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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन | Nirantar &#8211; Hindi Blogzine</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन | Nirantar &#8211; Hindi Blogzine</title>
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		<title>140 अक्षरों की दुनिया: माइक्रोब्लॉगिंग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[देबाशीष चक्रवर्ती]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 Jul 2008 07:54:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
		<category><![CDATA[Microblogging]]></category>
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		<category><![CDATA[Twitter]]></category>
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					<description><![CDATA[ब्लॉगिंग के बाद इंटरनेट पर एक और विधा ने जोर पकड़ा है। जी हाँ ट्विटर, पाउंस और प्लर्क के दीवाने अपने बलॉग छोड़ दीवाने हो चले हैं माईक्रोब्लॉगिंग के। <strong>पैट्रिक्स </strong>और <strong>देबाशीष </strong>कर रहे हैं इस लोकप्रिय तकनीक की संक्षिप्त पड़ताल जिसमें लोग फकत 140 अक्षरों में कभी अपने मोबाईल, कभी डेस्कटॉप तो कभी जालस्थल द्वारा अपना हालेदिल लिखे चले जाते हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><img fetchpriority="high" decoding="async" title="Microblogging" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/story-big-twitter.jpg" alt="Microblogging" width="490" height="302" align="middle" border="0" hspace="3" vspace="3" /></p>
<div class="dropCap">आ</div>
<p>प अभी क्या कर रहे हैं? ये बड़ा ही सीधा सवाल है जिसका जवाब देना भी बेहद आसान होता है। अंतरजाल पर दुनिया के हजारों लोग इसी सवाल का जवाब देते अघाते नही और <strong>ट्विटर </strong>की दुनिया में उनके इस सवाल का इंतज़ार कभी दस तो कभी हजारों <strong>फॉलोवर्स </strong>को रहता है। इससे पहले कि आप ट्विटर को कोई धार्मिक संप्रदाय समझ बैठें जिसके अनुयायी भेद भरे संदेश साझा करते हैं, हम आपको इसका राज़ बता ही देते हैं।</p>
<div id="boxR">
<h3>क्या है माइक्रोब्लॉगिंग?</h3>
<p><img decoding="async" title="Microblogging" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/dchucks-on-twitter.jpg" alt="Microblogging" width="198" height="154" align="middle" border="0" hspace="2" vspace="2" /></p>
<p>माइक्रोब्लॉगिंग (Microblogging) पारंपरिक ब्लॉगिंग का एक अलाहदा रूप है जिसमें संक्षिप्त टेक्स्ट संदेश भेजे जा सकते हैं। संदेश की सीमा अक्सर 140 अक्षरों की होती है जिसे आप अपने मोबाईल फ़ोन, इंस्टैंट मैसेंजर, ईमेल या जालघर द्वारा भेज सकते हैं। 2006 में प्रारंभ, ट्विटर सर्वाधिक प्रसिद्ध माइक्रोब्लॉगिंग सेवा है, अगला नंबर गूगल द्वारा अधिग्रहित <strong>जायकू </strong>का है।</p>
<p>ज्यों ज्यों माइक्रोब्लॉगिंग की लोकप्रियता में इज़ाफ़ा हो रहा है इसके अति साधारण रूप में नये नग जोड़े जाने की कवायद चल रही है। डिग के संस्थापक केविन रोज़ द्वारा स्थापित <strong>पाउंस </strong>में फाइल शेयरिंग व कार्यक्रम न्यौते भेजने कि सुविधा जोड़ी गई तो हाल ही में शुरु किये गई प्लर्क के जालघर में अंतरापृष्ठ को एक टाईम लाईन का स्वरूप दे कर विडियो व अन्य मीडिया जोड़ने की सुविधा दी गई है।</p>
<p>माइक्रोब्लॉगिंग का जादू इस कदर सर चढ़कर बोल रहा है कि फ़ेसबुक से लेकर लिंक्ड-इन तक को, स्टेटस अपडेट के बहाने ही सही, माइक्रोब्लॉगिंग की सुविधा मुहैया करानी पड़ी है। तो यह बिलावजह नहीं है कि माइक्रोब्लॉगिंग नामचीन शख्सियतों को भी लुभा रही है तभी तो ब्लॉगअड्डा ने अमिताभ बच्चन के बलॉग के बाद खास उनके लिये माइक्रोब्लॉगिंग की <a href="http://www.masala.com/4133-micro-blogging-just-for-the-big-b" target="_blank" rel="noopener">सुविधा भी शुरु</a> की है। <a href="http://twitter.com/bbc" target="_blank" rel="noopener">बीबीसी</a> व <a href="http://twitter.com/ajenglish" target="_blank" rel="noopener">अलज़जीरा</a> जैसे नामचीन समाचार संस्थानों स लेकर अमरीका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार <a href="http://twitter.com/barackobama" target="_blank" rel="noopener">बराक ओबामा</a> तक ट्विटर पर हैं।</p>
</div>
<p>ट्विटर एक अलग किस्म की <strong>इंस्टैंट मैसेजिंग</strong> सेवा है, कई इसे <strong>माइक्रोब्लॉगिंग </strong>(देखें बॉक्सः क्या है माइक्रोब्लॉगिंग?) कहकर पुकारते हैं। फर्क़ यह है कि आप ट्विटर पर केवल 140 या उससे कम अक्षरों में ही संदेश भेज सकते हैं जो आपके फॉलोवर्स (ट्विटर की ज़बान में आपके संदेश पाने की हामी भरने वाले को फॉलोवर कहा जाता है) को तुरंत मिल जाता है। इसी तरह आप भी अपनी पसंद के लोगों को फॉलो कर सकते हैं। और इस तरह बन जाता है एक बढ़िया सामाजिक तंत्र या सोशियल नेटवर्क जिसकी बात आजकल हर वेंचर कैपिटलिस्ट किया करता है। मज़े की बात यह है कि ट्विटर सेवा मोबाईल पर भी चलती है यानी आप अपने सेल फोन द्वारा भी संदेश भेज व प्राप्त कर सकते हैं।</p>
<p>ट्विटर के अलावा अन्य माइक्रोब्लॉगिंग सेवायें भी आहिस्ता आहिस्ता अपनी पैठ बना रही हैं। विपणन व सोशियल मीडिया में रुचि रखने वाले <strong>गौरव मिश्रा</strong>, जो <a href="http://www.gauravonomics.com/" target="_blank" rel="noopener">गौरवानॉमिक्स</a> नामक चिट्ठा लिखते हैं, ट्विटर के अलावा जायकू, पाउंस, प्लर्क, क्युपि, चित्र व एसएमएस गपशप जैसी सेवायें आजमा चुके हैं। ट्विटर के प्रयोक्ता इसे विविध माध्यमों से भी इस्तेमाल करते हैं, कई लोग अपने मोबाईल द्वारा भारत के शॉर्टकोड 5566511 पर संदेश भेजते हैं तो कई टीव्हिर्ल (Twhirl) या ट्विटरफॉक्स (TwitterFox) जैसे डेस्कटॉप क्लायंट या ब्राउज़र एक्सटेंशन का प्रयोग करते हैं।<img decoding="async" class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 8px 25px;" title="Gaurav Mishra" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/gaurav-mishra-quote.jpg" alt="Gaurav Mishra" width="225" height="123" align="left" border="0" hspace="5" vspace="5" /></p>
<p>140 अक्षरों की सीमा ट्विटर पर अनचाही बातों और बड़बोलेपन पर बाँध तो लगाती ही है, साथ ही न्यूनतम शब्दों में वही बात कहने का हुनर भी सिखा देती है जो आप अपने ब्लॉग पर 1000 शब्द खर्च करे बिना कह नहीं पाते। और यकीन मानिये 140 अक्षर कम नहीं होते क्योंकि ट्विटर पर अक्सर लोग बेतकल्लुफ और निजी बातें लिखते हैं। कई बार ये बातें रिमाईंडर, निजी नोट, त्वरित विचार या आवश्यक खबर होती है। किसी व्यक्ति को फॉलो करते करते आपको उसकी शख्सियत का इल्म होने लगता है, मसलन उसे कैसी फिल्में पसंद है, वो क्या पढ़ता है, कहाँ खाना खाता है, उसके आफिस में क्या चल रहा है, वगैरह। पर ट्विटर पर लोग इतनी निजी बातें क्यों करने लगते हैं जो वो साधारणतः अपने ब्लॉग पर नहीं करते। <a href="http://www.b5media.com/" target="_blank" rel="noopener">बी 5 मीडिया</a> व <a href="http://www.inquisitr.com/" target="_blank" rel="noopener">इंक्यूज़िटर</a> के संस्थापक <strong><a href="http://www.duncanriley.com/" target="_blank" rel="noopener">डंकन रियली</a></strong> &#8220;नेटवर्क व त्वरित वार्तालाप&#8221; को इसकी वजह मानते हैं, &#8220;ट्वीट काफी सीमित पाठकवर्ग पर केंद्रित होते हैं और इनका छोटा आकार इनका प्रारूप निजी बना देता है&#8221;, वे कहते हैं। गौरव कहते हैं, &#8220;माइक्रोब्लॉगिंग ने ब्लॉगिंग के साथ वही किया जो एक समय ब्लॉगिंग ने पारंपरिक प्रकाशन के साथ किया था। माइक्रोब्लॉगिंग के एसएमएस और चैट से साम्य ने इसे अनौपचारिक कलेवर दे दिया है&#8221;</p>
<p>ट्विटर पर अधिकांश लोग पहले चिट्ठाकारी से जुड़े फिर इस माध्यम से। प्रकाशन की सरलता ने लाखों लोगों को अपने ब्लॉग पर जो चाहे वो लिखना सिखाया। पर लंबे गद्य लेखन से कई ब्लॉगर उकता जाते हैं। ब्लॉग का प्रारूप अमूमन ऐसा होता है कि कम शब्दों में लिखना श्रेष्ठ नही होता। वर्डप्रेस की असाईड्स और टंबल ब्लॉग जैसे माध्यमों ने यहाँ निजात ज़रूर दी, जहाँ एक लाईना पोस्ट लिखना संभव था, टेबल ब्लॉग पर तो आप केवल एक विडियो या चित्र भी पोस्ट कर सकते थे, बिना एक भी शब्द लिखे। पर तात्कालिकता ने ट्विटर को मकबूलियत दिला दी। कहना न होगा कि कई दफा किसी बात को तुरंत कहना ज़्यादा जरुरी होता है और ट्विटर ने इसी जरुरत को पूरा किया।</p>
<div id="boxL">
<h3>नया रूप, नई बातें</h3>
<p>माइक्रोब्लॉगिंग के पदार्पण और ट्विटर की मकबूलियत से कुछ नये शब्दों का सृजन भी हुआ है, नोश फ़रमायें</p>
<ul>
<li><strong>ट्वीटः </strong>माइक्रोब्लॉग प्रविष्टि</li>
<li><strong>ट्विटररः </strong>ट्विटर प्रयोक्ता</li>
<li><strong>ट्विटोस्फ़ीयरः </strong>ट्विटर संसार</li>
<li><strong>मिसट्वीटः</strong> ऐसी माइक्रोब्लॉग प्रविष्टि जिस पर आपको खेद हो। ट्विटर पोस्ट हटाने की सुविधा तो देता है पर संपादित करने या वापस लेने की नहीं।</li>
</ul>
<p>ऐसे और भी शब्दों के बारे में जानिये <a href="http://twitter.pbwiki.com/Twitter%20Glossary" target="_blank" rel="noopener">इस विकीपृष्ठ</a> पर।</p>
<h3>ट्विटर मैशअप</h3>
<p>जाल पर ट्विटर जैसी तो सेंकड़ों सेवायें हैं पर इसके जैसा नाम किसी का नही है। ट्विटर से जुड़े निम्नलिखित मैशअप खासे लोकप्रिय हैं</p>
<ul>
<li><a href="http://twittermap.com/twittervision" target="_blank" rel="noopener"><strong>ट्विटरविज़नः</strong></a> यह विश्व के नक्शे के द्वारा ट्विटर पर विभिन्न जगहों से भेजे जा रहे संदेशों के बारे में बताता है।</li>
<li><a href="http://www.twitterholic.com/" target="_blank" rel="noopener"><strong>ट्विटरहॉलिकः</strong></a> 100 सवार्धिक फॉलोवर्स वाले प्रयोक्ताओं की पायदान।</li>
<li><a href="http://summize.com/" target="_blank" rel="noopener"><strong>सम्माईज़ः </strong></a> ट्विटर का खोज इंजन, जुलाई 2008 में इस सेवा को ट्विटर ने खरीद लिया है।</li>
<li><a href="http://iconfactory.com/software/twitterrific" target="_blank" rel="noopener"><strong>ट्विटेरिफिक</strong></a> , <strong>ट्विटरफॉक्स </strong>जैसे अनेक तंत्रांश व ब्राउज़र एक्सटेंशन आपको ट्विटर पर संदेश अपने कंप्यूटर से भेजने की सुविधा देते हैं।</li>
</ul>
<p>ऐसे और भी मैशअप के बारे में जानिये <a href="http://twitter.pbwiki.com/Mashups" target="_blank" rel="noopener">इस विकीपृष्ठ</a> पर।</p>
</div>
<p>ट्विटर के आने के बाद से कई अनियमित चिट्ठाकार तो खुश हुये ही, अनेक नियमित लेखकों ने भी अपने ब्लॉग लेखन में कमी की बात स्वीकारी है। अपने ब्लॉग पर लंबी उबाउ पोस्ट लिखने से ट्विटर पर नन्हा सा अपडेट देना कई लोगों को भाने लगा है। शायद इसकी वजह है ट्विटर पर अपना संदेश छोड़ना बेहद आसान है और इसमें समय बेहद कम लगता। इन संदेशों को प्राप्त करने वाले तुरंत लेखक को उसके प्रयोक्ता नाम के सामने खास @ चिन्ह लगाकर अपना जवाब भी दे सकते हैं। डंकन इस बात से सहमत हैं कि अनके निजी ब्लॉग पर लेखन कम हुआ है पर अपने मुख्य ब्लॉग पर उन्हें ट्विटर की बदौलत ज्यादा लिखने का मौका मिला है। ट्विटर को मुख्यतः ब्रेकिंग न्यूज़ या रोचक बातें तुरंत बताने के लिये प्रयोग करते हैं और यही खबरें बाद में उनके ब्लॉग पर विस्तार से लिखने का मसाला बन जाती हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 8px 25px;" title="Duncan Riley" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/duncan-riley-quote.jpg" alt="Duncan Riley" width="225" height="124" align="right" border="0" hspace="5" vspace="5" />हालांकि ट्विटर पर सब अच्छा ही है ऐसी बात तो नहीं है। खास तौर पर हालिया महीनों में जब ये सेवा अनिश्चित रूप से कई बार बंद पड़ गई और जब कभी पुनः शुरु की जाती तो अनेक फीचर्स बंद कर दिये जाते। यह अंदेशा गलत न होगा कि ट्विटर की खटारा हालत का फ़ायदा हाल ही में प्रारंभ एक अन्य माइक्रोब्लॉगिंग सेवा <strong>प्लर्क </strong>को मिला है। डंकन यह बात मानते हैं कि लोगों ने अन्य सेवाओं का रुख किया है। &#8220;पर तकनीकी दिमाग वाले लोगों को प्लर्क उतना पसंद नहीं आ रहा। फ्रेंडफीड की बढ़त जारी है और हर रोज़ इससे नये लोग जुड़ते जा रहे हैं&#8221;, डंकन कहते हैं।</p>
<p>बात सिर्फ माइक्रोब्लॉगिंग की ही की जाय तो ढेर सारे लोगों को फॉलो करने वाले प्रयोक्ताओं को संदेशों की बाढ़ से निबटना सीखना होता है। कुछ प्रयोक्ता ऐसे भी होते हैं जो पचासों बार अपने बारे में संदेश भेजते हैं और सारी बातें व्यक्तिगत ही हों तो असंबद्ध व्यक्ति के लिये यह सरदर्दी का सबब भी बन सकते हैं।</p>
<p>ट्विटर पर अपने बारे में बताने की उत्कंठा भी कई बार हदें पार कर जाती हैं। देखा जाय तो तो ब्लॉगिंग करने वालों का इस इच्छा से पहले भी नाता पड़ चुका होता है। समय पर ट्वीट न करने पर फॉलोवर्स की संख्या कम होने का अंदेशा रहता है, संदेश भेजते समय भी सोचना होता है कि क्या यह संदेश साझा करने लायक है या नहीं। जैसे जैसे आपके फॉलोवर्स की संख्या बढ़ती जाती है यह मानसिक दबाव भी बढ़ता चला जाता है।</p>
<p>तो ट्विटर पारंपरिक चिट्ठाकारी से कितना अलग है? गौरव मानते हैं कि माइक्रोब्लॉगिंग काफी अलग विधा है, &#8220;माइक्रोब्लॉगिंग और ब्लॉगिंग दोनों साथ जी सकते हैं। मैंने वर्डप्रेस के माइक्रोब्लॉगिंग आधारित प्रोलोग थीम के इस्तेमाल के बाद यह पाया कि ट्विटर महज़ एक अलहदा इंटरफेस वाली सेवा नहीं है।&#8221;। वाकई यह तुलना गैरवाजिब है। पारंपरिक ब्लॉगिंग का अपनी आकर्षण और पाठक वर्ग है, आखिरकार दुनिया में ऐसी सेंकड़ों बातें हैं जो 140 अक्षरों में समेटी नहीं जा सकती। किसी भी सर्जनात्मक विधा की ही तरह पारंपरिक निबंधात्मक ब्लॉगिंग का अंत होना असंभव ही है। मसलन, किसी ट्विटरर को उसके माइक्रोब्लॉग के आधार पर पुस्तक लिखने का प्रस्ताव मिले इस बात के आसार कम ही हैं।</p>
