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<?xml-stylesheet href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/atom10full.xsl" type="text/xsl" media="screen"?><?xml-stylesheet href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css" type="text/css" media="screen"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0"><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759</id><updated>2008-07-16T17:01:29.797-07:00</updated><title type="text">पहलू</title><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pahalu.blogspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25" /><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>157</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><link rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/pahalu" type="application/atom+xml" /><feedburner:emailServiceId>897399</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://www.feedburner.com</feedburner:feedburnerHostname><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-99050312601063329</id><published>2008-05-30T04:02:00.000-07:00</published><updated>2008-05-30T04:10:33.125-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="blah-blah" /><title type="text">An emotional rejoinder</title><content type="html">Dear friends,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;I have changed my job and new environs are proving too tedious. I think it will take a month more to come on blog again. Till then, have a great time (i.e. times will not be the same again after I rejoin the party)</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/301327385/emotional-rejoinder.html" title="An emotional rejoinder" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=99050312601063329" title="14 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/99050312601063329/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/99050312601063329" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/99050312601063329" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/05/emotional-rejoinder.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-4093478222929935462</id><published>2008-05-15T02:18:00.000-07:00</published><updated>2008-05-15T03:53:54.133-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कुछ मुझ से ...." /><title type="text">कॉमरेड वेन जियाबाओ, लाल सलाम!</title><content type="html">पिछले तीन दिनों से लगातार ढलती उम्र वाले एक चीनी राजनेता को दुर्गम भूकंप ग्रस्त इलाकों में घूमते, दबे हुए लोगों को बचाने की कोशिश करते, उनका मनोबल बढ़ाते, सरकारी मशीनरी को चाक-चौबंद करते देख रहा हूं। तिब्बत मामले में चीन का तख्तापलट करा देने पर उतारू फ्रांसीसी और अमेरिकी मीडिया तक एक बात को लेकर पूरी तरह सहमत है कि इस असाधारण प्राकृतिक आपदा से निपटने में चीनी राज्य मशीनरी ने जो चुस्ती दिखाई है, उसकी मिसाल मुश्किल से ही मिल सकती है। इस चुस्ती के पीछे जो एक सजग चेहरा दिखाई पड़ रहा है वह चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ का है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकादमिक योग्यता के मामले में चीन का राजनीतिक नेतृत्व इस समय दुनिया भर में अव्वल दर्जे का है, लेकिन यह एक अलग मामला है। वेन जियाबाओ खुद प्रशिक्षित भूगर्भशास्त्री हैं, लिहाजा भूकंप जैसी आपदा के प्रबंधन में उनकी दक्षता भी स्वयंसिद्ध है। लेकिन इस आदमी की जन-सक्रियता के बारे में मैं और भी अवसरों पर लगातार पढ़ता-सुनता आ रहा हूं और मुझे लगता है कि चीनी आमजन इसके लिए पीपुल्स प्रीमियर का विशेषण यूं ही चापलूसी में इस्तेमाल नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस भूकंप को ही लें तो वेन जियाबाओ की कितनी बातें हैं, जो हर जगह आपदा प्रबंधन केंद्रों में लिखकर टांगने लायक हैं- &lt;em&gt;जितना भी हो सके, उतना जल्दी मौके पर पहुंचें, एक मिनट, एक सेकंड का मतलब है एक बच्चे की जान.....&lt;/em&gt; या फिर यह.....&lt;em&gt;मलबे के नीचे अगर एक भी व्यक्ति जिंदा बचा हो तो वह इत्मीनान रखे, उसे बचाए बिना हम यहां से कहीं नहीं हिलने वाले......&lt;/em&gt;या फिर एक ढहे स्कूल की दरार से झांकते हुए किसी बच्चे से कही यह बात.....&lt;em&gt;धीरज रखो , मैं हूं यहां, मैं, तुम्हारा बाबा वेन....&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेन जियाबाओ में कुछ ऐसी बात है जो असंभव परिस्थितियों में भी एक महादेश की महाक्रांति को बचा लेने वाले चाओ एन लाई या ल्यू शाओ ची की याद दिलाती है। हर हाल में लोगों के बीच रहना, विचारधारा को लेकर जड़सूत्री न होना लेकिन इतनी ढील भी न देना कि चालबाज लोग इसका फायदा उठा ले जाएं। विचारधारा के मामले में यह एक कसौटी है, जिसपर ज्यादा लोग खरे नहीं उतर पाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने आज ही विकीपीडिया में पढ़ा कि वेन जियाबाओ को चीन की केंद्रीय राजनीति में ले आने वाले हू याओबांग और झाओ जियांग थे। ये दोनों ही व्यक्ति अस्सी के दशक में मेरे प्रिय राजनेता हुआ करते थे। मुझे यह बात कभी समझ में नहीं आई कि थ्येनआनमन प्रकरण में तङ श्याओ फिङ इन दोनों के खिलाफ कैसे हो गए। हू और झाओ की सोच में दिल का बड़ा दखल था, जो उनसे बाद के चीनी नेताओं में मुझे देखने को नहीं मिला। ठीक वही चीज अब वेन जियाबाओ में दिखाई देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे कुछ मित्र वेन जियाबाओ की इतनी तारीफ से नाराज हो सकते हैं। खासकर तिब्बत के संदर्भ में दिए गए उनके बयानों को आधार बनाकर। मैं तिब्बतियों के मौजूदा नेतृत्व को बिल्कुल पसंद नहीं करता। जो लोग अपनी जनता की तकलीफों की बात करते हैं लेकिन उसका साथ छोड़कर भाग खड़े होते हैं, जो बिना कोई श्रम किए दुनिया भर में ग्रांट बटोरते हुए महीन खाते हैं और मोटा बोलते हैं, उनके प्रति मेरे मन में कोई आस्था नहीं हो सकती। अलबत्ता मेरा यह जरूर मानना है कि चीन को तिब्बत की सांस्कृतिक स्वायत्तता को लेकर ज्यादा पहलकदमियां लेनी चाहिए और यहां  की सरकार का नेतृत्व बाध्यकारी रूप से तिब्बती मूल के लोगों को ही सौंपना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस भूकंप में, इससे पहले इसी साल जनवरी की भीषण सर्दियों में और इससे भी पहले सुख-दुख के कई मौकों पर आम चीनी जनता के बीच वेन जियाबाओ की किसी घरेलू व्यक्ति जैसी मौजूदगी एक ऐसी चीज है, जिसके लिए तिब्बत मसले पर मैं आने वाले काफी समय तक इंतजार करने के लिए तैयार हूं। यह चीज मेरी नजरों में उन्हें एक अच्छा कम्युनिस्ट और एक अच्छा राजनेता ही नहीं, एक आला दर्जे का इन्सान भी बनाती है। उन्हें देखकर मैं अपनी वैचारिक आस्था में गौरव महसूस करता हूं और दिल की गहराइयों से उनके लिए लाल सलाम पेश करता हूं।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/291058804/blog-post_15.html" title="कॉमरेड वेन जियाबाओ, लाल सलाम!" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=4093478222929935462" title="14 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/4093478222929935462/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/4093478222929935462" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4093478222929935462" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/05/blog-post_15.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-3962013096958279357</id><published>2008-05-08T05:30:00.000-07:00</published><updated>2008-05-09T00:01:00.006-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस" /><title type="text">ब्लॉग की रूह कहां?