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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" gd:etag="W/&quot;DUECRXw_fCp7ImA9WhRUEEk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358</id><updated>2012-01-20T13:51:04.244+05:30</updated><category term="गांधी" /><category term="फॉस्टर" /><category term="मोदी" /><category term="गोड़ेसे" /><category term="अजदक" /><category term="बिडला" /><category term="उदय प्रकाश" /><category term="शाकिर अली" /><category term="मोहल्ला" /><title>अखाड़े का उदास मुगदर</title><subtitle type="html">प्यार की कहानियों के 563 सिलसिले. और नफरत पर कुछ निबंध</subtitle><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://kataksh.blogspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false&amp;v=2" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>151</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/atom+xml" href="http://feeds.feedburner.com/kataksh" /><feedburner:info uri="kataksh" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><entry gd:etag="W/&quot;C0QERX4_eip7ImA9WxBQFko.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-8411536468873260825</id><published>2010-01-17T01:16:00.002+05:30</published><updated>2010-01-17T01:18:24.042+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2010-01-17T01:18:24.042+05:30</app:edited><title>किताबें बचेंगी तो पढ़ना बचेगा, लिखना भी</title><content type="html">कई समय से मन था कि कोई ऐसी जगह बने जहां हिंदी किताबों के बारे में नये सिरे से बात हो सके. अगर किताबें होंगी तो लिखना और पढ़ना भी बचा रहेगा. हमारी ये बातचीत ही हिंदी को बचा सकेगी. एक तरीका यह सोचा है कि हम अपनी अपनी पसंदीदा हिंदी किताबों की फेहरिस्त बनाएं और आपस में बांटे. मैं अपनी पसंदीदा किताबों की फेहरिस्त यहां दे रहा हूं. वे किसी क्रम में नहीं हैं, न ही अंतिम हैं. सिर्फ वे हैं जिन्होंने मुझे बचाये रखने और बनाने में मदद की. जो मुझे अभी याद हैं. बहुतेरी तो रायपुर में रामकृष्ण मिशन की लाइब्रेरी में पढ़ने को मिलीं, जब मैं शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय से बीएससी होने के असफल प्रयास कर रहा था. फिर बाद की भी हैं. हिंदी किताबें हमारे विमर्श से बाहर खिसकती जा रही हैं. भले ही हिंदी पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है. अब जब मैं हिंदी प्रदेशों से बाहर हूं तो उस तिकड़म के बारे में सोचता हूं, जहां से ये पता चल सके कि हिंदी में इधर क्या चल रहा है. जो जवाब मिलते हैं वे फुटकर होते हैं. ये ही कितना साफ है कि हम किताबों से ज्यादा हिंदी मठाधीशों की उठापटक में कितना रस लेते हैं. ये एक कोशिश उस विमर्श में वापस जाने की. यह जानने की कि जो कहीं रह- छूट गया हो, उसे वापस पाया जा सके. उपन्यास के नाम हैं, पर कहानी और कविता में कई जगह लेखक कवि के नाम से ही काम चलाया है. &lt;br /&gt;उपन्यास&lt;br /&gt;1. वे दिन - निर्मल वर्मा&lt;br /&gt;2. कितने पाकिस्तान - कमलेश्वर&lt;br /&gt;3. अपने अपने अजनबी- अज्ञेय&lt;br /&gt;4. नौकर की कमीज – विनोद कुमार शुक्ल&lt;br /&gt;5. दीवार में खिड़की रहती थी – विनोद कुमार शुक्ल&lt;br /&gt;6. कलिकथा वाया बाइपास- अलका सरावगी&lt;br /&gt;7. खिलेगा तो देखेंगे – विनोद कुमार शुक्ल&lt;br /&gt;8. एक चीथड़ा सुख – निर्मल वर्मा&lt;br /&gt;9. शेखर एक जीवनी – अज्ञेय&lt;br /&gt;10. नाच्यो बहुत गोपाल – अमृतलाल नागर&lt;br /&gt;11. खंजन नयन – अमृतलाल नागर&lt;br /&gt;12. ययाति – विष्णु सखाराम खांडेकर (मूल मराठी)&lt;br /&gt;13. मैला आंचल – फणीश्वर नाथ रेणु&lt;br /&gt;14. आधा गांव – राही मासूम रजा&lt;br /&gt;15. राग दरबारी – श्रीलाल शुक्ल&lt;br /&gt;16. पहला गिरमिटिया – गिरिराज किशोर&lt;br /&gt;17. 74 डाउन – रमेश बक्षी&lt;br /&gt;18. कसप – मनोहर श्याम जोशी&lt;br /&gt;19. आवारा मसीहा – विष्णु प्रभाकर&lt;br /&gt;20. कुरू कुरू स्वाहा – मनोहर श्याम जोशी&lt;br /&gt;21. कहां पाऊं उसे- समरेश बसु कालकूट (मूल बांग्ला)&lt;br /&gt;22. अमृत कुंभ की खोज में – समरेश बसु कालकूट (मूल बांग्ला)&lt;br /&gt;23. टोपी शुक्ला – राही मासूम रजा&lt;br /&gt;24. कटरा बी आरजू – राही मासूम रजा&lt;br /&gt;25. शहर में कर्फ्यू- विभूति नारायण राय&lt;br /&gt;26. मित्रो मरजानी – कृष्णा सोबती&lt;br /&gt;27. गुनाहों का देवता – धर्मवीर भारती&lt;br /&gt;28. &lt;br /&gt;कहानी&lt;br /&gt;29. सहादत हसन मंटो&lt;br /&gt;30. प्रेमचंद&lt;br /&gt;31. मोहन राकेश&lt;br /&gt;32. कमलेश्वर&lt;br /&gt;33. राजेंद्र यादव&lt;br /&gt;34. निर्मल वर्मा&lt;br /&gt;35. श्रीकांत वर्मा&lt;br /&gt;36. उदय प्रकाश&lt;br /&gt;37. ज्ञानरंजन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता&lt;br /&gt;38. रामचरितमानस – तुलसी दास&lt;br /&gt;39. कबीर&lt;br /&gt;40. अमीर खुसरो&lt;br /&gt;41. नज़ीर अकबराबादी&lt;br /&gt;42. संसद से सड़क तक - धूमिल&lt;br /&gt;43. साये में धूप - दुष्यंत कुमार&lt;br /&gt;44. दुनिया रोज बदलती है- आलोक धन्वा&lt;br /&gt;45. नारों के अंधे शहर में- शिशु रश्मि&lt;br /&gt;46. शहर अब भी संभावना है- अशोक वाजपेयी&lt;br /&gt;47. चांद का मुंह टेढ़ा है – मुक्तिबोध&lt;br /&gt;48. सुदामा पांडे का प्रजातंत्र – धूमिल&lt;br /&gt;49. मगध – श्रीकांत वर्मा&lt;br /&gt;50. सदानीरा – अज्ञेय की सारी कविताएं&lt;br /&gt;51. कहीं नहीं वहीं – अशोक वाजपेयी (सारी कविताएं)&lt;br /&gt;52. सब कुछ होना बचा रहेगा- विनोद कुमार शुक्ल (सारी कविताएं)&lt;br /&gt;व्यंग्य&lt;br /&gt;53. शरद जोशी&lt;br /&gt;54. हरिशंकर परसाई&lt;br /&gt;काव्य नाटक&lt;br /&gt;55. अंधा युग – धर्मवीर भारती&lt;br /&gt;56. एक कंठ विषपायी – दुष्यंत कुमार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने हिंदी की कौन सी किताबें पढ़ी हैं जो आपको लगता है मुझे पढ़नी ही चाहिए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-8411536468873260825?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/2lfq708H9fM" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/8411536468873260825/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=8411536468873260825" title="25 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/8411536468873260825?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/8411536468873260825?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/2lfq708H9fM/blog-post.html" title="किताबें बचेंगी तो पढ़ना बचेगा, लिखना भी" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><thr:total>25</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2010/01/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkABSH4zcSp7ImA9WxNQF0w.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-5959063048567804202</id><published>2009-09-23T19:23:00.004+05:30</published><updated>2009-09-23T19:35:59.089+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-23T19:35:59.089+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 391: उस रात कुछ नहीं हुआ. वह बहुत ज़्यादा शराब पीता था</title><content type="html">वह बहुत ज्यादा &lt;a href="http://www.outlookindia.com/article.aspx?229205"&gt;पढ़ी लिखी औरत&lt;/a&gt; नहीं थी और सिर्फ पंजाबी में ही लिखती थी. दूसरी भाषाओँ का लिखा वह बमुश्किल पढ़ पाती थी और इसलिए लिखने में कोई बहुत तहजीब नहीं थी. वह बॉलीवुड पर मरी जाती थी. उसके लिए कामयाबी का असली मुक़ाम अपने उपन्यास या कहानियों की फिल्म बनते देखना था. पंजाबी से अंग्रेजी में तर्जुमा होने वाली उसकी पहली नॉवेल पिंजर (द स्केलेटन) थी. ये तर्जुमा मैंने सिर्फ मोहब्बत के नाते किया था. मैंने उस किताब की पूरी रॉयल्टी उसे दे दी इस शर्त पर कि वह अपनी लव लाइफ का पूरा चिट्ठा मुझे तफसील से बता दे. कई बैठकें हुयीं भी. जिस इकलौते इश्क़ का जिक्र उसने किया वह फ़िल्मी गीतकार साहिर लुधियानवी को लेकर था, जिससे वह कभी मिली नहीं थी. पर ख़त ओ खिताबत जरूर हुयी थी. मुझे यह सुनकर काफी निराशा हुयी. मैंने उससे कहा, ' इतनी सी बात तो एक रसीदी टिकट के पीछे लिखी जा सकती है.' बहरहाल जब उसने अपनी आत्मकथा लिखी तो उसका नाम उसने रखा - रसीदी टिकट (हालाँकि रसीदी टिकट में जिक्र है कि &lt;a href="http://www.outlookindia.com/article.aspx?229060"&gt;साहिर &lt;/a&gt;लाहौर में उससे मिला करते थे- एडिटर, आउटलुकइंडिया.कॉम)आखिरकार लुधियानवी से उसकी मुलाक़ात यहाँ दिल्ली में हुयी। उसको उड़ने से डर लगता था, सो वह बम्बई से ट्रेन लेकर पहुंचा. वे क्लारिजेस होटल में मिले, जहाँ उनकी महान प्रेम कहानी को अपने अंजाम तक पहुंचना था. कुछ नहीं हुआ. लुधियानवी बहुत ज्यादा शराब पीता था.&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;&lt;em&gt;&lt;a href="http://www.outlookindia.com/article.aspx?229205"&gt;( लेखिका अमृता प्रीतम की मृत्यु पर उनके मित्र खुशवंत सिंह का लेख। इसे श्रद्धांजली कहने में अजगर को संकोच है) &lt;/a&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-5959063048567804202?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/Bo8NTkFEIdw" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/5959063048567804202/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=5959063048567804202" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/5959063048567804202?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/5959063048567804202?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/Bo8NTkFEIdw/love-story-391.html" title="LOVE STORY # 391: उस रात कुछ नहीं हुआ. वह बहुत ज़्यादा शराब पीता था" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><thr:total>4</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/09/love-story-391.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0MGRn8-cSp7ImA9WxNQF00.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-7475188425773586371</id><published>2009-09-23T15:10:00.000+05:30</published><updated>2009-09-23T15:53:47.159+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-23T15:53:47.159+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 392: फ़ोन पर तैरती हुयी आवाज़ असल की आवाज़ से अलग होती</title><content type="html">बहुत सारे अँधेरे खामोश में बीच एक शब्द जैसे एक झील में उछाला हुआ कंकर और डूबने से पहले फिर फिर उछलता हुआ. उस अँधेरे खामोश में आवाज़ का अपना अमूर्त था, अपना जादू, अपना यथार्थ. दूरी की खाई को लांघती हुयी, माइकलएंजेलो की पेंटिंग में बढ़ी हुयी उंगली की तरह. एक लम्बी रस्सी का सिरा पकड़ता हुआ, थमता हुआ, पूछता हुआ उस सन्नाटे की जगह का पता जहाँ उसे उतरना है, अदृश्य की सीढियों से.&lt;br /&gt;वह उस अदृश्य का हिस्सा होती. अदृश्य की अपनी आज़ादी होती. अदृश्य का अपना विन्यास. जैसे जैसा चाहा, वैसा. अँधेरा मखमल बन जाता. खुश होने के लिए ऑंखें बंद हो जाती. आवाज़ अपने मायने उस आज़ाद अदृश्य में गढ़ती. आवाज़ उसे जगाती, छेड़ती. आवाज़ उसके साथ प्यार करती. आवाज़ उसके बिस्तर की सलवटों को पढ़ती. आवाज़ उसे सुला देती. आवाज़ उसके सपनों और स्मृतियों को गड्ड मड्ड कर देती. कभी यहाँ से बुलाती. कभी वहां से.  आवाज़ कवितायेँ पढ़ती. आवाज़ एक लम्बा वाक्य कहती. आवाज़ एक लम्बे वाक्य को दुबारा कहती. आवाज़ कई बार एक दूसरे वाक्य को अधूरा छोड़ देती. आवाज़ चुप्पी को ताड़ जाती, उसे समझा लेती, बुझा लेती. आवाज़ उस वाक्य को पूरा करती. आवाज़ उसे पेट से हंसा देती. और कई बार इतनी खामोशी से भर देती कि हाथ बढाकर कांच पर जामे कुहरे की तरह उसे साफ़ करना पड़ता. आवाज़ कई बार शरीर होती, कई बार आत्मा. अक्सर आवाज़ के मायने शब्द के मायनों से अलग होते.&lt;br /&gt;वह हुंकारे भरती. पलट कर आवाज़ देती. नए विन्यास और व्याकरण को रचते. जो आसमान, खामोशी, रात के पहर, अँधेरा तय करता.&lt;br /&gt;फ़ोन पर तैरती हुयी आवाज़ असल की आवाज़ से अलग होती. असल में बहुत सारा शोर होता. ठण्ड, गर्मी, उमस, पसीना, चाँद, बदल, बारिश, अख़बार, दुनिया. असल का एकांत बँटा हुआ होता. असल का ध्यान कई बार भटका हुआ.&lt;br /&gt;वह अँधेरे खामोश में आवाज़ का इंतज़ार करती. खामोश अँधेरे एकांत में आवाज़ का अपना सच था. और असल का अपना. दोनों एक नहीं थे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-7475188425773586371?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/UXllKc4YQd0" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/7475188425773586371/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=7475188425773586371" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/7475188425773586371?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/7475188425773586371?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/UXllKc4YQd0/love-story-392.html" title="LOVE STORY # 392: फ़ोन पर तैरती हुयी आवाज़ असल की आवाज़ से अलग होती" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><thr:total>3</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/09/love-story-392.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEICSX8yfyp7ImA9WxJRE0o.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-3832065858400383918</id><published>2009-05-15T12:46:00.003+05:30</published><updated>2009-05-15T12:59:28.197+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-15T12:59:28.197+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 393: चाहता है कि वह गलती ज़िन्दगी भर उसका पीछा करे</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sg0ZipNKphI/AAAAAAAAAdA/XSWxsn_N4jE/s1600-h/fc+hill+graffiti.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5335949216471229970" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sg0ZipNKphI/AAAAAAAAAdA/XSWxsn_N4jE/s400/fc+hill+graffiti.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; (मित्र की ही)&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;लोग उस पहाड़ी पर देवी के दर्शन के लिए चढ़ा करते हैं. लेकिन वो दोनों एक दूसरे के लिए हाँफते हुए सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे. उन्हें नहीं पता था कि ऊपर चढ़ने से क्या होगा. लेकिन उन्हें यह पता था कि ऊपर चढ़ते और उतरते हुए वो दोनों साथ रह सकते हैं. सबसे ऊपर पहुँचकर वे देवी के मंदिर में नहीं गए. थोड़े नीचे एक चट्टान के पीछे बैठ गए. जब साँसें थमीं तो दोनों ने उस चट्टान पर अपना नाम लिखा. चट्टान पर जमी हुई काई पर नाम लिखने में दिक्कत भी नहीं हुई. दोनों को भ्रम न था कि चट्टान पर नाम लिखने से उनका प्यार अमर हो जाएगा या फिर यह नाम कभी नहीं मिटेगा. आधे घंटे बाद दोनों नीचे उतर आए. तब तक सूरज ढल चुका था. वापस लौटते हुए वो जंगलों के बीच पहुंच गए. पहले तो एक दूसरे का हाथ थामे इतने मगन थे कि पता ही नहीं चला. लेकिन जब अंधेरा गहराने लगा और जंगल घना होने लगा तो दोनों को महसूस हुआ कि यह रास्ता ग़लत है.ग़लतियाँ तो हर किसी को सुधारनी पड़ती हैं वरना वो सही किए जाने तक पीछा करती रहती हैं. एक दिन उसने ग़लत रास्ता चुनने की ग़लती सुधार ली. वह अकेला रह गया.उसके बाद से वह उस पहाड़ी पर कभी नहीं गया. उसे यक़ीन है कि उस चट्टान पर जमी काई ने भी अगले मौसम में अपनी ग़लती सुधार ली होगी और नाम मिटा दिए होंगे. सुना है कि अब मंदिर से उतरकर जंगल के उस रास्ते पर कोई नहीं भटकता क्योंकि जंगल विभाग ने वह सड़क ही बंद कर दी है. जंगल विभाग ने भी अपनी ग़लती सुधार ली.लोग उसे कहते हैं कि उसने प्यार करके ग़लती की थी. उसे ऐसा नहीं लगता. अगर वह ग़लती थी भी तो वह उसे सुधारना नहीं चाहता. चाहे तो शायद सुधार भी नहीं सकता. लेकिन वह चाहता है कि यह ग़लती ज़िंदगी भर उसका पीछा करती रहे.प्यार अपनी स्मृति में भी प्यार ही रहता है.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-3832065858400383918?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/_ekJ1rxSO5M" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/3832065858400383918/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=3832065858400383918" title="9 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/3832065858400383918?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/3832065858400383918?