<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" gd:etag="W/&quot;DkQDSHgzeip7ImA9WxNUF0g.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005</id><updated>2009-11-09T13:42:59.682+05:30</updated><title>निर्मल-आनन्द</title><subtitle type="html" /><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/" /><link rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false&amp;v=2" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>350</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><link rel="license" type="text/html" href="http://creativecommons.org/licenses/by/2.0/" /><logo>http://creativecommons.org/images/public/somerights20.gif</logo><link rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/nirmal-anand" type="application/atom+xml" /><feedburner:emailServiceId xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">nirmal-anand</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com" /><entry gd:etag="W/&quot;C0MMQHw8eCp7ImA9WxNUF00.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-2090681837377274285</id><published>2009-11-08T22:36:00.003+05:30</published><updated>2009-11-08T23:01:21.270+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-11-08T23:01:21.270+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वन्दे मातरम" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साम्प्रदायिकता" /><title>वसुधैव कुटुम्बकम?</title><content type="html">दुनिया भर में फैले हुए प्रवासी भारतीय हिन्दुओं को यदि उन देशों के बहुसंख्यक लोग गोमांस खाने पर मजबूर करने लगे तो उन्हे कैसा लगेगा। यदि वो अपनी मरजी से ऐसा करते हैं तो किसी को कोई आपत्ति क्यों होगी लेकिन यदि उन पर यह बाध्य कर दिया जाय कि यदि उस देश में रहना होगा तो गोमांसाहारी बनना होगा तो उन को कैसा महसूस होगा और आप को कैसा महसूस होगा? *&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में मुसलमान तेरह चौदह सौ साल से रह रहे हैं। कोई भारतीय मुसलमान विदेशी नहीं है, इस भूमि पर उसका भी इतना ही हक़ है जितना कि किसी और का। वे अपने वतन को किस तरह से प्यार करेंगे और किस तरह उसका प्रदर्शन करेंगे यह तय करने वाला कोई और नहीं वे खुद होंगे। यदि कोई दीनी तंजीम यह तय करती है कि यह गीत उनके धर्म के आड़े आता है और वे वन्दे मातरम का गान नहीं करना चाहते तो इसमें किसी को ऐतराज़ कैसा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह गीत देशभक्ति का कोई पैमाना नहीं है। देशभक्ति की आड़ में देशवासियों से नफ़रत करना यह कैसी नीति है? इस गीत को गाने से या न गाने से देश का क्या हानि-लाभ हो जा रहा है? यह कोई मुद्दा ही नहीं है। इस बात पर विवाद करना वितण्डा खड़ा करना और साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काने की साज़िश है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर धार्मिक व्यक्ति साम्प्रदायिक नहीं होता, जैसे कि हर साम्प्रदायिक व्यक्ति धार्मिक नहीं होता (आडवाणी जी इस का सबसे बड़ा प्रमाण हैं)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वसुधैव कुटुम्बकम का नारा देने वाले पहले देश के लोगों के साथ कुटुम्ब के सदस्यों के तौर पर सम्मान करना सीखें, ये हिटलरी नीति छोड़ें और विचारों और मान्यताओं के वैविध्य के लिए जगह बनाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/08/blog-post_18.html"&gt;(जन गण मन और वन्दे मातरम पर यहाँ और पढ़ें!)&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic;font-size:85%;" &gt;* यह प्रवासी का उदाहरण इसलिए दिया है कि वे भारत में बहुसंख्यक और किसी भी अन्य देश में पहले प्रवासी है फिर अल्पसंख्यक।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-2090681837377274285?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/2090681837377274285/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=2090681837377274285" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2090681837377274285?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2090681837377274285?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html" title="वसुधैव कुटुम्बकम?" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEANSX8zfip7ImA9WxNUFkw.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-4973569898969460663</id><published>2009-11-07T12:47:00.008+05:30</published><updated>2009-11-07T22:23:18.186+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-11-07T22:23:18.186+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="माओवाद" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चॉम्स्की" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फ़ूको" /><title>फ़ूको बनाम चॉम्स्की</title><content type="html">&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;फ़ूको &lt;/span&gt;: बजाय सामाजिक संघर्षों को ‘न्याय’ की दृष्टि से समझने के, हमें न्याय को सामाजिक संघर्ष के नज़रिये से देखना चाहिये ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.. सर्वहारा शासक वर्ग के खिलाफ़ इसलिए युद्ध नहीं छेड़ता क्योंकि ये एक इंसाफ़ की लड़ाई है। सवर्हारा शासक वर्ग के विरुद्ध युद्ध करता है क्योंकि, इतिहास में पहली बार, वह सत्ता हथियाना चाहता है। और क्योंकि वो शासक वर्ग की सत्ता को उखाड़ फेंकेगा इसलिए वह इस लड़ाई को न्यायपूर्ण समझता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;चॉम्स्की &lt;/span&gt;: मैं सहमत नहीं हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;फ़ूको &lt;/span&gt;: आदमी लड़ाई जीतने के लिए लड़ता है, न्याय के विचार से नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;चॉम्स्की &lt;/span&gt;: निजी तौर पर मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ।&lt;br /&gt;मिसाल के तौर पर, अगर मुझे लगता है कि सर्वहारा के द्वारा सत्ता पर क़ब्ज़े से एक आतंकवादी पुलिस राज्य का जनम होगा जिसमें आज़ादी और सम्मान और मानवीय सम्बन्धों की गरिमा नष्ट हो जाएगी, तो मैं नहीं चाहूँगा कि सर्वहारा सत्ता में आए। असल में, ऐसा चाहने के पीछे का एकमात्र कारण, मेरे मत से, यह है कि आदमी सोचता है, सही या ग़लत, कि ऐसे सत्ता परिवर्तन से कुछ मूलभूत मानवीय मूल्य हासिल किए जा सकेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;फ़ूको &lt;/span&gt;: जब सर्वहारा सत्ता हासिल करता है, तो बहुत मुमकिन है कि सवर्हारा जिन वर्गो पर विजयी हुआ है, उनके प्रति एक हिंस्र, तानाशाही भरी और खूनी ताक़त का इस्तेमाल करे। मैं नहीं समझ पाता कि इस में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है।&lt;br /&gt;लेकिन अगर आप मुझ से पूछें कि वे कौन से हालात होंगे कि सर्वहारा एक हिंस्र, तानाशाही भरी और खूनी ताक़त का इस्तेमाल करे, तो मैं कहूँगा कि यह तभी सम्भव है जब कि सत्ता सर्वहारा के हाथ में आई ही नहीं, बल्कि सर्वहारा से बाहर का कोई वर्ग, सर्वहारा के भीतर का कोई दल, किसी तरह की नौकरशाही या मध्यवर्ग (पेटी बुर्ज़ुआ) के तत्वों ने सत्ता हथिया ली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;चॉम्स्की &lt;/span&gt;: मैं आप की क्रांति की अवधारणा से कई ऐतिहासिक और दूसरे भी कारणों से ज़रा भी मुतमईन नहीं हूँ। मगर फिर भी यह मान लिया जाय, तर्क के लिए, कि अवधारणा के अनुसार यह सही है कि सर्वहारा सत्ता हथिया ले और उसका अन्यायपूर्ण तरीक़े से खूनी और हिंस्र प्रयोग करे, क्योंकि यह दावा किया गया है, जो कि मेरी समझ से ग़लत दावा है, कि ऐसा करने से एक अधिक न्यायपूर्ण समाज बनेगा, जिस समाज में राज्य का विलोप हो जाएगा, सर्वहारा एक सार्वभौमिक वर्ग होगा, और न जाने क्या-क्या। गर यह न्यायसंगत उद्देश्य न हो, तो सर्वहारा की इस तरह की हिंस्र और रक्तरंजित तानाशाही निश्चित ही अन्याय होगी। अब यह अन्य मामला है कि मुझे इस हिस्र और रक्तरंजित तानाशाही के विचार के प्रति बहुत शंकाएं हैं, खासकर तब जब कि वो किसी हिरावल पार्टी के स्वनियुक्त प्रतिनिधि की तरफ़ से आएं, जो, हम एक लम्बे ऐतिहासिक अनुभव से पहले से ही जानते हैं, कि इस ‘नए’ समाज पर नए शासक होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;(१९७१ में फ़ूको और चॉम्स्की के बीच एक बहस का अंश) &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 51, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 0, 51);"&gt;पू्री बहस&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;a style="color: rgb(0, 51, 0);" href="http://www.chomsky.info/debates/1971xxxx.htm"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;यहाँ पर पढ़ें&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 51, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 0, 51);"&gt;या&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;a style="color: rgb(0, 0, 153);" href="http://video.google.com/videosearch?hl=hi&amp;amp;source=hp&amp;amp;q=foucault+vs+noam+chomsky&amp;amp;um=1&amp;amp;ie=UTF-8&amp;amp;ei=efj0Su3yOJ766gP1wbgU&amp;amp;sa=X&amp;amp;oi=video_result_group&amp;amp;ct=title&amp;amp;resnum=4&amp;amp;ved=0CCYQqwQwAw#"&gt;यहाँ देखें&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 51, 0);"&gt;।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-4973569898969460663?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/4973569898969460663/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=4973569898969460663" title="7 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4973569898969460663?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4973569898969460663?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/11/blog-post_07.html" title="फ़ूको बनाम चॉम्स्की" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;Dk4MR3s8fCp7ImA9WxNUE0g.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-422064561262310806</id><published>2009-11-04T12:04:00.008+05:30</published><updated>2009-11-04T22:46:26.574+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-11-04T22:46:26.574+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="परेश कामदार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फ़िल्म" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कला" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="खरगोश" /><title>खरगोश : नारेबाज़ी नहीं कला</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SvEhfnZ0-WI/AAAAAAAACU4/Y0OWhKetcAE/s1600-h/khargosh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 174px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SvEhfnZ0-WI/AAAAAAAACU4/Y0OWhKetcAE/s320/khargosh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400134255230908770" /&gt;&lt;/a&gt;एक खुशखबरी यह है कि मेरे मित्र &lt;a href="http://www.imdb.com/name/nm0436501/"&gt;परेश कामदार&lt;/a&gt; की फ़िल्म &lt;a href="http://www.khargosh.net/"&gt;खरगोश&lt;/a&gt;  को ओसियान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पुरस्कार मिल गया है। और एक नहीं चार पुरस्कार मिल गए हैं: ज्यूरी पुरस्कार, अन्तर्राष्ट्रीय क्रिटिक पुरस्कार, ऑडियेन्स पुरस्कार, और नेटपैक पुरस्कार। किसी भी फ़िल्म के लिए चार अलग-अलग ज्यूरी के दिलों में अपनी जगह बनाना आसान नहीं होता, खरगोश ने यह करिश्मा कर दिखाया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कथाकार प्रियंवद की कहानी पर बनी यह फ़िल्म के केन्द्र में एक दस बरस के बच्चे की दुनिया और उसका नज़रिया है। उसके दुनिया में माँ है, उसके अध्यापक हैं, स्कूल है, सहपाठी हैं, एक कठपुतली वाला है, मोहल्ले की गलियाँ हैं, पीछे के खेत और खेतों के पार का जंगल है, मन के भीतर एक और बड़ा जंगल है, और सबसे बढ़कर उसके घर में किरायेदार भैया है, उनकी मोटरसाइकिल है, और मोहल्ले की छतों के आर-पार संचालित होने वाला प्रेम और उसका लक्ष्य नायिका - भैया की प्रेमिका है। मासूम बच्चा इन दो नौजवानों के प्रेम का क़ासिद बनता है और जाने कब से क़ासिद से रक़ीब की हैसियत में आने लगता है, उसे खुद पता नहीं लगता। एक तरह से यह एक बच्चे के भीतर काम के प्रस्फुटन का &lt;a href="http://in.news.yahoo.com/32/20091102/1070/ten-khargosh-is-aesthetically-driven-pra.html"&gt;कलात्मक लेखा&lt;/a&gt; है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरगोश परेश भाई की तीसरी फ़िल्म है। इसके पहले वे एन एफ़ डी सी के प्रायोजन से &lt;a href="http://www.arsenal-berlin.de/forumarchiv/forum97/f082e.html"&gt;टुन्नु की टीना&lt;/a&gt; और जुगाड़े हुए स्रोतों व दोस्तों-यारों के प्रायोजन से 'जॉनी-जॉनी येस पापा' बना चुके हैं। &lt;span style="font-style:italic;"&gt;टुन्नु की टीना&lt;/span&gt; ने बर्लिन तक का सफ़र भी किया, और दूरदर्शन के छोटे पर्दे पर भी उसे जगह मिली। &lt;span style="font-style:italic;"&gt;जॉनी-जॉनी येस पापा&lt;/span&gt; इतनी भाग्यशाली नहीं रही, तीन-चार साल से बन कर तैयार है लेकिन अभी तक वितरण नहीं हो सका है। परेश भाई एफ़ टी आई आई ने सम्पादन  में डिप्लोमा हासिल किया है और कुमार शाहणी के साथ भी काम करते रहे हैं, बाद के वर्षों में टी वी पर सीरियलों का निर्देशन भी किया। लेकिन अच्छी बात ये रही कि बावजूद पैसे के लालच के टीवी की दुनिया में रमे नहीं और कला का जोखिम उठाया। (आजकल कला का जोखिम महज़ अभिव्यक्ति का ही जोखिम नहीं, अस्तित्व का जोखिम भी बनता है) उनकी पत्नी और मेरी सहपाठी रह चुकीं गज़ाला नरगिस ने भी उन्हे इस राह पर बढ़ चलने के लिए उत्साहित बनाए रखा। उनके सहयोग के बिना यह सफ़र बहुत मुश्किल हो सकता था। और धन्यवाद है ऋषि चन्द्रा जैसे निर्माता को जिसने परेश जी को अपनी समझ से एक अच्छी फ़िल्म बनाने की पूरी आज़ादी दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म पिछले वर्ष ही बन कर तैयार हो गई थी और मुम्बई में हुए तमाम ट्रायल शो में से एक ट्रायल में मैंने भी इसका आस्वादन किया। इस तरह की फ़िल्में भारत में कम ही बनी हैं और सन अस्सी के बाद तो बिलकुल ही नहीं बनीं। असल में समान्तर सिनेमा के नाम पर भारत में जो सिनेमा बनाया गया वह मोटे तौर पर सामाजिक सच्चाई का सिनेमा था। सिनेमाई कला की बरीक़ियों का अनुसंधान और संधान करने वाले सिनेमा के साधक कम ही रहे। सत्यजित राय, ऋत्विक घटक और बिमल राय, कला और सामाजिक सच्चाई को संतुलित करते रहे। लेकिन धीरे-धीरे कला पिछड़ती गई और जिसे कथ्य कहा जाता है उसकी धार भोथरी होती गई। (बहुत लोग मानते हैं कि शिल्प और कथ्य दो अलग-अलग हस्तियाँ हैं, पर इस मसले पर मैं गोदार का मुरीद हूँ जो मानते थे कि कथ्य शिल्प की अन्तर्वस्तु है और शिल्प कथ्य का आवरण) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्यधारा के सिनेमा ने ही सामाजिक परिवर्तन को एक मसाले की तरह अख्तियार कर लिया और अगर आप भूले न हो तों मेरी आवाज़ सुनो, आज का एम एल एल राम अवतार, इंक़िलाब, अंकुश, प्रतिघात आदि फ़िल्में इसी अन्दाज़ की फ़िल्में थीं। मणि कौल और कुमार शाहणी ने ही कलात्मक सिनेमा के महीन परचम की झण्डाबरदारी की लेकिन वह नदी नब्बे आते-आते तक सूख गई। कला के जोखिम से भरी एक अनोखी फ़िल्म &lt;a href="http://www.psbt.org/directors/67"&gt;कमल स्वरूप&lt;/a&gt;  की &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Om-Dar-Ba-Dar"&gt;ओम दरबदर&lt;/a&gt;  भी अस्सी के दशक के नारेबाज़ों का शिकार हुई थी जिसे तब के ‘सचेत’ बुद्धिजीवियों ने इसलिए नकार दिया क्योंकि उसमें सामाजिक सच्चाईयों का कोई प्रगतिशील संदेश उन्हे नहीं मिल सका; आज कला के भूखे लोग खोज-खोज के वो फ़िल्म देखने के लिए मचलते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नब्बे और नई सदी के वर्षों में प्रयोग तो कई हुए पर कामयाब कम हुए। लगभग टीवी के जन्म और नई आर्थिक नीति के समान्तर ही समान्तर सिनेमा की मृत्यु हो गई। मल्टीप्लेक्स फ़िल्मों का उदय हुआ, फ़िल्मों में बड़े तकनीकि विकास हुए मगर कलात्मक विकास पिछड़ता रहा। खरगोश इन अकाल वर्षों में वर्षा की पहली फुहार की तरह हैं, उस ज़मीन पर जहाँ सिनेमाई प्रयोग के नाम पर लोग शुद्ध नक़ल, योरोपीय सिनेमा और अमरीकी इन्डेपेन्डेन्ट सिनेमा को हिन्दी की बोतल में ढाल कर पेश करने के आगे जाने से क़तराते रहे हों। खरगोश पर सिनेमा की ईरानी परम्परा का प्रभाव ज़रूर दिखता है पर किसी फ़िल्म का नहीं ज़रा नहीं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SvEhf1rfqHI/AAAAAAAACVA/z1QAksenfvA/s1600-h/DSC00671cr.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SvEhf1rfqHI/AAAAAAAACVA/z1QAksenfvA/s320/DSC00671cr.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400134259063105650" /&gt;&lt;/a&gt;फ़िल्म को विदिशा और महेश्वर की पुरानी क़स्बाई दुनिया में फ़िल्मांकित किया गया है। उसका भूगोल बच्चे की मानसिक दुनिया का भूगोल बनता है दरअसल। विवेक शाह का कैमरा और मनोज सिक्का का ध्वनि संयोजन दोनों फ़िल्म की अंतरंगता के माध्यम हैं। जैसा कि पुरस्कारों की झड़ी से ही ज़ाहिर है कि ओसियान में लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया। मेरी उम्मीद है कि यह सफलता परेश भाई को आगे तमाम ऐसी और फ़िल्में बनाने के रास्ते साफ़ करेगी और उनके दर्शक इस फ़िल्म की कला से अभिभूत होकर इस परम्परा को आगे बढ़ाएंगे।  विशेषकर इस तथ्य की रौशनी में कि आजकल सामाजिक संदेश को प्रसारित करने का बीड़ा मनोरंजन टीवी ने अपने हाथ ले लिया है, और सिनेमा की ज़मीन का संकट गहरा गया है.. या शायद ये बेहतर हुआ है!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-422064561262310806?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/422064561262310806/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=422064561262310806" title="10 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/422064561262310806?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/422064561262310806?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/11/blog-post_04.html" title="खरगोश : नारेबाज़ी नहीं कला" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SvEhfnZ0-WI/AAAAAAAACU4/Y0OWhKetcAE/s72-c/khargosh.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DUUBRX47eSp7ImA9WxNUEkk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-8282569870824366600</id><published>2009-11-03T12:14:00.010+05:30</published><updated>2009-11-03T16:50:54.001+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-11-03T16:50:54.001+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="इतिहास" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="माओवाद" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राज्य" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आदिवासी" /><title>राज्य की नैतिकता और तमाम उलझे सवाल</title><content type="html">माओवादियों की नीति और हिंसा के खिलाफ़ लिखे मेरे &lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/10/blog-post_31.html"&gt;पिछले लेख&lt;/a&gt; को कुछ पाठकों ने उसे आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ़ भी समझ लिया। और यह भी समझ लिया कि मैं राज्य की हर उलटी-सीधी हिंसा और अन्याय का समर्थक हूँ। शायद लेख के शीर्षक से ऐसा बोध हुआ है। ऐसा नहीं है, मैं राज्य की हिंसा का समर्थक नहीं हूँ और मैं पूरी तरह से चाहता हूँ कि आदिवासियों के साथ न्याय हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह राज्य और लोकतंत्र दोनों ही विभिन्न प्रकार रोगों, दोषों से आक्रान्त है लेकिन मैं शरीर में बुखार या दूसरा कोई रोग हो जाने पर हाथ-पैर फेंक कर उससे लड़ने या हताश हो कर ये सोचने कि ‘अब तो मर ही जायेंगे’ की जगह रोग को समझ लेने और उपलब्ध ज्ञान और पिछले अनुभवों के आधार पर उपचार में क्या-क्या कष्ट आने वाला है, उसे जान लेना अधिक बेहतर समझता हूँ। मुझे लगता है कि इस मामले में बहुत सारे लोग राज्य और सरकार के खिलाफ़ एक प्रकार के हताश आक्रोश से भरकर विरोध कर रहे हैं। जैसे कि देखा कि मित्र &lt;a href="http://lokshahi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html"&gt;आनन्द प्रधान&lt;/a&gt; ने चिंता व्यक्त की है कि देश में अघोषित आपातकाल लगने वाला है। &lt;a href="http://samkaleenjanmat.blogspot.com/2009/10/blog-post_28.html"&gt;अरुंधति&lt;/a&gt; मानती हैं कि इस देश में लोकतंत्र ही नहीं है एक ढकोसला है। और भी बहुत सारे बुद्धिजीवी चिंतक ऐसी ही चिंताए व्यक्त कर रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतंत्र क्या है? रूसो, वालतेयर के नवजागरण के विचारों और फ़्रांसीसी क्रांति के गर्भ से जन्मा यह शासनतंत्र बंधुता, समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों पर आधारित हुआ। लेकिन जन्म लेते ही खुद फ़्रांस में इसका अस्तित्व खतरे में पड़ा रहा और एक समय चक्र के बाद ही इसकी पुनर्स्थापना हो सकी। ब्रिटेन, अमरीका और अन्य योरोपीय देशों में यह फिर भी एक कुदरती चाल से क़ाबिज़ हुआ, भारत में लोकतंत्र लगभग ऊपर से आरूढ़ हुआ। जनता लोकतंत्र के लिए नहीं अंग्रेज़ो को बाहर करने के लिए आन्दोलन कर रही थी। अंग्रेज़ बाहर गए उनका बनाया तंत्र रह गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तंत्र की ज़रूरत, पहुँच और क्षमता कहाँ तक थी और कितनी थी, यह सब कहना मुश्किल है। माओवादी तो मानते हैं कि हम अभी भी अर्धसामन्ती समाज में हैं (फिर भी लड़ाई पूँजीवाद और साम्राज्यवाद से?)। लेकिन हमारे लगभग सभी बुद्धिजीवी संवाद के समय एक ऐसी जगह से अपनी बात शुरु करते हैं जहाँ पर लोकतंत्र एक ऐसा खूबसूरत और कल्याणकारी लिबास है जो सरकार ठीक से पहन नहीं पा रही और जगह-जगह से उघड़ जा रही है। गोरख पाण्डेय के गीत की एक पंक्ति है : &lt;a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6_/_%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%96_%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%AF"&gt;समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई&lt;/a&gt;। गीत व्यंग्य में है पर मैं मानता हूँ कि क्रांतिकारी समाजवाद की गति हम देख चुके हैं, जल्दी में बहुत नुक़्सान भी हुए। और अभी तो ये लगता है कि लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे आई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य का स्वरूप आज जैसा है, हमेशा वैसा नहीं था। मेरे मित्र &lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/10/blog-post_31.html#comment-4973939720713567917"&gt;आशुतोष&lt;/a&gt; आज के इस राज्य को अन्याय की मशीनरी मानते हैं, है, पर मेरा आग्रह है कि वर्तमान की आलोचना करते हुए आदर्शों और सुनहरे सपनों को तो नज़र में ज़रूर रखें पर उसका इतिहास भी मत भूल जाइये। ऐतिहासिक रूप से हम जिसे भारत का स्वर्ण काल समझते हैं –मुग़ल काल – उस दौर में व्यक्ति को सम्पत्ति का अधिकार नहीं होता था, सबै भूमि गोपाल की नहीं, बादशाह की होती थी। जब जिस को चाहे दी जब चाही वापस ले ली। आज रहीम खानखाना बड़े अच्छे हैं कल मन उखड़ गया सब कुछ छीन-छान कर भिखारी बना दिया। कल तक जो दसहज़ारी सरदार था, जंग में काम आ गया या बादशाह रूठ गए, दी हुई जागीर वापस ले ली, यहाँ तक कि मकान और सौगातें भीं। दसहज़ारी सरदार का सारा खानदान दाने-दाने को मोहताज़ हो गया। यह हाल मनसबदारों का हो सकता था तो आम जन के क्या हुक़ुक़ थे, पूछे जाने की ज़रूरत है क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेज़ो के सत्ता में आने के पहले आलम ये था कि पूरा ‘देश’ (उस वक़्त देश क्या था, ठीक-ठीक कहना मुश्किल था, लोग दूसरे गाँव जाकर भी परदेसी हो जाते थे) घोड़ों की टापों के नीचे लगातार रौंदा जा रहा था। बरसात के चार महीने जब नदियां उफ़न कर सेनाओं की आवाजाही पर रोक लगा देतीं, साल भर मराठे, ईरानी, तूरानी, अफ़्गान, जाट, रोहिल्ले, और सिक्ख आपस में तलवार भांजते रहते। इसी सब के बीच पिंडारी भी थे जो राजस्थान में टौंक से निकलते और कर्णाटक के दक्षिणी इलाक़ो तक गाँव-गाँव को लूटते और आग लगाते जाते। कई बार ऐसा होता कि एक गाँव साल में तीन-चार बार अग्नि को समर्पित हो जाता। ऐसी हालत से बचने के लिए कुछ गाँवो ने शहरपनाह की तर्ज पर गाँवपनाह की चहारदीवारियां बना रखी थीं ताकि लुटेरों और चौथ लेने आने वाली फ़ौजों से कुछ सुरक्षा मिले। पर चौथ के भूखे लड़ाके गाँव वासियों के खिलाफ़ तोप का भी  इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज हमारी ज़बान अंग्रेज़ो को गाली देती नहीं थकती लेकिन सच तो यह है कि उनहोने इस भूमिखण्ड को एक भयंकर अराजकता से मुक्ति दिलाई। अराजकता का आतंक कैसा होता था इसे बनारसी दास ने अपनी किताब &lt;a href="http://shabdavali.blogspot.com/2009/04/4.html"&gt;अर्धकथानक&lt;/a&gt; में लिखा है कि जब उनके गाँव में पता चला कि अकबर की मौत हो गई तो लोग-बाग़ के दिल संदेह और भय से दहल उठे। लोगों ने अपने कीमती वस्त्र और गहने ज़मीन में गाड़ दिये। और बहुत से लोग अपनी-अपनी सम्पत्ति को लेके इधर-उधर भागने लगे। हर आदमी घर की रक्षा के लिए हथियार एकत्र करने लगा। ऐसी अराजकता का आलम अकबर महान के मरने पर था।  अठारहवीं सदी का जो हाल जो हुआ वो हमारे लिए अकल्पनीय है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाह आलम की सत्ता दिल्ली से पालम तक सिमट कर रह गई थी। मगर उसके बहुत पहले यानी १७०७ में औरंगज़ेब की मौत के ठीक बाद से ही अस्थिरता घर कर गई थी और पूरी सदी पूरे देश का नक़्शा और मिल्कियत लगातार बदलता रहा। रात को सोते समय कौन राजा था और सुबह जागते समय कौन- कोई ठीक-ठीक नहीं कह सकता था। कितने मुग़ल सलातीन अंधे किए गए, उनकी औरतों को लज्जित किया गया, गिनती मुश्किल है। खुद शाह आलम उनके एक पुराने वफ़ादार के हाथों अंधे हुए। ऐसी हालत में आम जन किस असुरक्षा की मानसिकता में जीते होंगे, ये जानने के लिए कभी मौक़ा लगे तो ‘मीर की आप बीती’ पढ़ लीजियेगा, सूरते हाल साफ़ हो जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन अंग्रेज़ो के खिलाफ़ हमने १७५७ से लड़ना शुरु किया, १८५७ में महासंग्राम किया, और १९४७ तक लड़ते रहे, वो अंग्रेज़ वास्तव में इतिहास की एक प्रगतिशील शक्ति थे, ये बात हम आज समझ सकते हैं। उस व़क्त वो विदेशी हमारे दुश्मन थे जो हमारे देश को बुरी तरह से अपनी छवि में ढाल रहे थे, हमारी मर्ज़ी, परम्परा और संस्कारों के विरुद्ध। आज हम जो भी लोकतंत्र, जनतंत्र, मानव अधिकार के नाम पर जिन भी चीज़ों का जाप करते हैं, वो हमारी अपनी सोच नहीं है, अंग्रेज़ो के साथ यूरोप से आयातित चिंतन है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम आज अमरीका द्वारा इराक़ और अफ़्ग़ानिस्तान में की जा रही सैनिक कार्रवाई के खिलाफ़ बोलते नहीं थकते। हम ऐसे किसी देश का दूसरे देश पर हमला कर देना ग़लत मानते हैं। ग़लत है.. पर किस नैतिकता के आधार पर? हमारी भारतीय परम्परा में इस तरह के आपसी युद्ध को लेकर 'मानवीय' नैतिकता का कोई आग्रह नहीं रहा। (बुद्ध और महावीर की अहिंसक परम्परा को छोड़ दें तो) उलटे लड़ना और रणभूमि में शहीद होना एक योद्धा के लिए उच्च नैतिक मूल्य है। कहा ही गया है कि वीर भोग्या वसुंधरा। और इस भोग की शुरुआत युद्ध जीतते ही लूट-पाट से आरम्भ हो जाती, जिसे विजेता का अधिकार माना जाता। सबसे बड़ा लुटेरा राजा कहलाने का अधिकारी होता था। (आज वीर भोग्या वसुंधरा मानने वालों को हम अपराधी कहते हैं)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्लामिक नैतिकता का युद्ध के बारे में क्या नज़रिया है? अब जब मुहम्मद साहब और खुल्फ़ा उल रशीदुन ही खुद युद्ध का परचम उठा कर चले हो और पराजित जातियों के मर्दोज़न को गु़लाम बनाने की रवायत बरक़रार रखी हो तो इस्लामिक नैतिकता में कोई शुबहे की गुंज़ाइश नहीं है। मुहम्मद साहब ने ७०० यहूदियों के गले इसलिए कटवा दिए थे क्योंकि उन्हे शक़ था कि वो उनके साथ ग़द्दारी करने वाले थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विष्णु भट्ट गोडशे की एक किताब है- माझा प्रवास। इस किताब में १८५७ की गदर का आँखो देखा वर्णन है। झांसी में अंग्रेज़ो की लूट के समय लेखक वहीं थे; लिखते हैं कि लूट सात दिन चली। पहले दिन अंग्रेज़ सिपाहियों ने लूटा। उनको देख कर भूसे के ढेर में छिप गए लोगों को आग लगा कर जला देते। कुँए में कूदते तो बन्दूक लेकर जगत पर जम जाते-लोग डूबकर मरते या गोली खाकर। खोज-खोज कर लोगों को मार गया- आम जनों को। इस लूट को विजन कहा गया – जनविहीन कर देने की प्रक्रिया। तीन दिन गोरों ने सोना, चांदी, रूपया-पैसा, ज़ेवर आदि लूटा। चौथे दिन काले मन्दराजी लोगों ने बर्तन भांड़े लूटे। अगले दिन हैदराबाद वालों के नाम; उन्होने कपड़े लूटे। उसके बाद रियासती पलटनें आईं, उन्होने अनाज लूटा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबर ने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उसे लोगों को मारकर उनके कटी हुई खोपड़ियों का पहाड़ बनाने का शौक़ था। हर लड़ाई के बाद ऐसा ज़रूर किया जाता; शायद अपने प्रतिद्वन्दियों के दिल में खौफ़ पैदा करने के लिए। अहमद शाह अब्दाली ने भी इस पुरानी परम्परा को अपने भारत अभियान में जारी रखा। हलाकू ने बग़दाद शहर को क़त्लेआम के बाद जला कर राख कर दिया था। दिल्ली कितनी बार उजड़ी है, कोई हिसाब नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और हर छोटी-बड़ी लड़ाई के बाद औरतों का क्या हाल होता था, इसके लिए किसी कल्पना शक्ति की ज़रूरत नहीं है। कहते हैं कि आज दुनिया में चंगेज़ खान के सबसे अधिक वंशज है; कैसे, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। इस पृष्ठभूमि में अगर आप इराक़ और अफ़्ग़ानिस्तान का युद्ध देंखे तो आप को मानवीय लग सकता है। अबू ग़रीब की यातना जैसी घटना को छोड़ दें तो अमरीकी फ़ौजों ने न तो लूट-पाट की और न ही बेवजह हत्या-बलात्कार। (भाई मेरे, कृपया इसे अमरीकी नीति का अनुमोदन समझ कर चढ़े मत आईयेगा, ज़रा ठण्ड रखकर पढ़िये, बात-बात पर तलवार मत निकालिए हे मानवतावादी!)