<p>ट्विटर की बेतकल्लुफ बातचीत के माध्यम के रूप में एक अलहदा जगह बन ही गई है, बातें जो हम दफ्तर में कॉफी मशीन के पास या नुकक्ड़ पर यार दोस्तों के साथ करते हैं। ट्विटर की सादगी उसकी पहचान है और इसने आनलाईन संपर्क के एक नये और खास माध्यम के रूप में अपनी जगह बना ली है।</p>
<div id="section-teaser">
<h2>और भी सेवायें हैं ट्विटर के सिवा</h2>
<p>जी हाँ, ट्विटर पर पूर्णतः निर्भर होना कितनी खराब बात है यह इसके प्रयोक्ताओं ने हाल ही में सीख लिया जब अत्यधिक प्रयोक्ताओं की संख्या से निबटने में ट्विटर का रूबी आधारित तंत्राँश नाकामयाब रहा। नतीजन ट्विटर सेवा अक्सर बंद रहती या इसके अनेक फ़ीचर बंद पड़े रहते। ट्विटर के अनेक विकल्प हैं जिनमें से कुछ की जानकारी निम्नलिखित हैः</p>
<table border="0" width="100%" cellspacing="2" cellpadding="2" bgcolor="#f2ecec">
<tbody>
<tr>
<td align="center">
<table border="0" width="99%" bgcolor="#ffffff">
<tbody>
<tr bgcolor="#f2ecec">
<td style="width: 70%;"><a href="http://www.pownce.com/" target="_blank" rel="noopener">पाउंस</a> इस माइक्रोब्लॉगिंग माध्यम में अतिरिक्त सुविधायें भी हैं। मैसेजिंग यानि संदेश भेजने पाने के अलावा प्रयोक्ता अपने परिचितों के साथ इसके द्वारा कड़ियाँ, फाईलें और इवेंट्स साझा कर सकते हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.pownce.com/" target="_blank" rel="noopener"><img loading="lazy" decoding="async" title="Pownce" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/pownce_logo.jpg" alt="Pownce" width="150" height="46" border="0" hspace="2" vspace="2" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td><a href="http://www.tumblr.com/" target="_blank" rel="noopener">टंबलर</a> यह बेहद सरल और कुशल माइक्रोब्लॉगिंग प्लैटफॉर्म है। इसके द्वारा भी ढेरों किस्म की चीज़ें, जैसे चित्र, उद्धरण, कड़ियाँ, गपशप और विडियो आदि प्रकाशित की जा सकती हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.tumblr.com/" target="_blank" rel="noopener"><img loading="lazy" decoding="async" title="Tumblr" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/tumblr-logo.gif" alt="Tumblr" width="127" height="36" border="0" hspace="2" vspace="2" /></a></td>
</tr>
<tr bgcolor="#f2ecec">
<td><a href="http://www.jaiku.com/" target="_blank" rel="noopener">जाईकू</a> इसे ट्विटर का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी माना जाता है। सुविधाओं के मामले में दोनों में काफी समानता है।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.jaiku.com/" target="_blank" rel="noopener"><img loading="lazy" decoding="async" title="Jaiku" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/jaiku.gif" alt="Jaiku" width="79" height="62" border="0" hspace="2" vspace="2" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td><a href="http://www.plurk.com/" target="_blank" rel="noopener">प्लर्क</a> इसमें भी ट्बलर जैसे अनेकों चीजें साझा करने की सुविधा है पर इसकी खास बात है इसका टाईमलाईन प्रारूप जो इसे बिल्कुल अनोखा बनाता है। प्लर्क में ट्विटर के फॉलोवर की जगह कर्मा प्वाइंट्स के ज़रिये लोकप्रियता मापी जाती है।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.plurk.com/" target="_blank" rel="noopener"><img loading="lazy" decoding="async" title="Plurk" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/plurk.png" alt="Plurk" width="130" height="58" border="0" hspace="2" vspace="2" /></a></td>
</tr>
<tr bgcolor="#f2ecec">
<td style="width: 70%; text-align: left;" align="justify"><a href="http://www.smsgupshup.com" target="_blank" rel="noopener">एसएमएस गपशप</a> यह वेबारू द्वारा निर्मित माइक्रोब्लॉगिंग प्लैटफार्म है जहाँ आप किसी समूह के सदस्य बनकर या अपना समूह बनाकर एसएमएस भेज व प्राप्त कर सकते हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.smsgupshup.com" target="_blank" rel="noopener"><img loading="lazy" decoding="async" title="SMS Gupshup" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/smsgupshup.gif" alt="SMS Gupshup" width="140" height="38" border="0" hspace="2" vspace="2" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 70%;"><a href="http://www.vakow.com" target="_blank" rel="noopener">वकाओ</a> एसएमएस गपशप जैसे ही सुविधा के साथ ही टैगिंग व श्वेत श्याम चित्र भेजने की सुविधा भी। वकाओ से ट्विटर पर भी संदेश भेजे जा सकते हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.vakow.com" target="_blank" rel="noopener"><img loading="lazy" decoding="async" title="Tumblr" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/vakow.gif" alt="Vakow" width="111" height="37" border="0" hspace="2" vspace="2" /></a></td>
</tr>
</tbody>
</table>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
</div>
<p class="note"><strong>छपते छपते</strong>: इस लेख को अंतिम रूप देते समय (बमार्फत <a title="Twitter Summize Deal confirmed" href="http://gigaom.com/2008/07/15/twitter-summize-deal-confirmed/" target="_blank" rel="noopener">ओम मलिक</a>) खबर पक्की हुई है कि ट्विटर ने अपनी ही पर आधारित खोज ईंजन <a href="http://www.summize.com">सम्माईज़</a> को खरीद लिया है। सौदे की कीमत 80 लाख डॉलर से अधिक आँकी जा रही है।</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>IDN करेंगे हिन्दी का नाम रोशन</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-nidhi/</link>
					<comments>http://www.nirantar.org/0708-nidhi/#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[वरुण अग्रवाल]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 Jul 2008 07:50:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[DNS]]></category>
		<category><![CDATA[IDN]]></category>
		<category><![CDATA[Punycode]]></category>
		<category><![CDATA[TLD]]></category>
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					<description><![CDATA[जब जालपृष्ठ हिन्दी में है तो भला डोमेन नाम हिन्दी में क्यों नहीं? <strong>अन्तरराष्ट्रीय डोमेन नाम (IDN)</strong> द्वारा ग़ैर-अंग्रेज़ी भाषी इंटरनेट प्रयोक्ताओं को इसका हल तो मिला ही है, भविष्य में संपूर्ण डोमेन नाम अपनी भाषा में लिख सकने के मार्ग भी प्रशस्त हो रहे हैं। पढ़िये आइडीएन के बारे में विस्तृत जानकारी देता <strong>वरुण अग्रवाल</strong> का लिखा, रमण कौल द्वारा अनूदित लेख।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><img loading="lazy" decoding="async" title="Nidhi" src="http://www.nirantar.org/images/stories/nidhi.gif" alt="Nidhi" width="135" height="140" align="right" border="0" hspace="5" vspace="5" /></p>
<div class="dropCap">इं</div>
<p>टरनेट हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन चुका है। हमें जब भी कोई जानकारी खोजनी हो, चाहे वो स्थानीय पीवीआर में कौन सी फिल्म चल रही है यह मालूम करना हो, या हाल की सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक के बारे में पता करना हो, हम बस उसे &#8220;गूगल&#8221; कर लेते हैं। यह हमारे जीवन का इतना महत्वपूर्ण अंग बन चुका है कि यदि इंटरनेट सेवा एक दिन के लिए भी ठप्प पड़ जाए तो हममें से अधिकांश अवसादग्रस्त हो जायें। पर यहाँ &#8220;हम&#8221; का तात्पर्य &#8211; &#8220;हम&#8221; भारतीयों से या &#8220;हम&#8221; अंग्रेज़ी पढ़े भारतीयों से है! जब देश में इंटरनेट के महत्व और विकास की बात होती है तो यही प्रश्न उठता है। हालाँकि विश्व के अंग्रेज़ी भाषियों में से एक बहुत बड़ी संख्या भारत में निवास करती है, फिर भी भारत की जनसंख्या के हिसाब से देखा जाए तो उन का प्रतिशत बहुत कम है।</p>
<p>इस समस्या को सुलझाने के लिए लोगों ने क्षेत्रीय भाषाओं में जालस्थल बनाने शुरू किए ताकि इंटरनेट अधिकाधिक भारतीयों तक पहुँचे। परंतु इस में एक अड़ंगा यह है कि जालस्थल तो क्षेत्रीय भाषाओं में है, पर प्रयोक्ता को जालस्थल का पता फिर भी अंग्रेज़ी के अक्षरों में ही याद रखना और टाइप करना पड़ता है, जो कोई खास आरामदेह बात तो है नहीं। इस समस्या का हल हो सकता है अन्तरराष्ट्रीयकृत डोमेन नाम यानि आइडीएन (IDN) द्वारा।</p>
<h1>आइडीएन, एक संक्षिप्त पृष्ठभूमि</h1>
<p>फिलहाल, इंटरनेट की कुछ तकनीकी कमियों के कारण, डोमेन के नाम केवल अंग्रेज़ी के सादे अक्षरों (प्लेन टेक्स्ट यानि ASCII या एस्की) में ही पंजीकृत किए जा सकते हैं (उदाहरणतः nirantar.org)। अन्तरराष्ट्रीय अक्षरों (उदाहरणतः उदाहरण.in जिसमें इस तरह के अक्षर हैं) को इंटरनेट की डोमेन नाम प्रणाली यानि डीएनएस (DNS) नहीं पहचान पाती, और इस कारण ये एक पंजीकृत नाम के रूप में डोमेन नाम रजिस्ट्री में नहीं रह सकते।</p>
<p>2003 में विकसित एक अन्तरराष्ट्रीय मानक &#8220;प्यूनीकोड&#8221; (Punycode) की मदद से ग़ैर-एस्की अक्षरों को ऐसे अक्षरों में परिवर्तित किया जा सकता है, जिन्हें डीएनएस समझ सके। इसके द्वारा ऐसी प्रक्रिया हासिल होती है जिससे ग़ैर-एस्की अक्षरों को डोमेन रजिस्ट्री और डीएनएस तो एस्की प्रारूप में ही देखता है, पर साधारण वेब प्रयोक्ता उसे मूल भाषा में देख पाता है। &#8220;प्यूनीकोड&#8221; ग़ैर-एस्की अक्षरों वाले शब्द को एक एस्की अक्षरमाला में अनूदित करता है, जिसे डोमेन नाम रजिस्ट्री में पंजीकृत किया जा सकता है और डीएनएस द्वारा समझा जा सकता है। अन्तरराष्ट्रीय डोमेन नामों को एस्की में परिवर्तित करने के लिए सर्वप्रथम इन अन्तरराष्ट्रीय अक्षरों को, अन्तरराष्ट्रीय रूप से अनुमोदित भाषा प्राधिकरण द्वारा विकसित, एक सारणी की मदद से एस्की अक्षरों से संबद्ध करना पड़ता है।</p>
<p>उदाहरण.in का ही उदाहरण लें तो द्वितीय स्तर डोमेन (.in से पहले का शब्द) को प्यूनीकोड परिवर्तक द्वारा एस्की अक्षरमाला में परिवर्तित किया जाता है। फिर इस नाम के उपसर्ग के रूप में (“xn-“) अक्षर जोड़ दिए जाते हैं, ताकि डीएनएस इसे आइडीएन के रूप में पहचान सके। तो इस तरह, अन्तरराष्ट्रीय डोमेन नाम उदाहरण.in का एस्की नाम xn-p1b6ci4b4b3a.in बनता है।</p>
<p style="align: center; text-align: center;"><img loading="lazy" decoding="async" title="Unicode to Punycode conversion" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/idn-to-punycode.jpg" alt="Unicode to Punycode conversion" width="490" height="226" align="middle" border="0" hspace="3" vspace="3" /></p>
<p><!-- Boxitem 1 starts--></p>
<div id="boxR" style="background: #F7F7F7;">
<h2>सुनहरा भविष्य भी</h2>
<p>जब जालपृष्ठ हिन्दी में है तो भला डोमेन नाम हिन्दी में क्यों नहीं? यह प्रश्न तो हम हिन्दी प्रेमियों के मन में सदा रहा ही है। देश में 4 करोड़ 10 लाख जाल प्रयोक्ता हैं और यह हमारी कुल आबादी का महज़ 4 प्रतिशत ही है। ज़ाहिर है कि प्रयोक्ताओं की यह संख्या तेज़ी से बढ़ रही है, पिछले साल ही यह बढ़त दर 25 फीसदी थी। स्पष्टतः अंग्रेजी का प्रभुत्व अब खत्म हो रहा है। <a href="http://www.eurekalert.org/features/kids/2004-02/aaft-wlw020805.php" target="_blank" rel="noopener">विशेषज्ञों का अनुमान</a> है कि 2050 तक अंग्रेज़ी का कद चीनी, हिन्दी व उर्दु के सामने बेहद छोटा रह जायेगा (ग्राफ देखें)।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" title="Rise of Hindi &amp; Urdu" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/language-rise-graph.jpg" alt="Rise of Hindi &amp; Urdu" width="230" height="151" align="middle" border="0" hspace="2" vspace="2" /></p>
<p>तो हिन्दी अब आहिस्ता आहिस्ता जाल पर कदम बढ़ा रही है। हमारे देश की कोडयुक्त ccTLD यानि .in ने पहले ढाढस बंधाई और फिर आइडीएन से डोमेन नाम अपनी भाषा में लिखने के मार्ग प्रशस्त हुये। अक्तुबर 2007 से समूचे डोमेन नाम जिसमें <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/TLD" target="_blank" rel="noopener">TLD</a>(जालपते में डॉट के बाद आने वाले शब्द जैसे कॉम, आर्ग, बिज़, इंफ़ो) भी शामिल है का हिन्दी व तमिल समेत 11 लिपियों में परीक्षण भी प्रारंभ हुये। हिन्दी के लिये यह पता <a href="http://उदाहरण.परीक्षा" target="_blank" rel="noopener">http://उदाहरण.परीक्षा</a> है। अन्य परीक्षण जालपते नीचे दिये चित्र में दिये हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" title="Example.test URLs" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/example-test-urls.jpg" alt="Example.test URLs" width="225" height="236" align="middle" border="0" hspace="2" vspace="2" /></p>
<p>जुलाई 2008 में संपन्न ICANN की बैठक में यह निर्णय भी आ गया है कि 2009 से नये जेनेरिक टॉप लेवल डोमेन यानि gTLD भी उपलब्ध होंगे और ये पूरी तरह गैर रोमन अक्षरों में लिखे जा सकेंगे। तो वो समय जल्द ही आने वाला है जब जालपते <a href="http://निरंतर.पत्रिका" target="_blank" rel="noopener">http://निरंतर.पत्रिका</a> या <a href="http://नुक्ताचीनी.चिट्ठा" target="_blank" rel="noopener">http://नुक्ताचीनी.चिट्ठा</a> जैसे पते दिखें।</p>
