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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" gd:etag="W/&quot;D0EBR3YzeCp7ImA9WhRSF0U.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849</id><updated>2011-11-20T02:40:56.880-08:00</updated><category term="ध्यानचंद" /><category term="स्‍टीव वॉ" /><category term="द्रविड़" /><category term="ग्‍लेन मैक्‍ग्रा" /><category term="ईशांत" /><category term="इयान हाइबेल" /><category term="मैथ्यू हेडन" /><category term="अमेरिका" /><category term="शौकेन्द्र" /><category term="टीम इंडिया" /><category term="हसी" /><category term="ओलंपिक" /><category 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/><category term="युवराज सिंह" /><category term="लांस आर्मस्ट्रांग" /><category term="मुरली विजय" /><category term="बुकानन" /><category term="वॉट्सन" /><category term="वार्न" /><title>खेल ज़िंदगी है.....</title><subtitle type="html" /><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://npsingh.itzmyblog.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false&amp;v=2" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>69</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/atom+xml" href="http://feeds.feedburner.com/khel" /><feedburner:info uri="khel" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><feedburner:emailServiceId>khel</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><entry gd:etag="W/&quot;CE4DSHcyeCp7ImA9WxJSGE0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-1508064346203866975</id><published>2009-05-08T10:14:00.000-07:00</published><updated>2009-05-08T10:16:19.990-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-08T10:16:19.990-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मैकुलम" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="इशांत शर्मा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बुकानन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गौतम गंभीर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गांगुली" /><title>बुकानन के ब्लू प्रिंट से आगे की सोच की दरकार</title><content type="html">यह धीरे धीरे नियति से समझौता करते कप्तान मैकुलम थे। उन्हें अब गेंद से परास्त होते फील्डर से झुंझलाहट नहीं हो रही थी। हाथ से फिसलते आसान कैच पर हताशा उभार नहीं ले रही थी। अगरकर की गेंद पर दिलशान के बल्ले का किनारा लेती गेंद पर फील्डर काबू नहीं कर पाया तो मैकुलम के चहरे पर नाराजगी नहीं थी। उनके होठों पर एक हलकी सी मुस्कराहट तैर रही थी। मुकाबले के आखिरी क्षणों में इशांत शर्मा की गेंद पर हेनरिक्स ने गौतम गंभीर का आसान सा   कैच टपका दिया तो मैकुलम शून्य में ताक रहे थे। वो आत्मचिंतन की मुद्रा में थे। यह अपनी नियति को स्वीकारते मैकुलम थे। हार के न टूटते सिलसिले को अपनी किस्मत मानते हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये अपने कोच जॉन बुकानन की सोच से ठीक उलट खड़े मैकुलम थे। खेल में नियति को अस्वीकार कर सिर्फ और सिर्फ जीत तक पहुँचने की सोच रखने वाले बुकानन। मल्टीपल कप्तान  की थ्योरी के बीच जीत के बेहतरीन कॉम्बिनेशन को इजाद करने की धुन में जुटे बुकानन। ये भूलते हुए कि खेल में आप नतीजों की भविष्यवाणी का जोखिम नहीं उठा सकते। जिस दिन आप नतीजों की भविष्यवाणी करने लग जाएंगे, उस दिन आप खेल से इसके सबसे खूबसूरत पहलू ‘चमत्कार’ को गायब कर देंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर क्रिकेट के मुकाबले में कोई बॉलिंग मशीन नहीं खेलती। मशीन, जो आपको गेंद की सही लम्बाई, ऊँचाई और उछाल को पहले से बता सके। यहाँ फील्डर कैच का पहले से पूर्वानुमान या आकलन नहीं कर सकता। यहाँ बल्लेबाज के लिये हर अगली गेंद एक नयी चुनौती होती है। गेंदबाज रन उप पर उठते कदमों के बीच विकेट से आगे जाकर बल्लेबाज की सोच पर जीत दर्ज करना चाह्ता है। अंपायर का एक फैसला पूरे मुकाबले का रुख मोड़ सकता है। दरअसल, हर एक नयी गेंद के क्रम में एक नयी शुरुआत होती है। गेंदबाज, बल्लेब्बाज, फील्डर और अंपायर के बीच से गुजरती एक नयी कहानी से हम रुबरु होते हैं। ऐसी कहानी, जिसमें आप पहले से कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकते। फिर इन सबसे आगे यहाँ हाड मांस के खिलाडी खेलते हैं&lt;br /&gt;। भावनाओं में लिपटे हुए अपनी अपनी भूमिकाओं को अंजाम देते हुए। जीत के लम्हों में लिपटी असीम ख़ुशी होती है तो हार के बीच छिपा दर्द होता है। अपने तमाम टेलेंट और अनुभव के बीच वो अगली गेंद के नतीजे से अनजान दर्द और ख़ुशी के बीच से गुजरते हैं। इन दो छोरों के बीच, जो जितना सहज रह पता है, कामयाबी उसी के हाथ लगाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसीलिये एक दिन युवराज सिंह हैट्रिक लेते हैं। चार खूबसूरत छक्कों से सजी हाफ सेंचुरी बनाते हैं। लेकिन इसके बावजूद उनकी टीम हार जाती है। एक दिन वॉर्न की राजस्थान रॉयल्स महज 58 रन पर सिमट जाती है। लेकिन एक दिन प्रतियोगिता का सबसे बड़ा स्कोर 212 रन बना देती है। बंगलोर रॉयल्स लगतार तीन मुकाबले हारती है। लेकिन अगले ही दिन वो मुंबई इंडियंस को 9 विकेट से हराती है। यह हार और जीत के दो छोरों को पकड़ती टीम हैं। यहाँ जीत जितना बड़ा सच है, हार उससे भी बड़ा। लेकिन हार और जीत के बीच पूरी सहजता ! यही सहजता इन्हें मुकाबलों के दबाव से उबारती हुई हार से वापस जीत की ओर मुड़ने का हौसला देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सिर्फ जीत के आस पास घूमती बुकानन की सोच उन्हें इस सहजता से दूर कर रही है। 17 खिलाडियों की टीम के लिये 16 लोगों का कोचिंग स्टाफ भी जीत का मंत्र नहीं सूझा पा रहा। हर गेंद के साथ बदलता मुकाबला और शुरू होती नयी कहानी के बीच पहले से तैयार फार्मूला अचानक खारिज हो जाता है। मंगलवार को ही ब्रेड हॉज के आउट होने पर 6 ओवर बाकी रहते सौरव को विकेट पर न भेजना अपनी बनी बनायी रणनीति से आगे जाकर न सोचने की कहानी कहता है। वन डे में 22 शतक और 11,000 रन बना चुके सौरव की जगह हेनरिक्स को भेजा जाता है। वो लेग स्पिनर अमित मिश्रा के ओवर को मेडन निकाल देते हैं। भारतीय क्रिकेट में स्पिन्नर के खिलाफ सबसे बड़े स्ट्रोक खेलने वाले सौरव डगआउट में पैड पहने ये सब देखते रह जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना ही नहीं, बुकानन की सोच को मैदान पर साकार करने में जुटे कप्तान मैकुलम सौरव की गेंदों में कोई भरोसा नहीं दिखा पाते। शायद बुकानन के दिये ब्लू प्रिंट से मैकुलम आगे जाना नहीं चाहते। बेशक मुकाबले में हर पल आते नए मोड़ कुछ नयी मांग कर रहे हों। यह बुकानन के ब्लू प्रिंट को साकार करने की चुनौती है या हर गुजरते दिन के साथ सामने आती हार का खौफ, मैकुलम दबाव में हैं। उनके साथी भी दबाव में हैं। यही वजह है कि इंटरनेशनल स्टेज पर 300 से ज्यादा कैच ले चुके कप्तान मैकुलम गौतम गंभीर को उस मौके पर आसान सा जीवन दान दे डालते हैं, जहाँ से मुकाबले को अपनी और मोड़ा जा सकता है। पास आती हर गेंद पर अनुभवी हॉज और गांगुली का हौसला लड़खड़ाता दिखता है। और हर दूसरे दिन ऐसे ही लडखडाती कोलकाता से हम रुबरु हो रहे हैं। सिर्फ जीत की सोचते सोचते जो जीतना ही भूल गयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  उम्मीद करनी कहिये कि नियति में भरोसा दिखाते मैकुलम हार और जीत को सहजता से स्वीकार करना शुरू करेंगे। सहजता लौटेगी तो कोलकाता की भी वापसी होगी। भले अब काफी देर हो चुकी है, लेकिन हम सभी को उसके लौटने का इंतज़ार है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-1508064346203866975?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/gU7GPZebVio" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/1508064346203866975/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=1508064346203866975" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1508064346203866975?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1508064346203866975?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/gU7GPZebVio/blog-post_08.html" title="बुकानन के ब्लू प्रिंट से आगे की सोच की दरकार" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>3</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/05/blog-post_08.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0QNRnw6fCp7ImA9WxJSF0g.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-9217919838255948553</id><published>2009-05-07T20:59:00.000-07:00</published><updated>2009-05-07T21:03:17.214-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-05-07T21:03:17.214-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वॉर्न" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वॉट्सन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नमन ओझा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अमित सिंह" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पेट रिले" /><title>वॉर्न की शख्सियत के जादू से पार पाने की चुनौती</title><content type="html">शेन वॉर्न को देख अमेरिकी बास्केटबाल के महानतम कोच पेट रिले का कथन याद आता है। अमेरिकी  बास्केटबाल  लीग की  पांच विजेता टीमों के कोच रहे रिले का मानना है कि आपको महान खिलाडी को शिकस्त देने के लिये उसके खेल से ज्यादा उसके प्रभामंडल,  उसके जादू से पार पाना होता है। यानि आपके सामने जीत के लिए दोहरी चुनौती होती है। वॉर्न के खिलाफ भी आप एक महान खिलाडी से जूझते हैं।  एक महान गेंदबाज और एक बेहतरीन कप्तान से पार पाने की कोशिश करते हैं। लेकिन इन सबसे ज्यादा आपके सामने इस महानायक की शख्सियत के आस पास रचे जादू से भी पार पाने की चुनौती होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन गुरूवार को सेंचुरियन में वॉर्न रिले की सोच से भी आगे जा रहे थे। बंगलोर रॉयल चैलेंजर्स की पारी का आखिरी ओवर था। उसके आठ विकेट गिर चुके थे। उनके रन भी बमुश्किल 100 तक पहुंचे थे। कोई दूसरा कप्तान होता तो किसी अनुभवी गेंदबाज को गेंद थमा कुछ राहत की सांस ले सकता था। लेकिन वॉर्न अपने विपक्षी को हल्की सी भी राहत नहीं देना चाहते थे। उन्होंने अपना दूसरा मुकाबला खेल रहे अमित सिंह को गेंद थमाई। साथ ही हर गेंद पर उन्हें सलाह देने के लिए वो मिड ऑफ पर मौजूद थे। माहौल पर हावी होते वॉर्न के जादू के बीच बंगलोर मुकाबला खत्म होने से बहुत पहले ही हार कबूल रहा था। वॉर्न की दी हिदायतों के बीच इस धीमे विकेट पर अपनी पेस में बदलाव करते हुए अमित सिंह ने बंगलोर को आखिरी छह गेंदों पर सिर्फ तीन रन ही बनाने का मौका दिया। साथ ही उनके बाकी बचे दोनों विकेट हासिल कर प्रतियोगिता का अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन किया।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; फिर यह वॉर्न की शख्सियत का जादू विपक्षी ही नहीं, उनके अपने साथियों को भी  अपने साथ बहा ले जाता है। आखिर इस प्रतियोगिता से पहले गुजरात की ओर से रणजी ट्राफी में खेलने वाले अमित सिंह को फर्स्ट क्लास क्रिकेट में पांच साल हो गए  थे। लेकिन वो महज १५ मुकाबलों में ही मैदान में उतर पाए। इसके लिये उनकी गेंदबाजी एक्शन पर बोर्ड की तकनीकी समिति की ऊँगलियाँ उठाना भी एक वजह  कही जा सकती है। लेकिन वॉर्न ने इन सब को नज़रंदाज कर अमित सिंह पर भरोसा जताया। नतीजा सामने था। वॉर्न के दिखाए भरोसे के बीच अमित ने पहले मुकाबले में संगकारा समेत तीन विकेट लिये। दूसरे मैच में वो अपने प्रदर्शन को चार विकेट तक खींच ले गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक इसी आइने में आप नमन ओझा की पंजाब के खिलाफ खेली विस्फोटक पारी को पढ़ सकते हैं। आप कोलकाता के खिलाफ आखिरी ओवर डालते कामरान खान के भरोसे को छू सकते हैं। किसी भी स्तर के राष्ट्रीय क्रिकेट में न उतरने वाले कामरान आखिरी ओवर में सौरव का विकेट लेते हैं। सुपर ओवर फेंकने का भरोसा हासिल करते हैं। जब इस लाजवाब प्रदर्शन के बाद कामरान से प्रतिक्रिया ली जाती है, तो वो सिर्फ एक बात कहते है- मैं कप्तान के भरोसे पर खरा उतरा। फिर, यही सोच टीम के  सीनियर सदस्यों में भी झलकती है। युसूफ पठान अपनी कामयाबियों को वॉर्न के दिये हौसलों से जोड़ देते है। मोर्केल उनमे बेहतरीन कप्तान को देखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; दरअसल, वॉर्न और उनके साथियों के बीच भरोसे के इस तार का सिरा वॉर्न की शख्सियत के जादू से जुड़ा है। कोई वॉर्न के सामने नाकाम नहीं होना चाहता। यही टीम को सबसे बड़ी ताकत देता है।  फिर वॉर्न बड़े नामों से हटकर अपनी टीम में ऐसे युवा टेलेंट को जगह देने में यकीन करते हैं जो उनकी सोच के मुताबिक ढल जाये। मज़ाक में वो ये भी कहते हैं कि इन युवा खिलाड़ियों की वजह से वो भी खुद को युवा महसूस करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, बात मज़ाक से आगे की है। शेन वॉर्न टीम में अंग्रेजी न जानने वाले ज्यादातर युवाओं के होने के बावजूद शिद्दत से संवाद करते हैं। वो उनकी बात तसल्ली से सुनते हैं तो अपनी बात विस्तार से समझाने के लिए द्विभाषिये की मदद लेते हैं। वार्न मैदान में कैच छूटने से लेकर ओवर थ्रो जैसी गलतियों पर नाराज नहीं होते। वो नाजुक मौकों पर गलतियां करते अपने साथियों का हौसला बढ़ाते हैं। एक कप्तान की भूमिका से आगे की कोशिशें ही युवा खिलाड़ियों को उनके पीछे चलने पर मजबूर कर देती हैं।  युवा टेलेंट को तरजीह देने के चलते ही पिछली बार के तीन स्टार खिलाडियों  की गैरमौजूदगी का टीम पर कोई असर नहीं है। इस बार शेन वॉट्सन, सोहेल तनवीर और कामरान अकमल टीम के साथ नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इसके बावजूद राजस्थान रॉयल्स अपने खिताब को बचाने की ओर बहुत मजबूती से बढ़ रही है। कल तक वो कोलकाता के खिलाफ सुपर ओवर में जीत दर्ज कर रही थी, तो आज वो पंजाब किंग्स इलेवन और बंगलोर पर एकतरफा जीत दर्ज करते हुए ट्वेंटी ट्वेंटी के रोमांच को खारिज कर रही है। प्रतियोगिता की बाकी टीमों को आगाह करती हुई-आप किसी टीम  के खिलाफ नहीं खेल रहे। आप वॉर्न नाम के इस महानायक से जूझ रहे हैं। आपको राजस्थान पर जीत दर्ज करने से पहले वॉर्न के जादू से पार पाना होगा। इसमें फिलहाल सभी बहे चले जा रहे हैं। विपक्षी टीम भी और खुद वॉर्न की राजस्थान रॉयल्स भी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-9217919838255948553?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/dA-r2WoaqDA" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/9217919838255948553/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=9217919838255948553" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/9217919838255948553?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/9217919838255948553?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/dA-r2WoaqDA/blog-post.html" title="वॉर्न की शख्सियत के जादू से पार पाने की चुनौती" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/05/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkQDQXc4eCp7ImA9WxJSEEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-1231658269052696727</id><published>2009-04-30T02:37:00.001-07:00</published><updated>2009-04-30T02:39:30.930-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-30T02:39:30.930-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="स्पिनर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आईपीएल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बुकानन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पीटरसन" /><title>पीटरसन की जीत छोड़ गई बुकानन के लिए कुछ सवाल</title><content type="html">मार्क बाउचर के लिए आखिरी ओवर में टीम को मंजिल तक पहुँचाना कोई नयी बात नहीं थी। बीते 12 सालों में इंटरनेशनल स्टेज पर दक्षिण अफ्रीका को वो कितनी ही बार जीत तक ले गए हैं। बुधवार को डरबन में एक बार फिर उन पर ऐसी ही जिम्मेदारी थी। बस, टीम बदल चुकी थी। इस बार उन्हें बंगलोर रॉयल चैलेंजर्स को जीत तक पहुँचाना था। मैच के आखिरी ओवर की पांचवी गेंद पर बाउचर ने विजयी चौका जमाया तो वो एक असीम ख़ुशी में डूब गए। क्रिस गेल की लेग स्टम्प पर आती फुलटॉस पर बाउचर ने जोरदार प्रहार करने के साथ ही अपनी मुट्ठी तानी और हवा में लहरा दी। इशारा करते हुए कि उनके और बंगलोर के लिये इस जीत के मायने क्या हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार लगातार शिकस्त के बाद ये बंगलोर की पहली जीत जीत थी। कुल मिलकर दूसरी। बंगलोर के डगआउट से लेकर स्टेडियम में मौजूद हर समर्थक बाउचर की दी ख़ुशी में भीग रहा था। लेकिन कप्तान पीटरसन से ज्यादा खुश शायद कोई नहीं था। मार्क बाउचर और उनके साथी मनीष पांडेय को बाँहों में भर लेने के लिए पीटरसन सबसे पहले डगआउट से बाहर निकले तो उनके पैड बंधे हुए थे। इशारा करते हुए कि कितनी बेताबी से वो इस एक जीत का इंतज़ार कर रहे थे। 16वें ओवर में एक और नाकाम पारी खेलने के बाद से वो डगआउट में पैड बांधे बैठे थे। बस, इस एक जीत के इंतज़ार में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर इस प्रतियोगिता में यह उनका आखिरी मैच था। इसके बाद वो इंग्लैंड लौट रहे हैं। वेस्टइंडीज के खिलाफ टेस्ट सीरीज़ में शिरकत करने। जिस तरह इस प्रतियोगिता के पहले मुकाबले में उन्होंने डिफेंडिंग चैम्पियन राजस्थान रॉयल्स को शिकस्त देकर जोरदार आगाज किया था, उसी तरह वो जीत के साथ यहाँ से विदा लेने की ठान कर आये थे। बेशक, वो बल्ले से खुद लगातार नाकाम रहे थे। लेकिन, क्रिकेट की स्टेज पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने, उस पर हावी हो जाने की उनकी सोच में कोई कमी नहीं थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर, अपनी पहचान को दर्ज कराने की उनकी फितरत भी है। इसलिए बुधवार को मुकाबले की पहली ही गेंद से वो नाइट राइडर्स पर हावी हो गए। गेंद उनके हाथ में थी। अपने विरोधी कप्तान मैकुलम को वो प्वाइंट पर विराट कोहली के हाथों कैच करा रहे थे। यह सिर्फ संयोग भी कहा जा सकता है। लेकिन पीटरसन डरबन के धीमे और स्ट्रोक प्ले के लिये मुश्किल विकेट पर एक बेहद सोची समझी रणनीति के साथ उतरे थे। धीमे गेंदबाजों के सहारे अपनी ही तरह हताश कोलकाता पर जीत की सोच के साथ। प्रवीण कुमार और पंकज सिंह जैसे गेंदबाजों की मौजूदगी के बावजूद अपने  साथ दूसरे छोर से भी रौलेफ़ वन को लेफ्ट आर्म स्पिन की जिमादारी सौपने का जोखिम उठाया। लेकिन अपनी रणनीति को लेकर उनकी सोच साफ़ थी। इसे आप पीटरसन के धीमे गेंदबाजों से कराये 15  ओवर में महसूस कर सकते हैं। इसी का नतीजा था कि पॉवर प्ले में ही दो विकेट गंवाने के साथ कोलकाता आखिर तक कोई बड़ी चुनौती पेश नहीं कर पाया। उसके बल्लेबाज़ कोई बड़ा प्रहार करने में नाकाम रहे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना ही नहीं, द्रविड़ की गैरमौजूदगी और नाकाम उथप्पा की भरपाई करने के लिये नौजवान बल्लेबाजों में भरोसा दिखाया। श्रीवत्स गोस्वामी से पारी की शुरुआत कराई। आखिरी ओवर में मनीष पाण्डेय को भेजने का जोखिम उठाया। और दोनों ने ही  अपने कप्तान के भरोसे को टूटने नहीं दिया। गोस्वामी ने बेहद सीधे बल्ले से रन भी जोड़े और अनुभवी कालिस के साथ पहले 11 ओवर तक विकेट बचा कर रखा। यह इस प्रतियोगिता में बंगलोर की सबसे बेहतर शुरुआत थी। मनीष पांडे ने आखिरी ओवर की पहली गेंद पर एक जरुरी सिंगल लेते हुए सीनियर बल्लेबाज मार्क बाउचर को जरुरी स्ट्राइक थमाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, यही सोच बंगलोर को इस बेहद नजदीकी मुकाबले में जीत तक ले गयी। वरना कोलकाता की तरह बंगलोर भी लगातार शिकस्त से जूझ रही थी। लेकिन  पीटरसन की टीम ने न केवल खेल के बेसिक पर पकड़ जमाई। जीत के लिये अपने साथियों में सबसे जरुरी भरोसा भी दिखाया। दरअसल, बिना भरोसे के आप जोखिम नहीं उठा सकते। लेकिन कोलकत्ता की टीम  की तरह ही  बुकानन  की अगुवाई में लम्बा चौडा कोचिंग स्टाफ टीम में  जीत की नयी  सोच , नया भरोसा नहीं भर सका . मैकुलम के नाकाम होने के बावजूद ओपनिंग में कोई नया प्रयोग नहीं दिख रहा . फील्डिंग में  छोटी छोटी  चूक किसी कमजोरी से ज्यादा अपने भरोसे में कमी को ज़ाहिर करती है . एक दिन पहले बुकानन को वार्न ने शिकस्त दी थी। अपनी निजी नाकामी के बीच भी वापस लौटे पीटरसन जाते जाते उन्हे कुछ सबक सिखा गए हैं। यह पीटरसन की टीम की जीत है। बुकानन को अभी टीम की तलाश है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-1231658269052696727?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/Up5sdc8hfdg" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/1231658269052696727/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=1231658269052696727" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1231658269052696727?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1231658269052696727?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/Up5sdc8hfdg/blog-post_30.html" title="पीटरसन की जीत छोड़ गई बुकानन के लिए कुछ सवाल" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/04/blog-post_30.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEQGQXc_fyp7ImA9WxJTGUU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-2003991662131418527</id><published>2009-04-28T23:19:00.000-07:00</published><updated>2009-04-28T23:25:20.947-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-28T23:25:20.947-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="स्पिनर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="टी-20" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आईपीएल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="क्रिकेट" /><title>22 गज की बिसात पर नए मोहरे बनते स्पिनर</title><content type="html">टी- ट्वेंटी के रोमांच के बीच मुझे अचानक आज बॉबी फिशर याद आ गए। शतरंज की दुनिया में अकेले दम सोवियत किले को ध्वस्त करने वाले बेजोड़ फिशर। फिशर का कहना था, “शतरंज की बिसात पर हार जीत के लिये मैं मनोविज्ञान पर भरोसा नहीं करता। मैं सिर्फ और सिर्फ सही मूव पर भरोसा करता हूं।” ट्वेंटी ट्वेंटी का रोमांच भी सिर्फ उसकी रफ़्तार में नहीं, हर पल आते उतार चदाव में भी छिपा है। और ये उतार चढ़ाव छिपा है कप्तान की चली जा रही चालों में। उसके हर मूव से मुकाबला नया मोड़ लेता है। नए रोमांच से रुबरु कराता है। और इस मूव में अब उसका सबसे बड़ा मोहरा है स्पिनर। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खास बात ये कि इस मोहरे को लेकर चली जा रही हर चाल बेहद दिलचस्प है। ये ट्वेंटी ट्वेंटी के खेल में बनी बनाईं धारणाओं को तोड़ रही है। सोच को हर पल नया विस्तार दे रही है। इस प्रतियोगिता के शुरू होते ही अनिल कुंबले, हरभजन सिंह, शेन वार्न और मुरलीधरन ने अपने अनुभव और चतुराई भरी गेंदों से एलान कर दिया था कि ट्वेंटी ट्वेंटी की इस रफ़्तार के बीच स्पिन गेंदबाजी को खारिज नहीं किया जा सकता। प्रज्ञान ओझा, अमित मिश्र, युसूफ पठान, और अपन्ना ट्वेंटी ट्वेंटी पर मजबूत होती स्पिन की पकड़ को और आगे ले गये। इस हद तक की कप्तान पॉवर प्ले के पहले 6 ओवर में ही उन्हें आक्रमण पर लगाने का दांव खेलने लगे। लेकिन अब कप्तान खालिस स्पिनर पर ही निर्भर नहीं है। वो मुकाबले में हाथ से छिटकती बाज़ी को अपनी और मोड़ने के लिये किसी भी काम चलाऊ स्पिनर की और गेंद उछाल सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोमवार को डेक्कन चार्जर्स के कप्तान गिलक्रिस्ट और चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान धोनी दोनों ने ये चाल चली। ये हताशा में लिये फैसले नहीं थे। सीधे सीधे एक बेहतरीन मूव था। चेन्नई  के मैथ्यू हेडन और सुरेश रैना के आक्रामक तेवेरों के सामने इस प्रतियोगिता में सबसे बेहतर दिख रही आरपी सिंह और फिडल एडवर्ड्स की जोड़ी कोई असर नहीं छोड़ पा रही थी। महज पांच ओवर में ये दोनों बल्लेबाज 55 रन जोड़ चुके थे। ऐसे मौके पर गिलक्रिस्ट ने दोनों ओर से स्पिन गेंदबाजों को आक्रमण पर लगाया। लेकिन अपने सबसे बेहतर स्पिनर प्रज्ञान ओझा को इस मुहिम से दूर रखा। एक छोर पर वेणुगोपाल राव थे। दूसरे छोर पर रोहित शर्मा। लेकिन गिलक्रिस्ट का यह मूव रंग लाया। रोहित ने अपनी पांचवी गेंद पर ही रैना को खूबसूरती से लपकते हुय इस खतरनाक बनती साझेदारी को रोक दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह गिलक्रिस्ट और हर्शल गिब्स धोनी के दोनों तेज गेंदबाजों बालाजी और गोनी के खिलाफ जमकर स्ट्रोक खेल रहे थे। ऐसा लग रहा था की 166 रन का लक्ष्य वो महज १५ ओवर में पूरा कर लेंगे। इस मौके पर धोनी ने एक एंड से मुरलीधरन को लगाया तो दूसरे एंड से गेंद सुरेश रैना को गेंद सौंप दी। दांहिने हाथ से ऑफ स्पिन फ़ेंक रहे रैना ने पहले कुछ धीमी और वाइड गेंद पर गिलक्रिस्ट को जल्दी स्ट्रोक खेलने को मजबूर किया। थर्डमैन पर मौजूद मुरली ने उन्हे लपकने में कोई चूक नहीं की। अगले ही ओवर में लक्ष्मण को ठीक इसी तरह ओरम के हाथों कैच कराया। इन दो विकेट के गिरने के साथ ही अभी तक एकतरफा दिख रहा मुकाबला बराबरी में बदलने लगा। सिर्फ तीन गेंद पहले ही चेन्नई जीत तक पहुंच पाया। लेकिन मैं हार और जीत के पार जाकर कप्तानों की सोच को पकड़ने की कोशिश कर रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मुकाबले में दोनों कप्तानो के ये फैसले ज़ाहिर कर रहे थे हर गुजरती गेंद के साथ धीमी गेंदबाजी में बढ़ते उनके भरोसे को। इस भरोसे के सहारे नए नए मूव रचती उनकी सोच को। दरअसल, इन दोनों कप्तानों ने इन गेंदबाजों को विकेट लेने के बावजूद आक्रमण से हटाया नहीं। गिलक्रिस्ट ने राव से लगातार तीन ओवर फिंकवाये तो धोनी ने रैना से पूरे चार ओवर का स्पेल डलवाया। इन चार ओवर में रैना ने डेक्कन के बल्लेबाजी पर नकेल कस ली। दरअसल, तेज गेंदबाजी के खिलाफ बल्लेबाज गेंद की रफ़्तार के साथ अपने स्ट्रोक को पूरा कर सकता है। लेकिन धीमी गेंदबाजी के सामने उसे अपने स्ट्रोक को बनाना पड़ता है। गेंद की रफ़्तार, उसके घुमाव और दिशा को आखिरी मौके तक पढ़ते हुए। स्पिनर की सोच से आगे जाते हुए। फिर दक्षिण अफ्रीकी विकेटों पर मिलती मदद के बीच धीमे गेंदबाज ज्यादा कारगर होते जा रहे हैं। इसी का नतीज़ा है कि इस प्रतियोगिता में अभी तक सबसे ज्यादा किफायती 15 गेंदबाजों में 12 स्पिनर हैं। फिर यह 12 स्पिनर अपने एक ओवर ने 4.5 से 6.5 रन तक ही खर्च कर रहे। बल्लेबाजों के ट्वेंटी ट्वेंटी की रफ़्तार में यह आंकडा बहुत मायने रखता है। यही वजह हे की कप्तान इनके इर्द गिर्द अपनी रणनीति को नया विस्तार दे रहे हैं। अपना हर दूसरा मूव बना रहे हैं। अभी तो यह प्रतियोगिता अपने पहले हफ्ते में है। आने वाले दिनों में सिर्फ 20 ओवर में सिमटे इस खेल में हम  धीमी गेंदबाजी को लेकर प्रयोगों में नया विस्तार देख सकते हैं। शतरंज की बिसात की तरह सजी इस ट्वेंटी ट्वेंटी की स्टेज पर कुछ नए मूव। शायद इसीलिये आज मुझे फिशर याद आ रहे थे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-2003991662131418527?