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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0"><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759</id><updated>2009-10-27T20:16:14.840-07:00</updated><title type="text">पहलू</title><subtitle type="html">रात का राही</subtitle><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://pahalu.blogspot.com/" /><link rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>183</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><link rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/pahalu" type="application/atom+xml" /><feedburner:emailServiceId>pahalu</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com" /><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-1198113890500756299</id><published>2009-09-16T05:29:00.000-07:00</published><updated>2009-09-16T06:40:14.277-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चलते-चलते" /><title type="text">बिल्डर ब्रोकर का कॉमनवेल्थ</title><content type="html">आलम में इंतखाब दिल्ली शहर धूल और बारिश में बारी-बारी भच-भच करता कॉमनवेल्थ नाम के अगम-अगोचर गोदो का इंतजार कर रहा है। लगभग हर चौराहे पर फ्लाईओवर या तो बन गए हैं या बनने की प्रक्रिया में हैं। सड़कें खुदी हुई हैं। बगल में पड़ा ढेर सारा लोहा सड़ रहा है। बड़े-बड़े क्रेन बीसियों किलो के हिलते-डुलते हुक लटकाए कभी भी कपाल क्रिया कर देने को उतावले हैं। मेट्रो को एनसीआर के चप्पे-चप्पे से जोड़ देने की तैयारी है लेकिन उसके खंभे दरक रहे हैं। पटरियों को रोकने के उपाय छूंछे साबित हो रहे हैं और पता चल रहा है कि मेट्रो का एक सीमेंट सप्लायर न जाने कब से घटिया माल उसके मत्थे मंढ़ रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर में अब धीरे-धीरे कॉमनवेल्थ को लेकर एक किस्म का डर व्यापने लगा है। माइकल फेनेल नाम के एक कॉमनवेल्थिया अफसर यहां आकर गहरी चिंता जता गए। यहां तक कहा कि अब तो समय भी इतना कम रह गया है कि खेलों की जगह भी नहीं बदली जा सकती, लेकिन दिल्ली में अभी तैयारियों की जो हालत है, उसमें कोई चमत्कार ही न हो गया तो यहां होने वाले आयोजन से इन खेलों की प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ सकता है। न कोई स्टेडियम तैयार है, न खिलाड़ियों और अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था अगले एक साल में हो पाने के कोई आसार हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि आयोजकों की बहुत लंबी सूची में हर कोई अपना-अपना साम्राज्य चलाने में ही मगन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ऐसा शहर, जहां पचास लाख के लगभग गाड़ियां चल रही हों और इनकी संख्या में हर रोज ही सैकड़ों का इजाफा हो रहा हो, सचमुच जादू की छड़ी हासिल कर ले तो भी अपने यातायात का स्तर सुधार नहीं सकता। सफाई वगैरह के मामले में यह शहर पहले से ही माशाअल्ला है और शहर भर में खुदाई से जमा मिट्टी ने नालों को ढक कर सड़कें बनाने जैसी इंजीनियरिंग कसरतों के साथ मिलकर यहां की गंदगी को चमत्कारिक ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है। मजे की बात यह कि इस धकापेल को घटाने के बजाय तैयारी निरंतर इसे बढ़ाते जाने की ही चल रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले आठ-दस वर्षों में राई से पर्वत बने दिल्ली, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और हरियाणा के कुछ और पड़ोसी जिलों के बिल्डर और उनके दलाल किसी इलाके में मेट्रो पहुंचने, कहीं आसपास फ्लाईओवर बनने या विकास की ऐसी ही किसी और खबर के दम पर अपने मकानों की कीमत सवा से डेढ़ गुनी कर दे रहे हैं। साथ में खरीदार के लिए यह आश्वासन भी कि मकान लेकर किसी तरह साल-दो साल का वक्त निकाल लीजिए और फिर दस लाख का मुनाफा लेकर कहीं और निकल लीजिए। लालच का यह ऐसा विस्फोट है जिसकी जद में हजार-हजार मील दूर के खाता-कमाता लोग भी आ जा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानगरों में आम तौर पर लोग नौकरी-चाकरी के लिए आते हैं और सिलसिला जम जाए तो यहां स्थायी रूप से रहने का इंतजाम भी कर लेते हैं। लेकिन एनसीआर की किसी भी नई विकसित हुई कालोनी में निकल जाइए, हर जगह दस में से दो या तीन लोग वहां ऐसे जरूर मिल जाएंगे, जो यहां कोई काम नहीं करते। वे बलिया, मुजफ्फरपुर, सागर, बीकानेर या तरन तारन से दो-चार लाख का जुगाड़ करने के बाद किसी तरह लंबे लोन की व्यवस्था करके यहां मालिक मकान बन गए हैं और अब अपने मकान की कीमत चढ़ने का इंतजार कर रहे हैं। इस बीच यूं ही लोगों के बिल जमा करवाने लगे, एलआईसी की एजेंटी पकड़ ली, लकड़ी या मार्बल के किसी डीलर के साथ बैठने लगे, किराने की दुकान खोल ली या और कुछ नहीं तो एक फोटोस्टैट मशीन रख ली और साथ में प्रॉपर्टी की दलाली करने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बताया जा रहा है कि अगले दस वर्षों में एनसीआर में पांच करोड़ परिवार बस रहे होंगे। इनकी रोजी-रोटी का जरिया क्या होगा, कोई नहीं जानता। 1982 के एशियाड में साउथ दिल्ली बसा था और कहा जा रहा है कि 2010 के कॉमनवेल्थ से पूर्वी दिल्ली की किस्मत चमक जाएगी। लेकिन किस्मत तो अभी यहां सिर्फ ब्रोकरों और बिल्डरों की चमकती नजर आ रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एशियाड ने दिल्ली में झोपड़पट्टियों की शुरुआत की थी लेकिन कॉमनवेल्थ के नाम पर पूरी दिल्ली को एक विशाल स्लम एरिया बना देने की दिशा में तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं। वे कौन भाग्यशाली लोग होंगे, जो कॉमनवेल्थ में खेल कर देश का नाम रौशन करेंगे। कोई नहीं जानता क्योंकि उनके बारे में सोचने की किसी को फुरसत नहीं है। अलबत्ता जो लोग इस खेल में काफी पहले से पदक पर पदक हासिल करते जा रहे हैं, उनका जिक्र यहां कर दिया गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-1198113890500756299?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/1198113890500756299/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=1198113890500756299" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1198113890500756299" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1198113890500756299" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/tG5SUIRF2DA/blog-post_16.html" title="बिल्डर ब्रोकर का कॉमनवेल्थ" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/09/blog-post_16.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-5174209228114219543</id><published>2009-09-10T06:07:00.000-07:00</published><updated>2009-09-10T06:29:50.320-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कवितायेँ" /><title type="text">पैसे का क्या है</title><content type="html">पैसे का क्या है&lt;br /&gt;वो तो हाथ का मैल है&lt;br /&gt;पता भी नहीं चलता और चिपकता जाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काफी जम जाए तो भी नजर नहीं आता&lt;br /&gt;देखने में बिल्कुल साफ दिखते हैं हाथ&lt;br /&gt;मगर पानी में डालो तो समझ नहीं पड़ता&lt;br /&gt;कि कालिख इतनी कहां छिपी थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैसे का क्या है&lt;br /&gt;इधर से आता है उधर चला जाता है&lt;br /&gt;घेर-घार लेकिन इतनी मचाता है&lt;br /&gt;कि दूर तक कुछ भी नजर नहीं आता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब यार-दोस्त होते हैं, पैसा नहीं होता&lt;br /&gt;जब दिल लगता है तो पैसा नहीं होता&lt;br /&gt;जब खुद में खोए रहो तो भी वो नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर पीछे पड़ो उसके&lt;br /&gt;तो उठ-उठ कर सब जाने लगते हैं&lt;br /&gt;पहले दृश्य, फिर रिश्ते, फिर एहसास&lt;br /&gt;फिर थक कर तुम खुद भी चले जाते हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूर तक कहीं जब कुछ नहीं होता&lt;br /&gt;तो पैसा होता है&lt;br /&gt;पैसे का क्या है&lt;br /&gt;वो तो.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-5174209228114219543?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/5174209228114219543/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=5174209228114219543" title="11 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5174209228114219543" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5174209228114219543" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/qhZhb3zqlxQ/blog-post.html" title="पैसे का क्या है" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">11</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/09/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2152871861647101416</id><published>2009-08-10T06:11:00.000-07:00</published><updated>2009-08-10T06:45:18.409-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="गिलहरी ज्ञान" /><title type="text">गिलहरी का घोंसला</title><content type="html">घर के सामने एक शहतूत और एक बकाइन का पेड़ है। दोनों मेरे ही लगाए हुए हैं। शकरपुर में लंबे समय तक रहते चिड़ियों की आवाजें भूल गया था। वैशाली, गाजियाबाद में अपना फ्लैट हुआ तो सबसे पहली चिंता यही हुई कि यहां चिड़ियां कैसे लाई जाएं। ये दोनों ऐसे पेड़ हैं जो बढ़ने में ज्यादा वक्त नहीं लेते। जो लोग पहली बार मेरे यहां आते हैं वे यह जान कर चकित रह जाते हैं कि ये पेड़ मेरे ही लगाए हुए हैं। चिड़ियां तो यहां जल्द ही आने लगी थीं लेकिन गिलहरियों ने आने में वक्त लिया। यह और बात है कि  पिछले तीन-चार सालों में ही उन्होंने संख्या और सक्रियता, दोनों ही मोर्चों पर चिड़ियों को काफी पीछे छोड़ दिया है। गर्मियों में तो वे पेड़ों से उतर कर आराम फरमाने के लिए बालकनी में रखे गमलों में चली आती हैं और उनकी नर्म मिट्टी में बाकायदा अपने शरीर का आकार बना जाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो-तीन महीने पहले अचानक शहतूत पर बिल्कुल बालकनी से  हाथ बढ़ाने की दूरी पर एक सुबह अचानक एक घोसला नजर आने लगा। हम लोगों ने सोचा कोई चिड़िया तो यह बेवकूफी करने से रही। पता चला कि गिलहरियों का एक जोड़ा इस गतिविधि में जुटा है। मुझे पता नहीं कि छोटे स्तनधारियों में स्थायी रूप से जोड़े बना कर रहने की प्रवृत्ति होती है या नहीं। मैंने मां से पूछा कि क्या चूहे जोड़े में रहते हैं तो उसने कहा, जोड़े तो सबके होते हैं। फिर मैंने टोका कि स्थायी जोड़ा तो कुछ चिड़ियों को छोड़ कर और किसी चीज का नहीं होता, तो उसमें कुछ दुविधा नजर आने लगी। जिसे पता हो वह बताए कि गिलहरियों के अलावा क्या वह किसी और स्तनधारी को जानता है जिसमें अपने स्वभाव में ही जोड़ा बना कर रहने की प्रवृत्ति हो। इस बिरादरी में इन्सानों को शामिल मानना शायद ठीक न हो क्योंकि अपनी जाति के पूरे इतिहास में इन्हें जोड़ा बना कर रहते अभी दस फीसदी समय भी नहीं गुजरा है, और आज भी, सारे दिखावे के बावजूद ये इसमें घपले करने से नहीं चूकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, गिलहरियों के जोड़े ने पूरे उत्साह के साथ एक सुरक्षित जगह पर मजबूत और सुंदर सा घोसला बनाया और जब घोसला बन गया तो उन्हें लगा कि सामने बालकनी पर बानरों की अलग सी जाति वाले ये बड़े-बड़े जानवर रहते हैं वे कभी न कभी उनके बच्चे उठा ले जाएंगे। लिहाजा घोसला बनते ही उसे उजाड़ने की कवायद शुरू हो गई। इस बार इसे शहतूत से बिल्कुल सटे, बल्कि उसी में उलझे बकाइन के पेड़ की काफी ऊपरी शाख पर घोसला बनाने का फैसला किया गया। एक काफी जटिल प्रक्रिया में पुराने घोसले की उजाड़न से नए घोसले की नींव पड़नी शुरू हुई। इसमें समस्या यह थी कि गिलहरियों के रास्ते में हमेशा कुछ कबूतर बैठे ऊंघते रहते थे जो जोरों की किटकिट के बाद भी रास्ते से हट कर नहीं देते थे। करीब दस दिन की कोशिश के बाद नया घोसला तैयार हुआ तो उसके बनते ही जोरों की आंधी आ गई। आंधी से घोसला गिरा नहीं लेकिन काफी छिन्न-भिन्न हो गया। नतीजा यह निकला कि उसे वहां से भी हटा देना जरूरी समझा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिलहरियों के प्रेग्नेंसी पीरियड के बारे में भी मुझे कुछ नहीं मालूम, लिहाजा मुझे डर हुआ कि बच्चे होने तक पता नहीं इनका नया घोसला तैयार भी हो पाएगा या नहीं। इस बार घोसले की दूरी और बढ़ा दी गई। इसे हमारे पड़ोसी के नीम के पेड़ पर बनाने का फैसला हो चुका था। पश्चिम की तरफ, ताकि बारिश का मौसम नजदीक आने के साथ दिनोंदिन पुरवा होती जा रही  हवा के सीधे रपेटे में न आए। भयानक बात यह हुई कि घोसला आधा ही बन पाया था और फिर आंधी आ गई। इस बार सारे तिनके और धागे बिल्कुल तितर-बितर करती हुई। इस श्रेणी का चौथा और अंतिम घोसला आज भी नीम के पेड़ पर ही दिखाई देता है। पता नहीं यह उसी जोड़े का है या किसी और का। बच्चे अगर इस बीच हो चुके हों तो भी उनके कभी दर्शन नहीं हुए, अलबत्ता गिलहरियों की तादाद कुछ बढ़ी हुई जरूर मालूम पड़ने लगी है। दरअसल, मां-बाप और बच्चों के आकार में फर्क इतना कम होता है कि ठीक से अंदाजा नहीं लगाते बनता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिलहरियों का साथ मुझे बचपन से बहुत अच्छा लगता रहा है लेकिन गांव में मैंने कभी किसी गिलहरी को घोंसला बनाते नहीं देखा। गिलहरियों और तोतों के रहने की स्थायी जगह पेड़ों के कोतड़ ही हुआ करते थे। समस्या यह है कि हमारा इलाका अभी महज आठ-नौ साल पुराना है और यहां कोई भी पेड़ अभी इतना पुराना नहीं हुआ है कि उसमें घोसला बनाने भर को गहरा कोतड़ निकल आए। एक दिन मैं सोचता रहा कि ऐसे में गिलहरियों की जात ही यहां कैसे आई होगी। शायद पास के प्रह्लादगढ़ी गांव से कोई जोखिम लेने को आतुर जोड़ा इधर निकल पड़ा हो। लेकिन या तो इस जोड़े की स्कूलिंग ठीक से नहीं हुई थी या यह सचमुच नई राहों का अन्वेषी हो। वरना चिड़ियों की तरह पेड़ों पर घोसला बनाकर बच्चे देने की बात उसने भला कैसे सोची होगी। शाखा पर लगाए घोसले अंडे देने के लिए भले ही काम के हों लेकिन पहले दिन से ही चहलकदमी करने वाले गिलहरी के बच्चों के लिए वे पता नहीं काम के होते भी होंगे या नहीं। जरूर होते होंगे, वरना इनकी आबादी यहां कैसे बढ़ रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नए इलाकों का भी अपना अलग व्याकरण होता है। यहां मैंने कुत्तों को लोमड़ियों की तरह गहरी मांद बना  कर बच्चे देते देखा, हालांकि इतनी कोशिश के बाद भी उस पीढ़ी का एक भी बच्चा बचाया नहीं जा सका। और अब गिलहरियों को घोंसला बनाकर बच्चे देते देख रहा हूं। शायद यह एक ही प्लॉट पर ऊपर-नीचे कई सारे फ्लैट बनाकर बेचने की नई इन्सानी युक्ति जैसा ही है। इवोल्यूशन की हजारों साल लंबी प्रक्रिया अनगढ़ और अक्सर नाकाम ढंग से इन्सानों और जानवरों, सभी में सक्रिय है। पता नहीं सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के लिहाज से इसमें किसके लिए कौन सा नतीजा कितना सफल साबित होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-2152871861647101416?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/2152871861647101416/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2152871861647101416" title="10 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2152871861647101416" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2152871861647101416" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/K-1dsBN6720/blog-post.html" title="गिलहरी का घोंसला" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/08/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-9214459324607833115</id><published>2009-07-14T06:23:00.000-07:00</published><updated>2009-07-14T07:10:53.757-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="रामझरोखा" /><title type="text">सूखे में बारिश का इंतजार</title><content type="html">पिछले पंद्रह दिनों से यही हाल है। कभी सुबह से ही ऐसा माहौल बनता है जैसे अभी जम कर बारिश हो जाएगी। लेकिन थोड़ी ही देर में बादल साफ हो जाते हैं या धुंधले पड़ जाते हैं। कभी शाम को बिजलियां कड़कती हैं लेकिन सारा किस्सा कहीं दूर का मालूम पड़ता है। हवा में लगातार इतनी उमस बनी रहती है कि घर में रहते दम घुटता है। पंखे के नीचे लेटिए तो शरीर में जितनी दूर हवा लगती है उतनी ही दूर राहत रहती है। उसके ठीक बगल में ही या नीचे जबर्दस्त पसीने से बिस्तर भीग रहा होता है। अब उम्मीद धीरे-धीरे जा रही है। लगता नहीं कि इस साल इतनी बारिश हो पाएगी कि धरती की तपन कम हो सके। सबसे बुरी बात है कि ऐसा मौसम न सिर्फ रचनात्मकता के लिए, बल्कि पूरे मानसिक स्वास्थ्य के लिए ही खतरनाक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे उत्तर भारत में सूखे के दो हालिया सालों की याद है। कुछ घटनाएं इनसे जुड़ी हुई हैं, जिनका मौसम संभवतः जून-जुलाई का ही है। ये साल हैं 1995 और 2001 के। इन सालों की घटनाएं याद करके मुझे लगता है कि  निर्मल वर्मा की कहानी सूखा की तरह बाहर का सूखा अक्सर लोगों के मन और उनकी अंतश्चेतना में और भी गहरा सूखा बनकर उतर आता है। 