<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<?xml-stylesheet type="text/xsl" media="screen" href="/~d/styles/rss2enclosuresfull.xsl"?><?xml-stylesheet type="text/css" media="screen" href="http://feeds.feedburner.com/~d/styles/itemcontent.css"?><rss xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:itunes="http://www.itunes.com/dtds/podcast-1.0.dtd" xmlns:feedburner="http://rssnamespace.org/feedburner/ext/1.0" version="2.0"><channel><title>रेडियोनामा</title><link>http://radionamaa.blogspot.com/</link><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="self" type="application/rss+xml" href="http://feeds.feedburner.com/radionamaa" /><description></description><language>en</language><managingEditor>noreply@blogger.com (Radionama)</managingEditor><lastBuildDate>Wed, 20 Jun 2012 18:06:55 PDT</lastBuildDate><generator>Blogger http://www.blogger.com</generator><openSearch:totalResults xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">708</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage xmlns:openSearch="http://a9.com/-/spec/opensearch/1.1/">25</openSearch:itemsPerPage><feedburner:info uri="radionamaa" /><atom10:link xmlns:atom10="http://www.w3.org/2005/Atom" rel="hub" href="http://pubsubhubbub.appspot.com/" /><itunes:owner><itunes:email>noreply@blogger.com</itunes:email><itunes:name>??????????</itunes:name></itunes:owner><itunes:author>??????????</itunes:author><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>????? ?????? ??...????? ????</itunes:subtitle><feedburner:feedFlare href="http://add.my.yahoo.com/rss?url=http%3A%2F%2Ffeeds.feedburner.com%2Fradionamaa" src="http://us.i1.yimg.com/us.yimg.com/i/us/my/addtomyyahoo4.gif">Subscribe with My Yahoo!</feedburner:feedFlare><feedburner:feedFlare href="http://www.newsgator.com/ngs/subscriber/subext.aspx?url=http%3A%2F%2Ffeeds.feedburner.com%2Fradionamaa" src="http://www.newsgator.com/images/ngsub1.gif">Subscribe with NewsGator</feedburner:feedFlare><feedburner:feedFlare href="http://www.bloglines.com/sub/http://feeds.feedburner.com/radionamaa" src="http://www.bloglines.com/images/sub_modern11.gif">Subscribe with Bloglines</feedburner:feedFlare><feedburner:feedFlare href="http://www.netvibes.com/subscribe.php?url=http%3A%2F%2Ffeeds.feedburner.com%2Fradionamaa" src="http://www.netvibes.com/img/add2netvibes.gif">Subscribe with Netvibes</feedburner:feedFlare><feedburner:feedFlare href="http://fusion.google.com/add?feedurl=http%3A%2F%2Ffeeds.feedburner.com%2Fradionamaa" src="http://buttons.googlesyndication.com/fusion/add.gif">Subscribe with Google</feedburner:feedFlare><feedburner:feedFlare href="http://www.pageflakes.com/subscribe.aspx?url=http%3A%2F%2Ffeeds.feedburner.com%2Fradionamaa" src="http://www.pageflakes.com/ImageFile.ashx?instanceId=Static_4&amp;fileName=ATP_blu_91x17.gif">Subscribe with Pageflakes</feedburner:feedFlare><feedburner:feedFlare href="http://www.live.com/?add=http%3A%2F%2Ffeeds.feedburner.com%2Fradionamaa" src="http://tkfiles.storage.msn.com/x1piYkpqHC_35nIp1gLE68-wvzLZO8iXl_JMledmJQXP-XTBOLfmQv4zhj4MhcWEJh_GtoBIiAl1Mjh-ndp9k47If7hTaFno0mxW9_i3p_5qQw">Subscribe with Live.com</feedburner:feedFlare><feedburner:feedFlare href="http://odeo.com/listen/subscribe?feed=http%3A%2F%2Ffeeds.feedburner.com%2Fradionamaa" src="http://odeo.com/img/badge-channel-black.gif">Subscribe with ODEO</feedburner:feedFlare><feedburner:feedFlare href="http://www.podnova.com/add.srf?url=http%3A%2F%2Ffeeds.feedburner.com%2Fradionamaa" src="http://www.podnova.com/img_chicklet_podnova.gif">Subscribe with Podnova</feedburner:feedFlare><item><title>कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन- 9 : महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/xyRh_4xbOqY/9.html</link><category>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन</category><category>mahendra modi</category><category>महेन्द्र मोदी</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Fri, 25 May 2012 20:55:27 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-3702777568797670274</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;मशहूर रेडियो शख्सियत महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला की नौंवी कड़ी।&lt;/font&gt;       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;कितनी छोटी होती है इंसान की ज़िंदगी ? शुरू में उसे इस बात का अहसास नहीं होता. बचपन में हर बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है और इस बात में फख्र महसूस करता है कि वो बड़ा हो गया है. वो जब ४-५ साल का होता है, तब भी माँ बाप के सामने तरह तरह से सिद्ध करने की कोशिश करता है कि वो बड़ा हो गया है. जब प्राइमरी क्लासेज़ में आता है तब भी उसे लगता है , अब वो एल के जी या यू के जी में नहीं है, बड़ा हो गया है......फिर जब छठी सातवीं में आता है तो उसे लगता है कि अब तो उसकी गिनती बडों में होनी ही चाहिए..... यानि वो तब तक बडा होने के लिए जी जान से कोशिश करता है जब तक कि वास्तव में बड़ा नहीं हो जाता. जब सब ये मान लेते हैं कि वो बड़ा हो गया है और हर बात में टोकने लगते है, ऐसा मत करो, वैसा मत करो..... अब तुम बड़े हो गए हो.... तब उसके पांव के नीचे से ज़मीन खिसकने लगती है और वो अपने बचपन को मिस करने लगता है.....बचपन को मिस करने का ये सिलसिला जीवन भर चलता है, ये बात अलग है कि जैसे जैसे बूढा होता जाता है..... बचपन के साथ साथ जवानी के दिनों को भी मिस करने लगता है.... एक बात आपने महसूस की है या नहीं, मैं नहीं जानता, बचपन में समय की गति बहुत धीमी होती है शायद इसीलिये बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है... मगर धीरे धीरे समय की गति बढ़ने लगती है और फिर वो बढ़ती ही जाती है.       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;आप ज़रा याद करके देखिये २० साल पहले घटी कोई घटना आपको काफी दूर लगती होगी मगर १० साल पहले की कोई और घटना उससे आधी दूरी पर महसूस नहीं होगी बल्कि आधी से बहुत कम दूरी पर लगेगी और ५ साल पहले की घटना तो ऐसा लगेगा कि कल ही घटी हो. यानि समय की गति समान नहीं रहती ..... जैसे जैसे ज़िंदगी में आगे बढते हैं, समय की गति भी बढ़ती जाती है. जब वो अंतिम दिन आता है, जब उसे इस दुनिया को छोड़कर जाना होता है तब उसे लगता है अरे...... ज़िंदगी तो इतनी जल्दी गुज़र गयी.... मैं तो इसे ठीक से जी भी नहीं पाया..... मुझे थोड़ा सा समय काश मिल सके....मगर उसे जाना होता है तो जाना ही होता है.......ऐसे में वो लोग बहुत सुखी रहते हैं जो भगवान में, धर्म में, धार्मिक मान्यताओं में, पुनर्जन्म में गहरा विश्वास रखते हैं क्योंकि उन्हें लगता है....ये शरीर छोड़कर मुझे तो बस दूसरे शरीर में जाना है......मैं पूजा करूँगा, धर्म कर्म करूँगा तो ईश्वर मुझे किसी अच्छे घर में जन्म देंगे. दान-धर्म करूँगा तो मेरा अगला जन्म सुधर जाएगा ..... वगैरह वगैरह, मगर हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर कसने वाले इंसान इन सब बातों पर विश्वास नहीं कर सकते. जीवन के इस दर्शन की शुरुआत उसी वक्त हो जाती है जब बच्चा बहुत छोटा होता है. वो अपने आस पास जो कुछ होता है उसे देखता है और ईश्वर, धर्म, समाज, स्वर्ग, नर्क, पुनर्जन्म, पूजा –पाठ इन सबके बारे में उसके विचार बनने लगते हैं. मैंने बचपन से देखा कि मेरे पिताजी बहुत मन से दुर्गा की पूजा किया करते थे.....उनसे मेरे भाई साहब ने और मैंने भी ये संस्कार लिए मगर मेरे पिताजी कभी भी पंडितों की पोंगापंथी को स्वीकार नहीं करते थे......स्वर्ग, नर्क, धर्म, कर्म, इन सबको वो विज्ञान की कसौटी पर कसकर फेल कर चुके थे..... मैं भी इन सब बातों पर कभी विश्वास नहीं कर पाया. मेरे पिताजी ने कालांतर में जब मेरी माँ की मृत्यु हुई तो पूजा पाठ करना बिल्कुल बंद कर दिया. हालांकि पूजा-पाठ में मेरा बहुत विश्वास कभी नहीं रहा मगर जब उन्होंने पूजा-पाठ करना छोड़ा तो उनके साथ ही साथ मैंने भी पूजा-पाठ को तिलांजलि दे दी. मेरे भाई साहब आज भी नियमित रूप से पूजा करते हैं मगर जब भी उनसे इस बारे में बात होती है तो वो कहते हैं यार... इतने सालों का एक रूटीन बना हुआ है उसे तोड़ने का मन नहीं करता, इसके अलावा और कोई बात नहीं है........स्कूल में पढता था, घर में हर तरह के त्यौहार मनाये जाते थे.... मगर मेरे पिताजी उन त्योहारों के सामाजिक पक्ष पर ही ज़ोर देते थे...... धार्मिक पक्ष को हंसी में उड़ा देते थे.... नतीजा ये हुआ कि मेरे दिमाग़ में भी धीरे धीरे बैठने लगा कि ईश्वर कुछ नहीं होता...... ईश्वर की रचना लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए की और उसके नाम पर अपना पेट भरते हैं. और ९वीं १०वीं कक्षा में पहुँचते पहुँचते पूरी तरह नास्तिक हो गया      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;......इसी समय में मैंने एक तरफ जहां सुकरात, प्लेटो, हैरेक्लिटस जैसे ग्रीक दार्शनिकों को पढ़ना शुरू किया, वहीं सांख्य, बौद्ध, जैन, योग, चार्वाक, मीमांसा, न्याय आदि भारतीय दर्शनों को पढ़ना शुरू किया. इन सबका विवरण देना यहाँ मौजूं नहीं होगा, बस इतना कहूँगा कि सबसे ज़्यादा अपने आपको तर्क पर आधारित कहने वाला न्याय दर्शन भी मुझे कोई रास्ता नहीं दिखा सका और मैं पूरी तरह से नास्तिक हो गया ऐसे में मैंने नीत्शे को पढ़ा तो लगा शायद जो नीत्शे की सोच है वो सच्चाई के ज़्यादा करीब है..... मैं आज भी नास्तिक हूँ .... और मरते दम तक रहूँगा . हालांकि मैं जानता हूँ कि नास्तिक होना कितना तकलीफदेह है? आप के सामने कोई भगवान नहीं हैं, आपको बचाने कोई देवी देवता नहीं आयेंगे और आपके मरने के बाद आपका अस्तित्व मात्र आपके बाद की एक पीढ़ी तक घर में टंगी हुई एक तस्वीर तक सीमित हो जाएगा... वो भी अगर आपकी औलाद लायक हुई तो वरना वो आपकी नहीं, सिर्फ अपनी औलादों की तस्वीरों से अपने घर को सजाना पसंद करेंगे. यानि आपके इस दुनिया से जाने के बाद सब खत्म. आप ने चाहे कैसे भी कर्म किये हों, मृत्यु के पश्चात आपको उनका कोई लाभ नहीं होने वाला है... और आप इस विश्वास के साथ नहीं मर सकते कि ये तो सिर्फ शरीर का बदलना ही है.... मैं फिर से दूसरे जन्म में इस धरती पर आऊँगा..... बहुत डरावना लगता है न ये सोचकर कि मेरी मृत्यु के बाद मेरा कोई वजूद इस दुनिया में नहीं रहेगा.... मैं हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाऊँगा. मगर क्या कर सकते हैं? आपने अपने जीवन का जो दर्शन तय किया है...वो आपकी सोच की जड़ों में इस तरह बैठ चुका होता है कि आप बहोत चाहकर भी नहीं बदल सकते. मेरे रेडियो के कई कार्यक्रमों में मेरी इस विचारधारा का असर साफ़ दिखा भी है और... इस विषय पर अपने साथियों और अफसरों से इस विषय में टकराव भी हुए हैं... मेरा मानना है कि धर्म और ईमान दो अलग अलग चीज़ें हैं. आप धर्म को न मानकर भी ईमानदार हो सकते हैं मगर ईमानदार हुए बिना धार्मिक होने का कोई मायने नहीं है बल्कि ईमान के बिना धर्म का कोई अस्तित्व ही नहीं हो सकता.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;स्कूल में इस विषय पर कभी कोई बात होना बिल्कुल संभव नहीं था. अगर किसी अध्यापक से जीवन, दुनिया, ईश्वर, इन विषयों पर बात करने की कोशिश करते तो वो डांटकर बिठा देते और हंसी उड़ाते कि पढाई तो होती नहीं जीवन को समझने की कोशिश कर रहे हैं.......गणित के हमारे एक अध्यापक थे डी पी मित्तल साहब. बड़े ही लहीम शहीम इंसान. हाथ में हर वक्त एक डंडा. बहुत ही कड़क अध्यापक माने जाते थे. क्लास में हम दो तीन लड़के ऐसे थे जो गणित के पीरियड में दुनिया भर की बातें करने को तैयार रहते थे सिवाय गणित के...... मित्तल साहब ने एक दिन हम दोनों तीनों लड़कों को एक उपाधि दे डाली. उन्होंने कहा... राजा महाराजाओं की सवारी जब चलती है, तो उसमें कुछ बेहद खूबसूरत और सजे धजे घोड़े भी चलते हैं. इन्हें कोतल घोड़े कहा जाता है.... ये और किसी काम के नहीं होते... इनकी सवारी नहीं की जा सकती, इन पर सामान नहीं ढोया जा सकता, ये युद्ध में भी काम नहीं आते. इन्हें तो बस सजा धजाकर रखिये... ये सिर्फ देखने में ही खूबसूरत लगते हैं. आप तीनों मेरे कोतल घोड़े हो.......संगीत और नाटक जैसी विधाओं में हर बार ढेरों तालियां और वाहवाही बटोरने वाले इंसान को कोतल घोड़े की ये उपाधि कैसी लगी होगी, आप समझ सकते हैं. लगा गणित विषय को छोड़ दूं मगर फिर क्या करूँगा? ये समझ नहीं आ रहा था.....ये मेरे जीवन का शायद बहुत कठिन वक्त था.....दिल कर रहा था पढाई छोड़ दूं और कुछ ऐसा काम करूँ जिस में संगीत हो मगर संगीत के आम कलाकारों की जो स्थिति देखता था, उसमें मैं अपने आपको फिट नहीं पाता था. इधर भाई साहब मेडिकल कॉलेज में पहुँच गए थे और घर में सब लोग उन्हें डॉक्टर कहकर पुकारने लगे थे.......आस पास के सभी लोगों की निगाहें अब मुझपर थीं कि मैं क्या लाइन पकडता हूँ..... मेरे ताऊजी के एक लड़के ने तो मेरी माँ से एक दिन कह भी दिया “काकी, राजा (मेरे भाई साहब का घर का नाम) तो खैर मेडिकल कॉलेज में दाखिल हो गया है तो डॉक्टर बन ही जाएगा लेकिन महेन्द्र किसी दिन कुछ बनेगा तब देखेंगे....... देखना... ये हमारी ही तरह रहेगा” ये बात कुछ समय बाद मुझे मेरी माँ ने उस वक्त बताई जब मैं रेडियो नाटक के उस ऑडिशन में पास हुआ जिसमें ३५० लोग बैठे थे और सिर्फ ३ लोग पास हुए थे.......बहुत खुश हुईं थीं वो और मुझे कहा था “लोग चाहे कुछ भी कहें तुम ज़रूर इस लाइन में अपना नाम कमाओगे. ज़रूरी थोड़े ही है कि सब लोग पढाई में ही नाम कमाएँ.” वैसे मैं आपको बता दूं कि हायर सेकेंडरी में मेरे ५५% अंक बने थे. मुझे इन्जीनियरिंग में सिविल ब्रांच मिल रही थी&amp;#160; जो मुझे कतई पसंद नहीं थी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;अब सवाल ये था कि आखिर हायर सेकेंडरी के बाद क्या करूँ मैं? संगीत के पीछे मैं पागल था. मैं चाहता था कि संगीत की शिक्षा लूं मगर मेरा दुर्भाग्य देखिये, उस ज़माने में बीकानेर में लड़कों के कॉलेज में संगीत नहीं था. संगीत सिर्फ और सिर्फ लड़कियों का विषय मन जाता था. अमर चंद जी जैसे कुछ कलाकार थे जो संगीत जानते थे मगर सिखाने में उनकी कोई रुचि नहीं थी. एक दिन मेरा दिमाग पता नहीं कैसे खराब हुआ, मैंने साईकिल उठाई और चल पड़ा महारानी सुदर्शना गर्ल्स कॉलेज की ओर. लड़कियों की कॉलेज में १६-१७ साल के लड़के को अंदर कौन घुसने दे? बाहर खड़े चौकीदार की बहुत मिन्नतें कीं कि बस एक बार मुझे प्रिंसिपल साहिबा से मिला दें. मैं इधर उधर देखूँगा भी नहीं. मैंने यहाँ तक कहा कि वो चाहें तो मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दें ताकि मैं किसी लड़की की तरफ न देख सकूं. आखिर उसे दया आई और वो मुझे प्रिंसिपल के कमरे में ले गया और डरते डरते कहा कि मैडम जी ये लड़का आपसे मिलने की बहुत जिद कर रहा था. उन्होंने जलती हुई नज़रों से मुझे देखा और बोलीं “ पुलिस को बुलाऊँ? जानते हो लड़कियों की कॉलेज के अंदर आना तो दूर आस पास चक्कर लगाना भी जुर्म है और तुम्हें अंदर बंद किया जा सकता है.” मैं घबराया मगर किसी तरह अपनी घबराहट पर काबू पाते हुए टूटे फूटे शब्दों में कहा “ मैडम मैं संगीत पढ़ना चाहता हूँ और संगीत आपकी कॉलेज के अलावा किसी भी दूसरे कॉलेज में नहीं है.”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; “क्या मतलब? क्या तुम्हें लगता है कि तुम यहाँ संगीत पढ़ सकते हो?”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; “मेरी आपसे रिक्वेस्ट है कि चाहे आप मुझे क्लास में मत आने दीजिए मगर इम्तेहान देने के लिए नाम को एडमिशन दे दीजिए क्योंकि लड़के प्रायवेट इम्तेहान भी नहीं दे सकते.”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; उन्होंने संगीत की लेक्चरर को अपने कमरे में बुलाया और कहा “ये लड़का बड़ी जिद कर रहा है कि इसे संगीत विषय के साथ बी ए करना है इसलिए इसे हम यहाँ एडमिशन दे दें.”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; वो लेक्चरर मुस्कुराईं और बोलीं... “ ये कैसे संभव है?”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; मैंने कहा “मैडम कोई रास्ता निकालिए न.....संगीत मेरा जीवन है..... अगर आप लोगों ने मना कर दिया तो मुझसे मेरा जीवन छीन जाएगा.”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; संगीत की मैडम बहुत मुलायमियत के साथ बोलीं.... “ अच्छा बेटे तुम संगीत संगीत कर रहे हो, क्या तुमने संगीत किसी से सीखा है?”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; मैंने कहा “जी नहीं मैडम.”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; वो बोलीं “अच्छा तुम संगीत में क्या कर सकते हो?”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; मैं उस वक्त तक बैंजो, हारमोनियम, बांसुरी बहुत अच्छी तरह बजाने लगा था और सितार, सारंगी और सरोद टूटा फूटा बजाने लगा था. मैं बोला.... आप मुझे संगीत रूम में ले चलिए.... जो कुछ में थोड़ा बहुत कर सकता हूँ आपको उसकी बानगी दिखाता हूँ.” मुझे म्यूजिक रूम में ले जाया गया. साथ में बहुत से लैक्चरर्स का काफिला हो गया था, तमाशा देखने. मुझे एक बार तो लगा... मुझे फांसी के फंदे की ओर ले जाया जा रहा है और ये सारे तमाशबीन मुझे फांसी पर चढाये जाने का तमाशा देखने जा रहे हैं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; हम लोग म्यूजिक रूम में बैठे. मैंने डरते डरते हारमोनियम उठा लिया और मैडम से कहा आप किस सुर से गाएंगी? और क्या गाएंगी? मैं आपके साथ अलग अलग साज़ पर संगत करने की कोशिश करूँगा. उन्होंने बताया कि वो पांचवें काले से गाएंगी और दरबारी गाएंगी. मेरा भाग्य, मुझे एक सितार भी वहाँ मिल गया जो दरबारी के&amp;#160; सुरों में मिला हुआ था औरउनके सुर की बांसुरी भी मिल गयी. अब उन्होंने गाना शुरू किया... मैंने बारी बारी से उनके साथ हारमोनियम, बांसुरी और सितार बजाये. वो लगभग १५ मिनट गाती रहीं और मैं फुर्ती से बदल बदल कर साज़ उनके साथ बजाता रहा...१५ मिनट बाद जब वो रुकीं तो उनकी आँखें भरी हुई थीं... उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरा और बोली” शानाश बेटा शाबाश तुमने ये सब कहाँ सीखा? “ मैं बोला “बस रेडियो के साथ बजा बजा कर, लेकिन मैडम अगर आप बुरा न मानें तो एक चीज़ मैं भी सुनना चाहता हूँ”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; वो बोली “हाँ हाँ ज़रूर, मगर क्या सुनाना चाहते हो?”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; मैंने कहा “ये मैं नहीं आप तय करेंगी”.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; उन्होंने अचरज से पूछा “क्या मतलब?”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; मैंने कहा “ जी मैडम अब हारमोनियम आप उठाइये और कोई भी राग जो आप चाहें छेडिए. मैं उसी राग में गाऊंगा, थोडा बहुत आलाप लूँगा, ख़याल तो शायद मैं नहीं जानता रहूँगा मगर तराना भी गाऊंगा और तानें भी लूँगा.”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; उन्होंने राग ललित छेड़ा और मैं उसमें खो गया.......गाता गया गाता गया.....आँखें बंद करके गाता ही चला गया..... होश तब आया जब मैडम ने हारमोनियम बजाना रोका और पूरा म्यूजिक रूम तालियों की गडगडाहट से गूँज उठा.... मैंने अपनी आँखें खोलीं..... मुझे कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था......तब महसूस हुआ... कि मेरी आँखें आंसुओं से सराबोर थीं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; म्यूजिक की मैडम और प्रिंसिपल मैडम दोनों ने कहा “हम बहुत प्रभावित हैं तुमसे मगर बेटा, हमारी भी कुछ मजबूरियाँ है, हम कुछ नहीं कर सकते.......हाँ हमारे यहाँ जब भी कोई संगीत का प्रोग्राम होगा हम चाहेंगे तुम ज़रूर आओ.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; मैं वहाँ किसी प्रोग्राम का निमंत्रण लेने नहीं गया था........मैंने उन्हें धन्यवाद कहा, उन दोनों के पैर छुए और अपनी साईकिल उठाकर धीरे धीरे कॉलेज के गेट से बाहर निकल गया, इस अहद के साथ कि अब मैं कभी नहीं गाऊंगा......... मैंने संगीत को अपने जीवन से खुरच खुरच कर निकाल फेंका.....अब भी वो खुरचन रह रह कर बहुत दुःख देती है जब उसमें बड़ी गहरी टीस उठती है.     &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;पूरी श्रृंखला एक साथ पढ़ने के लिए &lt;a href="http://radionamaa.blogspot.in/search/label/%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%9F%E0%A4%B8%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B9%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%20%E0%A4%8F%E0%A4%95%20%E0%A4%AE%E0%A4%A8" target="_blank"&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;यहां क्लिक कीजिए&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;। &lt;/font&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-3702777568797670274?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-05-26T09:25:27.779+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/05/9.html</feedburner:origLink></item><item><title>कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन- 8 : महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/YmjwKc-SLRc/8.html</link><category>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन</category><category>mahendra modi</category><category>महेंद्र मोदी</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Wed, 02 May 2012 20:00:49 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-8696202807261208701</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रेडियोनामा पर जानी-मानी रेडियो-शख्सियत महेंद्र मोदी रेडियोनामा पर अपनी जीवन-यात्रा के बारे में बता रहे हैं। तो आज सातवीं कड़ी में पढिए कुछ और यादें।&lt;/font&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;hr /&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;     &lt;br /&gt;अब मैं सादुल स्कूल में पढ़ रहा था. मेरा बैंजो वादन भी चल रहा था. स्कूल में मैं पढाई के लिए कम और अपने बैंजो वादन के लिए ज़्यादा जाना जाने लगा था. पढाई से इतर गतिविधियों में मेरे भाई साहब भी बहुत सक्रिय थे मगर चूंकि वो पढाकू किस्म के रहे, उनका क्षेत्र रहा डिबेट, शतरंज और राजनीति. उन दिनों स्कूल कॉलेज में आज की तरह के चुनाव नहीं होते थे न चुनाव लड़ना सिर्फ गुण्डे बदमाशों का ही काम हुआ करता था. मेरे भाई साहब छोटे कद के हैं, चश्मा छठी-सातवीं कक्षा में ही लग गया था. क्लास में अव्वल आया करते थे. सभी अध्यापकों के अत्यंत प्रिय छात्र. श्री ओम प्रकाश जी केवलिया हम सब के अत्यंत प्रिय अध्यापक थे.....मगर केवलिया साहब के सबसे प्रिय छात्र थे मेरे बड़े भाई श्री राजेन्द्र मोदी. केवलिया साहेब ने उन्हें नाम दिया था “छोटा गांधी”. क्लास में अव्वल आने पर उन्होंने मेरे भाई साहब को एक बहुत ही सुन्दर पुस्तक ईनाम में दी थी “बन्दा बैरागी”. किस प्रकार बन्दा बैरागी देश के लिए शहीद होते है, इस पर पद्य में ये इतनी शानदार किताब थी कि इसकी कुछ पंक्तियाँ मुझे आज भी याद हैं.केवलिया साहब की प्रेरणा से ही भाई साहब स्कूल के प्रधानमंत्री पद के लिए खड़े हुए और बहुत अच्छे अंतर से अपने प्रतिद्वंद्वी सूर्य प्रकाश को मात दी.आदरणीय गुरुदेव ओम प्रकाश जी केवलिया का निधन अभी कुछ ही साल पहले हुआ है.इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ कि हम दोनों भाइयों पर केवलिया साहब का अत्यंत स्नेह रहा, हाँ ये बात और है कि दोनों पर उनके इस अप्रतिम स्नेह के कारण अलग अलग थे. भाई साहब पर उनके स्नेह का कारण उनका पढ़ाई में बहुत अच्छा होना था और मुझ पर उनका स्नेह मेरी स्टेज की गतिविधियों के कारण. हम दोनों भाई आज भी कभी साथ बैठते हैं तो केवलिया साहब को ज़रूर याद करते हैं. एक बात और बताऊँ? उनके सुपुत्र श्री गौतम केवलिया आज भी मेरी फेसबुक के दोस्तों की सूची में मौजूद हैं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;मेरा संगीत प्रेम ज़ोरों पर था. मैं बैंजो तो बजाता ही था, जब भी मौक़ा मिलता, कोशिश करता कि किसी दूसरे साज़ पर भी हाथ आज़माऊँ. मेरे ताऊ जी लोकदेवता राम देव जी के बहुत बड़े भक्त थे. पश्चिमी राजस्थान में रामदेव जी की बहुत मान्यता है. भाद्रपद में भक्तों के जत्थे के जत्थे बीकानेर से एक सौ बीस मील यानि लगभग पौने दो सौ किलोमीटर की पैदल यात्रा करके आज भी जोधपुर ज़िले के रामदेवरा नामक स्थान पर पहुँचते हैं जहां बाबा रामदेव का मंदिर बना हुआ है और एक बहुत गहरी बावली बनी हुई है. इस राम देवरा को बीकानेर और आस पास के क्षेत्रों में रूणीचा कहा जाता है और बावली को हमारे यहाँ बावड़ी कहते हैं. हर&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/-hwp6uI84L7s/T6H01rypvGI/AAAAAAAAEW8/3zcPcNq_-Ts/s1600-h/r6%25255B6%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; border-right-width: 0px" height="186" alt="" src="http://lh6.ggpht.com/-2AJXEUee--k/T6H03SkDJmI/AAAAAAAAEXE/6ROfrGVfrzY/r6_thumb%25255B4%25255D.jpg?imgmax=800" width="246" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; साल दो बार इस जगह मेला भरता है जहां दूर दूर से यात्री आकर इस बावडी में स्नान करते हैं और बाबा के दर्शन करते हैं. अरे ...... इस जगह की एक खास बात तो मैंने आपको बताई ही नहीं. जानते हैं जब आप बाबा रामदेव जी के मंदिर में प्रवेश करते हैं तो मंदिर के अंदर एक मज़ार बना हुआ पाते हैं. सभी लोग इसी मज़ार की पूजा करते हैं और सुबह शाम मज़ार की आरती भी उतारी जाती है. इस मंदिर में जितने हिन्दू तीर्थ करने आते हैं उतने ही मुस्लिम ज़ियारत करने आते हैं. हिदू इन्हें पुकारते हैं “रामदेव बाबा” और मुसलमान इन्हें कहते हैं “राम सा पीर”. आज तो ज़माना बदल चुका है, किसी मंदिर में कोई भी जा सकता है मगर इस मंदिर में कभी भी ऊंच-नीच, छोटे बड़े का भेद-भाव नहीं किया गया और हमेशा से ही हर धर्म, हर जाति के लिए इस मंदिर के द्वार खुले रहे हैं.ये बात कहाँ तक सच है कहा नहीं जा सकता, मगर लोग ऐसा कहते हैं कि यहाँ बहुत बड़े बड़े पर्चे यानि चमत्कार होते थे....बावडी की रचना कुछ इस तरह की है कि ऊपर लोहे का एक जंगला लगा हुआ है, और एक तरफ से सीढियां अंदर तक गयी हुई हैं. कहा जाता है कि जब कोई चमत्कार होना होता था तो उस व्यक्ति को बाबा रामदेव पुकारते थे और वो व्यक्ति भागता हुआ उस बावडी की तरफ जाता था, बावडी के जंगले का दरवाज़ा खुल जता था और वो व्यक्ति उस बावडी में कूद जाता था. कुछ ही पलों बाद वो सीढियां चढ़कर बाहर आता था पूरी तरह स्वस्थ होकर. कहा जाता है के हर साल इस मेले के दौरान इस तरह के कई पर्चे यानि चमत्कार होते थे और कई लोगों की आखें ठीक हो जाती थीं, कई लोगों को हाथ पैर मिल जाते थे और कई लोगों का कोढ़ ठीक हो जाता था. विज्ञान के युग में इस तरह की बातों पर विश्वास होना तो आसान नहीं है मगर बाबा रामदेव में पूरे राजस्थान और गुजरात की अत्यंत श्रद्धा है ये मानना ही पडेगा. मेरे मुम्बई आने पर एक बार संगीतकार आनंद जी से बात हुई तो उन्होंने बताया कि बाबा में उनकी ही नहीं स्वर्गीय कल्याण जी की भी बहुत श्रद्धा थी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;इन्हीं बाबा रामदेव जी के परम भक्त थे मेरे ताऊ जी . हर महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उनके घर एक बड़ा आयोजन हुआ करता था जिसे जम्मा कहा जाता था. पास के ही एक गाँव सुजानदेसर के मंदिर के (जहां ताऊ जी रोज पैदल फेरी देने जाया करते थे ), पांच-सात पुजारी शाम से पहले ही आकर इकट्ठे हो जाया करते थे. ढेर सारी गुड़ की लापसी या चावल और चने की दाल बनती थी और हम सब लोग मिलकर गुड़ की उस लापसी या चावल और दाल के स्वाद का आनंद उठाया करते थे. उसके बाद घर के बाहर बनी हुई एक बड़ी सी चौकी पर जाजम बिछाकर सब लोग बैठ जाते थे. एक थैली में से मजीरे जिन्हें हम छमछमा कहते थे सब बच्चों के हाथ में दे दिए जाते थे, बड़े मजीरों की जोड़ी, ढोलक और खडताल पुजारियों के सुपुर्द कर दी जाती थीं और उसी वक्त ताऊ जी अंदर से निकालकर लाते थे वो चीज़ जो मुझे इस जम्मे में सबसे ज़्यादा आकर्षित करती थी. वो था एक पुराना हारमोनियम, जिसे सिर्फ और सिर्फ जम्मे के दिन ही ओरे (बिल्कुल अंदर के कमरे) में से निकला जाता था. मैं बेमन से छमछमे बजाता रहता था मगर मेरी निगाह हारमोनियम पर अटकी रहती थी. मैं बैंजो तो बजाता ही था इसलिए हारमोनियम बजाना मेरे लिए बहुत मुश्किल नहीं था मगर फिर भी जो चीज़ हमारी पहुँच में नहीं होती वो हमें ज़्यादा आकर्षित करती है. रात भर में कई बार जम्मा देने वाले पुजारियों के लिए चाय बनती और बार बार वो चिलम भी सुलगाते. ऐसे में मुझे मौक़ा मिल जाता हारमोनियम बजाने का. हारमोनियम बजाने वाले पुजारी जी चिलम सुलगाने लगते और कोई भजन शुरू हो जाता तो मैं आँखों ही आँखों में ताऊ जी से पूछता कि हारमोनियम मैं संभाल लूं? और वो आँखों ही आँखों में हामी भर देते थे और इस तरह मैं हारमोनियम संभाल लिया करता था. एक दो भजन तक मैं हारमोनियम बजाता रहता, फिर तो पुजारी जी को सौंपना ही पड़ता. ये जम्मा रात भर चलता था. सुबह सुबह सभी पुजारी वापस सुजानदेसर लौट जाया करते.... घर के सब लोग रात भर जागने के कारण अक्सर दूसरे दिन आराम करते मगर मेरे लिए वो दिन आराम करने का नहीं होता था क्योंकि उसके बाद तो वो हारमोनियम फिर से ओरे में रखा जाना होता था.... वही एक दिन होता था जब मैं पूरी आजादी के साथ हारमोनियम बजा सकता था. इस प्रकार हारमोनियम पर भी मेरा हाथ थोड़ा साफ़ होने लगा था. लेकिन ये सब तभी हो पाता था जब छुट्टियों में ताऊजी परिवार सहित बीकानेर में रहते थे.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;उन दिनों सेवानिवृत्ति की उम्र ५८ वर्ष थी. अचानक राजस्थान सरकार ने सेवानिवृत्ति की उम्र घटा कर ५५ वर्ष कर दी. हजारों लोग जो ५५ और ५८ के बीच के थे..... एक साथ घर भेज दिए गए. इन हजारों लोगों में मेरे ताऊजी भी शामिल थे. अब उन्हें बीकानेर लौटना ही था.ताऊ जी के तीन बड़े बेटे पहले से ही बीकानेर में रहने लगे थे, अब ताऊजी, ताई जी, गणेश भाई साहब, विमला, रतन, निर्मला और मग्घा को लेकर बीकानेर आ गए थे. विमला, निर्मला और मग्घा का दाखिला महिला मंडल स्कूल में और रतन का दाखिला सादुल स्कूल में करवा दिया गया मगर ताऊजी के आमदनी के स्रोत बहुत सीमित हो गए थे.बहुत सिद्धांतवादी रहे वो जीवनभर. उन्होंने कभी भी ट्यूशन व्यवस्था को बढ़ावा नहीं दिया. बोर्ड से उनके पास इम्तहानों की कॉपियां आया करती थीं जो सेवानिवृत्ति के बाद भी चालू रह सकती थी मगर नौकरी के आखिरी दिनों में पदमपुर में अपनी ही एक औलाद के हाथों वो कुछ इस तरह छले गए कि उनके हाथ से आमदनी का ये स्रोत हमेशा के लिए छिन गया. अब उन्होंने एल एल बी की अपनी डिग्री को झाड़ पोंछकर निकाला और वकालत शुरू कर दी. बड़े ही जीवट के इंसान थे वो. बहुत सी भाषाओं पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी. वो संस्कृत, पालि और प्राकृत के भी बहुत अच्छे विद्वान थे और उनका हस्तलेख ऐसा सुन्दर था कि उसके सामने छपे हुए शब्द भी फीके लगते थे. शाम के वक्त मैं देखता वो पालि और प्राकृत भाषाओं के हस्तलिखित ग्रंथों की अपने हाथ से हूबहू वैसी ही प्रतियां बनाया करते थे.......उन्होंने मुझे बताया कि बीकानेर में अगर चंद नाहटा जी की पांडुलिपियों की एक लायब्रेरी है. वो उस लायब्रेरी में मौजूद ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ बनाकर रख रहे हैं ताकि शोधकर्ताओं को मूल पांडुलिपियों को छूना न पड़े.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;ताऊजी जब छुट्टियों में बीकानेर आते थे तो रतन, निर्मला और मग्घा तीनों अक्सर या तो मेरे घर रहते थे या फिर मैं उनके घर मगर रतन तो हर हाल में मेरे साथ ही रहता था. उन दिनों पता नहीं कैसे बीकानेर में मच्छर नाम की कोई चीज़ नहीं हुआ करती थी. गर्मी में मैं और रतन अपने मालिये (छत पर बना कमरा) की छत जिसे तिप्पड कहते हैं उसपर सोया करते थे.........रात को जब हम दोनों अपने बिस्तर उठाये तिप्पड पर पहुँचते, चारों तरफ बिल्कुल शान्ति होती तो कई बार उस शान्ति को चीरती हुई एक सुरीली आवाज़ हमारे कानों से टकरा जाती और हम एक साथ या तो चिल्ला पड़ते “जगदीश जी”....... या फिर और भी ज़ोर से चिल्ला पड़ते&amp;#160; “सोहनी बाई”. और बिस्तर तिप्पड पर जैसे तैसे फेंककर नीचे उतरते, एक दरवाज़े पर ताला लगाते और चल पड़ते शब्दभेदी बाण की तरह उस आवाज़ की दिशा में और सचमुच हम कभी रास्ता नहीं भूलते थे.........और जा पहुँचते थे अपने लक्ष्य तक.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;उन दिनों जोधपुर के एक कलाकार थे मोहनदास निम्बार्क जो जगह जगह घूम घूमकर रामदेव जी की कथा किया करते थे. अच्छा गाते थे मोहनदास जी मगर हमें जो चीज़ उनके गाने में चुम्बक की तरह खींचती थी वो थी उनके साथ बजने वाले क्लेरियोनेट की मधुर आवाज़. हम लोग जिस दिन पहली बार ये कथा सुनने पहुंचे तो देखा.... दरम्याने कद का दुबला सा एक इंसान आखें बंद किये बड़ी तन्मयता से क्लेरिओनेट जैसे मुश्किल साज़ पर कुछ इस तरह अंगुलियां घुमा रहा है, जैसे कोई कुशल तैराक बड़े सुकून से किसी स्वीमिंग पूल में तैर रहा हो. मैं और रतन मंत्रमुग्ध क्लेरिओनेट की उस मधुर आवाज़ को सुनते रहे. थोड़ी देर में कलाकार ने आँखे खोलीं. हम सबसे आगे बैठे हुए थे. आँखें खोलते ही उनकी नज़र हमारे मंत्रमुग्ध चेहरों पर पड़ी.... वो मुस्कुरा पड़े. हम जैसे निहाल हो गए........ सुबह चार बजे तक हम वो कथा सुनते रहे. जब कथा समाप्त हुई तो क्लेरिओनेट के वो सुरीले कलाकार उठकर हमारे पास आये क्योंकि वो समझ गए थे कि हम उन्हें सुनने के लिए ही बैठे थे. अब हमारा परिचय हुआ. उन्होंने बताया कि उनका नाम जगदीश है और वो एक बैंड में काम करते हैं....... हमारे पास तो अपना परिचय देने के लिए था ही क्या? सिवा इसके कि हम दोनों एक अच्छे घर के बच्चे हैं और पढ़ाई कर रहे हैं. बस उस दिन से जब भी जगदीश जी की क्लेरिओनेट की मधुर तान हमारे कानों में पड़ती थी हम भागे चले जाते थे उन्हें सुनने के लिए और अक्सर उनसे बात होती थी. ये दोस्ती जो मेरे छात्र जीवन में शुरू हुई वो तब तक चलती रही जब तक जगदीश जी परिस्थितियों से जूझते हुए क्लेरिओनेट जैसे मुश्किल साज़ को अपनी साँसों की भेंट चढाते रहे..... आखिरकार उसी क्लेरिओनेट ने बड़ी बेरहमी से उनकी साँसों को लील लिया जिसपर तैरती हुई उनकी अंगुलियां उस बेजान क्लेरिओनेट को साक्षात् सरस्वती में बदल देती थीं.......मगर अफ़सोस.....मैं उनके लिए बहुत कुछ करना चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया.      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;मैंने जब आकाशवाणी ज्वाइन किया ....और १९७७ में बीकानेर ट्रान्सफर होकर आया तो बहुत कोशिश की कि जगदीश जी को किसी तरह स्टाफ आर्टिस्ट के तौर पर ले लिया जाए मगर मैं कुछ नहीं कर पाया क्योंकि तब तक वो बहुत कमज़ोर हो गए थे और विभाग की अपनी कुछ सरकारी किस्म की मजबूरियाँ थीं. आप शायद जानते होंगे कि इस तरह के साज़ बजाने वालों के फेफड़ों पर बहुत ज़ोर पड़ता है....उनके लिए ज़रूरी है कि वो अच्छा और संतुलित खाना खाएं वरना टी बी के कीटाणु तो हर वक्त वातावरण में रहते हैं, जैसे ही शरीर की शक्ति कम हुई वो तुरंत उस शरीर को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं. आज टी बी का इलाज बहुत आसान है, बहुत मुश्किल तब भी नहीं था मगर अच्छा खाना उस वक्त भी इलाज की पहली शर्त थी और आज भी है........आखिर वो सुरीला कलाकार अपने उस साज़ की ही भेंट चढ गया जिसे वो अपनी ज़िंदगी से ज्यादा प्यार करता था. मुझे आज भी याद है, जैसी कि मेरी आदत थी कि मैं हर साज़ को बजाने की कोशिश किया करता था, छात्र जीवन में, एकाध बार मैंने जगदीश जी से क्लेरिओनेट लेकर बजाने की कोशिश की तो उन्होंने क्लेरिओनेट देने से मना तो नहीं किया लेकिन वो बोले..... “नहीं महेन्द्र जी ....आपके लिए और बहुत साज़ हैं..... आप कुछ और बजाइए.... ये साज़ ज़िंदगी का साज़ नहीं.... मौत का साज़ है”. उस वक्त मैं कुछ नहीं समझा था कि जगदीश जी ने ऐसा क्यों कहा मगर थोड़ा बड़ा हुआ तो बहुत से फूँक का साज़ बजाने वाले कलाकारों का हश्र देखा तो उनकी बात समझ में आई.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;दूसरी आवाज़ जिसे सुनकर मैं और रतन खुशी से चिल्ला पड़ते थे......वो थी सोहनी बाई की आवाज़. दुबली पतली काया. चेहरे पर हल्का सा घूंघट और हाथ में तम्बूरा लिए हुए बड़ी सादगी से तान खींचती हुई सोहनी बाई.......हम लोग आवाज़ की सीध में भागते हुए जा पहुँचते थे उस जागरण में जहां सोहनी बाई गा रही होती थीं..... लगता था मीरा फिर से अवतार लेकर आ गयी हों इस धरती पर. सच बताऊँ मेरे जीवन में तीन लोगों में मुझे मीरा के दर्शन हुए हैं. जुथिका रॉय जी, सोहनी बाई और श्रीमती महादेवी वर्मा. महादेवी जी के साथ अपने अनुभव मैं तब लिखूंगा जब कि आकाशवाणी इलाहाबाद की बातें लिखूंगा........ सोहनी बाई की आवाज़ में कोई खास हरकत या गायकी नहीं थी, बहुत ही सीधा सीधा गाती थीं वो मगर दो चीज़ें ऐसी थीं जो उनके गाने को खास बना देती थीं. एक उनकी आवाज़ में ग़ज़ब का मिठास था और दूसरा समर्पण..... वो सिर्फ लोक भजन गाती थीं और उनका भजन सुनकर ऐसा लगता था कि ईश्वर के प्रति वो इस क़दर समर्पित हो गयी हैं कि स्वयं उनकी आत्मा परमात्मा का हिस्सा हो गयी हैं. मेरे कानों में आज भी उनका वो भजन गूँज रहा है “म्हाने अबके बचा ले म्हारी माय बटाऊ आयो लेवाने.....”&amp;#160; सीधा सीधा शब्दार्थ लें तो एक बेटी अपनी माँ से कह रही है कि हे माँ तेरा दामाद मुझे लेने आ गया है तू मुझे इस बार बचा ले...... मगर दरअसल ये माँ, दामाद और बेटी, ये सब तो प्रतीक हैं. मृत्यु के आगमन पर इस दुनिया से जाती हुई आत्मा वेदना से तडपती है और कहती है... कोई तो मुझे मृत्यु से बचा ले.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;मैं और रतन सोहनी बाई के भजन सुनने बैठते तो कब सुबह हो जाती हमें पता ही नहीं चलता. इसके बरसों बाद १९७७ में जब मैं उदयपुर से ट्रान्सफर होकर बीकानेर आया और सबसे पहली बार सोहनी बाई को रिकॉर्ड किया तो मुझे लगा मेरा जीवन धन्य हो गया...... न कोई आलेख, न कोई कागज़ का टुकड़ा, न कोई लंबा चौड़ा लवाज़मा. बस हाथ में एक तम्बूरा और एक ढोलक.... कभी कभी दयाल पंवार जैसे कोई कलाकार हारमोनियम लेकर बैठ गए तो ठीक नहीं तो किसी साज़ की मांग नहीं.....&amp;#160; हर भजन के आखिर में या तो आता था “कहे कबीर सुनो भाई साधो....” या फिर “मीरा के प्रभु गिरधर नागर.......” अब ये पूछने की तो गुंजाइश ही नहीं रहती कि ये किसका भजन है. एक बार मैंने पूछा “बाई आपको इतने भजन याद कैसे रहते हैं? ये जो आपने अभी गाया वो मीरा का भजन था?” वो बड़ी सरलता से बोलीं.... “हुकुम.... मीरा बाई रो ई है (हुकुम मीरा बाई का ही है.)मैंने कहा “लेकिन कभी सुना नहीं ये भजन. वो थोड़ा घबरा गईं और बोलीं “अन्दाता म्हनै कीं ठा नईं है (अन्नदाता मुझे कुछ भी पता नहीं है) अब मैं चकराया. मैंने फिर भी मुलायमियत से कहा “बाई कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप खुद भजन लिख लेती हैं और मीरा बाई और कबीर दास जी के नाम से गा देती हैं ....घूंघट की ओट से वो हलके से मुस्कुराईं और बोलीं “म्हारी काईं औकात सा ? मैं तो साफ़ अनपढ़ हूँ.म्हने दसतक करना ई कोनी आवै. हूँ काईं लिख्सूं ? (मेरी क्या औकात साब? मैं तो बिल्कुल अनपढ़ हूँ. मुझे तो दस्तखत करने भी नहीं आते. मैं भला क्या लिख सकती हूँ?) मैंने कहा “सच सच बताइये कि फिर आखिर बात क्या है?” तो वो हाथ जोड़कर बोलीं&amp;#160; “भगवान री सौगन म्ह्नै कीं ठा नईं है. हूँ तंदूरो नईं उठाऊँ जद तईं म्हनै कीं पतों नईं रैवे कि मैं काईं गासूं पण तंदूरो उठाता ईं बा मावडी या बो बाबो जाणै हिवडेमें काईं उपजावै के आप ऊं आप जिको म्हारै मूंडै मैं आवै हूँ गा दूं.... (जब तक मैं तंबूरा नहीं उठाती हूँ, मुझे कुछ पता नहीं होता कि मैं क्या गाऊंगी मगर बस तम्बूरा हाथ में लेते ही या तो वो माँ(मीरा) या वो बाबा(कबीर) हिवडे में उतर के जो कुछ उसमें उपजा देते हैं, मैं गाती चली जाती हूँ......) हुकुम जिकी चीज नै हूँ समझूं ई नईं बा म्हारी कियां हूँ सकै? बा या तो बीं मावडी री हू सकै या फेर बीं बाबै री (हुकुम जिस चीज़ को मैं समझ ही नहीं सकती वो चीज़ मेरी कैसे हो सकती है? वो या तो उस माँ मीरा बाई की हो सकती है या फिर उस बाबा कबीर दास की). उनकी आवाज़ से लगा उनकी आँखें छलछला आई हैं. मुझे लगा इस विषय में और कुछ कहना उनका दिल दुखाना होगा. वैसे भी मीरा बाई तो राजस्थान की धरती पर पैदा हुईं थीं मगर देश के हर हिस्से में मीरा बाई के भजन लोक कलाकारों द्वारा अलग अलग रूप में गाये जाते रहे हैं...... कौन कह सकता है कि कौन कौन से भजन उनके खुद के रचे हुए हैं और कौन कौन से भजन महज़ उनके ऊपर घनघोर आस्था रखने वाले लोक कलाकारों के हृदयों ने रच दिए हों. मैंने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और.....