<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><rss xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" version="2.0"><channel><title>एनजीओ विरोधी मोर्चा</title><description>एनजीओ के जरिये चल रही घिनौनी साम्राज्‍यवादी साजिशों के विरुद्ध एक आंदोलन</description><managingEditor>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</managingEditor><pubDate>Sat, 5 Oct 2024 07:28:25 +0530</pubDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">32</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/">25</openSearch:itemsPerPage><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/</link><language>en-us</language><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>एनजीओ के जरिये चल रही घिनौनी साम्राज्‍यवादी साजिशों के विरुद्ध एक आंदोलन</itunes:subtitle><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email></itunes:owner><item><title>ख़बरों में सड़क के बच्चे</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/06/blog-post_13.html</link><category>ये दाग-दाग उजाला</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Fri, 13 Jun 2008 13:44:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-4555465881064393339</guid><description>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;सेवा में,&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;श्री प्रशांत झा &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;रिपोर्टर हिंदुस्तान दैनिक &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;१८-२०,के जी मार्ग, नई &lt;span class=""&gt;दिल्ली। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;महोदय ! आपका लेख "......और यह है बच्चा पार्टी का अपना बैंक "(हिंदुस्तान २ अप्रैल २००८) पढ़ा। यह सही बात है कि सड़क के कामकाजी बच्चों का एक बैंक होना अपने आप में एक आश्चर्य की बात है, लेकिन उतनी नहीं जितने आश्चर्य के साथ आपने लिखा है। आपने अपने लेख में लिखा कि -(१) यह बच्चों का अपना बैंक है ,(२) इस बैंक (बाल विकास बैंक) के मैनेजर ,प्रबंधक कमिटी और जमाकर्ता सड़कों पर जीवनयापन करने वाले बच्चे ही हैं,(३) वे जब चाहें रुपये निकाल सकते हैं और लोन भी ले सकते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;मैं आपको बताना चाहता हूँ कि आपको यह जानकारी जहाँ कहीं से भी मिली हो पूरी हकीकत के साथ नहीं मिली। यह बैंक बच्चों का अपना बैंक है, पर सिर्फ़ इसलिए कि इस तरह का और किसी संस्था के पास बैंक नहीं है। इसलिए संस्था ने इस बैंक को (जिसे ख़ुद संस्था के स्टाफ चलाते हैं)बच्चों के बैंक का नाम दे रखा है। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:Arial;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;&lt;span class=""&gt;कागज &lt;/span&gt;के रिकार्डों पर ही सिर्फ़ बच्चों की प्रबंधक कमिटी और लोन कमिटी है। हकीकत में बच्चों को प्रबंधक का मतलब भी नहीं मालूम। लोन कमिटी, जिसके सदस्य बच्चे हैं(कागजों पर) , किसी को लोन नहीं दे सकती क्योंकि लोन की स्वीकृति के लिये डॉ सुमन सचदेवा (बैंक डवलपमेंट मैनेजर) की स्वीकृति ज़रूरी है। डॉ सुमन सचदेवा का कहना है कि "बैंक चलाने का मुख्य उद्देश्य बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ उनमें बचत की आदत विकसित करना है" मगर संस्था पिछले सात सालों में (२००१ से अबतक) कितने बच्चों को शिक्षित कर पाई है और कितने बच्चों में बचत की आदत विकसित कर पाई है -इसका संतोषजनक जवाब उनके पास नहीं होगा। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:Arial;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;आप सोच रहे हैं कि मैं इतनी सारी बातें कैसे जानता हूँ ? महोदय जब बाल विकास बैंक की शुरुआत हुई थी तो मैं उसका पहला बैंक मैनेजर था। बैंक शुरू करने के लिये एन एफ आई (नेशनल फाउनडेशन फॉर इंडिया) ने ५०-५० हजार की किस्तों में दो साल के अन्दर दो लाख रुपये बटरफ्लाइज संस्था को दिए। संस्था की पहले से बचत योजना होने के कारण संस्था ने सोचा कि क्यों न बच्चों का बैंक बना दिया जाए। जबकि एन एफ आई का ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था। उनके पैसा देने का कारण था कि सड़क पर रह रहे बच्चों को कुछ काम मिल जाए। मगर जब संस्था ने उसके सामने अपना लुभावना प्रोजेक्ट रखा तो उन्हें पसंद आ गया। एन एफ आई से मिला पैसा (दो लाख रुपये) संस्था ने १० बच्चों को काम के लिये देकर, स्टाफ की तनख्वाह देकर और मीटिंग्स का खर्चा लिखकर खर्च कर दिया। बच्चों को जो काम दिया गया वह सिर्फ़ संस्था की पब्लिसिटी के लिये। इस प्रकार उन दो लाख रुपयों का क्या हुआ पता नहीं चला। हाँ, इस काम से संस्था को शिवा(CIVA) नामक फंडिंग एजेंसी ने पैसा देना शुरू कर दिया था। लेकिन जब उसे संस्था की करतूतों का पता चला तो उसने अपना सारा फंड चाइल्ड होप नामक फंडिंग एजेंसी को दे दिया जो अभी बटरफ्लाइज को बैंक के लिये पैसा दे रही है। लेकिन अभी चाइल्ड होप को भी संस्था की करतूतों का पता चला है इसलिए संस्था मीडिया को माध्यम बनाकर प्रचार करा रही है। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:Arial;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;एमिल जोला ने अपने एक प्रसिद्ध लेख में कहा था "यदि सच्चाई  छुपाई जायेगी , उसे पोशीदा रखा जाएगा, तो यह इकट्ठी होती जायेगी और जब यह फटेगी तो अपने साथ हर चीज़ को उड़ा देगी। बटरफ्लाईज हकीकत को जितना भी छिपा ले मगर एक दिन तो उसे विस्फोट होना ही है। संस्था अपने बचाव के लिये चाहे जितना भी तर्क दे दे कि कुछ व्यक्ति और युवा उसे बदनाम कर रहे हैं मगर हकीकत एकदम विपरीत है. संस्था को अपनी सच्चाई का बाहर आना बदनामी लग रही है.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;मैं संस्था के अन्दर १९९५ से २००५ तक रहा यानि पूरे दस साल. आठ साल की उम्र में मैंने अपना घर छोड़ा था. जब दिल्ली आया तो सड़क पर रहकर कबाड़ चुनता था और पढ़ाई करता था. संस्था ने दस साल तक विदेशी लोगों के सामने मुझे हीरो बनाकर पेश किया और जब मैं बड़ा हो गया तो यह कहकर कि अब तुम बड़े हो गए हो- संस्था से बाहर निकल दिया. सिर्फ़ मुझे ही नहीं इन दस सालों के अन्दर संस्था ने सैकड़ों बच्चों का अपने फायदे के लिये इस्तेमाल कर बाहर फेंक दिया. हमे इस बात का दुःख नहीं है कि हम संस्था से बाहर निकल दिए गए, दुःख इस बात का है कि संस्था ने पहले हमे सपने दिखाए और फ़िर अचानक उन सपनों को चूर-चूर कर दिया. हमारा सपना था कि हम भी संस्था के अन्दर रहकर अपना विकास करेंगे और अपने जैसे बच्चों के लिये कुछ कर पाएंगे, मगर हमे क्या पता था कि ऐसी संस्थाएं सिर्फ़ पैसों के लिये काम करती हैं और वास्तव में बच्चों के विकास से इन्हें कोई मतलब नहीं होता. इन बातों पर गहराई से सोचने के बाद हमने तय किया कि हम बच्चे और युवा मिलकर एक अख़बार निकालेंगे . आज हम बाल मजदूर की आवाज नाम से बच्चों का एक अखबार निकलते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;महोदय हम चाहते हैं कि आप पूरी हकीकत के साथ लिखें और यदि सम्भव हो तो आप मिलकर बटरफ्लाईज संस्था के बारे में और भी जानकारी हमसे ले सकते हैं.आज बाल मजदूरी एक ऐसा मुद्दा बन गया है जिसे अपनी रोटी सेंकने के लिये हर कोई इस्तेमाल करने लगा है. जितना पैसा बाल मजदूरी ख़त्म करने के लिये भारत में आता है यदि वो पैसा एक तय योजना के साथ खर्च किया जाए तो जरूर कुछ नतीजा निकल सकता है मगर संस्था के माध्यम से आने वाला पैसा क्या सही मायनों में बच्चों पर खर्च हो रहा है? सच्चाई क्या है सब जानते हैं पर कोई आगे बढ़कर सवाल नहीं करता. सरकार इन बातों पर क्यों खामोश है क्या इस बात को समझ पाना इतना मुश्किल है?&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;अगर आप हमसे बात करके एक रिपोर्ट लिख सकें तो हमे अच्छा लगेगा.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;भवदीय,&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;अनुज चौधरी &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;प्रतिलिपि- श्रीमती मृणाल पण्डे जी,प्रधान संपादक हिंदुस्तान. &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;बाल मजदूर की आवाज से साभार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>एड्स पर स्वीकारोक्ति</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/06/blog-post.html</link><category>सोचो कि सोचने की ज़रूरत बनी रहे</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Wed, 11 Jun 2008 16:14:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-4241529481690733299</guid><description>एड्स एवं एचआईवी ये दो शब्द पिछले करीब दो दशकों से पूरी दुनिया को आतंकित करते रहे हैं। तथाकथित एचआईवी विषाणु से उत्पन्न होने वाले एड्स को लेकर इतना प्रचार हुआ और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इतना व्यापक कार्यक्रम चलाया कि तमाम देशों को अपने स्वास्थ्य ढांचे में परिवर्तन करने को बाध्य होना पडा। पिछले दो दशकों में सबसे ज्यादा किसी एक बीमारी से जुड़े कार्यक्रम पर धन झोंका गया है तो वह एड्स है। हालांकि आरंभ से ही एड्स के भय को अनावश्यक करार देने वाले भी रहे हैं, पर उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई। अब अपने जीवन का एक बडा हिस्सा एड्स के विरूद्ध लड़ने में बिताने वाले डॉ। केविन डी. कॉक ने कहा है कि एचआईवी विषाणु से होने वाला खतरा बदल गया है। उनके अनुसार यह विषाणु अब केवल समलैंगिकों, नशाखोरों और वेश्याओं व उनके ग्राहकों तक सीमित हो गया है। एड्स को सबसे बड़ी महामारी मानने वालों में डॉ. केबिन अकेले व्यक्ति नहीं हैं जिनकी भाषा बदली है, इसके सबसे बडे प्रचारक संयुक्त राष्ट्र ने ही कुछ महीने पहले कहा था कि विा भर में एचआईवी के मामले घटे हैं। उसने 4 करोड़ से घटकर 3 करोड़ 30 लाख होने का आंकडा भी दिया है। इन दोनों बातों में अभी भी एचआईवी एवं एड्स के खतरे को स्वीकार किया गया है। वास्तव में दुनिया भर में ऐसे लोग अब खड़े हो चुके हैं जो एचआईवी की कल्पना, उसके आधार पर बुनी गई बीमारी एवं उसकी संख्या की भयावह तस्वीर को पूरे मनुष्य समुदाय के लिए धोखाधड़ी करार दे रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र अभी भी जो आंकडा दे रहा है वह संदिग्ध है, क्योंकि ये आंकड़े उन एनजीआ॓ द्वारा जुटाए गए हैं जो कि एड्स के नाम पर करोडों का कार्यक्रम चलाते हैं। स्वयं भारत में ही यह साफ हो चुका है कि जितने एचआईवी संक्रमण की संख्या यहां दी गई उतनी है ही नहीं। जिस समय एड्स का नाम अस्तित्व में आया तब यह कहा गया था कि एशिया की आबादी ज्यादा होने के कारण वहां यह बड़ी महामारी होगी। इसमें भारत एवं चीन का नाम लिया गया था। हालांकि ये दोनों बातें गलत साबित हुईं, लेकिन इस बीच एशिया के देशों ने एड्स के नाम पर न जाने कितना धन खर्च किया। स्वयं भारत ने स्वास्थ्य मंत्रालय में अलग से राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन नाम से एक विभाग ही कायम कर दिया। भारत में काम की जो बातें पर्दे के पीछे थीं उसे विज्ञापनों के माध्यम से बच्चों तक पहुंचा दिया गया। कंडोम के विज्ञापन को सामाजिक सेवा बना दिया गया। इससे नैतिक हानि हुई और सामाजिक मर्यादाएं ध्वस्त होने से परंपरागत व्यवस्था की चूलें हिल गयीं। बच्चों को विघालयों में सेक्स शिक्षा देने के पीछे सबसे बडा तर्क एड्स जागरूकता को ही बनाया गया। अब डॉ. केविन कह रहे हैं कि लोगों को जागरूक करने पर धन लगाने से ज्यादा जरूरी है कि खतरे की अधिक संभावना वाले क्षेत्रों को निशाना बनाया जाए। यानी जन जागरूकता के नाम पर जो कुछ किया गया वह व्यर्थ था। अगर एचआईवी वाकई है तो यह सेक्स के मामले में व्यभिचार करने वालों, खतरनाक नशे का सेवन करने वालों को हो ग्रसित करता है। भारत के आम आदमी को परंपरागत रूप से इतनी सीख मिली हुई है।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.rashtriyasahara.com/"&gt;www.rashtriyasahara.com&lt;/a&gt; से साभार</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>फोर्ड फाउन डेशन : विदेशी फंडिंग के परिप्रेक्ष्य में एक अध्ययन</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/05/blog-post_13.html</link><category>सोचो कि सोचने की ज़रूरत बनी रहे</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Tue, 13 May 2008 11:56:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-7299329466674994900</guid><description>दूसरा भाग (गतांक से आगे)&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;फोर्ड भारत में&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;फोर्ड फाउनडेशन की नई दिल्ली ऑफिस के वेब पेज के अनुसार -"भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर फाउनडेशन ने 1952 में भारत में एक ऑफिस की स्थापना की।" वास्तव में चेस्टर बाउल्स जो 1951 में भारत में अमरीका के राजदूत थे, ने इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी। अमरीकी विदेश नीति की स्थापना में लगे बाउल्स को गहरा धक्का तब लगा जब 'चीन हाथ से निकल &lt;span class=""&gt;गया' (&lt;/span&gt;राष्ट्रीय स्तर पर वहां 1949 में कम्युनिस्ट सत्ता में आ गए थे)। इसी तरह वे इस बात से भी दुखी थे &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हुए हथियारबंद आन्दोलन को कुचलने में भरतीय सेना नाकाम रही थी (1946-51) " जब तक कि कम्युनिस्टों ने स्वयं ही हिंसा का रास्ता बदल नहीं लिया। "भारतीय किसानों की अपेक्षा थी कि अंग्रेजी राज की समाप्ति के बाद उनकी इस दीर्घकालीन मांग को पूरा किया जाएगा कि जमीन जोतने वाले को मिलनी चाहिए। और यह दबाव तेलंगाना आन्दोलन की समाप्ति के बाद भी आज भारत में हर कहीं महसूस किया जा सकता है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पॉल  हॉफमैन को जो फोर्ड फाउनडेशन के  तत्कालीन अध्यक्ष थे, बाउल्स ने लिखा-"स्थितियां चीन में बदल रही हैं पर यहाँ भारतीय परिस्थितियां स्थिर हैं.....अगर आने वाले चार-पाँच वर्षों में वैषम्य बढ़ता है , या फ़िर अगर चीनी भारतीय सीमाओं को धमकाए बगैर अपना उदारवादी और तर्कसंगत रवैया बनाये रखते हैं .... भारत में कम्युनिस्म का बड़ा भारी विकास हो सकता है। नेहरू की मृत्यु अथवा उनके रिटायरमेंट के पश्चात् यदि एक अराजक स्थिति बनती है तो सम्भव है यहाँ एक ताक़तवर कम्युनिस्ट देश का जन्म हो।" हॉफमैन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए एक मज़बूत भारतीय राज्य की जरूरत पर बल दिया -"एक मज़बूत केन्द्र सरकार का गठन होगा , उग्र कम्युनिस्टों को नियंत्रित किया जाएगा....प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को जनता तथा दूसरे स्वतंत्र (बीमार) देशों से तालमेल, सहानुभूति और मदद की अत्यन्त आवश्यकता है। "&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नई दिल्ली ऑफिस फौरन स्थापित किया गया , और फोर्ड फाउन डेशन ने कहा- "यह अमरीका से बाहर फाउन डेशन का पहला कार्यक्रम है और नई दिल्ली ऑफिस इसकी क्षेत्रीय कार्रवाइयों का काफ़ी बड़ा हिस्सा पूरा करेगा। इसका प्रभाव क्षेत्र नेपाल और श्रीलंका तक व्याप्त है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;"फोर्ड फाउन डेशन की गतिविधियों का क्षेत्र तय कर दिया गया ( अमरीकी स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा) है "- जॉर्ज रोजेन लिखते हैं ,- " हमारा अनुभव है कि एक विदेशी (अमरीकी) सरकारी एजेंसी का ...................में काम करना अत्यन्त संवेदनशील मसला है .......दक्षिण एशिया बड़ी तेजी से  फाउनडेशन की गतिविधियों के लिए एक संभावित क्षेत्र के रूप में सामने आया है.........भारत और पाकिस्तान दोनों ही चीन की ज़द में हैं और कम्युनिज्म द्वारा निशाने पर लिए हुए प्रतीत होते हैं। इसलिए वे अमरीकी नीतियों के सन्दर्भ में अत्यन्त महत्वपूर्ण बन गए हैं..... । " फोर्ड फाउन डेशन ने भारतीय नीतियों पर आधिपत्य जमा लिया है। रोजेन कहते हैं कि "1950 से लेकर 1960 के बीच विदेशी विशेषज्ञों ने  भारतीयों के बनिस्बत  उच्च अधिकार हासिल कर  लिए हैं ", और फोर्ड फाउनडेशन तथा (फोर्ड फाउनडेशन/सी आई ए फंडेड) एमआईटी सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज "योजना आयोग के आधिकारिक सलाहकार" की तरह कार्य कर रहे हैं।  बाउल्स लिखते हैं कि " डगलस एन्समिन्जर के नेतृत्व में , भारत में फोर्ड के कर्मचारी योजना आयोग के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं जो पंचवर्षीय योजनाओं का संचालन करता है। जहाँ भी दरार दिखती है , वे उसे भरते हैं, चाहे वह खेती का, स्वास्थ्य शिक्षा का अथवा प्रशासनिक मामला हो। वे ग्रामीण स्तर के कार्यकर्ता प्रशिक्षण विद्यालयों में साथ जाते हैं, संचालन करते हैं और  वित्तीय मदद देते हैं।"&lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>फोर्ड फाउनडेशन-विदेशी फंडिंग के परिप्रेक्ष्य में एक अध्ययन</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/05/blog-post.html</link><category>अथ उपनिवेश कथा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Sat, 3 May 2008 11:48:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-1045309147451412206</guid><description>&lt;span style="color:#006600;"&gt;" कभी न कभी कोई फोर्ड फाउनडेशन द्वारा भारत में किए जा रहे कार्यों का ब्योरा ज़रूर अमरीकी जनता के सामने रखेगा। देश में फोर्ड फाउनडेशन का कुछ लाख डॉलर में आने वाला कुल खर्च इस कहानी का दसवां हिस्सा भी शायद ही बयान कर सके "- चेस्टर बाउलन ( भारत में पूर्व अमरीकी राजदूत ) ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोर्ड फाउनडेशन द्वारा विश्व सामाजिक मंच को दिए जा रहे अकूत धन के प्रवाह ने इस संस्थान की पृष्ठभूमि और इसकी वैश्विक गतिविधियों को जगजाहिर कर दिया है। यह न सिर्फ़ इसके बल्कि इस जैसी दूसरी संस्थाओं के अध्ययन की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है। फोर्ड फाउनडेशन (एफ एफ) की स्थापना 1936 में फोर्ड के विशाल साम्राज्य के हित में कर बचाने की जुगत के तौर पर हुई थी लेकिन इसकी गतिविधियाँ स्थानीय तौर पर मिशिगन के स्टेट को समर्पित थीं। 1950 में जब अमरीकी सरकार ने इसका ध्यान "कम्युनिस्ट धमकियों" से मुठभेड़ पर केंद्रित किया , फोर्ड फाउनडेशन एक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फाउनडेशन में तब्दील हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;फोर्ड और सी आई ए &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच तो यह है कि अमरीका की केन्द्रीय गुप्तचर संस्था लम्बे समय से अनेकानेक लोकोपकारी फाउनडेशनों (खासकर फोर्ड फाउनडेशन) के माध्यम से कार्य करती आ रही थी। &lt;span style="color:#33cc00;"&gt;जेम्स पेत्रास&lt;/span&gt; के शब्दों में फोर्ड और सी आई ए का अंतर्सम्बंध " &lt;em&gt;अमरीका के साम्राज्यवादी सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को मजबूती देने और वामपंथी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों की जड़ें खोदने के लिये एक सोची-समझी और सजग संयुक्त पहलकदमी थी।&lt;/em&gt; " फ्रांसिस स्टोनर इस दौर पर अपने एक अध्ययन में कहते हैं -&lt;em&gt; इस समय फोर्ड फाउनडेशन ऐसा प्रतीत होता है मानो वह अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक दुष्प्रचार के क्षेत्र में सरकार का ही एक विस्तार हो। फाउनडेशन के पास इसका पूरा ब्योरा है कि उसने यूरोप में मार्शल प्लान और सी आई ए अधिकारियों के विशिष्ट अभियानों में कितनी प्रतिबद्धता और अंतरंगता के साथ कार्य किया है।&lt;/em&gt; "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिचर्ड बिशेल ,जो 1952 -54 के दरम्यान फाउनडेशन के प्रमुख रहे, तत्कालीन सी आई ए प्रमुख एलन &lt;span class=""&gt;ड्यूल्स &lt;/span&gt;के साथ खुले तौर पर मिलते-जुलते रहे थे। उन्होंने फोर्ड फाउनडेशन को सी आई ए की विशेष मदद के लिये प्रेरित किया। ड्यूल्स के बाद जॉन मैकक्लॉय फोर्ड के प्रमुख बने। इससे पहले का उनका कैरिअर वार (War) के सहायक सचिव, विश्व बैंक के अध्यक्ष, अधिकृत जर्मनी के उच्चायुक्त, &lt;span class=""&gt;रौकफेलर &lt;/span&gt;के चेज मैनहट्टन बैंक के &lt;span class=""&gt;अध्यक्ष &lt;/span&gt;और सात बड़ी तेल कंपनियों के वाल स्ट्रीट अटोर्नी के तौर पर काफी विख्यात रहा था। मैकक्लॉय ने सी आई &lt;span class=""&gt;ए &lt;/span&gt;और फोर्ड की साझेदारी को तीखा किया - फाउनडेशन के &lt;span class=""&gt;अंतर्गत &lt;/span&gt;एक प्रशासनिक इकाई गठित की जो खास तौर से सी आई ए के साथ तालमेल बिठा सके और उन्होंने निजी तौर पर भी एक परामर्शदात्री समिति का नेतृत्व किया ताकि फोर्ड फाउनडेशन फंड के लिए एक आवरण और (Conduit) वाहक के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वहन कर सके। 1966 में मैक जॉर्ज &lt;span class=""&gt;बंडी , &lt;/span&gt;जो उस वक्त अमरीकी राष्ट्रपति के राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में विशेष सहायक थे, फोर्ड फाउनडेशन के प्रमुख बने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह फाउन डेशन और सी आई ए के बीच एक व्यस्त और सघन साझेदारी थी। "&lt;em&gt;सी आई ए के बहुसंख्य "दस्तों" ने फोर्ड फाउनडेशन से &lt;span class=""&gt;भारी &lt;/span&gt;अनुदान प्राप्त किया। बड़ी संख्या में सी आई ए प्रायोजित तथाकथित " &lt;span class=""&gt;स्वतन्त्र &lt;/span&gt;" सांस्कृतिक संगठनों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने सी आई ए /फोर्ड फाउन डेशन से अनुदान प्राप्त किया। फोर्ड फाउन डेशन द्वारा दिए गए सबसे बड़े दानों में एक वह था जो सी आई ए प्रायोजित सांस्कृतिक आज़ादी (स्वायत्तता ) कांग्रेस को 1960 में दिया गया था - सात मिलियन यानि सत्तर लाख डॉलर। सी आई ए से जुड़कर काम करने वाले बहुतेरे लोगों को फोर्ड फाउनडेशन में पक्की नौकरी मिलती रही और यह घनिष्ठ साझेदारी परवान चढ़ती रही।" &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिशेल के अनुसार फोर्ड फाउनडेशन का मकसद "&lt;em&gt;केवल इतना भर नहीं था &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;वह वामपंथी बुद्धिजीवियों को वैचारिक समर में हरा दे बल्कि यह भी था कि प्रलोभन देकर उन्हें उनकी जगह से च्युत कर दे। " &lt;/em&gt;सो 1950 के सांस्कृतिक स्वायत्तता कांग्रेस (सीसीएफ) &lt;span class=""&gt;को &lt;/span&gt;सी आई ए ने फोर्ड फाउनडेशन &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;कीप से फण्ड दिया। सी सी एफ की सबसे प्रसिद्ध गतिविधियों में से एक थी वैचारिक पत्रिका "एनकाउन्टर "। बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी जैसे बिकने को तैयार बैठे थे। सी आई ए और फाउन डेशन ने विशिष्ट कलात्मक परम्पराओं , जो अमूर्त अभिव्यक्तियों पर आधारित थीं, को प्रोत्साहित करना शुरू किया - ताकि वह उस कला को जो सामाजिक सरोकारों को वाणी देती है - कड़ी चुनौती दे सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमरीकी फाउनडेशनों में सी आई ए की अत्यन्त व्यापक घुसपैठ थी। अमरीकी सीनेट द्वारा 1976 में गठित एक कमिटी ने यह रहस्योद्घाटन किया कि 1973-76 के दरम्यान दस हज़ार डॉलर से अधिक के 700 अनुदान जो 164 फाउनडेशनों के माध्यम से बांटे गए थे , उनमे से 108 आंशिक तौर पर अथवा &lt;span class=""&gt;शत &lt;/span&gt;प्रतिशत सी आई ए पोषित थे। पेत्रास के अनुसार, "&lt;em&gt;फोर्ड फाउनडेशन के शीर्ष  पदाधिकारियों और अमरीकी सरकार के बीच का सम्बन्ध सुस्पष्ट है और यह जारी है।  हाल के दिनों के कुछ फंडेड  प्रोजेक्ट का एक अध्ययन भी साफ बताता है कि फोर्ड फाउनडेशन ने किसी भी ऐसे बड़े प्रोजेक्ट को  फण्ड नहीं किया है जो अमरीकी नीतियों की खिलाफत करता हो।" &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;फोर्ड फाउनडेशन कबूल करता है (अपने नयी दिल्ली ऑफिस  की वेबसाइट  पर) कि सन् 2000 की शुरुआत में इसने  ७.