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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका | Samayiki - Hindi Webzine</title>
	
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
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		<title>ओपनऑफ़िस एनाफ्रेसियज़ से करें तेज़, उन्नत अनुवाद</title>
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		<pubDate>Mon, 19 Oct 2009 04:59:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रौद्योगिकी]]></category>
		<category><![CDATA[Computer Aided Translation]]></category>
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		<description><![CDATA[रवि रतलामी बता रहे हैं ओपनऑफ़िस.ऑर्ग ऑफ़िस सूट के इस उम्दा प्लगिन का उपयोग का सरल तरीका।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_logo.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-154" title="anphraseus_logo" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_logo.jpg" alt="anphraseus_logo" width="325" height="110"  style="border:none"/></a>ओपनऑफ़िस.ऑर्ग ऑफ़िस सूट</strong> के लिए बहुत से उम्दा प्लगइन उपलब्ध हैं जिनकी सहायता से विशिष्ट किस्मों के उत्पादकता संबंधी कार्यों को बख़ूबी, त्वरित तरीके से निपटाए जा सकते हैं। <a href="http://www.openoffice.org/" target="_blank">ओपनऑफ़िस.ऑर्ग</a> राइटर के लिए एक ऐसा ही उम्दा प्लगइन है <strong>एनाफ्रेसियज़</strong> जो अनुवाद कार्य में बेहद सहायक है। एनाफ्रेसियज़ प्लगइन कम्प्यूटर की सहायता से <em><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Translation_memory" target="_blank">ट्रांसलेशन मेमरी</a> डाटाबेस</em> के आधार पर अर्ध-स्वचालित अनुवाद कार्यों में अनुवादकों की सहायता करता है। आइए, इसके सरल प्रयोग के बारे में जानें।</p>
<p>डाउनलोड किए एनाफ्रेसियज़ प्लगइन फ़ाइल  को ओपनऑफ़िस.ऑर्ग राइटर में संस्थापित करने हेतु <em>फ़ाइल  &gt; ओपन</em> कमांड से खोलें। इससे एनाफ्रेसियज़ प्लगइन आपके ओपनऑफ़िस.ऑर्ग राइटर में संस्थापित हो जाएगा। आपको ओपनऑफ़िस.ऑर्ग के मेन्यू में एनाफ्रेसियज़ का मेन्यू कुछ इस तरह से दिखाई देगा -</p>
<div id="attachment_151" class="wp-caption aligncenter" style="width: 450px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_1.jpg"><img class="size-full wp-image-151" title="anphraseus_1" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_1.jpg" alt="ओपनऑफ़िस.ऑर्ग में एनाफ्रेसियज़ का मेन्यू " width="440" height="464" /></a><p class="wp-caption-text">ओपनऑफ़िस.ऑर्ग में एनाफ्रेसियज़ का मेन्यू </p></div>
<p>आपका ओपनऑफ़िस.ऑर्ग <em>कम्प्यूटर एडेड ट्रांसलेशन टूल</em> के रूप में आपके अनुवाद कार्य में सहायक के रूप में अब तैयार हो चुका है।</p>
<p>अब आप जिस फ़ाइल को अनुवादित करना चाहते हैं उसे ओपनऑफ़िस.ऑर्ग में खोलें। उदाहरण के लिए, अंग्रेज़ी की कोई फ़ाइल खोलें। इसके पश्चात एनाफ्रेसियज़ मेन्यू में जाकर ट्रांसलेट (<em>आल्ट + डाउन </em>कुंजी शॉर्टकट) मेन्यू पर क्लिक करें। आप देखेंगे कि अंग्रेजी में लिखे पहले वाक्य को एक अलग रंग से चमकाया गया है, तथा उसका अनुवाद करने के लिए नीचे एक अलग लाइन बना दी गई है, जिसमें संकेतक टिमटिमा रहा है।</p>
<div id="attachment_152" class="wp-caption aligncenter" style="width: 407px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_2.jpg"><img class="size-full wp-image-152" title="anphraseus_2" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_2.jpg" alt="एनाफ्रेसियज़ का प्रयोग" width="397" height="218" /></a><p class="wp-caption-text">एनाफ्रेसियज़ का प्रयोग</p></div>
<p>अब आप अपना अनुवाद पूरा कर लें। अनुवाद पूरा कर लेने के बाद फिर से ट्रांसलेट मेन्यू पर क्लिक करें। आपका संकेतक अगले वाक्य को जिसे अनुवादित करना है, उसे चमकाएगा तथा आपको उसका अनुवाद करने के लिए एक अलग, संपादन योग्य लाइन प्रस्तुत कर देगा।</p>
<p>यहाँ पर (जैसा कि ऊपर चित्र में वर्णित है) आप देखेंगे कि यदि एनाफ्रेसियज़ की ट्रांसलेशन मेमरी में आपके द्वारा पूर्व में किया गया अनुवाद उपलब्ध है, अतः उसे एनाफ्रेसियज़ ने स्वचालित रूप से उसे वहां टाइप कर दिया है। यदि अनुवाद डाटाबेस में उपलब्ध नहीं है, तो आपके लिए कोई विकल्प नहीं दिया जाएगा और आपको अनुवाद स्वयं टाइप करना होगा। एनाफ्रेसियज़ की ख़ूबी यह है कि यह प्रयोग करते करते स्वतः ही अपना अनुवाद डाटाबेस बनाता जाता है। आपके पुराने अनुवाद के डाटाबेस इसमें सुरक्षित रहते हैं, और एक जैसे अनुवाद कार्यों में इससे अनुवाद में एकरूपता बनाए रखने और त्वरित अनुवाद करने में अच्छी खासी सहायता मिलती है।</p>
<p>फ़ाइल में अनुवाद का कार्य पूर्ण होने के बाद मेन्यू में <em>एनाफ्रेसियज़  &gt;  ट्रांसलेशन </em>मेन्यू पर क्लिक करें। अब आप  फ़ाइल को चाहें तो द्विभाषी रूप में सहेज सकते हैं या फिर इसकी अनुवादित फ़ाइल को अनुवाद की भाषा वाली फ़ाइल में सहेज सकते हैं। यदि आपको लगता है कि फ़ाइल का  अनुवाद परिपूर्ण है, और इसे अनुवाद की भाषा वाली फ़ाइल के रूप में प्रयोग हेतु सहेजा जा सकता है तो आपको एनाफ्रेसियज़ का फ़ाइल क्लीन कमांड चलाना होगा। इसके लिए <em>एनाफ्रेसियज़  &gt; क्लीनअप</em> मेन्यू क्लिक करें। आप देखेंगे कि ओपनऑफ़िस.ऑर्ग राइटर में आपकी फ़ाइल की अंग्रेज़ी की तमाम प्रविष्टियाँ मिट गई हैं और फ़ाइल में अब सिर्फ हिन्दी का अनुवादित पाठ ही दिखाई दे रहा है।</p>
<div id="attachment_153" class="wp-caption alignright" style="width: 197px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_3.jpg"><img class="size-full wp-image-153" title="anphraseus_3" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_3.jpg" alt="एनाफ्रेसियज़ द्वारा अनुवादित फाईल" width="187" height="120" /></a><p class="wp-caption-text">एनाफ्रेसियज़ द्वारा अनुवादित फाईल</p></div>
<p>इस फ़ाइल को नए नाम से सहेज लें। बस, आपका अनुवाद कार्य पूरा हो गया। एनाफ्रेसियज़ के सेटअप मेन्यू में विविध पैरामीटरों को सेट किया जा सकता है &#8211; उदाहरण के लिए, यदि आपके पास पहले से ही कोई ट्रांसलेशन मेमरी है तो आप उसका प्रयोग कर सकते हैं, इत्यादि।</p>
<p>एनाफ्रेसियज़ कुछ कुछ अनुवाद औजार ट्रेडोस के टैग-एडीटर के जैसा काम करता है। हालांकि यह उतना उन्नत किस्म का नहीं है, मगर फिर भी मुफ़्त में उपलब्ध यह औजार छोटे मोटे अनुवाद परियोजनाओं पर बख़ूबी काम में लिया जा सकता है।</p>
<p><strong>एनाफ्रेसियज़ प्लगइन की फ़ाइल  anaphraseus_latest.oxt को <a href="http://nchc.dl.sourceforge.net/project/anaphraseus/Daily%20Snapshot/Snapshots/anaphraseus_latest.oxt" target="_blank">यहाँ से डाउनलोड करें</a>।</strong></p>
<img src="http://www.samayiki.com/sam/?ak_action=api_record_view&id=150&type=feed" alt="" /><img src="http://feeds.feedburner.com/~r/nirantar/~4/Dsuz-Zg4dTk" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
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		<title>बालिका वधु: नाटक द्वारा सच का सामना</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2009/09/balika-vadhu-showcasing-reality-through-drama-and-text/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 14:57:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय रानाडे</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Balika Vadhu]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[literacy]]></category>
		<category><![CDATA[Rajasthan]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[Television]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ नेताओं की सोच के विपरीत संजय रानाडे मानते हैं कि यह दुर्लभ धारावाहिक बाल विवाह को "बढ़ावा" नहीं बल्कि मनोरंजन द्वारा दर्शकों को सामाजिक संघर्ष का बौद्धिक रूप से सामना करने की प्रेरणा दे रहा है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="aligncenter size-full wp-image-146" title="बालिका वधु" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/09/balika_vadhu_01.jpg" alt="बालिका वधु" width="400" height="267"></p>
<div class="dropCap">ग्रा</div>
<p>मीण राजस्थान की पृष्ठभूमि में निर्मित धारावाहिक &#8220;बालिका वधु&#8221;, बालवधु आनंदी की कहानी बयां करती है। आठ साल की कच्ची उम्र में अपनी हमउम्र जगदीश से विवाहोपरांत आनंदी एक ऐसी नई दुनिया में प्रवेश करती है जो भ्रामक और दुत्कार भरी है। बचपन और परिवार के बेफ्रिकी भरे आनंद से वंचित आनंदी को एक अजनबी परिवार और नए रिश्तों के मुताबिक खुद को ढालना है और दोस्त, प्रेमिका, पत्नी और माँ के रूप में अपनी भूमिका को स्वीकारना है।</p>
<p>यह कार्यक्रम स्फ़ीयर ओरिजिन द्वारा निर्मित है और <em>कलर्स चैनल</em> पर सोमवार से शुक्रवार रात आठ बजे प्रसारित किया जाता है।</p>
<p>पर बालिका वधु ने मेरा ध्यान इस सीरियल द्वारा प्रयुक्त एक युक्ति के कारण आकर्षित किया। धारावाहिक के प्रत्येक एपिसोड के अंत में, यह एपिसोड में प्रस्तुत द्वन्द के बारे में कोई सवाल या बयान पेश करता है। सवाल या बयान सुनाया जाता है और पाठ रूप में स्क्रीन के नीचे भी दिखाई देता है। संघर्ष को दर्शाने के लिये पाठ के उपयोग ने मुझे आकर्षित किया क्योंकि इसने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि आखिर यह किस किस्म का संघर्ष है जिसे एक प्रासंगिक धारावाहिक के सामान्य मनोरंजन प्रारूप के माध्यम से पहुंचाया नहीं जा सकता।</p>
<p>दरअसल टेलीविजन के हर प्रसंग की कहानी का संपूर्ण उद्देश्य दर्शकों की बुद्धि की बजाए भावनाओं को छेड़ना है। दर्शकों को <em>महसूस </em>करना है, सोचना नहीं है। यह धारावाहिक एक भावुक वातायनी है जो कमोबेश एक द्विपदीय प्रारूप में संचालित होती है, जहाँ सिक्के के दो लोकसिद्ध पक्ष हैं &#8211; एक अच्छा, दूसरा खराब। सरलीकरण ही कुंजी है। हर एपिसोड के अंत में प्रस्तुत पाठ से यह एक मुद्दे पर कई दृष्टिकोण पेश कर पाता है। सवाल यह है कि क्या यह बस इस धारावाहिक को &#8216;बौद्धिक&#8217; दर्शाने की युक्ति है?</p>
<p>मैं इस धारावाहिक को दो मीडिया संबंधित घटनाओं के संदर्भ में देखता हूँ। पहला यह है कि लगभग सभी मीडिया सामग्री पर मनोरंजन मंच का भारी प्रभुत्व है, यहाँ तक कि समाचार और समसामयिक कार्यक्रम भी <em>रियेलिटी शो</em> की तरह लगने लगे हैं। दूसरी ओर, धारावाहिक और ओछे होते जा रहे हैं। ऐसे में यह एक धारावाहिक है जो नाटक और साहित्यिक पाठ द्वारा भारत की सामाजिक वास्तविकताओं को ज़ाहिर कर रहा है।</p>
<p>दूसरी खास बात यह है कि गंभीर और आधुनिक संदेश देने के लिये पारंपरिक नाट्य का प्रयोग ऐसे दर्शकवर्ग हेतु किया जा रहा है जो मुख्यतः विशुद्ध मनोरंजन के लिए टीवी देखते हैं। मराठी भाषा के दो कार्यक्रम यहाँ अपनी जगह बनाते हैं। एक है<em> टिकल ते पॉलिटिकल </em>और दूसरा<em> दार उधाड़ा न गडे</em>। दोनों पारंपरिक <em>वाग </em>और <em>तमाशा </em>प्रारूपों का गंभीर सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों का प्रस्तुतिकरण करने के लिये का प्रयोग करते हैं। बालिका वधु पारंपरिक नाटक प्रारूप का बहुत प्रभावी ढंग से उपयोग करता है, पर ज्यादा दिलचस्प बात है पाठ यानि टेक्स्ट का प्रयोग।</p>
<p>गंभीर और आधुनिक संघर्षों से जुड़े मनोरंजन कार्यक्रमों के लोक मीडिया स्वरूप में टेक्सट के प्रयोग को दर्शकों की मिली स्वीकृति से संकेत मिलता है कि दर्शक बौद्धिक सामाजिक संघर्षों के साथ नाता जोड़ना चाहते हैं, अलबत्ता सरोकार का यह मंच मनोरंजन का होना चाहिये। यह कोई नई बात नहीं है। हमें हमारे मूल्य, नैतिकता और आचार दार्शनिकों और विचारकों के मुकाबले कथावाचकों से ज़्यादा मिले हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय वास्तविकताओं के साथ सामंजस्य बिठाने के लिये मास मीडिया अब कार्यक्रम के प्रारूप में परिवर्तन ला रहे हैं।</p>