<p>आइडीएन जालपते फिलहाल तो .कॉम TLD के लिये ही उपलब्ध हैं और उसमें भी TLD रोमन लिपी में ही स्वीकार्य होता है। ध्यान दें कि अन्तर्राष्ट्रीय डोमेन नाम बुक कराते समय आपको भाषा भी चुननी पड़ती है जिसे डोमेन मिलने के बाद बदला नहीं जा सकता, दो लिपियों को मिलाकर भी नाम बनाना स्वीकृत नहीं है। फिलहाल सभी ब्राउज़र भी आइडीएन जालपते समझने में असमर्थ हैं। अगर आप इंटरनेट एक्सप्लोरर 7 या फायरफॉक्स 3 इस्तेमाल करते हैं तो <a href="http://www.देबाशीष.com" target="_blank" rel="noopener">http://www.देबाशीष.com</a> अथवा <a href="http://www.निरंतर.com" target="_blank" rel="noopener">http://www.निरंतर.com</a> पर जाने पर आप सही जालपते तक पहुंच जायेंगे। पर इंटरनेट एक्सप्लोरर 5 या 6 या फायरफॉक्स 2 के प्रयोक्ता ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि इनमें गैररोमन लिपी से प्यूनीकोड बनाने की क्षमता नहीं होती।</p>
<p>पर पुराने ब्राउज़र का प्रयोग आइडीएन जालपते के प्रयोग करने की राह में बाधक भला कैसे बनें। आप चाहें तो हिन्दी डोमेन नाम का प्यूनीकोड खुद ही निकाल लें, यह काम उन्नत ब्राउज़र खुद ही करते हैं पर आप <a href="http://mct.verisign-grs.com/index.shtml" target="_blank" rel="noopener">प्यूनीकोड कंवर्टर</a> जैसे जाल तंत्रांश से यह काम कर सकते हैं। अगर आप और भी उत्सुक हैं तो इस काम के लिये बने विशेष प्लगिन का इस्तेमाल कर सकते हैं, मसलन वेरिसाईन द्वारा बनाया <a href="http://www.idnnow.com/index.jsp" target="_blank" rel="noopener">आईनैव</a> नामक मुफ्त प्लगिन जिससे आप अपने ईमेल में भी आइडीएन जालपतों का प्रयोग कर सकेंगे। आइडीएन का समर्थन करने वाले विभिन्न ब्राउज़रों व तंत्रांशों की एक विस्तृत सूची <a href="http://www.verisign.com/information-services/naming-services/internationalized-domain-names/page_002201.html" target="_blank" rel="noopener">यहाँ दी गई है</a>।</p>
</div>
<p><!-- Boxitem 1 ends--></p>
<p><a href="http://www.afilias.info/biographies/ram-mohan" target="_blank" rel="noopener">राम मोहन</a>, जो एफिलियास के मुख्य तकनीक अधिकारी और उपाध्यक्ष हैं, बताते हैं, &#8220;यह परिवर्तन प्रक्रिया डोमेन पंजीकर्ताओं अथवा डोमेन विक्रेताओं द्वारा, जो प्यूनीकोड या &#8220;:xn-&#8221; प्रारूप में नाम तैयार करने हेतु इंटरनेट इंजीनियरी टास्क फोर्स (IETF) के नेम-प्रेप (Nameprep) और स्ट्रिंग-प्रेप (Stringprep) मानकों का प्रयोग करते हैं, पूरी की जाती है। ग़ैर-एस्की नामों को पंजीकृत करने के पूर्व उसे प्यूनीकोड में परिवर्तित करना आवश्यक है क्योंकि डोमेन रजिस्ट्री केवल एस्की अक्षरों को ही संजो पाती है और इस बात को सुनिश्चित करती है कि हर नाम अनूठा हो। इसके अतिरिक्त रजिस्ट्री अपने उत्तरदायित्व में हर डोमेन के लिए एक ज़ोन फाइल बना कर प्रकाशित करती है और ज़ोन फाइल ही वह डाइरेक्ट्री प्राधिकरण है जो अन्त में हर नाम को इंटरनेट पर खोज पाने में मदद करती है। रजिस्ट्री दरअसल हर नाम को प्यूनीकोड प्रारूप में आरक्षित करती है, न कि मूल प्रारूप में, और सामंजस्य प्रक्रिया के तहत आइडीएन समर्थित अनुप्रयोग प्रयोक्ता और रजिस्ट्री के बीच उपयुक्त अनुवाद के दायित्व का निर्वाह करते हैं।&#8221;</p>
<h1>आइडीएन के विकास में बाधाएँ</h1>
<p>आइडीएन की संभावनाएँ तो प्रबल हैं, पर अगले कदम पर आने वाली पेचीदगियाँ NIXI  और इस विकास प्रक्रिया से संबन्धित अन्य संस्थाओं के लिए खासी चुनौती पेश करती हैं। भारत में 24 भाषाएँ हैं और 12 लिपियाँ (शायद किसी भी अन्य देश से अधिक), जिस का अर्थ है विभिन्न भाषाओं में मिलते जुलते अक्षरों और लिपियों का प्रयोग।</p>
<p>डाइरेक्टी के अध्यक्ष और कार्यकारी अधिकारी <a href="http://bhavin.directi.com/about-me/" target="_blank" rel="noopener">भाविन तुराखिया</a> कहते हैं, &#8220;यह बुनियादी समस्या है और इससे अन्य समस्याएं भी जन्मी जो आइडीएन को अपनाने की राह में रोड़ा बने हुये हैं। ये समस्याएं केवल तकनीकी ही नहीं है, बल्कि इनमें नीति निर्धारण के मुद्दे भी शामिल हैं। पर फिर भी, आइडीएन अंगीकरण की ओर भारत की पहल और इस दिशा में अब तक किये कार्य द्वारा यह अंदाज़ा तो लग जाता है कि भारत इसमें कितना बड़ा सुअवसर देख रहा है। हालाँकि भारत की जनसंख्या 100 करोड़ से कुछ अधिक ही है, फिर भी केवल 12.5 करोड़ ही अंग्रेज़ी बोलते हैं। 30 करोड़ प्रयोक्ताओं वाली हिन्दी सब से अधिक प्रयुक्त भाषा है, और उर्दू बोलने वाले 13 करोड़ हैं, यह संख्या दुगनी हो जाती है अगर पड़ौसी देशों को भी गिना जाए। इसलिये यदि आइडीएन को प्रभावशाली ढंग से अपनाया जाता है, तो कुल इंटरनेट प्रयोक्ता आधार दुगनी या तिगुनी संख्या भी छू सकता है। पर इस क्षेत्र में अभी बहुत काम बाकी है।&#8221;</p>
<p>यूँ तो यह समस्या हर देश के लिए है, पर भारत के लिए यह समस्या कुछ ज़्यादा ही टेढ़ी है। चीन के साथ स्थिति की तुलना की जाए तो भारत के लिए कितना काम है, उस का पता चलता है। चीन में 160 करोड़ चीनी भाषी हैं, जो केवल दो ही लिपियाँ प्रयोग करते हैं, और उन में भी जापानी और कोरियाई भाषाओं से मिलते जुलते अक्षर भी हैं।</p>
<p>तुराखिया समझाते हैं, &#8220;इन देशों में विकास प्रयत्नों के परिणाम काफी तेज़ी से आए हैं क्योंकि उनकी पेचीदगियों हमारे जितनी अधिक नहीं है। इस का अर्थ यह भी हुआ कि उन भाषाओं में आनलाइन मसौदा कहीं ज़्यादा है। तिस पर इन देशों में इंटरनेट की पहुँच कहीं ज़्यादा है, हालाँकि आइडीएन भारत में इसी पहुँच को बढ़ाने की दिशा में एक कदम है। हमारी वर्तमान पहुँच केवल 5.3% है, जबकि चीन की 15.9% है और जापान की 68.7%।&#8221;</p>
<p>इंटरनेट एक्सप्लोरर 7.0 और फायरफाक्स 1.5 से आगे ब्राउज़र तो पहले ही आइडीएन का समर्थन करते हैं। समस्या यहाँ पहचान और समझ की नहीं है। भारत में पहले ही ऐसे जालपृष्ठ हैं जो हिन्दी, तमिल और अन्य भाषाओं में मसौदा उपलब्ध कराते हैं। इस के अतिरिक्त कई ईमेल भेजे जाते हैं, जिन में ग़ैर-एस्की अक्षर होते हैं।</p>
<p>मुख्य चुनौती यह है कि डोमेन नाम ही एस्की के परे नहीं जा पाए हैं, जिस के फलस्वरूप प्रयोक्ताओं को जालस्थल के मसौदे और पते के बीच भाषा बदलनी पड़ती है। &#8220;अब, जब कि इस परिवर्तन को क्रियान्वित करने की तकनीक उपलब्ध है, हम नीति संबन्धी मुद्दों पर काम कर रहे हैं। जब दोनों पूरे हो जाएँगे, तब प्रयोक्ताओं को पूरी तरह (या लगभग पूरी तरह) अपनी भाषा में संवाद करने का एक पूर्ण और सरल रास्ता मिल जाएगा।&#8221;, राम मोहन बताते है।</p>
<h1>आगे की राह</h1>
<p>मोबाइल उद्योग के साथ तुलना की जाए तो, उस की प्रयोक्ता संख्या इंटरनेट के मुकाबले तीन गुणा हैं। इस संख्या में तब्दीली लाने के लिए यह ज़रूरी है कि कुछ मुद्दों को सुलझाया जाए &#8211; जिनमें से एक इंटरनेट की उपलब्धि और कीमत से जुड़ा है। चूँकि दूरसंचार की मूल व्यवस्था इंटरनेट सेवा के मूल्य पर सीधा असर डालती है, यह ज़रूरी है कि सरकार पूरे देश में इसके विकास की राह आसान बनाए। आइडीएन पर केन्द्रित प्रयासों से काफी अपेक्षायें हैं और यह सही दिशा में उठाया गया कदम है।</p>
<p>आइडीएन इंटरनेट में लोकतंत्रीकरण लाने हेतु एक आवश्यक कारक है। तुराखिया कहते हैं &#8220;ट्रेडमार्क धारकों के लिए प्राथमिक पंजीकरण 2008 की प्रथम तिमाही में उपलब्ध होने की आशा है। पहले ही ICANN द्वारा 13 भाषाओं में परीक्षण नाम लागू किये गए हैं, जिनमें देवनागरी और तमिल लिपियाँ शामिल हैं। जहाँ तक आम तौर पर अपनाए जाने का प्रश्न है, उस में अभी देर लग सकती है, क्योंकि देश का अधिकतर भाग अभी इंटरनेट के इस्तेमाल से अछूता है, और जहाँ प्रयोग हो भी रहा है, वहाँ इस बात की मुश्किल से समझ है कि दूसरी भाषा में इसे कैसे प्रयोग किया जाए।&#8221;</p>
<p>मोहन कहते हैं, &#8220;हमारा विचार है कि इंटरनेट का विकास सीधा उस के प्रयोग से जुड़ा है। दूरसंचार तेज़ी से इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि आम आदमी को इसका रोज़मर्रा का इस्तेमाल दिखता है। मैं मानता हूँ कि NeGP (राष्ट्रीय अनु-प्रशासन योजना) जैसी परियोजनाएँ और सभी सरकारी सेवाओं को इंटरनेट पर उपलब्ध कराने के राज्य आधारित प्रयास आम आदमी को लाभ पहुँचाएँगे। इंटरनेट की पहुँच इसलिए भी कम है कि अधिकतर लोग इसे पी.सी. या लैपटॉप द्वारा प्रयोग की जाने वाली सेवा के रूप में देखते हैं।&#8221; इस स्थिति में नाटकीय परिवर्तन आने वाला है। अगली लहर आएगी भारत में मोबाइल फोनों पर इंटरनेट सेवा की और इससे मोबाइल फोन की बिक्री और इसके इस्तेमाल में अतिशय वृद्धि होगी।</p>
<p>भारत पहला ऐसा राष्ट्र बनने का सामर्थ्य रखता है, जो पी.सी. और लैपटॉपों पर आधारित &#8220;इंटरनेट 1.0 से&#8221;, मोबाइल फोनों पर आधारित &#8220;इंटरनेट 2.0&#8221; की ओर छलाँग लगाएगा।</p>
<p>चूँकि अधिकतर भारतीय अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं, आइडीएन का लागूकरण सकारात्मक कदम ही होगा, और यह तथ्य दूसरे कारकों के साथ मिल कर इंटरनेट को अपनाने में तेज़ी लाने में मदद करेगा। आशा है कि आइडीएन की आमद के साथ हमें इंटरनेट को केवल देश के अंग्रेज़ी भाषी लोगों से जोड़ कर देखना नहीं पड़ेगा।</p>
<blockquote><p>वरुण के एक्सप्रेस कंप्यूटर में प्रकाशित मूल लेख का अनुवाद किया <strong>रमण कौल</strong> ने। ग्राफिक्स व अतिरिक्त सामग्री: <strong>देबाशीष चक्रवर्ती</strong>। आधार चित्र इंटरनेट से साभार।</p></blockquote>
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		<item>
		<title>मनोचिकित्सा से फ़िल्म निर्देशन तक</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-samvaad/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[डॉ सुनील दीपक]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:37:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Direction]]></category>
		<category><![CDATA[Documentary]]></category>
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					<description><![CDATA[<strong>डॉ परवेज़ इमाम </strong>ने चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई पूरी कर मनोचिकित्सक का पेशा अपनाया पर अस्पताल की बजाय उनकी कर्मभूमि बनी वृतचित्र यानि डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों की दुनिया। टीवी कार्यक्रम टर्निंग प्वाईंट से शुरुवात कर उन्होंने अब तक अनेकों पुरस्कृत वृत्तचित्रों का निर्माण किया है। संवाद में पढ़ें परवेज़ के जीवन और अनुभव पर<strong> डॉ सुनील दीपक </strong>से हुई उनकी बातचीत।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: center;">
<p><img decoding="async" title="Parvez Imam" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/story-big-parvez.jpg" alt="Parvez Imam" border="0" hspace="3" vspace="2" /></p>
</div>
<div id="section-teaser" style="padding: 0px 5px 5px; margin-top: 0px;">
<p>डॉ. परवेज़ इमाम ने चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई पूरी करके मनोरोग चिकित्सक बनने का निश्चय किया था पर मानसिक रोगों के अस्पताल की बजाय उनकी कर्मभूमि बनी वृतचित्र यानि डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों की दुनिया। 1993 से अब तक वे अनेक विधाओं में प्रयोग कर चुके हैं। 30 सेकंड की विज्ञापन फिल्म से लेकर म्यूज़िक वीडियो तक। दूरदर्शन पर प्रसारित विज्ञान कार्यक्रम टर्निंग प्वाईंट के लिये वे काम कर चुके हैं, बाद में रिलायंस समूह के लिये बंगलौर में टेलीमेडिसिन और मेडिकल शिक्षा पर भी काम किया। वे पेशेवर संगीतकार भी हैं, अनेक फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों के लिये संगीत रचना कर चुके हैं। अनेक पत्रिकाओं के लिये लिखते भी हैं। उनकी वेबसाईट http://www.f20communications.com पर और अधिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है।</p>
<p>प्रस्तुत है फ़िल्म निर्माता के रूप में उनकी यात्रा और उनके जीवन के बारे में <a href="http://www.kalpana.it" target="_blank" rel="noopener"><strong>डॉ सुनील दीपक</strong></a> से हुई बातचीत के कुछ अंश। यह बातचीत 2007 के पूर्वार्ध की है।</p>
</div>
<p><strong> सुनीलः डॉ. परवेज आज आप जाने माने डॉक्युमेंट्री फ़िल्म बनाने के रूप में जाने जाते हैं। सबसे पहले अपने बचपन और परिवार के बारे में कुछ बतायें।</strong></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" title="Dr Parvez Imam" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/parvez_imam.jpg" alt="Dr Parvez Imam" width="237" height="233" align="left" border="0" hspace="5" vspace="5" /><strong>परवेज़ः</strong> मैं अलीगढ़ में बड़ा हुआ जो कि दिल्ली से करीब 120 किमी दूर है, अलीगढ़ विश्वविद्यालय के लिये पहचाना जाने वाला शहर है। सामान्य मध्यम वर्ग का परिवार था। बचपन में पढ़ाई में मैं अच्छा नहीं था। कक्षा में मेरा अधिकतर समय कक्षा के बाहर खड़े रहने में निकलता था क्योंकि सजा बहुत मिलती थी, और कक्षा के भीतर मैं अन्य विद्यार्थियों के पीछे छुपने की कोशिश करता रहता ताकि शिक्षकों के सामने न पड़ जाउं, खासकर गणित तथा इतिहास के शिक्षकों के सामने।</p>
<p>मेरे पिता अलीगढ़ विश्वविद्यलय में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर थे, अब रिटायर हो चुके हैं, और माँ तो हमेशा से गृहणी ही रही हैं। दोनों से ही मुझे, चाहे मैं कुछ भी करूँ, सदा स्वीकृति ही मिली। उन्होंने कभी मुझ पर जोर नहीं डाला कि मैं अधिक पढ़ूँ, वगैरह। छठी से नौंवीं कक्षा तक हर वर्ष गणित में मुझे स्पलीमैंट्री इम्तहान देना पड़ता था, तब भी उन्होंने कभी मुझ पर जोर नहीं डाला कि मैं अपना जीवन बदलूँ, मुझे उनसे सहारा ही मिला। इसका अर्थ यह होता कि माँ मेरी बहनों और छोटे भाई के साथ गर्मियों की छुट्टियों में कहीं जाती, और मैं पिता के साथ घर में रहता, पिता जी मुझे गणित पढ़ाते ताकि मैं सप्लीमैंट्री इम्तहान पास कर सकूँ। पर उन्होंने कभी मुझसे यह नहीं कहा कि खेलों में हिस्सा न लो, वगैरह।</p>