५ विलियन डॉलर ग्रांट के रूप में दिया है और 1999 में इस क्षेत्र में कुल मिलाकर 13 विलियन डॉलर दान में दिया है। वह यह भी दावा करता है कि "सरकारों अथवा अन्य श्रोतों से फण्ड प्राप्त नहीं करता," पर वास्तव में, जैसा कि हमने देखा है, यह एक उल्टी बात है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्रमशः अगले अंक में जारी &lt;/strong&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>रीटा पणिक्कर के नाम तीसरा पत्र</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post_1724.html</link><category>एनजीओनामा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Mon, 28 Apr 2008 15:06:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-7176509875263194243</guid><description>तिथि - 05-12-2007&lt;br /&gt;सेवा में,&lt;br /&gt;निदेशक ,&lt;br /&gt;बटरफ्लाइज, यू-4,ग्रीनपार्क एक्सटेंशन , नई दिल्ली -110016।&lt;br /&gt;महोदया,&lt;br /&gt;03-12-2007 के मेरे पत्र के जवाब में आपने कल जो सामूहिक सर्कुलर जारी किया है उसमें एक बार फिर से पूरे घटनाक्रम को यथार्थ और वस्तुपरक तरीके से न देखकर उससे जैसे-तैसे पीछा छुड़ाने की कोशिश की है जो आपकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। संगठन के प्रमुख की हैसियत से जिस फैसले पर आपको पहले दिन ही पहुँच जाना था, वहाँ तक पहुँचने से बचाने वाले रास्तों की तलाश ने आपको उस मनःस्थिति तक ला खड़ा किया है कि अब आपको अपने ही संगठन और उसकी एकजुटता पर भरोसा नहीं रहा। आपको यह स्वीकार करना चाहिये कि आप अपने ही संगठन के खिलाफ खड़ी हो गई हैं। सर्कुलर से मुख्यतः जो बातें उभरकर आ रही हैं वे इशारा करती हैं कि -&lt;br /&gt;(क) आप इस बात से अत्यंत दुखी हैं कि संगठन में सब आपके हिसाब से क्यों नहीं सोचते। संभवतः आप यह मानती हों कि वेतनभोगी कर्मचारी होने के कारण इस संगठन में किसी को अलग विचार रखने अथवा असहमति व्यक्त करने का क्या अधिकार हो सकता है।&lt;br /&gt;(ख) विगत दिनों के घटनाक्रम को देखते हुए आपको इस बात पर संदेह है कि यह संगठन एकजुट रह गया है, इसलिये आप जब एकजुटता की बात कर रही हैं तो उसमें आत्मविश्वास की कमी झलक रही है। पिछले 23 अक्टूबर की घटना के बाद से पूरा संगठन अन्याय के खिलाफ संगठित और एकजुट हुआ जो कि आप जानती हैं। क्यों यह एकजुटता आपको निराश या हतोत्साहित करती है ? क्या इसलिये कि इसे राजधर्म के साथ खड़ा होना चाहिये था न कि न्याय के पक्ष में ?&lt;br /&gt;(ग) आप कहती हैं कि हमारे पास वह मंच उपलब्ध था जहाँ हम शिकायतों को सुलझा सकते थे। फिर क्यों उसका उपयोग नहीं हुआ ? क्या इसलिये नहीं कि आपको मालूम था कि उस मंच से खासकर इस मसले पर मनमाफिक निर्णय लेना संभव नहीं होगा ?&lt;br /&gt;(घ) आपको जिस एक और बात पर बहुत ज्यादा ऐतराज  है वह यह कि आपको मेरे द्वारा भेजे गये पत्र संगठन के और लोगों की जानकारी में क्यों हैं। सार्वजनिक फण्ड से सामुदायिक सहभागिता के आधार पर काम करते हुए अपने सहकर्मी बाल अधिकार कार्यकर्ताओं के प्रति ऐसा गैरबराबरी वाला नजरिया रखना क्या आपको उचित लगता है ? क्या आप यह नहीं मानतीं कि इस कार्यक्रम में भागीदारी निभा रहे सभी व्यक्ति एक समान और महत्वपूर्ण हैं तथा उनके बीच पूरी पारदर्शिता होनी चाहिये ? फिर इस दुराव-छिपाव का क्या अर्थ है ?&lt;br /&gt;(च) आपने यह बताया है कि इस पूरे मसले की जाँच हेतु आप किसी बाहरी व्यक्ति को नियुक्त करने जा रही हैं। यह अत्यंत दुखद स्थिति है। जब 23 अक्टूबर को मेरे साथ हुए अमानवीय दुर्व्यवहार का संगठित होकर विरोध करते हुए संगठन के पच्चीस से अधिक सहकर्मियों ने स्वहस्ताक्षरित मांग-पत्र में आपसे यह माँग की कि पी॰ एन॰ राय को इस आपराधिक कृत्य के लिये कड़ी सजा दी जाए, ताकि फिर कोई इस संगठन में महिलाओं या बच्चों के साथ हिंसक व्यवहार करने और उनकी मानवीय गरिमा को नष्ट करने की हिम्मत न कर सके, तो यह अपने आप में पूरे संगठन का निर्णय था, जिसपर आपको केवल अपनी सहमति की मुहर लगाने की औपचारिकता पूरी करनी थी। उसके बाद भी संगठन के इस बहुमत के निर्णय को दरकिनार कर किसी बाहरी जाँच की बात करना न सिर्फ हास्यास्पद है बल्कि एक लोकतांत्रिक संगठन में बहुमत की अवहेलना भी है। दूसरी बात यह कि जब संगठन के 95 प्रतिशत सदस्यों के निर्णय पर आपको विश्वास नहीं है, तो आपके द्वारा मनोनीत किसी बाहरी व्यक्ति की जाँच या उसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता क्यों होनी चाहिये ?&lt;br /&gt;मेरा विश्वास पहले भी संगठन में था और अब भी उतना ही है। इस पूरे मामले को संगठन से बाहर के किसी भी व्यक्ति को सौंपने से मेरा पूरा विरोध है और मैं इसे कतई स्वीकार नहीं कर सकती। उम्मीद तो यही थी कि आप मानवाधिकार हनन और स्त्री-उत्पीड़न के इस मसले पर संगठन के निर्णय के पक्ष में खड़ी होंगी और पी॰ एन॰ राय जैसे मानव-विरोधी व्यक्ति के लिये इस संगठन में कोई जगह नहीं रहने देंगी, परन्तु अब तक आपने जो भी कदम उठाये हैं उससे यही जाहिर होता है कि आप एक दोषी व्यक्ति को हर कीमत पर बचाना चाहती हैं। एक बाहरी व्यक्ति या संगठन से जाँच कराने की आपकी घोषणा भी आपके इसी प्रयास का एक हिस्सा है। दुनिया के इतिहास में जाँच कमिटियों ने ज्यादातर सच को झुठलाने या उसे निलम्बित करने में ही अपनी महारत साबित की है।   न्याय के लिये अपने इस संघर्ष में मैं ऐसे किसी भी प्रयास को कबूल नहीं कर सकती और मुझे विश्वास है मेरे सभी सहकर्मी अन्याय के खिलाफ तनकर खड़े रहेंगे और संगठन के इस आंतरिक मामले को किसी बाहरी व्यक्ति अथवा संगठन को सौंपे जाने के कदम का विरोध करेंगे।&lt;br /&gt;आदर सहित,&lt;br /&gt;उषा ,&lt;br /&gt;बटरफ्लाइज।</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>रीटा पणिक्कर के नाम दूसरा पत्र</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post_28.html</link><category>एनजीओनामा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Mon, 28 Apr 2008 14:54:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-339633718744022101</guid><description>दिनांक - 03-12-2007&lt;br /&gt;आदरणीया निदेशक,&lt;br /&gt;बटरफ्लाइज , यू-४, ग्रीनपार्क एक्सटेंशन , नई दिल्ली- ११००१६ ।&lt;br /&gt;महोदया,&lt;br /&gt;विगत 23-10-2007 को फतेहपुरी में वरिष्ठ सहकर्मी पी॰ एन॰ राय द्वारा अधिकांश सहकर्मियों, सैकड़ों बच्चों और स्थानीय नागरिकों-व्यवसायियों के सामने मेरे साथ किये गये अमानवीय दुर्व्यवहार और मानसिक भावनात्मक उत्पीड़न के बारे में मैंने आपके और संगठन के अन्य महत्वपूर्ण सहकर्मियों के नाम एक लिखित पत्र दिया था। आमतौर पर एनजीओ के बारे में लागों की यह धारणा और विश्वास है कि वहाँ लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकार और असहमति का सबसे अधिक मखौल उड़ाया जाता है। यह भी कि ज्यादातर एनजीओ से लोकतांत्रिक व्यवहार और पारदर्शिता की उम्मीद करना इस वक्त की सबसे बड़ी बेवकूफियों में से एक हो सकती है। इस सबके बावजूद अगर मैंने आपके समक्ष इस अमानवीय प्रताड़ना की शिकायत की थी तो केवल इसलिये कि मैं आज भी संगठन और उसके लोकतांत्रिक मूल्यों में भरोसा करती हूँ और मेरा दृढ़ विश्वास था कि एक ऐसे संगठन में जिसका नेतृत्व एक स्त्री कर रही है, वहाँ एक इतने गंभीर किस्म के स्त्री-उत्पीड़न और हिंसक व्यवहार को कतई माफ नहीं किया जाएगा और दोषी को ऐसी सजा मिलेगी जो एक उदाहरण प्रस्तुत कर सके। अब तक के घटनाक्रम और मेरे अनुभव ने यही साबित किया है कि मैंने बहुत ज्यादा उम्मीद की थी। मैं भूल गई थी कि मेरी हैसियत इस संगठन में क्या है। घटना की लिखित शिकायत के बाद आपने न तो दोषी को संगठन के समक्ष बुलाकर बात करने की जरूरत समझी और न ही मुझसे किसी प्रकार की संवेदना ही प्रकट की। उल्टे आपने अकेले में मुझे बुलाकर कहा कि मैंने लिखित रूप से शिकायत करके और संगठन के अन्य साथियों के समक्ष यह बात रखकर बड़ी गलती की है, जिसके लिए मुझे आपसे लिखित तौर पर माफी मांगनी होगी। इसके जवाब में मैंने यह कहा था कि ऐसा करना मेरा लोकतांत्रिक अधिकार है और मैं नहीं समझती कि संगठन के मंच पर अन्याय का विरोध करना गलत है, इसलिये मैं कोई माफीनामा नहीं दे सकती।&lt;br /&gt;न्याय के लिये धैर्यपूर्वक इंतजार करते हुए मैं संगठन में अपनी जिम्मेदारियों का अपनी तरफ से बेहतर निर्वहन करती आ रही हूँ; और गौर करने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी घटना और समूचे संगठन द्वारा इस आपराधिक कृत्य की भर्त्सना करने के बाद भी पी॰ एन॰ राय के व्यवहार और हाव-भाव में कोई परिवर्तन नहीं आया बल्कि वह और भी हिम्मत के साथ मुझे अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती भेजते रहे, धमकाते रहे कि मैंने उनका विरोध करके बहुत बड़ी गलती की है जिसका खामियाजा मुझे जल्दी ही भुगतना पड़ेगा। चूँकि संगठन के सभी सहकर्मियों को यह उम्मीद थी कि आपकी तरफ से इस घटना का संज्ञान लेते हुए तुरंत बैठक बुलाई जायेगी जिसमें पी॰ एन॰ राय से इस आपराधिक कृत्य का स्पष्टीकरण लिया जाएगा और उचित दण्डात्मक कार्रवाई की जायेगी, परन्तु काफी समय बीत जाने के बाद भी जब कोई हलचल नहीं सुनाई पड़ी तो संगठन के पच्चीस-तीस साथियों ने स्वहस्ताक्षरित शिकायत -पत्र में 23 अक्टूबर की घटना और पी॰ एन॰ राय के इस भयावह कृत्य की घोर भर्त्सना करते हुए आपसे यह मांग की थी कि -&lt;br /&gt;(क) इस निकृष्टतम कुकृत्य की, जो एक स्त्री के प्रति मानसिक और भावनात्मक हिंसा है - कठोर शब्दों में निन्दा करनी चाहिये।&lt;br /&gt;(ख) पी॰ एन॰ राय को उषा से लिखित तथा सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिये।&lt;br /&gt;(ग) उषा जो कि स्वयं पीडि़ता हैं, उनसे किसी भी तरह का माफीनामा या लिखित आश्वासन न माँगा जाए।&lt;br /&gt;(घ) पी॰ एन॰ राय का व्यवहार शुरू से ही न तो बाल-हितैषी है और न ही ऐसा है जो हमारे बच्चों और स्टाफ के लिये अनुकरणीय है। यह संस्था के ध्येय और मूल उद्देश्यों के खिलाफ है। इस प्रकार के महिला विरोधी और मानवीय गरिमा तथा अधिकारों के खिलाफ काम करने वाले व्यक्ति पर उदाहरण प्रस्तुत करने वाली कार्रवाई की जाए।&lt;br /&gt;- उपरोक्त पत्र जिसमें संगठन के पच्चीस से अधिक सदस्यों के हस्ताक्षर थे, आपको सौंपा गया, जिसके फौरन बाद आपने दो काम जल्दी-जल्दी कर डाले। एक तो यह कि 26-11-2007 को मुझे कार्यालय बुलवाकर पी॰ एन॰ राय द्वारा 25-10-2007 की तिथि में मेरे नाम लिखा गया पत्र ऐन उस वक्त दिया जब संगठन की बैठक शुरू हो रही थी और मेरे पास उस पत्र को पढ़ने का बिल्कुल भी वक्त नहीं था। दूसरा यह कि आनन-फानन में उसी दिन बैठक कर ली और पूरी बैठक में अंग्रेजी के अलावा हिन्दी में एक शब्द भी आपने नहीं कहा, नतीजतन बैठक की ज्यादातर बातें मेरी समझ से बाहर ही रहीं और मैं बातचीत की पूरी प्रक्रिया में कोई शिरकत नहीं कर पाई। मैं इससे पहले की कितनी ही बैठकों में शामिल हुई पर इस बैठक में क्यों सारी कार्यवाही एक विदेशी भाषा में चल रही थी यह मुझे बाद में ही समझ में आ सका। सचमुच हिन्दी तो इस देश के नब्बे प्रतिशत असभ्य, गँवार और कंगलों की भाषा है, भला उसमें ऐसी क्षमता कहाँ कि कोई गम्भीर बातचीत की जा सके। इस देश के मूर्ख, निरक्षर, भोले-भाले लोगों, स्त्रियों और दलितों का उद्धार अंग्रेजी बोलने-समझने वाले लोग ही करते आए हैं और रहेंगे भी - यह बात तो औपनिवेशिक स्वर्णयुग से ही हम सब जानते हैं। यह एक सिद्ध और आजमाई हुई भाषा है जिसने सैकड़ों वर्षों तक दुनिया के भूखे-नंगे, बीमार-लाचार लोगों और उनकी संभावनाओं पर हुकूमत की है। बहुत ताकत है इसमें, यह विजेता लोगों की भाषा है। सो देश के एक अत्यंत पिछड़े इलाके से आई हुई एक स्त्री जिसे अंग्रेजी नहीं आती वह भला क्या विरोध कर सकेगी एक अंगरेजी समाज के सामने।&lt;br /&gt;बाद में मुझे और साथियों ने बताया कि बैठक में आपने पी॰ एन॰ राय के कृत्य पर दुख प्रकट करते हुए कहा कि आपने उनपर कड़ी कार्रवाई की है, पर साथियों के यह पूछने पर कि क्या कार्रवाई की गई है, आपने कहा कि यह बताना आप जरूरी नहीं समझतीं। संगठन के खास व्यक्तियों के बारे में सारी बातें सार्वजनिक नहीं की जा सकतीं। साथ ही आपने यह कहा है कि पी॰ एन॰ राय द्वारा किया गया दुर्व्यवहार एक स्त्री के उत्पीड़न के दायरे में नहीं आता। एक सार्वजनिक स्थल पर किसी स्त्री के साथ घोर अपमानजनक व्यवहार करना, उसे मानसिक और भावनात्मक रूप से चोट पहुँचाना, संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित प्रस्ताव और इस देश के संविधान द्वारा लैंगिक उत्पीड़न का ही एक रूप माना गया है। अगर आप नहीं मानतीं तो अवश्य ही इसके पक्ष में आपके पास अकाट्य तर्क होंगे। फिर अगर आप पी॰ एन॰ राय को दोषी मानने से इनकार करती हैं तो यह कहने का क्या अर्थ है कि आपने उन्हें कड़ा दण्ड दिया है ?&lt;br /&gt;सबसे अधिक आश्चर्य मुझे तब हुआ जब मैंने बैठक से लौटकर पी॰ एन॰ राय द्वारा मेरे नाम लिखा गया वह पत्र पढ़ा, जिसे आपने उनके माफीनामे के तौर पर मुझे सौंपा है। जाहिर है यह पत्र आपकी सहमति से, आपके निर्देशानुसार लिखा गया है। यह पत्र एक लोकतांत्रिक संगठन में न्याय की उम्मीद कर रहे किसी भी व्यक्ति के साथ एक भद्दा मजाक ही कहा जा सकता है। आप इस बात से कैसे इनकार करेंगी कि आपने यह पत्र नहीं पढ़ा है।एक भयावह घटना, जिसने मेरे अधिकांश सहकर्मियों, सैकड़ों बच्चों और मुझे दहला दिया था, को अंजाम देने वाला व्यक्ति, उससे भी बड़ी निर्लज्जता के साथ यह कह रहा है कि उसने मेरे साथ जो व्यवहार (?) किया वह व्यवस्था के लिये आवश्यक था। क्या आपने उस व्यक्ति से पूछने की जरूरत महसूस की कि एक महिला सहकर्मी को सरेआम धक्के मारकर शेल्टर से बाहर निकालने की तत्परता और उसके साथ बर्बर कबीलों के जमाने की भाषा का इस्तेमाल कर वह व्यवस्था-पुरूष आखिर किस किस्म की व्यवस्था वहाँ बहाल कर रहे थे ? जिस महिला सहकर्मी के शेल्टर में प्रवेश करने पर उन्हें व्यवस्था भंग होने की भारी चिंता थी, आखिर उसके पीछे क्या वजह थी ? पत्र में उन्होंने खुद को एक समाजसेवक कहते हुए लिखा है कि वे व्यक्तिगत जीवन में महिलाओं को आदर और सम्मान की नजर से देखते हैं - फिर उस दिन की घटना क्या थी ? क्या यह बात उनके सार्वजनिक जीवन और सार्वजनिक स्थलों पर लागू नहीं होती ? पत्र में जो तिथि लिखी गई है वह है - 25-10-2007, और यह पत्र मुझे दिया गया 26-11-2007 को। जाहिर है इतने दिनों तक आपने मेरे माफीनामे या लिखित आश्वासन का इंतजार किया।&lt;br /&gt;26-11-2007 की बैठक के बाद संगठन के पुराने सहकर्मियों ने मुझे साफ तौर पर कहा कि अब मैं संगठन में अपने लिये उल्टी गिनती शुरू कर दूँ - क्योंकि बैठक में जैसी बातचीत हुई है, उससे यही संकेत निकलते हैं। वैसे भी पी॰ एन॰ राय के कारगुजारियों की शिकायत करके मैंने बड़ी आफत मोल ले ली है, और संभव है मुझे इसकी भारी व्यक्तिगत कीमत चुकानी पड़े। लेकिन आपके नेतृत्व और संगठन में मेरा विश्वास पहले की तरह दृढ़ है और मैं मानती हूँ कि संगठन से न्याय की उम्मीद करते हुए मुझे और इंतजार करना चाहिये।&lt;br /&gt;आदर सहित,&lt;br /&gt;उषा&lt;br /&gt;अध्यापिका,बटरफ्लाइज ।</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>एनजीओ और दलितप्रश्न</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post_26.html</link><category>सोचो कि सोचने की ज़रूरत बनी रहे</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Sat, 26 Apr 2008 16:23:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-8026623446261947567</guid><description>&lt;span style="color:#663333;"&gt;यह उल्लेखनीय है कि दक्षिण एशिया के संदर्भ में जाति प्रथा सामंतवाद का महत्वपूर्ण तत्व है। सामंती तथा साम्राज्यवादी दोनों ताकतें अपने फायदे में जाति व्यवस्था का इस्तेमाल करती हैं। सामंती ताकतें जाति व्यवस्था को धर्मों को आपस में तथा धर्म के भीतर वर्गों को आपस में लड़ाने के लिए इस्तेमाल करती हैं। साम्राज्यवादी ताकतें दलित मुद्दे का इस्तेमाल उत्पीड़ित जनता को विभाजित करने में करती हैं। वे जाति व्यवस्था को अक्षुण्ण रखते हुए इसे पृथक पहचान रूप में रेखांकित करती हैं और आर्थिक उदारीकरण को सभी समस्याओं का हल बताती हैं।उत्पीड़क शासक वर्ग शोषितों की तुलना में बहुत ज्यादा वर्ग चेतन होते हैं क्योंकि उन्हें एक विशाल आबादी पर शासन करना होता है। ऐसा वे शोषित वर्गों को बांट कर तथा उनमें से कुछ को एनजीओ के माध्यम से रोटी का टुकड़ा फेंककर करते हैं। जो समुदाय जितना ज्यादा गरीब होता है, उनके लिए एनजीओ को उतना ही ज्यादा फंड आवंटित कराया जाता है। इसलिए दलित मुद्दे तथा दलितों के भीतर दलित औरतों के मुद्दे एनजीओ तथा अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ के लिए खूब बिकाऊ होते हैं। इन सभी योजनाओं का उद्देश्य दलितों के वर्गीय चेतना को कुंद करने के लिए क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को उनसे दूर रखना होता है। ऐसा करने के उनके विभिन्न तरीके हैं।दलितों को ब्राह्मण-विरोधी, मनु-विरोधी तथा ओबीसी-विरोधी के रूप में इतना ज्यादा प्रचारित किया जाता है कि दलित पहचान संकीर्णतावादी चरित्र ग्रहण कर लेता है। ब्राह्मण संस्कृति से लड़ने के नाम पर वह दलित ब्राह्मणवाद व्यवहृत करने लगता है जिसके तहत अपनी पहचान खोने के डर से दलित स्त्री -पुरूषों को दूसरी जातियों, धर्मों तथा समुदायों में विवाह करने से रोकते हैं। उत्पादन संबंधों एवं दलितों-गैर-दलितों के बीच सांस्कृतिक संबंधों के सामंती चरित्र पर चोट करने की जगह राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ गैर-दलितों के साथ झगड़ों से बचने के नाम पर अलग पानी का नल, मंदिर, समुदायिक भवन आदि बनाकर उनके अलगाव को और ज्यादा बढ़ावा देते हैं। दलितों में एकता मजबूत करने के लिए विभिन्न दलित जातियों का जमात बनाने की जगह वे अलग-अलग दलित जाति का अलग संगठन बनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और फिर ज्यादा-से-ज्यादा फंड पाने के लिए उनमें प्रतियोगिता पैदा करते हैं। इसका परिणाम होता है कि अपेक्षाकृत शिक्षित और उन्नत दलित जातियां ज्यादा फंड पाने में सफल होती हैं, जिससे दलितों के बीच विभाजन होता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मध्यवर्गीय अवसरवादी दलित नेता भी तैयार किये जाते हैं जिनका इस्तेमाल संसदीय राजनीति के तहत वर्गीय शासन को चलायमान रखने के लिए किया जाता है।कई राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ हिन्दू फासिस्टों के साथ मिलकर साम्प्रदायिक दंगे भी भड़काते हैं। भारत में गुजरात के गोधरा में २००२ में हिन्दू-मुसलमानों के बीच जो दंगे हुए वह इसका एक उदाहरण है। ऐसा पाया गया कि कई हिन्दू फासिस्ट एनजीओ दलित पहचान के संकट को उनमें मुसलमानों से भय तथा उनके खिलाफ हिंसा करने के लिए प्रेरित करने में इस्तेमाल करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#6600cc;"&gt;सीपीएन (माओवादी) के मुखपत्र "&lt;span class=""&gt;द &lt;/span&gt;वर्कर" की लेखमाला "जन युद्ध और दलित &lt;span class=""&gt;प्रश्न"&lt;/span&gt; के जन विकल्प द्वारा अनूदित एवं प्रकाशित आलेख से कुछ अंश साभार&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>Oh, What A Racket!</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/oh-what-racket.html</link><category>कतरनें और चिन्दियाँ</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Sat, 26 Apr 2008 15:24:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-1423966264087929800</guid><description>Author: Anupreeta Das&lt;br /&gt;Publication: Outlook&lt;br /&gt;Date: September 22, 2003&lt;br /&gt;Introduction: The hills are alive with the buzz of self-seeking NGOs, many existing only in name&lt;br /&gt;Lush forests are not the only bounty that Uttaranchal got in its kitty after it became a state in November 2000. It also got close to 45,000 NGOs— mind-boggling for a state so tiny, with a population of only 84.7 lakh. Records from the offices of the chief commissioner of income tax and the registrar of societies confirm this huge NGO presence. What has also come as a surprise to the authorities is the unusually high density of NGOs in a state with 13 districts. That's nearly 4,000 NGOs per district!&lt;br /&gt;When Uttaranchal's IT commissioner Ashwini Luthra initiated a survey of NGOs in May, he did not expect to chance upon a fraud that runs into crores of rupees. "When the IT department started collecting data, we found that many NGOs did not actually exist or were non-functional," says Luthra. "Yet, money is being pumped into trusts, educational societies, NGOs and ashrams all over Uttaranchal."&lt;br /&gt;While the IT office lists a total 44,824 groups, the office of the registrar puts the figure at 41,826.&lt;br /&gt;No wonder then that Uttaranchal's NGO community is rife with allegations of corruption and diversion of funds. Amidst the profusion, one can find registered NGOs such as the Mahila Vikas Sansthan and Priyadarshini Himalayan Seva Institute that don't exist at their addresses, educational societies that have run up huge accounting discrepancies, and blacklisted NGOs that are ostensibly unaware of their disrepute.&lt;br /&gt;Take, for instance, the Bal Evam Mahila Kalyan Sansthan in Dehradun's Nehru Nagar. This NGO has been blacklisted by the Central Social Welfare Board (CSWB) for "non-refund of loans and non-submission of accounts", but its founder-director Parmanand Agarwal denies it outright. "In the past, we have run a tailoring centre, training sessions for making incense sticks and health relief camps with funds from CAPART. Who says we have been blacklisted?" asks Agarwal. He took voluntary retirement from the army to pursue his "mission", which is to provide "literacy, health and employment for the people of Uttaranchal". His tiny one-room office, which sits atop his residence, houses the meagre tools of his mission: a computer, a typewriter, two desks, government pamphlets and a telephone.&lt;br /&gt;Since 2001, Agarwal's NGO has been running a tele- counselling centre for HIV/AIDS under a Rs 2.74 lakh grant from the National AIDS Control Organisation. "People call every few minutes asking about HIV/ AIDS," he informs us and opens a register to show calls recorded at two-minute and three- minute intervals. However, in the one hour we sat in his office, there was not a single call. Agarwal insists it is because it's "lunch break", presumably for callers too. Neither he nor his colleague Dinesh Chand seem to know much about HIV/ AIDS. "Hum pamphlet se padh ke batate hain (We read out answers to queries from the pamphlets)," explains Chand.&lt;br /&gt;Faced with reports and allegations of such misconduct, Dehradun's district magistrate ordered a survey of registered NGOs and societies in June last year. Dehradun district is home to 7,469 NGOs, the largest concentration in the state. The initial results of the survey show that of 223 organisations checked so far, 139 NGOs and societies are fraudulent or registered only on paper. "It is quite evident that barely 10 per cent of the NGOs in Dehradun district are functional. The rest just sit there, waiting for funds to come by," says chief development officer P.S. Jangpangi. He says the situation in the rest of Uttaranchal is "even worse".&lt;br /&gt;Examination of bank accounts has yielded irregularities in the funds of many NGOs. The Van Karamchari Welfare Society, for instance, could not identify the source of Rs 4.6 lakh in its bank account when questioned by officials of the District Programmes Office (DPO).Setting up schools appears to be another racket. In October last year, a survey of educational societies by the IT department showed unaccounted funds to the "tune of several crores", says an IT official. However, Devender Mann, chairman of the Doon International School Education Society (not to be confused with the renowned Doon School), which is one of the schools surveyed, dismisses it as "baseless". "We are a no profit, no loss society. All the money we earn from students is spent on improving school facilities," he says.