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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0"><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-13053295</atom:id><lastBuildDate>Wed, 30 Sep 2009 13:46:06 +0000</lastBuildDate><title>* लखनवी *</title><description /><link>http://lakhnawi.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>32</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/lakhnawi" type="application/rss+xml" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com" /><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-5257311278871355515</guid><pubDate>Wed, 03 Jun 2009 01:14:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-06-02T18:16:25.246-07:00</atom:updated><title>प्रार्थना</title><description>&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;हर वर्ष की भाँति इस बार भी मोहल्ले के लोगों ने महिने भर पहले से ही होली के साँध्य कार्यक्रमों की तैय्यारियाँ प्रारम्भ कर दीं। होली की संध्या को होने वाले कार्यक्रम विविध श्रेणियों में बाँटे जाते हैं – गायन, नृत्य, नाटक तथा वाद्य यंत्र इत्यादि। और, गायन की श्रेणी में एक उप-श्रेणी होती है पाँच से बारह साल के बच्चों की – जो कि मेरी सबसे प्रिय श्रेणी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पड़ोसी सिन्हा जी का दस वर्षीय पुत्र “एकाग्र” गत तीन वर्षों से इस स्पर्धा में भाग ले रहा है, परंतु सर्वथा उसे द्वतीय या तृतीय स्थान से ही संतुष्ट होना पड़ा। “होनहार बिरवान के होत चीकने पात” वाली कहावत एकाग्र पर पूरी तरह से चरितार्थ होती है – अल्प आयु से ही शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहा है, और गायन इतना मँझा हुआ है कि दिग्गजों को भी मात दे दे। मेरे विचार से तो एकाग्र मोहल्ले क्या शहर, प्रदेश और राष्ट्र स्तर की प्रतिस्पर्धा को भी सरलता से जीत सकता है। परंतु, यदि परिणाम जनमत पर आधारित हो तो गुणों के अतिरिक्त कई अन्य कारक भी परिणाम को प्रभावित करते हैं। और, कदाचित इन्हीं अन्य “कारणॉ” के कारण एकाग्र प्रथम स्थान पाने से सदैव वंचित रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गत वर्ष शुक्ला जी की इकलौती प्यारी सी नौ वर्षीय बिटिया गरिमा ने प्रथम स्थान प्राप्त किया था। गरिमा नेत्र हीन है। और, उससे पहले साल पोलियो की मार से ग्रसित अंकुश ने प्रतिस्पर्धा जीती थी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;सारे बच्चे जी-जान से अभ्यास में लगे हुये थे इस बार प्रथम स्थान पाने के लिये। गरिमा ने लता के एक पुराने शास्त्रीय गाने का चयन किया हुआ था, और एकाग्र मन्ना डे के गीतों से लोगों को लुभाने की सोच रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होली से पहले वाली भीनी भीनी ठंढक थी, सूर्यास्त होने वाला था और मंगलवार का दिन था - मैं हनुमान जी के मंदिर की ओर निकल पड़ा। रास्ते में बाग में देखा कि एकाग्र कई बच्चों के साथ खेलने में व्यस्त है। मैंने पास जाकर पूछा, “एकाग्र, क्यों आज गाने का अभ्यास नहीं हो रहा है?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;"अंकल उससे क्या फायदा होगा। मैं जीतने वाला तो हूँ नहीं।"&lt;br /&gt;"फिर भी प्रयत्न तो करना ही चाहिये।" ये कहते हुये मेरे मन में गीता के श्लोक “कर्मण्ये वाधुकारस्ते...” का ध्यान आ गया। पर जब स्वयं को ही उस पर विश्वास न हो तो बच्चे को घुट्टी पिलाना व्यर्थ ही समझा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;“आप कहाँ जा रहे हैं?”, एकाग्र ने पूछा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;“आज मंगल है। हनुमान जी के दर्शन के लिये जा रहा हूँ। साथ चलोगे? परसों ही तुम्हारी गायन प्रतियोगिता है – भगवान के समक्ष माथा टेक लो, शुभ होगा। प्रार्थना कर लेना कि बजरंग बली तुमको ही इस बार विजयी बनायें।"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;एकाग्र सहमति में सर हिलाते हुये मेरे साथ मंदिर की ओर चल पड़ा। मंदिर पहुँच कर हम दोनों ने बेसन के लड्डुओं का प्रसाद चढ़ाया और हाथ जोड़ कर कुछ क्षणों के लिये प्रभु की प्रार्थना करी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;“तो एकाग्र तुमने क्या प्रार्थना की?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;“अंकल, अगर मेरी प्रार्थना स्वीकार हो गयी तो अगले वर्ष मैं ही गायन प्रतियोगिता जीतूँगा।"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;"आखिर ऐसा क्या माँग लिया तुमने?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;“मैंने भगवान से कहा कि मुझे भी अंधा या लंगड़ा बना दें।"&lt;br /&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-5257311278871355515?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/C8dt-5lO4Fw/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2009/06/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-1429978052664365198</guid><pubDate>Thu, 26 Mar 2009 23:01:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-03-26T16:07:19.784-07:00</atom:updated><title>भैय्या.</title><description>&lt;span style="color:#003300;"&gt;कुछ ही महिनों पहले की बात है भगवान श्री राम चंद्र जी स्वर्ग में बैठे बैठे उकता गये। सीता मैय्या से बोले, "हे सीते! मैं क्या करूँ? इतने युगों से एक ही जगह रहते रहते मन उकता सा गया है। सोचता हूँ किसी दूसरी जगह का भ्रमण कर आऊँ।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जैसा आप उचित समझें।", जानकी ने उत्तर दिया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"सोचता हूँ अपनी जन्म भूमि के दर्शन कर आऊँ।" ये कहते हुये श्री राम अपनी अयोध्या यात्रा का प्रबंध करने के बारे में विचार करने लगे। श्री राम ने अभी सोचना प्रारंभ ही किया था कि श्री कृष्ण का आगमन हो गया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"राम, आप किस विषय के बारे में सोच रहे हैं।", श्री कृष्ण ने बिना किसी विलम्ब के प्रश्न पूछ डाला।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"कुछ नहीं, सोच रहा हूँ कुछ दिनों के लिये अयोध्या का भ्रमण कर आऊँ।"&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"अत्यंत ही नेक विचार है। मैं भी आपके साथ चलता हूँ - साथ ही साथ मथुरा और ब्रज के भी दर्शन कर लेंगे।"&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;बात अभी आगे बढ़ती कि उससे पहले ही हमेशा की तरह नारद मुनि बिना बुलाये आगंतुक की भाँति आ धमके।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"श्री राम, श्री कृष्ण, आप दोनों किस विचार विमर्श में व्यस्त हैं?"&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"कुछ नहीं मुनिवर। राम और मैं अयोध्या, मथुरा और ब्रज भूमि के भ्रमण हेतु पृथ्वी लोक जाने कार्यक्रम बना रहे हैं।", श्री कृष्ण ने तत्परता से उत्तर दिया।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"हरे हरे, प्रभु प्रभु! आप लोगों को भारत भूमि के किसी और नगर में जाना चाहिये - कुछ नया कीजिये। पिछले कई युगों ने भारतीयों ने बहु-आयामी प्रगति की है। भारतीयों द्वारा की हुई प्रगति के दर्श्नार्थ हेतु आप दोनों को मुम्बई नामक नगर की ओर प्रस्थान करना चाहिये।", नारद मुनि ने भारतीय परंपरा का अनुसरण करते हुये बिन माँगी सलाह दे डाली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री कृष्ण और श्री राम को नारद मुनि का सुझाव अत्यंत रोचक लगा और दोनों ने नारद मुनि से आग्रह किया कि पुष्पक विमान का मुम्बई प्रस्थान के लिये प्रबंध किया जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारद मिनु ने कहा, "प्रभु, विमान की व्यवस्था तो मैं कर देता हूँ, परंतु एक सलाह है - आप दोनों एक साधारण नागरिक के परिवेष में ही मुम्बई जायें न कि अपने दैवीय वेश भूषा और अलंकारों में।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंततः वो दिवस भी आ गया जब श्री राम और कृष्ण एक आम भारतीय के भाँति मुम्बई नगरी में अवतरित हो गये। प्रातः से सान्ध्य काल तक दोनों ने मुम्बई नगरी का आनन्द लिया और जब मुम्बई नगरी रात्रि के अंधकार से घिर गई तो दोनों ने एक साधारण भारतीय की भाँति लोकल ट्रेन से अपने निवास स्थान जाने का निर्णय लिया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;लोकल ट्रेन में अधिक भीड़ न थी अतः दोनों देवता खिड़की के पास बैठ गये ताकि द्रुत गामी ट्रेन की खिड़की से बाहर देखा जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट्रेन चलते हुये अभी कुछ ही क्षण व्यतीत हुये होंगे कि सात या आठ युवकों का एक समूह दोनों देवताओं के बगल में आ खड़ा हुआ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;एक नवयुवक बोला, "ओये शाणों बाप की ट्रेन है जो खिड़की हथियाये बैठे हो?"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"वत्स, ऐसी अभद्र भाषा.."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री राम अपना वाक्य पूरा भी न कर पाये थे कि दूसरा युवक चिंघाड़ पड़ा, "अबे तुम दोनो साले भैय्या हो क्या?"&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"वत्स ये भैय्या क्या होता है? मैं तुम्हारा तात्पर्य नहीं समझा।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे ये साले सौ परसेंट भैय्या हैं। हिन्दी तो सुनो इन सालों की। ओये शाणों नाम क्या है और किस जगह के रहने वाले हो तुम दोनों?"&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"मेरा नाम राम चंद्र है और मैं अयोध्या नगरी का निवासी हूँ। और, मेरे मित्र का नाम कृष्ण है और ये मथुरा निवासी हैं।"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"मैं बोलता था न कि दोनों भैय्या हैं। अबे सालों तुम लोग यहाँ क्यों आ जाते हो हमारे महाराष्ट्र में - गंदगी फैलाने? तुम लोगों को तो मार मार कर वापस अयोध्या और मथुरा भेज देना चाहिये।"&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;बस ये कहते हुये "वनमानुष" निर्माण सेना के सिपाही डंडा, जूता और चप्पल ले कर पिल पड़े श्री राम और श्री कृष्ण के ऊपर। दुर्भाग्यवश धनुष, चक्र और अपनी दैवीय शक्ति के बिना हमारे देवता अपना बचाव भी न कर सके। उस दिन खूब धुनाई हुई दोनों की - वो तो भला हो भगवान का कि बस जान बच गई।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;ट्रेन से उतरते ही दोनों ने त्वरित गति से मुम्बई नगरी से प्रस्थान किया और भविष्य में भारत भूमि पर वापस आने का विचार सर्वथा के लिये त्याग दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सारी हाये तौबा का हल हमें स्वयं ही निकालना है क्यों कि भगवान भी अब भारत भूमि पर आने से रहे....&lt;br /&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-1429978052664365198?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/Er-nNtKr76w/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2009/03/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-4202466747935319687</guid><pubDate>Wed, 11 Feb 2009 18:17:00 +0000</pubDate><atom:updated>2009-02-11T10:21:36.922-08:00</atom:updated><title>हे भगवान!</title><description>&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कुछ दिन पहले की ही बात है मैं निराशाओं के बादलों से घिरा हुआ था। सोचा चलो प्रभु से ही याचना की जाये। बस पड़ोस के मंदिर में जा धमका। हर भक्त की तरह मैंने भी सौ डेसिबल का घंटा टनटनाया और हाथ जोड़ कर एक पैर पर खड़े हो कर प्रभु से प्रार्थना की - हे प्रभु! अपने इस भटके हुये भक्त का मार्ग प्रदर्शन करो। एक बड़े जोर का धमाका हुआ और जब धुँआ हटा तो अपने समक्ष प्रभु विष्णु को खड़ा पाया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"बोल वत्स तुझे क्या चाहिये?"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"प्रभु आप भी न मजाक करते है। अभी एक मिनट पहले ही तो कहा था कि अपने इस भटके हुये भक्त को सही रास्ता दिखायें।"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"वत्स उस समय मैं पारगमन (transit) में था। परंतु तुम चिंतित न हो। समझो तुम्हरी समस्या का निवारण हो गया है। मेरे पास उपाय है।" &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"प्रभु बताईये मुझ तुक्ष प्राणी को क्या करना होगा।" &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"वत्स तुम्हें कुछ नहीं करना होगा। ये GPS Navigation System ग्रहण करो, बस अब तुम भविष्य में मार्ग से कदापि न भटकोगे।" &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-4202466747935319687?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/XQ4jkI_uT_0/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2009/02/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-762820945633837290</guid><pubDate>Thu, 18 Dec 2008 23:59:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-12-18T16:02:46.124-08:00</atom:updated><title>महापुरुष</title><description>&lt;span style="color:#003300;"&gt;लखनऊ में निवास करते हुये भी मेरा चौक की तरफ जाना यदा-कदा ही होता है। पिछले सप्ताहाँत किसी कारणवश मुझे चौक की ओर जाना ही पड़ गया। मैं चौक के अंगद के पाँव की तरह न हिलने वाले यातायात में फंसा हुआ अपने भाग्य और वाहनों की बढ़ती हुई जनसंख्या को कुशब्दों से अलंकृत कर ही रहा था कि मुझे अपने चौक निवासी परम मित्र संजय त्रिपाठी की याद आ गयी। संजय मेरा बचपन का साथी है - मेरा परम मित्र, लंगोटिया यार। परंतु दुर्भाग्यवश अपरिहार्य कारणों के कारण मैं उससे पिछले एक या दो सालों से मिल नहीं सका हूँ। सोचा आज जब चौक की ओर आ ही गया हूँ तो संजय के घर भी हो लिया जाये। संजय महात्मा गाँधी का परम भक्त, पुजारी और महात्मा की शिक्षायों का अनुयायी रहा है। संजय के जीवन में गाँधी का स्थान समस्त देवी-देवताओं और उसके स्वयं के माता-पिता से ऊपर है। मुझे अच्छे से याद है जब पिछली बार मैं उसके घर गया था तो उसके घर की बैठक की दीवारें पूरी तरह से गाँधी जी के चित्रों से ढंकी हुई थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना व्यक्तिगत कार्य निपटा कर मैं संजय के घर की ओर चल पड़ा। घर पहुँच कर द्वार पर दस्तक दी - संजय ने स्वयं दरवाजा खोला, और मुझे सामने खड़ा देख कर पल भर के लिये जड़वत हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"और संजय क्या हाल चाल हैं?" मेरे इस प्रश्न ने जैसे उसकी निद्रा भंग कर दी हो - दौड़ कर गले लगाया और कोसा भी कि इतने दिनों तक मैं कहाँ गायब रहा। मेरा हाथ पकड़ कर अंदर की ओर खींचता हुआ बोला, "आओ यार, अंदर आओ।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर की बैठक में प्रवेश करते ही मुझे एक झटका सा लगा - ये क्या दीवार पर गाँधी जी का एक भी चित्र नहीं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;मैंने कौतहूलतापूर्वक पूछा, "संजय, गाँधी जी के सारे चित्र कहाँ चले गये?"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;संजय ने मेरे प्रश्न का उत्तर देने के बजाय अपना टीवी चलाया और कोई संगीत प्रतियोगिता का कार्यक्रम लगा दिया।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;"लो ये कार्यक्रम देखो। तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं ही मिल जायेगा।", संजय ने आक्रोश युक्त वाणी में कहा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;वैसे मैं भारतीय टीवी के कार्यक्रमों से उतना ही दूर रहता हूँ जितना कि हमारे नेता गण सच्चाई और इमानदारी से, पर मैंने बड़े संयम के साथ ये वाला कार्यक्रम पूरा देख डाला क्यों कि मुझे अपने प्रश्न का उत्तर जो खोजना था। एक घंटे के उस कार्यक्रम में बारह या तेरह युवक और युवतियों ने फिल्मी गीत गाये - कुछ ने अति सुंदर गाया, कुछ ने ठीक-ठीक और कुछ ने असहनीय। परंतु आश्चर्य की बात कि समस्त निर्णायक एवं स्वयं उद्घोषक महोदय उन प्रतियोगियों का गुणगान किये जा रहे थे जिनका गायन मेरे विचार में अपेक्षाकृत निम्न स्तर का था। और, अंत में निर्णायकों ने एक ऐसे प्रतियोगी को प्रतियोगिता से निकाल दिया जो मेरे विचार में उन निम्न स्तर प्रतियोगियों से कई स्तर ऊपर था। मुझे ये बात समझ में नहीं आई और न ही मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिला। अत: मैंने संजय से पूछ ही डाला, "ये क्या पहेलियाँ बुझा रहे हो?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब संजय की बारी थी और इस बार उसने अविराम कहना प्रारम्भ किया - अतुल, तुमने स्वयं देखा कि कुछ प्रतियोगियों ने कोई बहुत अच्छा नहीं गाया। फिर भी सभी निर्णायकों ने उनकी अधिक प्रसंशा की और कई अच्छा गाने वाले प्रतियोगियों की न केवल उपेक्षा की बल्कि अनावश्यक रूप से उनकी कमियों को ढूँढा। तुम्हें पता है कि जिन प्रतियोगियों के लिये तुमने कहा कि उन्होंने अच्छा नहीं गाया वो सभी पाकिस्तान से आये हैं; और वो प्रतियोगी जिन्हें अच्छे गायन के बावजूद भी फटकार मिली भारतीय हैं। मुझे ये नहीं समझ में आता है कि ये कहाँ का तर्क है कि अपने आप को महान सिद्ध करने के लिये अपने ही लोगों की उपेक्षा की जाये, और दूसरों की अनावश्यक बढ़ा चढ़ा कर प्रसंशा की जाये - उन्हें गले लगाया जाये, उनकी झोली में आँख मूँद कर सब डाल दिया जाये भले ही वो उस योग्य हों या नहीं। अतुल, मुझे पहली बार ये आभास हुआ है कि कुछ लोगों को गाँधी जी क्यों नहीं पसंद थे। हम लोग दूसरों की दृष्टि में महान बनने.....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;संजय बोलता ही रहा, पर अब मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था। थोड़ा समय संजय के साथ बिता कर मैंने एक विचलित मन के साथ उससे विदा ली। पूरे रास्ते मैं बस यही सोचता रहा कि महात्मा ने जो किया क्या वो.....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-762820945633837290?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/3D8nSeKJFFs/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2008/12/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-7610715644357106882</guid><pubDate>Fri, 28 Sep 2007 17:54:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-09-28T10:54:55.582-07:00</atom:updated><title>सत्य वचन - कटु वचन....</title><description>&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इतनी सरलता, सहजता और संवेदना से मैं भी ये विचार व्यक्त नहीं कर सकता था....&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;hr color="blue"&gt;&lt;center&gt;&lt;br /&gt;&lt;object height="240" width="320"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/llplayer/llplayer.swf?file=http://lakhnawi.lifelogger.com/media/videos0/537253_cldiqvsynf_conv.flv&amp;amp;noAuto=1"&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/llplayer/llplayer.swf?file=http://lakhnawi.lifelogger.com/media/videos0/537253_cldiqvsynf_conv.flv&amp;noAuto=1" type="application/x-shockwave-flash" width="320" height="240"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;/center&gt;&lt;hr color="blue"&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-7610715644357106882?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/TMhA9On5TTk/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2007/09/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-303169808527906803</guid><pubDate>Mon, 13 Aug 2007 15:29:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-08-13T08:29:57.521-07:00</atom:updated><title>कल, आज और कल - हैप्पी इंडिपेंडेंस डे!!</title><description>&lt;span style="color:#009900;"&gt;नवभारत टाईम्स&lt;br /&gt;15 अगस्त, 1977&lt;br /&gt;आज भारत की स्वाधीनता दिवस के पावन पर्व पर प्रधान मंत्री ने ध्वजारोपण के समय देश की समस्त जनता को बधाई दी और देश वासियों से भारत की बहु-आयामी प्रगति में जुट जाने के लिये आग्रह किया. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कई नगरों में झाकियाँ निकाली गयीं और विद्यालयों में छात्रों के लिये मिष्ठान वितरण किया गया...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;__________________________________________________&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;नवभारत टाईम्स&lt;br /&gt;15 अगस्त, 2007&lt;br /&gt;आज इंडिया की इंडिपेंडेंस डे के मौके पर प्राईम मिनिस्टर ने फ्लैग सेरोमेनी के समय देश की सारी पॉपुलेशन को कॉंग्रचुलेट किया और सभी सिटिज़ेंस से ये रिक्वेस्ट किया कि वो इंडिया की ऑल-डाईमेंशन प्रोग्रेस में लग जायें. आज इंडपेंडंस डे के दिन कई शहरों में परेड ऑर्गनाईज़ की गयीं और स्कूल्स में स्टुडेंट्स में मिठाईयाँ डिस्ट्रीब्यूट की गयीं...&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;__________________________________________________&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;Navabhaarat Times&lt;br /&gt;August 15, 2027&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Aaj India kee Independence Day ke occasion par Prime Minister ne flag ceremony ke time country kee entire populations ko congratulate kiya aur sabhi citizens se ye request kari ki vo India ki all-dimension progress mein involve ho jayen. Aaj Independence Day ke din kai cities mein parades organize kee gayi aur schools mein students ke liye sweets distribute kee gayee…&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-303169808527906803?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/vcQkgxA-fec/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2007/08/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-7862957106600406538</guid><pubDate>Mon, 13 Aug 2007 15:19:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-08-13T08:19:22.073-07:00</atom:updated><title>वो कौन थी?</title><description>&lt;span style="color:#006600;"&gt;राहुल ने बधाई पत्र को उसके आवरण से निकाल कर पढ़ना प्रारंभ किया, “जीवन का अर्ध शतक सफलतापूर्वक पूर्ण करने की हार्दिक बधाई. आशा है शतक के उत्सव में भी हम सबको आमंत्रित किया जायेगा.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;राहुल ने मुस्कराते हुए सबको धन्यवाद दिया और मेज पर रखे केक पर लगी हुई मोमबत्तियाँ बुझा कर केक को काटने ही जा रहा था कि दृष्टि चौखट पर खड़ी एक छोटी सी लड़की पर जा टिकी. छः या सात साल की वो लड़की मंद मंद मुस्कान के साथ अपने आप को दरवाजे के पीछे छुपाने का असफल प्रयास कर रही थी. राहुल हाथ के इशारे से उसे अंदर बुलाने लगा. सरिता, राहुल की पत्नी, ने पीछे से आकर पूछा, “ये हाथ के इशारे से किसको अंदर बुला रहे हो?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“वो चौखट पर जो छोटी सी लड़की खड़ी है उसी को अंदर बुला रहा हूँ. बहुत प्यारी सी है. सोचा उसको भी अपने जन्म दिवस की खुशी में सम्मलित कर लूँ.