1995 में दिल्ली के कांग्रेसी नेता सुशील शर्मा का नयना साहनी तंदूर कांड और लखनऊ में मायावती का बीजेपी से समर्थन लेकर मुख्यमंत्री बनना लगभग आसपास की ही घटनाएं हैं। मुझे इन घटनाओं की याद एक खास तरह की न्यूरोसिस (मनोरोग) को लेकर है जिसने मुझे उस दौर में कोई महीना भर परेशान किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई अपनी पत्नी के टुकड़े करके उसे तंदूर में भून दे और ऐसा कैसे हो सकता है कि मनुवाद को गालियां देते-देते कोई दलित धारा सबसे प्रखर मनुवादी पार्टी का हाथ थाम ले। पता नहीं कैसे उस दौर में मेरे लिए ये राजनीतिक घटनाएं आपस में जुड़ गईं और बाहरी न रह कर मेरे भीतर चली गईं। मैं हंसना भूल गया और बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो गया। दोस्तों से मेरे झगड़े होने लगे और लिखना-पढ़ना सब कसैला हो गया। भौतिक इलाज के रूप में मेरा काम हफ्ते भर मशीन पर आंखों की कसरत और सुबह टहलने-घूमने की दिनचर्या दुरुस्त करके चल गया। लेकिन वह मेरी शादी के तीन-चार महीने बाद का समय था और संयोगवश उस समय की अपनी जो एक-दो तस्वीरें मेरे पास बची हुई हैं उन्हें देखकर मैं आज भी अपनी समस्या को याद कर सकता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ऐसा ही हाल सन 2001 में देखने को मिला था काला बंदर या मुंहनोचवा के रूप में। इन घटनाओं के पीछे शरारत चाहे जिसकी भी रही हो और नए-नए आए खबरिया चैनलों ने नमक-मिर्च लगाकर इसमें चाहे जितना भी योगदान किया हो लेकिन लगातार गर्मी और सुखाड़ से उपजी सामूहिक न्यूरोसिस का दखल इसमें बिल्कुल साफ नजर आता था। बाहरी दुनिया के समानांतर भीतरी दुनिया में भी  तापमान और दबाव की एक ऐसी स्थिति, जब अफवाहें लोगों के सिर ज्यादा आसानी से चढ़ जाती हैं और दिमागी दशा सहज तर्क से कहीं ज्यादा भगदड़ के अनुरूप हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे बारिश का इंतजार तेज हो रहा है, माहौल में गर्मी और उमस बढ़ रही है, मुझे व्यक्तिगत और सामूहिक न्यूरोसिस का डर सता रहा है। ऐसे में कौन काला बंदर, कौन मुंहनोचवा कहां से उभर आएगा, कोई ठिकाना नहीं।  मुझे लगता है कि ब्लॉग जैसी निरापद जगहें भी उसके उभरने के लिए काफी मुफीद हो सकती हैं। ऐसे माहौल में भीड़ और भीड़ की मानसिकता से दूर रहना चाहिए और जहां तक हो सके, खुद को हल्का रखने की कोशिश करनी चाहिए। वैसे  बाहर का सूखा भीतर न आए, यह एक ज्यादा गहरी समस्या है और इसका कोई बहुत आसान रास्ता तो हो ही नहीं सकता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-9214459324607833115?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/9214459324607833115/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=9214459324607833115" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/9214459324607833115" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/9214459324607833115" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/qHVPkbWvLjI/blog-post_14.html" title="सूखे में बारिश का इंतजार" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/07/blog-post_14.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-201275087052580925</id><published>2009-07-07T06:38:00.001-07:00</published><updated>2009-07-07T07:31:04.875-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="होमो" /><title type="text">एक थे उत्तम</title><content type="html">कबाड़खाना पर समलैंगिक संबंधों को लेकर जारी  उत्तम बहस देखकर उत्तम की याद आ गई। मेरे परिचय में आए लोगों में वह अकेले ही हैं जिन्हें मैं शुद्ध और सबलाइम स्तर तक पहुंचता हुआ  समलैंगिक मान सकता हूं। बाकी जो भी लोग इस श्रेणी में दिखे, वे निरपवाद रूप से बाइसेक्सुअल थे, और उनमें कुछ ऐसे भी थे जो एक किस्म के यौन अत्याचार से गुजरते हुए खुद भी उसमें भागीदार हो गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उत्तम की बात कुछ और थी। वे जिस लड़के से प्रेम करते थे उसकी लात खाते थे और पूरे गांव में बदनाम होकर भी खुलेआम, यहां तक कि उसके और अपने बाप के सामने हर तरह की चुटकियां झेल कर भी उसकी पूजा करते मालूम पड़ते  थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब तीस साल पहले उत्तम को मैंने अपनी बहन के ससुराली गांव में देखा था। गोरखपुर जिले  के उस सामंती मिजाज और हैसियत वाले ब्राह्मण बहुल गांव में पूजा-पाठ की पवित्रता और सेक्स से जुड़े एक से एक कमीनेपन एक साथ देखने को मिलते थे। अपनी सोच में परिष्कार करते हुए  उत्तम को मैं कमीने लोगों की  श्रेणी से बाहर मान लूं तो भला दिलीप को क्या कहूं जो बैल बांधने की ओसारी में एक दोपहर अपनी पालतू कुतिया के साथ पकड़ लिए गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय मैं नवीं में पढ़ रहा था और ये दोनों कमोबेश मेरे हमउम्र लोग ही थे। मेरी बहन के ससुराल में मेरे दो रिश्ते के भानजे (बहन के जेठ के बेटे)  भी कमोबेश मेरी ही उम्र के, यानी चौदह-पंद्रह साल के रहे होंगे।  उनमें बड़े लड़के से दो-तीन साल ज्यादा उम्र वाले  उत्तम उससे उसी तरह प्रेम करते थे जैसे राधा कृष्ण को करती रही होंगी। या शायद यह कहना गलत हो क्योंकि उनके प्रेम में साख्य के बजाय दास्य भाव प्रमुख था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्मियों की छुट्टियों में ही मेरा अपनी बहन के यहां जाना हो पाता था और इन दिनों की दोपहरें हमारे  किशोर मनों को जरूरत से कुछ ज्यादा ही रोमांटिक बना देती थीं। हमउम्र लड़कों से आसपास दिखने वाली सुंदर लड़कियों के बारे में बातें करना, उनकी दिलचस्पियों के बारे में जानना, उनमें खुद को लेकर मौजूद संभावनाओं के बारे में जानना  तपती जमीन पर छींटे मारने जैसा लगता था। इस गांव में मुझे पहली बार पैंट-टॉप पहनने वाली पढ़ी-लिखी मॉडर्न लड़कियां देखने को मिली थीं। उनकी दुनिया कैसी होगी, उनके सपने कैसे होंगे। इन शाश्वत दिलचस्पियों के बीच अचानक वहां लुंगी पहने, तेल से चिपका कर मांग निकालने वाले लजाए सकुचाए मेहराए से उत्तम की आमद भयंकर खीझ पैदा करती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तम वहां लकी के चक्कर में आते थे जो अपनी उमर में गांव का ही नहीं, पूरे इलाके का सबसे सुंदर और सजीला किशोर हुआ करता था। उसके बारे में किंवदंती थी कि लड़कियों में उसे लेकर झगड़े तक हो जाया करते हैं। लेकिन उत्तम को इससे कोई परेशानी नहीं थी। वे किसी मुग्धा नायिका की तरह पलंग की पाटी पर बैठे-बैठे लकी को निहारा करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दोपहर लकी सोया हुआ था और उत्तम वहां पहुंच कर उसके बाल संवारने लगे। इसी बीच लकी की नींद खुल गई और आधी नींद में ही हाथ के झटके से उसने उत्तम को जमीन पर गिरा दिया। फिर उठ कर गरियाते हुए  लातैलात कम से कम पांच-सात लात उन्हें मारा। उत्तम उठे और सुबक-सुबक कर  रोते हुए अपने  घर चले गए। हमें लगा कि चलो किस्सा खत्म हुआ। लेकिन नहीं। परम धैर्य के साथ तीसरे-चौथे दिन उत्तम दोबारा हाजिर थे। उनके परिवार के कोई व्यक्ति सऊदी अरब रहते थे। वहां से उन्होंने उत्तम के लिए एक धूपी चश्मा भेजा था, जिसे वे लकी को भेंट करना चाहते थे। लकी ने चश्मा ले लिया लेकिन मेरे देखते उन्हें कोई भाव नहीं दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तम के बारे में आखिरी जानकारी मेरे पास यही है कि दो-तीन कोशिशों के बाद हाई स्कूल पास करके उन्होंने अपना पासपोर्ट-वीजा बनवाया और कहीं विदेश चले गए। करीब पंद्रह साल के फासले के बाद लकी और उसके भाई विनोद से यहीं दिल्ली में ही मुलाकात हुई तो उसने बड़े गर्व से बताया कि महिलाओं में उसकी लोकप्रियता आज भी पहले की ही तरह बरकरार है। इसके कुछ देर बाद उसने मेरे सामने ही फोन पर बिना विवाह वाली अपनी एक पत्नी से खूब प्रेम भरी बातें कीं और  इसके ठीक बाद विवाह वाली पत्नी को खूब गंदी-गंदी गालियां दीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटना को लगभग दस साल हो गए, लेकिन तब से अब तक एक ही शहर में रहते हुए भी लकी से मिलने का मेरा दिल नहीं हुआ। उत्तम उस वक्त मेरे राडार पर कहीं नहीं थे लिहाजा उनके बारे में पूछने का कोई सवाल ही  नहीं था। मेरे ख्याल से समलैंगिकता उत्तम के लिए मैटर ऑफ च्वाइस न होकर एक जैविक स्थिति रही होगी। वे जहां भी हों, मुझे लगता है कि दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद उन्हें काफी खुशी हुई होगी, भले ही नैतिक और सामाजिक दबावों के चलते निजी जीवन में उन्हें इसका कोई फायदा मिल पाए या नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-201275087052580925?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/201275087052580925/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=201275087052580925" title="6 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/201275087052580925" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/201275087052580925" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/yOwhZOQ570Q/blog-post_07.html" title="एक थे उत्तम" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/07/blog-post_07.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-4400496595425331097</id><published>2009-07-06T08:05:00.000-07:00</published><updated>2009-07-07T00:08:19.654-07:00</updated><title type="text">चुप लेटे मदान</title><content type="html">इतवार की सुबह-सुबह एक अजीब घटनाक्रम में पता चला कि ब्रजेश्वर मदान को पैरालिसिस हो गया है। फोन किया तो कोई उठा नहीं रहा था। दो-चार फोन इधर-उधर खटकाने के बाद स्थिति का पता चला। घर उनके कुल दो बार ही जाना हुआ था लेकिन बिना किसी से रास्ता पूछे स्कूटर ठीक उनके घर के सामने ही खड़ा हुआ। वहां पता चला कि यहां उनकी देखरेख के लिए कोई है नहीं लिहाजा उनके साले साहब ने उन्हें अपने ही यहां रख लिया है। वहां पहुंचने पर मदान साहब को देखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जिंदादिल इन्सान, जिसे एक बार पैर में चोट खाने के अलावा मैंने कभी बीमार नहीं देखा था, जो न जाने किस समय से हर शाम दारू का पूरा पौआ नीट और एक सांस में ही पीने का आदी रहा, मेरे सामने पड़ा था कमर पर बच्चों की हगीज पहने, बच्चों जैसा ही निस्संग चेहरा लिए, सोया हुआ इस तरह कि जागने भर को भी स्फुरण शरीर के भीतर पैदा नहीं हो रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक हाथ अजीब तरह मुड़ा हुआ था। उस पर मैंने अपना हाथ रखा तो कोई हरकत नहीं हुई। फिर माथा छुआ और दूसरा हाथ सहलाया। नाम बताया तो चेहरे पर कहीं कोई भाव नहीं। मन में खुटका हुआ कि यह नाराजगी तो नहीं। फिर शायद वहां मेरे होने की बात दिमाग तक पहुंची होगी। हरकत वाले हाथ से हाथ थाम लिया, आंख खोलकर रोने सा मेरी तरफ देखा और बाईं तरफ जरा सा  खुल पा रहे  मुंह से मुअइं जैसा कुछ कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस आदमी के बारे में मैं क्या कहूं। बहुत लोग बहुत तरह से बहुत कुछ कहेंगे। कहने-सुनने में ब्रजेश्वर मदान जो हैं सो हैं। पढ़ने-लिखने वाले लोग उन्हें जीनियस कहते हैं। उनकी कई कहानियां और कुछ कविताएं भी ऐसी हैं जिन्हें पढ़कर अपने आसपास की दुनिया को आप नए तरह से देखने लगते हैं। यह जीनियस का ही काम है। लेकिन उनका लिखा पढ़ने से ज्यादा मजा मुझे उनके साथ होने में, उनकी बातें सुनने में और उनसे बकवास करने में आता रहा है। मुझे इतना भयंकर रोना आया कि क्या कहूं। थोड़ी देर और वहां बैठा, फिर भाग खड़ा हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पहुंचकर शाम होने को थी कि शिवसेवक सिंह आ गए। इलाहाबाद में नगरपालिका पार्षद हैं। बातों-बातों में इलाहाबाद ही पहुंचा देते हैं। मदान साहब का दुख भरमाने में उनकी बातें बड़े काम आईं। फिर सड़क पर यूं ही चाईं-माईं भटकते एक लंबी कार में आते मृगांक शेखर, उनकी पत्नी और पीछे बैठे खालिद पति-पत्नी मिल गए। सहारा से मेरे हटने के बाद ये दोनों लोग मदान साहब के सबसे करीबी थे। मदान साहब अपनी सारी गालियां इन्हीं के मार्फत मुझ तक पहुंचाते थे। कब ठीक होगे ब्रजेश्वर मदान? कभी इतने ठीक होगे कि हम साथ मिलकर वह किताब कर सकें, जिसके बारे में इतनी बातें की हैं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-4400496595425331097?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/4400496595425331097/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=4400496595425331097" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4400496595425331097" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4400496595425331097" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/dyfnkal1Iaw/blog-post_06.html" title="चुप लेटे मदान" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/07/blog-post_06.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8011262830450511944</id><published>2009-07-04T06:28:00.000-07:00</published><updated>2009-07-04T07:29:53.677-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="काम-धंधा" /><title type="text">शादी में संपादक</title><content type="html">मित्र प्रदीप एनडीटीवी में हैं- उत्साही फ्रीलांस रिपोर्टर से धीरे-धीरे वजनदार डेस्क हैंड में तब्दील होते हुए। अभी चार-पांच दिन पहले उनकी शादी थी। शादी के आयोजन में मिले पत्रकारिता जगत के तमाम बड़े छोटे लोग। प्रभाष जोशी से लेकर ओम थानवी और राजेश रपरिया से होते हुए मंगलेश डबराल, मनोहर नायक, हरवीर सिंह, उर्मिलेश, मनोज चतुर्वेदी, अरिहन जैन, दिलीप चौबे, प्रियदर्शन, शरद गुप्ता, प्रेम, वेंकटेश और प्रवीण  तक। इस लाइन में रहते हुए, इतने लोगों के साथ काम करते हुए इतना वक्त इतनी जल्दी कैसे गुजर गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में पार्टी की पत्रिका के लिए लिखना और बात है लेकिन बाकायदा पत्रकारिता की नौकरी करने के बारे में तो नौकरी शुरू करने से पहले कभी सोचा भी नहीं था। अब से करीब चौदह साल पहले गृहस्थी शुरू हुई और छोटी-छोटी जरूरतों के लिए पैसों की किल्लत होने लगी तो भी दिमाग अनुवाद और जब-तब रिक्शा-ठेला चलाने जैसे मेहनत-मजूरी के कामों की तरफ ही जाता था। अखबार में नौकरी कर लेने की बात एकाध बार मुंह से निकली भी तो वैसे ही, जैसे लोग खीझकर कहते हैं कि ज्यादा तंग करोगे तो कुएं में कूद जाऊंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन प्रदीप की शादी से लौटते हुए आयोजन में मिले लोगों के बारे में सोचता रहा। कैसे-कैसे आत्ममुग्ध तुर्रम खां। इनमें कुछ तो सचमुच दमदार हैं जिन्होंने शब्द तक पहुंचने से पहले उसके अर्थ के साथ साक्षात्कार किया है और आज भी शब्द को अर्थ के करीब रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने सिर्फ कुर्सी के सहारे शब्द पर अपनी इजारेदारी मान ली है। लेकिन इन दोनों छोरों के बावजूद पत्रकारिता में बहुत कम ही लोग ऐसे हैं जो कुछ साल यहां रह जाने के बाद भी अपनी सहजता बचा ले गए हैं। कुल मिला कर यह एक तरह का शो बिजनेस ही है, जिसमें उड़ना आसान होता है, लेकिन जमीन पर उतरते वक्त पता चलता है कि पहिया तो कब का पंक्चर पड़ा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप रिपोर्टर हैं तो बड़े-बड़े लोगों के करीब रहने का मौका आपको मिलता है। उनसे कभी-कभार थोड़े-बहुत फायदे भी मिल जाते हैं, लेकिन उनकी ज्यादा बड़ी भूमिका अपनी जीवनशैली से ललचा कर आपके भीतर कुंठा बोने की होती है। अगर आप डेस्क पर हैं तो दुनिया भर की सूचनाओं और उच्च विचारों के करीब होते हैं, जो कुछ समय बाद आपको अपने से लगने लगते हैं और आप भूल ही जाते हैं कि आप यहां नहीं होते तो किसी चीज के बारे में किस तरह सोचते । इस क्रम में अमौलिक तो आप हो ही जाते हैं, लेकिन असल समस्या यह नहीं होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल समस्या यह होती है कि मीडिया की  इन दोनों ही भूमिकाओं मे रहते हुए आप एक ऐसी हायरार्की के अधीन होते हैं, जिसका कोई तर्क आपकी समझ में नहीं आता। खासकर हिंदी में तो और भी, जहां अजीब-अजीब वजहों से लोग संपादकी या किसी और तरह की मीडिया अफसरी के हकदार हो जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर इस लाइन में काम कर रहे एक ही व्यक्ति में रौशनखयाली और घोंचूपने का, बहादुरी और कायरता का, जूते मारने और जूते चाटने का, एक्स्ट्रोवर्टनेस और इंट्रोवर्टनेस का अजीब घोलमट्ठा देखने को मिलता है। बातचीत में आपने जरा सी ढील दी और लोग मोर की तरह नाचने लगते हैं। येम्मेरी रिपोर्ट, वोम्मेरा आर्टिकल, वोक्कहानी, वोक्कविता....। इनका फोन आया तो कह रहे थे कि अरे अब बर्बाद करके ही छोड़िएगा और उनका फोन आया तो मैंने कहा कि तुम्हारी औकात क्या है। और फिर अंत में यह कि संस्थान में कौन किसके पीछे पड़ा है और कैसे किसका पत्ता कटने वाला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफसरी का आलम यह है कि मध्यकाल के बादशाहों को तस्वीर दिखा दी जाए तो उन्हें भी एकबारगी पसीने छूट जाएं। एक बार मैंने एक प्रोफेशनल साइकियाट्रिस्ट से पूछा कि आजकल सारे संपादक इतने सनकी क्यों होने लगे हैं। उन्होंने कहा कि सबका तो नहीं पता लेकिन कहीं-कहीं यह बात मैन-मैनेजमेंट के स्किल के रूप में सिखाई जाती है। सोचने-समझने वाले मातहतों के बीच आप अगर बहुत ज्यादा प्रेडिक्टिबल होकर काम करेंगे तो वे इसका नाजायज फायदा उठाने लगंगे। लिहाजा उन्हें लगातार पंजों के बल रखने के लिए यह जरूरी है कि उन्हें लगातार आपके बारे में सोचने को मजबूर रखा जाए। इससे उनका दिमाग कामकाजी बना रहता है और आपको उनके बारे में सोचने की जरूरत नहीं रहती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने दो पुराने संपादकों से दो-दो मिनट बात भी हुई। जैसा कि जुरासिक पार्क भाग एक में कहा गया है, पुरानी आदतें जल्दी नहीं जातीं। मुझे लगा कि मैं फर्श पर कालीन की तरह बिछा हुआ उनसे बात कर रहा हूं। लेकिन थोड़ी ही देर में मुझे एहसास हो गया कि मेरी विनम्रता को वे गर्व प्रदर्शन की टेक्नीक की तरह लेकर कुछ आहत से हो रहे हैं। इनमें से एक फिलहाल खाली हैं और दूसरे किसी वजह से मेरे प्रति अपनी नाराजगी आज भी दिल से निकाल नहीं पाए हैं। वह दो-ढाई मिनट की यातना असहनीय थी, लेकिन शादी-ब्याह में यह सब करना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं कब तक जिंदगी की जरूरतें इस लाइन से बांधे रखेंगी। गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज और अर्नेस्ट हेमिंग्वे जैसे पत्रकार साहित्यकारों की मिसाल बेमानी है। ऐसी मिसालों के जरिए ही साहित्य में मीडियोक्रिटी का झंडा बुलंद रहता है। हिंदी की पत्रकारिता आपको इस तरह चुसा हुआ आम बना देती है कि आप किसी काम के नहीं रहते। क्या जिंदा रहते इस नियति से कोई निस्तार है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-8011262830450511944?