<p>मेरे पिता, अन्य बहुत सी बातों में असमान्य व्यक्ति रहे हैं। जैसे कि हमें घर में कभी धर्म की बातें नहीं बताई गईं। एक बार की बात याद है कि विद्यालय में सर्वेक्षण हो रहा था, शायद जनगणना की बात थी, और एक शिक्षक ने छात्रों को अपने धर्मों के हिसाब से हाथ उठाने के लिये कहा। मैं तब छह या सात साल का था। मैंने किसी भी धर्म के लिए हाथ ऊपर नहीं उठाया क्योंकि मुझे मालूम ही नहीं था कि मेरा धर्म क्या था। जब कुल छात्रों के और विभिन्न धर्मों के नम्बर आपस में नहीं मिले, तो उन्होंने दोबारा से वही सवाल किया। तीन बार गिनती की और तब मुझे उस शिक्षक ने पकड़ लिया, और गणना करने वालों को बोले कि मैं ही वह बेवकूफ हूँ जिसकी वजह से गलती हो रही थी और मुझसे चिल्ला कर बोले कि &#8220;&#8230;आप मुसलमान हो, आप को मालूम नहीं?&#8221; उस दिन शाम को घर वापस जा कर मैंनें और मुझसे एक साल छोटी बहन ने, पिता जी से पूछा कि यह मुसलमान वाली क्या बात है? वह बोले कि मेरे शिक्षक ने ठीक नहीं कहा था और सच में हमारा कोई धर्म नहीं है, बोले, जब आप लोग व्यस्क होगे तो आपको जो धर्म अच्छा लगे वही ले लेना। अलीगढ़ जैसे छोटे से शहर में यह बहुत बड़ी बात थी और मेरे कई मित्र मुझे छेड़ते थे कि मैं &#8220;नास्तिक&#8221; या &#8220;कम्यूनिस्ट&#8221; हूँ, पर मुझे इस बात पर गर्व होता था कि मैं अपना धर्म खुद चुन सकता हूँ।</p>
<p><strong> सुनीलः अगर आप पढ़ाई में कमज़ोर थे और पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता था तो आपने मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने की कैसे सोची और दाखिला मिला कैसे?</strong></p>
<p><strong>परवेज़ः</strong> हाईस्कूल में मेरी सेकंड डिविजन आई थी, पर साथ में मेरे पास खेलों के बहुत सारे सर्टीफिकेट थे। मेरी एक बड़ी कज़न थी, उन दिनों में उसका मुझ पर उसका बहुत प्रभाव था। वह जीवविज्ञान पढ़ाती थीं, और शाम को घर के काम करते करते वह मुझे पढ़ाती थीं। जैसे कि रसोई में चपाती बनाते बनाते, वह मुझसे जेनेटिक्स या एवोल्यूशन की बातें करती, और मैं रसोई के दरवाजे पर खड़ा हो कर ध्यान से सुनता। मेरी रुचि को देख कर वह अक्सर कहती, &#8220;आपको जीवविज्ञान अच्छा लगता है, आप परिवार के पहले डाक्टर बन सकते हो।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">पिताजी बोले, जब आप व्यस्क होंगे तो जो धर्म अच्छा लगे वही ले लेना। मेरे कई मित्र मुझे छेड़ते थे कि मैं &#8220;नास्तिक&#8221; या &#8220;कम्यूनिस्ट&#8221; हूँ, पर मुझे इस बात पर गर्व होता था कि मैं अपना धर्म खुद चुन सकता हूँ।</div>
<p>जब हाई स्कूल के परिणाम निकले उन्हीं दिनों में मेरी उस बहन का दुघर्टना में देहांत हो गया। उसको सिर में चोट लगी थी और वह कोमा में चली गईं थीं। उसी रात उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। मुझे लगा कि डाक्टरों ने उनका ठीक से उपचार नहीं किया और शायद अगर उसे जल्दी ठीक उपचार मिल जाता तो वह बच जातीं। उनकी मौत का मुझ पर बहुत असर पड़ा। कुछ महीने बाद जब मैं ग्याहरवीं कक्षा में दाखिला लेने गया तो मैंने जीवविज्ञान का विषय चुना। पिता जी को बहुत अच्ररज हुआ। पूछने लगे कि क्या मैंने सोच समझ कर यह निर्णय लिया था? हाँ, मैंने कहा। हालाँकि नम्बर कम थे पर साथ में खेल के सार्टिफिकेट होने की वजह से खिलाड़ी कोटे में मुझे दाखिला मिल गया।</p>
<p>उस वर्ष मैंने सब खेलकूद बंद कर दिया। साहित्यिक कार्यक्रम, बहस आदि में हिस्सा लेने लगा और ग्यारहवीं और बारहवीं के इम्तहानों में फर्स्ट डिविजन लाया। फ़िर मैंने मेडिकल कॉलिज में दाखिला लेने की तैयारी शुरु कर दी। बिल्कुल किताबी कीड़ा बन गया। माँ और पिता चिंतित हो गये। कई बार रात को पिता जी मेरे कमरे में आते और कहते कि अब पढ़ना बस करो, सो जाओ, पर उनके जाने के बाद में फ़िर से बत्ती जला लेता और पढ़ता रहता। मेडिकल कालिज में मुझे जब दाखिला मिला तो सभी लोग चकित रह गये।</p>
<p><strong> सुनीलः अच्छा, यह बतायें कि आपने मनोरोग चिकित्सक बनने की क्यों सोची और फ़िर अचानक चिकित्सक से फ़िल्म निर्देशक कैसे बन गये?</strong></p>
<p><strong>परवेज़ः</strong> पहले सोचता था कि मैं बच्चों का डाक्टर बनूँगा, पर जब मेडिकल कालेज के आखिरी साल में मेरी पोस्टिंग मनोरोग विभाग में हुई तो चिकित्सा क्षेत्र का नया रूप देखा। अन्य सभी विभागों में तो क्लिनिकल या सर्जिकल इलाज की बात होती थी। ये सब शारीरिक स्तर तक ही सीमित थे, जबकि मनोरोग चिकित्सा विचारों की दुनिया की बात करती थी, कि कैसे विचारों का असर भी बीमारी बनाने और उसका इलाज करने पर होता है, यह बात मुझे मुझे अच्छी लगा।</p>
<p>मानसिक रोग में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद पहले मैंने राँची के मनोरोग अस्पताल में काम करना शुरु किया। वहाँ मनोरोग पीड़ित लोगों का हाल देखा देखा तो विश्वास नहीं हुआ। यह भारत की सबसे प्रमुख मनोरोग संस्था मानी जाती थी और वहाँ रोगियों का जीवन इस तरह का था जिसमें कैदखाने की मानसिकता अपनी कठोर निर्ममता के साथ दिखती थी। मुझे धीरे धीरे समझ आने लगा कि मानसिक रोगों के लिए क्लिनिक की चाहरदिवारी में बंद करके केवल दवा देने के अलावा भी और कुछ किया जा सकता है। मुझे लगा कि मानसिक रोगों के बारे में बात करने की, दुनिया को इसके बारे में बताने की बहुत आवश्यकता है&#8230;कि इसमें समय लगेगा पर इससे मरीज़ों को, परिवार वालों को और अन्य उपचार कर्मियों को सहायता मिलेगी।</p>
<p>पर मुझे नहीं मालूम था कि यह कैसे किया जाये और मैं स्वयं क्या कर सकता हूँ? मैंने कुछ मरीज़ों की बीमारी के बारे में उनकी &#8220;जीवनकथा&#8221; लिखना शुरु कर दिया। यह कहानियाँ लिखना उस वातावरण में होने वाले मेरे अपने मानसिक तनाव को भी कम करता था। एक बार एक जीवनकथा को लिख कर मैंने उसे अंग्रेजी पत्रिका इलस्ट्रेटेड वीक्ली आफ इँडिया को भेजा तो उस पत्रिका के सम्पादक ने मुझे उत्तर में कहा कि वह उस तरह की अन्य कहानियाँ भी छापना चाहेंगे। उन्हीं दिनों में मैंने राँची मानसिक रोग अस्पताल को छोड़ने का निश्चय किया क्योंकि मुझे वहाँ रहना बहुत कठिन लग रहा था। लगता था कि वृहद समाज से बिल्कुल कट गया हूँ।</p>
<p>मैंने दिल्ली जाने का फैसला किया। मेरी छोटी बहन सेहबा तब दिल्ली में मास कम्यूनिकेशन का कोई कोर्स कर रही थी और मैं उसके ही मित्रों के साथ घूमने लगा। एक दिन किसी ने कहा कि लोग दूरदर्शन के लिए विज्ञान के विषय पर होने वाले टर्निंग प्वाईंट नामक कार्यक्रम के लिए वैज्ञानिक विषयों पर पटकथा लेखक की तलाश कर रहे हैं तो मैं उस कार्यक्रम के निर्देशक से मिलने गया। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं कार्यक्रम की पटकथा लिख सकता हूँ तो मैंनें हाँ कर दी। फ़िर और लोगों से बात कर, समझ कर, कि पटकथा कैसे लिखी जाती है मैंने &#8220;आनुवंशिकता और आनुवंशिकी&#8221; (Heredity and Genetics) विषय पर पटकथा लिख कर उन्हें दी।</p>
<p>उस निर्देशक को वह पटकथा बहुत पसंद आई। उसके आधार पर किसी ने एक फ़िल्म बनाई, पर मुझे वह फ़िल्म अच्छी नहीं लगी और मैंने ज़ोर डाला कि उसका दुबारा संपादन किया जाये। बाद में उस निर्देशक की बदली हो गयी और उन्होंने मुझे बुला कर कहा कि मैं उनके लिए विज्ञान संबधी अन्य पटकथाएँ लिखूँ। तब मुझे लगने लगा कि मैं फ़िल्म बनाने के क्षेत्र में जा सकता हूँ और साथ साथ अपना मनोचिकित्सक का काम भी कर सकता हूँ। इससे मुझे अपने अन्य शौक जैसे फोटोग्राफी, संगीत आदि भी पूरे करने का मौका मिलेगा।</p>
<p>तकरीबन एक साल बाद मैंने एक अन्य पटकथा लिखी पर मैंने उनसे कहा कि मैं स्वयं ही इस फ़िल्म का निर्देशन करना चाहता हूँ। वे कुछ हिचकिचाए पर मैंने उन्हें अपने नाटक, संगीत, फोटोग्राफी आदि शौक के बारे में बताया तो वह फ़िर मान गये। वह मेरी पहली फ़िल्म थी, चार मिनट की थी और विषय था &#8220;फोबिया&#8221; यानि डर।</p>
<p>निर्देशक श्री के पी मधु ने मुझे उस फ़िल्म का संपादन भी करने दिया। फ़िल्म संपादन कैसे करते हैं, यह उन्होंने मुझे सिखाया। बाद में हम दोनों मित्र बन गये और उन्होंने बताया कि वह स्वयं भी विज्ञान के स्नातक थे और जब फ़िल्म जगत में आये तो उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी थी।</p>
<p>यह निर्णय कि मैं मनोरोग चिकित्सा का क्षेत्र छोड़ दूँ और अपना सारा समय फ़िल्म बनाने को दूँ, काफी समय बाद आया। एक बार अपने अंकल से बात कर रहा था तो वह बोले कि मैं अगर अपना समय अपने फिल्म बनाने के शौक को दे दूँ और मनोरोग चिकित्सा को शौक बना लूं तो शायद अधिक खुश रह सकता हूँ। उनकी इस बात पर मैंने बहुत सोचा और तब यह निर्णय लिया। 31 जनवरी 1995 को मैंने अस्पताल का काम छोड़ दिया।</p>
<p><strong> सुनीलः यानि कि अब आप मनोरोग चिकित्सा का काम नहीं करते। अच्छा अब कुछ फ़िल्म जगत में अपनी सफलता के बारे में बतायें।</strong></p>
<p><strong>परवेज़ः</strong> मुझे सफलता मिली जब मैंने एक स्वतंत्र फ़िल्म बनाई &#8220;बिटवीन द लाइंस&#8221;। यह फ़िल्म भारत आने वाले बांग्लादेश के शरणार्थियों के बारे में थी। इस फ़िल्म को नयी दिल्ली वीडियो फ़िल्म फेस्टीवल में &#8220;सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म&#8221; का पुरस्कार भी मिला। फ़िल्म स्विटज़रलैंड में मिटिल फेस्टिवल में भी भेजी गयी जहाँ यह पुरस्कार नामांकन तक पहुँची। इस फ़िल्म को अन्य कई फेस्टिवल में भी दिखाया गया।</p>
<p>तब मुझमें आत्मविश्वास आ गया कि हाँ में अपनी फ़िल्मों से अपनी बात कह सकता हूँ। अब मैं सचमुच अपने विचारों पर फ़िल्म बना सकता हूँ। तब से बहुत सी फ़िल्में बनाई हैं, कुछ वर्ष पहले मैंने मानसिक रोगों पर भी फ़िल्में बनाई हैं। बहुत से फेस्टिवल में मेरी फ़िल्में गयीं हैं, कुछ पुरस्कार भी मिले हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">अच्छे फिल्मकार और कथाकार दोनों में दर्शक के मन की बढ़िया समझ होना ज़रूरी है। अपने दर्शकों की सही पहचान पर ही फ़िल्म का बजट, समय और निर्माण योजना निर्भर रहती है।</div>
<p><strong> सुनीलः क्या मनोरोग चिकित्सा का अनुभव फिल्म निर्माण में काम आता है?</strong></p>
<p><strong>परवेज़ः</strong> अच्छे फिल्मकार और कथाकार दोनों में दर्शक के मन की बढ़िया समझ होना ज़रूरी है। मेरा मानना है कि मनोविज्ञान की समझ और अनुभव ने मुझे यह जानने में मदद की है कि मैं अपनी फिल्म में कौन सी बात किस प्रकार कहूं ताकि दर्शक मेरी भावनायें पूर्णतः समझ सकें। अपने दर्शकों की सही पहचान पर ही फ़िल्म का बजट, समय और निर्माण योजना निर्भर रहती है। जहाँ तक फिल्म के विषय का सवाल है मैं हमेशा हर चीज़ को मानवीय दृष्टकोण से देखता हूँ, विषयों में लोग और उनके नज़रिये की तलाश रहती है। क्योंकि मेरा यकीन है कि पृथ्वी पर रहने वाली हर चीज़ जीवन से जुड़ी है।</p>
<p><strong>सुनीलः वृत्तचित्र निर्माण में नई तकनीक से क्या निर्माण के काम कुछ आसान हुये हैं?</strong></p>
<p><strong>परवेज़ः</strong> अच्छी फिल्म बनाने के लिये कोई शार्टकट नहीं हैं। मौलिक विचार होना ज़रूरी है। मुझे पता होना चाहिये कि क्या कहना है, क्यों और किसे कहना है। इसी हिस्से पर अब भी सबसे ज़्यादा समय लगता है। मेरे काम में कमोबेश सस्ती और आसान तकनाजी का असर ज्यादा होता है क्योंकि मैं इनमें प्रयोग कर सकता हूं। इनसे मुझे अपने किरदारों से समझ बढ़ाने और नज़दीक जाने में भी आसानी होती है क्योंकि ये बड़े पैरों वाले ट्राईपॉड पर सवार भारी भरकम काले कैमरों जैसे डरावने नहीं होते। चुंकि मैंने फिल्म निर्माण में कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की है अतः प्रयोग करता रहता हूँ।</p>
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		<title>व्यतीत</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-kahani/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[डॉ वीणा  सिन्हा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:35:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Calcutta]]></category>
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					<description><![CDATA[संस्कृतियों, लिबासों और भाषाओं के कॉकटेल कलकत्ता में नीता के सामने श्यामल है, उसका वर्तमान। श्यामल पहली बार आया है यहाँ, पर नीता का व्यतीत अतीत उसे साल रहा है। वह कलकत्ता को भूल जाना चाहती है। वातायन में पढ़िये 1963 में मनोरमा पत्रिका में प्रकाशित <strong>वीणा सिन्हा</strong> की स्त्री के अंतर्दंद्व पर लिखी कहानी जो आज भी सामयिक लगती है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><center><img loading="lazy" decoding="async" title="Kolkata" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/kolkata.jpg" alt="Kolkata" width="490" height="296" align="top" border="0" hspace="3" vspace="4" /></center></p>
<div class="dropCap">नी</div>
<p>ता, जो व्यतीत है, दोहराई जा रही है रात और दिन में। श्यामल उसके लिये एक सीमा है जिसके बाद सब गैर और अनैतिक है। दक्षिणेश्वर, बेलूर, काली माँ का मंदिर, विक्टोरिया मेमोरियल, ज़ू और म्यूज़ियम में इतिहास जीवित है। श्यामल इतिहास के पृष्ठों से गुज़र रहा है। नीता इन जगहों की धूल में अपना इतिहास खोज रही है जो श्यामल से पहले बीत गया है, जहाँ नीता अव्यतीत है।</p>
<p>अतीत के पत्थर पर खुदी दो मूर्तियाँ &#8211; पुरुष और नारी &#8211; जो मिलते मिलते जड़ हो गये सदा सदा के लिये। बारिश से नहाई सड़क पर तेज़ी से फ़िसलती हुई अनगिनत गाड़ियाँ, व्यस्त चेहरों का प्रवाह, झिझका हुआ अँधेरा, बेशुमार जलते हुये लट्टुओं की हँसी, सब हल्की फ़ुहारों से गीले। और नीता, सड़क के धुँधले आईने में इनकी भागती हुई प्रतिछाया देखती है। यह सड़क जो समय के जंगल से गुजरती आ रही है, अतीत के पहाड़ को काटती हुई वर्तमान के समतल मैदान में।</p>
