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<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/atom10full.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:gd="http://schemas.google.com/g/2005" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" gd:etag="W/&quot;Dk4DSH47eyp7ImA9WxNUF0g.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-15182217</id><updated>2009-11-09T13:52:59.003+05:30</updated><title>रचनाकार</title><subtitle type="html">इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य के दस्तावेज़ीकरण का एक सार्थक प्रयास...</subtitle><link rel="http://schemas.google.com/g/2005#feed" type="application/atom+xml" href="http://rachanakar.blogspot.com/feeds/posts/default" /><link rel="alternate" type="text/html" href="http://rachanakar.blogspot.com/" /><link rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><link rel="next" type="application/atom+xml" href="http://www.blogger.com/feeds/15182217/posts/default?start-index=4&amp;max-results=3&amp;redirect=false&amp;v=2" /><author><name>Raviratlami</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07878583588296216848</uri><email>raviratlami@gmail.com</email></author><generator version="7.00" uri="http://www.blogger.com">Blogger</generator><openSearch:totalResults>1736</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>3</openSearch:itemsPerPage><link rel="self" href="http://feeds.feedburner.com/rachanakar" type="application/atom+xml" /><feedburner:emailServiceId>rachanakar</feedburner:emailServiceId><feedburner:feedburnerHostname>http://feedburner.google.com</feedburner:feedburnerHostname><feedburner:browserFriendly>This is an XML content feed. It is intended to be viewed in a newsreader or syndicated to another site, subject to copyright and fair use.</feedburner:browserFriendly><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com" /><entry gd:etag="W/&quot;Dk4DSH46cSp7ImA9WxNUF0g.&quot;"><id>tag:blogger.com,1999:blog-15182217.post-7721886303224732592</id><published>2009-11-09T13:52:00.001+05:30</published><updated>2009-11-09T13:52:59.019+05:30</updated><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2009-11-09T13:52:59.019+05:30</app:edited><category scheme="http://www.blogger.com/atom/ns#" term="कहानी" /><title>यशवन्त कोठारी की कहानी : फ्लेट नं 301</title><content type="html">&lt;p&gt;&amp;#160;&lt;img title="yashwant kothari[2]" border="0" alt="yashwant kothari[2]" src="http://lh5.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/SvfRXc089wI/AAAAAAAAGwY/E0RRp8Z0dkU/yashwant%20kothari%5B2%5D%5B3%5D.jpg?imgmax=800" width="132" height="147" /&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font color="#ff0080"&gt;&lt;font size="7"&gt;सामान्‍यतया&lt;/font&gt; &lt;/font&gt;अमर रात को काफी देर से ही अपने फ्‍लेट में पहुंचता था। कभी-कभी तो सुबह होने के थोड़ी देर पहले ही वह घर में घुसता है और दोपहर तक सोता रहता है। आसपास के फ्‍लेट वाले सोये होते हैं, चौकीदार की ऊंघ को तोड़कर वह लिफ्‍ट के सहारे अपने फ्‍लेट नं. 301 तक पहुंचता और ताला खोलकर थका हारा पड़ा रहता। इस फ्‍लेट के बारे में बिल्डिंग में कई अफवाहें थी। लेकिन अमर ने इन अफवाहों की ओर कभी भी ध्‍यान नहीं दिया। वो जानता था लोग उसे पसन्‍द नहीं करते, मगर वह बिल्डिंग के सदस्‍य के रूप में अपना भुगतान समय पर करता। बस...............।