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“पर वहाँ पर तो कोई नहीं है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“चौखट के पीछे ही तो खड़ी थी. लगता है भीड़ देख कर भाग गयी.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“पर राहुल चौखट तक कोई आ ही नहीं सकता है. बाहर के गेट पर ताला लगा हुआ है. तुमको कोई भ्रम हुआ होगा.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;रात पूर्णतः फैल चुकी थी - अतिथियों ने एक बार पुनः राहुल को पचासवें जन्मदिवस की बधाई दी और एक एक कर के विदा ली. सभी लोगों के चले जाने के बाद सरिता ने राहुल से कहा, “थक गये होगे. तुम चल कर सोने की तैय्यारी करो. मैं बस थोड़ी सफाई कर के आती हूँ.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;राहुल अपने कमरे के दरवाजे तक पहुँचा ही था कि उसे अंदर से एक छोटी लड़की के खिलखिलाने की आवाज सुनाई दी – कमरे में पहुँचा तो देखा वही छोटी लड़की बिस्तर पर उछल रही थी. पर इस बार उसके बाल दूसरी तरह से बने हुये थे और कपड़े भी भिन्न थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“तुम यहाँ कैसे आ गयी?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;ये सुनते ही वो बच्ची बिस्तर से कूद कर खिलखिलाती हुई कमरे में इधर उधर भागने लगी और राहुल भी एक बच्चे की तरह उसका पीछा करने लगा, “ठहर. अभी पकड़ कर मैं तुम्हारी खैर लेता हूँ. तुम हो कौन? यहाँ कैसे आई?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“राहुल ये क्या बच्चों की तरह भाग दौड़ कर रहे हो? और, ये बातें किससे कर रहे हो?”, सरिता ने पीछे से टोका.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“अरे वही छोटी लड़की....”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“राहुल ये अचानक क्या हो गया है तुमको? थक गये हो चलो अब सो जाओ.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;बिस्तर पर आँख मूँद कर आधा घंटे लेटने के बाद भी राहुल को झपकी नहीं लगी. उठ कर बाहर के कमरे की तरफ चल पड़ा पानी पीने के लिये. जैसे ही राहुल ने फ्रिज खोला, उसकी रोशनी में उसे फ्रिज के बगल में सलवार कुर्ते में सजी एक पंद्रह या सोलह वर्ष की युवती खड़ी दिखाई दी जो राहुल को एकटक देखे जा रही थी. अचंभे की बात कि राहुल को किसी भी प्रकार के भय का अनुभव नहीं हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“कौन हो तुम? अंदर कैसे आ गई सारे दरवाजे और खिड़कियाँ तो अच्छे से बंद हैं. तुम्हारी शकल तो बिल्कुल उस बच्ची से मिलती है जो अभी कुछ देर पहले मेरे सोने के कमरे में उछल कूद मचा रही थी. लगता है जैसे कि मैं तुम्हें पहले से जानता हूँ. कृपया अपना नाम बताओ.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;राहुल की बड़बड़ाहट से सरिता की आँख खुल गयी. सरिता ने बाहर आ कर देखा कि राहुल फ्रिज का दरवाजा खोल कर अपने आप से ही बातें किये जा रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“राहुल तबियत ठीक नहीं लग रही है क्या?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“मैं तो ठीक हूँ. पर इस लड़की से पूछो कि ये अंदर कैसे आ गयी.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“पर राहुल वहाँ तो कोई भी नहीं है. मुझको तो अब डर लगना शुरू हो गया है. कहीं कोई भटकती हुई आत्मा तो नहीं है? कुछ कहती है तुमसे?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“कुछ नहीं. बस मंद मंद मुस्कराती रहती है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“अभी भी खड़ी है वहाँ पर?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“नहीं अब चली गयी है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;राहुल और सरिता दोनों कमरे में आकर सोने का असफल प्रयास करने लगे. सरिता को नींद नहीं आ रही थी भय के कारण, और राहुल सोच रहा था कि वो बच्ची इतनी शीघ्र इतनी बड़ी कैसे हो गयी.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;अगले दिन सरिता को कार्यवश घर से बाहर जाना पड़ा. सरिता की अनुपस्तिथि में उसका चाय पीने का मन होने लगा – अतः उठ कर रसोई में जाकर चाय बनाने लगा. पानी के साथ साथ दूध, अदरक और चाय की पत्ती भी खौलने लगे कि राहुल को याद आया कि चीनी का डिब्बा तो बाहर के कमरे में रखा है. वो जब चीना का डिब्बा ले कर लौटा तो देखा कि गैस के चूल्हे के बगल में साड़ी में लिपटी हुई बीस या बाईस साल की एक युवती खड़ी थी. राहुल कुछ कहता उससे पहले ही वो युवती बोल पड़ी, “चाय कबसे बनानी शुरू कर दी? याद है पहली बार जब चाय बनाई थी तो चीनी की जगह नमक डाल दिया था.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“तुमको कैसे पता?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;युवती कोई उत्तर देती उससे पहले ही घंटी बज उठी. राहुल ने दरवाजा खोला.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“ड्राई क्लीनिंग करवाने वाले कपड़े तो घर में ही भूल गई थी.”, कहते हुए सरिता अंदर आ गई और राहुल को विचलित देख कर पूछा, ““क्या हुआ राहुल? सब ठीक तो है?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“रसोई में एक औरत खड़ी है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;सरिता ने भाग कर रसोई में झाँका, “यहाँ तो कोई भी नहीं है. मुझे तो बहुत डर लग रहा है. ऐसा करो तुम घर में अकेले मत रहो. बाहर जा कर पार्क में टहल आओ. मैं ढाई तीन घंटे में वापस आ जाऊँगी.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;राहुल ने स्वीकृति में सर हिलाया और अकेले का समय व्यतीत करने के लिये पार्क में जाकर बैठ गया. अपने चारों ओर टहलते हुये लोगों और इधर उधर भागते हुये बच्चों को निहारने लगा कि अचानक उसकी दृष्टि कोने में अकेले खड़ी हुई एक दस या ग्यारह साल की लड़की पर पड़ी. वही चेहरा.... वो लड़की राहुल को अपने पास बुलाने लगी और राहुल सम्मोहित सा उसकी ओर बढ़ चला. थोड़ी ही देर में राहुल भी उस लड़की के साथ बाकी के बच्चों की तरह खिलखिलाते हुये भाग दौड़ करने लगा. समय कब व्यतीत हो गया उसे तब पता चला जब पीछे से सरिता की आवाज आई, “घर चलें?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;रास्ते में बगल में रहने वाले शर्मा दम्पति मिले. श्रीमति शर्मा ने सरिता से कहा, “आज तो भाई साहब बिलकुल बच्चों की तरह पार्क में खेल रहे थे और वो भी अकेले.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“पर मैं अकेले...” राहुल ने अपना वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“चलो पार्क में तुम्हारा मन लग गया. पर अकेले ही भाग दौड़...”, घर पहुँच कर सरिता ने राहुल से कहा.&lt;br /&gt;“मैं अकेले नहीं था. मैं तो एक दस या ग्यारह साल की लड़की के साथ... और अचंभे की बात तो ये है कि उसकी शक्ल बिल्कुल उस छोटी बच्ची, किशोर लड़की और युवती से मिलती जुलती थी.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“राहुल तुम मुझे बहुत डरा रहे हो. मैं सोच रही हूँ पंडित जी को बुलाया जाये. खैर मैं खाना बनाने जा रही हूँ जब तक तुम ऊपर वाले कमरे का फ्यूज़ बल्ब बदल दो. मैं बल्ब ले आई हूँ बाहर के मेज पर रखा है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;राहुल ने बल्ब उठाया और ऊपर के कमरे की ओर चल पड़ा. ऊपर पहुँचा तो उसने देखा कि कमरे में रखी हुई कुर्सी पर गुलाबी रंग का सलवार कुर्ता पहने हुये लंबे बालों वाली लगभग उन्नीस वर्षीय एक युवती बैठी हुई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“कौन हो तुम? हर बार अलग अलग वेश-भूषा और आयु में दिखती हो.... मेरे अतिरिक्त किसी और को क्यों नहीं दिखायी देती हो?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“राहुल मैं मात्र तुम्हारे जीवन का अंश हूँ किसी और को कैसे दिखाई पड़ सकती हूँ? तुम्हें पता है मैं कौन हूँ परंतु न जाने क्यों तुम मुझे स्वीकार करने का साहस नहीं कर पा रहे हो.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“नहीं पता है मुझे कि कौन हो तुम. क्या नाम है तुम्हारा?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“मेरा नाम जानने की जिज्ञासा है? मेरा नाम स्मृति है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;ये सुन कर राहुल कुछ देर चुप रहा और फिर धीरे से बोला, “स्मृति – मेरे बचपन और युवा अवस्था की स्मृति. स्मृति, तुम बहुत निष्ठुर हो.”&lt;br /&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-7862957106600406538?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/kUo5_aW6oJc/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2007/06/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-6270797700115341369</guid><pubDate>Mon, 13 Aug 2007 15:18:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-08-13T08:18:45.493-07:00</atom:updated><title>टिस्क!</title><description>&lt;span style="color:#990000;"&gt;मेरे एक पुराने घनिष्ठ मित्र हैं आत्म त्रिवेदी. सातवीं कक्षा से लेकर बारहवीं तक मैं और मेरे समस्त साथी गण इन्हें पंडत (पंडित का बिगड़ा रूप) कह कर ही सम्बोधित करते आये हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हम सबने नवीं कक्षा में पदार्पण किया तो चिकित्सक बनने की चाह वालों ने जीव विज्ञान और अभियंता बनने का स्वप्न देखने वालों ने गणित का चयन किया. पंडत हिन्दी का पुजारी और भक्त था. जयशंकर प्रसाद और रामधारी सिंह “दिनकर” जैसे लोग उसके प्रेरणा पात्र थे. पंडत का स्वप्न था एक कवि, लेखक और उद्घोषक बनने का. अतः बिना किसी झिझक के उसने जीव विज्ञान और गणित का परित्याग कर के संस्कृत के चरणों में मस्तक रख दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय बीता – कुछ यार दोस्त डॉक्टर बन गये और कुछ रो पीट कर अभियंता. और, पंडत इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी और संस्कृत का विद्वान बन कर प्रकट हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडत के लेख और कवितायें धर्मयुग और सारिका जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपने लगे. कुछ ही वर्षों में भारी भरकम वेतन के साथ एक मासिक हिन्दी पत्रिका का संपादक भी बन बैठा. पर ये सब तो लगभग बीस-पच्चीस साल पुरानी बात है. समय कुछ अधिक तेजी से ही बदला. समय के हथौड़े से धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं की दोनों टाँगें टूट गयीं - कुछ समय तक तो घिसट घिसट कर चलती रहीं, पर अंततः लाभ और हानि के आँकणों के सामने आकर दम तोड़ दिया. अब भला पंडत की छोटी सी पत्रिका की क्या औकात - उसे भी कुछ वर्षों के उपराँत आत्म-दाह करना ही पड़ गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तैंतालीस वर्ष की आयु में पंडत एक बार पुनः ढंग की नौकरी ढूँढने में लग गया. घर में बीबी उलाहना देती फिरती – अरे अगर अंग्रेजी में कुछ किया होता तो कम से कम “एक महिने में फ़र्राटे दार अंग्रेजी बोलना सीखें” जैसे कोचिंग कॉलेज में ठीक ठाक नौकरी मिल जाती. पंडत का पंद्रह साल का किशोर लड़का भी दुखी रहता कि उसके “डैड” बिलकुल भी “कूल” नहीं है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;पंडत के पास कुछ एक हिन्दी के समाचार पत्रों से प्रस्ताव आये, पर इन समाचार पत्रों के हिन्दी के निम्न और घटिया स्तर को देख कर उसका मन खिन्न हो उठा. साथ में उसे ये भी लगा कि इन समाचार पत्रों में नौकरी करने से वो कभी भी अपने पुत्र के लिये एक “कूल डैड” नहीं बन सकेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस इसी उधेड़बुन के साथ पंडत मेरे साथ बैठा चाय की चुस्कियाँ ले रहा था, और साथ में बैठे थे मेरे एक और मित्र राजीव सिंह. राजीव ने पंडत की करुण गाथा सुनी और गला खंखारते हुये पंडत को सलाह दी, “त्रिवेदी भाई आप कहानियाँ लिखते हो, कवितायें रचते हो. अपने इन गुणों का सदुपयोग “बॉलीवुड” में क्यों नहीं करते हो? और, आपके बेटे को भी ये कहते हुये गर्व होगा कि उसका “डैडी” भी बॉलीवुड की एक हस्ती है. अगर आप जरा भी रुचि रखते हों तो बेझिझक मुझे बतायें मैं आपकी भेंट बॉलीवुड की कुछ हस्तियों से करवा दूँगा.” मैंने राजीव को एक तिरछी प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा. राजीव ने मेरी ओर मुस्कुराते हुये कहा, “अरे भाई ऐसे क्यों देख रहे हो. मुम्बई में नौकरी के साथ साथ रंगमंच पर भी काम करता हूँ. उसी के जरिये किरन गौहर से भेंट हो गयी और उसकी तीन चार फिल्मों में छोटी मोटी भूमिकायें करने को मिल गयीं. किरन से मेरी ठीक ठाक जान पहचान है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;पंडत ने उत्सुकता से कहा, “हाँ एक महिला के लिये साहित्यिक कार्य करना अच्छा भी रहेगा क्यों कि पुरुषों की अपेक्षा महिलायें अधिक संवेदनाशील होती हैं.” राजीव ने हँस कर उत्तर दिया, “त्रिवेदी भाई, किरन गौहर कोई औरत वौरत नहीं बल्कि आदमी हैं. हाँ हाव भाव अवश्य महिलाओं जैसे हैं. लगता है आपने उनकी ब्लॉक-बस्टर फिल्में देखी नहीं हैं. ‘कभी सुट्टा कभी रम’, ‘कभी आलू बड़ी न खाना’ और ‘कब्ज़ हो न हो’ जैसी महान कृतियाँ उन्हीं के दिमाग की उपज हैं.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, पंडत ने राजीव की सलाह स्वीकार कर ली और पहुँच गया मुम्बई अपनी लेखनी से सबको सम्मोहित करने. पंडत का सौभाग्य कि किरन ने “क” अक्षर से एक और “कूड़ा” बनाने का निर्णय लिया और एक नये गीतकार की खोज प्रारंभ हो गयी. राजीव भी मौके का लाभ उठाते हुये पंडत को लेकर किरन के समक्ष उपस्थित हो गया. किरन ने मुस्करा कर पंडत और राजीव से पूछा, “विल यू लाईक टु हैव कॉफी विद किरन गौहर.” सारी बेकार की औपचारिकताओं के बाद किरन ने पंडत से कहा, “आत्म डियर, हेयर इज़ ए सीन फ्रॉम माई न्यू मूवी. हेरोईन इज़ गेटिंग मैरिड. हर फ्रेंड्स ऐंड रिलेटिव्ज़ आर सिलेब्रेटिंग, डाँसिंग ऐंड सिंगिंग. कैन यू राईट ए नाईस साँग फॉर दिस सिचुएशन?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडत हाथ में कलम और एक पन्ना लेकर कोने में जा बैठा. करीब आधा घंटा तक सर खुजाने के बाद पंडत के दिमाग के घोड़े थोड़े गतिशील हुये. कुछ देर के बाद वो किरन के समक्ष अपनी रचना लेकर उपस्तिथ हुआ -&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;em&gt;सखी तुझे इस पावन बेला पर क्या दूँ मैं उपहार,&lt;br /&gt;बस प्यार के इस दोने में कर कुछ स्मृतियाँ स्वीकार.&lt;br /&gt;जब पिया जायें परदेस, और अकेली हो तुम साँझ सवेरे,&lt;br /&gt;चुम्बन कर लेना दोने का, आ जाऊँगी झूले की पेंग लगा आँगन में तेरे.&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;“होल्ड इट होल्ड इट.” किरन ने झुँझलाते हुये कहा, “ये कौन सी लैंग्वेज़ में लिख रहे हो? आई आस्क्ड यू टु राईट इन हिन्दी, नॉट इन संस्कृत. ये सब कौन से वर्ड हैं? हू विल अंडरस्टैंड दीज़ – दोना, स्वीकार, उपहार ऐंड समरितया व्हाट एवर दैट इज़. आई वान्ट समथिंग मॉडर्न, पेपी ऐंड स्टाईलिश.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;पंडत को एक हजार वोल्ट का झटका लग गया. बेचारा आँसुओं को किसी तरह रोक कर राजीव के साथ भौंचक्का सा वापस घर आ गया. उसी शाम को राजीव के घर राजीव के एक सॉफ्टवियर इंजीनियर मित्र नितिन पधारे. पंडत से भी मिले. कॉफी पी, समोसे खाये और साथ में गीत लेखन से संबन्धित सुबह का किस्सा सुना. नितिन ने हँसते हुये कहा, “आत्म यार तुम भी कहाँ अकल के घोड़े दौड़ाने में लग गये. कंप्यूटर का जमाना है. अब अगर कंप्यूटर सारे वाद्य यंत्रों की जगह ले सकता है तो गीत की धुन क्यों नहीं बना सकता है? अरे मैं तो यह भी कहूँगा कि गीत की रचना क्यों नहीं कर सकता है? मानता हूँ कि ऐसे गीतों में कोई भावना या मादकता नहीं होगी, पर आजकल संगीत भी तो हर चीज की तरह एक प्रयोज्य (disposable) वस्तु होकर ही तो रह गया है. मैंने एक सॉफ्टवेयर लिखा है “टिस्क” (TISC – The Incredible Song Constructor). आप इसमें अपने मनपसंद शब्दों की सूची डाल दीजिये, “गीत रचना” बटन पर क्लिक कीजिये – बस मेरा जादुई “टिस्क” शब्दों की सूची में से कुछ शब्दों का चुनाव कर के उन्हें एक अनियमित क्रम में रख कर गीत बना डालेगा. मैं अभी ऑफिस से ही आ रहा हूँ. मेरा लैपटॉप साथ में है, अगर तुम चाहो तो “टिस्क” का प्रयोग कर के देख लो.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;पंडत ने मरे मन से कहा – चलो ये भी कर के देख लिया जाये. लैपटॉप चलाया गया. “टिस्क” में गीत श्रेणी चुनी गयी “मॉडर्न”. “मॉडर्न” श्रेणी के लिये नीचे लिखे शब्द पहले से ही शब्द-सूची में पड़े हुये थे:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माही&lt;br /&gt;बल्ले बल्ले&lt;br /&gt;हड़िप्पा&lt;br /&gt;चूड़ियाँ&lt;br /&gt;शरारा&lt;br /&gt;बेबी&lt;br /&gt;पार्टी&lt;br /&gt;लव&lt;br /&gt;यू&lt;br /&gt;कुड़ी&lt;br /&gt;किस&lt;br /&gt;आई&lt;br /&gt;वाना (वांट टू)&lt;br /&gt;आहा आहा&lt;br /&gt;यो&lt;br /&gt;कूल&lt;br /&gt;रब्बा&lt;br /&gt;ओ या&lt;br /&gt;गल&lt;br /&gt;नसीबा&lt;br /&gt;और भी कई अंग्रेजी और पंजाबी के शब्द....&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;पंडत ने धड़कते हृदय से “गीत रचना” वाला बटन क्लिक कर किया, और ये लो लैपटॉप की स्क्रीन पर एक “मॉडर्न” गीत तैय्यार हो कर आ गया:&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;em&gt;ओ या&lt;br /&gt;आहा आहा&lt;br /&gt;ओ या&lt;br /&gt;यो बेबी यो बेबी, ओ या&lt;br /&gt;आई वाना टेल यू आहा आहा&lt;br /&gt;वाना वाना टेल यू बेबी&lt;br /&gt;यू कूल यू क्यूट, आई लव यू ओ या&lt;br /&gt;ओ....&lt;br /&gt;माही.. माही वे...&lt;br /&gt;रब्बा तेरे नसीबा आया...&lt;br /&gt;एक कूल डूड... हाऊज़ दैट..&lt;br /&gt;हियर इज़ द पार्टी...&lt;br /&gt;ओ या&lt;br /&gt;मैं हाथों विच लगा दे मेंहदी..&lt;br /&gt;बालों विच लगा दे गजरा..&lt;br /&gt;पहन दे शरारा...&lt;br /&gt;यो बेबी यू डाँस.&lt;br /&gt;मेरी प्यारी कुड़ी बनी एक दुल्हन...&lt;br /&gt;आई वाना किस यू, वाना वाना किस यू बेबी...&lt;br /&gt;हाऊज़ दैट..&lt;br /&gt;ओ या.&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ये पढ़ कर पंडत ने अपना माथा मेज पर दे मारा, बोला, “ये क्या कचरा है. इसको गीत कहते हो?” नितिन ने तत्परता से कहा, “अरे पहले इसे किरन को सुना कर आओ फिर कुछ कहना.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;अगले दिन सुबह सुबह ही पंडत और राजीव जा पहुँचे किरन के घर और पंडत ने एक ही साँस में “अपना” नया “साँग” सुना डाला. “साँग” खतम होने के बाद कमरे में कुछ देर शांति छाई रही, फिर अचानक किरन ने दौड़ कर पंडत को गले लगाते हुये कहा, “फेंटास्टिक, सुपर्ब, माईंड-ब्लोईंग.” पंडत की बोहनी हो गयी और वो एक बार पुनः प्रसिद्धि के पथ पर चल पड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले हफ्ते काम के सिलसिले में मुम्बई जाना हुआ. पंडत से मिलने उसके घर भी गया. घर और घर की साज सज्जा से पंडत की नयी संपन्नता झलक रही थी. मैंने पंडत से उसके पुनर्जन्म और नये अवतार के बारे में पूछा. एक लम्बी सी आह भरते हुए पंडत ने कहा, “लड़का मुझ पर गर्व करने लग गया है. बीबी भी खुश रहती है. लक्ष्मी देवी भी कृपालु हो गयी हैं. पर ये सब मुझे प्राप्त हुआ है आत्म त्रिवेदी की हत्या कर के. बस यही सोच कर हृदय से ग्लानि का बोझा हटाने का प्रयत्न करता हूँ कि आत्म त्रिवेदी को मैंने अकेले ही नहीं मारा है. उसके और उसके जैसे कई और लोगों की आसमयिक मृत्यु के लिये भारत के कई बड़े नगरों की बड़ी जनसंख्या उत्तरदायी है. दिल ढूँढता है फिर वही....”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;साहिर, शैलेन्द्र, कैफी आज़मी और गुलज़ार को समर्पित.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-6270797700115341369?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/gt524mQmyv0/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2007/01/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-4279070038760495854</guid><pubDate>Tue, 08 May 2007 14:29:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-05-08T07:29:48.032-07:00</atom:updated><title>ऐसा और कहाँ....</title><description>&lt;span style="color:#003300;"&gt;कई दिनों की व्यस्तता के पश्चात पिछले सप्ताहाँत थोड़ा खाली समय मिला. सोचा चलो कुछ घुमाई कर ली जाये. जंग खाती हुई अपनी दस-बारह साल पुरानी खटारा मारुति निकाली और चल पड़ा कनॉट प्लेस की ओर.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;किस्मत ने थोड़ा साथ दिया और आसानी से पार्किंग मिल गई. अपनी कार खड़ी ही कर रहा था कि बिना चाहते हुए भी बगल में खड़ी चमचमाती हुई टोयोटा कैमरी पर नजर पड़ ही गयी. सुना है मिला जुला कर तकरीबन बीस या पच्चीस लाख की पड़ती है. मन ही मन सोचा किसी नेता, अभिनेता या स्मगलर की होगी – बिना चोरी चमारी किये कोई इतना पैसा कमा ही नहीं सकता है कि ऐसी कार खरीद सके. चाभी उमेंठ कर अपनी कार का दरवाजा बंद कर के चलने ही वाला था कि बगल वाली कार के रिमोट दरवाजों की बंद होने वाली ध्वनि ने एक बार पुनः ध्यान आकर्षित कर लिया. देखा कार के बगल में अपनी ही उमर के एक महानुभाव सूट और टाई लगाये खड़े हुये थे. नजरें थोड़ी और पैनी हुई तो हाथ में कीमती विदेशी घड़ी और आँखों पर असली रे-बैन का धूप का चश्मा भी दिख गया. रे-बैन से जब नजरें हटीं तो चेहरे पर भी ध्यान चला गया – चेहरा कुछ पहचाना सा लगा. अरे ये तो मनोज सिंह लगता है. पर मन ने ये स्वीकार करने से साफ मना कर दिया.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;मनोज सिंह आठवीं से लेकर बारहवीं तक मेरी ही कक्षा में हुआ करता था. पढ़ने लिखने में सबसे पीछे, पर आवारागर्दी, सिगरेट पीने, स्कूल कट करने और बाकी की सभी दुर्गणों में अग्रणी था. जिस प्रकार हिन्दी फिल्मों का नायक लफंगागिरी, आवारागर्दी, चोरी चमारी वगैरह वगैरह करने के उपराँत भी एक नेक इंसान और दिल का अच्छा होता है; उसी प्रकार मनोज भी दिल का बहुत साफ था – और, मात्र इसी कारण मेरी उससे बात चीत हो जाती थी. परंतु मैं था पढ़ाई में अग्रणी. अतः मेरे सभी हितैषियों ने सलाह दी कि मनोज जैसे प्राणी से मुझे कोसों दूर रहना चाहिये. उसके बाद से मेरी मनोज से भूले भटके साल में दो या तीन बार बात हो जाती थी – वो भी तब जब उसका मन गलती से विद्यालय-दर्शन के लिये आतुर हो जाता था. बारहवीं के बाद मैं घिस-घिसा कर भारत के अग्रणी इंजीनियरिंग कालेज में पहुँच गया. कुछ साल के बाद पता चला कि मनोज ने फैज़ाबाद से बी.ए. कर के पढ़ाई छोड़ दी थी और घर में खाली बैठ कर अपने पिताजी का रक्तचाप बढ़ाने में लग गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतनी घिसाई करने के बाद मैं एक पुरानी मारुति में और मनोज सिंह कैमरी में – ये कुनैन की गोली तो निगली ही नहीं जा पा रही थी. खैर दिल थोड़ा बड़ा कर के मैं उन महानुभाव की ओर बढ़ा और हिम्मत कर के एक प्रश्नवाचक दृष्टि से पूछा, “मनोज सिं...?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“अरे अतुल! क्या बात है. पूरे 25 साल बाद मिल रहे होंगे. हाँ भाई मैं वही पुराना मनोज हूँ.