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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज</title>
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	<description>Daily news analysis , Hindi samachar ,Hindi magazine,Hindi website,a6V3sbK3z0d4m7JTOT6OQOVo1jQ</description>
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		<title>और वे कहते हैं कि, कानून-व्यवस्था की नजर में सब बराबर हैं&#8230;</title>
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		<pubDate>Thu, 23 Feb 2012 06:42:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयदीप शेखर</dc:creator>
				<category><![CDATA[दो-टूक]]></category>

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		<description><![CDATA[खबर है विजय माल्या की विमानन कम्पनी &#8216;किंगफिशर&#8217; को उबारने के लिए भारतीय स्टेट बैंक 1650 हजार करोड़ रुपये का &#8216;राहत पैकेज&#8217; देगा। पता होना चाहिए कि किंगफिशर ने पहले ही विभिन्न भारतीय बैंकों से 2000 करोड़ से ज्यादा का कर्ज ले रखा ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/Vijay-Malya-on-a-Motor-Cycle-costing-Rs-80000001.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-26909" title="Vijay Malya on a Motor Cycle costing Rs 8000000" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/Vijay-Malya-on-a-Motor-Cycle-costing-Rs-80000001-300x225.jpg" alt="Vijay Malya on a Motor Cycle costing Rs 8000000" width="300" height="225" /></a>खबर है विजय माल्या की विमानन कम्पनी &#8216;किंगफिशर&#8217; को उबारने के लिए भारतीय स्टेट बैंक 1650 हजार करोड़ रुपये का &#8216;राहत पैकेज&#8217; देगा। पता होना चाहिए कि किंगफिशर ने पहले ही विभिन्न भारतीय बैंकों से 2000 करोड़ से ज्यादा का कर्ज ले रखा है। विदेशी बैंकों का कितना कर्ज है, यह तो नहीं पता; मगर कुछ दिनों पहले खबर आयी थी कि एक विदेशी बैंक ने इसके जहाज को जब्त कर लिया है। कुल-मिलाकर यह कम्पनी डूबने की कगार पर है। यह भी पता होना चाहिए कि विजय माल्या का मुख्य व्यवसाय शराब बनाना है और उन्हें इस देश में &#8220;शराब के राजा&#8221; के रुप में जाना जाता है। यह &#8216;राहत पैकेज&#8217; भारत सरकार के (पर्दे के पीछे से) दवाब के कारण दिया जा रहा है या नहीं- यह तो नहीं पता; मगर इतना पता है कि-</p>
<p style="text-align: justify;">1. किंगफिशर के कर्मियों को पिछले दो महीनों ने वेतन नहीं मिला है। उसके सी.ई.ओ. ने बताया कि &#8220;कोई बड़ा खर्च&#8221; आ गया था, जिस कारण कर्मियों का वेतन रोकना पड़ा।</p>
<p style="text-align: justify;">2. ठीक उन्हीं दिनों विजय माल्या ने एक खास किस्म की मोटर साइकिल खरीद कर बंगलोर की सड़कों पर उसे चलाया था। कहते हैं कि इस मोटर साइकिल की कीमत 25 करोड़ रुपये (50 लाख डॉलर) है!</p>
<p style="text-align: justify;">3. देश का एक आम आदमी या आम नौजवान बैंक से 30-40 हजार रुपये का कर्ज लेकर कोई व्यवसाय करे और दुर्भाग्य से, वह असफल हो जाये, तो बैंक कभी उसे &#8217;राहत पैकेज&#8217; देने पर विचार नहीं करता है। इतना ही नहीं, शहर के दूसरे बैंक भी उसे कर्ज नहीं देते हैं। उसका जीना हराम हो जाता है। उसे पुश्तैनी अचल सम्पत्ति बेचनी पड़ती है, उसके घर की कुर्की-जब्ती होती है, उसे जेल जाना पड़ता है, यहाँ तक कि उसे आत्महत्या करनी पड़ती है!</p>
<p style="text-align: justify;">निष्कर्ष के रुप में आज कुछ कहने का मन नहीं कर रहा; अब तो जी करता है- सरदार भगत सिंह या नेताजी सुभाष के दिखाये रास्ते पर चल पड़ूँ!</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>आजमगढ में बाटला हाउस मुठभेड़ में चुनावी मुद्दा नहीं ( उर्दू अख़बारों से )</title>
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		<pubDate>Wed, 22 Feb 2012 16:13:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[उर्दू मीडिया]]></category>
		<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>

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		<description><![CDATA[&#160; इंकलाब ने 10 फरवरी के अंक मे अकं में तीन समाचार छापें हैं जिनमें कहा गया हैं कि बाटला हाउस. इनकाउंटर के मुद्दे को भले ही सारे उत्तर प्रदेश में उछाला जा रहा हो मगर आजमगढ़ जिले में यह ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/batla_house466.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-26897" title="batla_house466" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/batla_house466-300x168.jpg" alt="batla_house466" width="300" height="168" /></a></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इंकलाब ने  10 फरवरी के अंक मे अकं में तीन समाचार छापें हैं जिनमें कहा गया हैं कि बाटला हाउस. इनकाउंटर के मुद्दे को भले ही सारे उत्तर प्रदेश में उछाला जा रहा हो मगर आजमगढ़ जिले में यह कोई चुनावी मुद्दा नहीं है। इस रिपोर्ट के अनुसार इस जिले में उलेमा काउंसिल के उम्मीदवारों की हालत पतली है। क्योंकि आम मुसलमानों को यह शिकायत है कि उलेमा काउंसिल ने इस मुठभेड़ को चुनावी मुद्दा बना लिया है और इससे भाजपा को लाभ हो सकता है। आजमगढ़ सदर सीट पर उलेमा काउंसिल का उम्मीदवार रविन्द त्यागी नामक व्यक्ति है, जिसे मुसलमान अपना वोट देने के लिए तैयार नहीं हैं। एक अन्य समाचार में बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए आरिफ और साजिद के पैतृक गांव संजरपुर के मुसलमानों का कहना है कि हमारे बच्चों की मौत पर राजनीति न की जाए। उनका यह भी कहना है कि उलेमा काउंसिल के नेता आमिर रष्दी ने तो इस मामले में बहुत अच्छा काम किया था मगर बाद में उन्होंने उलेमा काउंसिल को राजनीतिक दल बनाकर सारा खेल ही बिगाड़ दिया है।</p>
<p>अब वे मुस्लिम एकता की बात कर रहे हैं। जिससे बीजेपी को लाभ हो रहा है। आतिफ और साजिद के परिवारजनों का कहना है कि मुसलमानों की बजाय हमारे हिन्दू पड़ोसियों ने इस संकट की घड़ी में जिस तरह से हमारा साथ दिया है उसका जवाब नहीं है। मुस्लिम लीडरों ने तो सिर्फ मामले को बिगाड़ा ही है।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>ब्रिटेन की जेलों में इस्लाम का प्रचार</strong></span></p>
<p><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/britain_jail2.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-26900" title="britain_jail" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/britain_jail2.jpg" alt="britain_jail" width="226" height="283" /></a>हिंदुस्तान एक्सप्रेस ( १८ फरबरी २०१२) के अनुसार ब्रिटेन की गृहमंत्रालय की एक कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश की जेलों में इस्लाम का तेजी से प्रचार हो रहा है। लंदन की जेल में 20 प्रतिशत मुसलमान हैं। बलमारिच नामक इस जेल में एक आतंकवादी मुसलमान अबु हमजा, अल मिसरी भी शामिल है जो कि जेल में बंद कैदियों को उग्रवाद का प्रषिक्षण देता है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि क्रिसमस के अवसर पर लंदन स्टाक एक्सचेंज को बमों से उड़ाने के आरोप में जब चार युवकों को गिरफ्तार किया गया तो उनमें से एक आतंकवादी अब्दुल मियाद ने पूछताछ के दौरान बताया कि जेल में बंद कुछ कट्टर इस्लामी उग्रवादियों ने उसे स्टॉक एक्सचेंज को बमों से उड़ाने के लिए उकसाया था। इन लोगों ने उनके गिरोह को बम भी उपलब्ध कराने का आश्वासन भी दिया था।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>बंगाल में उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा</strong></span></p>
<p><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/urdu_What-Urdu-Is.gif"><img class="aligncenter size-medium wp-image-26901" title="urdu_What-Urdu-Is" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/urdu_What-Urdu-Is-300x144.gif" alt="urdu_What-Urdu-Is" width="300" height="144" /></a>रोजनामा राष्ट्रीय सहारा 4 फरवरी 2012 के अनसुार पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य</p>
<p>के उन सभी क्षेत्रों में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा देने का फैसला किया है। जिनमें उर्दू भाषियों की संख्या 10 प्रतिषत से अधिक है। यह फैसला मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यकों की मांग को सामने रखकर किया है। राज्य के मंत्री पार्थो चटर्जी ने संवाददाताओं को बताया कि जिन नए क्षेत्रों में उर्दू भाषा को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया गया है उनमें इस्लामपुर, ग्वालतोड़, टीटागढ़,गरौलिया, कुमार हट्टी, जामोडि़या, हुगली, बांस भेडिया, बदरेष्वर, रसड़ा, बेदिया आदि शामिल हैं।</p>