और किसी भी चीज से उसका कोई विश्‍ोष ताल्‍लुक नहीं था। हां जब वह बाहर निकलता तो बिल्‍डिंग के लोग उसे अजीब नजरों से देखते थे। खासकर मध्‍यम वय की महिलाएं मगर अमर नीची गर्दन करके आता और नीची गरदन करके जाता। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;कोई नहीं जानता है उसकी आय के साधन क्‍या है और वह किसी से कोई बातचीत नहीं करता था। यह वह समय होता था जब बिल्डिंग के सभी लोग बेखबर होकर सोये रहते। दूधवाला, अखबारवाला, कामवाली बाई आदि के आने से कभी-कभी सन्‍नाटा टूट जाता था। बस। बाकी बिल्डिंग के लोग देर से उठते थे। कुछ बूढ़े - बुढ़िया सुबह की सैर को जाने की तैयारी कर रहे होते तो कुछ बच्‍चे स्‍कूल की तैयारी करते होते। अमर बिना कपड़े बदले सो जाता। रातभर की थकान, शराब और काम का बोझ उसे दोपहर तक सोने को मजबूर कर देता। कई बार वह सोचता सुबह का सूरज देख्‍ो कितना वक्‍त बीत गया। रात का सन्‍नाटा सुनते कितनी राते बीत गई। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;एकान्‍त में वह स्‍वयं सोचता उसका यह अपार्टमेंट किन अर्थों में घर था। एक अनाथ, अविवाहित, आवारा और बदलचलन (जैसा उसे अन्‍य लोग कहते) का घर या फ्‍लेट या अपार्टमेंट या रात्रि को ठहरने, सोने, नहाने की जगह .............बस .........। घर का मतलब शायद यही था उसके लिए। वह सोचता काश ........... उसका भी घर होता पत्‍नी होती, बच्‍चे होते। वो साझं ढले घर आता। एक पेग पीकर फ्रेश होकर सब बाजार जाते, खाते-पीते, देर रात घर आते। बच्‍चे सो जाते। वो और पत्‍नी सपनों की दुनिया में खो जाते। मगर यह सब शायद उसकी किस्‍मत में नहीं था । वो तकिये में मुंह छिपाकर पड़ गया। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अमर का जीवन भी क्‍या जीवन था। होटल के चकाचौंध भरे कमरे, केबरे, डांस, बार, बार बालाएं, झूठी उम्‍मीदें, घिसेपिटे वादे, महंगे तोहफे, महंगी साड़िया, महंगी लिपिस्‍टके, महंगी कारे, महंगी ज्‍यूलरी, मगर सस्‍ती और ज्‍यादा सस्‍ती जिन्‍दगी जो नाम मात्र की होती। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;उसका काम था नव धनाढ़यों की खूबसूरत बीबियों को खुश करना और बदले में एक आलीशान शानदार रईसी जीवन जीना, भोगना और कुंठाओं के बारे में सोचना। हर समय बस सोचना। क्‍योंकि वह कर कुछ नहीं सकता था। उसने अपने बाडी शापिंग एजेन्‍ट से कह दिया था ‘‘यार बस बहुत हो गया और नहीं इस गलीज जिन्‍दगी से मुझे अलग हो जाने दो।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘मगर ऐसा हो नहीं सकता माई डियर। इस जिन्‍दगी में आने के रास्‍ते तो हजारों है मगर वापसी का कोई रास्‍ता नहीं है और फिर इन नई उम्र के लड़कों की तुलना में तुम्‍हारी रिपीट वेल्‍यू बहुत ज्‍यादा है।'' ऐजेन्‍ट ने साफ-साफ बात कहो। उस दिन बम्‍बई की उस बड़ी कार्पोरेट हस्‍ती ने तुम्‍हें ही नहीं मुझे भी बहुत बड़ी और मंहगी गिफ्‍ट दी थी। जब भी दिल्‍ली आती है तो तुम्‍हें ही पहले से बुक करने को कहती है। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;एजेन्‍ट ने यह कहकर फोन बन्‍द कर दिया। अमर क्‍या करें। उसे इसी समाज, इसी दुनिया में रहना और इसे ही भुगतना है। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;कई बार विदेशी मेहमान तक उसकी फरमाईश करते। अमर कई बार तो मना कर देता या अन्‍यत्र बुकिंग की बात कर टाल जाता। मगर बकरे की मां कब तक ख्‍ौर मनाती है? कभी-कभी तो उसे अपने आपसे और इस माहौल से घृणा हो जाती। मगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहता। उसने चलने दिया। अपने वजूद को मारकर चलने दिया। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;कई बार वो सोचता इन क्‍लाइटों के पास क्‍या नहीं है सब कुछ अरबों रूपये, कम्‍पनियां, पति, बच्‍चे, नौकर-चाकर, मगर फिर भी खुश नहीं। खुशी, उल्‍लास, उमंग, प्रसन्‍नता कोई बाजार से मिलने वाली चीज नहीं है कि उसे डायमण्‍ड के नेकलेस की तरह पहन लिया जाये या रिस्‍ट वाच की तरह कलाई में बाध दिया जाये। वे केवल चेंज के लिये उसे बुलाती, मुंहमांगी कीमत देती, कीमती तोहफे देती और अगली फ्‍लाइर्ट से वापस उड़ जाती। उसे लगता क्‍लाइन्‍ट का क्‍या है। चाटेगी, चूमेगी, खायेगी, नोचेगी, बाद में शराब में डूब जायेगी। बिस्‍तर तक उसे लाना पड़ेगा फिर वह भी उसमें डूब जायेगा। होश किसे रहता है, होश रखना कौन चाहता है। अंग्रेजी की कविताएं, कालीदास की सूक्‍तियाँ और बात्‍स्‍यायन के आसनों की जानकारी इन क्‍लाईंटों को होती थी। वे सब आजमाती और अमर भारी लिफाफे, महंगी गिफ्‍ट के लिए सब कुछ करता जाता। सोचने समझने की न फुरसत थी न आवश्‍यकता वह सोचता अपना काम पूरी ईमानदारी और मेहनत से करो। जो करो दिल से करो। हार जीत का सवाल नहीं है। काम खत्‍म हो तो सो जाओ। उठो, चलो अपना माल गिनों और गाड़ी पकड़ो। कई बार अमर को लगता उसके शरीर को किसी नागिन ने अपने पाश में जकड़ लिया है। उसे नागिन डस रही है । उसे अपने शरीर पर सांप, बिच्‍छू, केंचुए रेगते हुए महसूत होते। वह इन विष कन्‍याओं, महिलाओं से ज्‍यादा गिफ्‍ट ऐठने में लग जाता। कभी-कभी उसे अजीब-अजीब से सपने आते। सपने में कभी वो देखता अजीब मुखोटे लगाये औरते, गाती, रोती, चिल्‍लाती औरतें उसके नंगे बदन काली, सफेद चमड़ी, जांगे कुचाग्र और न जाने क्‍या-क्‍या उसे पूरा शरीर एक जननांग लगता। उसकी नींद खुल जाती। वो पसीने से तर बतर हो जाता। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;कई बार उसे दुख होता। आश्‍चर्य होता सब कुछ है इन लोगों के पास और कुछ भी नहीं है। खाली ............ शून्‍य ........... अन्‍ध्‍ोरा ...... और बस अन्‍ध्‍ोरा। कई बार तो वह गिफ्‍ट नही लेता। मगर जबरदस्‍ती उसे दी जाती। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;रख लो यार। किसी ओर को दे देना। मुझे तुम पसन्‍द हो। अच्‍छे लगते हो। तुम्‍हारे लिए यूरोप से लाई हूं। सब कुछ है मेरे पास बस प्‍यार नहीं है, वो तुम में पाकर एक रात के लिए खुश हो जाती हूं। इसी खुशी की कीमत भी देती हूं। वो क्‍या कहता चुपचाप रख लेता। एजेन्‍ट के अनुसार बड़े क्‍लाईंटों को नाराज करना ठीक नहीं रहता। वे सब आपस में एक दूसरे को बताती है और इसी प्रकार धन्‍धा चलता है तो यह भी एक धन्‍धा है। हो जाए यार धन्‍धा, व्‍यवसाय। खाओ जी के। ऐश करो। मस्‍ती करो और ऊपर से एक रइर्साना जिन्‍दगी और क्‍या चाहिए। एजेन्‍ट ने उसकी पीठ थपथपाई और चला गया। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;एक दिन अमर को अजीब अहसास हुआ। एक विदेशी महिला ने उसका पासपोर्ट मांग लिया चलो तुम्‍हें अपने देश ले चलती हूं। वहां पर मौजमस्‍ती करना। मगर अमर का दिल नहीं माना। वो नहीं गया। उसे फिर याद आया। पिछली बार एक फिल्‍म प्रोड्‌यूसर की धर्मपत्‍नी थी। पार्टी थी, संगीत था, खाना था, खूब पीने के बाद ऊंची-ऊंची बातें और गन्‍दी-गन्‍दी हरकतें थी। फाइव स्‍टार बैडरूम में अमर ने कपड़े उतारते हुए पूछा ‘‘और लोगी''। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;हां एक बड़ा पेग नीट। अमन ने आज्ञा का पालन किया कोई अपराध बोध नहीं, कोई चिन्‍ता नहीं। होटल के कमरे में पूरी शान से वे जागते रहे। क्‍लाइंट की बातें सुन-सुनकर वह बोर हो गया और आखिर में उसने क्‍लाइंट को निपटाया और होटल के बाहर आकर एक सिगरेट सुलगाया। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अमर सो भी रहा था और जाग भी रहा था। आज उसके पास कोई अपोइन्‍टमेंट भी नहीं था। सोचा कुछ मस्‍ती की जाये। सारा दिन घर पर पड़े-पड़े बोर हो गया था। खूब नहाया एक पेग लिया, खूब फ्रेश हो गया और घूमने निकल पड़ा। कपड़े भी उसने बिल्‍कुल साधारण पहने थे उसका खूबसूरत जिस्‍म ही काफी था। जिसकी कृपा से वह एक अलमस्‍त नौजवान लग रहा था। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;बहुत लम्‍बी शाम गुजारने के बाद भी उसकी भूख मरी नहीं थी। उसने एक साधारण रेस्‍टोरंट में साधारण खाना खाया और एक बेफिक्री से सिगरेट का धुंआ फेंकने लगा। अचानक उसके मोबाइल की घंटी बजी। उसके एजेन्‍ट का फोन था। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘प्‍यारे तैयार रहना। मैं आ रहा हूं।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘नहीं आज नहीं। आज मेरा मूड ठीक नहीं है।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘मूड को मार गोली यार। तेरी परमानेंट ग्राहक है। वह कल ही आई है और आते ही तेरी फरमाईश कर दी है उसने .............. उसे मना करना, मेरी बस की बात नहीं है।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘कुछ भी कर यार मुझे माफ कर। तेरे पास बहुत से फोन नम्‍बर है।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘मगर वो तो तुम पर फिदा है।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;नहीं यार आज नहीं। ‘‘अच्‍छा कल के लिए फिक्‍स कर दूं।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘कल फोन कर लेना।'' ऐजेन्‍ट ने फोन बन्‍द कर दिया। अमर फिर नरवस सा हो गया। आज तो वह फ्री ही था, चाहता तो एन्‍टरटेन कर सकता था, मगर पता नहीं क्‍यों उसका मन ही नही माना। बस सोचता रहा .........। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अपने जीवन के संघर्ष के दिनों में जब कुछ नहीं था, मगर सुकून था, आज सब कुछ है मगर सुकून नहीं है, संतोष नहीं है , वो किसी के फोन का गुलाम है और इस गुलामी से ऊब गया था। गांव, घर, मां, बाप, सब बहुत पीछे छूट गये थे, बचा था वर्तमान ............... एक गलीज, घटिया कृत्रिम वर्तमान जो सुविधाओं से भरपूर था, मगर अतीत की तरह शीतल नही था। कभी-कभी तो कैसी-कैसी क्‍लाइंट आती है भगवान। बचना मुश्‍किल, सब कुछ करने के बाद भी गाली ......... बस असंतुष्‍टि। यहां तक की मारपीट भी सब सहना क्‍यों कि वो उसे खरीदती थी। पिछली बार उसे अपने आप पर बहुत खीज भी आई थी। छोड़ो सब कुछ मगर छोडना इतना आसान था क्‍या? एक साथी ने छोड़ने का प्रयास किया था, दूसरे ही दिन लाश समुन्‍दर में तैर रही थी। कहीं कुछ नहीं हुआ। सब कुछ शान्‍ति से निपट गया। क्‍लाइन्‍ट ने एक करोड़ में सब सुलटा दिया। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;थीम पार्टी में उसे अक्‍सर बुलाया जाता था। उसकी तारीफों के पुल बांध्‍ो जाते थे। वाईफ स्‍वेपीस की तरह बायफ्रेण्‍ड स्‍वेपीज ख्‍ोला जाता था और आवश्‍यकतानुसार अमर और उसके साथियों का दुरूपयोग किया जाता था। किसी पार्टीमें हसबेण्‍डस्‍वेपी क्‍यों नही ख्‍ोलती ये क्‍लाइन्‍टस। उसने सोचा। एक बार अमर के साथी अशोक ने कहा भी था। अब इसको छोड़ने का समय आ गया। दूसरे ही दिन वह गायब हो गया था। बाद में पता चला कि वो एक निर्वासित जीवन जीने के लिए हिमालय में कहीं चला गया था। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;फिर फोन बजा अमर ने देखा एजेन्‍ट का था। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘हां, भाई आजके बारे में क्‍या ख्‍याल है।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘आजका भी मूड कुछ उखड़ा-उखड़ा है।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘आज डबल रेट का काम है।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘मुझे भी ज्‍यादा मिलेगा।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘वो तो ठीक है यार पर मुझे कुछ अच्‍छा नहीं लग रहा है।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘बोल हां करता है या क्‍लाईंट को तेरा नम्‍बर दूं।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘नहीं रहने दे यार।