</title><content type="html">पिछले साल अप्रैल में जब राहुल पांडे की पहल पर खेल-खेल में ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो इसका अकेला मकसद कविताएं लिखने का अपना शौक जिंदा रखने का था। लिखत-पढ़त की नौकरी में बाकी सारा लिखना-पढ़ना होता रहता है लेकिन कुछ रचने की बात भूल ही जाती है। संतोष है कि यहां आने के बाद तीसेक कविताएं लिखी जा सकीं। बिना मांगे अपना लिखा कहीं भेजने की मेरी आदत नहीं है और कविताएं तो मांगने पर भी नहीं भेज नहीं पाता। इसका ऐडिशनल नुकसान यह होता है कि लिखने की बाहरी प्रेरणा भी मरती जाती है। अच्छा रहा कि ब्लॉग ने मुझे अकवि होने से बचा लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा कुछ संस्मरणात्मक पीसेज लिखे। कुछ चीजों पर प्रतिक्रियास्वरूप लिखा और इस तरह अपने भीतर मंद पड़ रहे गुस्से का कुछ हद तक पुनर्संधान किया। जीवन की दौड़ में शायद कुछ मित्र हमेशा के लिए छूट जाने की राह पर थे। ब्लॉग ने ऐसा नहीं होने दिया। वे बहुत दूर-दूर रहते हैं लेकिन निरंतर वैचारिक संपर्क के चलते हमेशा लगता रहता है जैसे बगल वाले कमरे में हैं, या बाथरूम के लिए उठकर गए हैं, दो मिनट में चले आएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ नए मित्र मिले। लगा कि ये अबतक कहां थे, इतना समय गुजर गया बिना इनसे बोले-बतियाए। कुछ पुराने मित्र अनजाने में केवल भावना के धरातल पर ही मित्र रह गए थे। बहसों की तपिश में संबंधों का पुनर्संस्कार हो रहा है। कह नहीं सकता कि जब यह दुतरफा अग्निपरीक्षा समाप्त होगी, उसके बाद भी हम लोग मित्र रह पाएंगे या नहीं। न रह जाएं तो भी मुझे यकीन है कि हमारे संबंध शत्रुतापूर्ण नहीं होंगे। कोई समय आएगा जब हम किसी नए धरातल पर खड़े होकर अपनी कही बातों का आकलन करेंगे और एक-दूसरे को अपने लिए फिर से खोज निकालेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलबत्ता इस एक साल की अवधि में दो बातें खास तौर पर बदली हैं और किसी को इन्हें ज्यादा अच्छी तरह चिह्नित करना चाहिए। एक, लगभग हर किसी के लेखन की तपिश समान रूप से कम हुई है और खरबूजे को देखकर खरबूजे के रंग बदलने की तर्ज पर नए आ रहे ब्लॉगरों में भी वैसा कुछ नजर नहीं आ रहा है। इसके चलते स्व-केंद्रित लेखन और आत्ममुग्धता की गुंजाइश बढ़ गई है। एक महीन सी रेखा भविष्योन्मुख सिंहावलोकन को अतीतोन्मुख आत्ममुग्धता से अलग करती है- क्या हम उस रेखा को लेकर पर्याप्त रूप से सजग हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और दो, कुछ अत्यंत संभावनामय ब्लॉगरों में इस निजी तेवरों वाले माध्यम को अखबार और टीवी के समकक्ष एक शक्ति-केंद्रित, पूंजी-केंद्रित माध्यम बना देने की हवस उन्हें किसिम-किसिम के द्रविड़ प्राणायाम कराने की तरफ ले गई है, जिसके चलते इस माध्यम की दरिद्रता और दयनीयता अद्भुत रूप से जाहिर होने लगी है। यह कुछ-कुछ टीआरपी हथियाने की होड़ जैसा है। हर रोज किसी सस्ती सनसनी की तलाश, भले ही इसके लिए किसी को नंगा करना पड़े, किसी की पगड़ी उछालनी पड़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई जबर्दस्त चीजें यहां हो सकती थीं लेकिन अपनी शुरुआती झलक दिखाकर ही वे न जाने कैसे गायब हो गईं। मसलन, जयपुर में हिंदुत्व ब्रिगेड द्वारा एक शिक्षक की पूर्वघोषित पिटाई कवर करने गए एक टीवी रिपोर्टर ने खबर के पीछे की जो खबर लिखी थी, वैसी चीजों के लिए यह माध्यम शानदार है। प्रभावी माध्यमों का जो हाल है, उसमें सारी की सारी खबरें प्रायोजित हैं। असली खबरें तो खबरों के पीछे हुआ करती हैं, जिन्हें जानने का कोई जरिया किसी के पास नहीं है। फर्जी नामों का इस्तेमाल ऐसी ही चीजों के लिए जायज लगता है, जबर्दस्ती की वितंडाबाजी के लिए नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगता है, ब्लॉगिंग का माध्यम हमारा अनुभव संसार बढ़ाने के काम आना चाहिए। और पिछले अनुभव संसार को खंगाल कर उसमें से ऐसी चीजें निकाल लाने के भी, जो लोगों को अपनी खाल से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करें। सत्ता केंद्रित दोनों माध्यम- अखबार और टीवी- हमें सिर्फ चीजों का निष्क्रिय उपभोग करते रहने वाला सब्जीनुमा प्राणी बना देने के लिए ओवरटाइम कर रहे हैं। क्या इनके विपरीत ब्लॉग हमें ज्यादा सक्रिय, ज्यादा सजग बनाने वाले माध्यम की भूमिका निभा सकता है? दुर्भाग्यवश, यह उम्मीद लगातार बढ़ने के बजाय पिछले कुछ महीनों से लगातार क्षीण होती जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या इस बीमारी का कोई इलाज है?</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/286224275/blog-post_08.html" title="ब्लॉग की रूह कहां?" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=3962013096958279357" title="12 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/3962013096958279357/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/3962013096958279357" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3962013096958279357" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/05/blog-post_08.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2288704708994338362</id><published>2008-05-07T00:44:00.000-07:00</published><updated>2008-05-07T02:50:17.162-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कवितायेँ" /><title type="text">तुम्हें नहीं लगता</title><content type="html">बहुत देर हो चुकी है&lt;br /&gt;कहते कहते  कि देर हो चुकी है&lt;br /&gt;तुम्हें नहीं लगता?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह सुकूनदेह झुटपुटा&lt;br /&gt;जिसमें खुशी-खुशी&lt;br /&gt;हम चलते चले आए थे&lt;br /&gt;इसी चिपचिपे अंधेरे का बचपना था&lt;br /&gt;और मिट्टी की वो भीनी गंध&lt;br /&gt;सीलन का पहला भभका थी फकत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हें लगता है&lt;br /&gt;समझ का यह बदलाव&lt;br /&gt;हकीकतबयानी नहीं&lt;br /&gt;सिर्फ उमर का खेल है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम इतने सारे लोग&lt;br /&gt;यहां खुद को&lt;br /&gt;यही समझाते आए थे&lt;br /&gt;कि हमारे मन की तरंग&lt;br /&gt;और तन के ताप से&lt;br /&gt;पूरा दृश्य एक दिन&lt;br /&gt;शीतल प्रकाश में नहा  जाएगा&lt;br /&gt;हालांकि ऐसे भ्रम की गुंजाइश&lt;br /&gt;यहां कम ही थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितना समय हुआ&lt;br /&gt;जब हममें से बोला था कोई पहली बार&lt;br /&gt;'देर हो चुकी है'?&lt;br /&gt;और उसका हमने क्या किया?&lt;br /&gt;हम अपने खलनायक&lt;br /&gt;जरा जल्दी ही चुन लेते  हैं&lt;br /&gt;क्या तुम्हें नहीं लगता?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न जाने कितनी देर हुई तुम्हें&lt;br /&gt;बोले यह वेदवाक्य&lt;br /&gt;कि तुम्हारे कहने पर नहीं&lt;br /&gt;अपनी मर्जी से हम यहां आए थे&lt;br /&gt;इस मर्जी  की तह में  समझ  तुम्हारी  थी&lt;br /&gt;यह समझने के लिए&lt;br /&gt;इतना समय कम नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अब तो यहां&lt;br /&gt;'हम' जैसा भी कुछ नहीं बचा है&lt;br /&gt;अंधेरे में आमने-सामने&lt;br /&gt;मैं हूं और तुम हो&lt;br /&gt;और  एक  भुतही  अनुगूंज&lt;br /&gt;जो कोई सवाल हो सकती थी&lt;br /&gt;जो शायद  कोई&lt;br /&gt;जवाब भी  हो सकती थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे नायक&lt;br /&gt;निकल जाने या खत्म हो जाने की&lt;br /&gt;यह  अंतिम दुविधा  जीते&lt;br /&gt;क्या तुम्हें नहीं लगता&lt;br /&gt;कि बहुत देर हो चुकी है</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/285488735/blog-post_07.html" title="तुम्हें नहीं लगता" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2288704708994338362" title="8 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/2288704708994338362/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/2288704708994338362" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2288704708994338362" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/05/blog-post_07.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-7469476823167272669</id><published>2008-05-01T05:13:00.000-07:00</published><updated>2008-05-01T05:59:31.101-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कार्यकर्ता की डायरी" /><title type="text">एक हड़ताल की दास्तान</title><content type="html">आरा शहर में सफाईकर्मियों की कोई यूनियन नहीं थी। उनका एक नामनिहाद संगठन दिलीप सिंह नाम का एक दलाल कांग्रेसी नेता चलाता था, जिसे मजदूरों की मुश्किलों से कुछ भी लेना-देना नहीं था। 