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/DvAw-SgwvVM" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/2003991662131418527/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=2003991662131418527" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/2003991662131418527?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/2003991662131418527?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/DvAw-SgwvVM/22.html" title="22 गज की बिसात पर नए मोहरे बनते स्पिनर" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/04/22.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkcESXs5eCp7ImA9WxJTFE0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-5987569477189036147</id><published>2009-04-22T05:37:00.000-07:00</published><updated>2009-04-22T05:40:08.520-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-22T05:40:08.520-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सचिन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="द्रविड़" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कुंबले" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हेडेन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सौरव" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वार्न" /><title>सिर्फ़ 24 गेंदों में ख़ुद को साबित करते सौरव</title><content type="html">ये कप्तान ब्रैंडन मैकुलम का हताशा में लिया गया फैसला भी कहा जा सकता है। इरफान पठान के आक्रामक स्ट्रोक प्ले का कोई जवाब न तो इशांत शर्मा की रफ़्तार भरी गेंदों के पास था, न ही नौजवान अशोक डिंडा के हौसलों में। बादलों से घिरे माहौल में अगर मैकुलम के गेंदबाज बल्लेबाजों को थाम नहीं पाते तो टॉस जीतकर किंग इलेवन पंजाब को पहले बल्लेबाजी के लिये उतारने का दांव बेकार चला जाता। सिर्फ 6 ओवर में ही इरफान इंग्लैंड के रवि बोपारा के साथ 47 रन स्कोर बोर्ड पर टांग चुके थे। यानी अगर यहाँ से मुकाबला इस रफ़्तार से आगे बढ़ निकालता तो पहले से ही विवादों में घिरी कोलकाता के लिये आगे का सफ़र बेहद मुश्किल हो जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इरफान के इस आक्रामक मूड के दौरान कैमरा या तो कभी तनाव में सिगरेट के कश भरते शाहरुख खान तक पहुंचता। या ख़ुशी में झूमती प्रीति जिंटा को कैद करता। लेकिन फाइन लेग पर तन्हा तन्हा अपने से बतियाते सौरव तक कैमरा कम ही पहुंच रहा था। कल तक कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान और आइकन सौरव इस मुकाबले में अभी तक हशिए पर थे। इन्हीं, सौरव गांगुली की ओर मैकुलम ने अपने आखिरी दांव की तरह गेंद उछाली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौरव के लिये जैसे ये अपने लम्हे को लपक लेना था। अब ये सौरव नहीं, उनके भीतर बैठा कभी हार ना मानने वाला सौरव गांगुली था। वो सौरव जो टीम में वापसी के लिये अपने चेहेते एडेन गार्डन में अकेला पसीना बहाते बहाते कभी थकता नहीं था। यही सौरव था, जिसने भारतीय क्रिकेट में ऐसी यादगार विदाई ली, जिसे कभी गावस्कर और कपिल जैसे लेजेंड्स भी हासिल नहीं कर पाये। ठीक खेल की स्टेज के बीच से।  ऐसा सौरव आईपीएल की स्टेज पर ,वो भी अपने कोलकाता के लिये खेलते हुए यूं ही खारिज नहीं हों सकता। आज गेंद हाथ में लेकर रनअप पर उठे उनके कदम में  आप इस बात को महसूस कर सकते थे। सौरव की  दूसरी ही गेंद पर इरफान पठान के पुल स्ट्रोक को मुरली कार्तिक ने ठीक डीप मिड विकेट सीमा रेखा पर थाम लिया। सिर्फ दो गेंद बाद ही कट करने के फेर में रवि बोपारा के बल्ले का किनारा लेती गेंद जब विकेट के पीछे मैकुलम के दस्तानों में गयी तो डरबन पर पुराना सौरव लौट चुका था। अपने दायें हाथ को हवा में लहरा असीम ख़ुशी में डूब दौड़ लगाते सौरव से हम रुबरु थे। कुछ इस तरह कि विवादों के बीच से खुद को बाहर निकाल अपने होने और अभी न चुके होने का अहसास करा रहे हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सौरव अब इस धीमे विकेट पर अपनी लाइन और लेंग्थ में बदलाव कर रहे थे। रफ़्तार से भरमा रहे थे। मुझे बारह साल पहले टोरंटो में फेंके सौरव के स्पेल याद आ रहे थे। सौरव ने पांच मुकाबलों की सीरीज़ में 15 विकेट लिये थे। वो भी सईद अनवर,रमीज राजा,सलीम मलिक और मोइन खान, अफरीदी जैसे बेजोड़ बल्लेबाजी क्रम के खिलाफ। एक मुकाबले में तो उन्होने सिर्फ १5 रन देकर पांच विकेट अपने नाम किये थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेशक आज बारिश से प्रभावित इस मुकाबले में क्रिस गेल की 44 रन की पारी ने कोलकाता को जीत थमा दी। लेकिन इस जीत की जमीं सौरव के फेंके 4 ओवर में ही तैयार हुई। वरना इरफान के आक्रामक तेवर के चलते डकवर्थ लुइस नियम भी कोलकाता के काम नहीं आ पाता। इस ढलती उम्र में सौरव का प्रदर्शन उन्हे इस आईपीएल में सीनियर खिलाडियों की कतार में शामिल कर रहा है, जिन्हे टी-20 की अंतरराष्ट्रीय स्टेज पर खारिज मान लिया गया है। द्रविड़ , सचिन, वार्न,कुंबले,हेडन और अब सौरव यही साबित कर रहे हैं। दिलचस्प है कि ट्वेंटी ट्वेंटी तो दूर द्रविड़ को एक दिवसीय मुकाबलों के लायक भी नहीं समझा जाता। कुंबले,हेडेन,वार्न,और सौरव आज इंटरनेशनल स्टेज से अलविदा ले चुके हैं.लेकिन ये सभी अपने बीते कल की छाप  बराबर छोड़ रहे हैं। जैसा सचिन का कहना है की हमें या द्रविड़ को अब कुछ साबित नहीं करना है। हम तो सिर्फ अपने खेल का भरपूर आनंद ले रहे हैं। सचमुच ये सभी आनंद के बीच अपने क्रिकेट को परवान चढ़ा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सौरव अपने बीते कल की तरह आज भी एक लडाई लड़ रहे हैं- क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में दर्ज सौरव गांगुली की शख्सियत को बने रखने की लडाई। भारत के महानतम खिलाड़ियों में शुमार सौरव को विवाद की छाया में समेटकर रखने की कोशिश होती है, और हर बार साबित करने की चुनौती सौरव को दी जाती है। ग्रेग चैपल विवाद से वनडे और टेस्ट टीम से बाहर करने और अब कोलकाता नाइट राइडर्स की कप्तानी छीनने तक हर बार सौरव को खुद को साबित करना पड़ा। शायद इसलिए निराश सौरव भावुकता में कह भी पड़ते हैं - हर बार मेरे साथ ही न जाने क्यूं ऐसा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, वो सौरव जो कभी हार नहीं मानता। वो यहाँ भी हार नहीं मानेगे। सौरव यहाँ भी पीछे नहीं हटेंगे ।  यह उनके हाथ से छूटती 24 गेंदों ने बखूबी साबित किया है। फिर यही तो सौरव गांगुली होने का मतलब है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-5987569477189036147?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/cgHcV98pyVM" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/5987569477189036147/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=5987569477189036147" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/5987569477189036147?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/5987569477189036147?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/cgHcV98pyVM/24.html" title="सिर्फ़ 24 गेंदों में ख़ुद को साबित करते सौरव" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>2</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/04/24.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUMNQnY6fip7ImA9WxJTEkQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-4401836779615027309</id><published>2009-04-19T20:30:00.001-07:00</published><updated>2009-04-21T00:04:53.816-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-21T00:04:53.816-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वार्न" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बुकानन" /><title>बुकानन की सोच से आगे के सवाल</title><content type="html">डेक्कन चार्जर्स की एक तरफा जीत मे कोरबो, लोडबो, जीतबो की गूँज कहीं खो गयी थी। हार मे लिपटे कोलकत्ता के स्टार खिलाडियों के चेहर स्क्रीन पर उभार ले रहे थे। नए कप्तान ब्रैडम मैकुलम थे। पूर्व कप्तान सौरव गांगुली थे। वेस्टइंडीज के कप्तान क्रिस गेल थे। लेकिन निगाह सिर्फ और सिर्फ कोच जॉन बुकानन को ढूंढ रही थी .उस बुकानन को जो आंकड़ों और विज्ञान के सहारे नियति से जुडे क्रिकेट के खेल से हार को ख़त्म करना चाहते हैं। जिनके लिये ट्वेंटी ट्वेंटी क्रिकेट दो टीमों के बीच मुकाबला नहीं ज़ंग का मैदान है। वो ट्वेंटी ट्वेंटी को चीन के मिलिटरी जीनिउस सून झू की हजारों साल पहले लिखी किताब आर्ट ऑफ़ वार के आइने में देखते हैं। इस सोच के साथ कि ट्वेंटी ट्वेंटी मे हर पल बदलती परिस्थितियों के लिये तेज और आक्रमक होना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यहीं बुकानन और क्रिकेट के बीच विरोधाभास उभार लेता है। अगर ट्वेंटी ट्वेंटी ज़ंग का मैदान है तो आप सिर्फ और सिर्फ जीत के लिये खेलेंगे। अगर सिर्फ जीत के लिये खेलते हैं तो आप एक दबाव के साथ मैदान में पहुंचते हैं। अगर आप पर दबाव है तो आप अपना सहज खेल नहीं खेल सकते। सहज खेल के बिना आप अपना बेहतरीन खेल नहीं पा सकते। और अगर आप अपना बेहतरीन नहीं दे सकते तो जीत की सोच बेमानी है। फिर, बुकानन भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी से भी क्रिकेट के इस सूत्र को सीख सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौजूदा क्रिकेट के सबसे कामयाब कप्तान धोनी के लिये क्रिकेट मुकाबला कभी जिन्दगी और मौत नहीं बनता। वो हार और जीत से आगे जाकर सिर्फ और सिर्फ खेल के हर हिस्से को भरपूर जीते हैं। अपने साथी खिलाडियों में भी यही सोच भरते हैं। उनका मानना है कि आपकी कामयाबी के सही मायने तभी हैं, जब आपका साथी उस में अपनी ख़ुशी तलाशे। यह इस टीम गेम का वो सूत्र है, जो आज इंडियन ड्रेसिंग रुम को बेजोड़ बनाता है। सचिन से लेकर सहवाग तक सभी का मानना है कि मौजूदा भारतीय ड्रेसिंग रुम अब तक का सर्वश्रेष्ठ है। यही इस भारतीय टीम की जीत का सबसे बड़ा आधार है।लेकिन बुकानन की जीत और जीत के इर्द गिर्द बनती सोच में ये सब पहलू हाशिए पर हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुकानन जब मल्टीपल कैप्टन की थ्योरी सामने लाते हुए हुए सौरव को किनारे करते हैं तो वो अकेले सौरव के हौसले को नहीं तोड़ते। वो सौरव में अपना नायक तलाशने वाली टीम के हर नौजवान खिलाड़ी के भरोसे पर चोट करते हैं। यहीं टीम में जीत की साझा कोशिश करने की सोच पीछे छूट जाती है। आप एक विनिंग कॉम्बिनेशन मैदान पर नहीं उतारते। आप 11 खिलाड़ियों को मैदान में उतारते हैं। रविवार को कोलकाता की टीम के खिलाड़ी मैदान पर बल्लेबाजी करते हुए भी अकेले थे। फील्डिंग करते हुए भी। बल्लेबाजी में कोई एक नहीं था,जो इस उछाल और मूवमेंट के विकेट पर सचिन और द्रविड़ की तरह एक एंड को संभाले रखता। ब्रैड हॉग को छोड़ कोई भी बल्लेबाज 20 गेंदें भी नहीं खेल पाया। इस पहलू पर टीम में कोई बड़ी रणनीति की दरकार नहीं थी। एक सहज क्रिकेट सोच की जरुरत थी। द्रविड और वार्न के शब्दों में कहें तो इस विकेट पर जीत के लिए जरुरी था सही स्ट्रोक्स सिलेक्शन। लेकिन,कोलकाता के ज्यादातर बल्लेबाजों को जितनी देर डगआउट से विकेट तक पहुंचने में नहीं लगी, उससे कम समय वो विकेट पर टिक सके। यानी दो वर्ल्ड कप और 25 टेस्ट सीरिज जिताने वाले बुकानन की रणनीति यहां खारिज हो गई। इतना ही नहीं, मल्टीप्ल कप्तान का विचार भी तार तार होता दिख रहा था। कप्तान के साथ सीनियर खिलाड़ियों की बातचीत का कोई सिरा आप फील्डिंग के दौरान पकड़ नहीं सकते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, ये सिर्फ एक मुकाबल है, इससे बहुत नतीजे निकलना सही नहीं है। क्रिकेट के इस ताबड़ तोड़ फॉर्मेट मे हर दूसरे दिन नतीजा बदलता है। पिछले आईपीएल में ही कोलकाता ने बेहतरीन शुरुआत की थी ,लेकिन वो सेमीफाइनल के आस पास नहीं पहुँच सकी। दूसरी और राजस्थान रॉयल्स पहले मुकाबले में दिल्ली से बुरी तरह हारी , लेकिन खिताब तक जा पहुंची। यानी कोलकत्ता और बुकानन के पास आगे की राह तलाशने के लिये प्रेरणा की कमी नहीं है। हां, इतना जरुर है कि यह सीख उन्हे वार्न से मिल रही है, जिन्होंने उनके कामयाब सफ़र में लगातार निशाने पर रखा। लेकिन उस वक़्त भी वार्न का कहना था कि खेल जितना सहज रहे उतना ही बेहतर होता है। आज भी वार्न यही कहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि मंच बदल गया है। नहीं बदला है तो क्रिकेट।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुकानन ने बेशक अपनी सोच से ८ साल तक कामयाबियों की दास्ताँ लिखी हो, लेकिन यह भी एक सच है. इससे मुंह नहीं मोड़ सकते। वरना ऐसा ना हो कि जीत और जीत की कोशिश में उनकी कामयाबी की तस्वीर बदरंग हो जाये। २००५ मे एशेज में मिली हार के बाद एयान चैपल ने दो टूक शब्दों में कहा था -अगर आप बुकानन को कोच कहते हैं तो अपने समय की बर्बादी कर रहे हैं। वो क्रिकेट नहीं सिखा सकते। मेरे ख्याल से बुकानन ऐसी प्रतिक्रिया तो नहीं चाहेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-4401836779615027309?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/RLXlZRsVhpw" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/4401836779615027309/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=4401836779615027309" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/4401836779615027309?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/4401836779615027309?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/RLXlZRsVhpw/blog-post_22.html" title="बुकानन की सोच से आगे के सवाल" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/04/blog-post_22.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkQBQnk-eSp7ImA9WxJTEUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-1434486736293442529</id><published>2009-04-19T20:30:00.000-07:00</published><updated>2009-04-19T20:32:33.751-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-19T20:32:33.751-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="द्रविड़" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विटोरी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कुंबले" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वार्न" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="तेंदुलकर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बिशन सिंह बेदी" /><title>द्रविड़ से विटोरी तक मिलते संदेश को समझिए !</title><content type="html">ये क्रिकेट की ही खूबसूरती है। एक खेल अपने भीतर कितने ही फॉर्मेट लेकर आगे बढ़ रहा है। एक छोर पर टेस्ट क्रिकेट है। दूसरे छोर पर टी-ट्वेंटी का फॉर्मेट। लेकिन हर मोर्चे पर क्रिकेट कामयाब है। आखिर क्यों? इसकी एक ही वजह है। आप किसी  फॉर्मेट में दाखिल हो जाएँ, इसकी सोच नहीं बदलती। यह मूल रूप से बल्ले और गेंद के संघर्ष में ही सिमटा है। यहाँ बल्लेबाज के लिये जितनी गुंजाइश है, उतनी ही गेंदबाज के लिए। आईपीएल के पहले दो दिन इस बात को पुख्ता करते हैं। ये फटाफट क्रिकेट सिर्फ बल्लेबाजों का खेल है, महज 58 रन पर सिमटी राजस्थान रॉयल्स इस सोच को तोड़ती है . ये सिर्फ तेज गेंदबाजों का खेल है, हरभजन, वार्न और कुंबले के बाद आज विटोरी इस एकतरफा सोच पर विराम लगाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझ जैसे क्रिकेट की पारंपरिक सोच में जीने वाले के लिये डेनियल वेटोरी का स्पेल कभी न भुलने वाला अनुभव है। रविवार को विटोरी की महज 18 गेंदों के बीच पंजाब किंग्स इलेवन की तूफानी रफ़्तार लेती पारी अचानक थम गयी। विटोरी का यही स्पेल था, जिसने बारिश से छोटे और छोटे होते इस मुकाबले में  दिल्ली की जीत की जमीं तैयार की। उनकी इस गेंदबाजी के बाद मुझे अचानक बरसों पहले बिशन सिंह बेदी की कही बात याद आ गयी-  विटोरी एक कम्प्लीट स्पिनर है। वो  हर तरह की क्रिकेट मे कामयाब होगा। बेदी के कहने का मतलब यही था कि अगर आप बेहतर हैं तो आप हर मोर्चे पर कामयाब रहेंगे। चाहे वो टेस्ट हो या फिर फटाफट क्रिकेट। मौजूदा क्रिकेट मे सबसे बेहतरीन लेफ्ट आर्म स्पिनर विटोरी ने इसे फिर बखूबी साबित किया। वो भी सिर्फ और सिर्फ 18 गेंदों में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर कल इसी पहलू पर वार्न और कुंबले भी खरे उतरे थे।। इनका प्रदर्शन विटोरी से एक कदम आगे ठहरता है। लेग स्पिनर होने के नाते इन्हें अपनी गेंदबाजी की लय पाने के लिये 5-6 ओवर चाहिए। .लेकिन ट्वेंटी ट्वेंटी के इस फॉर्मेट मे तो महज 4 ओवर में ही गेंदबाजी का मौका ख़त्म हो जाता है। फिर वार्न तो करीब एक साल के बाद किसी बड़े मुकाबले मे गेंदबाजी संभाल रहे थे। लेकिन सिर्फ पांचवी गेंद पर ही वो विकेट तक पहुँच रहे थे। लेगस्टंप पर पड़ी गेंद को जब तक विराट कोहली अपनी क्रीज छोड़ टर्न करने की कोशिश करते उनका मिडिल स्टंप गिर चुका था। ये शेन वार्न थे, लेग स्पिन के जाद्दू से रूबरू कराते हुए। ठीक इसी मुकाबले मे 5 महीने पहले अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से अलग हुए कुंबले थे। सिर्फ 19 गेंद मे 5 रन देकर 5 विकेट लेते हुए।  मेरे जेहन में करीब 15 साल पहले कोलकत्ता के एडेन गार्डन पर वेस्ट इंडीज के खिलाफ हीरो कप मे 12 रन पर 6 विकेट लेते कुंबले की यादें जेहन में ताजा हो गयी। यह कुंबले के शिखर पर जाने की शुरुआत थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कुंबले और वार्ने जैसी परिपूर्णता से द्रविड़ और तेंदुलकर ने भी रूबरू कराया। भारत के मुकाबले मुश्किल दक्षिण अफ्रीकी विकेट पर वो आखिर तक एक छोर को संभाले ही नहीं खड़े थे। ये दोनों अपनी बेजोड़ तकनीक के दायरे को विस्तार देते हुए अपने स्ट्रोक्स को अंजाम दे रहे थे। मनप्रीत गोनी की गेंद पर कवर के ऊपर से जमाए बेहतरीन बाउंड्री में आप इसे महसूस कर सकते थे। वार्न की गेंद को आखिरी मौके पर थर्डमैन की ओर दिशा देते द्रविड़ के बल्ले में आप इस गूंज को महसूस कर सकते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सभी नौजवान खिलाडियों को सन्देश दे रहे थे। बेशक, हम इस फटाफट क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय मंच पर नहीं हैं। लेकिन इस्सकी बारीकियाँ हम ज्यादा करीब से पकड़ सकते हैं। कुंबले से लेकर वार्न तक, द्रविड़ से लेकर सचिन तक अपने खेल से यही ऐलान कर रहे थे - सिर्फ नौजवानों का खेल नहीं है टी-20 । अनुभव की जगह यहाँ  भी मौजूद है। बशर्ते आप खेल को परिपूर्णता में साकार करते हों। उसे भरपूर जीते हों। यही इस जेंटलमैन गेम की खूबसूरती है, जो हमें इसके हर लम्हे में साथ लेकर चलती है। फिर चाहे टेस्ट क्रिकेट हो या फिर आईपीएल की ये स्टेज हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-1434486736293442529?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/0laBzS7RIjA" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/1434486736293442529/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=1434486736293442529" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1434486736293442529?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1434486736293442529?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/0laBzS7RIjA/blog-post_5854.html" title="द्रविड़ से विटोरी तक मिलते संदेश को समझिए !" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/04/blog-post_5854.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkUERHs9fSp7ImA9WxJTEUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-9037303051867564042</id><published>2009-04-19T20:27:00.000-07:00</published><updated>2009-04-19T20:30:05.565-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-19T20:30:05.565-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सचिन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चेन्नई सुपरकिंग्स" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="डेक्कन चार्जर्स" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आईपीएल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धोनी" /><title>'कॉरपोरेट' आईपीएल खेल रहा है लोगों की भावनाओं से !</title><content type="html">ये मुकाबला था तो दो टीमों के बीच ही। चेन्नई सुपर किंग्स और मुंबई इंडियंस के बीच। लेकिन मेरी निगाह महेन्द्र सिंह धोनी और सचिन तेंदुलकर के आस पास ठहर गयी थीं। पहली ही गेंद पर स्ट्राइकर एंड पर धोनी के तेज थ्रो से बचते तेंदुलकर थे। मनप्रीत गोनी की गेंद को  कवर सीमा रेखा के बाहर भेजते तेंदुलकर से परेशान अपनी फील्डिंग रणनीति मे बदलाव करते धोनी थे। पूरे बीस ओवर तक विकेट पर मैजूद सचिन थे। आखरी ओवेरों मे अपनी टीम को जीत की और लेजाने की नाकाम कोशिश मे जुटे धोनी. टेलीविजन के स्क्रीन पर साकार होते हर मुमकिन फ्रेम में धोनी और तेंदुलकर को पकड़ने की कोशिश जारी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, मैं न तो महेन्द्र सिंह धोनी को हारते देखना चाहता था, न ही सचिन तेंदुलकर को। लेकिन, यह मुमकिन था नहीं। खेल मे ये संभव भी नहीं है। एक टीम को हारना, एक को जीतना था।आईपीएल के पहले मैच मे सचिन  की जीत हुई, धोनी  की टीम हार गयी। लेकिन, मुकाबले के बाद मे  आदतन हार की वजहों को नहीं टटोल रहा था। जेहन उस सच को छूना चाहता था, जहाँ इन दोनों की जीत की सोच एक साथ शक्ल ले रही थी। इसकी वजह साफ थी। एक ओर भारतीय क्रिकेट मे कामयाबियों की सुनहरी दास्तां लिखते धोनी थे। दूसरी ओर धोनी में एक बेहतरीन कप्तान को पढ़ने वाले सचिन तेंदुलकर थे। ये महज दो खिलाड़ी नहीं थे। ये दो महानायक थे । इन दो महानायकों के बीच से एक को चुनने के लिए मन तैयार ही नहीं था। हम इन दोनों को जीत की साझा कोशिश करते देखते रहे हैं। लेकिन आज यह ठीक आमने सामने थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिक्कत ठीक यहीं से शुरू हो रही थी। हम इन महानायकों की छवि को भारतीय क्रिकेट टीम के दायरे के बाहर जाकर पढ़ने के लिये मानसिक तौर पर तैयार ही नहीं हैं। इतना जरुर हो सकता है कि हम झारखण्ड मे धोनी की छवि को ढूँढ लें। मुंबई मे सचिन की। यह एक छोटी पहचान है, जहाँ से आप बड़ी राष्ट्रीय पहचान में दाखिल होते हैं .इसलिए हम रणजी ट्रॉफी मे झारखण्ड और मुंबई को आमने सामने  स्वीकार कर लेते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे काउंटी क्रिकेट में ससेक्स या केंट। यहाँ हम इन की छोटी छवियों के बीच शहर और राज्य के अहसास को भी छूते चले जाते हैं। आईपीएल ने भी ऐसी वफादारी बटोरने की कोशिश की। लेकिन एक कॉरपोरेट  कंपनी की सोच पर खड़ी इस इमारत मे यह अहसास कहीं नीचे दफ़न हो गया। वरना क्या वजह थी कि एक साल मे आपने अपने आइकन खिलाडियों को दरकिनार कर दिया। इन आइकन खिलाड़ियों को शहर की पहचान के तौर पर टीम में शामिल किया गया था। लेकिन आज कोलकत्ता ने सौरव,  बंगलोर ने द्रविड़ और हैदराबाद ने लक्ष्मण को हाशिए पर डाल दिया। आईपएल की शहर की पहचान को  टीम से जोड़ने के सच की कलाई खुल गयी। सिर्फ टीम के नाम भर रख देने की आप खेल को उसके चाहने वालों सेi इतनी आसानी से नहीं जोड़ सकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक यहीं आकर एक आम क्रिकेट चहेते की सोच आईपीएल की टकरा जाती है। आईपीएल कंपनी की हैसियत से खिलाडी को अपनी टीम का हिस्सा बनाता है। यहाँ कंपनी से खिलाड़ी की पहचान जुड़ी है न की खिलाडी से कंपनी की। यह ठीक मौजूदा दौर मे किसी व्यक्ति के लिये देश की पहचान के खो जाने जैसा है। अगर आप किसी बड़ी कारपोरेट कंपनी मे काम करते हैं तो आप उस कंपनी से पहचाने  जाते हैं।  