<p>वक्त नक्शा बदल देता है, फ़ंडामेन्टल्स हर हालत में जीवित रहते हैं, जो शाश्वत हैं &#8211; स्थान और काल सभ्यता और संस्कृति से बिलकुल अछूते &#8211; एक कुँवारी लड़की की तरह। कुछ ख्यालों, व्यक्तियों और घटनाओं में वक्त कैद हो जाता है। नीता आज अपने मन के द्वार पर किन्ही बिसरे हुये ख्यालों की दस्तक सुन रही है जो एक व्यक्ति और अनेक घटनाओं को जगा गई है। अनेक घटनाएँ और अनेक ख्याल जिसमें एक व्यक्ति जीवित है, ऊँची इमारतों को चूमने वाली किरणों की तरह और उस पर नृत्य करती हुई हवा की तरह।</p>
<div id="pullQuoteR">शहर जी रहा है, गीत से स्पंदित है, पल भर का विश्राम नहीं। किसी शहर को देखने और समझने के लिये पैदल चलना आवश्यक है कि आँखें थक जायें। टैक्सी से भागते हुये शहर को न हम आँखों से पकड़ सकते हैं न मन से।</div>
<p>शहर जी रहा है, गीत से स्पंदित है, पल भर का विश्राम नहीं। श्यामल गति को पकड़ रहा है। नीता पीछे छूट जाती है। वह मुड़ मुड़ कर गुज़रे वक्त के पास रह जाती है। लाल पीले, हरे नीले रिबनों की तितलियाँ, जीन्स, स्कर्ट, शलवार, दुपट्टों और साड़ियों की इन्द्रधनुषी रंगिनियों की परेड, सागर और घटाओं को मिलाने वाला संगीत, झरती हुई बूँदों की सिम्फ़नी और आत्म विस्मृति का अनंत सागर जो उन दोनों पर लहरा रहा है। चीनी, ईरानी, इंग्लिश और भारतीय होटलों और रेस्त्रांओं में विभिन्न संस्कृतियों, लिबासों और भाषाओं का कॉकटेल, यह कलकत्ता है, एक कॉस्मोपोलिटन शहर, जहाँ संस्कृतियाँ एक दूसरे को छूती हैं, टकराती हैं और एक दूसरे पर असर डालती हैं।</p>
<p>अब वे दोनों चौरंगी के सायादार फ़ुटपाथ पर चल रहे हैं। नीता बेहद थक गई है। श्यामल ताज़ा और चुस्त हैं। उसका कहना है, &#8220;किसी शहर को देखने और समझने के लिये पैदल चलना आवश्यक है कि आँखें थक जायें। टैक्सी से भागते हुये शहर को न हम आँखों से पकड़ सकते हैं न मन से।&#8221;</p>
<p>नीता की नज़र श्यामल पर है। श्यामल के घुँघराले बालों में बारिश की बून्दें मरकरी की उजली रौशनी में मोतियों सी चमक रही है। सस्ते बैगों, कंघियों, फ़ाउन्टेन पेनों और व्यवहार में आने वाली ऐसी अन्य छोटी चीज़ों के ढेर फ़ुटपाथ के दोनों बगल लगे हैं। बड़े बड़े फ़ूलों के स्कर्ट में एक जान्डिस सी पीली लड़की श्यामल को घेर रही है। उसके हाथ में फ़ाउन्टेनपेनों से भरा एक थैला है। इस हुजूम में कौन किसके साथ चल रहा है, समझना मुश्किल है। या तो सब साथ हैं या सब अकेले। श्यामल को उसने अकेला समझा है। वह श्यामल के हाथ में एक पेन थमा देती है। वह बहुत धीरे धीरे कुछ अँग्रेज़ी और बांगला में कुछ कह रही है जो शायद पेनों की बात नहीं है। नीता कुछ आगे श्यामल के लिये ठहरी है। वह उस लड़की को समझने की कोशिश कर रही है। लिबास और भाषा से नहीं जाना जा सकता कि वह किस देश की है, चेहरा भी शुद्ध मंगोल नहीं है। देश चाहे कोई भी हो पर भूख है जो काल और देश को नहीं बाँधती। श्यामल मुस्कुराता हुआ नीता के पास लौट आता है।</p>
<p>&#8220;नीता, पेन बेचने वाली लड़्की को देख रही हो न? पोशाक और बोलचाल से कितनी सभ्य लग रही है। मैंने बड़ी मुश्किल से पिंड छुड़ाया है। वह एक गलत तरह की लड़की है&#8221;।</p>
<p>&#8220;आपने पेन खरीदा?&#8221;</p>
<p>&#8220;वह पेन कहाँ बेच रही थी। उसका व्यापार पेनों का नहीं शरीर का है। वह चंद सिक्कों पर बिक सकती है किसी भी अदना चीज़ की तरह। वह मेरे या किसी के भी अकेलेपन को दूर कर सकती है, एक रात के लिये ही सही।&#8221;</p>
<p>ग्रैन्ड होटल आ गया था। वे दोनो&#x200d; वहाँ ठहरे हैं। बड़ा सा डाईनिंग हॉल, सुर्ख गुलगुला गलीचा, पीतल के चंद गमलों में कैद बहार, हर मेज़ पर सर उठाये सफ़ेद नैपकिनों के बगूले। प्लेटों और चम्मचों, काँटों और छुरियों की ऑरकेस्ट्रा के बीच डूबे हुये नीता और श्यामल और युनिफ़ॉर्म में मुस्तैद बओरे जो हर क्षण हुक्म की तामीली को प्रस्तुत हैं।</p>
<p>नीता का ध्यान खाने में कम है। उसकी निगाह हर मेज़ को छू रही है। एक मेज़ अभी खाली है। वह उस लड़की का इंतज़ार कर रही है जिसको वह लगातार तीन दिनों से देख रही है, जिसके गालों पर सुर्ख गुलाब की आभा रहती है और जिसकी ऐंठी हुई पिपनियों पर हँसी डोलती रहती है, जिसकी हर अदा अनमनी नज़रों को भी ठहरा लेती है और जिसके साथ कीमती सूट और बो में एक स्मार्ट लड़का रहता है। शायद उनका एन्गेज़मेंट हो गया है, शायद कोर्टशिप का स्टेज हो। खाने में तल्लीन श्यामल नीता को भला लगता है बिलकुल शिशु की तरह सरल और निश्छल। वह उसे माँ की ममता से देखती है।</p>
<p>खाना समाप्त कर वे दोनों उठ रहे हैं। वह लड़की आ रही है, रुक रुक कर चलती हवा की तरह। लड़का आज उसके साथ नहीं है। आज उसकी अदा में बिजली की चपलता नहीं है। चेहरे पर डूबती हुई शाम की खामोशी है और उजड़े हुये बाग की वीरानी। ठहरी हुई हवा की तरह वह कुर्सी पर स्थिर हो जाती है। नीता और श्यामल अपने कमरे में वापस आ जाते हैं। उस लड़की की उदासी नीता को छू गई है। उसे अजय की याद आती है और उस बंगालन लड़की की, जो अब आम रास्ते की तरह है जिस पर जो चाहे गुज़र जाये बेझिझक। ग्रैन्ड होटल, ये कमरा, नीता पर श्यामल नहीं अजय, दो साल पहले का कलकत्ता। अतीत दुहराया जा रहा है वर्तमान में। अजय के साथ वह दक्षिणेश्वर गई थी। अजय ने कहा था, &#8220;नीता, कलकत्ता मैं कई बार आया हूँ, दक्षिणेश्वर देखने की साध लेकर लौट जाता रहा हूँ। दक्षिणेश्वर देखने की चाह जैसे युग युग से मेरे अन्तर्मन में उमड़ती रही है, आज शायद तुम्हारे पुण्य से यह इच्छा पूरी हो सकी है।&#8221;</p>
<p>नीता पुलकित थी। आज मन मोरनी की तरह नृत्यमगन था। अजय परमहंस के कमरे के सामने भाव मग्न आत्मविभोर खड़े थे। नीता देख रही थी, पल भर के सन्यास से प्रभावित अजय को।</p>
<p>नीता को महसूस हुआ, प्रेम, सपने और अभिलाषायें विराग से धुलती जा रही हैं, और अजय पत्थर की मूर्ति की तरह जड़ थे। सिर्फ़ आँखों में गति थी, आँखें जो भक्ति सागर में तैर रही थीं। नीता को एहसास हुआ, अजय दूर बहुत दूर चले गये हैं और वह बिलकुल असहाय और अकेली रह गई है।</p>
<p>नीता ने दो एक बार उन्हें पुकारा पर वे ख्यालों की घाटी में इस तरह खो गये थे जैसे बाह्य दुनिया से संबंध के हर तार फ़्यूज़ हो गये हों। एक मुग्ध भाव उनकी आँखों में तैर रहा रहा था। नीता ने फ़िर उन्हें लगभग झँझोड दिया तो उन्हे चेतना हुई। चौंक कर बोले, &#8220;नीता मेरा तो जी चाहता है कि यहीं इस पवित्र धरती पर, जिंदगी के शेष दिन गुज़ार दूँ। कितनी मोहक और रमणीक जगह है, गंगा के पावन तीर पर दक्षिणेश्वर, एक पूर्ण विकसित कमल की तरह और उस तीर पर चन्दन की मीठी खुशबू की तरह बिखरा हुआ बेलूर मठ!&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">अजय सोचता रहा, क्या था परमहंस में? जिन्होंने अनगिनत पुरुष नारियों के सर झुका दिये अपने कदमों में। और नीता सोच रही थी, परमहंस की पत्नी शारदा देवी की बात जो अपने पति के सन्यास को खुशी खुशी झेल गई।</div>
<p>नीता को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। वह बेमन ही बारह शिवों के बीच एक ग्रह की तरह परिक्रमा करती रही और हर शिव में उसे एक ही चेहरा नज़र आ रहा था, अजय का। वे दोनों कुछ देर गंगा तीर पर बैठे रहे। फ़ूल, सिंदूर, बेल पत्र, धूप और चंदन के गंध से आच्छादित वातावरण और श्रद्धा से नतमस्तक अनगिनत पुरुष नारियाँ। अजय सोचता रहा, क्या था परमहंस में? जिन्होंने अनगिनत पुरुष नारियों के सर झुका दिये अपने कदमों में। और नीता सोच रही थी, परमहंस की पत्नी शारदा देवी की बात जो अपने पति के सन्यास को खुशी खुशी झेल गई। नीता अजय के साथ बेलूर और दक्षिणेश्वर में बिखरे छोटे बड़े मंदिरों में घूमती रही।</p>
<p>उस शाम जब नीता और अजय होटल वापस आये तो नीता बहुत थक गई थी अपने मन से। उसे बराबर यही लगता रहा कि अजय अपने आप में खूब उत्फुल्ल है और नीता से उनका कोई लगाव नहीं है। नीता की उदासी अजय की प्रसन्नता के वाटरप्रूफ पर फिसल फिसल जा रही थी। वे कमल के पत्ते की तरह अप्रभावित थे। कपड़ा बदलने से बिस्तर पर आने तक की क्रियाओं में वे बराबर रामकृष्ण के एक प्रिय भजन को गुनगुनाते रहे ..&#8221;मन चल निज निकेतन&#8221;। नीता कटी हुई शाख की तरह बिस्तरे पर गिर गई। अजय ने नीता को बड़े प्यार से अपनी बाँहों में बाँध लिया।</p>
<p>&#8220;आज मैं बहुत खुश हूँ। जानती हो नीता, दक्षिणेश्वर में मैंने अपने लिये क्या माँगा है, क्या कामना की है?&#8221;</p>
<p>&#8220;सन्यास की कामना की होगी&#8221;</p>
<p>&#8220;धत! तुम बिलकुल नहीं समझ सकीं। मैंने तुम्हे माँगा है। तुम कहती हो न नीता, कि छिपकर कलकत्ता आना, फिर पति पत्नी की हैसियत से होटल में ठहरना। तरह तरह के बहाने और झूठी बातें अंतरमन को मान्य नहीं होतीं। पर एक बड़े सत्य की रक्षा के लिये अनगिनत झूठ क्षम्य हैं। मैंने तो यही जाना है। क्या यह सच नहीं कि हम दोनों एक दूसरे को संसार की किसी भी चीज़ से बढ़ कर प्यार करते हैं? नीता, तुमने भी कोई वर शिव से माँगा? मैं तो ऐसा भाव विह्वल हो गया था कि एक क्षण के लिये सबकुछ भूल गया। सच कहता हूँ, तुम्हें भी भूल गया था।&#8221;</p>
<p>&#8220;जानती हूँ। आपका वह एक क्षण मेरे लिये अनगिनत सदियाँ थीं जिनमें मैं असहाय, अकेली भटक रही थी। आप ही मेरे शिव हैं। मेरा अंतर्मन क्या आपसे छिपा है।&#8221;</p>
<p>अजय नीता की प्यार भरी बातों को सुनते रहे अमर संगीत की तरह और देखते रहे मुग्ध होकर ताजमहल की तरह।</p>
<p>&#8220;लेकिन नीता, मैंने जान लिया है कि मेरे मन के किसी कोने में सन्यास छिपा बैठा है जो एक दिन मेरे भोगी और लोभी मन को जीत सकेगा। एक ऊँचाई पर भोग और योग के बीच की विभाजक रेखा मिट जाती है और दोनों एकाकार हो जाते हैं सम्पूर्ण में। कोणार्क के मंदिर पर पुरुष नारी के सम्भोग के अनगिनत आसन धर्म की नज़र में अश्लील नहीं हैं। धर्म की ऊँचाई पर नैतिक अनैतिक के भेद का अंत हो जाता है। अंतर सिर्फ देखने का है।</p>
<p>&#8220;तुम पर मुझे अगाध विश्वास है नीता। एक राज़ जो मेरे सीने में नज़रबंद है उसे तुम तक पहुँचा देना चाहता हूँ। मुझे भरोसा है कि तुम मुझे हर रूप, हर स्थिति में इसी तरह प्यार करती रहोगी।&#8221;</p>
<p>और अजय अपने अतीत के बखिया को उधेड़ने लगे&#8230;..</p>
<p>&#8220;तब मैं कोई अठारह उन्नीस साल का रहा होउँगा। पढ़ाई के सिलसिले में मैं एक बंगाली परिवार में पेईंग गेस्ट होकर रहने लगा। सारा परिवार मुझ पर खास तौर से मेहरबान था। मकान मालकिन की कई लड़कियाँ थीं। सभी ने लवमैरिज किया था। एक मँझली लड़की को छोड़कर जो पता नहीं अब तक क्यों अविवाहित थी। शायद उसे कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिला था। वह एक अत्यंत भावुक किस्म की, चुप सी लड़की थी जिसका दिल शीशे की तरह नाज़ुक और कमज़ोर था। उसकी बड़ी बड़ी आँखों में एक अजीब सी उदासी थिरकती थी। उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व में दो आँखें ही महत्त्वपूर्ण थीं, जिन्होंने मुझे सबसे अधिक आकर्षित किया। धीरे धीरे वह मुझसे खुलती गई और मैंने उसके तन मन के सारे बँधन खोल दिये। तुम्हें अपनी समस्त चेतना से छू कर कहता हूँ कि नीता, न तब मुझे उससे प्यार था न अब। महज एक उत्सुकता थी आविष्कार की। पता नहीं उसने किस भरोसे पर अपना सब कुछ लुट जाने दिया था। शायद वह उस बँधन का इंतज़ार कर रही थी जिसमें मैं बँध पाता।&#8221;</p>
<p>&#8220;और एक दिन उसने बतलाया कि वह माँ बनने वाली है। मैं घबरा गया। दरअसल अंजाम मैंने सोचा ही न था। उसे मैंने किसी डॉक्टर से सलाह लेने की बात समझाई पर वह उसके लिये एकदम राजी न थी। पूरी रात को वह आँसुओं से भिगोती रही। वह जो चाहती थी उसके लिये मेरे मन में हिम्मत न थी। बात उसके परिवार पर खुल गई। उसके पिता डरा धमका कर मुझे शादी के लिये बाध्य करना चाहते थे। पर उस आत्माभिमानी ने सबको चुप करा दिया। मैंने उन लोगों का घर छोड़ दिया। कुछ दिनों के बाद मुझे मालूम हुआ कि उसके पिता ने उसको भी घर से निकाल दिया है। अब वह कलकत्ते के टेलीफोन एक्सचेंज़ में काम करती है और अपना तथा अपने बच्चे की परवरिश करती है। मुझे उससे सहानुभूति थी। मैं अपनी भूल महसूस करता था। इसलिये कई बार मैंने रुपये पैसों से मदद करनी चाही थी पर हर बार उसने मनीऑर्डर लौटा दिया। कुछ दिन पहले सुना अब उसने इज़्ज़त की नौकरी छोड़ दी है और किसी न किसी मालदार व्यक्ति के साथ घूमा करती है। अब मेरे मन में उसके लिये घृणा के सिवा कुछ नहीं है, सिर्फ उस लड़के की बात सोचता हूँ। उसके प्रति एक अजब खिंचाव का एहसास मुझे होता है। वह जो किसी को अपना पिता नहीं पुकार सकता, करीब दस साल का होगा। उसे देखने की इच्छा कभी कभी प्रबल हो उठती है पर मैं उस इच्छा को कुचल देता हूँ।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">नीता सँभल न गई होती तो उसके इर्दगिर्द पड़ी बाँहों के नाग उसे डँस लेते। रामकृष्ण से प्रभावित होने की बात, सुहाने सपने और अनगिनत वायदे सब हवा महल की तरह विलीन हो गये। अजय के चेहरे पर एक नकाब था जो उतर गया। वह मामूली कमज़ोर पुरुष ही थे जो वासना की ज्वाला में अपने सिद्धांत, अपने आदर्श होम कर देता है।</div>
<p>नीता अजय की बाँहों के घेरे से मुक्त हो गई। उसे ऐसा लगा था कि उस घेरे में उसका दम घुट जायेगा। वह ठीक समय पर सँभल नहीं गई होती तो उसके इर्दगिर्द पड़ी बाँहों के नाग उसे डँस लेते और वह उस ज़हर में तड़पती रहती सारा जीवन। सन्यास की बात, रामकृष्ण से प्रभावित होने की बात, सुहाने सपने और अनगिनत वायदे सब हवा महल की तरह विलीन हो गये। उसे लगा कि अजय के चेहरे पर एक नकाब था जो उतर गया। अजय जो नीता को असाधारण लगते थे और जिनको वह प्रेम से ज़्यादा श्रद्धा और इज़्ज़त करती थी ..अब नीता की नज़र में किसी भी मामूली कमज़ोर पुरुष की तरह थे जो वासना की ज्वाला में अपने सिद्धांत, अपने आदर्श होम कर देता है।</p>