1993 की गर्मियां शुरू हो चुकी थीं और सफाईकर्मियों को तेरह महीने से एक भी पैसे पगार नहीं मिली थी। उनकी तनख्वाह की व्यवस्था भी अजीब थी। कहने को वे नगरपालिका के कर्मचारी थे लेकिन हर महीने वेतन का उनका कोई सिस्टम ही नहीं था। मुनिसपाल्टी में उनके नामों की एक लिस्ट रखी थी। जब तनख्वाह बंटनी होती थी तो ठीकेदार उनसे अंगूठे लगवाकर अपनी राजी-खुशी के मुताबिक किसी को हजार किसी को बारह सौ दे दिया करता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम लोगों के लिए यहां संगठन बनाना लोहे के चने चबाने जैसा था। दिन भर बस्ती में कोई मिलता नहीं था और शाम को लोग पता नहीं कहां से पैसे जुटाकर कच्ची दारू या ताड़ी पी लेते थे। फिर तो वे  इस हाल में भी नहीं होते थे कि चैन से कहीं बैठ सकें। ऐसे में उनसे बातचीत तो क्या होती। संयोग से शहर की मेहतर बस्ती के एक आदमी सदर अस्पताल में काम करते थे और हम लोगों के साथ उनकी कुछ हमदर्दी थी। उन्हीं के जरिए हम लोगों ने इस बस्ती में शाम के वक्त उठना-बैठना शुरू किया। तय हुआ कि जो भी थोड़ा-बहुत बैठ पाने की हालत में हो, उसे साथ में बैठने के लिए बुला लिया जाए। पुरुष फिर भी शुरू में आने में हिचकते रहे लेकिन महिलाएं धीरे-धीरे जमा होने लगीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब दो महीने की तैयारी के बाद  जब संगठन का कुछ हल्का-फुल्का ढांचा बनना शुरू हुआ तो सबसे पहले पुरुषों से कसम ली गई कि वे शराब अगर पिएंगे तो दिन में या शाम को नहीं, रात में घर में बैठकर पिएंगे। महिलाओं ने कहा कि जो भी यह कसम तोड़ेगा, उसकी सार्वजनिक रूप से झाड़ुओं से पिटाई की जाएगी। फिर हुआ कि नहीं,  कम से कम एक बार संबंधित व्यक्ति को चेतावनी दी जाएगी और अगली शाम की मीटिंग में सार्वजनिक रूप से उन्हें समझाने का प्रयास किया जाएगा। फिर भी कोई नहीं सुधरा तो महिलाएं उससे निपटने के लिए स्वतंत्र होंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अप्रैल-मई में संगठन की तरफ से हड़ताल करने का फैसला किया गया। दिलीप सिंह गुट के दो-तीन खांटी लोग बसंती में मौजूद थे। उन्होंने भीतर-भीतर माहौल बनाया कि हड़ताल करेंगे तो सबको रोल से हटा दिया जाएगा, खुद यह बस्ती ही गैरकानूनी है, तोड़ दी जाएगी। लेकिन लोगों में एक नवजागरण जैसी लहर थी। शादी-ब्याह की बातें तक वे शाम की मीटिंगों में करने लगे थे, बच्चों के पढ़ने-लिखने का कुछ खाका बनने लगा था, लिहाजा उन्होंने अफवाहों पर कान नहीं दिया और अपने फैसले पर डटे रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्या यह थी कि सफाईकर्मी कोई कारखाना, कोई दफ्तर या कोई बैंक तो नहीं चलाते जो उनकी हड़ताल पर कोई चौंककर गौर करता। सफाई की हड़ताल के  कोई मायने किसी को लंबे समय तक नहीं समझ में आए क्योंकि वैसे भी आरा में कौन सी  सफाई हर रोज हर जगह हुआ करती थी। मुनिसपाल्टी पर सभाएं लगभग हर रोज हुआ करती थीं। करीब पंद्रह दिनों की हड़ताल के बाद हम लोगों ने  शहर  के तमाम पढ़े-लिखे, गणमान्य लोगों को बुलाकर उन्हें सफाईकर्मियों की समस्या समझाने का प्रयास किया। अखबारों में खबर भी जारी हुई, लेकिन जिले के ताकतवर राजनीतिक दलों और पटना की सरकार के जिम्मे करने को बहुत सारे दूसरे काम थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अप्रैल के बाद मई भी बीतने जा रही थी। आखिरकार तंग आकर जुझारू लोगों के एक छोटे ग्रुप ने गुपचुप  फैसला किया कि शहर के सारे नाले जाम कर दिए जाएं, ताकि किसी को तो लगे कि सफाईकर्मी की भी शहर में कुछ जरूरत होती है। पूरे आरा शहर का कचरा बाहर निकालने वाले कुल ग्यारह नाले थे, जिनकी निकासी की सारी जगहें सफाईकर्मियों को अच्छी तरह पता थीं, और वह तकनीक भी, जिनके जरिए नाले बंद किए जा सकते थे। एक रात इस काम को अंजाम देकर लौटते कुछ लोगों को पुलिस ने पकड़ लिया। फिर रातोंरात  शहर के उस थाने  पर जबर्दस्त प्रदर्शन हुआ, जिसके हवालात में उन्हें रखा गया था। पुलिस वाले मारपीट पर आए तो उनकी कुछ गाड़ियां टूटीं। लोगों के हाथ-पैर टूटे तो कई पुलिस वाले भी ठीकठाक पिटे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात के इस बवाल ने आरा के एसपी-डीएम की नींद में खलल पैदा कर दिया। अगली सुबह कचहरी के घेराव का नारा दिया गया। शहर के दूसरे मेहनतकश तबकों को भी सफाईकर्मियों के पक्ष में खड़े होने के लिए तैयार किया गया। रिक्शे वाले, तांगे वाले, बक्सा मजदूर, दर्जी, खोखे-पटरी के दुकानदार और रेलवे स्टेशन के पल्लेदार सैकड़ों की संख्या में बारह बजे के आसपास कचहरी पर जमा हुए। फिर तीन बजे के आसपास डीएम ने पांच लोगों को बातचीत के लिए बुलाया। लोग अड़ गए कि डीएम को बाहर आकर सबसे एक साथ बात करनी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काफी लाग-लपेट के बाद इसके लिए तैयार हुए डीएम ने कचहरी के ग्रिल के पीछे से लोगों को संबोधित किया कि उनकी पटना बातचीत हो गई है। सफाईकर्मियों की  तनख्वाह करीब सवा साल से आरा में ही नहीं, पूरे राज्य में बकाया है। फिर भी आरा के लिए कुछ करने को  वे लोग तैयार हैं।  पूरी तो एक बार में नहीं दे सकते लेकिन  तीन-तीन  महीने की करके  दीवाली तक सारा हिसाब बराबर कर देंगे। यह आरा शहर की विरली कामयाब हड़तालों में एक थी और इसके मायने शहर के मेहनतकश वर्ग के लिए  सफाईकर्मियों की तनख्वाह से कहीं ज्यादा थे।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/281642991/blog-post.html" title="एक हड़ताल की दास्तान" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=7469476823167272669" title="8 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/7469476823167272669/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/7469476823167272669" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7469476823167272669" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/05/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8973814269219291352</id><published>2008-04-25T05:42:00.000-07:00</published><updated>2008-04-25T06:22:06.074-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="रामझरोखा" /><title type="text">मैं क्या-क्या हो सकता था</title><content type="html">भाई अजित वडनेरकर से क्षमायाचना के साथ अपनी उल्टी खोपड़ी को लानत भेजता हूं जो, अपने साथ  क्या-क्या हुआ से ज्यादा दिलचस्पी इस बात में लेने लगी है कि क्या-क्या नहीं हुआ। यानी वह, जो होना चाहता था, जिसके होने की स्थितियां भी पूरी थीं लेकिन किसी महीन-सी वजह से चीजें किसी और तरफ मुड़ती चली गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याददाश्त में  मेरी पहली महत्वाकांक्षा बिरहिया होने की आती है। खाली बैलगाड़ी में गाड़ीवान की जगह खड़े होकर कान में उंगली डालकर बिरहा गाना एक स्वर्गिक अनुभूति थी। इसके लिए मैंने बिरहा बनाना सीखा। तब के बनाए एक-दो छोटे-मोटे बचकाने किस्म के बिरहे अभी तक याद रह गए हैं। लेकिन यह देश-काल से कटी हुई महत्वाकांक्षा थी। शाम के वक्त गाड़ीवानों के इर्द-गिर्द पाए जाने पर घर में मार पड़ती थी और बैलगाड़ियों का वक्त भी जा रहा था क्योंकि उनकी जगह ट्रैक्टर लेने लगे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेटर बनना तो मेरे ख्याल से अस्सी के दशक में या उसके बाद जवान हुआ देश का हर व्यक्ति चाहता होगा। मैं भी चाहता था, लेकिन यह जानते हुए कि इसमें विकेटकीपर, ओपनर या स्पिनर, तीनों ही रूपों में अपना स्तर बहुत अच्छा नहीं है। लेकिन क्रिकेटर बनने का ख्वाब भी किशोरावस्था में मेरे लिए दोयम दर्जे का ही था। गांव में बहुत ज्यादा पैशनेट हो पाने की गुंजाइश उस समय किसी के लिए नहीं थी लेकिन मेरा पैशन जितना भी था वह वैज्ञानिक बनने का ही था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना यह  शौक पूरा करने के लिए मैंने बचपन और किशोरावस्था में बहुत सारे अजीब-अजीब काम किए, मार खाई, उल्टे-सीधे प्रयोगों की विफलता पर घंटों रोता रहा। एक बार तो रोते-रोते इस कदर आसमान सर पर उठाया कि मां ने पता नहीं कहां से खोजकर साढ़े तीन रुपये निकाल दिए कि मैं शहर जाऊं, वहां उस विज्ञान प्रदर्शनी को देखूं, जिसमें एक  प्रयोग की नाकामी के चलते शामिल होने का मौका नहीं मिला, और वापसी में एक सर्कस भी देखता आऊं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विज्ञान का यह पैशन काफी समय तक बना रहा, कुछ बदली शक्ल में आज भी बना हुआ है, लेकिन बी.एस-सी. आते-आते मुझे यह लगने लगा था कि अगर आपके पास पैसे नहीं हैं तो विज्ञान में सिर्फ कागज-पेंसिल से हो सकने वाला गणित ही आपके लिए खुला है, बाकी दरवाजे देर-सबेर बंद ही हो जाने हैं। इसके काफी करीब थोड़े समय के लिए एक हल्का सा झोंका फिलॉस्फर बनने का भी आया था, लेकिन फिर लगा कि एक स्वतंत्र शास्त्र के रूप में यह तो और भी बड़े आदमियों का खेला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जरा ठहरिए, इससे पहले मैं निरंतर कलह से परेशान होकर एक  दिन घर से निकल भागा और  दिल्ली चला आया। यहां तो मैं कुछ भी बन सकता था। इच्छा तो ट्यूशन पढ़ाकर एडीसन किस्म की कोई चीज बन जाने की थी लेकिन वह न होता तो भी इस शहर में मैं कुछ न कुछ तो कर ही जाता। शायद मैं यहां भूख-प्यास से हलकान होकर  कहीं मेहनत-मजूरी करने लगता और आज हर सुबह लंच का डिब्बा लेकर निकलने वाला फोरमैन जैसी कोई चीज होता। लेकिन दिल्ली में उस वक्त मेरी रिहाइश कुल मिलाकर बीस-बाइस दिन की ही रही, लिहाजा किस्सा आगे नहीं बढ़ा। भाई ने पढ़ाई के लिए बीच-बीच में कुछ पैसे भेजने का वादा किया और मैं  कॉलेज से हटते-हटते फिर वहीं पहुंच गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीस साल की उम्र सपने टूटने, शौक बिखरने और नए सिरे से जिंदगी के ठीहे तलाशने की थी। इस समय मैं कुछ भी हो सकता था।  