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“पुराने वाले मनोज तो नहीं हो सकते हो – ये गाड़ी, ये ठाठ... नेता बन गये, पुलिस में भर्ती हो गये या स्मगलिंग वगैरह करने लग गये?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“ऐसा कुछ नहीं है. यार मैं आवारा और लफंगा जरूर था पर किसी को नुकसान पहुँचाने वाला गैर कानूनी काम न तो कभी किया और न ही करने का विचार है.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“तो ये नई नई कैमरी...?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“अरे यार ये तो भारतीय क्रिकेट टीम के वर्ड कप से बाहर हो जाने का परिणाम है.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“सट्टा बाजी की थी क्या?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“तौबा तौबा. भाई मैं इज्जतदार बिजनेस मैन हूँ. अपनी फैक्टरी है. अभी मुझे एक जरूरी मीटिंग में जाना है. अपना पता बताओ मैं कल तुम्हारे घर आता हूँ.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;मैंने अपना कार्ड मनोज के हाथों में थमाया और हम दोनों अपने अपने रास्ते निकल गये.  अगले दिन सुबह सुबह ही मनोज घर आ धमका. पाँच दस मिनट बैठा और बोला, “चलो तुमको अपनी फैक्टरी ले चलता हूँ.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;मैं तैय्यार हो कर उसके साथ निकल पड़ा – मन आतुर हो रहा था मनोज की सफलता का रहस्य जानने के लिये. आधे घंटे के बाद मैं उसकी नौएडा की फैक्टरी की सामने खड़ा था. फैक्टरी में जाने से पहले मैंने पूछा, “मनोज, फैक्टरी तो देख ही लेंगे पर पहले ये बताओ कि वर्ड कप और कैमरी का क्या संबंध है.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“अतुल भाई ये बताओ कि भारत में लोग सबसे अधिक समय क्या करने में बरबाद करते हैं?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“इस तरफ तो कभी सोचा ही नहीं.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“मैं बताता हूँ – हड़ताल, धरना देना, मोर्चा निकालना, तोड़ फोड़ करना और इसी से मिलती जुलती कई तरह की हरकतें करना. अब ये बताओ कि इन हरकतों को सफलतापूर्वक करने के लिये किन किन चीजों की आवश्यकता पड़ती है?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“लोगों की?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“अरे भारत में फालतू के लोग हजारों लाखों में मिल जाते हैं. लोगों के अलावा जरूरत होती है मालों की, जूते चप्पलों की, पुतलों की, बैनर्स की. जिस दिन भारत वर्ड कप से बाहर हुया – मुझे पता था कि अगले ही दिन पूरे भारत में गली गली धरने दिये जायेंगे; जुलूस निकलेंगे; क्रिकेट की अर्थियाँ जलाई जायेंगी; सचिन, राहुल और धोनी वगैरह के पुतले जलाये जायेंगे और कुछ एक के घरों में ईंटे पत्थर भी फेंके जायेंगे. मतलब कि अगले ही दिन इन सब चीजों की भारी तादात में माँग होगी. बस मेरी फैक्टरी ने तुरंत थोक के भाव सबके पुतले, क्रिकेट की अर्थियाँ, फेंकने योग्य सस्तमूले जूते चप्पल बनाने शुरू कर दिये. अगले तीन हफ्तों में मैंने करीब तीस लाख रुपये का कचरा बेच डाला और बस कैमरी आ गई.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया, “जीनियस यार जीनियस. ऐसा धाँसू आईडिया मेरे दिमाग में क्यों नहीं आया.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“अब तो तुम्हें पता ही चल गया होगा कि मेरी फैक्टरी में क्या बनता है. फिर भी अंदर चलो.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;फैक्टरी में प्रवेश करते ही सबसे पहले देखा कि पुतले बनाये जा रहे है. मैं कुछ कहता उससे पहले ही मनोज ने कहना प्रारंभ कर दिया, “सामान की माँग परिस्तिथियों और घटनाओं के हिसाब से बदलती रहती है. पर फेंकने योग्य सस्तमूले जूते चप्पल, मालाओं और ईंटे पत्थर हमेशा ही माँग में रहते हैं.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“पर कोई ईंटे पत्थर क्यों खरीदेगा. ये तो हर गली नुक्कड़ में भरे पड़े रहते हैं.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“इन केस अगर आपका धरना या प्रदर्शन किसी साफ सुथरी जगह हो रहा हो तो अचानक थोक में ईंटे पत्थर कहाँ से लाओगे?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“खैर ये पुतला किसका बन रहा है?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“ये वाला शिल्पा शेट्टी का है और वो रिचर्ड गियर का है. भला हो दोनों का कि खुले आम किस कर लिया – बस, मेरी योरोप ट्रिप का पैसा निकल आया. महान देश है अपना. आप पैंट और कच्छा उतार कर खुले आम हग और मूत सकते हैं, पर किस नहीं कर सकते हैं. मैं तो मनाता हूँ कि ऐसे लोगों की जनसंख्या दिन दूनी और रात चौगनी बढ़े – भाई अपने धंधे के लिये अच्छा है वरना मेरे जैसा निकम्मा और निखट्टू सुलभ शौचालय साफ करता मिलेगा.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;थोड़ा और आगे बढ़ा तो देखा एक ओर छोटे छोटे पतली प्लास्टिक़ के बैगों का ढेर लगा था और पास में कड़ाहों में लाल रंग का द्रव्य.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“अब ये क्या बन रहा है?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“टमाटर. विपक्षी दल के नेता के भाषण में सड़े टमाटरों के प्रयोग से तो तुम परिचित हो ही. पर इस युग में इतने महंगे टमाटर कौन फेंकेगा? पहले तो लोग सड़े गले टमाटर फेंक लिया करते थे, पर जबसे ये एम. एन. सी. कंपनियाँ आई हैं सड़े गले टमाटर टोमैटो केचप और सॉस में प्रयुक्त हो जाते हैं”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फैक्टरी देखने के बाद मेरा घर जाने का समय आ गया. वापसी में मैंने मनोज से पूछा, “भारत अब विकास के पथ पर है. तुम्हारा ये धंधा कब तक चलेगा?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“जब तक सूरज चाँद रहेगा. अब देखो न परसों ही मंदिरा बेदी ने एक साड़ी पहन ली जिस पर भारत का झंडा बना था और वो झंडा मंदिरा के घुटनों के नीचे था – बस मच गयी हाये तौबा. अब अगले एक दो दिन इस घटना के हवन के लियी सामग्री बनानी पड़ेगी. जब तक अपना देश ऐसे बेवकूफों से भरा रहेगा, मेरा धंधा तो फलता फूलता रहेगा. अभी तो मैं सिर्फ बड़े बड़े शहरों में माल सप्लाई करता हूँ. अगर मेरी पहुँच गाँव गाँव हो गयी तो करोड़ों की आमदनी हो जायेगी. चाहो तो मेरे बिजनेस में भागीदार बन जाओ. मुझसे ज्यादा पढ़े लिखे हो – बिजनेस बढ़ाने में मेरी मदद करो. इंटरनेट शिंटरनेट पर भी डालो.  ये लो तुम्हारा घर आ गया. और हाँ मेरे प्रस्ताव के बारे में ध्यान से सोचना.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;पूरा एक सप्ताह हो गया है मनोज से मिले हुये. इन पिछले चार पाँच दिनों में मेरी भी दबी हुई इच्छाओं ने पेंगे मारनी शुरू कर दी हैं – अपना भी मन होता है आलीशान गाड़ी चलाने का. सोच रहा हूँ नौकरी छोड़ कर मनोज के व्यवसाय में भागीदार बन जाऊँ. भारत जैसे देश में इस तरह का धंधा तो बंद होने से रहा – इससे अच्छी नौकरी-सुरक्षा और कहाँ मिलेगी. मेरी तो सलाह है कि आप भी हमारे गुट में शामिल होने की सोचें. मेरे प्रस्ताव के बारे में अपने विचार टिप्पणी के माध्यम से छोड़ दें. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-4279070038760495854?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/zMAdReq_N9o/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2007/05/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-6113431356486067297</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:46:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:46:07.185-07:00</atom:updated><title>वानरतंत्र</title><description>&lt;span style="color:#000099;"&gt;प्राचीन समय में अनंत वन में शक्तिशाली सिंह अभयंकर का एकक्षत्र राज्य था. अभयंकर एक अत्यंत ही निपुण, शिक्षित, साहसी, विद्वान एवं उदार शासक था तथा राज्य को सुचारुपूर्वक चलाने में पूर्णतः सक्षम था. अनंत वन के सभी प्राणी और समस्त पड़ोसी राज्यों के राजा अभयंकर का आदर करते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंतु हर राज्य या राष्ट्र में ऐसे तत्व अवश्य होते हैं जिनकी मानसिकता विनाशकारी होती है और उनको किसी भी प्रकार के संतुष्ट नहीं किया जा सकता है. दुर्भाग्यवश, अनंत वन के वानर इसी श्रेणी के नागरिकों में आते थे. वानर समुदाय चोरी, तोड़ फोड़, अन्य नागरिकों के कार्य में विघ्न पहुँचाने तथा वन के नियमों का उल्लंघन करने में अग्रणी था. राज्य में उचित व्यवस्था बनाये रखने के लिये अभयंकर ने कड़े नियम स्थापित कर रखे थे और इन्हीं नियमों के कारण वानर खुल कर मनमानी करने में अक्षम थे. इसी कारण से समस्त वानर अभयंकर से क्षुब्ध थे और उसको किसी प्रकार से अपदस्थ करना चाहते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन वानरों का मुखिया दुष्कामी घूमते घूमते पड़ोसी राज्य जनराष्ट्र में पहुँच गया. जनराष्ट्र अनंत वन का मित्र राज्य था और वहाँ के अधिकांश नागरिक सुशिक्षित तथा स्व-अनुशासित थे. दुष्कामी को जनराष्ट्र के राज-काज की पद्धति अलग सी प्रतीत हुई अतः वो जनराष्ट्र में कुछ दिनों के लिये रुक गया वहाँ के राज-काज की पद्धति के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिनों के पश्चात दुष्कामी अनंत वन वापस आया और उसने घूम घूम कर सभी नागरिकों को ये बताना प्रारम्भ कर दिया कि जनराष्ट्र किस प्रकार से भिन्न है. दुष्कामी ने एक नागरिक सभा का आयोजन किया और नागरिकों को सभा में आने के लिये निःशुल्क भोजन का लोभ दिया. सभा में दुष्कामी ने बताया कि जनराष्ट्र में प्रजातंत्र है – राज्य के नागरिक मिल जुल कर ये निर्णय लेते हैं कि उनका शासक कौन बने. कोई भी नागरिक राज्य के शासक के पद के लिये अपना नामांकन कर सकता है भले ही वो अशिक्षित या भ्रष्टाचारी ही क्यों न हो. राज्य के नागरिक मतदान देकर निर्वाचन में खड़े किसी एक उम्मीदवार को अपना शासक चुनते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनंत वन के सभी नागरिकों को प्रजातंत्र का विचार बहुत ही भाया और सभी ने अभयंकर के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत किये. अभयंकर ने कहा कि यदि प्रजातंत्र के माध्यम से एक अत्यंत सक्षम शासक का चयन हो सकता है जो कि राज्य को कुशलतापूर्वक सुचारु रूप से चला सके, तो मुझे प्रजातंत्र से कोई आपत्ति नहीं है. अभयंकर ने उसी समय घोषणा की कि अनंत वन में प्रजातंत्र की स्थापना की जा रही है और अगले माह शासक चुनने के लिये मतदान किये जायेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्वाचन हेतु दुष्कामी और अभयंकर का नामांकन हुआ. अभयंकर को विश्वास था कि अनंत वन की जनता दुष्कामी जैसे दुराचारी की जगह उस जैसे निपुण, शिक्षित, साहसी, एवं विद्वान को ही अपना शासक चुनेगी. परंतु सभी वानरों ने, जो कि समस्त राज्य की 25 प्रतिशत जनसंख्या थी, दुष्कामी को ही अपना मत दिया. वानरों के अतिरिक्त राज्य के अशिक्षित नागरिकों ने भी दुष्कामी द्वारा दिये गये उपहारों को स्वीकार कर के अपना मत दुष्कामी के हित में डाल दिया. अंततः चुनाव परिणाम ने दुष्कामी को अनंत वन का शासक घोषित किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुष्कामी के विजयी होते ही समस्त वानर और उनके जैसी मानसिकता रखने वाले अन्य नागरिकों की पौ-बारह हो गयी. और, देखते ही देखते समस्त राज्य में अराजकता फैल गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रति वर्ष चुनाव होते पर परिणाम सर्वदा एक ही होता – दुष्कामी की विजय, अभयंकर की पराजय और अराजकता का विस्तार. अंततः अभयंकर ने राजनीति से सन्यास ले लिया और एक विद्यालय की स्थापना की. विद्यालय स्थापना के दिवस एक नागरिक ने अभयंकर से पूछा कि उसने किसी और कार्य के बारे में क्यों नहीं सोचा. अभयंकर ने उत्तर दिया -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी प्रजातंत्र की सफलता के लिये ये अत्यंत ही आवश्यक है कि उस राज्य या राष्ट्र के अधिकांश नागरिक शिक्षित, स्वयं ही अनुशासित हों, भ्रष्ट न हों, और सही और गलत को पहचानते हुये उचित निर्णय में सक्षम हों. और, ये तभी संभव है जब कि शिक्षा की आधारशिला ऐसे नागरिक बनाने के लिये रखी जाये. मेरे विचार से अनंत वन के नागरिक इस प्रकार से शिक्षित नहीं किये गये थे. हम लोगों ने शिक्षा को मात्र गणित, भौतिकी और रसायन शास्त्र की सीमाओं में बाँध दिया है. मेरा ऐसा मानना है कि अनंत वन प्रजातंत्र के लिये तैय्यार नहीं था, और, प्रजातंत्र की इमारत बिना एक ठोस आधारशिला के खड़ी कर दी गयी. बंदर के हाथ में कृपाण दोगे तो वो दूसरों के साथ साथ अपनी भी गर्दन काट डालेगा. प्रजातंत्र एक कृपाण ही है – इसे देने से पूर्व यह निश्चित कर लेना चाहिये कि इसे ग्रहण करने वाला इसको उचित प्रकार से प्रयोग में ला भी पायेगा अथवा नहीं. इस विद्यालय की स्थापना के पीछे मेरा एक मात्र उद्देश्य है अज्ञानता का विनाश कर के अच्छे नागरिक बनाना जो कि प्रजातंत्र को एक उचित दिशा में ले जा सकें – स्वार्थ रहित. और, इस वानरतंत्र को हटा कर एक वास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना कर सकें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभयंकर ने जगह जगह इस प्रकार के विद्यालयों और महा-विद्यालयों की स्थापना की - परिणाम स्वरूप अगली पीढ़ी के नागरिकों ने अभयंकर जैसे योग्य व्यक्ति को एक बार पुनः शासक के पद पर स्थापित कर दिया.&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-6113431356486067297?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/7ovW_-PgpEE/blog-post_10.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2007/03/blog-post_10.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-1982747726851774442</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:45:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:45:21.642-07:00</atom:updated><title>नामों का चक्कर.</title><description>&lt;span style="color:#6666cc;"&gt;पुनीत और सुनीत जुड़वा भाई – दोनों ही पढ़ने में अव्वल. बिना कोई कोचिंग किये ही दोनों ने भारतीय औद्योगिकी संस्थान (आई. आई. टी.) की दीवार पार कर ली और चार साल बाद कैंपस में आने वाली प्रसिद्ध कंपनियों की साक्षात्कार की पंक्तियों में खड़ा होना शुरू कर दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकतर भारतीय अभियाँत्रिकी (इंजीनियरिंग) छात्रों की तरह पुनीत और सुनीत भी एक नामी गिरामी साफ्टवेयर कंपनी के अंग बन गये – अब ये बात तो बेकार की ही है कि पुनीत ने मेकैनिकल और सुनीत ने केमिकल में इंजीनियरिंग की है. खैर, अधिकतर भारतीय साफ्टवेयर अभियंताओं (इंजीनियर) के पद चिन्हों पर चलते हुये पुनीत और सुनीत भी पहुँच गये संयुक्त राज्य अमेरिका – संक्षिप्त में अमेरिका.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी जेट लैग पूरी तरह से ठीक भी नहीं हुआ था कि ऑफिस के लोगों ने एक पिकनिक का आयोजन कर दिया. दोनों बन्धु भी पहुँच गये – सोचा इसी बहाने लोगों से खुल कर मिलना जुलना भी हो जायेगा. कुछ देर बाद पुनीत को अचानक कुछ याद आया और आदतन सुनीत को उसके घर के नाम से पुकार बैठा, “ए रिंकू, अब घर के लिये निकलते हैं. आज घर फोन करना है.” सुनीत ने पलट कर कहा, “क्या यार चिंकू, अभी से? खैर चल मैं भी साथ में चलता हूँ.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुनीत और सुनीत का वार्तालाप पास खड़े डैन के कानों में भी पड़ गया. उससे रहा नहीं गया और उसने सुनीत से पूछ ही डाला, “तुमको पुनीत ने अभी क्या कह कर पुकारा?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“रिंकू”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“ये क्या है?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“मेरा नाम.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“पर तुम्हारा नाम तो सुनीत है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हाँ. पर रिंकू मेरा घर का नाम है. जैसे कि चिंकू पुनीत का.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“तो क्या तुम दोंनो भाईयों के दो दो नाम हैं.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हाँ. अधिकतर भारतीयों के दो नाम होते हैं.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“वाह. ऐसा तो मैंने आज तक नहीं देखा या सुना था. नामों को छोटा करना तो सामान्य है – जैसे कि थॉमस का टाम, जेफरी का जेफ या रिचर्ड का रिच, पर दो दो नाम... पता करना पड़ेगा कि ऐसा किसी और भी देश में होता है क्या. पर ये दो दो नाम क्यों.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“अब ये तो मुझे पता नहीं. अब आदमी ही क्यों, हमारे तो देश के भी दो नाम हैं – इंडिया और भारत.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“ये तो मुझे पता ही नहीं था कि इंडिया का एक और भी नाम है – भारत.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“भारत नाम उसी तरह है जैसे कि रिंकू या चिंकू. ये नाम बस घर के भीतर ही लिया जाता है. पढ़े लिखे और सभ्य लोगों के बीच में इंडिया नाम ही लिया जाता है जैसे कि पुनीत या सुनीत.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“रिंकू और सुनीत के अलावा भी और कोई नाम है तुम्हारा?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हाँ है न. मेरा राशि का नाम. मेरा राशि का नाम ‘ब’ से शुरू होना था, इसलिये पिता जी ने ‘बद्रीनाथ’ रख दिया.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“फैसिनेटिंग! तो फिर इंडिया, भारत...”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“और हिन्दुस्तान... ये तीसरा नाम न बस ऐंवे ही होता है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“तो क्या मुअन जोदारो के समय से ही दो दो नामों का प्रचलन है?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“इस बारे में तो कभी सोचा ही नहीं. भाई मैं कोई इतिहासकार तो नहीं हूँ, पर मेरे विचार से पहले शायद ऐसा नहीं था. मैंने अशोक, हर्षवर्धन, चंद्रगुप्त, अकबर, शिवाजी और बिम्बसार वगैरह के कभी दूसरे नाम तो नहीं पढ़े या सुने. मेरे बाबा और पर-बाबा के भी दो नाम नहीं थे.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“तो फिर ये नया फैशन होगा.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“नहीं नया तो नहीं है. मुझे लगता है ये सब आजादी के बाद ही शुरू हुआ है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“खैर, मुझको तो इतने सारे नामों का कोई खास फायदा नहीं समझ में आता है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“सो तो है. इसी लिये अब हम लोग भी दूसरे नाम को छोड़ने लगे हैं. नई पीढ़ी में बच्चों के अब एक ही नाम रखे जाते हैं.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“तो फिर इंडिया...”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“यहाँ भी दूसरे नाम को छोड़ना शुरू कर दिया है. अब देखो न टीवी कार्यक्रम का नाम रखा गया है ‘शाबाश इंडिया’ गाना लिखा गया है ‘आई लव माई इंडिया, वतन मेरा इंडिया..’”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“देर आये दुरुस्त आये.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“ओके डैन मैं अब चलता हूँ. घर जाकर इंडिया फोन करना है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-1982747726851774442?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/V2P1ROHnDRM/blog-post_27.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2007/02/blog-post_27.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-7650086689297259228</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:44:59.890-07:00</atom:updated><title>ये डे, वो डे</title><description>&lt;span style="color:#003300;"&gt;टड़ाँग, ढड़ाँग, छन्न, टन्न – भगवान बचाये बगल में रहने वाले गुप्ता दंपति से. सुबह सुबह नींद खोल दी बर्तनों की टनटनाहट से. पता नहीं बर्तन धोये जा रहे हैं या बर्तनों से किसी को धोया जा रहा है. उठ कर मैं बालकनी की ओर चला ये पता करने के कि बगल वाले फ्लैट में हो क्या रहा है. बाहर जाकर देखा गुप्ता जी कोने में अपना सर पकड़ कर खड़े हैं. देखने से तो लग रहा था कि सर में चोट लगी हुई है. मैंने चिंता दिखाते हुए पूछा, “ये चोट कैसे लग गयी?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“अरे कुछ नहीं फिसल कर बर्तनों पर गिर गया.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“गुप्ता जी बर्तनों पर गिर गये कि बर्तनों को ऊपर गिरा दिया गया.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;बात आगे बढ़ती उससे पहले ही श्रीमति गुप्ता बाहर आकर मानसून के घने काले बादल की तरह गुप्ता जी पर बरस पड़ीं. जवाब में गुप्ता जी भी भूखे शेर की तरह दहाड़ पड़े. नतीजे में श्रीमति गुप्ता तीन चार आँसू टपकाते हुये अंदर चली गयीं.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;यह सब देखने के उपरांत मैंने एक आदर्श भारतीय पड़ोसी की तरह गुप्ता जी को बिन माँगे मुफ्त की सलाह दे दी, “क्या करते हो गुप्ता जी. बीबी को प्यार से रखा करो. अब अंदर जाकर प्यार से ज्वालामुखी को शांत करो.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;गुप्ता जी बोले, “अरे भाई आज कोई वेलंटाईन डे है क्या? प्यार व्यार, मनाना जताना सब कर लिया कल. अब बैक टू नारमल लाईफ.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;अचानक मेरे पेट में फिर से गुड़गुड़ाहट हुई और मैं लपक कर बड़े घर की ओर भागा. अब आप लोगों से क्या छुपाना - लखनऊ नगरी में बाहर जाकर रेस्टोरेंट वगैरह में खाने का प्रचलन कोई बहुत ज्यादा तो है नहीं. रेस्टोरेंट वाले हर शनिवार को थोक में खाना बनाते हैं इस आशा के साथ कि सप्ताहांत में शायद भीड़ भड़्ड़क्का हो. ऐसा होता है नहीं अतः वही खाना कई दिनों और कभी कभी तो कई महिनों तक चल जाता है. अच्छी तरह से खमीर उठे हुये खाने का सबसे अधिक उपभोग होता है वेलंटाईन डे के दिन – कारण तो आप सभी अच्छे से ही जानते हैं. बस कल रात मैं भी पास के ही मुग़लई रेस्टोरेंट में इसी तरह के खाने का भोग लगा आया. ये खमीर उठे हुये खाने बड़े तुनक मिजाज होते हैं – बस लड़ पड़े पेट से कि नहीं रहना है तुम्हारे साथ. पेट महराज भी अकड़ गये – नहीं रहना है तो दफा हो जाओ यहाँ से. सुलह कराने वाली मिस पुदीन हरा भी नहीं थी अतः पेट जी के दफा आदेश के कारण रात में कई बार....&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;रात भर की दौड़ भाग की वजह से तबियत थोड़ी ढीली लग रही थी इसलिये “धपजी” (धर्म पत्नी जी) से कहा कि आज ऑफिस जाने का कार्यक्रम स्थगित. धपजी थोड़ा सा आपत्तिजनक लहजे में बोलीं, “तो क्या सारे दिन घर पर ही पड़े रहोगे.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“नहीं घर पर पड़े पड़े क्या करूँगा. सोचता हूँ साईकिल उठा कर आस पास का चक्कर लगा आऊँ. इसी बहाने थोड़ी इक्सरसाईज़ हो जायेगी.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;हाथ मुँह धोकर पेट के बिगड़े हुये मूड को ध्यान में रखते हुये कॉर्न फ्लेक्स का नाश्ता किया, धपजी ने बाजार से सब्जी और परचून लाने की लिस्ट हाथ में जबरन थमा दी, और मैं अपनी साईकिल उठा कर निकल पड़ा. अभी गली के कोने तक ही पहुँचा था कि संजीवनी मेडिकल स्टोर के मिश्रा जी ने पीछे से टोक दिया, “सुबह सुबह साईकिल उठा कर कहाँ चल दिये श्रीवास्तव जी.