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/8011262830450511944/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8011262830450511944" title="6 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8011262830450511944" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8011262830450511944" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/imZVMmEswfQ/blog-post.html" title="शादी में संपादक" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/07/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2904207126254924172</id><published>2009-06-24T06:28:00.000-07:00</published><updated>2009-06-24T06:55:05.918-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="रामझरोखा" /><title type="text">मेरे नाम से भेजो</title><content type="html">जिंदगी में आज पहली बार कोई मनीऑर्डर भेजा। अपने घर नहीं। वहां तो अब कोई रिसीव करने वाला ही नहीं है। इसकी डिलीवरी पलंगी के घर होगी। बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में चेनमारी टी गार्डेन की फागू लाइन में। पलंगी एक मेड एजेंसी के जरिए हमारे घर में डोमेस्टिक हेल्प के रूप में आई है। उसके पति एक चाय बागान में काम करते हैं और कुछ दिन पहले तक सीपीएम के ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता भी थे। सोलह-सत्रह साल की उसकी एक बेटी है जो आठवीं में पढ़ती है। पलंगी की योजना बेटी को ऊपर तक पढ़ाने और नौकरी कराने की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी के लिए एक मोबाइल खरीदने को तीन हजार रुपये पलंगी ने घर भिजवाए हैं- अपनी गाढ़ी कमाई का पहला मनीऑर्डर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह काम बहुत खर्चीला है। तीन हजार भेजने में 150 रुपये देने पड़ते हैं- पूरे पांच प्रतिशत। समझ में नहीं आता कि खुद को गरीब समर्थक बताने वाली सरकारों को इसमें कोई अन्याय क्यों नहीं नजर आता। अमीर लोग एटीएम के जरिए देश में कहीं भी पैसा निकाल सकते हैं और मुफ्त में इसे कहीं से कहीं भेजवा सकते हैं लेकिन जिसे मनीऑर्डर का ही आसरा है वह रुपये में पांच पैसे तो यहीं गंवा दे। वहां पावती के वक्त डाकिया और डाकमुंशी लेता है सो अलग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छह-सात महीने पहले जलपाईगुड़ी से दिल्ली आई पलंगी का यह दूसरा काम है। पहला काम नोएडा में मिला था जहां मैडम जी तो बहुत अच्छी थीं लेकिन साहब और उनका लड़का दोनों बदमाश थे। एजेंसी में शिकायत करने पर वहां से हटा लिया लेकिन चार-पांच महीने के पैसे का कोई हिसाब नहीं दिया। पता नहीं बाद में भी देता है या नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनीऑर्डर का फॉर्म भरने के बाद मैंने पलंगी से पूछा कि क्या इसे अपने नाम से भेज दूं तो उसने कहा- नहीं, मेरे नाम से भेजो। पैसा सही जगह पहुंचे, इसके अलावा इस जवाब में यह खनक भी थी कि मेरी कमाई मैं अपने घर भेज रही हूं तो यह मेरे नाम से ही जानी चाहिए न।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, रसीद सही जगह वापस लौट आए, इसके लिए मैंने केयर ऑफ करके अपना नाम-पता भी डाल ही दिया। महानगरों में आकर मेड का काम करने की अपनी अलग यातना है। एजेंसियों की लूटमार का अपना ही तंत्र है और जिन घरों में काम मिलता है, उनमें भी हर किसी की अलग कहानी होती है। लेकिन यहां से गई कुछ नगदी अगर गांवों और छोटे कस्बों में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनकी जिंदगी बनाने के काम आ जाए तो इसके सात खून माफ किए जा सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-2904207126254924172?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/2904207126254924172/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2904207126254924172" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2904207126254924172" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2904207126254924172" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/ebo7zA6JZvI/blog-post_24.html" title="मेरे नाम से भेजो" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/06/blog-post_24.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-6138670070719121693</id><published>2009-06-22T06:08:00.000-07:00</published><updated>2009-06-22T07:25:25.480-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="वाम से काम" /><title type="text">मार्क्सवादी, माओवादी और मालेवादी</title><content type="html">वामपंथी मुख्यधारा का नेतृत्व भारत में लंबे समय से सीपीएम ही करती आ रही है। लेकिन इस बार के चुनावी नतीजों से न सिर्फ उसके लिए बल्कि उसके नेतृत्व में चलने वाली सीपीआई, आरएसपी, फॉरवर्ड ब्लॉक और कुछ छिटपुट अन्य वाम दलों के लिए भी एक मुश्किल दौर की शुरुआत हो गई मालूम पड़ती है। चुनाव बाद आम धारणा यह बनी थी कि संसदीय वामपंथ के लिए संकट केरल में अंदरूनी झगड़ों से पैदा हुआ है, जो दूर भी हो सकता है, जबकि प. बंगाल में संकट का स्वरूप व्यावहारिक से ज्यादा वैचारिक और आस्तित्विक किस्म का है और इसका फायदा ममता बनर्जी के नेतृत्व में चलने वाली दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी ताकतों को मिलने वाला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी यह धारणा तेजी से बदलने लगी है। लोगों को लगने लगा है कि पश्चिम बंगाल में संसदीय वामपंथ द्वारा खाली की जा रही जगह पर सिर्फ दक्षिणपंथी और अवसरवादी मध्यमार्गी शक्तियां ही काबिज नहीं होने जा रही हैं, बल्कि राज्य में दशकों पहले कुचल दी गई रेडिकल वाम ताकतें इसे किसी और ही तरह की चीज से भर सकती हैं, जिसका पहले किसी को अंदाजा भी नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उड़ीसा और झारखंड से सटे पश्चिम बंगाल के चारो आदिवासी बहुल जिलों पश्चिमी मिदनापुर, पूर्वी मिदनापुर, बांकुड़ा और पुरुलिया में सीपीआई (माओवादी) ने चुनाव के ठीक बाद जोरदार हस्तक्षेप किया है। यहां यह खास तौर पर चिह्नित करना जरूरी है कि इस बार उसके संघर्ष का स्वरूप ठीक उसी तरह का नहीं है, जैसा आंध्र प्रदेश, बिहार और कुछ हद तक छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में भी इसे समझा जाता रहा है। माओवादियों की आम छवि बारूदी सुरंगों से पुलिस की गाड़ी उड़ा देने या किसी थाने पर ऐक्शन करके जनता को मार खाने के लिए छोड़ कर भाग जाने वाले संगठन की रही है। इसके विपरीत लालगढ़ और उसके इर्द-गिर्द उनकी गोलबंदी नक्सल आंदोलन के पुराने संघर्षों की याद दिलाने वाली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां पहुंच कर हमें कुछ पल ठहरना चाहिए। ऊपरी तौर पर 1967 से 1971 तक बंगाल में और 1969 से 1986-87 तक बिहार में चले नक्सली संघर्षों की याद दिलाने के बावजूद लालगढ़ की लड़ाई उसका दोहराव नहीं है। दोहराव तो क्या, उसका जारी रूप भी नहीं है। नक्सली आंदोलन भारत में रूसी निर्देशों से अलग क्रांति की एक नई रणनीति तलाशने की कोशिश के रूप में शुरू हुआ था। क्रांति की उसकी समझ  भारत को 1949 के पहले के चीन से मिलता-जुलता अर्धसामंती-अर्धऔपनिवेशिक देश मानने पर आधारित थी, जहां से भूमिहीन मजदूरों, गरीब किसानों की फौज बनाने, इलाके मुक्त कराने, नव-जनवादी ताकतों का मोर्चा बनाने और गांवों से शहरों को घेरने आदि जैसी कार्यनीतियां निकलती थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीपीआई (माओवादी) का वैचारिक साहित्य पढ़ें तो लगता है कि दुनिया इन चार दशकों में कहां से कहां गई लेकिन इनकी सोच की सुई वहीं की वहीं अटकी पड़ी है। इन्हें अलकायदा में भी अपना दोस्त नजर आता है क्योंकि इनके मुताबिक यह संगठन अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष कर रहा है। जमीन पर ये बेरहमी से वामपंथी कार्यकर्ताओं को मारते, निजी फायदे के लिए ठेकेदारों से वसूली करते और मध्यमार्गी पार्टियों के हाथों इस्तेमाल होते नजर आते रहे हैं, जिसका चरम बिंदु यह है कि अपने आदि गढ़ आंध्र प्रदेश को इन्होंने लगभग खाली ही कर दिया है। ये मंडल आंदोलन के दौर में यात्रियों से भरा रेल का डिब्बा जला देते हैं और बीएसपी के उभार के वक्त इनके ज्यादातर शीर्ष नेता मार्क्स, लेनिन और माओ का दामन छोड़ कर कांशीराम के साथ जाना ज्यादा बेहतर समझते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इन सारी विकृतियों के बावजूद पिछले तीन-चार वर्षों में- मोटे तौर पर कहें तो पीपुल्स वार, पार्टी यूनिटी और एमसीसी के परस्पर विलय के जरिए सीपीआई (माओवादी) के गठन के बाद से ही- भारतीय वामपंथ की इस सबसे रेडिकल धारा का वैचारिक ढांचा पहले से काफी सुधरा है। बिहार और झारखंड में  कई सारे पेशेवर लुटेरे और हत्यारे इसकी कतारों से बाहर निकाले गए हैं (हालांकि उनसे पूरी तरह मुक्त इसे आज भी नहीं माना जा सकता ) और खासकर छापामार युद्ध की संभावना लिए पठारी-जंगली संरचना वाले  कई इलाकों में गरीब आदिवासी आबादी के बीच इसकी पैठ मजबूत हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुद को भारत के रेडिकल वामपंथ का आधिकारिक प्रतिनिधि बताने वाली धारा सीपीआई एमएल (लिबरेशन) अपनी वैचारिक बहस एक तरफ सीपीएम से और दूसरी तरफ संसदीय संघर्ष का निषेध करने वाली धाराओं से मानती आई है ( जिसका एकमात्र प्रतिनिधि अब सीपीआई (माओवादी) को ही मान लेने  में कोई हर्ज नहीं है)। देश के वाम आंदोलन से लगाव रखने वाले लोग करीब डेढ़ दशक तक लिबरेशन के मुखपत्रों में चलने वाली ऐसी ऊर्जस्वी बहसों से जरूर वाकिफ होंगे। इन बहसों की जेनुइनिटी इनमें कही गई बातों से कहीं ज्यादा लिबरेशन के जमीनी आंदोलनात्मक प्रयोगों से बनती थी, जिनमें संघर्ष के किसी भी रूप का निषेध किए बगैर भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का क्रांतिकारी तेवर बनाए रखने का प्रयास किया जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये बातें भूतकाल में कहने को लेकर कोई विशेष निजी आग्रह नहीं है, लेकिन इस हकीकत का क्या करें कि पिछले कई सालों से सीपीआई एमएल (लिबरेशन) को लेकर सारी बातें उसकी चुनावी सफलताओं और विफलताओं के ही इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं। पार्टी के पिछले अधिवेशन में केंद्रीय बहस संशोधनवाद के खिलाफ चलाई गई थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि उत्तर प्रदेश के कुछ बड़े नेता पार्टी छोड़ कर चले गए। इन नेताओं का आग्रह एक जेनुइन वाम-लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में अपनी धारा की राष्ट्रीय उपस्थिति चिह्नित करने के लिए करीबी सोच वाली ताकतों का देशव्यापी मोर्चा बनाने पर था। अगर इस आग्रह को संशोधनवाद मान लिया जाए तो भी इसको परास्त करने के बाद पार्टी का जो रेडिकलाइजेशन होना चाहिए था, उस तरह की कोई खबर अभी तक सुनने में नहीं आई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश का यथार्थ आज चमक-दमक और बदहाली के बीच बुरी तरह विभाजित है। इतना बंटा हुआ कि हकीकत के एक छोर की आवाज  भी दूसरे छोर तक नहीं पहुंच पाती। ऐसे में कोई जरूरी नहीं कि पूरे देश पर लागू हो सकने वाली क्रांति की कोई एक ही रणनीति जब तक न खोज ली जाए तब तक देश भर की रेडिकल वाम ताकतें एक-दूसरे से संवादहीनता बनाए रखें। क्या लालगढ़ की लड़ाई उनके बीच आपस में ऐसी किसी बातचीत की गुंजाइश पैदा कर सकती है........ताकि देश में जारी फर्जी विमर्शों का पैराडाइम बदला जा सके और उसमें लोगों के दुख-तकलीफ के लिए कोई जगह बनाई जा सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6138670070719121693?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/6138670070719121693/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6138670070719121693" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6138670070719121693" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6138670070719121693" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/GDJ14SIsBos/blog-post_22.html" title="मार्क्सवादी, माओवादी और मालेवादी" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/06/blog-post_22.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-5107854033093562871</id><published>2009-06-16T04:09:00.000-07:00</published><updated>2009-06-16T06:59:51.443-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दोस्त" /><title type="text">रमाकांत-सूर्यकांत</title><content type="html">एक सुबह दिल्ली आने के लिए कप्तानगंज से बस पकड़ते हुए दोनों एक साथ ही मिल गए। बस सेकंड भर का खुटका, और लगा कि अभी कल ही शाम बस्ता कंधे पर टांगे स्कूल से घर जाने के लिए अलग हुए  हों। रमाकांत उपाध्याय और सूर्यकांत राय। माट्साब लोग इन्हें दो बैलों की जोड़ी कहा करते थे। अगल-बगल के गांवों के रहने वाले और क्लास में सबसे पहले सिगरेट का सुट्टा मारना सीखने वाले नवीं-दसवीं के मेरे क्लासमेट। हाफ पैंट से फुल पैंट में पहुंचने की उस उम्र में ये दोनों मित्र हमारी पूरी क्लास के लिए एक साथ भय और आकर्षण, दोनों का ही केंद्र बने रहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाई स्कूल का रिजल्ट आने के बाद पता चला कि इन दोनों लोगों को अभी अपनी जड़ें और मजबूत करनी हैं, उसके बाद ही ये कहीं और जा पाएंगे। बाद में पता चला कि अगले साल भी उनकी बात नहीं बनी और तीसरे साल स्कूल बदल कर किसी सुविधाजनक सेंटर के सहारे ही वे पढ़ाई के अगले मुकाम की ओर कूच कर पाए। कप्तानगंज में इंटरमीडिएट साइंस की व्यवस्था नहीं थी लिहाजा मैंने तेरही इंटर कॉलेज की तरफ प्रस्थान किया। लेकिन कभी किसी क्रिकेट मैच में तो कभी यूं ही बाजार में टहलते हुए दोनों मित्रों से मुलाकात होती रही। इसी बीच पता नहीं कैसे इन्होंने मुझे गुरू कहना शुरू कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे इसकी वजह कभी समझ में नहीं आई क्योंकि सिगरेट का स्वाद बहुत बाद में ले पाने के बावजूद रमाकांत और सूर्यकांत को मैं उनकी हिम्मत और फाकामस्ती, सिनेमाबाजी के उनके शौक और मास्टरों को लेकर उनकी जन्मजात अवमानना के चलते  बिल्कुल दिल से अपना गुरू मानता था। स्कूल के सबसे कड़क मास्टर को जो छात्र क्लास में ही उसकी औकात बताने लगे और दोनों हथेलियों पर गिन कर कुल बासठ डंडे खाने के बावजूद उसके सामने रोए-गिड़गिड़ाए नहीं, उसके सामने मेरे जैसे लोग क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा। बहरहाल, चाहे जिस भी वजह से, वे मुझे गुरू कहते रहे और मैंने कभी इस पर खुल कर एतराज भी नहीं जताया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब एक घंटे के बस के सफर में और फिर किसी दुकान पर एक-दो चाय लड़ाते हुए मैंने हाई स्कूल के बाद गुजरी सूर्यकांत और रमाकांत की जिंदगी का हाल जानने की कोशिश की। उनकी कहानियों में गोगोल की डेड सोल्स और बाल्जाक की ओल्ड गोरियो जैसी रवानी थी। फौरी हाल यह कि रमाकांत ने अयोध्या में एक पुराने मंदिर पर कब्जा कर रखा है और सूर्यकांत आजमगढ़ की फौजदारी अदालत में नाम और दाम कमाने की तरफ बढ़ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमाकांत ने किसी तरह इंटर-बीए निपटाने के बाद एमए की पढ़ाई के लिए फैजाबाद स्थित साकेत विश्वविद्यालय का रुख किया। वहां मेरी ही तरह एक पुराने मंदिर की छोटी सी कोठरी में रह कर उन्होंने पढ़ाई की शुरुआत की, लेकिन दो-तीन संयोग उन्हें मुझसे बिल्कुल अलग रास्ते पर ले गए। पहला संयोग यह कि उनके मंदिर का महंथ काफी बूढ़ा था, दूसरा यह कि रमाकांत अपने इरादों में बिल्कुल साफ थे और बाहुबल के इस्तेमाल से उन्हें कोई परहेज नहीं था, और तीसरा यह कि जब वे साकेत विश्वविद्यालय में एमए फाइनल की तैयारी कर रहे थे तब मंदिर आंदोलन अपने चरम पर पहुंच रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे की कहानी रमाकांत के शब्दों में- साला बुड्ढा हर महीने किराए को लेकर बड़ी किचकिच करता था। इधर हम लोग मंदिर आंदोलन में सक्रिय हुए तो वह थोड़ा डरने लगा था और बार-बार कोठरी खाली करने की जिद करने लगा था। एक रात हम लोगों ने डंडा उठाया  और घुसकर उसको लगे मारने- साले मुसलमान आएंगे मंदिर पर कब्जा करने तो इसको तुम्हीं बचाओगे। इधर पवन भइया (लोकल गुंडा और अयोध्या आंदोलन का दंगाई नेता)  का हमको पूरा सपोर्ट था ही। ले गए हम लोग महंथवा को सरजू डका आए। तब से मंदिर पर रात में हमारा ही ताला रहता है। बुढ़वा शुरू में आता था, अब नहीं आता- अपने टाइम में ऊ भी त साला ऐसे ही मंदिरवा कब्जिआया था न।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर सूर्यकांत ने अपने करीअर के विकास में भारतीय न्यायपालिका की काफी पोल खोली। कैसे उनके सीनियर बाजार से आम खरिदवा कर जज साहब के यहां पहुंचवाते हैं, यह कह कर कि घर में पाल खुली है, जरा चख के देखिए। या फिर हर नए आए जज के यहां महीनों दूध का उठवना चलता है, यह कह कर कि भैंस ब्याई है, दूध इतना हो जा रहा है कि समझ में नहीं आता करें क्या।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने समय में जज साहब का नरम-गरम पता चल जाता है। क्या चाहते हैं, क्या नहीं चाहते। किस मामले में कहां तक जा सकते हैं और  किसमें ज्यादा दबाव देना ठीक नहीं है। बाकी जिरह और दलील सब सिनेमा के लिए है- नीचे तो जैसी जिसकी सेटिंग, वैसी उसकी गेटिंग। अपने सीनियर के पीछे-पीछे सूर्यकांत भी अब इस कला में दक्ष हो चले हैं और अब धीरज के साथ सही मौके का इंतजार कर रहे हैं। किसी दिन उनके सीनियर अपनी कुर्सी के नीचे झांकेंगे तो वहां उन्हें अंतहीन सुरंग नजर आएगी, जो दरअसल उनके सारे कमाऊ  मुकदमों और मुवक्किलों को लिए-दिए  शहर के नामी वकील सूर्यकांत राय के दफ्तर पहुंच रही होगी। कौन जाने, यह अब तक हो भी चुका हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे जिले के दो रंगबाज भाई उमाकांत यादव और रमाकांत यादव बारी-बारी से अगल-बगल के क्षेत्रों से एमपी बनते रहते हैं, लेकिन जब भी उनका जिक्र आता है, मुझे नवीं और दसवीं में अपने साथ पढ़े रमाकांत उपाध्याय और सूर्यकांत राय की जोड़ी याद आती है। दोनों बिल्कुल सही रास्ते पर जा रहे हैं और शायद कुछ साल बाद उनमें भी कोई एमएलए या एमपी बना हुआ दिखे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-5107854033093562871?