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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2enclosuresfull.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" version="2.0"><channel><title>नारी की कहानी</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/</link><description>पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं...</description><language>en</language><managingEditor>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</managingEditor><lastBuildDate>Tue, 13 Oct 2009 01:49:37 PDT</lastBuildDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">19</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">25</openSearch:itemsPerPage><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email></itunes:owner><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं...</itunes:subtitle><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/narikikhani" type="application/rss+xml" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com" /><item><title>श्रीराम का पुतला कब जलेगा!</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2009/09/blog-post_29.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Wed, 30 Sep 2009 06:18:43 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-3017332544247761388</guid><description>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_s-CzBruxm6M/SsNaoCTHMrI/AAAAAAAAATg/q9-O-nqZVqY/s1600-h/jai-shri-ram.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 170px; height: 184px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_s-CzBruxm6M/SsNaoCTHMrI/AAAAAAAAATg/q9-O-nqZVqY/s400/jai-shri-ram.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5387249223123546802" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नवमी की रामलीला खत्म हो गई। अगले दिन रावण का पुतला भी जल गया। महफिल में मौजूद किसी मासूम बच्चे ने अपने बाबा से पूछा- दादा अब क्या होगा। दादा बोले, `अब क्या! भगवान राम दीवाली पर अयोध्या लौट कर रामराज्य चलायेंगे। हम्म्म! मेरा मन हमेशा की तरह स्तब्ध रह गया। तो वह था रामराज्य! फिर तौ तौबा है। कब तक हम उस सच को नजरअंदाज करते रहेंगे जो रावण की मौत के बाद घटित हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.......वानरसेना रावण की मौत का जश्न मना रही थी। विभीषण के राजतिलक की तैयारियां चल रही थी। अशोक वाटिका में विरह जीवन में तडप रही सीता का निर्वासन खत्म हो गया। राम और सीता के मिलन का प्रेममय समय आ गया। होना तो यह चाहिए था कि देव, यक्ष, गंधर्व और भगवान इन लम्हों का दीदार करने के लिए इंतजार करते और फूलों की बारिश करते। लेकिन यह क्या! यहां तो विराना छा गया। प्रियवर से मिलने के लिए आ रही सीता को मर्यादा पुरूषोत्तम ने अचानक रोक दिया। लक्ष्मण से कहा कि आग जलाओ। सीता को अग्नि परीक्षा देनी होगी। वह परपुरूष के सानिध्य में रहकर आई है। .....अग्नि परीक्षा! लक्ष्मण का स्वर तक कांपने लगा। हर शख्स सन्न रह गया। लेकिन लक्ष्मण से बडा भाई का भक्त तो दूसरा कोई हुआ ही नहीं। वैसे भी स्त्री के दर्द को लक्ष्मण कब समझ सके थे। वरना भाईप्रेम कर महान मिशाल पेश कर वनवास धारण करने वाले लक्ष्मण अपनी धर्मपत्नी को वियोग में अकेला छोड करने नहीं आते। यह भी त्रासदी ही है कि राम और सीता के वियोग को तो सब की सहानुभूमि मिली लेकिन अयोध्या के राजमहल में आसूं भी बहाने में अक्षम लक्ष्मण की जीवनसंगिनी के दुख का हाल किसी ने नहीं पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और सीता.... उसको भी कब किसने पूछा था। इस बार भी उसकी हालत का जायजा लेने वाला कोई भी नहीं था। खैर आग जली। सीता जलती लपटी के बीच से गुजर कर आई। लेकिन जली नहीं। उनकी शान में आंच भी नहीं आ सकी। शायद आग भी स्त्री होती है तभी सीता का दर्द समझ पाई होगी। फिर हुआ मिलन। लेकिन अब तो सब बेमतलब था। बहरहाल, औरत को हक ही नहीं होता कि अपना कचोट, अपना अपमान, अपना दर्द याद करने का। खासकर जब दोषी कोई और नहीं बल्कि उसका पति हो। प्रभु की टोली अयोध्या पहुंची। जोरदार स्वागत हुआ। श्रीराम का राजतिलक हुआ और आया रामराज्य! रामराज्य का अर्थ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अयोध्या बहुत अच्छी नगरी है। सत्ता में रहने वाले लोग इस जगह का विशेष ख्याल रखते हैं। आज भी आप जायें वहां तो छावनी से भी ज्यादा जवान नजर आयेंगे। तब भी हालात जुदा न थे। श्रीराम तो थे ही प्रजा के सच्चे रखवाले। उन दिनों सीता गर्भवती थी। राम बहुत खुश थे। इसी दौर में एक बार संध्या समय नगरी के गुप्त भ्रमण को निकल गए प्रभु। सरयु नदी के तट पर जहां एक ओर दशरथपुत्र का राजमहल था तो दूसरी ओर विशाल नगर। राम चले जा रहे थे। रास्ते में एक गरीब धोबी की कुटिया थी। धोबी अपनी पत्नी को घर से बाहर निकाल रहा था। कह रहा था अरे मैं कोई राम नहीं हूं जिसकी पत्नी को कोई उठा कर ले गया और उसने फिर उसको घर में रख लिया। राजा राम सन्न रह गये। उन्होंने उसी क्षण न्याय किया। ना ना... धोबी को दंड नहीं दिया बल्कि पत्नीव्रत राम ने सीता को तुरन्त घर से निकालने का फैसला किया। पल भर के लिए सोचिए! राम और धोबी में कौन श्रेष्ठ था! मेरी बुद्धि अल्पविकसित है लेकिन मैं इतना जानता हूं कि दोनों ने अपनी पित्नयों को घर से निकाल दिया लेकिन धोबी ने अपनी पत्नी की अग्नि परीक्षा नहीं ली। खैर, राजा जनक की बेटी गर्भवती बेटी सीता एक बार फिर जंगलों में ठोकरें खाने के लिए छोड दी गई। जय श्री राम!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन बाद राजा राम ने अश्वमेद्य यज्ञ कराने का फैसला किया। लेकिन एक अडचन आ गई। इस यज्ञ में पत्नी कर साथ होना आवश्यक था। राम यहां भी एक मिशाल पेश कर गये। उन्होंने सीता को नहीं खोजा। खोजते भी कैसे। श्रीराम ने सीता की सोने की प्रतिमा बनवाई उसे यज्ञ मंडप में बिठाया। प्रभु भक्तों को रास्ता बता गये और स्त्री को औकात।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, सीता का क्या हुआ। इससे पहले की अयोध्या की राजशाही फिर उनका अपमान करती सीता इतिहास बन गई। अतं में सीता को शरण देने वाला कोई पुरूष नहीं था। धरती फटी और सीता उसी में समा गई। मैं आस्तिक हूं। लेकिन मेरा मन पूछता है कि राम का पुतला कब जलेगा। मां सीता मुझे क्षमा कर देना।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-3017332544247761388?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-30T06:18:43.618-07:00</app:edited><media:thumbnail url="http://1.bp.blogspot.com/_s-CzBruxm6M/SsNaoCTHMrI/AAAAAAAAATg/q9-O-nqZVqY/s72-c/jai-shri-ram.