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मसला यह है कि आम जीवन में ‘मानवीय’ मूल्य और युद्ध में भी मानवता बरतने की जो नीति विकसित हुई है यह शुद्ध योरोपीय चिन्तन है और आधुनिक काल में पैदा हुआ है। कुछ लोग इस कारुणिक विचार की उत्पत्ति इमैन्वल कान्ट के दर्शन से देखते हैं। जो भी हो, जिस नैतिकता के दम पर हम अमरीका को गाली देते हैं, उस का ठीक-ठीक आगा-पीछा भी हमें नहीं मालूम। वो कैसे, किस रस्ते से हम तक पहुँची, और कैसे वह हमारी और हम उसके मालिक बन बैठे, हम नहीं जानते। हम उदार जन जिन मानवीय मूल्यों की बात-बात पर दुहाई देते हैं वो आम जन (राज्य के कर्मचारी, अधिकारी, सिपाही, सैनिक आदि भी) के भीतर कितने आत्मसात हैं, हमें नहीं मालूम। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जिस जीवन को जी रहे हैं, जिन सुविधाओं को भोग रहे हैं, क्या उस के लिए ‘हम’ ने संघर्ष किया है? क्या वो ‘हमारी’ आंकाक्षाओं और प्रयत्नों का परिणाम है? भारत में स्त्रियों को मताधिकार मिला,  दलितों को आरक्षण मिला है, इसके लिए भारतीय स्त्रियों और दलितों ने कितना संघर्ष किया? क्या क़ुर्बानियां दी? तो फिर बिना संघर्ष, बिना बलिदान के कैसे मिल गयी उनको यह वरीयता? औरतों को मताधिकार योरोप के देशों में लम्बे संघर्ष के बाद मिला (और वो भी मिला क्योंकि स्त्री स्वातंत्र्य पूँजीवाद की ज़रूरत है, उसे सस्ता मज़दूर चाहिये) भारत में यूँ ही मिल गया?  कैसे? बिना लड़े ये लड़ाईयां कैसे जीती जा रही हैं? वो कौन सी शक्ति है जो इस बदलाव के पीछे है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद हमें यह मानने की ज़रूरत है कि कुछ अधिकार माँगने से, लड़ने से मिलते हैं, और कुछ बहुत लड़ने पर भी नहीं मिलते क्योंकि उनके लिए ऐतिहासिक परिस्थिति परिपक्व नहीं थी, और कुछ बैठे-बिठाए मिल जाते हैं क्योंकि वो इतिहास की ज़रूरत हैं। सोचिये इन में से कुछ अधिकार हमें अंग्रेज़ो के समय में ही हासिल हो गए थे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर क्या दबाव थे जिसके तहत अंग्रेज़ो ने मताधिकार और प्रतिनिधित्व जैसे ये अधिकार हमारी तरफ़ बढ़ा दिए थे? लोकप्रिय शासक अकबर के समय ऐसा क्यों नहीं हो सका? योद्धाओं की सन्तान उस अकबर ने तो ज़मीनदार, मनसबदार, जागीरदार और सूबेदार की श्रेणियों में ही सत्ता का वितरण करके मान लिया कि जनता का प्रतिनिधित्व सम्पन्न हो गया, चुनाव और मताधिकार जैसी बात उसके ख्याल में भी नहीं आई, बावजूद उसकी सारी भलमनसाहत के। लेकिन ‘सौदागर’ अंग्रेज़ ने सत्ता के बाज़ार को जन-जन तक फैला दिया और आमजन को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दे दिया। इस अधिकार को हमें मिले लगभग अस्सी बरस से भी ऊपर हो गया लेकिन कितनी अजीब बात है कि हम आज भी अपने लिए ज़मीनदार, मनसबदार, जागीरदार और सूबेदार ही चुनते हैं, अपने प्रतिनिधि नहीं। ये दोष राज्य का है कि जनता का? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये ठीक बात है कि राज्य हमारे जीवन की अधिकतर बातों का नियन्ता है और उसने ही हमें शिकायत करने का भी हक़ हमें नियत कर दिया है। पर हमारी भी आदत हो चुकी है सारी समस्याओं को किसी एक संस्था के मत्थे मढ़ कर छुट्टी पाने की। ये प्रवृत्ति हमारी अपने जीवन की स्वयं ज़िम्मेदारी न लेने और हर बात के लिए ईश्वर पर निर्भर होने की आदत का अवशेष है। ईश्वर से हमारी शिकायतों का सिलसिला थमता नहीं दिखता। हम बजाय पुरुषार्थ पर विश्वास करने के हर चीज़ के लिए ईश्वर के आगे झोली फैलाये खड़े रहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(वैसे कुछ चीज़ों का ठीकरा हम अंग्रेज़ों के सर भी फोड़ते हैं जैसे कि साम्प्रदायिकता; अच्छे-खासे प्रगतिशील लोग इस बात पर विश्वास करना पसन्द करते हैं कि अंग्रेज़ो के पहले भारत में साम्प्रदायिक मन-मुटाव नाम की चीज़ थी ही नहीं। एक मिसाल के तौर पर अशफ़ाक़ुल्ला खाँ के बारे में खुद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनके साथ आने से सिद्ध हो गया कि मुसलमान ग़द्दार नहीं होते- क्या ऐसी बातें सौ-पचास बरस के अंग्रेज़ों के षडयन्त्र से किसी के मन में बैठ सकती हैं या उसके लिए आपसी नफ़रत का एक लम्बी विरासत होनी चाहिये?) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रवृत्ति की सबसे अच्छा उदाहरण शिरडी के साईं बाबा के भक्त हैं: साईं बाबा का दो शब्दों का संदेश है- श्रद्धा और सबुरी; उनके भक्तों में न तो श्रद्धा है और न सबुरी, शिरडी जा के माँग-माँग कर उन्हे मरने के बाद भी हकालते रहते हैं। ऐसे अनास्था वाले लोग – हम सभी, भले ही हम साईं बाबा के भक्त हो या न हों, इस दोष के रोगी हैं – राज्य के प्रति भी ऐसी ही अनास्था से पेश आते हैं। ये नहीं है, वो नहीं है, ये नहीं दिया, वो नहीं दिया। कोई विपदा आती है तो टीवी का कैमरा आते ही लोग शुरु हो जाते हैं, हमें तो कोई पूछने नहीं आया, किसी ने हमारी खबर नहीं ली? सवाल यह भी पूछना चाहिये लोगों ने एक-दूसरे की कितनी मदद की? &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वेलफ़ेयर स्टेट (पहले थे, अब पता नहीं हैं कि नहीं) का तो काम है लोगों की मदद करना लेकिन इस स्थिति को अठाहरवीं सदी से तुलना कर लें और समझें। सरकार/राज्य किसी ईश्वर का स्थानापन्न है – ईश्वर के प्रति तो हम उच्छवास भरते हुए कहते हैं कि हे ईश्वर कहाँ हो तुम - लेकिन सरकार को सीधे गरियाते हैं। क्योंकि वो हमारी प्रतिनिधि है, उसे हमारे हित में काम करना चाहिये, लेकिन वो करती नहीं, क्योंकि हमारे प्रतिनिधि हमारे नहीं किसी पूँजीपति के प्रतिनिधि हैं। एक बार फिर से- क्या इस का दोष राज्य का है कि जनता का? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी इस अनास्था के चलते हमारे भीतर की उद्यमता पर भी असर पड़ा है, वो भी गहरे तौर पर भ्रष्ट हो चली है। किसी भी काम को हम पूरी शिद्द्त और मनोयोग से कर ही नहीं पाते। थोड़ी सी सुख-सुविधा और ऐशो आराम हमारी नैतिकता और आदर्श को ढहा देने के लिए काफ़ी साबित होते हैं। मुस्लिम हितों की बात करने वाले क्रांतिकारी अपने राजनैतिक करियर के लिए उन्ही के शक़-शुबहों के सहारे उनका शोषण करने लगते हैं। मज़दूरों के महान नेता, कोकाकोला को देशनिकाला देने वाले जार्ज साहब किस गली में जा कर फ़ंसते हैं। अपने भीतर की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करने निकले कविवर पुरुस्कारों की जुगाड़ू राजनीति में दण्ड पेलने लगते हैं। बाक़ी छोड़िये देखिये उदाहरण शिबू सोरेन और मधु कोडा का, आदिवासियों के बीच से निकले उनकी आकांक्षाओं को स्वर देने के लिए लेकिन कहाँ जा गिरे? क्या इन के पतन पीछे सरकार और राज्य का चरित्र ही उत्तरदायी है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य से पहले हम एक समाज हैं और समाज से पहले हम एक व्यक्ति। व्यक्ति के रूप में हम कितने नैतिक हैं? ये कौन सी बात है कि गूँहू रोटी को गाली दे कि वो बेस्वाद है? ये बात ठीक है कि राज्य का जो स्वरूप हमें मिला है उसे वैसा बनाने में हमने कोई भूमिका नहीं निभाई है, मगर सरकार तो हमारी ही अभिव्यक्ति है न? और अगर हम राज्य के इस स्वरूप से असंतुष्ट हैं तो हमारे पास कोई विकल्प तो होना चाहिये? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माओवादियों के विकल्प की चर्चा मैं पिछले लेख में कर चुका हूँ, वो मेरी समझ से वरेण्य नहीं है। अरुंधति से जब पूछा गया तो उन्होने कहा कि उनके पास कोई मैनिफ़ेस्टो नहीं है। यही हाल देश के सभी (ग़ैर-मार्क्सवादी) असंतुष्ट बुद्धिजीवियों का है: उनके पास शिकायतें तो हैं, सवाल तो हैं पर विकल्प नहीं है। अरुंधति का जो&lt;a href="http://www.outlookindia.com/article.aspx?262519"&gt; लम्बा लेख आउटलुक में&lt;/a&gt; छ्पा है उसकी मुख्य बातें निम्न हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१) आदिवासी जंगल- पहाड़-नदी के साथ एकाकार हैं (जैसे आदिकाल में सभी मनुष्य थे)&lt;br /&gt;२) बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आदिवासियों की इस सम्पदा पर नज़र गड़ा के बैठी हैं और उसे हथियाने के लिए कार्यरत हैं।&lt;br /&gt;३) यह सम्पदा एक अनुमान के अनुसार चार ट्रिलियन (१२ शून्य) डालर्स की है, भारत के जीडीपी से कई गुना अधिक।&lt;br /&gt;४) देश की सरकार ने ऐसी बहुराष्टीय कम्पनियों के साथ समझ के समझौते कर रखे हैं जिसके तहत ७-८% के हिस्सेदारी पर भारत सरकार यह सम्पदा उनके हवाले कर देगी। &lt;br /&gt;५) इस मुनाफ़े में आदिवासियों को कोई हिस्सा नहीं मिलेगा, जो उसके असली मालिक हैं। &lt;br /&gt;६) उलटे उन्हे अपने घर, गाँव, और वातावरण –जिसके साथ वो एकीकृत हैं –से बेदखल कर दिया जाएगा।&lt;br /&gt;७) माओवादियों ने आदिवासियों के असंतोष को स्वर दिया है, पर वो बरगलाए हुए नहीं है, उनकी अपनी एक लड़ाकू परम्परा है। &lt;br /&gt;८) माओवादियों के साथ उनकी इस हथियारबन्दी से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खनन का अपना काम नहीं कर पा रहीं। &lt;br /&gt;९) सरकार पर इन समझौतों को निभाने के लिए दबाव बढ़ रहा है औरे जिसके कारण वो इस समस्या को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रही है।&lt;br /&gt;१०) वही सरकार जो विकास के नाम पर विस्थापित पाँच करोड़ लोगों का पुनर्वास नहीं कर सकी, उसे ३०० सेज़ बनाने के लिए १,४०००० हेक्टेयर ज़मीन मिल जाती है।&lt;br /&gt;११) सरकार के साथ-साथ (चिदम्बरम वेदान्ता के लिए वक़ील और डाइरेक्टर के पद भी सम्हाल चुके हैं) अदालतें भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों बिक चुकी हैं। &lt;br /&gt;१२) और जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए माओवादियों के दम-खम और आतंक का हौवा बना रही है ताकि उनके बहाने आदिवासियों को रौंदा जा सके और साथ ही दूसरी लोकतांत्रिक आवाज़ों को भी। &lt;br /&gt;१३) सरकार उनसे बात तक करने को तैयार नहीं वह युद्ध चाहती है बस।  &lt;br /&gt;१४) पूँजी के हाथ की कठपुतली मीडिया सरकार का प्रवक्ता बना हुआ है, और कोई स्वतंत्र रपट करने के बजाय सरकार की भाषा बोल रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोटे तौर पर इनमें से शायद ही कोई ऐसी बात हो कि जिसका कोई संवेदनशील व्यक्ति विरोध करेगा। बंधुता, समानता और स्वतंत्रता के मूल्य हम सभी ने भीतर तक स्वीकार कर लिए हैं (ये सवाल भी उठता है कैसे अपना लिए हैं, बिना उन पर विचार किए, क्योंकि वो खुद व्यवस्था द्वारा प्रचारित हैं; और सच में कितने अपनाए हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यापक जन भीतर अभी भी किसी अन्य नैतिक मापदण्ड के सहारे हैं) और ये जो हो रहा है इन आदर्शों से मेल नहीं खाता। ज़ाहिर तौर पर अत्याचार हो रहा है। मैं इस अत्याचार का विरोध करता हूँ और चाहता हूँ कि पर्यावरण की हानि न हो, जंगल-पहाड़-नदी की पवित्रता बनी रही, पर मेरे चाहने और विरोध करने भर से क्या होता है। इतिहास बड़ा क्रूर है उसकी विशाल नदी के बीच मेरी नन्ही वैचारिक (और तमाम दूसरों की ठोस आन्दोलित) चेष्टाएं क्या बिसात रखती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस नदी की धारा को पलटने के लिए जिस प्रकार की हिंसा और नरबलि लगेगी उस के प्रति हम अहिंसक उदारजनों का क्या नज़रिया होगा, यह भी सोचना चाहिये। माओवादी तथा दूसरे पके हुए राजनीतिकर्मियों को कोई शुबहा नहीं होता, वो अपनी तरह की व्यवस्था लाने के लिए हर क़ुरबानी देने के लिए तैयार रहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वयं अरुंधति भी जानती हैं कि माओवादी, आदिवासियों की बलि देकर आम जनता के आगे नरसंहार का एक विहंगम दृश्य खड़ा कर के अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने की नीति खेल सकते हैं। लेकिन फिर भी वो उनके समर्थन में इसलिए जाती  हैं क्योंकि उन्हे इस कॉरपोरेट पूँजीवाद के अधिक समाजवादी तंत्र पर भरोसा है (फिर भी ये सवाल रह जाता है कि उसमें पर्यावरण के मसलों की जगह कहाँ रहेगी?), इसीलिए अरुंधति जिस मुखर स्वर से राज्य की हिंसा की आलोचना करती हैं माओवादी हिंसा की नहीं करतीं। यानी विरोध हिंसा का नहीं, हिंसा के चरित्र का है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप तय कीजिये कि आप किस हिंसा के हिमायती हैं। हिंसा से छुटकारा नहीं है। बुद्ध की शिक्षाएं पा कर भी जापानी हिंसा के पुजारी बनी रहे। गाँधी बाबा अहिंसा-अहिंसा करते रहे, देश उन्हे बापू, महात्मा कहता रहा और जब देश आज़ादी की बारी आई तो लाखों लोग अल्लाहोअकबर और हरहरमहादेव कह कर लड़ मरे। हिंसा की ऐसी सर्वव्यापकता के बावजूद हम हिंसा को अनैतिक मान कर अपना पक्ष चुनते हैं, मैं भी – ऐसा है अपने युग की नैतिकता का दबाव। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी इच्छा है कि सरकार और माओवादी के नेतृत्व में आदिवासी जन बातचीत करें और सरकार उनकी ज़मीन का उन्हे उचित मुआवज़ा दे, और साथ ही यह भे सुनिश्चित करे कि पर्यावरण की हानि न हो या कम से कम हो। ऐसा चाहने वाले किसी भी नागरिक आन्दोलन का मैं समर्थन करता हूँ। साफ़ तौर पर मैं नहीं चाहता कि मार-काट हो, मैं नहीं चाहता कि माओवादी प्रबल होकर इस राज्यतंत्र को कमज़ोर करें और १८ वीं सदी वाली अराजकता का परिदृश्य दोहराया जाय। पर ये सब सदिच्छाएं हैं, देखें ऐसा सम्भव हो पाता है कि नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-8282569870824366600?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/8282569870824366600/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=8282569870824366600" title="12 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/8282569870824366600?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/8282569870824366600?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/11/blog-post.html" title="राज्य की नैतिकता और तमाम उलझे सवाल" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkMDRHcyeip7ImA9WxNVGUs.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-8012231041878725773</id><published>2009-10-31T07:42:00.007+05:30</published><updated>2009-10-31T11:24:35.992+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-10-31T11:24:35.992+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="माओवाद" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="रा्जनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नक्सलवाद" /><title>एक निर्मम राज्य के पक्ष में</title><content type="html">बावजूद इसके कि लोकतांत्रिक राज्य अभी भी, मानवाधिकारों को अनदेखा कर के अपनी प्रजा का दमन करता है, और एक विशेष वर्ग के हित में समाज के दूसरे वर्गों के शोषण को प्रायोजित करता है, ऐतिहासिक तौर पर अब तक लोकतांत्रिक राज्य ही सबसे उदार और मानवतावादी सिद्ध हुआ है- और वो व्यवस्थाएं जो अपने को मनुष्य के विकास की आगे की अवस्थाएं मानती थीं, कहीं अधिक क्रूर और दमनकारी सिद्ध हुईं जैसे समाजवाद और साम्यवाद। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में चल रहे आन्दोलनों, विशेषकर कश्मीर के हुर्रियत आन्दोलन और आदिवासियों के बीच जंगल के अधिकार को लेकर माओवादियों द्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन, के सन्दर्भ में हमें ये समझने की ज़रूरत है कि राज्य कोई व्यक्ति नहीं है कि जिसकी पकड़ संवेदना के नदी के प्रवाह में बह कर अचानक ढीली पड़ जाएगी और वो कश्मीरियों को उनकी आज़ादी ले लेने देगा और आदिवासियों को उनके जंगल। राज्य हज़ारों साल के मनुष्य के इतिहास में विकसित एक जटिल सरंचना है जो अपने अस्तित्व को विलीन नहीं होने दे सकती न अपनी विघटन को सहन कर सकती है। ऐसे ही नहीं टूट गई बर्लिन वाल; उसके टूटने की पूर्वशर्त थी एक राज्य का विघटन, जैसा कि हुआ। और ये बात बेहद बचकानी है कि कोई किसी राज्य से यह उम्मीद करे कि वो अपने क़ब्ज़े की ज़मीन छोड़ दे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये एक अजीब विरोधाभास है : हमारे भारत के उदारवादी भद्रजन सबसे प्रगतिशील लोग, सबसे पिछड़े जन के साथ मोर्चाबद्ध हैं। मात्र विरोध दर्ज करने के लिए? या वे सच में विश्वास करते हैं कि भविष्य का समाज यही लोग  गढ़ेंगे? मैं समझ नहीं पाता कि कश्मीर में कट्टर जमाते इस्लामी के नेता सैयद अली शाह गिलानी जैसे शख्स के हाथ में यदि सत्ता आएगी तो वह किस तरह के लोकतंत्र का निर्माण करेगा? चलिए उन्हे छोड़ दें और मान लीजिये कि हुर्रियत के दूसरे धड़े मीरवाइज़ (यानी इस्लाम के उपदेशक) उमर फ़ारुख ही अगर अगुआ हुए तो? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीर वाइज़ पेशे से एक मौलवी हैं एक ऐतिहासिक मस्जिद के मुल्ला - कुछ ऐसे समझें कि जैसे कि अपने जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी साहब। जो लोग भूल गए हों वे कृपया याद कर लें कि शाही इमाम साहब ने हमारी अपनी उदार मानवतावादी नायिका शबाना आज़मी के बारे में क्या उद्गार प्रगट किए थे एन डी टी वी के एक कार्यक्रम पर। हो सकता है कि व्यक्तिगत रूप से मीरवाइज़ बेहद उदार और भले हों पर जिस विचारधारा के वे प्रवक्ता हैं वो बेहद दमनकारी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा मानना है कि कहीं न कहीं औद्योगिक विकास एक ऐसी छंछूदर बन चुका है जिसे अब सिर्फ़ निगला जा सकता है, उगला नहीं। साम्राज्यवादी शक्तियों और उनके ऐतिहासिक अन्याय से लड़ने की एक अन्य मिसाल ज़िम्बाब्वे में राबर्ट मुगाबे भी हैं –जिन्होने सौ-डेढ़ सौ साल पहले गोरों द्वारा की हुई ज़मीन की लूट का इंसाफ़ तो कर दिया मगर देश, समाज और अर्थव्यवस्था का कबाड़ा कर दिया। ज़िम्बाब्वे अब शायद एक महामारी बन चुका है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वयं अपने गांधी जी भी एक रामराज्य का सपना देखते थे। उनका मानना था इस समाज की सबसे बड़ी बुराइयों में वक़ील और डॉक्टर हैं। वक़ीलों और डॉक्टरों दोनों के व्यवहार से मैं भी बहुत क्षुब्ध रहता हूँ, मगर गांधी जी के रामराज्य में दलितों की जगह को लेकर अम्बेडकर को क्या आपत्ति थी इसे नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता। उनके ग्रामीण समाज में जातीय रिश्ते सिर्फ़ सवर्णों की सहृदयता के बंधुआ होते। क्या वो हमें, उदार मानवतावादियों को स्वीकार्य है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर मुझ से पूछा जाय कि मुझ किन आदर्शों में विश्वास है तो शायद मैं एक अराजकतावादी सिद्ध हो जाऊँ। जहाँ न राज्य है, न पुलिस, न क़ानून, आदमी प्रकृति के साथ एकाकार है और ‘जीवनयापन के लिए काम करना’ मानवता का अपमान है। पर क्या मैं आज के समाज में इन आदर्शों के साथ जी सकता हूँ? यदि मैं भारत सरकार से माँग करूँ कि पुलिस और क़ानून का अन्त कीजिये और उसके बाद खुद भी विलोप हो जाइये और जेन्टलमैनली मनमोहन सिंह मेरी माँग मान कर सब कुछ समाप्त कर के अपने आसाम वाले घर में पलायित कर जाएं तो क्या मेरे आदर्शों का अराजक समाज क़ायम हो जाएगा? या पलक़ झपकते ही हरियाणवी गुण्डे/ बिहारी बाहुबली/इस्लामी आतंकवादी/हिन्दू हलकट अपने-अपने शक्ति-वृत्त बना लेंगे और समाज में व्यवहारिक अराजकता क़ायम हो जाएगी। दार्शनिक अराजकता और व्यवहारिक अराजकता में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे खेद है कि इस देश में आत्महत्या कर रहे ग़रीब किसानों और अपने ही ज़मीन से बेदखल किए जा रहे आदिवासियों, और क़ानून ताक़ पर रखकर सताए जा रहे नक्सलियों के प्रति अपनी सारी चिन्ताओं के बावजूद मैं माओवादियों की हिंसा का समर्थन नहीं कर सकता। क्योंकि मुझे पूरा भरोसा है कि एक बार माओवादी लड़ाकू मानवता से द्रवित होकर अपने दुश्मन (आम सिपाही) को गोली मारने से हिचकिचा सकता है, लेकिन राज्य तंत्र की नमक-रोटी खाने वाला सिपाही ये रियायत माओवादी को नहीं बख्शेगा। मैं शायद उमर बढ़ने के साथ कुछ अधिक निराशावादी (या व्यवहारिक) हो गया हूँ और अपने उस क्रांतिकारी जोश को पूरी तरह हिरा चुका हूँ जो कि जवानी के दिनों में मुझे क्रोध और आक्रोश से भर दिया करता था- अब मुझे यक़ीन है कि माओवादियों और राज्य की इस लड़ाई में मारे आदिवासी ही जाएंगे या फिर निरीह सिपाही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं नहीं जानता कि कारपोरेट पूँजीवाद और उसकी सहयोगी शक्तियों ने मिलकर ये जो भूमण्डलीकरण की महा संरचना/ महातंत्र खड़ा किया है, उसका विकल्प क्या हो सकता है? पर ये ज़रूर लगता है कि जो शक्तियाँ अभी अमरीकी नेतृत्व में इस पूँजीवादी लोकतंत्र का विरोध कर रहे हैं – इस्लामिक जड़वादी और माओवादी – वो इसका विकल्प नहीं हो सकते। ये दोनों प्रतिगामी शक्तियाँ हैं जो एक पुरातनता को बचाने की कोशिश की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस्लाम लड़ रहा है एक मध्ययुगीन नैतिकता को बचाने के लिए- उसका विकल्प है शरई क़ानून। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और माओवादी लड़ रहे हैं आदिवासियों के जंगल पर अधिकार के लिए, कम से कम नज़र तो ऐसा ही आता है और दावा भी वो ऐसा ही करते हैं, पर उनके इरादे कुछ और हैं। वे नव-लोकतंत्र के लिए लड़ रहे हैं- माओ की एक अवधारणा न्यू डेमोक्रेसी के लिए – जो पूंजीवाद को सामन्तवाद और साम्राज्यवाद के चंगुल से आज़ाद करेगी। यह सोच माओ ने १९४० में चीन की हालात के अनुसार पेश की थी। वे पूँजीवाद (यानी उद्योग, कारखाने, खनन, बाज़ार; सब मिला कर जंगल के आदिम जीवन से पूर्ण विरोध) के विरोधी नहीं है  मगर उनका मानना है कि अभी का शासक वर्ग पूँजीवाद का सही विकास करने में अक्षम है। यदि वे सत्ता में आए तो चीन की तरह खुद ही पूँजी का विकास करेंगे- चीन के मानवाधिकार हनन से कैसे बचेंगे, ये वे नहीं बताते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले तो इस तरह की सोच एक नियतिवादी चिन्तन है: &lt;span style="font-style:italic;"&gt;विकास की सारी अवस्थाएं और नमूने पहले से तय हैं अब मनुष्य को अंजाम देना है- मगर मनुष्य (उनकी समझ से) ऐसा मूढ़ है कि विकास की नमूने से भटक कर एक अलग ही रास्ता पकड़ लेता है; अपने नियन्ता के सच्चे अनुगामी होने के नाते माओवादी ये ज़िम्मेदारी अपने सर लेते हैं कि नमूने की योजना को जस का तस लागू किया जाय। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे ये कि नियन्ता माओ के द्वारा पूज्य एक पूर्वगामी नियन्ता लेनिन ने इस विषय में एक विरोधी बात कह रखी है – “&lt;span style="font-style:italic;"&gt;कोई मार्क्सवादी यह कभी नहीं भूल सकता कि पूँजीवाद, सामन्तवाद की तुलना में प्रगतिशील है, और साम्राज्यवाद इजारेदारी के पहले की पूँजीवादी अवस्था से प्रगतिशील है। इसलिए हमें साम्राज्यवाद के खिलाफ़ हर संघर्ष का समर्थन नहीं करना चाहिये। साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिक्रियावादी शक्तियों के संघर्ष का समर्थन हम नहीं कर सकते&lt;/span&gt;”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेनिन की समझ से माओवादी प्रतिक्रियावादी साबित होते हैं। (विकास के साथ उनके विरोधाभास पर &lt;a href="http://radicalnotes.com/journal/2009/10/25/maoists-and-the-paradox-of-development/"&gt;यहाँ&lt;/a&gt; और पढ़ें) और क्रांतिकारी भी तभी तक क्रांतिकारी रहता है जब तक सत्ता की लड़ाई जारी है, सत्ता पलटते ही वह खुद प्रतिक्रियावादी हो जाने के लिए अभिशप्त है। नेहरू जी आज़ादी मिलने के पहले तक तो नौकरशाहों की सख्त खिलाफ़त किया करते थे, मगर सत्ता हाथ में आते ही उन्होने नौकरशाहों में ही अपना सबसे बड़ा मित्र पाया। और जो क्रांतिकारी प्रतिक्रियावादी नहीं होते वे कितने बड़े मानवतावादी होते हैं इसे स्टालिन के दौर में मारे गए और माओ की सतत क्रांति के प्रयोग सांस्कृतिक क्रांति के दौरान मारे गए लाखों लोगों की मिसाल से समझना चाहिये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निछन्दम जंगल का प्राकृतिक जीवन और शरई क़ानून की सीमाओं में रहकर एक पवित्र नैतिक जीवन दोनों ही काल्पनिक अवधारणाएं हैं और रूमानी दोष से ग्रस्त हैं। औद्योगिकीकरण और उसकी संस्कृति का पहाड़ एक ऐसा वस्तुगत सच है जिसे अनदेखा करना, शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर दबाना है। भविष्य का समाज इस पहाड़ के उस पार ही बन सकता है, इस पार नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;औद्योगिक समाज ने हम से बहुत कुछ छीना है मगर जो हमें दिया है उसकी चर्चा करना हमारे क्रांतिकारी मित्र हमेशा भूल जाते हैं? भौतिकवाद मानता है कि मनुष्य का वस्तुजगत से एक गहरा तादात्म्य है, और वस्तुओं से भी। आज जिन-जिन वस्तुओं को हम अपने इर्द-गिर्द पाते हैं जिसने हमारा जीवन सुविधाजनक बनाया है, उन्हे हम तक लाने में पूँजीवादी बाज़ार ने जो क्रांतिकारी भूमिका निभाई है, उसे लगातार अनदेखा किया नहीं जा सकता। स्त्री अधिकार को एक मानसिक अवधारणा के जगत से निकालकर उसकी बराबरी के लिए एक वास्तविक दुनिया बनाने का काम पूँजीवाद ने ही किया है। ज्ञान को कुलीन कुटियाओं से निकालकर जनसाधारण तक पुस्तकाकार में पहुँचाने का काम क्या बाज़ार ने नहीं किया है? इन्टनेट जैसे सूचना के महामार्ग और लैपटॉप जैसे उपकरण को जनसुलभ करने का काम बाज़ार के बिना कैसे मुमकिन हो सकता था? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्या दुनिया भर में चल रहे बाज़ारीकरण के साथ आ रहे बदलाव से होने वाले संक्रमण की है। जैसे भारत की सरकार कृषि में आधुनिकीकरण तो चाहती है मगर ज़मीन पर हल जोत रहे किसान को आत्महत्या के पहाड़ी से नीचे धकेल कर। सरकारी तंत्र द्वारा अपने लोगों की प्रति इस संवेदनहीनता का विरोध करते हुए क्या हम उन सब के पक्ष में भी खड़े हो जाएंगे जो विरोध में हमारे साथ हैं? चूंकि वो बन्दूक लेकर अत्याचार के विरोध की लड़ाई लड़ रहे हैं क्या सिर्फ़ इसलिए उनके सपने के दुनिया खुदबखुद इस दुनिया से बेहतर हो जानी है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्मीद बस यही की जा सकती है कि उनके इस आन्दोलन से आदिवासियों और नक्सली कार्यकर्ताओं के प्रति बरती जा रही निर्ममता में कमी आए और उनके साथ न्याय हो!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-8012231041878725773?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/8012231041878725773/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=8012231041878725773" title="19 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/8012231041878725773?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/8012231041878725773?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/10/blog-post_31.html" title="एक निर्मम राज्य के पक्ष में" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">19</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;AkIHRH4zcSp7ImA9WxNVF0k.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-6035540606593095359</id><published>2009-10-25T16:42:00.010+05:30</published><updated>2009-10-28T22:18:55.089+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-10-28T22:18:55.089+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पोस्ट मार्डनिज़्म" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उत्तर आधुनिकता" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="रोलाँ बात्थ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="रचयिता की मृत्यु" /><title>रचयिता की मृत्यु</title><content type="html">&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;इलाहाबाद के ब्लॉग सम्मेलन में मुझे भी बुलावा था, जाना तय भी था मगर आरक्षण नहीं मिला और ऐन मौक़े पर तबियत ने भी जवाब दे दिया। प्रकृति और संयोग दोनों के नकार को स्वीकार कर हम घर पर ही रुके रहे। &lt;/span&gt;&lt;a style="color: rgb(0, 0, 153);" href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2009/10/blog-post_23.html"&gt;अनूप जी&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt; और होनहार &lt;/span&gt;&lt;a style="color: rgb(0, 0, 153);" href="http://taanabaana.blogspot.com/"&gt;विनीत&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt; की रपटें और मसिजीवी की &lt;/span&gt;&lt;a style="color: rgb(0, 0, 153);" href="http://masijeevi.blogspot.com/2009/10/blog-post.html"&gt;फ़िसलरपटें&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt; पढ़ता रहा- बहसें तमाम जो हुई उनसे विभक्ति से अधिक दुख दोस्तों से मिल न पाने का था। घर पर पड़े-पड़े जी बहलाने के लिए बोर्ग़्हेज़ पढ़ रहा था। उसमें &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Calvinism"&gt;कैल्विनवाद&lt;/a&gt; का ज़िक़्र आया। कैल्विनवाद को समझने के लिए पीटर वाटसन की आईडियाज़ पलटने लगा। उसे पलटते हुए &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Derrida"&gt;देरिदा&lt;/a&gt; को बूझने लगा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefuhttp://www.blogger.com/img/blank.giflly();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SuQ0IB5OFpI/AAAAAAAACUw/WdPHSddJ1PY/s1600-h/roland_barthes.