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/_ekJ1rxSO5M/love-story-393.html" title="LOVE STORY # 393: चाहता है कि वह गलती ज़िन्दगी भर उसका पीछा करे" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sg0ZipNKphI/AAAAAAAAAdA/XSWxsn_N4jE/s72-c/fc+hill+graffiti.JPG" height="72" width="72" /><thr:total>9</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/05/love-story-393.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkEAR3gzfSp7ImA9WxJTFko.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-5756076221625543764</id><published>2009-04-25T19:38:00.006+05:30</published><updated>2009-04-25T20:14:06.685+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-25T20:14:06.685+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 460- 394:  एक ज़िंदगी की एक लाइन में दुनिया भर से 66 कहानियां प्यार की</title><content type="html">&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SfMeLtbduHI/AAAAAAAAAc4/PJPPbG8VIok/s1600-h/secrets+of+the+floating+world+compound+eye.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5328635970631612530" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SfMeLtbduHI/AAAAAAAAAc4/PJPPbG8VIok/s400/secrets+of+the+floating+world+compound+eye.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;em&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;(धूमिल की एक कविता ऐसे शुरू होती है- ओ अपराध सी अंधी, पाप सी उजागर, आदम इरादों से बित्ता भर ऊपर उठी हुई पृथ्वी. ये 66 कहानियां ट्विटर पर मिलीं. &lt;a href="http://secrettweet.com/"&gt;एक ऐसी साइट पर जहां आप अंग्रेजी के 140 कैरेक्टर्स में अपना रहस्य लिख कर उस भार से मुक्त हो सकते हैं, जो आपको खाये जा रहा है. &lt;/a&gt;अजगर पहले तो उन्हें एक वोयरिस्ट की तरह पढ़ता रहा, पर जल्द ही लगा कि रहस्य की हर पंक्ति के पीछे एक जीता जागता संसार है, एक जीती-मरती जिंदगी है. चरित्र हैं. 140 कैरेक्टर के विन्यास में न बांटे के दर्द से छुटकारा पाते हुए. जरूरी नहीं कि यहां जो कहा गया, वह सब कुछ सच हो. पर ये आप भी जानते हैं और मैं भी ये सब कुछ झूठ नहीं है क्योंकि हम सब के सच का कोई न कोई हिस्सा इससे मिलता जुलता है. भले ही ज्यादातर लाइनें अमेरिका से हैं. ज्यादातर रहस्य औरतों के हैं. ज्यादातर उलझनें उन फैसलों के बारे में हैं, जहां जिंदगी दुनिया बनने बनाने की देहरी पर कदम रखती है. और ज्यादातर भयावहताएं एक वाक्य में कही जा सकती हैं, भले ही हम उनके लिखने वालों को कभी नहीं जान पाएंगे सिवा एक नंबर के )&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;36467&lt;/strong&gt; अच्छा होता कि मैं अपने पति को कभी न छोड़ती. मैं अपने बच्चों की आंखों में तकलीफ पढ़ सकती हूं. अच्छा होता कि मैं लौट सकती और सब ठीक कर देती.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;36538&lt;/strong&gt; सबसे बड़ा डर मेरा यह है कि वह जिस शख्स के काबिल है, वह मैं नहीं हूं. मुझे यह खुद को रोज़ बताना पड़ेगा कि मैं वह शख्स बनकर रहूं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;36520&lt;/strong&gt; मुझे दस साल लगे अपने एब्यूजिव पति को छोड़ने में. अब वह कसमें खा रहा है कि वह बदल गया है और मुझे वापस चाहता है. आखिर अब न कहने में इतनी दिक्कत क्यों हो रही है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;36428&lt;/strong&gt; बीवी, कामकाजी, फुलटाइम स्टूडेंट, पति दूसरी स्टेट में, मुझे न मदद मिलती है न प्यार. भाग जाने के लिए एक सेलिब्रिटी की कल्पना&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;36423&lt;/strong&gt; मुझे बात वहीं खत्म कर देनी थी, जब शादी की रात मेरी बीवी रो पड़ी थी, क्योंकि वह मेरे साथ सोना नहीं चाहती थी. यह 1993 की बात है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;36356&lt;/strong&gt; अगर मुझे पता होता कि शादी इस कदर मुश्किल है, तो शादी पैसे के लिए की जाती.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;36353&lt;/strong&gt; मेरा मंगेतर मुझसे धोखा कर रहा है, मुझे शादी के दो रोज पहले पता चला. मैंने फिर भी उसी से शादी की, क्योंकि मेरा कोई दोस्त नहीं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;36259&lt;/strong&gt; बीवी और उसकी सहेली आजकल ज्यादा मिलते जुलते नहीं. मैं असल में भले ही कुछ न करूं, पर मुझे फैंटेसियों से प्यार है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;36198&lt;/strong&gt; मेरे पिता का एक सीक्रेट लव चाइल्ड है. मैंने जासूसी कर ये पता लगाया. किसी से नहीं कहा.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;36015&lt;/strong&gt; मुझे अपनी बीवी से प्यार है, पर मंगलवार की हर रात मैं किसी मर्द के साथ रहता हूं. मैं गे हूं, पर बीवी को नहीं छोड़ सकता.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;35948&lt;/strong&gt; साल भर पहले मैंने अबार्शन करवाया था. मुझे अभी भी लगता है कि दुनिया में मुझसे बुरा कोई नहीं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;35702&lt;/strong&gt; मेरे पति को नहीं मालूम कि मैं अपने थेरेपिस्ट के बारे में सैक्सुअली फैंटेसाइज करती हूं&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;35589&lt;/strong&gt; मेरे साथ रात बिताने का शुक्रिया. खुद को मार डालने का जब मैं मजाक कर रहा था, वह मजाक नहीं था. तुमने मेरी जान बचा ली.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;35210&lt;/strong&gt; इराक का अपना दौरा खत्म करने के बाद मैं नहीं चाहता कि तुम घर वापस आओ. तुमसे उबरना मेरे लिए जरूरी है और तुम्हारी शक्ल नहीं देखना काफी मददगार होगा.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;35176&lt;/strong&gt; मैं अपने पति को पोर्नोग्राफी देखने की इजाजत नहीं दे सकती क्योंकि मेरा कहना है कि वह न सिर्फ भद्दा है और फिर औरतों के लिए असम्माननीय भी. पर मैं खुद अकेले में पोर्नोग्राफी देखती हूं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;34969&lt;/strong&gt; कई बार चाहता हूं कि मेरी पत्नी मर जाए (चैन से) ताकि मुझे तलाक के कागजों से मुझे उसका दिल न तोड़ना पड़े.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;34948&lt;/strong&gt; मेरी मां ने अपनी जिंदगी के प्यार को मेरे लिए छोड़ा. अब वह एक नाखुश शादी में तीन और बच्चों के साथ है. मुझे इससे नफरत है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;34896&lt;/strong&gt; मेरा पति पोर्नोग्राफी देखता है और मेरा कहीं और चक्कर है. मुझे फिर भी लगता है, उसका धोखा मुझसे बड़ा है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;34804&lt;/strong&gt; मेरी नौकरी छूट गई, हम कंगाल हैं और मुझे पता चल गया कि पिछले 6 सालों से मेरा पति मुझसे धोखा फरेब कर रहा था. मैं अपने बच्चों की खातिर खुश रहने का नाटक कर रही हूं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;34725&lt;/strong&gt; मैं अपनी बीवी को तलाक दे दूंगा अगर उसने वज़न घटाना शुरू न किया. मैं उसके आलस और मोटापे से थक चुका हूं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;34562&lt;/strong&gt; यह लगभग तयशुदा है कि मेरी बीवी मुझसे प्यार नहीं करती.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;34201 &lt;/strong&gt;पहली मुलाकात में तुमने मुझे बता दिया कि तुम इनफर्टाइल हो और मैंने कहा कि मुझे कोई दिक्कत नहीं. पर अब मुझे बच्चे चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;34195&lt;/strong&gt; मैंने अपने पति से धोखा दिया. तब वह अफ़गानिस्तान की जंग में था.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;34150&lt;/strong&gt; मैंने अबार्शन करवाया, क्योंकि मेरा बॉयफ्रेंड ने मजबूर किया..मुझे तभी पछतावा हुआ. 4 माह बाद वह चल बसा. कम से कम बच्चा तो रह जाता.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;34120&lt;/strong&gt; मेरे पिता मेरी मां से पिछले 26 सालों से धोखा कर रहे हैं. मैं 29 साल की हूं और वे पिछले 49 सालों से साथ हैं. अच्छा होता वह उन्हें पहले ही छोड़ देती .&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;33868&lt;/strong&gt; प्यार में उस औरत के साथ, जो मेरे प्यार में हैं. शादीशुदा, बाल बच्चेदार, कोई परवाह नहीं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;33552&lt;/strong&gt; सोचती हूं मुझे पति से ज्यादा प्यार अपने पपी से है. उसमें कोई दिक्कत नहीं है, पर पपी कितना बेशकीमती है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;33524&lt;/strong&gt; जब मेरे बच्चे मुसीबत लगने लगते हैं, तो मैं इनफर्टिलिटी ब्लॉग्स पढ़ती हूं और खुद को फिर भाग्यशाली मानने लगती हूं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;33516&lt;/strong&gt; मैं उसे छोड़ना चाहती हूं पर मैं ऐसा करूंगी नही. मैं नहीं चाहती बच्चों को इस सबसे गुजरना पड़े.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;33326&lt;/strong&gt; मुझे अपनी बीवी से अब बिल्कुल प्यार नहीं. मैं शादी से बाहर आना चाहता हूं, पर मुझे डर अपनी बेटी को लेकर हैं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;33224&lt;/strong&gt; हमसे अलग औऱ दूर रह रहे डैड से मैंने कहा कि आई लव हिम, ताकि वे मुझे कार खरीदने का पैसा दे सकें.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;33051&lt;/strong&gt; मैं कई बार उस पैसे को खर्च करने के तरीकों के बारे में फैटेसाइज करती हूं, जो मेरे पति के मरने पर बीमा वालों से मिलेगा.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32968&lt;/strong&gt; मुझे कैंसर है जिसमें 4फीसदी लोग ही 5 साल से ज्यादा बचते हैं. मैं इतना अकेला हूं और शॉवर में खड़ा होकर मैं रोज रोता हूं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32920&lt;/strong&gt; मुझे पक्का पता है मैं प्रेगनेंट हूं. डर इस बात का कि वह मुझे छोड़ देगा.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32848&lt;/strong&gt; मैं 31 एफ हूं, जो अभी भी वर्जिन है. मुझे इस बात का गर्व भी है और शर्मिंदगी भी.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32840&lt;/strong&gt; बस अभी ही खत्म हुई मेरे पहले प्यार से घंटे भर लंबी बातचीत. वह इराक में है. अभी भी चिंगारियां हैं हमारे बीच. मैं शादीशुदा, पेट में तीसरा बच्चा. उसकी सगाई हो चुकी है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32824&lt;/strong&gt; मुझे मुहब्बत है उससे जिससे मैं कभी कोई संपर्क नहीं रखूंगा.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32777&lt;/strong&gt; इस बात से खीझ है कि मुझे इस काल्पनिक चरित्र (एडवर्ड) से ज्यादा प्यार है बनिस्बत खुद अपने बॉय फ्रेंड के.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;37971&lt;/strong&gt; मैं 27 का हूं. और मेरे सेलफोन कॉंटैक्ट में तीन लोगों के नंबर हैं. एक तो मेरा खुद ही का है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;31565&lt;/strong&gt; मैं सिंगल हूं तीन बच्चों को पाल रही हूं. मेरी मां चाहती है मैं शादी कर लूं. पर मुझे बच्चों को बड़ा करना और सिंगल रहना पसंद है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;31465&lt;/strong&gt; मेरा पति मेरी जिंदगी का प्यार है. पर कसम से मैं उसके चेहरे पर हमेशा मुझसे शादी करने और बच्चे करने का पछतावा देखती हूं. मैं मर जाती हूं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;31426&lt;/strong&gt; मैं रोज रोती हूं क्योंकि मैं खुद को इतना अकेला महसूस करती हूं. मेरे पति को नहीं पता.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;30834 &lt;/strong&gt;मुझे पता था कि तुम खुद को मार डालने वाले हो.. अच्छा होता तुम्हें रोकने के लिए मैंने कुछ और ज्यादा किया होता.. बजाय तुम्हें तुम्हारी जिद पर छोड़ देने के.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;30427&lt;/strong&gt; मैंने अपने पति को बता दिया कि मैं लेसबियन हूं, ताकि वह मुझसे तलाक मांगना चाहे. कुछ सालों बाद वह हैरत में पड़ जाएगा, जब मैं दुबारा शादी करूंगी.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;30409&lt;/strong&gt; जिस इंसान से आप दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करते हैं, उससे बहस जीतना कितना तकलीफदेह और जीत कितनी खोखली होती है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;30268&lt;/strong&gt; मैं इस कदर इन दिनों डरा हुआ हूं कि मेरी कुतिया जल्द ही मरने वाली है और पूरी दुनिया वह इकलौती है, जो मुझसे प्यार करती है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;28629&lt;/strong&gt; मुझे लगता है कि मुझे अब मुहब्बत में कोई यकीन नहीं रहा. यह बहुत ही तकलीफदेह है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;28619&lt;/strong&gt; पिछले दो सालों में हमने एक बार भी बात नहीं कि पर हर दिन मुझे खुद को तुम्हें फोन करने से रोकना पड़ता है. मिस यू.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;27554&lt;/strong&gt; मैंने अपनी डायरी में झूठ लिखे. मुझे पता था तुम पढ़ोगे जरूर और फिर उसके बारे में बात भी करोगे. बिना अदलबदल किये. अफसोस कि मेरा अंदेशा सही निकला.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;27828 &lt;/strong&gt;मेरे सबसे पक्के दोस्त ने बस अभी अभी कहा कि बजाय मेरे बॉय फ्रेंड के मैं उससे शादी कर लूं. मैं यह सुनने के लिए सात साल से इंतजार कर रही थी.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;27977&lt;/strong&gt; आज रात मैं अपने पति से चीट करने वाली हूं. और जो अकेली बात मुझे परेशान कर रही है वह ये है कि मैं परेशान क्यों नहीं हूं इस बात को लेकर.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;27456&lt;/strong&gt; मुझे फिक्र है कि वह मुझसे वफादार नही रहेगा. उसने अपनी बीवी को मेरे लिए छोड़ा था.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;26216&lt;/strong&gt; दरअसल ये बच्चा उसका नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32716&lt;/strong&gt; तुम्हारा एक बेटा है. वह खूबसूरत है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32695&lt;/strong&gt; बीती रात अपने बॉयफ्रेंड से जिदकरके ट्विलाइट फिल्म देखने के बाद मैंने उसे एडवर्ड कहकर पुकारा. तब हम बिस्तर में थे.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32640&lt;/strong&gt; तुम्हारा दिये हुए डिजाइनर बॉक्स का इस्तेमाल बतौर एश ट्रे हो रहा है :D उम्मीद है तुमसे जल्दी मुलाकात हो ताकि तुम देख सको कि तुम्हारे बिना मैं कितनी खुश हूं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32536&lt;/strong&gt; मैं पेट से थी, जब मैंने पति को एक औरत के साथ पकड़ा. मैंने गुस्से में अबार्शन करवाया और उससे कहा कि मेरा मिसकैरेज हुआ है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32510&lt;/strong&gt; उसने कहा था कि वह मुझसे शादी करने वाला है. ऐसा बोले हुए भी पांच साल बीत गये.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32451&lt;/strong&gt; मेरी गर्लफ्रेंड इम्प्लांट लगवाना चाहती है. मुझे वह जैसी है, ठीक लगती है, पर वह मेरी नहीं सुनती. मुझे लग रहा है कि वह दूसरे मर्दों को इम्प्रेस करना चाहती है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32222 &lt;/strong&gt;मुझे हमेशा लगता था कि मेरा बॉयफ्रेंड बदसूरत है और मिसकैरेज होने पर मुझे राहत हुई क्योंकि मैं नहीं चाहती मेरे बच्चे की शक्ल उसके जैसी हो.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32176&lt;/strong&gt; मुझे अपने परिवार को ये बताने में डर लग रहा है कि मैंने अपने बेरोजगार पूर्व पति को अपने घर में वापस आने दिया.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32146&lt;/strong&gt; मेरा बॉय फ्रेंड मेरी आदतें खराब करता है जो कुछ मुझे चाहिए वह सब खरीदकर. अब उसकी नौकरी नहीं रही, मैं उसे डम्प कर रही हूं. चीयर्स!&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32109&lt;/strong&gt; अपने पीरियड्स आने की खुशी इतनी पहले कभी नहीं हुई, जैसे आज.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32091&lt;/strong&gt; पिछले 13 साल से मैं अपनी पत्नी के साथ हूं औऱ उसके प्यार में डूबा हुआ, पर अक्सर मैं दूसरों के बारे में फैंटेसाइज करता हूं, क्योंकि मैं कभी भी किसी और के साथ नहीं गया.