<p>सारी रात नीता तनी रही, अजय उसे झुकाते रहे ..पर नीता थी कि टूट सकती थी, झुक नहीं सकती थी।</p>
<p>&#8220;नीता क्या तुम मुझे मेरे दोषों के साथ स्वीकार नहीं कर सकतीं? प्रेम जीवन में एक बार किया जाता है और वह मैंने तुमसे किया है, विश्वास करो। वह लड़की तुम्हें मिले तो पूछना कि क्या मैंने उसे कभी प्रेम का आश्वासन दिया था? धोखा मैंने उसे दिया नहीं और न मैंने उससे कोई वायदा ही किया।&#8221;</p>
<p>नीता खामोश थी। उसे लग रहा था वो नीता नहीं है, बंगालन लड़की है और ये सारी बातें अजय उससे ही कह रहा हो। उसे अजय से कुछ कहना नहीं था।</p>
<p>&#8220;नीता क्या मेरे सन्यास का वक्त आ गया है?&#8221;</p>
<p>नीता ने सोचा ये सारी बातें न जाने कितनी बार, कितनों के सामने की गई होंगी और आगे कही जायेंगी। दूसरी सुबह वह कलकत्ता से अकेली ही लौट आई थी।</p>
<p>दो साल बाद फिर कलकत्ता आई है श्यामल के साथ। श्यामल पहली बार आया है और नीता जो एक बार कलकत्ता देख चुकी है उस कलकत्ता को भूल जाना चाहती है।</p>
<p>खिड़की के शीशे पर बून्दों का नृत्य खत्म हो चुका है। घटायें जो आखिरी बून्द तक बरस चुकी हैं&#8230;अब खामोश हैं। श्यामल के हाथ में सिगरेट है। नीता जानती है आखिरी कश के बाद श्यामल कुछ कहेगा। और श्यामल ख्यालों के घाटी में भटकती नीता को छेड़ता नहीं। वह धैर्य से इंतज़ार करता है।</p>
<p>&#8220;नीता तुम कभी कभी मूडी क्यों हो जाती हो? क्या तुम्हें कलकत्ता आकर्षक नहीं लगा?&#8221;</p>
<p>&#8220;हाँ श्यामल&#8221;, और नीता श्यामल की बाँहों के घेरे में समा गई। इन बाँहों के घेरे में उसे कितनी शांति मिलती है। अब उसे कुछ सोचना नहीं है। व्यतीत को वह स्पर्श नहीं करेगी। आज उसके सामने श्यामल है जो उसका वर्तमान है &#8230;श्यामल जो उसके लिये एक सीमा है जिसके आगे सब गैर और अनैतिक।</p>
<p>&#8220;नीता, कल हम कलकत्ता छोड़ देंगे। मैं जानता हूँ कलकत्ता तुम्हें अच्छा नहीं लगा। हम कहीं और चलेंगे।&#8221; और प्यार से वह नीता को थपथपाता रहा।</p>
<p>आँधी की तरह एक ख्याल नीता के मन में आता है और उड़ जाता है कि अजय की मंजिल कहीं वही तो न थी। शायद अजय अब तक भटक रहा हो ..भटकता रहेगा ज़िन्दगी भर?</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>अमृता इमरोज़: रूहानी रिश्तों की बयानी</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-samiksha-amrita-imroz/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[रविशंकर श्रीवास्तव]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:33:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Amrita Pritam]]></category>
		<category><![CDATA[Imroz]]></category>
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					<description><![CDATA[<strong>उमा त्रिलोक</strong> ने अपनी किताब में इमरोज़ और अमृता की रूहानी मोहब्बत के जज़्बे को तो खूबसूरती से अभिव्यक्त किया ही है, साथ ही अमृता प्रीतम के जीवन के आखिरी लम्हों को भी अपनी कलम से बख़ूबी बटोरा है। पढ़िये पुस्तक अमृता इमरोज़ की <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> व <strong>रंजना भाटिया</strong> द्वारा समीक्षायें।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div id="boxL" style="background: #ffffff;">
<p align="center"><img decoding="async" title="Amrita Imroz" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/Amrita-Imroz-Book-Details.jpg" alt="Amrita Imroz" align="middle" border="0" hspace="2" vspace="2" /></p>
</div>
<div class="dropCap">ज</div>
<p>ब-जब भी दो विलक्षण प्रेमियों की बातें लिखी जाती हैं, तो आख्यान में एक अलग तरह का आवेग पाठक के मन में आ ही जाता है। उमा त्रिलोक की संस्मरणात्मक किताब अमृता इमरोज़ भी कुछ ऐसी ही है। इस किताब को पढ़ते हुए पाठक प्रेम और प्यार के दिव्य प्रकाश को अनुभव सा करने लगता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" style="margin: 20px;" title="Book Review" src="http://www.nirantar.org/images/stories/vaatayan_samiksha.gif" alt="Book Review" width="135" height="140" align="right" border="0" />उमा ने अमृता से अपने सान्निध्य के बारे में इस पुस्तक में अति विस्तार से लिखा है &#8211; कैसे उनके मन में अमृता से मिलने की इच्छा हुई, कैसे वे उनसे पहली दफ़ा मिलीं, और फिर कैसे उनसे नियमित, निरंतर मिलते रहने का सिलसिला शुरू हुआ। पुस्तक में उन्होंने अमृता &#8211; इमरोज़ के प्यार, उनके सरल, सुलझे व्यक्तित्व का तरतीबवार वर्णन किया है। एक अंश &#8211;</p>
<blockquote><p>एक बार मैंने इमरोज़ जी से पूछा, “आप जानते थे कि अमृता जी साहिर को प्यार करती थीं और फिर साजिद पर भी स्नेह रखती थीं। आपको कैसा लगता था?”</p>
<p>मेरे इस सवाल पर इमरोज़ जोर से हँसे और बोले, “मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ। एक बार अमृता ने मुझसे कहा कि अगर वह साहिर को पा लेतीं तो मैं उसे नहीं मिलता। तुम्हें मालूम है, मैंने क्या कहा? मैंने कहा, ‘तुम मुझे तो जरूर ही मिलतीं, चाहे मुझे तुम्हें साहिर के घर से निकालकर ही क्यों न लाना पड़ता।’ जब हम किसी को प्यार करते हैं तो रास्ते की मुश्किलों को नहीं गिनते।” थोड़ी देर बाद कुछ सोचते हुए उन्होंने अपने अनोखे अंदाज में हौले से कहा, “तुम्हें पता है, जब मैं मुम्बई जा रहा था तब मुझे ही अमृता ने अपनी किताब साहिर को देने के लिए दी थी और मैं खुशी खुशी ले गया था”</p>
<p>फिर कुछ ठहरकर, कुछ सोचते हुए इमरोज़ ने कहा, “मुझे मालूम था अमृता साहिर को कितना चाहती थी, लेकिन मुझे यह भी बख़ूबी मालूम था कि मैं अमृता को कितना चाहता था।” <em>(पृष्ठ &#8211; 43)</em></p></blockquote>
<p>अमृता-इमरोज के बीच उनके डिवाइन लव यानी ईश्वरीय प्रेम के वर्णन को बहुत ही सहज ढंग से बयान करने में उमा सफल रही हैं। उन्होंने काफी सारा वक्त अमृता इमरोज़ के साथ बिताया है और उन पलों को बड़ी खूबसूरती से, बड़ी बारीकी से वर्णन किया है।</p>
<p><img decoding="async" style="align: left; margin: 15px;" title="Amrita Imroz" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/Amrita-and-Imroz.jpg" alt="Amrita Imroz" align="left" border="0" />कहीं कहीं उमा एकल-बयानी करती भी दिखाई देती हैं। मैं अमृता जी से ऐसे मिली, मैं अमृता जी को इस तरह ले कर गई, एक दिन जब मैं अमृता के यहाँ थी&#8230;इत्यादि। अमृता इमरोज के बारे में इतना ज्यादा लिखा और छापा जा चुका है कि उनके जीवन का कोई पहलू पाठकों से अनछुआ सा नहीं रह गया है। वैसे भी अमृता-इमरोज ने बिंदास, पारदर्शी जीवन जिया है। लेखिका यहाँ पर सिर्फ अपने एकपक्षीय अनुभवों को बयान करती दीखती हैं। हाँ, उन्होंने अमृता-इमरोज के साथ अपने संस्मरण, उनसे बातचीत, उनके विचारों को भी पर्याप्त स्थान दिया है।</p>
<p>पुस्तक की भाषा सरल, पठनीय है। परंतु भाषा प्रवाह व कथ्य पाठकों को बाँध रखने में सक्षम प्रतीत नहीं होता। छोटे छोटे ढेरों अध्याय से पठन में निरंतरता नहीं बन पाती। संस्मरण लिखते समय अमृता का विशाल व्यक्तित्व लेखिका पर हावी रहा है और वे अपनी भाषा में से अमृता के प्रति आदरसूचक प्रतीकों को जरा ज्यादा ही प्रयोग करती दिखाई देती हैं जो त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती है। अमृता के प्रति आदरभाव को नकारा नहीं जा सकता, मगर जब बात संस्मरण लिखने की आती हो तो ‘थर्ड पर्सन’ रूप में लिखा गया पाठ निःसंदेह ज्यादा सहज रहता है।</p>
<p>कुल मिलाकर किताब अमृता के प्रशंसकों के लिए संग्रहणीय है। 120 रुपए मूल्य की 130 पृष्ठों की किताब की साज सज्जा, प्रस्तुतिकरण आकर्षक है।</p>
<div id="boxR" style="width: 100%; margin-left: 30px; padding-left: 30px;">
<h2>एक आज़ाद रुह जिस्मानी पिंजरे से निकल, फ़िर आज़ाद हो गई</h2>
<div class="dropCap">उ</div>
<p>मा त्रिलोक की किताब को पढ़ना मुझे सिर्फ़ इसलिए अच्छा नही लगा की यह मेरी सबसे मनपसंद और रुह में बसने वाली कवियित्री अमृता के बारे में लिखी हुई है, यह पुस्तक मेरे लिये इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इसको इमरोज़ ने ख़ुद अपने हाथों से हस्ताक्षर करके मुझे दी। उमा त्रिलोक ने इस किताब में उन पलों को तो जीवंत किया ही है जो इमरोज़ और अमृता की जिंदगी से जुड़े हुए बहुत ख़ास लम्हें हैं, साथ ही उन्होने इस में उन पलों को भी समेट लिया है जो अमृता जी की जीवन के आखिरी लम्हे थे। उन्होंने उस रूहानी मोहब्बत के जज़्बे को अपनी कलम से बख़ूबी बटोर लिया है।</p>
<div id="pullQuoteR" style="margin-bottom: 15px; margin-top: 5px;">उमा त्रिलोक के लेखन में इमरोज़ की पेंटिंग और अमृता की कविताओं व नॉवल के किरदारों में एक ख़ास रिश्ता जुडा हुआ सा दिखायी देता है&#8230;एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे समाज की मंजूरी की ज़रुरत नही पड़ती।</div>
<p>मैंने इस किताब को पढ़ते हुए इसके हर लफ्ज़ को रुह से महसूस किया। उनके लिखे लफ्ज़ अमृता और इमरोज़ की जिंदगी के उस रूहानी प्यार को दिल के करीब ला देते हैं। उनके लेखन में इमरोज़ की पेंटिंग और अमृता की कविताओं और नॉवल के किरदारों में एक ख़ास रिश्ता जुडा हुआ सा दिखायी देता है&#8230;एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे समाज की मंजूरी की ज़रुरत नही पड़ती है।</p>
<p>उमा की अमृता से हर भेंट रिश्तों की दुनिया का एक नया सफर होता। इस किताब में अमृता का अपने बच्चों के साथ व इमरोज़ का उनके बच्चों से रिश्ता भी बखूबी बयां किया गया है। उमा उनसे आखरी दिनों में तब मिलीं जब वह अपनी सेहत की वजह से परेशान थीं। ऐसे में उमा, जो एक रेकी हीलर भी हैं, को अमृता के साथ रहने का मौका मिला। उन्होंने अपने अंतिम दिनों की इमरोज़ के लिए लिखी कविता &#8220;मैं तेनु फेर मिलांगी&#8221; का अंग्रेज़ी अनुवाद करने की बात कही। उन आखिरी लम्हों में इमरोज़ के भावों को उन्होंने बहुत खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है। उमा ने सही लिखा है कि प्यार में मन कवि हो जाता है। वह कविता को लिखता ही नहीं, कविता को जीता है। शायद तभी उमा के संवेदना जताने पर इमरोज़ कहते हैं कि एक आज़ाद रुह जिस्म के पिंजरे से निकल कर फ़िर से आज़ाद हो गई।</p>
<p>अमृता इमरोज़ के प्यार को रुह से महसूस करने वालों को यह किताब शुरू से अंत तक अपने लफ्जों से बांधे रखती है। और जैसे जैसे हम इस के वर्क पलटते जाते हैं उतने ही उनके लिखे और साथ व्यतीत किए लम्हों को ख़ुद के साथ चलता पाते हैं।</p>
<p class="note"><strong>समीक्षक &#8211; रंजना भाटिया</strong></p>
</div>
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		<title>मैं बोरिशाइल्ला :  भीड़ से अलग</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-samiksha-borishailla/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[रविशंकर श्रीवास्तव]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:30:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Bangladesh]]></category>
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					<description><![CDATA[बांग्लादेश की मुक्ति-गाथा पर केंद्रित &#34;मैं बोरिशाइल्ला&#34; <strong>महुआ माजी</strong> का पहला उपन्यास है जो चर्चित भी हुआ और सम्मानित भी। <strong>रवि </strong>कहते हैं&#160; कि थोड़ा बोझिल होने के बावजूद यह अलग सा उपन्यास अपने प्रामाणिक विवरण के कारण बांग्ला जनजीवन को जानने समझने वाले और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों को दिलचस्प लगेगा।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">म</div>
<p>हुआ माजी का उपन्यास &#8220;मैं बोरिशाइल्ला&#8221; बांग्लादेश की मुक्ति-गाथा पर केंद्रित है। महुआ माजी ने इस उपन्यास को कई वर्षों के शोध उपरांत लिखा है और प्रामाणिक इतिहास लिखा है। यह उपन्यास बहुत ही कम समय में खासा चर्चित हुआ है और इस कृति को सम्मानित भी किया गया है। इस उपन्यास के अजीब से नाम के बारे में स्पष्टीकरण देती हुई महुआ, उपन्यास के अपने प्राक्कथन में कहती हैं &#8211;</p>
<blockquote><p>“&#8230;जिस तरह बिहार के लोगों को बिहारी तथा भारत के लोगों को भारतीय कहा जाता है, उसी प्रकार बोरिशाल के लोगों को यहाँ की आंचलिक भाषा में बोरिशाइल्ला कहा जाता है। उपन्यास का मुख्य पात्र केष्टो, बोरिशाल का है। इसीलिए वह कह सकता है &#8211; मैं बोरिशाइल्ला।”</p></blockquote>
<p>जैसा कि उपन्यास के द्वितीय शीर्षक पृष्ठ पर अंकित है &#8211; यह उपन्यास बांग्लादेश के अभ्युदय की महागाथा है। 1948 से लेकर 1971 तक के ऐतिहासिक तथ्यों, पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा बांग्लादेशी जनता पर किए अत्याचारों की घटनाओं तथा मुक्तिवाहिनी के संघर्ष गाथाओं को महुआ माजी ने इस उपन्यास के कथा सूत्र में पिरोया है। एक बानगी देखें &#8211;</p>
<blockquote><p>&#8220;&#8230;इसी तरह एक बार मैं सब्जियाँ खरीदने बाजार गया। एक सब्जीवाला शिमला मिर्च, जिसे वहां के लोग बोम्बाइया लौंका कहा करते थे, बेच रहा था। मुझे देखकर सब्जीवाले ने जोर से आवाज दी, &#8220;बोम्बाइया लौंका ले जाइए बाबू।&#8221; बाज़ार में घूमते एक सैनिक के कानों तक जैसे ही बोम्बाइया यानी बम्बइया शब्द पहुँचा, उसने सब्जी वाले की पीठ पर एक भरपूर बेंत मारी और चिल्लाते हुए कहा, &#8220;इंडिया से मिर्च मंगाता है? यहां पाकिस्तान में पैदा नहीं कर सकता?&#8221;</p></blockquote>
<div id="boxR" style="width: 250px;">
<h2>समर्थ उपस्थिति</h2>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Mahua Maji" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/mahua_maji.jpg" alt="Mahua Maji" width="151" height="168" align="middle" border="0" hspace="5" vspace="5" /><br />