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 240px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SuQ0IB5OFpI/AAAAAAAACUw/WdPHSddJ1PY/s320/roland_barthes.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5396495566048728722" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;उसी सन्दर्भ में &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Roland_Barthes"&gt;रोलाँ बात्थ&lt;/a&gt; भी याद आए और याद आई उनकी किताब माइथॉलजीस। एक और लेख का ज़िक्र देखा- &lt;a href="http://evans-experientialism.freewebspace.com/barthes06.htm"&gt;डेथ ऑफ़ दि ऑथर&lt;/a&gt;। नेट पर खोजा तो मिल गया। पढ़ कर बाग़-बाग़ हो गया। नामवर जी ने इलाहाबाद के सम्मेलन में जो कहा वो मेरी उनसे जो उम्मीद थी उस से काफ़ी कम था। मेरा अनुमान था कि वो ब्लॉग माध्यम के अनोखेपन की दार्शनिक विवेचना करेंगे। निराशा हुई। फिर याद आया कि &lt;a href="http://azdak.blogspot.com/2009/10/blog-post_24.html"&gt;प्रमोद भाई &lt;/a&gt;कहते हैं हिन्दी में कोई भी बुद्धिजीवी नहीं है। है कोई &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Raymond_Williams"&gt;रेमण्ड विलियम्स&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Walter_Benjamin"&gt;वाल्टर बेन्जामिन&lt;/a&gt; या फ़ूको? सही है, कोई नहीं है। अचरज होता है कि इतनी अद्भुत बातें रोलाँ बात्थ १९६७-६८ में कर रहे थे, मेरे जन्म के साल, और हम हिन्दी में आज भी प्रेमचन्द के युग से ठीक से बाहर नहीं आ सके हैं? इस लेख को लिखे जाने के इतने सालों बाद भी हिन्दी में इस चेतना की सुगबुगाहट तक नहीं है? फिर प्रमोद भाई की बात- हिन्दी एक मरी हुई भाषा है। है कि नहीं पता नहीं, कुछ उनके धकेलने पर और कुछ अपनी भाषा के प्रति ज़िम्मेदारी के एहसास से दब कर एक दिन इस अनुवाद के नाम गया। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;इस लेख में अनुवाद करते हुए वाक्य रचना में विराम चिह्नों के प्रयोग को ज्यों का त्यों छोड़ा गया है। कई जगह मैं पूर्ण विराम का इस्तेमाल कर सकता था, लेकिन इस चिन्तन को मैं ऐसे रख कर ही देखना चाहता हूँ। वैसे भी हिन्दी और उसकी जननी संस्कृत में भी विराम चिह्नो की परम्परा नहीं है, यह परम्परा सीधे योरोप से आई है। हिन्दी में आज भी पूर्ण विराम, कॉमा, कोष्ठक के अलावा और विराम चिह्न कम ही इस्तेमाल होते हैं। प्रमोद भाई जो मन की गतिविधि को उसके समूचेपन में पकड़ने की कोशिश सतत करते हैं, इन विराम चिह्नों से क़तराते रहते हैं शायद इसलिए कि पहले से जटिल-जटिल अलाप रहे पाठक विराम चिह्नों की जटिल झाड़ियों में न उलझ मरें। फिर भी मेरी इच्छा है कि लोग कोशिश करें और जटिल-पाठ करें। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;हिन्दी में इस भाषा की परम्परा नहीं है, इसलिए पाठकों से थोड़े धीरज की उम्मीद है। रोलाँ बात्थ बीसवीं सदी के बड़े दार्शनिक नामों में से हैं, फ़्रांस की धरती से जो उत्तर आधुनिकता के दादाओं में जिनका नाम लिया जाता है उन में &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Michel_Foucault"&gt;फ़ूको&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Lacan"&gt;लाकाँ&lt;/a&gt;, और देरिदा के साथ बात्थ भी शामिल हैं। इस लेख में बात्थ ने ऑथर और राइटर (स्क्रिप्टर) में भेद किया है जिसे मैंने रचयिता और लेखक (लिपिक) के रूप में अनूदित किया है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;रचयिता की मृत्यु : रोलाँ बात्थ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बालज़ाक अपनी कहानी &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sarrasine"&gt;सरासिने&lt;/a&gt;  में, औरत के भेस में रहने वाले एक &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Castrato"&gt;कैस्तरातो&lt;/a&gt; (नटुआ जिसे बचपन में ही बधिया किया गया हो)  के सन्दर्भ में लिखते हैं: “ये स्वयं एक औरत थी, अपने एकाएक उपजे डर, बेदलील तरंगें, अपने मादरजाद खौफ़, बिलावजह की दिलेरी का मुज़ाहरा, अपने हौसलों और अपने लज़ीज़ नाज़ुक़ी जज़्बात के साथ’’। ये कौन है जो यूं बोल रहा है? क्या ये औरत के भेस में छिपे कैस्तरातो की उपेक्षा से चिंताग्रस्त कहानी का नायक है? या अपने निजी अनुभवों से औरत के दर्शन से समृद्ध बालज़ाक नाम का आदमी है? या फिर रचयिता बालज़ाक, जो स्त्रीत्व के बारे में कुछ साहित्यिक विचारों की व्याख्या कर रहा है? क्या यह सार्वभौमिक ज्ञान है? या रूमानी मनोविज्ञान? यह जानना कभी सम्भव नहीं होगा, क्योंकि सारा लेखन एक विशेष प्रकार की वाणी है जिसमें समाई होती हैं दूसरी कई अनजानी वाणियां। और साहित्य इसी विशेष प्रकार की वाणी का आविष्कार है जिसके उद्गम का हम कोई निर्धारण नहीं कर पाते: साहित्य है वह तटस्थ, मिला-जुला, तिर्यक आयाम जिसमें पलायित हो जाते हैं सभी विषय, वो जाल जिसमें खो जाती हैं सभी पहचान, सर्वप्रथम उस व्यक्ति की पहचान जो उसे लिखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्भवतः हमेशा यही मामला रहता है: जब कभी कुछ वर्णन किया जाता है, वास्तविकता पर किसी सीधी प्रतिक्रिया के लिए नहीं वरन अकर्मक लक्ष्य के लिए – यानी किसी भी क्रिया से अन्ततः परे लेकिन प्रतीक के ठीक-ठीक प्रयोग में - तब होता है यह अलगाव, वाणी अपना उद्गम खो देती है, रचयिता प्राप्त होता है अपनी मृत्य को, लेखन आरम्भ होता है। तब पर भी इस परिघटना को लेकर भावना मिली-जुली रही है; प्राचीन समाजों में, वृत्तान्त कभी एक व्यक्ति की ज़िम्मेवारी नहीं रही, बल्कि एक माध्यम की, ओझा की या वक्ता की, जिसके प्रदर्शन (वृत्तान्त संग्रह की उसके कौशल) पर श्रद्धा हो सकती थी  परन्तु उसकी मेधा पर नहीं। रचयिता एक आधुनिक आकृति है, जो पैदा हुई है बेशक़ हमारे समाज (&lt;span style="color: rgb(153, 153, 153);"&gt;पश्चिमी योरोप&lt;/span&gt;) द्वारा ही मध्ययुग के अन्त में, अंग्रेज़ी व्यवहारवाद, फ़्रांसीसी बुद्धिवाद और सुधारआन्दोलन की निजी आस्था से उपजी एक निर्मिति। जिसने खोजी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, और उदार शब्दों में कहें तो, ‘मानवीय व्यक्ति’ की प्रतिष्टा। इसीलिए यह तार्किक लगता है कि साहित्य की दृष्टि से, पूँजीवादी चिन्तन के सार व परिणाम, प्रत्यक्षवाद ने ही रचयिता के व्यक्ति को सबसे अधिक महत्व प्रदान किया है। साहित्यिक इतिहास के गुटकों में, रचयिताओं की आपबीतियों में, पत्र-पत्रिकाओं के साक्षात्कारों में, यहाँ तक कि साहित्यिक लोगों की स्मरण में भी रचयिता आज भी राज करता है, अपने निजी डायरियों के ज़रिये अपने कृतित्व और अपने व्यक्तित्व को एकरूप करने के लिए बेचैन। समकालीन संस्कृति में मौजूद साहित्य की छवि अत्याचार की हद तक रचयिता पर केन्द्रित है, उस का व्यक्तित्व, उसका इतिहास, उसकी पसन्द, उसके शौक़; आलोचना भी यही होती है कि बॉदलेयर का काम बॉदलेयर व्यक्ति की असफलता है, वैन गॉह का काम उसकी विक्षिप्तता, त्चैकोवस्की का उसके अवगुण: कृति की व्याख्या उस आदमी में खोजी जाती है जिसने उसे रचा है जैसे कि गल्प के कमोबेश पारदर्शी रूपक के ज़रिये ये हमेशा अन्ततः उस ही एक व्यक्ति, रचयिता, की वाणी थी जिसने उसकी गोपनीयता का उद्घाटन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि रचयिता का साम्राज्य अभी भी बहुत मज़बूत है ( हालिया आलोचना ने उसे और सुदृढ ही किया है), यह ज़ाहिर है कि एक लम्बे समय से कुछ निश्चित लोगों ने उसकी चूलें हिलाने के प्रयास किए हैं। फ़्रांस में, मलाहमे सबसे पहले थे जिन्होने पूर्वानुमान लगाया और उसके पूरे विस्तार में समझा कि अभी तक आदमी जिस स्थान पर स्वामित्व का दावा कर रहा था उस आदमी की जगह पर भाषा को रखने की ज़रूरत है। मलाह्मे के लिए, और हमारे लिए भी, वो भाषा है जो बोलती है, रचयिता नहीं : लिखना पहुँचना है, एक पहले से मौजूद व्यक्तित्वहीनता के ज़रिये- यथार्थवादी उपन्यासकार की बधिया तटस्थता के ज़रिये नहीं – वह बिन्दु जहाँ भाषा मात्र ही काम करती है, ‘निष्पादन’ करती है, ‘हमारा स्वत्व’ नहीं। मलाह्मे का सम्पूर्ण काव्यशास्त्र लेखन के हित में रचयिता का दमन करने में ही निहित है (जो, हम देखेंगे, पाठक की प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना के लिए है।) आत्म के मनोविज्ञान को ढोते हुए वैलरी ने मलाह्मे की प्रस्थापना को नर्म तो बनाया, साथ ही आलंकारिकता के सबक़ पर शास्त्रीयता को वरीयता दे कर उन्होने रचयिता पर सवाल खड़े किए और हँसी उड़ाई, और उसकी गतिविधि के भाषिकी और ‘सांयोगिक’ प्रकृति पर ज़ोर दिया, और उनके गद्य ने लगातार साहित्य की मौखिक स्थिति का समर्थन किया जिसके सम्मुख रचयिता की हीनता की कोई भी शरण लेना उनको शुद्ध अन्धविश्वास लगा। यह साफ़ है कि स्वयं प्रुस्त ने भी, उनके विश्लेषणों के ज़ाहिरा मनोवैज्ञानिक चरित्र के बावजूद रचयिता और उसके चरित्रों के बीच के सम्बन्धों को, एक चरम सूक्ष्मता के ज़रिये, निर्दयता से धूमिल करने का काम किया : कथावाचक को एक ऐसा व्यक्ति बना कर- जो लिखेगा, न कि जो लिख रहा है, या जिसने देखा और महसूस किया। (उपन्यास का नौजवान – पर, कौन है ये, क्या उमर है इसकी? -  लिखना चाहता है पर लिख नहीं पाता और उपन्यास वहाँ समाप्त हो जाता है जब अन्ततः लेखन सम्भव हो पाता है) प्रुस्त ने आधुनिक साहित्य को उसका महाकाव्य दिया है : एक मूलभूत विपर्यय के द्वारा; बजाय अपने जीवन को उपन्यास में डालने के, जैसा कि कहा जाता है, वे अपने जीवन को एक ऐसा काम बना डालते हैं जिसके लिए एक तरह से उनकी अपनी किताब एक नमूना थी, ताकि ये हम पर साफ़ज़ाहिर रहे कि ये चार्लि नहीं है जो मन्तेसकियू का अनुकरण करता है बल्कि मन्तेसकियू अपने क़िस्साई, ऐतिहासिक सच्चाई में एक गौण अंश है जो चार्लि से उपजा है। आधुनिकता के इस पूर्वइतिहास पर बने रहने के लिए अब आखिर में अतियथार्थवाद : अतियथार्थवाद बेशक़ भाषा को एक स्वायत्त दरज़ा नहीं दे सका, चूंकि भाषा एक व्यवस्था है, और इस आन्दोलन का (रूमानी) मक़सद ही सारी नियमावलियों को छिन्न-भिन्न करना था – एक आभासी छिन्न-भिन्नता, क्योंकि कोई नियमावली नष्ट नहीं की जा सकती, केवल उसके साथ खिलवाड़ किया जा सकता है; लेकिन अपेक्षित अर्थों को झटके से भंग कर के (अतियथार्थवादियों का प्रख्यात झटका), जिस चीज़ को सिर अनदेखा कर जाता है उसके लेखन की ज़िम्मेदारी शीघ्रातिशीघ्र हाथ को देकर (यह था स्वचालित लेखन), सामूहिक लेखन का सिद्धान्त और अनुभव स्वीकार कर के, अतियथार्थवाद ने लेखक की छवि को लौकिक बनाने में मदद की। और अन्त में,  साहित्य की दुनिया से बाहर (वास्तव में, ये सारी भिन्नताएं लांघी जा रही हैं) भाषाशास्त्र ने बहुमूल्य वैश्लेषिक औज़ार के साथ रचयिता का विनाश सम्पन्न कर दिया है  यह दिखाकर कि अपनी समूचेपन में प्रगटीकरण एक खोखली प्रक्रिया है जो उस खाली जगह पर किन्ही संभाषी व्यक्तियों को रखे बिना ही अच्छी तरह काम करती है। भाषिकी तौर पर, रचयिता कभी भी लिखने वाले से अधिक कुछ नहीं है, जैसे कि मैं, मैं कहने वाले से ज़्यादा कुछ नहीं है : भाषा एक कर्ता को जानती है, व्यक्ति को नहीं, इस कर्ता का अन्त कर दो, तो ठीक इस प्रगटीकरण के बाहर की शून्यता जो इसे परिभाषित करती है, वही काफ़ी है भाषा के ‘कर्म’ द्वारा इसे खाली कराने के लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रचयिता की अनुपस्थिति (ब्रेष्ट के मामले में रचयिता साहित्यिक मंच के एक कोने में सिमट जाता है, इसे हम कह सकते हैं सचमुच का विलगाव) मात्र कोई लिखने की प्रक्रिया या ऐतिहासिक सच ही नहीं है : इस ने आधुनिक पाठ को पूरी तरह से रूपान्तरित कर दिया है। (या – जो कि एक ही बात है – अब पाठ ऐसे लिखा और पढ़ा जाता है कि उस में से, हर स्तर पर, रचयिता स्वयं को अनुपस्थित कर लेता है) समय, सबसे पहले, भी वह नहीं रहा। रचयिता, जब हम उस पर भरोसा करते हैं, की कल्पना हम उसकी किताब के भूतकाल की तरह करते हैं : किताब और रचयिता अपने आप ही एक ही रेखा में अपनी जगह लेते हैं, पूर्व और पश्चात के रूप में, रचयिता से अपेक्षित होता है कि वह किताब को भोजन दे – मतलब कि, वह पहले होता है, सोचता है, उसके लिए जीता है; अपने काम के साथ पूर्ववर्ती होने का वह वही सम्बन्ध निभाता है जो एक पिता अपने बच्चे के साथ। इसके ठीक विपरीत, आधुनिक लेखक (लिपिक) अपने पाठ के साथ ही जन्मता है। किसी भी तौर पर उसे ऐसी कोई हस्ती नहीं मिलती जो उसके लेखन से पहले से हो और बढ़ कर भी हो, वह किसी भी तौर पर वह कर्ता नहीं है जिसका कि उसकी किताब कथन है, प्रगटीकरण के अलावा कोई दूसरा समय नहीं है, और हर पाठ शाश्वत रूप से अभी और यहीं लिखा जाता है। यह इसलिए है (या : इसके परिणाम स्वरूप है)  अब लेखन का अर्थ अभिलेखन, अवलोकन, निरूपण, चित्रण की प्रक्रिया (जैसे कि शास्त्रीय लेखक कहते हैं) नहीं हो सकता, बल्कि जिसे भाषाशास्त्री, ऑक्सफ़ोर्ड स्कूल की शब्द सम्पदा का अनुकरण करते हुए, निष्पादात्मक कहते है, एक विरल क्रियात्मक रूप (विशिष्ट रूप से केवल प्रथम पुरुष और वर्तमान काल के लिए सुरक्षित) जिसमें कि प्रगटीकरण में कोई और कथ्य नहीं, सिवा उस क्रिया के जिस के द्वारा वह प्रगट किया गया : पूर्वकालिक चारणों की चरणवन्दना की तरह ; आधुनिक लेखक, ‘रचयिता’ को दफ़नाने के बाद अब यह मान नहीं सकता, अपने पूर्ववर्तियों की दयनीय नज़रिये की तरह, कि उसका हाथ उसके विचारों और आवेगों के लिए बहुत मन्द है, जिसके परिणामस्वरूप, आवश्यक्ता को नियम में ढालते हुए, उसे इस अन्तराल को भरना होगा और अनन्तकाल तक अपने शिल्प का मांजना होगा; इसके विपरीत उसके लिए, उसका हाथ किसी भी वाणी से स्वतन्त्र होकर, अंकण (अभिव्यक्ति नहीं) की एक शुद्ध चेष्टा से भरा हुआ, खींचता है एक निर्मूलक क्षेत्र – या जिसका, कम से कम, सिवा भाषा के और कोई मूल नहीं, यानी कि वही एक तत्व जो लगातार हर उत्पत्ति पर प्रश्न उठाती चलती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जानते हैं कि कोई पाठ सिर्फ़ शब्दों की एक पंक्ति भर ही नहीं होता, जिस से मात्र एक ‘धर्मशास्त्रीय’ अर्थ (लेखकीय ईश्वर का संदेश) निकले  बल्कि होता है कई पहलुओं वाला एक आयाम, जिस में तमाम तरह के लेख जड़े और लड़े होते हैं, और जिन में कोई भी मौलिक नहीं होता : संस्कृति के हज़ार मुखों से निकला, पाठ उद्धरणों का एक तन्तु है। हमेशा के नक़लची बूवा और पेक्यूशे की तरह, एक साथ ही उदात्त और हास्यास्पद दोनों और जिनकी गहन निरर्थकता लेखन के सच को ठीक-ठीक दिखाती है, लेखक केवल हमेशा अपनी पूर्ववर्ती चेष्टा की नक़ल भर कर सकता है, मौलिक कभी नहीं हो सकता; उसकी सारी सामर्थ्य विभिन्न प्रकार के लेखन का मिश्रण करने में है, और एक को दूसरो के विरुद्ध खड़ा करने में है, ताकि उसे कभी किसी एकमात्र पर ही निर्भर न हो जाना पड़े; अगर वह स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहता है, तो कम से कम उसे पता होना चाहिये कि वह आन्तरिक ‘तत्व’, जिसका वह ‘रूपान्तरण’ करने का दावा करता है, अपने आप में एक पहले से तैयार शब्दकोष है जिसके शब्दों की व्याख्या (परिभाषा) केवल दूसरे शब्दों के द्वारा ही की जा सकती है, और दूसरे शब्दों की और दूसरे शब्दों से, और ऐसे ही अनन्त काल तक :, ग्रीक भाषा में विशेष प्रतिभा सम्पन्न, नौजवान डि क्विन्सी का एक अनुकरणीय अनुभव हमारे सामने है, ऐसा बॉदलेयर बताते हैं कि, उस मृत भाषा में कुछ विशेष अत्याधुनिक विचारों और छवियों का अनुवाद करने के लिए, “उन्होने तैयार किया शुद्ध साहित्यिक विषयों के अश्लील धैर्य से उपजने वाले से भी अधिक विस्तृत और जटिल एक शब्दकोष” (पैरादिस आर्तिफ़िसियल)। रचयिता के परवर्ती होने के बाद, लेखक आवेग, परिहास, भाव, छाप, अपने भीतर नहीं रख सकता बल्कि रखता है वह विशाल शब्दकोष जिससे वह हासिल करता है लेखन, जो न रुकता है और न खत्म होता है ; जीवन किताब की नक़ल करने से अधिक कुछ नहीं करता और किताब स्वयं किसी खोये हुए, अनन्त दूरी पर स्थित, संकेतों का तन्तु है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार जब रचयिता विदा हो गया, तो पाठ के रहस्योद्घाटन का दावा भी बिलकुल अर्थहीन हो जाता है। किसी पाठ को एक रचयिता के हवाले करना उस पाठ को एक सीमा में बाँधना है, उसको एक अन्तिम अर्थ तक पहुँचा कर लेखन को समाप्त करना है। यह परिकल्पना आलोचना को बिलकुल जंचती है, जो अपने लिए पाठ के पीछे से रचयिता की खोज (या उसकी प्रस्थापनाएं : समाज, इतिहास, अन्तर्मन, स्वतन्त्रता) का एक बड़ा बीड़ा उठा सकती है:  एक बार जब रचयिता की खोज हो गई तो पाठ की व्याख्या भी हो जाती है और आलोचक विजयी होता है; इसलिए ये ज़रा भी आश्चर्य की बात नहीं कि ऐतिहासिक तौर पर रचयिता का युग आलोचक का भी युग हो, और आलोचना (“नई आलोचना” भी) को भी रचियता के साथ उखाड़ फेंकना चाहिये। लेखन की बहुलता में, वास्तव में, हर एक की विशिष्टता है पर व्याख्या किसी की नहीं; संरचना जारी रह सकती है, अपनी चरणों के सारी पुनरावृतियों में (किसी मोज़े के तरह) बिनी हुई, मगर जिसके नीचे कोई धरातल नहीं है; लेखन के आयाम से गुज़रा जा सकता है उसे भेदा नहीं जा सकता : लेखन लगातार अर्थ को स्थान देता है लेकिन हमेशा बिला जाने के लिए : लेखन, अर्थ के एक व्यवस्थाबद्ध विमोचन की ओर बढ़ता है। और इस रास्ते से साहित्य (वैसे अब से लेखन कहना अच्छा होगा), पाठ को कोई रहस्य, या उसका परम अर्थ, देने से इन्कार कर के, एक ऐसी गतिविधि को मुक्ति प्रदान करता है जिसे धर्मशास्त्र विरोधी कहा जा सकता है, और सच में क्रांतिकारी, क्योंकि अर्थ को जड़ करने से इन्कार करना ईश्वर और उसके प्रस्थापनाओं तर्क, विज्ञान और विधि से इन्कार करना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलिये बालज़ाक के वाक्य पर वापस लौटते हैं : वह किसी का (यानी किसी  व्यक्ति का) कथन नहीं है : इस वाणी के स्रोत का पता नहीं चलता; फिर भी सब कुछ समझ में आता है; वह इसलिए कि लेखन का असली बिन्दुपथ पठन है। इसे एक और विषेश उदाहरण से समझते हैं : हालिया शोधों (जे पी वेरनाँ) ने ग्रीक त्रासदी के मूलभूत श्लेषात्मक स्वभाव पर प्रकाश डाला है, उनका पाठ ऐसे शब्दों से बुना हुआ है जो द्विअर्थी हैं, पर हर चरित्र उनका एक ही अर्थ लेता है (त्रासदी का अर्थ, लगातार होने वाली ऐसी ही ग़लतफ़हमी से ही है); फिर भी कोई है जो हर शब्द को उसके द्वैधता में समझता है, और यह भी कहा जा सकता है कि अपने सामने खड़े चरित्रों के बहरेपन को भी समझता है : यह कोई और नहीं पाठक है (यहाँ दर्शक)। इस तरह से लेखन के सारा अस्तित्व सामने आ जाता है : एक पाठ के भीतर कई लेख होते हैं विभिन्न संस्कृतियों से आए और एक दूसरे के साथ संवाद में, विद्रूप में, और संघर्ष में संलग्न; लेकिन एक जगह है जहाँ ये सारी विविधता एकत्र होती है, एकजुट होती है, और यह जगह रचयिता नहीं है, जैसा कि हम अभी तक कहते आ रहे हैं कि थी, बल्कि पाठक है। पाठक ही वह आयाम है जहाँ किसी भी लेखन के भीतर के सारे उद्धरण, बिना खोये अंकित होते हैं; किसी भी पाठ की एकता उसके उद्गम में नहीं बल्कि उसके गन्तव्य में है; लेकिन वह गन्तव्य अब निजी नहीं रह सकता ; पाठक एक ऐसा आदमी है जिसका कोई इतिहास नहीं, कोई जीवनी नहीं, कोई मनोविज्ञान नहीं; वह मात्र एक  कोई है जो पाठ के भीतर निर्मित विभिन्न राहों को एक क्षेत्रीय इकाई में थामे रखता है। इसीलिए पाठक के अधिकारों के स्वनियुक्त और पाखण्डी हिमायतियों द्वारा, मानवतावाद के नाम पर, नवलेखन की निन्दा करना बिलकुल अनर्गल है। शास्त्रीय आलोचना का सरोकार कभी भी पाठक नहीं रहा है; उसके लिए साहित्य में लिखने वाले के अलावा दूसरा कोई है ही नहीं। इस तरह के अन्तरविरोधी जुमलों का कपट अब नहीं चल सकता जिनके ज़रिये हमारा सभ्य समाज गर्व से उनकी हिमायत करता है जो उसी के द्वारा अस्वीकृत हैं, उपेक्षित हैं, जिनका गला घोटा जाता है और नष्ट किया जाता है; हम जानते हैं कि लेखन के भविष्य की प्रतिष्ठा के लिए, हमें उसके मिथक को उलटना होगा ; पाठक के जन्म की फ़िरौती रचयिता को अपनी मृत्यु से चुकानी होगी।&lt;br /&gt;.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-6035540606593095359?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/6035540606593095359/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=6035540606593095359" title="10 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/6035540606593095359?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/6035540606593095359?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html" title="रचयिता की मृत्यु" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SuQ0IB5OFpI/AAAAAAAACUw/WdPHSddJ1PY/s72-c/roland_barthes.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;Ck8CQ3k8eCp7ImA9WxNVEEg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-7007460094867585726</id><published>2009-10-20T13:04:00.011+05:30</published><updated>2009-10-20T20:31:02.770+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-10-20T20:31:02.770+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बोर्ग़्हेस" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साहित्य" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखक" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="किताब" /><title>एक अद्भुत लेखक से परिचय</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/St1pDarvKyI/AAAAAAAACUQ/m3Jv2GKni9s/s1600-h/borgescoinf.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 312px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/St1pDarvKyI/AAAAAAAACUQ/m3Jv2GKni9s/s320/borgescoinf.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5394583436083014434" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jorge_Luis_Borges"&gt;ऑरहे लुइस बोर्ग़्हेस&lt;/a&gt;*   का रचना संसार एक ऐसा विद्वतापूर्ण जटिल और सघन दलदल है जिसमें आप उतरने से क़तरा सकते हैं। पहले वाक्य से ही वो आप को डरा सकता हैं आतंकित कर सकता है अनजाने नामों, सन्दर्भों और लोकों से।  लेकिन उस साहसी पाठक के लिए जो न घबराया- न डरा, ये कहानियां बौद्धिक आनन्द का उम्दा ईनाम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोर्ग़्हेस की रचनाओं के बारे में यह तय काना मुश्किल होता है कि वे दार्शनिक संवाद है जिनके भीतर कहानी के अद्भुत तत्व विद्यमान हैं या फिर वे कमाल की कहानियां हैं जो गहरे दार्शनिक अर्थों से लबरेज़ हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम तौर पर कहानियां ऐसी होती हैं कि आप एक पंक्ति का एक शब्द पढ़कर नीचे उतरते चले जाइये, सुपरमैन की तरह सुपरस्पीड से पढ़ते हुए। लेकिन बोर्ग़्हेस की कहानी में कोई वाक्य कूद कर आगे नहीं जा सकते। हर वाक्य एक नया आयाम उद्घाटित करता है। एक नयी परत खोलता है। पुराना अर्थ तोड़ता है, एक नया अर्थ जोड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बौद्धिक तेज से चमचमाती ये कहानियां पढ़ कर ऐसा लगा जैसे कि बीस वर्ष पहले के दौर में लौट गया हूँ जब पहली बार मिलान कुन्देरा पढ़कर या बुनुएल की फैन्टम ऑफ़ लिबर्टी और ओब्सक्योर ऑबजेक्ट ऑफ़ डिज़ायर देखकर एक बौद्धिक सनसनी हुई थी। शायद काफ़्का के बाद बोर्ग़्हेस दुनिया के अकेले ऐसे लेखक होंगे जिन्होने अपने समय को सबसे अधिक प्रभावित किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोर्ग़्हेस पोस्ट-मार्डनिस्म के अस्तित्व में आने से पहले ही वे एक पोस्ट-मार्डनिस्ट थे। वे यथार्थवादी नहीं बल्कि अल्ट्राइस्ट थे। उनका यथार्थ जैसा यथार्थ नहीं है, और स्वप्न ठीक ठीक स्वप्न ही है यह नहीं माना जा सकता है। दोनों एक दूसरे में घुलते हुए से हैं। कब स्वप्न की तरलता यथार्थ की तरह ठोस हो जाए और यथार्थ का घनत्व पिघल कर कैसा अचरजी रंग बदल ले आप तय नहीं कर सकते। उनकी हर कहानी कुछ विशेष विषय के गिर्द ही चलती है - अनन्त, असीम, भ्रम, माया, स्वप्न, परतदार सत्य, लैबीरेन्थ (जटिल भूलभुलैया या सघन गोरखी दुनिया), समय; वर्तुलाकार या चक्राकार समय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी एक मशहूर कहानी है -पियर मेनार, ऑथर ऑफ़ द ‘कीहोटि’। लेखकीय मौलिकता के ऊपर ऐसी मौलिक कहानी पहले नहीं पढ़ी थी। यह एक ऐसे लेखक की कथा जो सरवान्तीज़ के डॉन कीहोटि की पुनर्रचना में कुछ इस तरह जुटता है कि उसका एक एक लफ़्ज़ सरवान्तीज़ के साथ मेल खाता है मगर विश्लेषक या पाठक के लिए उसके अर्थ भिन्न हो जाते हैं क्योंकि उनकी देश काल परिस्थिति भिन्न है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/St145J90q6I/AAAAAAAACUo/7eNFn-lMOyI/s1600-h/3769146999_f11e7c9071.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 234px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/St145J90q6I/AAAAAAAACUo/7eNFn-lMOyI/s320/3769146999_f11e7c9071.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5394600851982822306" /&gt;&lt;/a&gt;मिसाल के तौर पर एक और कहानी है ‘लाइब्रेरी ऑफ़ बेबेल’, जिसमें लाइब्रेरी ब्रह्माण्ड का एक रूपक है- ये अनन्त लाइब्रेरी एक विशाल खगोल है जो अनगिनत षटभुजों से मिलकर बनी है, जिसका केद्र तो हर एक षटभुज है पर परिधि कहीं नहीं। लाइब्रेरी सम्पूर्ण है, जिस में एक जैसी कोई भी दो किताबें नहीं हैं। और उसकी आलमारियों में २२ लेखन चिह्नों के सभी समुच्च्य मौजूद हैं। चूंकि लाइब्रेरी में सभी सम्भव लेखन उपस्थित है इसलिए दुनिया की हर समस्या, निजी और सामाजिक का हल लाइब्रेरी के किसी न किसी कोने में रखी किसी किताब के भीतर लिखा हुआ है। और इन्ही किताबों के बीच एक ऐसी किताब भी है जो कि है सम्पूर्ण किताब, जो कि बाक़ी सभी किताबों की कुंजी- सभी किताबों के रहस्य अपने भीतर छिपाये हुए है।  बावजूद इस सब के लाइब्रेरी में अशांति है, अराजकता है, हताशा है..कुछ लोग किताबें जला रहे हैं, कुछ उस दिव्य किताब की खोज में विचित्र प्रयोग कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोर्ग़्हेस की कहानियों के भीतर के कल्पनालोक में काल्पनिक लेखकों की काल्पनिक किताबें होती हैं एक नहीं तमाम। ऐसा माना जा सकता है कि ये सारी किताबें वो किताबें है जो बोर्ग़हेस स्वयं लिखना चाहते थे चूंकि उनका मानना है कि &lt;span style="font-style:italic;"&gt;पांच सौ पन्नो की किताबें लिखने की मशक्कत एक ऐसा व्यर्थ का पागलपन जो आप के बहुमूल्य समय पर डाका डालता है, जबकि वही बात आप पांच मिनट में मुँहज़बानी सुना सकते हैं। बेहतर ये है कि मान लिया जाय कि वो किताबें पहले ही लिखीं जा चुकी हैं और सिर्फ़ उन पर टिप्पणी लिखी जाय।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेंग्विन ने उनकी कहानियों के सारे संग्रह छापे हैं। लेकिन सबसे बेहतरीन कहानियां &lt;a href="http://www.flipkart.com/fictions-jorge-borges/0141183845-vow3f9yqnz"&gt;‘फ़िक्शन्स’&lt;/a&gt; नाम के संग्रह में संकलित है। अगर आप कहानियों के घिसे-पिटे सुर से ऊब चुके हैं तो ज़रूर आज़माईये बोर्ग़्हेस को- नाउम्मीद नहीं होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;*Borges के उच्चारण को लेकर भी एक विविधता है- जो उन पर जंचती है। हिन्दी भाषी लोग इसे आम तौर पर बोर्जेस पढ़ेंगे मगर अगर आप Borges के हिन्दी अनुवाद देखेंगे तो आप को वहाँ बोर्ख़ेस लिखा मिलेगा-हिन्दी के विद्वजन भी यही उचारते मिलेंगे। G किस नियम के अनुसार ख़ में बदल जाएगा, को लेकर मेरे भीतर एक हलचल मची रही। मैंने &lt;/span&gt;&lt;a style="color: rgb(0, 0, 153);" href="http://dictionary.reference.com/browse/Borges"&gt;डिक्शनरी डॉट कॉम&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt; पर  देखा तो वहाँ उचारण मिला- ऑरहे लुइस बोर्हेस। यह सही भी है क्योंकि स्पेनी फ़िल्मों में Jorge (George) को ऑरहे ही बोला जाता है। लेकिन जब मैं इसे बातचीत में बोरहेस-बोरहेस बोलने लगा तो उलझन सी होने लगी। G की छवि को ह की तरह बोलने में तक़लीफ़ हो रही है बावजूद इसके कि प्रसिद्ध चित्रकार Modigliani को हम मोदिहलियानी ही कह कर बुलाते सुन सकते हैं। फिर मेरी पत्नी तनु ने मुझ से कहा कि बोरहेस का जो ह है वह हलक़ से निकलना चाहिये, अरबी के हलक़ वाले हे की तरह। मैंने बोलकर देखा- बेहतर लगा। फिर भी मुझे सन्तोष नहीं हुआ। फिर ख्याल आया कि G को ग भी तो बोला जा सकता है और उसे अगर ग़ैन वाले ग़ की तरह बोला जाय तो कैसा रहे? तो हुआ बोरग़ेस मगर डिक्शनरी डॉट कॉम का उच्चारण इससे मेल नहीं खाता। लिहाज़ा मैंने दोनों को मिला दिया और पाया – बोर्ग़्हेस। ये काफ़ी कुछ असली उच्चारण के क़रीब है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-7007460094867585726?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/7007460094867585726/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=7007460094867585726" title="9 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/7007460094867585726?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/7007460094867585726?