तीन महीने के अंदर मैंने  बैंक की क्लर्की से लेकर आईएएस तक के इम्तहान दिए। फिर वजीफे के पैसे खत्म हो गए और ट्यूशनों के पैसे के बल पर ज्यादा कुलांचें नहीं मारी जा सकती थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां से रास्ता राजनीति और होलटाइमरी की तरफ मुड़ा। फिर जनमत की पत्रकारिता से होते हुए ठेठ राजनीति तक पहुंच गया। शायद मैं सीपीआई-एमएल का कोई बड़ा राजनेता हो सकता था। 1992 में मैं पार्टी की बिहार स्टेट कमेटी के लिए चुना गया और  कमेटी की तरफ  से मुझे राज्य में सांस्कृतिक मोर्चे की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। लेकिन कुछ महीने भी नहीं गुजरे और पता चलने लगा कि  नेता स्तर की राजनीति महज  कार्यकर्ता स्तर की राजनीति का विस्तार नहीं होती। इस अंतर्विरोध की बारीकियां समझने का ज्यादा वक्त नहीं मिला, लेकिन इस  तरफ शायद मैं कुछ ज्यादा दूर तक जा सकता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी इच्छा इस खाके के जरिए उन सारी संभावनाओं को संवेदना के धरातल पर जीने की है, जो मुझे अपना सकती थीं लेकिन या तो मैं उनके लिए अनफिट साबित हुआ या वे मेरे लिए।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/277886449/blog-post_25.html" title="मैं क्या-क्या हो सकता था" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8973814269219291352" title="5 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/8973814269219291352/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/8973814269219291352" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8973814269219291352" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/04/blog-post_25.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-4097153785348807272</id><published>2008-04-22T05:07:00.000-07:00</published><updated>2008-04-22T06:16:16.865-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="विज्ञान दर्शन" /><title type="text">रहस्यवादी न्यूटन</title><content type="html">न्यूटन की छवि मेरे मन में हाल-हाल तक बड़ी भगवान टाइप की थी। वे अपने जमाने (1643-1727) में ब्रिटेन के कुलीन वर्ग की कुंडलियां बांचा करते थे, यह सूचना (स्टीफन हॉकिंग द्वारा उनकी बहुचर्चित किताब &lt;em&gt;अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम&lt;/em&gt; में प्रदत्त) भी ज्यादा तंग करने वाली नहीं थी क्योंकि इस तरह के शौक आज भी बड़े पढ़े-लिखे लोग करते पाए जाते हैं। इस छवि में पहली बार खरोंच पकी उम्र में निकोलाई चेर्नीशेव्स्की का उपन्यास &lt;em&gt;ह्वाट इज टु बी डन&lt;/em&gt; पढ़ते हुए लगी। उन्नीसवीं सदी में रूस में उभर रही समाजवादी धारणाओं की जमीन तलाशती इस महत्वपूर्ण रचना में एक जीनियस किस्म के नौजवान को बराबर न्यूटन की संकलित रचनाओं का ग्यारहवां वाल्यूम पढ़ता दिखाया जाता है, जिसमें उनकी रहस्यवादी संकल्पनाएं दर्ज हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले साल भाई दिलीप मंडल की सलाह पर डैन ब्राउन के  थ्रिलर उपन्यास &lt;em&gt;दा विंची कोड&lt;/em&gt; पढ़ते हुए न्यूटन को लेकर रहस्य और गहरा गया। इस किताब में उन्हें यूरोप में पिछले एक हजार से भी ज्यादा वर्षों से सक्रिय एक भूमिगत धार्मिक संगठन प्रायोरी ऑफ सिओन का सदस्य बताया गया है, जिसका मकसद सन् 2000 के बाद किसी समय ईसा मसीह की असली हकीकत सामने लाना है। इस हकीकत  का केंद्रीय तत्व ईसा का विवाहित और बाल-बच्चेदार आदमी  होना है,  और इसका उद्देश्य ईसाई धर्म में पिछले सत्रह सौ सालों से आदिम पाप की मूल दोषी बताकर बहिष्कृत कर दी गई स्त्रीजाति को धर्म में बराबरी का दर्जा देना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलीप ही नहीं, मैं खुद भी दा विंची कोड से बहुत प्रभावित रहा हूं (दिलीप ने अपनी एक बहुचर्चित पोस्ट  का  शीर्षक  इसके इर्द-गिर्द बनाया था ), लेकिन जहां तक तथ्यों की दृष्टि से इसके महत्व का प्रश्न है, एक जासूसी उपन्यास से ज्यादा ऊंचा दर्जा इसे देना ठीक नहीं है। न्यूटन का अपना निजी जीवन तरह-तरह की अतार्किक-रहस्यवादी  मान्यताओं से भरा हुआ था, लेकिन इनमें से ज्यादातर &lt;em&gt;प्रायोरी ऑफ सिओन&lt;/em&gt; की मान्यताओं के बिल्कुल उलट प्रतीत होती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों में साझा बात सिर्फ एक है कि &lt;em&gt;प्रायोरी ऑफ सिओन&lt;/em&gt; की तर्ज पर ही न्यूटन कैथोलिक धर्म के घोर विरोधी थे और कैथोलिकों को 'रोमन रंडियों की औलाद' मानते थे। लेकिन यह एलिजाबेथ के जमाने से ही ऐंग्लिकन इंग्लैंड की एक आम सांप्रदायिक मान्यता थी।  न्यूटन का निजी योगदान इसमें कुछ भी नहीं था, उनकी निजी मान्यता जैसा इसमें कुछ भी नहीं था। इस मान्यता के चलते कैथोलिक धर्म के अनुयायी कवि अलेक्जेंडर पोप को जिंदगी भर दुत्कार सहनी पड़ी और इंग्लैंड में अपनी प्रतिभा के अनुरूप इज्जत उन्हें कभी नहीं मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक &lt;em&gt; दा विंची कोड&lt;/em&gt; के गुप्त संगठन में स्त्रियों को बराबरी का, बल्कि पुरुषों से भी ऊंचा दर्जा देते हुए सामूहिक संभोग जैसे कर्मकांडी कृत्यों का प्रश्न है, न्यूटन बिल्कुल ही दूसरे छोर पर खड़े दिखाई देते हैं। स्त्रियों से उनके मन में घृणा कूट-कूट कर भरी हुई थी और शायद पूरी जिंदगी किसी स्त्री के साथ संसर्ग का अवसर उन्हें कभी प्राप्त नहीं हुआ (दरअसल,  इसके लिए कभी कोई प्रयास ही उन्होंने नहीं किया)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम स्त्रियों के बजाय शायद वेश्याओं को लेकर कुछ प्रेक्षण उन्होंने जरूर किए थे, अन्यथा उनकी इस मान्यता का कोई आधार समझ में नहीं आता कि वेश्याओं के मासिक धर्म के रक्त में कुछ जादुई गुण मौजूद होते हैं। इस मासिक रक्त को लेकर एक ऑब्सेसन उनके द्वारा रंगों के चयन में भी दिखाई पड़ता है। उनके शयन कक्ष का रंग, उसमें मौजूद एक-एक चीज- गद्दा-तकिया-चादर-पर्दे आदि का रंग खूनी लाल (क्रिमसन) था। भारत में यह रंग तांत्रिकों की पसंद माना जाता है, लेकिन न्यूटन की पसंद यह क्योंकर था, यह बात कतई समझ में नहीं आती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्मांड  में  जीवन को लेकर भी उनकी कुछ विचित्र अवधारणाएं थीं,  जिसे फिलहाल फैशन में चल रही एक वैज्ञानिक धारणा सर्वजीवनवाद (पैनस्पर्मिया)  की बुनियाद माना जा सकता है। उनका मानना था कि ब्रह्मांड में एक विशिष्ट जीवन-वीर्य हर तरफ बिखरा हुआ है। उनकी मान्यता थी कि पुच्छल तारों की लंबी पूंछ विभिन्न ग्रहों में जीवन आरोपित करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संग्रहालय में सुरक्षित न्यूटन के कुछ बालों के अध्ययन से पता चला है कि उनमें सीसे (लेड) और पारे की खतरनाक मात्रा मौजूद है। प्राचीन यूनानी कीमियागर (अलकेमिस्ट)  पारस पत्थर (फिलॉस्फर्स स्टोन) के जरिए  इन भारी धातुओं से ही सोना और अमृत बनाने में अपनी जिंदगी झोंके रहते थे। ऐसा लगता है कि न्यूटन ऐसे कुछ न कुछ अपने शरीर पर भी करते रहते थे। आग लग जाने के उनके शाश्वत भय और सचमुच उनके घर में बार-बार आग लगने की हकीकत के पीछे मुख्य  वजह उनकी कीमियागिरी  के अलावा और क्या  हो सकती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक ऐसे समय में, जब पूरे यूरोप में तमाम प्राचीन विश्वासों वाले लोग जादूगर और चुड़ैल बताकर मौत के घाट उतारे जा रहे थे, न्यूटन आखिर बच कैसे गए? इसका सीधा कारण ऐंग्लिकन सोच की उदारता से ज्यादा अपने दरबार के लिए तमाम मामलों में उनका उपयोगी होना था। वे इंग्लैंड की टकसाल के प्रभारी थे और नकली सिक्के बनाने वालों को फांसी पर लटकाने का हुक्म देना उनका रोजमर्रे का प्रिय शगल था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल में पीटर ऐकरवुड द्वारा  लिखित  न्यूटन की जीवनी में वर्णित इन तथ्यों पर एकबारगी मैं शायद यकीन करने को तैयार नहीं होता, लेकिन इनपर मौजूदा  समय के सबसे तीखे नास्तिक (बल्कि धर्मविरोधी) चिंतक  क्रिस्टोफर हिचेंस की मोहर लगी हुई है, लिहाजा इनसे सहमत होने में मुझे कोई एतराज नहीं है। हिचेंस की कई पॉपुलर उक्तियां मुझे पुराने जमाने के नास्तिक विचारकों की याद दिलाती रही  हैं, हालांकि इस्लाम संबंधी उनके कुछ विचारों में मैं (कबीर आदि के संदर्भ से)  कुछ  सुधार की गुंजाइश देखता हूं। आप लोग  न्यूटन के बारे में हिचेंस के विचार अगर विस्तार से पढ़ना चाहें तो &lt;em&gt;आर्ट ऐंड लिटरेचर डेली&lt;/em&gt; (अलडेली.