<p>इस सरकारी घोषणा का स्वागत करते हुए राज्य के मंत्री फरियाद हकीम ने कहा है कि राज्य में उर्दू भाषा की शिक्षा के लिए स्कूल और कॉलेज भारी संख्या में खोले जाएंगे।</p>
<p><strong>साभार : उर्दू  अनुवाद डेस्क ,भारत नीति प्रतिष्ठान</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
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		<title>रेडियो से जुड़ते महादलित</title>
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		<pubDate>Wed, 22 Feb 2012 15:35:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>

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		<description><![CDATA[मीडिया का इस्तेमाल कैसे किया जाये इस फिराक में हर काई रहता है। चाहे वह, सरकार हो या राजीतिक दल या फिर नेता या आम-खास आदमी, हर कोई अपने जनसंपर्क के लिए मीडिया को किसी न किसी रूप में अपनाने ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/own-radio.png"><img class="aligncenter size-medium wp-image-26892" title="own-radio" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/own-radio-300x329.png" alt="own-radio" width="300" height="329" /></a>मीडिया का इस्तेमाल कैसे किया जाये इस फिराक में हर काई रहता है। चाहे वह, सरकार हो या राजीतिक दल या फिर नेता या आम-खास आदमी, हर कोई अपने जनसंपर्क के लिए मीडिया को किसी न किसी रूप में अपनाने की हर जी तोड़ कोशिश करता रहता है। इसके लिए खबर या विज्ञापन का सहारा लिया जाता है। ताकि लोगों तक उनकी बातें पहुंच सकें। अखबार को पढ़ने के लिए रोजाना पैसे देकर खरीदना पड़ता है और खबरिया चैनलों को देखने के लिए जनता को मासिक षुल्क देने पड़ते हैं। जबकि, सरकारी मीडिया रेडियो-दूरदर्शन  सुनने एवं देखने के लिए कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है। अखबार ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे, इसके लिए अखबार पाठकों को समय-समय पर स्कीम निकाल कर प्रलोभित करता रहता हैं। वहीं, खबरिया चैनल अपनी टी.आर.पी. को बढ़ाने के लिए खबरों को मसालेदार बनाने से बाज नहीं आते। लेकिन रेडियो- दूरदर्शन अपनी चाल में चलते हैं, मामला सरकारी जो है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह सब जानते है कि सरकार जनहित में इसका प्रयेाग करती है। इसमें रेडियो की पहुंच को नकारा नहीं जा सकता। सबसे सशक्त और सहज मीडिया है यह। तभी तो बिहार सरकार की इस पर नजर गयी है। रेडियो से बिहार के महादलितों को जोड़ने की दिशा में एक नयाब प्रयोग शुरू किया गया है। वह है महादलितों को ‘रेडियो’ से जोड़ने की पहल  ‘‘ मुख्यमंत्री महादलित रेडियो योजना ’’।</p>
<p style="text-align: justify;">रेडियो पर बिहार सरकार की खास नजर पड़ी हैं। खासकर बिहार के महादलितों को रेडियो जैसे जनसाधारण मीडिया से जोड़ने की पहल शुरू की है। वह अपने आप में मिसाल है। इसके तहत वैसे महादलित, गरीब परिवार को सरकार की ओर से रेडियो-सेट खरीदने के लिए कूपन देने की योजना शुरू की गयी है। हालांकि बड़े पैमाने पर  बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार 25 फरवरी को पटना के मसौढ़ी में ‘‘महादलित रेडियो योजना’’ का राज्यव्यापी शुभारंभ करने जा रहे हैं। मसैढ़ी के सैकड़ों महादलित परिवार को इस दिन रेडियो खरीदने के लिए मुफ्त कूपन दिये जायेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">महादलित परिवारों के बीच उनके विकास से संबंधित योजनाओं की जानकारी और उनके स्वास्थ्य या शिक्षा से जुड़ी सूचनाएं रेडियो के माध्यम से उन तक पहुंचे। इस योजना का मुख्य मकसद है, साथ ही देश-दुनिया की खबरों से भी वे जुड़ेगें। साथ ही गीत-संगीत और मनोरंजन का लाभ उठायेंगे। हालांकि, बिहार सरकार ने इसके लिए उपयोगी कार्यक्रम तैयार करने और सामुदायिक रेडियो जैसी व्यवस्था पर कार्य करना शुरू कर दिया है। वैसे, अभी इसमें वक्त लगेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">‘‘मुख्यमंत्री महादलित रेडियो योजना’’ की शुरूआत 09 जनवरी को पायलट योजना के तहत पटना सदर, दानापुर और जहानाबाद के कुल 22,284 हजार दो सौ चैरासी महादलित परिवारों के बीच बांटकर किया गया। दानापुर में 3297 पटना सदर में 1602, काको में 6898, और मखदुमपुर में 10487 महादलित परिवारों के बीच रेडियो का वितरण किया जा चुका है। इस योजना का राज्यव्यापी शुभारंभ होने से बिहार के अन्य जिलों के दलित परिवारों को रेडियो मिलेगा और वे मीडिया से जुड़ेगे। बिहार में 22 लाख महादलित परिवार हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">महादलितों को रेडियो देने की बिहार सरकार की यह योजना राजनीतिक गलियारें में हलचल भी पैदा कर चुकी है। विपक्षी दल इस योजना को वोट की राजनीति या फिर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की बात करते हैं, जबकि सत्तापक्ष का मानना है कि महादलित परिवारों के बीच रेडियो पहुंचने से उनके विकास से संबंधित योजनाओं की जानकारी सीधे उन तक पहुंच पायेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">मुख्यमंत्री महादलित रेडियो योजना से रेडियो पा चुके महादलितों के बीच खुशी भी है। वे कहते भी हैं कि इससे वे जहां खबरें सुनते हैं, वहीं अपना मनोरंजन भी कर लेते हैं। रेडियो, जैसे सशक्त मीडिया को बिहार सरकार ने चुनकर एक बेहतरीन कार्य भले ही किया हो, लेकिन सवाल उठने से रोका नहीं जा सका। इसके पीछे राजनीतिक रणनीति और चुनावी लाभ का सवाल खड़ा हुआ, तो वहीं दलित समुदाय की कुल 22 जातियों में से सिर्फ एक जाति दुसाध यानी पासवान को दरकिनार कर महादलित वर्ग बनाकर बिहार सरकार पहले ही सवालों के घेरे में हैं। दलितों के बांटने का आरोप मढ़ा गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">रेडियो से महादलितों को जोड़ने की योजना के पीछे भले ही राजनीति हो, लेकिन एक बड़ा काम यह है कि बिहार के महादलित बस्तियों में घर-घर रेडियो पहुंचाने का जो कार्यक्रम शुरू हुआ है, यकीनन वह रेडियो पत्रकारिता की पहुंच को और मजबूत बनायेगा। इसके पीछे पक्ष-विपक्ष का जो भी राजनीतिक मामला हो, यह तय है कि जनहित, जनसाधारण और सहज, सुगम, मीडिया, रेडियो की पहुंच से महादलितों को यकीनन फायदा पहुंचेगा। रेडियो सेट के माध्यम से केवल बिहार सरकार ही नहीं, केन्द्र सरकार की जनउपयोगी योजनाओं के बारे में जान सकेंगे। मुख्यधारा से कटे या अंतिम कतार में खड़े महादलित समय-समय पर प्रसारित होने वाले सरकारी ( केन्द्र व राज्य सरकार) कार्यक्रमों को जान सकेंगे। रेडियो सुन कर केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं के बारे में लाभान्वित होने की दिशा में वे गोलबंद भी हो सकेंगे, जिससे वे वंचित रहते हैं। क्योंकि, ऐसे महादलितों के बीच खबरिया चैनल या फिर अखबारों की पहुंच नहीं के बराबर होती हैं। ऐसे में मुफ्त में मिले रेडियो सेट के माध्यम से महादलित अपनी योजनाओं-परियोजनाओं से अपने को जोड़ अपने जीवन को साकार कर पायेगें।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>डॉ लोहिया के कार्यक्रम,सिद्धांत और वर्तमान में समाजवादियों का दायित्व</title>
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		<pubDate>Wed, 22 Feb 2012 07:52:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अरविन्द विद्रोही</dc:creator>
				<category><![CDATA[भारतनामा]]></category>

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		<description><![CDATA[डॉ राम मनोहर लोहिया ब्रितानिया हुकूमत से आजादी की जंग लड़ने वाले सेनानी के साथ साथ आजाद भारत में कांग्रेस सरकार की गलत नीतिओ के खिलाफ लड़ने वाले महान समाजवादी चिन्तक व योद्धा भी थे &#124; आजाद भारत में व्याप्त ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/ram_mohan_lohiya.