यह कंपनी इस  ग्लोबल विलेज  में तब्दील होती दुनिया में कंपनी किसी भी देश मे हो सकती है। यहाँ देश नहीं वो कंपनी पहले है। आईपीएल भी इसी सोच के साथ खिलाडियों को टीम मे जगह दे रहा है। देश की अवधारणा यहाँ खारिज हो रही है। खिलाडियों ने बाज़ार के इस सच को कबूल कर लिया है। वो ठेठ पेशेवर अंदाज में मैदान पर उतरते हैं। अपना सब कुछ दांव पर लगाकर खेलते हैं। ये जानते हुए कि जरा सी चूक उन्हें बाहर का रास्ता दिखा सकती है। इसलिए  आज वो भारत के लिये खेलते हैं। ऑस्ट्रेलिया के लिये खेलते हैं, लेकिन अगले ही दिन एक साथ नाइट राइडर्स,डेक्कन चार्जर्स और चेन्नई सुपरकिंग्स के लिये मैदान मे उतरते हैं। सिर्फ एक ऐसे कॉम्बिनेशन मे तब्दील होने के लिये, जो उनकी जीत के सम्भावनाओं को उसके सर्वश्रेष्ठ तक ले जाए। कंपनी को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा दिलाए।  लेकिन एक आम दर्शक अभी इस सच को स्वीकार नहीं कर पाया है। हो सकता है कि वो इस सच की तरफ जानबूझकर कर आंख मूंदे हुए है। इसलिए वो सौरव की कप्तानी छीनने से व्यथित होता है। सचिन की हार और धोनी की जीत मे खुद को दोराहे पर खड़ा पाता है। खुद को छला और घायल महसूस करता है। लेकिन यही आईपीएल है.यही आज का सच है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-9037303051867564042?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/DKXz_EEVHpE" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/9037303051867564042/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=9037303051867564042" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/9037303051867564042?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/9037303051867564042?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/DKXz_EEVHpE/blog-post_19.html" title="'कॉरपोरेट' आईपीएल खेल रहा है लोगों की भावनाओं से !" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/04/blog-post_19.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkYCRHk_eCp7ImA9WxJTEE4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-7723595824177955613</id><published>2009-04-17T23:52:00.000-07:00</published><updated>2009-04-18T00:02:45.740-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-18T00:02:45.740-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जयसूर्या" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आईपीएल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सौरव" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जहीर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दक्षिण अफ्रीका" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चीयरलीडर्स" /><title>अनलिमिटेड मनोरंजन के पैकेज में तब्दील एक ‘रिएलिटी शो’</title><content type="html">न तो ये दक्षिण अफ्रीकी टीमें थी, न ही इन टीमों ने दुनिया फतेह की थी। लेकिन,इसके बावजूद 35 लाख की आबादी वाले केपटाउन ने इन टीमों की अगुआई में पलके बिछा दी। खुली बसों में सवार जयसूर्या और जहीर खान की मुंबई इंडियंस थी, नाचते इठलाते श्रीसंत और युवराज की किंग्स इलेवन थी। सौरव और शाहरुख की नाइट राइडर्स थी। ये इंडियन प्रीमियर लीग की आठ टीमों का कारवां था। अपनी जमी से हजारों मीलों दूर सड़क के दोनों ओर खड़े केपटाउन के सैकड़ों खेल प्रेमियों से सवाल करता हुआ-आप किसकी तरफ हैं।बेशक मजबूरी में ही सही रग्बी और फुटबॉल के दीवाने दक्षिण अफ्रीका में आईपीएल के विस्तार की ये एक नयी कोशिश है। पिछले साल आईपीएल ने अपने घर में वफादारी बटोरने की ऐसी ही कोशिश की थी। कोलकाता से चेन्नई, दिल्ली से मुंबई, महानगरों के बीच क्रिकेट की वफादारी को समेटा जा रहा था। अब केपटाउन की सड़कों और गलियों से गुजरते ऐसे काफिलों और कार्निवल के जरिए दक्षिण अफ्रीकी शहरों में भी ये कवायद शुरु हो गई है। चीयरलीडर्स के थिरकते कदमों ,गीत संगीत की सुर लहरियों और ग्लैमर के चकाचौंध में इस मुहिम को परवान चढ़ाया जाएगा। लेकिन , इन सबके बीच क्रिकेट अपनी जगह ठहरकर रह जाएगा। और उसका शो यानी आईपीएल आगे और आगे निकल जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, आईपीएल का शो फिल्म की अवधारणा के बरक्स उसी की तर्ज पर एक रिएलिटी शो रचने की कोशिश है ताकि टीवी के जरिए उसे भुनाया जा सके। रिएलिटी शो में कहने को एक असली कहानी होती है। लेकिन,फिल्म से होड़ लेने के चक्कर में उसने नाटकीय उतार चढ़ाव भरपूर होते हैं। आखिर क्या होता है रिएलिटी शो में ? टीवी के पर्दे पर उतरती इस रिएलिटी में पहले से लिखी किसी स्क्रिप्ट की जरुरत नहीं होती। न ही किसी बड़े स्टार की। यहां एक या एक से अधिक आदमियों की असली कहानी क्लाइमेक्स की ओर रुख करती है। इसी के चलते 60 के दशक में सात साल की उम्र के बच्चों के इंटरव्यू पर बने कार्यक्रम सेवन अप ने रातों रात उन्हें स्टार में तब्दील कर दिया। पिछले पांच साल में अमेरिकन आइडल ने टेलीविजन स्क्रीन पर कब्जा जमा लिया। आलम ये है कि आज इंग्लैंड से लेकर अमेरिका में टेलीविजन पर रिएलिटी शो ही नहीं चलते। रिएलिटी चैनल उभार ले चुके हैं। रिएलिटी टीवी मौजूदा दौर की एक बड़ी हकीकत है। न्यूज चैनल का भी रिएलिटी के इर्दगिर्द सिमट जाना इसका गवाह है। इसका एक सीधा गणित है। जितनी ज्यादा जीवंत तस्वीरें ,उतने ही ज्यादा दर्शक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आईपीएल भी क्रिकेट का ऐसा ही रिएलिटी शो है। इसके आयोजकों ने बेहद चतुराई से इसे एक रिएलिटी शो में बदल दिया है। मजेदार बात ये है कि टी-20 के बेहतरीन फॉर्मेट में उसे कुछ करना ही नहीं पड़ा है। तीन घंटे के इस खेल में एक की जीत तो दूसरी की हार तय है। यानी सीधी सीधे एक रिएलिटी मौजूद है। इस ठोस भरोसे के साथ ही कि शो खत्म होने के साथ ही आप एक टीम को जीतते हुए देखेंगे तो दूसरे का हारना तय है। इस हार और जीत के बीच नाटकीय उतार चढ़ाव तो होंगे ही। इतना ही नहीं ,इसमें ज्यादा से ज्यादा नाटकीय पहलू भरने के लिए फॉर्मेट को तीन घंटे के एक पैकेज में बदल दिया गया है। यहां क्रिकेट को शिद्दत से जीने वाले के लिए जितनी गुंजाइश है, उतनी ही संभावनाएं क्रिकेट की ओर मुड़ते नए दर्शकों के लिए भी मौजूद है। मुकाबले के मोड़ पर रणनीति और उसकी सोच से रुबरु कराने के लिए कमेंटेटर मैदान पर फील्डर से लेकर बल्लेबाज तक से सीधी बात करता है। ये एक ऐसी दुनिया है,जहां  क्रिकेट का चहेता नहीं पहुंच पाया था। दूसरी ओर,नौजवान और क्रिकेट से नए जुड़ने वाले वर्ग के लिए सीमारेखा से बाहर चीयरलीडर्स से लेकर गीत संगीत और ग्लैमर सभी मौजूद है। ये आज के दौर के प्रतीक शॉपिंग मॉल में बने मल्टीप्लेक्स की तरह है। यहां आप सिर्फ फिल्म नहीं देखते। यहां खाने पीने से लेकर खरीदारी तक के कई विकल्प मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहें तो कह लें आईपीएल के शो में सीधे सीधे ये किसी फिल्म का सजा सजाया एक सैट है। इस सैट को एक पर्दा चाहिए। टेलीविजन इसे ये पर्दा या मंच मुहैया कराता है। एक बेहतरीन रिएलिटी शो टेलीविजन स्क्रीन से आपके घर के ड्राइंगरुम में दाखिल हो जाता है। ये ऐलान करते हुए कि इस स्क्रीन के सहारे ये आईपीएल कहीं भी हो सकता है। इसे सिर्फ एक ढांचा चाहिए, जिसके इर्द गिर्द क्रिकेट को खड़ा किया जा सके। इसीलिए, भारत से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक , इंग्लैंड से लेकर आस्ट्रेलिया तक, आईपीएल देश की हदों के पार जाकर रिएलिटी शो और मनोरंजन का एक बेहतरीन पैकेज बनकर सामने आ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिनेमा का शो तो खैर एक मनोरंजन है। फिर चाहे इस मनोरंजन के स्वस्थ या अस्वस्थ होने के बारे में हजारों सवाल क्यों न उठें लेकिन खेल सिर्फ मनोरंजन ही नहीं है। मनोरंजन में कुछ भी दांव पर नहीं होता। आप फिल्म देखते हैं तो घटनाओं का दबाव आप पर हावी नहीं होता लेकिन खेल में एक पहचान जुड़ी होती है। कभी मुहल्ले की, कभी राज्य की तो कभी देश की पहचान। इसी के इर्दगिर्द खिलाड़ी को खड़ा कर दर्शक इससे जुड़ता है। चाहे वो मैदान में पहुंचे या स्क्रीन के सामने बैठे, वो किसी एक टीम या एक खिलाड़ी के प्रति झुका रहता है। इसीलिए अपनी पसंदीदा टीम की हार में दुखी होता है। तो जीत में खुश हो जाता है। हार की वजहों का पोस्टमार्टम करता है तो जीत में अपने हीरो तलाशता है। खेल में सचमुच की घटना घटित होती है। फिर,खेल आंकड़ों में भी दर्ज होता है। इतिहास में भी तब्दील होता है। हार से उपजे दुख और जीत से बहते सुख में लिपटकर सामने आता है। बावजूद इसके आईपीएल ने रिएलिटी शो के फॉर्मेट को भुनाकर क्रिकेट को ऐसे मनोरंजन में बदल दिया है,जहां बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत नहीं है। ये एक अनलिमिटेड मनोरंजन है। एक पूरे का पूरा पैकेज।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-7723595824177955613?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/NVNCLloVWYA" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/7723595824177955613/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=7723595824177955613" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/7723595824177955613?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/7723595824177955613?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/NVNCLloVWYA/blog-post_17.html" title="अनलिमिटेड मनोरंजन के पैकेज में तब्दील एक ‘रिएलिटी शो’" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/04/blog-post_17.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CE8CQ3g9cCp7ImA9WxVbFUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-9177452551247468677</id><published>2009-04-01T06:33:00.000-07:00</published><updated>2009-04-01T06:34:22.668-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-04-01T06:34:22.668-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आईपीएल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सौरव गांगुली" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बुकानन" /><title>यहां सौरव के सामने खारिज हो जाते हैं बुकानन</title><content type="html">ये सौरव गागंली का अपना कोलकाता था। ये सौरव गांगुली का अपना इडेन गार्डन था। ‘कोरबो लोड़बो जीतबो’ की गूंज के बीच ये उनकी अपनी टीम कोलकाता नाइट राइडर्स थी। लेकिन, इन सबके बीच सौरव गांगुली अकेले छूट गए थे, बिल्‍कुल अकेले। उन्‍हें इस कदर अकेला कर दिया था जॉन बुकानन ने। पूर्व ऑस्‍ट्रेलियाई कोच और अब कोलकाता नाइट राइडर्स के कोच बुकानन ने उन्‍हें अपनों के बीच अकेला कर दिया था। अपने इस एक बयान के साथ कि अब सौरव नाइट राइडर्स के अकेले कप्‍तान नहीं होंगे। नाइट राइडर्स की कप्‍तानी की कैप अब खिलाडि़यों के बीच झूलती रहेगी। इस दलील के साथ कि ये ट्वेंटी-20 क्रिकेट की दरकार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेशक, नाइट राइडर्स के मालिक शाहरूख खान ने सौरव को मुख्‍य कप्‍तान कहते हुए उनके जख्‍मों पर मरहम लगाने की कोशिश की है। लेकिन, शाहरूख की ये कोशिशें भी बुकानन और सौरव के बीच फैलते फासले को थाम नहीं सकेंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर, ये दोनों आज नाइट राइडर्स टीम में दो छोर पर नहीं खड़े हैं। मेरे लिए क्रिकेट के आइने में ये दो जीवन दृष्टियों को उभारते सौरव और बुकानन हैं। यहां एक ओर सौरव हैं। क्रिकेट की अनिश्चितता, जीवट, संघर्ष और टेलेंट के प्रतीकों को समेटे हुए। सौरव की क्रिकेट में आप शून्‍य पर आउट हो सकते हैं, लेकिन अगली बार आप दोहरा शतक भी जमा सकते हें। आप एक दिन एक गेंद पर छक्‍का जमा सकते हैं, तो अगली दस गेंद तक हर एक रन के लिए तरस सकते हें। ये है क्रिकेट की अनिश्चितता और उतार-चढ़ाव के बीच आगे बढ़ते सौरव गांगुली। दूसरी ओर जॉन बुकानन हैं। खेल को आंकड़ों में पढ़ते बुकानन। ये आंकड़े जो अलग-अलग स्थितियों में जीत की संभावना बताते हैं। बुकानन इन्‍हीं संभावनाओं को कप्‍तानी के मुद्दे तक ले जाते हैं। किन सर्वश्रेष्‍ठ स्थितियों में जीत तक पहुंचेंगे। इसी से नतीजा निकालते हैं कि कप्‍तानी की अदला-बदली करेंगे, तो जीतने की संभावना ज्‍यादा होगी। लेकिन, इसी सोच के बीच बुकानन क्रिकेट टीम के कोच से पहले किसी कारपोरेट कंपनी के मैनेजर की दृष्टि को समेटे ज्‍यादा दिखते हैं। अगर कंपनी है, तो उसे लाभ दिखाना है। लाभ चाहिए तो, उसे बेहतरीन लोग रखने हैं। इन बेहतरीन लोगों के प्रदर्शन को नापना है, तो इन आंकड़ों के बीच जीत तक ले जाने की उनकी कोशिशों को परखना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये आज के जमाने के ज्‍योतिषी हैं। खेल को सीधे-सीधे आंकड़ों में, अंकों में तब्‍दील करते हुए। लेकिन, खेल महज अंक नहीं है। ये एक सजीव अनुभव है। ये सिर्फ आंकड़े में बदल गया, तो आप इस सजीव अनुभव से हाथ मलते रह जाएंगे। आंकड़ों के दो छोर पर हार और जीत दिखाई देती है। बल्‍लेबाज का शतक, गेंदबाज के विकेट दिखते हैं। लेकिन, आप उसमें खिलाड़ी सौरव या सचिन, स्‍टीव वॉ या ब्रायन लारा की शख्सियत को नहीं पढ़ सकते। इनकी शख्सियत को पढ़ने के लिए आपको आंकड़ों के इस म‍कड़जाल से ऊपर उठकर इसे महसूस करना होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर बुकानन जिस कारपोरेट सोच के साथ क्रिकेट में दाखिल होते हैं, वहां कंपनी में सर्वश्रेष्‍ठ कर्मचारी को शामिल करने की तरह सर्वश्रेष्‍ठ खिलाड़ी को टीम में जगह दी जाती है। इसके सहारे वे टीम को शिखर तक ले जाते हैं। लेकिन, लगातार शिखर पर रहना किसी के लिए मुमकिन नहीं है। प्रकृति का नियम भी यही कहता है। ऑस्‍ट्रेलियाई कोच के नाते बुकानन ने भी इस कड़वे सच को महसूस किया है। बुकानन ने ऑस्‍ट्रेलियाई टीम को कामयाबी की बुलंदियों पर पहुंचाया। इस दौरान उनके पास एक से एक बेहतरीन खिलाड़ी मौजूद था। स्‍टीव वॉ जैसा जुझारू कप्‍तान था, तो शेन वार्न जैसा स्पिन का जादूगर। बेमिसाल ग्‍लेन मैक्‍ग्रॉ थे, तो शास्‍त्रीय संगीत की तरह बल्‍ले से रन बटोरने वाले मार्क वॉ। ये इन बेहतरीन खिलाडि़यों का सर्वश्रेष्‍ठ दौर था। यही बुकानन की ऑस्‍ट्रेलियाई टीम को टेस्‍ट और वनडे के शिखर पर ले जाता दौर था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, ये संयोग ही है कि बुकानन के शिखर की ओर बढ़ते इस कारवां को थामा, तो इन्‍हीं सौरव गागुली ने। सौरव ने ऑस्‍ट्रेलिया के लगातार 16 टेस्‍ट जीतने के सिलसिले को इसी कोलकाता के इडन गार्डन पर रोक दिया था। इस सौरव के पास ऑस्‍ट्रेलिया की तरह दुनिया के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी नहीं थे। लेकिन, उन्‍होंने अपने खिलाडियों में जीत का जुनून भर दिया। बुकानन की विश्‍वविजयी टीम को चित कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुकानन के जहन में हो सकता है कि कोलकाता का ये लम्‍हा एक टीस पैदा करता हो। बुकानन इस टीस की चुभन को स्‍वीकार नहीं करेंगे। सौरव भी एक खिलाड़ी और पूर्व कपतान के नाते इससे बच कर निकल सकते हैं। लेकिन, कोलकाता का दर्शक या क्रिकेट को बेहद करीब से टटोलने वाला शख्‍स इस आधे-अधूरे सच को छूने की कोशिश जरूर करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, जिंदगी हो या फिर क्रिकेट, आप सर्वश्रेष्‍ठ को गणित के आइने में नहीं पढ़ सकते। आप इसे गणित के दायरे में समेट भी नहीं सकते। क्रिकेट में अगर जिंदगी के अक्‍स झलकते हैं, तो इसीलिए कि यहां आप अचानक चमत्‍कार से रूबरू होते हैं। आप लगातार आंकड़ों के आधार पर भविष्‍यवाणी करेंगे, तो चमत्‍कार गायब हो जाएगा। बुकानन की यही दिक्‍कत है। वो आंकड़ों, उसके आधार पर आकलन और संभावनाओं के सहारे क्रिकेट में चमत्‍कार को कम से कम करना चाहते हैं। लेकिन, वो शायद भूल जाते हैं कि चमत्‍कार नहीं होगा, तो क्रिकेट अपनी पहचान ही गवां देगा। हम करिश्‍मों से महरूम हो जाएंगे। इसी इडेन गार्डन पर लक्ष्‍मण की पारी को बुकानन कभी भूला पाएंगे ? इस एक अकेली पारी ने हार की दहलीज पर खड़ी सौरव की टीम को क्रिकेट इतिहास की सबसे बड़ी जीत तक पहुंचाया था। ये वीवीएस लक्ष्‍मण का करिश्‍मा था। इस करिश्‍मे का कोई तोड़ बुकानन के पास नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, सांचे में ढली सोच के पास करिश्‍माओ का तोड़ नहीं होता। फिर बुकानन को मिली टीम ऑस्‍ट्रेलियाई क्रिकेट के मजबूत और बेहद व्‍यवस्थित सिस्‍टम की देन थी। यहां बुकानन ने अपनी गढ़ी सोच, अपनी रणनीति और समीकरणों के मुताबिक सर्वश्रेष्‍ठ खिलाडि़यों का समूह चुना। यहां जीत का जज्‍बा भरने से ज्‍यादा जोर इन बेहतरीन खिलाडि़यों के सर्वश्रेष्‍ठ खेल के आधार पर जीत तक पहुंचने का था। इसमें वो बेहद कामयाब रहे। आईपीएल में भी उन्‍हें बेहतरीन खिलाडि़यों का समूह जरूर मिला, लेकिन यहां इस समूह के इर्द-गिर्द जीत की रणनीति और समीकरण बनाने थे। यहां समूह पहले था और टीम रणनीति और समीकरण बाद में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद यही वजह है कि बुकानन की ऑस्‍ट्रेलियाई टीम शिखर चुनती है, लेकिन उन्‍हीं की कोलकाता नाइट राइडर्स आईपीएल में नाकाम रहती है। ठीक यहीं, जीत के जज्‍बों से लबालब शेन वार्न की अनजान चेहरों से बनी राजस्‍थान रॉयल्‍स खिताब तक पहुंचती है। बुकानन की नाइट राइडर्स उनके समीकरणों में उलझ कर पीछे छूट जाती है। बुकानन अपना गणित तो ठीक बिठाते हैं, लेकिन प्रतिद्वंद्वी के गणित के सामने खारिज हो जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ है, बुकानन सिर्फ और सिर्फ सर्वश्रेष्‍ठ खेल खेलना चाहते हैं। अनिश्चितताओं और नियति के चोली-दामन से लिपटे इस खेल में सर्वश्रेष्‍ठ को आंकड़ों के गणित के सहारे पकड़ना चाहते हैं। लेकिन, फिर वही बड़ी बात, कि जिंदगी हो या क्रिकेट, यहां सर्वश्रेष्‍ठ को आप महज गणित से नहीं पकड़ सकते। अगर ऐसा होता तो कभी केन्‍या, वेस्‍टइंडीज को शिकस्‍त नहीं दे पाता। जिम्‍बाब्‍वे, ऑस्‍ट्रेलिया को उसी के खेल में मात नहीं देता। कभी पाकिस्‍मान या भारत को बांग्‍लादेश से हार का मुंह नहीं देखना पड़ता। इसीलिए, सौरव गांगुली के सामने ये बुकानन खारिज हो जाते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-9177452551247468677?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/joX8jcIfqGM" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/9177452551247468677/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=9177452551247468677" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/9177452551247468677?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/9177452551247468677?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/joX8jcIfqGM/blog-post.html" title="यहां सौरव के सामने खारिज हो जाते हैं बुकानन" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/04/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEADQXc-cSp7ImA9WxVbFE4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-4373156728998716395</id><published>2009-03-30T10:01:00.000-07:00</published><updated>2009-03-30T10:06:10.959-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-03-30T10:06:10.959-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ग्रेग चैपल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कपिल देव" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सुनील गावस्कर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धोनी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पटौदी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चंदू बोर्डे" /><title>नया इतिहास लिखने के लिए ही बने हैं धोनी</title><content type="html">कभी गेंद पर पूरी ताकत से प्रहार कर उसे सीमा रेखा से बाहर भेजते हुए। कभी गेंद को क्षेत्ररक्षण के बीच मौजूद दरार में धकेल तेजी से बाइस गज का फासला तय करते हुए। कभी विकेटकीपर की सामान्य कद काठी से जुदा अपने गठीले बदन से गेंद की दिशा में छलांग लगाते हुए।कभी विकेटकीपिंग के लिए पंजों के बल स्टास लेने से ठीक पहले मैदान पर सजायी फिल्डिंग का मुआयना करते हुए। कभी अखबार के पन्नों पर छपे विज्ञापनों के जरिये ख़बरों से पहले निगाहों में धंसते हुए। कभी टेलीविजन स्क्रीन पर शाहरुख खान के कदमों से कदम मिलाते हुए। तो कभी तमिल सुपरस्टार रजनीकांत के अवतार में खुद को ढालते हुए। क्रिकेट की सीमारेखा के आर-पार महेंद्र सिंह धोनी की ये छवियां एक आम भारतीय की जेहन में कभी ना कभी दस्तक जरूर दे जाती हैं। उत्तर में उत्तराखंड की पृष्ठभूमि से लेकर पूर्व में झारखंड का परिवेश और दक्षिण में चेन्नई सुपरकिंग की कप्तानी की राह में धोनी, राज्य, भाषा और समुदाय की लकीरों को मिटाते हुए, एक अरब उम्मीदों को परवान चढ़ाते हमसे रू-ब-रू होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन धोनी को लेकर मेरी सोच इन स्थापित छवियों से आगे जाकर २०-२० वर्ल्ड कप को जीतते और आईपीएल में हाथ से छिटके टाइटल के बाद उभार लेते एक अलहदा धोनी के इर्द-गिर्द सिमट जाती है। २०-२० वर्ल्ड कप में मिली खिताबी जीत के साथ ही भारतीय टीम जश्न में सराबोर है, लेकिन निगाहें भावनाओं के सैलाब से परे विकेट की ओर बढ़ते धोनी पर ठहर जाती हैं। आईपीएल के खिताबी मुकाबले की आखिरी गेंद पर राजस्थान रॉयल्स को एक रन बनाने से रोकने की चुनौती है। उस निर्णायक लम्हे में विकेटकीपर पार्थिव पटेल के दस्तानों से गेंद छिटकी और साथ ही चेन्नई सुपरकिंग्स के हाथ से खिताब। नवी मुंबई का डी वाई पाटिल स्टेडियम शेन वॉर्न की टीम के साथ जश्न में डूब गया। लेकिन अगले ही पल हार को पीछे छोड़ धोनी साथियों के कंधों को थपथपाते हैं। चेन्नई सुपरकिंग्स के सभी खिलाड़ी एक दूसरे के कंधों पर हाथ डाले घेरे की शक्ल ले लेते हैं। जीत के जश्न के बीच शिकस्त खाई धोनी की इस टीम से आप निगाहें हटा नहीं सकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल ये दो तस्वीरें टीम इंडिया के कप्तान धोनी की सोच का आइना हैं। ये हार और जीत के पार खड़े धोनी के करीब ले जाती छवियां हैं। इन छवियों के बीच क्रिकेट जिंदगी और मौत नहीं हैं। ये जश्न और मातम नहीं है। ये सिर्फ एक खेल है और यहां एक की जीत और दूसरे की हार तय है। आपको पूरी तरह अपने खेल में डूब कर जीत तक पहुंचने की हर मुमकिन कोशिश करनी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी सोच के इस धरातल पर पूर्व क्रिकेटर और कोच ग्रेग चैपल की थ्योरी को मैदान पर साकार करते दिखाई देते हैं। चैपल का मानना है कि आपको नतीजों से बेपरवाह होकर सिर्फ और सिर्फ अपने खेल को डूब कर जीना चाहिये। इसकी प्रक्रिया का आनंद लेना चाहिये। धोनी पूरी शिद्दत से इसी कोशिश में जुटे रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए जब हार और जीत एक साथ दस्तक देने लगें तो धोनी का खेल परवान चढ़ता है। बल्लेबाजी के मोर्चे पर वो टीम को मंजिल तक पहुंचाए बिना नहीं लौटते। मैच के मोड़ के मुताबिक वो अपनी बल्लेबाजी को ढालते हैं। अगर टीम को बड़े स्ट्रोक्स की दरकार है तो वो इसमें कतई वक़्त नहीं गंवाते। वनडे ही नहीं टेस्ट में इस धोनी से रू-ब-रू हो सकते हैं। मिसाल के लिए धोनी ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ मोहाली टेस्ट में ८वें नंबर पर बल्लेबाजी करते हुए ९२ रन की ताबड़तोड़ पारी खेलते हैं। ८ चौकों और ४ छक्कों से सजी इस पारी के सहारे सौरव गांगुली के साथ सातवें विकेट की शतकीय साझेदारी पूरी करते हैं। अपनी टीम को एक शुरुआती एडवांटेज दिलाते हैं । यही धोनी अगली पारी में तीसरे नंबर पर मोर्चा संभालते हैं। ८४ गेंदों पर ५५ रन की ठोस पारी से पॉन्टिंग की विश्व विजयी टीम को बैकफुट पर ला खड़ा करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी की इन्हीं कोशिशों का नतीजा है कि टेस्ट में उनकी ३३ रन की कुल औसत कप्तान धोनी के बल्ले से ५५ में तब्दील हो जाती है। वनडे में ४४ की औसत को वो कप्तानी में 57 तक खींच ले जाते हैं। इस मोड़ पर धोनी सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ से आगे जा निकलते हैं। भारत में इन दोनों महानायकों ने अपनी बल्लेबाजी की लय को वापस पाने के लिए कप्तानी से किनारा कर लिया। लेकिन धोनी ने कप्तानी की चुनौती को स्वीकारते हुए अपनी बल्लेबाजी में नए आयाम जोड़ लिये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद धोनी ने टीम को कामयाबी की दहलीज तक लाने के सूत्र रांची में स्थानीय टीमों के लिए खेलते हुए पकड़े होंगे। टीम की जीत सीधे-सीधे धोनी के प्रदर्शन से जुड़ी रही होगी। धोनी इसी सोच को आज अंतर्राष्ट्रीय मंच पर विस्तार देते दिखाई देते हैं। लेकिन अपनी कामयाबी को वो अपने हर एक साथी के साथ साझा करना चाहते उनका मानना है कि “मेरी कामयाबी के मायने तभी हैं जब साथी खिलाड़ी इसमें अपनी खुशी तलाशें। हम सब एक दूसरे की कामयाबी में खुशी तलाशें”। ये बड़ी सोच धोनी की बहुत बड़ी ताकत है। गेंदबाजी के रनअप पर ईशांत शर्मा के कदम जरा से लड़खड़ाए नहीं कि जहीर खान उनके पास पहुंच जाते हैं। युवराज को उनकी लय में लौटाने के लिए सचिन आगे बढ़ कर मदद करते हैं। आपसी तालमेल का ही ये आइना है कि तेंदुलकर ने हैमिल्टन की ऐतिहासिक जीत के बाद दोहराया - इस भारतीय टीम के ड्रेसिंग रूम का माहौल बेहतरीन है। हम खेल का आनंद ले रहे हैं और परिवार की तरह एक दूसरे के साथ जुड़े हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये उस देश की क्रिकेट टीम का ड्रेसिंग रूम है जिसमें अहम के टकराव की ढेरों कहानियां हैं। इतिहास के पन्ने विजय मर्चेंट-विजय हजारे, विजय हजारे-लाला अमरनाथ, मंसूर अली खान पटौदी-चंदू बोर्डे, सुनील गावस्कर-कपिल देव, अजहरूद्दीन-नवजोत सिंह सिद्धू और सौरव गांगुली-ग्रेग चैपल के टकराव के किस्सों से भरे हैं। मगर मौजूदा टीम अलग है। दिलचस्प है कि हैमिल्टन टेस्ट जीतने वाली टीम में मुनाफ पटेल और ईशांत शर्मा को छोड़ दें तो बाकी आठ खिलाड़ियों का करियर धोनी से पहले शुरू हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी की इस बेमिसाल कामयाबी के सूत्र टटोलते पूर्व भारतीय कप्तान और कोच अजीत वाडेकर का मानना है कि धोनी अपने सीनियर्स के अहम पर कभी चोट नहीं करते। खुद धोनी अपने बयान से इसे एक नया विस्तार देते हैं। हैमिल्टन की जीत के बाद धोनी ने कहा कि “उम्मीद करनी चाहिये की हम ये सीरीज जीत जाएं, ये हमारी ओर से सचिन और राहुल को एक सौगात होगी”। इस सम्मान और श्रद्धा के बाद कौन ऐसे कप्तान को अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं देना चाहेगा। यही वजह है कि बीस साल बाद भी सचिन तेंदुलकर अपनी जीनियस की छाप छोड़ रहे हैं। वीरेंद्र सहवाग बेहतरीन फॉर्म में दिख रहे हैं। जहीर खान में वसीम अकरम की आक्रामकता और पैनेपन की झलक नज़र आ रही है। ईशांत शर्मा और गौतम गंभीर जैसे युवा खिलाड़ी अपने कप्तान की उम्मीदों पर खरा उतरने में कोई कसर नहीं रहे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन कामयाबियों और सोच के बीच आगे बढ़ते धोनी को क्रिकेट आलोचक टाइगर पटौदी के बराबर खड़ा कर रहे हैं। साठ के दशक की शुरुआत में कप्तानी संभालने वाले पटौदी ने भारतीय क्रिकेट को ड्रॉ की मानसिकता से उबारते हुए जीत की नई सोच से भर डाला था। क्रिकेट इतिहासकार मिहिर बोस के मुताबिक पटौदी से पहले भारतीय क्रिकेट में ड्रॉ को एक संभावित नतीजे की तरह देखा जाता था। टाइगर पटौदी ने जीतना सिखाया ना सिर्फ घर में बल्कि घर के बाहर भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पटौदी ने टीम में जीतने का भरोसा जगाया तो सौरव गांगुली ने जीत की भूख पैदा की। धोनी गांगुली की इसी विरासत को और आगे बढ़ाते दिखते हैं। गांगुली ने इस दशक की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया को हराते हुए विदेश में जीत की नई इबारतें लिखनी शुरू कीं। न्यूजीलैंड एक अपवाद की तरह छूट गया। धोनी ने ३३ साल बाद यहां टेस्ट जीत कर इस खालीपन को भी भर दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कामयाबियों के शिखर से गुजरते धोनी की बस एक ही छवि हमारे जेहन में हावी होती जा रही है। वो छवि है कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की। कप्तानी, जो उन्हें टीम इंडिया के एक नाजुक दौर में सौंपी गई। लेकिन धोनी ने खुद को उस भूमिका में ऐसे ढाल लिया जैसे वो नेतृत्व करने और एक नया इतिहास लिखने के लिए ही बने हों।