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“बस यहीं आस पास ऐसे ही...”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“क्यों आज कोई खास बात है क्या?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;अब ये भी कोई बात हुई कि किसी खास वजह से कोई काम किया जाये. मैंने बनावटी हँसी के साथ कहा, “आपको पता नहीं आज आवारागर्दी डे है. आज के दिन पुरुष जाति के लोग सुबह से उठ कर आवारागर्दी करते हैं. खैर मिश्रा जी ये नुक्कड़ पर कूड़े का ढेर बड़ा फल-फूल रहा है. इसको कब हटवा रहे हैं?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिश्रा जी ने मौके का फायदा उठाते हुये कटाक्ष के साथ उत्तर दिया, “हटवा देंगे ‘कूड़ा-उठाओ डे’ के दिन.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“ये कौन सा डे है?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“इस दिन गली मुहल्लों से कूड़ा या मलबा हटाया जाता है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“अब आपका ये ‘कूड़ा-उठाओ डे’ कब आता है?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“हर दिवस की तरह ये भी साल में एक बार आता है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“वो तो ठीक है. पर कब?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“‘कूड़ा-उठाओ डे’ ‘दौरा डे’ के ठीक अगले दिन आता है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“’दौरा डे’?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“हाँ भई हर दिवसों की भाँति ये ‘दौरा डे’ भी साल में एक बार आता है. इस दिन कोई नगर अधिकारी या मंत्री नगर के हालात का मुआईना करने दौरे पर निकलता है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“अब ये ‘दौरा डे’ किस दिनाँक को पड़ता है?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“अतुल जी ये ‘दौरा डे’ अंग्रेजी नहीं हिन्दु कैलेंडर का पालन करता है. होली और दीवाली की तरह इसकी भी तिथि कोई निश्चित नहीं है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;बात आगे चलती उससे पहले ही एक युवक ने मिश्रा जी को पीछे से टोक दिया, “आपके पास अपच की कोई दमदार दवा है?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;मैंने पूछा, “क्यों, वेलंटाईन डे के दिन मुग़लई खाना खा आये क्या?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“आपको कैसे पता?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;बिना जवाब दिये ही मैं साईकिल खिसकाते हुआ आगे बढ़ चला. साईकिल पर बस चढ़ने ही वाला था कि नीचे के फ्लैट वाले जौहरी जी का दस वर्षीय पुत्र अकेला ही स्कूल जाता हुआ दिखाई दे गया. अपने हाथ से लम्बी टाई लटकाये और अपने वजन से भारी बस्ता उठाये टिंकू (घर का नाम) बहती हुई नाक को लहराती हुई टाई से पोंछते और ‘झलक दिखला जा..’ गुनगुनाते हुये अपने ही में मस्त चला जा रहा था. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;मैंने उसको रोक कर पूछा, “टिंकू अकेले? पापा नहीं हैं क्या घर पर?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“पापा का पेट खराब हो गया है. कई बार पाकिस्तान के चक्कर लगा चुके हैं.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“कल रात को मुग़लई खाना खाने गये थे क्या?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“हाँ. पर आपको कैसे पता?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“वो छोड़ो. तुमको स्कूल की देर हो रही है. चलो मैं साईकिल से छोड़ देता हूँ.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;टिंकू को साईकिल पर बैठा कर उसके स्कूल पहुँचा, पर बेचारे को फिर भी देर हो ही गयी. बाहर ही प्राचार्या जी मिल गयीं. क्रुद्ध वाणी में बेचारे टिंकू पर शुरू हो गयीं, “यंग मैन यू शुड बी अशेम्ड ऑफ योरसेल्फ – कमिंग सो लेट. आई कैन नॉट टालरेट सच काईंड ऑफ बिहेवियर. यू नो पंक्चुऐलिटी इस दि की फॉर सक्सेस. यू विल बी पनिश्ड फॉर दिस. यू मे गो टु योर क्लास रूम नाओ.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;होनहार बिरवान के होत चीकने पात – चीकने पात तो पता नहीं पर ये बिरवान चिकना घड़ा जरूर निकला. ‘झलक दिखला जा..’ का जाप करते हुये अपनी कक्षा की ओर चला गया. उसके जाते ही मैंने प्राचार्या महोदया से कहा, “मैंने बच्चे के सामने कहना उचित नहीं समझा, पर क्या आपको ये नहीं लगता कि बच्चों से हिन्दी में बात करनी चाहिये?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“करते हैं न?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“पर अभी अभी तो आप उसको अंग्रेजी में ही भला बुरा कहे जा रही थी.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“ऐसा नहीं है. हिन्दी में बात करते हैं न ‘हिन्दी डे’ यानि कि ‘हिन्दी दिवस’ के दिन. उस दिन सारे बच्चों को पूरे दिन हिन्दी में बोलने की छूट होती है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कुछ और कहता उससे पहले ही प्राचार्या जी ‘इक्सक्यूज़ मी’ कह कर वहाँ से नदारद हो गयीं. क्या करता, मैं भी साईकिल पर उछल कर चढ़ गया और पैडल मारता हुआ वहाँ से निलक पड़ा. अभी सौ मीटर ही गया होऊँगा कि सड़क पर पड़ी कील ने पीछे के टायर में छेद कर के उसकी हवा निकाल दी. अपने नगर वासियों की इसी बात से मुझे बहुत कोफ्त होती है – भाई लोगों सड़क पर जी भर के कूड़ा फेंको, तबियत से थूको या मूतो, पर ये कील शील न फेंका करो. टायर का पंचर जेब में पड़े बटुये में भी छेद कर देता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर पास में ही पंचर जोड़ने वाली दुकान दिख गई. पास जाकर अंडी बंडी में बैठे मिस्तरी जी से कहा, “भैय्या जरा पंचर जोड़ दो.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“अबे ठिल्लू जरा बाहर आ. इन साहब का पंचर जोड़ दे.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“मैं पंचर नहीं हूँ. साईकिल के टायर का पंचर जोड़ना है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“एक ही बात है साहब.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;ठिल्लू जी बाहर आये. ये क्या ठिल्लू तो मात्र दस या ग्यारह साल का लड़का निकला. मैंने मिस्तरी भाई से कहा, “ये तुम्हारा लड़का है?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“हाँ, मेरा सगा लड़का है - मेरी इकलौती सगी बीबी का.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“तो इसको पढ़ाने की जगह इससे मजदूरी करवाते हो? इसको एक बच्चे की तरह पालो.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“करते हैं न साहब – चिल्ड्रेंस डे यानि कि बाल दिवस के दिन. मैंने बोल रखा है – बाल दिवस के दिन खुल्ली छूट. जो चाहे करो. पर साहब ये ससुरा उस दिन स्कूल जाने के बजाय मलिका शेहरावत की पिक्चरें देखना ज्यादा पसंद करता है. अब बताईये इसमें मेरा क्या दोष है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;पंचर जुड़ने के बाद मैं फिर से चल पड़ा. ये लीजिये मोहल्ले की दस फीट चौड़ी सड़क पर जाम. साथ में ढिशुम ढिशुम की आवाजें आ रहीं थी. मैंने कोने में खड़े एक तमाशबीन से पूछा, “ये क्या हुड़दंग मचा हुआ है यहाँ पर.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“आपको पता है आज इंटरनेशनल पीस डे यानि कि अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस है? उसी का सड़क के बीचों बीच से जुलूस निकल रहा था. कुछ वाहन चालकों ने जुलूस को जगह नहीं दी – बस, हाथापाई और लातापाई शुरू हो गयी.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“मुझे तो लगता है कि ये पीस डे (शांति दिवस) का जुलूस नहीं बल्कि पीस दे (जैसा कि चक्की में पीस दे) का जुलूस है.”, टिप्पणी करते हुये मैं बीच बीच से जगह बनाता हुआ भीड़ से निकल भागा. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;मुझे पता ही नहीं चला और मैं साईकिल चलाते चलाते लखनऊ विश्वविद्यालय के सामने आ पहुँचा. लीजिये यहाँ भी एक कोने में लातापाई हो रही थी. वैसे लखनऊ विश्वविद्यालय में लातापाई का न दिखना अनहोनी होता है. क्या करें आदत से मजबूर एक सच्चे भारतीय नागरिक की तरह मैं भी तमाशे का हिस्सा बन गया, “अरे भाई ये किसकी पिटाई कर रहे हो तुम लोग?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“प्रोफेसर सिन्हा की.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“छि छि. शरम नहीं आती है अपने गुरु की पिटाई करते हो?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;घूँसा चलाते हुये एक छात्र ने जवाब दिया, “शरम क्यों आयेगी. आज कोई टीचर्स डे थोड़े ही है. वैसे भी ये हमारे राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर हैं और ये हमारी प्रैक्टिकल की क्लास चल रही है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;मैंने मन ही मन सोचा कि बहुत हो गयी साईकिल चलाई आज. वापस घर की ओर का रुख़ किया और पैडल मारते हुये घर पहुँच गया. घर पहुँच कर सोफे पर पैर फैलाये और हाथ में अखबार लेकर पसर गया. धपजी को मेरा आना सुनाई दे गया. आकर पूछा, “सब्जी कहाँ रखी है?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हत्तेरे की. वो तो लाना ही भूल गया.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“तुम भी न. मैं तो तंग आ गयी हूँ तुमसे.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“मुझसे तंग? मैंने तो सुना था कि आदमी की सिर्फ बनियान और कच्छी ही तंग हुआ करती हैं. और हाँ आज तुम मुझ पर चिल्ला नहीं सकती हो.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“क्यों? ऐसा क्या है आज?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“आज हसबेंड डे यानि कि पति दिवस है. आज के दिन कोई भी पत्नी अपने पति को डाँट पीट नहीं सकती है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;“ऐसा क्या? तो ये लो पकड़ो घर में पड़ी हुई इकलौती लौकी. इसे छील कर अपने लिये बनाओ कोफ्ते. मैं चली शॉपिंग करने क्यों कि आज शॉपिंग डे भी है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता है मुझे अब आप सब से विदा लेनी पड़ेगी क्यों कि धपजी वास्तव में शॉपिंग के लिये निकल गयीं है और मुझे उठ कर पेट में उछल कूद कर रहे चूहों के लिये लौकी का कुछ बनाना पड़ेगा. ऐसे हालात में मुझे सिर्फ एक ही डे याद आ रहा है – मन्ना डे. लखनवी मियाँ लगाओ मन्ना डे के दर्दीले गीत और लग जाओ लौकी छीलने में.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-7650086689297259228?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/Av-HoaLSDTA/blog-post_16.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2007/02/blog-post_16.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-1577349152270272491</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:44:41.007-07:00</atom:updated><title>देवनगरी में हाहाकार</title><description>&lt;span style="color:#993399;"&gt;समस्त देवी देवताओं की सभा सजी हुई थी. प्रतिदिन की भाँति आज भी भगवान विष्णु भारत धरती पर घटने वाली घटनाओं से अनभिज्ञ अपनी शेषनाग शय्या पर पसरे हुये लक्ष्मी देवी से अपने पाँव दबवा रहे थे, और एक हाथ में कमल का सुन्दर पुष्प ले कर उसकी सुगंध का आनंद ले रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहसा सभा में हुड़दंग मच गयी – देखा नारद मुनि बिना धोती बाँधे ही भरी सभा में दौड़े भागे चले आ रहे हैं. भगवान विष्णु ने क्रोध भरी दृष्टि से नारद की ओर देखते हुये पूछा, “ये क्या हाल बना रखा है?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;नारद मुनि क्रुद्ध वाणी में बोले, “प्रभु आप बस लेटे लेटे कमल का फूल सूँघिये. आपको पता भी है कि नीचे भारत भूमि में क्या गुल खिल रहे हैं.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;प्रभु ने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुये पूछा, “ऐसी क्या अनहोनी हो गयी कि तुम लाज हया त्याग कर बिना धोती के ही दौड़ पड़े.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;नारद ने अपना माथा पीटते हुये कहा, “हे भगवान क्या दिन आ गये हैं. अब ये भी मुझे ही बताना पड़ेगा. प्रभु एक वेलंटाईन नामक विदेशी देवता ने कामदेव को अपदस्थ कर दिया है यानि कि वेलंटाईन जी ने कामदेव की गद्दी छीन कर स्वयं को उस गद्दी पर विराजमान कर दिया है. आज वेलंटाईन देवता का महान पर्व है. आप जरा नीचे झाँक कर तो देखिये कि ये पर्व कितने हर्षौल्लास के साथ मनाया जा रहा है. इतना धूम धड़ाका तो शिवरात्रि, राम नवमी और जन्माष्टमी में भी नहीं होता है. छि छि यही दिन देखने को बचे थे. हरि ओम हरि ओम.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;नारद मुनि आगे और कुछ कहते कि कामदेव भी अपना लंगोट संभालते हुये सभा में आ धमके. अष्रुपात करते हुये विष्णु के चरणों में लोट गये. हिचकियों के साथ सुबक सुबक कर बोले, “प्रभुश्री मैं तो लुट गया, बरबाद हो गया. न जाने कहाँ से और कब ये कमबख्त वेलंटाईन आ धमका, और भारत की युवा वर्ग को अपने वश में कर के मेरे ऊपर धावा बोल बैठा. गद्दी तो गयी सो गयी, अब तो भारत के मूढ़ युवा मेरा नाम तक नहीं पहचानते हैं.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;विष्णु ने लापरवाही के साथ कहा, “कामदेव सीधे शब्दों में बतलाओ कि तुम मुझसे चाहते क्या हो?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;प्रभु विष्णु के इस रवैये को देख कर नारद मुनि से रहा नहीं गया. बस कटु सत्य उगल ही दिया, “प्रभुश्री यदि आपका यही हाल रहा तो अति शीघ्र आपकी शय्या भी आपके कर कमलों के नीचे से नदारद हो जायेगी. वो सफेद दाढ़ी, मोटी तोंद और लाल स्लीपिंग सूट वाला बाबा उठा ले जायेगा हाँ. फिर भारत भूमि में दुबारा अपने झंडे गाड़ने के लिये आपको भी दाढ़ी मूँछ लगा कर और बाल लम्बे बढ़ा कर सूली पर लटकना पड़ेगा.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी शय्या छिनने की बात सुन कर तो प्रभु विष्णु को भी घबराहट होने लग गयी. बस नारद जी से पूछ बैठे, “हे मुनिवर! आप बस ऐसे ही सबको डराते फिरोगे या कुछ करोगे भी?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;नरद मुनि ने तत्परता से उत्तर दिया, “प्रभु मैंने तो एक तरीके का प्रयोग भी किया परंतु उसका कोई प्रभाव ही नहीं हुआ. मैंने भारत भूमि पर निवास करने वाले भक्तों के दो बड़े समूहों ‘शिव सेना’ तथा ‘बजरंग दल’ के कर्मठ सिपाहियों को जिम्मा सौंपा कि इस समस्या का किसी भी प्रकार से समाधान करें. उन्होंने वेलंटाईन के भक्तों को पकड़ पकड़ कर उनका मुँह काला कर के, गधों पर उल्टा बैठा कर और जूतों की माला पहना कर गली कूँचों से जुलूस निकाला. वेलंटाईन देवता की पूजा पाठ की सामग्री बेचने वाली दुकानों को तोड़ा फोड़ा भी. पर प्रभुश्री भला मुठ्ठी भर प्रभु के सेवक वेलंटाईन जी के अनगिनत भटके हुये अनुयायियों को कैसे सुधार पाते. और, वैसे भी भारत जैसे प्रजातंत्र में सबको सभी कुछ करने की संपूर्ण छूट है – आप या मैं किसी को भी कुछ करने से रोक नहीं सकते हैं भले ही वो स्वयं की ही कब्र खोद कर उसमें चादर ओढ़ कर लेट जायें. और, अगर जबरन ऐसा किया तो भारत के जनतंत्र की छवि अन्य देशों में मैली हो जायेगी. मुझको तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये मनहूस वेलंटाईन जरूर युवा पीढ़ी को भाँग या गाँजे का नशा करा करा के उनको पथ भ्रष्ट कर रहा है. हे देवताओं के देवता अब आप ही बताईये कि और क्या किया जा सकता है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तो नारद मुनि ने और भी हृदय भेदी सूचना दे डाली. भगवान विष्णु ने तुरंत सर्वश्री ब्रह्मा और महेश को एक आपतकालीन बैठक के लिय बुला भेजा. सभी देवी देवता गण जुट गये ब्रेन स्टॉर्मिंग सत्र में कि किस प्रकार से वेलंटाईन के खतरनाक तरीके से बढ़ते हुये प्रभाव को कम किया जाये. गुर्भाग्यवश कई घंटो की तू तू मैं मैं और गरमा गरम बहस के बाद भी कोई उपयुक्त हल न निकल पाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक यमराज जी की दायीं आँख तेजी से फड़कने लग गयी (मतलब की कोई टेक्स्ट मैसेज आ गया). यमराज ने उठते हुये कहा, “देवी और सज्जनों मुझे जाना होगा. अभी अभी कोई भारतीय युवा ऊपर आ पहुँचा है. मुझे अपने कार्यालय जा कर उसका कागज़ी काम पूरा करना है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी देवता गण एक-स्वर चिल्ला उठे, “जब तक इस समस्या का हल नहीं निकल आता है आप इस सदन से बाहर नहीं जा सकते हैं. यदि आपको अपना कार्य निपटाना ही है तो उस युवक को यहीं बुला लीजिये.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यमराज जी जनमत को कैसे ठुकराते. इशारे से द्वारपालों को उस युवक को अंदर भेजने को कहा. कक्ष का द्वार खुला और अठ्ठारह या उन्नीस साल का एक सींकिया सा नौजवान सीटी बजाता हुआ अंदर आया. अंदर आते ही युवक ने समस्त देवियों और देवताओं की ओर हाथ हिलाते हुये कहा, “हैप्पी वेलंटाईन्स डे अंकल्स ऐंड आंट्स.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यमराज ने घनी मूछों पर हाथ फेरते हुये पूछा, “वत्स, तुम्हारा नाम क्या है?”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;“ऐंडी.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;“ऐंडी?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;“अरे माँ बाप ने आनन्द रखा था.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;“अच्छा अच्छा. वत्स ये बताओ तुम यहाँ कैसे आ पहुँचे?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;“आप सब लोग देखने में तो काफी पुराने जमाने के लगते हो. शायद आप लोगों को पता भी नहीं होगा कि आज वेलंटाईन्स डे है. यू नो मैंने भी सोचा कि अपनी दोनों स्वीट-हार्ट्स सेलिना और टीना के लिये वेलंटाईन डे कार्ड खरीद लूँ. कार्नर की आर्चीस की शॉप जाकर मैंने दोनों के लिये एक एक कार्ड खरीद लिया. सोचा पहले टीना को जाकर विश करता हूँ. टीना के घर पहुँचा – वो सिज़र (कैंची) लेकर अपनी जींस में होल्स कर के उसे स्टाईलिश बना रही थी. मैंने जाकर उसे किस किया, विश किया और कार्ड दे दिया. बट माई बैड लक मैंने टीना को सेलिना वाला कार्ड दे दिया. टीना ने कार्ड खोला और पढ़ा – सेलिना डार्लिंग, यू आर माई ओनली हार्ट... टीना ने बस इतना ही पढ़ा था कि गुस्से में उसने हाथ में पकड़ी हुई सिज़र मेरे ऊपर थ्रो कर दी. सिज़र सीधे मेरे हार्ट में पेनीट्रेट कर गयी ऐंड आई फेल लाईक ए बिग लोड ऑफ काऊ डंग. उसके बाद दो काले कलूटे ड्यूड्स मुझे पुल करते हुये यहाँ ले आये. बट टेल मी व्हाई आल यू गाईज़ आर लुकिंग सो स्ट्रेस्ड आऊट. आप लोगों को क्या बॉदर कर रहा है. टेल मी – मे बी आई कैन साल्व योर प्राबलम.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;नारद मुनि ने ऐंडी को अभी तक घटी सारी वार्तालाप का विवरण दे दिया. ऐंडी ने मुस्कराते हुये कहना शुरू किया, “आई सी. सो दिस इस योर प्राबलम. सी गाईज़ आप लोगों की प्राबलम ये है कि आप लोग पिछले कई मिलियन ईयर्स से चेंज नहीं हुये हो. अरे टाईम के साथ साथ अपने को बदलना पड़ता है. लुक ऐट यू गाईज़ पता नहीं किस जमाने के कपड़े पहनते हो, जेवेलरी पहनते हो. डिजाईनर क्लोथ्स पहनो. लुक ऐट यू विष्णु सर आप iPod की जगह शंख लिये फिरते हो. जेम्स बाँड स्टाईल की टाईनी रिवाल्वर की जगह गदा और चक्र थाम रखा है. और, कमल फेंक कर रेड रोज़ पकड़ो. लक्ष्मी आँटी को बाहों में रखने की जगह उनसे पैर दबवाते हो. ऐंड यम जी आई थिंक यू नीड टु गो टू ए गुड सलून फार ए डीसेंट हेयर कट. मेरी मानों तो मूँछे वूँछे मुड़वा दो. और, हो सके तो अगले आने वाले ड्यूड से तीन चार डज़न फेयर ऐंड हैंडसम की ट्यूबें मंगवा लो. शिव सर, ब्रह्मा सर और नारद सर – देखिये आप लोगों ने अपना क्या हुलिया बना रखा है. पूरे कार्टून नेटवर्क के कैरेक्टर्स लग रहे हैं आप सब इन कपड़ों और गेट-अप में. ऐसे रहोगे तो कर चुके आप लोग वेलंटाईन जी से कॉम्पटीशन. आल यू फोक्स नीड इज़ ऐन इमेज मेक-ओवर. और, जरा मार्डन नाम शाम रखो – जैसे कि आनन्द का ऐंडी, सन्दीप का सैंडी वगैरह वगैरह.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;सभी देवी और देवताओं ने युवक ऐंडी की बातों को ध्यानपूर्वक सुनने के बाद एकमत सहमति में मुंडी हिलाते हुये कहा, “बालक सही कहता है. हमें ऐसा ही करना चाहिये.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;इस बीच भारत के मुम्बई नगर में अचानक ही मौसम ने रौद्र रूप धारण कर लिया. बुरे मौसम के कारण कुछ एक भीषण कार दुर्घटनायें हो गयीं जिसमें मुम्बई के दो नामी गिरामी फैशन डिजाईनर्स और एक बहुत बड़ी काल सेंटर कंपनी के एच. आर. मैनेजर की मृत्यु हो गयी. समाचारों ने दुर्घटना और मृत्यु का कारण बुरा मौसम बताया. पर, उन्हें क्या पता था कि इन सब के पीछे यमराज और कई देवी देवताओं का हाथ था – आखिर उन्हें अब कम्प्लीट इमेज मेक-ओवर के लिये उम्दा किस्म के फैशन डिजाईनर्स की आवश्यकता जो थी. पर काल सेंटर कंपनी का एच. आर. मैनेजर बेचारा क्यों पीसा गया – अरे वही तो देवी देवताओं का नया नामकरण करने वाला है.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;खैर जब तक हमारे देवी देवताओं का इमेज मेक-ओवर का काम पूरा नहीं हो जाता है, तब तक के लिये – “हैप्पी वी.डी.!” अरे वी.डी. का मतलब “वेनेरल डिज़ीज़” नहीं बल्कि “वेलंटाईंस डे” है. वैसे भी मेरे विचार से दोनों में कोई खास अंतर नहीं है. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-1577349152270272491?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/arczV8zy-kY/blog-post_14.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2007/02/blog-post_14.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-4631603578831902061</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:44:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:44:27.818-07:00</atom:updated><title>नगाड़ा-ए-फ्रीडम</title><description>&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;वैधानिक सूचना:&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; यह लेख काल्पनिक &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; है. इस लेख का कोई भी पात्र काल्पनिक &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; है. पात्र का किसी जीवित व्यक्ति (या महिला) से मेल खाना संयोग &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;नहीं&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; है. पात्र की गोपनीयता को बनाये रखने के लिये सिर्फ पात्र का नाम बदल दिया गया है. इस लेख को पूरा बिना पढ़े बीच में छोड़ना धारा 911 के तहत एक जघन्य कानूनी अपराध है.