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/10/blog-post_20.html" title="एक अद्भुत लेखक से परिचय" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://4.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/St1pDarvKyI/AAAAAAAACUQ/m3Jv2GKni9s/s72-c/borgescoinf.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">9</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0UFQHk5fSp7ImA9WxNXFks.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-6865714460273009986</id><published>2009-10-04T09:31:00.009+05:30</published><updated>2009-10-04T18:30:11.725+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-10-04T18:30:11.725+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="टैरनटीनो" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फ़िल्म" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कला" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="इन्ग्लोरियस बास्टर्ड्स" /><title>आत्माहीन कला</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://article-niche.com/news_images/news_Inglourious-Basterds.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 200px;" src="http://article-niche.com/news_images/news_Inglourious-Basterds.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Inglourious_Basterds"&gt;इन्ग्लोरियस बास्टर्ड्स&lt;/a&gt; - अगर मुझे पता होता कि नाज़ियो और यहूदियों के समीकरण के ही बारे में ये एक और फ़िल्म है तो मैं कभी इस फ़िल्म को देखने को राज़ी नहीं होता। मैंने इसका पोस्टर देखा ज़रूर था और यह भी जानता था कि यह एक वॉर फ़िल्म है, लेकिन.. मेरी मूर्खता थी शायद.. मुझे बूझ लेना था। पिछले बीस सालों में मैंने यहूदियों पर नाज़ी अत्याचारों को लेकर इतनी फ़िल्में देखी हैं कि मैं अब इस विषय के प्रति अपनी संवेदना खो चुका हूँ। होलोकास्ट, गैस चैम्बर्स, यहूदियों की प्रताणना जैसे बातें सुनकर मेरे चित्त पर रञ्जना और अभिव्यञ्जना की सारी सम्भावनाएं विलोप हो जाती हैं.. चालू ज़ुबान में मैं चटने लगता हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे सारे प्रगतिशील दोस्त मेरे इस बयान को लेकर अपने हाथों में पत्थर कस चुके होंगे। जैसी कि आम प्रगतिशीलों की फ़ित्रत होती हैं वे अपने कट्टर दुश्मन साम्प्रदायिकों की तरह ही, सारी दुनिया को अस एण्ड देम के दो बाड़ों में ही देख पाने के लिए अभिशप्त होते हैं। उन्होने मुझे या तो मुझे महमूद अहमेदीनिज़ाद की तर्ज़ पर होलोकास्ट को होक्स मानने वाली प्रस्थापना का समर्थक मान लिया होगा या किसी एक नई-नवेली 'हिन्दू ज़ायनिस्ट' डिज़ाइन का हिस्सा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर उन के सामने आप कश्मीर के आन्दोलन में निहित मूल साम्प्रदायिकता की बात कर दीजिये तो वो आप को कम्यूनल भाजपाई मान लेंगे और इसके विपरीत अगर आप मोदी को चार गाली दे दीजिये तो अपनी राय पर थोड़ा शक़ होगा और हो सकता है कि आप को सेक्यूलर क्लब की सदस्यता की पर्ची काट दें। इसके बाद अगर आप श्राद्ध पक्ष के बाद सर घुटाए दिख गए तो हैरानी से उनका मुँह खुला रह जाएगा.. अरे आप तो.. और आप की सदस्यता पर पुनर्विचार चलने लगेगा। उनकी कमज़ोर जीवन दृष्टि पर जो मोटा चशमा चढ़ा है उससे कुछ भी महीन सूक्ष्म देख पाने की क्षमता वो खो चुके हैं। मैं कह सकता था कि ये उस चश्मे का दोष है, उनका दोष नहीं है, पर नहीं कहूँगा। मैं उन से भी बहुत चटा हुआ हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मेरे पाठक आप ही बताइये.. एक आदमी जो कि न तो नाज़ी है, न जर्मन है, न ब्रिटिश है, न फ़्रेंच, न यूरोपी और न अमरीकी.. और यहूदी तो बिलकुल ही नहीं..आखिर क्यूंकर उसे इस विषय के प्रति हर मौक़े-बेमौक़े पर अपनी आंसुओं की बाल्टी तैयार कर लेनी चाहिये? और माफ़ कीजिये मैं मुसलमान भी नहीं हूँ जिनके भीतर प्रायः यहूदियों के प्रति एक खास नफ़रत का समन्दर ठाठें मारता रहता है। (यहाँ पर मुझे लिखना चाहिये कि - हर मुसलमान नहीं - पर मैं नहीं लिखूंगा) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया में तमाम ऐसे दारुण विषय हैं जिन पर फ़िल्म बनने की दरकार हो सकती है लेकिन नहीं बनती। अब जैसे कल एक लेख में पढ़ रहा था कि एक चीनी लेखक द्वारा लिखी एक नई किताब के अनुसार चेयरमैन माओ की 'ग्रेट लीप फ़ारवर्ड' के तहत ३ करोड़ साठ लाख लोगों की हत्याएं हुई, जो कि होलोकास्ट में मारे गए लोगों से सम्भवतः अधिक है। मगर उस त्रासदी के बारे में कितने लोग जानते हैं? अपने १८५७ के बारे में ही एक अनुमान है कि ९० लाख लोग मारे गए - उस पर कितनी फ़िल्में बनी हैं? जो बनी थी - मंगल पाण्डेय - वो बरदाश्त के बाहर थी। लेकिन हमारी मानसिकता ऐसी बन गई है कि अत्याचार और त्रासदी के नाम पर हमारे पास सबसे दारुण मिसाल होलोकास्ट ही होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक सीधा साधा फ़िल्म-प्रेमी हूँ। जो सिनेमा हॉल के गाढ़े अंधेरों में अपने मानस के जाने-अनजाने तत्वो को दूसरे मनुष्य के अनुभवों के जीवन्त चित्रण के हवाले कर उन्हे साझना चाहता है। &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Quentin_Tarantino"&gt;टैरनटीनो&lt;/a&gt; बड़े निर्देशक हैं। किल बिल, रेज़ेरवायर डॉग्स और पल्प फ़िक्शन कल्ट फ़िल्म्स हैं और सही हैं। डेथ प्रूफ़ अच्छी नहीं थी मगर बुरी भी नहीं थी। उनकी इन्ही फ़िल्मों को प्रभाव था कि मैंने फ़िल्म रिलीज़ होने के पहले ही उसे देखने का मन बना लिया था। एक्सप्रेस में रिव्यू के आगे पाँच स्टार्ज देखे ज़रूर थे, और उस का असर भी मन पर लिया था, लेकिन पढ़ा नहीं था। अच्छा पढ़ा नहीं था फिर तो शायद और गु़स्सा होता। रिव्यू लिखने पर किसी स्टूडियो का दबाव रहा होगा ऐसा नहीं है लेकिन सबसे बड़ा दबाव प्रतिष्ठा का होता है। वो ऐसा दबाव होता है कि अगर आप को फ़िल्म न भी समझ आए, बुरी भी लग जाए तो आप कसूर फ़िल्म को देने के बजाय या अपनी राय साफ़ सामने रखने के बजाय बड़े-बड़े झूठे शब्द उछाल कर तारीफ़ों का ऐसा मुज़ाहरा करते हैं कि किसी को भनक भी न पड़ने पाए कि आप ऐसे मूर्ख हैं जिसे टैरनटीनो की फ़िल्म नहीं समझ आई? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक ऐसा मूर्ख हूँ जिसे फ़िल्म पसन्द नहीं आई। ऐसा नहीं कि फ़िल्म आप को पकड़ती नहीं, पकड़ती है और जकड़ती भी है.. इस हद तक कि आप का माथा पिराने लगे और आप आशंका और उत्तेजना से थथराने लगें। फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर टैरनटीनो ने जो दस साल तक मेहनत की है वो दिखाई देती है, महसूस भी होती है। असर में कमी नहीं है.. फ़िल्म की जो मूल समझ है, एहसास की जिस दुनिया में फ़िल्म हमें ले जाती है, शिकायत और तक़लीफ़ उस से है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म रंगीन ज़रूर है पर दिखाई देनी वाली दुनिया दुरंगी यानी काली सफ़ेद है। एक हिंसा और प्रतिहिंसा का सिलसिला है। जर्मन्स खोज-खोज कर यहूदियों की हत्याएं कर रहे हैं उसके जवाब में प्रतिशोध से भरे हुए जर्मन यहूदियों और अमरीकियों का एक गैंग है जो जरमनों की हत्याएं कर रहा है उनसे भी अधिक पाशविकता से। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक है मगर कथानक काल्पनिक है। फ़िल्म के अंत में जिस तरह से द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो जाता है वो टैरनटीनो की ‘गूढ़’ कल्पना है। गूढ़ पर ज़ोर इसलिए कि उस कल्पना को जेब में डाले हर आतंकवादी घूम रहा है। अगर टैरनटीनो की इस दुनिया में एलाइड पक्ष की जगह अफ़्ग़ानी, पाकिस्तानी और अरब लड़ाके और नाज़ियों की जगह अमरीकी, फ़्रेंच और अंग्रेज़ हो तो आज की सही तस्वीर बन जाएगी। लेकिन शायद टैरनटीनो साहब के दिमाग़ में दो पैमाने होंगे एक अमरीकी हिंसा को तौलने का और दूसरा नाज़ियों और मुसलमानों की हिंसा को तौलने का? (मेरे प्रगतिशील मित्र नाज़ियों और मुसलमानों को समीकरण के एक ओर एक साथ रखने को अन्यथा ले सकते हैं, मेरा वैसा कोई आशय नहीं है लेकिन मैं इस वाक्य संरचना को नहीं बदल रहा हूँ) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म का आधार नफ़रत है। दोनों तरफ़ से हचक के नफ़रत। ऐसी करुणाहीन फ़िल्म, चाहे कितनी भी कारीगरी की शिखर पर चढ़ कर बैठी हो, मेरी नज़र में बुरी फ़िल्म है। कोई हत्यारा अगर किसी का गला काटने समय गणपति की अद्भुत आकृति उकेरने का उस्ताद हो तो क्या उसे कलाकार मान लेना चाहिये? एक ऐसा चिंतन है जो मानता है। मैं नहीं मानता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रैड पिट ने जबड़ों में अजब तनाव पैदा कर के न जाने कैसी अभिनय की कोशिश की है; मुझे तो ज़रा भी समझ नहीं आई। क्रिस्टोफ़ वाल्ट्ज़ ने बहुत बेहतर काम किया है जिसके लिए उन्हे कान फ़िल्मोत्सव में पुरस्कार भी मिला। एक बात और जो मुझे बहुत अखरी – पूरी कहानी फ़्रांस में घटित होती है लेकिन इनग्लोरियस बास्टर्ड्स में फ़्रांस की ज़रा भी आत्मा नहीं है। सच पूछिये तो आत्मा है ही नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-6865714460273009986?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/6865714460273009986/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=6865714460273009986" title="13 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/6865714460273009986?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/6865714460273009986?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/10/blog-post.html" title="आत्माहीन कला" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0MHRHw-eSp7ImA9WxNQF08.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-9090530004289514633</id><published>2009-09-23T21:15:00.007+05:30</published><updated>2009-09-23T22:33:55.251+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-23T22:33:55.251+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="काशी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ई रजा कासी हॅ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बनारस" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="घुमक्कड़ी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमरे ऊपी के बासी" /><title>ई रजा कासी हॅ  - लंगोट सर्ग</title><content type="html">वैसे तो बनारस में और भी तमाम रंग देखे, सब का ज़िक्र करना यहाँ मुमकिन नहीं लेकिन लंगोट की चर्चा के बिना यह विवरण अधूरा रह जाएगा। अपनी काशी डायरी का अंत इसी लंगोट को समर्पित करता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ बाकी देश में खासकर बड़े शहरों में ब्रीफ़्स और अण्डरवियर्स का चलन है, बनारस में लंगोट अभी भी लोकप्रिय है, घाट पर नहाते पुरुषों में अधिकतर लोग आप को ब्राण्डेड अण्डरवीयर में ज़रूर दिखेंगे मगर एक अच्छी संख्या लंगोटधारियों की भी मिलेगी। और नगरों में लंगोट को लोगों ने पके करेले की तरह त्याग दिया है। करेला तो वो पहले भी था क्योंकि जो लोग लंगोट के योग्य अपने को नहीं पाते थे उन्होने पिछली पीढ़ी में ही पटरे वाले जांघिये का आविष्कार करवा लिया था। अब तो खैर! ये भी बात होने लगी है कि लंगोट पहनने से आदमी नपुंसक हो जाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक विज्ञान के फ़ैड्स पर यक़ीन करना ख़तरे से खाली नहीं। साठ के दशक में पूरे योरोप और अमरीका के वैज्ञानिकों ने मिल्क फ़ूड कम्पनियों को यह प्रमाण पत्र दे दिया है कि माँ का दूध बच्चे के लिए पर्याप्त नहीं। साठ, सत्तर और अस्सी, और नब्बे के दशक में पैदा होने वाले बच्चे डिब्बा बन्द पाउडर के दूध पर पले। आज बिना किसी माफ़ी, किसी अपराध स्वीकरोक्ति के ये फ़िर से स्थापित कर दिया गया है कि माँ का दूध ही सर्वश्रेष्ठ है। तो आज का कॉमन सेन्स है कि लंगोट पहनने से आदमी नपूंसक हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर सचमुच ऐसा होता तो काशी में आबादी की वृद्धि दर में कमी ज़रूर नोटिस की जाती। काशी में लंगोट कितना आम है इसका अन्दाज़ा आप को कपड़ों की कुछ दुकानों के आगे फ़हराते रंगीन पताकाओं से मिलेगी। अगर आप भूल न गए हों तो आप पहचान जाएंगे कि ये झण्डा-पताका नहीं छापे वाले रंगीन लंगोट हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrpECA4EtQI/AAAAAAAACTA/DaCElof0NF4/s1600-h/DSCN0850.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrpECA4EtQI/AAAAAAAACTA/DaCElof0NF4/s320/DSCN0850.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5384691105860465922" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;लंगोट पहनना कोई कला नहीं है। आप को बस गाँठ मारना और हाथ घुमा के सिरा खोंसना आना चाहिये। लेकिन घाट पर लंगोट पहनना एक हुनर ज़रूर है। इस हुनर में पहले लंगोट का एक सिरा मुँह में दबा कर शेष तिकोना भाग लटका लिया जाता है। फिर पहने हुए लंगोट/अंगौछे को गिरने के लिए आज़ाद छोड़कर फ़ुर्ती से तिकोने को पृष्ठ भाग पर जमा लिया जाता है। दोनों तरफ़ ओट हो जाने के बाद फिर नाड़े को कस लिया। सारा हुनर इस फ़ुर्ती में ही है। अनाड़ी लोग चूक जाते हैं तो उनके पृष्ठ भाग आम दर्शन के लिए सर्व सुलभ हो जाता है। और हुनरमन्द हाथ की सफ़ाई से नज़रबन्दी कर देते हैं और एक पल में ही सब कुछ खुल कर वापस ओट में हो जाता है। जय लिंगोट।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे हिसाब से लंगोट से बेहतर अन्डरवियर मिलना असम्भव है। एक प्रकार के मॉर्डन अण्डरवियर की टैग लाइन है कि फ़िट इतना मस्त कि नो एडजस्ट। बात मार्के की है। हर आदमी अण्डी पहन के एडजस्ट का हाजतमन्द हो जाता है। मुश्किल ये है कि सारी अण्डीज़ प्रि फ़िटेड आती है वो आप के लिए कस्टम मेड नहीं है। ९० हो सकता है आप के लिए ढीला हो, और ८५ टाइट। आप सर पटक कर मर जाइये आप के लिए कोई ८७ या ८८ साइज़ का अण्डरवियर नहीं बनाएगा। और किसी ने बना भी दिया तो आप का साइज़ सर्वदा ८७ ही रहेगा इस की क्या गारन्टी है हो सकता है सुबह ८४ हो शाम ९१ हो जाय और रात को ८१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झख मार कर आप ८५ या ९० का साइज़ लेंगे और फिर आप कितना भी एडजस्ट करें कुछ एडजस्ट नहीं होगा। इसके विपरीत लंगोट है। इसके ठीक विपरीत लंगोट कस्टम मेड है। जितना चाहे एडजस्ट। टाइट पहनना हो सिरा खींच कर टाइट कर लीजिये। और नपुंसक हो जाने के अफ़वाह से बचाव करना हो तो ढील दे कर लंगोट का वातायन बना लीजिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जय बनारस! जय लंगोट!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;(बनारस यात्रा के दौरान लिखी गई डायरी से)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-9090530004289514633?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/9090530004289514633/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=9090530004289514633" title="11 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/9090530004289514633?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/9090530004289514633?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/09/blog-post_1381.html" title="ई रजा कासी हॅ  - लंगोट सर्ग" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrpECA4EtQI/AAAAAAAACTA/DaCElof0NF4/s72-c/DSCN0850.JPG" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">11</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEcBQXg9eSp7ImA9WxNQF08.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-3253348436104899697</id><published>2009-09-23T08:45:00.008+05:30</published><updated>2009-09-23T21:37:30.661+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-23T21:37:30.661+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="काशी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ई रजा कासी हॅ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बनारस" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="घुमक्कड़ी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमरे ऊपी के बासी" /><title>ई रजा कासी हॅ !  - ६</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrmZuBrRQsI/AAAAAAAACSQ/xmF2a35i398/s1600-h/1186452.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 242px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrmZuBrRQsI/AAAAAAAACSQ/xmF2a35i398/s320/1186452.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5384503845501092546" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; किन्ही लाल साहब का मक़बरा है राजघाट के पुल के पास। आरकेयोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इन्डिया के संरक्षण में है वो खूबसूरत इमारत। हम ने चाहा कि देखें मगर पन्द्रह अगस्त के दिन छुट्टी है और उस दिन किसी को काम करने की इजाज़त नहीं है। शायद घूम-फिर कर ऐसे ऐतिहासिक स्थलों को देखने की आज़ादी भी नहीं। हमें ये लाभ देने के लिए जो व्यक्ति उस के देखरेख करता होगा उसे काम करना पड़ता शायद इसीलिए वहाँ प्रवेश बन्द था मगर सुरक्षाकर्मी फिर भी नौकरी बजा रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम यह सोच ही रहे थे कि वहाँ मुसलमानों के एक जत्थे की आमद हुई। हमें लगा कि शायद इन लोगों से इस इमारत की तारीख़ का कुछ पता चले सो दीनी पहनाव में पैबस्त एक मोटी-ताजी शख्सियत से हम ने पूछा कि क्या वो जानते हैं कि इस ऐतिहासिक इमारत की क्या अहमियत है। पर वे शायद खुद परिचित नहीं थे और सम्भवतः बाहर से आए थे। उनके साथ एक स्थानीय से लगने वाले जनाब उस पुलिस वाले से बहस में उलझ गए कि ये लोग बाहर से आए हैं और इनका मक़बरा देखना ज़रूरी है। हम ने उनसे भी अपनी जिज्ञासा ज़ाहिर की तो बासित जमाल नामधारी इन साहब ने इमारत की ऐतिहासिकता पर हमारी पुर्सिश को बुरी तरह से नज़र अंदाज़ कर दिया और अपने दुख भरे आक्रोश को प्रगट करने लगे कि मुसलमानों की जगह और उन्हे ही नहीं घुसने दे रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर से आए अपने रिश्तेदारों या दोस्तों को वो हिन्दू बनारस में मुस्लिम परम्परा के नाम पर जो कुछ है उसका मुज़ाहिरा करने में अपने को बेबस पा कर वे ये भी नहीं देख पा रहे थे कि सुरक्षाकर्मी हमें भी नहीं घुसने दे रहे। फिर भी मैंने उन के दुख को समझने की कोशिश करते हुए कहा कि आज पन्द्रह अगस्त है आज आज़ादी की छुट्टी है। तो भी उनका मानना था कि उस से क्या। उन्हे तो ये आज़ादी नहीं मिली कि वे अपने बुज़ुर्ग की जगह जा कर जो करना चाहें कर सके। शायद उन्हे बाबा विश्वनाथ के श्रद्धालुओं से ईर्ष्या हो जो संडे, मंडे, बैंक हॉलीडे सभी दिन अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में जमाल साहब की शिकायत पर सोचते हुए मैंने पाया कि मजारों को तो सरकार हस्तगत नही करती, सिर्फ़ ऐतिहासिक स्थलों को। अजमेर शरीफ़, निज़ामुद्दीन औलिया की मजार आदि तो जनता के ही अधिकार में रहती हैं बावजूद इसके कि वो ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण हैं। तो क्या जमाल साहब मुसलमानों के पुरानी हुक़ूमत के सभी स्थानों पर अधिकार न मिलने से दुखी थे। अगर ऐसा है तो ये बहुत बड़ी शिकायत है क्योंकि मुसलमानों के अधिकार में तो एक वक़्त पूरे का पूरा हिन्दुस्तान था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जमाल बासित हमें बहुत देर तक अरझा कर नहीं रख पाए और हम आगे निकल गए। वरूणा और गंगा के संगम पर लगा वाराणसी का पहला घाट है आदि केशव घाट। गंगा के प्रवाह की दिशा से देखेंगे तो आखिरी घाट मगर न जाने क्यों इसे पहला घाट ही कहते हैं। वाराणसी में भी पहले वरुणा आती है और असी बाद में। घाट पर लिखा है काशी पहले विष्णु की नगरी है बाद में शिव की। मन्दिर जीर्ण है और प्राचीन मूर्ति के बारे में उघारे बदन, अगोंछे में अधोभाग का आच्छादन किए पुजारी जी ने बताया कि वह स्वयं विष्णु जी के द्वारा स्थापित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrmancwWulI/AAAAAAAACSg/cLVkrSYdTBM/s1600-h/DSCN0698.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrmancwWulI/AAAAAAAACSg/cLVkrSYdTBM/s320/DSCN0698.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5384504832022723154" /&gt;&lt;/a&gt;दो बकरी और एक गाय के अलावा घाट लगभग सुन्न पड़ा है। मन्दिर के चारों ओर लोगों ने अपना घर बना लिया है। आप मन्दिर में घुसते हैं तो आप को लगता है कि आप किसी के घर की सीमा का उल्लंघन कर रहे हैं। चौसट्ठी घाट पर चतुर्षष्ठेश्वर मन्दिर में भी इसी संकोच के चलते मैं बाहर ही रह गया। यह केवल आदिकेशव की नहीं सम्पूर्ण बनारस का चरित्र है यहां लोग मन्दिर में घुस कर रहते ही नहीं, वहां से दुकान धंधा भी संचलित करते हैं। विश्वनाथ गली में भी कई प्राचीन मन्दिर ऐसे हैं जो लोगों के घरों और दुकानों के बीच पिस कर महीन हो कर विलीन होते जा रहे हैं। कुछ एक ने तो मन्दिरवे में ही होटल खोल दिया है। खाओ रजा इडली डोसा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पाया कि काशी का कुछ अलग रंग नहीं है। ऊ पी का ही रंग है जो यहाँ कुछ खिल कर निकलता है। आदमी नंगा है कुछ नहीं है उसके पास। फिर भी मस्त है। जैसे उसे दुनिया जहान से कोई मतलब ही नहीं। कहते हैं जो आनन्द यहाँ हैं कहीं नहीं। यहाँ एक अजब मिठास है। गमछा लपेटे हैं, दो रुपये की सब्जी खरीदें हैं, जेब खाली है, पर कोई परिचित दिख जाय तो आवा एक ठ पान हो जाए, चाय हो जाए। ये चरित्र पूरे प्रदेश का है- खास तौर पर आगरा से दक्षिण-पूर्व का- लेकिन काशी तो जैसे एक सुरूर में रहता है हमेशा। जैसे नशा यहाँ की भंग में नहीं गंगा के पानी में हो। जिसने डुबकी लगायी वो गया, सुरूर में। मन लागो यार फ़कीरी में। दूसरी तरफ़ कुछ लोगों का मानना है कि बनारस एक लद्धड़ शहर है जो अपनी निरुद्देश्यता को बनारसी मस्ती का नाम देकर आँखें मूंदे पड़ा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी ही निरुद्देश्य मस्ती में शाम को घाट पर टहलते हुए अचानक बारिश होने लगी। दौड़ कर एक चाय की दुकान पर लगे तिरपाल में घुस गए। तमाम श्रद्धालुओं के बीच गीता वचन उवाचते मिले झक्क कुर्ता पैजामा धारी सज्जन जो आपस के राग-द्वेष से चिंतित थे। कानों में पड़ा कि उनकी दृष्टि में कोई अपना-पराया नहीं, सब आत्मा है। और आत्मा आत्मा में क्या भेद। यह कहते हुए उनके मुख कमल से मदिरा की गन्ध मन्द-मन्द आ रही है। धीरे से बात खेत के पट्टो और फ़ौजदारी पर लौट गई। ये एक और विषेशता है। लम्पट सबसे बढकर साधु की भाषा बोलता है। लेकिन उसके हाव-भाव और कर्म उसका राज़ खोल देते हैं। कभी भाषा मंत्र थी। उसमें इतनी शक्ति थी कि उच्चारण मात्र ही वरदान और शाप हो जाता था। पर आज की भाषा वास्तव में धोखा है। अकेले भाषा से साधु और शैतान का भेद करना बहुत मुश्किल है। हर लंगोटधारी ब्रह्मचारी हो ये ज़रूरी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(बनारस यात्रा की दौरान लिखी डायरी से)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-3253348436104899697?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/3253348436104899697/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=3253348436104899697" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/3253348436104899697?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/3253348436104899697?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/09/blog-post_23.html" title="ई रजा कासी हॅ !  - ६" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrmZuBrRQsI/AAAAAAAACSQ/xmF2a35i398/s72-c/1186452.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEcBQXg9fSp7ImA9WxNQF08.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-1071081441058817259</id><published>2009-09-22T08:58:00.007+05:30</published><updated>2009-09-23T21:37:30.665+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-23T21:37:30.665+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="काशी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ई रजा कासी हॅ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बनारस" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="घुमक्कड़ी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमरे ऊपी के बासी" /><title>ई रजा कासी हॅ  ! - ५</title><content type="html">ओम नमो शिवाय! ओम नमो शिवाय!! सुबह सुबह पाँच साढ़े पांच बजे होटल गैंजेस के नीचे से इस मंत्र जाप के साथ भक्तो की टोली खड़ताल खड़काते निकलती हैं। शिव मंत्र का यह सस्वर पाठ बड़ा ऊर्जावान जागृति देने वाला मालूम हुआ मुझे। होटल के छज्जे पर खड़े होकर उन्हे देखा और फटाफट नीचे उतर आया। उनके पीछे चलते हुए मुझे भी मन हुआ कि मैं भी उस टोली का हिस्सा होकर ओम नमो शिवाय का जाप करने लगूं। लेकिन अपनी स्वाभाविक झिझक और लज्जा के चलते मैं चुप ही रहा। विश्वनाथ गली के अन्दर मुड़कर वे वहीं खड़े होकर कुछ देर तक माहौल बनाते रहते। उनके इस जादू से कुत्ते भी मुग्ध हो गए। पास आकर पूँछ हिलाते शामिल हो गए। एक ने तो अपना स्वरदान भी किया; भौं-भौं, कूं-कूं नहीं, अजब आह्लाद से भरा हुआ। जैसे किसी उसमें भी किसी सुसुप्त स्मृति का जागरण हो गया हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शंख नाद के साथ बाबा विश्वनाथ की अर्चना समाप्त करके टोली दशाश्वमेध घाट की ओर स्नान के लिए चली गई। पाठ का स्वर बदल कर मद्धम हो गया पर जारी रहा। चाय वाले ने बताया कि यह बहुत पुराना नहीं है। पाँच साल से ही चालू हुआ है। चार टोली आती हैं। एक कबीरचौरा से, एक चेतगंज से, एक चौक से और एक अन्यत्र से। पास खड़े एक बाबा ने कामना की कि अब एक टोली सोनारपुरा से आनी चाहिये। चायवाले ने सहमति जतायी। एक सभ्रान्त पुरुष जिसके कपड़े काफ़ी मलिन हो चुके थे मुझसे आग्रह किया कि बाबू एक चाय पिलाइये। उसके आग्रह में विनय़ था,  दैन्यता न थी। ऐसे आग्रह को टालना असम्भव था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाय वाले के हाथ में तुलसी और पुदीने के रस मिश्रित काली चाय बनाने का हुनर था, मैं उसका मुरीद हो कर सुबह तीन चार चाय पी जाता हूँ। तीन चार इसलिए भी क्योंकि बढ़ती महँगाई में दाम बढ़ाने के अलावा कुल्हड़ का आकार भी मध्यम से छोटा और छोटे से नन्हा होता जा रहा है। पर अफ़सोस यह था कि उसकी सड़क पर स्थित अस्थायी दुकान, स्थायी दुकानों के खुलते ही बन्द हो जाती है। चाय का आनन्द लेते हुए मैं ने देखा कि कि एक बड़ी गाड़ी टयोटा इनोवा आकर विश्वनाथ गली के दूसरी तरफ़ रुकी। आगे के दरवाजे से एक सुथरे स्वरूप के सिल्क के कुर्ता-धोती डांटे एक धनिक सज्जन उतरे। ड्राइवर गाड़ी रोके रहे। पीछे एक प्रौढ़ महिला थीं। वे नहीं उतरी। फिर हमने देखा कि एक मोटरसायकिल सवार पुलिस वाला ऊँचे स्वर में कुछ अपशब्द हकाल रहा था- साले एक गाड़ी से पूरा रस्तवा जाम कर दिया है.. बढ़ा भोसड़ी वाले। गाड़ी का ड्रायवर उतर कर दूसरी तरफ़ का दरवाजा खोल रहा था। गाड़ी से एक प्रौढ़ महिला का अवतरण हुआ। ड्रायवर बहुत हड़का नहीं मगर वापस आकर अपनी गद्दी सम्हाली और गाड़ी जब तक आगे नहीं बढ़ी, पुलिसवाले की प्रेरणा जारी रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrhFpyhxsAI/AAAAAAAACRk/cdb9_Bk1c5I/s1600-h/DSCN1050.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrhFpyhxsAI/AAAAAAAACRk/cdb9_Bk1c5I/s200/DSCN1050.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5384129938761822210" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;बनारस प्रवास की शुरुआत ही यहाँ के यातायात की अराजक रोमांच से हुई थी। तभी समझ गया था कि यह सड़क पर दृश्यमान ये स्वच्छन्द गतियां बनारसी मानस का निछन्दम प्रवृत्ति का प्रतिबिम्ब हैं। कोई किसी के लिए रुकने को तैयार नहीं है। एक दूसरे को रास्ता देने की न्यूनतम विनम्रता भी नहीं है, जिसे इंगलिश ऐटीकेट या ‘पहले आप’ वाली लखनवी तहज़ीब में देखा जाता है। यहाँ तो बस उन दो प्राचीन राजाओं की अदम्य ऊर्जा है जो संकरे पुल पर आमने सामने होकर अपने रथ पीछे हटाने से इन्कार कर देते हैं। और जो अपनी सुविधा के लिए पूरे जगत की गतियों को अवरुद्ध करने में भी नहीं संकोच करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक मुझे कल शाम की एक घटना याद हो आई। यही सड़क थी, और गाड़ी भी इनोवा ही थी। ठीक ऐसे ही चिल्ल-पों करती सड़क पर एक इनोवा रुक गई थी और उसके पीछे का सारा ट्रैफ़िक जड़वत हो गया था। अजीब दृश्य था, न तो कोई इनोवा के अगल-बगल की जगह से अपने वाहन को रगड़ते हुए निकालने की कोशिश कर रहा था और न ही पीछे खड़े वाहनसवारों में से कोई बेचैन आत्मा अपने स्वरयंत्र के ज़रिये इनोवावासियों को धकेलने जैसी प्रतिक्रिया कर रहा था। बड़े अचरज का नज़ारा था, ग़ौर से देखने पर समझ आया कि इनोवा के आगे एक पुलिस की जीप भी खड़ी है जिसके वर्दीधारी सरकारी कर्मचारी इनोवा से उतरने वाली सभ्रान्त महिलाओं के लिए गाड़ी का दरवाज़ा खोलने से लेकर उन्हे दुकान के भीतर छोड़ आने तक जैसी सेवा-टहल कर की स्वयं को सार्थक सिद्ध कर रहे हैं। निश्चित ही ये महिलाएं किसी कुलीन अफ़सर के परिवार की थीं। दो-तीन मिनट तक गौदौलिया से दशाश्वमेघ जाने वाली सड़क का संसार एक सम्मोहक जड़ता में स्तम्भित रहा। और ये सब एक सरकारी अफ़सर के रौब-दाब के भौकाल में।