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">11</thr:total></item><item><title>फिर चकनाचूर हुआ पुरुष वर्चस्व!</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2009/09/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Wed, 02 Sep 2009 10:53:22 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-8464446171793125727</guid><description>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_s-CzBruxm6M/Sp6w8tlhVEI/AAAAAAAAAS4/FNFA4V60TpQ/s1600-h/5_uni_14thFeb.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 213px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_s-CzBruxm6M/Sp6w8tlhVEI/AAAAAAAAAS4/FNFA4V60TpQ/s320/5_uni_14thFeb.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5376929562202559554" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दुनिया के सबसे जांबाज लड़ाकू विमान 'सुखोई-30 एमकेआई' की कॉकपिट पर अब तक के पुरूष वर्चस्व को चकनाचूर करते हुए एक भारतीय युवती ने इसमें उड़ान भर इतिहास रच दिया है।&lt;br /&gt;भारतीय युवती सुमन शर्मा ने रूस में हाल ही में सम्पन्न हवाई कार्यक्रम में भारत के लिए यह गौरव अर्जित किया और सुखोई लड़ाकू विमान में उड़ान भरने वाली वह विश्व की प्रथम महिला बन गई।&lt;br /&gt;सुखोई विमान भारतीय वायु सेना में 12 साल से है और रूस की वायु सेना का भी यह अग्रिम पंक्ति का विमान है लेकिन यह पहला मौका था जब कोई महिला इसकी कॉकपिट में बैठी।&lt;br /&gt;सुमन शर्मा वही युवती हैं जिन्होंने इस साल के 'एयरो इंडिया' में अमेरिकी लड़ाकू विमान 'एफ-16' और रूसी विमान 'मिग-35' में उड़ान भरी थी लेकिन 'सुखोई-30 एमकेआई' असैनिकों की उड़ान के लिए अभी तक उसका सपना ही बना हुआ था। दुनियाभर के पायलट सुखोई में उड़ान भरने की हसरत रखते हैं लेकिन भारत की एक साधारण युवती को सुखोई डिजाइन ब्यूरो ने कीर्तिमान बनाने का अवसर दिया।&lt;br /&gt;सुमन की यह उड़ान मॉस्को से करीब 40 किलोमीटर जुकोव्स्की से हुई और सुखोई डिजाइन ब्यूरो के टेस्ट पायलट यूरी वास्चुक ने इस भारतीय युवती का सपना साकार किया। इतिहास रचने से उत्साहित सुमन शर्मा ने जोश के साथ बताया कि सुखोई में वह 12 हजार फुट की ऊंचाई तक गई और एक समय था जब उनके शरीर पर गुरूत्वाकर्षण का पांच गुना दबाव था। यानी आंकडों की भाषा में उस समय इस युवती का वजन 230 किलो से ऊपर चला गया था।&lt;br /&gt;सुखोई की इस यादगार उड़ान के सबसे रोमांचक क्षण की याद करते हुए उन्होंने बताया कि उड़ान के समय एक बार ऐसा लगा कि विमान रूका हुआ है। मैंने पायलट यूरी से पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्होंने विमान पर ब्रेक लगा दिए हैं। उस समय ऐसा लग रहा था कि सुखोई हवा में ठहरा हुआ है। उड़ान के समय बाहर का वातावरण बहुत खराब था और सुमन के अनुसार आकाश में धुंध की सफेद चादर फैली हुई थी।&lt;br /&gt;विमान एक समय 700 मील प्रति घंटे की रफ्तार पर था यानी वह ध्वनि की गति को पीछे छोड़ चुका था। यूरी ने अचानक सूचित किया कि अब वे जोन चार में प्रवेश कर रहे हैं। यह सुखोई के हवा में कुलांचे लगाने का क्षण था। विमान ने 360 डिग्री का पूरा टर्न लिया और मैंने चारों देखा तो लगा कि कांच के कवच में ऐसे हिलडुल रही हूं जैसे बच्चा मां के गर्भ में सिकुड़ा हुआ होता है।&lt;br /&gt;भारतीय महिला की सुखोई में यह उड़ान ऐसे समय हुई है जब दुनिया की छह दिग्गज कम्पनियां भारतीय वायु सेना के लिए होने वाले 126 लड़ाकू विमानों के सौदे को हासिल करने के जी-तोड़ प्रयास कर रही हैं। इन देशों में रूस अपना मिग-35 विमान उतार रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-8464446171793125727?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-02T10:53:22.906-07:00</app:edited><media:thumbnail url="http://4.bp.blogspot.com/_s-CzBruxm6M/Sp6w8tlhVEI/AAAAAAAAAS4/FNFA4V60TpQ/s72-c/5_uni_14thFeb.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>बधाई हो! ...पति की अर्थी के साथ उठी 'उसकी' डोली</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2009/07/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Thu, 23 Jul 2009 14:38:32 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-3060344884636820507</guid><description>अब देखिये न, भारत ने कितनी तरक्की कर ली है. एक जमाना था जब विधवा का पुनर्विवाह महापाप समझा जाता था. लेकिन भला हो नारी सशक्तिकरण का ...जिसकी बदौलत पति की अर्थी उठने से पहले ही पत्नी की दूसरी शादी करा दीगयी. हमारे बुजुर्ग कितना ख्याल रखते हैं महिलायों का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    यह वाकया है हरियाणा का। जी हाँ, यह जींद इलाके का वही मामला है जिसमें पंचायत के तालिबानी फैसले पर अपने ही गौत्र में शादी करने पर युवक की पुलिस के सामने ही बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी।   &lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:100%;"&gt;हरियाणा में समाज की मर्जी के खिलाफ अपने ही गोत्र की एक लड़की से विवाह करने के कारण 21 वर्षीय एक युवक की उसकी पत्नी के गांव वालों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी।&lt;br /&gt;  त्रासदी यह है की साडी दुनिया ने और मीडिया ने इस दर्दनाक घटना पर तो दुःख जाहिर किया लेकिन किसी ने सोचने की जहमत नही उठाई की उस लड़की का क्या होगा। पर लोग सोचें भी क्यों.... आख़िर हर कदम पर नारी को दबाया जाता रहा है तो अगर वो फ़िर आफत बनी तो कौन सी आफत आ गयी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;        उक्त युवक रवींद्र अपनी पत्नी सोनिया को विदा कराने बुधवार को इस गांव में पहुंचा था और तभी उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। गांव वालों ने रवींद्र के शव को बुधवार देर रात तक किसी को भी ले जाने नहीं दिया और उसे वहीं गांव के चौराहे पर रख दिया था। यह गांव जाट बहुल है।&lt;br /&gt;रवींद्र ने इसी वर्ष मार्च में सोनिया (18) से विवाह किया था। उनकी शादी का सोनिया के घर वालों और ग्रामीणों ने यह कहते हुए विरोध किया कि दोनों समान गोत्र के हैं और ऐसे वे भाई-बहन होंगे।