मुझे लगा, मुझे आज मीरा बाई के दर्शन हुए हैं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;     &lt;br /&gt;&lt;iframe src="http://w.soundcloud.com/player/?url=http%3A%2F%2Fapi.soundcloud.com%2Ftracks%2F45139743&amp;amp;show_artwork=true" frameborder="no" width="100%" scrolling="no" height="166"&gt;&lt;/iframe&gt;      &lt;br /&gt;आज वो सोहनी बाई हमारे बीच नहीं हैं.... राजस्थान के बाकी केन्द्रों पर तो उनकी शायद ही कोई रिकॉर्डिंग होगी, पता नहीं आकाशवाणी बीकानेर पर भी उनके भजनों के कितने टेप्स इरेज़ कर, उनपर कमर्शियल रिकॉर्ड कर लिए गए होंगे क्योंकि अब तो आकाशवाणी के हर केन्द्र पर पैसा कमाने पर ही ज़ोर दिया जाता है ना? आकाशवाणी कभी कला और कलाकारों का अवश्य ही पोषक रहा है मगर पिछले काफी समय से ज़्यादातर इस पर अधकचरे अफसर ही काबिज रहे हैं, जिन्हें न कला की समझ होती है और न ही अफसरी की तमीज़ वरना डेढ़ डेढ़ घंटे तक के मेरे पचासों ऐसे नाटक एक ही दिन में श्याम प्रभू एरेज़ नहीं करवा देते जिन्हें तैयार करने में कोटा के ३०-४० कलाकारों ने एक एक महीने का वक्त दिया था . खैर...... ये कहानी फिर सही.........&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;हां...... अब भी जब कभी बीकानेर जाता हूँ और इत्तेफाक से रतन भी श्री गंगानगर से आया हुआ होता है, हम दोनों छत पर जाकर लेटते हैं तो दिल करता है, काश एक बार फिर जगदीश जी की क्लेरिओनेट की मधुर आवाज़ या फिर सोहनी बाई की ह्रदय के अंदर तक उतर जाने वाली तान सुनाई दे जाए........... मगर बीछवाल औद्योगिक क्षेत्र में बने हमारे नए घर की छत पर पूरी रात या तो कारखानों की खर्र खट खर्र खट सुनाई देती है या फिर पास ही बने लालगढ़ रेलवे स्टेशन पर खड़ा कोई डीज़ल इंजन बीच बीच में चीख पड़ता है.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;पूरी श्रृंखला एक साथ पढ़ने के लिए &lt;a href="http://radionamaa.blogspot.in/search/label/%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%9F%E0%A4%B8%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B9%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%20%E0%A4%8F%E0%A4%95%20%E0%A4%AE%E0%A4%A8" target="_blank"&gt;यहां क्लिक करें।&lt;/a&gt; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-8696202807261208701?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-05-03T08:30:49.351+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh6.ggpht.com/-2AJXEUee--k/T6H03SkDJmI/AAAAAAAAEXE/6ROfrGVfrzY/s72-c/r6_thumb%25255B4%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/05/8.html</feedburner:origLink></item><item><title>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन-7: महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/p1A-Drb_GmI/7.html</link><category>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन</category><category>mahendra modi</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Sat, 07 Apr 2012 07:25:20 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-1275390215564759628</guid><description>&lt;p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;color:#0000ff;"&gt;रेडियोनामा पर जानी-मानी रेडियो-शख्सियत महेंद्र मोदी रेडियोनामा पर अपनी जीवन-यात्रा के बारे में बता रहे हैं। तो आज सातवीं कड़ी में पढिए कुछ मार्मिक यादें।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;  &lt;hr /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;जिस उम्र में स्कूल में पेन-पेन्सिल खो जाना या होम वर्क न कर पाने पर अध्यापक की डांट पड़ जाना या फिर किसी खिलौने का टूट जाना बहुत बड़ी दुर्घटना लगती है, उस उम्र में मैंने अपने प्यारे दोस्त कल्याण सिंह को इस तरह खो दिया था. मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये आखिर हुआ क्या है? मौत से ये मेरा पहला आमना-सामना था.......नहीं नहीं..... शायद ये कहना ठीक नहीं होगा कि मौत से ये मेरा पहला साबका था क्योंकि सरदार-शहर के कसाइयों के उस मोहल्ले में,कोठरी में बंद झुण्ड में से छांट कर लाने से लेकर ज़िबह किये जाने और जान निकलने तक लम्हा लम्हा मरते हुए उन बेजुबान जानवरों को अपनी खिड़की से न चाहते हुए भी मैं रोज देखा करता था.......वो छटपटाते थे मौत के पंजों से बचने के लिए मगर........मौत अट्टहास कर उठती थी और वो तब तक चीखते रहते थे जब तक कि .........आधी कटी गर्दन से उबलता हुआ खून धरती को पूरी तरह भिगो नहीं देता था.......कुछ ही देर में उनकी आँखें पथरा जाती थीं और कुछ हाथ तैयार हो जाते थे गर्दन को धड से अलग कर खाल उतारने के लिए. पास की कोठरी में बंद बाकी बकरे जो इतनी देर तक सांस रोके उस कट रहे बकरे की चीखें सुन रहे होते.... अब मिमियाने लगते थे....इसी उम्मीद में कि शायद... आज उनकी जान बच गयी......&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;न जाने क्या हो गया था मुझे, जब भी किसी कसाई के घर में कोई बकरा कटता, उसकी हर चीख के साथ मेरी आँखों के सामने कल्याण सिंह का चेहरा उभर आता और मुझे लगता कुछ हाथ उसे कसकर पकडे हुए हैं और दो हाथ धीरे धीरे उसका गला रेत रहे हैं और.... और..... उन कई जोड़ा हाथों में से एक जोड़ा हाथ मेरे भी हैं.........मैंने ही थाम रखा है उसके जिस्म को और कोई रेत रहा है उसका वो मासूम गला जिसने अपने जीवन के १२ सावन भी नहीं देखे थे....... और मैं चौंक कर जाग जाता था..... देखता मैं छत कि मुंडेर पर खड़ा हूँ और मुझे माँ और पिताजी ने दोनों तरफ से थाम रखा है. मैं पूछता “......क्या हुआ?” पिताजी कहते “कुछ नहीं, तुम सो जाओ.” और मैं अपने बिस्तर पर आकर सो जाता.... हर रोज यही सिलसिला..... मैं आधी रात को उठकर चल पड़ता था उस ओर जिधर से कल्याण सिंह की चीखें मुझे बुलाती थीं ........ माँ और पिताजी परेशान हो गए थे क्योंकि जिस छतपर हमलोग सोते थे उसकी दीवारें बहुत छोटी थीं. पूरी रात वो दोनों जागते रहते थे क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं ऐसा न हो, उनकी आँख लग जाए और नींद में चलते हुए मैं उस छोटी सी दीवार से नीचे गिर जाऊं.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;पिताजी मुझे लेकर स्कूल गए.....स्कूल के प्रधानाध्यापक जी ने बहुत स्नेह से मेरी पीठ पर हाथ रखा और कहा “बेटा तुम तो बहुत बहादुर बच्चे हो, जाओ, अपनी क्लास में जाओ.” मैं अपनी क्लास में पहुंचा, देखा सबसे आगे की लाइन में दूसरी डेस्क पर बैठा हुआ कल्याण सिंह मुस्कुराते हुए मुझे बुला रहा है. मुझे लगा “मैं यूं ही डर रहा था... कल्याण सिंह तो वहीं बैठा है ... अपनी पुरानी जगह पर....” मैं डेस्क पर पहुंचा तो अचानक कल्याण सिंह चीख पड़ा...... ये चीख बिल्कुल वैसी ही थी जैसी मैं हर रोज अपने घर की खिड़की में खड़े होकर अपने आस पास के घरों में से आते हुए सुनता था.... मुझे लगा कोई कल्याण सिंह के गले पर छुरी फेर कर उसे रेत रहा है और कल्याण सिंह के गले से एक दबी हुई चीख निकल रही है..... मुझे चक्कर सा आया और मैं बेहोश होकर गिर पड़ा.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;मुझे होश आया तो मैं घर पर था. पिताजी माँ से कह रहे थे “तुम लोग बीकानेर चले जाओ, मुझे नहीं लगता कि महेन्द्र को इन हालात में यहाँ रहना चाहिए.” मैं आँखें बंद किये हुए ये सब सुन रहा था.......पता नहीं कब फिर मेरी आँख लग गयी. जब आँख खुली तो देखा सुबह का समय था वो.... मैं शायद पूरी रात सोता रहा था मगर आज भी याद है मुझे... मैं उस पूरी रात कल्याण सिंह के साथ था, कभी स्कूल के प्ले ग्राउंड में, कभी प्रार्थना स्थल पर और कभी क्लास में उस छोटे से डेस्क पर उस से बिल्कुल सटकर बैठे हुए.........मुझे बाद में पिताजी ने एक बार बताया कि दरअसल उस पूरी रात में बिस्तर पर नहीं सोया था, इधर से उधर टहलता रहा था.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;आखिरकार मुझे लेकर मेरी माँ बीकानेर लौट आईं. भाई साहब पहले से ही यहाँ ताऊजी यानि ‘बा’ के घर राम भाई साहब और गायत्री भौजाई के पास रह रहे थे. मेरा दाखिला फिर से गंगा संस्कृत स्कूल में करवा दिया गया...... करनी सिंह, आशुतोष कुठारी झंवर लाल व्यास और दूसरे दोस्तों ने देखा कि मैं बदल गया हूँ, बिल्कुल बदल गया हूँ. इस दुर्घटना ने एक ही झटके में, बड़ी बेरहमी से जैसे मुझसे मेरा बचपन छीन लिया था. ऐसे में मुझे बहुत बड़ा मानसिक सहारा दिया, मेरे प्रधानाध्यापक पंडित गँगाधर शास्त्री जी ने. उन्होंने देखा कि खेलकूद में मेरी रुचि बिल्कुल खत्म हो गयी थी और मैं बहुत गंभीर रहने लगा था. उन्होंने मेरे बदले हुए स्वभाव को समझते हुए, मुझे कुछ बहुत अच्छी अच्छी पुस्तकें दीं और कहा “देखो बेटा, जब मन बहुत अशांत हो तो ये पुस्तकें पढ़ा करो...... मन को बहुत शान्ति मिलेगी.” और सचमुच उन पुस्तकों ने मुझे बहुत संभाला. पुस्तकें मेरी सबसे अच्छी दोस्त बन गईं. पुस्तकें पढ़ने की ऐसी आदत लग गयी कि अपने ३६ बरस के कार्यकाल में  जिस जिस केन्द्र पर  मेरी पोस्टिंग रही, मैंने वहाँ की लायब्रेरी को पूरी तरह से पढ़कर ही छोड़ा. इसी बीच पण्डित जी ने मुझे तैयारी करवा कर संस्कृत की दो परीक्षाएं और पास करवा दीं, “संस्कृत प्रबोध” और “संस्कृत विनोद”. इस तरह सातवीं क्लास में मैंने संस्कृत में स्नातक स्तर की परीक्षा पास कर ली थी. यहीं से भाषाओं के प्रति मेरे मन में रुचि जागनी शुरू हो गयी. आगे जाकर मैंने बाक़ायदा उर्दू और पंजाबी सीखी, टूटी फूटी रूसी अपने “बा” की मदद से और जर्मन अपने इलाहाबाद प्रवास के दौरान विभास चंद्र की सहायता से सीखी.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;सातवीं क्लास पास करने के बाद मैंने एक बार फिर स्कूल बदला. घर में सबकी राय थी कि चूंकि नौवीं क्लास में मुझे साइंस लेनी है, बेहतर ये होगा कि मैं आठवीं में ही सादुल स्कूल ज्वाइन कर लूं ताकि एक साल में मैं अपने आपको नए स्कूल के वातावरण में ढाल सकूं. स्कूल बदलना मुझे हमेशा तकलीफ देता था, इस बार भी मैं थोड़ा परेशान हुआ, मगर इत्तेफाक से  श्याम सुन्दर मोदी, श्याम प्रकाश व्यास, ब्रजराज सिंह जैसे कुछ पुराने दोस्त जो मेरे साथ राजकीय प्राथमिक पाठशाला संख्या ९ में थे, यहाँ मुझे मिल गए थे. इनके साथ साथ शशि कान्त पांडे और हरि प्रसाद मोहता जैसे कुछ नए दोस्त भी बन गए. आगे जाकर यही शशि आकाशवाणी में भी न केवल मेरा सहकर्मी बना बल्कि, न जाने किस किस तरह की कितनी मुसीबतों में उसने रेडियो के लोगों के मिज़ाज के बिल्कुल खिलाफ एक सच्चे दोस्त की तरह मेरा साथ दिया. मैं जब आकाशवाणी, बीकानेर में था तो क़मर भाई ने एक बार कहा था, रेडियो में सहकर्मी तो खूब मिलेंगे तुम्हें, मगर रेडियो में दोस्त ढूँढने की कोशिश कभी मत करना. जब भी ऐसा करोगे, याद रखना एक गहरी चोट खाओगे. क़मर भाई के बारे में विस्तार से आगे चलकर लिखूंगा, जब आकाशवाणी बीकानेर की बात चलेगी, अभी तो यही कहूँगा कि उन्होंने बिल्कुल सही सीख दी थी मुझे. ३६ साल की नौकरी में, कई बार क़मर भाई की सीख को भुलाकर भी मैं अपने रेडियो के सहकर्मियों में से कुल २० दोस्त भी नहीं जुटा सका.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;इसी बीच एक और तब्दीली आई मेरी ज़िंदगी में. मेरे छोटे मामाजी जो पहले जयपुर में रहते थे, अब बीकानेर आ गए थे. उनका दिमाग तकनीकी कामों में बहुत चलता था. उन्होंने बीकानेर आकर एक स्टील फ़र्नीचर का कारखाना लगाया......आर सी ए इंडस्ट्रीज़. ये कारखाना मेरे स्कूल और घर के बीच में पड़ता था. मामाजी के कारखाने में अच्छा खासा स्टाफ था मगर मामाजी खुद भी हमेशा मशीनों से जूझते रहते थे. स्कूल से लौटते &lt;a href="http://lh3.ggpht.com/-RwRxzYkfZ-U/T3u-EvcN9PI/AAAAAAAAELI/0wEHVVs0MPQ/s1600-h/radio-tower%25255B3%25255D.gif"&gt;&lt;img title="radio-tower" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" alt="radio-tower" src="http://lh4.ggpht.com/-If8YQHrcul0/T3u-GAhAlHI/AAAAAAAAELQ/3IBc2-US3RI/radio-tower_thumb%25255B1%25255D.gif?imgmax=800" align="right" border="0" height="222" width="240" /&gt;&lt;/a&gt; हुए मैं अक्सर उनके कारखाने में रुक जाया करता था और वो जो भी काम कर रहे होते थे, मैं उस काम में उनका हाथ बंटाने लगता. मुझे बड़ा अच्छा लगता था मशीनों को खोलना, उन्हें ठीक करना और फिर वापस वैसे का वैसा जोड़ देना. उन दिनों घर में अक्सर ये चर्चा चलती थी कि नौवीं कक्षा में मुझे क्या विषय लेने हैं.मामाजी ने सलाह दी कि मुझे गणित विषय लेकर इंजीनियरिंग में जाना चाहिए क्योंकि मेरा दिमाग इस तरह के कामों में अच्छा चलता था. इस तरह मामाजी के उस कारखाने में कभी कभार उन मशीनों से जूझते हुए मेरे जीवन की दिशा तय होने लगी. मैंने नौवीं में गणित ली भी और इंजीनियरिंग में दाखिला भी लगभग ले ही लिया था मगर होनी को तो मुझे माइक्रोफोन के सामने लाकर खड़ा करना था जहां मुझे अपने अनगिनत श्रोताओं से जुड़ना था. मगर मशीनों में इस रुचि ने मुझे रेडियो के मेरे पूरे जीवन में बहुत से नए नए अनुभव भी दिए, कई बार लताड़ भी पड़वाई और कई अवसरों पर शाबाशी भी दिलवाई. हालाँकि जीवन भर अपने अधिकाँश इंजीनियर साथियों से मेरे अच्छे सम्बन्ध रहे मगर मशीनों से जूझ जाने की इसी आदत की बदौलत मुझसे पंगा लेने वाले कुछ इंजीनियरों को कई बार मैंने मज़ा भी चखाया. यहाँ एक मज़ेदार किस्सा याद आ रहा है जो हालाँकि मुझे कुछ आगे जाकर लिखना चाहिए था, जबकि मैं आकाशवाणी बीकानेर के अपने कार्यकाल की बात करता मगर कहीं ऐसा न हो कि एक बार रेडियो ज्वाइन करने तक पहुँच कर कैक्टस के काँटों में इतना उलझ जाऊं कि ऐसी हल्की फुल्की बातें ज़ेह्न से ही उतर जाएँ.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;ये बात है सन १९७७-७८ की. मैं आकाशवाणी, बीकानेर में ट्रांसमिशन एक्जेक्यूटिव था. हमारे स्टेशन इंजीनियर थे श्री घनश्याम वर्मा. पूरे सफ़ेद बाल, गोरे चिट्टे, कड़क आवाज़. कुल मिलाकर प्रभावशाली व्यक्तित्व. आकाशवाणी में जहां प्रोग्राम स्टाफ और इंजीनियरिंग स्टाफ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता आया है वहीं कभी कभी कुछ ऐसे अफसर आ जाते हैं जो इंजीनियरिंग और प्रोग्राम स्टाफ के बीच खाई पैदाकर अपने आपको महान साबित करने की कोशिश करते हैं. इत्तेफाक से वर्मा साहब उसी तरह की ज़ेहनियत के इंसान थे. मशीनों के मामले में वो आकाशवाणी का सबसे बुरा समय था. जापान के निप्पन रिकॉर्डर जा रहे थे और थोक के भाव न जाने किस किस स्तर पर रिश्वत खा खिलाकर उसके बलबूते पर एकदम कचरे से भी गए गुज़रे बैल के रिकार्डर और डैक आकाशवाणी में भर दिए गए थे. बेचारे इंजीनियरिंग एसिस्टेंट और टेक्नीशियन रात और दिन उन्हें ठीक करने में ही जुटे रहते थे. हम प्रोग्राम के लोग इन मशीनों पर काम करते करते इनकी बहुत सी कमजोरियों को जान गए थे. एक दिन एक मशीन कुछ गडबड कर रही थी. बहुत माथापच्ची चल रही थी. वर्मा साहब भी वहीं मौजूद थे कि न चाहते हुए भी मेरे मुँह से एक जायज़ सी राय निकल गयी....... बस मेरा बोलना था और वो चिल्ला पड़े “आप चुप रहिये मिस्टर मोदी, ये इंजीनियरिंग का मामला है, इसमें अपनी टांग मत अड़ाइये.” मेरा चेहरा उतर गया......पन्द्रह बीस लोगों के बीच उन्होंने मेरा पानी उतार दिया था. मैंने  धड़ाम से स्टूडियो का दरवाज़ा बंद किया और बाहर आ गया. शुरू से मिज़ाज थोड़ा गर्म ही रहा...... इस तरह बेइज्ज़त होना बहुत खल गया और मैं वर्मा साहब को झटका देने का रास्ता तलाशने लगा.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;हम लोगों को रोज शाम को ५.५५ पर दिल्ली से और ६.०० बजे जयपुर से आनेवाला कार्यक्रम विवरण रिकॉर्ड करना होता था ताकि अगर कोई महत्त्वपूर्ण दिल्ली या जयपुर से आनेवाला है तो हम अपने कार्यक्रमों को निरस्त कर उन कार्यक्रमों को रिले  करने का निर्णय ले सकें.कार्यक्रम विवरण की ये रिकॉर्डिंग डबिंग रूम में की जाती थी जिसमें तीन रिकार्डर लगे रहते थे. हर स्टूडियो की लाइन इस रूम में आती थी और एक कंसोल पर कुछ बटन लगे हुए थे जिनको दबाकर आप किसी स्टूडियो में चल रहे प्रोग्राम को रिकॉर्डर पर लेकर उसे रिकॉर्ड कर सकते थे. इस कंसोल की एक कमज़ोरी मैंने पकड़ी और बस उस कमज़ोरी ने मुझे बहुत अच्छा मौक़ा दे दिया वर्मा साहब को झटका देने का. हुआ ये कि अचानक एक दिन ६.०० बजे जब आकाशवाणी बीकानेर से कार्यक्रम विवरण पढ़ा जा रहा था, धीमे स्वर में आकाशवाणी, बीकानेर के उद्घोषक की आवाज़ के पीछे पीछे न समझ में आने वाला कोई कार्यक्रम चल रहा था. कंट्रोलरूम में दौड भाग मच गयी मगर जैसे ही कार्यक्रम विवरण खत्म हुआ, पीछे चलनेवाला कार्यक्रम भी रुक गया. इंजीनियर्स ने वार्ता स्टूडियो, जहाँ से प्रसारण होता था, का माइक बदल दिया ये सोचकर कि शायद माइक में कोई समस्या हो. अगले दिन फिर मेरी शाम की ड्यूटी थी. कार्यक्रम विवरण का समय हुआ और फिर उसके पीछे पीछे न समझ में आने वाला कुछ प्रसारित होने लगा. कंट्रोलरूम के इंजीनियर्स ने वर्मा साहब को फोन किया.... वो बोले “अभी एक बार स्टूडियो बदल दो  तब तक मैं आता हूँ.और हाँ... मेरे लिए गाड़ी भेज दो.”ये सब होते होते पांच मिनट का कार्यक्रम विवरण समाप्त हो गया. प्रसारण को वार्ता स्टूडियो से नाटक स्टूडियो में स्थानांतरित कर दिया गया. वर्मा साहब तशरीफ़ ले आये और आते ही वार्ता स्टूडियो को पूरा खुलवा डाला. स्टूडियो के कनेक्शन उधेड़ते उधेड़ते रात के ग्यारह दस हो गए.... सभा समाप्त हो गयी, मैं और उद्घोषक घर के लिए रवाना हो गए मगर वर्मा साहब और उनकी टीम के ५-७ लोग रात भर स्टूडियो में लगे रहे. दूसरे दिन मेरी दिन में ड्यूटी थी.... जब दस बजे ऑफिस पहुंचा तो सुना कि वर्मा साहब रात भर स्टूडियो में थे, सब कुछ ठीक हो गया है और अब कोई गडबड नहीं होगी. उस दिन तो गडबड होनी भी नहीं थी क्योंकि मेरी तो दिन की ड्यूटी थी और ५ बजे मुझे तो घर चले जाना था. बड़ी शान से वर्मा साहब ने हमारे डायरेक्टर साहब को बताया कि कुछ टेक्नीकल गडबडी थी वार्ता स्टूडियो में, उसे ठीक कर दिया गया है.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;दो दिन सब कुछ ठीक रहा. दो दिन बाद मेरी ड्यूटी फिर शाम की लगी और जैसे ही ६.०० बजे.......आकाशवाणी, बीकानेर के उद्घोषक की आवाज़ के पीछे पीछे कुछ अस्पष्ट और न समझ आने वाले शब्द सुनाई देने लगे. कंट्रोलरूम फिर परेशान. वर्मा साहब भी रेडियो सुन रहे थे......उन्होंने भी वो सब कुछ सुना.....५ मिनट गुज़र गए.... अगले दिन डायरेक्टर साहब ने उन्हें बुलाकर पूछा तो बोले “शायद स्टूडियो बिल्डिंग और ट्रांसमीटर के बीच की लाइन में लीकेज है. लगता है उसकी खुदाई करवानी पड़ेगी.” डायरेक्टर साहब बोले “देखिये ये इंजीनीयरिंग का मामला है, क्या करना है, क्या नहीं करना है वो आप जानें.... मगर जैसे भी हो जल्दी से जल्दी इसे ठीक करवाइए.” उस मीटिंग में गर्दन झुकाए मैं भी बैठा हुआ था.... मन ही मन मुझे मज़ा तो आ रहा था मगर न जाने कैसे मन के भाव चेहरे पर उभर आये. मेरे डायरेक्टर साहब ने पूछा “क्या हुआ महेन्द्र ? तुम मुस्कुरा क्यों रहे हो?” मैं एकदम हडबडा गया. बड़ी मुश्किल से अपने आप पर काबू करते हुए मैंने कहा “नहीं सर कोई बात नहीं है.”&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;स्टूडियो बिल्डिंग और ट्रांसमीटर में करीब सात किलोमीटर का फासला था. स्टूडियो से लेकर ट्रांसमीटर के बीच टेलीफोन लाइन बिछी हुई थी. जो प्रोग्राम स्टूडियो में बजाया जाता था, वो उस टेलीफोन लाइन के ज़रिये ट्रांसमीटर तक आता था और यहाँ से प्रसारित हो जाता था. वर्मा साहब ने हर तरह से अपना दिमाग लगा लिया मगर कार्यक्रम विवरण के पीछे आने वाली वो आवाजें नहीं रुकीं. मुझे लग रहा था कि इस तरह किसी दिन तो मैं पकड़ा ही जाऊँगा क्योंकि लोगों के दिमाग में कभी तो आ ही जाएगा कि ये गडबडी उसी दिन होती है जब शाम की ड्यूटी पर मैं होता हूँ. इसलिए कई बार बिना काम ही रुक कर शाम की ड्यूटी वाले को मदद करने के बहाने मैं अपनी कारस्तानी कर देता था. आखिरकार वर्मा साहब ने टेलीफोन लाइन खुदवानी शुरू कर दी कोई दो किलोमीटर की खुदाई हुई थी कि मैंने अपनी कारस्तानी रोक दी... अब शाम का कार्यक्रम बिना किसी विघ्न के प्रसारित हो रहा था. दो तीन दिन बाद वर्मा साहब ने खुदाई रुकवा दी और घोषणा कर दी. लीकेज मिल गया है.... उसे ठीक कर दिया है और अब प्रसारण बिल्कुल ठीक होगा. मैं मन ही मन मुस्कुराया. जिस तरह वर्मा साहब ने मेरी बेइज्ज़ती की थी, मैं उन्हें अब भी माफ करने के मूड में नहीं था. ५-६ दिन बाद फिर से कार्यक्रम विवरण के पीछे आवाजें आने लगीं. इस बार बात अखबारों तक जा पहुँची. अखबार नमक-मिर्च लगाकर ख़बरें छापने लगे. अब वर्मा साहब थोड़ा घबराए मगर फिर भी उनकी अकड अपनी जगह क़ायम थी. मीटिंग में बोले “एक जगह लीकेज ठीक कर दी गयी थी मगर शायद कहीं और भी लीकेज रह गयी है. मैं और खुदाई करवाऊंगा, अगर फिर भी ठीक नहीं हुआ तो पूरी लाइन चेंज करवानी पड़ेगी. मैंने सोचा अब बहुत ज़्यादा हो रहा है. एक वर्मा साहब को सबक सिखाने में सरकार का बहुत नुकसान हो जाएगा अगर इन्होने सात किलोमीटर की खुदाई करवाकर पूरी लाइन बदलने का निर्णय ले लिया तो. वो बस आगे खुदाई करवाने की तैयारी कर ही रहे थे कि एक दिन सुबह सुबह मैं उनके कमरे में पहुंचा और कहा “सर नमस्कार”. उन्होंने गर्दन उठाई और अजीब सी नज़रों से देखते हुए बोले “हम्म, कहिये क्या बात है?” मैंने कहा “सॉरी सर अगर आप इसे इंजीनियरिंग मामलों में टांग अड़ाना न समझें तो..... मैं आपको आश्वस्त करना चाहूँगा कि अब वो आवाजें नहीं आयेंगी आप बेफिक्र रहिये...... और प्लीज़ अब खुदाई मत करवाइए और न ही लाइन चेंज करवाने की सोचिये.” उनके चेहरे पर पसीने की बूँदें छलछला उठीं. वो दस सैकंड चुप रहे और फिर गर्दन उठा कर बोले “अच्छा.... तो ये आपका काम था....”&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;  मैंने कहा “जी”.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;“आपने ऐसा क्यों किया और कैसे किया?”&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt; “आपने इतने लोगों के सामने मुझे बेइज्ज़त किया तो मुझे गुस्सा आ गया....”&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;“मगर आपने ये किया कैसे?”&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;मैंने उन्हें बताया कि डबिंग रूम के कंसोल में एक कमज़ोरी है. स्टूडियोज़ के प्रोग्राम को तो वहाँ की मशीनों पर रिकॉर्ड किया ही जा सकता है, डबिंग रूम की किसी भी मशीन पर कोई टेप चलाकर कंसोल पर दो बटन एक साथ दबाकर उस टेप पर रिकॉर्डेड प्रोग्राम को किसी भी स्टूडियो से निकलकर कंट्रोलरूम जानेवाले प्रोग्राम के साथ मिक्स किया जा सकता है. मैंने डबिंग रूम की इसी कमज़ोरी को काम में लिया. मैं ५.५५ पर दिल्ली का कार्यक्रम विवरण रिकॉर्ड कर एक मशीन पर टेप को उलटा चला देता था और उसे वार्ता स्टूडियो की लाइन में मिक्स कर देता था. जब टेप को उलटा चलाया जाता है तो जो आवाज़ निकलती है वो बड़ी अजीब सी होती है और उसका लेवल इतना कम रखता था कि ये तो पता चलता था कि कोई बोल रहा है मगर किस भाषा में बोल रहा है ये समझ नहीं आता था.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;ये सब सुनकर वर्मा साहब का मुंह खुला का खुला रह गया. बोले “बस इतनी सी बात थी?” मैंने कहा “जी हाँ.....मेरा मन तो था आपको और तंग करने का लेकिन मैंने सोचा कि इस तरह आप पूरी लाइन खुदवाएंगे और चेंज करवाएंगे तो बेकार में बहुत खर्च हो जाएगा. इसलिए मैंने आपको ये सब बता दिया मगर उम्मीद करता हूँ कि अगर कोई भी कुछ कह रहा है तो कम से कम उसकी बात सुन तो लीजिए..... वो इंजीनियर नहीं है तो क्या हुआ, हो सकता है उसकी राय में कुछ काम की बात हो.” वर्मा साहब ने वादा किया कि आगे से वो किसी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करेंगे मगर मुझसे भी ये वादा लिया कि जो कुछ इस बीच केन्द्र पर हुआ, उसके पीछे सच्चाई क्या थी, इसका किसी को पता नहीं लगेगा.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;बस..... इसके बाद आकाशवाणी, बीकानेर से प्रसारण बिल्कुल सही तरीके से, बिना किसी विघ्न के होने लगा. मैंने सबसे यही कहा कि वर्मा साहब ने सब कुछ ठीक कर दिया है. हर तरफ उनकी काफी वाहवाही हुई. अब तक मैंने इस वाकये को अपने सीने में दफन कर रखा था. आज वर्मा साहब अगर इस दुनिया में हैं और इत्तेफाक से मेरी ये श्रृंखला पढ़ रहे हों तो उनसे हाथ जोड़कर क्षमा चाहूँगा कि जिस बात को मैंने ३५ बरस तक सीने में दफन रखा, आज उसे दुनिया के सामने रख दिया है.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;hr /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;पिछली सभी कडियां पढ़ने के लिए &lt;a href="http://radionamaa.blogspot.in/search/label/%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%9F%E0%A4%B8%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B9%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%20%E0%A4%8F%E0%A4%95%20%E0%A4%AE%E0%A4%A8"&gt;यहां क्लिक कीजिए।&lt;/a&gt; &lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-1275390215564759628?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-04-07T19:55:20.277+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh4.ggpht.com/-If8YQHrcul0/T3u-GAhAlHI/AAAAAAAAELQ/3IBc2-US3RI/s72-c/radio-tower_thumb%25255B1%25255D.gif?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/04/7.html</feedburner:origLink></item><item><title>रेडियो सीलोन की 61 वीं सालगिरह पर अतुल का विशेष लेख</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/LHwRpQmAvc8/61.html</link><category>रेडियो सिलोन</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Thu, 29 Mar 2012 19:18:29 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-522259762999148324</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font color="#0000ff" size="3"&gt;     &lt;br /&gt;आज रेडियो सीलोन की 61 वीं सालगिर‍ह है। श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के विदेश विभाग ने भारतीय रेडियो की दुनिया में भी क्रांति लाई। कहीं ना कहीं इसकी कामयाबी विविध-भारती की स्‍थापना की वजह भी बनी। दुनिया के इस बेहद लोकप्रिय रेडियो-स्‍टेशन की चमक आज पहले जैसी नहीं रही। अतुल ने अपने ब्लॉग &lt;/font&gt;&lt;a href="http://squarecutsblog.blogspot.in/"&gt;&lt;font color="#ff0000" size="3"&gt;bollywood,binaca geetmala,humour etc&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;font size="3"&gt;&amp;#160;&lt;font color="#0000ff"&gt;पर ये लेख सन 2008 में लिखा था। जिसे रेडियोनामा पर अंग्रेज़ी में ही साभार प्रस्‍तुत किया जा रहा है। अतुल रेडियो और संगीत पर लेखन के लिए जाने जाते हैं और उनके काम को आप उनके ब्‍लॉग की लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं। &lt;/font&gt;      &lt;hr /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;Ceylon, as Sri Lanka was called till 1970 tended to emulate India in many fields. For example it got Independance just after India. They too had a political dynasty ruling Sri Lanka just like India.Their lady PM imposed emergency in their country in 1970s just after the Indian lady PM did, and then revoked it,just after her Indian counterpart did,and ended up losing the general elections just like her Indian counterpart.     &lt;br /&gt;But there was one field in which Ceylon stole a march over India.It was in the field of radio broadcasting, where they did not look up to India.Good that they did not seek to emulate India in this field, because what the Indian I &amp;amp; B minister did to their government broadcaster ( he banned film music from being played in akashwani),if emulated, would have killed Radio Ceylon's Hindi service for ever. Instead, Radio Ceylon saw the marketing potential of playing the latest Bollywood filmy songs in their Hindi overseas service, and the rest, as they say, is glorious history.      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;Ceylon as a country was just as resource starved as India during 1940s and 50s, but they made good use of their resources, at least in the field of radio broadcasting. They got some good radio transmitters for free from the British troops stationed in Sri Lanka who left their equipments behind when the WW II was over. Radio Ceylon used these equipments to set up Radio Ceylon's overseas service, viz English service and Hindi service.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;   &lt;br /&gt;&lt;font size="3"&gt;Soon, they saw the potential of playing Bollywood filmy songs in their Hindi service. They signed up announcers from India who came to Colombo and would broadcast from the radio Ceylon studio there. The earliest announcers that joined them included one person called Balraj Dutt, who would later on go on to become a big Bollywood star under the name Sunil Dutt.     &lt;br /&gt;Ameen Sayani became the most famous name associated with Radio Ceylon. But in reality, he was not an employee of Radio Ceylon. He was a freelancer who worked for sponsors like Binaca.Ameen Sayani was based in Bombay and there he recorded sponsored programmes viz Binaca geetmala etc and their tapes were then flown to Colombo for broadcast. The inhouse announcers on the other hand were based at Colombo, and they were employees of Radio Ceylon.      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;Initially, the in house programmes of Radio Ceylon were nowhere near as impressive as their sponsored programmes.There were quite a few good quality sponsored programmes, but Binaca geetmala ended up as the most famous and the longest running sponsored programme of them all.     &lt;br /&gt;It was Vijay Kishore Dubey, recruited in 1954, who was entrusted with the job of improving the format of radio Ceylon's in house programmes. And what we grew up listening to in 1960s was a result of Mr Dubey's efforts. Dubey's efforts in revamping radio Ceylon were akin to Pt narendra Sharma's efforts in creating Vividh Bharati from scratch a couple of years later. While Pt Sharma, a respected man in Bollywood circles had the backing of Indian I &amp;amp; B ministry and the support of Indian film industry, Vijay Kumar Dubey did not have these luxuries. While Pt Narendra Sharma entrusted the job of creating signature tunes of various Vividh Bharati programmes to well known music directors like Anil Biswas, Dubey used readymade filmy tunes as the signature tunes for radio Ceylon's programmes. For instance, &amp;quot;Dastaan&amp;quot; movie's tune served as the signature tune for aaphi ke geet programme.      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;Another lasting contribution that Vijay Kishore Dubey made in programming was to make it compulsory to have a Sehgal song as the last song in the &amp;quot;purani filmo ke geet&amp;quot; programme just before 8 AM.     &lt;br /&gt;Vijay Kishore Dubey left Radio Ceylon in 1956 and he groomed Shiv Kumar Saroj to take his place. Other announcers who joined Radio Ceylon Hindi service included names like Manohar Mahajan, Dalbir Singh Parmar, VijayLaxmi etc. I do not remember who was the announcer ( may be Parmar) who tried to coin new Hindi words for standard English words. For instance, he would say &amp;quot;laghu tarang&amp;quot; for short wave, but gave up using this term when his enthusiasm did not rub off on the audience.      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;Like Akashwani, Radio Ceylon too functioned in three shifts. The morning shift started at 7 AM in the earlier days, but later it was made 6 AM. The first programme would be instrumental music of Bollywood songs,followed by filmy bhajans. then songs from one movie would be played in the &amp;quot;Ek hi film ke geet&amp;quot; programme from 7:15 to 7:30. 7:30 to 8 AM was for &amp;quot;purani filmon ke geet&amp;quot;.The slot from 8 AM to 9 AM was for the farmaishi programme called &amp;quot;aap hi ke geet&amp;quot;. This programme made places like Jhumri talaiya, Ganj Basoda,Akola, Nanded etc famous. In fact an entire article can be written on these places, and I intend to write one in the coming days. So keep watching this space.     &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;9 AM to 9 :30 AM was the time when programmes like songs from one artist,or quawwali, or ghazals etc were played on different days of the week. 9:30 to 10 AM was the least popular one when classical music was played. It was also the time when school kids would be leaving for their schools.It may be difficult to imagine it today, but those days schools would start at 10 AM, not 8 AM as is the case these days.     &lt;br /&gt;When Vividh Bharati started in 1957, they not only had song based programmes, they also had news, which they relayed from the Delhi station of Akashwani.Radio Ceylon too decided to have atleast one news, but they did not have the resources to have dedicated staff for this Hindi news. So they hit upon a novel idea.The first sabha ( that is how BBC hindi service described it) of BBC Hindi service began at 6 AM and ended with a 8 minutes long news beginning at 6:20 AM. Radio Ceylon Hindi service started relaying this Hindi news. I am not aware if Radio Ceylon had taken any permission from BBC to do so, but I will not be surprised if it was done without informing BBC.Those were the days when terms like intellectual property, broadcasting rights etc were not yet coined.      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;This was a very good idea for Radio Ceylon because BBC was regarded very highly for its unbiased reporting and professionalism, unlike Akashwani news which was mainly government propaganda. Also, this 6:20 Hindi news was the earliest Hindi news in any radio stations that one could tune into.It was through one such BBC news relayed by Radio Ceylon that I came to know that India had beaten West Indies at Port of Spain in 1976 chasing over 400 runs in the last innings for a world record beating victory.     &lt;br /&gt;The afternoon programme of Radio Ceylon, which started at 12 O' Clock was not really any great shakes. This could be because most of their potential audience at that time were busy in their jobs. I do not remember whether this afternoon slot had anything for house wives. I vaguely remember that there was a programme in the afternoon where only female listeners were supposed to send their farmaishes. But I could be wrong.This programme ended at 3 or 3:30 PM, I am not sure.      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;The evening programme was prime time programme.It began tamely enough from 6 PM till 8 PM. It was from 8 PM onwards that sponsored programmes if any, were broadcast. There may have been sponsored programmes of 30 minutes durations on some of the week days. Wednesday was of course booked for the one hour sponsored programme Binaca geetmala. It was on this day that small time advertisers began to have 15 minutes sponsored programmes from 7:45 to 8 PM, hoping to cash in on the fact that most radio listeners had tuned in to Binaca geetmala at that time. This programme too needs a separate article, and I will come up with one article dedicated on Binaca geetmala.     &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;Sunday was the day when there was no break between morning programme and afternoon programme and the programme that began at 6 AM would extend well into the afternoon. This day,sponsored programmes would be presented right from 8 AM onwards. The &amp;quot;aap hi ke geet &amp;quot; programme on sunday was presented at 1 PM, by which time there may not have been too much enthusiasm left among listeners.     &lt;br /&gt;Sunday sponsored programmes included programmes like &amp;quot;Polydor Sangeet Dhara&amp;quot; at 9 AM, presented by an announcer with a clipped voice and with a signature tune that went &amp;quot;tip tip tip tip, like a horse running on a canter.&amp;quot;Tabassum ke chutkule&amp;quot; was at 10 AM ( or was it 10:30) where Tabassum would read out her stale jokes to Ameen Sayani. Once,Ameen Sayani actually complained that her jokes were stale. The quality of jokes definitely improved from the next episode, but she reverted back to type after a few weeks.      &lt;br /&gt;If I recall correctly then a slot was purchased by a Christian missionary oganisation too who would present their own sponsored programme at 9:30 and I remember hearing their prayer in Hindi &amp;quot;Vandana karte hain hun&amp;quot;.      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&amp;quot;S Kumar ka filmy muqadma&amp;quot; was also broadcast on sunday.     &lt;br /&gt;Advertisers not only presented their sponsored programmes, but there were small few seconds long ads too, viz the ad of Brylcreem who had signed cricketer Farokh Engineer to endorse them.The sportsweek publishers would give ads for their Urdu newspaper called &amp;quot;Inquilaab&amp;quot;. Nowadays of course, both Sportsweek as well as Inquilaab have gone defunct. Ads of new films were played during the &amp;quot;aphi ke geet&amp;quot; and other such popular programmes. For a song lasting 3 minutes,the announcer would read out the list of farmaish senders that consumed more time than the duration of the song.And after every song, there would be ads.      &lt;br /&gt;Of course such ads were not played during the duration of a sponsored programme. For example, if S Kumar ka filmi muqadma was being presented, then only S Kumar's ads were played. Ads of movies etc were not given at that time.Producers of new movies also bought 15 minutes slots on sunday to advertise for their movies, and these programmes typically had Ameen Sayani exhorting the listeners to watch these movies by playing songs from these movies.      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;It is not incorrect to say that Radio Ceylon Hindi service was a musical opium for the masses in India. They were totally sold out on Radio Ceylon, and this state of affairs continued till 1970s when Indian I &amp;amp; B ministry finally decided to allow ads on Vividh Bharati. TV revolution in India in mid 1980s finally sounded the death knell of radio every where, and that included Radio Ceylon ( which was renamed as Sri Lanka Broadcasting Corporation in 1972) too.But it was good, rather great as long as it lasted.