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विचार ही रहा था कि देखा कि सुबह से बानारस के यातायात को सुधार देने के लिए तत्पर एक लम्बोदर पुलिसवाला अपनी टांग उठाकर रिक्शेवाले के पृष्ठभाग वो अंकन कर रहा था जिसे आम चलन में गाँड़ पर लात कहा जाता है। गाँड़ पर लात मुहावरे का प्रयोग आजकल जी पी एल के रूप में एम टी वी पर भी लोकप्रिय हो चला है लेकिन उसके सार्वजनिक प्रयोग का साक्षात दर्शन आप को काशी या काशी जैसी दिव्यनगरी में ही सम्भव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अनुभव के बाद मन पर जो बनारस की अराजकता को जो अभिराम बिम्ब बना था, ऐसे खण्डित होने लगा कि नई बनी छवि का कुछ स्पष्ट अर्थ निकालना कठिन हो गया। क्या इसका अर्थ यह था कि बनारसी अराजकता और स्वच्छन्दता तभी तक है जब तक कि राज्य का डण्डा पिछवाड़े पर अंकित होने की सम्भावना क्षितिज पर दूर हो? कुछ चाह कर भी इस मुद्रांकन से बच नहीं पाते और कुछ ऐसी सम्भावना के उपजते ही अपनी निर्दोषता का सबूत, बुत बन पेश करने लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बनारस का अन्तिम घाट है राजघाट। लोगों ने बताया कि वो एकदम ‘गँवार’ है। उसे देखने की इच्छा इसलिए बलवती हुई कि वो सम्भवतः बनारस का पूर्ववर्ती रूप है। पिछली सदियों का जिसे अभी देखा जा सकता है। वहाँ पहुँचे तो समझ आया कि उसे गँवार क्यों कहा गया.. घाट पर पत्थर की सीढ़िया तो हैं मगर मिट्टी का साम्राज्य कहीं अधिक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहाँ पहुँचने के पहले ही दर्शन हुए भैंसासुर मन्दिर के। थोड़ा चौंका। भैंसासुर यानी महिषासुर - देवी माँ द्वारा जिसके मर्दन का उत्सव हर वर्ष  हम करते ही हैं- उसका मन्दिर? आगे घाट पर देखा कि घाट का नाम भैंसासुर राज घाट लिखा है। फिर ऊपर देखा तो एक भव्य संत रविदास मन्दिर निर्माणाधीन दिखा। उसके नीचे लिखा था – संत रविदास घाट। ये थोड़ा उलझाने वाला लगा। एक घाट के तीन-तीन नाम कैसे। पूछा तो मल्लाहों ने बताया कि घाट का नाम भैंसासुर राजघाट है। संत रविदास बोलेंगे तो दूसरी छोर पर अस्सी के आगे भेज दिये जायेंगे। फिर एक स्त्री ने बताया कि इस घाट का असली नाम कुलकुल घाट है। इसकी क्या कहानी है उसने नहीं बताई बस यही कहा कि कुलकुल ही पुराना नाम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrhFqgs4wsI/AAAAAAAACRs/3hqd4ApmfHM/s1600-h/DSCN0767.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrhFqgs4wsI/AAAAAAAACRs/3hqd4ApmfHM/s200/DSCN0767.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5384129951156454082" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;अपने मातृपक्ष और श्वश्रूपक्ष की पूरी कहानी बताने के बात उसने हमें दस-दस रुपये की माला बेच दी और कहा कि जाइये भैंसासुर बाबा पर चढ़ा आइये। वो जागता बाबा है। हैजा फैलता है तो हम बाबा से कहते हैं कि बाबा हैजा रोक दो तो बाबा रोक देता है। बेटी मर गई थी तो बाबा के पास जा के लिटा दिया। बोला कि बाब इसे जिला दो- बाबा ने जिला दिया। जागता बाबा है। ऐसे जागते बाबे कितने हैं देश में। शायद हजारों, शायद लाखों। मगर भैंसासुर बाबा पूरे वर्ल्ड में एक ही है। ऐसा एक अन्य भक्त ने बताया। हम अपराजित/नीलकण्ठ की माला ले के गए। बाबा का केवल धड़ था और बाबा की सहधर्मिणी सायरा माता की पूरी आकृति। और अन्दर भैंसासुर बाबा के बगल में बाबा की सवारी भैंसा या उनका कोई बन्धु ही- पता नहीं कह नहीं सकते! न विष्णु थे, न राम, न कृष्ण, न गणेश और न ही कोई अन्य देवी देवता। ये देवालय नहीं एक असुरालय था जहाँ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा के होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। लेकिन बाहर शंकर जी के नन्दी थे। और मन्दिर के भीतर ही बाजू में भोले बाबा भी उपस्थित थे। इस प्राचीन गँवार घाट पर असुर संस्कृति के चिह्न आज भी जीवित हैं और उन्हे भोले बाबा का समर्थन और संरक्षण दोनों प्राप्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(बनारस यात्रा के दौरान लिखी डायरी से)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-1071081441058817259?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/1071081441058817259/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=1071081441058817259" title="6 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/1071081441058817259?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/1071081441058817259?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/09/blog-post_22.html" title="ई रजा कासी हॅ  ! - ५" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SrhFpyhxsAI/AAAAAAAACRk/cdb9_Bk1c5I/s72-c/DSCN1050.JPG" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEcBQXg8eCp7ImA9WxNQF08.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-2537208233723998513</id><published>2009-09-14T08:19:00.009+05:30</published><updated>2009-09-23T21:37:30.670+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-23T21:37:30.670+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="काशी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ई रजा कासी हॅ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="घुमक्कड़ी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमरे ऊपी के बासी" /><title>ई रजा कासी हॅ ! - ४</title><content type="html">घाट पर मुझे कुछ मुसलमान भी दिखाई दिए। अपने सफ़ेद कुर्ते, टखने के ऊपर पैजामे और नमाज़ी टोपी पहने हुए। दाढ़ी करीने से कटी हुई। मोटे तौर पर एक साफ़-सुथरा रूप। मुझे जिज्ञासा हुई कि मुसलमानी इलाक़ो का हाल कैसा होगा। मैं और मेजर दोनों मदनपुरा से होकर रेवडी बाज़ार की गलियों में घुस गए। गलियाँ वैसी ही संकरी और अंधेरी थी। ज़्यादातर मर्द दाढ़ी, और औरतें बुरक़े के पैरहन में क़ैद थे। गलियों में यहाँ भी थोड़े-थोड़े अन्तराल पर कूड़े के ढेर नमूदार हो रहे थे। दुकाने अलग क़िसम की थी। लेकिन शुचिता में कोई खास अन्तर नहीं मिला और न ही भाषा में। औरतें भी रहल-गयल कर रही थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे ऐसा लगा कि हिन्दू और मुसलमान दोनों शुचिता को अपने-अपने निजी नियम तक सीमित कर के ही देख रहे हैं। सामाजिक शुचिता का किसी के पास कोई दृष्टिकोण नहीं है। कहीं-कहीं तो यह मन्दिर-मस्जिद तक महदूद है और कहीं-कहीं वहाँ भी नहीं मिलती। प्राचीनता के नाम पर जो ढोया जा रहा है, वहाँ नहीं है, लेकिन आधुनिक संरचनाओं में है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के भीतर स्थित भव्य विश्वनाथ मन्दिर में है। और रेवड़ी बाज़ार के अंत पर स्थित अल्जामिया अलतु्स्सलफ़िया में भी है जिस की खूबसूरत इमारत देखकर भीतर जाने की इच्छा ज़ाहिर की थी। और जहाँ गेरुआ गमछा गले में डाल कर और अपना नाम पता उर्दू में लिखकर मैं ने चौकीदार को थोड़ा चौंकाया और अपनी इस नाटकीयता पर प्रसन्न रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sq2xCazRFAI/AAAAAAAACRE/_52eQjCJoS0/s1600-h/DSCN0878.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sq2xCazRFAI/AAAAAAAACRE/_52eQjCJoS0/s320/DSCN0878.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5381151784889816066" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;बनारस के घाटों का वर्तमान रूप बहुत पुराना नहीं हैं। कहते हैं कि मुगल काल और उसके बाद ही सारे घाटों को आधुनिक शक्ल मिली। साफ़ देखा भी जा सकता है। घाटों की सीढियों और मन्दिरों के  लाल- भूरे पत्त्थर पर इसी मुगल-राजपूत शैली का प्रभाव है। लेकिन काशी और उसकी संस्कृति का अस्तित्व तो बहुत प्राचीन है। हज़ारों सालों की ग्रामीण सभ्यता का संस्कार रहा है – खुले मैदान में , नदियों के किनारे तक में निबटना, कहीं भी थूक देना और मूत्र विसर्जित करना। यहाँ तक कि इनका रोकना स्वास्थ्य के विरुद्ध माना जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रामीण सभ्यता जिसमें कि आप कभी भी खेत, मैदान और जंगल से बहुत दूर नहीं होते, इस स्वास्थ्य सम्बन्धी संस्कार का पालन कोई कठिन नहीं और शालीनता के विरुद्ध भी नहीं। लेकिन शहरी समाज एक अलग संस्कार की माँग करता है। घाट का पत्थर मिट्टी की तरह मल, मूत्र, थूक को जज़्ब कर के फिर से एकरस नहीं बन जाता। ये बात हम ही नहीं वे भी समझते हैं जो घाट पर बैठ कर हगते हैं। लेकिन उसका विकल्प क्या है। कहाँ घाटो के आस-पास बसी सघन आबादी के लिए सार्वजनिक शौचालय?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस वर्ष को सार्थक करने के लिए जन्माष्टमी तक भी वर्षा नहीं हुई है। पारम्परिक ज्ञान बताता है कि जिस काली अँधियारी मूसलाधार बारिश की रात में कृष्ण जी का अवतरण हुआ था, हर बरस उस रात बरखा ज़रूर होती है। आसाढ़ गया, सावन भी गया, भादों भी सूखा निकला ज़ा रहा था, भगवान ने ज्ञानियों की लाज रख ली, जन्माष्टमी के दिन से ही बारिश शुरु हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन घाट पर गंगा का स्तर देखकर मुझे लगा कि कल की बर्षा के बाद कुछ बढ़ोत्तरी हुई है। मैंने एक पण्डे से यही कहा तो बोले कि पानी एक सीढ़ी उतर गया है। अभी आप खड़े रहिये तो जिस पत्थर पर लहर आती दिख रही है, एक ही घण्टे में एक इंच उतर जाएगी। मैं इस विरोधाभास पर हैरान हुआ मगर गंगा के जल को देखता हुआ आगे बढ़ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक मल्लाह ने पूछा कि नौका लेंगे। अपनी रजा बताने के बाद मैंने कहा कि पानी घट रहा है। जैसे मैंने उसकी दुखती रग़ पर हाथ रख दिया हो। “भगवान जाने क्या होगा। पानी घटता ही जा रहा है। गंगा जी रहेंगी या नहीं अब तो यही प्रश्न खड़ा हो गया है।”...वैसे ये बात सभी जानते हैं कि गंगा सदा से इस धरती पर नहीं है। भगीरथ के प्रयत्नों से सगर-पुत्रों के उद्धार के लिए स्वर्ग से गंगावतरण हुआ है, पर एक अन्य पौराणिक कथा से कम लोग परिचित है जिसके अनुसार कालान्तर में गंगा का लोप हो जाएगा... आजकल पूरा बनारस तो नहीं पर असी और वरुणा के बीच घाट के आस-पास रहने वाले काशी निवासी इसी एक चिंता के द्वारा पकड़े गए हैं। पानी घटता जा रहा है- गंगा जी बचेंगी या नहीं। घाट के पण्डों, मल्लाहों के अलावा घाट के आस-पास का पूरा कार्य-व्यापार गंगा जी पर ही निर्भर है। चिंता स्वाभाविक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sq2x6rxh-eI/AAAAAAAACRU/G18fCQnHxlo/s1600-h/DSC00642.JPG"&gt;&lt;img style="cursor: pointer; width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sq2x6rxh-eI/AAAAAAAACRU/G18fCQnHxlo/s200/DSC00642.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5381152751518611938" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sq2ybiN-_5I/AAAAAAAACRc/gYPbe98uMPA/s1600-h/DSCN0703.JPG"&gt;&lt;img style="cursor: pointer; width: 200px; height: 150px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sq2ybiN-_5I/AAAAAAAACRc/gYPbe98uMPA/s200/DSCN0703.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5381153315889282962" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ सोचकर मैंने कहा कि गंगा जी का सफ़ाई अभियान चल रहा है। जैसे बीमार आदमी इलाज के दौरान कमज़ोर बना रहता है लेकिन बाद में स्वस्थ होकर बलवान हो जाता है, वैसे ही गंगा जी भी.. । “कहाँ सफ़ाई, कितनी गंदगी बढ़ गई है। घाट पर एकदम नरक हो गया है।“ जिस कचरे के ढेर पर कल तक लोग पेशाब कर रहे थे और जिसे देखकर मैं विचलित हो रहा था. उसने बताया कि कल करपात्री जी के आश्रम के विद्यार्थियों ने उस पूरे कचरे को सफ़ा किया और कचरा बड़ी नौका पर डालकर उस पार गाड़ आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इस बात से बड़ा खुश हुआ कि शुचिता का भाव अभी पूरी तरह मरा नहीं है। पर मल्लाह दुखी था कि ब्राह्मण सफ़ाई कर रहे हैं, कचरा ढो रहे हैं। बाद में सोचते हुए मैं ने पाया कि शायद शुचिता की पुनर्स्थापना के लिए अब ब्राह्मणों को ही सफ़ाई की ज़िम्मेदारी ढोनी होगी.. अन्य शब्दों में अब वो काल है कि अब उन्हे कचरा ढोना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sq2xdnZEhKI/AAAAAAAACRM/_AnC4-jIZRg/s1600-h/DSCN0882cr.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 242px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sq2xdnZEhKI/AAAAAAAACRM/_AnC4-jIZRg/s320/DSCN0882cr.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5381152252126069922" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;प्रकृति में दिव्यता और पवित्रता के आरोपण का एक खतरा यह भी बन जाता है कि हम उसे शुचिता और पवित्रता का ऐसा स्वयंभू स्रोत मान लेते हैं जो हमें निरन्तर पवित्र करता चलती है/ चलता है। और चूंकि वह हमें पवित्र करता है तो उसके दूषित होने और भ्रष्ट होने की किसी भी सम्भावना पर हम विचार करते ही नहीं। और इसलिए पवित्र नदियों व कुण्डादि की साफ़-सफ़ाई के प्रति एक आम उदासीनता हमें देखते हैं। उसमें माला, फूल, चन्दन, रोली के अलावा मूर्ति आदि भी फेंके जाते हैं। आजकल लोग साबुन लगा के कपड़ा धो आते हैं, प्लास्टिक बहाते हैं, घर की नाली भी उसी में खोल देते हैं। उद्योगपति तो मनुष्य से कुछ ऊपर के जीव हैं, वे मानवीय नैतिकता के द्वन्द्वों से अछूते रहते हैं और अपना औद्योगिक कचड़ा गंगा की पवित्रता के हवाले कर के निर्द्वन्द्व हो जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्ही सब चिन्ताओ को माथे पर ढोकर टहलते-टहलते तुलसी घाट पहुँचा। तुलसी बाबा ने असी घाट पर पर ही बैठ कर रामचरितमानस की रचना की थी, ऐसा बताया जाता है। उनकी झोपड़ी जहाँ रही होगी कभी, वहाँ एक बड़ी इमारत है। बडी इमारत में एक छोटा मन्दिर बाबा के नाम पर है। मैंने तस्वीर लेना चाही तो पुजारी ने आकर डाँटना शुरु कर दिया। फोटो पर इस तरह के ऐतराज़ पर मेरी हैरानी के जवाब में उन्होने कहा कि हर स्थान की एक मर्यादा होती है। पुजारी जी को उठने बैठने में तक़्लीफ़ है यह दिखाई दे रहा था, लेकिन भूमि पर ही आसन था उनका। उन्होने अपने बैठने के लिए किसी मोढ़े आदि का इन्तज़ाम भी नहीं किया था, । ऐसा करना भी सम्भवतः मर्यादा के विरुद्ध जाता होगा- मर्यादा के मापदण्ड अपने ऊपर भी लागू करते हैं यह पा कर मुझे पुजारी जी पर श्रद्धा हो आई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोने में एक जोड़ा खड़ाऊँ और एक कठवत नुमा लकड़ी का पुराना टुकड़ा पड़ा हुआ था। पूछने पर बताया कि दोनों आईटम तुलसी बाबा के ही हैं। लकड़ी का टुकड़ा दर असल उनकी नाव का अवशेष है जिसे लेकर वो उस पार के 'मगहर' में जाया करते थे; वह काशी में कोई काम नहीं करते थे। ‘कोई काम’ का अर्थ पुजारी जी ने बताया कि मल-मूत्र त्याग। काशी दिव्य नगरी है, पूरी सृष्टि नष्ट हो जाएगी पर काशी बनी रहेगी। ऐसी नगरी को अपने मल-मूत्र से दूषित करने की सोच, संस्कार विरुद्ध थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस जानकारी के बाद यह तो तय हो गया कि शुचिता के अभाव की इस दूषित नैतिकता का स्रोत तुलसी दास की भक्ति परम्परा से नहीं आ रहा है। और शुद्ध अंग्रेज़ी संस्कार भी नाक छिड़क कर रूमाल जेब में रखने में विश्वास करता है। तब शायद ये भ्रष्ट आचार अलग संस्कृतियों के संयोग हो जाने से ही हुआ है। एक तत्व का गुण दूसरे से मिल जाने को ही भाषिक अर्थों में भ्रष्ट होना कहते हैं। इस्लाम के साथ एक स्वच्छ संयोजन संघर्ष और एकता की राह से बन—बिगड़ ही रहा था कि योरोपीय संस्कारों ने आकर सब माठा कर दिया। अब पीछे वाली स्थिति में जाने का कोई रास्ता नहीं है। संस्कृति की नदियों का संगम हो चुका है, अब पानी अलग-अलग करने का कोई उपाय नहीं है। नए संस्कार गढ़ना ही शायद अकेला विकल्प है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 0, 153);"&gt;(बनारस यात्रा के दौरान लिखी डायरी से)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-2537208233723998513?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/2537208233723998513/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=2537208233723998513" title="12 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2537208233723998513?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2537208233723998513?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/09/blog-post_14.html" title="ई रजा कासी हॅ ! - ४" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sq2xCazRFAI/AAAAAAAACRE/_52eQjCJoS0/s72-c/DSCN0878.JPG" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEcBQXg8fSp7ImA9WxNQF08.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-6641478307241170235</id><published>2009-09-12T09:46:00.006+05:30</published><updated>2009-09-23T21:37:30.675+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-23T21:37:30.675+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="काशी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ई रजा कासी हॅ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="घुमक्कड़ी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमरे ऊपी के बासी" /><title>ई रजा कासी हॅ  ! – ३</title><content type="html">मुख्य मन्दिर से बाहर निकला तो कोई ऊँचे स्वर में कुछ गा रहा था। गेरुए कुर्ते और लुंगी में, गले में तुलसी की पत्तियों की माला डाले, माथे पर चन्दन, तीन दिन की दाढ़ी और दाँत लम्बे समय तक पान चर्वन से काले हो चुके। वो गा रहा था ऊँचे प्रभावशाली स्वर में लिंगाष्टक। उसकी वाणी में ओज, श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत मिश्रण था। लिंगाष्टक गाते-गाते ही उसके गिर्द एक छोटी भीड़ इकठ्ठा हो गई। पहले से ही उसकी प्रतिभा से परिचित कुछ लोगों ने अनुनय किया कि बहुत दिन हुए उनके स्वर में रावण कृत शिव स्तोत्र सुने हुए। थोड़े मनव्वुअल के बाद वो गाने लगे। और उनकी वाणी में मुझे असली ईश्वरत्व के आभास होने लगे। मन्दिर के भीतर चालू पूरे ठग-विसर्ग में एक वही अकेले धर्म-प्राण मुझे नज़र आए। पत्थर के मन्दिर और पण्डो के बीच एक जीवित भाव बस वही थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर जाने से पहले ज्ञानवापी मस्जिद की ओर निकल गया। मन्दिर और मस्जिद के बीच एक अस्थायी प्रांगण है जिसके बीच में एक कुँआ है। भीतर झांकने पर दिखा कि कुँए के मुँह पर चादर पड़ी है और उसके ऊपर फूलमाला का एक लिंग बना दिया गया है। एक साथी भक्त ने बताया कि जब औरंगज़ेब मन्दिर तुड़वाने लगा तो शंकर भगवान इसी कुँए में कूद गए- प्राचीन मन्दिर के लिंग को कुँए में फेंक दिया गया इस तथ्य को बताने का ये शायद एक मिथकीय रूप था। कुँए के पास कुछ पण्डे भक्तो को जेब ढीली करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। उनसे बचने के लिए मैं दूर हट गया और कुँए के पीछे मस्जिद की ओर मुख करके बैठे सुन्दर नन्दी से आकर्षित हो गया। नन्दी के पास एक बीस-बाईस बरस का युवक पण्डा विराजमान था। उसके इकहरे बदन और चेहरे की युवा मृदुलता ने मुझे कुछ आश्वस्त रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पास पहुँचते ही उसने बोलना शुरु कर दिया, मस्जिद की ओर इशारा करते हुए, “ये पुराना मन्दिर है। मन्दिर में इक्कीस फ़ुट का लिंग था। शुद्ध पन्ने का, जो दिन में घटता और रात को बढ़ता था। औरंगज़ेब ने मन्दिर तोड़ दिया। १६६५ में। जब नन्दी तोड़ने लगे तो उसमें से भौरें निकल कर मुसलमानों को काटने लगे। इसलिए नन्दी बच गए। यह नन्दी तब नौ फ़ुट के थे, फिर पाँच फ़ुट के रह गए थे, अब छै फ़ुट के हो गए हैं। विश्वनाथ जी के अभाव में काशी में धर्म को नन्दी जी और गंगा जी ने बचाए रखा”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी बातें दिलचस्प मालूम दे रही थीं। लिंग का  घटना-बढ़ना तो तब भी  समझा जा सकता है मगर नन्दी क्यों घट-बढ़ गए हैं? क्या वे धर्म रूपी वृषभ यही नन्दी हैं? मुझे अधिक सोचने का अवसर दिए बिना युवा पण्डा बोलता रहा। “फिर १०० साल बाद अहल्या बाई होलकर को सपना आया। तो उनकी गोद में तीन शिव लिंग प्रगट हुए, एक को सोमनाथ में, दूसरे को उज्जैन के ओंकारेश्वर, और तीसरे को काशी के विश्वनाथ मन्दिर में स्थापित किया गया। तुलसी दास जी ने यहीं बैठ कर, और अस्सी पर बैठ कर रामचरितमानस लिखी। तुलसीदास जी रोज़ नन्दी को लड्डू खिलाते थे। ढाई सौ मन लड्डू खिलाया। बाएं हाथ के ऊपर दहिना हाथ रखकर इनका गोड़ पूजने से तीन फल की प्राप्ति होती है। भक्ति, ज्ञान और मोक्ष। गोड़ पकड़ कर आशीर्वाद लीजिये!”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने सुदर्शन नन्दी के गोड़ पकड़ने का उपक्रम करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं थी। गोड़ पकड़ने के लिए मेरा शरीर कमर से झुक गया। पण्डे ने बतलाया कि मैंने उलटा हाथ नीचे रखा है। मैंने हाथ उलट लिए। मैं झुका हुआ था। फिर उसने मेरे सर के ऊपर अपना हाथ रख कर हलके से दबा दिया। अब मैं पूरी तरह से उसके वश में था, समर्पण कर चुका था। कहानी सुनने के लालच ने मुझे असावधान कर दिया था। अब वो टूटी-फूटी संस्कृत में कुछ वाक्यांश बोल कर मुझे दुहराने का आदेश दे रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी स्थिति आपत्ति करने वाली नहीं थी। शरीर कमर से झुका हुआ था, सर नन्दी के पैरों में था, दोनों हाथ सर के नीचे दबे थे, और पण्डे का हाथ मेरे सर को दबा रहा था। स्वयं को इतनी दबी हुई स्थिति में मैंने कभी नहीं पाया। कोई टंटा खड़ा करने की कोई मंशा न होने से मैंने बेमन से हलकी आवाज़ में उसके आधी-संस्कृत आधी हिन्दी के वाक्यों को दुहरा दिया। इस अस्फुट अपभ्रंश मंत्रोच्चार के बीच उसने मुझसे मेरे पिता, पत्नी और अन्य सम्बन्धियों की जानकारी लेनी शुरु कर दी। ये जानकर कि मेरे कोई सन्तान नहीं है और ये मानकर कि वो मेरी दुखती रग़ होगी, वो मुझसे पुत्रकामना के लिए संकल्प कराने लगा। बताने लगा कि ये वह विशेष स्थान है जहाँ दोये सौ रुपये में गौदान हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुपये पैसे की बात सुनकर मेरे मस्तक के हथियार जाग गए। रुपये का चला जाना स्वीकार है, &lt;a href="http://pahalu.blogspot.com/2009/09/blog-post.html"&gt;रुपया क्या है हाथ का मैल है&lt;/a&gt;, मगर किसी धूर्त पण्डे द्वारा ठग लिए जाना स्वीकार नहीं है। अपने अस्वीकार को मैंने मस्तक में मज़बूत किया और ज़ोर लगा कर अपने सर को ऊपर की ओर धकेला और उसके हाथों के दबाव से आज़ाद किया। मैंने उसे बताया कि मुझे न तो कोई पुत्रकामना है और न ही कोई संकल्प करना है। उसे नमस्कार कर के मैं उस के पाश से दूर चलने लगा। वह नरम हो कर पुकारने लगा कि खाली हाथ नहीं जाते हैं, कुछ चढा के जाते हैं। लेकिन लेकिन मैं रुका नहीं, खाली हाथ झुलाते हुए निकल आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह के संकल्प कराने वाले पण्डे मन्दिर के हर कोने में मौजूद  रहते हैं। मैंने देखा है कि उनकी भाषा एक जादूगर की भाषा सी होती है। दोनों लोग का सम्मोहन इस बात पर निर्भर करता है कि आप उनके सामने कितना समर्पण करते हैं। इसलिए वो शुरुआत किसी बेहद मामूली आदेश से करते है। बाज़ीगर कहते हैं- हाथ की मुठ्ठियां खोल दें! बच्चों बजाओ ताली! पण्डे कहते हैं –फूल दहिने हाथ में लें लें! हाथ के ऊपर सर रखकर गोड़ पकड़ लें! एक बार आदेश मान लिया तो मस्तक समर्पण की स्थिति में चला जाता है। तब तक, जब तक कि आप सचेत रूप से विद्रोह की मुद्रा न पकड़ें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 0, 153);"&gt;(बनारस यात्रा के दौरान लिखी डायरी से&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 0, 153);"&gt;)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-6641478307241170235?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/6641478307241170235/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=6641478307241170235" title="14 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/6641478307241170235?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/6641478307241170235?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/09/blog-post_12.html" title="ई रजा कासी हॅ  ! – ३" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEcBQXgzeSp7ImA9WxNQF08.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-8328415605769557305</id><published>2009-09-11T07:32:00.007+05:30</published><updated>2009-09-23T21:37:30.681+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-23T21:37:30.681+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="काशी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ई रजा कासी हॅ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="घुमक्कड़ी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमरे ऊपी के बासी" /><title>ई रजा कासी हॅ ! - २</title><content type="html">&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sqm1FsUQRrI/AAAAAAAACQ8/ZrBWLvnV-pY/s1600-h/DSCN0709cr.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 229px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sqm1FsUQRrI/AAAAAAAACQ8/ZrBWLvnV-pY/s320/DSCN0709cr.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5380030339270854322" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;बनारस बेहद गंदा शहर है। खासकर घाट और घाट &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;के आस-पास की गलियाँ- जो कि प्राचीन मन्दिरों, मठों और आश्रमो का आश्रय हैं। गलियों में पत्ते, दोने, प्लास्टिक, सब्जी के छिलके, कुल्हड़, पान की पीक, गाय का गोबर, थूक, मूत और कुत्ते का मल सब एक साथ पड़ा रहता है। लोग अपने घरों से अन्दर, बाहर होते रहते हैं एक अनुष्ठान के बतौर अपनी देहरी भी साफ़ कर देते हैं। मगर उनकी आदतों में कोई सुधार नहीं होता। वे जहाँ रहते हैं, वही थूकते हैं, वहीं मूतते हैं, और अगर कोई न देख रहा हो तो वहीं हग भी लेते हैं। बच्चो के लिए ये दोष तो माफ़ है ही। उन्हे माताएं, पिता, बड़े भैया, दीदी दरवाजे के सामने ही बैठा देते हैं। मगर बड़े.. कुछ तो ऐसे पहुँचे हुए भी हैं जो गंगा-तीर के लिए अपने मल को सुरक्षित रखते हैं और ठीक घाट की पथरीली पावनता पर अपना उत्सर्जन करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;दशाश्वमेघ घाट की बड़ी महिमा है। ब्रह्मा जी के प्रताप से बना है। मगर सब कहीं ऐसा थूक खखार, हगा-मूता पड़ा रहता है कि आप को पाँव रखने में भी घिन आए। मगर बनारसियों को नहीं आती। वे वहीं विचरण करते हुए काशी की धर्म की धुरी होने की गौरवपूर्ण निश्चिंताताओं में रमे रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;दशाश्वमेघ के बगल के घाट राजेन्द्रप्रसाद घाट की दीवार से लग कर शहर के सीवर के दो बड़े नाले खुलते हैं। वहीं कुछ मलबा भी पड़ा है। यूँ तो कुल घा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;ट&lt;span lang="HI"&gt; गंदा है मगर ये कोना कुछ अधिक गंदा है। ये जान कर लोग-बाग अपनी लघु शंका का समाधान यहीं करने आते रहते हैं। दीवार के उस पार गंगा की महाआरती चल रही है। इधर मूत्र की धार चल रही है। और उसके साथ सीवर का धारा चल रहा है जिसका प्रवाह गंगा से भी तेज है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sqmx4QUXqUI/AAAAAAAACQ0/z7VQ354Gx44/s1600-h/DSC00642.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sqmx4QUXqUI/AAAAAAAACQ0/z7VQ354Gx44/s320/DSC00642.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5380026809881962818" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;शुचिता का ऐसा अभाव देखकर मन उदास हो गया। याद आया कि श्रीमद भागवत में&lt;span style=""&gt;  &lt;/span&gt;धर्म के चार पैर बताए गए हैं। तप, शुचिता, दया, और सत्य। खेद के साथ लिखना पड़ रहा है कि बनारस में मुझे किसी के भी दर्शन नहीं हुए। धर्म रूपी वृषभ के तप रूपी पैर का लोप कृतयुग के अंत से ही हो चुका है, शुचिता और दया का भी बाद के युगों में; और अब धर्म केवल सत्यरूपी पैर पर खड़ा है। रूपक बहुत मोहक और रोचक है पर विश्वास करना इस पर कठिन है। सत्य अगर बचा है कलियुग में तो कहाँ? कहाँ है सत्य?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;फिर भी एक समान्तर व्याख्या मानती है कि समय का बोध सब के लिए एक सा नहीं होता &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;–&lt;span lang="HI"&gt; सम्भव है कि कोई पहुँची हुई विभूति कृतयुग में अस्तित्वमान हो। दधीचि की परम्परा में हाड़ गला कर तप करने वाले ऐसी किसी विभूति को काशी के घाटों पर देखने की उम्मीद मैं कर भी नहीं रहा था। पर दया और शुचिता तो न्यूनतम योग्यता है.. धर्म छोड़िये.. मनुष्यता की। &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;एक अनुभव बताता हूँ- मन्दिर ठीक है, ईश्वर भी ठीक है, मन्दिर में क़ैद ईश्वर पर मेरी कोई श्रद्धा नहीं है। काशी विश्वनाथ के शिवलिंग पर मदार की माला चढ़ा देने से अन्तर्जगत में कोई विशेष घटित हो जाएगा, यह सोचकर नहीं बस एक जिज्ञासावश ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ के सह-अस्तित्व का प्रत्यक्ष दर्शन करने की इच्छा हुई। लम्बी लाइन का हिस्सा बन गया।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;इस प्रपंच में मेरी अश्रद्धा साफ़ अलग दिखाई देने से किसी को कोई तक़लीफ़ न हो तो दस रुपये का दूध-फूल-माला आदि भी ले ली। मन्दिर के कीच भरे पथ पर रेंगते हुए फिर शुचिता का प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया पर अब भक्तों की भीड़ का हिस्सा हो चुकने के बाद निजता की गली में खिसक चलने का विकल्प बचा नहीं था। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;मुख्य शिवलिंग को तमाम अन्य भगवान मूर्ति रूप में उपस्थित हो कर घेरे हुए हैं और हर मूर्ति से लगकर खड़ा पण्डा बाहर मूर्ति में और भीतर भक्त के हृदय में भगवत उपस्थिति इस संयोजन के शोषण का कोई अवसर जाने नहीं देना चाह रहा, भक्तों को कोंच-कोंच कर मूर्ति के आगे झुकने और फिर दान पेटी में अपनी कमाई का अंश गिरा देने के लिए प्रेरित कर रहा।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;भक्त सरल होता है। ईश्वर के आगे आत्म समर्पण के लिए आया भक्त निरीह होता है। इसलिए पण्डों के आगे लाचार होता है। मैं लेकिन सरल होकर नहीं पहुँचा था। फूल हाथ में अवश्य थे पर मेरे हथियार मस्तक में सजग थे। पण्डो के हर आक्रमण को मैं झेल गया और कहीं नहीं रुका, कहीं नहीं झुका, जेब में जो थोड़े पैसे थे उन को इस धार्मिक डाके से बचा ले गया। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;लाइन बहुत देर रुकने के बाद धीरे से आगे बढ़ी। &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;बाबा विश्वनाथ के दर्शन हुए। कहीं मेरी तमाम बौद्धिक विवेचनाएं मिथ्या हों और इस शिवलिंग का आशीर्वाद ही जगत का अन्तिम सत्य हो, इस संशय से ग्रसित हो कर मैंने बाबा के चरण चाँप लिए। तीस सेकेण्ड बाद ही लेकिन धर्मप्राण समझे जा सकने वाले काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारी मेरे ऊपर चिल्लाने लगे क्योंकि साधारण लोगों की लाइन में खड़ा मैं उस पूरे मन्दिर में सिर्फ़ एक चीज़ से आकर्षित हुआ &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;–&lt;span lang="HI"&gt; भक्तों के माथे पर एक मोटे हाथ से लगा देने वाला पीला चन्दन। सोचा माथे पर लगकर सर पर ठण्डक देगा। चन्दन लगाना उनके पुजारी अनुष्ठान का अंग था लेकिन पुजारी जी भक्तों की लाइन रोककर एक विशेष पूजा में व्यस्त थे। चन्दन लगा देने के मेरे अनुरोध से बिफ़र पड़े और &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI"&gt;दयालु&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI"&gt; होकर चीखने लगे कि&lt;span style="font-style: italic;"&gt; देख नहीं रहे हो बिजी हैं? क्या-क्या करें? फट के आठ हो जायं&lt;/span&gt;? और इसी बहाने भक्त और ईश्वर के बीच की कड़ी होने की अपनी पारम्परिक सत्ता के प्रति अपनी &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI"&gt;सत्यनिष्ठा&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI"&gt; का प्रदर्शन कर बैठे।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;/span&gt;अन्य &lt;span lang="HI"&gt;पैरों के बारे में तो आप यह कर सन्तोष कर सकते हैं कि उनका सहज दर्शन नहीं हो सकता, वे तो छिपे रह सकते हैं, यहाँ नहीं कहीं और हो सकते हैं, लेकिन शुचिता का क्या करेंगे? वो भी क्या छिपा कर रखने की चीज़ है?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 0, 153);"&gt;(बनारस यात्रा के दौरान लिखी डायरी से)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-8328415605769557305?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/8328415605769557305/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=8328415605769557305" title="12 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/8328415605769557305?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/8328415605769557305?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/09/blog-post_11.html" title="ई रजा कासी हॅ ! - २" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/Sqm1FsUQRrI/AAAAAAAACQ8/ZrBWLvnV-pY/s72-c/DSCN0709cr.JPG" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEcBQXgzfip7ImA9WxNQF08.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-4542729789825632558</id><published>2009-09-09T21:26:00.009+05:30</published><updated>2009-09-23T21:37:30.686+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-23T21:37:30.686+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="काशी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ई रजा कासी हॅ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="घुमक्कड़ी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमरे ऊपी के बासी" /><title>ई रजा कासी हॅ !</title><content type="html">&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SqfUIlT_VBI/AAAAAAAACQU/DbpMGbl-3TU/s1600-h/DSCN1076.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SqfUIlT_VBI/AAAAAAAACQU/DbpMGbl-3TU/s200/DSCN1076.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379501523837342738" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;लोगों को यह दुहराते बहुत सुना था। मगर प्रत्यक्ष समझा न था। आज अनुभव हो गया कि इसकी क्या घात है, क्या मार है। बनारस कैण्ट पर हमें लेने आए हमारे पुराने मित्र संजय मेजर का बटुआ किसी बदमुआश ने मार दिया। पहली बात बनारस के बारे में उन्होने हमें यही बताई कि बनारस में पैंतीस प्रतिशत लुच्चे हैं। मेरा ख्याल था कि हम रिक्शे-ऑटो से अपने मक़ाम तक पहुँचेंगे मगर उन्होने इसरार किया कि बैग लेके बाइक पर सवार हो जाया जाय। मैं घबराया किसी भी तरह उनके पीछे मोटरसाइकिल पर सवारी करने को तैयार न था। मगर  उनके बेहद ज़ोर देने पर मुझे पिछली सीट पर बैग समेत क़ाबिज़ होना ही पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे अज़ीज़ ने अपनी गाड़ी को विपरीत दिशा से आने वाले ट्रैफ़िक की लेन में डाल दिया। मैंने प्रतिवाद किया कि ये क्या करते हो। उन्होने बताया कि रस्ता यही सही है। पूरा दृश्य तेज़ धूप से प्रकाशमान था।  सड़क पर गाड़ी, मोटर, ठेला, रिक्शा, साइकिल, मोबाइक, स्कूटर से गँजा हुआ था। ऐसे बहुत मौके आए कि अब गिरे कि तब गिरे। हर वाहन एक दुर्घटना की सम्भावना की तरह से सामने से आता और अगल बगल से, और जाने कितनी बार तो छू कर निकल जाता; हमारा बाल भी बांका न होता। धन्य हैं मेरे मित्र संजय मेजर जिनके भीतर तमाम अन्य सौन्दर्यबोधों के अलावा बनारसी का ठेठ अबोध भी स्वयंभू रूप में अस्तित्वमान है। सारे वाहन हम पर चढ़े आते रहे मगर हम बने रहे अपनी जगह। जैसे बनारस इतनी अराजकता के बावजूद बना हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बनारस और बनारसी किसी नियम-क़ानून की मर्यादा का पालन करते नहीं दिखते। अपनी सहूलियत के लिए वे जिस तरफ़ निकल पड़ें वही मार्ग होता है। बनारस का जीवन एक बेतरतीबी के सौन्दर्य(!) से आच्छादित है। कहीं पढ़ा था कि रैन्डमनेस इज़ वेरी डिफ़ीकल्ट टु अचीव, दि इन्स्टिन्क्ट ऑफ़ ऑर्गेनाइज़ेशन कीप्स स्पॉइलिंग इट। शायद काशी का महत्व इस बात में भी है कि वे इस दुर्गम पथ पर चौड़े होकर चलते हैं। बल्कि नहीं चलते हैं, पथ से उतर के चलते हैं, पथ के चारों ओर चलते हैं, पथ से उलट कर चलते हैं, और पथ को उलट कर चलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे ग़ौर करने लायक बात ये है कि जहाँ मुम्बई, दिल्ली, कानपुर आदि बाक़ी के शहर एक खास तौर के रोड-रेज से ग्रस्त होते जा रहे हैं, बनारस में हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की सम्भावित मार्ग पर निरन्तर डाका डालता रहता है, फिर भी कोई क्रोधित नहीं होता। सभी एक विचित्र वैराग्य से सब कुछ सहते रहते हैं और दूसरे के मार्ग पर डाका डालते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। सम्भवतः यही वह फ़्री ट्रेड की असली आत्मा है जिसे पश्चिम ने भुला दिया और जिसे बनारस ने न जाने कब से अपनी संस्कृति में जिलाए रखा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या फिर प्राचीन 'आनन्दवन' पर यह  गौ, गंगा, और गौरीपति शंकर का प्रभाव है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 0, 153);"&gt;(बनारस यात्रा के दौरान लिखी गई डायरी से)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-4542729789825632558?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/4542729789825632558/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=4542729789825632558" title="15 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4542729789825632558?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4542729789825632558?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/09/blog-post_09.html" title="ई रजा कासी हॅ !" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://3.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SqfUIlT_VBI/AAAAAAAACQU/DbpMGbl-3TU/s72-c/DSCN1076.JPG" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">15</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CUcCQn0zfyp7ImA9WxNREks.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-3651290978445535620</id><published>2009-09-06T19:08:00.005+05:30</published><updated>2009-09-07T00:21:03.387+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-07T00:21:03.387+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लघु फ़िल्म" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मैजिक लैन्टर्न फ़ाउन्डेशन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="डाक्यूमेन्टरी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सरपत" /><title>मैजिक लैन्टर्न में सरपत</title><content type="html">मेरी छोटी सी फ़िल्म को कोई मुम्बईया डिस्ट्रीब्यूटर किसी थियेटर, सिनेमा हॉल में तो रिलीज़ करने से रहा। अधिक से अधिक उसकी कि़स्मत छोटे-मोटे समूहों में प्रदर्शन की है- चाहे वे मंच किसी फ़िल्मोत्सव के हों या अन्य किसी संगठन के। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले सालों में इस देश में डाक्यूमेन्टरी वितरित करने के लिए एक संस्था का विकास हुआ है जिसका नाम है &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अन्डर कन्स्ट्रक्शन&lt;/span&gt; जो &lt;a href="http://www.magiclanternfoundation.org"&gt;मैजिक लैन्टर्न फ़ाउन्डेशन&lt;/a&gt; के तहत यह कार्य सम्पादित कर रही है। भारत के लगभग सभी स्वतंत्र डाक्यूमेन्टरी फ़िल्म मेकर्स की फ़िल्में अन्डर कन्सट्रक्शन ही वितरित कर रहे हैं, जिनमें मधुश्री दत्ता, पारोमिता वोहरा, अमर कँवर, पंकज बुटालिया, रीना मोहन, संजय काक, सुप्रियो सेन, अरुण खोपकर ओर्घ्यो बोसु, राजुला शाह जैसे नाम शामिल हैं।  और विदेशों के भी तमाम ख्यातिलब्ध फ़िल्ममेकर्स की फ़िल्में उनके अधिकार में हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छी बात ये हुई है कि पहली बार उन्होने एक शॉर्ट फ़िक्शन का वितरण अपने हाथ में लिया है – &lt;a href="http://www.magiclanternfoundation.org/uc_filmdetails.php?FilmID=213"&gt;मेरी फ़िल्म सरपत का। &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे सभी दोस्त जो मेरी फ़िल्म देखना चाहते हैं मगर मैं अभी तक उन तक पहुँचने में असमर्थ रहा हूँ, अब मैजिक लैन्टर्न के माध्यम से वे मेरी फ़िल्म की प्रति हासिल कर सकते हैं। यह सौदा एक आर्थिक प्रतिदान के बदले होगा। यूँ तो यह आर्थिक विनिमय मेरी तबियत के बहुत माकूल नहीं है - मैं अभी तक अपनी फ़िल्म की प्रतियाँ दोस्तो- परिचितों को मुफ़्त ही बाँटता आया हूँ- मगर एक फ़िल्ममेकर के अस्तित्व के लिए यह आदत बेजा है। उम्मीद है मित्रगण इस योगदान को लेकर एक अनुकूल राय रखेंगे क्योंकि इस धन राशि का एक हिस्सा मुझ तक आएगा और जो मुझे आगे इस तरह के स्वतंत्र काम करने के लिए हिम्मत बढ़ाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म मँगाने के लिए इस पते पर लिखें – &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैजिक लैन्टर्न फ़ाउन्डेशन&lt;br /&gt;जे १८८१, चित्तरंजन पार्क, नई दिल्ली – ११००१९&lt;br /&gt;फोन: +९१ ११ ४१६०५२३९, २६२७३२४४&lt;br /&gt;ईमेल: underconstruction@magiclanternfoundation.org / magiclantern.foundation@gmail.com / magiclf@vsnl.com&lt;br /&gt;वेब पेज: http://www.magiclanternfoundation.org&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मूल्य: &lt;br /&gt;भारत&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;व्यक्तिगत&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वी सी डी: २५० रुपये&lt;br /&gt;डी वी डी: ४०० रुपये&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;संस्थागत: &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;डी वी डी: ७०० रुपये&lt;br /&gt;(४% वैट व डाक शुल्क अतिरिक्त)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अन्तर्राष्ट्रीय&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;व्यक्तिगत:&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;डी वी डी: २० य़ूएस डॉलर&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;संस्थागत: &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;डी वी डी: ३२० यू एस डॉलर&lt;br /&gt;(डाक शुल्क अतिरिक्त)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुम्बई के मित्रो के लिए एक अन्य सूचना यह भी है कि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;९ सितम्बर, बुधवार को सरपत, कमला रहेजा इन्स्टीट्यूट ऑफ़ आर्कीटेक्चर, जुहु &lt;/span&gt;में दिखाई जा रही है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सुबह पौने ग्यारह बजे&lt;/span&gt;। यह संस्थान अपने विद्यार्थियों के लाभार्थ हर बुधवार को एनकाउन्टर नाम से एक लेक्चर सीरीज़ चलाते हैं उसी के तहत इस फ़िल्म का भी आयोजन है। फ़िल्म के बाद कुछ वार्तालाप की भी गुंज़ाईश होगी। जो मित्र आना चाहें स्वागत है। फ़िल्म की अवधि है अठारह मिनट।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-3651290978445535620?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/3651290978445535620/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=3651290978445535620" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/3651290978445535620?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/3651290978445535620?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/09/blog-post_06.html" title="मैजिक लैन्टर्न में सरपत" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;D0YEQn8_eip7ImA9WxNREkk.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-4710579147958938966</id><published>2009-09-05T09:59:00.012+05:30</published><updated>2009-09-06T19:21:43.142+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-09-06T19:21:43.142+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गुरु" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="माँ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ज्योतिष" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शिक्षक" /><title>गुरु का स्वाभाविक स्वरूप</title><content type="html">शिक्षक सब जगह होते हैं पर भारत के शिक्षक मात्र शिक्षक नहीं गुरु होते हैं। गुरु एक ऐसा भारी शब्द है कि अंग्रेज़ इसका अर्थ अपनी भाषा के किसी शब्द के आवरण में उठा के नहीं ले जा सके - गुरु का एक अन्य अर्थ भारी होता ही है – समूचे शब्द को ज्यों का त्यों स्वीकार करना पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरु का नाम लेते ही मन में एक छवि उभरती है जिसकी काली-सफ़ेद, लम्बी दाढ़ी हृदय प्रदेश तक लहरा रही है, शिर के केश जटाओं में गुम्फित हैं, गले में रुद्राक्ष या तुलसी की माला है, बाएं कंधे से कमर में दाईं तरफ़ तक जनेऊ पड़ा हुआ है, अधोभाग सूती धोती से आवृत्त है, मुखमण्डल पर सौम्यता, गाम्भीर्य और ज्ञान की आभा है और साथ में कम से कम दो चार शिष्य तो हैं ही। कुछ लोगों को यह छवि पुरातन पंथी मालूम देगी वे एक मोटे चश्मे और खिचड़ी दाढ़ी वाले, पतलून-कमीज़ में अपने गुरु की कल्पना कर सकते हैं जो ब्लैक-बोर्ड पर गणित की एक दुरुह प्रमेय का पथ सरल कर रहा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे ये दोनों छवियां समस्यामूलक लगतीं हैं। क्योंकि ये दोनों ही एक पुरुष की छवि है। मेरा मानना है कि स्त्री स्वाभाविक गुरु होती है जबकि परिपाटी ने यह दरजा पुरुष पर आरोपित कर दिया है। इस मान्यता के पीछे के पुरुषवादी नज़रिया छुपा हुआ है। मैं यह नहीं कहता कि पुरुष गुरु होता ही नहीं। सभी मनुष्य सभी ग्रहों और राशियों का समावेश हैं। समष्टि में सब एक ही तत्व है। और वो इतना विराट है कि उसे उसकी विराटता में एक साथ विचार कर पाना दूभर है। इसलिए इस सब को अलग-अलग खानों में बाँटना ही तो व्यष्टि है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जब इस पूरे प्रपंच को समझने के लिए इस तरह के विभाजन करने की बारी आई तो पुरुष ने राशियों में तो क्रम से एक को पुरुष और एक स्त्री के रूप से चिह्नित किया। लेकिन ग्रहों को गुणधर्मिता तय करते हुए एक चन्द्रमा और दूसरे शुक्र को ही स्त्रीत्व के योग्य माना। चन्द्रमा यानी मन और कल्पना के दायरे के तमाम तत्व। और शुक्र यानी सजने-सँवरने, कला और विलास के सभी विषय। देखा जाय तो सूक्ष्मतम चीज़ों का सम्बन्ध शुक्र से है जैसे घी और इत्र और शुक्राणु। हालांकि शुक्राणु किन अर्थों में स्त्रीलिंग माना जाएगा यह संशय के घेरे में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चन्द्रमा बावजूद सूर्य का प्रतिबिम्ब होने के सभी इच्छाओं, अस्थिरता और विचलन का कारक होने के कारण और शुक्र भोग-विलास के विभाग का स्वामी होने के कारण भारतीय दार्शनिक परम्परा के अनुसार प्रतिगामी ग्रह हो जाते हैं। योग भोग-शुक्र पर संयम और मन-चन्द्रमा-स्त्री- पर नियंत्रण रखने का निर्देश देता है और धर्म बताता है कि स्त्री नरक का द्वार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्मा का प्रतीक सूर्य, पुरुष है। सामर्थ्य का प्रतीक मंगल, पुरुष है। बुद्धि का प्रतीक बुध और दुख और वैराग्य का प्रतीक शनि, नपुंसक हैं। गुरु आनन्द और ज्ञान का कारक है और पुरुष है। सूर्य, मंगल, बुध और शनि की श्रेणियों के लिंग निर्धारण पर सवाल किए जा सकते हैं। लेकिन वे अपनी दार्शनिक परम्परा में अतार्किक नहीं है। परन्तु उन पर चर्चा करने से बात फैल जाएगी। बात अभी गुरु की है, उसी तक सीमित रखते हैं। गुरु को पुरुष घोषित ज़रूर किया गया है मगर मुझे वह इस अनुशासन के आन्तरिक तर्क पर सही बैठता नहीं दिखता। इस परम्परा के आन्तरिक तर्क के अनुसार ही देखें कैसे-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१] सूर्य, मंगल आदि क्रूर हैं गुरु सौम्य है, कोमल है, मृदु है। कोमलता स्त्री स्वभाव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२] किसी को वश में करने के लिए सूर्य और मंगल दण्ड की नीति अपनाते हैं, चन्द्रमा दान की, बुध और शनि भेद की और गुरु और शुक्र साम की। यह भी स्त्री स्वभाव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३] जन्म कुण्डली में विवाह, परिवार, बच्चों और बुज़ुर्गों का कारक गुरु ही होता है। किसी भी सामान्य स्त्री का जीवन इन्ही विषयों के इर्द-गिर्द घूमता है। पुरुष विवाह करता है पर उसकी मर्यादा की रक्षा स्त्री उस से अधिक करती प्रतीत होती है। बच्चे विशेष रूप से स्त्री की ही ज़िम्मेदारी होते हैं। परिवार में सब का ख्याल और बुज़ुर्गों की देखभाल भी स्त्री का ही विभाग है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरुष एक गर्भाधान को लेकर लालायित रहता है लेकिन वह सम्पन्न होते ही उसे जीवन के उद्देश्य की चिंता सताने लगती है। स्त्रियां आम तौर पर जीवन के उद्देश्य को लेकर व्यथित नहीं होती। वे अपने दैनिक पारिवारिक जीवन से सार्थकता पाती रहती हैं। ऐसी स्त्री की उपेक्षा करके परिवार से इतर जीवन की सार्थकता खोजने वाला पुरुष क्या स्वाभाविक गुरु हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४] गुरु शरीर में स्थूलता का कारक भी होता है। आम तौर पर गुरु मोटा होगा ही। और गुरु जनित मोटापे के बारे में राय है कि वह शरीर में चारों ओर से मोटा होगा मगर विशेषकर मध्यभाग यानी कि पेट, कमर, नितम्ब और जंघा से मोटा होगा। कोई अंधा भी देख सकता है कि ये स्त्री के आकार का विवरण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्मकुण्डली में पाँचवे स्थान का कारक है गुरु। पाँचवे स्थान से  पेट, भूख, बुद्धि, पुत्र आदि देखते हैं। पेट, भूख और बुद्धि तो स्त्री व पुरुष दोनों में होती है लेकिन पुत्र(!) को पेट में रखकर पालना तो स्त्री ही करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५] गुरु का स्वाभाविक स्थान कोषागार है। स्त्री स्वाभाविक खंजाची है। उड़ाना पुरुष का स्वभाव है, बचाना स्त्री का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;६] बिन घरनी घर भूतों का डेरा। यदि पुरुष स्वभावतः गुरु है तो इस तरह की कहावत बेमानी हो जाती जबकि ये कहावत परखी हुई बात पर आधारित है। दूसरी तरफ़ बिना पुरुष के गृहस्थी कमज़ोर ज़रूर पड़ती है पर चुड़ैलों का अड्डा नहीं बनती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;७] गुरु मध्यमार्गी होता है। और स्त्री न तो पैसे की इतनी भूखी होती है कि अरबों—खरबों की सम्पत्ति जुटाना ही अपना मक़सद बना ले और न ही इतनी वैरागी कि सब कुछ को लात मार के शरीर पर भभूत मल कर भिखारी हो जाय। पुरुष इन्ही दो अतिवादों में फंसा रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;८] धर्म जो कि गुरु का मुख्य विभाग है वह भी स्त्रैण मालूम देता है। यह सही है कि दुनिया के सारे धर्म पुरुषों ने अन्वेषित किए और उनके नियम ग्रंथ में सूची बद्ध किए पर धर्म का विभाग भी पुरुष से अधिक स्त्री के दायरे में आता है। मेरे विवाह के अवसर पर संस्कार सम्पन्न करा रहे पण्डित जी ने कहा कि चार में से तीन पुरुषार्थ- काम, अर्थ और मोक्ष में तो आप आगे रहेंगे लेकिन धर्म में आप अपनी पत्नी के पीछे रहेंगे। ये अनायास नहीं है कि ईश्वर में आस्था और तीज त्योहारों क पालन पुरुष से अधिक स्त्रियां करती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्म का मूल समर्पण है और समर्पण यदि स्त्रैण नहीं तो क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;९] गुरु, शिष्य के बिना अधूरा है। पुरुष, बच्चे के बिना अधूरा नहीं है। लेकिन स्त्री माँ के रूप में बच्चे के बिना अधूरी है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१०] नियम है कि गुरु जिस स्थान में बैठता है वहाँ की हानि करता है लेकिन जहाँ देखता है वहाँ की वृद्धि करता है। अपना नुक़्सान करके बच्चे पर सब न्योछावर करने की आत्म बलिदान की भावना को माँ से बेहतर कौन जानता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना कुछ सोचने के बाद मैंने पाया कि गुरु का स्वाभाविक स्वरूप स्त्री का है। और वह भी एक बच्चे के साथ या बच्चों से घिरी स्त्री का। हर स्त्री माँ हो यह ज़रूरी नहीं लेकिन हर माँ गुरु ज़रूर होती है। अपने बच्चे की प्रथम गुरु और सम्भवतः सबसे महत्वपूर्ण गुरु भी। माँ स्वाभाविक गुरु है, बच्चा स्वाभाविक शिष्य है। आज शिक्षक दिवस के दिन मैं अपनी प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण गुरु अपनी माँ को नमन करता हूँ और धन्यवाद करता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SqHsImKI5YI/AAAAAAAACPU/uGuGY7o33uU/s1600-h/mummy+in+train+003.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer; width: 300px; height: 400px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SqHsImKI5YI/AAAAAAAACPU/uGuGY7o33uU/s400/mummy+in+train+003.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5377839062483264898" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुनश्च : प्रत्येक व्यक्ति ग्रहों और राशियों का समावेश है। सब में सब गुण मौजूद हैं। यहाँ प्रयोग की गई श्रेणियां का उद्देश्य स्त्री या पुरुष पर कोई विशेष चरित्र आरोपित करना नहीं बल्कि पहले किए जा चुके ऐसे आरोपण से पीछा छुड़ाना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानव डी एन ए के एक्स क्रोमोज़ोम में बमुश्किल २०-३० वाक्य हैं जो स्त्री को हासिल नहीं होते। वरना मानव के सभी गुण स्त्री में मौजूद हैं - हिंसा भी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-4710579147958938966?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/4710579147958938966/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=4710579147958938966" title="8 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4710579147958938966?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4710579147958938966?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/09/blog-post.html" title="गुरु का स्वाभाविक स्वरूप" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" url="http://2.bp.blogspot.com/_3Daz3CsJg_0/SqHsImKI5YI/AAAAAAAACPU/uGuGY7o33uU/s72-c/mummy+in+train+003.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEYAQHg9cCp7ImA9WxNSEU0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-4213526578667355899</id><published>2009-08-24T14:47:00.005+05:30</published><updated>2009-08-24T14:59:01.668+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-08-24T14:59:01.668+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="प्रकृति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="प्रवृत्ति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बनारस" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मन की गाँठें" /><title>कूद जाऊँ क्या?</title><content type="html">मैं बनारस की ट्रेन बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस में सवार था। खिड़की के बगल वाली सीट थी। ट्रेन लगभग खाली थी। आराम से सामने की सीट पर पैर टिकाकर अधलेटे होने में मन अवचेतन में विचरने लगा। बाहर के खेत-मेंड़, पेड़-पंछी देखते-देखते अचानक मन में विचार आया कि चश्मा निकाल कर बाहर फेंक दूँ। फिर सोचा कि बैग से कैमरा निकाल कर बाहर फेंक दूँ। जेब से मोबाइल निकाल कर उसे भी खिड़की के बाहर उछाल दूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे विचारों के पीछे मेरे पास कोई कारण कोई तर्क नहीं था। मैं न तो क्षुब्ध, न क्रुद्ध और न अवसादग्रस्त। न किसी से झगड़ा न कोई मेरे ऊपर कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती। फिर भी मन अजीब दिशा में ठेल रहा था। मैं मनमानी करने वाला आदमी नहीं हूँ। इच्छाओं का दास तो बिलकुल नहीं। मन पर, विचारों पर तक कठोर नियंत्रण रखने वाला आदमी हूँ। मगर मन अभी स्वतन्त्र था। मेरी उस पर कोई रोक न थी। वो कह रहा था- चश्मा, मोबाइल, और कैमरा खिड़की के बाहर फेंक दूँ। न जाने क्यों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन बाद बनारस में दरभंगा घाट के एक ऊँचे चबूतरे पर बैठ कर मन में आने लगा कि वहाँ से सीधे नीचे गंगा में कूद जाऊँ। बनारस आकर मैं आनन्द में हूँ। जीवन का अन्त करने का मेरा कोई विचार नहीं है। ऐसी प्रेरणा मुझे पहले भी हुई है। गंगटोक में एक बार सीधी घाटी में झाँकते एक मकान के छोर पर खड़े होकर जब मैंने अपने तलवों से लेकर घुटनों तक एक भयावह झुरझुरी और मस्तक तक दौड़ते खून को महसूस किया तो मैंने जाना कि मेरा शरीर ऊपर से नीचे तक अज्ञात में कूदने की भौतिक तैयारी कर चुका है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अन्तः प्रेरणा के सम्बन्ध में मेरा एक विचार है। मेरा सोचना है कि यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। हर किसी को ऊँचाई पर जाकर डर लगता है। क्योंकि हर एक के भीतर ऊँचाई पर जाकर नीचे छलांग लगाने की प्रेरणा जागती है। सिर्फ़ उसे डर नहीं लगता जो या तो छलांग लगा-लगा कर अज्ञात के डर के पार हो गया है या फिर उसे जो अपनी प्रवृत्तियों के पार हो गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मल्लाहों के बच्चे इस प्रेरणा को सुनते हैं और छलांग लगा कर नदी को अपना दोस्त बना लेते हैं। हम जो छलांग नहीं लगाते, सारी उमर किनारे बैठकर इस अन्तः प्रेरणा को सुनते हैं और सुन-सुन कर डरते हैं। डर कर किनारे से थोड़ा और दूर हो जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अज्ञात में छलांग की प्रेरणा उठना हमारी स्वाभाविक वृत्ति है- यह सोचकर मैं घाट के चबूतरे से उठ गया। पास ही एक कुत्ता सो रहा था। मन में आया कि उसे एक लात लगाऊँ। पर मैंने अपने को रोक लिया। क्या आप जानते हैं कि मेरे भीतर कुत्तों का कितना डर है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-4213526578667355899?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/4213526578667355899/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=4213526578667355899" title="23 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4213526578667355899?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4213526578667355899?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/08/blog-post_24.html" title="कूद जाऊँ क्या?" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">23</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkADR3kzcSp7ImA9WxJaF0w.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-4691486116624900634</id><published>2009-08-08T08:46:00.007+05:30</published><updated>2009-08-08T11:22:56.789+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-08-08T11:22:56.789+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="प्रकृति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ट्रैफ़िक" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कानपुर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पेड़" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हमरे ऊपी के बासी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मन की गाँठें" /><title>हमरे ऊ पी के बासी</title><content type="html">कानपुर की गाड़ी में बैठते ही कानपुर का स्वाद मिल गया। दूसरे दर्जे के कूपे में चार के बजाय पाँच सहयात्री दिखाई दिये। मैं और तनु साईड की बर्थ पर थे। पाँचवे शख्स के पास आरक्षण नहीं था। वे इस विश्वास से चढ़ बैठे कि टी टी के साथ जुगाड़ बैठा लेंगे। जुगाड़ यह इस प्रदेश के मानस का बेहद प्रिय शब्द है। तमाम जुगाड़ कथाओं के बीच दल के नेता ने अपने मित्रो को यह भी एक कथा-मर्म समझाया कि सरकारी हस्पताल प्रायवेट नर्सिंग होम से कहीं अधिक बेहतर पड़ता है। जितना खर्चा प्रायवेट में करोगे उसका चार आने का भोग सिस्टर आदि को चढ़ा दो फिर देखो कैसी सेवा होती है। दिन में चार बार चादर बदलेगी, सब तरह की दवा मिल जाएगी। भोग और प्रसाद का यह चलन जुगाड़ की परिभाषा के भीतर ही समाहित है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टी टी ने एक बार घुड़की ज़रूर दी मगर फिर चार्ज वगैरा लगा के मान गया और एक बर्थ एलॉट भी कर दी। सारे रास्ते ठेकेदारों की यह टोली अपने हमसफ़रों की अमनपसन्दगी, और सामान्य शालीनता के प्रति एक बेलौस बेपरवाही बरतते हुए मादरचो बहन्चो करते आए। ये इस प्रदेश की ही विशेषता हो ऐसा नहीं है। क्योंकि पढ़े लिखे सभ्य लोगों को को वेल एडुकेटेड सोसायटी में फ़क्देम-फ़क्यू इत्यादि का जाप करते सुना जा सकता है। इस अर्थ में हम्रे ऊपी के बासियों में एक प्रकार की सार्वभौमिकता भी है। &lt;br /&gt;‌&lt;br /&gt;***&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कानपुर में गाड़ी चलाना एक अनुभव है। यहाँ का बच्चा-बच्चा जानता है कि जिसने कानपुर में गाड़ी चला ली, वो दुनिया के किसी भी इलाक़े में गाड़ी चला सकता है- लाइसेन्स हो या न हो। मेरा तजुरबा ये है कि लोग इस शहर में गाड़ी चलाते कम हैं सड़क पर मौजूद तमाम गाड़ियों के बीच खाली जगहों में अपना वाहन पेलते अधिक हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अगर आप को सचमुच कानपुर में गाड़ी चलाने का अनुभव प्राप्त करना है तो कभी सूरज ढलने के बाद चक्का घुमाइय़े। रात में कई सूरज आप को अंधा बनाने के लिए तैयार नज़र आयेंगे। या तो कानपुर में कोई नहीं जानता कि कार में हेड लाईट की एक सेटिंग का नाम लो बीम भी होता है या वो गहरे तौर पर विश्वास करते हैं कि ड्राईविंग एक युद्ध है और सड़क उनकी रणभूमि। सामने वाले को किसी तरह भी मात करना उनकी युद्ध-नीति का अंग है। जिसकी गाड़ी में जितनी तेज़ लाईट होगी वो सामने वाले को अंधा करके गाड़ी धीमी करने पर मजबूर कर सकेगा और बची हुई जगह में अपनी गाड़ी पेलने में सफल हो सकेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप सोचेंगे कि ये जुझारू चालक रात में तो हेडलाईट के हथियार से युद्ध करते हैं मगर दिन में? दिन में तो उनका यह अस्त्र  बेकार सिद्ध हो जाएगा। बात माकूल है। मगर दिन में वे आँखों की जगह कानों पर हमला करते हैं। दूर से ही कानफोड़ू क़िस्म के भोंपू बजाते हुए वाहन दौड़ाते आते हैं। अपने शहर की रवायतों से अजनबी हो चुका मेरे जैसा आदमी घबरा के किनारे हो जाता है। मगर घिसा हुआ कनपुरिया अंगद की तरह डटा रहता है। इंच भर भी जगह नहीं छोड़ता। जनता का यह उदासीन व्यवहार और चिकना घड़त्व चालक को हतोत्साहित नहीं करता। वह लगा रहता है। उसे आदत पड़ चुकी है। उसे डर है कि हॉर्न न बजाने पर लोग उसे रास्ते का पत्थर मानकर सड़क के परे न धकेल दें। वो अपनी अंगुली हॉर्न से हटाता ही नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम नागरिक इस व्यवहार का वह इतना अभ्यस्त हो चुका है कि सुबह छै बजे चन्दशेखर आज़ाद विश्वविद्यालय में सुबह की टहल का आचमन करके स्वास्थ्य वृद्धि के उद्देश्य से आए मगर गलचौरे में व्यस्त निरीह, निरस्त्र लोगों पर भी वह इस हथियार का अबाध इस्तेमाल करने से बाज नहीं आता। और जड़ानुभूति हो चुके पक्के कानपुरिया कभी उस का कॉलर पकड़ कर सवाल करने का सोचते भी नहीं कि अबे भूतनी के! सुबह-सुबह खाली सड़्क पर काहे कान फोड़ रहा हैं.. हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अन्य अनुभव में यह पाया गया कि बड़े चौराहे पर नवनिर्मित पैदल पार पथ का इस्तेमाल करने में किसी पथिक की श्रद्धा नहीं है। परेड, शिवाले और मेस्टन रोड के आने जाने वाले बड़े चौराहे के हरे लाल सिगनल और चौराहे के केन्द्र में स्थापित ट्रैफ़िक हवलदार की किसी भी चेष्टा को पूरी तरह नगण्य़ मानते हुए इधर से उधर, और उधर से इधर होते रहते हैं। अनुभूति जड़ हो चुके पक्के कानपुरिया जानते हैं कि अगर वे अपने वाहन पर आसीन नहीं होते तो वे स्वयं भी अपने इस गऊवत व्यवहार के सामने बाक़ी दुनिया को झुकाए रखते। और गऊ हमारा श्रद्धेय प्राणी है जिसे क़तई भी कोई पुरातन कालीन न समझे.. आज कल गऊ पट्टी के ह्र्दय प्रदेस ऊपी में गऊ प्लास्टिक खाती है, इस से अधिक आधुनिकता का प्रमाण आप को और क्या चाहिये? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;***&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ नवाबगंज में तमाम तरह के पेड़ लगे हैं नए-पुराने। बरगद, पीपल, आम, इमली, पकड़िया, और नीम जैसे सर्वव्याप्त वृक्षों के अलावा सहजन, अमलतास, गुलमोहर, गूलर, जंगलजलेबी, बालमखीरा, सुबबूल आदि भी लगे हैं। नए रोपे गए वृक्षों में कदम्ब कई जगह लगा है चूंकि वह जल्दी बढ़ने वाला पेड़ है। कदम्ब से पुराने वृक्षों में कसोड नाम का एक वृक्ष भी बहुतायत में लगा हुआ है। कई गलियों के तो पूरे के पूरे किनारे इसी कसोड के द्वारा आच्छादित हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे जिज्ञासा हुई कि कसोड नाम तो प्रदीप क्रिशन ने अपनी किताब ट्रीज़ ऑफ़ डेल्ही में दिया है। न जाने किस इलाक़े में यह नाम चलता हो। अपने कानपुर का क्या नाम है यह सोचते हुए मैं एक प्लास्टिक के पैकेट में आठ रुपये का पचास ग्राम धनिया झुलाते हुए चला जा रहा था। एक बंगले के सामने लगे कसोड के नीचे एक प्रौढ़ सज्जन एक ऐसी बेपरवाही और सहजता से पूरे चित्र में मौजूद थे जैसे कि कोई सिर्फ़ अपने घर के आगे ही हो सकता है। यह जानकर कि महाशय और इस पेड़ का साथ कई बरसों का लगता है, मैंने उन से पूछ डाला तपाक से – इस पेड़ का नाम क्या है। वो पहले तो अचकचाए फिर पेड़ की तरफ़ एक औचक दृष्टि उछाली और सर हिला दिया। इस का नाम तो नहीं मालूम। अपनी अज्ञानता में वो असहज न हो जायं मैंने कहा कि पीले फूल आते हैं न इसमें? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ- पीले। बहुत पुराना पेड़ है। यहाँ जगह-जगह लगा है। तमाम लोगों ने कटवा दिया है। हमारा वैसेई बना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने सर हिलाया कि जी यहाँ बहुत लगा है। और चलने लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सड़क के पार उनके पड़ोसी बाहर खाट डाले पड़े थे। मेरे वाले महाशय ने उनसे पूछा कि नाम क्या है इस का। अधलेटे पड़ोसी ने सर प्रश्नवाचक मुद्रा में सर उचकाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुकिये उनको पता है शायद। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उनके पीछे-पीछे सड़क के पार गया। सवाल के जवाब में उन्होने सर नकारात्मक हिला दिया। और मेरी तरफ़ एक निगाह फेंकी जिस से मुझे समझ आया कि वो मेरे सवाल से ज़्यादा इस बात से दिलचस्पी रखते थे कि मैं कौन चीज़ हूँ जो ऐसे सड़क चलते पेड़ो का नाम-धाम पूछ रहा हूँ? इस के पहले कि वो मेरी कोई इन्क्वारी करते मैंने खिसक लेने में अपनी भलाई समझी क्योंकि उन्हे ये समझाना कि मैं इतना खलिहर हूँ कि मेरी दिलचस्पी काम धन्धे की दुनियादारी में नहीं.. बेफ़ालतू की ऐसी जानकारी इकट्ठी करने में है जो उन निम्न वर्ग के लोगों के पास ही बची है जो प्रकृति के साथ रहने के लिए अभी भी मजबूर हैं। बंगले में बन्द लोगों को अपने सामने खड़े पेड़ का नाम भी नहीं मालूम रहता और न वे मालूम करने की कोई कोशिश करते हैं। वैसे मेरे वाले महाशय ने ये ज़रूर वादा किया कि वन विभाग के लोग आते-जाते रहते हैं उन से पूछ कर वो हमें बतायेंगे। अब वो हमें कैसे बतायेंगे इस सवाल में आप अपनी मूँड़ी मत घुसाइये। हम ऊ पी के बासियों की ये एक और निर्मल निराली अदा है। कहीं तो मिलोगे कभी तो मिलोगे तो बता देंगे नाम। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे मेरी थेरम को इति सिद्धम करते हुए सासेज ट्री के नीचे मौसम्मी का ठेला लगाए बालक ने दूसरी ओर देखते हुए कहा- बालम खीरा। मेरा सवाल वही था कि इस पेड़ का नाम क्या है। मैं उस के ज़रिये एक पीछे की दुनिया में झांकना चाह रहा था और वो मुझ से पार एक आगे की दुनिया में कुछ तलाश रहा था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-4691486116624900634?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/4691486116624900634/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=4691486116624900634" title="17 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4691486116624900634?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4691486116624900634?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/08/blog-post_08.html" title="हमरे ऊ पी के बासी" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">17</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;C0AEQnY8eyp7ImA9WxJaE0o.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-7670081368313470686</id><published>2009-08-04T12:55:00.004+05:30</published><updated>2009-08-04T13:11:43.873+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-08-04T13:11:43.873+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी" /><title>अथ संयम व्यथा</title><content type="html">&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 0, 153);"&gt;दोस्तों,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 0, 153);"&gt;बचपन और जवानी में कविता करने और कविकर्म में जीवन का अर्थ खोजने की कल्पना हम ने भी की थी, मगर कहानी कभी नहीं लिखी। कहानी की विधा को समझने में हमें एक उम्र लग गई। जीवन की सतत धारा को एक सार्थक टुकड़े में पकड़ पाने की कला के साथ हम बरसों से दो-चार होते रहे हैं। बावजूद इसके कि हमने टीवी सीरियल के लिए भी माल पैदा किया और फ़िल्म की कहानी भी बनाई। मगर जैसा कि वाक्य विन्यास से स्पष्ट है कि यह दोनों कर्म मेरे भीतर कहानी की कला नाम के कोने में जो अंधेरा था उसे उजाला करने में असमर्थ रहे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 0, 153);"&gt;इसी कारण मैंने कभी अपना विज़िटिंग कार्ड नहीं बनवाया। कार्ड तो बनवा लेंगे मगर उस पर लिखेंगे क्या? कहानीकार? लेखक? फ़िल्मकार? किसी भी परिभाषा के सामने खरे उतरने लायक कोई कर्म तो किया नहीं आप ने? तो कार्ड बनाने का काम तब तक मुल्तवी होता रहा जब तक कि केरल के शार्ट फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 'सरपत' को ले जाने के लिए यह निहायत ज़रूरी नहीं हो गया। उस पर भी सिर्फ़ नाम लिखकर ही काम चला लिया गया। एक शार्ट फ़िल्म बनाई ज़रूर है मगर क्या वह आप को फ़िल्मकार साबित करने के लिए पर्याप्त है? और दूसरा इस से बड़ा सवाल- क्या फ़िल्मकार अकेले भर ही अभय तिवारी का समूचा परिचय है? खैर!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 0, 153);"&gt;तो कहानी के मारे हम ने तय किया कि कहानी लिखे बिना तो नहीं बनेगी बात। रुक-रुक कर, श्रम साध्य विधि से हम ने स्मृति और कल्पना का एक जाल बुनने में अपने को लगा दिया। पन्द्र बीस रोज़ गुज़र गए बात आठ- नौ पन्ने पर एक जगह जा कर अटक गई। फिर एक रोज़ इस कहानी को पगुराते-पगुराते एक दूसरा विचार मस्तक में चमका। और पहले प्रयास के अधूरेपन को हास्यास्पद बनाते हुए कुल जमा दो घंटो में ही कागज़ पर भी आ गया। &lt;a href="http://azdak.blogspot.com"&gt;प्रमोद भाई &lt;/a&gt;को पढ़ाया। उन्होने हिम्मत बढाई और कहा कि इसे &lt;a href="http://www.geetchaturvedi.blogspot.com"&gt;गीत चतुर्वेदी &lt;/a&gt;को भेजो- वो आजकल भास्कर में साहित्य का पन्ना सम्हाल रहे हैं।&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 0, 153);"&gt;गीत ने पढ़ा, पसन्द किया और पिछले रविवार को दैनिक भास्कर की मैगज़ीन रसरंग में जगह दी। कुछ अनजान पाठकों के उत्साह वर्धक मेल भी आए पर ब्लॉग के दोस्तों ने लगता है अभी तक नहीं देखा। पहली कहानी है, उदारता की उम्मीद के साथ यहाँ छाप रहा हूँ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;अथ संयम व्यथा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;ससुरा बैजनवा रस्सी छोड़ै नहीं रहा था। पण्डितजी के सीने पे दबाव बढ़ता ही जा रहा था। बैजनवा ने एक झटका दिया। पण्डितजी चरपैय्या से नीचे आ पड़े। अचानक सारा दबाव सीने से उनके अधो भाग पर आ पड़ा। लगा कि यहीं पैखाना हो जाएगा। रुक जा बैजनवा मादर.. पण्डितजी ने अपनी तरफ़ की रस्सी के तनाव को अपना बल बनाने की कोशिश करते हुए कहा। मगर बैजनवा ने उधर से एक झटका दिया। अब पण्डितजी घिसटने लगे थे। और अधोभाग पर दबाव और बढ़ गया था। लगता था कि लेटे-लेटे ही पैखाना हो जाएगा। पण्डित जी ने करवट बदली। गला सूख रहा था। मगर अभी उठने का का मन नहीं था। अधोभाग पर दबाव बना हुआ था। पण्डितजी को सुध हुई कि वे बिस्तर पर हैं और बैजनवा स्वप्न में। इस राहतेजान से उनके मन में ऐसी शांति छायी कि फिर से नींद आने लगी। इच्छा हुई कि अधोभाग पर बने वेग को पाद मारकर बाहर कर दिया जाय। परन्तु अधोभाग से जवाब आया कि महज़ पाद नहीं हूँ मैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पण्डितजी को स्वप्न में बैजनवा में वापस मिल जाने का डर था वरना वे बिस्तर ना छोड़ते। गला अभी भी सूख रहा था। धोती सम्हालते हुए पण्डितजी बैठक में चले आए। सुशीला और बिट्टी दोनों बैठकर ड्रम में से पुराने चावल निकाल कर उसमें से घुन बीन रहीं थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चा बना दूँ दद्दा? सुशीला ने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पण्डितजी सोचने लगे कि पहले चा पी लूँ या निबट लूँ? पण्डितजी ने बाहर झांका। मई की धूप में अभी कमी नहीं आई थी। चार बज रहे होंगे। इस लू में लोटा लेकर मैदान जाने की इच्छा नहीं हुई पण्डितजी की। क्या घर की टट्टी में निबट लूँ। इतना सोचते-सोचते वे सुशीला के सवाल को भूल गए। वेग ऐसा है कि किसी को पता भी नहीं लगेगा कि लघुकाल में दीर्घकाल की शंका का समाधान हो जाएगा। पण्डितजी गलियारा पार के टट्टी में जा बैठ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोती और लंगोट का छोर कंधे पर लपेट कर शरीर के वेगों को आज़ाद किया ही था कि अधोभाग से एक आरोही स्वर बजने लगा। पण्डितजी चौंके फिर घबराए। और वापस वेगों को गिरफ़्तार कर लिया। सुशीला और बिट्टी की बैठक में उपस्थिति ने पण्डितजी को लज्जित कर दिया था। वे क्या सोचेंगी- दद्दा इस वेला में निबट रहे हैं। उनकी ख्याति इन्द्रियजित योगी और आयुर्वेद के ऐसे अनुशासित सिपाही की है जो हवा भी तौल के पीता है। कितनी बार उन्होने सुशीला और बिट्टी को संयमित आहार के लिए घुट्टी पिलाई थी कि दिन में शौच से बचने के लिए कैसा आचरण रखा जाय। आज स्वयं पण्डितजी... हा!.. इस वेला में निबटान और वो भी ऐसी सुरीले पाद के साथ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पण्डितजी शारीरिक वेग और मानसिक उद्वेग में फंस गए थे। शंका का समाधान करने टट्टी पर बैठे कितनी दूसरी शंकाओं की टट्टियों में अपने व्यक्तित्व को छिपाने में उलझ गए थे। पण्डितजी की राय थी कि शारीरिक वेगों को कभी न रोका जाय मगर आज अपनी राय के विरुद्ध उन्होने मस्तक को देह पर तरजीह दी। किसी तरह रोक-रोक कर शरीर का धर्म निभाया और बाहर आए। जितना समय पण्डितजी ने टट्टी की खुड्डी पर बैठकर बिताया था किसी को संशय तो नहीं होगा कि भीतर ले जानी वाली शंका लघु थी क्या? नज़र बचा कर पण्डितजी ने सुशीला और बिट्टी को देखा- दोनों निर्विकार भाव से घुन बीनने में लगीं थी। बिट्टी ने पण्डितजी की काया को गलियारे से गुज़रते देखा और उठ खड़ी हुई। पण्डितजी पानी के ड्राम के सामने खड़े सोच रहे थे कि कैसे बिना संकरा किए हस्त प्रक्षालन सम्पन्न कर लिया जाय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिट्टी ने पीछे से पुकारा- दद्दा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुँह?? उन्होने गले से ऐसे उच्चारा जैसे खदेड़ रहे हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर बिट्टी भी दद्दा की सहायता के लिए पूरी तरह प्रतिज्ञा कर के उठी थी जैसे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथ धुला दूँ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पण्डितजी की आदत थी कि लघुशंका के भी उपरान्त हस्त-प्रक्षालन करते थे। तो हाथ धोने भर से राज़ ज़ाहिर नहीं होता था। तो किसी तरह गले के थूक को भीतर उतारा और हाथ आगे बढ़ा दिए। हाथ धोते हुए पण्डितजी ने सोचा कि उचित तो यह होगा कि नहा लूँ मगर पण्डितजी ऐसी किसी भी सूरत से बचना चाह रहे थे जिसमें यह सिद्द हो कि वे दीर्घशंका के अपराधी हैं। और नहा लेने से तो यह पक्का हो जाएगा कि .. नहीं-नहीं.. पाँच बजने को है। बिट्टी रस्तोगी की बिटिया को लाने जाएगी और सुशीला भी भाजी लाने साथ निकलेगी। उनके जाते ही.. पण्डितजी ने महसूस किया के वात का प्रकोप पेट में अभी भी ज़ोर मार रहा है.. पहले शरीर को अपान के वेग से मुक्त करूँगा फिर स्नान। यह सोचते हुए उन्हे पवनमुक्तासन की याद भी हो आई- सवेरे सवेरे कर लेने से शायद ऐसी स्थिति से बच जायं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पण्डितजी यही सोचते हुए कमरे की ओर निकल पड़े। रसोई में सुशीला और बिट्टी की मद्धम सुर में कुछ वार्ता चल रही थी। साथ में भगोने की खटर-पटर भी उन्हे सुनाई दी- यानी चाय का प्रकरण पूरा होने को है। पण्डितजी ने घड़ियाल की ओर दीठ उछाली; बड़का हाथ पाँच के पास और छोटका ग्यारह के नजदीक पहुँच रहा था। एक बार चाय बन गई तो ये दोनों रवाना हो जाएंगी। पाँच मिनट की बात है। ये सोचकर पण्डितजी बिस्तर पर टिकने को ही थे कि वापस सीधे हो गए- अभी तो देह अशुद्ध है। कान वापस रसोई की दिशा में उन्मुख हो गए। गिलास में तरल द्रव गिरने का शब्द आ रहा था। चाय छन गई है, बस कुछ देर की और बात है- अधोवायु के दबाव को जैसे दिलासा देते हुए पण्डितजी ने सोचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहाते के साथ ही धोती भी फ़रिया के डाल दूँगा। लेकिन निरमा की बट्टी तो कल ही शेष हो गई थी। बिट्टी को लाने को बोल देता हूँ.. नहीं-नहीं.. उस से कहूँगा तो बेकार के सवाल करेगी। ऐसे ही फरिया दूँगा। ह्म्म यही ठीक रहेगा। पण्डितजी ने अपनी योजना को मन में पक्का कर लिया। फिर ध्यान रसोई की ओर गया। चाय लेके क्यों नहीं आई अब तक सुशीला। कान लगा कर सुना तो सुशीला और बिट्टी के वार्तालाप के खुसफुस के साथ तरल द्रव में चम्मच हिलाने का शब्द आ रहा था। जब जब धातु का चम्मच धातु के गिलास से टकराता तो ऊँचे सुर की रचना हो रही थी। एक तरफ़ पण्डितजी का अधोभाग गुदा पर बनते दबाव से आक्रांत हो रहा था वहीं मानसिक तरंगे मस्तक के उस भाग में आलोड़न पैदा कर रही थीं जहाँ शब्द की व्युत्पत्ति सम्बन्धी सूचनाएं जमा थीं। वहाँ से विचार उठ रहा था कि चम्मच शब्द, सोमरस पीने के पात्र वैदिक चमस का बिगड़ा हुआ रूप है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शरीर और मस्तक के द्वन्द्व से पण्डितजी विचलित होते जा रहे थे। अब यह दशा उनकी सहन शक्ति के परे होती जा रही थी। इसके पहले कि उनका शरीर उनके नियंत्रण से बाहर जा कर उनके लिए कोई अपमान जनक स्थिति पैदा करता, पण्डितजी ने हालात पर हस्तक्षेप करने क फ़ैसला किया। उनका इरादा तो बहुत वेग से रसोई में दाखिल होने का था मगर दो क़दम चलने के बाद ही उन्हे एहसास हो गया कि अधिक वेग नीचे के वेग को उच्च स्वर में मुक्त कर सकता है। इसलिए वे सम्हल कर पैर रखते हुए रसोई के द्वार तक पहुँचे। सुशीला चाय के गिलास में चम्मच डालकर बिट्टी से खुसफ़ुस बतियाये जा रही थी। खुसफुस इसलिए क्योंकि ऊँचे सुर में बात करने से पण्डितजी की साधना में बाधा होती है। पण्डितजी को देखकर दोनों शांत हो गईं। सुशीला किसी आदेश की आशा में उनकी ओर देखने लगी। पण्डितजी चिड़चिड़ाए हुए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो गया?     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाय?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या करना है उसका?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ नहीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे दोगी या किसी और को?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.. आप ही के लिए तो..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो दो.. कब से अगोर रहा हूँ। दिन भर तुम लोगों का खुसुर-फुसुर चलता ही रहता है। और कोई काम नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुशीला ने आंचल से गिलास को नीचे से पकड़ कर पण्डितजी की ओर बढ़ा दिया ताकि वो गिलास को ऊपर से पकड़ सकें जहाँ पर गिलास अपेक्षाकृत ठण्डा होगा। पण्डितजी ने गिलास पकड़ा और मुड़कर वापस कमरे में लौट गए। अब उन्हे इन्तज़ार था कि दोनों घर से बाहर निकलें तो वे अपनी क़ैद से आज़ाद हों। चाय पीने की उनकी ज़रा भी इच्छा नहीं हो रही थी। इच्छा तो ये हो रही थी कि चाय का गिलास दीवार पर दे मारें। मगर उन्होने इस इच्छा को भी शरीर के भीतर ही दबा लिया। शरीर की दशा और बुरी हो गई। किसी भी वक़्त विस्फोट हो सकता था। पण्डितजी ने सोचा कि मन को किसी ओर दिशा में लगाने से कदाचित राहत मिले। वे मन में ही गिनती गिनने लगे। गिनती तेरह तक पहुँची थी कि उन्हे सुशीला और बिट्टी गलियारे में जाते दिखे। अब कुछ ही पलों में उनकी मुक्ति हो जाएगी। निर्वाण हो जाएगा। पण्डितजी की नज़र दोनों के क़दमों पर जम गई एक-एक क़दम उनके मोक्ष की ओर बढ़ रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुशीला और बिट्टी दरवाजे पर पहुँची। सुशीला ने कुण्डी उतारी। पहले बिट्टी बाहर निकली। सुशीला ने एक पैर बाहर निकाला और बिट्टी से कहा- सुन, आज दद्दा का जी अच्छा नहीं लग रहा। दोनों चले जायें और उनको कुछ जरूरत पड़े तो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो तुम रुको न जिज्जी। मैं भाजी ले के रस्तोगी की बिटिया को स्कूल से ले लूँगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये ले पैसे। सुशीला ने भाजी के पैसे बिट्टी को थमा दिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीतर पण्डितजी की श्रवणग्रन्थियां दरवाजे की कुण्डी के शब्द पर लगी थीं। बाहर सुशीला ने सांकल कुण्डी में जमाई और इधर पण्डितजी ने देह पर से सारे बंधन खोल दिए। पूरा घर एक फड़फाड़ते पंछी के जैसे आरोही स्वर से भर गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-7670081368313470686?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/7670081368313470686/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=7670081368313470686" title="19 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/7670081368313470686?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/7670081368313470686?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/08/blog-post.html" title="अथ संयम व्यथा" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">19</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CU8NSXwyfCp7ImA9WxJUGU8.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-2030653390381551018</id><published>2009-07-18T08:20:00.005+05:30</published><updated>2009-07-18T19:01:38.294+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-18T19:01:38.294+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मन" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मन की गाँठें" /><title>कबूतर जैसा मशहूर नहीं!</title><content type="html">वैसे तो मैं नाटक देखता नहीं लेकिन कल एक देखना पड़ा। पृथ्वी पर। वहीं मेरे एक दोस्त सलीम शेख मिल गए। मिज़ाजपुर्सी हुई। मोहब्बत के दो बोल उन ने बोले। एकाधी अदा हम ने भी दिखाई। फिर कहने लगे कि क्या कर रहे हो आजकल। हमारा हाल किस से पोशीदा है। सब जानते हैं कि ज़माने से बेरोज़गार हूँ। वो बात अलग है कि किसी मजबूरी में नहीं अपनी मर्ज़ी से हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी डर भी लगता है कि कहीं एक दिन ऐसा न आए कि लोग काम के लिए पूछना भी छोड़ दें। लोग पुर्सिश करते रहें और आप कहें कि अमां जाओ यार कहाँ फंसा रहे हो, हमें अपनी आज़ादी कहीं प्यारी है। मन-माफ़िक काम न मिले तो दो-चार पैंटो और नए-ताज़े असबाब की हवस के लिए रुपये के लिए गधा मजूरी करने से तो इन्कार की यह लज़्ज़त भली। नए कपड़े नहीं खरीदता हूँ, जहाँ तक हो सके बस और ट्रेन से चलता हूँ, सिगरेट छोड़ ही चुका हूँ। जब तक सर पर ना आ पड़े ग़ुलामी नहीं करेंगे ऐसा सोचा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया में लोगों की तमाम ज़िम्मेदारियां होती हैं। माँ-बाप, बीबी-बच्चे, भाई-बहन। नसीब ने हमें ऐसी किसी भी ज़िम्मेदारी से आज़ाद रखा है। अगर उसके बावजूद मैं मौक़े का फ़ाएदा न उठाऊँ, और वो न करूँ जो वाक़ई दिल की तमन्ना है तो निहायत अहमक़ होऊँगा। और अपना तो उलटे ऐसा ख्याल है कि हम काफ़ी ज़हीन हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो सलीम साहब कहने लगे कि यार हमारे एक दोस्त हैं। थियेटर की बड़ी हस्ती हैं। अगले माह एक बड़े फ़ेस्टिवल के लिए हम से इंडिया टुडे पर दस मिनट का पीस लिखवना चाहते हैं। पर हमें ससुरा वक़्त ही नहीं मिल रहा, तुम लिखोगे क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इंडिया टुडे पर दस मिनट का पीस लिखना कौन बड़ी बात है। मैं क्या कोई भी सेल्फ़ रेस्पेक्टिंग ब्लॉगिया लिख देगा। आज कल तो वैसे भी साहित्य-ब्लॉगित्य की बड़ी धूम है। मैंने बोला कि बेफ़िकर रहिये लिख दूंगा। तो कहने लगे कि मगर उन की थियेटर पर्सनैल्टी ने उनसे लिखने को कहा है। और जब वो कहेंगे कि फ़लां साहब लिख रहे हैं तो वो कहेंगे कि कौन फ़लां साहब? क्या जवाब देंगे? यानी सलीम शेख की तो एक शुहरत है, आप कौन? मैंने कहा कि अगर ऐसा है तो जाने दीजिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोले नहीं कि कर लो, लूप में आ जाओगे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लूप में?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम बमुश्किल टीवी के लूप से बाहर निकले हैं। मसाला फ़िल्म के लूप के जबड़ों में जाते-जाते खुद को किसी तरह बचाया है। और अब आप थियेटर के लूप का झुनझुना हमें झलका रहे हैं। हद है। हम ने कहा कि नहीं भाई हमें माफ़ करें हम अब थियेटर के लूप में आने के लिए स्ट्र्गल नहीं करेंगे। सलीम मियां चुप हो गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर मैंने उन से पूछा कि उन्होने कभी कबूतर देखा है। ज़ाहिर सी बात है सब ने देखा है उन्होने भी देखा होगा। कबूतर को कौन नहीं पहचानता। बोले हाँ। फिर मैंने पूछा कि फिर तो आप ने हरेवा भी देखा होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरेवा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो क्या होता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पंछी होता है हरे रंग की देह, सर लाल, चोंच और गला काला और सर से लेकर गरदन तक एक सुनहरी पट्टी। निहायत दिलकश पंछी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तोता है क्या किसी तरह का?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं साहब तोते से इसका कोई रिश्ता नहीं। बुलबुल के क़द का होता है और घने जंगल में बसर करता है। मगर क़िस्मत अच्छी हो तो हो सकता है आबादी के आस-पास के दरख्तों में भी छिपा दिख जाय। अंग्रेज़ी में गोल्ड फ़्रन्टेड क्लोरोप्सिस कहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्लोप्सिस..?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.flickr.com/photos/30679461@N03/3509322624/"&gt;गोल्ड फ़्रन्टेड क्लोरोप्सिस&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोल्ड फ़्रन्टेड क्लोरोप्सिस!?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करेक्ट! इसमें बस एक ही नुक़्स है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबूतर जैसा मशहूर नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-2030653390381551018?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/2030653390381551018/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=2030653390381551018" title="14 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2030653390381551018?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2030653390381551018?