&lt;br /&gt;Furthermore, a rough estimate by the registrar's office shows that nearly 10,000 NGOs and societies have been registered since Uttaranchal was created. "After schools, NGOs are the sunrise industry," says Geetanjali, a social worker with the development NGO Rural Litigation and Entitlement Kendra (RLEK).&lt;br /&gt;"Many paratroopers, lured by the funds on offer for a newborn state, have come in and set up NGOs," alleges RLEK chairman Avdhesh Kaushal. Uttaranchal is one of the few states that enjoys special status with regard to central government development funds. Besides, several international aid agencies too have pitched their tents here. "There is money to be had, respect to be earned and very little work to be done. No wonder, starting an NGO is a very attractive option," says Kadambari Gosain, who helps her husband S.S. Gosain run the Kunwari Human Development Institute in Dehradun.&lt;br /&gt;The Gosains, however, have run into financial difficulties and now run private vocational training courses even though their institute is registered as a 'no profit, no loss' one. "We are poor and honest. Why don't you talk to all those relatives of government officials who have also started their own NGOs?" asks Gosain.&lt;br /&gt;There is much speculation among the NGO community about the wives of Uttaranchal's bureaucrats running NGOs to line their pockets. But in the absence of any proof, the suspicion is mostly based on observation and hearsay. "These NGOs never participate in workshops and meetings, so we don't know what they do. They say they have no sources of funds but they bring out glossy calendars and stationery every year," says J.M. Singh of NGO Mamta Samajik Kendra, which works on health- related issues in the Chakrata region.&lt;br /&gt;The government policy itself may be a reason for the mushrooming of NGOs. Says Sushil Sharma of Aarohi, which has been working in the Nainital-Almora region for 15 years, "Top government officials have been mindlessly promoting development through the creation of women's self-help groups, which are registered as societies." At present, registered mahila and yuva mandals, which are intended as grassroots empowerment groups for women and the youth under a CSWB scheme, number 20,401. Meanwhile, Singh argues that development NGOs should be registered separately from religious, cultural and educational societies in order to bring the number down to "manageable" levels.&lt;br /&gt;Uttaranchal is not the only state in the country with such a large number of registered NGOs and societies—Maharashtra has approximately 50,000.But the number is suspect because of the state's size. According to Sanjay Bapat of the website www.indianngos.com, which maintains a database of NGOs in India, of the 20 lakh registered NGOs and societies in the country, only 30,000 or so are actually doing developmental work. How many of these are in Uttaranchal is anybody's guess.</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>रीटा पणिक्कर के नाम पहला पत्र</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post_24.html</link><category>एनजीओनामा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Thu, 24 Apr 2008 15:39:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-5565541384642827347</guid><description>2४ -१० -२००७, नयी दिल्ली।&lt;br /&gt; सेवा में,&lt;br /&gt;निदेशक,&lt;br /&gt;बटरफ्लाइज , ग्रीन पार्क एक्सटेंशन ,नई दिल्ली-110016।&lt;br /&gt;विषय:- फतेहपुरी नाइट शेल्टर में एक वरिष्ठ सहकर्मी पी० एन० राय और उनके उकसावे पर केयर टेकर कलाम द्वारा मेरे साथ लगातार किये जा रहे दुर्व्यवहार और मानवाधिकार हिंसा के बारे में।&lt;br /&gt;आदरणीया रीटा जी,&lt;br /&gt;नमस्कार।&lt;br /&gt;मैं यह पत्र आपको इसलिये लिख रही हूँ क्योंकि अब इसके अलावा मेरे पास और कोई विकल्प नहीं रह गया है। एक महिला होने की वजह से जैसा भेदभाव और हिंसक व्यवहार मेरे साथ हो रहा है मुझे इसपर काफी दुख भी है और आश्चर्य भी। आश्चर्य इसलिये कि मैं अबतक यही समझती रही कि जिस संगठन में मैं काम कर रही हूँ वह किसी भी किस्म के मानव अधिकारों के दमन के खिलाफ तो है ही साथ ही इस संगठन के कुछ मूल्य भी हैं, जिनसे पूर्ण सहमति का वादा लेने के बाद ही इस संगठन से कोई जुड़ सकता है, और जिस एक बात से संगठन के अंदर मानवीय और न्यायपूर्ण माहौल की उम्मीद बनती है वह है एक महिला का संगठन में शीर्ष पर होना। पर मुझे दुख के साथ यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि अबतक के अनुभव ने संगठन और इसके ढाँचे पर मेरे विश्वास को कम ही किया है। क्या ऐसे संगठन को लोकतांत्रिक कहा जा सकता है जहाँ निष्ठापूर्वक काम करनेवालों के साथ जानवरों-जैसा सलूक किया जाए और विरोध की आवाज को धमकियों और हिंसक व्यवहार से दबाया जाए ? सवाल उठता है कि जब बाल अधिकारों के लिये काम कर रहे कार्यकर्ता स्वयं ही उत्पीड़न के शिकार हों तो उस संगठन में बच्चों के अधिकारों की कितनी सुरक्षा हो सकेगी - उनमें भी वैसे बेघर और बेसहारा बच्चे, जिनके साथ हर कदम पर छल ही होता आया है ?&lt;br /&gt;गौरतलब है कि -&lt;br /&gt;(1) विगत 22-10-2007 को अपनी कार्ययोजना (वर्क प्लान) के अनुसार जब मैं फतेहपुरी नाइट शेल्टर में कक्षा लेने पहुँची तो कक्षा के वक्त बच्चों से व्यवस्था-सम्बंधी कार्य कराये जा रहे थे। मेरे द्वारा हस्तक्षेप करने पर केयर टेकर कलाम ने बच्चों के सामने ही मुझसे अपमानजनक व्यवहार किया और कहा कि यहाँ मेरा राज चलता है। आपको जिससे शिकायत करनी हो करके देख लीजिये, मेरा कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। बड़ी मुश्किल से बच्चों की कक्षा ली जा सकी, क्योंकि माहौल काफी अशांत हो चुका था।&lt;br /&gt;(2) अगले दिन 23-10-2007 को जब मैं तय समय पर दुबारा फतेहपुरी पहुँची तो शेल्टर के गेट पर ही वरिष्ठ सहकर्मी पी० एन० राय ने अत्यंत भद्दे और अपमानजनक तरीके से मुझे रोक दिया और कहा कि मुझे अंदर नहीं जाने देंगे। उस समय वहाँ काफी संख्या में अन्य सहकर्मी और बच्चे उपस्थित थे और यह दृश्य देख रहे थे। जब मैंने उनसे इस दुर्व्यवहार का कारण जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि इस संगठन में केवल उनकी मर्जी चलती है और अगर इस संगठन में रहना है तो उनके इशारे पर चलना होगा। उन्होंने दुबारा मुझसे कहा कि फौरन यहाँ से निकलो वरना धक्के मारकर निकाल दूँगा। चूँकि पूरी घटना मुख्य गेट पर घटित हो रही थी इसलिये बाहर भी काफी लोग जमा हो गये थे जो अजीब तरीके-से मुझे घूर रहे थे। मैं खुद को अत्यंत अपमानित महसूस करती हुई करीब आधे घंटे तक गेट के बाहर खड़ी रही और उसके बाद मैंने ऑफिस में इस घटना की सूचना दी।&lt;br /&gt;यह सारी बात आपके सामने रखते हुए मैं आपसे यह जानना चाहती हूँ कि क्या -&lt;br /&gt;(1) ऐसे माहौल में संगठन में किसी महिला का सम्मानजनक तरीके से काम करना संभव है ?&lt;br /&gt;(2) क्या एक लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों के लिये काम करने वाले संगठन में किसी व्यक्ति को, चाहे वह किसी भी पद पर हो, किसी महिला सहकर्मी का उत्पीड़न करने की छूट दी जा सकती है ? अगर नहीं तो ऐसे व्यक्ति को संगठन में रखने की क्या मजबूरी हो सकती है ?&lt;br /&gt;(3) शेल्टर के बच्चों, दूसरे सहकर्मियों और बाहरी व्यक्तियों के सामने महिला सहकर्मी के साथ इस तरह का बर्ताव करना संगठन के किन मूल्यों का परिचय देता है ?&lt;br /&gt;(4) इन दिनों चूँकि मैंने कई बार अपने साथ किये जा रहे दुर्व्यवहार की शिकायत मौखिक तौर पर की है और हर बार मुझे यह सुनना पड़ा है कि यहाँ विरोध करने वाले को अंततः संगठन छोड़ने पर मजबूर कर दिया जाता है। क्या मैं यह समझूँ कि मेरे साथ भी यह सब इसी वजह से किया जा रहा है कि मैं भी अपना आत्मसम्मान बचाने के लिये यह संगठन छोड़ दूँ, जिस तरह दूसरे सहकर्मी छोड़ते रहे हैं ?&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;चूँकि सड़क के बच्चों के लिये काम करना मेरी व्यक्तिगत प्रतिबद्धता है और मुझे उन जिम्मेदारियों का भी एहसास है जो इस संगठन से जुड़ते वक्त मैंने ली थी, इसलिये मैं ये सारे सवाल आपके और संगठन के सामने रख रही हूँ। इस उम्मीद के साथ कि एक सामाजिक और लोकतांत्रिक संगठन अपने मूल्यों को किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों पर कुर्बान नहीं होने देगा और समुचित कार्रवाई करेगा, ताकि बेघर और मुसीबतजदा बच्चों तथा बाल अधिकार कार्यकर्ताओं के सम्मान और अधिकारों की सुरक्षा की जा सके एवं उन्हें एक गरिमा से पूर्ण माहौल दिया जा सके।&lt;br /&gt;विश्वासभाजन,&lt;br /&gt;उषा&lt;br /&gt;अध्यापिका, बटरफ्लाइज।</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>रीटा पणिक्कर के नाम एक खुला पत्र</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post_22.html</link><category>एनजीओनामा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Tue, 22 Apr 2008 14:50:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-2784200405812049436</guid><description>04 फरवरी, 2008नई दिल्ली।&lt;br /&gt;आदरणीया निदेशक ,&lt;br /&gt;बटरफ्लाइज , यू -४, ग्रीनपार्क एक्सटेंशन , नई दिल्ली - 110016।&lt;br /&gt;महोदया,&lt;br /&gt;अपने ईमेल से भेजे गये पिछले चार पत्रों के समुचित जवाब और न्याय की उम्मीद करते हुए जितना लम्बा समय मैंने धैर्यपूर्वक इंतजार करते हुए बिताया है इस बात से आप और संगठन के सभी सदस्य भलीभाँति परिचित हैं। अपने साथ हुए भयावह दुर्व्यवहार के दोषी पी॰ एन॰ राय पर कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए पहला पत्र मैंने 24 अक्टूबर 2007 को भेजा था और उसके बाद क्रमशः 03 दिसम्बर, 06 दिसम्बर और 15 जनवरी 2008 को अन्य पत्र भेजे। न्याय की मेरी इस मांग के समर्थन में तथा पी॰ एन॰ राय को ऐसे आपराधिक कृत्य के लिये संगठन से बाहर निकालने की पुरजोर मांग करते हुए संगठन के 25 से अधिक सदस्यों ने आपको प्रतिवेदन दिया था। पूरे संगठन की भावना और मानव अधिकारों के साथ खिलवाड़ करते हुए आपने पी॰ एन॰ राय को बचाने में भूखे-नंगे, बेघर-बेसहारा बच्चों के नाम पर इकट्ठा किये गये पैसों को पानी की तरह बहाया। बेघर बच्चों को आश्रय देने के नाम पर बटोरी गई राशि कुछ जेबों में जाती रही और बच्चे भूख, मौसम और पुलिस की मार सहते हुए फुटपाथों पर दम तोड़ते रहे।&lt;br /&gt;वैसे ये बातें आप जैसे बाल अधिकार का व्यवसाय करने वाले लोगों के लिये कुछ खास महत्व की नहीं हैं यह बात जगजाहिर ही है।अपने साथ हुए बर्बर दुर्व्यवहार की शिकायत करते हुए 24 अक्टूबर को आपके नाम भेजे गये मेरे पत्र की तारीख से लेकर अबतक करीब चार महीने गुजर चुके हैं और इस बीच आपने जो भी हथकंडे अपनाये हैं उनसे साबित हो चुका है कि आप पी॰ एन॰ राय पर कार्रवाई की मांग करने वाले संगठन के सभी सदस्यों को हर कीमत पर कुचल देना चाहती हैं। बर्बर कबीलाई आचरण में अब आपने पी॰ एन॰ राय को भी पीछे छोड़ दिया है। पूरे संगठन के कड़े विरोध के बावजूद अपने जरखरीद और ईमान की दुकानदारी करने वाले कुछ लोगों को जुटाकर आपने भानुमति का कुनबा जोड़ा और उसे जाँच कमिटि के नाम पर इस मामले को दबाने, कुचलने की खुली छूट दे दी। इस जाँच कमिटि के सदस्यों ने मेरे तथा कुछ अन्य सहकर्मियों के साथ जैसा बर्ताव किया उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है ये लोग किसी पुलिसिया एनकाउण्टर दल के लिये सबसे योग्य उम्मीदवार हो सकते हैं। मानवाधिकारों के इन बड़े और मँझे हुए खिलाडियों की सलाह से आपने सबसे पहले एक-एककर उन लोगों को संगठन से बाहर निकाला जो इस मामले के प्रत्यक्ष गवाह थे (मो॰ आजाद, सुनील, डॉक्टर प्रदीप, तेजपाल, सादिक, सुनील कुमार, अशरफ और मनोज) और किसी भी कीमत पर बिकने को तैयार नहीं थे।शेष बचे सदस्यों को डराने, धमकाने और ब्लैकमेल करने में आपने कोई कसर नहीं छोड़ी। वर्तमान में भी साथी ऋषि और मोनिका को हर स्तर पर प्रताडि़त किया जा रहा है और यदि उन्होंने भी झुकना कबूल नहीं किया तो आश्चर्य नहीं कि जल्दी ही उन्हें भी संगठन से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। आपके इस अभियान में प्रमुख भूमिका निभा रहे तीनों नुमाइंदे जावेद, सत्यवीर और पी॰एन॰राय जिनके कुकर्मों के बल पर आप अब तक बच्चों का कारोबार चलाती रही हैं और सड़क पर रहने वाले बेघर, बेसहारा बच्चों के बीच आतंक फैलाती रही हैं, पिछले चार महीनों से संगठन के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं और बच्चों को डराने, धमकाने के साथ-साथ जान से मारने की धमकी देते फिर रहे हैं।&lt;br /&gt;दरअसल प्रारम्भ में सरकार की आलोचना कर सहानुभूति बटोरने वाले और देशी-विदेशी धनकुबेरों तथा थैलीबाजों को झूठी तस्वीरें दिखाकर भ्रमित करने वाले आप जैसे लोग संगठन को अपनी जागीर समझते हैं और इसीलिये जबान खोलने वाले सहकमिर्यों (अथवा कर्मचारियों) को कुचलने में नीचता की सारी हदें लांघ जाते हैं। चूंकि आप जैसे लोग सोशल सेक्टर को पैसा बनाने का सबसे सुरक्षित जरिया मानते हैं इसलिये आपका सबसे बड़ा मूल्य पैसा है। आपके इस व्यवसाय में बाधा डालने वाले आपके लिये बड़े दुश्मन हैं। यह अकारण नहीं है कि सड़क के बच्चों को ड्रग्स की सप्लाई करने वाले, उन्हें भीख मांगने और देह व्यापार करने के लिये मजबूर करने वाले माफिया और ठेकेदार तथा पुलिस वाले जो छोटे-छोटे बच्चों को बेरहमी से मार-पीटकर उनसे ड्रग्स बिकवाते और उनका भयावह दैहिक मानसिक शोषण करते-करवाते हैं आपके अघोषित मित्र हैं जिनका विरोध करने की बजाय आप लोग उनसे गलबहियाँ डाले रहते हैं।&lt;br /&gt;चार महीनों के अपने प्रशासनिक प्रहसन की अगली कड़ी में यह भी सम्भव है कि आप उस मुर्दा फर्जी जांच कमिटी को फ़िर से सामने ले आयें पर अब यह गुलाम कमिटी और आपके अपर्णा भट्टों एवं योगेश मेह्ताओं जैसे कारिंदे , जिनका सरोकार ही मानवाधिकारों का व्यवसाय कर पैसा बनाना है , भी आपके हित में कोई करिश्मा कर पाने में कामयाब नहीं हो सकेंगे। आपने अपने अपराधों की फेहरिस्त इतनी लम्बी कर ली है कि कोई भी साबुन उसे धो नहीं सकेगा।&lt;br /&gt; आपका यह मानवविरोधी चरित्र उस तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टी (पीसीसी सीपीआई एमएल) के चरित्र को भी उजागर करता है जिसके स्वनामधन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं के प्रयास से बटरफ्लाइज की स्थापना हुई थी और आज भी जिसके कुछ नेता इस संगठन के सिपहसालार और संरक्षक बने हुए हैं। जाहिर है इसके एवज में उन्हें हर महीने एक मोटी रकम बतौर नजराने मिलती है। छिः यह पार्टी खुद को सर्वहारा का हितैषी कहती फिरती है। इस देश का इससे बढ़कर दुर्भाग्य भला और क्या हो सकता है ?&lt;br /&gt;कुछ और भी संगठन जिनमें पीयूडीआर (पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स) आदि शामिल हैं, का मानवतावादी नकाब उतारने में इस घटना ने बड़ी भूमिका निभाई है। बटरफ्लाइज निदेशक के काले कारनामों की शिकायत लेकर जब संगठन के दर्जनों सदस्य इस संगठन के पास गये और हस्तक्षेप की मांग की तो पहले तो उन्होंने सहयोग का भरोसा दिलाया और बाद में बेशर्मी से पीछे हट गये। यह बात साबित करती है कि इस हम्माम में सब नंगे हैं। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो- ‘‘हाय हाय मैंने उन्हें देख लिया नंगा, अब इसकी मुझे और सजा मिलेगी !"&lt;br /&gt;सार्वजनिक पैसों का इतना निर्लज्ज दुरुपयोग और संस्थाबद्ध भ्रष्टाचार एवं शोषण का ऐसा वीभत्स प्रदर्शन विरले ही देखने को मिलता है। समाज के संवेदनशील , जनपक्षधर और प्रगतिशील लोगों की ऐसी घटनाओं के प्रति मुर्दा खामोशी सचमुच एक अज्ञात रहस्य की तरह है। क्या हम सब हत्यारों के साझीदार हो गये हैं ? क्या साम्राज्यवाद हर विरोध को सहमति में बदलने में कामयाब हो गया है ? अगर नही तो इस नपुंसक चुप्पी की और क्या वजह हो सकती है ? फैज अहमद फैज की ये पंक्तियाँ दुहराने का माकूल वक्त है यह शायद-&lt;br /&gt;‘‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे बोल जबाँ अब तक तेरी है&lt;br /&gt;तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा बोल कि जाँ अब तक तेरी है&lt;br /&gt;देख के आहंगर की दुकाँ में तुन्द हैं शोले सुर्ख है आहन&lt;br /&gt;खुलने लगे कुफलों के दहाने फैला हर इक जंजीर का दामन&lt;br /&gt;बोल ये थोड़ा वक्त बहुत है जिस्म-ओ-जबाँ की मौत से पहले&lt;br /&gt;बोल कि सच जिन्दा है अब तक बोल जो कुछ कहने हैं कह ले।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर खासो-आम की अदालत में और जिन्दा लोगों के सामने इस पूरे मामले को रखते हुए मुझे पूरी उम्मीद है कि लोग इस गहन अंधकार के खिलाफ एकजुट होकर बदलावकारी हस्तक्षेप करेंगे।&lt;br /&gt;उषा ,&lt;br /&gt;संगीत अध्यापिका,बटरफ्लाइज ।</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>जितेन्द्र की मौत से उठते सवाल</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post_19.html</link><category>एनजीओनामा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Sat, 19 Apr 2008 17:02:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-8614087754100936551</guid><description>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;street health initiative&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;dear friends,&lt;br /&gt;we weep this morning to mourn an unknown boy jitender who died a lonely completely avoidable death of tb. his last breadths were on a hospitall bed in lnjp hospital with a young caring doctor and some volunteers by his side. but till just a day earlier, he was wasting between railway tracks on new delhi railway station.&lt;br /&gt;in dil se, we need to craft (and resource) a community health initative for the streets (and our hostels). we have a small proposed plan. we wanted to invite you all to a brainstorming for this, at B102, Sarvodaya Enclave at 5 pm on 20 july. i do hope that you can make it. thank you for your time and solidarity.&lt;br /&gt;warm regards,&lt;br /&gt;harsh&lt;br /&gt;Harsh Mander,Aman Biradari,&lt;br /&gt;R38-A, South Extension Part 2,New Delhi 110049.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;Human history is not only a history of cruelty, but also of compassion, sacrifice, courage, kindness. What we choose to emphasize in this complex history will define our lives. Howard Zinn.&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आदरणीय हर्ष सर,&lt;br /&gt;नमस्कार&lt;br /&gt;जितेन्द्र की मौत की ख़बर सुनकर मुझे गहरा सदमा पंहुचा है क्योंकि मैं उसके साथ विगत ५-६ महीनों से व्यक्तिगत रूप से जुड़ा हुआ था, पर मुझे जिस एक और बात से काफी आघात पंहुचा है वह यह कि आपने उसके नाम से जो एक अपील -नुमा पत्र अपने कुछ मित्रों को भेजा है (जो मेरे किसी मित्र ने मुझे फोरवर्ड किया है) उसमे जितेन्द्र के बारे मे आधा ही सत्य लिखा है जबकि आप विगत ४-५ महीनों से जानते थे कि जितेन्द्र को टी.बी. है. चार महीने पहले मैंने वरुण और राजेश भाई के साथ मिलकर एल एन जे पी हॉस्पिटल मे उसका इलाज शुरू करवाया था और उसके बाद जितेन्द्र मार्च के महीने मे सराय बस्ती हॉस्टल मे शिफ्ट हो गया था .&lt;br /&gt;शुरुआत के कुछ दिनों तक हमारे अतिरिक्त प्रयास से उसका इलाज भी चला पर चूंकि आपकी और संगठन की उसमे बिल्कुल भी दिलचस्पी नही थी इसलिए बाद मे उसके लिए एक ही विकल्प बच गया था कि वह सराय बस्ती मे पड़ा पड़ा अपनी मौत के दिन गिनता रहे। तबसे लेकर एक-दो सप्ताह पहले तक , जब उसे अन्तिम बार किंग्सवे कैंप टी.बी. सेंटर मे सराय बस्ती के कुछ बच्चे अकेला छोड़ गए ,जितेन्द्र के साथ कभी सम्मानजनक बर्ताव नही किया गया .&lt;br /&gt;इसलिए आपका यह लिखना अर्धसत्य है कि अस्पताल मे भरती कराने के ठीक एक दिन पहले वह रेलवे स्टेशन पर ट्रैक के बीच मे पड़ा मिला था। मैं या मेरे जैसे मित्र जो अच्छी तरह से उन हालात से परिचित थे जिनसे जितेन्द्र लगातार संघर्ष कर रहा था, वे कभी भी यह कबूल नही करेंगे कि जितेन्द्र की मौत को महज एक द्रवित करने वाली घटना मानकर थोड़े नकली आंसू बहा लिए जाएँ और सचमुच की उस बड़ी गैरजिम्मेदारी से बच निकला जाए जो जितेन्द्र की असमय मौत से साबित हुई है ।&lt;br /&gt;जितेन्द्र की मौत से कई ऐसे सवाल उपज रहे हैं जिनके जवाब देने की ज़िम्मेदारी से हम बच नही सकते –(१) मार्च के महीने में जब जितेन्द्र को सराय बस्ती हॉस्टल में शिफ्ट कराया गया तो क्या उसके इलाज के लिए पर्याप्त इंतजाम किए गए थे ?(२) टी.बी. के एक ऐसे मरीज़ के लिए जिसने पहले ही जीने की आस छोड़ दी थी , उस हॉस्टल में क्या सुविधाएं  मुहैया कराई गयी  थीं ? हम सभी इस बात को जानते हैं कि हॉस्टल  में खाना, पानी, इलाज और सफ़ाई को लेकर कितनी लापरवाही बरती जाती रही है और मरीज़ की बात छोड़ दें वहां  तो सामान्य बच्चों के लिए भी हमेशा इन्फेक्शन का खतरा बना रहा है ।(३)  जितेन्द्र लगभग तीन महीनों तक सराय बस्ती हॉस्टल में रहा और इस बीच उसके इलाज को लेकर जिस भयानक आपराधिक किस्म की लापरवाही बरती जाती रही , इस बात को तमाम पुराने साथी कबूल करेंगे. उसके नाम पर जो दूध, फल आदि आते थे उसे दूसरे लोग खाते थे और उसकी दवाइयों के पैसों से फिल्मो की सीडी मंगाई जाती थी.(४) क्या यह सच नही है कि अपने इलाज में बरती जा रही लापरवाही से जितेन्द्र अत्यन्त दुखी था और उसने हममे से ज्यादातर लोगो को यह बात बताई थी कि उसका इस संगठन और हॉस्टल प्रशासन से पूरी तरह भरोसा उठ चुका है – कि सभी उसके मरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं – कि वह ख़ुद को बहुत ही असुरक्षित और अकेला महसूस कर रहा है ?(५) जब ज़्यादा तबीयत  बिगड़ने पर उसे पहले एल एन जे पी और बाद में  किंग्सवे कैंप टीबी सेंटर भेज दिया गया  तो क्या यह सच नही है कि उसके साथ जो दिलीप नाम का बच्चा होता था केयर टेकर के तौर पर , उसे पानी और इमर्जेंसी की  दवाइयाँ खरीदने तक के पैसे नही दिए जाते थे और वो बेचारा दो-दो दिनों तक मरीज़ के साथ भूखा-प्यासा हॉस्पिटल में बैठा रहता था.(६) अगर ऐसे हालत में जितेन्द्र  किंग्सवे कैंप से भाग कर फ़िर न्यू डेल्ही रेलवे स्टेशन आ गया था  तो उसके पास इसके अलावा और कौन सा विकल्प था ? और क्या जितेन्द्र ही अकेला ऐसा बच्चा था सराय बस्ती हॉस्टल का जिसके साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार किया गया ? क्या आरिफ , जो ब्लड कैंसर से पीड़ित था उसके साथ भी यही व्यवहार नही हुआ और बाद में अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए उसे चाइल्ड वेलफेयर कमिटी जिसे आप ख़ुद बच्चों के खिलाफ बर्बर कार्रवाई करने वाली एक संस्था के रूप मी बताते रहे हैं, के हवाले कर दिया गया?ये सारे ही सवाल अत्यन्त अप्रिय लगने वाले हैं पर क्या एक ऐसे व्यक्ति को जो बच्चो- खासकर सड़क के बच्चो के लिए बेहतर दुनिया बनाने के नारे के साथ अभियान चला रहा हो , इन सवालों से बच कर निकलने का रास्ता दिया  जाना   चाहिए ?आप लिखते हैं कि जितेन्द्र जैसे बच्चों की मदद के लिए एक (स्ट्रीट बेस्ड ) कम्युनिटी  हैल्थ इनिशिएटिव तुरंत शुरू करने के लिए आपने एक प्लान तैयार किया है ……ताज्जुब है… जितेन्द्र की मौत सड़क पर निराश्रित पड़े हुए किसी बच्चे की मौत की घटना भर नही है बल्कि यह ऐसे बच्चों के नाम पर देश-विदेश से धन लेकर शुरू किए गए हॉस्टल और केयर एंड प्रोटेक्शन के दावे के औचित्य पर भी एक सवालिया निशान है ।वास्तविकता तो यह है कि अब इस नारे के पीछे की असलियत खुलकर सामने आ गई है और ज़्यादा दिनों तक सड़क के बच्चों की उम्मीदों के साथ छल करने की इजाज़त किसी को नही दी जा सकती. इन ज़रूरी सवालों के जवाब अब लिए जाने चाहिए तभी जितेन्द्र जैसे बच्चो को न्याय मिल पाएगा .