कॉम) पर  इसी हफ्ते  प्रकाशित (मूलतः वैनिटी फेयर में छपी) ऐकरवुड की किताब पर उनकी समीक्षा देख सकते हैं।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/275586579/blog-post_22.html" title="रहस्यवादी न्यूटन" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=4097153785348807272" title="9 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/4097153785348807272/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/4097153785348807272" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4097153785348807272" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/04/blog-post_22.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-4563095773825944385</id><published>2008-04-21T05:06:00.000-07:00</published><updated>2008-04-21T06:24:15.868-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नेपाली क्रांति कथा" /><title type="text">अल्लाह..अल्लाह..तेरी मां की..तेरी बहेन की (नेपाल डायरी-6)</title><content type="html">हफ्ता बीतते जेब में कुल अस्सी-बयासी रुपये बचे, जो काठमांडू से पटना पहुंचने के लिए 'जस्ट फिट' थे। त्रिभुवन युनिवर्सिटी के हॉस्टल से रोमनी भट्टराई मुझे छोड़ने के लिए चले और आखिरी आतिथ्य के रूप में मुगलाई होटल लिवाते गए। इस महिमामंडित ढाबे में खाना बासी और ठंडा था। बस के लंबे पहाड़ी सफर में मांसाहार मुझे सुरक्षित नहीं लगा, लेकिन रोमनी का कहना था कि मीट पेट में रहेगा तो जरा दम दिए रहेगा। पता नहीं क्यों खाते वक्त मुझे लगा कि यह मेरा अंतिम खाना भी हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस अड्डे पर विकट कचकच मची हुई थी। शायद छठ या कोई और बड़ा त्योहार था। काठमांडू में नौकरी-चाकरी करने वाले तराई के लोग जैसे-तैसे ठुंसकर बीरगंज और वहां से अपने घर जाने के लिए उतावले थे। यहीं पहली बार मेरा साक्षात्कार मधेसियों की आत्मछवि से हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तराई में रहने वाले हिंदीभाषी नेपाली अब खुद को भारतवंशी कहने लगे हैं, हालांकि नेपाल में उनकी साझा संज्ञा 'मधेसी' ही है। बस की छत पर सामान पहले चढ़ाने को लेकर दो लोग आपस में लड़ रहे थे और सीट पर मेरी बगल में बैठे हुए सज्जन, जो खुद भी एक मधेसी ही थे, कह रहे थे- 'ई साला मधेसिया सब दुनिया में कत्तौं चला जाए, रहेगा हर जगह मधेसिए बनके।' फिर बस छूटने के ऐन पहले बस अड्डे पर रंगदारी करने वाले दो-तीन गंठे-गंठे गोरखे टाइप लोग आए और झगड़ रहे दोनों सज्जनों को गरिया-लपड़ियाकर दोनों का ही सामान बस पर से उतरवा दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस शहर में मेरा करीबी दायरा कम्युनिस्टों का ही था, लिहाजा यहां की पहाड़ी आबादी में मौजूद मैदानियों के प्रति हिकारत मुझे समझ में नहीं आई थी। यहां तक कि सद्भावना पार्टी के गजेंद्र नारायण सिंह जब नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी, दोनों में ही तराई को लेकर मौजूद उपेक्षा का जिक्र करते हुए मधेसियों के हक के लिए लंबी लड़ाई लड़ने का जिक्र कर रहे थे तो मैं उन्हें पर्याप्त गंभीरता से नहीं ले पाया था। लेकिन बस के बाहर हो रहे झगड़े और उसके समाधान को लेकर लगभग नस्लवादी तेवरों वाली मधेसी-गैर मधेसी प्रतिक्रियाओं को देख-सुनकर मुझे लगा कि काठमांडू की मधेसी संज्ञा दिल्ली की बिहारी संज्ञा से कहीं ज्यादा निम्न कोटि की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस चलनी अभी शुरू भी नहीं हुई थी कि पीछे से एक सज्जन बोल पड़े, अरे भाई जरा देख लेना पंचर-वंचर तो नहीं है न। ऐसी टिप्पणियों पर ड्राइवरों को उबलते मैंने कई बार देखा है, लिहाजा बस के ड्राइवर ने जब छूटकर उन्हें गाली बकी तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। अलबत्ता बस की हालत कुछ ठीक नहीं लग रही थी, खड़खड़-भड़भड़ कुछ ज्यादा ही हो रही थी, लिहाजा थोड़ा संतोष ही हुआ कि सबसे पहले बस को लेकर ऐसा संदेह जताकर गाली खाने का सुअवसर मुझे नहीं मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिलती-कांपती बस करीब घंटे भर में काठमांडू की बत्तियों को पीछे छोड़ती हुई हाईवे पर आई और नौ बजे के लगभग ड्राइवर ने बस की भीतरी बत्तियां बुझा दीं। मैंने भी कंधे पर लटकाने वाला अपना बैग सामने वाली सीट के पीछे लगी खूंटी पर टांग दिया और अपने पैर यथासंभव फैलाकर ऊंघने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंद्रा की कुछ लंबी-लंबी बेमतलब कुलांचें चल रही थीं, जब अचानक धड़ाके से टायर फटने की जोरदार आवाज आई। फिर अचानक रिम पर गिरी बस जमीन पर घिसटती हुई घूमी और तेज रफ्तार में बाकायदा एक चक्कर  खाती हुई पलटकर खड्ड के किनारे खड़ी एक चट्टान से जा टकराई। सारा कुछ ठीक ऐसा ही हुआ या इससे कुछ अलग, मुझे नहीं पता। यह बाद में सहयात्रियों द्वारा किए गए विश्लेषणों का एक संक्षिप्त निचोड़ भर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तो बस अपनी सीट से लुढ़ककर दूसरी तरफ की किसी सीट पर बैठे लोगों पर गिरा, जो बेचारे वहां कुचले पड़े थे। लाठीचार्जों के दौर का एक सीधा सबक उस समय भी मेरे अवचेतन में था कि जान का खतरा हो तो सबसे पहले सिर बचाना चाहिए। मैंने कुछ पकड़ने का ख्याल छोड़कर दोनों हाथों का कक्कन फंसा कर उनसे सिर और दोनों कनपटियों को ढंक लिया और बस के लुढ़कते हुए नीचे जाने का इंतजार करने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घोर अंधेरी रात में पता नहीं किस जगह पर ढही हुई मौत और जिंदगी के बीच झूलती पूरी की पूरी बस बिल्कुल खामोश। सिर्फ जहां-तहां लोहा घिसटने और शीशे चिटकने  की आवाज। एक-दो सेकंड तक तो समझ में ही नहीं आया कि कोई कुछ बोल क्यों नही रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर लगा कि बस अब घिसट नहीं रही है, लुढ़क भी नहीं रही है, यानी कुछ उम्मीद अभी बाकी है। ठीक तभी अपने पीछे से अंधेरे में मैंने एक आवाज आती सुनी- 'अल्लाह...अल्लाह...अरे तेरी मां की...अरे तेरी बहेन की...अल्लाह...अल्लाह'।  और यह विचित्र सा कलमा सुनते ही उस  भयानक स्थिति में भी मुझे हंसी आ गई। सच कहता हूं, उस वक्त मुझे लगा कि  मेरा जन्म ऐसे ही अवसरों के लिए हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरवाजे वाली दीवार फिलहाल छत बनी हुई थी। उससे अब हल्का आसमानी उजाला भी भीतर आने लगा था। हुआ कि पहला काम तो यही किया जाए कि  बस का शीशा तोड़कर लोगों को बाहर निकाला जाए।  अपने सामने वाली सीट से टंगा मेरा  बैग फिलहाल मेरे सिर से टकरा रहा था। छूकर इत्मीनान हो गया कि यह मेरा ही बैग है। फिर लंगूरों की तरह लटकते-पटकते सामने वाले शीशे तक पहुंचा तो वह वैसे ही चिटका हुआ था। शक्लें किसी की पहचान में नहीं आईं, लेकिन कम से कम चार-पांच लोग हौसले के साथ शीशा तोड़ने में जुटे। सूटकेसों और झोलों से ठेल-ठालकर अगले दोनों शीशे मुसल्लम चकनाचूर कर दिए गए और फिर खरोंचें और मामूली टूट-फूट  लिए  लोग धीरे-धीरे बाहर आ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर का नजारा ठोस भय का था। शायद बस खड्ड में चली जाती तो भी इतना डर नहीं लगता। बस अगर इतनी खचड़ा न होती तो शायद इसकी यह दशा भी न होती। लेकिन अगर यह वाकई ठीक रहती और बीरगंज रोड की बाकी बसों जितनी रफ्तार से चल पाती तो  शायद पलटने के बाद थोड़ा और घूमती।  बस लगभग खड्ड के कगार पर लटकी हुई थी। दो-चार मीटर की कसर रह गई वरना पूंछ के बल यह सीधी नीची गई होती और हम लोगों की यहीं पूर्णाहुति  भी हो गई होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम लोग कहां हैं, यहां कितनी देर रुक पाएंगे, यहां से आगे जाएंगे तो कैसे, यह सब बताने वाला कोई नहीं था क्योंकि ड्राइवर और कंडक्टर हर दुर्घटना की तरह यहां भी  हबड़-धबड़ में निकलकर सबसे पहले फरार हो चुके थे।  फिर थोड़ी देर में पीछे से आने वाली दो बसों ने मेहरबानी करके कुछ-कुछ लोगों को जगह दे दी और सनम बेवफा फिल्म का नया-नया आया चाट शिरोमणि गाना- 'तू जब-जब मुझको पुकारे, मैं दौड़ी आऊं नदिया किनारे' लगातार कम से कम  सौ या डेढ़ सौ बार सुनते हुए सुबह तक हम लोग बीरगंज पधार गए।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/274878176/blog-post_21.html" title="अल्लाह..अल्लाह..तेरी मां की..