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-26889" title="ram_mohan_lohiya" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/ram_mohan_lohiya-300x364.jpg" alt="ram_mohan_lohiya" width="300" height="364" /></a>डॉ राम मनोहर लोहिया ब्रितानिया हुकूमत से आजादी की जंग लड़ने वाले सेनानी के साथ साथ आजाद भारत में कांग्रेस सरकार की गलत नीतिओ के खिलाफ लड़ने वाले महान समाजवादी चिन्तक व योद्धा भी थे | आजाद भारत में व्याप्त बुराइयों की जननी कांग्रेस को मानने वाले डॉ लोहिया ने गैर कांग्रेस वाद की आधार-शिला रखी थी| वर्तमान समय में अपने को डॉ लोहिया के अनुयायी मानने वाले लोगो में विचारधारा ,सिद्धांतो के अनुपालन का संकट व्याप्त है | राजनीतिक स्वार्थो और सत्ता की चाहत में समाजवादी पुरोधा डॉ लोहिया के सिद्धांतो की अनदेखी करना समाजवादी मूल्यों और समाजवादी राज्य की स्थापना के प्रयासों-संकल्पों पर कुठारा घात सरीखा ही होगा | डॉ लोहिया की गरीब-गुरबा के जीवन स्तर में सुधार की सोच के क्रियान्वयन की जगह राहत और बख्शीश की राजनीति से समाजवाद का परचम कैसे लहरा सकता है ? राहत और बख्शीश की राजनीति की जगह अधिकार और कर्त्तव्य के संघर्ष को आगे बढ़ाने का दायित्व अपने को डॉ लोहिया के लोग मानने वालो को ,राजनेताओ को शुरु करना चाहिए |    डॉ राम मनोहर लोहिया आत्मा की आवाज की शक्ति को स्वीकार करते थे | साथ साथ सामाजिक और वस्तु परक सत्य को भी आत्मा की आवाज की शक्ति के जितना ही महत्व-पूर्ण मानते थे | डॉ लोहिया के अनुसार &#8211; समस्त निर्गुण सिद्धांत और आदर्श थोथे है और इनकी सार्थकता तभी हो सकती है जब इस निर्गुण आदर्शो को सगुण और संभव आचार संहिता में ढाल कर प्रस्तुत किया जाये | यह डॉ लोहिया ही थे जिन्होंने सगुण सिद्धांतो और गाँधी की प्रासंगिकता के माध्यम से तत्कालीन सरकारी नीतियो की प्रासंगिकता और गाँधी की प्रासंगिकता दोनों की चुनौतियो को देश के निवासियो के बीच विचार-विमर्श का मुद्दा बनाया ,इन मुद्दों पर बहस चलायी |                                                डॉ लोहिया का जीवन चरित्र व संघर्ष कट्टर अहिंसक आंदोलनों और सिद्धांतो का ज्वलंत उदाहरण है | दफा १४४ का विरोध करते हुये पचासों बार जेल जाने वाले डॉ लोहिया ने आजाद भारत में पुरे देश के नागरिको के अधिकारों के हित के लिए , शासन सत्ता के जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुये एक सत्याग्रही के रूप में मारेंगे नहीं पर मानेंगे नहीं का  एक निर्भीक दर्शन प्रस्तुत किया | भारतीय संविधान में दिये गये नैसर्गिक अधिकारों के विरुद्ध दफा १४४ को मानने वाले डॉ लोहिया के लोग देखते है कब दफा १४४ को ख़त्म करने का संघर्ष जीवित करते है या सत्ता मिलने पर दफा १४४ को ख़त्म करते है |                                                                                                                                      डॉ लोहिया मूलता अस्वीकारवादी थे-गाँधी के सही मायनो में शिष्य थे  ,प्रसिद्ध समाजवादी लेखक लक्ष्मी कान्त वर्मा के अनुसार &#8212;- डॉ लोहिया का यह अस्वीकारवाद गाँधी के उस नैतिक बोध से विकसित हुआ है जिसके आधार पर गाँधी ने भारत में ब्रिटिश शासन को अनैतिक करार दिया था और यह कहा था कि मैं ब्रिटिश शासन का इसलिए विरोध करता हूँ कि अंग्रेजो का भारत में शासक के रूप में रहना अनैतिक है | उन्होंने तो अंग्रेजो को यह सलाह दी थी कि वे अपनी इस अनैतिक उपस्थिति को स्वीकार करके भारत छोड़ कर चले जाये | सन १९२०-२१ में ही गाँधी जी ने अंग्रेजो को यह सलाह दी थी और १९४२ में उन्होंने अंग्रेजो को भारत छोड़ो का नारा देकर भारतवासियों से कहा कि अंग्रेजो को भारत से हटाने के लिए करो या मरो के स्तर पर संघर्ष करे | डॉ लोहिया ने इसी नैतिक बोध के आधार पर पूरे समाजवादी आन्दोलन को संगठित किया था और गाँधी के मौलिक सिद्धांतो को भारतीय समाजवाद का एक अंग माना था | अंग्रेजी हटाओ ,सत्ता का विकेंद्री करण करो,ग्राम्य पंचायतो को स्वायत्ता और अधिकार दो ,चौखम्भा राज्य की स्थापना करो,स्वदेशी अपनाओ ये सारे के सारे समाजवादी कार्यक्रम गाँधी जी के सिद्धांतो पर आधारित थे और इसी आधार पर वह भारत की स्वायत्ता की रक्षा करना अपना नैतिक कर्त्तव्य मानते थे | गाँधी की नैतिकता का आधार यदि उनका मन था तो लोहिया का आधार भारत का सामाजिक यथार्थ था | गाँधी की आत्मा की आवाज और डॉ लोहिया के सामाजिक यथार्थ में कोई भेद नहीं है ,क्योंकि लोहिया भी देश का मन बनाने  की बात करते थे | सीधे शब्दों में आत्मा के पारंपरिक अर्थ व्यूह में ना फंस कर वह मन की बात करते थे | बारीकी से देखे तो हम पाएंगे की लोहिया के मन में और गाँधी की आत्मा में कोई विशेष अंतर नहीं है | जो लोहिया का मन है वही गाँधी की आत्मा है |             आज सामाजिक -राजनीतिक जीवन में नैतिक बोध समाप्त प्राय हो गया है | राजनेताओ के पास सिर्फ तिकड़म,व्यक्तिगत स्वार्थ और सत्ता लोलुपता ,सिद्धांत हीनता &#8211; विमुखता ही शेष बची है | राजनीति के अपराधी करण के बाद अपराध का राजनीतिकरण हो चुका है | व्यावसायिक उत्पादों की तरह नेताओ का प्रस्तुतीकरण जनता जनार्दन के सामने प्रचार माध्यमो के जरिये बदस्तूर जारी है | भाषण देने ,कुरता पहनने से लेकर कैसे कदम बढाया जाये ,कैसे हाथ हिलाया जाये इस तक का प्रशिक्षण लेकर आज लोग जन नेता बनने की तरफ अग्रसर है | नेताओ की कथनी करनी में गज़ब का विरोधाभास उत्तर प्रदेश विधान सभा के इस आम चुनाव २०१२ में देखने को मिला | डॉ लोहिया दूरदर्शी थे ,उनके चिंतन और साहित्य में आम जन के प्रति समर्पण साफ़ दीखता है | डॉ लोहिया की नीति भारत की आम जनता के हित में है | डॉ राम मनोहर लोहिया देश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार और उसकी नीतियो से उपज रहे हालातो से परेशान रहते थे | सरकार के द्वारा पनपायी जा रही यथास्थितिवादी जड़ता को कैसे समाप्त किया जाये ?, इसकी चिंता गाँधी के क्रांतिकारी स्वरुप को उभारने की चिंता ,हर पल बढती हिंसा ,अन्याय और समता विरोधी सरकारी कानूनों और शिकंजो को तोड़ने की चिंता ,यह तीन चिंताए डॉ लोहिया को आंदोलित करती थी | डॉ लोहिया देश की संस्कृति और चेतना का संरक्षण करते हुये सामाजिक न्याय और शोषण रहित समाज की संरचना की प्रक्रिया को तेज़ करने में विश्वास रखते थे | डॉ लोहिया लोकतंत्र की कसौटी पर जब आजाद भारत की कांग्रेसी सरकार के कार्यक्रमों की समीक्षा करते थे तो उन्हें अपार कष्ट होता था ,यही कष्ट गैर कांग्रेस वाद के सिद्धांत के जन्म का कारण बना | डॉ लोहिया का मानना था कि सरकार की यह जो गृह नीति है उससे भारत के आम जनों के नैसर्गिक अधिकारों का गला घोंटा जा रहा है | विदेश नीति में राष्ट्रीय हितो की बलि चढ़ाई जा रही है | आर्थिक नीतियो में उपभोक्ता-वादी दृष्टिकोण को अपनाया जा रहा है और बढ़ावा दिया जा रहा है | सरकार  के द्वारा ग्राम्य विकास की उपेक्षा से, लघु और कुटीर उद्योगों की जगह सरकार के द्वारा अधिकार और सत्ता पर एकाधिपत्य ज़माने के लिए देश की प्रकृति के विरुद्ध भारी उद्योगों को अनावश्यक बढ़ावा देने के कारण डॉ लोहिया परेशान रहते थे | लोहिया की विशेषता थी कि वो जैसा महसूस करते थे वैसा ही व्यक्त भी कर देते थे | लोहिया के मतानुसार कि किसी भी सत्य को इसलिए ना कहना कि सत्य कहने से भय लगता है ,अनुचित है | असत्य पनपता रहे और आदमी उस असत्य को आने वाले सत्य की मृग मरीचिका में स्वीकार कर ले तो वह स्वयं को नष्ट और कलुषित करता है | लोहिया के जीवन संघर्ष के दो महत्व पूर्ण पक्ष सत्य बोलना और अन्याय के खिलाफ अविलम्ब संघर्ष करते रहना रहे है | लोहिया की नज़र में निर्भय होकर अन्याय के खिलाफ लडाई लड़ना ,सहारा लेकर अन्याय के खिलाफ लड़ने की पद्धति से अधिक शक्तिशाली है | लोहिया बिना हथियार के अन्याय के खिलाफ लड़ने की इच्छा शक्ति को अधिक महत्व पूर्ण मानते थे | डॉ लोहिया के ही अनुसार &#8212; इस माध्यम से समाज के हर व्यक्ति की साझेदारी अन्याय को समाप्त करने में हो जाती है ,जबकि संगीन के सहारे लड़ने में ,जिसके पास संगीन नहीं है ,वह केवल मूक दर्शक बन कर रह जाता है |       डॉ लोहिया की समाजवादी पार्टी के कार्यक्रमों का मूल आधार चौखम्भा राज था | डॉ लोहिया का साफ़ मानना था कि चौखम्भा राज कि ग्राम पंचायत कि इकाई तभी प्रभावी हो सकती है ,जब उसके काम काज की भाषा और प्रदेश तथा केंद्र की सरकार की काम काज की भाषा भारतीय भाषा हो | जब तक अंग्रेजी रहेगी तब तक भारत की कोई भी भाषा प्रयोग में नहीं आ सकेगी | इसलिए डॉ लोहिया ने अंग्रेजी हटाओ का कार्यक्रम दिया था | यह डॉ लोहिया की क्रांतिकारी सोच थी जिसका उद्देश्य मूल रूप से ग्राम पंचायत की इकाई में आत्म विश्वास पैदा करने को था | उनका मानना था कि अंग्रेजी धीरे धीरे नहीं एक झटके से समाप्त की जा सकती है | भाषा के साथ साथ शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन चाहने वाले डॉ लोहिया का सपना था कि प्रधान मंत्री का बेटा और प्रधान मंत्री के चपरासी का बेटा जब एक ही स्कूल में पढ़ेगा तो समता प्रधान समाज विकसित होगा | अंग्रेजी की वरीयता समाप्त हो जाने से अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की  प्रभुता भी समाप्त हो जाएगी तथा भारतीय स्थानीय भाषा व हिंदी का महत्व बढेगा | डॉ लोहिया का कथन था कि &#8212; अंग्रेजी इसी तरह जाएगी | डेढ़ मिनट में नहीं बल्कि एक सेकंड में | झटके में यह सब चीजे हुआ करती है | धीरे धीरे नहीं हुआ करती हैं | धीरे धीरे कहने वाला यह शासक और शोषक सामंती वर्ग है जो कि ८० करोड़ भारतीय जनता पर अपना राज चलाना चाहता है और इसीलिए इस मसले पर एक मजबूत विचार ना करके अंग्रेजी बनाये रखना चाहता है | अब हमें तयें करना चाहिए कि अंग्रेजी को अपने इलाके से हटायेंगे | जाती तोड़ो-समाज जोड़ो आन्दोलन ,विशेष अवसर का