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<?xml-stylesheet href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/atom10full.xsl" type="text/xsl" media="screen"?><?xml-stylesheet href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css" type="text/css" media="screen"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/"><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005</id><updated>2008-07-19T20:46:58.845+05:30</updated><title type="text">निर्मल-आनन्द</title><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25&amp;redirect=false" /><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/posts/default" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>276</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><link rel="license" type="text/html" href="http://creativecommons.org/licenses/by/2.0/" /><logo>http://creativecommons.org/images/public/somerights20.gif</logo><link rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/nirmal-anand" type="application/atom+xml" /><feedburner:emailServiceId xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">850825</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0">http://www.feedburner.com</feedburner:feedburnerHostname><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-3721563313084796064</id><published>2008-07-16T07:14:00.004+05:30</published><updated>2008-07-16T12:50:42.729+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सोमनाथ" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साम्प्रदायिकता" /><title type="text">सोमनाथ की शुचिता</title><content type="html">मुझे याद आता है कि कुछ महीनों पहले देश में राष्ट्रपति का चुनाव हुआ था और तब माकपा ने कांग्रेस की प्रत्याशी श्रीमती प्रतिभा पाटिल को अपना समर्थन दिया था। उनके विरुद्ध स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में उपराष्ट्रपति और भाजपा के पूर्व नेता श्री भैंरो सिंह शेखावत थे। भाजपा और उनके सभी सहयोगी दलों ने शेखावत जी को जिताने की कोशिश की थी। मगर शिवसेना ने मराठी होने के नाते प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस वक़्त किसी माकपाई ने ये नहीं कहा था कि चूँकि शिव सेना प्रतिभा जी का समर्थन कर रही है इसलिए हम उन्हे मत नहीं देंगे। बंगाल से भी ये आवाज़ नहीं उठी थी। सोमनाथ जी ने स्पीकर के बतौर तब क्या किया था ये तो मैं नहीं जानता लेकिन अभी वो, और माकपा के भीतर अन्य कुछ लोग कह रहे हैं कि साम्राज्यवाद और साम्प्रदायिकता के बीच साम्प्रदायिकता अधिक बड़ा खतरा है। और इसीलिए सोमनाथ बाबू लोकसभा के अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा इसलिए नहीं दे रहे क्योंकि वे भाजपा के साथ वोट नहीं देना चाहते?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका भाजपा-विरोध समझ में आता है.. भाजपा इस देश में हुए बहुत सारे दंगो और साम्प्रदायिक भय के माहौल के लिए ज़िम्मेदार है। पर उनका कांग्रेस-प्रेम नहीं समझ आता.. कांग्रेस भी तो अनेको दंगो को प्रायोजित करने की और देश में साम्प्रदायिक ज़हर घोलने की भूमिका आज़ादी के बाद से लगातार निभाती आ रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर पश्चिम बंगाल में माकपाई और ग़ैर-माकपाई के बीच जो हाय-हत्या होती है वो किस मापदण्ड से साम्प्रदायिकता से कम है? यदि उनकी समझ से साम्प्रदायिकता का अर्थ सिर्फ़ हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य होता हो तो बात अलग है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं यह नहीं कहता कि भाजपा बुरी नहीं है.. पर उसे इस तरह से अस्पृश्य बनाकर व परोक्ष रूप से बाक़ी सभी को पाक होने का प्रमाणपत्र दे देना सही नहीं हैं। ये शुचिता के वैसे ही मानदण्ड है जिन के अनुसार एक ब्राह्मण प्रतिदिन गुदा-प्रक्षालन कर के भी अशुद्ध नहीं होता था मगर एक दूसरा व्यक्ति सिर्फ़ एक जाति विशेष में जन्म लेकर जीवन भर के लिए अस्पृश्य बन जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चित ही ऐसा करने के पीछे सोमनाथ बाबू अपने इस ब्राह्मणवादी पूर्वाग्रह के प्रति सचेत तो नहीं होंगे। उनके इस आग्रह के मूल में जो भी हो उनकी बात मुझे हजम नहीं हुई.. आप को हुई क्या?</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/07/blog-post_16.html" title="सोमनाथ की शुचिता" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=3721563313084796064" title="6 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/3721563313084796064/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/3721563313084796064" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/3721563313084796064" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-8830202162583145912</id><published>2008-07-08T14:29:00.011+05:30</published><updated>2008-07-09T11:02:41.843+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="महाभारत" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="एकता कपूर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सीरियल" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="टीवी" /><title type="text">एकता की महाभारत</title><content type="html">महाभारत की कहानी हर भारतीय के भीतर ऐसी रची-बसी है कि एक सहज उत्सुकता मेरे भीतर भी उमड़ रही थी कि मल्लिका-ए-सीरियल &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ekta_Kapoor"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;एकता कपूर&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;इस महाकाव्य को क्या नया रंग प्रदान करती हैं। कल रात &lt;span style="color:#660000;"&gt;'कहानी हमारे महाभारत की'&lt;/span&gt; का पहला एपीसोड प्रसारित हुआ। पहला नयापन तो उन्होने ये किया कि कहानी को दौपदी के चीरहरण से आरम्भ किया.. और स्त्री के अपमान और विनाश में उसकी भूमिका से जुड़े भारी-भरकम संवादों के ज़रिये कहानी को एक स्त्री-केन्दित झुकाव देने की कोशिश की। चलो ये उनका अपना संस्करण है..ठीक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर इस झुकाव को देने में वो इतना मशग़ूल हो गईं कि उन्होने कथानक से कुछ खटकने वाली आज़ादियाँ ले ली। जैसे कि दुःशासन का यह कहना कि द्रौपदी वो पहली नारी थी जिसके एक से अधिक पति थे। यह बात तथ्यात्मक रूप से ग़लत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन समाज मातृसत्तात्मक समाज था। कुछ मातृसत्तात्मक समुदाय में स्त्रियाँ अपने घरों में अपनी माताओं-बहनों के साथ रहती थी। उनका अपना अलग कमरा होता जहाँ रात्रिकाल में उनके प्रेमी उनके साथ रमण कर सकते थे। ऐसी स्थिति में हर स्त्री के एक से अधिक प्रेमी होते। बच्चे माँ के घर में पैदा होते और वहीं पलते और पुरुष अभिभावक के रूप में मामा को पहचानते। &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mosuo"&gt;चीन में कुछ कबीले&lt;/a&gt; ऐसे हैं जो अभी भी लगभग ऐसे ही सामाजिक नियमों के तहत रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिमाचल और &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Polyandry"&gt;उत्तराखण्ड के पहाड़ों में भी&lt;/a&gt; स्त्रियों द्वारा कई पति रखने की प्रथा रही है। खैर.. एक शुद्ध साबुन बेचने के लिए सीरियल का निर्माण करने वाली निर्मात्री से मैं इतनी उम्मीद रखूँ ये नाजायज़ है। फिर एक दो और छोटी-छोटी चीज़े ऐसी थीं जो खटक गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे दुर्योधन को बताया जाता है कि महारानी श्रृंगार कर रही हैं जबकि मूल महाभारत में द्रौपदी रजस्वला होने के कारण एक वस्त्र में (तत्कालीन नियमों के अधीन) और खुले केशों में अपने शुद्ध होने के दिन की एकांत में प्रतीक्षा कर रही होती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे दु:शासन का हाथ पकड़ कर द्रौपदी को खींचकर लाना मगर द्रौपदी का कहना कि ये दुष्ट मुझे बाल पकड़ कर लाया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे दुःशासन द्वारा द्रौपदी के बाल पकड़ने पर और दुर्योधन के अपनी जंघा ठोंककर द्रौपदी को वहाँ बैठने का आमंत्रण देने पर भीम की दःशासन का सीना चीर कर उसका खून पीने की और दुर्योधन की जंघा तोड़ने की प्रतिज्ञा करना पूरे एपीसोड में ग़ायब रहा। इसी मौक़े पर द्रौपदी ने भी अपने बाल तब तक खुले रखने की प्रतिज्ञा की थी जब तक दुःशासन के रक्त से उन्हे धो न ले.. वह भी अनुपस्थित थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में &lt;a href="http://vinay-patrika.blogspot.com/"&gt;बोधिसत्व&lt;/a&gt; ने, जो इस सीरियल के रिसर्च और स्क्रिप्ट आथेन्टीकेटर हैं, बताया कि ये सिर्फ़ एक झलक था बाद में सब कुछ विस्तार से आएगा। उनकी बात सुनकर मैं आश्वस्त हुआ पर उनका क्या बोधिसत्व जिनके मित्र नहीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एपीसोड के आखिर में लहराती दाढ़ी विहीन &lt;span style="color:#000099;"&gt;मकरन्द देशपाण्डे&lt;/span&gt; महामुनि वेदव्यास के रूप में अवतरित हो कर मुझे चौंका गए.. व्यास के इस नए स्वरूप से अधिक भौचक्का करने वाला महाभारत के महाविनाश पर उनका प्रलाप था। अपनी उस चीखपुकार के कारण वो व्यास कम और धृतराष्ट अधिक लगे। व्यास भी एक चरित्र हैं महाभारत में.. पर प्रलाप उनकी चरित्र की गरिमा के परे है। बोधि भाई के पास इसका कोई उत्तर ज़रूर होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी ये सब छोटी-छोटी बाते हैं तुलसीदास ने राम़चरित मानस लिखते समय रामायण के बहुत से प्रसंगो के साथ आज़ादी ले ली थी। यहाँ तुलसी जैसा कोई आध्यात्मिक उद्देश्य तो किसी की निगाह में नहीं होगा पर व्यापारिक-आर्थिक उद्देश्य तो होगा। और पूरे महाभारत को आधे-आधे घंटे की अवधि की सीमाओं में तोड़ने से लेकर तमाम दूसरी सीमाएं भी होंगी। फिर भी हम शिकायत कर रहे हैं क्योंकि वह नहीं होगी तो भी ठीक नहीं..