तेरी बहेन की (नेपाल डायरी-6)" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=4563095773825944385" title="3 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/4563095773825944385/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/4563095773825944385" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4563095773825944385" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/04/blog-post_21.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8613725274727186401</id><published>2008-04-19T04:11:00.000-07:00</published><updated>2008-04-19T22:06:14.824-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नेपाली क्रांति कथा" /><title type="text">तीन गाड़ियां दो मकान (नेपाल डायरी-5)</title><content type="html">कुछ बातों पर आप कभी यकीन नहीं कर पाते। यूं कहें कि उनपर यकीन करने का जी नहीं होता। आपके मन में उनके घटित हो जाने का भय कहीं गहरे दबा होता है। यहां तक कि दिन में हजार बार उनके बारे में बात भी करते हैं। फिर भी जब उनके हो जाने की सूचना मिलती है तो इस सूचना से नजरें चुराने की कोशिश करते हैं, इससे बच निकलने की सुरंगें ढूंढते हैं, यहां तक कि सूचना लाने वाले को ही खलनायक बना डालते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उषा तिवारी (जो अब उषा तितिक्षु बन चुकी हैं) नेपाल में 1990 के लोकतांत्रिक जन-विप्लव की संतान हैं। वे अंतरराष्ट्रीय ख्याति की फोटोग्राफर हैं। देश-विदेश में अपनी फोटो प्रदर्शनियां लगा चुकी हैं। नेपाल की तराई के एक प्रतिष्ठित परिवार से आती हैं लेकिन हाल-हाल तक अपना आधा समय काठमांडू में और आधा भारत के तमाम शहरों में भटकती हुई गुजारती रही हैं। 1991 की मेरी नेपाल यात्रा के चार-एक साल बाद जब उन्होंने नेपाल के कम्युनिस्ट नेताओं के विचलन और पतन के किस्से बयान करने शुरू हुए तो मुझे उनकी एक भी बात पर विश्वास नहीं हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा कॉ. मदन भंडारी तो अब रहे नहीं, लेकिन मुझे यकीन है कि दुनिया इधर से उधर हो जाए तो भी कॉ. मोदनाथ प्रश्रित जैसा कवि-राजनेता कभी भ्रष्ट नहीं हो सकता। उषा मुझसे उम्र में कम से कम दस साल छोटी होगी, लेकिन मेरी इस बात को उसने कुछ इस तरह हंसी में उड़ाया, जैसे उसके सामने मैं कोई छोटा सा बच्चा होऊं। 'किस दुनिया में हैं आप? जमीन पर आइए साथी, जमीन पर। मोदनाथ प्रश्रित के पास आज काठमांडू में दो मकान हैं, तीन जर्मन मेक की बड़ी गाड़ियां हैं। उनसे मिलने जाएं तो आसानी से आपकी बात नहीं हो पाएगी!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे पक्का लगा कि इस लड़की के रिश्ते अब एमाले के साथ अच्छे नहीं रह गए हैं, इसीलिए यह सब बोल रही है। तबतक नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) दो हिस्सों में बंट चुकी थी, लेकिन इस बंटवारे का आधार भी सैद्धांतिक नहीं, नेपाली कांग्रेस के किस गुट के साथ मिलकर सरकार बनाई जाए, या न बनाई जाए, किस्म का ही था। मैंने दूसरे गुट के नेताओं के नाम लेकर टोह लेनी चाही तो उनके बारे में भी उषा की राय उतनी ही कड़वी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके कुछ समय बाद मैंने नेपाल पर लगातार नजर रखने वाले आनंद स्वरूप वर्मा जी से इस बारे में बात की- कुछ इस तरह, जैसे किसी गोपनीय चीज के बारे में बात कर रहा होऊं। वे भी उषा जितने ही तिरस्कार पूर्वक मुझपर हंसे- 'कितना बचकाना, सूचनाओं से किस कदर वंचित!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी समय पहली बार उन्होंने मुझे नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नीतिगत विमर्शों और रणनीतिक फैसलों के बारे में बताया। इससे जुड़े दस्तावेज पढ़ने को दिए। नेपाल में माओवादियों के सशस्त्र संघर्षों की खबरें उस समय तक आनी शुरू हो गई थीं , लेकिन जिस तरह मैं पीपुल्स वार और पार्टी यूनिटी (फिलहाल साथ मिलकर गठित भाकपा- माओवादी) की हथियारबंद लड़ाइयों के क्रांतिकारी महत्व को लेकर आज तक आश्वस्त नहीं हो पाया हूं, कुछ वैसा ही हाल तब से लेकर अभी दो-तीन साल पहले तक नेकपा-माओवादी को लेकर भी बना रह गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी इस वैचारिक और संवेदनात्मक जड़ता की कोई ठोस वजह मुझे समझ में नहीं आती। क्या अपनी पिछली चार पोस्टों में मैं लगातार नेकपा (एमाले) के वैचारिक विरोधाभासों और उन्हें लेकर अपने मन में पैदा होने वाले संदेहों का जिक्र नहीं करता आ रहा हूं? आप चाहें तो इसे मेरे अंदर लगातार दृढ़ होते जा रहे लिबरल पूर्वग्रहों का नतीजा बता सकते हैं, यहां तक इसे सवर्ण मध्यवर्गीय सोच की सामान्य परिणति भी कह सकते हैं। अगर आप ऐसा कहते हैं तो मैं एतराज नहीं करूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मेरी केंद्रीय समस्या दूसरी है। नेकपा (एमाले) के जिन नेताओं, कार्यकर्ताओं और जनाधार के मुखर लोगों से मैं मिला, वे अपने समाज के सबसे आदर्शवादी, परिवर्तनकामी लोग थे। कम से कम उस समय तक तो भ्रष्टाचार और बेईमानी की कोई झलक उनमें नहीं देखी जा सकती थी। व्यवहार गणित का सीधा सा सवाल है- ऐसे मजबूत लोगों की चेतना और क्रांतिकारी संवेदना को क्षत-विक्षत करने में नेपाल के नवोदित लोकतंत्र को अगर सिर्फ चार साल लगे, तो नेकपा (माओवादी) या किसी भी क्रांतिकारी शक्ति को क्रांतिकारी बने रहने के लिए अपने मन में कितने साल का समय हम दे सकते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना मन रखने के लिए इस समस्या को मैं किसी कम्युनिस्ट पार्टी से ज्यादा एक गरीब-पिछड़े देश की विडंबना से जोड़कर देखता हूं। कोई बहुत बड़ा विश्वास टूटता है तब समाज में कोई गृहयुद्ध आकार लेता है। लेकिन पंद्रह हजार लोगों की जान लेने वाले, दस साल लंबे गृहयुद्ध से निकली माओवादी सरकार भी अगर अपने देशवासियों के भरोसे पर खरी नहीं उतरी तो गृहयुद्ध से भी बड़ा कोई अनर्थ नेपाल को झेलना पड़ सकता है। आशा है, कॉ. पुष्प कुमार दहल 'प्रचंड' , कॉ. बाबूराम भट्टराई, कॉ. मातृका यादव और अन्य शीर्ष माओवादी नेता अपनी इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को जरूरत से कुछ ज्यादा ही गंभीरता से लेंगे और मेरे जैसे बहुत सारे नेपाल हितैषियों की आशंका को गलत साबित करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1991 में धादिङ से काठमांडू और फिर वहां से भारत वापसी की मेरी यात्रा के साथ भी कुछ यादगार व्यक्तिगत और सामाजिक अनुभव जुड़े हुए हैं। इनमें एक तो बिल्कुल मौत की कगार पर पहुंचकर वापस लौट आने का है। लेकिन अट्ठारह साल पुरानी एक यात्रा पर आधारित श्रृंखला की पांच कड़ियां सिलसिलेवार पढ़ा देने के बाद क्या मुझे इसमें एक और कड़ी जोड़कर आपके धीरज का इम्तहान लेने का कोई हक बनता है?</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/273617664/blog-post_19.html" title="तीन गाड़ियां दो मकान (नेपाल डायरी-5)" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8613725274727186401" title="10 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/8613725274727186401/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/8613725274727186401" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8613725274727186401" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/04/blog-post_19.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8265704254263565859</id><published>2008-04-18T00:36:00.000-07:00</published><updated>2008-04-18T03:51:45.321-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नेपाली क्रांति कथा" /><title type="text">असूर्यम्पश्या होलटाइमर (नेपाल डायरी-4)</title><content type="html">एक छोटे से झरोखे से आती उगते सूरज की रोशनी सीधी आंख पर पड़ रही थी। यह बांस और लकड़ी की बनी चूल्हे और सिगड़ी के धुएं में लंबे समय तक सिझकर काली हो चली दुछत्ती या कोठे जैसी कोई जगह थी, जिसमें मेरे जैसा दरमियानी कद का आदमी भी अचके में खड़ा हो जाने पर सिर फुड़ा सकता था। इसी जगह सुबह-सुबह मेरी आंख खुली थी। थोड़ी देर तक तो कुछ समझ में ही नहीं आया। फिर ध्यान पड़ा कि कल शाम नेकपा (एमाले) के धादिङ जिला कार्यालय से बहुत लंबा, थकाऊ पहाड़ी रास्ता पैदल तय करके एक वरिष्ठ कम्युनिस्ट कार्यकर्ता के साथ मैं यहां पहुंचा था और जैसे-तैसे दो-चार कौर मुंह में फेंक कर कोठे पर अचेत सो गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रास्ते में कई नदियां पड़ी थीं, या शायद एक ही नदी को कई बार पार करना पड़ा था। बमुश्किल पंद्रह-बीस फुट चौड़ी लेकिन बहुत तेज बहने वाली बर्फ जितनी ठंडी उथली जलधाराएं। ठरते हुए पांव चिकने पत्थरों पर जरा भी फिसल जाएं तो आप किसी लकड़ी के लट्ठे की तरह बहते नजर आएं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीधी चढ़ाई चढ़ते हुए पहाड़ पर अच्छी-खासी ऊंचाई तक पहुंचना, फिर उतनी ही सीधी