<p>इस लेख को लिखे जाते समय, परिवार के एक किशोर ने (धारावाहिक में) एक कंप्यूटर गेम खरीदने के लिये पैसे चुराये हैं। वह एक अन्य किशोर के प्रभाव में है जिसे उसके आवारापन के कारण शहर से गांव वापस भेजा गया है। बयान: &#8216;अक्सर ऐसा होता है कि एक किशोर यह तय नहीं कर पाता कि क्या सही है और क्या गलत&#8217;।</p>
<div id="pullQuoteR">दर्शक बौद्धिक सामाजिक संघर्षों की बात सुनना चाहते हैं, अलबत्ता सरोकार का यह मंच मनोरंजन का ही हो तो बेहतर। रात 8 बजे, जब पति काम से वापस आ गये हों और रोटियाँ बेलनी बाकी हों, तो टीवी पर कोई भी नैतिकता पर प्रवचन नहीं सुनना चाहेगा।</div>
<p>आप कहेंगे कि यह कोई कहने की बात है भला। हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बयान से आगामी संघर्ष के कारणों का भान हो जाता है। इस तरह का बयान देने के बाद धारावाहिक के मनोरंजन मूल्यों और उसकी शिक्षाप्रद क्षमता के बीच संतुलन बनाये रखना एक चुनौती भरा काम है। एक गलत कदम कहानी को उपदेशात्मक बना सकता है और दर्शकों को खो सकता है। नैतिक अंत सुबह सुबह देखना सुखद रहता है, जब बच्चे स्कूल चले गए हों, किशोर अब तक सो रहे हों, और पति चाय की चुस्कियों के बीच अखबार बाँच रहे हों। लेकिन रात 8 बजे, जब पति काम से वापस आ गये हों, गैस पर प्रेशर कुकर चढ़ाया हो, और रोटियाँ बेलनी बाकी हों, तो कोई भी नैतिकता पर प्रवचन नहीं सुनना चाहेगा। तो क्या यह धारावाहिक केवल महिलाएं देख रही हैं? हो सकता है कि दर्शकवर्ग में अधिकांश महिलायें शामिल हों।</p>
<p>मैंने कई किशोरियों को इस धारावाहिक की चर्चा करते सुना है। किशोरियों, और किशोरों की भी, उनके माता पिता काफी फिक्र करते हैं और उनकी हरकतों को बेहद संदेह की नजर से देखते हैं। मैं जानबूझ कर &#8216;मुंबई जैसे शहर में&#8217; या &#8216;आज भी&#8217; जैसे जुमलों का प्रयोग नहीं कर रहा क्योंकि मैं इस परिकल्पना का हिमायती हूं कि लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और संघवाद जैसी परिकल्पनायें भारतीय परिवार की दहलीज के बाहर ही होती हैं। परिवार में शिक्षा या कमाई का स्तर चाहे कुछ भी हो दहलीज़ के अंदर का जीवन ग्रामीण, सामंती, पितृसत्तात्मक, जातिवाद से भरा और सांप्रदायिक ही होता है। इससे यह समझा जा सकता है कि इस धारावाहिक को देखने वालों में किशोरियाँ क्यों शामिल हैं क्योंकि जब यह धारावाहिक प्रसारित होता है तब वे घर पर होती हैं, और उनकी मातायें भी यह सीरियल देखती हैं।</p>
<p>गौरतलब है कि सीरियल के दो मुख्य किरदार उन श्रेणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका दर्शकवर्ग सबसे बड़ा है। एक है बालवधु आनंदी और दूसरी विधवा कुलमाता दादीसा। आनंदी ने शादी के बाद यौवन में प्रवेश किया। उसकी शादी के लिये उसके पिता को परिवार की भूमि गिरवी रखनी पड़ी थी। शिक्षा पाने के लिये उसका संघर्ष अब तक जारी है। आनंदी का पति जगदीश लगभग उसी का हमउम्र किशोर है।</p>
<p>आनंदी का पति अभी तक एक &#8216;पुरुष&#8217; नहीं है &#8211; यह एक ऐसा अंतर है जिसे कॉलेज जाने वाली लगभग हर किशोरी स्वाभाविक रुप से समझती है लेकिन स्पष्ट रूप से कह नहीं पाती। इस तरह का रिश्ता सेक्स और उसमें अंतर्निहित विकर्षण को तस्वीर से बाहर तो रखता है ही, इससे कथानक में लैंगिक संघर्ष को मुखर करने की खासी गुंजाईश रहती है। इस तरह जहाँ हमें यौनिक और लैंगिक संघर्ष के भावनात्मक और बौद्धिक पहलू अन्य लोगों के जीवन में दिखते रहते हैं, वहीं इस मासूम दंपती के बहाने भावनात्मक और बौद्धिक खुलाव भी मिल जाता है। दर्शक इस जोड़े की तरह मासूम बन जाता है; इससे अलग और अक्सर विरोधाभासी दुनिया में बड़े हो रहे पुरुष और महिलाओं की जटिल वास्तविकता से सामना करना आसान हो जाता है।</p>
<p>दादीसा पुराने ख्यालों की अनपढ़ औरत हैं। वह घर में सब पर पूर्ण नियंत्रण रखती है पर फिर भी हम देख सकते हैं कि परिवार के भीतर की राजनीतिक शक्ति के मामले में उसकी सत्ता को पुरुषों से चुनौती मिलती रहती है भले वो उसके प्रौढ़ बेटे क्यों न हो। इस संघर्ष को एक बुजुर्ग और उसके पुत्रों की बजाय एक कुल-माता और उसके बेटों के संदर्भ में देखना लेखक और दर्शक दोनों के लिये आसान होता है क्योंकि यहाँ हिंसा शारीरिक स्तर पर नहीं वरन &#8216;शब्दों&#8217; और &#8216;भावनाओं&#8217; के माध्यम से व्यक्त होती है। सीरियल में शारीरिक हिंसा अन्य परिवारों में होती दिखाई जाती है जिससे कथा का केंद्रीय परिवार अधिक नैतिक और प्रगतिशील लगे।</p>
<p>दादीसा पारम्परिक भारतीय परिवार की माँ, सास और कुल‍माता का प्रतिरूप है जो हमेशा अज्ञात, अपरिभाषित लोगों या समाज के दबाव में रहती है और सोचती रहती है कि वे क्या कहेंगे, उसके परिवार और उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगे या कोई घटना किस प्रकार परिवार में उसकी स्थिति और उसके परिवार की समाज में स्थिति को प्रभावित करेगी।</p>
<p>यह धारावाहिक अब तक बाल विवाह, लैंगिक पक्षपात, नैतिकता, कामुकता, विधवा पुनर्विवाह, जाति, वर्ग, ग्रामीण और शहरी संघर्ष, बाल अपराध, साहूकारी, भारतीय परिवारों में नैतिकता की पदावनति, विवाह की संस्था, और शिक्षा जैसे मुद्दों को संबोधित कर चुका है। जैसा कि हमने पहले चर्चा की, धारावाहिक के निर्माताओं ने हर नाटकीय विधा का प्रयोग कर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि जिम्मेवारी का अनावश्यक बोझ लादे बिना दर्शकों तक ये मुद्दे सीधे पहुंचाये जा सके। टेक्सट यानि पाठ द्वारा दर्शकों को इस मुद्दे से भावनात्मक रूप से अलग कर उन्हें इस पर बौद्धिक तौर पर विचार करने को प्रेरित किया जाता है।</p>
<p>तो आखिरकार इस धारावाहिक पर कुछ नेताओं को आपत्ति क्यों है? आपत्ति का कारण शायद धारावाहिक में हुआ बाल विवाह है। धारावाहिक में दिखाया गया था कि कैसे एक जटिल सामाजिक और पारिवारिक प्रक्रिया के माध्यम से यह शादी तय की गई थी, कैसे विभिन्न समूहों ने एक दूसरे के फायदा उठाया और खुद भी दूसरों के शिकार बने। क्या इस धारावाहिक पर बाल विवाह को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जा सकता है? निश्चित रूप से, नहीं। बाल विवाह के खिलाफ कानून लागू करने का हमारा रिकॉर्ड वैसे भी संदिग्ध है। दरअसल, किसी भी मुद्दे पर है धारावाहिक की राय, विशेष रूप से प्रकरण के अंत में दिखाये जाने वाले साहित्यिक पाठ में, एक समाचार पत्र की सुर्खियों की तरह है। यह पाठ संघर्ष को सही संदर्भ में प्रस्तुत करता।</p>
<p>एक युवा विधवा गर्भवती महिला की एक युवक से शादी से संबंधित एपीसोड में भावनात्मक और नाटकीय संवाद और कड़ी के अंत में प्रस्तुत गंभीर बौद्धिक साहित्यिक पाठ के बीच संतुलन बनाये रखना बेहद मुश्किल था। इस मामले में लड़की के परिवार में घटना के प्रति नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से लड़के के परिवार में हिंसात्मक और नाटकीय दृश्य रूपी प्रतिक्रिया मिली। पूरी संभावना थी कि यहाँ धारावाहिक खून के बदले खून जैसा माहौल चित्रित कर देता जिसमें लड़के के परिवार वाले लड़की के परिवार पर धोखाधड़ी और उनके एकलौते बेटे को हथिया लेने का आरोप लगाते और बदले की यह दास्तां दोनों परिवारों के बीच चलती रहती।लेकिन धारावाहिक इस हिंसा और घृणा को दोनों परिवारों की एक गर्भवती विधवा औरत और एक युवक की उससे शादी की इच्छा की वास्तविकता को स्वीकारने में असमर्थता के संदर्भ में प्रस्तुत करने में सफल रहा। धारावाहिक ने यहाँ एक बेहद दिलचस्प युक्ति का उपयोग किया &#8211; लड़का अपने परिवार को यह नहीं बताता कि महिला गर्भवती है, बस यह कहता है वह उसे प्यार करता है। अंतर्निहित पाठ में कहा जाता है: &#8216;अक्सर एक झूठ को छिपाने के लिए बार बार झूठ बोलना पड़ता है&#8217;।</p>
<p>बालिका वधु अब तक मुद्दों को एक सूत्र में जोड़ता रहा है जिसमें शुरुवात द्वंद्व को स्पष्ट करने से होती है, किरदारों की प्रतिक्रियाओं के माध्यम से इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा, फिर साहित्यिक पाठ द्वारा उभरते सवाल और बहस के मुद्दों पर बौद्धिक चर्चा, और अंत में, समाधान।</p>
<p>जाहिर है, बालिका वधु भारतीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है। जो कहते हैं कि भारत में समस्याएं नहीं है मुगालते में हैं। यह कहना वैसा ही होगा कि हमारे देश में औरतों के साथ अत्याचार नहीं होता जब कि हमें अब भी दहेज विरोधी और महिला से अत्याचार के खिलाफ अधिनियमों की ज़रूरत पड़ती है।
<p class="note"><a href="http://infochangeindia.org" target="_blank">इंफ़ोचेंज इंडिया</a> से साभार, पूर्वानुमति से प्रकाशित। मूल अंग्रेजी लेख से हिन्दी अनुवादः देबाशीष।</p>
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		<title>प्रिंट आन डिमांड से लेखक बने प्रकाशक</title>
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		<pubDate>Thu, 26 Mar 2009 20:06:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रिंट आन डिमाँड सेवा द्वारा सेल्फ पब्लिशिंग अब केवल व्यक्तिगत वैनिटी प्रकाशन नहीं रहा। ईबुक्स के युग में अब प्रकाशक भी इस तकनीक का महत्व समझने लगे हैं। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">ए</div>
<p>क लेखक क्यों लिखता है? जाहिर है, तमाम दुनिया तक अपनी बात पहुँचाने के लिए। वह चाहता है कि लोग उसकी बातें उसके विचार पढ़ें, गुनें। अपनी किताबों के ज़रिये वह दुनिया को अपना अर्जित ज्ञान व अनुभव बांटता है। प्राचीन काल के भोज पत्रों व ताड़ पत्रों से लेकर आधुनिक आफसेट प्रिंटरों, डिजिटल ईबुक्स तक का सहारा वह अपनी रचनाओं को चहुँओर सर्वसुलभ बनाने में लेता आ रहा है। आधुनिक युग में लेखकों की प्रकाशित रचनायें आमजन तक पहुंचाने का परंपरागत माध्यम केवल प्रकाशक रहे हैं। परंतु उन्नत छपाई तकनीक की बदौलत अब प्रकाशन जगत में एक और नए विचार का पदार्पण भी हो गया है वह है <strong>सेल्फ़ पब्लिशिंग</strong> या स्वप्रकाशन। और सेल्फ़ पब्लिशिंग को बढ़ावा देने वाला यह प्रकल्प है<strong> प्रिंट आन डिमांड</strong> या मांग पर छपाई।</p>
<h3>क्या है मांग पर छपाई?</h3>
<p>प्रिंट आन डिमांड या मांग पर छपाई की अवधारणा इंटरनेट की दुनिया के लिये नई नहीं है। 2003 में प्रारंभ <strong><a href="http://www.cafepress.com/" target="_blank">कैफेप्रेस</a></strong> जैसे जालस्थलों के माध्यम से आप कॉफी मग, पोस्टर, टी शर्ट, डेस्क कैलेंडर, जैसी विभिन्न वस्तुयें अपने मनमुताबिक डिज़ाईन में मंगा सकते हैं। ये साईटें आपको अपनी बनाई डिज़ाईन भी इस्तेमाल करने देती हैं और खरीदी की कोई न्यूनतम संख्या नहीं होती, चाहें तो केवल एक मग या टीशर्ट मंगा लें। विगत 2‍ &#8211; 3 वर्षों से मांग पर छपाई सेवा में एक नया आयाम आ जुड़ा है सेल्फ़ पब्लिशिंग या स्वप्रकाशन का जिसके अंतर्गत आप अपनी किताब के प्रकाशक स्वयं बन सकते हैं।</p>
<p>2006 के आसपास जब फ्लिकर जैसी फोटो शेयरिंग सेवाओं की लोकप्रियता आसमान छू रही थी तब <strong><a href="http://www.blurb.com" target="_blank">ब्लर्ब</a></strong> जैसे जालस्थलों ने इन चित्रों को प्रिंट रूप में सहेजने के विचार का सृजन किया। फोटो अल्बम रखने के शौकीन लोगों के लिये यह आकर्षक प्रस्ताव था। <a href="http://www.lulu.com/" target="_blank"><strong>लुलु</strong>.कॉम</a> जैसी सेवाओं ने इसे और भी विस्तार दिया और अन्य किस्म के प्रकाशन भी स्वप्रकाशन के दायरे में शामिल होने लगें। पिछले साल लुलु के जरिए 98 हजार किताबें छापी गईं हैं। ऑनलाइन किताब बेचने वाली बड़ी कंपनी अमेजन.कॉम ने भी <a href="http://www.createspace.com/" target="_blank">क्रियेट स्पेस</a> के माध्यम से स्वप्रकाशन की सेवा  पेश की है। 2007 के उत्तरार्ध से भारतीय कंपनियों ने भी इस ओर रुख किया है, फिलहाल अगस्त 2007 में प्रारंभ <strong><a href="http://cinnamonteal.dogearsetc.com/" target="_blank">सिनामोन टील</a></strong> व जुलाई 2008  में प्रारंभ <strong><a href="http://www.pothi.com/" target="_blank">पोथी डॉट कॉम</a></strong> इस क्षेत्र में अग्रणी हैं। <a href="http://www.depotindia.in" target="_blank">डिपो इंडिया</a> जैसी कुछ अन्य साईटें भी हैं जो कम से कम 25 प्रतियाँ प्रकाशित करती हैं।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none;" title="Jaya-Abhay / Leonard-Quennie" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/pothi-cinnamon.jpg" alt="Jaya-Abhay / Leonard-Quennie" width="615" height="326" /></p>