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/5107854033093562871/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=5107854033093562871" title="1 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5107854033093562871" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5107854033093562871" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/Hj1IltLnRv8/blog-post_16.html" title="रमाकांत-सूर्यकांत" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/06/blog-post_16.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2299026363665680764</id><published>2009-06-13T05:09:00.000-07:00</published><updated>2009-06-13T07:07:43.279-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दोस्त" /><title type="text">ओए राजू, प्यार ना करियो</title><content type="html">अराजीबाग में हमारा कमरा सड़क से थोड़ी दूर खेत में था। उस तरफ मोहल्ले के पिछले मकानों की नालियां निकलती थीं और बिजली विभाग के किन्हीं इंजीनियर साहब ने अपने विभाग को चूना लगाने के बाद हम जैसे किरायेदारों के साथ यही क्रिया दोहराने के लिए इसे खड़ा किया था। कमरे में सोने के लिए मेरे पास तो खटिया थी लेकिन राजू का फैसला वनवास की शर्तों के मुताबिक जमीन पर ही सोने का था। लिहाजा हम लोग अड़ोस-पड़ोस से बहुत सारे ईंटों के टुकड़े उठा लाए और कच्चे फर्श पर उन्हें ठोक-ठोक कर इस लायक बना दिया कि उस पर एक अदद बिस्तर बिछाया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वभाव से राजू निहायत काहिल थे और मेरे देखते परिश्रम का एकमात्र काम उन्होंने सिर्फ यह फर्श बनाने का ही किया। उनका हंसना शुरू में मुझे चकित करता था, फिर धीरे-धीरे आदत होती गई। वे हंसना शुरू करते तो डर लगता कि कहीं उनकी सांस न अटक जाए। पूरा चेहरा लाल हो जाता और मुंह इस कान से उस कान तक फैल जाता। फिर हिक-हिक हुच-हुच जैसी कोई आवाज आनी शुरू होती और लगता कि घबराने की कोई बात नहीं है। वैसी हंसी मैंने न राजू से पहले देखी थी न उनके बाद देखी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में उनके पिता-माता और अन्य परिजनों से मुलाकात होने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि राजू की यह हंसी जेनेटिक नहीं है। दरअसल, उनके पिता जी दिल्ली में एक्सपोर्ट प्रमोशन बोर्ड में बड़े बाबू थे और इस तरह हंसने की कला उन्होंने खासकर पंजाबी एक्सपोर्टरों को साधने के लिए ईजाद की थी। हंसी जैसी सहज क्रिया में  चापलूसी और जिंदादिली को एक साथ साधने का यह उपक्रम उनसे होता हुआ उनके ज्येष्ठ पुत्र तक इसी रूप में पहुंच पाया था।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अराजीबाग में रहते हुए  हमारा नियमित भोजन दाल और रोटी हुआ करता था, और बहुत बिरले ही कभी भात। सब्जी पकाने के लिए न समय होता न पैसे, लिहाजा दाल की पतीली में ही टमाटर काट लिए जाते और ऊपर से लहसुन-मिर्चे का बघार मार दिया जाता। एक बार दाल खत्म हो गई और सब्जी के लिए पैसे किसी के पास नहीं थे तो हम लोगों ने पिछवाड़े कहीं से कुछ तोड़ लाने की योजना बनाई। बहुत दूर तक चक्कर मारने के बाद भी खेतों में कहीं सब्जी नजर नहीं आई लेकिन एक जगह प्याज के साग जैसा कुछ दिख गया तो उसे हम दो टाइम बनाने भर की मात्रा में उखाड़ लाए। प्याज का साग पकते-पकते पक गया और रोटियां भी बन गईं तो बड़े शौक से खाने बैठे, लेकिन पहला कौर तोड़ कर मुंह में रखते ही जान निकल गई। इतना कसैला कि दोनों से एक कौर भी नहीं खाया गया। फिर हम इस नतीजे पर पहुंचे कि प्याज के चक्कर में हम किसी के खेत से लहसुन उखाड़ लाए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ़ाई-लिखाई के मामले में राजू की अपनी अलग शैली थी। खाना नाक तक चढ़ा लेने के बाद वे कोई बहुत मोटी किताब सामने रख कर आलथी-पालथी मारे बैठ जाते। फिर मैं मन ही मन एक से सौ तक की गिनती शुरू करता। बमुश्किल बहत्तर-तिहत्तर तक पहुंचते-पहुंचते वे नाक के बल सीधे किताब पर ही गिरते। अगर बिजली नहीं होती और पढ़ाई लैंप से करनी होती तो इसे न सिर्फ उनके लिए बल्कि पूरे कमरे के लिए खतरनाक जानकर मैं उन्हें आज की पढ़ाई भी कल ही कर लेने की सलाह देता । एक बार मेरे एक अन्य मित्र राजकुमार सिंह ने उनकी यह क्रिया देखी तो उनके मुंह से बेसाख्ता निकला- का ए राजू, मर्दवा जिउ देबा का (क्या राजू, जान देंगे क्या)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साल जब निकल गया और इम्तहान की बारी आई तो राजू अचानक सक्रिय हुए। पहले ही पेपर में उन्होंने बड़े मनोयोग से बहुत सारी पुर्जियां बनाईं और किसी सुसाइड बॉम्बर की तरह पूरे शरीर में कहीं गेटिस से तो कहीं रबर बैंड से उन्हें फिट कर लिया। इसके बाद एक अंतिम पुर्जी इंडेक्स के लिए बनाई कि कौन सी पुर्जी कहां रखी है, और उसे जेब में रख लिया। मैंने उन्हें चेतावनी दी कि कहीं इंडेक्स ही न धर लिया जाए। यह तो नहीं हुआ लेकिन एक तो सवाल समझ में नहीं आए, दूसरे नकल की पूरी प्रक्रिया उन्होंने इतनी जटिल बना डाली कि रिजल्ट उनका लगभग पैंतालीस प्रतिशत ही आ सका। अलबत्ता यह अच्छा रहा कि शिब्ली कॉलेज ने उन्हें निराश नहीं किया। वे दोनों साल लगातार पास हुए और आखिरकार बी.एससी. बायो की डिग्री लेकर ही आजमगढ़ से दिल्ली रवाना हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजू की एक और अच्छी बात झूठ बोलने की थी। जैसे कोयल कूकती है और भौंरे गुनगुनाते हैं, वैसे ही वे झूठ बोलते थे। किसी बुरे इरादे से नहीं, ऐसे ही मन की तरंग में। जिसे आजकल लोग मिसाइल से फेंकना कहने लगे हैं और महत्वाकांक्षी लोगों के किसी भी झुरमुट में जिसे सांय-सांय अपने अगल-बगल से गुजरता देख आप तय नहीं कर पाते कि इस पर हंसें या रोएं- उस अकच्च झुट्ठेपने से पहला साक्षात्कार मुझे राजू के जरिए ही हुआ। मेरे ख्याल से यह गुण भी उनके पास फर्जी एक्सपोर्टरों और उनके पिता से होता हुआ उन तक पहुंचा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिनों बाद राजू से जब दिल्ली में मुलाकात हुई तो पता चला कि वे एक्सपोर्ट के बिजनेस में ही कुछ कर रहे हैं। इस समय तक वे बाल-बच्चेदार हो चुके थे और मेरी शादी बस हुई ही हुई थी। दोनों के रास्ते बिल्कुल अलग थे और संवाद की कोई गुंजाइश नहीं थी लेकिन अब शादी नाम की एक ऐसी चीज नजर आने लगी थी जो दोनों के बीच साझा थी। राजू के कामधंधे के बारे में ज्यादा कुछ पूछ पाना मेरे बूते से बाहर था, लेकिन उस मुलाकात में मैंने गौर किया कि राजू बहुत बदल गए हैं। वे करोड़ों-अरबों में खेलने की बातें, अशोका होटल की काजू और मखाने के तड़के वाली दाल की लंतरानियां सब कहां गईं, जबकि वे फिलहाल एक्सपोर्ट के बिजनेस में थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके और भी बहुत सालों बाद राजू मुझसे फोन पर मिले, जब मैं सहारा में नौकरी कर रहा था। उन्होंने बाकायदा मुझसे टाइम लिया और एक बड़े से झोले  में बहुत सारे कागजात लेकर अखबार के दफ्तर में ही मिलने आए। बहुत देर तक वे मुझे अपने साथ हुए एक षडयंत्र के बारे में समझाते रहे लेकिन मेरे पल्ले ज्यादा कुछ नहीं पड़ा। शायद किसी फर्जी एक्सपोर्टर ने उनकी जिंदगी तबाह करने का इंतजाम कर दिया था। अपने पिता के संपर्कों से अपनी एक एक्सपोर्ट असिस्टेंस कंपनी उन्होंने बना रखी थी। इनके दस्तखत वाली बिल्टी से कोई कंटेनर विदेश भेजा गया लेकिन वहां पहुंचने के बाद कंटेनर खुला तो उसमें एक्सपोर्ट आइटम के नाम पर कागज और भूसा भरा पाया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मामले में सारे कागज-पत्तर राजू के नाम से बने थे लिहाजा कुछ समय के लिए वे जेल गए और फिर बारह-चौदह साल की मुकदमेबाजी ने उनके अंजर-पंजर ढीले कर दिए। सारा किस्सा बताने के बाद उन्होंने कुछ मदद की गुजारिश की, लेकिन झूठे दिलासे देने के अलावा उनके लिए मैं भला क्या कर सकता था। बाद में सिद्ध रिपोर्टर और अपने खोजी संपादक प्रभात रंजन दीन से इस विषय में चर्चा की तो उन्होंने कहा कि जैसा ये बता रहे हैं, वैसा होना संभव नहीं लगता, और हो भी तो इस बारे में कुछ किया नहीं जा सकता। फर्जी एक्सपोर्ट का अपना एक अलग ही धंधा है और इसका इस्तेमाल हवाले की तरह विदेशी पैसा देश में लाने के लिए किया जाता है। इस धंधे में शामिल दो पार्टियां आपस में टकरा जाएं या संयोग से यह कस्टम की नजर में आ जाए तभी ऐसी स्थिति बन सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लब्बोलुआब यह कि इस भीषण संकट में राजू की कोई मदद मुझसे नहीं हो पाई। राजू मददगार आदमी थे, शायद आज भी हों। पढ़ाई के दिनों में तो मेरी बहुत ही मदद उन्होंने की थी, लेकिन उनकी कोई मदद मुझसे नहीं हो पाई। आजमगढ़ में साथ रहते एक-दो बार झल्लाहट के मौके जरूर आए थे लेकिन सिर्फ एक को छोड़कर उनकी कोई कड़वी बात मेरे मन पर नहीं है। डिग्री लेकर दिल्ली पहुंचने के बाद उन्होंने न सिर्फ अपने परिवार को बल्कि मेरे  बड़े भाई को भी बताया कि सिर्फ ईमानदारी से इम्तहान देने की सजा उन्हें यह मिली कि उनके नंबर खराब आ गए जबकि नकल करके मैं फर्स्ट क्लास मार ले गया। भैया ने यह किस्सा मुझे बताया तो गुस्सा बहुत आया लेकिन फिर लगा कि वे तो राजू हैं, एक छोटे से झूठ के लिए उन पर गुस्सा क्या करना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओह राजू, बीस-पच्चीस सालों में आजमगढ़ से दिल्ली तक आने में हम कहां से कहां पहुंच गए। अराजीबाग की सड़क पर बैंक मैनेजर ढिल्लों साहब की बेटी में पूनम ढिल्लों को तलाशते हुए छपेली शर्ट में गर्मियों की शाम तीन घंटे इधर से उधर चक्कर मारना और बिना किसी आरो-आहट के उससे जबर्दस्त अफेयर चलने के दावे करना आखिरतुम्हारे किस काम आया। सरदार जी ने उसी वक्त कायदे से तुम्हारी पुंगी बजा दी होती तो शायद पैर जमीन पर आ जाते और एक्सपोर्टरों का फेंकू धंधा तुम्हें इतना रास न आता। ......मुझे कभी समझ में नहीं आएगा कि तुम्हारी कहानी पूरी कैसे करूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-2299026363665680764?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/2299026363665680764/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2299026363665680764" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2299026363665680764" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2299026363665680764" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/33TOxQq_W7w/blog-post_13.html" title="ओए राजू, प्यार ना करियो" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/06/blog-post_13.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-1997064934696824385</id><published>2009-06-12T06:47:00.000-07:00</published><updated>2009-06-12T07:50:30.306-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दोस्त" /><title type="text">करुण कन्या का आतंक और राजू का अवतरण</title><content type="html">सड़क चलते आदमी को यह बिल्कुल नजर नहीं आता। आजमगढ़ में शिवमूर्ति चौराहे के पास लाल डिग्गी बंधे के नीचे एक रास्ता झटकू पहलवान के अखाड़े की तरफ गया है। इस अखाड़े के बगल में ही ढूह जैसी जगह पर एक गणेश मंदिर है। शिब्ली कॉलेज में दाखिले के बाद पिताजी मुझे इसके महंथ के पास लिवा ले गए। महंथ जी चौक के पास एक कटरे के मालिक थे और लंबी चिलम से गांजा पीते थे। इस मंदिर की एक कच्ची कोठरी रहने के लिए आजमगढ़ में शायद सबसे सस्ती जगह थी- सन इक्यासी में तीस रुपये महीने किराये वाली। लेकिन पिताजी की दिलचस्पी मुझे यहां रखने में इसलिए ज्यादा थी कि मैंने यहां रहकर रेगुलर रियाज नहीं किया तो भी कम से कम पहलवानों की संगत में तो रहूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मंदिर की अनेक स्मृतियां हैं, जिनमें से एक का जिक्र मैंने बहुत पहले इसी जगह किया था। तनहाई और गुंडई, आरती और लंठई का यहां अद्भुत समागम था। लेकिन सुबह-शाम की इसकी चहल-पहल मेरे लिए नहीं थी। तेरही इंटर कॉलेज के भोजपुरी मीडियम से निकल कर सीधे अंग्रेजी मीडियम की पढ़ाई मेरी जान लिए हुए थी और खाना बनाने का तजुर्बा न होने के चलते कोठरी में रहने का आधे से ज्यादा वक्त खाना बनाने में ही निकल जाता था। रोज बुरादे की भट्ठी भरना, एक पाव आटा सान कर उसकी रोटी और दो नेनुए या एक लौकी छील कर उनकी सब्जी बनाना। ऊपर से महंथ के लड़के की लुच्चई, जो लगभग हर सुबह चार में से एक या दो रोटी खाकर सुदामा पर कृष्ण जैसा एहसान कर जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में एक दिन बड़ा अजीब लगा जब महंथ जी की एक अत्यंत करुण, अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी टाइप मिजाज वाली भतीजी पता नहीं क्या देने या लेने मेरी कोठरी में आई और इसके बहाने जोर से मेरी हथेली दबाती चली गई। मेरे लिए इस अनुभव में अभूतपूर्व, अद्वितीय या अनुपम जैसी कोई बात नहीं थी, लेकिन यह इतना अजीब, अटपटा और गिजगिजा जरूर था कि मेरी आत्मा सटक गई। सारे रास्ते बंद थे। विकल्प की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। महंथ की भतीजी के बताए रास्ते पर चलने का मतलब था बलात्कार का शिकार होना, क्योंकि उसे देखते ही मुझे करुणा की हीक आती थी और उससे किसी तरह के लगाव का तो कोई सवाल ही नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस रास्ते को छोड़ने का मतलब खतरनाक था। सीधी-सादी दिखने वाली जो लड़की जरा सी आड़ पाते ही इतनी बोल्ड हो सकती थी वह खुद को तिरस्कृत पाकर मेरा जीना हराम कर सकती थी। उसका एक छोटा सा आरोप भी मुझे न सिर्फ इस मंदिर से निकलवाने के लिए काफी होता, बल्कि मेरे पहलवान पिता की नाराजगी शायद मेरी पढ़ाई छूटने की भी वजह बन जाती। इसे कोई चाहे तो लड़कों के बजाय लड़कियों की आम मनःस्थिति के करीब बता सकता है, लेकिन अब क्या करें, जो था सो था। संकट इतना गहरा हो गया कि मैं अपनी कोठरी में जाने से कतराने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी दौर में दिल्ली से वेद प्रकाश उर्फ राजू नाम के एक सज्जन आजमगढ़ पधारे, जिनकी इंटरमीडिएट में कंपार्टमेंट आ जाने के वजह से राजधानी के किसी कॉलेज में दाल नहीं गल पाई थी। उनकी सबसे अच्छी बात यह थी कि कॉलेज और पढ़ाई का उन पर कोई दबाव नहीं था। अगले डेढ़ वर्षों के समय को वे अपने लिए वनवास की तरह ले रहे थे और इस दौरान किसी लक्ष्मण की तलाश उन्हें बड़ी शिद्दत से थी। मेरा संपर्क दिल्ली में उन्हें मेरे बड़े भाई से मिला था जो उस समय से लेकर आज तक इस लोहे के शहर से अपनी रोटी निकालने के प्रयास में जुटे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजू बाबू ने मुझसे मिलने के बाद जो पहला काम किया, वह था मेरी मुर्दनी के लिए मेरी लानत-मलामत। उन्होंने मुझे बताया कि कॉलेज की पढ़ाई कोठरी में रहकर किताबें घोटने से नहीं होती। इसके लिए सिनेमा देखना, क्लास बंक करना और अच्छी-अच्छी सूरतों से आंखें सेंकना भी जरूरी है। नतीजा यह हुआ कि अगले एक दो हफ्तों में हम लोगों ने डिलाइट में नसीब से शुरू करके आजमगढ़ के तीनों सिनेमा हॉलों में लगी फिल्में डेढ़ रुपये वाले थर्ड क्लास में बैठ कर देख डालीं। इससे सबसे बड़ा फायदा मुझे यह हुआ कि उस करुण कन्या के आतंक से छुटकारा मिल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच राजू भी शहर के एक निर्माणाधीन मकान में अपने मामा के साले के यहां रहते-रहते थक गए थे। लिहाजा हम लोगों ने लंबी छलांग मारी और शहर के दूसरे छोर अराजीबाग में नब्बे रुपये किराये वाला एक कमरा ले लिया। इससे मेरा किराये का खर्चा डेढ़ गुना बढ़ गया लेकिन आगे से राशन-पानी में राजू का बड़ा योगदान देखते हुए मैंने यह बोझ बर्दाश्त करने का फैसला कर लिया। पाठक गण क्षमा करें। मेरा इरादा अपना संस्मरण लिखने का नहीं, राजू के बारे में बात करने का था, लेकिन ऑफिस के बाहर खड़ा बगैर ताले का मेरा स्कूटर कोई उठा न ले गया हो, यह देखने के लिए फिलहाल इस पोस्ट को यहीं बंद करना जरूरी है। राजू के बारे में अब कल, या अगली पोस्ट वाले दिन बात करेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-1997064934696824385?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/1997064934696824385/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=1997064934696824385" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1997064934696824385" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1997064934696824385" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/VKbU2zuh8EY/blog-post_12.html" title="करुण कन्या का आतंक और राजू का अवतरण" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/06/blog-post_12.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-5751729164408499426</id><published>2009-06-10T06:10:00.000-07:00</published><updated>2009-06-10T06:59:13.558-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="दोस्त" /><title type="text">दोस्तों की याद में</title><content type="html">कल शाम घर लौटते हुए एक मोड़ पर स्कूटर जवाब दे गया। मकेनिक खोज कर बनवाने बैठा, तभी फोन की घंटी बजी। अनजान नंबर। फोन उठाया तो किसी ने पूछा, मिश्रा जी का नंबर है? मैंने कहा, जी मैं चंद्रभूषण बोल रहा हूं, आपको किससे बात करनी है? फिर सीधे- अरे साले मैं नीरज बोल रहा हूं, नीरज अग्रवाल। मैंने कहा, कौन नीरज? अरे, आजमगढ़, शिब्ली कॉलेज भूल गए? फोन में अंग्रेजी गाना लगाए हो पंडितऊ, सब समझ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिब्ली कॉलेज में नीरज ठीक-ठीक मेरा दोस्त तो नहीं था लेकिन मेरे एक दोस्त का दोस्त जरूर था। किसी संयोग की तरह मेरा रूम पार्टनर और आजमगढ़ के मेरे सारे दोस्त बायो में थे जबकि मैं अकेला मैथिया रहा था। नीरज और मेरे साझा दोस्त थे पंकज वर्मा, जो आजकल लोकल कोर्ट में दीवानी के ठीकठाक वकील हैं। हम लोग 1983 तक, यानी बी.