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;अतुल की मूल पोस्‍ट का लिंक &lt;/font&gt;&lt;a href="http://squarecutsblog.blogspot.in/2008/07/radio-ceylon-hindi-service-those-were.html?showComment=1333073140757"&gt;&lt;font size="3"&gt;http://squarecutsblog.blogspot.in/2008/07/radio-ceylon-hindi-service-those-were.html?showComment=1333073140757&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font size="3"&gt;Square cuts blog से साभार &lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&amp;#160;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-522259762999148324?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-03-30T07:48:29.085+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">9</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/03/61.html</feedburner:origLink></item><item><title>'मैं बसंती हवा हूं': वसंत पर शुभ्रा शर्मा का रेडियो-फीचर</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/FUi_Vqa2V1g/blog-post.html</link><category>shubhra sharma</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Tue, 13 Mar 2012 19:14:44 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-6751065523390741735</guid><description>&lt;p&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#0000ff" size="3"&gt;जानी-मानी न्‍यूज़-रीडर शुभ्रा शर्मा की साहित्यिक प्रस्‍तुतियां हम रेडियोनामा पर आपको पहले भी सुनवाते रहे हैं। हाल ही में उन्‍होंने वसंत पर एक ख़ास फीचर तैयार किया। और अब&amp;#160; वे उसे रेडियोनामा के साथ साझा कर रही हैं। इस फीचर में वसंत पर तमाम महत्‍वपूर्ण कविताओं का समावेश है। साथ में पढ़ने के आनंद के लिए इसका आलेख भी दिया जा रहा है। &lt;/font&gt;&lt;font face="Mangal" color="#0000ff" size="3"&gt;ऑडियो चाहें तो यहां सुनें, चाहें तो डाउनलोड करके सुनें। लिंक नीचे दी गयी है। &lt;/font&gt;    &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;&lt;object height="94" width="422"&gt;&lt;param value="http://www.divshare.com/flash/audio_embed?data=YTo2OntzOjU6ImFwaUlkIjtzOjE6IjQiO3M6NjoiZmlsZUlkIjtzOjg6IjE3MDI4NDY1IjtzOjQ6ImNvZGUiO3M6MTI6IjE3MDI4NDY1LWRmYSI7czo2OiJ1c2VySWQiO3M6NjoiNzExMjU5IjtzOjEyOiJleHRlcm5hbENhbGwiO2k6MTtzOjQ6InRpbWUiO2k6MTMzMTY5MDY5ODt9&amp;amp;autoplay=default" name="movie"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed wmode="transparent" height="94" width="422" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" src="http://www.divshare.com/flash/audio_embed?data=YTo2OntzOjU6ImFwaUlkIjtzOjE6IjQiO3M6NjoiZmlsZUlkIjtzOjg6IjE3MDI4NDY1IjtzOjQ6ImNvZGUiO3M6MTI6IjE3MDI4NDY1LWRmYSI7czo2OiJ1c2VySWQiO3M6NjoiNzExMjU5IjtzOjEyOiJleHRlcm5hbENhbGwiO2k6MTtzOjQ6InRpbWUiO2k6MTMzMTY5MDY5ODt9&amp;amp;autoplay=default"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;    &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;कई बरस पहले &lt;strong&gt;पं० विद्यानिवास मिश्र&lt;/strong&gt; का एक ललित निबंध पढ़ा था - &amp;quot; &lt;strong&gt;वसंत आ गया, पर कोई उत्कंठा नहीं&lt;/strong&gt;&amp;quot;. हम तब विद्यार्थी थे और वसंत के आगमन के समय हमारी सबसे बड़ी उत्कंठा यही होती थी कि परीक्षा &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/-b3xrMZ46hJE/T1_-7yXR9aI/AAAAAAAAD_8/UBaAmFa6ds0/s1600-h/4%25255B4%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="4" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="186" alt="4" src="http://lh5.ggpht.com/-QHqs0OOKivo/T1_-9YgsEHI/AAAAAAAAEAE/_disL8SBmaE/4_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" width="246" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; में अच्छे नंबरों से पास हो जाएँ. युवा ह्रदय की क्या आशा, अपेक्षा, उत्कंठा होती है, यह जानने-बूझने का न तो हमारे पास समय था और न माहौल.१४ फरवरी को मनाया जाने वाला आयातित पर्व - सेंट वैलेंटाइन्स डे - अभी भविष्य के गर्भ में निहित था. इसलिए युवाओं को वसंत के आने की खबर वैलेंटाइन्स डे के विशेष ऑफर्स से नहीं, गमलों में लगे गेंदे-गुलाब से, खेतों में लहलहाती सरसों से, बौराये आमों से और अगर शहरों-कस्बों के छोर पर रहते हों तो टेसू के फूलों से मिलती थी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;कवियों के लिए तो वसंत ऋतु अक्षय प्रेरणा का स्रोत रही है. संस्कृत साहित्य में वसंत को कामदेव का प्रिय सखा कहा गया है. वही कामदेव जब गन्ने के धनुष पर, भंवरों की पांत की डोरी बाँध, रंग-बिरंगे फूलों के बाण चढ़ाये निकलता है, तब आम लोगों की तो बिसात ही क्या, देवाधिदेव महादेव भी उसके प्रभाव से बच नहीं पाते. कालिदास ने अपने महाकाव्य कुमारसंभवम में इस प्रसंग का विषद वर्णन किया है.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;हिंदी साहित्य में भी वसंत से जुडी इतनी कवितायेँ हैं कि उन सबकी चर्चा संभव नहीं. हम केवल इतना ही प्रयास कर सकते हैं कि उनमें से कुछ की बानगी आपको दिखाएँ. रीतिकालीन कवियों से शुरुआत करें तो सबसे पहले याद आते हैं &lt;strong&gt;पद्माकर.&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#8000ff" size="3"&gt;कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में क्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#8000ff" size="3"&gt;कहे पद्माकर परागन में पौनहू में पानन में पीक में पलासन पगंत है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#8000ff" size="3"&gt;द्वार में दिसान में दुनी में देस-देसन में देखो दीप-दीपन में दीपत दिगंत है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#8000ff" size="3"&gt;बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में बनन में बागन में बगरयो बसंत है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/-CxtUvvXlMvk/T1_--yVk09I/AAAAAAAAEAM/Zrh47cRDosk/s1600-h/3%25255B5%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="3" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="164" alt="3" src="http://lh4.ggpht.com/-ECdbmi4WSQk/T1__ANrgyyI/AAAAAAAAEAU/MNuEUjOKULY/3_thumb%25255B3%25255D.jpg?imgmax=800" width="246" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;#160; &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;महानगर के कंक्रीट के जंगल में रहने वाली हमारी नई पीढ़ी ने भले ही बनन में, बागन में,बगरे बसंत की शोभा न देखी हो, लेकिन गाँव-देहात से आकर शहर में बसने वाले ज़रूर आज भी बौरे आमों की मादक गंध को याद करते हैं. &lt;strong&gt;बच्चन जी&lt;/strong&gt; जिन दिनों कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में थे और वहां वसंत आने की चर्चा हो रही थी, तब उन्होंने लिखा था -&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;     &lt;br /&gt;बौरे आमों पर बौराए भंवर न आये..... कैसे कह दूं मधु ऋतु आई ?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;माना अब आकाश खुला-सा और धुला-सा, फैला-फैला नीला-नीला&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;बर्फ जली-सी पीली-पीली दूब हरी फिर जिस पर खिलता फूल फबीला&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;तरु की निरावरण डालों पर मूँगा-पन्ना और दखिन्हटे का झकझोरा&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;बौरे आमों पर बौराये भँवर न आये .... कैसे कह दूँ मधु ऋतु आयी?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;और फिर उसके बरक्स अपने देश के वसंत को याद करते हैं कि -&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;डार-पात सब पीत पुष्पमय जो कर लेता, अमलतास को कौन छिपाये&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;सेमल और पलाशों ने सिन्दूर पताके नहीं गगन में क्यूँ फहराये&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;छोड़ नगर की सँकरी गलियाँ, घर-दर, बाहर आया हूँ पर&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;फूली सरसों से मीलों लम्बे खेत नहीं दीखते पियराये ....कैसे समझूँ मधु ऋतु आयी?     &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/-alfQEv6nnSE/T1__BWKFdDI/AAAAAAAAEAc/sGsXovX3I7I/s1600-h/2%25255B5%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="2" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="186" alt="2" src="http://lh3.ggpht.com/-zolKMWQ_rAQ/T1__CfLCCLI/AAAAAAAAEAk/1dSlBfNB39k/2_thumb%25255B3%25255D.jpg?imgmax=800" width="246" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/font&gt;    &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;     &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;बौराए आमों के अलावा वसंत का दूसरा अग्रदूत है पलाश या टेसू. &lt;strong&gt;सेनापति &lt;/strong&gt;कहते हैं -&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;लाल लाल टेसू फूल रहे हैं रसाल संग स्याम रंग भेंटि मानो मसि में मिलाये हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;सेनापति माधव महीना&amp;#160; में पलास तरु देखि देखि भाव कविता के मन आये हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;आधे अनसुलगि सुलगि रहे आधे मानो बिरहि दहन काम कोयला परचाये हैं.     &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;कैसी सुन्दर उपमा है! विरह से जल रहे प्रेमियों को और अधिक तड़पाने के लिए मानो कामदेव ने कोयले दहका दिए हैं. लेकिन अगर प्रिय साथ हो तो यही वसंत कितना मधुर, कितना सुखद हो उठता है.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;चंचल पग दीप शिखा से धर गृह मग वन में आया वसंत&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;सुलगा फागुन का सूनापन सौन्दर्य शिखाओं में अनंत&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;सौरभ की शीतल ज्वाला से फैला उर-उर में मधुर दाह&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;आया वसंत भर पृथ्वी पर स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;कलि के पलकों में मिलन स्वप्न अलि के अंतर में प्रणय गान&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;लेकर आया प्रेमी वसंत आकुल जड़-चेतन स्नेह-प्राण. . .     &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/-CXIBIsMaQ3M/T1__DTU5DrI/AAAAAAAAEAs/hvpvEn0tMyQ/s1600-h/1%25255B3%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="1" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="185" alt="1" src="http://lh3.ggpht.com/-r0dydF3vRZI/T1__EWaqZBI/AAAAAAAAEA0/qwK2-WFTZvY/1_thumb%25255B1%25255D.jpg?imgmax=800" width="246" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;इस कविता का प्रारंभ &lt;strong&gt;पन्त जी&lt;/strong&gt; ने 'चंचल' शब्द से यूँ ही नहीं कर दिया था - इसका एक विशेष प्रयोजन है. यह जो वसंत ऋतु है, यह मन में चंचलता और नटखट छेड़-छाड़ जगाती&amp;#160; है. तभी तो होली भी इसी ऋतु में खेली जाती है.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;आयौ जुरि उत तें समूह हुरिहारन कौ, खेलन कों होरी वृषभान की किसोरी सों ।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;कहै रतनाकर त्यों इत ब्रजनारी सबै, सुनि-सुनि गारी गुनि ठठकि ठगोरी सों ॥&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;आँचर की ओट-ओटि चोट पिचकारिन की, धाइ धँसी धूँधर मचाइ मंजु रोरी सों ।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;ग्वाल-बाल भागे उत, भभरि उताल इत, आपै लाल गहरि गहाइ गयौ गोरी सौं ॥&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;फिर एक बार &lt;strong&gt;पद्माकर&lt;/strong&gt; की, या यूँ कहें कि कान्हा को फिर से आने का आमंत्रण देने वाली उनकी गोरी की याद आती है -&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;फाग की भीर अभीरन तें गहि स्यामहि लै गई भीतर गोरी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;भाई करी मन की पद्माकर ऊपरि नाँय अबीर की झोरी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;छीन पितम्बर कम्मर तें सु बिदा दइ मींडि कपोलन रोरी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;नैन नचाय, कह्यो मुसकाय, लला फिर आइयो खेलन होरी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;यही नटखटपन बसंती बयार को भी सूझा है. &lt;strong&gt;केदारनाथ अग्रवाल&lt;/strong&gt; लिखते हैं -&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ!&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;जहाँ से चली मैं, जहाँ को गई मैं शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;हरे खेत, पोखर, झुलाती चली मैं, झुमाती चली मैं,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;हवा हूँ, हवा, मै बसंती हवा हूँ।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया,गिरी धम्म से फिर,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;चढ़ी आम ऊपर उसे भी झकोरा, किया कान में 'कू',&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;उतर कर भगी मैं हरे खेत पहुँची वहाँ गेहुँओं में लहर खूब मारी,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक इसी में रही मैं।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;खड़ी देख अलसी लिए शीश कलसी, मुझे खूब सूझी!&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;हिलाया-झुलाया, गिरी पर न कलसी! इसी हार को पा,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;हिलाई न सरसों, झुलाई न सरसों, मज़ा आ गया तब,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;न सुध-बुध रही कुछ, बसन्ती नवेली भरे गात में थी!&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ!&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;मुझे देखते ही अरहरी लजाई, मनाया-बनाया, न मानी, न मानी,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;उसे भी न छोड़ा पथिक आ रहा था, उसी पर ढकेला,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;हँसी ज़ोर से मैं, हँसी सब दिशाएँ हँसे लहलहाते हरे खेत सारे,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;हँसी चमचमाती भरी धूप प्यारी, बसंती हवा में हँसी सृष्टि सारी!&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;वसंत ऋतु के इस नटखट मलय समीर का स्पर्श पाकर प्रकृति कैसी नव वधू सी सज उठी है. &lt;strong&gt;अज्ञेय जी&lt;/strong&gt; के शब्दों में -&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;मलयज का झोंका बुला गया&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;खेलते से स्पर्श से रोम रोम को कंपा गया&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;जागो-जागो, जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो .&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;पीपल की सूखी खाल स्निग्ध हो चली&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;सिरिस ने रेशम से वेणी बाँध ली&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;नीम के भी बौर में मिठास देख हँस उठी है कचनार की कली&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;टेसुओं की आरती सजा के बन गयी वधू वनस्थली &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;स्नेह भरे बादलों से व्योम छा गया&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;जागो-जागो, जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो .&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;एक चित्र निराला जी ने भी प्रस्तुत किया था -&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;केशर की कलि की पिचकारी पात-पात की गात सँवारी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;राग-पराग-कपोल किये हैं, लाल-गुलाल अमोल लिये हैं, तरु-तरु केतन खोल दिये हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;आरती जोत-उदोत उतारी, गंध-पवन की धूप धंवारी .&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;गाये खग-कुल-कंठ गीत शत, संग मृदंग तरंग-तीर-हत, भजन-मनोरंजन-रत अविरत&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;राग-राग को फलित किया री, विकल-अंग कल गगन विहारी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;लेकिन सच पूछिए तो आज के आपाधापी भरे जीवन में समय कहाँ है कि हम खिड़की खोलें, बसंती बयार को भीतर आने दें, फूलों के रंगों से आँखों को तृप्त होने दें. &lt;strong&gt;शिवमंगल सिंह सुमन&lt;/strong&gt; के शब्दों में बस यही कह सकते हैं कि -&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;अवकाश कभी था इनकी कलियाँ चुन-चुन कर होली की चोली रसमय करने का&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;सारे पहाड़ की जलन घोल अनजानी डगरों में बगरी पिचकारी भरने का। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;अब ऐसी दौड़ा-धूपी में खिलना बेमतलब है,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;इस तरह खुले वीरानों में मिलना बेमतलब है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;अब चाहूँ भी तो क्या रुककर रस में मिल सकता हूँ?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;चलती गाड़ी से बिखरे- अंगारे गिन सकता हूँ। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;अब तो काफी हाऊस में रस की वर्षा होती है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;प्यालों के प्रतिबिंबों में पुलक अमर्षा होती है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;टेबिल-टेबिल पर टेसू के दल पर दल खिलते हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;दिन भर के खोए क्षण क्षण भर डालों पर मिलते हैं। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;पत्ते अब भी झरते पर कलियाँ धुआँ हो गई हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" color="#ff00ff" size="3"&gt;अंगारों की ग्रंथियाँ हवा में हवा हो गई हैं। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;hr /&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;&lt;a href="http://www.divshare.com/download/17028465-dfa" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;यहां से&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; डाउनलोड करके सुनें &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-6751065523390741735?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-03-14T07:44:44.969+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh5.ggpht.com/-QHqs0OOKivo/T1_-9YgsEHI/AAAAAAAAEAE/_disL8SBmaE/s72-c/4_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><media:content url="http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~5/Z05V-3oCrPM/audio_embed" fileSize="31072" type="application/x-shockwave-flash" /><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle> &amp;#160; जानी-मानी न्‍यूज़-रीडर शुभ्रा शर्मा की साहित्यिक प्रस्‍तुतियां हम रेडियोनामा पर आपको पहले भी सुनवाते रहे हैं। हाल ही में उन्‍होंने वसंत पर एक ख़ास फीचर तैयार किया। और अब&amp;#160; वे उसे रेडियोनामा के साथ साझा कर रही हैं। इस फीचर में वसंत पर तमाम महत्</itunes:subtitle><itunes:author>??????????</itunes:author><itunes:summary> &amp;#160; जानी-मानी न्‍यूज़-रीडर शुभ्रा शर्मा की साहित्यिक प्रस्‍तुतियां हम रेडियोनामा पर आपको पहले भी सुनवाते रहे हैं। हाल ही में उन्‍होंने वसंत पर एक ख़ास फीचर तैयार किया। और अब&amp;#160; वे उसे रेडियोनामा के साथ साझा कर रही हैं। इस फीचर में वसंत पर तमाम महत्‍वपूर्ण कविताओं का समावेश है। साथ में पढ़ने के आनंद के लिए इसका आलेख भी दिया जा रहा है। ऑडियो चाहें तो यहां सुनें, चाहें तो डाउनलोड करके सुनें। लिंक नीचे दी गयी है। कई बरस पहले पं० विद्यानिवास मिश्र का एक ललित निबंध पढ़ा था - &amp;quot; वसंत आ गया, पर कोई उत्कंठा नहीं&amp;quot;. हम तब विद्यार्थी थे और वसंत के आगमन के समय हमारी सबसे बड़ी उत्कंठा यही होती थी कि परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास हो जाएँ. युवा ह्रदय की क्या आशा, अपेक्षा, उत्कंठा होती है, यह जानने-बूझने का न तो हमारे पास समय था और न माहौल.१४ फरवरी को मनाया जाने वाला आयातित पर्व - सेंट वैलेंटाइन्स डे - अभी भविष्य के गर्भ में निहित था. इसलिए युवाओं को वसंत के आने की खबर वैलेंटाइन्स डे के विशेष ऑफर्स से नहीं, गमलों में लगे गेंदे-गुलाब से, खेतों में लहलहाती सरसों से, बौराये आमों से और अगर शहरों-कस्बों के छोर पर रहते हों तो टेसू के फूलों से मिलती थी. कवियों के लिए तो वसंत ऋतु अक्षय प्रेरणा का स्रोत रही है. संस्कृत साहित्य में वसंत को कामदेव का प्रिय सखा कहा गया है. वही कामदेव जब गन्ने के धनुष पर, भंवरों की पांत की डोरी बाँध, रंग-बिरंगे फूलों के बाण चढ़ाये निकलता है, तब आम लोगों की तो बिसात ही क्या, देवाधिदेव महादेव भी उसके प्रभाव से बच नहीं पाते. कालिदास ने अपने महाकाव्य कुमारसंभवम में इस प्रसंग का विषद वर्णन किया है. हिंदी साहित्य में भी वसंत से जुडी इतनी कवितायेँ हैं कि उन सबकी चर्चा संभव नहीं. हम केवल इतना ही प्रयास कर सकते हैं कि उनमें से कुछ की बानगी आपको दिखाएँ. रीतिकालीन कवियों से शुरुआत करें तो सबसे पहले याद आते हैं पद्माकर. कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में क्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है कहे पद्माकर परागन में पौनहू में पानन में पीक में पलासन पगंत है द्वार में दिसान में दुनी में देस-देसन में देखो दीप-दीपन में दीपत दिगंत है बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में बनन में बागन में बगरयो बसंत है &amp;#160; महानगर के कंक्रीट के जंगल में रहने वाली हमारी नई पीढ़ी ने भले ही बनन में, बागन में,बगरे बसंत की शोभा न देखी हो, लेकिन गाँव-देहात से आकर शहर में बसने वाले ज़रूर आज भी बौरे आमों की मादक गंध को याद करते हैं. बच्चन जी जिन दिनों कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में थे और वहां वसंत आने की चर्चा हो रही थी, तब उन्होंने लिखा था - बौरे आमों पर बौराए भंवर न आये..... कैसे कह दूं मधु ऋतु आई ? माना अब आकाश खुला-सा और धुला-सा, फैला-फैला नीला-नीला बर्फ जली-सी पीली-पीली दूब हरी फिर जिस पर खिलता फूल फबीला तरु की निरावरण डालों पर मूँगा-पन्ना और दखिन्हटे का झकझोरा बौरे आमों पर बौराये भँवर न आये .... कैसे कह दूँ मधु ऋतु आयी? और फिर उसके बरक्स अपने देश के वसंत को याद करते हैं कि - डार-पात सब पीत पुष्पमय जो कर लेता, अमलतास को कौन छिपाये सेमल और पलाशों ने सिन्दूर पताके नहीं गगन में क्यूँ फहराये छोड़ नगर की सँकरी गलियाँ, घर-दर, बाहर आया हूँ पर फूली सरसों से मीलों लम्बे खेत नहीं दीखते पियराये ....कैसे समझूँ मधु ऋतु आयी? बौराए आमों के अलावा वसंत का दूसरा अग्रदूत है पलाश या टेसू. सेनापति कहते हैं - लाल लाल टेसू फूल रहे हैं रसाल संग स्याम रंग भेंटि मानो मसि में मिलाये हैं सेनापति माधव महीना&amp;#160; में पलास तरु देखि देखि भाव कविता के मन आये हैं आधे अनसुलगि सुलगि रहे आधे मानो बिरहि दहन काम कोयला परचाये हैं. कैसी सुन्दर उपमा है! विरह से जल रहे प्रेमियों को और अधिक तड़पाने के लिए मानो कामदेव ने कोयले दहका दिए हैं. लेकिन अगर प्रिय साथ हो तो यही वसंत कितना मधुर, कितना सुखद हो उठता है. चंचल पग दीप शिखा से धर गृह मग वन में आया वसंत सुलगा फागुन का सूनापन सौन्दर्य शिखाओं में अनंत सौरभ की शीतल ज्वाला से फैला उर-उर में मधुर दाह आया वसंत भर पृथ्वी पर स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह. कलि के पलकों में मिलन स्वप्न अलि के अंतर में प्रणय गान लेकर आया प्रेमी वसंत आकुल जड़-चेतन स्नेह-प्राण. . . इस कविता का प्रारंभ पन्त जी ने 'चंचल' शब्द से यूँ ही नहीं कर दिया था - इसका एक विशेष प्रयोजन है. यह जो वसंत ऋतु है, यह मन में चंचलता और नटखट छेड़-छाड़ जगाती&amp;#160; है. तभी तो होली भी इसी ऋतु में खेली जाती है. आयौ जुरि उत तें समूह हुरिहारन कौ, खेलन कों होरी वृषभान की किसोरी सों । कहै रतनाकर त्यों इत ब्रजनारी सबै, सुनि-सुनि गारी गुनि ठठकि ठगोरी सों ॥ आँचर की ओट-ओटि चोट पिचकारिन की, धाइ धँसी धूँधर</itunes:summary><itunes:keywords>shubhra sharma</itunes:keywords><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/03/blog-post.html</feedburner:origLink><enclosure url="http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~5/Z05V-3oCrPM/audio_embed" length="31072" type="application/x-shockwave-flash" /><feedburner:origEnclosureLink>http://www.divshare.com/flash/audio_embed?data=YTo2OntzOjU6ImFwaUlkIjtzOjE6IjQiO3M6NjoiZmlsZUlkIjtzOjg6IjE3MDI4NDY1IjtzOjQ6ImNvZGUiO3M6MTI6IjE3MDI4NDY1LWRmYSI7czo2OiJ1c2VySWQiO3M6NjoiNzExMjU5IjtzOjEyOiJleHRlcm5hbENhbGwiO2k6MTtzOjQ6InRpbWUiO2k6MTMzMTY5MDY5ODt9&amp;amp;autoplay=default</feedburner:origEnclosureLink></item><item><title>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन-6: महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/iqZT41hyI7I/6.html</link><category>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन</category><category>mahendra modi</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Thu, 23 Feb 2012 21:22:53 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-3622649704598253586</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;     &lt;br /&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रेडियोनामा पर जानी-मानी रेडियो-शख्सियत महेंद्र मोदी रेडियोनामा पर अपनी जीवन-यात्रा के बारे में बता रहे हैं। अनेक कारणों से पिछली और इस कड़ी के बीच का वक्‍फा लंबा हो गया। पर हमारा प्रयास होगा कि अब कडियां नियमित आएं। इस लंबे आत्‍मीय और रोचक सफर के हमसफ़र बनिए और हर दूसरे हफ्ते पढिये इसकी अगली कडियां।&amp;#160;&amp;#160; &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&amp;#160; &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;hr /&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;     &lt;br /&gt;पांचवीं क्लास पास करने के बाद सवाल ये उठा कि किस स्कूल में दाखिला लिया जाए क्योंकि राजकीय प्राथमिक पाठशाला संख्या ९ में छठी कक्षा तो थी नहीं. घर से थोड़ी ही दूर रतन बिहारी जी के पार्क में एक मिडिल स्कूल था, श्री गंगा संस्कृत विद्यालय. पिताजी को लगा मुझे थोड़ी संस्कृत पढनी चाहिए और उन्होंने मुझे इस स्कूल में डाल दिया....सारे पुराने साथी छूट गए....पता लगा मेरे खास दोस्तों श्याम सुन्दर, श्याम प्रकाश व्यास और बृजराज सिंह ने सादुल स्कूल में एडमिशन लिया है. मन बहुत दुःखी हुआ..... लगा कहीं कुछ खो गया है. बाद की ज़िंदगी में बड़े बड़े झटके खाए तो अपने इस दुःख को याद करके हंसी आती थी मगर उस वक्त यही महसूस हुआ कि नहीं.....अपने दोस्तों को छोड़कर जाने के बराबर कोई दुःख हो ही नहीं सकता.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;नया स्कूल, नए सहपाठी, नए अध्यापक और नया परिवेश. बहुत रोकते रोकते भी शुरू शुरू के दिनों में मुझे रोना आ जाता था... तब मुझे सम्भाला एक लड़के करनी&amp;#160; सिंह राठौड़ ने. वो मुझे प्रधानाध्यापक जी के पास ले गया..... मुझे लगा वो मुझे नौ नंबर स्कूल के श्री किशन मास्टर जी की तरह डांटेंगे या हो सकता है एकाध थप्पड़ भी जड़ दें. मैं करणी सिंह से मिन्नतें करने लगा... “नहीं, मुझे उनके पास मत ले जाओ”, मगर वो नहीं माना और मुझे घसीटकर उनके पास ले गया. मैं सहमा हुआ सा उनके कमरे में पहुंचा..........प्रधानाध्यापक जी ने प्यार से मुझे बुलाकर मेरी पीठ पर हाथ रखा तो मैं ज़ोर से फूट पड़ा. उन्होंने पानी मंगवाकर मुझे दिया और बोले “बच्चे क्यों रो रहे हो? क्या तुम्हें किसी ने मारा?”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;मैंने रोते रोते कहा “नहीं”.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;“तो किसी अध्यापक ने डांटा”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;मैंने कहा “नहीं”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;“तो फिर क्या हुआ है?क्यों रो रहे हो?”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;बहुत प्यार से बोल रहे थे वो. क्या जवाब देता मैं? क्या जवाब था मेरे पास? मैंने तब तक किसी अध्यापक को अपने छात्र के साथ इतने प्यार से बोलते हुए नहीं देखा था, इसलिए एक ओर जहां मैं इस नए वातावरण में अपने आपको अकेला पाने की वजह से रो रहा था वहीं प्रधानाध्यापक जी के इस प्यार भरे व्यवहार ने मेरा रोना और तेज़ कर दिया थाक्योंकि मुझे लगा यही शायद वो दामन है जिसमें मुंह छुपाकर मैं अपने सारे आंसू बहा सकता हूँ .अपने मन का पूरा गुबार मैंने उनके दामन को सौंप दिया. मैं थोड़ा प्रकृतिस्थ हुआ.... मैंने गौर से उनके चेहरे को देखा... वहाँ एक अजीब सा वात्सल्य मुझे नज़र आया. मेरा रोना थम गया था मगर रह रहकर सिसकियाँ अब भी आ रही थीं. उन्होंने मुझे दुलारते हुए कहा “ बच्चे, जब भी तुम्हें कोई दिक्कत हो तुम सीधे मेरे पास चले आया करो. मैंने हाँ में सर हिलाया और करणी सिंह के साथ आकर क्लास में बैठ गया. अब करणी सिंह से मेरी दोस्ती हो गयी थी और मुझे लगने लगा कि नहीं... मैं इस स्कूल में अकेला नहीं हूँ. कम से कम दो लोग हैं जो किसी भी मुसीबत में मेरी सहायता करेंगे. मुझे पता लगा...हमारे प्रधानाध्यापक जी का &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/-9z3XX6o07WA/T0cekuJyNbI/AAAAAAAAD-Y/HLQh_aY7hVg/s1600-h/pandit%252520gangadhar%252520shastri%25255B4%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="pandit gangadhar shastri" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="246" alt="pandit gangadhar shastri" src="http://lh3.ggpht.com/-SIkmjSlvLeM/T0cemh3hi2I/AAAAAAAAD-g/_qruaaj-Hz0/pandit%252520gangadhar%252520shastri_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" width="186" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; नाम पण्डित गंगाधर शास्त्री है और वो संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान हैं.....इस घटना के ३३ बरस बाद जब मैं आकाशवाणी, उदयपुर में पोस्टेड था प्रोग्राम क्यूशीट में यही नाम देखकर चौंक पड़ा था...मुझे एक बार को लगा कि नहीं ये पण्डित जी कोई और होंगे क्योंकि............ खैर मैंने पूछा इनकी रिकॉर्डिंग कब है? पता लगा दो दिन बाद. जिस दिन रिकॉर्डिंग थी उस दिन मैं स्टूडियो बिल्डिंग में समय से पहले ही पहुँच गया और पण्डित जी का इन्तजार करने लगा. थोड़ी ही देर में पण्डित जी ने मेन् गेट में प्रवेश किया और मैं चकित रह गया, उनकी शक्ल-सूरत, चाल-ढाल किसी में कोई फर्क नहीं आया था. मैं आगे बढ़ा और उनके चरणों में झुक गया. उन्होंने मेरे चेहरे की तरफ देखा, आशीर्वाद दिया मगर न पहचान पाने का भाव उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता था, जो स्वाभाविक भी था. कहाँ एक छठी-सातवीं का छात्र और कहाँ ४२ बरस का अधेड़ावस्था की ओर तेज़ी से बढ़ता इन्सान. मैंने उनकी उलझन को दूर किया.. उन्हें अपना नाम और स्कूल का नाम बताया तो उन्हें भी सब कुछ याद आ गया. वैसे तो हर अध्यापक अपने जीवनकाल में हज़ारों छात्रों को पढ़ाता है और उसके लिए किसी भी छात्र को याद रखना आसान नहीं होता मगर ये मेरा सौभाग्य ही मानता हूँ कि पढ़ाई में बहुत असाधारण न होते हुए भी मेरे अध्यापकों ने अक्सर मुझे याद रखा है..... मुझे एक बार फिर से याद आ गए छठी और सातवीं क्लास के वो दिन जब मैंने आधा छठी का और आधा सातवीं का साल पण्डित जी के सान्निध्य में गुज़ारा था और उसी दौरान उनकी प्रेरणा से “संस्कृत भारती” “संस्कृत प्रबोध” और “संस्कृत विनोद” एक के बाद एक तीन परीक्षाएं पास कर ली थीं.... यानि सातवीं कक्षा में मैंने संस्कृत में स्नातक स्तर प्राप्त कर लिया था और ये सब पण्डित गंगाधर शास्त्री जी के प्रोत्साहन से ही हो पाया था. जानते हैं अभी अभी मेरे उदयपुर के एक साथी दीपक मेहता ने मुझे बताया कि मेरे वो गुरु जी ईश्वर की कृपा से आज भी ज़िंदा हैं और नाथद्वारा के दिलीप शर्मा ने बताया है कि हालांकि वो आजकल अस्वस्थ हैं मगर जब दिलीप ने उन्हें मेरे बारे में बताया तो वो बहुत खुश हुए और मेरे लिए ढेरों आशीर्वाद भिजवाए हैं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;पंडित जी के प्रोत्साहन से जहां मैंने ये परीक्षाएं पास कीं, वहीं अब मैं स्टेज पर खुलकर बैंजो के प्रोग्राम देने लगा था और अपने स्कूल के लिए कई प्रतियोगिताओं में इनाम जीतकर लाने लगा था. छठी और सातवीं के इन दो सालों की ये उपलब्धियां निश्चित ही मेरे लिए अभूतपूर्व थी मगर इस बीच जो कुछ मैंने खोया उसे भी मैं जीवन भर नहीं भूल पाऊंगा. वो रात... वो डरावनी रात आज भी मेरी आँखों में, मेरे जेहन में ज्यों की त्यों ज़िंदा है जिसकी वजह से आज ये एपिसोड में लिख रहा हूँ और जो मेरे एक नाटक “लम्हों ने खता की थी......” की विषयवस्तु बनी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;छठी कक्षा का आधा साल गुजरा था.... तब तक करणी सिंह के अलावा आशुतोष कुठारी और जगमोहन् व्यास जैसे कुछ और दोस्त भी बन गए थे और दो महीनों की तैयारी में संस्कृत भारती परीक्षा पास कर लेने के कारण अध्यापक भी मुझसे ठीक से पेश आने लगे थे कि एक दिन स्कूल से घर लौट कर आया तो पता चला, पिताजी का तबादला सरदारशहर हो गया है और हमें एक हफ्ते में अपना बोरिया बिस्तर बांधकर बीकानेर से रवाना होना है......दिल धक् से रह गया.... इतनी मुश्किल से नए स्कूल के वातावरण में ढाला था मैंने अपने आपको... अब फिर सब कुछ शून्य से शुरू करना पड़ेगा? मैं नहीं जानता था कि नियति अपने गर्भ में मेरे लिए कितना ज़बरदस्त अभिशाप लिए बैठी है, वरना मैं कुछ भी करता सरदार शहर नहीं जाता. मेरी बाई (दीदी) बीकानेर में रहती थीं, उनके पास रहकर ही वक्त गुज़ार लेता....... मगर नहीं नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था और मैं उसीके इशारों पर चलते हुए पिताजी, माँ और भाई साहब के साथ एक सुबह सरदारशहर आ गया, अपने दोस्तों के पीछे छूट जाने का अफ़सोस दिल में छुपाये हुए. दूर रिश्ते की मेरी एक नानी कसाइयों के मोहल्ले में रहती थीं, उनका ऊपर का हिस्सा हमने किराए पर ले लिया. दिन किसी तरह गुज़रा.....शाम गहराने लगी तो मैं बिजली का स्विच ढूँढने लगा...वहाँ न तो कोई स्विच था और न ही कोई बल्ब. पता चला सरदारशहर के ज़्यादातर इलाकों में बिजली नहीं थी और ये मोहल्ला उन्हीं इलाकों में से एक में था. चौराहे पर नज़र दौड़ाई तो देखा, एक आदमी सीढ़ी कंधे पर रखकर आया और वहाँ लगे हुए लैम्प पोस्ट पर चढ़कर उसने उसमें मिट्टी का&amp;#160; तेल डाला और उसे जला दिया... मिट्टी के तेल का वो नन्हा सा दिया घनघोर अँधेरे से लड़ने की जी तोड़ कोशिश करने लगा....मगर क्या औकात थी उस छोटे से दिये की....उस घुप्प अँधेरे के सामने? अन्धेरा उस दिये की हिमाक़त को देखकर अट्टहास कर उठा... मेरा मन घबरा गया.... नहीं नहीं दरअसल ये कोई अट्टहास नहीं था .... कसाइयों का मोहल्ला था... किसी घर में बंधे बकरे को शायद अगली सुबह आने वाली अपनी मौत की आहट सुनाई दे गयी थी और वो ज़ोर से चीख पड़ा था. बड़ी ही दर्दनाक थी वो चीख......आज भी उस चीख को याद कर मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;वो अंधेरी रात किसी तरह गुज़री. दूसरे रोज़ सुबह हुई फिर एक चीख से. खिड़की में जाकर खड़ा हुआ, तो देखा, एक बकरे का गला रेता जा रहा था और वो चिल्लाये जा रहा था. मैंने सोचा, अभी इसका गला पूरा काट दिया जाएगा और ये शांत हो जाएगा, मगर ये क्या?...... उसका आधा गला काटकर छोड़ दिया गया था तडपने और चिल्लाने के लिए.... मैं एकदम सन्न.... मैंने पिताजी से पूछा कि इस बकरे का गला आधा काटकर क्यों छोड़ दिया उस आदमी ने? तो उन्होंने बताया कि इसे हलाल करना कहते हैं......पूरे दिन उस बकरे का आधा कटा हुआ वो गला, उसकी वो तडपती देह और दिल को दहलाने वाली चीखें मेरे ज़ह्नोदिल पर छाई रहीं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;उसी दिन पिताजी मुझे दाखिला करवाने के लिए हनुमान संस्कृत विद्यालय लेकर गए. प्रधानाध्यापक जी के &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/-Mlq579mT1Nw/T0ceojorXBI/AAAAAAAAD-o/A7-4EYhgt_I/s1600-h/DSC00016%25255B6%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="DSC00016" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="268" alt="DSC00016" src="http://lh5.ggpht.com/-690IasPVW3E/T0ceqdaEXXI/AAAAAAAAD-w/KCCs1UnjdIU/DSC00016_thumb%25255B4%25255D.jpg?imgmax=800" width="351" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; कमरे में हम लोग पहुंचे तो मेरा दिल प्रार्थना कर रहा था “भगवान करे... प्रधानाध्यापक जी कह दें कि हमारे यहाँ जगह नहीं है, हम इसे एडमिशन नहीं दे सकते.... और फिर तो पिताजी को मुझे बीकानेर वापस भेजना ही पडेगा.” मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ, प्रधानाध्यापक जी ने मेरा और मेरे पिताजी का स्वागत किया और मेरा एडमिशन हो गया.पिताजी मुझे प्रधानाध्यापक जी के कमरे में छोड़कर घर लौट गए और मैं एक बार फिर अजनबियों के बीच में खडा था. मुझे रोना आने लगा जिसे बड़ी मुश्किल से मैंने रोका. मुझे प्रधानाध्यापक जी का चपरासी क्लास में लाकर छोड़ गया था. उस समय क्लास में कोई अध्यापक नहीं था. मैं रुआंसा सा कमरे के एक कोने में जाकर खडा हो गया, तभी क्लास का मॉनीटर मेरे पास आया और बोला “नया आया है?” मैंने हाँ में गर्दन हिला दी. वो फिर बोला “मेरा नाम तेजकरण छाजेड़ है... मैं क्लास का मॉनीटर हूँ, आ तेरे बैठने की व्यवस्था करता हूँ”. मैं क्या करता? उसके पीछे पीछे चल पड़ा.... मेरे कानों में रह रहकर पिछली रात सुनी बकरे की चीख गूँज रही थी.मुझे लग रहा था, अभी मेरे गले से भी वैसी ही चीख निकल पड़ेगी और कुछ लोग मुझे दबोच लेंगे जैसे कि मैं अपनी कल्पना में उस बकरे को दबोचे जाते हुए देख रहा था.मुझे लग रहा था... अब तक उस बकरे को दबोच कर काट डाला गया होगा और शायद उसकी खाल उतारी जा रही होगी...अभी मेरी भी खाल उसी तरह से उधेड़ी जाएगी . मेरा मन कर रहा था इस डरावने माहौल से बस किसी तरह भागकर बीकानेर पहुँच जाऊं... नहीं पढ़ना है मुझे. तेजकरण ने कुछ&amp;#160; बच्चों को इधर उधर किया और एक लड़के के पास मेरी बैठने की व्यवस्था कर दी. वो बोला “देख ये कल्याण सिंह है. बहुत अच्छा लड़का है, इसलिए तेरी व्यवस्था इसके साथ की है मैंने.” आज सोचता हूँ, नियति ने क्यों मेरे साथ ये खेल खेला? बीकानेर में ही पढता रहता तो उस भगवान का क्या बिगड़ जाता? क्यों मुझे बीकानेर से लाकर इस लड़के कल्याण सिंह की बगल में लाकर बिठा दिया था? मैं नज़रें नीची किये चुपचाप बैंच पर कल्याण सिंह के साथ बैठ गया तो कल्याण सिंह बोला “क्या बात है भायला (दोस्त), बहुत उदास है?” जवाब में मेरी आँखों से टप-टप दो आंसू टपक गए..... कल्याण सिंह बोला “अरे रोने क्यों लगा ? तू चिंता मतकर यहाँ सारे मास्टर जी बहुत अच्छे हैं, कभी नहीं मारते और अब तो हम लोग भायले बन गए हैं.....अरे तेज करण देख तो इस छोरे को रोने लगा है ये.” तेज करण भी वहाँ आ गया और मुझे दिलासा देने लगा. रोते रोते आखिर आंसू भी तो साथ छोड़ देते हैं न? खैर चार छह दिन में मेरा मन लगने लगा था. तेजकरण और कल्याण सिंह दोनों ही मेरा बहुत ख़याल रखते थे. कल्याण सिंह का गाँव सरदारशहर से ६०-७० किलोमीटर दूर था और उसके पिताजी बैंक में चौकीदार थे. हर शनिवार को शाम को कल्याण सिंह के पिताजी उसे गाँव जाने वाली बस में बिठा देते थे और सोमवार को वो वापस सरदारशहर आ जाया करता था. बाकी दिन वो बैंक में अपने पिताजी के साथ ही रहता था. कभी कभी मैं, कल्याण सिंह और तेजकरण साथ बैठ कर पढ़ा करते थे. कल्याण सिंह का तो घर वहाँ था नहीं, इसलिए कभी हम तीनों मेरे घर रह जाते और कभी तेज करण के घर. दिन इसी तरह गुज़र रहे थे. हम तीनों ही क्लास में पढ़ने में सबसे आगे थे... हम तीनों अच्छे अंक लाने की कोशिश तो करते थे मगर हमारी दोस्ती पर उसका कोई असर नहीं पड़ता था. कल्याण सिंह और तेजकरण मेरे पक्के दोस्त बन गए थे और मेरी हर समस्या का समाधान भी. मैं अब थोड़ा नॉर्मल हो गया था. इसी बीच छठी कक्षा के इम्तिहान आ गए. रिज़ल्ट आया तो कल्याण सिंह क्लास में पहले नंबर पर आया, मैं दूसरे नंबर पर और तेजकरण तीसरे नंबर पर. हम तीनों बहुत खुश थे. लग रहा था हम तीनों ही क्लास में अव्वल आये हैं.....