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;-- लेख प्रारम्भ --&lt;br /&gt;कई साल हो गये हैं संयुक्त राज्य अमेरिका (संक्षिप्त में अमेरिका या अमरीका) में रहते हुये. और, इन पिछले कई सालों में बाकी की दुनिया से अनभिज्ञ अधिकतर अमरीकियों की हास्यासपद बातों को सुन कर अनसुना कर दिया. पर बेड़ा गर्क हो बिन लादेन की अमानवीय करतूत का कि सारे अमरीकी अब मिल जुल कर एक नये नगाड़े को पीटने लगे हैं. ये नया नगाड़ा है “फ्रीडम” का. हमेशा पिटाई करने को आतुर रहने वाले अमरीकी इस नये नगाड़े को जोर जोर से हर दस या पन्द्रह मिनट के बाद पीटना शुरू कर देते हैं – टीवी पर, ऑफिस और स्कूल में, और हर उस जगह जहाँ मानव जाति दिखाई दे जाती हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे एक सहकर्मी हैं जिनका नाम है रॉब - रॉबर्ट का सक्षिप्त रूप. रॉब को भी अविराम इस नगाड़े को पीटने की बुरी लत लग गयी है. और, मेरा ऐसा दुर्भाग्य कि रॉब महाशय मुझसे मात्र बीस फीट की दूरी पर बैठते हैं. नगाड़े के शोर से मेरी सुनने की शक्ति तकरीबन 70-80 प्रतिशत क्षीण हो चुकी थी और मैने निर्णय लिया कि मैं पूरी तरह से बधिर हो जाऊँ उससे पहले ही कुछ करना पड़ेगा. अतः एक दिन सुनहरा मौका ताड़ कर मैंने रॉब के साथ सौहाद्र भाव से वार्तालाप प्रारम्भ कर दिया. लीजिये आप लोग भी उस ज्ञानवर्धी वार्तालाप का आनन्द उठाईये. सारा वार्तालाप अंग्रेजी में हुआ था, पर यहाँ पर मैं उसका हिन्दी अनुवाद थोड़ा सा नमक-मिर्च लगा कर और थोड़ा सा चाट मसाला छिड़क कर प्रस्तुत कर रहा हूँ:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;br /&gt;मैं : रॉब, यार मुझ मूर्ख को भी जरा इस फ्रीडम के नगाड़े के महत्व के बारे में बताओ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : सारी दुनिया अमेरिका से चिढ़ती है क्यों कि हमारे पास फ्रीडम है. हम लोग जो कर सकते हैं वो बाकी के देश के लोग नहीं कर सकते हैं. हम अपनी फ्रीडम पर हमला कभी भी बरदाश्त नहीं करेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : फ्रीडम को जरा विस्तार में समझाने का प्रयास करें तो बड़ी कृपा होगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : हमें पूरी तरह से धार्मिक “फ्रीडम” है. हम लोग कुछ भी बोल सकते हैं, पेपर में कुछ भी लिख सकते हैं. हमारे यहाँ जनतंत्र है - हमें फ्रीडम है अपना नेता चुनने की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं (कटाक्ष के साथ) : सही कह रहे हो – एक गधे को भी चुन कर... वैसे रॉब तुम जो नगाड़ा पीट रहे हो, हो सकता है कि वो चीन में बना हुआ हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब ने अपनी डेस्क पर रखी “स्टैचू ऑफ लिबर्टी” और फहराते हुये “स्टार एंड स्ट्राईप्स” को उठा कर देखा तो उस पर “मेड इन चाईना” लिखा हुआ पाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : शिट (जान बूझ कर इस शब्द का अनुवाद नहीं किया गया है)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : रॉब, तुमको ये क्यों लगता है कि किसी और के पास ये फ्रीडम का नगाड़ा नहीं है? या फिर किसी और को ये नगाड़ा पीटने की तमीज़ नहीं है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब (आश्चर्य से) : तो क्या दूसरों के पास भी ये नगाड़ा है? मैं ये कतई नहीं मान सकता हूँ. क्या न्यू मेक्सिको के पास ये नगाड़ा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : पर न्यू मेक्सिको तो अमेरिका का ही एक प्रदेश है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : ठीक है ठीक है. पर मैं ये दावे के साथ कह सकता हूँ कि न्यू इंगलैंड के लोगों को ये नगाड़ा पीटने का सौभाग्य नहीं प्राप्त होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : अबे भूगोल से गोल प्राणी न्यू इंगलैंड भी अमेरिका का ही भाग है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : ओह तो तुमको भूगोल का भी ज्ञान है. खैर ये सब छोड़ो और मुझे सिर्फ एक देश का नाम बताओ जहाँ के लोगों के पास ये नगाड़ा हो और उन्हें नगाड़ा बजाने भी दिया जाता हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : रॉब अब मैं तुम्हें एक ऐसे देश के बारे में बताने जा रहा हूँ जहाँ के लोगों के पास ये नगाड़ा तो है ही और साथ में उसको तरह तरह से बजाने के तरीके भी मालूम हैं. ये लोग इस नगाड़े को ऐसा पीटते हैं कि उसमें छेद हो जाते हैं – कई बार नगाड़ा फूट भी जाता है, पर पेबंद लगा कर और कीलें ठोंक ठोंक कर लोग फिर से जुट जाते हैं नगाड़े की धुनाई में. कोई नगाड़ा चप्पलों से पीटता है, कोई लाठी से, तो कोई हाथों से. अब तुम्हें ये तो पता ही है कि मैं भारत से हूँ – इसलिये मैं भारतीय फ्रीडम नगाड़े की बात कर रहा हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : हाँ हाँ बोले जाओ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : रॉब, तुमने धार्मिक स्वतंत्रता की बात की थी तो मुझे ये बताओ कि अमेरिका में कितने धर्मों के लोग रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : क्रिश्चियंस, ज्यूज़, मुस्लिम और और... (40 सेकेंड के बाद भी गाड़ी आगे नहीं बढ़ी)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : अब मेरी सुनो - क्रिश्चियंस, ज्यूज़, मुस्लिम, हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी….&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : ये सब क्या हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : ये भारत में पाये जाने वाले कुछ एक धर्मों के नाम हैं. और, हमें इन सब धर्मों के नाम इसलिये पता हैं क्यों कि हमको इन सब के बारे में स्कूलों में बताया जाता है. खैर मुझको ये बताओ कि तुमको क्रिसमस के अलावा और कितने धार्मिक पर्वों के नाम पता हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : हनुकाह और क्वांज़ा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : अब ये लम्बी सी सूची सुनो – क्रिसमस, गुरु नानक जयंति, बुद्ध पूर्णिमा, महावीर जयंति, होली, दिवाली, ईद-उल-फ़ित्र, ईद-उल-जुहा, ईस्टर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : तुमको इतने सारे त्योहारों के नाम कहाँ से मिल गये? गूगलिंग की है क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : मुझे ये सब इस लिये मालुम हैं क्यों कि ये सारे पर्व भारत में मनाये जाते हैं. और, भारत सरकार सभी धर्मों को एक ही स्तर पर रख कर सबके लिये छुट्टियाँ घोषित करती है. कहने को तो यू, एस. में धार्मिक स्वतंत्रता है पर क्रिसमस के अलावा और किन किन त्यौहारों की छुट्टियाँ होती हैं? भारतीय ‘फ्रीडम’ का नगाड़ा इतना बड़ा है कि कोई भी कहीं भी – नगाड़े के ऊपर, नीचे, दायें, बायें, कोने में और तो और नगाड़े के ठीक बीचों बीच मंदिर या मस्जिद का निर्माण कर सकता है. और, सरकार बिना चूं किये, मुस्कराते हुये बाकी का काम जैसे कि फ्री-वे बनाना वगैरह मंदिर या मस्जिद के अगल बगल से कर देती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : पर तुम लोग पिछड़ी जाति के लोगों को पीटते हो उन्हें आगे नहीं आने देते हो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : हाँ ये तो है. पर ये भी तो फ्रीडम है जो उच्च जाति के लोगों को मिली है. ठीक उसी तरह की फ्रीडम जो यहाँ गोरों को मिली है – किसी भी काले या भूरे को पीट दो, कालों के चर्च जला डालो, कालों को सिर्फ जैनिटर (सफाई करने वाला) और ड्राईवर जैसे निम्न स्तर के काम दो. अब ये बताओ कि अमरीका में कभी कोई अश्वेत या किसी दूसरे धर्म का राष्ट्रपति हुआ है? भारत में हिन्दु, मुस्लिम, सिख और पिछड़ी जाति के लोग राष्ट्रपति बन चुके हैं. और, एक गोरी महिला भी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रॉब : पर ‘न्यूज़ पेपर्स’ को कितनी फ्रीडम है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तत्परता से रॉब को ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ ‘इंडियन एक्स्प्रेस’ और ‘हिन्दुस्तान टाईम्स’ के वेब पते दे दिये. इन समाचार पत्रों की भाषा और समाचार की विविधता को देख कर रॉब बेचारे की बोलती बंद हो गयी. अब ऊँट पहाड़ के पास आना शुरू हुआ था. मैंने घाव पर नमक छिड़कते हुये कहा -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं : भारतीय नगाड़े ने तो इतनी ‘फ्रीडम’ दे रखी है कि हम लोग मनोरंजन के लिये कुछ भी तोड़ और जला सकते हैं. और तो और अगर और मजा लेना है तो किसी दूसरे समुदाय के लोगों को पकड़ कर लतिया भी सकते हैं. बात करते हो ‘फ्रीडम’ की. यू.एस.ए. में तो हर किसी की ‘फ्रीडम’ को दुनिया जहान के नियमों से बाँध कर रखा हुआ है. न तो मैं सड़क के उल्टी ओर कार चला सकता हूँ. मन हो भी तो कंटिया डाल कर बिजली चोरी नहीं कर सकता हूँ. कितना मन करता है कि गेरू से दीवारों पर लिख डालूँ – “गली गली में शोर है, बुश झूठा और चोर है.” या “आई. टी. समस्या? मिल तो लें टाटा और विप्रो से.” या फिर “गदहे पर मुहर लगायें, डेमोक्रेट्स की सरकार बनायें” – पर ये सब करने की फ्रीडम कहाँ है अमरीका में? अरे क्रिसमस के अलावा किसी और धर्म के त्योहारों की छुट्टी होती है यहाँ?. कटु सत्य तो ये है कि अमरीका एक इसाई देश है. और, मानो या न मानो ईराक की लड़ाई के समय यहाँ के समाचार पत्रों को भी असलियत छापने की कोई फ्रीडम श्रीडम या हिम्मत नहीं थी. असलियत छपने वालों और कहने वालों को तुम्हारे जैसे लोग गद्दार कह कर पुकारने लगे – ये तो वही बात हुई कि तुमको हर चीज़ कहने और करने की फ्रीडम है अगर वो मुझको पसंद आये. अब मेरे सामने कभी अपना ये ‘फ्रीडम’ वाला नगाड़ा मत पीटना वरना मैं दस गुना ज्यादा डेसिबल वाला इंडियन नगाड़ा पीटने लग जाऊँगा – समझे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक तो रॉब के ज्ञान चक्षु पूरी तरह से खुल चुके थे पास आकर कहा, “नगाड़ों को मारो लात. चलो आज लंच में ‘टेस्ट ऑफ इंडिया’ चलते हैं..”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;लखनवी खड़ा बजार में, खोले सबकी पोल,&lt;br /&gt;तोड़े सबका नगड़वा और फोड़े सबकी ढोल.&lt;br /&gt;(कबीरदास के दोहे से प्रेरित)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- लेख समाप्ति --&lt;br /&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-4631603578831902061?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/myPjF7w5Ngk/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">16</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2007/02/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-7412275388648559198</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:43:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-11-12T22:18:54.586-08:00</atom:updated><title>महा यज्ञ</title><description>&lt;span style="color:#990000;"&gt;एक ट्रक ने बकरी को कुचला,&lt;br /&gt;पाँच ट्रक स्वाहा.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;..........एक मूर्ति को किसी ने रंगा,&lt;br /&gt;..........कई गाड़ियों के डिब्बे स्वाहा.&lt;br /&gt;आरक्षण का समाचार उड़ा,&lt;br /&gt;बीस नगर बसें स्वाहा.&lt;br /&gt;..........एक चलचित्र नगर में लगा,&lt;br /&gt;..........दिखाने वाला हॉल स्वाहा.&lt;br /&gt;आज कुछ करने को नहीं,&lt;br /&gt;सड़क के बीच में नेताओं के पुतले स्वाहा.&lt;br /&gt;..........फिर से हार के आ गये,&lt;br /&gt;..........कुछ एक खिलाड़ियों के घर स्वाहा.&lt;br /&gt;बेरोज़गार युवक भड़के,&lt;br /&gt;सड़क पर खड़ी कारें स्वाहा.&lt;br /&gt;..........चलो दंगा करें,&lt;br /&gt;..........सौ हिन्दू और सौ मुसलमान स्वाहा.&lt;br /&gt;अब सब मिल कर कहें,&lt;br /&gt;स्वाहा, स्वाहा, स्वाहा – पूरे देश का स्वाहा.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_Am4mWx64_F0/RX2jZNJ90WI/AAAAAAAAAAU/Ps9BJvb9bdo/s1600-h/barx.gif"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;अब सभी श्रद्धालु लोग अपने अपने मस्तक पर इस पवित्र राख का टीका लगा लें.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-7412275388648559198?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/wP6EYpFIduM/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2006/12/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-7951962422212728177</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:42:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:42:51.401-07:00</atom:updated><title>शाबाश जनार्दन</title><description>&lt;span style="color:#6666cc;"&gt;जनार्दन मिश्रा पूरे ढाई साल के बाद अवकाश लेकर न्यू जर्सी से आजमगढ़ पहुँच ही गया. अगले दिन ही भारतीय मुद्रा की आवश्यकता पड़ी तो चौराहे पर स्थित इलाहाबाद बैंक की शाखा में जा पहुँचा. कोने में लकड़ी के एक काऊंटर पर तरह तरह के फॉर्म बिखरे पड़े थे. छितरे पड़े फॉर्मों के ढेर में से जनार्दन ने पहचाना हुआ सा एक गुलाबी रंग का फॉर्म खींच कर निकाला और जेब से कलम निकाल कर भरना शुरू कर दिया. पैसे निकालने वाला फॉर्म भरे हुये जनार्दन को अरसा हो गया था फिर भी अपनी ओर से उसने फॉर्म को ठीक से और पूरी तरह से भर डाला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फॉर्म लेकर सामने की खिड़की पर पहुँचा, सलाखों और शीशे की दीवार में बने छोटे से छेद में हाथ डालते हुये उसने कटघरे के भीतर बैठे बैंक कर्मचारी की तरफ फॉर्म सरकाया और विनम्रता से कहा, “भाई साहब पैसे निकलवाने हैं.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कटघरे के भीतर बैठे कर्मचारी श्री सदानन्द सिंह ने फॉर्म हाथ में लिया, ऐनक को नाक के ऊपर सरकाया, फॉर्म पर एक सरसरी नजर दौड़ाई और उसे वापस खिड़की की तरफ फेंकते हुये कहा, “पैसा निकलवाना है तो फॉर्म तो जरा ठीक से भरो.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनार्दन ने फॉर्म उठाया, जाँचा परखा और सिंह साहब से पूछने का दुस्साहस कर डाला, “भाई साहब फॉर्म तो ठीक से भरा है. इसमें गलती क्या है जरा बतायें.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंह साहब ने क्षुब्ध होते हुये जनार्दन की तरफ देखते हुये कहा, “शकल से तो पढ़े लिखे लगते हो, पर फॉर्म तक भरना नहीं आता है. ठीक से देखो आज की दिनाँक नही भरी है. वो कौन भरेगा.” ये कहते हुये सिंह साहब ने अपनी कुर्सी खिसकाई और चल पड़े शायद मूत्र त्याग या जलपान के लिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनार्दन ने सोचा बस इतनी सी बात और ऐसा जवाब. खैर, जेब से पुनः कलम निकाली और जल्दी से फॉर्म पर दिनाँक भर कर उसे खिड़की के भीतर सिंह साहब की तरफ सरका दिया. पर सिंह साहब तो नदारद थे. जनार्दन के पास और कोई चारा नहीं था इसलिये वहीं खड़ा हो कर सदानन्द सिंह की प्रतीक्षा करने लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब पूरे पाँच मिनट व्यतीत हो गये तो जनार्दन ने बगल की खिड़की पर बैठे खरे जी से पूछ ही डाला, “ये सिंह साहब कहाँ चले गये? कितनी देर में वापस आयेंगे?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुरंत जवाब भी मिल गया, “ये तो सिंह साहब ही जानें कि वो कब तक वापस आयेंगे. अरे जायेंगे कहाँ? गये होंगे शौचालय वगैरह. थोड़ा इंतजार कीजिये.” ये कह कर खरे जी ने पतलून की जेब से अपना मोबाईल फोन निकाला और नंबर दबा कर उसे अपने कान से चिपका लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे दस मिनट के बाद सिंह साहब अपने कटघरे में अवतरित हुये, जनार्दन के हाथ से लटकता हुआ फॉर्म खींचा, नीचे मुंडी झुका कर आधा मिनट तक कुछ किया और फिर जनार्दन की तरफ मुँह उठा कर कहा, “आपके खाते में तो पिछले ढाई साल से कोई ट्राँज़ैक्शन हुआ ही नहीं है. जरा जल्दी जल्दी बैंक आया करिये वरना हम आपका खाता बंद कर देंगे.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक जनार्दन भी थोड़ा थोड़ा झल्ला गया था. बस बोल पड़ा, “क्यों? खाता क्यों बंद कर देंगे. बैंक खाते को बनाये रखने का शुल्क लेती है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सच्चे भारतीय कर्मचारी की तरह सदानन्द को अब तक ग्राहकों से नाहक बहस लड़ाने का अच्छा अनुभव प्राप्त हो चुका था, तुरंत भौंक पड़ा, “देखिये आपके खाते में इतने पैसे नहीं हैं कि उसे खुला रखने की जहमत उठाई जाये. और, आपसे जितनी शुल्क ली जाती है वो भी इस मुसीबत के लायक नहीं है. हम तो आपका खाता बंद ही कर देंगे.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनार्दन ने बहस करना उचित नहीं समझा और सिंह साहब से तुरंत पैसे देने का आग्रह किया. सिंह साहब ने गुलाबी फॉर्म पर अपने हस्ताक्षर किये, ठप ठप कर के दो या तीन मुहरें लगाईं, फॉर्म को एक नोटबुक के बीच में खोंसा और जनार्दन के हाथ में पीतल का एक टोकन थमा दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनार्दन एक कोने में खड़ा हो कर प्रतीक्षा करने लगा उस नोटबुक के अगले पड़ाव तक पहुँचने की. पर नोटबुक न्यूटन के नियम का पालन करने के लिये बाध्य थी – जड़त्व के कारण अपनी जगह से एक सूत भी नहीं खिसकी और वाह्य बल भी नदारद था. जनार्दन ने एक बनावटी मुस्कान अपने चेहरे पर चिपका कर सदानन्द सिंह से कहा, “मुझे जरा जल्दी है. पैसे कितनी देर में मिल जायेंगे.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सदानन्द ने बेमन से उत्तर दिया, “बस जैसे ही ये नोटबुक चौबे जी के पास जायेगी और वो आपका फॉर्म पास कर देंगे.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“पर ये नोटबुक तो पिछले सात-आठ मिनट से आपके ही पास पड़ी हुई है.”, जनार्दन ने थोड़ा सा शिकायती लहजे में कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“देखिये नोटबुक ले जाने वाला लड़का अभी चाय लेने गया है. वो जैसे ही वापस आयेगा ये नोटबुक चौबे जी के पास पहुँचा दी जायेगी.”, सिंह साहब ने स्तिथि का खुलासा किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“पर चौबे जी की मेज तो आपके ठीक पीछे ही है. आप ही हाथ बढ़ा कर नोटबुक उनकी मेज पर रख दीजिये. या तो कहिये मैं ही नोटबुक उठा कर उनको दे आऊँ.”, जनार्दन ने बेवजह धृष्टता दिखा डाली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार सदानन्द ने कोई उत्तर नहीं दिया और जान बूझ कर जनार्दन की अवहेलना करते हुये बगल में बैठे हुये खरे जी से उत्तर प्रदेश सरकार में फैले हुये भ्रष्टाचार पर वार्तालाप प्रारम्भ कर दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो अति ही हो गयी. जनार्दन की सहन शक्ति भी जवाब दे गयी और झुँझला कर वह स्वयं से ही कह उठा – महा निकम्मे और कामचोर हैं इस देश के लोग. कोई भला नहीं हो सकता इस देश का...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सदानन्द के तेज कानों को जनार्दन का बुदबुदाना सुनाई दे गया. बस उसके अंदर देश प्रेम का ज्वार फूट पड़ा और अपनी कुर्सी से उठते हुये कहा, “क्या बकवास करता है तू. ये देख.” ये कहते हुये सदानन्द ने मेज की दराज से एक डेढ़ फुट लम्बा सूजा निकाला और चार सेकेंड के अंदर अंदर उसे अपने दोनों गालों के आर पार कर दिया. फिर, गालों के बाहर निकले सूजे के दोनों सिरों पर एक एक किलो के पेपर वेट धागे से लटका दिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सदानन्द के पीछे बैठे चौबे जी को भी ताव आ गया. झट से अपने बालों को कोने में पड़ी एक मजबूत रस्सी से बांधा और रस्सी के दूसरे सिरे को ऊपर लटके पंखे पर बांध कर अपने आप को पंखे से लटका लिया. चौबे जी के कहने पर खरे साहब ने पंखा चालू कर दिया और चौबे जी अपने बालों के माध्यम से पंखे से लटकते हुये गोल गोल घूमने लग गये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनार्दन बेचारा ऐसे जान लेवा कारनामे देख कर हक्का बक्का रह गया. अचानक कहीं से एक आवाज आई – हम में है कुछ कर दिखाने की लालसा. हमारे लिये नामुमकिन कुछ भी नहीं. ये है इंडिया. शाबाश इंडिया. और, साथ ही साथ एक गीत भी शुरू हो गया – कुछ कर दिखाने की उमंग से चलो.... शाबाश, शाबाश, शाबाश इंडियाआआआआ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खड़े हुये ग्राहक भी झूम झूम कर लय में तालियाँ बजाने लगे. सभी की नजरें एक प्रश्न वाचक चिन्ह के साथ जनार्दन पर केन्द्रित हो गयीं – बोलो, अब क्या कहते हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनार्दन ने झुंझलाते हुये कहा – ये सब तो अपनी जगह ठीक है पर मुझे तो अभी तक पैसे नहीं मिले हैं. और, शाबाश इंडिया तो समझ में आ गया, पर भारत के क्या हाल हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीड़ में खड़े पान चबाते हुये एक ग्राहक ने पीक की पिचकारी से कोने की दीवार को रंगते हुये अपना मुँह खाली किया और सबसे कहा, “अरे ये तो कोई सर फिरा लगता है. इसकी बातों का कोई सर पैर नहीं है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमाशाबीन लोग धीरे से वहाँ से खिसक गये और जनार्दन पीतल के टोकन को हवा में उछालते हुये फिर से नोटबुक और अपने फॉर्म के गतिमान होने की प्रतीक्षा करने लगा.&lt;br /&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-7951962422212728177?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/DNNTL-2syFw/blog-post_27.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2006/11/blog-post_27.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-4580345797507154369</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:42:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:42:42.673-07:00</atom:updated><title>एफ़. पी. ओ.</title><description>&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;** इस लेख में बीबी साहिबा को धपजी कह कर सम्बोधित किया जायेगा. धपजी= धर्म पत्नी जी **&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#330099;"&gt;तीन सप्ताह पुरानी बात है. सुबह सुबह जब आँख खुली तो देखा धपजी खिड़की के सामने गमगीन सी खड़ी होकर कुछ बुदबुदाये जा रहीं थीं. चारों तरफ खतरे की लाल झंडियाँ एक एक कर के खड़ी होने लग गयीं और मैं बिस्तर से इतनी तेजी से उछल कर भागा कि मानो रजाई के भीतर छिपकलियों का पूरा परिवार देख लिया हो. इस तेज उछाल की दया से मैं सीधे धपजी के सामने जा गिरा. आने वाले खतरे को भाँपते हुये मैंने पूछा, “इतनी उदास और परेशान सी क्यों हो, सुबह सुबह.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;धपजी ने तमतमाते हुये कहा, “ये सब तुम्हारी वजह से है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हैं? मैं तो अभी तक पूरी तरह से जागा भी नहीं हूँ और अभी तक मेरे मुँह से कुल अठ्ठाईस शब्द ही निकले हैं. मैंने ऐसा क्या कर और कह दिया?” मैंने हर उस पति की तरह बक दिया जो अपनी धपजी की बातों की गूढ़ता को नहीं समझता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धपजी थोड़ा और तमतमा कर बोली, “ये सब हिन्दुस्तान के सारे पतियों की करतूत है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“चलो जान में जान आई कि मैं अकेला ही इस इसका जिम्मेदार नहीं हूँ. ये सारे पति साले होते ही निकम्मे हैं.” कहते हुये मैंने राहत की साँस ली और ये सोच कर कि चलो अपनी जान बच गयी मैं वापस उछल कर बिस्तर पर लोट गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धपजी उतनी ही तेजी से मेरी ओर झपटी और मेरे ऊपर से चद्दर खींचते हुये बोलीं, “पता है आज कौन सा दिन है?