एससी. पूरा होने तक एक साथ थे लेकिन पंकज से आखिरी मुलाकात को भी अब करीब पंद्रह साल गुजर चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव से जैसे-तैसे शहर पढ़ने गए लड़कों के हमारे सर्किल में पंकज अकेला मध्यवर्गीय इलीट था। उसी के जरिए हम लोगों को थोड़ी-थोड़ी शहर की हवा लगी। पंकज ने मुझे शहरी बनाने में अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। बैडमिंटन खेलने से लेकर डांस करने तक कई सारे गुर सिखाने के प्रयास किए, यहां तक कि किसी से प्रेम कराने की कोशिश भी की। अब इसका क्या करें कि जिसके लिए यह कोशिश की गई थी, उसका इरादा प्रेम करने का था ही नहीं। पंकज को मैंने इस बारे में सिर्फ इतना सा राज बताया था कि एक शाम मैं उसकी गली से होता हुआ सड़क पर पहुंचने को था कि उसने नई-नई आई फिल्म लव स्टोरी का गाना गुनगुनाना शुरू कर दिया- ए लड़का जरा सा दीवाना लगता है........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर क्या था, पंकज बाबू ने आगे का किस्सा खुद ही बना लिया और कहा कि हम तुम्हें गाड़ी का कोई पुराना-धुराना मॉडल तो नहीं लगने दे सकते- एलएमएल वेस्पा नहीं तो चेतक बजाज बनाकर ही छोड़ेंगे। यह कोशिश परवान नहीं चढ़ी, लेकिन कुछ बुनियादी बातें इस दौरान मेरी समझ में आ गईं- जैसे यह कि पैजामे में शर्ट खोंस कर पहनना सिर्फ खुद को ठीक लगता है, दूसरों को तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। और अगर संभव हो तो हवाई चप्पल के ऊपर ओवरकोट पहन कर और ऊनी टोपी पर मफलर का मुंड़ेसा बांध कर कॉलेज में क्लास करने नहीं जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज का वश चलता तो वह मुझे फैंसी चश्मा भी पहना देता लेकिन चश्मा बदलने की मेरी औकात नहीं थी। जो फ्रेम कानपुर में चाचा जी ने बनवा कर दिया था, उसी में पॉवर के मुताबिक शीशा बदलता रहे, तो भी चेहरे पर काफी रौब लाया जा सकता है- ऐसा मैंने पंकज को समझाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजमगढ़ में रहने को लेकर मेरे और राजू के बीच यह समझौता था कि कोठरी का किराया दोनों आधा-आधा देंगे, गेहूं, चावल और दाल घर से राजू लाएंगे जबकि मैं गेहूं की पिसाई दूंगा और बाजार से सब्जी खरीद कर लाऊंगा। फीस और किताब-कॉपी मिलाकर महीने में यह करीब सौ रुपये का खर्चा बैठता था। इतना पैसा दे पाने की हालत पिताजी की थी नहीं, लिहाजा मैं राजू को यह कह कर टरकाए रहता था कि साल के अंत में जैसे ही स्कॉलरशिप मिली, वैसे ही उनका सारा कर्जा उतार दिया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेती-किसानी से मजबूत राजू की भी नगदी के मामले में अपनी सीमाएं थीं लिहाजा हर हफ्ते इतवार के दिन हम दोनों सुबह से ही पंकज के यहां जाकर जम जाते थे कि उसके घर पर अगर दोपहर का खाना नहीं, कायदे का नाश्ता भी मिल जाए तो कम से कम एक दिन का खर्चा तो बच ही जाएगा। डर की बात सिर्फ एक थी। पंकज के वकील पिता कान से लगभग बहरे थे और मामूली बातें भी इतने करख्त लहजे में इतने जोर से कहते थे कि हमें लगता था, यह सब वे हमें भगाने के लिए कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बी.एससी. का रिजल्ट आने के बाद आजमगढ़ में ही करीब एक साल मुझे और रहना पड़ा, लेकिन बिना किसी आपसी घटना के, इस इतनी सी अवधि में ही पंकज इतने अजनबी हो गए कि बस एक या दो बार उनसे मेरी मुलाकात हो पाई- वह भी बिल्कुल ठंडी और बेजान। दरअसल, कॉलेज की दोस्तियों की यही सीमा होती है कि जिंदगी के तूफानों का सामना होते ही वे मुरझा जाती हैं। अब लगता है कि इससे उनका महत्व कम नहीं होता क्योंकि किसी फूल की अच्छाई या बुराई नापने का पैमाना यह नहीं हो सकता कि वह आग में पहुंच कर भी खिला रह पाता है या नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीरज के फोन ने मुझे छब्बीस साल पहले वाले आजमगढ़ के समय में घुमा दिया। दोस्तों को याद करने का मन हो रहा है। मौका लगा तो उन पर कुछ पोस्टें लगातार डालूंगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-5751729164408499426?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/5751729164408499426/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=5751729164408499426" title="6 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5751729164408499426" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5751729164408499426" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/chv8ywy9H6E/blog-post.html" title="दोस्तों की याद में" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/06/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-1798022263595115621</id><published>2009-05-26T06:11:00.000-07:00</published><updated>2009-05-26T06:53:48.463-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="राजनीति" /><title type="text">नई चाल में ढली सियासत</title><content type="html">सबसे पहले माफी चाहता हूं भाई अशोक पांडे से। यह टीप लिखनी थी कबाड़खाने के लिए लेकिन ब्लॉग खोला तो पता चला कि पहलू बेचारा रो रहा है कि एक महीने से यहां कुछ नहीं पड़ा। बहरहाल, अगली राजनीतिक टीप वहीं पड़ेगी, यह वादा रहा। चुनाव नतीजे जो आए, उनका अनुमान किसी को नहीं था, लिहाजा इस पर अलग से पछतावा क्या करें। लेकिन यह तो लगने लगा था, और कबाड़खाने की अपनी पिछली पोस्ट में मैंने साफ कहा भी था कि करीब बीस साल बाद राजनीति का मुहावरा बदल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजकिशोर जी का यह कहना सही है कि मायावती को विधानसभा चुनाव में जिस समीकरण के लिए धन्य-धन्य कहा गया, उसी का दोहराव लोकसभा में करने के लिए उनकी थू-थू क्यों की जा रही है। लेकिन दोनों स्थितियों में एक बुनियादी फर्क है। विधानसभा में जब उन्होंने ब्राह्मण-दलित समीकरण गढ़ा था तो लगता था कि यह पुराने और नए लतियाए लोगों की दोस्ती है। लेकिन लोकसभा चुनाव तक यह साबित हो गया था कि नहीं, यह लतियाने वालों की वापसी का ही एक चोरदरवाजा भर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मायावती आगे भी इस समीकरण पर डटी रह सकती हैं लेकिन ऐसा उन्होंने किया तो निश्चित रूप से उनकी जबर्दस्त दुर्गति होगी। जैसे लक्षण हैं, उत्तर प्रदेश में आगे दो ही छोर बचेंगे। एक तरफ कांग्रेस और दूसरी तरफ सपा और बसपा में जो भी बचे। इन दोनों पार्टियों की  मार अब पिछड़े और अति पिछड़े वोटरों पर होनी है।  लेकिन राजनीति के बदले हुए मुहावरे की कोई काट भी इन्हें खोजनी होगी। निकट भविष्य में अगर पाकिस्तान बिखर जाए और उसकी अराजकता भारत पर भारी पड़ने लगे,  देश पर तालिबान का हमला ही हो जाए, तो बात अलग है, अन्यथा राजनीति का नया मुहावरा पकड़ने का काम भाजपा नहीं कर पाएगी और आप चाहें तो अभी से उसकी ऑबिचुअरी लिख सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हां, इसके अलावा भी एक रास्ता ऐसा है, जिसके जरिए धर्म और जाति की सियासत देश में पूरे जोर-शोर के साथ दुबारा लौट सकती है। ताकतवर कांग्रेस से ज्यादा बड़ा दुश्मन कांग्रेसी राज के लिए और कोई हो नहीं सकता। बिल्कुल संभव है कि अगले एक-दो सालों में इस सरकार की ऐसी गंध मच जाए कि नई राजनीति का इसका सारा आबा-काबा बिखर जाए। 1985-86 की अपार लोकप्रियता और आधुनिक छवि के बाद राजीव गांधी के राज की जो गत बनी थी, उसकी परिणति जातिगत और सांप्रदायिक चेतना के अलावा और भला हो ही क्या सकती थी। ऐसे मोहभंग में राजर्षि की छवियां ज्यादा काम नहीं आतीं। न वीपी की आई, न राहुल की आएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनीति का नया मुहावरा मोटे तौर पर एनजीओ वाला है। पूरी ईमानदारी, जनता से सीधे संपर्क, लोगों का काम कराने का प्रयास करना- लेकिन यह सब तभी तक, जब तक ऊपर से भरपूर माल आने का इंतजाम न हो जाए। इसकी विडंबनाओं  पर पूरी सख्ती से नजर रखी जानी चाहिए, क्योंकि राहुल की राजनीति से होने वाला मोहभंग देश के लिए उनके पिताश्री से होने वाले मोहभंग की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक साबित होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलते-चलते एक बात वाम मोर्चे की राजनीति पर भी। पश्चिम बंगाल में उसकी अजेयता का मिथक टूट चुका है। और यह महज 1984 की सहानुभूति लहर में पिट जाने जैसा मामला नहीं है। ममता की वन-मैन डिमोलिशन आर्मी ने अगर अपनी बेवकूफी से अपना सर्वनाश न कर लिया तो अगले विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे को सरकार बचाने की नहीं, अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ेगी। उसके सारे पुराने कारतूस चुक गए हैं और नए गढ़ने की कूवत उसके नेताओं में नजर नहीं आती। विचार के नाम पर सीपीएम संसार की सबसे पैदल कम्युनिस्ट पार्टी है, लेकिन व्यवहार में यह बात पहली बार जाहिर हो रही है। आत्ममुग्ध  विरोधाभासों की इस पोटली का भला कोई क्या करे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-1798022263595115621?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/1798022263595115621/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=1798022263595115621" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1798022263595115621" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1798022263595115621" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/m36Dlw_h5CY/blog-post.html" title="नई चाल में ढली सियासत" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/05/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-3062483125427300943</id><published>2009-04-24T06:06:00.000-07:00</published><updated>2009-04-24T07:07:57.317-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कार्यकर्ता की डायरी" /><title type="text">बिहटा का खामोश पीपल</title><content type="html">क्या आपने शाम के वक्त किसी विशाल पीपल के पेड़ को खामोश देखा है? शुरुआती जाड़ों की गुनगुनी धूप गुजर जाने के बाद थिर आकाश में टंगा कांपते पत्तों वाला जंडइल पीपल का स्तब्ध पेड़, जिस पर एक भी चिड़िया नहीं बोल रही हो, यहां तक कि गिलहरी के किटकिटाने या झींगुर के झिनझिनाने की आवाज भी न आ रही हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1989 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के ठीक बाद हम लोग सोन नदी के पास भोजपुर के बिहटा गांव में थे, और वहीं के प्राइमरी स्कूल में पीएसी कैंप के ऊपर मैंने एक ऐसा पीपल का पेड़ देखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव में दो दिन पहले बिहार के सबसे भयंकर जनसंहारों में से एक संपन्न हुआ था। दलितों-पिछड़ों के सारे घर खाली थे। उनमें से कई के चौखटों पर खेलने वाले बच्चे चौखटों पर ही पटक कर  मारे जा चुके थे। पास की नहर में बहती हुई दूर चली गई कटी-फटी लाशें मील-दो मील-चार मील दूर के गांवों में अब भी निकाली जा रही थीं, और हम बिहटा गांव में थे, यह जानने के लिए कि इस अंधे मोड़ से बाहर आने का रास्ता कहां से निकलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीपीआई-एमएल लिबरेशन की पहल पर बने आईपीएफ का यह पहला लोकसभा चुनाव था। आरा से किसान नेता रामेश्वर प्रसाद पार्टी के उम्मीदवार थे और एक नक्सली नेता के रूप में संसद पहुंचने की पहली और अभी तक की एकमात्र मिसाल भी उन्होंने ही पेश की थी। आईपीएफ ने उस चुनाव में किसी भी सूरत पर बूथ कब्जा न होने देने की मुहिम चलाई थी, लेकिन सामंती प्रभुत्व वाले बिहटा गांव में वोट डालने गए दलितों-पिछड़ों को तीन-तीन बार बूथ से भगा दिया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद उन्हीं की झोपड़ियों में छिपे लिबरेशन के हथियारबंद दस्ते के लोग राइफलें लिए बाहर आए, बूथ लुटेरों को भगाने के लिए कुछ हवाई फायर मारे और दो को उसी ठौर मार भी डाला। उस समय तक बाकायदा योजना बनाकर गांव के  सारे पोलिंग बूथ दबंगों की बस्तियों में ही बनाए जाते थे, लिहाजा घेरेबंदी जैसी हालत में इस फायरिंग से मची अफरा-तफरी में तीन निर्दोष लोग भी मारे गए। इस घटना की प्रतिक्रिया में वह जनसंहार घटित हुआ, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीस से ज्यादा औरतें, बूढ़े, बच्चे स्थानीय सामंत ज्वाला सिंह और उसके गुंडों की क्रोध ज्वाला में भस्म हो गए।  बचे हुए लोगों में एक आईपीएफ के कार्यकर्ता राजबलम साह भी थे, जिनके सगों में ससुराल गई लड़कियों के अलावा कोई नहीं बचा था। घटना के बाद उन्हें मैंने न कभी सुखी देखा, न दुखी। राख जैसी कोई चीज उनकी आंखों और चेहरे से हमेशा झरती मालूम पड़ती थी, हालांकि मैं भोजपुर में जब तक रहा, उनकी राजनीतिक सक्रियता में कमी आते कभी नहीं देखी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा ख्याल है, नवंबर की किसी तारीख को हम बिहटा पहुंचे थे। रामेश्वर जी,  सहार विधानसभा क्षेत्र  से जुड़े कार्यकर्ता सतेंद्र सिंह, मैं, गाड़ी चलाने वाला एक पार्टी कार्यकर्ता और बतौर सांसद रामेश्वर जी को कुछ ही समय पहले मिला एक गार्ड। हमारी योजना पुलिस कैंप जाकर वहां के अधिकारियों से बात करने की थी कि भागे हुए लोगों की वापसी और उनकी सुरक्षा के लिए वे क्या कर रहे हैं। लेकिन कैंप कहां है, यह तो हमें पता ही नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव की सीमा तक पहुंचने के बाद भी रास्ता बताने वाला कोई नहीं दिखा तो कुछ देर दुविधा रही कि गांव के भीतर चलें या नहीं। फिर हुआ कि गाड़ी से चुपचाप निकल जाएंगे, कौन देखता है। लेकिन थोड़ा ही अंदर जाने पर गाड़ी के पिछले चक्के सड़क पर बह रही एक नाली में फंस गए। गाड़ी हल्की करने के लए ड्राइवर के अलावा बाकी लोग नीचे उतर गए तो सतेंद्र ने कहा कि खुले में वहां खड़ा रहना ठीक नहीं है, रास्ता पूछते हुए धीरे-धीरे आगे ही बढ़ना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर ड्राइवर ने जोर-जोर से ऐक्सीलरेटर देते हुए गाड़ी निकालने की कोशिश शुरू की, इधर छतों और खिड़कियों से गली पर नजर रखे कुछ लोगों ने सतेंद्र को पहचान लिया। सतेंद्र का जाति से राजपूत होना उनके लिए कुछ ज्यादा ही खतरनाक साबित हुआ। आवाजें सुनाई पड़ने लगीं- सतेंदरा है रे साला सतेंदरा, अरे देखो रमेसरा भी है साला, मार साले के। कई तरफ से ईंट-पत्थर उछल कर हम पर पड़ने लगे। छिपने की कोई जगह नहीं थी। संयोग से इतने में जीप नाली से निकल आई और किसी तरह लटक-पटक कर हम लोग उसमें लद लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी संयोग ही था कि वह रास्ता आगे स्कूल तक जाता था, जहां विशाल पीपल के पेड़ के नीचे पुलिस का कैंप लगा हुआ था। लाल टहक खूनी शाम में कैंप की एक-दो लालटेनें टिमटिमाने लगी थीं। रामेश्वर जी ने पुलिस अधिकारियों से बात शुरू ही की थी कि उन्होंने उन्हें तत्काल निकल जाने का संकेत किया। उस माहौल में वहां रुकने का कोई मतलब भी नहीं था लिहाजा हम लोगों ने भी इस पर कोई एतराज नहीं जताया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद बिहटा के उजड़े हुए लोगों को बसाने का संघर्ष कई वर्षों तक चला और अंत में यह कामयाब भी हुआ। मेरे दिल्ली आने के कुछ समय बाद बिहटा के ज्वाला सिंह और उसके साथ के कुछ सरगना किस्म के लोगों के मार दिए जाने की सूचना भी मिली। लेकिन चुनाव से जुड़ी अपनी यादों में सबसे चटख चीज मुझे आज भी बिहटा की वह खतरनाक रुआंसी शाम ही मालूम पड़ती है, जिसमें एक पीपल का पेड़ था, जिस पर कोई चिड़िया नहीं बोल रही थी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-3062483125427300943?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/3062483125427300943/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=3062483125427300943" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3062483125427300943" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3062483125427300943" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/6Afx6mOV-j4/blog-post_24.html" title="बिहटा का खामोश पीपल" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/04/blog-post_24.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-4421678022794723242</id><published>2009-04-21T06:30:00.000-07:00</published><updated>2009-04-21T07:07:24.311-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="नरम गरम गरम" /><title type="text">राहुल पांडे की ऐंग्जाइटी</title><content type="html">एक दिन फोन किया तो पता चला कि सज्जन अस्पताल में पड़े हैं। उनकी  पत्नी ने बताया कि कैल्शियम का अटैक पड़ा है। इस तरह की बीमारी के बारे में पहले कभी सुना नहीं था, फिर भी मानने के अलावा कोई चारा नहीं था। कुछ दिन बाद फिर फोन किया तो इस बार फोन पर खुद राहुल ही थे। बताया कि कैल्शियम का नहीं ऐंग्जाइटी का अटैक पड़ा था, मोटर साइकिल चलाते हुए हाथ पैर ढीले पड़ने लगे, नियंत्रण खोता सा लगा, जैसे-तैसे घर पहुंचे और चौखट पर ही ढेर हो गए। फिर पड़ोसी की मदद से पत्नी किसी तरह अस्पताल लिवा गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राहुल अभी डेढ़ साल पहले तक हिंदी ब्लॉगिंग के धाकड़ लोगों में थे, जब वह और प्रदीप सिंह नोएडा के सेक्टर 11 में बेरोजगार रहते हुए प्याज का तड़का मारी  कातिल दाल और ढेरों भात बनाकर खाया करते थे और कभी-कभी मुझे भी खिलाया करते थे। फिर भड़ासी यशवंत की दिलाई नौकरी राहुल को मेरठ ले गई और काफी टपले खिलाने के बाद वापस साहिबाबाद ले आई। शायद वे कभी दुबारा भी ब्लॉग पर लौटें लेकिन अभी मंदी और बेईमानी के जिस दोहरे दुष्चक्र में वह फंस गए हैं उससे निकलने के लिए उन्हें कई दिशाओं से मदद की जरूरत पड़ सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरठ में एक इंचार्ज नुमा स्वनामधन्य पत्रकार उनके पीछे इस कदर हाथ धोकर पड़े कि लगता था जान ही लेकर छोड़ेंगे और अब साहिबाबाद में भी कमोबेश वैसी ही बिरादरी से उनका पाला पड़ गया। मैं कहता रहा कि हे 42 किलो के इन्सान, रिपोर्टिंग के धंधे में सिर्फ मोटरसाइकिल दौड़ा कर अच्छी-अच्छी खबरें लाने से काम नहीं चलता, इस खतरनाक जगह में सर्वाइव करने के लिए आपको खबर से हट कर बहुत सारे दूसरे काम भी करने होंगे। लेकिन राहुल तो राहुल हैं। अपनी खबरों पर उन्हें बाइलाइन कभी नहीं मिलती लेकिन बात जब भी करते हैं, खबरों पर ही करते हैं। वह नौकरी छोड़ दी और जो नई नौकरी पकड़ी है, उसमें जान बची रह जाए तो भी गनीमत समझनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय पहले अचानक उनका फोन आया कि जिला इन्चार्ज ने बीएसपी से खबरें छापने के लिए पैसे ले रखे हैं जबकि कांग्रेस वाले एक दिन पैसे लेकर सीधे दफ्तर ही चले आए थे। गुस्सा आ गया तो पुलिस को फोन कर दिया और घेर कर पकड़ने की कोशिश तो जैसे-तैसे निकल भागे। यह भी बताया कि स्टाफ की कमाई बंद हो गई है इसलिए सब ऊपर से नीचे तक शिकायत लगाने में जुटे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने राहुल से साफ कहा कि बाकायदा एक अभियान चला कर अपने अखबार में सबको खुश करें क्योंकि इसके बगैर रिपोर्टिंग तो आप नहीं कर पाएंगे। फिर माहौल कुछ समझ में आने लगे तो कुछ अपनी मर्जी का भी कर लीजिएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोन पर ऐंग्जाइटी अटैक की बात सुनते ही मैंने राहुल से पूछा कि मेरे नुस्खे पर अमल किया कि नहीं। बोले, किया लेकिन तब तक मामला काफी आगे बढ़ चुका था। एक दिन मुझे फोन पर ही इन्चार्ज ने काफी डांटा और दफ्तर में जाकर चीफ से बात की तो उन्होंने अखबार से सिर उठाए बगैर ही  कहा कि तुम्हारा तबादला कर दिया गया है, वहां भी शिकायत सुनने को मिली तो निकाल देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई जगह दूर और असुविधाजनक है। सुबह-सुबह  वहां के रास्ते में ही वह दौरा पड़ा, जिसे राहुल की पत्नी ने गाजियाबाद के डॉक्टरों के कहे मुताबिक कैल्शियम अटैक और खुद राहुल ने मेरठ के डॉक्टरों के कहे मुताबिक ऐंग्जाइटी अटैक बताया है। डॉक्टरी इलाज से यह बीमारी कुछ कंट्रोल में आ जाएगी, मनोचिकित्सक शायद इसे और ज्यादा काबू कर ले जाएं, लेकिन राहुल जैसे ईमानदार और सजग रिपोटर्रों को जिस असली बीमारी का सामना करना पड़ रहा है, उसका इलाज भला कहां मिलने वाला है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मालिकों के खास आदमी, जिन्हें आजकल ब्रांड मैनेजर, संपादक, ब्यूरो चीफ वगैरह  कहने का चलन हो गया है, मंदी की आड़ लेकर अखबारों में सारे ढंग के लोगों का इंतजाम करने में जुट गए हैं। अगर संभव हो तो इसी मंदी के बीच इनकी संपत्तियों की पड़ताल की जाए कि मंदी के बहाने ये अखबारों के हिस्से आने वाली कितनी रकम अपने पास दबा ले गए हैं।  