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और आखिरी शिकायत हमारी द्रौपदी की लाज बचाने के लिए सुदर्शन चक्र के हैलीकॉप्टर की तरह आने और उसमें से उसकी रक्षार्थ साड़ी के रस्सी की तरह लटकने से हुई जो काफ़ी हास्यास्पद था। मैं एकता कपूर के विराट बालाजी प्रोड्क्शन्स से बेहतर स्पेशल इफ़ेक्ट की उम्मीद कर रहा था। क्योंकि जब मैंने पहले—पहल इस सीरियल के ट्रेलर्स देखे तो मैं बहुत प्रभावित हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी की कैलेण्डर आर्ट की अबाध पौराणिक परम्परा को पहली बार एकता कपूर ने तोड़ दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारी-भारी स्वर्ण जटित मुकुट और आभूषणों के भार से धँसे जा रहे तनों को एक सहज स्फूर्तता दे दी एकता ने अपने महाभारत में। जो सच में भारतीय आइकनोग्राफ़ी के लिए एक बड़ा क़दम है। पीटर ब्रूक ने अपनी महाभारत में ऐसा किया था। पर उनकी महाभारत एक एक्सपेरिमेंटल थिएटर था जबकि एकता की महाभारत शुद्ध बाज़ारू कसरत है। भारतीय पौराणिक छवि को वास्तविकता के क़रीब खींच कर उसने ये एक क्रांतिकारी क़दम उठाया है। और इस काम के लिए तो वो सचमुच बधाई की पात्र है।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/07/blog-post_08.html" title="एकता की महाभारत" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=8830202162583145912" title="14 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/8830202162583145912/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/8830202162583145912" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/8830202162583145912" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-404538783916248273</id><published>2008-07-05T18:04:00.005+05:30</published><updated>2008-07-06T06:46:57.295+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सत्संग" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शरीर" /><title type="text">अपना-अपना सत्संग</title><content type="html">ऐसा सुना है कि आदमी को पाँच प्रकार के भोजन की ज़रूरत होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. पृथ्वी तत्व; वह भोजन जो ठोस आकार में हो.. आम तौर पर भोजन के नाम पर हम जो खाते हैं वो सभी इस क़िस्म में गिना जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२. जल तत्व; पीने योग्य जितने भी द्रव्य हमारे भीतर प्रवेश करते हैं वे सभी.. पर मूल तौर पर पानी.. जो जीवन के लिए अनिवार्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३. वायु तत्व; हमारी साँस.. जो निरन्तर चल रही है.. कभी तेज़, कभी धीरे। इस भोजन में ज़रा भी बाधा पड़ते ही हम दम तोड़ देते हैं। दम यानी हवा यानी साँस।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४. अग्नि तत्व; सूर्य का प्रकाश। यह भी हमारे जीवन और स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य तत्व है। सूर्य के प्रकाश से दूर पलने वाले बच्चे ज़िन्दा तो रह जाते हैं पर नितान्त तेजहीन। तेज यानी प्रकाश।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये खुराक  हमारे शरीर के लिए कितनी ज़रूरी है इसको इस बात से ही समझा जा सकता है कि उत्तरी अक्षांशो पर रहने वाले मनुष्य ने अपने त्वचा, केश और आँखों तक में ऐसी व्यवस्था की ताकि कम समय में अधिक से अधिक प्रकाश ग्रहण किया जा सके। जैसे कम रौशनी में हम कैमरे का अपर्चर पूरा खोल देते हैं। वैसे इस की अधिकता घातक भी हो सकती है इसीलिए भूमध्य के पास रहने वाले मनुष्य मेलेनिन बढ़ा कर त्वचा, केश आदि के पोरों से प्रकाश का प्रवेश बंद रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर उपवास आदि में लोग पृथ्वी तत्व से परहेज़ करके अपने भीतर की पार्थिवता को क्षीण कर के तेज को प्रबल करने की कोशिश करते हैं। रोज़े और निर्जल व्रत में लोग जल तत्व से दूर रह कर तेज के और क़रीब जाना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन चार तत्वों के अलावा  पाँचवे प्रकार का भोजन, तत्व की शकल में तो नहीं है पर यदि मान लीजिये कि वो आकाश तत्व है.. तो आप की "क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा" की सूची पूरी हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५. वैसे पाँचवा तत्व साधुगण बताते हैं – सत्संग। महंतो-महात्माओं की भाषा में इसका अर्थ दरी पर बैठकर उनका प्रवचन सुनना होता है। पर यदि इसे व्यापक अर्थ में समझा जाय तो सत्संग का अर्थ अपने जीवन के सामाजिक आयामों को विकसित करना, एक जानवर से इतर अपनी सार्थकता को खोजना और इस विराट ब्रह्माण्ड में अपनी जगह को ठीक-ठीक पहचानना। इस तत्व की खुराक को समझते तो सभी हैं पर सत्संग के नाम पर अलग-अलग और अक्सर विपरीत प्रकृति की सामग्रियों का सेवन करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखिये न ये ब्लॉग लिखना भी एक प्रकार का सत्संग है पर सभी की अपनी-अपनी व्याख्या है।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/07/blog-post_05.html" title="अपना-अपना सत्संग" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=404538783916248273" title="8 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/404538783916248273/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/404538783916248273" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/404538783916248273" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-2690847794673798310</id><published>2008-07-03T19:27:00.004+05:30</published><updated>2008-07-03T19:59:37.686+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शरीर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="स्वास्थ्य" /><title type="text">ग्यारह सबसे हितकारी पदार्थ</title><content type="html">ये इस ग्रह पर मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए ग्यारह सबसे हितकारी पदार्थों की सूची है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. चुकन्दर&lt;br /&gt;२. पत्ता गोभी&lt;br /&gt;३. &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Chard"&gt;स्विस चार्ड्स&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;४. दालचीनी&lt;br /&gt;५. अनार&lt;br /&gt;६. आलू बुखारा&lt;br /&gt;७. कद्दू के बीज&lt;br /&gt;८. &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sardine"&gt;सार्डीन मछली &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;९. हल्दी&lt;br /&gt;१०. &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Blue_berry"&gt;ब्लूबेरीज़&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;११. कद्दू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://well.blogs.nytimes.com/2008/06/30/the-11-best-foods-you-arent-eating/?em&amp;amp;ex=1215144000&amp;amp;en=aae8f317805e7437&amp;amp;ei=5087%0A"&gt;इस साइट पर दी गई इस सूची&lt;/a&gt; के कई पदार्थों में से कुछ का रस निकाल कर, कुछ को सुखा कर और कुछ को फ़्रीज़ करके खाने की सलाह दी गई है.. मेरा मानना है कि यदि उस पदार्थ में कोई लाभकारी पदार्थ है तो उसकी सबसे उत्तम अवस्था उसकी प्राकृतिक अवस्था ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे इस सूची को बहुत गम्भीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है। चूँकि ज्ञान की पश्चिमी शाखा पारम्परिक ज्ञान को नकार कर सब कुछ नई वैज्ञानिक पद्धति से सिद्ध करना चाहती है इसलिए वे अपने निष्कर्षों को बार-बार संशोधित करते चलती है। इसलिए मान कर चलिए कि इस सूची में बराबर संशोधन होता रहेगा। और आयुर्वेद का सिद्धान्त कहता है कि कोई भी पदार्थ सभी व्यक्ति के लिए सभी समय हितकारी नहीं हो सकता। यहाँ तक कि एक व्यक्ति के लिए जो जून में लाभप्रद है वो अक्तूबर में हानिकारक हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी मैं ये सोच कर बड़ा प्रसन्न हूँ कि इन ग्यारह में से छै पदार्थ मेरे नियमित भोजन का हिस्सा हैं। सार्डीन मैं शाकाहारी होने के नाते नहीं खाता और आलू बुखारा मेरी पित्त प्रकृति के विरुद्ध पड़ता है इसलिए नहीं खाता। स्विस चार्ड्स न जाने क्या है.. कभी न देखा न जाना.. &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Chard"&gt;विकी पीडिया&lt;/a&gt; पालक जैसी कोई सब्ज़ी बताता है जो देखने में चौलाई सी लगती है। कद्दू के बीज घर में पड़े हैं.. हफ़्ते में दो-चार खा लेता हूँ। ब्लूबेरीज़ भी भारतीय धरती के लिए दुर्लभ फल है.. इसलिए नहीं प्राप्त होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप देखिए कि आप इन में से किस-किस को अपना भोजन बना रहे हैं। वैसे इस बात से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं वो हानिकारक चीज़ें जो आप खा रहे हैं। इन को खाते रहे और हानिकारक दल को भी .. तो इन का क्या खाक असर होगा?