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;32020&lt;/strong&gt; मुझे जिससे प्यार है, वह एचआईवी पॉजिटिव है और मुझे नहीं पता क्या करना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;33583 &lt;/strong&gt;अगर अबार्शन के लिए न गई होती, तो मैं इन दिनों मां बनने वाली होती। &lt;div&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;picture: &lt;a href="http://www.flickr.com/photos/paopix/244067624/"&gt;secrets of the floating world on flickr&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-5756076221625543764?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/8cJTUd6E7kk" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/5756076221625543764/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=5756076221625543764" title="7 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/5756076221625543764?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/5756076221625543764?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/8cJTUd6E7kk/love-story-460-394-66.html" title="LOVE STORY # 460- 394:  एक ज़िंदगी की एक लाइन में दुनिया भर से 66 कहानियां प्यार की" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SfMeLtbduHI/AAAAAAAAAc4/PJPPbG8VIok/s72-c/secrets+of+the+floating+world+compound+eye.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>7</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/04/love-story-460-394-66.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0MGQn87cSp7ImA9WxJTFkk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-138897761484927141</id><published>2009-04-25T12:01:00.000+05:30</published><updated>2009-04-25T12:07:03.109+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-25T12:07:03.109+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 461: नदियों के बीच दूरियां थी, बहाव के बीच नहीं</title><content type="html">&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;(उसी मित्र की एक और कहानी)&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उनके छोटे से शहर से डेन्यूब नदी बहती थी. वे दोनों डेन्यूब के किनारे ही पले-बढ़े थे. इसी नदी के किनारे वे सपनों और सच से परिचित हुए थे. किसी भी प्रेमी जोड़े की तरह उन्हें नदी अच्छी लगती थी. उन्हें कोई भी नदी अच्छी लग सकती थी लेकिन उनके पास अच्छी लगने के लिए सिर्फ़ डेन्यूब ही थी. अब नदी बहुत प्रदूषित थी लेकिन उसका अच्छापन बरक़रार था. वे जवान हो चुके थे लेकिन नदी से उनका लगाव बना हुआ था. लड़की के माँ-बाप समय के साथ बूढ़े हो गए और फिर बेरोज़गार. हंगरी जैसे देश में जीवन कठिन होता जा रहा था. बहुत संघर्ष के बाद उसने अपना शहर छोड़ने का फ़ैसला किया. डेन्यूब ने कभी कहा नहीं कि मत जाओ. लेकिन उसके प्यार ने ज़रुर कहा कि मत जाओ. उसने डेन्यूब को साक्षी मानकर अपनी कौमार्यता पहले ही उसे सौंप दी थी. लेकिन लड़की के जीवन के लिए यह कौमार्यता और प्यार से थोड़ा बड़ा सवाल था. शायद डेन्यूब से भी बड़ा. इसलिए वह वहाँ से निकल पड़ी. उसने ख़ुद को समझाया. अपने प्यार को भी समझाया कि दूरी से प्यार ख़त्म कहाँ होता है. वह टेम्स के किनारे रहने लगी. बहुत दिनों तक कोशिश करती रही कि टेम्स में कभी अपने प्यार की परछाईं देख सके. कभी वह नदी के किनारे बैठे अपने सुनहरे पलों को याद कर सके. लेकिन उसे निराशा हुई. उसे लगा कि टेम्स को थोड़ा ज़्यादा ग़ुरुर है. ऐसा होता है कि हम अपने शहर-गाँव की नदियों में अपनों को देखते हैं और उसे अपनी जीवन यात्रा का साक्षी मानते रहते हैं. नदी कभी नहीं बताती कि वह क्या सोचती है. हम धीरे-धीरे सभी नदी को एक जैसा भी मानने लगते हैं. लेकिन उसे बाद में पता चला कि सभी नदियाँ एक जैसी नहीं होतीं. डेन्यूब और टेम्स दो अलग-अलग नदियाँ हैं. उधर अपनी प्रिया से बिछुड़ने के बाद लड़के को भी डेन्यूब बदली हुई नदी लगने लगी थी. अक्सर वह नदी के किनारे बैठा रहता लेकिन अब नदी उससे बात नहीं करती थी. बहुत दिनों बाद, एक दिन, लड़की ने टेम्स के किनारे बैठे-बैठे अपने प्यार को याद किया. उस दिन संयोग से लड़का भी डेन्यूब के किनारे बैठा उसे ही याद कर रहा था. अचानक उसने देखा कि टेम्स में उसे अपने प्यार की परछाईं दिखाई दे रही है. उसे यक़ीन नहीं हुआ. उधर उसके प्यार को भी डेन्यूब में अपनी प्रिया दिखाई पड़ रही थी. यक़ीन उसे भी नहीं हुआ. दोनों के लिए यह नई अनुभूति थी. दोनों ने तय किया कि इस अनुभूति को उसकी पूरी गहराई से महसूस करना चाहिए. दो दूर देशों में, एक ही दिन, कुछ मनचलों को दो अलग-अलग नदियों के किनारे दो मोबाइल फ़ोन मिले. उनके सिमकार्ड्स अभी भी डेन्यूब और टेम्स की तली में कहीं बह रहे होंगे. उनके बीच अब संपर्क नहीं होता.&lt;br /&gt;दोनों नदियाँ अब भी भली हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-138897761484927141?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/CBA-IKJOs_g" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/138897761484927141/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=138897761484927141" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/138897761484927141?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/138897761484927141?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/CBA-IKJOs_g/love-story-461.html" title="LOVE STORY # 461: नदियों के बीच दूरियां थी, बहाव के बीच नहीं" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><thr:total>2</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/04/love-story-461.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkIGRXY8fSp7ImA9WxJTFEo.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-1534398547592808191</id><published>2009-04-23T12:32:00.003+05:30</published><updated>2009-04-23T12:38:44.875+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-23T12:38:44.875+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 462: उसके अरमान थे, कुछ मजबूरियां भी थीं, फिर वह सपने देखने लगी, जिन्हें टूटना ही था</title><content type="html">&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;(उसी मित्र की भेजी गई एक और कहानी) &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वह बहुत ख़ूबसूरत नहीं थी. दोहरा बदन था पर आकर्षक होने के सारे तत्व मौजूद थे. उसे शहर में बहुत से लोग जानते थे. क्यों जानते थे यह बहुत रहस्य की बात नहीं थी. ठीक उसी तरह जिस तरह वासवदत्ता और वसंतसेना की ख्याति रहस्य की बात नहीं थी. ये और बात है कि लोग कहते हैं कि वासवदत्ता और वसंतसेना बला की ख़ूबसूरत थीं. लेकिन ख़ूबसूरती जैसी दुनियावी चीज़ अक्सर दिल और जिस्म के मामलों में बेईमान हो जाती है.&lt;br /&gt;वह जो करती थी वैसा करने के लिए उसके पास अपने तर्क थे. बेरोज़गार, बुज़ुर्ग और विधुर पिता, दो छोटी बहनें और एक छोटा भाई और वह अकेली कमाने वाली आदि-आदि. उसके पास नौकरी भी थी लेकिन इसी नौकरी ने उसे दूसरा रास्ता भी दिखाया था. उसे इस रास्ते में डालने वाला शहर का एक बड़ा सेठ था.&lt;br /&gt;जो धंधा करते हैं वो जानते हैं कि धंधे में दिल का मामला ख़तरनाक होता है. टाटा, बिड़ला से लेकर मित्तलों और अंबानियों तक यह बात सबको याद रहती है. वासवदत्ता, वसंतसेना से लेकर सुंदरीबाई, मुन्नीबाई और इस लड़की तक को यह बात ठीक से पता थी. लेकिन इतिहास गवाह है कि वसंतसेना ने भी ग़लती की थी और मैं गवाह हूँ कि इस लड़की से भी ग़लती हुई.&lt;br /&gt;वह अब तक पैसों पर सोती आई थी. लेकिन इस बार उसे किसी ने सपनों के बिछौने पर सुला दिया था. पैसा जागने पर बचा रहता था लेकिन सपना, जैसा कि हर सपने के साथ होता है, जागने पर टूट चुका था.&lt;br /&gt;अब कई बरस बीत गए पर उसके सपनों के टूटने की कंपन अभी भी अक्सर महसूस होती है. ख़ासकर उस लड़के के दिल में जो न तब रो सका था और न अब रो सकता है. लड़की पता नहीं अब कहाँ है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-1534398547592808191?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/Trg3iDJX5Qg" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/1534398547592808191/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=1534398547592808191" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/1534398547592808191?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/1534398547592808191?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/Trg3iDJX5Qg/love-story-462.html" title="LOVE STORY # 462: उसके अरमान थे, कुछ मजबूरियां भी थीं, फिर वह सपने देखने लगी, जिन्हें टूटना ही था" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><thr:total>3</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/04/love-story-462.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkcDRHw_eip7ImA9WxJTEU8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-1195810152823145722</id><published>2009-04-19T01:30:00.004+05:30</published><updated>2009-04-19T13:31:15.242+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-19T13:31:15.242+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 463: उसने समंदर में बड़े यकीन से वह बोतल फेंकी जिसमे एक ख़त था</title><content type="html">वह उस अजनबी को वैसे ही जानती थी, जैसे उसके भीतर एक हिस्से को वह नहीं जानती थी.&lt;br /&gt;उस बोतल में एक ख़त था. वह किनारे पर थी. जब उसने उसे देखा. वह ख़त किसी के लिए भी हो सकता था. पर उसे लगा कि वह उस ख़त का इंतज़ार कर रही थी. उसे लगा जिसने ख़त लिखकर उसे बोतल में भर समुद्र में बहाया है, वह उसे जानती है. हम अजनबियों के एक हिस्से को ठीक वैसे ही जानते हैं, जैसे अपने भीतर के एक हिस्से को नहीं जानते. वह उस खत को अकेले में पढ़ने बैठती है, क्योंकि सिर्फ उसी को पता है कि वह खत उसी के लिए लिखा गया है. नहीं तो क्या जरूरत थी उस बोतल को, कि वह बिना टूटे पानी में डूबती उतराती ठीक उसीके रास्ते आकर पड़ती. उस ख़त में लिखने वाले ने अपने अकेलेपन, अधूरेपन के बारे तफसील से लिखा था और ख़त को पढ़ने वाले को दुआएं दी थी. उसे बार बार लगा कि वह जानती है उसे उसकी बातों से, उसके शब्दों से, दुआओं से, उसके अक्षरों के घुमाव और भूले गये हिज्जों से. वह जानती है उसे उस ख़त में शब्दों के बीच खाली रह गई जगह से. वह जानती है उसे जैसे हम जानते हैं अपने भीतर के किसी को. जिसका हम इंतजार नहीं करते, जिसके लिए हम कोशिश भी नहीं करते, पर जिसके लिए हम हमेशा अपने दरवाजे खुले रखते हैं. ताकि जब वह आये तो न आहट की आवाज़ हो और न दस्तक की दरकार.&lt;br /&gt;बहरहाल उसने उस ख़त को कई बार कई तरह से अकेला होकर पढ़ा. हर बार उसके मन में एक नयी शक्ल का जंगल उग आता, नये तरह के बादल, नये तरह की हवाएं, नये तरह का आकाश.&lt;br /&gt;अपनी दुनिया से छुपकर उसने उस ख़त का जवाब लिखा. कई दिन लगे. जिस अजनबी को वह जानती थी, जो उसका ही हिस्सा था, उसी को अपने मन की बात समझाने की उलझी हुई कोशिश. बहुत संभालकर रखा उस कागज को. बहुत तौलकर लिखा एक एक हर्फ. फिर एक दिन उसे बोतल में भरा, उसकी डाट लगाई और पानी में बहा दिया.&lt;br /&gt;ये काफी हिम्मत का काम था. कोई देख लेता तो. कोई जान लेता तो. कोई पकड़ लेता तो. उस भरोसे का क्या होता, जो उसपर दुनिया ने किया. उसने यह सब पाप की तरह किया, छिपकर. पर जो किया, वह उसके अपने लिए जरूरी था. &lt;br /&gt;समंदर के इस तरफ रेत में कई सारे किले थे. दुनिया थी. पति, बच्चे, रिश्तेदार, दोस्त, पड़ौसी, जानने वाले सब थे. वह लौट आई सोचकर कि जिसने उसे ख़त लिखा है, उसे उसका जवाब मिल जाएगा. उसे लगा कि इस बहाने वह अपने भीतर के अजनबी से दोस्ती बढ़ा लेगी, उसे लगा बोतल को वापस पानी में फेंक वह अपनी जमीन पर वापस लौट आएगी. &lt;br /&gt;ये तय कर पाना मुश्किल था कि बोतल में भेजा गया संदेश उसके सपने में था, कल्पना में, सच में, सोच में कहां.. ये तय कर पाना मुश्किल नहीं था कि उसने जिया था उस पूरे वाकये को, पल पल बित्ता बित्ता. किसी को पता नहीं था. सिवा उसके. पर वह जहां लौट रही थी, जिस रेत, दुनिया, दिनचर्या, पड़ोस में वहां सब कुछ सामान्य था. &lt;br /&gt;वह असहज तौर पर सामान्य होने, दिखने की कोशिश कर रही थी. हालांकि इससे भी किसको फर्क पड़ता था.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-1195810152823145722?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/4K3IuAtamnI" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/1195810152823145722/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=1195810152823145722" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/1195810152823145722?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/1195810152823145722?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/4K3IuAtamnI/love-story-463.html" title="LOVE STORY # 463: उसने समंदर में बड़े यकीन से वह बोतल फेंकी जिसमे एक ख़त था" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><thr:total>3</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/04/love-story-463.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0QASXk-eyp7ImA9WxJTEEk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-3867054483890845524</id><published>2009-04-18T12:44:00.007+05:30</published><updated>2009-04-18T13:25:48.753+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-18T13:25:48.753+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 464: वह जो लाल रंग फैल रहा था, क्रांति का नहीं था</title><content type="html">&lt;strong&gt;&lt;em&gt;(इस श्रृंखला की यह सौवीं कहानी है. इसके बाद 463 कहानियां और इस सरदर्द से निज़ात पाने के लिए. लंदन से एक मित्र ने अपने बहुत अकेले दिनों को बिताते हुए इसे लिखा है. लिखना हम सबके अकेले होने की निशानी है. और अच्छा लिखना बहुत अकेले होने की. अकेले होने के लिए लंदन एक शानदार शहर है. क्योंकि वह बहुत खूबसूरत और गहरे, ज्ञानी और संवेदनशील, सवालों से जूझते अकेले लोगों का शहर है. वक़्त को जब भी सांस लेने, एक गिलास बियर पीने, सिगरेट का सुट्टा और गप मारने के लिए अगर रुकना हो तो लंदन से मुफीद कोई जगह शायद ही हो. चाहे कोई भी वक़्त हो. कहीं का भी. जैसे यहां है मॉस्को और छत्तीसगढ़ का एक फ्रेम में और फिर उससे बाहर आते हुए.)&lt;br /&gt; &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SemAmhsFdeI/AAAAAAAAAcw/0IYdr5o1-RM/s1600-h/tate+russia+stalin+on+bed.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325929433708983778" style="WIDTH: 338px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SemAmhsFdeI/AAAAAAAAAcw/0IYdr5o1-RM/s400/tate+russia+stalin+on+bed.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SemAmr2vqoI/AAAAAAAAAco/Pd5yS8JcNHY/s1600-h/tate+russia+monde.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325929436438047362" style="WIDTH: 333px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SemAmr2vqoI/AAAAAAAAAco/Pd5yS8JcNHY/s400/tate+russia+monde.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SemAmflcziI/AAAAAAAAAcg/HV0IiEXOXk8/s1600-h/tate+russia+books.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325929433144282658" style="WIDTH: 327px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SemAmflcziI/AAAAAAAAAcg/HV0IiEXOXk8/s400/tate+russia+books.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SemAmSCuuHI/AAAAAAAAAcY/FHtYa6TlLd8/s1600-h/tate+russia+lenin.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325929429508995186" style="WIDTH: 308px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SemAmSCuuHI/AAAAAAAAAcY/FHtYa6TlLd8/s400/tate+russia+lenin.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;टेट मॉर्डन गैलरी में वे वह सोवियत संघ के पुराने पोस्टरों का संग्रह देख रहा था. एक बड़े हॉल में चारों ओर पोस्टर ही पोस्टर थे. स्टालिन से लेकर लेनिन तक. हँसिया, हथौड़ा और तनी हुई मुट्ठियाँ और झंडे. भाषा समझ में नहीं आ रही थी. लेकिन समय के क़दमों के निशान को पहचानना कठिन नहीं था. लगा कि घूमते-घूमते थक गया सो उस बड़े से हॉल के बीचों-बीच लगी बेंच पर बैठ गया. पूरे कमरे में लाल रंग भर गया था.