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने मन ही मन सोचा, “हे भगवान लगता है मैं फिर से किसी खास का जन्मदिन या विवाह की वर्षगाँठ भूल गया.” पर भोला भाला बनते हुये कहा, “हाँ हाँ क्यों नहीं आज बुधवार है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हाँ तुमको क्यों याद रहने लगा. भुगतना तो मुझे ही पड़ता है.” कहते हुये धपजी कमरे से प्रस्थान करने लगीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पीछे से टोकते हुये कहा, “तुमको तो मेरे सारे रिश्तेदारों ने जयमाल के समय ही बता दिया था कि पहेलियाँ बुझाने में बिरजू धोबी का लंगड़ा गधा भी मुझे चारों खाने चित पटक देता था और अब तो अकल पर बढ़ती उमर का भी असर होने लगा है. अब ज्यादा प्रताड़ित न करो और साफ साफ बताओ कि आज ऐसा कौन सा दिन है कि...” मैं अपना वाक्य पूरा कर पाता उससे पहले ही धपजी का चार शब्दों का सीधा सा जवाब आ गया, “आज करवा चौथ है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं: “हाँ तो?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धपजी: “हाँ तो? तो क्या? मुझे नहीं रहना पूरे दिन भूखा और वो भी बिना पानी पिये. और, ये मनहूस चाँद भी आज के दिन अपनी सूरत रात के दस बजे के बाद ही दिखाता है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं: “पर ये तो हमारी प्रथा है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धपजी: “प्रथा को मारो गोली. ये बताओ कि क्यों रहूँ मैं करवा तुम्हारे लिये? न जाने अपने ब्लॉग में क्या क्या लिखते रहते हो मेरे बारे में. मुझसे अगले जन्म में छुटकारा पाने के तरीके पूछते हो अनजान लोगों से – और, फिर चाहते हो कि मैं दिन भर भूखी रहूँ तुम्हारे लिये. नहीं रहना मुझे करवा का व्रत.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं: “अरे अरे गुस्सा थूक दो. वो ब्लॉग तो मैंने मजाक में लिखा था. अब अगर तुम्हें नहीं पसन्द है तो मैं अभी जाकर उसे “डिलीट” किये देता हूँ.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धपजी: “अपने मन की तो तुमने सारे जग को सुना ही दी – अब उसे हटाने से क्या होगा?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं: “अगर चाहो तो उस ब्लॉग की जगह क्षमा याचना लिख दूँ?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धपजी: “अब पछतात होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गयीं खेत? कुछ भी कर लो मेरा मन नहीं है ये करवा शरवा का व्रत रह के अपने आपको पीड़ा पहुँचाने का.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे विश्वास होने लगा कि धपजी कोई मजाक नहीं कर रही थीं और व्रत न रहने का निर्णय गम्भीर और दृढ़ था. अब तो मेरे कानों में बचपन में सुनी करवा चौथ की कथायें गूँजने लगीं कि पत्नी द्वारा करवा का व्रत न रहने के जघन्य अपराध में किस तरह भगवान जी ने पति महोदय को तड़पा तड़पा के मारा था. सड़क के किनारे मिलने वाले उन कैलेंडरों के चित्र आँखों के सामने घूम गये जिनमें यमदूतों को नरक में आदमियों को खौलते तेल में कचौड़ी की तरह तलते हुये, पापियों को खुली आग पर बकरे की तरह भूनते हुये और कोयले की भट्ठी में तन्दूरी मुर्गे की तरह सेंकते हुये दिखाया जाता था. ऐसे भयावह विचार आते ही मेरी गंजी होती हुई खोपड़ी से कई अदद बाल निकल आये ताकि डर के मारे रोम रोम खड़े हो जाने वाली कहावत पूरी हो सके.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बारी थी मेरे गमगीन होने की. दोनों हाथ जोड़ कर मैंने धपजी से याचना की, “ऐसा अत्याचार न करो मुझ पर. थोड़ी तो रहम खाओ. अगर तुम करवा का व्रत नहीं रखोगी तो पता है वो कलूटे यमराज के हबशी यमदूत मेरा क्या हश्र करेंगे? व्रत रह लो भले ही बीच बीच में चाय पानी पी लेना. मेरे खयाल से चाय पानी पीने के जुर्म में करवा वाले देवी या देवता शायद मेरी एक आध उँगली काट कर या हड्डी तोड़ कर ही तसल्ली कर लेंगे – पर जान तो बरकरार रहेगी. बोलो क्या कहती हो?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धपजी का दिल थोड़ा सा पसीजा और दयाभाव दिखाते हुये कहा, “मैं भी कहाँ चाहती हूँ कि कोई तुम्हारे हाथ पैर तोड़े या तुम्हारे कबाब बनाये, पर अब उमर भी असर दिखाने लगी है और शरीर साथ नहीं देता है कि ऐसे व्रत रख सकूँ. काश कोई मेरे बदले में व्रत रख लेता.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.... कोई मेरे बदले में व्रत रख लेता – ये सुनते ही मैंने लपक कर धपजी को चूम लिया, “वाह क्या धाँसू ‘आईडिया’ दिया है. भारतीय औद्योगिकी संस्थान की डिग्री और ‘सिलिकॉन वैली’ में रहने वाले सभी भारतीयों का सम्मान करते हुये मेरी भी ये तमन्ना थी कि अपनी कोई ‘कंपनी’ शुरू करूँ पर इस कुंद दिमाग को कुछ सूझ ही नहीं रहा था. आज तुमने मेरी समस्या का समाधान कर दिया. सारे हिन्दुस्तानी तो ‘बी.पी.ओ.’ (बिज़नेस प्रासिसिंग आउटसोर्सिंग) की भेंड़ चाल में लगे हैं, पर मैं बिल्कुल नये तरह के उद्योग की शुरुआत करने जा रहा हूँ – ‘एफ़.पी.ओ.’ यानि कि फैमिली प्रॉबलम आउटसोर्सिंग. व्रत नहीं रहना है – कोई बात नहीं, आपकी जगह कोई हिन्दुस्तान में व्रत रह लेगा. और, भारत में तो ऐसे ही अनगिनत लोग बिना खाये पिये दिन और हफ्ते गुजार देते हैं. उनके लिये तो ये एक पंथ दो काज वाली बात हो जायेगी – भूखे तो वो वैसे ही रहते हैं, पर साथ में भूखा रहने के पैसे भी मिल जायेंगे. नालायक बेटा दिन भर माई-स्पेस डाट कॉम और यू-ट्यूब डाट कॉम पर लगा रहता है, और स्कूल से मिला ‘होम-वर्क’ नहीं करता है? कोई परेशानी की बात नहीं है – हिन्दुस्तान में अनगिनत पढ़े लिखे बेरोज़गार लोग हैं जो सिर्फ़ 7-10 अमरीकी डालर प्रति घंटा की दर से पूरा पूरा ‘होम वर्क’ कर के नालायक बेटे के अध्यापक महोदय की ई-मेल के ‘इन-बॉक्स’ में प्रेषित कर देंगे. क्यों बात कुछ जमी कि नहीं?” मैंने धपजी से उत्साहपूर्वक पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धपजी ने थोड़ी सी चिंता जाहिर करते हुये कहा, “वो तो ठीक है पर भगवान को ये मंजूर होगा या नहीं?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने एक ज्ञानी की तरह जवाब दिया, “क्या बात करती हो. हमारे भगवान को ‘प्रॉक्सी’ व्रत से क्या नाराज़गी होगी? अब अगर इस तरह की बातों को नजरंदाज कर दो कि पूजा पाठ भूलने पर वो आँखे फोड़ देते हैं या भगवान जी का मजाक बनाने पर बच्चों को गूँगा कर देते हैं, तो तुम ये पाओगी कि हमारे देवता गण बहुत ही सहनशील हैं और अपने भक्तों कि समस्यायों और मजबूरियों को बखूबी समझते हैं. अब देखो न जब ऊपर वाले शर्मा जी वैष्णों देवी के दर्शन के लिये जाते हैं तो बगल वाले घूसखोर, दारूबाज, जुआड़ी और अव्वल दर्जे के महापापी टंडन जी टेंटुये से चपरासी से घूस में लिये हुये तीन हजार रुपये निकाल कर शर्मा जी को देकर उनकी जगह वैष्णों देवी की सुपर डीलक्स आरती फेरने को कह देते हैं. देवी माँ को भी पता है कि टंडन साहब पैसा कमाने में इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास स्वयं दर्शन के लिये आने का समय नहीं है. टंडन साहब की मजबूरी समझते हुये देवी माँ उनकी डीलक्स आरती स्वीकार कर ही लेती हैं तभी तो टंडन जी की दौलत हिन्दुस्तान की जनसंख्या की तरह बढ़ती ही जा रही है. कौन बेवकूफ कहता है कि भारत की बढ़ती जनसंख्या एक अभिशाप है – इसी की बदौलत तो हम ‘बी.पी.ओ.’ और अब ‘एफ़.पी.ओ.’ जैसी चीज़ों के सपने देख सकते है. खैर, मैंने सोच लिया है कि मैं ‘एफ़.पी.ओ.’ की एक ‘कंपनी’ खोलने जा रहा हूँ.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धपजी ने खुश होते हुये कहा, “तो शुरुआत मुझसे ही कर दो. कोई व्रत रखने वाला पकड़ कर लाओ.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा, “अभी तो अपनी ‘कंपनी’ का पंजीकरण तक नहीं हुआ है. खैर, इस बार ‘आउटसोर्सिंग’ खुद ही किये लेता हूँ – मतलब कि तुम्हारी जगह मैं खुद ही अपनी लम्बी उमर के लिये करवा चौथ का व्रत रख लेता हूँ. हाँ ये याद रहे कि इसके लिये तुम्हें दस अमरीकन डालर प्रति घंटा के हिसाब से ‘आउटसोर्सिंग’ की रोजगारी देनी पड़ेगी.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस मुझे अपना पहला ग्राहक (क्लाईंट) मिल गया. मैंने अपना नाम अतुल से बदल कर ऐंथनी कर दिया और लग गया काम पर, यानि कि, व्रत पर. मेरा पूरा दिन बिना खाये पिये टी.वी. के सामने बिना सर पैर की छह या सात हिन्दी फिल्में देखते हुये कष्ट रहित बीत गया. धपजी ने भी हर्षोल्लास के साथ मेरे लिये ‘फ्रोज़ेन पिज़्ज़ा’ लाकर ‘फ्रिज़’ में रख दिया – आखिर मैं उनके पति की लम्बी आयु के लिये व्रत जो रखे हुये था. रात को गरम किये हुये ‘चीज़ पिज़्ज़ा’ और ‘डायट पेप्सी’ की एक बोतल से अपना व्रत तोड़ा और मन ही मन आज के व्रत के फायदे सोचे:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. थोड़ा तो कैलोरी उपभोग कम हुआ. बढ़ती हुई तोंद ने भी दुआयें दी.&lt;br /&gt;2. मैंने खुद की जिन्दगी थोड़ी बढ़ा ली.&lt;br /&gt;3. पूरे 130 अमरीकन डालर की कमाई हो गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और, सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि&lt;br /&gt;4. धपजी भी दिन भर प्रसन्नचित्त रहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, ये तो बीती हुई बात है. फ़िलहाल, मेरी ‘सिलिकॉन वैली’ के कुछ एक वी.सी. (वेंचर कैपिटलिस्ट) से बात चल रही है अपनी ‘एफ़. पी. ओ.’ कंपनी शुरू करने की. बात उनको भी जँच रही है और अगर सारे ग्रह एक सीधी कतार में आ कर खड़े हो गये तो अति शीघ्र ही आप सब मेरे नाम के पीछे ‘सी.ई.ओ.’ लिखा हुआ पायेंगे. अब, यदि आप लोग भी मेरे इस दुस्साहस में अपनी घूस या पसीने की कमाई का निवेष करना चाहते हैं तो बिना कोई विलम्ब किये अपनी मंशा टिप्पणी के जरिये यहाँ छोड़ दीजिये.&lt;br /&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-4580345797507154369?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/Wzq2wsVqttc/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">15</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2006/11/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-1750299849768048663</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:42:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:42:16.515-07:00</atom:updated><title>परीक्षा</title><description>&lt;span style="color:#663366;"&gt;लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व उत्तराष्ट्र नामक राज्य पर अतुल्यबोध का राज्य था. अतुल्यबोध एक अत्यंत ही न्यायप्रिय एवं कुषाग्र बुद्धि वाला शाशक था. कहा जाता है कि ऐसी जटिल समस्यायें, जिनका हल स्वयं भगवान भी करने में असमर्थ होते थे, उन्हें अतुल्यबोध पलक झपकते ही सुलझा दिया करता था. उत्तराष्ट्र में सभी धर्म और जाति के लोग शांति पूर्वक, मिल जुल कर सांप्रदायिक सौहाद्र की भावना के साथ रहते थे. अतुल्यबोध के गुणों की प्रसंशा न केवल उत्तराष्ट्र के नागरिक वरन समस्त पड़ोसी राज्य तथा स्वयं देवी देवता भी किया करते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वभावानुसार असुरों से अतुल्यबोध का यशगान सहा नहीं गया और असुरों के राजा बालखारी ने अतुल्यबोध को नीचा दिखाने का उपाय ढूँढना प्रारम्भ कर दिया. बाकी के असुरों से विचार विमर्श करने के उपराँत बालखारी ने धर्म को अपना अस्त्र बना कर अतुल्यबोध के विरुद्ध अपना षड़यंत्र रचा. उसने उत्तराष्ट्र के रघुकुलपुरी नगर में राक्षस तैयबखारी को मुस्लिम समुदाय और राक्षस बाकरे को हिन्दू समुदाय का प्रतिनिधि बना कर भेज दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तैयबखारी ने मुस्लिम समुदाय के दिशाहीन और अनपढ़ युवकों का एक दल बना कर नगर के बाहर स्तिथ एक प्राचीन भवन को मस्जिद का रूप दे दिया. बाकरे इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था. उसने भी कुछ दिशाहीन और अनपढ़ हिन्दू युवकों को हथौड़ों और फावड़ों से लैस कर के मस्जिद पर धावा बोल दिया. कुछ ही क्षणों में पूरा भवन पूरी तरह से ध्वस्त हो गया. तैयबखारी ने बाकरे और समस्त हिन्दू समुदाय पर आरोप लगाया कि उन्होंने एक मस्जिद को तोड़ा है और अतुल्यबोध से आग्रह किया कि समस्त अपराधियों को उचित दंड दे कर उस स्थान पर एक नयी मस्जिद का निर्माण करवाया जाये. बाकरे ने भी तैयबखारी और मुस्लिम समुदाय पर आरोप लगाया कि उन्होंने एक प्राचीन हिन्दू भवन को मस्जिद में परिवर्तित कर दिया था. बाकरे का कहना था कि उसके अनुयायियों ने उचित कार्य किया है और अब अतुल्यबोध को उस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण करवाना चाहिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तैयबखारी और बाकरे दोनों ही अतुल्यबोध के समक्ष अपनी अपनी माँगें लेकर उपस्तिथ हो गये. अतुल्यबोध के सामने एक जटिल समस्या खड़ी हो गयी – उस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया जाये या मस्जिद का या दोनों का? अतुल्यबोध की यह स्तिथि देख कर असुरों के बीच हर्ष की लहर दौड़ गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतुल्यबोध ने तैयबखारी और बाकरे को अगले दिन राजदरबार में उपस्तिथ होने के लिये कहा और ये अश्वासन दिया कि कल तक इस समस्या का हल अवश्य ढूँढ लिया जायेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन जब तैयबखारी और बाकरे अतुल्यबोध के समक्ष पहुँचे तो अतुल्यबोध ने अपना निर्णय सुनाया:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार की समस्यायें तभी उठती हैं जब लोगों के बीच अज्ञानता, अशिक्षा और धर्माँधता का निवास हो. मेरा ऐसा विचार है कि ज्ञान और विज्ञान की उचित शिक्षा ही ऐसी समस्यायों का निवारण कर सकती है. धर्म का अपना महत्व है परंतु मेरे विचार से उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है उच्चतर श्रेणी की शिक्षा प्राप्त करना ताकि हम दूसरे लोगों को समझ सकें और विज्ञान के माध्यम से मानव पीड़ा और अंधविश्वासों को दूर कर सकें. जिस स्थान पर आप लोग मस्जिद या मंदिर बनवाने का आग्रह कर रहे हैं वहाँ इतनी जगह नहीं है कि एक विद्यालय की स्थापना की जा सके अतः मैंने ये निर्णय लिया है कि वहाँ पर एक उच्च स्तर के पुस्तकालय का निर्माण करवाया जाये. इस पुस्तकालय में देश विदेश से कला, साहित्य, विज्ञान और तकनीकि की पुस्तकें मँगवा कर रखी जायेंगी और सभी धर्म, जाति और समुदाय के लोगों को निःशुल्क प्रवेश दिया जायेगा. बाकी के बचे स्थान में सुलभ शौचालयों का निर्माण करवाया जायेगा ताकि यात्रियों और एक आम नागरिक को बाग बगीचों और राजमार्ग का दुरुपयोग न करना पड़े.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतुल्यबोध का ये निर्णय सुन कर तैयबखारी और बाकरे के साथ साथ समस्त असुरों के मस्तक लज्जा से झुक गये. सभी देवी देवताओं और असुरों ने मिल कर अतुल्यबोध के इस उचित तथा व्यावहारिक निर्णय पर शंख नाद करते हुये पुष्प बरसाये. और, एक बार पुनः उत्तराष्ट्र में शाँति की स्थापना हो गई.&lt;br /&gt;***** &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-1750299849768048663?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/My-1LemTdpg/blog-post_25.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2006/10/blog-post_25.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-163791621227760517</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:42:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:42:03.111-07:00</atom:updated><title>गिलौरियाँ.</title><description>&lt;span style="color:#000099;"&gt;नौबस्ता निवासी मेरे परम मित्र बिल्लू भैय्या के सिर्फ दो अदद ही शौक हैं – खाना खाने का और फिल्मी गाने सुनने का. रविवार का दिन था, काम धाम कुछ था नहीं और रेडिओ पर हिंमेंशं रेंशंमिंयाँ के नकहे गाने बज रहे थे – भला हो कि घर से कोसों दूर कोई कब्रस्तान नहीं था वरना हिंमेंशं के कर्ण भेदी गायन से परेशान हुये मुर्दों से बचने के लिये मुझे कुकरैल वाले भूतनाथ बाबा की शरण में जाना पड़ता. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और दरवाजा खोलने पर कत्थे से सने हुये दातों की खीसें निपोरते हुये बिल्लू भैय्या के दर्शन हुये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सच्चे भारतीय मित्र की परंपरा निभाते हुये बिल्लू भैय्या बिना कुछ कहे सुने सीधे अंदर घुस आये, सोफे पर अपने आपको जमाया और दातों पर जमा हुये पान के लेप को मुँह में उँगली घुमा कर जबान पर गिराते हुये कहा, “अमाँ जरा कुछ ठंडा पिलाना. पेप्सी वेप्सी रखे हो फ्रिज में.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने भी दोस्ती निभाते हुये कहा, “वेप्सी तो नहीं है. पेप्सी लाता हूँ और कहो तो खाने के लिये चूहे मारने वाली दवा भी साथ ले आऊँ. अबे तेरे लिये तो साँड़ मारने वाले गोलों की जरूरत पड़ेगी. बको कैसे आना हुआ.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्लू भैय्या ने पतलून की जेब में हाथ सरकाया और नोटों की एक गड्डी मेज पर पटक दी. करीब दस या पंद्रह हजार रुपये रहे होंगे. बिल्लू भैय्या ने घोषणा की, “यार कल मेरे जैसे मनहूस की भी किस्मत खुल गयी. कुछ एक दिन पहले जगदम्बे लॉटरी का एक टिकट लिया था – कल मेरा बीस हजार रुपये का इनाम निकल आया. अब फ़टाफ़ट थोड़ी ढंग की शर्ट और पतलून चढ़ा ले, बालों में कंघी मार ले और चल मेरे साथ ऐश करने.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“पर मियाँ क्या करने का इरादा है?” मैंने मेज पर से गिलास हटाते हुये पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्लू भैय्या जैसे जवाब देने को तैय्यार ही बैठे थे, “यार मैं तो सिर्फ खाने और गाने का ही शौक रखता हूँ. चलो आज चल कर तरह तरह के पकवान खाते हैं – ढाबे से लेकर पाँच सितारा होटेल तक. खाते जाओ जब तक पेट सुअर के पेट की तरह न फूल जाये.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“पर अभी तो सुबह का सिर्फ नौ बजा है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“कोई नहीं सुबह के नाश्ते से ही शुरुआत करते हैं.” बिल्लू भैय्या ने कार की चाभी हाथ में घुमाते घुमाते कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर हम दोनों निकल पड़े लॉटरी में जीते हुये पैसों का सदुपयोग करने के लिये. पहला पड़ाव नेतराम की दुकान. पहले एक आध किलो कड़ाही से गरम गरम निकल रही देसी घी की जलेबियों का भोग लगाया गया, फिर आलू वाली कचौड़ियों की मोटी परत जमायी गयी और अंत में मुँह में बचे खुचे खाने को मलाई दार लस्सी के जरिये पेट में पहुँचाया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह पूरे दिन हम दोनों हब्शियों की तरह ढाबे ढाबे और रेस्ट्रॉ रेस्ट्रॉ जाकर पकवानों का लुत्फ उठाते रहे – क्लार्क अवध में आलीशान लंच, बेकर्स हट में पेस्ट्री, शर्मा जी की चाट, राम आसरे के मलाई पान, चौधरी का मिल्क बादाम और शाम को जेब में छेद कर देने वाला ताज अवध का नाश्ता. रात के खाने के लिये हमने टुंडे की दुकान से कबाब, लखनवी बिरयानी और रूमाली रोटियाँ; गणेश गंज से दर्जन भर दही बड़े और शिव के यहाँ से एक एक किलो रस मलाई और मोतीचूर के लड्डू बंधवा लिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पहुँच कर डी.वी.डी. पर अपने पेट के नये आकार के अनुरूप “गोलमाल” लगाई, मेज पर खाना खोल कर सजाया और लज़ीज़ खाने का लुत्फ़ उठाते हुये प्लेटों को खाली करना शुरू कर दिया. सारी प्लेटें सफा-चट करने के बाद मैंने भारतीय परम्परा का अनुसरण करते हुये अपनी बाहर कूदती हुई तोंद पर हाथ फेरा, शेर की दहाड़ जैसी डकार ली और बिल्लू भैय्या को धन्यवाद देते हुये कहा, “मजा आ गया. आज तो आत्मा तृप्त हो गयी ऐसा स्वादिष्ट खाना खा कर.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर अपने बिल्लू मियाँ कुछ परेशान से दिख रहे थे, सो पूछ लिया, “क्या बात है भाई - ऐसे दिन और खाने के बाद भी ये मनहूसियत क्यों?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्लू भैय्या का जवाब आया, “यार इसमें कोई दो राय नहीं कि सुबह से शाम तक का भोजन बड़ा स्वादिष्ट रहा, पर मुझे ऐसा लग रहा है कि कोई चीज़ छूट रही है. मैं अभी तक तृप्त नहीं महसूस कर रहा हूँ.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक बिल्लू भैय्या चिल्लाये, “अरे यार पता चल गया क्या चीज़ अभी बची है. चल मेरे साथ गली के नुक्कड़ तक.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्लू भैय्या मुझे घसीटते हुये नुक्कड़ तक ले गये और गली के कोने में ईटों के ढेर पर टिकी हुई “चौरसिया पान भंडार” की गुमटी के सामने रुक गये. घनी मूँछो वाले चौरसिया जी रेडियो पर बजते हुये हिंमेंशं रेंशंमिंयाँ के गाने की धुन पर पान के पत्तों पर चूना और कत्था मलने में लगे हुये थे और हमारे बिल्लू भैय्या बर्फ़ की सिल्ली पर बिछे हुये लाल कपड़े के टुकड़े पर चाँदी की परत से सजी हुयी पान की गिलौरियों को ललचाई नजरों से देखने में व्यस्त थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“भैय्या जरा दुई ठो गिलौरी देना.” ये कहते हुये बिल्लू भैय्या ने पान की दो गिलौरियाँ उठाईं – एक मुँह के दाँयी ओर दबायी और दूसरी बाँयी ओर, और आनन्द से बोल उठे, “अब जा कर मजा आया. बिना गिलौरी खाये खाना फीका फीका सा लग रहा था. अब जा कर खाने का भी आनन्द आया. बिना मीठे पान की गिलौरी के तृप्ति नहीं मिलती. कितना भी स्वादिष्ट खाना हो पर अंत में पान की गिलौरी तो होनी ही चाहिये.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छह सात गिलौरियाँ बंधवा कर हम वापस चल पड़े घर की ओर. रास्ते में मैंने पूछ ही डाला, “ये क्या चक्कर है बिल्लू? दिन भर ऐसे ऐसे लजीज पकवान खाने के बाद भी बिना पान की गिलौरी खाये तुम्हारा मन नहीं भरा?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्लू ने भाषण पिलाना शुरू कर दिया, “देखो भाई इस एक छोटी सी गिलौरी में सारे स्वाद एक साथ कैद हैं – गुलुकन्द की मिठास, पेपरमिंट की ठंढक, चूने का तेजपन, कटी हुई सुपाड़ियों का नशा, कत्थे का रंग, पान के पत्ते की तीखापन, चाँदी के काम की बारीखी, धीरे धीरे मुँह में घुलता हुआ रस. जो लोग खाने के सच्चे शौकीन हैं वही इस पान की गिलौरी की महिमा समझ सकते है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“समझाया बड़े ढंग से. तुम्हारा दूसरा शौक फिल्मी गाने सुनने का है. तो दूसरे शौक की भी कोई गिलौरी जैसी चीज़ है?” मैंने बवजह भौंक रहे आवारा कुत्ते को भगाते हुये पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"राहुल देव बर्मन.”, फटाक से जवाब आया, “दिन भर कितने भी गाने क्यों न सुन लूँ पर जब तक आर डी बर्मन के गाने न सुन लूँ मन नहीं भरता है – लगता है पूरी और अच्छे तरीके से गाने सुने ही नहीं. आर डी बर्मन गानों की गिलौरी है. घर चलो तुम्हें इस गिलौरी का भी असली स्वाद चखाता हूँ.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पहुँचते ही बिल्लू भैय्या ने जेब से अपना एम-पी-3 प्लेयर निकाला, स्पीकर जोड़े और एक के बाद एक आर डी बर्मन के गाने बजाने शुरू कर दिये. मैंने मेज पर पड़ी हुई दो पान की गिलौरियों को मुँह में ठूँसा और उनका रसास्वादन करते हुये बिल्लू भैय्या से कहा, “मान गये गुरू. दोनों ही गिलौरियों का कोई जवाब नहीं है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;-----&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मेरा आर डी बर्मन संग्रह:&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;a href="http://www24.brinkster.com/shria/RDB.htm"&gt;&lt;strong&gt;यहाँ क्लिक करें&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-163791621227760517?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/Lzfzt6sgzdY/blog-post_12.