सिद्धांत की  व्याख्या करते हुये डॉ लोहिया ने कहा कि &#8212; जब तक तेली,अहीर, चमार,पासी आदि में से नेता नहीं निकलते ,छोटी जाति में कहे जाने वाले लोगो को जब तक उठने और उभरने का मौका नहीं दिया जता ,देश आगे नहीं बढ़ सकता | कांग्रेसी लोग कहते है पहले छोटी जाति के लोगो को योग्य बनाओ फिर कुर्सी दो | मेरा मानना है कि अवसर की गैर बराबरी का सिद्धांत अपनाना होगा | देश की अधिसंख्य जनता जिसमे तमोली ,चमार,दुसाध ,पासी,आदिवासी आदि शामिल है ,पिछले दो हज़ार वर्षो से दिमाग के काम से अलग रखे गये हैं | जब तक तीन चार हज़ार वर्षो के कुसंस्कार दूर नहीं होता ,सहारा देकर ऊँची जगहों पर छोटी जातियो को बैठना होगा | चाहे नालायक हो तब भी | इस देश ने ऊँची जातियो की योग्यता को बहुत देख लिया है | देश की गजटी नौकरियो ,राजनीतिक पार्टियो की नेतागिरी ,पलटन ,व्यापार आदि में जनता के दिमाग पर जो हजारो वर्ष का ताला बंद किया गया है,खुलेगा | दाम बांधो और आमदनी खर्ज पर सीमा लगाओ का नारा लोहिया ने शायद आजाद भारत के ग्रामीणों की दशा को देख कर लगाया था और संसद में पैरवी भी की थी | डॉ लोहिया के विचार और कार्यक्रम भारत के आम जन से जुड़े थे और आज भी जुड़े है | आज डॉ लोहिया के विचारो के दो टूक और निर्भीक सत्य की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है | अगर अपने को डॉ लोहिया के लोग मानने वालो ने इस पर ईमानदारी से काम किया होता तो आज पूरा देश समाजवादी आन्दोलन से जुड़ा होता | समाजवादियो को लोहिया के विचारो की चर्चा परिचर्चा के शिविर लगाने चाहिए , समाजवादी आन्दोलन में जातीयता की जकड़न की जगह समाजवादी विचारो की प्रखरता और कर्म का मिश्रण महत्वपूर्ण है | देश में व्याप्त समस्याओ-  बुराइयों की जननी कांग्रेस के मुकाबिल अंततोगत्वा डॉ लोहिया के लोगो को खड़ा ही होना होगा और समाजवादियो की एका के सपने एक मधुर परन्तु दुष्कर स्वप्न की तरह आने बदस्तूर जारी है |</p>
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		<title>निवेश नहीं तो फिर किसके लिए था सम्मलेन?</title>
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		<pubDate>Tue, 21 Feb 2012 11:46:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>गिरिजेश कुमार</dc:creator>
				<category><![CDATA[यूपी-बिहार]]></category>
		<category><![CDATA[अदम गोंडवी]]></category>
		<category><![CDATA[अर्थशास्त्रियों]]></category>
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		<description><![CDATA[तक़रीबन ३ करोड रूपये खर्च कर बदलते बिहार पर जिस वैश्विक सम्मलेन का आयोजन राज्य सरकार के सहयोग से हुआ, अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की माने तो वह निवेश के लिए नहीं था। सवाल है फिर वह किसके लिए था? ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;"> </span><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/bihar_globalmeet_janokti.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-26879" title="bihar_globalmeet_janokti" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/bihar_globalmeet_janokti-300x168.jpg" alt="bihar_globalmeet_janokti" width="300" height="168" /></a>तक़रीबन ३ करोड रूपये खर्च कर बदलते बिहार पर जिस वैश्विक सम्मलेन का आयोजन राज्य सरकार के सहयोग से हुआ, अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की माने तो वह निवेश के लिए नहीं था। सवाल है फिर वह किसके लिए था? अख़बारों की रपटों पर भरोसा करें तो इस सम्मलेन में विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने, उनके जीवन स्तर में सुधार लाने तथा उनकी आमदनी बढ़ाने सहित समावेशी विकास के हर पहलुओं पर मंथन हुआ। समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों, उद्योगपतियों समेत इतिहास, कला-संस्कृति, रंगमंच, स्वास्थ्य, पर्यटन क्षेत्र के विशेषज्ञों का जमावड़ा विकास के रास्ते सुझाने के लिए हुआ या सरकार ने अपनी ब्रांड इमेज बनानी चाही, उद्देश्य चाहे जो भी हो आखिर इसका फायदा क्या होगा, और किसे होगा? सवाल यह भी है कि आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, गरीबी और पिछड़ेपन से जूझ रही राज्य की जनता का पैसा पिकनिक नुमा समारोह आयोजित कर  सिर्फ़ बौद्धिक समागम पर उड़ाना कितना उचित है?</p>
<p style="text-align: justify;">विदित हो कि बिहार सरकार के सहयोग से ‘ग्लोबल सम्मिट ऑन चेंजिंग बिहार’ नामक तीन दिवसीय वैश्विक सम्मलेन  का आयोजन किया गया था। 17-19 फरवरी तक आयोजित इस सम्मलेन का उद्घाटन नेपाल के प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टराई ने किया था। इस सम्मलेन में भारतीय रिजर्ब बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव, योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आहुलवालिया, मेघनाथ देसाई सहित कई देश-विदेश के शोधकर्ता व विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ मौजूद थे। इस सम्मलेन की सबसे खास बात यह थी कि इसमें किसी भी राजनीतिक पार्टी को आमंत्रित नहीं किया गया था। विपक्ष की नजर में यह सम्मलेन सीएम् का ‘रिन्यूवल ऑफ इमेज’ रहा तो सत्ता पक्ष के अनुसार सम्मलेन में आए सुझाव नीतियाँ बनाने में मार्गदर्शन करेंगे। यहाँ यह याद दिलाना भी ज़रुरी है कि आज से ठीक पाँच साल पहले इसी तरह सिर्फ़ विचार मंथन के लिए ‘ग्लोबल मीट फॉर रिसर्जेन्ट बिहार’ का आयोजन हुआ था। तर्क उस समय भी तक़रीबन यही थे, लेकिन नतीजा सिफ़र रहा। इसलिए इस सम्मलेन की समाप्ति पर सबसे  बड़ा सवाल यही उठा कि कहीं इसका हश्र भी उसी सम्मलेन की तरह तो नहीं होने जा रहा?</p>
<p style="text-align: justify;">यह विडम्बना ही है कि आम आदमी की तरक्की की बात हमेशा वातानुकूलित कमरों और सुसज्जित महलों में हुआ करती है। दुर्भाग्य से आम आदमी का सीधा सम्बन्ध इनमे से किसी भी चीज़ से नहीं है। दुर्भाग्य से यह सवाल भी राज्य सरकार और उसके रहनुमाओं से कोई नहीं पूछ सकता कि जब सबकुछ आम आदमी की बेहतरी के लिए ही हो रहा है, तो वही आम आदमी वीआईपी के नाम पर सड़कों पर पांच घंटे जाम में क्यों फँसा रहा? गरीबों, मजदूरों के पेट पर लात मारकर कौन सा परिवर्तन राज्य सरकार लाना चाहती है यह समझ से बाहर है। तरक्की, विकास, बेहतरी और बदलाव के बीच वास्तविक हकीकत न तो तारीफ करने वालों को दिखती है न ही सरकार को। पिसता है वही आम आदमी जिसकी बेहतरी का दावा किया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी गुड गवर्नेंस की बात करते हैं। जबकि इस गुड गवर्नेंस की कलई राजधानी पटना में ही खुलती दिखती है। शिक्षा, संस्कृति, समाज में महिलाओं की स्थिति इन विषयों पर सम्मलेन तो हर रोज होते हैं लेकिन इन सम्मेलनों से निकले निष्कर्ष पर वास्तविक कार्यान्वयन कभी नहीं होता। इतिहास के पन्नों को पलटिए तो यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आती है। किसी भी चीज़ को बहुप्रचारित करने का यह मतलब कतई नहीं होता कि वह हमारे भले के लिए ही होगा। समाज में आम आदमी तक लाभ पहुँचे इसकी चिंता देश के मनीषियों ने भी की, गाँधीजी, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, जयप्रकाशनारायण, भीमराव अम्बेडकर, राजेन्द्र प्रसाद आदि ने भी विकास का लाभ समाज के अंतिम आदमी तक पहुँचाने की बात कही, लेकिन कभी भी होटलों के सुईट में रहकर या वातानुकूलित कारों में घूमकर नहीं। मँहगे होटल, महाभोज और मनोरंजन की तमाम व्यवस्था कर ये तथाकथित आधुनिक सामाजिक हितसोचक आम आदमी की बेहतरी के लिए लंबे-लंबे वक्तव्य देते हैं तो बड़ा ही हास्यास्पद लगता है।</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे समाज का तानाबाना ऐसा बुना गया है जहाँ सच के लिए मुँह खोलना उसका सबसे बड़ा अपराध हो जाता है। अथितियों को देवता माननेवाला हमारा समाज अथितियों से भी ऐसी अपेक्षा नहीं रखेगा कि वह उनकी कमजोरियों और खामियों की ओर ध्यान आकृष्ट कराएँ। इस सम्मलेन में भी ऐसा ही हुआ। बिहार का भौगोलिक इतिहास जाने बिना सबने बिहार के कायापलट का रास्ता सुझा दिया।  राज्य सरकार भी अपनी तारीफ़ सुनकर फुले नहीं समा रही, लेकिन अफ़सोस की किसी ने वास्तविक स्थिति का अवलोकन नहीं किया। ज़ाहिर सी बात है अगर आप किसी को घर बुलाएँगे तो वह आपकी बुराई नहीं करेगा। वैसे ही जैसे किसी बारात में दूल्हा कितना भी खराब दिखे, घर में मौजूद महिलाएँ हमेशा यही गाती हैं ‘हमरे दूल्हा के रूप अनमोल’। विकास, तरक्की और खुशहाली के सरकारी दावों की हकीकत यही है कि न पहले से बंद पड़े उद्योग खुल रहे हैं, न नये उद्योग लगाये जा रहे हैं। शिक्षक पात्रता परीक्षा को महापरीक्षा का नाम देकर और मानवीय संवेदनाओं का हवाला देकर अयोग्य उम्मीदवारों को चयनित किया जा रहा है। प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही बाज़ारों में बिकने लगते हैं,  और परीक्षार्थी इसलिए निश्चिन्त है, क्योंकि  उसका सोर्स इतना बड़ा है कि वह तो शिक्षक बनकर ही रहेगा। भले ही उसे मजदूरों से भी कम वेतन क्यों न मिले।  गुड गवर्नेंस की असली तस्वीर, दरअसल यही है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह सम्मलेन बिहार को तरक्की के किस राह पर ले जाएगा या इसकी स्थिति भी ढाक के तीन पात वाली होगी यह तो आनेवाला वक्त बताएगा लेकिन जिस उद्देश्य से इसका आयोजन हुआ था, सिद्धांततः अगर उसे मान भी लिया जाए तो व्यवहारतः उसपर अमल होगा इसकी गारंटी कौन देगा? सवाल यह भी है कि दावे और वास्तविकता के बीच इतना बड़ा अंतर आखिर क्यों है? अदम गोंडवी साहब की पंक्ति याद आ रही हैं- <strong>&#8220;</strong><strong>तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर यह आंकडे झूठे है</strong><strong>, </strong><strong>यह दावा किताबी है</strong><strong>”</strong><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>बलात्कार आदि मामलों के लिए न्यायिक प्रक्रिया: एक सुझाव</title>