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-4373156728998716395?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/L0WrqHzu_2A" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/4373156728998716395/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=4373156728998716395" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/4373156728998716395?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" 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Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/03/blog-post_30.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DkAFR3syfSp7ImA9WxVVF0U.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-1375269898954416331</id><published>2009-03-11T08:16:00.000-07:00</published><updated>2009-03-11T08:18:36.595-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-03-11T08:18:36.595-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लारा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="युवराज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="रिचर्डस" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धोनी" /><category 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पर ले आयी। इसलिए भी नहीं कि इस पारी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में तेंदुलकर के बल्ले से शतकों के शतक के ख्वाब को हकीकत में बदलने की उम्मीद जगा दी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल,ये पारी आंकडों और रनों के मायावी खेल से कहीं बहुत आगे जाकर क्रिकेट की स्टेज पर तेंदुलकर होने के अक्स तलाशती एक और बेजोड़ पारी है। इस पारी में क्रीज पर मौजूद एक बल्लेबाज नहीं है। ये अपनी साधना में लीन एक कलाकार है। सिर्फ इस फर्क के साथ कि उसके हाथ में ब्रश की जगह बल्ला थमा दिया गया है। कैनवास की जगह क्रिकेट के मैदान ने ली है। अपने खेल में डूबकर उसका भरपूर आनंद लेते हुए तेंदुलकर नाम का ये जीनियस इस कैनवास पर एक और तस्वीर बनाने में जुटा है। ये रनों,रिकॉर्ड और लक्ष्य से पार ले जाती तस्वीर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट की पूरी दुनिया वैसे उसकी रची हर पेंटिग को सराहती है। लेकिन, हर दूसरे कलाकार की तरह सचिन को भी शायद अपनी एक मुकम्मल तस्वीर की तलाश है। बीस साल से लगातार अंतरराष्ट्रीय मंच पर वो अपने स्ट्रोक्स को रन में, रनों को शतक में और शतकों को नए शिखर में तब्दील कर रहे हैं। लेकिन, उनकी इस मुकम्मल तस्वीर की खोज खत्म नहीं हुई है। वो लगातार जारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए,बीस साल लगातार क्रिकेट खेलने के बावजूद वो आज भी गेंद की रफ्तार, उसकी दिशा और लंबाई को गेंदबाज के हाथ से छूटने के साथ ही पढ़ लेते हैं। कदमों के मूवमेंट की हर बारीकी को तय करते हैं। क्रीज को बॉक्सिंग रिंग में तब्दील कर एक चैंपियन मुक्केबाज की तरह सधे हुए फुटवर्क के साथ स्ट्रोक्स के लिए सही पोजिशन ले लेते हैं। अपने बेहद सीधे बल्ले के मुंह को आखिरी क्षण में खोलते हैं। गेंद कभी लाजवाब कारपेट ड्राइव की शक्ल में तो कभी हवा में सीधे सीमा रेखा की ओर रुख करती है। क्राइस्टचर्च में इसी तरह उनके बल्ले से निकले १६ चौकों और पांच आसमानी छक्कों के बीच यह अहसास बराबर मजबूत होता रहा कि इस कलाकार के अवचेतन में गहरे कहीं कोई मुकम्मल तस्वीर दर्ज है। वो अपने स्टोक्स के सहारे इसे उकेरने में जुटा है। लेकिन,तस्वीर अभी भी पूरी नहीं हो पायी है। ये उसकी अपनी खड़ी की गई चुनौती है। उसे इससे पार जाना है। लेकिन,इतिहास का सच तो यही है कि कलाकार कभी अपनी मुकम्मल तस्वीर तक पहुंच ही नहीं पाता। वो केवल उसे रचने में जुटा रहता है। बस,इसे रचने के लिए वो सही मौके और सही क्षण का इंतजार करता है। ये मौका और ये लम्हा आते ही उसकी साधना शुरु हो जाती है। क्राइस्टचर्च में भी तेंदुलकर उसी मौके और लम्हे में पहुंच गए थे,जहां से उनकी अधूरी तलाश आगे बढ़ रही थी। इसीलिए ये पारी हमारे ही जेहन में जारी नहीं है। वो भी उस पारी को अभी जी रहे हैं। मुकाबले के बाद अपनी पारी का जिक्र करते तेंदुलकर के बयान पर गौर कीजिए। यहां वो क्रिकेट की बात करते हैं। विकेट की भी और माहौल की भी। लेकिन,यही जोर देकर कहते हैं कि यहां आपको इस मैदान के आकार के मुताबिक अपनी बल्लेबाजी और स्ट्रोक्स को ढालना था। तेंदुलकर ने खुद को बखूबी ढाला भी। अपनी पहचान बन चुके स्ट्रेट ड्राइव को कुछ देर के लिए भुलाते हुए उन्होंने बैटिंग क्रीज के समानांतर दोनों ओर रन बरसाए। एक नहीं,दो नहीं १२९ रन। अपनी क्रिकेट को लेकर तेंदुलकर की यही सोच उन्हें क्रिकेट के रोजमर्रा के गणित से बाहर ले जाता है। ये तेंदुलकर को क्रिकेट के दायरे से पार ला खड़ा करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद सोच का यही धरातल है कि इसी मैच में युवराज की क्लीन स्ट्राइकिंग पावर, धोनी के ताकत भरे स्ट्रोक्स और रैना की बेहतरीन टाइमिंग से भी रनों की बरसात होती है। लेकिन,सचिन के जीनियस के सामने ये कोशिशें हाशिए पर छूट जाती हैं। इतना ही नहीं,इस नयी टीम इंडिया के ये नाम, उम्र और अनुभव में ही पीछे नहीं छूटते। अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद तेंदुलकर की इस ऊंचाई के सामने बौने दिखने लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेंदुलकर आज भी टीम की रणनीति में अपनी भूमिका तय कर उसे मंजिल तक पहुंचाते हैं। कभी दूसरे छोर पर सहवाग के साथी के तौर पर तो कभी सहवाग के जल्द आउट होने पर आक्रमण की बागडोर हाथ में लेते हुए। कभी एक छोर को संभाल अपने नौजवान साथियों को क्रिकेट के गुर के साथ साथ जरुरी हौसला थमाते हुए। वो धोनी की इस टीम इंडिया के एक सदस्य हैं। उनकी विनिंग कॉम्बिनेशन की एक मजबूत कड़ी। लेकिन,इसके बावजूद वो टीम में सबसे अलग पायदान पर हैं। सचिन इस टीम के एक सदस्य,एक खिलाड़ी भर नहीं है। सचिन एक युग में तब्दील हो चुके हैं। धोनी की इस विश्व विजयी टीम में वो एक एवरेस्ट की मानिंद खड़े हैं,जिसके इर्द गिर्द बाकी खिलाड़ी पठार की तरह दिखायी देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर,युग में तब्दील हो चुके तेंदुलकर आज की घटना नहीं हैं। सर डोनाल्ड ब्रैडमैन ने ९० के दशक में अपनी ड्रीम टीम में सचिन को जगह देते हुए उन्हें एक जीनियस से एक युग में बदल डाला था। तेंदुलकर एक ऐसी टीम में शुमार किए गए,जो समय,काल और देश की हदों से बाहर खड़ी थी। शायद,एक ड्रीम टीम में ही कई युगों को एक साथ समेटा जा सकता है। दिलचस्प है कि ८० के दशक में डेनिस लिली के बाद बीते २५ सालों में तेंदुलकर की अकेले खिलाड़ी हैं,जिन्हें इस टीम में जगह मिल पायी। जॉर्ज हैडली से लेकर एवरटन वीक्स तक विव रिचर्डस लेकर ब्रायन लारा तक विक्टर ट्रपर से लेकर वॉली हेमंड तक, नील हार्वे से लेकर ग्रैग चैपल तक, डेनिस कॉम्टन से लेकर ग्रीम पॉलक तक-तेंदुलकर सब को पीछे छोड़ते हुए टीम में दाखिल हुए। लेकिन,ये फैसला करते वक्त ब्रैडमैन किसी दुविधा में नही थे। उनका कहना था-ये सभी बल्लेबाज अपने प्रदर्शन में किसी बल्लेबाज से कम नहीं हैं। न आंकडों में कहीं उन्नीस ठहरते हैं। सभी खेल के महान नायक हैं। लेकिन,तेंदुलकर अलग हैं। उनके पास किले की तरह मजबूत डिफेंस हैं। साथ ही जरुरत के मुताबिक रक्षण को आक्रमण में बदलने की महारथ। और इससे भी आगे उनकी कंसिस्टेंसी।  तेंदुलकर में अपनी झलक देखते ब्रैडमेन का कहना था कि उनकी बल्लेबाजी परिपूर्ण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेशक,ब्रैडमैन की निगाहों में तेंदुलकर एक दशक पहले ही एक परिपूर्ण बल्लेबाज बन गए थे। लेकिन शायद तेंदुलकर को अभी भी परिपूर्णता की तलाश है। अपनी मुकम्मल तस्वीर की तलाश है। अपनी इस कोशिश के बीच वो सिर्फ एक बल्लेबाज और क्रिकेटर नहीं रह जाते। तेंदुलकर एक सोच की शक्ल ले लेते हैं। एक नजरिए में तब्दील हो जाते हैं। ये संदेश देते हुए कि क्रिकेट की किताब अब तेंदुलकर की नजर से भी लिखी जाएगी। ठीक उसी तरह जैसे सर डॉन ब्रैडमैन ने क्रिकेट को परिभाषित किया। शायद यही सचिन रमेश तेंदुलकर होने के मतलब है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-1375269898954416331?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/GYWlRnLb1HI" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/1375269898954416331/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=1375269898954416331" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1375269898954416331?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1375269898954416331?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/GYWlRnLb1HI/blog-post.html" title="मुकम्मल तस्वीर की तलाश में तेंदुलकर" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>2</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/03/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkUBR34zeCp7ImA9WxVXEUg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-1534877940303796592</id><published>2009-02-08T21:39:00.000-08:00</published><updated>2009-02-08T21:44:16.080-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-02-08T21:44:16.080-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="युवराज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धोनी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जहीर खान" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ईशांत" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="तेंदुलकर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सहवाग" /><title>खेल के हर लम्हे को भरपूर जीती धोनी की टीम इंडिया</title><content type="html">ये सचिन तेंदुलकर का लम्हा था। वो इस डूबकर जी रहे थे। अजंथा मेंडिस ने युवराज सिंह की गेंद को कवर में पुश किया। तेंदुलकर ने पूरी फुर्ती से इस पर कब्जा जमाया। एक ही एक्शन में नॉन स्ट्राइकर एंड पर मौजूद युवराज की ओर सटीक थ्रो किया। जब तक दिलहारा फर्नान्डो बीच विकेट से वापस अपनी क्रीज में पहुंचने की कोशिश करते, युवराज उनकी गिल्लियां बिखेर चुके थे। हालांकि, अंपायर ने हवा में बॉक्स बनाते हुए तीसरे अंपायर की तरफ अंतिम फैसला उछाल दिया था। लेकिन खुशी में डुबे तेंदुलकर को देख कोई भी महसूस कर सकता था कि भारत श्रीलंका का ये आखिरी विकेट,तीसरा वनडे और ये सीरिज जीत चुका है। तेंदुलकर इसी लम्हे को जी रहे थे। आखिर,इस सीरिज में तेंदुलकर के हाथ यही एक लम्हा लगा था। अपने बल्ले से वो लगातार गेंदबाज के बजाय अंपायर का शिकार बनते हुए टीम की जीत में कोई योगदान नहीं कर सके थे। यहां सिर्फ ४२ वें ओवर में खत्म होते मैच में तेंदुलकर को ये मौका मिला और उन्होंने उसमें कोई चूक नहीं की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,बात सिर्फ सचिन तेंदुलकर की नहीं है। बात इस आखिरी थ्रो की भी नहीं है,जिसने सीरिज में जीत की मुहर लगाई। दरअसल,बात उन मौकों की है,जहां महेन्द्र सिंह धोनी की इस टीम इंडिया का कोई भी खिलाड़ी चूकना नहीं चाहता। वो जानता है कि उसके हासिल किए लम्हे में वही अकेला जश्न में नहीं डूबेगा, पूरी टीम उसके साथ इस पल को जीएगी। इस हद तक कि सीमा रेखा के बाहर ड्रेसिंग रुम में भी उसकी गूंज सुनायी देगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, महेन्द्र सिंह धोनी की ये टीम इंडिया मैदान पर बिताए हर लम्हे को भरपूर जी रही है। खेल के हर पहलू में। बिना इस बात की परवाह किए कि ये पल किसने रचा,और इस पल का नायक कौन है। यही वजह है कि तीसरे वनडे में बेहतरीन शतक बनाने के बाद अपने "मैन ऑफ द मैच' अवॉर्ड को युवराज अपने साथी वीरेन्द्र सहवाग के साथ साझा करना चाहते हैं। यही वजह है कि तेंदुलकर बल्ले से अपनी नाकामी को पीछे छोड़ सहवाग और युवराज के हर स्ट्रोक पर आनंद में डूब जाते हैं। यही वजह है कि युवराज के बल्ले से बहते हुए स्ट्रोक्स में आप तेंदुलकर को गलत आउट दिए जाने की नाराजगी को पढ़ सकते हैं। यही वजह है कि मैच के आखिरी तनाव भरे लम्हों में अपने रनअप की ओर लौटते ईशांत शर्मा को हौसला देते जहीर खान बार बार दिखायी देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का दिया मंत्र है। आस्ट्रेलियाई सीरिज में धोनी ने लाजवाब पारियां खेलने के दौरान टीम की कामयाबी के बारे में बेहद सहजता से कहा था-"मेरी हाफ सेंचुरी का मज़ा तभी है,जब मेरा कोई साथी मेरी इस कोशिश पर उतना ही आनंद महसूस करे। इस टीम का हर खिलाड़ी एक दूसरे की कोशिशों में, एक दूसरे की मुश्किलों में साथ खड़ा है।"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर, इस टीम का हर खिलाड़ी अपने कप्तान धोनी की कसौटी पर खरा उतरना चाहता है। घरेलू सीजन में नाकामी के बावजूद प्रवीण कुमार को इस टीम में जगह मिलती है। श्रीलंका के खिलाफ पिछली वनडे सीरिज में डे नाइट मुकाबलों में वो अपनी लय खो बैठते हैं। उन्हें टीम से बाहर कर दिया जाता है। लेकिन हाथ में आए इस मौके पर वो एक बार फिर अपनी पहचान के मुताबिक टीम को शुरुआती कामयाबी दिलाते हैं। पिछली ही सीरिज में मेंडिस के खिलाफ अपने स्ट्रोक्स भूल चुके युवराज सिंह इस बार उसकी भरपाई करने का फैसला कर विकेट पर पहुंचते हैं,और टीम को जीत की दहलीज तक खींच लाते हैं। फिर,दूसरे वनडे मुकाबले की तरह नाजुक मौकों पर अगर कोई गेंदबाज चूक करता है,तो धोनी अपने सहज अंदाज में उसे टोकने में कोई कोताही नहीं बरतते। धोनी की इस टीम में कोई सचिन तेंदुलकर,कोई जहीर खान और कोई वीरेन्द्र सहवाग नहीं है। इस टीम में शख्सियत से पहले हर एक सिर्फ खिलाड़ी है। खिलाड़ियों की ये यूनिट टीम को एक विनिंग कॉबिनेशन में तब्दील करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथ ही,कप्तान धोनी नाजुक मौकों पर आगे बढ़कर चुनौती को खुद हाथ में लेते हैं। विकेट के पीछे या विकेट के सामने। धोनी ने अपनी ताबड़तोड़ बल्लेबाजी के अंदाज से इतर एक ऐसे ठोस बल्लेबाज की शक्ल ले ली है,जो मैच की जरुरत के मुताबिक अपना गेयर बदल देता है। न सिर्फ वनडे मुकाबलों के दौरान बल्कि टेस्ट और ट्वेंटी-२० में भी धोनी मैच के मोड़ के मुताबिक अपने बल्ले के मुंह को खोलते या बंद कर देते हैं। यही वजह है कि आंकडों के आइने में कप्तान धोनी का औसत वनडे में ५५ को पार कर रहा है, जबकि उनका करियर औसत करीब ४७ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सबके बीच कप्तान धोनी की अगुआई में क्रिकेट चहेते खेल की उस खूबसूरती से रुबरु हो रहे हैं, जहां खिलाड़ी हार और जीत से बेपरवाह अपने खेल को नयी ऊंचाइयां देने में जुटा है। इसी सोच ने उसे जीत की ऐसी राह पर डाल दिया है,जहां हर पल वो एक नए शिखर की ओर मुखातिब है। यहां वो बीते कल से बेखबर आने वाले कल को भूलकर सिर्फ और सिर्फ आज में ही अपना सब कुछ झोंक देना चाहते हैं। ठीक इसी बिन्दु पर धोनी की ये टीम सुनील गावस्कर से लेकर कपिल देव और सौरव गांगुली से लेकर राहुल द्रविड़ की टीमों से अलग हो जाती है। बेशक,इस टीम ने लगातार नौ एकदिवसीय मैचों में जीत का रिकॉर्ड बनाया है,लेकिन ये टीम रिकॉर्ड के लिए नहीं खेल रही। ये अलग बात है कि उनकी इसी सोच से टीम कामयाबी के उस पायदान की ओर बढ़ रही है,जहां वनडे इतिहास में क्लाइव लॉयड, रिकी पोंटिंग, हैंसी क्रोनिए, विव रिचर्ड्स और स्टीव वॉ जैसे कप्तानों की टीमें खड़ी रही हैं। अपनी कप्तानी में धोनी ने ६० फीसदी से ज्यादा मुकाबले जीतते हुए भारतीय क्रिकेट में एक अलग मुकाम बनाया है। क्लाइव लॉयड ७६ फीसदी जीत के साथ सबसे ऊपर खड़े हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल,धोनी की टीम जीत का सिलसिला जारी रखे हैं। इस कदर कि अब टीम इंडिया विश्व में नंबर एक के पायदान के बिलकुल करीब है। ये एक ऐसा अहसास है,जिससे भारतीय टीम कभी रुबरु नहीं हुई। बेशक,भारत ने १९८३ में वर्ल्ड कप जीता,और १९८५ में वर्ल्ड चैंपियनशिप ऑफ क्रिकेट। लेकिन,धोनी की अगुआई में अब हम यह सपना देख रहे हैं। यहां अमेरिकी कवि और लेखक रॉबर्ट मोंटेगरी का कथन दिलचस्प है "अगर आप कामयाब हो रहे हैं तो आपकी तारीफों के पुल बंधते हैं। आप भी इसमें बह जाते हैं। मेरा मानना है कि आप इसका भरपूर आनंद लें,लेकिन इस पर कभी भरोसा न करें।" धोनी की टीम जीत के इन लम्हों का भरपूर आनंद ले रही हैं। इन्हें भरपूर जी रही है। लेकिन,मुझे यकीं है कि वो भी इस पर भरोसा नहीं कर रही। शायद,यही उसकी जीत में जुड़ती हर नयी कड़ी का पहला और आखिरी सूत्र है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-1534877940303796592?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/KlgigPVNz-U" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/1534877940303796592/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=1534877940303796592" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1534877940303796592?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1534877940303796592?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/KlgigPVNz-U/blog-post.html" title="खेल के हर लम्हे को भरपूर जीती धोनी की टीम इंडिया" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2009/02/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkMCQ38zfip7ImA9WxRaFk0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-1640386010148586219</id><published>2008-12-18T03:39:00.000-08:00</published><updated>2008-12-18T03:41:02.186-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-12-18T03:41:02.186-08:00</app:edited><title>टीम इंडिया के ड्रेसिंग रुम में छिपा है जीत का फलसफा</title><content type="html">&lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;मैं कुछ देर के लिए अब से 13 साल पहले लौटना चाहता हूं- जमैका के सबीना पार्क की ओर। टेलीविजन के पर्दे से ज़ेहन में ठहर गई तस्वीरों की ओर। कुछ देर के लिए वक्त को अपनी मुठ्ठी में भींच कर खड़ी तस्वीरें। ऑस्ट्रेलिया की वेस्टइंडीज पर जीत के बाद ड्रेसिंग रुम में जश्न में डूबे मार्क टेलर और उनके साथियों के चेहरे पर तैरती एक असीम खुशी 13 साल बाद भी सिर्फ कल ही की बात लगती है। उस वक्त पहली बार मैंने देखा था टेलीविजन के पर्दे पर खिलाड़ियों के ड्रेसिंग रुम को पहुंचते हुए। 22 साल बाद वेस्टइंडीज को उसी के घर में शिकस्त देने के ऐतिहासिक लम्हों की जीवंतता से रुबरु कराते हुए। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;13 साल बाद खुशी से सराबोर ऐसे ही लम्हों को चेन्नई के चेन्नास्वामी स्टेडियम पर धोनी और उसके साथी जी रहे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि कैमरा इस तरह उन तक नहीं पहुंचा था। लेकिन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; सचिन तेंदुलकर से लेकर वीरेन्द्र सहवाग तक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; युवराज सिंह से लेकर अमित मिश्रा तक और हरभजन सिंह से लेकर प्रज्ञान ओझा और बद्रीनाथ तक, धोनी की टीम का हर एक सदस्य इंग्लैंड पर मिली ऐतिहासिक जीत के जश्न को विराम नहीं देना चाहता था।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;लेकिन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; आप सोच रहे होंगे कि मैं इन 13 साल को क्यों एक-दूसरे से जोड़ कर देखना चाह रहा हूं। मैं सबीना पार्क पर ड्रेसिंग रुम तक पहुंचे टेलीविजन कैमरे के जरिए मार्क टेलर और उनके साथियों के चेहरे से बहती खुशी के बीच ऑस्ट्रेलियाई टीम के जीत के सूत्र तलाशने की कोशिश कर रहा था। इधर चेन्नई में भी भारतीय ड्रेसिंग रुम में धोनी के इस विजयी टीम के समीकरण उभार ले रहे थे।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;दरअसल&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; चेन्नई में इंग्लैंड के एक नामुमकिन से लक्ष्य तक पहुंचाने में वीरेन्द्र सहवाग से लेकर सचिन तेंदुलकर और युवराज सिंह तक की बेजोड़ पारियां अहम थीं। मैच के बाद हर कोई इन जैसे व्यक्तिगत प्रदर्शनों के आसपास भारतीय जीत के गुत्थी को सुलझाने की कोशिश में जुटा है। लेकिन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;जीत के जश्न की गूंज में वीरेन्द्र सहवाग और सचिन तेंदुलकर का एक अहम बयान कहीं खो गया। इन दोनों का कहना था कि इस वक्त भारतीय ड्रेसिंग रुम का माहौल इस कदर बेहतरीन है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; जैसा पहले कभी नहीं रहा।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;दरअसल&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; इन्हीं बयानों में भारतीय टीम की सोच का फलसफा छिपा है। गौर कीजिए- ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सीरिज जीत के बाद भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का कहना था कि टीम की असली ताकत इसी में है कि टीम का हर सदस्य एक दूसरे की कामयाबी में खुशी ढूंढ ले। ठीक इसी सूत्र को पकड़ धोनी की ये टीम भारतीय क्रिकेट में नयी इबारतें लिखने की ओर बढ़ रही है। राहुल द्रविड़ अपने करियर के सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। उनके टीम में बने रहने पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। लेकिन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;आप सचिन तेंदुलकर के बयान पर गौर कीजिए। वो कहते हैं &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;राहुल सिर्फ एक अच्‍छा बल्लेबाज नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; एक महान बल्लेबाज है।