आपसे एक बार फ़िर मेरा यह निवेदन है कि आप प्लीज सड़क के बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दें ताकि वे  कम से कम जीवित तो रह सकें । जबरन इन बच्चों (?) की मदद करने की आपकी कोशिशों ने उनका जीना दूभर कर दिया है .आशा है आप अन्यथा नही लेंगे .&lt;br /&gt;सादर,&lt;br /&gt;अभिषेक शर्मा(अमन साथी) । &lt;br /&gt;१८-०७-२००७, नयी दिल्ली।</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>my feelings on loss of my friend: Jitender</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/my-feelings-on-loss-of-my-friend.html</link><category>एनजीओनामा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Tue, 15 Apr 2008 15:18:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-2666282311720608541</guid><description>&lt;strong&gt;17-07-2007&lt;/strong&gt;.&lt;br /&gt;Greetings! Dear friends I am writing here to share my deep feelings for the close friend I made from the streets who reached my heart, the friend named jitender who I unfortunately lost due to his prolonged i'll health... the pain I feeling in my heart for this valuable loss is something I am unable to define in words... I believe we cud have helped Jitender fight out and survive this avoidable death  and somewhere deep within me I feel myself responsible for this failure that even after getting him admitted in T.B. hospital, somehow follow up could not be made and  I specially wasn't able to follow up... due to my own accident after which I myself was on long bed rest... after me recovering from my wounds, when i was back on work  after a long break/gap when I came to know about Jitender's then present condition I found him between the railway tracks instead of the hospital in a condition that  his 17 year old boy was in a totally naked condition between two railway tracks and in that condition he resembled like a skeleton with only bones left in his body weighing around only 10 kgs...  a condition which was hard to look at so I wonder how he was surviving it.&lt;br /&gt;when I asked him how and why did he reach back to new delhi railway station?... Jitender replied to me, "bhaiya wahan log sab marr rhe the.. me bhi marr jata... isliye me wahan se bhag aya"  ....... and I still believe if I were there I would have been able to stopped him from running away from the hospital...&lt;br /&gt;I still believe that this untimely death of  my friend Jitender could have been avoided by our a little more efforts and care. what I feel is the urgent need now is to maintain proper follow ups as a team effort and get more serious and careful so that such unfortunate incidents do not take place in future। we should try and get more efficient on our own responsibilities instead of playing blame game. Lastly, it is just that I shall miss my friend Jitender who will forever stay in my heart as a close friend that I had found...&lt;br /&gt;May his soul rest in peace...&lt;br /&gt;Warm Regards&lt;br /&gt;Varun (luckey)</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>जितेन्द्र के बारे में जो अब नहीं है</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post_15.html</link><category>एनजीओनामा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Tue, 15 Apr 2008 14:38:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-2082517442024405008</guid><description>&lt;strong&gt;1८-0७-2००७, दिल्ली&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वरुण और मेरे अजीज़ दोस्तो,&lt;br /&gt;नमस्कार।दो दिनों पहले जितेन्द्र की दुखद मौत की सूचना मिली. व्यक्तिगत रूप से मैंने क्या खोया है यह बता पाना मेरे लिये मुश्किल है. उन अभागे और शर्मसार कर देने वाले दो-तीन लोगों मे मैं भी शामिल था जिन्होंने पहले पहल एल एन जे पी हॉस्पिटल मे जितेन्द्र को दाखिल करते हुए उसे यह भरोसा दिलाने का अपराध किया था कि हम टीबी से उसके अनथक संघर्ष मे हमेशा उसके साथ खड़े होंगे. हालांकि तब मुझे बिल्कुल भी गुमान नही था कि अपने खून-पसीने से सींचकर जिस अभियान की हम बुनियाद रख रहे हैं उसका केवल गुम्बद ही प्रकाशमान हो रहा है और रोशनी को नीचे तक लाने के लिये बेताब हाथों को जड़ से अलग कर देने की वसीयत  है ।&lt;br /&gt;धूमिल ने  " अकाल" शीर्षक कविता मे एक जगह लिखा है.......".बच्चे हमे बसंत बुनने मे मदद देते हैं"......सचमुच बच्चे एक बहुत बड़े बाज़ार का हिस्सा हैं. सभी उनकी संभावनाओं की तस्करी करने मे लगे हैं . एक बड़ी जमात है जो सीधे बच्चों का व्यापार कर रही है तो दूसरी तरफ़ एक उससे भी बड़ी और ज़्यादा खतरनाक जमात है जो उनका संरक्षण करने के नाम पर उनका व्यापार कर रही है .भयानक बात यह है कि ये जमात ज़्यादा संगठित, आर्थिक रूप से ज़्यादा समृद्ध है और सभ्यता के महान आदर्शों एवं नैतिकता के सबसे आक्रामक और चकाचौंध पैदा करने वाले नारों-दावों और उदघोष के साथ बच्चों के ऊपर जैसे टूट पड़ी है..............बच्चे उन्हें बसंत बुनने मे मदद देते हैं।&lt;br /&gt;प्यारे दोस्तो, मुझे माफ़ करना, कि मैं पहले से ही भयानक हालातों मे फँसे (या पाब्लो नेरुदा के शब्दों मे - "पत्थर और पत्थर के बीच") बच्चों की जिंदगियों को और कठिन......और असहनीय बना देने वाली उस साजिश मे शामिल था जो दिल से के नाम पर चल रहा था और जारी है. यह सच है कि मैंने वास्तविकता को अनुभव करते ही ख़ुद को अभियान से अलग कर लिया था पर क्या इससे ही मैं उन तमाम अपराधों से मुक्त हो जाऊंगा जिनकी काली छाया हमेशा अपने वजूद के इर्द-गिर्द मैं महसूस करता हूँ ? मेरी तरह ही क्या मेरे और दोस्तों का अंतर्मन उन्हें इस बात के लिये नहीं कचोटता होगा कि क्यों हमने उन बच्चों के दिलों मे ऐसी उम्मीदें जगाईं जिन्हें पूरा कर सकने की कुव्वत हममे कभी थी ही नही . क्या हमे अपने दिल पर हाथ रख कर एक बार यह नही कबूल करना चाहिए कि ..............प्यारे बच्चो हम जिन्हें तुमने टूटकर प्यार किया-हम असल मे झूठे, मक्कार और अव्वल दर्जे के चालाक लोग थे......और ये हमीं हैं....जिन्होंने जितेन्द्र को सड़क से उठाकर हॉस्पिटल-हॉस्पिटल से उठाकर सराय बस्ती- सराय बस्ती से उठाकर किंग्सवे कैंप लाते ले जाते रहे.........ठीक वैसे ही जैसे कोई पौकिट्मार पॉकेट से पर्स निकालने के बाद तबतक उस पर्स को ढोता रहता है जबतक उस पर्स को वह पूरी तरह खाली नही कर लेता.........और इस बीच जितेन्द्र के हालात बदले नही क्योंकि यह हमारा सरोकार भी नही था ............क्योंकि हमारा ज़्यादा ध्यान उन देशी-विदेशी धनकुबेरों की तरफ़ था जिनकी कृपादृष्टि से हम रातों-रात मालामाल होते रहते हैं.........आख़िर इसी दिन के लिये तो हम हर रोज़ हर पल अपनी आत्माओं को मारते रहते हैं.......&lt;br /&gt;जितेन्द्र ट्रैक के बीच लेटा मौत की बाट जोह रहा था , वह क्यों सराय बस्ती मे मरना तक नही चाहता था.....कोई पूछे भाषा के बाजीगरों से, जो दुनिया के लुप्त हो रहे शब्दकोष के सबसे कोमल और लगभग पिघला देनेवाले शब्दों को भी अपने कुत्सित इरादों के लिये इस्तेमाल कर ले रहे हैं........जो भयानकतम अपराध कर चुकने के बाद भी निडर और निर्भीक होकर कहने का माद्दा रखते हैं कि वे तो बिल्कुल पाक-साफ हैं..... कि उनके अलावा इस दुनिया मे और कोई भला कैसे निर्दोष हो सकता है.....वे इतने निर्दोष होते हैं.......कि हमेशा अनजान ही रह जाते हैं......या खुदा. वरुण मेरे भाई, अपने को कमज़ोर न होने दें . जितेन्द्र की मौत का कोई रहस्य नही है..........जो हालात थे सबके सामने थे- जो हालत हैं वे भी सबके सामने हैं.....हाँ कुछ लोग इस मौत को एक रहस्य की तरह पेश करेंगे........ऐसे लोगों की पहचान करने और उनकी नज़रों मे नज़रें डालकर उनके छिपे हुए दांत और नाखून बाहर निकालने का यही वक्त है ताकि फ़िर कोई जितेन्द्र हर बढे हुए हाथ को मौत का हाथ न समझ ले. जितेन्द्र कोई पहला नही था.........कितने ही थे और हैं भी जिन्हें बचाना होगा मौत के सौदागरों से.....हमे अपने दम पर ही आगे बढ़ना चाहिए. इस मुश्किल घड़ी मे मैं हर क़दम पर आपके और उन सबके भी जो सचमुच बच्चों के पक्ष मे खड़े हैं ,साथ हूँ।&lt;br /&gt;आपका अपना,&lt;br /&gt;राजेश चंद्र</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>हर्ष मंदर के नाम एक खुला पत्र</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post_11.html</link><category>एनजीओनामा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Fri, 11 Apr 2008 17:09:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-9147704081622072248</guid><description>&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgEUckyA3UnUnagElPcTZwjEgrDDs1thQCUKyb0ngPZrx-tyew5YaMwyPRaa3-c6jEyo3NeBBSr_Nbj_uVwvTMPuJfPNO9riFOsAuUiLYNoMy-d4YIboBA8kjbQ6pD49xLf6pzaKN-4EmA/s1600-h/HARSHA+MANDER.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187965190405515362" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgEUckyA3UnUnagElPcTZwjEgrDDs1thQCUKyb0ngPZrx-tyew5YaMwyPRaa3-c6jEyo3NeBBSr_Nbj_uVwvTMPuJfPNO9riFOsAuUiLYNoMy-d4YIboBA8kjbQ6pD49xLf6pzaKN-4EmA/s320/HARSHA+MANDER.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;आदरणीय हर्ष सर ,&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नमस्कार। यह संभवतः मेरा अन्तिम पत्र ही होगा आपके लिये क्योंकि आप जानते हैं अमन बिरादरी में जिस तरह के हालात हैं उसमे किसी सीधे-सच्चे आदमी के लिये न तो पहले काम के अनुकूल स्थितियां थीं और न अब हैं। मैंने अपने वरिष्ठ सहकर्मियों को जिस भयानक मनःस्थिति से गुजरते और आखिरकार अपने सबसे पसंदीदा काम से ख़ुद को अलग करते देखा है मैं शायद उसपर विश्वास भी नहीं कर पाता अगर मेरा अपना अनुभव उससे कुछ बेहतर होता। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आपके साथ जुड़ते वक्त जिस आदर्श को मैंने अपने जीवन का आकाशदीप बनाया था उसे ख़ुद आपने और आपकी चाटुकार मंडली ने धराशायी कर दिया। आपका अकुशल मार्गदर्शन, निष्ठावान साथियों के साथ छल और कीर्तन करने वाले कर्मियों की ताजपोशी, सड़क के बच्चों के साथ धोखा करने की नीयत( जो सराय बस्ती के अनुभव ने साबित कर दिया है) सबकुछ तार-तार हो चुका है -(१) कि जो खाना आपने सड़क के बच्चों को खिलाया वैसा खाना आप अपने बच्चों को कभी नहीं खिला सकते थे, (२) सराय बस्ती होस्टल का अब एक साल पूरा होने वाला है पर आजतक पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद, रिक्रियेशन, कौन्सिलिंग, ड्रग-डी-एडिक्शन जैसी गतिविधियाँ शुरू नहीं हो पायीं, (३) आज तक होस्टल में सभी बुनियादी सुविधाएँ मुहैया नहीं कराई गयीं जैसे पानी, बाथरूम,मेडीसिन वगैरह। जिन बच्चों का स्वास्थ्य ज्यादा बिगड़ गया, जो कि होना ही था, उनसे पिंड छुडाने में ही आप और आपकी मंडली अपनी काबिलियत दिखती रही- कई बच्चों को आपने बाल सुधार गृहों में भिजवा दिया पाता नहीं उनमें से कितने आज जीवित बचे हैं। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मैंने हमेशा यहाँ यही देखा कि कभी भी कर्मियों को समय पर मानदेय नहीं दिया गया जबकि आप हमेशा यह बताते रहे कि अमेरिका इंडिया फाउनडेशन , दिल्ली सरकार और जमायते-उलेमा-ए-हिंद से हमे भरपूर पैसा मिल रहा है। मैं तो फ़िर भी नया था पर मेरे पुराने साथी भी कभी यह जान नहीं सके कि इतना सारा पैसा आख़िर कहाँ और कैसे खर्च हो रहा है। मुझे तो केवल २००० रुपये मिलते थे पर यहाँ तमाम पुराने सहकर्मी जो पोस्ट ग्रेजुएट थे या हैं और जिनमे से कुछ के परिवार भी हैं जो दिल्ली में किराये पर रहते हैं, को केवल ५००० रुपये में १८-२० घंटे काम कराते हुए भी जानवरों जैसा सलूक करना आपके मानवीय और न्यायपूर्ण दुनिया बनने के अभियान का कौन सा चेहरा है आप ही बेहतर जानते होंगे। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अप्रील के महीने में, मैं कभी भूल नहीं सकता , एक पूर्व अमन साथी द्वारा एक पाँच महीने से गर्भवती, दो साल के बच्चे वाली निराश्रित औरत को सराय बस्ती होस्टल में आश्रय देने पर आपने जिस तरह का तूफ़ान खड़ा किया था और उस साथी को बगैर साँस तक लेने का मौका दिए यह कहा था कि उस औरत को फौरन बाहर निकालो उसने मुझे ही नहीं सारे साथियों को दहला दिया था। आपने ऐसी स्थिति बना दी थी जिसके कारण अंततः उस औरत को दुबारा सड़क पर जाना पड़ा। बच्चों की दुहाई देकर जो आश्रय आपने हासिल किया है वहां से दो साल के उस मुसीबतज़दा बच्चे को निकालने में आपने सारी सीमाएं पर कर लीं। उस औरत का क्या हुआ यह तो पता नहीं हाँ उस साथी को आपने ज़रूर संगठन छोड़ने को मजबूर कर दिया जिनकी एकमात्र गलती यह थी की वे आपकी तरह कथनी कुछ और करनी कुछ के सिद्धांत से समझौता करने की बजाय मिट जाना अच्छा समझते थे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आप जो सूचना के अधिकार/गरीबों के अधिकार /रोज़गार के अधिकार......के लिये बात करते हैं , आपसे यह पूछा जाना चाहिए की जो लोग आपके साथ दो साल से /तक काम करते रहे उनकी सेवा शर्तें क्या हैं /थीं ? ये स्पष्ट क्यों नहीं हैं ? क्या केवल इस बात की सुविधा के लिये नहीं की आप जब चाहें किसी को बुलाकर निकाल सकें ? मैंने सुना है कि अमन बिरादरी एक ट्रस्ट है। क्या आपने कभी इस ट्रस्ट में सेवा-शर्तों पर बात /बहस की ? क्या आप यह बता पाने की स्थिति में हैं कि अमन बिरादरी में सेवा सम्बन्धी सारे निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिये जाते हैं ?आठ महीनों का मेरा जो अनुभव है उसमें मेरे लिये एकमात्र संतोष है कि मैंने बच्चों के साथ काम किया। इसके अलावा दफ्तर और आपके प्रशासन का अनुभव निरंतर यंत्रणा देने वाला रहा। संगठन का प्रशासनिक ढांचा एकदम अस्पष्ट है। सारे निर्णय जो अमन बिरादरी में होते हैं- क्या सी ई एस में तय होते हैं या कहीं और लिये जाते हैं ?इस सम्बन्ध में कोई पारदर्शिता क्यों नहीं है ?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;पिछले दिनों आप उन सारे लोगों को जो फील्ड में काम करते रहे हैं/थे अस्थिर करते रहे हैं-तबादला करते रहे - संगठन से निकलने को मजबूर करते रहे। यह सब करते हुए क्या आपने एकबार भी उन बच्चों के बारे में सोचा जिनके साथ सम्बन्ध बनाने में सालों का वक्त लगा ? आपके साथ एक तो वह टीम थी - १०-१२ लोगों की जिसने संगठन को खड़ा किया - दूसरी तरफ़ एक बिल्कुल नई टीम है जिसे आपने प्रशासक की भूमिका में खड़ा कर दिया और वे बाकी लोगों को हांकते-हांकते संगठन से बाहर तक हांक आए! ताज्जुब है आप सामूहिकता की बात करते हैं ! लाख जूझने के बावजूद अमन साथी ये नहीं जान सके कि उनकी कानूनी हैसियत इस संगठन में क्या है - भागीदार की- नौकर की या कुछ और ?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आपके बात करने का तरीका कभी एक नहीं रहा। कभी आप अकेले बुलाकर बात करते हैं कभी आपका प्रशासन अकेले बुलाकर बात करता है- मुझे लगता है कि ये सारी बातें सार्वजनिक महत्त्व की हैं अतः इन्हें लोगों के सामने आना चाहिए। आपको यह तय करना चाहिए कि जो काम आप नहीं कर सकते - या नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें आप नहीं करेंगे। आप अधिक से अधिक एक अक्षम प्रशासक हो सकते हैं जिसने चीजों को उलझा दिया। आप बताएं कि विगत दो साल में आप कितनी बार बच्चों के बीच शारीरिक रूप से उपस्थित हुए ? आठ महीनों के दरम्यान आप मेरे फील्ड में केवल एक बार ही आए। कहने को तो इतनी बातें हैं कि ...........पर मैं समझता हूँ इसका कोई असर नहीं होनेवाला क्योंकि जहाँ एजेंडे पर झूठ, स्वार्थपरता, चाटुकारिता पहले से प्राथमिकता के साथ मौजूद हो वहां एक अदना आदमी क्या कर पायेगा....क्या कर पाया है आजतक ?सारतः इतना कहूँगा कि मैं अब आगे उस अंधी गली में जाने से इनकार करता हूँ जिसमे आप संभावनाशील नौजवानों की एक पीढ़ी को, और बेघर-बेसहारा बच्चों की संभावनाओं को धकेलते हुए लिये जा रहे हैं, इस विश्वास के साथ कि आपके मसीहा बनने में ये कुर्बानियां ज़रूरी हैं। आपकी यह जीत आपको मुबारक हो ......मैं इस कैम्पेन(?) से ख़ुद को पूर्णतया अलग कर रहा हूँ।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अंत में मैं आपसे इस बात के लिये माफी चाहता हूँ कि मैं ये पत्र सार्वजनिक कर रहा हूँ। पर मेरी सदिच्छा इस अभियान को बचाने की है, इसीलिए ऐसा करना मेरी मजबूरी है। एक आम आदमी के पास विरोध का इससे अहिंसक तरीका क्या हो सकता था ?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सादर,&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अभिषेक शर्मा &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अमन साथी। &lt;/div&gt;</description><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgEUckyA3UnUnagElPcTZwjEgrDDs1thQCUKyb0ngPZrx-tyew5YaMwyPRaa3-c6jEyo3NeBBSr_Nbj_uVwvTMPuJfPNO9riFOsAuUiLYNoMy-d4YIboBA8kjbQ6pD49xLf6pzaKN-4EmA/s72-c/HARSHA+MANDER.jpg" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total></item><item><title>दुनिया किसकी मुट्ठी में?</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post_7316.html</link><category>ये दुनिया क्या चाहे मनी-मनी</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Sat, 5 Apr 2008 15:45:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-1575781660045575770</guid><description>एक थे सेसिल रोड्स। अफ्रीका में हीरे की खानों को बड़ी युक्ति से उन्होंने कब्जा कर लिया था. उनके काम को देखते हुए एक देश का नाम रोडेशिया रखा गया था जो आजकल जिम्बाबवे के नाम से जाना जाता है. आप लोगों ने अगर हीरा कंपनी डी-बियर्स का नाम सुना हो तो यह भी जान लीजिए कि इस डी-बियर्स कंसालिडेटेड माईन्स एण्ड गोल्डफील्ड की स्थापना सेसिल रोड्स ने ही की थी. 1890 के दशक में रोड्स अमीरों के अमीर थे. उस समय उनकी आमदनी 10 लाख डॉलर यानि एक मिलियन डॉलर सालाना थी जो कि आज भी किसी अमरीकी के लिए बहुत बड़ी रकम होती है. रोड्स अमीरी के लिए पैसे नहीं कमाता था. उसका एक सपना था.उसका सपना था कि हमें कुछ ऐसी रणनीति विकसित करनी चाहिए कि दुनिया पर अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थायी रूप से कायम हो सके. उसका मानना था कि इसके लिए हमें बहुत लंबी रणनीति के तहत काम करना होगा. और उसने यह किया भी.उसने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में छात्रवृत्ति देकर लोगों को पढ़ने के लिए आमंत्रित करना शुरू किया. उसका मानना था कि दुनिया में कहीं भी प्रतिभा हो तो उसका उपयोग साम्राज्य विस्तार में करना चाहिए. उसने एक राउण्ड टेबल की स्थापना की थी जो आज भी काम कर रही है. यह राउण्ड टेबल दुनिया के वर्तमान की समीक्षा और भविष्य को तय करती है. आज दुनिया की तथाकथित बड़ी-बड़ी संस्थाएं जो दुनिया पर नियंत्रित कर रही हैं उनमें से अधिकांश राउण्ड टेबल के दिमाग की उपज हैं. राउण्ड टेबल की स्थापना के बाद रॉथचाईल्ड कारपोरेशन, कार्नेगी युनाईटेड किंगडम ट्रस्ट, रॉकफेलर फाउण्डेशन, फोर्ड फाउण्डेशन, जे पी मार्गन, हिटनी परिवार, लेजार्ड ब्रदर्स आदि महत्वपूर्ण घराने इसके सदस्य बनते चले गये. अमेरिका की प्रितिष्ठित येल यूनिवर्सीटी में एक विभाग था स्कल एण्ड बोन सोसायटी. यह सोसायटी गुप्त रूप से राउण्ड टेबल के लिए काम करती थी.रोड्स तो कब के मर गये लेकिन राउण्ड टेबल जिन्दा है.राउण्ड टेबल की कारगुजारियों और योजनाओं पर एक किताब है जिसका नाम है- द प्रिजन. इस किताब में राउण्ड टेबल का पूरा इतिहास और आगे की कारगुजारियों के बारे में विस्तार से लिखा गया है. किताब बताती है कि राउण्ड टेबल दुनिया को मुट्ठी में करने के लिए युद्ध को आवश्यक हथियार मानती है. इसकी शुरूआत 1899 से होती है जब दक्षिण अफ्रीका में बोअर युद्ध की शुरूआत हुई थी. 13 साल चले इस युद्ध में अफ्रीका तबाह हुआ और वहां की प्राकृतिक संपदा अंग्रेजों के हाथ में चली गयी. वहां के लोग अपने ही देश में गुलाम बन गये. कुछ-कुछ वैसा ही जैसा हाल में ही इराक में हुआ है. पहले और दूसरे विश्वयुद्ध की व्यूह-रचना में भी इसी राउण्ड टेबल की सोच काम कर रही थी. आज राउण्ड टेबल कोई संस्था नहीं है, यह एक सोच है जो संस्थाओं को जन्म देती है. इसने बहुत सी संस्थाओं को जन्म दिया है. दुनिया की सबसे बड़ी संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 26 जून 1946 को जिस अधिनियम के तहत की गयी थी वह अधिनियम गोलमेज के काउंसिल आफ फारेन रिलेशन्स के तहत आता था. गोलमेज की मंशा साफ थी कि दुनिया पर नियंत्रण करना है तो ऐसी कोई संस्था होनी चाहिए जो छद्म आजादी के नाम पर हमारी योजनाओं को पूरी दुनिया में लागू करवा सके.द प्रिजन में विलियम एच मैकहनी लिखते हैं - संयुक्त राष्ट्र की योजना पूरी तरह वैश्विक नियंत्रण की है. इसके लिए यहां साम-दाम-दंड-भेद सभी नीतियों का इस्तेमाल किया जाता है. यह विश्व सरकार जीवन के हर क्षेत्र में नियंत्रण के लिए जनसंख्या नियंत्रण, विज्ञान और तकनीकि, स्वास्थ्य, शस्त्र और सैनिक नियंत्रण, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों के लिए नीतियां बनाती और लागू करवाती है.गोलमेज समुदाय के लोग संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से दुनिया में यह मानसिकता विकसित करना चाहते हैं कि देश के लोगों का अपने शासन-प्रशासन से धीरे-धीरे विश्वास खत्म हो जाए. (इस बात को ठीक से समझने के लिए आप संयुक्त राष्ट्र शांति सेना, संयुक्त राष्ट्र के स्वास्थ्य और शिक्षा मिशन का उदाहरण ले सकते हैं). एक बार लोगों का स्थानीय लोक प्रशासन से विश्वास उठ जाएगा तो दुनिया में एक केन्द्रीय सेना, केन्द्रीय सरकार, केन्द्रीय अर्थतंत्र के बारे में लोगों का विरोध समाप्त हो जाएगा.इसी सोच को पुख्ता करने के लिए विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोश, एमनेस्टी इंटरनेशनल, वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन, यूनेस्को, यूएनडीपी, मानवाधिकार से जुड़े संगठन, गैर-सरकारी संगठन आदि बनाये गये हैं. आज भारत में ही विकास की कई योजनाओं पर काम करनेवाली संस्थाओं को फोर्ड फाउण्डेशन पैसा देता है. यह फोर्ड फाउण्डेशन गोलमेज समुदाय का सक्रिय सदस्य है. इस गोलमेज समुदाय का हाल के दिनों में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय था गैट की स्थापना. गोलमेज समुदाय की एक संस्था बिल्डबर्ग की एक बैठक 1991 में वाडेन, जर्मनी में हुई थी. इस बैठक में डेविड रॉकफेलर, कई प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी, राजनीतिज्ञ, उद्योगपति, एक अमेरिकी प्रांत के गवर्नर बिल क्लिंटन, तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश, नीदरलैण्ड की रानी बीट्रीक्स, स्पेन की रानी सोफिया, ब्रिटेन की ओर से जॉन स्मिथ आदि मौजूद थे. इसी बैठक में जार्ज बुश ने इराक के खिलाफ युद्ध का खुलासा किया था. इसके बाद निर्णय हुआ कि युद्ध के बाद वहां संयुक्त राष्ट्र सेना नियुक्त कर दी जाएगी. वहां उपस्थित सभी लोगों ने जार्ज बुश सीनियर की योजना को सही ठहराया और संयुक्त राष्ट्र से बात करने का प्रस्ताव किया. इस बैठक में और नामों के अलावा एक नाम पीटर डी सदरलैण्ड का भी था. सदरलैण्ड इस बैठक के बाद गैट के डायरेक्टर जनरल बन गये. बिल्डरबर्ग की अगली बैठक 1994 में फिनलैण्ड में हुई. गैट की सफलता को नये आयाम देने के लिए व्यापार को और प्रभावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति पर काम शुरू हुआ. 1995 में स्विटजरलैण्ड में कई गोपनीय बैठकों के बाद आखिरकार वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन का चेहरा दुनिया के सामने आ गया. आज भारत में जिस डब्ल्यूटीओ का गुणगान किया जाता है और जिसकी शर्तों की दुहाई देकर व्यापारिक नीतियों को बड़े पैमाने पर उलट-पुलट दिया गया उसके जन्म की कहानी यह है कि वह दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपनी मुट्ठी में लेने के लिए अस्तित्व में आया था.द प्रिजन में मैकहनी लिखते हैं - आईएमएफ की यह जिम्मेदारी है कि वह अफ्रीका, एशिया और दुनिया के दूसरे विकासशील देशों को "सभ्य" समाज में शामिल करने के लिए धन का वितरण करे.