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		<pubDate>Tue, 21 Feb 2012 06:51:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयदीप शेखर</dc:creator>
				<category><![CDATA[दो-टूक]]></category>
		<category><![CDATA[Girl Exploitation]]></category>
		<category><![CDATA[female rape]]></category>
		<category><![CDATA[बलात्कार]]></category>
		<category><![CDATA[भारत में बलात्कार]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया]]></category>

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		<description><![CDATA[कल बलात्कार की सजा के रुप में बलात्कारी को &#8220;नपुँसक&#8221; बनाये जाने, या उसका &#8220;लिंग-परिवर्तन&#8221; किये जाने पर बात हुई थी। आज बलात्कार तथा यौन-उत्पीड़न-जैसे मामलों की सुनवाई कैसे होनी चाहिए इस पर कुछ सुझाव प्रस्तुत है- 1. ऐसे मामलों ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/female-rape_Girl_Exploitation.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-26873" title="female rape_Girl_Exploitation" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/female-rape_Girl_Exploitation.jpg" alt="बलात्कार"width="295" height="290" /></a>कल बलात्कार की सजा के रुप में बलात्कारी को &#8220;नपुँसक&#8221; बनाये जाने, या उसका &#8220;लिंग-परिवर्तन&#8221; किये जाने पर बात हुई थी। आज बलात्कार तथा यौन-उत्पीड़न-जैसे मामलों की सुनवाई कैसे होनी चाहिए इस पर कुछ सुझाव प्रस्तुत है-</p>
<p style="text-align: justify;">1. ऐसे मामलों को &#8220;बन्द अदालतों&#8221; में चलाया जाना चाहिए। हालाँकि हमारा मीडिया शालीनता बरतते हुए &#8220;नाम बदलकर&#8221; ही समाचार देता है और चित्रों में चेहरे को धुँधला बनाकर दिखाता है; फिर भी, &#8220;खुली अदालतों&#8221; में इन मामलों का चलना अशोभनीय है।</p>
<p style="text-align: justify;">2. इन मामलों में (12 सदस्यीय) &#8220;ज्यूरी&#8221; का होना &#8220;अनिवार्य&#8221; किया जाना चाहिए और ज्यूरी के मत को ध्यान में रखते हुए न्यायाधीश को निर्णय देना चाहिए। ज्यूरी में अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता, मनोविज्ञानी, पुलिस अधिकारी, वकील, डॉक्टर तथा पत्रकार के रूप में छह महिला और छह पुरूष सदस्य होने चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">3. अदालत में पीड़िता स्त्री द्वारा एक बार अपराध में अपनी &#8220;असहमति&#8221; या अपने समर्पण को किसी किस्म की &#8220;मजबूरी&#8221; बताये जाने के बाद इसे ग़लत साबित करने के लिए बहस या जिरह बिलकुल नहीं होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">4. बहस या जिरह क्यों नहीं होनी चाहिए- इसका जवाब यह है कि एक पुरूष को &#8220;अपनी पत्नी&#8221; या &#8220;नगरवधू&#8221; (Commercial Sex Workers) के अलावे किसी और के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने (या ऐसी कोशिश करने) का अधिकार ही नहीं है! अगर कोई ऐसा करता है, तो वह &#8220;दण्ड का भागी&#8221; है। स्त्री पहले सहमत होकर बाद में अदालत में अगर अपनी असहमति दर्ज कराती है, तो भी पुरूष को दण्ड मिलना चाहिए!</p>
<p style="text-align: justify;">5. अगर स्त्री अपनी सहमति की बात स्वीकार करती है- जैसा कि &#8220;लिव-इन&#8221; रिश्तों में हो सकता है- तो फिर यह &#8220;अनैतिकता&#8221; का मामला बन जाता है और जब तक कोई &#8220;तीसरा पक्ष&#8221; शिकायत दर्ज न कराये, अदालतों को इन मामलों को नजरअन्दाज करना चाहिए। कहने का तात्पर्य, दो बालिगों के सहमतिपूर्ण सम्बन्धों पर भी अगर किसी तीसरे पक्ष को आपत्ति है, तो उसे शिकायत दर्ज कराने का अधिकार होना चाहिए; अदालतों को भी इन &#8220;अनैतिक&#8221; मामलों की सुनवाई करनी चाहिए तथा आरोपितों को जरूरी सुझाव (जैसे विवाह) या चेतावनी देनी चाहिए; कुछ मामलों में जुर्माने तथा कुछ में दोनों को कारावास तक की सजा देने की जरुरत महसूस की जा सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>पत्रकारों की नेतागिरी की आड़ में दलाली का घिनौना षडय़ंत्र</title>
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		<pubDate>Tue, 21 Feb 2012 06:38:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौथा खंभा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया-संसार]]></category>

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		<description><![CDATA[विनय जी. डेविड भोपाल . मध्यप्रदेश की पत्रकारिता आज बाजारवाद की गंदगी से सराबोर है। तीसरे दर्जे की राजनीति के षडयंत्रों से घिरी इस पत्रकारिता को दलालों के गिरोह ने फुटबॉल बनाकर रख दिया है। जो ईमानदार पत्रकार अपनी लेखनी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="text-decoration: underline;"><strong> </strong></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/journalist_Corrupt-Poltics_journalist-MP1.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-26868" title="journalist_Corrupt Poltics_journalist MP" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/journalist_Corrupt-Poltics_journalist-MP1-300x181.jpg" alt="journalist_Corrupt Poltics_journalist MP" width="300" height="181" /></a><strong>विनय जी. डेविड</strong></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="text-decoration: underline;"><strong>भोपाल</strong></span> . मध्यप्रदेश की पत्रकारिता आज बाजारवाद की गंदगी से सराबोर है। तीसरे दर्जे की राजनीति के षडयंत्रों से घिरी इस पत्रकारिता को दलालों के गिरोह ने फुटबॉल बनाकर रख दिया है। जो ईमानदार पत्रकार अपनी लेखनी की पूजा करते हैं और सामाजिक विद्रूपताओं को उजागर करते हैं वे दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। इसकी तुलना में वसूली का कारोबार करने वाले विज्ञापन के एजेंटों की पौ बारह है। यही कारण है कि अधिकतर पत्रकार या तो पीआरओ बनते जा रहे हैं या फिर विज्ञापन एजेंट। इसी तरह विज्ञापन एजेंटों ने पत्रकारों की कुर्सियां हथिया लीं हैं और अब तो वे भ्रष्ट अफसरों की कृपा से पत्रकारों के नेता तक बन गए हैं। पत्रकारों के नेताओं के इन हिजड़ा परस्त फार्मूलौं के कारण सरकार जनता के खजाने से पत्रकारों के लिए तमाम सुविधाएं उपलब्ध करा रही है लेकिन पत्रकारों का शोषण करने वाले ये सत्ता के दलाल इन संसाधनों को पत्रकारों तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">पत्रकारों की ये रसद बीच में ही गड़प कर जाने वाले इन सत्ता के दलालों को मध्यप्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग के कुछ अफसरों ने अपना एजेंट बना रखा है। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारों की नीतियों को भ्रष्टाचार की गटर गंगा में बहाने वाले इन दलालों को पत्रकारों के एक स्वयंभू नेता ने अपनी सत्ता चमकाने के लिए पनाह दी थी। आज उस गद्दार नेता का सबसे पुराना एजेंट राधावल्लभ शारदा जनसंपर्क विभाग के भ्रष्ट अफसरों का सबसे बड़ा एजेंट बन गया है। पिछले कुछ सालों में इस दलाल ने पत्रकारों को सरकार से मिलने वाली योजनाओं के सहारे ही अपना कारोबार फैलाया है। जनसंपर्क विभाग के अफसरों ने पत्रकारों के बीच पिछले पंद्रह सालों से ज्यादा समय से चल रहे विवादों की आड़ में इस दलाल को भरपूर विकास दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">जनसंपर्क विभाग के भुगतानों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो से जांच कराई जाए तो राधा वल्लभ शारदा की नपुंसक राजनीति की पोल आसानी से खोली जा सकती है। इसका कारण ये है कि विभाग के भ्रष्ट अफसरों ने इसे जनता के खजाने से टैक्सी की सुविधा उपलब्ध कराकर पूरे प्रदेश के दौरे करने का मौका दिया। इससे इस दलाल ने प्रदेश के पत्रकारों को अपने संगठन का सदस्य बना डाला। कई स्थानों पर तो पत्रकारों के नेताओं ने एकमुश्त रकम देकर सभी पत्रकारों को इसके संगठन का सदस्य बनाया। जो पत्रकार शारदा को खुलेआम गालियां देते हैं वे भी इसके संगठन के सदस्य कैसे बन गए ये उनकी  समझ में खुद नहीं आता।  पत्रकारों को गुमराह करने के लिए इस दलाल ने इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन की मध्यप्रदेश इकाई के नाम से मिलते जुलते नाम वाले संगठन के माध्यम से ये घोटाले किए। जनसंपर्क विभाग के एक रिटायर हो चुके एक अफसर ने सबसे पहले इसके संगठन की नींव डलवाई थी। जब पूर्व की कांग्रेसी सरकार ने आईएफडब्ल्यूजे के नाम का अनुवाद करके बनाए गए मप्र श्रमजीवी पत्रकार संगठन का सूर्य अस्त करने की पहल की तो इसी विवाद का लाभ लेकर शारदा ने अपना संगठन बना लिया।</p>