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; साफ है कि अपनी निजी और टीम की कामयाबी के बीच हाशिए पर छूट रहे अपने कल के साथी को कोई इस कदर हौंसला दे रहा है। उसे एक बार उसके बेहतर दिनों की ओर लौटा ले जाने के लिए। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;दूसरी ओर सिर्फ अपना चौथा टेस्ट खेल रहे अमित मिश्रा के लिए हरभजन सिंह की सोच को देखिए। उनका कहना था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;कुंबले जैसे शख्सियत की जगह को भरना आसान नहीं है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; लेकिन अमित मिश्रा भी बहुत अच्छा गेंदबाज है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; और हम सब उसकी मदद करना चाहते हैं। उसके पास गेंदबाजी का हरसंभव वेरिएशन है। यानी तेंदुलकर से लेकर हरभजन तक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; हर खिलाड़ी अपने से पहले अपने साथी के लिए&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; अपनी टीम के लिए खड़ा दिखाई दे रहा है। यही टीम इंडिया की असली ताकत है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; जिसकी पहली झलक ड्रेसिंग रुम में ही दिखाई दे जाती है।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;ये इस ड्रेसिंग रुम की ही ताकत है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; जो अनिल कुंबले की अचानक विदाई को भारतीय क्रिकेट के एक बेमिसाल लम्हे में तब्दील कर देती है। ये इसी ड्रेसिंग रुम से उभार लेती सोच है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; जो भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे बड़े कप्तान सौरव गांगुली को एक यादगार विदाई देती है। ये भी ड्रेसिंग रुम में एक-दूसरे से जुड़े गहरे तार हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; जो आरपी सिंह को टीम से बाहर करते ही कप्तान धोनी के कथित तौर पर इस्तीफे की पेशकश की शक्ल में सामने आते हैं।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;इसी ड्रेसिंग रुम में कोच गैरी कर्स्टन खड़े हैं। वीरेन्द्र सहवाग की नजर में &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;मैन टू मैन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; मैनजमेंट में वो जॉन राइट को पीछे छोड़ते हैं। इशांत शर्मा के मुताबिक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; जब भी आपका खेल उम्मीदों से नीचे गिरता है तो सबसे पहले आपके करीब खड़े होते हैं कोच कर्स्टन। टीम को एक यूनिट में तब्दील करते दक्षिण अफ्रीका के पूर्व सलामी बल्लेबाज। यहीं आप याद कीजिए ग्रेग चैपल को। भारतीय टीम को वर्ल्ड चैंपियन बनाने की हुंकार के बीच ज़िम्मेदारी संभालने वाले ग्रेग के दौर में भारतीय टीम जितना जीती&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; उससे ज्यादा दरारें भी सामने आती गईं। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;धोनी की इस टीम इंडिया में बेशक सचिन तेंदुलकर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; वीरेन्द्र सहवाग&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; राहुल द्रविड़&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; वीवीएस लक्ष्मण से लेकर हरभजन सिंह&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; जहीर खान और युवराज सिंह जैसे सीनियर खिलाड़ी मौजूद हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; लेकिन धोनी की अगुआई में जब ये मैदान पर कदम रखते हैं तो सब सिर्फ एक खिलाड़ी में तब्दील हो जाते हैं। वो खिलाड़ी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; जो जीत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार हों। इसलिए&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; धोनी भारतीय क्रिकेट में बाकी कप्तानों से अलग पायदान पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। न सिर्फ नतीजों में&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; बल्कि अपनी सोच के साथ भी। यही टीम इंडिया की जीत का सबसे बड़ा सूत्र भी है।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p style="margin: 0in 0in 0.0001pt;"&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;दिलचस्प है कि &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;13 &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;साल पहले ही ऑस्ट्रेलिया के&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;" lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;शिखर पर पहुंचने की शुरुआत सबीना पार्क पर मिली उस जीत से हुई थी। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;13 &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;साल&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;" lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;बाद चेन्नई के चेपक पर मिली इस जीत में वैसे ही शिखर की ओर बढ़ते कदमों की&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;" lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;आहट सुनाई दे रही है।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 10pt;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-1640386010148586219?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/x8zTha87wQM" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/1640386010148586219/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=1640386010148586219" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1640386010148586219?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/1640386010148586219?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/x8zTha87wQM/blog-post_18.html" title="टीम इंडिया के ड्रेसिंग रुम में छिपा है जीत का फलसफा" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/12/blog-post_18.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEQCQn8zcSp7ImA9WxRaFE4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-6632595009727823692</id><published>2008-12-16T06:01:00.000-08:00</published><updated>2008-12-16T06:06:03.189-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-12-16T06:06:03.189-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गावस्कर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राहुल द्रविड" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वीरेन्द्र सहवाग" /><title>आखिर क्यों न जीना चाहें इस बेखौफ सहवाग को गावस्कर !</title><content type="html">वो सचिन तेंदुलकर के टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाजी के शिखर पर काबिज होने का लम्हा था। इस मौके पर सचिन टेलीविजन चैनल पर सुनील गावस्कर के साथ बैठे थे। एंकर राजदीप सरदेसाई ने इन दोनों लेजेंड की उपलब्धियों से गुजरते हुए बातचीत को कुछ अधूरे छूट गए ख्वाब की ओर मोड़ दिया था। उन्होंने गावस्कर से जानना चाहा कि अगर आज भी आपको मौका मिले तो किसकी तरह बल्लेबाजी करना चाहेंगे। टेस्ट क्रिकेट में करीब करीब हर मुमकिन शिखर तक जा पहुंचे गावस्कर का जवाब था- वीरेन्द्र सहवाग। क्यों ? गावस्कर का जवाब था- ही इज फियरलैस। भय से कोसो दूर खड़े होकर वो बल्लेबाजी करते हैं। गावस्कर की नजर में उनकी ये एप्रोच बेमिसाल है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीरेन्द्र सहवाग ने बेखौफ अंदाज में बल्लेबाजी करते हुए ढेरो पारियां खेली हैं, और अपनी शख्सित को भी इस एक शब्द के साथ जोड़ दिया है। लेकिन, गावस्कर के मुंह से निकले इन शब्दों के बाद मैं बराबर इस बेखौफ सहवाग से फिर रुबरु होना चाहता था। चेन्नई के चेपक पर अपने स्ट्रोक्स की गूंज के बीच अपनी शख्सियत को परवान चढ़ाते हमारे सामने थे सहवाग। कुछ इस अंदाज में कि चेपक से मेरे जेहन में जुड़ी दिलीप मेंडिस और सचिन तेंदुलकर की बेजोड़ पारियां भी पृष्ठभूमि में छूट गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविवार की ढलती दोपहर में सहवाग जब विकेट पर पहुंचे तो इंग्लैंड का जीत के लिए दिया 387 रन का लक्ष्य सामने था। एक ऐसा स्कोर, जो इतिहास के पन्नों के बीच चौथी पारी में रनों का पीछा करने के हौसले को तार-तार कर देता है। भारत में अब तक वेस्टइंडीज ही सबसे ज्यादा 275 रनों तक पहुंच सका है। फिर, इस 387 रनों के पहाड़ के बीच चेपक की टूटती और घूमती विकेट भी मौजूद थी। गेंद के टप्पा खाने के बाद उछलती धूल में आप इसे महसूस कर सकते थे। फिर, ये वो भारतीय टीम थी, जहां सहवाग के पीछे तीसरे नंबर पर राहुल द्रविड़ मौजूद तो थे, लेकिन वो राहुल द्रविड, जो अपने सुनहरे करियर के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। भारत के लिए कितनी ही जीत के धुरी रहे द्रविड़ रनों से ज्यादा अब अपने कहीं बहुत पीछे छूट चुके आत्मविश्वास को तलाशने में जुटे हैं। इन सब सवालों और आशंकाओं से पहले खुद सहवाग भी चौथी पारी में बहुत कामयाब नहीं रहे हैं। वो चौथी पारी में अपनी करियर औसत 52 रन से कहीं बहुत पीछे महज 30 का औसत ही बना पाए हैं। इस दौरान भी वो सिर्फ तीन बार ही पचास रन से आगे जा सके थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, सहवाग ने पहली ही गेंद से इन सब आशंकाओं और खौफ को हाशिए पर ढकेल दिया। उनकी बेमिसाल टाइमिंग के सामने हार्मिंसन की तेजी से लेकर मोंटी पनेसर की स्पिन तक, कोई भी गेंद असर नहीं छोड़ रही थी। कप्तान पीटरसन की फील्ड प्लैसमेंट खारिज हो रहा थी। थर्ड मैन के ऊपर से वो हार्मिंसन को छक्का जमाने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं दिखा रहे थे। सिर्फ पांचवे ओवर में ही गेंदबाजी का मोर्चा संभालने पहुंचे पनेसर की गेंद को फुलटॉस बनाकर सहवाग स्क्वेयर लेग के ऊपर से स्टैंड में भेज रहे थे। मजबूरन ओवर द विकेट गेंदबाजी करते हुए पैड पर लगी गेंद पर जोरदार अपील करते पनेसर में आप इंग्लैंड की हताशा को पढ़ सकते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीमा रेखा के अंदर इंग्लैंड की टीम हो या सीमा रेखा के बाहर क्रिकेट के जानकर या आम चाहने वाले सभी के लिए ये करिश्माई बल्लेबाजी थी,जिसे सिर्फ सहवाग ही साकार कर सकते हैं। लेकिन, खुद सहवाग का कहना था- मैं तो बिलकुल अपना सहज स्वाभाविक खेल रहा था। इंग्लैंड के गेंदबाज मुझे स्ट्रोक खेलने के लिए जगह दे रहे थे, और मैं अपने स्ट्रोक खेल रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बेखौफ सहवाग की बल्लेबाजी का आलम ये था कि महज पंद्रह गेंदों में ही वो छह चौके जमा चुके थे। क्रिकेट जानकार हैरत में कुछ देर पहले इंग्लैंड के लंच के बाद के 21 ओवरों का हिसाब-किताब जुटा रहे थे। मुकाबले में हावी होने के बावजूद इंग्लैंड के बल्लेबाज इस दौरान सिर्फ 57 रन ही जोड़ पाए थे, और दो बार ही गेंद को सीमा रेखा के बाहर भेज पाने में कामयाब हो पाए थे। दूसरी ओर सहवाग ने गंभीर के साथ इतने ही ओवर में 14 चौकों और चार आसामानी छक्कों के साथ भारतीय पारी को 100 रनों के पार ला खड़ा किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; हैरान-परेशान कप्तान पीटरसन ने ऑफ स्पिनर स्वान के लिए मिडविकेट और लांगऑन समेत सीमा रेखा पर तीन फील्डर खड़े किए थे। लेकिन, इस व्यूह रचना से बेपरवाह सहवाग ने ठीक लांग ऑन के ऊपर से छक्का जमाकर करारा जवाब दिया। हालांकि, अगली ही गेंद पर स्वान ने सहवाग को एलबीडल्लू कर अपना हिसाब चुकता कर लिया। ऑफ स्टंप के बाहर से पिच होकर अंदर आती गेंद पर स्कवेयर लेग के ऊपर से उड़ाने के फेर में सहवाग चूक गए। पैवेलियन लौटते सहवाग या तो अपने स्ट्रोक खेलने के फैसले से नाराज थे या अंपायर के फैसले से, कहना मुश्किल है। लेकिन, खुशी में सराबोर इंग्लैंड खेमे के लिए ये हाथ से छिटकते मैच को वापस पकड़ लेने की शुरुआत थी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर, सहवाग के वापस लौटते हुए विकेट पर गेंद एक बार फिर घूम रही थी। एक बार फिर बल्लेबाज उछाल से परेशान थे। बल्लेबाज के लिए हर रन एक बड़े 22 गज के फैसले में तब्दील हो रहा था। और यही पहलू बेखौफ सहवाग की शख्सियत को चेपक पर एक नया आयाम दे रहा था। मैच के चौथे दिन का खेल खत्म होने पर दोनों पारियों में शतक जमाने मे वाले स्ट्रॉस की उपलब्धियां भी कुछ देर के लिए पीछे छूट गई थीं। कॉलिंगवुड का संघर्षपूर्ण शतक भी फिलहाल याद नहीं आ रहा था। अब सबको इंतजार था चेपक पर पांचवे दिन के रोमांच का। क्या भारत के बल्लेबाज बाकी बचे 256 रन बनाने मे कामयाब हो पाएंगे? क्या पीटरसन सोमवार की सुबह भारत को शुरुआती झटके देते हुए इंग्लैंड को जीत की ओर ले जाएंगे? रविवार की दोपहर तक एकतरफा दिख रहा मुकाबला अब बराबरी के मुकाबले में तब्दील हो गया था। इस नामुमकिन को मुमकिन में बदलने की राह तैयार की वीरेन्द्र सहवाग ने। बेखौफ वीरेन्द्र सहवाग ने। यही वीरेन्द्र सहवाग की शख्सियत का सार है। बल्ले के स्ट्रोक की गूंज से बहकर आते वीरेन्द्र सहवाग। अब आप भी महसूस कर सकते हैं कि आखिर सुनील मनोहर गावस्कर के लिए ये बेखौफ सहवाग एक अधूरे ख्वाब की तरह क्यों है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-6632595009727823692?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/zqEyYC0cMzQ" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/6632595009727823692/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=6632595009727823692" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/6632595009727823692?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/6632595009727823692?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/zqEyYC0cMzQ/blog-post_16.html" title="आखिर क्यों न जीना चाहें इस बेखौफ सहवाग को गावस्कर !" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/12/blog-post_16.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D04NSH44cSp7ImA9WxRaFE4.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-4446604828292719384</id><published>2008-12-15T05:20:00.000-08:00</published><updated>2008-12-16T05:59:59.039-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-12-16T05:59:59.039-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चेन्नई टेस्ट" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सेंचुरी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सचिन तेंदुलकर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शतक" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="क्रिकेट" /><title>सचिन सही कहते हैं "प्लेयिंग फॉर इंडिया, नॉउ मोर दैन एवर"</title><content type="html">ये सिर्फ सचिन तेंदुलकर का लम्हा था। तेंदुलकर जैसे इस एक लम्हे का दम साधे इंतजार कर रहे थे। शायद इसलिए,माइकल स्वॉन की गेंद को पैडल स्वीप के जरिए फाइन लैग की ओर मोड़ते ही उनकी मुठ्ठी भिंच चुकी थी। हवा में छलांग लगाते वो एक जोरदार हुंकार भर रहे थे। युवराज सिंह की बांहों में खुशी में डूबे तेंदुलकर मानो बीस साल से नहीं, पहली बार टेस्ट क्रिकेट की स्टेज पर किसी लम्हे से एकाकार हो रहे थे। तेंदुलकर इस लम्हे को पूरी तरह जी लेना चाहते थे। बीते दो दशक के दौरान हर घड़ी एक नए मुकाम की ओर बढ़ते तेंदुलकर के लिए इस एक स्ट्रोक ने मीलों का फासला तय कर डाला। इस एक स्ट्रोक से तेंदुलकर ने आंकडों में टेस्ट क्रिकेट में 41 बार तीन अंकों को छुआ। लेकिन,सचिन का ये शतक उनके बाकी 40 शतकों से अलहदा था। तेंदुलकर के इस एक स्ट्रोक और शतक के साथ भारत इंग्लैंड पर यादगार जीत दर्ज कर रहा था। वो भी मैच की चौथी पारी में 387 रन के पहाड़ जैसे लक्ष्य को हासिल करते हुए। इसलिए, इस मंज़िल तक पहुंचते ही तेंदुलकर को ये कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं थी-“ये मेरे शतकों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर है।” तेंदुलकर के मुताबिक-“मैं हमेशा कहता रहा हूं मेरे शतक की अहमियत तभी है जब टीम जीते।” आज तेंदुलकर के शतक के साथ भारतीय टीम सिर्फ एक जीत नहीं,एक नए इतिहास को रच रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत ने चौथी पारी में 387 रन के लक्ष्य को हासिल करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप में एक नया इतिहास रचा था। चेन्नई के असमान उछाल वाले इस विकेट पर इस यादगार जीत को जानकार 1971 में ओवल में दर्ज की गई ऐतिहासिक जीत से लेकर साल की शुरुआत में पर्थ में मिली फतेह के करीब खड़ा करने में जुटे थे। लेकिन, तेंदुलकर के लिए ये चेन्नई में आठ साल पहले हाथ से छिटके लम्हे को वापस अपनी मुठ्ठी में लाने का मौका था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर,चेन्नई में पाकिस्तान के खिलाफ तेंदुलकर अकेले दम अपनी टीम को जीत की दहलीज पर लाकर अचानक ठिठक गए थे। सिर्फ 271 रनों का पीछा करते तेंदुलकर सातवें बल्लेबाज के तौर पर पैवेलियन लौटे तो स्कोरबोर्ड पर भारत के 254 रन टंग चुके थे। लेकिन,जीत के लिए जरुरी 17 रन बनाने की कोशिश में बाकी तीन बल्लेबाज पांच रनों के भीतर ही पैवेलियन लौट गए। भारत सिर्फ 12 रन से ये मुकाबला हार गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इस शिकस्त से तेंदुलकर के साथ जुड़ गया कि वो बड़ी पारियां खेलने के बावजूद अपनी टीम को जीत तक पहुंचाने में अक्सर चूक जाते हैं। चौथी पारी में तेंदुलकर का बल्लेबाजी औसत इस आलोचना का एक आधार बनकर सामने आने लगा। चेन्नई से पहले 55 टेस्ट की 45 पारियों में चौथी बार खेलते हुए तेंदुलकर महज 33.61 के औसत से सिर्फ 1109 रन ही जोड़ पाए थे। ये उनके करियर औसत 54.30 से कहीं बहुत पीछे है। क्रिकेट की दुनिया में सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने वाले इस लेंजेंड के लिए अपनी उपलब्धियों के बीच यह पहलू भी बार बार एक कचोट की तरह उभार ले रहा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए,सोमवार की सुबह तीसरे ओवर में ही द्रविड़ के पैवेलियन लौटने के बाद तेंदुलकर ने एक छोर संभाला तो जीत के बाद ही वहां से ड्रेसिंग रुम की ओर कदम बढ़ाए। बेशक, वीरेन्द्र सहवाग की तूफानी पारी ने भारत के लिए इस नामुमकिन सी लगनी वाली जीत को हकीकत में तब्दील करने की राह खोली,लेकिन यह तेंदुलकर के दो दशक के अऩुभव को समेटे बेजोड़ पारी ही थी,जिसने भारत को जीत की मंजिल पर पहुंचा कर ही दम लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरी दिन,हर गुजरते ओवर के बीच मुकाबला पूरी तरह से तेंदुलकर के नियंत्रण में दिखा। उन्हें अपने स्ट्रोक खेलने में न कोई हड़बड़ाहट थी, न ही दूसरे छोर पर उनका साथ छोड़ते गंभीर और लक्ष्मण उनकी इरादों पर चोट पहुंचा रहे थे, और न ही युवराज की आक्रामक बल्लेबाजी उन पर किसी तरह का दबाव बना रही थी। युवराज के साथ उन्होंने पांचवे विकेट के लिए 163 रन की बेहतरीन नाबाद साझेदारी पूरी की। लेकिन, वो एक छोर पर अपनी टीम को लक्ष्य तक पहुंचाने में जुटे दिखे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे भी आगे,तेंदुलकर की बल्लेबाजी के बीच चेन्नई के विकेट को लेकर छाया भय कहीं बहुत पीछे छूटता दिखायी दिया। ये साबित करते हुए कि विकेट के खौफ से ज्यादा किसी भी बल्लेबाज के लिए पॉजिटिव सोच जरुरी है। तेंदुलकर के इस बयान पर गौर कीजिए-विकेट में उछाल असमान था,लेकिन इन्हीं उछालों में रन बनाने के मौके थे। मैं सिर्फ इन मौकों को इंतजार कर रहा था। ये तेंदुलकर की पॉजिटिव एप्रोच की कहानी को खुद बयां करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवा पांच घंटे की अपनी बल्लेबाजी के दौरान 132 खाली गेंदों और 45 सिंगल्स में आप तेंदुलकर की विकेट पर टिके रहने की सोच को पढ़ सकते थे। एंडरसन से लेकर फ्लिंटॉफ की गेंद पर आखिरी क्षणों तक इंतजार के बाद उसे थर्डमैन से प्वाइंट की ओर दिशा देते तेंदुलकर में आप उनके पूरे अनुभव को महसूस कर सकते थे। इतना ही नहीं, जरुरत के मुताबिक रनों की रफ्तार को अपने मुताबिक ढालते तेंदुलकर में आप उनके जीनियस की झलक देख सकते थे। तेंदुलकर ने अपनी पारी में नौ बेहतरीन चौके भी जमाए। दूसरे छोर पर खड़े युवराज सिंह को सही वक्त पर सही स्ट्रोक्स खेलने की नसीहत के बीच आप भारतीय क्रिकेट के इस ‘स्टैट्समैन’ की भूमिका को आप परख सकते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर,तेंदुलकर ने इस दौरान एक कैलेंडर ईयर में पांचवी बार 1000 रन छूने का कारनामा भी कर दिखाया। इस दौरान तेंदुलकर ने 52 रन की औसत से चार शतक के सहारे ये रन जोड़े हैं। 19 साल तक लगातार क्रिकेट खेलने के बाद रनों की ये बेताबी इस लेजेंड की शख्सियत को एक नया आयाम देती है। ये टेलीविजन के स्क्रीन पर मुंबई हादसों के बाद उभरते उनके विज्ञापन की पंच लाइन को ही पुख्ता करती दिखायी देती है। तेंदुलकर इस विज्ञापन में कहते हैं-आई एम प्लेयिंग फॉर इंडिया,नॉउ मोर दैन एवर(मैं भारत के लिए क्रिकेट खेल रहा है। अब,पहले से भी ज्यादा शिद्दत से)। सचमुच, तेंदुलकर 16 साल की उम्र में पाकिस्तान में अपने अंतरराष्ट्रीय करियर का आगाज करने वाले किशोर से भी ज्यादा शिद्दत से क्रिकेट की स्टेज पर नए रंग भरने में जुटे हैं। इसलिए, कल भी सिर्फ एक सचिन तेंदुलकर थे,और आज भी सिर्फ एक सचिन तेंदुलकर हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-4446604828292719384?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/JPU0kfpdudc" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/4446604828292719384/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=4446604828292719384" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/4446604828292719384?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/4446604828292719384?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/JPU0kfpdudc/blog-post_15.html" title="सचिन सही कहते हैं &quot;प्लेयिंग फॉर इंडिया, नॉउ मोर दैन एवर&quot;" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>2</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/12/blog-post_15.