इम्तिहान के बाद छुट्टियाँ हो गईं. अब मुझे बीकानेर जाने से रोकने वाला कोई नहीं था क्योंकि पिताजी ने वादा किया था कि छुट्टियों में वो मुझे बीकानेर भेज देंगे...रतन, निर्मला और मग्घा भी तो आनेवाले थे बीकानेर. मेरा मन एक ओर उनसे मिलने को बेताब था वहीं कल्याण सिंह और तेजकरण को छोड़ने का बहुत अफ़सोस भी हो रहा था मगर कल्याण का घर तो वहाँ था नहीं , उसे तो हर हाल में अपने गाँव जाना ही था, इसलिए बड़ी अजीब सी दुविधाओं में घिरा मैं छुट्टियों में बीकानेर आ गया. अगर मुझे पता होता कि मेरे वापस आते ही कल्याण के साथ ये सब कुछ होने वाला है तो मैं किसी भी हालत में न उसे गाँव जाने देता और न ही खुद बीकानेर आता.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;छुट्टियाँ खत्म हुई और २९ जून को मैं वापस सरदारशहर आ गया क्योंकि एक जुलाई से स्कूल खुलने वाले थे. एक जुलाई को बहुत खुश खुश स्कूल गया और कल्याण और तेजकरण को देख कर फिर मेरा मन भर आया. हम तीनों दोस्त गले लगकर मिले और पहली बार मैंने देखा कि मेरी आँखों में आये आंसुओं ने कल्याण की आँखें भी भर दीं. हमने एक दूसरे से वादा किया, चाहे कुछ भी हो जाए , हम पूरे जीवन एक दूसरे से अलग नहीं होंगे. हा हा हा ...... हम जीवन की बात कर रहे थे मगर हम जानते कहाँ थे कि जीवन क्या होता है? कल्याण की बात तो खैर छोड़िये मगर कहाँ है वो हमेशा कत्था अपने मुंह में डाले रहने वाला तेजकरण? हाँ, तेजकरण के पिताजी का असम में कत्थे का व्यापार था और उसकी आदत पड़ गयी थी अपने घर में मौजूद रहने वाले कत्थे में से एक टुकड़ा अपने मुंह में डाल लेने की और उसे चूसते रहने की. अगर आज कहीं देश के किसी कोने में बैठा तेजकरण मेरी इस बात को पढ़ रहा हो तो मैं उससे आग्रह करूँगा, दोस्त मैं आज भी तुम्हें बहुत याद करता हूँ, तुम जहां कहीं भी हो, मुझसे संपर्क करो, मुझे, यकीन जानो, दूसरा जीवन मिल जाएगा.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;जुलाई का महीना था, बादल घिरने लगे थे. जैसा कि मैंने बताया घर में बिजली का कनेक्शन नहीं था, रात में आसमान में छाये काले काले बादलों के बीच चमकती बिजली बहुत डरावनी लगती थी. पता नहीं क्यों ऐसे डरावने मौसम में मेरे मोहल्ले के घरों में बंधे हुए बकरे कुछ ज़्यादा ही डर जाते थे और कुछ इस तरह चीखने लग जाते थे कि मेरा दिल रह रहकर धक् धक् कर उठता था. इसी बीच वो शनिवार आगया. हर शनिवार कल्याण सिंह अपने गाँव जाता था मगर उस दिन सुबह से ही रह रहकर बारिश हो रही थी और कल्याण सिंह के पिताजी को उस दिन अपने मैनेजर साहब के साथ बीकानेर जाना था, इसलिए उन्होंने कल्याण सिंह को कहा कि वो ऐसे खराब मौसम में गाँव न जाए क्योंकि गाँव दूर था और उस ज़माने में न तो बसें आज जितनी अच्छी हुआ करती थीं और न ही सड़कें. उन्होंने कल्याण सिंह को कहा कि वो आज गाँव न जाकर बैंक में ही चपरासी आसू राम के पास सो जाए. स्कूल में उसने मुझे ये बताया कि वो गाँव नहीं जा रहा है, बैंक में ही रहेगा. स्कूल खत्म होने तक मौसम और भी खराब हो गया था... ५ बजे ही इतना अन्धेरा हो गया था मानो रात हो गयी हो. बादल इस तरह गरज रहे थे मानो अभी पूरी धरती को निगल जायेंगे. मेरा घर स्कूल से बैंक जाते हुए रास्ते में पड़ता था. स्कूल से निकल कर मैं और कल्याण मेरे घर तक पहुंचे तब तक वो भयंकर गरजते हुए बादल बरसने लगे थे. मैंने कल्याण को ज़बरदस्ती अपने घर में खींच लिया. हम लोग भीग चुके थे. मैंने उसे तौलिया दिया और कहा “ कल्याण, यार बहुत तेज़ बारिश होने लगी है, बादल गरज रहे हैं, कल छुट्टी है, तेरे पिताजी भी यहाँ नहीं हैं, तू बैंक जाकर क्या करेगा?तू मेरे यहाँ क्यों नहीं रुक जाता ?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt; वो बोला “नहीं यार पिताजी कहकर गए हैं कि मैं बैंक में आसू चाचाजी के पास ही रहूँ. अब अगर मैं उनकी बात नहीं मानूंगा तो वो नाराज़ हो जायेंगे. इससे अच्छा तो ये है कि तू अपने पिताजी से पूछ ले, हम दोनों बैंक चलते हैं और तू&amp;#160; वहाँ मेरे साथ ही रह जाना.”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;मैं जिद करने लगा कि वो मेरे घर रह जाए मगर वो बोला “देख यार मेरे पिताजी तो बीकानेर जा चुके हैं और मुझे कहकर गए हैं कि मैं बैंक में रहूँ. अब अगर मैं यहाँ रहूँगा तो उनकी आज्ञा के बिना रहना पड़ेगा, लेकिन तेरे तो पिताजी यहीं हैं, तू उनकी इजाज़त ले सकता है, चल न, पिताजी से पूछ ले और मेरे साथ बैंक चल, हम खूब बातें करेंगे... प्लीज़.........”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;हम दोनों अपनी अपनी जिद पर अड़े रहे. वो कहता रहा, बैंक चल हम दोनों वहाँ रहेंगे और मैं कहता रहा, तू मेरे घर ही रह जा. बारिश कम हो गयी थी मगर हमारे बीच कोई सझौता नहीं हो पा रहा था.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;जब कोई समझौता नहीं हुआ तो यही तय हुआ कि वो बैंक जाकर अपने आसू चाचा जी के पास सोयेगा और मैं अपने घर. वो निकल पड़ा........मैं पता नहीं क्यों बेचैन होकर तब भी उसकी मिन्नतें कर रहा था, “यहीं रह जा न यार.......” मगर वो नहीं माना. आगे बढ़ता गया.... बढ़ता गया..... अब भी अक्सर बारिश के मौसम में जब काले काले बादल गरजते हैं तो लगता है, मैं वहीं... सरदारशहर के कसाइयों के मोहल्ले के उस घर के बाहर खड़ा कल्याण सिंह की मिन्नतें कर रहा हूँ.... “यहीं रुक जा न यार....? मत जा ना कल्याण.....कहना मान ले न मेरा” मगर होनी उसे बहुत शिद्दत से बुला रही थी. वो नहीं रुका. वो कल्याण सिंह... वो मेरा सबसे गहरा दोस्त मेरी मिन्नतों को ठुकराकर इस बात पर नाराज़ होकर चला गया कि मैंने उसकी बात नहीं मानी... मैं उसके साथ नहीं गया.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;मैं निराश होकर घर के अंदर लौट आया....बादल अब भी कहानियों के राक्षसों की तरह गरज रहे थे. आखिरकार मैं कल्याण सिंह के बारे में सोचते सोचते सो गया........&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;अगले दिन का सूरज मेरे लिए मेरी ज़िंदगी की सबसे भयंकर सुबह लेकर आया. आधी नींद में था कि पिताजी को माँ से फुसफुसाकर कहते सुना “महेन्द्र को मत बताना, घबरा जाएगा” मैं चौंककर उठा.... मैंने पूछा “क्या हुआ?” पिताजी चुप. मुझे लगा, ज़रूर कुछ अनहोनी हुई है. मैं चिल्लाया “बताइये न कि क्या हुआ?” उसके बाद उन्होंने जो कुछ बताया और जो तस्वीरें मैंने अगले दिन अखबारों में देखीं, उसने मुझे एक बार को पूरी तरह खत्म कर दिया. उस रात कल्याण सिंह बैंक जाकर चपरासी आसू राम के पास सो गया था और खराब मौसम का फायदा उठाकर कुछ डाकू बैंक में घुस गए थे ...... आसूराम बेचारा चपरासी था, कोई हथियार भी नहीं था उसके पास. डाकू अपना काम आसानी से कर सकें इस लिए उन्होंने आसूराम को तलवार से काट डाला, तभी कल्याण सिंह की आँख खुल गयी, वो रोने लगा तो उन बेरहम डाकुओं ने उसका भी गला तलवार से रेत डाला. दूसरे दिन अखबार में जो फोटो छापा था, उसे मैं अंतिम सांस तक नहीं भूल सकता. एक खाट पर आसूराम का शव पड़ा था और उसके ऊपर कल्याण सिंह का शव था जिसका गला आधा रेता हुआ था..... ठीक उसी तरह जैसे मेरे मोहल्ले के कसाई बकरे का आधा गला रेत कर उसे चिल्लाने और मरने के लिए छोड़ दिया करते थे, हलाल के नाम पर....... मेरे कानों में कल्याण सिंह की वो चीखें गूंज रही थीं.... और मेरी आँखों के आगे उसका वो आधा कटा हुआ गला स्थायी रूप से अंकित हो गया........मुझे लगा... उसका खून डाकुओं ने नहीं, मैंने किया है. अगर मैं उसे ज़बरदस्ती रोक लेता..... तो आज वो भी इस दुनिया में होता... क्या बिगड जाता अगर मैं उसके पैर पकड़ लेता... या दो थप्पड़ मार कर ही रोक लेता..... कम से कम उसकी जान तो नहीं जाती.......... आज भी जब कभी काले काले बादल आसमान में घुमड़ते हैं, बिजली कड़कड़ाती है, लोग “मौसम अच्छा हो गया” कहकर पिकनिक पर निकल पड़ते हैं, तो उसका वो मुस्कुराता चेहरा, उसके घुंघराले बाल, उसका गोरा चेहरा... मेरी आँखों के सामने रह रहकर आ जाता है लेकिन तुरंत ही उसका वो आधा कटा हुआ गला....उससे उबलकर फैला हुआ खून इन सबको धुंधला कर देता है और मेरे कानों में उसकी चीखें गूंजने लगती हैं और मैं फिर पछतावे से भर उठता हूँ “........काश मैं उस रात उसे अपने घर रोक लेता.”&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;/p&gt; &lt;font size="4"&gt;   &lt;hr /&gt;पिछली सभी कडियां पढ़ने के लिए &lt;a href="http://radionamaa.blogspot.in/search/label/%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%9F%E0%A4%B8%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B9%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%20%E0%A4%8F%E0%A4%95%20%E0%A4%AE%E0%A4%A8" target="_blank"&gt;यहां क्लिक कीजिए।&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-3622649704598253586?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-02-24T10:52:53.831+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh3.ggpht.com/-SIkmjSlvLeM/T0cemh3hi2I/AAAAAAAAD-g/_qruaaj-Hz0/s72-c/pandit%252520gangadhar%252520shastri_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">12</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/02/6.html</feedburner:origLink></item><item><title>काशीनाथ सिंह के बारे में शेषनारायण सिंह से शुभ्रा शर्मा की बातचीत</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/-zl7zyqkpyI/blog-post_30.html</link><category>news room se shubhra sharma</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Sun, 29 Jan 2012 18:03:42 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-8061752882868139159</guid><description>&lt;p&gt;   &lt;br /&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;जैसा कि आप सभी जानते हैं कि 'काशी का अस्‍सी' के लिए लेखक काशीनाथ सिंह को साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार दिये जाने की &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/-AE096-JZsmw/TyX6Yb71MkI/AAAAAAAAD9k/2pSJIhFtPiI/s1600-h/img040%25255B4%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="img040" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="175" alt="img040" src="http://lh5.ggpht.com/-YepU8iH_GGk/TyX6ZjFtByI/AAAAAAAAD9s/zXtEN6WV-I4/img040_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" width="246" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;घोषण की गयी है। शुभ्रा जी ने इस मौक़े पर दिल्‍ली के एफ.एम. गोल्‍ड के लिए काशी जी के पुराने मित्र शेष नारायण सिंह से उनके व्‍यक्तित्‍व के कुछ अंतरंग पहलुओं पर बातचीत की। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;ये बातचीत एक जनवरी को काशीनाथ सिंह के जन्‍मदिन पर प्रसारित की गयी थी। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;रेडियोनामा के पाठकों के लिए इसे यहां प्रस्‍तुत किया जा रहा है।&amp;#160; &lt;br /&gt;पूरी बातचीत तकरीबन दस मिनिट की है।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt; &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/-PPnHcWmmA0o/TyX6byG8ipI/AAAAAAAAD90/FSjEehOKGnk/s1600-h/img038%25255B3%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="img038" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="246" alt="img038" src="http://lh5.ggpht.com/-YIkVrv1JcPQ/TyX6c0XwjtI/AAAAAAAAD98/r1rpXp89uSU/img038_thumb%25255B1%25255D.jpg?imgmax=800" width="171" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/-ZCcyTaxupmg/TyX6dxr0j3I/AAAAAAAAD-E/tKk6lwiX7Tk/s1600-h/img039%25255B3%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="img039" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; border-left: 0px; border-bottom: 0px" height="246" alt="img039" src="http://lh5.ggpht.com/-buCsncVb1mo/TyX6fEi_8tI/AAAAAAAAD-I/JFCYXczw20Y/img039_thumb%25255B1%25255D.jpg?imgmax=800" width="82" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt; &lt;object height="94" width="422"&gt;&lt;param value="http://www.divshare.com/flash/audio_embed?data=YTo2OntzOjU6ImFwaUlkIjtzOjE6IjQiO3M6NjoiZmlsZUlkIjtzOjg6IjE2NjczMTczIjtzOjQ6ImNvZGUiO3M6MTI6IjE2NjczMTczLTFkYSI7czo2OiJ1c2VySWQiO3M6NjoiNzExMjU5IjtzOjEyOiJleHRlcm5hbENhbGwiO2k6MTtzOjQ6InRpbWUiO2k6MTMyNzg4ODQ5Nzt9&amp;amp;autoplay=default" name="movie"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed wmode="transparent" height="94" width="422" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" src="http://www.divshare.com/flash/audio_embed?data=YTo2OntzOjU6ImFwaUlkIjtzOjE6IjQiO3M6NjoiZmlsZUlkIjtzOjg6IjE2NjczMTczIjtzOjQ6ImNvZGUiO3M6MTI6IjE2NjczMTczLTFkYSI7czo2OiJ1c2VySWQiO3M6NjoiNzExMjU5IjtzOjEyOiJleHRlcm5hbENhbGwiO2k6MTtzOjQ6InRpbWUiO2k6MTMyNzg4ODQ5Nzt9&amp;amp;autoplay=default"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-8061752882868139159?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-01-30T07:33:42.636+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh5.ggpht.com/-YepU8iH_GGk/TyX6ZjFtByI/AAAAAAAAD9s/zXtEN6WV-I4/s72-c/img040_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><media:content url="http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~5/hdixHdvXk2Q/audio_embed" fileSize="31072" type="application/x-shockwave-flash" /><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle> जैसा कि आप सभी जानते हैं कि 'काशी का अस्‍सी' के लिए लेखक काशीनाथ सिंह को साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार दिये जाने की घोषण की गयी है। शुभ्रा जी ने इस मौक़े पर दिल्‍ली के एफ.एम. गोल्‍ड के लिए काशी जी के पुराने मित्र शेष नारायण सिंह से उनके व्‍यक्तित्‍व के कुछ अ</itunes:subtitle><itunes:author>??????????</itunes:author><itunes:summary> जैसा कि आप सभी जानते हैं कि 'काशी का अस्‍सी' के लिए लेखक काशीनाथ सिंह को साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार दिये जाने की घोषण की गयी है। शुभ्रा जी ने इस मौक़े पर दिल्‍ली के एफ.एम. गोल्‍ड के लिए काशी जी के पुराने मित्र शेष नारायण सिंह से उनके व्‍यक्तित्‍व के कुछ अंतरंग पहलुओं पर बातचीत की। ये बातचीत एक जनवरी को काशीनाथ सिंह के जन्‍मदिन पर प्रसारित की गयी थी। रेडियोनामा के पाठकों के लिए इसे यहां प्रस्‍तुत किया जा रहा है।&amp;#160; पूरी बातचीत तकरीबन दस मिनिट की है। रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें । radionama@gmail.com</itunes:summary><itunes:keywords>news room se shubhra sharma</itunes:keywords><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/01/blog-post_30.html</feedburner:origLink><enclosure url="http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~5/hdixHdvXk2Q/audio_embed" length="31072" type="application/x-shockwave-flash" /><feedburner:origEnclosureLink>http://www.divshare.com/flash/audio_embed?data=YTo2OntzOjU6ImFwaUlkIjtzOjE6IjQiO3M6NjoiZmlsZUlkIjtzOjg6IjE2NjczMTczIjtzOjQ6ImNvZGUiO3M6MTI6IjE2NjczMTczLTFkYSI7czo2OiJ1c2VySWQiO3M6NjoiNzExMjU5IjtzOjEyOiJleHRlcm5hbENhbGwiO2k6MTtzOjQ6InRpbWUiO2k6MTMyNzg4ODQ5Nzt9&amp;amp;autoplay=default</feedburner:origEnclosureLink></item><item><title>नए साल पर रेडियो से उम्‍मीदें: रेडियोनामा परिचर्चा</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/HsqOh3_yDV8/blog-post_25.html</link><category>रेडियोनामा परिचर्चा</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Tue, 24 Jan 2012 20:54:08 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-5896687791530402951</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;नया साल अब लगभग पुराना होने को है। जनवरी का महीना बस बीता ही जा रहा है। साल के शुरू होते-होते ही हमने रेडियोनामा के कुछ साथियों से ई-मेल पर नए साल में रेडियो से उनकी उम्‍मीदों के बारे में कुछ सवाल पूछे। ये हमारे वो साथी हैं जो रेडियो के नियमित श्रोता हैं। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;हमारे सवाल थे ये- &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;1. नये साल में रेडियो की दुनिया से आपको कौन सी उम्‍मीदें हैं।     &lt;br /&gt;2. आज निजी और सरकारी रेडियो चैनलों में सबसे ज्‍यादा असह्य बात आपको कौन सी लगती है।      &lt;br /&gt;3. क्‍या गुज़रे साल का कोई यादगार कार्यक्रम याद है जिसके बारे में बताना चाहें।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;सुजॉय चैटर्जी पेशे से इंजीनियर हैं। लेकिन संगीत के क़द्रदान हैं। इन दिनों वो &lt;/font&gt;&lt;a href="http://radioplaybackindia.blogspot.com" target="_blank"&gt;&lt;font size="3"&gt;रेडियो प्‍ले-बैक इंडिया&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;font size="3"&gt; पर &lt;a href="http://lh3.ggpht.com/-qlnMQBRzq4U/Tx-KxnEFDAI/AAAAAAAAD8k/vid7Rw3pJiA/s1600-h/sujoy%25255B5%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="sujoy" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="141" alt="sujoy" src="http://lh6.ggpht.com/-9SaQLYUHZgU/Tx-KynwkRZI/AAAAAAAAD8s/EXgT_00H0oQ/sujoy_thumb%25255B3%25255D.jpg?imgmax=800" width="186" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; संगीत पर लिख रहे हैं। इससे पहले 'आवाज़' पर उन्‍होंने फिल्‍म-संगीत पर बेहतरीन लेख लिखे थे। सुजॉय विविध-भारती के भी बहुत सजग श्रोता हैं। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;b&gt;     &lt;br /&gt;&lt;font size="3"&gt;1. &lt;/font&gt;&lt;/b&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;b&gt;नये&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;साल&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;में&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;रेडियो&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;की&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;दुनिया&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;से&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;आपको&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;कौन&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;सी&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;उम्‍मीदें&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;हैं।&lt;/b&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;नये साल में रेडियो की दुनिया से मेरी उम्मीदें कई हैं, कुछ के बारे में बताता हूँ।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;आकाशवाणी के स्थानीय केन्द्र, जो विविध भारती का प्रसारण रिले करते हैं, उनसे हाथ जोड़ कर विनती है कि विज्ञापन ठूंसते वक़्त कम से कम इतना ध्यान रखें कि सुनने वालों का मज़ा खराब न हो। कई बार ऐसा हुआ है और आज भी होता है कि फ़रमाइशी कार्यक्रमों में जब गीत के बाद फ़रमाइशी नाम बोले जाते हैं, उस वक़्त विज्ञापन बजाये जाते हैं, और जब तक विज्ञापन ख़त्म होते हैं, अगला गीत शुरु हो चुका होता है। 'विशेष जयमाला' के दौरान जब सेलिब्रिटी बोल रहे होते हैं, तब भी विज्ञापन बजाये जाते हैं, जिसके लिए माफ़ी की कोई गुंजाइश नहीं है। स्थानीय केन्द्रों को इस मामले में जागरूक होने और श्रोताओं के मनोभाव को समझने की ज़रूरत है।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;जैसे-जैसे स्थायी उद्‍घोषक सेवानिवृत्त होते जा रहे हैं, वैसे वैसे आकस्मिक उद्‍घोषकों की संख्या और उनके द्वारा प्रसारण समय में वृद्धि होती जा रही है। (आकाशवाणी गुवाहाटी में इस समय हिन्दी विभाग में कोई भी स्थायी उद्‍घोषक नहीं हैं, बस प्रोग्राम एग्ज़ेक्युटिव हैं और कुछ आकस्मिक उद्‍घोषक)। लिस्नर्स के साथ कनेक्ट करने के लिए रेगुलर अनाउन्सर की बहुत ज़्यादा ज़रूरत होती है। एक जो नियमितता वाली बात होती है, वह बहुत ज़्यादा मायने रखती है। यह बात मुझे आकाशवाणी गुवाहाटी की एक स्थायी उद्‍घोषिका नें ख़ुद बताई थी जब मैं उनसे मिलने रेडियो स्टेशन गया था कुछ साल पहले। अगर आकाशवाणी को बचाये रखना है तो सरकार को इस बारे में सोचना ही होगा।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;और ख़ास तौर से विविध भारती से मेरी यह उम्मीद है कि 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में स्वर्गीय कलाकारों (जिनसे साक्षात्कार सम्भव नहीं हो पायी है), के परिवार वालों के भी इन्टरव्यूज़ लिए जायें। हिन्दी सिनेमा की प्रथम पार्श्वगायिका पारुल घोष की परपोती हैं, संगीतकार विनोद की बेटी और दामाद हैं, शक़ील बदायूनी के बेटे हैं, ये सभी फ़ेसबूक पर उपलब्ध हैं। साथ ही 'उजाले' में लता जी का लम्बा-सा इन्टरव्यू सुनने के लिए पता नहीं कब से तरसा बैठा हूँ।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;b&gt;2. &lt;/b&gt;&lt;b&gt;आज&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;निजी&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;और&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;सरकारी&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;रेडियो&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;चैनलों&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;में&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;सबसे&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;ज्‍यादा&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;असह्य&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;बात&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;आपको&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;कौन&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;सी&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;लगती&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;है।&lt;/b&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;तकनीकी ऐंगल की बात करें तो निजी चैनल सरकारी चैनलों से काफ़ी आगे हैं। उनका प्रसारण बहुत ही कसा हुआ होता है। गीत और घोषणा के बीच एक सेकण्ड का भी गैप नहीं होता। एक सेकण्ड के लिए भी आवाज़ ग़ायब नहीं होती और न ही कभी सीडी अटकने या किसी तरह का कोई तकनीकी समस्या जान पड़ती है। पर सरकारी चैनलों में ऐसा नहीं है। कभी सीडी अटक जाती है तो कभी घोषणा और गीत के बीच काफ़ी समय लिया जाता है। कभी ग़लत गीत भी बज जाता है।     &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;निजी चैनलों की सबसे असह्य बात है कि उनके पास गीतों का बहुत बड़ा ख़ज़ाना नहीं होता। और ख़ास तौर से पुराने गीतों की बात करें तो राहुल देव बर्मन के गीतों की ही भरमार होती है। विविधता बहुत ही कम है। ऐसे में सरकारी चैनलों के पास कुबेर का ख़ज़ाना है। इस तरह से अगर निजी चैनलों का प्रसारण तकनीक और सरकारी चैनलों का आरकाइव एक साथ हो जाये तो रेडियो की दुनिया में नई क्रान्ति आ सकती है।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;b&gt;3. &lt;/b&gt;&lt;b&gt;क्‍या&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;गुज़रे&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;साल&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;का&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;कोई&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;यादगार&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;कार्यक्रम&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;याद&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;है&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;जिसके&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;बारे&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;में&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;बताना&lt;/b&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;चाहें।&lt;/b&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;गुज़रे साल का कोई यादगार कार्यक्रम तो नहीं है। &lt;/font&gt;&lt;font size="3"&gt;पर रविवार की शाम 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम को सुनना एक अच्छा अनुभव रहता है हर सप्ताह।     &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;a href="http://raviratlami.blogspot.com/" target="_blank"&gt;रवि रतलामी&lt;/a&gt; का नाम नेट-जीवियों के लिए अनजान नहीं है। उन्‍हीं की प्रेरणा से मैंने ब्‍लॉगिंग की दुनिया में &lt;a href="http://lh6.ggpht.com/-jwUKLrQ0qus/Tx-KzkHMmZI/AAAAAAAAD8w/iRKn57k_zcs/s1600-h/raviRATLAMI%25255B4%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="raviRATLAMI" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="156" alt="raviRATLAMI" src="http://lh6.ggpht.com/-v3_YXw7wYIM/Tx-K1Do2xZI/AAAAAAAAD88/epBmQZ7762A/raviRATLAMI_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" width="120" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; क़दम रखा था। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की नौकरी से रिटायरमेन्‍ट लेने के बाद वो पूर्ण-कालिक तकनीकी सलाहकार हैं। लिनक्‍स पर हिंदी और छत्‍तीसगढ़ी को शामिल करने में उनका &lt;a href="https://plus.google.com/101962590885527404417/about" target="_blank"&gt;महत्‍वपूर्ण योगदान&lt;/a&gt; रहा है। रवि भाई ब्‍लॉगिंग और कंप्‍यूटर की दुनिया में हम जैसे अज्ञानियों के लिए एक सतत हेल्‍पलाइन हैं। उनका नाम ब्‍लॉगिंग की दुनिया में बेहद सम्‍मान के साथ लिया जाता है। दिलचस्‍प बात ये है कि वो रेडियो की दुनिया से जुड़ाव रखते हैं। ये रहे उनके जवाब&amp;#160; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;strong&gt;1. नये साल में रेडियो की दुनिया से आपको कौन सी उम्‍मीदें हैं।&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;उम्मीद तो कुछ खास नहीं है. निजी चैनलों में वही फालतू की बकवास - बकबक, वही 4-5 नए हिट गाने जिसे हर घंटे बीस बार बजाकर आपके दिमाग का दही जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. सरकारी चैनलों में वही बीस साल से चल रहे टाइप्ड प्रोग्राम - कहीं कोई नयापन नहीं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;strong&gt;2. आज निजी और सरकारी रेडियो चैनलों में सबसे ज्‍यादा असह्य बात आपको कौन सी लगती है।&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;निजी - फालतू की बकवास, सड़ियल चुटकुले, बारंबार बजते प्रोमो गाने। सरकारी - शून्य प्रयोगधर्मिता. बाबा आदम के जमाने से चले आ रहे टाइप्ड किस्म के प्रोग्राम. अरे भाई, कोई घंटे/आधे घंटे का दुनिया के बेहतरीन संगीत के बारे में कोई प्रोग्राम (या ऐसे ही कुछ अन्य) बनाने के बारे में क्यों नहीं सोचता?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;strong&gt;3. क्‍या गुज़रे साल का कोई यादगार कार्यक्रम याद है जिसके बारे में बताना चाहें।&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;यादगार याद नहीं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;font color="#000000"&gt;'डाकसाब' का जिक्र रेडियोनामा पर पहले भी होता रहा है। ज़ाहिर है कि पेशे से डॉक्‍टर/सर्जन हैं। और रेडियो &lt;/font&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/-yrYjzGHk5I4/Tx-K2pxbpNI/AAAAAAAAD9E/wV95Dp-z8ow/s1600-h/sti%25255B4%25255D.png"&gt;&lt;font color="#000000"&gt;&lt;img title="sti" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="246" alt="sti" src="http://lh4.ggpht.com/-qzmk5Lq6e64/Tx-K33chUSI/AAAAAAAAD9M/yhcU_dXFELU/sti_thumb%25255B2%25255D.png?imgmax=800" width="173" align="right" border="0" /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;font color="#000000"&gt; कार्यक्रमों के सुधि श्रोता। रेडियो कार्यक्रम पसंद आए तो बढिया। वरना यहां भी उनकी सर्जरी से बचना मुश्किल है। ऐसे सुधि-श्रोताओं से रेडियो-प्रस्‍तुतकर्ताओं को सुधार करने में काफी मदद मिलती है। उनके ज़रिये हम अपने कार्यक्रमों में रोचकता की नब्‍ज़ टटोल पाते हैं। ये रहे उनके जवाब&lt;/font&gt; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;strong&gt;1. नये साल में रेडियो की दुनिया से आपको कौन सी उम्‍मीदें हैं ?&lt;/strong&gt;&amp;#160;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;(क) नये ज़माने के हिसाब से कन्टेन्ट में बदलाव की ।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;(ख) देश के भावी नागरिकों &lt;u&gt;(देश की जनसंख्या और श्रोता-वर्ग का एक बहुत बड़ा प्रतिशत)&lt;/u&gt; के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी के एहसास की । &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;आज देश में संस्कृति और मूल्यों के आदर्श का जो संकट है, उसके पीछे मुख्य कारण मेरी दॄष्टि में नयी पीढ़ी में इस तरह की सोच विकसित न कर सकने की हमारी अक्षमता है । &amp;quot;बच्चे देश के भावी नागरिक हैं&amp;quot; - यह जुमला जहाँ-तहाँ उछालते सब हैं ,पर उनके लिये अच्छे कार्यक्रमों का कम से कम रेडियो की दुनिया में तो आज सर्वथा अभाव दिखता है ।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;strong&gt;2. आज निजी और सरकारी रेडियो चैनलों में सबसे ज्‍यादा असह्य बात आपको कौन सी लगती है ?&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;(क)&lt;u&gt; सरकारी चैनलों पर&lt;/u&gt; घटिया सरकारी प्रचार की । पिछले लगभग पाँच दशकों से आकाशवाणी के समाचारों की शुरुआत हमेशा &amp;quot; प्रधानमंत्री ने .....&amp;quot; से ही होती आयी है, कभी-कभार के अपवादों को छोड़ कर ।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;(ख) &lt;u&gt;निजी चैनलों पर&lt;/u&gt; भाषा के बिगड़ते संस्कार और प्रसारण-सामग्री में घोर अश्लीलता । &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;strong&gt;3. क्‍या गुज़रे साल का कोई यादगार कार्यक्रम याद है जिसके बारे में बताना चाहें।&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;विविध भारती पर &amp;quot;उजाले उनकी यादों के&amp;quot;&amp;#160; श्रॄंखला में प्रसारित भेंट-वार्ताएं, जिनके माध्यम से तमाम उन लोगों को निकट से जानने-समझने का अवसर मिला, जिन्होंने अपने काम से हमारे समाज पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;सागर नाहर रेडियोनामा के संस्‍थापकों में से एक हैं। हैदराबाद में रहते हुए वे लगातार रेडियो सुनते हैं। और &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/-WT6ZH8iJcUY/Tx-K5n0351I/AAAAAAAAD9U/7s-PxjyPXyE/s1600-h/n%25255B4%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="n" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="194" alt="n" src="http://lh5.ggpht.com/-mkbVLUVE_EA/Tx-K6jKT_KI/AAAAAAAAD9c/c7CLwGQKcKI/n_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" width="186" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; अपनी पसंद-नापसंद बताते रहते हैं। फेसबुक पर रेडियोनामा और श्रोता बिरादरी समूहों का और यहां रेडियोनामा ब्‍लॉग का कुशल तकनीकी संचालन दर्शाता है कि वे परदे के पीछे चुपचाप अपना काम करते रहने वाले लोगों में से हैं। ये रहे उनके जवाब। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;strong&gt;1. नये साल में रेडियो की दुनिया से आपको कौन सी उम्‍मीदें हैं।&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;नए साल में रेडियो से उम्मीद है कि कार्यक्रम के बीच में विज्ञापन ना बजाएं मसलन पं वसंत देसाई के कार्यक्रम के दौराना गाना बज रहा था, राधा को विदा के इशारे थे... तभी बीच में मैं अपना इंश्योरेंस बदलना चाहता हूँ... फिर से गाने का हिस्सा घुमकित- घुमकित घूम गई.. !!! इस तरह &lt;/font&gt;&lt;font size="3"&gt;विज्ञापन नहीं बजने चाहिए।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मानता हूँ कि विज्ञापन भी जरूरी है तो विज्ञापन बजाने के समय पर कंपनी को बता दिया जाए कि इस समय गीत बज रहा होता है सो विज्ञापन गाने के बाद बजेगा। चाहें तो बीच में एक की बजाए दो ब्रेक ले लिए जाएं लेकिन गाने में खलल ना डाला जाए। दिनांक 23.1.2011 को संगीत सरिता में पं उल्हास बापट कुछ बोल रहे थे, और उसी समय स्थानीय स्टेशन ने विज्ञापन बजा दिया। इस तरह की हरकतें खीझ पैदा करती है सो उम्मीद है कि इस दिशा में कोई सार्थक कदम उठेगा।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;दूसरी बात शास्त्रीय संगीत से जुड़े कार्यक्रमों में नए कलाकारों को भी मौका दिया जाए जैसे विदुषी डॉ राधिका बुधकर, पं संजीव अभ्यंकर आदि। लोकेन्द्र शर्मा जी का कार्यक्रम बाइस्कोप की बातों को पुन: चालू किया जाए। उजाले उनकी यादों को हफ्ते में एक से अधिक बार सुनाया जाए।     &lt;br /&gt;मेरी राय त्रिवेणी को बन्द करके उसका समय संगीत सरिता को दिया जाना चाहिए। बच्‍चों के कार्यक्रम विविध भारती पर नहीं है अत: बच्‍चों के लिए भी कार्यक्रम चालू किए जाएं।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;स्थानीय स्टेशन के प्रसारण कर्ताओं को हिदायत दी जानी चाहिए कि हिन्दी कार्यक्रमों का विवरण हिन्दी में दें, क्यों कि वे तेलुगु में बताते हैं और हमें पता भी नहीं चल पाता कि कौनसा कार्यक्रम कितनी बजे आएगा।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;ol start="start"&gt;   &lt;li&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;strong&gt;आज निजी और सरकारी रेडियो चैनलों में सबसे ज्‍यादा असह्य बात आपको कौन सी लगती है।&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/li&gt; &lt;/ol&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;निजी तो मैं कभी सुनता ही नहीं सरकारी में जो बात असह्‍न लगती है वह मैं पहले प्रश्‍न में बता चुका।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;ol start="start"&gt;   &lt;li&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;strong&gt;क्‍या गुज़रे साल का कोई यादगार कार्यक्रम याद है जिसके बारे में बताना चाहें।&lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;/li&gt; &lt;/ol&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;कई सारे हैं जैसे कि ऊर्दू सर्विस पर मशहूर गायिका राजकुमारी जी का साक्षात्कार; ऊर्दू सर्विस का प्रसारण और उनके उद्‍घोषकों को श्रोताओं की पसन्दगी की अच्छी समझ है। जब राजकुमारीजी बोल रही थी, एक बार भी उद्‍घोषिका ने उन्हें टॊका नहीं कि इस बात पर यहाँ एक गीत तो बनता है, या आपकी पसन्द का कोई गीत बताईये... ना ही उद्‍घोषिका ने बेवजह ठहाके नहीं लगाए।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;विविध भारती पर संगीत सरिता में बहुत से सुन्दर कार्यक्रम आए हैं जैसे रसिकेषु, राजस्थानी लोक कलाकारों द्वारा प्रस्‍तुत कार्यक्रम जिसमें महेन्द्र मोदी जी ने राजस्थानी कलाकारों के गीतों का भावार्थ बताया था। , विदुषी गिरिजा देवी, उस्‍ताद वासिफुद्दीन डागर की श्रृंखला, विविध भारती के ख़ज़ाने से वाली श्रृंखला और बाद में उनके रागों पर चर्चा.. ऐसे कई कार्यक्रम जो फिलहाल याद नहीं आ रहे हैं।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;उम्मीद है कि वि.भा. पर ऐसे रचनात्मक कार्यक्रम आगे और भी सुनने को मिलेंगे।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-5896687791530402951?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-01-25T10:24:08.181+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh6.ggpht.com/-9SaQLYUHZgU/Tx-KynwkRZI/AAAAAAAAD8s/EXgT_00H0oQ/s72-c/sujoy_thumb%25255B3%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/01/blog-post_25.html</feedburner:origLink></item><item><title>'कविताएं अगर होती परियां'.....जाने-माने न्‍यूज़-रीडर राजेंद्र चुघ की कविताएं</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/WHVkKjwR1xM/blog-post_22.html</link><category>rajendra chugh</category><category>news room se shubhra sharma</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Sat, 21 Jan 2012 20:27:59 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-5398859083590802587</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;पिछले कुछ दिनों से रेडियोनामा पर ना तो शुभ्रा जी आ रही थीं और ना ही 'न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा' वाले स्‍तंभ की अगली कडियां। नया साल शुरू होते ही शुभ्रा जी ने दो अनमोल प्रस्‍तुतियां रेडियोनामा के लिए तैयार की हैं। इनमें से एक आज। अगली अनमोल प्रस्‍तुति असल में ऑडियो के साथ है। और इसकी प्रतीक्षा कीजिए। क्‍योंकि प्रतीक्षा का फल&amp;#160; 'मीठा' होता है। तो लीजिए रेडियोनामा पर रविवार की विशेष पेशकश।&amp;#160; जाने-माने न्‍यूज़-रीडर राजेंद्र चुघ की कविताएं। रेडियोनामा पर चुघ साहब की ये कविताएं पेश करना हमारे लिए सौभाग्‍य ये कम नहीं है। हम शुभ्रा जी और राजेंद्र चुघ दोनों के शुक्रगुज़ार हैं।        &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/font&gt;    &lt;hr /&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160; &lt;br /&gt;दोस्तो, आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि मैं इतने दिनों से कहाँ लापता हूँ. तो अर्ज़ कर दूं कि वैसे तो दोस्तों की महफ़िल में बैठना, उनके साथ इधर-उधर की बातें करना, और खुलकर ठहाके लगाना किसे पसंद नहीं आता? लेकिन कभी-कभी इससे भी ज़्यादा &amp;quot;दिलफ़रेब हो जाते हैं ग़म रोज़गार के &amp;quot;....और फिर महिलाओं के ऊपर तो प्रकृति ने दोहरी उदारता दिखाई है.... कि घर भी संभालें और रोज़गार भी. आशा है इस दोहरी मजबूरी को समझते हुए मुझे माफ़ कर देंगे.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;जहाँ तक &amp;quot;न्यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा&amp;quot; का सवाल है.... यादों का सिलसिला ऐसे मोड़ पर आ पहुंचा था, जहाँ से कुछ तीखी और तल्ख़ यादें झाँकने लगी थीं इसलिए मैंने रास्ता ही बदल दिया.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;आज मैं आपकी चिर-परिचित आवाज़ के एक नये पहलू से आपका परिचय कराने जा रही हूँ. राजेंद्र चुघ की आवाज़ में आप बरसों&amp;#160;&amp;#160; से समाचार सुनते आ रहे हैं. वे न सिर्फ हिंदी समाचार कक्ष के हमारे वरिष्ठ सहयोगी हैं बल्कि इस समय &lt;strong&gt;मुख्य समाचार वाचक&lt;/strong&gt; भी हैं. सम-सामयिक विषयों की बहुत अच्छी जानकारी रखते हैं. पंजाबी और हिंदी साहित्य का विशद अध्ययन किया है. ख़ुद भी लिखते रहे हैं. विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में उनकी कहानियां और कवितायेँ बराबर प्रकाशित होती रही हैं. हमारी गप-गोष्ठियों में बहुत इसरार करने पर कभी- कभी अपनी रचनाएँ सुना दिया करते हैं.      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/-8rwjk97LjbM/TxuQR2k28kI/AAAAAAAAD8U/JhuIy0CSp6Q/s1600-h/1%25255B14%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="1" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-left: 0px; margin-right: auto; border-bottom: 0px" height="305" alt="1" src="http://lh4.ggpht.com/-KJ3lsVOhR20/TxuQTJLUTdI/AAAAAAAAD8c/eHvKSwb40l0/1_thumb%25255B12%25255D.jpg?imgmax=800" width="398" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;     &lt;br /&gt;पंजाब के जालंधर जिले के शाहकोट गाँव से ताल्लुक रखते हैं. गाँव की बातें करते हुए बहुत भावुक हो जाते हैं. शाहकोट मिर्च की बहुत बड़ी मंडी है. मिर्च की तल्ख़ी तो नहीं, हाँ उसका रंग और ख़ूबसूरती चुघ साहब की कविताओं में झलकती है. पहले गाँव, फिर नकोदर और फिर जालंधर से पढ़ाई पूरी की और वहीँ से आकाशवाणी से साथ जुड़ा. पत्नी सीमा सच्चे अर्थों में उनकी सह-धर्मिणी हैं. चुघ साहब बातचीत में अक्सर उन्हें 'मालकिन' कहकर बुलाते हैं. इसी वजह से मैं कभी-कभी उन्हें 'सीमाबद्ध' कहकर चिढ़ाती भी हूँ .