<p style="text-align: justify;">जनसंपर्क विभाग के उसी पूर्व अफसर ने इस संगठन को मान्यता भी दिला दी। उस अफसर ने अपनी टैक्सी सेवा के माध्यम से इस दलाल को पूरे प्रदेश के दौरे कराए और दौरों की तीन गुनी संख्या में फर्जी बिल तैयार करके कोषालय से रकम आहरित कर ली। ये बिल विभिन्न ट्रांसपोर्टरों के नाम से तैयार कराए गए थे। उस समय ई पेमेंट की कोई प्रथा ही नहीं थी इसलिए ये बिल पास हुए और आडिट पार्टी ने भी अपनी दस्तूरी लेकर उन्हें अपनी हरी झंडी दे दी।  बस यहीं से इस दलाल की राजनीति चमक गई। तभी से इसका पूरा परिवार जनसंपर्क विभाग में होने वाली लूट के टुकड़ों पर पल रहा है। बाद के अफसरों ने सहज कमाई की ये कहानी सुनी तो उन्होंने भी इस प्रथा को सहज की अपना लिया। सरकारी खजाने से बिल आहरित करने के लिए बनाए गए इस कमीशनखोर के संगठन ने जहां जनसंपर्क विभाग के चंद भ्रष्ट अफसरों के लिए कमाई के नए स्रोत विकसित किए वहीं इस भड़ुए ने पत्रकारों के शोषण के नए तरीके विकसित कर लिए। इसने पत्रकारों की आर्थिक सहायता के बजट पर अपने जहरीले दांत गड़ा दिए। अपने दौरों में ये दलाल पत्रकारों की संख्या के आधार पर सदस्यता राशि सबसे पहले वसूलता है।</p>
<p style="text-align: justify;">इसके बाद पत्रकारों को आर्थिक सहायता दिलवाने का प्रलोभन देता है। खासतौर पर कमजोर आर्थिक हालत वाले पत्रकारों को इसका शिकार बनाया जाता है। इसके संगठन के इलाकाई दलाल उन सदस्यों को शारदा के पास भिजवाते हैं। उनके आर्थिक सहायता के फर्जी प्रकरण तैयार कराए जाते हैं फिर उन्हें जनसंपर्क विभाग से पास करा लिया जाता है।   अपने इस कारोबार को विस्तार देने के लिए इस शातिर बदमाश ने भोपाल के जय प्रकाश चिकित्सालय में पूर्व सांसद प्रफुल्ल माहेश्वरी की सांसद निधि से एक वार्ड विकसित करवाया था। इस वार्ड के बहाने ये दलाल जेपी अस्पताल के डाक्टरों को अपने हित साधने में इस्तेमाल करता  रहता है। ये डाक्टर इस दलाल के कहने पर प्रदेश भर के उन पत्रकारों के चिकित्सा देयक तैयार करवा देते हैं। डाक्टरों को ये दलीलें देता है कि फलां साथी जरूरत मंद है कृपया उसकी मदद कर दें। डाक्टर इसे पत्रकारों का सेवक समझते हैं और वे फर्जी बिलों पर बगैर कोई विचार किए दस्तखत कर देते हैं। जनसंपर्क विभाग में लगे बिलों से इस तथ्य की पुष्टि की जा सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">पत्रकारों की आर्थिक सहायता के प्रकरणों की पैरवी करते करते ये दलाल अपने भी फर्जी चिकित्सा देयकों को पारित करवाने की जुगत भिड़ाता रहता है। कुछ दिनों पहले इसने इंदौर के एक अस्पताल के फर्जी चिकित्सा देयक लगाकर मोटी रकम का भुगतान करवाने की योजना बनाई थी. इस राशि का चैक भी तैयार हो चुका था। बस केवल भुगतान होना था। तभी किसी जानकार ने इस मामले की शिकायत कर दी। जनसंपर्क विभाग के अधिकारी ने उन बिलों की जांच करवाने के लिए इंदौर के उस  अस्पताल से संपर्क किया। वहां के चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि इस नाम के किसी भी मरीज का इलाज उनके असपताल में नहीं हुआ है। उस बिल क्रमांक पर किसी दूसरे मरीज का नाम दर्ज था।</p>
<p style="text-align: justify;">इसलिए जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों ने बिल का भुगतान तो रोक दिया पर जालसाजी करने वाले शारदा को दया करके छोड़ दिया।  पत्रकार बनकर जनता के खजाने से जालसाजी करने वाला ये दलाल आज पत्रकार भवन समिति के अध्यक्ष विनोद तिवारी का संरक्षण लेकर अपना काला कारोबार चला रहा है। मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष शलभ भदौरिया को इसने जालसाजी के  एक प्रकरण में फंसाकर दबा रखा है। भदौरिया के खिलाफ भी ये प्रकरण आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में दर्ज है। इस प्रकरण की आड़ में शारदा अपना काला कारोबार चला रहा है और उसे अच्छी तरह मालूम है कि भदौरिया जब तक इस प्रकरण में फंसा रहेगा तब तक वह उसकी भी शिकायत नहीं कर सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">पत्रकारों के नाम पर चलाई जा रही इस घटिया राजनीति को जनसंपर्क विभाग के अधिकारी आसानी से समाप्त कर सकते थे लेकिन कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए इस दलाल को भरपूर पनाह दी। अब यदि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अप्रैल में होने वाली पत्रकार पंचायत में इस दलाल के काले कारोबार पर सवाल उठेंगे इस दलाल का धंधा बंद हो सकता है। वास्तव में पत्रकारों का शोषण करने वाला ये दलाल पत्रकारिता छोडक़र सब करता है। जनसंपर्क विभाग की खबरों या चुराई गई खबरों में हेरफेर करके ये खुद को पत्रकार साबित करता रहता है। जबकि पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों का शोषण करने के लिए ये खुद अपने बेटों के साथ षडयंत्र रचता रहता है। अपने सरकारी घर पर इसने पीडब्लयूडी विभाग से एक दफ्तर बनवा लिया है और इस दफ्तर से ये पत्रकारों के शोषण के नए नए षडयंत्र रचता रहता है। जनसंपर्क विभाग के अधिमान्य पत्रकारों को अपने संगठन के सदस्य बताकर इस दलाल ने कमीशनखोरी का बड़ा जाल बना लिया है।  जब मुख्यमंत्री जी ने पत्रकार पंचायत की घोषणा की तो जनसंपर्क विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों और बाबुओं को भय सताने लगा कि कहीं उनकी पोल न खुल जाए। उन्होंने आनन फानन में इस दलाल के माध्यम से इसके नकली संगठन के कुछ पत्रकारों की बैठक बुलवाई। इन पत्रकारों की भोजन व्यवस्था भी इन्हीं भ्रष्ट अफसरों ने ही करवाई थी। इस बैठक में पत्रकारों की कथित कार्यसमिति के नाम से पत्रकार पंचायत का विरोध करने की रणनीति बनाई गई। इसके बाद शारदा ने कई अखबारों में ये खबरें छपवाईं। कुछ अखबारों को तो पूरे के पूरे पेज बनाकर भेजे गए जिनमें पत्रकार पंचायत का विरोध किया गया था। बाद में मुख्यमंत्री कार्यालय को इन अखबारों की कतरनें भिजवाई गईं. सरकारी बजट के इन दलालों ने मुख्यमंत्री को धमकाने के लिए तरह तरह के आरोप लगवाए। जिनमें कहा गया कि बड़े समाचार पत्रों और चैनलों के पत्रकार तो पंचायत में आएंगे नहीं। जबकि सच ये है कि इसी गिरोह ने कुछ तथाकथित बड़े पत्रकारों को भयभीत किया गया कि वे पत्रकार पंचायत का विरोध करें।</p>
<p style="text-align: justify;">यदि पंचायत होगी तो फिर बड़े पत्रकारों को दिए गए विज्ञापन और सत्कार के देयकों की पोल भी खुलेगी। इसके बाद पूरी दुनिया में पत्रकारों के भ्रष्टाचारों की कहानियां छपेंगी। बड़े कहे जाने वाले कुछ भ्रष्ट पत्रकारों ने जनसंपर्क विभाग से लाखों रुपयों के भुगतान प्राप्त किए हैं इसलिए वे भी धीरे धीरे शारदा के सुर में सुर मिलाने के लिए मजबूर हो गए हैं। जनसंपर्क विभाग और सरकार के कुछ नेता भी भेडियों के इसी सुर में सुर मिला रहे हैं क्योंकि उन्हें भय है कि यदि जनसंपर्क के बजट में भ्रष्टाचार की कहानियां खुलेंगी तो उनकी भी राजनीति चौपट हो जाएगी। इसलिए वे भी मंत्रियों के सहयोग से मुख्यमंत्री जी की ईमानदार पहल का विरोध करने में लग गए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि मुख्यमंत्री जी अपनी ही सरकार के खिलाफ रची गई इस साजिश का  शिकार होने से खुद को जरूर बचा लेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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		<title>वजूद खोती राजनीति</title>
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		<pubDate>Mon, 20 Feb 2012 16:16:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अब्दुल रशीद</dc:creator>
				<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[संसद मार्ग]]></category>