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D08CRHwyeCp7ImA9WxRbGU0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-2837541804057162210</id><published>2008-12-10T02:34:00.000-08:00</published><updated>2008-12-10T02:44:25.290-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-12-10T02:44:25.290-08:00</app:edited><title>क्रिकेट की खूबसूरती के बीच आतंक को मात देने की कोशिश</title><content type="html">एक न्यूज़फोटोग्राफर की चुनौती बेहद दिलचस्प होती है। रिपोर्टर को अपनी बात कहने के लिए सैकड़ों शब्दों की छूट मिल सकती है, लेकिन फोटोग्राफर एक ठहरे हुए फ्रेम में पूरी कहानी को समेटे आपसे रुबरु होता है। कभी न थमने वाले वक्त को भी कुछ पलों के लिए वह अपने कैमरे में कैद करता है। कहानी के बीते कल, आज और आने वाले कल के तीनों छोर को पकड़ने की कोशिश करता है। चेन्नई में गुरुवार से शुरु हो रहे पहले टेस्ट मैच से जुड़े हर दूसरे फोटोग्राफ को देखिए। आप इस पहलू से बखूबी रुबरु होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैदान में अभ्यास के दौरान कप्तान पीटरसन और गेंदबाजी कोच एशले जाइल्स से बतियाते फ्लिंटाफ की पृष्ठभूमि में आपको खाकी वर्दी में मुस्तैद पुलिसकर्मी मिलेंगे। अभ्यास से ड्रेसिंग रुम की तरफ लौटते कप्तान पीटरसन के फ्रेम में संगीनधारी पुलिसकर्मी और कमांडो दिखायी देंगे। चेपक की छत पर चहलकदमी करता कमांडो एक पूरी कहानी को समेटे खड़ा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन तस्वीरों पर निगाह डालते ही मौजूदा घटनाक्रम से अंजान शख्स भी महसूस कर सकता है कि ये सिर्फ क्रिकेट नहीं है। यहां क्रिकेट से सुरक्षा के तार कहीं बहुत गहरे जुड़े हैं। यही भारत और इंग्लैंड के बीच खेली जा रही सीरिज का सबसे बड़ा सच भी है। यहां सिर्फ दो टीमों के बीच ही टेस्ट नहीं खेला जा रहा। यहां क्रिकेट जरिया बना है, आम आदमी और आतंक के बीच जारी जंग से पार पाने का। उसके व्यवस्था में खोए भरोसे को लौटा लाने का। यहां इन दोनों टीमों की हार और जीत से पहले ज़रुरी है, इस सीरिज का सलामती से अंजाम तक पहुंचना। यही इस सीरीज का अनकहा मकसद है। इसी मकसद में टीमों की हार-जीत से पहले क्रिकेट की जीत छिपी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी इसी भरोसे के साथ इस सीरिज की ओर निगाह डाल रहा हूं। मेरा ये भरोसा है, और इसकी ठोस वजह है। बीते कल से जुड़ी एक मिसाल है, जो बार-बार इस भरोसे को मजबूती देती है। ये सिर्फ संयोग ही है कि ये मिसाल भी इन दोनों टीमों से ही जुड़ी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब से ठीक सात साल पहले अहमदाबाद में ये दोनों टीमें एक दूसरे के सामने मैदान पर थीं। ये भी एक संयोग है कि वो मुकाबला भी 11 दिसंबर को ही शुरु हुआ था। मोहाली में पहले टेस्ट में शिकस्त के बावजूद नासिर हुसैन की टीम ने पहले दो दिन बेहद मजबूती से भारतीय गेंदबाजी का जवाब देते हुए 400 रनों का स्कोर खड़ा किया था। भारत की शुरुआत लड़खड़ाहट भरी रही। भारत चार विकेट गंवा चुका था। तीसरे दिन लंच के आसपास सचिन तेंदुलकर और वीवीएस लक्ष्मण विकेट पर मौजूद थे। उसी वक्त भारतीय संसद पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया। ये महज एक आतंकी कार्रवाई नहीं थी। ये भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रतीक पर सबसे बड़ा हमला था। अब एक तरफ टेस्ट मैच का सीधा प्रसारण था, दूसरी ओर न्यूज़ चैनलों पर इस आतंकी हमले की सीधी तस्वीरें हर भारतीय को अंदर तक झकझोर रही थी। एकबारगी लगा कि न सिर्फ ये टेस्ट मैच ही बीच में रोक दिया जाएगा,ये दौरा भी यहीं खत्म कर इंग्लैंड टीम वापस लौट जाएगी। इस हमले की गूंज इतनी दूर तक प‍हूंची कि इसे अंजाम देने वाले लश्‍करे-तयब्‍बा को बैन कर दिया गया। भारत और पाकिस्‍तान की सीमाओं पर फौजों की सरगर्मियां बढ़ गईं। दोनों देशों के बीच युद्ध के से हालात पैदा हो गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, न तो टेस्ट रुका और न ही इंग्लैंड की टीम बीच दौरे से वापस लौटी। नासिर हुसैन की टीम ने इस हमले से बेपरवाह सीरिज को आगे बढ़ाया। ये सीरिज भारत और इंग्लैंड के बीच एक सबसे यादगार दौरे की तरह दर्ज हो गई। इस सीरिज में नासिर हुसैन की कप्तानी ने आलोचकों को अपना मुरीद बना दिया। शायद, इसी सीरिज की कप्तानी थी, जिसके चलते तेंदुलकर ने नासिर हुसैन को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कप्तानों में एक ठहराया है। इस सीरिज में हमने देखा सचिन तेंदुलकर और एशले जायल्स के बीच एक दिलचस्प संघर्ष। हमने देखा वानखेड़े वनडे में भारत को जीत की दहलीज से वापस लौटाते फ्लिंटाफ को। इस सीरिज के आखिरी दिन हमने देखा अपनी टीम 3-3 की बराबरी पर लाते जीत के जुनून में डूबे फ्लिंटाफ को। वानखेड़े में नंगे बदन अपनी शर्ट लहराते फ्लिंटाफ। एक ऐसी तस्वीर, जिसका जवाब नेटवेस्ट ट्रॉफी जीतते हुए लॉर्ड्स की बालकनी से सौरव गांगुली ने दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंग्लैंड ने तो 2005 में एशेज के दौरान ही लंदन के ट्यूब धमाकों को झेला है। उस वक्त वो ठीक भारत की स्थिति में खड़ा था। आज जिस जगह इंग्लैंड खड़ा है, उस वक्त वहां आस्ट्रेलिया खड़ा था। आस्ट्रेलिया ने भी सीरिज को जारी रखते हुए क्रिकेट के जरिए आतंकवादियों के नापाक इरादों का मुंहतोड़ जवाब दिया था। अब यही काम भारत और इंग्लैंड की टीमों को करना है। अहमदाबाद और लंदन के वाकयों की तरह ये सीरिज भी क्रिकेट के जरिए आतंक को हाशिए पर ढकेलने की बड़ी कोशिश की तरह सामने है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब, गुरुवार की सुबह ये दोनों टीमें जब मैदान में उतरेंगी, तो सुरक्षा बंदोबस्त में जुटे 3000 पुलिसकर्मियों की छवि पीछे छूट जाएगी। होटल से ड्रेसिंग रुम तक मौजूद कमांडो के साए से खिलाड़ी उबर जाएंगे। मैदान में होगा क्रिकेट का वो मूल नियम, जहां हर गेंद के साथ एक नयी जंग परवान चढ़ती है। यहां हार्मिंसन की उछाल लेती गेंदों से लेकर एंडरसन की आउटस्विंगर और फ्लिंटाफ की तेजी के साथ साथ पनेसर की घुमाव लेती गेंदें भारतीय बल्लेबाजों से पार पाने की कोशिश में जुट जाएंगी। वीरेन्द्र सहवाग से लेकर गौतम गंभीर और सचिन से लेकर लक्ष्मण तक टेस्ट क्रिकेट में अपने सुनहरे सफर को आगे ले जाएंगे। महेन्द्र सिंह धोनी पहली बार एक पूरी सीरिज में भारतीय टेस्ट टीम की कप्तानी संभालेंगे। भारतीय टीम अनिल कुंबले और सौरव गांगुली के बाद बदलाव के नए दौर से रुबरु होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर, बात पूरी तरह से क्रिकेट के इर्द-गिर्द घूमेगी, तो एक बहस भी उभार लेगी। पीटरसन की ये टीम बिना किसी वार्मअप गेम के सीधे टेस्ट मैच में उतर रही है। चार महीने पहले उन्होंने अपना आखिरी टेस्ट खेला था। लेकिन, जैसा एलियस्टर कुक का कहना है कि क्रिकेट तकनीक से ज्यादा दिमागी खेल है, और आप कैसे खुद को इसके अनुरुप ढालते हैं, यही मायने रखता है। सिर्फ एक दिन में आप अपनी तकनीक अचानक गंवा नहीं देते। इसलिए, बेशक पीटरसन की टीम वनडे सीरिज में बुरी तरह परास्त हुई हो, लेकिन टेस्ट में आप उनकी वापसी की उम्मीद को नकार नहीं सकते। हो सकता है कि मैदान के बाहर के मौजूदा हालात के बीच एक-दूसरे को हौसला देते हुए वो एक बेहतरीन यूनिट की शक्ल ले रहे हों। उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसा ही इंग्लैंड खेमे में हो रहा होगा। अगर इंग्लैंड एक बेहतरीन यूनिट की तरह धोनी की शिखर की ओर बढ़ती टीम को जवाब देता है, तो ये एक यादगार सीरिज होगी। अब, हम सभी को इंतजार है एक ऐसी ठहरी तस्वीर का, जिसमें क्रिकेट अपनी खूबसूरती के बीच भय के इस माहौल को पीछे छोड़कर आगे जा निकले।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-2837541804057162210?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/klIpQABQtKA" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/2837541804057162210/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=2837541804057162210" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/2837541804057162210?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/2837541804057162210?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/klIpQABQtKA/blog-post_10.html" title="क्रिकेट की खूबसूरती के बीच आतंक को मात देने की कोशिश" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/12/blog-post_10.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CU8GQH44fip7ImA9WxRbF04.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-109090686088044116</id><published>2008-12-08T02:53:00.000-08:00</published><updated>2008-12-08T02:57:01.036-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-12-08T02:57:01.036-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जेटी कप" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सचिन तेंदुलकर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="जीव मिल्खा सिंह" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गोल्फ" /><title>मौत के सन्नाटे के बीच ज़िंदगी की राह तलाशते जीव</title><content type="html">&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_ub5B7Z3WUj4/STz9W0ekKpI/AAAAAAAAACY/wMnW6FaGjIU/s1600-h/jeev+milkha.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5277371431857171090" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 258px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_ub5B7Z3WUj4/STz9W0ekKpI/AAAAAAAAACY/wMnW6FaGjIU/s320/jeev+milkha.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; लाल जैकेट में जेटी कप हाथ में उठाए जीव मिल्खा सिंह की ये तस्वीर अमूमन हर खिताबी जीत के बाद यूं ही दिखायी देती है। यहां भी उनके होंठों पर तैरती मुस्कान मंजिल तक पहुंचने की कहानी बयां करती है। लेकिन,टोक्यो में रविवार की शाम यह तस्वीर हार और जीत के दायरे से बहुत दूर ले जाती है। ये खेल में ज़िंदगी के मायनों को तलाशती तस्वीर है। कैमरे की चौंधियाती रोशनी के बीच होंठो पर मजबूरन तैरती मुस्कुराहट के पीछे एक अंतहीन दर्द को समेटे तस्वीर हमसे रुबरु होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीव मिल्खा सिंह की इस तस्वीर को मैं हमेशा सहेज कर रखना चाहता हूं। समझना चाहता हूं कि मृत्यु के आखिरी शोक से पार जाकर आप कैसे ज़िंदगी जीने के हौसले को ढूंढ निकालते हैं। जीव ने टोक्यो में निप्पॉन सीरिज जेटी कप तक पहुंचते हुए सिर्फ गोल्फ का एक और खिताब हासिल नहीं किया। जीव ने इस खिताब तक पहुंचते हुए खेल के मैदान पर रची इंसानी हदों को पार कर डाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस टूर्नामेंट से ठीक पहले जीव और उनकी पत्नी कुदरत का ख्वाब तार तार हो गया था। अपने आंगन में एक किलकारी की आहट संजोए दोनों ने तिनका तिनका एक ख्वाब को पिरोया था। लेकिन, किलकारी की गूंज इन दोनों के कानों में पहुंचने से बहुत पहले ही शांत हो चुकी थी। कुदरत के आंचल में किलकारी लेता बच्चा नहीं, एक मृत बच्चा था। किस्मत के इस क्रूर मजाक के सामने ये दोनों बेबस थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,इस बेबसी और तार तार हुए ख्वाबों के बीच भी कुदरत ने जीव को टूटने नहीं दिया। जीव इस टूर्नामेंट में उतरने को तैयार नहीं थे। टूर्नामेंट से ठीक एक दिन पहले खेले जाने वाले जरुरी प्रो एम में भी उन्होंने हिस्सा नहीं लिया। लेकिन,जीव से जुड़ने के बाद हर वक्त उनके साथ मौजूद रहने वाली कुदरत ने जीव को उनके चहेते गोल्फ कोर्स से अलग हटने नहीं दिया। टूर्नामेंट आयोजकों से विशेष अनुमति के साथ जीव कोर्स पर उतरे। चार दिन तक मौत के इस कड़वे सच के बीच गोल्फ कोर्स पर ज़िंदगी के मायने तलाशने में जुटे रहे जीव।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने में ये आसान लगता है। लेकिन, मैं बार बार ये समझने की कोशिश कर रहा हूं कि कैसे हर एक स्ट्रोक पर जीव के हाथों में कंपकंपी पैदा नहीं हुई होगी। क्या स्ट्रोक लेते जीव के सामने लक्ष्य की शक्ल में सिर्फ ‘होल’ ही सामने नहीं होगा। कभी कुदरत का मुरझाया चेहरा उभार लेता होगा तो कभी उस बच्चे का चेहरा,जिसकी किलकारी कभी न खत्म होने वाले इंतजार में तब्दील हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सबके बीच से गुजरते हुए जीव ने बाकी दुनिया के लिए खिताब की राह तलाशी। लेकिन, अपने लिए ज़िंदगी की नयी राह। इसलिए, जीत के बाद जीव का यह कहना था-इस जीत से लगता है कि ईश्वर हमारे प्रति दयालु है। मुझे भरोसा है कि भविष्य में कुछ बेहतर छिपा है। उन्होंने यह जीत अपनी पत्नी कुदरत को समर्पित करते हुए कहा-उसके कहने पर मैं गोल्फ कोर्स में उतरने का हौसला बटोर पाया,इसलिए ये जीत मैं उसी को समर्पित करता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस साल जीव ने चार खिताबी जीत हासिल की हैं। जीव को अभी कई मंजिलें तय करनी हैं। वर्ल्ड रैंकिंग में 44वें पायदान पर जा पहुंचे जीव के लिए आने वाला साल कामयाबियों के नये रास्ते खोलेगा। इन सबके बीच अपने करियर में नए शिखर की ओर बढ़ते जीव जब भी गोल्फ कोर्स को विदा कहेंगे, उनकी ये जीत बाकी सभी उपबल्धियों पर हावी हो जाएगी। आखिर, भावनात्मक झंझावत शारीरिक चोटों से पेश आने वाली परेशानियों से कहीं ज्यादा दुखद और बड़ी चुनौती सामने रखता है। चोट से जूझते हुए पिछली जुलाई में यहीं जापान में जीव ने सेगा सेमीकप हासिल किया था। यहां लगातार वो अपनी दांहिनी एडी के दर्द से जूझते हुए फिजियोथेरेपिस्ट की मदद से खिताब तक पहुंचे थे। लेकिन,ये शारीरिक चुनौतियां खिलाड़ी की ज़िंदगी का एक आम हिस्सा हैं। टाइगर वुड्स खराब घुटने के बावजूद यूएसओपन जीतते हैं,हेरिंग्टन कलाई में चोट के बावजूद ब्रिटिश ओपन के खिताब तक पहुंचते हैं। गोल्फ के कोर्स के बाहर हमनें सियोल ओलंपिक में सिर में टांके लगे होने के बावजूद ग्रेग लुआनिस को गोल्ड मेडल तक पहुंचते देखा है। हम वेस्टइंडीज में टूटे जबड़े के साथ अपनी गेंदों से ब्रायन लारा के विकेट तक पहुंचते अनिल कुंबले की कामयाबी से रुबरु हुए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,इन चुनौतियों से खिलाड़ी अपने जीवट और इरादों से पार पा लेता है। इस मोड़ पर मुझे ब्रिस्टल मे केन्या के खिलाफ सेंचुरी जमाकर आसमान की ओर निहारते सचिन तेंदुलकर का चेहरा बरबस याद आ जाता है। 1999 के वर्ल्ड कप के ठीक बीच सचिन ने अपने पिता को खो दिया था। वो अपने पिता को आखिरी विदाई देकर एक बार फिर मैदान में थे। सेंचुरी जमाकर सचिन ने बाकी दुनिया को जीत का तोहफा पेश किया था। यहीं विराट कोहली भी याद आते हैं। रणजी मुकाबले के बीच पिता के निधन के बावजूद वो मैदान पहुंचते हैं। अपनी टीम दिल्ली को मुश्किल से निकाल किनारे तक ले जाते हैं। अपनी पारी खत्म कर पिता के अंतिम संस्कार में शरीक होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन और विराट की तरह जीव के लिए भी ये जीत से आगे की दुनिया है। मौत के सन्नाटे के बीच से ज़िंदगी के मायने तलाशती हुई। खेल को ज़िंदगी के सबसे करीब जोड़ते हुए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-109090686088044116?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/gtRmxscTUow" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/109090686088044116/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=109090686088044116" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/109090686088044116?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/109090686088044116?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/gtRmxscTUow/blog-post.html" title="मौत के सन्नाटे के बीच ज़िंदगी की राह तलाशते जीव" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_ub5B7Z3WUj4/STz9W0ekKpI/AAAAAAAAACY/wMnW6FaGjIU/s72-c/jeev+milkha.jpg" height="72" width="72" /><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/12/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0AGSHo5cSp7ImA9WxRbEEg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-8731924015998391122</id><published>2008-11-30T06:27:00.000-08:00</published><updated>2008-11-30T06:35:29.429-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-30T06:35:29.429-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कुंबले" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धोनी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="टीम इंडिया" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ज़हीर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ईशांत" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अमित मिश्रा" /><title>ये जीत की एकलौती सोच है</title><content type="html">गावस्कर बॉर्डर ट्रॉफी को हाथ में लिए जश्न में डूबी भारतीय क्रिकेट टीम की तस्वीर को बार बार देखिए। जीत के जुनून में डूबे इन चेहरों के बीच एक चेहरा ढूंढना होगा। भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का चेहरा। जीत के इस सैलाब की अगुआई करने के बावजूद धोनी भारतीय क्रिकेट की इस ठहरी तस्वीर में पृष्ठभूमि में हैं। लेकिन,धोनी का मंजिल पाने के बाद खुद को पीछे खींच लेने का ये अकेला वाक्या नहीं है। ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप का खिताब जीतने से लेकर आस्ट्रेलिया पर ट्राइंगुलर सीरिज में ऐतिहासिक जीत तक धोनी टीम को मंजिल तक पहुंचाने के बाद अपने साथियों को इस विजयी लम्हे को जी लेने के लिए छोड़ देते हैं। जीत की नयी इबारतों के बीच यही खूबसूरती टीम इंडिया के इस नए चेहरे को एक अलहदा रंग से सराबोर कर रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"'टीम में अगर आप एक दूसरे की कामयाबियों को इंजॉय करने लगें तो ये सबसे बड़ी बात है। अपनी हाफ सेंचुरी पर मेरा खुश होना स्वाभाविक है। लेकिन,मेरी इस उपलब्धि पर मेरे साथी भी आनंद में डूब जाएं,ये ज्यादा जरुरी है।"इंदौर में इंग्लैंड पर दो मैचों में दो बेहद इकतरफा जीत के बाद धोनी का यही कहना था। लेकिन,पहली नज़र में यह एक कप्तान की अपनी टीम को एकजुट करने के लिए बेहद सहज सोच कही जा सकती है। गहराई से मंथन करें तो ये टीम इंडिया को एक बेहतरीन यूनिट में तब्दील करने का पहला और आखिरी सूत्र है। धोनी की यही सोच भारत के पूर्व कप्तान, कोच और चयनसमिति के पूर्व अध्यक्ष चंदू बोर्डे को उनका कायल बना देती है।&lt;br /&gt;"धोनी गांगुली की तरह 'इंस्टिक्ट' से कप्तानी नहीं करते। सौरव मैदान में अचानक कोई फैसला लेकर सबको हैरत में डाल देते थे। लेकिन,कामयाबी मिलते ही सबको सौरव के फैसले की दाद देनी पड़ती थी। लेकिन,धोनी बेहद शांत स्वभाव से अपने काम को अंजाम देते हैं। बेहद परिपक्वता और सहजता से।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल,धोनी टीम इंडिया को आस्ट्रेलिया मॉडल की ओर ले जाते दिखते हैं। यहां टीम में हर खिलाड़ी की हिस्सेदारी है। टेस्ट से लेकर वनडे तक अलग अलग मोर्चों पर जीत का सिलसिला बरकरार रखना जरुरी है। लिहाजा धोनी भारतीय टीम को आस्ट्रेलिया से भी एक कदम आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। ट्वेंटी-20 की बादशाहत,वनडे में वर्ल्ड चैंपियन पर फतेह और अब गावस्कर बार्डर ट्रॉफी में टेस्ट की अधिकारिक चैंपियन को शिकस्त। भारतीय टीम इस वक्त शिखर की ओर बढ़ रही है। बोर्डे का कहना है "आस्ट्रेलिया पर जीत से हमारा कॉन्फिडेंस बहुत बढ़ गया है। इंग्लैंड पर डोमिनेंस इसी का रिफ्लेक्शन है। भारतीय खिलाड़ी एक जिद के साथ खेलते हुए दिखायी दे रहे हैं।" पूर्व क्रिकेटर और कमेंन्टेटर अशोक मल्होत्रा इसी पहलू को और आगे ले जाते हैं। "इस टीम को कोई भय नहीं है। यहां कोई एक्स्ट्रा बैगेज नहीं हैं। सिर्फ और सिर्फ परफोरमेंस है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये जीत की एकलौती सोच है। यही सूत्र पकड़कर दो दशक पहले आस्ट्रेलिया ने शिखर की ओर कदम बढ़ाया। 1987 की वर्ल्ड कप फतेह के बाद आस्ट्रेलिया में वेस्टइंडीज की बादशाहत को तोड़ने का भरोसा जागा था। इसे सच में तब्दील करने के लिए ग्रेग चैपल और बॉबी सिम्पसन जैसे कप्तानों ने एक ब्लू प्रिंट तैयार किया। इस ब्लू प्रिंट पर चलने की शुरुआत एलन बॉर्डर ने की। आठ साल बाद मार्क टेलर ने वेस्टइंडीज में इसे आखिरी फतेह में तब्दील किया। स्टीव वॉ ने इसे जीत के ऩए इतिहास में बदल डाला। और पोंटिंग ने जीत को एक सिलसिले और आदत में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,आज शिखर से बेदखल होती दिख रही आस्ट्रेलिया से भी चूक हुई। क्रिकेट की बाकी दुनिया के सामने मिसाल बना आस्ट्रेलिया अपने 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' में खिलाड़ियों की फौज तो तैयार करता रहा लेकिन टेलेंटेड खिलाड़ियों को सही वक्त पर आस्ट्रेलियाई ड्रेसिंग रुम तक पहुंचाने मे उसकी रफ्तार लगातार धीमी होती गई। शुरुआत में जरुर बॉर्डर की जगह मार्क टेलर,स्लेटर की जगह लेंगर,इयान हिली की जगह गिलक्रिस्ट ने ली तो टीम की जीत का सिलसिला परवान चढ़ता रहा। गुजरते वक्त के साथ यह रफ्तार मद्धिम हुई। इस कदर कि टीम में सालों साल एक नए खिलाड़ी को जगह बनाना मुश्किल हो गया। माइकल क्लार्क और शेन टॉट को अपवाद मान लें तो माइकल हसी फर्स्ट क्लास में दस हजार रन बनाकर तीस साल की ढलती उम्र में आस्ट्रेलियाई टीम में पहुंचे। इसी का नतीजा था कि खिलाड़ियों की एसेंबली लाइन ही गायब होने लगी। इसीलिए ग्लैन मैक्ग्रा,शेन वार्न,गिलक्रिस्ट,डेमियन मार्टिन,जस्टिन लैंगर और स्टुअर्ट मैक्गिल की विदाई के साथ ही आस्ट्रेलियाई क्रिकेट मे शून्य गहराता जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसीलिए,भारतीय क्रिकेट के सामने इस आस्ट्रेलियाई मॉडल पर चलने के साथ साथ इससे सीख लेने की भी जरुरत है। "नंबर एक की जगह को हथियाने के लिए हमें निरंतरता जाहिए। अपने प्रदर्शन को एक नियमित प्रकिया में तब्दील करना होगा।" भारतीय टीम के पूर्व कोच लालचंद राजपूत का कहना है "हर वक्त सामने आ रहे एक मुकाबले,एक सीरिज को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना होगा।" भारत को यह काम सिर्फ टेस्ट में ही नहीं,वनडे और ट्वेंटी ट्वेंटी के तिहरे मोर्चे पर करना है। हर फॉर्मेट की खास जरुरतें हैं। इसी के मद्देनजर खिलाड़ियों के एक बड़े पूल से छांट छांटकर मुकाबलों में उतारना होगा।बोर्डे के मुताबिक "हमारे यंगस्टर्स बेहतर खेल रहे हैं। युवराज बेहतरीन फॉर्म में लौट रहे हैं। रोहित शर्मा मौजूद हैं। बद्रीनाथ को भी टीम में जगह मिलनी चाहिए। इन युवा खिलाड़ियों को जल्द से जल्द मौका देना होगा तभी इनका आत्मविश्वास बढ़ेगा।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,ये पेचीदा काम है। इसे कौन करेगा और यह कैसे होगा। बोर्डे कहते हैं&lt;br /&gt;"यही काम सिलेक्शन कमेटी और कप्तान का है। "इसी बात को राजपूत आगे बढ़ाते हैं "इंडेक्शन सिलेक्टर्स के लिए चुनौती है। कब खिलाड़ी को टीम में जगह मिलनी चाहिए,ये एक बेहद चुनौतीपूर्ण काम है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस आस्ट्रेलियाई जीत में ही भारत के लिए ज़हीर और ईशांत सबसे बड़े स्ट्राइक जोड़ी के रुप में उभरे। लेकिन,सवाल ये है कि कैसे लगातार आप इन दोनों को लंबे समय तक टीम की जरुरतों के मद्देनजर उतार सकते हैं। अशोक मल्होत्रा के मुताबिक "जहीर अपनी ऊर्जा को बचाकर उसे कायम रखना सीख गए हैं। कई बार छोटे रन अप से गेंदबाजी करते हैं। वो अपने करियर के सबसे बेहतरीन दौर मे चल रहे हैं। लेकिन, ईशांत को बचाकर चलना होगा। उनके करियर को सही पेस देना होगा। टेस्ट में खिलाया तो वनडे में एक दो मैचों में ब्रेक देना जरुरी है।" उनका मानना है कि हमारे पास तेज गेंदबाजों का एक भरपूर टेलेंट है। लेकिन, सभी का समझदारी से इस्तेमाल होना चाहिए। "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,स्पिन गेंदबाजी में अनिल कुंबले के खालीपन को भरना आसान नहीं होगा। मल्होत्रा कहते हैं&lt;br /&gt;"कुंबले को बनने में 16 साल लग गए। अमित मिश्रा को अभी लंबा रास्ता तय करना है। हरभजन को यह भार उठाना होगा तभी हम कुंबले के खालीपन को भर सकते हैं।" बोर्डे का मानना है कि कुंबले की सटीकता बेमिसाल थी लेकिन हमें अमित मिश्रा का हौसला बढ़ाना होगा। ये जानते हुए इस गेंदबाज के पास लेग स्पिन,गुगली,स्ट्रेटर वन सब कुछ है। राजपूत का कहना है कि भारत के पास अमित मिश्रा ही नहीं, पीयूष चावला भी इस जगह के लिए दूसरे विकल्प हैं। हमारे पास क्वालिटी बेंच स्ट्रैंथ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में,जीत की इस राह के बीच टीम इंडिया के सामने चुनौतियों की लंबी फेहरिस्त है। शिखर पर काबिज होने के लिए जीत और सिर्फ जीत ही चाहिए,एक सिलसिले की तरह। कप्तान धोनी भी इसे बखूबी समझते हैं। उनका कहना है कि एक हार के बाद भी सवाल उठने शुरु हो सकते हैं। हमें जीत की निरंतरता बनाये रखनी होगी। वैसे, यही बात बोर्डे बेहद खूबसूरत अंदाज में कहते हैं-"इस सिलसिले को बनाए रखना होगा। दो जीत से ताजमहल नहीं बन सकता।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[This article was first published in outlook (hindi)]&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-8731924015998391122?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/3UAQTJfbna8" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/8731924015998391122/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=8731924015998391122" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/8731924015998391122?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/8731924015998391122?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/3UAQTJfbna8/blog-post_30.html" title="ये जीत की एकलौती सोच है" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/11/blog-post_30.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEEASXgzeyp7ImA9WxRVFUs.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-2580088363919397442</id><published>2008-11-12T23:46:00.000-08:00</published><updated>2008-11-12T23:50:48.683-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-12T23:50:48.683-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वर्ल्ड कप" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सुनील गावस्कर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सौरव गांगुली" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कपिल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="धोनी" /><title>सौरव के आइने में सौरव चंडीदास गांगुली</title><content type="html">ये 1996 के मई महीने की बात है। न्यूज चैनल 'आजतक' एक न्यूज कैप्सूल की शक्ल में दूरदर्शन पर प्रसारित होता था। इसी के लिए कवरेज करने के इरादे से मैं दिल्ली के ताजमहल होटल पहुंचा। यहां मोहम्मद अजहरुद्दीन की अगुआई में इंग्लैंड दौरे पर जा रही भारतीय टीम को इकट्ठा होना था। वहां पहुंचने पर पता चला कि अब तक सिर्फ एक खिलाड़ी को छोड़ कोई नहीं पहुंचा है। वो अकेले खिलाड़ी थे-सौरव गांगुली। भारतीय टीम में पांच साल बाद (इससे पहले 1990-91 के दौरे में आस्ट्रेलियाई दौरे के लिए सौरव को टीम में जगह दी गई थी।) वापसी करते सौरव।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, उनसे बातचीत की जाए या नहीं, मैं सोच में डूबा था। क्या बीस मिनट के बुलेटिन में इस इंटरव्यू को जगह मिल भी पाएगी या नहीं, इसी उधेड़बुन में था। फिर सोचा, खाली हाथ लौटने से बेहतर है कि सौरव से ही बात कर लें। यही सोचकर सौरव से संपर्क साधा। सौरव ने मुझे कमरे में बुलाया। मेरे कैमरामैन ने बेहद तसल्ली से उन्हें शूट करना शुरु किया। उस वक्त तक किसी क्रिकेटर से इतनी आरामतलबी से शूट करना मुश्किल होने लगा था। खासतौर से वर्ल्ड कप के कामयाब आयोजन के बाद से टेलीविजन की ताकत को क्रिकेटर भी बखूबी महसूस करने लगे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, ये सौरव गांगुली थे। माना जा रहा था कि बंगाल का होने के नाते जगमोहन डालमिया की पैरवी पर उन्हें टीम मे जगह दी गई है। वर्ल्ड कप के कामयाब आयोजन के बाद डालमिया का सिक्का क्रिकेट की दुनिया में चलना शुरु हो चुका था। मैंने भी अपनी बातचीत इसी सवाल के इर्दगिर्द बुननी शुरु की। "कहा जाता है कि आपको कोटा सिस्टम के चलते टीम में जगह मिली है। क्या ये तकलीफदेह नहीं लगता।" सौरव का दो टूक जवाब था-"आप क्यों ये सवाल करते हैं। मेरी परफोरमेंस देखिए। मौका मिला तो मैं साबित कर दूंगा।