही ।
शुरुआती दौर में मध्य प्रदेश में इन कारोबारियों पर इनकम टैक्स छापों का मामला गंभीर होता नज़र आ रहा था । इस मुद्दे पर पोस्टर वॉर शुरू हो गया । एक बारगी तो ऎसा लगा मानो इस मुद्दे पर भाजपा को ना सिर्फ़ मुख्यमंत्री बदलना पड सकता है , बल्कि कर्नाटक के येदियुरप्पा के मामले से भी कई गुना ज़्यादा बड़े तमाम घोटालों पर किरकिरी झेलना पड़ सकती है । मगर भला हो काँग्रेस के नेताओं खास तौर पर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह , विधायक कल्पना परुलेकर और चौधरी राकेश सिंह का , जिन्होंने वक्त रहते सरकार के “साँच पर आँच” नहीं आने दी । हालांकि छापों के तुरंत बाद कांग्रेस ने भोपाल में पोस्टर लगाकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से ग्यारह सवाल पूछे थे। कांग्रेस का आरोप था कि जिन कारोबारियों के यहां छापे पड़े हैं, वे सब शिवराज सिंह के खास करीबी हैं और उनकी ही मेहरबानी से रातोंरात अरबपति बन गए हैं।

पोस्टरों में दावा किया गया था कि साढ़े छह साल पहले दिलीप सूर्यवंशी की कंपनी दिलीप बिल्डकॉन का टर्नओवर तेरह करोड़ रुपये था , आज जेट की रफ़्तार से एक हजार करोड़ रुपये तक जा पहुँचा है। उनकी कंपनी चार हजार करोड़ रुपये के ठेकों पर काम कर रही है। पोस्टर में सवाल पूछा गया कि क्या दिलीप सूर्यवंशी ने मुख्यमंत्री के अरेरा कॉलोनी के फ्लैट ई-3/163 की साज सज्जा पर बीते साल बीस लाख रुपये खर्च नहीं किए? मुख्यमंत्री के निजी सचिव का भाई दिलीप सूर्यवंशी के किस कारोबार में पार्टनर है? 
 
इन इन आरोपों के जवाब में मध्य प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष प्रभात झा का कहना था कि क्या बीजेपी के लोग व्यापार नहीं करेंगे? और व्यापार करेंगे तो क्या इनकम टैक्स वाले टैक्स नहीं मांगेगे। ये कोई अपराध नहीं है। मनुष्य की वृत्ति होती है टैक्स बचाना और इनकम टैक्स का काम होता है, ज्यादा इनकम होने पर टैक्स लेना और अपने अपने काम में सब लगे हैं।   



मीडिया मैनेजमेंट और निहित स्वार्थों के कारण विपक्ष के ढ़ीले पड़ते तेवरों से बेशक सूबे के मुखिया कुछ और वक्त तक अपना चेहरा चमकाए रख सकते हैं , लेकिन इस हकीकत को झुठलाया नहीं जा सकता कि सच्चाई को लम्बे वक्त तक दबाना या छिपाना किसी के बूते की बात नहीं है । गुज़रते वक्त के साथ सच्चाई खुद ब खुद बाहर आकर ही रहेगी । रसूख से लोगों का मुँह बंद किया जा सकता है । नोटों से समाज पर असर डालने वाले चंद लोगों को कुछ वक्त के लिये अपने पक्ष में खड़ा किया जा सकता है । इस सबके बावजूद वक्त की बदलती चाल दूध का दूध और पानी का पानी किए बिना नहीं रहती ।

शनिवार, 12 मई 2012

मध्यप्रदेश में शिव ”राज” नहीं, माफ़िया राज

नौ मई को मुरैना जिले के चिन्नौनी थाना क्षेत्र में चंबल नदी से अवैध रूप से रेत भरकर ले जा रही ट्रैक्टर –ट्रॉली रोकने पर पुलिस टीम पर कट्टे से फायर और पथराव ।


• मई में मुरैना जिले में खनिज माफ़िया द्वारा एक और पुलिस अधिकारी को ट्रेक्टर-ट्रॉली से
कुचलकर मारने की कोशिश ।


• मई की शुरुआत में राजधानी से लगे बड़ली गाँव में जंगल माफ़िया ने वन विभाग के अमले को घेर कर पीटा ; जंगल चोरों ने डिप्टी रेंजर सहित नौ वन कर्मियों को किया पीट-पीट कर अधमरा ।