&lt;br /&gt;विवरण में लिखा था कि सोवियत संघ की क्रांति में महिलाओं का बड़ा योगदान था. पोस्टरों में छपी उनकी तस्वीरों से उनकी भूमिका स्पष्ट दिखती थी. मक्सिम गोर्की का उपन्यास ‘माँ’ याद आ गया. फिर कॉलेज के दिनों के दिन याद आ गए. एसएफ़आई के लिए रात-रात पोस्टर लिखना फिर वॉल राइटिंग के लिए निकल जाना और आधी रात को घर लौटते हुए कॉमरेडों से सुबह मिलने के वादे याद आए. कॉमरेड शैली का भरोसा याद आया कि सर्वहारा वर्ग में चेतना जाग रही है और क्रांति अब बहुत दूर नहीं है.&lt;br /&gt;विचारों की श्रृंखला और पोस्टरों का अवलोकन साथ-साथ चल रहे थे. बेंच और पोस्टरों के बीच से लोग गुज़रते जा रहे थे. लेकिन उसे लगा जैसे वे सब पारदर्शी से हैं. अचानक बेंच और पोस्टरों के बीच एक लड़की आ खड़ी हुई. इस बार आर-पार दिखना बंद हो गया. सालों पुराने अतीत और कुछ क्षणों पुराने अतीत से टूटकर वह एकदम वर्तमान में आ गया.&lt;br /&gt;लड़की सिर से पैर तक इतनी सुडौल थी मानों नकली हो. वह कमर पर हाथ धरे पोस्टरों को निहार रही थी. उसके हाथ और कमर के बीच बने तिकोने से उसे कुछ पोस्टर अभी भी दिख सकते थे. लेकिन नज़रें इसी तिकोने जाल में फँस गई थीं. लाल रंग अब और सुर्ख़ हो गया था. लेकिन अब वह पोस्टर से निकलकर लड़की के कपड़ों में आ गया था. जो उसकी नाज़ुक गोरी देह पर कम ही जगह पर था.&lt;br /&gt;अचानक लड़की को मानों मेरे पीछे बैठे होने का अहसास हुआ. अचानक पीछे मुड़ी तो उसने देखा कि लाल रंग मेरे चेहरे पर भी फैल गया था. वह मुस्कुराई और फिर पोस्टर देखने लगी.&lt;br /&gt;क्रांति का इंतज़ार ख़त्म हो गया था. कॉमरेड शैली को आत्महत्या किए भी अब कई बरस बीत गए.&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;photos: www.tate.org &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-3867054483890845524?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/GoxKZX9R7fg" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/3867054483890845524/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=3867054483890845524" title="8 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" 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/><thr:total>8</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/04/love-story-464_18.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEMDQ3w5fyp7ImA9WxVbGUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-3341291251578758444</id><published>2009-04-06T09:47:00.003+05:30</published><updated>2009-04-06T10:04:32.227+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-06T10:04:32.227+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 465: तानाशाह ने वर्ल्डस्पेस रेडियो में लेटिन गानों का स्टेशन लगाया और अपनी कामवाली से पूछा- नाचोगी मेरे साथ</title><content type="html">&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SdmCjsqnGEI/AAAAAAAAAcQ/l3aI_2fHz08/s1600-h/evil+dictator+dr+john2005.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5321427984511866946" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 309px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SdmCjsqnGEI/AAAAAAAAAcQ/l3aI_2fHz08/s400/evil+dictator+dr+john2005.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; तानाशाह ने सिर्फ बरमूडा पहन रखा था जब उसकी नींद खुली. तानाशाह फर्श पर सो रहा था. गर्मी थी. पंखा चल रहा था. तानाशाह घर में अकेला था. तानाशाह ने रात में शराब पी थी, जिसकी बोतल पर ओल्ड मॉंक लिखा हुआ था और जिसके करीब नमकीन की प्लेट और मुर्गे की हड्डियां पड़ी हुई थी. पास में एक डायरी थी जिसमें तानाशाह की दर्द भरी शायरी थी. तानाशाह का अपने दिल को लेकर भयानक मुलायम और दुनिया को लेकर काफी सख्त रवैया था. तानाशाह मोटा, बेढब और क्रांतिकारियों की तरह की मूंछो वाला था. तानाशाह तानाशाहों की किताबें पढ़ता था और अपनी तानाशाही और उनकी तानाशाही से तुलना करते हुए खुद को हमेशा तैयार रखता था कि पता नहीं कब तानाशाह को इतिहास आवाज दे कि दरबार लग गया है, महराज. तानाशाह का बचपन बाकी तानाशाहों की तरह ही तकलीफ वाला था, और बाकी तानाशाहों की तरह ही वह उस तकलीफ को बांट नहीं सका था. तानाशाह शीशे के सामने या बाथरूम में खुद को एक भयानक गौरवशाली मुद्रा में एक आलीशान तानाशाह की तरह खड़ा होने की प्रैक्टिस करता था. तानाशाह को उन कौवों और कबूतरों से सख्त नफरत थी, जो बाकी तानाशाहों के बुतों का इस्तेमाल सुलभ शौचालय की तरह करते थे. वह तानाशाहों की सीक्रेट कौवा कबूतर भगाओ कमेटी का मानद सदस्य था. तानाशाह ने बाहर जाकर अखबार उठाये, सिगरेट जलाई, कॉफी का घूंट लिया और पहले पन्ने की खबरों को तानाशाही सरसरी के साथ देखा जबकि उसके मुंह में सिगरेट और कॉफी की कड़ुवाहट घूम रही थी. जब उसे पता चला कि उसे प्यार हो गया है और उसके प्यार ने जिस औरत को चुना है, वह शादीशुदा और बाल बच्चेदार है, तब से तानाशाह और ज्यादा अकेला और ज्यादा क्रूर और ज्यादा ओल्ड मॉंक, और ज्यादा कड़ुवी कॉफी, और ज्यादा सिगरेटें पीने लगा था. न सिर्फ टूटे हुए दिल को संभालने के लिए, बल्कि एक अच्छे तानाशाह होने के लिए भी ये जरूरी था. तानाशाह के चेहरे पर तबाही का वह मंजर देखा जा सकता था, जिसका अंदाजा मरी हुई बिल्ली की तरह ढुलमुल तकिये में सोखी गई आंसू और पसीने की नमी से लगाया जा सकता था. तानाशाह को डरावने सपने आते थे. और वह कई बार खुद को सपने में एसेसिनेट होता हुआ देख चुका था. एक बार उसके अपने कुत्ते उसे नोंच कर खा गये थे, ऐसा एक सपने में आया था मार्क्वेज के लिखे एक किस्से की तरह. उस शादीशुदा और बाल बच्चेदार औरत को नहीं पता था कि तानाशाह के तंगदिल होने में उसकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है. तानाशाह की सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि उसकी तकलीफ समझने वाला कोई नहीं था. थे भी तो उसकी तानाशाही ही उसमें आड़े आ गई.&lt;br /&gt;तभी तानाशाह की काम वाली आ गई. तानाशाह ने वर्ल्ड स्पेस सैटेलाइट रेडियो में लेटिन म्यूजिक का चैनल लगाया और कामवाली से कहा- मेरे साथ नाचो.&lt;br /&gt;मुंह बिचका कर कामवाली ने उसका एक और गिलास तोड़ दिया.&lt;br /&gt;तानाशाह इतिहास की अगली पुकार का इंतजार करने लगा. तब तक उसका गणतंत्र उसका बाथरूम ही था.&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://www.flickr.com/photos/dr_john2005/2894885187/"&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;picture: evil dictators by Dr John2005/ flickr&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-3341291251578758444?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/ZB2T-cDdrAk" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/3341291251578758444/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=3341291251578758444" title="10 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/3341291251578758444?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/3341291251578758444?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/ZB2T-cDdrAk/love-story-464.html" title="LOVE STORY # 465: तानाशाह ने वर्ल्डस्पेस रेडियो में लेटिन गानों का स्टेशन लगाया और अपनी कामवाली से पूछा- नाचोगी मेरे साथ" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SdmCjsqnGEI/AAAAAAAAAcQ/l3aI_2fHz08/s72-c/evil+dictator+dr+john2005.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>10</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/04/love-story-464.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkEASX07cCp7ImA9WxVbGEs.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-8716562846258767112</id><published>2009-04-04T21:12:00.002+05:30</published><updated>2009-04-04T21:27:28.308+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-04T21:27:28.308+05:30</app:edited><title>देश को आडवाणी के योगदान और हमारी जिंदगियों के निजी मामले..</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SdeCWoiGxyI/AAAAAAAAAcI/t3nOGRIOCAE/s1600-h/lka.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5320864810110732066" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 274px; CURSOR: hand; HEIGHT: 400px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SdeCWoiGxyI/AAAAAAAAAcI/t3nOGRIOCAE/s400/lka.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://raviwar.com/news/147_advani-india-sms-astin-ka-azagar.shtml"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;(रविवार.काम पर 4 अप्रैल 2009 को प्रकाशित)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;उसके बच्चे थे और वह इतिहास की मरम्मत के लिए नहीं, बल्कि हादसों के टालने का तरफदार था. वह चाहता था कि उसके बच्चे एक अच्छे हिंदू की बजाय एक अच्छा मनुष्य बनने में यकीन रखें. जैसे उसके मुसलमान दोस्त थे और उनका परिवार उसके परिवार की तरह था. नफरत उन्हें हिंदू या मुसलमान बना सकती थी. नफरत जिस असुरक्षा से आती थी, वह उस असुरक्षा का शिकार नहीं था और न ही चाहता था कि उसके बच्चे एक ऐसे देश और एक ऐसी पृथ्वी पर बड़े हों, जहां नफरत और असुरक्षा सियासी करंसियों की तरह न हों. जब हम बच्चों के लिए छोड़े जाने वाली दुनिया की बात करते हैं, तब वह हमेशा खूबसूरत और मानवीय होती है. कोई है जो ऐसा नहीं करने देना चाहता. वह इतिहास को सुधारने की जिद में जो कुछ लिखना चाह रहा है, उसकी सियाही खून है और उसकी इबारत नफरत भरी और उसके इरादे खौफनाक.&lt;br /&gt;पिछले दशहरे को उसने बहुत से दोस्तों को एसएमएस पर दशहरे की रामराम लिख कर भेजा, जो कि उसके बचपन में उसके गांव के लोग कहते थे. तब बाबरी मस्जिद थी और राम राम एक शिष्ट, विनम्र अभिवादन था. उसके नाना की हवेली में जो बढ़ई मुसलमान आता था, उसे मामा कहना उसके लिए जरूरी था. एक दिन नहीं कहा तो नानी ने गर्मी की दोपहर उनके घर भेजा माफी मांगने के लिए. उन बढ़ई मामा की चाय का कप शायद अलग था, पर चाय थी, वे आते थे और उसके बचपन में धुलाई की थपकी की तरह जो क्रिकेट का बल्ला था, वह उन्होंने ही बना कर दिया था ये कहते हुए कि किरकेट से हॉकी ज्यादा बड़ा खेल है.&lt;br /&gt;इस एसएमएस के दो तरह के जवाब आये. एक तो इस तरह का कि – सेम टू यू. दूसरा जय श्रीराम. राम को बख्तरबंद नारे में बदलने का सीधा योगदान दो लोगों का है- एक तो दूरदर्शन पर रामायण सीरियल दिखाने वाले रामानंद सागर का. दूसरा लालकृष्ण आडवाणी का. रामानंद सागर अब पता नहीं कहां हैं. आडवाणी फॉर पीएम का इश्तेहार वर्ल्ड वाइड वेब पर इस वक्त हर कहीं है.&lt;br /&gt;पोर्नोग्राफिक वेबसाइट्स में लालकृष्ण आडवाणी को वोट देने के विज्ञापन नहीं आते होंगे (क्योंकि वे मैंने देखे नहीं), पर बाकी हर कहीं आते हैं. पाकिस्तान से लेकर अरब, यूरोप से लेकर अमेरिकी साइट्स तक (गूगल एडसेंस के साभार). क्या वर्चुअल रियलिटी में उनका फोटोशॉप किया गया चेहरा वह बदल सकता है, जो मेरी और तुम्हारी हकीकत में है.&lt;br /&gt;83 साल के इस बुजुर्गवार के पास यह शायद आखिरी मौका है प्रधानमंत्री बन पाने का और इसलिए इस बार कोई भी लुकाछिपी या संकोच नहीं. लालकृष्ण आडवाणी की शिक्षा भले ही संदिग्ध हो (यहां लिखा है कि वे न तो ग्रेजुएट हैं, न एलएलबी, जैसा कि बताया जाता है) , पर दीक्षा को लेकर कोई संदेह नहीं है. जब इतिहास को ठीक करने वालों का इतिहास लिखा जाएगा, तो पता नहीं उनके कौन से योगदानों को स्वर्णाक्षर नसीब होंगे. आडवाणी का इस देश के लिए क्या योगदान है. मनमोहन सिंह कहते हैं कि बाबरी मस्जिद तुड़वाना उनका इकलौता योगदान है. मनमोहन सिंह थोड़े विनम्र हैं. स्वराज माज्दा नाम के ट्रक को रथ कहलवाने और राम के नाम पर कितने हजार लोगों को मरवाने में श्री आडवाणी जी का सीधा योगदान है. गुजरात दंगों के दौरान देश के गृहमंत्री की हैसियत से मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की पीठ थपथपाते रहना, कुछ न करना भी बड़ी बात है. (फोन किया तो था, उनकी बायोग्राफी बताती है. ये भी कि नरेन्द्र मोदी ने कहा सब कंट्रोल में है). और ये आडवाणी के ही बूते है कि वे एक हाथ से नरेंद्र मोदी की पीठ थपथपाते रहे, और नरेन्द्र मोदी की सरकार खुले आम लोगों को चुन चुन कर मारती रही और दूसरे हाथ से आडवाणी जी अपनी आंख से छलकते आंसू पोंछते रहे, जो उनके लिए खास तौर पर स्क्रीन किये गये –तारे जमीं पर- शो के दौरान निकल रहे थे. आमिर खान जिनकी फ़ना गुजरात में बैन कर दी गई थी, आडवाणी की इस भावविह्वलता से हतप्रभ रह गये थे. अपनी खबरनवीसी के जमाने में आडवाणी जी फिल्म रिव्यू लिखा करते थे. यथार्थ और फिल्मों का रिव्यू एक जैसा कैसे हो सकता था.&lt;br /&gt;आडवाणी का ये योगदान काफी संजीदगी से फिलहाल नहीं देखा गया है, पर बाद में भाषाविद, स्क्रीनप्ले लेखक और राजनीतिशास्त्र के माहिर लोग देखेंगे कि किस तरह से उन्होंने भाषाई तुक्कड़बाजी, अनुप्रास अलंकारों और बातों की बाजीगरी को एक टुच्ची आर्ट में बदल दिया.&lt;br /&gt;• बाबरी मस्जिद के गिरने पर यह कहकर कि – हम दुखी है, पर शर्मिंदा नहीं हैं. बाबरी मस्जिद के ध्वंस उनकी जिंदगी का सबसे दुःखद दिन था, उनकी आत्मकथा बताती है.&lt;br /&gt;• हिंदू की कई परिभाषा है. जब भाई बंदी की बात होती है तो देश में रह रहा मुसलमान भी हिंदू है. जब भाई बंदी की बात नहीं होती तो पड़ोस में नगर निगम की नौकरी कर रहा है मुसलमान भी तालिबान है. फिर जिस हिंदू का खून न खौले, खून नहीं वह पानी है- ये नारा भी दीवारों पर तभी आया, जब आडवाणी का स्वराज माज्दा सड़क पर नफरत फैला रहा था.&lt;br /&gt;• जैसे अब वे कह रहे हैं कि पिंक चड्ढी फेम मुतलिक का उनकी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है. जैसे उनका कोई भी सीधा रिश्ता साध्वी प्रज्ञा, डॉ प्रवीण तोगड़िया, साध्वी ऋतंभरा, मोहम्मद अली जिन्ना, दारा सिंह, बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाले कारसेवकों से नहीं रहा. कहानी पूर्णतः काल्पनिक रही और चरित्र- घटनाओं का वास्तविकता से मेल पूरी तरह से संयोगवश रहा.&lt;br /&gt;• एक समय उन्हें जिन्ना में वह दिखलाई दिया, जो एक विभाजनकारी ही देख सकता है. ये अलग बात है कि ये बात उल्टे उन्हीं के गले पड़ी. न संघ को मजा आया, न गांधी का कद कम हुआ.&lt;br /&gt;• चचचच अनुप्रास- चालचलनचोगाचरित्र.. इस तरह के कई अनुप्रास उनके नारों, नीतियों में जबरने ठेले और पेले गये.&lt;br /&gt;• जब उड़ीसा में ईसाइयों को मारा और एक नन का बलात्कार किया जा रहा था, आडवाणी जी उत्तर पूर्व में अफसोस जाहिर कर रहे थे, जैसे हमलावर किसी और विचारधारा के हों. जब मालेगांव धमाकों में साध्वी प्रज्ञा का नाम फंस रहा था, तो वे प्रधानमंत्री से उसे तंग न करने की मानवीय हिंदू अपील करने दौड़े गये और उस एसआईटी की शिकायत लगाई, जिसके बहादुर अफसर 26-11 के हमलों में मारे गये. हिंदू ताकतों द्वारा सामुहिक बलात्कार की शिकार बिलकीस बानो के बारे में आडवाणी मुंह में दही जमाए बैठे रहे, जो उनके प्रिय मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी की सरकार, हिंदुत्व और विचारधारा की सबसे घिनौनी मिसाल है.&lt;br /&gt;• आडवाणी जी की एक और खास बात यह भी है कि वे तथ्यों को लेकर बहुत सीरियस नहीं है, जब तक उनका उद्देश्य हल हो रहा हो. उनकी किताब में इमरजेंसी की तारीख भी गलत लिखी है, जब वे खुद जेल में थे. और यह अकेली गलती नहीं. वे कहते हैं इमरजेंसी भारत के इतिहास का सबसे स्याह हिस्सा थी.&lt;br /&gt;आडवाणी जी का सबसे बड़ा योगदान यह भी है कि दुनिया में और कहीं भी- सिवा हिटलर के जर्मनी के- बहुसंख्य वर्ग को असुरक्षित नहीं महसूस करवाया जा सका. जहां से भी सीखा है, वे इतिहास के गलत को ठीक करने के लिए उन लोगों का इस्तेमाल करना चाहते हैं, जो उसके लिए जिम्मेदार नहीं थे. वे अतीत के काल्पनिक दोषों को ठीक करने के लिए वर्तमान को सबक सिखाना चाह रहे हैं. जब अहमदाबाद में मेरी मुसलमान दोस्त को किराये का मकान नहीं मिल पाता है, तो ये योगदान लालकृष्ण आडवाणी का ही है, भले ही वे इसकी जिम्मेदारी न लें. जब लखनऊ में मेरे मुसलमान दोस्त की बेटी स्कूल जाती है, तो मैं चाहता हूं कि उसकी बेटी और मेरी बेटी के सपनों में कोई कतरब्योंत न हो. मैं चाहता हूं वे भी हमारी तरह दोस्त रहें (मैं मिला हूं अहमदाबाद की एक ही गली में रहने वाले लोगों से जिन्होंने कहा- हम साथ में क्रिकेट खेलते थे. हमारे बच्चे नहीं खेलते. ये योगदान किसका है..) जब मैं और मेरा दोस्त न रहें तब भी. और मैं यह जानता हूं कि श्री लालकृष्ण आडवाणी ऐसा नहीं चाहते.&lt;br /&gt;भले ही तोड़मरोड़ कर पेश किये गये उनके सच का बहुत मंहगा मीडिया प्लान हो.&lt;br /&gt;नाना अब नहीं है. बढ़ई मामा का पता नहीं. हवेली दरक रही है. भारतीय जनता पार्टी के मैनिफेस्टो में फिर राम मंदिर है. जो एनडीए के मैनिफेस्टो में नहीं होगा. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-8716562846258767112?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/mum73g6z4Ew" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/8716562846258767112/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=8716562846258767112" title="8 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/8716562846258767112?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/8716562846258767112?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/mum73g6z4Ew/blog-post.html" title="देश को आडवाणी के योगदान और हमारी जिंदगियों के निजी मामले.." /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SdeCWoiGxyI/AAAAAAAAAcI/t3nOGRIOCAE/s72-c/lka.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>8</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/04/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0cFR3g9eCp7ImA9WxVbF04.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-6561521725510088863</id><published>2009-04-03T10:26:00.003+05:30</published><updated>2009-04-03T10:33:36.660+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-03T10:33:36.660+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 466: आईने में जितना दिख रहा है, हक़ीकत उससे ज्यादा करीब है</title><content type="html">&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SdWXtLUpdsI/AAAAAAAAAcA/tTPiyGB1r_Y/s1600-h/mirror+deansouglass.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5320325337197409986" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 266px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SdWXtLUpdsI/AAAAAAAAAcA/tTPiyGB1r_Y/s400/mirror+deansouglass.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt; तुम उसे नहीं जानते थे. पर एक लाल बत्ती पर तुम्हारी कार रुकी तो तुमने अपने रियर व्यू मिरर में पीछे वाली कार को चला रहे आदमी को देखा. तुम्हारी तरह वह भी दफ्तर जा रहा है. उसकी कमीज़ बुर्राक सफ़ेद है और टाई गुलाबी. वह बिल्कुल सजा धजा और तरोताज़ा लग रहा था. तुमने अपनी कार में रेडियो की आवाज़ तेज कर दी और रेडियो जॉकी निइइशा को इस बात की इजाज़त दी कि वह तुम्हारा ध्यान बंटा सके. बाहर भी शोर था, पर कार के बंद शीशों ने उन्हें रोक रखा था. बाहर ट्रैफिक है रेंगता हुआ एक लाल बत्ती पर कई बार रुकता हुआ. अख़बार, फिर गजरा, फिर कार साफ करने का कपड़ा बेचने वाले भिखारीनुमा लोग एक के बाद एक तुम्हारे कांच पर हाथ रख कर जा चुके हैं. तुम्हें लग रहा है कि तुम्हें देर हो रही है. तुम फिर उसे देखते हो उस गुलाबी टाई वाले आदमी को. और चौंक जाते हो. पर तभी बत्ती हरी हो जाती है. तुम सामने देखने लगते हो. गाड़ी आगे बढ़ती है. तुम देखते हो धीरे से गुलाबी टाई वाला आदमी अपनी कार को तुम्हारे पीछे लगा लेता है. अगला चौराहे पर फिर लाल बत्ती है. तुम गुलाबी टाई वाले आदमी की तरफ देखना नहीं चाहते. कम से कम इस तरह से नहीं कि उसे लगे कि तुम उसे देख रहे हो. तुम घड़ी देखते हो और खुद से कहते हो कि आज फिर देर से दफ्तर पंहुचोगे. अगले मोड़ पर गुलाबी टाई वाले की कार बांये घूम जाती है और तुम सीधे अपने दफ्तर के रास्ते. काम, फोन, ईमेल, लंच, गपशप और घर लौटना. बीच में निइइशा.&lt;br /&gt;गुलाबी टाई वाला तुम्हारी ज़िंदगी से जा चुका है. अपनी दुनिया में होगा कहीं. &lt;br /&gt;अगले दिन जब उसी चौराहे पर लाल बत्ती, रेंगता रुकता ट्रैफिक, एक के बाद एक सामान बेचते भिखारी.. तब तुम्हें यकायक गुलाबी टाई वाले आदमी की याद आती है. &lt;br /&gt;तुम बिना उसकी तरफ देखे, बिना उससे पूछे, बिना ये जताये कि तुम कितने ज्यादा उत्सुक हो ये जानना चाहते हो कि गुलाबी टाई पहने हुए वह आदमी इतनी बेसाख्ता रो क्यों रहा था. तुम उसे नहीं जानते थे, पर उसकी कार, उसकी कमीज़, उसके तरोताज़ा चेहरे, उसके संभावित आफ्टर शेव को तुम ठीक वैसे ही जानते थे, जैसे खुद को.  क्या कोई बीमार था? कोई नहीं रहा जिंदगी या दुनिया में? क्या कोई धोखा हो गया? पैसा? बेदखली? और क्या वजह रही होगी, तुम सोचते हो अख़बारों, टीवी सीरियल्स की सुर्खियों के बीच दिमाग का गूगल करते हुए.  &lt;br /&gt;कई बार रोने के लिए कोई भी जगह काफी नहीं होती, चौराहों की लाल बत्ती भी नहीं. क्या दुख से ज्यादा भयानक तकलीफ यह है कि रोने की कोई सही जगह का न होना. तुम्हें उस खबरनवीस की याद आती है, जिसने खुदकुशी से पहले अपने तमाम दोस्तों को फोन किया, और कहा सब ठीक है बॉस.&lt;br /&gt;रेडियो जॉकी निइइशा भयानक बकर करती रहती है. घर से दफ्तर तक का एक घंटा निइइशा उसकी हमसफर है. वह इतनी बकवास के बाद भी इतने सारे लवसांग्स सुनाती है, कि एक दिन तुम निइइशा से बेपनाह मुहब्बत करने लगोगे बीवी बच्चों का मोह छोड़ कर. निइइशा की समदृष्टि कुछ इस तरह की है कि हिमेश रेशमिया (जो मुंह से नहीं गाता) से लेकर ब्रायन एडम्स (जो फटे बांस से गले से गज़ब का गाता है) के प्रति समान श्रद्धा रखती है. निइइशा तुम्हारी कार में चल रहे प्राइवेट मुजरे का आइटम है.&lt;br /&gt;तुम सोचते हो निइइशा की शक्ल कैसी होगी. &lt;br /&gt;तुम सोचते हो पिछली बार तुमने गुलाबी टाई कब पहनी थी. तुम कब रोए थे पिछली बार. तुम्हें जो दुःख सालते हैं कई बार बरसों बाद भी, तुम्हारे जहन में तैरते हैं. &lt;br /&gt;तुम रियर व्यू मिरर में झांकते हो. वहां तुम्हारी शक्ल है. तुम अपना चेहरा साफ करते हो.  &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.flickr.com/photos/deansouglass/414814876/"&gt;photo: deansouglass/ flickr&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-6561521725510088863?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/P-nx_qOag5Q" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/6561521725510088863/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=6561521725510088863" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/6561521725510088863?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/6561521725510088863?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/P-nx_qOag5Q/love-story-466.html" title="LOVE STORY # 466: आईने में जितना दिख रहा है, हक़ीकत उससे ज्यादा करीब है" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SdWXtLUpdsI/AAAAAAAAAcA/tTPiyGB1r_Y/s72-c/mirror+deansouglass.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>4</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/04/love-story-466.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0IEQ3w5cSp7ImA9WxVbEk4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-8480141826732079818</id><published>2009-03-28T15:03:00.003+05:30</published><updated>2009-03-28T15:48:22.229+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-03-28T15:48:22.229+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 467 : दुःख की लम्बी एफआईआर होती, खुशी का न ठौर न ठिकाना</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sc34546xN4I/AAAAAAAAAb4/4i3obxgOEGo/s1600-h/thorns+ARG.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5318180408409536386" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 272px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sc34546xN4I/AAAAAAAAAb4/4i3obxgOEGo/s400/thorns+ARG.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;उसकी डायरी में उसने कभी झांक कर नहीं देखा. कहती है मर जाऊंगी तो पढ़ लेना. पर कभी कभी खुद ही से कुछ एंट्रीज बांट लेती है. पता नहीं वे पूरे पन्ने होते हैं या कुछ पैराग्राफ ही. जब ज़िंदगी को जिया जा रहा होता तकलीफ़ और राहत के बीच, तो डायरी छोटी हो जाती, पर जब दिन खाली होते और रातें लम्बी और वीरान, तो डायरी और लंबी हो जाती.&lt;br /&gt;डायरी में दुख अपना ब्यौरा विस्तार से लिखता. ईश्वर के खिलाफ, नियति के खिलाफ, भाग्य के खिलाफ एक चश्मदीद गवाह के निर्णायक हलफनामे की तरह. हर बात का बारीकी से जिक्र. वक्त, कपड़े, मौका, वारदात, शब्दों का एक एक अक्षर. एक एफआईआर की तरह दुःख खुद को काग़ज पर पूरा का पूरा उकेरता शायद इस उम्मीद से कि कह देने से मन हल्का हो जाएगा.&lt;br /&gt;डायरी में दुःख की स्मृति और सुख के सपनों का ही ब्यौरा होता. वह खुद को हर बार नई रौशनी में अधूरा देखती. कई बार बहुत बाद में जब पुराने पन्ने पलटती तो उसे अचरज होता कि ये वाक्य उसने लिखे हैं. उसे यकीन न होता कि उसका दुःख उस वक़्त कितना गहरा था और चोट कितनी ज्यादा और धोखा कितना बुरा. पर उन शब्दों में दुःख और उम्मीद के गहरे मायने गड़े हुए कालपात्र की तरह थे. परछाइयों की तरह डायरी के पन्ने उसी हिसाब से लंबे और स्याह होते जाते, जितना वह अकेली और खाली होती जाती. दुःख एक वकील ढूंढता, जिरह करता, न्याय की गुहार लगाता. दुःख निर्मल वर्मा की कहानी की तरह शब्दों के बीच की खाली जगह मोम की तरह पिघल पिघल गिरता.&lt;br /&gt;ऐसा नहीं हुआ था कि ज़िंदगी में तकलीफ और उम्मीद के अलावा और कुछ नहीं था.&lt;br /&gt;कई सफेद फूल बगीचे में खिले थे. बिल्ली ने बच्चे दिये थे, जो कार के टायरों के पीछे छुपने का खेल खेलते थे. एक दिन सैर से लौटने पर जमीन पर हजारों हरसिंगार महक रहे थे. कई दिन आसमान बहुत साफ था, कई बार बहुत रंगीन. सैवन सिस्टर्स कई शामों में इतना शोर करती थीं कि न्यूज चैनल्स के एंकर उनके आगे अप्रासंगिक थे. कई राग उसके फेफड़ों से फूटे थे, दमे के बावज़ूद. खुशी थी. इतने दबे पांव, इतनी ठिठकी हुई, इतनी अस्थाई, इतनी वायदाखिलाफ, इतनी जिंदा कि उसे दर्ज करना उस वक़्त मुमकिन न था. खुशी थी, पर दुख के लम्बे उपन्यास में एक विषयांतर और एक फुटनोट की तरह. खुशी जब होती थी, तब उसका कोई न तो ठौर था, न ठिकाना. डायरी में भी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;&lt;a href="http://www.flickr.com/photos/anuprajg/2187340240/sizes/o/"&gt;photo : way to success ARG on flickr&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-8480141826732079818?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/vv64__4Ydc4" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/8480141826732079818/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=8480141826732079818" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/8480141826732079818?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/8480141826732079818?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/vv64__4Ydc4/love-story-467.html" title="LOVE STORY # 467 : दुःख की लम्बी एफआईआर होती, खुशी का न ठौर न ठिकाना" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sc34546xN4I/AAAAAAAAAb4/4i3obxgOEGo/s72-c/thorns+ARG.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>4</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/03/love-story-467.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DU8GQ389eyp7ImA9WxVbEUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-4855602424003565608</id><published>2009-03-28T02:12:00.005+05:30</published><updated>2009-03-28T02:33:42.163+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-03-28T02:33:42.163+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 468: जिस तवायफ से उसने दिल लगाया है, उसका नाम दिल्ली है</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sc0-hiclCMI/AAAAAAAAAbw/XRSv57wIN4E/s1600-h/ruins+of+hauz+khas+pranav+singh.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5317975480897702082" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 368px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sc0-hiclCMI/AAAAAAAAAbw/XRSv57wIN4E/s400/ruins+of+hauz+khas+pranav+singh.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;वह हमेशा से दिल्ली के रास्ते पर था. दिल्ली से गुजरकर आगे चला जाता. फिर लौटता दिल्ली के रास्ते पूछता हुआ. दिल्ली का रास्ता भटकने का सवाल ही नहीं था. सब जानते थे. पर दिल्ली न तो उसे आने से मना करती थी, न बैठने को कहती थी. दिल्ली किसी को न नहीं कहती, दिल्ली के बारे में मशहूर है. वह दिल्ली आना चाहता था हमेशा से, क्योंकि उसके पास लौटने की और कोई भी जगह नहीं थी. सिर्फ दिल्ली ही उसे अपना बना सकती थी, क्योंकि न तो उसका कोई अपना था, और न ही दिल्ली का. उसे पता था कि दिल्ली को पता है बार बार उजड़ने का मतलब. हर बार जब भी दिल्ली उजड़ी तो शायद ही किसी को उम्मीद थी, कि अब आगे कुछ होगा. पर दिल्ली फिर बसी, जहां से उजड़ी थी, उसीके बगल में. सात बार उजड़ी, आठ बार बसी. उसे यकीन है कि एक दिन दिल्ली उसे भी बसा लेगी. दिल्ली जानती है, बहुत सारे लोग आएंगे और जाएंगे, बहुत सारे राजे और सरकारें, बहुत सारा इतिहास, बहुत सारे दलाल और कारकून, बहुत सारे दस्तावेज और पालकियां दिल्ली का इस्तेमाल करेंगे और गुज़र जाएंगे. हालांकि दिल्ली को भी पता है कि कितने लोग दिल्ली की आंख में झांक कर उसका दर्द भांप सकते हैं.&lt;br /&gt;जिस तवायफ का नाम दिल्ली है, वह प्यार जानती है. एक दिन दिल्ली का दिल पसीज ही जाएगा और वह गर्मी की किसी शाम पानी के छिड़काव के बाद मूढ़े पर बैठा हुआ दिल्ली की यादों की बातें करेगा. खुसरो और ग़ालिब और भूली भठियारिन की. वह बात करेगा कि किस वफा से दिल्ली ने उसकी थोड़ी सी बेवफाई को रिश्ते की तरह निभाया. इस बात पर वे बेसाख्ता हसेंगे.&lt;br /&gt;उस वक़्त तक वह दिल्ली के रास्ते चलता रहेगा. और दिल्ली उसके रास्ते.&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;&lt;a href="http://www.flickr.com/photos/pranavsingh/789853597/sizes/l/"&gt;photo: ruins of hauz khas by pranav singh on flickr&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-4855602424003565608?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/RPDSrLHxtcs" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/4855602424003565608/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=4855602424003565608" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/4855602424003565608?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/4855602424003565608?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/RPDSrLHxtcs/love-story-468.html" title="LOVE STORY # 468: जिस तवायफ से उसने दिल लगाया है, उसका नाम दिल्ली है" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sc0-hiclCMI/AAAAAAAAAbw/XRSv57wIN4E/s72-c/ruins+of+hauz+khas+pranav+singh.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>5</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/03/love-story-468.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkYHQ3k4eCp7ImA9WxVbEUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-169458156484758299</id><published>2009-03-28T01:20:00.002+05:30</published><updated>2009-03-28T01:32:12.730+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-03-28T01:32:12.730+05:30</app:edited><title>लव स्टोरी # 469: एक बदलते हुए दृश्य में मौजूद होने का मतलब</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sc0wlVWuWFI/AAAAAAAAAbo/jFAXJGK9Mp8/s1600-h/sun+shade.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5317960152940173394" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 340px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sc0wlVWuWFI/AAAAAAAAAbo/jFAXJGK9Mp8/s400/sun+shade.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;अगर वे उस जगह पर वापस जाते भी, तो सब कुछ वैसा ही न होता जैसा उस बार था. ढलती सर्दियों वाली दोपहर में भला से लगता सूरज और ज़मीन से टकराकर उछलती रौशनियों का जादूई असर. ब्रह्मांड के उस कोने पर शहर में नौकरी न ढूंढने वाला चाय बेचता अनपढ़ बच्चा और चार देसी पिल्ले. पहाड़ और खाई. खाई में उगा हुए ठूंठ की तरह एक और पहाड़. ऱौशनी. कुछ उस तरह की जो फुजीकलर फिल्मों में दिखता था. जैसे सब कुछ पर एक हाईलाईटर चला हुआ है. बहुत आक्रामक सा नहीं, पर भला सा. वक्त, सड़कों, पंहुच, दुनिया, मोबाइल नेटवर्क, हवाई यातायात, रिंगटोन, हॉर्न की हद से बाहर.&lt;br /&gt;लौटना न तो आसान था. और लौटते भी तो क्या मिलता. सिर्फ पहाड़. चाय वाला लड़का शहर चला गया होता नौकरी ढूंढने. कूं कूं करते पिल्ले भौंकना सीख चुके होते. सूरज के मिजाज बदल चुके होते. उस वक़्त के बादल पता नहीं कहां पानी बन बरस चुके होते.