ब्लॉगिंग के माध्यम का कुछ ढंग का इस्तेमाल होना है तो यहां कुछ ऐसे असुविधाजनक काम भी करने ही होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-4421678022794723242?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/4421678022794723242/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=4421678022794723242" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4421678022794723242" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4421678022794723242" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/f28z6tPiR2g/blog-post_21.html" title="राहुल पांडे की ऐंग्जाइटी" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/04/blog-post_21.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8349204032293399446</id><published>2009-04-18T06:22:00.000-07:00</published><updated>2009-04-18T06:42:35.706-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कवितायेँ" /><title type="text">सांझ ढले आईना देखा</title><content type="html">दाईं भौंह पर कटे का निशान&lt;br /&gt;आंखों की कोर पर कौओं के पंजे&lt;br /&gt;माथे पर आड़े-तिरछे टूटे-बिखरे इतने सारे बल&lt;br /&gt;सब कुछ ठीक होने पर भी&lt;br /&gt;जो नहीं जाते नहीं जाते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निचले होंठ के दोनों किनारों पर&lt;br /&gt;नीचे को निकलती गहरी नालियां&lt;br /&gt;दाईं लंबी बाईं कुछ छोटी&lt;br /&gt;आंखें भीतर को धंसी चुंधियाई&lt;br /&gt;चश्मे बगैर जो देखी नहीं जातीं&lt;br /&gt;कनपटी पर पकते बालों के नीचे&lt;br /&gt;अट्ठाइस साल से रगें दबाती&lt;br /&gt;चश्मे की कमानियों के दाग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यही इस चेहरे की पैमाइश है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं, और भी है बहुत कुछ&lt;br /&gt;आईने में जो नजर नहीं आता&lt;br /&gt;न जिसे कोई कैमरा पकड़ पाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोखे जो दिए गए और जो खाए गए&lt;br /&gt;जिल्लतें जो झेली गईं इज्जत समझ कर&lt;br /&gt;हताशाएं जो धारी गईं ढाल की तरह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक घिसा-थका प्रेमहीन जीवन&lt;br /&gt;खुद में कोई चमत्कार नहीं&lt;br /&gt;चमत्कार इसके मगर चेहरे पर बिछलते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक चेहरा तुम गौर से देखते हो&lt;br /&gt;एक पूरा वक्त खुलता हुआ आता है&lt;br /&gt;और चेहरा जब खुद का हो&lt;br /&gt;तब गूंजती है हर तरफ वक्त की भायं-भायं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इसकी कैफियत मुझसे क्या पूछते हो&lt;br /&gt;मैं क्या ऐसा ही इस दुनिया में आया था&lt;br /&gt;ऐसा ही खुरदुरा और बदरूप&lt;br /&gt;पिलपिला चिड़चिड़ा और थका हुआ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतनी हसरत से तुम्हारा मुझे देखना-&lt;br /&gt;क्या तुम चाहते हो यह सब मैं वीरगाथा में लिखूं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं, तुम सिर्फ एक परछाईं हो&lt;br /&gt;इस तनहाई में भी मैं तुम्हें कृतार्थ नहीं करूंगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौगिर्द नाचते युद्ध के रूपकों बीच&lt;br /&gt;सांझ के झुटपुटे में आईना देखना&lt;br /&gt;हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम् जित्वा भोक्ष्यसे महीम्&lt;br /&gt;जैसे किसी सुहाने विभ्रम से भी वंचित योद्धा का&lt;br /&gt;युद्ध में गिरते हुए अंतिम बार रणखेत देखने जैसा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झर-झर बहते रक्त के साथ बाहर जाती&lt;br /&gt;कुछ पलों की व्यर्थ की अनुगूंज&lt;br /&gt;क्यों जिया क्यों लड़ा&lt;br /&gt;मरा भी तो आखिर क्यों&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-8349204032293399446?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/8349204032293399446/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8349204032293399446" title="0 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8349204032293399446" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8349204032293399446" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/Ulo2Mr8Zrz4/blog-post_18.html" title="सांझ ढले आईना देखा" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/04/blog-post_18.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-901124722871313995</id><published>2009-04-16T06:24:00.000-07:00</published><updated>2009-04-16T07:05:17.072-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="बहस" /><title type="text">मजबूरी का महिमामंडन</title><content type="html">सारे नेता अपराधी पालते हैं, उन्हें टिकट देकर चुनाव लड़वाते हैं, यही  मायावती भी करती हैं तो इसमें गलत क्या है। सारे नेता भ्रष्ट हैं, पैसे खाते हैं, मायावती भी खाती होंगी, गलत क्या है। सारे नेता जाति की गोलबंदियां बना कर चुनाव जीतते हैं, मायावती उनसे अलग क्या कर रही हैं, जो इतना शोर मचाया जा रहा है। जब इन सारे नेताओं में से कोई भी प्रधानमंत्री बन सकता है तो मायावती क्यों नहीं बन सकतीं। जो ऐसा सोचता है कि उन्हें नहीं बनना चाहिए, वह ब्राह्मणवादी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में राजनीति जिन-जिन औजारों से खेली जाती है, वे सभी मायावती के पास हैं। वे जैसे मुख्यमंत्री बनी हैं, वैसे ही प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं। शायद इस बार बन भी जाएं। किसी पूर्वाग्रह वश कोई अगर चाहे भी कि वे न बनें तो वह उनका क्या कर लेगा। उसके ब्राह्मणवादी पूर्वाग्रहों का इलाज करने आएंगे हरिशंकर तिवारी, अन्ना शुक्ला, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद  और इनके ही जैसे न जाने कितने लोग, जिनके पास हर दलील और हर पूर्वाग्रह का इलाज मौजूद है। पहले वे मायावती के समर्थकों का इलाज करते थे, अब उनके विरोधियों का कर देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलबत्ता मायावती के प्रधानमंत्री बनने तक कई चीजें पीछे छूट चुकी होंगी, जैसे उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद  उत्तर प्रदेश में छूट गई हैं। इस राज्य में अब किसी अपराधी के लिए खुद को यथासंभव शरीफ या नेता जैसा दिखाने की जरूरत नहीं रही, किसी अफसर को काम करता या कराता हुआ दिखने की जरूरत नहीं रही, किसी पैसे वाले को अपना घटिया से घटिया काम करा लेने की जुगत छिपाने की भी कोई जरूरत नहीं रही  क्योंकि बहन जी की पारसमणि छू जाने के बाद इन्सान सभी तरह के दिखावों और औपचारिकताओं से मुक्त हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बहन जी के साथ जुड़ा  कोई विशिष्ट मामला नहीं है। दक्षिण अफ्रीका ने अपनी आजादी के बाद के वर्षों में कई बार ऐसी सामाजिक  समझदारी के चलते खुद को गर्त में जाता महसूस किया है। उसके  पड़ोस का जिंबाबवे तो पूरा का पूरा गर्त में ही चला गया है। कोई भी विचारधारा, सूत्र या व्यक्ति अगर खुद को आम जन-जीवन के तर्कों से इतना ऊपर मानने-बताने लगे कि सिर्फ किसी जगह उसका चेहरा चेप दिया जाना ही हर चीज को जायज बना दे तो इसका नतीजा यही होता है। खास कर मुक्ति का दावा करने वाली विचारधाराएं और व्यक्ति ऐसे असाध्य विध्वंसों के सबसे कारगर औजार बनते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्वी यूरोप में समाजवाद के बिखराव के समय अक्सर दोहराए जाने वाले हेगल के एक सूत्र की याद आती है- विचार धुंधले पड़ जाते हैं, जीवन का वृक्ष फिर भी हरा रहता है। मायावती के उत्तर प्रदेश का अगर कोई सबक है तो सिर्फ यह कि दो तरह के घटियापने के  बीच किए गए चयन को उसके घटियापन के साथ ही ग्रहण किया जाना चाहिए। उसका महिमामंडन तो  किसी भी हाल में  नहीं किया जाना चाहिए- न सामाजिक न्याय के नाम पर, न दलित मुक्ति के नाम पर, न राजनीतिक क्रांति के नाम पर, न ही किसी और नाम पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि ऐसा करने पर जो नए तरह का चमकदार घटियापन पैदा होता है, उसका सामना करने के लिए जरूरी सेफ्टी बेल्ट हम हमला शुरू होने से काफी पहले ही खो चुके होते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-901124722871313995?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/901124722871313995/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=901124722871313995" title="8 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/901124722871313995" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/901124722871313995" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/C2cZ-g5RyGY/blog-post_16.html" title="मजबूरी का महिमामंडन" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/04/blog-post_16.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-7627625291370676133</id><published>2009-04-15T06:18:00.000-07:00</published><updated>2009-04-15T06:48:14.897-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लौटते हुए" /><title type="text">कब्रिस्तान में कुछ गप्पें</title><content type="html">अभय अक्खी मुंबई में घूम-घूम कर पेड़ों और फूलों की पहचान कर रहे हैं तो इधर दिल्ली में उनके दोस्त-मित्र भी उनसे ज्यादा पीछे नहीं हैं। पहचान भले न कर पाएं लेकिन दफ्तर की आलस भरी गर्म दुपहरिया में कुछ  पेड़-पौधे देखने का जुगाड़ कर ही ले रहे हैं। संयोग से भाई  दिलीप मंडल  भी उसी समूह में नौकर हैं जिसमें मैं हूं- एक ही धंधे में इतने दिनों तक रह लेने के बाद यह मौका पहली बार ही आया है। एक दिन दिलीप बाबू ने फोन पर एक बड़ी अच्छी जगह दिखाने का वादा किया और दफ्तर के पीछे की चाय की दुकानों से एक-एक चाय पकड़ कर उससे भी पीछे के एक विशाल कब्रिस्तान में लिवाते चले गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौ साल से भी ज्यादा पुराने इस कब्रिस्तान की महिमा न्यारी है। अनुराधा (प्रख्यात लेखिका, कैंसर कार्यकर्ता और दिलीप की पत्नी) इस पर छोटी-मोटी रिसर्च कर चुकी हैं। देश-दुनिया के न जाने कितने बड़े-बड़े लोग यहां दफन हैं। छेनी-हथौड़ी लिए आठो पहर की खिटखिट से कब्रों के शिलालेख लिखने वाले बाराबंकी के एक सज्जन ने बताया कि यहां तो एक से एक अल्ला वाले सोए पड़े हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्यादातर  शिलालेखों पर सिर्फ उर्दू में इबारतें लिखी हैं, जिसमें अपनी कोई गति नहीं है। घने पेड़ों की छांव में शानदार मजार जैसी दिखती एक कब्र के पास खड़े होकर हम लोगों ने वहीं हिलगे- मटुआए हुए कुछ लोगों से पूछा कि यह कब्र किसकी है तो हल्की-फुल्की दाढ़ी रखे एक नौजवान ने काफी गर्व से जवाब दिया- यह  फलाने (कोई नाम लेकर) साहब का मजार है, इन्होंने ही तो श्रद्धानंद को मारा था!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास में कहीं पढ़ने को मिला था कि एक सिरफिरे द्वारा आर्यसमाजी स्वामी श्रद्धानंद की हत्या कर दिए जाने के साथ ही भारत में खिलाफत और असहयोग आंदोलन की साझा लय हमेशा-हमेशा के लिए टूट गई। कभी सोचा न था कि उस सिरफिरे का इतना शानदार  मजार दिल्ली में आज भी मौजूद होगा और एक दिन उसके बगल में खड़े होकर प्लास्टिक के कप में चाय पीते हुए इतने झटके से उसके बारे में जानकारी प्राप्त हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कब्रिस्तान की सबसे अच्छी बात यह है कि दिल्ली के मुख्य चौराहों में गिने जाने वाले आईटीओ इलाके में होते हुए भी यहां बहुत पुराने पेड़ सही-सलामत हैं। कुछ जगहों पर लताओं का घना जाल भी बिछा है, जो एक झटके में जंगल जैसा एहसास कराती हैं। चटख गर्मी में यहां की शीतल छाया जी जुड़ाती है। कुछ पेड़ों पर हल्का हरापन लिए सफेद फूल भी आए हुए हैं, जो पहले कभी देखे नहीं। इन पेड़ों का नाम भी नहीं पता है और पास में इतनी सलाहियत भी नहीं है कि इनका फोटू यहां डाल कर चार पंचों से इनका नाम ही पूछ लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में चुनावों की धूम मची हुई है लेकिन अखबारों में आ रही खबरें इतनी बुरी, इतनी भयानक हैं कि शायद हमारी ही तरह देश का आम मतदाता भी इस धूम में शामिल होने के बजाय इससे कतराने  के उपाय ढूंढ रहा हो। बहरहाल, चुनावों पर नजर है और कुछ कहने को सूझा तो जरूर कहा जाएगा। प्यारे भाई अशोक पांडे से वादा है कि यह शुभकार्य पहलू पर नहीं, कबाड़खाने पर ही किया जाएगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-7627625291370676133?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/7627625291370676133/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=7627625291370676133" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7627625291370676133" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7627625291370676133" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/mTEWHzUfpSk/blog-post.html" title="कब्रिस्तान में कुछ गप्पें" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/04/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8715904038589949000</id><published>2009-03-17T10:41:00.000-07:00</published><updated>2009-03-17T10:45:13.094-07:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="पर्दा है पर्दा" /><title type="text">स से सरपत स से सोलारिस</title><content type="html">सबसे पहले बता दूं कि सिनेमा माध्यम के बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता। मोटे तौर पर कहानी या ड्रामा पढ़ने की तरह ही कोई फिल्म भी देख लेता हूं। सुना है कि यह माध्यम कविता के करीब है, इमेजरी वगैरह की वजह से। लेकिन कविता की स्पांटेनिटी इतने महंगे और आर्टिकुलेट मीडियम में भला कैसे समा सकती है, यह बात मेरी समझ में कभी नहीं आई। इस शनिवार को अभय की फिल्म सरपत देखने का मौका मिला तो उसे भी कहानी की तरह ही देख गया। शुरू में स्लो चलने वाली यह फिल्म बीच में एक जगह बुरी तरह चौंकाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चरम गरीबी के मारे दुखियारे लोग अचानक एक जगह लुटेरे नजर आने लगते हैं। बाद में पता चलता है कि यह सिर्फ नायिका का वहम था। एकबारगी यह बात मेरी समझ में नहीं आई। शायद दूसरी बार देखने पर आ जाए। कहानी के कंटेंट से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूं। किसी वर्ग के बारे में उससे बिल्कुल अलग-थलग रहते हुए बनाया गया जीवन भर का सदाग्रह अगर किसी घटनावश पल भर में दुराग्रह बन जाए तो इससे ड्रामा जरूर क्रिएट होता है लेकिन इसमें कोई गहरी बात कहने या सुनने की गुंजाइश नहीं होती। यहां तो कोई घटना भी नहीं होती, सिर्फ घटना का वहम होता है। सुकून की बात यहां सिर्फ इतनी है कि फिल्मकार का इरादा नेक है। नायक-नायिका भले ही सिर्फ सड़क के मुसाफिर हों लेकिन फिल्मकार अपने समाज को नजदीकी से देखना चाहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक गरीब आदमी के लिए नैतिकता के ठीक वही मायने नहीं होते जो अमीर आदमी के लिए होते हैं, लिहाजा गरीबी और चोरी-चकारी के बीच के रिश्ते को आमफहम मध्यवर्गीय नजरिए से देखना छोड़े बगैर भारतीय समाज के आम आदमी को देखने की बात सोची भी नहीं जा सकती। अभय की फिल्म ठीक यही काम करने की कोशिश करती है। यह अजेंडा खुद में बहुत प्यारा है और छोटी फिल्मों की विधा में ही अभय अगर इस तरह के कुछ और प्रयोग करते हैं तो उनसे कुछ उम्मीद बांधी जा सकती है। फिल्म की लोकेशन से लेकर फ्रेम और ऐंगल तक- मेरे कुछ भी पल्ले न पड़ने के बावजूद- आम फिल्मों से हट कर हैं, और उनके कुछ अपने अलग मायने हैं। अपना कोई नजदीकी बगल से कार चलाता गुजरे तो लगता है कि इस डब्बे पर कभी अपन भी हाथ साफ कर सकते हैं। अभय की फिल्म देखने के बाद लगा कि इस माध्यम से कभी इस बंदे का भी नजदीक का रिश्ता बन सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गढ़ी से अभय की फिल्म देखकर निकले तो अनुराग वत्स अपने घर खिजरपुर लेते गए और वहां पहली बार तारकोव्स्की की सोलारिस दिखा डाली। इस फिल्म के बारे में इतना सारा कुछ पहले ही लिखा जा चुका है कि नया क्या लिखूं। स्तानिस्लाव लेम मेरे सबसे प्रिय साइंस फिक्शन लेखक हैं लेकिन तारकोव्स्की से मुझे रिश्ता बनाना पड़ता है। दोस्तोएव्स्की औऱ ताल्स्ताय की बहसों को वे अपने ढंग से फिल्म माध्यम में आगे बढ़ाते हैं लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि वे इन दोनों से कुछ ज्यादा ही आध्यात्मिक हैं। उनका अजेंडा भी मुझे ग्रीक आर्थोडाक्सी को आगे बढ़ाने का ही लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टाकर (रोडसाइड पिकनिक) और सोलारिस दोनों अपने उपन्यास रूप में कारपोरेट साइंस की सर्वज्ञता को बौना बनाने का प्रयास करते हैं लेकिन साइंस की स्पिरिट से उनका कोई विरोध नहीं है। इनके बरक्स तारकोव्स्की के लिए साइंस घूरे पर डालने की चीज लगती है, जैसे यह किसी शैतान की ईजाद हो। साइ-फाइ के बहाने वे इन्सानी रिश्तों, खासकर उसके सूखते मनोजगत पर बात करते हैं- सोलारिस में तो यह खूब ही किया है। लेकिन साइंस और स्पिरिचुअलिटी का यह द्वंद्व मुझे इतना नकली लगता है कि अगली बार देखना हो तो शायद सोलारिस को किसी बेहतरीन तमाशे की तरह ही देख पाऊं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में कुछ अपनी बात। बहुत कठिन दौर से गुजर रहा हूं। पत्नी इंदु जी दो महीने से बेड पर हैं। इस बीच उनकी स्लिप डिस्क का मामला बिगड़ता ही चला गया। आखिरकार आपरेशन हुआ लेकिन रिकवरी बहुत धीमी है। किसी मेडिक्लेम के बगैर स्पाइन आपरेशन जैसा बड़ा झटका हमारे जैसे मूर्खों के ही भाग्य में लिखा होता है। दोस्तों की दुआएं चाहिए- ढेर सारी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-8715904038589949000?