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/07/blog-post_18.html" title="कबूतर जैसा मशहूर नहीं!" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">14</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CEEBQXo-eCp7ImA9WxJUGE0.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-1488147172729484919</id><published>2009-07-17T08:45:00.006+05:30</published><updated>2009-07-17T09:20:50.450+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-17T09:20:50.450+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पाकिस्तान" /><title>गिलानी के आगे गुलाटी</title><content type="html">भारत की पाक-नीति मिस्र में मुँह के बल गिर पड़ी है। शर्म अल शेख में गिलानी और मनमोहन सिंह की मुलाक़ात के बाद एक उद्घोषणा के अनुसार :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१) दोनों देश &lt;a href="http://www.bhaskar.com/business/article.php?id=18619"&gt;सभी मुद्दों पर बात करने को राजी&lt;/a&gt; हो गए है। (सभी मुद्दों में कश्मीर मुद्दा भी शामिल माना जाएगा)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२) दोनों देशों ने माना कि आतंकवाद और वातचीत के बीच में कोई सीधा संबन्ध नहीं बनाया जा सकता। (यानी पाकिस्तान की ओर से कितनी भी आतंकी गतिविधियां हो, भारत ये नहीं कह सकेगा कि &lt;span style="font-style: italic;"&gt;जाओ हम तुम से बात नहीं करते तुमने हमें मारा&lt;/span&gt; !)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३) पाकिस्तानी प्रांत बलूचिस्तान में अशांति पर भारत बातचीत करने को तैयार हो गया है। !!!??? (ये एक परोक्ष स्वीकार है कि वहाँ हो रहे आज़ादी के आन्दोलन को भारत प्रायोजित कर रहा है)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तानी प्रधान मंत्री ने कल रात से ही इसे अपनी जीत के रूप में प्रचारित करना शुरु कर दिया है। जबकि भारत ने तुरंत&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2009/07/090717_manmohan_statem_ac.shtml"&gt; लीपापोती&lt;/a&gt; भी शुरु कर दी है। भारतीय मीडिया इसे अण्डरप्ले कर रहा है। कल रात एन डी टी वी को छोड़कर सब ने माया-रीता विवाद पर ही ज़ोर बनाए रखा। अखबारों में भी इस समर्पण को ज़्यादा अहमियत नहीं दी गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि &lt;a href="http://www.dawn.com/wps/wcm/connect/dawn-content-library/dawn/news/world/04-gilani-singh-meet-in-egypt-qs-09"&gt;पाकिस्तान में हाल उलट&lt;/a&gt; हैं। निश्चित ही यह उनकी कूटनीतिक जीत है। पिछले महीने ही ज़रदारी मनमोहन के द्वारा बुरी तरह झिड़क दिए गए थे सरे मीडिया; कि भारत सिर्फ़ आतंकवाद के रोकथाम पर ही बात करेगा और कुछ भी नहीं। और एक ही महीने में इतनी भी बड़ी गुलाटी? राज़ क्या है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चित ही यह किसी दबाव में हुआ है। और वह अमरीकी दबाव के अलावा और क्या हो सकता है। अमरीका ने पाकिस्तान को तालिबान के खिलाफ़ लड़ाई के लिए कुछ मुआवज़ा तय किया था। लड़ाई लड़ने की मोटी आर्थिक क़ीमत के अलावा उनकी मुख्य शर्त भारत के साथ समीकरण में अपने पक्ष को भारी करवाना ही रही होगी। जिस को वे सार्वजनिक रूप से भी कहते रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज मोहतरमा क्लिण्टन भारत पधार रही हैं। पांच दिन के लिए। और सब से दिलचस्प बात ये है कि न वो भारत आने से पहले पाकिस्तान जा रही हैं और न बाद में। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। अमरीका ने हमेशा भारत और पाकिस्तान को भारत-पाक की तरह हाइफ़ेनेट ही किया है जिसके प्रति लगातार भारत ने शिकायत की है। अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर पाकिस्तान से मुक्त होकर अपनी पहचान बनाने की यह क़ीमत चुका रहा है शायद भारत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा ख्याल है कि पाकिस्तान में भारत के प्रति इस नए अमरीकी झुकाव को लेकर कोई आन्तरिक आन्दोलन न खड़ा हो जाय इसलिए भारत को यह कूटनीतिक गुलाटी मारनी पड़ी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत सारे लोग देश की कूटनीति को शुद्ध ठकुरैती की नज़र से देखते हैं। &lt;span style="font-style: italic;"&gt;घुस जाओ! खदेड़ दो! नेस्तओनाबूद कर दो!&lt;/span&gt; मगर देश ऐसे नहीं चलता। कूटनीति में न तो कोई स्थायी मित्र होता है न शत्रु। यहाँ तक कि कोई स्थायी नीति भी नहीं होती; होते हैं सिर्फ़ स्थायी हित। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत सम्भव है कि भारत के वर्तमान कर्णधारों ने ये फ़ैसला इसलिए लिया हो कि मोहतरमा क्लिण्टन ऐसा कुछ दे रही हों जो इस गुलाटी से कहीं अधिक देश के लिए हितकारी हो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखें क्या दे के जाती हैं मिसेज़ क्लिण्टन!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-1488147172729484919?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/1488147172729484919/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=1488147172729484919" title="6 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/1488147172729484919?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/1488147172729484919?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/07/blog-post_17.html" title="गिलानी के आगे गुलाटी" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CkcERn8yeip7ImA9WxJUFUQ.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-8384150500760918120</id><published>2009-07-14T21:34:00.003+05:30</published><updated>2009-07-14T22:16:47.192+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-14T22:16:47.192+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="प्रोफ़ेसर सबरवाल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साम्प्रदायिकता" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><title>अ सिविलाइज़्ड एण्ड डीसेन्ट सोसायटी</title><content type="html">भारत ने कहा है कि पाकिस्तान शुड एक्ट अगेन्स्ट हाफ़िज़ सईद इफ़ इट इज़ अ सिविलाइज़्ड एण्ड डीसेन्ट सोसायटी। वेल सेड।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विडम्बना यह है कि यह बयान उस दिन आया है जब प्रोफ़ेसर सबरवाल की हत्या के सभी आरोपियों को सबूत के अभाव में &lt;a href="http://kissago.blogspot.com/2009/07/blog-post_14.html"&gt;अदालत द्वारा बाइज़्ज़त रिहा&lt;/a&gt; कर दिया गया। मुक्त हुए मुल्ज़िमों ने मालाएं पहनी, मिठाई चाभी और मुस्कुराहटें बिखेरीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आप ने प्रोफ़ेसर सबरवाल की मौत से पहले उनकी पिटाई का वीडियो देखा था। मैंने देखा था.. मज़े की बात है अदालत के पास एक भी गवाह नहीं कोई सबूत नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अजीब बात है लाहौर हाई कोर्ट में भी यही दलील देकर हाफ़िज़ सईद को आज़ाद छोड़ दिया गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-8384150500760918120?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/8384150500760918120/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=8384150500760918120" title="10 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/8384150500760918120?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/8384150500760918120?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/07/blog-post_14.html" title="अ सिविलाइज़्ड एण्ड डीसेन्ट सोसायटी" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;CUUAQn44fip7ImA9WxJUFEU.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-7280617879627521491</id><published>2009-07-13T16:08:00.005+05:30</published><updated>2009-07-13T16:37:23.036+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-13T16:37:23.036+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="उदय प्रकाश" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नैतिकता" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हिन्दी" /><title>एक क्रांतिकारी नैतिकता की उम्मीद</title><content type="html">&lt;meta equiv="Content-Type" content="text/html; charset=utf-8"&gt;&lt;meta name="ProgId" content="Word.Document"&gt;&lt;meta name="Generator" content="Microsoft Word 11"&gt;&lt;meta name="Originator" content="Microsoft Word 11"&gt;&lt;link rel="File-List" href="file:///C:%5CUsers%5CABHAYT%7E1%5CAppData%5CLocal%5CTemp%5Cmsohtml1%5C01%5Cclip_filelist.xml"&gt;&lt;!--[if gte mso 9]&gt;&lt;xml&gt;  &lt;w:worddocument&gt;   &lt;w:view&gt;Normal&lt;/w:View&gt;   &lt;w:zoom&gt;0&lt;/w:Zoom&gt;   &lt;w:punctuationkerning/&gt;   &lt;w:validateagainstschemas/&gt;   &lt;w:saveifxmlinvalid&gt;false&lt;/w:SaveIfXMLInvalid&gt;   &lt;w:ignoremixedcontent&gt;false&lt;/w:IgnoreMixedContent&gt;   &lt;w:alwaysshowplaceholdertext&gt;false&lt;/w:AlwaysShowPlaceholderText&gt;   &lt;w:compatibility&gt;    &lt;w:breakwrappedtables/&gt;    &lt;w:snaptogridincell/&gt;    &lt;w:wraptextwithpunct/&gt;    &lt;w:useasianbreakrules/&gt;    &lt;w:dontgrowautofit/&gt;   &lt;/w:Compatibility&gt;   &lt;w:browserlevel&gt;MicrosoftInternetExplorer4&lt;/w:BrowserLevel&gt;  &lt;/w:WordDocument&gt; &lt;/xml&gt;&lt;![endif]--&gt;&lt;!--[if gte mso 9]&gt;&lt;xml&gt;  &lt;w:latentstyles deflockedstate="false" latentstylecount="156"&gt;  &lt;/w:LatentStyles&gt; &lt;/xml&gt;&lt;![endif]--&gt;&lt;style&gt; &lt;!--  /* Font Definitions */  @font-face 	{font-family:Mangal; 	panose-1:2 4 5 3 5 2 3 3 2 2; 	mso-font-charset:0; 	mso-generic-font-family:roman; 	mso-font-pitch:variable; 	mso-font-signature:32771 0 0 0 1 0;}  /* Style Definitions */  p.MsoNormal, li.MsoNormal, div.MsoNormal 	{mso-style-parent:""; 	margin:0in; 	margin-bottom:.0001pt; 	mso-pagination:widow-orphan; 	font-size:12.0pt; 	font-family:"Times New Roman"; 	mso-fareast-font-family:"Times New Roman"; 	mso-bidi-font-family:"Times New Roman"; 	mso-bidi-language:AR-SA;} @page Section1 	{size:8.5in 11.0in; 	margin:1.0in 1.25in 1.0in 1.25in; 	mso-header-margin:.5in; 	mso-footer-margin:.5in; 	mso-paper-source:0;} div.Section1 	{page:Section1;} --&gt; &lt;/style&gt;&lt;!--[if gte mso 10]&gt; &lt;style&gt;  /* Style Definitions */  table.MsoNormalTable 	{mso-style-name:"Table Normal"; 	mso-tstyle-rowband-size:0; 	mso-tstyle-colband-size:0; 	mso-style-noshow:yes; 	mso-style-parent:""; 	mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; 	mso-para-margin:0in; 	mso-para-margin-bottom:.0001pt; 	mso-pagination:widow-orphan; 	font-size:10.0pt; 	font-family:"Times New Roman"; 	mso-ansi-language:#0400; 	mso-fareast-language:#0400; 	mso-bidi-language:#0400;} &lt;/style&gt; &lt;![endif]--&gt;      &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;उदय प्रकाश से एक क्रांतिकारी नैतिकता की उम्मीद की जा रही है बल्कि कुछ हद तक उन पर थोपी जा रही है। वे इस नैतिकता के थोपे जाने का विरोध करने के बजाय सामने वालों पर कीचड़ उछाल रहे हैं। हिन्दी साहित्य की दुनिया का जवाब नहीं।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;      &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;मसला ये है कि उदय प्रकाश गोरखपुर के एक आयोजन में भाजपा के उग्र सांसद योगी आदित्यनाथ के साथ न केवल मंच पर बैठे वरन उनके हाथों सम्मान भी ग्रहण किया। सम्मान, बताया जा रहा है कि उदय जी के दिवंगत भाई के नाम पर है।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;उदय जी का सारा साहित्य वामपंथी, प्रगतिशील मूल्यों पर आधारित है। अब यह एक आम परम्परा बन चुकी है कि किसी भी साम्प्रदायिक, जातिवादी ‘आततायी’ संस्था या व्यक्ति के हाथों पुरस्कार को ठोकर मार दी जाय। अच्छी बात है। ऐसा करने वाले सभी कलावन्तों का मैं नमन करता &lt;/span&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;हूँ। हालांकि ये स्वयं एक ऐसा मुकुट बन चुका है जिस के प्रति एक अभिलाषा पाली जा सकती है &lt;/span&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;–&lt;span lang="HI"&gt; &lt;span style="font-style: italic;"&gt;मुझे पुरस्कार मिला मगर मैंने ठोकर मार दी&lt;/span&gt;।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;मेरा मानना है कि जीवन और साहित्य दो अलग-अलग मामले हैं। उनमें एक साम्य अपेक्षित है पर सहज प्राप्य नहीं। जीवन ठोस और क्रूर है। साहित्य तरल और नरम है। उसमें वह बहुत कुछ व्यक्त हो सकता है जीवन जिस की राह में रोड़े अटका रहा हो। साहित्यकार समाज से हमेशा विद्रोह की मुद्रा में ही रहे यह सम्भव नहीं, वह बहुत सारे समझौते करेगा क्योंकि वह समाज का अंग है। क्रांतिकारी की बात अलग है। वह समझौतापरस्त जीवन को ठोकर मार देता है- &lt;span style="font-style: italic;"&gt;मैं नकारता हूँ तुझे&lt;/span&gt;- वह एक नए समाज की निर्माण में लग जाता है।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;    &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;जब तक उनके साहित्य में आपत्तिजनक रंग नहीं घुलने लगे या उनका साहित्य नक़ली और घटिया न हो जाय, हमें शिकायत क्यों होनी चाहिये? और जब होने लगे तो उन्हे बख्शना भी नहीं चाहिये। मैं पिछले दिनों उनकी &lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/11/blog-post_11.html"&gt;एक फ़र्जी कविता&lt;/a&gt; पर अपनी निराशा व्यक्त कर ही चुका हूँ। इसलिए बहस उनके व्यक्तित्व के बजाय उनके कृतित्व पर होती तो बेहतर था।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;    &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;दुनिया में आप के अनेको ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें बड़े-बड़े कलाकार अपने निजी जीवन में हिंसक, बदमिज़ाज, चोर यहाँ तक कि बलात्कारी भी हुए हैं। उदय प्रकाश ने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया। समाज में दूसरों के तुलना में अपने सम्मान और पुरस्कारो को लेकर एक विपन्न भाव से ग्रस्त रहना एक कलाकार का मनोगत दोष है।उदय प्रकाश जैसे सफल और मशहूर लेखक का स्वयं को लांछित और उपेक्षित महसूस करना खेदपूर्ण है पर ठीक है। &lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;    &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;उदय जी को हम क्रांतिकारी के तौर पर नहीं जानते, साहित्यकार के बतौर पहचानते हैं। न जाने किन कारणों के दबाव में उन्होने योगी आदित्यनाथ से पुरस्कार लेना स्वीकार किया। ग़ैर-साम्प्रदायिक, ग़ैर-जातिवादी होना क्या नैतिकता का सब से बड़ा पैमाना है?
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;और ये मान लेना भी बचकाना ही होगा कि तथाकथित ग़ैर-साम्प्रदायिक, ग़ैर-जातिवादी दुनिया में सफलता की सभी सीढ़ियाँ सुबह-शाम नैतिकता के गंगाजल से धो कर पवित्र रखी जाती हैं। आज कल के अखबारों और टीवी चैनलों के दौर में कौन अपनी चदरिया के कोरी होने का दावा कर सकता है? दिक़्क़त बस इतनी सी है कि उदय प्रकाश स्वयं दूसरों को गाली देते वक़्त इन्ही मापदण्डो का सहारा लेते हैं।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;    &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;और एक दुख की बात ये भी है कि हम लोग बेहद असहिष्णु हो चुके हैं। किसी भी छोटी सी ग़लती को हम नज़रअंदाज़ करने को तैयार नहीं। मित्रों ने उदय प्रकाश पर जम कर आक्रमण किया मगर शालीन। पर देख रहा हूँ कि उदय जी आक्रमण से तिलमिलाकर अपनी शालीनता का विस्मरण कर बैठे। और उन्होने उलटा आरोप लगाया है कि उन की आलोचना करने वाले सभी लोग साम्प्रदायिक, जातिवादी और न जाने क्या क्या हैं।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span   lang="HI" style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;इस तरह की होने वाली बहसों के दौरान मुझे ये बोध हुआ है कि आजकल किसी भी व्यक्ति की इज़्ज़त उतारनी हो तो उसे साम्प्रदायिक और जातिवादी की गाली दे दो। अच्छी बात यह है कि ये मूल्य असभ्यता का प्रतीक माने जा रहे हैं। अफ़सोस की बात ये है कि उदय प्रकाश जैसे साहित्य का शिखर कहे जाने वाले व्यक्ति के इस आरोप के मूल में वही असत्य और अश्लील भाव है जिसकी अभिव्यक्ति पहले माचो-बैंचो में होती थी अब ऐसे हो रही है।
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;
&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;font-size:85%;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-7280617879627521491?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/7280617879627521491/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=7280617879627521491" title="10 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/7280617879627521491?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/7280617879627521491?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/07/blog-post_13.html" title="एक क्रांतिकारी नैतिकता की उम्मीद" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total></entry><entry gd:etag="W/&quot;DEEBSHk8cCp7ImA9WxJVGEg.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-1574339642978491867</id><published>2009-07-06T09:23:00.014+05:30</published><updated>2009-07-06T10:34:19.778+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-07-06T10:34:19.778+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समलैंगिकता" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लौण्डेबाज़ी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="संस्कृति" /><title>एक छिलके में दो गिरियां</title><content type="html">&lt;p style="COLOR: rgb(0,0,153)" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;मुझे याद हैं वो दिन जब मैं और मेरा दोस्त बादाम के एक छिलके में दो गिरियों जैसे बने रहते। फिर अचानक हम बिछड़ गए। कुछ वक़्त बाद मेरा दोस्त लौटा और मुझ पर इल्ज़ाम धरने लगा कि मैंने उस दौरान कोई क़ासिद भी क्यों न भेजा। मैंने कहा कि जिस हुस्न से मैं महरूम हूँ उस पर किसी क़ासिद की नज़र क्यों पड़े?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="COLOR: rgb(0,0,153)" class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;?xml:namespace prefix = o /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="COLOR: rgb(0,0,153)" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="COLOR: rgb(0,0,153)" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;न दे मुझे सलाहे ज़ुबानी कह दो मेरे यार से।&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="COLOR: rgb(0,0,153)" class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;क्यूंकि &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;तोबा क&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;रूँ ये होगा नहीं ज़ोरे तलवार से॥ &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="COLOR: rgb(0,0,153)" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="COLOR: rgb(0,0,153)" class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="COLOR: rgb(0,0,153)" class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;देख नहीं सकता कि हो तू ग़ैर से रज़ामन्द। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="COLOR: rgb(0,0,153)" class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;मैं फिर कहता हूँ कि हो सबका मज़ा बन्द॥&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="COLOR: rgb(0,0,153)" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;तेरहवीं सदी के शाएर &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Saadi_%28poet%29"&gt;शेख सादी&lt;/a&gt; की यह लघुकथा समलैंगिक प्रेम पर आधारित है। &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gulistan_of_Sa%27di"&gt;गुलिस्तान&lt;/a&gt; में संकलित इस लघुकथा के आधार पर भले ये सिद्ध न हो कि शेख सादी लौंडेबाज़ थे मगर ये तो ज़रूर पता चलता है कि उनके काल में भी यह तथाकथित &lt;span style="FONT-STYLE: italic"&gt;बीमारी&lt;/span&gt; मौजूद थी। वेश्यावृत्ति की तरह इसका &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt; इतिहास बड़ा पुराना है। बाईबिल के पुराने विधान में भी इसका ज़िक्र मिलता है। &lt;a href="http://www.religioustolerance.org/hom_bibg.htm"&gt;सोडोम&lt;/a&gt; नाम का एक शहर था&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt; (इसी के नाम से समलैंगिकता सोडोमी कहलाई)&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;, जिसके निवासी सलोनी लड़कियों के बजाय खूबसूरत लड़कों के लिए मचलते थे। बाईबिल घोषणा करती है कि ईश्वर ने उनके शहर पर बिजली गिरा कर उन्हे उनके अपराध की सजा दी।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;बावजूद इस के तीनों अब्राहमपंथी धर्मावलम्बियों की परम्पराओं में इस बीमारी की उपस्थिति बनी रही। यहूदियों, योरोपीय ईसाईयों और अरब मुस्लिम और ग़ैर अरब मुस्लिम समाजों में समलैंगिकता अबाध रूप से चलती रही। इस रुझान के लोगों की सूची में तमाम बड़े-बड़े नाम हैं जिसमें लियोनार्दो दा विंची जैसे कलाकार और बाबर जैसे सेनानायक शामिल हैं। मैंने इस ब्लॉग पर पहले भी &lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/02/blog-post_19.html"&gt;मीर के शौक़&lt;/a&gt; के बारे में लिखा है-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,0,153)"&gt;मीर क्या सादे हैं बीमार हुए जिसके सबब&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(0,0,153)"&gt;उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं।&lt;/span&gt; &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;ऐसी लौंडेबाज़ी को धर्म और नैतिकता तब भी नहीं स्वीकारती थी। मगर नसीब वाले थे मीर कि उनके समय इस तरह के रुझान अपराध नहीं थे। अंग्रेज़ो के आने के बाद लॉर्ड मैकाले ने क़ानून बना के इसे अपराध घोषित कर दिया। आज हमारे देश में अदालत के आदेश से यह सम्बन्ध अपराध नहीं रहा। इस कारण से बड़ा हो-हल्ला है। लोग नाराज़ हैं। संस्कृति और परम्परा, धर्म और नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं। उनका मानना है कि ये रुझान अप्राकृतिक है इसलिए निन्दनीय है। और समाज के लिए घातक है और इसीलिए आपराधिक है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;एक तर्क यह भी सुनने को मिलता है कि पशु ऐसा नहीं करते! वैसे यह पूरी तरह सच नहीं है कुछ पशु समलैंगिक व्यवहार प्रदर्शित करते पाए गए हैं। एक अन्य तर्क यह भी दिया जाता है कि ये लोग जो समलैंगिक सेक्स की आज़ादी चाहते हैं कल को पशुओं से सेक्स करने की भी इजाज़त माँगेंगे? मैं ऐसे लोगों के तर्कों के आगे ध्वस्त हो जाता हूँ। क्या कोई सचमुच इजाज़त माँग कर यह काम करता है। क्या कल तक इजाज़त न होने पर लोग समलैंगिक सेक्स नहीं कर रहे थे और आज आज़ादी मिल जाने पर मुफ़्तिया माल की तरह टूट पडेंगे? &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;क्या इन का सोचना यह है कि हर व्यक्ति के भीतर समलैंगिक सेक्स की ऐसी भयानक चाह है कि अपराध का डर हटते ही समाज में प्रेम का स्वरूप धराशायी हो जाएगा? बाबा रामदेव कहते हैं कि आदमी आदमी पर चढ़ने लगेगा तो बच्चे कैसे पैदा होंगे? यएनी बाबा मानते हैं कि लोग डण्डे के डर से मन मार के बैठे हैं? हास्यास्पद है ये सोच! &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;क्या आप ने ऐसे व्यक्ति नहीं देखे जो नर के शरीर में क़ैद नारी हैं और ऐसे भी जो नारी के शरीर में क़ैद नर हैं? ज़रूर देखें होंगे। पर मैं इस से अलग जा के एक और बात कहना चाहता हूँ- नर और नारी के चरित्र की यह श्रेणियां ही ग़लत हैं। यह वास्तविक नहीं कल्पित हैं। मानवीय गुण-दोषों की ये शुद्ध परिभाषाएं है। मगर वास्तविकता में कोई तत्व शुद्ध नहीं मिलता। शुद्ध तत्व प्रयोगशालाओं में अशुद्ध तत्वों से अलग कर के पाए जाते हैं। मेरी नज़र में तो ग़लत ये है कि नर-नारी के एक कल्पना की गई छवि के आधार पर लोगों के बारे में कोई फ़ैसला करे। फ़ैसला करे तो करे ये तो हद ही है कि फिर उन्हे आपराधिक घोषित करे?&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt; अब आप बताइये कौन प्राकृतिक है?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;यह ठीक है कि मनुष्य के शरीर में यौन अंग प्रजनन के उद्देश्य से उपजे हैं। और यह बात भी तार्किक लगती है कि जो चीज़ जिस उद्देश्य के लिए बनाई गई हो वो उसी उद्देश्य के लिए प्रयोग की जाय। मगर प्रकृति ऐसा नहीं करती। प्रजनन के लिए एक शुक्राणु ही चाहिये होता है मगर प्रकृति उन्हे करोड़ो के संख्या में पैदा करती है। बबून के समूह में एक बंदर ही प्रजनन करता है मगर प्रकृति प्रजननांग सभी नर बंदरो को प्रदान करती है। पूछा जाना चाहिये कि प्रकृति हर चीज़ नाप-तौल के क्यों नहीं करती? और उद्देश्य के तर्क से घायल ये सारे लोग क्या अपना सारा यौनाचार प्रजनन के उद्देश्य से ही करते हैं?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;span style="FONT-STYLE: italic"&gt;समलैंगिकता प्रकृति के विरुद्ध है।&lt;/span&gt; चलिए माना। पर मनुष्य के जीवन में क्या और कुछ भी नहीं जो प्रकृति के विरुद्ध है? &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;पका हुआ भोजन भी प्रकृति के विरुद्ध है। समलैंगिकता का विरोध करने वाले क्या मिर्च-मसाले छोड़ कर कच्चा भोजन खाना शुरु कर सकेंगे? ईंट-गारे की इमारतें, मोटरकार, और पैसा-रुपया भी तो प्रकृति के विरुद्ध है। और तो और कपड़े भी प्रकृति के विरुद्ध है। पश्चिम में एक ऐसा आन्दोलन है जो प्राकृतिक होने की ज़िद में ऐसे समुदाय बना के रहते हैं जिसमें कपड़ों का कोई इस्तेमाल नहीं। क्या समलैंगिकता के विरोधी कपड़े उतार के नंगे रहना पसन्द करेंगे क्योंकि ईश्वर ने हमें कपड़े पहना के नहीं भेजा?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;और सबसे बड़ा प्रकृति का विरोधी तो धर्म है। प्रकृति तो किसी धर्म को नहीं मानती। वो न तो गाय खाने से मना करती है न सूअर खाने से। प्राणी जगत में तो हर जन्तु स्वतंत्र है उस पर कोई बन्दिश नहीं। और इस तर्क से तो मनुष्य पर इस तरह की बन्दिशें लगाने वाला धर्म आप ही अप्राकृतिक है। और समलैंगिको का अपने स्वभावाविक आकर्षण के प्रति जवाबदारी बरतना प्राकृतिक।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;मैं मानता हूँ कि नैतिकता समाज को स्वस्थ रखने का &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;एक &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;बेहतर आचरण है। पर नैतिकता स्थिर तो नहीं रहती। देश-काल-परिस्थिति के सापेक्ष है। निरन्तर बदलती है।और धार्मिक दृष्टि से तो समलैंगिकता अभी भी अनैतिक है न! उसे अवैध बनाकर समलैंगिकों को निशाना क्यों बनाना चाहता है धार्मिक नेतृत्व? कहीं ये चोर की दाढ़ी में तिनके वाली बात तो नहीं?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;प्रकृति का नियम है जहाँ पानी रोका जाय वहाँ दबाव सबसे तेज़ होता है। साथ ही मैंने अक्सर महसूस किया है कि धर्म और यौनाचार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तंत्र कहता है कि दोनों एक ही ऊर्जा का उपयोग करते हैं। शायद इसीलिए दोनों में ऐसा ज़बरदस्त विरोध है। पर वो दूसरी बहस है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;अंत में इतना ही कहूँगा कि मनुष्य का स्वभाव, सामाजिक और धार्मिक नैतिकता से कहीं जटिल है और प्रकृति के अनन्त भाव मनुष्य के सामाजिक परिपाटियों से कहीं विराट है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI"  style="font-family:Mangal;"&gt;क्या आप जानते हैं कि किशोर डॉल्फ़िन्स वयस्कता पाने के पहले अन्य प्रजातियों के जन्तुओं के साथ यौनाचार के प्रयोग करते हैं?&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3447425639729337005-1574339642978491867?l=nirmal-anand.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/1574339642978491867/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=1574339642978491867" title="9 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/1574339642978491867?v=2" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/1574339642978491867?v=2" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2009/07/blog-post.html" title="एक छिलके में दो गिरियां" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty name="OpenSocialUserId" value="14325834476032618441" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">9</thr:total></entry></feed>