</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/07/blog-post_03.html" title="ग्यारह सबसे हितकारी पदार्थ" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=2690847794673798310" title="6 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/2690847794673798310/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2690847794673798310" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2690847794673798310" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-2467610199868805746</id><published>2008-07-03T09:07:00.005+05:30</published><updated>2008-07-03T09:30:11.933+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साम्प्रदायिकता" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कश्मीर" /><title type="text">दूसरों के आईनों में अपना अक्स</title><content type="html">पाकिस्तान और भारत दोनों देश के लोग कश्मीर के नाम पर सर काटने और कटाने को राजी हैं। मगर साठ सालों की इस खींचतान में कश्मीर के भीतर निहित स्वार्थों के ऐसे गड़हे पैदा हो गए हैं जो इस कश्मीरियों की इस त्रिशंकु अवस्था को कभी सामान्य नहीं होने देंगे। ज़ाहिर तौर पर कश्मीर की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार पर्यटन है पर वास्तव में अब कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर नहीं आतंकवाद के सहारे चल रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आतंकवाद के नाम पर कश्मीर में भारत से और इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान और खाड़ी के देशों से पैसा उड़ेला जा रहा है। और इसी सब के चलते कश्मीर दुनिया के सबसे भ्रष्ट इलाक़ों में तब्दील हो गया है। जो लोग इस पैसे से अपनी रोटी खा रहे हैं वो क्यों चाहेंगे कि पैसा आना बंद हो जाय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कश्मीरी लोगों को इस नरक से छुटकारा मिलना चाहिए। वो जो चाहते हैं उन्हे दिया जाना चाहिए.. भले ही वो पाकिस्तान के साथ मिलना ही क्यों न हो। मेरा मानना है कि वो एक शुद्ध साम्प्रदायिक विकल्प है.. पर यदि वे इसी के पक्ष में है तो ये उनका अधिकार है कि वे इसे चुन सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कम से वे उस दुष्चक्र से तो बाहर निकल सकेंगे.. जो उन्हे बाक़ी दुनिया से अलग साठ साल पहले की बँटवारे की मनःस्थिति में बराबर बनाए रखे हुए है। आज जब कि पूरी दुनिया में देश और राष्ट्र जैसी अवधारणाएं धीरे-धीरे बेमानी होती जा रही हैं.. कश्मीर अपनी राष्ट्रीयता को लकर जूझा हुआ है जिसका आधार मुख्य तौर पर साम्प्रदायिक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी ख्वाहिश है कि उनकी समस्या का जल्द से जल्द समाधान हो ताकि वे अपने असुरक्षा-जनित चिन्तन से मुक्त हो सकें। पर दुख है कि ऐसा होने की ज़मीनी हालात अभी तो नहीं दिख रहे.. दिख तो बस इतना रहा है पर अब कश्मीर के किरदार के नाम पर राजनीति घाटी के अन्दर ही नहीं उसके बाहर भी शुरु हो गई है। जम्मू तो जल ही रहा है.. अब भाजपा और विहिप ने देशव्यापी बन्द के ऐलान के साथ दूसरी भी धमकियाँ दे डाली हैं। जैसे कि वो अजमेर में आने वाले श्रद्धालुओं का रस्ता रोकेंगे। और हज के लिए दी जाने वाली सब्सिडी का विरोध करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा और विहिप बार-बार हिन्दुओं को किसी दूसरे के सन्दर्भ में ही परिभाषित होने के लिए क्यों  प्रेरित करते हैं? क्यों? क्या हिन्दुओं का अपना कोई स्वभाव, किरदार, मूल्य-विधान नहीं है? या असल में हिन्दू नाम का कोई समुदाय है ही नहीं? मध्यकाल में भारत की विविध सामुदायिक पहचानों से अपरिचित टिप्पणीकारों ने ग़ैर-मुस्लिम समुदायों को एक नाम -हिन्दू- देकर सहूलियत का दामन पकड़ा। और तब से आज तक हिन्दू की परिभाषा गैर-मुस्लिम के अर्थ में ही चली आ रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या इस का अर्थ यह लिया जाय कि हिन्दू नाम से राजनीति करने वाले ये दल आम गैर-मुस्लिम व्यक्ति को मध्यकाल की मानसिक सींखचो में ही क़ैद रखना चाहते हैं। और वो भी वास्तविक नहीं प्रकल्पित सींखचे! क्योंकि इतिहास की जो साम्प्रदायिक व्याख्या वे पेश करते हैं वो सबूतों पर नहीं खामख्याली पर खड़ी है।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/07/blog-post.html" title="दूसरों के आईनों में अपना अक्स" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=2467610199868805746" title="1 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/2467610199868805746/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2467610199868805746" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2467610199868805746" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-5763732763742643421</id><published>2008-06-30T09:21:00.010+05:30</published><updated>2008-06-30T11:33:10.535+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ब्लॉगर्स मीट" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बाज़ार" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सुपरसाइज़ मी" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="मैक्क्डोनाल्ड्स" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="शहर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="अफ़लातून" /><title type="text">अगली बार कहीं और मिला जाय!</title><content type="html">आजकल के शहरी बच्चे मैक्डोनाल्ड्स के बर्गर के प्रति इस तरह समर्पित होते हैं जैसे हमारे समय के बच्चे कैथे और चूरन के प्रति लालायित रहते थे। निश्चित ही चूरन और कैथा उन बच्चो के लिए कोई बाल जीवन घुट्टी नहीं था और मैक्डोनाल्ड्स के बर्गर्स और फ़्रेन्च फ़्राईस भी आज के बच्चे के लिए वाईटेमिन्स की गोलियाँ नहीं हैं। फ़्री मार्केट की पक्षधर हमारी सरकार इस ‘स्वादिष्ट’ सत्य के प्रति आँख मूँदे पड़ी है जो हमारे लोगों के स्वास्थ्य में लगातार सेंध लगा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी मसले पर एक अमरीकी नागरिक ने एक फ़िल्म का निर्माण किया- &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Super_Size_Me"&gt;सुपरसाइज़ मी!&lt;/a&gt; यह नाम मैक्डोनाल्ड्स के सुपरसाइज़ बरगर्स से प्रेरित है जिसे पहली बार खाकर फ़िल्म के नायक और निर्माता-निर्देशक &lt;span style="color:#000099;"&gt;मॉर्गन स्परलॉक&lt;/span&gt; उलटी कर देते हैं। वो बात अलग है कि शीघ्र ही उनका शरीर इस मात्रा के लिए लचीला रुख अख्तियार कर लेता है। और फिर उन तीस दिनों में उनके शरीर की क्या दुर्दशा होती है जिस दौरान वे सिर्फ़ और सिर्फ़ मैक्डोनाल्ड्स के आउटलेट्स से मिलने वाली सामग्री से ही अपनी शरीर की खाद्य आपूर्ति कर रहे थे इसे आप फ़िल्म देखकर &lt;a href="http://freedocumentaries.org/film.php?id=98"&gt;यहाँ से&lt;/a&gt; जानिये। &lt;a href="http://freedocumentaries.org/"&gt;यहाँ पर&lt;/a&gt; आप कई दूसरी डॉक्यूमेन्टरीज़ भी देख सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फ़िल्म की खबर मुझे &lt;a href="http://samatavadi.wordpress.com/"&gt;भाई अफ़लातून&lt;/a&gt; से हुई जब वे अपनी पत्नी स्वाति जी समेत मुम्बई पधारे। वे दोनों गुजरात के एक प्राकृतिक स्पा से स्वास्थ्यलाभ कर के लौट रहे थे। आठ दिन की उस अवधि में उन दोनों का वजन साढ़े पाँच किलो कम हो गया। इसी सन्दर्भ में &lt;a href="http://surabesura.blogspot.com/2008/06/blog-post_27.html"&gt;इस फ़िल्म&lt;/a&gt; का भी ज़िक्र आया। मित्रों को याद होगा कि पिछले दिनों अफ़लातून भाई की तबियत कुछ नासाज़ थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफ़लातून जी के साक्षात दर्शन हम सब ने पहले दफ़े गोरेगाँव पूर्व के जावा ग्राइण्ड कैफ़े में तारीख २२ जून को किये। इस अवसर पर &lt;span style="color:#660000;"&gt;अनिल रघुराज&lt;/span&gt;, &lt;span style="color:#660000;"&gt;प्रमोद सिंह&lt;/span&gt;, &lt;span style="color:#660000;"&gt;विमल वर्मा, बोधिसत्व, शशि सिंह, हर्षवर्धन&lt;/span&gt;, और &lt;span style="color:#660000;"&gt;विकास&lt;/span&gt; मौजूद थे। और मैं तो था ही। लगभग चार घण्टे तक चली इस मुलाक़ात में तमाम आर्थिक, राजनैतिक और ब्लॉगिक मुद्दो पर खूब विचार-विमर्श हुआ। अफ़लातून भाई तो अपने फ़ितरत के अनुसार मजमा लगाने लग पड़े ही थे मगर स्वाति जी उन्हे खींच के ले गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाति जी जिन से हमारा अन्तजालीय परिचय भी नहीं था.. उनसे मिलना भी हमारे लिए एक ‘स्टिमुलेटिंग एक्सपीरिंयस’ रहा और वे भी हमसे मिलकर ‘बोर’ नहीं हुई जैसा कि उन्हे अन्देशा था। तस्वीरें शशि सिंह ने खींची और पी गई कॉफ़ियों का आधा बिल विकास ने भरा जिनकी जेब नई नौकरी की पगार से गर्म थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;embed pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" src="http://picasaweb.google.com/s/c/bin/slideshow.swf" width="400" height="267" type="application/x-shockwave-flash" flashvars="host=picasaweb.google.com&amp;amp;RGB=0x000000&amp;amp;feed=http%3A%2F%2Fpicasaweb.google.com%2Fdata%2Ffeed%2Fapi%2Fuser%2Fabhaytri%2Falbumid%2F5217356330583716817%3Fkind%3Dphoto%26alt%3Drss"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफ़लातून भाई के सम्मान में हम इकट्ठा हुए और इसी बहाने हम सब की बड़े दिनों बाद एक दूसरे से भी मुलाक़ात हुई, वरना कहाँ मिलना हो पाता है। इस मुलाक़ात का ढीला पहलू सिर्फ़ मिलन-स्थल जावा ग्राइण्ड ही रहा जो अपने संगीत से हमें थकाता रहा और उसी माहौल से हमें दबाता रहा जिसकी चर्चा हम सारे समय करते रहे! तय हुआ कि अगली दफ़े कहीं और मिला जाय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परेशानी की बात यही है कि बाज़ार ने सारी सार्वजनिक जगहों पर क़ब्ज़ा कर लिया है (यहाँ तक कि बचे-खुचे सार्वजनिक पार्कों को भी निजी हाथों में धकेला जा रहा है) और उन्हे ऐसी जगहों मे तब्दील कर दिया है जो आप के मन-मानस को सिर्फ़ एक उपभोक्ता के बौने स्वरूप में सीमित कर देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैक्डोनाल्ड्स की बड़ी सफ़लता के पीछे एक राज़ यह भी है बच्चों के खेलने के मैदान शहरों में से बिला गए हैं और मैक्डोनाल्ड्स के प्रांगण में फ़्री प्ले-स्टेशन्स उग आए हैं। ये हाल अमरीका का है जहाँ की आधी से ज़्यादा आबादी इन्ही प्लेस्टेशन्स की छाया में ओवरवेट या ओबीस हो चुकी है और हमारे दलाल नेता और मक्कार अफ़रशाहों की बेईमानी के चलते यही हाल हिन्दुस्तान का भी होने जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा नज़ारा होगा.. एक तरफ़ गाँवों में किसान अपने गले में रस्सी कस रहा होगा और शहरों का मध्यवर्ग कमर की पेटी ढीली पर ढीली कर रहा होगा!</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/06/blog-post_30.html" title="अगली बार कहीं और मिला जाय!" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=5763732763742643421" title="11 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/5763732763742643421/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/5763732763742643421" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/5763732763742643421" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-2184834220926365251</id><published>2008-06-29T08:16:00.007+05:30</published><updated>2008-07-09T11:01:17.868+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="साम्प्रदायिकता" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कश्मीर" /><title type="text">कश्मीरी घड़ी की अटकी सुईयाँ</title><content type="html">&lt;p&gt;&lt;br /&gt;कश्मीर में पीडीपी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। वैसे तो तीन महीने बाद यूँ भी चुनाव होने ही थे मगर जिन हालात में ये कदम उठाया गया है वह बेहद शर्मनाक है। कहा जा रहा है कि नब्बे के उबलते हुए दिनो के बाद से कश्मीर घाटी की ये सबसे बुरी दशा है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सारा मामला तब शुरु हुआ जब सरकार ने वन-विभाग की भूमि को अमरनाथ धाम के बढ़ते तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए आवंटित कर दिया ताकि उनके रहने आदि का अस्थायी इंतज़ाम हो सके। भयानक विस्मृति के इस दौर में भी मुझे याद है कि अभी कुछ रोज़ पहले ही अमरनाथ यात्रियों की अप्रत्याशित भीड़ में दुर्घटनाओं के चलते यात्रा में बाधाएं उपस्थित हो गई थी और अव्यवस्था फैल गई थी। शायद ऐसी ही किसी अव्यवस्था से निजात पाने के लिए कश्मीर की राज्य सरकार ने ये फ़ैसला किया होगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शीघ्र ही पर्यावरण के सजग प्रहरियों ने इस फ़ैसले का विरोध किया जिस से ये मामला आम रौशनी में आ गया और पलक झपकते ही कश्मीर के नौजवान सड़को पर उतर आए और इस फ़ैसले को वापस लेने की माँग करने लगे। उनका आरोप है कि ये असल में एक साज़िश है कश्मीर में हिन्दुओं को बसा कर मुसलमानों को अल्पसंख्यक तबक़े में बदल देने की। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जब मैंने पहले ये खबर सुनी तो मैं इस आरोप की मूर्खता से सन्न रह गया। और कश्मीर के नौजवानों के मानसिक क्षमता का सोचकर एक बार फिर सन्न रह गया। आज भी कश्मीरियों की आय का मुख्य स्रोत पर्यटन ही है और वे उसी स्रोत की जड़ में माठा डाल रहे हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं नहीं जानता कि हुर्रियत का इस बेसिरपैर के चिंतन में कितना योगदान है पर वो इस मामले को पूरी तरह से भुनाने में लगी हुई है। परिपक्व राजनेता की छवि रखने वाले मीरवाइज़ उमर फ़ारुख कल टीवी पर इस फ़ैसले की वापसी की माँग करते दिखे.. पर एक लफ़्ज़ भी अपनी जनता की मूर्खतापूर्ण सोच का धुआँ छाँटने में ज़ाया उन्होने नहीं किया। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पीडीपी के राजनैतिक अवसरवादिता पर मुझे कोई शक़ नहीं था। कश्मीर मंत्रिमण्डल के भूमि-आवंटन के इस फ़ैसले पर पीडीपी के भी मंत्रियों के दस्तखत थे और अब उन्होने ही सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। एक ऐसे आदमी की पार्टी से आप उम्मीद ही क्या कर सकते थे जो सक्रिय राजनीति से लगभग सन्यास ले चुकने के बाद अचानक सत्तालोभ में अपनी बेटी को पीछे धकेल कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर चढ़ जाता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज जबकि बाक़ी दुनिया पर्यावरण के गहराते संकट के प्रति जाग रही है कश्मीर की अवाम एक वन-संरक्षण के मुद्दे को भी साम्प्रदायिक रंग में रंग कर अपनी हुर्रियत उसमें खंगाल रही है। कश्मीर का अध्याय एक के बाद एक न जाने कितनी ही भयानक भूलों के दुखद पन्नो से भरा हुआ है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे कश्मीरी पंडित मित्र बताते हैं कि नवासी-नब्बे के सालों में घाटी में पन्डितों को मार देने की और उनकी औरतों को रख लेने की धमकियों का बाज़ार गर्म था। पण्डित वहाँ से अपना घर छोड़कर तभी भागे जब वाक़ई हत्याओं का सिलसिला चल पड़ा। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब कश्मीर को हिन्दुओं से खाली कर देने का उत्साह था और आज कश्मीर में हिन्दुओं के भर जाने का भय। दोनों ही भाव शुद्ध साम्प्रदायिक हैं.. मानो उन्हे आज़ादी हिन्दुस्तान से नहीं हिन्दुओं से चाहिये हो! इसी साम्प्रदायिकता के चलते कश्मीर के हुर्रियत आन्दोलन को भारतीय मुसलमान से कभी रत्ती भर भी समर्थन नहीं मिला और न मिलने की उम्मीद है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसा लगता है जैसे कश्मीर सन ४७ के भयानक साम्प्रदायिक हादसों से कभी उबरा ही नहीं। पूरी दुनिया कहाँ से कहाँ जाती जा रही है.. पर कश्मीर उसी बँटवारे के उलझाव में फँसा पड़ा है। जैसे कश्मीर में घड़ियों को लकवा मार गया हो। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज फिर कश्मीर की सड़कों पर पाकिस्तान-पाकिस्तान के नारे लग रहे हैं और हम उन्हे टीवी पर देखकर कुढ़ रहे हैं। वे लोग जो हमारे साथ हमारे देश का हिस्सा होना ही नहीं चाहते उन्हे ज़बरदस्ती अपने साथ घसीटने का ‘सुख’ झेल रहे हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं तो कहता हूँ दे दो इन लोगों को पाकिस्तान.. ऐसे लोगों को अपने साथ रखने का लाभ ही क्या। मगर मैं कौन हूँ और मेरी कौन सुनता है। ये राज्यसत्ता का अधिकारक्षेत्र है- और राज्यसत्ता के लिए लोग नहीं राज्य और सत्ता महत्वपूर्ण होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/06/blog-post_29.html" title="कश्मीरी घड़ी की अटकी सुईयाँ" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=2184834220926365251" title="2 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/2184834220926365251/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2184834220926365251" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2184834220926365251" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-2110407219103188745</id><published>2008-06-19T19:17:00.007+05:30</published><updated>2008-06-19T23:41:45.876+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दलित" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="इतिहास" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कुलीनता" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><title type="text">कुलीनता का भौकाल</title><content type="html">गोरेगाँव में एक आदमी तपड़िया दिया गया। ये आदमी मैं भी हो सकता था.. अच्छा हुआ मैं नहीं था। जुर्म उसका बस इतना था कि हमारी राजमाता श्रीमती सोनिया गाँधी को काला झण्डा दिखाने की कोशिश की थी। विरोध-प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार के इस मामले में स्थानीय राजनीति की खींचतान और बढ़ती हुई असहिष्णुता के अलावा एक और अहम पहलू है- वो है कुलीनता का भौकाल। कुलीन रक्त का सम्मान करना दुनिया भर में आम चलन रहा