&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;दो बच्चे हैं - संकेत और निष्ठा. संकेत होटल मैनेजमेंट व्यवसाय से जुड़े हैं और निष्ठा ने पत्रकारिता का पेशा अपनाया है. पुत्रवधू जसरिता और दामाद विलास समेत पूरा परिवार आत्मीयता की ऐसी प्यारी डोर से बंधा हुआ है कि देखकर हमेशा यही दुआ करने को जी चाहता है कि यह डोर और मज़बूत हो. यहां ये जिक्र करते चलें कि चुघ साहब के दामाद विलास चित्राकरण दक्षिण भारत के हैं। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;चुघ साहब ने अभी पिछले दिनों एक कविता सुनाई. उसे सुनते हुए मुझे अपने पापा&amp;#160; कुछ इस तरह याद आये कि मेरी आँख भीग गयी. यह कविता उन्होंने अपनी बेटी के जन्मदिन पर उसके लिए उपहार के रूप में लिखी थी.&lt;/font&gt; मैंने उनसे वह कविता माँग ली और अपने संकलन में संजो कर रख ली. कुछ मित्रों की नज़र पड़ी....कुछ टिप्पणियां भी आयीं. आखिरकार आम सहमति से तय पाया गया कि इन कविताओं को रेडियोनामा के माध्यम से सभी श्रोताओं-पाठकों तक पहुँचाया जाये. अनुमति के लिए चुघ साहब से संपर्क किया तो बोले - चाहे जितनी कवितायेँ ले लो और जहाँ चाहो, चिपका दो.&amp;#160; तो लीजिये, राजेंद्र चुघ की ये कवितायेँ आपके हवाले कर रही हूँ. पढ़ कर देखिये और बताइये कैसी लगीं. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;         &lt;br /&gt;          &lt;br /&gt;निष्ठा के लिए&lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;कवितायेँ अगर होतीं परियां&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;बच्चों की कहानियों जैसी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;और उतर आतीं लेकर जादू की छड़ी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;हर सपना सच करने को ....&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;कवितायेँ अगर होतीं तितलियाँ&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;स्वर्ग की क्यारियों जैसी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;और उतर आतीं लेकर सारे चमकीले रंग&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;हर ख्वाब में भरने को .....&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;कवितायेँ अगर होतीं दुआएं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;काबे के आँगन जैसी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;और उतर आतीं लेकर मन्नतों का असर&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;हर ख्वाहिश में भरने को....&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;तो भेज देता मैं सारी परियों और तितलियों को तुम्हारे घर के पते पर&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;और बैठा रहता काबे के आँगन में दुआ के लिए हाथ उठाये&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;तुम्हारे लिए.......उम्र भर.......&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt; ------&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;यादें &lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt; जाने किस चीज़ से बुनी होती हैं ये यादें,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;समय के सूत से या रिश्तों के रेशम से&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;प्रवासी पंछियों की तरह उड़ आती हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;बीते की बर्फ से ....&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;कभी गोद में बैठकर दाढ़ी के बाल टटोलती हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;कभी दीवार घड़ी से कोयल की तरह निकलकर हर घंटे बोलती हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;ज़रा सा वक़्त खोलकर शरारत से झाँकती हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;पुराने पलों पर जमी ज़ंग की परत पोंछ डालती हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;ये यादें उतार देती हैं पस्त लम्हों की थकान&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;वे खोल देते हैं आँखें फिर नवजात शिशु के समान&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;मेरी उँगली पकड़कर इन्द्रधनुष पर झुलाने ले जाती हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;तेरी यादें ....&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;इन यादों की उम्र दराज़ हो&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;और तुम्हारी भी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;-----------&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;संकेत और जसरिता के नाम&lt;/font&gt;&lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;सदियों से घूम रही है धरती अपने सूरज के गिर्द&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;सदियों से झूल रहा है चाँद अपनी रात के बालों में&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;सदियों से धो रहा है समंदर अपनी धरती के पैर&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;सदियों से चूम रही है बर्फ़ अपने पर्वत के होंठ&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;सदियों से दे रही है बहार अपने मौसम के हाथों फूल&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;लिखी जा रही है मुहब्बत की&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;एक मुक़द्दस और मुसलसल दास्ताँ&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;क़ुदरत के काग़ज़ पर सदियों से...&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;आओ हम तुम भी आज दस्तख़त करें,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;इस दस्तावेज़ के नीचे,&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;कि हमारी मुहब्बत के निशान&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;संभालकर रख लें&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;ये सदियाँ....&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;-------     &lt;br /&gt;बातों ही बातों में चुघ साहब ने यह भी बताया कि बरसों पहले जब उन्होंने कविता की ज़मीन पर पैर रखा तो सबसे पहले यह ग़ज़ल बन गयी थी, जो आज भी उनके दिल के बहुत क़रीब है.....      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;बेसब्र है बादल उसे तड़पाइयेगा मत&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;गर टूट के बरसे तो पछताइयेगा मत.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;बिजली के नंगे तारों से छींके हैं खतरनाक&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;इन पर किसी उम्मीद को लटकाइयेगा मत.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;वो बांटने तो आये हैं खैरात में सपने&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;ख़ाली जनाब आप भी घर जाइयेगा मत.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;जो ज़िन्दगी को समझते हैं महज़ चुटकुला&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;कह दो उन्हें कि तालियाँ बजाइयेगा मत.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;उनके भी दिल में दर्द है, मैं बहुत सुन चुका&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;अब इस ख़याल से मुझे बहलाइयेगा मत.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;सतलुज की धारा शाहकोट से कुछ ही दूर बहती है. हिंदुस्तान के गावों में बसने वाले लोगों की ज़िन्दगी में नदियों का जो दर्जा है, जो अहमियत है, वह कहने-सुनने की नहीं, समझने और महसूस करने की बात है. चुघ साहब बताते हैं कि वेग से बहते सतलुज में उन्हें अपने दादाजी की झलक मिलती थी. और सतलुज से दूर होने पर तो यह एहसास और भी गहरा होता गया....&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;ख़ुद रोये और मुझे रुलाये सतलुज&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;अथरू अथरू रोता जाये सतलुज.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;तर दाढ़ी,पगड़ी पर काले धब्बे&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;रोज़ रात सपनों में आये सतलुज.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;हर क्यारी में सूखे खून के छींटे&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;किस-किस खेत से बचकर जाये सतलुज.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;इंतज़ार में जैसे हो महबूबा&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;ऐसे भागा भागा जाये सतलुज.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;जी करता है तुतला तुतला बोलूँ&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;मुझको अपनी गोद खिलाये सतलुज.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;मेरे पंज-आबों की पीड़ हरे जो&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" color="#0000ff" size="3"&gt;उसपे वारी-वारी जाये सतलुज.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-5398859083590802587?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-01-22T09:57:59.390+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh4.ggpht.com/-KJ3lsVOhR20/TxuQTJLUTdI/AAAAAAAAD8c/eHvKSwb40l0/s72-c/1_thumb%25255B12%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/01/blog-post_22.html</feedburner:origLink></item><item><title>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन-5: महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/xFFdec-VpNs/5.html</link><category>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन</category><category>mahendra modi</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Sat, 14 Jan 2012 19:39:18 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-7331769902650157683</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;नाटक हर इंसान की……..नहीं शायद इंसान ही नहीं, हर प्राणी की ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा होता है. आपने देखा होगा कुत्ते अक्सर आपस में खेलते हैं.... एक दूसरे को काटने का अभिनय करते हैं... मगर चोट नहीं पहुंचाते . आपका पालतू कुत्ता जब आपके साथ खेलना चाहता है तो आपके सामने आकर भौंकने लगता है....भौंकने के साथ साथ उसकी पूंछ हिलती है तो आप समझ जाते हैं कि वो वास्तव में नाराज़ होकर नहीं भौंक रहा बल्कि आपके साथ खेलना चाहता है और आप भी उसकी भाषा समझकर ज़रा सा नाटक करते हैं यानि उठने का अभिनय करते हैं तो वो दौड पड़ता है ताकि आप उसके पीछे दौड लगाएं और आप दौड़ते हैं……… कभी आप उसके पीछे और कभी वो आपके पीछे और जब भी मौक़ा मिलता है, वो आपको काटने का नाटक करने लगता है.ये खेल इसी तरह चलता रहता है जब तक कि आप थक कर बैठ नहीं जाते. तब वो आपके पास आकर आपको काटने का नाटक करने लगता है और फिर आपकी गोद में लोटने लगता है.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मैं जब भी बीकानेर जाता हूँ , मेरी जर्मन शेफर्ड शैरी बड़े लाड प्यार से मुझसे मिलती है,आकर लिपट जाती है और काफी समय तक छोडती ही नहीं. वो पलंग के उसी तरफ बैठती है जिधर मैं लेटता हूँ. भाभी जी शैरी को &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/-lJLPogf9kYA/TxJKXvvr1ZI/AAAAAAAAD68/ZOhTxFWQG_I/s1600-h/409019_2724925036123_1047046211_3007860_18572033_n%25255B6%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="409019_2724925036123_1047046211_3007860_18572033_n" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="186" alt="409019_2724925036123_1047046211_3007860_18572033_n" src="http://lh3.ggpht.com/-GZPYUTA9Rbs/TxJKYxoBbPI/AAAAAAAAD7E/fAwkXxGmV-o/409019_2724925036123_1047046211_3007860_18572033_n_thumb%25255B4%25255D.jpg?imgmax=800" width="246" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; उलाहना भी देती हैं कि वो मौक़ापरस्त है, मेरे वहाँ जाने के बाद वो उनके पास नहीं जाती है ... मेरे पास ज्यादा रहती है.मेरे वहाँ जाने के बाद वो दूध रोटी खाना बिल्कुल छोड़ देती है. मैं जानता हूँ, उसे मछली बहुत पसंद है और जब भी मैं वहाँ जाता हूँ, चाहे कुछ भी हो जाए , उसे मछली लाकर ज़रूर खिलाता हूँ जोकि भाई साहब नहीं कर पाते...... मेरे पास आकर वो ज़ोर ज़ोर से भौंकने लगती है मानो कह रही हो, मुझे मछली खिलाओ, मगर वो भौंकना बहुत प्यारभरा होता है और साफ़ लगता है कि वो नाटक कर रही हैं क्योंकि भौंकने के साथ साथ पूंछ हिलाती जाती है. मेरे भाई साहब जो कि एक डॉक्टर हैं हमेशा कहा करते हैं कि जिस प्राणी में जितना ज़्यादा ग्रे मैटर होता है उसमें उतनी ही ज़्यादा बुद्धि होती है. तो इस हिसाब से इंसान के एक बच्चे में भी कुत्ते से ज़्यादा अक्ल होती है और जिसमें जितनी ज़्यादा अक्ल होती है वो उतना ही ज़्यादा नाटक कर सकता है...... हा हा हा ... आप ये न समझें कि मैं नाटक वालों को ज़्यादा बुद्धिमान साबित करने की कोशिश कर रहा हूँ. मैं तो सिर्फ नाटक की जो सबसे छोटी और सरल परिभाषा है उसकी बात कर रहा हूँ. “आप जब वो बनते हैं जो आप नहीं हैं तो आप नाटक करते हैं”, मैं बस यही कहना चाहता हूँ. आज भी मेरा पोता टाइगर कभी कभी कहता है “दादू आप स्टूडेंट हैं और मैं टीचर” तो मुझे स्टूडेंट बनना पड़ता है या फिर मेरी नातिन नैना मेरी माँ बनकर खाना परोसती है तो मुझे झूठमूठ ही वो खाना खाना होता है जो प्लेट में कहीं नहीं होता . आपने भी देखा होगा कि अक्सर लडकियां दुपट्टे को साडी की तरह पहनकर घर घर खेलती हैं, खाना बनाती हैं और बच्चों को धमकाती हैं फिर प्यार से समझाती हैं...... आज, टी वी, कंप्यूटर और वीडियो गेम्स, न जाने क्या क्या है, जिन्होंने इन सब खेलों से बच्चों को बहुत दूर कर दिया है. मेरा पोता टाइगर आई पैड पर तरह तरह के खेल खेलता है मगर फिर भी मुझे लगता है, मेरा टीचर बनने में जो सुख उसे मिलता है वो उस आई पैड में उसे कतई नहीं मिलता होगा .&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मेरा मोहल्ला शेखों का मोहल्ला कहलाता था और इन शेखों के साथ हम लोगों के खेलने खाने के सम्बन्ध नहीं हुआ करते थे. इन लोगों को बस हमारे घर की देहरी तक ही आने की इजाज़त थी. मेरे पड़ोस में कुंदन भाई जी का घर था, उससे&amp;#160; बिल्कुल जुड़ा हुआ सोहन बाबो जी का घर था,जो मेरे पिताजी की मौसी जी के बेटे थे.सोहन बाबोजी की एक ही औलाद थी, पूनम भाई जी.बहुत रोचक चरित्र थे वो. १९९३ में जब मैं उदयपुर में पोस्टेड था, एक साप्ताहिक हास्य धारावाहिक शुरू किया था मैंने. वैसे तो इस धारावाहिक को मेरे साथी कुलविंदर सिंह कंग लिखा करते थे मगर कुछ एपिसोड्स मैंने भी लिखे. उस धारावाहिक का एक चरित्र मैंने दो लोगों को मिलाकर गढा,एक मेरा छात्र सत्यप्रकाश और दूसरे पूनम भाई जी. इन दोनों का विस्तार से ज़िक्र तब आएगा जब मैं उदयपुर की बात करूँगा.मेरे दूसरे ताऊ जी दीना नाथ जी थे, जिनको हम सब “बा” कहते थे. उनका&amp;#160; घर हमारे घर से थोड़ा सा दूर, सड़क के उस पार था.वो मेरे पिताजी के मामा जी के बेटे थे. बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, जब मेरे पिताजी सिर्फ पौने दो साल के थे,मेरे परिवार में एक बहुत बड़ी दुर्घटना हो गयी थी.मेरे दादा जी और उनके दस बच्चे, पूरे देश में तबाही मचाने वाली प्लेग की बीमारी में, चार दिनों में श्मशान घाट पहुँच गए थे. यानि एक झटके में एक भरा पूरा घर खाली हो गया था.घर में बच गई थीं, मेरी दादी जी, अपनी गोद में पौने दो साल का एक बच्चा लिए हुए. मेरे दादाजी की सारी ज़मीन जायदाद, सोना चांदी, मेरे दादा जी के क़रीबी रिश्तेदार खा गए. ऐसे वक्त में मेरे पिताजी के मामा जी, मेरी दादी जी और मेरे पिताजी को अपने घर ले गए और भाई बहन दोनों ने मिलकर पिताजी और “बा” दोनों को पाला पोसा क्योंकि “बा” की माँ की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी. इस प्रकार मेरे पिताजी और “बा” की परवरिश एक साथ हुई. नतीजा, जब तक वो ज़िंदा रहे, दोनों में सगे भाइयों से भी ज़्यादा प्यार रहा.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;”बा” बहुत पढ़े लिखे थे. एम् ए, एल एल बी, बी एड. उस ज़माने में स्कूल में हैड मास्टर ही सबसे बड़ी पोस्ट हुआ करती थी और वो एक हैड मास्टर थे. कई किताबें लिखी थी उन्होंने. आज भी ‘बीकानेर के इतिहास’ पर, उनकी और नरोत्तम दास स्वामी की लिखी किताब, एक प्रामाणिक किताब मानी जाती है. उनकी एक बहुत बड़ी सी लाइब्रेरी थी.इसी लाइब्रेरी की कुछ किताबें १९८१ में, मैंने अपनी ताई जी से लेकर अपने स्टेशन डायरेक्टर श्री उमेश दीक्षित को दी थी.ये लायब्रेरी कैसे बाद में जाकर दहीबडों और कचौरियों में बदल गयी ये मैं सूरतगढ़ वाले एपिसोड्स में लिखूंगा. हाँ तो मैं बता रहा था “बा” के बारे में. उनकी पोस्टिंग अक्सर बीकानेर से बाहर के स्कूलों में रहती थी. छुट्टियों में जब डेढ़ महीने के लिए वो बीकानेर आते थे तो मेरे लिए वो साल का सबसे सुनहरा वक्त होता था... उनके आठ बच्चे थे, पांच लड़के और तीन लडकियां. चार लड़के मुझसे बहुत बड़े थे मगर एक लड़का रतन और तीन लडकियां विमला, निर्मला और मग्घा मेरे हमउम्र थे क्योंकि इन सबकी उम्र में एक-एक साल का अंतर रहा होगा. जब भी छुट्टियों में वो बीकानेर आते थे , बस हम पाँचों लोग दिन रात साथ ही रहते थे. कई बार इस बात के लिए मुझे और उन लोगों को डाट भी पड़ती थी, मगर हम लोग उस डाट को सह लेते थे और साथ साथ ही रहते थे. मेरे घर की छत पर एक टूटा हुआ पलंग था और एक टूटी हुई तीन पहियों की साइकिल. टूटी हुई साइकिल को पलंग में कुछ इस तरह फंसा लिया जाता था कि साइकिल का पहिया स्टीयरिंग की तरह लगने लगता था और बस हमारी शानदार गाड़ी तैयार......सच बता रहा हूँ,जो थ्रिल, बचपन में उस टूटे पलंग और टूटी साइकिल से बनी गाड़ी को चलाने में महसूस होता था, आज अपने घर में मौजूद कैप्टिवा से लेकर स्विफ्ट तक किसी को भी चलाने में नहीं होता . हम अपनी उस शानदार गाड़ी में सवार होकर निकल पड़ते थे, शिकार के लिए... वो ज़माना था, जब शिकार एक ज़रूरी हिस्सा हुआ करता था, राजाओं और राजकुमारों के जीवन का. बस कल्पना में हम सभी राजकुमार और राजकुमारियां घने जंगल में पहुँच जाते थे. जंगल में कभी सामने शेर आता था और कभी हिरन .... यही नाटक घंटों चलता रहता था और हम कई शेरों और कई हिरणों का शिकार करके अपनी उस शानदार गाड़ी में लाद कर घर लौटते थे चाहे लौटकर कितनी भी डाट पड़े. क्या था ये सब? एक नाटक ही तो था न ?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इस मौके पर एक नाटक और याद आ रहा है मुझे. बहुत छोटा था मैं शायद ३-४ साल का. हम लोग चूनावढ में रहते थे, जिसका ज़िक्र मैं पहले एक एपिसोड में कर चुका हूँ .मैं और मेरे भाई साहब बस दो ही पात्र थे इस नाटक के. शुरू से ही पता नहीं क्यों भाई साहेब हमेशा छोटा भाई बनते थे और मैं बड़ा भाई. एक दिन इसी तरह हमारा खेल चल रहा था. मैं हस्बेमामूल बड़े भाई के रोल में था और भाई साहब छोटे भाई के रोल में. खेलते खेलते वो मुझसे बोले “भाई साहब भूख लगी है” मैंने झूठमूठ एक डिब्बा खोला और झूठमूठ कुछ निकाला और कहा “ लो ये भुजिया खा लो” उन्होंने झूठमूठ के भुजिया खा लिए और बोले “ मुझे और चाहिए” मैंने उन्हें समझाकर कहा “ ज़्यादा भुजिया खाने से पेट खराब हो जाता है”. वो बोले “थोड़े से और देदो भाई साहब”. मैंने फिर उन्हें थोड़े से दे दिए.उन्होंने झूठमूठ खा लिए और फिर बोले “ ऊं ऊं ऊं थोड़े और दो भाई साहब......ऊं ऊं ऊं.... दे दो ना ” मुझे पता नहीं क्या हुआ....और पता नहीं कैसे .... मैंने खींच कर एक थप्पड़ जमा दिया भाई साहब को और बोला “ समझ नहीं आता तुम्हें? ज़्यादा भुजिया खाने से पेट खराब हो जाता है?” ताड़ से जो थप्पड़ लगा तो वो हक्के बक्के रह गए..... उन्हें रोना आ गया और मैं......? मैं एकदम से होश में आ गया.....मुझे लगा कि मैंने ये क्या कर दिया ... तो मुझे भी&amp;#160; रोना आ गया.. बस हम दोनों एक दूसरे से लिपट कर रोने लगे. पिताजी ने जब हमारा रोना सुना तो दौड़े आये और पूछने लगे... “क्या हुआ... क्यों रो रहे हो?” हम चुप, बस एक दूसरे से लिपटे हुए आंसू बहाए चले जा रहे थे .........&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मैं इस घटना को कभी भूल नहीं सका .... आज तक नहीं. इस घटना के ३५ साल बाद ,इसी घटना को आधार बनाकर मैंने एक नाटक लिखा जो आकाशवाणी इलाहाबाद से प्रसारित हुआ. इतेफाक से जब मैंने ये नाटक लिखा, उन दिनों मेरे पिताजी इलाहाबाद आये हुए थे. जब नाटक लिखकर मैंने उन्हें सुनाया... तो कहने लगे ... तुम कलाकार लोग पागल होते हो क्या? हाँ ... शायद हम कलाकार लोग पागल ही होते हैं... तभी तो “यात्रा” नाटक के दौरान आकाशवाणी कोटा में १५ साल की छोटी सी सरिता जो, तवायफ का ठीक से अर्थ भी नहीं जानती थी, ये रोल करते करते इस तरह रो पड़ती थी कि उसे चुप कराने में हम सबको घंटों लग जाते थे और &lt;u&gt;ललित&lt;/u&gt;&lt;u&gt;, &lt;/u&gt;&lt;u&gt;दीपेंद्र&lt;/u&gt;&lt;u&gt;, &lt;/u&gt;&lt;u&gt;आनंद, ऋतु, रिचा और नीरू&lt;/u&gt; जैसे लोग तो उसे चुप करवाते करवाते खुद ही रो पड़ते थे................&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-7331769902650157683?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-01-15T09:09:18.323+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh3.ggpht.com/-GZPYUTA9Rbs/TxJKYxoBbPI/AAAAAAAAD7E/fAwkXxGmV-o/s72-c/409019_2724925036123_1047046211_3007860_18572033_n_thumb%25255B4%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/01/5.html</feedburner:origLink></item><item><title>रेडियो आपकी मुट्ठी में है- अरूण जोशी से राजेश मिश्र की बातचीत</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/0Owx-IOukbs/blog-post.html</link><category>समाचार</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Sat, 07 Jan 2012 20:09:27 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-7821485342195645695</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font color="#0000ff" size="3"&gt;रेडियोनामा पर ना सिर्फ रेडियो की यादों का कारवां चल रहा है। बल्कि हमारा प्रयास है कि रेडियो की दुनिया की दशा और दिशा पर विमर्श भी किया जाता रहे। रेडियो की दुनिया से जुड़े रहे अरूण जोशी का ये इंटरव्‍यू 7 जनवरी 2012 को नवभारत टाइम्‍स में प्रक‍ाशित हुआ था। इसे रेडियोनामा के पाठकों के लिए और रेडियो की दुनिया के लिए संदर्भ-सामग्री जमा करने के मक़सद से यहां प्रस्‍तुत किया जा रहा है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;strong&gt;आकाशवाणी के न्यूज सेक्शन से अरसे तक जुडे़ रहे अरुण जोशी ने देश और विदेशों में कई महत्वपूर्ण न्यूज कवरेज की हैं। रिटायर होने के भी वे आकाशवाणी के कई कार्यक्रमों से जुड़े हैं। फिलहाल वे इग्नू के 37 ज्ञानवाणी एफएम रेडियो स्टेशन में बतौर सलाहकार अपनी सेवाएं दे रहे हैं। रेडियो की भूमिका पर उनसे राजेश मिश्र की बातचीत :       &lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;      &lt;br /&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;क्या आपको नहीं लगता कि इंटरनेट के इस युग में रेडियो अपनी उपयोगिता खो रहा है ?&lt;/font&gt;      &lt;br /&gt;रेडियो की उपयोगिता विश्व में कहीं पर भी कभी भी समाप्त नहीं हुई है। आज अमेरिका और यूरोपीय देशों में रेडियो के कई स्टेशन काम कर रहे हैं। साथ ही वहां एक के बाद एक स्टेशन खुलते चले जा रहे हैं। इनमें सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के रेडियो स्टेशन हैं। अगर भारत की बात करें, तो यहां जैसे ही टेलिविजन की एंट्री हुई तो ये फर्क जरूर आया कि रेडियो कुछ समय के लिए लोगों की नजरों से ओझल हो गया। लेकिन एफएम क्रांति के बाद रेडियो आम श्रोताओं के बीच फिर से अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा। रेडियो आज सर्वव्यापी हो गया है।      &lt;br /&gt;दिल्ली जैसे शहर में आज करीब 45 लाख से अधिक कारें हैं। इनमें कुछ ही ऐसी गाड़ियां होंगी जिसमें एफएम रेडियो के सेट न लगे हों। देखिए, इस भागदौड़ से भरी दुनिया में आपका अधिकांश समय ऐसी जगहों पर बीतता है जहां आप टीवी और न्यूजपेपर का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। वहां रेडियो आपका सबसे अच्छा दोस्त साबित होता है। गांव में जहां बिजली नहीं है, वहां रेडियो ही सबसे बेहतर माध्यम है। दरअसल रेडियो आज आपकी मुट्ठी में है।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;आम लोगों के लिए रेडियो किस तरह फायदेमंद रहा है?&lt;/font&gt;      &lt;br /&gt;देश में ग्रीन रिवोल्यूशन, ऑपरेशन फ्लड जैसे अभियानों की सफलता में रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। क्योंकि रेडियो आम भाषा और बोलियों में बात करता रहा है। नॉर्थ ईस्ट में कई रेडियो स्टेशन हैं। वे वहां की लोकल लैंग्वेज में कार्यक्रमों का प्रसारण करते हैं। हमारे देश के गांवों में साक्षरता का प्रतिशत कम रहा है। पहले वहां न्यूजपेपर्स भी बहुत मुश्किल से पहुंचा करते थे। खेती से जुड़ी पत्रिकाएं भी नहीं पहुंच पाती थीं। वैसे समय में कृषि जगत कार्यक्रम में छुट्टन काका जैसे पात्र किसानों को उनसे जुड़ी तमाम जानकारी दे रहे थे। आज भी वही स्थिति है। दिल्ली के बाहर निकलकर जाएं तो पाएंगे कि शाम पांच बजे के बाद कई जगहों पर बिजली की सप्लाई होती ही नहीं है, इस कारण वहां टीवी चल नहीं पाते हैं। ऐसे में लोगों के लिए एकमात्र सहारा रेडियो ही है।      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;रेडियो के प्राइवेटाइजेशन का क्या असर हुआ?       &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;प्राइवेट एफएम चैनल महज एंटरटेनमेंट चैनल बनकर रह गए हैं। यह स्थिति सही नहीं है। हेल्थ, एजुकेशन, राष्ट्रीय एकता और लोकतंत्र को मजबूत करने वाले कार्यक्रम भी उन्हें प्रसारित करने चाहिए। उन्हें भाषा की शालीनता का ध्यान रखना चाहिए। मैं पिछले दिनों एक प्राइवेट एफएम पर कार्यक्रम सुन रहा था। उनमें वे ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे जो हमारी संस्कृति के अनुरूप नहीं कहे जा सकते हैं। लेकिन उनका प्रस्तुतिकरण निश्चित रूप से जीवंत है। वे सीधे श्रोताओं से संवाद स्थापित करते हैं।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;     &lt;br /&gt;&lt;font color="#0000ff"&gt;क्या एफएम चैनलों ने आकाशवाणी पर दबाव बढ़ा दिया है?       &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;हां, यह बात सही है। एफएम क्रांति के बाद से आकाशवाणी पर दबाव बढ़ गया है। लेकिन मैं मानता हूं कि बदलती चुनौतियों के अनुरूप आकाशवाणी को बदलना होगा। इसके प्राइमरी चैनल पर पहले वाले फॉर्मेट आज भी चल रहे हैं। रेडियो पर आज भी नाटक होते हैं। रूपक और झलकियों का प्रसारण होता है। लेकिन ये सब प्राइमरी चैनल तक सीमित हैं। आज देश में कम से कम दो सौ रेडियो स्टेशन हैं। कोशिश जरूर की जानी चाहिए कि उनको नया फॉर्मेट दिया जाए। उनमें परिवर्तन लाने की जरूरत है। बदलते युग के हिसाब से रेडियो को ज्यादा इंटरेक्टिव बनाने की जरूरत है। उसे श्रोताओं के साथ संवाद स्थापित करना होगा। कुछ परिवर्तन आए भी हैं।      &lt;br /&gt;आज आकाशवाणी के कई केंद्रों से विभिन्न विषयों पर फोन इन जैसे कार्यक्रम चल रहे हैं। ये बहुत पॉप्युलर हुए हैं क्योंकि इसमें श्रोताओं की सीधी भागीदारी होती है। पहले भी आकाशवाणी पर फरमाइशी कार्यक्रमों में श्रोताओं से संवाद स्थापित करने की कोशिश की जाती थी। लेकिन इसमें और विस्तार की आवश्यकता है। प्रचलित आकाशवाणी के सेंटरों को अपनी प्रसारण तकनीक में बदलाव करना होगा। क्योंकि जितना शक्तिशाली प्रसारण का क्षेत्र होगा, उतना वह श्रोताओं तक पहुंच पाएगा। कार्यक्रमों में कुछ ऐसी चीजें डालनी होंगी जो श्रोताओं को आकर्षित कर सके। आप विज्ञापन जगत में हुए चेंज को देख सकते हैं। विज्ञापनों ने खुद को नए संदर्भों में पेश किया और यही उनकी सफलता का राज है। रेडियो प्रोग्राम्स को भी इसी आधार पर आज के बदलते संदर्भ में पेश करना होगा।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-7821485342195645695?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2012-01-08T09:39:27.732+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">2</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2012/01/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन-4: महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/E6evNQza-dk/4.html</link><category>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन</category><category>महेंद्र मोदी</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Sun, 25 Dec 2011 00:28:09 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-8665122902888845191</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;     &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;पांचवीं क्लास तक मैं जिस स्कूल में पढ़ा, उसका नाम था राजकीय प्राथमिक पाठशाला नंबर ९ . बहुत ही साधारण सा स्कूल था,अंग्रेज़ी के ए बी सी डी अभी कोर्स में नहीं थे हालांकि सभी गुरु लोग अंग्रेज़ी का नाम लेकर डराया करते थे कि अभी ये हाल है तो अगले साल छठी में क्या करोगे जब अंग्रेज़ी पढनी पड़ेगी. टाट पट्टी पर बैठना होता था अपने बराबर के बच्चों के साथ भी और अपने से बड़े बड़े चूहों के साथ भी. फर्श पर बड़े बड़े गड्ढे थे और बड़ी बड़ी मूंछों वाले एक मास्टर जी जिनका नाम श्री किशन जी था, एक बड़ा सा डंडा हाथ में लेकर जब क्लास में अवतरित होते थे तो हम सब बच्चों के प्राण सूख जाते थे. कम से कम मुझे तो वो चूहे, वो गड्ढे, वो मूंछे और वो डंडा हर चीज़ बड़ी बड़ी सी लगती थी. घर में साळ(अंदर का कमरा जिसे आज की भाषा में बैडरूम कह सकते हैं ) और ओरा ( साळ के अंदर का कमरा जिसमें पूरे घर की संदूकें रहती थी, अनाज रहता था और वो सभी चीज़ें रहती थी जो रोज़मर्रा काम में आने वाली नहीं होती थीं ) मुझे बचपन में बहुत बड़े बड़े लगा करते थे लेकिन अभी कुछ दिन पहले जब मैं बीकानेर गया तो अपने पुराने मोहल्ले में जाकर उस घर को एक बार देखने को मन ललचा गया जिसमें मैंने आँखें खोली थीं .       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;फड बाज़ार का वो मोहल्ला जिसमें कभी हम खुलकर मारदडी(एक खेल जिसमें एक दूसरे को गेंद फेंक कर मारा जाता है) और सतोलिया(सात ठीकरी और एक गेंद से खेला जाने वाला एक खेल) खेला करते थे अब भीड़ भरे बाज़ार में बदल गया है. कार आधा किलोमीटर दूर हैड पोस्टऑफिस के पास खडी करके मैं किसी तरह पैदल पैदल अपने पुराने घर में पहुंचा जिसे हमने १९९५ में लतीफ़ खान जी को बेच दिया था और उन्होंने उस पूरे घर को दुकान में बदल दिया था. मैं अंदर पहुंचा तो वो साळ और ओरा मुझे बहुत ही छोटे छोटे लगे मुझे समझ नहीं आया कि बचपन के इतने बड़े बड़े साळ और ओरा आखिर सिकुड़ कर इतने छोटे कैसे हो गए? मुझे एक बार को लगा, नहीं ये वो घर नहीं है जिसमें मैं पैदा हुआ बड़ा हुआ. १०-११ बरस की छोटी सी उम्र में मैं रसोई में बैठकर खाना बनाया करता था और मेरी माँ आँगन में खाट पर लेटे लेटे मुझे खाना बनाना सिखाती रहती थीं क्योंकि वो बहुत बीमार रहने लगी थीं जब मैं छोटा सा ही था.ये इतना छोटा सा आँगन? नहीं ये वो घर नहीं हो सकता.मैं ऊपर अपने प्रिय मालिए में भी गया जिसमें बैठकर मै पढाई भी करता था और बैंजो पर रियाज़ भी करता था. अरे ये तो बहुत ही छोटा सा कमरा है जबकि मेरे ज़ेहन में ये एक अच्छा बड़ा सा कमरा था. तब मैंने महसूस किया कि बचपन में चूंकि हम छोटे होते हैं हमें हर चीज़ बड़ी बड़ी लगती है और जब बड़े हो जाते हैं तो सभी चीज़ें छोटी लगने लगती हैं . मुझे वो बग्घी (विक्टोरिया) भी बहुत विशाल लगती थी, बिलकुल किसी राजा के सिंहासन की तरह, जो मेरे बड़े मामा राम चंद्र जी होली के दिन अपने क़ाफिले में लेकर आया करते थे और हम दोनों भाइयों को उस पर बिठा कर ले जाया करते थे . बड़ा लंबा काफिला हुआ करता था . आगे एक बग्घी और उसके पीछे कई तांगे.उन दिनों बीकानेर में कार तो शायद महाराजा करनी सिंह जी के पास हुआ करती थी और कुछ बड़े वणिक पुत्रों के पास. आम आदमी की सवारी थी तांगा और जो लोग थोड़े समृद्ध होते थे वो बग्घी पर आया जाया करते थे.      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;ये तो जब मैं १९८३ में आकाशवाणी, मुम्बई में कार्यक्रम अधिशासी बनकर आया तो इन बग्घियों की जिन्हें यहाँ की भाषा में विक्टोरिया कहा जाता था की दुर्दशा देखी. ५० पैसे में इसकी सवारी की जा सकती थी. तो... होली के मौके पर उस बग्घी पर बड़े बड़े लाउड स्पीकर्स लगे रहते थे. मेरे मामा जी बहुत पढ़े लिखे नहीं थे ये मुझे उस वक्त पता लगा जब मैं काफी बड़ा हो गया. मैं तो उन्हें काफी विद्वान समझता था क्योंकि चाहे वो ज्यादा पढ़े लिखे न हों और एक सेठ के यहाँ मुनीम की नौकरी करते हों, मगर उनमें एक बहोत बड़ा गुण था. वो आशुकवि थे. खड़े खड़े किसी पर भी कविता कर देते थे और वो इतनी सटीक हुआ करती थी कि लोग दांतों तले अंगुली दबाने लगते. उनका गला भी इतना सुरीला था कि जब वो गाते तो लोग जस के तस खड़े रह जाते. एक बात और बताऊँ, हँसेंगे तो नहीं न....? वो मुझे प्यार से चीनिया (चीनी) पुकारते थे क्योंकि मैं बचपन में ज़रा गोल मटोल था और मेरी आँखें छोटी छोटी थीं. आप सोच रहे होंगे कि मैं यहाँ अपने मामाजी का बखान क्यों कर रहा हूँ, मगर उसका एक कारण है जो अभी आपको समझ में आ जाएगा. उन दिनों बीकानेर में होली का त्यौहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता था . होली से १५ दिन पहले लोग अपने चंग(बड़े बड़े डफ) निकाल लेते थे और हर गली कूचे में चंग और मजीरों के साथ कुछ सुरीली आवाजें गूंजने लगती थीं “हमैं रुत आई रे पपैया थारै बोलण री रुत आई रे............... ढमक ढमक टक ढमक ढमक .............” गीत बहुत से हुआ करते थे. लोग शराब या भंग पीकर अश्लील गीत भी गाया करते थे,ज़्यादातर के अर्थ भी मुझे समझ नहीं आते थे मगर चंग की ढमक ढमक और ऊंचे सुर में ली हुई टेर दिल के अंदर तक उतर जाती थी .       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;जैसे जैसे होली नज़दीक आती ये गीतों का रंग और गहरा होता जाता और पूरा बीकानेर शहर चंग, मजीरों और गीतों के सागर में डूबने लगता. आखिरकार होली खेलने का दिन आ जाता. यों तो बिना किसी जाति-धर्म के भेदभाव के सभी लोग फाग गाते और फाग खेलते मगर शहर के परकोटे के अंदर पुष्करणा ब्राह्मणों के दो समुदायों की होली दूर दूर से लोग देखने आते थे. चौक में दोनों ओर चंग, मजीरों, डोल्चियों, रंग से भरे बड़े बड़े टबों से सुसज्जित हर्षों और व्यासों के दो समूह जिन्हें बीकानेर की भाषा में गैर कहा जाता है और चौक के चारों ओर घरों की मुंडेरों पर औरतों के समूह के समूह. एक प्यार भरा संगीतमय युद्ध शुरू होता था जिसमें एक दूसरे पर रंग की बौछारें भी की जाती थीं और साथ ही स्नेह से सराबोर संगीतमय गालियों के तीर भी छोड़े जाते थे.हालांकि मैंने इस अद्भुत युद्ध के बारे में सिर्फ पढ़ा है या फिर सुना है, इसे साक्षात देखा नहीं पर अब भी दिल के किसी कोने में ये इच्छा है कि इसका साक्षी बनूँ, पता नहीं अब ये वैसा होता भी है या बाकी त्योहारों की तरह इसकी भी बस लोग तकमील ही पूरी करके रह जाते हैं.&amp;#160; हम लोगों के लिए भी ये दिन बहुत खास हुआ करता था. इस दिन मामाजी एक सजी धजी बग्घी पर लाउड स्पीकर्स लगाए, अपने पीछे पीछे तांगों का लंबा सा क़ाफ़िला लिए अपने बनाए हुए गीत गाते हुए हमारे घर आते थे और आवाज़ देते “चीनियाआआअ....” हम लोग दौडकर उनके पास पहुँच जाते.वो मुझे और भाई साहब को बग्घी में बिठाकर ले जाते थे. मैं जब उनके गीत सुनता था तो मुझे बहुत अच्छा लगता था और मैं सोचता था ... कैसे लिख लेते हैं ये इतने सुन्दर गीत?       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;मुझे नहीं पता था उस वक्त कि जीन्स क्या होते हैं और जीन्स के ज़रिये कोई गुण एक पीढ़ी अनजाने में ही दूसरी पीढ़ी को कैसे सौंप देती है? इसका थोड़ा एहसास हुआ जब मैं आकाशवाणी, बीकानेर में था, इस मास का गीत रिकॉर्ड करने की बीकानेर की बारी थी और कोई गीत नहीं मिल रहा था, हमारे कार्यक्रम अधिशासी स्वर्गीय महेंद्र भट्ट(ग्रेमी अवार्ड विजेता पंडित विश्व मोहन भट्ट के बड़े भाई) जो कि एक ही नाम होने के कारण मुझे मीता बुलाते थे, मुझसे बोले “मीता, एक गीत लिखोगे?”, मैंने कहा “जी मैं ?”&amp;#160; तो वो बोले “ हाँ, मुझे पता है तुम लिख लोगे”. मेरे पास कुछ जवाब था ही नहीं. मैंने कहा “जी कोशिश करता हूँ” .अपने साथी भाई चंचल हर्ष जी की मदद लेकर एक टूटा फूटा गीत लिखा था मैंने “ज़िंदगी अब है सज़ा जीना हुआ मुहाल है, मौत भी आती नहीं किस्मत का ये कमाल है”. एक समय में संगीतकार मदन मोहन के सहायक रहे स्वर्गीय डी. एस. रेड्डी ने धुन बनाई, स्वर्गीय दयाल पंवार( संगीतकार पंडित शिवराम के सहायक)ने रेड्डी जी के सहायक के तौर पर काम किया और स्वर्गीय बदरुद्दीन ने गाया इसे. इन सभी के साथ साथ स्वर्गीय जसकरण गोस्वामी (सितारवादक),स्वर्गीय मुंशी खान (सितारवादक)और स्वर्गीय इकरामुद्दीन खान(तानपूरावादक)के प्रति इस माध्यम से मेरी स्नेह्पूरित श्रद्धांजलि . जीन्स के ज़रिये ये गुण आगे बढते हैं इस पर विश्वास पक्का हुआ जब मेरे बेटे वैभव ने “जस्सी जैसा कोई नहीं”,“काजल”,“रिहाई”,”ये मेरी लाइफ है” वगैरह वगैरह बीसियों टी वी धारावाहिकों और “द्रोण”, “चल चला चल” और “नाइन्टी नाइन” जैसी फिल्मों में गाने लिखे. मगर इस सबके बीच मैं आज भी आकाशवाणी, इलाहाबाद के किसी ज़माने में मशहूर रहे गायक प्रणव कुमार मुखर्जी को नहीं भूल सकता जिन्होंने बात ही बात में मुझसे न जाने कितनी ग़ज़लें कहलवा लीं मगर अफ़सोस अब न प्रणव रहे और न ही ............ . खैर... उनकी कहानी फिर कभी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-8665122902888845191?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-12-25T13:58:09.209+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">8</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/12/4.html</feedburner:origLink></item><item><title>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन-3: महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/PH6GDOHx2Po/3.html</link><category>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन</category><category>mahendra modi</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Thu, 08 Dec 2011 16:08:55 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-7330161722151359220</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;देश के आज़ाद होने के कुछ ही साल बाद मेरा जन्म हुआ था. यानि मेरा और आज़ाद भारत का बचपन साथ साथ गुज़रा. तब तक मेरे पिताजी पुलिस की नौकरी छोड़ चुके थे. यों तो उनकी श्री गंगानगर की पोस्टिंग भी मुझे याद है जब हम आसकरण बहनोई जी और रामभंवरी बाई के साथ एक ही घर में रहते थे. घर में कुल तीन कमरे थे. एक में मैं, मेरे भाई साहब, मेरे पिताजी और माँ, हम चारों रहते थे और एक कमरे में जीजाजी और बाई अपनी पांच लड़कियों के साथ. तीसरा कमरा बैठक कहलाता था जिसे हम सब काम में लेते थे मगर&amp;#160;&amp;#160; &lt;br /&gt;मुझे उनकी जो पहली पोस्टिंग बहुत अच्छी तरह याद है वो है श्री गंगानगर जिले के चूनावढ गाँव की.       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Mangal" size="3"&gt;राजस्थान सरकार ने ग्रामीण उत्थान के लिए एक योजना शुरू की थी जिसके अंतर्गत गाँवों में एक दफ्तर खोला जाता था जिसे ग्राम सुधार केंद्र कहा जाता था. पिताजी चूनावढ के ग्राम सुधार केंद्र के प्रभारी थे. एक पुरानी मगर बड़ी सी मस्जिद में उनका दफ्तर था जो शायद पार्टीशन के वक्त उजड गयी थी और मस्जिद से लगे हुए एक छोटे से कच्चे घर में हम लोग रहा करते थे. घर और दफ्तर के बीच एक दरवाज़ा लगा हुआ था, यानि घर और दफ्तर एक ही था. पिताजी के दफ्तर में मेरी रुचि की तीन ऐसी चीज़ें मौजूद थीं जो अक्सर मुझे वहाँ खींच ले जाती थीं. रेडियो, ग्रामोफोन और कैमरा. कैमरा छूने की हमें इजाज़त नहीं थी हालांकि दिल बहुत करता था उसे छूने का, फोटो खींचने का मगर खैर हमारे लिए बाकी दोनों चीज़ों को छूने की इजाज़त भी कम नहीं थी. जूथिका रॉय, पहाड़ी सान्याल, जोहरा बाई अम्बालावाली, अमीर बाई कर्नाटकी, कुंदन लाल सहगल, पंकज मलिक, मास्टर गनी, ललिता बाई आदि के बहुत से रिकॉर्ड्स वहाँ मौजूद थे. संगीत से मेरा पहला परिचय था ये.