• अप्रैल में देवास ज़िले की कन्नौद तहसील के कुसमनिया गाँव में महिला तहसीलदार को जेसीबी मशीन से रौंदने की खनन माफ़िया की कोशिश ।

घुन की तरह प्रदेश की नैसर्गिक संपदा को चट कर रहे खनन माफ़िया से टक्कर लेते हुए युवा आईपीएस नरेन्द्र कुमार ने होली के दिन शहादत दी । लेकिन सत्ता मद में चूर सरकार के रहनुमाओं ने युवा पुलिस अधिकारी की मौत को हादसा बताकर कुछ इस तरह की दलीलें पेश कीं, मानो सरकार को बदनाम करने की साज़िश रची जा रही हो ।प्रदेश सरकार की इस बेहयाई ने माफ़ियाओं के हौंसले इतने बुलंद कर दिये हैं कि अब जंगल, खनिज और रेत, ज़मीन,पानी, बिजली और शराब का गैरकानूनी धंधा करने वाले बेखौफ़ होकर सरकारी मुलाज़िमों को अपना निशाना बना रहे हैं । अवैध कारोबार पर नकेल कसने की कोशिश में सरकार के कारिंदे कहीं बँधक बनाये जा रहे हैं , कहीं सरेआम रौंदे जा रहे हैं या फ़िर बदमाशों के गोली, लाठी,डंडे खाने को मजबूर हैं । सत्ता का गुरुर अब मगरुरी में तब्दील होता जा रहा है । जो अधिकारी अपना ईमान और ज़मीर बेचने को राज़ी नहीं है, वो सत्ताधारी दल के लोगों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं । उन्हें झूठे आरोपों में फ़ँसाकर निलंबन या बार-बार तबादले की सज़ा दी जा रही है ।

यह हमारे लोकतंत्र की विडंबना है कि जब एक जाँबाज युवा पुलिस अधिकारी मुरैना में खनन माफियाओं की चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने लहू की अंतिम बूँद भी धरती पर बहा रहा था... तब हमारे प्रदेश के मुखिया होली के रंगों में सराबोर हो रहे थे । जब उस युवा पुलिस अधिकारी की पत्नी अपनी कोख में साढ़े आठ माह के शिशु को लेकर अपने सुहाग को मुखाग्नि दे रही थी... फाग गाते, ढोल मँजीरे बजाते हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री की तस्वीरें अखबारों और चैनलों में छाई थीं ।

एक ऐसी हत्या, जिसकी चर्चा केवल प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश में हो रही हो, उस घटना पर सूबे के मुख्यमंत्री का बयान चौबीस घंटे बीत जाने के बाद आता है । अपनी पत्रकार वार्ता में भी वे इस बात पर ज्यादा खफा दिखाई पड़े कि बार बार माफियाओं का नाम लेकर प्रदेश को बदनाम किया जा रहा है । जब नरेन्द्र कुमार के पिता और आईएएस पत्नी इस हत्या के पीछे खदान माफियाओं का हाथ होने की बात बार-बार दोहरा रहे थे, तब मुख्यमंत्री प्रदेश में कोई भी खदान माफिया न होने का दावा कर रहे थे

मुख्यमंत्री प्रदेश में कोई खदान माफिया नहीं होने का जितना दावा करते हैं , राजनीतिक संरक्षण का भरोसा पाकर माफियाओं के हौंसले उतने ही बुलंद होते जा रहे हैं । सियासी आकाओं का प्रश्रय पाकर अब माफ़िया पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को अपना निशाना बना रहे हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में 20 आईपीएस और आईएएस अधिकारियों सहित 65 पुलिस वालों पर हमले हुए हैं । ग्रामीण इलाकों में छोटे कर्मचारियों की पिटाई का आँकड़ा तो हज़ारों में है । हालत ये है कि प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का मध्यप्रदेश से मोह भंग होने लगा है । हाल ही में नरेन्द्र कुमार की आईएएस पत्नी मधुरानी तेवतिया ने अपना भी कैडर बदलने का आवेदन दिया है ।