है और हिन्दुस्तान में इसका एक इतिहास है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नादिर शाह खानदाने तैमूरी के इतने भौकाल में था कि दिल्ली में क़त्ले आम करने के बावजूद उसे मुहम्मद शाह जैसे अय्याश को हाथ लगाने की हिम्मत तक नहीं हुई। नादिर ने कोहिनूर लिया.. तख्ते ताऊस लिया.. दिल्ली के अमीरो-उमरा की खूबसरत लड़कियाँ लीं.. दिल्ली के शहरियों के तन से कपड़े तक उतार लिए .. पर मुहम्मद शाह को गद्दी को हाथ तक नहीं लगाया.. उलटे उस के साथ पगड़ी बदल कर उसे अपनी बराबरी का दरजा दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहमद शाह अब्दाली ने भी आलमगीर द्वितीय के साथ ऐसा ही व्यवहार किया.. जबकि मुल्क के अमीरों ने आलमगीर द्वितीय के लाल क़िले में रहते-रहते अब्दाली के नाम खुत्बा पढ़वा दिया था.. और मुल्लाओं तक ने चूँ नहीं की.. फिर भी उदार-हृदय अब्दाली ने आलमगीर को उनका मुल्क वापस कर दिया.. आखिर वे अकबर और औरंगज़ेब के फ़रज़ंद थे। दो महीने तक दिल्ली से मथुरा तक सरकटी लाशें सड़कों पर सड़ती रहीं.. आबरुएं लुटती रहीं.. पर खानदाने मुग़लिया की शान में गुस्ताखी की एक आँख तक नहीं उठी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईरानी और अफ़्गानी तो छोड़िये अपने रैशनल अंग्रेज़ भी इस राजसी पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं थे। बक्सर की लड़ाई के बाद और उसके पहले भी जब शाह आलम शिकस्तज़दा हो गए तो उनके सरदारों का तो वही हाल हुआ जो पराजितों का होता आया है मगर ज़िलावतन बादशाह को पूरी इज़्ज़त और बादशाही शान-बान से ले जाके इलाहाबाद में स्थापित किया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ तक मराठे भी बादशाह को बराबर इज़्ज़त बख्शते आए। १७६० में दिल्ली जब भाऊ के क़ब्ज़े में थी और भाऊ की जेब बिलकुल खाली। उन्होने लुटी-पिटी दिल्ली को बहुत निचोड़ा और फिर भी जब कुछ हाथ नहीं आया तो भी उन्होने दबी हुई दौलत की तलाश में लाल क़िले के ज़नानखाने की तरह एक क़दम तक नहीं रखा.. हाँ दीवानेखास की छत से चाँदी ज़रूर उतार ली। बाद में जब ग़ुलाम क़ादिर खान ने शाह आलम को अंधा कर दिया तो इस अक्षम्य अपराध का बदला भी मराठों ने ही लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब मामलों में सियासत का भी एक पहलू है मगर इस सोच की जड़े सियासत के अलावा कहीं और भी हैं। खानदान के ऊँचे गुणों की ‘खून’ के ज़रिये निरन्तरता या आनुवंशिकी पर एक अंधविश्वास इस पूर्वाग्रह की ज़मीन है। इसी सोच से सवर्ण और सय्यद पूज्य हो जाते हैं और राजे-महाराजे ईश्वर का अवतार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण क्या ऐसे ही विष्णु के अवतार बने और पाँच पाण्डव देवपुत्र? शम्बूक इसीलिए तो मारा गया क्यों कि उसका पिता शूद्र था और उसका खून तपस्या के योग्य नहीं था। इस देश में गाँधी-परिवार में श्रद्धा क्या उसी पूर्वाग्रह का परिणाम नहीं है जो एक को पूज्य और दूसरे को दलित बनाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारे कांग्रेसी चरम अवसरवादिता में आम जनों की इस सोच का ही चुनावी लाभ उठाना चाहते हैं और साथ में मुलम्मा दलित-उत्थान का पहनाना चाहते हैं। अंग्रेज़ी में इस &lt;a href="http://dictionary.reference.com/browse/oxymoron"&gt;ऑक्सीमोरॉन&lt;/a&gt; कहते हैं। इसीलिए हम एक तरफ़ तो सोनिया जी के चरणों में बिछे रहते हैं और दूसरी तरफ़ एक काले झण्डे वाले को भी टीप मार-मार कर मिटा देना चाहते हैं- जैसे कभी चार्वाक को ब्राह्मणों ने अपनी हुंकार से दमित कर दिया था।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/06/blog-post_19.html" title="कुलीनता का भौकाल" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=2110407219103188745" title="10 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/2110407219103188745/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2110407219103188745" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/2110407219103188745" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-7051956618663720397</id><published>2008-06-14T08:56:00.005+05:30</published><updated>2008-06-14T09:16:31.485+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आमिर" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="फ़िल्म" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समर २००७" /><title type="text">अधिक से अधिक एक भावुक छाप!</title><content type="html">पिछले सात दिनों में मैंने दो नई हिन्दी फ़िल्में देखी- आमिर और समर २००७। एकदम अलग-अलग तबियत की दो फ़िल्में। &lt;a href="http://chavannichap.blogspot.com/2008/06/blog-post_7243.html"&gt;आमिर&lt;/a&gt; की विशेषता यह है कि वो एक परिस्थिति में फँसे आदमी के चंद घण्टों का बयान है जबकि समर २००७ एक पूरे देश की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था, तमाम लोगों की ज़िन्दगी और तमाम मौतों में गहरे रची-बसी एक लम्बी कहानी है। दोनों ही फ़िल्में पिटी हुई मुम्बईया लीक से हटकर बनाई गई हैं.. फिर भी दोनों फ़िल्में एक दूसरे से बहुत जुदा हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमिर य़ूटीवी और अनुराग कश्यप के साझे निर्माण से उपजी फ़िल्म है। फ़िल्म में अनुराग का क्रेडिट भी क्रिएटिव प्रोड्यूसर है। अगर वो क्रेडिट न भी होता तो भी आमिर के फ़िल्मांकन में मुम्बई की गन्द भरी गलियों की वो जीवन्त छाप मौजूद है जिसे ब्लैक फ़्राईडे और नो स्मोकिंग के बाद शायद अनुराग कश्यप का खास फ़न समझा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म का कथानक पूरा-पूरा &lt;a href="http://www.imdb.com/title/tt0428303/"&gt;फ़िलीपीनो फ़िल्म कैविते&lt;/a&gt; से उधार लिया गया है.. बिना आभार। आमिर के परिवार को बंधक बनाकर एक मुस्लिम आतंकवादी दल उसे अपने इशारों पर नचा रहा है- एक आतंकी कार्रवाई के लिए। इस बहाने से आप आमिर का तनाव झेलते हुए मुम्बई की गंद के दर्शन करते हैं और मुस्लिम समाज की मुश्किलों को भी याद कर लेते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक थ्रिलर के बतौर फ़िल्म कामयाब है ऐसा कहना कठिन है। बमुश्किल ९० मिनट की होने के बावजूद अंत तक आते-आते फ़िल्म थकाने लगती है। कुछ भी नया कहने को नहीं है और बात वही है कि एक मामूली सी बात का बहुत प्रचार किया जा रहा है। सारे चरित्र एकाश्मी हैं और एक ही सुर में बतियाते नज़र आते हैं। ये तरक़ीब फ़िल्म को एक मूड ज़रूर प्रदान करती है मगर फ़िल्म के कथ्य को गाढ़ा करने में जो मदद भरे-पूरे चरित्रों से मिल सकती थी वो मौका खो देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलोचकगण इस फ़िल्म की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा कर रहे हैं पर मुझे लगता है कि भारतीय सामाजिक परिस्थितियों के नज़रिये से ये कहानी पूरी तरह उपयुक्त नहीं है। फ़िल्म एक स्टाइलिश फ़्लिक के बतौर बस ठीक-ठाक है और प्रगतिशील संदेश तो आधा-अधूरा और कमज़ोर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म बनाने के इस तरीक़े के उलट खड़ी है &lt;a href="http://chavannichap.blogspot.com/2008/06/2007.html"&gt;समर २००७&lt;/a&gt;- निर्देशक सुहैल तातारी की पहली फ़िल्म। जिसमें किसी फ़िल्म से कोई प्रेरणा नहीं ली गई है.. फ़िल्म हमारे देश की उस सच्चाई को सामने लाने की कोशिश है जिसके चलते शहर और गाँव का सम्पर्क, संवाद और नाता सब टूट चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसानों द्वारा की जा रही लगातार आत्म-हत्याएं, हमारी लड़खड़ाती कृषि व्यवस्था (जिसमें सिर्फ़ अर्थ ही नहीं समाज भी शामिल होता है) और इस तरह से पैदा होने वाले महासंकट से शहरी जनता को आगाह करने के लिए फ़िल्म के निर्देशक और लेखक ने एक सम्पन्न शहरी युवा मित्र मण्डली के ज़रिये गाँव की दुनिया में उतरने की हिम्मत दिखाई है। यह कोशिश इतने साहस और निष्ठा से उपजी है कि इसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिक़्क़्त की बात यह है कि फ़िल्म अकेले साहस और निष्ठा के सहारे नहीं बनती और नहीं चलती। फ़िल्म अन्ततः एक मनोरंजन का ज़रिया है.. दर्शक के दिल को अरझाये बिना आप कुछ हासिल नहीं कर सकते भले ही आप की नीयत कितनी भी नेक क्यों न हो। ऐसा ही कुछ हादसा समर २००७ के साथ हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे फ़िल्म दोनों मोर्चों पर कमज़ोर पड़ती नज़र आई- न तो वो शहरी युवाओं की स्टाइलिश बेफ़िक्री को ढंग से पकड़ पाई और न ही गाँव की बेडौल चिन्ताओं को। स्टाइल का तो फ़िल्म में अभाव है ही.. फिर कहीं स्क्रिप्ट कमज़ोर पड़ती है तो कहीं निर्देशन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजट की सीमाओं समझी जा सकती हैं पर फ़िल्म की अवधि को भी हदों में रखा गया होता तो बेहतर होता। उत्तरार्ध में तो फ़िल्म दर्दनाक तरह से धीमी और लम्बी हो जाती है। दर्शक के पौने तीन घण्टे लेने के बावजूद फ़िल्म उसे एक भी किसान से परिचित कराने में चूक जाती है और न जाने क्यों अपने सरोकार को शहरी युवा के भीतरी बदलाव तक ही महदूद रखती है। और अंत तक पहुँचते-पहुँचते पूरी तरह विश्वसनीयता भी खो देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद समर २००७ वास्तविकता के अधिक क़रीब है फिर भी आमिर जैसी फ़िल्म दर्शक पर अपना प्रभाव छोड़ने में कहीं अधिक सफल हैं। कोई भी फ़िल्म भौतिक वास्तविकताओं को बदल नहीं सकती.. अधिक से अधिक उस के प्रति एक भावुक छाप छोड़ सकती है। असली बदलाव सत्ता के अधिग्रहण से ही आता है। बाक़ी सब उसकी तैयारी है।