&lt;br /&gt;गौरतलब है कि हरियाणा में गोत्र और परिवार के कथित सम्मान के नाम पर इस तरह की हत्याएं पहली भी होती रही हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; गाँव वालों का भयानक रूप यहीं ख़त्म नही हुआ बल्कि उन्होंने उस युवक की हत्या के बाद इस बेचारी लड़की की भी दूसरी शादी करा दी गयी। मेरा मसला यही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरियाणा को विकास में अव्वल राज्यों में शुमार किया जाता है। लेकिन इस मुद्दे को राजनेता नही उठाएंगे क्योंकि इसमें वोट बैंक का फायदा नही है बल्कि घटा ही है। युवक को तो मार ही दिया लेकिन जरा उस लड़की के बारे में सोचिये। वो तो कहीं की न रही। न तो उसके घरवाले उसके साथ रहे और न ही उसका प्रेम। उससे न कुछ पूछा गया और न किसी ने उसकी राइ जानने की कोशिस तक की। उसे जिंदा छोड़ दिया गया और उसकी दूसरी शादी करा दी गयी। अब उसे या तो उम्र भर भरी बोझ तले जिंदगी बितानी होगी...... या फ़िर!! हाँ, अगर आप सोच रहे होंगे की वह लड़की आत्महत्या कर लेगी तो भी भूल जाइये। हरियाणा जैसे विकसित राज्य में आज भी ऐसा तबका है जहाँ लड़कियों की कुछ औकात नही समझी जाती... यह मेरे देश का दुर्भाग्य है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-3060344884636820507?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-23T14:38:32.173-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total></item><item><title>यहाँ पेशाब करना मना है (सिर्फ पुरुषों के लिए)!!!</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2009/06/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Tue, 30 Jun 2009 07:11:41 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-4419215138447214635</guid><description>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_s-CzBruxm6M/SknVcQLtk7I/AAAAAAAAARs/hYPKUQ58C8g/s1600-h/1285engrish-funny-pass-urine.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 400px; height: 277px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_s-CzBruxm6M/SknVcQLtk7I/AAAAAAAAARs/hYPKUQ58C8g/s400/1285engrish-funny-pass-urine.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353044313463690162" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;चौंक गये... ?&lt;br /&gt;अजी बात ही कुछ ऐसी है. दरअसल बहुत दिनों से मेरे मन में एक बात उमड़ रही थी. इसलिए सोचा की आज दिल खोल कर अपने मन का बोझ हल्का कर ही लूँ. आप लोगों ने अक्सर देखा होगा हिंदुस्तान के हर गाँव, हर शहर, हर कस्बे में और कुछ बेशक न मिले लेकिन एक बोर्ड जरुर मिल जायेगा जिस पर लिखा होगा कि&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; '&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;यहाँ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;पेशाब&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;करना&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मना&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;है&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;'&lt;/span&gt; . आपने यह भी देखा होगा कि जहां भी ऐसा बोर्ड नज़र आता है वहां पेशाब कि सबसे ज्यादा बदबू हो जाती है. और मेट्रो शहरों में तो पेशाब का छोटा तलब भी बन जाता है. अगर आप लोगों को विश्वास न हो तो कभी दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल से एम्स कि तरफ आयें ...सब समझ आ जायेगा. दूसरी बड़ी बात कि यहाँ पेशाब करने वालों में सिर्फ और सिर्फ पुरुष होते हैं. और उनका बहाना होता है कि क्या करें कंट्रोल नहीं होता. हालाँकि साथ में महिलाएं भी होती हैं. लेकिन न तो महिलाएं कभी रस्ते गंदे करती है  और न ही शिकायत करती हैं. मेरा मसला यही है. अगर महिलाएं अह्तिआत कर सकती हैं तो पुरुष  क्यों नहीं. क्या यह भी पुरुष प्रधान समाज के वर्चस्व का ही नमूना है. आखिर यूँ ही हर जगह गंदगी फैलाने से नुक्सान भी तो हमारा है, हमारे देश का है. वजह कुछ भी हो अगर महिलाएं नियंत्रण कर सकती हैं, घर से अहतियात लेकर चल सकती हैं तो पुरुष क्यों नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामला बहुत बडा नहीं लेकिन सोचने लायक है. फिर भी अगर पुरुष मनमानी करते हैं तो क्यों निर्दोष महिलायों को सम्मानित किया जाये. और सुई कि तरह बात चुभोने के लिए इस तरह के बोर्डों में सीधे लिखा जाये कि यहाँ पुरुषों का पेशाब करना मना है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-4419215138447214635?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-06-30T07:11:41.671-07:00</app:edited><media:thumbnail url="http://2.bp.blogspot.com/_s-CzBruxm6M/SknVcQLtk7I/AAAAAAAAARs/hYPKUQ58C8g/s72-c/1285engrish-funny-pass-urine.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total></item><item><title>भारत को ओबामा की नहीं श्रीराम सेना की जरुरत है!</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2009/01/blog-post_30.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Sat, 31 Jan 2009 02:55:11 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-7202582946227604211</guid><description>हाँ, सोलह आने सच बात है.. वो लड़की पब जाती है... मैंने खुद देखा उसे.. फिर तो सिगरेट भी पीती होगी और शराब भी... हे राम!! मेरे देश को किसकी नज़र लग गयी... आखिर जो नियम सदियों से चले आ रहे हैं वो गलत कैसे हो सकते हैं... अब देखो न सिर्फ भाजपा वाले कहते तो सा,अझ भी आता की बात एकतरफा है.. लेकिन अब तो कांग्रेस वाले भी बोल रहे हैं.. पब कल्चर हमारा है ही नहीं... विदेशी है.. और फिर लड़कियों की भी कुछ मर्यादा होती है....&lt;br /&gt;   नहीं यह सब मैं नहीं बल्कि इस देश के 'समझदार' लोग कह रहे हैं.. अब बहस यह है की लड़कियां किस हद तक जा सकती हैं... हर अख़बार यही कह रहा है.. हर चैनेल भी.. &lt;br /&gt;         संस्कृति के यह तथाकथित पहरेदार लड़कयों को पीटना बहादुरी समझते हैं... यह लोग शायद नहीं जानते की यह सातवीं सदी नहीं बल्कि 21वीं सदी है... लड़की यह न करे वो न करे... सब अपनी मर्जी चलाना चाहते हैं.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर हम कहते हैं की मेरा भारत महान.. कुछ महान नहीं.. सब बकवास है.. हम बराक ओबामा की बात करते हैं.. लेकिन यह नहीं देखते की वो लोग कैसे कंधे से कन्धा मिलाकर चलते हैं.. वहां तो  ऐसा नहीं होता... लेकिन यह हमारी संस्कृति नहीं है भाई...&lt;br /&gt;  हमारी संस्कृति तो है कि औरतो को घर के अंदर रखो... जैसे वो पालतू जानवर हों.. सॉरी, गलती हो गयी... पालतू जानवर भी तो मनमर्जी से घूमते हैं.. औरत तो औरत होती है.. सबसे नीचे.. जरा सोचो अगर वो पब में जायेगी तो घर कि इज्ज़त खराब होगी... कुछ काम लड़कों के लिए होते हैं...&lt;br /&gt;           &lt;br /&gt;वाह जी वाह!!! जय श्री राम.. पब में मत जाना.. कोई नहीं बचायेगा... सुनो कुछ दिनों में एक और फरमान आने वाला है.. नोकरी भी मत करना.. क्या मर्द मर गये हैं.. पढ़ लिखा कर क्या करोगे.. घर का काम काज सीखो.. आजकल नोकर भी नहीं मिलते.. औरत का धरम पति कि सेवा ही है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझे... भारत को बराक ओबामा कि नहीं श्री राम सेना कि जरुरत है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-7202582946227604211?