<p>पोथी डॉट कॉम का संचालन कर रही <strong>जया झा</strong> ने बताया कि भारत में प्रिंट आन डिमांड का प्रयोग तो काफी दिनों से हो रहा है, मसलन भारतीय कार्पोरेट जगत सीमित संख्या में ब्रोशर वगैरह छपवाने और सामान्यजन पोस्टर या मग जैसे उपहार देने हेतु इसका प्रयोग करते रहे हैं पर प्रकाशन जगत में यह अभी प्रयोगात्मक दौर में है। वे मानती हैं कि स्वप्रकाशन की संभावनायें तो विशाल हैं परंतु प्रकाशन की नई तकनीक का भरपूर दोहन करने हेतु परंपरागत प्रकाशन जगत के सभी साझेदारों को इसके मुताबिक खुद को ढालना होगा। सिनामोन टील के <strong>लेनार्ड फर्नान्डिस</strong> भी स्वप्रकाशन के उज्जवल भविष्य के प्रति आशावान हैं। &#8220;मुख्यधारा के भारतीय प्रकाशकों द्वारा सालाना 80 हजार से अधिक किताबें प्रकाशित की जाती हैं और यह उद्योग सालाना 10 से 12 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। अगर हम क्षेत्रिय भाषाओं में स्वप्रकाशन को मिला कर देखें तो यह बाजार बेहद बड़ा है।&#8221;, फर्नान्डिस कहते हैं।</p>
<div id="boxR" style="width: 300px; margin-bottom: 0px; padding-bottom: 0px;">
<h2>फ़्यूचर रेडी बन रहा है प्रकाशन</h2>
<p><a target="_blank" href="http://pothi.com/pothi/book/httpwwwsamayikicom-samayiki-january-2009-edition"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin: 0px;" title="Kindle" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/kindle.jpg" alt="Kindle" width="300" height="237" /></a><br />
दुनिया बदल रही है, हमारे पढ़ने लिखने की आदतें भी। बदलते समय के साथ लोगों को अब परंपरागत प्रकाशन व विपणन की खामियाँ भी समझ आ रही हैं। <a href="http://www.last100.com/2008/01/16/reading-between-the-lines-of-jobs-comments-on-kindle-android/" target="_blank">स्टीव जॉब्स ने एक बार कहा</a> कि लोग अब पढ़ते ही कहाँ हैं। और बात कड़वी पर सच्ची भी है। ब्रिटेन में प्रकाशित तकरीबन 50 फीसदी किताबें कभी पढ़ी ही नहीं जातीं। कमोबेश यही हाल अन्य मुल्कों का भी होगा। ये पुस्तकें वापस लुगदी बना दी जाती हैं, हालांकि बेहद कम पुस्तकें <em>रीसाईकल्ड </em>कागज पर छापी जाती हैं। इन अतिरिक्त पुस्तकों, जो कभी पढ़ीं नहीं जातीं, की छपाई में जितना <a href="http://booktwo.org/notebook/books-in-the-landfill/" target="_blank"><strong>कार्बन उत्सर्जन</strong> होता है</a> वह एक लाख कारों द्वारा होते कार्बन उत्सर्जन के बराबर होता है। अगर हम वृक्षों की परवाह न भी करें तो भी पर्यावरण को होते इतने नुकसान को रोकना गैरवाजिब नहीं है। समय आ गया है कि मार्केटिंग के उग्र तेवर त्याग प्रकाशक केवल उतना ही छापें जितना लोग वाकई खरीदते और पढ़ते हैं।</p>
<p>तो यह अच्छा ही है कि ईबुक्स आहिस्ता आहिस्ता परंपरागत पुस्तकें का स्थान ले रही हैं। डिजिटल पुस्तकें सस्ती हैं, कागज बचाती हैं और महज़ आपके कंप्यूटर या मोबाईल पर ही हज़ारों किताबें समा सकती हैं। मांग पर छपाई समेत यह सारी तकनीक फ़्यूचर रेडी हैं। अमेज़ॉन द्वारा निर्मित <strong><a target="_blank" href="http://www.amazon.com/dp/B000FI73MA">किंडल</a></strong>  तथा <strong><a target="_blank" href="http://www.sonystyle.com/webapp/wcs/stores/servlet/ContentDisplayView?cmsId=content/reader/index_reader&#038;hideHeaderFooter=false&#038;storeId=10151&#038;catalogId=10551&#038;XID=F:reader:sony">सोनी ईरीडर</a></strong> जैसे <a target="_blank" href="http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_e-book_readers">ईबुक रीडर</a> यंत्रों के कारण किताबें पढ़ने का तरीका और भी बदल गया है। इनके माध्यम से ईबुक, आनलाईन अखबार और ब्लॉग किताबों की तरह पढ़े जा सकेंगे। ज़ाहिर है लेखक पाठकों के इस एक और वर्ग तक पहुंच सकते हैं।</div>
<p>पारंपरिक छपाई, जहाँ प्रकाशित किताबों को अनुमानित मांग के अनुसार निश्चित संख्या में छाप कर भंडारित कर लिया जाता है,  के विपरीत मांग पर छपाई तकनीक में पुस्तक की डिजाइन, लेआउट, सामग्री इत्यादि डिजिटल रूप में तैयार कर कम्प्यूटर में सहेज ली जाती है और जब भी कभी मांग होती है, तो उसे निश्चित संख्या में छाप उनकी आपूर्ति कर दी जाती हैं। इस विधि द्वारा 1 किताब भी छापी जा सकती है और 1 लाख भी। अनोखी बात यह है कि न तो आपको या प्रकाशक को भारी भरकम राशि का निवेश करना होता हैं,  ना ही छपी किताबों की <em>इनवेंटरी </em>प्रबंधित करना होता है, और न <em>लॉजिस्टिक्स </em>का खरचा वहन करना होता है। साथ ही अनबिकी किताबों को ठिकाने लगाने की समस्या से भी दो-चार नहीं होना पड़ता। सेल्फ़ पब्लिशिंग के प्रति रुझान के पीछे अंधाधुंध छपाई से होती पर्यावरणीय क्षति और पारंपरिक पुस्तकों मे प्रति घटती व ईबुक्स जैसे विकल्पों की बढ़ती लोकप्रियता भी है  (<strong>देखें बॉक्सः </strong><em>फ़्यूचर रेडी बन रहा है प्रकाशन</em>)।</p>
<h3>लेखक भी आप और प्रकाशक भी आप</h3>
<p>यदि आप लेखक हैं, और आप अपनी किताब छपवाना चाहते हैं, तो आपको ऐसे प्रकाशक को खोजना होगा, जो आपकी किताब छापे भी और विक्रय पर रॉयल्टी भी दे। हिन्दी के लेखक आमतौर पर इतने भाग्यशाली नहीं होते। नतीजतन अधिसंख्य हिन्दी लेखक अपनी किताबें स्वयं छपवाते हैं जिनके लिए उन्हें स्वयं खर्च करना होता है और यह राशि न्यूनतम 15 हजार रुपयों से असीमित हो सकती है। यूं प्रकाशित किताबों के विपणन के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता, क्योंकि अमूमन 500-700 प्रतियों में छपी किताबें साभार भेंट स्वरूप सिर्फ चंद चुनिंदा मित्रों-परिचितों व समीक्षकों के हाथों तक ही पहुँच पाती हैं। पर स्वप्रकाशन तकनीक से यह काम बहुत ही कम लागत में किया जा सकता है। यदि लेखक स्वयं कम्प्यूटर का प्रयोग जानता है, या पाठ डिजिटल सामग्री में उपलब्ध करवाता है तो उसे टाइपिंग-कम्पोजिंग का खर्च भी यहाँ वहन नहीं करना होता है। साथ ही न्यूयार्क हो या बस्तर कहीं से भी कोई इस पुस्तक को मंगवा सकता है, किताबों का आउट आफ स्टॉक हो जाने का कोई भय नहीं। स्वप्रकाशन जालस्थलों के माध्यम से आप बिकी किताबों की संख्या और अपनी रॉयल्टी पर नजर रखी जा सकती है।</p>
<p>पर क्या स्वप्रकाशन अन्ततः शान दिखाने वाली <strong>वैनिटी पब्लिशिंग</strong> ही नहीं है, छपास पीड़ितों के लिये अपने पैसे से अपने रचना कौशल का दावा करने का प्रयास? लेनार्ड फर्नान्डिस इस बात से सहमत नहीं हैं। &#8220;हम अपने ग्राहकों से कभी भी 500 किताबें आर्डर कर उनकी मार्कटिंग करने के लिये नहीं कहते। अलबत्ता हम यह ज़रूर सुझाव देते हैं कि 5 या कम प्रतियाँ छपवाकर समीक्षकों को भेजें और फिर बाजार के निर्णय की प्रतीक्षा करें। हालांकि हम कुछ वितरकों से संपर्क कर रहे हैं पर मुख्यतः हम इंडियाप्लाज़ा और अपने <a href="http://books.dogearsetc.com/" target="_blank">आनलाईन स्टोर</a> से किताबें बेचते हैं।&#8221;  पर जया झा स्पष्ट कहती हैं कि स्वप्रकाशन आम प्रकाशनों के लिये नहीं है, &#8220;यह बाकी बाजारों जैसा ही है, जो मार्केटिंग कर सकें वह बेचने में भी सफल रहते हैं। पर यह समझना ज़रूरी है कि स्वप्रकाशन मास मार्केट के लिये नहीं है, यह niche यानि आला प्रकाशनों के लिये सही माध्यम है।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">बड़े प्रकाशक अब पुरानी किताबों के प्रकाशन के लिये तो नये प्रकाशक पारंपरिक प्रकाशन की ऊंची कीमतों से निजात पाने के लिये प्रिंट आन डिमांड तकनीक की शरण ले रहे हैं।</div>
<p>प्रिंट आन डिमांड के वैनिटी पब्लिशिंग की धारा से निकलकर मुख्यधारा के प्रकाशन में पदार्पण के अन्य सबूत भी मिल रहे हैं। <strong>कैंब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस</strong> ने हाल ही में 10,000 पुस्तकें<strong> लाइटनिंग सोर्स</strong> द्वारा बेची हैं। बड़े प्रकाशक अब पुरानी, आउट आफ प्रिंट किताबों के प्रकाशन के लिये तो नये प्रकाशक पारंपरिक प्रकाशन, वेयरहाउसिंग और लौटाई गईं किताबों की ऊंची कीमतों से निजात पाने के लिये प्रिंट आन डिमांड तकनीक की शरण ले रहे हैं।</p>
<h3>किनके लिये सही है स्वप्रकाशन</h3>
<p>अगर स्वप्रकाशन वैनिटी पब्लिशिंग नहीं है तो फिर यह किन लेखकों व प्रकाशकों के लिये उपयुक्त होगा? जया बताती हैं कि स्वप्रकाशन का उपयोग थोक प्रकाशन के पहले बाज़ार का जायज़ा लेने के लिये बखूबी किया जा सकता है। और कई प्रकाशक ऐसा कर भी रहे हैं।</p>
<div id="boxL" style="width: 300px;">
<h2>प्रिंट आन डिमांड के अनूठे प्रयोग</h2>
<p><strong><a href="http://www.publicdomainreprints.org" target="_blank">पब्लिकडोमेन रीप्रिंट्स</a></strong> के माध्यम से आप ऐसी किताबों को खास अपने लिये छपवा सकते हैं जो कहीं और नहीं मिलतीं। इस जालस्थल पर इंटरनेट आर्काईव और गूगल बुक्स में <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Public_domain" target="_blank">सार्वजनिक रूप से मुफ्त  उपलब्ध</a> 20 लाख से ज्यादा किताबें मुहैया हैं। आर्डर करने पर यह उन्हें सही प्रारुप में बदल कर प्रकाशित कर देता है।</p>
<p><strong><a href="http://www.faber.co.uk/faberfinds/" target="_blank">फ़ाबर फाईंड्स</a></strong> पर भी आप आउट आफ प्रिंट पुरानी किताबें मंगा सकते हैं।</p>
<p><img class="alignnone" style="border: 0pt none;" title="Book Mobile" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/bookmobile.jpg" alt="Book Mobile" width="300" height="211" /></p>
<p><strong><a href="http://www.archive.org/texts/bookmobile.php" target="_blank">बुकमोबाईल सेवा</a></strong> के अंतर्गत एक वैन में सैटैलाईट संपर्क, लैपटॉप, लेज़र प्रिंटर और बुक बाईंडिंग मशीन के द्वारा <a href="http://www.archive.org" target="_blank">इंटरनेट आर्काईव</a> पर मुफ्त उपलब्ध हज़ारों उपलब्ध प्रकाशनों को सिर्फ एक डॉलर प्रति पुस्तक की दर से उपलब्ध कराया जाता है। यह गाड़ी अमरीका के स्कूलों में घुमती रहती है और इसे हाल ही में युगांडा भी भेजा गया। इस प्रकल्प को भारत में भी आजमाया गया है। भारत सरकार द्वारा प्रायोजित व सीडैक द्वारा क्रियांवित यह परियोजना अंग्रेजी व हिन्दी की किताबों को इंटरनेट से पुस्तक आकार में उपलब्ध कराती है। सितंबर 2003 की <a href="http://www.powis.com/solutions/case_studies/use_indiabookmobile.php" target="_blank">इस खबर</a> के अनुसार इस परियोजना को वृहद होना था पर इसकी वर्तमान स्थिति के बारे में सामयिकी अनभिज्ञ है। <a href="http://mobilelibrary.cdacnoida.com/" target="_blank">परियोजना का जालस्थल</a> भी बंद पड़ा है।</div>
<p>&#8220;मूलतः यह उन लोगों के लिये है जो प्रकाशन के बारे में कुछ भी नहीं जानते। पर हमारी साईट पर इस बाबत काफी सामग्री है जो उन्हें जानकारी देती है। जो पहले इस सेवा का उपयोग कर चुके हैं और जो उसके लाभ समझते हैं वो हमारे नियमित ग्राहक होते हैं। इसके अलावा उपहार के तौर पर या अपने माता पिता, किसी संबंधी या मित्र की याद में स्मरणीय प्रकाशन के रूप में इसका उपयोग करते हैं। रचना संकलन की पुस्तकें भी काफी लोकप्रिय हैं&#8221;, जया ने बताया।</p>
<p>स्वप्रकाशन के अनेक और अनूठे प्रयोग भी संभव हैं (<strong>देखें बॉक्स:</strong> <em>प्रिंट आन डिमांड के अनूठे प्रयोग</em>)। लेनार्ड बताते हैं कि पुणे के एक कॉलेज ने कम छात्र संख्या और बदलते पाठ्यक्रम से निबटने के लिये पाठ्यपुस्तकें स्वप्रकाशन द्वारा छपवाईं। इसी तरह बंगलौर के एक सज्जन ने अपने दादा की कविताओं का संकलन प्रकाशित कर अपने परिवार में ही वितरण किया। जब पाठकवर्ग सीमित हो तो स्वप्रकाशन उपयुक्त माध्यम होता है।</p>
<h3>स्वप्रकाशन और विपणन</h3>