&amp;#160; रेडियो से मेरी दोस्ती की शुरुआत भी यहीं हुई और कैमरा भी पहली बार मैंने यहीं देखा. मैं कहाँ जानता था उस वक्त कि ये तीनों ही मेरी ज़िंदगी के अटूट हिस्से बन जायेंगे.      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;उस गाँव में एक शानदार नहर थी जिसका पानी पीने से लेकर सिंचाई तक सब कामों के लिए था लेकिन ये नहर महीने में तीसों दिन चालू नहीं रहती थी इसलिए गाँव में जगह जगह पक्की डिग्गियां बनी हुई थीं जिनमें घरेलू ज़रूरतों के लिए पानी जमा कर लिया जाता था और लोग अपनी अपनी ज़रूरत का पानी रस्से और बाल्टी की मदद से निकाल लिया करते थे. और हाँ एक बात तो मैं बताना ही भूल गया, चूनावढ में बिजली नहीं थी. आप सोच रहे होंगे कि फिर रेडियो कैसे बजता था? आपका सोचना सही है, उस वक्त तक ट्रांजिस्टर का आविष्कार भी नहीं हुआ था.&amp;#160; कार में जो बैटरी लगती है, उस से थोड़ी छोटी EVEREADY की लाल रंग की एक बैटरी आया करती थी, जिसमें रेडियो का प्लग लगाया जाता था और लगभग १५ फीट लंबा जालीदार एरियल रेडियो से जोड़ दिया जाता था तब जाकर बजता था रेडियो . हर शाम मस्जिद यानि दफ्तर के आँगन में गाँव के लोग इकठ्ठे होते थे और उन्हें रेडियो पर समाचार, संगीत और खेती बाडी के कार्यक्रम सुनवाए जाते थे. बाकी वक्त वैसे तो वो रेडियो हमारी पहुँच में रहता था, हम जब चाहे उसे बजा सकते थे मगर सबसे बड़ी दिक्कत थी बैटरी, जो कि श्री गंगानगर से लानी पड़ती थी. हमें उस बैटरी को ६ महीने चलाना होता था, इसलिए रेडियो सुनने में बहुत कंजूसी बरतनी पड़ती थी. पूरे गाँव में उसी तरह का एक और रेडियो मौजूद था और वो था पिताजी के ही एक मित्र जोधा राम चाचाजी के घर में . कभी कभी हम वहाँ जाकर भी रेडियो सुनते थे मगर वहाँ दिक्कत ये होती थी कि चाचाजी सीलोन लगाते थे और उनका बेटा तुरंत विविध भारती की तरफ सुई घुमा देता था जो कि उन दिनों शुरू हुआ ही था फिर जैसे ही चाचाजी का बस चलता, वो फिर सीलोन लगा दिया करते थे . इस तरह दिन भर रेडियो की सुई, सीलोन और विविध भारती के बीच घूमती रहती थी.       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;ग्रामोफोन हालांकि बैटरी से नहीं चलता था, उसमें थोड़ी थोड़ी देर में चाबी भरनी पड़ती थी मगर आज से १५-२० साल पहले के रिकॉर्ड प्लेयर की तरह उसमें डायमंड की नीडल नहीं लगी होती थी. उसमें मैटल की सुई लगती थी और एक सुई से बस दो रिकॉर्ड ही बज पाते थे. हर दो रिकॉर्ड के बाद घिसी हुई सुई को हटा कर नई सुई लगानी पड़ती थी. यहाँ भी वहीं संकट था, सुइयां खत्म हो गईं तो जब तक पिताजी श्री गंगानगर जाकर सुई की डिब्बियां नहीं लायेंगे तब तक ग्रामोफोन बंद. बड़ी किफायतशारी से काम लेते हुए हम लोग बारी बारी से अपनी पसंद के गाने सुना करते थे. विविध भारती के अपने १२ बरस के कार्यकाल में जब भी मैं भूले बिसरे गीत सुना करता था, चूनावढ की ये तस्वीरें हर बार ज़िंदा होकर मेरे सामने आ खड़ी होती थीं और मैं आँखें बंद कर उसी वक्त में पहुँच जाता था. बीच के ४५-५० बरस एक लम्हे में न जाने कहाँ गायब हो जाते थे.चूनावढ के दिनों में मुझे जूथिका रॉय का गाया मीरा का भजन “घूंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे” बहुत पसंद था.       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;&lt;iframe src="http://www.youtube.com/embed/9UyqE_azHao" frameborder="0" width="420" height="315" allowfullscreen="allowfullscreen"&gt;&lt;/iframe&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;मुझे जब भी अकेले ग्रामोफोन बजाने का मौक़ा मिलता था, मैं ये भजन सुनता और रिकॉर्ड के साथ गुनगुनाया करता था. पता नहीं सुर में गाता था या बेसुरा मगर एक रोज मैं रिकॉर्ड चलाकर उसके साथ यही भजन गा रहा था कि पिताजी कमरे में घुसने लगे, मुझे गाते सुनकर वो दरवाज़े के बाहर ही रुक गए. रिकॉर्ड खत्म होने लगा तो वो अंदर आये.... मैं एकदम हडबडा गया... मेरी उम्र छह साल रही होगी उस वक्त. मुझे लगा अब शायद डांट पड़ेगी, मगर पिताजी ने बहुत प्यार से मुझे पूछा “तुम गा रहे थे?” मैंने डरते डरते हाँ में सर हिलाया. इस पर वो बोले “डर क्यों रहे हो? ये तो अच्छी बात है.” मेरी जान में जान आई. पिताजी थोडा बहुत हारमोनियम बजा लिया करते थे. कुछ ही दिन बाद उन्होंने एक हारमोनियम का इंतजाम किया और मुझे गाने का अभ्यास करवाने लगे.............मेरा गाने का ये सिलसिला कॉलेज में पहुंचा तब तक जारी रहा. आप पूछेंगे, “क्या उसके बाद ये सिलसिला रुक गया?” जी हाँ, उसके बाद मैंने गाना बंद कर दिया. क्यों बंद कर दिया मैंने गाना... इसका ज़िक्र मैं आगे चलकर करूँगा.       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;हाँ तो मैं बता रहा था कि जुथिका रॉय का गाया मीरा का भजन मुझे बहुत प्रिय था.... सही पूछिए तो उस &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/-Akm_M4duvMk/Tt-d9DHU27I/AAAAAAAAD6Y/Jt-FIr_4m4g/s512/Picture-1%252520006%25255B4%25255D.jpg?imgmax=800"&gt;&lt;img title="Picture-1 006" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; border-right-width: 0px" height="157" alt="Picture-1 006" src="http://lh4.ggpht.com/-zN1qzbyw-YY/Tt-d-tG6isI/AAAAAAAAD6g/mOjqEstXkFo/s512/Picture-1%252520006_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" width="246" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; वक्त मुझे ये लगता था कि जो कलाकार ये भजन गा रही हैं वही मीरा हैं. चार साल पहले की बात है. मैं विविध भारती का प्रमुख था. एक रोज यही भजन विविध भारती से प्रसारित हो रहा था..... मैं हमेशा की तरह आँखें बंद करके अपने बचपन में पहुँच गया, वही चूनावढ का कच्ची ईंटों का बना कमरा और उसमें बजता वही चाबी वाला ग्रामोफोन.थोड़ी देर में भजन तो ख़त्म हो गया मगर मैं दिन भर चूनावढ के उस कमरे से बाहर नहीं निकल पाया. ऑफिस में भी आँखें बंद किये उन्हीं बचपन की यादों में खोया था कि तभी फोन की घंटी बजी, मानो किसी ने झिन्झोड़कर मेरा सपना तोड़ दिया. मैंने थोडा सा झुंझलाकर फोन उठाया. उधर से किसी संभ्रांत महिला ने नमस्कार के साथ एक ऐसी बात कही कि मैं उछल पड़ा. वो बोलीं “ सर, एक बहुत पुरानी सिंगर कलकत्ता से आयी हुई हैं, पता नहीं आपने उनका नाम सुना है या नहीं मगर वो विविध भारती आना चाहती हैं और आप चाहें तो उन्हें रिकॉर्ड भी कर सकते हैं.” मैंने कहा “विविध भारती में सभी कलाकारों का स्वागत है, मगर नाम तो बताइये उनका.” वो धीरे से बोलीं “ जूथिका रॉय.” मुझे उछलना ही था. खैर, अगले दिन उन्हें विविध भारती में आमंत्रित किया गया....वो जब मेरे सामने आईं तो मैं एक बार फिर चूनावढ के अपने उस कच्चे कमरे में पहुँच गया, अपने बचपन की उंगली थामे&amp;#160; ..... मगर इस बार मेरे साथ सिर्फ वो चाबी वाला ग्रामोफोन ही नहीं था... इस बार साक्षात् मीरा मेरे सामने बैठकर हारमोनियम हाथ में लिए गा रही थीं, “घूंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे ..........” और मेरी आँखों से दो आंसू टपक गए .       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;विविध भारती के स्‍टूडियो में जूथिका रॉय: एक वीडियो। &lt;a href="http://www.vividhbharati.org/apps/videos/videos/show/2062993-ghoonghat-ke-pat-khol-" target="_blank"&gt;यहां देखिए।&lt;/a&gt; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-7330161722151359220?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-12-09T05:38:55.803+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://img.youtube.com/vi/9UyqE_azHao/default.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/12/3.html</feedburner:origLink></item><item><title>कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन-2 :महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/nNYDFgjg4wc/blog-post_23.html</link><category>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन</category><category>mahendra modi</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Tue, 22 Nov 2011 19:32:38 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-8817192830029293358</guid><description>&lt;p&gt;   &lt;br /&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="4"&gt;रेडियोनामा पर महेंद्र मोदी अपने संस्‍मरणों की पाक्षिक श्रृंखला लिख रहे हैं--'कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन'। इस श्रृंखला में राजस्‍थान से शुरू होकर देश के अलग अलग शहरों तक पहुंची उनकी रेडियो-जिंदगी की यादें आप पढ़ रहे हैं। दूसरी कड़ी।      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt; &lt;font face="Arial Unicode MS" size="4"&gt;   &lt;hr /&gt;&lt;/font&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="4"&gt;उस ज़माने में राजस्थान में कहने को पांच रेडियो स्टेशन हुआ करते थे जिनमें से एक अजमेर में सिर्फ ट्रांसमीटर लगा हुआ था, जो पूरे वक्त जयपुर से जुड़ा रहता था. मुख्य स्टेशन जयपुर था और बाकी स्टेशन यानी जोधपुर, बीकानेर और उदयपुर केन्द्रीय समाचार दिल्ली से रिले करते थे, प्रादेशिक समाचार जयपुर से, कुछ प्रोग्राम के टेप्स जयपुर से आते थे उन्हें प्रसारित करते थे और कुछ प्रोग्राम जिनमें ज़्यादातर फ़िल्मी गाने बजाये जाते थे, अपने अपने स्टूडियो से प्रसारित करते थे. मुझे इस से कोई मतलब नहीं था कि कौन सा प्रोग्राम कहीं और से रिले किया जाता है और कौन सा बीकानेर के स्टूडियो से प्रसारित होता है, मैं तो अपने मालिये ( छत पर बने कमरे ) में बैठा अपने उस छोटे से रेडियो को कानों से लगाए हर वक्त रेडियो सुनने में मगन रहता था. जब भी संगीत का कोई प्रोग्राम आता तो मैं बैंजो निकालकर उसके साथ संगत करने लगता...... उस वक्त मुझे इस बात का ज़रा भी आभास नहीं था कि खेल खेल में की गयी ये संगत आगे जाकर हर उस स्टेशन पर मेरे साथियों के बीच मुझे एक अलग स्थान दिलवाएगी जिस जिस स्टेशन पर मेरी पोस्टिंग होगी. हर बुधवार और शुक्रवार को रात में नाटक आया करता था जिसे मैं किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ सकता था. रविवार को दिन में पन्द्रह मिनट की झलकी आती थी और महीने में एक बार रात में नाटकों का अखिल भारतीय कार्यक्रम. ये सभी कार्यक्रम मेरे सात रुपये के उस नन्हें से रेडियो ने बरसों तक मुझे सुनवाए.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;   &lt;br /&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="4"&gt;उन दिनों जयपुर केंद्र से नाटकों में जो आवाजें सुनाई देती थीं उनमें प्रमुख थीं- श्री नन्द लाल शर्मा, श्री घनश्याम शर्मा, श्री गणपत लाल डांगी, श्री देवेन्द्र मल्होत्रा, श्री गोरधन असरानी (आगे चलकर फिल्‍मों के प्रसिद्ध कलाकार बने असरानी), श्रीमती माया इसरानी, श्री सुलतान सिंह, श्रीमती लता गुप्ता . इन सब कलाकारों के इतने नाटक मैंने सुने कि सबकी अलग अलग तस्वीरें मेरे जेहन में बन गईं. वो तस्वीरें इस क़दर पक्की हो गईं कि 22-23 बरस बाद सन १९८५ में जब मैं नाटकों के अखिल भारतीय कार्यक्रम के एक नाटक में भाग लेने के लिए इलाहाबाद से दिल्ली आया और नन्द लाल जी को पहली बार देखा तो मैं मानने को ही तैयार नहीं हुआ कि मेरे सामने खड़े सज्जन नन्द लाल जी हैं क्योंकि मेरे तसव्वुर के नन्द लाल जी तो लंबे चौड़े बहुत स्मार्ट से नौजवान थे मगर जो सज्जन मेरे सामने स्टूडियो में खड़े थे वो तो छोटे से कद के, मोटे शीशे का चश्मा लगाए अधेड उम्र के थे. उस दिन मेरे दिल-ओ-दिमाग में बनी एक शानदार तस्वीर चकनाचूर हो गयी थी मगर फिर सोचा, कितना बड़ा है ये कलाकार जिसने अपने अभिनय से मेरे जेहन में इतनी कद्दावर तस्वीर उकेर दी. मैं उनके कदमों में झुक गया था, श्रद्धा से सराबोर. खैर ये बात आगे चलकर पूरी करूँगा. तो........ इन सभी कलाकारों के नाटक सुनते सुनते पता नहीं कब नाटक का एक बीज मेरे भीतर भी फूट पड़ा. कहते हैं आप चाहकर भी किसी को कलाकार बना नहीं सकते.... कला का बीज तो हर कलाकार में जन्म से ही होता है......जब भी उसे सही वातावरण मिलता है वो बीज अंकुरित होने लगता है……नाटक करने की कितनी क्षमता मुझमें रही है इसका आकलन तो मैं खुद नहीं कर सकता मगर नाटक करने का शौक़ मुझे बचपन में उस वक्त से रहा है जब मुझे पता भी नहीं था कि जो मैं कर रहा हूँ उसे नाटक कहते हैं.      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;मुझे याद आ रही है ऐसी ही एक घटना...... बात उस वक्त की है जब मेरी उम्र थी लगभग चार साल. मेरी एक रिश्ते की मौसी जी उज्जैन से आए हुई थीं. वो, मेरी माँ और मेरी मामी जी बैठी हुईं बातें कर रही थीं और मैं जो कि अपनी मौसी जी के बहुत मुंह लगा हुआ था, वहाँ खूब शैतानियां कर रहा था. सभी लोगों ने मुझे शैतानियाँ न करने के लिए कहा लेकिन मुझ पर कोई असर नहीं हुआ&amp;#160; और मैंने अपनी मस्ती चालू रखी. जब सब लोग तंग हो गए तो मेरी मौसी जी ने आख़िरी हथियार का उपयोग किया. वो बोलीं “ देख महेन्द्र, अब भी तू नहीं मानेगा तो मुझे तेरी शिकायत जीजा जी (मेरे पिताजी) से करनी होगी.” लेकिन मैं शैतानी करने से फिर भी बाज़ नहीं आया क्योंकि मैं मान ही नहीं सकता था कि मेरी इतनी प्यारी मौसी जी मेरी शिकायत पिताजी से कर सकती हैं. जब मैं किसी भी तरह काबू में नहीं आया तो मौसी जी उठीं और अंदर की तरफ जिधर के कमरे में पिताजी बैठे हुए थे चली गईं. दो मिनट बाद लौटकर आईं और बोलीं “ महेन्द्र , जा तुझे जीजा जी बुला रहे हैं.” मुझे अंदाजा हो गया कि वो मुझे बेवकूफ बना रही हैं, उन्होंने मेरी शिकायत हरगिज़ नहीं की है. मैं उठा.... अंदर आँगन के चार चक्कर लगाए और रोता हुआ वापस उस कमरे में आ गया जहां मौसी जी वगैरह बैठे थे. मैं सिर्फ नकली रोना चाह रहा था मगर न जाने कैसे नकली रोते रोते सचमुच मेरी आँखों में आंसू आ गए. मौसी जी घबराईं.... बोलीं “ अरे क्या हुआ? क्यों रो रहे हो?” मैं रोते रोते बोला “ पहले तो मेरी शिकायत पिताजी से करके डांट पड़वा दी और अब पूछ रही हैं क्यों रो रहे हो?” उन्होंने मुझे गोद में लिया और बोलीं “लेकिन बेटा न तो मैं उनके पास गयी और न ही तुम्हारी शिकायत की . मैं तो वैसे ही आँगन में चक्कर लगा कर आ गई थी.” मेरी आँखें तो अब भी आंसुओं से भरी हुई थी मगर मुझे जोर सी हंसी आ गयी और&amp;#160; मैंने कहा “ तो मैं कौन सा उनके पास गया था? मैं भी आँगन में चक्कर लगाकर लौट आया था.” इस पर वो बोलीं “ अरे राम...... फिर ये इतने बड़े बड़े आंसू? ये कैसे आ गए तुम्हारी आँखों में ?” इसका मेरे पास भी कोई जवाब नहीं था ....... क्योंकि मुझे खुद पता नहीं लगा कि रोने का अभिनय करते करते कब मेरी आँखों में सचमुच के आंसू आ गए. शायद ये मेरी ज़िंदगी का पहला मौक़ा था जब मैंने सफलतापूर्वक नाटक किया था. उस वक्त मेरी उम्र महज़ चार साल थी, मुझे कहाँ समझ थी कि जो मैंने किया, उसे नाटक कहते हैं और आगे जाकर ये नाटक मुझे ज़िंदगी के कितने कितने रंग दिखायेगा? &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="4"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-8817192830029293358?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-11-23T09:02:38.437+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/11/blog-post_23.html</feedburner:origLink></item><item><title>सुबह आठ और रात पौने नौ बजे का बुलेटिन-न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा: दसवीं कड़ी</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/3v7xyqYTFY8/blog-post_16.html</link><category>news room se shubhra sharma</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Tue, 15 Nov 2011 17:38:29 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-4852431444831575480</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;रेडियोनामा पर जानी मानी समाचार वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने दिलचस्‍प पाक्षिक संस्‍मरण लिख रही हैं। उनके सारे लेख आप &lt;a href="http://radionamaa.blogspot.com/search/label/news%20room%20se%20shubhra%20sharma" target="_blank"&gt;यहां&lt;/a&gt; चटका लगाकर पढ़ सकते हैं।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;एक समय था जब स्कूल-कॉलेज या ऑफिस जाने वालों के लिए आकाशवाणी का सवेरे आठ बजे का बुलेटिन घर से रवाना होने की पहली घंटी के समान होता था. जिसको जब भी रवाना होना होता था, वह आठ बजे के बुलेटिन को मीन टाइम बनाकर, उसके इर्द गिर्द अपने चाय - नाश्ते का क्रम बता देता था. मसलन मेरी स्कूल बस लगभग पौने नौ बजे आती थी तो मैं घर वालों को आगाह कर देती थी कि मैं बुलेटिन के साथ नहाने जाऊंगी और उसके फ़ौरन बाद नाश्ता करूंगी. मेरे पापा चाय - काफी नहीं पीते थे. तो उनके लिए भी मेरे साथ ही दूध का गिलास तैयार कर दिया जाता क्योंकि वे दूध काफी ठंडा करके पीते थे. पापा हिंदी और अंग्रेज़ी के दोनों बुलेटिन अहिंसा की तरह &amp;quot;परम धर्म&amp;quot; मानकर सुनते थे और उसके बाद स्नान - ध्यान में लग जाते थे. बुलेटिन शुरू होने के समय से घर की घड़ियाँ मिलायी जाती थीं. घड़ी का समय बिलकुल सही है, यह बताने के लिए बस इतना ही कहना काफी होता था कि &amp;quot;रेडियो टाइम&amp;quot; से&amp;#160; मिली है. आगे तर्क की कोई गुंजाईश ही नहीं रह जाती थी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;यह बहुत ख़ुशी की बात है कि तमाम अच्छे - बुरे परिवर्तनों के बीच आकाशवाणी की यह परंपरा आज तक क़ायम है. आठ बजे का बुलेटिन अब भी ठीक आठ बजे प्रसारित होता है .... न एक सेकण्ड पहले, न एक सेकण्ड बाद. पहले इसकी ज़िम्मेदारी दिल्ली केंद्र के तकनीकी सहायकों की होती थी.... अब स्वचालित यंत्रों की है. ठीक समय पर स्टूडियो की लाल बत्ती जल जाती है और शुरू हो जाता है समाचारों का सिलसिला.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;आज से कोई २४-२५ वर्ष पहले सुबह आठ बजे और रात पौने नौ बजे के बुलेटिन इतने अधिक महत्त्वपूर्ण माने जाते थे कि नये वाचकों को कई-कई बरस तक पढ़ने को नहीं मिलते थे. किसी को १३ तो किसी को १७ बरस तक इंतज़ार करना पड़ा.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इस बारे में वरिष्ठ समाचार वाचक हरी संधू एक मज़ेदार क़िस्सा सुनाते हैं. बताते हैं कि उन्हें न्यूज़ रूम में &lt;a href="http://lh3.ggpht.com/-pNB2ANdg01E/TsMUDAGbSJI/AAAAAAAAD3M/HK1QQdIanfU/s1600-h/hari%252520sandhu_thumb%25255B16%25255D%25255B4%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="hari sandhu_thumb[16]" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="187" alt="hari sandhu_thumb[16]" src="http://lh3.ggpht.com/-XevFHCsj48o/TsMUERbyQdI/AAAAAAAAD3U/_ueK8u2_TA0/hari%252520sandhu_thumb%25255B16%25255D_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" width="246" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; आये कई साल हो गये थे लेकिन तब भी रात पौने नौ का बुलेटिन पढ़ने को नहीं मिला था. संधू जी को पान खाने का शौक़ है. कई बार दुकान से पान बँधवा कर ले आते हैं. एक दिन न्यूज़ रूम में शाम सात बजे के आस-पास चाय का दौर चला. चूँकि अगले बुलेटिन में अभी काफी देर थी, सो संधू जी ने सोचा - तब तक पान जमाया जाये.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;पान का दोना निकाला ही था कि इंदु वाही सामने आ गयीं. इंदु जी ने कहा - पान तो हम भी खायेंगे.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;संधू जी ने दोना उनके आगे बढ़ा दिया.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इंदु जी ने उसमें से दो पान निकाले और मुंह में रख लिए. दोना वापस संधू जी के पास आ गया.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इंदु जी ने सिद्धहस्त पान खाने वालों की तरह पान मुंह में घुला तो लिया, लेकिन जैसे ही उसका कुछ अंश भीतर गया.....सर पकड़ कर बैठ गयीं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;नाराज़ होकर बोलीं- संधू, इसमें क्या है ?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;संधू जी बोले - पान.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इंदु जी बोलीं- हाँ हाँ, पान तो है लेकिन इसके अंदर क्या है?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;संधू जी ने निहायत मासूम अंदाज़ में गिनाना शुरू किया - चूना, कत्था, सुपारी, ख़ुशबू और तम्बाखू .....&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;तम्बाखू भी था?.....कहती हुई इंदु जी बाहर भागीं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;पान थूकने, कुल्ले करने और ठंडा पानी पीने के बाद भी जब उनकी तबियत नहीं संभली, तब आखिरकार पौने नौ का बुलेटिन उनकी जगह संधू जी को पढ़ना पड़ा.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;संधू जी कहते हैं कि उन्होंने जान बूझ कर इंदु जी को तम्बाखू वाला पान नहीं दिया था. उधर, इंदु जी कहती थीं कि पान देने से पहले उन्हें बताना चाहिए था कि उसमें तम्बाखू पड़ा हुआ है. मेरे न्यूज़ रूम में आने के बाद तक दोनों के बीच यह बहस जारी थी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;दूसरी तरफ थीं एक कैजुअल समाचार-वाचिका, जो मेरे लगभग दो वर्ष बाद के पैनल में चुनकर आयी थीं. जिस दिन उनकी न्यूज़ रूम में पहली ड्यूटी लगी, संयोग से मैं भी ड्यूटी पर थी. शायद किसी ने उन्हें मुझसे बात करने और काम समझने की सलाह दी होगी. वे मेरे पास आकर बैठीं. लेकिन मैंने देखा कि उनकी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;दिलचस्पी काम समझने में कम और यह समझने में ज़्यादा थी कि न्यूज़ रूम का असली कर्ता-धर्ता कौन है. जब मैंने उनके तिरछे सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया तो उन्होंने सीधे-सीधे पूछ लिया - वाचकों का ड्यूटी चार्ट कौन बनाता है?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मैंने उन्हें बताया कि विनोद कश्यप जी सबसे सीनियर समाचार वाचिका हैं और वे ही वाचन का चार्ट बनाती हैं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इस पर उन्होंने पूछा कि विनोद जी कब और कहाँ मिलेंगी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मैंने उन्हें ले जाकर विनोद जी से मिलवा दिया.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;उन्होंने नमस्कार किया और कहा - मैं पौने नौ का बुलेटिन पढ़ने आयी हूँ.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मैं और विनोद जी, दोनों अवाक........ बस उनका चेहरा ही देखते रह गये.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;फिर विनोद जी ने अपनी गुरु गंभीर आवाज़ में कहा - तो फिर कबसे पढ़ना चाहेंगी?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इसके पहले कि वे कोई और ज़बरदस्त बयान देतीं, मैं उन्हें कोहनी से पकड़ कर विनोद जी के आगे से हटा ले गयी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;अब सुनिए मेरा हाल.... मुझे न्यूज़ रूम में दाख़िल हुए लगभग दो वर्ष हुए थे. जुलाई १९८७ से मैंने आकाशवाणी में ड्यूटी शुरू की थी और यह बात होगी मई १९८९ की. ज़ाहिर है तब तक मैंने न तो सवेरे आठ बजे का कोई बुलेटिन पढ़ा था और न रात पौने नौ का. बल्कि छोटे-मोटे बुलेटिन बनाने या पढ़ने की ज़िम्मेदारी निभाते हुए भी अक्सर लोग-बाग मुझे छेड़ते रहते थे कि - मैडम अब बस एक- दो महीने की बात है. प्रोबेशन पीरियड किसी तरह शांति से बीत जाने दो.&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt; पिछली किसी कड़ी में मैंने ज़िक्र किया है कि उन दिनों ड्यूटी लगाने से पहले प्रशासन के लोग फोन कर, हमारी सुविधा पूछ लिया करते थे. ऐसे ही एक दिन प्रशासन से गिलानी जी का फोन आया. उन्होंने पहले तो मेरी उपलब्धता पूछी और फिर मुझे बताया कि इस बार वे मेरी ड्यूटी आठ बजे के बुलेटिन के संपादन पर लगा रहे हैं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मैं बुरी तरह घबड़ा गयी. पहला तर्क तो मुझे यही सूझा कि भाई, जिस व्यक्ति को आप बुलेटिन पढ़ने के योग्य नहीं समझते हैं, उसे संपादन की ज़िम्मेदारी कैसे सौंप सकते हैं? &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;लेकिन इस तर्क को गिलानी जी ने नकार दिया. बोले - यह सोचिये कि कितने लोग होंगे, जिन्होंने पढ़ने से भी पहले बुलेटिन बनाया होगा?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मैंने तरकश से दूसरा तीर निकाला. कहा - मैं अभी अपने को इस योग्य नहीं समझती.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;गिलानी जी ने मेरा यह तीर भी काट दिया. कहने लगे - आप ख़ुद जो चाहे समझें... लेकिन अफसरों ने काफी सोच समझ कर ये फ़ैसला किया है. और आज नहीं तो कल, जब आपको संपादन करना ही है तो आज ही क्यों नहीं कर लेतीं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मैं और कोई तर्क नहीं दे पायी. मुझे बुलेटिन बनाना ही पड़ा..... और वह भी पढ़ने से पहले.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;बहुत सारी यादें उमड़ घुमड़ कर आती जा रही हैं. पहला बुलेटिन बनाना.....पढ़ना....महानिदेशक की बैठक में जाना....आलोचना सुनना..... और बेहतर काम करने का संकल्प लेना और भरसक उस संकल्प को पूरा करना.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;आज की हमारी-आपकी बातचीत शुरू हुई थी बुलेटिन के ठीक समय से प्रसारण को लेकर तो चलते- चलते इसी सन्दर्भ में एक क़िस्सा सुनाती चलूँ. हुआ यों कि उस दिन भी मेरी आठ बजे का बुलेटिन बनाने की ड्यूटी थी. बुलेटिन की ख़बरें तो तैयार थीं, मगर यह अंदाज़ नहीं लग रहा था कि हेडलाइन्स क्या होंगी और उनका क्रम क्या होगा. हमारे बुलेटिन का समय पास आता जा रहा था. सिर्फ दो मिनट रह गये थे जब हेडलाइन्स हमारे पास पहुंची. इतना समय नहीं था कि उनका अनुवाद कराया जा सके. मैं अंग्रेज़ी&amp;#160; हेडलाइन्स ही हाथ में लेकर स्टूडियो की तरफ दौड़ी. सोचा था.... ख़बरों के पहले वाक्य हेडलाइन्स के तौर पर पढ़वा दूँगी. लेकिन उसके लिए उन सभी ख़बरों का मेरे हाथ में होना ज़रूरी था. इसलिए दौड़ते-दौड़ते भी ख़बरें छांटती जा रही थी. कमरे के बाहर पैर रखा ही था कि धड़ाम से गिरी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;समाचार पत्रों की सुर्ख़ियों वाला अंश पढ़ने के लिए राजेंद्र चुघ मेरे पीछे आ रहे थे. मुझे गिरते देखा तो एकदम चिल्ला पड़े - अरे रे.... क्या करती हो.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;उन्हें देख कर मेरी जान में जान आयी. मैंने कहा- मुझे छोड़ो...&amp;#160; हेडलाइन्स लेकर भागो. मैं आ रही हूँ.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;चुघ साहब वाक़ई मेरे हाथ से हेडलाइन्स लेकर बगटूट भागे. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मैं जब तक लंगड़ाती हुई स्टूडियो में पहुंची, वे मुख्य वाचक से हेडलाइन्स पढ़वा चुके थे. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;उन्होंने मुझे इशारा किया कि तुम बैठ जाओ .... मैं बुलेटिन पढ़वा देता हूँ.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;लेकिन मैंने उन्हें इशारा किया कि मैं अब ठीक हूँ. कर लूंगी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;बुलेटिन के बाद मुझे 'झाँसी की रानी' और 'राणा सांगा' जैसी उपाधियों से नवाज़ा गया. कुछ लोग मेरे गिरने के स्थल पर मरने वाली चींटियों को गिनने भी गये. ड्यूटी के बाद मैं गाड़ी चलाकर घर भी आ गयी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;शाम को मेरे डिब्बे जैसे फूले पैर के एक्स-रे से पता चला कि उसकी एक कोई बेचारी मुन्नी-सी हड्डी टूट गयी है. अब दर्द के बावजूद हंसने की मेरी बारी थी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-4852431444831575480?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-11-16T07:08:29.061+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh3.ggpht.com/-XevFHCsj48o/TsMUERbyQdI/AAAAAAAAD3U/_ueK8u2_TA0/s72-c/hari%252520sandhu_thumb%25255B16%25255D_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">5</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/11/blog-post_16.html</feedburner:origLink></item><item><title>कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन-1 :महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/GO2nExFLpnA/1.html</link><category>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन</category><category>mahendra modi</category><category>महेन्द्र मोदी</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Wed, 09 Nov 2011 22:00:41 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-7481332611080951035</guid><description>&lt;span style="font-family:Arial Unicode MS;font-size:120%;color:#0000ff;"&gt;रेडियो की दुनिया में महेंद्र मोदी का नाम किसी के लिए अनजान नहीं है। हिंदी रेडियो नाटकों में उन्‍होंने अपना महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है। हमारे लंबे इसरार के बाद आखिरकार मोदी जी रेडियोनामा के लिए अपने संस्‍मरणों की श्रृंखला शुरू करने जा रहे हैं। राजस्‍थान के बीकानेर से विविध-भारती मुंबई तक की इस लंबी यात्रा में रेडियो के अनगिनत दिलचस्‍प किस्‍से पिरोये जायेंगे। खट्टी-मीठी यादें आपसे बांटी जायेंगी। इन दिनों मोदी जी राजस्‍थान की लंबी यात्रा पर हैं इसके बावजूद उन्‍होंने समय निकालकर श्रृंखला का आग़ाज किया है। उम्‍मीद है कि आप सभी इस श्रृंखला का गर्मजोशी से स्‍वागत करेंगे। ये बता दें कि हर दूसरे बुधवार मोदी जी के संस्‍मरण होंगे और हर दूसरे बुधवार शुभ्रा जी के संस्‍मरण। इस तरह बुधवार रेडियोनामा पर 'संस्‍मरण-वार' होगा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Arial Unicode MS;font-size:120%;"&gt;स्कूल से घर लौटकर बस्ता रखा और मुंह हाथ धोकर खाना खाने बैठा ही था कि दरवाज़े की सांकल बजी. सोचा, लाय ( आग ) &lt;a href="http://lh5.ggpht.com/-Zd_sxR_FjNc/TrqYEQvtOoI/AAAAAAAAD2c/1gVEDN9_jwU/s1600-h/modiji%25255B4%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="modiji" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" alt="modiji" src="http://lh3.ggpht.com/-foP23o-MF3A/TrqYFwshgfI/AAAAAAAAD2k/e0J7gy6X3UQ/modiji_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" height="166" align="right" border="0" width="246" /&gt;&lt;/a&gt; बरसती ऐसी दुपहरी में कौन होगा भला? घर में और कोई था नहीं उस वक्त, भाई साहब अपने किसी सहपाठी के यहाँ गए हुए थे, पिताजी अपने दफ्तर और माँ मौसीजी के घर. उठकर दरवाज़ा खोला तो देखा पसीने से सराबोर मेरा दोस्त हरि अपनी साइकिल को सामने के पेड़ की हल्की सी छाया में खड़ी कर दरवाज़ा खुलने की राह देख रहा है. दरवाज़ा खुलते ही वो चिलचिलाती धूप को भागकर पार करते हुए घर के अंदर घुस गया. बीकानेर की गर्मी के तेवर उन दिनों कुछ ज्यादा ही तेज हुआ करते थे. ए. सी. तो बहुत दूर की चीज़ थी, कूलर भी नहीं होते थे उन दिनों. पचास में से किसी एक घर में पंखा होता था और बाकी लोग खस की टट्टियाँ खिड़कियों पर लगाकर उस से छनकर यदा कदा आती हवा से ही गुज़ारा किया करते थे. नींद की मीठी मीठी झपकियों के बीच बार बार हाथ के पंखे को झलना बहुत अखरता था और भगवान पर बड़ा गुस्सा आता था कि वो गर्मी के मौसम में खूब तेज हवा क्यों नहीं चलाये रखता? मगर हवा जो बंद होती थी तो कुछ इस तरह बंद होती थी कि पेड़ का पत्ता तक नहीं हिलता था और मुझे याद है कि घर में बिजली लगने से पहले कई बार मेरी माँ रात रात भर बैठ कर हम लोगों को पंखा झलती रहती थीं. जब कई कई दिन इसी तरह गुजर जाते तो सब लोग भगवान से अरदास(प्रार्थना) करते “हे भगवान और कुछ नहीं तो आंधी ही भेज दे.” &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Arial Unicode MS;font-size:120%;"&gt;भगवान को भी पश्चिमी राजस्थान की इस धोरों (रेत के टीलों) की धरती पर बसे हर तरह के अभाव झेलते लोगों पर थोड़ी दया आ जाती और इधर उधर से कोई आवाज़ आ जाती “अरे काली पीली आंधी आ रही है रे ......” और सब लोग उठ खड़े होते थे काली पीली आंधी को देखने के लिए. क्षितिज पर उभरता एक छोटा सा काला पीला धब्बा थोड़ी ही देर में रेत का समंदर बनकर पूरे आकाश को ढंक लेता था . हर ओर बस रेत ही रेत .... सड़क की बत्तियाँ जला दी जाती थीं क्योंकि इस काली पीली आंधी की परत इतनी मोटी होती थी कि सूर्य देवता की तेज किरणें भी उस परत को भेद नहीं पाती थीं. हर तरफ मिचमिचाती आँखें और सर पर रुमाल या गमछा लपेटे लोग.....और हाँ हर आँख रेत से कडकडाती हुई और हर मुंह रेत से भरा हुआ. ये आंधी लगातार कई कई दिनों तक चलती रहती थी. इसी रेत की आंधी के बीच सोना, इसी रेत के बीच उठना, इसी के बीच नहाना धोना और इसी के बीच खाना पीना....सुबह सोकर उठते तो देखते कि जिस करवट सोये थे उस करवट पर शरीर के साथ साथ रेत का एक छोटा सा टीला बन गया है और पूरा मुंह रेत से भरा हुआ है. आँखों को बहुत देर तक खोल नहीं पाते थे क्योंकि आँख की पलकें रेत से भरी हुई होती थीं. मगर ये रेत की काली पीली आंधी अपने साथ एक ऐसी सौगात लेकर आती थी जिसकी वजह से इतनी तकलीफों के बावजूद ये आंधी हमें बुरी नहीं लगती थी. ये सौगात थी .... गर्मी से राहत. जितने दिन ये आंधी चलती रहती थी ज़ाहिर है, हवा भी चलती रहती थी और हवा चलने का मतलब गर्मी से ज़बरदस्त राहत. मैं जल्दी से हरि को ड्राइंग रूम में ले गया जहां पंखा लगा हुआ था,एक खिड़की में खस की टट्टी लगी हुई थी और रेडियो पर धीमी धीमी आवाज़ में अल्लाह जिलाई बाई का गाया लोक गीत बज रहा था “थांने पंखियो झलाऊँ सारी रैन जी म्हारा मीठा मारू ..........”  वो गाना तो नहीं पर फिलहाल अल्‍लाह जिलाई बाई को &lt;a href="http://www.esnips.com/displayimage.php?pid=23771682" target="_blank"&gt;यहां सुनिए&lt;/a&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" codebase="http://fpdownload.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=8,0,0,0" id="divplaylist" height="28" width="335"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=16141363-0cc"&gt;&lt;embed src="http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=16141363-0cc" name="divplaylist" type="application/x-shockwave-flash" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" height="28" width="335"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Arial Unicode MS;font-size:120%;"&gt;बीकानेर में रेडियो स्टेशन सन १९६२ में खुल गया था.घर में रेडियो तभी आ गया था मगर रेडियो उन दिनों ड्राइंग रूम की शोभा हुआ करता था. सब लोग उसके चारों तरफ बैठकर ज़ाहिर है,घर के बड़ों की पसंद के प्रोग्राम सुना करते थे.रेडियो पर प्रोग्राम भी &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/-LE2Ku29aymM/TrqYHGG1ijI/AAAAAAAAD2s/DAHlYhxrcfc/s1600-h/DSC01344%25255B10%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="DSC01344" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" alt="DSC01344" src="http://lh6.ggpht.com/-RVPtWmmfyL4/TrqYIYimv1I/AAAAAAAAD20/-gGyAWXBNlc/DSC01344_thumb%25255B8%25255D.jpg?imgmax=800" height="200" align="right" border="0" width="315" /&gt;&lt;/a&gt; चलते रहते थे और गपशप भी. कभी ताऊजी या मामा जी आ जाते थी या पिताजी के मित्रों की मंडली जम जाती थी तो हम बच्चों को वहाँ से हटना पड़ता था. शायद बड़ों को लगता था कि चाहे हम बच्चे पास न बैठे हों गाने तो दूर तक भी सुनाई देते ही थे इसलिए उन्हें ऐसा कुछ भी नहीं लगता था कि रेडियो सुनने के हमारे अधिकार को वो हमसे छीन रहे हैं क्योंकि बाकी लोगों के लिए रेडियो फ़िल्मी गाने सुनने का साधन मात्र था. दो बातें थीं जो मुझे बहुत परेशान करती थीं. दरअसल मेरे पास एक बैंजो था जो भाई साहब के छठी कक्षा में अव्वल आने पर पिताजी ने उन्हें बतौर ईनाम दिलवाया था, उन्होंने तो दो चार दिन उसे बजाने की कोशिश कर के रख दिया था मगर मुझे वो बहुत आकर्षित करता था, एक दिन भाई साहब से डरते डरते पूछा “आप तो इसे बजाते नहीं हैं, क्या....... मैं........ इसे बजाने की कोशिश करूँ?” वो बोले “हाँ मुझसे तो नहीं बज रहा है ये, तुम कोशिश करके देख लो “. मैं रेडियो के पास बैठकर गानों के साथ साथ बैंजो पर सुर मिलाने की कोशिश करता था. जब लोग आस पास बैठे होते तो मेरी ये साधना नहीं हो सकती थी क्योंकि इस काम में एकाग्रता की ज़रूरत होती थी और भीड़ में मैं एकाग्रचित्त नहीं हो पता था. मेरी दूसरी परेशानी ये थी कि मुझे फ़िल्मी गाने सुनने में जितना आनंद आता था, उस से कहीं ज्यादा आनंद रेडियो नाटक सुनने में आता था, जब भी रेडियो पर नाटक सुनने का मौक़ा मिलता था मेरी कल्पना के सारे दरवाज़े खुल जाते थे और मैं दूसरी ही दुनिया में पहुँच जाता था......मगर दुर्भाग्य से घर में न जाने क्यों और किसी को भी रेडियो नाटक सुनने में कोई रुचि नहीं थी. इसलिए अगर कभी मैं रेडियो पर कोई नाटक लगा कर सुनने की कोशिश करता तो कोई न कोई स्टेशन बदल देता और मुझे नाटक की उस खूबसूरत दुनिया से बाहर आना पड़ता. ये दोनों ही समस्याएँ ऐसी थीं जिसका एक ही हल था कि मेरे पास अपना एक अलग रेडियो हो जिसपर मैं जब चाहूँ अकेला बैठकर नाटक सुन सकूं और जब चाहूँ, उस पर संगीत चलाकर उसके साथ बैंजो बजा सकूं. लेकिन........ जब बीस-तीस घरों में से किसी एक घर में रेडियो हो तो मुझ जैसे सातवीं आठवी कक्षा के छात्र के पास एक अलग रेडियो हो, ये शायद सपने में ही संभव था.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Arial Unicode MS;font-size:120%;"&gt;हरि घर के अंदर आया और आते ही बड़े उत्साह के साथ बोला “एक चीज़ लाया हूँ, तू देखेगा तो खुश हो जाएगा.” मैंने कहा “अरे भायला (दोस्त), इतनी गर्मी में आया है, पहले पानी तो पी ले, मेरे साथ दो निवाले रोटी के खा ले  फिर देख लूँगा कि तू क्या लाया है.” दरअसल हरि डाक टिकिट इकट्ठे करता था इसलिए मैंने सोचा शायद कोई अच्छा डाक टिकिट लाया होगा दिखाने, जिसमें मुझे कोई खास रुचि नहीं थी. मगर उसने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया और बोला “दो तार के टुकड़े लेकर आ, फिर दिखाता हूँ तुझे कि मैं क्या लाया हूँ”. अब मुझे लगा कि शायद बात वो नहीं है जो मैं समझ रहा था. मैं उठा और दो तार के टुकड़े लेकर आ गया. अब हरि ने अपनी जेब से काले रंग का एक हैडफोन निकाला जो किसी फोन का एक हिस्सा लग रहा था, उसके पीछे की तरफ दो स्क्रू से निकले हुए थे. तार के दोनों टुकड़े उन स्क्रूज पर लपेटे गए. एक तार को एरियल के तौर पर ऊंचा टांग दिया गया और दूसरे तार के टुकड़े का एक सिरा हरि ने मेरे मुंह में डाल दिया. उस हैडफोन में कुछ कम्पन्न सी होने लगी तो हरि ने उसे मेरे कान से लगा दिया. उसमें बहुत ही साफ़ साफ़ आवाज़ में गाने आ रहे थे. हरि बोला “घर में बिजली न हो, तब भी आकाशवाणी, बीकानेर इसमें जब तक स्टेशन चालू रहे सुना जा सकता है. प्रभु रेडियो पर पांच रुपये में हैडफोन मिलता है और उसमें दो रुपये का एक क्रिस्टल लगवाना पड़ता है.”&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;span style="font-family:Arial Unicode MS;font-size:120%;"&gt;उसी शाम अपनी गुल्लक को तोड़ा तो देखा उसमें आठ रुपये चार आने जमा थे. अपने उस बैंक को खाली करते हुए मुझे ज़रा भी अफ़सोस नहीं हुआ क्यों कि मुझे लगा, इसके बाद मेरी दुनिया बदल जाने वाली थी. मैंने प्रभु रेडियो से हैडफोन खरीद कर उसमें क्रिस्टल लगवाया और घर आकर अपने कमरे में उसे अच्छी तरह स्थापित कर दिया.... मेरा कमरा ऊपर की मंजिल पर था... एरियल के तार को खिडकी में से निकाल कर सबसे ऊपर लगी लाइट के छोटे से पोल से बाँध दिया. अब मेरे पास मेरा खुद का व्यक्तिगत रेडियो था. अब मैं जब चाहूँ, संगीत के साथ बैंजो बजा सकता था और अब मुझे रेडियो नाटक सुननेसे कोई नहीं रोक सकता था.&lt;/span&gt;  &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Arial Unicode MS;font-size:120%;"&gt;( क्रमश: )&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-7481332611080951035?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-11-10T11:30:41.415+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh3.ggpht.com/-foP23o-MF3A/TrqYFwshgfI/AAAAAAAAD2k/e0J7gy6X3UQ/s72-c/modiji_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">27</thr:total><media:content url="http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~5/DXMydYZ0q8c/playlist" fileSize="40129" type="application/x-shockwave-flash" /><itunes:explicit>no</itunes:explicit><itunes:subtitle>रेडियो की दुनिया में महेंद्र मोदी का नाम किसी के लिए अनजान नहीं है। हिंदी रेडियो नाटकों में उन्‍होंने अपना महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है। हमारे लंबे इसरार के बाद आखिरकार मोदी जी रेडियोनामा के लिए अपने संस्‍मरणों की श्रृंखला शुरू करने जा रहे हैं। राजस्‍थान के</itunes:subtitle><itunes:author>??????????