&lt;br /&gt;लौटना कहां हो पाता है किसी भी जादू में. जो तैलचित्रों की तरह बहुत तयशुदा नहीं थे. वे जलरंगों की तरह थे. काबू से बाहर. प्यार की तरह.&lt;br /&gt;अगली बार वे मिलते तो ब्रह्मांड के किसी और कोने में. जहां से उन्हें अपना ही एक सिरा मिलता. अपने अगले संयोग तक.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-169458156484758299?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/V4l9RKKTU_s" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/169458156484758299/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=169458156484758299" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/169458156484758299?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/169458156484758299?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/V4l9RKKTU_s/469.html" title="लव स्टोरी # 469: एक बदलते हुए दृश्य में मौजूद होने का मतलब" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Sc0wlVWuWFI/AAAAAAAAAbo/jFAXJGK9Mp8/s72-c/sun+shade.JPG" height="72" width="72" /><thr:total>4</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/03/469.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0EAQn86eSp7ImA9WxVWE0o.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-7575143990789497717</id><published>2009-02-23T13:02:00.003+05:30</published><updated>2009-02-23T13:24:03.111+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-02-23T13:24:03.111+05:30</app:edited><title>मीडिया के मारेः नौकरियां फिर आएंगी पर..</title><content type="html">&lt;em&gt;&lt;a href="http://raviwar.com/news/135_media-ke-maare-aastin-ka-ajagar.shtml"&gt;&lt;strong&gt;( रविवार डॉट कॉम पर २३ फरवरी को प्रकाशित लेख)&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span class=""&gt;जब अनापशनाप भर्तियों का दौर था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि छंटनी का वक्त कैसा होगा? कोई नहीं सोचता. पर सिर्फ नहीं सोचने से आप उसे टाल नहीं सकते. मीडिया का धंधा ही परजीवी है. अगर बाज़ार अच्छा चलेगा, तभी विज्ञापन आएंगे, अगर नहीं चलेगा, तो नहीं आएंगे.&lt;br /&gt;अब जब छंटनी का वक्त है, तो यकायक बाज़ारवाद बुरा हो गया है. बाजार वाद को बुरा कहने से कोई समाधान निकलने वाला है, ऐसा भी नहीं है. कोई भी धंधा मुनाफे के सिद्धांत पर चलता है, और पत्रकारिता के पेशे में आने वाले वे लोग जो खुद को प्रोफेशनल कहते हैं यहां न खैरात खाने आए थे, न खैरात बांटने. उनका काम ऐसा कुछ करना था, कि जिस पन्ने, रिपोर्टिंग बीट, जिस प्रोग्राम को वे अंजाम दे रहे हों, उसपर पाठक या दर्शक का ध्यान जाता हो, और एकबारगी वह वहां ठिठक जाए, ताकि वहां पर विज्ञापन आ सके, और विज्ञापनदाता को ग्राहक मिल सके, और मीडिया के उस पन्ने या प्रोग्राम को मुनाफा और इस पत्रकार को इंक्रीमेंट या तरक्की. एक सफल बिजनेस मॉडल में ये पारस्परिक निर्भरताएं अंतरनिहित थीं. और एक का असर दूसरे पर पड़ना लाजिमी था. नौकरी से निकाले जाने की किसी को खुशी नहीं होती, पर 2009 में हम सातवें दशक के समाजवाद की अगर दुहाई देंगे, तो वह न समाज, न उद्योग और न समय के साथ इंसाफ होगा. हम सुख के वक्त अमेरिका और दुख के वक्त सोवियत संघ नहीं हो सकते. अब विज्ञापन वैसे नहीं हैं, जैसे पहले थे. अखबारों में पन्ने कम हो रहे हैं. उनका मुनाफा भी कम हो रहा है. लोग भी जाहिर है कम होंगे. तरक्कियां और इंक्रीमेंट- बोनस पर भी असर पड़ेगा. हम जिस अर्थ व्यवस्था के हिस्से हैं वह बहुत सारे अनुमानों पर चलते हुए बहुत तेज़ी से विस्तार कर रही थी, क्योंकि आगे बढ़ने का यही सही रास्ता समझा जा रहा था कि तेज़ चलो. वे अनुमान गलत निकल रहे हैं तो नजला सिर्फ पत्रकारों पर ही नहीं झड़ रहा है. इंडस्ट्री पर हर तरफ पड़ रहा है. विज्ञापन लाने वाले पर, जगह बेचने वाले पर, मुनाफे पर, रिकवरी पर. इतनी बड़ी और व्यापक तस्वीर को सिर्फ पत्रकारों के खिलाफ साजिश और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले की तरह पेश किया जाना सही नहीं है कामरेड. अब जब बहुत सारी नौकरियां जाने की बात हो रही हैं, तो ये सवाल करना बुरा तो है, पर ज्यादती नहीं कि उत्कृष्ठ पत्रकारिता की ऐसी कौन सी मिसालें कायम हो रहीं थीं, जिनके न रहने का समाज को अफसोस होने वाला है. जिन लोगों को निकाला जा रहा है, उन्हें हम पत्रकारों की बिरादरी तो मिस करेगी, पर क्या यह समय, समाज, उद्योग भी मिस करेगा. अगर हां तो फिर सचमुच यह त्रासदी है. पर किसी पत्रकार के नौकरी से निकाले जाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना, किसी कार फैक्ट्री या बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी से निकाले गये आदमी से ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसा मानना मुश्किल है.&lt;br /&gt;समाज मीडिया के जरिये खुद से बात करता है. इस वक्त उसके पास बात करने को बहुत ज्यादा औऱ बहुत अच्छा नहीं है. सबसे दर्दनाक तो बिजनेस के अखबार हैं- जो फुलटाइम स्यापे में लगें हैं. मीडिया की अपनी तकलीफें हो सकती हैं, पर अपनी बात को दिलचस्प तरीके से सामने रखना उसकी जिम्मेदारियों का हिस्सा है. आर्टीकुलेशन का चुनौती हमेशा है, अभी और भी ज्यादा, जहां बदलते हुए वक़्त को, उसकी जटिलताओं को सिर्फ कुछ नौकरियों के आने – जाने से देखना एक तरह का सरलीकरण है.&lt;br /&gt;ये समय दिलचस्प है क्योंकि वे सारे लोग जो उथलपुथल का हिस्सा हैं, अगर वे सचमुच सूझबूझ से भरे लोग हैं, तो वे कोई रास्ता जरूर निकालेंगे. अगर वे सचमुच अपने अपने मीडिया में ऐसी प्रॉपर्टीज खड़ी कर रहे होते, जिनपर लोगों का ध्यान जाता, तो शायद नौकरी जाने के आसार अपने आप ही कम हो जाते. जिन्हें नौकरियों से निकाला गया और जो इस वक्त कतार में हैं- क्या उन्होंने उत्कृष्ठ पत्रकारिता का कोई उदाहरण पेश किया. इस सारे स्यापे के बीच कि नौकरियां जा रही हैं, क्या आइने में झांककर ये नहीं देखा जाना चाहिए कि जब वक्त अच्छा था तब क्या हो सकता था. हम अपने आसपास ऐसा क्या खास देख रहे हैं कि कुछ लोगों के नौकरी पर नहीं रहने से नहीं दिखलाई देगा.&lt;br /&gt;प्रिंट हो या टेलीविजन- बकौल श्रीकांत वर्मा- कोंसल में विचारों की बहुत कमी है. अच्छी और पेशेवर पत्रकारिता की जरूरत एक संक्रांत समय में समाज को और भी ज्यादा होगी. जिनके पास सूझबूझ होगी, जिनके पास विचार होंगे, उनकी जरूरत समाज को भी होगी और मीडिया उद्योग को भी. दिक्कत उस मनोदशा की बहुत अधिक है, जहां ध्यान काम पर नहीं, नौकरी पर था, जहां हर नौकरी को हमेशा के लिए तयशुदा मान लिया गया था. हम उस दौर में हैं, जो हमारे पिताओं और माताओं की तरह एक जिंदगी में एक नौकरी वाली नियतियों में नहीं है.&lt;br /&gt;एक सवाल इसके ठीक उलट है. जिन लोगों को नौकरी से निकाला गया, क्या वे बेहतर भविष्य, तनख्वाह, बेहतर सुविधाओं के लिए अपनी नौकरी नहीं बदलते. अगर नहीं बदलते, तो आश्चर्य का विषय होता.&lt;br /&gt;पिछले लगभग दो दशकों से मीडिया का चश्मदीद गवाह होने के कारण ये कह सकता हूं कि ये स्यापा हमेशा के लिए नहीं है. दूसरा ये समय एक ऐसी उथलपुथल का है, जहां मोटे तौर पर फिटेस्ट सरवाईव करेंगे. इस नौकरी में नहीं तो, किसी और काम में. टाइपराइटर के प्रति मेरा सम्मान कम नहीं है, पर खुद को अपग्रेड करने की जरूरत हमेशा थी. अब पहले से बहुत ज्यादा.&lt;br /&gt;तीसरा ये कि मीडिया स्कूल के कर्ताधर्ताओं को अपने तौरतरीके बदलने की जरूरत पड़ेगी क्योंकि वे बहुत सारे नौजवानों का समय और उनके मां-बाप का पैसा और दोनों के सपनों से खिलवाड़ कर रहे हैं. वे ऐसी फसल तैयार नहीं कर रहे, जो मीडिया के बहुत काम की हो. मसलन मीडिया स्कूलों में पढ़ रहे बतेरे डिग्री धारकों को जानता हूं, जिन्होंने न तो कोई गंभीर स्तर पर पढ़ाई की है और न ही लिखाई. बहुतों की तो भाषा ही गड़बड़ है. वे क्वार्क एक्सप्रेस चलाने के अलावा बहुत माहिर नहीं लगते. सबसे बुरी बात तो ये है कि वे मीडिया कोर्स करने के कारण ये बहुत तयशुदा मानते हैं कि उन्हें नौकरी मिल ही जाएगी (जबकि मैंने ये पाया कि भाषा, इतिहास या अर्थशास्त्र की पढ़ाई किए हुए लोग अक्सर ज्यादा बेहतर होते हैं, हालांकि मैंने खुद एक मीडिया स्कूल में दाखिला और वहां से डिप्लोमा लिया था. बहुत तयशुदा होकर अब नहीं कह सकता कि वहां पढ़ाई की थी और जो की, वह किसी काम आई) और नौकरी मिल ही जाएगी, तो उन्हें निकाला नहीं जाएगा. ये कमाल का और बहुत खतरनाक दुराग्रह है. इन नौजवानों को अब तक नौकरियां मिलती रहीं तो सिर्फ इसलिए कि मीडिया बहुत तेजी से विस्तार कर रहा था, पर जाहिर है अब ऐसा नहीं होगा. और छंटनी जब होगी, तो उन लोगों के बचने का चांस ज्यादा होगा, जो क्वार्क एक्सप्रेस से ज्यादा कुछ जानते होंगे. उनकी डिग्रियां शायद सरकारी नौकरियों के लिए दरख्वास्त लगाने के काम आए.&lt;br /&gt;चौथी बात यह कि जिन पत्रकारों की पैनी नज़र भविष्य की तरफ गड़ी होंगी, वे देख सकते हैं कि हम अपने जन्म में ही कागज पर छपे अखबार को खत्म होता हुआ देख सकेंगे. भविष्य इंटरनेट और मल्टीमीडिया का होगा, सिर्फ टैक्नोलॉजी का नहीं बल्कि इस बात का कि किस चतुराई से आप उनका इस्तेमाल अपने ग्राहकों के लिए करेंगे. हर संक्रमण पत्रकारों के लिए शुभ समय होता है और ऑनलाइन मीडिया के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि उसके लिए आपको धन्ना सेठ होने की जरूरत नहीं है. अगर आपके पास लिखने के लिए ऐसा कुछ है, जो लोग पढ़ना चाहते हैं, तो उसे बेचने का रास्ता निकाला जा सकता है.&lt;br /&gt;पांचवी बात यह कि यह संकट उन बहुत से लोगों के लिए वरदान होगा, जो जिंदगी में कुछ करने के लिए किसी चुनौती का इंतजार कर रहे थे. वे अपनी किताब लिखेंगे, वे छोटा मोटा ही सही पर अपना धंधा शुरू करेंगे, वे सोचेंगे कि कैसे वे इस तरह के समय में ज्यादा मुस्तैद, तैयार और चतुर हो सकेंगे, वे सिनेमा की स्क्रिप्ट लिखेंगे, वे आलस को अपनी हड्डियों से झाड़ेंगे. मीडिया के सुपरस्ट्रकचर्स के खतरे छोटे, हल्के और जैव विविध प्रयोगों को जगह देंगे, जिनकी जरूरत हमेशा से थी, पर तब तक किसी को पड़ी नहीं थी.&lt;br /&gt;छठी बात- जो नौकरी से निकाले जाने के बाद कुछ नहीं करेंगे, अपने को पहले से ज्यादा माहिर बनाने की कोशिश नहीं करेंगे, अपनी प्रतिभा को टटोलकर नये प्रयोग नहीं करेगें, समाज के लिए अपनी उपयोगिता को साबित करने का कोई प्रयास नहीं करेंगे और इंतजार करेंगे कि उनके साथ हुए अन्याय का उन्हें मुआवजा मिले, वे ज्यादा बड़े अफसोस के हकदार हैं.&lt;br /&gt;कई ऐसे लोग हैं, जो इस जटिल होते वक़्त में नौकरियां छोड़ रहे हैं. इसलिए कि उन्हें नौकरियां मिल रही हैं. इसलिए नहीं कि वे किसी खास जात, जीपीआरएस या चमड़ी के हैं. इसलिए वे हमेशा एक ऐसा मौका तलाश रहे थे, कि उन्हें किसी की नौकरी न करनी पड़े. इसलिए कि वे हर दिन को चुनौती मान रहे थे. क्योंकि उन्हें अपने काम से प्यार है. क्योंकि अख़बार (मीडिया) का काम ही बदलते हुए वक़्त को दिलचस्प तरीके से रेखांकित करना है, वे खुद को रोज रिइन्वेंट करते हैं.&lt;br /&gt;चुनौती सिर्फ नौकरियों को लेकर नहीं है. ज्यादा बड़ी चुनौती विभिन्न मीडिया संगठनों के लिए यह है कि वह कैसे इस संक्रमण के समय और समाज के प्रति प्रासंगिक बना रहे और एक सफल बिजनेस मॉडल भी. नौकरियों का गणित इसी समीकरण से तय होगा.&lt;br /&gt;© आस्तीन का अजगर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-7575143990789497717?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/rhFtU_pXbTo" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/7575143990789497717/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=7575143990789497717" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/7575143990789497717?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/7575143990789497717?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/rhFtU_pXbTo/blog-post.html" title="मीडिया के मारेः नौकरियां फिर आएंगी पर.." /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><thr:total>3</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/02/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;Dk8CQnw-eSp7ImA9WxVSFE0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-4395289170103930715</id><published>2009-01-05T00:15:00.004+05:30</published><updated>2009-01-08T14:24:23.251+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-08T14:24:23.251+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 470: जवानी की अंगड़ाई और बुढ़ापे की जम्हाई के बीच उन लड़कों की यादें थीं</title><content type="html">दिल्ली में कुहरे के कई दिनों के बाद धूप निकली थी. वे तीनों एक ही साथ पढ़ती थी और एक ही दफ्तर में काम करती थीं. जवानी की अंगड़ाई और बुढ़ापे की जम्हाई के बीच वे तीनों अपनी दफ्तरी कुर्सियां धूप में ले आतीं और दोपहर के खाने के वक्त बैठकर उस वक्त की बातें करती, जो बीत चुका है. वे चढ़ती हुई चर्बी, ढीली होती त्वचा, डी ऑडरेंट की गंध और मध्य वर्गीय ऊब के बीच टीवी सीरियल्स की बातें करती और कई बार लंच आवर कुछ ज्यादा चलता, और टीवी की बातें खत्म हो जातीं और फिर भी बात करने का बहुत सा मन उनका रह जाता, तो तीनों अपने अतीत के उस मुहाने तक जातीं, जहां से वह साझा होना शुरू हुआ था.&lt;br /&gt;बातें यहां वहां होते हुए उनके क्लास के लड़कों पर घूमने लगतीं.&lt;br /&gt;जवानी की अंगड़ाई और बुढ़ापे की जम्हाई के बीच उनकी आंखों से उन लड़कों के बारे में एक तुरत फुरत का ओपिनियन पोल पढ़ा जा सकता था. वे अपने मजाक याद करतीं. वे बतातीं कौन किस पर किस कदर मरता था. कौन भला था और कौन धोखेबाज़. कौन कविताएं लिखता था और कौन अच्छे सा प्रेमपत्र.&lt;br /&gt;वे लंच के बाद ड्यूटी पर फिर लौट आतीं. बाहर धूप कुछ और देर खिली रहती.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-4395289170103930715?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/G-GBQfGbOXI" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/4395289170103930715/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=4395289170103930715" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/4395289170103930715?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/4395289170103930715?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/G-GBQfGbOXI/love-story-470.html" title="LOVE STORY # 470: जवानी की अंगड़ाई और बुढ़ापे की जम्हाई के बीच उन लड़कों की यादें थीं" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><thr:total>4</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/01/love-story-470.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkcEQ3s5cSp7ImA9WxVSEEQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-7540374244762866401</id><published>2009-01-04T23:57:00.003+05:30</published><updated>2009-01-05T00:03:22.529+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-05T00:03:22.529+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 471: टीवी चैनल पर जारी फेहरिस्त में उसका नाम भी था</title><content type="html">सब पूछ रहे थे उसके पति का हालचाल. वह बंबई के उस होटल में कामकाज के सिलसिले में गये हुए थे, जहां उस शाम गोलियां दनदनाते आतंकवादी घूमते देखे जा रहे थे. वह टीवी से चिपक कर बैठी हुई थी. फोन पर वह लोगों को यही कहती कि उसे उम्मीद है सब ठीक हो जाएगा.. पर वह डर भी रही थी.. टीवी चैनलों पर बैठे लोग तरह तरह के कयास लगा रहे थे, इस खतरनाक वारदात की संजीदगी को लेकर, उसमें मारे जाने वाले लोगों की संख्या को लेकर.. चौबीस घंटे बाद भी कोई खबर नहीं थी..&lt;br /&gt;48 घंटे बाद जब आतंकवादी मार गिराये गये, तब तक ये भी साफ होने लगा कि उन्होंने जानमाल का कितना नुक्सान किया है.&lt;br /&gt;टीवी चैनल के नीचे पट्टी पर उस होटल के उन मेहमानों के नाम आ रहे थे, जिन्हें आतंकवादियों ने अपनी गोली का शिकार बनाया था.&lt;br /&gt;फेहरिस्त में सातवां नाम उसके पति का था.&lt;br /&gt;आठवां खुद उसका.&lt;br /&gt;वह टेलीविजन पर अपनी मौत की ख़बर खुद पढ़ रही थी. और आंसुओं से लबालब होती आंखों के बीच यह सोच रही थी कि अपने ज़िंदा होने की सफाई में वह क्या कहेगी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-7540374244762866401?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/8lVmrlje5H0" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/7540374244762866401/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=7540374244762866401" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/7540374244762866401?