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौरव ने जो कहा, वो कर दिखाया। इस धमाकेदार अंदाज में, जिसकी गूंज आज भी क्रिकेटप्रेमियों के जेहन में कमजोर नहीं पड़ी है। पहले लॉर्ड्स और फिर नॉटिघंम में लगातार दो टेस्ट में दो शतक जमाते हुए। आलोचक और प्रशंसक दोनों की हालत एक सी थी। एक आलोचना के शब्द तलाशने मे जुटा था। प्रशंसक को सराहना के शब्द कम पड़ रहे थे। टीम की रवानगी पर जो शख्स हाशिए पर था, टीम की वापसी पर भारतीय क्रिकेट के सबसे चमकदार सितारे में तब्दील हो चुका था। दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर अगर किसी एक खिलाड़ी के सबसे करीब लोग पहुंचना चाहते थे तो वो थे सिर्फ और सिर्फ सौरव चंडीदास गांगुली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लॉर्डस के पहले शतक से लेकर नागपुर में भारतीय क्रिकेट के सबसे यादगार शून्य के बीच सौरव क्रिकेट की हर छटा को समेटे खड़े हैं। कोटा क्रिकेटर के दर्द से मुक्त होते सौरव। 1999 के वर्ल्ड कप में कपिल की ऐतिहासिक 175 रनों की पारी से आगे निकलते सौरव। मैच फिक्सिंग के दंश को झेल रही भारतीय क्रिकेट को उबारते सौरव। टीम में जीत की नयी सोच को लाते सौरव। ब्रिसब्रेन में बेजोड़ शतक के सहारे स्टीव वॉ को उनके घर में ललकारते सौरव। लॉर्डस की बालकनी में जीत के जुनून में नंगे बदन शर्ट लहराते सौरव। वर्ल्ड कप हासिल करने की दहलीज तक ले जाते सौरव। पाकिस्तान को उसी के घर में सीरिज में शिकस्त देकर नया इतिहास रचते सौरव। ग्रेग चैपल के अहम से टकरा अपनी राह भटकते सौरव। अकेले दम ईडन गार्डन की भरी दोपहरी में पसीना बहाते एक फिनिक्स की मानिंद टीम में वापसी करने की कोशिशों में जुटे सौरव। 99 टेस्ट खेलने के बाद दोहरा शतक जमाने का जीवट दिखाते सौरव। अपनी आखिरी सीरिज में बेजोड़ पारियां खेल अपने आलोचकों को ठेंगा दिखाते सौरव।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौरव के इंद्रधनुषी करियर में ऐसे कई अलहदा रंग हैं। इसमें सबसे गहरा है-भारतीय टीम की अगुआई करते सौरव गांगुली। मौजूदा भारतीय टीम की सोच की पहली इबारत इसी सौरव गांगुली की अगुआई मे लिखी गई। सौरव गांगुली से पहले भारतीय क्रिकेट ने कई कप्तान देखे। लेकिन, किसी कप्तान ने अपने खिलाड़ियों में जीत का ऐसा जज्बा नहीं भरा कि हार की दहलीज से भी जीत को खींचकर ले आए। बल्ला न चले तो गेंद से और गेंद न चले तो फील्डिंग से। सौरव ने अपने साथियों को जंग के मोर्चे पर लड़ रहे सैनिकों में तब्दील कर दिया। अकेले दम अपनी टीम को मंजिल तक पहुंचाने के जुनून में डूबे सैनिकों में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर, दक्षिण अफ्रीका में हुए वर्ल्ड कप को कौन भुला सकता है। शुरुआती मुकाबलों में मिली हार के बाद पूरे देश में सौरव की इसी टीम को लेकर एक आक्रोश हर शहर, हर मुहल्ले, हर गली से होता हुआ चौराहों तक दिखने लगा था। इस मौके पर सौरव की टीम अपने चहेतों के बीच अकेली छूट गई थी। लेकिन, सौरव ने अपने साथियों में ही अपनी दुनिया खोज डाली। एक दूसरे के कंधे पर हाथ डालकर जीत का आगाज करती खिलाड़ियों की जिस गोलबंदी(हडल) को आप धोनी की अगुआई में देखते हैं, इसकी शुरुआत इसी वर्ल्ड कप में सौरव ने की थी। उस वक्त जब वर्ल्ड कप में उसकी टीम को पूरे देश ने अकेला छोड़ दिया था। यही वो वर्ल्ड कप था, जहां भारतीय टीम कपिल की कामयाबी को दोहराने की दहलीज पर जा पहुंची थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या सौरव को ऐसी जुझारु टीम तैयार करते हुए खयाल आया होगा कि इसी टीम इंडिया की तैयारी में वो अपनी विदाई की इबारत लिख रहे हैं। धोनी की मौजूदा टीम इंडिया एक अनकहा कानून गढ़ चुकी है। ये कानून कहता है कि सर्वश्रेष्ठ से कम कुछ भी मंजूर नहीं। ये कानून खिलाड़ी को न थकने की छूट देता है, न शतक से चूकने की, न एक कैच छोड़ने की। यहां उम्र का भी लिहाजा नहीं किया जा सकता। इसी कानून ने सौरव से कहा कि ये उनकी विदाई का वक्त है। आपको ये स्टेज छोड़नी होगी। ये एक ट्रेजेडी ही है कि ये स्टेज खुद सौरव ने तैयार की। अपनी आखिरी पारी खेल विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के मैदान की सुनसान सीढियों से ड्रेसिंग रुम की ओर बढ़ते सौरव किसी से नहीं हारे। सौरव अपराजेय रहे। लेकिन, खिलाड़ी सौरव से कप्तान सौरव जीत गया। जिस कप्तान ने जीत की इबारत लिखी थी, उसी ने खिलाड़ी सौरव को स्टेज से बेदखल होने के लिए मजबूर कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए ये एक ऐसी यादगार विदाई थी, जिससे न सुनील गावस्कर रुबरु हो पाए न कपिल देव। गावस्कर ने बेंगलोर में पाकिस्तान के खिलाफ 96 रन की आखिरी बेजोड़ पारी जरुर खेली। लेकिन, क्रिकेट से अलग होने के सच को वो अपने चाहने वालों के बीच नहीं बांट सके। उनकी विदाई भी एक खिलाड़ी या बल्लेबाज की विदाई रही। सौरव की तरह एक रणनीतिकार की नहीं। कहा जाता है कि विश्व एकादश की ओर से लॉर्ड्स में खेलने के चलते वो इस विदाई की घोषणा नहीं कर सके। अगर गावस्कर संन्यास की घोषणा कर देते तो उन्हें विश्व एकादश की ओर से खेलने का मौका नहीं मिलता। कपिल देव ने भी क्रिकेट को अलविदा कहा, लेकिन अपनी चहेती स्टेज के बीच से नहीं, दिल्ली के एक पांच सितारा होटल के एक अंजान से कमरे से। ये एक लेजेंड की कचोट में तब्दील होती विदाई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर,ये सौरव की शख्सियत ही है, जो उन्हें खेल के जुनून में डूबे कोलकाता में एक खिलाड़ी, एक क्रिकेटर और एक कप्तान के दायरे से भी बाहर ले जाती है। कभी रविन्द्र नाथ टेगौर, कभी सुभाष चंद बोस और कभी सत्यजीत रे में अपने समाज और अपनी सोच को तलाशने वाला कोलकाता आज सौरव में भी अपनी पहचान ढूंढता है। इसीलिए ये वो सौरव गांगुली है, जिसकी शख्सियत आंकडों के तमाशाई खेल से बहुत आगे जाती है। ये दंतकथाओं में तब्दील हो चुकी सौरव चंडीदास गांगुली की शख्सियत है।&lt;br /&gt;[This article was first published in Dainik Bhaskar on november 12, 2008]&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-2580088363919397442?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/GxJW8D_dX4M" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/2580088363919397442/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=2580088363919397442" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/2580088363919397442?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/2580088363919397442?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/GxJW8D_dX4M/blog-post_12.html" title="सौरव के आइने में सौरव चंडीदास गांगुली" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>2</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/11/blog-post_12.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;A04DQXkzfip7ImA9WxRVE0w.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-4667101483686302044</id><published>2008-11-10T04:04:00.000-08:00</published><updated>2008-11-10T04:26:10.786-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-10T04:26:10.786-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वर्ल्ड कप" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अमित मिश्रा और जॉंटी रोड्स" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आस्ट्रेलिया" /><title>टीम इंडिया को कमज़ोर समझ जीत की राह से भटकी पोंटिंग की टीम</title><content type="html">&lt;div align="justify"&gt;अमित मिश्रा और जॉंटी रोड्स। इन दोनों के बीच आप कोई सिरा पकड़ नहीं सकते। एक फील्डर के नाते तो कतई नहीं। जॉंटी रोड़्स क्रिकेट की ज़मी पर फील्डिंग का दूसरा नाम। अमित मिश्रा ! उनकी फील्डिंग की बात शुरु की जाए तो मैदान पर उनकी छवि रोड्स की मुस्तैदी और चपलता से कोसो दूर ले जाती है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लेकिन,यही अमित मिश्रा सोमवार को जॉंटी रोड्स का लम्हा जी रहे थे। नागपुर के विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन मैदान पर आस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग ने ज़हीर खान की गेंद को मिडऑफ की ओर पुश किया और तेजी से रन लेने के लिए दौड़ पड़े। मिड ऑफ पर तैनात मिश्रा ने एक ही एक्शन में गेंद पर कब्जा किया और उसी पल जमीन के समानान्तर हवा में अपने शरीर को फैलाते हुए दांहिने हाथ से गेंद को थ्रो किया और गिल्लियां बिखेर दीं। ये लम्हा 1992 के वर्ल्ड कप में इंजमाम उल हक को आउट करते जॉंटी रोड्स की एक ठहरी तस्वीर को लौटाता सा दिखा। पोंटिंग आखिरी कदम के फासले से रन पूरा करने से चूक गए थे।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;लेकिन, शायद पोंटिंग अमित मिश्रा से ऐसे थ्रो की उम्मीद नहीं कर रहे थे। सोमवार की सुबह लॉंग ऑफ पर फील्डिंग करते हुए मिश्रा से हुई एक दो चूक के चलते वे उनकी इस फुर्ती को नज़रअंदाज कर बैठे। पोंटिंग की इस चूक के बाद आस्ट्रेलिया सिर्फ अगले 45 ओवर के दौरान यह टेस्ट ही नहीं हारा,उसने भारत और आस्ट्रेलिया के बीच प्रतिष्ठा की प्रतीक गावस्कर बॉर्डर ट्रॉफी भी गंवा दी।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बेशक,इस शिकस्त के बाद पोंटिंग यह कहें कि भारत ने उन्हें खेल के हर पहलू में हाशिए पर धकेल दिया लेकिन घर वापस लौटते पोंटिंग इस सच से भी मुंह नहीं मोड़ पाएंगे कि उन्होंने अमित मिश्रा की थ्रो की तरह भारतीय टीम की ताकत को भी नज़रअंदाज करने की कोशिश की। यह वो भारतीय टीम है,जिसने पिछले 10 साल में आस्ट्रेलियाई टीम को दो सीरिज में शिकस्त दी है। उस आस्ट्रेलियाई टीम को ,जिसने पिछले एक दशक के दौरान 31 टेस्ट सीरिज में कुल जमा तीन शिकस्त झेली हैं।साथ ही, 2005 में एशेज गंवाने के बाद लगातार 16 टेस्ट जीतने के सिलसिले को भी अगर तोड़ा था,तो भारत ने। वो भी आस्ट्रेलिया के सबसे पसंदीदा मैदान पर्थ पर। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इसके बावजूद पोंटिंग भारत पहुंचने के बाद से इसकी ताकत से आंख चुरा रहे थे। ठीक इसी तरह जैसे अमित मिश्रा के इस सटीक थ्रो से। एक दिन पहले भी जरुरत से ज्यादा आत्मविश्वास के चलते गिरफ्त में आता मुकाबला उनके हाथों से छिटक गया था। धोनी और हरभजन के बीच सातवें विकेट के लिए 108 रनो की साझेदारी ने आस्ट्रेलिया के हाथ में आती जीत को छीन लिया था। लेकिन, अब ये आस्ट्रेलिया में एक बडी बहस में तब्दील हो गया है कि पोंटिंग ने  अपने करियर की एक बड़ी चूक करते हुए इन दोनों बल्लेबाजों को हावी होने का मौका दिया। पोंटिंग ने ओवरों की रफ्तार को बरकरार रखने के लिए स्ट्राइक गेंदबाजों के बजाय हसी,क्लार्क और व्हाइट को मोर्चे पर उतार दिया। वो इस मौके पर कप्तान पर लगने वाले संभावित निलंबन के भय में ये चूक कर बैठे।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;चूक! आस्ट्रेलिया क्रिकेट की जीत की सोच में यह शब्द नहीं है। आस्ट्रेलियाई सोच है मैदान पर हर हाल में बेहतर रहने की । मुश्किल से मुश्किल मोड़ पर मुकाबले को अपनी ओर मोड़ने की। स्टीव वॉ से लेकर मार्क टेलर तक,शेन वार्न से लेकर मैक्ग्रा तक- आस्ट्रेलिया का मानना रहा है कि आप अपनी मानसिक सोच को जितना बेहतर करोगे,आपका स्किल उतना ही निखार लेगा। आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को ये कहा जाता है कि नाजुक मौकों पर खिलाड़ी जो फैसला करते हैं,वो ही आखिरी मौकों पर हार और जीत को तय करता है। पोंटिंग की ये चूक या ये फैसले भी भारत और आस्ट्रेलिया को जीत और हार के दो छोर पर खड़ा कर रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;फिर,सोमवार की सुबह 90 ओवर में 369 रन के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जुनून चाहिए था,न कि बेताबी। शुरुआत में अपने विकेट बचाकर ही आप इस मुश्किल लक्ष्य की ओर पहुंचने की आखिरी कोशिश कर सकते थे। लेकिन,आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज पहली गेंद से ही मुकाबले को दो सेशन में पूरा करने का इरादा जता रहे थे। धोनी का भी कहना था कि आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी पांच रन की रफ्तार से रन बना रहे थे लेकिन हम जानते थे कि आप लगातार ऐसा नहीं कर सकते। कम से कम मौजूदा क्रिकेट में एक बेजोड़ तेज गेंदबाज जोड़ी के रुप मे उभार लेते ईशांत और ज़हीर खान के खिलाफ तो कतई नहीं। फिर,पोंटिंग शायद इस पहलू पर भी नज़र नहीं डाल सके कि भारत में रनों का पीछा करते हुए चौथी पारी में अब तक सबसे बड़ी जीत दर्ज की है वेस्टइंडीज ने। लेकिन, 1987-88 में खेले गए दिल्ली टेस्ट में उनके सामने लक्ष्य था सिर्फ 276 रन का।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ऐसे में, शेन वार्न और मैक्ग्रा के संन्यास के बाद से ही शिखर से उतरती दिख रही पोंटिंग की इस टीम को जरुरत थी बल्लेबाजी के सहारे जीत तक पहुंचने की। लेकिन,अनुभवहीन गेंदबाजी की भरपाई के लिए इस पूरी सीरिज में 2004 के स्टार माइकल क्लार्क से लेकर 2001 सीरिज के सबसे कामयाब बल्लेबाज मैथ्यू हैडन और खुद कप्तान पोंटिंग तक कोई भी बल्लेबाज 40 की औसत तक नहीं पहुंच सका। सिर्फ माइकल हसी की औसत ही 50 के पार जा सकी। इस मोड़ पर एयान चैपल के इस बयान पर गौर करना चाहिए कि बेशक आस्ट्रेलिया ने पिछले दस साल तक क्रिकेट की दुनिया पर राज किया है लेकिन जब भी उसे एक बेहतर और संतुलित आक्रमण से जूझना पड़ा है तो उसकी बल्लेबाजे चूक गए हैं। उनके मुताबिक,2005 के एशेज सीरिज में इंग्लैंड ने चार मीडियम पेसर के सटीक आक्रमण के सहारे सीरिज पर कब्जा किया था। यहां भारत की ओर से ईशांत शर्मा,जहीर खान के साथ साथ हरभजन और अमित मिश्रा के बेहद संतुलित प्रहार ने उन्हें संभलने का मौका नहीं दिया। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;इनसे उलट आस्ट्रेलिया का कोई गेंदबाज भारत के बीस विकेट लेता नहीं दिखायी दिया। नागपुर में क्रेजा अकेले दम 12 विकेट तक पहुंचे तो इसने आस्ट्रेलियाई थिंक टैंक के लिए इस सीरिज में टीम कॉम्बिनेशन पर ही सवाल खड़ा कर दिया। आखिर,क्रेजा कैसे पहले तीन टेस्ट में टीम में जगह नहीं बना पाए। ये भी आस्ट्रेलिया के लिए बहस का एक और मुद्दा है। ऐसे में ये चूक या ये फैसले पोंटिंग की टीम को उस आस्ट्रेलियाई सोच से दूर ले जा रहे हैं,जो जीतना ही नहीं,जीत के शिखर पर बने रहना भी सिखाती है। फिलहाल,पोंटिंग की यह आस्ट्रेलियाई टीम शिखर की इस राह से भटक गई है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-4667101483686302044?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/OUKWk8JNQw4" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/4667101483686302044/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=4667101483686302044" title="2 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/4667101483686302044?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/4667101483686302044?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/OUKWk8JNQw4/blog-post_10.html" title="टीम इंडिया को कमज़ोर समझ जीत की राह से भटकी पोंटिंग की टीम" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>2</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/11/blog-post_10.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkEHSHs7eip7ImA9WxRVEkk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-8125215632394400528</id><published>2008-11-09T06:16:00.000-08:00</published><updated>2008-11-09T06:23:59.502-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-09T06:23:59.502-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="महेन्द्र सिंह धोनी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="रिकी पोंटिंग" /><title>सीरिज के आखिरी दिन पोंटिंग के सामने कप्तान धोनी से पार पाने की चुनौती</title><content type="html">आस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग के 13 साल के यादगार टेस्ट करियर में कितने ही सोमवार आकर चले गए। लेकिन,नागपुर के विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के मैदान पर इंतजार करता सोमवार उनका सबसे कड़ा इम्तिहान लेने जा रहा है। सीरिज के आखिरी दिन गावस्कर बॉर्डर ट्रॉफी पर कब्जा बरकरार रखने के लिए उन्हें 369 रनों की चढ़ाई करनी है। सिर्फ यही एक सूरत है कि अपनी कप्तानी में आस्ट्रेलिया को लगातार 16 और कुल जमा 33 जीत दिला चुके पोंटिंग सम्मान के साथ घर लौट सकें। जीत की पहचान को लेकर बनी आस्ट्रेलियाई इमेज को एक नए सिरे से गढ़ सकें। लेकिन,वो अगर इस लक्ष्य से आखिरी कदम के फासले से भी चूक गए तो उनके जेहन में इस शिकस्त के लिए सिर्फ और सिर्फ एक ही नाम उभार लेगा-भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर, अब से 50 दिन पहले पोंटिंग ने अपने साथियों के साथ भारत की उड़ान भरी थी तो उनके सामने चुनौतियों की एक लंबी फेहरिस्त थी। वीरेन्द्र सहवाग से शुरु होकर वीवीएस लक्ष्मण, हरभजन सिंह से होते हुए ईशांत शर्मा तक। फ्रेम दर फ्रेम ये चेहरे पोंटिंग और उनके साथियों के बीच एक बहस में तब्दील होते रहे होंगे। भारत आस्ट्रेलिया सीरिज को एशेज से कई पायदान ऊपर ठहरा रहे आलोचक भी पोंटिंग-ईशांत शर्मा, पोंटिंग-हरभजन,हेडन-जहीर,ब्रेटली-सचिन के संघर्ष के बीच सीरिज के संभावित रोमांच को महसूस कर रहे थे। लेकिन,इनमें कहीं महेन्द्र सिंह धोनी का नाम नहीं था। इसके बावजूद कि इसी साल की शुरुआत में धोनी ने पोंटिंग की इस आस्ट्रेलियाई टीम को उसी के घर में अपनी बेजोड़ कप्तानी मे ट्राइंगुलर सीरिज में शिकस्त दी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; दरअसल,इस सीरिज में कुंबले नहीं धोनी की कप्तानी ही कसौटी पर थी। ट्वेंटी 20 के वर्ल्ड चैंपियन और वनडे के नए बादशाह धोनी को अभी टेस्ट में कप्तानी के लिए तैयार नहीं माना जा रहा था। लेकिन,धोनी की कप्तानी ही भारत और आस्ट्रेलिया के बीच हार और जीत का सबसे बड़ा फासला बनकर उभार ले रही है। सचिन तेंदुलकर से लेकर सौरव गांगुली,गौतम गंभीर से लेकर वीरेन्द्र सहवाग या लक्ष्मण तक या गेंदबाजी मे जहीर से लेकर ईशांत शर्मा या हरभजन से लेकर अमित मिश्रा तक-सबने इस सीरिज में अपनी छाप छोड़ी है। लेकिन, इन सबके बीच भी सबसे बड़े चेहरे के तौर पर धोनी ही उभार ले रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आखिर,रविवार को जीत की ओर बढ़ रही भारतीय पारी लंच और चयकाल के बीच अचानक चरमरा गई। वीरेन्द्र सहवाग और मुरली विजय की ठोस शुरुआत के बावजूद भारतीय पारी देखते ही देखते बिना विकेट पर 116 रन से छह विकेट पर 166 रन पर आकर लड़खड़ाने लगी। शेन वाटसन और जैसन क्रेजा के सामने महज 50 रन के दरम्यान भारत के पहले छह बल्लेबाज ड्रेसिंग रुम लौट गए। इस मोड़ पर भारत के पास केवल 252 रन की बढ़त थी। भारत की पारी के आखिरी चार विकेट हासिल करते हुए आस्ट्रेलिया मुकाबले में अपनी गिरफ्त मजबूत कर लेने की कगार पर था। आलोचकों की निगाह अब धोनी की कप्तानी पर थी। धोनी कैसे इस नाजुक मोड़ से भारतीय पारी को किनारे तक ले जाते हैं। धोनी किस अंदाज मे इस चुनौती से पार पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,धोनी इस कसौटी पर खरे उतरे। अपनी आक्रामक छवि से हटकर धोनी ने जरुरत के मुताबिक अपनी टीम के लिए रन बटोरे। साथ ही, अपने साथी हरभजन सिंह को सीरिज में एक और अहम पारी खेलने के लिए प्रेरित किया। इसी का नतीजा था कि इन दोनों ने इस नाजुक मोड़ पर सांतवे विकेट के लिए 108 रन की साझेदारी की। इसमे भी धोनी की बल्लेबाजी सोच सबकी निगाहों में ठहर गई। वनडे क्रिकेट में अपनी भूमिका में लगातार बदलाव कर रहे धोनी ने यहां टेस्ट में भी एक नए बल्लेबाज धोनी से रुबरु कराया। धोनी ने 81 गेंदों में अपने 55 रनों के दौरान 19 सिंगल्स लेते हुए बराबर स्ट्राइक बदलते हुए आस्ट्रेलियाई गेंदबाजों के लिए विकेट तक की राह को मुश्किल बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; धोनी अपनी इस बल्लेबाजी से क्रिकेट चहेतों को डेढ साल पहले लॉर्ड्स पर खेली अपनी एक और बेजोड़ पारी की ओर लौटा ले गए। इंग्लैंड के खिलाफ चौथी पारी में 380 रनों का पीछा कर रहा भारत एक वक्त 145 रन पर पांच विकेट गंवा चुका था। मुकाबले के इस मोड़ से ड्रॉ तक ले जाने के लिए भारत को अभी 48 ओवर और खेलने थे। धोनी ने अपनी आक्रामक छवि से हटकर 76 रन की बेहद ठोस पारी खेली। करीब साढ़े तीन घंटे तक एक छोर पर मजबूती से थामे रखा। इस हद तक कि वीवीएस लक्ष्मण के वापस लौटने के बावजूद भारत इस तय हार को टालने में कामयाब रहा। मैच के आखिरी बीस ओवर मे धोनी के साथ दूसरे छोर पर कुंबले,जहीर खान,आरपी सिंह और श्रीसंत ही बचे थे। इनमें भी श्रीसंत के साथ तो धोनी ने आखिरी विकेट को बचाए रखने के लिए बेहद परिपक्वता से बल्लेबाजी की। आखिरी पांच ओवर में उन्होंने श्रीसंत को सिर्फ सात गेंदों के लिए इंग्लैंड गेंदबाजों के सामने आने दिया। लॉर्ड्स में ड्रॉ रहा ये टेस्ट ही था,जिसके बाद भारत ने सीरिज पर ही कब्जा जमा लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सीरिज में भी कप्तान धोनी ने मोहाली में अपने बल्ले से ऐसी छाप छोड़ी कि पोंटिंग के लिए ट्रॉफी को बरकरार रखना मुश्किल दर मुश्किल होता चला गया। मोहाली में आठवें नंबर पर बल्लेबाजी करने आए धोनी ने 92 रन की एक बड़ी पारी खेली। इस पारी में जरुरत के मुताबिक आक्रमण का भरपूर समावेश था। आठ चौके और चार छक्कों से सजी इस पारी के दौरान धोनी ने गांगुली के साथ सातवें विकेट के लिए सिर्फ बीस ओवर में 109 रन जोड़ डाले। इतना ही नहीं,मैच के चौथे दिन आस्ट्रेलिया को दबाव में लाने के लिए एक बार फिर तेज रनों की दरकार थी,तो धोनी तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करने पहुंचे। पहली पारी में भी सौरव गांगुली के साथ अहम मौके पर महत्‍वपूर्ण साझेदारी करने वाले  धोनी ने इस बार 84 गेंदों में 55 रनों की ठोस पारी के दौरान 19 सिंगल्‍स लेकर आस्ट्रेलिया को सीरिज में शिकस्त की ओर धकेलने की शुरुआत की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सीरिज में यह सिर्फ धोनी के बल्ले की ही बात नहीं है। धोनी की कप्तानी भी कसौटी दर कसौटी खरी साबित हो रही है। मोहाली में ही जीत तक पहुंचने की राह में कुंबले की जगह अपना पहला टेस्ट खेल रहे अमित मिश्रा से लेकर अनुभवी हरभजन सिंह तक का बेहतरीन इस्तेमाल धोनी ने किया। खासतौर से चौथे दिन शाम आठवें ओवर मे ही हरभजन सिंह की ओर गेंद उछालते हुए मुकाबले का सबसे बड़ा दांव खेला। हरभजन ने सिर्फ दस गेंदों के बीच ही हेडन, कैटिच और हसी के विकेट लेते हुए मुकाबले पर भारत की मुहर लगा दी थी। नागपुर टेस्ट में ही धोनी ने अपनी सूझबूझ भरी कप्तानी से कैटिच और हसी की साझेदारी से एडवांटेज की ओर बढ़ रही आस्ट्रेलियाई पारी को बैकफुट पर ला खड़ा किया। तमाम आलोचनाओं के बावजूद ऑफ साइड की मजबूत घेराबंदी के बीच ऑफ स्टंप की दिशा पकड़कर गेंदबाजी की हिदायत देते हुए। रनों के प्रवाह को रोकते हुए धोनी ने पहले उनकी बल्लेबाजी लय को तोड़ा और फिर आस्ट्रेलियाई पारी को। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इस सीरिज के आखिरी दिन पोंटिंग को इसी कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी से जूझना है। किस तरह पोंटिंग धोनी की बिछायी बिसात से अपनी मंजिल तलाशते हैं,इस पर सबकी निगाह रहेगी। नतीजा कुछ भी हो,लेकिन इतना तय है कि घर लौटते पोंटिंग भारतीय चुनौतियों की फेहरिस्त एक नए सिरे से तैयार करेंगे। इसमें सबसे पहला नाम होगा-महेन्द्र सिंह धोनी का। अपने आखिरी पढ़ाव पर पहुंची गावस्कर बार्डर ट्रॉफी से यही सबसे बड़ा पहलू उभरकर सामने आ रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-8125215632394400528?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/Rz2F6Qeb0A4" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/8125215632394400528/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=8125215632394400528" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/8125215632394400528?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/8125215632394400528?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/Rz2F6Qeb0A4/blog-post_09.html" title="सीरिज के आखिरी दिन पोंटिंग के सामने कप्तान धोनी से पार पाने की चुनौती" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>1</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/11/blog-post_09.