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;‘‘जैसी तेरी मरजी।'' &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;एजेन्‍ट ने फोन काट दिया। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;अमर सोचने लगा। वो हीरों बनने आया था। भाग्‍य ने कितना अन्‍याय किया, उसे कहां से ला कर कहा पटक दिया। उसकी महत्‍वकाक्षाएं निरोध में दबकर मर गई। कण्‍डोम जीवन का सत्‍य हो गया। निरन्‍तर घृणा, निरन्‍तर अवरोध, निरन्‍तर उपेक्षा, निरन्‍तर घुटन बस .............घुटन।&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;उसके उपर खूबसूरत रोशनियां, खूबसूरत चेहरे, मुखोटे, सेंट, इत्र, साड़िया, नाइर्टियां, अनाथ, स्‍त्री, नंगा नांच ........................ बस एक कमीनेपन का अहसास था। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;वह सोचता परम्‍पराएं, मान्‍यताएं, संभ्रान्‍त लोगों के लिए होती है मगर उसको अक्‍सर यह गलत लगता उसे कामवाली बाई की परम्‍पराएं इन उच्‍च जाति की बाइयों से बेहतर नजर आती। इनके जीवन के उतार-चढ़ाव सब कुछ बोगस, घटिया, ओछा, निकम्‍मा और आवारा जीवन का असली चैहरा थीम पार्टी में विचारहीन क्रान्‍ति का जलवा। वह बचपन याद करना चाहता। असफल रहता। तंग शहर, तंग लोग, तंग दिमाग, मगर मन के साफ सुथरे। मगर जीवन का सफर संतोषजनक, सारा दिन काम की तलाश फिर काम को पूरा करने की जद्दोजहद। मां का बलात्‍कार, बहन का अपहरण जैसी घटनाएं ....... अमर क्‍या करता, भाग कर मुम्‍बई और घारावी की झोपड़पट्‌टी से इस आलीशान फ्‍लेट तक का सफर तय कर लिया। कार, फ्‍लेट, चमचमाती जिन्‍दगी और इन सबके पीछे आंसू ............. आंसू। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;क्‍लाइंट का फोन इस बार डायरेक्‍ट आया। उसने क्षमा मांग ली। अब उसका मन कुछ ठीक हो गया था। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;क्‍लाइंट को मना करने पर उसे आत्‍मिक खुशी हुई। उसे लगा, अभी वह पूरा, मरा नहीं है, उसका स्‍वजिन्‍दा है। क्‍लाइंट का गुलाम नहीं है वो। उसने चुपचाप कपडे बदले। अपने आपको संवारा और बाहर घूमने निकल पड़ा। सड़क पर कौलाहल था। वो धीरे-धीरे कोलाबा की ओर बढ़ गया। टेक्‍सी में बैठ-बैठे ही उसने कोलाबा की एक किशौरी से सौदा किया और कार में उसे रौंदने लगा। उसे आत्‍मिक खुशी हो रही थी। बाहर चांदनी छिटकी हुई थी।&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;---&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;यशवन्‍त कोठारी&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;जयपुर - 2&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;फोन – 2670596&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="mailto:ykkothari3@gmail.com"&gt;ykkothari3@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;रचनाकार में और भी पसंदीदा सैकड़ों रचनाएँ पढ़ें - &lt;/p&gt;

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जमीन पर रहने वाला आलू तक महंगाई के बल पर आसमान में हवाई जहाज के आसपास ही चक्‍कर लगाता मिला तो सेब ने आंखें ही बंद कर लीं। जिस तरह बिल्‍ली को देखकर कबूतर आंखें बंद करता रहा है पर आलू महाशय वहीं मंडरा रहे हैं। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;हवाई जहाज विचारमग्‍न है कि इन जमीनी सब्जियों के भी पंख महंगाई ने निकाले हैं अब कॉमनमैन वेल्‍थ गेम्‍स के नाम पर गरीबों के मुंह से छीन लिए निवाले हैं। पर ऐसों की भी कमी नहीं है जिन्होंने इन्‍हीं कार्यों को कराने के नाम पर खूब हिस्‍सेदारी बंटाई है। उसे स्‍मरण हो आती है अपनी दुर्दशा जब जमीन पर रेंगने दौड़ने वाली रेल उसे नीचे से सीटी बजा बजाकर चिढ़ाती रही है क्‍योंकि उसके किराये हवाई जहाज के किरायों से भी अधिक हो गए थे और आज भी ऐसा ही है पर क्‍या करे हवाई जहाज जब सेब कुछ नहीं कर पा रहा है। तीनों विवश हैं। आप पूछेंगे कि तीसरा कौन है, तो तीसरा तो आजाद भारत की राजधानी में रहने वाला कॉमनमैन है जिसकी वेल्‍थ के नाम पर उसे बीमार कर दिया गया है। &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;...