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/06/blog-post_14.html" title="अधिक से अधिक एक भावुक छाप!" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=7051956618663720397" title="5 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/7051956618663720397/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/7051956618663720397" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/7051956618663720397" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-6640607991619871190</id><published>2008-06-13T12:43:00.003+05:30</published><updated>2008-06-13T12:54:05.496+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आरुषि" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नार्को टेस्ट" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="ट्रुथ सीरम" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="हिंसा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="आज़ादी" /><title type="text">ट्रुथ सीरम का ट्रुथ</title><content type="html">&lt;div&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_3Daz3CsJg_0/SFIfJLoXETI/AAAAAAAABKs/Z119PmLb2M0/s1600-h/Truth_Serum.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5211261961422442802" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_3Daz3CsJg_0/SFIfJLoXETI/AAAAAAAABKs/Z119PmLb2M0/s320/Truth_Serum.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आजकल आरुषि हत्या काण्ड (जिसमें हेमराज नाम का शख्स भी मारा गया) की तफ़्तीश में सी.बी.आई डॉक्टर तलवार के कम्पाउण्डर कृष्णा के ज़रिये केस सॉल्व करने की जीतोड़ कोशिश में लगी हुई है। इस कोशिश में कृष्णा को किस तरह की हिरासत में कितने दिन से रखा जा रहा है इसका पता ठीक-ठीक नहीं चल सका है। कुछ सूत्रों का कहना है कि उसकी गिरफ़्तारी भी नहीं हुई है। मैंने भी सी बी आई के निदेशक को टी वी पर एक बयान देते हुए सुना कि वे नार्को टेस्ट करने के लिए कृष्णा को उसकी इजाज़त से बेंगालूरू ले जा रहे हैं। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;ये अलग बात है कि कृष्णा के घरवाले हाय-तोबा मचा रहे हैं कि न जाने कितने रोज़ से कृष्णा घर नहीं लौटा है। वैसे एक सच्चा देशभक्त होने के नाते मैं उनकी इन बातों पर कान नहीं देता.. आखिर सी बी आई एक सम्मानित केन्द्रीय संस्था है वो कोई अवैध काम करेगी ये कोई सोच भी कैसे सकता है.. उसका तो काम ही अवैध अपराधिक गतिविधियों की जाँच करना है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;इसी जाँच के सिलसिले में कृष्णा के तीन लाई-डिटेक्टर टेस्ट हुए और फिर बेंगालूरू में नार्को टेस्ट। अभी-अभी खबर आई है कि कृष्णा के दूसरे नार्को टेस्ट की भी सम्भावना है? अब वो होगा या नहीं वो तो भविष्य में देखेंगे मगर मुझे जिज्ञासा हुई कि होती क्या है यह बला? &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Truth_serum"&gt;अन्तरजाल से ही पता &lt;/a&gt;चला कि ट्रुथ सीरम या सोडियम पेन्टाथॉल नाम की ये दवा गन्धहीन स्वादहीन और लगभग प्रभावहीन है.. इसका एक मात्र प्रभाव फ़िसलती हुई ज़ुबान ही है। ये एक तरह का अनेस्थेटिक है जिसे सर्जरी के वक़्त इस्तेमाल किया जाता है। &lt;a href="http://www.psicologia.freeservers.com/diversos/soro_verdade.html"&gt;जंगली जानवरों को&lt;/a&gt; क़ाबू में करने के लिए भी ये दवा ट्रान्क्वेलाइज़र के बतौर प्रयोग की जाती है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;आदमी के ऊपर नार्को टेस्ट की दवा का असर खत्म होने के बाद  व्यक्ति को जिह्वा-स्वातंत्र्य के इस अनुभव की कोई स्मृति नहीं रहती। लोगों की ज़ुबान खुलवाने का यह तरीक़ा रूसी गुप्तचर संस्था केजीबी ने ईजाद किया था जिसका लाभ आगे चलकर सीआईए ने भी उठाया। फ़िलहाल ये अन्तराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार प्रतिबंधित है। अमरीका ने ग्वान्टानामो बे में क़ैद लोगों का अपराध सिद्ध करने के लिए भी इसके इस्तेमाल नहीं किया है.. कम से कम ऐसा घोषित तो नहीं किया है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;फिर इस सीरम की उपयोगिता पर भी बड़ा प्रश्न चिह्न है क्योंकि ये सीरम सिर्फ़ हिचक तोड़कर ज़ुबान को खोलता है पर उस ज़ुबान से सत्य ही निकलेगा इसे पक्का नहीं करता। दवा के प्रभाव में आदमी ज़ुबान पर से अपने बन्धन उठा लेता है मगर नियंत्रण नहीं खोता और भड़भड़ा कर सब कुछ नहीं बकने लगता। अगर वो सच को छिपाना चाहेगा तो छिपा ले जाएगा। मुझे याद है कि तेलगी के नार्को टेस्ट में उसने कोई ऐसी बात नहीं बोली जिस से वो या कोई दूसरा बड़ा आदमी फँस सकता था। &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;इसके अलावा ये नार्को टेस्ट व्यक्ति के मूलभूत अधिकारों का कितना अतिक्रमण करता है यह और भी बड़ा प्रश्न है। आखिर मार-पीट कर किसी से अपराध उगलवाने से कितना अलग है यह? हो सकता है कुछ बन्धुओं को लगे कि इसे प्रताड़ना की कोटि में नहीं रखा जा सकता और यह तरीक़ा न्यायोचित है। हो सकता है.. लोग तरह-तरह से सोचते हैं। कुछ लोग ऐसे भी तो हैं जो दंगो के दौरान मर्दों का पैजामा उतार कर सत्य की परीक्षा करने को भी उचित समझते हैं। &lt;/div&gt;</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/06/blog-post_13.html" title="ट्रुथ सीरम का ट्रुथ" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=6640607991619871190" title="4 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/6640607991619871190/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/6640607991619871190" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/6640607991619871190" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-4726793587631168727</id><published>2008-06-03T09:37:00.007+05:30</published><updated>2008-06-03T10:26:41.376+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सेज़" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="भूमि अधिग्रह" /><title type="text">सीधी हो रही हैं सेज़ की सलवटें!</title><content type="html">जिसका डर था वो हो ही गया.. देश का मीडिया क्रिकेट, बौलीवुड और आपराधिक सनसनी के साथ हमारी आँखों में धूल झोंकता रहा और किसी को पता नहीं चला कि सेज़ के लिए ज़मीन हथियाने के लिए देश की संसद में बैठे पैसे वालों के दलालों ने चुपचाप एक क़ानून का मसविदा तैयार कर लिया जो सेज़ (एस ई ज़ेड यानी स्पेशल एकोनोमिक ज़ोन्स) के लिए ग़रीब लोगों की ज़मीन अधिग्रहण की प्रकिया को आसान बना देगा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह क़ानून १८९४ के भूमि अधिग्रहण अधिनियम में संशोधन कर के बनाया जाएगा। फ़िलहाल ये बिल की अवस्था में है पर इतना तय है कि जब इसे संसद में सर्वसम्मति से पारित किया जाएगा तो किसी को इसकी हवा भी नहीं लगेगी। मीडिया वही ग्लमैर और सनसनी परोस रहा होगा, ब्लौग पर बन्धुगण खास ब्लौगीय क़िस्म की सरगर्मियों में तप रहे होंगे और संसद में..? वहाँ कोई नारेबाज़ी नहीं होगी, कोई वौक आउट नहीं होगा.. एक क़लम भी अध्यक्ष या किसी दूसरे सांसद की तरफ़ नहीं फेंकी जाएगी। क्यों? इस से किस पार्टी का क्या बिगड़ता है..? कांग्रेस और भाजपा से लेकर माकपा तक सेज़ के समर्थन में हैं और ये बिल तो सिर्फ़ सेज़ की सलवटों को निकालने के लिए भर है। (तृणमूल कांग्रेस ज़रूर अपनी फ़ौरी ज़रूरतों के लिहाज़ से कुछ विरोध का ड्रामा कर सकती है)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल के विवरण में जाने से पहले ज़रा इस पर ग़ौर कीजिये कि १८९४ का क़ानून २००८ में बदला जा रहा है.. वो भी तब जबकि देश के धनिक वर्ग को तक़लीफ़ आन पड़ी है.. जब तक आदिवासी और अन्य ग्रामीण जन बार-बार इधर से उधर धकेले जा रहे थे तब तक किसी को क़ानून बदलने की याद नहीं आई? आज़ादी के रणबांकुरों ने देश की बागडोर अपने हाथ में लेने के बाद अंग्रेज़ों के दमनकारी क़ानूनों को जस का तस क्यों छोड़ दिया? किसी क़ानून में बदलाव लाना तो दूर उन्होने तो क़ानून के सिपाहियों को उनके हास्यास्पद काले कोट और सफ़ेद टाई से मुक्ति दिलाने में भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई? क्यों? क्या इस से हमारे शासकों के चरित्र पर क्या कोई रौशनी पड़ती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;इस बिल का मसविदा तैयार करने के पहले सेज़ के लिए बनाई स्टैंडिंग कमेटी ने कुछ सिफ़ारिशें की थीं.. उन सिफ़ारिशों के रू-ब-रू देखने पर ही इस बिल की क़लई खुल जाती है कि किस तरह से सारे पहलू अमीर आदमी को सहूलियत और फ़ायदा पहुँचाने के लिए हैं और एकाध नियम अगर ऐसा लगे कि जो ग़रीब आदमी की सहूलियत के लिए है वो व्यावहारिक स्तर पर जा कर ऐसी शक़ल अख्तियार कर लेगा कि अन्ततः उसे कोई लाभ नहीं पहुँच सकेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;बिल के चमचमाते लक्षण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;हासिल की जा रही ज़मीन