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2006/10/blog-post_12.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-2157935044377802862</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:41:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:41:37.002-07:00</atom:updated><title>समस्या का हल.</title><description>&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;सर्व प्रथम हार्दिक धन्यवाद उन सभी पाठकों को जिन्होंने मेरी समस्या को ध्यान पूर्वक पढ़ कर मुझे अपने अनमोल सुझाव दिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर पिछले कई दिनों से ऑफिस में मैं थोड़ा सुस्त सुस्त और गमगीन सा लग रहा था. मेरे बगल में बैठने वाले सहकर्मी जेफ़ (Jeff – Jefferson का छोटा रूप) से शायद ये सब सहा नहीं गया और कल मेरे कमरे में आ टपका, चिंता दिखाते हुये पूछा, “अटूल, क्या बात है? आज कल थोड़ा परेशान दिखाई दे रहे हो. घर में सब खैरियत तो है?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(वार्तालाप अंग्रेजी में हुई थी. यहाँ उसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं: “बात तो घर की ही है. पर तुम्हारे पल्ले नहीं पड़ेगी.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेफ़: “जरूर कोई पेंचीदा इंडियन फ़ैमिली मामला होगा. पर बताओ तो सही. समझने की कोशिश करूँगा.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने जेफ़ से कुर्सी खींच कर आराम से बैठने को कहा क्यों कि इस समस्या को एक अमरीकी दिमाग को समझाने में एक या दो घंटे लगने ही वाले थे. शुरुआत की गयी पुनर्जन्म पर बीस मिनट के एक छोटे से पाठ से और अंत हुआ एक घंटे और नौ मिनट के बाद समस्या को सफलता पूर्वक समझाने से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेफ़: “अब मेरी समझ में आया कि अधिकतर हिन्दुस्तानी शकल से दुखी क्यों लगते हैं, शाम को हम लोगों के साथ बार में क्यों नहीं जाते हैं और आठ घंटे में से चार घंटे तक किससे फोन पर लगे रहते हैं. बेचारे इस जनम ही नहीं पर अगले जनम की भी सोच कर परेशान होते रहते हैं. तुम्हें ये नहीं पता कि जीवन का असली आनन्द कैसे उठाया जाये. तुम लोगों को हम अमेरिकन से कुछ सीखना चाहिये. अरे अगले जन्म को मारो गोली, कम से कम इस जन्म में तो ढंग से जियो. एक ही बीबी के पीछे कब तक पड़े रहोगे. अब मुझको देखो – अपने जीवन के अड़तालिस सालों में मैं एक बीबी छोड़ चुका हूँ, डेढ़ बीबीयाँ मुझे छोड़ चुकी हैं और आज शाम को बार में कैथी से मिलने जा रहा हूँ.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं: ये डेढ़ बीबी का चक्कर समझ में नहीं आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेफ़: एक कानूनी शादी वाली बीबी ने छोड़ा और एक साथ मैं बिना शादी के दो साल तक रहा, दो सालों के बाद वो भी मुझे छोड़ कर किसी और के साथ निकल गयी. इस लिये दूसरी वाली को आधी बीबी ही मानता हूँ क्यों कि उससे शादी जो नहीं हुई थी. और एक तुम हो एक ही के साथ अगला जन्म भी बिताना चाहते हो – अरे तुमको कोई बॉलीवुड की मूवी की स्क्रिप्ट लिखनी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने मन ही मन सोचा कि बन्दे की बात में दम है – कह सही रहा है. ये सोचना भर ही था कि भारतवर्ष का नक्शा; माता पिता की तस्वीरें; काली, दुर्गा और चण्डी की मूर्तियाँ; अट्ठाहस मारते हुये मिनमिखिया रिश्तेदारों के चेहरे; राम, भरत, विष्णु और गणेष के रंग बिरंगे चित्र, और न जाने क्या क्या मेरी आँखों के सामने कौंध गये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने एक डरे हुये मेमने की तरह मिमियाते हुये कहा: “यार ये सब मुझसे नहीं होगा.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेफ़: कोई नहीं, मेरे पास एक बेजोड़ आईडिया है. बुरा नहीं मानना पर इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिये इस जन्म में ना सही पर अगले जन्म में तुम्हें या तुम्हारी बीबी को अमरीकन बनना ही पड़ेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं: मंजूर है और कोई चारा भी नहीं नज़र आ रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेफ़: तो जैसा बीबी चाहती है वैसा ही करो. अपने भगवान के सामने जाओ, बीबी को भी साथ ले जाओ और जोर जोर से कहो – हे भगवान मुझे अगले जनम में भी यही बीबी चाहिये. पर भगवान अगले जन्म में हम दोनों को अमरीकन बनाना. अगर दोनों को न अमरीकन बना पाओ तो कम से कम मेरी बीबी को अमरीकन जरूर बनाना. बस – तुम्हारी समस्या खलास.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं: हैं? इससे मेरी समस्या का हल कैसे होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेफ़: अरे भैय्या अगर अगले जन्म में तुम दोनों अमरीकन हुये तो मैं गारण्टी के साथ कह सकता हूँ कि तुम्हारे अगले जन्म की शादी दो या तीन साल से ज्यादा नहीं टिकेगी. और, मान लो कि तुम अगले जन्म में हिन्दुस्तानी ही हुये पर बीबी अमरीकन हुयी तो भैय्या तुमको तो कोई मेहनत करनी ही नहीं पड़ेगी – बीबी खुद ही तुमको कुछ महीनों में छोड़ कर रफूचक्कर हो जायेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तुरंत जेफ़ के पैरों में गिर पड़ा. कमीज की बाँह से आँसू पोंछते हुये मैंने दोनों हाथ उठा कर ऊपर वाले को धन्यवाद दिया कि उसने जेफ़ जैसे ज्ञानी को मेरे बगल वाला कमरा दिया. और, एक बार फिर एक आम असहाय भारतीय को मुसीबत से बचाने के लिये एक गोरा ही काम आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;** जेफ़ का दूसरा सुझाव ये था: भगवान अगले जन्म में भी हम दोनों की शादी हो बस सिर्फ रोल उलट देना. यानि कि मैं लड़की पैदा हूँ और बीबी बनूँ; और बीबी लड़का पैदा हो कर पति बन जाये. फिर अपने दिल की सारी भड़ास निकाल लेना – और, तब तक तो डेटाबेस टेक्नलॉजी भी काफी तरक्की कर जायेगी. पर मैं पहले वाले सुझाव पर ही अमल करने जा रहा हूँ.&lt;br /&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-2157935044377802862?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/Eh64dVvCE2A/blog-post_10.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2006/10/blog-post_10.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-7295897669963859170</guid><pubDate>Tue, 13 Mar 2007 23:41:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-03-13T16:41:16.995-07:00</atom:updated><title>समस्या</title><description>&lt;span style="color:#006600;"&gt;यदि आप पुरुष जाति के हैं और मेरी इस समस्या को पूरा पढ़ने का धैर्य रखते हैं, तो इसे पढ़ने के उपराँत मुझे इस समस्या समाधान की कोई उपयुक्त युक्ति सुझायें. अपनी समस्या लिखने से पूर्व मैं सर्व प्रथम आप को एक ऐसी अदृश्य “वस्तु” से अवगत कराना चाहूँगा जो कि मेरी समस्या का एक आधार है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ऊपर निवास करने वाले भगवान ने संसार की सभी पत्नियों, चाहे वो किसी भी जाति, धर्म, वर्ण या देश की हों, को एक अदृश्य एवं अत्यंत शक्तिशाली पति-वेधी शस्त्र से लैस कर रखा है – और, ये शस्त्र है एक डेटाबेस. संसार की सभी पत्नियाँ इस डेटाबेस का उपयोग अपने अपने पतियों के दुष्कर्मों और कुकर्मों का लेखा संजो कर रखने के लिये करती हैं. पतियों के दुष्कर्मों और कुकर्मों के कुछ एक उदाहरण देखिये – 1.) आपने 14 अप्रैल सन 1996 को मेरी मामी के घर, जब हम वहाँ उनकी भतीजी के मुंडन में गये थे, सबके सामने भोंदू कह कर मुझे बे-इज्जत किया था. और, ये सुन कर आपका छोटा भाई मुँह पर हाथ रख कर बंदर की तरह ही ही कर के हँसा था. 2.) सात साल पहले आप मेरे सत्ताईसवें जन्मदिन के दिन सुबह सुबह उठ कर हैप्पी बर्थ-डे कहना भूल गये थे. अब तक तो आप मेरे कहने का तत्पर्य समझ ही गये होंगे. दुर्भाग्यवश इस डेटाबेस का खाता विवाह से पहले की मुलाकात के समय ही खुल जाता है. पत्नियाँ किसी भी समय इस डेटाबेस में से आपके करोड़ों अरबों संरक्षित कुकर्मों में से स्तिथि के अनुरूप किसी एक कुकर्म का संपूर्ण विवरण मिसाईल की तरह आपके ऊपर गिरा देती हैं.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;strong&gt;अब लीजिये मेरी दुविधा गाथा सुनिये –&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो मैं पूजा पाठ करता नहीं हूँ पर पत्नी जी की मन की लालसा को भाँपते हुये मैं पिछले सप्ताहाँत सपरिवार एक परिचित के घर पूजा पाठ के लिये चला गया. परिचित महोदय ने मुझ अनभिज्ञ को इस तथ्य से अवगत कराया कि देवी माँ के समक्ष हाथ जोड़ कर सच्चे हृदय से की गयी प्रार्थना 88.708% अवश्य पूरी होती है.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;बस ये सुनना था कि पत्नी जी ने त्वरित गति से दोनों हाथ जोड़ कर आँखें मूँदी और धीरे से पाँच या सात सेकेंड कुछ बुदबुदा दिया. फिर बड़ी प्रेम की भावना से मेरे सर के ऊपर बचे खुचे बालों में उंगलियाँ फिराते हुये कहा, “मैंने तो माँगा कि अगले जन्म में भी तुमसे ही विवाह हो.” मैंने सुबह सुबह ही उठ कर पूरे घर में वैक्यूम किया था और सभी लोगों के तकरीबन 25 या 30 कपड़ों में स्त्री (आयरन) किया था – ये सब शायद उसी का परिणाम था. अपनी बात को आगे बढ़ाते हुये पत्नी जी ने कहा, “अब तुम भी देवी माँ से वही माँग लो जो मैंने माँगा है - कि अगले जन्म में भी तुम्हारा मेरे साथ ही विवाह हो. क्यों तुम भी यही माँगोगे न?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस यही है मेरी दुविधा – यदि हाँ कहूँ तो मुसीबत ये है कि अभी तक मेरे जितने भी कुकर्म डेटाबेस में संजोये गये हैं और बाकी के जीवन के भी जो कुकर्म इस डेटाबेस में संजोये जायेंगे, वो सब के सब अगले जन्म में पहले फेरे के बाद ही पत्नी जी को प्रक्षेपास्त्र के रूप में पके पकाये मिल जायेंगे. और, यदि न कह दिया तो अगले कई सप्ताहों तक मौन-अस्त्र का सामना करना पड़ेगा, सम्भवतः अपना वजन कम करने का बहाना मिल जायेगा और मेरा ये कुकर्म डेटाबेस में जाकर शेष जीवन भर चौड़ा सा मुँह खोल कर मुझे उलाहना देता रहेगा. संक्षिप्त में – हाँ कहूँ तो कोड़ों की मार और न कहूँ तो जूतों की मार.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;खैर उस समय तो मैंने स्तिथि सँभाल ली (मेरा दिमाग चाचा चौधरी के दिमाग से भी तेज चलता है). मैंने अपने भय को छुपाते हुये निडर हो कर कहा, “मैं तो गणेश का भक्त हूँ. इतनी मूल्यवान प्रार्थना तो मैं दीपावली के दिन लम्बोदर के चरणों में ही करूँगा.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय तो जान बच गयी पर अब समस्या ये है कि दीपावली बस अब कुछ ही दिन दूर रह गयी है और मेरे दिमाग में अभी तक कोई युक्ति नहीं आयी है जो कि मेरे इस और अगले दोनों जीवनों को कष्ट रहित बना दे (क्या करें चाचा चौधरी का साबू मेरा दिमाग चुरा ले गया है).&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हे मेरे प्रिय ब्लॉग पाठकों यहीं आपके सहयोग की आवश्यक्ता है. “टिप्पणी” पर क्लिक करें और मेरी इस दुविधा का समुचित समाधान दें - कि मैं पत्नी जी को क्या बताऊँ कि मैंने गणेश जी से क्या माँगा. यदि आप विवाहित हैं तो आपको ये बताने की आवश्यक्ता नहीं है कि “मैं भूल गया और कुछ और ही माँग बैठा” सही उत्तर नहीं है और ये डेटाबेस के उच्चतम श्रेणी के कुकर्म के अंतर्गत आता है.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;अपने भाई, बन्धुओं, सखा, मित्रों और रिश्तेदारों से भी कहें कि इस नेक काम में हिस्सा ले कर एक “ब्लॉगर” की सहायता करें. सर्वश्रेष्ठ उत्तर (जिसका मैं प्रयोग करूँगा) देने वाले पाठक को दंडवत नमन कर के यहाँ पर सम्मानित किया जायेगा.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;सधन्यवाद,&lt;br /&gt;एक पति.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-7295897669963859170?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/hT_d8DGkaik/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">17</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2006/10/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-2768236032720044441</guid><pubDate>Fri, 29 Sep 2006 23:26:00 +0000</pubDate><atom:updated>2006-09-28T08:17:36.697-07:00</atom:updated><title>देवी शरणम गच्छामि.</title><description>&lt;span style="color:#006600;"&gt;आज से कई सौ वर्ष पूर्व सम्पूर्ण उत्तर भारत पर सम्राट यशोधर सिंह का एकक्षत्र राज्य था. पिछले कई वर्षों से साम्राज्य की परिस्तिथि बिगड़ती जा रही थी – विद्रोही दल अस्त्र शस्त्र ले कर साम्राज्य के कोने कोने में खड़े होने लग गये थे और आर्थिक स्तिथि भी सामान्य नहीं थी. ये सब तो यशोधर के लिये एक चिंता का विषय थे ही, साथ में सम्राट के लिये सबसे बड़ी चिंता का कारण था उनका एक मात्र पुत्र युवराज अमीर सिंह.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;अमीर सिंह हर क्षेत्र में पूर्णतः अयोग्य था. न तो उसे शिक्षा में कोई रुचि थी और न ही उसे खेल-कूद, राजनीति और कला के क्षेत्र से कोई लगाव था. और, यशोधर के लिये इनसे भी बड़ी पीड़ा का कारण ये था कि अमीर के हृदय में अपने स्वयं के साम्राज्य के लिये कोई भक्ति या त्याग की भावना नहीं थी. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;यशोधर ने सभी प्रकार के यत्न कर लिये अमीर को परिवर्तित करने के लिये. अंततः जब सारी युक्तियाँ असफल हो गयीं तो यशोधर आशुकेष ऋषि की शरण में जा पहुँचा. यशोधर ने अश्रु प्रवाह को रोकने की चेष्टा करते हुये कहा – “स्वामी, मेरा पुत्र युवराज अमीर सिंह हर क्षेत्र में अयोग्य एवं अक्षम है. उसका जीवन इस साम्राज्य के लिये व्यर्थ ही है. आपको तो विदित ही है कि हमारे साम्राज्य में धनुर्विद्या का कितना महत्व है. साम्राज्य का बच्चा बच्चा हाथ में धनुष बाण ले कर ये स्वप्न देखता है कि एक दिन वो धनुष प्रतिस्पर्धा का विजेता बनेगा. कुछ महिनों के पश्चात सभी पड़ोसी राज्यों के राजकुमारों की धनुष प्रतिस्पर्धा है और पराजित युवराज को अगले एक वर्ष तक समस्त विजेताओं को प्रति माह पाँच सहस्त्र स्वर्ण मुद्रायें लगान के रूप में देनी होंगी. आप कुछ और नहीं तो अमीर को इस योग्य तो बना ही दें कि वो इस धनुष प्रतिस्पर्धा में विजयी हो जाये.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महर्षि आशुकेष ने यशोधर की समस्या सुनने के बाद सम्राट को ये आज्ञा दी कि अमीर सिंह को महर्षि के आश्रम में आठ सप्ताह के लिये शिक्षा एवं तप के लिये भेजा जाये. आठ सप्ताह के अविरत कठोर परिष्रम के उपरांत भी आशुकेष ऋषि अमीर के भीतर तिनका भर भी परिवर्तन ना ला सके और निराश हो कर यशोधर के राजमहल में जा पहुँचे. आशुकेष ने एक हारे हुये सिपाही की भाँति कहा, “सम्राट, क्षमा करें ये कहने के लिये कि एक पत्थर में ज्ञान डाला जा सकता है परंतु युवराज अमीर में नहीं. मैं असफल रहा युवराज को धनुर्विद्या सिखाने में”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;सम्राट ने दुखी स्वर में पूछा, “ऋषिवर क्या ऐसी कोई भी युक्ति नहीं है जिससे युवराज और उसके कर्मों से इस साम्राज्य का भला हो सके?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;आशुकेष ने सम्राट को सांत्वना देते हुये कहा, “राजन! ये दुष्कर कार्य हमारे साम्राज्य में रहने वाले साधारण नागरिकों, शिक्षकों और ऋषि, मुनियों के लिये सम्भव नहीं है. इसके लिये हमें ज्ञान सम्पदा से भरपूर, दैवीय शक्ति वाले दूसरे लोक के देवदूतों की सहायता लेनी होगी. और, उसके लिये मुझे सप्ताह भर का यज्ञ करना होगा. यदि सम्राट की अनुमति हो तो मैं यज्ञ का प्रबन्ध करता हूँ.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;यशोधर से अनुमति प्राप्त करने के पश्चात आशुकेष ने पूरे एक सप्ताह यज्ञ किया. यज्ञ के सातवें दिन हवन कुंड से उच्च जाति की अहिल्यबेथ नामक एक देवी प्रकट हुयी. उसकी देह मट्ठे के समान दूधिया, गुलाबी वर्ण की थी, केश स्वर्णिम थे तथा नेत्र एक गहरे सागर के समान नीले रंग के थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहिल्यबेथ के बोलने और सिखाने के ढंग में कुछ इस प्रकार का सम्मोहन था कि अमीर उसके समस्त आदेशों का पालन करते हुये धनुर्विद्या सीखने में लिप्त हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन सप्ताह के पश्चात पड़ोसी राज्यों के युवराजों की धनुष प्रतिस्पर्धा हुई और अमीर सिंह अहिल्यबेथ के योग्य मार्ग दर्शन के कारण विजयी हो कर लौटा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यशोधर ने अहिल्यबेथ को राजकीय सम्मान से सुशोभित किया और उसके चरणों में भाँति भाँति प्रकार के उपहार बिछा कर राजसी ठाठ बाठ के साथ विदा किया.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;पूरे राज्य में कई महिनों तक अमीर सिंह की विजय के उत्सव मनाये गये. जब उत्सव का वातावरण शाँत हुआ तो अमीर पुनः साम्राज्य के प्रति अपने दायित्व से मुँह मोड़ कर रंगरेलियों में व्यस्त हो गया. और, यशोधर पुनः चिंतित हो गया कि किस प्रकार अमीर के हृदय में राज्य और राज्य से सम्बन्धित वस्तुओं के प्रति प्रेम, भक्ति एवं त्याग की भावना जागृत की जाये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास दोहराय गया – यशोधर आशुकेष की शरण में गया, महर्षि आशुकेष अमीर को अपने आश्रम में ले गये, उनकी सारी युक्तियाँ और पाठ विफल रहे और आशुकेष के आठ सप्ताह के कठिन परिश्रम के उपराँत भी अमीर में कोई परिवर्तन न हुआ.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;पूरी तरह से निराश आशुकेष और यशोधर ने पुनः अपनी समस्त आशायें दूसरे लोक के देवदूतों और देवियों पर लगा दीं. एक बार फिर से आशुकेष ने पूरे एक सप्ताह यज्ञ किया और यज्ञ के सातवें दिन हवन कुंड से उच्च जाति की एक देवी प्रकट हुयी. परंतु, इस बार एक दूसरी देवी प्रकट हुई – इसका नाम स्यू था. स्यू भी अहिल्यबेथ के ही लोक की थी और उसकी देह भी मट्ठे के समान दूधिया, गुलाबी वर्ण की थी, केश स्वर्णिम थे तथा नेत्र एक गहरे सागर के समान नीले रंग के थे. सम्मोहित अमीर पुनः दैवीय प्रताप के वश में आकर पठन पाठन में रम गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार सप्ताह के कठोर परिश्रम के पश्चात जब अमीर राजमहल में वापस आया तो उसके रोम रोम से राज्य भक्ति की भावना टपक रही थी. यशोधर का सर अमीर का ये रूप देख कर गर्व से ऊँचा हो गया और उसने समस्त जन सभा के समक्ष अमीर का आलिंगन करते हुये कहा, “पुत्र, हमें अपनी राज्य भक्ति का कोई उदाहरण तो दो.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;ये सुनते ही अमीर ने अपनी म्यान से कृपाण निकाल कर यशोधर के बगल में बैठे सेनापति तथा वाणिज्य मंत्री का सर धड़ से अलग कर दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विस्मित यशोधर ने पोछा, “अमीर ये तुमने क्यों किया?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमीर ने उत्तर दिया, “महराज, ये दोनों गरीब जनता को कष्ट दिया करते थे, राजकीय पैसों का दुरुपयोग किया करते थे. सेनापति ने तो व्यापारियों से पैसा ले कर निम्न स्तर के हथियार सैनिकों के लिये खरीदे थे. इन्हें जीवित नहीं रहने दिया जाना चाहिये था. मैंने एक सच्चे राष्ट्र भक्त का कर्त्व्य निभाते हुये इनको उपयुक्त दण्ड दे दिया है.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;“परंतु राष्ट्र भक्ति का ये कोई उचित तरीका तो नहीं हुआ. तुम्हें इसके बारे में मुझे सूचित करना चाहिये था. अब इनको मारा है तो उन सभी व्यापारियों को भी मार कर आओ जिन्होंने सेनापति को निम्न स्तर के हथियार बेचे. समस्या हल करने का एक सभ्य तरीका होता है.”, यशोधर ने क्रुद्ध हो कर कहा.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;ये सुनते ही अमीर कृपाण ले कर यशोधर की ओर झपटा ये कहते हुये, “यशोधर, मुझे सबसे पहले तुझे ही मारना चाहिये था. देख तूने इस राष्ट्र का क्या हाल कर दिया है. तू और तेरे सभी सहकर्मी जन्मजात चोर हैं.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;अमीर यशोधर पहुँच पाता उससे पहले ही यशोधर के अंगरक्षकों ने अमीर का वध कर दिया. अमीर का जीवन हीन देह स्यू के चरणों में गिरा. यशोधर ने स्यू की ओर लाचार दृष्टि से देखा और कहा, “देवी, आज से ये सम्राट आपकी शरण में है. मेरा उचित मार्ग दर्शन करें और ये सिखायें कि इस साम्राज्य को किस प्रकार से भली भाँति चलाया जाये.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;(“लगान” और “रंग दे बसंती” से प्रेरित)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;******&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-2768236032720044441?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/U6jxEejr7CQ/blog-post_28.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2006/09/blog-post_28.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-1043916190542633102</guid><pubDate>Fri, 29 Sep 2006 23:26:00 +0000</pubDate><atom:updated>2006-09-15T22:05:20.217-07:00</atom:updated><title>आदर्श</title><description>&lt;span style="color:#000099;"&gt;15 अगस्त का दिन था और गाजीपुर के एक छोटे से पर देशभक्ति से लिपे पुते नेता श्री सत्य नारायण पाँडे धोती संभालते हुये नगर के एक मात्र राजकीय इंटर कालेज की तरफ चल पड़े तिरंगा फहराने के लिये.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;पाँडे जी कालेज के मैदान में पहुँचे, सारे अध्यापकों ने डंडी हिला हिला कर राक्षसी बच्चों को कक्षा के अनुसार कतारों में सजाया और फिर नेता जी ने पजामे के नाड़े की बनी हुई डोरी को खींच कर तिरंगा लहराया. झंडे के खुलने से उस में से तकरीबन आधा दर्जन सूखे हुये गेंदे के फूल गिरे, बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ तालियाँ बजाईं और फिर पाँडे जी ने हर साल की तरह भाषण देना शुरू कर दिया. पाँडे जी ने पूरे जोश में आकर बच्चों को भारत के महान सपूतों और नेताओं के बारे में बताना शुरू कर दिया – गाँधी, नेहरू, आज़ाद, भगत सिंह, सरदार पटेल और न जाने कौन कौन लोग. टीचरों ने धीरे से अपनी अपनी जेबों से धूप के चश्मे निकाले और उन्हें अपनी आँखों के ऊपर सरकाना शुरू कर दिया. दूसरी ओर जमीन पर बैठे बच्चों ने जमीन से घास उखाड़नी शुरू कर दी, जमीन से चीटें उठा उठा कर सामने वाले की कालर के भीतर डालने शुरू कर दिये और कुछ महा उपद्रवी बच्चों ने ख़ी ख़ी कर के चुपचाप बैठी छात्रों की पूरी भीड़ को हँसाने का जिम्मा ले लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, पूरी पच्चीस मिनट की यातना के बाद पाँडे जी के नीरस भाषण का खातमा हुआ और इस बार सभी ने तिगुने जोश के साथ तालियाँ बजाईं. और, फिर वो घड़ी आ गयी जिसका सभी छात्रों को सुबह से इंतजार था – मोतीचूर के लड्डुओं के बाँटने का समय. छोटी कक्षा के सभी बच्चे राष्ट्र गान से भी ज्यादा उत्साह के साथ चिल्लाने लगे – हगो सर, हगो सर. बच्चों की चीख पुकार सुन कर संस्कृत के आचार्य हगो (पूरा नाम हर गोविन्द त्रिपाठी – नाम का छोटा रूप ह.