<p>जब प्रकाशक भी आप हों तो स्पष्टतः अपने प्रकाशन की मार्केटिंग की ज़िम्मेवारी भी आप के ही कंधों पर रहती है। लेनार्ड बताते हैं, &#8220;किताब का विपणन पाठकवर्ग के मुताबिक ही किया जा सकता है। जैसे कि हमने एक शिक्षण संस्थान के पूर्व छात्रों की स्मारिका का प्रकाशन किया। ज़ाहिर तौर पर यह समारिका उन पूर्व छात्रों के अलावा किसी और को बेच पाना असंभव होगा।&#8221;  जया का मानना है कि प्रिंट आन डिमांड पुस्तकों को बेचने का स्वाभाविक स्थान आनलाइन है। &#8220;पुस्तक का विपणन उसके लेखक की आनलाईन उपस्थिति का ही विस्तार होता है। वह अपने ब्लॉग, सोशियल नेटवर्क जैसे माध्यमों का प्रयोग कर पुस्तक के बारे में उत्सुकता बढ़ा सकता है। विपणन का एक मूल सिद्घांत हैः सही पाठक या श्रोता वर्ग तक पहुंचना। यह न हो कि लो एक और किताब बाजार में आ गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह स्पष्ट किया जाय कि इस नई किताब में ऐसा क्या है जो पूर्व प्रकाशनों में नहीं था।&#8221;</p>
<p>हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा &#8211; मांग पर छपाई की सुविधा के संबंध में यह कहावत सटीक बैठती है। यह तकनीक आकर्षित करती है, और अंग्रेजी भाषी लेखकों में यह खासी लोकप्रिय भी होने लगी है। और लगता है कि इस विचार को हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों के बीच प्रचलन में आने में अधिक समय नहीं लगेगा। तो फिर देर किस बात की? छाप डालिए अब तक की अपनी सारी की सारी अप्रकाशित पुस्तकें, या फिर लिख डालिए दर्जनों किताबें सांय सांय जिन्हें आप प्रकाशक के इंतजार में अपने मन में तैयार किए बैठे हैं।</p>
<p class="note"><strong>अतिरिक्त सामग्री व साक्षात्कार:</strong> देबाशीष चक्रवर्ती। रवि रतलामी की कुछ पुस्तकें पोथी डॉट कॉम पर क्रय हेतु उपलब्ध हैं। विवरण हेतु <a target="_blank" href="http://raviratlami.blogspot.com/2008/08/blog-post_05.html">यहाँ देखें</a>। सामयिकी का <a target="_blank" href="http://pothi.com/pothi/book/httpwwwsamayikicom-samayiki-january-2009-edition">जनवरी 2009 का प्रिंट अंक</a> भी पोथी डॉट कॉम पर उपलब्ध है।</p>
<img src="http://www.samayiki.com/sam/?ak_action=api_record_view&id=145&type=feed" alt="" /><img src="http://feeds.feedburner.com/~r/nirantar/~4/1SWDaYLgs-M" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
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		<title>सलमान के कारण मेरा नाम याद रखते हैं</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2009/03/salman-khan-interview/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 14 Mar 2009 17:19:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[mathematics]]></category>
		<category><![CDATA[salman khan]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[teaching]]></category>
		<category><![CDATA[youtube]]></category>

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		<description><![CDATA[कैलीफोर्निया निवासी बैंकर सलमान खान अपनी संस्था खान अकेडमी से इंटरनेट द्वारा मुफ्त शिक्षण उपलब्ध कराते हैं। सामयिकी के लिये डॉ सुनील दीपक ने उनसे बातचीत की।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">
<div class="dropCap">ग</div>
<p>ये दिन खाना खाने के बाद सुस्ता रहा था तो बात पढ़ाई की निकली। &#8220;गणित में तो अपना बुरा हाल था, कितनी बार ही फेल होते होते बचा&#8221;, मैंने कहा, तो सुपुत्र बोले, &#8220;तब तो <strong>सलमान खान</strong> की तरह कोई शिक्षक आप को भी मिल जाता तो ज़रूर समझ जाते।&#8221;</p>
<p><img style="margin:3px;" title="Salman Khan" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/salman_khan.jpg" alt="Salman Khan" width="300" height="201" align="right" />मुझे थोड़ी हैरानी हुई, सलमान खान और गणित के शिक्षक? आपकी ही तरह मैं भी सोच रहा था हिंदी फिल्म जगत के स्टार सलमान के बारे में, जबकि बेटा बात कर रहा था अमरीका में रहने वाले गणित, एलजेब्रा, केलकुलस आदि विषय आसानी से समझाने वाले एक अन्य सलमान खान के बारे में।</p>
<p>इस दूसरे सलमान के माता पिता बंगलादेश के प्रवासी थे। सलमान 1976 में अमरीका के न्यू ओरलिअंस शहर में पैदा हुए। उन्होंने इंजीनियरिंग और एमबीए की डिग्री प्राप्त की है और कैलीफोर्निया के मेनलो पार्क में एक बैंक में काम करते हैं। अपने खाली समय में वह इंटरनेट के माध्यम से कठिन विषयों को आसान बना कर पढ़ाते हैं। उनकी वेबसाईट <a href="http://www.khanacademy.org"><strong>खान अकेडमी डॉट ओर्ग</strong></a> पर विभिन्न विषयों पर करीब 800 पाठ हैं जिन्हें हर रोज़ करीब 15,000 लोग पढ़ते हैं।</p>
<p>प्रस्तुत है सलमान खान से एक ईमेल साक्षात्कार।</p></div>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> सलमान, &#8220;खान अकेडमी&#8221; के बारे में बताओ। कैसे यह विचार तुम्हारे मन में आया कि इस तरह सरल वीडियो बना कर उनसे कठिन विषयों को समझाया और पढ़ाया जाये?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> खान अकेडमी का ध्येय है लोगों को पूर्ण और मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराना। इस पर वह सब विषय हैं जिन्हें उच्चतर विद्यालय के अंतिम वर्षों और विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाया जाता है। इसकी शुरुआत 2006 में हुई जब मैंने अपनी ममेरी बहन को समझाने के लिए गणित का पाठ रिकार्ड करके उसे यूट्यूब पर रखा, जिसे अन्य लोगों ने देखा और मुझे लिखा कि वह पाठ उन्हें अच्छा लगा था और कहा कि अन्य पाठ बनाऊँ। बस वहीं से मेरा यह शौक शुरु हुआ कि सरल, छोटे वीडियो पाठ बनाओ और उन्हें <a href="http://www.youtube.com/khanacademy" target="_blank">यूट्यूब पर</a> डाल दो। खान अकेडमी की वेबसाईट अप्रैल 2008 में बनायी गई।</p>
<div id="boxR" style="width: 342px;">
<h2>नये युग की पाठशालाः यूट्यूब</h2>
<p>आधुनिक युग में यूट्यूब जैसी विडियो शेयरिंग वेबसाईट से शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है। शायद इसी काबलियत पर ऩज़र रख गूगल ने दो साल पहले यूट्यूब को 17.6 लाख डॉलर में खरीदा था। कहते हैं कि एक चित्र हज़ारों शब्दों से बेहतर होता है, पर शायद एक विडियो और भी बेहतर होता है। विडियो का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इन्हें अपनी सुविधानुसार देखा जा सकता है और जितनी बार चाहें उतनी बार देखा जा सकता है। और सबसे अहम बात, यह मुफ्त में उपलब्ध हैं।</p>
<div class="wp-caption aligncenter" style="width: 340px"><img title="Khan Academy" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/salman_khan_story.jpg" alt="Khan Academy" width="330" height="235" align="middle" /><p class="wp-caption-text">सलमान माईक्रोसॉफ्ट पेंट पर पाठ समझाते हैं, उनके कंप्यूटर के स्क्रीन की छवि पार्श्व में उनकी आवाज़ के साथ कैमरे द्वारा रिकार्ड कर ली जाती है। फिर आठ मिनट के यह विडियो यूट्यूब पर अपलोड कर दिया जाते है और कड़ियाँ खान अकेडमी के जालस्थल पर डाल दी जाती हैं।</p></div>
<p>खान अकेडमी के विडियो उटपटांग हरकतें करते लोगों के घरेलू विडियो जितने लोकप्रिय भले न हो पर वे छात्रों के बड़े काम आते हैं। इसका सबूत हैं, &#8220;मैं तो फिज़िक्स का कोर्स छोड़ने ही वाला था। आपने बचा लिया&#8221; और यह &#8220;आप तो गणित के भगवान हो!!!&#8221; जैसी टिप्पणियाँ। और यह सब तब, जब सलमान के विडियो बेहद कमतर तकनलाजी से बने होते हैं और जिनमें सलमान खुद दिखते भी नहीं। मियामी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक वॉल्टर सेकाडा जैसे <a href="http://www.msnbc.msn.com/id/28200197" target="_blank">विशेषज्ञों ने माना है</a> कि ये विडियो त्रुटिहीन हैं। उनकी शिकायत बस यह है कि परिभाषा समझाने के बजाय खान उदाहरण से शब्दों को समझाते हैं। पर आठ मिनट के विडियो में इससे ज्यादा और किया भी क्या जा सकता है।</p>
<p>खान का कदम विकाशशील राष्ट्रों के लिये नये द्वार खोलता है। शिक्षाविदों के लिये इस उदाहरण को दोहराना आसान भी है। <a href="http://sites.google.com/" target="_blank">गूगल साईट्स</a> जैसे जालसथल पर मुफ्त साईट बना सकते हैं, <a href="http://zaidlearn.blogspot.com/2008/10/8-free-screencasting-tools-for-tony.html" target="_blank">सेंकड़ों मुफ़्त के स्क्रीन रिकार्डिंग सॉफ्टवेयर</a> उपलबध हैं और सामग्री <a href="http://www.youtube.com/" target="_blank">यूट्यूब</a> या <a href="http://www.slideshare.net/" target="_blank">स्लाईडशेयर</a> पर डाली जा सकती है।</p>
<h3>खान अकेडेमी के बारे में जानकारी देता विडियो</h3>
<p><object width="340" height="285"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/dP6Op2jCcJc&#038;hl=en&#038;fs=1&#038;rel=0&#038;border=1"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/dP6Op2jCcJc&#038;hl=en&#038;fs=1&#038;rel=0&#038;border=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="340" height="285"></embed></object>
</div>
<p>मेरे पास अच्छी नौकरी है, मुझे पैसा नहीं चाहिये। मुझे गणित और विज्ञान के विषय बहुत अच्छे लगते हैं, और मुझे पढ़ाने का भी शौक है। इस तरह से वह बच्चे जो पढ़ना चाहते हैं पर जिनके सामने पैसे की या अन्य रुकावटें हैं, वह पढ़ सकते हैं। जब लोग मुझे ईमेल लिखते हैं कि इन पाठों से वे भारत, इथिओपिया या यूगाँडा जैसे देशों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। इंटरनेट फ़ैलेगा तो एक दिन दूर गाँवों में बैठे बच्चे शिक्षक न होने पर भी पढ़ पायेंगे।</p>
<div id="pullQuoteL" style="margin-bottom:10px">इन पाठों से लोग भारत, इथिओपिया या यूगाँडा जैसे देशों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इंटरनेट फ़ैलेगा तो एक दिन दूर गाँवों में बैठे बच्चे शिक्षक न होने पर भी पढ़ पायेंगे।</div>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> तुम्हारे पाठ केवल दस मिनट के ही क्यों होते हैं, और उनमें तुम क्यों नहीं दिखते, केवल तुम्हारी आवाज़ ही सुनायी देती है?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> यह सब यूट्यूब की वजह से है, वहाँ पर दस मिनट से अधिक लम्बे वीडियो नहीं चढ़ा सकते थे तो मैंने अपने सारे पाठ दस दस मिनट की अवधि के ही बनाये। बाद में लोग कहने लगे कि पाठ छोटा हो तो उससे समझ अच्छी आती है, तो वही दस मिनट का नियम अब भी चल रहा है। शुरु में मेरे पास वीडियो कैमरा नहीं था, पेंट के प्रोग्राम से लिख कर पाठ बनाता और माईक से साथ में समझाता तो आवाज रिकार्ड हो जाती, इसलिए वीडियो में मेरा चेहरा नहीं दिखता। पर इस बात को भी पढ़ने वाले पसंद करते हैं, कहते हैं कि लगता है कि उनके साथ बैठा कोई साथी ही समझा रहा है।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> तुम्हारा परिवार बांग्लादेश से है पर तुम अमरीका में पैदा हुए, यहीं पले और बड़े हुए। तो तुम्हारी संस्कृति की यह दो जड़े, बंगाली और न्यू ओरलिअंस की अमरीकी जड़ें, इनका आपस में किस तरह से समन्वय होता है?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> जब मैं छोटा था तो न्यू ओरलिअंस में गिने चुने बंगाली परिवार थे (अब तो बहुत हैं) लेकिन तब भी वह परिवार सामाजिक दृष्टि से बहुत सक्रिय थे जिससे मेरी अपनी बंगाली पहचान बनी। यह मेरी पहचान धार्मिक और राजनीतिक भेदों से ऊपर थी। मैं दस या ग्यारह साल का हुआ था जब मुझे समझ आया कि मैं हिंदू नहीं और तभी मुझे पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश का अंतर भी समझ में आया। तो इस तरह जब छोटी उम्र में आप दूसरे धर्म के साथ इतना गहरा सम्बंध रखते हैं तो एक धर्म के दायरे में स्वयं को बँधा महसूस करना कठिन लगता है।</p>