की जाँच&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सिफ़ारिश थी कि राज्य सरकार और ग्राम पंचायत मिल कर फ़ैसला करें कि कौन सी ज़मीन इस योग्य है और फिर एक जन विज्ञप्ति जारी करें ताकि ज़मीन के रिकॉर्ड्स में किसी भी तरह के कपट से बचा जा सके.. मगर बिल में इसके विपरीत ज़मीन के रिकॉर्ड्स को दुरुस्त करने, ज़मीन सम्बन्धी सभी निर्णय लेने के लिए सारे अधिकार कलेक्टर साहब के सुपुर्द कर दिए गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ज़मीन की क़िस्म&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;कमेटी की सिफ़ारिश थी कि केवल बंजर और बेकार ज़मीन का ही उपयोग सेज़ के लिए किया जाय और बिलकुल ही अनिवार्य होने पर वर्षा पर आश्रित एक फ़सल वाली ज़मीन और कई फ़सल वाली सिंचित ज़मीन के अधिग्रहण पर पाबन्दी लगाई जाय .. मगर बिल इस मामले में चुप्पी साधे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ज़मीन खरीदने की सीमा&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;सिफ़ारिश थी कि हर तरह के सेज़ के लिए ज़रूरत से ज़्यादा ज़मीन खरीदने पर रोक लगाई जाय, अधिकतम सीमा निर्धारित की जाय और अधिग्रहीत ज़मीन का कम से कम ५०% हिस्सा प्रोसेसिंग एरिया की तरह इस्तेमाल किया जाय। मगर बिल कोई सीमा नहीं बताता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ज़मीन के मालिकों की अनुमति&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;सिफ़ारिश थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले को छोड़कर ज़मीन के मूल स्वामियों/निवासियों की अनुमति आवश्यक हो.. मगर बिल कहता है कि प्रभावित लोग अधिसूचना के तीस दिन के भीतर अपनी आपत्ति कलेक्टर के पास दायर कर सकते हैं। सम्बन्धित सरकार इन आपत्तियों पर विचार करेगी और पुनर्वास का मामला ग्रामसभा में विचारा जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रभावित लोगों को सूचना&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सिफ़ारिश की गई थी कि प्रभावित लोगों को ज़मीन के अधिग्रहण के उद्देश्य, असर और पुनर्वास सम्बन्धी व्यवस्था के बारे में सूचित किया जाय। मगर बिल कहता है कि ये सारी सूचनाएं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाएंगी और पुनर्वास की योजना उन लोगों से मशविरा कर के सार्वजनिक कर दी जाएगी। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;ज़रा सोचिये! कल को आप के घर पर क़ब्ज़े का नोटिस कलेक्टर के दफ़तर के बाहर चिपका हो या अखबार के एक कोने में भी छ्पा हो और आप शेन वार्न, शाहरुख खान और तुलसी विरानी के बीच झूलते हुए उसे पढ़ने से चूक गए तो आप सर पटक के मार जाइये आप का वैधानिक अधिकार आप के हाथ से निकल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ज़मीन अगर इस्तेमाल नहीं हुई&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सिफ़ारिश थी कि ज़मीन खरीदने के बजाय लीज़ पर लेने का प्रावधान रखा जाय जिसमें ज़मीन के मालिक को एकमुश्त रक़म के अलावा लगातार किराया भी मिले और यदि सेज़ न चले या खत्म हो जाय तो ज़मीन को उसके मूल मालिक के पास वापस लौटा दिया जाय। मगर बिल एक बार फिर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं करता और पांच साल तक इस्तेमाल न होने की सूरत में ज़मीन को उलटे सरकार के क़ब्ज़े में जाने की बात करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मुआवज़े का गणित&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;सिफ़ारिश थी कि मुआवज़ा उस समय के बाज़ार भाव के अनुसार दिया जाय मगर बिल इसकी भी ऐसी खिचड़ी बनाता है कि अमीर आदमी को और फ़ायदा पहुँचे.. कहता है कि मुआवज़े का आकलन बाज़ार भाव, ज़मीन का क्या इस्तेमाल होना है, ज़मीन पर खड़ी फ़सल, अन्य अधिग्रहीत ज़मीनों के ऊपरी ५०% भावों का ‘औसत’ के आधार पर किया जाय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ज़मीन का मालिकाना&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सिफ़ारिश थी कि भले ही सरकार खुद भी अधिग्रहण कर रही हो तो भी ज़मीन खरीदने के बजाय लीज़ पर ली जाय मगर बिल इस को तो अनदेखा करता ही है साथ एक और अनोखी बात करता है कि अगर अधिग्रहण की जा रही ज़मीन का ७०% हथियाया जा चुका है तो फिर कम्पनी को शेष ज़मीन को ‘&lt;strong&gt;पब्लिक परपज़’&lt;/strong&gt; के आधार पर लेने का अधिकार स्वतः मिल जाता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;वास्तव में इस ‘पब्लिक परपज़’ के चलते ज़मीन का मालिक इस तरह से ज़मीन पर अपने सारे अधिकार खो देता है। सबसे मज़े की बात यह है कि पूरे बिल में इस ‘पब्लिक परपज़’ को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। यानी इसकी अपने मनमाफ़िक व्याख्या करने का रास्ता खुला छोड़ा गया है। और पब्लिक कौन है इसका मतलब भी परदे में नहीं रह गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत सोचने पर भी मुझे सिफ़ारिशों के उलट जा कर बिल का ऐसा स्वरूप तैयार करने के पीछे मुझे कोई और मक़्सद समझ नहीं आया सिवाय इसके कि ये राज्यसत्ता, सरकार और इसके चुने हुए प्रतिनिधि विकास के नाम पर, लुटे-पिटे ग़रीब आदमी को जितना हक़ बनता है उसे उतना भी नहीं देना चाहते। और वित्त मंत्री महाशय जो विकास के इस मॉडल के ज़रिये ही &lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/05/blog-post_31.html"&gt;सबसे बड़े प्रदूषक- ग़रीबी&lt;/a&gt; को दूर करने की बात करते हैं.. क्या इतने भोले हैं कि इन बदलावों का अर्थ नहीं समझते और इसी नासमझी के चलते वे इस बिल की सहमति में हाथ खड़ा कर देंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे इस बिल की जानकारी &lt;a href="http://www.indiatogether.org/"&gt;इंडिया टुगेदर&lt;/a&gt; नाम की सचेत साइट पर &lt;strong&gt;प्रिया पारकर&lt;/strong&gt; और &lt;strong&gt;सरिता वनका&lt;/strong&gt; के लेख &lt;a href="http://www.indiatogether.org/2008/may/law-land.htm"&gt;न्यू रूल्स फ़ॉर सीज़िंग लैण्ड&lt;/a&gt; से से हासिल हुई। &lt;/div&gt;</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/06/blog-post.html" title="सीधी हो रही हैं सेज़ की सलवटें!" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&amp;postID=4726793587631168727" title="6 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/feeds/4726793587631168727/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4726793587631168727" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/3447425639729337005/posts/default/4726793587631168727" /><author><name>अभय तिवारी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05954884020242766837</uri><email>noreply@blogger.com</email></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3447425639729337005.post-740938370194558418</id><published>2008-05-31T08:42:00.007+05:30</published><updated>2008-05-31T10:29:31.344+05:30</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समय" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पी चिदम्बरम" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="समाज" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सभ्यता" /><title type="text">मंत्री जी का सपना</title><content type="html">तहलका के ताज़े अंक में देश के वित्त मंत्री माननीय &lt;a href="http://www.tehelkahindi.com/Sakshaatkar/Mulaquaat/659.html"&gt;पी चिदम्बरम साहब का इंटरव्यू &lt;/a&gt;छ्पा है जिसमें शोमा चौधरी ने कुछ करारे सवाल किए हैं और मंत्री जी ने कुछ ऐसी साफ़गोई से जवाब दिए हैं कि मेरी इस सरकार के प्रति रही सही शंकाए भी जाती रहीं। जैसे जब उनसे प्रदूषण के मामले पर पूछा गया कि &lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;em&gt;"क्या जरूरी है कि हम विकास का वही रास्ता अपनाएं और वही गलतियां करें? क्या हमारा रास्ता अलग नहीं हो सकता?" &lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो उनका कहना था कि &lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;em&gt;“हमें भी विकसित देशों की तरह तरक्की करने का अधिकार है. कभी उनका मौका था. अब हमारा है…”&lt;/em&gt;&lt;/span&gt; यानी पर्यावरण को लगातार नुक़सान पहुँचा रहे औद्यौगिक इकाईयों के प्रति वे ‘त्वरित विकास’ के नाम पर आँख फेर लेना चाहते हैं। विकसित देशों ने जब ग़लतियाँ की तब पर्यावरण के खतरे इतने आसन्न न थे मगर हम सब कुछ जान-बूझ कर उस रस्ते क्यों जाना चाहते हैं जिस पर नाग बैठा हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माननीय मंत्री जी की ये बात सही है कि औद्यौगिकीकरण को अब वापस उलटाया नहीं जा सकता मगर उसे पर्यावरण के अनुकूल और अधिक मानवीय तो बनाया जा सकता है? कैनाडा और उत्तरी योरोप के कई देशों में औद्यौगिक समाज होने के बावजूद एक अन्तर्निहित मानवता भी है और ये संयोग नहीं है कि इन्ही देशों में पर्यावरण को लेकर संचेतना विकसित हुई है। अफ़सोस सिर्फ़ इस बात का है हमारा ग्राम्य समाज जो पहले से ही एक संतुलित पर्यावरण के &lt;a href="http://jajbat.blogspot.com/2008/05/blog-post_27.html"&gt;आदर्श मॉडल पर&lt;/a&gt; खड़ा हुआ था.. उसके प्रति माननीय मंत्री जी के विचार बेहद अफ़सोसनाक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;“गरीबी प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक है. गरीब सबसे गंदी दुनिया में रहते हैं. उनकी दुनिया में सफाई, पेयजल, आवास, हवा...