इसी रणनीति पर काम करते हुए आईएमएफ ने पूरी दुनिया के गरीब मुल्कों में घूसखोरी का सहारा लेकर वहां राजनीतिज्ञों को खरीद लिया. उसने ऐसी नीतियां बनवाने में कामयाबी हासिल कर ली कि गरीब मुल्क अपनी जमीन पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आने दें. यहां खेती की ऐसी विधि विकसित की जा रही है जो नकद आमदनी देनेवाली हो. इस पैसे से वह अपने लिए जरूरत के सभी सामान अमीर मुल्कों से आयात करेगा. इससे दोहरा फायदा है. गरीब देश केवल अमीर मुल्कों के लिए निर्यातक बनकर रह जाएंगे और इस निर्यात से जो पैसा मिलेगा उससे फिर वे उन्हीं अमीर मुल्कों से जरूरत का सामान खरीदेंगे. इस तरह अमीर मुल्क दोनों ओर से फायदे में हैं. वे बड़ी चालाकी से दुनिया की सारी प्राकृतिक संपदा का इस्तेमाल अपने ऐशो-आराम के लिए कर रहे हैं और गरीब मुल्कों पर उनकी संप्रभुता भी कायम है.&lt;br /&gt;युगवार्ता डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम से साभार</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>अनुदान का खेल</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post_05.html</link><category>कतरनें और चिन्दियाँ</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Sat, 5 Apr 2008 13:16:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-8686623254734204721</guid><description>&lt;strong&gt;कामरान  परवेज़,  अगस्त 2007 &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पटना मे जॉब करते हुए मुझे एक बन्दे से मिलने का मौका मिला। जनाब कहने को तो एक NGO चलाते थे, लेकिन उनका असल धंधा अनुदान हासिल कर उसकी मलाई खाना था। खैर ऐसे बन्दे बहुत से है जिनके बारे मे बाद मे बात होगी। अभी अनुदान से सम्बंधित एक बात।- हमारे देश मे अनुदान हासिल करने के कुछ नियम काएदे बने है। विदेशी अनुदान किस व्यक्ति या संस्था को लेने कि इजाजत होगी, इसके लिए 1976 का "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" मौजूद है। इसी कानून के तहत " centre for equity studis" नाम कि एक संस्था ने कुछ साल पहले विदेशी अनुदान के लिये आवेदन दिया था। लेकिन इस संस्था के आवेदन को ये कह कर खारिज कर दिया गया कि " यह संगठन राजनितिक गतिविधियों मे संलिप्त है।" आपकी जानकारी के लिये ये बता दे कि इस संस्था के निदेशक "हर्ष मंदर " साहब है। दुबारा आवेदन करने और काफी इंतजार करने के बाद जब "मंदर साहब" ने सरकार से ये जानना चाहा कि राजनितिक गतिविधियों का क्या मतलब है तो, कहा गया कि " उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के कारणों कि वजह से ये नही बताया जा सकता। "- 2004 मे ऊपर लिया गया फैसला 1976 के "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" के तहत लिया गया था। 2006 मे तथाकथित धर्म निरपेक्ष सरकार ने इस कानून मे संशोधन किया।- किसी भी राज्य के लिए अपने कानून बनाना उसका अधिकार है। लेकिन समाज को इस कानून बनने कि प्रक्रिया कि सतत निगरानी करनी चाहिए। ये इसलिये जरूरी है कि प्रायः आधुनिक राष्ट्र - राज्य खुद को अपने ही नागरिको के विरूद्व सुरक्षित करने के लिए उपाय करते हुए पाये गय है। "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" मे परिवर्तन कि वजह राष्ट्रीय सुरक्षा का रहा है। - राष्ट्रीय हित, आतंरिक सुरक्षा और राजनितिक प्रकृति के संगठन --ये वो कारण है जिनकी वजह से सरकार ये सुनिश्चित करना चाहती है कि विदेशी अनुदान का इस्तेमाल सिर्फ " सार्थक कार्यो " के लिये किया जाए। कौन से काम सार्थक है इस काम के लिये सरकार ने जिलाधिकारी तय कर रखे है। इसके साथ सरकार ही ये निर्णय करेगी कि कौन सा संगठन " राजनितिक प्रकृति " का है और इसलिये विदेशी अनुदान का पात्र नही है। - --------शिक्षा हो या जन स्वास्थ, लोगो के भोजन का हक हो या सुचना का अधिकार, रोजगार का अधिकार हो या औरतो का अधिकार --इन सारे मुद्दों को किसी ना किसी रुप मे राजनितिक मुद्दा कहा जा सकता है। जल, जंगल और जमीन या रोजगार के हक का मुद्दा तो राजनैतिक है ही। केरल मे कोक के खिलाफ आंदोलन हो या तमिलनाडु मे समंदर किनारे पर्यटन स्थल बनाने के खिलाफ मछुआरों का संघर्ष, जंगल से बाहर किये जाने के खिलाफ आदिवासियो का आंदोलन हो, उड़ीसा, मुम्बई, बंगाल या छत्तीसगढ़, झारखण्ड मे विदेशी कम्पनियों या देशी पूंजी के लिये जमीन अधिग्रहण के खिलाफ अभियान --इनमे से कौन राजनितिक है और कौन सामाजिक?- साम्प्रदायिकता के खिलाफ जनता को शिक्षित करना तो सही मे राजनितिक काम ही है। नए "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" मे ऐसी गतिविधि को विदेशी अनुदान के लिए अनुचित माना गया है, जो समुदायों के बीच विभेद और वैमनस्य को बढावा देती हो। लेकिन हमे यह पता है कि रामजन्म भूमि आंदोलन से लेकर गुजरात के क़त्ल- ओ - गारत तक या उसके बाद गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, केरल, आदि मे ईसाईयों, मुसलमानो के खिलाफ निरंतर अभियान मे शामिल RSS , विश्व हिंदु परिषद या बजरंग दल को अभी तक राज्य कि तरफ से वैमन्स्यकारी गतिविधि का दोषी नही बताया गया है, जबकि वर्त्तमान सरकार M F hussain कि कलाकृति कि जांच करने के बाद इस नतीजे पर पहुंची है कि वे समुदायों के बीच नफरत पैदा कर सकती है, और उन पर करवाई कि जा सकती है। अगर हुसैन कोई विदेशी अनुदान लेना चाहे तो उन्हें रोका जा सकता है। - विनायक सेन का मामला हो या सरोज मोंहंती कि गिरफ़्तारी का मुद्दा- अगर आप इनके समर्थन मे आवाज उठाते है तो आप कि गतिविधि को राजनितिक मानने का वाजिब कारण सरकार के पास है, और आप को विदेशी अनुदान नही मिलेगा।- जिस देश मे सर्वोच्च ख़ुफ़िया संस्था RSS को सैनिक Training देने कि तैयारी कर सकती है। वहा कौन सी 'राजनीती' देशहित मे है और कौन सी देश विरोधी ? किसकी राजनीती को निष्प्रभावी करने कि कोशिश "विदेशी अनुदान (नियमन) कानून- २००६" का प्रस्ताव कर रहा है?&lt;br /&gt; साभार ,अपूर्वानंद जी&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;comments:&lt;br /&gt;&lt;a name="c1213877478060002197"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/09328177598273459390" rel="nofollow"&gt;apoorv&lt;/a&gt; said...&lt;br /&gt;is tippani ko jagah dene ke liye shukriya.aapko yah zaroor bata dena chahiye tha ki yah jansatta ke mere niyamit stamhba VILAMBIT mein cchapee tippani ka sampadit roop hain- yaani apke dwara sampadit.is roop mein diye jaane par is tippani ka mool matavay kuch ashpashta sa rah jaata hai. umeed hai aap meri baat ko sahi dhanga se lenge.apoorvanand&lt;br /&gt;&lt;a title="comment permalink" href="http://intajar.blogspot.com/2007/08/blog-post_05.html?showComment=1186314600000#c1213877478060002197"&gt;5 August, 2007 5:20 PM &lt;/a&gt;&lt;a title="Delete Comment" href="http://www.blogger.com/delete-comment.g?blogID=5821074090166604012&amp;amp;postID=1213877478060002197"&gt;  &lt;/a&gt;&lt;/span&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>पोलियो अभियान के सबक</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/04/blog-post.html</link><category>सोचो कि सोचने की ज़रूरत बनी रहे</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Fri, 4 Apr 2008 15:53:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-8366589607255680415</guid><description>शुक्रवार, 19 जनवरी, 2007&lt;br /&gt;डॉ. जेकब पुलियन&lt;br /&gt;अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि राष्ट्रीय पोलियो उन्मूलन अभियान योजना के मुताबिक नहीं चल पाया है । हममें से कई लागों ने इसे सफल बनाने में दिन-रात एक कर दिए । पोलियो (जो कि मूलत: पानी और स्वच्छता से सम्बंधित समस्या है) पर काबू में करने में बार-बार ओरल (मुंह से दिये जाने वाले) पोलियो टीके के जादुई नुस्खे की नाकामी काफी हद तक पूर्व अनुमानित ही थी । मगर इसके कारण हमारी मायूसी कम  नहीं  हो  जाती । इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन की टीकाकरण उपसमिति में इस बात पर काफी बहस हुई कि इस प्रयास की असफलता की बात को सार्वजनिक किया जाए या नहंी । अंतत: अगस्त २००६ में उपसमिति ने फैसला किया कि इस बात को सार्वजनिक करना उसका फ़र्ज है ।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सार्वजनिक करना जरुरी -&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के वर्तमान उपाध्यक्ष डॉ। पुष्पा भार्गव ने १९९९ में यह लेख लिखा था- फाइटिंग दी पोलियो वायरस । यह लेख हिंदू के १२ दिसम्बर १९९९ के अंक में प्रकाशित हुआ था। १९८८ में डॉ. भार्गव एक बैठक में शरीक हुए थे जहां यह फैसला हुआ था कि भारत में पोलियो के इंजेक्शन टीके का उपयोग किया जा चाहिए क्योकि ओरल पोलियो टीके की कारगरता कम है । पोलियो का इंजेक्शन टीका बनाने के लिए गुड़गांव में एक कारखाना भी स्थापित किया गया था। चार वर्षों के बाद १९९२ में , विश्व स्वास्थ्य संगठन की सलाह पर इस योजना को ठंडे बस्ते मंे डाल दिया गया और ओरल पोलियो टीका इस्तेमाल करने का निर्णय ले लिया गया । डॉ. भार्गव ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री नरसिंह राव , स्वास्थ्य मंत्री तथा स्वास्थ्य सचिव को कई पत्र लिये । डॉ. भार्गव उस निर्णय में शरीक थे जिसमें कहा गया कि ओरल पोलिया टीका भारत के लिये अनुपयुक्त है । लिहाज़ा उन्होंने यह जानना चाहा था कि किन प्रमाणों के आधार पर सरकार ने ओरल टीके का उपयोग करने का निर्णय लिया है । उन्हेांने यह भी जानना चाहा था कि इण्डियन वेक्सीन कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने इंजेक्शन टीका उत्पादन के लिये जो ५० करोड़ रुपए का निवेश किया है उसका क्या औचित्य रह जाएगा । उनके पत्रों के जवाब नहीं दिए गए । अंतत: उन्होंने एक लेख लिखा । अपने लेख में उन्होंने निष्कर्ष स्वरुप कहा था- यदि निर्विवाद रुप से यह बताया जा सके कि ओरल पोलियो टीका कारगर रहा है, तो सबसे ज्यादा खुशी व तसल्ली मुझे मिलेगी । बदकिस्मती से आज उपलब्ध प्रमाण इस मत के विरुद्ध जाते हैं । इसलिए संभावना यही दिखती है कि कीमती समय और धन गंवाने के बाद पोलियो की नियति वही होगी जो बीसीजी (टीबी के टीके) की हुई थी। आने वाले दिनों के घटनाक्रम ने इस वक्तव्य की सत्यता को साबित किया है ।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सार्वजनिक जवाबदेही-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;उक्त लेख का शुक्र है कि हमारे पास कुछ लिखित इतिहास मौजूद है । ज़रुरत सार्वजनिक जवाबदेही की है और यह बात विश्व स्वास्थ्य संगठन के बेशक्ल अफसरों पर और भारत सरकार के उन अधिकारियों पर भी लागू होती है जिनका ज़िक्र उस लेख में हुआ था । यह तो संभव है कि विवेक के आधार पर लिए गए निर्णय गलत हो सकते हैं मगर जब तक इस बात को स्वीकार नहीं किया जाता तब तक हम ये गलतियां बार -बार दोहराते रहेंगें ।&lt;br /&gt;इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन की उपसमिति के सामने भी वही दुविधा थी जो डॉ. भार्गव के सामने थी । उपसमिति वेक्सीन - प्रेरित पोलिया के मामलों की बढ़ती संख्या (पिछले साल १६००) से चिंतित थी। ये मामले पोलियो टीके की बार-बार दी जाने वाली खुराकों के कारण सामने आ रहे थे । इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह थी कि २७००० बच्चे पोलियोनुमा लकवे के शिकार हुए थे जिनमें मल में पोलियो वायरस का संवर्धन नहंी हुआ था । सरकार तो यह जांच करवाने को भी तैयार नहीं थी कि इन बच्चों में से कितनों में अपंगता शेष रही थी। इस बात के पुख्ता प्रमाण थे कि कई ऐसे बच्चों को पोलियोजनित लकवा हो रहा है जिनका टीकाकरण हो चुका है । इससे जाहिर था कि टीका कारगर नहीं है । जब अफसरशाही ऐसी हो जो समस्या के वजूद को भी मानने से इंकार करे, तो उपसमिति के सामने इस मखौल का भंडाफोड़ करने के अलावा काई चारा न था ।&lt;br /&gt;यह अच्छी बात है कि इस सरकार ने खबरची को बुरा-भला कहने और इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन को नीचा दिखाने के प्रयास शुरु नहंी किए । मगर बदकिस्मती से सरकार की प्रतिक्रिया यह रही कि उसने एक और कार्यक्रम शुरु कर दिया है जो इस स्थिति को सुधारने के बजाए और बिगाड़ेगा ।इस लेख का समापन हम इस तरह के हवाई किले से बचने का उपाय सुझाने के साथ करेंगें ।&lt;br /&gt;बड़े मुद्दों पर जाने से पहले पाठक शायद उस बीमारी को समझना चाहें जिसके कारण यह गोरखधंधा शुरु हुआ था । पोलियो एक वायरस है जो लकवा पैदा कर सकता है । यह वायरस आंतों में पलता बढ़ता है और दूषित पानी के माध्यम से फैलता है । पानी और शौच व्यवस्था की स्थिति में सुधार से इस बीमारी पर काबू पाया जा सकताह । इसके अलावा सामान्य टीकाकरण से इसके उन्मूलन में मदद मिलेगी। सामान्य टीकाकरण के साथ पोलिया नियंत्रण कार्यक्रम बढ़िया चल रहा था । १९८८ में पोलियो का प्रकोप २४००० था जो १९९४ में घटकर ४८०० रह गया था । यह पल्स पोलियो शुरु होने से बहुत पहले की बात है ।&lt;br /&gt;१९९८ में विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाआें ने पोलियो टीका बार-बार पीलाकर दुनिया भर में इस बीमारी का सफाया करने की योजना लागू की । शुरुआती फंडिंग, करीब ४०० करोड़ रुपए, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं (रोटरी अंतर्राष्ट्रीय समेत) से आया था । यह तो जैसे अपरिहार्य था कि कार्यक्रम शुरु होने के दो साल बाद इन संस्थाआें ने दानदाता थकान (डोनर फटीग) की दुहाई देकर फंडिंग बंद कर दिया । पिछले वर्ष भारत सरकार ने इस कार्यक्रम पर १००० करोड़ रुपए खर्च किए थे । शेष समस्त टीकाकरण (पांच बीमारियांे के लिये) पर खर्च ३०० करोड़ रहा। यह विदेशी फंडिंग काएक पेटर्न सा है ।&lt;br /&gt;अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग मिल रही हो और सरकार अपने लोगों के लिए पेश किए जा रहे दान को लेने से इंकार करे तोयह बेवकूफी सी नजर आती है । एक बार विदेशी फंडिंग के आधार पर कार्यक्रम शुरु होन जाने पर विदेशी सहायता रोक दी जाती है ।गरीब देश इस चाल में फंस जाते हैं और बगैर जरुरी लाभ-लागत आकलन के ही टीके देना शुरु हो जाता है ।&lt;br /&gt;हम नहंी जानते कि विदेशी फंडिंग की पेशकश ने इस निर्णय पर कितना असर डाला था मगर तथ्य यह है कि परिणाम यह रहा कि भारत सरकार को एक ऐसे कार्यक्रम के लिए अभूतपूर्व वित्त व्यवस्था करनी पड़ी है, जिसकी नाकामी तय थी ।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सबक नहीं सीखे गए&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मगर दु:ख की बात यह है कि हमने अपनी गलतियों से कोई नसीहत नहीं ली है । ओरल पोलियो टीके पर आधारित पोलियो उन्मूलन रणनीति के नाकाम रहने के बाद सरकार ने एक और विदेशी पेशकश स्वीकार कर ली है जिसमें उच्च प्रकोप वाले क्षेत्रों के लिये इंजेक्शन टीका मुफ्त दिया जाएगा ।&lt;br /&gt;यह आयातित इंजेक्शन टीका ओरल टीके से २५ गुना ज़्यादा महंगा है। लगभग अवसान (एक्सपायरी) की तारीख वाले टीकों की एक खेप मुफ्त दी जा रही है मगर हम अपना राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम इसके आधार पर तो नहीं चला सकते । इसके अलावा इस टीके को घर-घर जाकर लगाने की लागत भयावह होगीं यदि यह पैसा उन क्षेत्रों में पेयजल व शौच व्यवस्था को सुधारने में लगाया जाए तो इस समस्या का स्थायी समाधान निकल सकता है । इंजेक्शन टीका सब बच्चों को देना जरुरी होगा । जब हम ओरल टीका शत प्रतिशत बच्चों को नहीं दे सके हैं, तो इंजेक्शन का प्रतिशत तो और भी कम रहेगा । यानी एक बार फिर असफलता शर्तिया है ।&lt;br /&gt;दरअसल, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की उपसमिति ने सुझाव दिया है कि सरकार इस पूरे अभियान को थोड़ा धीमा करे और सामान्य टीकाकरण को सुदढ़ करने के अलावा प्रभावित क्षेत्रों में पानी व शौच व्यवस्था में सुधार के कदम उठाए । टीकों को शामिल करने या न करने के बारे में पेचीदा निर्ण तक पहुंचने के लिए हमें कोई स्थायी व्यवस्था बनानी होगी । यह व्यवस्था यू.के. के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लिनिकल एक्सलेंस जैसी कोई स्वतंत्र संस्था हो सकती है । स्वास्थ्य पेशेवरों, तकनीकी विशेषज्ञों, स्वास्थ्य के अर्थशास्त्रियांे और जनप्रतिनिधियों की एक पेशेवर संस्था बनाई जानी चाहिए । सरकार विचाराधीन टीके का प्रचार करे । मरीजों के समूह, स्वास्थ्य पेशेवर, अकादमिक संस्थान, टीका उद्योग, ट्रेड यूनियन्स और विश्व स्वास्थ्य संगठन व ग्लोबल वेक्सीन इनिशिएटिव जैसे सारे हितधारी अपने-अपने हित सामने रखें ।&lt;br /&gt;उक्त संस्था को टीके से संबंधित चिकित्सकीय प्रमाण और उसके लाभों के आर्थिक पक्ष का आकलन करके दिशानिर्देशों का मसौदा तैयार करना चाहिए, जिसका आकलन सारे पंजीकृत हितधारी और एक नागरिक परिषद द्वारा किया जाना चाहिए । इनकी राय के आधार पर निकाय को दिशानिर्देशों में संशोधन करना चाहिए। अंतत: एक स्वतंत्र पैनल को इन्हें देखकर यह तसल्ली कर लेना चहिए कि सारे हितधारियों के हितों को इनमंे स्थान मिल गया है । इसके बाद अंतिम दिशानिर्देश जारी किए जाएं ताकि सरकार को निष्पक्ष सलाह मिल सके जिसके आधार पर वह निर्णय कर सके ।&lt;br /&gt;पर्यावरण डाइजेस्ट से साभार</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>जगतीकरण क्या है ? : किशन पटनायक</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/03/blog-post_9824.html</link><category>अथ उपनिवेश कथा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Mon, 31 Mar 2008 17:31:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-8177140735357362914</guid><description>&lt;strong&gt;शुक्रवार, फ़रवरी 09, 2007&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;सब दल लेकर हैं खड़े , अपने - अपने जाल&lt;br /&gt;हे साधो ! कुछ चेतिए , देश बड़ा बेहाल .(१)&lt;br /&gt;हल्दी ,तुलसी , नीम के , बाद जूट पेटेण्ट&lt;br /&gt;ये भारत की सम्पदा , वो ग्लोबल मर्चेण्ट.(२)&lt;br /&gt;भारत बस बाजार है , विस्तृत और समग्र&lt;br /&gt;सिर्फ मुनाफे के लिए,मल्टीनेशनल व्यग्र.(३)&lt;br /&gt;सम्प्रभुता,गौरव कहाँ,कहाँ आत्मसम्मान&lt;br /&gt;अजी छोड़िए, आइए, करना है उत्थान.(४)&lt;br /&gt;- शिव कुमार 'पराग' के दोहे(साभार-'देश बड़ा बेहाल')&lt;br /&gt;भूमंडलीकरण , वैश्वीकरण ,खगोलीकरण , जगतीकरण आदि कई शब्दों का प्रयोग हो रहा है - अंग्रेजी शब्द , ग्लोबलाइजेशन के लिए । आधुनिक विश्व में तीन प्रकार के जगतीकरण हुए हैं । अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में प्रत्यक्ष साम्राज्यवाद के द्वारा जगतीकरण का एक ढाँचा यूरोपीय देशों ने बनाया । जब यूरोप का बौद्धिक उत्थान हुआ और समुद्र पर उनकी श्रेष्ठता प्रमाणित हो गयी तो यूरोप के लोगों ने पूरी दुनिया से धन संपत्ति बटोरने के लिए समुद्री यात्राएं कीं । अनेक भूखंडों के मूलवासियों को हटाकर वहाँ पर वे खुद बस गये । दूसरे देशों पर उन्होंने अपना प्रत्यक्ष शासन यानि साम्राज्य स्थापित किया । आधुनिक यंत्र विद्या पहली बार साम्राज्य की केन्द्रीय व्यवस्था बनाए रखने में मददगार हुई । उसके पहले के युगों में जो साम्राज्य होते थे उनकी केन्द्रीय व्यवस्था नहीं हो सकती थी और शीघ्र ही वे बिखर जाते थे । सिकंदर और सीजर से लेकर सम्राट अशोक का यह किस्सा है कि थोड़े से समय के लिए धन बटोरा जाता था । लेकिन यंत्र विद्या केवल यूरोपीय साम्राज्यवाद के केन्द्रीकृत ढाँचे के तौर पर टिकी रही और शताब्दियों तक शोषण का अनवरत सिलसिला चलता रहा । कहावत बन गयी कि " ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्य कभी डूबता नहीं है । " दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस प्रकार के जगतीकरण का अध्याय समाप्त हुआ ।&lt;br /&gt;दूसरे विश्व युद्ध के बाद दो नये प्रकार के जगतीकरण शुरु हुए । उसकी एक धारा संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा चलायी गयी । संयुक्त राष्ट्र संघ की महा सभा में राष्ट्रों की बराबरी मानी गई थी । इसलिए बहुत सारी बातचीत और लेन-देन राष्ट्रों के बीच बराबरी के आधार पर होती थी। सारे विश्व से साधन इकट्ठा कर दुनिया से भूख , बीमारी , अशिक्षा , नस्लवाद , हथियारवाद आदि मिटाने के लिए महत्त्वपूर्ण पहल और कार्रवाइयाँ हुईं । उस समय की अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक सहयोग की संस्थाओं की कार्य प्रणाली भी अपेक्षाकृत ज्यादा जनतांत्रिक थी । अंकटाड और डंकल प्रस्ताव के पहले की गैट संधि इसका उदाहरण है । संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से जिस प्रकार का यह जगतीकरण चला , उससे अमरीका बिलकुल खुश नहीं था।अमरीका ने जब देखा कि उसके साम्राज्यवादी उद्देश्यों में राष्ट्र संघ बाधक बन सकता है , उसने राष्ट्र संघ को चंदा देना बंद कर दिया और राष्ट्र संघ से बाहर ही अंतर्राष्ट्रीय कूटनैतिक कार्यकलापों को बढ़ावा देने लगा । सोवियत रूस के पतन के बाद अमरीका को मौका मिल गया कि राष्ट्र संघ को बिलकुल निष्क्रीय बना दिया जाय । ईराक और युगोस्लाविया पर हमला राष्ट्र संघ की उपेक्षा का ताजा उदाहरण है । राष्ट्र संघ के माध्यम से चलने वाला जगतीकरण इस वक्त पूरी तरह अप्रभावी हो गया है ।&lt;br /&gt;दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमरीका की अपनी बुद्धि से अन्य एक प्रकार का जगतीकरण भी शुरु किया गया था । उसको उन दिनों वामपंथियों ने आर्थिक साम्राज्यवाद कहा , क्योंकि इस बीच अमरीका ने साम्राज्यवाद की अपनी शैली विकसित की थी । उसमें किसी औपनिवेशिक देश पर प्रत्यक्ष शासन करने की जरूरत नहीं होती है । कमजोर और गरीब मुल्कों पर दबाव डालकर उनकी आर्थिक नीतियों को अपने अनुकूल बना लेना उसकी मुख्य कार्रवाई होती है । उन आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप आत्मनिर्भरता खतम हो जाती है और औपनिवेशिक देश धनी देशों पर पहले से अधिक निर्भर हो जाते हैं । जब कोई बड़ा संकट होता है और धनी देशों की मदद की जरूरत होती है तब धनी देशों के द्वारा नयी शर्तें लगायी जाती हैं जिससे औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था को थोड़े समय की राहत मिलती है;लेकिन वह अर्थव्यवस्था अधिक आश्रित हो जाती है,और धनी देशों के द्वारा शोषण के नये रास्ते बन जाते हैं।औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था वाला देश आर्थिक रूप से इतना कमजोर और आश्रित होता है कि उसकी राजनीति को भी आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है ।उपर्युक्त उद्देश्य से १९४५ में ही विश्वबैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष नामक अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं की स्थापना हुई । १९९५ में विश्व व्यापार संगठन बना । ये तीन संस्थायें हैं जो नये जगतीकरण के तीन महत्वपूर्ण स्तंभ हैं । विश्वबैंक विकास के लिए ऋण देकर सहायता करता है और कैसा विकास होना चाहिए उसकी सलाह देता है । कई बार कर्ज लेने वाला देश विश्वबैंक की विकासनीति को अपनी विकास नीति के तौर पर मान लेने के लिए बाध्य होता है । इसलिए सारे गरीब देशों में एक ही प्रकार की विकास नीति प्रचलित हो रही है । यह विश्वबैंक के द्वारा बतायी गयी विकास नीति है ।&lt;br /&gt;अक्सर हम विदेशी मदद की बात सुनते हैं । विश्वबैंक ,मुद्राकोष या धनी देशों की सरकारों से कम ब्याज पर जो ऋण मिलता है , उसी को विदेशी मदद कहा जाता है । विदेशी मदद के साथ-साथ विश्वबैंक की सलाह भी मिलती है कि हम अपने विकास के लिए क्या करें ।उनकी सलाह पर चलने का एक नतीजा होता है कि विदेशी मुद्रा की आवश्यकता बढ़ जाती है और उसकी कमी दिखाई देती है । जब विदेशी मुद्रा का संकट आ जाता है तब हमारा उद्धार करनेवाला अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष होता है । उसके पास जाना पड़ता है ।वह मदद देते समय शर्त लगाता है। उसकी शर्तें मुख्यत: दो प्रकार की होती हैं ;&lt;br /&gt;(१) आर्थिक विकास के कार्यों मे सरकार की प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं होनी चाहिए। किसी उद्योग , व्यापार या कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी अनुदान ,सबसिडी नहीं दी जाएगी ।&lt;br /&gt;(२) देश की आर्थिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए विदेशी पूंजी और विदेशी कंपनियों को अधिक से अधिक छूट देनी होगी ।