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/8715904038589949000/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8715904038589949000" title="10 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8715904038589949000" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8715904038589949000" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/HTsvcCzlyUc/blog-post.html" title="स से सरपत स से सोलारिस" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/03/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2797333844012488127</id><published>2009-01-11T05:03:00.000-08:00</published><updated>2009-01-11T05:07:15.474-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चलते-चलते" /><title type="text">कर्जा उतर गया</title><content type="html">सहारा और जनसत्ता से पीएफ का पैसा निकाला तो कुल मिलाकर करीब दो लाख रुपया बना। पैसे बैंक में जमा होते ही आफत शुरू हो गई कि इसका क्या करें। कई बुरे-बुरे और कुछ अच्छे विचार मन में आए। आखिरकार पूरे चार महीने की कशमकश के बाद आज घर का कर्जा उस पैसे से चुका दिया। अब कुछ दिन बिना कर्जे की जिंदगी का आनंद लिया जा सकता है, बशर्ते अगले कुछ महीनों में कोई और कर्जा सिर पर सवार न हो जाए। देश ही नहीं, पूरी दुनिया कर्जे के बल पर जी रही है। हाल तक हाल यह था कि किसी से आप उसके कर्जे के बारे में पूछिए और वह कहे कि कर्जा कोई नहीं है या बस दो-चार लाख का है तो लोग उसकी तरफ सहानुभूति की नजर से देखते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गनीमत है कि अब हालात कुछ बदल रहे हैं। इलाहाबाद बैंक की वसुंधरा शाखा के मैनेजर मि. टंडन से आज मैंने बैंक बंद होने से ठीक पहले दरखास्त की कि आपके ही बैंक में मेरा बचत खाता भी है, कर्जा चुकाना चाहता हूं। उन्होंने असाधारण तेजी से सारा कामकाज बमुश्किल पंद्रह मिनट में संपन्न करके घर के कागजात मेरे हाथ में थमा दिए, साथ में यह भी बोले कि अपने अखबार में छाप दीजिएगा कि हमारे यहां काम कितनी तेजी से होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टंडन साहब की बात अपनी जगह बिल्कुल वाजिब है और उनकी इच्छा पूरी करने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन जहां तक मुझे याद है, और बैंकों की तुलना में कम, लेकिन इस बैंक में भी दो साल पहले तक कर्जा वापसी से कहीं ज्यादा जोर कर्जा बांटने पर दिया जाता था। शायद बैंक के ढांचे में ज्यादा से ज्यादा कर्जा बांटने से मैनेजरों की साख बढ़ती थी। इसमें खास भूमिका किसी बैंक विशेष के प्रशासन की न होकर एक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समझदारी की थी। बाजार में ज्यादा से ज्यादा पूंजी जाएगी तो धंधा बढ़ेगा। धंधा बढ़ेगा तो और ज्यादा पूंजी की खपत बढ़ेगी। इस तरह बाकी दुनिया के साथ-साथ बैंकिंग का भी भला होता रहेगा। ज्यादातर निजी बैंकों की पूंजी इसी सिद्धांत का अनुसरण करते हुए पिछले पांच सालों में कम से कम दस गुनी हो गई। लेकिन हकीकत में यह ताश के पत्तों का महल बनाने जैसा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निजी संबंधों या कागजी साख के आधार पर, बिना किसी कोलैटरल के बांटे गए कर्जों का नतीजा अभी तक बैंकों ने छोटे स्तर पर भुगता है लेकिन अब सत्यम जैसे बड़े-बड़े नामों के डिफाल्टर होने के साथ ही यह काम बड़े स्तर पर शुरू होने जा रहा है। भारत में ज्यादातर बड़े उपद्रव जमीन के नाम पर हुए हैं और यह सिलसिला मुख्य रूप से उत्साही बैंकरों की मेहरबानी से आज भी जारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्यम के बी. रामलिंग राजू साफ्टवेयर की दुनिया के कितने बड़े सूरमा थे, इसका तो अंदाजा नहीं है लेकिन कुछ आदमी बिठाकर कोई प्रोसेसिंग प्रोजेक्ट अपेक्षाकृत कम कीमत पर पूरा करवा लेने का जो धंधा अपने यहां के आईटी महारथी करते आए हैं उसमें करीब दस साल उनकी अच्छी गति रही। कंपनी 87 में बनी लेकिन नाम, पैसा और शोहरत इसने 97 से 2007 तक के बीच कमाया। पिछले दो-तीन साल से अंग्रेजी वाले सत्यम की स्पेलिंग पलट कर बनाई गई राजू के ही परोक्ष मालिकाने वाली मेटास नाम की दो कंपनियों ने जब इन्फ्रास्ट्रक्चर और रीयल एस्टेट में अपना खेल करना शुरू हुआ तो किसी न किसी का माथा जरूर ठनकना चाहिए था। नहीं ठनका, इसका मतलब यही है कि या तो पूरे देश का ही माथा फिरा हुआ है, या अनजाने में माथे की जगह मटके जैसा कुछ आ जाने का पता भी देश को नहीं चल पाया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेटास इन्फ्रास्ट्रक्चर को हैदराबाद मेट्रो बिछाने का ठेका मिला तो सलाहकार ई. श्रीधरन ने सरकार को चिट्ठी लिखी कि इसमें घपला है। ठेकेदार मेट्रो का एलाइनमेंट बदल कर मेटास प्रापर्टीज के नाम से खरीदी गई अपनी विशाल जमीनों की तरफ ले जा रहा है ताकि साल भर में उन्हें पांच गुनी कीमत पर बेच सके। इस चिट्ठी का जवाब ठेकेदार के बजाय आंध्र की कांग्रेसी सरकार ने जारी किया कि वह मानहानि के आरोप में श्रीधरन को अदालत में घसीटने जा रही है। केंद्र से प्लानिंग का कमीशन का बयान भी अगले दिन ही आया कि श्रीधरन की शंकाएं निराधार हैं। सवाल है, एक आदमी को आप उसकी अकलमंदी के लिए पद्म विभूषण वगैरह देते हैं तो कोई अक्लमंदी की बात कहते ही उसे बेअक्ल क्यों बताने लगते हैं। आज बी. रामलिंग राजू जेल में हैं तो वाईएस राजशेखर रेड्डी और मोंटेक सिंह अहलूवालिया अपने पदों पर ससम्मान कैसे मौजूद हैं, यह सवाल विपक्ष भी नहीं पूछ रहा क्योंकि सौदे में बराबर की साझेदारी टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू की भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी देश की संपदा नीचे से ऊपर की तरफ ही सृजित होती है, यानी खेती, उद्योग और सुपरस्ट्रक्चर। यह एक पारंपरिक नजरिया है और इसे ज्यादा ठस्स ढंग से न लिया जाए इसलिए कहा जा सकता है कि एक मीजान में ऊपरी पूंजी की देसी-विदेशी डोज मिल जाए तो राष्ट्रीय संपदा का यह पौधा ज्यादा अच्छी तरह फल-फूल सकता है। लेकिन एक बड़े देश की विकास दर को उत्पादन संबंधों में कोई बुनियादी बदलाव किए बगैर 5 से प्रतिशत से उठाकर स्थायी रूप से 9 प्रतिशत तक ले जाने की जादुई क्षमता वाली खाद की भूमिका ऐसी पूंजी निभा सकती है या नहीं, इसका सही अंदाजा लगाने का वक्त अब आ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काफी संदेह है कि जिन कंपनियों की बैलेंस शीट देख कर इतनी ऊंची विकास दर का हिसाब बैठाया गया है, उनमें से ज्यादातर नहीं तो कम से कम एक चौथाई सत्यम जैसे ही खेल-कूद की उपज हैं। कुछ साख बनाई, राजनीतिक संपर्क जोड़े, बैंकों से कर्ज का जुगाड़ किया और फर्जी बैलेंस शीट के आधार पर शेयर फ्लोट करके बाजार से पैसे बटोरने लगे। पिछले साल शायद 27 या 28 जनवरी को रिलायंस पावर का आईपीओ क्लोज होने के बाद मैंने एक पोस्ट लिखी थी जिसमें इस खेल का अंदाजा लगाने की कोशिश की गई थी। सवाल था कि एक कंपनी, जो धेले भर का भी उत्पादन न कर रही हो, बाजार में अपना आईपीओ फेस वैल्यू की पचास गुनी कीमत पर कैसे उतार सकती है? जवाब सिर्फ रिलायंस नहीं, पूरे हिंदुस्तानी शेयर बाजार की बर्बादी के रूप में दिखाई पड़ा। उस प्रक्रिया का अगला चरण सत्यम है। लेकिन जमीन पर बिल्डरों और डेवलपरों के रूप में छोटे-बड़े हजारों सत्यम विकसित होते दिखाई दे रहे हैं। इनके खेल का अंदाजा मार्च-अप्रैल तक मिलने लगेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज इलाहाबाद बैंक की कर्ज वापसी के जरिए इस भंवर से अपने कदम बाहर निकाल लेने का संतोष है। लेकिन व्यक्तिगत फैसले की यह किसी भी व्यवस्था में बहुत सीमित मात्रा में ही उपलब्ध होती है। कौन जाने कब कोई और लहर आए और अपने पांव उखाड़ती चली जाए। कोशिश करूंगा कि जब ऐसा हो तब भी अपनी तरफ से चुप्पी न सधी रहे, कुछ बातें उस बारे में भी आपसे जरूर शेयर की जाएं।&lt;br /&gt;निजी दुनिया की एक बड़ी खबर यह है कि मित्र ब्रजेश्वर मदान का बहुप्रतीक्षित कविता संग्रह आलमारी में रख दिया है घर आ गया है और खालिद के मार्फत उसे सूंघने, छूने और देखने का मौका भी मिल गया है। समय मिला तो किसी दिन इस संग्रह की कुछ कविताएं यहां डालूंगा। बीच में पहली बार राजस्थान जाने का मौका मिला। लेकिन ये सब तजुर्बे शेयर तब कर पाता, जब रोज थोड़ा-बहुत लिखने का मौका मिलता। मौके...तुम कहां हो प्यारे मौके....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-2797333844012488127?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/2797333844012488127/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2797333844012488127" title="13 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2797333844012488127" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2797333844012488127" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/qwKj_xx4KbI/blog-post_11.html" title="कर्जा उतर गया" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/01/blog-post_11.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-6912997227943139939</id><published>2009-01-04T09:15:00.000-08:00</published><updated>2009-01-04T09:19:18.141-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="सभ्यता विमर्श" /><title type="text">फुकुयामा, हंटिंगटन और इन्सानी नियति</title><content type="html">अगर अपनी बात कहने में मुझे एक-दो विदेशियों के नाम लेने पड़ जाएं तो कहीं आप इसे मेरा ज्ञान छांटना तो न मान लेंगे? ऐसे-ऐसे घनचक्करों से पाला पड़ गया है कि सोचना पड़ता है। आपको लगे भी तो प्लीज, थोड़ा धीरज रखिएगा। मेरा ऐसा कोई मकसद नहीं है। कुछ समय तक मुझे जान लेने के बाद आपको अपना नतीजा बदलना पड़ सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, 1992 में सोवियत संघ का पतन हुआ तो दो अमेरिकी सिद्धांतकार उछल कर नए समय का दर्शन और विचारधारा गढ़ने आए। फ्रांसिस फुकुयामा, जिन्होंने शीतयुद्ध के वैचारिक टकरावों को नोस्टैल्जिया के साथ याद किया और जर्मन फिलास्फर हीगल से नाता जोड़ते हुए मानव सभ्यता की चरम अवस्था फ्री मार्केट कैपिटलिज्म और लिबरल डेमोक्रेसी बताई। फुकुयामा का कहना था कि साम्यवाद के खात्मे के साथ ही दुविधामुक्त हुई दुनिया अब अपेक्षाकृत सीधे रास्तों से अपनी इस पूर्वनिर्धारित नियति की ओर बढ़ेगी। उनके ठीक बाद सैमुअल हंटिंगटन नाम के सज्जन ने दावा किया कि शीतयुद्ध के वैचारिक सरलीकरण ने इतिहास के एक कहीं ज्यादा टकराव को दुनिया की नजरों से ओझल कर दिया था। उनके मुताबिक ये टकराव दरअसल सभ्यता के संघर्ष हैं, जो धुंध खत्म हो जाने के बाद अब इतिहास की मुख्य संचालक शक्ति के रूप में काम करने लगेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये दूसरे वाले सज्जन अभी हाल में मर गए तो पहले वाले ने उछलकर उनकी याद में एक जबरजंग श्रद्धांजलि लिखी जिसमें बुढ़ऊ का बड़ा सम्मान करते हुए कहा कि उनका विश्लेषण पैन-इस्लामवादियों और रूसी राष्ट्रवादियों को खूब रास आया, लेकिन इन सभ्यताओं की मुख्यधारा भी चूंकि फ्री मार्केट कैपिटलिज्म और लिबरल डेमोक्रेसी को ही काम्य मानती है लिहाजा बात तो आखिरकार अपनी ही सही साबित होनी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्यवश, यह श्रद्धांजलि लिखने का मौका उन्हें ऐसे समय मिला जब बाकी दुनिया की तो बात ही छोड़ें, खुद अमेरिका में ही फ्री मार्केट कैपिटलिज्म का बाजा बजा हुआ है। चीनी बैंकर अमेरिका के भीषण बेल-आउट पैकेज को सोशलिज्म विद अमेरिकन करैक्टरिस्टिक्स बताते हुए हंस-हंस कर लोटपोट हुए जा रहे हैं। धीर-गंभीर अमेरिकी चिंतक इसे अमेरिकी पूंजीवाद के बजाय जार्ज बुश या एलन ग्रीनस्पैन या किसी और का रचा हुआ संकट बता रहे हैं लेकिन जो चीज ही अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है उसका कारगर विश्लेषण कोई क्या खाकर करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में कुछ साल पहले दिल्ली स्कूल आफ इकनामिक्स में एक कैंड़े के अमेरिकी चिंतक नोम चोम्स्की को सुनने का मौका मिला, जिनकी बाद में एक-दो किताबें मैंने ट्रांसलेट भी कीं। इसके कुछ ही समय बाद ठीक इसी जगह उत्तर आधुनिक फ्रांसीसी चिंतक जाक दरीदा को भी सुना। इन दोनों ने ही हंटिंगटन और फुकुयामा की कस के रगड़ाई की थी। खास कर दरीदा ने अपने पेपर &lt;em&gt;झूठ का इतिहास&lt;/em&gt; में फुकुयामा की जम कर खबर ली थी और बताया था कि अकेडमिक्स में आने से पहले की अपनी जिंदगी उन्होंने सीआईए के कर्मचारी के रूप में गुजारी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चोम्स्की और दरीदा की बातों से यह रहस्य भी उजागर हुआ था कि हंटिंगटन और फुकुयामा का रिश्ता दर्शन और चिंतन से ज्यादा अमेरिकी रणनीति से है और इनके बीच वैसा कोई विरोध नहीं है, जैसा ये दिखाने का प्रयास करते हैं। बाकी दुनिया को सभ्यताओं के कथित संघर्ष में उलझाकर धीरे-धीरे उसे अमेरिकी दबदबे वाली एकतरफा किस्म की सो-काल्ड मार्केट की ओर ठेलना ही अब तक अमेरिकी थैलीशाहों की रणनीति रही है, जिसे पोस्ट-सोवियत युग में ये खामखा चिंतन का जामा पहना रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुद चोम्स्की और दरीदा की सोच में बहुत थोड़ी ही चीजें साझा मानी जा सकती हैं लिहाजा इनके साथ समझ का कोई पितृतुल्य नाता जोड़ना बेतुकी बात है। अलबत्ता एक साझा एतराज इन पर जरूर उठाया जा सकता है कि अमेरिका या किसी और केंद्रीय सत्ता को इतना ज्यादा वजन देकर दुनिया के बारे में कोई आम बात कहना क्या उचित है? मसलन, क्या यह कहना बिल्कुल वाजिब है कि अगर अंग्रेज हिंदुओं और मुसलमानों के बीच फूट नहीं डालते तो वे हमेशा आपस में भाई-भाई की तरह रहते? टकरावों के इतने आसान, कांग्रेसी टाइप समाधान ज्यादा समय तक काम नहीं आते। इतिहास की गुत्थियां सामना करने से हल होती हैं, कतराने से नहीं। इसलिए हंटिंगटन और फुकुयामा के सरलीकरणों से चोम्स्की और दरीदा के सरलीकरणों को बेहतर मानने का ज्यादा मतलब मेरी समझ में नहीं आता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्ल मार्क्स की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे समाज की मुश्किल से मुश्किल गुत्थी का सामना किसी गणितज्ञ की तरह करते थे- एक-एक कर उनकी पर्तें खोलना, उन्हें सुलझाना, फिर उन्हें जोड़ कर उनकी ज्यादा पारदर्शी तस्वीर बनाने की कोशश करना। बल्कि मुझे तो मार्क्स से भी ज्यादा सोच की यह तरतीब एंगेल्स में नजर आती है। उनके चेलों और अनुयायियों में यह सिफत नहीं थी, और बीसवीं सदी में रूसियों ने तो मार्क्स को बाकायदा जारशाही मार्क्स बना डाला। स्तालिन के जमाने में ईजाद हुई- आदिम साम्यवाद, दासप्रथा, सामंतवाद, पूंजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद- की सीढ़ी के डंडे पकड़ कर हम लोगों ने भी दुनिया को देखना सीखा है। बाद में मार्क्स-एंगेल्स की किताबों में ऐसी कोई चीज लिखी न देख कर बड़ी निराशा हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानव इतिहास की प्रेरणा, उसकी चालक शक्ति, उसकी नियति जैसी कोई चीज होती भी है या नहीं? और अगर ऐसा कुछ होता है तो उसका सड़क पर चलते एक आम आदमी की जिंदगी से, उसके सुख-दुख, रिश्तों-नातों से, उसकी सोच-समझ से क्या रिश्ता बनता है? यह सवाल फासीवाद, नाजीवाद, स्तालिनवाद, बुशवाद और ओसामावाद जैसी बंद गलियों से गुजर कर इक्कीसवीं सदी में नए सिरे से खुल गया है। फुकुयामा और हंटिंगटन का रोल इसमें इतना जरूर रेखांकित किया जाना चाहिए कि उन्होंने अपने दो फुग्गे उछाल कर लंबे अर्से तक उबासियों का सबब समझे जाने वाले इस सवाल में कुछ रोमांच पैदा किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वस्तुगत रूप से इस सवाल का एक सिरा सोवियत युग के पराभव से खुला था और दूसरा अभी की ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के साथ खुलने की राह पर है। डेढ़ सौ साल पहले मार्क्स और एंगेल्स ने इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की थी। आने वाले समय में शायद कुछ और लोग इसे आगे बढ़ाएं। यह काम दुनिया में जहां भी, जिस भी कोने पर हो, उस पर नजर रखी जानी चाहिए क्योंकि अपने अस्तित्व के बड़े सवालों से कतरा कर निकल जाने की सुविधा प्रकृति ने मानुस जाति को नहीं दी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6912997227943139939?