<p>मैं घर में मज़ाक करता हूँ कि हम लोग इस लिए न्यू ओरलियोनस में बसे क्योंकि यह बंगाल से मिलता जुलता है &#8211; खाने के लिए भरपूर मछली और सीफूड, तेज़ उमस वाला वातावरण, बड़े बड़े तिलचट्टे, बहुत सारे अजीब अजीब लोग, सब कुछ बंगाल से मिलता जुलता। दरअसल यहाँ बसने का कारण था कि मेरे पिता जो डाक्टर थे, उन्हें अस्पताल में रेज़िडेंसी की जगह यहीं मिली थी। मुझे यह भी अच्छा लगता है कि न्यू ओरलिअंस की अपनी गहरी संस्कृति और सभ्यता है। मेरे माँ के परिवार से उनके पाँच भाई और एक फुफेरा भाई भी यहीं आ कर बसे, और उन सब लोगों ने यहाँ की न्यू ओरलिअंस की सभ्यता को खुले मन से स्वीकार और आत्मसात किया है। अपने बचपन होने के दिनों में मुझे व मेरी बहन को लगता था कि हम दुनिया की सबसे अच्छी जगह पर रहते हैं।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> क्या तुम बांग्ला बोल और लिख पढ़ सकते हो?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> मैं बांग्ला बोल समझ तो सकता हूँ पर मेरे बोलने के तरीके पर बंगाली लोग थोड़ा हँसते हैं। लेकिन मुझे बांग्ला लिखना या पढ़ना नहीं आता। मुझे कुछ कुछ हिंदी और उर्दू भी समझ आती हैं पर बोलने में थोड़ी कठिनाई है, हाँ अगर कोई एमरजेंसी हो तो काम चला लेता हूँ।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> काम के अलावा तुम्हारे क्या शौक हैं? क्या कोई भारतीय या बंगाली लेखक तुम्हें पसंद है?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> मुझे चित्रकारी और गिटार का शौक है। भारतीय लेखकों में से मैं केवल सलमान रश्दी को जानता हूँ, जिनकी किताब &#8220;मिडनाईटस चिल्डर्न&#8221; मेरी पसंदीदा किताबों में से है। मुझे बॉलीवुड की फ़िल्मों का भी बहुत शौक है। बहुत से लोग सोचते हैं कि यह मेरी पत्नी उमाइमा का प्रभाव है क्योंकि वह बचपन में कराची में रहती थी, लेकिन यह बात सच नहीं, हिदी फ़िल्में मुझे पसंद हैं और मैं उस पर ज़ोर डालता हूँ कि चलो हिंदी फ़िल्म देखें।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> किस तरह की हिंदी फ़िल्में तुम्हें पसंद हैं? और तुम्हारा सबसे प्रिय अभिनेता या अभिनेत्री? क्या सलमान खान की फ़िल्में पसंद हैं? &#8220;द नेमसेक&#8221; और &#8220;स्लमडॉग मिलियनेयर&#8221; देखी?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> &#8220;खोसला का घोसला&#8221; मुझे बहुत अच्छी लगी थी, बोमन ईरानी मुझे बहुत पंसद है। मुझे मसाला फ़िल्में भी अच्छी लगती हैं, जैसे कि &#8220;ओम शाँति ओम&#8221; मुझे बहुत अच्छी लगी थी। सलमान खान की फ़िल्में ठीक ठाक लगती हैं, कुछ खास नहीं। लेकिन उनकी वजह से लोग मेरा नाम ज़रूर याद रखते हैं। &#8220;द नेमसेक&#8221; के गोगोल में मुझे अपनी छवि दिखी थी, वैसा ही परिवारिक वातावरण, वैसे ही बाल, वैसे ही अपनी पहचान न समझ पाने का दिल पर बोझ। मैं भी लड़कपन में न्यू ओरलिअंस के एक हैवी मैटल बैंड का प्रमुख गायक था। जैसे ही मेरी बहन ने &#8220;द नेमसेक&#8221; देखी, उसने मुझे टेलीफ़ोन किया यही बताने के लिए कि फ़िल्म का गोगोल बिल्कुल मेरे जैसा था।</p>
<p>&#8220;स्लमडॉग&#8221; भी मुझे अच्छी लगी, मैंने इसे शुरु शुरु में एक फेस्टीवल में देखा जब यह फ़िल्म इतनी मशहूर नहीं हुई थी।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> इस बातचीत के लिए धन्यवाद सलमान। उम्मीद है कि तुमसे प्रेरणा लेकर कोई इस तरह के पाठ हिंदी व बांग्ला जैसी भाषाओं में भी बनाये तो यह भारत और बांग्लादेश के गाँवों के बच्चों तक भी पहुँच सकते हैं।</em></p>
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		<title>सर्वगुण संपन्न आटो सुंदरी</title>
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		<pubDate>Sun, 08 Mar 2009 07:56:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>हुसैन</dc:creator>
				<category><![CDATA[कड़ी की झड़ी]]></category>
		<category><![CDATA[amnesia]]></category>
		<category><![CDATA[icecream]]></category>
		<category><![CDATA[london]]></category>
		<category><![CDATA[nagesh kukonoor]]></category>
		<category><![CDATA[tendulkar]]></category>
		<category><![CDATA[women's day]]></category>

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		<description><![CDATA[चिड़ियों ने चुराई आईसक्रीम, न्यूयॉर्क की महिला ने खोई अपनी पहचान और सचिन तेंदुलकर के बैग में क्या है। अंतर्जाल पर कहाँ और क्या क्या हो रहा है? जानिये हर इतवार सामयिकी पर।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="boxR" style="width: 260px;"><strong><a href="http://www.bangaloremirror.com/index.aspx?page=article&amp;sectid=1&amp;contentid=20090305200903050019303105352cf20" target="_blank">आटो सुंदरी</a></strong><br />
<img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin: 2px;" title="गायत्री" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/auto-sundari.jpg" alt="गायत्री" width="250" height="242" />21 साल की गायत्री कंप्युटर साइंस की छात्रा है, प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहती है, आटो चलाती है और पार्ट टाइम मॉडलिंग भी करती है। है न सर्वगुण संपन्न? हमारे देश में महिला आटोचालक का मिलना तो लगभग असंभव है। दाद देनी पड़ेगी इस युवती के साहस की। वुमेंस डे के अवसर पर इससे अधिक प्रेरणादायक कहानी और क्या हो सकती है।</div>
<p><strong><a href="http://www.visualeditors.com/apple/2009/03/deccan-herald-of-bangalore-india-redesigns/" target="_blank">डेक्कन हेराल्ड नये रूप में</a></strong><br />
टाईम्स आफ इंडिया से पछाड़ खाकर और डीएनए की शानदार शुरुवात से घबराकर ही सही इस अखबार को नया रूप मिला है। जी नहीं मारियो गार्सिया नहीं पाल्मर वॉटसन का काम है यह।</p>
<p><strong><a href="http://in.rediff.com/cricket/2009/mar/06flash-fun-want-to-know-what-is-inside-tendulkar-kit-bag.htm" target="_blank">तेंदुलकर के बैग में क्या है?</a></strong><br />
बाकी सब तो ठीक है पर पुट्टपर्थी के साईबाबा का फोटो भी? बड़ा अजीब लगता है जब आपके चहेते महान लोग भी अज्ञान और अंधविश्वास में लिप्त नज़र आते हैं।</p>
<p><strong><a href="http://www.noiseaddicts.com/2009/03/can-you-hear-this-hearing-test/" target="_blank">सुनाई दिया?</a></strong><br />
8 हर्ट्ज़ से लेकर 22 हज़ार हर्ट्ज़ तक की आवृत्ति वाली ध्वनि का संकलन। अब पता चल जायेगा कि संगीत समारोहों, गणपती मंडलों पर बजते कानफोड़ू संगीत, आईपॉड और आपकी बीवी की चीखों ने आपके कान के पर्दों का क्या हाल किया है।</p>
<p><strong><a href="http://www.nytimes.com/2009/03/01/nyregion/thecity/01miss.html?pagewanted=all" target="_blank">गुमशुदा शिक्षिका के खोये दिनों की खोज</a></strong><br />28 अगस्त को हैमिल्टन हाइट्स की 23 वर्षीय शिक्षिका हाना एमिली नदी किनारे जॉगिंग पर निकलीं। बस उन्हें यही आखिरी बात याद है। न्यूयॉर्क हार्बर से उन्हें 16 सितंबर को डूबने से बचाया गया। अब वे एक खास किस्म की भूलने की व्याधि से ग्रस्त हैं जिसमें व्यक्ति अपनी पहचान अचानक ही भूल जाता है। यह विस्मृति कुछ घंटों से लेकर कई सालों तक रह सकती है। खैर बॉलीवुड की फिल्मों में यादाश्यत का खो जाना (और अतिनाटकीय तौर पर लौट आना भी) तो बड़ी आम बात है। इस पर तो गज़नी जैसी फिल्मों ने करोड़ों कमा लिये। </p>
<p><strong>8&#215;10 तस्वीर का ट्रेलर</strong><br />
नागेश कुकनूर की नई फ़िल्म (और यह &#8220;थियेट्रिकल ट्रेलर&#8221; का नया शगूफा क्या छोड़ा है निर्माताओं ने?)<center><object width="425" height="264"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/Ym5VbrSoDbs&#038;hl=en&#038;fs=1&#038;color1=0x3a3a3a&#038;color2=0x999999"></param><param name="allowFullScreen" value="false"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/Ym5VbrSoDbs&#038;hl=en&#038;fs=1&#038;color1=0x3a3a3a&#038;color2=0x999999" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="264"></embed></object></center></p>
<h2>कड़ियाँ और भी हैं</h2>
<ul>
<li><a href="http://abduzeedo.com/clever-logos" target="_blank">15 चतुराई भरे लोगो</a></li>
<li><a href="http://www.oddee.com/item_96590.aspx" target="_blank">चिड़ियों ने चुराई आईसक्रीम</a></li>
<li><a href="http://al3x.net/2008/09/08/al3xs-rules-for-computing-happiness.html" target="_blank">खुशी की गणना करने के नियम</a></li>
<li><a href="http://www.washingtonpost.com/wp-dyn/content/article/2009/03/01/AR2009030101745_pf.html" target="_blank">तकनीक को सरकार में ढालने में फंस गई है ओबामा सरकार</a></li>
<li><a href="http://www.yeeeeee.com/2009/02/24/london-underground-vintage-ads-55-pics/" target="_blank">लंदन के पुराने भूमिगत विज्ञापनों का संसार</a></li>
<li><a href="http://www.webmd.com/skin-problems-and-treatments/news/20090225/why-hair-goes-gray" target="_blank">क्यों हो जाते है बाल सफेद?</a></li>
<li><a href="http://www.boston.com/bigpicture/2009/03/robots.html" target="_blank">अनोखे रोबोट्स की कल्पनाशील दुनिया</a></li>
</ul>
<img src="http://www.samayiki.com/sam/?ak_action=api_record_view&id=142&type=feed" alt="" /><img src="http://feeds.feedburner.com/~r/nirantar/~4/JhT8LBjVHko" height="1" width="1"/>]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>साबुनी रंगभूमि का रियैलिटी सम्मोहन</title>
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		<pubDate>Sat, 07 Mar 2009 07:16:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>परोमिता देब अरंग</dc:creator>
				<category><![CDATA[चित्र कथ्य]]></category>
		<category><![CDATA[caustic soda]]></category>
		<category><![CDATA[dhobi]]></category>
		<category><![CDATA[dhobi-ghaat]]></category>
		<category><![CDATA[mahalaxmi]]></category>
		<category><![CDATA[munnabhai]]></category>
		<category><![CDATA[pens]]></category>
		<category><![CDATA[reality tourism]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[wash]]></category>

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		<description><![CDATA[दक्षिणी मुंबई की आलीशान इमारतों के बीच बसे इस साबुनी घाट में वो सारे तत्व हैं जो इस शहर को महानगर बनाते हैं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" title="Clothes dries at Dhobi Ghaat" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/dry-away.jpg" alt="Clothes dries at Dhobi Ghaat" width="500" height="329" /></p>
<div class="dropCap">यूँ</div>
<p>तो अधिकतर मुंबई वालों रविवार की सुस्ती भरी शुरुआत एक प्याली कॉफी और मुंबई मिरर से होती है पर ऐसे ही एक रविवार को मैंने खुद को महालक्ष्मी के सात रस्ता धोबी घाट में धोबियों की चहल पहल  के बीच पाया।</p>
<p>यह जगह तकरीबन 150 वर्ष पुरानी है, इसे अंग्रेज़ वाइसरायों और अन्य वरिष्ठ अफसरों के कपड़े लत्ते धोने के लिए बनवाया गया था, और इतने वर्षों में यहाँ कुछ खास नहीं बदला। अंग्रेज़ों ने इस घाट को एक औद्योगिक संस्थान को लीज़ पर दिया, जिन्होंने स्वतन्त्रता के पश्चात लीज़ समाप्त होने पर इसे नगर निगम के हवाले कर दिया। नगर निगम ही घाट की अधिकतर हौदियों का मालिक है, और वे ही उन्हे धोबियों को किराए पर देते हैं। धोबियों की अनेक पीढ़ियाँ इस घाट पर रही हैं, जिन्होंने कपड़े धोने की प्रथा को अपने पूर्वजों से अपना लिया है, और शायद इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों को देंगे।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" title="Pens at Dhobhi Ghaat" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/life-at-pens.jpg" alt="Pens at Dhobhi Ghaat" width="500" height="336" /></p>
<div id="pullQuoteR">कपड़ों को चाबुक की मानिंद लहराते हुये ये मैल का नामोनिशां मिटा देने पर आमादा मशीन में तब्दील हो जाते हैं</div>
<p>मुंबई के &#8220;पर्यटक&#8221; स्थलों में से एक, यह धोबीघाट वास्तव में एक निराली जगह है, जहाँ खुले आकाश तले कंक्रीट की हौदियों की कतारें ही कतारें हैं। हर कोठरीनुमा हौदी एक व्यक्ति को उसके कार्यस्थल के रूप में दिया जाता है, जहाँ ये इंसान कपड़ों को चाबुक की मानिंद लहराते हुये मानो गन्दे कपड़ों में से मैल का नामोनिशां मिटा देने पर आमादा मशीन में तब्दील हो जाते हैं। </p>
<p>पूरे शहर से मैले कपड़ों के ढ़ेर अलसुबह यहाँ आते है और साबुनी पानी से भरे कंक्रीट की टंकियों पर बेतहाशा पटके और निचोड़े जाते हैं। हर टंकी नालियों की शृंखला से जुड़ी होती है जहाँ एक धोबी पौ फटने से ले कर सांझ ढलने डटा रहता है। वह एक दिन में 200 कपड़े तक धो डालाता है।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" title="Caustic Cleaniness at Dhobhi Ghaat" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/caustic-cleaniness.jpg" alt="Caustic Cleaniness at Dhobhi Ghaat" width="500" height="329" /></p>