</itunes:author><itunes:summary>रेडियो की दुनिया में महेंद्र मोदी का नाम किसी के लिए अनजान नहीं है। हिंदी रेडियो नाटकों में उन्‍होंने अपना महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है। हमारे लंबे इसरार के बाद आखिरकार मोदी जी रेडियोनामा के लिए अपने संस्‍मरणों की श्रृंखला शुरू करने जा रहे हैं। राजस्‍थान के बीकानेर से विविध-भारती मुंबई तक की इस लंबी यात्रा में रेडियो के अनगिनत दिलचस्‍प किस्‍से पिरोये जायेंगे। खट्टी-मीठी यादें आपसे बांटी जायेंगी। इन दिनों मोदी जी राजस्‍थान की लंबी यात्रा पर हैं इसके बावजूद उन्‍होंने समय निकालकर श्रृंखला का आग़ाज किया है। उम्‍मीद है कि आप सभी इस श्रृंखला का गर्मजोशी से स्‍वागत करेंगे। ये बता दें कि हर दूसरे बुधवार मोदी जी के संस्‍मरण होंगे और हर दूसरे बुधवार शुभ्रा जी के संस्‍मरण। इस तरह बुधवार रेडियोनामा पर 'संस्‍मरण-वार' होगा। स्कूल से घर लौटकर बस्ता रखा और मुंह हाथ धोकर खाना खाने बैठा ही था कि दरवाज़े की सांकल बजी. सोचा, लाय ( आग ) बरसती ऐसी दुपहरी में कौन होगा भला? घर में और कोई था नहीं उस वक्त, भाई साहब अपने किसी सहपाठी के यहाँ गए हुए थे, पिताजी अपने दफ्तर और माँ मौसीजी के घर. उठकर दरवाज़ा खोला तो देखा पसीने से सराबोर मेरा दोस्त हरि अपनी साइकिल को सामने के पेड़ की हल्की सी छाया में खड़ी कर दरवाज़ा खुलने की राह देख रहा है. दरवाज़ा खुलते ही वो चिलचिलाती धूप को भागकर पार करते हुए घर के अंदर घुस गया. बीकानेर की गर्मी के तेवर उन दिनों कुछ ज्यादा ही तेज हुआ करते थे. ए. सी. तो बहुत दूर की चीज़ थी, कूलर भी नहीं होते थे उन दिनों. पचास में से किसी एक घर में पंखा होता था और बाकी लोग खस की टट्टियाँ खिड़कियों पर लगाकर उस से छनकर यदा कदा आती हवा से ही गुज़ारा किया करते थे. नींद की मीठी मीठी झपकियों के बीच बार बार हाथ के पंखे को झलना बहुत अखरता था और भगवान पर बड़ा गुस्सा आता था कि वो गर्मी के मौसम में खूब तेज हवा क्यों नहीं चलाये रखता? मगर हवा जो बंद होती थी तो कुछ इस तरह बंद होती थी कि पेड़ का पत्ता तक नहीं हिलता था और मुझे याद है कि घर में बिजली लगने से पहले कई बार मेरी माँ रात रात भर बैठ कर हम लोगों को पंखा झलती रहती थीं. जब कई कई दिन इसी तरह गुजर जाते तो सब लोग भगवान से अरदास(प्रार्थना) करते “हे भगवान और कुछ नहीं तो आंधी ही भेज दे.” भगवान को भी पश्चिमी राजस्थान की इस धोरों (रेत के टीलों) की धरती पर बसे हर तरह के अभाव झेलते लोगों पर थोड़ी दया आ जाती और इधर उधर से कोई आवाज़ आ जाती “अरे काली पीली आंधी आ रही है रे ......” और सब लोग उठ खड़े होते थे काली पीली आंधी को देखने के लिए. क्षितिज पर उभरता एक छोटा सा काला पीला धब्बा थोड़ी ही देर में रेत का समंदर बनकर पूरे आकाश को ढंक लेता था . हर ओर बस रेत ही रेत .... सड़क की बत्तियाँ जला दी जाती थीं क्योंकि इस काली पीली आंधी की परत इतनी मोटी होती थी कि सूर्य देवता की तेज किरणें भी उस परत को भेद नहीं पाती थीं. हर तरफ मिचमिचाती आँखें और सर पर रुमाल या गमछा लपेटे लोग.....और हाँ हर आँख रेत से कडकडाती हुई और हर मुंह रेत से भरा हुआ. ये आंधी लगातार कई कई दिनों तक चलती रहती थी. इसी रेत की आंधी के बीच सोना, इसी रेत के बीच उठना, इसी के बीच नहाना धोना और इसी के बीच खाना पीना....सुबह सोकर उठते तो देखते कि जिस करवट सोये थे उस करवट पर शरीर के साथ साथ रेत का एक छोटा सा टीला बन गया है और पूरा मुंह रेत से भरा हुआ है. आँखों को बहुत देर तक खोल नहीं पाते थे क्योंकि आँख की पलकें रेत से भरी हुई होती थीं. मगर ये रेत की काली पीली आंधी अपने साथ एक ऐसी सौगात लेकर आती थी जिसकी वजह से इतनी तकलीफों के बावजूद ये आंधी हमें बुरी नहीं लगती थी. ये सौगात थी .... गर्मी से राहत. जितने दिन ये आंधी चलती रहती थी ज़ाहिर है, हवा भी चलती रहती थी और हवा चलने का मतलब गर्मी से ज़बरदस्त राहत. मैं जल्दी से हरि को ड्राइंग रूम में ले गया जहां पंखा लगा हुआ था,एक खिड़की में खस की टट्टी लगी हुई थी और रेडियो पर धीमी धीमी आवाज़ में अल्लाह जिलाई बाई का गाया लोक गीत बज रहा था “थांने पंखियो झलाऊँ सारी रैन जी म्हारा मीठा मारू ..........” वो गाना तो नहीं पर फिलहाल अल्‍लाह जिलाई बाई को यहां सुनिए बीकानेर में रेडियो स्टेशन सन १९६२ में खुल गया था.घर में रेडियो तभी आ गया था मगर रेडियो उन दिनों ड्राइंग रूम की शोभा हुआ करता था. सब लोग उसके चारों तरफ बैठकर ज़ाहिर है,घर के बड़ों की पसंद के प्रोग्राम सुना करते थे.रेडियो पर प्रोग्राम भी चलते रहते थे और गपशप भी. कभी ताऊजी या मामा जी आ जाते थी या पिताजी के मित्रों की मंडली जम जाती थी तो हम बच्चों को वहाँ से हटना पड़ता था. शायद बड़ों को लगता था कि चाहे हम बच्चे पास न बैठे हों गाने तो दूर तक भी सुनाई देते ही थे इसलिए उन्हें ऐसा कुछ भी नहीं लगता था कि रेडियो सुनने</itunes:summary><itunes:keywords>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन, mahendra modi, महेन्द्र मोदी</itunes:keywords><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/11/1.html</feedburner:origLink><enclosure url="http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~5/DXMydYZ0q8c/playlist" length="40129" type="application/x-shockwave-flash" /><feedburner:origEnclosureLink>http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=16141363-0cc</feedburner:origEnclosureLink></item><item><title>जल्‍द आ रही है महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की एक श्रृंखला: 'कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन'</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/JypCqY62eV4/blog-post_07.html</link><category>कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन</category><category>mahendra modi</category><category>महेंद्र मोदी</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Mon, 07 Nov 2011 19:35:05 PST</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-187189665955452203</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;रेडियोनामा पर हमने हमेशा रेडियो से जुड़ी यादों को संजोने पर ज़ोर दिया है। &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/-JfAMhmTXSA8/TrgMlqHBeCI/AAAAAAAAD2I/G-54zCwhYNQ/s1600-h/modiji%25255B5%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="modiji" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; border-right-width: 0px" height="193" alt="modiji" src="http://lh4.ggpht.com/-wTxhQMoHTas/TrgMmrTJkgI/AAAAAAAAD2Q/YuXgwoTc1lE/modiji_thumb%25255B3%25255D.jpg?imgmax=800" width="262" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;       &lt;br /&gt;हालांकि हम धीरे-धीरे रेडियो-विमर्श पर भी फोकस करने का प्रयास कर रहे हैं। नियमित संस्‍मरणों की श्रृंखला में हर बुधवार मशहूर न्‍यूज़रीडर शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। जिसका नाम है--'न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा'। शुभ्रा जी की श्रृंखला को देश-विदेश में काफी पसंद किया जा रहा है।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;इस दौरान हमारा दूसरा प्रयास है रेडियो से जुड़े बहुत पुराने दौर के मशहूर लोगों के इंटरव्‍यू का। हालांकि ये सिलसिला फिलहाल अनियमित है।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;रेडियोनामा को और आगे बढ़ाने और नया आयाम देने की दिशा में आज हम ऐलान करने जा रहे हैं विविध भारती में सहायक केंद्र निदेशक रहे और रेडियो की दुनिया में अपना महत्‍वपूर्ण योगदान देने वाले श्री महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला का।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;मोदी जी ख़ासतौर पर रेडियो-नाटकों की दुनिया के एक महत्‍वपूर्ण हस्‍ताक्षर रहे हैं। अभी हाल ही में उन्‍होंने रेडियो में अपनी लंबी और कामयाब पारी खत्‍म की है। हमें याद है कि रेडियोनामा ब्‍लॉग की शुरूआत से ही इससे मोदी जी का प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष जुड़ाव रहा है। अब रेडियोनामा पर मोदी जी अपने संस्‍मरणों की लंबी श्रृंखला लेकर आ रहे हैं। इस श्रृंखला का नाम है--'कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन'।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;तय ये पाया गया है कि श्रृंखला हर दूसरे बुधवार को प्रस्‍तुत हो। इस तरह रेडियोनामा पर हर बुधवार सजीला हो जायेगा।       &lt;br /&gt;एक बुधवार आप शुभ्रा जी को पढ़ेंगे। उसके अगले बुधवार को मोदी जी को। यानी संस्‍मरणों की जुगलबंदी।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;उम्‍मीद है कि हमारा ये प्रयास आपको पसंद आयेगा।       &lt;br /&gt;सच तो ये है कि हम भी इस श्रृंखला को लेकर काफी उत्‍साहित और बेक़रार हैं।       &lt;br /&gt;इसके अलावा रेडियो की एक और मशहूर हस्‍ती श्री लोकेंद्र शर्मा से भी हमने अपनी यादें लिखने का अनुरोध किया है।       &lt;br /&gt;उनके लिखे का भी हमें इंतज़ार रहेगा।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;तो मिलते हैं इसी बुधवार यानी नौ नवंबर 2011 को।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-187189665955452203?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-11-08T09:05:05.875+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh4.ggpht.com/-wTxhQMoHTas/TrgMmrTJkgI/AAAAAAAAD2Q/YuXgwoTc1lE/s72-c/modiji_thumb%25255B3%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/11/blog-post_07.html</feedburner:origLink></item><item><title>'वरना गत्‍ता उठाकर फेंक देते': न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा: नौंवी कड़ी</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/6C--FBWLehY/blog-post.html</link><category>news room se shubhra sharma</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Thu, 03 Nov 2011 07:37:17 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-7174286283017227182</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने बेहद दिलचस्‍प संस्‍मरण लिख रही हैं। इस श्रृंखला का नाम है न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा। ये है इस श्रृंखला की नौंवी कड़ी। शुभ्रा जी के सारे लेख आप &lt;/font&gt;&lt;a href="http://radionamaa.blogspot.com/search/label/news%20room%20se%20shubhra%20sharma" target="_blank"&gt;&lt;font size="3"&gt;यहां&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;font size="3"&gt; चटका लगाकर पढ़ सकते हैं। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt; &lt;font size="3"&gt;   &lt;hr /&gt;&lt;/font&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;पुरानी दिल्ली की अलीपुर रोड की कोठी में न्यूज़ रूम की शुरुआत और फिर वहां से नयी दिल्ली के संसद मार्ग स्थित प्रसारण भवन में आने का क़िस्सा मैंने आपको पिछली कड़ी में आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक श्री पी सी चैटर्जी की ज़ुबानी सुनाया. संसद मार्ग पर प्रसारण भवन की भव्य इमारत के बारे में कुछ ख़ास लोगों, जैसे भीष्म साहनी, गोपीचंद नारंग और रेवती सरन शर्मा की राय से भी मैं आप को परिचित करा चुकी हूँ. आज न्यूज़ रूम के अंदर के कुछ ऐसे लोगों से आपको मिलवाती हूँ, जो दिन-रात समाचारों की दुनिया से जुड़े रहने के बावजूद कभी बाहरी लोगों के सामने नहीं आये. अपने काम की बदौलत न्यूज़ रूम में मिसाल बने..... लेकिन बाहरी दुनिया उनका नाम तक नहीं जान सकी. ऐसे ही एक युगपुरुष थे - नरिंदर सिंह बेदी जी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मैं जब पहले-पहल हिंदी न्यूज़ रूम में आयी थी और यहाँ का कामकाज सीखने की कोशिश कर रही थी.....उन दिनों मेरे सीनियर्स अक्सर एक जुमला मेरी तरफ उछाला करते थे - &amp;quot; ख़ैर मनाओ कि तुम्हारा यह अनुवाद बेदी साहब के हाथ में नहीं जा रहा है, वरना सीधे गत्ता उठाकर बाहर फेंक देते.&amp;quot;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;( न्यूज़ रूम में हम ख़बरों को टाइप करवाकर और गत्ते पर लगाकर रखते हैं ताकि न्यूज़रीडर के पढ़ने के समय काग़ज़ की आवाज़ न हो.)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इस तरह शुरूआती दिनों में ही मैं इतना तो समझ गयी थी कि हो न हो बेदी साहब हिंदी न्यूज़ रूम की कोई तोप चीज़ थे. फिर धीरे-धीरे, अलग-अलग लोगों के मुंह से सुनकर जाना कि बेहद बुद्धिमान और समर्पित व्यक्ति थे. अनुवाद और संपादन में ख़ुद तो सिद्ध-हस्त थे ही, बहुत सारे दूसरे लोगों को सिखाने में भी उनका बहुत बड़ा योगदान था. मूर्खता और मूर्ख....दोनों को ही बर्दाश्त नहीं कर पाते थे इसीलिए गत्ते फेंकने की घटनायें होती रहती थीं. लेकिन जिसने उनके गत्ते फेंकने को एक चुनौती की तरह स्वीकार किया और अपने को बेहतर बनाने की कोशिश की...वह ज़रूर आगे बढ़ा.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;बेदी साहब का जन्म २४ सितम्बर १९२२ को हुआ था. बी ए करने के बाद कई जगह नौकरी के लिए आवेदन भेजे. मौसम विभाग, वन विभाग और आल इंडिया रेडियो में चयन भी हो गया. कहाँ नौकरी करें, यह चुनने की अब उनकी बारी थी. रेडियो नयी, उभरती विधा थी. उन दिनों इसके साथ ज़बरदस्त ग्लैमर जुड़ा हुआ था. कुछ सार्थक करने का संतोष भी था. लिहाज़ा उन्होंने रेडियो की नौकरी स्वीकार कर ली. दिसंबर १९४४ में वे न्यूज़ रूम में आये. उन दिनों अंग्रेज़ी और हिन्दुस्तानी के बुलेटिन प्रसारित होते थे. हिन्दुस्तानी के बुलेटिन देवनागरी में नहीं बल्कि फ़ारसी लिपि में तैयार किये जाते थे. लाहौर से लेकर दिल्ली तक स्कूली पढ़ाई का माध्यम उर्दू भाषा थी. बेदी साहब को हिन्दुस्तानी के बुलेटिन बनाने का ज़िम्मा सौंपा गया तो उर्दू की पृष्ठभूमि के कारण उन्हें इसमें कोई दिक्क़त पेश नहीं आयी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;दिक्क़त तब हुई, जब १९५१ के आस-पास सरकारी नीति के तहत हिन्दुस्तानी बुलेटिन समाप्त कर उनकी जगह हिंदी और उर्दू के अलग-अलग बुलेटिन शुरू किये गये. बेदी साहब को हिंदी लिपि का बिलकुल ज्ञान नहीं था. उनकी इस दिक्क़त को समझते हुए उन्हें जी एन आर यानी अंग्रेज़ी न्यूज़ रूम में भेज दिया गया. लेकिन बेदी साहब इस तरह हार मानकर बैठ जाने वाले व्यक्ति तो थे नहीं. इसलिए लगभग तीस साल की उम्र में और छः साल की नौकरी के बाद उन्होंने क ख ग से शुरुआत कर हिंदी सीखी और प्रभाकर की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया. और फिर हिंदी में पढ़े-लिखे लोगों को हिंदी में अनुवाद की बारीकियां समझायीं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;बेदी साहब ने १९४४ से १९८० तक आकाशवाणी में काम किया. अपने इस पूरे कार्यकाल के दौरान वे दिल्ली में ही रहे. कभी जी एन आर तो कभी एच एन आर में. उनके बिना दिल्ली के न्यूज़ रूम की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. यह ज़रूर था कि जब कभी आकाशवाणी के किसी नये केंद्र से समाचारों का प्रसारण शुरू होता था तो डमी बुलेटिन बनाने और लोगों में कार्य संस्कृति विकसित करने का ज़िम्मा उन्हीं को सौंपा जाता था. जयपुर और जालंधर केन्द्रों से समाचारों का प्रसारण उन्हीं की देख रेख में शुरू हुआ था. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;पूर्व समाचारवाचक कृष्ण कुमार भार्गव बता रहे थे कि बेदी साहब अगर ग़लती करने पर डांट पिलाते थे...तो अच्छा काम करने पर तारीफ करने में भी पीछे नहीं रहते थे. एक बार बुलेटिन पढ़ते-पढ़ते भार्गव जी को लगा कि समाचार कुछ कम पड़ सकते हैं. जैसेकि अगर सामान्य गति से पढ़ते रहने पर तीस पंक्तियों की आवश्यकता थी तो वहां केवल बीस पंक्तियाँ ही उपलब्ध थीं. मौक़े की नज़ाकत को भांपते हुए भार्गव जी ने पढ़ने की गति कम किये बिना, दो पंक्तियों और दो समाचारों के बीच का अंतराल थोड़ा-थोड़ा बढ़ाना शुरू कर दिया और सुनने वालों को यह बिलकुल महसूस नहीं हो सका कि बुलेटिन में पंक्तियाँ कम थीं या पढ़ने की गति धीमी थी. बुलेटिन के बाद बेदी साहब ने धीमे से कहा - &amp;quot;गुड&amp;quot;. उनके उस एक शब्द को भार्गव जी आज तक अपना सबसे बड़ा प्रशस्ति-पत्र, सबसे बड़ा मेडल मानते हैं. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;बेदी साहब के परिवार के लोग कहते हैं कि उन्होंने शायद ही कभी किसी त्यौहार पर पूरे दिन उनका साथ पाया हो. हर होली, दीवाली, दशहरे पर वे सबसे पहले अपनी ड्यूटी लगाते थे. उसके पीछे शायद यह भावना काम करती थी कि अगर वे ख़ुद ड्यूटी नहीं करेंगे तो दूसरों को ड्यूटी पर आने के लिए कैसे कहेंगे. पत्नी और बच्चे उनकी सारी दुनिया थे ..... लेकिन काम का महत्व उनसे भी कहीं अधिक था.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;एक बात और .... जिस बात को सही समझते थे, उसके लिए अड़ जाते थे. यहाँ तक कि नौकरी छूट जाने तक की परवाह नहीं करते थे. एडमंड हिलेरी और तेन्ज़िंग नोर्के ने २९ मई १९५३ को दुनिया की सबसे ऊंची छोटी एवरेस्ट पर चढ़ने में कामयाबी हासिल की. ख़बर न्यूज़ रूम में आ चुकी थी लेकिन अधिकारी चाहते थे कि यह ख़बर सबसे पहले साढ़े आठ बजे के अंग्रेज़ी बुलेटिन में प्रसारित हो. इधर बेदी साहब का मन था कि सवा आठ बजे हिंदी के बुलेटिन में यह ब्रेकिंग न्यूज़ दें. बार-बार अनुरोध के बावजूद अधिकारीगण राज़ी नहीं हुए. समाचार पर २०३० तक प्रतिबन्ध लगा था...लगा ही रहा. बेदी साहब ने अपने समाचारवाचक से मंत्रणा की और बुलेटिन को साढ़े आठ से.... ज़रा आगे तक खींच दिया. प्रतिबन्ध की अवधि समाप्त हो गयी और &amp;quot;मुख्य समाचार एक बार फिर कहकर&amp;quot; समाचारवाचक ने एवरेस्ट विजय का समाचार सुना दिया.      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;बेदी साहब को शायरी का शौक़ था. ख़ुद भी लिखते थे.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;ये रही नरिंदर सिंह बेदी &amp;quot;सुख़न&amp;quot; की शायरी ---&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;ज़ोर-ओ-जफ़ा को क्या करूँ... नाज़-ओ-अदा को क्या करूँ&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इश्क़ है ख़ुद मेरा सिला, अहद-ओ-वफ़ा को क्या करूँ?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;उसकी हयात जाँविदा... मेरी हयात चंद रोज़&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;वो भी तो ख़ुदनवाज़ है... ऐसे ख़ुदा को क्या करूँ?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;आज तो हुस्न को भी ख़ुद... मेरी निगह की तलाश है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;जलवे ही बेनक़ाब हैं... रस्म-ए-हया को क्या करूँ?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;रूह में इक तड़प भी है... ज़हन में कुछ सवाल भी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;सजदे को सर न झुक सका, दस्त-ए-दुआ को क्या करूँ?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;काविश-ए-फ़न में सबको है... नाम-ओ-नमूद की हवस&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मौत के बाद जो मिले... ऐसी बक़ा को क्या करूँ???&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;***&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ****&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ***&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;जी का रोग निराला है... जब ये किसू को होले है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;तारों के संग जागे है... अश्कों के संग सोले है .&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;बाद-ए-सबा दीवानी है... गुलशन-गुलशन डोले है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;किस जलवे को ढूँढे है... घूँघट-घूँघट खोले है.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;ओस बड़ी दीवानी है...दश्त में मोती रोले है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;चाँद बड़ा सौदाई है ...दूध में हीरे घोले है.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;दिल अपना मस्ताना है, रहबर-रहज़न क्या जाने&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;जो भी ढब से बात करे... साथ उसी के होले है.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इस तिफ्लों के मेले में... खेल-खिलौने बिकते हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;आंसू कौन ख़रीदेगा... क्यों पलकों पर तोले है?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;ये तो &amp;quot;सुख़न&amp;quot; दीवाना है... इसकी बातें कौन सुने&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;'फ़ैज़-ओ-फ़िराक़' की महफ़िल में 'मीर' की बोली बोले है. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; -------&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मोल-तोल के शहर में आकर हम क्या नफ़ा कमा बैठे&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;क़िस्मत ने दो आँखें दी थीं... उनको भी धुंधला बैठे.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;जब से सफ़र पे निकला हूँ, धूप ने साथ निभाया है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;रुका तो साये बन गये साथी, चला तो हाथ छुड़ाया है.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;अब तो अपने यार भी हमको किश्तों-किश्तों मिलते हैं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;सालिम मिलने वाले जाने किस आकाश पे जा बैठे.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;ये तो जहाँ भी जाता है बस उलटी-सीधी कहता है&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;आज &amp;quot;सुख़न&amp;quot; के आते-आते हम तो बज़्म उठा बैठे.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ----------&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;ये नया दौर है इस दौर के पैग़ाम समझ&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;घर उजड़ जाने को ख़ुश-आइए-अय्याम समझ.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;ख़ुदफ़रोशी का अगर तुझ में सलीका ही नहीं&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;छोड़ काऊस.. उसे ज़हमत-ए-नाकाम समझ.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इन फ़िज़ाओं में मयस्सर है किसे उम्र-ए-दराज़&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;जो भी साँस आये उसे ज़ीस्त का इनाम समझ.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;अहदे-जम्हूर, दयानत, नयी रख्शंदा सदी&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;सब बड़ी बातों को अलफ़ाज़ का इबहाम समझ.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;ज़हर-आलूद धुआं हो तो उसे अब्र न जान&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;शोरिश-ए-ज़हल को मत धर्म का अहकाम समझ&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-7174286283017227182?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-11-03T20:07:17.279+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">4</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/11/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>चुनौतीपूर्ण होता है शोक-कार्यक्रमों को पेश करना</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/IIHSHfh4AaE/blog-post_22.html</link><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Fri, 21 Oct 2011 22:53:02 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-7089921806594756691</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;जगजीत सिंह के अवसान कि खबर ने एक बड़ा झटका दिया संगीत-संसार को.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मीडिया को कितना निस्संग और निर्मम होना पड़ता है इसकी एक बानगी आज आपको दी जाए.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;जब भी कोई उम्र-दराज़ फ़िल्मी हस्ती अस्पताल पहुँचती है तो रेडियो और टीवी वाले आपातकालीन तैयारियां कर लेते हैं. ताकि वो सबसे पहले श्रद्धांजलि प्रस्तुत कर सकें. ये बात आपको इसलिए बता रहा हूँ क्यूंकि जगजीत गए तो किसी को इसका अंदेशा तक नहीं था. इससे पहले जब शम्मी कपूर अस्पताल में भर्ती किये गए तो भी किसी ने सोचा नहीं था कि वो हमें छोड़ कर चले जायेंगे. दरअसल शम्मी जी नियमित अस्पताल में भर्ती होते थे और डायलिसिस वगैरह करवाके लौट आते थे. अचानक सितम्बर कि एक सुबह उनकी विदाई का संदेसा आ गया.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;रेडियो और टीवी कि दुनिया में आजकल इतनी प्रतियोगिता है कि सबसे पहले और सबसे आगे रहने की तमन्ना में हमें जाने क्या क्या करना पड़ता है. इसमें कुछ बातें निस्संगता और निर्ममता लग सकती हैं. मुद्दा ये है कि जब किसी फ़िल्मी हस्ती कि दुनिया से विदाई होती है और आप रेडियो पर सबसे पहले कोई कार्यक्रम सुनते हैं तो शायद आपके मन में ये नहीं आता होगा कि इसके लिए जो संसाधन हैं वो पहले से जुटाकर रखे गए होंगे. त्वरित प्रस्तुति होते हुए भी इसकी तैयारियां करके रखी होंगी. गाने, जानकारियाँ, इंटरव्यू और संवाद पहले से जमा कर लिए गए होंगे. लेकिन जैसे ही आपको ये बात पता चलती है कि हम रेडियो वालों को अमूमन पहले से मानसिक रूप से तैयारी करके रखनी पड़ती है, तो निश्चित है कि ये बात आपको बहुत नागवार गुजरेगी. पर ये दुनिया ऐसी ही है. हमें सचमुच इतना निर्मम होना पड़ता है.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;जगजीत के जाने के बाद मुझे अचानक विविध भारती के लिए श्रद्धांजलि कार्यक्रम पेश करना पडा. यकीन मानिए एक तो अपने प्रिय कलाकार के दुनिया से चले जाने का सदमा और ऊपर से आनन फानन देश के सबसे बड़े रेडियो चैनल पर कार्यक्रम प्रस्तुत करना.....ये बेहद कठिन था. या सच है कि ये हमारा पेशा है, हमें इसकी आदत होती है. लेकिन लाख आदत हो जाए. लाख आप खुद को संभाल लें, पर जिस कलाकार से आपकी जिंदगी की इतनी सारी यादें, इतने सारे रेफेरेंस जुड़े हों. उसकी आवाज़ सुनकर ही सारा धीरज टूट जाता है. केवल आधे घंटे कि उस पेशकश के लिए मैंने ना तो इंटरव्यू ढूंढे,&amp;#160; ना ज्यादा जानकारियाँ जमा कीं...इस कार्यक्रम को जज्बाती बनाकर पेश किया. अपने मन कि सच्ची बातें कीं. जो नियमित सुनते हैं उन्होंने महसूस किया कि मेरी आवाज़ काँप रही है. स्टूडियो के कुछ साथियों के गले रुंधे थे....आंखे भीगी थी, यहाँ तक कि एक सहयोगी जब फिल्म और संगीत कि दुनिया की जानी मानी हस्तियों को फोन पर रिकॉर्ड कर रही थीं तो वो रो पड़ीं. श्रद्धांजलि के कार्यक्रमों में समकालीन कलाकारों से बातें करना भी एक चुनौती होती है. क्यूंकि अमूमन किसी का मन नहीं होता उस वक्त बातें करने का. पर हमें सवाल कर करके बातें निकलवानी पड़ती हैं. संस्मरण निकलवाने पड़ते हैं. ये सब उस श्रोता के लिए किया जाता है, जो ऐसे मौकों पर हमसे उम्मीद लगाए रहता है. यकीन मानिए ये अपने आपमें बहुत चुनौतीपूर्ण कार्यक्रम होते हैं.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;परदे के पीछे कि ये सच्चाइयां दर्शकों या श्रोताओं तक नहीं पहुँचती. लेकिन इससे प्रदर्शनकारी कलाओं से जुड़े लोगों के जीवन और काम कि मुश्किलों का अंदाजा ज़रूर लगाया जा सकता है. हम जब कार्यक्रम पेश कर रहे होते हैं तो ज़्यादातर अच्छा यही माना जाता है कि हमारे निजी एहसास सामने ना आयें. पर फिर भी आवाज़ और चेहरे झूठ तो नहीं बोल सकते ना. आवाजों की दुनिया में मन की भावनाएं उजागर हो ही जातीं हैं. रेडियो कि दुनिया में कितनी कितनी मिसालें हैं, चुनौतीपूर्ण खबरें देने की. जैसे जब महात्मा गांधी की ह्त्या हो गयी तो रेडियो पर उसकी खबर मेलविल डी-मेलो ने पढ़ी थी. उन्होंने जिस तरह इस खबर को पढ़ते हुए पॉज़ लिया था, वो रेडियो की दुनिया का सबसे सूझ-बूझ भरा पॉज़ बन गया था. वो ज़माना तेज़ी से सूचनायें पहुँचने का नहीं था. इसलिए लोग रेडियो पर निर्भर रहते थे. रेडियो ने ये खबर पंहुंचाई और पूरा देश स्तब्ध रह गया. यही विनम्रता और संवेदनशीलता पिछले कुछ दशकों में कुछ और मशहूर हस्तियों के निधन पर भी देखी गयी। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;शोक या दुःख से भरे पलों के कार्यक्रम पेश करने का पाना एक तरीका है. एक अनुशासन है. रेडियो-प्रोफेशनल इसे मानें या ना मानें पर अलिखित रूप से श्रोता भी उम्‍मीद तो यही करते हैं कि जैसा धक्‍का या दुख उन्‍हें पहुंचा है—उनके पसंदीदा रेडियो-प्रस्‍तुतकर्ताओं को भी पहुंचा होगा। पर अगर रेडियो-प्रजेन्‍टर अपने ही रंग में रंगा नज़र आए—तो सुनने वाले स्‍तब्‍ध रह जाते हैं।      &lt;br /&gt;देखा जाता है कि आज के नए ज़माने के रेडियो चैनल ऐसे लम्हों में भी संयमित नहीं होते. एक खास किस्म का शोर, एक खास किस्म कि आक्रामकता के साथ ये चैनल कार्यक्रम पेश करते हैं, ज़ाहिर है कि इस आक्रामकता में दुखी होने की गुंजाइश नहीं होती. अगर थोड़ी बहुत गुंजाइश निकाल भी ली जाए तो भी उसके लिए ज़्यादा वक्त नहीं दिया जा सकता. यही कारण है कि ऐसे मौक़ों पर कई मशहूर चैनल भी अपेक्षा के अनुरूप बर्ताव करते नहीं पाए जाते। वो जिस धूम-धड़ाके के लिए जाने-जाते हैं—उससे पार नहीं हो पाते। बाज़ार के दबाव उन्‍हें ज़्यादा देर अफ़सोस के रंग में रहने नहीं देते। इसलिए उनका मनाया अफ़सोस भी किसी त्यौहार या मार्केटिंग की तरह लगता है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;जगजीत सिंह की विदाई के बहाने आपने अपने शहर के रेडियो-चैनलों का असली रंग देखा होगा। जब भी कोई बड़ा कलाकार दुनिया से विदा हो, तब किसी भी चैनल के सरोकारों और उसकी गंभीरता का असली रंग आप आसानी से पहचान सकते हैं। अगर आप एक जागरूक श्रोता हैं तो आपको ये फर्क आईने की तरह साफ़ नज़र आएगा।      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;(जनसंदेश लखनऊ में बुधवार 19 अक्‍तूबर को प्रकाशित)&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-7089921806594756691?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-10-22T11:23:02.779+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/10/blog-post_22.html</feedburner:origLink></item><item><title>रेडियो - आशिक भगवान काका</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/VnD1QjXCXcY/blog-post_20.html</link><category>अफलातून</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Thu, 20 Oct 2011 02:59:54 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-4308129115435433801</guid><description>&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;भगवान काका लालकृष्ण आडवाणी के उलट थे । उनकी पैदाइश भी सिन्ध प्रान्त की थी । बँटवारे की फ़िरकावाराना हिन्सा और दर्द को उन्होंने साम्प्रदायिकता विरोध को अपना आजीवन मिशन बनाकर जज़्ब किया था। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;१९९२ - ९३ में जब जब देश भर में साम्प्रदायिक हिन्सा में हजारों निर्दोष लोग मारे गए तब महाराष्ट्र का भिवण्डी इस आग से बचा रहा। भिवण्डी साम्प्रदायिकता के लिहाज से अतिसंवेदनशील माना जाता है । साम्प्रदायिक हिन्सा का भिवण्डी का इतिहास भी था फिर भी भिवण्डी में आग नहीं भड़की यह अचरज की बात थी । भिवण्डी में सत्तर के दशक में हुए भयंकर दंगों के बाद जो मोहल्ला समितियाँ गठित हुईं उन्हें इस अचरज का पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए । यह समितियाँ पुलिस की पहल पर बनीं शान्ति समितियाँ नहीं हैं , भगवान काका जैसे शान्ति सैनिकों और जनता की पहल पर बनीं थीं । इनकी बैठक अमन के दिनों में भी नियमित होती हैं ।बनारस के सद्भाव अभियान के तालिमी शिबिरों में भगवान काका के सवाल होते थे - 'दूसरों' के मोहल्ले की चाय की दुकानों पर बैठते हो या नहीं ? उनके परचे और इश्तेहार पढ़ पाते हो ? ' चिट्ठेकार &lt;a href="http://neerajdiwan.wordpress.com/2007/08/13/freedom-urdu/"&gt;नीरज दीवान&lt;/a&gt; की तरह उर्दू लिपि पढ़ना जानने वाले तरुण &lt;a href="http://neerajdiwan.wordpress.com/2007/08/14/freedom-urdu2/"&gt;कम&lt;/a&gt; ही मिलते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे यहाँ पढ़ें  &lt;a href="http://radionamaa.blogspot.com/2007/09/blog-post.html"&gt;" रेडियो आशिक- भगवान काका" &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-4308129115435433801?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-10-20T15:29:54.116+05:30</app:edited><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">0</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/10/blog-post_20.html</feedburner:origLink></item><item><title>रेडियो की स्मृति</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/sR7sPa6u2UA/blog-post_08.html</link><category>सागर चन्द नाहर</category><category>कविता.</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Sat, 08 Oct 2011 08:39:39 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-1146920164290563199</guid><description>&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Arial Unicode MS'; "&gt;&lt;b&gt;रेडियो की स्मृति&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;ब्रजेश कानूनगो &lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"&gt;गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों&lt;br /&gt;बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"&gt;कबाड मे पडे रेडियो का इतिहास जानकर&lt;br /&gt;फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style="border-top-width: 7px; border-top-style: solid; border-top-color: rgb(92, 138, 100); border-bottom-color: rgb(92, 138, 100); margin-top: 10px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 400px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: left; "&gt;&lt;span style="font-family: 'Arial Unicode MS'; font-size: medium; "&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-EtN1vpQJeSU/TpBYXFeLvWI/AAAAAAAAAHg/mxTDz7yZ4To/s1600/Brajesh.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 125px; height: 160px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-EtN1vpQJeSU/TpBYXFeLvWI/AAAAAAAAAHg/mxTDz7yZ4To/s320/Brajesh.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5661121885233724770" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p style="border-bottom-width: 7px; border-bottom-style: solid; border-bottom-color: rgb(92, 138, 100); margin-top: 10px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 400px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: left; "&gt;&lt;b&gt;बृजेश कानूनगो&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: 'Arial Unicode MS'; font-size: medium; "&gt;25 सितम्बर 1957 देवास, मध्य प्रदेश मे जन्म । रसायन विज्ञान तथा हिन्दी साहित्य मे स्नातकोत्तर।&lt;br /&gt;देश की प्रतिष्ठित पत्र –पत्रिकाओँ मेँ वर्ष 1976 से बाल कथाएँ ,बालगीत, वैचारिक पत्र, व्यंग्य लेख ,कविताएँ, कहानियाँ ,लघुकथाएँ प्रकाशित।&lt;br /&gt;वर्ष 1995 मे व्यंग्यसंग्रह-पुन: पधारेँ, 1999 मे कविता पुस्तिका-धूल और धुएँ के परदे मेँ, 2003 मे बाल कथाओँ की पुस्तक- फूल शुभकामनाओँ के तथा 2007 मेँ बाल गीतोँ की पुस्तिका- चाँद की सेहत प्रकाशित।&lt;br /&gt;स्टेट बैक आफ इन्दौर मे 33 वर्ष सेवा के बाद स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति। बैककर्मियोँ की साहित्यिक संस्था-प्राची के माध्यम से अनेक साहित्यिक गतिविधियोँ का संचालन। तंगबस्तियोँ के गरीब बच्चोँ के लिए चलाए जाने वाले व्यक्तित्व विकास शिविरोँ मे सक्रिय सहयोग।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;503, गोयल रिजेंसी,&lt;br /&gt;कनाड़िया रोड़, इन्दौर-18,&lt;br /&gt;मो. नं. 09893944294&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Arial Unicode MS'; font-size: medium; "&gt;न जाने क्या सुनते रहते हैं&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;स्मृति मे सुनाई पडता है&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;पायदानों पर चढता&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;अमीन सयानी का बिगुल&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;न जाने किस तिजोरी में कैद है&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;हॉकियों पर सवार होकर&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;फसलों के बचाव के तरीके&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;अपने समय का महत्वपूर्ण कवि&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;सारंगी रोती रहती है अकेली&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू &lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;याद आता है रेडियो&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;सुनसान देवालय की तरह&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;मुख्य मन्दिर मे प्रवेश पाना&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;जब सम्भव नही होता आसानी से&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;और तब आता है याद&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;जब मारा गया हो बडा आदमी&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;वित्त मंत्री देश का भविष्य&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;निश्चित करने वाले हों संसद के सामनें&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;परिणाम निकलने वाला हो दान किए अधिकारों की संख्या का&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;धुएँ के बवंडर के बीच बिछ गईं हों लाशें&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;फैंकी जाने वाली हो क्रिकेट के घमासान में फैसलेवाली अंतिम गेन्द&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;और निकल जाए प्राण टेलीविजन के&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;सूख जाए तारों में दौडता हुआ रक्त&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;तब आता है याद&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;कबाड में पडा बैटरी से चलनेवाला&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;पुराना रेडियो&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;याद आती है जैसे वर्षों पुरानी स्मृति&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;जब युवा पिता&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;इमरती से भरा दौना लिए&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;दफ्तर से घर लौटते थे।&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-1146920164290563199?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-10-08T21:09:39.186+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://2.bp.blogspot.com/-EtN1vpQJeSU/TpBYXFeLvWI/AAAAAAAAAHg/mxTDz7yZ4To/s72-c/Brajesh.jpg" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">3</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/10/blog-post_08.html</feedburner:origLink></item><item><title>पी.सी.चैटर्जी का एक दिलचस्‍प किस्‍सा: न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा, कड़ी 8</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/Lt-50mfVB5I/8.html</link><category>news room se shubhra sharma</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Wed, 05 Oct 2011 02:05:50 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-4041483632443906402</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;मशहूर समाचार वाचिका शुभ्रा शर्मा रेडियोनामा पर अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। पिछले कुछ हफ्तों से छुट्टियां मनाने गईं शुभ्रा जी अब फिर इस श्रृंखला को आगे बढ़ा रही हैं। आठवीं कड़ी में वो बातें कर रही हैं मशहूर प्रसारणकर्ता पी.सी.