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/7540374244762866401?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/8lVmrlje5H0/love-story-471.html" title="LOVE STORY # 471: टीवी चैनल पर जारी फेहरिस्त में उसका नाम भी था" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><thr:total>4</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2009/01/love-story-471.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEMHQH8-fip7ImA9WxVbEUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-1154565236138305221</id><published>2008-12-12T12:26:00.002+05:30</published><updated>2009-03-28T01:03:51.156+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-03-28T01:03:51.156+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 472: लड़की देखते ही अंदाजा लगा लिया कि उसका ब्लड प्रेशर कितना है</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SUIL0gXzg7I/AAAAAAAAAbg/PbzQQTi71nk/s1600-h/blood+pressure+gauge.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5278794709902525362" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 267px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SUIL0gXzg7I/AAAAAAAAAbg/PbzQQTi71nk/s400/blood+pressure+gauge.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; वह एक डॉक्टर के यहां काम करता था. उसका काम डॉक्टर की मदद करना था, पर वह माहिर था लोगों का ब्लड प्रेशर नापने का. लोगों का ब्लड प्रेशर नापते नापते हुए उसे इतनी महारत हासिल हो गई थी, कि वह लोगों का चेहरा देखकर उनके ब्लड प्रेशर का अंदाजा लगाने लगा था. शुरू शुरू में सारे अंदाजे सही नहीं होते थे, पर प्रैक्टिस करते करते उसके तुक्के सही लगने लगे थे. वह पूरी दुनिया में रह रही मनुष्यता को उसके ब्लड प्रेशर से पहचानने की चमत्कारिक शक्ति पाने में सफल हो रहा था. क्योंकि वह बहुत पढ़ा- लिखा, होशियार और साहित्यिक नहीं था, इसलिए उसके लगनशील होने पर शक किया जाना बेमानी और बेबुनियाद था. अपने डॉक्टर की मदद से फिर धीरे धीरे वह ब्लड प्रैशर के अंदाजे से बीमारियों का भी अंदाजा लगाने लगा, और प्रैक्टिस, मेहनत और लगन से ये भी मुमकिन होने लगा कि वह सामने बैठे शख्स के ब्लड प्रैशर के साथ साथ उसकी बीमारी के बारे में बता सके.&lt;br /&gt;28 साल का होते होते उसके घर वालों ने उसका रिश्ता करना चाहा. लड़की देखने जब वह गया तो उसने उसका चेहरा देखते ही उसका बीपी ताड़ लिया. और जैसे ही उन्हें थोड़ा बातचीत करने के लिए अकेला छोड़ा गया, उसने उसपर इम्प्रैशन जमाने के लिए उसका बीपी बता दिया. हालांकि लड़की का बीपी लगभग नारमल ही था, पर वह सहम गई. वह लड़की को देखता हुआ उसकी उन बीमारियों के बारे में सोचने लगा जो लगभग नॉरमल बीपी वाली लड़कियों को हो सकती थी.&lt;br /&gt;बाद में कुंडली मिलने के बाद भी लड़की वालों ने शादी से मना कर दिया.&lt;br /&gt;नागपुर के रामदासपेठ में रह रहे उस शख्स का बीपी मापने का शौक जारी रहा.&lt;br /&gt;बहुत बाद में देखा गया, कि मुहल्ले में जो भी साइकल उसे दिखाई देती, वह उसके टायर पर हाथ लगा कर उसकी हवा जरूर चैक करता.&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://www.flickr.com/photos/25492962@N06/2399993975/"&gt;&lt;span style="font-size:78%;"&gt;फोटो: स्टेफन बेनितो&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-1154565236138305221?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/T_gJXac5HyQ" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/1154565236138305221/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=1154565236138305221" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/1154565236138305221?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/1154565236138305221?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/T_gJXac5HyQ/love-story-472-hai.html" title="LOVE STORY # 472: लड़की देखते ही अंदाजा लगा लिया कि उसका ब्लड प्रेशर कितना है" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SUIL0gXzg7I/AAAAAAAAAbg/PbzQQTi71nk/s72-c/blood+pressure+gauge.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>2</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2008/12/love-story-472-hai.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0EAQnY8fCp7ImA9WxRaEEo.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-3698274850349227412</id><published>2008-12-12T12:19:00.003+05:30</published><updated>2008-12-12T15:24:03.874+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-12-12T15:24:03.874+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 473: सीसीटीवी में दिखा कि वह गोलियां चलते वक्त एकबारगी ठिठक गया था</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SUIJ1ZvGhfI/AAAAAAAAAbY/7VQbIAlkzyI/s1600-h/kareena+2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5278792526277805554" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SUIJ1ZvGhfI/AAAAAAAAAbY/7VQbIAlkzyI/s400/kareena+2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वह विक्टोरिया टर्मिनस उर्फ छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन पर उस रात जेहादी हमला करने आया था. अपनी ए के 56 से वह जहां लोगों को देखता गोलियां दागता रहता.&lt;br /&gt;बाद में मुम्बई और सुरक्षा एजेंसियों ने सीसीटीवी फुटेज देखा. वह लगातार गोलियां चलाता हुआ एकबारगी बीच में ही रुक गया था. सामने एक पोस्टर था. उसमें करीना कपूर का ब्लो अप था.&lt;br /&gt;फिर उसके साथ सैफ अली खान पटौदी को.&lt;br /&gt;सीसीटीवी में दर्ज फुटेज के मुताबिक उसने एक भद्दी सी गाली दी.&lt;br /&gt;गोलियां फिर चलनी शुरू हो गईं.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-3698274850349227412?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/lUE6_iqY8yg" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/3698274850349227412/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=3698274850349227412" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/3698274850349227412?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/3698274850349227412?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/lUE6_iqY8yg/love-story-273.html" title="LOVE STORY # 473: सीसीटीवी में दिखा कि वह गोलियां चलते वक्त एकबारगी ठिठक गया था" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SUIJ1ZvGhfI/AAAAAAAAAbY/7VQbIAlkzyI/s72-c/kareena+2.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>2</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2008/12/love-story-273.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkMMQ3k5cSp7ImA9WxRbEEs.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-2463854139673055113</id><published>2008-11-30T20:08:00.006+05:30</published><updated>2008-11-30T22:31:22.729+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-30T22:31:22.729+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 474: मुंबई की मुजाहिदीन शाम में उसे बामियान बुद्ध को उड़ाने के बाद की खाली जगह याद आई</title><content type="html">&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/STKmyHtqisI/AAAAAAAAAbQ/fs7NVlGkpxI/s1600-h/bamiyaan.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5274461493598522050" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 223px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/STKmyHtqisI/AAAAAAAAAbQ/fs7NVlGkpxI/s400/bamiyaan.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;मुंबई में जब वह धमाकों के बीच भाग रही थी, उसका चेहरा पीछे छूट चुका था.उसमें कोई भाव नहीं थे. दहशत हर जगह थी. सड़क पर. होटलों में. सड़क पर गश्त करती पुलिस जिप्सी के टोही दलों के चेहरों पर. मुंबई में उसे सब कुछ दिया था. बान्द्रा में बंगला. सुपर स्टार का दर्जा. 100 करोड़ के देश में पच्चीस साल से ज्यादा तक जिस आदमी को लोग भगवान समझ रहे थे, उसका प्यार. उनके प्यार पर फ़िल्म तक बनी थी. लोग कहते थे कि उसकी घड़ी उलटी घूम रही है. जब वह मुंबई आई थी, तब वह बहुत ही बौड़म, भौंडी, बेतरतीब और एक हद तक बचकानी भी थी. पर अब वह सिर्फ़ खूबसूरत ही नहीं, गरिमा और लावण्य की प्रतीक भी बन गई थी. मुंबई ने उसे एक्टिंग सिखाई और भीड़ से एक अलग दर्जा दिया. पर उस दिन जब वह ताज होटल से अपने घर जाने के लिए निकली तो कार का ड्राईवर आवाज़ देने पर भी नहीं आया. शायद वह जान बचाकर भाग गया था. फ़ोन लगा नहीं. उसे लगा कि वह सड़क से टैक्सी ले लेगी. दूर तक टैक्सी नहीं थी. जो थी, वे तेजी से निकल रही थी. उसके लिए कोई रुक नहीं रहा था. उसे पहली बार लगा वह अकेली है. उसका चेहरा न कोई देख पा रहा था, न पढ़. उसने अपने पर्स से छोटा आईना निकाल कर देखा, तो दंग रह गई. उसका चेहरा गायब हो चुका था. उसे लगा ये उसी दहशत का हिस्सा है, जिसके कारण उसकी पुरानी फिल्मों के जोडीदार हीरो को उस रात मुंबई में भरी पिस्तौल के साथ सोना पड़ा था. उसे मुजाहिदीन हो चले वक्त में वह खोखली जगह याद आई, जो बामियान में बुद्ध की प्रतिमाएँ उड़ाने के बाद रह गई थीं. उसे समझ में नहीं आया कि वह उस शाम मुंबई में अपना चेहरा ढूंढें या फिर जान बचाकर उसी तरह भागे जैसा भरी पिस्तौल के साथ सोना होता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-2463854139673055113?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/f6CCzhln4QU" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/2463854139673055113/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=2463854139673055113" title="4 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/2463854139673055113?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/2463854139673055113?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/f6CCzhln4QU/love-story-474.html" title="LOVE STORY # 474: मुंबई की मुजाहिदीन शाम में उसे बामियान बुद्ध को उड़ाने के बाद की खाली जगह याद आई" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/STKmyHtqisI/AAAAAAAAAbQ/fs7NVlGkpxI/s72-c/bamiyaan.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>4</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2008/11/love-story-474.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D08ASHkzcCp7ImA9WxRUEEw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-6211635402601335397</id><published>2008-11-18T18:56:00.005+05:30</published><updated>2008-11-18T19:14:09.788+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-18T19:14:09.788+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 475: पेंटिंग पूरी होने का पता उसे वैसे ही चलता है जैसे प्यार करने के पूरा होने का</title><content type="html">&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SSLECbO2IYI/AAAAAAAAAbA/Wp0cKnqOKuw/s1600-h/pollocknumber-8.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5269990059925709186" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 322px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SSLECbO2IYI/AAAAAAAAAbA/Wp0cKnqOKuw/s400/pollocknumber-8.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SSLCt-DWx7I/AAAAAAAAAa4/_kdS3PIv_gM/s1600-h/pollock.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;strong&gt;लाइफ मैगजीन: आप कैसे जान लेते हैं की पेंटिंग पूरी हो गई?&lt;br /&gt;जैक्सन पॉलक: आप कैसे जान लेते है प्यार करना कब पूरा हो गया?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;(सोनी पिक्स पर सोमवार रात फ़िल्म &lt;em&gt;&lt;strong&gt;पॉलक&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; देखने के बाद)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हम अपनी मनुष्यता में अकेले हैं. वह एक अरण्य है. बेतरतीब और कुदरती. अरण्य की तरफ़ जाने वाले पहले कदम रोमांच के होते हैं, फिर सैलानियों के, फिर कारोबारियों के. कई बार ये कदम एक ही आदमी के हो सकते हैं. पहले जंगल पटवारियों के नक्शे से बाहर अपरिमित होता है, फिर धीरे से एक पगडण्डी बनती है, फिर सड़क, फिर कांटो की बाड़ में जंगल क़ैद होने लगता है, और मनुष्यता बेदखल. मनुष्यता के जंगल ने यकीन करना पहले सीखा है. शक करना बाद में. यकीन के शक में बदलने की विकासशील प्रक्रिया पूरी होने में देर लगती है. जितनी एक आदिवासी को कारोबारी होने में.&lt;br /&gt;जंगल फिर खुदकुशी क्यों कर लेता है, सभ्य समाज शाम के कारोबार को समेटता हुआ सवाल नहीं करता, सिर्फ़ मुस्कुराता है. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-6211635402601335397?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/z-Dp0hIeLMk" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/6211635402601335397/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=6211635402601335397" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/6211635402601335397?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" 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gd:etag="W/&quot;Dk4GQ386fyp7ImA9WxRVGUg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-6336294755915982159</id><published>2008-11-18T02:01:00.001+05:30</published><updated>2008-11-18T02:18:42.117+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-18T02:18:42.117+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 476: कुहासे में गड्डमड्ड सपने की याद में वह एक सिगरेट जलाता है. सपने के कुहासे में धुंआ छोड़ता हुआ.</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SSHYgSCLLnI/AAAAAAAAAaw/jujUsnEa4mo/s1600-h/cigarette+lanier67.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer; width: 400px; height: 316px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SSHYgSCLLnI/AAAAAAAAAaw/jujUsnEa4mo/s400/cigarette+lanier67.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5269731088108564082" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यहां आओ और बैठ जाओ, बेटे.&lt;br /&gt;वह अपने पिता के पास बैठ गया. वे सोने जा रहे थे. मां पास में बैठी है.&lt;br /&gt;‘तुम इतनी स्मोकिंग क्यों कर रहे हो’, उन्होंने पूछा.&lt;br /&gt;बहुत सारी घनी चुप्पी. छुए जा सकने वाले कुहासे की तरह. नवम्बर का महीना.&lt;br /&gt;‘पापा वह मर रही है’, उसने कहा.&lt;br /&gt;‘पर तुम?’&lt;br /&gt;फिर बहुत सारी चुप्पी. घना होता कुहासा.&lt;br /&gt;'तुम तो अपना ख्याल रखो.'&lt;br /&gt;'पापा, उसने तो कुछ नहीं किया ऐसा, फिर भी हो गया न कैंसर उसे!'&lt;br /&gt;कुहासा एक दम छंटने लगा. वह उठा और बाहर फिर. एक और सिगरेट.&lt;br /&gt;एक लंबी मियाद बीत चुकी है. पिता अब नहीं हैं. वह मर चुकी है. सिगरेट छोड़े उसे पांच साल हो चुके हैं. पर सपने में याद लौटती है. एक पिता पूछता है, तुम सिगरेट क्यों पी रहे हो?&lt;br /&gt;सपने में वह सफाई देता है.  सपने में जो याद की फाइल है, जिंदगी से अलग है. कोई एक जगह छूटी रह गई है, जहां वह मर रही है, वह सिगरेट पी रहा है, उसका पिता परेशानी को एक खामोश गुस्से की शक्ल देता पूछता है. जो जिंदगी में नहीं है, यादों में दफन है. जो यादों में दफन है, वह सपनों में लौटता है. कुहासे में गड्डमड्ड सपने की याद में वह एक सिगरेट जलाता है। सपने के कुहासे में धुंआ छोड़ता हुआ.&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic;font-size:78%;" &gt;&lt;a href="http://flickr.com/photos/lanier67/237055775/"&gt;photo: cigarette by lanier/ flickr&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-6336294755915982159?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/6NW8Vq5fXBU" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/6336294755915982159/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=6336294755915982159" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/6336294755915982159?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/6336294755915982159?