<p>धोबीघाट समुदायों के मुताबिक से बंटी हुई है, बड़ी हैरत होती  है कि इतनी छोटी जगह में भी लोग जातपात और धर्म का ध्यान रख रहे हैं। यहाँ दो मुख्य समुदाय हैं &#8212; एक उत्तर प्रदेश से और दूसरा आन्ध्र प्रदेश से &#8212; और लगता नहीं कि उनमें आपस में अधिक मित्रता है। यहाँ कोई 200 धोबी परिवार रहते हैं पर धीरे धीरे लोगों के द्वारा जगह बेच कर शहर से बाहर जाने के कारण यह समुदाय पिछले कुछ वर्षों से सिमटता जा रहा है।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" title="Pressed to perfection at Dhobhi Ghaat" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/pressed-to-perfection.jpg" alt="Pressed to perfection at Dhobhi Ghaat" width="500" height="333" /></p>
<p>धोबियों की दशकों से चलती आ रही कार्य प्रणाली अचूक है। हर सुबह शाम स्थानीय धोबी कपड़े इकट्ठे करता है और लोकल ट्रेन या ठेले पर उन्हें शहर में फैले धोबी घाटों में से एक पर ले जाता है। सब से बड़ा धोबी घाट यहीं, यानि सात रस्ता महालक्ष्मी में, है जहाँ अधिकतर होटलों और अस्पतालों के कपड़े धुलने के लिए आते हैं। विरार जैसे दूर दराज़ इलाकों से भी कपड़े यहाँ धुलने आते हैं। कपड़ों पर हाथ से बने काले निशानों वाले टैग लगाए जाते हैं, और फिर उन्हें रंगों के हिसाब से छाँटा जाता है, धोया जाता है, सुखाया जाता है, इस्त्री की जाती है, और फिर दुबारा उन्हें छाँट कर वापस भेजने के लिए एकत्र कर लिया जाता है।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" title="Kids at Saat Rasta Dhobi Ghaat" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/kids-at-dhobighaat.jpg" alt="Kids at Dhobhi Ghaat" width="500" height="332" /></p>
<p>हर तरफ बच्चों के झुंड ये देख कर हैरान हो रहे होते हैं कि दुनिया वाले इन धोबियों के बारे में इतनी उत्सुक क्यों हैं और इन मैले कपड़ों के और धोबियों के दस्तानों से ढ़के उन हाथों के चित्र खींचने में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं, जो दिन भर साबुन और पानी झेल कर कठोर हो गए हैं। इन में से कम ही बच्चे स्कूल भेजे जाते हैं, पर आखिरकार इन्हें ही परिवार का व्यवसाय अपनाना है और इन्हीं हौदियों में काम करना है। धोबियों की पत्नियाँ अपने मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं, जब एक आराम करे तो दूसरा उसकी जगह ले लेता है।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" title="Wash Away the filth at Dhobhi Ghaat" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/wash-away.jpg" alt="Wash Away the filth at Dhobhi Ghaat" width="500" height="332" /></p>
<p>यह स्थान &#8220;रियैलिटी सैलानियों&#8221; को आकर्षित कर रहा है और कई सैलानी यहाँ की साबुन भरी और कॉस्टिक सोडा की गन्ध वाली तंग गलियों में विचरते नज़र आते हैं &#8212; छींटे उड़ाते, कपड़े पीटते हुए धोबियों की फोटो लेते हुए और खुद को गीला होने से बचाते हुए। उन्हें आज़ादी से फोटो लेने क्यों दिया जाता है, और हम भारतीयों को रोक कर पैसे क्यों मांगे जाते हैं, इस बात का अन्दाज़ा लगाना ज़्यादा मुश्किल नहीं है। बॉलीवुड वालों को भी इस स्थान ने आकर्षित किया है, और &#8220;मुन्ना भाई&#8221; जैसी हिट फिल्मों की शूटिंग भी यहाँ की हौदियों में हुई है। यहाँ के निवासी गर्व से कहते हैं कि बिल क्लिंटन तक ने इस में खास दिलचस्पी दिखाई थी।</p>
<p>महालक्ष्मी का धोबी घाट यूं तो दक्षिणी मुंबई के कंक्रीट जंगल और आलीशान इमारतों के बीच एक पानी में डूबा, साबुन की बू से भरा घाट भर है पर यह एक अनोखी सम्मोहक रंगभूमि भी है जिसमें वो सारे तत्व मौजूद हैं जो इस शहर को महानगर बनाते हैं।
<p class="note">सभी चित्र &#169; <strong>परोमिता देब अरंग</strong>, चित्र कथ्य का हिन्दी में अनुवाद किया है सामयिकी के संपादक <a href="http://kaulonline.com"><strong>रमण कौल</strong></a> ने।</p>
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		<item>
		<title>भाषा पर इतिहास का बोझ ना डालें</title>
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		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 17:02:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[anita nair]]></category>
		<category><![CDATA[bangalore]]></category>

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		<description><![CDATA[अँग्रेज़ी में लिखने वाली बंगलौर निवासी लोकप्रिय भारतीय उपन्यासकार व लेखिका अनीता नायर से डॉ सुनील दीपक की बातचीत]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">जनवरी 2008 में मुझे अँग्रेज़ी में लिखने वाली भारतीय लेखिका सुश्री <strong>अनीता नायर</strong> से मिलने का और बात करने का मौका मिला था। केरल में जन्मीं अनीता ने 1997 में अपनी पहली पुस्तक तब लिखी जब वे बंगलौर की एक विज्ञापन एजेंसी में कार्यरत थीं। अब तक उनके <a href="http://anitanair.net/novels/index.htm" target="_blank">ग्यारह उपन्यास</a> प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत है अनीता से हई बातचीत से कुछ अंश।</div>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अनीता आपकी हिन्दी इतनी अच्छी है पर आप लिखती अंग्रेज़ी में है?</em></p>
<p><img class="alignright" style="margin: 10px;" title="Anita Nair" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/02/anita_nair_story.jpg" alt="Anita Nair" width="300" height="358" /><strong>अनीताः </strong>मैं चेन्नई के पास अवडि नाम की छोटी सी जगह पर बड़ी हुई। अवडि कुछ अविश्वस्नीय सी जगह है। यहाँ भारतीय फौज के टैंक बनाये जाते हैं, देश के विभिन्न भागों के लोग वहाँ मिलजुल कर रहते हैं, जिसमें कोई एक गुट अन्य गुटों पर भारी नहीं पड़ता। मैंने आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई हिंदी माध्यम के विद्यालय में की है और हिंदी पर मेरा अच्छा अधिकार है। मैंने हिंदी साहित्य बहुत पढ़ा है, प्रेमचंद से ले कर मोहन राकेश तक, सभी जाने माने हिंदी लेखकों को पढ़ा है। शायद इसीलिए मेरे लेखन पर पश्चिमी नहीं भारतीय साहित्य का प्रभाव है।</p>
<p>मैं बड़ी तो हुई चेन्नई में पर मेरे अधिकतर साथी थे उत्तर भारतीय, इसलिए कुछ अजीब सी जगह थी। शेष भारतीय भाषाओं के मुकाबले अँग्रेजी में पढ़ना कम ही होता था। कुछ भाषाओं से मैंने अनुवाद भी पढ़े पर सबसे अधिक हिंदी में ही पढ़ा। इस तरह चेन्नई के उस समय में मेरा पढ़ना लिखना कुछ अजीब सा था। मेरी माँ मुझे मलयालम और तमिल भाषा में पढ़ कर सुनाती थीं, विद्यालय में मैं अधिकतर हिंदी में पढ़ती थी।</p>
<p>फ़िर अचानक ही किताबों के माध्यम से अँग्रेजी से मेरी मुलाकात हुई और मुझे इस भाषा से प्यार हो गया। इसीलिए मैंने अँग्रेजी में लिखने को चुना। लोग मुझसे अक्सर पूछते रहते हैं कि मैं अँग्रेजी में क्यों लिखती हूँ, जबकि मैं आम हिंदी भाषीयों से अच्छी हिंदी बोल लेती हूँ? यह सच है कि मैं अन्य बहुत से हिंदी लिखने बोलने वालों से अच्छी हिंदी लिख बोल लेती हूँ, पर मैं अच्छी मलयालम भी बोलती हूँ और अच्छी तमिल और कन्नड़ भी। </p>
<div id="pullQuoteL">मैंने प्रेमचंद से लेकर मोहन राकेश तक, सभी जानेमाने हिंदी लेखकों को पढ़ा है। शायद इसीलिए मेरे लेखन पर पश्चिमी नहीं भारतीय साहित्य का प्रभाव है।</div>
<p>तो यह बात नहीं कि मैं भारतीय भाषाएँ नहीं जानती पर मैंने स्वयं ही अँग्रेजी में लिखने को चुना। शायद अरबी या फ्रेंच या किसी अन्य भाषा से इस तरह प्यार हो जाता तो उस भाषा में लिखती। मुझे अँग्रेजी अच्छी लगती है इसलिए मैंने अँग्रेजी को चुना। इससे क्या फर्क पड़ता है? भाषा तो भाषा ही होती है, उस पर इतिहास का बोझ क्यों डालें?</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> मैं आप से सहमत हूँ, कई बार भाषा की बहस में बहुत अजीब अजीब से तर्क दिये जाते हैं कि कौन किस भाषा में लिखे।</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>मुझे इस तरह की बहस से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब मेरी किताब &#8220;<em>लेडीस कूपे</em>&#8221; का हिंदी में अनुवाद किया गया तो अनुवाद मुझे भेजा गया ताकि मैं जाँच लूं कि अनुवाद ठीक है या नहीं। मुझे पूरा उपन्यास नहीं पढ़ना पड़ा, पहले दो तीन अध्याय पढ़ कर ही मुझे महसूस हो गया कि हाँ अनुवादक ने ठीक काम किया है। मैं स्वयं अपने हिंदी अनुवाद को जाँच सकती हूँ, इतना ही मेरी लिए काफ़ी है। बाकी बहस से मुझे कुछ सरोकार नहीं। मेरे विचार में तो यह मेरा ही फायदा है कि मैं अँग्रेजी में लिख सकती हूँ।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अच्छा यहाँ विदेश में इस बात पर विमर्श किया जाता है कि प्रवासी होने का एक लेखक के लिए क्या अर्थ है। हम लोग भारत से बाहर रहने वाले प्रवासी लेखकों के बारे में बहस करते हैं। पर भारत में रह कर भी, अपनी भाषा और संस्कृति से दूर रह कर प्रवासी अनुभव होते हैं। आप का परिवार भी तो भारत में प्रवासी था।  आप का परिवार केरल से है पर आप केरल के बाहर पली बड़ी हैं। आप इस बारे में क्या सोचती हैं?</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>अब मेरे माता पिता केरल में ही रहते हैं।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> लेकिन जब आप बड़ी हो रहीं थीं तब वे लोग केरल में नहीं थे। </em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>एक बात तो यह है कि चेन्नई में केरल के लोगों के बारे में बहुत बुरी तरह से बात की जाती है, उनके बारे में जाने क्या क्या कहते हैं। जब तक अवडि में रहे तो आसपास उत्तर भारतीय, महाराष्ट्र के, आँध्र के लोग थे। वहाँ रहने पर यह नहीं सोचते थे कि हम किस राज्य से हैं, सोचते थे कि हम भारतीय हैं। विवाह के बाद अवडि से बाहर निकलने पर पाया कि बाहर का संसार अवडि के संसार से भिन्न था, जहाँ पर हम अजनबी या &#8220;बाहर वाले&#8221; थे क्यों कि हमें ठीक से बोलना नहीं आता था या हमारी खाने पीने की आदतें भिन्न थीं। मेरे लिए सौभाग्य की बात हुई कि उन्हीं दिनों मेरे माता पिता ने वापस केरल जाने की सोची। तब से अक्सर मन ही मन मैं स्वयं से कहती हूँ कि &#8220;यह सब जगह थोड़े से दिनों के लिए ही हैं, बाद में हम लोग केरल वापस चले जायेंगे।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">चाहूँ तो वेनिस में घर ले कर रह सकती हूँ, पर जितनी बार यूरोप आती हूँ मुझे बताना पड़ता है कि मैं यहाँ क्यों आ रही हूँ। भारत से कदम बाहर रखने पर इस तरह के सवाल हमेशा उठते हैं।</div>
<p>फ़िर हम लोग कर्नाटक में आ गये। हमने बंगलौर में अपना घर बनवाया है पर मन में कहीं गहराई में यह बात छुपी है यह मेरा घर बँगलौर में है पर मैं अपनी जड़े यहाँ नहीं जमा सकती। इसलिए मैंने केरल में अपने लिए एक कॉटेज भी बनवाया, यह सोचकर कि चलो वहाँ पर अपना कुछ तो रहे। मैं सोचती हूँ कि यह मेरी अंदरूनी ज़रूरत है कि मैं वहाँ रहूँ जहाँ अपनापन मिले और यही वजह है कि मैं भारत में रहती हूँ, कहीं और नहीं।</p>
<p>आज मेरे लिए अपने रहने की जगह चुनना आसान है पर अपनापन खोजना, जड़ें खोजना, यह मेरी गहरी चाह है। चाहूँ तो वेनिस में घर ले कर रह सकती हूँ पर जितनी बार यूरोप आती हूँ मुझे बताना पड़ता है कि मैं यहाँ क्यों आ रही हूँ, कितने दिन रुकूगीं, आदि। मुझे इस तरह के सवाल अच्छे नहीं लगते। जब मैं भारत में यात्रा करती हूँ तो कोई मुझसे यह सवाल नहीं करता कि कितने दिन रुकोगी, क्यों आयी हो, वगैरह। पर भारत से कदम बाहर रखो तो इस तरह के प्रश्न हमेशा उठते हैं।</p>