उन पर और उनकी वस्तुओं पर लगने वाली टिकस कम कर दी जाएगी । यानी विकासशील देश की अर्थव्यवस्था में धनी देशों के पूंजीपतियों का प्रवेश अबाध रूप से होगा ।इसके अलावा मुद्राकोष मदद माँगने वाले देश की मुद्रा का अवमूल्यन कराता है। ताकि हमारा सामान उनके देश में सस्ता हो जाए और उनकी वस्तुओं का दाम हमारे लिए महँगा हो जाए ।&lt;br /&gt;सारे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के साथ इस प्रकार जुड़ जाती है । इस प्रकार का जुड़ाव प्रत्यक्ष साम्राज्यवाद के युग में भी था । फर्क यह है कि उस जमाने में हमारी अर्थनीति और विकासनीति का राजनैतिक निर्णय साम्राज्यवादी सरकार करती थी । आज हम खुद अपनी अर्थनीति को धनी देशों की अर्थनीति के साथ जोड़ने का निर्णय कर रहे हैं ।वे लोग सलाह देते हैं , हमारी सरकार उसी सलाह को निर्णय का रूप देती है। इसलिए इसको जगतीकरण कहा जा रहा है ।&lt;br /&gt;१९४५ से १९९५ तक विकासशील देशों की अर्थनीति को धनी देशों की अर्थनीति का पिछलग्गु बनाने के लिए जितने नियम और तरीके बनाये गए थे , उन सारे नियमों को विश्वव्यापार संगठन कानून का रूप देकर अपना रहा है । विश्वबैंक सलाह देता है ;मुद्राकोष शर्त लगाता है और विश्वव्यापार संगठन कानून चलाता है । यहाँ दन्ड का प्रावधान भी है । यह व्यापार के मामले में विश्व सरकार है । लेकिन इस सरकार के निर्णयों को विकासशील देश अपने हित की दृष्टि से प्रभावित नहीं कर पाते हैं । व्यापार की विश्व सरकार में वे केवल दोयम दर्जे के सदस्य हैं ।&lt;br /&gt;विश्वबैंक , मुद्राकोष और विश्वव्यापार संगठन तीनों अपने - अपने ढंग से काम कर रहे हैं। लेकिन ये एक दूसरे के पूरक हैं ।तीनों में इतना मेल है कि तीनों मिलकर विकासशील देशों एक ही रास्ता दिखाते हैं - एक ही दिशा में ढ़केलते रहते हैं । इसलिए सारे विकासशील देशों की समस्याएं एक ही प्रकार की होती जा रही हैं । इससे जो प्रतिक्रिया होगी , जो असन्तोष होगा,उसको हम एक दिशा में ले जा सकेंगे , तब संभवत: एक नयी यानी चौथे प्रकार का जगतीकरण शुरु होगा । क्योंकि तीसरी दुनिया के सारे देशों की समस्याएं सुलझाने के बजाए जटिल होती जा रही हैं , मौजूदा जगतीकरण की व्यवस्था के खिलाफ़ सारे देशों में गुस्सा और विद्रोह होना चाहिए । धनी देशों पर अपनी निर्भरता खतम कर गरीब देश अगर एकल ढंगसे या परस्पर के सहयोग से आत्मनिर्भर होने का लक्ष्य अपना लेंगे तो प्रचलित जगतीकरण के विरुद्ध एक विश्वव्यापी विद्रोह का माहौल बन जाएगा । विकासशील देशों के परस्पर सहयोग से जो अंतर्राष्ट्रीय संबंध बनेगा , उसके आधार पर नये जगतीकरण का आरंभ होगा ।&lt;br /&gt;समतावादी डॉट ब्लॉग स्पॉट से साभार</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>एचआईवी: आओ मिलकर एड्स भगाएं</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/03/blog-post_31.html</link><category>सोचो कि सोचने की ज़रूरत बनी रहे</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Mon, 31 Mar 2008 16:59:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-606633094813490762</guid><description>लेख़क - अभिषेक श्रीवास्तव&lt;br /&gt;Sunday, 30 December 2007&lt;br /&gt;एचआईवीएड्स के लिए आ रहे भारी विदेशी अनुदान के लालच में हम इससे ज्यादा खतरनाक व जानलेवा बीमारियों से बचने के उपायों और योजनाओं से विमुख होते जा रहे हैं।क्या आपने पुरुषोत्तमन मुलाली का नाम सुना है? आप जैक के बारे में क्या जानते हैं? जाहिर तौर पर एचआईवीएड्स पर बात करते वक्त ऐसे सवाल घोर अप्रासंगिक जान पड़ेंगे। आप सोचेंगे कि एचआईवीएड्स के क्षेत्र में तो बिल गेट्स से लेकर क्लिंटन और देसी नामों में नाको से लेकर अंजलि गोपालन की किस्में पाई जाती हैं। अगर यूएसएड्स और यूएनएड्स की बात न की जाए तो एड्स पर कोई भी विमर्श अधूरा ही रहेगा। लेकिन शुरुआत एक ऐसे नाम से जिसका कोई अता-पता नहीं है। जी हां, वास्तव में मीडिया की एड्स से जुड़ी तमाम खबरों में यह नाम गुमनाम है। इसी व्यक्ति ने हमें बताया कि इस महीने कर्नाटक में एचआईवीएड्स के भ्रामक आंकड़ों के खिलाफ प्रचार करने और सरकार का विरोध करने वाली एक एचआईवी संक्रमित महिला आंदोलनकारी की हत्या हो गई है। इस महिला ने अपने पीछे 600 एचआईवी संक्रमित महिलाओं को संगठित किया था जो सरकार द्वारा जुलाई में जारी एचआईवीएड्स के आकड़ों की सचाई का पर्दाफाश कर रही थीं।&lt;br /&gt;सवाल उठता है कि ऐसी खबरें हम तक क्यों नहीं आ पाती हैं? इसका कारण पुरुषोत्तमन खुद बताते हैं, 'जाहिर सी बात है कि जो लोग विदेशी अनुदान लेकर एड्स के आंकड़ों को तोड़ते-मरोड़ते हैं, उनके हित बड़ी पूंजी से चलने वाले मीडिया के हितों से जुदा नहीं हैं। दूसरे, न तो मीडिया को और न ही एड्स जागरूकता का दम भरने वाले तमाम एनजीओ और अन्य कार्यकर्ताओं को कोई भी वैज्ञानिक जानकारी है कि एड्स के आंकड़े कैसे निकाले जाते हैं? और यह भी कि आखिर एड्स होता क्या है। जो बताया जाता है उसे मान कर आम सहमति बना लेने की आदत ने इस देश को सौ फीसद बेच डाला है।'आखिर इस शख्स की बातों में कितनी सचाई है? पहले बता दें कि पुरुषोत्तमन मुलाली देश के उन शुरुआती लोगों में से एक हैं जिन्होंने 1986-87 के दौरान भारत में एड्स के आरंभिक मामले सामने आते ही इस पर चिंता जाहिर करते हुए काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने यह शुरुआत ज्वाइंट एक्शन काउंसिल कुन्नूर (जैक) नाम के संगठन से की और आज भी इसी बैनर तले काम जारी रखे हुए हैं। आज एचआईवीए्ड्स के क्षेत्र में जितने चेहरे दिखाई दे रहे हैं सब पुरुषोत्तमन की अगली पीढ़ी के लोग हैं। वह बताते हैं, 'मेरी भी दुकान अच्छी चल रही थी। एड्स के नाम पर सालाना पांच करोड़ का कारोबार था। लेकिन जब मैं इस तंत्र के भीतर घुसा और मैंने देखा कि किस तरह विदेशी अनुदानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फायदे के लिए आकड़ों को मनमर्जी तोड़ा-मरोड़ा जाता है और एक बीमारी के बारे में इतने अवैज्ञानिक नजरिए से प्रचार किया जा रहा है तो मैंने दुकान बंद कर दी। कहते हुए शर्म आती है कि मैं पहला और इकलौता व्यक्ति हूं जो एचआईवीएड्स की राजनीति का पर्दाफाश करने के लिए पिछले दस वर्षों से लगा हूं। मेरी जेब में एक पैसा नहीं है लेकिन मैं इन लोगों को छोड़ूंगा नहीं।'&lt;br /&gt;गौरतलब है कि 6 जुलाई 2007 को राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यम के तीसरे चरण का उद्धाटन करते वक्त स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने बड़े उत्साह के साथ घोषणा की थी कि भारत में एक आकलन के मुताबिक एचआईवी ग्र्रस्त लोगों की संख्या में नाटकीय तरीके से गिरावट आई है। उन्होंने कहा था कि पहले के आंकड़े 57 लाख से गिर कर यह संख्या अब 20 लाख तक पहुंच गई है और प्रसार की दर 0.9 फीसद से गिर कर 0.36 फीसद हो गई है। पुरुषोत्तमन हंसते हुए सवाल करते हैं, 'या तो 37 लाख लोगों की मौत हो गई या वे ठीक हो गए। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं हो सकता कि सरकार ऐसे दावे करे।' सरकार का जवाब यह आता है कि इस बार आंकड़ों के आकलन के लिए अपनाई गई प्रणाली को बदल दिया गया है जिससे इतना फर्क दिखाई दे रहा है। रामदास ने खुद कहा था, 'हमने इस आपदा की गंभीरता को कम कर के आंकने की गलती हमेशा से ही की है।' उन्होंने चेतावनी दे डाली कि दोनों वर्षों के आंकड़ों की तुलना संभव नहीं है। उनका कहना था कि यदि हम दोनों ही वर्षों के लिए एक ही प्रविधि अपनाते हैं तो पाते हैं कि प्रसार में न्यूनतम फर्क पड़ा है।&lt;br /&gt;सवाल उठता है कि दो वर्षों में आंकड़े निकालने की प्रविधि को क्यों बदल दिया गया? खैर, निष्कर्ष यही निकलता है कि एचआईवी के मामलों में वास्तव में कोई कमी नहीं आई है। इस तथ्य से हालांकि एचआईवीएड्स पर काम करने वाले कई कार्यकर्ता खुद सहमत हैं लेकिन अनुदानों का इतना दबाव है, खासकर वे अनुदान जो नाको के माध्यम से आते हैं, कि इस क्षेत्र में काम कर रहे लोग और संगठन इसके कारणों की तह में नहीं जाते हैं। सरकार ने अब तक नई प्रविधि का कोई भी विवरण मुहैया नहीं कराया है कि आखिर कैसे वह इस निष्कर्ष पर पहुंची कि संक्रमित व्यक्तियों की संख्या कम हो गई है। दूसरा पक्ष यह भी है कि तमाम एनजीओ इस बात को लेकर सशंकित हैं कि सरकार के इन आंकड़ों से कहीं अनुदानों पर कोई फर्क न पड़ जाए। जाहिर सी बात है कि यदि दानदाता एजेंसियां सरकारी आंकड़ों से सहमत हो जाती हैं तो अनुदानों में कमी आना तय है।&lt;br /&gt;गैरसरकारी संगठनों द्वारा ये चिंताएं भी जताई जा रही हैं कि संशोधित आंकड़ों से बड़ी दवा कंपनियों द्वारा अनिवार्य एड्स दवाओं का पेटेंट कराने की संभावना बढ़ जाती है। पुरुषोत्तमन कहते हैं, 'यदि एक फीसद से ज्यादा आबादी एचआईवीएड्स से प्रभावित होती तभी इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जा सकता है। सरकार खुद कहती है कि 0.9 फीसद आबादी अभी इसकी चपेट में है। फिर इस पर एक राष्ट्रीय विधेयक बनाने की जरूरत क्यों आन पड़ी?'&lt;br /&gt;ध्यान देने वाली बात है कि पिछले वर्ष सरकार संसद में एचआईवीएड्स विधेयक 2006 लाने वाली थी जिसके खिलाफ काफी बवाल मचा था। इस मामले में 'जैक' द्वारा राष्ट्रपति और राज्य सभा के महासचिव को एक पत्र भी लिखा गया था। जबकि इस संबंध में दिल्ली के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में आईपीसी की धारा 377 के तहत दो मामले 2001 से ही लंबित हैं। इसके अलावा संसद के समक्ष एक याचिका डाली गई थी जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि एचआईवीएड्स पर बनाई गई संसदीय समिति दरअसल यूएनएड्स से संबध्द इकाई है। जाहिर तौर पर यूएनएड्स पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा है और वहां चीजें स्वतंत्र रूप से संचालित नहीं होती हैं।&lt;br /&gt;इसी बारे में पुरुषोत्तमन कहते हैं कि बल्ब इस देश में जलता है लेकिन उसका स्विच कहीं और होता है। यह बात दूसरी तमाम विकास परियोजनाओं के बारे में भी उतनी ही सच है जितना एचआईवीएड्स से जुड़ी परियोजनाओं के बारे में। सोचने वाली बात है कि जिस देश में टीबी, हैजा, मलेरिया, डेंगू, खसरा, कैंसर आदि से लोग इतनी आसानी से रोजाना मर-खप जाते हैं वहां एचआईवीएड्स को इतना तूल दिए जाने का क्या अर्थ है? टीबी, मलेरिया और एचआईवीएड्स पर भारत को मिलने वाले वैश्विक अनुदानों की तुलना की जाए तो इस बात को अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि इनके बीच कितना भारी अंतर है। यह संयोग नहीं है कि 'नाको' की वेबसाइट पर प्रकाशित रिक्त पदों में एक कम्प्यूटर ऑपरेटर का वेतन मासिक 75000 दिखाया गया है। और यह स्थिति उस देश में है जहां 70 फीसदी आबादी की औसत कमाई एक डॉलर (41रुपए) प्रतिदिन से नीचे है।&lt;br /&gt;इस वर्ष के आल्टरनेटिव इकोनॉमिक सर्वे पर नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है कि देश में जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में जितना पैसा खर्च किया जाना चाहिए उतना या उससे ज्यादा सिर्फ एक बीमारी के लिए खर्च किया जा रहा है। ग्रामीण संस्थाओं में चिकित्सकों और चिकित्सकीय कर्मचारियों के वितरण का यह हाल है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सक 90 फीसद से ज्यादा समय मौजूद नहीं रहते हैं। एक प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ एक चिकित्सक की व्यवस्था है। सरकारी आंकड़े खुद बताते हैं कि 50 फीसदी पुरुष स्टाफ, 21 फीसदी नसर्ें (एएनएम), 34 फीसदी प्रयोगशाला कर्मी और 34 फीसदी फार्मासिस्ट आम तौर पर अपने कार्य स्थलों से गायब रहते हैं। एक बात और ध्यान देने वाली है कि मानव संसाधन यदि पर्याप्त हो भी तो ग्रामीण इलाकों में चिकित्सीय उपकरणों की संख्या का टोटा है।&lt;br /&gt;यदि हम स्वास्थ्य सूचकों पर नजर डालें तो पाएंगे कि शिशु मृत्यु दर, मलेरिया, हैजा जैसे सांमक रोगों का प्रसार खराब ढांचागत व्यवस्था के बावजूद घटा है। इससे सीधा सबक मिलता है कि जो पैसा निजी क्षेत्र में या गैरसरकारी संस्थानों के माध्यम से निवेश किया जा रहा है उसे अगर सार्वजनिक क्षेत्र और जन स्वास्थ्य में लगाया जाए तो स्थितियों के सुधरने की संभावनाएं बढ़ना लाजिमी है। हालांकि सवाल उठाए जाते रहे हैं कि पिछले दो दशकों के दौरान स्वास्थ्य सूचकों में आया सुधार निजी क्षेत्र की बढ़त की वजह से है या सार्वजनिक क्षेत्र की बेहतरी की वजह से। हम आज ऐसी खबरों से रूबरू होते हैं कि मेरठ जैसे शहर में एक एचआईवी रोगी का इलाज करने से चिकित्सक मना कर देते हैं। एम्स जैसे संस्थान में एक मरीज समुचित व्यवस्था न होने के चलते उसके गलियारों में ही दम तोड़ देता है और उसकी लाश को उसके गांव पहुंचाने वाला कोई नहीं होता। उस पर से बर्बर व असंवेदनशील मीडिया इस लाश का ऐसे प्रचार करता है जैसे संवाददाता का इस मौत से कोई संबंध नहीं है।&lt;br /&gt;अन्य बीमारियों को यदि कुछ समय के लिए हम अलग रख दें तो एचआईवीएड्स के साथ एक पक्ष जो बहुत मजबूती से जुड़ा नजर आता है वह सामाजिक विभेद और कलंक का है। आम तौर पर हमारे यहां एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। इस दिशा में जागरूकता फैलाने के लिए हालांकि कई गैरसरकारी संगठन और सरकारी एजेंसियां कार्यरत हैं लेकिन इसमें भी जो अनुदान प्राप्त होता है वह बुनियादी तौर पर सामंती मानसिकता के खिलाफ इस पूरी लड़ाई को प्रोजेक्ट में बदल कर रख देता है। दिल्ली से ही चलने वाली एक संस्था 'सम्यक' के संजय देव और वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव इस संस्था के माध्यम से पिछले कई वर्षों से मीडियाकर्मियों के बीच एचआईवीएड्स को लेकर जागरूकता फैलाने के काम में लगे हैं। इस बीमारी से जुड़ी शब्दावली के अखबारी खबरों में प्रयोग को लेकर कई शहरों में संवाददाताओं और पत्रकारों के साथ कार्यशालाएं की जा चुकी हैं और उन्हें बताया जाता है कि किस तरह से ऐसी भाषा का प्रयोग करें जो असम्मानजनक न हो। हालांकि इस भाषा के बारे में एनजीओ की पुस्तकों के बड़े प्रकाशक विनय आदित्य बहुत स्पष्ट राय रखते हैं, 'यह भाषा सीधे विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र से आ रही है। ऐसा लगता है जैसे कि अंग्रेजी का हिंदी में तर्जुमा कर दिया गया हो। लोगों को ध्यान ही नहीं रहता कि हिंदी में कितने खूबसूरत शब्द हैं जिन्हें वापस लाया जाना चाहिए।' सलन, आजकल एचआईवी से ग्रस्त मरीजों के लिए एक शब्द चल पड़ा है 'एचआईवी के साथ जी रहे व्यक्ति।' अब यह नाम भले ही संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार कर्मियों के बीच सम्मानित माना जाता हो लेकिन लिखने और पढ़ने में काफी अटपटा लगता है। भले ही इस तरह की शब्दावली के पैरोकार अपने तर्क दें लेकिन मोटे तौर पर इस संदर्भ में एक बार फिर पुरुषोत्तमन मुलाली की बात मार्के की लगती है, 'एचआईवीएड्स कोई बीमारी नहीं है। यह एक पूरी सभ्यता है। इसीलिए अन्य बीमारियों की तुलना में एचआईवीएड्स को आने वाला अनुदान इतना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यह हमारी भाषा, संस्कृति और जीने की शैली पर सीधे हमला करता है।' तमाम किस्म के दावों, आंकडों और भय के बीच पुरुषोत्तमन के बेलाग बयान हमें ज्यादा आकर्षित करते हैं। जाहिर सी बात है कि हम भी एचआईवीएड्स के भीतरी दांव-पेंचों से तकनीकी तौर पर इतने वाकिफ नहीं लेकिन कहा गया है कि धुआं है तो आग भी कहीं होगी ही। पुरुषोत्तमन हमारे सामने बगैर कोई खुलासा किए सिर्फ इतना ही कहते हैं, 'यह आग आपको मार्च-अप्रैल में दिखाई दे जाएगी। सारे खेल का पर्दाफाश होने में कुछ ही वक्त बाकी है। मैं इसी में लगा हूं।' हम हतप्रभ उनका मुंह देखते रह जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समकाल डॉट कॉम से साभार</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>कैलाश सत्‍यार्थी जी यह पब्लिक है सब जानती है</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/03/blog-post_19.html</link><category>एनजीओनामा</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Wed, 19 Mar 2008 13:50:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-7624666137048176124</guid><description>&lt;strong&gt;आशीष (बोल हल्ला ब्लॉग स्पॉट &lt;span class=""&gt;पर)&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Thursday, 24 January, 2008&lt;br /&gt;&lt;a name="2690900999507558407"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;(इस रिपोर्ट को पढ़कर मुझे और मेरे जैसे कई लोगों को थोड़ा दुख हो सकता है। समाज सेवा और इससे जुड़े लोगों की मैं बहुत इज्‍जत करता हूं लेकिन आज जब &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;a href="http://janpath.blogspot.com/2008/01/blog-post.html"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;जनपथ &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पर यह रिपोर्ट पढ़ा तो &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;a href="http://www.bbasaccs.org/"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कैलाश सत्‍यार्थी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt; से पहली मुलाकात याद आ गई । उनसे पहली बार मैं जयपुर में एक कार्यक्रम में मिला था। दी संडे इंडियन के एक पत्रकार ने एक स्‍टोरी की है जो मशहूर बचपन बचाओ आंदोलन के बारे में है...पता चला है कि इस स्‍टोरी पर संस्‍था के प्रमुख कैलाश सत्‍यार्थी द्वारा उन्‍हें जान से लेकर नौकरी से निकलवाने तक की धमकियां दी जा रही हैं। अब इस रिपोर्ट को पढकर आपकी अपनी राय जरुर देंताकि कैलाश सत्‍यार्थी और इन जैसे समाज सेवा के ठेकेदारों को पता चले कि जनता आपके बारें क्‍या सोचती है। यदि आपको और कुछ जानकारी मिलती है तो इसे बोलहल्‍ला के साथ बांटिएगा जरुर।)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हरेक महान शुरुआत आखिरकार लड़खड़ाने को अभिशप्त होती है। प्रत्येक महान यात्रा कहीं-न-कहीं तो समाप्त होती ही है। - संत &lt;span class=""&gt;औगस्तीन। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के संदर्भ में भी यह बात नई नहीं है, बात आप चाहे जिस भी क्षेत्र की कर लें। यही बात समाज की सेवा के महान उद्देश्य और परोपकार के महान धर्म को ध्यान में रखकर शुरु हुई गैर-सरकारी, सामाजिक या फिर स्वयंसेवी संगठनों के साथ भी लागू होती है। जो विचारक या निर्देशक इनकी शुरुआत करता है। ताजा मामले की बात हम बचपन बचाओ आंदोलन, ग्लोबल मार्च या असोशिएशन फॉर वोलंटरी एक्शन(आवा) से कर सकते हैं. ये तीन नाम इस वजह से क्योंकि इन संस्थाओं का ढांचा ही ऐसा है. सारे एक-दूजे से जुड़े और अलग भी. ऊपर से इस मामले के पेंचोखम इतने कि आम आदमी तो उनको समझने में ही तमाम हो जाए या उसे यह शेर याद आ जाए- जो उलझी थी कभी आदम के हाथों, वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूं. बहरहाल, मामला अभी टटका और ताजा है. इस पूरे मसले में तमाम नामचीन शख्सियतें उलझीं हैं और साथ ही मीडिया भी अपना अमला पसारे है. पूरे फसाद की जड़ में है दिल्ली-हरियाणा सीमा पर स्थित इब्राहिमपुर में मौजूद बालिका मुक्ति आश्रम. कभी हमसफर रहे दो लोग ही अब एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं. तलवारें तन चुकी हैं, बखिया उधेड़ी जा रही है, आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं और दोनों ही खेमे एक-दूजे के चरित्र हनन पर आमादा हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर इस पूरे घटनाक्रम का इतिहास जानना होगा। बालश्रम को खत्म करने और बंधुआ मजदूरों को बचाने के पवित्र उद्देश्य को ध्यान में रखकर दो महानुभाव इकट्ठा हुए. ये दोनों ही आज काफी नामचीन हैं-स्वामी अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी. 80 के दशक में शुरु हुआ यह सफर काफी मशहूर हुआ और सफल भी. इसका नाम फिलहाल बचपन बचाओ आंदोलन है, पर इसकी शुरुआत बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने की थी और उस वक्त संस्था के तौर पर साउथ एशियन कोलिशन अगेंस्ट चाइल्ड सर्विटयूड (साक्स) का निर्माण किया गया. इसमें पेंच केवल एक आया, जब 93-94 में स्वामी अग्निवेश इस आंदोलन से अलग हो गए. बहरहाल स्वामी अग्निवेश से इस मसले पर जब पड़ताल की गई, तो उन्होंने कुछ ऐसा बयान दिया, ''देखिए, असल में बंधुआ मुक्ति मोर्चा(बीएमएम) ने ही इस पूरे आंदोलन की शुरुआत की थी. आप जो आश्रम देखकर आ रहे हैं, वह भी असल में बीएमएम का ही बनाया हुआ था. बाद में मुझे महसूस हुआ कि कैलाश जी उसका और भी कोई इस्तेमाल करना चाह रहे हैं. उसी समय हम दोनों में कुछ बातचीत हुई और मैंने अलग होने का फैसला कर लिया. ''खैर, अब आते हैं तात्कालिक मसले पर. फिलहाल विवाद की जड़ में है बालिका मुक्ति आश्रम और कभी कैलाश सत्यार्थी की करीबी सहयोगी और इसकी संचालिका रहीं सुमन ही खम ठोंककर मैदान में आ खड़ी हुई हैं. लाखों रुपए मूल्य की यह संपत्ति किसी व्यक्ति ने संस्था को दी थी और शायद यही वजह है-तलवारें खिंचने की. मामला तब सुर्खियों में आया, जब पिछले महीने मीडिया में यहां की कुछ लड़कियों के यौन-शोषण की खबरें आईं. वे लड़कियां उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से लाई गईं थीं और आश्रम में रह रही थीं. बच्चियों ने मसाज करवाने की बात भी स्वीकारी. साथ ही सुमन और संगीता मिंज(फिलहाल आश्रम की केयरटेकर) पर तो दलाली के भी आरोप लगे. बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) के राष्ट्रीय महासचिव राकेश सेंगर इसे कुछ ऐसे बयान करते हैं, ''देखिए, हम व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाना चाहते, लेकिन आप रांची जाकर पता करें तो इनके खिलाफ कई मामले दर्ज पाएंगे. उन पर तो एफसीआरए के तहत भी आंतरिक कार्रवाई चल रही है. उन्होंने 2004 में अपनी एक अलग संस्था द चाइल्ड ट्रस्ट बनाई और संस्था की संपत्ति को निजी तौर पर इस्तेमाल किया. अपने लिए गाड़ी खरीदी और कई सारी वित्तीय अनियमितताएं की. हमारे पास सारे जरूरी कागजात हैं और आप उनको देक सकते हैं. ''हालांकि सुमन का इस मसले पर कुछ और ही कहना है. वह कहती हैं, ''ये सारे आरोप निराधार और बेबुनियाद हैं. मैं किसी भी जांच के लिए तैयार हूं. दरअसल यह सारा कुछ आश्रम पर कब्जा करने को लेकर है. उन्होंने तो मेरे कमरे को भी हथिया लिया और मेरे सामान को उठा लिया. आप खुद जाकर देख सकते हैं कि आश्रम में सुरक्षा के लिए हमें पुलिस से गुहार करनी पड़ी है. कैलाश जी ने संस्था में अपनी बीवी और बेटे को स्थापित कर यह सारा झमेला खड़ा किया है. अगर मैं इतनी ही बुरी थी तो 22 सालों तक ये चुप क्यों रहे और मुझे बर्दाश्त क्यों करते रहे?''खैर, अब जरा पीछे की ओर लौट कर इस पूरे विवाद की जड़ देखें. साक्स से बीबीए की यात्रा में कई पड़ाव आए. संस्था जैसे-जैसे बढ़ती गई, विवाद भी गहराते गए. आखिरकार 2004 में यह तय किया गया कि आवा एक मातृसंस्था रह जाएगी और इसके बैनर तले सेव द चाइल्डहुड फाउंडेशन, बाल आश्रम ट्रस्ट, ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर और द चाइल्ड ट्रस्ट बनाए जाएंगे. यही से पूरा बवाल शुरु हुआ. सुमन का कहना है, ''आप खुद देख सकते हैं कि कैलाश जी ने किस तरह अपने प्रभाव का दुरुपयोग किया. अपनी पत्नी को तो उन्होंने सेव द चाइल्डहुड...का अध्यक्ष बना दिया, तो बेटे को बाल आश्रम...का. ग्लोबल मार्च...के तो वह खुद ही मुख्तार हैं. इसके अलावा उनकी पत्नी के ट्रस्ट में ही उन्होंने सारे संसाधनों का रुख कर दिया. यही सब विवाद की जड़ में है. ''हालांकि इस संवाददाता ने जब बीबीए के वर्तमान अध्यक्ष रमेश गुप्ता से बात की, तो उनका कुछ और ही कहना था. वह बताते हैं, ''हमने तो सुमन को हमेशा ही सम्मान दिया है. लेकिन जब उसकी हरकतें नाकाबिले-बर्दाश्त हो गई तो हमें मामले को उजागर करना ही पड़ा. हमने तो उसे एक खुला पत्र भी लिखा है, उससे आप सारी बातें जान सकते हैं. उसने एक भी निर्णय का सम्मान नहीं किया. कभी भी वित्तीय पारदर्शिता नहीं दिखाई और आवा के संसाधनों का दुरुपयोग कर अपनी खुद की संस्था को पालती-पोसती रही. खुद को तो उसने जैहादी के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया, लेकिन बाकी साथियों का नाम भी नहीं लिया. यह सचमुच अफसोसनाक है. ''राकेश सेंगर तो उनसे भी एक कदम आगे बढ़कर आरोप लगाते हैं कि जबरिया निकालने वगैरह की बात बिल्कुल बेबुनियाद है. बाल आश्रम की लीज तो वैसे भी 31 दिसंबर को खत्म हो रही थी. फिर इस्तीफा भी उनसे जबरन नहीं लिया गया. जब उन्होंने संस्था छोड़ दी तो फिर वैसे ही आश्रम में उनके बने रहने की कोई तुक नहीं थी. जहां तक उनके कमरे से कुछ लेने की बात है, तो यह तो बिल्कुल अनर्गल प्रलाप है. आप खुद ही बताएं किसी स्वयंसेवी संस्था में काम करनेवाली महिला के पास 2 किलो सोना कहां से आ गया? हालांकि, कैलाश सत्यार्थी इस पूरे विवाद से पल्ला झाड़ लेते हैं. वह कहते हैं, ''भई, मेरा तो न बाल आश्रम और न ही बालिका आश्रम से कोई लेना-देना है. वहां से तो मैं डेढ़ साल पहले ही अलग हो गया था. आप मुझसे ग्लोबल मार्च के बारे में पूछें तो कुछ बता सकता हूं.''