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		<description><![CDATA[सियासत में जीत सबसे अहम होता है। और लोक तन्त्र के लिए लोक और तन्त्र अहम होता है। दुर्भाग्य से दुनिया के सबसे बड़े लोक तन्त्र में आज लोक कि स्थिति इतनी प्रभावशाली नही दिखती कि वह तन्त्र को चलाने ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/INDIA-Poltics-_VICTORY-IN-POLTICS_Poltics.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-26852" title="INDIA Poltics _VICTORY IN POLTICS_Poltics" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/INDIA-Poltics-_VICTORY-IN-POLTICS_Poltics-300x214.jpg" alt="INDIA Poltics _VICTORY IN POLTICS_Poltics" width="300" height="214" /></a>सियासत में जीत सबसे अहम होता है। और लोक तन्त्र के लिए लोक और तन्त्र अहम होता है। दुर्भाग्य  से दुनिया  के सबसे बड़े लोक तन्त्र में आज लोक कि स्थिति इतनी प्रभावशाली नही दिखती कि वह तन्त्र को चलाने वाले सियासतदां पर अंकुश लगा सके, नतीजा तन्त्र भ्रष्ट होता जा रहा है, और तन्त्र को चलाने वाले सियासतदां वो सब कुछ कर रहे हैं जो उनके हित में है सिवाय लोक हित के। मुद्दों के नाम पर महज़ बयानबाजी और झुठे घोषणापत्र ,झुठा इसलिए कि किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में किया वादा यदि पूरी तरह से पूरा हो जाए तो आमजनता के लिए यह देश स्वर्ग हो जाए । आप यकीन कर सकते हैं आप कि मर्जी है लेकिन ऐसा होगा नही इसकी 100% गारंटी है।<br />
राजनीति अब जनसेवा के लिए नही किया जाता है यह अब कारोबार की शक्ल लेता जा रहा है इस देश में ऐसा कोई कारोबार नही जैसा राजनीति जिसमे महज़ चन्द रोज़ कि मेहनत और झुठे वादे के बाद 5 साल के लिए आपको रुतबा और अलीबाबा का ऐसा सीरिन्ज मिल जाता है जिससे आप गरीबो का हक चूस चूस कर अपना खजाना भर सकते हैं । चलो मान लो मेरी बात गलत है तो कोई ऐसे नेता का नाम बताओ जो चुनाव जीता हो और उसका विकास न हुआ हो, क्षेत्र का विकास कार्य तो बीरबल की खिचडी है जो छ: दशक से पक रही है और आने वाले छ: दशक तक पकती ही रहेगी। आज के दौर में राजनीतिज्ञ लोग न तो शासक ही बन पाए और न ही जनसेवक, शासक बन जाते तो कम से कम जनता को यह उम्मीद तो न होती कि यह जनतन्त्र है और यह सब जनता के लिए जनता के द्वारा ही है, हाँ जनसेवक क रूप धारण कर यह जरूर नटवर लाल बन बैठे हैं जो आम जनता को बरगला कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं ।<br />
ज़रा सोचिए,कांग्रेस ने नारा दिया है तो क्या काँग्रेस सोचती है? बीजेपी ने सुथरी कहा है क्या वह सुथरी है? महज़ नारो से न तो विकास होगा न ही बदलाव आएगा । स्वार्थ और कृत्रिम उर्वरक जहाँ एक ओर हरे भरे लोकतन्त्र को नुकसान कर रहा है वहीँ राजनीति को भी दीमक की तरह चाट रहा है । ऐसा न हो कि राजनीतिज्ञों का कारोबारी नज़रिया राजनीति के वजूद के लिए भस्मासुर साबित हो। विकास और बदलाव के लिए जरूरी है जिम्मेदार होना जो अब राजनीति में दिखती ही नही ।</p>
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		<title>कौन है भारत का दुश्मन-ईरान या ईस्राइल?</title>
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		<pubDate>Mon, 20 Feb 2012 14:29:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>ब्रज किशोर सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[संसद मार्ग]]></category>
		<category><![CDATA[कौन है भारत का दुश्मन-ईरान या ईस्राइल?]]></category>

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		<description><![CDATA[मित्रों,एक कहावत है और वह बिलकुल माकूल भी है कि इस दुनिया में कोई भी शह टुच्ची राजनीति से बचकर नहीं रह सकता.राजनीति की जद में परिवार से लेकर विश्व यानि हर कोई है.वैश्विक राजनीति भी घरेलू राजनीति की तरह ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div dir="ltr">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/Iran_India.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-26846" title="Iran_India" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/Iran_India-300x213.jpg" alt="Iran_India" width="300" height="213" /></a>मित्रों,एक कहावत है और वह बिलकुल माकूल भी है कि इस दुनिया में कोई भी शह  टुच्ची राजनीति से बचकर नहीं रह सकता.राजनीति की जद में परिवार से लेकर  विश्व यानि हर कोई है.वैश्विक राजनीति भी घरेलू राजनीति की तरह निरंतर  परिवर्तनशील है और यहाँ भी वही सिद्धांत काम करता है यानि कोई न तो किसी का  स्थायी मित्र होता है और न ही स्थायी शत्रु.वैश्विक कूटनीति में भी किसी  देश का दूसरे देश का शत्रु या मित्र होना केवल एक चीज पर निर्भर करता है और  वो है परिस्थिति.<br />
मित्रों,भारत नेहरु के ज़माने से ही <span style="text-decoration: underline;"><strong><em>ना काहू </em></strong></span><em><span style="text-decoration: underline;"><strong>से दोस्ती, ना काहू से वैर</strong></span></em> के मार्ग पर यानि <strong><em><span style="text-decoration: underline;">कथित गुटनिरपेक्षता की नीति</span></em></strong> पर चलता आ रहा है और उसने इसका भारी खामियाजा अपनी कई लाख वर्ग किलोमीटर  भूमि चीन और पाकिस्तान के हाथों खोकर भुगता भी है.वर्तमान में भी हमारे लिए  अब भी दुनिया की कूटनीतिक जलवायु माकूल नहीं है.चीन और पाकिस्तान के इरादे  अब भी हमारे प्रति नेक नहीं हैं.दुर्भाग्यवश हमारे दोनों चिरशत्रुओं की  मित्रता रात दूनी दिन चौगुनी की रफ़्तार से बढती चली जा रही है.अभी  अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में इस बात की चर्चा बड़े ही जोर-शोर से चल रही है  कि पाकिस्तान अपने द्वारा १९४७ में कब्जाए गए कश्मीर को चीन को सौंपने जा  रहा है.इस तरह की दुखद संभावित स्थितियों से अगर भारत को बचना है तो उसे  जल्द-से-जल्द अपनी मर्जी से ओढ़े गए गुटनिरपेक्षता के चोले को सदा-सदा के  लिए उतार फेंकना होगा.खुदा न करे कभी अगर चीन और पाकिस्तान दोनों ने भारत  के खिलाफ एक साथ युद्ध का मोर्चा खोल दिया तो बिना अमेरिकादि पश्चिमी देशों  और जापान-आस्ट्रेलिया जैसे पूर्वी देशों की सहायता के हम शायद अपना  अस्तित्व भी नहीं बचा पाएँगे.<br />
मित्रों,भारत के सामने जो सबसे ताज़ी चुनौती कूटनीतिक  मोर्चे पर आ खड़ी हुई है वो भारत के कथित ऐतिहासिक मित्र ईरान और पश्चिमी  देशों में चल रही शीतयुद्ध जैसी खींचतान के चलते.पश्चिमी देश और ईस्राइल  ईरान के परमाणु कार्यक्रम को किसी भी कीमत पर रोकना चाहते हैं मगर ईरान  रूकने को तैयार ही नहीं है.उन्होंने ईरान पर कई तरह के व्यापारिक और आर्थिक  प्रतिबन्ध लगा दिए हैं लेकिन नई परिस्थितियों में ईरान के लिए संकटमोचक  बनकर उभरा है भारत.शायद इसके लिए ५ राज्यों का विधानसभा चुनाव भी जिम्मेदार  है.यह तो हुआ भारत-ईरान संबंधों का एक पहलू.इसका दूसरा पहलू यह भी है कि  ईरान को भारत के सरोकारों से कुछ ज्यादा लेना-देना नहीं है और वो भारत को  एक ऐसा मजबूर देश समझता है जो अपने कुल तेल आयत का १२% उससे करके काफी हद  तक उस पर आश्रित है.तभी तो उसने दिल्ली में इस्राइली दूतावास के सदस्य के  परिजनों पर संदिग्ध हमला करने की गुस्ताखी की है.हालाँकि अभी तक हमारी  चिरकारी सुरक्षा-एजेंसियां किसी नतीजे पर नहीं पहुंची हैं और अगर हम उनकी  योग्यता को मद्देनजर रखें तो कभी पहुँचनेवाली भी नहीं हैं परन्तु जार्जिया  और थाईलैंड में हुए विस्फोटों से मिलनेवाली संभावनाओं की कड़ियों को अगर हम  दिल्ली-विस्फोट से जोड़कर देखें तो काफी हद तक धुंध साफ़ हो जाती है कि  दिल्ली-हमला भी ईरान प्रायोजित ही था.यदि यह सत्य है तो स्पष्ट हो जाता है  कि भले ही भारत ईरान को अपना अभिन्न मित्र माने वो भारत को अपना मित्र तक  नहीं मानता.वैसे अगर हम कश्मीर के मुद्दे पर विभिन्न मंचों पर समय-समय पर  ईरान की नीतियों को देखें तो पाएँगे कि उसने हमेशा पाकिस्तान का साथ दिया  भारत का नहीं.उसके सर्वोच्च धार्मिक  नेता अयातुल्ला खोमेनी तो लगातार  दुनियाभर के मुसलमानों से कश्मीरी अलगाववादियों की सहायता करने की अपील भी  करते रहे हैं.फिर भी न जाने किन मजबूरियों के कारण भारत-सरकार ईरान से  एकतरफा और जबरदस्ती की दोस्ती गांठने पर तुली हुई हैं?भारत कोई विधवाओं का  देश नहीं है कि कोई भी <strong><em>ऐरा गैरा नत्थू खैरा </em></strong>भारत की पवित्र  भूमि को अपने कुत्सित स्वार्थों का रणक्षेत्र बना दे.निश्चित रूप से ईरान  ने दिल्ली में ईस्राइली दूतावासकर्मियों पर हमला करके जो कुछ भी किया है वह  भारत की शान में गुस्ताखी है,हमारी संप्रभुता पर हमला है,हमारी गैरत को एक  ललकार है और इसे हम भारतवासी हरगिज सहन नहीं करनेवाले!<br />