<p>कई बार लोग सोचते हैं कि मैं स्पैनिश हूँ या दक्षिण इटली से क्लाबरिया जैसी जगह से हूँ, मुझसे स्पेनिश या इतालवी भाषा में बात करने लगते हैं। हो सकता है मैं स्पैनिश या इतालवी दिखती हूँ, कारण कुछ भी हो भीतर से मुझे लगता है कि मैं यहाँ की नहीं, यह मेरी जगह नहीं। भारत में चाहे लोग मुझे देख कर यह न बता पायें कि मैं कौन से राज्य से हूँ, पर कोई इस तरह के सवाल तो नहीं पूछता मुझसे।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> आप के पति कहाँ से हैं?</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>वह भी केरल के ही हैं।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> तो क्या आप के बच्चों को लगता है कि उनकी जड़ें केरल में हैं?</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong><em>(हँस कर) </em>मेरा बेटा तो कुछ कुछ इतालवी भाषा भी बोलता है, फ्राँचेस्का की वजह से, जो मेरी किताबों का इतालवी में अनुवाद करती है।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अच्छा अपने लिखने के बारे में बताईये। यह निर्णय कैसे लेती हैं कि आप किस विषय पर लिखेंगी?</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>यह निर्णय करना कि अगली किताब कौन सी होगी, इसमें मुझे दो साल तक लग जाते हैं। लिखने का विचार मेरे अंदर लम्बे समय तक घूमता रहता है। अगर दो साल बाद भी मुझे लगे कि हाँ उस विचार में दम है तो मैं उस पर लिखूँगी। सोचने से लिखने तक दो तीन साल लग जाते हैं, और उसके बाद में उस विचार पर ठीक तरह से काम शुरु करती हूँ।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अच्छा आप किताब को सोच विचार कर बनाती हैं या फ़िर एक बार शुरु हो तो उसे अपने आप भावनाओं के बल पर बढ़ने देती हैं?</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>दोनों ही तरह से। शुरु शुरु में तो बहुत सोच विचार कर पूरी योजना बनाती हूँ, पर कई बार कहानी और पात्रों की भावनाएँ सब कुछ अपने काबू में कर लेती हैं। और  जब ऐसा हो तो मैं उसे रोकने या बदलने की कोशिश नहीं करती।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अनीता इस बातचीत के लिए धन्यवाद।</em></p>
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		<title>आस्था की जैविकी</title>
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		<pubDate>Sun, 22 Feb 2009 08:42:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>हुसैन</dc:creator>
				<category><![CDATA[कड़ी की झड़ी]]></category>
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		<category><![CDATA[spiritualism]]></category>
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		<description><![CDATA[आध्यात्मिकता का आपकी सेहत पर असर, अजनबी के साथ भोजन की अजीब शर्त, इंटरनेट व अखबार युक्त आटो रिक्शा, और...भी बहुत कुछ। हुसैन की इतवारी कड़ियाँ बतायें इंटरनेट के हाल चाल।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.time.com/time/health/article/0,8599,1879016,00.html" target="_blank"><strong>आस्था की जैविकी</strong></a><br />
विज्ञान और धर्म का छत्तीस का आंकड़ा रहा है पर एक बात पर वे काफी हद तक सहमत हो जाते हैः थोड़ी बहुत आध्यात्मिकता आपकी सेहत के लिये अच्छी है। मैं भी मानता हूं कि विश्वास से सेहत सुधरती है पर इसे इलाज समझना भूल होगी। पर जब हमारे शरीर और दिमाग में आध्यात्मिक तार मौजूद हैं तो इनका फायदा उठाने में क्या नुकसान हो सकता है।</p>
<p><a href="http://www.frankejames.com/debate/?p=118" target="_blank"><strong>एक अजनबी के साथ भोजन</strong></a><br />
अगर आपको किसी अजनबी से ईमेल मिलता है कि अगर आप उसे एक शाम अपने घर शाकाहारी भोजन के लिये आमंत्रित करें तो वो आपकी पसंद की किसी चैरिटी को 200 डॉलर का दान दे देगा, तो आपका जवाब क्या होगा?</p>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://www.boston.com/bigpicture/2009/02/scenes_from_pakistan.html" target="_blank"><img style="border: 0pt none; margin: 5px;" title="पाकिस्तान से कुछ दृश्य" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/02/pakistan_story.jpg" alt="" width="300" height="200" /></a><p class="wp-caption-text">पाकिस्तान से कुछ दृश्य</p></div>
<p><a href="http://www.contentsutra.com/entry/419-hindustan-times-being-redesigned-mario-garcia-on-the-job" target="_blank"><strong>हिंदुस्तान टाईम्स की वेबसाईट का कायाकल्प करेंगे मारियो गार्सिया</strong></a><br />
पता नहीं सारे भारतीय अखबार गार्सिया के भक्त क्यों हैं? अब वो कितने भी अच्छे हों पर, सारे जालस्थल कुछ ही महीनों में फिर गर्दिशी में पहुंच जाते हैं। या तो स्टाईल गाईड समझायी नहीं जाती या लोगबाग उसे मानते नहीं हैं। शायद मिंट ही ऐसा अखबार होगा जो इसे पूरी तरह से मान कर चलता है।</p>
<p><a href="http://www.dnaindia.com/report.asp?newsid=1232623" target="_blank"><strong>आटो शिक्शा जिनमें मिलेगा अखबार, इंटरनेट और भरोसेमंद ड्राइवर भी</strong></a><br />
ये धरती की ही बात है या हम स्वर्ग का ज़िक्र कर रहे हैं?</p>
<p><a href="http://digital.afaqs.com/perl/digital/news/index.html?sid=23384" target="_blank"><strong>आईसीसी और याहू बने आधिकारिक यार</strong></a><br />
<a href="http://iccevents.yahoo.com/" target="_blank">http://iccevents.yahoo.com</a> पर आईसीसी की खास सामग्री मिलेगी। साथ ही शुरु किया गया है <a href="http://cricket.yahoo.com/" target="_blank">http://cricket.yahoo.com</a></p>
<p><a href="http://news.bbc.co.uk/1/hi/sci/tech/7893414.stm" target="_blank"><strong>एलियन हमारे बीच में भी हो सकते हैं</strong></a><br />
परग्रहियों को खोजने के लिये अब मंगल ग्रह जाने की छोड़िये, अगर वैज्ञानिकों की सुनी जाय तो परग्रहियों के हमारे बीच पृथ्वी पर भी पनपने की संभावना है।</p>
<p><a href="http://www.dnaindia.com/report.asp?newsid=1230936" target="_blank"><strong>रजिस्टर्ड शादी के नाम पर भगवा ब्रिगेड लगा बगलें झांकने</strong></a><br />
वैलेंटाईन दिवस पर खुराफात मचाने के दौरान भगवा ब्रिगेड के लोग असमंजस में पड़ गये जब एक युवक ने अपनी प्रेमिका के साथ धरे जाने पर रजिस्टर्ड विवाह करवाये जाने की माँग रख दी। बड़ा चतुर बालक है।</p>
<p><a href="http://www.pcworld.com/article/159630/universal_chargers_to_finally_become_a_reality.html" target="_blank"><strong>युनिवर्सल मोबाईल फोन चार्जर</strong></a><br />
नये मोबाईल फोन में अब माईक्रो यूएसबी आधारित युनिवर्सल चार्जर उपलब्ध होंगे। यानि अब आफिस में किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं, &#8220;यार नोकिया का चार्जर है किसी के पास?&#8221;</p>
<p><a href="http://wordpress.org/extend/plugins/" target="_blank"><strong>वर्डप्रेस प्लगिन निर्देशिका</strong></a><br />
नई चमकार के साथ, जिसमें है बेहतर खोज और मैल हटाने की ज्यादा शक्ति। हीहीही&#8230;लगता है मैं कुछ ज्यादा ही बोल गया <img src='http://www.samayiki.com/sam/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> </p>
<h2>कड़ियाँ और भी हैं</h2>
<ul>
<li><a href="http://sanjaynirupam.blogspot.com/" target="_blank">संजय निरुपम</a> जी हाँ अब ये भी ब्लॉगिंग कर रहे हैं। बताइये!</li>
<li><a href="http://prototype.nytimes.com/gst/articleSkimmer/" target="_blank">न्यूयार्क टाईम्स <em>आर्टिकल स्किमर</em></a> अब लेख तलाशना पढ़ान हुआ आसान</li>
<li>टाईम्स पत्रिका <a href="http://www.time.com/time/specials/packages/completelist/0,,1879276,00.html" target="_blank">2009 के 25 सर्वेश्रेष्ठ ब्लॉग</a></li>
<li>नेट सिल्वर की <a href="http://nymag.com/movies/features/54335/" target="_blank">2009 आस्कर विजेताओं का पूर्वानुमान</a></li>
<li><a href="http://nom2008.indibloggies.org/" target="_blank">इंडीब्लॉगीज़ 2008</a>: अंग्रेजी ब्लॉगों के लिये नामांकन शुरु</li>
<li>वन्यजीवन फोटोग्राफी के <a href="http://www.smashingmagazine.com/2009/02/15/35-beautiful-examples-of-animals-photography/" target="_blank">35 नायाब नमूने</a></li>
</ul>
<p class="note"><a href="http://simpli-city.blogspot.com/2009/02/links-for-sunday-morning_22.html">मूल आलेख</a> से अनुवाद देबाशीष द्वारा</p>
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		<title>सामयिकी का जनवरी 2009 का प्रिंट अंक उपलब्ध</title>
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		<pubDate>Fri, 20 Feb 2009 20:48:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सामयिकी दल</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सामयिकी का जनवरी 2009 का प्रिंट अंक पोथी कॉम पर उपलब्ध है। यदि आप इंटरनेट की बजाय अपनी सुविधानुसार प्रिंट पत्रिका पढ़ने अधिक सुविधाजनक पाते हैं तो यह पत्रिका आपके काम की होगी। 
प्रिंट आन डिमांड सेवा में कीमत फिलहाल एक बड़ी बाधा बनी हुई है। हम इसे पाटने के मार्ग खोजने में प्रयासरत हैं।  [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a title="Samayiki - Jan 2009 Print editon Cover by chucks, on Flickr" href="http://www.flickr.com/photos/dchucks/3295218651/" target="_blank"><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px;" title="Samayiki - Jan 2009 Print editon Cover" src="http://farm4.static.flickr.com/3627/3295218651_4a61ed7bdc_t.jpg" alt="Samayiki - Jan 2009 Print editon Cover" /></a>सामयिकी का <a href="http://pothi.com/pothi/book/httpwwwsamayikicom-samayiki-january-2009-edition" target="_blank"><strong>जनवरी 2009 का प्रिंट अंक</strong></a> पोथी कॉम पर उपलब्ध है। यदि आप इंटरनेट की बजाय अपनी सुविधानुसार प्रिंट पत्रिका पढ़ने अधिक सुविधाजनक पाते हैं तो यह पत्रिका आपके काम की होगी। <em></em></p>
<p><em>प्रिंट आन डिमांड</em> सेवा में कीमत फिलहाल एक बड़ी बाधा बनी हुई है। हम इसे पाटने के मार्ग खोजने में प्रयासरत हैं।  <a href="http://pothi.com/pothi/book/httpwwwsamayikicom-samayiki-january-2009-edition" target="_blank">प्रिंट अंक</a> के बारे में अपने विचारों से हमें ज़रूर अवगत करायें।</p>
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		<title>प्रायोगिक भौतिकी के जनक: गैलीलियो</title>
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		<pubDate>Sat, 07 Feb 2009 18:36:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पीयूष पाण्डेय</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष 2009 पर सामयिकी की विशेष शृंखला के द्वितीय लेख में नेहरू तारामण्डल, मुंबई के निदेशक पीयूष पाण्डेय आधुनिक प्रायोगिक विज्ञान के जन्मदाता गैलीलियो गैलिली को याद कर रहे हैं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">वर्ष 2009 को अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है &#8211; वर्ष 1609 में गैलीलियो द्वारा खगोलीय प्रेक्षण आरंभ करने की घटना की 400वीं जयंती के रूप में। इस शृंखला के दूसरे लेख में हम गैलीलियो को याद कर रहे हैं जिन्हें आधुनिक प्रायोगिक विज्ञान का जन्मदाता कहा जाता है।</div>
<p><a href="http://www.samayiki.com/tag/iya2009/"><img class="alignright" style="margin:5px;border:none" title="अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष: विशेष शृंखला " src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/iya2009-series.png" border="0" alt="IYA Special" width="200" height="159" /></a><span class="dropCap">आ</span>धुनिक इटली के पीसा नामक शहर (पीसा की टेढ़ी मीनार के लिए प्रसिद्ध) में 15 फरवरी 1564 को गैलीलियो गैलिली का जन्म हुआ। अधिकांश लोग गैलीलियो को एक खगोलविज्ञानी के रूप में याद करते हैं जिसने दूरबीन में सुधार कर उसे अधिक शक्तिशाली तथा खगोलीय प्रेक्षणों के लिए उपयुक्त बनाया और साथ ही अपने प्रेक्षणों से ऐसे चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए जिसने खगोल विज्ञान को नई दिशा दी और आधुनिक खगोल विज्ञान की नींव रखी। पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि खगोलविज्ञानी होने के अलावा वे एक कुशल गणितज्ञ, भौतिकीविद् और दार्शनिक भी थे जिसने यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसीलिए गैलीलियो को &#8221;आधुनिक खगोल विज्ञान के जनक&#8221;, &#8221;आधुनिक भौतिकी का पिता&#8221; या &#8221;विज्ञान का पिता&#8221; के रूप में संबोधित किया जाता है।</p>