जैसी चीजें नारकीय अवस्था में होती हैं. हर चीज प्रदूषणयुक्त होती है. इसलिए मैंने कहा कि सबसे ज्यादा प्रदूषण गरीबी फैलाती है. ये हमारा अधिकार और कर्तव्य है कि पहले गरीबी को हटाया जाए.”&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंत्री जी ने यहाँ पर जिन ग़रीबों की बात की है वो साफ़ नहीं है कि किसे ग़रीब कह रहे हैं क्या ग़रीब से उनका अर्थ शहर की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले वो लोग जो गाँव से भाग कर आए हैं? पर ये अर्थ होता तो ऐसा क्यों कहते कि &lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;“गरीबी मुक्त भारत को लेकर मेरा जो सपना है उसमें एक बड़ी आबादी, तकरीबन 85 फीसद लोग शहरों में रहेंगे..” &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;ज़ाहिर है के खातमा चाहने वाले मंत्री जी के विचार से शहर में रहने से ग़रीबी दूर होती है। तो फिर उनका अर्थ गाँव में रहने वाले करोड़ों-करोड़ ग़रीबों से होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मंत्री जी जिन नारकीय तत्वों की बात कर रहे हैं क्या वे गाँव से ज़्यादा शहर की पहचान नहीं हैं? क्या औद्योगिकीकरण के पहले की दुनिया में इन तत्वों का प्रदूषण था? पेयजल की समस्या अगर रेगिस्तानी इलाक़ों को छोड़ दिया जाय तो कहीं नहीं थी.. ज़मीन में तीर मारने से पानी निकलता था, कुँए थे, बावड़ियाँ थी, तालाब थे, नदियाँ थी। आवास के लिए मीलों तक फैली ज़मीन थी। गन्दगी के नाम जैविक कचरा था जो सड़कर उत्पादक खाद में बदल जाता था। स्वच्छ हवा के लिए घने जंगल थे, उनकी समृद्ध जैविक विभिन्नता थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर आज के शहरों में क्या हाल है? ऐसा कचरा है जो सदियों तक नष्ट नहीं होगा.. ज़हरीली गैसे हैं.. बांद्रा जैसे इलाक़ों में भी नलके से आने वाला काला पानी है..१० बाई १० के खोलियों में क़ैद दरज़नों लोग हैं..! और नारकीय अवस्था कहाँ हैं ये मंत्री जी के कुशाग्र मस्तिष्क के लिए अग्राह्य है या वे देश की आँखों में शुद्ध धूल झोंक रहे हैं..? सम्पन्नता के लिए मंत्री जी के एकमात्र उपाय औद्यौगिकीकरण ने ही तो वे सारे रोग पैदा किए हैं जिनको हल करने के लिए वे औद्यगिकीकरण का हक़ीम लाने की पैरवी कर रहे हैं। ये कैसा विरोधाभास है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;“गरीबी मुक्त भारत को लेकर मेरा जो सपना है उसमें एक बड़ी आबादी, तकरीबन 85 फीसद लोग शहरों में रहेंगे. महानगरों में नहीं बल्कि शहरों में. किसी शहरी वातावरण में जल आपूर्ति, बिजली, शिक्षा, सड़क, मनोरंजन और सुरक्षा को प्रभावी तरीके से मुहैया करवाना 6 लाख गांवों के मुकाबले ज्यादा आसान है.” &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या उनका विश्वास है कि जैसे धारावी में दसियों लाख लोग एक सम्पन्न जीवन गुज़ार रहे हैं जहाँ उनको शिक्षा, पानी, और चिकित्सा आसानी से उपलब्ध कराई जा रही है? उनका मानना है कि गाँव-गाँव में ये सुविधाएं पहुँचाना बहुत टेढ़ी खीर है.. मगर शहर में आसान है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी समझ में ऐसे गाँव भी होंगे जहाँ प्राथमिक पाठशाला और प्राथमिक चिकित्सा केंद्र न हो.. पर जहाँ हैं वहाँ उनको ठीक से चलाने की इच्छा-शक्ति सरकार की क्यों नहीं है। बहुधा गाँवों में समस्या ये नहीं है कि गाँव में बिजली के तार नहीं है.. समस्या ये है कि उन तारों में बिजली की आपूर्ति नहीं है? और गाँव की बात छोड़ दीजिये आप दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों के अलावा अन्य शहरों में इन सुविधाओं की क्या स्थिति है? मुम्बई में भी कई धारावी हैं और देश के तमाम छोटे-छोटे शहरों में भी तमाम छोटे—छोटे धारावी! वहाँ पर कितना पानी और कितनी बिजली मुहैय्या करा रहे हैं आप?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंत्री जी कहते हैं कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छता आदि मदों पर अब तक की सबसे बड़ी धनराशि खर्च कर रहे हैं मगर पहले के मुक़ाबले उस राशि का वास्तविक मूल्य और बजट का प्रतिशत गोल कर जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ पर ये बताना भी उल्लेखनीय होगा कि शिक्षा के बजट के नाम पर जो पैसा खर्च किया जाता है उसका एक बड़ा हिस्सा आई.आई.एम जैसे संस्थानों को ग्रांट के तौर पर दान दिया जाता है जो अपने विद्यार्थियों से मोटी फ़ीस लेते हैं। क्या मंत्री जी कभी सोचते हैं कि मुनाफ़े की व्यवस्था के मूल्यों की शिक्षा देने वाले ये संस्थान राज्य की कल्याणकारी अवधारणा की छाँव में खड़े होकर अपना व्यापार क्यों करते हैं? मैं फिर पूछता हूँ ये कैसा विरोधाभास है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंत्री जी कहते हैं कि &lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;"ये एक साजिश है कि गरीब लोग गरीब ही रहें. हम जीवन की किस गुणवत्ता की बात कर रहे हैं? उनके पास खाना नहीं है, नौकरियां नहीं हैं, शिक्षा नहीं है, पेयजल नहीं है.."&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; ..मैं पूछना चाहता हूँ मंत्री जी से जो देश की ८५ प्रतिशत जनता को शहर में धकेल देने के स्वप्नदर्शी हैं कि इन बहुसंख्यक लोगों को शहरों में बसाने के लिए उनके पास क्या ब्लूप्रिंट है.. और फिर अगर सचमुच उनकी चिंता ग़रीब लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास है तो इन बुनियादी ज़रूरतों को बाज़ार की मुनाफ़ाखोरी के हवाले क्यों कर दिया गया है? जबकि इंगलैंड जैसे अनेक योरोपीय देशों में प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत ज़रूरतों की ज़िम्मेदारी राज्य वहन करता है। जबकि हमारे यहाँ उसे नोट काटने का धंधा बना दिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं मंत्री जी के भोले भाले चेहरे पर उनकी मुस्कान पर विश्वास करना चाहता हूँ मगर फिर जब सोचता हूँ कि पाँच हज़ार बरस से ग़रीबी में रह रहे लोगों के लिए धड़कने वाले दिल के मालिक मंत्री जी सरकार में रहते हैं तो एनरॉन और &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Vedanta_Resources"&gt;वेदान्ता&lt;/a&gt; जैसे कम्पनियों के लिए मुनाफ़ा कमाने के लिए नीतियाँ मुकर्रर करते हैं और जब सत्ता से बाहर होते हैं तो उनकी लिए वक़ालत करते हैं तो मेरा दिल टूट जाता है। इतने भोले चेहरे का व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर सच यही है कि आदिवासियों की ज़मीन हड़पने, पर्यावरण का बलात्कार करने, नियमों की धज्जियाँ उड़ाने वाली माइनिंग कम्पनी &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Vedanta_Resources"&gt;वेदान्ता&lt;/a&gt; जो विश्व भर में बदनाम और निन्दित है उसके टैक्स मामलों की पैरवी पी चिदमबरम साहब करते हैं और उनके बोर्ड के डाइरेक्टर का पद भी सम्हालते हैं और सत्ता में आने पर इस सर्वनिन्दित कम्पनी को अयोग्य घोषित करने के बजाय उसे धंधा करने की खुली छूट देते हैं और उस पर सवाल करने पर भड़क जाते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;उसका इससे क्या सबंध है? क्या आप अप्रत्यक्ष रूप से ये कह रही हैं कि मैं उनसे मिला हुआ हूं? अगर कोई वकील हत्या के मामले के किसी आरोपी की तरफ से जिरह कर रहा है तो क्या इसका ये मतलब है कि उसकी भी हत्या में मिलीभगत है?”&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिलीभगत का आरोप कौन लगा सकता है मंत्री जी पर ये सवाल तो बनता है कि आप ग़रीबों के खैरख्वाह हो कर उन लोगों की किसी भी मामले की पैरवी करते ही क्यों हैं जिन पर ग़रीबों की हत्या का आरोप हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं फिर भी नहीं कहता कि लोगों को गाँवों में ही बंद कर के रखा जाय.. अगर बहुमत शहरी सभ्यता को ही स्वीकार करना चाहता है और यही इतिहास की गति है तो मैं कौन होता हूँ किसी को रोकने वाला? मगर उन्हे भिखारी बना कर गाँव से शहर की ओर खदेड़ना में क्या जनहित हैं मेरी समझ में नहीं आता?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने सपने में एक और उल्लेखनीय बात मंत्री जी जोड़ते है &lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;“मैं ये भी मानता हूं कि एक बड़ी आबादी गांवों में रहना और खेती करना चाहेगी. इसका स्वागत होना चाहिए..”&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; निश्चित ही ज़हर खा कर मरने की मानसिकता वाला किसान तो किसी तरह से खेती-बाड़ी से निकलने की मानसिकता रखता है तो फिर उनका इशारा ये किस आबादी की तरफ़ हो सकता है इसका फ़ैसला आप खुद करें!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर किसी दिन आप को अखबार के किसी कोने में छोटी इबारत में यह पढ़ने को मिल जाय कि देश की संसद ने सर्वसम्मति से क़ानून पारित कर दिया है कि अब देश का कोई भी नागरिक कहीं भी कितनी भी ज़मीन खरीद कर खेती कर सकता है तो आप को हैरान नहीं होना चाहिये।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2008/05/blog-post_31.html" title="मंत्री जी का सपना" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3447425639729337005&a