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-31T02:55:11.167-08:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">11</thr:total></item><item><title>अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो......</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2009/01/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Sun, 25 Jan 2009 05:00:50 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-3739017490930428786</guid><description>आज फिर बालिका दिवस है। मतलब आज फिर लोग चिल्लायेंगे.. नारे लगेंगे और टीवी पर फोटो खींचेंगे. हाँ ब्लॉग भी खूब चमकेंगे... लेकिन....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिन नहीं हुए... शायद १५ दिन.. मैं अपने दोस्त के घर में था . तभी एक फ़ोन आया.. मेरे दोस्त के पिताजी को. उनके किसी साथी को यहाँ बच्चे का जन्म हुआ था...&lt;br /&gt;क्या हुआ लड़का..? उन्होंने पूछा.. &lt;br /&gt;स्पीकर बंद था.. दूसरी तरफ की आवाज़ मैं न सुन सका..&lt;br /&gt;अंकल के चेहरे से ख़ुशी गायब हो गयी.. वो जोर से बोले ...क्या करते हो गुप्ता जी फिर लड़की ....मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया... स्पीकर अभी भी बंद था..लेकिन दूसरी तरफ से आवाज सुनाई दी... ऐसा नहीं होता अंकल जी... लड़कियां बहुत अच्छी होती हैं.. मुझे लड़की ही चाहिए थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी पर चर्चा हो रही थी. एक लड़की का बलात्कार हो गया था. एक महोदय बोले लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए... लेकिन क्यों.....&lt;br /&gt;कई प्रश्न उठते हैं.. सबसे पहला कि क्या कम फैशन करने से ऐसे अपराध नहीं होंगे? इससे भी खतरनाक प्रश्न यह है कि ऐसे अपराध करने वाले लोग भेड़िये हैं... जो लड़कियों को देखते ही आप खो देते हैं.. अगर सचमुच ऐसा है तो पर्दा करने की जरूरत किसे है?.. ऐसे संदिग्ध लोगों की आखों पर पट्टियाँ बांध देनी चाहिए.. पर्दे की जरूरत उन लोगों को है न की मासूम लड़कियों को.. &lt;br /&gt;दूसरी बात क्या सचमुच फैशन ही जिम्मेदार है ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए? तो क्या कारण है की दूध पीती बच्चियों के बलात्कार हो जाते हैं? क्यों मानसिक रूप से विक्षिप्त लड़कियों पर कहर टूटता है..&lt;br /&gt;यह कैसी सोच है कि फैशन पर रोक लगा दो... रोक तो उन लोगों पर लगनी चाहिए जो ऐसे भयानक बयान देते हैं.. सोच बदलनी होगी ऐसी लोगों की.. अगर नहीं तो ऐसी सोच रखने वालों को ही बदल देना होगा.. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं लड़का हूँ.... बिटिया की पीड़ा का अनुभव नही कर सकता.... लेकिन इतना जरूर चाहता हूँ भगवान् से... अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-3739017490930428786?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-01-25T05:00:50.100-08:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total></item><item><title>क्यों?</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/09/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (गरिमा)</author><pubDate>Sun, 14 Sep 2008 07:39:57 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-6420567533661234786</guid><description>अक्सर एक सवाल माँ से पुछा जाता है...&lt;br /&gt;माँ क्या मुझे जीने का अधिकार नहीं?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इस सवाल के रूप अलग अलग हो सकते हैं। जैसे कि आजकल भ्रुण हत्या पर आवाज उठाने मे इस पुँछ वाक्य का प्रयोग किया जाता है, कोई बेटी अपनी मन माफिक जिन्दगी नही जी पाती है तो भी अपने माँ से यह सवाल पुछती है... और भी कई जगह हैं, जहाँ माँ के सामने इस तरह के सवाल खडे होते हैं, कई बार माँ जवाब नही दे पाती, कई बार कह देती है कि यह नियति है, कई बार इसी को जीवन मान लेने कि सलाह देती है, या कई बार मौन को परिभाषित करती है... और कुछेक को यह जीवन वाकई मे पसन्द होता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सामने बहुत तरह की परिस्थितीयाँ हो सकती हैं.... इस पर कुछ कहने का मन नही है...&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मेरा सवाल है कि क्या किसी बेटी/बेटे ने अपने माँ के अन्दर देखने कि कोशिश की है?&lt;br /&gt;क्यों कोई ये नही जानना चाहता कि उसकी माँ जी रही है कि नही? बार बार सोचती हूँ, क्या माँ सिर्फ माँ है? क्या वो इन्सान नहीं  हैं? उसके अपने सपने नही होंगे? उसने अपने अरमानो का गला नही काटा कभी?&lt;br /&gt;माँ सिर्फ ममता का ही रूप तो नही, वो भी इच्छाओ कि खेती करती होगी, उसने भी ख्वाब देखा होगा अपने फसल के लहलहाने का.... पर हम कभी ये जानने कि कोशिश क्यों नही करते कि, हम अपने सवाल तो उसके सामने खडे कर रहे हैं, पर कभी उसके सवालो को पढ ही नही पाये, या पढना ही नही चाहा, जानना ही नही चाहा कि माँ भी एक अस्तित्व है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अपने अस्तित्व की तलाश मे हम इतने अंधे होते जा रहे हैं, कि अपनी जननी को ही भुल गये..... क्यों?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;समझना मुश्किल है... समझाना भी मुश्किल है... किसी के पास जवाब हो तो बताये&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आज बात नर नारी कि नही कर रही हूँ... प्रश्न है कि कब तक माँ को ममतामयी माँ, के रूप मे ही देखेंगे, और भूल जायेंगे कि वो इससे अलग भी एक वजुद रखती है... अगर ऐसा चलता रहा तो, बस हमारे मुट्ठी मे इन सवालो के अलावा कभी कुछ बचेगा ही नही... रहेंगे तो सिर्फ अनसुलझे सवाल और अस्तित्व हीन शरीर.... :।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-6420567533661234786?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-09-14T07:39:57.861-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total></item><item><title>हे भगवान! तुम पर लानत है...</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/08/blog-post_20.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Wed, 20 Aug 2008 08:01:19 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-6043500850376734526</guid><description>&lt;strong&gt;प्रभु श्रीराम: सीता!मैंने तुम्हारे लिए युद्ध नहीं किया मैंने तो अपने कुल के मान के लिए रावण का बध किया है. तुम पर रावण बुरी दृष्टि डाल चुका है. अब तुम मेरे लिए भोग्य नहीं हो. तुम उस घी के समान हो जिसे कुते ने चाट लिया है.