मित्रों,जहाँ तक ईस्राइल का सवाल है तो उसने कभी  भारत-विरोधी तेवर नहीं दिखाए हैं और लगभग निःस्वार्थ भाव से हमारी मदद करता  रहा है.आज भी सामरिक तकनीक के मामले में काफी हद तक हम उस पर निर्भर हैं  जबकि हमने नेहरु-युग से ही फिलिस्तीनियों का बिना शर्त समर्थन करके उसे  बार-बार चिढ़ाया है.हम नहीं चाहते कि दोनों में से किसी एक का नामोनिशान  विश्व के मानचित्र से मिट जाए.दुनिया का इकलौता यहूदी राष्ट्र ईस्राइल और  मुस्लिम देश फिलिस्तीन दोनों रहें और फले-फूलें परन्तु उस क्षेत्र में  स्थायी शांति तभी कायम हो सकती है जब दोनों ही पक्ष सहअस्तित्व के  सिद्धांतों को स्वीकार कर लें.<br />
मित्रों,यह अति कड़वा सत्य है और भविष्य में भारत की  परेशानियाँ बढ़ानेवाला भी कि दुनियाभर में मुसलमानों के बीच कट्टरता नए  उभार पर है और मिस्र से लेकर मालदीव तक उदारवादी शक्तियां हाशिए पर चली गईं  हैं और कट्टरवादियों को धरती और आकाश के बीच सिर्फ  एक ही धर्म चाहिए  इस्लाम और दूसरा कोई नहीं.यह सर्वविदित है कि हिन्दूबहुल भारत में  मुसलमानों को जितनी आजादी,सुविधाएँ और अधिकार प्राप्त हैं उतनी किसी  इस्लामिक देश में भी नहीं है.फिर भी हमारे कुछ मुसलमान भाई अपनी जेहादी  मानसिकता को त्याग नहीं पा रहे हैं अन्यथा भारत में इन्डियन मुजाहिद्दीन और  सिम्मी जैसे आतंकवादी संगठन नहीं होते जिन्होंने शायद दिल्ली हमले में भी  ईरान की मदद की है.<br />
मित्रों,आज ईरान वैश्विक राजनीति में अकेला पड़ता जा रहा  है.ऐसे में उसके साथ चिपके रहने की हमारी जिद हानिकारक ही सिद्ध होगी.माना  कि आयातित तेल का ज्यादा मूल्य देकर हमें सम्बन्ध-विच्छेद का मूल्य चुकाना  पड़ सकता है लेकिन उससे भी कहीं कई गुना ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी जब हम  उसके साथ रहेंगे.इस सन्दर्भ में मुझे अकबर-बीरबल कथा से एक कथा का सन्दर्भ  लेना समीचीन मालूम पड़ता है.हुआ यह कि बादशाह अकबर एक दोपहर को बीरबल के  साथ भोजन कर रहे थे.तभी उन्हें न जाने क्या सूझी कि लगे बैगन की बड़ाई करने जिसे कुछ ही समय पहले पुर्तगाली भारत में लेकर आए थे.बीरबल ने भी कहा कि <strong><em>&#8216;बजा फ़रमाया हुजूर,बैगन तो सभी सब्जियों का राजा है&#8221; </em></strong>फिर  कुछ लम्हों तक ईधर-उधर की बातें करने के बाद अकबर लगे बैगन की बुराई करने  परन्तु बीरबल तो हमेशा की तरह सचेत थे.सो उन्होंने भी तुरंत हामी भर दी और  यहाँ तक कह दिया कि <strong><em>&#8220;हुजूर मैं तो कहता हूँ कि इसकी खेती पर ही प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए.&#8221;</em></strong>अकबर चौंके और पूछा कि बीरबल पहले यह तो निर्णय कर लो कि बैगन अच्छा है या ख़राब.बीरबल ने भी छूटते ही कहा कि <strong><em>&#8220;हुजूर,बैगन जाए चूल्हे की भांड में,मुझे क्या?</em></strong><strong><em>मुझे  तो बस आपसे मतलब है जो मेरी रोजी-रोटी चलते हैं,आप कहते हैं कि बैगन अच्छा  है तो अच्छा है और आप कहते हैं कि बुरा है तो बुरा है.&#8221;</em></strong>इसी तरह भारत-सरकार को भी ईरान को नहीं बल्कि अपने हितों को ध्यान में रखना चाहिए.ईरान भी तो यही कर रहा है.</p>
</div>
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		<title>लोकतांत्रिक राजनीति में कारपोरेट घरानों की घुसपैठ</title>
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		<pubDate>Mon, 20 Feb 2012 08:02:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[लोकतांत्रिक राजनीति में कारपोरेट घरानों की घुसपैठ एक चिंता का विषय है। राजनीति में धन की जरूरत होती है यह बात सर्वविदित है। यह धन पहले कुछ जनता और ज्यादा पूंजीपतियों से चंदे के रूप में लिया जाता था। फिर ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/indian-indian-poltics.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-26840" title="indian-indian poltics" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2012/02/indian-indian-poltics.jpg" alt="indian-indian poltics" width="229" height="221" /></a>लोकतांत्रिक राजनीति में कारपोरेट घरानों की घुसपैठ एक चिंता का विषय है। राजनीति में धन की जरूरत होती है यह बात सर्वविदित है। यह धन पहले कुछ जनता और ज्यादा पूंजीपतियों से चंदे के रूप में लिया जाता था। फिर वसूली शुरू हो गई। इस वसूली के कार्य में गुण्डे-माफिया सहायक होते थे अतः राजनीति में उनकी एक भूमिका हो गई। बहुमत जुटाने के वक्त उनका बाहुबल भी उपयोगी सिद्ध होने लगा। लेकिन पैसों की बढ़ती भूमिका से अब निजी कम्पनियों ने राजनीति पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। अब तो निजी कम्पनियां ही कई बार नीतियां तय करती हैं और इनके नुमाइंदों की सरकारों में घुसपैठ होती है, कहीं तो सीधे मंत्री के ही रूप में। हम जिनको जन प्रतिनिधि चुन कर भेजते हैं वे निजी कम्पनियों के दलाल हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2 जी स्पैट्रम की आवंटन नीति को खारिज कर जितने भी 122 लाइसेंस दिए गए थे उनको रद्द कर देने से अब यह साफ हो गया है कि केन्द्र सरकार के मंत्रियों ने देश को बेशर्मी से लूटा है। कहा जा रहा है कि प्रधान मंत्री ने ए. राजा को ये आवंटन न करने का सुझाव दिया था। किन्तु प्रधान मंत्री का यह कहना कि वे गठबंधन की सरकार को बचाने के लिए राजा को रोक नहीं रहे थे तर्कसंगत बात नहीं है। इस पूरे कांड के लिए प्रधान मंत्री जिम्मेदार हैं और उन्हें इस्तीफा देना ही चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">इसी तरह उत्तर प्रदेश में किस पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा था इसका अंदाजा खुद मायावती ने अपनी ही सरकार के जितने मंत्री निकाले हैं उससे लगाया जा सकता है। यह कैसे माना जा सकता है कि प्रदेश में जो कुछ भी हो रहा था वह मुख्य मंत्री की जानकारी के बिना हो रहा था? क्या पोंटी चड्ढा या बाबू सिंह कुशवाहा को बहन जी का संरक्षण प्राप्त नहीं था? जैसे केन्द्र के भ्रष्टाचार के लिए प्रधान मंत्री दोषी हैं उसी तरह प्रदेश के भ्रष्टाचार के लिए मायावती दोषी हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">उत्तर प्रदेश में सत्ता के लिए दावेदार सभी बड़े दल भ्रष्ट हैं या/और साम्प्रदायिक। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि भ्रष्टाचार की मूल वजह हमारी राजनीतिक व्यवस्था का भ्रष्टाचार से वित्तीय पोषण है। जब तक राजनीतिक व्यवस्था का चरित्र नहीं बदलता तब तक भ्रष्टाचार से पीछा छुड़ाना मुश्किल है।</p>
<p style="text-align: justify;">युवा नेताओं का बोलबाला है। किन्तु क्या ये सामान्य युवा हैं? 30-40 वर्ष की आयु में कौन सा सामान्य युवा किसी राष्ट्रीय-प्रादेशिक दल का नेता बन सकता है, वह भी बिना कोई जमीनी काम किए हुए? ये तथाकथित युवा नेता तो सामंती वंशवादी परम्परा की देन हैं जिन्हें पार्टी नेतृत्व विरासत में मिल गया है। लोकतंत्र में यह सवाल तो कोई पूछ ही नहीं रहा कि नेता का बेटा कैसे नेता बन गया? यह तो घोर अलोकतांत्रिक बात है। जिस दल के अन्दर लोकतंत्र नहीं है वह लोकतंत्र को कैसे मजबूत करेगा? सामंती सोच वाली राजनीति जो भ्रष्टाचार और अपराध की नींव पर टिकी है एक भ्रष्ट-आपराधिक-सामंती व्यवस्था का ही निर्माण कर सकती हैं। ऐसी राजनीति को जड़-मूल से खत्म किए बगैर हम सही लोकतंत्र का सपना साकार नहीं कर सकते।</p>
<p style="text-align: justify;">किन्तु आज लोकतंत्र के नाम पर यही लोकतंत्र विरोधी दल व्यवस्था पर हावी हैं जो सत्ता को अपनी जागीर समझते हैं और मनमाने ढंग से काम करते हैं। यदि इन्हें कोई चुनौती देता है, जैसे अण्णा हजारे ने दिया, तो यह लोकतंत्र की दुहाई देने लगते हैं। क्या भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर, अपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को संसद व विधान सभाओं में पहुंचाकर, दलों को निजी कुनबों की तरह चलाते हुए ये लोकतंत्र व संसद की गरिमा को बढ़ा रहे हैं या गिरा रहे हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">राजनीति से मुद्दे गायब हो गए हैं इसलिए संसदीय बहस या कार्यवाही की गम्भीरता भी खत्म हो गई। क्या हमारे संविधान निर्माताओं में से किसी ने सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि विधायक सदन में बैठ कर अश्लील तस्वीरें देख रहे होंगे? क्या इस तरह की कार्यवाही से सदन की गरिमा नहीं गिरती? लेकिन फिर भी राजनीतिक दल अपने तौर तरीके बदलने को तैयार नहीं। वे उन्हीं भ्रष्ट व आपराधिक पृष्ठभूमि वालों पर निर्भर हैं जो उनकी सरकारें बनवा सकते हैं। राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के कारण इन दलों के लिए बड़ा मुश्किल हो गया है कि वे गलत तरीके और लोगों को छोड़ सही को अपना लें। अण्णा हजारे के आंदोलन की तरह अब जनता ही उन्हें मजबूर करेगी की वे बदलें। अन्यथा जनता उन्हें अपने मताधिकार से खारिज कर देगी।</p>
<p style="text-align: justify;">साभार -सिटिजन न्यूज सर्विस</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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