&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;- अविनाश वाचस्‍पति, साहित्‍यकार सदन, पहली मंजिल, 195 सन्‍त नगर, नई दिल्‍ली 110065 मोबाइल 09868166586/09711537664&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;--    &lt;br /&gt;अविनाश वाचस्‍पति Avinash Vachaspati     &lt;br /&gt;Mobile 09868166586     &lt;br /&gt;&lt;a href="http://twitter.com/avachaspati"&gt;http://twitter.com/avachaspati&lt;/a&gt;     &lt;br /&gt;&lt;a href="http://avinashvachaspati.blogspot.com/"&gt;http://avinashvachaspati.blogspot.com/&lt;/a&gt;     &lt;br /&gt;&lt;a href="http://nukkadh.blogspot.com/"&gt;http://nukkadh.blogspot.com/&lt;/a&gt;     &lt;br /&gt;&lt;a href="http://pitaajee.blogspot.com/"&gt;http://pitaajee.blogspot.com/&lt;/a&gt;     &lt;br /&gt;&lt;a href="http://jhhakajhhaktimes.blogspot.com/"&gt;http://jhhakajhhaktimes.blogspot.com/&lt;/a&gt;     &lt;br /&gt;&lt;a href="http://bageechee.blogspot.com/"&gt;http://bageechee.blogspot.com/&lt;/a&gt;     &lt;br /&gt;&lt;a href="http://tetalaa.blogspot.com/"&gt;http://tetalaa.blogspot.com/&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;रचनाकार में और भी पसंदीदा सैकड़ों रचनाएँ पढ़ें - &lt;/p&gt;

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हैड सा’ब भी इसी रोग से पीड़ित थे।&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;-- -- गुरुजनों द्वारा सब्जियां मंगवाने की बात धीरे-धीरे पूरे गांव में आग की तरह फैल गई। घर-घर में पंचायतें होने लगी कि सारे मास्टर और मैडमें बच्चों से सब्जियां आदि मंगवाते रहते हैं। इस पर रोक लगनी चाहिए।&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;-- --आखिर हैड सा’ब ने मन मसोस कर सभी शिक्षकों को मौखिक आदेश पारित किया कि किसी भी बच्चे से स्कूल टाइम में सब्जी आदि न मंगवाई जाए।&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;-- --पांच-सात दिन आदेश की पालना की गई। लेकिन बच्चे हैं कि सेवा करने से चूकते ही नहीं हैं। बच्चों ने अब हैड सा’ब को अन्य गुरुजनों से ज्यादा सब्जियां देनी शुरू कर दी है।&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;-- --हैड सा’ब सब्जियां आदि लेते हुए उनसे पूछते हैं-‘क्यूं बच्चो, ये सब्जी स्कूल टाइम -में तो नहीं लेकर आये ना?’&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;-- --‘नहीं जी! छुट्टी के बाद लाए हैं जी।’&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;-- --सब्जियां लाने का काम अब भी जारी है। कई गुरुजन बच्चों से सब्जी लेते हुए कह देते हैं कि ‘जो करेगा सेवा, वो ही पाएगा मेवा।’किसान के शत्रु बनाम गुरुजी – &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;--&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;b&gt;Deendayal Sharma, Hanumangarh Jn.-335512, Rajasthan, Mobile : 0914514666&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;img title="clip_image001" border="0" alt="clip_image001" src="http://lh4.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/SvU54ltoWvI/AAAAAAAAGwM/KFKtqmUCCLY/clip_image001%5B3%5D.gif?imgmax=800" width="32" height="32" /&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;p&gt;रचनाकार में और भी पसंदीदा सैकड़ों रचनाएँ पढ़ें - &lt;/p&gt;

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