मुरैना जिले में खदान माफिया कलेक्टर आकाश त्रिपाठी और पुलिस अधीक्षक हरि सिंह पर भी फायरिंग कर चुके हैं । भिंड में भी शराब माफियाओं ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के साथ मारपीट की । खरगोन में एक आरक्षक की हत्या के साथ ही एएसआई पर जानलेवा हमला हुआ । सागर में अवैध खनन पकडऩे की कोशिश कर रहे टीआई पर माफिया ने गोलियाँ चलाईं और उन्हें जान बचाकर भागना पड़ा । पन्ना में रेत माफिया ने नदी पर पुल बना डाला था, जिसे तोड़ने गए एसडीएम पर भी फायरिंग की गई । शहडोल में भाजपा नेता और पूर्व विधायक छोटेलाल सरावगी के बेटे ने कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह पर फायरिंग की थी, क्योंकि वह उनकी कोयले की चोरी रोकने की कोशिश कर रहे थे।

मध्यप्रदेश में सरकारी अमले पर हमलों की लगातार बढ़ रही वारदातें कहती हैं कि सूबे में हालात चिंताजनक है । तुर्रा ये कि यहाँ चोरी और सीनाज़ोरी में ना सत्ता पीछे है और ना ही संगठन । हाल ही में अपनी नाकाबिलियत के बावजूद प्रदेश संगठन की कमान सम्हालने के दो साल पूरे होने का जश्न सरकारी खर्च मनाने पर “आमादा“ प्रभात झा छाती ठोक कर दावा कर रहे थे कि प्रदेश में कोई माफ़िया नहीं है । मुख्यमंत्री भी मीडिया के “चोंगे“ पर आये दिन कुछ ऎसा ही आलापते सुनाई देते हैं । मगर शायद वे भूल गये कि सत्ता सम्हालते ही उन्होंने कहा था कि प्रदेश में सात किस्म के माफ़िया सक्रिय हैं । उन्होंने बाकायदा इन माफ़ियाओं के नाम भी गिनवाये थे । हाल की घटनाओं पर सरसरी नज़र डालते ही ’“रक्तबीज“ की तरह तेज़ी से फ़ैलते माफ़िया राज की हकीकत का खुलासा हो जाता है ।

वो शायद भूल गये कि वर्ष 2010 में शिवपुरी में दिए कथित बयान में उन्होंने भूमाफ़िया पर तोहमत जड़ी थी कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने की साज़िश रची जा रही है । उनके इस बयान पर मचे बवाल के बाद विधानसभा में दंभ से भरे चौहान ने कहा था कि ”उन्हें हटाने का किसी माई के लाल में दम नहीं है और वे किसी से डरते नहीं हैं । न किसी में हिम्मत है कि उन्हें हटा सके । उन्होंने कहा, भूमाफियाओं पर कार्रवाई की बात मैं करता आया हूँ । भूमाफियाओं से मुझे कोई डर नहीं है । ” यह स्वीकारोक्ति सूबे में जड़े जमा चुके माफ़िया की मौजूदगी बताने के लिये काफ़ी है ।

श्री चौहान का दावा है कि प्रदेश में सब कुछ बढ़िया है । यहाँ कोई माफ़िया नहीं हैं । लेकिन हकीकत तो ये है कि उनके कार्यकाल में एक और किस्म का यानी मीडिया माफ़िया भी तेज़ी से पनपा है । करोड़ों के विज्ञापनों के ज़रिये छबि गढ़ने की कवायद ने इस ’अमरबेल” को खूब फ़लने-फ़ूलने का मौका दिया है । प्रदेश की पत्रकारिता मीडिया घरानों और चंद चापलूसों के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई है । ’’पत्रकारिता के बंध्याकरण” के कारखाने में तब्दील हो चुके जनसंपर्क विभाग के ज़रिये प्रदेश की खुशहाल तस्वीर पेश की जा रही है, जो हकीकत से कोसों दूर है । विज्ञापनों के बूते मीडिया घरानों का मुँह बंद कर और चंद तथाकथित बड़े पत्रकारों को ’एवज़ी’ देकर भले ही स्वर्णिम मध्यप्रदेश का ढ़ोल पीटा जा रहा हो, मगर सच्चाई तो यह है कि इस ढ़ोल में पोल ही पोल है ।

मुख्यमंत्री कहते हैं कि न तो प्रदेश में कोई खदान माफिया है और न ही सरकार माफियाओं के दबाव में है। लेकिन सरकारी आँकड़े ही उनके इस दावे की हवा निकालने के लिये काफ़ी हैं । प्रदेश के खनन विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार राज्य के 27 जिलों में अवैध खनन के मामलों में 141.49 करोड़ रुपये का ज़ुर्माना लगाया गया । मगर 80.81 लाख रुपये की नाम मात्र की रकम वसूल कर मामले निबटा दिये गये । गौरतलब है कि वसूली गई राशि लगाये गये जुर्माने के 1 प्रतिशत से भी कम है । क्या इसके बाद भी किसी सबूत की जरूरत रह जाती है कि राज्य सरकार किसकी मुठ्ठी में है?