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/6NW8Vq5fXBU/love-story-476.html" title="LOVE STORY # 476: कुहासे में गड्डमड्ड सपने की याद में वह एक सिगरेट जलाता है. सपने के कुहासे में धुंआ छोड़ता हुआ." /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SSHYgSCLLnI/AAAAAAAAAaw/jujUsnEa4mo/s72-c/cigarette+lanier67.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>5</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2008/11/love-story-476.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0EGSXwyfCp7ImA9WxRVGEg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-9196073176827882539</id><published>2008-11-16T22:36:00.002+05:30</published><updated>2008-11-16T22:43:48.294+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-16T22:43:48.294+05:30</app:edited><title>LOVE STORY # 477: नाम दो कि वे सुन सकें तुम्हें और तुम भी उन्हें पुकार सको</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SSBUWa_XTSI/AAAAAAAAAao/iWJCPjCPF3c/s1600-h/kittens.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer; width: 400px; height: 307px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SSBUWa_XTSI/AAAAAAAAAao/iWJCPjCPF3c/s400/kittens.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5269304308202425634" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;नाम दो उन बिल्ली के बच्चों को कि वे डरना भूल सकें. और ठिठकने का संकोच भी. ताकि वे आ सके तुम्हारे पास बिना दबे पांव भी. ताकि वे भूखे हों तो तुम्हारे पास आ कर भूखी म्याऊं कर सकें. कि वे आएं तुम्हारे पास और तुम्हारे पांवों से खुद को रगड़ते हुए वहीं कहीं पसर सकें. तुम्हारा मिज़ाज ताड़ने की अन्यमनस्कता से मुक्त हो सकें. कार के टायर के नीचे छिपने की जरूरत तभी पड़ें जब धूप बहुत हो, तुम्हारी नज़रों से बचने के लिए नहीं. नाम दो उन्हें कि वे आ सकें तुम्हारे करीब बिना सोचे अपनी हरी बिल्ली आंखों से झांकते अपनी बिल्ली खुशियों औऱ बिल्ली अरमानों के साथ. नाम दो कि वे डरना भूल सकें. कि वे दौड़ते हुए आ सकें, तुम्हारे फर्श पर फिसलकर, तुम्हारे कदमों से लिपटते हुए. नाम दो कि वे सुन सकें तुम्हें. और तुम उन्हें पुकार सको.&lt;br /&gt;नाम दो उस खुशी को जो उस फूल की तरह तुम्हारे बगीचे में उग आई, जिसका किसी को इंतजार नहीं था, तुम्हें, मौसम को, न मुहुरत, न क्यारी को... पर वह उग आया सारे अंदाजों को चौंकाता हुआ.&lt;br /&gt;नाम दो उस हक को, जिसने कमा लिया तुम्हें. बिना ख़बर दिये भी.&lt;br /&gt;नाम.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; दो.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-9196073176827882539?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/osZWLA8rzao" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/9196073176827882539/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=9196073176827882539" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/9196073176827882539?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/9196073176827882539?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/osZWLA8rzao/love-story-477.html" title="LOVE STORY # 477: नाम दो कि वे सुन सकें तुम्हें और तुम भी उन्हें पुकार सको" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SSBUWa_XTSI/AAAAAAAAAao/iWJCPjCPF3c/s72-c/kittens.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2008/11/love-story-477.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DE8NR3YyfCp7ImA9WxRVFks.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-2347809967790526358.post-3431381501773874528</id><published>2008-11-14T15:54:00.009+05:30</published><updated>2008-11-14T18:18:16.894+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-14T18:18:16.894+05:30</app:edited><title>बहुमत की लठैती वाले लोकतंत्र में आस्थाएं मरी जा रही हैं आहत होने के लिए</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SR1n-adj0JI/AAAAAAAAAag/2qDZv-yYCZI/s1600-h/2467.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer; width: 400px; height: 288px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SR1n-adj0JI/AAAAAAAAAag/2qDZv-yYCZI/s400/2467.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268481461046202514" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span lang="EN-GB"  style="font-size:14;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;एक पूर्व गृहमंत्री अब प्रधानमंत्री बनना चाहता है. वह कह रहा है कि मालेगांव धमाके में जो आरोपी हैं, अगर वे दोषी हैं, तो उनपर कानून अपनी कार्रवाई करे.. ये वह आदमी कह रहा है, जिसने पूरे मुल्क में रथ यात्रा कर पहले दंगे करवाए, फिर बाबरी मस्जिद तुड़वाई, जिन्ना को गांधी के बराबर बताने की कोशिश की..&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-size:14;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;वह कह रहा है वह ईसाई स्कूलों में पढ़ा है, &lt;a href="http://ibnlive.in.com/news/advani-meets-christian-leaders-calls-nuns-rape-shameful-crime/75355-3-1.html?from=rssfeed"&gt;उसे अच्छा नहीं लगता जब ईसाइयों का हिंदुस्तान में कत्लेआम होता है. और नन का बलात्कार.&lt;/a&gt; और &lt;a href="http://in.news.yahoo.com/32/20081004/1055/tnl-shame-in-orissa.html"&gt;एक कारगिल के बहादुर सिपाही मोतीलाल प्रधान के घर परिवार की तबाही&lt;/a&gt;. बात वहां तक नहीं पंहुचती. बीच में ही आई गई हो जाती है.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;    &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="EN-GB"  style="font-size:14;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;लालकृष्ण आडवाणी की &lt;a href="http://www.ndtv.com/convergence/ndtv/elections-jk/gallery.aspx?imgid=2807&amp;amp;img=1"&gt;भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष महोदय की तस्वीर उस साध्वी के साथ है, जिसका नाम मालेगांव धमाकों में बतौर प्रमुख अभियुक&lt;/a&gt;्त है. राजनाथ सिंह कह रहे हैं &lt;a href="http://sify.com/news/fullstory.php?id=14797502"&gt;&lt;span&gt;मासूम&lt;/span&gt; साध्वी प्रज्ञा को फंसाया &lt;/a&gt;जा रहा है. प्रज्ञा की ब्यूटीशियन बहन को मिलने नहीं दिया जा रहा है उस साध्वी से, जिसके फोटो की पूजा उसके जैविक पिता अपने पूजाघर में कर रहे हैं. पूजाघर में जो फोटो है, क्या उसमें वह मोटरसाइकिल भी है, जिस पर सवारी गांठकर प्रज्ञा घूमा करती थी और जिसका इस्तेमाल बम विस्फोट में किया गया.&lt;span style=""&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-GB"  style="font-size:14;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;इस तरह के चरित्र प्रमाणपत्र योगा &lt;a href="http://www.zeenews.com/nation/2008-11-11/482546news.html"&gt;&lt;span&gt;मास्टर&lt;/span&gt; रामदेव&lt;/a&gt; भी दे रहे हैं, जिनकी चमत्कारी और शुद्ध और मंहगी आयुर्वेदिक औषधियों में इंसानी हड्डियों के होने का आरोप लगा था, जिसका खंडन तो उन्होंने किया था, पर ऐसी कोई कैमिकल एनालिसिस रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई. एक हिमानी सावरकर हैं, जो खुद को वीर सावरकर के भाई की बहू बताती है, जो साध्वी और दूसरे आरोपियों के लिए कानूनी मदद जुटा रही हैं. वे ये नहीं बताती कि वे नाथूराम गोड़से की भतीजी और गांधी हत्या के दूसरे आरोपी गोपाल गोड़से की बेटी भी हैं. &lt;a href="http://www.hindu.com/2008/11/06/stories/2008110659591200.htm"&gt;&lt;span&gt;हिमानी&lt;/span&gt; सावरकर&lt;/a&gt; जिस अभिनव भारत की कल्पना को साकार करने में लगी हैं, राजनाथ सिंह उसकी तस्वीर का हिस्सा हैं. आडवाणी जी की मज़बूरी है कि प्रधानमंत्री बनने का उनके पास ये आखिरी मौका है. इसलिए अब वे पार्टी निर्माण, और राष्ट्र निर्माण जैसी बेकार की बातों में समय न गंवाते हुए सिर्फ पीएम की कुर्सी की तरफ फोकस कर रहे हैं. उन्होंने अपनी एक हिंदी वेबसाइट भी शुरू की है, जिसमें उस भाषा को लेकर उनका प्रेम छलकता है, जिसे वे अपने जबड़ों से चबाते हुए कहते हैं. हिंदी वह जुबान है, जिसे जबड़ों से चबाते हुए आडवाणी और उनके चपाटियों ने नफरत फैलाई है. (अगर वे देवभाषा संस्कृत में अपनी नफरत पेलते, तो शायद इस नागरिक समाज का इतना बुरा न होता, जितना आज है.) उनकी जिंदगी एक नाखुश आदमी के संघर्ष में निकली है. उन्होंने पार्टी को किस गर्त से किन ऊंचाइयों तक पंहुचाया. त्याग किया. बलिदान किया. तकलीफ सहीं. अरमानों पर पत्थर रखे. और अब जब लास्ट चांस है, तो चांस कैसे लिया जा सकता है.&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-GB"  style="font-size:14;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;    &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="EN-GB"  style="font-size:14;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;इसलिए वे हिंदुस्तान की सरहद पर लड़ रहे मुस्लिम पैरामिलीटरी सिपाही के लिए कुछ नहीं कहते, &lt;a href="http://www.indianexpress.com/news/i-begged-told-them-im-a-soldier...-i-was-told-im-muslim-nothing-else/373414/"&gt;&lt;span&gt;जिसे&lt;/span&gt; धुले में बताया गया कि तुम्हें और तुम्हारे कुनबे को बख्शने के लिए ये वजह काफी नहीं. तुम्हें इस लिए मारा जा रहा है कि तुम मुसलमान हो.&lt;/a&gt; एक ईसाई सिपाही का मकान कंधमाल में जला दिया गया और &lt;a href="http://timesofindia.indiatimes.com/India/Kandhmal_sees_first_burial_in_45_days/articleshow/3575593.cms"&gt;&lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; अपने पैरालिटिक भाई की अस्थियां दफनाने के लिए हत्या के ४५ मिनट बाद १० मिनट का समय दिया गया&lt;/a&gt;. कहा सुरक्षा नहीं दी जा सकती. उसका परिवार एक शरणार्थी शिविर में है. उसके पक्ष में कोई खड़ा नहीं होता. पर एक फौजी अफसर जिसका नाम हिंदू जेहादियों में लिया जा रहा है, उसे अदालत के कठघरे में खड़ा किये जाने पर भी ऐतराज किया जा रहा है. यह देश हिंदू आस्थाओं का देश है. इस देश में हिंदुओं के अलावा किसी भी और संप्रदाय के लोगों की जानमाल की गारंटी लेने वाला कोई नहीं है, ऐसा दो बातों से पता चलता है- एक जो उन पर हमला करते हैं. दूसरा जिन्हें इस मुल्क के संविधान ने उन लोगों को बचाने का काम सौंपा था. यानी मुख्यमंत्री, खुद को सैक्यूलर कहने वाली पार्टियां, पुलिस और प्रशासन. &lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-GB"  style="font-size:14;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;मुंबई में राज ठाकरे की आस्था आहत है और कांग्रेस सरकार अपनी टांगों में दुम दिये बैठी है. &lt;a href="http://www.nytimes.com/2008/11/09/world/asia/09india.html?_r=1&amp;amp;scp=1&amp;amp;sq=Maqbool%20Fida%20Hussain&amp;amp;st=cse&amp;amp;oref=slogin"&gt;93 साल का मकबूल फिदा हुसैन अदालत के फैसले के बाद भी &lt;/a&gt;हिंदुस्तान नहीं लौट रहे, क्योंकि उसे बाल ठाकरे की गारंटी चाहिये, आडवाणी का क्षमादान (देखिये आइंदा हमारी देवियों को बिना ब्रा-पैंटी- ब्लाउज- साड़ी के आप पेंट नहीं करेंगे... अदालतें जो भी कह रही हों, आपको पता है न हम आपका क्या हाल कर देंगे मकबूल जी) चाहिए, राज ठाकरे का प्रोटेक्शन चाहिए. 93 साल का एक बूढ़ा भारतीय जो पद्मविभूषण है, वह उन हिंदू आस्थाओं का दुश्मन है, जो इस्लामिक जेहादियों के तेवर अपना चुकी हैं. अगर मकबूल फिदा हुसैन हिंदू देवी देवताओं को नंगा दिखाकर असम्मान करते हैं, तो खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों और अजंता के चित्रों को यह देश अपने विरासत में क्यों गिन रहा है. वे कामसूत्र और वात्साययन पर शर्मिंदा क्यों नहीं हैं और उनपर प्रतिबंध क्यों नहीं लगातीं. करोड़ों हिंदू औरतें सांपों के बीच शिव के लिंग को दूध चढ़ा रहीं है एक अच्छे से पति के लिए, पर इसमें कोई असम्मान, अश्लीलता का सवाल नहीं है. (अच्छा पति नहीं मिलने पर भी उनकी आस्था आहत नहीं होती..)&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-size:14;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;वे ताज़ महल को हिंदू मंदिर बताने वाले थ्योरिस्ट की बात को मानते हुए वहां भजन कीर्तन और शाखा क्यों नहीं शुरू करवा देती. यह देश तस्लीमा नसरीन को सुरक्षा, शरण, घर सब दे सकता है, मकबूल फिदा हुसैन को नहीं. तस्लीमा की अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा भी जरूरी है, पर हुसैन को ठीक करना जरूरी है.&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;सिलेक्टिव आस्थाओं का दौर है. और आस्थाएं आहत होने के लिए कमबख्त मरी जा रही है. और आस्था किसी भी बात से आहत हो सकती है. बहुसंख्य की आस्था लठैती हो गई है. लोकतंत्र में बहुमत मायने रखता है. लोकतंत्र में अल्पमत मायने नहीं रखता, ये नई सीख है. और वह सब पर लागू होती है. चाहे वह सरहद को बचाने वाला हो, या फिर कोई और. अगर हिंदू नहीं है, तो मर सकता है. कई बार जान बूझ कर, कई बार गलती से, कई बार तैश में, कई बार आस्थाएं आहत होने पर, कई बार सिर्फ इसलिए कि एक ईसाई नन या बिलकीस बानो का बलात्कार करने से हिंदूत्व का झंडा थोड़ा और ऊंचा हो जाता है. इस ऊंचे झंडे के बूते आडवाणी और उनके लोग इस मुल्क पर राज करना चाहते हैं. एक बार और. बस एक बार. उनमें ऐसा क्या खास है, जो मुझमें नहीं. &lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-GB"  style="font-size:14;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;जब ये सब हो रहा होता है, तो नवीन पटनायक और विलास राव देशमुख और डॉ मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल जो बोलते हैं उसमें से बेचारगी की ऐसी आवाज़ निकलती है- चूंचूंचूंचूंचूं.. कहीं ऐसा न हो कि जो मुंह में दही जमाकर बैठे हों, उसमें ख़ल़ल पड़ जाए. जैसे सरकार चलाने की जगह उन्हें भंडैती करने का जनादेश मिला हो. वे पता नहीं किस ख़ौफ में सबकी नाफरमानी कर रहे हैं- संविधान की, जनादेश की, अदालतों की, इंसानियत के तकाजे की. लोग तो ये शरीफ लगते हैं, पर वे हमेशा कम्प्रोमाइजिंग पोजिशन में क्यों पाये जाते हैं. इन शरीफ और पनीले लोगों के कारण समाज में शराफत से रहना ही मुश्किल हो गया है.&lt;/span&gt;&lt;span lang="EN-GB"  style="font-size:14;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;    &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="EN-GB"  style="font-size:14;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;अब ये मसला कानून और व्यवस्था का नहीं है. आस्था का है. आस्था कुछ भी करवा सकती है. कत्ल, ब्लात्कार, बम विस्फोट..&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;                                      &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style=";font-family:Mangal;font-size:14;"  lang="HI" &gt;लोकतंत्र, संविधान, गणतंत्र, मानव अधिकार खुशी से तेल लेने जा सकते हैं.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2347809967790526358-3431381501773874528?l=kataksh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/kataksh/~4/mOz6gGLXlE0" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://kataksh.blogspot.com/feeds/3431381501773874528/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2347809967790526358&amp;postID=3431381501773874528" title="11 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/3431381501773874528?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/2347809967790526358/posts/default/3431381501773874528?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/kataksh/~3/mOz6gGLXlE0/blog-post.html" title="बहुमत की लठैती वाले लोकतंत्र में आस्थाएं मरी जा रही हैं आहत होने के लिए" /><author><name>आस्तीन का अजगर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15811514788578363221</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="32" height="32" src="http://3.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/Srn_jg5tuAI/AAAAAAAAAdM/PSsnZEAqL64/S220/DSC00018.JPG" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/__DFvzZO__qk/SR1n-adj0JI/AAAAAAAAAag/2qDZv-yYCZI/s72-c/2467.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>11</thr:total><feedburner:origLink>http://kataksh.blogspot.com/2008/11/blog-post.html</feedburner:origLink></entry></feed>