उतराई पर लुढ़कते हुए से नीचे आना, फिर थोड़ा सा समतल पार करके घुटनों तक पैंट चढ़ाए किसी का हाथ पकड़े-पकड़े डरते-कांपते नदी पार करना, फिर थोड़ा समतल, और फिर खड़ी चढ़ाई। यही प्रक्रिया कम से कम तीन बार दुहराई गई। पहले शाम के धुंधलके में, फिर घुप्प अंधरे में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिजली का दूर-दूर तक कहीं नामोनिशान नहीं। ऊंचे पहाड़ों पर बसी बस्तियों में जलती लालटेनों की रोशनी ही दिशा का अनुमान लगाने का अकेला सहारा। साथ चल रहे कार्यकर्ता स्थानीय थे, लेकिन उन्हें भी एक बार एक रास्ते पर कुछ दूर तक आगे बढ़ जाने के बाद वापस आकर दूसरा रास्ता पकड़ना पड़ा था। एक चढ़ाई पर बीच में ही कहीं मामूली लयभंग के साथ लगातार चलने वाली घरड़-घरड़ की आवाज सुनाई दी। मैंने पूछा, यह कैसी मशीन चल रही है। उन्होंने बताया, घराट है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेहूं पीसने की ठेठ पहाड़ी टेक्नीक, जो अपने कुमाऊं-गढ़वाल से अब तकरीबन गायब ही हो चली है । नदी के किसी ऊंचे बिंदु से नाली निकाल कर खड़े गिरते हुए पानी से चक्की चलाई जाती है। कम से कम एक आदमी घराट पर हमेशा मौजूद रहता है। जिस भी परिवार पर घराट का जिम्मा होता है वह पसेरी भर गेहूं पर एक पाव आटे के हिसाब से पिसाई लेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह नेकपा (एमाले) के एक पुराने समर्थक परिवार का घर था। रात के घने अंधेरे में इलाका जितना पिछड़ा नजर आ रहा था, दिन की तस्वीर उससे काफी अलग थी। भीतर का हाल चाहे जैसी भी हो लेकिन ऊंचाई पर बना हुआ यह घर भी बाहर से बहुत सुंदर था। चारो तरफ नींबू जैसे पेड़ थे। मैंने पूछा तो लोग बोले सुनतले के पेड़ हैं। सुनतला? पता चला संतरे को पूरे नेपाल में इसी नाम से पुकारा जाता है। हैसियत से लोग खुशहाल किसान नजर आए। संभवतः क्षत्रिय परिवार था। मैंने पूछा पार्टी से संपर्क कैसे हुआ, तो पता चला कि गांव के स्कूल में पढ़ाने वाले मास्टर साहब ही कम्युनिज्म को इस गांव और इस घर की दहलीज तक ले आए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी ही देर में इस घर से जुड़ा एक और रहस्य खुलना शुरू हुआ। पिछले साल यहां पुलिस दबिश देकर गई थी। मार-पीट तो नहीं की गई लेकिन कुर्की-जब्ती कर लेने, घर उजाड़ देने की धमकियां जरूर दी गई थीं। वजह? इस घर में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की दो होलटाइमर नेत्रियों का वास था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुआ और भतीजी, दो की दोनों पूर्णकालिक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता।...और अब उल्टे पल्ले के साथ सिर पर सफेद साड़ी का पल्लू लिए, कंधे पर अपना-अपना अपना-अपना झोला लटकाए दोनों तीसरे पहर इलाके में होने वाली एक चुनावी आमसभा की तैयारी के लिए एक साथ ही घर से बाहर निकल रही थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पचीस-तीस साल की उम्र वाली उन महिलाओं का पहनावा-ओढ़ावा देखकर मैं कुछ चकित हुआ। उनके निकल जाने के बाद साथ आए कार्यकर्ता साथी से मैंने पूछा कि ये दोनों लोग सफेद कपड़े क्यों पहने हुए हैं, और उत्साह से दागे गए लाल सलाम के बाद भी चेहरे पर एक अजीब विषाद सा क्यों छाया हुआ है? उन्होंने पहले बात को टालने की कोशिश की, फिर धीरे-धीरे खुले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता चला कि नेपाल के गांवों में कम से कम ब्राह्मण-ठाकुर परिवारों में आज भी निस्संतान विधवाओं को असूर्यम्पश्या ही बनाए रखने का रिवाज है। इस जुबान टेढ़ी कर देने वाले शब्द से अब हम भारतीय जन नावाकिफ हो चले हैं, जो कि अच्छा ही है। इसका अर्थ होता है, ऐसी स्त्री, जिसका दर्शन कोई पुरुष तो क्या, खुद सूर्य भी न कर सके। यानी पूरा दिन घर में बंद रहने वाली स्त्री। कोई निस्संतान विधवा यदि इस नियम का उल्लंघन करती है तो उस परिवार के सामाजिक बहिष्कार की नौबत आ जाती है। सुनते हैं, यह रिवाज पहले भारत में भी था- सती से निचले दर्जे की एक वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्यकर्ता साथी ने बताया कि नेपाल में कमउम्र विधवाएं दिखना आम बात है। रोजी-रोटी के लिए पुरुषों को प्रायः भारत जाकर फौज में या मेहनत-मजूरी के दूसरे कामों में लगकर कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। नेपाल में कहीं कोई काम मिल गया तो हालत और खराब रहती है क्योंकि यहां तो अभी कार्यस्थल की सुरक्षा की कोई अवधारणा ही नहीं है। उनकी अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित उनकी पत्नियों का जीवन इन्हें जीते-जी मार देने का सबब बन जाता है। हालांकि वे भी इसे मात्र संयोग ही मानते थे कि इस घर में दो जवान विधवा स्त्रियां मौजूद थीं, और वे बुआ-भतीजी के रिश्ते के बावजूद लगभग हमउम्र भी थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव के कम्युनिस्ट मास्टर साहब ने अस्सी के दशक में जब यहां सामाजिक जागरण का सिलसिला शुरू किया तो इसकी लौ धीरे-धीरे गांव की स्त्रियों तक भी पहुंची। फिर तो यहां की असूर्यम्पश्या अभिशप्त स्त्रियों ने न सिर्फ सूरज को बल्कि अपने इर्द-गिर्द की धरती और वहां रहने वाले इन्सानों को भी खुली आंखों देखना शुरू कर दिया। आज यह प्रक्रिया इन दोनों स्त्रियों को होलटाइमर बनाने की हद तक ले आई है और ये पूरे इलाके में जागृति फैला रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉ. मदन भंडारी के नेतृत्व में नेकपा (माले) ने अपनी धज में यही बुनियादी बदलाव किया था। क्रांति की माओवादी पद्धति का अनुसरण करते हुए हथियारबंद संघर्षों के जरिए खुद को दूर-दराज के इलाकों में 'मुक्त-क्षेत्र' विकसित करने के काम में लगाए रखने के बजाय अस्सी के दशक में उसने एक व्यापक लोकतांत्रिक जनजागरण को अपना मुख्य एजेंडा बनाया। इसके लिए उच्च शिक्षण संस्थाओं के अलावा शिक्षकों को प्रशिक्षित करने वाले नॉर्मल स्कूलों में भी उसने अपना काम केंद्रित किया। इन प्रशिक्षण स्कूलों से निकले शिक्षक उसके भूमिगत कार्यकर्ताओं की भूमिका निभाते हुए ग्रामीण नेपाली समाज में परिवर्तन के खमीर बन गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह जानने में भी मुझे ज्यादा देर नहीं लगी कि माले (बाद में एमाले) की यह सामर्थ्य ही दरअसल उसकी सीमा भी थी। समाज के उच्चजातीय, मध्यवर्गीय तबकों में एक उदार लोकतांत्रिक चेतना विकसित करने का महत्व जगजाहिर है, लेकिन राजशाही और पूंजी की मिली-जुली ताकत का मुकाबला क्या सिर्फ इस चेतना के जरिए किया जा सकेगा? नव जनवादी क्रांति के लिए समर्पित ग्रामीण सर्वहारा की छापामार टुकड़ियों वाली बात अगर एक तरफ रख दें तो भी आंदोलन को कठिन से कठिन दौर में टिकाए रखने वाला समाज का दलित, उत्पीड़ित मेहनतकश तबका इस जनजागरण केंद्रित उदारवादी एजेंडे से किस हद तक आकर्षित हो सकेगा? उसी दिन तीसरे पहर हुई चुनावी आमसभा में लोगों की उदासीन सी भागीदारी देखकर यह संदेह और भी पुख्ता हो गया।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/273050590/4.html" title="असूर्यम्पश्या होलटाइमर (नेपाल डायरी-4)" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8265704254263565859" title="4 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/8265704254263565859/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/8265704254263565859" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8265704254263565859" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/04/4.