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त कथन भगवान राम के हैं जिन्हें मर्यादा पुरषोतम कहा जाता है. हिन्दू धरम मैं ही क्यों लगभग हर धर्म में नारी को वस्तु समझा गया और उसे भोगने के आलावा कभी भी किसी काबिल नहीं समझा गया. ऐसे तुच्छ धर्मों को मानने का क्या लाभ. दरअसल भगवान के नाम पर मानुषों ने ही नारी को पांव की जूती बना कर रखा था. और जब नारी समानता की और बड रही है तो धर्म को आड़ बना लिया जाता है. एक उदाहरण कुरान हदीस का है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;औरत को जब भी उसका शोहर सम्भोग के लिए बुलाये तो उसे तत्काल हाज़िर हो जाना चाहिए. जो औरत बिस्तर पर अपने पति को संतुष्ट नहीं कर पति उसे पति पीट भी सकता है.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैं यह इसलिए नहीं दे रहा हूँ की आप किसी धर्म से नफरत करें बल्कि इसलिए लिख.रहा हूँ ताकि पाठक महिलाएं सच्चाई समझ स्केन और स्वाबलंबी हो सकें.. लेकिन अक्सर क्या होता है कि मुस्लिम महिलएं हिन्दू धर्म ग्रंथों की बात सुन कर हिन्दू महिलायों को बेचारा कह देती है और कमोबेश यही होता है जब हिदू महिलाओं को मुस्लिम मजहबी किताबों के बारे में पता चलता है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब यह महिलायों पर निर्भर है की वो इसे नियति समझें या पक्षपात. हालाँकि बर्षों से दबे नारी समाज का अचानक उठाना सभव नहीं परन्तु जोर लगाया जा सकता है.. हम भी साथ हैं&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-6043500850376734526?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-08-20T08:01:19.894-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total></item><item><title>हुस्न की तारीफ़ भी गुनाह तो नहीं!!!</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/08/blog-post_10.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Sun, 10 Aug 2008 10:39:58 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-3890561714503481641</guid><description>अपनी तारीफ सभी को अच्छी लगती है. खासकर अपने रंग रूप और नैन नक्शों की तारीफ. और फिर महिलायों के हुस्न की तारीफ करना तो सबसे अच्छा काम समझा जाता है. और इसमें भी कोई शक नहीं कि खुद महिलाएं भी अपने हुस्न कि तारीफ सुनना पसंद करती हैं. लेकिन सचमुच स्थिति इतनी सुन्दर नहीं है और शयद कभी नहीं थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय पहले मैंने एक लेख लिखा था, इसी ब्लॉग पर हालाँकि वह विषय अलग था. और मैंने उस लेख में एक पंक्ति लिख दी थी कि &lt;em&gt;'मैं उसके हुस्न को निहार रहा था'&lt;/em&gt; इसमें कुछ भी गलत नहीं था.. और फिर हमारा साहित्य और खासकर कवितायेँ, गीत, शेर और गज़लें आदि सब हुस्न कि तारीफ और शोखियों कि मदहोशियों पर लिखी गयी हैं. फिर लेख में हुस्न की तारीफ कैसे गलत हो सकती है. लेख में ही क्यों कहीं भी गलत नहीं हो सकती. चूँकि में यह ब्लॉग महिला सशक्तिकरण के समर्थन में शुरू किया था और मैं नारी और पुरुष की समानता का पक्षधर हूँ. और रहूँगा.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ तक मेरा विचार है इस मसले पर संकीर्ण राय के पीछे कारण क्या है तो मैं समझता हूँ की पुरुष और महिलाएं दोनों इसलिए इस मसले पर बचते फिरते हैं क्योंकि उन्हें एक अपराधबोध सताता रहता है जो निराधार है. सच कहूँ तो वे कुछ ज्यादा ही निष्पक्ष या नैतिक होने का प्रयत्न करते हैं. उदाहरण के तौर पर मैं बताना चाहता हूँ की अधिक वर्षा खतरनाक है लेकिन बारिश न होना भी ठीक नहीं है. नैतिक होना जरूरी है परन्तु कुछ ऐसा बन जाना जो नैतिकता की सीमा मैं भी न आये उस बात का फायदा. और फिर यथार्थ में जीना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर मैं कहूँ कि प्रैक्टिकल हो कर रहा जाये तो अच्छा है सबके किए. और फिर अगर जीवन को जीवन की तरह जिया जाए तो बेहतर है. &lt;br /&gt;हो सकता है कि मी विचारों से आप सहमत न हों या हों भी. पर मैंने बहस छेड़ दी है आपसे आशा है कि आप बहस को मुकाम तक पहुंचाएंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-3890561714503481641?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-08-10T10:39:58.055-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total></item><item><title>नारी की कहानी, नारी की जुबानी</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/07/blog-post_3485.html</link><author>noreply@blogger.com (गरिमा)</author><pubDate>Thu, 31 Jul 2008 23:25:43 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-4649781794904804842</guid><description>&lt;span class=""&gt;लिखना है नारी की कहानी पर, और यह मेरी सबसे बडी परेशानी है कि कैसे लिखूँ, एक तो संशय है कि इस ब्लॉग पर यह मेरा पहला पोस्ट है, जाने क्या प्रतिक्रियायें आयेंगी, अरसा बीता गया इस तरह के मुद्दो पर लिखते हूए, और मैने पाया है कि जब भी किसी मुद्दे पर लिखा बोला जाता है तो जैसे सभी लोगो को हंगामा करने के लिये एक अच्छा विषय मिल जाता है, विषय भी ऐसा कि लोग चटखारे ले ले पढते हैं, सार्थक बहस तो होती नही, ऊपर से कई और तोहमत लगा दिया जाता है, बात मुद्दे से हटकर, व्यक्तिगत बन जाती है, लेखक या तो चुप हो जाये या फिर माँगी ना मान ले तब तक विचार-विमर्श बहस होता ही रहता है, बहस ऐसा कि आप या तो रो पडेंगे या फ़िर क्रोध से मर जायेंगे।&lt;br /&gt;वास्तव मे मुझे डर इस बात का नही लग रहा है कि कितना विचार-विमर्श बहस होगा, डर इस बात का है कि इस बहाने कितनी ही औरतो का दर्द कुरेदा जायेगा, और उस पर कितने पूरूष अपने हाथ सेकेंगे और ये कहते दिखेंगे कि जाने ये औरते हर गम की जिम्मेदार पूरूषो को ही क्यों मानती हैं, ऐसा सोचते हूए घर तक जायेंगे और कहेंगे सुनती हो, आज ब्लॉग पर एक ब्लॉगर को खुब लपेटा, असहज सी अगडम-बगडम बाते बोलती है, और फिर अपनी भडास वहाँ भी निकालेंगे, युवक अपने दिल की भडास दुसरे दोस्तो से बाँटकर और लेखक के प्रति कुछ अपशब्द बोलकर निकालेंगे, बात इतनी बलवती होगी कि अब महिलायें भी अपना भडास निकालने से पीछे नही हटेंगी वो भी कही ना कही सुविचार विचार देते हूए मिल जायेंगी, अर्रे समाज की व्यवहारिकता को समझना ही पडता है, जो नही समझ सकता उसे इस तरह के तानो का शिकार तो होना ही पडेगा, फ़िर अब ये कहानी किसलिये लिखा जाये, जब अन्त मुझे अभी से दिख रहा है।&lt;br /&gt;ऐसा नही कि नारी कहानी लिखने पर सिर्फ़ तर्क ही दिखेंगे, आपका साथ देते हूए साथ भी आयेंगे पर वो भी सार्थक चर्चा के लिये आये ऐसा नही है, कुछेक वाह-वाह बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है, ऐसा बोलके निकल जायेंगे तो कुछ लोग कहेंगे आप घबडाईये मत, हम आपके साथ है।&lt;br /&gt;इनमे बहूत कम लोग ऐसे होंगे जो वास्तव मे विषय की गम्भीरता को समझ पायेंगे। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-4649781794904804842?