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/6912997227943139939/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6912997227943139939" title="13 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6912997227943139939" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6912997227943139939" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/_dVWH2-An1I/blog-post.html" title="फुकुयामा, हंटिंगटन और इन्सानी नियति" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">13</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2009/01/blog-post.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2151935216458490789</id><published>2008-12-18T08:27:00.000-08:00</published><updated>2008-12-18T08:29:34.088-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कुछ निवेदन" /><title type="text">मंदी पर कुछ बातें, एक प्रस्ताव और एक सौरी नोट</title><content type="html">मन बहुत सेंटी-सेंटी हो रहा है। इतने सारे मित्र ब्लाग के जरिए ही मिले थे। इतने दिन सभी ने किसी न किसी तरीके से हाल-चाल लेने की कोशिश भी की लेकिन छह महीने बाद जब वापसी हुई तो न किसी से दुआ न सलाम। और तो और, कहीं कोई टिप्पणी भी नहीं। मित्रों की टिप्पणियों का जवाब तक नहीं। सफाई में कहने को कुछ नहीं है। दफ्तर में ब्लाग छू नहीं सकते। घर पर मुश्किल से आधा घंटा निकल पाता है, वह भी ऐसे जैसे किसी के घर सेंध मार रहा होऊं। इतने समय में क्या-क्या किया जा सकता है। खैर, इस झींखने से भी क्या होने वाला है। ई-मेल का रास्ता खुला हुआ है। सबके मेल ऐड्रेस कल खोज-खोज कर निकालूंगा और बातचीत दुबारा शुरू हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक प्रस्ताव है कि दुनिया भर में चल रही मंदी की परिघटना को हम लोग अपने-अपने स्तर पर अच्छी तरह दर्ज करें। हम लोगों की पीढ़ी जिस तरह सोवियत संघ के साथ समाजवादी खेमे के विघटन और अमेरिका पर हमले जैसी ऐतिहासिक घटनाओं की साक्षी है उसी तरह इसे मंदी को देखने का मौका भी मिल रहा है। यह एक भयानक चीज है और हर किसी के लिए अपने-अपने ढंग से इसके दुखद मायने हैं। लेकिन साथ में यह एक ऐसी चीज भी है जिसके बारे में दावे के साथ कोई कुछ नहीं जानता, लिहाजा जितने तरीकों से हो सके, इसे दर्ज किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोज सुबह मैं कुछ लोगों के साथ वालीबाल खेलता हूं। इनमें कोई बैंक में वसूली एजेंट है तो कोई कार डीलर है, कोई किसी रियल एस्टेट कंपनी में अपना ट्रक लगाकर ईंटा ढोता है तो कोई किसी निर्माणाधीन इमारत में चौकीदारी करता है। इनमें से ज्यादातर दलाली और सट्टेबाजी वाली अर्थव्यवस्था की पैदाइश हैं, लेकिन मेरे साथ खेलते हैं, इसी से जाहिर है कि शिकार करने वाले नहीं, जूठन पर जीने वाले जीव हैं। सभी लोग बुरी तरह मंदी से डरे हुए हैं लेकिन सभी को लगता है कि मौका आते ही वे इसी मंदी में काफी कुछ कमा गुजरेंगे। अभी डीडीए फ्लैट्स के ड्रा निकलने वाले थे तो लगभग सभी ने बुकिंग करा रखी थी। किसी का नहीं आया, सबने एक सुर से सात-आठ हजार का घाटा उठाया, लेकिन चार और स्कीमों में पैसे लगाने से इनमें कोई चूकने वाला नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ही दिन सुबह आठ बजे मंदी के फायदे-नुकसान पर जमीनी गप्प सुनना और फिर दस बजे अमेरिका के ऐतिहासिक जालसाज बर्नार्ड मैडाफ के बारे में पढ़ना एक विचित्र अनुभूति जगाता है। लगता है जैसे कोई अदृश्य शक्ति इस पूरे ग्रह को एक साथ निचोड़ कर इसका कचूमर निकाल देने पर आमादा है। पिछले पंद्रह-बीस सालों से उम्मीद का चुग्गा फेंक-फेंक कर इस दुनिया को चराया जा रहा है। करोड़ रुपये के फ्लैट, दस लाख की गाड़ी, सौना बाथ, गार्डन फेसिंग, होनोलूलू का टूर। खुशियों की इस असाध्य बाढ़ में मैडाफ जैसे कितने गड्ढे हैं, कोई नहीं जानता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थशास्त्र की जितनी मेरी समझ है, उसके मुताबिक आप इस शास्त्र की सिर्फ और सिर्फ शब्दावली समझ सकते हैं। उससे आगे यह लालच और भय का विचित्र खेल है और जो भी इसे समझ लेने का दावा करता है वह न सिर्फ दुनिया से बल्कि खुद से भी झूठ बोल रहा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मंदी अगले साल के मध्य तक या अंत तक खत्म हो जाएगी, जो लोग यह बात कह रहे हैं, वे ठीक यही बात एक साल बाद भी कहेंगे लेकिन तारीख बदल कर। यह उनका धंधा है और यकीनन वे मंदी की डाइनेमिक्स के बारे में किसी आम आदमी से ज्यादा नहीं जानते।&lt;br /&gt;1930 का उदाहरण देना बेकार है। तब की अर्थव्यवस्था वैसी नहीं थी, जैसी आज है और न ही इससे उबरने की कोशिशें तब की कोशिशों का दोहराव बन कर सही साबित होंगी। हम लोग बराबर इसे समझने की कोशिश करेंगे। लेकिन यह बाद की बात है। मेरा प्रस्ताव है कि इसे जितनी तरह से हम देख सकते हैं, देखने की कोशिश करें। बाद में इसे पढ़ कर हम ज्यादा बेहतर नतीजे निकालने की हालत में होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा समय समाप्त- बाय-बाय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-2151935216458490789?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/2151935216458490789/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2151935216458490789" title="3 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2151935216458490789" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2151935216458490789" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/X2HQk7xyR2k/blog-post_18.html" title="मंदी पर कुछ बातें, एक प्रस्ताव और एक सौरी नोट" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/12/blog-post_18.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-1593842477768895083</id><published>2008-12-16T08:14:00.000-08:00</published><updated>2008-12-16T08:30:55.673-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="रामझरोखा" /><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="लेखक" /><title type="text">लेखक का समर्पण उर्फ कस्मै देवाय हविषा विधेम</title><content type="html">लेखक का कविता संकलन आने वाला है और उसकी दुविधा यह है कि वह इसे समर्पित किसे करे। अतीत में बताया जा चुका है कि यह लेखक क्या बला है और कहानी से कविता में उसका आगमन कैसे हुआ। फिर भी यह सोच कर कि &lt;strong&gt;पहलू&lt;/strong&gt; ब्लाग की दुबारा शुरुआत ही एक जमाने बाद हो रही है, लेखक का परिचय दुहराना जरूरी है। लेखक एक आर्कीटाइप लेखक है, जैसे कभी हुआ करते थे। लिखने से न उसकी रोटी निकलती है, न करियर बनाने में कोई मदद मिलती है, न समाज में इससे उसका रुतबा बढ़ता है। यह सब हो तो उसे बुरा नहीं लगेगा लेकिन लिखने में इस सब का दखल उसे पसंद नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक ने कहा, यह संकलन वह अपनी दिवंगता पत्नी को समर्पित करने जा रहा है। संकलन में तीन-चार साल पहले स्वर्गवासी हुई पत्नी की स्मृति में लिखी कई कविताएं हैं, जिनमें कुछ अच्छी और कुछ बहुत अच्छी हैं। लेकिन पत्नी के नाम समर्पण को लेकर मेरा इंस्टैंट रिएक्शन यही था कि ऐसा बिल्कुल मत कीजिए। वजह यह कि कविता की नई ऊर्जा आपमें पत्नी के बजाय कुछ दूसरी जगहों से आई है। किसी और लड़की के प्रति प्रेम को पत्नी की आड़ देना खुजली पैदा करने वाली चीज है। खास कर तब तो और भी जब पत्नी अब इस दुनिया में न हों। प्रकटतः मैंने यही कहा कि संकलन को अगर बाबाजी की पेटी बनाना है तो जरूर इसे पत्नी के नाम समर्पित करें, वरना बिना समर्पण के ही किताब जाने दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक ने शायद मेरी बात को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया। किताब में समर्पण जा रहा है लेकिन उसके प्रति, जिससे खुद को जुड़ा मान कर लेखक ने हाल में कुछ जबर्दस्त कविताएं लिखी हैं, लेकिन जो कोई ठोस उम्मीद जगने से पहले ही एक प्लेटोनिक भाप में विलीन हो चुका है। जाहिर है, इस समर्पण से बवाल मचेगा और शायद इससे किताब को कुछ पब्लिसिटी भी मिलेगी। लेकिन अगर इसे सही स्पिरिट में लिया गया तो शायद हिंदी समाज में चीनी कम से आगे की कुछ बात शुरू हो। वैसे उम्मीद इसकी नहीं के बराबर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने यहां हर इन्फेचुएशन को बहन, बेटी या किसी और रिश्ते का नाम देकर ढक देने का चलन है। रचनात्मकता के सबसे बड़े स्रोत की मौत तो ठीक इसी बिंदु पर हो जाती है। यहां से बेईमानियों के तमाम किस्से शुरू होते हैं लेकिन उनका जिक्र यहां रहने ही देते हैं। ईमानदार लोगों का हाल भी खास अच्छा नहीं है। कुछ बड़े लेखक अपनी रचना में व्यक्त हुई रूमानी ऊर्जा को किसी न किसी समाजग्राह्य रिश्ते का टाट ओढ़ा देते हैं। नतीजा यह होता है कि अक्सर उनके जीवन काल में उनकी बात ही पूरी-पूरी किसी के पल्ले ही नहीं पड़ती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शमशेर की मृत्यु के कुछ साल बाद तक हम लोग &lt;em&gt;टूटी हुई बिखरी हुई&lt;/em&gt; और अन्य कई घोर ऐंद्रिक प्रेम कविताओं को अपनी पत्नी की याद में लिखी गई रचना मान कर उनके प्रति दास्य भक्ति के भाव से सन जाया करते थे। फिर दूधनाथ सिंह की &lt;em&gt;लौट आ ओ धार&lt;/em&gt; ने चीजों को एक संदर्भ दिया और शमशेर को नए सिरे से पढ़ने की दृष्टि भी। &lt;em&gt;लौट आ ओ धार /टूट मत ओ दर्द के पत्थर हृदय पर/ लौट आ ओ फूल की पंखुड़ी/ फिर फूल से लग जा&lt;/em&gt; और &lt;em&gt;तुम मुझे प्रेम करो ऐसे/ जैसे हवाएं मेरे सीने को दबाती हैं&lt;/em&gt;- जैसी अलौकिक पंक्तियां जिस रिश्ते से उपज सकती हैं, उसे महसूस करने के लिए पाठक के पास तथ्यों का कुछ तो अवलंब होना ही चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्यवश, शमशेर के इस रिश्ते के बारे में पता चलने तक देर हो चुकी थी। जब इस कवि को सचमुच पढ़ने की हालत बनी, तब तक सघन ढंग से उसे पढ़ने के लिए कई दूसरे जरूरी काम छोड़ने जरूरी हो गए थे लिहाजा शमशेर फिर कभी एजेंडा पर नहीं आए तो नहीं आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्यकालीन कवियों ने अपनी समझ और बुद्धि के मुताबिक नायिका भेद रचा। सात साल की कन्या से सत्तर साल की प्रौढ़ा तक का शरीर विन्यास और उसी के मुताबिक उनका श्रृंगारिक प्रेम भाव। यह दरबारी पुरुष कवियों की रची हुई स्त्री थी, या शायद स्त्री का कैरीकेचर। अपना इरादा यहां कोई नायक भेद रचने का नहीं है। लेकिन कुछ बात है, जिसे मैं यहां पकड़ने की कोशिश कर रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चरम अवसाद में चला गया एक मृत्युगामी बूढ़ा एक नवयुवती से जितनी हताशा, उम्मीद और आजादी के साथ प्रेम कर सकता है, वह मैंने लेखक में ही देखा है। रूमी की एक पंक्ति याद आती है (सही या गलत, अभय तिवारी बताएंगे) &lt;em&gt;मी चू सब्जा बारहा रूईदः एम।&lt;/em&gt; सब्जे की तरह मैं बार-बार उग आता हूं। मैंने लेखक के मरे हुए मनोजगत को पिछले कुछ दिनों में सब्जे की तरह उगते, मुरझाते, चटख होते देखा है। काश, यह खुशनसीबी जीवन में कम से कम एक बार सबको हासिल हो। हालांकि जितनी तकलीफ यह अपने साथ लाती है, उसे झेलना सबके बूते की बात नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-1593842477768895083?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/1593842477768895083/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=1593842477768895083" title="5 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1593842477768895083" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1593842477768895083" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/ewfMGvFaSZ0/blog-post_16.html" title="लेखक का समर्पण उर्फ कस्मै देवाय हविषा विधेम" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/12/blog-post_16.html</feedburner:origLink></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-6704548879903464930</id><published>2008-12-14T03:12:00.000-08:00</published><updated>2008-12-14T03:13:31.307-08:00</updated><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="चलते-चलते" /><title type="text">यहां-यहां से गुजर गया</title><content type="html">सहारा ग्रुप का साप्ताहिक अखबार सहारा समय ज्वाइन करते वक्त सोचा था कि दो साल यहां किसी तरह कट जाएं तो फिर कोई और दरवाजा देखा जाएगा। काटूर्निस्ट मित्र सौरित ने आश्चर्य से मुंह फाड़ते हुए जवाब में दो साल ऐसे कहा था जैसे मैं दो साल नहीं दो युगों की बात कर रहा होऊं। लेकिन गोड़ी कुछ ऐसी रही कि 18 मई 2008 को इस्तीफा लिखने तक पांच साल एक महीना और आठ दिन पार हो चुके थे। तजुर्बे के लिहाज से यह समय बुरा नहीं था लेकिन नौकरियों का जो हाल है, उसमें बार-बार यही लगता था कि शायद अनेक कर्मचारियों की तरह अपनी भी श्रद्धांजलि सभा सहारा, नोएडा के विशाल लान में ही मनेगी।&lt;br /&gt;बहरहाल, 19 मई से एक अलग जिंदगी शुरू हुई। पत्रकारिता में बिजनेस ही ऐसी चीज थी जो अपने मिजाज के सबसे खिलाफ लगती थी, लेकिन करियर में ले-दे कर करीब पांच महीने बिजनेस पत्रकारिता में भी निकल गए। और जो भी निकले, अच्छे निकले। इंटेलिजेंट लोगों के साथ काम करने का मौका मिला। ऐसे लोग, जो आज के जमाने में पत्रकारिता करते हुए भी रसीली तस्वीरों के बजाय, सूचनाओं के प्रति अपना आग्रह बचाए हुए हैं। पूरी मेहनत से कठिन चीजों का अर्थ समझने की कोशिश करते हैं और सरल ढंग से उन्हें लोगों तक पहुंचाते हैं। ये सूचनाएं लोगों के काम-धंधे से जुड़ी होती हैं, इनसे उन्हें दो पैसे कमाने या बचाने में मदद मिलती है।&lt;br /&gt;बिजनेस भास्कर का काम मेरे मन का था, सिर्फ दो दिक्कतों को छोड़कर। एक तो काम की जगह मेरे घर से काफी दूर थी। 11 बजे घर से निकल कर लौटने में भी तकरीबन 11 बज जाते थे। दूसरे, कम से कम लोगों को लगा कर प्रोडक्ट निकालना शायद भास्कर ग्रुप की पालिसी है। इसका कष्ट मैं एक बार पहले भी भुगत चुका हूं, लिहाजा भ्रम की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। इसी बीच संयोग से नवभारत टाइम्स में मेरे लायक (या पत्रकारिता में मेरे बारे जो राय बनी हुई है उसके मुताबिक) एक काम निकल आया और मैं इधर आ गया।&lt;br /&gt;यह तो हुई रोजी-रोजगार की बात, जिसमें अगर बताने लायक कुछ हुआ तो आगे बताता रहूंगा। अभी इस सिलसिले में सिर्फ इतना कहना है कि संजय खाती के रूप में यहां अच्छा सुनने, पढ़ने और लिखने वाले एक सज्जन मौजूद हैं, जिनसे शायद दो-चार साल साथ काम करने के बाद दोस्ती भी हो जाय। अनुराग वत्स हैं जो सबद नाम का एक साहित्यिक ब्लाग चलाते हैं। इनके पास मौजूद किताबों और फिल्मों का जखीरा देखकर खामखा की हीनभावना पैदा होती है (जैसी अक्सर प्रमोद भाई अजदक की पढ़ान और देखान से हुआ करती है)।&lt;br /&gt;अगर इनके साथ से मैंने एक भी नई किताब पढ़ ली या फिल्म देख ली या सीडी सुन ली तो मानूंगा कि एक ढंग के आदमी से मुलाकात हुई, वरना जिस तरह तमाम ज्ञान के गोदाम इस बड़बोले शहर में इधर-उधर चरते-विचरते रहते हैं, वैसे ही एक मजबूरी की सोहबत यह भी ठहरेगी। अभी तक होता यही है कि ये चीजों का झरोखा दर्शन कराते हैं, जो एक कसैला सा स्वाद मुंह में छोड़कर आंखों के सामने से कहीं कहीं की कहीं चली जाती हैं।&lt;br /&gt;संजय कुंदन कवि भी यहीं पाए जाते हैं। करीब बीस वर्षों के परिचित तो होंगे ही, लेकिन दूरियों-नजदीकियों में आगे भी कोई विशेष बदलाव आने के आसार नहीं नजर आते। बाकी डिपार्टमेंट में संस्थान के पुराने महारथी बालमुकुंद और संजय वर्मा हैं, जो एक तरह से मेरे लिए अभी अनएक्सप्लोर्ड टेरिटरी में आते हैं। ब्लागरों में अनुराग अन्वेषी भी इसी संस्थान में हैं जिनकी मेहरबानी से ब्लाग पर दुबारा वापसी कराने वाला यह मंगल फांट प्राप्त हुआ है। कवि यशःप्रार्थी, पूर्व सैनिक अधिकारी और पत्रकारिता जगत के उगते सितारे सुंदर ठाकुर ने मुझे नवभारत टाइम्स के न्यौते वाला फोन किया था। वे न्यूज सेक्शन में हैं और सिर्फ सिगरेट न पीने के चलते कायदे से उनके साथ छन नहीं पा रही है। बड़ी उम्मीद थी कि काफी छनेगी लेकिन ऐसी छनाई के लिए कोई छनौटा ही अभी तक नहीं मिल पाया है।&lt;br /&gt;इस मीडिया ग्रुप का हल्ला बहुत सुना है। इसकी प्रसिद्धियां और बदनामियां पत्रकारिता में मौजूद हर छोरे-छोरी की जुबान पर हुआ करती हैं। इसकी टांग के नीचे से अज्ञेय, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर, कमलेश्वर, विष्णु खरे और आधुनिक हिंदी साहित्य की ज्यादातर हस्तियां निकली हैं (हल्की सी खंखार के साथ कहूं तो मैं भी अब यहीं आ गया हूं)। आशा है आगे की पोस्टों में आपको अपनी नौकरी की जगह के बारे में बता कर बोर करने का सुयोग नहीं प्राप्त होगा।&lt;br /&gt;अमे कुछ ढंग की कहो, ढंग की सुनो यार....&lt;br /&gt;क्या यार, अमे तुम भी..के....&lt;br /&gt;अमे, जहैं देखो तहैं सुरू हो जाते हो मूं फाड़के....हैं&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6704548879903464930?l=pahalu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel="replies" type="application/atom+xml" href="http://pahalu.blogspot.com/feeds/6704548879903464930/comments/default" title="Post Comments" /><link rel="replies" type="text/html" href="https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6704548879903464930" title="11 Comments" /><link rel="edit" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6704548879903464930" /><link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6704548879903464930" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://feedproxy.google.com/~r/pahalu/~3/EwRjINUj-ns/blog-post.html" title="यहां-यहां से गुजर गया" /><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" name="OpenSocialUserId" value="03802692743342534652" /></author><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">11</thr:total><feedburner:origLink>http://pahalu.blogspot.com/2008/12/blog-post.html</feedburner:origLink></entry></feed>