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8386413170615318164</id><published>2008-04-16T23:43:00.000-07:00</published><updated>2008-04-17T05:07:15.866-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नेपाली क्रांति कथा" /><title type="text">बस की छत पर ईलू-ईलू (नेपाल डायरी-3)</title><content type="html">ठहरने का कोई पक्का ठिकाना था नहीं। नेताओं से टाइम लिया और दस बजे के आसपास ठीहे से निकल पड़े। लेकिन बीच के बड़े-बड़े वक्फों का क्या करें। इन समयों में काठमांडू की सड़कों पर बेमतलब टहलते हुए पहला कल्चरल शॉक वहां की मांस की दुकानें देखकर लगा। अपने यहां सुअर, बकरा, मुर्गा और मछली खुले में काटकर बेचे जाते हैं लेकिन भैंस जैसे बड़े जानवर बूचड़खाने की बंद दीवारों के भीतर ही काटे जाते हैं। बड़े का मीट खरीदना हो तो आप यूं ही सड़क पर खड़े-खड़े खरीद नहीं सकते। लेकिन काठमांडू की सड़कों पर हर आठवीं-दसवीं दुकान भैंसे के मांस की थी। मोटे-मोटे हुकों पर फुल साइज कटे और उधड़े हुए भैंसे लटके नजर आते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग सभी चाय की दुकानों पर दो रुपये (भारतीय मुद्रा में एक रुपये साठ पैसे) में उपलब्ध दो विकल्प मौजूद थे- अल्मुनियम की गिलास में बेस्वाद मटमैली चाय, या जरा सा नमक पड़ा भैंसे का मीट उबाला हुआ पानी। मौसम गर्मी का होने के बावजूद जरा सी भी बारिश होने पर ठंड विकट पड़ने लगती थी लिहाजा एक-दो आजमाइशों के बाद मैंने दूसरा वाला विकल्प ही स्थायी रूप से अपना लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस हिंदू राष्ट्र में बेचारे भैंसों के पीछे इतनी बुरी तरह हाथ धोकर कौन पड़ा रहता होगा? पूछने पर पता चला कि बौद्ध धर्म को मानने वाली प्राचीन नेपाली नेवार जाति का बुनियादी खाना भैंसे का मांस ही है। यह सूचना भी जरा चौंकाने वाली ही थी क्योंकि बौद्ध धर्म के साथ दिमाग में अहिंसा वगैरह के पूर्वग्रह मजबूती के साथ जुड़े हुए हैं। फिर टहलते हए एक दिन तीसरे पहर मैं काठमांडू के अत्यंत पुराने बौद्ध मंदिर की तरफ चला गया। यह एक ढलान सी जगह पर बना है, जिसका नाम मुझे याद नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में तंत्र का उदय बौद्ध धर्म की महायान शाखा से हुआ बताया जाता है। एक नजर में यह एक अटपटी प्रस्थापना लगती है। बौद्ध धर्म की छवि हमारे मन में एक पाखंड विरोधी तार्किक प्रणाली की है, जबकि तंत्र रहस्यों के आवरण में लिपटी हुई विशिष्ट कर्मकांडी व्यवस्था है। यह अटपटापन काठमांडू के उस बौद्ध मंदिर के भीतर प्रवेश करने के तत्काल बाद समाप्त हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां ठेठ पहाड़ी नैन-नक्श वाली पीतल या कांसे की चमकती बुद्ध मूर्ति के नीचे घी की जोत जल रही थी। मूर्ति की दैनंदिन सफाई तो धर्म का हिस्सा है, लेकिन जिस दिए में अखंड जोत जलाई गई थी, उसकी सफाई शायद कई सौ साल पहले मूर्ति की स्थापना के समय से ही नहीं हुई थी। नतीजा यह था कि यह दिए के बजाय बहुत ही मोटे और बड़े काले मोमियाए खप्पर जैसा दिखने लगा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिए के अलावा वहां ढेरों अगरबत्तियां भी जल रही थीं, जिनका धुआं भी शायद कई सौ साल से उस सीलन भरे गुफानुमा मंदिर में घुमड़ रहा था। अच्छा-भला आदमी मंदिर में जाते ही ट्रांस में पहुंचकर अल-बल बकने लगे, ऐसी वहां की स्थिति थी। बौद्ध धर्म का यह ठेठ नेपाली प्रकार मुझे तांत्रिक अनुष्ठानों या औघड़पंथ के बहुत ज्यादा करीब लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिर से बाहर निकलने के बाद जूते पहन रहा था कि पीछे से आवाज सुनाई पड़ी, हलो भाई साहब, आप इंडिया से आए हैं? मैंने घूमकर देखा तो वहां एक दुबले-पतले सांवले से नौकरीपेशा जैसे लगते सज्जन खड़े थे। बोला जी, बताइए। वे बोले, चलिए ऊपर चलकर कहीं बैठते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने मुझे एक दिन पहले बाघ बाजार में एमाले के दफ्तर में देखा था और पता नहीं कैसे उन्हें लग गया था कि मैं उनकी बात समझ सकता हूं। नाम मुझे उनका याद नहीं रहा, लेकिन वे मुझसे बहुजन समाज पार्टी का संपर्क सूत्र और उसका लिटरेचर मिलने की व्यवस्था के बारे में जानना चाहते थे। उन्होंने बताया कि वे दलित हैं और नेपाली समाज में दलित-आदिवासी तबकों की बहुत बड़ी संख्या होने के बावजूद यहां की राजनीतिक व्यवस्था में उनका कोई पुर्साहाल नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उत्सुकता जताई कि पंचायती व्यवस्था में ऐसा रहा हो, यह बात तो समझ में आती है, लेकिन नई संसदीय व्यवस्था में तो अभी कोई चुनाव भी नहीं हुआ है, फिर ऐसी राय उनकी क्यों बनी हुई है। उन्होंने कहा, सब नेता यहां सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, निचली जातियों को टिकट देने या नेता बनाने की बात कहीं से भी इनके एजेंडा पर नहीं है। मेरे पास कोई तथ्य नहीं था, न कहने को कोई बात थी, सो मैं गुटुर-गुटुर उन्हें सुनता रहा। भारत में बीएसपी के केंद्रीय कार्यालय का पता-ठिकाना मेरे पास था नहीं, लिहाजा औपचारिकतावश उनके साथ नाम-पते का लिखित आदान-प्रदान किया, इस वादे के साथ कि बाद में जानकारी जुटाकर उन्हें सौंप दी जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन तीन-चार दिनों में बड़े नेताओं से मिलने की मेरी चाट खत्म हो चुकी थी। मधेसियों का प्रतिनिधित्व करने वाली नेपाली सद्भावना पार्टी और नेपाली वर्कर्स ऐंड पीजैंट्स पार्टी के नेताओं से अपनी मुलाकात की चर्चा मैं यहां नहीं करने जा रहा हूं, अलबत्ता मधेसियों से जुड़े एक रोचक प्रसंग का जिक्र शायद जगह मिलने पर निकल आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीर्ष नेपाली कांग्रेस नेता गिरिजा प्रसाद कोइराला के साथ हुई बातचीत का भी कोई टुकड़ा शायद प्रसंग आने पर उठ आए, लेकिन वे इतने डिप्लोमेटिक हैं कि मेरे अंतस पर उनकी रत्ती भर भी छाप नहीं पड़ी। अलबत्ता मनीषा कोइराला की पहली फिल्म 'सौदागर' का गाना ईलू-ईलू उन दिनों हाल-हाल में ही आया हुआ था और गिरिजा बाबू उनके ताऊ हैं, यह जानकारी ठीक उनसे मुलाकात के दिन ही प्राप्त हुई थी। नतीजा यह हुआ कि बातचीत के दौरान और इसके कई दिनों बाद तक कान में ईलू-ईलू ही गूंजता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन-चार दिनों में ही लगने लगा था कि काठमांडू हर मायने में किसी दिल्ली या पटना जैसा ही है, यहां रहकर नेपाली समाज की नस-नाड़ी ज्यादा पकड़ में नहीं आएगी। मैंने एमाले और नेपाली कांग्रेस के नेताओं से किसी पास के जिले के संपर्क सूत्र मांगे, जहां से चुनाव प्रचार का जमीनी हाल-चाल देखकर दो दिन में काठमांडू लौटा जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोच-विचारकर धादिङ जाने पर सहमति बनी। निर्दलीय पंचायती व्यवस्था में वहां से चुने जाने वाले कांग्रेसी मिजाज के एक पंच और एमाले के स्थानीय कार्यालय का संपर्क सूत्र लेकर मैं वहां के लिए रवाना हुआ। काठमांडू से यह जगह करीब साठ किलोमीटर दूर है। वहां से आस-पास के गांवों में निकला जा सकता था। जिले के ज्यादातर लोग भारत में जाकर पहरेदारी या मेहनत-मजूरी करने वाले थे, लिहाजा थोड़ी-बहुत हिंदी समझ सकते थे और कुछ बातें भी उनसे कही-सुनी जा सकती थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काठमांडू से धादिङ की बसें बीरगंज और काठमांडू के बीच चलने वाली डीलक्स बसों जैसी नहीं हुआ करतीं। खासकर इंटीरियर इलाकों में जाने वाली बसें तो अपनी लोकल बसों से भी ज्यादा डग्गेमार हुआ करती हैं। जैसे-तैसे एक बाजार में पहुंचने के बाद मैं पैर सीधे करने उतरा तो मेरे चढ़ने से पहले ही भीड़ ने घुसकर दरवाजा जाम कर दिया। फिर मैंने बस में जबरिया घुसने का इरादा छोड़कर दिल में दबा अपना एक बहुत गहरा अरमान पूरा करने का फैसला किया। ऊपर-नीचे फर्न जैसी घूमी हुई हरियर कचर वनस्पतियों से भरे दुर्गम पहाड़ी रास्ते में बस की छत पर बैठकर सफर करने का अरमान!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह काम कहने में जितना आसान है, करने में उतना ही मुश्किल था। हालत यह थी कि रास्ते के एक तरफ जितना ऊंचा पहाड़, दूसरी तरफ उतना ही गहरा खड्ड। छत पर सामान रखने के लिए बने बाड़े की छड़ें मैं मजबूती से पकड़े हुए था, फिर भी नीचे झांकने पर लगता था जैसे कोई पकड़कर बहुत बुरी तरह खींचे लिए जा रहा है। बार-बार लगता कि बस ने जरा भी झटका खाया तो मन ही मन ईलू-ईलू करते अपन लुगदी बने किसी खड्ड में पड़े होंगे और गांव-देस तक इसकी खबर पहुंचने में भी महीनों लग जाएंगे। घंटे भर में दिमाग दुरुस्त हो गया, चक्कर जाने में कई घंटे और लगे।</content><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feeds.feedburner.com/~r/pahalu/~3/272351818/3.html" title="बस की छत पर ईलू-ईलू (नेपाल डायरी-3)" /><link rel="replies" type="text/html" href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8386413170615318164" title="2 Comments" /><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/8386413170615318164/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default/8386413170615318164" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8386413170615318164" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/04/3.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-7673180453874177783</id><published>2008-04-16T01:30:00.000-07:00</published><updated>2008-04-16T05:43:56.280-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नेपाली क्रांति कथा" /><title type="text">कॉ. मदन भंडारी के साथ एक शाम (नेपाल डायरी-2)</title><content type="html">संजय तिवारी ने अपने ब्लॉग &lt;strong&gt;विस्फोट&lt;/strong&gt; में पुष्प कुमार दहल 'प्रचंड' का राजनीतिक जीवन परिचय दिया है- उन आशाओं और आशंकाओं के साथ, जिन्हें हाल के चुनाव नतीजों के बाद उनसे जोड़कर नेपाल और पास-पड़ोस के देशों में महसूस कि