हालांकि अपने परिवार के बारे में पूछने पर वह बिफर पड़े. इस संवाददाता को धमकी भरे लहजे में कैलाश जी ने कहा, ''अगर मेरा बेटा या पत्नी किसी संस्था का नेतृत्व करने लायक हैं तो इसमें गलत क्या है? वैसे भी वे दूसरे संस्थानों से जुड़े हैं. आप बेबुनियाद बातें न करें, वरना आपका करियर भी खतरे में पड़ सकता है. '' हालांकि इसके ठीक उलट राकेश सेंगर का कहना है कि अगर कैलाश जी के बेटे की बात साबित हो जाए तो वह सामाजिक जीवन ही छोड़ देंगे. बहरहाल, आरोपों की इस झड़ी में नुकसान सबसे ज्यादा तो उन बच्चों का हो रहा है, जिनका जीवन सुधारने के मकसद से इस आंदोलन की शुरुआत हुई है. साथ ही कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब खोजने होंगे. मसलन, वे लड़कियां अब कहां हैं, जिन्होंने मीडिया के सामने आकर मसाज की बात कबूल की थी? फिर मीडिया पर भी कुछ उंगलियां उठेंगी. जैसे, क्या हरेक रिपोर्टर ने इब्राहिमपुर जाकर पड़ताल की थी?जब यह संवाददाता बालिका आश्रम में पहुंचा, तो नजारा कुछ और ही था. वहां बाकायदा सारे काम सामान्य तौर पर ही हो रहे थे. फिलहाल वहां 25 बच्चियां हैं. जिसमें से चार वयस्क हैं. वहां सात-आठ बच्चियों के अभिभावक भी थे. जब हमने बच्चियों से बात की तो उन्होंने सारी बातों से इंकार किया. उनके अभिभावकों ने भी सुर में सुर मिलाते हुए आश्रम के काम की तारीफ ही की. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन पर किसी तरह का दबाव है, तो उन्होंने नकारात्मक जवाब दिया. वहां की एक कर्मचारी बबली ने बताया, ''मीडिया ने एकतरफा रपटें छापी और दिखाई है. हमारा पक्ष किसी ने जानने की भी कोशिश नहीं की. आप खुद बताएं अगर यहां मसाज जैसे काम होते रहे हैं, तो क्या दूसरे लोग भी अपराधी नहीं सिध्द होते? फिर महिला आयोग ने जिन बच्चियों को निर्मल छाया भेजा, आप खुद उनके कागजात देख सकते हैं. उनके साथ उनके अभिभावकों ने भी अपनी सहमति से जाने की बात लिख कर दी है. यहां आप खुद आए, तो हालात आपके सामने हैं.''बहरहाल, जब इस संवाददाता ने बाल आश्रम जाकर चीजें देखने का फैसला किया, तो उसे अंदर घुसने की अनुमति नहीं दी गई. सवाल कई हैं, जवाब अधूरे या मुकम्मल नहीं हैं. वैसे, यह कहानी किसी एक गैर-सरकारी संगठन की नहीं है. बटरफ्लाई नाम की एक संस्था में भी एक कर्मचारी के लैंगिक -शोषण और दुर्व्यवहार का मामला सामने आया है. साथ ही वहां अचानक कई कर्मचारियों की बर्खास्तगी भी विवाद का विषय है.इसी तरह ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क नाम की संस्था में एक महिला कर्मी के यौन-शोषण का मामला सामने आया है. इसी तरह जंगपुरा में (जो दिल्ली की महंगी जगहों में से एक है) भी करोड़ों रुपए की संपत्ति को लेकर एक संस्था में खींचतान जारी है. यहां विलियम केरी स्टडी एंड रिसर्च सेंटर और क्रिश्चियन इंस्टीटयूट फॉर स्टडी एंड रिलीजन के बीच तलवारें खिंची हैं. हालांकि दोनों संस्थाएं मूल रूप से एक ही हैं और एक ही व्यक्ति इनका जनक भी था. मामला यहां भी संपत्ति का ही है.बहरहाल, तालाब की सारी मछलियां गंदी ही नहीं, पर ऐसे उदाहरण इस क्षेत्र के महान उद्देश्य पर सवालिया निशान तो खड़ा कर ही देते हैं. यक्ष प्रश्न तो बचा ही रहता है, क्या ये स्वयंसेवी संगठन अपने मूल की ओर वापस लौटेंगे? क्या लोगों के कल्याण हेतु बनी संस्थाएं उसी काम में लगेंगी? या फिर, यह सिरफुटव्वल जारी रहेगी?(साभार - दी संडे इंडियन)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;at &lt;a class="timestamp-link" title="permanent link" href="http://bolhalla.blogspot.com/2008/01/blog-post_6233.html"&gt;4:10 PM&lt;/a&gt; &lt;a title="Edit Post" href="http://www.blogger.com/post-edit.g?blogID=3558649438192355601&amp;amp;postID=2690900999507558407"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="comments"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;5 आपकी राय:&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a name="comment-2964636698966171414"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/08537581524466402579" rel="nofollow"&gt;अनिल पाण्डेय&lt;/a&gt; said...&lt;br /&gt;jankari kabile gaur hai.&lt;br /&gt;&lt;a title="comment permalink" href="http://bolhalla.blogspot.com/2008/01/blog-post_6233.html#comment-2964636698966171414"&gt;24 January, 2008 4:22 PM &lt;/a&gt;&lt;a title="Delete Comment" href="http://www.blogger.com/delete-comment.g?blogID=3558649438192355601&amp;amp;postID=2964636698966171414"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="comment-4165656540665169107"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/00891524525052861677" rel="nofollow"&gt;कमल शर्मा&lt;/a&gt; said...&lt;br /&gt;बेहतर रिपोर्ट। पहले मीडिया पर...मेरे ख्‍याल से सारे मीडिया वाले आश्रम नहीं गए होंगे और दिल्‍ली में ही दूसरी जगह पर बैठकर या फोन पर बात कर रिपोर्ट बनाई होगी क्‍योंकि आजकल टीवी में तो हर रिपोर्टर घोड़े पर सवार है सो उसके पास कहीं जाने का वक्‍त ही नहीं है।अब आश्रम पर। ज्‍यादातर समाजसेवक और समाज नेता आर्थिक भ्रष्‍टाचार और सेक्‍स में डूबे हुए हैं। समाजसेवा के नाम पर हर तरह से हाथ फेरने में ये लोग माहिर हो चुके हैं। सरकार को चाहिए कि जरुरतमंद लोगों का ध्‍यान रखने के लिए वह खुद संस्‍थाएं बनाएं और उनके मानक तय करें। निजी संस्‍थाओं के कर्ताधर्ता इसी तरह लड़ते हैं, पैसे खाते हैं और यौन कार्य में लिप्‍त रहते हैं। इन लोगों के बारे में यह पता लगाना चाहिए कि इनका घर कैसे चलता है जब ये कहीं नौकरी नहीं करते। केवल संस्‍थाएं चलाते हैं। हमें तो लगता है कि एक महीना नौकरी न करे तो अगले महीने घर नहीं चला पाएंगे लेकिन ये निखट्टू तो जिंदगी भर नौकरी या कारोबार नहीं करते और ऐशों आराम की जिंदगी जीते हैं। इन मक्‍कारों की आय और आयकर के बारे में जांच होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;a title="comment permalink" href="http://bolhalla.blogspot.com/2008/01/blog-post_6233.html#comment-4165656540665169107"&gt;24 January, 2008 4:39 PM &lt;/a&gt;&lt;a title="Delete Comment" href="http://www.blogger.com/delete-comment.g?blogID=3558649438192355601&amp;amp;postID=4165656540665169107"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="comment-5680542674530255106"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://ujjas.blogspot.com/" rel="nofollow"&gt;उमाशंकर मिश्र&lt;/a&gt; said...&lt;br /&gt;ashish ji , yeh ek mahtavpurn shoochna di hai aapne.... iski aur bhi padtal ki jayegi.... desh bahr me jis tarah se ngo's ki fauj khadi ho rahi hai achhi baat kahi ja sakti hai, lekin vidambana hai ki kabhi swaal nahi pooche jaate ki kya ye sansthayen apna kaam bakhoobhi nibhati hai. bundelkhand me bhi log marne lage hain.....kanha thi ye samajsevi sansthayen....iss tarah ke swaalon se ye samjsewi tilmila jate hain.... ho sakta hai... ab bundelkhand me marte huye logo ko jilane ke naam par kuchh aur ngo's ban jayen... sarkari rahnaumaon ne bhi iss field ko durgandh se bhar diya hai aur smaaj sewa ka jajba upekshit hua hai.....sharm sharm sharm&lt;br /&gt;&lt;a title="comment permalink" href="http://bolhalla.blogspot.com/2008/01/blog-post_6233.html#comment-5680542674530255106"&gt;24 January, 2008 4:43 PM &lt;/a&gt;&lt;a title="Delete Comment" href="http://www.blogger.com/delete-comment.g?blogID=3558649438192355601&amp;amp;postID=5680542674530255106"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="comment-7709503847822933983"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/07241456869337929788" rel="nofollow"&gt;राजीव जैन Rajeev Jain&lt;/a&gt; said...&lt;br /&gt;निश्चित रूप से कुछ न कुछ घालमेल है वहां पर। अब यह छिपा हुआ नहीं है कि समाजसेवा की आड में क्‍या क्‍या होता है। कल ही हिंदुस्‍तान ने अपने ही मित्र अजीत सिंह की एक खबर प्रकाशित की है किफर्जी समाज सेवा में यूपी नंबर वन मेरठ। सत्ता प्रतिष्ठान को समाजसेवा की घुट्टी पिलाने वाली गैर सरकारी संस्थाओं का एक चेहरा यह भी है और यह है प्रोजेक्ट में अनियमितता और सरकारी धन का दुरुपयोग। इसमें उत्तर प्रदेश की संस्थाएं सबसे आगे हैं । महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने देश की दो हजार से ज्यादा एनजीओ को ब्लैक लिस्टेड किया है । इनमें सबसे ज्यादा 332 संस्थाएं उप्र की हैं । इन संस्थाओं पर सरकारी फंड के दुरुपयोग और दिए गए प्रोजेक्ट में अनियमितताएं बरतने का आरोप है । बार-बार चेतावनी देने के बाद भी इन अनियमितताओं पर लगाम लगती न देख महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इन्हें ब्लैक लिस्टेड किया है । इन संस्थाओं के नाम मंत्रालय की वेबसाइट में डाले गए हैं । मिली जानकारी के मुताबिक सेंट्रल सोशल वेलफेयर बोर्ड इन ब्लैक लिस्टेड एनजीओ के मामलों की सुनवाई क रे गा। सुनवाई में अगर संस्थाएं खुद को सही साबित करती हैं तो उसका नाम काली सूची से बाहर निकाला जा सक ता है । ब्लक लिस्टेड एनजीओ के मामलों में राजस्थान और हिप्र की स्थिति बेह तर है । राजस्थान से 89 और हिमाचल प्रदेश से 53 एनजीओ काली सूची में हैं। मेरठ और अलीगढ¸ की 13 एनजीओज् महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से जारी सूची के मुताबिक मेरठ की छह और अलीगढ¸ की सात एनजीओ को काली सूची में डाला गया है । इन संस्थाओं में मेरठ की सर्व इंडिया, ग्रामीण विकास मंडल, गामोद्योग विकास मंडल, ग्रामीण उत्थान संस्थान, नवीन जनकल्याण संस्थान, शीतल कौर नारी उत्थान संस्थान शामिल हैं। गौरतलब है कि हाल ही में ग्रामीण विकास पर अनुदान देने वाले संगठन के पार्टनर मेरठ की संकल्प और भोर संस्था के खिलाफ कार्रवाई क रने के निर्देश दिए थे। पिछले महीने मेरठ में ही जिला पंचायत के निर्माण कायर्ों में कोताही बरतने वाली एक संस्था के खिलाफ सिविल लाइन थाने में एफ आईआर दर्ज की गई थी। भ्रष्ट एनजीओ के टॉप फाइव गढ¸ उत्तर प्रदेश 332 मेघालय 323 तमिलनाड 304 आन्ध्र प्रदेश 287 पंजाब 223* स्‍त्रोत-महिला एवं बाल विकास मंत्रालय&lt;br /&gt;&lt;a title="comment permalink" href="http://bolhalla.blogspot.com/2008/01/blog-post_6233.html#comment-7709503847822933983"&gt;24 January, 2008 5:09 PM &lt;/a&gt;&lt;a title="Delete Comment" href="http://www.blogger.com/delete-comment.g?blogID=3558649438192355601&amp;amp;postID=7709503847822933983"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a name="comment-313457395967027496"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/15834195672907897315" rel="nofollow"&gt;आशेन्द्र सिंह&lt;/a&gt; said...&lt;br /&gt;समाज सेवा के नाम पर मसीहा बनने और राजनीति में प्रवेश करने का औजार हमारे देश में कई लोगों ने अपनाया है . कैलाश जी भी उन्ही में से एक हैं. मैंने भी उनके और उनकी श्रीमती जी के उपदेशात्मक इंटरव्यू लिये और छापे हैं ,लेकिन जब हकीकत से वाकिफ हुआ तो तथ्यगत जानकारी को आधार बना कर पानी उतरने में भी कसर नहीं छोड़ी. आप देशबंधु भोपाल (19 अप्रेल 2004 ) के सरोकार पेज पर ' ग्लोबल एक्शन वीक : बच्चों के नाम पर एक और जलसा ' पढ़ सकते हैं .</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total></item><item><title>एड्स नियंत्रण का अनकहा सच</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/03/blog-post_14.html</link><category>सोचो कि सोचने की ज़रूरत बनी रहे</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Fri, 14 Mar 2008 15:02:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-4794079748716551985</guid><description>&lt;strong&gt;(एड्स नियंत्रण के नाम पर इस देश में जितने बड़े पैमाने पर गोरखधंधा चल और फल-फूल रहा है इसकी दूसरी कोई मिसाल शायद ही ढूँढने पर मिले। यह किस्सा इस वक़्त के बहुचर्चित ब्लॉग मोहल्ला पर तीन किस्तों में आया था। दिलीप मंडल के इस रहस्योद्घाटन को हम यहाँ आभार सहित रख रहे हैं क्योंकि ज्यादातर लोग साम्राज्यवाद प्रायोजित प्रचार के घटाटोप में सच देख नहीं पा रहे।)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;गन्दा है पर धंधा है ये &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;दिलीप मंडल&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;( एड्स खतरनाक बीमारी है। इस बात को आप अपने निजी अनुभव, आस-पास रिश्तेदारी, दोस्तों, मोहल्ले, कस्बे, अपार्टमेंट में होने वाली मौतों से बेशक महसूस न कर पाएं, लेकिन सरकार से लेकर तमाम एनजीओ और विश्वभर की संस्थाएं आपको यही समझाने की कोशिश कर रही हैं। आइए जानते हैं कुछ तथ्यों के बारे में। ये सारे तथ्य भारत सरकार ने संसद में लिखित रूप में रखे हैं। ये सबसे ताजा उपलब्ध आंकड़े है। इन सबके लिंक दे रहा हूं, ताकि निष्कर्ष पर विवाद हो तो भी स्रोत सामग्री की विश्वसनीयता बनी रहे। - दिलीप मंडल)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एड्स से भारत में हर साल कितने लोग मरते हैं?भारत सरकार कहती है कि 2004-5 में 1678, 2005-2006 में 1624 और 2006-2007 में 1786 लोग एड्स की वजह से मौत के शिकार हुए। स्वास्थ्य मंत्रालय ने ये &lt;a href="http://164.100.47.4/rsq/quest.asp?qref=129361"&gt;आंकड़ा &lt;/a&gt;7 सितंबर 2006 को संसद में पेश किया। ये उस सरकार के नतीजे हैं जो एड्स को देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या मानती है और कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में जिस एक बीमारी का जिक्र है वो एड्स ही है।टीबी और कैंसर से हर साल कितने लोग मरते हैं?भारत सरकार ने संसद को &lt;a href="http://164.100.47.4/rsq/quest.asp?qref=131028"&gt;बताया &lt;/a&gt;है कि कि हर साल 18 लाख से ज्यादा लोगों को टीबी होता है और साल में 3 लाख 70 हजार से ज्यादा लोग टीबी से मरते हैँ। दुनिया में टीबी के कुल केस का 20 परसेंट सिर्फ भारत में दर्ज होता है। यानी दुनिया में टीबी का हर पांचवां मरीज भारतीय है।कैंसर की बात करें तो आईसीएमआर के जरिए राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री में हर साल 7 से 9 लाख नए कैंसर मरीजों के मामले हर साल दर्ज होते हैं और हर साल 4.4 लाख लोग कैंसर से मरते हैं। कैंसर भारत में मौत की चौथी सबसे बड़ी वजह है। ये आंकड़े आप संसद की साइट पर &lt;a href="http://164.100.47.4/rsq/quest.asp?qref=131494"&gt;देख सकते हैं। &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/02/129-3181.html"&gt;एक मौत 1.29 करोड़ रुपए की और दूसरी मौत 3,181 रुपए की&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;(मौत को रुपए में आंकने से बुरी बात क्या हो सकती है। लेकिन बात इतनी कड़वी है कि इसे मीठे अंदाज में पेश करना मुश्किल है। बात एड्स के अर्थशास्त्र और राजनीति की हो रही है। एड्स सचमुच एक अद्भुत बीमारी है। इसे लेकर पढ़ने बैठा तो जानकारियों को पिटारा खुलता चला गया। आप भी इस चर्चा में हिस्सेदार बनें। आखिर ये आपकी सेहत का मामला है - दिलीप मंडल)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पांच साल में 11,585 करोड़ रुपए। आपको एड्स न हो जाए, इसके लिए ये रकम पांच साल में खर्च की जाएगी। पैसा सरकार भी खर्च कर रही है और दुनिया भर से बरस भी रहा है। और देश में मची है इस पैसे की लूट। इस लूट में कई हिस्सेदार हैं। लूट तो देश-दुनिया में और भी कई किस्म की हो रही है, लेकिन भारत जैसे गरीब देश में जहां 30-40 रुपए के आयरन टैबलेट न मिलने के कारण न जाने कितनी गर्भवती महिलाएं और नवजात बच्चे दम तोड़ देते हैं, वहां ये लूट मानवता के खिलाफ अपराध है। देखिए एड्स के लिए आ रहे पैसे का ऑफिशियल लेखाजोखा :बिल और मिलेंडा गेट्स फाउंडेशन से आएंगे 1425 करोड़ रुपए।ग्लोबल फंड टू फाइड एड्स, ट्यूबरकलोसिस एंड मलेरिया से मिलेंगे 1787 करोड़ रुपए।वर्ल्ड बैंक देगा 1125 करोड़ रुपए।डीएफआईडी से आएंगे 862 करोड़ रुपए।क्लिंटन फाउंडेशन ज्यादा पैसे नहीं दे रहा है, वहां से आएंगे 113 करोड़ रुपए।यूएसएड से 675 करोड़ रुपए आ रहे हैं।यूरोपियन यूनियन को भी भारत के एड्स पीड़तों से हमदर्दी है और वो 77 करोड़ रुपए दे रहा है।संयुक्त राष्ट्र की अलग अलग एजेंसियों 323 करोड़ रुपए दे रही हैं।दूसरे विदेशी स्रोतों से 741 करोड़ रुपए आ रहे हैं, जिसमें अमेरिकी सरकार से मिलने वाले 450 करोड़ रुपए शामिल हैं।भारत सरकार के बजटीय आवंटन को जोड़ दें तो ये रकम हो जाती है 11,585 करोड़ रुपए।ये वो रकम है जो पांच साल के राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल प्रोग्राम फेज-3 पर खर्च होनी है। प्रधानमंत्री की सलाहकार समिति के एक &lt;a href="http://nac.nic.in/concept%20papers/naco_presentation.pdf"&gt;प्रेजेंटेशन &lt;/a&gt;के पेज 44-45 पर आप पूरा हिसाब देख सकते हैं। संसद की साइट पर भी विदेश से आने वाले पैसे का हिसाब किताब आपको &lt;a href="http://www.blogger.com/%20http://164.100.47.4/rsq/quest.asp?qref=131022"&gt;इस लिंक&lt;/a&gt; पर दिखेगा। वैसे ये तो सीधा साधा हिसाब हैं वरना राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रम में भी फोकस एड्स पर ही कर दिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/02/blog-post_25.html"&gt;कंडोम बांटते एनजीओ और एड्स का कारोबार&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;(पिछली दो पोस्ट में आपने पढ़ा कि किस तरह एड्स से साल में 2000 से कम लोग मरते हैं और मरने वालों की संख्या बढ़ भी नहीं रही है, लेकिन एड्स से लड़ने के नाम पर आने वाला पैसा लगातार बढ़ता जा रहा है। आपने ये भी पढ़ा कि एड्स की एक मौत को टालने पर सवा करोड़ रुपए खर्च होते हैं जबकि कैंसर जैसी बीमारियों से होने वाली मौत से निबटने के लिए औसत खर्च 3181 रुपए है। पैसा किन स्रोत से आ रहा है इसकी भी बात हो चुकी है। अब जानते हैं ये पैसा जा कहां रहा है। - दिलीप मंडल)एड्स के नाम पर आ रहे अंधाधुंध पैसे का सबसे बड़ा हिस्सा (73%) खर्च किया जा रहा है लोगों को अवेयर बनाने के लिए। यानी पोस्टर, पर्चे, नुक्कड़ नाटक, बुकलेट, विज्ञापन आदि पर। प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को दिए&lt;a href="http://nac.nic.in/concept%20papers/naco_presentation.pdf"&gt; प्रेजेंटेशन&lt;/a&gt; में नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन यानी नैको ने बताया है कि एड्स जागरूकता के विज्ञापन 2006 में 19,250 बार टेलीविजन चैनलों पर दिखाए गए।इसी प्रेजेंटेशन में बताया गया है कि नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत 2007 से 2012 के बीच सरकार देश में 2031 करोड़ रुपए के कंडोम बांटेगी। ये रकम तो सिर्फ एनएचआरएम के तहत कंडोम खरीदने पर खर्च होनी है। नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम (एनएसीपी) का खर्च इससे अलग है। एनएसीपी के तहत देश में कंडोम की कुल खपत 3।5 अरब सालाना पर ले जाने का इरादा है। देश की कुल जनसंख्या में आधी आबादी और बच्चों और बूढ़ों के साथ उन लोगों की संख्या घटा दें जो अपना कंडोम खुद खरीदतें हैं, तो प्रति व्यक्ति कंडोम की खपत का रोचक आंकड़ा निकलेगा। एड्स के नाम पर हो रहे खर्च में चूंकि अस्पतालों की खास भूमिका नहीं है (क्योंकि मरीज कहां से आएंगे)। ये खर्च हो रहा है एनजीओ के माध्यम से। एड्स की जागृति फैलाने में एक लाख बीस हजार सेल्फ हेल्प ग्रुप को ट्रेनिंग दी जा रही है। आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि एड्स के लिए पैसा आता रहे और स्वास्थ्य पर खर्च की प्राथमिकताएं न बदलें इसमें कितने लोगों का स्वार्थ जोड़ दिया गया है।संख्या का हिसाब देखें तो अभी पौने तीन लाख लोग फील्ड वर्कर के तौर पर एड्स की जागरूकता फैला रहे हैं। नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम के तहत 2012 तक इनकी संख्या बढ़ाकर साढ़े तीन लाख करने का इरादा है। एडस कंट्रोल कार्यक्रम से एक लाख तेरह हजार डॉक्टरों और लगभग एक लाख नर्सों को भी जोड़ा जा हा है। यानी हमारे देश में एड्स बेशक बड़ी बीमारी नहीं है लेकिन ये बहुत बड़ा रोजगार जरूर है। ये सरकारी आंकड़े तो बता रहे हैं कि एड्स से मिलने वाला रोजगार बीपीओ सेक्टर के रोजगार से भी ज्यादा है।</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>नींद में सपना, सपने में घर</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/03/blog-post.html</link><category>जागे फिर न डसैहों</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Thu, 13 Mar 2008 14:12:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-5913410907886969696</guid><description>&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;(सतीश&lt;/span&gt; जायसवाल की यह कहानी सितम्बर में बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम की कहानी पत्रिका में छपी थी। यहाँ हम लेखक तथा बीबीसी हिन्दी के प्रति आभार प्रकट करते हुए इसे इस ब्लॉग के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अदालत के फैसले ने हाजी होटल के मालिक के होश उड़ा दिए. सुबह से भरा बैठा था और उसका सारा गुस्सा अख़बार पर था, जिसमें अदालत का फैसला छपा था. छपा था कि जिस होटल में बाल श्रमिक काम पर मिलेंगे उनको प्रत्येक बाल श्रमिक के पीछे 20 हज़ार रुपए जमा करने पड़ेंगे. कहां से आएंगे इतने रुपए? इतने में तो पूरा होटल बिक जाएगा. हाजी होटल के मालिक की सांस ऊपर-नीचे होने लगी. तभी छछूंदर उसके सामने पड़ गया.&lt;br /&gt;हाजी होटल के मालिक ने ही आदम की इस औलाद का नाम छछूंदर रखा था. वह अपने घर से भागा हुआ था. इस नाम की आड़ में उसे छिपने की जगह मिल गई और पेट भरने के लिए हाजी होटल में काम मिल गया. रिश्तेदारों के साथ मिलकर उसे खोजने और घर वापस ले जाने के लिए उसके घर वाले आए थे. लेकिन उसकी तकदीर में तो बाल श्रमिक होना लिखा था.&lt;br /&gt;छछूंदर के सामने न अदालत का फैसला था न फैसले को छापने वाला अख़बार था. होता भी तो क्या होता? न उसे पढ़ना आता, न लिखना. उसके सामने तो आधी रात होती है और पूरा दिन होता है. दिन भर जूठे बर्तन रात को ही मांज-धो कर रखने पड़ते हैं. इसके बिना सोने को नहीं मिलता. सुबह भी जब रात बकाया रहती है तभी उसे उठा दिया जाता है. शुरू के दिनों में तो इस तरह आधी अधूरी नींद से उठा दिए जाने पर वह रोने लगता था. बाद में धीरे-धीरे आदत पड़ गई.&lt;br /&gt;छछूंदर के सामने पड़ते ही हाजी होटल का मालिक उस पर फट पड़ा. उसने हाथ में रखे अख़बार को हवा में लहराया और दहाड़ा, 'इधर आ, शैतान की औलाद'.&lt;br /&gt;छछूंदर का कहीं, कोई कसूर नहीं था. फिर भी उसकी शामत आती दिखी. लेकिन इससे पहले ही वह भाग निकला.&lt;br /&gt;इस बार वह दूसरी बार भाग रहा था. पहली बार वह घर से भाग था और इस बार वह हाजी की होटल से भाग रहा था. रात ठंडी थी और ओस बर्फ की तरह पड़ रही थी. वह अपने को ठंड से बचा रहा था और नींद उस पर हावी हो रही थी.&lt;br /&gt;नींद में सपना था. सपने में घर था. घर, पता नहीं किसका था? फिर भी घर था. वहां मजबूत कद-काठी का एक वृद्ध था. वह पिता की तरह दिख रहा था. किसका पिता? क्या पता. बच्चे भी थे. बच्चे उसे अपने भाई-बहनों की तरह लगे. एक मां भी थी. मालूम नहीं, सगी या सौतेली. फिर भी माँ थी.&lt;br /&gt;घर की फर्श गोबर से लिपी हुई थी. वहां पुआल का गरम बिछौना था और दुबक कर सो जाने के लिए रजाई भी. सपने में वह सब कुछ था, जो उसकी स्मृतियों में रहा होगा.&lt;br /&gt;सपना टूटा तो वह सड़क पर था. वह किसी पराए शहर में था और उस पर धूप पड़ रही थी. वह किसी और की जगह थी जहां वह सो गया था इसलिए वे सबके सब उस पर नाराज थे. वे सबके सब गिरोहबंद थे और छछूंदर एक अकेला था. उसके बीच वह बाहर का था. तभी बाल वेश्या वहां आई और फुटपाथ पर रहने वाले उन गिरोहबंद बच्चों के साथ उसने छछूंदर की दोस्ती करा दी. फिर उसने छछूंदर से पूछा-भूख लगी है कुछ खाएगा?