<strong>महुआ माजी</strong> द्वारा बांग्&#x200d;लादेश के मुक्ति संग्राम की पृष्&#x200d;ठभूमि पर 2006 में लिखा &#8220;मैं बोरिशाइल्ला&#8221;, उनका पहला ही उपन्&#x200d;यास है पर इससे उन्होंने साहित्य संसार में समर्थ रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज की। महुआ समाजशास्&#x200d;त्र में पीएचडी हैं। उनकी लिखी अनेक कहानियां विभिन्&#x200d;न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। &#8220;मैं बोरिशाइल्&#x200d;ला&#8221; को पाठकों और समीक्षकों की काफी प्रशंसा मिलने के बाद इसके अंग्रेजी और बांग्ला में अनिवादित किये जाने की खबरें हैं। महुआ को 2007 में इस उपन्यास के लिये अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान से भी सम्मानित किया गया।</div>
<blockquote><p>&#8230; अयूबशाही शासनकाल में भारत की मुहर लगी हुई कोई भी चीज रखना जुर्म माना जाता था। सैनिक घर-घर की तलाशी लेते थे। एक दिन जब हमारे घर में सेना के जवान भारतीय सामानों की जांच करने घुस आए तब मेरी मां को उनके अत्याचार के डर से भारत से मंगाई गई अपनी सिन्दूर की डिबिया को, यह जानते हुए भी कि सुहागन के लिए सिन्दूर पानी में फेंकना अपशगुन होता है, मजबूरन उठाकर खिड़की से बाहर फेंकना पड़ा था&#8230;इस बीच अयूब खान ने यह फरमान जारी कर दिया था कि पाकिस्तान के हर घर में उनकी तस्वीर टाँगना अनिवार्य है। जांच के दौरान जिनके घर में उनकी तस्वीर टंगी हुई नहीं मिलती थी, कड़ी सज़ा दी जाती&#8230;” (पृ 141-142)</p></blockquote>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Mei Borishailla" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/mei-borishailla.jpg" alt="Mei Borishailla" width="237" height="358" align="left" border="0" hspace="5" vspace="5" />जैसा कि ऊपर दिए उद्धरण में स्पष्ट है, उपन्यास की भाषा अत्यंत साधारण है, और समूचे उपन्यास में कहीं भी कोई भाषाई शिल्प नमूदार नहीं होता। कथन में प्रवाह नहीं है, और उपन्यास घटना-प्रधान होते हुए भी आमतौर पर बोझिल-सा बना रहता है। इसके कई खण्ड घोर अपठनीय ही बने रहते हैं।</p>
<p>कुल मिलाकर उपन्यास पाठक को लगातार बांधे रखने में अक्षम ही रहता है। जाहिर है उपन्यास के ताने-बाने को और कसावदार बुना जा सकता था। दरअसल लेखिका ने मुक्ति संग्राम के दिनों में पाकिस्तानी सैनिकों तथा उर्दूभाषी नागरिकों द्वारा बांग्लाभाषियों पर किए गए अत्याचारों तथा मुक्तिवाहिनी के कार्यों के बहुत प्रामाणिक विवरण देने के लोभ में उपन्यास को बिखरा सा दिया है। घटना प्रधान कथानक में सस्पेंस का सर्वथा अभाव भी आगे पढ़ने में जिज्ञासा बनाए रखने में मदद नहीं करता।</p>
<p>जो भी हो, 400 पृष्ठों की यह किताब बांग्ला जन जीवन को निकट से जानने समझने वाले, बांग्लादेश के इतिहास में रुचि रखने वाले उत्सुक लोगों के लिए निःसंदेह दिलचस्प रहेगी। और, आम हिन्दी उपन्यासों की तर्ज पर यह मात्र विचारों व कल्पना की निपट-बयानी नहीं है। क्योंकि यह पारिवारिक, ग्रामीण जन-जीवन या दलित-विमर्श जैसी कहानी नहीं है संभवतः इसीलिए यह भीड़ से अलग भी है। पाठक अगर हिन्दी उपन्यासों में अगर कुछ नया सा पढ़ना चाहते हैं तो मैं बोरिशाइल्ला अवश्य पढ़ें।</p>
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		<title>सफल-असफल बनने की सत्य तथाकथा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-vyangya/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[रविशंकर श्रीवास्तव]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:24:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
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					<description><![CDATA[<strong>रवि रतलामी </strong>सफ़ल बनना चाहते थे, महान बनना चाहते थे। और खोजते खोजते उनका हाथ वो नुस्ख़ा लग ही गया जिससे वे महान ही नहीं, महानतम बन गये। तो देर किस बात की? आप भी बन जाइये उन के अनुयायी।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: center;"><img loading="lazy" decoding="async" title="Vynagya" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/story-big-vyangya.jpg" alt="Vynagya" width="490" height="275" border="0" hspace="3" vspace="3" /></div>
<div class="dropCap">जी</div>
<p>वन के चार दशक गुजार लेने के बाद पीछे मुड़कर जब मैंने देखा तो पाया कि मैं सफल तो कतई नहीं कहलाऊंगा। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता के कोई खास झंडे गाड़े हों, जब मुझे दिखाई नहीं दिया तो मैं उदास हो गया। इसी उदासी में मैं टहलने निकल गया। सोचा था इस उदासी को गायों-गोल्लरों, ट्रैफ़िक और धूल भरी सड़कों में उड़ाकर आ जाऊंगा। वैसे भी, ऑटो-टैम्पो और सड़क के दोनों ओर रेहड़ी-खोमचे-ठेलों की भीड़ के बीच यदि आप सकुशल एक दो किलोमीटर की यात्रा बिना ठुके-ठोंके सप्रयत्न कर आएं, तो आपकी उदासी यकीनन कई दिनों के लिए छूमंतर हो जाएगी।</p>
<p>सड़क में एक सांड के सींग से बचने की कोशिश में मैं सीधे एक फेरी वाले के ठेले के ऊपर जा गिरा। वो कुछ सज्जन किस्म का आदमी था जिसने मुझे पलट कर गालियाँ नहीं दीं और मुझे तत्परता से उठाया। मेरी भी सज्जनता कुछ जागी और मैं ठेले पर विक्रय के लिए रखी सामग्रियों को उचटती निगाह से देखने लगा। वो किताब की दुकान थी। तमाम तरह की किताबें विक्रय के लिए उपलब्ध थीं। उन सबमें सबसे ऊपर एक किताब का चमकीला शीर्षक चमक रहा था &#8211; &#8220;उठो महान बनो&#8221;।</p>
<div id="pullQuoteR">जरूर इस किताब में महान बनने के सस्ते सुंदर सरल तरीके होंगे। मेरी आंतरिक खुशी जाग उठी। मुझे लगा कि मेरे पास महान बनने का हथियार आ गया है।</div>
<p>आह! यही तो मैं खोज रहा था। मैं सफल बनना चाह रहा था, महान बनना चाह रहा था। जरूर इस किताब में महान बनने के सस्ते सुंदर सरल तरीके होंगे। मेरी आंतरिक खुशी जाग उठी। मुझे लगा कि मेरे पास महान बनने का हथियार आ गया है। कांपते हाथों से मैंने उस किताब को उठाया। डरते डरते उसकी कीमत देखी &#8211; कहीं यह हजारों में न हो &#8211; महान बनाने वाली महान किताब कहीं कीमत में भी महान न हो। कीमत से तसल्ली हुई। वो जेब पर बहुत भारी नहीं हो रही थी। मैंने तत्काल उसे खरीद लिया और सीधे घर की ओर वापस लपका।</p>
<p>अब मेरे महान बनने में चंद लमहों की ही देरी थी। किताब का आद्योपांत पाठन करना था। चंद बातों को जीवन में उतारना था और बस हो गया। लौटते समय मेरे कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। कल्पना में मैंने देखा कि मैं महान से महानतम बन गया हूं और तमाम दुनिया के लोग मेरे अनुयायी बन गए हैं और मेरे जयकारे लगा रहे हैं। घर आकर मैंने बीवी की ओर हिकारत भरी नजरों से देखा कि वो हमेशा मुझे मेरी औकात से कम आंका करती है, मेरी असफलताओं पर टोकती रहती है, मेरे निठल्लेपन के ताने कसती रहती है, अब देखना &#8211; तेरा वही निठल्ला पति देखते देखते ही कैसे महान बनता है।</p>
<p>नहा-धोकर, किताब में धूप-बत्ती देकर उसका पारायण प्रारंभ किया। आंखें मुंद रही थीं, सिर भारी हो रहा था, मुँह से उबासी दूर हो नहीं रही थी, मगर मैं किताब पढ़ता रहा। इतनी गंभीरता से तो मैंने अपने बोर्ड के इम्तिहान की पढ़ाई भी नहीं की थी। मगर यहाँ मामला महान बनने का जो था। सो गुंजाइश ही नहीं थी। अठारह घंटे छत्तीस मिनट में किताब एक ही बैठक में आद्योपांत पढ़ गया। इस बीच कोई छब्बीस कप कॉफ़ी के उदरस्थ कर लिए और बीबी के छः ताने और स्मित हास्य के कोई आठ वार भी झेल लिए। किताब को मैंने पूरा पढ़ लिया था। उठो महान बनो। अब मैं उठ सकता था। मैं उठा और सीधे बिस्तरे पर जा गिरा। उसके बाद दो दिनों तक सोता रहा।</p>
<p>उठो महान बनो नाम की किताब पढ़ने के महीनों बीत जाने के बाद भी मुझे मेरी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। मैंने तो उसमें बताए तौर तरीकों को अपने ऊपर ओढ़ने आजमाने की ईमानदार कोशिश की थी। मगर महानता शायद मुझसे कोसों दूर थी। या इस शब्द से मेरा छत्तीस का आंकड़ा था। मैं फिर से गहन उदासी के दौर में फंस गया था।</p>
<p>मैं एक बार फिर उदासी दूर करने घूमने निकला तो अपने आपको उसी किताब दुकान पर पाया। इस दफ़ा सबसे ऊपर एक किताब चमकती दिखाई दे रही थी &#8211; &#8220;बेस्ट सेलर &#8211; कैसे पाएं सफलता।&#8221; वल्लाह! क्या किताब है। एकदम सही। सही समय पर सही किताब मिली मुझे। मैं अब तक हर क्षेत्र का असफल आदमी सफलता ही तो चाहता था। मुझे लगा कि दुनिया का हर सफल आदमी इस किताब में से होकर निकला है। और अब मेरी बारी है। मैंने अपनी जेब कुछ ढीली की और इस किताब को ले आया।</p>
<div id="pullQuoteR">मुझे लगा कि मेरी सफलता में अब बस आठ-दस दिनों की देरी है। मगर सूरज रोज सुबह उगता रहा और चन्द्रमा की कलियाँ रोज-ब-रोज, उसी रफ़्तार से, कम होती रहीं।</div>
<p>इस दफ़ा मैंने इस किताब के हर हिस्से को गौर से पढ़ा। ये नहीं कि अखंड-रामायण पाठ की तरह एक बैठक में पढ़ मारा। मैंने नोट्स बनाए, सूत्रों को, वाक्यांशों को रटा। मुझे लगा कि मेरी सफलता में अब बस आठ-दस दिनों की देरी है। मगर सूरज रोज सुबह उगता रहा और चन्द्रमा की कलियाँ रोज ब रोज कम होती रहीं &#8211; उसी रफ़्तार से। उनमें भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ और मेरी सफलता में भी बाल बराबर फर्क नजर नहीं आया। मैं फिर निराश हो गया।</p>
<p>निराशाओं के ऐसे दौर आते रहे और मैं अपनी निराशा दूर करने सड़क नापता रहा, सांड के सींग खाता रहा, और किताब दुकान पर गिरता रहा। वहां से अपने आपको बदलने के लिए, सफल होने के लिए, धनी बनने के लिए, स्मार्ट बनने के लिए, सुखी बनने के लिए, व्यवहार कुशल बनने के लिए तमाम किताबें लाता रहा, और पढ़ता रहा। मगर परिस्थितियों को नहीं बदलना था सो नहीं बदलीं। मेरे घर के दरवाजे की दिशा दक्षिण की ओर थी और वो भी वैसी ही बनी रही।</p>
<p>घोर निराशा में मैंने इन सारी किताबों को एकत्र किया और उस दुकान में वापस फेंकने के लिए ले गया। मैंने किताबों का गट्ठर उसके ठेले पर दे मारा। मारे क्रोध के मेरा माथा भन्ना रहा था मैं उसे क्रोध में कुछ बोलता &#8211; कि वो कैसी अनुपयोगी, बेकार, रद्दी अप्रभावी किताबें बेचता है &#8211; सामने एक नई नवेली चमचमाती किताब पर मेरी नजर पड़ी। किताब का नाम था &#8211; &#8220;चिंता छोड़ो सुख से जिओ&#8221;। आह! तो ये है अल्टीमेट, अंतिम किताब। मेरा गुस्सा काफूर हो गया। मैंने तत्काल उसे खरीदा और प्रसन्न मन घर वापस आया।</p>
<p>मेरी निराशा दूर हो चुकी है। हमेशा के लिए। ऐसा नहीं है कि मैंने किताब का पाठ कर लिया है और उसे पूरा पढ़ लिया है और उसके उपदेशों को जीवन में उतार लिया है। दरअसल, जब भी मैं उसे पढ़ने के लिए उठाता हूं, और उसका शीर्षक पढ़ता हूँ, मेरी सारी दुश्चिंताएं हवा में विलीन हो जाती हैं। मैं सारी चिंता वहीं छोड़ देता हूं &#8211; उस किताब को पढ़ने की चिंता को भी और मैं सुख से जीने लग जाता हूं। किताब को मैंने अपने इबादतगाह में सबसे ऊपर रख दिया है और इसका शीर्षक ही मुझे रोज-ब-रोज, हर वक्त प्रेरित करता रहता है। यह वो किताब है &#8211; ओह माफ कीजिए, यह किताब का वो शीर्षक है, जिसने मेरे जीवन में सर्वाधिक प्रभाव डाला है। जय हो।</p>
<p>मैं सफल हो गया हूँ। मैं महान हो गया हूँ। मैं धनवान, अरबपति हो गया हूँ &#8211; क्योंकि अब मैं इन बातों के लिए कतई कोई चिंता नहीं करता।</p>
<p>आप बताएं, क्या आप चिंता करते हैं? यदि हाँ, तो मेरी सलाह मानें &#8211; &#8220;चिंता छोड़ो सुख से जियो&#8221; नाम की यह किताब खरीद लाएं। पढ़ने व आत्मसात करने के लिए नहीं, उसकी पूजा करने के लिए &#8211; जैसे कि मैं करता हूं।</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>कितना बोलती हो सुनन्दा!</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-kavita/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[गौरव सोलंकी]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:21:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
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					<description><![CDATA[वातायन के काव्य प्रभाग में पढ़िये युवा कवि <strong>गौरव सोलंकी</strong> की कविता।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>कितना बोलती हो सुनन्दा!<br />
फुदक रही हो सुबह से,<br />
<img decoding="async" title="तुम्हारे पैरों में बँधी हैं गली के लड़कों की सीटियाँ" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/sunanda.jpg" alt="तुम्हारे पैरों में बँधी हैं गली के लड़कों की सीटियाँ" align="right" border="0" hspace="5" vspace="5" /><br />
चाची के घर तक जाती हो तो<br />
लड़ने लगती हैं सीटियाँ,<br />
सब गुत्थमगुत्था,<br />
तुम अनजान,<br />
मुस्कुराकर माँगती हो उड़द की दाल।</p>
<p>कितना बोलती हो सुनन्दा<br />
जैसे नया नया पढ़ना सीखने के दिनों में<br />
बोल बोलकर अख़बार पढ़ती हो,<br />
दिन में तीन वक़्त आता हो अख़बार।<br />
गली में से गुजरते हुए<br />
सब पूछते हैं तुमसे ही पता<br />
शिक्को हलवाई का,<br />
तुम बताती रहती हो<br />
बिजलीघर से बाएँ,<br />
फिर हनुमान मन्दिर,<br />
फिर नाई की दुकान,<br />
सामने शिक्को हलवाई।</p>
<p>खरबूजे के मौसम में<br />
बीकानेरी रसगुल्लों की तरह<br />
हुलसी फिरती हो,<br />
तुम्हारे लहंगे ने बुहार दिया है<br />
सुबह से पूरा घर।<br />
चौके में से चम्मच<br />
चोंच में दबाकर उड़ गया है कौआ,<br />
तुम दीवार पर कुहनी टिकाकर<br />
हँस-हँसकर बता रही हो<br />
कि कौन आने वाला है!</p>
<p>कहाँ से लाती हो<br />
इतनी किलकारियाँ भरते शब्द<br />
कि सब खरीदकर ले आए हैं डिक्शनरी,<br />
बोलती हो तो<br />
तुम्हारे होठों में पड़ते हैं<br />
डिंपलिया गड्ढे,<br />
कितना बोलती हो सुनन्दा<br />
कि मोहल्ले में अफीम बिकनी<br />
बन्द सी हो गई है।</p>