क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक है कि जिस मुरैना में दस महीनों में अवैध खनन का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ था , वहाँ नरेन्द्र कुमार के बानमौर के एसडीओपी बनने के चालीस दिन के भीतर 20 मामले दर्ज हुए । इन मामलों में 18 हज़ार 240 रुपये पैनल्टी लगाई गई ,लेकिन केवल 4 हज़ार 240 रुपये वसूल कर मामला रफा दफा कर दिया गया । पड़ोसी जिले भिंड में जहाँ नरेन्द्र कुमार की हत्या के दिन शराब माफियाओं ने एक दूसरे आईपीएस अधिकारी पर जानलेवा हमला किया था, वहाँ इसी साल 1.89 करोड़ रुपये की पैनल्टी अवैध खनन को लेकर की गई और आज तक वसूली नहीं हो सकी है । होशंगाबाद जिले में 4 करोड़ 52 लाख के ज़ुर्माने के एवज़ में 50 लाख 52 हजार रुपये की मामूली रकम वसूल कर मामलों खत्म कर दिया गया ।

खदान माफिया पूरे प्रदेश में फैले हुए हैं । अलीराजपुर जिले में तो खदान माफियाओं ने नकलीरसीदें छपवा रखी हैं । इन रसीदों के पकड़े जाने के बाद भी उन अपराधियों पर किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं हुई है । रतलाम जिले की पिपलौदा तहसील के गांव चैरासी बड़ायला में तो एक फोरलेन सड़क बनाने वाली कंपनी ने पत्थर और मुरम की पूरी पहाड़ी खोद डाली , लेकिन रायल्टी के 3 करोड़ रुपये में से छदाम भी राज्य सरकार को नहीं दिया है । इसी दौरान नीमच जिले में खनिज अधिकारी वीके सांखला ने अवैध गिट्टी के 10 ट्रैक्टर पकड़ कर उन पर 47 लाख रुपये जुर्माना किया था । भाजपा नेता ने अपने रसूख के दम पर एक भी पैसा जुर्माना भरे बगैर ही इन ट्रैक्टरों को छुड़वा दिया । धार में नर्मदा नदी की रेत का अवैध खनन हो रहा है । इंदौर जिले में नेमावर और रंगवासा पहाडिय़ों को खनन माफिया ने लीज से कई गुना ज्यादा खोद डाला है ।

प्रदेश में न केवल खदान माफिया ही राज कर रहे हैं , बल्कि भाजपा नेता और राज्य सरकार के मंत्री भी या तो खुद खनन माफिया बने हुए हैं या फिर वे खनन माफियाओं को संरक्षण दे रहे हैं । बात सिर्फ मुरैना की नहीं है । मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर और उनके विधान सभा क्षेत्र भी रेत के अवैध खनन का अड्डा बना हुआ है । सवाल लाज़मी है कि मुख्यमंत्री के अपने जिले में ही प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट , क्या राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव है? दमोह की खनिज अधिकारी दीपारानी ने मीडिया को बताया था कि किस तरह उन्हें कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया के दबाव में अवैध खनन में लगे वाहनों को छोडऩा पड़ा । लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह के खिलाफ अवैध खनन के मामले तो केन्द्र सरकार तक पहुँच चुके हैं ।

मुरैना में शहीद हुए नरेन्द्र कुमार के पिता भाजपा के राष्ट्रीय नेता और सांसद नरेन्द्र सिंह तोमर को खदान माफिया बता रहे हैं । उधर खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ला सतना में किसानों को बेदखल कर हजारों एकड़ जमीन की लीज हथियाना चाहते हैं । एनडीए के संयोजक शरद यादव पहले ही पूरे विंध्य-महाकौशल में हर जिले में बैल्लारी होने की बात चुके हैं । लेकिन यदि मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि प्रदेश में खदान माफिया नहीं हैं, तो फिर कहना ही होगा कि प्रदेश में अब माफिया नहीं हैं , माफिया राज है ।