गो. त्रिपाठी यानि कि हगो) बाँये हाथ में मोतीचूर के लड्डुओं से भरी लोहे की बाल्टी लेकर अवतरित हो गये. सभी छात्र गण दोनों हथेलियों से दोना बना कर लार टपकाते हुये खड़े हो गये. हगो सर बाल्टी में हाथ डालते, एक लड्डू निकालते और सामने भिखमंगे की तरह फैले हुये हाथों में दूर से टपका देते. बीच बीच में हगो सर एक आधा बदकिस्मत बच्चे को झड़प देते – दिवाकर, लड्डू खा क्यों नहीं लेता? जेब में क्यों डाल रहा है? तो दिवाकर तत्परता से उलट कर जवाब देता – सर, ये सब नाटक खतम हो जाने के बाद हम सब मैंदान में जा कर क्रिकेट खेलेंगे. आज मैं बॉल लाना भूल गया हूँ. अब ये लड्डू ही बॉल के काम आयेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारे लड्डू भी बँट गये. छात्र गण गधे के सर से सींग की तरह गायब होने ही वाले थे कि प्राचार्य महोदय ने एक मनहूस घोषणा कर दी – बच्चों, श्री सत्य नारायण पाँडे जी आज के इस पावन पर्व पर तुम सबसे एक एक कर के मिलना चाहेंगे. सभी छात्रों ने एक जुट हो कर मन ही मन पाँडे जी की कई गुजर चुकी और कई आने वाली पीढ़ियों को सतरंगी गालियों से धोया और मन मार कर वापस अपनी अपनी जगह आ कर खड़े हो गये.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;पाँडे जी अपनी मनभावन हँसी, जो कि छात्रों को रावण की कुटिल मुस्कान से भी ज्यादा भयावह दिख रही थी, के साथ मंच से नीचे उतरे और बढ़ चले सामने लगी हुई कतारों की तरफ. पहली कतार थी कक्षा आठ के छात्रों की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंक्ति में सबसे आगे खड़ा था संजीव (प्यार का नाम मोची क्यों कि बापू की जूते की दुकान थी). नेता जी ने सर पर वात्सल्य की भावना से हाथ फेरते हुये पूछा, “बेटे बड़े हो कर क्या बनना चाहोगे?” संजीव के अपने बापू ने आज तक ये सवाल उससे नहीं पूछा था क्यों कि उन्हें पता था कि आखिरकार बेटे को पुश्तैनी जूते की दुकान ही चलानी थी. इस सवाल को सुनते ही बच्चा जोश से भर उठा और बोल पड़ा, “सर मैं तो शाहरुख खान बनूँगा, किंग खान, बादशाह खान.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाँडे जी बोल उठे, “हाँ हाँ क्यों नहीं बहुत नाम कमाया है उसने..” पाँडे जी अपना वाक्य पूरा करते उससे पहले ही बगल में खड़ा रितेश तैश में आ कर चिल्लाया, “क्या बे शाहरुख? वो तो ससुरा हकला हकला के बोलता है. मैं तो बड़ा हो कर आमिर खान बनूँगा. क्या धाँसू एक्टिंग करता है. रंगीला में क्या काम किया था अपने हीरो ने...”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब भला नीरज कैसे चुप रहता? उसने भी अपने दिल की बात खोल दी, “अबे आमिर तो लड़की लगता है. मैं तो सलमान या संजय दत्त बनूँगा. बॉडी देखी है अपुन के भाई की? दाँयी बगल में श श शाहरुख और बायीं बगल में आमिर को दबा कर उनका भरता बना दे.” अब तक तो सूखी घास में आग पूरी तरह से लग चुकी थी – मैं ह्रितिक, मैं अभिषेक और बीच बीच में मैं सचिन और मैं द्रविड़ की आवाजें भी आयीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाँडे जी ने बच्चों से मिलने का अपना विचार फटे हुये कच्छे की तरह त्याग दिया और निराशा में मुंडी हिलाते हुये वापस पलट लिये. अभी कुछ ही कदम आगे बढ़े थे कि शोर शराबे और चिल्ल-पों के बीच में से एक मिमियाती हुई सी आवाज सुनायी दी, “मैं बड़ा होकर अशोक बनूंगा.” खीज खाये हुये पाँडे जी ने झुँझलाते हुये पूछा, “अब ये अशोक ससुरा कौन है? पहले तो इसका नाम कभी नहीं सुना.” एक बार फिर से मिमियाती हुई आवाज सुनाई दी, “अशोक पुराने जमाने में बहुत बड़ा राजा था.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;पाँडे जी के रेगिस्तान से तपते हुये लाल चेहरे पर आशा की फुहार गिर पड़ी और बाँछे खिलाते हुये उल्टे पाँव वापस आ गये. भीड़ में खड़े हुये सींकिया सुधाकर, जिसकी आँखों पर बोतल के पेंदे की तरह के लेंसों का चश्मा चढ़ा हुआ था, की ओर गर्व से देखा और अपनी आँख से गिरते हुये आँसुओं को कुर्ते की बायीं बाँह से पोंछते हुये कहा, “जुग जुग जियो बेटा. धन्य हैं वो माँ बाप जिन्होंने आज कल के जमाने में ऐसे सपूत को जन्मा है. बेटा बताओ कि तुम अशोक क्यों बनना चाहते हो.”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;सुधाकर का सीना अपनी तारीफ सुन कर चौड़ा हो गया और वो सर ऊपर उठा कर शुरू हो गया, “सर परसों ही मैंने पल्लव के घर डी.वी.डी. पर अशोक देखी. बड़ी चीज़ रहा होगा तभी तो शाहरुख उसका रोल करने को मान गया. और बाई गॉड क्या फाईट करता था – हज़ारों को तो ऐसे ही काट डाला. आल इन वन था – गाता भी बढ़िया था – रात का नशा अभी आँख से गया नहीं. और, सर कितनी खूबसूरत खूबसूरत लड़कियों के साथ डांस किया करता था – और लड़कियाँ भी क्या छोटे छोटे मस्त कपड़े पहना करती थीं उसके जमाने में...”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;पाँडे जी बिना पूरा इतिहास सुने ही आगे बढ़ चले. पाँडे जी सामने लगे नीम के पेड़ पर अपना सर मारने में लग गये और हगो अपनी नौ बित्ते की छड़ी लेकर बेचारे सुधाकर के ऊपर पिल पड़े.&lt;br /&gt;*****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-1043916190542633102?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/TUnDeQPbZqI/blog-post_15.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2006/09/blog-post_15.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-115759517303183018</guid><pubDate>Thu, 07 Sep 2006 02:10:00 +0000</pubDate><atom:updated>2006-09-06T19:12:53.046-07:00</atom:updated><title>नारद मुनि का भ्रम</title><description>&lt;span style="color:#993399;"&gt;अनेक कालों एवं युगों के व्यतीत हो जाने के पश्चात नारद मुनि ने निर्णय लिया कि वो भक्तों की भूमि भारत का भ्रमण करने जायेंगे ये देखने के लिये कि श्रद्धालु जन आमोद प्रमोद मय जीवन किस प्रकार से व्यतीत कर रहे हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;मुनिवर ग्रीष्म की एक तपती दोपहर में हरि ओम हरि ओम का जाप करते हुये भारत भूमि पर अवतरित हो गये. कुछ ही क्षणों में नारद ने जो अपने आस पास देखा उससे उनका हृदय विचलित हो कर वेदना एवं क्रोध की भावना से भर उठा. वो भारत भूमि जहाँ का प्रत्येक प्राणी सर्वथा ईश्वर पूजन और भजन में रमा रहता है, वर्षों से जमा की हुई सम्पत्ति भगवान के चरणों में बिना कुछ सोचे समझे भेंट चढ़ा देता है और ईश्वर के प्रति अपने जीवन की आहुति तक देने को तत्पर रहता है – उसी भारत के श्रद्धालु अनगिनत वेदनाओं के बोझ से दबे जा रहे हैं. भूख, गरीबी और मानवीय पीड़ा का ये द्र्श्य नारद मुनि से सहन नहीं हुआ. क्रोध तथा आक्रोश से भरे हुये मुनिवर वापस चल पड़े स्वर्ग की ओर सभी भगवानों से अनगिनत प्रश्नों की पुष्टि करने के लिये.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;नारद मुनि बिना किसी विलम्ब के विष्णु के आवास स्थल पर पहुँच गये जहाँ ब्रह्मा तथा शिव के साथ साथ अन्य अनगिनत देवी देवता गण भी उपस्थित थे. नारद ने क्रोधमय कटु वाणी में कहा, “भगवनों, आज मैं भारत भ्रमण पर गया था. मुझे विश्वाश था कि आप सभी देवताओं ने भारतवासियों की अविरत भक्ति को समुचित विधि से पुरस्कृत किया होगा. परंतु वहाँ का द्र्श्य देख कर तो ऐसा प्रतीत होता है कि आप सभी ने आज तक किय गये समस्त यग्न, पूजन पाठ, भजन और कीर्तन को व्यर्थ ही जाने दिया. हे विष्णु, ब्रह्मा और महेश आप लोगों ने ऐसा क्यों किया? भारत भूमि पर वेदना एवं पीड़ा दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है और आप लोग अपने ही भक्तों की व्यथा-गाथा को अनसुना करते जा रहे हैं.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;नारद के क्रोध भरे वक्तव्य और दोषारोपण सुनने के उपराँत विष्णु ने कहना प्रारम्भ किया -&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;हे योग्य मुनिवर आपका क्रोध उचित एवं मान्य है. परंतु क्या आपको ये ज्ञात है कि हम सब देवी और देवता ऊपर स्वर्ग में क्यों रहते हैं? मैं आपको इसका इतिहास बताता हूँ. जब हम सब भगवानों ने मिल कर इस सृष्टि और मानव जाति की रचना करी थी, तो हम सब भी मनुष्य के साथ धरा पर ही निवास किया करते थे. हम लोग अदृश्य अवश्य थे परंतु प्रतिवेशी (पड़ोसी), शिक्षक, चिकित्सक, मार्ग दर्शक, दार्शनिक और ऐसे ही कई अनगिनत रूप धारण कर के मानव जाति की विपदाओं तथा पीड़ाओं का समाधान निकाल कर उन्हें दूर कर दिया करते थे. हम भगवान उनके बीच ही नहीं वरन उनके भीतर रहा करते थे. परंतु युग परिवर्तन के साथ साथ मनुष्य का स्वयं और दूसरे मनुष्य, अर्थात भगवान, से विश्वाश उठ गया. मानव जाति को लगा कि यदि ईश्वर को स्वर्ण और आभूषणों से सुसज्जित आवास भेंट कर दिये जायें तो सम्भवतः उनका हर प्रकार का कार्य पूर्ण हो जायेगा. मानव ने अनगिनत मंदिरों का निर्माण कर डाला. हे नारद क्या हम सब देवी देवता धन सम्पदा के लिये लालायित रहते हैं? मंदिरों के निर्माण से भी जब संतोषजनक परिणाम न प्राप्त हुआ तो हमें रंग और रूप दिया जाने लगा. एक के बाद एक -अनेक रूप दिये जाने लगे इस आशा के साथ कि सम्भवतः कोई रूप पीड़ा निवारण में साध्य होगा. जब मनुष्य ने हमें बंदर, सुअर, भालू और लिंग का रूप दिया तो हमसे ये सहन नहीं हुआ. मन तो हुआ कि मानव जाति से संबंध विच्छेद कर लिया जाये, परंतु हमने मनुष्य का साथ नहीं छोड़ा और धरा पर ही रहे उस माँ के समान जो कभी भी अपने दुष्कर्मी पुत्र की अवहेलना नहीं करती है और सर्वथा ये आशा करती है कि उसका पुत्र अवश्य ही उचित मार्ग पर आ जायेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्मा ने विष्णु के कथन को गति प्रदान करते हुये कहा -&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;नारद मुनि, इसके पश्चात भी हम देवता गण मानव की पीड़ाओं का निवारण करते रहे. परंतु मानव को ऐसा लगा कि हम उसकी प्रार्थनाओं का तत्परता तथा कुशलतापूर्वक उत्तर नहीं देते हैं और अपना समय मनोरंजन या निद्रा में व्यतीत कर देते हैं. अतः उसने मन्दिरों में विशालकाय घंटे लगा दिये ताकि वो हमारा ध्यान घंटों की कर्ण भेदी गूँज से आकर्षित कर सके. मन्दिरों में लटके सहस्त्रों घंटों के अविराम कोलाहल से हम सभी के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव तो पड़ा ही साथ में हम कोई भी कार्य एकाग्रचित्त हो कर नहीं कर सके.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;शिव ने भी सहमति में कहना प्रारम्भ कर दिया -&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;मुनिवर, हमें सर्वदा कार्यरत और जगाये रखने के लिये मनुष्य ने मन्दिरों के आहाते में ढोलक, मंजीरा और मृदंग लेकर सर्व शक्ति से जोर जोर भजन कीर्तन करना प्रारम्भ कर दिया. कभी कभी ये कोलाहल रात्रि जागरण का रूप धर कर सारी रात्रि चलता तो कभी कभी पूरे सप्ताह. भजन कीर्तनों में हम सभी देवी देवताओं के गुण गाये जाते ताकि हम सब स्वयं की प्रशंशा सुन कर भक्तों की इच्छा पूर्ति कर दें. नारद मुनि हम देव लोग क्या बधिर हैं कि हमें झुंड में जोर जोर से चिल्ला कर गाथा सुनाई जाये और क्या हम देवता गण अपनी ही प्रशंशा सुनने को उतावले रहते हैं? साथ में पूजन के रूप में हवन किया जाता - वनों को काट कर लकड़ियाँ लाई जातीं और उनको जला कर अनावश्यक धुआँ फैलाया जाता. धुयें से भरे आवासों में हम सबका श्वाश लेना असम्भव होता जा रहा था और घंटों, ढोल, मंजीरों, भजन एवं कीर्तनों के कोलाहल तथा नाद से हम सबकी श्रवण शक्ति दिन प्रतिदिन क्षीण होती जा रही थी. अतः हम सभी देवताओं ने मिल कर ये एकमत निर्णय लिया कि पूर्णतः बधिर और नेत्रहीन होने से पूर्व ही हमें धरा और इस कोलाहल से अत्यंत दूर चले जाना चाहिये. अंततः सभी देवी और देवता गण वसुन्धरा का परित्याग कर के वहाँ से अरबों मील दूर स्वर्ग में आ बसे.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;विष्णु ने नारद को सम्बोधित करते हुये कहा -&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;नारद मुनि आपके व्याख्यान से प्रतीत होता है कि भारतवासी अभी भी मन्दिरों के आहातों में हवन किये चले जा रहे हैं और सम्भवतः ध्वनि विस्तारक (लाऊड स्पीकर) के माध्यम से और अधिक ध्वनि व नाद के साथ भजन कीर्तन किये चले जा रहे हैं. दुर्भाग्यवश हम देवताओं की श्रवण क्षमता भजन-कीर्तन कोलाहल से पहले ही क्षीण हो चुकी है और धरा से अरबों मील दूर होने के कारण भारतवासियों का गाना-बजाना हमें सुनाई भी नहीं देता है – इस लिये भक्तों की प्रार्थना को अनसुना कर देने का प्रश्न ही नहीं उठता. अतः हे मुनिवर भारतवासियों की वर्तमान परिस्थितियों के लिये हमें दोषी ठहराना अनुचित होगा.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;नारद ने ये सब सुनने के पश्चात सभी देवी और देवताओं के समक्ष कर बद्ध क्षमा याचना की और हरि ओम हरि ओम का जाप करते हुये आगे की ओर बढ़ चले.&lt;br /&gt;****&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-115759517303183018?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/uyHjjwXqPSk/blog-post_06.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://lakhnawi.blogspot.com/2006/09/blog-post_06.html</feedburner:origLink></item><item><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-115604007293464387</guid><pubDate>Sun, 20 Aug 2006 02:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2006-08-19T19:20:42.926-07:00</atom:updated><title>अकबर और बीरबल</title><description>&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;बादशाह अकबर का दरबार लगा हुआ था. सारे दरबारी अपने अपने काम में व्यस्त थे कि अकबर ने बीरबल की तरफ देखते हुये कहा, “बीरबल कई दिनों से एक सवाल मुझे काफ़ी परेशान किये जा रहा है. शायद तुम्हारे पास इस सवाल का कोई जवाब हो.” &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;बीरबल ने सर झुका कर कहा, “हुज़ूर आप अपना सवाल पूछिये. मैं पूरी कोशिश करूँगा आपके सवाल का वाज़िब जवाब देने की.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकबर ने कहा, “बीरबल मुझे ये मालुम करना है कि इस दुनिया में सबसे अधिक मूर्ख किस देश में रहते हैं.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीरबल ने कुछ देर सोचा और कहा, “हुज़ूर इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिये मुझे संसार के सारे देशों में घूम घूम कर वहाँ के लोगों के बारे में जानकारी लेनी होगी, और ये यात्रा पूरी करने में मुझे कम से कम तीन साल तो लग ही जायेगा.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकबर ने तुरंत जवाब दिया, “ठीक है मैं तुम्हें दो साल की मोहलत देता हूँ. आज से ठीक दो साल के बाद यहाँ आकर सारे दरबार के सामने अपना जवाब देना.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;बीरबल ने अदब से सर झुका कर कहा, “तो फिर जहाँपनाह मुझे इज़ाज़त दें, मैं घर जा कर अपनी यात्रा की तैयारी करता हूँ.” ये कह कर बीरबल ने दरबार से विदा ली.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;बीरबल को गये हुये पूरे तीन हफ्ते गुज़र गये थे और अकबर को बीरबल के बिना दरबार में सूनापन महसूस होने लगा. बादशाह सलामत आँख मूँद कर ये सोचने लगे कि बीरबल न जाने इस समय किस देश में होगा कि अचानक दरबार में होने वाली खुसर पुसर ने उनकी आँखें खोल दीं – और, अकबर ने अपने सामने बीरबल को हाथ जोड़े खड़ा पाया.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;अकबर ने अचंभित हो कर पूछा, “अरे बीरबल तुम इतनी जल्दी कैसे वापस आ गये? और, मेरे सवाल के जवाब का क्या हुआ?”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;बीरबल ने कहा, “हुज़ूर मुझे आपके सवाल का जवाब मिल गया है और इसी लिये मैं वापस आ गया हूँ.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;“तो फिर बताओ तुम्हारा जवाब क्या है?” अकबर ने अधीरतापूर्वक पूछा.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;बीरबल ने विनती की, “हुज़ूर पहले वचन दीजिये कि मेरा जवाब सुन कर आप मुझे किसी भी तरह का दंड नहीं दीजियेगा.”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;“ठीक है मैं वचन देता हूँ. अब तो बताओ तुम्हारा जवाब क्या है?”, अकबर ने कहा.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;बीरबल ने सर झुका कर उत्तर दिया, “सरकार दुनिया में सबसे ज्यादा मूर्ख हमारे ही देश हिन्दुस्तान में रहते हैं.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“पर बीरबल बिना किसी और देश गये सिर्फ़ तीन हफ्तों में तुमने ये कैसे जान लिया कि हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा मूर्ख रहते हैं?” अकबर ने खीजते हुये पूछा.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;“हुज़ूर मैं विस्तार से आपको बताता हूँ कि पिछले तीन हफ्तों में मैंने क्या क्या देखा. और, मैंने जो कुछ भी देखा उसी के आधार पर आपके सवाल का जवाब दिया है.”, ये कहते हुये बीरबल ने अपनी पिछले तीन हफ्तों की दास्तान बयान करनी शुरू कर दी.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;उस दिन दरबार से जाने के बाद मैं सीधा घर गया और बोरी बिस्तर बाँध कर अगले दिन सुबह सुबह ही विश्व भ्रमण के लिये निकल पड़ा. दो दिन की घुड़सवारी के बाद एक छोटे से नगर में पहुँचा तो देखा कि गुस्से से तमतमाते हुये लोगों की एक भीड़ सड़क पर खड़े वाहनों को आग लगा रही थी और साथ ही साथ ईंटे पत्थर मार कर दुकानों को तोड़ने में लगी हुई थी. मैंने भीड़ में से एक युवक को कोने में खींच कर पूछा कि ये सब क्यों किया जा रहा है. पता चला कि नगर के पीने के पानी वाले कुयें में एक चूहा पाया गया है – बस नागरिकों को आ गया गुस्सा. पहले तो नगर अधिकारी की जम के पिटाई की और फिर तोड़ फ़ोड़ में लग गये. मैंने पूछा कि अखिर चूहे को कुयें में से निकाला किसने – तो जवाब मिला कि चूहा तो अभी भी उसी कुयें में मरा पड़ा है और उसे निकालना तो सरकार का काम है. खैर मैंने गुस्से से लाल पीली भीड़ को समझाने की कोशिश की कि इस तोड़ फ़ोड़ से तो उनको ही नुकसान होगा. अगर सारे वाहन जला दिये तो क्या गधे पर बैठ कर जगह जगह जायेंगे? दुकानें और दुकानों में रखा सामान तुम्हारे जैसे नागरिकों की ही सम्पत्ति है – उसे जलाने से आखिर नुकसान किसका होगा. ये सुनना था कि सारी भीड़ ये चिल्लाते हुये कि मैं एक निकम्मा सरकारी जासूस हूँ मेरी तरफ डंडे ले कर दौड़ पड़ी. सरकार मैं किसी तरह जान बचा कर भागा और पास की ही एक सराय में जा कर छुप गया.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;पूरी रात सराय में बिता कर मैं अगले दिन सूरज निकलने से पहले ही आगे के लिये निकल पड़ा. अगले पाँच सात दिन बड़े चैन से गुजरे – कोई बड़ा हादसा भी नहीं हुआ. दो हफ्ते पूरे होने को आये थे और मैं अब तक पिछले नगर की घटना को थोड़ा थोड़ा भूल भी चुका था. पर हुज़ूर-ए-आला अगले दिन जो मैंने देखा वैसा नज़ारा तो शायद नरक में भी देखने को नहीं मिलेगा. शहर की सड़कें खून से लाल थीं, चारों तरफ बच्चों, आदमियों, औरतों, बकरियों और तकरीबन हर चलने फ़िरने वाली चीज़ों की लाशें पड़ी हुई थीं. इमारतें आग में जल रहीं थी. मैंने सड़क के कोने में सहमे से बैठे हुये एक बूढ़े से पूछा कि क्या किसी दुश्मन की फौज ने आ कर ये कहर ढा दिया है. बूढ़े ने आँसू पोंछते हुये बताया शहर में हिन्दू और मुसलमानों के बीच दंगा हो गया और बस मार काट शुरू हो गयी. मैंने विचलित आवाज़ में पूछा कि दंगा शुरू कैसे हुआ. पता चला कि एक आवारा सुअर दौड़ते दौड़ते एक मस्जिद में घुस गया – किसी ने चिल्ला कर कह दिया कि ये किसी हिन्दू की ही करतूत होगी. बस दोनों गुटों के बीच तलवारें तन गयीं और जो भी सामने आया अपने मजहब के लिये कुर्बान हो गया. मुझसे वो सब देखा नहीं गया और मैं घोड़ा तेजी से दौड़ाते हुये उस शहर से कोसों दूर निकल गया.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;&lt;br /&gt;तीसरा हफ्ता शुरू हो गया था और मैं भगवान से मना रहा था कि हिन्दुस्तान की सीमा पार होने से पहले मुझे अब कोई और बेवकूफी भरा नजारा देखने को न मिले. पर जहाँपनाह शायद ऊपर वाले को इतनी नीचे से कही गयी फरियाद सुनाई नहीं दी. अगले दिन जब मैं मूढ़गढ़ पहुँचा तो क्या देखता हूँ कि युवकों की एक टोली कुछ खास लोगों को चुन चुन कर पीट रही है. मैं एक घायल को ले कर जब चिकित्सालय गया तो पता चला कि सारे चिकित्सक हड़ताल पर हैं और किसी भी मरीज़ को नहीं देखेंगे. खैर मैं उस घायल को चिकित्सालय में ही छोड़ कर बाजार की तरफ चल पड़ा जरूरत का कुछ सामान खरीदने के लिये. बाजार पहुँचा तो पाया कि सारी दुकानें बंद हैं. और, कुछ एक जो खुली हैं उनके दुकानदार अपनी टूटी हुई टाँगो को पकड़ कर अपनी दुकानों को लुटता हुआ देख रहे हैं – पता चला कि वो लोग बंद में हिस्सा न लेने की सज़ा भुगत रहे हैं. सारी स्तिथि से मुझे एक नौजवान ने अवगत कराया जो कि उस समय एक दूसरे युवक की पिटाई करने में जुटा हुआ था. उसने बताया कि जहाँपनाह अकबर ने दो दिन पहले घोषणा की कि अस्सी फीसदी सरकारी नौकरियाँ पिछड़ी जाति के लोगों को ही दी जायेंगी. उसी के विरोध में पिछड़ी जाति के युवकों की पिटाई की जा रही है और पूरे नगर में सब हड़ताल पर हैं. मैंने उस युवक से कहा कि इन पिछड़ी जाति के युवकों को पीट कर तुमको क्या मिलेगा – अरे पीटना ही है तो उसे पीटो जिसने ऐसी घोषणा की. और, हड़ताल और बंद करने से तो हम जैसे साधारण नागरिकों को ही तकलीफ़ उठानी पड़ती है. मेरी बातों को अनसुना कर के वो एक खुली हुई दुकान की तरफ लाठी ले कर दौड़ पड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुज़ूर मैंने मन ही मन सोचा कि यहाँ के नागरिक तो मूर्ख हैं ही, पर यहाँ का शाशक तो महा मूर्ख है जिसके दिमाग में इस तरह का वाहयात खयाल आया. बस सरकार मैंने आगे जाना व्यर्थ समझा – मुझे आपके सवाल का जवाब मिल चुका था और मैंने वापस आना ही उचित समझा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीरबल की व्याख्या सुन कर अकबर थोड़ी देर शाँत रहे, फ़िर मुस्कुराते हुये बीरबल के पास आ कर बोले, “बीरबल तुम्हारा जवाब सुन कर मुझे बहुत बड़ी राहत मिल गयी है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीरबल ने भ्रमित हो कर अकबर की तरफ़ देखते हुये कहा, “हुज़ूर मैं कुछ समझा नहीं.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकबर ने खुलासा किया, “बीरबल अगर इस देश के प्राणी इतने मूर्ख न होते तो मैं इन पर शाशन कैसे कर पाता. और जब तक ये मुल्क़ मूर्खों से भरा रहेगा, तब तक हम और हमारी पीढ़ियाँ यहाँ राज करती रहेंगी. जहाँ तक आरक्षण का सवाल है तो तुम क्यों परेशान होते हो. तुम्हारे बच्चों को कौन सी नौकरी करनी है – कल को जहाँगीर बादशाह बनेगा और तुम्हारे बच्चे शान-ओ-शौकत से उसके दरबार में काम करेंगे. आरक्षण करने से मुझको ये फायदा हुआ कि मूर्खों की एक टोली अब मूर्खों की दो टोलियों में बँट गयी है – इन्हें जितना बाँटते जाओगे, शाशन करने में उतनी ही आसानी होगी. बीरबल तुम्हारे जवाब ने मेरे दिल पर से एक काफ़ी बड़ा बोझ हटा दिया है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीरबल के भी ज्ञान चक्षु खुल गये और उसने मुस्कुराते हुये पास में रखे मदिरा के प्याले को मुँह से लगा लिया.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13053295-115604007293464387?l=lakhnawi.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://feedproxy.google.com/~r/lakhnawi/~3/r2xdQw7SRlg/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (अतुल श्रीवास्तव)</author><thr:total 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