<p><strong>2</strong></p>
<p>चाँद बहुत दूर है,<br />
बसों की भी हड़ताल है,<br />
कोई कब तक पीता रहे<br />
रूखी आशाएँ?<br />
साल भर ही तो बीता है<br />
जब तीज पर<br />
कलाई तक मेंहदी लगे हाथों से<br />
तुम पोंछ दिया करती थी<br />
गाँव भर के माथे की सलवटें।<br />
कहाँ गया वो जादूगर किराएदार<br />
बिना नोटिस के<br />
तुम्हारी आँखें खाली करके,<br />
भड़ भड़ बजते रहते हैं<br />
खाली चौबारे के किवाड़।<br />
बेसुध सी डगमगाती हुई चलती हो<br />
और उस पर भी ठहर जाती हो<br />
फ़िल्मों के पोस्टर देखकर<br />
उदास पानी की तरह।</p>
<p>भला कहाँ करता होगा कोई इतना प्यार<br />
कि बिछुड़ने की सालगिरह पर<br />
सूजी का हलवा बनाते हुए<br />
गर्मजोशी से गुनगुनाता रहे<br />
&#8216;मैं तैनू फेर मिलांगी&#8217;,<br />
ऊपर वाले शेल्फ में<br />
काँच की डिब्बी में रखा रहे<br />
शांत सा पोटेशियम सायनाइड,<br />
जिस पर चिप्पी लगाकर लिखा हो<br />
मीठा सोडा।<br />
श्श्श्श्श&#8230;.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>देख तमासा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[निरंतर पत्रिका दल]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 07:48:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समस्या पूर्ति]]></category>
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					<description><![CDATA[<strong>समस्या पूर्ति</strong> निरंतर का ऐसा स्तंभ है जहाँ आप अपनी रचनात्मकता परख सकते हैं। स्तंभ में दिये चित्र व शीर्षक के आधार पर रच डालिये कोई कविता, छंद या हाईकू। सर्वश्रेष्ठ रचना को मिलेगा आकर्षक पुरस्कार।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h1>लिखो कविता, जीतो ईनाम!</h1>
<p>नीचे दिए चित्र और इस लेख के शीर्षक को ध्यान से देखिए और रच डालिए एक छोटी सी कविता। रचना ज्यादा बड़ी न हो तो अच्छा, चार लाईना हो तो उत्तम, हाइकू हो तो क्या कहनें! शीर्षक मुख्यतः भाव के लिए है, पर आप इसे कविता में प्रयोग कर सकते हैं। यदि आपकी रचना निरंतर संपादक मंडल को पसंद आ गई तो आप जीत सकेंगे डॉ अंजली देवधर द्वारा रचित &quot;उत्कृष्ट हाईकू&quot;  की एक प्रति। कविता इस पोस्ट पर अपने टिप्पणी (कमेंट) के रूप में ही प्रेषित करें।</p>
<p>&nbsp;</p>
<div align="center">
<p align="center">  <img decoding="async" border="0" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/samasya-purti-0708.jpg" /></p>
</p></div>
<p>&nbsp;</p>
<h3>प्रतियोगिता के नियमः</h3>
<ul>
<li>रचना मौलिक, अप्रकाशित होनी चाहिए।</li>
<li>ईमेल या अन्य किसी माध्यम से प्राप्त प्रविष्टि मान्य नहीं होगी। केवल इस लेख के कमेंट या टिप्पणी के माध्यम से ही रचना प्रेषित करें।
 </li>
<li>एक प्रेषक से एक ही प्रविष्टि स्वीकार्य होगी।</li>
<li>संपादक मंडल का निर्णय साधारण अथवा विवाद की स्थिति में अंतिम व सर्वमान्य होगा।</li>
<li>किसी भी प्रविष्टि की प्राप्ति न होने या न जीतने पर पुस्तक आगामी अंकों में वितरित होगी।</li>
<li>संपादक मंडल के सदस्य प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकते।</li>
<li>एक बार पुरस्कृत विजेता को अगले 6 माह तक दुबारा पुरस्कृत नहीं किया जा सकेगा। हालांकि पूर्व विजेताओं के भाग लेने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।</li>
<li>क्षमा करें, डाक में पुस्तक खो जाने या पुस्तक अप्राप्ति कि जिम्मेवारी निरंतर नहीं ले सकता।</li>
<li>रचना भेजने की अंतिम तिथि हैः <strong>15 अगस्त, 2008</strong></li>
</ul>
]]></content:encoded>
					
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		<title>असली भारत के लिये असली शिक्षा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0207-cover-yashpal/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रो.यश पाल]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:58:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[Education]]></category>
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					<description><![CDATA[हमारी शिक्षा पद्धति में बच्चे भारी बैग लिये फिरते हैं, जोर रहता हैं रटन विद्या और परीक्षाओं पर। यहाँ पाठ्यक्रम में बाहर से अर्जित ज्ञान, हुनर और काबलियतों को स्थान नहीं मिलता। शिक्षाविद व राष्ट्रीय शोध <strong>प्रोफेसर यश पाल</strong> मानते हैं कि आधुनिक औपचारिक शिक्षा तंत्र में प्रकृति और जीवन से सीखे हुनर को शामिल करना भी ज़रूरी है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: center;">
<p style="text-align: center;"><img loading="lazy" decoding="async" class=" aligncenter" style="border: 0pt none;" title="Photo by Akshay Mahajan" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/story-big-yashpal.jpg" alt="Photo by Akshay Mahajan" width="500" height="250" border="0" /></p>
</div>
<div class="dropCap">मे</div>
<p>रे लेख का शीर्षक ज़रा कठोर है। थोड़ा अक्खड़ भी। इसका मंतव्य यह है कि कुल मिलाकर हमारी शिक्षा पद्धति वास्तविक भारत की ज़रूरत मुताबिक ढली नहीं है और यह कि जो शिक्षा हम दे रहें हैं वह काफी हद तक कर्मकाण्डी और यथार्थ से परे है।</p>
<p>हमारे जैसी विशाल और विस्तृत प्रणाली के लिये ये शायद एक और गैर जिम्मेदाराना सामान्यीकरण लगे। मैं इस तथ्य से वाकिफ हूँ कि हम कुछ असाधारण लोगों की भी रचना करते हैं पर मेरा विचार है कि प्रणाली चाहे कैसी भी हो कुछ असाधारण लोग तो यूँ भी तैयार हो ही जाते हैं, ज़्यादातर किसी औपचारिक तंत्र के प्रयोग के बिना। 95 करोड़ के देश में हम कड़ी और कष्टकर छंटाई के द्वारा भी कुछ हजार लोगों को ही चुन पाते हैं। इंजीनियरिंग के प्रशिक्षण के उपरांत इनमें से भारी संख्या में लोग विदेश चले जाते हैं और वहाँ सफलता भी प्राप्त करते हैं। यह तथ्य यही साबित करता है कि हमारी कुछ संस्थाओं में हर किसी को नष्ट करने में हम पूर्णतः सफल नही हो सके।</p>
<div id="pullQuoteR">हायर सेकेंडरी परीक्षा में बैठने वाले 100 छात्रों में से हर साल 50 से भी कम पास होते हैं। यही साल दर साल चलता रहता है।</div>
<p>सार्विक प्राथमिक शिक्षा देने से तो हम कोसों दूर हैं। हम मौजूदा शालाओं जैसी ढेरों और शालायें खोल भी दें तो यह हालात खास बदलने नही वाले बशर्ते हम साथ साथ हमारी शिक्षण और ज्ञान तंत्र तथा शाला के अपने पास पड़ोस से संबंधों में प्रबल बदलाव लायें। इसके कारणों की चर्चा निम्नलिखित है।</p>
<p>कक्षा 1 में दाखिल होने वाले 50 प्रतिशत बच्चे कक्षा 5 तक और 25 प्रतिशत बच्चे कक्षा 8 तक आते आते स्कूल छोड़ देते हैं। केवल 5 से 10 प्रतिशत ही हाई स्कूल पास करते हैं और बमुश्किल 1 या 2 प्रतिशत बारहवीं पास कर पाते हैं। हायर सेकेंडरी परीक्षा में बैठने वाले 100 छात्रों में से हर साल 50 से भी कम पास होते हैं। यही साल दर साल चलता रहता है।</p>
<p>जब भी हम इन आंकड़ों को देखते हैं, अपने शिक्षों पर दोषारोपण करने और स्कूलों में सेवाओं की खराब स्थिति, माता पिता की उदासीनता, खराब पाठ्य पुस्तकों वगैरा वगैरा को कोसने लगते हैं। छात्रों के लिये अनिवार्य हो गया है कि अच्छे अंक पाने के लिये वे महंगे ट्यूशन व कोचिंग कक्षायें जायें। आपके माता पिता का मालदार और शिक्षित होना काम आता है। अगर वे अंग्रेजी बोल सके तो क्या कहनें।</p>
<p>मेरी यही धारणा है कि ये सभी एक गहरी गलती के लक्षण हैं। 3 वर्ष पूर्व मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा गठित एक कमेटी ने एक रपट दाखिल की थी जिसका शीर्षक था &#8220;लर्निंग विदाउट बर्डन&#8221; यानि &#8220;बिना बोझ की पढ़ाई&#8221;। इस कमेटी का अध्यक्ष मैं था। मंत्री जी चर्चा में रहे एक मसले, स्कूल बैगों के बढते वजन, से चिंतित थे।</p>
<p>इस रपट की अनेक बैठकों तथा सेमिनारों में व्यापक चर्चा हुई है, शिक्षा पर सेंट्रल एडवाइजरी कमेटी ने इस पर चर्चा के बाबत खास गोष्ठी की है। स्कूलों तथा शिक्षकों की संस्थाओं ने इस पर चर्चा और सेमिनार के आयोजन किये। संसद में इसके कार्यन्व्यन पर सवाल पूछे गये हैं और एन.सी.आर.टी में इस बाबत एक विशेष मॉनीटरिंग प्रकोष्ट की भी स्थापना की गई। फिर भी शालाओं की कार्यपद्धति में कोई स्पष्ट बदलाव नही दिखता। ज्यादातर बच्चे अभी भी भारी बैग लिये फिरते हैं। पाठ्यक्रमों में संशोधन नही हुए, कब क्या पढ़ाना है यह निर्णय लेने के लिये शिक्षकों को अधिक अधिकार नही दिये गये, रटन विद्या पर जोर कम नहीं हुआ, विषय को समझने पर जोर नहीं है और एक छात्र के जीवन में अब भी परीक्षायें, टेस्ट और स्पर्धाओं का बोलबाला है।</p>
<div id="pullQuoteR">ज्यदातर बच्चे यह मानते हैं कि ज्ञान दो तरह के होता है एक, जिसका असल ज़िंदगी से वास्ता है और दूसरा, जो स्कूल में अर्जित होता है।</div>
<p>कुछ लोग ये तर्क देंगे कि सीखना हमारे मिज़ाज के ही मुताबिक नहीं, कि हम एक निकृष्ठ प्रजाति है और ये कि हम केवल प्रशिक्षण के ही लायक है, ऐसा प्रशिक्षण जिसका पैकेज किसी ने पहले से ही तैयार कर रखा हो। ये भी कहा जा सकता है कि हमारे अधिकांश बच्चे जड़मति हैं और और उनके रहन सहन का तरीका ऐसी चीजों में अरूचि पैदा करता है जो सैद्धांतिक (एकेडेमिक) या वैचारिक (कनसेप्चुयल) हों। ये भी तर्क दिया जा सकता है कि ये सब जानते हुये ही हमारे शिक्षक और परीक्षण संस्थायें रटन विद्या पर जोर देते हैं।</p>
<p>जैसे ही हम रटन विद्या का विषय की समझ से साम्य करने लगते हैं हम ये निष्कर्ष निकालने लगते हैं कि शिक्षा का बच्चे की वातावरण की खासियत या ऐसे सवाल जवाबों से कोई नाता नहीं है जो बच्चा स्कूल से बाहर ग्रहण या प्रतिपादित करता है। बेशक हमारे अध्ययन से भी यही पता चला कि ज्यादातर बच्चे यह मानते हैं कि ज्ञान दो तरह के होता है एक, जिसका असल ज़िंदगी से वास्ता है और दूसरा, जो स्कूल में अर्जित होता है। बच्चों के एक बड़े तबके को समझने (कॉम्प्रिहेन्शन) के बिना सीखना बोझ सा लगता है और अगर माता पिता का दबाव ना हो या फिर उन्हें असाधारण शिक्षक और घर में पढ़ाई के उत्तम वातावरण का सौभाग्य प्राप्त ना हो तो वे स्कूल छोड़ देते हैं।</p>
<p>मुझे कई दफ़ा यह हैरत होती है कि जीवन से शिक्षा को अलग करने कि यह आदत कहीं हमारा सांस्कृतिक लक्षण तो नहीं जो हमें अपने अतीत से मिला हो। उँची जाति की शिक्षा की ब्राह्मण परंपरा में हम जीवन को अनेक मियादों में बाँटते हैं जिनमें से एक वक्त ऐसा होता है जब हम केवल ज्ञान अर्जित करते थे और शेष सारा जीवन युवावस्था की इसी सीख के सहारे यापन होता था। इसके सापेक्ष हमारे समाज ने विश्व और अनुभव से सीखने के महत्व को पहचाना और इसलिये उसके अधिकांश बच्चों को स्कूल से अलग रखा गया।</p>
<div id="pullQuoteR">औपचारिक शिक्षा की हमारे समाज में निहित यह प्रवृत्ति 19वीं सदी में मैकॉले की शिक्षा पद्धति से दृढ़ हुई जहाँ शिक्षा का उद्देश्य जीवन से संलाप नहीं बल्कि ऐसे हुनर सीखना था जिसमें हम दूसरों की बनाई मशीनों में फिट होकर उनको फायदा पहुँचा सकें।</div>
<p>शालेय जीवन का प्रयोजन शारीरिक श्रम के बिना जीवनयापन तथा जीवन की जद्दोजहद से दूरी बनाये रखना था। यह संभव है कि औपचारिक शिक्षा की हमारे समाज में निहित यह प्रवृत्ति 19वीं सदी में मैकॉले की शिक्षा पद्धति से दृढ़ हुई हो जहाँ शिक्षा का उद्देश्य जीवन से संलाप नहीं बल्कि ऐसे हुनर सीखना था जिसमें हम दूसरों की बनाई मशीनों में फिट होकर उनको फायदा पहुँचा सकें। चुनौतियों के अभाव में हमारी शिक्षा पद्धति ने श्रेष्ठता मापने के ऐसे मापदंडों का प्रयोग किया है जो या तो विदेशों से उधार ली गई हैं या फिर कुल प्राप्तांकों में आधे से भी कम प्रतिशत के आधार पर अंतर करने जैसे बेसिरपैर के पैमाने। ये तो हमारे युवाओं के लचीलेपन की दाद देनी होगी कि इनमें से कुछ के व्यक्तित्व हमेशा के लिये नष्ट होने से बच जाते हैं। पर कई ऐसे जिनमें तेज़ अनुबोधक (परसेप्टिव) शक्तियाँ या असाधारण सर्जनात्मक काबलियते थीं या तो असफल हो जाते हैं या फिर पढ़ाई छोड़ देते हैं।</p>
<p>भारत की पहचान बनाने वाली अधिकांश चीजें ऐसे लोगों द्वारा बनाई और संजोई गई हैं जिन्होंने औपचारिक शिक्षा तंत्र के बाहर से हुनर, संवेदनशीलता व शिल्प कौशल ग्रहण किये। हमारे समाज में ज़्यादातर हुनर प्रयोग व अवलोकन द्वारा सीखे जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि हमें बस ऐसे ही लोग चाहिये। हमें नई सामग्री, नई तकनीक, कंप्यूटर तथा सूचना आधार की बिल्कुल ज़रूरत है। पर मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहता हूँ कि ज़मीन से जुड़े और हाथों से काम करने वालो लोगों को हमारी औपचारिक शिक्षा तंत्र से दूर रखकर हमने बहुत बड़ी बेवकूफी की है। हम अपने पाठ्यक्रम में बाहर से अर्जित ज्ञान, हुनर और काबलियतों को स्थान ही नहीं देते।</p>
<p>कई मौकों पर जब मैनें आयातित तकनीक से प्रभावित नौकरशाहों से ये ज़िक्र किया तो उन्होंने मुझ पर मुल्क के आधुनिकीकरण में बाधा डालने का आरोप जड़ दिया। मैं यही कहूंगा कि हमें शीघ्र ही हमारी शिक्षण संस्थाओं में दी जा रही पृथक और बंजर know why में वास्तविक काम और समाज की परंपराओं से अर्जित know how को मिलाने का यत्न करना चाहिये। केवल तभी हम उच्च योग्यता वाले आविष्कर्ताओं, इंजीनियरों तथा वैज्ञानिकों का निर्माण कर पायेंगे। और वास्तविक आधुनिकीकरण भी ऐसे ही होगा।</p>
<blockquote>
<p class="note"><em>तहलका में पूर्व प्रकाशित <a href="http://www.tehelka.com/story_main29.asp?filename=op050507Real_Education.asp" target="_blank" rel="noopener">इस अंग्रेज़ी लेख</a> का हिन्दी अनुवाद किया है देबाशीष चक्रवर्ती ने। पूर्वानुमति से प्रकाशित। छायाः <a href="http://trivialmatters.blogspot.com">अक्षय महाजन</a></em></p>
</blockquote>
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