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0UCRn05cSp7ImA9WxRVEUk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-4071427981963249795</id><published>2008-11-08T03:37:00.000-08:00</published><updated>2008-11-08T03:54:27.329-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-08T03:54:27.329-08:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="द्रविड़" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मिश्रा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विदर्भ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हसी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गावस्कर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गांगुली" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मुरली विजय" /><title>विजय,मिश्रा,गांगुली की कामयाबी सिलेक्टर्स के भरोसे की जीत है</title><content type="html">महज एक सेंकेंड। लेकिन,मुरली विजय को अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए सिर्फ यह एक सेंकेंड ही बहुत था। सिली प्‍वाइंट पर तैनात विजय ने माइकल हसी के बल्ले से निकले स्ट्रोक को बीच रास्ते में ही दांहिने हाथ से रोका। हसी जब तक अपने स्ट्रोक के फॉलो थ्रू से वापस लौटते हुए क्रीज में बल्ला पहुंचाने की कोशिश भी करते,विजय के थ्रो पर विकेटकीपर महेन्द्र सिंह धोनी स्टंप बिखेर चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिर्फ एक सेंकेंड में विजय ने माइकल हसी की लगातार मजबूती लेती पारी को शतक से दस रन पहले थाम दिया। यह सिर्फ हसी की पारी का ही अंत नहीं था, ये गावस्कर बॉर्डर ट्रॉफी में बराबरी पर आने के लिए जीतोड़ कोशिशों में लगी आस्ट्रेलिया की उम्मीदों का बिखरना भी था। इस मुकाबले में विजय के लिए यह पहला मौका नहीं था। दूसरे दिन ऐसे ही एक सेंकेड में उनके सटीक थ्रो ने आस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी की अगुवाई कर रहे अनुभवी मैथ्यू हेडन को भी ड्रेसिंग रुम की ओर मोड़ दिया था। ये दोनों बल्लेबाज "फोटो फ्रेम फिनिश" में अपना विकेट बचा नहीं पाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक टेस्ट में दो-दो रन आउट। वो भी बल्लेबाज की चूक से नहीं,फील्डर की चीते सी चपलता से। टेस्ट क्रिकेट में यह किसी गेंदबाज के विकेट तक पहुंचने से कतई कम नहीं है। मुरली विजय ने एक-एक सेंकेंड के इन दो लम्हों में नागपुर के विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन मैदान में अपनी फील्डिंग से ऐसी छाप छोड़ दी है कि इस मुकाबले और सीरिज के आखिरी नतीजे में वो एक बहस का मुद्दा बनेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर,शनिवार की सुबह भारत ने एक नहीं दो बार साइमन कैटिच को जीवनदान दिया। पहले राहुल द्रविड़ और फिर वीवीएस ने स्लिप में अपने हाथ में पहुंची गेंद को कैच में तब्दील नहीं कर पाए। लेकिन,ठीक इसी मोड़ पर विजय ने मुकाबले में फील्डिंग की अहमियत को भी जता दिया। आखिर,इस मुकाबले से ठीक पहले विजय को जब टीम में जगह मिली तो कितने ही लोगों के जेहन में यह सवाल कुलबुलाने लगा कि विजय-कौन विजय?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं कहीं 1997 के आसपास भारतीय टीम में अचानक जगह बनाने वाले ऑफ स्पिनर नोएल डेविड की तरह उनका नाम भी सुनायी पड़ने लगा। क्रिकेट आलोचकों ने सवाल खड़ा किया कि आखिर आकाश चोपड़ा,वसीम जाफ़र के रहते एम विजय को टीम में जगह कैसे मिल सकती है। लेकिन,विजय ने अपने इन दो लम्हो के साथ साथ भारतीय पारी को एक मजबूत आधार भी दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने बेशक सिर्फ 33 रन ही अपनी पारी में जोड़े लेकिन वीरेन्द्र सहवाग के साथ पहले विकेट के लिए बनाए 98 रन ही थे,जिसने भारत को इस मुकाबले में कई बार लड़खड़ाने के बावजूद एक विजयी लक्ष्य की ओर मोड़ दिया। लेकिन,विजय की इस पहचान दर्ज कराते आगाज के लिए हमें चयनसमिति के भरोसे को सलाम करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चयनसमिति को यह मालूम था कि इस फैसले से उन्हें सवालों के घेरे में लिया जाएगा,उन्होंने विजय में अपने भरोसे को बनाए रखा। खबरों के मुताबिक,सौरव गांगुली ने चयनसमिति के अध्यक्ष कृष्णामाचारी श्रीकांत को कहा कि अगर आप इस पोजिशन के लिए किसी को देख रहे हैं तो वो शख्स विजय हो सकता है। गांगुली टीम में अपनी वापसी की तैयारियों के तहत न्यूजीलैंड ए के खिलाफ खेलते हुए भारत ए के इस ओपनर की बल्लेबाजी से रुबरु हुए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये इस सीरिज में अकेला वाक्या नहीं है,जहां अपनी नयी पारी खेल रहे सिलेक्टर्स का अपनी सोच में एक ठोस भरोसा दिखायी दिया है। उन्होंने पीयूष चावला पर तरजीह देते हुए टीम में हरियाणा के लेग स्पिनर अमित मिश्रा को टीम में जगह दी। इतना ही नहीं,मोहाली टेस्ट से ठीक पहले तत्कालीन कप्तान अनिल कुंबले को चोट की वजह से बाहर बैठना पड़ा तो मिश्रा को उतारने में कतई देरी नहीं की गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चयनकर्ताओं का यह तीर भी बिलकुल ठीक निशाने पर लगा। इस मैच की पहली पारी में पांच और दूसरी पारी में दो विकेट लेकर मिश्रा ने सीरिज में भारत के लिए पहली जीत की राह तैयार की। उनका प्रदर्शन इस कदर सबकी निगाहों में चढ़ गया कि सीरिज के ठीक बीच कप्तान कुंबले के संन्यास के झटके को भी भारतीय टीम झेलने के लिए तैयार दिखी। फिर,चयनसमिति के सौरव गांगुली में जाहिर किए गए भरोसे को भारतीय क्रिकेट में कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमाम आलोचनाओं और सौरव के फॉर्म पर उठते सवालों के बावजूद श्रीकांत एंड कंपनी ने भारत के पूर्व कप्तान को सीरिज में खेलने का मौका दिया। अपनी विदाई सीरिज में इस मौके को हाथों हाथ लेते हुए सौरव ने चार टेस्ट की पांच पारियों में 324 रन बनाते हुए इसे यादगार बना दिया है। इस सीरिज में सौरव का योगदान सिर्फ रनों के आइने में ही नहीं देखा जा सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेंगुलुरु की 47 रनों की छोटी पारी से लेकर मोहाली और नागपुर में कप्तान धोनी और तेंदुलकर के साथ निभायी साझेदारियां भारत के आस्ट्रेलिया पर हावी होने की नींव बनी। इन सबसे आगे सौरव के प्रदर्शन ने भारतीय क्रिकेट में अपने महानायकों को अलविदा कहने के लिए एक नयी राह खोल दी है। पूरे सम्मान के साथ अपने चहेतों के बीच अपनी स्टेज से अलविदा कहने का मंत्र। एक ऐसा सूत्र,जिसे थामने में सुनील गावस्कर से लेकर कपिल देव तक नाकाम रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, सौरव नागपुर में पूरे सम्मान के साथ आखिरी बार ड्रेसिंग रुम की ओर मुखातिब होंगे तो उनका हर कदम,उनका हर हाव भाव,उनके चाहने वालों के दिलो-दिमाग में हमेशा हमेशा के लिए ठहर जाएगा। महानायक को लेकर गढ़ा उनका मिथक कभी नहीं दरक पाएगा। सिर्फ एक सवाल जेहन में होगा-आखिर क्यों सौरव इस स्टेज से इस वक्त अलग हो रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी खिलाड़ी के लिए इससे बेहतर अलविदा हो नहीं सकती। लेकिन,इस अलविदा के लिए इतनी खूबसूरत ज़मी तैयार करने के लिए श्रीकांत एंड कंपनी को बार बार सलाम। इस सीरिज में सौरव गांगुली से लेकर अमित मित्रा और एम विजय की कामयाबियां अरसे तक लोगों की यादों में बसी रहेंगी। निश्चित तौर पर ये चयनसमिति के भरोसे की जीत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-4071427981963249795?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/6Ie0H4NcezY" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/4071427981963249795/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=4071427981963249795" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" 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Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>3</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/11/blog-post_08.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;A0cBRHY_cSp7ImA9WxRWFkQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-5524906272653748616</id><published>2008-11-02T07:51:00.000-08:00</published><updated>2008-11-02T23:57:35.849-08:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-02T23:57:35.849-08:00</app:edited><title>अनिल कुंबले की विदाई के साथ 22 गज की स्टेज पर छूटा एक खालीपन</title><content type="html">अनिल कुंबले ने अंपायर से गेंद अपने हाथ में ली। लेकिन, इस बार गेंदबाजी रनअप के लिए कदम बढ़ाने के लिए गेंद नहीं थामी। कुंबले ने ये गेंद ली हमेशा-हमेशा के लिए सहेज कर रखने के लिए। एक बेशकीमती धरोहर की तरह कुंबले उसे थाम ड्रेसिंग रुम लौट रहे थे। कुछ ही लम्हों पहले तक अपनी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी 22 गज की स्टेज को पीछे छोड़ते हुए। दुनिया के हर हिस्से में ज़मीं के ऐसे टुकडों पर सिर्फ और सिर्फ बल्लेबाज के विकेट तक पहुंचने का एकमात्र लक्ष्य लेकर कुंबले ने अपने रनअप की ओर कदम बढ़ाए। एक बार नहीं, सौ बार नहीं बल्कि 40,852 बार। 18 साल तक लगातार एक सिलसिले की तरह। जीवट, धैर्य और खेल में डूबकर उसे जीने का तरीका बनाते हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही कुंबले रविवार की ढलती शाम में अपने सफर पर पूर्ण विराम लगा रहे थे। सचिन तेंदुलकर के साथ इस लम्हे को साझा करते हुए उनके चेहरे पर हमेशा की तरह एक मुस्कुराहट तैर रही थी। लेकिन, कुंबले की पहचान बनी इस मुस्कुराहट के पीछे अपनी ज़िंदगी के एक हिस्से को अलग करने के दर्द को आप महसूस कर सकते थे। टेलीविजन स्क्रीन पर उनके चेहरे पर टिके कैमरे मुझे भावुकता में बहाए लिए जा रहे थे। ऐसे में, इस लम्हे में ज़िंदगी में अचानक घर कर गए इस खालीपन के साथ आगे बढ़ते कुंबले की मन:स्थिति को सिर्फ और सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुंबले अपनी जिंदगी में इस खालीपन के लिए बेशक मानसिक तौर पर खुद को तैयार कर रहे थे। आज जैसा उन्होंने कहा भी- "मैं इसे अपनी आखिरी सीरीज मानकर आगे बढ़ रहा था।" लेकिन, ये उनका आखिरी मैच होगा, ये कोई नहीं जानता था। शनिवार शाम तक कुंबले भी नहीं। महज एक शाम के डूबने और दूसरी सुबह के उगने के बीच उन्होंने ये फैसला लिया। "मैंने कल रात ही ये तय किया कि मुझे अब क्रिकेट से अलग हो जाना चाहिए।" बेहद साफगोई से, ईमानदारी से भारतीय क्रिकेट के इस बेमिसाल नायक ने अपने फैसले पर पहुंचने के मोड़ से सबको रुबरु करा दिया। "मेरी उंगली में लगे 11 टांके और चोट मुझे अपना सौ फीसदी खेल नहीं खेलने देगी। अपने प्रदर्शन से मैं अपनी टीम को नुकसान नहीं पहुंचा सकता।" ये बेशक अचानक उठी आलोचनाओं और सवालों का जवाब था। लेकिन, इतनी कड़वी सचाई को इतनी सहजता से सिर्फ कुंबले और कुबंले ही कह सकते हैं। सिर्फ कुंबले ही इसे स्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर, कुंबले बेमिसाल हैं। इसलिए नहीं कि टेस्ट क्रिकेट में 619 विकेट के खड़े किए शिखर तक पहुंचना किसी भी भारतीय का पहुंचना फिलहाल मुश्किल लगता है। इसलिए भी नहीं कि कुंबले की रची जीत की कहानियों को दोहराना अब नामुमकिन हो जाएगा। कुंबले का पूरा सफर अकेले दम सवालों, आलोचनाओं के बीच एक संन्यासी की तरह तपस्या में जुटे रहने की कहानी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप कुंबले को भारतीय क्रिकेट का सबसे बड़ा तपस्वी कह सकते हैं। आखिर एक गेंदबाज मैच दर मैच अपनी गेंदों से टीम के लिए जीत की राह तैयार करता है। लेकिन, आलोचक उसकी कामयाबियों को नवाजने के बजाय उन पर सवाल खड़ा करते हैं। बेदी, प्रसन्ना और चंद्रा के सुनहरे दौरे के बीच ये उन्हें एक मीडियम पेसर दिखायी देता है। इसकी गेंदें घूमती ही नहीं। अगर बल्लेबाज एक बार इन्हें समझ जाए तो वो बेफिक्र होकर खेल सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन आलोचनाओं के बीच भी कोई बल्लेबाज कुंबले को बेफिक्र होकर खेल नहीं पाया। 1992 में पहले दक्षिण अफ्रीका और फिर अपने घर में इंग्लैंड के बल्लेबाजों के पांव कुंबले के सामने कांपने लगे। इन आलोचनाओं का ज्‍वार कुछ कम हुआ, लेकिन खत्म नहीं। अब कहा जाने लगा- "कुंबले की गेंदों में टर्न है। सिर्फ उतना ही, जितना विकेट के लिए जरुरी है।" लेकिन, साथ में सवाल भी जोड़ दिए गए। इस लेग स्पिनर की तरकश में गुगली नहीं है। लेग स्पिन नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, कुंबले इस बेपरवाह होकर लगातार अपनी गेंदों में नए आयाम जोड़ते चले गए। लेग स्पिन की हर विधा को उन्होंने अपनी गेंदबाजी में शामिल कर लिया। आखिर, आप इसे क्या कहेंगे कि भारतीय स्पिन के सुनहरे दौर के सबसे बड़े नायक बिशन सिंह बेदी के हासिल किए गए 266 विकेट के मुकाबले कुंबले ढाई गुना आगे जाकर 619 विकेट के नए शिखर के साथ करियर को अलविदा कह रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सिर्फ कुंबले के हाथों से छूटी गुजरते वक्त के साथ तेज होती धार ही नहीं है, ये अपनी सीमाओं में एक परिपूर्णता की तलाश करता एक गेंदबाज ही नहीं है, ये स्किल और टेलेंट से आगे जाकर जीवट की ढेरों कहानियों को समेटे एक बेजोड़ नायक है। टूटे जबड़े के बावजूद एंटिगा के सेंटजोंस मैदान पर उतरे कुंबले को कौन भूल सकता है। दर्द से बेपरवाह 14 ओवर के स्पैल में ब्रायन लारा के विकेट तक पहुंचे कुंबले की कहानी भारतीय क्रिकेट में किंवदंती की शक्ल ले चुकी है। ये अगर छह साल पहले की बात थी, तो एक दिन पहले ही उंगली में लगे 11 टांकों के बावजूद अपने से जुड़े सवालों का जवाब तलाशते कुंबले को आप सिर्फ सलाम ही कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर, जब इन सवालों का जवाब जब उनकी गेंदें नहीं दे पायी। तो इस बार बेहद ईमानदारी से उन्होंने खुद से जवाब मांगा। ये सवाल पिछले एक साल से लगातार उन पर हावी हो रहा था। ये कबूलने मे भी उन्होंने कोई हिचकिचाहट नही दिखायी। ढलती उम्र में शरीर लगातार जवाब दे रहा था। लेकिन,उनके भीतर का खिलाड़ी अभी हार मानने को तैयार नहीं था। कुंबले का कहना है "बेशक मैं दर्द निवारक दवाइयों के साथ खेल में खुद को झोंक रहा था। खेलना मुश्किल हो रहा था। लेकिन, मुझे लगता था कि मैं अभी कुछ और खेल सकता हूं। लेकिन, उंगली में लगी चोट के बाद मुझे लगा कि अब इस सफर को थामना होगा। ये चोट काफी गंभीर थी। अब शायद बस।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुंबले ने इस 'बस' के साथ क्रिकेट सफर को पूर्णविराम लगा दिया। अब एक खालीपन सिर्फ उनकी जिंदगी में ही नहीं है। हम सब भी उसी खालीपन के साथ जीने को मजबूर हैं। हम सब की जिंदगी में भी मैदान के 22 गज की इस जमी पर कुंबले की छवि फिर उभार नहीं लेगी। लेकिन, हौसलों से भरे उनके डग, हाथ से छूटती गेंद, बल्लेबाज के विकेट तक पहुंचने के बाद एक असीम खुशी में डूबते कुंबले हमारी यादों में कभी धुंधले नहीं पड़ेंगे। पाकिस्तान के खिलाफ एक पारी में हासिल दसों विकेट से लेकर वेस्टइंडीज के खिलाफ उसी की ज़मी पर इतिहास दोहराती जीत तक। आस्ट्रेलिया में साइमंड्स-भज्जी विवाद के मद्देनजर मैदान से बाहर भारतीय गौरव की अगुआई करते कुंबले से लेकर, पर्थ में यादगार जीत तक पहुंचाती इस नायक की उपलब्धियों में हम बार-बार डूबते उतरते रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविवार को कोटला पर आखिरी बार अपनी स्टेज को पीछे छोड़ अपनी बेटी का हाथ थामे कुंबले वापस लौट रहे थे। उनकी बेटी बेहद मासूमियत से अपने पिता की ओर देख रही थी। छह फीट लंबे कुंबले को देखने के लिए वो बराबर अपना सिर उठा नज़रों को ऊंचा कर रही थी। इस बच्ची को आज अपने पिता के असली कद का अंदाज तो नहीं हुआ होगा। आने वाले कल में जब वो इस एक तारीख की ओर रुख करेगी तो जरुर एक रोमांच और गर्व से भर जाएगी कि कितने बड़े लम्हे के बीच से वो गुजरकर आयी थी। कितनी बड़ी शख्सियत की उंगली थाम उसने कदमों के साथ कदम मिलाए थे। ऐसे कदम, जिनके निशां भारतीय क्रिकेट में इतने गहरे छप गए हैं कि कभी मिटाए नहीं जा सकेंगे। ये भारतीय क्रिकेट के महानायक अनिल कुंबले के कदमों के निशां हैं। इस पर आने वाला हर एक गेंदबाज चलना चाहेगा। यही अनिल कुंबले होने का मतलब है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-5524906272653748616?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/kGVNP7jv9U4" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/5524906272653748616/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=5524906272653748616" title="6 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/5524906272653748616?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/5524906272653748616?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/kGVNP7jv9U4/22.html" title="अनिल कुंबले की विदाई के साथ 22 गज की स्टेज पर छूटा एक खालीपन" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>6</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/11/22.html</feedburner:origLink></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0EGSXg-fip7ImA9WxRWFUg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-4942508908242162849.post-7927382054787590953</id><published>2008-11-01T07:56:00.000-07:00</published><updated>2008-11-01T08:00:28.656-07:00</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-11-01T08:00:28.656-07:00</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वाटसन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हसी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पोंटिंग" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अनिल कुंबले" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वीरेन्द्र सहवाग" /><title>चौतरफा दबाव के बीच खुद से जूझते अनिल कुंबले</title><content type="html">वीरेन्द्र सहवाग- 40-9-104-5 । अनिल कुंबले- 43.3-9-112-3 । ये सिर्फ दो गेंदबाजी विश्लेषण नहीं हैं। ये एक पारी में एक गेंदबाज की कामयाबी और दूसरे की नाकामी का चेहरा भी नहीं हैं। अगर आप फिरोजशाह कोटला पर भारत और आस्ट्रेलिया के बीच खेले जा रहे तीसरे टेस्ट मैच को लगातार देख रहे हैं तो इस विश्लेषण से कहीं आगे ये दो खिलाड़ी दो अलग ज़मी पर खड़े दिखेंगे। दबाव से बेफ्रिक्र होकर कैसे आप लगातार नयी कामयाबियों की ओर मुखातिब होते हैं। दबाव किस तरह आपकी राह मुश्किल दर मुश्किल बना डालता है। सहवाग और कुंबले दोनो इस मुकाबले में इन दो छोर पर खड़े दिखायी दे रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीरेन्द्र सहवाग ! जरुर उन्हें हरभजन की गैरमौजूदगी में गेंदबाजी की ज़िम्मेदारी सौपी गईं। मुकाबले के बीच कुंबले को लगी चोट के बाद ये जिम्मेदारी दोहरी हो गई। लेकिन, मूल रुप से सहवाग की पहचान न तो एक गेंदबाज के तौर पर गढ़ी गई है, न ही उनकी गेंदों से बल्ले की तरह भारत ने जीत की राह का ख्वाब संजोया है। उनकी भूमिका या तो एक बड़ी साझेदारी को तोड़ने की शक्ल में देखी गई या फिर एक छोर पर बदलाव के लिए उनके हाथ में गेंद थमायी गई। बहुत ज्यादा हुआ तो एक छोर पर रनों के प्रवाह को रोकने के इरादे से कप्तान ने सहवाग का इस्तेमाल किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहवाग दबाव से मुक्त होकर अपनी इस जिम्मेदारी को निभाते रहे हैं। इस मुकाबले में भी बल्ले से नाकाम होने के बावजूद सहवाग पर विकेट लेने का दबाव तो नहीं रहा होगा। गेंदबाजी में कुछ भी दांव पर न होने के चलते उनकी गेंदों में पारी के आगे बढ़ने के साथ साथ धार भी दिखायी देने लगी। एक भरोसे के साथ सहवाग अपनी गेंदों को टॉस कराया। साथ ही, ऑफ स्टंप की दिशा को थामते हुए लगातार आस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को भी परेशान करते रहे। तीसरे दिन शतक के करीब खड़े कप्तान पोंटिंग उनकी एक सहज ऑफ स्पिन पर ड्राइव करने की कोशिश में पूरी तरह परास्त हुए। आस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी का सबसे ठोस किला कहे जाने वाले माइकल हसी हताश हुए। शनिवार की सुबह बेहद सहजता से खेल रहे शेन वाटसन सहवाग की अंदर आती गेंद से पार पाने का सूत्र तलाशते हुए अपना लेग स्टंप गंवा बैठे। सहवाग आस्ट्रेलियाई पारी में पांच विकेट अपने नाम किए। भारतीय गेंदबाजी में एक नये स्ट्राइक गेंदबाज की शक्ल लेते हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे छोर पर अनिल कुंबले थे। पूरी तरह दबाव के बीच। बाएं हाथ की उंगली में लगे 12 टांकों का दबाव शायद इस अनुभवी स्ट्राइक गेंदबाज पर नहीं रहा होगा,जितना कि आस्ट्रेलियाई विकेट तक पहुंचने का। इस सीरिज में अपने पहले विकेट का इंतजार करते कुंबले लगातार इस चुनौती से जूझते दिखायी दिए। पिछली 17 पारियों से कुंबले एक पारी में पांच विकेट लेने का कारनामा नहीं दोहरा पाए हैं। ये वो कुंबले हैं, जिन्होंने 35 बार पांच विकेट और आठ बार एक मैच में दस विकेट हासिल किए हैं। अपने करियर में करीब 29 रन की औसत से 617 विकेट लेने वाले कुंबले पिछली 16 पारियों के दौरान 52 के औसत से विकेट तक पहुंच पाए हैं। भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े मैच विनर कुंबले ने अपने करियर में करीब हर 66वीं गेंद पर विकेट लिया है,लेकिन पिछले एक साल के दौरान इन 16 पारियों मे उन्हें औसतन 98 गेंद तक इंतजार करना पड़ा है।आस्ट्रेलिया,श्रीलंका और अपने घर में पिछले एक साल से लगातार विकेट के लिए तरसकर रह गए हैं कुंबले। ये कुंबले के करियर का दूसरा सबसे बड़ा दौर है,जब उन्हें विकेट के लिए इस कदर जूझना पड़ा है। इससे पहले, 2006 में भी 19 पारियों में भी वो एक पारी में पांच विकेट के लिए तरसते रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन,इस बार कुंबले पर अकेला यही दबाव नहीं था। कुंबले की नाकामी के पिछले दौर में उनका विकल्प खोजने की बात नहीं हो रही थी। लेकिन,यहां न सिर्फ गेंदबाज बल्कि कप्तान के तौर पर भी वो अपनी जगह बरकरार रखने के लिए जूझते दिखायी दे रहे हैं। ये भी एक अजब संयोग है कि दोनों विकल्प ठीक उनके साथ मैदान में तलाशे जा रहे हैं। मोहाली में बेहतरीन गेंदबाजी कर चुके लेग स्पिनर अमित मिश्रा बेशक कोटला पर कारगर साबित नहीं हो पाए लेकिन कुंबले के बाद उनका नाम तो लिया ही जाने लगा है। महेन्द्र सिंह धोनी ट्वेंटी-20 और वनडे के बाद अब टेस्ट में भी मौका मिलने पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस चौतरफा दबाव के बीच कुंबले की मनस्थिति को महसूस करना आसान नहीं है। यहां मुझे टॉनी फ्रांसेस की 'जेन ऑफ क्रिकेट' में कही एक बात याद आ रही है। उनके मुताबिक, पेशेवर क्रिकेट में नब्बे फीसदी आप अपने दिमाग से खेलते हैं,और दस फीसदी अपनी क्षमताओं से। यहां कुंबले उस नब्बे फीसदी से खुद को उबारने में लगे हैं। कहा जाता है कि आप दबाव में हैं, तो अपने गुजरे कल के सबसे बेहतरीन लम्हे को याद कर उससे उबरने की कोशिश करें। लेकिन, शायद कुंबले की ये नियति ही कही जाएगी कि उसी कोटला पर वो अपनी इन चुनौतियों से जूझ रहे हैं,जिसने उन्हें करियर के सबसे यादगार पल दिए। इस हद तक कि कोटला और कुंबले एक दूसरे से हमेशा के लिए जुड़ गए। यही एक अकेला टेस्ट होगा,जहां कुंबले और कोटला के बीच एक अदृश्य सी लकीर खींच गई है।  फिर,ये लकीर इस मुकाबले के आगे बढ़ते बढ़ते लगातार गहराती जा रही है। क्रिकेट आलोचकों का मानना है कि इस विकेट पर चालीस ओवर में तो कुंबले पूरी पारी को ही साफ कर देते थे,लेकिन अब कुंबले के कंधों में पहले जैसी ताकत दिखायी नहीं दे रही। ऐसी ताकत,जो उन्हें विकेट से टर्न से ज्यादा एक उछाल देती थी। आज आलोचकों की निगाहों में कुंबले की गेंदों की पहेली सुलझा ली गई है। कुंबले को अब बल्लेबाज बैकफुट पर भी आसानी से खेलने लगे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सबके बीच कुंबले अपने हर विकेट के साथ इन्हीं सवालों का जवाब देते दिखते हैं। हैडिन का विकेट लेने के बाद मुट्ठी भींचते और चेहरे पर एक जवाबी मुस्कुराहट लाते कुंबले को देख आप इसे महसूस कर सकते हैं। लेकिन,साथ ही ये संदेश भी आप तक पहुंच जाता है कि कुंबले की गेंदों के लिए अब विकेट तक की राह मुश्किल और मुश्किल होती जा रही है। उन पर गहराता ये दबाव उनके रास्ते को और दुरुह बना रहा है। उम्र के इस पढ़ाव पर कुंबले अपने इस चहेते खेल से अलविदा कहने का मन तो बना चुके होंगे लेकिन इंतजार में हैं सही वक्त के। ये भी अजीब संयोग है कि उनकी स्थिति शायद आज के शेयर बाजार में निवेश कर चुके हजारों निवेशकों सरीखी है, जो सेंसेक्स का शिखर देख चुके हैं,लेकिन मंदी के इस दौर में अब बाजार से निकलने का सही वक्त खोज रहे हैं। उन्हें अपने वक्त का इंतजार है, तो कुंबले को भी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4942508908242162849-7927382054787590953?l=npsingh.itzmyblog.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://feeds.feedburner.com/~r/khel/~4/iJ5GJ6WCCRg" height="1" width="1"/&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://npsingh.itzmyblog.com/feeds/7927382054787590953/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4942508908242162849&amp;postID=7927382054787590953" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/7927382054787590953?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/4942508908242162849/posts/default/7927382054787590953?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/khel/~3/iJ5GJ6WCCRg/blog-post.html" title="चौतरफा दबाव के बीच खुद से जूझते अनिल कुंबले" /><author><name>N.P. Singh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09717760577972667115</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel="http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail" width="16" height="16" src="http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif" /></author><thr:total>0</thr:total><feedburner:origLink>http://npsingh.itzmyblog.com/2008/11/blog-post.html</feedburner:origLink></entry></feed>