चैटर्जी की। आपको बता दें कि उनकी दो मशहूर पुस्‍तकें आई हैं। एक है broadcasting in india जो भारत में प्रसारण के इतिहास पर लिखी गयी एक बेहद सटीक और महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक है। उनकी दूसरी पुस्‍तक आत्‍मकथात्‍मक है The Adventure in Indian Broadcasting; A Philosopher's Autobiography. जिसका जिक्र शुभ्रा जी इस संस्‍मरण में कर रही हैं। ये पुस्‍तक आप &lt;/font&gt;&lt;a href="http://www.indianbooks.co.in/bookmart/index.php?dispatch=products.view&amp;amp;product_id=23266" target="_blank"&gt;&lt;font size="3"&gt;यहां&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;font size="3"&gt; से प्राप्‍त कर सकते हैं। शुभ्रा जी के बाक़ी लेख पढ़ने के लिए &lt;a href="http://radionamaa.blogspot.com/search/label/news%20room%20se%20shubhra%20sharma" target="_blank"&gt;चटका लगायें यहां।&lt;/a&gt;       &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;hr /&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;समाचार कक्ष से अपनी यादों की पिछली कड़ियाँ पढ़ रही थी,तो सोचा ऐसा क्यों हुआ कि वहां सिर्फ मेरी यादें हैं? क्या मुझसे पहले...बहुत पहले से.....समाचार तैयार नहीं होते थे, प्रसारित नहीं होते थे? कौन थे वह लोग जिन्होंने इस प्रसारण की शुरुआत की, इसके नियम-क़ायदे बनाये और एक अनवरत परम्परा की नींव रखी?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;समाचार सेवा प्रभाग के पुस्तकालय में जिस अलमारी में इस विषय की पुस्तकें रखी जाती थीं, उसे खोलने पर पाया कि देश की जनसंख्या की ही तरह वहां भी पुस्तकों की संख्या में अप्रत्याशित किन्तु अपार वृद्धि हुई है. हो सकता है कि मैं इसे प्रसारण के इतिहास के प्रति जागरूकता और सही दिशा में उठा क़दम मानकर खुश हो लेती मगर इस गुब्बारे से हवा निकल गयी, जब पता चला कि अधिकतर पुस्तकें ऐतिहासिक दस्तावेज़ न होकर मात्र पत्रकारिता के विविध संस्थानों की परीक्षा पास करने के उद्देश्य से जुटायी गयी हैं. लेकिन कहावत है न कि - &amp;quot;जिन खोजा तिन पाइया गहरे पानी पैठ&amp;quot; - सो मैं भी लगी रही....देर तक उस पोथी-समुद्र में डूबती-उतराती रही और आख़िरकार एक मोती ढूंढ लायी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक श्री पी सी चैटर्जी ने &lt;/font&gt;&lt;a href="http://www.cscsarchive.org:8081/MediaArchive/library.nsf/(docid)/5C6DC68D6DA7631E652570D100205BBD?OpenDocument&amp;amp;StartKey=adventure&amp;amp;Count=100" target="_blank"&gt;&lt;font size="3"&gt;एक आत्मकथात्मक पुस्तक&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;font size="3"&gt; लिखी थी .... यह तो मुझे मालूम था, लेकिन अपने करियर की शुरुआत उन्होंने समाचार कक्ष से की थी......यह ज्ञात नहीं था. बहरहाल मैंने वह पुस्तक इशु करायी और छुट्टियों के दौरान पढ़ने के लिए अपने साथ ले गयी. और फिर, जैसा कि आम तौर पर होता है, आने-जाने, मिलने-मिलाने और देखने-दिखाने के बीच पुस्तक पढ़ने का मौक़ा हाथ नहीं लगा. दिल्ली लौटने के बाद ही उसे पढ़ पायी. कुछ हिस्से बड़े रोचक लगे.....ख़ास तौर पर शुरुआती दौर के न्यूज़ रूम का वर्णन.... तो सोचा क्यों न उस समय की कुछ बातें रेडियोनामा के अपने पाठकों के साथ शेयर करूँ. &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;यह घटना १९४३ की है. चैटर्जी साहब के पिता लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ाते थे. बाद में वाइस प्रिंसिपल &lt;/font&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/-xemSRf5bo8U/TowdYRbc0qI/AAAAAAAAD1k/yIYxGXIKg6Q/s1600-h/img037%25255B4%25255D.jpg"&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;img title="img037" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="196" alt="img037" src="http://lh4.ggpht.com/-cYCdjDgeURY/TowdZAPftaI/AAAAAAAAD1o/niXj8LIQCtc/img037_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" width="246" align="right" border="0" /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;font size="3"&gt; और प्रिंसिपल भी बने. ख़ुद चटर्जी साहब ने भी वहीँ से दर्शन शास्त्र में एम ए किया था. वायु सेना के लिए चयन हो गया था लेकिन विमानों की कमी के कारण बुलावा नहीं आ रहा था. ख़ाली बैठे क्या करें....यही सोचते हुए दिल्ली में अपने एक मित्र तोतो गुप्ता को पत्र लिखा कि कोई नौकरी ध्यान में हो तो बताना. मित्र ने फ़ौरन जवाब दिया कि ऑल इंडिया रेडियो में भर्ती चल रही है. आवेदन भेज दो. चैटर्जी साहब को यह तक पता नहीं था कि किस पद के लिए भर्ती हो रही है....बस एक सादे काग़ज़ पर अपनी योग्यता लिखकर, एकाध प्रमाण-पत्रों के साथ डायरेक्टर न्यूज़ को भेज दी. जल्दी ही बुलावा भी आ गया और वे दिल्ली आ गये.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;दिल्ली में वे विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार राय बहादुर निशिकांत सेन के यहाँ ठहरे. रजिस्ट्रार के बंगले से अलीपुर रोड के एक बंगले से चल रहे ऑल इंडिया रेडियो तक का रास्ता साइकिल से नापते हुए जब वे न्यूज़ रूम में दाख़िल हुए तब उनके मित्र तोतो गुप्ता ने उन्हें सीनियर असिस्टेंट न्यूज़ एडिटर श्री ए एन भनोट से मिलवाया, जो डायरेक्टर के बाद दूसरे सबसे बड़े अधिकारी थे. श्री भनोट ने उनसे कहा कि इंतजार करें. डायरेक्टर श्री चार्ल्स बार्न्स उन्हें बुलाएँगे.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;चैटर्जी साहब शाम तक इंतजार करते रहे. पूरे दिन किसी ने उनसे कोई बात नहीं की. सभी लोग अपने काम में व्यस्त थे. संपादक आते-जाते रहे. स्टेनो को ख़बरें लिखवाते रहे. बुलेटिन प्रसारित होते रहे. आखिरकार शाम के करीब छः बजे श्री बार्न्स ने उन्हें बुलवा भेजा. चैटर्जी साहब ने लिखा है कि वे लगभग चालीस मिनट बार्न्स साहब के कमरे में रहे मगर उन्हें बैठने को नहीं कहा गया. बार्न्स साहब ने उन्हें वापस श्री भनोट के पास भेज दिया. भनोट जी ने उन्हें अलग-अलग दिन अलग-अलग शिफ्ट में ड्यूटी दी ताकि वे सभी शिफ्ट्स का कामकाज समझ सकें.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;चैटर्जी साहब ने लिखा है कि उन दिनों अंग्रेज़ी में चार महत्त्वपूर्ण बुलेटिन प्रसारित होते थे. सवेरे आठ बजे, दोपहर डेढ़ बजे, शाम छः बजे और रात नौ बजे. सवेरे और रात के बुलेटिन १५-१५ मिनट के होते थे और दिन तथा शाम के बुलेटिन १०-१० मिनट के. अंग्रेज़ी के बुलेटिनों के ठीक बाद हिन्दुस्तानी के बुलेटिन प्रसारित किये जाते थे. चैटर्जी साहब ने इस बात को ख़ास तौर पर रेखांकित किया है कि ये बुलेटिन हिंदी या उर्दू में न होकर हिन्दुस्तानी में होते थे, यानी उस भाषा में जो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को आसानी से समझ में आ सके. इसके बाद विभिन्न भारतीय भाषाओँ के १०-१० मिनट के बुलेटिन होते थे.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इन बुलेटिनों के संपादन का काम कुछ इस तरह बाँटा जाता था कि अंग्रेज़ी के लिए दो संपादक होते थे, जिनमें से एक ए एन ई और एक सब-एडिटर होता था. हिन्दुस्तानी के लिए ए एन ई या कोई अनुभवी सब होता था. भाषायी बुलेटिन दूसरे सब-एडिटर सँभालते थे. अंग्रेज़ी का बुलेटिन जैसे-जैसे बनता जाता था...उसकी कॉपी हिन्दुस्तानी और अन्य भाषायी एडिटरों के पास पहुँचती रहती थी. वही उनकी मास्टर कॉपी होती थी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;वैसे रॉयटर्स की ख़बरें टेलीप्रिंटर से आती रहती थीं और यू एन आई से भी दिन में ५-६ बार ख़बरों के टेक्स भेजे जाते थे. इनके अलावा लड़ाई की ख़बरों का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण स्रोत था बी बी सी. चैटर्जी साहब ने लिखा है कि बी बी सी से ख़बरें आती थीं, तब संपादक और स्टेनो हेडफ़ोन लगाकर बैठ जाते थे और यथाशक्ति, यथासंभव सभी समाचारों को नोट करने का प्रयास करते थे. अधिकारी उसी बुलेटिन को अच्छा समझते थे जो भाषा-शैली की दृष्टि से बी बी सी के सबसे निकट होता था.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;भनोट साहब ने उन्हें यह सब देखने और सीखने को कहा था. सो, काफी समय तक देखने के बाद चैटर्जी साहब ने ए एन ई से काम माँगा. बड़े मनोयोग से ख़बर की प्रसारण-योग्य कॉपी बनायी लेकिन देखा कि ए एन ई ने उसे एक तरफ फेंक दिया. बेचारे मन मसोस कर रह गये. क्या करते. लेकिन जल्दी ही उन्हें अपनी योग्यता साबित करने का मौक़ा मिला.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;तब तक ऑल इंडिया रेडियो का कार्यालय अलीपुर रोड से संसद मार्ग वाले प्रसारण भवन में स्थानांतरित हो गया था. इस वजह से काफी अव्यवस्था फैली हुई थी. उनके मित्र तो गुप्ता ने छुट्टी की अर्जी दी थी कि उनकी पत्नी किसी भी समय बच्चे को जन्म देने वाली थीं. लेकिन उनकी अर्जी कहीं इधर-उधर पड़ी रह गयी और उस पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. एक दिन सुबह ड्यूटी पर आने के बाद चैटर्जी साहब को पता लगा कि गुप्ता जी नहीं आएंगे और उन्हें सवेरे आठ बजे का बुलेटिन अकेले ही बनाना होगा. डायरेक्टर चार्ल्स बार्न्स पूरा बुलेटिन फोन पर पढ़वाकर सुनते थे. उस दिन भी सुना और प्रसारण की अनुमति दे दी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;कोई दस बजे भनोट साहब आये. चैटर्जी साहब ने उन्हें बताया कि गुप्ताजी नहीं आ सके. भनोट साहब का चेहरा फक्क पड़ गया. चिल्ला पड़े - तो फिर बुलेटिन किसने बनाया?&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;चैटर्जी साहब ने शांत भाव से कहा - मैंने.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;भनोट बिगड़े - मुझे ख़बर क्यों नहीं की? &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;चैटर्जी साहब ने कहा - चिंता की कोई बात नहीं है. मैंने बार्न्स साहब को पढ़कर सुना दिया था और उनकी मंज़ूरी ले ली थी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;इसके बाद दोनों अधिकारियों के बीच जो भी सलाह-मशविरा हुआ हो उसका तो पता नहीं, लेकिन उस दिन से चैटर्जी साहब को अकेले बुलेटिन की ज़िम्मेदारी सौंपी जाने लगी.&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;चैटर्जी साहब की पुस्तक में यह प्रसंग पढ़ने के बाद से मैं बराबर सोच रही हूँ कि १९४३ के न्यूज़रूम से आज २०११ के न्यूज़रूम तक क्या और कितना परिवर्तन हुआ है. यह तो स्पष्ट है कि बुलेटिनों की संख्या बढ़ी है, उनकी अवधि बढ़ी है, तकनीकी प्रगति के कारण अब हम दूर दराज़ के संवाददाताओं की आवाजें सीधे बुलेटिनों में शामिल कर पाते हैं. लेकिन क्या आज भी न्यूज़रूम में पहली बार प्रवेश करने वाला व्यक्ति अपने आप को डायरेक्टर चार्ल्स बार्न्स&amp;#160; के सामने खड़ा हुआ नहीं पाता, क्या उसके मेहनत से किये गये काम को उठाकर एक तरफ नहीं फेंक दिया जाता और सबसे बड़ी बात यह कि क्या कोई उसे धैर्य के साथ उसका काम समझाता है?&amp;#160;&amp;#160; &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font size="3"&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-4041483632443906402?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-10-05T14:35:50.712+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh4.ggpht.com/-cYCdjDgeURY/TowdZAPftaI/AAAAAAAAD1o/niXj8LIQCtc/s72-c/img037_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">1</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/10/8.html</feedburner:origLink></item><item><title>जन्मदिन मुबारक हो  विविध भारती</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/bR00q12Zqlw/blog-post.html</link><category>Happy Birth day Vividha Bharti</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Mon, 03 Oct 2011 01:13:04 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-5300638716576195918</guid><description>&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;आज विविध  भारती के जन्मदिवस विविध भारती और उनके सभी अनांऊसर्स और श्रोताओं को हार्दिक बधाई। इस अवसर पर पर हमने पाठकों और श्रोता बिरादरी  ग्रुप पर मित्रों से अनुरोध किया था कि वे अपनी रेडियो से जुड़ी यादें हमें भेजें। तो नेहा शर्मा जी, राजश्री शर्माजी और अखिलेन्द्र प्रताप जी यादव  ने अपनी यादें हमें लेख कर भेजी है तो हम सहर्ष उन्हें यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;Rajshree Sharma&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;रेडियो की बात करते ही बचपन की याद आ जाती है ,और बचपन के साथ बरसाती पानी सी हहराती यादें बादलों भरे आसमान में बिजली सी कौंध जाती हैं |ढेरों खट्टी मीठी ,चुलबुली यादें इस मन को वापस वहीं बाबुल के आँगन में खींच ले जाती है | पापा उस समय पचमढ़ी में पोस्टेड थे बेहतरीन ब्रिटिशकाल का बंगला मिला था | भाईजी सबसे बड़े थे और बेहद ज़हीन पर शरारती  | हम बहनों पर उनका बड़ा रूआब था | गाने सुनने के बेहद शौक़ीन | उन्होंने ही हम बहनों को रेडियो के चस्के के साथ उसकी तमीज़दारी से भी वाकिफ कराया | पापा के घर में ना होने परऊँचे सुर में गाने सुनने का  बड़ा शौक  |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;br /&gt;उस समय पचमढ़ी का मौसम काफी खुशनुमा हुआ करता था |स्कूलों की छुट्टियाँ भी भारी बरसात के कारण गर्मियों की नहीं बरसात की हुआ करती थी| ऐसे ही भारी बरसात के दिन माँ खाना बना रही थी ,पापा के ऑफिस में होने का फायदा जोर -२ सेरेदियो सुन कर उठाया जा रहा था| गाना बज रहा था "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम" हम दो छोटी बहने आगे कमरे में खिड्की की चौखट पर चढ़े हुए रेडियो के साथ खूब झूम झूम कर गुनगुना रहे थे पीछे के आँगन में बड़ी बहने झूले पर रेडियो के साथ सुर मिला रही थीं | माँ के एक बार मना करने पर मस्ती में हमने ध्यान नहीं दिया, और दुबारा माँ ने टोका तो भाईजी ने बढ़ावा दिया "गाओ गाओ  कितना अ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;च्छा गा रही हो" तारीफ से फूल कर हम दोनों ने बिना सुर लय ताल के चिल्ला -२ कर गाना शुरू कर दिया , फिर थोड़ी देर बाद  पीछे जब बहनों को डांट पड़ी तो भाईजी ने उनका हौसला भी ऐसे ही बढ़ाया| २-४ बार कहना नहीं सुनने पर सप्तम सुर में गाने वाली हम बहनों की जो खिचाई और धुलाई हुई उससे दरअसल में हमारे "नैन रिमझिम रिमझिम" बरसने लगे और भाईजी शरारतसे मुस्कुराने लगे | अब जब भी ये गीत कहीं बजता है तो  उन मासूम दिनों को याद करके आँखे भीग जाती हैं और ओठों पर मुस्कराहट आ जाती है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a style="color: rgb(51, 51, 255);" href="http://facebook.com/akhilendra.live"&gt;Akhilendra Pratap Singh&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;आज विविध  भारती ने अपने 54 साल पुरे कर लिए और  साथ ही साथ मेरी रेडियो भी इसकी  आधी उम्र यानि 27वें  साल के सफ़र में है. यह रेडियो 1984 में पापा को उनकी शादी में मिली थी. होश सभॉंलने से पहले पता नहीं घर कौन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;कितना रेडियो सुनता था  और न ही  ये पता करने की कोशिश की, लेकिन जब होश सभॅांला तो घर में आकाशवाणी और बीबीसी हिंदी की आवाजों को  सुनते पाया । पापा और चाचा जी को संगीत सुनने का  कोई खास लगाव नहीं है वे लोग मुख्यत समाचारों और परिचर्चाओं को ही सुना करते थे . शाम के समय अक्सर चाचा जी "युववाणी " सुना करते थे। शुरू-शुरू में इस कार्यक्रम  के गाने आकर्षित करने लगे ...थोड़ा बड़े हुए तो क्रिकेट का शौक बड़ा तो रेडियो पर क्रिकेट&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;कमेन्ट्री सुने जाने लगी...धीरे-धीरे  रेडियो प्रेम  बढने लगा. .तब आकाशवाणी वाराणसी और गोरखपुर खूब सुने जाते थे ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-Vkq6EI9DF7w/ToltuURQpPI/AAAAAAAAA_k/Lrx9ZPOVly4/s1600/akhil.JPG"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 242px; height: 181px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-Vkq6EI9DF7w/ToltuURQpPI/AAAAAAAAA_k/Lrx9ZPOVly4/s320/akhil.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5659175049250252018" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;एक दिन  शोर्ट वेब पर   बीबीसी हिंदी ट्यून  करते  समय एक आवाज़ सुनाई दी " मंथन है आपके विचारों का दर्पण " जिसे युनुस खान अपने चिर- परिचित जोशीले अंदाज़  में पेश कर रहे थे ...थोड़ी देर में ही पता चल गया की यही "देश की सुरीली  धड़कन  विविध भारती है.".. (इससे पहले विविध भारती के बारे में इतना सुना था की कि यह एक ऐसा रेडियो चैनल है जिस पर हरदम गाने बजते हैं  लेकिन कभी ट्युन करने का प्रयास नहीं किया था.)  फिर उस दिन से विविध भारती की आवाजें घर में गूँजने लगी....।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;कुछ ही दिनों में  ममता  सिंह , रेनू बंसल , निम्मी मिश्रा , कमलेश  पटक, लोकेन्द्र शर्मा ,कमल शर्मा, अशोक सोनावने , युनुस खान ,अमरकांत आदि सभी लोंगो की आवाजों ने  मुझे विविध भारती का दीवाना बना दिया.. मैं  और दीदी स्कूल से लौटकर पहले  सखी सहेली और पिटारा सुनते ।. और रात में समाचार सध्‍ंया के बाद  कहकशा , गुलदस्‍ता  छायागीत सुनते ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;सुबह में  त्रिवेणी , चित्रलोक , और आज के फनकार विशेष  रूप सुन जाते थे ...। इन सब कार्यक्रमों के मध्य युनुस खान के साथ  मंथन , जिज्ञासा , और यूथ एक्सप्रेस जैसे ज्ञानवर्धक  कार्यक्रम विविध भारती के लिए एक अलग पहचान&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;कायम किये. जिसमे मनोरंजन के साथ साथ ज्ञान भी खूब बटोरे गये .। लोकेन्द्र शर्मा  जी द्वारा  पिटारा में प्रस्तुत  किया जाने वाला कार्यक्रम " बाईस्कोप की बातें " की प्रंशसा के लिए कोई शब्द   ही नहीं है  मेरे पास ..।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हवामहल कभी कभार ही सुन पाने  को  मिलता क्योंकि ये  पढाई के  साथ -साथ बीबीसी हिंदी का भी वक्त होता  था ! गत वर्ष ही अमृतसर के डीएवी कालेज द्वारा आयोजित एक रेडियो वर्कशॉप  में  संदीप सर की मदद से मेरी मुलाक़ात युनुस खान जी और ममता दीदी  से हुई, और  इसी वर्ष फरवरी में जब मुंबई गया तो विविध भारती स्टूडियो भी गया,शनिवार का  दिन होने के  कारण सिर्फ ममता  दीदी से ही मुलाकात हो पाई ..उनके साथ  चित्रलोक  और समस के बहाने , वीबीएस के तराने दो कार्यक्रमों  लाइव देखा.  वाकई ये दोनों दिन मेरी जिन्दगी  के सबसे खुबसूरत हैं !!    &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;विविध&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भारती&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;इस&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; 54&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;वीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;जयंती&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;विविध&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;भारती&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सभी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;उद्घोषको&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;ढेर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सारी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;शुभकामनाएं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;रेडियो प्रेमी&lt;br /&gt;अखिलेन्द्र प्रताप यादव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;गृह-नगर - आजमगढ़&lt;br /&gt;(वर्तमान में लखनऊ में रहकर के पढाई  कर रह रहा हूँ  )&lt;br /&gt;मोबाइल&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; :-8127842382&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;e-mail- akhilendra44@gmail.com&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/profile/01342785247243151659"&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;नेहा शर्मा&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;मेरे सपनों की दुनिया- विविध भारती&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;मुझे याद भी नहीं कि कब से मैं विविध भारती सुनती चली आई हूँ..शायद बहुत छोटी थी तभी ये आदत लग गई थी...और जब से विविध भारती और उसके प्रोग्राम के नाम याद रहने लगे...तब से ही कुछ नाम भी जाने पहचाने लगने लगे...ऐसे ही जाने पहचाने दो नाम थे...कमल शर्मा और युनुस खान...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;शायद ये विविध भारती का प्यार ही था जो मुझे वोइसिंग की दुनिया से लगाव हुआ और मैं वोइस आर्टिस्ट भी बन गई..और १६ मई को मुझे एक सुनहरा मौका मिला...विविध भारती जाने का...बस सुबह से ही अपने सपनों की दुनिया में जाने की ख़ुशी संभाले नहीं संभल रही थी...मैं अपने बड़े&lt;/span&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-lN_Bu5GF1eA/Tolo0mEvX7I/AAAAAAAAA_c/XBdl-v-QvCE/s1600/Naha%2BSharma.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 165px; height: 165px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-lN_Bu5GF1eA/Tolo0mEvX7I/AAAAAAAAA_c/XBdl-v-QvCE/s320/Naha%2BSharma.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5659169659550654386" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt; भाई के साथ जाने वाली थी...उनकी पहचान युनुस भाई (हाँ...युनुस जी को अब तो इस नाम से पुकारा ही जा सकता है..) से इन्टरनेट पर हुई थी....घर से विविध भारती कुछ ४५ मिनट की दूरी पर है..जब घर से निकले तो रास्ते में ही हल्की बूंदाबांदी ने मानो मेरे सपने के सच होने की ख़ुशी में मेरे मन के भावों को बयां किया...ऑटो से हाथ बाहर निकालकर बूंदों को हाथ में लेकर मैंने भी ईश्वर का धन्यवाद किया...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;हम विविध भारती पहुंचे...युनुस भाई से पहली बार मिलकर भी कोई औपचारिकता की बातें नहीं हुईं वो कुछ इस तरह से मिले जैसे कोई पुराना दोस्त अचानक मिल जाता है और बस अपने दोस्त के ताज़ा हालचाल पूछ लेता है...कोई औपचारिकता नहीं...?...आश्चर्य तो हुआ...पर जब उनमे अपनी आवाज़ से लोगों को अपना बनाने की ताकत है तो फिर सामने बैठे व्यक्तियों की तो बात ही क्या...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;जब हम पहुंचे तब विविध भारती में एक प्रोग्राम लाइव चल रहा था...सखी सहेली...ये प्रोग्राम मेरा बहुत ही फेवरेट हुआ करता था...ऐसा लगता था मानो किसी सहेली से ही बातें हो रही हों..साथ ही इस पर चलने वाला पिटारा और हवा महल भी मेरे पसंदीदा कार्यक्रमों से एक हैं...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;खैर उनसे बातें चल ही रही थी की एक शख्स उनसे मिलने पहुंचे और युनुस भाई ने उनका परिचय करवाया कि, "ये कमल जी हैं..." कमलजी भी उन बातों में शामिल हो गए...हंसी- मज़ाक का कुछ ऐसा दौर चला कि ऐसा लगा ही नहीं की हम यहाँ पहली बार आये हैं और इन सभी से पहली बार मिले हैं....(वैसे रेडिओ के जरिये हम तो कई बार इनसे मिल चुके थे...)...कमल जी ने मेरा मार्गदर्शन भी किया कि मुझे विविध भारती के लिए किन- किन बातों पर ध्यान रखना चाहिए...उनसे बातें करके अच्छा लगा....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;वैसे सच कहूँ तो ज्यादातर बातें युनुस भाई, कमलजी और मेरे भाई आलोक भैया के बीच ही चल रही थी....मैं तो यहाँ भी एक श्रोता की भूमिका में ही थी....लेकिन सुनकर भी कितना कुछ सीखा जा सकता है ये बातें उस दिन मुझे समझ में आई....दरअसल जब बातें ही इतनी खुबसूरत चल रही हों तो उन्हें बीच में रोकना तो सब से बड़ा गुनाह है....और उनको देखकर कुछ ऐसा लग रहा था..जैसे वो कोई बिछड़े दोस्त हों और कई अरसों बाद मिल गए हों...और जितनी बातें एक-दूसरे से कर सकें...कर लेना चाहते हों...मुझे याद है कुछ २-३ घंटे हमने वहां बिताये...फिर भी लग रहा था जैसे अभी तो आये हैं...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style=";font-family:Arial Unicode MS;font-size:medium;"  &gt;वो दिन कुछ अनोखा था....एक तोहफे की तरह...जो मुझे अचानक से मिल गया था....इस तरह से कभी विविध भारती में जाकर युनुस भाई और कमल जी से मिलने का मौका मिलेगा...सोचा न था.... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.s4soch.blogspot.com/"&gt;नेहा शर्मा का ब्लॉग&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-5300638716576195918?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-10-03T13:43:04.841+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://1.bp.blogspot.com/-Vkq6EI9DF7w/ToltuURQpPI/AAAAAAAAA_k/Lrx9ZPOVly4/s72-c/akhil.JPG" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">10</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/10/blog-post.html</feedburner:origLink></item><item><title>बड़े भैया यानी श्री विजय बोस को जन्‍मदिन मुबारक</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/IGNTdH6EQ4s/blog-post_21.html</link><category>अग्रज पीढी</category><category>बड़े भैया</category><category>विजय बोस</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Wed, 21 Sep 2011 09:17:21 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-1276579889146347228</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;रेडियोनामा पर मैं एक अनियमित श्रृंखला प्रस्‍तुत कर रहा हूं जिसका नाम है अग्रज पीढी। इस श्रृंखला के अंतर्गत      &lt;br /&gt;रेडियो की दुनिया के दिग्‍गज व्‍यक्तित्‍वों को याद किया जाता है। उनसे बातें की जाती हैं।       &lt;br /&gt;आज का दिन इस मायने में ख़ास है कि आज अग्रज पीढी के एक जाने-माने रेडियोकर्मी का जन्‍मदिन है।       &lt;br /&gt;रेडियोनामा पर इनकी बातें पहले भी हुई हैं।       &lt;br /&gt;आकाशवाणी इलाहाबाद के 'बड़े भैया' के नाम से मशहूर श्री विजय बोस। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;रेडियो के उस दौर में जब तकनीकी सुविधाएं ज्‍यादा नहीं होती थीं, और इस सबके बावजूद रेडियो शीर्ष पर होता था, बडे भैया ने आकाशवाणी इलाहाबाद और शहर इलाहाबाद की सरहदों से परे सारे देश में नाम कमाया।      &lt;br /&gt;बच्‍चों के उनके कार्यक्रम बालसंघ के बारे में रेडियोनामा की &lt;a href="http://radionamaa.blogspot.com/2008/05/blog-post_208.html" target="_blank"&gt;एक पुरानी पोस्‍ट में&lt;/a&gt; बाक़ायदा चर्चा की जा चुकी है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt; &lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;   &lt;p&gt;     &lt;br /&gt;&lt;/p&gt;   &lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;इलाहाबाद में उनसे मिलने का सौभाग्‍य भी हुआ। सन 2009 में 24 अक्‍तूबर के दिन बड़े भैया के घर जब मैं,ममता और जादू (और डाकसाब) गए तो वहां रेडियो की पुरानी दुनिया की बहुत सारी बातें हुईं। ये वीडियो मेरे संग्रह में जाने कब से पड़ा था। &lt;a href="http://lh4.ggpht.com/-UlQy22OdsYo/TnoOConf-fI/AAAAAAAAD1U/_d-bI-zaoBY/s1600-h/IMG_4718%25255B6%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="IMG_4718" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-left: 0px; margin-right: auto; border-bottom: 0px" height="337" alt="IMG_4718" src="http://lh4.ggpht.com/-x4JSbeH5ZZc/TnoOD3-ivgI/AAAAAAAAD1Y/vkN1eWd2zRw/IMG_4718_thumb%25255B4%25255D.jpg?imgmax=800" width="446" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/font&gt;&lt;/font&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;लग ये रहा था कि इसे अच्‍छी तरह एडिट करके पेश किया जाए। यही नहीं हम चाहते थे कि इस बातचीत की इबारत भी दी जाए। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;पर फिलहाल बड़े भैया के जन्‍मदिन के उपलक्ष्‍य में प्रस्‍तुत है अनकट वीडियो। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;यहां रेडियो की दुनिया की शब्‍दावली इफरात में सुनाई पड़ेगी अगर दिक्‍कत आए तो पूछा जा सकता है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;भविष्‍य में इस बातचीत को शब्‍दांकित करके प्रस्‍तुत करने का वादा जरूर कर रहे हैं। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;तो हमारे साथ आप सभी बड़े भैया को 84 वर्ष पूरे करने पर बधाईयां दीजिए।      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;ये वीडियो दो हिस्‍सों में है। तकरीबन आठ आठ मिनिट की दो फाइलें। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;यानी कुल साढ़े सत्रह मिनिट के आसपास। बातचीत बेहद आत्‍मीय पारिवारिक और अनौपचारिक है। पर इसमें हैं रेडियो की दुनिया की अनमोल यादें।      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;पहला भाग।       &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt; &lt;iframe src="http://www.youtube.com/embed/Fg76iGgHh-c" frameborder="0" width="560" height="315" allowfullscreen="allowfullscreen"&gt;&lt;/iframe&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;दूसरा भाग      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;iframe src="http://www.youtube.com/embed/TPloutuaVcM" frameborder="0" width="560" height="315" allowfullscreen="allowfullscreen"&gt;&lt;/iframe&gt;    &lt;br /&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;बडे भैया के बारे में विकीपीडिया पर &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Vijay_Bose" target="_blank"&gt;यहां&lt;/a&gt; पढ़ें       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;और हाल ही में इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज की स्‍वर्ण जयंती के उत्‍सव पर बड़े भैया मंच पर उपस्थित हुए।      &lt;br /&gt;उसका वीडियो लिंक &lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=oHnC5I_CbOE" target="_blank"&gt;ये रहा&lt;/a&gt; ।&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;आपकी बधाईयां हम बड़े भैया तक ज़रूर पहुंचायेंगे। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-1276579889146347228?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-09-21T21:47:21.696+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh4.ggpht.com/-x4JSbeH5ZZc/TnoOD3-ivgI/AAAAAAAAD1Y/vkN1eWd2zRw/s72-c/IMG_4718_thumb%25255B4%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">6</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/09/blog-post_21.html</feedburner:origLink></item><item><title>रेडियो की दुनिया में कन्‍टेन्‍ट ही राजा है</title><link>http://feedproxy.google.com/~r/radionamaa/~3/tuCfLH5lzqs/blog-post_14.html</link><category>युनूस ख़ान</category><author>noreply@blogger.com (??????????)</author><pubDate>Wed, 14 Sep 2011 02:21:51 PDT</pubDate><guid isPermaLink="false">tag:blogger.com,1999:blog-3782548319482564737.post-3559382815842594388</guid><description>&lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;प्रिय मित्रो हर दूसरे बुधवार को मशहूर समाचार-वाचिका शुभ्रा जी अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। जिसका शीर्षक है 'न्‍यूज़रूम से शुभ्रा शर्मा'। अवकाश पर होने के कारण इस हफ्ते वे अपने आलेख के साथ नहीं आ पाईं। इसलिए उनकी जगह मेरा आलेख--जिसका संबंध रेडियो में कन्‍टेन्‍ट से है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&amp;#160; &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;रेडियो की दुनिया कमाल की है। जिन कार्यक्रमों को आप आधे-एक या दो घंटे में सुनकर याद रखते हैं या फिर भुला देते हैं, पसंद करते हैं या फिर नापसंद करते हैं उनके पीछे गहरी सोच, मंथन, तैयारियां, रिहर्सल और विचार छिपे होते हैं। पहले एक विचार तैयार किया जाता है। उसके बाद उस विचार को एक शक्‍ल, एक आलेख या स्क्रिप्‍ट का रूप दिया जाता है। और उसमें संगीत या गानों की जगह तय की जाती है। उसके बाद कार्यक्रम को प्रस्‍तुत किया जाता है। ज़रा सोचिए कि इतनी सारी मेहनत का अंजाम ज़रा-सी देर में मिल जाता है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;रेडियो के लिए कार्यक्रम निर्माण बहुत कुछ फिल्‍म-निर्माण की तरह है। जिस तरह फिल्‍मों के हिट होने का कोई तयशुदा फॉर्मूला नहीं&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/-y0BB_RjVx_E/TnByIVJa5VI/AAAAAAAAD1E/j89jEoFo6Zs/s1600-h/lucknow_31_08_2011_page11%25255B4%25255D.jpg"&gt;&lt;img title="lucknow_31_08_2011_page11" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="246" alt="lucknow_31_08_2011_page11" src="http://lh5.ggpht.com/-VefZTyZmB1s/TnByJUEv5bI/AAAAAAAAD1I/YiIVGP1vt1g/lucknow_31_08_2011_page11_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" width="159" align="right" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; होता उसी तरह रेडियो पर कौन-सा कार्यक्रम लोकप्रिय हो जाएगा, इसका पहले-से अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। लेकिन ये तय है कि अगर ठोस तैयारी और बेहतरीन विचार के साथ कार्यक्रम लेकर श्रोताओं से मुख़ातिब हों तो उसका असर ज़रूर होता है। आपको ये जानकर थोड़ी हैरत हो सकती है कि रेडियो कार्यक्रम के फॉर्मेट को तय करने में इस बात का ध्‍यान रखना ज़रूरी होता है कि उसका प्रसारण दिन के किस समय किया जाएगा। मान लीजिए कि कोई बहुत ही ‘लाउड’ और ‘उछाल-भरा’ कार्यक्रम तैयार करना है तो सुबह आठ-नौ बजे से लेकर शाम पांच बजे तक का वक्‍त इसके लिए ठीक माना जाता है पर ढलती शाम और रात के वक्‍त थोड़े रूमानी और हल्‍के-फुलके कार्यक्रम पसंद किये जाते हैं। पर ये बात रेखांकित करते चलें कि इसका कोई तैयार फॉर्मूला नहीं है। हमेशा इसके अपवाद मिल सकते हैं।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;रेडियो की सबसे बड़ी ताक़त होता है उसका कन्‍टेन्‍ट। जो ज्‍यादातर तो फिल्‍मी-गानों पर आधारित होता है पर बहुत बड़ा फर्क इस बात से पड़ता है कि फिल्‍मी गानों को आप पेश किस तरह से कर रहे हैं। यानी उसकी पैकेजिंग कैसी है। मैं बता रहा था कि कई बार टाइम-स्‍लॉट ग़लत होने के बावजूद कार्यक्रम हिट होते हैं। इसकी एक मिसाल था विविध-भारती का बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम ‘बाइस्‍कोप की बातें’। जिसे विविध-भारती के नामी प्रोड्यूसर लोकेंद्र शर्मा प्रस्‍तुत करते रहे। सन 1996 में ये कार्यक्रम वेराइटी शो पिटारा के तहत शुरू किया गया था। और विविध-भारती की कार्यक्रम-सारिणी ऐसी थी कि शाम चार बजे के सिवाय कोई गुंजाईश नहीं थी। ज़रा सोचिए कि अमूमन परिवार के घर पर रहने वाले सदस्‍यों का ये झपकी लेने का समय होता है। लेकिन इस कार्यक्रम की लोकप्रियता का असर ये था कि देश भर के हज़ारों लाखों शौक़ीन श्रोताओं ने अपने सोने के समय में तब्‍दीली कर दी थी। पिछले दिनों गुजरात के एक प्रशासनिक अधिकारी ने ये बताया कि इस कार्यक्रम को वो दफ्तर में सुन नहीं सकते थे। पर छोड़ भी नहीं सकते थे। ये उन दिनों की बात है जब मोबाइल पर एफ.एम.रेडियो का उतना चलन नहीं होता था। इसलिए इस कार्यक्रम के लिए वो या तो एक घंटे के लिए दफ्तर से ग़ायब होकर चाय की किसी गुमठी पर पाए जाते थे या फिर दफ्तर की छत पर, पार्किंग में या ऐसी किसी सहूलियत वाली जगह पर सुनते थे।       &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;मैंने अब तक जो मिसाल दी है उससे आप ये समझ सकते हैं कि कन्‍टेन्‍ट हमेशा राजा होता है। कन्‍टेन्‍ट सब चीज़ों से ऊपर है। और वही है जो रेडियो-चैनल के निर्माताओं की नैया को पार लगा सकता है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;&lt;a href="http://lh3.ggpht.com/--K898-mJzUE/TnByKZaRnqI/AAAAAAAAD1M/5U8T61jzdmI/s1600-h/g0601845%25255B4%25255D.gif"&gt;&lt;img title="g0601845" style="border-right: 0px; border-top: 0px; display: inline; margin-left: 0px; border-left: 0px; margin-right: 0px; border-bottom: 0px" height="246" alt="g0601845" src="http://lh6.ggpht.com/-jcdpMy-nt40/TnByLV00ClI/AAAAAAAAD1Q/HeHpJoaeU7E/g0601845_thumb%25255B2%25255D.gif?imgmax=800" width="238" align="left" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; रेडियो की दुनिया में आने के लिए लालायित नौजवानों के मन में अकसर यही सवाल उठता है कि वो कौन सी शैली अपनाएं। कैसे बोलें। कैसे लिखें। कैसे कार्यक्रम करें वो सुनने वालों का मन मोह ले और उनकी लोकप्रियता को शिखर पर पहुंचा दे। ऐसे में युवा और कम अनुभवी प्रस्‍तुतकर्ता अकसर एक बड़ी ग़लती करते हैं। अपने कार्यक्रम को बड़े ताम-झाम के साथ तैयार करने की ग़लती। ढेर सारे म्‍यूजिक-इफेक्‍ट। बहुत सारी बातें और जानकारियां। और खू़ब लटके-झटके के साथ बोलना। उसके बाद जब कार्यक्रम चल नहीं पाता तो वो निराश भी होते हैं। दरअसल इसकी एक ही वजह है। ज़रूरत से ज्‍यादा सजावट और स्‍टाइलिंग कहीं ना कहीं श्रोताओं को आपसे दूर करती है। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;हमें ये समझ लेना ज़रूरी है कि रेडियो सुनने वालों में बहुत कम ऐसे लोग होते हैं, जो पूरी तन्‍मयता के साथ इसे सुनते हैं। ज्‍यादातर श्रोता अपनी जिंदगी के कुछ ज़रूरी काम कर रहे होते हैं और रेडियो उनकी जिंदगी का बैक-ग्राउंड म्‍यूजिक या पार्श्‍व-संगीत होता है। और वो इस पर तभी ध्‍यान देते हैं जब उन्‍हें कोई जानकारी अपने काम की लगती है। तब हो सकता है कि वो काम बंद कर दें और रेडियो की आवाज़ ऊंची कर दें। ज्‍यादा ‘लाउड’ तरीक़े से पेश किये गये कार्यक्रमों को इसलिए श्रोता अमूमन नकार देते हैं क्‍योंकि वो उनके सुकून को और उनके सोचने या मंथन करने की प्रक्रिया में अड़चन बन जाते हैं। रेडियो बहुधा मनोरंजन के लिए, तनाव दूर करने के लिए सुना जाता है। ज़ाहिर है कि अगर कोई कार्यक्रम तंग करे या आपके सुकून पर ग्रहण लगाए तो फौरन चैनल बदल दिया जाता है। आज का सच ये है कि श्रोताओं के पास बहुत विकल्‍प हैं। पर फिर भी वो विकल्‍पहीनता के दौर से गुज़र रहे हैं। इसकी वजह ये है कि जो विकल्‍प हैं वो अकसर काम के साबित नहीं होते। &lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;font face="Arial Unicode MS" size="3"&gt;फिर भी सुबह शाम पुराने गानों के सुनने के ख्‍वाहिशमंद श्रोताओं की तादाद कभी भी कम नहीं रहती। नए गानों का वक्‍त देर सुबह या फिर देर दोपहर को माना जाता है। आज के ज़माने में चूंकि बहुत सारे लोग सड़क पर सफ़र करते हुए अपनी गाड़ी या सार्वजनिक परिवहन में रेडियो सुन रहे होते हैं, इसलिए उनके लिए ये अपनी बोरियत को दूर करने का ज़रिया है। मजबूरी में वो हर तरह के गीत सुन सकते हैं। पर अगर रेडियो-प्रस्‍तुतकर्ता उनके साथ गानों को लेकर जुल्‍म करें तो वो अपनी मन की वादियों में गुम होना ज्‍यादा पसंद करेगा। आगे जब भी कभी मुलाकात होगी तो आपको बतायेंगे कि रेडियो की दुनिया में किस तरह अच्‍छी आवाज़ एक गुण होती है। पर वो एकमात्र गुण नहीं होती।      &lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;u&gt;(लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश में 31 अगस्‍त को प्रकाशित) &lt;/u&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;रेडियोनामा आपका ब्लॉग है । आप भी इस पर लिखना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें ।
radionama@gmail.com&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3782548319482564737-3559382815842594388?l=radionamaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><app:edited xmlns:app="http://www.w3.org/2007/app">2011-09-14T14:51:51.478+05:30</app:edited><media:thumbnail url="http://lh5.ggpht.com/-VefZTyZmB1s/TnByJUEv5bI/AAAAAAAAD1I/YiIVGP1vt1g/s72-c/lucknow_31_08_2011_page11_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800" height="72" width="72" /><thr:total xmlns:thr="http://purl.org/syndication/thread/1.0">7</thr:total><feedburner:origLink>http://radionamaa.blogspot.com/2011/09/blog-post_14.html</feedburner:origLink></item><media:credit role="author">??????????</media:credit><media:rating>nonadult</media:rating><media:description type="plain">????? ?????? ??...????? ????</media:description></channel></rss>