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-07-31T23:25:43.026-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total></item><item><title>नारीवाद खतरनाक तो नहीं?</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/07/blog-post_15.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Tue, 15 Jul 2008 02:40:19 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-8135916173206620236</guid><description>ब्लॉग की दुनिया तो महज़ एक उदाहरण है, आजकल इस संसार में और खासकर भारत में नारीवाद में तेजी से वृद्धि दिखाई दे रही है. महिलाओं को सशक्त होता देखना सचमुच रोमांचक और ख़ुशी देने वाला है. आखिर हम भारतवासी तो सदियों से महिलाओं की बराबरी की बात करते हैं.. 'अर्धांगिनी' शब्द या सिद्धांत शायद इसी बात को पुष्ट और परिभाषित भी करता है... परन्तु साथ ही महिलाओं को पहले अघोषित फिर घोषित तौर पर पुरुषों से कम योग्य बता दिया. कमोबेश स्तिथि यहाँ तक अ गयी की पुरुष महिलायों के लिए स्वामी बन गये..तथा महिलाओं उनके लिए कुछ कारणों मात्र का साधन.. भले ही पुरुष औरर महिलाएं एक दूसरे के पूरक हों तथा प्रभु ने दोनों को अलग कारणों से बनाया हो..परन्तु मनुष्य मात्र में यह खाई बड़ती गयी.. और आज हम देख सकते हैं की पशुओं में मादाओं का भी समान महत्व है और कुछ विशेष स्थानों पर नर से भी ज्यादा.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आप कब तक किसी को दवा सकते हैं, आखिर लावा फूट पडा और महिलाएं एकजुट व सशक्त हो कर उबार रही है.. हर कम में पुरुषों की न सिर्फ बराबरी का रही हैं बल्कि उनसे श्रेष्ठ भी साबित हो रही हैं.. शायद अब पुरुषों को भी वस्तुस्थिति का आभास हो चूका है.. ऐसे में दुखद बात यह है कि महिलाएं अब न्याय की लडाई अन्याय के विरुद्ध न लड़कर पुरुषों के खिलाफ अपनाती जा रही हैं..   कहीं यह कह्तार्नक साबित न हो ..समूचे मानव इतिहास के लिए.. बराबरी की दुनिया में क्या वर्चस्व को जगह मिल सकती है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न कायम है.. उत्तर की प्रतीक्षा है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-8135916173206620236?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-07-15T02:40:19.309-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total></item><item><title>पुरुष नसबन्धी मतलब मर्दों के नाम पर कलंक</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/07/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Fri, 11 Jul 2008 08:27:06 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-8463268201472566436</guid><description>मेरे एक सहयोगी अख़बार पढ़ रहे थे. अख़बार का पेज पलटते ही एक खबर पर नज़र गयी. पुरुष नसबन्धी से अभी भी डरते हैं लोग. मेरे सहयोगी ने कहा, मर्द जात पर कलंक हैं ऐसे लोग.. जो नसबन्धी करवा लेते हैं..&lt;br /&gt;बहुत साल पहले जब मैं बहुत छोटा था..   शायद सातवीं मैं पड़ता था.. हमारे पडौस में एक व्यक्ति ने नसबन्धी करवाई थी. उस के अगले दिन वो काम पर नही गया. हालाँकि में बहुत छोटा था लेकिन मैंने पाया कि हर कोई उसकी आलोचना कर रहा था, हर कोई कह रहा था कि देखो उसकी औरत कितनी मोटी है लेकिन उसने अपना 'आपरेशन' करवा लिया.. अब पता चलेगा जब बीमार पड़ेगा पहले ही उसकी हालत ठीक नहीं है.. औरतों को इतना चडाना ठीक नहीं. ऐसा कहने वालों में अधिकतर महिलाएं ही थी.हालाँकि तब में 'आपरेशन' का मतलब नहीं जानता था लेकिन अब अच्छी तरह से जानता हूँ.. इतने सालों बाद भी पढे लिखे लोगों कि मानसिकता में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक डाक्टर मित्र से बात करने पर मैंने जाना कि महिलाओं को'आपरेशन' के बाद कई बीमारियाँ घेर लेती हैं साथ ही उन्हें तकलीफदेह आपरेशन का सामना भी करना पड़ता है. जबकि पुरुषों के साथ ऐसा नहीं है उनके साथ ऐसा नहीं होता. उनका आपरेशन जल्दी और बिना तकलीफ के हो जाता है..जबकि महिलाओं को लम्बे समय तक इसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिलाओं को बराबरी तो घर से ही देनी होगी न... हर काम को साझा कर के.. सुख-दुःख दोनों को साथ ही निभाने होंगे..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-8463268201472566436?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-07-11T08:27:06.843-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total></item><item><title>कुछ 'काम' सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं...</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/06/blog-post_27.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Fri, 27 Jun 2008 12:06:23 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-2217803137982135906</guid><description>कुछ दिन पहले की बात है. मैं हरियाणा के एक गाँव में गया. दिल्ली से कुछ ही दूर. में वहन अपने एक दोस्त के साथ गया था क्योंकि वहाँ एक फक्ट्री बंद हो जाने के कारण बहुत से लोग बेरोजगार हो गये थे. चूँकि मैं पत्रकारिता इ जुदा हूँ इसलिए वहाँ के लोगों का दर्द उजागर करना मेरा फ़र्ज़ था. वहाँ जाकर मैंने देखा कि बेरोजगार हो चुके मर्द हुक्के और ताश कि महफिल जमा कर अपना धुखडा रोते थे. और उनकी पत्नियाँ सारा काम करती थी. हमने गौर किया कि महिंलाओं कि जिंदगी सूरज निकले से पहले शुरू हो जाती है. घर में झाडू-पोचा करके लकडी काट कर चूल्हा जलती हैं. पुरे घर के लिए खाना बनाकर, उन्हें खिला कर फिर उन्हें खाना नसीब हिओता है. उसके बाद पशुओं के लिए घास काटने का काम, साथ ही पानी भरना और न जाने कितने काम.. सब लिखने बैठूँगा तो न जाने कितने पेज भर जाएँ..  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि सारा दिन मर्द खाते पीते और पडे रहते शाम को उनकी महफिलें शुरू हो जाती... हमने उसे पुछा  कि आप क्यों अपनी पत्नियों कि मदद करते हैं.. तो अधिकतर का कहना था कि कुछ काम सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं.. और चाहे हम दिन भर बेकार बैठे रहें महिलाओं के काम तो महिलाऐं ही करेंगी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश! यह एक गाँव कि कहानी होती. अफ़सोस पुरे हिंदुस्तान कि यही कहानी है. हाँ, पड़े लिखे परिवारों में यह बात जरूर काम है. मेरे अपने घर में मैंने पिता जी को खाना बनाते, कपडे धोते, पानी भरते देखा है. लेकिन अभी भी ऐसे घर हमारे पहाडों में हैं जहाँ महिलाओं को ऊँचे पेड़ों पर से लकडी काट कर लानी होती है.. और सब काम करने होते हैं..और मर्द रोटियां फाड़ते हैं..&lt;br /&gt;शिक्षा कि व्यार पहुँचने के साथ फर्क आता है लेकिन यह धरना ख़त्म नहीं होती कि कुछ काम सिर्फ महिलाओं के लिए होते हैं.. इसकी झलक उन परिवारों में मिलती है जहाँ पति पत्नी दोनों काम करते हैं..