&lt;br /&gt;उसे भूख लग रही थी. लेकिन वह स्नेह में भटक गया. बाल वेश्या किसी माँ की तरह उसका ख्याल रख रही थी. छछूंदर उससे पूछा क्या तू माँ है?&lt;br /&gt;बाल वेश्या ने जवाब दिया - नहीं. अभी मैं छोटी हूं. थोड़े दिन में बन जाऊंगी.&lt;br /&gt;उसने छछूंदर को एक रहस्य की बात बताई- मैं जानती हूं कि माँ कैसे बनती है.&lt;br /&gt;छछूंदर का मन भी उस रहस्य को जानने के लिए हुआ. लेकिन बाल वेश्या ने उसे बताया वहां मेरी फ़िल्म चल रही है.&lt;br /&gt;वहां प्रशासनिक भवन था और उसके सेमिनार हाल में बाल वेश्या की फ़िल्म चल रही थी. फ़िल्म को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आए थे. लेकिन छछूंदर को विश्वास नहीं हो रहा था. बाल बेश्या ने जोर देकर कहा-‘भरोसा नहीं हो रहा है ना? तो भीतर जाकर खुद देख ले.’&lt;br /&gt;दोनों को मालूम था कि भीतर नहीं जा सकते. भीतर बड़े लोग थे और बड़ी बातें हो रही थीं. बाल वेश्या बाहर थी और भीतर उसकी फ़िल्म दिखाई जा रही थी. बाल बेश्या अपनी कहानी बता रही थी. फ़िल्म में जो दिखाया जा रहा था वह उसके साथ सचमुच में हुआ था.&lt;br /&gt;प्रशासनिक भवन के भीतर चल रहे सेमिनार में बाल अधिकारों पर चर्चा हो रही थी. इसलिए वहाँ दिखाई जा रही फ़िल्म में भी बाल वेश्या थी. वे सबके सब बाल वेश्या के लिए चिंताएं कर रहे थे. लेकिन बाल वेश्या सबकी चिंता कर रही थी. फुटपाथ पर वाले उन सबके साथ छछूंदर की भी चिंता कर रही थी. छछूंदर उनके बीच नया था और भूखा था. बाल वेश्या ने उसे धीरज बंधाया-थोड़ा रूक. जब ये लोग खाकर चले जाएंगे तो हमको खाना मिलेगा.’&lt;br /&gt;वहां भोजन था और बाल वेश्या को पता था कि भीतर, उसकी फ़िल्म देख रहे और उस पर चिंता कर रहे लोग खाते कम हैं और छोड़ते अधिक हैं.&lt;br /&gt;पता नहीं वे लोग खाने के लिए कब आएंगे?&lt;br /&gt;फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों को भूख लग रही थी. अपनी भूख को भुलाने के लिए उन सबने मिलकर एक खेल खोज लिया. वहां पोस्टरों की सजावट थी और पोस्टरों में दुनिया भर के बाल श्रमिकों के चित्र थे. फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों ने पहले तो इन चित्रों की खिल्ली उड़ाई. लेकिन जब उधर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो इधर से दोस्ती की पहल हुई. इस पर भी जब कोई बात नहीं बनी तो वे सब मिलकर गालियां बकने लगे.&lt;br /&gt;छछूंदर को कुछ समझ में नहीं आया कि ऐसे में उसे क्या करना चाहिए. अब तक तो उसने गालियां सुनी भर थी. लेकिन अब वह गालियां बकने वालों की तरफ था. फिर भी वह अलग था. तभी एक अक्षर यात्री उधर से गुजरा. उसके कंधे पर अक्षर छाप झोला था और वह साक्षरता कार्यक्रम का एक स्वयंसेवक था.&lt;br /&gt;सेवा के बदले में उसे एक अक्षर छाप झोला और अक्षर यात्री का नाम मिला था. वह एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता था और निरक्षरों को साक्षर बनाने का काम उसने धर्म-भाव से अपनाया था. उसने अक्षरों के साथ अनाचार होते देखा तो वहीं रुक गया. उसे लगा कि यहां उसकी ज़रूरत है. उसने नारा लगाया-‘जय अक्षर.’&lt;br /&gt;थोड़ी देर पहले गालियां बक रहे, फुटपाथ के बच्चों ने उसके साथ मिलकर नारा लगाया- जय अक्षर...’&lt;br /&gt;उनको कुतूहल हो रहा था कि अक्षर की भी जैकार की जा सकती है? उन्होंने मिलकर दोहराया जय अक्षर...’&lt;br /&gt;अक्षर यात्री का काम हो रहा था. लेकिन भीतर विघ्न पड़ने लगा. भीतर से स्टेट प्रोग्राम डायरेक्टर निकलकर बाहर आए. उन्हें आशंका हुई कि कोई ऐसी बात तो नहीं, जिसे बाहर से भीतर नहीं जाना चाहिए? उनकी नजर अक्षर यात्री पर पड़ी और वे संतुष्ट हो गए कि चिंता की कोई बात नहीं. उन्होंने अक्षर यात्री से पूछा- स्ट्रीट एज्युकेटर हो?&lt;br /&gt;अक्षर यात्री ने जवाब दिया - वह तो आप देख ही रहे हैं. आप यह भी देख रहे हैं कि मैं क्या काम कर सकता हूँ.’ अब उसने काम की बात की- मैं भी सेवा करना चाहता हूं. विश्व के बाल श्रमिकों के लिए कुछ करना चाहता हूँ.&lt;br /&gt;स्टेट प्रोग्राम डायरेक्टर ने कहा – देखेंगे. फंड आने वाला है. तब तक इसे देखो और पढ़ो.’&lt;br /&gt;उन्होंने बाल श्रमिकों की रिपोर्ट अक्षर यात्री के हाथ में रख दी और बताया-‘यह बच्चों के अधिकार का धर्म-ग्रंथ है. इसके अनुसार दुनिया के बाल श्रमिक सभी निरक्षर होते हैं.&lt;br /&gt;अक्षर यात्री ने आंखें मूंदकर उस धर्म-ग्रंथ को माथे लगाया. फिर उसने आंखें खोलकर देखा. धर्म-ग्रंथ की जिल्द पर एक बाल श्रमिक का चित्र है. चित्र में ढेर सारी गेंदें हैं और उनके बीच एक बाल श्रमिक- आंखे मूंदे सो रहा है. ये गेंदे अक्षर यात्री को बारूद के ऐसे गोलों की तरह लगीं जिनमें अब बारूद नहीं है. तभी तो, इनके बीच एक बाल-श्रमिक इतना निशंक और सुरक्षित है.&lt;br /&gt;छछूंदर को वह बाल-श्रमिक बिल्कुल अपनी तरह लगा. छछूंदर को लगा कि वह भी अपने घर से भागा हुआ होगा और भूखा होगा. हो सकता है कि वह भी कोई सपना देख रहा हो. सपने में घर हो, खाना हो और नींद हो...</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title/><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/02/blog-post_23.html</link><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Sat, 23 Feb 2008 17:21:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-7796966184077883328</guid><description>&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh1kACW_h4_E8YINOrm19Wpd9_3nxHhpzDr43bUx7dSfiHWIJbAAD5aQkjpUFBge6YG4dX-AhcOW_IoSiqWUApdp8Iq3-OQZoH9DqkLEk8yt_KQkkGqEkyPAcXJ1L2gvNIcoYRcEnpH7-U/s1600-h/Image073_edited[1].JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5170145331056667810" style="CURSOR: hand" alt="" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh1kACW_h4_E8YINOrm19Wpd9_3nxHhpzDr43bUx7dSfiHWIJbAAD5aQkjpUFBge6YG4dX-AhcOW_IoSiqWUApdp8Iq3-OQZoH9DqkLEk8yt_KQkkGqEkyPAcXJ1L2gvNIcoYRcEnpH7-U/s320/Image073_edited%5B1%5D.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjdFe7cbcad8JBNTWfPDqZycqRniO0XaoBzSKsIbL7A5iaQ8exqhr83zFGWVKct65-r8FB8UriNrhAQZ9ixsJ_WE_fJh-6d8tjDQOF1W13l3xM4MrfgyCB2uofXB07GJN_0IaFVz0HlFAY/s1600-h/Image067_edited[1].JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5170145335351635122" style="CURSOR: hand" alt="" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjdFe7cbcad8JBNTWfPDqZycqRniO0XaoBzSKsIbL7A5iaQ8exqhr83zFGWVKct65-r8FB8UriNrhAQZ9ixsJ_WE_fJh-6d8tjDQOF1W13l3xM4MrfgyCB2uofXB07GJN_0IaFVz0HlFAY/s320/Image067_edited%5B1%5D.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEik9BEDJKAbvtkAkBU-jjHcHxHnD9JJpcKRmQRaArk8vkX-Csxh5EcQ9kBFEUAKqgRxPqRx8kBxHkdGnLWEZ1IU7GW9EsOTT3VaRUc47wp5vYDWM_hgc4S5-mrYoCHtXpwHs6mSKy8D3hc/s1600-h/Image058_edited[1].JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5170145339646602434" style="CURSOR: hand" alt="" 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src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEglUvYfg2Y1Iyzqdca4iBQ22k2HsQUiZ5FgAiv2UNxRsy1lU_1TaUO5v05dcdWLZ3iaORjXv_MyVLIe05treyNRzvIIk6zGAh999TbpfYGl9UTT8Wh1Vg6_MqyS43CTudvGIGQUom9twy8/s320/Image053_edited%5B1%5D.JPG" border="0" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विगत २१ फरवरी को जंतर मंतर पर बेघर बच्चों ने प्रदर्शन किया। वे गैर सरकारी संगठनों द्वारा सड़क के बच्चों का अमानवीय और बर्बर शोषण किए जाने के खिलाफ पिछले एक महीने से आन्दोलन कर रहे हैं। कुछ झलकियाँ। &lt;/strong&gt;</description><media:thumbnail xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" height="72" url="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEh1kACW_h4_E8YINOrm19Wpd9_3nxHhpzDr43bUx7dSfiHWIJbAAD5aQkjpUFBge6YG4dX-AhcOW_IoSiqWUApdp8Iq3-OQZoH9DqkLEk8yt_KQkkGqEkyPAcXJ1L2gvNIcoYRcEnpH7-U/s72-c/Image073_edited%5B1%5D.JPG" width="72"/><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item><item><title>बेघर बच्चों ने एनजीओ के खिलाफ जंतर मंतर पर किया प्रदर्शन</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/02/blog-post_22.html</link><category>कतरनें और चिन्दियाँ</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Fri, 22 Feb 2008 16:21:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-8439777358091476399</guid><description>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;(सड़क&lt;/span&gt; पर रहने वाले बेघर-बेसहारा और कामकाजी बच्चों के संगठन बाल मजदूर &lt;span class=""&gt;यूनियन &lt;/span&gt;के बैनर &lt;span class=""&gt;तले &lt;/span&gt;विगत २१ फरवरी को सैकड़ों बच्चों ने जंतर मंतर पर इकठ्ठा होकर अपनी मांगों के साथ प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में बच्चों ने सरकार, समुदाय और विभिन्न गैर सरकारी संगठनों द्वारा अनवरत जारी शोषण-&lt;span class=""&gt;उत्पीड़न &lt;/span&gt;के खिलाफ डटकर मोर्चेबंदी करने की कसम ली और तय किया कि वे अब और बच्चों का व्यवसाय नहीं होने देंगे और ऐसे सभी संगठनों के काले कारनामों को सामने लायेंगे जो बच्चों की दुर्दशा का बाजारीकरण करते हुए मुट्ठी-भर लोगों की तिजोरियों के लिए सम्पदा जुटाने में लगे &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;हैं। &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;इस अवसर पर बच्चों ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के निदेशक को एक ज्ञापन भी &lt;span class=""&gt;दिया। &lt;/span&gt;हम यह ज्ञापन व्यापक जनता के सामने रख रहे हैं।)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हम सड़क पर रहने वाले और कामकाजी बच्चे हैं। हमारी ज़िंदगी अनंत दुखों और &lt;span class=""&gt;शोषण &lt;/span&gt;की कभी न ख़त्म होने वाली दास्तान है। सड़क पर आसरा लेने तथा वहां काम करने वाले बच्चों को कबाड़ चुनते , होटल या चाय की दूकान पर काम करते , कारखाने में खतरनाक काम करते , ठेले में धक्का &lt;span class=""&gt;लगाते, &lt;/span&gt;बोझ उठाते, मन्दिर की &lt;span class=""&gt;लाइन &lt;/span&gt;में लगकर खाना खाते, सड़क पर घूमते या खेलते, हर जगह पुलिस , मालिक, दलाल, &lt;span class=""&gt;नशेड़ी &lt;/span&gt;यहाँ तक कि आम राहगीर से भी गाली, मार सहनी पड़ती &lt;span class=""&gt;है &lt;/span&gt;और यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमारे शोषण का स्तर इतना वीभत्स और व्यापक है जिसे शब्दों में बयान कर पाना सम्भव नहीं है, संभवतः इसे वातानुकूलित, सभी सुख सुविधाओं से सुसज्जित घरों में बैठकर तो बिल्कुल ही नहीं समझा जा सकता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमे हर पल मार-&lt;span class=""&gt;पीट, &lt;/span&gt;गन्दी गालियों और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। यदि कड़ी मेहनत करके कुछ रुपये कमा भी लिए तो उसे छीनने के दावेदार बहुत &lt;span class=""&gt;हैं (&lt;/span&gt;पुलिस, बदमाश आदि) और रात को सोना तो हमारे लिए एक संघर्ष होता है। हमे न सिर्फ़ सर्दी, गर्मी व बारिश से बचना होता है बल्कि सड़क पर घूम रहे ऐसे लोगों से भी बचना होता है जो हमारे यौन शोषण की ताक में रहते हैं। इन शोषण कर्ताओं और नशेड़ियों की संगत हमें ऐसी बीमारियाँ दे जाती हैं जो मेडिकल साइंस के लिए भी दुर्जेय, वीभत्स और दुर्लभ बीमारियाँ होती &lt;span class=""&gt;हैं। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;हम सड़क के बच्चों का भविष्य तो पूछिए ही मत। हमारी आंखों में साधारण बच्चों की तरह डॉक्टर, वकील, टीचर आदि बनने के सपने नहीं पलते बल्कि यह चिंता रहती है कि अगले वक्त का खाना मिलेगा या नहीं। अगर खाना मिल भी गया तो सोना कहाँ होगा। या कि हमें जो बीमारी है उसका इलाज कैसे होगा? असीम शोषण और असुरक्षा हमें अनचाहे अनजाने ही सही पर अक्सर अपराध और गैर कानूनी रास्तों पर धकेल देती है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमारी तकलीफों और शोषण को बढाने का काम गैर सरकारी संगठन NGO ( बटरफ्लाइज जैसे ) और करते हैं। कहने को तो यह हमारे कल्याण के लिए काम करते हैं लेकिन वास्तविकता में ये सरकार और सार्वजनिक संस्थाओं की आलोचना कर उनकी नाकामी विदेशी फंडरों और डोनरों को दिखाकर अपने ऐशो-आराम के लिए अपनी थैली भरते हैं।   बटरफ्लाइज जैसी NGO बच्चों को एक पोस्टर भर मानती है। जब पोस्टर पुराना हो जाता है तो उसे उतारकर फेंक दिया जाता है। संस्था बच्चों को संख्या तथा उत्पाद भर मानती है जो उनके लिए डाटा भरने, झूठे किंतु लुभावने रिपोर्ट बनाने, करुणा से भर देने वाले फोटो खिंचवाने की चीज़ भर हैं जिनका इस्तेमाल कर वापिस उन्हें कूड़ेदान या गटर में फेंक दिया जाना चाहिए  क्योंकि इनके अनुसार हमारी नियति यही है।   इनके काम और अनवरत लाभ के लिए हमारा वहीं बने रहना ज़रूरी है। बटर फ्लाइज का उदाहरण देकर इसे आसानी से समझाया जा सकता है। इस संस्था ने अपने बीस वर्षों के इतिहास में तथाकथित बाल हितैषी कार्यक्रमों के लिए लगभग 50 करोड़ रुपये जुटाए तथा खर्च किए होंगे लेकिन इसके बदले में समाज को क्या प्राप्त हुआ? क्या यह संस्था समाज को उदाहरण प्रस्तुत करने लायक कोई बच्चा प्रस्तुत कर सकी है?  मतलब ये 50 करोड़ या तो व्यर्थ गए या फ़िर एक या कुछ लोगों की जेबों में गए। मात्र दिल्ली में ही  इस तरह की 200 से अधिक संस्थाएं हैं जिन्होंने पिछले एक दशक में  सैकड़ों करोड़ रुपये विदेशी या सरकारी सहायता के रूप में प्राप्त किए होंगे। इस अथाह धन का कहाँ किस तरह प्रयोग किया गया यह गंभीर जांच का विषय हो सकता है। संभवतः यह धन बाल कल्याण अथवा सामाजिक कल्याण की बजाय NGO संचालकों की जेबों में गया हो। समाज विरोधी  राष्ट्र विरोधी लोगों और गतिविधियों में लगा हो। निश्चित ही बाल अधिकार, बाल कल्याण के नाम पर अपनी दुकानदारी चमकाने वाली बटर फ्लाइज जैसी संस्थाएं बेघर और कामकाजी बच्चों का कोई भला नहीं कर सकती हैं।  ऐसे में सरकार और समुदाय (NCPCR और NCHR) अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं।  सरकार, विशेष तौर पर उसका मंत्रालय "महिला एवं बाल विकास" हम बच्चों की समस्याओं से ज़्यादा दिनों तक मुँह नहीं मोड़ सकता। ये ऐसा नहीं कह सकते कि एनजीओ हम बच्चों के कथित कल्याण के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं उसकी इन्हें जानकारी नहीं है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) से हम बच्चे इतनी तो उम्मीद कर ही सकते हैं कि वे स्वयं संज्ञान लेकर ठोस और बदलावकारी पहल करे। हम आपसे अपील करते हैं कि -&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;(1) सरकार के स्तर पर ठोस, व्यावहारिक व उपयोगी पहल हो जिसके कार्यान्वयन में सरकार या मंत्रालय की अहम् भूमिका हो। &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;(2) बाल अधिकारों के नाम पर दलाली कर रहे बटरफ्लाइज जैसे संगठनों को बाल हितैषी कार्यक्रमों से दूर रखा जाए।  &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;(3) बाल हितैषी कार्यक्रमों के योजना निर्माण में और उसके क्रियान्वयन में बच्चों के स्वर को अहमियत और स्थान दिया जाए। &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;(4) एनजीओ के क्रियाकलापों में पारदर्शिता लाने के लिए उनके सभी कार्यक्रमों को, चाहे वे गैर सरकारी अथवा विदेशी स्रोतों से ही क्यों न चलते हों, पारदर्शी बनाने के लिए जनसूचना क़ानून आर टी आई के दायरे में लाना चाहिए। &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमारी आपसे प्रार्थना है कि हमरे दुःख दर्द, तकलीफों के साथ संघर्ष में आपका योगदान हमारे लिए एक सहारा बनेगा जिससे हम अपने अंधकारमय वर्तमान को मिटाकर भविष्य को कुछ रोशन कर सकेंगे। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;राजू (पूर्व अध्यक्ष, बाल मजदूर यूनियन )       मुजीब (सचिव, बाल मजदूर यूनियन)  &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total></item><item><title>आईएमएफ और विश्वबैंक क्या हैं?</title><link>http://ntngomorcha.blogspot.com/2008/02/blog-post_8105.html</link><category>ये दुनिया क्या चाहे मनी-मनी</category><author>noreply@blogger.com (ANTI-NGO MORCHA)</author><pubDate>Sat, 16 Feb 2008 12:34:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-7414020428491357623.post-5344048814267237347</guid><description>&lt;strong&gt;प्रस्तुति- मीनाक्षी अरोड़ा&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;आईएमएफ और विश्वबैंक दुनिया के सबसे अमीर जी-7 के देशों -अमरीका, ब्रिटेन,जापान,जर्मनी, फ्रांस, कनाडा और इटली की सरकारों द्वारों नियंत्रित होते हैं, इन संस्थाओं के बोर्ड पर 40 फीसदी से भी ज्यादा नियंत्रण धनी देशों का ही रहता है। इनका काम तथाकथित 'तीसरी दुनिया' या ग्लोबल साऊथ के देशों और पूर्व सोवियत ब्लॉक की 'संक्रमणकालीन अर्थव्यवस्था' पर अपनी आर्थिक नीतियों को थोपना है।&lt;br /&gt;एक बार देश इन बाहरी कंर्जो के चुंगल में फंस जाते हैं तो उन्हें फिर कहीं कोई क्रेडिट या कैश नहीं मिलता, जैसे अधिकांश अफ्रीका, एशिया, लातिन अमरीका और कैरेबियाई देश कर्जे में फंसे हैं तो वे इन्हीं अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के पास जाने के लिये मजबूर हो गए हैं नतीजतन उन्हें वे सब शर्तें माननी पड़ती है, जो बैंक करने के लिये कहता है कोई भी देश कर्जे की समस्याओं से उबर नहीं पाया है, बल्कि बहुत से देशों की हालत तो पहले से भी बदतर हो गई है, विश्वबैंक-आईएमएफ से सहायता लेने के बाद तो कर्ज और भी बढ़ गया है।&lt;br /&gt;ढांचागत समायोजन कार्यक्रम (सैप- स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेंट प्रोग्राम)आईएमएफ-विश्वबैंक की शर्तों को ही ''ढांचागत समायोजन कार्यक्रम'' के नाम से जाना जाता है (हालांकि ये संस्थाएं इस शब्द की नकारात्मक स्थिति से बचने की कोशिश में लगे हैं, इसलिये इसका नाम बदलकर 'गरीबी घटाने और विकास का कार्यक्रम' किया गया है!) यह कार्यक्रम देशों को मजबूर करता है कि वे धनी देशों को निर्यात करें और ऊंचे मुनाफे वाले विदेशी निवेश करने की सुविधा दें। अन्तरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ोतरी यानी कारपोरेट ग्लोबलाइजेशल में 1980 के दशक में ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों को थोपने की प्रवृत्ति अपनाई गई क्योंकि कम्पनियां और निवेशकों ने अपने अधिकारों और सुरक्षा की मांग की, उनको सरकारों द्वारा सम्पत्ति के जब्त होता या नए नियमों के लादे जाने का खतरा महसूस हो रहा था। इन मांगों के जवाब में ही 1995, में डब्ल्यूटीओ की स्थापना की गई, यह एक ऐसी संस्था है। जिसकी गुप्त एजेंसिया, कंपनियों के अधिकारों के रास्ते में आने वाले हर राष्ट्रीय कानून को गैरकानूनी या निरस्त घोषित कर देती हैं।&lt;br /&gt;सर्वोत्त्तम रूप में विश्वबैंक को एक ऐसी संस्था के रूप में जाना जाता है जो आर्थिक विकास में सहायक बड़ी परियाजनाओं जैसे- बांधों, सड़कों और पावर प्लांटों आदि के लिये वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती हैं। लेकिल जो प्राय: पर्यावरणीय विनाश और सामाजिक भटकाव से भी सम्बन्धित है। आईएमएफ और इसकी अधिकांश सहायता उन कार्यक्रमों को जाती हैं जिनमें 'सुधार' के नाम पर आर्थिक नीतियों द्वारा गरीबों का गला घोंटकर कम्पनियों को लूट के लिये छूट दी जाती है। हालांकि पूर्वी एशिया में आए आर्थिक संकट के कारण आईएमएफ की काफी-कुछ आलोचना हुई है(इसने दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड पर अपने विकास कार्यक्रम लाद दिये थे) ज्यादा नुकसान अर्जेंटीना में हुआ, फिर भी दोनों संस्थाएं पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर काबिज होने के लिये लगभग 90 देशों की अर्थव्यवस्थाओं को राजनीतिक और व्यवसायिक एलीट वर्ग के जरिये, नियंत्रित करने में जुटी हुई हैं।&lt;br /&gt;ये देश इनकी नीतियां अपनाने के लिये मजबूर हैं खासतौर पर लोक कल्याणकारी कार्यों में राज्य की भूमिका कम करने और नियमों को हटाने के लिये बाध्य हैं। इन नीतियों को शुरू करने के साथ ही कमजोर देशों पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगे। ''बाजार की सफलता'' की जो कहानियां हमने पढ़ीं कि ये पूंजी पैदा करते हैं, वह तो जनसंख्या के एक छोटे से भाग को ही जाती है और उसमें से भी गरीबी की मार झेल रही हैं, बुनियादी सेवाएं तक उन्हें नहीं मिल पाती, अपनी ही अर्थव्यवस्थाओं पर उनका नियंत्रण खोता जा रहा है।‘सैप’ कारपोरेट और एलीट के लिये काम करता है:आईएमएफ और विश्वबैंक द्वारा बनाए गए ढ़ांचागत समायोजन कार्यक्रम (सैप) क्यों और कैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सुविधा के लिये आवश्यक ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करते हैं, जिन्होंने दक्षिणी के देशों के ज्यादातर लोगों को उजाड़ दिया है? सैप की परिस्थितियों पर एक नजर डालें तो मालूम होगा कि एक बहुसंख्यक आबादी की कीमत पर धन्नासेठों के हितों का पोषण करने के लिये कैसे आर्थिक 'सलाह' का इस्तेमाल किया जाता है।&lt;br /&gt;सैप के लिये देश हामी क्यों भरते हैं?सैप कई रूपों में प्रजातंत्र -विरोधी हैं। संस्थाएं ठीक ही कहती हैं कि सरकारें इन योजनाओं से सहमत हैं। लेकिन इन योजनाओं में शामिल सरकारी अधिकारी आमतौर पर वित्त मंत्रालय और केन्द्रीय बैंक तक ही सीमित हैं जो रूढ़िवादी, उत्तर में शिक्षित और सरकार के सबसे धनी सदस्यों में से होते हैं- यानी दूसरे शब्दों में कहें तो उनमें से अधिकांश आईएमएफ की आर्थिक नीतियों से सहमत और लाभाविन्त ही होते हैं। दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने वाले आधिकारियों का नजरिया चाहे कुछ भी हो, लेकिन इन सबसे बाध्यता जरूर होती है। शक्ति समीकरण बहुत सरल है: अगर कर्जदार देश ढांचागत समायोजन कार्यक्रम (सैप) योजना से सहमत नहीं है, तो इसे 'ग्लोबल इकॅनोमी ' से अलग कर दिया जाएगा – क्रेडिट (साख), सहायता, कर्ज सब कुछ बंद कर दिया जाएगा- फिर भी दूसरे अन्य कई कर्जदार आईएमएफ और विश्वबैंक का नेतृत्व स्वीकारने की लाइन में लगे हैं।&lt;br /&gt;''शॉर्ट टर्म पेन फॉर लोंग टर्म गेन'' का नारा खोखला लगता है, जब इसे सारी पीढ़ीयों के लिये कहा जाता है। ऐसी बेकार नीतियों के साथ कोई विरली सरकार ही अपने लोगों को ढांचागत समायोजन कार्यक्रम देना चाहेगी, खासतौर पर तब जबकि 25 साल के लम्बे समय में हम देख चुके हैं कि थोड़े समय की यह पीड़ा कभी खत्म नहीं होती और लाभ तो कभी शुरू ही नहीं होते। सैप प्रजातान्त्रिक देशों की प्रतिनिधि सरकारों को ऐसे मानक अपनाने को मजबुर कर अस्थायित्व पैदा कर देते हैं जिससे जनता में सरकार की वैधता कम हो जाए। ऐसा भी तर्क दिया गया है कि आईएमएफ प्रजातान्त्रिक देशों में तानाशाही पसंद करता है क्योंकि तानाशाह सैप को ज्यादा सफलतापूर्वक लागू कर सकते हैं और एक बार नियम लागू हो गए तो डब्ल्यूटीओ प्रजातंत्र पर प्रहार करता है इसके लिये वह कम्पनियों के मुनाफे के अधिकार के रास्ते में आने वाले हर नियम को निरस्त करवा देता है।&lt;br /&gt;यह सच है कि वाशिंगटन में स्थित ये संस्थाएं जो अमरीकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट द्वारा नियंत्रित होती हैं पिछले दो दशकों से दुनिया की बहुसंख्यक आबादी को भूखा मार रही हैं। अमरीका के लोग इस सच्चाई से पूरी तरह वाकिफ हैं कि यह अब एक कलंक बन गई है। यह व्यवस्था उनके लिये अच्छी है जिन्हें इससे मुनाफा हो रहा है।&lt;br /&gt;दुनिया में कहीं भी रहने वाले व्यक्ति को यह जानने के लिये कि यह व्यवस्था कैसे काम करती है, पचास सालों का समय बहुत होता है। इस व्यवस्था के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर हम व्यवस्था को बदल सकते हैं जो अमीर को और ज्यादा अमीर बना रहा है और उजड़े और कमजोर को और ज्यादा मार रहा है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पीएनएन हिन्दी से साभार&lt;/strong&gt;</description><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total></item></channel></rss>