<div id="pullQuoteL">बहुत कम लोग यह जानते हैं कि खगोलविज्ञानी होने के अलावा वे एक कुशल गणितज्ञ, भौतिकीविद् और दार्शनिक भी थे जिसने यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।</div>
<p>गैलीलियो को सूक्ष्म गणितीय विश्लेषण करने का कौशल संभवत: अपने पिता विन्सैन्जो गैलिली से विरासत में आनुवांशिक रूप में तथा कुछ उनकी कार्यशैली को करीब से देख कर मिला होगा। विन्सैन्जो एक जाने-माने संगीत विशेषज्ञ थे और &#8216;ल्यूट&#8217; नामक वाद्य यंत्र बजाते थे जिसने बाद में गिटार और बैन्जो का रूप ले लिया। उन्होंने भौतिकी में पहली बार ऐसे प्रयोग किए जिनसे &#8221;अरैखिक संबंध&#8221; का प्रतिपादन हुआ। तब यह ज्ञात था कि किसी वाद्य यंत्र की तनी हुई डोर (या तार) के तनाव और उससे निकलने वाली आवृत्ति में एक संबंध होता है, आवृत्ति तनाव के वर्ग के समानुपाती होती है। इस तरह संगीत के सिद्धांत में गणित की थोड़ी बहुत पैठ थी। प्रेरित हो गैलीलियो ने पिता के कार्य को आगे बढ़ाया और फिर उन्होंने बाद में पाया कि प्रकृति के नियम गणित के समीकरण होते हैं। गैलीलियो ने लिखा है &#8211; &#8221;भगवान की भाषा गणित है&#8221;।</p>
<p>गैलीलियो ने दर्शन शास्त्र का भी गहन अध्ययन किया था साथ ही वे धार्मिक प्रवृत्ति के भी थे। पर वे अपने प्रयोगों के परिणामों को कैसे नकार सकते थे जो पुरानी मान्यताओं के विरुद्ध जाते थे और वे इनकी पूरी ईमानदारी के साथ व्याख्या करते थे। उनकी चर्च के प्रति निष्ठा के बावजूद उनका ज्ञान और विवेक उन्हें किसी भी पुरानी अवधारणा को बिना प्रयोग और गणित के तराजू में तोले मानने से रोकता था। चर्च ने इसे अपनी अवज्ञा समझा। पर गैलीलियो की इस सोच ने मनुष्य की चिंतन प्रक्रिया में नया मोड़ ला दिया। स्वयं गैलीलियो अपने विचारों को बदलने को तैयार हो जाते यदि उनके प्रयोगों के परिणाम ऐसा इशारा करते। अपने प्रयोगों को करने के लिए गैलीलियो ने लंबाई और समय के मानक तैयार किए ताकि यही प्रयोग अन्यत्र जब दूसरी प्रयोगशालाओं में दुहराए जाएं तो परिणामों की पुनरावृत्ति द्वारा उनका सत्यापन किया जा सके।</p>
<p>गैलीलियो ने प्रकाश की गति नापने का भी प्रयास किया और तत्संबंधी प्रयोग किए। गैलीलियो व उनका एक सहायक दो भिन्न पर्वत शिखरों पर कपाट लगी लालटेन लेकर रात में चढ़ गए। सहायक को निर्देश दिया गया था कि जैसे ही उसे गैलीलियो की लालटेन का प्रकाश दिखे उसे अपनी लालटेन का कपाट खोल देना था। गैलीलियो को अपने कपाट खोलने व सहायक की लालटेन का प्रकाश दिखने के बीच का समय अंतराल मापना था-पहाड़ों के बीच की दूरी उन्हें ज्ञात थी। इस तरह उन्होंने प्रकाश की गति ज्ञात की।</p>
<p>पर गैलीलियो &#8211; गैलीलियो ठहरे &#8211; वे इतने से कहां संतुष्ट होने वाले थे। अपने प्रायोगिक निष्कर्ष को दुहराना जो था। इस बार उन्होंने ऐसी दो पहाड़ियों का चयन किया जिनके बीच की दूरी कहीं ज्यादा थी। पर आश्चर्य, इस बार भी समय अंतराल पहले जितना ही आया। गैलीलियो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रकाश को चलने में लग रहा समय उनके सहायक की प्रतिक्रिया के समय से बहुत कम होगा और इस प्रकार प्रकाश का वेग नापना उनकी युक्ति की संवेदनशीलता के परे था। पर गैलीलियो द्वारा बृहस्पति के चंद्रमाओं के बृहस्पति की छाया में आ जाने से उन पर पड़ने वाले ग्रहण के प्रेक्षण से <em>ओल रोमर </em>नामक हॉलैंड के खगोलविज्ञानी को एक विचार आया। उन्हें लगा कि इन प्रेक्षणों के द्वारा प्रकाश का वेग ज्ञात किया जा सकता है। सन् 1675 में उन्होंने यह प्रयोग किया जो इस तरह का प्रथम प्रयास था। इस प्रकार यांत्रिक बलों पर किए अपने मुख्य कार्य के अतिरिक्त गैलीलियो के इन अन्य कार्यों ने उनके प्रभाव क्षेत्र को कहीं अधिक विस्तृत कर दिया था जिससे लंबे काल तक प्रबुद्ध लोग प्रभावित होते रहे।</p>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><img style="border: 0pt none; margin: 5px;" title="&quot;ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं न कि पृथ्वी की&quot;,  कॉपरनिकस के इस सिद्धांत का गैलीलियो ने समर्थन किया। पर इस &quot;भूल&quot; के लिये चर्च ने उन्हें दिया कारावास। 1992 में वैटिकन यह स्वीकार किया कि गैलीलियो के मामले में उनसे गलती हुई थी। " src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/02/galileo_galilei.jpg" border="0" alt="IYA Special" width="300" height="316" /><p class="wp-caption-text">&quot;ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं न कि पृथ्वी की&quot;,  कॉपरनिकस के इस सिद्धांत का गैलीलियो ने समर्थन किया। पर इस &quot;भूल&quot; के लिये चर्च ने उन्हें दिया कारावास। 1992 में वैटिकन ने यह स्वीकार किया कि गैलीलियो के मामले में उनसे गलती हुई थी। </p></div>
<p>गैलीलियो ने आज से बहुत पहले गणित, सैद्धांतिक भौतिकी और प्रायोगिक भौतिकी के परस्पर संबंध को समझ लिया था। परवलय या पैराबोला का अध्ययन करते हुए वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि एक समान त्वरण (uniform acceleration) की अवस्था में पृथ्वी पर फेंका कोई पिंड एक परवलयाकार मार्ग पर चल कर वापस पृथ्वी पर आ गिरेगा &#8211; बशर्ते हवा के घर्षण का बल उपेक्षणीय हो। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि उनका यह सिद्धांत जरूरी नहीं कि किसी ग्रह जैसे पिंड पर भी लागू हो। उन्हें इस बात का ध्यान था कि उनके मापन में घर्षण (friction) तथा अन्य बलों के कारण अवश्य त्रुटियां आई होंगी जो उनके सिद्धांत की सही गणितीय व्याख्या में बाधा उत्पन्न कर रहीं थीं। उनकी इसी अंतर्दृष्टि के लिए प्रसिद्ध भौतिकीविद् आइंस्टाइन ने उन्हें &#8221;आधुनिक विज्ञान का पिता&#8221; की पदवी दे डाली। कथन में कितनी सचाई है पता नहीं &#8211; पर माना जाता है कि गैलीलियो ने पीसा की टेढ़ी मीनार से अलग-अलग संहति (mass) की गेंदें गिराने का प्रयोग किया और यह पाया उनके द्वारा गिरने में लगे समय का उनकी संहति से कोई सम्बन्ध नहीं था &#8211; सब समान समय ले रहीं थीं। ये बात तब तक छाई अरस्तू की विचारधारा के एकदम विपरीत थी &#8211; क्योंकि अरस्तू के अनुसार अधिक भारी वस्तुएं तेजी से गिरनी चाहिए। बाद में उन्होंने यही प्रयोग गेदों को अवनत तलों पर लुढ़का कर दुहराए तथा पुन: उसी निष्कर्ष पर पहुंचे।</p>
<p>गैलीलियो ने त्वरण के लिए सही गणितीय समीकरण खोजा। उन्होंने कहा कि अगर कोई स्थिर पिंड समान त्वरण के कारण गतिशील होता है तो उसकी चलित दूरी समय अंतराल के वर्ग के समानुपाती होगी।</p>
<p><code>S = ut + &frac12;ft<sup>2</sup>, if u = 0 then S = &frac12;ft<sup>2</sup> or S ∝ t<sup>2</sup></code></p>
<p>गैलीलियो ने ही जड़त्व का सिद्धांत हमें दिया जिसके अनुसार &#8221;किसी समतल पर चलायमान पिंड तब तक उसी दिशा व वेग से गति करेगा जब तक उसे छेड़ा न जाए&#8221;। बाद में यह जाकर न्यूटन के गति के सिद्धांतों का पहला सिद्धांत बना। पीसा के विशाल कैथेड्रल (चर्च) में झूलते झूमर को देख कर उन्हें ख्याल आया क्यों न इसका दोलन काल नापा जाए &#8211; उन्होंने अपनी नब्ज की धप-धप की मदद से यह कार्य किया &#8211; और इस प्रकार सरल लोलक का सिद्धांत बाहर आया &#8211; कि लोलक का आवर्त्तकाल उसके आयाम (amplitude) पर निर्भर नहीं करता (यह बात केवल छोटे आयाम पर लागू होती है &#8211; पर एक घड़ी का निर्माण करने के लिए इतनी परिशुद्धता काफी है)। सन् 1632 में उन्होंने ज्वार-भाटे की व्याख्या पृथ्वी की गति द्वारा की। इसमें उन्होंने समुद्र की तलहटी की बनावट, इसके ज्वार की तरंगों की ऊंचाई तथा आने के समय में संबंध की चर्चा की &#8211; हालांकि यह सिद्धांत सही नहीं पाया गया। बाद में केपलर व अन्य वैज्ञानिकों ने इसे सुधारा और सही कारण &#8211; चंद्रमा को बताया।</p>
<p>जिसे आज हम आपेक्षिकता (Relativity) का सिद्धांत कहते हैं उसकी नींव भी गैलीलियो ने ही डाली थी। उन्होंने कहा है &#8221;भौतिकी के नियम वही रहते हैं चाहे कोई पिंड स्थिर हो या समान वेग से एक सरल रेखा में गतिमान। कोई भी अवस्था न परम स्थिर या परम चल अवस्था हो सकती है&#8221;। इसी ने बाद में न्यूटन के नियमों का आधारगत ढांचा दिया। सन् 1609 में गैलीलियो को दूरबीन के बारे में पता चला जिसका हालैंड में आविष्कार हो चुका था। केवल उसका विवरण सुनकर उन्होंने उससे भी कहीं अधिक परिष्कृत और शक्तिशाली दूरबीन स्वयं बना ली। फिर शुरू हुआ खगोलीय खोजों का एक अद्भुत अध्याय। गैलीलियो ने चांद को देखा उसके ऊबड़-खाबड़ गङ्ढे देखे। फिर उन्होंने दूरबीन चमकीले शुक्र ग्रह पर साधी &#8211; एक और नई खोज &#8211; शुक्र ग्रह भी (चंद्रमा की तरह) कला (phases) का प्रदर्शन करता है। जब उन्होंने बृहस्पति ग्रह को अपनी दूरबीन से निहारा, फिर जो देखा और उससे उन्होंने जो निष्कर्ष निकाला उसने सौरमंडल को ठीक-ठीक समझने में बड़ी मदद की। गैलीलियो ने देखा की बृहस्पति ग्रह के पास तीन छोटे-छोटे &#8221;तारे&#8221; जैसे दिखाई दे रहे हैं। कुछ घंटे बाद जब दुबारा उसे देखा तो वहां तीन नहीं बल्कि चार &#8221;तारे&#8221; दिखाई दिए। गैलीलियो समझ गए कि बृहस्पति ग्रह का अपना एक अलग संसार है। उसके गिर्द घूम रहे ये पिंड अन्य ग्रहों की तरह पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए बाध्य नहीं हैं। (तब तक यह माना जाता था कि ग्रह और सूर्य सभी पिंड पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। हालांकि निकोलस कॉपरनिकस गैलीलियो से पहले ही यह कह चुके थे कि ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं न कि पृथ्वी की &#8211; पर इसे मानने वाले बहुत कम थे। गैलीलियो की इस खोज से सौरमडंल के सूर्य केंद्रित सिद्धांत को बहुत बल मिला।)</p>
<div id="pullQuoteL">1609 में गैलीलियो को दूरबीन के बारे में पता चला जिसका हालैंड में आविष्कार हो चुका था। केवल उसका विवरण सुनकर उन्होंने कहीं अधिक परिष्कृत व शक्तिशाली दूरबीन स्वयं बना ली।</div>
<p>इसके साथ ही गैलीलियो ने कॉपरनिकस के सिद्धांत को खुला समर्थन देना शुरू कर दिया। ये बात तत्कालीन वैज्ञानिक और धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध जाती थी। गैलीलियो के जीवनकाल में इसे उनकी भूल ही समझा गया। सन् 1633 में चर्च ने गैलीलियो को आदेश दिया कि वे सार्वजनिक रूप से कहें कि ये उनकी बड़ी भूल है। उन्होंने ऐसा किया भी। फिर भी गैलीलियो को कारावास भेज दिया गया। बाद में उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के मद्देनजर सजा को गृह-कैद में तब्दील कर दिया गया। अपने जीवन का अंतिम दिन भी उन्होंने इसी कैद में गुज़ारा। कहीं वर्ष 1992 में जाकर वैटिकन शहर स्थित ईसाई धर्म की सर्वोच्च संस्था ने यह स्वीकारा कि गैलीलियो के मामले में उनसे गलती हुई थी। यानी उन्हें तीन सौ से अधिक साल लग गए असलियत को समझने और स्वीकारने में।</p>
<p>जब गैलीलियो पीसा के विश्वविद्यालय में खगोल विज्ञान के प्राध्यापक थे तो उन्हें अपने शिष्यों को यह पढ़ाना पढ़ता था कि ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। बाद में जब वे पदुवा नामक विश्वविद्यालय में गए तब उन्हें जाकर निकोलस कॉपरनिकस के नए सिद्धांत का पता चला था। खुद अपनी दूरबीन द्वारा किए गए प्रेक्षणों से (विशेषकर बृहस्पति के चंद्रमा देख कर) वे अब पूरी तरह आश्वस्त हो चुके थे कि कॉपरनिकस का सूर्य-केंद्रित सिद्धांत ही सौरमंडल की सही व्याख्या करता है। बहत्तर साल की अवस्था को पहुंचते-पहुंचते गैलीलियो अपनी आंखों की रोशनी पूरी तरह खो चुके थे। बहुत से लोग यह मानते हैं कि उनका अंधापन अपनी दूरबीन द्वारा सन् 1613 में सूर्य को देखने (जिसके द्वारा उन्होंने सौर-कलंक या सनस्पॉट्स भी खोजे थे) के कारण उत्पन्न हुआ होगा। पर जांच करने पर पता चला कि ऐसा मोतियाबिंद के आ जाने और आंख की ग्लौकोमा नामक बीमारी के कारण हुआ होगा।</p>
<p>सन् 1642 में गृह-कैद झेल रहे गैलीलियो की 8 जनवरी को मृत्यु हो गई। कुछ मास बाद उसी वर्ष न्यूटन का जन्म हुआ। इस तरह कह सकते हैं कि तब एक युग का अंत और एक और नए क्रांतिकारी युग का शुभारंभ हुआ।
<p class="note"><a href="http://www.nrdcindia.com/pub.htm#Awishkar" target="_blank">आविष्कार पत्रिका</a> से साभार</p>
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