&lt;br /&gt;हमारे कार्यालय में काम करने वाली ऐसे महिलाएं अक्सर बताई हा कि उन्हें घर जाकर सब काम करने पड़ते हैं क्योंकि नोकरों पर १००% निर्भर नहीं रहा जा सकता...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सार्थक संवाद कि आशा से आपके सामने यह बात रख रहा हूँ,.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-2217803137982135906?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-06-27T12:06:23.222-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total></item><item><title>....एक लड़के ने अचानक अपने हाथ से उसका स्तन मसल दिया. मैं स्तब्ध रह गया..</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/06/blog-post_22.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Sun, 22 Jun 2008 12:01:19 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-9091726304427973822</guid><description>&lt;p&gt;कुछ समय पहले की बात है. मैं पार्क में आराम फरमा रहा था. सामने कुछ दूरी पर एक लड़की टहल रही थी. शाम का वक्त था फिर भी पार्क लगभग खाली था. कारण शायद मानसून होगा. उस समय भी आसमान में बदल थे. रह रह कर बूंदाबांदी हो रही थी. में एक तक उस लड़की के हुस्न को निहार रहा था. हालाँकि वो अपने में मस्त थी. उसे मेरे होने का अंदाजा भी शायद नहीं था. इतने में युवकों का एक दल उसके पास से गुजरा. शायद तीन थे. आवारा टाइप. जैसे ही टोली लड़की के पास पहुंची. एक लड़के ने अचानक अपने हाथ से उसका स्तन मसल दिया. मैं स्तब्ध रह गया..  &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पलक झपकते ही युवकों की टोली गायब हो गयी. लड़की के चेहरे का सारा नूर उड़ गया. हालाँकि मैं दूर था लेकिन उसके माथे का पसीना और आँखों के आंसू मुझे साफ़ दिखाई दे रहे थे. मोसम ठंडा था. लड़की उसी समय वहन से चली गयी.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं अपराध बोध से घिर रहा हूँ. यह कैसा समाज है. और ऐसा भी नहीं है की यह घटना अप्रत्याशित हो... लड़की होना क्या गुनाह है. और ऐसी घटनाओं का जवाब क्या हो. मैं नही जानता.. आपको पता हो तो जरूर बताएं....  &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-9091726304427973822?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-06-22T12:01:19.447-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">24</thr:total></item><item><title>मुसीबत का दूसरा नाम लड़की!</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/06/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Mon, 02 Jun 2008 10:57:47 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-6201772851939425679</guid><description>यूरोप के एक बडे देश के एक निसंतान दंपत्ति ने कृत्रिमगर्भधारण के जरिये संतान सुख पाने के लिए दिल्ली का रुख किया. टेस्ट ट्यूब तकनीक के जरिये उनकी मनोकामना पूरी भी हो गयी लेकिन जब बच्चे का जन्म हुआ तो वह 'बेटी' थी, विदेशी दंपत्ति वापस चला गया और अस्पताल में छोड़ गया उस बिलखती बच्ची को.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिर्फ इसलिए क्योंकि वह लड़की थी, मैं आज तक यह समझ नहीं पाया हूँ की लड़की में ऐसी क्या मनहूसियत होती है जो सदा से ही वो नकारी जाती है. लेकिन जरा गौर कीजिए, उक्त दंपत्ति में भी तो एक लड़की थी, जिसने मां कि भूमिका निभाई थी.. ऐसे में तो एक ही कारण हो सकता है कि उस मां ने यह सोच कर नवजात लड़की को नहीं अपनाया होगा कि उसकी हालत ठीक नहीं है अर्थात वो महिला खुद दुनिया से हार मान कर अपनी बच्ची को नहीं अपनाना चाहती क्योंकि शायद उसने समाज को औरत के साथ अच्छा बर्ताब करते नहीं देखा और घुटने टेक दिए... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में तो साफ है कि महिला कि कमजोरी के पीछे भी महिला है. अगर समाज चलाने के लिए, जीवन के लिए महिला और पुरुषों का बराबर होना जरूरी है तो क्यों महिला खुद को पीछे पाकर खामोश रहती है.. खासकर अब, जब यह समाज पुरुष प्रधान होने का लेबल उतरने को तैयार है..&lt;br /&gt;अब तो वो जमाने भी गए जब महिलाओं को सिर्फ चारदीवारी के अंदर रहना होता था... जहाँ तक मैं समझता हूँ, जो महिला प्रयत्न करती है आगे बढती है और यह बात सब पर लागू है. समाज भी हमसे ही बनता है ना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अगर उस माँ ने अपनी बेटी को अपनाने का हाथ किया होता तो शायद एक नन्ही जान को बोझ नहीं कहलाना पड़ता.. ..&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-6201772851939425679?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-06-02T10:57:47.417-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total></item><item><title>सफेद कपडों में लिपटी गंजी विधवा का क्या दोष है...</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/05/blog-post_26.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Mon, 26 May 2008 04:37:25 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-8712371167471486125</guid><description>तीन-चार साल पहले की बात है तब मैं 11वीं में पड़ता था, उन्ही दिनों हमारा हरिद्वार घूमने जाने का कार्यक्रम बना, गंगा तट पर हम लोग मौज कर रहे थे.. तभी हमने देखा की वहाँ एक बूढी औरत बात कटवा रही थी, साथ में कुछ और लोग थे.. बात करने पर पता चला की 65 साल की यह औरत राजस्थान की है और इसके पति की मौत हो गयी है.. कुछ ही देर में उस औरत के सिर से सफेद परत जमीन पर गिर चुकी थी.. नाई उस्तरे की धार तेज कर रहा था और वह निष्प्राण शरीर की तरह बैठी हुई थी. साथ में आये लोगों ने बताया की की अब उम्र भर यह औरत बिना बालों के रहेगी... पिछली पोस्ट में मैंने महिला के श्रृंगार की बात की थी, तब एक पाठिका ने मुझे इस घटना का बोध कराया..दिल्ली आने के बाद मैंने देखा की आस-पडोस में खासकर उत्तर प्रदेश की विधवा महिलाएं केवल सफेद कपडे पहनती हैं.. हमारे यहाँ हिमाचल में मैंने विधवा औरतों को हलके रंग के कपडे पहनते देखा है और उन्हें किसी भी तरह से अपवित्र नहीं समझा जाता है जबकि तथाकथित cow-belt में इससे उल्टा है.. जहाँ तक मैं समझता हूँ इस अंतर का कारण शिक्षा है.. क्योंकि शिक्षित होने के साथ समाज पुरानी दकियानूसी को ख़त्म कर देता है.. भला इसमें विधवा का क्या दोष की उसका पति मर गया. समस्या है की समाज जीने नहीं देता.. दया आप समाज से विद्रोह करने का साहस जुटा सकते हैं.. मैं आपके साथ हूँ..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-8712371167471486125?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-05-26T04:37:25.008-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>शादीशुदा पुरुष और विवाहित महिला   ...सवाल निशानी का!</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/05/blog-post_20.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Tue, 20 May 2008 03:43:51 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-2769328612703945116</guid><description>एक और बहस हो रही थी. वही घिसा-पिटा सवाल पूछा जा रहा था कि शादीशुदा महिलाएं बिंदिया लगती हैं, मांग में सिन्दूर सजाती हैं, मंगलसूत्र पहनती हैं, कुल मिला कर उन्हें आसानी से पहचान कर पता लगाया जा सकता है वह शादीशुदा हैं या नहीं. लेकिन मर्दों को पहचानना मुश्किल है, किसी भी पुरुष को देख कर आप पता नहीं लगा सकते कि वह शादीशुदा है या नहीं....  कुछ तथाकथित आधुनिक लोग सलाह देते हैं कि शादीशुदा मर्द ऐसा करें, वैसा करें...आदि. एक सुझाव जो अक्सर दिया जाता है वो यह कि शादीशुदा मर्द पांव में लोहे का कड़ा पहने.. कितना हास्यस्पद है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली बात, मंगल सूत्र, सिन्दूर, बिंदिया आदि को इसलिए नहीं धारण किया जाता कि पता लगाया जा सके कि महिला विशेष विवाहित है या नहीं... अतः यह धारणा कि पुरुषों या महिलाओं को विवाहित होने कोई चिन्ह हमेशा अपने साथ टांग कर रखना चाहिए ...सरासर गलत है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब प्रश्न उठता है कि अगर उपयुर्क्त चीज़ें विवाहित महिला कि निशानी नहीं हैं तो इन्हें केवल शादीशुदा महिलाएं ही क्यों धारण करती हैं.. जहाँ तक मैं समझता हूँ तो यह चीज़ें महिला का श्रृंगार हैं, जिनसे महिलाओं कि सुन्दरता मैं चार चाँद लगते हैं.. चूंकि महिला को सुन्दर का अधिकार हैं अतः उसे इन सब चीजों को धारण करने का भी अधिकार है.. हमने तो यहाँ तक पढ़ा है कि पाषंड युग में महिलाएं हड्डियों से बने आभूषण पहनती थी.. अतः आभूषण इत्यादी महिला के सौन्दर्य को निखारने के लिए हैं ना कि किसी और वजह के लिए..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्य से महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले पुरुषों पर हर तरह के हमले करते हैं..और भूल जाते हैं कि पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं..&lt;br /&gt;हाँ, यह सब चिन्ह कुछ ही धर्मों द्वारा इस्तेमाल किये जाते हैं, वैसे भी अगर किसी महिला को यह सब चीज़ें बोझ लगती हैं तो उसे इनका त्याग करना चाहिए..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-2769328612703945116?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-05-20T03:43:51.459-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total></item><item><title>एक और बलात्कार!  जम के फैशन करो..</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/05/blog-post_16.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Fri, 16 May 2008 04:56:12 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-5164442723306295</guid><description>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;टीवी पर चर्चा हो रही थी. एक लड़की का बलात्कार हो गया था. एक महोदय बोले लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए...&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन क्यों.....&lt;br /&gt;कई प्रशन उठते हैं.. सबसे पहला की क्या कम फैशन करने से ऐसे अपराध नहीं होंगे ?इससे भी खतरनाक प्रशन यह है कि ऐसे अपराध करने वाले लोग भेडिये हैं... जो लड़कियों को देखते ही आप खो देते हैं.. अगर सचमुच ऐसा है तो पर्दा करने कि जरूरत किसे है.. ऐसे संदिग्ध लोगों की आखों पर पट्टियाँ बांध देनी चाहिए.. पर्दे की जरूरत उन लोगों को है न की मासूम लड़कियों को.. &lt;br /&gt;दूसरी बात क्या सचमुच फैसहं ही जिम्मेदार है ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए. तो क्या कारण है की दूध पीती बच्चियों के बलात्कार हो जाते हैं.. क्यों मानसिक रूप से विक्षिप्त लड़कियों पर कहर टूटता है..&lt;br /&gt;यह कैसी सोच है की फैशन पर रोक लगा दो... रोक तो उन लोगों पर लगनी चाहिए जो ऐसे भयानक बयान देते हैं.. सोच बदलनी होगी ऐसी लोगों की.. अगर नहीं तो ऐसी सोच रखने वालों को ही बदल देना होगा.. &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;फैशन पतित नहीं पवित्र है&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-5164442723306295?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-05-16T04:56:12.371-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total></item><item><title>नारी या आफत की बीमारी...</title><link>http://narikikhani.blogspot.com/2008/05/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (SUNIL DOGRA जालि‍म)</author><pubDate>Tue, 13 May 2008 04:58:07 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-8442335366908845140.post-3454719211104936369</guid><description>दो चार दिन पहले की बात है. मैं बस से कहीं जा रहा था. दिल्ली की बसों में बहुत भीड़ होती है. उस दिन भी बहुत ज्यादा भीड़ थी. लेकिन मुद्दा कुछ और है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सीट पर बैठा हुआ था.. तभी एक लड़की मेरे बगल मैं आ खड़ी हुई. चूंकि मैं नॉन-लेडीज सीट पर बैठा था इसलिए मैंने उसे सीट देना जरूरी नहीं समझा. साथ में एक सरदार जी भी खडे थे. उनकी उम्र पैंतालिस से कम न थी. कुछ देर बाद मैंने ध्यान दिया की लड़की सहज नहीं थी. शायद कुछ प्रेषण थी. बार बार सरदार जी की तरफ घूर घूर कर देख रही थी.  लेकिन सरदार जी ध्यान नहीं दे रहे थे. पहले तो मैंने सोचा की शायद गर्मी की वजह से परेशान होगी. मेरा फ़र्ज़ था की में उसे सीट दे दूं लेकिन मैंने नहीं दी. कुछ देर बाद मैंने पाया की सरदार जी लड़की से छेड-छाड कर रहे हैं. वो बार बार लड़की की तरफ झुक रहे थे.. उसे छोने का प्रयास कर रहे थे..  शर्म और गुस्से के कारण मेरी आँखे लाल हो गयी...   लेकिन में तो तब कुछ करता अगर लड़की सरदार जी पर आपत्ति जताती.. खैर लड़की को सीट देकर मैंने तो अपनी गलती सुधार ली. लेकिन एक बात सामने आ गयी की नौजवान ही नहीं अधेड़ लोग भी ऐसी हरकतें करते हैं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में मैंने घटना का जिक्र एकमहोदय से किया तो उन्होने कहा कि लड़कियों को सभी कपडे पहनने चाहिए. लेकिन मैं सोचता हूँ कि ऐसे मर्द क्या भूखे भेडियें हैं जो अपने ऊपर सभ्यता को दमन नहीं रख सकते..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिला क्यों चुप है... लेकिन भला वो बोले क्या और किससे...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8442335366908845140-3454719211104936369?l=narikikhani.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2008-05-13T04:58:07.772-07:00</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">15</thr:total></item><media:rating>nonadult</media:rating></channel></rss>
